श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, द्वादशोऽध्यायः

49 मूल पद्य

यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके द्वादशोऽध्यायः — विद्याऽविद्यानिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।

द्वादशोऽध्यायः — विद्याऽविद्यानिर्णयः

अध्याय-सार — विद्या-अविद्या-निर्णय — ग्रन्थका उपसंहार। वेदशास्त्रसे भिन्न कोई शास्त्र नहीं; सब शास्त्र उसीसे निकले हैं, और ऋषियोंने उन्हें इसलिए रचा कि वेद दुर्बोध है (१२.१–२)। चौदह विद्यास्थान हैं; सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत ‘अतिप्रमाण’ हैं, जिनके कर्ता कपिल, हिरण्यगर्भ, नारायण, अपान्तरतमा और शिव हैं (१२.३–८)। बौद्ध, लोकायत आदि वेदबाह्य मत तामस हैं, और उनका ‘शरीर ही देवता है, परलोक नहीं’ वाला भाव आसुर है (१२.९–१७)। प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र तीनों जानने चाहिए (१२.१९); पर द्विज पहले वेद, वेदांग, वेदान्त और स्मृति पढ़े, और दूसरे सिद्धान्तोंको आत्मज्ञानके लिए ही विचारे — केवल उन्हींको पढ़नेवाला वेदबाह्य हो जाता है (१२.३४–३५)। वेद मूल और तना है, बाकी शास्त्र शाखाएँ (१२.२५); स्मृतियाँ लुप्त शाखाओंके स्मरणसे बनीं (१२.२६)। याज्ञवल्क्यने यही त्रयीका मार्ग दिखाया (१२.४२–४३); १२.४४–४७ ग्रन्थके सब विषयोंको फिरसे गिनाता है; और अन्तिम श्लोक कहता है कि यह शास्त्र उन्हींको दे, जो सब भूतोंको अपनेमें और अपनेको सब भूतोंमें देखते हैं (१२.४९)।

वेदशास्त्रमाहात्म्यम्

श्लोक १२.१

न वेदशास्त्रादन्यत्तु किञ्चिच्छास्त्रं हि विद्यते ।

सर्वं विनिःसृतं शास्त्रं वेदशास्त्रात् सनातनात् ॥ १२.१ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२९

वेदशास्त्रों से भिन्न अन्य कोई भी शास्त्र नहीं है, क्योंकि सनातन वेदशास्त्र से ही समस्त शास्त्र प्रकट हुए हैं।

अवतरणिका —

पिछले अध्यायों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार, व्याहृति, गायत्री, प्राणायाम और सूर्योपस्थान जैसी बाह्य विधियों के भीतर छिपे योगिक रहस्यों को उद्घाटित किया है। अब इस अंतिम अध्याय में वे समस्त साधनाओं और ज्ञान-मार्गों के मूल स्रोत का निर्धारण कर रहे हैं, ताकि साधक विभिन्न मतों के भँवर में न फँसकर एक ही सनातन सत्य की ओर अग्रसर हो।

अन्वय और पदार्थ —

न तु किञ्चिच्छास्त्रं वेदशास्त्रादन्यत् विद्यते, हि सर्वं शास्त्रं सनातनात् वेदशास्त्रात् विनिःसृतम्।

पदार्थ:

• न...किञ्चिच्छास्त्रं: कोई भी शास्त्र नहीं।

• वेदशास्त्रादन्यत्: वेदशास्त्र से भिन्न या अलग।

• विद्यते: अस्तित्व में है या उपलब्ध है।

• हि: क्योंकि (हेतुवाचक)।

• सर्वं शास्त्रं: समस्त शास्त्र (स्मृति, पुराण, दर्शन आदि)।

• सनातनात् वेदशास्त्रात्: उस सनातन वेदशास्त्र से, जो आदि-अनादि और शाश्वत है।

• विनिःसृतम्: निःसृत है, अर्थात् प्रस्फुटित हुआ है या निकला है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान-मीमांसा के मूल सिद्धांत की घोषणा करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि इस जगत में ज्ञान का जो भी प्रामाणिक स्रोत उपलब्ध है, वह मूलतः 'वेद' ही है। "वेदशास्त्रादन्यत्तु किञ्चिच्छास्त्रं हि विद्यते" के माध्यम से वे यह प्रतिपादित करते हैं कि वेद के अतिरिक्त कोई स्वतंत्र शास्त्र नहीं है। यहाँ 'शास्त्र' शब्द का प्रयोग केवल पुस्तकों के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्थित ज्ञान-परम्परा के लिए किया गया है जो मनुष्य को बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाती है।

जब वे कहते हैं कि समस्त शास्त्र "सनातनात् वेदशास्त्रात् विनिःसृतम्" (सनातन वेद से निःसृत) हैं, तो इसका भाव यह है कि जैसे एक विशाल वृक्ष की अनेक शाखाएँ और पत्तियाँ होती हैं, परंतु उनका पोषण एक ही मूल जड़ से होता है, वैसे ही सांख्य, योग, मीमांसा और अन्य धर्मशास्त्र वेद रूपी मूल वृक्ष की शाखाएँ हैं। वेद 'सनातन' हैं क्योंकि वे किसी व्यक्ति विशेष की रचना नहीं, अपितु ऋषियों द्वारा अनुभूत सार्वभौमिक सत्य हैं।

बाहरी दृष्टि से यह कथन केवल ग्रंथों की श्रेष्ठता का दावा प्रतीत हो सकता है, किन्तु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं; अतः यहाँ 'वेद' का आन्तर अर्थ 'विद्' धातु (जानना) से है। वेद वह ज्ञान है जो आत्मा, परमात्मा और प्रकृति के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। जब साधक बाहरी विधियों (संध्या, स्नान, जप) से ऊपर उठकर उनके आन्तर अर्थ को समझता है, तब वह पाता है कि हर विधि वास्तव में उसी एक वेद-तत्व (परम ज्ञान) की ओर संकेत कर रही है। अतः, जो ज्ञान वेद-मूलक नहीं है, वह केवल एक मत या धारणा हो सकती है, 'शास्त्र' नहीं।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस विचार की पुष्टि मनुस्मृति में भी मिलती है:

मनुस्मृति

यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ २.७ ॥

मनुने जिस किसीका जो धर्म कहा है, वह सब वेदमें कहा गया है, क्योंकि वह (वेद) सर्वज्ञानमय है।

मनुस्मृति २.७मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 165

यहाँ मनु ऋषि कहते हैं कि मनु द्वारा वर्णित कोई भी धर्म वास्तव में वेद में ही कहा गया है, क्योंकि वेद 'सर्वज्ञानमय' है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों का यह साझा मत है कि ज्ञान की समग्रता वेद में निहित है। यदि किसी अन्य शास्त्र में कोई सत्य कहा गया है, तो वह वेद का ही विस्तार है; यदि वह वेद के मूल सिद्धांतों के विपरीत है, तो वह प्रमाण नहीं माना जा सकता।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'एकत्व' के अनुभव का है। साधक जब विभिन्न साधना-पद्धतियों, मन्त्रों और दर्शनों के बीच द्वन्द्व का अनुभव करता है, तब उसे इस सत्य का स्मरण करना चाहिए कि सभी मार्ग एक ही सनातन स्रोत से निकले हैं।

अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के 'विविध ज्ञान' (विखंडित सूचनाओं) को 'एक वेद' (समग्र ज्ञान) में विलीन करे। जिस प्रकार अनेक नदियाँ अंततः एक ही सागर में मिलती हैं, उसी प्रकार योग का लक्ष्य भी विविध शास्त्रों के भेदों को मिटाकर उस 'सनातन' तत्व में स्थित होना है। साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि उसकी समस्त जिज्ञासाओं का उत्तर और उसकी साधना का चरम लक्ष्य उसी एक अक्षर-ब्रह्म में है, जिसे वेदों ने 'सत्यं' कहा है। यह बोध साधक को 'बहुत्व' से 'एकत्व' की भूमि पर ले जाता है।

ऋषीणां शास्त्ररचनाप्रयोजनम्

श्लोक १२.२

दुर्बोधं तु भवेद्यस्मादध्येतुं नैव शक्यते ।

तस्मादुद्धृत्य सर्वं हि शास्त्रं तु ऋषिभिः कृतम् ॥ १२.२ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२९

क्योंकि वह (वेद) दुर्बोध है और (सबसे) पढ़ा नहीं जा सकता, इसलिए ऋषियोंने (उसीसे) उद्धृत करके सब शास्त्र रचे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह उद्घोष किया कि समस्त ज्ञान-परम्पराएँ सनातन वेदशास्त्र से ही निःसृत हैं। अब इस श्लोक में वे उस व्यावहारिक कारण को स्पष्ट कर रहे हैं कि जब वेद ही एकमात्र मूल है, तो अन्य शास्त्रों की रचना की आवश्यकता क्यों पड़ी।

अन्वय और पदार्थ —

यस्मात् तु (वेदः) दुर्बोधं भवेत्, (तस्मात्) नैव (तेन) अध्येतुं शक्यते; तस्मात् ऋषिभिः सर्वं शास्त्रं हि (वेदात्) उद्धृत्य कृतम्।

पदार्थ:

• दुर्बोधं: जिसे समझना या ग्रहण करना कठिन हो; जो सूक्ष्म और गहन हो।

• अध्येतुं नैव शक्यते: अध्ययन या साक्षात्कार करना संभव नहीं हो पाता।

• उद्धृत्य: उद्धृत करके, अर्थात् मूल स्रोत से सार तत्व को चुनकर या निकालकर।

• ऋषिभिः कृतम्: ऋषियों द्वारा रचित किया गया।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान के 'स्रोत' और उसके 'प्रसार' के बीच के सेतु को स्पष्ट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वेद 'दुर्बोध' हैं। यहाँ दुर्बोध होने का अर्थ यह नहीं है कि वेद अस्पष्ट हैं, अपितु यह है कि वे 'अत्यंत सूक्ष्म' हैं। वेद केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि ऋषियों द्वारा अनुभूत वह नाद-ब्रह्म है जो सीधे चैतन्य से प्रकट होता है। साधारण मनुष्य की बुद्धि, जो वासनाओं और सीमित इंद्रियों से बंधी है, उस विराट और निराकार ज्ञान को सीधे ग्रहण करने में असमर्थ होती है।

"अध्येतुं नैव शक्यते" का भाव यह है कि जिस प्रकार सूर्य की सीधी किरणों को हर कोई नहीं देख सकता, उसी प्रकार वेदों के पूर्ण रहस्य को हर साधक सीधे आत्मसात नहीं कर सकता। वेद 'श्रुति' हैं—वे सीधे हृदय में गूँजते हैं। लेकिन जब ज्ञान को समाज के विभिन्न स्तरों के मनुष्यों तक पहुँचाना था, तब ऋषियों ने अपनी करुणा और प्रज्ञा से वेदों के गहन रहस्यों को 'उद्धृत' किया।

'उद्धृत्य' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि ऋषियों ने अपनी ओर से कुछ नया नहीं गढ़ा, बल्कि वेदों के ही बीजरूप सत्यों को लेकर उन्हें विस्तार दिया, उदाहरणों से सजाया और सरल विधियों में ढाला। इस प्रकार स्मृतियाँ, पुराण और दर्शन ग्रन्थों का जन्म हुआ। ये शास्त्र वेदों के विकल्प नहीं, बल्कि वेदों तक पहुँचने के सोपान (सीढ़ियाँ) हैं। ऋषियों ने वेदों के 'अक्षर' को 'शब्द' में और 'शब्द' को 'अर्थ' में परिवर्तित किया ताकि साधारण साधक भी सत्य के मार्ग पर चल सके।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साधन' और 'साध्य' के अंतर का बोध कराता है। वेद 'साध्य' (परम लक्ष्य/अक्षर) के समान हैं, जबकि शास्त्र 'साधन' (मार्ग) हैं।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह शास्त्रों के अध्ययन को ही अंतिम सत्य न मान ले, बल्कि यह स्मरण रखे कि शास्त्र केवल 'द्वार' हैं। जिस प्रकार एक मानचित्र स्वयं गंतव्य नहीं होता, अपितु गंतव्य तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है, वैसे ही शास्त्र साधक को उस 'दुर्बोध' वेद-तत्त्व की ओर ले जाते हैं।

साधक जब शास्त्र पढ़ता है, तो वह वास्तव में वेद के उस अंश का अभ्यास कर रहा होता है जिसे ऋषियों ने उसके स्तर के अनुकूल सरल किया है। जैसे-जैसे साधक की पात्रता बढ़ती है, वह शास्त्रों के शब्दों से ऊपर उठकर उस मौन और सूक्ष्म अनुभूति में प्रवेश करता है जिसे 'वेद' कहा गया है। इस श्लोक का योगिक संदेश यह है कि शास्त्रों का अध्ययन केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, बल्कि उस 'दुर्बोध' सत्य को अनुभव करने की तैयारी है। साधक शास्त्रों के माध्यम से अपनी बुद्धि को इतना सूक्ष्म बनाता है कि अंततः वह सीधे श्रुति के साक्षात्कार में सक्षम हो सके।

चतुर्दशविद्यास्थानानि

श्लोक १२.३

पुराणतर्कमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः ।

वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ १२.३ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२९

पुराण, तर्क (न्याय), मीमांसा और धर्मशास्त्र, (छहों) अंगोंसे मिले वेद — (ये) चौदह विद्याओं और धर्मके स्थान हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि वेदों की सूक्ष्मता और दुर्बोधता के कारण ऋषियों ने उनसे सार तत्व उद्धृत कर अन्य शास्त्रों की रचना की। अब इस श्लोक में वे उन विशिष्ट विद्या-स्थानों का विवरण दे रहे हैं, जो वेद के साथ मिलकर ज्ञान की पूर्णता और धर्म के आधार का निर्माण करते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

पुराण-तर्क-मीमांसा-धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः वेदाः, (एतानि) विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश स्थानानि।

पदार्थ:

• पुराण-तर्क-मीमांसा-धर्मशास्त्र: ये चार सहायक विद्याएँ हैं। 'तर्क' यहाँ न्याय शास्त्र का बोध कराता है, 'मीमांसा' वेदों के अर्थ-निर्णय की पद्धति है और 'धर्मशास्त्र' जीवन के व्यावहारिक नियम हैं।

• अङ्गमिश्रिताः: वेदों के छह अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष) से मिश्रित या युक्त।

• स्थानानि: आश्रय या आधार। यहाँ 'स्थान' का अर्थ है वह ज्ञान-क्षेत्र जहाँ सत्य प्रतिष्ठित है।

• चतुर्दश: चौदह (४ वेद + ६ अङ्ग + ४ सहायक शास्त्र)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान के उस व्यापक मानचित्र को प्रस्तुत करता है जिसे 'चतुर्दश विद्या' कहा जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि धर्म का साक्षात्कार केवल एक दिशा से नहीं, बल्कि चौदह विभिन्न आयामों के समन्वय से होता है।

वेदों को केवल मंत्रों का संग्रह नहीं, बल्कि 'अङ्गमिश्रिताः' कहा गया है। इसका अर्थ है कि वेद अपने छह अंगों के बिना अपूर्ण हैं। जिस प्रकार शरीर के बिना प्राणों का कोई स्थूल आधार नहीं होता, उसी प्रकार शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष के बिना वेदों का अर्थ और प्रयोग संभव नहीं है। ये छह अंग वेदों की बाहरी सुरक्षा और आंतरिक स्पष्टता के कवच हैं।

इसके साथ ही, महर्षि चार अन्य विद्याओं को जोड़ते हैं: पुराण, तर्क (न्याय), मीमांसा और धर्मशास्त्र। पुराण वेदों के रहस्यों को कथाओं के माध्यम से सरल बनाते हैं; तर्क बुद्धि को शुद्ध कर संशय मिटाता है; मीमांसा मन्त्रों के वास्तविक प्रयोजन को उद्घाटित करती है और धर्मशास्त्र उस ज्ञान को आचरण में उतारने की विधि बताता है।

जब ये चौदह स्थान—चार वेद, छह वेदाङ्ग और चार सहायक शास्त्र—एक साथ मिलते हैं, तब वह 'धर्म का स्थान' बनता है। यहाँ 'धर्म' का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि वह 'ऋत' है जो संपूर्ण सृष्टि को संचालित करता है। यह समन्वय साधक को स्थूल जगत (धर्मशास्त्र/पुराण) से सूक्ष्म जगत (मीमांसा/तर्क) और अंततः अक्षर-ब्रह्म (वेद) की ओर ले जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मुण्डक उपनिषद्

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ १.१.५ ॥

उनमें अपरा — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष; और परा वह, जिससे उस अक्षरकी प्राप्ति होती है।

मुण्डक उपनिषद् १.१.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 98

मुण्डक उपनिषद् में 'अपरा विद्या' के अंतर्गत चारों वेदों और छह अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) का उल्लेख है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस सूची को और विस्तार देते हुए इसमें पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र को भी सम्मिलित करती है, ताकि ज्ञान का व्यावहारिक और तार्किक पक्ष भी स्पष्ट हो सके।

छान्दोग्य उपनिषद्

ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम् … ॥ ७.१.२ ॥

(नारद:) भगवन्, मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, चौथा अथर्ववेद, पाँचवाँ इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद (व्याकरण) … पढ़ा हूँ।

छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 276

छान्दोग्य उपनिषद् में नारद मुनि जब अपनी शिक्षा का वर्णन करते हैं, तो वे चारों वेदों के साथ इतिहास-पुराण और वेदानां वेद (व्याकरण) को गिनते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल से ही वेदों के साथ इन सहायक विद्याओं का अध्ययन अनिवार्य माना गया है। स्मृति इसी परंपरा को व्यवस्थित कर 'चतुर्दश विद्या' के रूप में परिभाषित करती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से ये चौदह विद्या-स्थान साधक की चेतना के क्रमिक विकास के सोपान हैं।

१. वेदाङ्ग और धर्मशास्त्र: ये साधक की बाहरी शुद्धि, अनुशासन और बुद्धि के परिष्कार का साधन हैं।

२. तर्क और मीमांसा: ये मन के विकारों और संशयों का नाश कर उसे 'एकग्र' और 'तटस्थ' बनाते हैं।

३. पुराण: ये हृदय में भक्ति और श्रद्धा का बीजारोपण करते हैं, जिससे ज्ञान शुष्क नहीं रहता।

४. वेद: अंततः साधक जब इन सभी सोपानों से गुजरता है, तब वह वेदों के उस 'परा' स्वरूप को अनुभव करता है जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं और केवल 'अनुभूति' शेष रहती है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह ज्ञान को खंडों में न देखे, बल्कि यह अनुभव करे कि व्याकरण से लेकर ब्रह्म-ज्ञान तक, सब एक ही सत्य के विभिन्न स्तर हैं। जब बाहरी विधि (धर्मशास्त्र) और आंतरिक विश्लेषण (मीमांसा) का मिलन होता है, तब साधक 'विद्या' से 'विद्या-सिद्धि' की ओर बढ़ता है।

अतिप्रमाणानि (शास्त्राणि)

श्लोक १२.४

सांख्यं योगं पञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा ।

अतिप्रमाणान्येतानि हेतुभिर्न विचालयेत् ॥ १२.४ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२९

सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — ये अत्यन्त प्रमाण हैं; इन्हें हेतुओं (तर्कों) से विचलित न करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चौदह विद्या-स्थानों का परिचय देते हुए यह बताया कि वेदों के अंगों और सहायक शास्त्रों का समन्वय ही धर्म का पूर्ण आधार है। अब इस श्लोक में वे उन विशिष्ट प्रणालियों का उल्लेख कर रहे हैं जिन्हें 'अतिप्रमाण' की संज्ञा दी गई है, ताकि साधक ज्ञान के विविध मार्गों के प्रति श्रद्धा और स्थिरता रख सके।

अन्वय और पदार्थ —

सांख्यं, योगं, पञ्चरात्रं, वेदाः, पाशुपतं तथा (एतानि) अतिप्रमाणानि; (एतानि) हेतुभिः न विचालयेत्।

पदार्थ:

• सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद, पाशुपत: ये पाँचों ज्ञान-परम्पराएँ हैं। सांख्य प्रकृति-पुरुष विवेक का, योग चित्त-वृत्ति निरोध का, पाञ्चरात्र दिव्य-शक्ति और नारायण-तत्व का, वेद सर्वोपरि श्रुति-ज्ञान का और पाशुपत शिव-तत्व एवं वैराग्य का मार्ग है।

• अतिप्रमाणानि: 'अति' का अर्थ है श्रेष्ठ या सर्वोच्च, और 'प्रमाण' का अर्थ है वह साधन जिससे सत्य का ज्ञान हो। अतः 'अतिप्रमाण' वे शास्त्र हैं जो स्वयं में पूर्ण हैं और जिन्हें सिद्ध करने के लिए किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

• हेतुभिः: तर्कों, युक्तियों या बौद्धिक वाद-विवाद से।

• न विचालयेत्: विचलित न करें, डगमगाएँ नहीं या उन्हें तुच्छ न समझें।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि सत्य तक पहुँचने के मार्ग भिन्न हो सकते हैं, किंतु यदि वे शास्त्र 'अतिप्रमाण' की श्रेणी में आते हैं, तो उनकी प्रामाणिकता पर केवल बौद्धिक तर्क (हेतु) के आधार पर प्रश्न उठाना साधक के लिए हानिकारक है।

यहाँ 'अतिप्रमाण' शब्द का प्रयोग यह दर्शाने के लिए किया गया है कि सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत—ये पाँचों प्रणालियाँ केवल मत नहीं हैं, बल्कि ये 'अनुभव' और 'श्रुति' पर आधारित सिद्ध मार्ग हैं। जब कोई शास्त्र 'प्रमाण' से ऊपर उठकर 'अतिप्रमाण' हो जाता है, तो उसका अर्थ यह होता है कि वह शास्त्र केवल बाहरी शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि वह उस अवस्था का वर्णन करता है जिसे उसके वक्ता ने स्वयं अनुभव किया है।

महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इन्हें 'हेतुभिः न विचालयेत्' अर्थात् इन्हें तर्कों से विचलित न करें। इसका भाव यह है कि तर्क केवल वहीं तक काम करता है जहाँ तक बुद्धि की सीमा है, किंतु ये शास्त्र बुद्धि की सीमा के पार 'अनुभूति' के क्षेत्र की बात करते हैं। यदि कोई व्यक्ति केवल तर्क के आधार पर इन शास्त्रों का खंडन करता है, तो वह वास्तव में सत्य का नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि के अहंकार का पोषण कर रहा होता है। यह निर्देश साधक को बौद्धिक चपलता से हटाकर श्रद्धा और अभ्यास की ओर ले जाने के लिए है।

शास्त्र-साक्ष्य —

महाभारत

सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥

राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।

महाभारत, शान्तिपर्व ३४९.६४–६६महाभारत (गीता प्रेस) खण्ड ५ · पृष्ठ 2401

महाभारत के शान्तिपर्व में भी ठीक इसी सूची का उल्लेख मिलता है, जहाँ सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत को ज्ञान के विभिन्न नाम कहे गए हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और महाभारत दोनों का यहाँ मेल यह है कि ये दोनों ही ग्रन्थ इन पाँचों मार्गों को सत्य के वैध सोपानों के रूप में स्वीकार करते हैं। जहाँ महाभारत इन्हें 'नानामतानि' (विभिन्न नामों वाला एक ही ज्ञान) कहता है, वहीं यह स्मृति इन्हें 'अतिप्रमाण' कहकर उनकी अविचल प्रामाणिकता पर बल देती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'श्रद्धा' और 'समर्पण' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। साधक जब साधना के मार्ग पर होता है, तो अक्सर उसके मन में विभिन्न मतों को लेकर द्वंद्व उत्पन्न होता है। यह द्वंद्व उसकी ऊर्जा को बिखेर देता है।

यहाँ 'हेतु' का अर्थ केवल बाहरी तर्क नहीं, बल्कि मन के भीतर उठने वाले संदेह भी हैं। जब साधक यह अनुभव करता है कि ये पाँचों मार्ग 'अतिप्रमाण' हैं, तो वह मतभेदों के विवाद से ऊपर उठकर 'तत्व' की खोज में लग जाता है। वह समझ जाता है कि जिस प्रकार अलग-अलग नदियाँ अंततः एक ही सागर में मिलती हैं, उसी प्रकार सांख्य का विवेक, योग का निरोध, पाञ्चरात्र की भक्ति, वेदों का ज्ञान और पाशुपत का वैराग्य—सब एक ही परम-तत्व की ओर ले जाते हैं।

साधक का अभ्यास यहाँ यह होना चाहिए कि वह किसी एक प्रमाण को पकड़कर दूसरे का तिरस्कार न करे, बल्कि अपनी साधना में उस स्थिरता को लाए जहाँ तर्क समाप्त हो और अनुभव आरम्भ हो। यह श्लोक साधक को 'बौद्धिक विमर्श' की भूमि से उठाकर 'अनुभवात्मक स्थिरता' की भूमि पर ले जाता है।

संख्यादिकर्तारः

श्लोक १२.५

सांख्यस्य कर्ता कपिलः परमार्थः स उच्यते ।

हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ १२.५ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२९

सांख्यके कर्ता कपिल हैं, वे परमर्षि कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, दूसरा कोई पुरातन (वक्ता) नहीं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत को 'अतिप्रमाण' घोषित करते हुए उन्हें तर्कों से विचलित न करने का निर्देश दिया था। अब इस श्लोक में वे इन प्रमाणिक ज्ञान-परम्पराओं के मूल वक्ताओं का परिचय दे रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि यह ज्ञान किसी आकस्मिक विचार का परिणाम नहीं, अपितु प्राचीन ऋषियों की दृष्टि का विस्तार है।

अन्वय और पदार्थ —

सांख्यस्य कर्ता कपिलः (अस्ति), स परमर्षिः उच्यते। योगस्य वक्ता हिरण्यगर्भः (अस्ति), पुरातनः (वक्ता) नान्यः (अस्ति)।

पदार्थ:

• सांख्यस्य कर्ता: सांख्य दर्शन के प्रवर्तक या रचयिता। सांख्य का अर्थ है 'संख्या' (विवेकपूर्ण गणना) और 'सम्यक ज्ञान'।

• कपिलः: महर्षि कपिल, जिन्होंने प्रकृति और पुरुष के भेद का वैज्ञानिक विवेचन किया।

• परमर्षिः: वह ऋषि जो परम पद को प्राप्त हो चुका हो या जिसकी ऋषित्व-शक्ति सर्वोच्च हो।

• योगस्य वक्ता: योग विद्या के उद्घोषक या प्रवक्ता।

• हिरण्यगर्भः: स्वर्ण-गर्भ या ब्रह्मांडीय बुद्धि के प्रतीक। वे सृष्टि के आदि-गुरु माने जाते हैं, जिन्होंने योग के माध्यम से चेतना के उत्थान का मार्ग दिखाया।

• नान्यः पुरातनः: उनसे अधिक प्राचीन या उनसे भिन्न कोई अन्य आदि-वक्ता नहीं है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ज्ञान के दो महान स्तंभों—सांख्य और योग—के मूल स्रोतों को स्पष्ट कर रहे हैं।

प्रथमतः, सांख्य के कर्ता के रूप में वे 'कपिल' का नाम लेते हैं। सांख्य वह विद्या है जो यह विश्लेषण करती है कि यह दृश्य जगत् 'प्रकृति' है और उसे देखने वाला 'पुरुष' (शुद्ध चेतना) है। जब याज्ञवल्क्य उन्हें 'परमर्षि' कहते हैं, तो उनका भाव यह है कि कपिल केवल एक तर्कशास्त्री नहीं थे, बल्कि एक ऐसे दृष्टा थे जिन्होंने समाधि की अवस्था में प्रकृति के सूक्ष्म तंतुओं को देखा और फिर उसे शास्त्रबद्ध किया। सांख्य यहाँ केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, बल्कि उस विवेक का साधन है जो साधक को शरीर और मन के मोह से मुक्त कर उसे पुरुष-भाव में प्रतिष्ठित करता है।

द्वितीयतः, योग के वक्ता के रूप में वे 'हिरण्यगर्भ' का उल्लेख करते हैं। यहाँ एक गहरा रहस्य है—हिरण्यगर्भ वह आदि-चेतना है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड का बीज निहित है। योग का अर्थ है 'युज' (जोड़ना)। हिरण्यगर्भ योग के वक्ता इसलिए हैं क्योंकि योग ही वह एकमात्र सेतु है जो व्यष्टि (व्यक्तिगत आत्मा) को समष्टि (हिरण्यगर्भ/ब्रह्मांडीय चेतना) से जोड़ता है। 'नान्यः पुरातनः' कहकर याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट करते हैं कि योग की यह पद्धति उतनी ही प्राचीन है जितनी कि स्वयं सृष्टि। यह किसी व्यक्ति विशेष द्वारा गढ़ा गया नियम नहीं, बल्कि सृष्टि के संचालन का मौलिक विज्ञान है।

सांख्य यदि 'विवेक' है, तो योग 'अनुभव' है। कपिल हमें बताते हैं कि हम क्या नहीं हैं (नेति-नेति), और हिरण्यगर्भ हमें बताते हैं कि हम वास्तव में क्या हैं और उस परम तत्व में कैसे विलीन होना है।

शास्त्र-साक्ष्य —

महाभारत

सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥

राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।

महाभारत, शान्तिपर्व ३४९.६४–६६महाभारत (गीता प्रेस) खण्ड ५ · पृष्ठ 2401

महाभारत के शान्तिपर्व में भी यही व्यवस्था वर्णित है, जहाँ सांख्य, योग और अन्य विद्याओं को नानामता (विभिन्न नामों वाला) किंतु एक ही ज्ञान का विस्तार माना गया है। वहाँ भी कपिल को सांख्य का परमर्षि और हिरण्यगर्भ को योग का पुरातन वक्ता बताया गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और महाभारत की यह संगति सिद्ध करती है कि वैदिक परम्परा में इन विद्याओं को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक माना गया है। सांख्य जहाँ सैद्धांतिक आधार देता है, वहीं योग उसे व्यावहारिक सिद्धि में बदल देता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'श्रद्धा' और 'समन्वय' का है। जब साधक सांख्य के विवेक (कपिल) और योग के अनुशासन (हिरण्यगर्भ) को एक ही सत्य के दो पहलू के रूप में देखता है, तब उसके भीतर का द्वंद्व समाप्त हो जाता है।

अभ्यास यह है कि साधक पहले कपिल की दृष्टि से अपने भीतर के 'प्रकृति-तत्वों' (अहंकार, मन, बुद्धि) को पहचानकर उनसे तटस्थ हो (विवेक), और तत्पश्चात हिरण्यगर्भ के योग-मार्ग से अपनी चेतना को उस आदि-बीज (हिरण्यगर्भ) में विलीन करे। यह यात्रा 'विवेक' से 'योग' की ओर है। जो केवल सांख्य करता है, वह केवल ज्ञाता बनकर रह जाता है; जो केवल योग करता है, वह बिना विवेक के भटक सकता है। किंतु जब कपिल और हिरण्यगर्भ दोनों का समन्वय होता है, तब साधक 'परमर्षि' की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक १२.६

पञ्चरात्रस्य सर्वस्य वक्ता नारायणः स्वयम् ।

अपांतरतमश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ १२.६ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२९

सारे पाञ्चरात्रके वक्ता स्वयं नारायण हैं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सांख्य और योग के आदि-वक्ताओं के रूप में क्रमशः कपिल और हिरण्यगर्भ का परिचय दिया था। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए, इस श्लोक में वे पाञ्चरात्र और वेद-विद्या के मूल स्रोतों का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

पञ्चरात्रस्य सर्वस्य वक्ता नारायणः स्वयम् (अस्ति) । अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ।

पदार्थ:

• पञ्चरात्रस्य सर्वस्य: सम्पूर्ण पाञ्चरात्र विद्या का। 'पञ्चरात्र' का शाब्दिक अर्थ है पाँच रात्रिओं का ज्ञान, जो सृष्टि के पाँच तत्वों और उनके संचालन के समय (काल) के रहस्य को खोलता है।

• वक्ता नारायणः स्वयम्: इसके उद्घोषक या प्रवक्ता स्वयं भगवान नारायण हैं। यहाँ 'स्वयम्' शब्द यह दर्शाता है कि यह ज्ञान किसी माध्यम से नहीं, अपितु साक्षात् ईश्वर-वाणी है।

• अपांतरतमाश्च: 'अपांतरतम' वह है जो अत्यंत भीतर स्थित हो, या जो सबसे प्राचीन और सूक्ष्म हो। यह एक विशेष ऋषि का नाम है।

• वेदाचार्यः स उच्यते: वे 'वेदाचार्य' (वेदों के आचार्य) कहे जाते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ज्ञान की उन धाराओं को प्रमाणित कर रहे हैं जिन्हें उन्होंने पूर्व में 'अतिप्रमाण' कहा था।

प्रथमतः, वे पाञ्चरात्र विद्या के मूल में स्वयं नारायण को प्रतिष्ठित करते हैं। पाञ्चरात्र केवल एक संप्रदाय नहीं, अपितु वह विज्ञान है जो पुरुष और प्रकृति के संयोग से उत्पन्न पाँच तत्वों और उनके द्वारा रचित इस जगत् के विन्यास को समझाता है। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसके वक्ता 'नारायण स्वयम्' हैं, तो उनका भाव यह है कि यह ज्ञान उस परम पुरुष का है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर व्याप्त है। नारायण का अर्थ है—वह जल (नारा) जिसमें समस्त जीव निवास करते हैं। अतः यह विद्या उस विराट चेतना का प्रत्यक्ष प्रकटीकरण है।

द्वितीयतः, वे 'अपांतरतमा' का उल्लेख करते हुए उन्हें वेदाचार्य कहते हैं। 'अपांतरतमा' शब्द अत्यंत गूढ़ है। 'अन्तर' का अर्थ है भीतर, और 'अपांतरतम' का अर्थ है—वह जो सबसे अधिक भीतर (अत्यंत सूक्ष्म) स्थित है। वेदों का ज्ञान केवल शब्दों का संकलन नहीं है, अपितु वह उस सूक्ष्म ध्वनि का अनुभव है जो हृदय की गहराइयों में गूँजती है। अपान्तरतमा वह ऋषि हैं जिन्होंने वेदों के उस आंतरिक रहस्य को जाना और उसे आचार्य के रूप में प्रसारित किया। यहाँ याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि वेदों का वास्तविक आचार्य वह है जिसने स्वयं को 'अपांतरतम' (परम सूक्ष्म) स्तर पर अनुभव किया हो।

शास्त्र-साक्ष्य —

पाञ्चरात्र और अपान्तरतमा के विषय में महाभारत का मत इस स्मृति के पूर्णतः अनुकूल है:

महाभारत

पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वेत्ता तु भगवान्स्वयम् ॥ ३४९.६८ ॥

सम्पूर्ण पाञ्चरात्रके ज्ञाता स्वयं भगवान् (नारायण) हैं।

महाभारत, शान्तिपर्व ३४९.६८महाभारत (गीता प्रेस) खण्ड ५ · पृष्ठ 2401

यह अंश स्पष्ट करता है कि सम्पूर्ण पाञ्चरात्र के ज्ञाता स्वयं भगवान हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ 'वक्ता' शब्द का प्रयोग कर इसे एक प्रबोधन या उपदेश के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि महाभारत 'वेत्ता' (जानने वाले) कहकर इसे ईश्वर की सर्वज्ञता से जोड़ता है। दोनों का निष्कर्ष एक ही है—पाञ्चरात्र का स्रोत दिव्य है।

महाभारत

सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥

राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।

महाभारत, शान्तिपर्व ३४९.६४–६६महाभारत (गीता प्रेस) खण्ड ५ · पृष्ठ 2401

यहाँ सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत को 'नानामतानि' (विभिन्न नामों वाला) ज्ञान कहा गया है, किंतु मूलतः वे एक ही सत्य के विभिन्न आयाम हैं। अपान्तरतमा को वेदाचार्य कहना इस बात की पुष्टि करता है कि वेदों का ज्ञान किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा नहीं, अपितु उस ऋषि द्वारा दिया गया जिसने सत्य को अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर अनुभूत किया।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'बाह्य' से 'आन्तर' की ओर यात्रा है।

पाञ्चरात्र का अभ्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर के पाँच तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) वास्तव में नारायण की ही शक्ति हैं। जब वह 'नारायण स्वयम्' के भाव में स्थित होता है, तो वह स्वयं को केवल एक शरीर नहीं, अपितु उस विराट पुरुष का अंश अनुभव करता है।

'अपांतरतमा' का स्मरण साधक को 'अन्तःकरण' की गहराई में ले जाता है। योगिक अभ्यास में इसका अर्थ है—अपनी चेतना को स्थूल मन से हटाकर, सूक्ष्म मन से होते हुए, उस 'अत्यंत भीतर' (अपांतरतम) स्थित अक्षर या आत्मा में विलीन करना। जो साधक स्वयं को 'अपांतरतम' में खोजता है, वही वास्तव में वेदों के मर्म को जानने वाला 'वेदाचार्य' बनता है। इस प्रकार यह श्लोक साधक को नारायण (विराट) और अपान्तरतमा (सूक्ष्म) के समन्वय से पूर्णता की ओर ले जाता है।

श्लोक १२.७

प्राचीनगर्भं तमृषिं प्रवदन्ति हि केचन ।

उमापतिः पशुपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः ॥ १२.७ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

— कुछ लोग उन ऋषिको प्राचीनगर्भ कहते हैं। उमापति, पशुपति, श्रीकण्ठ, ब्रह्माके पुत्र —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने पाञ्चरात्र के वक्ता भगवान नारायण और वेद-विद्या के आचार्य के रूप में 'अपांतरतमा' का उल्लेख किया था। वर्तमान श्लोक उसी कड़ी में अपान्तरतमा ऋषि के अन्य नामों और पाशुपत विद्या के आदि-गुरु के परिचय को पूर्ण करता है।

अन्वय और पदार्थ —

केचन हि ते (अपांतरतमं) ऋषिं प्राचीनगर्भं प्रवदन्ति । उमापतिः, पशुपतिः, श्रीकण्ठः (च) ब्रह्मणः सुतः (अस्ति) ।

पदार्थ:

• प्राचीनगर्भं: 'प्राचीन' अर्थात् आदि या अनादि, और 'गर्भ' अर्थात् वह जो बीज रूप में भीतर स्थित हो। प्राचीनगर्भ वह है जो सृष्टि के आदि-बीज का ज्ञाता हो।

• प्रवदन्ति हि केचन: कुछ विद्वान या ऋषि उन्हें इस नाम से पुकारते हैं।

• उमापतिः, पशुपतिः, श्रीकण्ठः: ये तीनों भगवान शिव के नाम हैं। उमा (शक्ति) के पति, समस्त जीवों (पशुओं) के स्वामी और जिनका कंठ श्री (दिव्य तेज) से सुशोभित है।

• ब्रह्मणः सुतः: ब्रह्मा के पुत्र। यहाँ 'सुतः' शब्द जन्म से अधिक 'उत्पत्ति' का सूचक है, क्योंकि शिव का प्राकट्य ब्रह्मा के ललाट से हुआ था।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ज्ञान की उन धाराओं के वक्ताओं का विवरण दे रहे हैं, जिन्हें उन्होंने 'अतिप्रमाण' माना है।

प्रथम चरण में वे 'अपांतरतमा' ऋषि के विषय में स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि कुछ लोग उन्हें 'प्राचीनगर्भ' भी कहते हैं। 'अपांतरतमा' का अर्थ था—जो अत्यंत भीतर स्थित है। अब 'प्राचीनगर्भ' कहकर याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि यह ज्ञान केवल बाहरी शब्दों का संग्रह नहीं, अपितु उस आदि-बीज का अनुभव है जो सृष्टि के प्रारंभ से ही चैतन्य में विद्यमान है। जो साधक अपने भीतर के उस 'प्राचीन गर्भ' (आदि-बीज) को पहचान लेता है, वही वास्तव में वेदाचार्य कहलाता है।

द्वितीय चरण में वे पाशुपत विद्या के वक्ता का परिचय देते हैं। यद्यपि पाशुपत शब्द का उल्लेख पिछले श्लोक (12.4) में हुआ था, यहाँ उसके प्रदाता का नाम स्पष्ट किया गया है। वे उन्हें उमापति, पशुपति और श्रीकण्ठ कहकर संबोधित करते हैं। यहाँ शिव के इन नामों का चयन अत्यंत गूढ़ है। 'पशुपति' वह है जो जीव (पशु) को उसके बंधन (पाश) से मुक्त करता है। 'उमापति' वह है जहाँ ज्ञान (शिव) और शक्ति (उमा) का पूर्ण मिलन हो चुका है।

जब याज्ञवल्क्य उन्हें 'ब्रह्मणः सुतः' (ब्रह्मा के पुत्र) कहते हैं, तो वे यह सिद्ध कर रहे हैं कि यह ज्ञान वेदों के विरुद्ध नहीं, अपितु वेदों के सृजन-कर्ता ब्रह्मा से ही उत्पन्न है। इस प्रकार, वे सांख्य, योग, पाञ्चरात्र और पाशुपत जैसी विद्याओं को एक ही वैदिक मूल से जोड़ रहे हैं, ताकि साधक भ्रमित न हो कि ये अलग-अलग मत हैं।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'बाहर से भीतर' और 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाला है।

साधक जब 'अपांतरतमा' और 'प्राचीनगर्भ' शब्दों का चिंतन करता है, तो वह अपने हृदय के उस गहनतम केंद्र की ओर मुड़ता है जहाँ सृष्टि का बीज (बीज-अक्षर) छिपा है। यह अभ्यास उसे इस अनुभव की ओर ले जाता है कि ज्ञान कहीं बाहर से नहीं आता, बल्कि वह 'प्राचीन' है, वह हमारे भीतर 'गर्भ' रूप में पहले से मौजूद है; केवल उसे जगाने की आवश्यकता है।

वहीं, शिव के 'पशुपति' और 'श्रीकण्ठ' रूपों का स्मरण साधक को बंधन-मुक्ति के मार्ग पर ले जाता है। 'पशुपति' का ध्यान करते हुए साधक अपने भीतर के उन 'पाशों' (मोह, अहंकार, अविद्या) को पहचानता है जिन्होंने उसे जकड़ रखा है। 'श्रीकण्ठ' का भाव यह है कि जैसे शिव ने विष पीकर भी अपने कंठ की शोभा नहीं खोई, वैसे ही योगी संसार के विष (दुखों और विकारों) को अपने भीतर आत्मसात कर उन्हें ज्ञान के अमृत में बदल देता है।

यह श्लोक साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह यह अनुभव करता है कि ज्ञान की सभी धाराएँ—चाहे वह नारायण की हो या शिव की—अंततः एक ही परम सत्य की ओर ले जाती हैं। यह तैयारी अगले श्लोक में आने वाले 'उग्र ज्ञान' (पाशुपत ज्ञान) के लिए है, क्योंकि बिना पशुपति के अनुग्रह के, उस उग्र ज्ञान को सहने की शक्ति नहीं आती।

श्लोक १२.८

प्रोक्तवानिदमत्युग्रं ज्ञानं पाशुपतं हरः ।

अत ऊर्ध्वं तु ये केचिद्वेदशास्त्राण्यनेकशः ॥ १२.८ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

— हर (शिव) ने यह अत्यन्त उग्र पाशुपत ज्ञान कहा। इसके बाद जो कोई अनेक प्रकारसे वेदशास्त्रोंको —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने पाशुपत विद्या के आदि-गुरु के रूप में भगवान शिव के विभिन्न नामों—उमापति, पशुपति, श्रीकण्ठ और ब्रह्मणः सुतः का उल्लेख किया था। वर्तमान श्लोक उस विद्या के स्वरूप की विशेषता बताता है और एक नए विमर्श की ओर संकेत करता है।

अन्वय और पदार्थ —

हरः इदम् अत्युग्रं पाशुपतं ज्ञानं प्रोक्तवान् । अत ऊर्ध्वं तु ये केचिद् अनेकशः वेदशास्त्राणि...

पदार्थ:

• प्रोक्तवान्: कहा या प्रतिपादित किया।

• अत्युग्रं: 'उग्र' का अर्थ है तीव्र, प्रचंड या वह जो साधारण बुद्धि के वश में न हो। 'अत्युग्र' वह ज्ञान है जो साधक के अहंकार और वासनाओं का तीव्र प्रहार से नाश करता है।

• पाशुपतं ज्ञानं: वह ज्ञान जो 'पशु' (पाश या बंधन में बँधे जीव) को मुक्त कर उसे 'पशुपति' (परम शिव) के साथ एकाकार कर दे।

• अत ऊर्ध्वं: इसके बाद। यहाँ 'ऊर्ध्वं' का अर्थ केवल क्रम नहीं, बल्कि स्तर से भी है।

• अनेकशः: विविध प्रकार से या अनेक धाराओं में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी पाशुपत ज्ञान की प्रकृति को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि भगवान हर (शिव) ने इस पाशुपत ज्ञान का प्रतिपादन किया है, जिसकी विशेषता यह है कि यह 'अत्युग्र' है।

साधारणतः 'उग्र' शब्द भय या क्रोध का सूचक होता है, किन्तु योगिक दृष्टि से 'उग्र ज्ञान' वह होता है जो अत्यंत तीव्र और निर्णायक होता है। यह वह ज्ञान है जो धीरे-धीरे नहीं, अपितु एक झटके में अविद्या के आवरण को फाड़ देता है। जैसे अग्नि अशुद्धियों को जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही पाशुपत ज्ञान साधक के भीतर के 'पशुत्व' (अज्ञान, मोह और आसक्ति) को उग्रता से नष्ट करता है। यह ज्ञान उन साधकों के लिए है जो तीव्र तप और कठिन अनुशासन के माध्यम से शीघ्र मुक्ति की आकांक्षा रखते हैं।

श्लोक का उत्तरार्ध— "अत ऊर्ध्वं तु ये केचिद्वेदशास्त्राण्यनेकशः"—एक नए प्रकरण का आरम्भ है। यहाँ याज्ञवल्क्य जी यह संकेत दे रहे हैं कि अब तक उन्होंने उन 'अतिप्रमाण' ज्ञान-धाराओं (सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद, पाशुपत) की चर्चा की, जो सत्य के विभिन्न आयाम हैं। अब वे उन लोगों और उन मतों की चर्चा करने जा रहे हैं जो वेदशास्त्रों का विरूपण करते हैं या उनसे भिन्न मार्ग बताते हैं। यह वाक्य अगले श्लोकों तक विस्तृत है, जहाँ वे वेदबाह्य और तामस मतों का विश्लेषण करेंगे।

शास्त्र-साक्ष्य —

महाभारत

उमापतिर्भूतपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः । उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः ॥ ३४९.६७ ॥

उमापति, भूतपति, श्रीकण्ठ, ब्रह्माके पुत्र शिवने शान्त भावसे यह पाशुपत ज्ञान कहा।

महाभारत, शान्तिपर्व ३४९.६७महाभारत (गीता प्रेस) खण्ड ५ · पृष्ठ 2401

महाभारत के शान्तिपर्व में भी इसी ज्ञान-परम्परा का उल्लेख मिलता है जहाँ शिव द्वारा पाशुपत ज्ञान के प्रतिपादन की बात कही गई है। स्मृति और महाभारत दोनों में इस बात की सहमति है कि पाशुपत ज्ञान का स्रोत स्वयं शिव हैं। जहाँ महाभारत में इसे 'अव्यग्र' (शान्त/स्थिर) कहा गया है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसे 'अत्युग्र' कहती है। यह विरोध नहीं, अपितु दो दृष्टियाँ हैं: शिव की दृष्टि से यह ज्ञान स्थिर और सहज है, किन्तु संसार के बंधनों और अविद्या के विरुद्ध यह 'उग्र' प्रहार करने वाला है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए 'उग्र ज्ञान' का अर्थ है—साधना की वह अवस्था जहाँ अभ्यास इतना तीव्र हो जाए कि मन की चंचलता पूरी तरह थम जाए। पाशुपत ज्ञान का अभ्यास साधक को 'पाश' (बंधनों) से मुक्त करने की प्रक्रिया है।

यहाँ 'उग्रता' का अर्थ बाहरी क्रोध नहीं, अपितु आंतरिक 'तेज' है। जब साधक अपनी समस्त ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित करता है, तो वह आंतरिक अग्नि प्रज्वलित होती है, जिसे 'उग्र' कहा गया है। यह वह भूमि है जहाँ साधक अपने सीमित व्यक्तित्व (पशु-भाव) को त्यागकर शिव-भाव में प्रवेश करता है।

इस श्लोक के माध्यम से साधक यह अनुभव करता है कि सत्य की प्राप्ति के लिए केवल कोमल भाव पर्याप्त नहीं हैं, अपितु कभी-कभी अविद्या के विनाश के लिए 'उग्र' संकल्प और तीव्र वैराग्य की आवश्यकता होती है। यह श्लोक साधक को 'अतिप्रमाण' ज्ञान की स्थिरता से निकालकर अब उन भ्रामक मतों के प्रति सचेत करता है, जो सत्य की ओट में असत्य को छिपाते हैं।

वेदबाह्यानि शास्त्राणि

श्लोक १२.९

बौद्धः कापिलकुहको लोकायतिकभिक्षकाः ।

वेदबाह्यास्तथान्ये तु तामसा आशिवास्तु ते ॥ १२.९ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

— बौद्ध, कापिल-कुहक (कपटी), लोकायतिक (चार्वाक) और भिक्षुक (कहते हैं) — वे और दूसरे वेदबाह्य तामस और अमंगलकारी हैं;

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सांख्य, योग, पाञ्चरात्र और पाशुपत जैसी प्रमाण विद्याओं का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट किया कि ये ज्ञान-धाराएँ अति-प्रमाण हैं। अब इस श्लोक से वे उन मतों का वर्णन आरम्भ कर रहे हैं जो वेदों के आधार से रहित हैं और साधक के लिए अहितकर हैं।

अन्वय और पदार्थ —

बौद्धः, कापिलकुहकः, लोकायतिकः, भिक्षकाः (तथा) अन्ये तु वेदबाह्याः, ते तामसा आशिवाः स्तु।

पदार्थ:

• बौद्धः: बुद्ध के नाम पर चलने वाले या बौद्ध मत के अनुयायी।

• कापिलकुहकः: यहाँ 'कुहक' शब्द महत्वपूर्ण है। कुहक का अर्थ है कपटी या छल करने वाला। जो महर्षि कपिल के नाम का सहारा लेकर उनके वास्तविक सांख्य दर्शन को विकृत कर कपटपूर्ण मत फैलाते हैं, वे 'कापिल-कुहक' हैं। (ध्यान रहे कि श्लोक १२.४-५ में वास्तविक सांख्य और कपिल को प्रमाण माना गया है)।

• लोकायतिकः: लोकायत या चार्वाक मत के अनुयायी, जो केवल प्रत्यक्ष को मानते हैं और परलोक तथा आत्मा का निषेध करते हैं।

• भिक्षकाः: यहाँ भिक्षुक शब्द किसी विशेष सामाजिक वर्ग के लिए नहीं, अपितु उन मतों के लिए है जो केवल बाहरी भिक्षाचार और वैराग्य के ढोंग द्वारा वेद-विरोधी सिद्धांतों का प्रचार करते हैं।

• वेदबाह्यः: वे मत जो वेदों की ऋचाओं, ब्राह्मणों और उपनिषदों के प्रमाण से बाहर हैं।

• तामसः: 'तमस' का अर्थ है अंधकार। जो ज्ञान विवेक को नष्ट करे, प्रमाद बढ़ाए और आत्मा को जड़ता की ओर ले जाए, वह तामस है।

• आशिवाः: 'अशिवाः' अर्थात् अमंगलकारी। जो साधक के आध्यात्मिक उत्थान में बाधक हो और उसे पतन की ओर ले जाए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन मतों का वर्गीकरण कर रहे हैं जो वेदों के प्रकाश से विमुख हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि बौद्ध, कपिल के नाम पर कपट करने वाले (कापिल-कुहक), लोकायतिक और भिक्षाचार के आवरण में छिपे वेद-विरोधी मत तथा अन्य इसी प्रकार के समस्त वेदबाह्य विचार 'तामस' और 'अमंगलकारी' हैं।

यहाँ याज्ञवल्क्य जी का संकेत यह है कि सत्य केवल एक है, और वह वेदों में बीजरूप है। जब कोई मत उस मूल बीज (श्रुति) को त्यागकर केवल मानवीय तर्क या कपट पर आधारित होता है, तो वह ज्ञान नहीं, अपितु 'तमस' बन जाता है। 'तामस' होने का अर्थ यह है कि ऐसा मत साधक की बुद्धि में वह अंधकार उत्पन्न करता है जिससे वह अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को भूलकर देह-बुद्धि या शून्य-बुद्धि में फंस जाता है।

'आशिवा' शब्द का प्रयोग यहाँ अत्यंत गंभीर है। शिव का अर्थ है कल्याण। जो मत कल्याणकारी नहीं है, वह साधक के लिए अमंगलकारी है क्योंकि वह उसे मोक्ष के मार्ग से भटकाकर पुनः जन्म-मृत्यु के चक्र में या अविद्या के गहरे गर्त में धकेल देता है। याज्ञवल्क्य जी यहाँ यह भेद कर रहे हैं कि एक ओर वे प्रमाण विद्याएँ हैं (जैसे सांख्य, योग) जो वेदों की पुष्टि करती हैं, और दूसरी ओर वे मत हैं जो वेदों का बाधन करते हैं।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विवेक-ख्याति' का अभ्यास कराता है। साधक जब इस श्लोक का मनन करता है, तो वह यह अनुभव करता है कि केवल बाहरी वेशभूषा (जैसे भिक्षाचार) या किसी महान ऋषि के नाम का सहारा लेना (जैसे कापिल-कुहक) आध्यात्मिक प्रगति की गारंटी नहीं है।

साधक यहाँ 'तमस' से 'सत्व' की ओर जाने का अभ्यास करता है। वह यह देखता है कि जो विचार उसे जड़ता, निराशा या ईश्वर-निषेध की ओर ले जाते हैं, वे उसकी चेतना के लिए 'अमंगल' हैं। अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर उठने वाले उन विचारों को पहचाने जो वेद-विरुद्ध और तामस हैं, और उन्हें 'अशिवा' मानकर त्याग दे, ताकि वह अक्षर-ब्रह्म की ज्योति में प्रतिष्ठित हो सके। यह श्लोक साधक को भ्रम की भूमि से निकालकर प्रमाण की भूमि पर खड़ा करता है।

श्लोक १२.१०

नैरात्म(त्म्य)वादकुहकैर्मिथ्यादृष्टान्तहेतुभिः ।

वेदशास्त्रं तु बाधन्ते पौरुषेयास्तु ते स्मृताः ॥ १२.१० ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

नैरात्म्यवादी कपटी, झूठे दृष्टान्तों और हेतुओंसे वेदशास्त्रका बाधन करते हैं — वे पौरुषेय (मनुष्य-रचित मत) कहे गये हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बौद्ध, लोकायत और कपटी कापिल-कुहकों जैसे वेदबाह्य मतों को 'तामस' और 'अमंगलकारी' बताया। इस श्लोक में वे उन मतों की कार्यविधि और उनकी प्रकृति का विश्लेषण कर रहे हैं कि वे किस प्रकार वेदों का विरोध करते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

नैरात्म्य-वाद-कुहकैः मिथ्या-दृष्टान्त-हेतुभिः वेदशास्त्रं तु बाधन्ते, ते पौरुषेयाः स्मृताः।

पदार्थ:

• नैरात्म्य-वाद-कुहकैः: 'नैरात्म्य' का अर्थ है—आत्मा का अभाव। 'वाद' अर्थात् सिद्धांत और 'कुहक' का अर्थ है कपटी या छलावा करने वाला। अतः वे कपटी लोग जो आत्मा के अस्तित्व को नकारने वाले सिद्धांतों का प्रचार करते हैं।

• मिथ्या-दृष्टान्त-हेतुभिः: 'मिथ्या' अर्थात् असत्य या भ्रामक। 'दृष्टान्त' वह उदाहरण है जो किसी सत्य को सिद्ध करने के लिए दिया जाता है और 'हेतु' वह तर्क या कारण है जिसके आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है। यहाँ इसका अर्थ है—ऐसे तर्क और उदाहरण जो ऊपर से सत्य प्रतीत होते हैं, किन्तु वास्तव में भ्रामक हैं।

• बाधन्ते: बाधन करना अर्थात् खंडन करना, विरोध करना या किसी प्रमाण को निष्प्रभावी सिद्ध करने का प्रयास करना।

• पौरुषेयः: 'पुरुष' (मनुष्य) द्वारा रचित। जो अपौरुषेय (ईश्वरीय/श्रुति) नहीं है, बल्कि मानवीय बुद्धि, इच्छा और सीमित अनुभव से निर्मित है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन मतों की बौद्धिक प्रविधि का उद्घाटन कर रहे हैं जो वेदों के विरुद्ध खड़े हैं। वे कहते हैं कि जो लोग 'नैरात्म्य' का सहारा लेते हैं—अर्थात् यह दावा करते हैं कि कोई नित्य, शुद्ध और अविनाशी आत्मा नहीं है—वे वास्तव में कुहक (कपटी) हैं।

इनका कपट इस बात में है कि ये सीधे तौर पर झूठ नहीं बोलते, बल्कि 'मिथ्या दृष्टान्तों' और 'मिथ्या हेतुओं' का प्रयोग करते हैं। तर्कशास्त्र में हेतु और दृष्टान्त सत्य होने चाहिए, किन्तु ये लोग भौतिक जगत की नश्वरता को ही अंतिम सत्य मानकर उसे आत्मा के अभाव का प्रमाण बना देते हैं। उदाहरण के लिए, शरीर के नष्ट होने को वे आत्मा का विनाश कह देते हैं, जो कि एक मिथ्या दृष्टान्त है। इस प्रकार के भ्रामक तर्कों के माध्यम से वे वेदशास्त्र का बाधन (खंडन) करने का प्रयास करते हैं।

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद स्पष्ट कर रहे हैं। वे इन मतों को 'पौरुषेय' कहते हैं। वेदों का स्वरूप 'अपौरुषेय' है, क्योंकि वे किसी व्यक्ति की कल्पना नहीं, बल्कि ऋषियों द्वारा अनुभूत सार्वभौमिक सत्य (श्रुति) हैं। इसके विपरीत, नैरात्म्यवादी मत केवल मानवीय बुद्धि (पौरुष) की उपज हैं। मनुष्य की बुद्धि सीमित है, वह केवल स्थूल देख सकती है; इसलिए जब वह सूक्ष्म आत्मा को नहीं देख पाती, तो वह यह निष्कर्ष निकाल लेती है कि आत्मा है ही नहीं। यही पौरुषेयता का दोष है—सीमित अनुभव को पूर्ण सत्य मान लेना और उसके आधार पर अनंत वेदशास्त्र का खंडन करना।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विवेक-ख्याति' का अभ्यास कराता है। नैरात्म्य-वाद वास्तव में साधक के भीतर के उस 'अविद्या' रूपी अंधकार का विस्तार है, जो उसे अपनी वास्तविक सत्ता (आत्मा) से विमुख करता है।

साधक जब इस श्लोक का मनन करता है, तो वह यह अनुभव करता है कि केवल बौद्धिक तर्क (हेतु) और बाहरी उदाहरण (दृष्टान्त) सत्य तक नहीं ले जा सकते। सत्य तर्कों से सिद्ध नहीं होता, अपितु अनुभव से जाना जाता है। 'पौरुषेय' बुद्धि केवल संशय पैदा कर सकती है, किन्तु 'अपौरुषेय' ज्ञान (वेद) साक्षात्कार कराता है। साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह अपने भीतर के उन भ्रामक विचारों को पहचाने जो उसे यह विश्वास दिलाते हैं कि वह केवल यह नश्वर शरीर है। जैसे ही वह 'नैरात्म्य' के भ्रम को हटाकर 'आत्म्य' (आत्मा के होने) के बोध में स्थित होता है, वह तामस भूमि से ऊपर उठकर प्रकाशमय ज्ञान-भूमि की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक १२.११

आसुरेयाः पाशुपता बृहस्पतिकृतास्तु ये ।

शुक्रं रूपं समास्थाय देवानां हितकाम्यया ॥ १२.११ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

जो आसुर पाशुपत (मत) और जो बृहस्पतिके रचे (मत) हैं — (बृहस्पतिने) देवताओंके हितकी इच्छासे शुक्रका रूप धारण करके (उन्हें रचा) —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन कपटी नैरात्म्यवादियों की चर्चा की जो मिथ्या तर्कों से वेदशास्त्र का बाधन करते हैं। इसी क्रम में अब वे उन विशिष्ट मतों का उल्लेख कर रहे हैं जो बाह्यतः ज्ञान का रूप लेकर आए, किन्तु जिनका मूल उद्देश्य या प्रकृति वेदों से भिन्न है।

अन्वय और पदार्थ —

ये आसुरेयाः पाशुपता (मतः) और ये बृहस्पतिकृताः (मतः) अस्ति। (बृहस्पतिः) देवानां हितकाम्यया शुक्रं रूपं समास्थाय (एतानि अरचयत्)।

पदार्थ:

• आसुरेयाः: असुरों से संबंधित या असुरों की वृत्ति वाले। यहाँ इसका अर्थ उन मतों से है जो दैवीय अनुशासन के बजाय आसुरिक प्रवृत्तियों या भौतिकता को प्रधानता देते हैं।

• पाशुपता: पाशुपत मत। (ध्यान रहे कि श्लोक १२.४ में पाशुपत ज्ञान को 'अत्युग्र' और 'अतिप्रमाण' कहा गया था; यहाँ 'आसुरेयाः पाशुपता' शब्द का प्रयोग हुआ है, अतः संभवतः यहाँ उन विकृत मतों की बात हो रही है जो पाशुपत के नाम पर असुरों की वृत्ति का पोषण करते हैं, न कि उस मूल शिव-ज्ञान की जो १२.४ में वर्णित था)।

• बृहस्पतिकृताः: देवगुरु बृहस्पति द्वारा रचे गए।

• हितकाम्यया: हित की इच्छा से।

• रूपं समास्थाय: रूप धारण करके।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन मतों के उद्गम और उनके पीछे छिपे प्रयोजनों का विश्लेषण कर रहे हैं। वे कहते हैं कि कुछ मत 'आसुर' प्रकृति के हैं और कुछ पाशुपत के नाम से प्रचलित हैं। यहाँ 'आसुर' शब्द का प्रयोग उन प्रवृत्तियों के लिए है जो मर्यादा और श्रुति-विधान का उल्लंघन करती हैं।

विशेष रूप से, ऋषि उन मतों की चर्चा करते हैं जो देवगुरु बृहस्पति द्वारा रचे गए। यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य का संकेत है—बृहस्पति ने देवताओं के हित की इच्छा से (देवानां हितकाम्यया) शुक्र का रूप धारण किया और कुछ विशिष्ट मतों या विधियों का निर्माण किया।

रहस्य यह है कि शुक्र असुरों के गुरु हैं और उनकी विद्याएँ भौतिक सुख, काम और मायावी शक्तियों में निपुण हैं। जब असुरों को मोहित करना हो या उनके बीच रहकर देवताओं के गुप्त हितों की रक्षा करनी हो, तब गुरु बृहस्पति ने शुक्र का रूप धरकर ऐसी प्रणालियाँ रचीं जो असुरों को स्वीकार्य हों, किन्तु अंततः वे देवताओं के हित में हों। यह एक प्रकार की 'कौशल-विद्या' थी, जहाँ सत्य को बचाने के लिए उसे एक भिन्न आवरण (शुक्र के रूप) में प्रस्तुत किया गया। किन्तु समय के साथ, जब इन मतों को उनके मूल उद्देश्य से अलग कर देखा गया, तो वे वेदबाह्य और भ्रमित करने वाले प्रतीत होने लगे।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'रूप' और 'प्रयोजन' के भेद को समझने का अभ्यास कराता है। जिस प्रकार बृहस्पति ने एक उच्च लक्ष्य (देवहित) के लिए निम्न या भिन्न रूप (शुक्र रूप) धारण किया, उसी प्रकार योग मार्ग में भी साधक को यह अनुभव होता है कि सत्य कभी-कभी विपरीत आवरण में प्रकट होता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक बाहरी 'रूप' या 'नाम' (जैसे पाशुपत या अन्य मत) से भ्रमित न होकर उसके 'हित' और 'प्रमाण' को देखे। यह श्लोक संकेत देता है कि जो विद्या केवल भौतिकता या असुर-वृत्ति (अहंकार और भोग) को पुष्ट करती है, वह वास्तव में भ्रामक है। साधक इस बोध से ऊपर उठता है कि केवल वह ज्ञान सत्य है जो उसे 'अक्षर' की ओर ले जाए, न कि वह जो केवल रूप बदलने की कला सिखाए। इस श्लोक का पूर्ण फल अगले श्लोक (१२.१२) के साथ जुड़कर प्रकट होता है, जहाँ इन मतों के 'प्रमोहन' (मोहने वाले) स्वरूप की व्याख्या की गई है।

श्लोक १२.१२

प्रजापतिकृताश्चान्ये असुराणां प्रमोहनाः ।

येनेदं वाङ्मयं दुग्धमधर्मे विफलीकृतम् ॥ १२.१२ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

— और प्रजापतिके रचे दूसरे (मत) असुरोंको मोहित करनेवाले हैं, जिन्होंने इस वाङ्मयको दुहकर अधर्ममें निष्फल कर दिया।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन मतों का उल्लेख किया जो देवगुरु बृहस्पति द्वारा देवताओं के हित के लिए शुक्र का रूप धारण कर रचे गए थे। इसी क्रम में अब वे उन अन्य मतों के प्रयोजन और उनके द्वारा किए गए वाङ्मय के दुरुपयोग का विश्लेषण कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(एतानि) प्रजापतिकृतानि च अन्ये (मताः) असुराणां प्रमोहनाय (अस्ति)। येन (तेन) इदं वाङ्मयं दुग्धम्, (तद्) अधर्मे विफलीकृतम्।

पदार्थ:

• प्रजापतिकृताः: प्रजापति (सृष्टि के अधिष्ठाता) द्वारा रचे गए। यहाँ इसका संकेत उन विधानों की ओर है जो सृष्टि के संचालन और विभिन्न प्रवृत्तियों के प्रबंधन के लिए बनाए गए।

• प्रमोहनाः: मोह उत्पन्न करने वाले। वह विद्या जो सत्य को छिपाकर साधक को भ्रम में डाल दे।

• वाङ्मयं: वाणी का साम्राज्य, अर्थात वेद और समस्त पवित्र मन्त्र-विद्या।

• दुग्धम्: दुहकर। जैसे गाय से दूध निकाला जाता है, वैसे ही वेदों के मन्त्रों और रहस्यों को निकाल कर उनका उपयोग करना।

• विफलीकृतम्: निष्फल कर देना। जो विद्या मोक्ष या धर्म के लिए थी, उसे अधर्म के मार्ग पर लगाकर व्यर्थ कर देना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गंभीर सत्य उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि कुछ मत ऐसे भी हैं जो मूलतः प्रजापति द्वारा रचे गए थे। यहाँ रहस्य यह है कि प्रजापति ने केवल ऋषियों के लिए ही नहीं, अपितु समस्त प्रवृत्तियों के लिए विधान किए। असुरों की प्रकृति तामस और मोह प्रधान होती है; उन्हें उनके स्वभाव के अनुसार ही कुछ ऐसी विद्याएँ दी गईं जो उन्हें एक समय के लिए संतुष्ट रखें या उन्हें मोहित कर उनके वेग को नियंत्रित करें, ताकि वे सृष्टि के संतुलन को पूर्णतः नष्ट न कर सकें।

किन्तु, समस्या तब उत्पन्न हुई जब कुछ लोगों ने इस 'प्रमोहक' विद्या का उपयोग सत्य के मार्ग को अवरुद्ध करने के लिए किया। ऋषि कहते हैं कि इन मतों ने 'वाङ्मय' को दुहा है। 'दुहना' एक विशिष्ट क्रिया है—जिस प्रकार दूध निकालने के लिए गाय के थनों पर दबाव दिया जाता है, उसी प्रकार इन मतों के समर्थकों ने वेदों के शब्दों, मन्त्रों और प्रतीकों को अपनी सुविधा के अनुसार मरोड़ा (दुहा) और उनके आन्तर अर्थों को बदलकर उन्हें अधर्म की पुष्टि के लिए प्रयोग किया।

जब पवित्र मन्त्रों का प्रयोग आत्म-साक्षात्कार के बजाय केवल भौतिक भोग, अहंकार की तुष्टि या अधर्म के समर्थन में किया जाता है, तब वह वाङ्मय 'विफलीकृत' हो जाता है। अर्थात्, मन्त्र की वह शक्ति जो साधक को ऊपर उठाती है, वह समाप्त हो जाती है और वह केवल शब्दों का जाल बनकर रह जाता है। यह चेतावनी है कि विद्या का दुरुपयोग उसे निष्फल कर देता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विवेक' के अभ्यास का निर्देश देता है। योग मार्ग में 'वाङ्मय' का अर्थ है—मन्त्रों की शक्ति और प्राणों का स्पंदन। जब साधक मन्त्र का जप करता है, तो वह उसे 'दुहता' है, अर्थात मन्त्र के भीतर छिपे अमृत को निकालता है। यदि यह जप केवल सांसारिक कामनाओं या अहंकार (आसुर वृत्ति) के लिए किया जाए, तो वह योग-साधना 'विफलीकृत' हो जाती है; साधक केवल मानसिक कल्पनाओं के मोह में फँस जाता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर की 'आसुर' प्रवृत्तियों (मोह, क्रोध, लोभ) को पहचानें और देखें कि क्या वे अपनी आध्यात्मिक विद्या का उपयोग इन प्रवृत्तियों को संतुष्ट करने के लिए तो नहीं कर रहे? इस श्लोक से साधक 'मोह-भूमि' से निकलकर 'विवेक-भूमि' की ओर बढ़ता है, जहाँ वह शब्दों के मायाजाल को छोड़कर मन्त्र के वास्तविक लक्ष्य—अक्षर और सूर्य (आत्मा)—की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक १२.१३

आत्मानं भूषयेन्नित्यं भोजनाच्छादनादिभिः ।

स्वदेहमेव दैवत्यमन्यन्नैवात्र विद्यते ॥ १२.१३ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

(उनका मत है:) अपनेको सदा भोजन, वस्त्र आदिसे सजाओ; अपना शरीर ही देवता है, यहाँ दूसरा कुछ नहीं है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन मतों का विश्लेषण किया जो असुरों को मोहित करने के लिए रचे गए थे और जिनमें वाङ्मय का दुरुपयोग कर उसे अधर्म की ओर मोड़ा गया। अब वे उन वेदबाह्य मतों के उस विशिष्ट दर्शन को प्रस्तुत कर रहे हैं, जो साधक को सूक्ष्म से स्थूल की ओर ले जाकर उसे देह-अभिमान में बाँध देता है।

अन्वय और पदार्थ —

(ते) आत्मानं नित्यं भोजनात्, छादनात्, आदिभिः भूषयेत् । (तेषां मतम् अस्ति यत्) स्वदेहमेव दैवत्यम्, अन्यत् न एवात्र विद्यते ।

पदार्थ:

• आत्मानं: यहाँ 'आत्मा' शब्द का प्रयोग 'देह' या 'स्वयं' के अर्थ में हुआ है। वेदबाह्य मतों में शरीर को ही आत्मा मान लिया जाता है।

• भूषयेत्: सजाना या अलंकृत करना। यहाँ इसका अर्थ केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि इंद्रिय-तृप्ति और शारीरिक सुखों के संचय से है।

• भोजनाच्छादनादिभिः: भोजन (आहार), छादन (वस्त्र/आवरण) आदि के द्वारा।

• दैवत्यम्: देवता स्वरूप। जिसे पूजा जाए, जो पूजनीय हो या जो सर्वोपरि हो।

• अन्यन्नैवात्र विद्यते: यहाँ (इस संसार में) इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन तामस मतों की विचारधारा का उद्घाटन कर रहे हैं, जो पूर्णतः भौतिकतावादी हैं। इन मतों का मूल तर्क यह है कि मनुष्य का यह स्थूल शरीर ही एकमात्र सत्य है और यही पूजनीय है।

उनका मत है कि चूंकि शरीर ही सब कुछ है, इसलिए इसे निरंतर भोजन, उत्तम वस्त्रों और विलासिता की वस्तुओं से सजाया जाना चाहिए। यहाँ 'भूषय' शब्द का गहरा अर्थ यह है कि वे शरीर की तृप्ति को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं। जब शरीर को ही देवता मान लिया जाता है, तब उसकी भूख, उसकी प्यास और उसकी कामुकता ही 'पूजा' बन जाती है। वे कहते हैं कि इस दृश्य जगत में शरीर के अतिरिक्त कोई अन्य सत्ता, कोई ईश्वर या कोई सूक्ष्म आत्मा विद्यमान नहीं है।

यह दृष्टि साधक को 'अहंकार' के सबसे निचले स्तर पर ले आती है, जहाँ वह स्वयं को केवल मांस और अस्थियों का पुंज मानकर केवल इंद्रिय-सुख की खोज में लीन हो जाता है। यह वह अवस्था है जहाँ 'अक्षर' (अविनाशी) की खोज समाप्त हो जाती है और केवल 'क्षर' (विनाशी) का उत्सव शेष रहता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ चेतावनी दे रहे हैं कि जब मनुष्य देह को ही देवता मान लेता है, तो वह उस वास्तविक देवता (अंतर्यामी पुरुष) को विस्मृत कर देता है जो हृदय-आकाश में स्थित है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस देह-केंद्रित विचारधारा का उल्लेख अन्य शास्त्रों में भी मिलता है, जहाँ इसे असुरों की दृष्टि बताया गया है:

छान्दोग्य उपनिषद्

आत्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ८.८.४ ॥

(विरोचनने असुरोंसे कहा:) यहाँ आत्मा (शरीर) ही पूज्य है, आत्मा ही सेव्य; आत्माको ही पूजते और सेवते हुए (मनुष्य) यह और वह, दोनों लोक पाता है।

छान्दोग्य उपनिषद् ८.८.४उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 300

यहाँ विरोचन असुरों से कहता है कि शरीर ही पूज्य है और शरीर की ही सेवा करनी चाहिए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी विचार का विस्तार है। जहाँ वेद कहते हैं कि शरीर आत्मा को प्राप्त करने का साधन है, वहीं यह मत शरीर को ही साध्य (लक्ष्य) बना देता है।

छान्दोग्य उपनिषद्

असुराणां ह्येषोपनिषत्प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालंकारेणेति संस्कुर्वन्ति ॥ ८.८.५ ॥

यह असुरोंकी उपनिषद् (सिद्धान्त) है — वे मरेके शरीरको भी भिक्षा, वस्त्र और अलंकारसे सजाते हैं।

छान्दोग्य उपनिषद् ८.८.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 300

छान्दोग्य उपनिषद् स्पष्ट करता है कि मरे हुए शरीर को भी वस्त्रों और अलंकारों से सजाना असुरों का सिद्धांत है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि असुरों की दृष्टि में 'रूप' और 'सजावट' ही सत्य है, जबकि चेतना का विलोप हो जाने पर भी वे स्थूल शरीर के मोह को नहीं छोड़ते।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'अविद्या' की पराकाष्ठा को दर्शाता है। साधक के लिए यहाँ सबसे बड़ा अभ्यास यह समझना है कि 'देह' और 'आत्मा' में क्या भेद है।

जब साधक कहता है "मैं यह शरीर हूँ", तो वह स्वयं को सीमित कर लेता है। यह श्लोक उस 'भ्रम' का वर्णन है जिससे साधक को मुक्त होना है। योग का मार्ग 'देह-पूजा' से 'देव-पूजा' की ओर है, और 'देव-पूजा' से 'आत्म-साक्षात्कार' की ओर। जो व्यक्ति भोजन और वस्त्रों के विलास में स्वयं को सजाता है, वह वास्तव में अपनी चेतना को स्थूल शरीर की परतों में और अधिक गहरा दबा देता है।

साधक को यहाँ यह अनुभव करना चाहिए कि शरीर केवल एक उपकरण (यंत्र) है, वह स्वयं 'देवता' नहीं है। यदि शरीर को ही देवता मान लिया जाए, तो साधना का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है क्योंकि शरीर नश्वर है और देवता अविनाशी। इस श्लोक के माध्यम से साधक 'देहात्म-भाव' (शरीर को आत्मा मानना) का त्याग कर 'देही-भाव' (शरीर के भीतर रहने वाले साक्षी) की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास उसे तामस भूमि से उठाकर सत्त्व भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ वह समझ पाता है कि वास्तविक भूषण वस्त्र या भोजन नहीं, बल्कि ज्ञान और वैराग्य हैं।

श्लोक १२.१४

असत्यमप्रतिष्ठं च जगदाहुरनीश्वरम् ।

अयं लोकोऽस्ति न परः पुनः संभवनं कुतः ॥ १२.१४ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

वे जगत्‌को असत्य, बिना आधारका और ईश्वररहित कहते हैं; यही लोक है, परलोक नहीं, फिर पुनर्जन्म कहाँ?

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन भौतिकतावादी मतों का वर्णन किया जो शरीर को ही देवता मानकर इंद्रिय-तृप्ति को जीवन का लक्ष्य बताते हैं। इसी देह-अभिमान का तार्किक विस्तार करते हुए अब वे उन मतों के उस दर्शन को प्रस्तुत कर रहे हैं, जो ईश्वर, आधार और परलोक के अस्तित्व को ही नकार देता है।

अन्वय और पदार्थ —

(ते) जगत् असत्यम्, अप्रतिष्ठं च, अनीश्वरम् इति आहुर् । अयं लोकोऽस्ति, परः (लोको) न (अस्ति) । पुनः संभवनं कुतः (अस्ति)?

पदार्थ:

• असत्यम्: जिसका कोई शाश्वत अस्तित्व न हो; जो केवल इंद्रिय-भ्रम हो।

• अप्रतिष्ठम्: बिना किसी आधार के। यहाँ 'प्रतिष्ठा' का अर्थ उस मूल तत्त्व या अधिष्ठान से है जिस पर संपूर्ण सृष्टि टिकी है।

• अनीश्वरम्: ईश्वररहित। वह चेतना या नियामक शक्ति का अभाव, जो सृष्टि का संचालन करती है।

• अयं लोकोऽस्ति न परः: केवल यही दृश्यमान भौतिक जगत (इहलोक) सत्य है, कोई दूसरा लोक (परलोक) नहीं है।

• पुनः संभवनं कुतः: पुनः जन्म (पुनर्जन्म) कहाँ से संभव है? 'कुतः' प्रश्नवाचक अव्यय है, जो यहाँ निषेध के अर्थ में आया है कि पुनर्जन्म का कोई आधार ही नहीं है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन आसुरिक और तामस विचारधाराओं का विश्लेषण कर रहे हैं, जो मनुष्य को उसकी आध्यात्मिक यात्रा से विमुख कर उसे केवल स्थूलता में सीमित कर देती हैं।

इन मतों का पहला प्रहार सृष्टि के स्वरूप पर है। वे कहते हैं कि यह जगत् 'असत्य' है। यहाँ 'असत्य' का अर्थ वह दार्शनिक असत्य नहीं है जो मायावाद में है, बल्कि यह एक शून्यवादी दृष्टिकोण है। उनके अनुसार, जो दिखाई देता है वह केवल भौतिक संयोग है, उसका कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं है। वे इसे 'अप्रतिष्ठ' कहते हैं, अर्थात इस संसार का कोई ऐसा अधिष्ठान या मूल कारण नहीं है जो इसे धारण किए हुए हो। जब आधार ही नहीं है, तो इस सृष्टि का कोई उद्देश्य भी नहीं है।

इसी क्रम में वे इसे 'अनीश्वर' घोषित करते हैं। ईश्वर का अर्थ यहाँ उस सर्वव्यापी चेतना से है जो नियमबद्धता (ऋत) का संचालन करती है। इन मतों के अनुसार, कोई नियामक शक्ति नहीं है, सब कुछ आकस्मिक और यांत्रिक है। जब ईश्वर का अभाव माना जाता है, तो नैतिकता और धर्म का आधार समाप्त हो जाता है।

इसका अंतिम परिणाम यह होता है कि साधक की दृष्टि केवल वर्तमान शरीर और वर्तमान समय तक सीमित रह जाती है। 'अयं लोकोऽस्ति न परः'—अर्थात केवल यह भौतिक संसार ही सत्य है। जब परलोक का निषेध होता है, तो कर्मों के फल और उनके संस्कार का सिद्धांत स्वतः समाप्त हो जाता है। इसी तर्क से वे 'पुनः संभवनं कुतः' कहकर पुनर्जन्म को नकार देते हैं। उनका मानना है कि शरीर के नष्ट होते ही चेतना का भी अंत हो जाता है। यह विचार मनुष्य को भयमुक्त नहीं करता, बल्कि उसे उत्तरदायित्वहीन बनाकर केवल क्षणिक सुखों की ओर धकेलता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इसी भाव की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता में मिलती है:

भगवद्गीता

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ १६.८ ॥

वे (आसुर स्वभाववाले) कहते हैं — जगत् असत्य, आधाररहित, ईश्वररहित है, (स्त्री-पुरुषके) परस्पर संयोगसे उत्पन्न, कामके सिवा इसका और क्या कारण?

भगवद्गीता १६.८गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 385

यहाँ 'असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्' के माध्यम से स्पष्ट है कि आसुर स्वभाव वाले लोग संसार को आधाररहित और ईश्वररहित मानते हैं। स्मृति और गीता दोनों यहाँ एक ही सत्य को उजागर कर रहे हैं कि जब मनुष्य ईश्वर और अधिष्ठान को नकारता है, तो वह केवल काम-वासना को ही जीवन का हेतु मान लेता है।

इसी प्रकार, परलोक के निषेध और उसके दुष्परिणामों के विषय में कठोपनिषद् में यमराज का कथन है:

कठ उपनिषद्

न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ १.२.६ ॥

धनके मोहसे मूढ़, प्रमादी बालकको परलोक नहीं सूझता; 'यही लोक है, पर नहीं' — ऐसा माननेवाला बार-बार मेरे (मृत्युके) वशमें आता है।

कठ उपनिषद् १.२.६उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 64

यहाँ यमराज कहते हैं कि जो धन के मोह में मूढ़ है और मानता है कि 'यही लोक है, परलोक नहीं', वह बार-बार मृत्यु के वश में आता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति जहाँ इस मत के 'तर्क' को बता रही है, वहीं कठोपनिषद् उस तर्क का 'परिणाम' बता रहा है—कि ऐसा मानने वाला व्यक्ति जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता, बल्कि अज्ञानवश उसमें और गहराई से फँस जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'चेतना के पतन' की चेतावनी देता है। एक योगी के लिए जगत् 'असत्य' नहीं, बल्कि 'नाम-रूप' का विवर्त है जिसका आधार 'ब्रह्म' (प्रतिष्ठा) है।

जब साधक इस श्लोक में वर्णित आसुरिक भावों का विश्लेषण करता है, तो वह अनुभव करता है कि 'अनीश्वर' भाव वास्तव में हृदय के भीतर के सूर्य (अंतर्यामी) के विस्मरण का नाम है। यदि साधक केवल शरीर को ही सत्य माने, तो वह केवल स्थूल स्तर पर रहेगा। योग का अभ्यास उसे 'अयं लोक' (स्थूल जगत) से उठाकर 'पर लोक' (सूक्ष्म और कारण जगत) की ओर ले जाता है।

यहाँ 'परलोक' का अर्थ केवल मृत्यु के बाद जाने वाला स्थान नहीं, बल्कि चेतना की वह उच्च अवस्था है जहाँ साधक शरीर के घेरे से बाहर निकलकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है। जो साधक इस श्लोक के निषेधों को समझ लेता है, वह 'देह-अभिमान' से मुक्त होकर 'अक्षर' की खोज में प्रवृत्त होता है। अभ्यास यह है कि वह अपनी चेतना को केवल इंद्रिय-विषयों (अयं लोक) में न बहाए, बल्कि उस 'प्रतिष्ठा' (आधार) को खोजे जो इस संपूर्ण जगत् को धारण किए हुए है।

श्लोक १२.१५

जलबुद्बुदवच्चायं संभवेच्च पुनः पुनः ।

स्वेच्छयोत्पद्यते चैव स्वेच्छया च प्रलीयते ॥ १२.१५ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३०

यह (जगत्) जलके बुलबुलेकी भाँति बार-बार उत्पन्न होता है; अपनी इच्छासे उत्पन्न होता है और अपनी इच्छासे लीन होता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन मतों का उल्लेख किया जो ईश्वर, परलोक और पुनर्जन्म का निषेध करते हैं। इसी शून्यवाद और अनीश्वरवाद की तार्किक परिणति को स्पष्ट करने के लिए अब वे इस जगत की उत्पत्ति और प्रलय के विषय में उन मतों के दृष्टिकोण को प्रस्तुत कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अयं (जगत्) जलबुद्बुदवत् च संभवेच्च पुनः पुनः । स्वेच्छया उत्पद्यते च एव, स्वेच्छया च प्रलीयते ।

पदार्थ:

• जलबुद्बुदवत्: जल के बुलबुले के समान। बुलबुला क्षणभंगुर होता है, जिसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता और जो शीघ्र ही विलीन हो जाता है।

• संभवेच्च पुनः पुनः: बार-बार उत्पन्न होता है। यहाँ 'संभव' का अर्थ है भौतिक संयोग से प्रकट होना।

• स्वेच्छया: अपनी इच्छा से। यहाँ 'इच्छा' का अर्थ चेतना वाली इच्छा नहीं, अपितु एक यांत्रिक और आकस्मिक प्रक्रिया है, जिसे वे 'स्वेच्छा' कह रहे हैं।

• उत्पद्यते: प्रकट होता है या जन्म लेता है।

• प्रलीयते: लय हो जाता है, नष्ट हो जाता है या विलीन हो जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य उन विचारधाराओं के उस तर्क को उद्घाटित कर रहे हैं जो सृष्टि को किसी दिव्य संकल्प या ईश्वरीय विधान का परिणाम नहीं, बल्कि एक आकस्मिक घटना मानते हैं।

इन मतों के अनुसार, यह संपूर्ण जगत 'जलबुद्बुदवत्' है। जल का बुलबुला क्या है? वह जल का ही एक रूप है जो वायु के दबाव या किसी आकस्मिक हलचल से क्षण भर के लिए उभरता है और अगले ही पल फूटकर पुनः जल में मिल जाता है। उसका न कोई आदि है, न अंत, और न ही उसका कोई उद्देश्य। इसी प्रकार ये मत मानते हैं कि यह संसार भी भौतिक तत्वों के संयोग से बार-बार उत्पन्न होता है और बिना किसी कारण के नष्ट हो जाता है।

यहाँ 'स्वेच्छा' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः इच्छा किसी चेतन सत्ता की होती है, किंतु यहाँ 'स्वेच्छया' का भाव यह है कि सृष्टि के पीछे कोई 'स्रष्टा' या 'नियामक' नहीं है। यह जगत किसी नियम से नहीं, बल्कि अपनी ही एक अंधी, यांत्रिक और आकस्मिक प्रवृत्ति से उत्पन्न होता है और उसी अनियंत्रित ढंग से लीन हो जाता है। इसमें न तो कोई प्रारब्ध है, न कोई कर्म-फल और न ही कोई मोक्ष की संभावना।

यह दृष्टिकोण साधक को पूर्णतः निराशा और शून्य की ओर ले जाता है, क्योंकि यदि जीवन केवल एक बुलबुले की तरह आकस्मिक है, तो साधना, तप और धर्म का कोई अर्थ नहीं रह जाता। याज्ञवल्क्य यहाँ इस मत को इसलिए रख रहे हैं ताकि साधक यह समझ सके कि बिना आधार (प्रतिष्ठा) और बिना ईश्वर के, जगत की व्याख्या केवल 'बुलबुले' जैसी क्षणभंगुरता तक सीमित रह जाती है, जो जीवन के गहरे सत्य को ढक लेती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'वैराग्य' और 'विवेक' की एक विशेष भूमि पर ले जाता है। यद्यपि यहाँ एक नकारात्मक मत का वर्णन है, किंतु योगी इस 'बुलबुले' के दृष्टान्त से यह अनुभव करता है कि स्थूल जगत और मानसिक वृत्तियाँ वास्तव में इसी बुलबुले के समान हैं—जो उठती हैं और गिर जाती हैं।

साधक जब अपने भीतर के विचारों और भावनाओं का निरीक्षण करता है, तो पाता है कि वे भी 'जलबुद्बुदवत्' हैं; वे आते हैं और चले जाते हैं। इस श्लोक का अभ्यास करते हुए योगी यह अनुभव करता है कि यदि वह स्वयं को इस 'बुलबुले' (शरीर और मन) से जोड़कर देखेगा, तो वह भी उसी आकस्मिक प्रलय का हिस्सा बन जाएगा। अतः वह इस क्षणभंगुरता को साक्षी भाव से देखना सीखता है, ताकि वह उस 'जल' (परमात्मा/अक्षर) को खोज सके जिसमें बुलबुला उत्पन्न होता है और विलीन होता है। बुलबुला असत्य हो सकता है, किंतु वह जिस जल से बना है, वह सत्य है। साधक इसी अभ्यास से स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है।

श्लोक १२.१६

जातिप्राधान्यकं नास्ति एकजातिसमुद्भवः ।

न वेदा नैव यज्ञाश्च न दानं न तपांसि च ॥ १२.१६ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

जातिकी प्रधानता नहीं, (सब) एक ही जातिसे उत्पन्न हैं; न वेद हैं, न यज्ञ, न दान, न तप।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन मतों का विवरण दिया जो जगत को आकस्मिक और ईश्वररहित मानते हैं। इसी अनीश्वरवादी दृष्टिकोण की परिणति अब वे उन सामाजिक और आध्यात्मिक निषेधों के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जहाँ मर्यादा और साधना का पूर्ण अभाव होता है।

अन्वय और पदार्थ —

जातिप्राधान्यकं नास्ति, (सर्वं) एकजातिसमुद्भवः । न वेदाः, नैव यज्ञाः च, न दानं, न तपांसि च ।

पदार्थ:

• जातिप्राधान्यकं: जाति की प्रधानता या विशिष्टता। यहाँ 'जाति' का अर्थ केवल सामाजिक वर्ग नहीं, अपितु उस 'स्वभाव' और 'धर्म' से है जो जीव को उसकी विशिष्ट आध्यात्मिक यात्रा और कर्तव्यों से जोड़ता है।

• एकजातिसमुद्भवः: एक ही जाति (मूल तत्व/भौतिक संयोग) से उत्पन्न। इसका अर्थ है कि सभी जीव केवल भौतिक मांस-मज्जा के पुतले हैं, उनमें कोई दैवीय या आध्यात्मिक भेद नहीं है।

• न वेदाः: वेदों का अस्तित्व नहीं है। अर्थात, कोई शाश्वत ज्ञान या ईश्वरीय निर्देश नहीं है।

• नैव यज्ञाः: यज्ञों का कोई मूल्य नहीं है। यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं, अपितु वह समर्पण है जो जीव को विराट से जोड़ता है।

• न दानं: दान की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि परलोक और ऋण (ऋणानुबंध) का अस्तित्व ही नहीं है।

• न तपांसि: तप का कोई स्थान नहीं है। क्योंकि तप का लक्ष्य आत्म-शुद्धि और मोक्ष होता है, जबकि उनके अनुसार शरीर ही अंतिम सत्य है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य उन आसुरिक मतों के उस चरम बिंदु को दिखा रहे हैं जहाँ पहुँचकर मनुष्य स्वयं को केवल एक भौतिक इकाई मान लेता है।

इन मतों का पहला तर्क है कि 'जातिप्राधान्यकं नास्ति'। जब वे कहते हैं कि सब एक ही जाति से उत्पन्न हैं, तो वे वास्तव में उस आध्यात्मिक सोपान का निषेध कर रहे हैं जो जीव को पशु-भाव से ऊपर उठाकर देव-भाव तक ले जाता है। उनके अनुसार, मनुष्य और पशु में केवल शारीरिक भिन्नता है, चेतना का कोई स्तर नहीं। यदि चेतना के स्तर या स्वभाव की प्रधानता नहीं होगी, तो साधना की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी।

इसी तर्क का विस्तार करते हुए वे कहते हैं— 'न वेदा नैव यज्ञाश्च'। यदि कोई ईश्वरीय विधान नहीं है, तो वेदों जैसे अपौरुषेय ज्ञान का कोई आधार नहीं रहता। यज्ञ, जो कि वास्तव में 'यज्' धातु से बना है जिसका अर्थ है 'देवताओं को देना' या 'समर्पण करना', वह भी निरर्थक हो जाता है। जब देने वाला और लेने वाला दोनों केवल भौतिक शरीर हैं, तो समर्पण किसे किया जाए?

इसी क्रम में वे 'दान' और 'तप' का भी निषेध करते हैं। दान का आधार 'त्याग' और 'करुणा' है, जो इस विश्वास पर टिका है कि हम सब एक ही विराट चेतना के अंश हैं और परोपकार से ऋणों का क्षय होता है। किंतु यदि परलोक नहीं है और केवल यह शरीर ही सत्य है, तो अपना संसाधन किसी दूसरे को देना मूर्खता मानी जाएगी। इसी प्रकार, 'तप' का अर्थ है— 'तपते' अर्थात् स्वयं को तपाकर शुद्ध करना। लेकिन यदि आत्मा जैसी कोई शाश्वत सत्ता नहीं है जिसे शुद्ध करना हो, तो शरीर को कष्ट देना या इंद्रियों का दमन करना व्यर्थ है।

संक्षेप में, यह मत मनुष्य को केवल उसकी शारीरिक प्रवृत्तियों (इंद्रियों) के अधीन कर देता है, जिससे वह आध्यात्मिक विकास की संभावनाओं को स्वयं ही बंद कर लेता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक चेतावनी है। योग का मार्ग 'विवेक' पर आधारित है— यह पहचानना कि मैं केवल यह शरीर (एकजाति) नहीं हूँ, बल्कि मैं वह चैतन्य हूँ जो विभिन्न स्तरों (जाति/स्वभाव) से गुजरकर पूर्णता की ओर बढ़ता है।

जब साधक इस श्लोक के निषेधों को देखता है, तो वह अनुभव करता है कि 'वेद, यज्ञ, दान और तप' केवल बाहरी क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि आंतरिक रूपांतरण के साधन हैं। 'न वेद' का अर्थ है— ज्ञान का अभाव; 'न यज्ञ' का अर्थ है— समर्पण का अभाव; 'न दान' का अर्थ है— विस्तार का अभाव; और 'न तप' का अर्थ है— अनुशासन का अभाव।

साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अभ्यास करता है कि वह अपनी चेतना को केवल भौतिक पहचान तक सीमित न रखे, बल्कि उस 'अक्षर' और 'सूर्य-पुरुष' की ओर बढ़े जिसका वर्णन इस स्मृति के पूर्व अध्यायों में किया गया है। यह श्लोक साधक को 'तामस' भूमि से उठाकर 'सत्व' भूमि की ओर ले जाने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि वह देखता है कि बिना तप और ज्ञान के जीवन केवल एक बुलबुले की भाँति क्षणभंगुर है।

श्लोक १२.१७

न कार्यं नैव चाकार्यं सर्वं कुर्यादशङ्कया ।

एतदासुरकं भावं समाश्रित्य विनश्यति ॥ १२.१७ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

न कोई कर्तव्य है, न अकर्तव्य, सब कुछ निःशंक होकर करो — इस आसुर भावका आश्रय लेकर (मनुष्य) नष्ट हो जाता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन आसुरिक मतों का विवरण दिया जिन्होंने वेद, यज्ञ, दान और तप जैसे आध्यात्मिक सोपानों का पूर्ण निषेध कर दिया। अब इस श्रृंखला के अंतिम श्लोक में वे इस अनीश्वरवादी विचारधारा के उस भयावह परिणाम को उद्घाटित कर रहे हैं, जहाँ मनुष्य नैतिक और आध्यात्मिक दिशाहीनता के गर्त में गिरकर स्वयं का विनाश कर लेता है।

अन्वय और पदार्थ —

न कार्यं, नैव च अकार्यं, (सर्वं) सर्वं कुर्यात् अशङ्कया । एतत् आसुरकं भावं समाश्रित्य विनश्यति ।

पदार्थ:

• न कार्यं: कोई कर्तव्य नहीं है। अर्थात् ऐसा कोई कर्म नहीं है जिसे करना अनिवार्य हो या जो धर्म सम्मत हो।

• नैव च अकार्यं: और न ही कोई अकर्तव्य है। अर्थात् ऐसा कोई कार्य नहीं है जो वर्जित, पाप या अधर्म हो।

• सर्वं कुर्यात्: सब कुछ करे। यहाँ 'सर्वं' का अर्थ है—इच्छा अनुसार किसी भी कार्य का संपादन।

• अशङ्कया: बिना किसी शङ्का के। यहाँ 'शङ्का' का अर्थ केवल संदेह नहीं, अपितु वह 'विवेक' और 'भय' है जो मनुष्य को अधर्म करने से रोकता है।

• आसुरकं भावं: आसुरिक भाव या असुरों जैसी वृत्ति। वह चेतना जो स्वयं को ही सर्वोच्च मानकर मर्यादाओं का उल्लंघन करती है।

• समाश्रित्य: आश्रय लेकर या उस विचार को आधार बनाकर।

• विनश्यति: नष्ट हो जाता है। यह विनाश केवल भौतिक मृत्यु नहीं, अपितु संस्कारिक पतन और आध्यात्मिक अंधकार है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य उस मानसिक अवस्था का चित्रण कर रहे हैं जिसे 'अधर्म' की पराकाष्ठा कहा जा सकता है। जब मनुष्य यह मान लेता है कि न तो कोई शाश्वत नियम है और न ही कोई ईश्वरीय न्याय, तब वह 'न कार्यं नैव चाकार्यं' की स्थिति में पहुँच जाता है।

इस भाव का अर्थ है कि जीवन में कोई भी मानक नहीं है। यदि कोई कर्तव्य नहीं है, तो सेवा, त्याग और अनुशासन का कोई मूल्य नहीं रह जाता; और यदि कोई अकर्तव्य नहीं है, तो हिंसा, चोरी और व्यभिचार जैसे कृत्यों में कोई दोष नहीं रह जाता। ऐसा व्यक्ति 'अशङ्कया'—अर्थात् बिना किसी नैतिक संकोच के, केवल अपनी इंद्रिय-तृप्ति के लिए किसी भी कार्य को करने लगता है।

महर्षि स्पष्ट करते हैं कि यह कोई 'स्वतंत्रता' नहीं, अपितु 'आसुर भाव' है। असुर वह नहीं जो केवल दानव रूप में हो, अपितु वह चेतना है जो 'अहं' के वशीभूत होकर स्वयं को ही विधाता मान लेती है और मर्यादाओं को बंधन समझकर उन्हें तोड़ देती है। जब जीव इस भाव का आश्रय लेता है, तो वह 'विनश्यति'—नष्ट हो जाता है। यह विनाश इसलिए होता है क्योंकि वह प्रकृति के नियमों (ऋत) के विरुद्ध चलता है। जैसे अग्नि में हाथ डालने पर हाथ जलना अनिवार्य है, वैसे ही धर्म-विरुद्ध आचरण करने पर अंततः चित्त का क्षय और पतन अनिवार्य है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस आसुरिक प्रवृत्ति और शास्त्र-विमुखता के दुष्परिणामों की पुष्टि भगवद्गीता में भी मिलती है:

भगवद्गीता

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ १६.२३ ॥

जो शास्त्रविधिको छोड़कर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।

भगवद्गीता १६.२३गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 391

यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो शास्त्रविधि को छोड़कर मनमाना आचरण (कामकारतः) करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख और न ही परम गति। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'अशङ्कया सर्वं कुर्यात्' वही 'कामकारतः' आचरण है, जिसका परिणाम केवल विनाश है।

भगवद्गीता

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ १६.२४ ॥

इसलिए कर्तव्य-अकर्तव्यके निर्णयमें शास्त्र तेरे लिए प्रमाण है; शास्त्रविधिसे कहा कर्म जानकर तुझे यहाँ करना चाहिए।

भगवद्गीता १६.२४गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 391

इसीलिए गीता में निर्देश है कि कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही प्रमाण है। याज्ञवल्क्य भी इसी बात की ओर संकेत कर रहे हैं कि यदि शास्त्र (वेद) का प्रमाण हटा दिया जाए, तो मनुष्य की कामनाएँ ही उसके मार्गदर्शक बन जाएँगी, जो उसे पतन की ओर ले जाएँगी।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विवेक' और 'मर्यादा' के महत्व को रेखांकित करता है। साधक के लिए यह समझना आवश्यक है कि अनुशासन (यम-नियम) बंधन नहीं, अपितु सुरक्षा कवच हैं।

जो व्यक्ति यह सोचता है कि वह मर्यादाओं से ऊपर है, वह वास्तव में अपने ही भीतर के 'अहंकार' के वशीभूत होकर अपनी चेतना का क्षय कर रहा होता है। योग का मार्ग 'अशङ्कया' (अंधाधुंध कर्म) का नहीं, अपितु 'सचेतनता' का मार्ग है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके द्वारा किया गया प्रत्येक सूक्ष्म कार्य भी ब्रह्मांडीय ऊर्जा और कर्म-फल से जुड़ा है, तब वह 'कार्य' और 'अकार्य' के भेद को समझता है।

इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर उठने वाली उस प्रवृत्ति को पहचाने जो उसे नियमों से ऊपर दिखाने का भ्रम देती है। मर्यादा का पालन करना वास्तव में स्वयं के आंतरिक संतुलन को बनाए रखना है। जो मर्यादा तोड़ता है, वह अपने भीतर के सामंजस्य को नष्ट कर देता है, और यही वह 'विनाश' है जिसकी चेतावनी याज्ञवल्क्य दे रहे हैं। साधक इस बोध से अपनी वृत्ति को 'आसुर भाव' से हटाकर 'दैवीय भाव' (शास्त्र-सम्मत और विवेकपूर्ण आचरण) की ओर ले जाता है।

श्लोक १२.१८

नैयायिकार्थमालोक्य तथाहीश्वरकारणम् ।

प्रतिष्ठानानि वेदस्य एते तर्का उदाहृताः ॥ १२.१८ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

नैयायिकोंके अर्थ (युक्ति) को देखकर, और उसी प्रकार ईश्वरको कारण (मानकर) — ये तर्क वेदके आधार कहे गये हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन आसुरिक मतों का विवरण दिया जिन्होंने ईश्वर, परलोक और धर्म की मर्यादाओं का निषेध कर मनुष्य को विनाश की ओर धकेला। अब इस श्लोक से वे उस दिशा में मुड़ रहे हैं जहाँ तर्क, युक्ति और कारणता के माध्यम से वेद की प्रमाणिकता को स्थापित किया जाता है, ताकि साधक केवल अंधविश्वास से नहीं, अपितु विवेक से सत्य को स्वीकार करे।

अन्वय और पदार्थ —

नैयायिक-अर्थम् आलोक्य तथा ईश्वर-कारणम्, एते तर्काः वेदस्य प्रतिष्ठानानि उदाहृताः ।

पदार्थ:

• नैयायिक-अर्थम्: नैयायिकों (तर्कशास्त्र के विशेषज्ञों) के अर्थ या युक्तियों को। यहाँ 'अर्थ' का तात्पर्य उस तार्किक निष्कर्ष से है जो प्रमाणों पर आधारित हो।

• आलोक्य: देखकर या विचार करके। यह केवल आँखों से देखना नहीं, अपितु बुद्धि द्वारा विश्लेषण करना है।

• तथा: और उसी प्रकार।

• ईश्वर-कारणम्: ईश्वर को जगत् का कारण मानना। यह वह तर्क है कि जिस प्रकार कार्य के बिना कारण नहीं होता, उसी प्रकार इस व्यवस्थित सृष्टि के पीछे एक चेतन कारण (ईश्वर) का होना अनिवार्य है।

• एते तर्काः: ये तर्क।

• वेदस्य प्रतिष्ठानानि: वेद के आधार या स्तंभ। 'प्रतिष्ठान' वह नींव है जिस पर संपूर्ण ज्ञान की इमारत टिकी होती है।

• उदाहृताः: कहे गए हैं या उद्धृत किए गए हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सेतु का निर्माण कर रहे हैं। उन्होंने पूर्व में उन मतों का खंडन किया जो तर्क के नाम पर अनीश्वरवाद का समर्थन करते थे। अब वे स्पष्ट कर रहे हैं कि तर्क वेद का विरोधी नहीं, अपितु उसका सहायक है।

यहाँ 'नैयायिकों के अर्थ' का उल्लेख यह दर्शाने के लिए है कि सत्य को सिद्ध करने के लिए युक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। जब कोई साधक तर्कपूर्ण दृष्टि से देखता है कि यह सृष्टि इतनी सूक्ष्म और व्यवस्थित है, तो वह स्वतः इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इसका कोई न कोई 'कारण' अवश्य है। यही 'ईश्वर-कारणम्' का सिद्धांत है—कि यह जगत् स्वतः स्फूर्त नहीं, बल्कि एक परम चेतना द्वारा रचित है।

जब बुद्धि इस सत्य को स्वीकार कर लेती है कि एक ईश्वर-कारण है, तब वह सहज ही इस बात को स्वीकार करती है कि उस ईश्वर ने मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए कोई न कोई माध्यम अवश्य भेजा होगा। वह माध्यम 'वेद' हैं। अतः, तर्क यहाँ वेद को काटता नहीं, बल्कि वेद की ओर ले जाने वाला मार्ग प्रशस्त करता है। याज्ञवल्क्य यह समझा रहे हैं कि वेद केवल 'श्रुति' (सुना हुआ) होने के कारण सत्य नहीं हैं, बल्कि वे तर्क की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। ईश्वर की कारणता को स्वीकार करना ही वेदों की प्रमाणिकता का तार्किक आधार (प्रतिष्ठान) बन जाता है।

योग-रहस्य —

योगी के लिए यह श्लोक 'विवेक-चोदना' का अभ्यास है। योग केवल आँख मूँदकर बैठने का नाम नहीं, अपितु 'ऋत' को समझने की प्रक्रिया है। साधक जब बाहरी जगत की व्यवस्था को देखता है, तो वह 'तर्क' के माध्यम से यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार शरीर का संचालन एक प्राण द्वारा होता है, उसी प्रकार संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन एक परम पुरुष (ईश्वर) द्वारा हो रहा है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपनी बुद्धि को 'नैयायिक' की भाँति सूक्ष्म बनाए, किंतु उसे अहंकार में नहीं, बल्कि समर्पण में लगाए। जब तर्क अपनी सीमा पर पहुँचकर ठहर जाता है, तब वहीं से 'श्रुति' का प्रकाश आरंभ होता है। तर्क वह सीढ़ी है जो साधक को 'अविद्या' के अंधकार से निकालकर 'विद्या' के द्वार तक ले जाती है। इस श्लोक के माध्यम से साधक यह अनुभव करता है कि उसकी बुद्धि और वेद अलग-अलग नहीं हैं; यदि बुद्धि शुद्ध हो, तो वह वही सत्य बोलेगी जो वेदों में अंकित है। यह अवस्था साधक को संशय से मुक्त कर 'निश्चय' की भूमि पर प्रतिष्ठित करती है।

धर्मशुद्धिसाधनानि

श्लोक १२.१९

प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् ।

त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता ॥ १२.१९ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

(मनु १२.१०५:) धर्मकी शुद्धि चाहनेवालेको प्रत्यक्ष, अनुमान और विविध आगमरूप शास्त्र — इन तीनोंको भली-भाँति जानना चाहिए।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि नैयायिकों की युक्तियाँ और ईश्वर-कारणता के तर्क वेद के आधार (प्रतिष्ठान) हैं। अब वे उन विशिष्ट प्रमाणों का उल्लेख कर रहे हैं जिनके माध्यम से एक साधक धर्म की शुद्धि को प्राप्त कर सकता है और सत्य का विवेकपूर्ण निर्णय ले सकता है।

अन्वय और पदार्थ —

प्रत्यक्षं च, अनूमानं च, शास्त्रं च विविधागमम्, त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता ।

पदार्थ:

• प्रत्यक्षम्: जो इन्द्रियों और मन के द्वारा साक्षात् अनुभव किया जाए।

• अनुमानम्: ज्ञात के आधार पर अज्ञात का तार्किक निष्कर्ष निकालना।

• शास्त्रं च विविधागमम्: विविध आगमों (ऋषियों द्वारा प्राप्त ज्ञान) रूपी शास्त्र। यहाँ 'विविध आगम' का अर्थ उन सभी प्रामाणिक ग्रंथों से है जो वेदमूलक हैं।

• त्रयम्: ये तीनों (प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र)।

• सुविदितं कार्यम्: भली-भाँति जानना या अनुभव करना आवश्यक है। 'कार्यम्' यहाँ कर्तव्य या अनिवार्य क्रिया को दर्शाता है।

• धर्मशुद्धिमभीप्सता: जो धर्म की शुद्धि की अभिलाषा करता है। 'अभीप्सता' (अभि + ईप्सा) का अर्थ है तीव्र इच्छा रखने वाला।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य धर्म की शुद्धि के लिए 'प्रमाण-त्रय' का विधान कर रहे हैं। धर्म की शुद्धि का अर्थ केवल बाहरी नियमों का पालन नहीं, अपितु उस अवस्था को प्राप्त करना है जहाँ संशय का नाश हो और सत्य का साक्षात्कार हो।

ऋषि कहते हैं कि जो साधक धर्म की शुद्धि का अभिलाषी है, उसे केवल एक प्रमाण पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। प्रथम प्रमाण 'प्रत्यक्ष' है, जो हमें भौतिक जगत और अपनी शारीरिक संवेदनाओं का ज्ञान कराता है। द्वितीय 'अनुमान' है, जो बुद्धि को सूक्ष्म संबंधों को समझने और कारण-कार्य के विश्लेषण की शक्ति देता है। तृतीय 'शास्त्र' है, जो वह दिव्य दृष्टि है जो प्रत्यक्ष और अनुमान की सीमाओं के पार ले जाती है।

यहाँ रहस्य यह है कि प्रत्यक्ष और अनुमान सीमित हैं; वे केवल स्थूल और सूक्ष्म जगत तक पहुँचते हैं। किंतु जब ये दोनों शास्त्र (आगम) के साथ मिलते हैं, तब 'धर्म की शुद्धि' होती है। शास्त्र वह प्रकाश है जो प्रत्यक्ष को 'साक्षात्कार' में और अनुमान को 'ज्ञान' में बदल देता है। यदि कोई केवल प्रत्यक्ष को मानेगा, तो वह भौतिकता में फँसा रहेगा; यदि केवल अनुमान को मानेगा, तो वह बौद्धिक जाल (तर्क) में उलझा रहेगा; और यदि बिना प्रत्यक्ष-अनुमान के केवल शास्त्र को रटेगा, तो वह अंधविश्वास का शिकार होगा। अतः इन तीनों का समन्वय ही धर्म की वास्तविक शुद्धि है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् । त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता ॥ १२.१०५ ॥

धर्मकी शुद्धि चाहनेवालेको प्रत्यक्ष, अनुमान और विविध आगमरूप शास्त्र — तीनोंको भली-भाँति जानना चाहिए।

मनुस्मृति १२.१०५मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 599

यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति के इस अंश से मेल खाता है। मनु भी धर्म की शुद्धि के लिए प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम के त्रिविध ज्ञान को अनिवार्य मानते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ एकमत हैं कि धर्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे केवल परंपरा के नाम पर स्वीकार कर लिया जाए, बल्कि इसे प्रमाणों की कसौटी पर कसकर शुद्ध करना आवश्यक है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक की 'विवेक-भूमि' के विकास का सूत्र है। साधक के लिए इन तीनों प्रमाणों का अभ्यास इस प्रकार है:

१. प्रत्यक्ष का अभ्यास: साधक अपनी इन्द्रियों और प्राणों के प्रत्यक्ष अनुभव से शुरू करता है। वह देखता है कि श्वास कैसे चलती है, मन कैसे विचलित होता है। यह 'स्थूल प्रत्यक्ष' है। जैसे-जैसे साधना बढ़ती है, वह 'योगज प्रत्यक्ष' का अनुभव करता है, जहाँ उसे अपने भीतर के प्रकाश और स्पंदन का साक्षात् अनुभव होने लगता है।

२. अनुमान का अभ्यास: साधक यह अनुमान लगाता है कि यदि बाहरी जगत में कारण-कार्य का नियम है, तो आंतरिक जगत में भी शांति का कोई कारण होगा। वह अनुभव करता है कि जब मन शांत होता है, तब बुद्धि प्रखर होती है—यह अनुमान उसे गहरे ध्यान की ओर प्रेरित करता है।

३. शास्त्र का अभ्यास: अंत में, वह इन अनुभवों को वेदमूलक शास्त्रों और गुरु के वचनों से मिलाता है। जब उसका व्यक्तिगत अनुभव (प्रत्यक्ष) और तार्किक निष्कर्ष (अनुमान), शास्त्र के सत्य से मिल जाते हैं, तब वह 'धर्म-शुद्धि' की उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ संशय समाप्त हो जाता है।

साधक इस अभ्यास से 'अविद्या' के अंधकार से निकलकर 'विद्या' के प्रकाश की ओर बढ़ता है, जहाँ प्रमाण अब बाहरी नहीं रहते, बल्कि उसके अपने अनुभव बन जाते हैं।

मनोमाहात्म्यम्

श्लोक १२.२०

यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।

स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ १२.२० ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

(मनु २.७:) मनुने जिस किसीका जो भी धर्म कहा है, वह सब वेदमें कहा गया है; क्योंकि वह (वेद) सर्वज्ञानमय है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने धर्म की शुद्धि के लिए प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र—इन तीन प्रमाणों के ज्ञान को अनिवार्य बताया था। अब वे इस बात को पुष्ट कर रहे हैं कि समस्त प्रमाणों और धर्म-विधियों का अंतिम स्रोत और आधार केवल वेद ही हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यः कश्चित् कस्यचित् धर्मो मनुना परिकीर्तितः, स सर्वः वेदे अभिहितः, (यतः) स (वेदः) सर्वज्ञानमयः हि सः ।

पदार्थ:

• यः कश्चित् कस्यचित् धर्मो: जिस किसी का भी जो कोई धर्म (कर्तव्य, आचरण या स्वरूप)। यहाँ 'धर्म' शब्द व्यापक है, जिसमें वर्ण-आश्रम धर्म से लेकर मोक्ष-धर्म तक सम्मिलित हैं।

• मनुना परिकीर्तितः: मनु द्वारा विस्तार से कहा गया या वर्णित किया गया है। मनु यहाँ केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु मानवीकरण के माध्यम से 'स्मृति-परम्परा' के प्रतिनिधि हैं।

• स सर्वोऽभिहितो वेदे: वह सब (मनु द्वारा कहा गया धर्म) वेद में ही अभिहित (कहा गया/घोषित) है।

• सर्वज्ञानमयो हि सः: क्योंकि वह (वेद) वास्तव में सर्वज्ञानमय है। 'हि' यहाँ कारणवाचक अव्यय है, जो यह सिद्ध करता है कि वेद की सर्वज्ञता ही उसे समस्त धर्मों का मूल बनाती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्मृति और श्रुति के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। यह श्लोक एक सेतु है जो बाहरी विधि (स्मृति) को उसके आन्तर स्रोत (वेद) से जोड़ता है।

ऋषि कहते हैं कि मनु ने समाज के विभिन्न स्तरों, विभिन्न प्रकृतियों और विभिन्न अवस्थाओं के मनुष्यों के लिए जिस धर्म का विधान किया है, वह कोई नवीन रचना नहीं है। वह केवल वेदों के उस गूढ़ ज्ञान का सरल और व्यावहारिक विस्तार है, जिसे जनमानस के योग्य बनाया गया है। यदि मनु ने किसी विशेष परिस्थिति के लिए कोई नियम बताया है, तो उसका बीज, उसका तर्क और उसका लक्ष्य वेदों में पहले से विद्यमान है।

यहाँ 'सर्वज्ञानमय' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। वेद केवल मंत्रों का संग्रह नहीं हैं, अपितु वे उस 'पूर्ण ज्ञान' के प्रकटीकरण हैं जो सृष्टि के आरम्भ से विद्यमान है। जिस प्रकार एक वृक्ष की सभी शाखाएँ, पत्तियाँ और फल अंततः एक ही जड़ से पोषण पाते हैं, उसी प्रकार समस्त शास्त्र, स्मृतियाँ और आचार-संहिताएँ वेदों की जड़ से ही निकली हैं। यदि कोई स्मृति-वाक्य वेद के विरुद्ध प्रतीत होता है, तो वह या तो समझने की त्रुटि है या उस विशिष्ट परिस्थिति का अपवाद, किन्तु उसका मूल तत्त्व सदैव वेदमूलक ही रहता है।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ यह संकेत दे रही है कि साधक को केवल बाहरी नियमों (स्मृतियों) के यांत्रिक पालन में नहीं उलझना चाहिए, बल्कि उस 'सर्वज्ञानमय' स्रोत की ओर बढ़ना चाहिए जहाँ से ये नियम निकले हैं। जब साधक वेद के सर्वज्ञानमय स्वरूप को पहचान लेता है, तब उसके लिए स्मृति का पालन बोझ नहीं, बल्कि वेदों के लक्ष्य की प्राप्ति का एक सुगम मार्ग बन जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ २.७ ॥

मनुने जिस किसीका जो धर्म कहा है, वह सब वेदमें कहा गया है, क्योंकि वह (वेद) सर्वज्ञानमय है।

मनुस्मृति २.७मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 165

यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के सातवें श्लोक से उद्धृत है। मनु स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि उनका संपूर्ण उपदेश वेदों का ही विस्तार है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस उद्धरण के माध्यम से यह सिद्ध करती है कि स्मृति का प्रमाण केवल तभी तक मान्य है जब तक वह श्रुति (वेद) के अनुकूल है। यह मेल दर्शाता है कि वैदिक परम्परा में ज्ञान का पदानुक्रम निश्चित है—सर्वोपरि श्रुति है, और स्मृति उसकी व्याख्या करने वाली सहायक शक्ति है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के सम्बन्ध को दर्शाता है। मनु द्वारा बताया गया 'धर्म' वह साधन है जो साधक को उसकी प्रकृति के अनुसार तैयार करता है, जबकि 'सर्वज्ञानमय वेद' वह साध्य है जहाँ साधक पूर्णता को प्राप्त करता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह अपनी बाहरी क्रियाओं (धर्म) को केवल सामाजिक मर्यादा न माने, बल्कि उनमें छिपे वैदिक तत्त्व को खोजे। जब वह यह अनुभव करता है कि उसके द्वारा किया गया प्रत्येक धर्म-कार्य वास्तव में उस 'सर्वज्ञान' का एक अंश है, तब उसकी क्रिया 'कर्म' से उठकर 'योग' बन जाती है। यह श्लोक साधक को 'विखंडित ज्ञान' से निकालकर 'समग्र ज्ञान' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह देखता है कि समस्त विधियाँ अंततः एक ही सत्य की ओर संकेत कर रही हैं।

वेदाध्ययनप्रशंसा

श्लोक १२.२१

तस्माद्वेदादृते नान्यदध्येतव्यं द्विजन्मना ।

वेदबाह्यं तु यत् किञ्चिन्नाध्येतव्यं कदाचन ॥ १२.२१ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

इसलिए द्विजको वेदके सिवा दूसरा (शास्त्र प्रधानतः) नहीं पढ़ना चाहिए; और जो कुछ वेदबाह्य है, उसे कभी नहीं पढ़ना चाहिए।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह सिद्ध किया कि मनु द्वारा प्रतिपादित समस्त धर्म-विधान वास्तव में वेदों में ही निहित हैं, क्योंकि वेद सर्वज्ञानमय हैं। इसी तर्क के आधार पर अब ऋषि द्विज के लिए अध्ययन की प्राथमिकता और मर्यादा निर्धारित कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

तस्मात् द्विजन्मना वेदादृते नान्यदध्येतव्यं, वेदबाह्यं तु यत् किञ्चिद् न अध्येतव्यं कदाचन ।

पदार्थ:

• तस्मात्: इस कारण से (पिछले श्लोकों में दिए गए तर्कों और वेदों की सर्वज्ञता के कारण)।

• द्विजन्मना: द्विज द्वारा (वह जिसने दूसरा जन्म लिया है; यहाँ द्विज से तात्पर्य केवल जाति से नहीं, अपितु उस साधक से है जिसने उपनयन संस्कार द्वारा ज्ञान-मार्ग में प्रवेश किया है)।

• वेदादृते: वेद के अतिरिक्त (अदृते = बिना/अलावा)।

• नान्यदध्येतव्यं: अन्य किसी (प्रधान शास्त्र) का अध्ययन नहीं करना चाहिए। 'अध्येतव्यं' विधिलिङ् लकार है, जो कर्तव्य या अनिवार्यता को दर्शाता है।

• वेदबाह्यं तु यत् किञ्चिद्: किन्तु जो कुछ भी वेद के बाहर (वेद-विरुद्ध या वेद-विमुख) है।

• न अध्येतव्यं कदाचन: उसका कभी भी अध्ययन नहीं करना चाहिए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य अध्ययन की मर्यादा का निर्धारण कर रहे हैं। यहाँ 'द्विज' वह है जिसने ज्ञान की पिपासा के कारण स्वयं को संस्कारित किया है। ऋषि का निर्देश है कि ऐसे साधक के लिए वेद ही एकमात्र प्रधान आधार होने चाहिए।

जब ऋषि कहते हैं कि "वेद के सिवा दूसरा (प्रधानतः) नहीं पढ़ना चाहिए", तो उनका अर्थ यह नहीं है कि संसार के अन्य विषयों का ज्ञान वर्जित है, अपितु यह कि 'धर्म' और 'मोक्ष' के विषय में वेदों से श्रेष्ठ या स्वतंत्र कोई अन्य प्रमाण नहीं है। चूँकि पिछले श्लोक में यह स्पष्ट हो चुका है कि मनुस्मृति आदि समस्त प्रामाणिक स्मृतियाँ वेदों का ही विस्तार हैं, अतः वेदों का अध्ययन ही वास्तव में समस्त धर्म-शास्त्रों का मूल अध्ययन है।

द्वितीय पंक्ति में "वेदबाह्य" का निषेध अत्यंत कठोर है— "न अध्येतव्यं कदाचन" (कभी नहीं पढ़ना चाहिए)। यहाँ 'वेदबाह्य' का अर्थ उन मतों से है जो वेदों के मूल सिद्धांतों—जैसे ईश्वर-कारणता, कर्म-फल, परलोक और ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था)—का खंडन करते हैं। जैसा कि पिछले श्लोकों (१२.१६-१७) में 'आसुर भाव' का वर्णन आया है, जो कहता है कि "न कार्यं नैव चाकार्यं" (न कुछ कर्तव्य है, न अकर्तव्य), ऐसे विचार वेदबाह्य हैं। ऐसे मतों का अध्ययन केवल बौद्धिक जिज्ञासा नहीं, अपितु मानसिक विषाक्तता है, जो साधक की श्रद्धा और संकल्प को नष्ट कर देती है।

अतः, याज्ञवल्क्य की दृष्टि में ज्ञान की यात्रा 'केंद्र' (वेद) से शुरू होकर 'परिधि' (स्मृति/विस्तार) तक जानी चाहिए, न कि परिधि से केंद्र की ओर या केंद्र को छोड़कर किसी अन्य दिशा में।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'एकग्रता' और 'श्रद्धा' के अभ्यास का है। साधक जब किसी एक मूल स्रोत (वेद) को अपना आधार बनाता है, तो उसकी मानसिक ऊर्जा बिखरती नहीं है।

१. चित्त की शुद्धि: वेदबाह्य या परस्पर विरोधी मतों का अध्ययन करने से चित्त में 'संशय' उत्पन्न होता है। संशय योग का सबसे बड़ा अवरोध है। "कदाचन" (कभी नहीं) शब्द यह संकेत देता है कि साधक को अपने मानस-पटल पर ऐसे किसी विचार को स्थान नहीं देना चाहिए जो उसे उसके मूल लक्ष्य (अक्षर-ब्रह्म) से विमुख करे।

२. बीज और विस्तार: जिस प्रकार योग में केवल एक ही प्राण-शक्ति को जाग्रत कर उसे ऊपर उठाया जाता है, उसी प्रकार ज्ञान-साधना में भी 'वेद' रूपी बीज-मंत्र का ही अभ्यास प्रधान होना चाहिए। अन्य ज्ञान सहायक हो सकते हैं, किन्तु वे 'प्रधान' नहीं हो सकते।

३. भूमि परिवर्तन: जो साधक वेद-विरुद्ध मतों में उलझा रहता है, वह 'तमो-भूमि' में भटकता है। जब वह केवल वेदमूलक ज्ञान का आश्रय लेता है, तब वह 'सत्व-भूमि' में प्रवेश करता है, जहाँ से वह सूक्ष्म शरीर और अंततः अक्षर-ब्रह्म के साक्षात्कार की ओर बढ़ता है। यह श्लोक साधक को 'बौद्धिक भटकाव' से बचाकर 'स्थितप्रज्ञता' की ओर ले जाने का निर्देश है।

वेदबाह्यस्मृतिनिन्दा

श्लोक १२.२२

या वेदबाह्याः स्मृतयो याः काश्च कुदृष्टयः ।

सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ॥ १२.२२ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

(मनु १२.९५:) जो वेदबाह्य स्मृतियाँ और जो कोई कुदृष्टियाँ हैं, वे सब मृत्युके बाद निष्फल हैं; वे तमोनिष्ठ कही गयी हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने द्विज के लिए वेद के अतिरिक्त अन्य किसी प्रधान शास्त्र के अध्ययन का निषेध किया था। अब ऋषि उस निषेध का कारण और उसके दुष्परिणाम स्पष्ट कर रहे हैं कि वेद-विमुख ज्ञान अंततः साधक को कहाँ ले जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

याः काश्च वेदबाह्याः स्मृतयः, याः काश्च कुदृष्टयः, सर्वाः ताः प्रेत्य निष्फलाः, हि ताः तमोनिष्ठाः स्मृताः ।

पदार्थ:

• याः काश्च: जो भी (विविध)।

• वेदबाह्याः स्मृतयः: वे स्मृतियाँ (परम्पराएँ या मान्यताएँ) जो वेदों के बाहर हैं, अर्थात् वेदों के सिद्धांतों के प्रतिकूल हैं।

• कुदृष्टयः: कुदृष्टियाँ (गलत दृष्टिकोण या भ्रामक दर्शन); 'कु' (बुरा/भ्रामक) + 'दृष्टि' (देखने का ढंग/दर्शन)।

• सर्वाः ताः: वे सभी।

• प्रेत्य: मृत्यु के पश्चात (प्रेत्य = शरीर त्याग कर)।

• निस्फलाः: निष्फल; जिनका कोई आध्यात्मिक लाभ या मोक्ष-फल नहीं मिलता।

• तमोनिष्ठाः: तमोनिष्ठा; जो 'तमस' (अज्ञान और अंधकार) में प्रतिष्ठित करने वाले हैं।

• स्मृताः: कहे गए हैं या याद किए गए हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन मतों और स्मृतियों के आध्यात्मिक परिणाम की चेतावनी दे रहे हैं जो वेदों के प्रकाश से रहित हैं। यहाँ 'स्मृति' का अर्थ केवल लिखित ग्रंथों से नहीं, अपितु उन सामाजिक और मानसिक धारणाओं से है जो परंपरा के नाम पर चलती हैं किन्तु जिनका आधार श्रुति (वेद) नहीं है।

ऋषि कहते हैं कि जो ज्ञान 'वेदबाह्य' है, वह केवल सांसारिक तर्क या व्यक्तिगत कल्पना पर टिका होता है। ऐसा ज्ञान संसार में व्यक्ति को चतुर या विद्वान दिखा सकता है, किन्तु जब साधक 'प्रेत्य' अर्थात् देह त्याग करता है, तब केवल वही संस्कार साथ जाते हैं जो शाश्वत सत्य (वेद) से जुड़े थे। वेदबाह्य मत 'निस्फला' होते हैं क्योंकि वे आत्मा को उसके मूल स्रोत से नहीं जोड़ते, अपितु उसे केवल बाहरी आवरणों और मिथ्या धारणाओं में उलझाए रखते हैं।

'तमोनिष्ठा' शब्द यहाँ अत्यंत गंभीर है। तमस का अर्थ केवल अंधकार नहीं, अपितु वह जड़ता है जहाँ विवेक लुप्त हो जाता है। जो मत ईश्वर को नहीं मानता, जो कर्म और धर्म के संतुलन को नकारता है, या जो केवल शरीर को ही सब कुछ मानता है, वह साधक को चेतना के उच्च स्तरों से नीचे गिराकर अज्ञान के गहन अंधकार में प्रतिष्ठित कर देता है। यह स्मृति स्पष्ट करती है कि सत्य का मार्ग केवल वह है जो वेदों के प्रकाश से आलोकित है; उसके अतिरिक्त हर मार्ग अंततः भ्रामक और निष्फल है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ॥ १२.९५ ॥

जो वेदबाह्य स्मृतियाँ और जो कोई कुदृष्टियाँ हैं, वे सब मृत्युके बाद निष्फल हैं; वे तमोनिष्ठ कही गयी हैं।

मनुस्मृति १२.९५मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 598

यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति के इस अंश से मेल खाता है। मनु और याज्ञवल्क्य दोनों का मत एक है कि धर्म की शुद्धि और मोक्ष के लिए वेदों का आश्रय अनिवार्य है। मनुस्मृति जहाँ सामाजिक और विधिक व्यवस्था में वेद की प्रधानता पर बल देती है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसे योग और चेतना के स्तर पर 'तमोनिष्ठा' और 'निस्फलता' के रूप में परिभाषित कर रही है। दोनों शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि वेद-विरुद्ध मत अंततः विनाशकारी होते हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'दृष्टि' ही साधक की दिशा निर्धारित करती है। 'कुदृष्टि' वह है जो चेतना को अंतर्मुखी करने के बजाय उसे बाहरी भ्रमों, वासनाओं या मिथ्या तर्कों में उलझा दे। साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह अपने भीतर उठने वाले उन विचारों को पहचाने जो वेद-विरुद्ध (अतत्व) हैं।

जब साधक वेद-बाह्य मतों का आश्रय लेता है, तो उसकी मानसिक ऊर्जा का विखराव होता है, जिससे चित्त में 'तमस' बढ़ता है। तमस का अर्थ है—भारीपन और जड़ता। इसके विपरीत, वेदमूलक साधना 'सत्व' का उत्थान करती है। साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि सत्य का मार्ग केवल तर्क से नहीं, बल्कि श्रुति के प्रकाश और अनुभव से प्रशस्त होता है। वह अपने अभ्यास में यह सुनिश्चित करता है कि उसकी बुद्धि केवल उन्हीं सिद्धांतों पर टिकी हो जो उसे अक्षर (अविनाशी) की ओर ले जाएँ, न कि उन क्षणभंगुर मतों पर जो मृत्यु के साथ ही निष्फल हो जाते हैं।

श्लोक १२.२३

उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यानि तानि तु कानिचित् ।

एतान्यर्वाक्कालिकानि निष्फलान्यनृतानि च ॥ १२.२३ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

(मनु १२.९६:) उससे भिन्न जो कोई (मत) उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं, वे अर्वाचीन, निष्फल और असत्य हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेदबाह्य स्मृतियों और कुदृष्टियों को 'तमोनिष्ठा' कहकर उनके आध्यात्मिक विनाश का संकेत दिया था। अब ऋषि उन मतों की प्रकृति और उनके क्षणभंगुर होने का कारण स्पष्ट कर रहे हैं, जिससे साधक यह समझ सके कि सत्य और मिथ्या के बीच का अंतर क्या है।

अन्वय और पदार्थ —

यानि कानिचित् उत्पद्यन्ते च च्यवन्ते, तानि तु कानिचित् अर्वाक्कालिकानि, निष्फलानि च अनृतानि च ।

पदार्थ:

• उत्पद्यन्ते: उत्पन्न होते हैं; प्रकट होते हैं।

• च्यवन्ते: नष्ट हो जाते हैं; गिर जाते हैं या लुप्त हो जाते हैं।

• यानि कानिचित्: जो भी कुछ (विविध मत या विचारधाराएँ)।

• अर्वाक्कालिकानि: अर्वाचीन; समय के साथ आने वाले, नवीन या अल्पकालिक।

• निष्फलानि: फलहीन; जिनका कोई स्थायी आध्यात्मिक लाभ या मोक्ष-साधन नहीं है।

• अनृतानि: असत्य; जो वास्तविक तत्त्व (ऋत) पर आधारित नहीं हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य सत्य की कसौटी बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जो मत या सिद्धांत समय-समय पर उत्पन्न होते हैं और फिर विस्मृत होकर नष्ट हो जाते हैं, वे 'अर्वाक्कालिक' हैं। यहाँ 'उत्पद्यन्ते' और 'च्यवन्ते' शब्दों के माध्यम से ऋषि यह संकेत दे रहे हैं कि जो ज्ञान केवल मानवीय बुद्धि, तर्क या किसी विशेष काल की परिस्थिति से उपजता है, उसका स्वभाव ही नश्वरता है।

वेद 'अपाौरुषेय' हैं, क्योंकि वे किसी व्यक्ति की कल्पना नहीं, अपितु उस शाश्वत सत्य का साक्षात्कार हैं जो काल से परे है। इसके विपरीत, वेदबाह्य मत 'पौरुषेय' होते हैं—वे किसी व्यक्ति के विचार या किसी विशेष युग की मानसिक अवस्था से जन्म लेते हैं। जिस प्रकार शरीर का जन्म और मृत्यु निश्चित है, उसी प्रकार इन अल्पकालिक मतों का भी उदय और पतन निश्चित है।

ऋषि इन मतों को 'निष्फल' और 'अनृत' कहते हैं। 'अनृत' का अर्थ केवल झूठ नहीं, बल्कि वह है जो 'ऋत' (ब्रह्मांडीय नियम/ के विरुद्ध है। जो ज्ञान ऋत से नहीं जुड़ा, वह साधक को केवल मानसिक भ्रम दे सकता है, किन्तु उसे उस 'अक्षर' (अविनाशी) तक नहीं ले जा सकता जिसका वर्णन याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति में किया है। अतः, जो मत केवल तर्क की लहरों पर तैरते हैं, वे अंततः लुप्त हो जाते हैं और साधक का श्रम व्यर्थ जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् । तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥ १२.९६ ॥

इससे भिन्न जो कोई (मत) उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं, वे अर्वाचीन होनेसे निष्फल और असत्य हैं।

मनुस्मृति १२.९६मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 598

मनुस्मृति में भी यही बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि वेदों से भिन्न जो मत उत्पन्न और नष्ट होते हैं, वे अर्वाचीन होने के कारण निष्फल और असत्य हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ एकमत हैं कि सत्य की पहचान उसकी 'शाश्वतता' से होती है। जो समय के साथ बदल जाए, वह केवल एक 'दृष्टि' हो सकती है, 'सत्य' नहीं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'चित्त-वृत्तियों' के स्वभाव का बोध कराता है। जिस प्रकार बाहरी जगत में मत उत्पन्न और नष्ट होते हैं, उसी प्रकार अंतःकरण में भी अनेक विचार और मानसिक धारणाएँ उत्पन्न होती हैं और नष्ट हो जाती हैं। साधक यदि इन क्षणभंगुर मानसिक अवस्थाओं या किसी विशेष 'अनुभव' को ही अंतिम सत्य मान ले, तो वह 'अर्वाक्कालिक' ज्ञान के जाल में फँस जाता है।

साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह अपने भीतर उठने वाले हर विचार और धारणा को 'उत्पद्यन्ते च्यवन्ते' (उत्पन्न और नष्ट होने वाले) के रूप में देखे। जब वह यह अनुभव करता है कि विचार और मत नश्वर हैं, तब वह उन 'निष्फल' धारणाओं का त्याग कर उस 'अक्षर' (अविनाशी) की ओर बढ़ता है जो कभी उत्पन्न नहीं हुआ और कभी नष्ट नहीं होता। यह श्लोक साधक को 'भ्रम' से 'बोध' की भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ वह केवल उसी पर टिकता है जो शाश्वत है।

श्लोक १२.२४

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।

स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ॥ १२.२४ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

(मनु २.१६८:) जो द्विज वेद न पढ़कर अन्यत्र श्रम करता है, वह जीते-जी ही शीघ्र अपने वंश सहित शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन अर्वाचीन और मिथ्या मतों के निष्फल होने की घोषणा की थी जो वेद के विरुद्ध उत्पन्न होते हैं। अब ऋषि इस विषय के उपसंहार में उस गंभीर हानि का वर्णन कर रहे हैं, जो एक ज्ञान-योग्य व्यक्ति (द्विज) को वेद-अध्ययन का परित्याग कर अन्यत्र भटकने से होती है।

अन्वय और पदार्थ —

यो द्विजः वेदम् अनधीत्य अन्यत्र श्रमम् कुरुते, स सान्वयः जीवन्नेव आशु शूद्रत्वम् गच्छति ।

पदार्थ:

• यो: जो।

• अनधीत्य: अध्ययन न करके; वेद-विद्या का अभ्यास न करके।

• द्विजः: वह जो उपनयन संस्कार द्वारा ज्ञान-प्राप्ति के लिए द्वितीय जन्म ले चुका है।

• अन्यत्र: वेद के अतिरिक्त अन्यत्र; केवल भौतिक जीविकोपार्जन या वेद-विरुद्ध मतों में।

• श्रमम् कुरुते: परिश्रम करता है; श्रम करता है।

• सान्वयः: अपने वंश सहित; अपने परिवार और आने वाली पीढ़ियों के साथ।

• जीवन्नेव: जीवित रहते हुए ही।

• आशु: शीघ्र।

• शूद्रत्वम् गच्छति: शूद्रत्व को प्राप्त होता है (अर्थात् वह उन अधिकारों, संस्कारों और आध्यात्मिक फल से च्युत हो जाता है जो एक द्विज के लिए निर्धारित हैं; वह अपने वर्ण-धर्म के योग्य नहीं रहता)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक कठोर चेतावनी है, जो साधक को उसकी मूल जिम्मेदारी का स्मरण कराती है। यहाँ 'द्विज' शब्द का प्रयोग केवल जातिगत अर्थ में नहीं, अपितु उस व्यक्ति के लिए हुआ है जिसने उपनयन और संस्कारों के माध्यम से ज्ञान के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया है। द्विज वह है जिसके लिए 'अक्षर' (वेद) की प्राप्ति ही जीवन का मुख्य लक्ष्य है।

ऋषि कहते हैं कि यदि ऐसा व्यक्ति वेद का अध्ययन न करके 'अन्यत्र श्रम' करता है, तो वह पतन की ओर अग्रसर होता है। 'अन्यत्र श्रम' का अर्थ है—केवल भौतिक सुखों के लिए दौड़ना, या ऐसे मतों के पीछे चलना जो आत्मा के स्वरूप को नहीं जानते। जब एक ज्ञान-पिपासु व्यक्ति सत्य के मूल स्रोत (वेद) को छोड़कर बाहरी तर्कों या क्षणभंगुर मान्यताओं में अपनी ऊर्जा नष्ट करता है, तो वह अपनी उस आध्यात्मिक पात्रता को खो देता है जिसके लिए वह चुना गया था।

'शूद्रत्व' प्राप्त करने का यहाँ गहरा रहस्य है। योगिक दृष्टि से, शूद्रत्व वह अवस्था है जहाँ मनुष्य केवल 'सेवा' और 'कर्म' तक सीमित रह जाता है, लेकिन उस कर्म के पीछे का 'ज्ञान' और 'चेतना' लुप्त हो जाती है। जब विवेक मर जाता है और व्यक्ति केवल स्थूल जगत की वासनाओं का दास बन जाता है, तो वह जीते-जी शूद्रत्व को प्राप्त होता है। यह पतन केवल व्यक्तिगत नहीं है, अपितु 'सान्वयः' शब्द यह स्पष्ट करता है कि जब कुल का मार्गदर्शक (कुलपति या पिता) वेद-विद्या से विमुख होता है, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी अंधकार और अज्ञान का उत्तराधिकार प्राप्त करती हैं। इस प्रकार, ज्ञान का त्याग पूरे वंश की आध्यात्मिक चेतना को निम्न स्तर पर ले आता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ॥ २.१६८ ॥

जो द्विज वेद न पढ़कर अन्यत्र श्रम करता है, वह जीते-जी ही शीघ्र वंश सहित शूद्रत्वको प्राप्त होता है।

मनुस्मृति २.१६८मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 284

यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति के वचन का उद्धरण है। मनु भी इसी बात पर बल देते हैं कि वेद का अध्ययन न करना और अन्यत्र श्रम करना द्विज के लिए पतन का कारण है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस मनु-वचन को यहाँ इसलिए ला रही है ताकि यह सिद्ध हो सके कि समस्त धर्म और मर्यादा का मूल केवल वेदों में है। यदि मूल (वेद) से नाता टूट जाए, तो व्यक्ति की सामाजिक और आध्यात्मिक स्थिति दोनों ही गिर जाती हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'लक्ष्य-निष्ठा' और 'अधिकार-रक्षण' का अभ्यास है। योग का अर्थ है—चित्त की वृत्तियों का निरोध और सत्य का साक्षात्कार। जो साधक अपनी ऊर्जा को बिखेरता है (अन्यत्र श्रम), वह उस 'एकत्व' को प्राप्त नहीं कर सकता जो वेदों का सार है।

यहाँ 'वेद' का आन्तर अर्थ है—वह विद्या जो साधक को उसके वास्तविक स्वरूप (अक्षर) से मिलाती है। जिस व्यक्ति ने ज्ञान-प्राप्ति का संकल्प लेकर 'द्विज' की स्थिति ग्रहण की है, उसके लिए वेदों का अध्ययन केवल बौद्धिक कार्य नहीं, अपितु उसकी आध्यात्मिक जीवन-रेखा है। जब वह इस मूल मार्ग को त्यागकर अन्यत्र श्रम करता है, तो वह अपनी उस पात्रता और उन सूक्ष्म अधिकारों से च्युत हो जाता है, जो उसे अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाने वाले थे।

योगिक दृष्टि से, यह पतन चेतना के स्तर का नहीं, अपितु 'साधन-विधि' और 'अधिकार' के विस्मरण का है। जो व्यक्ति अपनी आत्मा के स्वरूप को जानने के लिए निर्धारित मार्ग का परित्याग करता है, वह उस फल से वंचित हो जाता है जिसके लिए वह दीक्षित हुआ था। वह अपनी चेतना को उस स्तर पर ले आता है जहाँ वह केवल स्थूल कर्मों में उलझकर रह जाता है और ज्ञान के उच्च सोपानों का अधिकार खो देता है। साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि ज्ञान के बिना किया गया कर्म केवल 'श्रम' है, 'साधना' नहीं। वह अपनी बुद्धि को बाहरी भटकाव से हटाकर, वेदों के माध्यम से हृदय के भीतर स्थित उस सूर्य (पुरुष) की ओर मोड़ता है, ताकि वह अपने निर्धारित आध्यात्मिक अधिकारों और फल को सुरक्षित रख सके और अपनी साधना की भूमि को निम्नतर होने से बचा सके।

वेदाध्ययनप्रशंसा

श्लोक १२.२५

मूलस्तम्भो भवेद्वेदः शाखाश्चान्यानि यानि तु ।

मूले ह्युपासिते सम्यक् फलं भवति नान्यथा ॥ १२.२५ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३१

वेद मूल और तना है, और जो दूसरे (शास्त्र) हैं वे शाखाएँ; मूलकी भली-भाँति सेवा करनेसे ही फल होता है, अन्यथा नहीं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेद-बाह्य मतों की निष्फलता और वेद का परित्याग करने वाले द्विज की दुर्गति का वर्णन किया था। अब ऋषि इस पूरे प्रकरण का सार प्रस्तुत करते हुए ज्ञान-परम्परा की संरचना को एक वृक्ष के रूपक से समझा रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि उसकी साधना का केंद्र और आधार कहाँ होना चाहिए।

अन्वय और पदार्थ —

वेदः मूल-स्तम्भः भवेत्, अन्यानि (शास्त्राणि) तु शाखाः । यतः मूले ह्युपासिते सम्यक्, (तदा) फलं भवति, न अन्यथा ।

पदार्थ:

• मूलस्तम्भः: मूल (जड़) और स्तम्भ (तना)। वह आधार जिससे पोषण मिलता है और जिस पर पूरा ढांचा टिका होता है।

• भवेद्वेदः: वेद ही है।

• शाखाश्चान्यानि: और अन्य (शास्त्र) शाखाएँ हैं।

• मूले ह्युपासिते: क्योंकि मूल की उपासना करने पर; यहाँ 'उपासना' का अर्थ केवल पूजा नहीं, अपितु समीप बैठना, अध्ययन करना और उसके तत्त्व में लीन होना है।

• सम्यक्: भली-भाँति, पूर्णता के साथ, विधिपूर्वक।

• फलं भवति: फल प्राप्त होता है; यहाँ फल का अर्थ आध्यात्मिक सिद्धि और मोक्ष है।

• नान्यथा: अन्यथा नहीं; अर्थात् मूल को छोड़ेकर केवल शाखाओं के सहारे फल की आशा करना व्यर्थ है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान-विज्ञान के सोपान को स्पष्ट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ वेदों को 'मूल' और 'स्तम्भ' दोनों कह रहे हैं। मूल वह है जो अदृश्य रहकर पोषण देता है, और स्तम्भ वह है जो दृश्य रूप में संपूर्ण वृक्ष को धारण करता है। इसका अर्थ यह है कि वेद केवल प्राचीन जड़ें नहीं हैं, बल्कि वे वर्तमान में भी वह मुख्य आधार (स्तम्भ) हैं, जिस पर समस्त धर्म, नीति, योग और दर्शन की शाखाएँ विकसित हुई हैं।

जब ऋषि कहते हैं कि "अन्य शास्त्र शाखाएँ हैं", तो उनका आशय यह नहीं है कि अन्य शास्त्र निरर्थक हैं। शाखाएँ वृक्ष का ही विस्तार होती हैं; वे फल और छाया देती हैं। किन्तु शाखा का अस्तित्व मूल पर निर्भर है। यदि मूल कट जाए या सूख जाए, तो शाखाएँ स्वतः ही सूख जाएँगी। इसी प्रकार, यदि किसी शास्त्र का आधार वेद नहीं है, या वह वेदों के मूल तत्त्व के विरुद्ध है, तो वह ज्ञान निष्फल है।

"मूले ह्युपासिते सम्यक् फलं भवति" — यहाँ 'सम्यक् उपासना' का रहस्य यह है कि साधक केवल शब्दों का पाठ न करे, बल्कि वेद के उस 'अक्षर' रूप को पहचाने जो सर्वव्यापी है। जब साधक मूल (वेद) की सेवा करता है, तो उसे वह फल प्राप्त होता है जो शाश्वत है। शाखाओं (अन्य शास्त्रों) में भटकने वाला व्यक्ति केवल तात्कालिक या आंशिक फल पा सकता है, किन्तु पूर्णता केवल मूल में ही निहित है।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ १५.१ ॥

ऊपर मूल और नीचे शाखाओंवाले अश्वत्थको अविनाशी कहते हैं; छन्द (वेद) जिसके पत्ते हैं — जो उसे जानता है, वह वेदवित् है।

भगवद्गीता १५.१गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 365

भगवद्गीता में संसार-वृक्ष (अश्वत्थ) का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उसके पत्ते 'छन्द' (वेद) हैं। यहाँ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में वेद को 'मूल' कहा गया है। इन दोनों रूपकों में एक गहरा सामंजस्य है। गीता में संसार-वृक्ष 'ऊर्ध्वमूल' (ऊपर की ओर जड़ वाला) है, जिसका अर्थ है कि इस दृश्य जगत का मूल स्रोत वह परमात्मा है, जिसकी अभिव्यक्ति वेदों के रूप में हुई। स्मृति यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि यदि आप इस संसार-वृक्ष के रहस्यों को समझना चाहते हैं या इससे मुक्त होना चाहते हैं, तो आपको उस मूल (वेद) की शरण में जाना होगा, जिससे समस्त ज्ञान की शाखाएँ निकली हैं।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'केंद्र' की ओर लौटने का निर्देश देता है। साधना में अनेक विधियाँ, अनेक ग्रंथ और अनेक मत (शाखाएँ) होते हैं, जो साधक को भ्रमित कर सकते हैं। 'मूल' का अर्थ है वह मूल-मन्त्र या वह मूल-तत्त्व (ओंकार), जिससे समस्त वाणी उत्पन्न हुई है।

साधक जब 'सम्यक् उपासना' करता है, तो वह शाखाओं के विस्तार (बौद्धिक विमर्श और तर्कों) से हटकर मूल-स्तम्भ (एकाग्रता और श्रुति-अनुभव) में स्थित हो जाता है। योग का फल तभी मिलता है जब अभ्यास 'मूल' यानी आत्मा और अक्षर के साथ जुड़कर किया जाए। जो केवल बाहरी विधियों (शाखाओं) का अभ्यास करता है, वह केवल मानसिक शांति पा सकता है, किन्तु जो मूल-वेद के रहस्यों को आत्मसात करता है, वह पूर्णता (फल) को प्राप्त करता है। यह श्लोक साधक को 'विविधता' से 'एकत्व' की ओर ले जाने का सूत्र है।

स्मृतीनामुच्छिन्नशाखामूलत्वम्

श्लोक १२.२६

उच्छिन्नशाखा याः काश्चित्तथा वेदान्तराणि च ।

अन्तर्धानगतानीह स्मृत्वा तु स्मृतयः कृताः ॥ १२.२६ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

जो कुछ शाखाएँ लुप्त हो गयीं और जो वेद-भाग यहाँ अन्तर्धान हो गये, उनका स्मरण करके स्मृतियाँ रची गयीं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेद को मूल और स्तम्भ मानकर समस्त शास्त्रों को उसकी शाखाएँ बताया था। अब ऋषि इस बात का रहस्य खोल रहे हैं कि यदि वेद मूल है, तो स्मृतियों की आवश्यकता क्यों पड़ी और उनका वेदों से क्या सम्बन्ध है।

अन्वय और पदार्थ —

याः काश्चित् उच्छिन्नशाखा (तथा) वेदान्तराणि च यानि काश्चित् अन्तर्धानगतानीह (सन्ति), तानि स्मृत्वा तु स्मृतयः कृताः ।

पदार्थ:

• उच्छिन्नशाखा: 'उच्छिन्न' का अर्थ है कटा हुआ या लुप्त। वेदों की वे शाखाएँ जो समय के प्रवाह में लुप्त हो गईं या जिनका ज्ञान अब सहज उपलब्ध नहीं है।

• वेदान्तराणि: वेदों के अन्य अंश, विशिष्ट मन्त्र या गुप्त विद्याएँ।

• अन्तर्धानगतानीह: जो इस लोक (इह) में ओझल हो गए हों, गुप्त हो गए हों या विस्मृत हो गए हों।

• स्मृत्वा: स्मरण करके। यहाँ 'स्मृति' केवल याद करना नहीं, बल्कि ऋषियों द्वारा अपनी योग-शक्ति और अंतःप्रेरणा से उस लुप्त ज्ञान को पुनः जागृत करना है।

• स्मृतयः कृताः: स्मृतियों की रचना की गई।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक श्रुति (वेद) और स्मृति के बीच के सेतु को स्पष्ट करता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि स्मृति वेद से भिन्न या बाद की रचना है, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक गहन सत्य प्रकट कर रहे हैं कि स्मृतियाँ वास्तव में वेदों का ही विस्तार हैं।

वेद अनंत हैं और उनकी शाखाएँ भी अनगिनत थीं। कालक्रम में कुछ शाखाएँ 'उच्छिन्न' हो गईं, अर्थात् वे लुप्त हो गईं। कुछ वेद-अंश 'अन्तर्धान' हो गए, जिसका अर्थ है कि वे पूरी तरह नष्ट नहीं हुए, बल्कि साधारण मनुष्यों की पहुँच से ओझल हो गए। जब समाज में धर्म की रक्षा और विधि के पालन के लिए उस लुप्त ज्ञान की आवश्यकता हुई, तब महान ऋषियों ने अपनी तपस्या और योग-बल से उन लुप्त वेदों के बीजों को अपने अंतःकरण में 'स्मृत' किया। इसी स्मरण के आधार पर जो शास्त्र रचे गए, उन्हें 'स्मृति' कहा गया।

अतः स्मृति, वेद का विरोध नहीं बल्कि उसका 'पुनरुद्धार' है। यदि वेद मूल है, तो स्मृति उस मूल से निकली वह शाखा है जो समय-समय पर मुरझाकर पुनः अंकुरित होती है। यह स्पष्ट करता है कि कोई भी प्रामाणिक स्मृति वेद-बाह्य नहीं हो सकती; वह केवल वेद का वह रूप है जो एक बार लुप्त होकर ऋषियों के स्मरण द्वारा पुनः प्रकट हुआ है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्मृति' की एक उच्च अवस्था का संकेत देता है। यहाँ 'स्मृत्वा' (स्मरण करके) शब्द केवल मानसिक याददाश्त नहीं, बल्कि 'योगज-स्मृति' है।

जब साधक अपनी चेतना को स्थूल जगत से हटाकर अंतर्मुखी करता है, तब वह उस 'अक्षर' या 'बीज' के संपर्क में आता है जहाँ समस्त वेदों का ज्ञान संचित है। जिस प्रकार लुप्त शाखाएँ ऋषियों के स्मरण से पुनः प्रकट हुईं, उसी प्रकार साधक जब अपने हृदय-आकाश में स्थित उस चैतन्य पुरुष का अनुभव करता है, तो उसके भीतर सोई हुई विद्याएँ स्वतः जागृत होने लगती हैं।

अभ्यास यह है कि साधक केवल बाहरी शब्दों को न रटे, बल्कि मन्त्रों के पीछे छिपे उस 'अन्तर्धान' अर्थ को खोजने का प्रयास करे। जब वह वेद के मूल (अक्षर) में स्थित होता है, तो उसे अनुभव होता है कि ज्ञान कहीं बाहर से नहीं आता, बल्कि वह उसके अपने ही स्वरूप में लुप्त था, जिसे योग के द्वारा पुनः 'स्मृत' किया गया है। यह प्रक्रिया साधक को विस्मृति (अज्ञान) की भूमि से स्मृति (बोध) की भूमि की ओर ले जाती है।

तुल्यबलयोर्विकल्पः

श्लोक १२.२७

एकमेव हि विज्ञेयं श्रुतिस्मृतिविचक्षणैः ।

तस्मात्तुल्यबलत्वात्तु विकल्पश्च क्वचित् स्मृतः ॥ १२.२७ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

श्रुति और स्मृतिके जानकारोंको (दोनोंको) एक ही जानना चाहिए; इसलिए समान बलवाली होनेसे कहीं-कहीं विकल्प कहा गया है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि स्मृतियाँ वास्तव में वेदों की उन लुप्त शाखाओं और अन्तर्धान हुए अंशों का स्मरण हैं, जिन्हें ऋषियों ने पुनः जागृत किया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य श्रुति और स्मृति के पारस्परिक सम्बन्ध और उनके प्रमाण-बल की स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

श्रुति-स्मृति-विचक्षणैः एकम् एव हि विज्ञेयम् । तस्मात् तुल्यबलत्वात् तु क्वचित् विकल्पश्च स्मृतः ।

पदार्थ:

• श्रुति-स्मृति-विचक्षणैः: श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्मशास्त्र) दोनों के मर्म को जानने वाले चतुर या कुशल विशेषज्ञों द्वारा। 'विचक्षण' वह है जो केवल शब्दों को न जाने, अपितु उनके पीछे छिपे तत्त्व और प्रयोजन को समझे।

• एकम् एव हि विज्ञेयम्: केवल एक ही (एक ही सत्य/एक ही सत्ता) जानना चाहिए। यहाँ 'एक' का अर्थ है कि श्रुति और स्मृति में कोई मौलिक विरोध नहीं है; दोनों एक ही सत्य के दो रूप हैं।

• तुल्यबलत्वात्: समान बल होने के कारण। जब स्मृति का आधार सीधे श्रुति हो, तो उसका प्रमाण-बल श्रुति के समान ही हो जाता है।

• विकल्पश्च क्वचित् स्मृतः: कहीं-कहीं विकल्प (दो भिन्न मत या मार्ग) का उल्लेख मिलता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक धर्म-मीमांसा के एक अत्यंत कठिन प्रश्न का समाधान करता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि श्रुति सर्वोच्च है और स्मृति उसके अधीन, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक उच्चतर दृष्टि दे रहे हैं। वे कहते हैं कि जो वास्तव में 'विचक्षण' है—अर्थात् जिसकी बुद्धि सूक्ष्म है और जो वेद तथा स्मृति दोनों का अध्येता है—वह यह अनुभव करता है कि इन दोनों में कोई भेद नहीं है।

श्रुति वह बीज है जो अनादि है, और स्मृति उस बीज से प्रस्फुटित वह वृक्ष है जो काल और परिस्थिति के अनुसार फल देता है। चूंकि स्मृति का उद्गम ही श्रुति है (जैसा पिछले श्लोक में बताया गया कि लुप्त वेदों का स्मरण ही स्मृति है), इसलिए मूल और शाखा में कोई विरोध हो ही नहीं सकता। जब साधक श्रुति और स्मृति को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटना बंद कर देता है, तब उसे 'एकमेव' का बोध होता है।

परन्तु, व्यवहार में हम देखते हैं कि कहीं-कहीं श्रुति और स्मृति के विधानों में भिन्नता प्रतीत होती है, जिसे 'विकल्प' कहा गया है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि यह विकल्प तब उत्पन्न होता है जब दोनों का बल 'तुल्य' (समान) हो। यह स्थिति तब आती है जब स्मृति का कोई निर्देश किसी विशिष्ट परिस्थिति के लिए हो और श्रुति का निर्देश सार्वभौमिक हो। ऐसे में दोनों अपने-अपने स्तर पर सत्य होते हैं। यह विरोध नहीं, बल्कि सत्य की बहुआयामी अभिव्यक्ति है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ । उभावपि हि तौ धर्मौ सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ २.१४ ॥

जहाँ श्रुतिमें दो (विधान) हों, वहाँ दोनों धर्म माने गये हैं; मनीषियोंने दोनोंको ही ठीक कहा है।

मनुस्मृति २.१४मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 13

इस अंश में मनु ऋषि कहते हैं कि जहाँ श्रुति में ही दो भिन्न विधान हों, वहाँ दोनों को ही धर्म माना गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं कि यदि श्रुति के भीतर ही द्वैध या विकल्प संभव है, तो श्रुति से उत्पन्न स्मृति और श्रुति के बीच का विकल्प भी स्वाभाविक है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—साधक को धर्म के माध्यम से सत्य तक पहुँचाना। अतः विचक्षण पुरुष इन विकल्पों में उलझकर विवाद नहीं करता, बल्कि उनके पीछे के एक ही मूल सत्य को देखता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'द्वैत से अद्वैत' की यात्रा का संकेत है। जिस प्रकार एक साधक आरम्भ में विधि (स्मृति) और मन्त्र (श्रुति) को अलग-अलग देखता है, किन्तु अभ्यास के गहन स्तर पर पहुँचकर अनुभव करता है कि विधि केवल मन्त्र के अनुभव की तैयारी थी और मन्त्र स्वयं विधि का पूर्णत्व है, वैसे ही श्रुति और स्मृति का भेद मिट जाता है।

साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह बाहरी नियमों (स्मृति) को केवल बंधन न माने, अपितु उन्हें श्रुति के आंतरिक प्रकाश का प्रतिबिंब समझे। जब साधक 'तुल्यबल' की स्थिति में आता है, तो वह यह अनुभव करता है कि हृदय के भीतर गूँजता हुआ प्रणव (श्रुति) और जीवन में व्यक्त होने वाला धर्म (स्मृति) एक ही चेतना के दो आयाम हैं। इस भूमि पर पहुँचकर साधक विकल्पों के द्वन्द्व से मुक्त होकर 'एकमेव' यानी उस अखंड सत्य में प्रतिष्ठित हो जाता है।

श्रुतिस्मृत्योर्माहात्म्यम्

श्लोक १२.२८

श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।

ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ १२.२८ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

(मनु २.१०:) श्रुति वेदको जानना चाहिए और स्मृति धर्मशास्त्रको; वे सब विषयोंमें तर्कसे परे हैं, क्योंकि उन्हींसे धर्म प्रकट हुआ।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि श्रुति और स्मृति के जानकारों के लिए दोनों एक ही सत्य के रूप हैं, जिसके कारण कहीं-कहीं उनमें विकल्प या भिन्नता प्रतीत होती है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इन दोनों की परिभाषा और उनकी प्रमाण-शक्ति की प्रकृति को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

श्रुतिः तु वेदो विज्ञेयः, धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेषु अमीमांस्ये, ताभ्यां धर्मः हि निर्बभौ ॥

पदार्थ:

• श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयः: श्रुति को वेद समझना चाहिए। 'श्रुति' वह है जो ऋषियों ने समाधि की अवस्था में सुना (श्रुतम्), जो अपौरुषेय है।

• धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः: और स्मृति को धर्मशास्त्र जानना चाहिए। 'स्मृति' वह है जो श्रुति के ज्ञान के आधार पर ऋषियों द्वारा स्मरण कर संहिताबद्ध किया गया, ताकि वह व्यवहार में लाया जा सके।

• सर्वार्थेष्वमीमांस्ये: सभी अर्थों (विषयों) में 'अमीमांस्य' हैं। 'अमीमांस्य' का अर्थ है—जिसका पुनः मीमांसा (तर्क, वाद-विवाद या बौद्धिक विश्लेषण) करने की आवश्यकता न हो; जो स्वयं में सिद्ध और प्रमाण हों।

• ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ: क्योंकि उन दोनों से ही धर्म प्रकट हुआ है। 'निर्बभौ' का अर्थ है—प्रकाशित होना या अभिव्यक्त होना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान और आचरण के दो मुख्य स्तंभों—श्रुति और स्मृति—के सम्बन्ध को परिभाषित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि वेद (श्रुति) वह मूल प्रकाश है जो अनादि है, और धर्मशास्त्र (स्मृति) उस प्रकाश का वह प्रतिबिम्ब है जो मनुष्य के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के लिए एक मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

यहाँ 'अमीमांस्य' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः मनुष्य हर बात को तर्क की कसौटी पर कसना चाहता है, किन्तु याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जब बात धर्म के मूल सिद्धांतों की हो, तो श्रुति और स्मृति तर्क से परे हैं। इसका कारण यह नहीं है कि तर्क गलत है, बल्कि यह है कि तर्क 'मन' का उत्पाद है, जबकि श्रुति 'ऋत' (ब्रह्माण्डीय सत्य) का साक्षात्कार है। मन की सीमाएँ हैं, किन्तु श्रुति की कोई सीमा नहीं है।

भाव यह है कि धर्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे मनुष्य अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ ले, अपितु धर्म वह शाश्वत नियम है जो श्रुति में बीजरूप में है और स्मृति में विस्ताररूप में। यदि कोई साधक केवल तर्क (हेतुशास्त्र) के आधार पर धर्म को खोजने का प्रयास करता है, तो वह केवल बौद्धिक विलास में उलझकर रह जाता है। वास्तविक धर्म तभी प्रकट होता है जब साधक श्रुति के प्रति श्रद्धा और स्मृति के प्रति अनुशासन रखता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ २.१० ॥

श्रुति वेदको जानना चाहिए और स्मृति धर्मशास्त्रको; वे सब विषयोंमें तर्कसे परे हैं, क्योंकि उन्हींसे धर्म प्रकट हुआ।

मनुस्मृति २.१०मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 11

यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति के द्वितीय अध्याय के दसवें श्लोक से मेल खाता है। मनु और याज्ञवल्क्य दोनों इस बात पर सहमत हैं कि श्रुति और स्मृति ही धर्म के एकमात्र प्रामाणिक स्रोत हैं। दोनों ही इन्हें 'अमीमांस्य' मानते हैं, जिसका अर्थ है कि धर्म के मूलभूत प्रश्नों का उत्तर केवल इन्हीं दोनों में खोजा जाना चाहिए, न कि केवल तर्क-वितर्क में।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से, श्रुति 'समाधि' की अवस्था है और स्मृति 'साधना' की अवस्था। श्रुति वह अनुभव है जो योगी ने शून्य में प्राप्त किया, और स्मृति वह विधि है जिससे वह अनुभव अन्य साधकों के लिए सुलभ बनाया गया।

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'श्रद्धा' और 'समर्पण' का अभ्यास है। जब साधक किसी विधि को 'अमीमांस्य' मानकर स्वीकार करता है, तो वह अपने मन के संशयों (तर्कों) को शांत करता है। योग में इसे 'चित्त-वृत्ति-निरोध' की एक प्रक्रिया माना जा सकता है, जहाँ बौद्धिक विश्लेषण के स्थान पर 'अनुभव' को प्रधानता दी जाती है। जब तर्क समाप्त होता है, तभी विश्वास का उदय होता है, और विश्वास से ही वह आंतरिक प्रकाश (धर्म) प्रकट होता है जिसे याज्ञवल्क्य 'निर्बभौ' कह रहे हैं। साधक इस स्थिति में अपनी बुद्धि को श्रुति के चरणों में समर्पित कर, स्मृति के अनुशासन का पालन करते हुए, स्थूल व्यवहार से सूक्ष्म सत्य की ओर बढ़ता है।

श्लोक १२.२९

योऽवमन्येत ते तूभे हेतुशास्त्राश्रयो द्विजः ।

स विद्वद्भिर्बहिः कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ १२.२९ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

(मनु २.११:) जो द्विज हेतुशास्त्र (कुतर्क) का आश्रय लेकर उन दोनोंका अपमान करे, वह नास्तिक, वेदनिन्दक सज्जनों द्वारा बहिष्कृत करने योग्य है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में श्रुति और स्मृति को 'अमीमांस्य' कहकर उनकी प्रमाण-शक्ति को स्थापित किया गया था कि धर्म इन्हीं दोनों से प्रकाशित होता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस मानसिक वृत्ति का निषेध कर रहे हैं जो तर्क के अहंकार में इन मूल प्रमाणों का तिरस्कार करती है।

अन्वय और पदार्थ —

यो द्विजः हेतुशास्त्राश्रयो ते तूभे अवमन्येत, स विद्वद्भिर्बहिः कार्यः, नास्तिकः वेदनिन्दकः ॥

पदार्थ:

• ते तूभे: उन दोनों का (श्रुति और स्मृति का)। यहाँ 'तूभे' शब्द श्रुति और स्मृति के संयुक्त स्वरूप को इंगित करता है।

• हेतुशास्त्राश्रयो: हेतुशास्त्र (तर्क-विद्या या केवल बौद्धिक विश्लेषण) का आश्रय लेकर। 'हेतु' वह कारण या तर्क है जिसे प्रमाण मानकर निष्कर्ष निकाला जाता है।

• अवमन्येत: अपमान करे, तुच्छ जाने या तिरस्कार करे।

• विद्वद्भिर्बहिः कार्यो: विद्वानों (सज्जनों) द्वारा बाहर किया जाना चाहिए। 'बहिः' का अर्थ यहाँ केवल सामाजिक बहिष्कार नहीं, अपितु सत्य के मार्ग और सत्संग के परिवेश से पृथक करना है।

• नास्तिकः: वह नास्तिक है। नास्तिक वह नहीं जो केवल ईश्वर को न माने, अपितु वह है जो 'नास्तिको वेदनिन्दकः' अर्थात् वेदों के प्रमाण को नकार दे।

• वेदनिन्दकः: वेदों की निंदा करने वाला।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उस बौद्धिक अहंकार के प्रति चेतावनी है जो साधक को सत्य से दूर ले जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'हेतुशास्त्र' के दोष को बता रहे हैं। हेतुशास्त्र या तर्क-विद्या स्वयं में दोषपूर्ण नहीं है, यदि वह श्रुति के प्रकाश में सहायक हो; किंतु जब तर्क स्वयं को श्रुति और स्मृति से ऊपर मान ले और उनके आधार पर धर्म का उपहास करने लगे, तब वह 'अविद्या' बन जाता है।

यहाँ 'द्विज' शब्द का प्रयोग महत्वपूर्ण है। द्विज वह है जिसका दूसरा जन्म हुआ है—अर्थात् जिसने संस्कार और स्वाध्याय के माध्यम से अपनी चेतना को जाग्रत किया है। एक द्विज से यह अपेक्षा की जाती है कि वह बुद्धि का प्रयोग सत्य की खोज के लिए करे, न कि सत्य के विनाश के लिए। जो व्यक्ति केवल तर्क को ही अंतिम सत्य मानकर श्रुति और स्मृति का अपमान करता है, वह अपनी उस आध्यात्मिक पात्रता को खो देता है जो उसे 'द्विज' बनाती है।

'बहिष्कृत' करने का भाव यह है कि ऐसा व्यक्ति सत्य के उस सामूहिक प्रवाह (सत्संग) से कट जाता है जहाँ अनुभव और श्रुति का समन्वय होता है। जब बुद्धि केवल तर्क का आश्रय लेती है, तो वह शुष्क हो जाती है और उसमें वह 'श्रद्धा' नहीं रहती जो सूक्ष्म सत्यों को ग्रहण करने के लिए अनिवार्य है। ऐसा व्यक्ति 'नास्तिक' कहलाता है क्योंकि वह उस मूल आधार (वेद) को ही नकार देता है जिससे समस्त धर्म और विद्या की उत्पत्ति हुई है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्द्विजः । स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ २.११ ॥

जो द्विज हेतुशास्त्रका आश्रय लेकर इन दोनों मूलोंका अपमान करे, वह नास्तिक, वेदनिन्दक सज्जनोंसे बहिष्कार्य है।

मनुस्मृति २.११मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 169

मनुस्मृति में भी यही व्यवस्था दी गई है कि जो द्विज हेतुशास्त्र का आश्रय लेकर श्रुति और स्मृति रूपी दोनों मूलों का अपमान करे, वह सज्जनों द्वारा बहिष्कार्य है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। दोनों ही ग्रन्थ यह स्पष्ट करते हैं कि तर्क जब प्रमाण (श्रुति) के विरुद्ध जाता है, तो वह ज्ञान नहीं, अपितु पतन का कारण बनता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'बुद्धि' और 'प्रज्ञा' के भेद को स्पष्ट करता है। हेतुशास्त्र 'बुद्धि' का क्षेत्र है, जबकि श्रुति 'प्रज्ञा' का। बुद्धि विश्लेषण करती है, टुकड़ों में देखती है, जबकि प्रज्ञा समग्रता को देखती है।

साधक जब योग के मार्ग पर चलता है, तो वह अनुभव करता है कि कई सत्य ऐसे हैं जिन्हें तर्क से सिद्ध नहीं किया जा सकता, केवल अनुभव (अनुभूति) किया जा सकता है। जो साधक केवल तर्क के आधार पर साधना के रहस्यों का उपहास करता है, वह 'नास्तिक' भाव में स्थित होता है। वह अनुभव की भूमि पर नहीं उतर पाता क्योंकि उसका द्वार 'अहंकार' और 'तर्क' से अवरुद्ध है।

इस श्लोक का अभ्यास साधक के लिए यह है कि वह अपनी बुद्धि को श्रुति के चरणों में समर्पित करे। जब तर्क, श्रुति के प्रकाश में विलीन हो जाता है, तब वह 'कुतर्क' से 'विवेक' में बदल जाता है। साधक इस अवस्था में पहुँचता है जहाँ वह तर्क को साधन मानता है, साध्य नहीं। इस प्रकार वह बौद्धिक शुष्कता से निकलकर हृदय की प्रज्ञा में प्रवेश करता है।

हेतुशास्त्राध्ययननिषेधः

श्लोक १२.३०

हेतुशास्त्राणि योऽधीते वेदबाह्यो भवेद्द्विजः ।

तेन नास्तिक्यभावेन सर्वे(र्वं)मन्येत सोऽन्यथा ॥ १२.३० ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

जो द्विज (केवल) हेतुशास्त्र पढ़ता है, वह वेदबाह्य हो जाता है; उस नास्तिकभावसे वह सब कुछ उलटा मानता है —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में तर्क के अहंकार में श्रुति और स्मृति का तिरस्कार करने वाले को 'नास्तिक' और 'वेदनिन्दक' कहकर उसे सत्संग से पृथक करने का विधान बताया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस मानसिक अवस्था का विश्लेषण कर रहे हैं कि केवल तर्क-विद्या का अध्ययन एक साधक या द्विज की दृष्टि को किस प्रकार विकृत कर देता है।

अन्वय और पदार्थ —

यो द्विजः हेतुशास्त्राणि अधीते, स वेदबाह्यो भवेत् । तेन नास्तिक्यभावेन सर्वे (वस्तुं/धर्मं) अन्यथा मन्येत ॥

पदार्थ:

• हेतुशास्त्राणि: तर्क-विद्या, न्याय-शास्त्र या केवल बौद्धिक विश्लेषण। यहाँ 'हेतु' का अर्थ है वह कारण या तर्क जिसे प्रमाण मानकर निष्कर्ष निकाला जाता है।

• अधीते: अध्ययन करता है। यहाँ 'केवल' शब्द का भाव निहित है, अर्थात् वह जो वेदों के बिना केवल तर्क का अध्ययन करता है।

• वेदबाह्यो भवेत्: वेद के बाहर हो जाता है। इसका अर्थ है कि उसकी बुद्धि उस प्रकाश-क्षेत्र से बाहर निकल जाती है जहाँ सत्य का साक्षात्कार होता है।

• नास्तिक्यभावेन: नास्तिकता के भाव से। वह मानसिक वृत्ति जिसमें वेदों के प्रमाण को स्वीकार करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।

• सर्वे अन्यथा मन्येत: सब कुछ उल्टा (विपरीत) मानता है। 'अन्यथा' का अर्थ है—सत्य को असत्य और असत्य को सत्य मानना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक बौद्धिक भटकाव के मनोविज्ञान को उद्घाटित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'द्विज' शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। द्विज वह है जिसका दूसरा जन्म संस्कार और विद्या से हुआ हो। एक द्विज के लिए वेद उसकी प्राणवायु हैं। किंतु जब वही द्विज वेदों के मार्गदर्शन को छोड़कर केवल 'हेतुशास्त्र' (तर्क-विद्या) का आश्रय लेता है, तो वह 'वेदबाह्य' हो जाता है।

'वेदबाह्य' होने का अर्थ केवल भौगोलिक या सामाजिक दूरी नहीं है, अपितु यह एक आंतरिक अंधकार है। वेद वह प्रकाश हैं जो सूक्ष्म जगत और अक्षर-ब्रह्म का मार्ग दिखाते हैं। तर्क (हेतु) की सीमा केवल स्थूल जगत और प्रत्यक्ष प्रमाणों तक है। जब कोई व्यक्ति केवल तर्क के आधार पर सत्य को खोजने का प्रयास करता है, तो वह उस सीमा में बँध जाता है जहाँ केवल 'बुद्धि' कार्य करती है, 'प्रज्ञा' नहीं।

इस श्लोक का सबसे गंभीर पक्ष है—'सर्वे अन्यथा मन्येत'। जब बुद्धि वेदों के प्रकाश से कट जाती है, तो वह केवल तर्क करती नहीं है, बल्कि वह 'विकृत' हो जाती है। नास्तिकता केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक 'भाव' (नास्तिक्यभाव) है। यह भाव एक ऐसा चश्मा है जिससे साधक को धर्म अधर्म जैसा, मोक्ष बंधन जैसा और सत्य मिथ्या जैसा प्रतीत होने लगता है। वह सत्य को तर्क की कसौटी पर कसता है, जबकि तर्क स्वयं सत्य का एक छोटा सा अंश है। वह अंश जब पूर्ण (वेद) का विरोध करने लगे, तो वह संपूर्ण जगत को 'अन्यथा' यानी उल्टा देखने लगता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-वृत्ति' के विरूपण की चेतावनी है। साधक के लिए बुद्धि एक साधन है, साध्य नहीं। जब साधक केवल बौद्धिक विश्लेषण (हेतुशास्त्र) में उलझ जाता है, तो उसका चित्त 'विचार-मंथन' के चक्र में फँस जाता है। यह स्थिति योग में 'अविद्या' की श्रेणी में आती है, जहाँ तर्क का अहंकार साधक को हृदय के शून्य से दूर कर केवल मस्तिष्क के कोलाहल में सीमित कर देता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि सत्य 'तर्क' का विषय नहीं, अपितु 'अनुभूति' का विषय है। जो सत्य श्रुति के माध्यम से हृदय में उतरता है, उसे मस्तिष्क के तर्क से सिद्ध करने का प्रयास करना वैसा ही है जैसे सूर्य के सामने दीपक जलाकर यह सिद्ध करना कि प्रकाश क्या है।

इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक अपनी बुद्धि को वेदों के अधीन करे। जब बुद्धि तर्क करती है, तो उसे 'हेतु' कहना चाहिए, किंतु जब वह सत्य को स्वीकार करती है, तो वह 'श्रद्धा' कहलाती है। इस श्रद्धा के बिना साधक 'वेदबाह्य' होकर मानसिक भटकाव का शिकार हो जाता है। यह श्लोक साधक को बौद्धिक अहंकार से निकालकर समर्पण की भूमि की ओर ले जाता है, क्योंकि केवल समर्पण में ही 'अन्यथा' देखने वाली दृष्टि शुद्ध होकर 'यथा' (जैसा है वैसा ही) देखने वाली दृष्टि बनती है।

श्लोक १२.३१

तीर्थं दानं व्रतं यज्ञा वेदा विप्राश्च देवताः ।

स्वर्गापवर्गहेतूनि कुदृष्ट्या पश्यतेऽनृतम् ॥ १२.३१ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

— तीर्थ, दान, व्रत, यज्ञ, वेद, विप्र और देवता — स्वर्ग और मोक्षके इन हेतुओंको (वह) कुदृष्टिसे असत्य देखता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि वेदों के बिना केवल तर्क-विद्या का आश्रय लेने वाला व्यक्ति 'नास्तिक' भाव से ग्रसित होकर सत्य को विपरीत रूप में देखने लगता है। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उसी 'कुदृष्टि' के परिणामों का विवरण दे रहे हैं कि वह व्यक्ति किन-किन आध्यात्मिक सोपानों को असत्य मानकर स्वयं को विनाश की ओर ले जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

तीर्थं, दानं, व्रतं, यज्ञाः, वेदाः, विप्राः च देवताः (एताः) स्वर्गापवर्गहेतूनि, (सः) कुदृष्ट्या अनृतं पश्यते ॥

पदार्थ:

• तीर्थं, दानं, व्रतं, यज्ञाः: ये बाह्य साधना के चार मुख्य स्तंभ हैं। तीर्थ (पवित्र स्थान/पवित्रता), दान (त्याग), व्रत (संयम) और यज्ञ (समर्पण)।

• वेदाः, विप्राः, देवताः: ये ज्ञान और मार्गदर्शन के स्रोत हैं। वेद (श्रुति), विप्र (गुरु/द्रष्टा) और देवता (दिव्य शक्तियाँ/चेतना के उच्च स्तर)।

• स्वर्गापवर्गहेतूनि: स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) के कारण। यहाँ 'हेतु' का अर्थ है वे साधन जिनके माध्यम से उच्च लोकों या पूर्ण मुक्ति की प्राप्ति होती है।

• कुदृष्ट्या: विकृत दृष्टि से। वह दृष्टि जो अहंकार, तर्क और अज्ञान के कारण सत्य को ग्रहण करने में असमर्थ है।

• अनृतं पश्यते: असत्य देखता है। 'अनृत' का अर्थ केवल झूठ नहीं, अपितु वह जो वास्तविक नहीं है या जिसका फल शून्य है, ऐसा मानना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उस बौद्धिक अंधकार का चित्रण करता है जहाँ तर्क, श्रद्धा का स्थान ले लेता है। महर्षि याज्ञवल्क्य उन सात साधनों की सूची दे रहे हैं जो मनुष्य को स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाते हैं।

प्रथम चार—तीर्थ, दान, व्रत और यज्ञ—साधना के 'कर्म' पक्ष हैं। तीर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं, अपितु चित्त की वह पवित्रता है जहाँ ईश्वर का वास हो। दान केवल वस्तु का त्याग नहीं, अपितु 'ममत्व' का विसर्जन है। व्रत इंद्रियों का दमन नहीं, अपितु उनका अनुशासन है और यज्ञ केवल अग्निहोत्र नहीं, अपितु स्वयं को ईश्वरीय इच्छा में होम कर देना है।

अगले तीन—वेद, विप्र और देवता—साधना के 'ज्ञान' और 'अनुग्रह' पक्ष हैं। वेद वह मानचित्र हैं जो मार्ग दिखाते हैं, विप्र (गुरु) वह पथ-प्रदर्शक हैं जो उस मानचित्र को पढ़ना सिखाते हैं, और देवता वे गंतव्य या दिव्य ऊर्जाएँ हैं जो साधक को अपनी ओर खींचती हैं।

जब कोई व्यक्ति केवल हेतुशास्त्र (कुतर्क) में डूब जाता है, तो उसकी बुद्धि 'कुदृष्टि' से ग्रस्त हो जाती है। वह तर्क करता है कि "दान से क्या मिलता है?" या "देवता कहाँ हैं?" वह इन साधनों को केवल भौतिक क्रियाएँ मानकर इनका उपहास करता है। वह यह नहीं देख पाता कि ये सात साधन वास्तव में 'स्वर्ग' (उच्च मानसिक अवस्था) और 'अपवर्ग' (जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति) के द्वार हैं। उसके लिए ये सब 'अनृत' (मिथ्या) हो जाते हैं। वास्तव में, वह साधनों को नहीं, अपितु उन साधनों के पीछे छिपे 'तत्त्व' को नकार रहा होता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'दृष्टि-शुद्धि' का महत्त्व बताता है। साधक के लिए तीर्थ, दान, व्रत और यज्ञ बाह्य क्रियाएँ नहीं, बल्कि आंतरिक शोधन की प्रक्रियाएँ हैं।

• तीर्थ का आन्तर अर्थ है हृदय के भीतर स्थित वह शून्य स्थान जहाँ आत्मा का वास है।

• दान का अर्थ है प्राणों को अहंकार से मुक्त कर उन्हें ब्रह्मांडीय चेतना में विसर्जित करना।

• व्रत का अर्थ है मन को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना।

• यज्ञ का अर्थ है प्राण-अग्नि में कामनाओं की आहुति देना।

जब साधक कुदृष्टि (अहंकारयुक्त तर्क) का त्याग कर 'श्रद्धा' के भाव में आता है, तब उसे अनुभव होता है कि वेद केवल शब्द नहीं, अपितु ध्वनि-ब्रह्म हैं; विप्र केवल देह नहीं, अपितु जागृत चेतना हैं; और देवता केवल प्रतिमाएँ नहीं, अपितु हमारे भीतर की ही उच्चतर शक्तियाँ हैं।

जो साधक इस श्लोक के भाव को समझता है, वह 'तर्क' की भूमि से उठकर 'अनुभूति' की भूमि पर जाता है। वह समझ जाता है कि बिना श्रद्धा के तर्क केवल एक मानसिक जाल है, जबकि श्रद्धा युक्त कर्म उसे अपवर्ग (मोक्ष) की ओर ले जाने वाला सेतु है। अभ्यास यह है कि अपनी बुद्धि को वेदों के प्रकाश में समर्पित किया जाए ताकि 'कुदृष्टि' समाप्त हो और सत्य 'ऋत' के रूप में प्रत्यक्ष हो।

श्लोक १२.३२

नास्तिक्यभावान्मूढात्मा पापेषु कुरुते मतिम् ।

श्रुतिस्मृत्युदितं त्यक्त्वा ततो नरकमृच्छति ॥ १२.३२ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

नास्तिक भाव के कारण मूर्ख आत्मा पापों में अपनी मति लगाता है । श्रुति और स्मृति द्वारा उद्घोषित को त्यागकर, उसके बाद मनुष्य नरक को प्राप्त होता है ।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह बताया गया कि केवल हेतुशास्त्र (तर्क-विद्या) का आश्रय लेने वाला व्यक्ति कुदृष्टि से ग्रसित होकर स्वर्ग और मोक्ष के साधनों को असत्य मानने लगता है। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य इस कुदृष्टि के अंतिम परिणाम और उससे उत्पन्न होने वाले नैतिक पतन का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

नास्तिक्यभावात् मूढात्मा पापेषु मतिं कुरुते । श्रुतिस्मृत्युदितं त्यक्त्वा ततो नरकं मृच्छति ॥

पदार्थ:

• नास्तिक्यभावात्: नास्तिक भाव के कारण। यहाँ 'नास्तिक्य' का अर्थ केवल ईश्वर का निषेध नहीं, अपितु श्रुति (वेद) के प्रमाण को नकारने की मानसिक अवस्था है।

• मूढात्मा: वह आत्मा जो मोह में फंसी है। 'मूढ़' वह है जिसकी बुद्धि विवेकशून्य हो गई है और जो सत्य-असत्य का निर्णय करने में असमर्थ है।

• पापेषु मतिं कुरुते: पापों में अपनी मति (बुद्धि/विचार) लगाता है। जब धर्म के मानक (श्रुति-स्मृति) नष्ट हो जाते हैं, तब व्यक्ति अपनी वासनाओं को ही 'सत्य' मानकर उन्हें सही ठहराने लगता है।

• श्रुतिस्मृत्युदितं त्यक्त्वा: श्रुति और स्मृति द्वारा उद्घोषित (कहे गए) मार्ग को त्यागकर।

• ततो नरकं मृच्छति: उसके पश्चात वह नरक को प्राप्त होता है। 'मृच्छति' का अर्थ है प्राप्त करना या गिरना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक गंभीर चेतावनी है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जब कोई साधक या जिज्ञासु श्रद्धा के बिना केवल तर्क (हेतुशास्त्र) के आधार पर धर्म का विश्लेषण करता है, तो वह केवल बौद्धिक विलासिता नहीं करता, बल्कि अपने आध्यात्मिक पतन का मार्ग प्रशस्त करता है।

रहस्य यह है कि 'नास्तिक्य' केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक 'भाव' है। जब व्यक्ति श्रुति के प्रमाणों को तुच्छ समझने लगता है, तब उसकी बुद्धि 'मूढ़' हो जाती है। मूढ़ता का अर्थ यहाँ मंदबुद्धि होना नहीं, अपितु 'विवेक का विलोपन' है। जब मर्यादाओं का बंधन (स्मृति) और सत्य का प्रकाश (श्रुति) हट जाता है, तब मनुष्य की बुद्धि केवल इंद्रिय-सुख और अहंकार की तृप्ति में संलग्न हो जाती है। इसी अवस्था को ऋषि ने "पापेषु मतिं कुरुते" कहा है—अर्थात वह पाप को पाप नहीं मानता, बल्कि तर्क के माध्यम से उसे उचित सिद्ध करने लगता है।

जब व्यक्ति श्रुति और स्मृति द्वारा बताए गए धर्म-मार्ग को पूरी तरह त्याग देता है, तब वह उस सुरक्षा-कवच से वंचित हो जाता है जो उसे पतन से बचाता है। इसके परिणामस्वरूप वह 'नरक' को प्राप्त होता है। यहाँ नरक केवल मृत्यु के पश्चात मिलने वाला कोई स्थान नहीं है, बल्कि वह मानसिक अवस्था भी है जहाँ मनुष्य अज्ञान, अशांति और अंतहीन वासनाओं के चक्र में फँसकर तड़पता है। यह श्लोक सिद्ध करता है कि बिना श्रुति-आधार के तर्क केवल भटकाव है, जो अंततः विनाश की ओर ले जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-भ्रम' और 'विवेक-खल' की स्थिति का वर्णन है। साधक के लिए यहाँ यह समझना आवश्यक है कि बुद्धि यदि श्रद्धा से अलग हो जाए, तो वह 'अहंकार' का उपकरण बन जाती है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक को यह देखना चाहिए कि जब वह केवल तर्क के आधार पर अपनी साधना के अनुभवों को मापता है, तो वह 'नास्तिक्य भाव' की ओर बढ़ता है। वास्तविक योग-अभ्यास में तर्क का स्थान 'अनुभव' और 'श्रुति' के प्रमाणों के अधीन होता है। जो साधक श्रुति-स्मृति के अनुशासन को त्यागकर केवल अपनी कल्पना या तर्क के सहारे ऊपर उठना चाहता है, वह मानसिक विक्षेप के नरक में गिर जाता है। अतः इस श्लोक का योगिक संदेश है—बुद्धि को श्रुति के प्रकाश में समर्पित करना, ताकि वह 'मूढ़' न होकर 'प्रज्ञा' में परिवर्तित हो सके।

श्लोक १२.३३

अज्ञानतमसाऽन्धानां भ्रामितानां कुदृष्टिभिः ।

न प्रत्यक्षं भवेत्तेषां वेदविद्यान्तरं तु यत् ॥ १२.३३ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

अज्ञानके अन्धकारसे अन्धे और कुदृष्टियोंसे भटके हुए लोगोंको वह (तत्त्व) प्रत्यक्ष नहीं होता, जो वेदविद्याके भीतर है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह बताया गया कि श्रुति और स्मृति के मार्ग को त्यागकर केवल तर्क के आधार पर चलने वाला मूढ़ व्यक्ति पापों में मति लगाकर नरकगामी होता है। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस मानसिक अवस्था का विश्लेषण कर रहे हैं जिसके कारण मनुष्य सत्य को देखने में असमर्थ रहता है।

अन्वय और पदार्थ —

अज्ञानतमसा अन्धानां, कुदृष्टिभिः भ्रामितानां (तेषां), वेदविद्यान्तरं तु यत्, न प्रत्यक्षं भवेत् ॥

पदार्थ:

• अज्ञानतमसा अन्धानां: अज्ञान रूपी घोर अन्धकार से अन्धे हुए लोगों के लिए। यहाँ 'तमस' केवल जानकारी का अभाव नहीं, अपितु वह आवरण है जो आत्मा के प्रकाश को ढंक लेता है।

• कुदृष्टिभिः भ्रामितानां: कुदृष्टियों (विकृत दृष्टिकोणों या दोषपूर्ण तर्कों) द्वारा भटकाए गए लोगों के लिए। 'कुदृष्टि' वह दृष्टि है जो सत्य को असत्य और असत्य को सत्य मान लेती है।

• वेदविद्यान्तरं तु यत्: वह जो वेदविद्या के 'अन्तर' में है। यहाँ 'अन्तर' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; इसका अर्थ केवल वेदों के पृष्ठों के बीच नहीं, बल्कि उस गुप्त तत्त्व (रहस्य) से है जो केवल अनुभूति से प्राप्त होता है।

• न प्रत्यक्षं भवेत्: प्रत्यक्ष नहीं होता। 'प्रत्यक्ष' का अर्थ यहाँ केवल आँखों से देखना नहीं, अपितु साक्षात् अनुभव करना या बोध होना है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान और अज्ञान के बीच की विभाजक रेखा को स्पष्ट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि वेद केवल शब्दों का समूह या कर्मकाण्डों की सूची नहीं हैं, अपितु उनके भीतर एक 'अन्तर-विद्या' छिपी है। यह वह विद्या है जो आत्मा, परमात्मा और सृष्टि के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन करती है।

रहस्य यह है कि इस भीतरी विद्या को प्राप्त करने के लिए केवल बौद्धिक योग्यता पर्याप्त नहीं है, अपितु 'दृष्टि' की शुद्धि अनिवार्य है। जो व्यक्ति अज्ञान के तमस में डूबा है, उसकी बुद्धि वैसी ही हो जाती है जैसे किसी अंधे व्यक्ति की आँखें—अंग तो उपस्थित हैं, किन्तु प्रकाश का अभाव है। जब मनुष्य केवल हेतुशास्त्र (तर्क) के अहंकार में डूबकर वेदों का उपहास करता है, तो वह 'कुदृष्टि' का शिकार हो जाता है। यह कुदृष्टि उसे सत्य के मार्ग से भटकाकर भ्रम के चक्रव्यूह में डाल देती है।

ऐसे भटके हुए व्यक्ति के लिए वेद केवल बाहरी नियमों की पुस्तक रह जाते हैं। वह वेदों के शब्दों को तो पढ़ सकता है, किन्तु उनके भीतर छिपे उस 'अक्षर' और 'ज्योति' को नहीं देख पाता जो साधक को मुक्त करती है। जिस प्रकार सूर्य सबके सामने होते हुए भी अंधे को दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार वेदविद्या का परम तत्त्व सबके लिए उपलब्ध होते हुए भी अज्ञानी और अहंकारी के लिए 'अप्रत्यक्ष' रहता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

कठ उपनिषद्

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ १.२.५ ॥

अविद्याके भीतर रहते हुए अपनेको धीर और पण्डित माननेवाले मूढ़ टेढ़े-मेढ़े भटकते हैं, जैसे अन्धेसे ले जाये जाते अन्धे।

कठ उपनिषद् १.२.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 64

कठोपनिषद् में भी इसी मानसिक अवस्था का वर्णन मिलता है जहाँ अविद्या में स्थित व्यक्ति स्वयं को पण्डित मानकर भटकता रहता है। वह उस अंधे के समान है जिसे दूसरा अंधा नेतृत्व कर रहा हो। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और कठोपनिषद् दोनों यहाँ एक ही सत्य की पुष्टि करते हैं कि बिना श्रद्धा और शुद्ध दृष्टि के, केवल स्वयं को 'धीर' या 'पण्डित' मानना वास्तव में मूढ़ता है। स्मृति यहाँ स्पष्ट करती है कि यह भटकाव 'कुदृष्टि' (विकृत तर्क) से आता है, जबकि उपनिषद् इसे 'अविद्या' का आवरण बताते हैं। दोनों का निष्कर्ष एक ही है—बाहरी पांडित्य भी भीतरी अन्धकार को नहीं मिटा सकता।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'दृष्टि-शुद्धि' के अभ्यास का निर्देश देता है। योग में 'प्रत्यक्ष' होने का अर्थ है—साक्षात् अनुभव। वेदविद्या का जो 'अन्तर' भाग है, वह केवल मंत्रों के उच्चारण से नहीं, बल्कि चित्त की शुद्धि से प्रकट होता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि अज्ञान एक 'तमस' (अन्धकार) है, जो मन और बुद्धि पर जम गया है। जब तक साधक के भीतर 'कुदृष्टि' (अहंकार और तर्क का अतिरेक) रहता है, तब तक वह केवल स्थूल जगत को देखता है। अभ्यास यह है कि वह अपनी बुद्धि को तर्क के संकीर्ण घेरे से निकालकर 'श्रद्धा' और 'समर्पण' की भूमि पर लाए।

जब साधक बाहरी विधियों (जैसे संध्या, जप) को केवल क्रिया न मानकर उन्हें भीतरी प्रकाश के साधन के रूप में देखता है, तब उसकी दृष्टि शुद्ध होने लगती है। इस श्लोक का योगिक संदेश यह है कि सत्य 'दिखाया' नहीं जा सकता, वह केवल 'प्रत्यक्ष' होता है—और प्रत्यक्ष होने के लिए अन्धकार (तमस) का निवारण आवश्यक है। साधक इस बोध से कि "मैं अभी अज्ञान के तमस में हूँ", अपने अहंकार का विसर्जन करता है और उस भीतरी विद्या की ओर अग्रसर होता है जो शब्दों से परे, अनुभव में स्थित है।

वैदिकशास्त्राध्ययनमाहात्म्यम्

श्लोक १२.३४

वेदांश्चैव तु वेदाङ्गान् वेदान्तानि तथा स्मृतिः(तीः) ।

अधीत्य ब्राह्मणः पूर्वं शक्तितोऽन्यांश्च संपठेत् ॥ १२.३४ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

ब्राह्मण पहले वेदों, वेदाङ्गों, वेदान्तों और स्मृतियोंको पढ़कर, फिर यथाशक्ति दूसरे (शास्त्र) भी पढ़े।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि अज्ञान के अन्धकार और कुदृष्टि से भटके हुए लोग वेदविद्या के उस आन्तर तत्त्व को नहीं देख पाते जो साक्षात् अनुभव का विषय है। अब इस श्लोक में वे उस अंधकार को मिटाने और सत्य के साक्षात्कार के लिए अध्ययन का सही क्रम और विधि बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

ब्राह्मणः पूर्वं वेदांश्चैव तु वेदाङ्गान् वेदान्तानि तथा स्मृतिः(तीः) अधीत्य, शक्तितोऽन्यांश्च संपठेत् ॥

पदार्थ:

• वेदांश्चैव: वेदों को भी। यहाँ वेदों का अर्थ है वह ऋतम्भरा ज्ञान जो श्रुति के रूप में प्राप्त है।

• वेदाङ्गान्: वेदों के अंगों को। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये वेदों के शरीर के अंगों के समान हैं, जो मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके अर्थ को स्पष्ट करते हैं।

• वेदान्तानि: वेदान्तों को। वेदों का अंतिम भाग, जो ब्रह्म-विद्या और आत्म-साक्षात्कार का उपसंहार है।

• स्मृतिः(तीः): स्मृतियों को। वह ज्ञान जो श्रुति के आधार पर ऋषियों द्वारा स्मरण कर समाज के आचरण के लिए लिपिबद्ध किया गया।

• अधीत्य: पढ़कर और आत्मसात् करके। 'अध्ययन' केवल शब्दों को पढ़ना नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारना है।

• शक्तितोऽन्यांश्च: अपनी शक्ति (क्षमता और पात्रता) के अनुसार अन्य शास्त्रों को भी।

• संपठेत्: पूर्णतः पढ़े या अध्ययन करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक केवल एक शैक्षिक निर्देश नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक सोपान (सीढ़ी) है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि ज्ञान का अर्जन एक निश्चित क्रम में होना चाहिए, अन्यथा साधक भटकाव का शिकार हो सकता है।

प्रथम चरण में 'वेद' हैं, जो मूल स्रोत हैं। फिर 'वेदाङ्ग' आते हैं, जो उस स्रोत की भाषा और विधि को शुद्ध करते हैं। इसके पश्चात 'वेदान्त' है, जो साधक को कर्म से ऊपर उठाकर ज्ञान के शिखर पर ले जाता है। अंत में 'स्मृतियाँ' आती हैं, जो उस उच्च ज्ञान को लौकिक जीवन के व्यवहार और मर्यादाओं के साथ जोड़ती हैं।

भाव यह है कि यदि कोई व्यक्ति सीधे वेदान्त या केवल स्मृतियों को पढ़ता है, तो उसके पास या तो आधार की कमी होगी या वह केवल बाहरी नियमों में उलझकर रह जाएगा। पहले वेदों और वेदाङ्गों के माध्यम से बुद्धि को शुद्ध करना आवश्यक है, ताकि वेदान्त का सूक्ष्म तत्त्व हृदय में उतर सके। जब आधार (वेद), साधन (वेदाङ्ग), लक्ष्य (वेदान्त) और मर्यादा (स्मृति) स्पष्ट हो जाते हैं, तब साधक अन्य शास्त्रों (जैसे दर्शन या अन्य विद्याओं) का अध्ययन अपनी पात्रता के अनुसार कर सकता है।

यहाँ 'शक्तितो' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका रहस्य यह है कि हर व्यक्ति की मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता भिन्न होती है। जो व्यक्ति मूल वैदिक आधार के बिना अन्य शास्त्रों में डूब जाता है, वह पिछले श्लोकों में वर्णित 'कुदृष्टि' का शिकार हो जाता है। अतः वेदों को नींव बनाकर ही अन्य ज्ञान का भवन खड़ा करना चाहिए।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधना के सोपानों' का वर्णन है। जिस प्रकार योग में पहले शरीर की शुद्धि, फिर प्राण की शुद्धि और अंत में मन की शुद्धि होती है, वैसे ही ज्ञान के मार्ग में भी एक क्रम है।

साधक के लिए वेदों का अध्ययन 'स्थूल शुद्धि' है, वेदाङ्गों का अध्ययन 'सूक्ष्म शुद्धि' (बुद्धि का परिष्कार) है, वेदान्त का अध्ययन 'कारण शुद्धि' (अहंकार का विसर्जन) है और स्मृतियों का पालन 'सांसारिक संतुलन' है। जब साधक इस क्रम से आगे बढ़ता है, तो वह केवल सूचनाएँ एकत्र नहीं करता, बल्कि उसकी चेतना निम्न भूमि से उच्च भूमि की ओर गमन करती है। वह 'विद्या' के बाहरी आवरण से निकलकर उसके 'अक्षर' रूप तक पहुँचता है। यह अध्ययन क्रम साधक को मानसिक भटकाव से बचाकर उसे एकनिष्ठता (एकाग्रता) की ओर ले जाता है, जो अंततः आत्म-साक्षात्कार का आधार बनता है।

श्लोक १२.३५

आत्मज्ञाननिमित्तं तु सिद्धान्तानि विचिन्तयेत् ।

केवलानि तु योऽधीते वेदबाह्यो भवेद् द्विजः ॥ १२.३५ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३२

आत्मज्ञानके लिए सिद्धान्तों (दर्शनों) का चिन्तन करे; पर जो केवल उन्हींको पढ़ता है, वह द्विज वेदबाह्य हो जाता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अध्ययन का एक क्रम निर्धारित किया, जिसमें वेदों, वेदाङ्गों, वेदान्तों और स्मृतियों को प्राथमिक स्थान दिया गया। अब इस श्लोक में वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि अन्य दर्शनों या सिद्धान्तों का अध्ययन किस उद्देश्य से किया जाना चाहिए और केवल उन पर निर्भर रहने का क्या संकट है।

अन्वय और पदार्थ —

तु आत्मज्ञाननिमित्तं सिद्धान्तानि विचिन्तयेत् । केवलानि तु योऽधीते (सः) द्विजः वेदबाह्यः भवेत् ॥

पदार्थ:

• आत्मज्ञाननिमित्तं: आत्म-साक्षात्कार के निमित्त या उद्देश्य से। यहाँ 'निमित्त' शब्द यह संकेत देता है कि सिद्धान्त साधन हैं, साध्य नहीं।

• सिद्धान्तानि: सिद्धान्तों को। यहाँ सिद्धान्तों का अर्थ उन दर्शनों (जैसे न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग आदि) से है जो तर्क, प्रमाण और विश्लेषण के माध्यम से सत्य तक पहुँचने का प्रयास करते हैं।

• विचिन्तयेत्: चिन्तन करे। यह केवल 'पठन' नहीं है, अपितु 'विचिन्तन' है—अर्थात् तर्क की कसौटी पर कसकर उसे अनुभव में उतारना।

• केवलानि: केवल उन्हीं को (बिना वेदमूलक आधार के)।

• वेदबाह्यः: वेद के बाहर स्थित। इसका अर्थ केवल भौगोलिक या किताबी दूरी नहीं, अपितु उस 'ऋत' और श्रुति-प्रकाश से वंचित हो जाना है जो जीवन को दिशा देता है।

• भवेत्: हो जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान-साधना के एक अत्यंत सूक्ष्म भेद को उजागर करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य, जो स्वयं तर्क और अनुभव के शिखर पुरुष हैं, यहाँ दर्शनों (सिद्धान्तों) के उपयोग की मर्यादा बता रहे हैं।

वे कहते हैं कि यदि कोई साधक 'आत्मज्ञान' की प्राप्ति करना चाहता है, तो वह विभिन्न सिद्धान्तों का विचिन्तन अवश्य करे। सिद्धान्तों का कार्य है—संदेह का निवारण करना, बुद्धि को प्रखर करना और सत्य के मार्ग में आने वाले तार्किक अवरोधों को हटाना। जब साधक वेदान्त के महावाक्यों का श्रवण करता है, तब बुद्धि में कई प्रश्न उठते हैं; उन प्रश्नों के समाधान के लिए सिद्धान्त (दर्शन) एक उपकरण की भाँति कार्य करते हैं। अतः सिद्धान्तों का चिन्तन तब तक श्रेयस्कर है जब तक वह आत्मज्ञान के लक्ष्य की ओर ले जा रहा हो।

किन्तु, यहाँ एक गंभीर चेतावनी है—'केवलानि तु योऽधीते'। जो द्विज (पुनर्जन्म लेकर ज्ञान के योग्य हुआ व्यक्ति) वेदों के प्रकाश को त्यागकर केवल तर्क-प्रधान सिद्धान्तों में उलझ जाता है, वह 'वेदबाह्य' हो जाता है। इसका रहस्य यह है कि तर्क केवल बुद्धि का विस्तार कर सकता है, वह 'प्रकाश' नहीं दे सकता। वेद वह प्रकाश हैं जो ऋषियों ने समाधि में देखा; सिद्धान्त उस प्रकाश की व्याख्या करने का प्रयास हैं। यदि व्याख्या को ही सत्य मान लिया जाए और मूल प्रकाश (वेद) को छोड़ दिया जाए, तो साधक केवल शब्दों के जाल में फँसकर रह जाता है। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान तो हो सकता है, किन्तु वह 'विज्ञ' (अनुभवी) नहीं हो पाता।

शास्त्र-साक्ष्य —

छान्दोग्य उपनिषद्

सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मवित् ॥ ७.१.३ ॥

(नारद:) भगवन्, मैं केवल मन्त्रोंका जाननेवाला हूँ, आत्माका जाननेवाला नहीं।

छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.३उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 276

यहाँ नारद मुनि स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे मन्त्रों के ज्ञाता तो हैं, किन्तु आत्मवित् (आत्मा को जानने वाले) नहीं। यह इस बात का प्रमाण है कि केवल शास्त्रों या मन्त्रों का बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जब महर्षि याज्ञवल्क्य सिद्धान्तों के विचिन्तन की बात करते हैं, तो वे उसी 'आत्मवित्' होने की प्रक्रिया की बात कर रहे हैं। यदि नारद जैसे महान ऋषि भी केवल मन्त्र-ज्ञान को अधूरा मानते हैं, तो केवल तर्क-सिद्धान्तों में डूबे रहना तो और भी अधिक अधूरा है। स्मृति यहाँ दर्शनों को वेदों के सहायक के रूप में स्वीकार करती है, किन्तु उन्हें वेदों का विकल्प मानने से मना करती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विवेक' और 'साधन' के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। साधक के लिए सिद्धान्त 'दर्शन-साधन' हैं। योग मार्ग में जब साधक प्रज्ञा का उपयोग करता है, तो वह उसे शुद्ध करने के लिए तर्क का सहारा ले सकता है, ताकि मन के संशय मिट सकें।

परन्तु, योग का लक्ष्य 'बुद्धि' नहीं, बल्कि 'बुद्ध' (चेतना) होना है। केवल सिद्धान्तों का अध्ययन साधक को 'बौद्धिक अहंकार' की भूमि पर खड़ा कर देता है, जहाँ वह सत्य को 'जानता' तो है, पर 'होता' नहीं है। वास्तविक अभ्यास यह है कि सिद्धान्तों के विचिन्तन से जब संशय समाप्त हो जाएँ, तब साधक उन सिद्धान्तों की सीढ़ी को छोड़कर सीधे श्रुति के अनुभव में उतरे।

साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि तर्क केवल द्वार तक ले जाता है, द्वार के भीतर प्रवेश केवल श्रद्धा और अनुभव से होता है। जो केवल तर्क में अटका रहता है, वह हृदय के द्वार पर ही रुक जाता है और उस 'अक्षर' का अनुभव नहीं कर पाता जिसका वर्णन याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति में किया है। अतः अभ्यास यह हो: सिद्धान्तों का उपयोग संशय-निवारण के लिए करें, किन्तु लक्ष्य सदैव आत्म-साक्षात्कार ही रहे।

श्लोक १२.३६

वेदान्तान्यः पठेद्विप्रश्चतुरश्चानुपूर्वशः ।

तथा शाखोपशाखानि गुह्यान्यादेशकानि च ॥ १२.३६ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

जो विप्र चारों वेदान्तों (वेदों) को क्रमसे पढ़े, तथा शाखाओं-उपशाखाओं, गुह्य (उपनिषदों) और आदेशोंको,

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि आत्मज्ञान के लिए सिद्धान्तों का विचिन्तन आवश्यक है, किंतु वेदमूलक आधार के बिना केवल सिद्धान्तों का आश्रय व्यक्ति को 'वेदबाह्य' कर देता है। अब इस श्लोक में वे उस पूर्ण अध्ययन-क्रम का विवरण दे रहे हैं, जिससे एक विप्र वास्तव में 'सर्ववित्' या सर्वज्ञता की ओर अग्रसर होता है।

अन्वय और पदार्थ —

विप्रः चतुर्णां वेदान्तान्यः (वेदान्) अनुपूर्वशः पठेद्विप्रः, तथा (पठेद) शाखोपशाखानि, गुह्यान्यादेशकानि च ॥

पदार्थ:

• वेदान्तान्यः (वेदान्): यहाँ 'वेदान्त' शब्द का प्रयोग वेदों के समग्र ज्ञान के लिए हुआ है। यद्यपि वेदान्त का अर्थ 'वेदों का अंत' (उपनिषद्) होता है, किंतु यहाँ यह चारों वेदों के पूर्ण अध्ययन का संकेत है।

• चतुरश्च: चारों (ऋक्, यजुः, साम और अथर्व)।

• अनुपूर्वशः: क्रमशः। यह केवल समय का क्रम नहीं, बल्कि ज्ञान के स्तर का क्रम है—स्थूल से सूक्ष्म की ओर।

• शाखोपशाखानि: शाखाओं और उपशाखाओं को। वेदों के विभिन्न संप्रदायों और उनके विस्तृत विवरणों को।

• गुह्य: गुह्य विद्याओं को। वह ज्ञान जो प्रत्यक्ष नहीं है, जो केवल योग्य शिष्यों को गुप्त रूप से दिया जाता है (उपनिषद् और रहस्य-विद्या)।

• आदेशकानि: आदेशों को। वे मन्त्र या निर्देश जो किसी विशेष विधान के लिए 'आदेश' स्वरूप दिए जाते हैं, या वे गुप्त संकेत जो मन्त्रों के आन्तर अर्थ को खोलते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान के उस सोपान को दर्शाता है, जिसे पार करके साधक 'अक्षर' तक पहुँचता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ केवल किताबी ज्ञान की बात नहीं कर रहे, अपितु एक व्यवस्थित मानसिक और आध्यात्मिक तैयारी की विधि बता रहे हैं।

वे कहते हैं कि एक विप्र को चारों वेदों का अध्ययन 'अनुपूर्वशः' अर्थात क्रमबद्ध तरीके से करना चाहिए। यह क्रम इसलिए आवश्यक है क्योंकि वेद केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि चेतना के उत्थान की एक प्रक्रिया हैं। पहले संहिता (मन्त्र), फिर ब्राह्मण (विधि), फिर आरण्यक (चिंतन) और अंत में उपनिषद् (अनुभव) का क्रम साधक को स्थूल जगत से हटाकर सूक्ष्म सत्ता की ओर ले जाता है।

'शाखा और उपशाखाओं' का अध्ययन यह सुनिश्चित करता है कि ज्ञान में कोई रिक्तता न रहे और वह पूर्णता को प्राप्त करे। इसके पश्चात 'गुह्य' का अध्ययन आता है। 'गुह्य' वह ज्ञान है जो हृदय की गुहा में स्थित है। जब तक साधक बाहरी विधियों (शाखाओं) में निपुण नहीं होता, वह गुह्य विद्याओं के भार को वहन नहीं कर सकता।

'आदेशकानि' का अर्थ यहाँ उन विशेष मन्त्रों और संकेतों से है, जो साधना के समय गुरु द्वारा दिए जाते हैं। जैसे शुक्लयजुर्वेद में कुछ मन्त्रों के स्थान पर अन्य मन्त्रों का 'आदेश' (प्रतिस्थापन) होता है, वैसे ही योग-साधना में भी एक स्तर पर पहुँचकर साधक को विशेष 'आदेश' या बीज-मन्त्र दिए जाते हैं, जो उसकी सुप्त चेतना को जाग्रत करते हैं।

यह श्लोक एक अधूरे वाक्य का अंश है, जिसकी क्रिया और फल अगले श्लोक (12.37) में पूर्ण होता है। यहाँ केवल अध्ययन की सामग्री और उसकी विधि बताई गई है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन-क्रम' का निरूपण है। साधक जब 'अनुपूर्वशः' अध्ययन करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को बाहरी जगत (स्थूल) से हटाकर आंतरिक जगत (सूक्ष्म) की ओर ले जा रहा होता है।

१. वेदों का अध्ययन: यह मन की शुद्धि और एकाग्रता का अभ्यास है।

२. शाखा-उपशाखा: यह ज्ञान के विस्तार और विश्लेषण का अभ्यास है, जिससे बुद्धि प्रखर होती है।

३. गुह्य: यह 'अंतर्मुखी' होने की अवस्था है। यहाँ साधक बाहरी शोर को छोड़कर हृदय के भीतर की उस ध्वनि को सुनने का प्रयास करता है, जिसे 'गुह्य' कहा गया है।

४. आदेश: यह गुरु-प्रसाद और मन्त्र-शक्ति का अनुभव है। जब साधक का पात्र तैयार हो जाता है, तब उसे वह 'आदेश' प्राप्त होता है जो उसे सीधे अक्षर-ब्रह्म से जोड़ देता है।

साधक इस अभ्यास से 'अविद्या' के अंधकार से निकलकर 'विद्या' के प्रकाश की ओर बढ़ता है। यह यात्रा उसे उस भूमि तक ले जाती है जहाँ वह केवल शास्त्र का ज्ञाता नहीं, बल्कि उस शास्त्र का साक्षात् अनुभवकर्ता बन जाता है।

श्लोक १२.३७

सर्ववेदप्रणीतानि मन्त्रांश्चापि पवित्रकान् ।

स सर्वविद्भवेद्विप्रो वेदवेदान्तपारगः ॥ १२.३७ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

सब वेदोंके रचे मन्त्रों और पवित्र (सूक्तों) को भी — वह विप्र सर्वज्ञ, वेद-वेदान्तका पारगामी होता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चारों वेदों, उनकी शाखाओं, गुह्य विद्याओं और आदेशों के अनुक्रमिक अध्ययन का विधान बताया। वर्तमान श्लोक उसी अध्ययन-क्रम की पूर्णता को दर्शाता है, जहाँ मन्त्रों और पवित्र सूक्तों का समावेश साधक को 'सर्ववित्' की स्थिति तक ले जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

(विप्रः) सर्ववेदप्रणीतानि मन्त्रांश्चापि पवित्रकान् (पठेद/अधीते), (तदा) स विप्रो सर्वविद्भवेत्, (यः) वेदवेदान्तपारगः (अस्ति) ॥

पदार्थ:

• सर्ववेदप्रणीतानि: समस्त वेदों द्वारा रचे गए या उनसे उद्भूत।

• मन्त्रांश्चापि पवित्रकान्: मन्त्रों और पवित्र सूक्तों को भी। यहाँ 'पवित्रकान्' शब्द केवल शुद्धि का सूचक नहीं है, अपितु उन सूक्तों का संकेत है जो चित्त को संस्कारित कर उसे दिव्य बनाते हैं।

• सर्वविद्: सर्वज्ञ या वह जो समस्त विद्याओं के मूल तत्त्व को जान ले।

• वेदवेदान्तपारगः: वेदों और वेदान्त (उपनिषदों) के पार उतर जाने वाला। 'पारग' वह है जो नदी के उस पार पहुँच गया हो, अर्थात् जिसने केवल शब्दों को नहीं, बल्कि उनके लक्ष्य (ब्रह्म) को प्राप्त कर लिया हो।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान की उस पराकाष्ठा का वर्णन करता है जहाँ अध्ययन, मन्त्र और अनुभव एक हो जाते हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि केवल वेदों के व्याकरण या शाखाओं का ज्ञान पर्याप्त नहीं है; जब तक साधक 'सर्ववेदप्रणीत' मन्त्रों और पवित्र सूक्तों के मर्म को नहीं समझता, तब तक उसकी विद्या अधूरी है।

यहाँ 'मन्त्र' का अर्थ केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि वह 'मनन' है जो मन को एकाग्र कर उसे अक्षर (ओंकार) में विलीन कर दे। 'पवित्र सूक्त' वे हैं जो साधक के अंतःकरण से मल को हटाकर उसे उस पात्रता तक ले जाते हैं जहाँ श्रुति का सत्य प्रत्यक्ष होता है। जब एक विप्र चारों वेदों के मन्त्रों का अध्ययन करता है और फिर वेदान्त (उपनिषदों) के माध्यम से उनके आन्तर अर्थ को समझता है, तब वह 'पारग' कहलाता है।

'सर्वविद्' होने का अर्थ यह नहीं है कि वह संसार की समस्त सूचनाओं को जानता है, अपितु इसका रहस्य यह है कि वह उस एक 'तत्व' को जान लेता है जिससे समस्त विद्याएँ उत्पन्न हुई हैं। जैसे समुद्र को जान लेने पर उसकी समस्त लहरों का ज्ञान स्वतः हो जाता है, वैसे ही वेद-वेदान्त के पारगामी विप्र के लिए समस्त ज्ञान एक ही सूत्र में पिरोया हुआ प्रतीत होता है। यह स्थिति केवल बौद्धिक उपलब्धि नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक रूपांतरण है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'स्वाध्याय' और 'मन्त्र-साधना' के समन्वय का निर्देश है। साधक जब वेदों के पवित्र सूक्तों का जप और मनन करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'शब्द-ब्रह्म' को जाग्रत कर रहा होता है।

अभ्यास यह है कि साधक पहले स्थूल मन्त्र (वाचिक जप) से आरम्भ करे, फिर उसके अर्थ में स्थित हो (मानसिक जप) और अंततः उस मन्त्र के पीछे छिपे मौन या अक्षर में स्थित हो जाए। जब विप्र मन्त्रों के 'पवित्र' स्वरूप का अनुभव करता है, तो उसका चित्त शुद्ध होता है और वह 'वेद-वेदान्त पारग' होकर अपनी ही चेतना के उच्चतम शिखर पर पहुँच जाता है। यह यात्रा शब्द से अर्थ की ओर और अर्थ से उस 'अक्षर' की ओर है, जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है।

आत्मोपासनाफलम्

श्लोक १२.३८

तथा चात्मगुणैर्युक्त आत्मोपासनतत्परः ।

वेदतुल्यो भवेत् सोऽपि ऋषितुल्यो द्विजोत्तमः ॥ १२.३८ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

और जो आत्माके गुणोंसे युक्त, आत्मोपासनामें तत्पर हो, वह श्रेष्ठ द्विज भी वेदके तुल्य, ऋषिके तुल्य होता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेदों, शाखाओं और मन्त्रों के विस्तृत अध्ययन के माध्यम से 'सर्वविद्' होने की विधि बताई। अब वर्तमान श्लोक में वे ज्ञान के उस संक्षिप्त और तीव्र मार्ग का उद्घाटन कर रहे हैं, जहाँ शास्त्र-अध्ययन के स्थान पर साक्षात् अनुभव (अनुभूति) को प्रधानता दी गई है।

अन्वय और पदार्थ —

तथा चात्मगुणैर्युक्तः, आत्मोपासनतत्परः (द्विजोत्तमः), सोऽपि वेदतुल्यः भवेत्, (तथा) ऋषितुल्यः (भवेत्) ॥

पदार्थ:

• आत्मगुणैर्युक्त: आत्मा के स्वाभाविक गुणों (सत्, चित्, आनन्द) से युक्त। यहाँ गुणों का अर्थ केवल नैतिक गुणों से नहीं, अपितु उस चैतन्य स्वरूप के लक्षणों से है जो आत्मा का मूल स्वभाव है।

• आत्मोपासनातत्परः: जिसकी पूरी चेतना आत्मा की उपासना (निरन्तर स्मरण और ध्यान) में लगी हो। 'तत्पर' वह है जिसके लिए वह कार्य ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन गया हो।

• वेदतुल्यः: वेदों के समान। वेद केवल ग्रन्थ नहीं, अपितु 'विद्' धातु से बना वह ज्ञान है जो सत्य का साक्षात्कार कराता है। वेदतुल्य होने का अर्थ है—उस सत्य का साक्षात् ज्ञाता होना।

• ऋषितुल्यः: ऋषियों के समान। ऋषि वह है जो 'ऋष' (देखना) करता है, अर्थात् जिसने सत्य के दर्शन कर लिए हों।

• द्विजोत्तमः: श्रेष्ठ द्विज। यहाँ द्विज वह है जिसका दूसरा जन्म ज्ञान के प्रकाश में हुआ है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान-मार्ग के दो भिन्न छोरों को एक बिंदु पर मिला देता है। एक ओर पिछले श्लोकों में विस्तृत अध्ययन, शाखाओं का ज्ञान और मन्त्रों के अभ्यास का विधान था, जो 'बाह्य से भीतर' की यात्रा है। दूसरी ओर, यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य 'भीतर से भीतर' की यात्रा का मार्ग बता रहे हैं।

भाव यह है कि जो साधक शास्त्रों के शब्दों के जाल में न उलझकर सीधे उस 'आत्मा' की उपासना में लग जाता है, जिसकी चर्चा वेदों में की गई है, वह उस लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त कर लेता है। जब कोई द्विज आत्मगुणों—जैसे कि साक्षी भाव, निर्लिप्तता और परम शान्ति—को अपने स्वभाव में उतार लेता है, तब वह केवल वेदों का 'पाठक' नहीं रहता, बल्कि स्वयं 'वेद' हो जाता है। क्योंकि वेद वह ज्ञान है जो आत्मा का बोध कराता है, और जिसने आत्मा को जान लिया, उसने वास्तव में वेदों के सार को जी लिया।

ऋषितुल्य होने का रहस्य यह है कि ऋषि वह नहीं है जिसने केवल शास्त्र पढ़े, अपितु वह है जिसने सत्य का 'द्रष्टा' होकर उसे अनुभव किया। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि शास्त्र एक मानचित्र की भाँति हैं और आत्मोपासना साक्षात् गंतव्य की यात्रा है। यदि कोई मानचित्र न पढ़कर भी सीधे गंतव्य पर पहुँच जाए, तो वह मानचित्र पढ़ने वाले से कम नहीं, अपितु उसके समान ही योग्य माना जाएगा। अतः, आत्म-साक्षात्कार की स्थिति में शास्त्र-ज्ञान और अनुभव-ज्ञान का भेद समाप्त हो जाता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'श्रवण-मनन' से 'निदिध्यासन' की ओर संक्रमण है। यहाँ दो मार्गों की समानता बताई गई है:

१. विस्तृत मार्ग: वेदों, शाखाओं और मन्त्रों का अध्ययन कर सत्य तक पहुँचना।

२. त्वरित मार्ग: आत्मगुणों का अभ्यास कर सीधे आत्म-उपासना में लीन होना।

साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि वह केवल सूचनाओं का संग्रह न करे, बल्कि अपने भीतर के 'गुणों' को जाग्रत करे। अभ्यास यह है कि हृदय में स्थित उस 'अक्षर' या 'पुरुष' का निरंतर स्मरण किया जाए, जिससे मन बाहरी जगत से हटकर अंतर्मुखी हो जाए। जब साधक 'तत्पर' होता है, अर्थात् उसकी एकाग्रता अखंड हो जाती है, तब वह 'द्विजोत्तम' की भूमि पर पहुँचता है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक अनुभव करता है कि जो सत्य वेदों के शब्दों में छिपा था, वह अब उसके अपने स्वरूप में प्रकाशित हो रहा है। इस प्रकार, वह शब्दों के माध्यम से नहीं, अपितु स्वयं के अस्तित्व के माध्यम से 'वेदतुल्य' और 'ऋषितुल्य' हो जाता है।

श्लोक १२.३९

एकेनापि भवेत्तेन सर्वधर्मविनिश्चयः ।

पङ्क्तिं पावयते चैव उद्धरिष्यत्यनुग्रहात् ॥ १२.३९ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

उस एक (ऐसे द्विज) से भी सब धर्मोंका निर्णय हो जाता है; वह पंक्तिको पवित्र करता है, और (अपने) अनुग्रहसे (दूसरोंका) उद्धार करेगा।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि जो साधक आत्मा के गुणों में स्थित होकर आत्म-उपासना में तत्पर है, वह शास्त्र-अध्ययन के बिना भी वेद और ऋषियों के तुल्य हो जाता है। वर्तमान श्लोक उसी 'वेदतुल्य' और 'ऋषितुल्य' व्यक्तित्व के प्रभाव और उसकी सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्रासंगिकता को प्रतिपादित करता है।

अन्वय और पदार्थ —

एकेनापि (तस्मात् एकेन द्विजोत्तमेन) भवेत् तेन सर्वधर्मविनिश्चयः । स (द्विजोत्तमः) पङ्क्तिं पावयते च एव, (तथा) उद्धरिष्यति (अन्यान्) अनुग्रहात् ॥

पदार्थ:

• एकेनापि: उस एक (आत्मज्ञानी या वेदपारग द्विज) से भी। यहाँ 'एक' संख्या मात्र नहीं, अपितु उस पूर्णता का संकेत है जहाँ अनेकता समाप्त हो जाती है।

• सर्वधर्मविनिश्चयः: समस्त धर्मों का निर्णय। 'धर्म' यहाँ केवल आचार-संहिता नहीं, अपितु 'धृ' धातु से वह शाश्वत नियम है जो सृष्टि और व्यक्ति को धारण करता है। 'विनिश्चय' का अर्थ है—संदेह का निवारण कर सत्य को प्रतिष्ठित करना।

• पङ्क्तिं पावयते: पंक्ति को पवित्र करता है। 'पङ्क्ति' का अर्थ यहाँ केवल भोजन की पंक्ति नहीं, अपितु शिष्यों का समूह, कुल, समाज या एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर साधकों की श्रृंखला है।

• उद्धरिष्यति: उद्धार करेगा। संसार रूपी सागर या अविद्या के अंधकार से ऊपर उठाना।

• अनुग्रहात्: अनुग्रह से। अनुग्रह वह ईश्वरीय कृपा है जो बिना किसी भौतिक कारण के, केवल करुणावश साधक पर बरसती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उस 'एक' व्यक्ति की महिमा गाता है जिसने ज्ञान और अनुभव का समन्वय कर लिया है। पिछले श्लोक में जिस व्यक्ति को 'वेदतुल्य' कहा गया, वह यहाँ 'धर्म-निर्णायक' के रूप में सामने आता है।

भाव यह है कि जब कोई साधक आत्म-साक्षात्कार कर लेता है, तो उसके भीतर वेदों का ज्ञान केवल शब्दों के रूप में नहीं, बल्कि साक्षात् अनुभव के रूप में विद्यमान होता है। ऐसे व्यक्ति के लिए धर्म कोई बाहरी नियम नहीं, बल्कि उसका स्वभाव बन जाता है। इसलिए, जब समाज या साधक समूह में किसी सूक्ष्म धर्म-संकट या आध्यात्मिक दुविधा का प्रश्न उठता है, तो उस एक आत्मज्ञानी का निर्णय अंतिम और प्रमाणिक होता है। वह निर्णय शास्त्रों के यांत्रिक पाठ पर नहीं, बल्कि उस 'ऋषितुल्य' दृष्टि पर आधारित होता है जो सत्य को सीधे देखती है।

'पङ्क्तिं पावयते' का गहरा रहस्य यह है कि जिस प्रकार एक जलते हुए दीपक से अन्य दीपक प्रज्वलित होते हैं, उसी प्रकार उस एक प्रबुद्ध पुरुष के सान्निध्य में आने से पूरी 'पङ्क्ति' (शिष्य-परम्परा या समाज) पवित्र हो जाती है। उसकी उपस्थिति मात्र से वातावरण में सात्विकता का संचार होता है और अन्य लोग भी अपनी अविद्या से मुक्त होने लगते हैं।

अंततः, वह केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि 'अनुग्रह' करता है। ज्ञान तर्क से प्राप्त हो सकता है, किन्तु 'उद्धार' केवल अनुग्रह से होता है। वह आत्मज्ञानी अपनी करुणा से दूसरों के भीतर सोई हुई चेतना को जगाता है और उन्हें निम्न भूमियों से उठाकर उच्चतर आध्यात्मिक अवस्था की ओर ले जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः ॥ १२.११३ ॥

वेद जाननेवाला एक भी श्रेष्ठ द्विज जिस धर्मका निश्चय करे, वही परम धर्म जानना चाहिए — दस हजार अज्ञानियोंका कहा हुआ नहीं।

मनुस्मृति १२.११३मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 601

मनुस्मृति में भी इसी तथ्य की पुष्टि की गई है कि वेद जानने वाले एक भी श्रेष्ठ द्विज का निर्णय, दस हजार अज्ञानियों के मत से श्रेष्ठ है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ मनु के मत से एक कदम आगे बढ़कर यह बताती है कि वह 'एक' केवल शास्त्र-विद् ही नहीं, बल्कि 'आत्मोपासनतत्पर' भी है। मनु जहाँ 'वेदविद्' के निर्णय पर बल देते हैं, वहीं याज्ञवल्क्य उसे 'अनुग्रह' और 'पवित्रता' के योगिक प्रभाव से जोड़ते हैं। दोनों शास्त्रों का मेल यह है कि सत्य का निर्णय बहुमत से नहीं, बल्कि पात्रता और प्रमाण (अनुभव) से होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'गुरु-तत्त्व' के अनुभव का सूत्र है। योग मार्ग में एक समय ऐसा आता है जब शास्त्र केवल संकेत मात्र रह जाते हैं और साधक को एक ऐसे 'मार्गदर्शक' की आवश्यकता होती है जो स्वयं उस लक्ष्य तक पहुँच चुका हो।

यहाँ 'सर्वधर्मविनिश्चय' का अर्थ है—साधक के भीतर उठने वाले द्वंद्वों का शांत होना। जब साधक उस एक प्रबुद्ध पुरुष (गुरु) के अनुग्रह में आता है, तो उसके मन की चंचलता समाप्त होती है और वह 'पवित्र पङ्क्ति' का हिस्सा बन जाता है, अर्थात् वह एक ऐसी चेतना-धारा में जुड़ जाता है जो उसे ऊपर की ओर ले जाती है। अभ्यास यह है कि साधक स्वयं को उस 'एक' (परमात्मा/गुरु) के प्रति समर्पित करे, क्योंकि व्यक्तिगत प्रयास (अध्ययन) एक सीमा तक ले जाता है, किन्तु अंतिम 'उद्धार' केवल उस अनुग्रह से संभव है जो पूर्णता से अपूर्णता की ओर प्रवाहित होता है।

वेदशास्त्रमाहात्म्यम्

श्लोक १२.४०

अनन्तं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रं सनातनम् ।

वेदितव्यं प्रयत्नेन सर्ववर्गफलप्रदम् ॥ १२.४० ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

सनातन वेदशास्त्र अनन्त और अप्रमेय है; (वह) प्रयत्नसे जानना चाहिए, (वह) सब पुरुषार्थोंका फल देनेवाला है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस आत्मज्ञानी द्विज की महिमा बताई जो अपनी अनुग्रह-शक्ति से संपूर्ण पंक्ति का उद्धार करने में समर्थ है। अब ऋषि उस आधार की ओर संकेत कर रहे हैं जिससे वह ज्ञान और वह सामर्थ्य प्राप्त होता है—अर्थात् वह सनातन वेदशास्त्र, जो समस्त विद्याओं का मूल और अंतिम लक्ष्य है।

अन्वय और पदार्थ —

वेदशास्त्रं सनातनं च अनन्तं चाप्रमेयं च (अस्ति) । (तत्) सर्ववर्गफलप्रदम् (अस्ति), (तस्मात् तत्) प्रयत्नेन वेदितव्यम् ॥

पदार्थ:

• अनन्तं: जिसका कोई अंत न हो। यहाँ अनन्त का अर्थ केवल विस्तार नहीं, अपितु वह पूर्णता है जिसमें समस्त ज्ञान समाहित है और जहाँ पहुँचकर जिज्ञासा शांत हो जाती है।

• अप्रमेयं: जो प्रमाणों के द्वारा पूरी तरह न मापा जा सके। 'प्रमाण' वह होता है जो सीमित वस्तु को सिद्ध करे; जो असीम है, वह अप्रमेय है।

• सनातनम्: जो सदा से है, सदा रहेगा और जिसका संबंध काल से नहीं, अपितु सत्य से है।

• प्रयत्नेन: कठिन परिश्रम, निरंतर अभ्यास और एकाग्रता के साथ।

• सर्ववर्गफलप्रदम्: समस्त वर्गों (पुरुषार्थों) के फल देने वाला। यहाँ 'वर्ग' का अर्थ केवल सामाजिक वर्ण नहीं, अपितु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों के फल से है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक वेदशास्त्र की उस विराटता को उद्घाटित करता है जिसे केवल बाहरी शब्दों में नहीं, अपितु अनुभव के धरातल पर समझा जा सकता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ वेदों को केवल 'ग्रन्थ' नहीं, बल्कि एक 'जीवन्त सत्ता' के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

भाव यह है कि वेदशास्त्र 'अनन्त' है क्योंकि वह उस ब्रह्म का प्रतिबिंब है जो स्वयं अनन्त है। जैसे सागर की गहराई को किनारे पर खड़े होकर नहीं मापा जा सकता, वैसे ही वेद के मर्म को केवल बौद्धिक विमर्श से नहीं जाना जा सकता; इसलिए वह 'अप्रमेय' है। वह 'सनातन' है क्योंकि वह सृष्टि के आरम्भ से पूर्व भी था और प्रलय के पश्चात भी रहेगा; वह ऋषियों द्वारा रचित नहीं, अपितु ऋषियों द्वारा 'द्रष्ट' (देखा गया) है।

ऋषि यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश देते हैं—'प्रयत्नेन वेदितव्यम्'। वेद का ज्ञान सहज उपलब्ध नहीं है। यह केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि 'प्रयत्न' से प्राप्त होता है। यह प्रयत्न केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि चित्त की शुद्धि, इंद्रिय-संयम और गुरु-निष्ठा का समन्वित प्रयास है। जब साधक इस प्रयत्न से वेदों के मर्म में उतरता है, तब उसे 'सर्ववर्गफल' प्राप्त होता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति वेदों के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, उसे लौकिक समृद्धि (अर्थ), इच्छाओं की तृप्ति (काम), नैतिक उत्थान (धर्म) और अंततः परम मुक्ति (मोक्ष) स्वतः प्राप्त हो जाते हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति में भी वेदशास्त्र की इसी अनंतता और उसकी अपरिमेयता का वर्णन मिलता है:

मनुस्मृति

पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् । अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ १२.९४ ॥

पितरों, देवताओं और मनुष्योंका वेद सनातन नेत्र है; वेदशास्त्र (मनुष्यसे) अशक्य और अप्रमेय है — यह स्थिति है।

मनुस्मृति १२.९४मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 597

यहाँ मनुस्मृति वेदों को 'सनातन नेत्र' कहती है और उन्हें 'अशक्य' एवं 'अप्रमेय' मानती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि वेद वह दृष्टि हैं जिससे मनुष्य भूत, भविष्य और वर्तमान को देख सकता है, और यह ज्ञान साधारण बुद्धि से परे (अप्रमेय) है।

इसी प्रकार, वेदों के भरण-पोषण वाले स्वरूप का वर्णन यहाँ मिलता है:

मनुस्मृति

बिभर्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् । तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ १२.९९ ॥

सनातन वेदशास्त्र सब भूतोंका भरण करता है; इसलिए मैं इसे परम मानता हूँ, जो इस प्राणीका साधन है।

मनुस्मृति १२.९९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 598

जहाँ मनुस्मृति कहती है कि सनातन वेदशास्त्र सब भूतों का भरण करता है, वहीं याज्ञवल्क्य उसे 'सर्ववर्गफलप्रद' कहकर यह स्पष्ट करते हैं कि यह भरण केवल भौतिक नहीं, अपितु आध्यात्मिक और पुरुषार्थ-सिद्ध करने वाला है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से 'अनन्त' और 'अप्रमेय' का अर्थ है—वह अवस्था जहाँ मन की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं और साधक 'अक्षर' (अविनाशी) में स्थित हो जाता है।

साधक के लिए 'प्रयत्न' का अर्थ है—प्राण और मन को एकाग्र कर उस शून्य या पूर्णता में प्रवेश करना जहाँ वेद के मन्त्र केवल शब्द नहीं रहते, अपितु स्पंदन बन जाते हैं। जब साधक 'प्रयत्नेन' (गहन ध्यान और स्वाध्याय से) वेदों के आंतरिक अर्थ को पकड़ता है, तो वह अनुभव करता है कि वेद बाहर किसी पुस्तक में नहीं, बल्कि उसके अपने हृदय की गहराई में 'सनातन' रूप से स्थित हैं।

यह श्लोक साधक को 'अध्ययन' से 'अनुभूति' की ओर ले जाता है। जब वह वेदों को 'अप्रमेय' मानकर अपने अहंकार (कि मैं सब जान गया हूँ) को त्याग देता है, तभी वह उस 'सर्ववर्गफल' का पात्र बनता है, जिसका सर्वोच्च फल 'ब्रह्म-साक्षात्कार' है।

श्लोक १२.४१

वेदमेव समभ्यस्येद्वेदश्चक्षुः सनातनम् ।

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदप्रतिष्ठितम् ॥ १२.४१ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

वेदका ही भली-भाँति अभ्यास करे; वेद सनातन नेत्र है; भूत, वर्तमान और भविष्य — सब वेदमें प्रतिष्ठित है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेदशास्त्र की अनंतता और उसके द्वारा समस्त पुरुषार्थों की प्राप्ति का वर्णन किया। अब ऋषि उस अनंत ज्ञान को प्राप्त करने के व्यावहारिक साधन (अभ्यास) और वेद की उस दृष्टि का उद्घाटन कर रहे हैं, जिससे काल की सीमाओं का अतिक्रमण संभव है।

अन्वय और पदार्थ —

(अतः) वेदमेव समभ्यस्येत्, (यतः) वेदः सनातनं चक्षुः (अस्ति) । भूतं, भव्यं, भविष्यं च सर्वं वेदप्रतिष्ठितम् (अस्ति) ॥

पदार्थ:

• समभ्यस्येत्: 'सम' (भली-भाँति/सम्यक्) + 'अभ्यस्येत्' (अभ्यास करे)। यहाँ अभ्यास का अर्थ केवल रटना नहीं, अपितु मन्त्रों के अर्थ, उनके प्रयोग और उनके आन्तर अनुभव का निरंतर परिमार्जन है।

• चक्षुः: नेत्र। वह साधन जिससे देखा जाता है। यहाँ वेद को 'चक्षु' कहना यह दर्शाता है कि वेद ज्ञान का वह आलोक है जिसके बिना सत्य अदृश्य रहता है।

• सनातनम्: काल से परे, जो आदि और अंत से रहित शाश्वत सत्य है।

• भूतं: जो बीत चुका है (अतीत)।

• भव्यं: जो अभी घटित हो रहा है (वर्तमान)।

• भविष्यं: जो आने वाला है (भविष्य)।

• वेदप्रतिष्ठितम्: वेद में ही स्थित या वेद के द्वारा ही परिभाषित।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को उस अंतिम आश्रय की ओर ले जाता है जहाँ समस्त संशय समाप्त हो जाते हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'समभ्यास' का निर्देश दे रहे हैं। जब वे कहते हैं कि "वेद का ही भली-भाँति अभ्यास करे", तो उनका संकेत उस समग्रता की ओर है जिसे उन्होंने इस ग्रन्थ के पूर्व अध्यायों में समझाया है—ओंकार, गायत्री, व्याहृति और प्राणायाम का वह समुच्चय जो स्थूल कर्म को सूक्ष्म योग में बदल देता है।

भाव यह है कि वेद केवल शब्दों का संग्रह नहीं, अपितु वह 'सनातन नेत्र' है। जैसे भौतिक नेत्रों से हम दृश्य जगत को देखते हैं, वैसे ही वेदों रूपी दिव्य नेत्र से हम उस अदृश्य सत्ता को देखते हैं जिसने इस जगत की रचना की है। यह नेत्र 'सनातन' है क्योंकि यह किसी मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं, अपितु ऋषियों द्वारा 'द्रष्ट' (देखा गया) सत्य है।

श्लोक का दूसरा चरण एक महान रहस्य खोलता है: "भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदप्रतिष्ठितम्"। सामान्य दृष्टि में काल एक प्रवाह है जिसमें हम बहते हैं, किन्तु योग की दृष्टि में काल वेद (ब्रह्मज्ञान) के भीतर समाहित है। जो बीत गया, जो है और जो होगा—इन तीनों का मूल कारण और परिणाम वेदों के सिद्धांतों में निहित है। जब साधक वेद के मन्त्रों और उनके आन्तर अर्थों में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब वह काल के बंधन से मुक्त होकर उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ भूत, भविष्य और वर्तमान एक ही बिंदु पर विलीन हो जाते हैं। यह वही स्थिति है जिसे उपनिषदों में 'त्रिकालाबाधित' या 'कालतीत' कहा गया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस श्लोक के पदों की साम्य मनुस्मृति में स्पष्ट दिखाई देती है:

मनुस्मृति

पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुः सनातनम् । अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ॥ १२.९४ ॥

पितरों, देवताओं और मनुष्योंका वेद सनातन नेत्र है; वेदशास्त्र (मनुष्यसे) अशक्य और अप्रमेय है — यह स्थिति है।

मनुस्मृति १२.९४मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 597

यहाँ मनु भी वेद को 'सनातन नेत्र' (वेदश्चक्षुः सनातनम्) कहते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि वेद वह दृष्टि है जो मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य के प्रकाश में लाती है।

मनुस्मृति

चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् । भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिध्यति ॥ १२.९७ ॥

चारों वर्ण, तीनों लोक, अलग-अलग चारों आश्रम, भूत, वर्तमान और भविष्य — सब वेदसे ही सिद्ध होता है।

मनुस्मृति १२.९७मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 598

मनुस्मृति में भी यह उल्लेख है कि "भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिध्यति"। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में 'प्रतिष्ठितम्' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है कि काल की तीनों अवस्थाएँ वेद में ही 'स्थित' हैं। मनु के अनुसार वे इनसे 'सिद्ध' होती हैं। दोनों का निष्कर्ष एक ही है—वेद ही वह एकमात्र प्रमाण है जो काल की सीमाओं को पार कर सत्य का बोध कराता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'दृष्टि-परिवर्तन' का अभ्यास है। 'वेदश्चक्षुः' का योगिक अर्थ है—अपनी चेतना को बाहरी विषयों से हटाकर उस आंतरिक आलोक में स्थापित करना, जिसे ऋषियों ने वेद कहा है।

साधक जब 'समभ्यास' करता है, तो वह केवल मन्त्रों का जप नहीं करता, अपितु मन्त्र के अक्षर को अपने हृदय में प्रतिष्ठित करता है। जब वह यह अनुभव करता है कि "सब कुछ वेदप्रतिष्ठित है", तब उसका मन वर्तमान क्षण में स्थिर हो जाता है। वह अनुभव करता है कि भूतकाल की स्मृतियाँ और भविष्य की कल्पनाएँ, दोनों ही उसी एक सनातन अक्षर (ओंकार) के विस्तार हैं। इस अभ्यास से साधक 'काल-भय' से मुक्त होकर उस भूमि पर जाता है जहाँ वह स्वयं को उस सनातन नेत्र के रूप में देखता है, जो केवल दृष्टा है, कर्ता नहीं।

श्लोक १२.४२

अनन्तं चाप्रमाणं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति ।

इति संचिन्त्य मुनिना वेदाचार्येण धीमता ॥

याज्ञवल्क्येन विप्राणां त्रयीमार्गः प्रदर्शितः ॥ १२.४२ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

अनन्त और अपरिमित सब (कुछ) वेदसे ही सिद्ध होता है — ऐसा विचार करके बुद्धिमान् वेदाचार्य मुनि याज्ञवल्क्यने विप्रोंके लिए त्रयीका मार्ग दिखाया,

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेद को 'सनातन नेत्र' बताते हुए यह स्पष्ट किया कि त्रिकाल (भूत, भविष्य, वर्तमान) वेद में ही प्रतिष्ठित है। अब यह श्लोक उस ज्ञान के व्यावहारिक प्रकटीकरण की ओर बढ़ता है, जहाँ ऋषि यह बताते हैं कि उस अनंत सत्य को साधकों के लिए सुगम बनाने हेतु उन्होंने किस मार्ग का चयन किया।

अन्वय और पदार्थ —

अनन्तं च अप्रमाणं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति । इति संचिन्त्य मुनिना, धीमता वेदाचार्येण याज्ञवल्क्येण, विप्रणां त्रयीमार्गः प्रदर्शितः ॥

पदार्थ:

• अनन्तं: जिसकी कोई सीमा न हो; जो देश, काल और संख्या से परे हो।

• अप्रमाणं: जिसे किसी बाहरी पैमाने या प्रमाण से नहीं मापा जा सके। यहाँ इसका अर्थ 'अपरिमित' है, क्योंकि वेद स्वयं ही समस्त प्रमाणों का मूल है।

• प्रसिध्यति: सिद्ध होता है, प्रमाणित होता है या प्रकट होता है।

• संचिन्त्य: विचार करके; गहन मनन के उपरांत।

• धीमता: बुद्धिमान्; यहाँ 'धी' का अर्थ केवल बौद्धिक क्षमता नहीं, अपितु वह प्रज्ञा है जो सत्य और असत्य का विवेक कर सके।

• त्रयीमार्गः: त्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद) का वह मार्ग जो कर्म, उपासना और ज्ञान के समन्वय से ब्रह्म तक ले जाए।

• प्रदर्शितः: दिखाया गया या उद्घाटित किया गया।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक सेतु है, जो वेदों की सैद्धान्तिक अनंतता को साधक की व्यावहारिक साधना से जोड़ता है। ऋषि कहते हैं कि यह संपूर्ण जगत, इसके नियम, और मोक्ष का मार्ग—सब कुछ 'अनन्त' और 'अप्रमाण' है। जब कोई वस्तु अनन्त होती है, तो वह साधारण बुद्धि के लिए अगम्य हो जाती है; और जब वह अप्रमाण होती है, तो उसे पकड़ने के लिए कोई बाहरी सहारा नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में केवल 'वेद' ही वह एकमात्र आधार है जिससे सब कुछ सिद्ध होता है।

भाव यह है कि सत्य स्वयं में निराकार और असीम है, किन्तु उस असीम को प्राप्त करने के लिए एक 'सीमित' और 'निश्चित' मार्ग की आवश्यकता होती है। बुद्धिमान् वेदाचार्य याज्ञवल्क्य ने इसी सत्य का मनन किया। उन्होंने देखा कि यदि साधक को सीधे अनंत में धकेल दिया जाए, तो वह विचलित हो सकता है, अतः उन्होंने 'त्रयीमार्ग' को प्रदर्शित किया।

यह 'त्रयीमार्ग' केवल तीन वेदों का अध्ययन नहीं है, अपितु वह पद्धति है जिसमें ऋग्वेद का ज्ञान, यजुर्वेद का कर्म (यज्ञ) और सामवेद का उपासना-भाव समाहित है। याज्ञवल्क्य ने इस स्मृति में उसी त्रयीमार्ग का निचोड़ प्रस्तुत किया है—जहाँ ओंकार से आरम्भ होकर, संध्या, प्राणायाम और ध्यान के सोपानों से होते हुए साधक अंततः उस 'अनन्त' में विलीन हो जाता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि इस ग्रन्थ में दी गई समस्त विधियाँ (जैसे न्यास, मार्जन, उपस्थान) मनमाने नियम नहीं हैं, बल्कि वेदों के उस विराट सत्य को साधक के लिए 'सुगम' बनाने के उपकरण हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् । भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिध्यति ॥ १२.९७ ॥

चारों वर्ण, तीनों लोक, अलग-अलग चारों आश्रम, भूत, वर्तमान और भविष्य — सब वेदसे ही सिद्ध होता है।

मनुस्मृति १२.९७मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 598

मनुस्मृति में भी यह स्पष्ट किया गया है कि वर्ण, आश्रम, लोक और त्रिकाल—सब कुछ वेद से ही सिद्ध होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि वेद केवल पूजा-पाठ की पुस्तक नहीं, अपितु अस्तित्व के हर आयाम (भौतिक और आध्यात्मिक) का एकमात्र प्रमाण हैं। भेद केवल इतना है कि जहाँ मनुस्मृति इसे सामाजिक और वैश्विक व्यवस्था के संदर्भ में देखती है, वहीं यह स्मृति इसे एक 'मार्ग' (त्रयीमार्ग) के रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे साधक व्यक्तिगत रूप से ब्रह्म के निकट जा सके।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के सम्बन्ध को दर्शाता है। 'अनन्त' और 'अप्रमाण' साध्य (परमात्मा/ब्रह्म) है, और 'त्रयीमार्ग' वह साधन है। साधक जब इस श्लोक का अभ्यास करता है, तो वह अपनी बुद्धि को इस विश्वास में स्थिर करता है कि उसकी साधना का आधार कोई व्यक्तिगत मत नहीं, बल्कि वह सनातन वेद-प्रवाह है जो अनंत से आता है।

यहाँ 'संचिन्त्य' शब्द महत्वपूर्ण है। साधक को केवल विधि का पालन नहीं करना है, बल्कि उस विधि के पीछे के 'विचार' (विवेक) को जाग्रत करना है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर का प्राण और बाहर का ब्रह्मांड एक ही वेद-तत्व से सिद्ध हो रहे हैं, तब वह 'विप्र' (विशिष्ट प्रज्ञा वाला) बनता है। यह श्लोक साधक को उस भूमि पर लाता है जहाँ वह बाहरी कर्मों (जैसे स्नान, संध्या) को केवल क्रिया नहीं, बल्कि अनंत की ओर बढ़ने वाली एक निश्चित सीढ़ी के रूप में देखना आरम्भ करता है। यह तैयारी अगले श्लोक के उस 'सत्पथ' के लिए है, जो सीधे ब्रह्म के अंतःपुर की ओर जाता है।

श्लोक १२.४३

येन गच्छन्ति विद्वांसः सत्पथा ब्रह्मणोऽन्तिकम् ।

असत्पथेन विप्रस्य गमनं हि विरुध्यते ॥ १२.४३ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

जिससे विद्वान् सन्मार्गसे ब्रह्मके निकट जाते हैं; विप्रका कुमार्गसे जाना (धर्मके) विरुद्ध है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने विप्रों के लिए 'त्रयीमार्ग' प्रदर्शित किया, जो वेदों की अनंतता को साधना के सुगम पथ में परिवर्तित करता है। वर्तमान श्लोक उस मार्ग की प्रकृति और उसकी अनिवार्यता को स्पष्ट करता है, जिससे साधक का गंतव्य निर्धारित होता है।

अन्वय और पदार्थ —

येन (मार्गेण) विद्वांसः सत्पथा ब्रह्मणोऽन्तिकम् गच्छन्ति । विप्रस्य असत्पथेन गमनं हि विरुध्यते ॥

पदार्थ:

• येन: जिस (मार्ग) से; यहाँ संकेत उस 'त्रयीमार्ग' की ओर है जिसका उल्लेख पिछले श्लोक में हुआ।

• विद्वांसः: वे जो केवल शास्त्र-पण्डित नहीं, अपितु जिन्होंने सत्य का अनुभव किया है; प्रज्ञावान साधक।

• सत्पथा: सत्य-पथ; वह मार्ग जो धर्म, सत्य और ऋत पर आधारित हो।

• ब्रह्मणोऽन्तिकम्: ब्रह्म के समीप; यहाँ 'अन्तिकम्' का अर्थ केवल निकटता नहीं, अपितु उस अवस्था से है जहाँ साधक और ब्रह्म के बीच का भेद समाप्त होने लगता है।

• असत्पथेन: कुमार्ग से; वह मार्ग जो केवल इंद्रिय-सुख, अहंकार या शास्त्र-विरुद्ध मान्यताओं पर आधारित हो।

• विरुध्यते: विरुद्ध है; वर्जित है या बाधा उत्पन्न करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधना के 'मार्ग' की शुद्धता पर बल देता है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म तक पहुँचने के लिए केवल इच्छा पर्याप्त नहीं है, अपितु 'सत्पथ' का चयन अनिवार्य है।

'सत्पथ' वह मार्ग है जिसमें क्रिया (कर्म), उपासना और ज्ञान का ऐसा समन्वय हो जैसा कि त्रयीमार्ग में बताया गया है। जब साधक ओंकार, गायत्री और प्राणायाम जैसी विधियों का पालन करता है, तो वह वास्तव में एक ऐसे मार्ग पर चलता है जो उसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। विद्वांसों के लिए यह मार्ग 'सत्पथ' इसलिए है क्योंकि यह उन्हें 'ब्रह्मणोऽन्तिकम्' अर्थात् उस परम सत्ता के सान्निध्य में ले जाता है जहाँ समस्त द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं।

दूसरी ओर, 'असत्पथ' वह है जहाँ साधक या तो केवल बाहरी कर्मकाण्ड में उलझकर रह जाता है या बिना आधार के केवल बौद्धिक तर्क करता है। विप्र (साधक) के लिए कुमार्ग से जाना 'विरुध्यते' अर्थात् विरुद्ध है। यह विरोध केवल सामाजिक या शास्त्रीय निषेध नहीं है, अपितु यह एक स्वाभाविक नियम है—जैसे जल का स्वभाव नीचे बहना है, वैसे ही सत्य का मार्ग ऊपर की ओर (ब्रह्म की ओर) जाता है। जो विपरीत दिशा में चलता है, वह गंतव्य से दूर होता जाता है। अतः विप्र के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी बुद्धि को उस त्रयीमार्ग में स्थिर करे जिसे महर्षि याज्ञवल्क्य ने उद्घाटित किया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

ईश उपनिषद्

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ॥ १८ ॥

हे अग्नि, हे देव, सब मार्गोंको जाननेवाले, हमें सुपथसे (परम) ऐश्वर्यकी ओर ले चल।

ईश उपनिषद् १८उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 48

ईश उपनिषद् में यह प्रार्थना की गई है कि अग्नि देव हमें 'सुपथ' से परम ऐश्वर्य की ओर ले चलें। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी 'सुपथ' की व्यावहारिक रूपरेखा प्रस्तुत करती है। जहाँ उपनिषद् में सुपथ की प्रार्थना है, वहीं यह स्मृति उस सुपथ का विवरण (ओंकार से आत्मज्ञान तक) देकर साधक को दिशा दिखाती है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि ब्रह्म की प्राप्ति के लिए मार्ग की शुद्धता प्राथमिक शर्त है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'सत्पथ' और 'असत्पथ' का अर्थ मानसिक वृत्तियों की दिशा से है। जब साधक का मन बाहरी विषयों (विषय-वासनाओं) की ओर बहता है, तो वह 'असत्पथ' है, क्योंकि वह उसे विखंडन की ओर ले जाता है। जब वही मन, मन्त्र और प्राण के माध्यम से अंतर्मुखी होकर 'ब्रह्मणोऽन्तिकम्' यानी हृदय के शून्य या अक्षर की ओर बढ़ता है, तो वह 'सत्पथ' है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि सत्य का मार्ग सरल और सीधा (सरल पथ) होता है, जिसमें कोई भटकाव नहीं होता। अभ्यास यह है कि साधक निरंतर स्वयं से यह प्रश्न करे—"क्या मेरी वर्तमान मानसिक स्थिति मुझे केंद्र (ब्रह्म) की ओर ले जा रही है या परिधि (संसार) की ओर?" इस विवेक का जागरण ही उसे कुमार्ग से बचाकर सन्मार्ग पर प्रतिष्ठित करता है।

एतत्स्मृतिप्रतिपादितविषयपरिसङ्ख्यानम्

श्लोक १२.४४

वेदान्तानां हि सर्वेषां या निष्ठा समुदाहृता ।

उपास्या यादृशी चैव मुनिना समुदाहृता ॥ १२.४४ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

सब वेदान्तोंकी जो निष्ठा (निष्कर्ष) कही गयी है, और जैसी उपासना (करनी चाहिए) — (वह) मुनिने कही है:

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने विप्रों के लिए 'त्रयीमार्ग' का प्रदर्शन किया, जो साधक को कुमार्ग से बचाकर ब्रह्म के समीप ले जाता है। वर्तमान श्लोक इस बात की पुष्टि करता है कि वह मार्ग कोई नवीन कल्पना नहीं, अपितु समस्त वेदान्तों का निचोड़ और उनकी अंतिम निष्ठा है।

अन्वय और पदार्थ —

वेदान्तानां हि सर्वेषां या निष्ठा समुदाहृता, उपास्या यादृशी चैव मुनिना समुदाहृता (इति प्रोक्तम्)।

पदार्थ:

• वेदान्तानां सर्वेषां: समस्त वेदान्तों का; यहाँ वेदान्त का अर्थ केवल उपनिषदों से नहीं, अपितु वेदों के उस अंतिम लक्ष्य (परमार्थ) से है जो समस्त ज्ञान की परिणति है।

• निष्ठा: अंतिम आश्रय, निष्कर्ष या वह स्थिति जहाँ पहुँचकर जिज्ञासा शांत हो जाती है।

• समुदाहृता: संकलित, एकत्रित या साररूप में प्रस्तुत।

• उपास्या: उपासना करने योग्य; वह विधि या भाव जिससे इष्ट (ब्रह्म) की प्राप्ति हो।

• यादृशी: जैसी; यहाँ 'यादृशी' शब्द उपासना की प्रकृति और उसकी सूक्ष्मता की ओर संकेत करता है।

• मुनिना: यहाँ मुनि महर्षि याज्ञवल्क्य हैं, जो योगीश्वर और द्रष्टा हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक सेतु के समान है, जो वेदों के विशाल ज्ञान और व्यावहारिक साधना के बीच की कड़ी को जोड़ता है। ऋषि यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उन्होंने इस स्मृति में जो कुछ भी प्रतिपादित किया है, वह उनकी निजी धारणा नहीं, अपितु समस्त वेदान्तों की 'निष्ठा' का सार है।

'निष्ठा' का अर्थ है वह अंतिम बिंदु जहाँ ज्ञान, कर्म और उपासना एक हो जाते हैं। वेदों में ज्ञान की अनेक धाराएँ हैं, अनेक विधियाँ हैं, किन्तु उन सबका गंतव्य एक ही है। मुनि याज्ञवल्क्य ने उन बिखरे हुए मोतियों को एक सूत्र में पिरोकर 'समुदाहृता' (संकलित) कर दिया है।

जब ऋषि कहते हैं कि "उपास्या यादृशी" (जैसी उपासना करनी चाहिए), तो वे केवल बाहरी पूजा की बात नहीं कर रहे। वेदान्त की निष्ठा 'अद्वैत' है, और उस अद्वैत को अनुभव करने के लिए जिस 'उपासना' की आवश्यकता होती है—अर्थात् जिस प्रकार के मानसिक और प्राणिक अनुशासन की आवश्यकता होती है—वही इस स्मृति का मूल आधार है। यह श्लोक संकेत देता है कि आने वाले श्लोकों में जो सूची दी जाएगी (ओंकार, गायत्री, प्राणायाम आदि), वह केवल कर्मकाण्ड नहीं, अपितु वेदान्त की उस निष्ठा को प्राप्त करने के सोपान हैं।

भाव यह है कि बिना विधि (उपासना) के निष्कर्ष (निष्ठा) तक पहुँचना कठिन है, और बिना निष्कर्ष के विधि केवल यांत्रिक क्रिया बन जाती है। मुनि ने इन दोनों का समन्वय प्रस्तुत किया है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'लक्ष्य' और 'साधन' के समन्वय का सूत्र है। योग में 'निष्ठा' का अर्थ है—चित्त की वह स्थिरता जो विचलित न हो। जब साधक यह अनुभव करता है कि समस्त शास्त्रों का सार एक ही है, तो उसकी साधना में बिखराव समाप्त हो जाता है।

यहाँ 'उपासना' का योगिक अर्थ है—अपने चित्त को उस 'अक्षर' या 'ब्रह्म' में लय करना जिसकी चर्चा वेदान्त करता है। साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि उसे किसी एक विशिष्ट विधि के मोह में नहीं पड़ना है, बल्कि यह देखना है कि वह विधि उसे वेदान्त की उस 'निष्ठा' (परम स्थिति) की ओर ले जा रही है या नहीं।

यह श्लोक साधक को 'तैयारी की भूमि' से 'अनुभव की भूमि' की ओर ले जाता है। वह समझ जाता है कि आगे जो ओंकार, गायत्री और ध्यान की विधियाँ आएँगी, वे वास्तव में वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को शरीर और मन में उतारने के व्यावहारिक प्रयोग हैं। यह उपासना ही उसे उस स्थिति तक पहुँचाएगी जहाँ वह 'सर्ववित्' (सब कुछ जानने वाला) बन सके।

श्लोक १२.४५

ओंकारस्याथ गायत्र्या व्याहृतीनां शिरस्य च

स्नानस्य चैव संध्यायाः प्राणायामस्य चैव हि ॥ १२.४५ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३३

ओंकार, गायत्री, व्याहृतियों और शिरस्‌की, स्नान, संध्या और प्राणायामकी,

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि उन्होंने इस स्मृति में समस्त वेदान्तों की निष्ठा और उपासना के सार को संकलित किया है। अब वे उस संकलित मार्ग के मुख्य अंगों की गणना कर रहे हैं, ताकि साधक को अपनी साधना की क्रमिक यात्रा का बोध हो सके।

अन्वय और पदार्थ —

(एतस्य) ओंकारस्य, अथ गायत्र्याः, व्याहृतीनां, शिरस्य च, स्नानस्य च एव, संध्यायाः, प्राणायामस्य च एव हि (विधिः प्रोक्तः)।

पदार्थ:

• ओंकारस्य: ओंकार (प्रणव) की; वह अक्षर जो समस्त ध्वनियों और ब्रह्मांड का बीज है।

• गायत्र्याः: गायत्री मन्त्र की; वह प्रकाशमय विद्या जो बुद्धि को प्रेरित करती है।

• व्याहृतीनां: भूः, भुवः, स्वः आदि व्याहृतियों की; जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाले सोपान हैं।

• शिरस्य: शिरस्‌ (शिरोन्यास) की; मन्त्रों को शरीर के विभिन्न अंगों में प्रतिष्ठित करने की क्रिया।

• स्नानस्य: स्नान की; केवल शरीर की शुद्धि नहीं, अपितु अन्तःकरण के शोधन की विधि।

• संध्यायाः: संध्या की; दिन और रात्रि के संधि-काल में की जाने वाली उपासना।

• प्राणायामस्य: प्राणायाम की; प्राण के विस्तार और निग्रह का अभ्यास।

भाष्य —

यह श्लोक बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के संपूर्ण उपदेशों की एक सूची का आरम्भ है। ऋषि यहाँ उन विधाओं का स्मरण करा रहे हैं जिन्हें उन्होंने पूर्व के अध्यायों में विस्तार से समझाया है। यह केवल विषयों की सूची नहीं है, अपितु एक साधक की उत्थान-यात्रा का मानचित्र है।

वाक्य की दृष्टि से यह श्लोक अपने आप में पूर्ण नहीं है; इसकी क्रिया और पूर्णता अगले श्लोक (12.46) के अंत में आने वाले शब्द 'विधिः' और उसके बाद के 'प्रोक्तं' (कहा गया है) से जुड़ी है। अतः यह श्लोक और अगला श्लोक मिलकर एक ही विस्तृत वाक्य का निर्माण करते हैं।

ऋषि सबसे पहले 'ओंकार' को रखते हैं, क्योंकि वह समस्त विद्याओं का मूल है। उसके पश्चात 'गायत्री' और 'व्याहृति' आते हैं, जो साधक की बुद्धि और चेतना को जाग्रत करते हैं। 'शिरस्' (न्यास) के माध्यम से मन्त्रों को देह में स्थापित किया जाता है, ताकि शरीर ही मन्त्रमय हो जाए। 'स्नान' और 'संध्या' बाहरी अनुशासन और आंतरिक लय का समन्वय हैं, और 'प्राणायाम' वह सेतु है जो कर्मकाण्ड को योग से जोड़ता है।

यहाँ बाहरी विधि का आन्तर अर्थ यह है कि साधक पहले बीज (ओंकार) को बोता है, फिर प्रकाश (गायत्री) से उसे सींचता है, व्याहृतियों के माध्यम से विभिन्न लोकों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) की यात्रा करता है और अंततः प्राणायाम द्वारा अपने प्राणों को उस अक्षर में विलीन करने का प्रयास करता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'क्रम' का महत्त्व समझाता है। एक योगी सीधे उच्च शिखर पर नहीं पहुँचता, वह सोपानों से ऊपर चढ़ता है।

साधक इस क्रम से यह अनुभव करता है कि उसकी साधना केवल बाहरी क्रिया नहीं है। जब वह ओंकार का जप करता है, तो वह शून्य का अनुभव करता है; गायत्री में वह अपनी बुद्धि के प्रकाश का अनुभव करता है; व्याहृतियों में वह अपने अस्तित्व के विस्तार (पृथ्वी से आकाश तक) को देखता है। स्नान और संध्या के माध्यम से वह अपनी इंद्रियों को लय करना सीखता है और प्राणायाम के द्वारा वह मन के वेग को शांत कर हृदय की गहराई में उतरता है।

यह श्लोक साधक को इस भूमि से उस भूमि की ओर ले जाता है जहाँ वह स्थूल देह (स्नान) से सूक्ष्म प्राण (प्राणायाम) और फिर उस अक्षर (ओंकार) की ओर अग्रसर होता है, जिसमें पूरा ब्रह्मांड समाहित है। यह क्रम साधक को 'अविद्या' के अंधकार से निकालकर 'विद्या' के प्रकाश की ओर ले जाने वाली एक व्यवस्थित पद्धति है।

श्लोक १२.४६

प्रत्याहारस्य ध्यानस्य मार्जनान्तर्जलस्य च ।

उपस्थानस्य होमस्य आत्मज्ञानस्य यो विधिः ॥ १२.४६ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३४

प्रत्याहार, ध्यान, मार्जन और अन्तर्जलकी, उपस्थान, होम और आत्मज्ञानकी जो विधि है,

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार से लेकर प्राणायाम तक की विधाओं का उल्लेख किया था। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए, इस श्लोक में वे साधना के उन सूक्ष्म अंगों और अंतिम लक्ष्य की गणना कर रहे हैं, जो साधक को स्थूल जगत से उठाकर पूर्ण आत्म-साक्षात्कार तक ले जाते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

प्रत्याहारस्य, ध्यानस्य, मार्जनान्तर्जलस्य च, उपस्थानस्य, होमस्य, आत्मज्ञानस्य च यो विधिः (प्रोक्तः)।

पदार्थ:

• प्रत्याहारस्य: प्रत्याहार की; इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर अन्तर्मुखी करने की क्रिया।

• ध्यानस्य: ध्यान की; चित्त को एकनिष्ठ करके उस पर स्थिर करने की प्रक्रिया।

• मार्जनान्तर्जलस्य: मार्जन और अन्तर्जल की; मार्जन बाहरी और मानसिक शुद्धि है, जबकि अन्तर्जल हृदय के भीतर प्रवाहित होने वाली वह सूक्ष्म जल-धारा (चेतना) है जो मलिनताओं को धो देती है।

• उपस्थानस्य: उपस्थान की; सूर्य के समक्ष या सूर्य-स्वरूप परमात्मा के सम्मुख उपस्थित होने की विधि।

• होमस्य: होम की; केवल अग्नि में आहुति देना ही नहीं, अपितु समस्त प्रवृत्तियों को ज्ञान की अग्नि में होम कर देना।

• आत्मज्ञानस्य: आत्मज्ञान की; वह अंतिम बोध जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है।

भाष्य —

यह श्लोक पिछले श्लोक (12.45) से शुरू हुए वाक्य का विस्तार है और इस वाक्य की पूर्णता अगले श्लोक (12.47) के 'तत् सर्वं मुनिना प्रोक्तं' (वह सब मुनि द्वारा कहा गया) में होती है। यहाँ ऋषि उन विधियों का उल्लेख कर रहे हैं जो साधक को 'प्राण' से 'परमात्मा' की ओर ले जाती हैं।

प्रत्याहार और ध्यान वे सोपान हैं, जहाँ साधक बाहरी जगत का त्याग कर अपने भीतर के सूर्य का दर्शन करता है। मार्जन और अन्तर्जल की विधि यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है; मार्जन यदि बाह्य शुद्धि है, तो अन्तर्जल वह योगिक प्रक्रिया है जिससे साधक अपने हृदय-आकाश को निर्मल करता है। उपस्थान का अर्थ है—उस विराट पुरुष के सम्मुख स्वयं को समर्पित करना, जो सूर्यमण्डल में भी है और हृदय-कमल में भी। होम यहाँ केवल कर्मकाण्डीय क्रिया नहीं, बल्कि 'अहंकार' की आहुति है। जब साधक अपनी समस्त वृत्तियों को ज्ञान-अग्नि में होम कर देता है, तब वह 'आत्मज्ञान' की उस स्थिति में पहुँचता है, जहाँ वह स्वयं को ब्रह्म के रूप में अनुभव करता है।

इस प्रकार, यह स्मृति केवल नियमों का संग्रह नहीं, बल्कि एक पूर्ण योग-मार्ग है, जो ओंकार (बीज) से आरम्भ होकर आत्मज्ञान (फल) पर समाप्त होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक क्रमिक उत्थान की यात्रा है। प्राणायाम के बाद जब प्राण स्थिर होता है, तब 'प्रत्याहार' का अभ्यास शुरू होता है, जिससे मन बाहरी विषयों से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है। इस स्थिति में 'ध्यान' का उदय होता है, जो साधक को एकाग्र करता है।

'मार्जन और अन्तर्जल' का योगिक अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के मानसिक विकारों को ज्ञान-जल से धो डाले, जिससे हृदय का दर्पण स्वच्छ हो जाए। 'उपस्थान' का अनुभव तब होता है जब साधक का चित्त सूर्य-पुरुष (आत्मा) में प्रतिष्ठित हो जाता है। 'होम' का अभ्यास यह है कि साधक अपनी प्रत्येक श्वास और विचार को ईश्वर को समर्पित कर दे। अंततः, जब साधन पूर्ण होता है, तब 'आत्मज्ञान' की भूमि प्राप्त होती है, जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह शरीर या मन नहीं, अपितु वह अविनाशी अक्षर-पुरुष है। यह यात्रा साधक को 'साधन' से 'साध्य' की ओर ले जाती है।

श्लोक १२.४७

विद्याऽविद्याविचारं च त्रयीविद्याभिशंसनम् ।

तत् सर्वं मुनिना प्रोक्तं विप्राणां हितकाम्यया ॥ १२.४७ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३४

विद्या-अविद्याका विचार और त्रयीविद्याकी प्रशंसा — वह सब मुनिने विप्रोंके हितकी कामनासे कहा।

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इस स्मृति में वर्णित समस्त साधना-क्रम की गणना की थी—ओंकार से आरम्भ होकर आत्मज्ञान की विधि तक। अब इस श्लोक में वे उस संपूर्ण उपदेश के प्रयोजन और उसके मूल उद्देश्य को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

विद्या-अविद्याविचारं च त्रयीविद्याभिशंसनम्, तत् सर्वं मुनिना विप्राणां हितकाम्यया प्रोक्तम्।

पदार्थ:

• विद्या-अविद्याविचारं: विद्या (परा और अपरा) तथा अविद्या के स्वरूप, उनके भेद और उनके पारस्परिक सम्बन्ध का विचार।

• त्रयीविद्याभिशंसनम्: त्रयीविद्या (ऋक्, यजुष्, साम) की महिमा का गान या उसकी प्रशंसा।

• तत् सर्वं: वह सब (जो पूर्व के श्लोकों में गणना की गई विधियाँ और विचार हैं)।

• मुनिना: मुनि (याज्ञवल्क्य) द्वारा।

• विप्राणां हितकाम्यया: विप्रों (ब्रह्मवेत्ताओं और साधकों) के कल्याण की कामना से।

• प्रोक्तं: कहा गया है।

भाष्य —

यह श्लोक पिछले श्लोकों (12.45-12.46) में आरम्भ हुए वाक्य का उपसंहार है। वाक्य की संरचना इस प्रकार है: "ओंकार... आत्मज्ञान की जो विधि है, वह सब (तत् सर्वं) मुनि द्वारा विप्रों के हित के लिए कहा गया है।" यहाँ ऋषि स्पष्ट कर रहे हैं कि इस स्मृति का उद्देश्य केवल विधियों का संग्रह करना नहीं, बल्कि साधक को अविद्या के अन्धकार से निकालकर विद्या के प्रकाश में प्रतिष्ठित करना है।

'विद्या-अविद्याविचार' का अर्थ है वह विवेक, जिससे साधक यह जान पाता है कि कौन सा ज्ञान उसे बंधन में रखता है (अविद्या/अपरा विद्या) और कौन सा ज्ञान उसे मुक्त करता है (परा विद्या)। त्रयीविद्या की प्रशंसा का अर्थ यह नहीं है कि केवल वेदों के शब्दों का गुणगान किया जाए, अपितु यह दर्शाना है कि त्रयी का मार्ग ही वह एकमात्र सन्मार्ग है जो अंततः ब्रह्म के निकट ले जाता है।

ऋषि ने इसे 'विप्राणां हितकाम्यया' कहा है। यहाँ 'विप्र' केवल जातिवाचक शब्द नहीं है, अपितु वह है जो 'विप्र' (विशिष्ट) चेतना का अन्वेषण करता है। मुनि याज्ञवल्क्य का हित-भाव यह है कि साधक बाहरी कर्मकाण्डों में उलझकर न रह जाए, बल्कि उन कर्मों के भीतर छिपे योगिक रहस्यों को समझकर आत्मज्ञान तक पहुँचे। अतः यह संपूर्ण स्मृति एक सोपान-क्रम है—जहाँ बाहरी शुद्धि (स्नान, मार्जन) से आरम्भ होकर, प्राणिक शुद्धि (प्राणायाम, प्रत्याहार) और मानसिक स्थिरता (ध्यान) के द्वारा अंततः आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक संपूर्ण ग्रन्थ के 'क्रम' की महत्ता को स्थापित करता है। एक साधक के लिए यह निर्देश है कि वह साधना में छलाँग न लगाए।

साधक सबसे पहले 'अविद्या' के प्रति सजग होता है, फिर 'त्रयी' के माध्यम से अनुशासन सीखता है, फिर ओंकार और गायत्री के माध्यम से सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करता है, और अंततः आत्मज्ञान में विलीन होता है। यदि कोई सीधे आत्मज्ञान की बात करे बिना प्राण और मन की शुद्धि (प्राणायाम-ध्यान) के, तो वह केवल बौद्धिक विमर्श होगा, अनुभव नहीं।

इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक अपने जीवन में 'हित' की परिभाषा को बदले। यहाँ हित का अर्थ भौतिक सुख नहीं, अपितु 'अमृतत्व' है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसकी प्रत्येक बाहरी क्रिया (जैसे संध्या या होम) वास्तव में उसके भीतर के सूर्य को जाग्रत करने की एक विधि है, तब वह 'विप्र' की वास्तविक स्थिति में आता है। यह श्लोक साधक को इस विश्वास में प्रतिष्ठित करता है कि इस शास्त्र में दी गई प्रत्येक विधि—चाहे वह स्थूल हो या सूक्ष्म—उसे पूर्णता की ओर ले जाने के लिए ही रची गई है।

एतत्स्मृत्यध्ययनफलम्

श्लोक १२.४८

य इदं धारयेद्विप्रः स्वधीतं शृणुयाच्च यः ।

मया स ते तु यः प्रोक्तं(?) सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १२.४८ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३४

जो विप्र इसे धारण करे, भली-भाँति पढ़े और जो सुने — मैंने (तुमसे) जो कहा है (?) — वह अमृतत्वके योग्य होता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इस स्मृति के समस्त विषयों—ओंकार से लेकर आत्मज्ञान और त्रयीविद्या की महिमा तक—की गणना करते हुए बताया कि यह सब विप्रों के हित के लिए कहा गया है। अब इस श्लोक में वे इस ज्ञान-समुच्चय के ग्रहण करने की विधि और उसके अंतिम फल 'अमृतत्व' का प्रतिपादन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यः विप्रः इदं स्वधीतं धारयेत्, शृणुयात् च, मया स ते यः प्रोक्तं (तद्), सोऽमृतत्वाय कल्पते।

पदार्थ:

• यः विप्रः: जो विप्र (ब्रह्म-जिज्ञासु या दीक्षित साधक) है।

• इदं धारयेत्: इसे (इस स्मृति के उपदेशों को) धारण करे। 'धारण' का अर्थ केवल याद करना नहीं, अपितु आचरण में उतारना और चेतना में स्थित करना है।

• स्वधीतं: भली-भाँति पढ़ा हुआ, आत्मसात किया हुआ या जिसे स्वयं के विवेक से अनुशासित किया गया हो।

• शृणुयात्: सुने। यहाँ 'श्रवण' का अर्थ केवल कानों से सुनना नहीं, अपितु गुरु-मुख से प्राप्त रहस्य का ध्यानपूर्वक ग्रहण करना है।

• मया स ते यः प्रोक्तं: वह (ज्ञान/विधि) जो मैंने तुमसे कहा है। (यहाँ 'स ते' का भाव है—वह रहस्य जो मैंने विशेष रूप से तुम्हारे लिए या साधकों के लिए प्रकट किया है)।

• अमृतत्वाय कल्पते: अमृतत्व (मृत्युंजय अवस्था या मोक्ष) के योग्य होता है।

भाष्य —

यह श्लोक इस स्मृति के संपूर्ण उपदेश का फलश्रुति-वाक्य है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल ज्ञान का संग्रह करना पर्याप्त नहीं है, अपितु उसके लिए एक विशिष्ट प्रक्रिया की आवश्यकता है, जिसके तीन सोपान उन्होंने बताए हैं: धारण, स्वाध्याय और श्रवण।

प्रथम सोपान 'धारण' है। जब साधक ओंकार, गायत्री और प्राणायाम जैसी विधियों को केवल बौद्धिक जानकारी न मानकर अपने प्राणों और मन में धारण करता है, तब वह विधि 'जीवंत' हो जाती है। द्वितीय सोपान 'स्वधीतं' है, जिसका अर्थ है कि साधक उस ज्ञान का निरंतर अभ्यास (स्वाध्याय) करे और उसे अपने अनुभव की कसौटी पर कसकर आत्मसात करे। तृतीय सोपान 'श्रवण' है। वैदिक परम्परा में श्रुति का स्थान सर्वोपरि है; जो रहस्य केवल पढ़ने से नहीं खुलते, वे गुरु के मुख से सुनने और उनके सानिध्य में अनुभव करने से खुलते हैं।

ऋषि कहते हैं कि जो विप्र इन तीनों प्रक्रियाओं के माध्यम से उनके द्वारा बताए गए मार्ग (मया प्रोक्तं) पर चलता है, वह 'अमृतत्व' के योग्य हो जाता है। यहाँ 'योग्य' शब्द महत्वपूर्ण है; इसका भाव यह है कि अमृतत्व कोई बाहरी पुरस्कार नहीं, अपितु साधना की परिणति है। जब साधक बाहरी क्रियाओं (स्नान, संध्या, होम) को आन्तरिक यज्ञ (प्राण, सूर्य, हृदय) में बदल देता है, तब वह उस अवस्था को प्राप्त करता है जहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। यह अमृतत्व वही है जिसे बृहदारण्यक में 'अक्षर' कहा गया है, जिसमें साधक अपनी सीमित पहचान को छोड़कर पूर्णता में स्थित हो जाता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'श्रवण-मनन-निदिध्यासन' की प्रक्रिया को दर्शाता है। 'शृणुयात्' श्रवण है, 'स्वधीतं' मनन है और 'धारयेत्' निदिध्यासन (निरन्तर ध्यान) है।

साधक जब इस स्मृति में वर्णित क्रम का पालन करता है—अर्थात् पहले ओंकार से नाद का अनुभव करता है, गायत्री से बुद्धि का संस्कार करता है, प्राणायाम से प्राणों को स्थिर करता है और अंततः आत्मज्ञान में स्थित होता है—तो वह स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म से कारण शरीर की ओर बढ़ता है। 'धारण' करने का योगिक अर्थ है—किसी मन्त्र या विचार को हृदय-आकाश में स्थिर कर लेना। जब साधक बाहरी विधियों को आन्तरिक सूर्य (हृदय-ज्योति) से जोड़ देता है, तब वह 'अमृतत्व' की भूमि पर पहुँचता है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक का मन अब बाहरी विषयों में नहीं भटकता, अपितु अपने ही भीतर के 'अक्षर' में लीन रहता है।

एतत्स्मृत्यध्ययनाधिकारी

श्लोक १२.४९

सर्वाणि भूतानि ममान्तराणि सर्वेषु भूतेष्वहमन्तरस्थः ।

पश्यन्ति ये योगविदो मनुष्यास्तेषां प्रदेयं न तु योऽन्यथा स्यात् ॥ १२.४९ ॥

द्वादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १३४

"सब भूत मेरे भीतर हैं, और मैं सब भूतोंके भीतर स्थित हूँ" — जो योगवेत्ता मनुष्य (ऐसा) देखते हैं, उन्हें (यह शास्त्र) देना चाहिए; जो अन्यथा हो, उसे नहीं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इस स्मृति के समस्त उपदेशों के ग्रहण और उनके फल 'अमृतत्व' का प्रतिपादन किया। अब इस अंतिम श्लोक में वे इस गुप्त ज्ञान के 'अधिकार' का निर्धारण कर रहे हैं कि यह शास्त्र किसे दिया जाना चाहिए और कौन इसका वास्तविक पात्र है।

अन्वय और पदार्थ —

सर्वाणि भूतानि ममान्तराणि (अस्ति), अहम् अन्तरस्थः सर्वेषु भूतेषु। ये मनुष्याः योगविदो (तत्) पश्यन्ति, तेषाम् (इदं शास्त्रं) प्रदेयं, न तु यः अन्यथा स्यात् (तस्य प्रदेयं न)।

पदार्थ:

• सर्वाणि भूतानि ममान्तराणि: समस्त प्राणी/भूत मेरे भीतर (स्थित) हैं। यहाँ 'मम' शब्द केवल याज्ञवल्क्य के व्यक्तिगत अहंकार का नहीं, अपितु उस 'अहम्' का है जो शुद्ध चैतन्य या आत्मा है।

• सर्वेषु भूतेष्वहमन्तरस्थः: मैं सब भूतों के भीतर स्थित हूँ।

• योगविदो मनुष्याः: वे मनुष्य जो योग के ज्ञाता हैं। यहाँ 'योग' का अर्थ केवल शारीरिक क्रिया नहीं, अपितु वह अवस्था है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है।

• पश्यन्ति: देखते हैं। यह 'दर्शन' आँखों का नहीं, अपितु प्रज्ञा का साक्षात्कार है।

• प्रदेयं: देने योग्य है। (अर्थात् यह शास्त्र उन्हें दिया जाए)।

• न तु योऽन्यथा स्यात्: किन्तु जो इसके विपरीत हो (जो द्वैत में स्थित हो, जो पृथकता का अनुभव करता हो), उसे यह न दिया जाए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह अंतिम श्लोक केवल एक निषेध नहीं, अपितु एक महान आध्यात्मिक सूत्र है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस 'अधिकारी' की पहचान बता रहे हैं जिसे इस योग-विद्या को ग्रहण करने का अधिकार है।

श्लोक का प्रथम चरण—"सब भूत मेरे भीतर हैं और मैं सब भूतों के भीतर हूँ"—अद्वैत की पराकाष्ठा है। जब साधक कहता है कि 'सब भूत मेरे भीतर हैं', तो वह अपनी चेतना के उस विस्तार को अनुभव करता है जहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड उसकी अपनी ही अभिव्यक्ति प्रतीत होता है। जब वह कहता है कि 'मैं सब भूतों के भीतर हूँ', तो वह स्वयं को एक सीमित शरीर न मानकर सर्वव्यापी चैतन्य के रूप में देखता है। यह अनुभव ही 'योग' है।

महर्षि स्पष्ट करते हैं कि यह शास्त्र केवल उन्हीं के लिए है जो इस सत्य को 'देखते' (पश्यन्ति) हैं। यहाँ एक सूक्ष्म रहस्य है: जो पहले से ही एकत्व का अनुभव कर रहा है, वही इस शास्त्र को आत्मसात कर पाएगा। यह शास्त्र किसी को 'बनाने' के लिए नहीं, अपितु जो पहले से ही उस दिशा में अग्रसर है, उसकी अनुभूति को पुष्ट करने और उसे विधिपूर्वक पूर्णता तक ले जाने के लिए है।

जो 'अन्यथा' है—अर्थात् जो अभी भी घृणा, ईर्ष्या, भेद और 'मैं और तू' के द्वैत में गहराई से डूबा हुआ है—उसके लिए यह गूढ़ विद्या केवल शब्दों का संग्रह बनकर रह जाएगी। वह इसे केवल बौद्धिक तर्क के रूप में लेगा, अनुभव के रूप में नहीं। इसीलिए, याज्ञवल्क्य इस ज्ञान की पवित्रता बनाए रखने के लिए इसे केवल योगवेत्ताओं तक सीमित रखने का निर्देश देते हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस स्मृति का यह विचार अन्य उपनिषदों और गीता के सिद्धांतों से पूर्णतः मेल खाता है। ईशोपनिषद् में कहा गया है:

ईश उपनिषद्

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥

जो सब भूतोंको आत्मामें ही देखता है और सब भूतोंमें आत्माको, वह फिर किसीसे घृणा नहीं करता।

ईश उपनिषद् ६उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 46

यहाँ भी वही सूत्र है कि जो सब भूतों को आत्मा में और आत्मा को सब भूतों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता। याज्ञवल्क्य इसी 'अघृणा' और 'समदृष्टि' को शास्त्र ग्रहण करने की अनिवार्य योग्यता मानते हैं।

इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण योगयुक्त आत्मा के लक्षण बताते हुए कहते हैं:

भगवद्गीता

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ ६.२९ ॥

योगयुक्त आत्मावाला, सर्वत्र समदर्शी, आत्माको सब भूतोंमें स्थित और सब भूतोंको आत्मामें देखता है।

भगवद्गीता ६.२९गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 187

स्मृति का 'योगविद्' और गीता का 'योगयुक्तात्मा' एक ही अवस्था के दो नाम हैं—वह अवस्था जहाँ सर्वत्र समदर्शन हो।

जहाँ तक शास्त्र देने के निषेध का प्रश्न है, गीता में भी अधिकारी का कड़ा नियम बताया गया है:

भगवद्गीता

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ १८.६७ ॥

यह (उपदेश) तुझे कभी तपरहितसे, भक्तिरहितसे, सुनना न चाहनेवालेसे और मुझमें दोष देखनेवालेसे नहीं कहना चाहिए।

भगवद्गीता १८.६७गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 476

जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने तपरहित और भक्तिरहित व्यक्ति को यह ज्ञान न देने की बात कही है, उसी प्रकार महर्षि याज्ञवल्क्य 'अन्यथा' (द्वैत-ग्रस्त) व्यक्ति को इस स्मृति के रहस्य न देने का निर्देश देते हैं। दोनों ही दृष्टियाँ इस बात पर सहमत हैं कि बिना पात्रता के दिया गया ज्ञान निष्फल या हानिकारक हो सकता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साध्य' और 'साधन' के मिलन का बिंदु है। सामान्यतः हम सोचते हैं कि शास्त्र पढ़कर हम योग प्राप्त करेंगे, किन्तु याज्ञवल्क्य यहाँ उलट मार्ग बता रहे हैं—जो योग (एकत्व) को देख रहा है, उसे यह शास्त्र दें।

इसका अभ्यास यह है कि साधक अपनी दृष्टि को 'बाहर' से 'भीतर' की ओर मोड़े। जब वह ओंकार, गायत्री और प्राणायाम के अभ्यास से अपने भीतर के सूर्य (चैतन्य) में स्थित होता है, तब उसे अनुभव होता है कि बाहरी जगत वास्तव में उसके अपने ही हृदय-आकाश का विस्तार है।

अभ्यास की भूमि यह है:

१. प्रथम अनुभव: "मैं इस शरीर में हूँ" (स्थूल दृष्टि)।

२. द्वितीय अनुभव: "मैं सबमें हूँ" (सूक्ष्म दृष्टि)।

३. तृतीय अनुभव: "सब मुझमें हैं" (कारण दृष्टि)।

जब साधक इन दोनों अनुभवों (अन्तस्थ और अन्तराणि) में स्थित हो जाता है, तब वह 'योगविद्' कहलाता है। इस श्लोक का योगिक अभ्यास 'समत्व' का अभ्यास है। जो व्यक्ति अपनी चेतना में संपूर्ण सृष्टि को समाहित कर लेता है, उसके लिए यह स्मृति केवल एक मार्गदर्शिका बन जाती है, क्योंकि वह पहले ही लक्ष्य के निकट पहुँच चुका होता है।

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-10-04।

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