व्याख्या · ब्रह्मसूत्र
ब्रह्मसूत्र — चतुर्थ अध्याय, द्वितीय पाद
21 मूल पद्य 20 संस्करणसे मिलाये गये
इन सूत्रों में जीवात्मा की सूक्ष्म अवस्थाओं और उनके ब्रह्म के साथ संबंध का विवेचन किया गया है। यहाँ मन, प्राण और इंद्रियों के माध्यम से आत्मा की सूक्ष्मता को सिद्ध करते हुए अंततः उसे परम तत्व के समीप ले जाने की प्रक्रिया बताई गई है। पाठक को इस क्रम में आत्म-साक्षात्कार के विभिन्न सोपानों और ज्ञान के सूक्ष्म स्तरों का बोध होगा।
वागधिकरणम्
4.2.1 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १
वाङ्मनसि दर्शनाच् छब्दाच् च ॥ ४.२.१ ॥
पदच्छेद — वाक् , मनसि , दर्शनात् , शब्दात् , च । , ( दर्शनात् ) क्योंकि
शाङ्करभाष्य
अस्ति प्रायणविषया श्रुतिः अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् इति। किमिह वाच एव वृत्तिमत्त्या मनसि संपत्तिरुच्यते उत वाग्वृत्तेरिति विशयः। तत्र वागेव तावत् मनसि संपद्यत इति प्राप्तम् तथा हि श्रुतिरनुगृहीता भवति इतरथा लक्षणा स्यात् श्रुतिलक्षणाविशये च श्रुतिर्न्याय्या न लक्षणा तस्मात् वाच एव अयं मनसि प्रलय इति।। एवं प्राप्ते ब्रूमः वाग्वृत्तिर्मनसि संपद्यत इति।
कथं वाग्वृत्तिरिति व्याख्यायते यावता वाङ्मनसि इत्येव आचार्यः पठति सत्यमेतत् पठिष्यति तु परस्तात् अविभागो वचनात् इति तस्मादत्र वृत्त्युपशममात्रं विवक्षतीति गम्यते। तत्त्वप्रलयविवक्षायां तु सर्वत्रैव अविभागसाम्यात् किं परत्रैव विशिंष्यात् अविभागः इति तस्मादत्र वृत्त्युपसंहारविवक्षा। वाग्वृत्तिः पूर्वमुपसंह्रियते मनोवृत्ताववस्थितायामित्यर्थः।
कस्मात् दर्शनात् दृश्यते हि वाग्वृत्तेः पूर्वोपसंहारो मनोवृत्तौ विद्यमानायाम् न तु वाच एव वृत्तिमत्त्या मनस्युपसंहारः केनचिदपि द्रष्टुं शक्यते। ननु श्रुतिसामर्थ्यात् वाच एवायं मनस्यप्ययो युक्त इत्युक्तम् नेत्याह अतत्प्रकृतित्वात् यस्य हि यत उत्पत्तिः तस्य तत्र प्रलयो न्याय्यः मृदीव शरावस्य न च मनसो वागुत्पद्यत इति किंचन प्रमाणमस्ति। वृत्त्युद्भवाभिभवौ तु अप्रकृतिसमाश्रयावपि दृश्येते पार्थिवेभ्यो हि इन्धनेभ्यः तैजसस्याग्नेर्वृत्तिरुद्भवति अप्सु च उपशाम्यति।
कथं तर्हि अस्मिन्पक्षे शब्दः वाङ्मनसि संपद्यते इति अत आह शब्दाच्चेति शब्दोऽप्यस्मिन्पक्षेऽवकल्पते वृत्तिवृत्तिमतोरभेदोपचारादित्यर्थः।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ४.२.२ के अनुवादके साथ है।)
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.२.३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
4.2.2 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २
अत एव सर्वाण्यनु ॥ ४.२.२ ॥
पदच्छेद — अतः , एव , च , सर्वाणि , अनु
सूत्रार्थ — ( अत एव ) उक्त दर्शन आदि हेतुओंसे ही वाणीके समान ( सर्वाण्यनु ) समस्त चक्षु आदि इन्द्रियोंकी वृत्ति ( च ) भी वृत्तिविशिष्ट मनमें लय होती है।
शाङ्करभाष्य
तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि संपद्यमानैः इत्यत्र अविशेषेण सर्वेषामेवेन्द्रियाणां मनसि संपत्तिः श्रूयते तत्रापि अत एव वाच इव चक्षुरादीनामपि सवृत्तिके मनस्यवस्थिते वृत्तिलोपदर्शनात् तत्त्वप्रलयासंभवात् शब्दोपपत्तेश्च वृत्तिद्वारेणैव सर्वाणीन्द्रियाणि मनोऽनुवर्तन्ते। सर्वेषां करणानां मनस्युपसंहाराविशेषे सति वाचः पृथग्ग्रहणम् वाङ्मनसि संपद्यते इत्युदाहरणानुरोधेन।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — निर्गुण विद्याके फल कथनानन्तर सगुण विद्याओंमें फल प्राप्तिके लिए देवयान मार्गका अवतरण करते हुए सूत्रकार प्रथम शास्त्रानुसार उत्क्रान्तिका क्रम कहते हैं। उपासक और अनुपासककी उत्क्रान्ति तुल्य ही है, ऐसा आगे कहेंगे। ' अस्य सोम्य पुरुषस्य ० ' ( हे सोम्य! इस त्रियमाण पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है, तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है ) ऐसी प्राण विषयक श्रुति है।
क्या यहाँ वृत्तिवाली वाणीकी ही मनमें सम्पत्ति ( लय ) कही जाती है अथवा वाणीकी वृत्तिकी। इसप्रकार संशय होता है। पूर्वपक्षी - उसमें वाणी ही मनमें लीन होती है, ऐसा प्राप्त होता है। क्योंकि ऐसा माननेपर श्रुति अनुगृहीत होती है, अन्यथा लक्षणा होगी। श्रुति और लक्षणामें सन्देह होनेपर श्रुति ही न्याय है लक्षणा नहीं। इसलिए वाणीका ही मनमें प्रलय है | सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वाणीकी वृत्ति मनमें लय होती है।
परन्तु जब कि आचार्यं ‘ वाङ्मनसि ' ( वाणी मनमें ) ऐसा पढ़ते हैं तब ' वाणीकी वृत्ति ' यह व्याख्यान कैसे किया जाता है? यह ठीक है। परन्तु ' अविभागो वचनात् ' इसप्रकार आगे कहेंगे। इसलिए यहाँ वृत्ति उपशम मात्र विवक्षित है, ऐसा ज्ञात होता है। परन्तु तत्त्वोंके प्रलयकी विवक्षा होनेपर तो सर्वत्र ही अविभागके साम्य होनेसे ' परत्र ही ' आगे [ ' अविभागो वचनात् ' यहाँ ही ] ' अविभाग ' ऐसा विशेषण क्यों देते?
इसलिए यहाँ वृत्ति उपसंहारकी विवक्षा है, मनकी वृत्तिकी अवस्थिति होनेके पूर्वं वाग्वृत्तिका उपसंहार होता है, ऐसा अर्थ है। किससे? इससे कि ऐसा दर्शन होता है। मनोवृत्ति के विद्यमान होनेपर पूर्वं वाग्वृत्तिका उपसंहार देखा जाता है। किन्तु वृत्तिवाली वाणीका ही मनमें उपसंहार तो किसीसे भी नहीं देखा जा सकता है। परन्तु यह जो कहा गया है कि श्रुतिको सामथ्र्यसे
यह मनमें प्रलय युक्त है। नहीं, ऐसा कहते हैं, क्योंकि अतत्प्रकृति है - वह वाणीकी प्रकृति नहीं है, जिसकी जिससे उत्पत्ति होती है उसका उसमें प्रलय युक्त है, जैसे सिकोराका मृत्तिकामें। वाणी मनसे उत्पन्न होती है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है। वृत्तिके उद्भव और अभिभव तो अप्रकृतिअनुपादन आश्रय भी देखे जाते हैं। जैसे पार्थिव इन्धनसे तैजस अग्निकी वृत्ति उत्पन्न होती है और जलमें उपशान्त होती है। तब इस पक्ष में ' वाङ्मनसि सम्पद्यते ' यह श्रुति किसप्रकार संगत होगी? इसपर कहते हैं - ' शब्दाच्च ' शब्द श्रुति भी इस पक्षमें संभव है, क्योंकि वृत्ति और वृत्तिमानुमें अभेदका उपचार है, ऐसा अर्थ है॥ १॥
' तस्मादुपशान्ततेजाः ० ' ( अतः जिसका तेज ( शारीरक ऊष्मा ) शान्त हो जाता है वह मनमें लीन हुई इन्द्रियों सहित पुनर्जन्मको प्राप्त हो जाता है ) इसमें सब इन्द्रियोंका समानरूपसे मनमें लय सुना जाता है। उसमें भी इसीसे - वाणीके समान चक्षु आदिका भी सवृत्तिक मनके अवस्थित होनेपर वृत्तिलयका दर्शन होता है, अतः तत्त्व ( स्वरूप ) प्रलयका असंभव होनेसे और शब्दोपपत्ति होनेसे सब इन्द्रियाँ वृत्तिद्वारा ही मनका अनुवर्तन करती हैं। सब इन्द्रियोंका समानरूपसे मनमें उपसंहार होनेपर ' वाङ्मनसि सम्पद्यते ' इस प्रकार वाणीका पृथक् ग्रहण उदाहरण के अनुरोधसे है।। २
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.२.३ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
मनोऽधिकरणम्
4.2.3 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ३
तन्मनः प्राण उत्तरात् ॥ ४.२.३ ॥
पदच्छेद — तत् , मनः , प्राणे , उत्तरात्
सूत्रार्थ — ( तत् ) सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी वृत्तिके लयका आधारभूत ( मनः ) वह मन भी ( प्राणे ) वृत्तिद्वारा प्राण में लीन होता है, ( उत्तरात् ) क्योंकि ' मनः प्राणे ' इस उत्तरवाक्यसे अवगत होता है।
शाङ्करभाष्य
समधिगतमेतत् वाङ्मनसि संपद्यते इत्यत्र वृत्तिसंपत्तिविवक्षेति अथ यदुत्तरं वाक्यम् मनः प्राणे इति किमत्रापि वृत्तिसंपत्तिरेव विवक्ष्यते उत वृत्तिमत्संपत्तिः इति विचिकित्सायाम् वृत्तिमत्संपत्तिरेव अत्र इति प्राप्तम् श्रुत्यनुग्रहात् तत्प्रकृतित्वोपपत्तेश्च तथा हि अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणः इत्यन्नयोनि मन आमनन्ति अब्योनिं च प्राणम् आपश्चान्नमसृजन्त इति श्रुतिः। अतश्च यन्मनः प्राणे प्रलीयते अन्नमेव तदप्सु प्रलीयते अन्नं हि मनः आपश्च प्राणः प्रकृतिविकाराभेदादिति। एवं प्राप्ते ब्रूमः तदपि आगृहीतबाह्येन्द्रियवृत्ति मनो वृत्तिद्वारेणैव प्राणे प्रलीयत इति उत्तराद्वाक्यादवगन्तव्यम् तथा हि सुषुप्सोर्मुमूर्षोश्च प्राणवृत्तौ परिस्पन्दात्मिकायामवस्थितायाम् मनोवृत्तीनामुपशमो दृश्यते न च मनसः स्वरूपाप्ययः प्राणे संभवति अतत्प्रकृतित्वात्। ननु दर्शितं मनसः प्राणप्रकृतित्वम् नैतत्सारम् न हि ईदृशेन प्राणाडिकेन तत्प्रकृतित्वेन मनः प्राणे संपत्तुमर्हति एवमपि हि अन्ने मनः संपद्येत अप्सु चान्नम् अप्स्वेव च प्राणः न ह्येतस्मिन्नपि पक्षे प्राणभावपरिणताभ्योऽद्भ्यो मनो जायत इति किंचन प्रमाणमस्ति तस्मात् न मनसः प्राणे स्वरूपाप्ययः। वृत्त्यप्ययेऽपि तु शब्दोऽवकल्पते वृत्तिवृत्तिमतोरभेदोपचारात् इति दर्शितम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' वाङ्मनसि सम्पद्यते ' इस श्रुतिमें वृत्तिलयकी विवक्षा है यह निश्चित किया गया है। अब जो आगेका वाक्य है ' मनः प्राणे ' ( मन प्राणमें लय होता है ) क्या यहाँ भी वृत्तिलय ही विवक्षित है अथवा वृत्तिवान्का लय विवक्षित है। इस प्रकार संशय होनेपर पूर्वपक्षी - यहाँ वृत्तिवाले मनका ही लय है, ऐसा प्राप्त होता है। कारण कि श्रुतिके अनुग्रहसे प्राण मनकी प्रकृति उपपन्न होता है। जैसे कि ' अन्नमयं हि सोम्य ० ' ( हे सोम्य! मन अन्नमय है और प्राण जलमय है ) इस प्रकार अन्न कारणक मन और जल कारणक प्राण है ऐसा श्रुति कहती है। और ' आपश्चान्नमसृजन्त ' ( जलने अन्न उत्पन्न किया ) ऐसी श्रुति है। इस कारण मनका जो प्राणमें विलय होता है वह अन्नका ही जलमें लय होता है, मन ही अन्न है और प्राण ही जल है, क्योंकि प्रकृति और विकारका अभेद है।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - तो भी बाह्य इन्द्रियोंकी वृत्तिको ग्रहण करनेवाला मन वृत्तिद्वारा ही प्राणमें लय होता है, ऐसा उत्तर वाक्य ( मनः प्राणे ) से जानना चाहिए, क्योंकि सुषुप्सु और मुमूर्षु पुरुषकी चलनात्मक प्राणवृत्तिके अवस्थित होनेपर मनकी वृत्तियोंका उपशम देखा जाता है। इसलिए मनका प्राणमें स्वरूप लय नहीं हो सकता, क्योंकि सतत्प्रकृति है - प्राण मनकी प्रकृति नहीं है। परन्तु ऐसा दिखलाया गया है कि प्राण मनकी प्रकृति है? उसमें कोई सार नहीं है, क्योंकि इस प्रकारकी परम्परा प्रणालीसे प्राण मनकी प्रकृति होनेसे मनका प्राणमें लय होना युक्त नहीं है। परन्तु ऐसी परम्परा प्रणाली होनेपर भी मन अन्न में लय हो, और अन्न जलमें और प्राण जलमें लय होना चाहिए। इस पक्ष में भी प्राणरूपसे परिणत जलसे मन उत्पन्न होता है, इसमें कोई प्रमाण नहीं हैं | इसलिए मनका प्राणमें स्वरूप लय नहीं है। वृत्तिका लय होनेपर भी तो [ मनः प्राणे ] यह श्रुति उपपन्न होती है, क्योंकि वृत्ति और वृत्तिमान्का अभेदोपचार है, ऐसा दिखलाया गया है || ३ ||
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत पादमें ब्रह्मविद्याके जीवनमुक्ति और विदेहमुक्तिरूपी फल कहे गये हैं। अब इस पादमें फलविचारके प्रकरण में सगुणविद्याका ब्रह्मलोक प्राप्तिरूप फल अचिरादि मार्ग द्वारा ही हो सकता है, वह उत्क्रान्तिके विना संभव नहीं है, इसलिए उसकी सिद्धिके लिए शास्त्रानुसार प्रथम उत्क्रान्तिका विचार किया जाता है। अतः इस फलाध्यायके दूसरे पादमें उपासनाकी फलसिद्धिके लिए ' वाङ्मनसि ' यह विचार संगत है। यहाँ उत्क्रान्तिके विषय में ' वाणी मनमें लीन होती है ' ऐसा कहा गया है। क्या यहाँ वाणीका स्वरूपसे मनमें लय है कि वाणीको वृत्तिका? संशय होनेका कारण यह है कि ' उच्यतेऽनेन ' ( जिससे कहा जाय ) यह करणव्युत्पत्ति और ' उक्ति इति वाक् ' ( जो कही जाय ) यह भावव्युत्पत्ति दोनों विद्यमान हैं। पूर्वपक्ष में ' वाङ्मनसि ' और ' वाङ्मनसि सम्पद्यते ' इसप्रकार सूत्र और श्रुतिके आधारपर वाणीका स्वरूपसे ही मनमें लय होता है। इसप्रकार करणमात्रका स्वरूपसे लय होनेपर यावत् म्रियमाणकी मुक्ति सिद्ध है, सिद्धान्तमें करणोंकी वृत्तिका लय होता है, अतः म्रियमाण मुक्त नहीं होता।
* सिद्धान्ती - वाणीकी वृत्तिका ही मनमें लय होता है। यद्यपि सूत्रकारने ' वाङ्मनसि ' ऐसा कहा है, तो मी यहाँ वृत्तिका ग्रहण युक्त है, क्योंकि स्वयं सूत्रकार धर्मी प्रलयकी विवक्षा में ' अविभागोवचनात् ' यह सूत्र आगे कहेंगे। यदि स्वरूपसे वाणीका लय माने तो ' अविभागो वचनात् ' इस सूत्रकी पृथक् रचना व्यर्थ होगी और तत्त्वश और अज्ञमें कोई भेद नहीं रहेगा। इसलिए म्रियमाणकी वाणीकी वृत्ति ही मनमें लय होती है॥ १॥
* कार्य अपने उपादानमें लय होता है अनुपादान में नहीं, इस न्यायसे मनका प्राणमें लय नहीं किन्तु उसकी वृत्तिका लय होना चाहिए, इससे ' मनः प्राणे ' इस श्रुति और न्यायका विरोध उपस्थित होनेपर संशय होता है। पूर्वपक्षी - मनका स्वरूपसे ही प्राणमें लय होना चाहिए, क्योंकि ऐसा होनेसे श्रुति और न्याय दोनोंकी उपपत्ति होती है। जैसे कि अन्न मनकी प्रकृति है और जल अन्नकी प्रकृति है। प्राण जलका विकार है और मन अन्नका है। इस प्रकार प्रकृति और विकारका अभेद होनेसे मन अन्नात्मक है और प्राण जलात्मक है। जैसे जल अन्नात्मक मनकी परम्परा प्रकृति है, वैसे जलात्मक प्राण भी मनकी प्रकृति है। इसप्रकार श्रुति और न्यायका अविरोध होनेसे मनका प्राणमें लय युक्त है।
सिद्धान्ती - ' आपोऽन्नमसृजन्त ' इससे जल और अन्नका केवक कार्य - कारणभाव सिद्ध होता है न कि उनके विकार प्राण और मनका भी। यदि इस कारणप्रणालीसे जल और अन्नके विकार प्राण और मनका भी प्रकृति - विकृतिभाव माना जाय तो जल और पृथिवीके विकार हिम और घटका भी प्रकृति - विकारभाव होने से अतिप्रसङ्ग होगा। जिस विकारका जो साक्षात् उपादान होता है वह उसमें लय होता है अन्य में नहीं, इसलिए इस न्यायसे श्रुत्यर्थंका बाधकर मन पदसे लक्षणा द्वारा मनकी वृत्तिका ग्रहण करना चाहिए॥ ३
अध्यक्षाधिकरणम्
4.2.4 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ४
सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ ४.२.४ ॥
शाङ्करभाष्य
स्थितमेतत् यस्य यतो नोत्पत्तिः तस्य तस्मिन्वृत्तिप्रलयः न स्वरूपप्रलय इति इदमिदानीम् प्राणस्तेजसि इत्यत्र चिन्त्यते किं यथाश्रुति प्राणस्य तेजस्येव वृत्त्युपसंहारः किं वा देहेन्द्रियपञ्जराध्यक्षे जीव इति। तत्र श्रुतेरनतिशङ्क्यत्वात् प्राणस्य तेजस्येव संपत्तिः स्यात् अश्रुतकल्पनाया अन्याय्यत्वात् इत्येवं प्राप्ते प्रतिपद्यते सोऽध्यक्ष इति।
स प्रकृतः प्राणः अध्यक्षे अविद्याकर्मपूर्वप्रज्ञोपाधिके विज्ञानात्मनि अवतिष्ठते तत्प्रधाना प्राणवृत्तिर्भवतीत्यर्थः कुतः तदुपगमादिभ्यः एवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोंच्छ्वासी भवति इति हि श्रुत्यन्तरम् अध्यक्षोपगामिनः सर्वान्प्राणान् अविशेषेण दर्शयति विशेषेण च तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति इति पञ्चवृत्तेः प्राणस्य अध्यक्षानुगामितां दर्शयति तदनुवृत्तितां च इतरेषाम् प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति इति सविज्ञानो भवति इति च अध्यक्षस्य अन्तर्विज्ञानवत्त्वप्रदर्शनेन तस्मिन् अपीतकरणग्रामस्य प्राणस्य अवस्थानं गमयति।
ननु प्राणस्तेजसि इति श्रूयते कथं प्राणोऽध्यक्षे इत्यधिकावापः क्रियते नैष दोषः अध्यक्षप्रधानत्वादुत्क्रमणादिव्यवहारस्य श्रुत्यन्तरगतस्यापि च विशेषस्यापेक्षणीयत्वात्।। कथं तर्हि प्राणस्तेजसि इति श्रुतिरित्यत आह
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — पदच्छेद - सः, अध्यक्षे, तदुपगमादिभ्यः।
सूत्रार्थ - ( सः ) वह प्राण वृत्तिरहित होकर ( अध्यक्षे ) जीवात्मामें अवस्थित होता है, ( तदुपगमादिभ्यः ) क्योंकि जीवमें प्राणके उपगम, अनुगम और अवस्थान श्रुत हैं।
यह सिद्ध हुआ कि जिसकी जिससे उत्पत्ति नहीं होती उसका उसमें वृत्तिलय होता है स्वरूप लय नहीं। अब ' प्राणस्तेजसि ' ( प्राण तेजमें लोन होता है ) इस श्रुति वाक्यपर यह विचार किया जाता है कि क्या श्रुति अनुसार प्राणका तेजमें ही वृत्तिलय होता है अथवा देह, इन्द्रियरूप पञ्जरके अध्यक्ष जीवमें वृत्तिलय होना है? पूर्वपक्षी — उसमें श्रुतिके विषय में अतिशङ्का युक्त न होनेसे प्राणका तेजमें ही लय होना चाहिए, क्योंकि अश्रु तकी कल्पना अन्याय है।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर प्रतिपादन करते हैं - ' सोऽध्यक्षे ' वह प्रकृत प्राण अविद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञारूप उपाधिवाले विज्ञानस्वरूप अध्यक्ष में अवस्थित होता है। वह अध्यक्ष प्रधान प्राणवृत्ति होती है, ऐसा अर्थ है। किससे? इससे कि उसके उपगमादि हैं। ' एवमेवे ममात्मानमन्तकाले ० ' ( इसीप्रकार अन्तकालमें जब वह ऊर्ध्वोच्छ्वासी होता है तब सब वाक् आदि प्राण इस आत्माके अभिमुख जाते हैं ) यह दूसरी श्रुति अविशेषसे सब प्राणोंको अध्यक्षोपगामी दिखलाती है।
बौर ' तमुक्रामन्तं ० ' ( उसके उत्क्रमण करनेपर उसके पीछे ही प्राण उत्क्रमण करता है ) यह श्रुति वाक्य विशेषरूपसे पाँच वृत्तिवाले प्राण में अध्यक्षकी अनुगामिता दिखलाता है। और ' प्राणमनुत्क्रामन्तं ० ' ( जीवके पीछे प्राणके उत्क्रमण करनेपर उसके पीछे सब वागदि प्राण उत्क्रमण करते हैं ) इसप्रकार अन्य प्राणोंमें उस प्राणकी अनुवृत्तिता दिखलाता है।
' सविज्ञानो भवति ' ( तब यह विज्ञानवाला होता है ) इस प्रकार अध्यक्षमें अन्तविज्ञानवत्त्व प्रदर्शन से उसमें विलय करण समुदायवाले प्राणका अवस्थान बोधन करती है। परन्तु ' प्राणस्तेजसि ' ऐसी श्रुति है तब ' प्राण अध्यक्ष में लोन होता है ' यह अधिक ग्रहण क्यों किया जाता है? यह दोष नहीं है, क्योंकि उत्क्रमण आदि व्यवहार अध्यक्ष प्रधान है और अन्य श्रुतिगत विशेषकी भी अपेक्षा होनी चाहिए॥४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * अब उक्त न्यायसे प्राणवृत्तिलयके विषय में विचार किया जाता है — ' प्राणस्तेजसि ' यह श्रुति प्राणका तेजमें और ' एवमेवेममात्मानमन्तकोले ' इत्यादि श्रुतियाँ उपगमन आदि हेतुओंसे जीव में लय कहती हैं। इन दोनों प्रकारकी श्रुतियोंके विद्यमान होनेपर संशय होता है। पूर्वपक्षी ' प्राणस्तेजसि ' आदिसे कहते हैं। सिद्धान्ती - इस प्रकृत प्राणकी वृत्ति जीवात्मा में ही लय होती है, क्योंकि जीवप्रधान ही प्राण वृत्ति होती हैं।
जबतक जीव शरीरमें . विद्यमान है तबतक प्राणकी श्वासोच्छ्वासरूप वृत्ति शरीर में रहती है अन्यथा नहीं। अब इसको उपगमन आदि श्रुतिद्वारा दिखलाया जाता है - ' एवमेवेममात्मानमन्तकाले ' यह श्रुति जीवात्मा के प्रयाणकालमें वाणी आदि सम्पूर्ण प्राणों का उसके प्रति उपगमन - अभिमुखत्व दिखलाती है। जैसे राजाकी यात्रा में साथ चलनेवाले सभो सेवक उसके प्रति अभिमुख हो जाते हैं और प्रस्थान करनेपर पीछे - पीछे चलते हैं।
इसप्रकार ' तमुत्क्रामन्तं •, यह श्रुतिवाक्य प्राणको विशेषरूपसे जीवात्माका अनुगामी बतलाता है। और ' प्राणमनूत्क्रामन्तं ० यह श्रुतिवाक्य वागादि प्राणोंमें विशेषरूप से प्राणकी जीवात्मा के प्रति अनुगमन वृत्तिता दिखलाता है। इस प्रकार ' सविज्ञानो भवति ' यह श्रुतिकरणों सहित प्राणको जीवात्मामें अवस्थिति दिखलाती है। यद्यपि ' प्राणस्तेजसि ' यह श्रुति प्राणवृत्तिका तेजमें लय कहती है, तो मी प्राण आदिका उत्क्रमण आदि व्यवहार देह आदिके अध्यक्ष जीवात्मा के अधीन होता है।
इस हेतुसे और ' तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूक्रामति ' इस अन्य श्रुतिमें विशेष कथन भी अपेक्षणीय होनेसे प्राणवृत्तिका जीवात्मा में ही लय होता है॥ ४
4.2.5 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ५
भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ ४.२.५ ॥
पदच्छेद — भूतेषु तच्छ्रतेः । C
सूत्रार्थ — ( भूतेषु ) प्राण संयुक्त वह अध्यक्ष तेजके सहचारी देहके बीजभूत सूक्ष्म भूतों में अवस्थित होता है ( तच्छू ते : ) क्योंकि ' प्राणस्तेजसि ' ऐसी श्रुति है।
शाङ्करभाष्य
स प्राणसंपृक्तोऽध्यक्षः तेजःसहचरितेषु भूतेषु देहबीजभूतेषु सूक्ष्मेषु अवतिष्ठत इत्यवगन्तव्यम् प्राणस्तेजसि इति श्रुतेः। ननु च इयं श्रुतिः प्राणस्य तेजसि स्थितिं दर्शयति न प्राणसंपृक्तस्याध्यक्षस्य नैष दोषः सोऽध्यक्षे इति अध्यक्षस्याप्यन्तराल उपसंख्यातत्वात् योऽपि हि स्रुघ्नान्मथुरां गत्वा मथुरायाः पाटलिपुत्रं व्रजति सोऽपि स्रुघ्नात्पाटलिपुत्रं यातीति शक्यते वदितुम् तस्मात् प्राणस्तेजसि इति प्राणसंपृक्तस्याध्यक्षस्यैव एतत् तेजःसहचरितेषु भूतेष्ववस्थानम्।। कथं तेजःसहचरितेषु भूतेष्वित्युच्यते यावता एकमेव तेजः श्रूयते प्राणस्तेजसि इति अत आह
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — तब ' प्राणस्तेजसि ' यह श्रुति कैसे है अर्थात् इसका क्या अर्थ है? इसपर कहते हैं-
प्राण संयुक्त वह जीवात्मा तेज सहचरित देहके बीजभूत सूक्ष्मभूतों में अवस्थित होता है, ऐसा जानना चाहिए | क्योंकि ' प्राणस्तेजसि ' ( प्राण तेजमें लीन होता है ) ऐसी श्रुति है। परन्तु यह श्रुति प्राणकी तेजमें स्थिति दिखलाती है न कि प्राणसम्बद्ध जीवात्माकी? यह दोष नहीं है, कारण कि ' सोऽध्यक्षे ' इस प्रकार अध्यक्षका मी मध्य में कथन है। जो भी सुध्नये मथुरा जाकर मथुरासे पाटलिपुत्र जाता है वह भी सुध्नसे पाटलिपुत्र जाता है, ऐसा कहा जा सकता है। इसलिए ' प्राणस्तेजसि ' इससे प्राण सम्बद्ध जीवका भी तेज सहचरित भूतोंमें यह अवस्थान है || ५ ||
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि ‘ प्राणस्तेजसि ' इस श्रुति वाक्यसे प्राणवृत्तिका तेजमें लय प्रतीत होता है, तो भी सर्वं शाखाओंके विश्वारसे तेज शब्दसे उपलक्षित तेज सहचारी देहके हेतुभूत सूक्ष्म पांच भूतोंके स्वामी जीवका ग्रहण है, उसमें प्राणवृत्ति लय होती है। परन्तु ऐसा माननेपर उक्त श्र ुतिका क्या अर्थ होगा? इसमें ' सो s पि ' आदिसे उदाहरण देते हैं। यह प्राण भी प्रथम अध्यक्षको प्राप्त होकर उसके द्वारा तेजको प्राप्त होता है, तो ऐसा उपपन्न होता है कि ' प्राण तेजमें लीन होता है ' इस प्रकार सूत्र और श्रुतिके बलसे प्राणवृत्तिका जीवात्मामें लय युक्त है॥ ५
4.2.6 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ६
नैकस्मिन् दर्शयतो हि ॥ ४.२.६ ॥
शाङ्करभाष्य
न एकस्मिन्नेव तेजसि शरीरान्तरप्रेप्सावेलायां जीवोऽवतिष्ठते कार्यस्य शरीरस्यानेकात्मकत्वदर्शनात्। दर्शयतश्च एतमर्थं प्रश्नप्रतिवचने आपः पुरुषवचसः इति तद्व्याख्यातम् त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् इत्यत्र। श्रुतिस्मृती च एतमर्थं दर्शयतः श्रुतिः पृथ्वीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयः इत्याद्या स्मृतिरपि अण्व्यो मात्राविनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः। ताभिः सार्धमिदं सर्वं संभवत्यनुपूर्वशः इत्याद्या। ननु च उपसंहृतेषु वागादिषु करणेषु शरीरान्तरप्रेप्सावेलायाम् क्वायं तदा पुरुषो भवति इत्युपक्रम्य श्रुत्यन्तरं कर्माश्रयतां निरूपयति तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ ह यत्प्रशशंसतुः कर्म हैव तत्प्रशशंसतुः इति अत्रोच्यते तत्र कर्मप्रयुक्तस्य ग्रहातिग्रहसंज्ञकस्य इन्द्रियविषयात्मकस्य बन्धनस्य प्रवृत्तिरिति कर्माश्रयतोक्ता इह पुनः भूतोपादानाद्देहान्तरोत्पत्तिरिति भूताश्रयत्वमुक्तम् प्रशंसाशब्दादपि तत्र प्राधान्यमात्रं कर्मणः प्रदर्शितम् न त्वाश्रयान्तरं निवारितम् तस्मादविरोधः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु तेज सहचारी भूतोंमें जीवकी अवस्थिति है यह कैसे कहा जाता है जब कि ' प्राणस्तेजसि ' इस प्रकार एक ही तेजकी श्रुति है? इसपर कहते हैं- - ~
पदच्छेदन एकस्मिन् दर्शयतः हि।
सूत्रार्थ - ( एकस्मिन् ) जीवकी उत्क्रमण कालमें एक ही तेजमें अवस्थिति ( न ) नहीं है, किन्तु देहके पाँच भौतिक होनेसे उसकी पाँच भूतों में स्थिति है, ( हि ) क्योंकि ( दर्शयतः ) श्रुति और स्मृति इसी अर्थको दिखलाती हैं।
अन्य शरीर प्राप्त करनेकी इच्छा के समय जोव एक ही तेजमें अवस्थित नहीं होता, क्योंकि कार्यं शरीर अनेकात्मक देखने में आता है। ' आपः पुरुषवचसः ' ( आप- सोम घृतादि - ' पुरुष ' संज्ञाको कैसे प्राप्त होता है ) यह प्रश्न और उत्तर इस अर्थको दिखलाता है। इसका ' ध्यात्मकत्वात्तु ० ' इस सूत्रमें व्याख्यान किया गया है। श्रुति और स्मृति भी इस अर्थको दिखलाती हैं। ' पृथिवीमय ० ' ( पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय ) इत्यादि श्रुति है।
खोर ' अण्ण्यो ० ' ( मोक्ष पर्यन्त पाँच भूतोंके जो सूक्ष्म अविनाशी माग कहे गये हैं, उनके साथ यह सब क्रमसे उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि स्मृति भी है। परन्तु शरीरान्तर प्राप्त करनेकी इच्छाके समय वाक् आदि इन्द्रियों का आत्मा में उपसंहार होनेपर ' क्वायं पुरुषो ० ' ( आर्तभाग- उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है ) ऐसा आरम्भकर ' तो ह यदूचतुः ० ' ( तब याज्ञवल्क्य और आतंभाग दोनोंने उठकर एकान्तमें विचार किया।
उन्होंने जो कुछ कहा वह कर्म ही कहा, तथा जिसकी प्रशंसा की वह कर्मकी प्रशंसा की ) इस प्रकार दूसरी श्रुति आत्माको कर्माश्रयता निरूपण करती है। इसपर कहते हैं - उसमें कमं प्रयुक्त ग्रह और अतिग्रह नामक इन्द्रिय और विषयात्मक बन्धनकी प्रवृत्ति होती है, अतः कर्म आश्रयरूपसे कहा गया है। और यहाँ तो भूतोपादानसे अन्य देहकी उत्पत्ति होती है, इसलिए भूताश्रयत्व कहा गया है। वहाँ प्रशंसाशब्द से भी प्राधान्यमात्र कर्मको दिखलाया गया है अन्य आश्रयका निवारण नहीं किया गया है, इससे कोई विरोध नहीं है॥
६
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * ' वायं तदा पुरुषो भवति ' इस प्रश्नके उत्तर में ' तौ ह यदूचतुः ' यह श्रुति कर्माश्रयता कहती है और देहका उपादानरूपसे पाँच भूत आश्रय हैं। इस प्रकार दोनोंको भिन्न - भिन्नरूपसे आश्रयत्व प्राप्त होनेसे दोनों श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है।। ६
आत्युपक्रमाधिकरणम्
4.2.7 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ७
समाना चासृत्युपक्रमाद् अमृतत्वं चानुपोष्य ॥ ४.२.७ ॥
पदच्छेद — समाना , च , आसृत्युपमक्रमात् अमृतत्वम् , च , अनुपोष्य |
सूत्रार्थ — ( आमृत्युपक्रमात् ) देवयान मार्गके उपक्रमसे पूर्व विद्वान् और अविद्वानकी ( समाना ) उत्क्रान्ति समान है, क्योंकि ' वाङ्मनसि ' यह अविशेष श्रुति है, और सगुण विद्यामें ( अमृतत्वं चानुपोष्य ) जो अमृतत्व है वह अपेक्षित है।
शाङ्करभाष्य
सेयमुत्क्रान्तिः किं विद्वदविदुषोः समाना किं वा विशेषवती इति विशयानानां विशेषवतीति तावत्प्राप्तम्। भूताश्रयविशिष्टा ह्येषा पुनर्भवाय च भूतान्याश्रीयन्ते न च विदुषः पुनर्भवः संभवति अमृतत्वं हि विद्वानश्नुते इति स्थितिः तस्मादविदुष एव एषा उत्क्रान्तिः।
ननु विद्याप्रकरणे समाम्नानात् विदुष एव एषा भवेत् न स्वापादिवत् यथाप्राप्तानुकीर्तनात् यथा हि यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम अशिशिषति नाम पिपासति नाम इति च सर्वप्राणिसाधारणा एव स्वापादयोऽनुकीर्त्यन्ते विद्याप्रकरणेऽपि प्रतिपिपादयिषितवस्तुप्रतिपादनानुगुण्येन न तु विदुषो विशेषवन्तो विधित्स्यन्ते एवम् इयमपि उत्क्रान्तिः महाजनगतैवानुकीर्त्यते यस्यां परस्यां देवतायां पुरुषस्य प्रयतः तेजः संपद्यते स आत्मा तत्त्वमसि इत्येतत्प्रतिपादयितुम्।
प्रतिषिद्धा च एषा विदुषः न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति इति। तस्मात् अविदुष एवैषेति।। एवं प्राप्ते ब्रूमः समाना चैषा उत्क्रान्तिः वाङ्मनसि इत्याद्या विद्वदविदुषोः आसृत्युपक्रमात् भवितुमर्हति अविशेषश्रवणात् अविद्वान् देहबीजभूतानि भूतसूक्ष्माण्याश्रित्य कर्मप्रयुक्तो देहग्रहणमनुभवन् संसरति विद्वांस्तु ज्ञानप्रकाशितं मोक्षनाडीद्वारमाश्रयते तदेतत् आसृत्युपक्रमात् इत्युक्तम्।
ननु अमृतत्वं विदुषा प्राप्तव्यम् न च तद्देशान्तरायत्तम् तत्र कुतो भूताश्रयत्वं सृत्युपक्रमो वेति अत्रोच्यते अनुपोष्य च इदम् अदग्ध्वा अत्यन्तमविद्यादीन्क्लेशान् अपरविद्यासामर्थ्यात् आपेक्षिकममृतत्वं प्रेप्सते संभवति तत्र सृत्युपक्रमः भूताश्रयत्वं च न हि निराश्रयाणां प्राणानां गतिरुपपद्यते तस्माददोषः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — क्या यह पूर्वोक्त उत्क्रान्ति विद्वान् और अविद्वान्की समान होती है अथवा क्या विशेष युक्त होती है? पूर्वपक्षी - ऐसा सन्देह करनेवालोंके मतमें विशेष युक्त होती है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि यह उत्क्रान्ति भूताश्रय विशिष्ट है। और पुनर्जन्मके लिए भूतोंका आश्रय किया जाता है। और विद्वानका पुनर्जन्म संभव नहीं है। क्योंकि ' अमृतत्वं हि विद्वानश्नुते ' ( विद्वान् मोक्षको प्राप्त होता है ) ऐसी श्रुति है। इसलिए यह उत्क्रान्ति अविद्वान्को ही है।
परन्तु विद्या के प्रकरण में इसका श्रवण होनेसे यह उत्क्रान्ति विद्वान्की ही होनी चाहिए? नहीं, कारण कि स्वाप आदिके समान यहाँ पर यथाप्राप्तका अनुकीर्तन है।
जैसे कि ' यत्रैतत्पुरुषः ' ( जिस अवस्थामें यह पुरुष ' सोता है ' ऐसा कहा जाता है, जिस समय यह भोजन करना चाहता है, पीना चाहता है ) इस प्रकार विद्याके प्रकरणमें मी प्रतिपादन के अमोप्सित वस्तुके प्रतिपादनके अनुगुणसे सर्वप्राणी साधारण ही स्वाप आदि कहे जाते हैं न कि विद्वान् के लिए विशेषरूपसे विधान करना अभीष्ट है, इस प्रकार जो जिस परदेवतामें प्रयाण करनेवाले पुरुषका तेज सम्पन्न होता है ' वह आत्मा है वह तू है ' उसे प्रतिपादन करनेके लिए महाजनजनसाधारणगत ही इस उत्कान्तिका अनुकीर्तन है।
' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' ( उसके प्राण
अमृतत्व प्राप्त करना चाहता है। इसलिए उस अवस्थामें उस विद्वानके लिए
भूतोंका आश्रय संभव है, क्योंकि निराश्रय प्राणोंकी गति उपपन्न नहीं होती, मार्गका उपक्रम और
॥ ७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस प्रकार प्रयाण समय प्रथम बाह्येन्द्रियोंका मनमें वृत्तिलय होता है, पश्चात् बाह्येन्द्रियवृत्तिसहित मनोवृत्तिका प्राण में और प्राणवृत्तिका तेज सहचारी भूतोपाधि विशिष्ट जीवमें लय होता है। इसप्रकार उत्क्रान्तिकी व्यवस्था कही गई है। वह सब प्राणियोमें समान है। यह ' समाना च ' इत्यादि से कहते हैं। ' अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते ' ( छा ० ६।८।६ ) ( हे श्वेतकेतु! प्रयाण करनेवाले इस पुरुषकी प्रथम वाणीकी वृत्ति मनमें लय होती है ) यह श्रुति विद्वान् और अविद्वान्का समानरूपसे उत्क्रमण प्रकार कहती है। और ' विद्ययाऽमृतमश्नुते ' यह श्रुति विद्वान् के उत्क्रमणका निषेध करती हैं। इस प्रकार दोनों श्रुतियोंका परस्पर विरोध होनेसे संशय होता है कि विद्वान् और व्यविद्वान्को उत्क्रान्ति समान होती है अथवा कुछ विषमता है? पूर्वपक्षी - सगुण ब्रह्मज्ञानवाले
नहीं होती है किन्तु उसकी मुक्ति हो जाती है। क्योंकि ' विद्ययाऽमृतमश्नुतें ' विद्वानकी उत्क्रान्ति और ' न तस्य प्राणा
उत्क्रामन्ति ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। अतः अविद्वान्की ही उत्क्रान्ति होती है।
* सिद्धान्ती
- ' वाङ्मनसि ' यह श्रुति विद्वान् और अविद्वान् दोनोंकी समानरूपसे उत्क्रान्ति कहती है। यह समान उत्क्रान्ति मार्गके उपक्रम तक है और उपक्रम अचिरादिसे होता है। भेद इतना है कि सगुण ब्रह्मोपासक उपासना से प्रकाशित मोक्ष नाड़ी - मूर्धन्य नाड़ीका आश्रयकर ब्रह्मलोकमें जाता है, अविद्वान् इस प्रकार नहीं जाता।
और ' तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति ' इस श्रुतिसे विद्वान के लिए जो अमृतत्व कहा गया है, वह आपेक्षिक है, क्योंकि ' यं कामं कामयते सोऽस्य सङ्कल्प देव समुत्तिष्ठति ' वह उपासक जिस मोगकी कामना करता है वह उसके संकल्पमात्र से ही समुपस्थित हो जाता है ) यह श्रुति उसके लिए भोगका कथन करती है।
' आभूतसम्प्लवममृतत्वं प्रचक्षते ' ( भूतोंके प्रलयपर्यन्त ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्तिको अमृतत्व कहते हैं ) इसलिए ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्ति सापेक्षिक अमृतत्व है I | और ' अमृतत्वं हि विद्वानश्नुते ' ' विद्ययाऽमृतमश्नुते ' इत्यादि श्रुतियोंसे जो असृतत्वका प्रतिपादन है, वस्तुतः वह निर्गुणविद्या - ब्रह्मात्मैकत्व जाननेवाले विद्वानके लिए है। उसके लिए ही ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' यह श्रुति देहसे प्राणोत्क्रान्तिका निषेध करती है।
इसलिए विद्याके प्रकरण में ' वाङ्मनसि ' यह श्रुति कही गई है, वह उपासक और अनुपासक दोनोंके लिए समानरूपसे उत्क्रान्ति कहती है॥७
संसारव्यपदेशाधिकरणम्
4.2.8 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ८
तदापीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ ४.२.८ ॥
पदच्छेद — तद् , आपीतेः संसारव्यपदेशात्
सूत्रार्थ — ( तत् ) वह तेज आदि सूक्ष्मभूत ( आपीते 1 ) मोक्ष पर्यंन्त रहते हैं, ( संसारव्यपदेशात् ) क्योंकि ' योनिमन्ये ' इत्यादिस संसारका व्यपदेश है। उत्क्रमण नहीं करते ) इस प्रकार यह उत्क्रान्ति विद्वानमें प्रतिषिद्ध है। इसलिए यह उत्क्रान्ति fant ही है | सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' वाङ्मनसि ' ( वाणी मनमें लोन होती है ) इत्यादि यह उत्क्रान्ति विद्वान् और अविद्वान् दोनोंकी मार्गके आरम्भ तक समान होनी चाहिए, क्योंकि उसका समानरूपसे श्रवण है। यविद्वान् देहके बीजरूप भूतसूक्ष्मोंका आश्रयकर कर्मसे प्रयुक्त हुआ देह ग्रहणकर अनुभव करनेके लिए संसार में आता है। विद्वान् तो सगुण ब्रह्मज्ञानसे आलोकित हुए मोक्षनाड़ीके द्वारका आश्रयण करता है। यह ' आसत्युपक्रमात् ' इस सूत्रावयवसे कहा गया है। परन्तु विद्वान्को तो अमृतत्व प्राप्त होना चाहिए वह अन्य देशके अधीन नहीं है, तो पुनः उस विद्वान् के लिए भूतोंका गाश्रय अथवा मार्गका उपक्रम कैसे? सि ० - इसपर कहते हैं - यह अमृतत्व आपेक्षिक है। उपासक अविद्या आदि क्लेशोंको अत्यन्त दग्ध न कर अपरविद्या सगुण ब्रह्मविद्याकी
शाङ्करभाष्य
तेजः परस्यां देवतायाम् इत्यत्र प्रकरणसामर्थ्यात् तत् यथा प्रकृतं तेजः साध्यक्षं सप्राणं सकरणग्रामं भूतान्तरसहितं प्रयतः पुंसः परस्यां देवतायां संपद्यत इत्येतदुक्तं भवति कीदृशी पुनरियं संपत्तिः स्यादिति चिन्त्यते। तत्र आत्यन्तिक एव तावत् स्वरूपप्रविलय इति प्राप्तम् तत्प्रकृतित्वोपपत्तेः सर्वस्य हि जनिमतो वस्तुजातस्य प्रकृतिः परा देवतेति प्रतिष्ठापितम् तस्मात् आत्यन्तिकी इयमविभागापत्तिरिति। एवं प्राप्ते ब्रूमः तत् तेजआदि भूतसूक्ष्मं श्रोत्रादिकरणाश्रयभूतम् आपीतेः आसंसारमोक्षात् सम्यग्ज्ञाननिमित्तात् अवतिष्ठते योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् इत्यादिसंसारव्यपदेशात् अन्यथा हि सर्वः प्रायणसमय एव उपाधिप्रत्यस्तमयादत्यन्तं ब्रह्म संपद्येत तत्र विधिशास्त्रमनर्थकं स्यात् विद्याशास्त्रं च मिथ्याज्ञाननिमित्तश्च बन्धो न सम्यग्ज्ञानादृते विस्रंसितुमर्हति तस्मात् तत्प्रकृतित्वेऽपि सुषुप्तिप्रलयवत् बीजभावावशेषैव एषा सत्संपत्तिरिति।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ४.२.९ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * पूर्व अधिकरणमें विद्वान् और अविद्वान्की समानरूपसे उत्क्रान्ति कही गई है। अब उत्क्रान्तिके समय लिङ्गशरीर आश्रित उत्क्रान्त तेज आदि सूक्ष्म भूत परमात्मामें स्त्ररूपसे लय होते है अथवा बीजभावको लेकर लय होते हैं? यह संशय इसलिए होता है कि दोनों प्रकारका विलय अवगत होता है। जैसे सुषुप्ति और प्रलय में बीजमाव युक्त विलय होता है, वैसे उत्क्रान्तिके समय
हैं। पूर्वपक्ष में मृतकमात्रकी मुक्ति सिद्ध भी बीज आदि सूक्ष्मभूत तेज सहित परमात्मामें विलय होते है, सिद्धान्तमें शास्त्रबल से सावशेष लय होता है॥ ८
4.2.9 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ९
सूक्ष्मं प्रमाणतश् च तथोपलब्धेः ॥ ४.२.९ ॥
पदच्छेद — सूक्ष्मम् , प्रमाणतः , च , तथा , उपलब्धेः
सूत्रार्थ — अन्य भूतों सहित वह तेज प्रमाणतः ) प्रमाणसे ( च ) और ( स्वरूपतः ) स्वरूपसे ( सूक्ष्मम् ) सूक्ष्म है, ( तथोपलब्धेः ) क्योंकि इसप्रकार ही उपलब्ध होता है। ' तेजः परस्यां देवतायाम् ' ( तेज परदेवतामे लीन होता है ) इस वाक्य में प्रकरणकी सामर्थ्यंसे उस प्रयाण करनेवाले पुरुषका जो प्रकृत तेज है वह अध्यक्ष सहित प्राणं सहित, करणग्राम सहित भूतान्तरसहित परदेवतामें लीन होता है ऐसा कहा जा चुका है। परन्तु यह संपत्ति किस प्रकार की होनी चाहिए? इसका विचार किया जाता है।
पूर्वपक्षी — ऐसी शङ्का होनेपर आत्यन्तिक ही स्वरूप विलय है, ऐसा प्राप्त होता है, क्योंकि वह परदेवता उस तेजकी प्रकृति हो सकता है। बोर सब उत्पन्न होनेवाले वस्तु समुदायकी परदेवता प्रकृति है, ऐसा प्रतिष्ठापित किया गया है। इसलिए यह अविभागापत्ति आत्यन्तकी है।
सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - वह तेज आदि सूक्ष्मभूत श्रोत्र आदि करणोंके आश्रयरूप सम्यग्ज्ञान निमित्तक संसार मोक्ष पर्यन्त अवस्थित होते हैं, क्योंकि ' योनिमन्ये ० ' ( कुछ अविद्यावान् मूढ जीव अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार शरीर धारण करनेके लिए वीरूप बीजसे संयुक्त होकर योनिद्वारको प्राप्त होते हैं किसी योनिमें प्रविष्ट हो जाते हैं और कुछ अधम जीव मरकर स्थावरभावको प्राप्त होते हैं ) इत्यादि संसारका व्यपदेश है।
अन्यथा— यदि स्वरूपतः भूतोंका लय माना जाय तो प्रयाणके समयमें ही उपाधिके अस्तमयसे सब ब्रह्मके साथ अत्यन्त सम्पन्न हो जायंगे। ऐसा होनेपर विधिशास्त्र और विद्याशास्त्र अनर्थक हो जायंगे। मिथ्याज्ञान ' निमित्तक बन्ध सम्यग्ज्ञानके विना विच्छिन्न नहीं हो सकता है। इसलिए परदेवता तेजकी प्रकृति होनेपर
शाङ्करभाष्य
तच्च इतरभूतसहितं तेजो जीवस्य अस्माच्छरीरात्प्रवसत आश्रयभूतं स्वरूपतः परिमाणतश्च सूक्ष्मं भवितुमर्हति। तथा हि नाडीनिष्क्रमणश्रवणादिभ्योऽस्य सौक्ष्म्यमुपलभ्यते। तत्र तनुत्वात्संचारोपपत्तिः स्वच्छत्वाच्च अप्रतिघातोपपत्तिः अत एव च देहान्निर्गच्छत् पार्श्वस्थैर्नोपलभ्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — इसलिए दोष नहीं है
सूत्रार्थ --- ( अतः ) तेज - सूक्ष्म शरीर अतिसूक्ष्म होने के कारण ( उपमर्देन ) स्थूल शरीर के उपमर्दन से भी ( न ) उपर्मादित नहीं होता है।
इस देहसे प्रयाण करनेवाले जीवके अन्य भूतों सहित आश्रयभूत वह तेज स्वरूपसे और परिमाणसे सूक्ष्म होने योग्य है, क्योंकि नाड़ो मार्ग निष्क्रमण प्रतिपादक श्रुति आदिसे इसकी सूक्ष्मता उपलब्ध होती है। ऐसा होनेपर सूक्ष्म होनेसे उसकी संचारोपपत्ति और स्वच्छ होनेसे प्रतिघातोपपत्ति होती है। अतएव देह निष्क्रमण करता हुआ वह मुमूर्षु पार्श्वस्थ लोगोंसे उपलब्ध नहीं होता॥ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * संसारके मोक्ष पर्यंत बीजभाव युक्त सूक्ष्म अन्य
भूतोंके साथ सूक्ष्म तेजका परमात्मा में लय कहा गया है। अब एक और शङ्का उत्पन्न होती है कि लिङ्गात्मक तेजकी सूक्ष्म नाड़ीसे गति कैसे होती है और किसी मूर्त पदार्थसे उसका प्रतिघात क्यों नहीं होता, और देहसे उत्क्रमण करते समय वह दिखाई क्यों नहीं देता? इसपर भगवान् सूत्रकार ' सूक्ष्मम् ' इत्यादिसे कहते हैं | अतिसूक्ष्म होने के कारण उसका सूक्ष्म नाड़ीसे गमन होता है। उद्भूतरूप और उद्भूत स्पर्श न
होने के कारण और अतिस्वच्छ होने से दर्शन और प्रतिघातके योग्य नहीं है॥ ९
4.2.10 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १०
नोपमर्देनातः ॥ ४.२.१० ॥
शाङ्करभाष्य
अत एव च सूक्ष्मत्वात् नास्य स्थूलस्य शरीरस्योपमर्देन दाहादिनिमित्तेन इतरत्सूक्ष्मं शरीरमुपमृद्यते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अतएव - उस तेज - लिङ्गात्मक देहके सूक्ष्म होनेसे ही इस स्थूल शरीरके दाह आदि निमित्त से उपमर्दन होने से अन्य सूक्ष्म शरीर उपमदित नहीं होता॥ १०
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.२.१२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
4.2.11 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र ११
अस्यैव चोपपत्तेर् ऊष्मा ॥ ४.२.११ ॥
पदच्छेद — अस्य , एव , च , उपपत्तेः , एष , ऊष्मा
सूत्रार्थ — ( अस्यैव ) इस सूक्ष्म शरीर की ही ( एष ऊष्मा ) यह ऊष्मा है, ( उपपत्तेः ) क्योंकि उसकी स्थूलशरीरके स्पर्श होनेसे उपपत्ति होती है।
शाङ्करभाष्य
अस्यैव च सूक्ष्मस्य शरीरस्य एष ऊष्मा यमेतस्मिञ्जीवच्छरीरे संस्पर्शेनोष्माणं विजानन्ति। तथा हि मृतावस्थायाम् अवस्थितेऽपि देहे विद्यमानेष्वपि च रूपादिषु देहगुणेषु न ऊष्मा उपलभ्यते जीवदवस्थायामेव तु उपलभ्यते इत्यत उपपद्यते प्रसिद्धशरीरव्यतिरिक्तव्यपाश्रय एव एष ऊष्मेति। तथा च श्रुतिः उष्ण एव जीविष्यञ्शीतो मरिष्यन् इति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — और इस सूक्ष्म शरीरकी ही यह ऊष्मा है। जिस ऊष्माको इस शरीरमें संस्पशंसे जानते हैं, क्योंकि मृतावस्या में देहके अवस्थित होनेपर और देहके रूप
आदि गुण विद्यमान होनेपर भी ऊष्मा उपलब्ध नहीं होती जीवितावस्था में ही तो उपलब्ध होती है।
इस अन्वयव्यतिरेकसे यह उपपन्न होता है कि यही ऊष्मा प्रसिद्ध स्थूल शरीर से भिन्न शरीराश्रय है।
उसीप्रकार ' उष्ण एव ० ' ( जीवित होते यह शरीर उष्ण होता है और मृतक होते यह शीतल होता है
) यह श्रुति है॥११
(इस सूत्रकी दीपिका सूत्र ४.२.१२ की दीपिकामें सम्मिलित है।)
प्रतिषेधाधिकरणम्
4.2.12 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १२
प्रतिषेधाद् इति चेन् न शारीरात् स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ ४.२.१२ ॥
पदच्छेद — प्रतिषेधात् इति चेत् , न , शारीरात्
सूत्रार्थ — ( प्रतिषेधात् ) ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' इत्यादि श्रुति निर्गुण ब्रह्मवित् के शरीरसे उत्क्रमणका प्रतिषेध होनेसे उसकी उत्क्रान्तिका प्रतिषेध है, : ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( शारीरात् ) क्योंकि यह उत्क्रमण निषेध जीवसे है शरीरसे नहीं। इससे प्राणादि युक्त जीव और ब्रह्मवित्की उत्क्रान्ति है।
शाङ्करभाष्य
अमृतत्वं चानुपोष्य इत्यतो विशेषणात् आत्यन्तिकेऽमृतत्वे गत्युत्क्रान्त्योरभावोऽभ्युपगतः तत्रापि केनचित्कारणेन उत्क्रान्तिमाशङ्क्य प्रतिषेधति अथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो भवति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति इति। अतः परविद्याविषयात्प्रतिषेधात् न परब्रह्मविदो देहात् प्राणानामुत्क्रान्तिरस्तीति चेत् नेत्युच्यते यतः शारीरादात्मन एष उत्क्रान्तिप्रतिषेधः प्राणानाम् न शरीरात्। कथमवगम्यते न तस्मात्प्राणा उत्क्रामन्ति इति शाखान्तरे पञ्चमीप्रयोगात् संबन्धसामान्यविषया हि षष्ठी शाखान्तरगतया पञ्चम्या संबन्धविशेषे व्यवस्थाप्यते तस्मात् इति च प्राधान्यात् अभ्युदयनिःश्रेयसाधिकृतो देही संबध्यते न देहः न तस्मादुच्चिक्रमिषोर्जीवात् प्राणा अपक्रामन्ति सहैव तेन भवन्ति इत्यर्थः। सप्राणस्य च प्रवसतो भवत्युत्क्रान्तिर्देहादिति।। एवं प्राप्ते प्रत्युच्यते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' अमृतत्वं चानुपोष्य ' ( अविद्या आदि क्लेश समुदायका अत्यन्त दाह किए विना अमृतत्व आपेक्षिक है ) इस विशेषणसे आत्यन्तिक अमृतत्त्वयें गति और उत्क्रान्तिका अभाव स्वीकार किया गया है। उसमें भी किसी कारणसे उत्क्रान्ति विषयक आशङ्काकर प्रतिषेध करते हैं - ' अथाकामयमानो ० ' ( अथ - सकामकी संसारोक्तिके अनन्तर जो कामना करनेवाला नहीं है, अकाम, निष्काम, आकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता, वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ) अतः परविद्या विषयक प्रतिषेध होनेसे ब्रह्मज्ञानीकी देहसे प्राणोंकी उत्क्रान्ति नहीं है, ऐसा कहो, तो नहीं, ऐसा कहते हैं— क्योंकि प्राणोंकी यह उत्क्रान्तिका प्रतिषेध जीवात्मा से है शरीरसे नहीं। यह कैसे अवगत हो? इससे कि ' न तस्मात्प्राणा ο ', ' उससे प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) इस प्रकार अन्य शाखामें पञ्चमीका प्रयोग है। सम्बन्ध सामान्य विषयक षष्ठी ही शाखान्तरगत पञ्चमीसे सम्बन्ध विशेष में व्यवस्थापित होती है। ' तस्मात् ' ( उससे ) उसके साथ प्राधान्यसे अभ्युदय और निःश्रेयसमें अधिकृत देही सम्बन्धित होता है, देह नहीं। उस उत्क्रमणकी इच्छा करनेवाले जीवसे प्राण चले नहीं जाते, किन्तु उस जीवके साथ ही होते हैं, ऐसा अर्थ है || १२ ||
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — कि जिसके अविद्या आदि
' अमृतस्वं चानुपोष्य ' इस अनुपोष्य पदसे यह सिद्ध होता है क्लेश ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त नहीं हुए हैं, ऐसे सगुण उपासककी गति और
उत्क्रान्ति हैं और जिसके अविद्या आदि क्लेश तत्त्वज्ञानसे निवृत्त हो गए हैं उस ब्रह्मवित्की गति और उत्क्रान्ति नहीं हैं, क्योंकि ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' यह श्रुति है, ऐसा सिद्धान्त कहा गया है। अब इसपर पूर्वपक्षी आक्षेपसंगतिसे ' प्रतिषेधादिति ' इत्यादि आक्षेप करते हैं। ' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ' ( उस ब्रह्मवित् शरीरखे प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) यह सिद्धान्तके अनुसार काण्व श्रुतिका अर्थं है।
और ' न तस्मात्प्राणा उत्क्रामन्ति ' ( उस जीवसे प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) यह पूर्वपक्ष के अनुसार माध्यन्दिन श्रुतिका अर्थ है। इसप्रकार श्रुतियोंमें षष्ठी और पश्चमीके श्रवणसे सन्देह होता है कि ब्रह्मवि उत्क्रान्ति होती है कि नहीं? सिद्धान्त में ' न तस्य ' इस श्रुति के अनुसार उत्क्रान्तिका प्रतिषेध देहसे है, और पूर्वपक्ष में ' न तस्मात् ' इस श्रुति के अनुसार उत्क्रान्तिका प्रतिषेध देही- जीवात्मा से है।
इसलिए ' न तस्मात् ' यह माध्यन्दिन श्रुति ' न तस्य ' इस सामान्य सम्बन्ध प्रतिपादक काण्व श्रुतिकी अपादान सम्बन्ध विशेषमें व्यवस्थापना करती है अर्थात् ' उस ब्रह्मवित् के प्राण जीवात्मासे उत्क्रमण नहीं करते किन्तु देहसे करते हैं ' इसप्रकार दोनों श्रुतियोंसे यह सिद्ध होता कि जीवसे प्राण उत्क्रमण नहीं करते। इसलिए ब्रह्मवित्की भी देहसे उत्क्रान्ति होती है॥ १२
4.2.13 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १३
प्रतिषेधाद् इति चेन् न शारीरात् स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ ४.२.१३ ॥
पदच्छेद — स्पष्टः , हि , एकेषाम्
सूत्रार्थ — ( एकेषाम् ) काण्व शाखावालोंके मतमें परब्रह्मवित् के प्राणोंके शरीरसे उत्क्रमणका प्रतिषेध ( स्पष्टः ) स्पष्ट उपलब्ध होता है ( हि ) क्योंकि ब्रह्मवेत्ता के प्राणोंका देहसे उत्क्रमण नहीं होता।
शाङ्करभाष्य
अमृतत्वं चानुपोष्य इत्यतो विशेषणात् आत्यन्तिकेऽमृतत्वे गत्युत्क्रान्त्योरभावोऽभ्युपगतः तत्रापि केनचित्कारणेन उत्क्रान्तिमाशङ्क्य प्रतिषेधति अथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो भवति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति इति। अतः परविद्याविषयात्प्रतिषेधात् न परब्रह्मविदो देहात् प्राणानामुत्क्रान्तिरस्तीति चेत् नेत्युच्यते यतः शारीरादात्मन एष उत्क्रान्तिप्रतिषेधः प्राणानाम् न शरीरात्। कथमवगम्यते न तस्मात्प्राणा उत्क्रामन्ति इति शाखान्तरे पञ्चमीप्रयोगात् संबन्धसामान्यविषया हि षष्ठी शाखान्तरगतया पञ्चम्या संबन्धविशेषे व्यवस्थाप्यते तस्मात् इति च प्राधान्यात् अभ्युदयनिःश्रेयसाधिकृतो देही संबध्यते न देहः न तस्मादुच्चिक्रमिषोर्जीवात् प्राणा अपक्रामन्ति सहैव तेन भवन्ति इत्यर्थः। सप्राणस्य च प्रवसतो भवत्युत्क्रान्तिर्देहादिति।। एवं प्राप्ते प्रत्युच्यते
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ४.२.१४ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * यद्यपि ' न तस्मात् ' इस श्रुतिवालों के मतमें प्रधानरूपसे जीवका अपादानरूपसे ग्रहण है, तो भी देह और देहीकी अभेद विवक्षासे ' तस्मात् ' कहा गया है। ' तस्मात् ' इस पञ्चम्यन्त सर्वनाम ' तत् ' शब्द से देहका परामशंकर देहापादानक उत्क्रान्तिका प्रतिषेध है। इसलिए माध्यन्दिन शाखा' वालों को भी ' न तस्मात् ' इस ' तत् ' पदसे देहका ग्रहणकर उससे उत्क्रान्तिका प्रतिषेध करना चाहिए। ' न तस्य ' यहाँ काण्वशाखावालोंको अभेदोपचारकी अपेक्षा नहीं है। ' प्राप्तौ सत्यां निषेधः ( प्राप्ति होनेपर निषेध होता है ) इस न्यायसे भी देहसे उत्क्रान्ति प्राप्त है, अतः उससे ही प्रतिषेध युक्त हैं जीवसे नहीं। इसलिए ' ब्रह्मवित्के प्राणोंकी देहसे उत्क्रान्ति नहीं होती ' यह दोनों श्रुतियों का एक अर्थ है |
* यदि अविद्वान्के समान विद्वान्की भी गति और उत्क्रान्ति मानी जाय तो ' अथाकामयमान यो कामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मसन्ब्रह्माप्येति ' ' यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्मसमश्नुते ' ( कठ ० २ | ३ | १४ ) ( जिस ज्ञानावस्था में इस विद्वान्की हृदयस्थित समस्त कामनाएँ निवृत्त हो जाती हैं तब वह विद्वान् पुरुष अमृत होता है यहीं ब्रह्म होता हुआ ब्रह्मको प्राप्त होता है ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित गति बोर उत्क्रांतिका अभाव असंगत होगा। इसलिए अविद्वानुमें प्राप्त गति और उत्क्रान्तिका विद्वान्में अभाव है, क्योंकि गति और उत्क्रान्तिका हेतु मिथ्याज्ञान ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे निवृत्त हो जाता है, तब सर्वगत ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मवित्की गति और उत्क्रान्तिका असम्भव है॥१३
4.2.14 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १४
स्मर्यते च ॥ ४.२.१४ ॥
पदच्छेद — स्मर्यंते , च
सूत्रार्थ — और ' देवा अपि मार्गे मुह्यन्ति ' यह स्मृति मी ब्रह्मज्ञानीकी गति और उत्क्रान्तिका अभाव कहती है।
शाङ्करभाष्य
स्मर्यतेऽपि च महाभारते गत्युत्क्रान्त्योरभावः सर्वभूतात्मभूतस्य सम्यग्भूतानि पश्यतः। देवा अपि मार्गे मुह्यन्त्यपदस्य पदैषिणः इति। ननु गतिरपि ब्रह्मविदः सर्वगतब्रह्मात्मभूतस्य स्मर्यते शुकः किल वैयासकिर्मुमुक्षुरादित्यमण्डलमभिप्रतस्थे पित्रा चानुगम्याहूतो भो इति प्रतिशुश्राव इति न सशरीरस्यैव अयं योगबलेन विशिष्टदेशप्राप्तिपूर्वकः शरीरोत्सर्ग इति द्रष्टव्यम् सर्वभूतदृश्यत्वाद्युपन्यासात् न हि अशरीरं गच्छन्तं सर्वभूतानि द्रष्टुं शक्नुयुः तथा च तत्रैवोपसंहृतम् शुकस्तु मारुताच्छीघ्रां गतिं कृत्वान्तरिक्षगः। दर्शयित्वा प्रभावं स्वं सर्वभूतगतोऽभवत् इति। तस्मादभावः परब्रह्मविदो गत्युत्क्रान्त्योः गतिश्रुतीनां तु विषयमुपरिष्टाद्व्याख्यास्यामः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रयाण करनेवाले पुरुष के प्राणकी वह उत्क्रान्ति देहसे होती है,
ऐसा प्राप्त होनेपर उसका निराकरण करते हैं-
सिद्धान्ती - जो यह कहा गया है कि ब्रह्मवेत्ताकी भी देहसे उत्क्रान्ति होती है, क्योंकि उत्क्रान्ति प्रतिषेधमें जीव अपादान है, यह युक्त नहीं है, क्योंकि कुछ शाखावालोंके मतमें देह अपादान - देह से ही उत्क्रान्तिका प्रतिषेध स्पष्टरूपये उपलब्ध होता है। जैसे कि ' यत्रायं पुरुषो म्रियत ० ' ( हे याज्ञवल्क्य! जिस समय यह ब्रह्मवित् पुरुषं मरता है उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है वा नहीं?
) इसमें इसप्रकार आर्तभाग के प्रश्न होनेपर ' नेति होवाच याज्ञवल्क्यः ' ( याज्ञवल्क्यने कहा कि प्राण उत्क्रमण नहीं करते ) इसप्रकार अनुत्क्रान्ति पक्षका परिग्रहकर तब क्या यह प्राणों के अनुत्क्रान्त होने पर मरता नहीं?
इस आयङ्काके होनेपर ' अत्रैव समवनीयन्ते ' ( वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं ) इसप्रकार प्राणोंके प्रविलयकी प्रतिज्ञाकर उसकी सिद्धिके लिए ' स उच्छ्वयत्या ० ' ( वह फूल जता है अर्थात् बाह्य वायुको भीतर खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर निश्चेष्ट हो जाता है ) इस ' सः ’ ( वह ) शब्दसे परामृष्ट प्रकृत उत्क्रान्तिकी अवधिके उच्छ्वयन - फूलना आदि श्रुति कहती है। ये देहके होने चाहिए देहीके नहीं।
तत्सामान्यात् विद्या प्रकरणरूप साधर्म्य होनेसे उक्त श्रुति साथ एकार्थक होने से ' तस्मात्प्राणा ० ' ( उससे प्राण उत्क्रमण नहीं करते किन्तु परमात्मामें ही पूर्णरूपसे विलीन हो जाते हैं ) यहाँ भी अभेदोपचारखे देह अपादानक ही उत्क्रमणका प्रतिषेध जिनको पञ्चमी विभक्ति पाठ है उनको यद्यपि देहीका प्राधान्य है तो भी यह व्याख्या करनी चाहिए जिनके मत में षष्ठी विभक्ति पाठ है उनके मत में विद्वत्सम्बन्धी उत्क्रान्तिका प्रतिषेध है।
इसलिए ' तस्य ' इस वाक्यको प्राप्त उत्क्रान्तिका प्रतिषेधार्थक होनेसे वह देहापादानक प्रतिषिद्ध होती है, क्योंकि देह उत्क्रान्ति प्राप्त है देहीसे नहीं। और ' चक्षुष्टो वा मूर्ध्ना वा ० ' ( यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य मागसे बाहर निकलता है।
उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, पीछे उत्क्रमण करते हुए उस प्राणके पीछे सब वागादि प्राण उत्क्रमण करते हैं ) इसप्रकार अविद्वान् विषयक विस्तार सहित उत्क्रमण और संसारगमन दिखलाकर ' इति तु कायममान ' ( इसप्रकार कामना करनेवाला संसारको प्राप्त होता है ) इसप्रकार अविद्वान्की कथाका उपसंहारकर ' अथाकामयमानः ' ( अब जो न कामना करनेवाला है ) इस रीति से विद्वान्का व्यपदेशकर यदि उसके विषय में भी उत्क्रान्ति ही प्राप्त कराए तो यह व्यपदेश असंगत अयुक्त ही होगा।
इसलिए अविद्वानके विषय में प्राप्त हुई गति और उत्क्रान्तिका विद्वानके विषय में प्रतिषेध है, अतः व्यपदेशकी सार्थकता के लिए ऐसा आख्यान करना चाहिए। सवंगत ब्रह्मात्मभूत प्रक्षीण काम कर्मवाले ब्रह्मवित् की उत्क्रान्ति अथवा गति उपपन्न नहीं होती, क्योंकि उसके निमित्तका अभाव है।
' अत्र ब्रह्म समश्नुते ' ( यहाँपर ब्रह्म प्राप्त करता है ) इसप्रकार की श्रुतियां गति और उत्क्रान्तिका अभाव सूचित करती हैं | १३ | पदकी इच्छा करनेवाले देवगण भी उसके मार्ग में मोह प्राप्त करते हैं अर्थात् उसके मार्गका अभाव होनेसे उसे देव नहीं जानते ) इसप्रकार गति और उत्क्रान्तिके अभावकी यह स्मृति मी है।
परन्तु ' शुकः किल ० ' ( महर्षि वेदव्यास के पुत्र मुमुक्षु शुकदेवने आदित्य की ओर प्रस्थान किया उसके पीछे जाकर पिताने बुलाया तब उन्होंने ' मो ' ऐसा उत्तर दिया और उसने सुना ) इसप्रकार सवंगत ब्रह्मात्मभूत ब्रह्मवेत्ता की गतिकी भी स्मृति है। नहीं, योगबल से - अपरविद्याबलसे शरीरसहितका ही विशिष्ट देश प्राप्ति पूर्वक यह शरीरका त्याग है, ऐसा समझना चाहिए। क्योंकि सब प्राणियोंसे दृश्यत्व आदिको उपन्यास है। अथरीर जाते हुएको सब प्राणी देख नहीं सकते।
और ' शुकस्तु ० ' ( शुकदेव तो अन्तरिक्ष में जाकर पवनसे भी त्वरितगति करं और अपना प्रभाव दिखलाकर सर्वभूत गत हुए ) इसप्रकार वहाँपर ही उपसंहृत किया है। इससे परब्रह्मवेत्ताकी गति और उत्क्रान्तिका अभाव है। गति श्रुतियों का विषय हम आगे व्याख्यान करेंगे॥ १४
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * नोव्क्रामन्ति मुनेः प्राणा व्यापी सर्वगतो हि सः। तेन व्याप्तमिदं सर्वं कुत उत्क्रम्य यास्यति॥ '
( ब्रह्मवित् पुरुष के प्राण उत्क्रमण नहीं करते, क्योंकि वह सवंगत व्यापी है। उस ब्रह्मवित्से यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है, तो वह कहाँसे उत्क्रमण कर कहाँ जायगा ) इत्यादि स्मृति से भी विद्वानुकी गति और उत्कान्तिका अभाव स्पष्टरूपसे सिद्ध होता है। परन्तु तयोर्ध्वमावन्नमृतत्वमेति ' ( उस सुषुम्ना नाड़ीसे ऊध्वं जाकर अमृतत्वको प्राप्त होता है ) ' स एवैतान्ब्रह्म गमयति ' ( वह उनको ब्रह्मा के पास पहुँचाता है ) इत्यादि गति विषयक श्रुतियोंका विचार इस अध्यायके तृतीय पादमें करेंगे॥ १४
वागादिलयाधिकरणम्
4.2.15 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १५
तानि परे तथा ह्य् आह ॥ ४.२.१५ ॥
पदच्छेद — तानि परे , तथा हि आह । और महाभारत में ' सर्वभूतात्मभूतस्य ० ' ( सब भूतोंका जो आत्मरूप है और जिसको भूतों का सम्यक् अर्थात् आत्ममावसे ज्ञान है उसके लिए प्राप्य स्थान नहीं है ऐसे प्राप्य पदरहित ब्रह्मवेत्ताके
शाङ्करभाष्य
तानि पुनः प्राणशब्दोदितानि इन्द्रियाणि भूतानि च परब्रह्मविदः तस्मिन्नेव परस्मिन्नात्मनि प्रलीयन्ते कस्मात् तथा हि आह श्रुतिः एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति इति। ननु गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः इति विद्वद्विषयैवापरा श्रुतिः परस्मादात्मनोऽन्यत्रापि कलानां प्रलयम् आह स्म न सा खलु व्यवहारापेक्षा पार्थिवाद्याः कलाः पृथिव्यादीरेव स्वप्रकृतीरपियन्तीति इतरा तु विद्वत्प्रतिपत्त्यपेक्षा कृत्स्नं कलाजातं परब्रह्मविदो ब्रह्मैव संपद्यत इति तस्माददोषः।।
(इस भाष्यका अनुवाद सूत्र ४.२.१६ के अनुवादके साथ है।)
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * गत सूत्रमें परब्रह्मवेत्ताको गति बौर उत्क्रान्तिका प्रतिषेध होने से उसके प्राण आदि कलामों का भी यहीं पर विलय कहा गया है। इससे संशय होता है कि क्या यह प्राण व्यादि इन्द्रियोंका लय अपने - अपने उपादान पृथिवी आदिमें होगा कि परमात्मामें? क्योंकि विलय और प्रतिष्ठा प्रतिपादक दो विरोधी श्रुतियोंकी उपलब्धि होती है। ऐसी परिस्थिति में विकारका अपने - अपने उपादानकारणमें ही लय होता है।
इस न्यायसे अनुगृहीत ' गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः ' इत्यादि श्रुति से पूर्वपक्ष में प्राण आदि अपने अपने उपादानमें लय होते हैं। इस पूर्वपक्षको आागेके लिए छोड़कर प्रथम ' तानि ’ इत्यादिसे सिद्धान्त कहते हैं। ' स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्रां खं वायुज्र्ज्योतिरापः पृथिवोन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु नाम च॥ ' प्रश्न ० ६।४ ) ( उस अन्तर्यामी पुरुषने प्राण ( हिरण्यगर्भ ) को उत्पन्न किया।
उस प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, इन्द्रियपाँच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रिय, मन, व्रीहि, यव आदि अन्न, अन्नसे वीयं -सामध्यं, तप, कर्म के साधन - भूत ऋक्, यजु आदि मन्त्र, अग्निहोत्र आदि कर्म, कर्मोंके फलरूप लोक, उन लोकोंमें रहने वालोंके यज्ञदत्त आदि नाम, उनकी रचना की ) इसप्रकार षोडश कलाएँ हैं। ' गताः कला : ' इस श्रुति मन और प्राणको एक कर पन्द्रह कलाएं कही गई हैं।
वस्तुतः विद्वान्को दृष्टिसे कलाओं का परमात्मामें विलय होनेपर मी लोकदृष्टिसे प्रतिष्ठा में - प्रकृतिरूप पृथिवी आदिमें लय कथनका विरोध नहीं है। इससे कलाओंका अपनी - अपनी प्रकृतिमें उसके अनन्तर उन उपादानोंके साथ पुरुषमें लय होती हैं, यह दोनों श्रुतियोंका तात्पर्य है। इसलिए ' गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः ' यह श्रुति व्यवहारदृष्टिकी अपेक्षासे है और ' एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः ' यह श्रुति परमार्थदृष्टिकी अपेक्षा से है।
इस प्रकार दोनों श्रुतियोंका विषय भिन्न - भिन्न होने से कोई विरोध नहीं है।। १५
अविभागाधिकरणम्
4.2.16 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १६
अविभागो वचनात् ॥ ४.२.१६ ॥
पदच्छेद — अविभागः , वचनात् । पर ब्रह्मवेत्ता की प्राण शब्दले कथित वे इन्द्रियाँ और भूत उस परमात्मामें ही विलीन होते हैं | क्योंकि ' एवमेवास्य ० ' ( जिस प्रकार नदियाँ समुद्रमें पहुँचकर विलीन हो जाती हैं , उसी प्रकार
शाङ्करभाष्य
स पुनर्विदुषः कलाप्रलयः किम् इतरेषामिव सावशेषो भवति आहोस्विन्निरवशेष इति। तत्र प्रलयसामान्यात् शक्त्यवशेषताप्रसक्तौ ब्रवीति अविभागापत्तिरेवेति कुतः वचनात् तथा हि कलाप्रलयमुक्त्वा वक्ति भिद्येते तासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलो़ऽमृतो भवति इति। अविद्यानिमित्तानां च कलानां न विद्यानिमित्ते प्रलये सावशेषत्वोपपत्तिः। तस्मादविभाग एवेति।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अ ० ४ पा ०
सूत्रार्थ - ( तानि ) वे प्राणात्मक इन्द्रियां और भूत ( परे ) परमात्मा में ही लय होते हैं, ( हि ) क्योंकि ( तथा बाह ) वैसे ही ' एवमेवास्य ' इत्यादि श्रुति कहती है। इस सवं द्रष्टा की ये सोलह कलाएँ जिनका अधिष्ठान पुरुष ही है उस पुरुषको प्राप्त होकर लीन हो जाती हैं ) ऐसी श्रुति है। परन्तु ' गताः कलाः ० ' ( मोक्षकालमें देहारम्भक प्राण आदि पन्द्रह कलाएँ अपने - अपने आश्रयों में स्थित हो जाती हैं ) इसप्रकार विद्वद्विषयक अन्य श्रुतिने परमात्मासे अन्यत्र मी कलाओंका प्रलय कहा है। नहीं, क्योंकि पार्थिव आदि कलाएँ अपनी प्रकृति पृथिवी आदिमें ही विलीन होती हैं वह श्रुति व्यवहारकी अपेक्षासे है। परब्रह्मवेत्ताका सम्पूर्ण कलासमूह ब्रह्ममें ही विलीन होता है इसप्रकार दूसरी श्रुति तो विद्वत् प्रतिपत्तिकी अपेक्षासे है। इसलिए दोष नहीं है | १५।
सूत्रार्थ - ( अविभाग ० ) विद्वान्की कलाओं का ब्रह्मके साथ अत्यन्त अविभाग ही है। इसमें ( वचनात् ) क्योंकि ' भिद्येते तासां नामरूपे ' इत्यादि श्रुति वचन है।
* समाप्ता प्रासङ्गिकी पर विद्यागता चिन्ता। संप्रति त्वपरविद्याविषयामेव चिन्ता-
क्या विद्वान्का वह कला प्रलय अन्योंके - अविद्वानोंके कला प्रलयके समान सावशेष होता है अथवा निरवशेष? ऐसा संशय होनेपर प्रलयके सादृश्यसे शक्ति अवशेष होती है ऐसा प्रसक्त होने पर, सिद्धान्ती - कहते हैं -अविभागसे ही प्राप्त होता है। किससे? इससे कि ऐसा श्रुतिवचन है। जैसे कि कलाप्रलय कहकर ' मिद्येते तासां नामरूपे ० ' ( उन कलाओंका नाम - रूप नष्ट हो जाता है और अनष्टतत्त्वको ब्रह्मवेत्ता ' पुरुष ' ऐसा कहते हैं वह कालाहीन छोर अमृत हो जाता है ) ऐसा कहती है, अविद्या निमित्तक कलाओंका विद्यानिमित्तक प्रलय होनेपर उनकी सावशेषत्व उपपत्ति नहीं होती है इसलिए अविभाग ही है॥ १६
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * उक्त लयको स्पष्ट करनेके लिए ' अविभागो वचनात् ' इस सूत्र की रचना है। सावशेष और निरवशेष इस भेदी प्रलय दो प्रकारका होता है। कारणको छोड़कर केवल कार्यं लय वह सावशेष लय कहा जाता है जैसे सुषुप्ति आदि अवस्थामें होता है। कारण सहित कार्यका लय वह निरवशेष लय कहा जाता है। जैसे रज्जु ज्ञानसे मिथ्याज्ञानको निवृत्ति होनेपर मिध्यास आदिकी निवृत्ति होती है। यहाँ दोनों विकल्पोंके होनेपर संशय होता है। पूर्वपक्षी - प्रलयके सादृश्य होनेसे विद्वान्का कलाप्रलय मी अविद्वान् कलाप्रलयके समान सावशेष होता है। इसलिए पूर्वपक्षमें विद्वान्की मुक्ति असिद्ध है, सिद्धान्तमें निरवशेष कलाप्रलय होनेपर विद्वान्की मुक्ति सिद्ध है। सिद्धान्ती - ' ब्रवीति ' आदिसे कहते हैं॥ १६
तदोकोऽधिकरणम्
4.2.17 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १७
हार्दानुगृहीतः शताधिकया ॥ ४.२.१७ ॥
पदच्छेद — तदोकोग्रज्वलनम् , तत्प्रकाशितद्वारः , विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगात् । च , हार्दानुगृहीतः शताधिकया
सूत्रार्थ — ( तदोकोग्रज्वलनम् ) इस शरीरसे उत्क्रमण करनेवाले विद्वान्के आयतनरूप हृदयके मागमें प्रकाश हो जाता है। ( तत्प्रकाशितद्वार। ) उस प्रकाशसे प्रकाशित द्वारवाला वह विद्वान् ( विद्यासामर्थ्यात् ) सगुण ब्रह्मविद्याकी सामथ्यं से ( तच्छेष गस्य नु स्मृतियोगाच्च ) विद्याके अङ्गभूत ब्रह्मलोक गमन विषयक स्मरण करता हुआ ( हार्दानुगृहीत ) हृदयस्थ परमेश्वरसे अनुगृहीत होता हुआ ( शताधिकया ) एक सौ एकवीं मूर्धन्य नाड़ीसे निष्क्रमण करता है।
शाङ्करभाष्य
तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात्तच्छेष गत्यनुस्मृतियोगाच्च मनुवर्तयति। समाना चासृत्युपकमाद्विद्वदविदुषोरुत्कान्तिरित्युक्तम्, तमिदानीं सृत्युपक्रमं दर्शयति, तस्योपसंहृतवागादि कलापस्यो च्चिक्रमिषतो विज्ञानत्मनः, ओक आयतनं हृदयम्। ' स एतास्तेजोमात्रा समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति ' इति श्रुतेः।
तद्ग्रप्रज्वलनपूविका चक्षुरादिस्थानापादाना चोत्कान्तिः श्रूयते- ' तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष भामा निष्क्रामति चक्षुष्टो वा मूर्ध्नो वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः ' ( बृह ० ४।४।२ ) इति। सा किमनियमेनैव विद्वदविदुषोर्भवति, अथास्ति कश्चिद्विदुषो विशेषनियम इति विचिकित्सायां श्रुत्यविशेषादनियमप्राप्ताचाचष्टे समानेऽपि हि विद्वदविदुषोदयाप्रप्रद्योतने तत्प्रकाशि तद्वायत्वे च मूर्धस्थानादेव विद्वान्निष्क्रामति स्थानान्तरेभ्यस्त्वितरे। * कुतः? विद्यासामर्थ्यात्।
यदि विद्वान पीतवद्यतः कुतश्चिद्द हदेशादुरकामेन्नैवोत्कृष्टुं लोकं लभेत। तत्रानर्थिकैच विद्या स्यात्। तच्छेवगत्यनुस्मृतियोगाच्च। विद्याशेषभूता च मूर्धन्यनाडो संबद्धा गतिरनुशोलयितव्या विद्याविशेषेषु विहिता, तामभ्यस्यंस्तयैव प्रतिष्ठत इति युक्तम्। तस्माद्धदयालयेन ब्रह्मणा खूणसितेनानुगृहीतस्तद्भावं समापन्नो विद्वान्मूर्धन्ययैव शताधिकया मेति विवङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ' ( छा ० ८ | ६ | ६ ) इति॥ १७
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — प्रसङ्ग प्राप्त परविद्यागत विचार समाप्त हुआ। अब तो सूत्रकार अपरविद्या विषयक विचारकी अनुवृत्त करते हैं। यह कहा जा चुका है कि अचिरादि मार्गके उपक्रम तक उपासक और अनुपासक की उत्क्रान्ति समान होता है। अब मार्ग उपक्रमको दिखलाते हैं। उपसंहृत वागादि समूहवाले उत्क्रमण करनेकी इच्छावाले उस जीवात्माका ओक - आयतन हृदय है, क्योंकि ' स एतास्तेजो मात्राः ० ' ( वह जीवात्मा इस तेजके अवयव चक्षु आदि इन्द्रियोंका उपसंहार करता हुआ हृदयमें प्राप्त होता है ) ऐसी श्रुति है।
उस हृदयके अग्र मागका प्रज्वलन - प्रकाश होता है, उस हृदयाग्रभाग प्रज्वलन पूर्विका चक्षु आदि स्थानोंसे उसकी उत्क्रान्ति होती है, कारण कि ' तस्य हैतस्य ० ' ( उस इस हृदयका अग्रभाग प्रकाशित होता है, उसी प्रकाशखे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य भागसे बाहर निकलता है ) ऐसी श्रुति है।
क्या वह उत्क्रान्ति अनियमसे विद्वान् और अविद्वानुकी होती है अथवा विद्वान् के लिए कोई विशेष नियम है, ऐसा संशय होनेपर श्रुति अविशेष अनियम प्राप्त होनेपर सि ० - कहते हैं - विद्वान् और अविद्वान्के हृदय नाड़ीमुखका प्रद्योतन और उससे प्रकाशित हुआ द्वार - समान होनेपर मो विद्वान् मूर्धस्थानसे ही निष्क्रमण करता है और अन्य अनुपासक अन्य स्थानोंसे निष्क्रमण करते हैं। किससे? विद्याको सामथ्र्यमे।
यदि विद्वान् भी अन्य के समान जिस किसी देहभाग से उत्क्रमण करे तो उत्कृष्ट लोक प्राप्त न करेगा, तो ऐसी परिस्थितिमें विद्या अनर्थक ही होगी, क्योंकि सगुणविद्याको शेषभूत गतिको अनुस्मृतिका सम्बन्ध है। विद्याकी शेषभूत और मूर्धन्य नाड़ीसे सम्बद्ध विद्यादिशेषों में विहित गतिका अनुशीलन - ध्यान करना चाहिए। उस गतिका चिन्तन करता हुआ उसीसे प्रस्थान करता है, यह युक्त है।
इससे हृदयस्थान स्थित और सम्यक् रूपसे उपासित ब्रह्मसे अनुगृहीत हुआ उसके मावको प्राप्त हुआ विद्वान् सौ से अतिरिक्त सौ से भिन्न एक सौ एकड़ों मूर्धन्य नाड़ीसे निष्क्रमण करता है, अन्य अनुपासक अन्य नाड़ियोंसे निष्क्रमण करते शतादतिरिक्तयैकशततम्या नाड्या निष्क्रामतीतराभिरितरे। तथा हि- हार्दविद्यां प्रकृत्य समामनन्ति – ' शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानममिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वहैं, क्योंकि हार्दविद्याको प्रस्तुत कर ' शतं चैका ० ' ( हृदयकी एक सौ एक मुख्य नाड़ियाँ हैं।
उनमें एक मूर्धाकी ओर निकल गई है, उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला जीव अमृतत्वको प्राप्त होता है, शेष नाड़ियां नाना गतिको देनेवाली केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं ) ऐसा कहते हैं॥ १७
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * इस अधिकरणमें सगुण उपासक और अनुपासककी उत्कान्ति आदि विषयक विचार किया जाता है। नाड़ी प्रवेशके नियमको कहनेके लिए सूत्रभागकी व्याख्याद्वारा ' तस्य ' इत्यादिसे अघिकरणका विषय कहते हैं। ' चक्षुष्टो वा मूनों वा ' ( नेत्रसे अथवा मूर्धासे ) इस प्रकारकी अनियमित वि और ' तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति ' ( उस मूर्धन्य नाड़ी द्वारा निष्क्रमणकर अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इस विशेष श्रुति होनेसे संशय होता कि उपासक और अनुपासककी उत्कान्ति समान होती है अथवा विद्वानके लिए कोई विशेष नियम है। पूर्वपक्ष में- उपासककी भी अनुपासक के समान अनियमसे उत्क्रान्ति होती है। सिद्धान्त में --- विद्वान्को उपासनाको सामथ्यंचे एक सौ एकवों मूर्धन्य नाड़ीसे उत्क्रान्ति होती है।
* यद्यपि हृदयसे अनन्त नाड़ियाँ निकलती हैं, तो भी उनमें एक सौ एक मुख्य हैं, उनमें भो एक सुषुम्ना नाड़ी मुख्य है, वह हृदयसे निकलकर दक्षिण नेत्र, तालु, कण्ठाध, स्तन, नासिका, मध्यभीतिसे ब्रह्मरन्ध्रको पहुँचकर सूर्य किरणोंसे एकरूप होकर व्यादित्यमण्डलमें प्रविष्ट होती है। इस प्रकार ब्रह्मनाड़ीका ध्यान करनेवाला उपासक अन्तकालमें उसीसे उत्क्रमण करता है॥ १७
रश्म्यधिकरणम्
4.2.18 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १८
रश्म्यनुसारी ॥ ४.२.१८ ॥
सूत्रार्थ — सुषुम्ना नाड़ीद्वारा देहसे उत्क्रमण किया हुआ उपासक नाड़ीसे सम्बद्ध सूर्य किरणोंका अनुसारी होता हुआ ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।
शाङ्करभाष्य
अस्ति हार्दविद्या अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म इत्युपक्रम्य विहिता तत्प्रक्रियायाम् अथ या एता हृदयस्य नाड्यः इत्युपक्रम्य सप्रपञ्चं नाडीरश्मिसंबन्धमुक्त्वा उक्तम् अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते इति पुनश्चोक्तम् तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति इति तस्मात् शताधिकया नाड्या निष्क्रामन् रश्म्यनुसारी निष्क्रामतीति गम्यते। तत् किम् अविशेषेणैव अहनि रात्रौ वा म्रियमाणस्य रश्म्यनुसारित्वम् आहोस्विदहन्येव इति संशये सति अविशेषश्रवणात् अविशेषेणैव तावत् रश्म्यनुसारीति प्रतिज्ञायते।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — ' अथ यदिदमस्मिन् ० ' ( अब इस ब्रह्मपुरके भीतर जो यह सूक्ष्म कमलाकार स्थान है ) इसप्रकार उपक्रमकर हार्दविद्या विहित है। उसके प्रकरणमें ' अथ या एता ० ' ( अब ब्रह्मोपासनाके स्थान कमलाकार हृदयकी जो ये वक्ष्यमाण नाड़ियाँ हैं ) इस प्रकार आरम्भकर सविस्तार नाड़ी और रश्मिसम्बन्धको कहकर ‘ अथ यत्रैतद ० ' ( पुनः जिस समय यह उपासक इस शरीरसे उत्क्रमण करता है उस समय इन किरणोंसे ही ऊष्वंको जाता है ) ऐसा कहा गया है। और पुनः ' तयोर्ध्वमाय ० ' ( उसके द्वारा ऊपर की ओर जानेवाला जीव अमृतत्वको प्राप्त होता है ) इस प्रकार कहा गया है। इसलिए एक सौ एकवीं नाड़ीसे निष्क्रमण करता हुआ रश्मिके अनुसारी निष्क्रमण करता है, ऐसा ज्ञात होता है। तो क्या अविशेषसे ही दिन अथवा रात्रिमें वह त्रियमाण रश्मि अनुसारी होता है अथवा दिनमें ही? ऐसा संशय होनेपर अविशेष श्रुतिसे अविशेषसे ही रश्मिका अनुसारी होता है, ऐसी प्रतिज्ञा की जाती है॥ १८
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — # ब्रह्मनाड़ी से निष्क्रान्त पुरुषका रश्मिके अनुसार ऊर्ध्वं गमन रात्रिमें भी समान है। उस निर्णय के लिए ' रम्यनुसारी ' इस सूत्र की रचना है। म्रियमाणके मरनेका समय निश्चित नहीं है, और रात में सूर्यके न होनेसे रश्मियोंका अभाव भी स्वाभाविक है, तब ऐसी परिस्थितिमें संशय होता है कि क्या उत्कान्त उपासक दिन अथवा रातमें अविशेषरूपसे रश्मिका अनुसारी होता है अथवा केवल दिन में? पूर्वपक्ष में- रात्रिमें मृत्तक उपासकको रश्मिकी प्राप्ति के लिए सूर्योदयकी प्रतीक्षा आवश्यक है। अतः दिनमें उत्क्रान्त उपासक ही रश्मि अनुसारी होता है। सिद्धान्तमें-- ' तयोर्ध्वमायन्नमृतत्व मे ति इस प्रकारकी अविशेष श्रृतिके होनेसे दिन अथवा रात्रि किसी समय भी उत्क्रान्त उपासक रश्मि अनुसारी होता है॥ १८
4.2.19 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र १९
निशि नेति चेन् न सम्बन्धस्य यावद्देहभावित्वाद् दर्शयति च ॥ ४.२.१९ ॥
पदच्छेद — निशि , न , इति चेत् , न , सम्बन्धस्य , यावद्देहमावित्वात् , दर्शयति , च
सूत्रार्थ — दिन में नाड़ी रश्मि सम्बन्ध होनेसे दिनमें ही उत्क्रान्त उपासक रश्मि अनुसारी होता है, ( निशि ) रात्रिमें नाड़ी रश्मि सम्बन्ध न होनेसे उत्क्रान्त उपासक ( न ) रश्मि अनुसारी नहीं होता ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है। ( सम्बन्धस्य यावद्देह भावित्वात् ) क्योंकि नाड़ी रश्मि सम्बन्ध यावद्देहभावी है, ( दर्शयति ) ' अमुष्मादादित्यात् ' यह श्रुति दिखलाती है।
शाङ्करभाष्य
अस्ति अहनि नाडीरश्मिसंबन्ध इति अहनि मृतस्य स्यात् रश्म्यनुसारित्वम् रात्रौ तु प्रेतस्य न स्यात् नाडीरश्मिसंबन्धविच्छेदात् इति चेत् न नाडीरश्मिसंबन्धस्य यावद्देहभावित्वात् यावद्देहभावी हि शिराकिरणसंपर्कः दर्शयति चैतमर्थं श्रुतिः अमुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः इति निदाघसमये च निशास्वपि किरणानुवृत्तिरुपलभ्यते प्रतापादिकार्यदर्शनात् स्तोकानुवृत्तेस्तु दुर्लक्ष्यत्वम् ऋत्वन्तररजनीषु शैशिरेष्विव दुर्दिनेषु अहरेवैतद्रात्रौ दधाति इति च एतदेव दर्शयति। यदि च रात्रौ प्रेतः विनैव रश्म्यनुसारेण ऊर्ध्वमाक्रमेत रश्म्यनुसारानर्थक्यं भवेत् न ह्येतत् विशिष्य अभिधीयते यो दिवा प्रैति स रश्मीनपेक्ष्योर्ध्वमाक्रमते यस्तु रात्रौ सोऽनपेक्ष्यैवेति अथ तु विद्वानपि रात्रिप्रायणापराधमात्रेण नोर्ध्वमाक्रमेत पाक्षिकफला विद्येति अप्रवृत्तिरेव तस्यां स्यात् मृत्युकालानियमात् अथापि रात्रावुपरतोऽहरागमम् उदीक्षेत अहरागमेऽप्यस्य कदाचित् अरश्मिसंबन्धार्हं शरीरं स्यात् पावकादिसंपर्कात् स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छति इति च श्रुतिः अनुदीक्षां दर्शयति। तस्मात् अविशेषेणैव इदं रात्रिंदिवं रश्म्यनुसारित्वम्।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — दिनमें नाड़ी और रश्मिका सम्बन्ध है, अतः दिनमें मृत विद्वान् रश्मि अनुसारी हो सकता है, किन्तु रात्रि में मृतक रश्मि अनुसारी नहीं हो सकता, क्योंकि रात्रिमें नाड़ी और रश्मिका सम्बन्ध विच्छिन्न होता है। सि ० - ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं है, कारण कि नाड़ो और रश्मि सम्बन्ध यावाद हावी है, जब तक देह विद्यमान है तब तक नाड़ी और रश्मिका सम्बन्ध है।
इस अर्थको ' अमुष्मादादित्यात्प्रता यन्ते ० ' ( वे रश्मियाँ निरन्तर उस मादित्य मण्डलसे फैलती हैं और इन नाड़ियों में प्रवेश करती हैं और इन नाड़ियोंसे फैलती हैं वे उस आदित्यमण्डल में प्रवेश करती हैं ) यह श्रुति दिखलाती है। ग्रीष्मकालमें रात्रियों में भी किरणों की अनुवृत्ति उपलब्ध होती है, क्योंकि ताप आदि कार्य देखने में आता है। शिशिर ऋतुके दुर्दिनोंके - मेघाच्छन्न दिनोंके समान अन्य ऋतुयोंकी रात्रियोंमें किरणोंकी अल्प अनुवृत्ति होने से वे दुर्लक्ष्य हैं।
' अहरेवैतद्रात्रौ दधाति ' ( सूर्य ही यह ताप रात्रि में धारण करता है ) यह श्रुतिमी यही दिखलाती है। यदि रात्रिमें मृतक रश्मि अनुसारके विना ही ऊर्ध्वं आक्रमण - गमन करे तो रश्मिका अनुसार अनर्थक होगा। श्रुति इस प्रकार यह विशेषकर अभिघान नहीं करती कि जो दिनमें मरता है वह रश्मिकी अपेक्षा कर ऊध्वं आक्रमण करता है जो रात्रिमें मरता है वह रश्मिकी अपेक्षा न कर ही ऊर्ध्वं आक्रमण करता है।
यदि विद्वान् मी रात्रि प्रायणके अपराधमात्र से ऊर्ध्वगमन - प्रक्रमण नहीं करे तो विद्या पाक्षिक फलवाली होगी, इससे उसमें प्रवृत्ति न होगी, क्यों, मृत्युसमयका अनियम है। यदि रात्रिमें मृतक दिन आगमनकी प्रतीक्षा करे तो दिनके आगमन होनेपर भी कदाचित् इसका शरीर अग्नि आदिके सम्पर्कसे रश्मिसम्बन्धके अयोग्य होगा, ' स यावत्क्षियेन्मनः ० ' ( वह जितने समय में मनकी प्रेरणा करता है उतने ही समय में आदित्य में पहुँचता है ) इस प्रकार यह श्रुति अप्रतीक्षा दिखलाती है।
इसलिए अविशेषसे ही यह रात्रि और दिन में रश्मिका अनुसरण होता है॥ १ ९
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * विद्याका फल पाक्षिक - केवल दिनमें मृत उपासक रश्मि अनुसारी होता है। ऐसा नहीं है, किन्तु दिन अथवा रातमें मृत उपासक मी विद्याकी सामर्थ्यंसे रश्मि अनुसारी होकर ऊर्ध्वं गमन करता है॥ १ ९
दक्षिणायनाधिकरणम्
4.2.20 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २०
अतश् चायनेऽपि दक्षिणे ॥ ४.२.२० ॥
पदच्छेद — अतः , च , आयने , अपि , दक्षिणे
सूत्रार्थ — ( अतश्च ) और प्रतीक्षाकी उपपत्ति न होने से ( दक्षिणे - आयनेऽपि ) दक्षिणायनमें भी मृत उपासकको विद्याका फल प्राप्त होता है।
शाङ्करभाष्य
अत एव च उदीक्षानुपपत्तेः अपाक्षिकफलत्वाच्च विद्यायाः अनियतकालत्वाच्च मृत्योः दक्षिणायनेऽपि म्रियमाणो विद्वान् प्राप्नोत्येव विद्याफलम्। उत्तरायणमरणप्राशस्त्यप्रसिद्धेः भीष्मस्य च प्रतीक्षादर्शनात् आपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासांस्तान् इति च श्रुतेः अपेक्षितव्यमुत्तरायणम् इतीमामाशङ्काम् अनेन सूत्रेणापनुदति प्राशस्त्यप्रसिद्धिः अविद्वद्विषया भीष्मस्य प्रतिपालनम् आचारपरिपालनार्थं पितृप्रसादलब्धस्वच्छन्दमृत्युताख्यापनार्थं च। श्रुतेस्तु अर्थं वक्ष्यति आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् इति।। ननु च यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ इति कालप्राधान्येन उपक्रम्य अहरादिकालविशेषः स्मृतावनावृत्तये नियतः कथं रात्रौ दक्षिणायने वा प्रयातोऽनावृत्तिं यायात् इत्यत्रोच्यते
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — अत एव प्रतिक्षाकी अनुपपत्ति विद्यफलके अपाक्षिक और मृत्युके अनियमित काल होनेसे दक्षिणायनमें भी म्रियमाण विद्वान् विद्याफलको प्राप्त होता ही है। उत्तरायणमें मरणकी प्रशस्ता प्रसिद्ध होनेसे और भीष्मको प्रतीक्षा दर्शनसे और ' आपूर्यमाणपक्षा ० ' ( शुक्ल पक्षाभिमानी देवता से उत्तरायणके छः मासोंको प्राप्त होता है ) इस श्रुतिसे मी उत्तरायण अपेक्षितव्य है, इस शङ्काको इस सूत्रसे दूर करते हैं। प्राशस्त्यप्रसिद्धि अविद्वद्विषयक है। मोष्मकी उत्तरायण प्रतीक्षा तो आचारके प्रतिपालन के लिए और पिता शान्तनुके प्रसादसे प्राप्त स्वेच्छा से मृत्यु दिखलाने के लिए है। श्रुतिका अथं तो, ' भातिवाहिकास्त लिङ्गात् ' इस सूत्रमें कहेंगे॥ २०
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * विद्वानुका दक्षिणायनमें मरण इस अधिकरणका विषय है। अब इसपर विचार किया जाता है - दक्षिणायनमें म्रियमाण विद्वान् विद्याफल प्राप्त करता है कि नहीं? यह सन्देह इसलिए होता है कि विद्याका फल नित्यके समान श्रुत है और उत्तरायण मरण दक्षिणायन मरणसे प्रशस्त कहा गया है। इसप्रकार सन्देह होनेपर पूर्वोक्त हेतुओंका ' अतश्च ' इस सूत्र से अतिदेश करते हैं। यदि विद्वान् केवल उत्तरायणमरणये विद्याका फल प्राप्त करता है और दक्षिणायन मरणसे नहीं, तो विद्याका फल पाक्षिक हुआ, इससे विद्यामें प्रवृत्ति नहीं होगी, इसलिए विद्याका फल नित्यके समान पूर्व अधिकरणमें कहा गया है। यदि अज्ञानियोंका देववश उत्तरायण मरण हो तो वह दक्षिणायन मरणसे प्रशस्त है। ' आपूयर्माणपक्षा ० ' यह जो श्रुति कही गई है वह काल विशेषका ज्ञान कराने के लिए नहीं है। किन्तु ' आतिवाहिका ' देवताओंका प्रतिपादन करती है। इसलिए दक्षिणायन में मृत विद्वान् मी विद्याकी सामथ्यसे विद्याके फल ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ २०
4.2.21 · चतुर्थ अध्याय द्वितीय पाद सूत्र २१
योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते ॥ ४.२.२१ ॥
पदच्छेद — योगिनः , प्रति , च , स्मयंते , स्मार्ते , च , एते
सूत्रार्थ — ( योगिनः प्रति ) योगीके प्रति अह आदि कालका विनियोग अनावृत्तिके लिए ( स्मर्यते ) स्मरण किया जाता है। ( स्मार्ते चैते ) और यह दोनों गति सांख्य और योग में भी प्रतिपादित है।
शाङ्करभाष्य
योगिनः प्रति च अयम् अहरादिकालविनियोगः अनावृत्तये स्मर्यते स्मार्ते चैते योगसांख्ये न श्रौते अतो विषयभेदात् प्रमाणविशेषाच्च नास्य स्मार्तस्य कालविनियोगस्य श्रौतेषु विज्ञानेषु अवतारः। ननु अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् इति च श्रौतावेतौ देवयानपितृयाणौ प्रत्यभिज्ञायेते स्मृतावपीति उच्यते तं कालं वक्ष्यामि इति स्मृतौ कालप्रतिज्ञानात् विरोधमाशङ्क्य अयं परिहारः उक्तः। यदा पुनः स्मृतावपि अग्न्याद्या देवता एव आतिवाहिक्यो गृह्यन्ते तदा न कश्चिद्विरोध इति।। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ शारीरकमीमांसासूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः।।
भाष्यका हिन्दी अनुवाद — परन्तु ' यन्त्र काले ० ' ( हे अर्जुन! जिस कालमें शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन अनावृत्ति गति और आवृत्ति गतिको मी प्राप्त होते हैं, उस काल - मार्गको कहूंगा ) इसप्रकार कालको प्रधानता से उपक्रमकर अह ( दिन ) आदि कालविशेष अपुनरावृत्ति के लिए स्मृतिमें नियमित किया है, तो रात में अथवा दक्षिणायनमें प्रायण करनेवाला अनावृत्तिको किसप्रकार प्राप्त होगा? इसपर कहते हैं-
योगी प्रति यह यह आदि कालका विनियोग अनावृत्तिके लिए है, ऐसी स्मृति है। और यह दोनों योग और सांख्य स्मृतिवचन हैं न कि श्रुतिवचन। इसलिए विषय भेदसे और प्रमाणविशेषसे इस स्मार्तकाल विनियोगका श्रौत उपासनाओं में अवतरण नहीं है। परन्तु ' अग्निर्ज्योतिरह ० ' ( अग्नि, ज्योतिः, अहः, शुक्लपक्ष, षड्मास, उत्तरायण, धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और षड्मास, दक्षिणायन ) इसप्रकार ये श्रौत देवयान और पितृयान स्मृतिमें भी प्रत्यभिज्ञात होते हैं। कहते हैं . ' तं कालं वक्ष्यामि ' ( उस काल - मागंको कहूँगा ) इसप्रकार स्मृतिमें कालके प्रतिज्ञान होनेसे विरोधकी आयङ्काकर परिहार कहा गया है। परन्तु जब स्मृतिमें भी अग्नि आदि देवताओंका आतिवाहिकरूपसे ही ग्रहण किया जाय तो कोई विरोध नहीं है।। २१
सत्यानन्दी दीपिका · स्वामी सत्यानन्द सरस्वती — * स्मृतिके बाधारपर कालकी प्रधानताको लेकर ' ननु ' इत्यादिसे शङ्का की गई है। अब स्मृति में काल वाचक ' अहं ' आदि शब्द अग्नि आदि व्यातिवाहिक देवता वाचक हैं, इस अर्थको ' योगिनः प्रति ' इस सूत्र से कहते हैं। यहाँपर श्रीत और स्मात भेदसे विचार किया जाता है— दहर आदि श्रोत उपासकोंको फल प्राप्तिके लिए कालकी प्रतीक्षा नहीं है 1
। स्मातं योगियोंके लिए तो कालकी अपेक्षा स्मृतिमें कही गई है, क्योंकि स्मात योगी दहर बादि श्रोत उपासक नहीं होते, किन्तु अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निराग्निर्न चाक्रियः॥ ( गी ० ६।१ ) ( हे अर्जुन! जो पुरुष कर्मफलको न चाहता हुआ कर्तव्य कर्म करता है वह संन्यासी और योगी है और केवल अग्निहोत्र आदि कर्मका त्याग करनेवाला संन्यासी और योगी नहीं है ) इसप्रकार भगवद् आराधनके लिए अनुष्ठित कर्म योग है।
धारणापूर्वक जो अकर्तृत्वानुभव है, उसे ' इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ' ( गीता ० ५१ ९ ) ( चक्षु आदि इन्द्रियाँ अपने अपने रूप आदि विषयोंमें वतं रही हैं इसप्रकार समझा हुआ निःसन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ मो नहीं करता हूँ ) इत्यादिसे सांख्य कहते हैं। इसप्रकार योग और सांख्य दोनों स्मृति प्रतिपादित हैं श्रुति प्रतिपादित नहीं हैं | इस तरह श्रुति और स्मृतिका विषय भिन्न - भिन्न होने से कोई विरोध नहीं है।
यदि यहाँ काल शब्द आतिवाहिक देवताके लिए माने तो श्रुति और स्मृति दोनोंमें कोई विरोध नहीं है। अग्नि आदि नामवाले देवता हैं जो सगुण उपासकोंको ऊध्वं लोकों में ले जाते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि दक्षिणायनमें भी मृत सगुण उपासक विद्याको सामथ्यं से फल - ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ २१
उपसंहार
ये सूत्र जीवात्मा की सूक्ष्म प्रकृति और उसकी ब्रह्म में लीन होने की यात्रा को तार्किक रूप से स्पष्ट करते हैं। इसमें इंद्रियों से मन और फिर प्राण तक की सूक्ष्मता का क्रमबद्ध विकास दिखाया गया है, जो अंततः मोक्ष की प्राप्ति का आधार बनता है। इन विवेचनों के माध्यम से साधक को देह-अभिमान से मुक्त होकर शुद्ध चेतना में स्थित होने का मार्ग प्राप्त होता है।
In English
Brahma Sutra: The Process of Mental Dissolution
This commentary explains verses from the Brahma Sutra, fourth chapter, second section. It describes how the functions of speech, senses, and mind dissolve into one another—from speech to mind, then mind to vital breath (prana)—to prepare the practitioner for higher spiritual states.
This article answers
- Brahma sutra 4.2.1 meaning?
- How does speech dissolve into the mind in vedanta?
- Process of prana and manas dissolution brahma sutra?
- Brahma sutra 4.2.2 explanation?
- Brahma sutra 4.2.3 summary?