श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — तृतीय अध्याय, चतुर्थ पाद

52 मूल पद्य 49 संस्करणसे मिलाये गये

ये सूत्र वेदान्त दर्शन के अंतर्गत यज्ञ और वैदिक कर्मकांड की प्रासंगिकता तथा उनके पुरुषार्थ संबंधी विवेचन पर आधारित हैं। इनमें शास्त्र द्वारा बताए गए विधि-विधानों, अनुष्ठानों और उनके फल की प्राप्ति के क्रम को तार्किक रूप से स्पष्ट किया गया है। पाठक को यहाँ यह समझ प्राप्त होगी कि वेद केवल उपदेश मात्र नहीं हैं, बल्कि वे कर्म और ज्ञान के बीच किस प्रकार सेतु का कार्य करते हैं।

पुरुषार्थाधिकरणम्

3.4.1 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १

सूत्र ३.४.१

पुरुषार्थो ऽतः शब्दाद् इति बादरायणः ॥ ३.४.१ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 779

पदच्छेद — पुरुषार्थ :, अतः , शब्दात् , इति , बादरायणः

सूत्रार्थ — ( बादरायणः ) बादरायण आचार्यका मत है कि ( अतः ) इसी ओपनिषद् आत्मज्ञानसे ( पुरुषार्थः ) मोक्षरूप पुरुषार्थं सिद्ध होता है, ( शब्दात् ) क्योंकि ' तरति शोकमात्मवित् ' इस प्रकारकी श्रुति है।

शाङ्करभाष्य

पुरुषार्थोऽत इति। अस्माद्वेदान्तविहितादात्मज्ञानात् स्वतन्त्रात् पुरुषार्थः सिध्यतीति बादरायण आचार्यो मन्यते कुत एतदवगम्यते शब्दादित्याह।

तथा हि तरति शोकमात्मवित् स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ब्रह्मविदाप्नोति परम् आचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये य आत्मापहतपाप्मा इत्युपक्रम्य स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानाति इति आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः इत्युपक्रम्य एतावदरे खल्वमृतत्वम् इति एवंजातीयका श्रुतिः केवलाया विद्यायाः पुरुषार्थहेतुत्वं श्रावयति।। शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्व् इति जैमिनिः ।

कर्तृत्वेन आत्मनः कर्मशेषत्वात् तद्विज्ञानमपि व्रीहिप्रोक्षणादिवत् विषयद्वारेण कर्मसंबन्ध्येव इत्यतः तस्मिन् अवगतप्रयोजने आत्मज्ञाने या फलश्रुतिः सा अर्थवादः इति जैमिनिराचार्यो मन्यते। यथा अन्येषु द्रव्यसंस्कारकर्मसु यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं श्रृणोति यदाङ्क्ते चक्षुरेव भ्रातृव्यस्य वृङ्क्ते यत्प्रयाजानूयाजा इज्यन्ते वर्म वा एतद्यज्ञस्य क्रियते वर्म यजमानाय भ्रातृव्याभिभूत्यै इत्येवंजातीयका फलश्रुतिः अर्थवादः तद्वत्।

कथं पुनः अस्य अनारभ्याधीतस्य आत्मज्ञानस्य प्रकरणादीनामन्यतमेनापि हेतुना विना क्रतुप्रवेश आशङ्क्यते कर्तृद्वारेण वाक्यात् तद्विज्ञानस्य क्रतुसंबन्ध इति चेत् न वाक्याद्विनियोगानुपपत्तेः अव्यभिचारिणा हि केनचिद्द्वारेण अनारभ्याधीतानामपि वाक्यनिमित्तः क्रतुसंबन्धोऽवकल्पते कर्ता तु व्यभिचारि द्वारम् लौकिकवैदिककर्मसाधारण्यात् तस्मान्न तद्द्वारेण आत्मज्ञानस्य क्रतुसंबन्धसिद्धिरिति न व्यतिरेकविज्ञानस्य वैदिकेभ्यः कर्मभ्योऽन्यत्र अनुपयोगात् न हि देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानं लौकिकेषु कर्मसु उपयुज्यते सर्वथा दृष्टार्थप्रवृत्त्युपपत्तेः वैदिकेषु तु देहपातोत्तरकालफलेषु देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानमन्तरेण प्रवृत्तिः नोपपद्यत इति उपयुज्यते व्यतिरेकविज्ञानम्।

ननु अपहतपाप्मत्वादिविशेषणात् असंसार्यात्मविषयम् औपनिषदं दर्शनं न प्रवृत्त्यङ्गं स्यात् न प्रियादिसंसूचितस्य संसारिण एव आत्मनो द्रष्टव्यत्वोपदेशात् अपहतपाप्मत्वादि विशेषणं तु स्तुत्यर्थं भविष्यति। ननु तत्र तत्र प्रसाधितमेतत् अधिकमसंसारि ब्रह्म जगत्कारणम् तदेव च संसारिण आत्मनः पारमार्थिकं स्वरूपम् उपनिषत्सु उपदिश्यत इति सत्यं प्रसाधितम् तस्यैव तु स्थूणानिखननवत् फलद्वारेण आक्षेपसमाधाने क्रियेते दार्ढ्याय।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसके अनन्तर औपनिषद् आत्मज्ञान अधिकारी पुरुष द्वारा क्या कर्ममें ही अनुप्रवेश करता है अथवा स्वतन्त्र ही पुरुषार्थका साधन है? अब ऐसा विचार करते हुए सूत्रकार प्रथम सिद्धान्तसे ही ' पुरुषार्थोऽतः ' इस प्रकारसे उपक्रम करते हैं। बादरायण आचार्य ऐसा मानते हैं कि इस वेदान्त विहित स्वतन्त्र आत्मज्ञानसे पुरुषार्थ सिद्ध होता है। यह कैसे अवगत हो? श्रुतिसे, ऐसा कहते हैं।

जैसे कि ' तरति शोकमात्मवित् ' ( आत्मवेत्ता शोकका अतिक्रमण करता है ) ' स यो ह व ० ' ( जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है ) ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' ( ब्रह्मज्ञानी परब्रह्मको प्राप्त होता है ) ' आचार्यवान् ० ' ( आचार्यवान् पुरुष ही सत्को जानता है, उसके लिए मोक्ष होनेमें उतना ही विलम्ब है जब तक वह देह बंधन से मुक्त नहीं होता।

उसके पश्चात् तो वह सत्सम्पन्न - ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ) ' य आत्मापहतपाप्मा ' ( जो आत्मा पप शून्य है ) ऐसा उपक्रम कर ' स सर्वांश्च ० ' ( जो उस आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार अन्वेषणकर जान लेता है, वह सम्पूर्ण लोकों और समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है ) ' आत्मा वा ० ' ( हे मैत्रेयी! आत्माका दर्शन करना चाहिए ) ऐसा आरम्भकर ' एतावदरे ० ' ( अरे मैत्रेयी!

इतना ही अमृतत्त्वका उपदेश है ) इसप्रकारको श्रुतियाँ केवल विद्या ( आत्मज्ञान ) को पुरुषार्थहेतुत्व श्रवण कराती हैं॥ १

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपाद में पर और अपरविद्याके गुणों का उपसंहार कहकर स्वरूपका निश्चय किया गया है। अब इस पादमें कर्मानपेक्ष उन विद्याओं में पुरुषार्थ हेतुत्व निरूपण करनेके लिए उसके यज्ञादि बहिरङ्ग और शम आदि अन्तरङ्ग साघनोंका निरूपण किया जाता है। इस प्रकार एक विद्याविषयत्वसंगतिसे यह चतुर्थपाद आरम्भ किया जाता है। गत पादके अन्तिम अधिकरणमें कर्मके अङ्गभूत विद्याका विचार किया गया है। अब उसके प्रसंगसे ब्रह्मज्ञान कर्मका अङ्ग है, ऐसी बाशङ्का कर उसका समाधान करते हैं। इसप्रकार प्रसंग संगति से इस अधिकरणको कहते हैं। पूर्वपक्षमें ज्ञान और कर्मका अङ्गाङ्गिभावसे समुच्चय है, सिद्धान्त में केवल ब्रह्मात्मैक्यज्ञानसे मोक्ष है। ' य आत्मापहतपाप्मा ' इसप्रकार प्रजापतिसे उपदिष्ट ब्रह्मविद्या में सगुणविद्या के फलरूप समस्त लोक आदिकी प्राप्तिका कथन इसलिए किया गया है कि मोक्षानन्दन में इन सबसे प्राप्त होनेवाले आनन्दका अन्तर्भाव है। इसलिए किसी प्रकार की शङ्काका अवसर नहीं है॥१

3.4.2 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २

सूत्र ३.४.२

शेषत्वात्पुरुषार्थवादी यथाऽन्येष्विति जैमिनिः ॥ ३.४.२ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 780

पदच्छेद — शेषत्वात् पुरुषार्थवाद :, यथा , अन्येषु इति , जैमिनिः

सूत्रार्थ — ( शेषत्वात् ) कर्तृरूपसे आत्मा कर्मका अङ्ग है, अतः उसका ज्ञान भी व्रीहि प्रोक्षण आदिके समान कर्मके अङ्गभूत आत्माद्वारा क्रतुका अङ्ग है। ( यथा ) जैसे ( अन्येषु ) अन्य द्रव्य संस्कार कर्मोंमें अपाप आदि फल श्रुति अर्थवाद है, वैसे ( पुरुषार्थवादः ) ज्ञानसे पुरुषार्थं श्रुति मी अर्थवाद है, ( जैमिनिः ) यह आचार्य जैमिनिका मत

शाङ्करभाष्य

अथात्र प्रत्यवतिष्ठते-

* कर्तृत्वेनात्मनः कर्मशेषत्वात्तद्विज्ञानमपि वीहिप्रोक्षणादिवद्विषयद्वारेण कर्मराचार्यो मन्यते, यथाऽन्येषु द्रव्यसंस्कारकर्मसु ' यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पाप श्लोक शृणोति। यदङ्क्ते चक्षुरेष भ्रातृव्यस्य वृङ्क्ते। यत्प्रयाजानुयाजा इज्यन्ते वर्मं वा एतद्यज्ञस्य क्रियते जर्म यजमानस्य भ्रातृव्याभिभूत्यै ' इत्येवंजातीयका फलश्रुतिरर्थवादः, तद्वत्। कथं पुनरस्यानारभ्यांघीतस्यात्मज्ञानस्य प्रकरणादीनामन्यतमेनापि हेतुना विना क्रतुप्रवेश आशङ्कयते? कर्तृद्वारेण वाक्यात्तद्विज्ञानस्य ऋतुसंबन्ध इति चेत् न, वाक्याद्विनियोगानुपपत्तेः। अस्यभिचारिणा हि केन चिद्वारेणानारभ्याधीतानामपि वाक्यनिमित्तः क्रतुसंबन्धोऽवकल्पते। कर्ता तु व्यभिचारि द्वारम्, लौकिकवैदिककर्मसाधारण्यात्। तस्मान्न तद्वारेणात्मज्ञानस्य कतुसंबन्धसिद्धिरिति न व्यतिरेकविज्ञानस्य वैदिकेभ्यः कर्मभ्योऽन्यत्रानुपयोगात्। नहि देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानं लौकिकेषु कर्मसूपयुज्यते, सर्वथा दृष्टार्थप्रवृ युपपत्तेः। वैदिकेषु तु देहपातोत्तरकालफलेषु देहव्यतिरिक्तात्मज्ञानमन्तरेण प्रवृत्तिर्नोपपद्यत इत्युपयुज्यते व्यतिरेकविज्ञानम्। नन्वपहतपाप्मत्वादिविशेषणादसंसार्यात्म-

I ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४ विषयमौपनिषदं दर्शनं न प्रवृत्त्यङ्गं स्यात्, न, प्रियादिसंसूचितस्य संसारिण एवात्मनो द्रष्टव्यत्वेनोपदेशात्। अपहतपाप्मत्वादि विशेषणं तु स्तुत्यर्थं भविष्यति। ननु तत्र तत्र प्रसाधितमेतदधिकमसंसारि ब्रह्म जगत्कारणं तदेव च संसारिण आत्मनः पारमार्थिक स्वरूपमुपनिषत्सूपदिश्यत इति। सत्यं प्रसाधितम्, तस्यैव तु स्थूणानिखननवत्फलद्वारेणाक्षेप समाधाने क्रियेते दायय॥ २

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अब उक्त सिद्धान्तपर पूर्वपक्षी शङ्का करते हैंसंबन्ध्येवेत्यतस्तस्मिन्नवगतप्रयोजने आत्मज्ञाने या फलश्रुतिः साऽर्थवाद इति जैमिनि-

कर्तृरूपसे आत्मा कर्मका अङ्ग है, अतः उसका ज्ञान मी व्रीहि प्रोक्षण आदिके समान विषयआत्माद्वारा कर्म सम्बन्धी ही है, इससे उस कर्मका प्रयोजन अवगत होनेपर आत्मज्ञानमें जो फल श्रुति है वह अर्थवाद है, ऐसा जैमिनि बाचायं मानते हैं।

जैसे अन्य द्रव्य संस्कार कर्मों में ' यस्य पर्णमयी ० ' ( जिसका पर्णमयी जुहू होता है वह पाप वचनका श्रवण नहीं करता वह जो अपने नेत्रोंमें अञ्जन लगाता है, उससे शत्रुके नेत्रोंका नाश करता है, जो प्रयाज और अनुयाज किये जाते हैं, वे यज्ञ कवच किये जाते हैं, शत्रुके अभिभव के लिए वे यजमानके कवच होते हैं ) इस प्रकारकी फलश्रुति अर्थवाद है, वैसे ही आत्मज्ञानमें फल श्रुति अर्थवाद है।

परन्तु यज्ञके प्रकरण में अनधीत आत्मज्ञानके प्रकरण आदिमें से किसी एक हेतुके विना भी क्रतु प्रवेशकी आशङ्का किस प्रकार की जाती है? यदि कहो कि कर्ताद्वारा वाक्यसे उसके विज्ञानका क्रतुके साथ सम्बन्ध है, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि वाक्यसे विनियोग नहीं हो सकता। किसी एक अव्यभिचारी - नित्यसम्बद्ध क्रतुके द्वारसे अप्रकरणमें पठितों का भी वाक्य निमित्तक क्रतु सम्बन्ध हो सकता है।

परन्तु कर्ता तो लौकिक और वैदिक कर्मोंमें साधारण होने से व्यभिचारी द्वार है, इसलिए उसके द्वारा आत्मज्ञानका क्रतुके साथ सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता। यह ठीक नहीं है, क्योंकि देहसे अतिरिक्त आत्मा है इस ज्ञानका वैदिक कर्म से अन्यत्र उपयोग नहीं है। देहसे अतिरिक्त आत्मज्ञानका लौकिक कर्मोंमें उपयोग नहीं होता, क्योंकि सर्वथा देहसे व्यतिरिक्त आत्मज्ञान हो चाहे न हो तो भी प्रत्यक्ष प्रयोजनवाले कर्मों में प्रवृत्ति हो सकती है।

परन्तु देहपातके अनन्तर फलदेनेवाले वैदिक कर्मोंमें देह व्यतिरिक्त आत्मज्ञानके विना प्रवृत्ति उपपन्न नहीं होती। इसलिए मरणानन्तर फल देनेवाले वैदिक कर्मोंमें देह व्यतिरिक्त आत्मा है, इस ज्ञानका उपयोग है। परन्तु ' अपहतपाप्मत्व ' आदि विशेषणोंसे असंसारी आत्मविषयक औपनिषद् ज्ञान वैदिक कर्ममें प्रवृत्तिका अङ्ग नहीं होगा। ऐसा नहीं, क्योंकि प्रिय आदिसे संसूचित संसारी आत्मा का ही द्रष्टव्यरूपसे उपदेश है। अपहतपाप्मत्व आदि विशेषण तो स्तुति के लिए होगा।

परन्तु जीवसे भिन्न असंसारी ब्रह्म जगत्का कारण है और वही संसारी आत्माका पारमार्थिक स्वरूप है, ऐसा उपनिषदों में उपदेश किया जाता है यह तत् तत् स्थलमें भली - भाँति सिद्ध किया गया है। हाँ, ठोक मली - भाँति सिद्ध किया गया है। किन्तु स्थूणानिखनन के समान फलद्वारा उसकी ही दृढताके लिए आक्षेप और समाधान किये जाते हैं॥ २

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सूत्रमें अर्थवाद पदकी आवृत्ति करनी चाहिए अर्थात् ज्ञानसे पुरुषार्थंवाद अर्थवाद है। ' ब्रह्मविद्ब्रह्मव भवति ' इत्यादि मोक्ष प्रतिपादक श्रुतियाँ अर्थवादमात्र हैं। और कर्मरूप अङ्गीके फलका ज्ञान होनेचे अङ्गभूत आत्माका प्रयोजन भी ज्ञात है, अतः आत्माके आश्रय उसके संस्कारभूत ज्ञानमें फलश्रुति अर्थवाद है। जैसे ' पर्णमयी ' ( पलाश ) यह द्रव्य है, यजमानका अञ्जन संस्कार है और प्रयाज आदि कर्म हैं, इनमें क्रमशः फलश्रुति अर्थवाद है।

जैसे प्रोक्षण आदिले संस्कृत व्रीहि आदि कर्मके अङ्ग हैं, वैसे उपनिषद् प्रतिपादित आत्मज्ञानसे संस्कृत कर्ता मैं पारलौकिक फलोपलभोगके योग्य हूँ, ऐसा विद्वान्, श्रद्धावान् क्रतुका अङ्ग है, अतः कर्ताद्वारा आत्मज्ञान भी कर्मका अङ्ग है।

सिं ० ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि वाक्यमात्र से आत्मज्ञानका क्रतुके साथ सम्बन्ध अनुपपन्न है, क्योंकि ' यस्य पर्णमयी ' इस वाक्यके पर्णमयीत्वका जुहूद्वारा क्रतुके साथ जो सम्बन्ध कहा गया है, वह अव्यभिचारी है | परन्तु यहाँ तो कर्ता सब कर्मोंमें साधारण होनेसे व्यभिचारी है, इसलिए व्यभिचारी कर्ताद्वारा आत्मज्ञानमें क्रतु सम्बन्ध सिद्ध नहीं हो सकता। पूर्वपक्षी ' न, व्यतिरेकविज्ञानस्य ' इत्यादिसे कहते हैं।

* वेदान्तमत में जो स्वरूपज्ञान है वह क्रत्वर्थ है अथवा पुरुषार्थं है, इसप्रकार विचारसे ही क्रत्वर्थव दृढ हो सकता है, अतः कर्ता आत्माद्वारा आत्मज्ञान क्रतुका अङ्ग है।। २

3.4.3 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३

सूत्र ३.४.३

आचारदर्शनात् ॥ ३.४.३ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 782

सूत्रार्थ — ' जनको ह वैदेहो ' इसप्रकार जनक आदि ब्रह्मज्ञानियोंका विद्याके साथ कर्मका आचरण देखा जाता है, अतः आत्मज्ञान कर्मका अङ्ग है।

शाङ्करभाष्य

जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि इत्येवमादीनि ब्रह्मविदामपि अन्यपरेषु वाक्येषु कर्मसंबन्धदर्शनानि भवन्ति। तथा उद्दालकादीनामपि पुत्रानुशासनादिदर्शनात् गार्हस्थ्यसंबन्धोऽवगम्यते। केवलाच्चेत् ज्ञानात् पुरुषार्थसिद्धिः स्यात् किमर्थम् अनेकायाससमन्वितानि कर्माणि ते कुर्युः अत्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत् इति न्यायात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' जनको ह वैदेहो ० ' ( विदेह देश अधिपति राजा जनकने बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा यजन किया ) ' यक्ष्यमाणो बै ० ' ( हे पूज्य ऋषि वृन्द! मैं मी यज्ञ करनेवाला हूँ ) इत्यादि विद्या विधिपरक वाक्योंमें भी ब्रह्मवेत्ताओं के कर्म सम्बन्ध दर्शन होते हैं। उसीप्रकार उद्दालक आदिका भी पुत्र उपदेश आदि दर्शनसे गार्हस्थ्य सम्बन्ध अवगत होता है। यदि केवल ज्ञानसे ही पुरुषार्थंकी सिद्धि हो तो वे विद्वान् अनेक प्रकारके आयास युक्त कर्म क्यों करें, क्योंकि ' अक्के चेन्मधु ० ' ( यदि समीपमें - घरके कोने अथवा आक्कके छोटे पोदेमें मधु मिले तो मधु अभिलाषी पर्वतमें क्यों जाय ) ऐसा न्याय है॥३

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.4 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४

सूत्र ३.४.४

तच्छ्रुतेः ॥ ३.४.४ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 782

सूत्रार्थ — ' यदेव विद्यया करोति ' इत्यादि तृतीया श्रुतिसे विद्यामें कर्माङ्गत्व श्रवण होनेसे ज्ञान कर्माङ्ग प्रतीत होता है।

शाङ्करभाष्य

यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति इति च कर्मशेषत्वश्रवणात् विद्याया न केवलायाः पुरुषार्थहेतुत्वम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' यदेव विद्यया ० ' ( जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त होकर किया जाता है वही कर्म

समुच्चय देखा जाता है, इससे मी

सूत्रार्थं - ' तं विद्याकर्मणी ' इत्यादिसे विद्या और कर्मका विद्या कर्मका अङ्ग है। वीर्यवत्तर होता है अर्थात् अविद्वान्से किये गये कर्मसे अधिक फलवाला होता है ) इसप्रकार कर्मके अङ्गरूपसे विद्याका श्रवण होनेसे केवल - कर्मरहित विद्या मोक्षका हेतु नहीं है॥ ४

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.5 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ५

सूत्र ३.४.५

समन्वारम्भणात् ॥ ३.४.५ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 783

शाङ्करभाष्य

तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते इति च विद्याकर्मणोः फलारम्भे साहित्यदर्शनात् न स्वातन्त्र्यं विद्यायाः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' तं विद्याकर्मणी ० ' ( मरणानन्तर परलोकमें जानेवालेके पीछे पीछे फलोत्पादनके लिए विद्या और कर्म जाते हैं ) इसप्रकार विद्या और कर्ममें फलके आरम्भ में सहकारित्व देखनेसे ज्ञात होता है कि विद्या स्वतन्त्र नहीं है।। ५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.6 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ६

सूत्र ३.४.६

तद्वतो विधानात् ॥ ३.४.६ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 783

पदच्छेद — तद्वता , विधानात्

सूत्रार्थ — ( तद्वतः ) ' आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य ' इत्यादि श्रुति से समस्त वेदार्थं जाननेवालेके लिए ( विधानात् ) कर्मका विधान किया जाता है, इससे भी विद्या कर्मका अङ्ग है।

शाङ्करभाष्य

आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानः इति च एवंजातीयका श्रुतिः समस्तवेदार्थविज्ञानवतः कर्माधिकारं दर्शयति तस्मादपि न विज्ञानस्य स्वातन्त्र्येण फलहेतुत्वम्। ननु अत्र अधीत्य इत्यध्ययनमात्रं वेदस्य श्रूयते न अर्थविज्ञानम् नैष दोषः दृष्टार्थत्वात् वेदाध्ययनम् अर्थावबोधपर्यन्तमिति स्थितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य ० ' ( नियमानुसार गुरुके कर्तव्य कर्मोंको समाप्त कर वेदका अध्ययन कर आचार्यकुलसे समावर्तनकर कुटम्बमें स्थित हो पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ ) इसप्रकारकी श्रुति समस्त वेदार्थ जाननेवालेका कर्ममें अधिकार दिखलाती है। इससे भी आत्मज्ञान स्वतन्त्ररूपसे फलका हेतु नहीं है। परन्तु यहाँ श्रुतिमें ' अधीत्य ' ( अध्ययनकर ) इसप्रकार वेदका अध्ययन मात्र सुना जाता है अर्थ विज्ञान नहीं। यह दोष नहीं है, वेदाध्ययनके दृष्टार्थं होनेसे वेदका अध्ययन अर्थज्ञान पर्यन्त है, ऐसा सिद्ध है॥ ६

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.7 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ७

सूत्र ३.४.७

नियमाच्च ॥ ३.४.७ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 783

पदच्छेद — नियमात् च

सूत्रार्थ — और ' कुर्वन्नेवेह ' इत्यादि श्रुतिसे जीवन पर्यन्त कर्माचरणका नियम होनेसे भी ज्ञान कर्मका अङ्ग है।

शाङ्करभाष्य

' कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ' ( ईशा ० २ ) इति, तथा ' एतद्वै जरामर्यं सत्रं यदग्निहोत्रं जरया वा ह्येवास्मान्मुच्यते मृत्युना वा ' इत्येवं जातीय कान्नियमादपि कर्मशेषत्वमेव विद्याया इति॥ ७

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.४.८ के अनुवादके साथ है।)

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.८ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.8 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ८

सूत्र ३.४.८

अधिकोपदेशात् तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ३.४.८ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 784

पदच्छेद — अघिकोपदेशात् , तु , बादरायणस्य , एवम् , " तद्दर्शनात्

सूत्रार्थ — ( तु ) सूत्रस्थ तु शब्द पूर्वपक्ष की व्यावृत्ति करता है। यह जो कहा गया है कि तत्त्वज्ञान कर्मका अङ्ग है, वह युक्त नहीं है, ( अधिकोपदेशात् ) क्योंकि संसारी जीवसे अन्य चिन्मात्र भोक्तृत्व आदि रहित ब्रह्मका उपदेश है, इसलिए तत्त्वज्ञानकी फल श्रुति अर्थवाद नहीं है, ( एवम् ) इसप्रकार ( बादरायणस्य ) बादरायण आचार्यका मत है, ( तद्दर्शनात् ) कारण कि ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुतिमें उस संसारी जीवात्मासे अन्य ईश्वर परमात्माका दर्शन होता है।

शाङ्करभाष्य

तुशब्दात् पक्षो विपरिवर्तते। यदुक्तम् शेषत्वात्पुरुषार्थवादः इति तत् नोपपद्यते कस्मात् अधिकोपदेशात् यदि संसार्येव आत्मा शारीरः कर्ता भोक्ता च शरीरमात्रव्यतिरेकेण वेदान्तेषु उपदिष्टः स्यात् ततो वर्णितेन प्रकारेण फलश्रुतेरर्थवादत्वं स्यात् अधिकस्तावत् शारीरादात्मनः असंसारी ईश्वरः कर्तृत्वादिसंसारिधर्मरहितोऽपहतपाप्मत्वादिविशेषणः परमात्मा वेद्यत्वेनोपदिश्यते वेदान्तेषु। न च तद्विज्ञानं कर्मणां प्रवर्तकं भवति प्रत्युत कर्माण्युच्छिनत्ति इति वक्ष्यति उपमर्दं च इत्यत्र।

तस्मात् पुरुषार्थोऽतः शब्दात् इति यन्मतं भगवतो बादरायणस्य तत् तथैव तिष्ठति न शेषत्वप्रभृतिभिर्हेत्वाभासैश्चालयितुं शक्यते। तथा हि तमधिकं शारीरात् ईश्वरमात्मानं दर्शयन्ति श्रुतयः यः सर्वज्ञः सर्ववित् भीषास्माद्वातः पवते महद्भयं वज्रमुद्यतम् एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत इत्येवमाद्याः। यत्तु प्रियादिसंसूचितस्य संसारिण एव आत्मनो वेद्यतया अनुकर्षणम् आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरः य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते इत्युपक्रम्य एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि इति चैवमादि तदपि अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः इत्येवमादिभिर्वाक्यशेषैः सत्यामेव अधिकोपदिदिक्षायाम् अत्यन्ताभेदाभिप्रायमित्यविरोधः।

पारमेश्वरमेव हि शारीरस्य पारमार्थिकं स्वरूपम् उपाधिकृतं तु शारीरत्वम् तत्त्वमसि नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ इत्यादिश्रुतिभ्यः। सर्वं च एतत् विस्तरेणास्माभिः पुरस्तात् तत्र तत्र वर्णितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' कुर्वन्नेवेह ० ' ( इस लोकमें कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीनेकी इच्छा करे। इसप्रकार मनुव्यवका अभिमान रखनेवाले तेरे लिए इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं है, जिससे तुझे अशुभ कर्मका लेप न हो ) इसीप्रकार ' एतद्वै ० ' ( जो अग्निहोत्र है वही जरा और मरणपर्यन्त सत्र है। इस अग्निहोत्रसे पुरुष जरा अथवा मृत्युसे मुक्त होता है ) इसप्रकार के नियमसे भी विद्या कर्मका अङ्ग है | ७ |

इसप्रकार छ : सूत्रोंसे पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर उसका निराकरण करते हैं-

' तु ' शब्द से पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति होती है। ' शेषत्वात्पुरुषार्थवादः ' ऐसा जो कहा गया है, वह उपपन्न नहीं होता, क्योंकि अधिकका उपदेश है। यदि संसारी जीवात्मा ही शारीर कर्ता, मोक्ता शरीरमात्रसे अतिरिक्त वेदान्तों में उपदिष्ट होता तो वर्णित प्रकारसे फल श्रुति अर्थवाद होती। किन्तु शारीर जीवात्मासे अधिक - अतिरिक्त असंसारी, ईश्वर कर्तृत्व आदि जीवात्मा के धर्मोसे रहित अपहतपाप्मत्व आदि विशेषणोंसे युक्त परमात्मा वेद्यरूपसे उपनिषदोंमें उपदिष्ट है।

और उसका ज्ञान कर्मों का प्रवर्तक नहीं होता, प्रत्युत कर्मोंका उच्छेद करता है, ऐसा आगे ' उपमर्दं च ' इस सूत्र में कहेंगे। इससे ' पुरुषार्थोऽतःशब्दात् ' यह जो भगवान् बादरायणका मत है वह वैसे ही अवस्थित है, शेषत्व आदि हेत्वाभासों से वह विचलित नहीं किया जा सकता। क्योंकि ' यः सर्वज्ञ सर्ववित् ' ' मीषाऽस्मा द्वातः ० ' ( इसके मयसे वायु चलता है, इसीके मयसे सूर्य उदय होता है ) ' महद्भयम् ० ' ( वह ब्रह्म महान् भयरूप उठाए हुए वज्र के समान है ) ' एतस्य वा ० ' ( हे गार्गी!

इस बक्षरके प्रशासन में सूर्य और चन्द्रमा अवधूत होकर स्थित हैं ) ' तदैक्षत ० ' ( उस सद्रूप ब्रह्मने ईक्षण किया ' मैं बहुत हो जाऊँ अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ। इसप्रकार ईक्षणकर उसने तेज उत्पन्न किया ) इत्यादि श्रुतियाँ उस ईश्वर परमात्माको जीवात्मासे भिन्न दिखलाती हैं। और ' आत्मनस्तु कामाय ' ( आत्मा - अपने ही प्रयोजनके लिए सब प्रिय होते हैं, हे मैत्रेयी।

आत्माका दर्शन करना चाहिए ) ' यः प्राणेन ' ( मुखनासिका संचारी प्राणसे जो चेष्टा करता है वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है ) ' य एषोऽक्षिण ( यह जो पुरुष नेत्रोंसे दिखाई देता है, यह आत्मा है ) इस प्रकार उपक्रम ' एतं त्वेव ' ( मैं तुम्हारे प्रति उस आत्माका पुनः व्याख्यान करूंगा ) इत्यादि श्रुतिमें प्रिय आदिसे संसूचित संसारी आत्माका ही वेद्य रूपसे जो अनुकर्षण है, वह भी ' अस्य महतो ' ( हे मैत्रेयी!

यह जो ऋग्वेद है वह इस महद्भूतका निःश्वास है ) ' योऽशनायापिपासे ' ( याज्ञवल्क्य - जो बुभुक्षा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्युसे परे है ) ' परं ज्योतिरुपसंपद्य ' ( इस शरीर से समुत्थानकर परं ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है वह उत्तम पुरुष है ) इत्यादि वाक्यशेषोंसे अधिक उपदेशकी इच्छा होनेपर ही अत्यन्त अभेदके अभिप्रायसे है, अतः विरोध नहीं है, क्योंकि परमेश्वरका स्वरूप हो जीवात्माका पारमार्थिक स्वरूप है, शारीरत्व तो उपाधिकृत है, कारण कि ' तत्त्वमसि ' ' नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं।

इन सबका तत् तत् स्थलमें विस्तारसे हम वर्णन कर चुके हैं॥ ८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपक्षीने जो यह कहा है कि ब्रह्मज्ञान फल शून्य होनेसे कर्मका अङ्ग है, वह मी निराकृत हुआ समझना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मज्ञान स्वतन्त्ररूपसे मोक्षका हेतु है। और ' आत्मनस्तु कामाय ' इत्यादि श्रुतिमें प्रिय आदि संसारी धर्मोसे लोक प्रसिद्ध कर्ता भोक्ता जीवात्माका जो अनुकर्षण है वह केवल अभेद प्रतिपादनके अभिप्रायसे है, कारण कि उसका ही ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि श्रतिसे उपदेश है॥ ८

3.4.9 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ९

सूत्र ३.४.९

तुल्यं तु दर्शनम् ॥ ३.४.९ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 785

पदच्छेद — तुल्यम् , तु , दर्शनम्

सूत्रार्थ — तत्वज्ञान कर्मका अङ्ग नहीं है, क्योंकि इसमें भी ' एतद्ध स्म वे ० ' इत्यादि श्रुतिसे ( तुल्यम् ) समान ही ( दर्शनम् ) आचारदर्शन है। ( तु ) शब्द कर्माङ्ग लिङ्गदर्शनका प्राबल्य सूचित करता है।

शाङ्करभाष्य

यत्तूक्तम् आचारदर्शनात्कर्मशेषो विद्येति अत्र ब्रूमः तुल्यमाचारदर्शनम् अकर्मशेषत्वेऽपि विद्यायाः। तथा हि श्रुतिर्भवति एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुऋर््षयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे किमर्था वयं यक्ष्यामहे। एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न जुहवांचक्रिरे एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति इत्येवंजातीयका। याज्ञवल्क्यादीनामपि ब्रह्मविदाम् अकर्मनिष्ठत्वं दृश्यते एतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यः प्रवव्राज इत्यादिश्रुतिभ्यः। अपि च यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि इत्येतत् लिङ्गदर्शनं वैश्वानरविद्याविषयम् संभवति च सोपाधिकायां ब्रह्मविद्यायां कर्मसाहित्यदर्शनम् न तु अत्रापि कर्माङ्गत्वमस्ति प्रकरणाद्यभावात्।। यत्पुनरुक्तम् तच्छ्रुतेः इति अत्र ब्रूमः

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह कहा गया है कि ' आचारदर्शनात् ' आचारदर्शनसे ज्ञान कर्मका अङ्ग है।

इसपर हम कहते हैं - विद्या अकमंशेषत्व में भी आचारदर्शन समान है, क्योंकि ' एतद्ध स्म ० ' ( यह जानकर कवषके पुत्र ऋषियोंने कहा कि हम अध्ययन किस लिए करेंगे, हम किसलिए यज्ञ करेंगे, निःसन्देह इस वाक् और प्राणके परस्पर होमात्मक अग्निहोत्रको जाननेवाले प्राचीन उपासकोंने अग्निहोत्र होम ' एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वितैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ मिक्षाचर्यं चरन्ति ' ( बृह ० ३।५।१ ) इत्येवंजातीयका।

याज्ञवल्क्यादीनामपि ब्रह्मविदामकर्मनहीं किया था ) ' एतं वै ० ' ( इस आत्माको में ही परब्रह्म परमात्मा हूँ, ऐसा जानकर ब्राह्मण पुत्रषणा, वित्तैषणा और लोकंषणासे अलग हटकर मिक्षाचर्यासे विचरते हैं ) इसप्रकार की श्रुति है। ' एतावदरे ० ' ( अरी मैत्रेयी! निश्चय जान इतना ही अमृतत्व है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्यने संन्यास ग्रहण किया ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्मज्ञानी याज्ञवल्क्य आदि मी अकर्मनिष्ठ देखे जाते हैं। और ‘ यक्ष्यमाणो ० ' ( हे पूज्य ऋषियो!

मैं भी यज्ञ करनेवाला हूँ ) यह लिङ्गदर्शन वैश्वानर विद्याविषयक है। सोपाधिक- सगुणब्रह्म विद्या में तो कर्म साहित्यदर्शन संभव है। परन्तु यहाँ तो विद्यामें कर्माङ्गत्व नहीं है, क्योंकि प्रकरण आदिका अभाव है॥ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे जनक आदि ब्रह्मवेत्ताओंका कर्माचरण दर्शन है, वैसे याज्ञवल्क्य, शुकदेव आदि ब्रह्मज्ञानियोंका अकर्माचरण दर्शन है। इससे कमं दर्शनात्मक लिङ्ग लोकसंग्रहके लिए होनेसे अन्यथा सिद्ध है | हमको ' तुल्यं तु दर्शनम् ' इससे कहते हैं। जो कर्मठ है वह ब्रह्मवित् नहीं है, ऐसा माध्यकार ' अपि च ' इत्यादिसे कहते हैं। वस्तुतः वैश्वानरविद्या भी कर्मका अङ्ग नहीं है, क्योंकि उसकी स्वतन्त्र फलश्रुति है, और उसमें कर्माङ्गत्व प्रतिपादक प्रकरण आदि नहीं है॥ ९

3.4.10 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १०

सूत्र ३.४.१०

असार्वत्रिकी ॥ ३.४.१० ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 786

सूत्रार्थ — ' यदेव विद्यया करोति ' यह श्रुति सर्वविद्या विषयक नहीं है, किन्तु केवल उद्गीथविद्या विषयक है।

शाङ्करभाष्य

यदेव विद्यया करोति इत्येषा श्रुतिर्न सर्वविद्याविषया प्रकृतविद्याभिसंबन्धात्। प्रकृता च उद्गीथविद्या ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत इत्यत्र।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' तच्छ्रुते ते : ' इस सूत्र में जो पूर्वपक्षीसे कहा गया है, उसपर हम कहते हैं-

' यदेव विद्यया करोति ' ( पुरुष विद्यासे युक्त होकर जो कर्म करता है ) यह श्रुति सर्वविद्याविषयक नहीं है, क्योंकि उसका प्रकृत विद्याके साथ सम्बन्ध है। ' ओमित्येदक्षर ० ' ( ॐ इस अक्षर उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) यहाँ उद्गीथ विद्या प्रकृत है॥ १०

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.११ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.11 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ११

सूत्र ३.४.११

विभागः शतवत् ॥ ३.४.११ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.११ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 786

पदच्छेद — विभागः , शतवत्

सूत्रार्थ — ( विभागः ) ' तं विद्याकर्मणी ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित विद्या अन्य पुरुषका और कर्म अन्य पुरुषका अनुगमन करते हैं, इसप्रकार विभाग है। ( शतवत् ) जैसे इन दो मनुष्यों को सौ मुद्रा दिये जायें, ऐसा कहनेपर पचास - पचास मुद्रा बाँट दिये जाते हैं।

शाङ्करभाष्य

यदप्युक्तम् तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते इत्येतत् समन्वारम्भवचनम् अस्वातन्त्र्ये विद्याया लिङ्गमिति तत् प्रत्युच्यते विभागोऽत्र द्रष्टव्यः विद्या अन्यं पुरुषमन्वारभते कर्म अन्यमिति। शतवत् यथा शतम् आभ्यां दीयतामित्युक्ते विभज्य दीयते पञ्चाशदेकस्मै पञ्चाशदपरस्मै तद्वत्। न च इदं समन्वारम्भवचनं मुमुक्षुविषयम् इति नु कामयमानः इति संसारिविषयत्वोपसंहारात् अथाकामयमानः इति च मुमुक्षोः पृथगुपक्रमात् तत्र संसारिविषये विद्या विहिता प्रतिषिद्धा च परिगृह्यते विशेषाभावात् कर्मापि विहितं प्रतिषिद्धं च यथाप्राप्तानुवादित्वात् एवं सति अविभागेनापि इदं समन्वारम्भवचनमवकल्पते।। यच्चैतत् तद्वतो विधानात् इति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और ' तं विद्याकर्मणी ० ' ( विद्या और कर्म परलोकमें जानेवालेका अनुगमन करते हैं ) यह सहानुगमन वचन विद्याकी अस्वतन्त्रतामें लिङ्ग है, ऐसा जो कहा गया है, उसका निराकरण किया जाता है | विद्या अन्य पुरुषका अनुगमन करती है और कर्म अन्य पुरुषका, इसप्रकार यहाँ विभाग समझना चाहिए | शतके समान। जैसे इन दोनों को सौ मुद्रा दीजिए, ऐसा कहने पर विभाग कर पचास मुद्रा एकको और पचास मुद्रा अन्यको दिये जाते हैं, वैसे ही प्रकृत में समझना चाहिए। और यह सहानुगमन वचन मुमुक्षुविषयक नहीं है, क्योंकि ' इति नु कामयमानः ' ( इसप्रकार कामना करने वाला पुरुष ऐसा करता है अर्थात् संसारमें कर्म करनेको आता है ) इसप्रकार संसारिविषयत्वका उपसंहार है, और ' अथाकामयमान : ' ( अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है, वह ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इसप्रकार मुमुक्षुका पृथक् उपक्रम है। उस संसारिविषयक वाक्यमें उद्गीथ आदि विषयक विहित विद्या और नग्नस्त्रीदर्शनरूप प्रतिषिद्ध विद्याका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि विद्याविशेषका अभाव है। उसीप्रकार कर्म भी विहित और प्रतिषिद्ध हैं, क्योंकि वह वाक्य यथाप्राठका अनुवादक है। ऐसा होनेपर यह सहानुगमन वचन अविभागसे भी उपपन्न हो सकता है॥ ११

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' तं विद्याकर्मणी ' श्रुति प्रतिपादित यह सहानुगमन वचन मुमुक्षुको भी विषय करता है, ऐसा मानकर विद्या मुमुक्षुको अमृतरूपसे और कर्म अन्यको परलोक फलोपभोगार्थ अनुगमन करते हैं। इस प्रकार सूत्रकारने विभाग किया है। वस्तुतः यह सहानुगमन वचन मुमुक्षु विषयक नहीं है, इसको ' नच ' इत्यादिसे कहते हैं॥ ११

3.4.12 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १२

सूत्र ३.४.१२

अध्ययनमात्रवतः ॥ ३.४.१२ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 787

सूत्रार्थ — ' आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य ' इस वाक्यमें केवल वेद अध्ययन करनेवालेके लिए विधान किया जाता है, औपनिषद् आत्मज्ञानवालेके लिए नहीं।

शाङ्करभाष्य

आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य इत्यत्र अध्ययनमात्रस्य श्रवणात् अध्ययनमात्रक्षवत एव कर्मविधिरित्यध्यवस्यामः। ननु एवं सति अविद्यत्वात् अनधिकारः कर्मसु प्रसज्येत नैष दोषः न वयम् अध्ययनप्रभवं कर्मावबोधनम् अधिकारकारणं वारयामः किं तर्हि औपनिषदमात्मज्ञानम् स्वातन्त्र्येणैव प्रयोजनवत् प्रतीयमानम् न कर्माधिकारकारणतां प्रतिपद्यते इत्येतत्प्रतिपादयामः। यथा च न क्रत्वन्तरज्ञानं क्रत्वन्तराधिकारेण अपेक्ष्यते एवमेतदपि द्रष्टव्यमिति।। यदप्युक्तम् नियमाच्च इति अत्राभिधीयते

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और ' तद्वतो विधानात् ' इस सूत्रसे पूर्वपक्षीने जो कहा है, उसका उत्तर कहते हैं-

' आचार्यकुलाद् ० ' ( आचार्यं कुलसे वेदका अध्ययन करके ) इस श्रुतिमें अध्ययनमात्रका श्रवण होनेसे केवल वेद अध्ययन करनेवालेके लिए ही कर्म विधि है, ऐसा हम निश्चय करते हैं। परन्तु ऐसा होनेपर विद्याहीन ( वेदार्थ ज्ञान शून्य ) होने से उसका कर्मों में अनधिकार प्रसक्त होगा? यह दोष नहीं है, हम वेदाध्ययनसे उत्पन्न होनेवाले कर्मोंमें अधिकार के कारणभूत कर्मावबोधका वारण नहीं करते, किन्तु औपनिषद् आत्मज्ञान स्वतन्त्ररूप से प्रयोजनवाला प्रतीत होता हुआ कर्मोंमें अधिकारकारणत्वको प्राप्त नहीं होता, इतनामात्र हम प्रतिपादन करते हैं। जैसे एक क्रतुका ज्ञान अन्य क्रतुके अधिकारके द्वारा अपेक्षित नहीं है, ऐसे यह भी समझना चाहिए॥ १२

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.१४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.13 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १३

सूत्र ३.४.१३

नाविशेषात् ॥ ३.४.१३ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 788

शाङ्करभाष्य

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् इत्येवमादिषु नियमश्रवणेषु न विदुष इति विशेषोऽस्ति अविशेषेण नियमविधानात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पदच्छेदन, अविशेषात्।

सूत्रार्थ - ( न ) ' कुवन्नेवेह कर्माणि ' इत्यादि श्रुति तत्त्वज्ञानी विषयक नहीं है, ( अविशेषात् ) क्योंकि ' विद्वान् ' विशेषका अभाव है।

और ' नियमाच्च ' इस सूत्र से जो पूर्वपक्षीसे कहा गया है, उसपर कहा जाता है।

' कुर्वन्नेवेह ० ' ( इस लोकमें अग्निहोत्र आदि कर्म करता हुआ सौ वर्ष जीनेकी इच्छा करे ) इत्यादि नियमों के श्रवण विद्वानके लिए है ऐसा विशेष नहीं है, क्योंकि अविशेष रूपसे नियमका विधान है॥१३

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.१४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.14 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १४

सूत्र ३.४.१४

स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ ३.४.१४ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 788

पदच्छेद — स्तुतये , अनुमतिः , वा

सूत्रार्थ — ( वा ) अथवा ( अनुमतिः ) तत्त्वज्ञानीके लिए जो अनुमति - कर्मानुज्ञा है, ( स्तुतये ) वह केवल स्तुति के लिए है।

शाङ्करभाष्य

कुर्वन्नेवेह कर्माणि इत्यत्र अपरो विशेष आख्यायते। यद्यपि अत्र प्रकरणसामर्थ्यात् विद्वानेव कुर्वन् इति संबध्येत तथापि विद्यास्तुतये कर्मानुज्ञानम् एतद्द्रष्टव्यम् न कर्म लिप्यते नरे इति हि वक्ष्यति। एतदुक्तं भवति यावज्जीवं कर्म कुर्वत्यपि त्वयि विदुषि पुरुषे न कर्म लेपाय भवति विद्यासामर्थ्यादिति तदेवं विद्या स्तूयते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' कुवन्नेवेह कर्माणि ० ' इस श्रुतिमें अन्य विशेष कहा जाता है। यद्यपि यहां प्रकरण की सामध्यंसे विद्वान् ही ' करता हुआ ' इस प्रकार सम्बन्धित किया जाय, तो भी यह कर्मानुज्ञा विद्यास्तुतिके लिए समझनी चाहिए, क्योंकि आगे ' न कर्म लिप्यते नरे ' ऐसा ही श्रुति कहेगी। तात्पर्य यह है - जीवन पर्यन्त कर्म करते हुए भी तत्त्ववित् पुरुषमें विद्याकी सामथ्यंसे कर्म लेप ( फलबन्धन ) के लिए नहीं होता। इससे इस प्रकार विद्याकी स्तुति की जाती है॥ १४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' कुवन्नेवेह कर्माणि ' यह नियम श्रुति केवल अविद्वान् के लिए है, ऐसा कहा गया है। अब इस श्रुतिको विद्वद् विषयक मानकर उसका ' स्तुतये ' इस सूत्र से परिहार करते हैं॥ १४

3.4.15 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १५

सूत्र ३.४.१५

कामकारेण चैके ॥ ३.४.१५ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 788

पदच्छेद — कामकारेण च , एके

सूत्रार्थ — ( च ) और ( एके ) ' एतद्ध स्म वे ० ' इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है कि कुछ विद्वानोंने भी ( कामकारेण ) स्वेच्छा से कर्मके साधनभूत प्रजा आदिका त्याग किया है।

शाङ्करभाष्य

अपि च एके विद्वांसः प्रत्यक्षीकृतविद्याफलाः सन्तः तदवष्टम्भात् फलान्तरसाधनेषु प्रजादिषु प्रयोजनाभावं परामृशन्ति कामकारेण इति श्रुतिर्भवति वाजसनेयिनाम् एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक इति। अनुभवारूढमेव च विद्याफलं न क्रियाफलवत् कालान्तरभावि इत्यसकृदवोचाम। अतोऽपि न विद्यायाः कर्मशेषत्वं नापि तद्विषयायाः फलश्रुतेरयथार्थत्वं शक्यमाश्रयितुम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और विद्या फलका साक्षात्कार करनेवाले कुछ एक विद्वान् लोग विद्याका अवलम्बनकर अन्य फलके साधन प्रजा आदिमें प्रयोजनाभावका परामर्श करते हैं अर्थात् प्रयोजनाभाव देखते हैं, क्योंकि ' एतद्ध स्म वै ० ' ( पूर्ववर्ती विद्वान् सन्तान तथा कर्म आदिकी इच्छा नहीं करते थे, वे सोचते कि हम इस प्रजासे क्या करेंगे अर्थात् इनसे क्या प्रयोजन है, जिन हमको यह आत्मलोक अभीष्ट है ) ऐसी अपनी इच्छा से त्याग करनेकी वाजसनेयी शाखावालोंकी श्रुति है। विद्या फल तो अनुभव सिद्ध ही है, कर्मफलके समान कालान्तर - जन्मान्तर भावी नहीं है, ऐसा हम अनेक वार कह चुके हैं। इससे भी विद्या कर्मशेष नहीं है और विद्या - विषयक फल श्रुति अयथार्थ है, ऐसा भी आश्रयण नहीं किया जा सकता।। १५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * स्वेच्छा से अग्निहोत्र आदि कर्मके साधनभूत प्रजा आदिके त्याग रूप लिङ्गसे भी विद्या स्वतन्त्र फलवाली होनेसे कर्माङ्ग नहीं है, ऐसा ' कामकारेण चैके ' इस सूत्र से कहते हैं। आत्मविद्याका अनुभव सिद्ध अनावृत्त आत्मस्वरूप मोक्ष फल है। यह कर्मफलके समान कालान्तरभावी, सातिशय और अनित्य नहीं है। और ' तरति शोकमात्मवित् ' इत्यादि विद्याफल श्रुति भी अर्थवाद नहीं है, किन्तु यथार्थ है।। १५

3.4.16 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १६

सूत्र ३.४.१६

उपमर्दं च ॥ ३.४.१६ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 789

पदच्छेद — उपमर्दम् , च

सूत्रार्थ — और ' यत्र वा अस्य ' इत्यादिसे ज्ञात होता है कि तत्त्वज्ञान कर्मानुष्ठान के हेतु भूत अविद्याकृत क्रिया, कारक, फल विभागका उपमर्दन करता है।

शाङ्करभाष्य

अपि च कर्माधिकारहेतोः क्रियाकारकफललक्षणस्य समस्तस्य प्रपञ्चस्य अविद्याकृतस्य विद्यासामर्थ्यात् स्वरूपोपमर्दमामनन्ति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं जिघ्रेत् इत्यादिना। वेदान्तोदितात्मज्ञानपूर्विकां तु कर्माधिकारसिद्धिं प्रत्याशासानस्य कर्माधिकारोच्छित्तिरेव प्रसज्येत। तस्मादपि स्वातन्त्र्यं विद्यायाः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और कर्माधिकार के हेतु क्रिया, कारक और फलरूप अविद्याकृत समस्त प्रपञ्चकी विद्याकी सामर्थ्य से स्वरूप निवृत्ति ' यत्र त्वस्य ० ' ( जिस विद्यावस्थामें इस ब्रह्मवेत्ताके लिए सब आत्मा हो हो गया उस अवस्था में किस करणसे किस विषयको देखे और किस करण से किस विषयको सूंघे ) इत्यादि श्रुतिसे कहते हैं 1। वेदान्तसे उत्पन्न मात्मज्ञानसे जो पूर्व है ऐसे कर्माधिकार सिद्धिकी प्रत्याशा रखनेवालेको तो कर्माधिकारका उच्छेद हो प्रसक्त होगा। इससे भी विद्या स्वतन्त्र है॥ १६

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.१७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.17 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १७

सूत्र ३.४.१७

ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि ॥ ३.४.१७ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 789

पदच्छेद — ऊर्ध्वरेतःसु , च , शब्दे , हि

सूत्रार्थ — ( च ) और ( ऊध्वरेत : सु ) संन्यासाश्रम में ही ब्रह्मविद्याका श्रवण है, इससे मो विद्या कर्माङ्ग नहीं है, ( हि ) क्योंकि ( शब्दे ) ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इत्यादि श्रुतिमें संन्यासाश्रम प्रतिपादित है |

शाङ्करभाष्य

ऊर्ध्वरेतःसु च आश्रमेषु विद्या श्रूयते न च तत्र कर्माङ्गत्वं विद्याया उपपद्यते कर्माभावात् न हि अग्निहोत्रादीनि वैदिकानि कर्माणि तेषां सन्ति। स्यादेतत् ऊर्ध्वरेतस आश्रमा न श्रूयन्ते वेद इति तदपि नास्ति तेऽपि हि वैदिकेषु शब्देष्ववगम्यन्ते त्रयो धर्मस्कन्धाः ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् इत्येवमादिषु। प्रतिपन्नाप्रतिपन्नगार्हस्थ्यानाम् अपाकृतानपाकृतर्णत्रयाणां च ऊर्ध्वरेतस्त्वं श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धम्। तस्मादपि स्वातन्त्र्यं विद्यायाः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और अध्वरेतः संन्यासाश्रमों में विद्याका श्रवण है। वहाँ विद्यामें कर्माङ्गध्व उपपन्न नहीं होता, क्योंकि उक्त आश्रमों में कर्मका अभाव है - अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्म उन बाश्रमों में नहीं है। ऐसा हो। परन्तु अतः आश्रम वेदमें नहीं सुने जाते, यह भी नहीं है, क्योंकि वे भी ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ’ ऽवसादय सर्व एते पुण्यलोका भवन्तीति परामर्शपूर्वकमाश्रमाणामनात्यन्तिकफलत्वं ( धर्मके तीन स्कन्ध - प्रविभाग हैं ) ' ये चेमे ० ' ( वे जो कि ज्ञान युक्त वानप्रस्थ और संन्यासी अरण्यमें श्रद्धा और तप इनकी उपासना करते हैं ) ' तप श्रद्धे ० ' ( जो विद्वान् लोग अरण्यमें तपः और श्रद्धाका सेवन करते हैं ) ' एतमेव ० ' ( इसी आत्मलोकको चाहते हुए संन्यासी सब कर्मोंका संन्यास करते हैं ) ' ब्रह्मचर्या देव ० ' ( ब्रह्मचर्यं से हो संन्यास ग्रहण करे ) इत्यादि वैदिक शब्दोंमें अवगत होते हैं। प्राप्त गार्हस्थ्य अप्राप्त गार्हस्थ्य, अपाकृत तीन ऋण और अनपाकृत तीन ऋण वालोंका अर्ध्वरेतस्त्व श्रुति और स्मृतिमें प्रसिद्ध है। इससे भी विद्या स्वतन्त्र है!॥ १७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — विद्याकी स्वतन्त्रतामें ' ऊर्ध्वरेतःसु ' इत्यादिसे अन्य हेतु कहते हैं। ' कर्मतत्वज्ञाने नाङ्गाङ्गिभूते मिन्नाधिकारिस्थितत्वात् राजसूय बृहस्पतिसववत् ' ( कर्म और तत्त्वज्ञान अङ्गाङ्गिभूत नहीं हैं, क्योंकि भिन्न - भिन्न अधिकारी स्थित हैं, जैसे राजसूय और बृहस्पतिसव ) इसलिए कर्म विधि रहित संन्यासाश्रममें ही विद्याका श्रवण होनेसे ब्रह्मज्ञान कर्मका अङ्ग नहीं है।

अब संन्यासाश्रम के अभावकी याङ्काको ' त्रयो धर्म स्कन्धाः ' इत्यादिसे निवृत्त करते हैं।

' तीन कर्म प्रधान आश्रम हैं और चौथा ब्रह्मसंस्थसंन्यासाश्रम है ' ' ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्य एष वा अनृण ' ( ब्रह्मचयं युक्त वेदाध्ययनसे ऋषिऋण, यज्ञ आदिसे देवऋण और प्रजा द्वारा पितृऋणसे मुक्त होकर यह ऋण रहित होता है ) ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम इनके लिए श्रौत और स्मार्तं कर्मोका विधान है और केवल ब्रह्म प्राप्ति के लिए गृहीत संन्यास के लिए कर्मका विधान नहीं है। परन्तु ' ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।

अनापकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः॥ ' ( तोनों ऋणों का अपाकरणकर मनको मोक्षमें प्रविष्ट करे। ऋणोंका अपाकरण किये विना मोक्षका सेवन करनेवाला अधोगतिको प्राप्त होता है ) इस प्रकरकी मनुस्मृति है। इसका अभिप्राय यह है — कि गृहस्थाश्रम में रहकर तीनों ऋणोंसे मुक्त हो संन्यास ग्रहण करे?

' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वावनाद्वा ' ' यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रत्रजेत् ' ( जाबा ० ३।४ ) इत्यादि श्रुति है | श्रुति और स्मृतिमें विरोध हो तो स्वतन्त्र प्रमाणभूत श्रति बलवती होती है 1। और ' द्वितीयमाश्रममिच्छेत्तम। वसेद् ' ( द्वितीय आश्रमकी इच्छा करे और उसमें रहे ) यह स्मृति है। इस प्रकार श्रुतिमें और स्मृति में संन्यासाश्रम प्रसिद्ध है। इसलिए ब्रह्मविद्यां संन्यासाश्रम निष्ठ होनेसे स्वतन्त्र है।। १७

परामर्शाधिकरणम्

3.4.18 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १८

सूत्र ३.४.१८

परामर्शं जैमिनिरचोदनाच्चापवदति हि ॥ ३.४.१८ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 790

पदच्छेद — परामर्शम् , जैमिनि :, अचोदना , च अपवदति , हि

सूत्रार्थ — ' ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ' इत्यादि शास्त्र ( परामर्शम् ) अन्ध परम्परान्याय से प्राप्त संन्यासाश्रमका अनुवादक है, ( जैमिनि : ) ऐसा आचार्य जैमिनिका मत है, ( हि ) क्योंकि ( अचोदना ) इस वाक्य में विधायक लिङ्ग आदि नही है, ( च ) और ( अपवदति ) ' वीरहा ' इत्यादि शास्त्र भी संन्यासाश्रमका प्रतिषेध करता है।

शाङ्करभाष्य

त्रयो धर्मस्कन्धाः इत्यादयो ये शब्दा ऊर्ध्वरेतसामाश्रमाणां सद्भावाय उदाहृताः न ते तत्प्रतिपादनाय प्रभवन्ति यतः परामर्शम् एषु शब्देष्वाश्रमान्तराणां जैमिनिराचार्यो मन्यते न विधिम्। कुतः न हि अत्र लिङादीनामन्यतमश्चोदनाशब्दोऽस्ति अर्थान्तरपरत्वं च एषु प्रत्येकमुपलभ्यते।

त्रयो धर्मस्कन्धाः इत्यत्र तावत् यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति इति परामर्शपूर्वकमाश्रमाणामनात्यन्तिकफलत्वं संकीर्त्य आत्यन्तिकफलतया ब्रह्मसंस्थता स्तूयते ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति इति। ननु परामर्शेऽपि आश्रमा गम्यन्त एव सत्यं गम्यन्ते स्मृत्याचाराभ्यां तु तेषां प्रसिद्धिः न प्रत्यक्षश्रुतेः अतश्च प्रत्यक्षश्रुतिविरोधे सति अनादरणीयास्ते भविष्यन्ति अनधिकृतविषया वा।

ननु गार्हस्थ्यमपि सहैवोर्ध्वरेतोभिः परामृष्टम् यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः इति सत्यमेवम् तथापि तु गृहस्थं प्रत्येव अग्निहोत्रादीनां कर्मणां विधानात् श्रुतिप्रसिद्धमेव हि तदस्तित्वम् तस्मात्स्तुत्यर्थ एव अयं परामर्शः न चोदनार्थः। अपि च अपवदति हि प्रत्यक्षा श्रुतिराश्रमान्तरम् वीरहा वा एष देवानां योऽग्निमुद्वासयते आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः नापुत्रस्य लोकोऽस्तीति तत्सर्वे पशवो विदुः इत्येवमाद्या।

तथा ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये इति च देवयानोपदेशः न आश्रमान्तरोपदेशः। संदिग्धं च आश्रमान्तराभिधानम् तप एव द्वितीयः इत्येवमादिषु। तथा एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति इति लोकसंस्तवोऽयम् न पारिव्राज्यविधिः। ननु ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् इति विस्पष्टमिदं प्रत्यक्षं पारिव्राज्यविधानं जाबालानाम् सत्यमेवमेतत् अनपेक्ष्य तु एतां श्रुतिम् अयं विचार इति द्रष्टव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' त्रयो धर्मस्कधाः ' धर्मके तीन स्कन्ध- प्रविभाग हैं ) इत्यादि श्रुतियाँ जो संन्यासाश्रर्मो के सद्भाव के लिए उदाहृत हैं, वे उनके प्रतिपादन करनेमें समर्थ नहीं है, क्योंकि जैमिनि आचार्थ इन श्रुतियों में अन्य आश्रमों का परामर्श मानते हैं, विधि नहीं, किससे? इससे कि लिङ्ग आदिमेंसे एक भी विधिशब्द यहाँ नहीं है। और इनमें प्रत्येक अन्य अर्थपरक उपलब्ध होता है।

' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' यहाँ तो ' यज्ञोऽध्ययनं दानमिति ' ( यज्ञ, वेदाध्ययन और दान यह प्रथम धर्मस्कन्ध है, तप द्वितीय धर्म स्कन्ध और आचार्यकुलमें वास करनेवाला, जीवनपर्यन्त नियमपूर्वक आचार्यकुलमें देहको क्षीण करनेवाला नैष्ठिक ब्रह्मचारी, यह तृतीय धर्मं स्कन्ध है, ये सब तीनों आश्रमी यथोक्त धर्मं पुण्यलोक वाले होते हैं ) इसप्रकार आश्रमोंका परामर्शपूर्वक व्यभिचरित फल कहकर ' ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ' ( ब्रह्ममें सम्यक् प्रकारसे स्थित चतुर्थाश्रमी संन्यासी अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इसप्रकार अव्यभि - चरित फलत्वसे ब्रह्मसंस्थताकी स्तुतिकी जाती है।

परन्तु परामर्श में भी आश्रम अवगत होते ही हैं। ठीक, अवगत होते हैं, परन्तु उनकी स्मृति और आचारसे तो प्रसिद्धि है, प्रत्यक्ष श्रुति से प्रसिद्धि नहीं है, अतः प्रत्यक्ष श्रुतिके विरोध होनपर वे अनादरणीय होंगे अथवा अनधिकारी विषयक होंगे अर्थात् अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें अनाधिकारी लूले लंगड़े होंगे। परन्तु ' यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः ' इसप्रकार गार्हस्थ्यका भी संन्यासियों के साथ परामर्श किय गया है।

ऐसा ठीक है, तो मी गृहस्थाश्रम के प्रति तो अग्निहोत्र आदि कर्मोंका विधान होने से उसका अस्तित्व श्रुति प्रसिद्ध ही है। इसलिए यह परामर्श स्तुत्यथंक ही है विध्यर्थक नहीं है।

और ' वीरहा वा एष ० ' ( जो अग्निका उद्वासन ( बुझाना ) करता है वह देवोंका वीरहा - पुत्रघाती होता है ) ' आचार्याय ० ' ( आचार्यको अभीष्ट धन लाकर [ उसकी आज्ञासे स्त्री परिग्रह कर ] सन्तान परम्पराका उच्छेद न करे ) ' नापुत्रस्य ० ' ( अपुत्रवालेको लोकप्राप्त नहीं होता, ऐसा सब पशु भी जानते हैं ) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुति आश्रमान्तरका प्रतिषेध करती है।

इसी प्रकार ' ये चेमेऽरण्ये ० ' ( जो ये अरण्यमें श्रद्धा और तपकी उपासना करते हैं ) ' तपः श्रद्धं ० ' ( जो तप और श्रद्धाका अरण्यमें रहकर सेवन करते हैं, ) यह देवयान मार्गका उपदेश है, आश्रमान्तरका उपदेश नहीं है 1। और ' तप एव द्वितीय : ' ( तप ही द्वितीय धर्म है ) इत्यादि श्रुतियोंमें अन्य कामों का कथन संदिग्ध है। उसीप्रकार ' एतमेव ० ' ( उसी आत्मलोक के अभिलाषी परिव्राजक सब कर्मोका त्याग करते हैं ) यह आत्मलोककी स्तुति है पारिव्राज्य विधि नहीं है।

परन्तु ' ब्रह्मचर्यादेव ' ( ब्रह्मचयं से ही संन्यास ग्रहण करे ) इसप्रकार जाबालोंमें यह स्पष्टरूपसे प्रत्यक्ष परिव्राज्यका विधान है। यह ठीक है। परन्तु इस श्रुतिकी अपेक्षा किये विना यह विचार है, ऐसा समझना चाहिए॥ १८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वं अधिकरणमें ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इत्यादि श्रुति जो यति आश्रम के सद्भावमें प्रमाणरूपसे कही गई है, उसका असंभव है, इसप्रकार आक्षेप संगतिसे ' परामर्श जैमिनिः ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं। ऊर्ध्वरेतः शब्दसे यहाँ संन्यासाश्रम समझना चाहिए।

माध्यमें ' आश्रमान्तराणां ' यह बहुवचन अवान्तर भेदके अभिप्रायसे है, इसलिए काण्वायन स्मृतिसे अर्थत : अनुवृत्ति करते हैं— गायत्र, ब्राह्म, प्रजापत्य और बृहन् भेदसे ब्रह्मचारी चार प्रकारके हैं। उपनयनानन्तर तीनरात्रि तक लवणका मक्षण न कर गायत्रीका अध्ययन करनेवाला गायत्र, वेदाध्ययन तक ब्रह्मचर्यव्रती ब्राह्म, ऋतुकालमें स्वस्त्री अनुगामी परस्त्रीविमुख रहनेवाला अथवा संवत्सरपर्यंन्त वेदव्रती वटुक प्राजापत्य और मरणपर्यंन्त गुरुकुलवासी नैष्ठिक ब्रह्मचारी बृहन् कहा जाता है!

वार्तांक, यायावर, शालीन . और घोरसंन्यासिक भेदसे गृहस्थ भी चार प्रकारका है। कृषि, गोरक्षा आदि वैश्यवृत्तिसे निर्वाहो तथा नित्य यादि क्रियापरक वार्त्ताकवृत्ति, जो सदा आयाचितवृत्ति हो याजन, अध्यापन और प्रतिग्रहसे • विमुख वह यायावर, षट्कर्मोंमें रत याजनादि वृत्ति सञ्चयी शालीन और उद्धृत पवित्र जलसे कर्मकरता प्रतिदिनं उच्छवृत्ति हिंसादिरहित ग्रामवासी घोरसंन्यासिक कहा जाता है। वैखानस, मोदुम्बर, बालखिल्य ओर फेनप भेदसे वानप्रस्थ चार प्रकारका है।

ग्रामके बाहर विना जोते औषधियोंसे अग्निहोत्र करनेवाला वैखानस, प्रातः उठकर जिस दिशाको देखे उसी दिशाके जोदुम्बर, बेर, निवार और सामासे कार्यं चलानेवाला औदम्बर, आठ मासतक उपार्जनकर चातुर्मासमें भोजन करे, कार्तिक पूर्णिमा संगृहीत पुष्प फलादिका त्यागी जटा वल्कलधारी बालखिल्य और गिरे फल पत्र आदि खाकर क्वचिद्वासकर और कर्मपरायण वह फेनप कहा जाता है। कुटीचक, बहुदक, हंस और परमहंस भेदसे पर व्राजक चार प्रकारके हैं।

उनमें स्वपुत्र के घरमें भिक्षा करते त्रिदण्डधारी वह कुटीचक, झोली, कमण्डलु, पवित्र, पादुका, आसन, शिखा, यज्ञोपवीत, कौपीन, कषायवस्त्रधारी, तीर्थोंमें भ्रमण करनेवाले, भिक्षावृत्तिसे रहकर आत्माभिलाषी त्रिदण्डी बहूदक है, शिक्षा त्यागकर यज्ञोपवीतधारी हाथ में झोली कमण्डलु ", ग्राम में एक रातवासी कृच्छ्र चान्द्रायण बादि व्रती एक दण्डधारी हंस एक दण्डधारी मुण्डित यज्ञोपवीत रहित सर्व कर्मत्यागी आत्मनिष्ठ परमहंस कहा जाता है।

परन्तु ऊपर वर्णित पूर्वपक्ष संन्यासका अभाव होनेसे ज्ञानमें स्वतन्त्र मोक्षरूपफल की असिद्धि है और सिद्धान्तमें संन्यासाश्रम के सिद्ध होनेपर ज्ञानमें फलकी सिद्धि है॥ १८

3.4.19 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र १९

सूत्र ३.४.१९

अनुष्ठेयं बादरायणस्साम्यश्रुतेः ॥ ३.४.१९ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.१९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 792

पदच्छेद — अनुष्ठेयम् , बादरायणः , साम्यश्रुतेः

सूत्रार्थ — ( बादरायणः ) बादरायणका मत है कि ( अनुष्ठेयम् ) संन्यासाश्रम अनुष्ठेय है, ( साम्यश्रुतेः ) क्योंकि ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इसप्रकार गृहस्थाश्रम के साथ संन्यासाश्रमकी भी समान परामशं श्रुति है।

शाङ्करभाष्य

अनुष्ठेयम् आश्रमान्तरं बादरायण आचार्यो मन्यते वेदेऽश्रवणादग्निहोत्रादीनां च अवश्यानुष्ठेयत्वात् तद्विरोधादनधिकृतानुष्ठेयमाश्रमान्तरम् इति हि इमां मतिं निराकरोति गार्हस्थ्यवदेव आश्रमान्तरमपि अनिच्छता प्रतिपत्तव्यमिति मन्यमानः।

कुतः साम्यश्रुतेः समा हि गार्हस्थ्येनाश्रमान्तरस्य परामर्शश्रुतिर्दृश्यते त्रयो धर्मस्कन्धाः इत्याद्या यथा इह श्रुत्यन्तरविहितमेव गार्हस्थ्यं परामृष्टम् एवमाश्रमान्तरमपीति प्रतिपत्तव्यम् यथा च शास्त्रान्तरप्राप्तयोरेव निवीतप्राचीनावीतयोः परामर्श उपवीतविधिपरे वाक्ये तस्मात् तुल्यमनुष्ठेयत्वं गार्हस्थ्येन आश्रमान्तरस्य। तथा एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति इत्यस्य वेदानुवचनादिभिः समभिव्याहारः ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते इत्यस्य च पञ्चाग्निविद्यया।

यत्तूक्तम् तप एव द्वितीयः इत्यादिष्वाश्रमान्तराभिधानं संदिग्धमिति नैष दोषः निश्चयकारणसद्भावात् त्रयो धर्मस्कन्धाः इति हि धर्मस्कन्धत्रित्वं प्रतिज्ञातम् न च यज्ञादयो भूयांसो धर्मा उत्पत्तिभिन्नाः सन्तः अन्यत्राश्रमसंबन्धात् त्रित्वेऽन्तर्भावयितुं शक्यन्ते तत्र यज्ञादिलिङ्गो गृहाश्रम एको धर्मस्कन्धो निर्दिष्टः ब्रह्मचारीति च स्पष्ट आश्रमनिर्देशः तप इत्यपि कोऽन्यस्तपःप्रधानादाश्रमात् धर्मस्कन्धोऽभ्युपगम्येत। ये चेमेऽरण्ये इति च अरण्यलिङ्गात् श्रद्धातपोभ्यामाश्रमगृहीतिः।

तस्मात् परामर्शेऽप्यनुष्ठेयमाश्रमान्तरम्।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.४.२० के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे अन्य श्रुतिमें विहित गार्हस्थ्यका ' त्रयो धर्म स्कन्धाः ' यहाँ परामरां ( अनुवाद ) किया गया है, वैसे ही यहाँ अन्य श्रं तिसे विहित अन्य आश्रमोंका भी परामर्श है। अनुवाद अन्यत्र विहितका होता है।

जैसे ' निवोतं मनुष्याणां प्राचीनावीतं पितॄणामुपवीतं देवानाम् ' ( निवीत मनुष्योंका, प्राचीनावीत पितरोंका और उपवीत देवोंका होता है ) इत्यादि वाक्यमें दैवकर्म में उपवीतका विधान है और उसकी स्तुति के लिए इन दोका अनुवाद है, क्योंकि मनुष्य सम्बन्धी क्रियामें निवीत- अर्ध देहका वस्त्रसे बन्धन प्राप्त है और पितृ - सम्बन्धी क्रियामें प्राचीनावीत मो अन्य विधिसे प्राप्त है।

इस प्रकार ' यो धर्म स्कन्धाः ' यह वाक्य भले ' यज्ञोऽध्ययनं दानमिति ' इसप्रकार अन्य अर्थ परक हो, परन्तु इस वाक्यमें परामर्शसे अन्य आश्रमोंकी प्रतीतिका वारण नहीं किया जा सकता है। ' एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति ' इत्यादि साक्षात् श्रुति पारिव्राज्य आश्रमका विधान करती है। वेदानुवचन आदि विधेयोंके साथ सहोच्चारण होनेसे पारिव्राज्य में भी विधेयता है।

' ये चेमे ० ' इत्यादि श्रुतिसे वानप्रस्थका विधान है, क्योंकि पञ्चाग्निविद्यारूप विधेयके साथ कथन होनेसे वानप्रस्थ मी विधेय है। ' स्वर्गकामो यजेत ' ' दद्यात् ' ' अध्येतव्यम् ' इत्यादि उत्पत्ति विधिसे भिन्न बहुत - से यज्ञ आदि धर्म हैं, उनका आश्रम सम्बन्धके विना ' त्रयो धर्म स्कन्धा : ' इसमें तीन संख्या में अन्तर्भाव नहीं हो सकता। इसलिए इनमें यज्ञादि लिङ्गवाला गृहस्थाश्रम एक धर्मस्कन्ध है | ' ब्रह्मचारीति द्वितीयः ' ' तपः ' इससे तप प्रधान तृतीय वानप्रस्थ आश्रमका ग्रहण है।

इसप्रकार ' ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ' यहाँ परिशेषसे ' ब्रह्मसंस्थ ' से संन्यासका ही ग्रहण होता है। पूर्वपक्षीने अन्य आश्रमके प्रतिषेधमें जो ' वीरहा वा एष ' यह श्रुति प्रमाण दिया है, वह भी गृहस्थाश्रम युक्त पुरुषके लिए है अर्थात् जो गृहस्थ अज्ञान अथवा प्रमाद आदिसे यज्ञीय अग्निको बुझा देता है वह देवोंका पुत्रघाती होता है, यह अभिप्राय है। इस श्रुति से अविरोध और परामर्श होने से ( संन्यासाश्रम ) का अनुष्ठान करना चाहिए।। १ ९

3.4.20 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २०

सूत्र ३.४.२०

विधिर् वा धारणवत् ॥ ३.४.२० ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 793

पदच्छेद — विधिः , वा , धारणवत्

सूत्रार्थ — ( वा ) अथवा ( विधि : ) अन्य आश्रमकी विधि माननी चाहिए, ( धारणवत् ) जैसे ' अधस्तात् समिधम् ' इत्यादि श्रुतिमें समिध् धारणकी विधि है। मशं होता है। इसलिए अन्य आश्रमका गार्हस्थ्यके साथ अनुष्ठेयत्व समान है। उसीप्रकार ' एतमेव ० ' ( इस आत्मलोककी इच्छा करनेवाले संन्यासी सब कुछ त्यागकर चले जाते हैं ) इसका वेदके अनुवचन आदिके साथ सहोच्चारण है। ' ये चेमेऽरण्ये ० ' ( ये जो कि वनमें श्रद्धा और तप इनकी उपासना करते हैं ) इसका पञ्चाग्निविद्या के साथ सहोच्चारण है। और यह जो कहा गया है कि ' तप एव द्वितीयः ' इत्यादिमें अन्य आश्रमका विधान संदिग्ध है। यह दोष नहीं है, क्योंकि निश्चय कारणका सद्भाव है। ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इसप्रकार धर्मं स्कन्ध तीन हैं, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है। बहुत - से यज्ञ आदि धर्मं उत्पत्तिविधि [ यजेत इत्यादि ] से भिन्न होते हुए आश्रम सम्बन्धसे अन्यत्र त्रिवमें अन्तर्भाव नहीं किये जा सकते। उनमें यज्ञादि - लिङ्गक गृहस्थाश्रम यह एक धर्मं स्कन्ध निर्दिष्ट है | ' ब्रह्मचारी ' इसप्रकार स्पष्ट आश्रमका निर्देश है, ' तपः ' यह भी तप प्रधान आश्रमसे कौन - सा दूसरा धर्मस्कन्ध स्वीकार किया जाता है। ' ये चेमेऽरण्ये ' इसमें अरण्यलिङ्गसे श्रद्धा और तपसे आश्रमका

शाङ्करभाष्य

विधिर्वा अयमाश्रमान्तरस्य न परामर्शमात्रम्। ननु विधित्वाभ्युपगमे एकवाक्यताप्रतीतिरुपरुध्येत प्रतीयते चं अत्र एकवाक्यता पुण्यलोकफलास्त्रयो धर्मस्कन्धाः ब्रह्मसंस्थता त्वमृतत्वफलेति सत्यमेतत् सतीमपि तु एकवाक्यताप्रतीतिं परित्यज्य विधिरेवाभ्युपगन्तव्यः अपूर्वत्वात् विध्यन्तरस्यादर्शनात् विस्पष्टाच्चाश्रमान्तरप्रत्ययात् गुणवादकल्पनया एकवाक्यत्वयोजनानुपपत्तेः।

धारणवत् यथा अधस्तात्समिधं धारयन्ननुद्रवेदुपरि हि देवेभ्यो धारयति इत्यत्र सत्यामप्यधोधारणेन एकवाक्यताप्रतीतौ विधीयत एव उपरिधारणम् अपूर्वत्वात् तथा च उक्तं शेषलक्षणे विधिस्तु धारणेऽपूर्वत्वात् इति तद्वत् इहापि आश्रमपरामर्शश्रुतिः विधिरेवेति कल्प्यते।। यदापि परामर्श एवायमाश्रमान्तराणाम् तदापि ब्रह्मसंस्थता तावत् संस्तवसामर्थ्यादवश्यं विधेया अभ्युपगन्तव्या। सा च किं चतुर्ष्वाश्रमेषु यस्य कस्य चित् आहोस्वित्परिव्राजकस्यैवेति विवेक्तव्यम्।

यदि च ब्रह्मचर्यान्तेष्वाश्रमेषु परामृश्यमानेषु परिव्राजकोऽपि परामृष्टः ततश्चतुर्णामप्याश्रमाणां परामृष्टत्वाविशेषात् अनाश्रमित्वानुपपत्तेश्च यः कश्चिच्चतुर्ष्वाश्रमेषु ब्रह्मसंस्थो भविष्यति अथ न परामृष्टः ततः परिशिष्यमाणः परिव्राडेव ब्रह्मसंस्थ इति सेत्स्यति। तत्र तपःशब्देन वैखानसग्राहिणा परामृष्टः परिव्राडपि इति केचित्।

तदयुक्तम् न हि सत्यां गतौ वानप्रस्थविशेषणेन परिव्राजको ग्रहणमर्हति यथा अत्र ब्रह्मचारिगृहमेधिनौ असाधारणेनैव स्वेन स्वेन विशेषणेन विशेषितौ एवं भिक्षुवैखानसावपीति युक्तम् तपश्च असाधारणो धर्मो वानप्रस्थानां कायक्लेशप्रधानत्वात् तपःशब्दस्य तत्र रूढेः भिक्षोस्तु धर्म इन्द्रियसंयमादिः लक्षणयैव तपःशब्देनाभिलप्येत। चतुष्ट्वेन च प्रसिद्धा आश्रमाः त्रित्वेन परामृश्यन्त इत्यन्याय्यम्।

अपि च भेदव्यपदेशोऽत्र भवति त्रय एते पुण्यलोकभाजः एकोऽमृतत्वभागिति पृथक्त्वे च भेदव्यपदेशोऽवकल्पते न ह्येवं भवति देवदत्तयज्ञदत्तौ मन्दप्रज्ञौअन्यतरस्त्वनयोर्महाप्रज्ञ इति भवति त्वेवम् देवदत्तयज्ञदत्तौ मन्दप्रज्ञौ विष्णुमित्रस्तु महाप्रज्ञ इति तस्मात् पूर्वे त्रय आश्रमिणः पुण्यलोकभाजः परिशिष्यमाणः परिव्राट् अमृतत्वभाक्।

कथं पुनः ब्रह्मसंस्थशब्दो योगात्प्रवर्तमानः सर्वत्र संभवन् परिव्राजक एवावतिष्ठेत रूढ्यभ्युपगमे च आश्रममात्रादमृतत्वप्राप्तेर्ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्ग इति अत्रोच्यते ब्रह्मसंस्थ इति हि ब्रह्मणि परिसमाप्तिः अनन्यव्यापारतारूपं तन्निष्ठत्वमभिधीयते तच्च त्रयाणामाश्रमाणां न संभवति स्वाश्रमविहितकर्माननुष्ठाने प्रत्यवायश्रवणात् परिव्राजकस्य तु सर्वकर्मसंन्यासात् प्रत्यवायो न संभवति अननुष्ठाननिमित्तः शमदमादिस्तु तदीयो धर्मो ब्रह्मसंस्थाया उपोद्बलकः न विरोधी ब्रह्मनिष्ठत्वमेव हि तस्य शमदमाद्युपबृंहितं स्वाश्रमविहितं कर्म यज्ञादीनि च इतरेषाम् तद्व्यतिक्रमे च तस्य प्रत्यवायः।

तथा च न्यास इति ब्रह्मा ब्रह्मा हि परः परो हि ब्रह्मा। तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत् वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः इत्याद्याः श्रुतयः स्मृतयश्च तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः इत्याद्याः ब्रह्मसंस्थस्य कर्माभावं दर्शयन्ति। तस्मात् परिव्राजकस्य आश्रममात्रादमृतत्वप्राप्तेर्ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्ग इत्येषोऽपि दोषो नावतरति। तदेवं परामर्शेऽपि इतरेषामाश्रमाणाम् पारिव्राज्यं तावद्ब्रह्मसंस्थतालक्षणं लभ्येतैव।

अनपेक्ष्यैव जाबालश्रुतिमाश्रमान्तरविधायिनीम् अयमाचार्येण विचारः प्रवर्तितः विद्यत एव तु आश्रमान्तरविधिश्रुतिः प्रत्यक्षा ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्गृही भूत्वा वनी भवेद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत्।

यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा इति न च इयं श्रुतिः अनधिकृतविषया शक्या वक्तुम् अविशेषश्रवणात् पृथग्विधानाच्च अनधिकृतानाम् अथ पुन रेव व्रती वाव्रती वा स्नातको वास्नातको वोत्सन्नाग्निरनग्निको वा इत्यादिना ब्रह्मज्ञानपरिपाकाङ्गत्वाच्च पारिव्राज्यस्य न अनधिकृतविषयत्वम् तच्च दर्शयति अथ परिव्राड्विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः शुचिरद्रोही भैक्षाणो ब्रह्मभूयाय भवति इति। तस्मात्सिद्धा ऊर्ध्वरेतसामाश्रमाः। सिद्धं च ऊर्ध्वरेतःसु विधानाद्विद्यायाः स्वातन्त्र्यमिति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सिद्धान्ती -- बादरायण आचार्यका मत है अन्य आश्रम अनुष्ठेय है, क्योंकि उसका वेदमें श्रवण है। अग्निहोत्र आदिके अवश्य अनुष्ठेय होनेसे उसके विरोधसे अन्य आश्रमकी इच्छा न करनेवालों को भी स्वीकार करना चाहिए, ऐसा माननेवाले आचार्य बादरायण निराकरण करते हैं। किससे? इससे किसाम्यश्रुति है। गार्हस्थ्य के साथ अन्य आश्रयकी भी ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' इत्यादि . समान परामर्शं श्रुति देखी जाती है। जैसे यहाँ अन्य श्रुति विहित ही गाहस्थ्यंका परामर्श किया गया है, वैसे ही अन्य श्रुतिमें विहित अन्य आश्रमका भी परामर्श किया गया है, ऐसा समझना चाहिए | जैसे अन्य शास्त्रसे ही प्राप्त निवीत और प्राचीनावीतका उपवीतविधि परक वाक्योंमें परा-

अथवा यह अन्य आश्रमकी विधि है केवल अनुवाद नहीं है। परन्तु विधित्व स्वीकार करनेपर एकवाक्यता की प्रतीतिका बाध होगा और यहाँ तीन धर्मस्कन्ध पुण्यलोक फलवाले हैं और ब्रह्मसंस्थता अमृतत्व फलवाली है, इसप्रकार यहाँ एकवाक्यता प्रतीत होती है। यह ठीक है। सिद्धान्ती - . परन्तु यहाँ एकवाक्यता की प्रतीति होनेपर भी उसका परित्यागकर अपूर्व होनेसे विधि ही स्वीकार करनी चाहिए, क्योंकि इनकी अन्य विधि नहीं देखी जाती।

कारण कि अन्य आश्रमोंका स्पष्ट ज्ञान होनेसे गुणवाद कल्पनासे एकवाक्यताकी योजना नहीं हो सकती। धारणके समान | जैसे ' अधस्तात्समिधम् ' ( सुवामें रखी हुई हविष्यके नीचे समिधाको धारणकर अनुद्रवण करे - आहवनीयाग्निके समीप जाय, क्योंकि उन देवताओंके लिए हविपूणं जुहूके ऊपर समिधाका धारण करता है ) इसमें नीचे धारणके साथ एकवाक्यता प्रतीत होनेपर भी अपूर्व होनेसे ऊपर धारणका विधान किया जाता है अर्थात् ऊपर धारणकी विधि मानी जाती है।

जैसे कि ' विभिस्तु धारणेऽपूर्वत्वात् ' ( दैविक हविष्य में जुहूत्रवाके ऊपर समिधाका धारण अपूर्व . होनेसे विधि है ) इसप्रकार शेषलक्षणमे कहा गया है। वैसे ही यहाँ मी आश्रमकी परामशं श्रुति विधि ही है ऐसी कल्पना की जाती है। यद्यपि यह अन्य आश्रमोंका परामशं ही है, तो भी ब्रह्मसंस्थता स्तुतिकी सामथ्यसे विधेयरूपसे स्वीकार करनी चाहिए | और वह स्तुति क्या चार आश्रमोंमें चाहे जिस किसी आश्रमकी है अथवा परिव्राजककी ही है? इसका विवेचन करना चाहिए।

यदि ब्रह्मचारी पर्यन्त अनुवाद किए जानेवाले आश्रमोंमें परिव्राजक इसलिए श्रुति की अन्यथा अनुपपत्ति होनेसे स्कन्धशब्दको आश्रमपरक मानना चाहिए। और मी परामृष्ट हो तो चारों आश्रमोंका भी समानरूपसे परामर्श हो जानेसे ओर अनाश्रमित्व [ अनाश्रमी न तिष्ठेत् ] की अनुपपत्ति होनेसे चारों आश्रमोंमें जो कोई ब्रह्मसंस्थ होगा। और यदि परिव्राजकका परामर्श न हो तो अवशिष्ट प्ररिव्राजक ही ब्रह्मसंस्य है, ऐसा सिद्ध होगा।

उनमें वैखानसग्राही तपः शब्द से परिव्राजकका मो परामर्श होता है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। वह युक्त नहीं है, क्योंकि गतिके होनेपर वानप्रस्थ के विशेषणसे ( तपः शब्दसे ) परिव्राजकका ग्रहण नहीं हो सकता। जैसे यहाँ ब्रह्मचारी और गृहस्थो अपने - अपने आसाधारण विशेषणसे विशेषित होते हैं, वैसे भिक्षु और वानप्रस्थ मो विशेषित हों, यह युक्त है। तपः वानप्रस्थोंका असाधारण धर्म है, क्योंकि उनमें कायक्लेश प्रधान हैं। तपः शब्द कायक्लेश आदिमें रूढ है।

परन्तु परिव्राजकका इन्द्रिय संयम आदि रूप घमं तपः शब्दसे नहीं कहा जाता। और चाररूपसे प्रसिद्ध आश्रमोंका तीनरूपसे अनुवाद अयुक्त है। और ' यन्त्र एते ० ' ( जहाँ ये तीन पुण्यलोकके भागी हैं और एक अमृतत्वका भागी है ) इस प्रकार यहाँ भेदका व्यपदेश भी है और ( वानप्रस्थ और परिव्राजक ) पृथक् होनेपर यह भेद व्यपदेश भी उपपन्न होता है। देवदत्त और यज्ञदत्त मन्दबुद्धि हैं किन्तु इन दोनोंमें से एक महाप्राज्ञ है, ऐसा कभी नहीं होता।

परन्तु ऐसा तो होता है कि देवदत्त और यज्ञदत्त मन्दबुद्धि हैं पर विष्णुमित्र महाप्राज्ञ है। इसलिए पूर्वके तीन आश्रमी पुण्यलोकके मागी होते हैं और परिशिष्यमाण परिव्राजक ही अमृतत्वका मागी होता है। पू ० - किन्तु योगसे प्रवृत्त होता हुआ ब्रह्मसंस्थ शब्द सब आश्रमों में सम्भव होता हुआ फिर परिव्राजकमें ही क्यों अवस्थित हो? और रूढ़िके स्वीकार होनेपर केवल आश्रममात्रसे अमृतत्वकी प्राप्ति होनेसे ज्ञानमें अनर्थक प्रसङ्ग होगा?

सि ० - इसपर कहते हैं- ' ब्रह्मसंस्थः ' इस शब्दसे ब्रह्ममें परि' अथ पुनरेव व्रती वाव्रती वा स्नातकी वाऽस्नातको वोत्सन्नाग्निरनग्निको वा ' ( जाबा ० ४ ) इत्यादिना। समाप्ति - अनन्य व्यापारतारूप ब्रह्मनिष्ठत्व कहा है। वह तीनों आश्रमोंमें नहीं हो सकता, क्योंकि अपने आश्रम विहित कर्मानुष्ठान न होनेपर प्रत्यवायका श्रवण है। परन्तु परिव्राजकमें सब कर्मोंका संन्यास होनेसे कर्माननुष्ठान निमित्तक प्रत्यवाय पापका संभव नहीं है।

शम, दम आदि तो उस परिव्राजकका धर्म है वह ब्रह्मसंस्थताका पोषक है विरोधी नहीं है, क्योंकि शम, दम आदिसे सुदृढ ब्रह्मनिष्ठत्व ही उसका स्वाश्रम - विहित कर्म है और यज्ञ आदि अन्य आश्रमोंके कर्म हैं।

स्वाश्रम विहित कर्मके उल्लङ्घन होनेपर उसको प्रत्यवाय होता है, क्योंकि ' न्यास इति ० ' ( यह संन्यास ब्रह्मा है, क्योंकि ब्रह्मा ही श्रुति स्मृतिमें श्रेष्ठ है, इसलिए ब्रह्मा- संन्यास ही श्रेष्ठ है, ये जो तप हैं वे अल्प हैं, संन्यास ही इन सबसे अधिक श्रेष्ठ है ) ' वेदान्तविज्ञान ० ' ( जिन्होंने वेदान्त जनित विज्ञानसे ज्ञेय अर्थका अच्छी तरह निश्चय कर लिया है वे संन्यासयोग से यत्न करनेवाले समस्त शुद्ध चित्त पुरुष ब्रह्मलोक में देह त्याग करते समय परम अमर मावको प्राप्त हो सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुतियां और ' तबुद्धयः ० ' ( तद्रूप ' मैं ब्रह्म हूँ ' बुद्धिवाले, तद्रूप मनवाले, तत् निष्ठावाले और तत् परायण पुरुष परम गतिको प्राप्त होते हैं ) इत्यादि स्मृतियाँ ब्रह्मसंस्थ में कर्मका अभाव दिखलाती हैं।

इससे परिव्राजकको शाश्रममात्र से मोक्षकी प्राप्ति होनेसे ज्ञान में अनर्थ प्रसङ्ग है यह दोष भी अवतरित नहीं होता, अपितु इस प्रकार अन्य अश्रमोंका परामर्श होनेपर ब्रह्मसंस्थतारूप पारिव्राज्य प्राप्त ही होना चाहिए। अन्य आश्रमका विधान करनेवाली जाबाल श्रुतिकी अपेक्षा किये विना ही आचार्य जैमिनिने यह विचार प्रवृत्त किया है।

' ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य ० ' ( ब्रह्मचर्यं भली - भाँति समाप्त कर गृहस्थाश्रमी हो, गृहस्थ होकर वानप्रस्थ हो, वानप्रस्थ होकर परिव्राजक हो, अथवा इसके विपरीत ब्रह्मचयंसे, गृहस्थसे अथवा वानप्रस्थसे ही परिव्राजक हो ) इस प्रकार अन्य - सन्यास आश्रमकी प्रत्यक्ष विधि श्रुति विद्यमान है। यह श्रुति अनधिकृत विषयक नहीं कही जा सकती, क्योंकि यह अविशेष श्रुटि है।

' अथ पुनरेव व्रती ० ' ( व्रतो अथवा अव्रती, स्नातक अथवा अस्नातक, उत्सन्नाग्नि - नष्ट हुई अग्निवाला विधुर वा अग्निरहित पुरुष संन्यास ग्रहण करे ) इत्यादिसे कर्मने अनधिकारियोंका पृथक् विधान है। और पारिव्राज्य ब्रह्मज्ञान परिपाक द्वारा ब्रह्म साक्षात्कारका अङ्ग होने से अनधिकृत विषयक नहीं है। उसे ' अथ परिव्राड् ' ( वर्णं रहित वस्त्रवाला, मुण्डी, परिग्रह रहित, पवित्र, द्रोह रहित, भिक्षा करनेवाला परिव्राजक ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए समर्थं होता है ) यह श्रुति दिखलाती है।

इसलिए ऊर्ध्वरेताओंके आश्रम सिद्ध हैं और विद्याका ऊर्ध्वरेताओंके लिए विधान होनेसे विद्यामें स्वातन्त्र्य सिद्ध है॥ २०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' त्रयो धर्मस्कन्धाः ' यह श्रुति अन्य आश्रमोंकी अनुवादक कही गई है विधि नहीं है। अब इसे अन्य आश्रमों में विधि कहते हैं अनुवादक नहीं है, क्योंकि इसमें लाघव है। पूर्वपक्षी - यदि ' यो धर्मस्कन्धाः ' इसको अन्याश्रमोंका विधि माने तो ' त्रयो ० ' और ' ब्रह्मसंस्थो ० ' इन दोनों की एक वाक्यताका बाध होगा, अतः इसको चारों आश्रमोंकी विधि मानना अयुक्त है।

सिद्धान्ती - अन्य arrant किसी अन्य विधिसे पूर्व सिद्धि न होनेसे उनका अनुवाद भी सम्भव नहीं है। ' ब्रह्मसंस्थो ० ' इस वाक्यको स्तुति परक माननेसे लक्षणा दोष है, इसलिए एकवाक्यता प्रतीतिका त्यागकर अन्य आश्रमोंकी प्रथम किसी अन्य विधिसे सिद्धि न होनेके कारण उनकी विधि मानना युक्त है। जैसे ' धारणवत् ' यजमानकी मृत्यु होनेपर आहिताग्निमें अग्निहोत्र होमकर उस अग्निसे उसका दाह संस्कार किया जाता है, अतः उसे प्रेताग्निहोत्र कहते हैं।

उसमें जुहूमें हविको मरकर हवन के लिए जब बाहवनीय अग्निके पास ले जाय, तब उस हविको ' अधस्तात्समिधम्, इससे विहित अधोधारणका स्तावक मानकर ' ऊपरि हि ' इस वाक्यकी एकवाक्यता हो सकती है, तो भी दैवहोम में जुहू दण्डके ऊपर समिधाके धारणमें ही अपूर्व होनेसे विधि है। इसप्रकार जैमिनि आचार्यने वाक्यभेद तृतीयाध्यायमें कहा है। इसप्रकार यहाँ भी चारों आश्रमोंकी विधि है। अब तीन आश्रमोंका अनुवादकर पारिव्राज्य विधिमें ' यदापि ' इत्यादिसे अन्य पक्ष कहा जाता है।

* क्या यह ' व्रह्मसंस्थः ' शब्द यौगिक है कि रूढि? इसको ' कथम् ' आदिसे कहते हैं। यद्यपि ' ब्रह्मसंस्थः ' शब्द संन्यासाश्रममें रूढ़ नहीं है, तो भी यौगिक अर्थसे उसी अर्थ की उपस्थिति करता है, क्योंकि अन्य आश्रमोंमें यौगिक अर्थका संभव नहीं है॥ २०

स्तुतिमात्राधिकरणम् । स् ० २१-२२

3.4.21 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २१

सूत्र ३.४.२१

स्तुतिमात्रम् उपादानाद् इति चेन् नापूर्वत्वात् ॥ ३.४.२१ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 797

पदच्छेद — स्तुतिमात्रम् , उपादानात् , इति चेत् , न , अपूर्वत्वात्

सूत्रार्थ — उद्गीथ आदि उपासनाओंमें श्रूयमाण ' स एष रसानां ' इत्यादि श्रुतियाँ ( स्तुतिमात्रम् ) केवल स्तुतिमात्र हैं, ( उपादानात् ) क्योंकि उद्गीथ आदि कर्माङ्गोंका ग्रहण है, ( इतिचेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( अपूर्वत्वात् ) क्योंकि वे अपूर्व हैं, अतः उनका विधान है।

शाङ्करभाष्य

स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो यदुद्गीथः इयमेवर्गग्निः साम अयं वाव लोकः एषोऽग्निश्चितः तदिदमेवोक्थम् इयमेव पृथिवी इत्येवंजातीयकाः श्रुतयः किमुद्गीथादेः स्तुत्यर्थाः आहोस्वित् उपासनाविध्यर्था इत्यस्मिन्संशये स्तुत्यर्था इति युक्तम् उद्गीथादीनि कर्माङ्गान्युपादाय श्रवणात् यथा इयमेव जुहूरादित्यः कूर्मः स्वर्गो लोक आहवनीयः इत्याद्या जुह्वादिस्तुत्यर्थाः तद्वत् इति चेत् नेत्याह न हि स्तुतिमात्रमासां श्रुतीनां प्रयोजनं युक्तम् अपूर्वत्वात् विध्यर्थतायां हि अपूर्वोऽर्थो विहितो भवति स्तुत्यर्थतायां त्वानर्थक्यमेव स्यात् विधायकस्य हि शब्दस्य वाक्यशेषभावं प्रतिपद्यमाना स्तुतिरुपयुज्यत इत्युक्तम् विधिना त्वेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः इत्यत्र प्रदेशान्तरविहितानां तु उद्गीथादीनाम् इयं प्रदेशान्तरपठिता स्तुतिः वाक्यशेषभावमप्रतिपद्यमाना अनर्थिकैव स्यात् इयमेव जुहूः इत्यादि तु विधिसंनिधावेवाम्नातमिति वैषम्यम्। तस्मात् विध्यर्था एव एवंजातीयकाः श्रुतयः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' स एष रसानां ० ' ( यह जो उद्गोथ संज्ञक ओंकार है वह सम्पूर्ण भूतादि रसोंमें रसतम, उत्कृष्ट, परमात्माका प्रतीक होनेसे परम परमात्मा के समान उपास्य होनेसे परमात्मा के स्थानके योग्य यह उद्गीथ पृथिवी आदि रसोंमें आठवाँ है ) ' इयमे वर्गग्निः ० ' ( यह पृथिवी ही ऋक् है और साम अग्नि है अर्थात् ऋमें पृथिवी दृष्टि और साममें अग्निदृष्टि करनी चाहिए ) ' अयं वाव लोकः ० ' ( यही लोक निश्चित यह अग्निचित है ) ' तदिदमेवोक्थ ० ' ( वह उक्थ यही है जो यह पृथिवी है ) इस प्रकारकी श्रुतियाँ क्या उद्गीथ आदिकी स्तुति के लिए हैं अथवा उपासनाविधिके लिए हैं? ऐसा संशय होने पर स्तुति के लिए हैं, यह युक्त है, क्योंकि उद्गीथ आदि कर्माङ्गोंको लेकर इनका श्रवण है। जैसे ' इयमेव ० ' ( यह पृथिवी जुहू है, आदित्य चयनस्थ कूर्म पुरोडाय है और स्वर्गलोक आहवनीय अग्नि है ) इत्यादि श्रुति जुहू आदिकी स्तुतिके लिए हैं, वैसे प्रकृत में भी। ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ऐसा [ सूत्रकार ] कहते हैं। इन श्रुतियोंका केवल स्तुतिमात्र प्रयोजन मानना युक्त नहीं है, क्योंकि वैलक्षण्य है। इसलिए इस प्रकारकी श्रुतियाँ विधिके लिए ही हैं॥ २१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पृथिवी, जल, ओषधि, पुरुष, वाक्, काक् और साम इन सात रसोंका आठवाँ उद्गीथका अवयव ओंकार परम रसतम है, क्योंकि वह परमात्माकी प्रतीक है। और पर ब्रह्म के अर्ध - स्थानको पाता है, अत : ओंकार पराध्यं है अर्थात् परब्रह्मके समान उपास्य है। इन उद्धृत श्रुतियोंमें ओंकारके उपादान और अपूर्वार्थता होनेसे ' किम् ' इत्यादिसे संशय कहते हैं। इसपर ' न हि ' इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं। पूर्वपक्षमें इनको स्तावक होनेसे अनुष्ठानका अभाव है, सिद्धान्तमें इनमें विधायक होने से अनुष्ठान है॥ २१

3.4.22 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २२

सूत्र ३.४.२२

भावशब्दाच् च ॥ ३.४.२२ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 798

पदच्छेद — भावशब्दात् , च

सूत्रार्थ — और ' उद्गीथमुपासीत ' इत्यादि विधि वाक्योंके होनेसे ' स एष ' इत्यादि श्रुतिवाक्य विधि परक ही हैं।

शाङ्करभाष्य

उद्गीथमुपासीत सामोपासीत अहमुक्थमस्मीति विद्यात् इत्यादयश्च विस्पष्टा विधिशब्दाः श्रूयन्ते ते च स्तुतिमात्रप्रयोजनतायां व्याहन्येरन्। तथा च न्यायविदां स्मरणम् कुर्यात्क्रियेत कर्तव्यं भवेत्स्यादिति पञ्चमम्। एतत्स्यात्सर्ववेदेषु नियतं विधिलक्षणम् इति लिङाद्यर्थो विधिरिति मन्यमानास्त एवं स्मरन्ति। प्रतिप्रकरणं च फलानि श्राव्यन्ते आपयिता ह वै कामानां भवति एष ह्येव कामागानस्येष्टे कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च इत्यादीनि तस्मादप्युपासनविधानार्था उद्गीथादिश्रुतयः।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.४.२३ के अनुवादके साथ है।)

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.२३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

पारिप्लवाधिकरणम्

3.4.23 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २३

सूत्र ३.४.२३

पारिप्लवार्था इति चेन् न विशेषितत्वात् ॥ ३.४.२३ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 798

पदच्छेद — पारिप्लावार्था :, इति चेत् , न , विशेषितत्वात्

सूत्रार्थ — ( पारिप्लवार्थाः ) ' अथ ह याज्ञवल्क्स्य द्वे मायें ' इत्यादि आख्यायिकाएँ पारिप्लव वे अपूर्व है। इन श्रुतियोंको विध्यर्थंक होनेपर अपूर्व अर्थका विधान होता है। इनको स्तुत्यर्थंक माननेपर तो अनर्थक ही होंगी, क्योंकि विध्यथंक शब्दके वाक्यशेषत्वको प्राप्त होनेवाली स्तुति उपयुक्त होती है, ऐसा ' विधिना त्वेकवाक्यत्वात् ० ' ( विधियोंके स्वावकरूपसे विधिवाक्योंके साथ एक वाक्यता होनेसे अर्थवाद वाक्योंकी सार्थकता होती है ) इस सूत्र में कहा गया है। परन्तु अन्य स्थलमें विहित उद्गीथ आदिकी अन्य प्रदेशमें पठित यह स्तुति वाक्यशेषत्वको नं प्राप्त होती हुई अनर्थक ही होगी। ' इयमेव जुहू : ० ' ( यह पृथिवी ही जुहू है ) इत्यादि तो विधिकी सन्निधिमें कहा गया है, यह

शाङ्करभाष्य

अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुर्मैत्रेयी च कात्यायनी च प्रतर्दनो ह वै दैवोदासिरिन्द्रस्य प्रियं धामोपजगाम जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य आस इत्येवमादिषु वेदान्तपठितेष्वाख्यानेषु संशयः किमिमानि पारिप्लवप्रयोगार्थानि आहोस्वित्संनिहितविद्याप्रतिपत्त्यर्थानीति। पारिप्लवार्था इमा आख्यानश्रुतयः आख्यानसामान्यात् आख्यानप्रयोगस्य च पारिप्लवे चोदितत्वात् ततश्च विद्याप्रधानत्वं वेदान्तानां न स्यात् मन्त्रवत् प्रयोगशेषत्वादिति चेत् तन्न कस्मात् विशेषितत्वात् पारिप्लवमाचक्षीत इति हि प्रकृत्य मनुर्वैवस्वतो राजा इत्येवमादीनि कानिचिदेव आख्यानानि तत्र विशेष्यन्ते आख्यानसामान्याच्चेत् सर्वगृहीतिः स्यात् अनर्थकमेवेदं विशेषणं भवेत्। तस्मात् न पारिप्लवार्था एता आख्यानश्रुतयः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' उद्गीथमुपासीत ' ( उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) ' सामोपासीत ' ( सामकी उपासना करनी चाहिए ) ' अहमुक्थमस्मीति विद्यात् ' ( मैं उक्थ हूँ, ऐसा ध्यान करे ) इत्यादि स्पष्टरूपसे विधि तियाँ सुनी जाती हैं, वे केवल स्तुति प्रयोजनवाली माननेपर बाधित होंगी। और ' कुर्यात् क्रियेत् ० ' ( कुर्यात् करे, क्रियेत - किया जाय, कर्तव्यम् - करना चाहिए, भवेत् - हो और पाँचवा स्यात् - हो, सब वेदोंमें यह निश्चित विधि लक्षण है ) इसप्रकार यह न्यायवेत्ताओंकी स्मृति है। लिङ् आदिका अर्थं विधि है ऐसा मानते हुए वे इसप्रकार स्मरण करते हैं, और प्रत्येक प्रकरणमें ' आपयिता ह बै ० ' ( जो विद्वान् आप्तिगुणविशिष्ट इस उद्गीथ अक्षरकी उपासना करता है, वह यजमानको सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला होता है ) ' एष ह्येव ० ' ( क्योंकि यह उद्गाता कामना सम्बन्धी आगानके उद्गानसे उन कामनाओंको सम्पन्न करनेमें समर्थ होता है ) ' कल्पन्ते हास्मै ० ' ( उस उपासकके नामक कर्म अङ्ग हैं, ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( विशेषित्वात् ) क्योंकि ' पारिप्लवमाचक्षीत ' इसप्रकार श्रुतिमें विशेषित की गई हैं।

' अथ ह ० ' ( यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यको मैत्रेयी और कात्यायनी ये दो मार्याएँ थीं ) ' प्रतर्दनो ह ० ' ( दिवोदासका पुत्र प्रतर्दन इन्द्रके प्रिय स्थान स्वर्ग में गया ) ' जानश्रुतिः हि पौत्रायण : ० ' ( जनश्रुतिकी सन्तान - परम्परा में उत्पन्न एवं उसके पुत्रका पौत्र श्रद्धापूर्वक देनेवाला एवं बहुत दान करनेवाला था और उसके यहाँ भोजनाथियोंके लिए बहुत - सा अन्न पकाया जाता था ) इत्यादि वेदान्त पठित आख्यानोंमें संशय होता है कि क्या ये आख्यान पारिप्लवके प्रयोगके लिए हैं अथवा सन्निहित विद्याकी प्रतिपत्ति के लिए हैं?

ये आख्यानश्रुतियाँ पारिप्लवार्थक हैं, क्योंकि इनमें आख्यानत्व समान है। और आख्यानका प्रयोग पारिप्लवमें विहित है। उससे वेदान्तवाक्योंमें मन्त्रों ( देवस्य त्वा सवितुः ) के समान प्रयोगका शेष होनेसे विद्या प्रधानत्व नहीं है। सिद्धान्ती - ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, किससे? इससे कि विशेषित होनेसे। कारण कि ' पारिप्लवमाचक्षीत ० ' ( पारिप्लव कहे ) ऐसा उपक्रम कर ' मनुर्वैवस्वतो राजा ' ( विवस्वान्का पुत्र राजा मनु ) इत्यादि कितने ही वाख्यान श्रुति विशेषित किये जाते हैं।

यदि आख्यानत्व समान धर्मसे सब वाख्यानोंका ज्ञान हो तो [ पारिप्लवमाचक्षीत ] यह विशेषण निष्फल ही होगा। इसलिए ये आख्यानश्रुतियाँ पारिप्लवार्थक नहीं हैं॥२३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अश्वमेध यागमें पुत्र बादि परिवार सहित राजाको रात में सम्मुख बैठाकर अध्वर्युं ' पारिप्लवमाचक्षीत ' ( पारिप्लव- अनेक प्रकारके वैदिक उपाख्यान कहे ) इस प्रकार पारिप्लव नामक प्रयोगका विधान किया गया है। उसीप्रकार वेदान्तों में उक्त कथाएँ भी इन आख्यानोंके समान हैं और विद्याका संविधान भी है, अतः ' किम् ' इत्यादिसे संशय होनेपर पूर्वपक्षी - ' पारिप्लवार्था : ' आदिसे कहते हैं। सिद्धान्ती – कथाएँ गुरु और शिष्य के समाचार प्रदर्शनसे बुद्धिमें सरलतासे बोधद्वारा संनिहित विद्याके अङ्ग हैं, अतः पारिप्लवार्थक नहीं हैं, क्योंकि सामथ्यंरूप लिङ्ग विद्यमान है, इससे विद्याका ही प्राधान्य है। अध्वर्युं प्रथम दिन में ' मनुर्वैवस्वतो राजा ' दूसरे दिन ' यमो बैवस्वत . ' तीसरे दिन ' वरुण आदित्यः ' इत्यादि आख्यायिका कहे। इसप्रकार वाक्यशेषमें विशेष आख्यायिकाओं कथन है। यद्यपि ' सर्वाण्याख्यानानि पारिप्लवे ' इस सर्वशब्दसे समस्त आख्यानोंका ग्रहण हो सकता है, तो मी ' पारिप्लवमाचक्षीत ' इस विशेष के ग्रहणसे यह सिद्ध होता है कि आख्यान श्रतियाँ पारिप्लवार्थक नहीं हैं, किन्तु विद्याकी स्तुति के लिए हैं॥ २३

3.4.24 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २४

सूत्र ३.४.२४

तथा चैकवाक्योपबन्धात् ॥ ३.४.२४ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 799

पदच्छेद — तथा , च एकवाक्यतोपबन्धात् । प्रति ऊर्ध्व और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ) इत्यादि फलोंका श्रवण कराया जाता है । उससे भी उद्गीथ आदि श्रुतियाँ उपासनाका विधान करने के लिए हैं ॥ २२ ॥

शाङ्करभाष्य

असति च पारिप्लवार्थत्वे आख्यानानां संनिहितविद्याप्रतिपादनोपयोगितैव न्याय्या एकवाक्यतोपबन्धात् तथा हि तत्र तत्र संनिहिताभिर्विद्याभिरेकवाक्यता दृश्यते प्ररोचनोपयोगात् प्रतिपत्तिसौकर्योपयोगाच्च मैत्रेयीब्राह्मणे तावत् आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः इत्याद्यया विद्यया एकवाक्यता दृश्यते प्रातर्दनेऽपि प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा इत्याद्यया जानश्रुतिः इत्यत्रापि वायुर्वाव संवर्गः इत्याद्यया यथा स आत्मनो वपामुदखिदत् इत्येवमादीनां कर्मश्रुतिगतानामाख्यानानां संनिहितविधिस्तुत्यर्थता तद्वत्। तस्मान्न पारिप्लवार्थत्वम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रार्थ - ( च ) और ( तथा ) वैसे ही ये आख्यायिकाएँ विद्याके लिए हैं, ( एकवाक्यबन्धात् ) क्योंकि सन्निहित तत् तत् विद्या के साथ एकवाक्यताका उपबन्ध - उपपत्ति है।

आख्यानोंके पारिप्लवार्थक न होनेपर उनकी सन्निहित विद्या प्रतिपादनकी उपयोगिता हीं त है, क्योंकि एक वाक्यताका उपबन्ध - उपपत्ति है। कारण कि उसी प्रकार तत् चत् प्रदेशमें संनिविद्याओंके साथ तत् तत् आख्यानोंकी, प्रीति उत्पन्न करनेके उपयोग से और ज्ञान सौकर्यके उपसे एकवाक्यता देखी जाती है। मैत्रेयीब्राह्मण में वो ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्य, ( हे मैत्रेयी! आत्माका दर्शन करना चाहिए ) इत्यादि विद्या के साथ आख्यानोंको एकवाक्यता देखी जाती है। { र्दन ब्राह्मण में भी ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' ( मैं प्रज्ञात्मा प्राण हूँ ) इत्यादि विद्या के साथ एकवाक्यता जाती है। और ' जानश्रुतिः ' यहाँ भी ' वायुर्वाव संवर्ग : ' ( वायु ही संवर्ग है ) इत्यादि विद्याके प एकवाक्यता देखनेमें आती है। जैसे ' स आत्म तो ० ' ( उस प्रजापतिने होम के लिए वपा हृदय के तरके मागका उद्धरण किया ) इत्यादि कमंश्रुति में स्थित आख्यान संनिहित विधिको स्तुति के लिए वैसे ही प्रकरणमें समझना चाहिए। इससे ये व्याख्यान पारिप्लवार्थक नहीं हैं॥ २४

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.२५ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

अग्नीन्धनाद्यधिकरणम् |

3.4.25 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २५

सूत्र ३.४.२५

अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ ३.४.२५ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 800

पदच्छेद — अतः , एव , च , अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा

सूत्रार्थ — ( अतएव ) अतएव विद्या पुरुषार्थंका हेतु होनेसे ( अग्नीन्धनादि ) अग्नीन्धनं दे आश्रम कर्मोकी ( अनपेक्षा ) अपेक्षा नहीं करती।

शाङ्करभाष्य

पुरुषार्थोऽतः शब्दात् इत्येतत् व्यवहितमपि संभवात् अतः इति परामृश्यते। अत एव च विद्यायाः पुरुषार्थहेतुत्वात् अग्नीन्धनादीन्याश्रमकर्माणि विद्यया स्वार्थसिद्धौ नापेक्षितव्यानीति आद्यस्यैवाधिकरणस्य फलमुपसंहरत्यधिकविवक्षया।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' पुरुषार्थोऽतः शब्दात् ' ( इस औपनिषद् आत्मज्ञानसे पुरुषार्थ - मोक्ष होता है ) यद्यपि यह पार्थं अधिकरण व्यवहित- दूरस्थ है, तो भी सम्भव होनेसे सूत्रस्थ ' अतः ' शब्दसे उसका परामशं पा जाता है। अतएव - विद्याको मोक्षका हेतु होनेसे ही अग्नि, इन्धन आदि आश्रम कर्म विद्या अपने फलसिद्धि में अपेक्षितव्य नहीं हैं। इसप्रकार आद्य अधिकरण के फलका अधिक कहने की छासे उपसंहार करते हैं॥ २५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * विद्या स्वतन्त्ररूप प्रमेयका तीन बधिकरणोंसे दृढीकरणकर आद्य अधिकरणका ' अतएवं ' दिसे फल कहते हैं। ब्रह्मविद्या मोक्षरूप अपने फलके संपादन में सहकारिरूपसे कर्मोकी अपेक्षा ती है कि नहीं? इसप्रकार संशय होनेपर ' तेनैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसः ' ( शुद्धान्तःकरणवाला रवि होकर आत्मज्ञानसे मोक्षको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्र तिसे ज्ञान और कर्मके समुच्चयसे मोक्षप्ति वर्णित है, अतः ' पुरुषार्थोऽतः शब्दात् ' इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं॥ २५

सर्वापेक्षाधिकरणम्

3.4.26 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २६

सूत्र ३.४.२६

सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेर् अश्ववत् ॥ ३.४.२६ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 801

पदच्छेद — सर्वापेक्षा , च , यज्ञादिश्रुतेः , अश्ववत्

सूत्रार्थ — विद्या अपनी उत्पत्ति में ( सर्वापेक्षा ) सभी आश्रम कर्मों की अपेक्षा करती है, ( यज्ञादिश्रुतेः ) क्योंकि ' विविदिषन्ति यज्ञेन ' इत्यादि श्रुतिसे यज्ञ आदिमें ज्ञानोत्पत्तिहेतुता प्रतिपादित है। ( अश्वदत् ) जैसे अश्व योग्यतावश रथमें जोता जाता है हलमें नहीं, वैसे ही कर्म भी योग्यतावश ज्ञानोत्पत्ति में अपेक्षित है मोक्षमें नहीं।

शाङ्करभाष्य

इदमिदानीं चिन्त्यते किं विद्याया अत्यन्तमेवानपेक्षा आश्रमकर्मणाम् उत अस्ति काचिदपेक्षेति। तत्र अत एवाग्नीन्धनादीन्याश्रमकर्माणि विद्यया स्वार्थसिद्धौ नापेक्ष्यन्ते एवमत्यन्तमेवानपेक्षायां प्राप्तायाम् इदमुच्यते सर्वापेक्षा चेति अपेक्षते च विद्या सर्वाण्याश्रमकर्माणि नात्यन्तमनपेक्षैव। ननु विरुद्धमिदं वचनम् अपेक्षते च आश्रमकर्माणि विद्या नापेक्षते चेति।

नेति ब्रूमः उत्पन्ना हि विद्या फलसिद्धिं प्रति न किंचिदन्यदपेक्षते उत्पत्तिं प्रति तु अपेक्षते कुतः यज्ञादिश्रुतेः तथा हि श्रुतिः तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन इति यज्ञादीनां विद्यासाधनभावं दर्शयति विविदिषासंयोगाच्चैषामुत्पत्तिसाधनभावोऽवसीयते अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् इत्यत्र च विद्यासाधनभूतस्य ब्रह्मचर्यस्य यज्ञादिभिः संस्तवात् यज्ञादीनामपि हि साधनभावः सूच्यते सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि इत्येवमाद्या च श्रुतिः आश्रमकर्मणां विद्यासाधनभावं सूचयति स्मृतिरपि कषायपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते इत्येवमाद्या। अश्ववदिति योग्यतानिदर्शनम् यथा च योग्यतावशेन अश्वो न लाङ्गलाकर्षणे युज्यते रथचर्यायां तु युज्यते एवमाश्रमकर्माणि विद्यया फलसिद्धौ नापेक्ष्यन्ते उत्पत्तौ च अपेक्ष्यन्त इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — * इदमिदानीं चिन्त्यते - किं विद्याया अत्यन्तमेवानपेक्षाऽऽश्रमकर्मणामुतास्ति

अब यह विचार किया जाता है कि क्या विद्याको आश्रमविहित कर्मोकी बिल्कुल अपेक्षा नहीं है अथवा कुछ अपेक्षा है? उसमें अतएव अग्नीन्धन - यज्ञादि आश्रम कर्मोंकी विद्याको अपने फलसिद्धिमें अपेक्षा नहीं है, इसप्रकार अत्यन्त अनपेक्षा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं - ' सर्वापेक्षा च ' विद्या सर्व आश्रमकर्मोकी अपेक्षा करती है उसे अत्यन्त अनपेक्षा नहीं है। परन्तु यह तो विरुद्ध वचन है कि विद्या आश्रम कर्मोंकी अपेक्षा करती है और अपेक्षा नहीं करती?

विरुद्ध नहीं है, ऐसा हम कहते हैं — क्योंकि उत्पन्न हुई विद्या फलसिद्धि के लिए किसी अन्यको अपेक्षा नहीं करती, किन्तु अपनी उत्पत्तिके लिए तो अपेक्षा करती है, किससे? इससे कि इसमें यज्ञादि श्रुति है। जैसे कि ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' ( उस आत्माको ब्राह्मण यज्ञ, दान और निष्काम ठपके द्वारा जाननेको इच्छा करें ) यह श्रुति यज्ञ आदिको विद्या के साधनरूपसे दिखलाती है और विविदिषाके सम्बन्धसे इन यज्ञादिमें विद्याकी उत्पत्ति के प्रति साधनत्व निश्चित किया जाता है।

' अथ यद्यज्ञ ० ' ( अब लोकमें जिसे ' यज्ञ ' परम पुरुषार्थंका साधन कहते हैं वह ब्रह्मचर्यं ही है ) इसमें विद्याके साधनभूत ब्रह्मचर्यकी यज्ञ आदि द्वारा स्तुति होनेसे यज्ञ आदि भी विद्याके लिए साधन हैं ऐसा सूचित होता है। ' सर्वे वेदा ० ' ( सब वेद जिस पदका वर्णन करते हैं, समस्त तपोंको जिसकी प्राप्ति के लिये कहते हैं, जिसकी इच्छासे [ मुमुक्षुजन ] ब्रह्मचयंका पालन करते हैं। उस पदको मैं तुमसे संक्षेपसे कहता हूँ ) इत्यादि श्रुति आश्रम कर्मों में विद्या प्रति साधनभाव सूचित करती है।

और ' कषायपक्तिः ० ' ( कर्म- राग द्वेष आदि पापकी निवृत्ति करनेवाले हैं, ज्ञान तो परम गति - मोक्षका साधन है। कर्मोंसे पापका नाश होनेपर तदनन्तर ज्ञान प्रवृत्त होता है ) इत्यादि स्मृति भी है। ' अश्वके समान ' यह योग्यता विषयक दृष्टान्त है 1

। जैसे योग्यतावश अश्व हल खींचने में नियुक्त नहीं किया जाता है, किन्तु रथ खींचने में तो नियुक्त किया जाता है, वैसे आश्रमक विद्यासे फलसिद्धि में अपेक्षित नहीं, किन्तु उसकी उत्पत्ति में तो अपेक्षित हैं || २६ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ** यद्यपि विद्याको अपने फलके संपादनमें कर्मोकी अपेक्षा नहीं है, तो भी उसे अपनी उत्पत्ति में आश्रम कर्मोंको अपेक्षा है। जैसे- ' ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः। कषाये कर्मभिः पक्के ततो ज्ञानं प्रवर्तते॥ ' ( पाप कर्मके क्षय होनेसे पुरुषोंको ज्ञान्न उत्पन्न होता है और कर्मोंसे पापके नष्ट होनेपर ज्ञान प्रवृत्त होता है ) इत्यादि स्मृति और ' अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ' ( अविद्या - कसे मृत्यु - पापका अतिक्रमणकर ज्ञानसे अमृतत्व मोक्षको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुति कमसे पापकी निवृत्ति होनेपर ज्ञानसे मोक्षका प्रतिपादन करती है। पूर्वपक्ष में विद्याके लिये कर्मोंके अनुष्ठानकी असिद्धि फल है और सिद्धान्तमें कर्मानुष्ठानकी सिद्धि फल है॥ २६

3.4.27 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २७

सूत्र ३.४.२७

शमदमाद्युपेतस् स्यात् तथापि तु तद्विधेस् तदङ्गतया तेषाम् अप्य् अवश्यानुष्ठेयत्वात् ॥ ३.४.२७ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 802

पदच्छेद — शमदमाद्युपेतः स्यात् , तथापि , तु , तद्विधेः , तदङ्गतया , तेषाम् अवश्यानुष्ठेयत्वात्

सूत्रार्थ — - यद्यपि ' विविदिषन्ति ' इत्यादिमें वर्तमान कालका प्रयोग होनेसे विधि नहीं है, ( तथापि ) तो मी ब्रह्मविद्या के अभिलाषीको ( शमदमाद्युपेतः स्यात् ) राम दम आदिसे युक्त होना चाहिए, क्योंकि ( तदङ्गतया ) विद्याके अङ्गरूपसे ( तद्विधेः ) ' तस्मादेवंवित् ० ' इत्यादि श्रुतिसे ( तेषाम् ) राम आदिका विधान है और विहित होनेके कारण ( अवश्यानुष्ठेयत्वात् ) वे अवश्य अनुष्ठेय हैं।

शाङ्करभाष्य

यदि कश्चिन्मन्येत यज्ञादीनां विद्यासाधनभावो न न्याय्यः विध्यभावात् यज्ञेन विविदिषन्ति इत्येवंजातीयका हि श्रुतिः अनुवादस्वरूपा विद्याभिष्टवपरा न यज्ञादिविधिपरा इत्थं महाभागा विद्या यत् यज्ञादिभिरेतामवाप्तुमिच्छन्तीति तथापि तु शमदमाद्युपेतः स्यात् विद्यार्थी तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति इति विद्यासाधनत्वेन शमदमादीनां विधानात् विहितानां च अवश्यानुष्ठेयत्वात्।

ननु अत्रापि शमाद्युपेतो भूत्वा पश्यतीति वर्तमानापदेश उपलभ्यते न विधिः नेति ब्रूमः तस्मात् इति प्रकृतप्रशंसापरिग्रहाद्विधित्वप्रतीतेः पश्येत् इति च माध्यंदिना विस्पष्टमेव विधिमधीयते। तस्मात् यज्ञाद्यनपेक्षायामपि शमादीन्यपेक्षितव्यानि। यज्ञादीन्यपि तु अपेक्षितव्यानि यज्ञादिश्रुतेरेव।

ननु उक्तम् यज्ञादिभिर्विविदिषन्तीत्यत्र न विधिरुपलभ्यत इति सत्यमुक्तम् तथापि तु अपूर्वत्वात्संयोगस्य विधिः परिकल्प्यते न हि अयं यज्ञादीनां विविदिषासंयोगः पूर्वं प्राप्तः येनानूद्येत तस्मात्पूषा प्रपिष्टभागोऽदन्तको हि इत्येवमादिषु च अश्रुतविधिकेष्वपि वाक्येषु अपूर्वत्वाद्विधिं परिकल्प्य पौष्णं पेषणं विकृतौ प्रतीयेत इत्यादिविचारः प्रथमे तन्त्रे प्रवर्तितः तथा च उक्तम् विधिर्वा धारणवत् इति।

स्मृतिष्वपि भगवद्गीताद्यासु अनभिसंधाय फलम् अनुष्ठितानि यज्ञादीनि मुमुक्षोर्ज्ञानसाधनानि भवन्तीति प्रपञ्चितम्। तस्माद्यज्ञादीनि शमदमादीनि च यथाश्रमं सर्वाण्येव आश्रमकर्माणि विद्योत्पत्तावपेक्षितव्यानि। तत्रापि एवंवित् इति विद्यासंयोगात् प्रत्यासन्नानि विद्यासाधनानि शमादीनि विविदिषासंयोगात्तु बाह्यतराणि यज्ञादीनीति विवेक्तव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यदि कोई ऐसा माने कि यज्ञ आदिमें विद्याके प्रति साधनभाव उचित नहीं है, क्योंकि विधिका अभाव है। ' यज्ञेन विविदिषन्ति ' ( यज्ञद्वारा जाननेकी इच्छा करें ) इस प्रकारकी श्रुति अनुवादरूप है, अतः वह विद्याकी स्तुति परक है यज्ञादि विधि परक नहीं है। यह ऐसी महाभागा विद्या है कि मुमुक्षुलोग उसे यज्ञ आदिसे प्राप्त करना चाहते हैं। यद्यपि ऐसा है, तथापि ब्रह्मविद्यार्थीको राम दम आदिसे युक्त होना चाहिये, क्योंकि ' तस्मादेवंविच्छान्तो ० ' ( अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें कार्यकरणसंघातमें हो आत्माको देखता है ) इस प्रकार शम, दम आदिका विद्याके प्रति साधनरूपसे विधान है और विहित होने से शम, दम आदि अवश्य अनुष्ठेय हैं। परन्तु यहाँ पर भी ' शम आदि युक्त होकर अनुभव करता है ' ' पश्यति ' यह वर्तमानकालका प्रयोग उपलब्ध होता है विधि उपलब्ध नहीं होती। हम कहते हैं कि ऐसा नहीं, क्योंकि ' तस्मात् ० ' इस श्रुतिस्थ पदसे प्रकृत ( ब्रह्मविद्या ) की प्रशंसा ग्रहण किये जानेसे यह विधि प्रतीत होती है I

। और माध्यन्दिन शाखावाले तो ' पश्येत् ' इस प्रकार स्पष्टरूपयेही विधिका अध्ययन करते हैं | इससे यज्ञ आदिकी अपेक्षा न होनेपर भी राम आदिकी अपेक्षा होनी चाहिए। यज्ञ आदिकी घी तो अपेक्षा होनी चाहिए, क्योंकि यश आदि श्रुति है। परन्तु यह कहा गया है कि ' यज्ञादिसे जाननेकी इच्छा करते हैं ' इसमें विधि उपलब्ध नहीं होती।

ठीक, कहा गया है, तथापि संयोग - सम्बन्धके अपूर्व होनेसे विधिक कल्पनाकी जाती है, क्योंकि यज्ञ आदिका विविदिषाके साथ यह सम्बन्ध पहले किसी अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, जिससे उसका अनुवाद माना जाय।

' तस्मात्पूषा ० ' ( इससे पूषा देवताके उद्देश्यसे मली - भाँति पिष्ट भाग करना चाहिए, क्योंकि वह दान्तोंसे रहित है ) इत्यादि अश्रुत विधि वाक्यों में पूर्व होनेसे विधिको कल्पनाकर पूषा सम्बन्धी पेषण - पिष्ट भाग विकृति यागमें जानना चाहिए, [ कारण कि प्रकृतिमें उसका विधान नहीं है ] इत्यादि विचार पूर्वमीमांसा शास्त्रमें प्रवृत्त किया गया है। और उसी प्रकार ' विधिर्वा धारणवत् ' इस सूत्र में सूत्रकारने कहा है।

भगवद्गीता आदि स्मृतियोंमें मी फलके अनुसंधानके विना अनुष्ठित यज्ञ आदि कर्म मुमुक्षुके लिए ज्ञानके साधन होते हैं, ऐसा विस्तारसे कहा गया है। इसलिए आश्रमके अनुसार यज्ञादि और राम, दम आदि सब आश्रमकर्म विद्याकी उत्पत्तिमें अपेक्षितव्य हैं। उसमें भी ' एवंत्रित् ' ( ऐसा जाननेवाला ) इस प्रकार विद्या के साथ सम्बन्ध होनेसे राम आदि विद्या के अन्तरङ्ग साधन हैं, और ' विविदिषा ' के सम्बन्धसे यज्ञ आदि कर्म और मी बहिरङ्ग साधन हैं, ऐसा भेद समझना चाहिए॥ २७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # इस प्रकार विद्याकी उत्पत्ति में बहिरङ्ग कर्मों का वर्णन कर अब अन्तरङ्ग साघनोंका ' राम ' वादिसे प्रतिपादन करते हैं।

* दर्शपूर्णमासके प्रकरण में ' पूषाप्रपिष्टभागः ' ऐसा सुना जाता है। परन्तु उसमें पूषा देवता अथवा पिष्टभाग नहीं सुना जाता है। उसका ' पौष्णं पेषणं विकृतौ प्रतीयेता चोदनात्प्रकृतौ ' ( पूषा सम्बन्धी पिष्टभाग विकृतियाग में जानना चाहिए, क्योंकि प्रकृति यागमें विधि नहीं है ) इस सूत्रमें विचार किया गया है। ' प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्य ' ( प्रकृतियागके समान विकृतियाग करना चाहिए ) जैसे यहाँ प्रकरणके बल से प्रकृतियागमें विधिकी कल्पना की जाती है, वैसे विद्याके प्रकरणसे यज्ञ आदिमें भी विधिक कल्पनाकी जा सकती है। किञ्च ' स्वकर्मणा तमभ्यच्यं सिद्धिं विन्दति मानवः ' ( भगवद्गीता ० १८/४६ ) ( अपने अपने आश्रम कर्मोसे उस ईश्वरकी आराधनाकर मानव ज्ञान निष्ठा रूप सिद्धिको प्राप्त होता है ) इत्यादि स्मृति मी प्रमाण है। दृष्ट चित्तविक्षेपके निराकरणद्वारा राम आदि ज्ञानार्थक हैं, अतः उनकी अनुवृत्ति होती है, परन्तु कर्मों की नहीं, क्योंकि वे अदृष्टद्वारा ज्ञानके लिए हैं। इसलिए राम आदि अन्तरङ्ग साधन हैं और यज्ञ आदि कर्म बहिरङ्ग साधन हैं || २७ ||

सर्वान्नानुमत्याधिकरणम्

3.4.28 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २८

सूत्र ३.४.२८

सर्वान् नानुमतिश् च प्राणात्यये तद्दर्शनात् ॥ ३.४.२८ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 804

पदच्छेद — सर्वान्नानुमतिः 1 च प्राणात्यये तद्दर्शनात्

सूत्रार्थ — ( प्राणात्यये ) ' न ह वाऽस्य ' इत्यादिसे प्राण निर्गमन काल में ( सर्वान्नानुमतिः ) सर्वान्न क्षणी अनुज्ञा है, ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि उसको ' मटचीहतेषु कुरुषु ' इत्यादि श्रुतिमें देखा जाता है।

शाङ्करभाष्य

प्राणसंवादे श्रूयते छन्दोगानाम् न ह वा एवंविदि किंचनानन्नं भवति इति तथा वाजसनेयिनाम् न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं प्रतिगृहीतम् इति सर्वमस्यादनीयमेव भवतीत्यर्थः। किमिदं सर्वान्नानुज्ञानं शमादिवत् विद्याङ्गं विधीयते उत स्तुत्यर्थं संकीर्त्यत इति संशये विधिरिति तावत्प्राप्तम् तथा हि प्रवृत्तिविशेषकर उपदेशो भवति अतः प्राणविद्यासंनिधानात् तदङ्गत्वेन इयं नियमनिवृत्तिरुपदिश्यते।

ननु एवं सति भक्ष्याभक्ष्यविभागशास्त्रव्याघातः स्यात् नैष दोषः सामान्यविशेषभावात् बाधोपपत्तेः यथा प्राणिहिंसाप्रतिषेधस्य पशुसंज्ञपनविधिना बाधः यथा च न कांचन स्त्रियं परिहरेत्तद्व्रतम् इत्यनेन वामदेव्यविद्याविषयेण सर्वस्त्र्यपरिहारवचनेन सामान्यविषयं गम्यागम्यविभागशास्त्रं बाध्यते एवमनेनापि प्राणविद्याविषयेण सर्वान्नभक्षणवचनेन भक्ष्याभक्ष्यविभागशास्त्रं बाध्येतेत्येवं प्राप्ते ब्रूमः नेदं सर्वान्नानुज्ञानं विधीयत इति न हि अत्र विधायकः शब्द उपलभ्यते न ह वा एवंविदि किंचनानन्नं भवति इति वर्तमानापदेशात्।

न च असत्यामपि विधिप्रतीतौ प्रवृत्तिविशेषकरत्वलोभेनैव विधिरभ्युपगन्तुं शक्यते। अपि च श्वादिमर्यादं प्राणस्यान्नमित्युक्त्वा इदमुच्यते नैवंविदः किंचिदनन्नं भवतीति न च श्वादिमर्यादमन्नं मानुषेण देहेनोपभोक्तुं शक्यते शक्यते तु प्राणस्यान्नमिदं सर्वमिति विचिन्तयितुम्। तस्मात् प्राणान्नविज्ञानप्रशंसार्थोऽयमर्थवादः न सर्वान्नानुज्ञानविधिः।

तद्दर्शयति सर्वान्नानुमतिश्च प्राणात्यये इति एतदुक्तं भवति प्राणात्यय एव हि परस्यामापदि सर्वमन्नमदनीयत्वेनाभ्यनुज्ञायते तद्दर्शनात् तथा हि श्रुतिः चाक्रायणस्य ऋषेः कष्टायामवस्थायाम् अभक्ष्यभक्षणे प्रवृत्तिं दर्शयति मटचीहतेषु कुरुषु इत्यस्मिन् ब्राह्मणे चाक्रायणः किल ऋषिः आपद्गतः इभ्येन सामिखादितान्कुल्माषांश्चखाद अनुपानं तु तदीयम् उच्छिष्टदोषात्प्रत्याचचक्षे कारणं चात्रोवाच न वा अजीविष्यमिमानखादन् इति कामो म उदपानम् इति च पुनश्च उत्तरेद्युः तानेव स्वपरोच्छिष्टान्पर्युषितान्कुल्माषान् भक्षयांबभूव इति तदेतत् उच्छिष्टोच्छिष्टपर्युषितभक्षणं दर्शयन्त्याः श्रुतेः आशयातिशयो लक्ष्यते प्राणात्ययप्रसङ्गे प्राणसंधारणाय अभक्ष्यमपि भक्षयितव्यमिति स्वस्थावस्थायां तु तन्न कर्तव्यं विद्यावतापि इत्यनुपानप्रत्याख्यानाद्गम्यते।

तस्मात् अर्थवादः न ह वा एवंविदि इत्येवमादिः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — छन्दोगों के प्राण संवादमें ' न ह वा एवंविदि ० ' ( यथोक्त प्राणके जाननेवालेको जो यह जानता है कि मैं सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित सारे अन्नोंका भोक्ता प्राण हूँ, कुछ भी अनन्न - अमक्ष्य नहीं है ) ऐसी श्रुति है। इसीप्रकार वाजसनेयियोंके प्राणसंवादमें ' न ह वाऽस्य ० ' ( जो इसप्रकार प्राण के अन्नको जानता है उसके द्वारा अभक्ष्य भक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका प्रतिग्रह- संग्रह भी नहीं होता ) ऐसी श्रुति है। इसका सब अदनीय ( भक्षणीय ) होता ही है, ऐसा अर्थ है।

क्या यह सर्वान्न भक्षणकी अनुज्ञा शम आदिके समान विद्याके अङ्गरूपसे विधानकी जाती है अथवा विद्याकी स्तुति के लिए इसका संकीर्तन किया जाता है। इसप्रकार संशय होनेपर पूर्वपक्षी - विधि है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि विशेषप्रवृत्ति करनेवाला उपदेश होता है, अतः प्राणविद्याके संनिधानसे विद्या अङ्गरूपसे इस नियमनिवृत्तिका उपदेश किया जाता है। परन्तु ऐसा होनेपर भक्ष्य और अमक्ष्यका विभाग करने वाले शास्त्रका व्याघात होगा?

यह दोष नहीं है, क्योंकि सामान्य और विशेष भावसे बाध उपपन्न होगा | जैसे यावत् प्राणिहिंसाप्रतिषेधक शास्त्रका पशुहिंसाबोधक विधि बाघ होता है, और जैसे ' न काञ्चन ० ' ( किसी स्त्रीका परित्याग नहीं करना चाहिए यह व्रत है ) इस वामदेव्यविद्या विषयक सर्वस्त्री अपरित्याग वचनसे उस सामान्य विषयक गम्य और अगम्य विभाग शास्त्रका बाघ होता है।

इसप्रकार इस प्राणविद्या विषयक सर्वान्न भक्षण वचनसे मक्ष्य क्योंकि ' न ह वा ० ' ( प्राणोपासकके लिए कुछ मो अनन्न - अभक्ष्य नहीं है ) इसप्रकार वर्तमानका उपदेश है। और यहाँ विधिकी प्रतीति न होनेपर भी प्रवृत्ति विशेषकरत्वके लोभसे विधि स्वीकार नहीं की जा सकती। और श्वान आदि पर्यन्त प्राणका अन्न है ऐसा कहकर ' नैवंविदः ० ' ( ऐसा जाननेवाले प्राणोपासकका कुछ अमक्ष्य नहीं होता ) इसप्रकार कहा है। दवान आदि पर्यन्त अन्नका मनुष्य देहसे उपभोग नहीं किया जा सकता।

परन्तु यह सब प्राणका अन्न है ऐसा चिन्तन - ध्यान किया जा सकता है। इसलिए प्राणान्नविज्ञानकी प्रशंसाके लिए यह अर्थवाद है किन्तु सर्वान्न मक्षणकी अनुज्ञा विधि नहीं है। उसे ' सर्वान्नानुमतिश्र प्राणात्यये ' इस सूत्र से दिखलाते हैं। तात्पर्यं यह है - प्राणनाथ होनेपर ही महती आपत्ति में सर्वान्न भक्षणीयरूपसे अनुज्ञा दी जाती है, क्योंकि उसका श्रुतिमें दर्शन है।

जैसे कि ' मंटचीहतेषु कुरुषु ' ( शलमोंसे करुदेश के खेतस्थ अन्नों का नाश होनेपर ) इस ब्राह्मण में श्रुति चाक्रायण ऋषिकी कष्ट अवस्था में अभक्ष्य भक्षण में प्रवृत्ति दिखलाती है।

इतिवृत्त ऐसा है कि आपद् ग्रस्त चाक्रायण ऋषिने हस्तिपालकके अधभुक्त उड़द खाये, अनन्तर जलपानका उच्छिष्ट दोषसे निषेध किया और उसमें कारण कहा – ' न वा अजीविष्यमिमानखादन् ' ( इन उड़दोंको खाये विना तो मैं जीवित नहीं रह सकता था ) और ( जलपान तो मुझे यथेच्छ इस उच्छिष्टोच्छिष्ट - परोच्छिर, स्वोच्छिष्ट और वासीका मक्षण दिखलाती हुई श्रुतिका

७ बाययातिशय मात्र में मिलता है ) और पुन : दूसरे दिन उसने अपने और वन्यके उच्छिष्ट तथा वासो उड़द खाये। लक्षित होता है कि प्राणनाशके प्रसंग होनेपर प्राण संधारणके लिए अभक्ष्य भी मक्षण के योग्य है। स्वस्थ अवस्थामें विद्वान्को भी ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा जलपानके प्रतिषेवसे अवगत होता है। इसलिए ' न ह वा एवंविदि ० ' इत्यादि अर्थवाद है।। २८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सिद्धान्ती - ' नेदम् ' इत्यादिसे सूत्रसे बाहर ही सिद्धान्त कहते हैं। यद्यपि ' यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति ' यहाँ आगत्या विधिकी कल्पना की गई है, तो भी यहाँ प्रकरण में काल्पनिकी विघिकी मी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि ऐसा कोई विधायक शब्द नहीं है। विरोध होनेपर विशेष विधिसे सामान्य विधिका बाध होता है, परन्तु काल्पनिक विधिसे बाध नहीं होता। इसलिए ' एवंविदि ० ' इत्यादि प्राणविद्याकी प्रशंसाके लिए अर्थवाद है विधि नहीं। पूर्वपक्षमें भक्ष्याभक्ष्य नियमका त्यागकर सर्वान्न भक्षणको अनुज्ञा विद्याके अङ्गरूपसे विधि है, सिद्धान्त में सर्वान्न मक्षणकी अनुज्ञा प्राणविद्याकी स्तुति लिए है || २८

3.4.29 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र २९

सूत्र ३.४.२९

अबाधाच् च ॥ ३.४.२९ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.२९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 805

पदच्छेद — अबाधात् च । और अभक्ष्य विभाग शास्त्र बाधित होना चाहिए । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- यह सर्वान्न अनुज्ञाकी विधि नहीं को जाती , कारण कि यहाँ विधायक शब्द उपलब्ध नहीं होता ,

शाङ्करभाष्य

एवं च सति आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः इत्येवमादि भक्ष्याभक्ष्यविभागशास्त्रम् अबाधितं भविष्यति।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.४.३० के अनुवादके साथ है।)

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.३२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.30 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३०

सूत्र ३.४.३०

अपि स्मर्यते ॥ ३.४.३० ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 806

पदच्छेद — अपि च , स्मयं I

सूत्रार्थ — ( अपि च ) और ' जीवितात्ययमापन्नो ' इत्यादि स्मृति भी आपत्ति कालमें विद्वान् और अविद्वान के लिए सर्वान्न मक्षणका प्रतिपादन करती है।

शाङ्करभाष्य

अपि च आपदि सर्वान्नभक्षणमपि स्मर्यते विदुषोऽविदुषश्च अविशेषेण जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा इति। तथा मद्यं नित्यं ब्राह्मणः सुरापस्य ब्राह्मणस्योष्णामासिञ्चेयुः सुरापाः कृमयो भवन्त्यभक्ष्यभक्षणात् इति च स्मर्यते वर्जनमनन्नस्य।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — III ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० ३ पा ० ४

सूत्रार्थ - मक्ष्य और अभक्ष्य विभाग शास्त्रका अबाध होनेसे भी ' न ह वा एवंविदि ' इत्यादि शास्त्र अर्थवादमात्र है।

और आपत्तिकालमें विद्वान् और अविद्वान् दोनोंके लिए समानरूपसे सर्वान्न मक्षणकी ' जीवितात्ययमापन्नो ० ' ( जीवन नाशको प्राप्त होनेवाला पुरुष जहाँ तहाँसे जो कुछ यन्न खाता है, वह अभक्ष्य भक्षण द्वारा उत्पन्न पापसे उस प्रकार लिप्त नहीं होता जैसे जलसे कमलपत्र लिप्त- गीला नहीं होता ) ऐसी स्मृति है। इसी प्रकार ' मद्यं नित्यं ब्राह्मण : ' ( ब्राह्मण नित्य सुराका त्याग करे ) और ' सुरापस्य ० ' ( सुरा पान करनेवाले ब्राह्मणके कण्ठ में अतितप्त सुरा डालनी चाहिए ) ' सुरापा ० ' ( अमक्ष्यका मक्षण करनेसे सुरा पान करनेवाले कृमि होते हैं ) इस प्रकार अमक्ष्य अन्नका स्मृतिमें प्रतिषेध किया गया है।। ३०

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.३२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.31 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३१

सूत्र ३.४.३१

शब्दश् चातोऽकामकारे ॥ ३.४.३१ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 806

पदच्छेद — शब्दः , च , अतः , आकामकारे

सूत्रार्थ — ( अकामकारे ) स्वेच्छा प्राप्त प्रवृत्तिके निराकरण में ही ( शब्दः ) ' तस्माद्ब्राह्मणः ' इत्यादि श्रुति है, ( अतः ) अतएव प्राणविद् के लिए सर्वान्न मक्षणकी अनुज्ञा अर्थवादमात्र है।

शाङ्करभाष्य

शब्दश्च अनन्नस्य प्रतिषेधकः कामकारनिवृत्तिप्रयोजनः कठानां संहितायां श्रूयते तस्माद्ब्राह्मणः सुरां न पिबेत् इति। सोऽपि न ह वा एवंविदि इत्यस्यार्थवादत्वात् उपपन्नतरो भवति। तस्मादेवंजातीयका अर्थवादा न विधय इति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यथेच्छ प्रवृत्तिकी निवृत्ति प्रयोजनवाली अमक्ष्य प्रतिषेधक ' तस्माद्ब्राह्मण : ' ( उससे ब्राह्मणको सुरापान नहीं करना चाहिए ) इत्यादि श्रुति काठकोंकी संहितामें सुनी जाती है। ' न ह वा एवंविदि ० ' ( इसमे अर्थवाद होनेसे उपपन्नतर होती है ) इसलिए इस प्रकारके श्रुति वाक्य अर्थवाद हैं, विधि नहीं।। ३१

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.३२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

आश्रमकर्माधिकरणम्

3.4.32 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३२

सूत्र ३.४.३२

विहितत्वाच् चाऽश्रमकर्मापि ॥ ३.४.३२ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 806

पदच्छेद — विहितत्वात् , च , आश्रमकर्म , अपि

सूत्रार्थ — तु शब्दार्थकच शब्द पूर्व = क्षकी निवृत्ति के लिए है, ( अपि ) आश्रममात्र निष्ठ ऐसा होनेपर - स्वस्थ अवस्थामें भक्ष्य और अमक्ष्यका भेद होनेपर ' अहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः ' ' आहारके शुद्ध होनेपर सत्त्व अन्तःकरणकी शुद्धि होती है ' इत्यादि मक्ष्य, अमक्ष्य विभाग शास्त्र

शाङ्करभाष्य

सर्वापेक्षा च इत्यत्र आश्रमकर्मणां विद्यासाधनत्वमवधारितम् इदानीं तु किममुमुक्षोरप्याश्रममात्रनिष्ठस्य विद्यामकामयमानस्य तान्यनुष्ठेयानि उताहो नेति चिन्त्यते। तत्र तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति इत्यादिना आश्रमकर्मणां विद्यासाधनत्वेन विहितत्वात् विद्यामनिच्छतः फलान्तरं कामयमानस्य नित्यान्यननुष्ठेयानि अथ तस्याप्यनुष्ठेयानि न तर्हि एषां विद्यासाधनत्वम् नित्यानित्यसंयोगविरोधात् इत्यस्यां प्राप्तौ पठति आश्रममात्रनिष्ठस्याप्यमुमुक्षोः कर्तव्यान्येव नित्यानि कर्माणि यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति इत्यादिना विहितत्वात् न हि वचनस्यातिभारो नाम कश्चिदस्ति।। अथ यदुक्तम् नैवं सति विद्यासाधनत्वमेषां स्यादिति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अमुमुक्षुको भी ( आश्रमकर्म ) नित्य कर्म करने चाहिए, ( विहितत्वात् ) क्योंकि ' यावज्जीवम् ' इत्यादि शास्त्रसे विहित हैं।

' सर्वापेक्षा च ' इस सूत्र में आश्रमकमं विद्याके प्रति साधनरूपसे निश्चित किये गये हैं। अब आश्रममात्रनिष्ठ विद्याकी कामना न करनेवाले अमुमुक्षुको वे आश्रमकमं अनुष्ठेय हैं अथवा नहीं? यह विचार किया जाता है? पूर्वपक्षी - ऐसा सन्देह होनेपर ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' ( उस उपनिषद् गम्य पुरुषको ब्राह्मण वेदके नित्य स्वाध्यायसे जाननेकी इच्छा करें ) इत्यादि श्रुतिसे आश्रमकमं विद्या के साधनरूपसे विहित हैं, अतः विद्याको इच्छा न करनेवाले और अन्य फलकी कामना करनेवालेको नित्यकर्म अनुष्ठेय नहीं है। यदि उसके लिए मी नित्यकर्म अनुष्ठेव हों तो वे विद्याके साधन नहीं होंगे, क्योंकि नित्य और अनित्य के संयोगका विरोध है। सिद्धान्ती - इसके प्राप्त होनेपर कहते हैं —- आश्रममात्रनिष्ठ अमुमुक्षुको भी नित्यकर्म कर्तव्य हो हैं, क्योंकि ' यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति ' ( जीवन पर्यन्त नहोत्र होम करे ) इत्यादिसे विहित हैं, कारण कि वचनपर कोई अतिभार नहीं होता॥ ३२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — सिद्धान्ती —– संयोगपृथकत्वन्याय से यह दोष नहीं है, क्योंकि ' खादिरो यूपो भवति ' ' खादिरं वीर्यकामस्य यूपं कुर्वीत ' इत्यादि स्थलोंमें वचनभेदसे नित्यत्व और काम्यत्व स्वीकृत हैं, वैसे ही प्रकरण में भी श्रुतिभेदसे दोनों प्रकारसे यज्ञादिका एक साथ सम्बन्ध अमीष्ट है, क्योंकि वचनको व्यवस्था करने में कुछ मार नहीं होता है। पूर्ववक्षमें यज्ञादि श्रुत्ति विद्याकी स्तुतिपरक है और सिद्धान्तमें उसका उमयथा अनुष्ठान है॥ ३२

3.4.33 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३३

सूत्र ३.४.३३

सहकारित्वेन च ॥ ३.४.३३ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 807

पदच्छेद — सहकारित्वेन च

सूत्रार्थ — और विद्याको उत्पत्ति में सहकारिरूपसे यज्ञ आदि कर्म अनुष्टेव हैं, क्योंकि ' तमेतं ' वेदानुवचनेन ' इत्यादि श्रुतिसे विहित हैं।

शाङ्करभाष्य

विद्यासहकारीणि च एतानि स्युः विहितत्वादेव तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति इत्यादिना तदुक्तम् सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् इति। न चेदं विद्यासहकारित्ववचनमाश्रमकर्मणां प्रयाजादिवत् विद्याफलविषयं मन्तव्यम् अविधिलक्षणत्वाद्विद्यायाः असाध्यत्वाच्च विद्याफलस्य विधिलक्षणं हि साधनं दर्शपूर्णमासादि स्वर्गफलसिषाधयिषया सहकारिसाधनान्तरम् अपेक्षते नैवं विद्या तथा चोक्तम् अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा इति तस्मादुत्पत्तिसाधनत्व एव एषां सहकारित्ववाचोयुक्तिः। न च अत्र नित्यानित्यसंयोगविरोध आशङ्क्यः कर्माभेदेऽपि संयोगभेदात् नित्यो हि एकः संयोगो यावज्जीवादिवाक्यकल्पितः न तस्य विद्याफलत्वम् अनित्यस्तु अपरः संयोगः तमेतं वेदानुवचनेन इत्यादिवाक्यकल्पितः तस्य विद्याफलत्वम् यथा एकस्यापि खादिरत्वस्य नित्येन संयोगेन क्रत्वर्थत्वम् अनित्येन संयोगेन पुरुषार्थत्वम् तद्वत्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो यह कहा गया है कि यदि आश्रम कर्म अमुमुक्षुको भी नित्यानुष्ठेय हैं, तो यज्ञ आदि विद्या साधन नहीं होंगे? इसका उत्तर कहते हैं-

सिद्धान्ती - ये कर्म विद्याके सहकारी होने चाहिए, क्योंकि ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' इत्यादि श्रुति विहित हैं। यह ' सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ' इस सूत्र में कहा गया है। और ' आश्रमकर्म ' विद्या सहकारी हैं ' यह वचन प्रयाज आदिके समान विद्याफल विषयक है, ऐसा नहीं मानना चाहिए, क्योंकि विद्या विधिरूप नहीं है और विद्याका फल असाध्य है। जैसे विधिरूप दर्शपूर्णमास आदि साधन स्वरूप फलसिद्ध करनेको इच्छासे अन्य सहकारी सधानको अपेक्षा करता है ; वैसे विद्या नहीं करती। उसीप्रकार ' अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ' इस सूत्र में कहा गया है। इसलिए विद्याकी उत्पत्ति साधनत्वमें ही इन कर्मोंके सहकारीत्व वचनकी उपपत्ति होती है। और यहाँ नित्यानित्य संयोगके विरोधकी भी आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कर्मके एक होनेपर भी संयोगभेद है। यावज्जीवादि वाक्यसे कल्पित एक संयोग ( विधि ) नित्य है, उसका फल विद्या नहीं है। बौर ' तमेतं वेदानुवचनेन ' इत्यादि वाक्यसे कल्पित दूसरा संयोग ( विधि ) अनित्य है उसका फल विद्या है। जैसे एक खादिरमें भी नित्यसंयोग से क्रत्वर्थत्व और अनित्यसंयोग से पुरुषार्थत्व है, वैसे ही यहां भी समझना चाहिए॥ ३३

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.३४ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.34 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३४

सूत्र ३.४.३४

सर्वथापि त एवोभयलिङ्गात् ॥ ३.४.३४ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 808

पदच्छेद — सर्वथा , अपि ते • एव , उमयलिङ्गात्

सूत्रार्थ — ( ते एव ) यज्ञादि कर्म, ( सर्वथापि ) आश्रमत्यपक्ष में और विद्या सहकारित्व पक्ष में दोनों प्रकार से अनुष्ठेत्र हो हैं, ( उभयलिङ्गात् ) क्योंकि ' यज्ञेन विविदिषन्ति ' और ' अनाश्रितः कर्मफलम् ' इत्यादि श्रुति और स्मृति दोनों लिङ्ग हैं।

शाङ्करभाष्य

सर्वथापि आश्रमकर्मत्वपक्षे विद्यासहकारित्वपक्षे च त एव अग्निहोत्रादयो धर्मा अनुष्ठेयाः। त एव इत्यवधारयन्नाचार्यः किं निवर्तयति कर्मभेदशङ्कामिति ब्रूमः यथा कुण्डपायिनामयने मासमग्निहोत्रं जुह्वति इत्यत्र नित्यादग्निहोत्रात्कर्मान्तरमुपदिश्यते नैवमिह कर्मभेदोऽस्तीत्यर्थः। कुतः उभयलिङ्गात् श्रुतिलिङ्गात्स्मृतिलिङ्गाच्च। श्रुतिलिङ्गं तावत् तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति इति सिद्धवदुत्पन्नरूपाण्येव यज्ञादीनि विविदिषायां विनियुङ्क्ते न तु जुह्वति इत्यादिवत् अपूर्वमेषां रूपमुत्पादयतीति। स्मृतिलिङ्गमपि अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः इति विज्ञातकर्तव्यताकमेव कर्म विद्योत्पत्त्यर्थं दर्शयति यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः इत्याद्या च संस्कारत्वप्रसिद्धिः वैदिकेषु कर्मसु तत्संस्कृतस्य विद्योत्पत्तिमभिप्रेत्य स्मृतौ भवति। तस्मात्साध्विदम् अभेदावधारणम्।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.४.३५ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' इस श्रुतिसे दर्शपूर्णमास याग विहित है, अतः उसे स्वर्गफल सिद्धिके लिए प्रयाज आदिकी अपेक्षा होती है। किन्तु ' मोक्षकामो विद्यामाप्नुयात् ' इस प्रकार विद्याको विधि नहीं है। और समान बलवाली ' यावज्जीव ' बौर ' तमेतं ' इन दोनों श्रुतियों से विनियोग पृथक्त्व - संयोग ( विधि ) भेद है, अतः विरोध नहीं है।

* अपनी धर्मपत्नी के साथ सम्भोग पर्यन्त गर्भाधान आदि चौदहां, महायज्ञ पाँच, सोमस्थ सात, हविः संस्थ सात, पाक संस्थ सात, भोजन रहित संहिताका अध्ययन, प्रायण, कर्म, जप, शरीरसे उत्क्रमण, दैहिक भस्ममय, अस्थि संचय और श्राद्ध इसप्रकार अड़तालीस संस्कारको प्रसिद्धि है, वह भी शुद्धिरूप संस्कार द्वारा ज्ञानार्थक स्मृतिमें हैं। अतः कर्मो के अभेदका अवधारण उचित ही है।। ३४

3.4.35 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३५

सूत्र ३.४.३५

अनभिभवं च दर्शयति ॥ ३.४.३५ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 809

पदच्छेद — अनभिभवम् , च , दर्शयति

सूत्रार्थ — ( च ) और भी, ( अनभिभवम् ) ब्रह्मचयं आदि साधान सम्पन्न पुरुषका रागद्वेष आदि क्लेशों से अभिभव नहीं होता, ( दर्शयति ) ' एष ह्यात्मा ' इत्यादि श्रुति दिखलाती है।

शाङ्करभाष्य

सहकारित्वस्यैव एतदुपोद्बलकं लिङ्गदर्शनम्। अनभिभवं च दर्शयति श्रुतिः ब्रह्मचर्यादिसाधनसंपन्नस्य रागादिभिः क्लेशैः एष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते इत्यादिना। तस्मात् यज्ञादीन्याश्रमकर्माणि च भवन्ति विद्यासहकारीणि चेति स्थितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सर्वथा - नित्यत्व और काम्यत्व - आश्रम कर्मत्व पक्ष में और विद्यासहकारित्व पक्ष में वे अग्निहोत्र आदि कर्म अनुष्ठेय ही हैं। ' त एव - वे ही ' इसप्रकार अवधारण करते हुए आचार्य किसको निवृत्ति करते हैं? कर्मभेदको शङ्का निवृत्त करते हैं, ऐसा हम कहते हैं। जैसे कुण्डपायियोंके अथनमें ' मासमग्निहोत्रं ० ' ( वे एक मास पर्यन्त अग्निहोत्र होम करें ) इसमें नित्य अग्निहोत्रसे अन्य कर्मका उपदेश किया जाता है, वैसे यहां कर्मभेद नहीं है, ऐसा अर्थ है। किससे?

उभयलिङ्ग से - श्रुतिलिङ्गसे और स्मृतिलिङ्गसे। ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' ( ब्राह्मण इस उपनिषद्गम्य पुरुषको वेदके नित्यं स्वाध्यायसे जानने की इच्छा करें ) यह श्रुतिलिङ्ग सिद्धवत् . उत्पन्नरूपवाले यज्ञ आदिका विविदिषा में विनयोग करता है और ' जुह्वति ' इत्यादिके समान इन यज्ञ मादिके अपूर्वरूपका उत्पादन नहीं करता।

इसप्रकार ' अनाश्रितः कर्मफलं ० ' ( जो पुरुष कर्मके फलको न चाहता हुआ करने योग्य कर्म करता है ) यह स्मृतिलिङ्ग भी विज्ञात कर्तव्यतावाले कर्मको विद्याकी उत्पत्ति के लिए दिखलाता है। ' जिसके ये अड़तालीस संस्कार होते हैं ' इत्यादि वैदिक कर्मोंमें संस्कारत्व प्रसिद्धि उनसे संस्कृत पुरुषकी विद्याकी उत्पत्तिको अभिप्रेत कर स्मृतिमें है। इसलिए यह अभेदका अवधारण उचित है | ३४ |

[ आश्रमक विद्या ] सहकारी हैं इसका ही समर्थक यह लिङ्गदर्शन है ' एष ह्यात्मा ० ' ( जिसे साधक ब्रह्मचयंसे प्राप्त होता है वह यह आत्मा नष्ट नहीं होता ) इत्यादिसे श्रुति ब्रह्मचर्यं आदि साधन सम्पन्न पुरुषका राग आदि क्लेशोंसे अनभिभव दिखलाती है। इससे यज्ञ आदि आश्रम कर्म हैं और विद्या सहकारी भी हैं, ऐसा निश्चित होता है।। ३५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.३९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.36 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३६

सूत्र ३.४.३६

अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥ ३.४.३६ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 809

पदच्छेद — अन्तरा , च , अपि , तु तद्दृष्टेः

सूत्रार्थ — ( तु ) पूर्वपक्षकी व्यावृत्ति के लिए है, ( अन्तरा ) आश्रम रहित पुरुषोंका ( अपि ) मी ब्रह्मविद्या में अधिकार है, ( तद्दृष्टेः ) क्योंकि रैक्व आादिकी श्रुति उपलब्ध होती है।

शाङ्करभाष्य

विधुरादीनां द्रव्यादिसंपद्रहितानां च अन्यतमाश्रमप्रतिपत्तिहीनानामन्तरालवर्तिनां किं विद्यायामधिकारोऽस्ति किंवा नास्ति इति संशये नास्तीति तावत्प्राप्तम् आश्रमकर्मणां विद्याहेतुत्वावधारणात् आश्रमकर्मासंभवाच्चैतेषाम् इत्येवं प्राप्ते इदमाह अन्तरा चापि तु अनाश्रमित्वेन वर्तमानोऽपि विद्यायामधिक्रियते कुतः तद्दृष्टेः रैक्ववाचक्नवीप्रभृतीनामेवंभूतानामपि ब्रह्मवित्त्वश्रुत्युपलब्धेः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — विधुरादि, द्रव्य आदि संपत्से रहित किसी एक आश्रमकी प्रांतिसे हीन मध्यवर्ती पुरुषोंका क्या विद्या में अधिकार है अथवा नहीं है? ऐसा संशय होनेपर, पूर्वपक्षी - उनका विद्या में अधिकार नहीं है ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि आश्रमकमं विद्याके हेतुरूपसे निश्चित हैं और उन पुरुषोंमें आश्रम कर्मोका संभव भी नहीं है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं- ' अन्तरा चापि तु ' अनाश्रमी इतिहासे॥ ३७॥

ननु लिङ्गमिदं श्रुतिस्मृतिदर्शनमुपन्यस्तं का नु खलु प्राप्तिरिति, साऽभिधीयतेवाचक्नवी आदि इसप्रकार के प्राणियों में भी ब्रह्मवित्त्व श्रुति उपलब्ध होती है॥ ३६

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.३९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.37 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३७

सूत्र ३.४.३७

अपि स्मर्यते ॥ ३.४.३७ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 810

पदच्छेद — अपि , च , स्मर्यते I

सूत्रार्थ — और अनाश्रमी संवर्त आदि मी महायोगिरूपसे इतिहास में स्मरण किये जाते हैं।

शाङ्करभाष्य

अपि च आपदि सर्वान्नभक्षणमपि स्मर्यते विदुषोऽविदुषश्च अविशेषेण जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा इति। तथा मद्यं नित्यं ब्राह्मणः सुरापस्य ब्राह्मणस्योष्णामासिञ्चेयुः सुरापाः कृमयो भवन्त्यभक्ष्यभक्षणात् इति च स्मर्यते वर्जनमनन्नस्य।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — नग्नचर्या आदि योगसे आश्रम कर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखनेवाले संवतं आादिका भी महायोगिरूप से इतिहास में स्मरण किया जाता॥ ३७

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.३९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.38 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३८

सूत्र ३.४.३८

विशेषानुग्रहश् च ॥ ३.४.३८ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 810

पदच्छेद — विशेषानुग्रहः " च

सूत्रार्थ — और रैक्व आदि अनाश्रमियोंका जप आदि ज्ञानके हेतुभूत कर्म विशेषोंसे विद्यामें अधिकार सुना जाता है।

शाङ्करभाष्य

तेषामपि च विधुरादीनाम् अविरुद्धैः पुरुषमात्रसंबन्धिभिर्जपोपवासदेवताराधनादिभिर्धर्मविशेषैरनुग्रहो विद्यायाः संभवति। तथा च स्मृतिः जप्येनैव तु संसिध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः। कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते इति असंभवदाश्रमकर्मणोऽपि जप्येऽधिकारं दर्शयति। जन्मान्तरानुष्ठितैरपि च आश्रमकर्मभिः संभवत्येव विद्याया अनुग्रहः तथा च स्मृतिः अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् इति जन्मान्तरसंचितानपि संस्कारविशेषान् अनुग्रहीतृ़न् विद्यायां दर्शयति। दृष्टार्था च विद्या प्रतिषेधाभावमात्रेणापि अर्थिनमधिकरोति श्रवणादिषु। तस्मात् विधुरादीनामप्यधिकारो न विरुध्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु यहाँ यह लिङ्गरूप श्रुति और स्मृति दर्शन उपन्यस्त किया है, उसकी प्राप्ति - विधिवाक्य कौन है? उसका अभिधान करते है —

उन विधुर आदिका भी अनाश्रमियोंके अविरुद्ध पुरुषमात्र सम्बन्धी जप, उपवास, देवाराधन बादि धर्मविशेषोंसे विद्यामें अधिकार संभव है। इसोप्रकार ' जप्येनैव तु ० ' ( ब्राह्मण जपसे ही संसिद्ध हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। वह अन्य कर्म करे अथवा न करे दयावान् ब्राह्मण कहा जाता है ) यह स्मृति जिसमें आश्रमकर्मका संभव नहीं है उनका भी जपमें अधिकार दिखलाती है। जन्मान्तर में अनुष्ठित आश्रम कर्मोंसे भी विद्या में अधिकार संभव ही है। इसीप्रकार ' अनेकजन्म ० ' ( अनेक जन्मके संस्कारके उपचयसे संसिद्ध होकर शुद्ध अन्तःकरणवाला होकर पुरुष सम्यग्दर्शनसे मोक्षको प्राप्त होता है ) यह स्मृतिवचन जन्मान्तरोंमें संचित और अनुग्रह करनेवाले संस्कार विशेषोंको भी विद्यामें दिखलाता है। दृष्ट फलवाली विद्या प्रतिषेध के अभावमात्र से भी विद्यार्थीको श्रवण आदिमें अधिकृत करती है। इसलिए विधुर आदिका भी विद्या में अधिकार विरुद्ध नहीं है।। ३८

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.३९ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.39 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ३९

सूत्र ३.४.३९

अतस् त्व् इतरज्ज्यायो लिङ्गाच् च ॥ ३.४.३९ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.३९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 810

पदच्छेद — अतः , तु , इतरत् ज्यायः , लिङ्गात् च

सूत्रार्थ — ( अस्तु ) मनाश्रमित्वकी अपेक्षासे तो ( इतरत् ) आश्रमित्व ( ज्यायः ) श्रेष्ठ - शीघ्र विद्याका साधन है, ( लिङ्गाच्च ) क्योंकि ' तेनैतिब्रह्मवित् ' इसप्रकार श्रुति और स्मृतिरूप लिङ्ग हैं | रूपसे वर्तमान पुरुष मी विद्या में अधिकृत हैं। किससे? इससे कि उनकी श्रुति देखी जाती है - रैक्व,

शाङ्करभाष्य

अतस्तु अन्तरालवर्तित्वात् इतरत् आश्रमवर्तित्वं ज्यायो विद्यासाधनम् श्रुतिस्मृतिसंदृब्धत्वात् श्रुतिलिङ्गाच्च तेनैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसश्च इति अनाश्रमी न तिष्ठेत दिनमेकमपि द्विजः। संवत्सरमनाश्रमी स्थित्वा कृच्छ्रमेकं चरेत् इति च स्मृतिलिङ्गात्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रार्थ - ( तद्भूतस्य ) उत्तमाश्रमको प्राप्त हुए पुरुषकी ( अतद्भावः ) उत्तमाश्रमसे च्युति ( न ) नहीं हो सकती, ( जैमिनेरपि ) यह आचार्य जैमिनिको मी सम्मत है, ( नियमातद्र पाभावेभ्यः ) क्योंकि नियम, अप और अभाव ये कारण हैं।

परन्तु इससे अन्तरालवतित्व - अनाश्रमित्व से अन्याश्रमवर्तित्व ( आश्रमित्व ) श्रेष्ठ विद्याका साधन है, क्योंकि श्रुति और स्मृतिमें ऐसा देखा जाता है। कारण कि ' तेनैति ब्रह्मवित् ० ' ( पुण्यकृत् - शुद्ध सत्त्व तेजःस्वरूप ब्रह्मवेत्ता उस ज्ञानमागंसे जाता है - ब्रह्मको प्राप्त होता है ) ऐसा श्रुतिलिङ्ग है मोर ' अनाश्रमी न तिष्ठेत ० ' ( द्विज एक दिन मी अनाश्रमी न रहे, एक वर्ष तक अनाश्रमी रहकर एक कृच्छ्र करना चाहिए ) ऐसा स्मृतिलिङ्ग भी है॥ ३ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' इत्यादि श्रुति और ' अनाश्चमी न तिष्ठेत ' इत्यादि स्मृति से अनाश्रमी - की अपेक्षा आश्रमीको श्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि पुण्यकी वृद्धि होनेसे शीघ्र विद्याकी प्राप्ति होती है। और ' अनाश्रमी न तिष्ठेत ' इत्यादि स्मृतिसे अनाश्रमीकी निन्दा भी की गई है॥ ३ ९

तद्भूताधिकरणम्

3.4.40 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४०

सूत्र ३.४.४०

तद्भूतस्य तु नातद्भावो जैमिनेर् अपि नियमात् तद्रूपाभावेभ्यः ॥ ३.४.४० ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 811

शाङ्करभाष्य

सन्ति ऊर्ध्वरेतस आश्रमा इति स्थापितम् तांस्तु प्राप्तस्य कथंचित् ततः प्रच्युतिरस्ति नास्ति वेति संशयः। पूर्वधर्मस्वनुष्ठानचिकीर्षया वा रागादिवशेन वा प्रच्युतोऽपि स्यात् विशेषाभावादित्येवं प्राप्ते उच्यते तद्भूतस्य तु प्रतिपन्नोर्ध्वरेतोभावस्य न कथंचिदपि अतद्भावः न ततः प्रच्युतिः स्यात् कुतः नियमातद्रूपाभावेभ्यः। तथा हि अत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् इति अरण्यमियादिति पदं ततो न पुनरेयादित्युपनिषत् इति आचार्येणाभ्यनुज्ञातश्चतुर्णामेकमाश्रमम्। आ विमोक्षाच्छरीरस्य सोऽनुतिष्ठेद्यथाविधि इति च एवंजातीयको नियमः प्रच्युत्यभावं दर्शयति। यथा च ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् इति च एवमादीनि आरोहरूपाणि वचांस्युपलभ्यन्ते नैवं प्रत्यवरोहरूपाणि। न चैवमाचाराः शिष्टा विद्यन्ते। यत्तु पूर्वधर्मस्वनुष्ठानचिकीर्षया प्रत्यवरोहणमिति तदसत् श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् इति स्मरणात् न्यायाच्च यो हि यं प्रति विधीयते स तस्य धर्मः न तु यो येन स्वनुष्ठातुं शक्यते चोदनालक्षणत्वाद्धर्मस्य। न च रागादिवशात्प्रच्युतिः नियमशास्त्रस्य बलीयस्त्वात्। जैमिनेरपीति अपिशब्देन जैमिनिबादरायणयोरत्र संप्रतिपत्तिं शास्ति प्रतिपत्तिदार्ढ्याय।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ऊर्ध्वरेता आश्रम हैं, ऐसा पहले सिद्ध किया जा चुका है। परन्तु उन आश्रमोंको प्राप्त हुए पुरुषों की किसी कारण से उन आश्रमोंसे च्युति होती है कि नहीं? ऐसा संशय होता है। पूर्वपक्षीपूर्व आश्रमविहित कर्मों के अनुष्ठान करने की इच्छा से अथवा राग आदिके वशसे वह ऊर्ध्वरेता प्रच्युत भी होगा, क्योंकि विशेषका अभाव है। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - तद्भूतका - ऊध्वरेतभावको प्राप्त हुए पुरुषका किसी प्रकार भी अतद्भाव - उस आश्रम से प्रच्युति नहीं हो सकती।

किससे? इससे कि उसके लिए नियम, अतद्रप और अभाव हैं। जैसे कि ' अत्यन्तमात्मानमा ० ' ( आचार्य - कुलमें रहनेवाला ब्रह्मचारी जो आचार्य कुलमें अपने शरीरको अत्यन्त क्षीण करता हुआ ) ' अरण्यमियादिति ० ' ( अरण्य - पारिव्राज्य प्राप्त करे यह पद शास्त्र मार्ग है, उस पारिव्राज्यसे प्रच्युत न हो, यह उपनिषद् - रहस्य है ) ' आचार्येणाभ्यनुज्ञातः ० ' ( आचार्यसे अनुज्ञा प्राप्तकर शरीर विमोक्षपर्यन्त चारों आश्रमोंमें एकका वह यथाविधि अनुष्ठान करे ) इस प्रकारका नियम प्रच्युतिका अभाव दिखलाता है।

और जैसे ' ब्रह्मचर्यं समाप्य ० ' ( ब्रह्मचर्यं समाप्तकर गृहस्थाश्रमी हो ) ' ब्रह्मचर्यादेव ० ' ( ब्रह्मचर्यं से ही संन्यास ग्रहण करे ) इसप्रकार के आरोहरूप वचन उपलब्ध होते हैं, वैसे प्रत्यवरोहरूप नहीं। और ऐसा आचारण करनेवाले शिष्ट नहीं है। और जो पूर्व आश्रमकर्मों के अनुष्ठान करनेकी इच्छासे प्रत्यवरोहण कहा है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि ' श्रेयान्स्वधर्मो ० ' ( भली - भांति अनुष्ठान किये गये परघमंसे विगुण भी स्वकीय धर्मं अत्युत्तम है ) यह स्मृति है और न्याय भी है।

जो ही जिसके लिए विधान किया जाता है वह उसका धर्म है, जिससे जो स्वयं अनुष्ठान किया जा सकता है वह उसका धर्म नहीं है, क्योंकि धर्मं तो चोदनारूप - विधिरूप है। और राग आदि वश भी प्रच्युति नहीं होती, कारण कि नियमशास्त्र बलवान् है 1

। ' जैमिनेरपि ' ( जैमिनिकी भी ) इस ' अपि ' शब्दसे इस विषयमें प्रतिपत्ति दृढ करने के लिए जैमिनि और बादरायणकी सम्प्रतिपत्तिका उपदेश करते हैं॥ ४०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जैसे ' ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् ' इन आश्रमोंका आरोह इच्छा अधीन है, वैसे राग मादिसे अथवा पूर्वाश्रमके यज्ञ आदि कर्मोके अनुष्ठान करनेकी इच्छासे संन्यास से वानप्रस्थ आदि हो सकता है तब वानप्रस्थादि आश्रम में किये गये कर्म भी विद्याके हेतु हो सकते हैं, यह पूर्वपक्षका फल है। सिद्धान्तमें - ऊर्ध्वरेताओंकी प्रच्युतिमें प्रमाणके न होनेसे आश्रमित्वमें श्रेष्ठता सिद्ध है। केवल अपनी इच्छासे आश्रमोंका ग्रहण नहीं होता, किन्तु ' ब्रह्मचर्यं समाप्य ' इत्यादि नियामक शास्त्रद्वारा सविधि आश्रमोंका ग्रहण होता है, मत। उक्त हेतुओंसे ऊर्ध्वरेताओंकी अपने आश्रमसे च्युति नहीं होती॥ ४०

अधिकाराधिकरणम्

3.4.41 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४१

सूत्र ३.४.४१

न चाधिकारिकम् अपि पतनानुमानात् तदयोगात् ॥ ३.४.४१ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 812

पदच्छेद — न , च , आधिकारिकम् अपि पतनानुमानात् , तदयोगात्

सूत्रार्थ — ( आधिकारिकमपि ) अधिकार शास्त्रसे प्राप्त आधिकारिक प्रायश्चित्त नैष्ठिक ब्रह्मचारीके लिए ( न ) नहीं है, ( पतनानुमानात् ) क्योंकि ' आरूढो नैष्ठिकं धर्मम् ' इत्यादिसे पातित्य श्रुति अनुमापक स्मृति है, ( तदयोगात् ) क्योंकि उस प्रायश्चित्तका अयोग असम्भव है।

शाङ्करभाष्य

यदि नैष्ठिको ब्रह्मचारी प्रमादादवकीर्येत किं तस्य ब्रह्मचार्यवकीर्णी नैऋर््तं गर्दभमालभेत इत्येतत्प्रायश्चित्तं स्यात् उत नेति। नेत्युच्यते यदपि अधिकारलक्षणे निर्णीतं प्रायश्चित्तम् अवकीर्णिपशुश्च तद्वदाधानस्याप्राप्तकालत्वात् इति तदपि न नैष्ठिकस्य भवितुमर्हति किं कारणम् आरूढो नैष्ठिकं धर्मं यस्तु प्रच्यवते पुनः। प्रायश्चित्तं न पश्यामि येन शुध्येत्स आत्महा इति अप्रतिसमाधेयपतनस्मरणात् छिन्नशिरस इव प्रतिक्रियानुपपत्तेः उपकुर्वाणस्य तु तादृक्पतनस्मरणाभावादुपपद्यते तत्प्रायश्चित्तम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — यदि नैष्ठिक ब्रह्मचारी प्रमादसे ब्रह्मचर्यं व्रतसे प्रच्युत हो तो उसका ' ब्रह्मचार्यवकीर्णी ० ' ( ब्रह्मचसे भ्रष्ट हुए ब्रह्मचारीको नैर्ऋत गर्दभका आलभन करना चाहिए ) यह प्रायश्चित्त होगा अथवा नहीं? नहीं, ऐसा कहते हैं— अधिकारलक्षणमें ' अवकीर्णिपशुश्च ० ' ( जैसे उपनयनकालमें लौकिक अग्नि में होम किया जाता है, वैसे ही अवकीणिपशुका भी लौकिक अग्निमें होम करना चाहिए, क्योंकि आधान अप्राप्तकाल है ) ऐसा जो प्रायश्चित्तका निर्णय किया गया है, वह भी नैष्ठिक ब्रह्मचारीका नहीं हो सकता। क्या कारण? ‘ आरूढो नैष्ठिकं ० ' ( नैष्ठिक धर्ममें आरूढ होकर जो पुनः उससे प्रच्युत होत है, वह मात्मघाती जिससे शुद्ध हो ऐसा प्रायश्चित्त नहीं देखता हूँ ) इसप्रकार स्मृति में अप्रतिकार्य पतन कहा गया है, अतः जैसे कटे हुए शिरका पुनः प्रतिसन्धान नहीं हो सकता, वैसे इस पतनका भी प्रतिकार नहीं हो सकता है। उपकुर्वाणके इस प्रकारकी पतनकी स्मृति न होनेसे उसका प्रायश्चित्त हो सकता है।। ४१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * स्त्रीप्रसंग करनेवाले नैष्ठिक ब्रह्मचारीको शास्त्रमें अवकीर्णी कहा गया है। इस व्यमि - चारको उपपातक कहने से और स्मृति में पातित्यका कथन होनेसे संशय होता है कि प्रच्युतका प्रायश्वित होता है कि नहीं? पूर्वपक्ष में प्रायश्चित्त नहीं होता, क्योंकि जैसे ' यज्ञोपवीतकालमें लौकिक अग्निमें होम करना चाहिए, क्योंकि विवाहके समय जो विहित अग्निका आधान है वही अहवनीय अग्नि है, उपनयन कालमें उसका अभाव है, इससे लौकिक अग्निमें होमका विधान है, वैसे व्यभिचारी नैष्ठिक ब्रह्मचारीको प्रायश्चित्त- पशु गदभंका अग्निमें होम करना चाहिए, क्योंकि उसको भी अविवाहित होनेसे आहवनीयाग्नि अप्राप्त है, ऐसा मीमांसाशास्त्र के छठे अध्याय में निर्णय किया गया है। यह जो प्रायश्चित्त लिखा गया है वह भी उपकुर्वाण ही के लिए है। परन्तु व्यभिचारी नैष्ठिक ब्रह्मचारीके लिए प्रायश्चित्त नहीं है॥। ४१

3.4.42 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४२

सूत्र ३.४.४२

उपपूर्वम् अपीत्य् एके भावमशनवत् तद् उक्तम् ॥ ३.४.४२ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 813

पदच्छेद — उपपूर्वम् , अपि , तु , एके , भावम् , अशनवत् , तदुक्तम्

सूत्रार्थ — ( अपितु, एके ) कई आचार्य इसे ( उपपूर्वम् ) उप उपसर्गपूर्वक उपपातक मानते हैं, ( अशनवत् ) जैसे उपकुर्वाण ब्रह्मचारी यदि मद्य - माँस खाए तो उसका व्रतलोप और पुनः संस्कार होता है, वैसे प्रच्युत नैष्ठिक ब्रह्मचारीके लिए मी प्रायश्चितका ( भावम् ) विधान है। ( तदुक्तम् ) इसका विचार पूर्वमीमांसा के ' समा विप्रतिपत्तिः स्यात् ' इत्यादि सूत्रोंमें किया गया है।

शाङ्करभाष्य

अपि तु एके आचार्या उपपातकमेवैतदिति मन्यन्ते यत् नैष्ठिकस्य गुरुदारादिभ्योऽन्यत्र ब्रह्मचर्यं विशीर्येत न तत् महापातकं भवति गुरुतल्पादिषु महापातकेष्वपरिगणनात् तस्मात् उपकुर्वाणवत् नैष्ठिकस्यापि प्रायश्चित्तस्य भावमिच्छन्ति ब्रह्मचारित्वाविशेषात् अवकीर्णित्वाविशेषाच्च अशनवत् यथा ब्रह्मचारिणो मधुमांसाशाने व्रतलोपः पुनः संस्कारश्च एवमिति। ये हि प्रायश्चित्तस्याभावमिच्छन्ति तेषां न मूलमुपलभ्यते ये तु भावमिच्छन्ति तेषां ब्रह्मचार्यवकीर्णी इत्येतदविशेषश्रवणं मूलम् तस्मात् भावो युक्ततरः तदुक्तं प्रमाणलक्षणे समा विप्रतिपत्तिः स्यात् शास्त्रस्था वा तन्निमित्तत्वात् इति प्रायश्चित्ताभावस्मरणं तु एवं सति यत्नगौरवोत्पादनार्थमिति व्याख्यातव्यम्। एवं भिक्षुवैखानसयोरपि वानप्रस्थो दीक्षाभेदे कृच्छ्रं द्वादशरात्रं चरित्वा महाकक्षं वर्धयेत् भिक्षुर्वानप्रस्थवत्सोमवृद्धिवर्जं स्वशास्त्रसंस्कारश्च इत्येवमादि प्रायश्चित्तस्मरणम् अनुसर्तव्यम्।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ३.४.४३ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — ' सिद्धान्ती - ' उप ' पद पूर्वक पाठक उपपातक कहा जाता है। " ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः। महन्ति पातकान्याहु संसर्गश्वापि तैः सह॥

" ( ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्णकी चोरी, गुरुपत्नीसे सङ्गम और उनसे वर्षतक सङ्ग इनको महापातक कहते हैं ) यह स्मृति है, और स्मृतिकी मूलभूत श्रुति भी है- ' स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचर स्तैरिति ” ( छा ० ५ / १०१ ९ ) ( ब्राह्मणके सुवर्णका चोर, मद्य पीनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा ये चारों पतित होते हैं और पाँचवां उनके साथ संसगं करनेवाला मी ) ये महापातक हैं।

अत : उपकुर्वाण ( समावर्तन के अनन्तर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करनेवाले ) ब्रह्मचारीके समान नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिए मी प्रायश्चित होना चाहिए, क्योंकि प्रायश्चित श्रुतिमूलक है। जैसे ' यवमयश्चरुः ' यहाँ यव शब्दका सन्देह होनेपर " यदान्या ओषधयोग्लायन्त्यथैते यवा मोदमानास्तिष्ठन्ति ' ( जब अन्य औषधियाँ सूखने लगती हैं तब ये यन मोदमान -हरे मारे रहते हैं ) इसप्रकार शास्त्रमूलक होनेसे दोघं शूक रूप अर्थ में यव शब्दका प्रयोग आदरणीय है, वैसे श्रतिमूलक प्रायश्चित्त भी आदरणीय है।

' सर्वपापप्रसक्तोऽपि ध्यायन्निमिषमच्युतम्। भूयस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावन एव च।। ' ' उपपातकसंघेषु पातकेषु महत्सु च। प्रविश्य रजनीपादं ब्रह्मध्यानं समाचरेत्॥ ' ( सर्व पापोंसे प्रसक्त होनेवाला भी अच्युत भगवानका निमिष मात्र ध्यान करता हुआ पुनः तपस्वी और पंक्तिपावन हो जाता है। उपपातकों के समुदाय में और महापातकों में रात्रि के चौथे प्रहरमें ब्रह्मका चिन्तन करे ) और “ मनोवाक्कायजान्दोषानज्ञानोत्थान्प्रमादजान्। सर्वान् दहति योगाग्निस्तूलराशिमिवाऽनलः।

नित्यमेव तु कुर्वीत प्राणायामांस्तु षोडशः। अपि भ्रूणहनं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः॥ ' ( जैसे अन्नि तुलराशिको जलाकर मस्ममय कर देती है, वैसे अज्ञानसे, प्रमादसे, मन - वाणी और शरोरसे हुए सब दोषों को योगाग्नि जला देती है। नित्य सोलह प्राणायाम करने चाहिए, एकमास तक प्रतिदिन किये गये प्राणायाम भ्रूणहत्या करनेवालेको भी पावन करते हैं ) इत्यादि वाक्योंका ग्रहण करना चाहिए। इसप्रकार उत्तम आश्रम से प्रच्युत ऊर्ध्वं रेताओंके लिए भी प्रायश्चित्तका विधान है।

अतः प्रायश्चित्तानन्तर उनका भी विद्यामें अधिकार है।। ४२

बहिरधिकरणम्

3.4.43 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४३

सूत्र ३.४.४३

बहिस् तूभयथापि स्मृतेर् आचाराच् च ॥ ३.४.४३ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 814

शाङ्करभाष्य

यदि ऊर्ध्वरेतसां स्वाश्रमेभ्यः प्रच्यवनं महापातकम् यदि वा उपपातकम् उभयथापि शिष्टैस्ते बहिष्कर्तव्याः आरूढो नैष्ठिकं धर्मं यस्तु प्रच्यवते पुनः। प्रायश्चित्तं न पश्यामि येन शुध्येत्स आत्महा इति आरूढपतितं विप्रं मण्डलाच्च विनिःसृतम्। उद्बद्धं कृमिदष्टं च स्पृष्ट्वा चान्द्रायणं चरेत् इति च एवमादिनिन्दातिशयस्मृतिभ्यः शिष्टाचाराच्च न हि यज्ञाध्ययनविवाहादीनि तैः सह आचरन्ति शिष्टाः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और दूसरे आचार्य ऐसा मानते हैं कि जो नैष्ठिक ब्रह्मचारीका गुरुपत्नी आदिसे अन्यत्र ब्रह्मचर्यं विशीर्ण हो तो वह उपपातक ही हैं महापातक नहीं है, क्योंकि उसकी गुरुतल्प आदि महापातकोंमें गणना नहीं है। इसलिए उपकुर्वाणके समान नैष्ठिकको मी प्रायश्चित्तके अस्तित्वकी इच्छा करते हैं, क्योंकि ब्रह्मचारित्व अविशेष है और अवकीर्णत्व अविशेष है अर्थात् दोनों समानरूपसे ब्रह्मचारी और अवकीर्णी हैं। अशनके समान।

जैसे मधु - मद्य और मांसके भक्षणसे ब्रह्मचारीके व्रतलोप और पुनः संस्कार होते हैं, वैसे यहाँ पर भी समझना चाहिए। जो प्रायश्चित्तका अभाव चाहते हैं उनके मतका मूल प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। और जो प्रायश्चित्तका माव चाहते हैं उनके मत में ' ब्रह्मचारी अवकीर्णी ' यह अविशेष श्रुतिमूल है।

इसलिए प्रायश्चित्तका अस्तित्व युक्ततर है | वह ' समा विप्रतिपत्तिः स्यात् ' ( यवमयश्चरुः ) यहाँपर कुछ लोग यव शब्दका दीर्घ शूक ' जो ' में प्रयोग करते हैं और कुछ ' त्रयंगु ' देशविशेषमें प्रयोग करते हैं, तो किसका चरु होना चाहिए। ऐसा सन्देह होनेपर वृद्ध प्रयोगके दोनों अर्थोंमें समान होनेसे विकल्पसे तुल्य प्रतिपत्ति होगी, ऐसा प्राप्त होने पर सिद्धान्त ' शास्त्रीय प्रतिपत्ति ही अधिक बलवती होती है, क्योंकि धर्मविज्ञान शास्त्रनिमित्तक है ' इसप्रकार प्रमाण लक्षण में कहा गया है।

ऐसा होनेपर प्रायश्चित्ताभाव प्रतिपादिक स्मृति तो [ नैष्ठिक में ] यत्नगौरव उत्पादन करनेके लिए है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए।

इसप्रकार ' वानप्रस्थो दीक्षाभेदे ० ' ( वानप्रस्थव्रतका लोप होनेपर ' दिनत्रयमेकवार भोजनं दिनत्रयं रात्रिभोजनं दिनत्रयमयाचितं दिनत्रयमुपवासकरणम् ' इसप्रकार बारह रात्रितक प्राजापत्यकर बहुत तृण और वृक्षवाले देशकी जलदान आदिसे वृद्धि करे ) ' मिक्षुर्वानप्रस्थवत् ० ' ( भिक्षु वानप्रस्थळे समान सोमलताको छोड़कर बहुत तृण और वृक्षवाले देशकी जलदान आदिसे वृद्धि करे और स्वशास्त्र विहित संस्कारध्यान प्राणायाम आदि भी करे ) इत्यादि प्रायश्चित्त स्मृतिका भिक्षु और वानप्रस्थमें भी अनुस्मरण

सूत्रार्थ - ( उभयथापि ) ऊर्ध्वरेताकी अपने आश्रम से प्रच्युति उपपातक हो चाहे महापातक दोनों प्रकारसे भी उसका शिष्टों द्वारा ( बहिस्तु ) बहिष्कार करना चाहिए, ( स्मृतेराचाराच्च ) क्योंकि ' प्रायश्चित्तं न पश्यामि ' इत्यादि निन्दास्मृति और शिष्टाचार हैं।

यदि ऊर्ध्वरेताओंका अपने आश्रम से प्रच्युत होना महापातक हो अथवा यदि उपपातक हो दोनों प्रकारसे उनका शिष्टपुरुषों द्वारा बहिष्कार करना चाहिए, क्योंकि ' आरूढो नैष्ठिकं ० ' ( जो नैष्ठिक धर्म में आरूढ हो पुनः प्रच्युत होता है, वह आत्मघाती जिससे शुद्ध हो ऐसा प्रायश्चित्त नहीं देखता हूँ ) और ' आरूढपतितं ० ' ( आश्रम में आरूढ हुए पतित विप्रको और मण्डलसे बहिष्कृत को, फाँसीते स्वयं मरनेवाले ब्राह्मणको और कृमियोंसे दष्ट ब्राह्मणको स्पर्श कर चान्द्रायण व्रत करे ) इत्यादि अतिशय निन्दा करनेवाली स्मृतियाँ हैं और शिष्टाचार भी है। इसलिए शिष्ट पुरुष उनके साथ यज्ञ, अध्ययन, विवाह आदि व्यवहार नहीं करते हैं॥ ४३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * जिन नैष्ठिक आदि पुरुषोंने प्रायश्चित्त कर लिया है, उनके साथ किया श्रवण आदि ब्रह्मविद्या साधन है कि नहीं? ऐसा सन्देह होनेपर पूर्वपक्ष में उनके साथ किया गया श्रवण आदि विद्या का साधन होता है। सिद्धान्तमें उनकी प्रायश्चित्त आदि पारलौकिक शुद्धि होनेपर भी यहाँ शुद्धि नहीं होती, इससे उनके साथ किया श्रवण आदि विद्याका साधन नहीं होता॥ ४३

स्वाम्यधिकरणम्

3.4.44 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४४

सूत्र ३.४.४४

स्वामिनः फलश्रुतेर् इत्य् आत्रेयः ॥ ३.४.४४ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 815

पदच्छेद — स्वामिनः फलश्रुतेः , इति , आत्रेयः

सूत्रार्थ — ( स्वामिन : ) यजमान ही साङ्ग प्रधान उपासनाओं का कर्ता है, ( इति आत्रेयः ) ऐसा आत्रेय आचार्यका मत है, ( फलश्रुतेः ) क्योंकि ' वर्षाति हास्मै ' इत्यादि फलश्रुति है।

शाङ्करभाष्य

अङ्गेषूपासनेषु संशयः किं तानि यजमानकर्माणि आहोस्वित् ऋत्विक्कर्माणीति। किं तावत्प्राप्तम् यजमानकर्माणीति कुतः फलश्रुतेः फलं हि श्रूयते वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते इत्यादि तच्च स्वामिगामि न्याय्यम् तस्य साङ्गे प्रयोगेऽधिकृतत्वात् अधिकृताधिकारत्वाच्च एवंजातीयकस्य फलं च कर्तरि उपासनानां श्रूयते वर्षत्यस्मै य उपास्ते इत्यादि। ननु ऋत्विजोऽपि फलं दृष्टम् आत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति इति न तस्य वाचनिकत्वात्। तस्मात् स्वामिन एव फलवत्सु उपासनेषु कर्तृत्वम् इत्यात्रेय आचार्यो मन्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अङ्गोंसे सम्बद्ध उपासनाओं में संशय होता है कि क्या वे उपासनाएँ यजमानके कर्म हैं अथवा ऋत्वक्के कर्म हैं? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षो – वे यजमानके कर्म हैं, क्योंकि ऐसी फलश्रुति है | ‘ वर्षति हास्मै ० ' ( जो इसे इसप्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकार के सामकी उपासना करता है उसके लिए वर्षा होती है वह स्वयं भी मेघोंसे वर्षा करा लेता है ) इत्यादि फलश्रुति है। वह फल स्वामी - यजमान को प्राप्त हो यह उचित है, क्योंकि वह साङ्ग प्रयोग में अधिकृत है। इस प्रकारकी उपासनामें वह अधिकृत अधिकार है। और ' वर्ष व्यस्मै ० ' ( जो उपासना करता है उसके आचार्य मानते हैं॥ ४४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अङ्गाश्रित उपासनाओंमें यजमान और ऋत्विक दोनोंके कर्तृत्वका संभव होनेसे संशय होता है। पूर्वपक्ष में इन उपासनाओंका कर्ता यजमान है, क्योंकि ' वर्षति हास्मै ' इत्यादि फलश्रुति है, कारण कि कर्तृत्व और मोक्तृत्व एकमें ही युक्त है। जैसे साङ्ग क्रतुमें अधिकृतका अधिकार होनेसे गोदोहनका फल क्रतुके अधिकारीको प्राप्त होता है, वैसे बङ्गाश्रित उपासनामों का फल भी यजमानको प्राप्त होता है, क्योंकि अधिकृत अधिकारी है। यद्यपि ऋत्विक् के लिए भी फलका श्रवण है, तो भी यजमान कर्तृक भोक्तृक फलका बाधक न होनेसे उपासनाओंका फल कर्ता यजमान को ही प्राप्त होता है॥ ४४

3.4.45 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४५

सूत्र ३.४.४५

आर्त्विज्यम् इत्य् औडुलोमिः तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ३.४.४५ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 816

पदच्छेद — विज्यम् , इति , ओडुलोभिः , तस्मै , हि , परिक्रीयते

सूत्रार्थ — ( आत्विज्यम् ) इन उपासनाओंका कर्ता ऋत्विक् हैं, ( इति ओडुलोमि : ) ऐसा मोडुलोभि आचार्यका मत है, ( हि ) क्योंकि ( तस्मै ) उस साङ्ग कर्म के लिए ( परिक्रीयते ) दक्षिणा से ऋत्विक खरीदा जाता है।

शाङ्करभाष्य

नैतदस्ति स्वामिकर्माण्युपासनानीति ऋत्विक्कर्माण्येतानि स्युः इत्यौडुलोमिराचार्यो मन्यते किं कारणम् तस्मै हि साङ्गाय कर्मणे यजमानेन ऋत्विक् परिक्रियते तत्प्रयोगान्तःपातीनि च उद्गीथाद्युपासनानि अधिकृताधिकारत्वात् तस्मात् गोदोहनादिनियमवदेव ऋत्विग्भिर्निर्वर्त्येरन् तथा च तं ह बको दाल्भ्यो विदांचकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव इत्युद्गातृकर्तृकतां विज्ञानस्य दर्शयति। यत्तूक्तं कर्त्राश्रयं फलं श्रूयत इति नैष दोषः परार्थत्वादृत्विजः अन्यत्र वचनात् फलसंबन्धानुपपत्तेः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सिद्धान्ती — उपासनाएँ स्वामी कर्म हैं, ऐसा नहीं है, ये ऋत्विक्के कर्म होने चाहिए, ऐसा बडुलोम आचार्य मानते हैं, क्योंकि उस साङ्ग कर्मके लिए यजमान से ऋत्विक्का परिक्रयण किया जाता है। और उद्गीथ आदि उपासनाएँ उस प्रयोगके अन्तर्भूत हैं, क्योंकि अधिकृतका अधिकार है। इसलिए गोदोहन आदिके समान ही वे साङ्ग उपासनाएँ ऋत्विजोंसे ही संपादन होनी चाहिए। उसी प्रकार ' तं ह बको दाल्भ्यो ० ' ( अतः दाल्भ्यके पुत्र बकने उसे जाना - पूर्वोक्त प्रकार से प्राणदृष्टिसे उद्गीथकी उपासनाकी वह नैमिषारण्यमें यज्ञ करनेवालोंका उद्गाता हुआ ) यह श्रुति विज्ञानको उद्गाता कर्तृक दिखलाती है। जो यह कहा गया है कि कर्ता आश्रय फलश्रुति है, यह दोष नहीं है, क्योंकि ऋत्विक् यजमानके लिए है, अतः वचनसे अन्यत्र ऋत्विक्का फल सम्बन्ध अनुपपन्न है।। ४५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.४७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

3.4.46 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४६

सूत्र ३.४.४६

श्रुतेश्व ॥ ३.४.४६ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 816

पदच्छेद — धुते च

सूत्रार्थ — क्योंकि ' यां वै काञ्चन ' इत्यादि श्रुति ऋत्विक् कर्तृक उपासनाका फल यजमानके लिए दिखलाती है। लिए मेघ यथेष्ट वृष्टि करता है ) इत्यादि फल उपासनाओंके कर्ता में सुना जाता है। परन्तु ' आत्मने वा यजमानाय ० ' ( अपने लिए अथवा यजमानके लिए जिस मनोरथकी वह उद्गाता कामना करता है उसे सामके उद्गानसे सिद्ध करता है ) इसप्रकार ऋत्विक्को भी फल प्राप्त हुआ देखा गया है। नहीं, क्योंकि वह वाचनीक है, इसलिए यजमान ही फलवाली उपासनाओंका कर्ता है, ऐसा आत्रेय

शाङ्करभाष्य

' यां वै कांचन यज्ञे ऋत्विज आशिषमाशासत इति यजमानायैव तामाशासत इति होवाच ' इति, ' तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात्कं ते काममागायानि ' ( छा ० १।१८ - ९ ) इति। तच्चविकर्तृकस्य विज्ञानस्य यजमानगामि फलं दर्शयति। तस्मादङ्गोपासनानामृत्विक्कर्मत्वसिद्धिः॥४६

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' यां वै कांचन ० ' ( ऋत्विक् यज्ञमें जिस किसी कामकी प्रार्थना करते हैं यजमानके लिए ही उसकी प्रार्थना करते हैं, ऐसा उसने कहा ) ' लस्मादु ० ' ( अतः इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे इस प्रकार कहे कि मैं तेरे लिए किन इष्ट कामनाओंका आगान करूँ ) इस प्रकार श्रुतियाँ ऋत्विक् कर्तृक उपासनाका फल यजमानगामी दिखलाती हैं। इसलिए अजोपासनाओंमें ऋत्विक् कर्मत्व सिद्ध होता है॥ ४६

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ३.४.४७ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

सहकार्यन्तरविध्यधिकरणम्

3.4.47 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४७

सूत्र ३.४.४७

सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ३.४.४७ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 817

पदच्छेद — सहकार्यन्वरविधिः , पक्षेण , तृतीयम् , तद्वतः विध्यादिवत्

सूत्रार्थ — - ( सहकायंन्तरविधिः ) ' बाल्यं च पाण्डित्यं ० ' इस श्रुति में विद्याके सहकारी मौनको अपूर्व होने से विधि समझना चाहिए, ( तृतीयम् ) और श्रवण आदि साधनोंमें तृतीय साधन निदिध्यासन मौनशब्दसे विहित है, ( तद्वतः ) परोक्ष ज्ञानयुक्त संन्यासियोंके लिए साक्षात्कार निमित्त यह विधि है, ( पक्षेण ) जिस पक्षमें भेद दर्शनकी प्राप्ति है उस पक्ष से साक्षात्कार की प्राप्ति न होनेसे यह विधि सार्थक है | ( विध्यादिवत् ) जैसे दर्शपूर्णमास प्रधान विधिमें अन्वाधान अङ्गोंकी विधि होती है, वैसे यहाँ मौनकी विधि है।

शाङ्करभाष्य

तस्माद्ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद्बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः इति बृहदारण्यके श्रूयते। तत्र संशयः मौनं विधीयते न वेति। न विधीयत इति तावत्प्राप्तम् बाल्येन तिष्ठासेत् इत्यत्रैव विधेरवसितत्वात् न हि अथ मुनिः इत्यत्र विधायिका विभक्तिरुपलभ्यते तस्मादयमनुवादो युक्तः कुतः प्राप्तिरिति चेत् मुनिपण्डितशब्दयोर्ज्ञानार्थत्वात् पाण्डित्यं निर्विद्य इत्येवं प्राप्तं मौनम्।

अपि च अमौनं च मौनं च निर्विद्याथ ब्राह्मणः इत्यत्र तावत् न ब्राह्मणत्वं विधीयते प्रागेव प्राप्तत्वात् तस्मात् अथ ब्राह्मणः इति प्रशंसावादः तथैव अथ मुनिः इत्यपि भवितुमर्हति समाननिर्देशत्वादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः सहकार्यन्तरविधिरिति। विद्यासहकारिणो मौनस्य बाल्यपाण्डित्यवद्विधिरेव आश्रयितव्यः अपूर्वत्वात्। ननु पाण्डित्यशब्देनैव मौनस्यावगतत्वमुक्तम् नैष दोषः मुनिशब्दस्य ज्ञानातिशयार्थत्वात् मननान्मुनिरिति च व्युत्पत्तिसंभवात् मुनीनामप्यहं व्यासः इति च प्रयोगदर्शनात्।

ननु मुनिशब्द उत्तमाश्रमवचनोऽपि श्रूयते गार्हस्थ्यमाचार्यकुलं मौनं वानप्रस्थम् इत्यत्र न वाल्मीकिर्मुनिपुंगवः इत्यादिषु व्यभिचारदर्शनात् इतराश्रमसंनिधानात्तु पारिशेष्यात् तत्र उत्तमाश्रमोपादानम् ज्ञानप्रधानत्वादुत्तमाश्रमस्य। तस्मात् बाल्यपाण्डित्यापेक्षया तृतीयमिदं मौनं ज्ञानातिशयरूपं विधीयते। यत्तु बाल्य एव विधिपर्यवसानमिति तथापि अपूर्वत्वान्मुनित्वस्य विधेयत्वमाश्रीयते मुनिः स्यादिति निर्वेदनीयत्वनिर्देशादपि मौनस्य बाल्यपाण्डित्यवद्विधेयत्वाश्रयणम्।

तद्वतः विद्यावतः संन्यासिनः कथं च विद्यावतः संन्यासिन इत्यवगम्यते तदधिकारात् आत्मानं विदित्वा पुत्राद्येषणाभ्यो व्युत्थाय अथ भिक्षाचर्यं चरन्ति इति। ननु सति विद्यावत्त्वे प्राप्नोत्येव तत्रातिशयः किं मौनविधिना इत्यत आह पक्षेणेति। एतदुक्तं भवति यस्मिन्पक्षे भेददर्शनप्राबल्यात् न प्राप्नोति तस्मिन् एष विधिरिति।

विध्यादिवत् यथा दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत इत्येवंजातीयके विध्यादौ सहकारित्वेन अग्न्यन्वाधानादिकम् अङ्गजातं विधीयते एवम् अविधिप्रधानेऽपि अस्मिन्विद्यावाक्ये मौनविधिरित्यर्थः।। एवं बाल्यादिविशिष्टे कैवल्याश्रमे श्रुतिमति विद्यमाने कस्मात् छान्दोग्ये गृहिणा उपसंहारः अभिसमावृत्य कुटुम्बे इत्यत्र तेन हि उपसंहरन् तद्विषयमादरं दर्शयति इत्यत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' तस्माद्ब्राह्मण : ० ' ( अत : ब्राह्मण आत्मज्ञानका पूर्णदया संपादन कर आत्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहने की इच्छा करे। फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्तकर वह मुनि होता है। तथा मौन और मौनका पूर्णतया संपादनकर ब्राह्मण कृतकृत्य होता है ) ऐसी बृहदारण्यकमें श्रुति है। उसमें संशय होता है कि मौनका विधान किया जाता है अथवा नहीं? पूर्वपक्षी - मौनका विधान नहीं किया जाता, ऐसा प्राप्त होता है। क्योंकि ' बाल्येन तिष्ठासेत् ' यहाँपर ही विधि समाप्त हो जाती है। कारण कि ' अथ मुनि : ' इसमें विधायक विधि प्रतिपादक विभक्ति उपलब्ध नहीं होती, इससे यह अनुवाद युक्त है। ऐसा यदि कहो कि मौनकी कहाँसे प्राप्ति हुई, तो मुनि और पाण्डित्य शब्दोंके ज्ञानार्थंक होने से ' पाण्डित्यं निर्विद्य ' इससे मौन प्राप्त होता है। और ' अमौनं च मौनं च ० ' ( अमोन और मौनका पूर्णतया संपादनकर ब्राह्मण कृतकृत्य होता है ) यहाँ ब्राह्मणत्का विधान नहीं किया जाता, क्योंकि वह [ विविदिषन्ति ब्राह्मणाः ] पूर्वसे प्राप्त है। इसलिए ' अथ ब्राह्मण : ' यह प्रशंसावाद ही है। इसीप्रकार ' अथ मुनिः ' यह भी प्रशंसावाद ही हो सकता है, क्योंकि दोनों में समानरूपसे निर्देश है।

सिद्धान्ती --- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' सहकार्यन्तरविधिः ' विद्या सहकारी मौनकी बाल्य और पाण्डित्य के समान विधि ही आश्रयण करनी चाहिए, क्योंकि वह अपूर्व है। परन्तु यह कहा गया है कि पाण्डित्यशब्दसे ही मौन अवगत है? यह दोष नहीं है, क्योंकि मुनि शब्द ज्ञानातिश्यार्थक है और ' मननसे मुनि ' इस व्युत्पत्तिका संभव है, धौर ' मुनीनामप्यहं व्यासः ' ( मुनियोंमें भी मैं व्यास हूँ ) इस प्रकार प्रयोग देखने में आता है।

परन्तु " गार्हस्थ्यमाचार्यकुलं ० ' ( गार्हस्थ्य, आचार्य कुल, मौन और वानप्रस्थ ) इस श्रुतिमें मुनिशब्द उत्तमाश्रमका वाचक भी है? नहीं, क्योंकि ' वाल्मीकि र्मुनिपुङ्गव ' इत्यादिमें व्यभिचार दिखाई देता है। परन्तु अन्य बाश्रमोंके सन्निधानसे और परिशेष इस वचनमें उत्तम आश्रमका ग्रहण है, कारण कि उत्तम आश्रम ज्ञान प्रधान है। इसलिए बाल्यमें ही विधिका पर्यवसान किया गया है, तो भी मुनित्वका अपूर्व होनेसे ' मुनिः स्यात् ' इस प्रकार विधेयत्व आश्रयण किया जाता है।

मोनका निर्वेदनीयरूपसे निर्देश होने से भी बाल्य और पाण्डित्य के समान विधेयत्व आश्रयण है। ' तद्वतो ' विद्यावान् - संन्यासीका। विद्यावान् - संन्यासीका, ऐसा किससे अवगत होता है? इससे कि ' आत्मानं विदित्वा ० ' ( आत्माको जानकर पुत्र आदि एषणाका त्यागकर अनन्तरमिक्षाचर्यं करते हैं ) इस प्रकार संन्यासीका अधिकार है। परन्तु विद्यावत्त्व होनेपर उसमें अतिशय प्राप्त होता ही है, तो मौन विधिका क्या प्रयोजन?

इसपर कहते हैं - ' पक्षेण ' अभिप्राय यह - जिस पक्षमें भेद दर्शनकी प्रधानतासे [ ज्ञानातिशय ] प्राप्त नहीं होता उस पक्ष में यह विधि है। विधि आदिके समान। जैसे ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' इस प्रकारकी विधि आदिमें सहकारिरूपसे अग्निके अन्वाधान आदि अङ्ग समूहका विधान किया जाता है। इस प्रकार अविधि प्रधान इस विद्यावाक्यमें भी मौन विधि है, ऐसा अर्थ है॥ ४७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * विधुर आदि मन्द अधिकायिोंके लिए ज्ञानका साधन जप, तप आदि और मध्यम अधिकारियोंके लिए ज्ञानका साधन अङ्गोपासनाको कहकर अब प्रसङ्गवश उत्तम अधिकारियोंके लिए ज्ञानका साधन ‘ सहकार्यन्तरविधिः ' इत्यादिसे कहते हैं। पूर्वपक्षमें मुमुक्षुको मौन अनुष्ठेय नहीं है, सिद्धान्त में मौन अनुष्ठेय है।। ४७

3.4.48 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४८

सूत्र ३.४.४८

कृत्स्नभावात् तु गृहिणोपसंहारः ॥ ३.४.४८ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 819

पदच्छेद — कृत्स्नभावात् तु गृहिणा , उपसंहारः

सूत्रार्थ — ( कृत्स्नभावात् ) गृहस्थाश्रम में विशेषरूपसे विद्यमान हैं, अतः यज्ञ आदि और आश्रमान्तर विहित शर्मा आदिका ( गृहिणा ) गृहस्थाश्रमसे ( उपसंहारः ) उपसंहार किया गया है, ( तु ) शब्द विशेषणार्थंक है।

शाङ्करभाष्य

तुशब्दो विशेषणार्थः कृत्स्नभावोऽस्य विशेष्यते बहुलायासानि हि बहून्याश्रमकर्माणि यज्ञादीनि तं प्रति कर्तव्यतयोपदिष्टानि आश्रमान्तरकर्माणि च यथासंभवमहिंसेन्द्रियसंयमादीनि तस्य विद्यन्ते। तस्मात् गृहमेधिना उपसंहारो न विरुध्यते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — • एवं बाल्यादिविशिष्टे कैवल्याश्रमे श्रुतिमति विद्यमाने कस्माच्छान्दोग्ये गृहिणोप-

इस प्रकार बाल्य आदि विशिष्ट श्रुति प्रतिपादित कैवल्याश्रमके विद्यमान होनेपर छान्दोग्योपनिषद् में ' अभिसमावृत्य कुटुम्बे ' ( आचार्यकुलसे समावर्तनकर कुटुम्ब - गृहस्थाश्रममें स्थित हो पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ ) इस वाक्य में गृहीसे किस प्रकार उपसंहार किया जाता है? इससे उपसंहार करता हुआ श्रुतिवाक्य गृहस्थाश्रम विषयक आदर दिखलाता है। अतः उत्तर कहते हैं—

सूत्रस्थ ' तु ' शब्द विशेषणार्थंक है। उससे गृहस्थाश्रमकी पूर्णता विशेषण विशिष्ट की जाती है, क्योंकि बहुत आयासवाले बहुतसे यज्ञ आदि आश्रमकर्म गृहस्थाश्रम के लिए कर्तव्यरूपसे उपदिष्ट हैं और अहिंसा, इन्द्रियसंयम आदि अन्य आश्रमके कर्म भी यथासंभव उसमें विद्यमान हैं, छतः गृहस्थाश्रमले उपसंहार विरुद्ध नहीं है॥ ४८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यहाँ संन्यासाश्रम अभावको लेकर गृहस्थाश्रमसे उपसंहार नहीं है, क्योंकि संन्यासाश्रम प्रतिपादक अनेक श्रुति, स्मृतिवाक्य हैं॥ ४८

3.4.49 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ४९

सूत्र ३.४.४९

मौनवद् इतरेषाम् अप्य् उपदेशात् ॥ ३.४.४९ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.४९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 819

पदच्छेद — मौनवत् , इतरेषाम् , अपि , उपदेशात्

सूत्रार्थ — ( मौनवत् ) जैसे मौन और गृहस्थाश्रम श्रुति सम्मत हैं, वैसे ( इतरेषामपि ) वानप्रस्थ और ब्रह्मचार्याश्रम मी श्रुति सम्मत हैं, ( उपदेशात् ) क्योंकि चारों आश्रमोंका श्रुतिमें उपदेश है।

शाङ्करभाष्य

यथा मौनं गार्हस्थ्यं च एतावाश्रमौ श्रुतिमन्तौ एवमितरावपि वानप्रस्थगुरुकुलावासौ दर्शिता हि पुरस्ताच्छ्रुतिः तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयः इत्याद्या। तस्मात् चतुर्णामप्याश्रमाणाम् उपदेशाविशेषात् तुल्यवत् विकल्पसमुच्चयाभ्यां प्रतिपत्तिः। इतरेषामिति द्वयोराश्रमयोर्बहुवचनं वृत्तिभेदापेक्षया अनुष्ठातृभेदापेक्षया वा इति द्रष्टव्यम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जैसे मौन -संन्यासाश्रम और गृहस्थाश्रम ये दो आश्रम श्रुतिसम्मत हैं, वैसे वानप्रस्थ और गुरुकुलवास- ब्रह्मचर्याश्रम ये अन्य दो आश्रम भी श्रुतिसम्मत हैं, क्योंकि ' तप एव द्वितीयो ० ' ( तप हो द्वितीय धर्मस्कन्ध है और ब्रह्मचारी आचार्यं कुलवासी यह तृतीय धर्मस्कन्ध है ) इत्यादि श्रुति पूर्व में दिखलाई गई है। इसलिए चारों आश्रमोंका भी अविशेष उपदेश होनेसे उनकी समानरूपसे विकल्प और समुच्चयसे प्रतीति होती है। इतरेषाम् ( अन्योंका ) इसप्रकार दो आश्रमोंके लिए बहुवचन वृत्तिभेदसे अथवा अनुष्ठाता के भेदसे है, ऐसा समझना चाहिए॥ ४ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * सूत्रकारने प्रथम दो सूत्रोंसे संन्यास और गृहस्थ आश्रमोंका प्रतिपादन किया है, अत : इनसे अतिरिक्त अन्य दो आश्रमोंके न होनेका यदि किसीको भ्रम हो तो ' मौनवत् ' इत्यादिसे निवृत्त करते हैं। प्रत्येक आश्रमका भेद ( ब्रह्मसूत्र ३, ४, १८ ) इस सूत्र की ' सत्यानन्दी - दीपिका ' में द्रष्टव्य है। इसप्रकार चार आश्रमोंका विशेषरूपसे उपदेश होनेसे ' यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रत्रजेद् गृहाद्वावनाद्वा ' यह विकल्प और ' ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्गृहीभूत्वा वनी भवेत्, वनीभूत्वा प्रव्रजेत् ' यह समुच्चय समानरूपसे समझना चाहिए॥ ४ ९

अनाविष्काराधिकरणम्

3.4.50 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ५०

सूत्र ३.४.५०

अनाविष्कुर्वन्न् अन्वयात् ॥ ३.४.५० ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.५०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 820

पदच्छेद — अनाविष्कुर्वन् , अन्वयात्

सूत्रार्थ — ( अनाविष्कुर्वन् ) बालक के समान अपने ज्ञान आदिको लोगों में प्रकट न करता हुआ ' केवल शुद्ध भाव हो ' इतना ही ' अव्यक्तलिङ्गः ' इत्यादि श्रुतिसे विहित है। ( अन्वयात् ) क्योंकि तावन्मात्र ही ज्ञानके अभ्यासमें अनुगत है।

शाङ्करभाष्य

तस्माद्ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् इति बाल्यमनुष्ठेयतया श्रूयते तत्र बालस्य भावः कर्म वा बाल्यमिति तद्धिते सति बालभावस्य वयोविशेषस्य इच्छया संपादयितुमशक्यत्वात् यथोपपादमूत्रपुरीषत्वादि बालचरितम् अन्तर्गता वा भावविशुद्धिः अप्ररूढेन्द्रियत्वं दम्भादिरहितत्वं वा बाल्यं स्यादिति संशयः। किं तावत्प्राप्तम् कामचारवादभक्षता यथोपपादमूत्रपुरीषत्वं च प्रसिद्धतरं लोके बाल्यमिति तद्ग्रहणं युक्तम्।

ननु पतितत्वादिदोषप्राप्तेर्न युक्तं कामचारताद्याश्रयणम् न विद्यावतः संन्यासिनो वचनसामर्थ्यात् दोषनिवृत्तिः पशुहिंसादिष्विवेत्येवं प्राप्ते अभिधीयते न वचनस्य गत्यन्तरसंभवात् अविरुद्धे हि अन्यस्मिन् बाल्यशब्दाभिलप्ये लभ्यमाने न विध्यन्तरव्याघातकल्पना युक्ता प्रधानोपकाराय च अङ्गं विधीयते ज्ञानाभ्यासश्च प्रधानमिह यतीनामनुष्ठेयम् न च सकलायां बालचर्यायामङ्गीक्रियमाणायां ज्ञानाभ्यासः संभाव्यते तस्मात् आन्तरो भावविशेषो बालस्य अप्ररूढेन्द्रियत्वादिः इह बाल्यमाश्रीयते तदाह अनाविष्कुर्वन्निति।

ज्ञानाध्ययनधार्मिकत्वादिभिः आत्मानमविख्यापयन् दम्भदर्पादिरहितो भवेत् यथा बालः अप्ररूढेन्द्रियतया न परेषाम् आत्मानमाविष्कर्तुमीहते तद्वत्। एवं हि अस्य वाक्यस्य प्रधानोपकार्यर्थानुगम उपपद्यते तथा च उक्तं स्मृतिकारैः यं न सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम्। न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित्स ब्राह्मणः।। गूढधर्माश्रितो विद्वानज्ञातचरितं चरेत्। अन्धवज्जडवच्चापि मूकवच्च महीं चरेत् अव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्ताचारः इति चैवमादि।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' तस्माद्ब्राह्मणः ०, ( इसलिए ब्राह्मणको पाण्डित्य - आत्मज्ञानका पूर्णतया सम्पादनकर बाल्यज्ञानबलभावसे स्थित रहना चाहिए ) इसप्रकार बाल्यकी अनुष्ठानरूपसे श्रुति है। यहाँ बालका भाव अथवा बालका कर्म बाल्य है इसप्रकार तद्धित प्रत्यय होनेपर बालभाव - वयोविशेषका इच्छासे सम्पादन नहीं किया जा सकता, अतः यथासम्भव मूत्र, पुरीषत्वका त्याग आदि बालचरित बाल्य है अथवा अन्तर्गत मावविशुद्धि अथवा दम्म दर्प और इन्द्रिय प्ररूढ आदिसे रहित बाल्य होना चाहिए, ऐसा संशय होता है। तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - इच्छानुसार वदन, मक्षण, यथेच्छ मूत्र, पुरीषका त्याग, ऐसा बाल्य लोक में अतिप्रसिद्ध है, उसका ग्रहण युक्त है। परन्तु पतितत्व आदि दोषकी प्राप्ति होनेसे कामचारता आदिका आश्रयण युक्त नहीं है। ऐसा नहीं, क्योंकि विद्यावान् संन्यासीका वचनकी सामर्थ्य दोष निवृत्त हो जाता है, जैसे विधि प्राप्त पशुहिंसा आदिमें दोष नहीं होता है।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - नहीं, क्योंकि [ बाल्येन तिष्ठासेत् ] इस वचनकी अन्य गति हो सकती है। बाल्य शब्द वाच्य अन्य अविरुद्ध अर्थके उपलब्ध होनेपर अन्य विधिके व्याघातकी कल्पना युक्त नहीं है। प्रधानके उपकारके लिए अङ्गका विधान किया जाता है। यहां ज्ञानाभ्यास यतियोंके लिए प्रधान अनुष्ठेय है। परन्तु सम्पूर्ण बालचर्या अङ्गीकार किये जानेपर ज्ञानाभ्यास की संभावना नहीं होगी। इसलिए बालका आन्तर भावविशेष अप्ररूढ इन्द्रियत्व यादि बाल्य यहाँ आश्रयण किया जाता है।

उसे कहते हैं - ' अनाविष्कुर्वन् ज्ञान, अध्ययन, धार्मिकत्व आदिसे अपनी [ बाल्येन तिष्ठासेत् ] इस वाक्यका प्रधानोपाकारी - ज्ञानाभ्यासोपकारी अर्थानुग " होता है। ख्याति न करता हुआ दम्म, दर्प आदिसे रहित हो, जैसे बालक इन्द्रियोंके प्ररूढ न होनेसे अपनेको अन्योंके आगे प्रकट करनेकी चेटा नहीं करता, वैसे विद्वानके विषयमें समझना चाहिए।

इसप्रकार और इसीप्रकार ' यं न सन्तं ० ' ( जिसे कोई न सत्, न असत्, न अश्रुत, न बहुश्रुत, न सुवृत्त और न दुवृत्त जानता है वह ब्राह्मण है | गूढ धर्मका आश्रय करता हुआ विद्वान् दूसरोंसे अज्ञात चरित होकर विचरण करे | अन्धके समान, जड़के समान और मूकके समान पृथिवी पर विचरण करे ) ( अब्यक्तलिङ्ग और अव्यक्त आचारवाला हो ) इत्यादि स्मृतिकारोंने कहा है॥ ५०

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपक्ष में- ' बाल्येन तिष्ठासेत् ' इस विधि वाक्यमें बाल्यशब्द से लोक प्रसिद्ध यथेच्छ खान, पान आदि ग्राह्य है। इसलिए इसप्रकारका यथेच्छ बालभ्यवहार विद्वान् द्वारा विद्याके अङ्गरूपसे अनुष्ठेय है, सिद्धान्त में - बाल्यशब्दसे भावशुद्धि विद्वानके लिए अनुष्ठेय है।

# सिद्धान्ती - बालके यावत् बाह्य चरित ग्राह्य नहीं हैं, क्योंकि ' यस्त्व विज्ञानवान्भवत्य मनस्कः सदाऽशुचिः ' ( कठ ० १।३।७ ) ( किन्तु जो बुद्धि युक्त नहीं है, स्थिर चित्त नहीं है और सदा अपवित्र रहता है वह उस ब्रह्मलोकको प्राप्त नहीं होता ) इत्यादि शौच आदिका नियामक शास्त्र है॥ ५०

ऐहिकाधिकरणम्

3.4.51 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ५१

सूत्र ३.४.५१

ऐहिकम् अप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ॥ ३.४.५१ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.५१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 821

पदच्छेद — ऐहिकम् अपि 3 अप्रस्तुतप्रतिबन्धे " तद्दर्शनात्

सूत्रार्थ — ( अप्रस्तुत प्रतिबन्धे ) प्रस्तुत प्रतिबन्धके न होनेपर ( ऐहिकमपि ) इस जन्म में भी विद्याकी उत्पत्ति होती है, ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि ' गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव : ' इत्यादि श्रुतियोंमें उसे देखा जाता है |

शाङ्करभाष्य

सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् इत्यत आरभ्य उच्चावचं विद्यासाधनमवधारितम् तत्फलं विद्या सिध्यन्ती किमिहैव जन्मनि सिध्यति उत कदाचित् अमुत्रापीति चिन्त्यते। किं तावत्प्राप्तम् इहैवेति किं कारणम् श्रवणादिपूर्विका हि विद्या न च कश्चित् अमुत्र मे विद्या जायतामित्यनुसंधाय श्रवणादिषु प्रवर्तते समान एव तु जन्मनि विद्याजन्म अभिसंधाय एतेषु प्रवर्तमानो दृश्यते। यज्ञादीन्यपि श्रवणादिद्वारेणैव विद्यां जनयन्ति प्रमाणजन्यत्वाद्विद्यायाः।

तस्मादैहिकमेव विद्याजन्मेत्येवं प्राप्ते वदामः ऐहिकं विद्याजन्म भवति असति प्रस्तुतप्रतिबन्ध इति। एतदुक्तं भवति यदा प्रक्रान्तस्य विद्यासाधनस्य कश्चित्प्रतिबन्धो न क्रियते उपस्थितविपाकेन कर्मान्तरेण तदा इहैव विद्या उत्पद्यते यदा तु खलु तत्प्रतिबन्धः क्रियते तदा अमुत्रेति। उपस्थितविपाकत्वं च कर्मणो देशकालनिमित्तोपनिपाताद्भवति यानि च एकस्य कर्मणो विपाचकानि देशकालनिमित्तानि तान्येव अन्यस्यापीति न नियन्तुं शक्यते यतो विरुद्धफलान्यपि कर्माणि भवन्ति।

शास्त्रमपि अस्य कर्मण इदं फलमित्येतावति पर्यवसितं न देशकालनिमित्तविशेषमपि संकीर्तयति। साधनवीर्यविशेषात्तु अतीन्द्रिया कस्यचिच्छक्तिराविर्भवति तत्प्रतिबद्धा परस्य तिष्ठति। न च अविशेषेण विद्यायाम् अभिसंधिर्नोत्पद्यते इह अमुत्र वा मे विद्या जायतामिति अभिसंधेर्निरङ्कुशत्वात्। श्रवणादिद्वारेणापि विद्या उत्पद्यमाना प्रतिबन्धक्षयापेक्षयैव उत्पद्यते। तथा च श्रुतिः दुर्बोधत्वमात्मनो दर्शयति श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः।

आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः इति। गर्भस्थ एव च वामदेवः प्रतिपेदे ब्रह्मभावमिति वदन्ती जन्मान्तरसंचितात् साधनात् जन्मान्तरे विद्योत्पत्तिं दर्शयति न हि गर्भस्थस्यैव ऐहिकं किंचित्साधनं संभाव्यते।

स्मृतावपि अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति इत्यर्जुनेन पृष्टो भगवान्वासुदेवः न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति इत्युक्त्वा पुनस्तस्य पुण्यलोकप्राप्तिं साधुकुले संभूतिं च अभिधाय अनन्तरम् तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् इत्यादिना अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् इत्यन्तेन एतदेव दर्शयति। तस्मात् ऐहिकम् आमुष्मिकं वा विद्याजन्म प्रतिबन्धक्षयापेक्षयेति स्थितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' सर्वापेक्षा च ' इस सूत्र से आरम्भकर नाना प्रकार के विद्यासाधनों का निश्चय किया गया है। उन साधनोंके फलरूपसे सिद्ध होती हुई विद्या इसी जन्म में सिद्ध होती है अथवा कदाचित् अन्य जन्ममें मी? इसपर विचार किया जाता है। तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - इसी जन्ममें विद्या सिद्ध होती है, क्योंकि विद्या श्रवण आदि पूर्विका है। मुझे अन्य जन्ममें विद्या उत्पन्न हो ऐसा संकल्पकर कोई भी श्रवण आदिमें प्रवृत्त नहीं होता। किन्तु इसी जन्म में विद्याजन्मका संकल्पकर इन साधनों में प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है। यज्ञ आदि मो श्रवण आदि द्वारा ही विद्याको उत्पन्न करते हैं, क्योंकि विद्या प्रमाणजन्य है। इसलिए विद्याका जन्म इसी जन्म में ही

है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त

उत्पन्न होती है। अभिप्राय होनेपर हम कहते हैं - प्रस्तुत प्रतिबन्धके न होनेपर इसी जन्म में विद्या यह है - जब प्रक्रान्त - पूर्ववर्णित विद्यासाधनका उपस्थित विपाकवाले अन्य

कर्मसे कोई प्रतिबन्ध नहीं किया जाता, तब इसी जन्म में विद्या उत्पन्न होती है और यदि उसका

प्रतिबन्ध किया जाता है तो अन्य जन्म में उत्पन्न होती है। कर्ममें उपस्थित विपाकत्व देश, काल

और निमित्तोंके प्राप्त होने से

कर्मके भी हैं, ऐसा नियम होता है। जो देश, काल और निमित्त एक कर्मके विपाचक हैं, वे अन्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि विरुद्ध फलवाले भी कर्म होते हैं। शास्त्र

जो इस कर्मका यह फल होता है, इतने मात्र में पर्यवसित होता है। देश, काल और निमित्त विशेषका संकीर्तन नहीं करता है | साधन सामर्थ्यविशेषसे किसीकी अतीन्द्रिय शक्ति आविर्भूत होती है और अन्यकी उससे प्रतिबद्ध होती हुई स्थित रहती है। और अविशेषरूपसे विद्या में अभिसन्धि उत्पन्न नहीं होती, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि इस जन्ममें अथवा अन्य जन्ममें मुझे विद्या उत्पन्न हो, ऐसी अभिसन्धि निरङ्कय है | श्रवण मदि द्वारा भी उत्पन्न होनेवाली विद्या प्रतिबन्धक्षयकी अपेक्षास ही उत्पन्न होती है।

और इसी प्रकार श्रुति आत्माका दुर्बोधत्व दिखलाती है - ' श्रवणायापि ० ' ( जो बहुतों को श्रवण के लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं है, जिसे बहुत श्रवण करते हुए भी नहीं समझते उस आत्मतत्त्वका निरूपण करनेवाला भी आश्चर्यरूप है, उसे प्राप्त करनेवाला मी निपुण पुरुष ही होता है तथा कुशल आचार्य द्वारा उपदेश किया हुआ ज्ञाता भी आश्चर्यरूप ही है ) और गर्भस्थित ही वामदेवने ब्रह्मभाव प्राप्त किया, ऐसा कहती हुई श्रुति जन्मान्तर संचित साधनसे भी जन्मान्तरमें विद्याकी उत्पत्ति दिखलाती है।

गमंस्थित में किसी ऐहिक साधनको संभावना नहीं की जाती। स्मृतिमें मी ' अप्राप्य योगसंसिद्धिं ० ' ( हे कृष्ण! योगफल - सम्यग्दर्शनको प्राप्त किए विना वह किस गतिको प्राप्त होता है ) इस प्रकार अर्जुन द्वारा पूछे गए भगवान् वासुदेव ' नहि कल्याणकृत् ० ' ( हे तात!

कोई भी कल्याणकृत् कुत्सित गतिको प्राप्त नहीं होता ) ऐसा कहकर पुनः उसकी पुण्यलोक प्राप्ति और साधुकुलमें उत्पत्ति कहकर अनन्तर ‘ तन तं ० ' ( उस योगी कुल में पूर्वं देहमें स्थित बुद्धि संयोगको प्राप्त करता है ) इत्यादिसे लेकर ‘ अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो ० ' ( अनेक जन्मोंमें उपचित हुए संस्कारोंसे सम्यग्ज्ञानी होकर श्रेष्ठगतिको प्राप्त होता है ) यहाँ तक यही बात दिखलाते हैं। इसलिए इस जन्ममें अथवा अन्य जन्म में प्रतिबन्ध क्षयकी पेक्षा विद्याजन्म होता है, यह सिद्ध हुआ॥ ५१

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ऐहिक और पारलौकिक साधनोंका फल दो प्रकारका होता है। जैसे कारीरियागका ऐहिक वृष्टि फल है और दर्शपूर्णमास आदि यागका अदृष्टद्वारा जन्मान्तरमें फल है। इस प्रकार विद्या मी इसी जन्म में उत्पन्न होती है अथवा जन्मान्तरमें? पूर्वपक्ष में कारीरियागफलके समान विद्या इसी जन्म में उत्पन्न होती है। यज्ञ आदि भी चित्तशुद्धि द्वारा विविदिषा उत्पन्नकर श्रवणादिसे विद्याको उत्पन्न करते हैं 1। यदि इसी जन्म में विद्याकी उत्पत्ति न माने तो श्रवण आदि विद्याके हेतु सिद्ध नहीं होंगे।

* प्रतिबन्धके सद्भावमें ‘ शृण्वन्तोऽपि बहुवो यं न विद्यु : ० ' ( कठ ० २, ७ ) ( बहुत से लोग सुनते हुए भी उस आत्मतत्त्वको यथार्थरूपसे नहीं जानते ) ' श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ' ( गीता २।२ ९ ) ( कोई - कोई सुनकर भी इस आत्मतत्त्वको नहीं जानता ) इत्यादि श्रुति और स्मृति प्रमाण हैं।। ५१

मुक्तिफलाधिकरणम्

3.4.52 · तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद सूत्र ५२

सूत्र ३.४.५२

एवं मुक्तिफलानियमस् तदवस्थावधृतेस् तदवस्थावधृतेः ॥ ३.४.५२ ॥

तृतीय अध्याय चतुर्थ पाद · सूत्र ३.४.५२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 823

पदच्छेद — एवम् , मुक्तिफलानियमः , तदवस्थावधृतेः , तदवस्थावधृतेः

सूत्रार्थ — ( एवम् ) ब्रह्म साक्षात्कार के समान, ( मुक्तिफलानियमः ) मुक्तिफलमें भी विशेष नियम नहीं है, ( तदवस्थावधृतेः ) क्योंकि उस मुक्त्यवस्थाका सब वेदान्तोंमें एकरूप ही अवधारण किया गया है। ' तदवस्थावधृते : ' इस पदका दो वार उच्चारण बध्यायकी परिसमाप्तिका सूचक है।

शाङ्करभाष्य

यथा मुमुक्षोर्विद्यासाधनावलम्बिनः साधनवीर्यविशेषाद्विद्यालक्षणे फले ऐहिकामुष्मिकफलत्वकृतो विशेषप्रतिनियमो दृष्टः एवं मुक्तिलक्षणेऽपि उत्कर्षापकर्षकृतः कश्चिद्विशेषप्रतिनियमः स्यात् इत्याशङ्क्य आह मुक्तिफलानियम इति।

न खलु मुक्तिफले कश्चित् एवंभूतो विशेषप्रतिनियम आशङ्कितव्यः कुतः तदवस्थावधृतेः मुक्त्यवस्था हि सर्ववेदान्तेष्वेकरूपैव अवधार्यते ब्रह्मैव हि मुक्त्यवस्था न च ब्रह्मणोऽनेकाकारयोगोऽस्ति एकलिङ्गत्वावधारणात् अस्थूलमनणु स एष नेति नेत्यात्मा यत्र नान्यत्पश्यति ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् इदं सर्वं यदयमात्मा स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् इत्यादिश्रुतिभ्यः।

अपि च विद्यासाधनं स्ववीर्यविशेषात् स्वफल एव विद्यायां कंचिदतिशयमासञ्जयेत् न विद्याफले मुक्तौ तद्धि असाध्यं नित्यसिद्धस्वभावमेव विद्यया अधिगम्यत इत्यसकृदवादिष्म। न च तस्यामप्युत्कर्षनिकर्षात्मकोऽतिशय उपपद्यते निकृष्टाया विद्यात्वाभावात् उत्कृष्टैव हि विद्या भवति तस्मात् तस्यां चिराचिरोत्पत्तिरूपोऽतिशयो भवन् भवेत्। न तु मुक्तौ कश्चित् अतिशयसंभवोऽस्ति। विद्याभेदाभावादपि तत्फलभेदनियमाभावः कर्मफलवत् न हि मुक्तिसाधनभूताया विद्यायाः कर्मणामिव भेदोऽस्ति।

सगुणासु तु विद्यासु मनोमयः प्राणशरीरः इत्याद्यासु गुणावापोद्वापवशाद्भेदोपपत्तौ सत्याम् उपपद्यते यथास्वं फलभेदनियमः कर्मफलवत् तथा च लिङ्गदर्शनम् तं यथा यथोपासते तदेव भवति इति नैवं निर्गुणायां विद्यायाम् गुणाभावात् तथा च स्मृतिः न हि गतिरधिकास्ति कस्यचित्सति हि गुणे प्रवदन्त्यतुल्यताम् इति। तदवस्थावधृतेस्तदवस्थावधृतेरिति पदाभ्यासः अध्यायपरिसमाप्तिं द्योतयति।।

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये तृतीयोऽध्यायः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जैसे विद्या साधनका अवलम्बन करनेवाले मुमुक्षुका साधनके सामर्थ्यविशेषसे विद्यारूप फलमें ऐहिक फलत्व और जन्मान्तरीय फलत्व कृत विशेष प्रतिनियम देखा गया है, वैसे मुक्ति लक्षणमें भी उत्कर्षं और अपकर्षकृत कोई विशेष प्रतिनियम होना चाहिए, ऐसी आशङ्काकर कहते हैं' एवं मुक्तिफकानियमः ' मुक्तिफलमें इसी प्रकारके किसी भी विशेष प्रतिनियमको आशङ्का नहीं करनी चाहिए, किससे? उसी अवस्थाका अवधारण होनेसे। मुक्ति अवस्था सब वेदान्तों में एक रूप ही निश्चित की जाती है।

ब्रह्म ही मुक्ति अवस्था है, ब्रह्ममें अनेक आकारोंका सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ' अस्थूलमनणु ० ' ( न स्थूल है और न अणु है ) ' स एष ० ' ( यह आत्मा ऐसा नहीं, ऐसा नहीं, इस प्रकार निर्दिष्ट है ) ' यत्र नान्यत्पश्यति ' ( जिसमें अन्य नहीं देखता है ) ' ब्रह्मैवेदममृतं ० ' ( यह अमृत ब्रह्म ही आगे हैं ) ‘ इदं सर्व ० ' ( यह सब जो कुछ भी है यह सब आत्मा ही है ) ' स वा एष ० ' ( वही यह महान् बज आत्मा अजर, अमृत, अमर एवं अमय ब्रह्म है ) ' यत्र त्वस्य ० ' ( जहाँ उसका सब आत्मा ही हो गया वहाँ किससे किसे देखे ) इत्यादि श्रुतियोंसे उसका एक लिङ्गत्व ( रूप ) निश्चय होता है।

और विद्याका साधन अपने सामथ्यं विशेष से अपने फल विद्यामें ही किसी एक अतिशयका आधान करेगा किन्तु विद्या फल मुक्तिमें नहीं, क्योंकि वह असाध्य है और नित्य सिद्ध स्वभाव विद्यासे अधिगत होता है, ऐसा हम अनेक वार कह चुके हैं। उस विद्यामें भी उत्कर्षात्मक और निकृष्टात्मक अतिशय उपपन्न नहीं होता, क्योंकि निकृष्टमें विद्यात्व नहीं है, किन्तु उत्कृष्ट ही विद्या होती है, इसलिए उस विद्या में विलम्ब और अविलम्बरूप अतिशय होता हो तो भले हो, किन्तु मुक्तिमें कोई अतिशय संभव नहीं है।

विद्याके भेदका अभाव होनेसे भी उसके फलभेद नियमका अभाव है, कर्म फलके समान | मुक्तिके साधनभूत विद्यामें कर्मो के समान भेद नहीं है। परन्तु ' मनोमयः प्राणशरीर ' इत्यादि सगुण विद्याओं में गुणोंके आवाप और उद्वापके वयसे भेदकी उपपत्ति होते पर उसके अनुसार कर्मफलके समान फलभेदका नियम उपपन्न होता है। उसीप्रकार ' तं यथा ० ' ( उसकी जिस प्रकार उपासना करता है वही होता है ) ऐसा लिङ्गदर्शन है। परन्तु इसप्रकार निर्गुण विद्यामें फलभेदका नियम नहीं है, क्योंकि उसमें गुणोंका अभाव है।

और ' नहि गतिरधिका ० ' ( किसी निर्गुणवत्ता की अधिक गति नहीं है, क्योंकि गुणके होनेपर ही अतुल्यता कहते हैं ) इसप्रकार स्मृति भी है | ' तदवस्थावधृतेः ' इस पदका दो वार कथन अध्यायकी परिसमाप्तिका द्योतन करता है || ५२ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # पूर्वपक्षी मुक्तिमें अतिशय विशेष मानकर उसे कर्म साध्य सिद्ध करना चाहते हैं। परन्तु २ सिद्धान्त में मुक्ति सभी उपनिषदोंमें एक रूप प्रतिपादित है, क्योंकि ब्रह्मरूप ही तो मुक्ति है। निरवयव एक ब्रह्ममें उत्कर्ष और अपकर्षका असम्भव है। केवल विद्यासे अविद्याकी निवृत्तिद्वारा ब्रह्मस्वरूप मोक्षकी अभिव्यक्तिमात्र होती है। यहाँ तो विद्याकी निवृत्ति भी ब्रह्मरूप है। अत : ब्रह्मरूप मोक्षमें किसी प्रकारका अतिशय विशेष नहीं है।

* जैसे वायु आदि प्रतिबन्ध होनेपर दीपोत्पत्ति में विलम्ब होता है, परन्तु उसके उत्पन्न होनेपर अन्धकार निवृत्तिरूप फलमें नहीं, वैसे तत्त्वज्ञान होनेपर अज्ञानकी निवृत्तिरूप फलमें विलम्ब नहीं होता। इसलिए विद्यामें अन्य प्रकारका कोई अतिशय नहीं है। जैसे गुणभेदसे कर्म और उपासनाके असमान होनेसे उनके अनुष्ठाताओंकी भी असमान गति होती है, वैसे निर्गुण विद्यामें नहीं होती, क्योंकि उसमें कोई गुण नहीं है। इसलिए ब्रह्मवेत्ताओं की ब्रह्म प्राप्तिरूप एक - सी गति होती है॥ ५२

उपसंहार

इन सूत्रों के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि वैदिक कर्मकांड केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक पुरुषार्थ हेतु अनिवार्य साधन हैं। शास्त्र की विधियों, आचारों और फलश्रुति के समन्वय से यह स्पष्ट होता है कि यज्ञ और अनुष्ठान मनुष्य के आध्यात्मिक उत्थान में कैसे सहायक होते हैं। अंततः, ये सूत्र कर्मकांड की महत्ता को ज्ञान मार्ग की प्राप्ति के आधार के रूप में स्थापित करते हैं।

In English

Brahma Sutra: Chapter 3, Section 4

This text explains the Brahma Sutras of Badarayana, specifically focusing on whether self-knowledge is an independent means to liberation or part of Vedic ritual. It presents the views of Badarayana and Jaimini regarding the relationship between knowledge of the self and the performance of Vedic duties.

This article answers

  • Brahma sutra 3.4.1 meaning?
  • Is self-knowledge a means to moksha?
  • Jaimini view on atman and karma?
  • Relationship between vedic ritual and self knowledge?

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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