श्रीगणेशाय नमः।
व्याख्या · ग्रन्थ
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः
योगियाज्ञवल्क्यकी स्मृति — ओंकार, व्याहृति, गायत्री, न्यास, संध्या, स्नान-तर्पण-जप, प्राणायाम-प्रत्याहार, ध्यान, सूर्योपस्थान, योगधर्म और विद्या-अविद्या: बारह अध्याय, संपादकोंके पाठभेद और विषयानुक्रमणी सहित।
- पृष्ठ
- 13
- मूल
- 1856
ग्रन्थ-सार
मिथिलामें, जनक आदि राजर्षियों, शिष्यों और मुमुक्षुओंसे घिरे योगीश्वर याज्ञवल्क्यसे कठोर व्रतवाले ऋषि पूछते हैं: सब वेदों, वेदान्तों, सिद्धान्तों, स्मृतियों और चौदह विद्याओंका वह सार क्या है, जिसे जानकर अमृत मिलता है (१.१–१९)? उनके प्रश्नोंकी सूची ही ग्रन्थकी विषय-सूची है — ओंकार, व्याहृतियाँ, शिरस् सहित गायत्री, प्राणायाम, ध्यान, संध्या, मार्जन-अभ्युक्षण, स्नान, अन्तर्जल-जप, सूर्योपस्थान और सूर्यके भीतरका आत्मा, मन्त्रोंके ऋषि-छन्द-देवता-विनियोग-ब्राह्मण, होम और अन्नयज्ञके समय क्या चिन्तन करे, और अन्तमें विद्या, अविद्या तथा परम निःश्रेयस। याज्ञवल्क्य अपने उत्तरको ‘योगसारसमुच्चय’ कहते हैं (१.२३) — वेदान्त, स्मृति और सिद्धान्तोंमें जो कहा गया है उसका सार, जिससे द्विज अपना नित्यकर्म करता है, ब्राह्मण्य पाता है और ब्रह्मसायुज्यको जाता है (१.२४)।
ग्रन्थ द्विजकी नित्य संध्याके क्रमको पकड़कर चलता है, और उसके प्रत्येक अंगको दो बार पढ़ता है — पहले बाहरी विधिके रूपमें (कौन-सा मन्त्र, उसका ऋषि-छन्द-देवता-विनियोग, कब और कैसे), फिर उसी अंगको भीतरकी योग-साधनाके रूपमें। बिना जलकी ‘अनूदकी’ संध्या हृदयाकाश और सुषुम्णामें होती है (६.२२–२४); प्राणायाम स्वयं व्याहृति और प्रणव सहित गायत्रीका, शिरस्के साथ, तीन बार पाठ है (८.२); गायत्रीका ‘भर्ग’ सूर्यमण्डलका वह पुरुष है जो हृदयमें जीव होकर बैठा है (अध्याय ९); और अग्निहोत्र तथा भोजन तक ‘आत्मयज्ञ’ बन जाते हैं (९.११६–१५१)।
पहले मन्त्रोंकी नींव है: ओंकार (अध्याय २), सात व्याहृतियाँ (३), गायत्री और उसका शिरस् (४), और इन तीनोंका शरीरमें न्यास (५)। इनका परस्पर सम्बन्ध ग्रन्थ स्वयं बताता है (४.७७–७९): वेदोंका सार गुह्य उपनिषदें, उनका सार गायत्री, गायत्रीका सार तीन व्याहृतियाँ और व्याहृतियोंका सार ओंकार — यही ‘त्रिवृत् ब्रह्म’ है, जिसमें निष्णात होकर (साधक) परब्रह्मको पाता है। फिर कर्म आता है: संध्या (६), और स्नान, तर्पण, जप, अघमर्षण तथा मार्जन (७), जिनसे बाहरी शुद्धि होती है; उसके बाद भीतरी शुद्धिके लिए प्राणायाम और प्रत्याहार (८)। अध्याय ९, जो ग्रन्थका सबसे बड़ा अध्याय (१९८ श्लोक) है, ध्यान और अध्यात्मका है — हृदयमें ओंकारसे लक्षित आत्मा, गायत्रीके पदोंका अर्थ, सूर्यमण्डलका पुरुष, सृष्टि, सूर्यके नाम, देहसे निकलनेके दो मार्ग, आत्मयज्ञ और प्राणाग्निहोत्र, और अन्तमें आसनसे धारणातक ध्यानकी विधि। अध्याय १० उसी संध्याको सूर्योपस्थान और गायत्री-जपसे पूरा करता है। अध्याय ११ और १२ निष्कर्ष हैं: योगसे आत्मदर्शन परम धर्म है (११.३४), और वेद सब शास्त्रोंका मूल है (१२.१, १२.२५)।
तीन विचार पूरे ग्रन्थमें बार-बार आते हैं। (क) ज्ञान और कर्मका समुच्चय: एक पंखसे पक्षी नहीं उड़ता (९.२९); ‘केवल ज्ञानसे मुक्ति’ कहना आलस्यका लक्षण है (९.३४); ज्ञान और कर्मके बिना मोक्ष नहीं (११.३३); और किसी भी आश्रममें रहकर आत्मज्ञानसे मुक्ति है, गृहस्थकी भी (११.४४–४५)। (ख) स्थूल और सूक्ष्म: शब्दब्रह्म और परब्रह्म दो जानने योग्य हैं (२.४७); उच्चारित ओंकार स्थूल है, अमात्र और अनुच्चार्य ओंकार पर है — यह याज्ञवल्क्यका अपना मत है (२.१३१–१३२); वेदका भी स्थूल रूप ऋक्-यजुः-साम है और सूक्ष्म रूप वह त्र्यक्षर ब्रह्म जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है (११.२५–३१)। (ग) एक आत्मा, पाँच स्थान: वही आत्मा आदित्यमें, हृदयमें, अग्निमें, व्योममें और परममें स्थित है (९.१५६), और ‘आदित्य ब्रह्म है’ — यह सब उपनिषदोंकी उपासना है (९.१५७–१५८)।
ग्रन्थ अपनी बात श्रुति-स्मृतिके वचनोंसे पुष्ट करता है; पहचाने गये उद्धरणोंमें गीता, ईश, मुण्डक और कठ उपनिषद्, ऋग्वेद, मनुस्मृति और वसिष्ठ धर्मसूत्र हैं। अन्तमें (१२.४४–४७) याज्ञवल्क्य स्वयं विषयोंको फिरसे गिनाते हैं — ओंकार, गायत्री, व्याहृति, शिरस्, स्नान, संध्या, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, मार्जन, अन्तर्जल, उपस्थान, होम, आत्मज्ञान, विद्या-अविद्याका विचार और त्रयीकी प्रशंसा — और कहते हैं कि यह शास्त्र उन्हीं योगवेत्ताओंको देना चाहिए, जो सब भूतोंको अपने भीतर और अपनेको सब भूतोंमें देखते हैं (१२.४९)।
ग्रन्थ-सार AI की सहायतासे तैयार है; कोष्ठकके अङ्क उन श्लोकोंके हैं जिनपर बात टिकी है — यह ग्रन्थमें प्रवेशकी सहायता है, प्रमाण नहीं।