श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · ब्रह्मसूत्र

ब्रह्मसूत्र — चतुर्थ अध्याय, प्रथम पाद

19 मूल पद्य 19 संस्करणसे मिलाये गये

इन सूत्रों में इस बात की विवेचना की गई है कि वेदान्त के उपदेशों को केवल एक बार सुनकर छोड़ना पर्याप्त क्यों नहीं है और ब्रह्म के वास्तविक ज्ञान के लिए बारंबार श्रवण एवं मनन की आवश्यकता क्यों पड़ती है। यहाँ शास्त्र द्वारा दिए गए उपदेशों की प्रमाणिकता, उनके अर्थ की गहराई और आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया में बार-बार अभ्यास के महत्त्व को तार्किक क्रम में समझाया गया है। इस अध्ययन से पाठक को यह बोध होगा कि ब्रह्म का ज्ञान केवल सूचना मात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है जिसे साधक को निरंतर साधना द्वारा सुदृढ़ करना पड़ता है।

आवृत्त्यधिकरणम्

4.1.1 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १

सूत्र ४.१.१

आवृत्तिर् असकृदुपदेशात् ॥ ४.१.१ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 825

पदच्छेद — आवृत्तिः , असकृत् , उपदेशात् । पदच्छेद

सूत्रार्थ — ( आवृत्ति :) प्रत्ययकी आवृत्ति करनी चाहिए, ( असकृदुपदेशात् ) क्योंकि ' श्रोतव्यो मन्तव्यः ' आदि श्रुतियोंमें इसप्रकारका वार - वार उपदेश है।

शाङ्करभाष्य

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः इति च एवमादिश्रवणेषु संशयः किं सकृत्प्रत्ययः कर्तव्यः आहोस्वित् आवृत्त्येति। किं तावत्प्राप्तम् सकृत्प्रत्ययः स्यात् प्रयाजादिवत् तावता शास्त्रस्य कृतार्थत्वात् अश्रूयमाणायां हि आवृत्तौ क्रियमाणायाम् अशास्त्रार्थः कृतो भवेत्।

ननु असकृदुपदेशा उदाहृताः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः इत्येवमादयः एवमपि यावच्छब्दमावर्तयेत् सकृच्छ्रवणं सकृन्मननं सकृन्निदिध्यासनं चेति नातिरिक्तम्। सकृदुपदेशेषु तु वेद उपासीत इत्येवमादिषु अनावृत्तिरित्येवं प्राप्ते ब्रूमः प्रत्ययावृत्तिः कर्तव्या कुतः असकृदुपदेशात् श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः इत्येवंजातीयको हि असकृदुपदेशः प्रत्ययावृत्तिं सूचयति।

ननु उक्तम् यावच्छब्दमेव आवर्तयेत् नाधिकमिति न दर्शनपर्यवसानत्वादेषाम् दर्शनपर्यवसानानि हि श्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानि भवन्ति यथा अवघातादीनि तण्डुलादिनिष्पत्तिपर्यवसानानि हि तद्वत्। अपि च उपासनं निदिध्यासनं च इत्यन्तर्णीतावृत्तिगुणैव क्रिया अभिधीयते तथा हि लोके गुरुमुपास्ते राजानमुपास्ते इति च यस्तात्पर्येण गुर्वादीननुवर्तते स एवमुच्यते तथा ध्यायति प्रोषितनाथा पतिम् इति या निरन्तरस्मरणा पतिं प्रति सोत्कण्ठा सा एवमभिधीयते।

विद्युपास्त्योश्च वेदान्तेषु अव्यतिरेकेण प्रयोगो दृश्यते क्वचित् विदिनोपक्रम्य उपासिनोपसंहरति यथा यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्तः इत्यत्र अनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामुपास्से इति क्वचिच्च उपासिनोपक्रम्य विदिनोपसंहरति यथा मनो ब्रह्मेत्युपासीत इत्यत्र भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद इति। तस्मात्सकृदुपदेशेष्वपि आवृत्तिसिद्धिः। असकृदुपदेशस्तु आवृत्तेः सूचकः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — है )

( इस फल अध्यायके प्रथम पादमें जीवन मुक्तिका निरूपण

तृतीय अध्यायमें पर और अपर विद्याओं में साधनाश्रय विचार प्रायः किया जा चुका है। अब इस चतुर्थ अध्यायमें फलाश्रय विचार आयेगा। और प्रसंगतः कुछ अन्य विषयक भी विचार किया जायेगा। प्रथम तो कुछ अधिकरणोंसे साघनाश्रय अवशिष्ट विचारका हम अनुसरण करते हैं!

और शास्त्रसे उस आत्माका परोक्षज्ञान प्राप्त कर प्रज्ञा ( साक्षात्कार ) के लिए राम दम आदि साधन करे ) ' सोऽन्वेष्टव्यः ० ' ( उसका अन्वेषण करना चाहिए, उसकी विशेष जिज्ञासा करनी चाहिए ) इत्यादि श्रवणोंमें संशय होता है कि क्या एक वार ही प्रत्यय करना चाहिए अथवा आवृत्ति से इन श्रवण आदि साधनोंका एक वार ही अनुष्ठान करना चाहिए अथवा साक्षात्कार पर्यन्त उनकी पुनः पुनः आवृत्ति करनी चाहिए? तब क्या प्राप्त होता है?

पूर्वपक्षी - प्रयाज आदिके समान एक ही वार प्रत्यय करना चाहिए, क्योंकि, इतनेमें ही शास्त्र कृतार्थं होता है, आवृत्तिके अश्रूयमाण होनेपर भी उसकी आवृत्ति किये जानेपर तो शास्त्रार्थसे विरुद्ध किया जायगा। परन्तु ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' इत्यादि असकृत् उपदेश उदाहृत हैं? ऐसा होनेपर भी जिसका शब्द है उसकी आवृत्ति करनी चाहिए - एक वार श्रवण, एह वार मनन और एक वार निदिध्यासन, इससे अधिक नहीं, ' वेद ' ' उपासीत ' इत्यादि सकृत् उपदेशों में आवृत्ति नहीं है।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - प्रत्यय की आवृत्ति करना चाहिए। किससे? इससे कि असकृत् उपदेश है। ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य : ' इस प्रकारका अनेक वार उपदेश प्रत्यय आवृत्ति सूचित करता है। परन्तु ऐसा कहा गया है कि श्रुतिके अनुसार ही आवृत्ति करनी चाहिए, अधिक नहीं। ऐसा नहीं, क्योंकि ये दर्शन पर्यवसायी हैं। साक्षात्कार पर्यवसायी वार - वार आवृत्ति किये जानेवाले श्रवण आदि साधन दृष्ट फलवाले होते हैं।

जैसे अवघात आदि तण्डुल आदि निष्पत्ति ( अभिव्यक्ति ) पर्यवसायी होते हैं, वैसे प्रकरण में भी समझना चाहिए। और उपासना और निदिध्यासन आवृत्ति गुण गर्मित क्रिया का ही अभिधान करते हैं। जैसे कि लोकमें ' गुरुमुपास्ते ० ' ( गुरुकी उपासना करता है, राजाकी उपासना करता है ) जो तत्परतासे गुरु आदिका अनुवर्तन करता है वह ऐसा हो कहा जाता है। वैसे ' ध्यायति ' ' जिसका पति परदेश गया है वह स्त्री पतिका ध्यान करती है ' जो निरन्तर स्मरण करती पति के प्रति सोत्कण्ठा है वह ऐसी कही जाती है।

विद् और उप पूर्वक अस् धातुका उपनिषदों में ( समान अर्थसे ) प्रयोग देखा जाता है। कहीं ' विदि ' से आरम्भकर उपास्तिसे उपसंहार करते हैं। जैसे कि ' यस्तद्वेद ० ' ( जिसे रैक्व जानता है उसे जो जानता है वह मैंने जैसे कहा है वैसे ही रैक्व सदृश होता है ) इसमें विदिसे उपक्रम है और ' अनु मे एतां ० ' ( हे भगवन् रैक्व! आप मुझे उस देवताका उपदेश कीजिए जिसकी आप उपासना करते हैं ) इसप्रकार उपास्तिसे उपसंहार है।

और कहीं उपास्तिसे उपक्रम कर विदिधे उपसंहार करते हैं- जैसे ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( मन ब्रह्म है ऐसी उपासना करनी चाहिए ) इसमें उपास्तिसे उपक्रम है और ' माति च ० ' ( जो ऐसा जानता है वह कीर्ति यश और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है ) इसप्रकार विदिसे उपसंहार है। इसमे एक वार उपदेशों में भी आवृत्ति सिद्ध होती है, वार वार उपदेश तो आवृत्तिका सूचक है॥ १

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * तृतीय अध्यायमें पर विद्या - ब्रह्मात्मसाक्षात्कार साधनीभूत ब्रह्मविद्या और अपर सगुणविद्या में साधन सम्बन्धी विचार प्रायः समाप्त किया गया है। अब हेतुहेतुमद्भाव संगति से इस चतुर्थं अध्याय में तत्फल सम्वन्धी विचार किया जाता है। और फलके प्रसङ्गसे उत्क्रान्ति एवं अचिरादि मामका मी विचार किया जायगा। प्रथम साक्षात् श्रुतिमें कथित संन्यास आदि साधनों का विचार किया जा चुका है। अब ' अघश्लेष ' इस अधिकरणके पूर्वतक फलार्थापत्ति से गम्य आवृत्ति आदिका विचार है। ' अघाश्लेष ' अधिकरणसे लेकर पाद समाप्तितक जीवनमुक्तिका, द्वितीय पादमें उत्क्रान्तिका, तृतीयपादमें अचिरादि गन्तव्य मार्गके निर्णयका और चतुर्थ पादमें ज्ञान और उपासना के फलके निर्णयका विचार है। पू ० – असकृत् उपदेश होनेपर भी उसका आवृत्तिमें तात्पर्य नहीं है। सिद्धान्तमें श्रवण आदिको दृष्टार्थं होनेसे ब्रह्म साक्षात्कारपर्यन्त आवृत्ति होनी चाहिए |॥ १

4.1.2 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र २

सूत्र ४.१.२

लिङ्गाच् च ॥ ४.१.२ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 827

पदच्छेद — लिङ्गात् , च

सूत्रार्थ — और ' रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयात् ' यह लिङ्ग प्रमाण मी बहुत - सी किरणोंका विधान करता हुआ प्रत्ययोंकी आवृत्ति दिखलाता है, इससे श्रवण आदि प्रत्ययोंकी भी आवृत्ति होनी चाहिए।

शाङ्करभाष्य

लिङ्गमपि प्रत्ययावृत्तिं प्रत्याययति। तथा हि उद्गीथविज्ञानं प्रस्तुत्य आदित्य उद्गीथः इत्येतत् एकपुत्रतादोषेणापोद्य रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयात् इति रश्मिबहुत्वविज्ञानं बहुपुत्रतायै विदधत् सिद्धवत्प्रत्ययावृत्तिं दर्शयति तत्सामान्यात् सर्वप्रत्ययेष्वावृत्तिसिद्धिः।। अत्राह भवतु नाम साध्यफलेषु प्रत्ययेष्वावृत्तिः तेष्वावृत्तिसाध्यस्यातिशयस्य संभवात् यस्तु परब्रह्मविषयः प्रत्ययो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावमेव आत्मभूतं परं ब्रह्म समर्पयति तत्र किमर्था आवृत्तिरिति।

सकृच्छ्रुतौ च ब्रह्मात्मत्वप्रतीत्यनुपपत्तेरावृत्त्यभ्युपगम इति चेत् न आवृत्तावपि तदनुपपत्तेः यदि हि तत्त्वमसि इत्येवंजातीयकं वाक्यं सकृच्छ्रूयमाणं ब्रह्मात्मत्वप्रतीतिं नोत्पादयेत् ततस्तदेव आवर्त्यमानमुत्पादयिष्यतीति का प्रत्याशा स्यात्। अथोच्येत न केवलं वाक्यं कंचिदर्थं साक्षात्कर्तुं शक्नोति अतो युक्त्यपेक्षं वाक्यमनुभावयिष्यति ब्रह्मात्मत्वमिति तथाप्यावृत्त्यानर्थक्यमेव सापि हि युक्तिः सकृत्प्रवृत्तैव स्वमर्थमनुभावयिष्यति।

अथापि स्यात् युक्त्या वाक्येन च सामान्यविषयमेव विज्ञानं क्रियते न विशेषविषयम् यथा अस्ति मे हृदये शूलम् इत्यतो वाक्यात् गात्रकम्पादिलिङ्गाच्च शूलसद्भावसामान्यमेव परः प्रतिपद्यते न विशेषमनुभवति यथा स एव शूली विशेषानुभवश्च अविद्याया निवर्तकः तदर्था आवृत्तिरिति चेत् न असकृदपि तावन्मात्रे क्रियमाणे विशेषविज्ञानोत्पत्त्यसंभवात् न हि सकृत्प्रयुक्ताभ्यां शास्त्रयुक्तिभ्यामनवगतो विशेषः शतकृत्वोऽपि प्रयुज्यमानाभ्यामवगन्तुं शक्यते तस्मात् यदि शास्त्रयुक्तिभ्यां विशेषः प्रतिपाद्येत यदि वा सामान्यमेव उभयथापि सकृत्प्रवृत्ते एव ते स्वकार्यं कुरुत इति आवृत्त्यनुपयोगः न च सकृत्प्रयुक्ते शास्त्रयुक्ती कस्यचिदप्यनुभवं नोत्पादयत इति शक्यते नियन्तुम् विचित्रप्रज्ञत्वात्प्रतिपत्तृ़णाम्।

अपि च अनेकांशोपेते लौकिके पदार्थे सामान्यविशेषवति एकेनावधानेन एकमंशमवधारयति अपरेण अपरम् इति स्यादप्यभ्यासोपयोगः यथा दीर्घप्रपाठकग्रहणादिषु न तु निर्विशेषे ब्रह्मणि सामान्यविशेषरहिते चैतन्यमात्रात्मके प्रमोत्पत्तावभ्यासापेक्षा युक्तेति।। अत्रोच्यते भवेदावृत्त्यानर्थक्यं तं प्रति यः तत्त्वमसि इति सकृदुक्तमेव ब्रह्मात्मत्वमनुभवितुं शक्नुयात् यस्तु न शक्नोति तं प्रति उपयुज्यत एव आवृत्तिः।

तथा हि च्छान्दोग्ये तत्त्वमसि श्वेतकेतो इत्युपदिश्य भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु इति पुनः पुनः परिचोद्यमानः तत्तदाशङ्काकारणं निराकृत्य तत्त्वमसि इत्येवासकृदुपदिशति तथा च श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः इत्यादि दर्शितम्। ननु उक्तम् सकृच्छ्रुतं चेत् तत्त्वमसिवाक्यं स्वमर्थमनुभावयितुं न शक्नोति तत आवर्त्यमानमपि नैव शक्ष्यतीति नैष दोषः न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नाम दृश्यन्ते हि सकृच्छ्रुताद्वाक्यात् मन्दप्रतीतं वाक्यार्थं आवर्तयन्तः तत्तदाभासव्युदासेन सम्यक्प्रतिपद्यमानाः।

अपि च तत्त्वमसि इत्येतद्वाक्यं त्वंपदार्थस्य तत्पदार्थभावमाचष्टे तत्पदेन च प्रकृतं सत् ब्रह्म ईक्षितृ जगतो जन्मादिकारणमभिधीयते सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म विज्ञानमानन्दं ब्रह्म अदृष्टं द्रष्टृ अविज्ञातं विज्ञातृ अजमजरममरम् अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम् इत्यादिशास्त्रसिद्धम् तत्र अजादिशब्दैर्जन्मादयो भावविकारा निवर्तिताः अस्थूलादिशब्दैश्च स्थौल्यादयो द्रव्यधर्माः विज्ञानादिशब्दैश्च चैतन्यप्रकाशात्मकत्वमुक्तम् एष व्यावृत्तसर्वसंसारधर्मकोऽनुभवात्मको ब्रह्मसंज्ञकस्तत्पदार्थो वेदान्ताभियुक्तानां प्रसिद्धः तथा त्वंपदार्थोऽपि प्रत्यगात्मा श्रोता देहादारभ्य प्रत्यगात्मतया संभाव्यमानः चैतन्यपर्यन्तत्वेनावधारितः तत्र येषाम् एतौ पदार्थौ अज्ञानसंशयविपर्ययप्रतिबद्धौ तेषां तत्त्वमसि इत्येतद्वाक्यं स्वार्थे प्रमां नोत्पादयितुं शक्नोति पदार्थज्ञानपूर्वकत्वाद्वाक्यार्थज्ञानस्य इत्यतः तान्प्रति एष्टव्यः पदार्थविवेकप्रयोजनः शास्त्रयुक्त्यभ्यासः।

यद्यपि च प्रतिपत्तव्य आत्मा निरंशः तथापि अध्यारोपितं तस्मिन् बह्वंशत्वं देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनादिलक्षणम् तत्र एकेन अवधानेन एकमंशमपोहति अपरेण अपरम् इति युज्यते तत्र क्रमवती प्रतिपत्तिः तत्तु पूर्वरूपमेव आत्मप्रतिपत्तेः।

येषां पुनः निपुणमतीनां न अज्ञानसंशयविपर्ययलक्षणः पदार्थविषयः प्रतिबन्धोऽस्ति ते शक्नुवन्ति सकृदुक्तमेव तत्त्वमसिवाक्यार्थम् अनुभवितुमिति तान्प्रतिआवृत्त्यानर्थक्यमिष्टमेव सकृदुत्पन्नैव हि आत्मप्रतिपत्तिः अविद्यां निवर्तयतीति नात्र कश्चिदपि क्रमोऽभ्युपगम्यते।

सत्यमेवं युज्येत यदि कस्यचित् एवं प्रतिपत्तिर्भवेत् बलवती हि आत्मनो दुःखित्वादिप्रतिपत्तिः अतो न दुःखित्वाद्यभावं कश्चित्प्रतिपद्यत इति चेत् न देहाद्यभिमानवत् दुःखित्वाद्यभिमानस्य मिथ्याभिमानत्वोपपत्तेः प्रत्यक्षं हि देहे छिद्यमाने दह्यमाने वा अहं छिद्ये दह्ये इति च मिथ्याभिमानो दृष्टः तथा बाह्यतरेष्वपि पुत्रमित्रादिषु संतप्यमानेषु अहमेव संतप्ये इत्यध्यारोपो दृष्टः तथा दुःखित्वाद्यभिमानोऽपि स्यात् देहादिवदेव चैतन्याद्बहिरुपलभ्यमानत्वाद्दुःखित्वादीनाम् सुषुप्तादिषु च अननुवृत्तेः चैतन्यस्य तु सुषुप्तेऽपि अनुवृत्तिमामनन्ति यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति इत्यादिना तस्मात् सर्वदुःखविनिर्मुक्तैकचैतन्यात्मकोऽहमित्येष आत्मानुभवः।

न च एवम् आत्मानमनुभवतः किंचिदन्यत्कृत्यमवशिष्यते तथा च श्रुतिः किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः इत्यात्मविदः कर्तव्याभावं दर्शयति स्मृतिरपि यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते इति। यस्य तु न एषोऽनुभवो द्रागिव जायते तं प्रति अनुभवार्थ एव आवृत्त्यभ्युपगमः।

तत्रापि न तत्त्वमसिवाक्यार्थात् प्रच्याव्य आवृत्तौ प्रवर्तयेत् न हि वरघाताय कन्यामुद्वाहयन्ति नियुक्तस्य च अस्मिन्नधिकृतोऽहं कर्ता मयेदं कर्तव्यम् इत्यवश्यं ब्रह्मप्रत्ययाद्विपरीतप्रत्यय उत्पद्यते यस्तु स्वयमेव मन्दमतिः अप्रतिभानात् तं वाक्यार्थं जिहासेत् तस्य एतस्मिन्नेव वाक्यार्थे स्थिरीकार आवृत्त्यादिवाचोयुक्त्या अभ्युपेयते। तस्मात् परब्रह्मविषयेऽपि प्रत्यये तदुपायोपदेशेष्वावृत्तिसिद्धिः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — का प्रत्याशा स्यात्? * अथोच्येत - न केवलं वाक्यं कंचिदर्थं साक्षात्कर्तुं शक्नोत्यतो युक्त्य-

लिङ्ग भी प्रत्ययोंकी आवृत्तिका ज्ञान कराता है, क्योंकि ' आदित्य उद्गीथः ' इसप्रकार उद्गीथ विज्ञानको प्रस्तुत कर एवं एक पुत्रताके दोषसे उसका प्रतिषेध कर ' रश्मींस्त्वं पर्यावर्तयात् ' ( अतः हे पुत्र! तू सूर्यं रश्मियोंका आदित्यसे भेदरूपसे चिन्तन कर ) इसप्रकार बहुत पुत्रता प्राप्ति के लिए बहुत रश्मियोंके विज्ञानका विधान करता हुआ लिङ्ग सिद्धवत् प्रत्ययोंकी आवृत्ति दिखलाता है।

प्रकृत उद्गीथ प्रत्ययके साथ सब प्रत्ययोंकी साक्षात्कार हेतुरूपसे अथवा ध्यानरूपसे समानता होनेके कारण अहंग्रहोपासना और श्रवण आदि सब प्रत्ययोंमें आवृत्तिकी सिद्धि होती है। पू ० – यहाँ कहते हैं कि साध्य फलवाले प्रत्ययों में आवृत्ति भले हो, क्योंकि उनमें आवृत्तिसे साध्य अतिशयका संभव है। परन्तु जो परब्रह्मविषयक प्रत्यय नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव आत्मभूत परब्रह्मका बोध कराता है, उसमें आवृत्तिका क्या प्रयोजन?

यदि कहो कि केवल एक वार श्रवण होनेपर ब्रह्मात्मत्व प्रतीतिकी अनुपपत्ति होनेसे आवृत्तिका स्वीकार है। तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि आवृत्ति होनेपर भी उसकी उपपत्ति नहीं होती। यदि ' तत्त्वमसि ' इस प्रकारका एक वार श्रूयमाण वाक्य ब्रह्मात्मत्व प्रतीतिको उत्पन्न नहीं कर सका तो वही आवृत्यमान हुआ प्रतीतिको उत्पन्न करेगा इसकी क्या आशा हो सकती है? यदि कहो कि केवल वाक्य किसी अर्थका साक्षात्कार करनेके लिए समर्थ नहीं है, अतः युक्तिकी अपेक्षा रखता हुआ वाक्य ब्रह्मात्मत्वका अनुभव कराएगा।

तथापि — ऐसा माननेपर भी श्रवण आदि प्रत्ययोंकी आवृत्ति निरर्थक ही है। क्योंकि वह युक्ति भी एक वार प्रवृत्त हुई अपने अर्थका बोघ करायेगी। और यदि ऐसी शंका करो कि युक्ति और वाक्यसे सामान्य विषयक ही ज्ञान किया जाता है विशेष विषयक नहीं। जैसे मेरे हृदयमें शूल है, इस वाक्यसे और गात्रकम्पन आदि लिंगसे शूलके अस्तित्वका सामान्य ज्ञान अन्यको होता है विशेष अनुभव नहीं होता, जैसा कि वही शूलवान् विशेष शूलका स्वयं अनुभव करता है।

यदि कहो कि विशेष अनुभव अविद्याका निवर्तक है, अतः उसके लिए आवृत्ति है। तो ठीक नहीं है, क्योंकि कितने ही पुनः पुनः भी श्रवण आदि किये जायँ तो भी विशेष विज्ञानकी उत्पत्तिका संभव नहीं है। कारण कि एक वार प्रयुक्त शास्त्र और युक्तिसे बनवगत विशेष सौवार प्रयुक्त हुए शास्त्र और युक्तिसे भी विशेष अवगत नहीं किया जा सकता।

इसलिए यदि कहो कि शास्त्र और युक्तिसे विशेष प्रतिपादन किया जाता है अथवा यदि कहो कि उनके योगसे सामान्यका प्रतिपादन किया जाता है, तो भी दोनों प्रकारसे एक वार प्रवृत्त होनेपर हो वे अपना कार्यं करते हैं, इसलिए वृत्तिका उपयोग नहीं है। एक वार प्रयुक्त हुए शास्त्र और युक्ति किसीके मी अनुभवको उत्पन्न नहीं करते, ऐसा नियमन नहीं किया जा सकता। क्योंकि अनुभवि - arrat बुद्धि विचित्र है।

और इसीप्रकार अनेक अंशोंसे युक्त सामान्य और विशेषवाले लौकिक पदार्थ में एक अवधान ( एक वार मनकी एकाग्रता ) से एक अंशका और दूसरे अवधान से दूसरे अंशका निश्चय करनेवालोंमें आवृत्तिका उपयोग भले ही हो। जैसे दीर्घं प्रपाठकके ग्रहण आदिमें आवृत्तिका उपयोग होता है। परन्तु सामान्य विशेषसे रहित चैतन्यमात्ररूप निर्विशेष ब्रह्म में प्रमाकी परन्तु जो इस प्रकार समर्थ न हो उसके प्रति आवृत्ति उपयुक्त ही है।

जैसे कि छान्दोग्यमें ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इस प्रकार उपदेश कर ' भूय एव ० ' ( श्वेतकेतु - हे भगवन्! पुनः मुझे समझाइए ) इस प्रकार पुनः पुनः प्रेरित होते हुए तत् तत् आशङ्का कारणका निराकरण कर ' तत्त्वमसि ' इस प्रकार अनेक वार उपदेश करते हैं। और उसी प्रकार ' श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ' इत्यादि दिखलाया गया है। परन्तु ऐसा कहा गया है कि यदि एक वार श्रुत ' तत्त्वमसि ' वाक्य अपने अर्थ अनुभव करानेमें समर्थ नहीं हैं तो आवर्त्यमान होनेपर भी समर्थ नहीं होगा?

यह दोष नहीं है, क्योंकि दृष्ट- अनुभव में आनेपर कुछ भी अनुपपन्न नहीं है। एक वार श्रुत वाक्यसे मन्दप्रतीत- सामान्य ज्ञात वाक्यार्थकी आवृत्ति करनेवाले तत् - तत् आभासोंका निराकरणकर सम्यग्ज्ञांन करते हुए देखे जाते हैं।

और ' तत्त्वमसि ' यह वाक्य ' त्वम् ' पदार्थका ' तत् ' पदार्थभाव कहता है, और ' तत् ' पदसे प्रकृत ईक्षितृ सद्ब्रह्म जगत्के जन्म आदिका कारण कहा जाता है, जो ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ' अदृष्टं द्रष्टृ ' ' अविज्ञातं ० ' ( यह अक्षर ब्रह्म स्वयं दृष्टिका विषय नहीं है, किन्तु स्वयं द्रष्टा है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है ) ' अजमजरममरम् ० ' ( ब्रह्म अज, अजर और अमर है ) ' अस्थूलम ० ' ( वह न स्थूल है, न अणु है, न ह्रस्व है और न दीर्घ है ) इत्यादि शास्त्रसे प्रसिद्ध है।

उस ब्रह्ममें अज आदि शब्दोंसे जन्म आदि भाव विकार निवृत्त किये गये हैं, अस्थूल आदि शब्दों से स्थौल्य आदि द्रव्यके धर्मं निवृत्त किये गये हैं। विज्ञान आदि शब्दोंसे ब्रह्म चैतन्य प्रकाशात्मक कहा गया है। समस्त संसारके धर्मोसे रहित ज्ञानात्मक ' तत् ' पद वाच्य यह ब्रह्म वेदान्तियोंमें प्रसिद्ध है। इसीप्रकार ' त्वम् ' पदार्थ भी प्रत्यगात्मा, श्रोता के देहसे आरम्भ कर प्रत्यगात्मरूपसे संभाव्यमान चैतन्यावधित्वसे निश्चित किया गया है।

ऐसी अवस्थामें जिनके ये दोनों पदार्थ अज्ञान, संशय और विपर्ययसे प्रतिबद्ध होते हैं, उनके लिए ' तत्त्वमसि ' यह वाक्य स्वार्थमें प्रमा उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं हैं, क्योंकि वाक्यार्थज्ञान पदार्थज्ञानपूर्वक होता / है, अत : उनके प्रति पदार्थोंके विवेक प्रयोजनवाले शास्त्र और युक्तिका अभ्यास होना चाहिए।

यद्यपि प्रतिपत्तिके योग्य आत्मा निरंश है, तो भी देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय, वेदना आदिरूप बहुतसे अंश उसमें अध्यारोपित हैं, उनमें एक अवधान से एक अंशका और दूसरेसे दूसरे अंशका निषेधकर उसमें क्रमिक प्रतिपत्ति युक्त है। वह आवृत्ति आत्मप्रतिपत्तिका पूर्वरूप है अर्थात् आत्मज्ञानमें कारण है। परन्तु जिन निपुण मतिवालोंके अज्ञान, संशय और विपर्यय ' तत् ' ' त्वम् ' पदार्थ विषयक प्रतिबन्ध नहीं है वे एक वार ही उक्त ' तत्त्वमसि ' वाक्यार्थ ज्ञान करनेमें समर्थ होते हैं।

उनके प्रति आवृत्तिकी अनर्थकता इष्ट ही है, क्योंकि एक वार उत्पन्न हुआ ज्ञान ही अविद्याकी निवृत्ति करता है, इससे इसमें कोई क्रम स्वीकार नहीं किया जाता। ठीक है, यदि किसीको इस प्रकार आत्मज्ञान हो तो आवृत्ति की निरर्थकता युक्त है। यदि कहो कि आत्मामें दुःखित्व आदिका ज्ञान बलवान् है, अतः कोई भी दुःखित्व आदि अभावको प्राप्त नहीं होता, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि आत्मामें देह आदि अभिमानके समान दुःखित्व अभिमान में भी मिथ्याभिमानत्व उपपन्न होता है।

देहका छेदन किये जानेपर अथवा दहन किये जानेपर मैं काटा जाता हूँ, मैं जलाया जाता हूँ, इस प्रकार प्रत्यक्ष मिथ्याभिमान देखा गया है। इसी प्रकार देहसे भिन्न बाह्य पुत्र, मित्र आदिके संतप्त होनेपर ' मैं ही संतप्य हूँ ' ऐसा अध्यारोप देखा जाता है। उसी प्रकार दुःखित्व आदि अभिमान होना चाहिए, क्योंकि देह आदिके समान ही दुःखित्व आदि चैतन्यरूपसे बाहर ( पृथक् ) उपलब्ध होते हुए सुषुप्ति आदिमें अनुवृत्त नहीं होते। " आत्मानुभव है।

और इस प्रकार आत्माका अनुभव करनेवालोंके लिए कुछ अन्य कृत्य अवशिष्ट नहीं होता 1। जैसे कि ' किं प्रजया ० ' ( परमार्थदर्शी जिन हम लोगोंका यह आत्मा ही लोक है वे हम इस प्रजा - संततिसे क्या करेंगे ) यह श्रुति आत्मवेत्ताके लिए कर्तव्याभाव दिखलाती है। और ' यस्त्वात्मरतिरेव ० ' ( परन्तु जो मनुष्य आत्मामें ही रति- प्रीतिवाला हैं विषयमें नहीं, और आत्मामें ही तृप्त है अन्न रस आदिसे नहीं, आत्मा में ही सन्तुष्ट है बाह्यार्थं लाभसे नहीं उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है ) यह स्मृति भी है।

परन्तु जिसको [ तत्त्वमसि आदि वाक्योंसे मैं ब्रह्म हूँ ] यह अनुभव शीघ्र नहीं होता, उसके प्रति अनुभव के लिए ही आवृत्तिका स्वीकार है। उसमें भी उसको ' तत्त्वमसि ' वाक्यार्थसे प्रच्युतकर आवृत्तिमें प्रवृत्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि वर नाशके लिए कन्याका विवाह नहीं करते। इसमें अधिकृत हुआ मैं कर्ता हूँ, यह मेरा कर्तव्य है, इस प्रकार नियुक्त पुरुषको ब्रह्मज्ञानसे अवश्य विपरीत ज्ञान उत्पन्न होता है।

किन्तु जो स्वयं ही मन्दमति वाक्यार्थके प्रतिभान न होनेसे उसके त्याग करनेकी इच्छा करता हो तो उसको इसी वाक्यार्थमें आवृत्ति आदि वचन [ श्रोतव्यः ] और युक्तिसे स्थिर करना स्वीकार है। इसलिए परब्रह्म विषयक ज्ञानमें भी उसके साधनभूत उपदेशोंमें आवृत्ति सिद्ध होती है॥ २

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * विषय साक्षात्कार फलवाले श्रवण आदि प्रत्ययोंकी आवृत्तिमें ' लिङ्गाच ' यह दूसरा हेतु कहते हैं | निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कार उत्पन्न करनेकी ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्योंमें शक्ति है कि नहीं? प्रथम पक्ष तो एक वार श्रवण किये गये वाक्यसे साक्षात्कार सिद्ध होनेसे आवृत्ति निष्फल है। द्वितीय पक्ष - तो उसकी वार वार आवृत्ति भी निष्फल है।

* ' मैं आत्मा हूँ और परमात्मासे भिन्न हूँ ' इस प्रकारका सामान्य ज्ञान तो प्रायः सभीको है, किन्तु उससे अविद्याकी निवृत्ति नहीं होती, उसकी निवृत्ति तो ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि उत्पत्तिके लिए आवृत्तिकी अपेक्षा युक्त नहीं है। सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं- जो पुरुष ' तत्त्वमसि ' इसप्रकार एक वार ही उक्त ब्रह्मात्मत्व अनुभव करनेमें समर्थ हो उसके प्रति आवृत्ति भले निरर्थक हो। वेदान्त वाक्योंके श्रवण आदिके अभ्याससे उत्पन्न हुए ' मैं ब्रह्मात्मा हूँ ' इस विशेष ज्ञानसे होती है। इसलिए आवृत्ति सार्थक है। पू ० - ' न, ' असकृदपि ' आदिसे कहता है।

* जैसे उद्दालकने श्वेतकेतुको ' तत्त्वमसि ' का नौ वार उपदेश किया है। जैसे षड्ज आदि स्वर भेदके साक्षात्कारके लिए श्रोत्र समर्थ हैं, तो भी उसके अभ्यासकी अपेक्षा है, वैसे ही ब्रह्म साक्षात्कार करनेकी वाक्यमें सामर्थ्य होनेपर भी अभ्यासकी अपेक्षा है। इस विषयमें अनुभव प्रमाण भी है। जैसे अध्ययन आदिमें एक वार श्रवणसे अल्पज्ञान होता है वार - वार वाक्यार्थका अभ्यास करनेपर विशेष ज्ञान होता है | और ' तत्त्वमसि ' इस वाक्यमें ' तत् ' पदसे ' तत् ' पद वाच्य ईक्षितृ सदब्रह्म जगत् के जन्म आदिका कारण कहा गया है, और ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इससे ' तत् ' पदका लक्ष्यार्थं कहा गया है।

* अब ‘ त्वम् ' पदका अर्थ ' तथा ' इत्यादिसे कहते हैं - स्थूल देह अन्नमय कोशसे लेकर आनन्दमय कोश पन्त ' यह मैं नहीं हूँ ' इस प्रकार सबकी निवृत्तिकर ' शुद्ध ब्रह्मात्मा हूँ ' यह निश्चय ' त्वम् ' पदका लक्ष्यार्थ है। इसी अर्थको ' तत्त्वमसि ' आदि वेदान्त महावाक्य प्रतिपादन करते हैं। किन्तु जिनको ' तत् ' और ' त्वम् ' पदका वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थं अविद्याकृत संशय आदिसे प्रतिबद्ध हैं, उनके प्रति ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्य अपने वाच्य और लक्ष्यार्थं आत्मैकत्वका बोध करानेमें समर्थ नहीं हैं। उनके प्रति शास्त्र और युक्तिका अभ्यास अपेक्षित है। इस प्रकार प्रथम ' तत् ' पदका लक्ष्यार्थं निश्चित होनेपर पश्चात् ' त्वम् ' पदका लक्ष्यार्थं निश्चित होता है। इस प्रकार क्रमिक ज्ञान आत्मज्ञानमें हेतु है।

* मन्द और मध्यम अधिकारियोंके लिए अभ्यास सार्थक कहकर अब उत्तम अधिकारियोंके . लिए ' येषाम् ' इत्यादिसे कहते हैं। जैसे एक बार उत्पन्न हुआ रज्जुज्ञान सर्प आदि भ्रान्तिको निवृत्त करता है, वैसे उत्तम अधिकारियोंके लिए एक वार ' तत्त्वमसि ' आदि महावाक्योंसे उत्पन्न ज्ञान अविद्याको निवृत्त करता है।

* जिसको ' तत्त्वमसि ' आदि महावाक्योंसे ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा शीघ्र ज्ञान उत्पन्न नहीं होता उसके · लिए आवृत्ति स्वीकृत है। परन्तु जो ' तत्त्वमसि ' वाक्यार्थं ज्ञानमें संलग्न है उसको वहाँसे हटाकर ' श्रोतव्यो मन्तव्यः ' इस प्रकार आवृत्ति में प्रवृत्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि ' श्रोतव्यः ' आदिकी आवृत्ति भी तो प्रधान ' तत्त्वमसि ' वाक्यार्थ ज्ञानके लिए है। यहाँपर ' तत्त्वमसि ' आदि वाक्यार्थं ज्ञान प्रधान है और ' श्रोतव्यः ' आदि उसके अङ्ग हैं। अङ्गोंका ग्रहण प्रधानकी सिद्धिके लिए होता है। इस प्रकार सगुण और निर्गुण ब्रह्मसाक्षात्कार फलके साधन भूत अहंग्रहोपासना और श्रवण आदिमें आवृत्ति सिद्ध होती है || २ ||

आत्मत्वोपासनाधिकरणम्

4.1.3 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र ३

सूत्र ४.१.३

आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॥ ४.१.३ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 831

पदच्छेद — आत्मा , इति , तु , उपगच्छन्ति , ग्राहयन्ति , च परन्तु ' यहाॅ ' ० . ' ( वह जो सुषुप्ति में नहीं देखता सो निश्चय देखता हुआ नहीं देखता ) इत्यादि श्रुतिसे चैतन्यकी अनुवृत्ति सुषुप्तिमें कहते हैं । इसलिए सब दुःखोंसे विनिर्मुक्त एक चैतन्य स्वरूप मैं हूँ यह

शाङ्करभाष्य

यः शास्त्रोक्तविशेषणः परमात्मा स किम् अहमिति ग्रहीतव्यः किं वा मदन्य इति एतद्विचारयति। कथं पुनरात्मशब्दे प्रत्यगात्मविषये श्रूयमाणे संशय इति उच्यते अयमात्मशब्दो मुख्यः शक्यतेऽभ्युपगन्तुम् सति जीवेश्वरयोरभेदसंभवे इतरथा तु गौणोऽयमभ्युपगन्तव्यः इति मन्यते।

किं तावत्प्राप्तम् न अहमिति ग्राह्यः न हि अपहतपाप्मत्वादिगुणो विपरीतगुणत्वेन शक्यते ग्रहीतुम् विपरीतगुणो वा अपहतपाप्मत्वादिगुणत्वेन अपहतपाप्मत्वादिगुणश्च परमेश्वरः तद्विपरीतगुणस्तु शारीरः ईश्वरस्य च संसार्यात्मत्वे ईश्वराभावप्रसङ्गः ततः शास्त्रानर्थक्यम् संसारिणोऽपि ईश्वरात्मत्वे अधिकार्यभावाच्छास्त्रानर्थक्यमेव प्रत्यक्षादिविरोधश्च।

अन्यत्वेऽपि तादात्म्यदर्शनं शास्त्रात् कर्तव्यम् प्रतिमादिष्विव विष्ण्वादिदर्शनम् इति चेत् काममेवं भवतु न तु संसारिणो मुख्य आत्मा ईश्वर इत्येतत् नः प्रापयितव्यम्।। एवं प्राप्ते ब्रूमः आत्मेत्येव परमेश्वरः प्रतिपत्तव्यः। तथा हि परमेश्वरप्रक्रियायां जाबाला आत्मत्वेनैव एतमुपगच्छन्ति त्वं वा अहमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि देवते इति तथा अन्येऽपि अहं ब्रह्मास्मि इत्येवमादय आत्मत्वोपगमा द्रष्टव्याः।

ग्राहयन्ति च आत्मत्वेनैव ईश्वरं वेदान्तवाक्यानि एष त आत्मा सर्वान्तरः एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि इत्येवमादीनि।

यदुक्तम् प्रतीकदर्शनमिदं विष्णुप्रतिमान्यायेन भविष्यतीति तदयुक्तम् गौणत्वप्रसङ्गात् वाक्यवैरूप्याच्च यत्र हि प्रतीकदृष्टिरभिप्रेयते सकृदेव तत्र वचनं भवति यथा मनो ब्रह्म आदित्यो ब्रह्म इत्यादि इह पुनः त्वम् अहमस्मि अहं च त्वमसीत्याह अतः प्रतीकश्रुतिवैरूप्यात् अभेदप्रतिपत्तिः भेददृष्ट्यपवादाच्च तथा हि अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद इत्येवमाद्या भूयसी श्रुतिः भेददर्शनमपवदति।

यत्तूक्तम् न विरुद्धगुणयोरन्योन्यात्मत्वसंभव इति नायं दोषः विरुद्धगुणताया मिथ्यात्वोपपत्तेः। यत्पुनरुक्तम् ईश्वराभावप्रसङ्ग इति तदसत् शास्त्रप्रामाण्यात् अनभ्युपगमाच्च न हि ईश्वरस्य संसार्यात्मत्वं प्रतिपाद्यत इत्यभ्युपगच्छामः किं तर्हि संसारिणः संसारित्वापोहेन ईश्वरात्मत्वं प्रतिपिपादयिषितमिति। एवं च सति अद्वैतेश्वरस्य अपहतपाप्मत्वादिगुणता विपरीतगुणता तु इतरस्य मिथ्येति व्यवतिष्ठते।

यदप्युक्तम् अधिकार्यभावः प्रत्यक्षादिविरोधश्चेति तदप्यसत् प्राक्प्रबोधात् संसारित्वाभ्युपगमात् तद्विषयत्वाच्च प्रत्यक्षादिव्यवहारस्य यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् इत्यादिना हि प्रबोधे प्रत्यक्षाद्यभावं दर्शयति। प्रत्यक्षाद्यभावे श्रुतेरप्यभावप्रसङ्ग इति चेत् न इष्टत्वात् अत्र पितापिता भवति इत्युपक्रम्य वेदा अवेदाः इति वचनात् इष्यत एव अस्माभिः श्रुतेरप्यभावः प्रबोधे। कस्य पुनरयम् अप्रबोध इति चेत् यस्त्वं पृच्छसि तस्य ते इति वदामः।

ननु अहमीश्वर एवोक्तः श्रुत्या यद्येवं प्रतिबुद्धोऽसि नास्ति कस्यचिदप्रबोधः। योऽपि दोषश्चोद्यते कैश्चिदविद्यया किल आत्मनः सद्वितीयत्वात् अद्वैतानुपपत्तिरिति सोऽपि एतेन प्रत्युक्तः। तस्मात् आत्मेत्येव ईश्वरे मनो दधीत।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रार्थ - ( आत्मेति ) ' आत्मरूप से परमेश्वरका ग्रहण युक्त है ' ( तु ) क्योंकि ( उपगच्छन्ति ) जाबाल ' त्वं वा अहमस्मि ' इसप्रकार स्वीकार करते हैं ( च ) और ( ग्राहयन्ति ) एष त आत्मा सर्वान्तरः ' इत्यादि श्रुति आत्मरूप से ईश्वरका ग्रहण कराती हैं।

जो शास्त्रोक्त विशेषण विशिष्ट परमात्मा है क्या वह ' मैं हूँ ' इसप्रकार ग्रहण करना चाहिए अथवा क्या वह ' मुझसे अन्य है ' ऐसा ग्रहण करना चाहिए, इसका विचार करते हैं। परन्तु प्रत्यगात्मविषयक आत्मशब्द श्रूयमाण होनेपर पुनः संशय कैसे? कहते हैं - जीव और ईश्वरका अभेद संभव होनेपर यह आत्मशब्द मुख्यरूपसे स्वीकार किया जा सकता है, अन्यथा यह आत्मशब्द गौण स्वीकार करना चाहिए, ऐसा मानते हैं। तब क्या प्राप्त होता है?

पूर्वपक्षी - ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि ' अपहतपाप्मत्व ' आदि गुणवाला विपरीत गुणरूपसे ग्रहण नहीं किया जा सकता अथवा विपरीत गुण - पाप आदि विशिष्ट ' अपहतपाप्मत्व ' आदि गुणरूपसे ग्रहण नहीं किया जा सकता। ' अपहतपाप्मत्व ' आदि गुण विशिष्ट परमेश्वर है और उससे विपरीत गुण विशिष्ट जीवात्मा है। ईश्वर में संसार्यात्मत्व स्वीकार होनेपर ईश्वरका अभाव प्रसङ्ग होगा, उससे शास्त्र अनर्थक होगा।

और संसारीमें भी ईश्वरात्मत्व स्वीकार होनेपर अधिकारीके न होनेसे शास्त्र अनर्थक ही होगा। और दोनोंके अभेद पक्षमें प्रत्यक्ष आदिका विरोध भी होता है। यदि ऐसा कहो कि दोनोंका भेद होनेपर भी प्रतिमा आदिमें विष्णु आदि दर्शन ( ध्यान ) के समान शास्त्र प्रामाण्यसे तादात्म्यदर्शन ( अभेद ध्यान ) करना चाहिए, तो भले ऐसा हो। परन्तु संसारी जीव मुख्यरूपसे परमात्मा ईश्वर है, ऐसा हमें प्राप्त नहीं कराना चाहिए।

सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यह आत्मा ही परमेश्वर समझना चाहिए, क्योंकि परमेश्वरके प्रकरणमें ' त्वं वा अहमस्मि ' ( हे भगवन् देवता! तू ही मैं हूँ, और हे भगवन् देवता! मैं ही तू है ) इसप्रकार जाबाल उसे आत्मरूप से स्वीकार करते हैं 1

। वैसे ही ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि अन्य भी आत्मत्व स्वीकार जानना चाहिए। ' एष त आत्मा ० ' ( यह तेरी आत्मा सर्वान्तर है ) ' एष त आत्मा ० ' ( यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी और अमृत है ) . ' तत्सत्यं ० ' ( वह सत्य है वह आत्मा है, है श्वेतकेतु! वह तू है ) इत्यादि वेदान्तवाक्य ईश्वरको आत्मरूपसे ग्रहण कराते हैं। जो यह कहा गया है कि विष्णुप्रतिमान्यायसे यह प्रतीक दर्शन होगा, वह अयुक्त है, क्योंकि ऐसा माननेसे गौणत्व प्रसङ्ग और वाक्यविरूपत्व - विरुद्धत्व होता है।

जहाँ प्रतीकदृष्टि अभिप्रेत होती है वहाँ एक ही वार वचन होता है। जैसे कि ' मनो ब्रह्म ' ( मन ब्रह्म है ) ' आदित्यो ब्रह्म ' ( आदित्य ब्रह्म है ) इत्यादि। परन्तु यहाँ तो ' तू मैं हूँ और मैं तू है ' ऐसा कहते हैं। अतः प्रतीक श्रुतिके विरुद्ध होनेसे अभेद प्रतिपत्ति है, क्योंकि • भेददृष्टिका अपवाद है।

जैसे कि ' अथ योऽन्यां ० ' ( और जो अन्य देवताकी ' यह अन्य है और मैं अन्य हूँ ' इसप्रकार उपासना करता है वह नहीं जानता ) ' मृत्योः स ० ’ ( जो पुरुष इस अभिन्न तत्त्वमें नाना - भेद देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ) ' सर्वं तं ० ' ( जो सबको आत्मासे भिन्न जानता है उसे सब परास्त कर देते हैं— कैवल्य सम्बन्ध से रहित कर देतें हैं ) इत्यादि बहुत - सी श्रुति भेद दर्शनका निषेध करती हैं।

और यह कहा गया है कि विरुद्ध गुणवालों ( जीव और ईश्वर ) का अन्योन्यात्मत्व - ऐक्य संभव नहीं है। यह दोष नहीं है, क्योंकि विरुद्ध गुणता में मिथ्यात्व उपपन्न है। और जो यह कहा गया है कि ईश्वरका अभाव प्रसङ्ग होगा। वह ठीक नहीं है, क्योंकि शास्त्रप्रमाण है और उसे हम स्वीकार नहीं करते। ईश्वरमें संसारी आत्मत्वका प्रतिपादन किया जाता हैं, ऐसा हम स्वीकार नहीं करते, किन्तु संसारी जीवका संसारित्व निरासकर ईश्वरभाव प्रतिपादन करना अभीप्सित है।

ऐसा होनेपर अद्वैत ईश्वरका अपहतपाप्मत्व आदि गुणत्व और अन्य जीवका विपरीत गुणत्व मिथ्या है, ऐसा व्यवस्थित होता है। जो यह भी कहा गया है कि अधिकारीका अभाव और प्रत्यक्ष आदिका विरोध है। वह भी अयुक्त है, क्योंकि तत्त्वज्ञानसे पूर्व जीवका संसारी आत्मत्व स्वीकार है और प्रत्यक्ष आदि व्यवहार तद्विषयक है। ' यत्र त्वस्य ० ' ( जहाँ इसका सब आत्मा ही हो गया वहाँ किससे किसे देखे ) इत्यादिसे श्रुति प्रबोध - तत्त्वज्ञान होनेपर प्रत्यक्ष आदिका अभाव दिखलाती है।

यदि कहो कि प्रत्यक्ष आदिके अभाव होनेपर श्रुतिका मी अभाव प्रसङ्ग हो जायगा, तो नहीं, क्योंकि ऐसा हमें इष्ट है। ' अत्र पिताऽपिता भवति ' ( इस अवस्थामें पिता अपिता हो जाता है ) ऐसा आरम्भकर ' वेदा अवेदा : ' ( वेद अवेद हो जाते हैं ) इस वचनसे प्रबोधमें श्रुतिका अभाव हमें भी इष्ट है। यदि कहो कि यह अज्ञान किसका है, तो हम कहते हैं कि तुम पूछते हो वह उस तुम्हारा हो है। परन्तु ' मैं ईश्वर हूँ ' ऐसा श्रुतिने कहा है। यदि इसप्रकार प्रतिबुद्ध हुए हो तो किसीका अज्ञान नहीं है।

और कुछ लोग जो दोष देते हैं कि अविद्यासे आत्मामें सद्वितीयत्व होनेसे अद्वैतकी अनुपपत्ति है, वह भी इससे प्रत्याख्यात हुआ। इससे आत्मा ही ईश्वर है, उस ईश्वरमें मन लगाना चाहिए || ३ ||

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वं अधिकरणमें श्रवण आदि साधनोंकी आवृत्ति कही गयी है। अब इस अधिकरणमें ध्यानके समय आवृत्ति विषयक विचार किया जाता है। तत्त्वज्ञानके लिए ध्यानकी आवृत्ति के समय ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा ध्यान करना चाहिए, अथवा ' मेरा स्वामी ईश्वर है ' ऐसा ध्यान करना चाहिए? इसप्रकार ऐक्थ और भेदविषयक प्रमाणोंके होनेसे ' यः ' इत्यादिसे संशय कहते हैं।

' शब्दादेव प्रमितः ' ( ब्र ० सू ० १।३।२३ ) इत्यादि सूत्र में और ' अयमात्मा ब्रह्म ' ( बृ ० २।५।१ ९ ) ( यह आत्मा ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियोंसे अभेदका प्रतिपादन किया गया है। तो फिर संशय क्यों किया जाता है? ' द्वा सुपर्णा सयुजा ' इत्यादि भेदश्रुति और ' मैं कर्ता, भोक्ता, सुखी - दुःखी, पुण्यी- पापी हूँ और ईश्वरसे भिन्न हूँ ' इत्यादि प्रत्यक्ष भेदप्रतीति से संशय होता है। जीव और ईश्वरका अभेद होनेपर तो जीवमें परमात्मशब्द मुख्यरूप से उपयुक्त हो सकता है।

परन्तु ' द्वा सुपर्णा सयुजा ' इत्यादि भेद प्रतिपादक श्रुति ' अप्रहतपाप्मा ' इत्यादि ईश्वर स्वरूप प्रतिपादक श्रुतियोंके विद्यमान होनेपर अभेद सम्भव नहीं है, इसलिए ' तत्त्वमसि ' इत्यादि अभेद प्रतिपादक श्रुतिवाक्य गौण हैं। यदि दोनोंका अभेद माना जाय तो ईश्वरको जीवभाव प्राप्त होनेपर ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि ईश्वर प्रतिपादक शास्त्र निष्फल होगा, और जीवको ईश्वरभाव प्राप्त होनेपर अधिकारीके न होनेसे कर्म, उपासना और ज्ञान प्रतिपादक शास्त्र निष्फल होगा।

इसलिए दोनोंका भेद मानना युक्त है। और अभेद प्रतिपादक ' तत्त्वमसि ' आदि श्रुतियोंसे ही अभेद ध्यान करना चाहिए। जैसे प्रतिमा आदिमें विष्णु आदिका अभेद बुद्धिसे ध्यान किया जाता है। अतः जीवको मुख्यरूपसे परमात्मा मानना युक्त नहीं है। सिद्धान्ती - ' आत्मेत्येव परमेश्वरः ' इत्यादिसे कहते हैं। पूर्वपक्ष में ' तत्त्वमसि ' आदि अभेद श्रुतियोंका अभेद अर्थं गौण है, सिद्धान्त में अभेद अर्थ मुख्य है || ३ ||

प्रतीकाधिकरणम्

4.1.4 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र ४

सूत्र ४.१.४

न प्रतीके न हि सः ॥ ४.१.४ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 834

पदच्छेद — न , प्रतीके , नहि , सः

सूत्रार्थ — ( प्रतीके ) प्रतीकों में ( न ) आत्मबुद्धि नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ( सः ) उपासकको व्यस्त प्रतीकोंका आत्मरूप से आकलन नहीं करना चाहिए।

शाङ्करभाष्य

मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेति तथा आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते इत्येवमादिषु प्रतीकोपासनेषु संशयः किं तेष्वपि आत्मग्रहः कर्तव्यः न वेति। किं तावत्प्राप्तम् तेष्वपि आत्मग्रह एव युक्तः कर्तुम् कस्मात् ब्रह्मणः श्रुतिषु आत्मत्वेन प्रसिद्धत्वात् प्रतीकानामपि ब्रह्मविकारत्वाद्ब्रह्मत्वे सति आत्मत्वोपपत्तेरित्येवं प्राप्ते ब्रूमः न प्रतीकेष्वात्ममतिं बध्नीयात् न हि स उपासकः प्रतीकानि व्यस्तानि आत्मत्वेन आकलयेत्। यत्पुनः ब्रह्मविकारत्वात्प्रतीकानां ब्रह्मत्वं ततश्च आत्मत्वमिति तदसत् प्रतीकाभावप्रसङ्गात् विकारस्वरूपोपमर्देन हि नामादिजातस्य ब्रह्मत्वमेव आश्रितं भवति स्वरूपोपमर्दे च नामादीनां कुतः प्रतीकत्वम् आत्मग्रहो वा न च ब्रह्मण आत्मत्वात् ब्रह्मदृष्ट्युपदेशेष्वात्मदृष्टिः कल्प्या कर्तृत्वाद्यनिराकरणात् कर्तृत्वादिसर्वसंसारधर्मनिराकरणेन हि ब्रह्मण आत्मत्वोपदेशः तदनिराकरणेन च उपासनविधानम्। अतश्च उपासकस्य प्रतीकैः समत्वात् आत्मग्रहो नोपपद्यते न हि रुचकस्वस्तिकयोः इतरेतरात्मत्वमस्ति सुवर्णात्मनेव तु ब्रह्मात्मना एकत्वे प्रतीकाभावप्रसङ्गमवोचाम। अतो न प्रतीकेष्वात्मदृष्टिः क्रियते।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ० ' ( मन ब्रह्म है ऐसी उपासना करनी चाहिए, यह अध्यात्मदृष्टि है आकाश ब्रह्म है ऐसी उपासना करनी चाहिए, यह अधिदैवत है ) इसीप्रकार ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ० ' ( आदित्य ब्रह्म है ऐसा उपदेश है ) ' स यो नाम ० ' ( वह जो कि नाम ब्रह्म है ऐसी उपासना करता आत्मरूप से श्रुतियोंमें प्रसिद्ध है, प्रतीक भी ब्रह्मके विकार हैं, अतः उनमें ब्रह्मत्व होनेपर आत्मत्वकी उपपत्ति संभव है।

सिद्धान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- प्रतीकोंमें आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उपासकको व्यस्त प्रतीकोंका आत्मरूपसे आकलन ( ग्रहण ) नहीं करना चाहिए, और जो कहा गया है कि ब्रह्मका विकार होनेसे प्रतीक ब्रह्म हैं उससे आत्मा हैं। वह युक्त नहीं हैं, क्योंकि ऐसा होने पर प्रतीकका अभाव प्रसङ्ग होगा। कारण कि विकार के स्वरूपका नाश होनेपर नाम आदि समुदाय ब्रह्म स्वरूप ही हो जाता है। नाम आदिके स्वरूपका नाश होनेपर उनमें प्रतीकत्व और आत्मग्रह कैसे हो सकता है?

ब्रह्मके आत्मत्व होनेसे ब्रह्मदृष्टिं उपदेशोंमें आत्मदृष्टिकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कर्तृत्व आदिका निराकरण नहीं किया गया है। कर्तृत्व आदि समस्त संसार धर्मोके निराकरण से ही ब्रह्म में आत्मत्व उपदेश है, और उसके अनिराकरणसे उपासनाका विधान है। अत : उपासककी प्रतीकों के साथ समानता होनेसे प्रतीकोंमें आत्मग्रह उपपन्न नहीं होता। रुचक और स्वस्तिकों में अन्योन्यात्मकत्व नहीं है।

जैसे ये दोनों सुवर्णरूपसे एक हैं, वैसे प्रतीक और उपासक दोनों ब्रह्मरूपसे एक होनेपर प्रतीकका अभाव प्रसङ्ग आ जायगा, ऐसा हम कह चुके हैं। इसलिए प्रतीकों में आत्मदृष्टि नहीं की जाती है॥४

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — जैसे पूर्वं अधिकरणमें ब्रह्ममें जीवका अभेद होनेसे अहंग्रह कहा गया है, वैसे ही प्रतीक भी ब्रह्म विचार होनेसे जीवसे अभिन्न ब्रह्म हैं, उससे अभिन्न होनेसे जीवसे अभिन्न हैं। उनमें भी अहंग्रह होना चाहिए। इसप्रकार दृष्टान्तसंगतिसे पूर्वपक्ष कहते हैं—- पूर्वपक्षमें प्रतीकोपासनाका अहं ग्रहोपासना से कोई विशेष नहीं है, इसलिए ' मनो ब्रह्म ' ( ब्रह्मरूप मन मैं हूँ ) ' आदित्यो ब्रह्म ' ( ब्रह्मरूप आदित्य मैं हूँ ) इसप्रकार प्रतीकोंमें आत्मरूप से अहंग्रह करना चाहिए। सिद्धान्ती - विकल्प कर पूर्वपक्षका निराकरण करते हैं— प्रतीकों में यह आत्मा है, ऐसे अनुभव के बलसे अहंग्रह होता है अथवा वस्तुतः . जीवसे प्रतीक अभिन्न हैं, अतः अहंग्रह होता है। प्रथमपक्ष युक्त नहीं है, इसको ' न हि सः ' आदिसे कहते हैं। दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतीक ब्रह्मका विकार होनेसे ब्रह्म है, इससे वह आत्मा है। ऐसा होने से प्रतीकका अभाव प्रसङ्ग होगा। नाम - रूप विकारका स्वरूपनाश होनेपर उसमें प्रतीकत्व और आत्मग्रह संभव नहीं हैं, अतः प्रतीकोंमें आत्मबुद्धि नहीं करनी चाहिए || ४ ||

ब्रह्मदृष्ट्यधिकरणम्

4.1.5 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र ५

सूत्र ४.१.५

ब्रह्मदृष्टिर् उत्कर्षात् ॥ ४.१.५ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 835

पदच्छेद — ब्रह्मदृष्टि , उत्कर्षात् । है ) इत्यादि प्रतीकोपासनाओंमें संशय होता है कि क्या उनमें भी आत्मग्रह करना चाहिए अथवा नहीं ? तब क्या प्राप्त होता है ? पूर्वपक्षी— उनमें भी आत्मग्रह युक्त ही है , किससे ? इससे कि ब्रह्म

शाङ्करभाष्य

तेष्वेव उदाहरणेष्वन्यः संशयः किमादित्यादिदृष्टयो ब्रह्मण्यध्यसितव्याः किं वा ब्रह्मदृष्टिरादित्यादिष्विति। कुतः संशयः सामानाधिकरण्ये कारणानवधारणात् अत्र हि ब्रह्मशब्दस्य आदित्यादिशब्दैः सामानाधिकरण्यमुपलभ्यते आदित्यो ब्रह्म प्राणो ब्रह्म विद्युद्ब्रह्म इत्यादिसमानविभक्तिनिर्देशात् न च अत्र आञ्जसं सामानाधिकरण्यमवकल्पते अर्थान्तरवचनत्वाद्ब्रह्मादित्यादिशब्दानाम् न हि भवति गौरश्व इति सामानाधिकरण्यम्।

ननु प्रकृतिविकारभावाद्ब्रह्मादित्यादीनां मृच्छरावादिवत्सामानाधिकरण्यं स्यात् नेत्युच्यते विकारप्रविलयो ह्येवं प्रकृतिसामानाधिकरण्यात्स्यात् ततश्च प्रतीकाभावप्रसङ्गमवोचाम परमात्मवाक्यं चेदं तदानीं स्यात् ततश्चोपासनाधिकारो बाध्येत परिमितविकारोपादानं च व्यर्थम्। तस्मात् ब्राह्मणोऽग्निर्वैश्वानरः इत्यादिवत् अन्यतरत्रान्यतरदृष्ट्यध्यासे सति क्व किंदृष्टिरध्यस्यतामिति संशयः। तत्र अनियमः नियमकारिणः शास्त्रस्याभावादित्येवं प्राप्तम्।

अथवा आदित्यादिदृष्टय एव ब्रह्मणि कर्तव्या इत्येवं प्राप्तम् एवं हि आदित्यादिदृष्टिभिः ब्रह्म उपासितं भवति ब्रह्मोपासनं च फलवदिति शास्त्रमर्यादा। तस्मात् न ब्रह्मदृष्टिरादित्यादिष्वित्येवं प्राप्ते ब्रूमः ब्रह्मदृष्टिरेव आदित्यादिषु स्यादिति।

कस्मात् उत्कर्षात् एवम् उत्कर्षेण आदित्यादयो दृष्टा भवन्ति उत्कृष्टदृष्टेस्तेष्वध्यासात् तथा च लौकिको न्यायोऽनुगतो भवति उत्कृष्टदृष्टिर्हि निकृष्टेऽध्यसितव्येति लौकिको न्यायः यथा राजदृष्टिः क्षत्तरि स च अनुसर्तव्यः विपर्यये प्रत्यवायप्रसङ्गात् न हि क्षत्तृदृष्टिपरिगृहीतो राजा निकर्षं नीयमानः श्रेयसे स्यात्।

ननु शास्त्रप्रामाण्यादनाशङ्कनीयोऽत्र प्रत्यवायप्रसङ्गः न च लौकिकेन न्यायेन शास्त्रीया दृष्टिर्नियन्तुं युक्तेति अत्रोच्यते निर्धारिते शास्त्रार्थे एतदेवं स्यात् संदिग्धे तु तस्मिन् तन्निर्णयं प्रति लौकिकोऽपि न्याय आश्रीयमाणो न विरुध्यते तेन च उत्कृष्टदृष्ट्यध्यासे शास्त्रार्थेऽवधार्यमाणे निकृष्टदृष्टिमध्यस्यन्प्रत्यवेयादिति श्लिष्यते।

प्राथम्याच्च आदित्यादिशब्दानां मुख्यार्थत्वम् अविरोधात् ग्रहीतव्यम् तैः स्वार्थवृत्तिभिरवरुद्धायां बुद्धौ पश्चादवतरतो ब्रह्मशब्दस्य मुख्यया वृत्त्या सामानाधिकरण्यासंभवात् ब्रह्मदृष्टिविधानार्थतैव अवतिष्ठते।

इतिपरत्वादपि ब्रह्मशब्दस्य एष एवार्थो न्याय्यः तथा हि ब्रह्मेत्यादेशः ब्रह्मेत्युपासीत ब्रह्मेत्युपास्ते इति च सर्वत्रेतिपरं ब्रह्मशब्दमुच्चारयति शुद्धांस्तु आदित्यादिशब्दान् ततश्च यथा शुक्तिकां रजतमिति प्रत्येतीत्यत्र शुक्तिवचन एव शुक्तिकाशब्दः रजतशब्दस्तु रजतप्रतीतिलक्षणार्थः प्रत्येत्येव हि केवलं रजतमिति न तु तत्र रजतमस्ति एवमत्रापि आदित्यादीन्ब्रह्मेति प्रतीयादिति गम्यते।

वाक्यशेषोऽपि च द्वितीयानिर्देशेन आदित्यादीनेव उपास्तिक्रियया व्याप्यमानान्दर्शयति स य एतदेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते इति च। यत्तूक्तम् ब्रह्मोपासनमेवात्र आदरणीयं फलवत्त्वायेति तदयुक्तम् उक्तेन न्यायेन आदित्यादीनामेव उपास्यत्वावगमात् फलं तु अतिथ्याद्युपासन इव आदित्याद्युपासनेऽपि ब्रह्मैव दास्यति सर्वाध्यक्षत्वात् वर्णितं चैतत् फलमत उपपत्तेः इत्यत्र।

ईदृशं च अत्र ब्रह्मण उपास्यत्वम् यत्प्रतीकेषु तद्दृष्ट्यध्यारोपणम् प्रतिमादिष्विव विष्ण्वादीनाम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — सूत्रार्थ -- ( ब्रह्मदृष्टिः ) आदित्य आदि प्रतीकोंमें ब्रह्मदृष्टि करनी चाहिए, ( उत्कर्षात् ) क्योंकि ब्रह्मदृष्टि उत्कर्ष है।

उन्हीं उदाहरणों में अन्य संशय होता है कि क्या आदित्य आदि दृष्टिका ब्रह्ममें अध्यास होना चाहिए अथवा क्या ब्रह्मदृष्टिका आदित्य आदिमें अध्यास होना चाहिए? किससे संशय होता है? इससे कि सामानाधिकरण्यमें कारणका निश्चय नहीं होता।

और यहीं पर ब्रह्म शब्दका आदित्य आदि शब्दों के साथ सामानाधिकरण्य उपलब्ध होता है, क्योंकि ' आदित्यो ब्रह्म ० ' ( आदित्य ब्रह्म है, प्राण ब्रह्म है, विद्युत् ब्रह्म है ) इत्यादि समान विभक्तिका निर्देश है और यहाँ मुख्य सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता, कारण कि ब्रह्म और आदित्य शब्द भिन्न - भिन्न अर्थके वाचक हैं | ' गौरश्वः ' ' गो अश्व ’ इसप्रकार सामानाधिकरण्य नहीं होता। परन्तु मृत्तिका और शराव ( सिकोरा ) के समान ब्रह्म और आदित्य आदिका प्रकृति - विकारभाव होनेसे सामानाधिकरण्य होना चाहिए?

नहीं, ऐसा कहते हैं— क्योंकि इसप्रकार प्रकृतिके साथ सामानाधिकरण्य होनेसे विकारका प्रविलय ही होगा, उससे प्रतीकका अभाव प्रसङ्ग आ जायेगा, ऐसा हम कह चुके हैं। और ऐसा माननेपर तो यह [ आदित्यो ब्रह्म ] परमात्मवाक्य होगा, उससे उपासना अधिकारका बाध हो जायगा। परिमित सीमित विकारका ग्रहण भी व्यर्थ है। इसलिए ' ब्राह्मणोऽग्निर्वैश्वानरः ' ( ब्राह्मण वैश्वानर अग्नि है ) इत्यादिके समान अन्योन्य अन्य दृष्टिका अध्यास होनेपर कहाँ किस दृष्टिका अध्यास होना चाहिए, ऐसा संशय होता है।

पूर्वपक्षी - इस विषय में कोई नियम नहीं है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि नियम करनेवाले शास्त्रका अमाव है। अथवा आदित्य दृष्टि ही ब्रह्ममें करनी चाहिए, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि इसप्रकार आदित्य आदि दृष्टिसे ब्रह्म उपासित होता है और ब्रह्मोपासना सप्रयोजन है, ऐसी शास्त्र मर्यादा है। इसलिए ब्रह्मदृष्टि आदित्य आदिमें नहीं है। सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ब्रह्मदृष्टि ही आदित्य आदिमें होनी चाहिए, किससे? उत्कर्ष से।

इस प्रकार उत्कर्षसे आदित्य आदि दृष्ट होते हैं, क्योंकि उत्कृष्ट दृष्टिका उनमें अध्यास है। ऐसे लौकिक न्याय अनुगत होता, उत्कृष्ट दृष्टिका ही निकृष्ट में अध्यास करना चाहिए, यह लौकिक न्याय है। जैसे सारथि में राजदृष्टि। इस लौकिक न्यायका ही यहाँ अनुसरण करना चाहिए। कारण कि विपर्यय होनेपर प्रत्यवायका प्रसङ्ग है। सारथि दृष्टिसे परिगृहीत होने से निकृष्टताको प्राप्त हुआ राजा श्रेयके लिए नहीं होता।

परन्तु शास्त्रप्रामाण्यसे यहाँ प्रत्यवाय प्रसङ्गकी शङ्का नहीं होनी चाहिए और लौकिक न्यायसे शास्त्रीय दृष्टिका नियमन होना युक्त नहीं है? क्षि ० - इसपर कहते हैं - शास्त्रार्थ के निर्धारित होनेपर यह ऐसा हो सकता है। परन्तु उसके संदिग्ध होनेपर उसके निर्णयके प्रति आश्रीयमाण लौकिक न्याय भी विरुद्ध नहीं है। इससे उत्कृष्टदृष्टि अध्यासरूप शास्त्रार्थंका निश्चय होनेपर निकृष्टदृष्टिका अध्यास करता हुआ प्रत्यवायको प्राप्त होगा, यह युक्त है।

और आदित्य आदि शब्दोंके प्रथम निर्दिष्ट होनेसे वे मुख्यार्थक हैं ऐसा अविरोधसे ग्रहण करना चाहिए | अपने अर्थ में वृत्तिवाले उन शब्दोंसे बुद्धिके अवरुद्ध होनेपर पश्चात् बुद्धिमें उतरते हुए ब्रह्मशब्दका मुख्यवृत्ति से सामानाधिकरण्य संभव न होनेसे ब्रह्मदृष्टि विधानार्थता अवस्थित होती है। और ' इति ' पर होने से भी ब्रह्मशब्दका यही अर्थ उचित है।

जैसे कि ' ब्रह्मेत्यादेशः ' ( आदित्य ब्रह्म है, ऐसा उपदेश है ) ' ब्रह्मेत्युपासीत ' ( ब्रह्म है, ऐसी उपासना करनी चाहिए ) ' ब्रह्मेत्युपास्ते ' ( ब्रह्म है, ऐसी उपासना करता है ) इस प्रकार सर्वत्र ' इति ' परक ब्रह्मशब्दका उच्चारण करते हैं और आदित्य आदि शुद्ध शब्दोंका उच्चारण करते हैं। उससे जैसे शुक्तिकाको यह रजत है, ऐसा जानता है। यहाँ शुक्तिका शब्द शुक्तिवाचक है और रजतशब्द तो रजत प्रतीति लक्षणार्थक है, क्योंकि ' रजत है ' यह केवल प्रतीति करता है, वहाँ तो रजत नहीं है।

इस प्रकार उदाहरणों में भी आदित्य आदिको यह ब्रह्म है ऐसा जाने, ऐसा ज्ञात होता है और ' स य एतमेवं ० ' ( वह जो इस प्रकार जाननेवाला होकर आदित्यकी यह ब्रह्म है, ऐसी उपासना करता है ) ' स यो वाचं ० ' ( वह जो वाणी की ब्रह्मरूपसे उपासना करता है ) ' यः संकल्पं ० ' ( जो संकल्पकी ब्रह्म बुद्धिसे उपासना करता है ) इस प्रकार वाक्यशेष भी द्वितीया विभक्तिके निर्देशसे आदित्य आदिको उपासना क्रिया द्वारा व्याप्यविषय किये हुए दिखलाता है।

और जो यह कहा गया है कि फलवत्त्वके लिए यहाँ ब्रह्मोपासना ही आदरणीय है ; वह अयुक्त है, क्योंकि उक्त न्यायसे आदित्य आदि ही उपास्य अवगत होते हैं। फल तो अतिथि आदिकी उपासना के समान आदित्य आदि उपासना में भी ब्रह्म ही देगा, क्योंकि वह सर्वाध्यक्ष है | और इसका ' फलगत उपपत्ते : ' इस सूत्रमें वर्णन किया गया है। यहाँ ब्रह्मका इसप्रकारका उपास्यत्व है जो प्रतिमा आदि विष्णु आदिके अध्यारोप समान प्रतीकोंमें ब्रह्मदृष्टिका अध्यारोप है॥५

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.१.६ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

आदित्यादिमत्यधिकरणम्

4.1.6 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र ६

सूत्र ४.१.६

आदित्यादिमतयश् चाङ्ग उपपत्तेः ॥ ४.१.६ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 838

पदच्छेद — आदित्यादिमतयः , च , अङ्गे , उपपत्तेः

सूत्रार्थ — ( अङ्गे ) उद्गीथ आदि कर्माङ्गों में ( आदित्यादिमतयः ) आदित्य आदि बुद्धि कहनी चाहिएँ, ( उपपत्तेश्च ) क्योंकि ऐसा होनेसे कर्म समृद्धिरूप फलकी उपपत्ति होती है।

शाङ्करभाष्य

य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीत लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत वाचि सप्तविधं सामोपासीत इयमेवर्गग्निः साम इत्येवमादिषु अङ्गावबद्धेषूपासनेषु संशयः किमादित्यादिषु उद्गीथादिदृष्टयो विधीयन्ते किं वा उद्गीथादिष्वेव आदित्यादिदृष्टय इति।

तत्र अनियमः नियमकारणाभावात् इति प्राप्तम् न हि अत्र ब्रह्मण इव कस्यचिदुत्कर्षविशेषोऽवधार्यते ब्रह्म हि समस्तजगत्कारणत्वात् अपहतपाप्मत्वादिगुणयोगाच्च आदित्यादिभ्य उत्कृष्टमिति शक्यमवधारयितुम् न तु आदित्योद्गीथादीनां विकारत्वाविशेषात् किंचिदुत्कर्षविशेषावधारणे कारणमस्ति। अथवा नियमेनैव उद्गीथादिमतय आदित्यादिषु अध्यस्येरन् कस्मात् कर्मात्मकत्वादुद्गीथादीनाम् कर्मणश्च फलप्राप्तिप्रसिद्धेः उद्गीथादिमतिभिरुपास्यमाना आदित्यादयः कर्मात्मकाः सन्तः फलहेतवो भविष्यन्ति।

तथा च इयमेवर्गग्निः साम इत्यत्र तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम इति ऋक्शब्देन पृथिवीं निर्दिशति सामशब्देनाग्निम् तच्च पृथिव्यग्न्योः ऋक्सामदृष्टिचिकीर्षायामवकल्पते न ऋक्सामयोः पृथिव्यग्निदृष्टिचिकीर्षायाम् क्षत्तरि हि राजदृष्टिकरणात् राजशब्द उपचर्यते न राजनि क्षत्तृशब्दः। अपि च लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत इति अधिकरणनिर्देशात् लोकेषु साम अध्यसितव्यमिति प्रतीयते एतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् इति च एतदेव दर्शयति।

प्रथमनिर्दिष्टेषु च आदित्यादिषु चरमनिर्दिष्टं ब्रह्माध्यस्तम् आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः इत्यादिषु प्रथमनिर्दिष्टाश्च पृथिव्यादयः चरमनिर्दिष्टा हिंकारादयः पृथिवी हिंकारः इत्यादिश्रुतिषु। अतः अनङ्गेष्वादित्यादिषु अङ्गमतिक्षेप इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः आदित्यादिमतय एव अङ्गेषु उद्गीथादिषु क्षिप्येरन् कुतः उपपत्तेः उपपद्यते हि एवम् अपूर्वसंनिकर्षात् आदित्यादिमतिभिः संस्क्रियमाणेषु उद्गीथादिषु कर्मसमृद्धिः।

यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति इति च विद्यायाः कर्मसमृद्धिहेतुत्वं दर्शयति। भवतु कर्मसमृद्धिफलेष्वेवम् स्वतन्त्रफलेषु तु कथम् य एतदेवं विद्वा्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते इत्यादिषु तेष्वपि अधिकृताधिकारात् प्रकृतापूर्वसंनिकर्षेणैव फलकल्पना युक्ता गोदोहनादिनियमवत्। फलात्मकत्वाच्च आदित्यादीनाम् उद्गीथादिभ्यः कर्मात्मकेभ्यः उत्कर्षोपपत्तिः आदित्यादिप्राप्तिलक्षणं हि कर्मफलं शिष्यते श्रुतिषु।

अपि च ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति इति च उद्गीथमेव उपास्यत्वेनोपक्रम्य आदित्यादिमतीर्विदधाति। यत्तूक्तम् उद्गीथादिमतिभिरुपास्यमाना आदित्यादयः कर्मभूयं भूत्वा फलं करिष्यन्तीति तदयुक्तम् स्वयमेवोपासनस्य कर्मत्वात् फलवत्त्वोपपत्तेः आदित्यादिभावेनापि च दृश्यमानानामुद्गीथादीनां कर्मात्मकत्वानपायात्।

तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम इति तु लाक्षणिक एव पृथिव्यग्न्योः ऋक्सामशब्दप्रयोगः लक्षणा च यथासंभवं संनिकृष्टेन विप्रकृष्टेन वा स्वार्थसंबन्धेन प्रवर्तते तत्र यद्यपि ऋक्सामयोः पृथिव्यग्निदृष्टिचिकीर्षा तथापि प्रसिद्धयोः ऋक्सामयोर्भेदेनानुकीर्तनात् पृथिव्यग्न्योश्च संनिधानात् तयोरेव एष ऋक्सामशब्दप्रयोगः ऋक्सामसंबन्धादिति निश्चीयते क्षत्तृशब्दोऽपि हि कुतश्चित्कारणाद्राजानमुपसर्पन् न निवारयितुं पार्यते।

इयमेवर्क् इति च यथाक्षरन्यासम् ऋच एव पृथिवीत्वमवधारयति पृथिव्या हि ऋक्त्वेऽवधार्यमाणे इयमृगेवेत्यक्षरन्यासः स्यात्। य एवं विद्वान्साम गायति इति च अङ्गाश्रयमवविज्ञानमुपसंहरति न पृथिव्याद्याश्रयम्। तथा लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत इति यद्यपि सप्तमीनिर्दिष्टा लोकाः तथापि साम्न्येव ते अध्यस्येरन् द्वितीयानिर्देशेन साम्न उपास्यत्वावगमात् सामनि हि लोकेष्वध्यस्यमानेषु साम लोकात्मनोपासितं भवति अन्यथा पुनः लोकाः सामात्मनाउपासिताः स्युः।

एतेन एतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् इत्यादि व्याख्यातम्। यत्रापि तुल्यो द्वितीयानिर्देशः अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत इति तत्रापि समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु इतिं तु पञ्चविधस्य अथ सप्तविधस्य इति च साम्न एव उपास्यत्वोपक्रमात् तस्मिन्नेव आदित्याद्यध्यासः। एतस्मादेव च साम्न उपास्यत्वावगमात् पृथिवी हिंकारः इत्यादिनिर्देशविपर्ययेऽपि हिंकारादिष्वेव पृथिव्यादिदृष्टिः। तस्मात् अनङ्गाश्रया आदित्यादिमतयः अङ्गेषूद्गीथादिषु क्षिप्येरन्निति सिद्धम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' य एवासौ ० ' ( जो कि यह आदित्य तपता है।

उसके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे अर्थात् आदित्य दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना करनी चाहिए ) ' लोकेषु ० ' ( पृथिवी आदि लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए अर्थात् लोक दृष्टि से पाँच प्रकार सामकी उपासना करनी चाहिए ) ' वाचि सप्तविधं ० ' ( वाणी दृष्टि से सात प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए ) ' इयमेव ० ' ( यह पृथिवी ऋ है और अग्नि साम है ) इत्यादि अंगोंसे सम्बन्धित उपासनाओंमें संशय होता है कि क्या आदित्य आदि उद्गीथादि दृष्टिका विधान किया जाता है अथवा क्या उद्गीथ आदि दृष्टिका आदित्य आदिमें विधान किया जाता है?

पूर्वपक्षी— उसमें नियमका कारण न होनेसें अनियम है, ऐसा प्राप्त होता है। यहाँ ब्रह्म के समान किसीका उत्कर्ष विशेष निश्चित नहीं किया जाता। ब्रह्म समस्त जगत्‌का कारण और अपहतपाप्मत्वादि गुणयोगसे आदित्य आदिसे उत्कृष्ट है, ऐसा अवधारण किया जा सकता है। परन्तु आदित्य और उद्गीथादिमें विकारत्व समान होनेसे उत्कर्ष विशेष अवधारणमें कोई कारण नहीं है। अथवा उद्गीथ आदि बुद्धिका नियमसे आदित्य आदिमें अध्यारोप होना चाहिए, किससे? इससे कि उद्गीथ आदि कर्मात्मक हैं और कर्मसे फलप्राप्ति प्रसिद्ध है।

उद्गीथ आदि बुद्धिसे उपास्यमान आदित्य आदि कर्मात्मक होते हुए फलके हेतु होंगे। और इसीप्रकार ' इयमेव ० ' ( यह पृथिवी ही ऋक् है और अग्नि साम है ) इसमें ' तदेतदेतस्या ० ' ( वह यह अग्निसंज्ञक साम इस पृथिवीरूप ऋक् में अध्यूढ - ऊपरिभावसे स्थित है ) इसप्रकार श्रुति ऋक् शब्दसे पृथिवीका और सामशब्दसे अग्निका निर्देश करती है।

और वह निर्देश क्रमशः पृथिवी और अग्निमें ऋक् दृष्टि और सामदृष्टि करनेकी इच्छा होनेपर उपपन्न होता है, किन्तु ऋक् और साममें पृथिवीदृष्टि और अग्निदृष्टि करनेकी इच्छा होनेपर उपपन्न नहीं होता है। सारथिमें राजदृष्टि करनेसे सारथिमें राजशब्द गौणीवृत्तिसे उपचरित होता है, किन्तु राजामें सारथिशब्द उपचरित नहीं होता। और ' लोकेषु ० ' ( लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए ) इसप्रकार अधिकरणके निर्देशसे लोकोंमें सामका अध्यास करना चाहिए, ऐसा प्रतीत होता है।

' एतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ' ( यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणों में प्रतिष्ठित है ) यह श्रुति भी ऐसा ही दिखलाती है और ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेश : ' ( आदित्य ब्रह्म है, ऐसा S उपदेश है ) इत्यादि प्रथम निर्दिष्ट आदित्य आदिमें अन्तिम निर्दिष्ट ब्रह्म अध्यस्त है और ' पृथिवी हिंकार : ' ( पृथिवी हिंकार है ) इत्यादि श्रुतियोंमें पृथिवी आदि प्रथम निर्दिष्ट हैं और हिकार आदि अन्तिम निर्दिष्ट हैं। इसलिए अनङ्ग आदित्यादिमें अङ्गमतिका निक्षेप है।

सिद्धान्ती -- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं --- आदित्य आदि बुद्धि ही उद्गीथ आदि अङ्गों में करनी चाहिए, किससे? इससे कि ऐसी उपपत्ति होती है। इसप्रकार अपूर्वं सन्निकर्षसे आदित्य आदि बुद्धि द्वारा संस्क्रियमाण उद्गीथ आदिमें कर्म समृद्धि उपपन्न होती है। ' यदेव विद्यया ० ' ( जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगते युक्त होकर करता है वह बलवत्तर होता है ) इसप्रकार श्रुति विद्याको कर्म समृद्धिका हेतु दिखलाती है।

कर्म समृद्धि फलवाली उपासनाओंमें भले ऐसा ( अङ्गों में अनङ्ग बुद्धिका अध्यास ) हो, परन्तु ' य एतदेवं ० ' ( जो इसे इसप्रकार जाननेवाला पुरुष लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है उसके लिए ऊर्ध्व और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ) इत्यादि स्वतन्त्र फलवाली उपासनाओंमें अङ्गों में अनङ्ग आदित्य आदिका अध्यास कैसे होगा? उन उपासनाओंमें भी अधिकृतका अधिकार होने से प्रकृत अपूर्व सन्निकर्षसे ही गोदोहन आदि नियमके समान फलकी कल्पना युक्त है।

आदित्य आदि फलात्मक होनेसे कर्मात्मक उद्गीथ आदिसे उनमें उत्कर्षत्व उपपन्न होता है, क्योंकि आदित्य आदि प्राप्तिरूप कर्मफल श्रुतियोंमें उपदिष्ट है। और ' ओमित्येतदक्षरमु ० ' ( ॐ यह अक्षर उद्गीथ है इसकी उपासना करनी चाहिए ) ' खल्वेतस्यै ० ' ( निश्चय ही यह सब इस अक्षरका उपव्याख्यान है ) इस प्रकार श्रुति उद्गीथका उपास्यरूपसे उपक्रम कर आदित्य आदि बुद्धिका विधान करती है। जो यह कहा गया है कि उद्गीथ आदि बुद्धिसे उपास्यमान आदित्य आदि कर्मात्मकत्व प्राप्तकर फल करेंगे।

वह अयुक्त है, क्योंकि उपासना कर्म होनेसे स्वयं फलवाली हो सकती है। उसी प्रकार आदित्य आदि भावसे दृश्यमान उद्गीथ आदिका कर्मात्मकत्व नष्ट नहीं होता। ' तदेतदेतस्या ० ' ( वह यह अग्निनामक साम पृथिवीरूप ऋक्के ऊपर स्थित है ) यह तो पृथिवी और अग्निमें ऋक् और साम शब्दों का प्रयोग लाक्षणिक है। लक्षणा यथासंभव संनिकृष्ट अथवा विप्रकृष्ट स्वार्थके साथ सम्बन्ध होनेसे प्रवृत्त होती है।

उसमें यद्यपि ऋक् और साममें पृथिवीदृष्टि और अग्निदृष्टि करनेकी इच्छा है, तो भी प्रसिद्ध ऋक् और सामका भेदसे अनुकीर्तन होनेसे एवं पृथिवी और अग्निका संनिधान होनेसे ऋक् और साम शब्दोंका यह प्रयोग उनमें ही है, ऋक् और सामके सम्बन्धसे ऐसा निश्चय होता है। क्योंकि सारथि शब्द मी किसी कारणसे राजानुगामी होता हो तो उसका निवारण नहीं किया जा सकता | ' इयमेव ' ० ' ( यही ऋक् है ) यह श्रुति अक्षरोंके न्यासके अनुसार ऋक्में ही पृथिवीत्वका अवधारण करती है।

यदि पृथिवीमें ही ऋक्त्व होता तो यह ऋक् ही है इस प्रकार अक्षरोंका न्यास होगा। ' य एवं विद्वान् ० ' ( जो इस प्रकार जानकर सामका गायन करता है ) यह श्रुति अङ्गाश्रय विज्ञानका ही उपसंहार करती है पृथिवी आदि आश्रय विज्ञानका नहीं। इसप्रकार ' लोकेषु पञ्चविधं ० ' ( लोकों में पञ्चविध सामकी उपासना करनी चाहिए ) इसमें यद्यपि सप्तमी विभक्तिसे लोक निर्दिष्ट हैं तो भी उनका साममें अध्यास होना चाहिए, क्योंकि द्वितीया विभक्तिके निर्देशसे साम ही उपास्य अवगत होता है।

साममें लोकोंके अध्यस्यमान होनेपर साम लोकरूपसे उपासित होता है, नहीं तो लोक सामरूपसे उपासित होंगे। इससे - लोकरूपसे सामकी उपासना होनेसे ' एतद्गायनं ० ' ( यह गायत्र साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है - गायत्र साम प्राणरूपसें उपासित है ) इत्यादिका भी व्याख्यान हुआ।

और जहाँ भी ' अथ खल्वमुमादित्यं ०, ( अब उस आदित्यके रूपमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिए ) इसप्रकार द्वितीयाका निर्देश -तुल्य हो, वहाँ भी ' समस्तस्य ० ' ( समस्त सामकी उपासना श्रेष्ठ है ) ' इति तु पञ्चविधस्य . ' ( यहाँ पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण है ) ' अथ सप्तविधस्य ० ' ( अब सात प्रकारके सामका ) इस प्रकार सामका ही उपास्यरूपसे उपक्रम होनेसे उसीमें आदित्यादिका अध्यास है।

क्योंकि इसीसे साम उपास्य अवगत होता है, ' पृथिवी हिंकारः " इत्यादि निर्देशके विपर्यय होनेपर मी हिंकार आदिमें ही पृथिवी आदि दृष्टि है। इससे यह सिद्ध हुआ कि अनङ्गाश्रय आदित्यादि बुद्धि उद्गीथ आदि अङ्गों में करनी चाहिए॥ ६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वं अधिकरणमें यह कहा गया कि आदित्य आदि प्रतीकोंको आत्मरूपसे ग्रहण नहीं करना चाहिए | अब इस अधिकरणमें आदित्य आदि प्रतीकोपासनाओं में कहाँ किस दृष्टिका अध्यास करना चाहिए, यह विचार किया जाता है। यहाँ संशयका कारण ' आदित्यो ब्रह्म ' यह आदित्य और ब्रह्म दोनों में समान विभक्तिरूप सामानाधिकरण्य है। और यह सामानाधिकरण्य मुख्य नहीं है, क्योंकि दोनोंका भिन्न - भिन्न अर्थ है। व्यापक चैतन्यरूप ब्रह्म शब्दका अर्थ है और आकाशस्थ प्रदीप्न तेजोमय मण्डल आदित्य शब्दका अर्थ है। किञ्च यदि ' आदित्यो ब्रह्म ' यह ब्रह्म वाचक मानें तो ' सर्वं ब्रह्म ' ऐसा कहना होगा। इसलिए यहाँ परिशेषसे अध्यास ही सामानाधिकरण्यका कारण सिद्ध होता है। अध्यासमें निश्चायक न होनेसे संशय होता है कि किसका किसमें अध्यास करना चाहिए। पूर्वपक्षी' तत्रा नियमः ' आदिसे कहते हैं। पूर्वपक्षमें विकारदृष्टिसे ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिए, इससे फलकी सिद्धि होती है, सिद्धान्त में ब्रह्मदृष्टिसे आदित्य आदिकी उपासना करनी चाहिए।

' आदित्य आदि दृष्टि से ब्रह्म उपास्य है अथवा ब्रह्मदृष्टिसे आदित्य आदि उपास्य हैं ' इस प्रकार जहाँ शास्त्रार्थमें सन्देह हो वहाँपर लौकिक न्यायका ग्रहण अयुक्त नहीं है। केवल लौकिक न्याय ही इस अर्थमें हेतु नहीं है, अपितु ' आदित्यो ब्रह्म ' इत्यादि श्रुति में आदित्य आदिका प्रथम प्रतिपादन भी उक्त निश्चयमें हेतु है। और यहाँ विरोध न होनेसे आदित्य आदिका मुख्यार्थं ग्रहण करना युक्त है। ब्रह्मशब्दका मुख्यार्थं बुद्धिमें त्वरित नहीं आता, इसलिए ब्रह्मशब्दकी ब्रह्मदृष्टि में लक्षणा करनी होगी। इससे ' आदित्य आदि ब्रह्म दृष्टि से उपास्य हैं ' ऐसा वाक्यार्थ है। और ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ' ब्रह्मशब्दसे ' इति ' परे होने से भी ब्रह्मशब्दका ब्रह्मदृष्टि अर्थ युक्त है।

* यहाँ द्वितीया विभक्तिका श्रवण, ' इति ' शब्दपर और उक्त लौकिक न्याय [ उत्कृष्ट और निकृष्ट के मध्यमें उत्कृष्ट दृष्टिसे निकृष्ट उपास्य है ] से यही सिद्ध होता है कि आदित्य आदि ब्रह्मदृष्टिसे उपास्य हैं।

* आदित्यादि और उद्गीथ आदिमें कौन किस दृष्टिसे उपास्य है, इस अधिकरण में यह विचार किया जाता है। यहाँ ' पृथिवी, अग्नि, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्यु दृष्टिसे क्रमशः हिकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन ' ईस पाँच प्रकारके सामकी उपासना

U करनी चाहिए एवं ' हिकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, निधन, आदि और उपद्रव ' इस सात प्रकारके सामकी वाणी दृष्टिसे उपासना करनी चाहिए ' इत्यादि अंगोंसे सम्बन्धित उपासनाओं में किसकी किसमें दृष्टि करनी चाहिए, इसका नियामक न होने से संशय होता है। पूर्वपक्षी ' तत्रानियमः ' आदिसे कहते हैं।

* यहाँ आदित्यादि सिद्धरूप हैं और उद्गीथ आदि कर्मका अङ्गरूप होनेसे फलवाले हैं, अतः उद्गीथ आदि आदित्य आदिसे उत्कृष्ट हैं, इसलिए उत्कृष्ट उद्गीथ आदि दृष्टिसे आदित्य आदि उपास्य हैं। और ' इयमेवर्गभिःसाम ' यहाँ भी पृथिवीमें ऋक्दृष्टि और अग्निमें सामदृष्टिका निर्देश है | क्योंकि निकृष्टमें ही उत्कृष्ट शब्द उपचरित होता है। जैसे सारथिमें राजशब्द और पूर्वाधिकरण में दर्शित न्याय से भी ऐसा ही होता है।

सिद्धान्ती - अनङ्ग आदित्य आदि दृष्टिसे अङ्गरूप उद्गीथ आदि उपास्य हैं। जैसे प्रोक्षण आदिसे संस्कृत व्रीहि आदि कर्ममें अपूर्वको उत्पन्न करते हैं, वैसे आदित्य आदि बुद्धिसे संस्कृत उद्गीथ आदि कर्मोंमें अपूर्वके सम्बन्ध से कर्मसमृद्धिरूप फल उत्पन्न होता है, क्योंकि संस्कृत अङ्ग कर्मसमृद्धिरूप फलके अनुकूल प्रकृत कर्ममें अपूर्व - अदृष्ट उत्पन्न करते हैं।

# अथवा नियमसे उद्गीथ आदि बुद्धि आदित्य आदिमें करनी चाहिए, अब इस दूसरे पक्षका निराकरण ' यत्तक्तम् ' आदिसे किया जाता है। ' माणवक अग्नि है ' जैसे माणवकमें अग्निदृष्टि करनेसे माणवकत्व नष्ट नहीं होता, वैसे आदित्य आदि दृष्टि से दृश्यमान उद्गीथ आदिमें भी कर्मात्मकत्व नष्ट नहीं होता। पूर्वोक्त गौण प्रयोगकी अनुपपत्ति भी नहीं है, क्योंकि यह लाक्षणिक प्रयोग है। ' गंगायां घोषः ' यहाँ गङ्गाशब्द वाच्य प्रवाहका सन्निकृष्ट संयोग सम्बन्ध तीरके साथ हैं, इससे यह सन्निकृष्ट सम्बन्धरूप लक्षणा है।

' माणवक अग्नि है ' यहाँपर अग्नि स्थित, शुचित्व, तेजस्त्व आदि गुणवत्त्व परम्परा सम्बन्धसे माणवकमें देखा जाता है, यह विप्रकृष्ट सम्बन्धरूप लक्षणा है। वैसे यहाँ ऋक् और साममें पृथिवीदृष्टि और अग्निदृष्टि के पक्षमें मी ऋक् और सामपदसे अपने वाच्यार्थ में द्रष्टव्यता नामक परम्परासे पृथिवी और अग्नि अर्थ में लक्षणा युक्त है इसलिए ' इयमेवर्गग्निः साम : ' इसप्रकार पृथिवी और अग्निमें ऋक् और सामशब्दका प्रयोग गौण है, इसलिए यहाँ ऋक्की पृथवी दृष्टिसे और सामकी अग्निदृष्टि उपासना है।

इसीप्रकार ' लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत ' यहाँ सप्तमीका तृतीयार्थं करना चाहिए ' लोकात्मनां पञ्चविधं सामोपासीत ' ' लोकदृष्टिसे पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिए। '

* यद्यपि हिकारके उद्देश्यसे पृथिवी दृष्टिका विधान है, इससे उद्देश्यका

' हिंकारः पृथिवी '

निर्देश है, तो भी इसप्रकार प्रथम प्रयोग होना चाहिए, किन्तु यहाँ ' पृथिवी हिंकार ' ऐसा विपर्यय उक्त न्यायके बलसे . ' समस्त सासकी उपासना श्रेष्ठ है अथवा उत्कर्ष दृष्टिसे निकृष्ट

उपास्य है ' व्यत्यय ग्राह्य है | अतः पृथिवी आदि दृष्टि हिंकार आदिमें करनी चाहिए। इससे यह सिद्ध हुआ कि अङ्ग ( सिद्धरूप ) आदित्य आदि दृष्टि से अङ्गभूत उद्गीथ आदि उपास्य हैं।। ६

आसीनाधिकरणम्

4.1.7 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र ७

सूत्र ४.१.७

आसीनः संभवात् ॥ ४.१.७ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 842

पदच्छेद — आसीनः 1 संभवात्

सूत्रार्थ — - ( आसीनः ) बैठकर ही उपासना करनी चाहिए, ( संभवात् ) क्योंकि इसप्रकार उसका संभव हैं।

शाङ्करभाष्य

कर्माङ्गसंबद्धेषु तावत् उपासनेषु कर्मतन्त्रत्वात् न आसनादिचिन्ता नापि सम्यग्दर्शने वस्तुतन्त्रत्वाद्विज्ञानस्य इतरेषु तु उपासनेषु किम् अनियमेन तिष्ठन् आसीनः शयानो वा प्रवर्तेत उत नियमेन आसीन एवेति चिन्तयति। तत्र मानसत्वावदुपासनस्य अनियमः शरीरस्थितेरित्येवं प्राप्ते ब्रवीति आसीन एवोपासीतेति कुतः संभवात्। उपासनं नाम समानप्रत्ययप्रवाहकरणम् न च तत् गच्छतो धावतो वा संभवति गत्यादीनां चित्तविक्षेपकरत्वात् तिष्ठतोऽपि देहधारणे व्यापृतं मनो न सूक्ष्मवस्तुनिरीक्षणक्षमं भवति शयानस्यापि अकस्मादेव निद्रया अभिभूयते आसीनस्य तु एवंजातीयको भूयान्दोषः सुपरिहर इति संभवति तस्योपासनम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — कर्माङ्गों के साथ सम्बद्ध उपासनाएँ कर्मके अधीन हैं, अतः उनमें आंसन आदिका विचार नहीं है। इसीप्रकार सम्यग्दर्शनमें भी यह विचार नहीं है, क्योंकि ' ज्ञान वस्तुके अधीन है। परन्तु अन्य उपासनाओंमें क्या अनियमसे खड़ा होकर, बैठकर अथवा सोता हुआ प्रवृत्त होता

है अथवा नियमसे

6 बैठकर ही, ऐसा विचार करते हैं। परन्तु उसमें उपासना के मानसिक होने से शरीर

स्थितिका अनियम दोषोंका सुपरिहार हो जाता है, इसलिए उसकी उपासना संभव है।। ७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वं अधिकरणमें आसन नियमको अपेक्षा रहित अङ्गाश्रित, उपासनाओंका अनुष्ठान प्रकार O कहा गया है। वैसे अङ्ग अनाश्रित उपासनाओंमें भी अनियम होना चाहिए। इसप्रकार दृष्टान्त संगति से ' तत्र ' आदि से पूर्वपक्ष है || ७ ||

4.1.8 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र ८

सूत्र ४.१.८

ध्यानाच् च ॥ ४.१.८ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 843

पदच्छेद — ध्यानात् च

सूत्रार्थ — और उपासना ध्यानरूप होनेसे बैठकर ही करनी चाहिए।

शाङ्करभाष्य

अपि च ध्यायत्यर्थ एषः यत्समानप्रत्ययप्रवाहकरणम् ध्यायतिश्च प्रशिथिलाङ्गचेष्टेषु प्रतिष्ठितदृष्टिषु एकविषयाक्षिप्तचित्तेषु उपचर्यमाणो दृश्यते ध्यायति बकः ध्यायति प्रोषितबन्धुरिति। आसीनश्च अनायासो भवति तस्मादपि आसीनकर्मोपासनम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — जो एक समान वृत्तिका ही प्रवाह करना है वही ' ध्यायति ' ( ध्ये धातु ) का अर्थ है। और ' ध्यायति ' शब्द प्रशिथिल अङ्ग चेष्टावालों, प्रतिष्ठित दृष्टिवालों और एक विषयमें आक्षिप्त चित्तवालोंमें उपचरित होता हुआ देखा जाता है। जैसे कि बगुला ध्यान करता है, परदेशमें गये हुए बन्धुका वह मित्र ध्यान करता है। बैठा हुआ पुरुष आयास रहित होता है। इससे भी उपासना बैठे हुए पुरुषका कर्म है।। ८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * तैलधाराके समान विजातीय प्रवाहसे रहित एकाकार चित्तकी अवस्थाको ध्यान कहा जाता

P है। इसप्रकार बाह्य हस्त, पाद आदि अङ्गोंकी चेष्टासे रहित एक विषयमें ही स्थिर चित्तवालेमें ' ध्यायति ' शब्दका प्रयोग होता है। अता उपासना मानसिक कर्म होनेसे बैठ कर ही करनी चाहिए॥ ८

4.1.9 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र ९

सूत्र ४.१.९

अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ४.१.९ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 843

पदच्छेद — अचलत्वम् , च , अपेक्ष्य । ( अपेक्ष्य ) अपेक्षाकर ध्यान शब्द उपचरित होता है । १०

सूत्रार्थ — ( अचलत्वं च ) और ' ध्यायतीव पृथिवी ' इत्यादिमें पृथिवी आदिकी अचलताकी

शाङ्करभाष्य

अपि च ध्यायतीव पृथिवी इत्यत्र पृथिव्यादिषु अचलत्वमेवापेक्ष्य ध्यायतिवादो भवति तच्च लिङ्गम् उपासनस्य आसीनकर्मत्वे।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और ' ध्यायतीव पृथिवी ' ( पृथिवी मानो ध्यान करती है ) यहाँपर पृथिवी आदिमें अचलताकी अपेक्षाकर ' ध्यायति ' शब्दका प्रयोग होता है। वह उपासना बैठे हुए का कर्म है इसमें लिङ्ग है || ९ ||

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.१.११ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

4.1.10 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १०

सूत्र ४.१.१०

स्मरन्ति च ॥ ४.१.१० ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१०ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 843

पदच्छेद — स्मरन्ति 9 च

सूत्रार्थ — और ' शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य ' इसप्रकार शिष्टपुरुष आसनका उपासना के लिए स्मृति में प्रतिपादन करते हैं। है 1 | सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - बैठकर ही उपासना करनी चाहिए, किससे? इससे कि इसप्रकार संभव है। एक प्रकारकी वृत्तिका प्रवाह करना उपासना है। उसका चलते अर्थवा दौड़ते हुए पुरुष में संभव नहीं है, क्योंकि गति आदि चित्तके विक्षेप करनेवाले हैं। खड़े होनेवाले पुरुषका देहधारणमें व्यापृत हुआ मन सूक्ष्म वस्तुके निरीक्षण करनेमें समर्थ नहीं होता। शयन किये हुए का मन भी अकस्मात् ही निद्रासे अभिभूत हो जाता है। किन्तु बैठे हुए के इस प्रकारके बहुत - से

शाङ्करभाष्य

स्मरन्त्यपि च शिष्टा उपासनाङ्गत्वेन आसनम् शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः इत्यादिना। अत एव पद्मकादीनामासनविशेषाणामुपदेशो योगशास्त्रे।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' शुचौ देशे ० ' ( पवित्र देशमें अपना स्थिर आसन स्थापित कर ) इत्यादि स्मृति वचनसे शिष्ट पुरुष उपासनाके अङ्गरूपसे आसनका प्रतिपादन करते हैं। अतएव पद्म आदि आसनविशेषोंका योगशास्त्रमें उपदेश है।। १०

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.१.११ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

एकाग्रताधिकरणम्

4.1.11 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र ११

सूत्र ४.१.११

यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ४.१.११ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.११ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 844

पदच्छेद — यत्र , एकाग्रता , तत्र , अविशेषात्

सूत्रार्थ — ( यत्र ) जिस देश और कालमें ( एकाग्रता ) मनकी एकाग्रता - स्थिरता हो ( तत्र ) उसी देश आदिमें उपासना करनी चाहिए, ( अविशेषात् ) क्योंकि श्रुतिमें देश विशेषका श्रवण नहीं है।

शाङ्करभाष्य

दिग्देशकालेषु संशयः किमस्ति कश्चिन्नियमः नास्ति वेति। प्रायेण वैदिकेष्वारम्भेषु दिगादिनियमदर्शनात् स्यादिहापि कश्चिन्नियम इति यस्य मतिः तं प्रत्याह दिग्देशकालेषु अर्थलक्षण एव नियमः यत्रैव अस्य दिशि देशे काले वा मनसः सौकर्येणैकाग्रता भवति तत्रैवोपासीत प्राचीदिक्पूर्वाह्णप्राचीनप्रवणादिवत् विशेषाश्रवणात् एकाग्रताया इष्टायाः सर्वत्राविशेषात्। ननु विशेषमपि केचिदामनन्ति समे शुचौ शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् इति यथेति उच्यते सत्यमस्ति एवंजातीयको नियमः सति त्वेतस्मिन् तद्गतेषु विशेषेष्वनियम इति सुहृद्भूत्वा आचार्य आचष्टे। मनोनुकूले इति चैषा श्रुतिः यत्रैकाग्रता तत्रैवइत्येतदेव दर्शयति।।

(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ४.१.१२ के अनुवादके साथ है।)

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — :

* मनकी एकाग्रतामें दिशा आदि नियमका विचार किया जाता है। पूर्वपक्षी - नियम होना चाहिए, क्योंकि ' ब्रह्मयज्ञेन यक्ष्माणः प्राच्यां दिशि ' ( पूर्वदिशा में ब्रह्मयज्ञ करे ) ' प्राचीन प्रवणे बैश्वदेवेन यजेत ' ( पूर्वं दिशामें क्रमशः निम्न स्थलमें वैश्वदेव यज्ञ करे ) ' अथ यदपराह्न पिण्डपितृयज्ञेन चरन्ति ' ( ' अपराह्नमें पिण्डपितृयज्ञ करें ) इन श्रुतियोंमें जैसे क्रमशः ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव और पिण्डपितृयज्ञमें पूर्व दिशा, निम्नदेश और अपराह्न कालका विशेषरूपसे नियम देखा जाता है, वैसे इन उपासनाओंमें भी पूर्वदिशा, तीर्थं आदि देश, प्रदोष आदि कालका नियम होना चाहिए। सिद्धान्ती - ऐसा नियम नहीं है, क्योंकि यहाँ मनकी एकाग्रता ही प्रयोजन है॥ ११

आ प्रायणाधिकरणम्

4.1.12 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १२

सूत्र ४.१.१२

आप्रयाणात् तत्रापि हि दृष्टम् ॥ ४.१.१२ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१२ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 845

पदच्छेद — आ , प्रायणात् , तत्र , अपि , हि , दृष्टम्

सूत्रार्थ — ( आप्रायणात् ) मरणपर्यन्त प्रत्यय - उपासनाकी आवृत्ति करनी चाहिए, ( हि ) क्योंकि ( तत्रापि ) मरणकालमें भी ' स यावत्क्रतु ' इत्यादि श्रुति में भी ( दृष्टम् ) ऐसा ही देखा गया है।

शाङ्करभाष्य

आवृत्तिः सर्वोपासनेष्वादर्तव्येति स्थितमाद्येऽधिकरणे तत्र यानि तावत् सम्यग्दर्शनार्थान्युपासनानि तानि अवघातादिवत् कार्यपर्यवसानानीति ज्ञातमेव एषामावृत्तिंपरिमाणम् न हि सम्यग्दर्शने कार्ये निष्पन्ने यत्नान्तरं किंचिच्छासितुं शक्यम् अनियोज्यब्रह्मात्मत्वप्रतिपत्तेः शास्त्रस्याविषयत्वात्। यानि पुनः अभ्युदयफलानि तेष्वेषा चिन्ता किं कियन्तंचित्कालं प्रत्ययमावर्त्य उपरमेत् उत यावज्जीवमावर्तयेदिति।

किं तावत्प्राप्तम् कियन्तंचित्कालं प्रत्ययमभ्यस्य उत्सृजेत् आवृत्तिविशिष्टस्योपासनशब्दार्थस्य कृतत्वादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः आ प्रायणादेव आवर्तयेत्प्रत्ययम् अन्त्यप्रत्ययवशाददृष्टफलप्राप्तेः कर्माण्यपि हि जन्मान्तरोपभोग्यं फलमारभमाणानि तदनुरूपं भावनाविज्ञानं प्रायणकाले आक्षिपन्ति सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति इति चैवमादिश्रुतिभ्यः तृणजलूकानिदर्शनाच्च प्रत्ययास्त्वेते स्वरूपानुवृत्तिं मुक्त्वा किमन्यत् प्रायणकालभावि भावनाविज्ञानमपेक्षेरन्।

तस्मात् ये प्रतिपत्तव्यफलभावनात्मकाः प्रत्ययाः तेषु आ प्रायणात् आवृत्तिः। तथा च श्रुतिः स यावत्क्रतुरयमस्माल्लोकात्प्रैति इति प्रायणकालेऽपि प्रत्ययानुवृत्तिं दर्शयति। स्मृतिरपि यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेबरम्। तं तमेवैति कौन्तय सदा तद्भावभावितः इति प्रयाणकाले मनसाचलेन इति च।

सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येत इति च मरणवेलायामपि कर्तव्यशेषं श्रावयति।।आवृत्तिः सर्वोपासनेष्वादर्तव्येति स्थितमाद्येऽधिकरणे तत्र यानि तावत् सम्यग्दर्शनार्थान्युपासनानि तानि अवघातादिवत् कार्यपर्यवसानानीति ज्ञातमेव एषामावृत्तिंपरिमाणम् न हि सम्यग्दर्शने कार्ये निष्पन्ने यत्नान्तरं किंचिच्छासितुं शक्यम् अनियोज्यब्रह्मात्मत्वप्रतिपत्तेः शास्त्रस्याविषयत्वात्। यानि पुनः अभ्युदयफलानि तेष्वेषा चिन्ता किं कियन्तंचित्कालं प्रत्ययमावर्त्य उपरमेत् उत यावज्जीवमावर्तयेदिति।

किं तावत्प्राप्तम् कियन्तंचित्कालं प्रत्ययमभ्यस्य उत्सृजेत् आवृत्तिविशिष्टस्योपासनशब्दार्थस्य कृतत्वादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः आ प्रायणादेव आवर्तयेत्प्रत्ययम् अन्त्यप्रत्ययवशाददृष्टफलप्राप्तेः कर्माण्यपि हि जन्मान्तरोपभोग्यं फलमारभमाणानि तदनुरूपं भावनाविज्ञानं प्रायणकाले आक्षिपन्ति सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति इति चैवमादिश्रुतिभ्यः तृणजलूकानिदर्शनाच्च प्रत्ययास्त्वेते स्वरूपानुवृत्तिं मुक्त्वा किमन्यत् प्रायणकालभावि भावनाविज्ञानमपेक्षेरन्।

तस्मात् ये प्रतिपत्तव्यफलभावनात्मकाः प्रत्ययाः तेषु आ प्रायणात् आवृत्तिः। तथा च श्रुतिः स यावत्क्रतुरयमस्माल्लोकात्प्रैति इति प्रायणकालेऽपि प्रत्ययानुवृत्तिं दर्शयति। स्मृतिरपि यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेबरम्। तं तमेवैति कौन्तय सदा तद्भावभावितः इति प्रयाणकाले मनसाचलेन इति च। सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येत इति च मरणवेलायामपि कर्तव्यशेषं श्रावयति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — दिशा, देश और काल इनके विषयमें क्या कोई नियम है अथवा नहीं, ऐसा संशय होता है। वैदिक आरम्भों में प्रायः दिशा आदिका नियम देखा जाता है। अतः यहाँ भी कोई नियम हो, ऐसा जिसका विचार हो उसके प्रति कहते हैं - दिशा, देश और कालमें अर्थलक्षण - प्रयोजनात्मक ही नियम है। जिस दिशा, देश अथवा कालमें इस उपासकके मनकी सहजमें एकाग्रता हो वहींपर उपासना करनी चाहिए, क्योंकि पूर्वदिशा, पूर्वाह्न, पूर्वदिशामें निम्नस्थान आदिके समान यहाँ विशेषका श्रवण नहीं है। कारण कि इष्ट एकाग्रता सर्वत्र समान है। परन्तु ' समे शुचौ ० ' ( समतल, पवित्र, सूक्ष्म पाषाण, अग्नि और बालूसे रहित तथा शब्द, जल - पनघट और आश्रय- जनसाधारणके निवास आदिसे भी शून्य, मनके अनुकूल एवं नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाले मच्छक आदिसे वर्जित, गुहा - एकान्त आदि वायुवर्जित स्थानमें बैठकर मनको परमात्मामें नियुक्त करना चाहिए ) इसप्रकार कुछ लोग विशेष भी कहते हैं। जैसे यह देश विशेषका नियम है, वैसे काल विशेषका भी है। इसपर कहते हैं — ठीक, इस प्रकारका नियम है। परन्तु ऐसे नियमके होनेपर भी तद्गत विशेषोंमें नियम नहीं है। इसप्रकार सुहृद् होकर आचार्य कहते हैं। ' मनोऽनुकूले ' यह श्रुति जहां एकाग्रता हो वहाँपर ही यही दिखलाती है। ११

सब उपासनाओंमें आवृत्ति आदरणीय है, ऐसा आद्य अधिकरण में निश्चय किया गया है। उनमें जो तत्त्वज्ञानके लिए उपासनाएँ हैं वे अवघात आदिके समान कार्य पर्यवसायी - कार्यं निष्पत्ति पर्यन्त हैं। उन उपासनाओंकी आवृत्तिका परिमाण ज्ञात है। सम्यग्दर्शनरूप कार्यके निष्पन्न होनेपर किसी अन्य यत्नका शासन- उपदेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि अनियोज्य ब्रह्मात्मत्व प्रतिपत्ति शास्त्रका विषय नहीं है।

परन्तु जो अभ्युदय फलवाली हैं उनमें यह विचार होता है कि कितने समय तक प्रत्ययका आवृत्तिकर उपराम होना चाहिए अथवा जीवन पर्यन्त आवृत्ति होनी चाहिए। तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - कुछ कालतक प्रत्ययकी आवृत्ति कर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि आवृत्ति विशिष्ट उपासना शब्दका अर्थ गतार्थ हो जाता है। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- - मरणपर्यन्त प्रत्ययोंकी आवृत्ति होनी चाहिए, क्योंकि अन्तिम प्रत्यय - वृत्तिके बलसे अदृष्ट फलकी प्राप्ति होती है।

क्योंकि ' सविज्ञानो भवति ० ' ( भावनामय विज्ञानसे - फलके स्फुरणसे युक्त होता है वह विज्ञान सहित फलका ही अनुगमन करता है ) ' यच्चित्तस्तेनैष ० ' ( मरणकालमें जैसा चित्तवाला होता है उसी चित्त - संकल्पसे इन्द्रियोंके साथ मुख्य प्राणवृत्तिको प्राप्त होता है, वह प्राण तेज - उदानसे अनुगृहीत होकर जीवात्मा के साथ संकल्प किये हुएके अनुसार उस लोकको ले जाता है ) इत्यादि श्रुतियोंसे और तृणजलूकाके दृष्टान्तसे यह ज्ञात होता है कि अन्य जन्ममें उपभोगके योग्य फलको उत्पन्न करनेवाले कर्म उसके अनुरूप भावना विज्ञानका मरणकालमें आक्षेप करते हैं।

और ये प्रत्यय तो स्वरूप अनुवृत्तिको छोड़कर मरणकालमें किस अन्य भाविभावना विज्ञानकी अपेक्षा करें? इसलिए प्राप्त करनेयोग्य फलके अनुरूप भावनात्मक जो प्रत्यय है उनकी मरण पर्यन्त आवृत्ति है। और इसप्रकार ‘ स यावत्क्रतु ० ', ( वह जैसे संकल्प विशेषवाला इस शरीररूपी लोकसे . प्रयाण करता है ) . यह श्रुति प्रायणकाल में भी प्रत्ययकी अनुवृत्ति दिखलाती है। और ' यं यं वाऽपि ० ' ( हे कुन्तिपुत्र अर्जुन!

यह मनुष्य अन्तकाल में जिस - जिस भी भावको स्मरण करता हुआ शरीरका त्याग करता हैं, सदा उसी मावसे भावित होकर उस उसको ही प्राप्त होता है ) ' प्रयागकाले ० ' ( मरणकालमें अचल मनसे ) ऐसी स्मृति भी है, और ' सोऽन्त वेलायामेव ' ( वह उपासक अन्त समयमें ' अक्षितमसि, अच्युतमसि, प्राणसंशितमसि ' इन तीन मन्त्रोंको स्मरण करे ) इसप्रकार यह श्रुति मरणकालमें भी कर्तव्यशेषका स्मरण कराती है॥ १२

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपक्षी - जैसे कर्म अदृष्टद्वारा फल विज्ञानमें कारण होते हैं, वैसे, उपासनाएं भी अदृष्ट द्वारा अन्तिम फल विज्ञानमें कारण होंगी? इससे मरणपर्यन्त उनकी आवृत्तिका क्या प्रयोजन हैं? सिद्धान्ती — ये प्रत्यय अपने सजातीय प्रत्ययोंकी अनुवृत्तिको छोड़कर मरणकालमें किसी अन्य विजातीय भावि - भावना विज्ञानका आक्षेप नहीं करेंगे, क्योंकि सजातीय प्रत्ययोंकी धारावाहिक अनुवृत्ति ही तो उपासना है। उन प्रत्ययोंकी स्वरूपतः अनुवृत्ति ही अन्तिम विज्ञान भावना है। कोई अदृष्ट द्वारक अन्य अपेक्षित नहीं है, क्योंकि सभी भाव समान जातीय भावोंकी द्वाररूपसे अपेक्षा नहीं करते हैं। इसलिए उपासना प्रत्यय भी अन्य विजातीय प्रत्ययकी अपेक्षा नहीं करेगा। कर्म तो दृष्टप्रत्यक्ष द्वारा अन्तिम विज्ञानरूप फलमें कारण नहीं हो सकते, इसलिए अगत्या उनका द्वारीभूत अदृष्ट कल्पना करना पड़ता है। इसलिए उपासकको मरणपर्यन्त प्रत्ययोंकी आवृत्ति करनी चाहिए॥ १२

तदधिगमाधिकरणम्

4.1.13 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १३

सूत्र ४.१.१३

तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोर् अश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात् ॥ ४.१.१३ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१३ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 846

पदच्छेद — तदधिगमे , उत्तरपूर्वाधयोः , अश्लेषविनाशी , तद्वयपदेशात्

सूत्रार्थ — ( तदधिगमे ) ब्रह्मज्ञान होनेपर ( उत्तरपूर्वाघयो : ) उत्तर और पूर्व पापोंका ( श्लेषविनाश ) अश्लेष और विनाश होता है, ( तद्व्यपदेशात् ) क्योंकि ' यथा पुष्करपलाश ' इत्यादि श्रुतिमें उसका व्यपदेश है।

शाङ्करभाष्य

गतस्तृतीयशेषः अथेदानीं ब्रह्मविद्याफलं प्रति चिन्ता प्रतायते। ब्रह्माधिगमे सति तद्विपरीतफलं दुरितं क्षीयते न क्षीयते वेति संशयः। किं तावत्प्राप्तम् फलार्थत्वात्कर्मणः फलमदत्त्वा न संभाव्यते क्षयः फलदायिनी हि अस्य शक्तिः श्रुत्या समधिगता यदि तत् अन्तरेणैव फलोपभोगमपवृज्येत श्रुतिः कदर्थिता स्यात् स्मरन्ति च न हि कर्म क्षीयते इति। नन्वेवं सति प्रायश्चित्तोपदेशोऽनर्थकः प्राप्नोति नैष दोषः प्रायश्चित्तानां नैमित्तिकत्वोपपत्तेः गृहदाहेष्ट्यादिवत्।

अपि च प्रायश्चित्तानां दोषसंयोगेन विधानाद्भवेदपि दोषक्षपणार्थता न त्वेवं ब्रह्मविद्यायां विधानमस्ति। नन्वनभ्युपगम्यमाने ब्रह्मविदः कर्मक्षये तत्फलस्यावश्यभोक्तव्यत्वादनिर्मोक्षः स्यात् नेत्युच्यते देशकालनिमित्तापेक्षो मोक्षः कर्मफलवत् भविष्यति। तस्मान्न ब्रह्माधिगमे दुरितनिवृत्तिरित्येवं प्राप्ते ब्रूमः तदधिगमे ब्रह्माधिगमे सति उत्तरपूर्वयोरघयोरश्लेषविनाशौ भवतः उत्तरस्य अश्लेषः पूर्वस्य विनाशः।

कस्मात् तद्व्यपदेशात् तथा हि ब्रह्मविद्याप्रक्रियायां संभाव्यमानसंबन्धस्य आगामिनो दुरितस्यानभिसंबन्धं विदुषो व्यपदिशति यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते इति तथा विनाशमपि पूर्वोपचितस्य दुरितस्य व्यपदिशति तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते इति अयमपरः कर्मक्षयव्यपदेशो भवति भिद्यते हृदयग्रन्धिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इति।

यदुक्तम् अनुपभुक्तफलस्य कर्मणः क्षयकल्पनायां शास्त्रं कदर्थितं स्यादिति नैष दोषः न हि वयं कर्मणः फलदायिनीं शक्तिमवजानीमहे विद्यत एव सा सा तु विद्यादिना कारणान्तरेण प्रतिबध्यत इति वदामः शक्तिसद्भावमात्रे च शास्त्रं व्याप्रियते न प्रतिबन्धाप्रतिबन्धयोरपि। न हि कर्म क्षीयते इत्येतदपि स्मरणमौत्सर्गिकम् न हि भोगादृते कर्म क्षीयते तदर्थत्वादिति इष्यत एव तु प्रायश्चित्तादिना तस्य क्षयः सर्वं पाप्मानं तरति तरति ब्रह्महत्याम् योऽश्वमेधेन यजते य उ चैनमेवं वेद इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः।

यत्तूक्तम् नैमित्तिकानि प्रायश्चित्तानि भविष्यन्तीति तदसत् दोषसंयोगेन चोद्यमानानामेषां दोषनिर्घातफलसंभवे फलान्तरकल्पनानुपपत्तेः।

यत्पुनरेतदुक्तम् न प्रायश्चित्तवत् दोषक्षयोद्देशेन विद्याविधानमस्तीति अत्र ब्रूमः सगुणासु तावद्विद्यासु विद्यत एव विधानम् तासु च वाक्यशेषे ऐश्वर्यप्राप्तिः पापनिवृत्तिश्च विद्यावत उच्यते तयोश्चाविवक्षाकारणं नास्ति इत्यतः पाप्मप्रहाणपूर्वकैश्वर्यप्राप्तिः तासां फलमिति निश्चीयते निर्गुणायां तु विद्यायां यद्यपि विधानं नास्ति तथापि अकर्त्रात्मत्वबोधात्कर्मप्रदाहसिद्धिः। अश्लेष इति च आगामिषु कर्मसु कर्तृत्वमेव न प्रतिपद्यते ब्रह्मविदिति दर्शयति।

अतिक्रान्तेषु तु यद्यपि मिथ्याज्ञानात्कर्तृत्वं प्रतिपेद इव तथापि विद्यासामर्थ्यान्मिथ्याज्ञाननिवृत्तेः तान्यपि प्रविलीयन्त इत्याह विनाश इति। पूर्वसिद्धकर्तृत्वभोक्तृत्वविपरीतं हि त्रिष्वपि कालेष्वकर्तृत्वाभोक्तृत्वस्वरूपं ब्रह्माहमस्मि नेतः पूर्वमपि कर्ता भोक्ता वा अहमासम् नेदानीम् नापि भविष्यत्काले इति ब्रह्मविदवगच्छति एवमेव च मोक्ष उपपद्यते अन्यथा हि अनादिकालप्रवृत्तानां कर्मणां क्षयाभावे मोक्षाभावः स्यात्।

न च देशकालनिमित्तापेक्षो मोक्षः कर्मफलवत् भवितुमर्हति अनित्यत्वप्रसङ्गात् परोक्षत्वानुपपत्तेश्च ज्ञानफलस्य। तस्मात् ब्रह्माधिगमे दुरितक्षय इति स्थितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तृतीय अध्यायका शेष भाग समाप्त हुआ। अब ब्रह्मविद्याके फलका विचार किया जाता है।

७ ब्रह्मज्ञान होनेपर उससे विपरीत ( बन्ध ) फलवाला पाप क्षय होता है अथवा क्षय नहीं होता, ऐसा संशय होता है। तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - कर्म फलार्थक होनेसे फल दिये विना उसका क्षय नहीं हो सकता, क्योंकि फल देनेवाली उसको शक्ति श्रुतिसे समधिगत होती है। यदि कर्म फलोपभोगके विना ही क्षय हो, तो फलबोधक श्रुति बाधित हो जायगी। और ' न ' हि कर्म क्षीयते ' ( कर्म क्षय नहीं होता ) इस प्रकार स्मृतिकार भी कहते हैं। परन्तु ऐसा होनेपर प्रायश्चित्तका उपदेश अनर्थक हो जायगा?

यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रायश्चित्तोंको गृहदाहेष्टि आदि के समान नैमित्तिकत्व उपपन्न होता है। और दोष के संयोगसे प्रायश्चित्तोंका विधान होनेसे दोष नाश प्रयोजनवत्ता उनमें भले हो, परन्तु इसप्रकार ब्रह्मविद्या में विधान नहीं है। परन्तु ब्रह्मज्ञानीके कर्मका क्षय स्वीकार न करनेपर उसका फल अवश्य भोक्तव्य होनेसे मोक्ष नहीं होगा 1 नहीं, ऐसा कहते हैं- देश, काल और निमित्त की अपेक्षा करनेवाला मोक्ष कर्मफल के समान होगा। इससे तो ब्रह्मसाक्षात्कार होनेपर भी पापकी निवृत्ति नहीं होती है।

ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' तदधिगमें ' ब्रह्मज्ञान होनेपर उत्तर और पूर्व पापका अश्लेष और विनाश होता है। उत्तर - देह धारणकर किये जानेवाले पापोंका अश्लेष और पूर्व पापोंका विनाश होता है, किससे? इससे कि उसका व्यपदेश है।

जैसे कि ' यथा पुष्करपलाश ० ' ( जैसे कमलका पत्ता जलसे सम्बन्धित नहीं होता, वैसे ' एवं वित् ' ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा जाननेवाले विद्वान्को पापका सम्बन्ध नहीं होता ) यह श्रुति ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें संभाव्यमान सम्बन्धवाले आगामी पापके सम्बन्ध का अभाव विद्वानके लिए कहती है।

इसी प्रकार ' तद्यथेषीका ० ( जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें प्रक्षिप्त करनेसे तत्काल जल जाता है, इसी प्रकार इस विद्वान्के सत्र पाप दग्ध हो जाते हैं ) यह श्रुति पूर्वोपचित - पूर्व सचित पापका विनाश भी कहती है }। और ' भिद्यते हृदयग्रन्थि ० ' ( उस परावर ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर इस जीवकी हृदय ग्रन्थि टूट जाती है, सम्पूर्ण संशय नष्ट हो जाते हैं और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ) यह दूसरा कर्मक्षयका व्यपदेश है।

और यह जो कहा गया है कि अभुक्त फलवाले कर्मके क्षयको कल्पना होनेपर फल बोधक शास्त्र बाधित होगा। यह दोष नहीं है, क्योंकि हम कर्मकी फल देनेवाली शक्तिको अवहेलना नहीं करते, वह भले विद्यमान हो, परन्तु वह विद्या आदि अन्य कारणसे प्रतिबद्ध होती है, केवल हम ऐसा कहते हैं। कर्ममें फलदायक शक्तिके सद्भावमात्रमें शास्त्रका व्यापार है न कि शक्तिके प्रतिबन्ध और अप्रतिबन्धमें मी।

' न हि कर्म क्षीयते ० ' ( कर्म क्षय नहीं होता ) यह स्मृति भी औत्सर्गिक - सामान्य नियमरूप है, कर्म भोगके लिए है, अतः भोगके विना कर्म क्षय नहीं होता। क्योंकि ' सर्वं पादमानं तरति ' ( सम्पूर्ण पापोंको तैरता है ) ' तरति ब्रह्महत्यां ० ' ( जो अश्वमेध यज्ञ करता है और जो इसे इस प्रकार जानता है वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुति और स्मृतिसे प्रायश्चित्त आदि द्वारा दुरितका क्षय इष्ट ही है 1

। जो यह कहा गया है कि प्रायश्चित्त नैमित्तिक होंगे। वह ठीक नहीं है, क्योंकि दोष के सम्बन्धसे शास्त्र द्वारा विहित इन प्रायश्चित्तों का दोष नाशरूप फलके संभव होनेपर अन्य फलकी कल्पना अनुपपन्न है। और जो पुनः यह कहा गया है कि प्रायश्चित्त के समान दोषक्षयके उद्देश्य से विद्याका विधान नहीं है। उसपर हम कहते हैंसगुण विद्याओंमें तो विधान विद्यमान ही है, क्योंकि उन सगुण विद्याओंके वाक्यशेषमें विद्यावान्की ऐश्वयंप्राप्ति और पापनिवृत्ति कही जाती है।

और उन दोनोंकी अविवक्षाका कारण नहीं है, अत : पापक्षयपूर्वक ऐश्वर्यं प्राप्ति उनका फल है, ऐसा निश्चय किया जाता है। निर्गुणविद्या में तो यद्यपि ' अश्लेषः ' यह शब्द आगामी कर्मोंमें ब्रह्मवित् कर्तृत्वको ही प्राप्त नहीं होता, ऐसा दिखलाता है और अतिक्रान्त- अतीत कर्मोंमें यद्यपि मिथ्याज्ञानसे कर्तृत्वको मानो प्राप्त हुआ - सा है, तो भी ज्ञानकी सामथ्यसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति होनेसे वे अतीत कर्म भी प्रविलीन हो जाते हैं, ऐसा सूत्रस्थ ' विनाश ' शब्दसे कहते हैं।

पूर्वंसिद्ध कर्तृत्व, भोक्तृत्वसे विपरीत, तीनों कालमें भी अकर्तृत्व, अभोक्तृत्व स्वरूप ब्रह्म मैं हूँ, इससे पूर्व भी कर्ता वा भोक्ता मैं नहीं था, अब भी नहीं हूँ, इसी प्रकार भविष्यत् कालमें भी नहीं होऊँगा, इसप्रकार ब्रह्मवित् जानता है, और इसप्रकार मोक्ष उपपन्न होता है। अन्यथा - ब्रह्मज्ञानसे कर्मका क्षय न मानें तो अनादिकालसे प्रवृत्त हुए कर्मोंके क्षयका अभाव होनेसे मोक्षाभाव होगा।

और कर्मफल के समान मोक्ष देश, काल निमित्तकी अपेक्षा करनेवाला नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे कर्म फलके समान मोक्ष में अनित्यत्व प्रसङ्ग आ जायगा। और ज्ञानके फलमें परोक्षत्व अनुपपन्न है। इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मज्ञान होनेपर पापका क्षय होता है।। १३

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व अधिकरणमें जैसे उपासकको मरणपर्यंन्त उपासनाको आवृत्ति कर्तव्य कही गयी है, वैसे ब्रह्मवेत्ताओंके लिए नहीं है। इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगतिसे शङ्का कर कर्मक्षयरूप जीवनमुक्तिको कहते हैं— ज्ञानके साधनोंमें अधिक यत्न करना चाहिए, इसलिए इस फलाध्यायमें अब तक उनका विचार किया गया है।

अब फलाध्यायके उपयुक्त फल सम्बन्धी विचार किया जाता है - ' अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ' ( पुण्य अथवा पापकर्म अवश्य ही भोक्तव्य है ) और ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' ( ब्रह्मवित् समस्त कर्म क्षोण हो जाते हैं ) इस प्रकार शास्त्र द्वारा विरोध उपस्थित होनेपर सन्देह होता है कि ब्रह्मज्ञान होनेपर कर्मका क्षय होता है कि नहीं? पूर्वपक्षी - कर्म फलवाला होता है।

क्योंकि ' मा हिंस्यात्सर्वा भूतानि ' ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि निषेध श्रुतिसे ज्ञात होता है कि पाप कर्ममें फल देनेकी शक्ति है। और ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म ' यह स्मृति वाक्य भी है। अतः कर्म फलोपभोगके विना ज्ञानसे नष्ट नहीं होता . अन्यथा फल श्रुति बाधित होगी। सि०- परन्तु ' ब्रह्महा द्वादशिकवार्षिकं चरेत् ' इत्यादि प्रायश्वित्त विधायक शास्त्र निष्फल होगा?

पू ० - जैसे आहिताग्निद्वारा गृहदाह निमित्तको लेकर आहिताग्नि पुरुष ' अग्नये क्षामवते पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपेत् ' ( क्षामवति अग्निके लिए अष्टकपालवाले पुरोडाशका होम करना चाहिए ) इस प्रकार क्षामवति इष्टिका विधान है, वैसे दोषके निमित्तमात्रसे प्रायश्चित्तका विधान है।

सि ० - तो भी ' दोषवान् प्रायश्चित्तं कुर्यात् ' ( दोष युक्त व्यक्ति प्रायश्चित्त करे ) और ' तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते ' ( जो अश्वमेध याग करता है वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ) इस प्रकार प्रायश्चितसे पापनिवृत्तिके श्रवणसे प्रायश्चित्त कर्मको नैमित्तिक कहना असङ्गत है। पू ० -- ' अपि च ' आदिसे कहते हैं।

* ' न हि क्षीयते कर्म ' यह सामान्य शास्त्र ' सर्व पाप्मानं तरति ० ' ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ० ' इत्यादि विशेष शास्त्र से बाधित हो जाता है। यद्यपि ऐश्वर्यप्राप्ति और पापनिवृत्तिका विधान सगुणविद्या के समान निर्गुणविद्या में दोष निवृत्तिका स्पष्ट विधान नहीं है, तो भी विद्यात्व दोनोंमें समान होने से निर्गुणविद्या में भी पापनिवृत्तिरूप फल मानना युक्त है, क्योंकि कर्तृत्व आदि अभिमान पाप आदि कर्मका कारण है। ब्रह्मज्ञानसे अविद्याकी निवृत्ति होनेपर तत्कृत कर्तृत्व आदिकी निवृत्तिसे तदाश्रित पापकर्मका क्षय भी हो जाता है। इसविषयमें ' ज्ञानिनः सर्वपापानि शीर्यन्ते नात्र संशयः I

। क्रीडन्नपि न लिश्येत पापैर्नानाविधैरपि॥ ' ( ज्ञान से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, इस विषय में संशय नहीं है। ज्ञानी संसारमें क्रीडा करता हुआ भी नानाप्रकारके पापोंसे लिप्त नहीं होता है ) यह स्मृति प्रमाण भी है।

* कर्मोका दृष्ट फल न होनेसे श्रुतिप्रमाणसे अदृष्ट स्वर्ग आदि फल मानना पड़ता है। परन्तु यहाँ तो केवल ब्रह्मात्मत्व ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्तिमात्र होती है, ब्रह्म तो स्वयं सिद्ध है। अतः अपरोक्ष ज्ञानका मोक्षरूप अपरोक्ष फल जब सम्भव है तो अदृष्ट फलकी कल्पना अन्याय है। इसलिए ब्रह्मज्ञान होनेपर पूर्व सश्चित कर्मोंका नाश और आगामी कर्मोंका सम्बन्ध नहीं होता, यह श्रुति और स्मृति सिद्ध है || १३

इतरासंश्लेषाधिकरणम्

4.1.14 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १४

सूत्र ४.१.१४

इतरस्याप्य् एवम् असंश्लेषः पाते तु ॥ ४.१.१४ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१४ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 849

पदच्छेद — इतरस्य , अपि , एवम् , असंश्लेषः , पाते , तु

सूत्रार्थ — ( इतरस्यापि ) ज्ञानवान् के पुण्यका भी ( एवम् ) पापके समान ( असंश्लेषः ) असंश्लेष और विनाश होता है, ( पाते तु ) इसप्रकार ब्रह्मज्ञानसे बन्धके हेतुभूत पुण्य और पापके असम्बन्ध और विनाश सिद्ध होनेसे ब्रह्मवेत्ताका शरीरपात होनेपर ही मोक्ष होता है।

शाङ्करभाष्य

पूर्वस्मिन्नधिकरणे बन्धहेतोरघस्य स्वाभाविकस्य अश्लेषविनाशौ ज्ञाननिमित्तौ शास्त्रव्यपदेशान्निरूपितौ धर्मस्य पुनः शास्त्रीयत्वात् शास्त्रीयेण ज्ञानेन अविरोध इत्याशङ्क्य तन्निराकरणाय पूर्वाधिकरणन्यायातिदेशः क्रियते इतरस्यापि पुण्यस्य कर्मणः एवम् अघवत् असंश्लेषो विनाशश्च ज्ञानवतो भवतः कुतः तस्यापि स्वफलहेतुत्वेन ज्ञानफलप्रतिबन्धित्वप्रसङ्गात् उभे उ हैवैष एते तरति इत्यादिश्रुतिषु च दुष्कृतवत्सुकृतस्यापि प्रणाशव्यपदेशात् अकर्त्रात्मत्वबोधनिमित्तस्य च कर्मक्षयस्य सुकृतदुष्कृतयोस्तुल्यत्वात् क्षीयन्ते चास्य कर्माणि इति च अविशेषश्रुतेः। यत्रापि केवल एव पाप्मशब्दः पठ्यते तत्रापि तेनैव पुण्यमप्याकलितमिति द्रष्टव्यम् ज्ञानापेक्षया निकृष्टफलत्वात्। अस्ति च श्रुतौ पुण्येऽपि पाप्मशब्दः नैनं सेतुमहोरात्रे तरतः इत्यत्र सह दुष्कृतेन सुकृतमप्यनुक्रम्य सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्ते इत्यविशेषेणैव प्रकृते पुण्ये पाप्मशब्दप्रयोगात्। पाते तु इति तुशब्दोऽवधारणार्थः। एवं धर्माधर्मयोर्बन्धहेत्वोः विद्यासामर्थ्यादश्लेषविनाशसिद्धेः अवश्यंभाविनी विदुषः शरीरपाते मुक्तिरित्यवधारयति।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पूर्व अधिकरण में स्वाभाविक बन्धके हेतुभूत पापका ज्ञाननिमित्तक असम्बन्ध और विनाश शास्त्र व्यपदेश से निरूपित किये गये हैं, और धर्म तो शास्त्रीय हैं। अतः उसका शास्त्रीय ज्ञानसे अवरोध है। ऐसी आशङ्का कर उसके निराकरण करनेके लिए पूर्वं अधिकरणके न्यायका अतिदेश किया जाता है। ज्ञानवान् के अन्यका भी - पुण्य कर्मका भी इसप्रकार पापके समान असंश्लेष और विनाश होता है, किससे? इससे कि उसको भी अपने फलके हेतुरूपसे ज्ञानफल में प्रतिबन्धत्वं प्रसङ्ग होगा।

' उभे उ हैवैष ० ' ( यह ब्रह्मवेत्ता पुण्य और पापरूप इन दोनों कर्मोंको तर जाता है ) इत्यादि श्रुतियों में पापके समान पुण्यका भी प्रणाश व्यपदेश है। आत्मा अकर्ता है, इस बोध निमित्तिक कर्मक्षय सुकृत और दुष्कृत दोनोंमें समान है, कारण कि ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ० ' ( इसके कर्म क्षीण होते है ) ऐसी अविशेष श्रुति है। जहाँ केवल ही पाप्म पाप शब्द दिखाई देता है वहाँ भी उसीसे पुण्यका भी ग्रहण होता है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि ज्ञानफलकी अपेक्षासे पुण्य निकृष्ट फलवाला है।

और श्रुतिमें पुण्य में भी पापशब्दका प्रयोग है, ' नैतं सेतुमहोरात्रे ० ' ( इस सेतुरूप आत्माका दिनपुण्य और रात - पाप अतिक्रमण नहीं करते अर्थात् आत्माको परिच्छिन्न नहीं करते ) इसमें दुष्कृतके साथ सुकृतका मी उपक्रमकर ' सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्ते ' ( इस आत्मारूप सेतुसे सब पाप निवृत्त होते हैं ) इसप्रकार अविशेषसे ही प्रकृत पुण्यमें पाप शब्दका प्रयोग है। ' पाते तु ' ' तु ' शब्द अवधारणार्थक है।

इसप्रकार बन्धके हेतुभूत धर्म और अधर्मका विद्याकी सामर्थ्य से असंश्लेष और विनाश सिद्ध होनेसे विद्वान् शरीरपात होनेपर मुक्ति अवश्यंभावी है, ऐसा निश्चय करते हैं॥ १४

(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.१.१५ की दीपिकामें सम्मिलित है।)

अनारब्धाधिकरणम्

4.1.15 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १५

सूत्र ४.१.१५

अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः ॥ ४.१.१५ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१५ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 850

पदच्छेद — अनारब्धकार्ये , एव तु पूर्वे तदवधेः

सूत्रार्थ — ( अनारन्धकार्ये एवं ) अनारब्ध फलवाले ही ( पूर्वे ) पूर्व संचित पुण्य - पापका ही ज्ञान से क्षय होता है, ( तदवस्तु ) क्योंकि ' तस्य तावदेव चिरम् ' इत्यादि श्रुतिसे देहपातरूप अवधि श्रुत है।

शाङ्करभाष्य

पूर्वयोरधिकरणयोर्ज्ञाननिमित्तः सुकृतदुष्कृतयोर्विनाशोऽवधारितः स किमविशेषेण आरब्धकार्ययोरनारब्धकार्ययोश्च भवति उत विशेषेणानारब्धकार्ययोरेवेति विचार्यते। तत्र उभे उ हैवैष एते तरति इत्येवमादिश्रुतिष्वविशेषश्रवणादविशेषेणैव क्षय इत्येवं प्राप्ते प्रत्याह अनारब्धकार्ये एव त्विति। अप्रवृत्तफले एव पूर्वे जन्मान्तरसंचिते अस्मिन्नपि च जन्मनि प्राग्ज्ञानोत्पत्तेः संचिते सुकृतदुष्कृते ज्ञानाधिगमात् क्षीयेते न तु आरब्धकार्ये सामिभुक्तफले याभ्यामेतत् ब्रह्मज्ञानायतनं जन्म निर्मितम्।

कुत एतत् तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये इति शरीरपातावधिकरणात्क्षेमप्राप्तेः इतरथा हि ज्ञानादशेषकर्मक्षये सति स्थितिहेत्वभावात् ज्ञानप्राप्त्यनन्तरमेव क्षेममश्नुवीत तत्र शरीरपातप्रतीक्षां न आचक्षीत।

ननु वस्तुबलेनैव अयमकर्त्रात्मावबोधः कर्माणि क्षपयन् कथं कानिचित्क्षपयेत् कानिचिच्चोपेक्षेत न हि समानेऽग्निबीजसंपर्के केषांचिद्बीजशक्तिः क्षीयते केषांचिन्न क्षीयते इति शक्यमङ्गीकर्तुमिति उच्यते न तावदनाश्रित्य आरब्धकार्यं कर्माशयं ज्ञानोत्पत्तिरुपपद्यते आश्रिते च तस्मिन्कुलालचक्रवत्प्रवृत्तवेगस्य अन्तराले प्रतिबन्धासंभवात् भवति वेगक्षयप्रतिपालनम्।

अकर्त्रात्मबोधोऽपि हि मिथ्याज्ञानबाधनेन कर्माण्युच्छिनत्ति बाधितमपि तु मिथ्याज्ञानं द्विचन्द्रज्ञानवत्संस्कारवशात्कंचित्कालमनुवर्तत एव। अपि च नैवात्र विवदितव्यम् ब्रह्मविदा कंचित्कालं शरीरं ध्रियते न वा ध्रियत इति कथं हि एकस्य स्वहृदयप्रत्ययं ब्रह्मवेदनं देहधारणं च अपरेण प्रतिक्षेप्तुं शक्येत श्रुतिस्मृतिषु च स्थितप्रज्ञलक्षणनिर्देशेन एतदेव निरुच्यते। तस्मादनारब्धकार्ययोरेव सुकृतदुष्कृतयोर्विद्यासामर्थ्यात्क्षय इति निर्णयः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — गत दो अधिकरणों में ज्ञानसे सुकृत और दुष्कृतका विनाश निश्चित किया गया है। क्या वह आरब्ध कार्यवाले और अनारब्ध कार्यवाले दोनोंका अविशेषरूसे होता है अथवा अनारब्ध कार्य - वालोंका ही विशेषरूपसे होता है, इसपर विचार किया जाता है।

पूर्वपक्षी— उसमें ' उभे उ हैचैष ० ' तत्र ‘ उभे उ हेंवैष एते तरति ' ( वृ ० ४।४।२२ ) इत्येवमादिश्रुतिष्वविशेषश्रवणादविशेषेणैव ( यह ब्रह्मवेत्ता इन दोनों - पुण्य और पाप कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है ) इत्यादि श्रुतियों में अविशेषरूपसे श्रवण होनेसे अविशेषरूपसे ही क्षय होता है।

सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर निराकरण कहते हैं - ' अनारब्धकार्ये एव तु ' पूर्व जन्ममें संचित और ज्ञानोत्पत्ति से पूर्व तक इस जन्ममें संचित अप्रवृत्त फलवाले सुकृत और दुष्कृत ज्ञानकी प्राप्तिसे क्षय होते हैं, किन्तु आरब्ध कार्य अर्धभुक्त फल वाले जिन पुण्य पापोंसे इस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिका स्थान यह जन्म निर्मित हुआ है, वे क्षय नहीं होते। यह किससे? इससे कि ' तस्य तावदेव चिरं ० ' ( उस विद्वान् के मोक्षमें उतना ही विलम्ब है जब तक कि वह देह बन्धन से मुक्त नहीं होता।

उसके अनन्तर तो वह सत्सम्पन्न हो जाता है ) इसप्रकार देहपात मोक्ष प्राप्तिकी अवधि किया गया है, अन्यथा - ज्ञानसे समस्त कर्मोंके क्षय होनेपर शरीर स्थिति का कारण न होनेसे ज्ञान प्राप्ति के अनन्तर ही विद्वानुको मोक्ष प्राप्त होगा, तो फिर शरीरपातकी प्रतीक्षा नहीं कहनी चाहिए | परन्तु ' आत्मा अकर्ता है ' यह बोध वस्तु सामर्थ्य से ही कर्मोंका क्षय करता हुआ कुछ कर्मोंको क्षय करे और कुछ कर्मोंकी उपेक्षा करे, यह कैसे होगा?

अग्नि और बीजों का संपर्क समान होनेपर कुछकी बीजशक्ति क्षय होती है और कुछकी बीजशक्ति क्षय नहीं होती, ऐसा अङ्गीकार नहीं किया जा सकता? कहते हैं - आरब्ध कार्यवाले कर्माशयका आश्रय किए विना ज्ञानकी उत्पत्ति उपपन्न नहीं होती। उसके आश्रित होनेपर कुलालचक्रके समान प्रवृत्त वेग वालेकें मध्यमें प्रतिबन्धके सम्भव न होनेसे वेग क्षयकी प्रतीक्षा होती है। अकर्तृ आत्मबोध भी मिथ्याज्ञानके बाधसे कर्मोंका उच्छेद करता है।

बाधित हुआ भी मिथ्याज्ञान दो चन्द्रज्ञानके समान संस्कारके बलसे कुछ समय तक अनुवर्तित होता ही है। और इस विषयमें विवाद नहीं करना चाहिए कि ब्रह्मज्ञानी कितने समय तक शरीर धारण करता है अथवा नहीं धारण करता है। एक ही पुरुषका स्वहृदय स्वसंवेद्य प्रत्यय - ब्रह्मज्ञान और देह धारण उसपर अन्य पुरुषद्वारा आक्षेप कैसे किया जा सकता है? अर्थात् नहीं किया जा सकता है। श्रुति और स्मृति में स्थितप्रज्ञ के लक्षणके उपदेशसे यही कहा जाता है।

इसलिए अनारब्ध कार्यवाले सुकृत और दुष्कृतका ही विद्याकी सामर्थ्य से क्षय होता है, ऐसा निर्णय है॥ १५

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * तत्त्वज्ञानसे पापकी निवृत्ति कहकर अब पुण्यकी निवृत्ति में ' इतरस्याप्येवम् ' इत्यादिसे अतिदेश करते हैं। जैसें याग आदि अदृष्टद्वारा पापका क्षय करते हैं, वैसे ब्रह्मविद्या नहीं करता, किन्तु दृष्टभोक्तृत्व आदिकी निवृत्ति करती है। इसलिए विद्याकी सामर्थ्य से ब्रह्मज्ञानीके जैसे पापका असंश्लेष और विनाश होता है, वैसे ही पूर्व संचित पुण्यका विनाश और आगामी पुण्यका असंश्लेष होता है | १४ |

* पूर्वं अधिकरणोंमें ज्ञानसे अशेष कर्मोंका क्षय और असंश्लेष निश्चित किया गया है। परन्तु ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ० ' यह श्रुति ज्ञानी के अशेष कर्मोंका क्षय कहती है और ' तस्य तावदेव चिरं ० ' यह श्रुति मोक्ष के लिए शरीरपातकी प्रतीक्षा कहती है, इससे यह प्रतीत होता है कि कुछ अवशेष कर्म हैं जिनका ज्ञानसे भी नाथ नहीं होता। इस संदिग्ध विषयको ' अनारब्धकार्ये ' इत्यादि से स्पष्ट करते हैं | ‘ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' यह उत्सर्ग श्रुति है, क्योंकि ' तस्य तावदेव चिरम् ' यह अपवाद श्रुति विद्यमान है | इससे ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' इस श्रुतिका प्रारब्ध कर्मोंको छोड़कर शेष कर्मोंके क्षयमें तात्पर्यं समझना चाहिए। ऐसा माननेसे दोनों श्रुतियोंका समन्वय होता है।

* यद्यपि अद्वैतात्मज्ञान अनादि अविद्या और तत्कृत समस्त प्रपञ्चका विरोधी होनेसे तन्मध्यवर्ती अशेष कर्मोंका भी विरोधी है, तो भी जैसे अनारब्ध कार्यवाले कर्मोंका शीघ्रता से विनाश करता है, वैसे आरब्ध कार्यवाले प्रारब्ध कर्मोंका नहीं। यदि दोनों प्रकारके कर्मोंका ज्ञानद्वारा समानरूपसे विनाश मानें तो हिरण्यगर्भ, याज्ञावल्क्यं, वसिष्ट, व्यास, शुकदेव, उद्दालक आदि जीवन मुक्त महापुरुषोंका जो श्रुति, स्मृति आदिमें गुरु शिष्य आदिरूपसे संवाद प्रसिद्ध है, वह काल्पनिक सिद्ध होगा।

इससे अद्वैत आत्मैकत्व ज्ञानका संप्रदाय भी उच्छिन्न हो जायगा। इत्यादि अनेक आपत्तियाँ प्रसक्त होंगी। इससे भगवद्गीताके दूसरे अध्यायमें विस्तार पूर्वक स्थितप्रज्ञ के लक्षणोंके उपदेशसे यह_ सिद्ध होता है कि ज्ञानीके प्रारब्ध कर्मके होनेपर ही उसकी जीवन्मुक्त अवस्था सिद्ध होती है और मुमुक्षु पुरुषोंको उनके उपदेशोंसे लाभ होता है। यदि यह मानें कि ब्रह्मज्ञानसे मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति - होनेसे अशेष कर्म नष्ट हो जाते हैं, तो उसको ' आश्रिते ' आदिसे कहते हैं।

किञ्च यह भी एक मत है कि आवरण और विक्षेप नामक अविद्याकी दो शक्तियाँ हैं। आवरणशक्ति तो विद्यासे निवृत्त हो जाती है किन्तु विक्षेपशक्ति नहीं। अतः विक्षेपशक्तिसे निर्मित ब्रह्मवेत्ताका शरीर भी विद्यमान रहता है। वह भोगके समाप्त होनेपर नष्ट हो जाती है, अनन्तर ज्ञानीका मोक्ष होता है, क्योंकि वस्तुकी सामर्थ्यं समान होनेपर भी कार्यलिङ्गसे यही सिद्ध होता है कि विद्याकी सामर्थ्य से अनारब्ध कार्यवाले सुकृत और दुष्कृतका ही क्षय होता है॥ १५

अग्निहोत्राद्यधिकरणम्

4.1.16 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १६

सूत्र ४.१.१६

अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ॥ ४.१.१६ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१६ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 852

पदच्छेद — अग्निहोत्रादि , तु , तत्कार्याय , एव तद्दर्शनात्

सूत्रार्थ — ( अग्निहोत्रादि ) अग्निहोत्र आदि नित्य नैमित्तिक कर्म समुदाय तो ( तत्कार्यायैव ) तत्त्वज्ञान साध्य मोक्षरूप कार्यके लिए ही है, ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि ' तमेतं वेदानुवचनेन ० ' इत्यादि श्रुतिमें कर्म आदिमें ज्ञान हेतुता देखी जाती है। ( तु ) शब्द शङ्का निवृत्त्यर्थं है।

शाङ्करभाष्य

पुण्यस्याप्यश्लेषविनाशयोरघन्यायोऽतिदिष्टः सोऽतिदेशः सर्वपुण्यविषय इत्याशङ्क्य प्रतिवक्ति अग्निहोत्रादि त्विति। तुशब्द आशङ्कामपनुदति यन्नित्यं कर्म वैदिकमग्निहोत्रादि तत् तत्कार्यायैव भवति ज्ञानस्य यत्कार्यं तदेव अस्यापि कार्यमित्यर्थः कुतः तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन इत्यादिदर्शनात्। ननु ज्ञानकर्मणोर्विलक्षणकार्यत्वात्कार्यैकत्वानुपपत्तिः नैष दोषः ज्वरमरणकार्ययोरपि दधिविषयोः गुडमन्त्रसंयुक्तयोस्तृप्तिपुष्टिकार्यदर्शनात् तद्वत् कर्मणोऽपि ज्ञानसंयुक्तस्य मोक्षकार्योपपत्तेः। ननु अनारभ्यो मोक्षः कथमस्य कर्मकार्यत्वमुच्यते नैष दोषः आरादुपकारकत्वात्कर्मणः ज्ञानस्यैव हि प्रापकं सत् कर्म प्रणाड्या मोक्षकारणमित्युपचर्यते अत एव च अतिक्रान्तविषयमेतत्कार्यैकत्वाभिधानम्। न हि ब्रह्मविद आगाम्यग्निहोत्रादि संभवति अनियोज्यब्रह्मात्मत्वप्रतिपत्तेः शास्त्रस्याविषयत्वात्। सगुणासु तु विद्यासु कर्तृत्वानतिवृत्तेः संभवति आगाम्यपि अग्निहोत्रादि। तस्यापि निरभिसंधिनः कार्यान्तराभावाद्विद्यासंगत्युपपत्तिः।। किंविषयं पुनरिदम् अश्लेषविनाशवचनम् किंविषयं वा अदो विनियोगवचनम् एकेषां शाखिनाम् तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् इति अत उत्तरं पठति

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — goat मी अश्लेष और विनाशमें पाप न्यायका अतिदेश किया गया है। क्या वह अतिदेश सर्व पुण्यविषयक है? ऐसी आशङ्का कर उसका निराकरण कहते हैं- ' अग्निहोत्रादि तु ' ' तु ' शब्द आशङ्काका परिहार करता है। जो वैदिक अग्निहोत्रादि नित्य कर्म हैं वे तत् तत् कार्य के लिए ही होते हैं, जो ज्ञानका कार्य है वही इसका भी कार्य है, ऐसा अर्थ है। किससे? इससे कि ' तमेतं वेदानुवच० ' ( ब्राह्मण उस आत्माको वेदाध्ययनसे, यज्ञसे, और दानसे जानने की इच्छा करें ) इत्यादि देखा जाता है।

परन्तु ज्ञान और कर्म विलक्षण कार्यंवाले होने से उनमें कार्यैकत्व उपपत्ति नहीं होती। यह दोष नहीं है, क्योंकि ज्वर और मृत्यु कार्यवाले दधि और विषमें भी गुड़ और मन्त्र संयुक्त होनेपर तृप्ति और पुष्टिरूप कार्यं देखे जाते हैं, वैसे ज्ञान संयुक्त कर्मका भी मोक्ष कार्य हो सकता है। परन्तु मोक्ष तो अनारभ्य है, उसको कर्मका कार्यं कैसे कहा जाता है? यह दोष नहीं है, क्योंकि कर्म ज्ञानका आराद ( दूरसे ) उपकारक है।

ज्ञानका ही प्रापक होता हुआ कर्म परम्परा - अन्तःकरण शुद्धिद्वारा मोक्षका कारण है, ऐसा उपचार किया जाता है। अतएव यह कार्यैकत्वका अभिधान अतिक्रान्त ( ज्ञानसे पूर्व ) कर्म विषयक है। कारण कि ब्रह्मवित् के लिए आगामी अग्निहोत्रादि संभव नहीं हैं। क्योंकि अनियोज्य ब्रह्मात्मत्व ज्ञान शास्त्रका विषय नहीं है। सगुणविद्याओंमें तो कर्तृत्वकी अनिवृत्ति होनेसे आगामी अग्निहोत्र आदि कर्म हो सकते हैं। फल अभिलाषा रहित उस कर्मको भी अन्य कार्यके न होनेसे विद्याकी संगति ( सम्बन्ध ) उपपन्न होती है।।

१६

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पुण्यका भी पापके समान अश्लेष और विनाश कहा गया। क्या वह सब पुण्य विषयक है अथवा नहीं? ऐसा सन्देह होता है। परन्तु पुण्यका अश्लेष और विनाश होनेसे ज्ञानीको वेदविहित अग्निहोत्र आदि नित्य कर्म भी नहीं करने चाहिएँ, क्योंकि उनका भी पुण्यके समान विद्यासे नाश होगा, इसलिए ' प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ' ( अङ्गों को पङ्क लगाकर उसे धोनेकी अपेक्षा उसका दूरसे अस्पर्श ही श्रेष्ठ है ) इसप्रकार पङ्कप्रक्षालन न्यायसे अग्निहोत्र आदि नित्य कर्म न करना श्रेष्ठ है। पूर्वपक्ष में प्रक्षालन न्यायसे ज्ञानके लिए नित्य कर्मोंका अनुष्ठान असिद्ध है और सिद्धान्तमें ज्ञानोत्पत्ति के लिए नित्यकर्म अनुष्ठेय हैं॥ १६

4.1.17 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १७

सूत्र ४.१.१७

अतोऽन्यापि ह्य् एकेषाम् उभयोः ॥ ४.१.१७ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१७ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 853

पदच्छेद — अतः , अन्या , अपि , हि , एकेषाम् उभयोः

सूत्रार्थ — ( एकेषाम् ) कुछ शाखावालोंके मतमें ( अतः ) अग्निहोत्र आदि नित्य कर्मसे ( अन्या ) स्वर्गादिकी साघनीभूत क्रिया अन्य है। ( उभयोरपि ) वह क्रिया जैमिनि और बादरायण दोनों को भी सम्मत है।

शाङ्करभाष्य

अतोऽग्निहोत्रादेर्नित्यात्कर्मणः अन्यापि ह्यस्ति साधुकृत्या या फलमभिसंधाय क्रियते तस्या एष विनियोग उक्तः एकेषां शाखिनाम् सुहृदः साधुकृत्यामुपयन्ति इति। तस्या एव च इदम् अघवदश्लेषविनाशनिरूपणम् इतरस्याप्येवमसंश्लेष इति। तथाजातीयकस्य काम्यस्य कर्मणो विद्यां प्रत्यनुपकारकत्वे संप्रतिपत्तिः उभयोरपि जैमिनिबादरायणयोराचार्ययोः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तो फिर यह अश्लेष और विनाश वचन किं विषयक हैं, और इस प्रकार इन शाखावालोंका ' तस्य पुत्रा ० ' ( उसके ' पुत्र दाय धन प्राप्त करते हैं, मित्र साधुकर्म और शत्रु पापकर्म प्राप्त करते हैं ) यह विनियोग वचन किसके लिए है? इसके लिए उत्तर कहते हैं-

अत : - अग्निहोत्रादि नित्यकर्मसे अन्य भी साधुकृत्य है, जो फलके उद्देश्यसे किया जाता है। उसका कुछ शाखावालोंके मत में ' सुहृदः साधुकृत्यामुपयन्ति ' ( मित्र इसके साधुकृत्यको प्राप्त होते हैं ) इस प्रकार यह विनियोग कहा गया है। उसका ही पापके समान यह अश्लेष और विनाश है, ऐसा ' इतरस्याप्येवमश्लेष ' इस सूत्र में निरूपण है। इस प्रकारके काम्य कर्मके विद्याके प्रति अनुपकारकत्व होने में जैमिनि और बादरायण दोनों आचार्यों को भी सम्मति है।। १७

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यह अश्लेष और विनाश वचन काम्य कर्मों के विषयमें है। काण्वशाखावालोंका ' सुहृदः साधुकृत्यामुपयन्ति ' यह विनियोगवचन भी काम्यकर्म विषयक है, क्योंकि ज्योतिष्टोमादि काम्य कर्म विद्या उपकारक नहीं होते, अतः काम्य कर्म विषयक ही अश्लेष, विनाश और विनियोग ये दोनों वचन समझने चाहिए॥ १७

विद्याज्ञानसाधनाधिकरणम्

4.1.18 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १८

सूत्र ४.१.१८

यद् एव विद्ययेति हि ॥ ४.१.१८ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१८ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 854

पदच्छेद — यद् एव , विद्यया इति " हि

सूत्रार्थ — ( विद्यया ) विद्या संयुक्त ( यद् ) अग्निहोत्रादि नित्य कर्म और केवल अग्निहोत्रादि नित्यकर्म दोनों इस जन्ममें ब्रह्मज्ञान के साधन हो सकते हैं, ( एव ही ) क्योंकि ' यदेव विद्यया ' ऐसी श्रुति है।

शाङ्करभाष्य

समधिगतमेतदनन्तराधिकरणे नित्यमग्निहोत्रादिकं कर्म मुमुक्षुणा मोक्षप्रयोजनोद्देशेन कृतमुपात्तदुरितक्षयहेतुद्वारेण सत्त्वशुद्धिकारणतां प्रतिपद्यमानं मोक्षप्रयोजनब्रह्माधिगमनिमित्तत्वेन ब्रह्मविद्यया सह एककार्यं भवतीति तत्र अग्निहोत्रादि कर्माङ्गव्यपाश्रयविद्यासंयुक्तं केवलं चास्ति य एवं विद्वान्यजति य एवं विद्वाञ्जुहोति य एवं विद्वाञ्शंसति य एवं विद्वान्गायति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद इत्यादिवचनेभ्यो विद्यासंयुक्तमस्ति केवलमप्यस्ति।

तत्रेदं विचार्यते किं विद्यासंयुक्तमेव अग्निहोत्रादिकं कर्म मुमुक्षोर्विद्याहेतुत्वेन तया सह एककार्यत्वं प्रतिपद्यते न केवलम् उत विद्यासंयुक्तं केवलं च अविशेषेणेति। कुतः संशयः तमेतमात्मानं यज्ञेन विविदिषन्ति इति यज्ञादीनामविशेषेण आत्मवेदनाङ्गत्वेन श्रवणात् विद्यासंयुक्तस्य च अग्निहोत्रादेर्विशिष्टत्वावगमात्।

किं तावत्प्राप्तम् विद्यासंयुक्तमेव कर्म अग्निहोत्रादि आत्मविद्याशेषत्वं प्रतिपद्यते न विद्याहीनम् विद्योपेतस्य विशिष्टत्वावगमाद्विद्याविहीनात् यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्येवं विद्वान् इत्यादिश्रुतिभ्यः बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय इत्यादिस्मृतिभ्यश्च इत्येवं प्राप्ते प्रतिपाद्यते यदेव विद्ययेति हि।

सत्यमेतत् विद्यासंयुक्तं कर्म अग्निहोत्रादिकं विद्याविहीनात्कर्मणोऽग्निहोत्राद्विशिष्टम् विद्वानिव ब्राह्मणो विद्याविहीनाद्ब्राह्मणात् तथापि नात्यन्तमनपेक्षं विद्याविहीनं कर्म अग्निहोत्रादिकम् कस्मात् तमेतमात्मानं यज्ञेन विविदिषन्ति इत्यविशेषेण अग्निहोत्रादेर्विद्याहेतुत्वेन श्रुतत्वात्।

ननु विद्यासंयुक्तस्य अग्निहोत्रादेर्विद्याविहीनाद्विशिष्टत्वावगमात् विद्याविहीनमग्निहोत्रादि आत्मविद्याहेतुत्वेनानपेक्षमेवेति युक्तम् नैतदेवम् विद्यासहायस्याग्निहोत्रादेर्विद्यानिमित्तेन सामर्थ्यातिशयेन योगात् आत्मज्ञानं प्रति कश्चित्कारणत्वातिशयो भविष्यति न तथा विद्याविहीनस्य इति युक्तं कल्पयितुम् न तु यज्ञेन विविदिषन्ति इत्यत्राविशेषेणात्मज्ञानाङ्गत्वेन श्रुतस्याग्निहोत्रादेरनङ्गत्वं शक्यमभ्युपगन्तुम् तथा हि श्रुतिः यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति इति विद्यासंयुक्तस्य कर्मणोऽग्निहोत्रादेः वीर्यवत्तरत्वाभिधानेन स्वकार्यं प्रति कंचिदतिशयं ब्रुवाणा विद्याविहीनस्य तस्यैव तत्प्रयोजनं प्रति वीर्यवत्त्वं दर्शयति कर्मणश्च वीर्यवत्त्वं तत् यत्स्वप्रयोजनसाधनसहत्वम्।

तस्माद्विद्यासंयुक्तं नित्यमग्निहोत्रादि विद्याविहीनं च उभयमपि मुमुक्षुणा मोक्षप्रयोजनोद्देशेन इह जन्मनि जन्मान्तरे च प्राग्ज्ञानोत्पत्तेः कृतं यत तद्यथासामर्थ्यं ब्रह्माधिगमप्रतिबन्धकारणोपात्तदुरितक्षयहेतुत्वद्वारेण ब्रह्माधिगमकारणत्वं प्रतिपद्यमानं श्रवणमननश्रद्धातात्पर्याद्यन्तरङ्गकारणापेक्षं ब्रह्मविद्यया सह एककार्यं भवतीति स्थितम्।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — मुमुक्षु द्वारा मोक्षरूप प्रयोजनके उद्देश्यसे किये गये नित्य अग्निहोत्र आदि कर्म संचित पापक्षय हेतु द्वारा अन्तःकरण शुद्धिकी कारणताको प्राप्त होकर मोक्ष प्रयोजनवाले ब्रह्मज्ञानके निमित्तरूपसे ब्रह्मविद्याके साथ एक कार्यवाले होते हैं, ऐसा गत अधिकरणमें भली - भाँति अधिगत हुआ है।

उसमें अग्निहोत्रादि कर्म अङ्गोंसे सम्बद्ध उपासना संयुक्त हैं और केवल - उपासना असंयुक्त भी हैं— ' य एवं विद्वान्यजति ' ( जो ऐसा जाननेवाला होकर याग करता है, जो ऐसा जाननेवाला होकर होम करता है, जो ऐसा जाननेवाला होकर शंसन करता है, जो ऐसा जाननेवाला होकर उद्गान करता है ) ‘ तस्मादेवं ० ' ( अतः इसप्रकार जाननेवालेको ही ब्रह्मा बनावे, ऐसा न जाननेवालेको नहीं ) ' तेनोमौ कुरुतो ० ' ( जो इस अक्षरको इसप्रकार जानता है और जो नहीं जानता वे दोनों ही उसके द्वारा कर्म करते हैं ) इत्यादि श्रुतिवचनोंसे अग्निहोत्र आदि कर्म विद्या संयुक्त हैं और केवल भी हैं।

उसपर यह विचार किया जाता है कि क्या विद्या संयुक्त ही अग्निहोत्र आदि कर्म मुमुक्षुकी विद्याके हेतुरूपसे उसके साथ एककार्यत्वको प्राप्त होते हैं केवल नहीं अथवा अविशेषसे विद्या संयुक्त और केवल कर्म एक कार्यत्वको प्राप्त होते हैं। ऐसा संशय किससे होता है? इससे कि ' तमेतमात्मानं ० ' ( उस इस उपनिषद्गम्य आत्माको यज्ञसे जाननेकी इच्छा करें ) इसप्रकार यज्ञ आदिका अविशेषरूपसे आत्मज्ञानके अङ्गरूपसे श्रवण है, अतः विद्या संयुक्त अग्निहोत्र आदि में विशिष्टत्व अवगत होता है।

तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - विद्या संयुक्त ही अग्निहोत्र आदि कर्म आत्मविद्या शेषत्वको प्राप्त होते हैं उपासना होन कर्म नहीं। क्योंकि ' यदहरेव जुहोति ० ' ( जो ऐसा जाननेवाला जिस दिन होम करता है उसी दिन मृत्युको जीत लेता है ) इत्यादि श्रुतिसे और ' बुद्धया युक्तो ० ' ( हे पार्थ!

जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तूं कर्मोके बन्धनको भली - भाँति नाश करेगा ) ' दूरेण ह्यवरं ० ' ( इस समत्वरूप बुद्धियोगसे सकाम कर्म अत्यन्त तुच्छ हैं ) इत्यादि स्मृतिसे विद्या युक्त कर्म विद्याहीन कर्म से विशिष्ट अवगत होते हैं। सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन किया जाता है— ' यदेव विद्ययेति हि ' यह ठीक है। विद्या संयुक्त अग्निहोत्र आदि कर्म विद्याहीन अग्निहोत्रादि कर्मोंसे विशिष्ट हैं। जैसे विद्वान् ब्राह्मण विद्याहीन ब्राह्मणसे विशिष्ट है।

तो भी विद्या विहीन अग्निहोत्र आदि कर्म अत्यन्त अनपेक्ष नहीं हैं, किससे? इससे कि ' तमेतमात्मानं यज्ञेन विविदिषन्ति ' इसप्रकार अविशेषसे अग्निहोत्रादि कर्म विद्याके हेतुरूपसे श्रुत हैं। पू ० – परन्तु विद्यासंयुक्त अग्निहोत्रादि कर्मों में विद्याविहोन अग्निहोत्र आदि कर्मोंसे विशिष्ट अवगम होनेसे विद्याविहीन अग्निहोत्रादि कर्म आत्मविद्या के हेतुरूपसे अनपेक्ष ही हैं, यह युक्त है।

सि ० - यह ऐसा नहीं, क्योंकि विद्या सहायवाले अग्निहोत्र आदिमें विद्या निमित्तिक सामर्थ्यं अतिशय के योगसे आत्मज्ञानके प्रति कोई कारणरूपसे अतिशय होगा, विद्याविहीन अग्निहोत्र आदि में ऐसा अतिशय नहीं होगा, ऐसी कल्पना करना युक्त है। परन्तु ' यज्ञेन विविदिषन्ति ' इसमें अविशेषसे आत्मज्ञानके अङ्गरूपसे श्रुत अग्निहोत्र आदिमें अनङ्गत्व स्वीकार नहीं किया जा सकता।

क्योंकि ' यदेव विद्यया ० ' ( जो कर्म विद्यासे, श्रद्धासे और योग युक्त होकर करता है वह वीर्यवत्तर होता है ) यह श्रुति विद्या संयुक्त अग्निहोत्र आदि कर्म अधिक वीर्यमान् हैं, इस कथनसे अपने कार्य प्रति कुछ अतिशय कहती हुई विद्याविहीन उसी कर्मको उस प्रयोजनके प्रति वीर्यवत् दिखलाती है। वही कर्ममें वीर्यवत्त्व है जो अपने प्रयोजनके सिद्ध करनेमें क्षमता हो।

इसलिए विद्या संयुक्त नित्य अग्निहोत्र आदि कर्म और विद्या रहित कर्म दोनों भी मुमुक्षुसे मोक्ष प्रयोजनके उद्देश्यसे इस जन्ममें अथवा जन्मान्तर में ज्ञानोत्पत्तिके पूर्व जो किये गये हैं वे अपनी सामर्थ्यके अनुसार ब्रह्मज्ञानके प्रतिबन्ध कारणरूप से प्राप्त पापक्षयके हेतुरूप द्वारसे ब्रह्मज्ञान के कारणत्वको प्राप्त होकर श्रवण, मनन, श्रद्धा, तात्पर्य आदि अन्तरङ्ग कारणोंकी अपेक्षा से ब्रह्मविद्याके साथ मोक्षरूप एक कार्य वाले होते हैं, यह सिद्ध होता है॥ १८

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्वपक्षमें विद्या संयुक्त अग्निहोत्र आदि नित्यकर्म विद्योत्पत्तिमें हेतु हैं, क्योंकि वे विद्याहीन कर्मोंसे विशिष्ट अवगत होते हैं। सिद्धान्तमें दोनों प्रकारके कर्म विद्योत्पत्ति हेतु हैं।। १८

इतरक्षपणाधिकरणम्

4.1.19 · चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद सूत्र १९

सूत्र ४.१.१९

भोगेन त्व् इतरे क्षपयित्वाथ संपद्यते ॥ ४.१.१९ ॥

चतुर्थ अध्याय प्रथम पाद · सूत्र ४.१.१९ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, सत्यानन्दी दीपिका (चौखम्बा)पृ. 856

पदच्छेद — भोगेन , तु , इतरे , क्षपयित्वा सम्पद्यते

सूत्रार्थ — ( इतरे तु ) आरब्ध पुण्यपापोंका तो ( भोगेन ) भोगसे ( क्षपयित्वा ) नाशकर ( सम्पद्यते ) ब्रह्मको प्राप्त होता है।

शाङ्करभाष्य

अनारब्धकार्ययोः पुण्यपापयोर्विद्यासामर्थ्यात्क्षय उक्तः। इतरे तु आरब्धकार्ये पुण्यपापे उपभोगेन क्षपयित्वा ब्रह्म संपद्यते तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये इति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति इति च एवमादिश्रुतिभ्यः। ननु सत्यपि सम्यग्दर्शने यथा प्राग्देहपाताद्भेददर्शनं द्विचन्द्रदर्शनन्यायेनानुवृत्तम् एवं पश्चादप्युनुवर्तेत न निमित्ताभवात्। उपभोगशेषक्षपणं हि तत्रानुवृत्तिनिमित्तम् न च तादृशमत्र किंचिदस्ति। ननु अपरः कर्माशयोऽभिनवमुपभोगमारप्स्यते न तस्य दग्धबीजत्वात् मिथ्याज्ञानावष्टम्भं हि कर्मान्तरं देहपात उपभोगान्तरमारभेत तच्च मिथ्याज्ञानं सम्यग्ज्ञानेन दग्धम् इत्यतः साध्वेतत् आरब्धकार्यक्षये विदुषः कैवल्यमवश्यं भवतीति।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः।।

भाष्यका हिन्दी अनुवाद — . अनारब्ध कार्यवाले पुण्य और पापका विद्याकी सामथ्यसे क्षय कहा गया है। अन्य तो - आरब्ध कार्यवाले पुण्य - पापका उपभोगसे क्षपणकर ब्रह्मको प्राप्त होता है, क्योंकि ' तस्य तावदेव चिरं ० ' ( उसके लिए मोक्ष होनेमें उतना ही विलम्ब है जब तक कि वह देहबन्धनसे मुक्त नहीं होता। उसके अनन्तर तो वह सत्सम्पन्न - ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ) ' ब्रह्मैव सन् ० ' ( ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं। पू ० – परन्तु सम्यग्दर्शनके होनेपर भी जैसे देहपातके पूर्व भेददर्शन द्विचन्द्रदर्शन न्यायसे अनुवृत्त होता है, वैसे देहपातके पश्चात् भी भेददर्शन अनुवृत्त होना चाहिए? सि ० -- नहीं, क्योंकि उसके कारणका अभाव है। उपभोग शेषका क्षपण ही ब्रह्मज्ञानीके भेददर्शन की अनुवृत्तिमें कारण है | किन्तु देहपात होनेपर ऐसा कोई निमित्त नहीं है। परन्तु दूसरा कर्माशय नवीन उपभोगको आरम्भ करेगा? सि ० – नहीं, क्योंकि उसका बीज दग्ध हो गया है। मिथ्याज्ञानका अवलम्बन करनेवाला

( इस पादमें उत्क्रान्ति और गतिका निरूपण है )

वाक् ) वाणीकी वृत्ति ( मनसि ) मनमें लीन होती है

सूत्रार्थ - ( मनकी वृत्तिके विद्यमान होनेपर वाग्वृत्तिका लय देखा जाता है, ( च ) और

( शब्दात् ) वृत्ति और वृत्तिमानके अभेदकी विवक्षासे यहाँ उपचारसे वाक् शब्दका प्रयोग किया

गया है कि वाक् मनमें लय होती है। कर्मान्तर देहपात होनेपर अन्य उपभोगको आरम्भ करता है। वह मिथ्याज्ञान सम्यग्ज्ञानसे दग्ध हो गया, अतः अन्य - आरब्ध कार्यका क्षय होनेपर विद्वानको अवश्य कैवल्य होता है, यह ठीक है॥ १ ९

सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अनारब्ध कर्म . ब्रह्मविद्याकी सामथ्यसे क्षय होते हैं, यह पूर्व अधिकरणमें कहा गया है। अब इस अधिकरणमें यह विचार किया जाता है कि ब्रह्मवित्के प्रारब्धकर्म क्षय होते हैं कि नहीं? इसप्रकार संदेह कर ' भोगेन वितरे ' इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं। मिथ्याज्ञान ही कर्मोंका बीज है। ' सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ' ( यो ० सू ० २।१३ ) ( कर्मों के बीजभूत अविद्याके होनेपर ही उसके फल जन्म, आयु और मोग होते हैं ) इसलिए अनारब्ध कर्म ब्रह्मविद्याकी सामर्थ्यसे निवृत्त होते हैं और प्रारब्ध कर्म भोगसे क्षय होते हैं। " तस्य तावदेव चिरं ० ' इत्यादि श्रुतिवचनसे सिद्ध होता है कि विद्वान्की देहपातके अनन्तर अवश्य कैवल्य मुक्ति होती है। पूर्वपक्ष में कैवल्य - विदेह मुक्ति असिद्ध हैं, सिद्धान्तमें विदेह - कैवल्यमुक्ति सिद्ध है। इस पादमें साधन अनुष्ठानका क्रम और निर्गुण ब्रह्मविद्याका फल कहा गया है || १ ९ ||

उपसंहार

इन सूत्रों का सार यह है कि ब्रह्म का ज्ञान बौद्धिक समझ से परे है, इसलिए शास्त्र के उपदेशों की पुनरावृत्ति और मन की एकाग्रता अनिवार्य है। यहाँ विभिन्न दृष्टांतों के माध्यम से स्पष्ट किया गया है कि कैसे निरंतर अभ्यास से अज्ञान का नाश होता है और साधक परम सत्य में स्थित हो जाता है। ये सूत्र ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में आने वाली सूक्ष्म बाधाओं को दूर कर आत्म-साक्षात्कार की पूर्णता की ओर ले जाते हैं।

In English

Brahma Sutra: The Necessity of Repeated Study

This commentary on the Brahma Sutra explains why a seeker must repeatedly listen to, reflect upon, and meditate on Vedic teachings rather than doing so just once. It argues that because spiritual realization is a lived experience rather than mere information, constant practice is required to move from general understanding to specific, direct realization of Brahman.

This article answers

  • Brahma sutra 4.1.1 meaning?
  • Why repeat hearing and meditation in vedanta?
  • Necessity of repeated study for self-realization?
  • Difference between one-time instruction and continuous practice in brahma sutra?

प्रामाणिकता

उद्धरण
19
संस्करणसे मिले
19
पाठभेद
0
छोड़े गये
0

मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — ब्रह्मसूत्र।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

मूल ग्रन्थ पढ़ें