श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, एकादशोऽध्यायः

56 मूल पद्य

यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके एकादशोऽध्यायः — योगधर्मनिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।

एकादशोऽध्यायः — योगधर्मनिर्णयः

अध्याय-सार — योगधर्मनिर्णय। सब धर्मोंको छोड़कर योगधर्मका आचरण करे, क्योंकि दूसरे धर्म फिर जन्मके कारण हैं (११.१); गीताके वचन इसकी पुष्टि करते हैं (११.२–३)। आत्मज्ञानी ही सर्वज्ञ है। फिर नाम अपने असली अर्थमें परिभाषित होते हैं: वेदवित् वह है जो वेदके आदिके वर्ण (ॐ) और उसके छठे पदको जाने; पारग वह है जो तत्त्वोंके पार गया हो, न कि स्वाध्यायके; षडङ्गवित् वह है जो हृदयकमलमें छः अंगोंवाले वर्णको जाने (११.९–१४)। असंयमसे पढ़ा वेद रक्षा नहीं करता, और आचारहीनको वेद पवित्र नहीं करते; विद्या और तप रथ और घोड़ोंकी तरह साथ चाहिए (११.१५–२४)। वेद दो प्रकारका है: स्थूल — ऋक्, यजुः और साम — और सूक्ष्म, वह त्र्यक्षर ब्रह्म जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है, जैसे भूसी और चावल (११.२५–३१)। ज्ञान और कर्मके बिना मोक्ष नहीं (११.३३); परम धर्म योगसे आत्मदर्शन है (११.३४)। प्रवृत्ति स्वर्ग देती है और निवृत्ति ब्रह्मभाव (११.३९–४२); किसी भी आश्रमका व्यक्ति, गृहस्थ भी, आत्मज्ञानसे मुक्त होता है, और त्याग नियत कर्मका नहीं, कर्मफलका होता है (११.४४–४९)। अध्याय ध्यानकी महिमा और (मनुके वचनोंसे) शरीरमें देवताओंकी भावनासे परम पुरुषको जाननेके मार्गपर समाप्त होता है (११.५०–५६)।

योगधर्ममाहात्म्यम्

श्लोक ११.१

सर्वधर्मान् परित्यज्य योगधर्मं समाचरेत् ।

सर्वे धर्माः सदोषास्तु पुनरुत्पत्तिकारकाः ॥ ११.१ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२२

सब धर्मोंको छोड़कर योगधर्मका आचरण करे; (अन्य) सब धर्म दोषयुक्त हैं, पुनर्जन्मके कारण हैं।

अवतरणिका — पिछले खण्ड में ऋषियों के प्रश्नों के उत्तर में मन्त्रों की नींव, व्याहृतियों के रहस्य और गायत्री के आन्तर अर्थ को समझाया गया। अब यह ग्रन्थ 'योगधर्म' के निर्णय की ओर बढ़ता है, जहाँ बाहरी क्रियाओं के पार उस परम धर्म की चर्चा है जो साधक को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधक) सर्वधर्मान् परित्यज्य योगधर्मं समाचरेत्, (यतः) सर्वे धर्माः सदोषाः तु पुनरुत्पत्तिकारकाः (सन्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• सर्वधर्मान्: यहाँ 'धर्म' का अर्थ उन समस्त 'काम्य-धर्मों' से है, जो किसी विशेष फल की इच्छा से किए जाते हैं (जैसे स्वर्ग-प्राप्ति, पुत्र-प्राप्ति या लौकिक सुख)।

• परित्यज्य: पूरी तरह त्याग कर। यहाँ त्याग का अर्थ क्रिया का भौतिक त्याग नहीं, अपितु फल की आसक्ति का त्याग है।

• योगधर्मं: वह धर्म जो आत्मा को परमात्मा (अक्षर) से जोड़ता है। यह केवल शारीरिक आसन नहीं, अपितु चित्त की वह अवस्था है जहाँ साधक स्वयं को 'द्रष्टा' के रूप में स्थित करता है।

• समाचरेत्: निरंतर आचरण करे; इसे अपने जीवन का स्वभाव बना ले।

• सदोषाः: दोषयुक्त। यहाँ दोष का अर्थ अनैतिकता नहीं, बल्कि 'सीमितता' है। जो फल सीमित है, वह दोषपूर्ण है क्योंकि वह समाप्त हो जाता है।

• पुनरुत्पत्तिकारकाः: पुनः जन्म का कारण बनने वाले। जिस कर्म का फल शेष रहता है, वह जीव को उस फल के भोग के लिए पुनः शरीर धारण करने पर विवश करता है।

भाष्य —

योगीश्वर महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से साधना के सर्वोच्च सोपान का संकेत दे रहे हैं। वे कहते हैं कि साधक को समस्त (काम्य) धर्मों का परित्याग कर केवल 'योगधर्म' का आचरण करना चाहिए।

यहाँ एक सूक्ष्म भेद समझना आवश्यक है। जब ऋषि 'सर्वधर्मान् परित्यज्य' कहते हैं, तो उनका आशय नित्य-कर्मों (जैसे संध्या, स्वाध्याय, अग्निहोत्र) के त्याग से नहीं है, क्योंकि वे कर्म आत्मा की शुद्धि के साधन हैं। यहाँ त्याग का विषय वह 'मानसिक व्यापार' है जिसे हम 'धर्म' मानकर फल की लालसा में करते हैं। जब मनुष्य यह सोचकर दान करता है कि उसे दस गुना फल मिलेगा, या यह सोचकर तप करता है कि उसे स्वर्ग मिलेगा, तो वह धर्म नहीं, अपितु एक 'सांसारिक व्यापार' कर रहा होता है।

ऐसे समस्त कामना-युक्त धर्म 'सदोषाः' अर्थात् दोषपूर्ण हैं। इनका दोष यह है कि ये जीव को बंधन में बाँधते हैं। शास्त्र का नियम है कि जिस कर्म के पीछे कामना (इच्छा) होती है, वह कर्म एक बीज की तरह होता है। जब तक वह बीज फल नहीं देता, तब तक जीव को पुनर्जन्म लेना पड़ता है। अतः, फल की इच्छा से किए गए समस्त धर्म 'पुनरुत्पत्तिकारकाः' हैं—वे मुक्ति के मार्ग नहीं, बल्कि पुनरागमन के निमंत्रण हैं।

इसके विपरीत 'योगधर्म' वह मार्ग है जहाँ कर्म तो होता है, किन्तु 'कर्ता' का भाव समाप्त हो जाता है। योगधर्म का अर्थ है—अपने आप को उस 'अक्षर' (ॐ) में विलीन कर देना, जहाँ न कोई इच्छा शेष रहती है और न कोई कर्ता। जब साधक फल की आसक्ति छोड़कर केवल उस परम तत्त्व के लिए जीता है, तब वह कर्म बंधन नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार बन जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस स्मृति का यह वचन श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेशों के साथ पूर्णतः मेल खाता है:

भगवद्गीता

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ १८.६६ ॥

सब धर्मोंको छोड़कर एक मेरी शरणमें आ; मैं तुझे सब पापोंसे छुड़ा दूँगा, शोक मत कर।

भगवद्गीता १८.६६गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 458

यहाँ 'सर्वधर्मान् परित्यज्य' का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी शरण में आने के लिए किया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में 'मेरी शरण' का अर्थ 'योगधर्म' के आचरण से है। दोनों ही स्थानों पर संदेश एक है—फल की आसक्ति और सीमित धर्मों के मोह को छोड़कर उस एक परम तत्त्व (ईश्वर/योग) में लीन हो जाना।

भगवद्गीता

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ६.४६ ॥

योगी तपस्वियोंसे श्रेष्ठ है, ज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है, कर्मियोंसे भी श्रेष्ठ है; इसलिए, अर्जुन, योगी बन।

भगवद्गीता ६.४६गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 194

यहाँ योगी को तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मियों से श्रेष्ठ बताया गया है। इसका कारण यही है कि कर्मी फल के बंधन में होता है और तपस्वी अपनी तपस्या के अहंकार या फल में, किन्तु योगी इन सबसे ऊपर उठकर केवल 'योग' (संयोजन) में स्थित रहता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अभ्यास' के स्तर को बदलने का निर्देश है। साधारण साधक 'साधन' को ही 'साध्य' मान लेता है और जप-तप के फल की प्रतीक्षा करता है। यह श्लोक उसे चेतावनी देता है कि यदि जप में भी 'फल की इच्छा' है, तो वह जप भी पुनर्जन्म का कारण बनेगा।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी विधि (कर्म) और आन्तर अनुभूति (योग) के बीच एक सेतु है—'अनासक्ति'। जब साधक अपनी समस्त वृत्तियों को 'योगधर्म' में विलीन करता है, तो वह 'कामना-भूमि' से उठकर 'साक्षी-भूमि' में प्रवेश करता है।

अभ्यास यह है कि प्रत्येक कर्म करते समय यह भाव रखा जाए कि "मैं कर्ता नहीं हूँ, यह केवल उस अक्षर-ब्रह्म की इच्छा से हो रहा है।" जब साधक फल की इच्छा का पूर्ण परित्याग कर देता है, तब उसका हृदय सूर्य के समान प्रकाशमान हो जाता है और वह पुनर्जन्म के भय से मुक्त होकर उस स्थिति की ओर बढ़ता है जहाँ से लौटना नहीं पड़ता।

श्लोक ११.२

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ११.२ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२२

(गीता २.४०:) इसमें आरम्भका नाश नहीं है, उलटा फल (प्रत्यवाय) नहीं है; इस धर्मका थोड़ा-सा (आचरण) भी बड़े भयसे रक्षा करता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने काम्य-धर्मों की सीमितता और पुनर्जन्म के चक्र को स्पष्ट करते हुए 'योगधर्म' के आचरण का निर्देश दिया। अब वे इस योगधर्म की उस अद्वितीय विशेषता को उद्घाटित कर रहे हैं, जो इसे संसार के समस्त अन्य कर्म-मार्गों से श्रेष्ठ और सुरक्षित बनाती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: अस्मिन् (योगधर्मे) अभिक्रमनाशः न अस्ति, प्रत्यवायः न विद्यते। अस्य धर्मस्य स्वल्पम् अपि (आचरणम्) महतः भयात् त्रायते।

पदार्थ और निर्वचन:

• अभिक्रमनाशः: 'अभिक्रम' का अर्थ है आरम्भ या संकल्प। 'नाश' का अर्थ है अधूरा रह जाना या व्यर्थ जाना। संसार के कर्मों में यदि संकल्प के बाद क्रिया पूरी न हो, तो वह फल नहीं देता; किन्तु योग में ऐसा नहीं है।

• प्रत्यवायः: 'प्रत्यवाय' का अर्थ है उल्टा फल या विपरीत प्रभाव। जैसे किसी गलत विधि से किया गया कर्म साधक को और अधिक बंधन या कष्ट में डाल सकता है, योगधर्म में ऐसा कोई जोखिम नहीं है।

• स्वल्पम्: थोड़ा-सा। यहाँ मात्रा का अर्थ समय या क्रिया की संख्या से अधिक, 'श्रद्धा' और 'जागरूकता' के सूक्ष्म अंश से है।

• महतः भयात्: 'महा भय' का अर्थ केवल मृत्यु का भय नहीं, अपितु जन्म-मरण के अंतहीन चक्र (संसार-भय) और अविद्या के अंधकार से है।

• त्रायते: रक्षा करता है या तार देता है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ योगसाधना की उस सुरक्षा-कवच जैसी प्रकृति का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक के मन से भय और संशय को समाप्त करती है।

साधारणतः सांसारिक धर्मों या कर्मकाण्डों में 'अभिक्रम-नाश' की संभावना सदैव रहती है। यदि कोई व्यक्ति किसी महान यज्ञ का संकल्प ले और बीच में किसी अशुद्धि या बाधा के कारण वह अधूरा रह जाए, तो वह न केवल निष्फल होता है, बल्कि कई बार उसके विपरीत परिणाम भी देता है। किन्तु योगधर्म ऐसा नहीं है। योग का आरम्भ ही उसकी सिद्धि की दिशा में पहला कदम है। यहाँ 'अभिक्रम' का अर्थ है—स्वयं को जानने की उत्कट इच्छा। जिस क्षण साधक ने यह संकल्प लिया कि "मैं उस अक्षर (ब्रह्म) को जानूँगा", उसी क्षण उसकी यात्रा आरम्भ हो गई। योग में कोई भी प्रयास व्यर्थ नहीं जाता; वह चित्त में एक संस्कार के रूप में अंकित हो जाता है, जो अगले जन्म में भी साधक को वहीं से आरम्भ करने की शक्ति देता है जहाँ उसने छोड़ा था।

'प्रत्यवाय' का न होना इस बात का प्रमाण है कि योग का मार्ग शुद्ध और नैसर्गिक है। यह आत्मा का अपने मूल स्वरूप की ओर लौटना है। जैसे जल की बूंद का सागर में मिलना कभी 'गलत' नहीं हो सकता, वैसे ही योगसाधना कभी साधक को पतन की ओर नहीं ले जाती। यह मार्ग केवल ऊपर की ओर जाता है।

अंत में ऋषि कहते हैं कि इस धर्म का 'स्वल्प' अंश भी महा-भय से रक्षा करता है। यहाँ 'स्वल्प' का अर्थ यह है कि यदि कोई साधक पूर्णता तक नहीं भी पहुँच पाया, यदि उसने केवल थोड़ा समय भी आत्म-चिंतन में बिताया या क्षण भर के लिए भी स्वयं को दृष्टा के रूप में अनुभव किया, तो वह अनुभव उसे संसार के भीषण अंधकार से बचा लेता है। यह थोड़ा-सा प्रकाश ही उसे यह बोध करा देता है कि वह शरीर नहीं, अपितु अविनाशी आत्मा है, और यही बोध मृत्यु के समय उसे भयमुक्त कर देता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अभ्यास' और 'श्रद्धा' के महत्त्व को स्थापित करता है। योग में किया गया थोड़ा-सा भी प्रयास भी संचित होता है। साधक जब इस श्लोक का अनुभव करता है, तो वह 'परिणाम' की चिंता छोड़कर 'प्रक्रिया' में स्थित हो जाता है।

अभ्यास की दृष्टि से यहाँ यह संकेत है कि योग केवल कठिन तपस्या नहीं, बल्कि निरंतरता है। यदि साधक प्रतिदिन केवल कुछ क्षणों के लिए भी अपने भीतर के 'सूर्य' (हृदय-पुरुष) का स्मरण करता है, तो वह 'स्वल्प' अभ्यास उसके चित्त की शुद्धि करता है। वह अनुभव करता है कि योग में कुछ भी नष्ट नहीं होता—न उसकी प्रार्थना, न उसका मौन और न ही उसका ध्यान।

यह श्लोक साधक को 'भय-भूमि' से उठाकर 'अभय-भूमि' की ओर ले जाता है। जब साधक यह जान लेता है कि उसका प्रयास व्यर्थ नहीं जाएगा और उसे कोई विपरीत फल नहीं मिलेगा, तब उसके भीतर का संशय समाप्त हो जाता है। संशय का अंत ही योग की वास्तविक आरम्भिक सिद्धि है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को उस मानसिक अवस्था में प्रतिष्ठित करता है जहाँ वह पूर्ण विश्वास के साथ अक्षर-ब्रह्म की ओर अग्रसर हो सके।

श्लोक ११.३

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।

तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ११.३ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२२

(गीता २.४६:) सब ओरसे जल भर जानेपर छोटे जलाशयका जितना प्रयोजन रहता है, उतना ही (ब्रह्म) जाननेवाले ब्राह्मणका सब वेदोंमें (प्रयोजन रहता है)।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में योगधर्म की उस सुरक्षा का वर्णन था जहाँ अल्प अभ्यास भी महाभय से रक्षा करता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस बात को स्पष्ट कर रहे हैं कि जब साधक उस परम तत्व को प्राप्त कर लेता है, तब उसके लिए वेदों के विस्तृत कर्मकाण्डों और विधियों की स्थिति क्या रह जाती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: सर्वतः संप्लुतोदके उदपाने यावानर्थ (भवति), विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषु तावान् (अर्थः भवति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• सर्वतः संप्लुतोदके: 'सर्वतः' (सब ओर से), 'संप्लुतोदके' (जल से भरा हुआ)। जब चारों ओर जल ही जल हो, अर्थात् जल की प्रचुरता हो।

• उदपाने: 'उदपान' वह छोटा जलाशय, कुआँ या गड्ढा है जहाँ से जल निकाला जाता है। यह सीमित साधन का प्रतीक है।

• यावानर्थ: जितना प्रयोजन। 'अर्थ' का अर्थ यहाँ उपयोगिता या आवश्यकता से है।

• विजानतः: 'वि' उपसर्ग के साथ 'जानतः' का अर्थ है—विशेष रूप से जानने वाला, अर्थात् वह जिसने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है।

• ब्राह्मणस्य: यहाँ ब्राह्मण जाति नहीं, अपितु 'ब्रह्म' को जानने वाला (ब्रह्मज्ञानी) है।

• सर्वेषु वेदेषु: समस्त वेदों में (यहाँ वेदों से तात्पर्य उन कर्मकाण्डीय विधियों, मंत्रों और अनुष्ठानों से है जो साधन रूप हैं)।

• तावान्: उतना ही।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य एक अत्यंत सूक्ष्म उदाहरण के माध्यम से साधन और साध्य के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब चारों ओर जल की प्रचुरता हो, तब किसी छोटे जलाशय या कुएँ का उपयोग केवल तभी होता है जब व्यक्ति को उस विशाल जल-राशि तक पहुँचने का मार्ग न पता हो या वह उससे दूर हो। परन्तु यदि व्यक्ति स्वयं जल के समुद्र में खड़ा है, तो उस छोटे जलाशय का प्रयोजन समाप्त हो जाता है; वह केवल एक स्मृति या एक छोटे साधन के रूप में शेष रहता है।

ठीक इसी प्रकार, वेद ज्ञान के विशाल भंडार हैं। उनमें अनेक विधियाँ, यज्ञ, तप और कर्म बताए गए हैं जो मनुष्य को धीरे-धीरे शुद्ध कर परमात्मा की ओर ले जाते हैं। ये वेद 'उदपान' (जलाशय) की भाँति हैं—ये प्यास बुझाने के साधन हैं। परन्तु वह 'विजानतः ब्राह्मण' जिसने आत्म-साक्षात्कार कर लिया है, वह उस 'पूर्ण जल' (ब्रह्म) में स्वयं स्थित हो गया है। जिसके भीतर स्वयं ही ज्ञान का अक्षय स्रोत फूट पड़ा हो, उसके लिए बाहरी विधियों का सहारा लेना वैसा ही है जैसे समुद्र के बीच खड़ा व्यक्ति किसी छोटे गड्ढे के जल की खोज करे।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि महर्षि वेदों की न्यूनता नहीं बता रहे, अपितु साधक की 'पूर्णता' बता रहे हैं। वेद साधन हैं और ब्रह्म साध्य है। जब साध्य प्राप्त हो जाता है, तो साधन की उपयोगिता समाप्त हो जाती है, किन्तु उसका सम्मान बना रहता है। विजानतः ब्राह्मण के लिए वेद अब 'विधि' नहीं, बल्कि 'अनुभव' बन जाते हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' से 'साध्य' की ओर संक्रमण का संकेत है। योग की यात्रा में मंत्र, न्यास, प्राणायाम और संध्या आदि वे 'उदपान' (छोटे जलाशय) हैं, जो मन और प्राण को शुद्ध कर उस स्थिति तक ले जाते हैं जहाँ साधक अक्षर-ब्रह्म में स्थित हो जाता है।

अभ्यास की दृष्टि से यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि वह बाहरी क्रियाओं में ही न उलझा रहे। यदि कोई साधक केवल मंत्रों की संख्या या विधियों की सूक्ष्मता में अटक गया है, तो वह केवल जलाशय के किनारे खड़ा है। योग का लक्ष्य उस 'पूर्ण जल' में डूब जाना है। जब साधक अनुभव करता है कि वह स्वयं ही वह चैतन्य है जिसके लिए वह जप और तप कर रहा था, तब वह 'विजानतः' हो जाता है।

इस अवस्था में साधक के लिए शब्द-वेद अब केवल संकेत मात्र रह जाते हैं। वह अब वेदों को 'पढ़ता' नहीं, बल्कि वेदों के मर्म को 'जीता' है। यह वह भूमि है जहाँ 'अहं' और 'ब्रह्म' का भेद समाप्त हो जाता है और साधक समस्त वेदों के सार रूपी एक ही तत्व में प्रतिष्ठित हो जाता है। यहाँ अभ्यास 'बाहर से भीतर' की ओर मुड़कर अंततः 'भीतर से शून्य' (अक्षर) में विलीन होने का है।

श्लोक ११.४

आत्मज्ञानं हि यो वेत्ति स सर्वज्ञः स सर्वकृत् ।

एवं ज्ञात्वा प्रयत्नेन योगयुक्तः सदा भवेत् ॥ ११.४ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२२

…क्योंकि जो आत्मज्ञान को जानता है, वह सब कुछ जानने वाला और सब कुछ करने वाला है; ऐसा जानकर प्रयत्नपूर्वक सदा योगयुक्त होना चाहिए।…

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह बताया गया कि ब्रह्म को जानने वाले के लिए वेदों के समस्त कर्मकाण्डों की उपयोगिता वैसी ही रह जाती है जैसे जल-प्लावन के समय किसी छोटे जलाशय की। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस 'ब्रह्म-विज्ञानी' की आंतरिक सामर्थ्य और उसकी अवस्था का वर्णन कर रहे हैं कि वह ज्ञान उसे किस पूर्णता तक ले जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यः आत्मज्ञानं हि वेत्ति, स सर्वज्ञः स सर्वकृत् (भवति)। एवं ज्ञात्वा प्रयत्नेन सदा योगयुक्तः भवेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• आत्मज्ञानं वेत्ति: यहाँ 'वेत्ति' का अर्थ केवल सूचना प्राप्त करना नहीं, अपितु 'अनुभव' करना है। आत्मज्ञान को जानना अर्थात् स्वयं के शुद्ध स्वरूप (अक्षर) में स्थित होना।

• सर्वज्ञः: 'सर्व' + 'ज्ञ'। वह जो समस्त प्रपंच, समस्त कारणों और उनके मूल स्रोत को जानता है।

• सर्वकृत्: 'सर्व' + 'कृत्' (कर्ता)। वह जो समस्त क्रियाओं का अधिष्ठान है। यह संसार की भौतिक क्रियाएँ नहीं, अपितु वह चैतन्य शक्ति है जिससे सृष्टि का सृजन, पालन और लय होता है।

• प्रयत्नेन: यत्नपूर्वक। यहाँ प्रयत्न का अर्थ शारीरिक श्रम नहीं, अपितु सजगता और निरंतरता है।

• योगयुक्तः: योग में स्थित। यहाँ योग का अर्थ है—व्यष्टि का समष्टि में, और जीव का शिव (परमात्मा) में लय होना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को उस शिखर का दर्शन कराता है जहाँ ज्ञान और क्रिया का भेद समाप्त हो जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं: "जो आत्मज्ञान को जानता है, वह सर्वज्ञ और सर्वकृत् है।"

साधारणतः हम समझते हैं कि 'सर्वज्ञ' वह है जिसने सारी पुस्तकें पढ़ लीं या जिसे संसार की हर खबर है। किन्तु योगेश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में सर्वज्ञता का अर्थ है—'मूल' को जान लेना। जब साधक उस एक अक्षर (ॐ) को जान लेता है जिससे समस्त ऋचाएँ और समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई है, तो वह स्वतः ही सबका ज्ञाता हो जाता है। क्योंकि जब आप बीज को जान लेते हैं, तो आपको वृक्ष की हर शाखा और पत्ते का ज्ञान स्वतः हो जाता है।

'सर्वकृत्' शब्द यहाँ और भी गहरा है। जब तक मनुष्य स्वयं को शरीर या मन मानता है, वह केवल सीमित क्रियाएँ कर पाता है और उनके फल से बँधता है। किन्तु जब वह आत्मज्ञान में स्थित होता है, तब उसे अनुभव होता है कि वह स्वयं वह 'चेतन सत्ता' है जिसके कारण ही यह संपूर्ण जगत क्रियाशील है। वह कर्ता नहीं रहता, बल्कि वह 'क्रिया का आधार' बन जाता है। वह देखता है कि सूर्य का उदय होना, प्राणों का चलना और नक्षत्रों का घूमना—सब उसी एक आत्म-शक्ति का विस्तार है। अतः वह 'सर्वकृत्' हो जाता है, क्योंकि अब उसकी चेतना संपूर्ण ब्रह्मांड की क्रियाशीलता के साथ एक हो चुकी है।

श्लोक का दूसरा भाग एक व्यावहारिक निर्देश है: "एवं ज्ञात्वा प्रयत्नेन सदा योगयुक्तः भवेत्।" यह संकेत है कि यह ज्ञान केवल बौद्धिक विमर्श के लिए नहीं है। इस सत्य को 'जानकर' (ज्ञात्वा) साधक को निरंतर अभ्यास (प्रयत्न) करना चाहिए ताकि वह क्षणिक अनुभव से निकलकर 'सदा' (स्थायी) योगयुक्त हो सके। यह ज्ञान ही वह प्रेरणा है जो साधक को आलस्य से उठाकर निरंतर साधना की ओर ले जाती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

बृहदारण्यक उपनिषद्

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि ॥ २.४.५ ॥

अरी मैत्रेयी, आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन करने योग्य है।

बृहदारण्यक उपनिषद् २.४.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 395

यह उपनिषद् का वचन कि "आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन करने योग्य है", इस स्मृति के वचन की पुष्टि करता है। जब आत्मा ही एकमात्र द्रष्टव्य (देखने योग्य) है, तो उसे जान लेने के बाद कुछ और जानने योग्य शेष नहीं रहता। यही कारण है कि आत्मज्ञानी 'सर्वज्ञ' कहलाता है। स्मृति यहाँ उपनिषद् के उस सिद्धांत को साधना के धरातल पर लाती है कि इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए 'प्रयत्नपूर्वक' योग में स्थित रहना अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साध्य' और 'साधन' के मिलन का बिंदु है।

१. सर्वज्ञता का अभ्यास: साधक जब जप और ध्यान के माध्यम से अपने भीतर के 'अक्षर' (ओंकार) में स्थित होता है, तो वह बाहरी जगत के ज्ञान से हटकर 'स्व-ज्ञान' की ओर मुड़ता है। जब वह अनुभव करता है कि "मैं ही वह शुद्ध चैतन्य हूँ", तब उसे बाहरी जगत की विविधता केवल उसी एक सत्ता के विभिन्न रूप लगने लगते हैं। यही 'सर्वज्ञता' की अनुभूति है।

२. सर्वकृत् का अनुभव: अभ्यास के दौरान जब प्राण और मन स्थिर होते हैं, तब साधक को अनुभव होता है कि उसके भीतर की शांति ही संपूर्ण जगत की शांति है। वह अपनी इच्छाओं से कुछ 'करने' के बजाय, उस परम पुरुष की इच्छा के साथ लय हो जाता है। यहाँ 'सर्वकृत्' होने का अर्थ है—अहंकार का विसर्जन और ईश्वरीय इच्छा का प्रकटीकरण।

३. निरंतरता (सदा योगयुक्त): साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि आत्मज्ञान की एक झलक मिलना पर्याप्त नहीं है। उस अनुभव को जीवन का स्वभाव बनाने के लिए 'प्रयत्न' (सजगता) आवश्यक है। वह अपनी चेतना को हृदय के उस केंद्र में टिकाए रखता है जहाँ सूर्य (आत्मा) का प्रकाश निरंतर प्रज्ज्वलित है। वह 'भूमिका' से 'भूमि' की ओर बढ़ता है—जहाँ ज्ञान केवल विचार नहीं, बल्कि उसका अस्तित्व बन जाता है।

श्लोक ११.५

अकृतान्येव यज्ञाश्च दानानि च तपांसि च ।

तेषां फलं तु संयोज्य लोकान् सोमानव(नु?)क्रमात् ॥ ११.५ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२२

(जो) यज्ञ, दान और तप बिना किये ही (योगीके हैं) — उनका फल (उसे) जोड़कर (मिलता है); (वह) क्रमसे सोम आदि लोकोंको —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह बताया गया कि आत्मज्ञानी पुरुष 'सर्वज्ञ' और 'सर्वकृत्' होता है, क्योंकि वह समस्त क्रियाओं के अधिष्ठान स्वरूप चैतन्य में स्थित हो जाता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस बात का विस्तार कर रहे हैं कि जब साधक इस योग-अवस्था को प्राप्त करता है, तो कर्मकाण्डों के बिना भी उसे उन समस्त पुण्यों की प्राप्ति कैसे होती है जो सामान्यतः कठिन तप और यज्ञों से मिलते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (योगयुक्त पुरुष के लिए) अकृतानि एव यज्ञाः च दानानि च तपांसि च (भवन्ति)। तेषाम् फलं तु संयोज्य (सः) लोकान् सोमानवक्रमात् (गच्छति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अकृतान्येव: 'अकृत' + 'एव'। जो नहीं किए गए हैं, वही। यहाँ 'एव' शब्द इस आश्चर्य को रेखांकित करता है कि बिना क्रिया के भी फल की प्राप्ति संभव है।

• यज्ञाः, दानानि, तपांसि: यज्ञ (अग्निहोत्र आदि), दान (त्याग) और तप (इन्द्रिय निग्रह)। ये तीनों वैदिक धर्म के मुख्य बाह्य स्तंभ हैं।

• संयोज्य: जोड़कर या सम्मिलित करके। इसका अर्थ है कि योगी को उन सभी पुण्यों का संचित फल एक साथ प्राप्त हो जाता है।

• लोकान् सोमानवक्रमात्: यहाँ 'सोमानवक्रमात्' का पाठ कुछ अस्पष्ट है, किन्तु इसका भाव संभवतः 'सोम आदि लोकों के क्रम से' है। सोम यहाँ चन्द्रलोक या आनंदमय अवस्था का प्रतीक है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक कर्म और ज्ञान के पारस्परिक सम्बन्ध का एक महान रहस्य उद्घाटित करता है। सामान्यतः वैदिक विधान यह है कि फल की प्राप्ति के लिए क्रिया अनिवार्य है—यज्ञ करने से स्वर्ग, दान करने से पुण्य और तप करने से सिद्धियाँ मिलती हैं। किन्तु महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'योगधर्म' की विशिष्टता बता रहे हैं।

वे कहते हैं कि जो साधक आत्मज्ञान में स्थित होकर योगयुक्त हो गया है, उसके लिए वे यज्ञ, दान और तप 'अकृत' (बिना किए हुए) होते हुए भी उपलब्ध हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि योगी कर्मों का तिरस्कार करता है, अपितु यह कि वह उस 'स्रोत' को पा लेता है जहाँ से ये सभी पुण्य उत्पन्न होते हैं। जब साधक स्वयं उस अक्षर-ब्रह्म में स्थित हो जाता है, तो वह समस्त सृष्टि का स्वामी बन जाता है; तब वह उन सभी सूक्ष्म फलों का अधिकारी हो जाता है जिन्हें अन्य लोग टुकड़ों में, कठिन शारीरिक और मानसिक श्रम से प्राप्त करते हैं।

यहाँ 'संयोज्य' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधारण मनुष्य एक यज्ञ करता है तो एक फल पाता है, एक दान करता है तो एक पुण्य पाता है। किन्तु योगी, जो समस्त द्वन्द्वों से ऊपर उठकर एकत्व (योग) में स्थित है, उसके लिए ये सब पृथक-पृथक क्रियाएँ नहीं, बल्कि एक ही चैतन्य की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। अतः उसे इन सबका सम्मिलित फल एक साथ प्राप्त होता है। वह क्रम से सोम आदि उच्च लोकों की यात्रा करता है, किन्तु यह यात्रा भौतिक नहीं, अपितु चेतना का उत्थान है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस विषय में भगवद्गीता का यह वचन पूर्णतः संगत है:

भगवद्गीता

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ ८.२८ ॥

वेदों, यज्ञों, तपों और दानोंमें जो पुण्यफल कहा गया है, इसे जानकर योगी उस सबको लाँघ जाता है और आद्य परम स्थानको पाता है।

भगवद्गीता ८.२८गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 225

यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि वेदों में यज्ञों, तपों और दानों के लिए जो पुण्यफल बताया गया है, उसे जानकर योगी उस सबको लाँघ जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता का यहाँ अद्भुत मेल है। जहाँ गीता 'लाँघ जाने' (अत्येति) की बात करती है, वहीं यह स्मृति बताती है कि लाँघने का अर्थ यह नहीं कि फल नष्ट हो गए, बल्कि यह कि योगी उन समस्त पुण्यों को अपने भीतर 'संयोजित' (एकत्र) कर लेता है। वह उन पुण्यों का उपभोग करने के लिए मोहग्रस्त नहीं होता, अपितु वह उन पुण्यों की सामर्थ्य को पाकर और भी सहजता से परम स्थान की ओर अग्रसर होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'अहंकार के विसर्जन' और 'पूर्णता के अनुभव' का है। जब साधक जप, ध्यान और प्राण के अभ्यास से अपने हृदय के भीतर उस सूर्य-पुरुष (आत्मा) को अनुभव करता है, तो वह यह जान जाता है कि बाह्य यज्ञ वास्तव में आंतरिक अग्नि का ही विस्तार हैं।

अभ्यास यह है कि साधक जब योग-अवस्था में होता है, तो वह स्वयं को केवल एक शरीर या व्यक्ति नहीं, बल्कि 'समस्त' अनुभव करता है। वह अनुभव करता है कि जिस पुण्य को प्राप्त करने के लिए लोग युगों तक तप करते हैं, वह पुण्य वास्तव में आत्मा का ही स्वभाव है। जब वह 'अक्षर' में स्थित होता है, तो वह समस्त पुण्यों का केंद्र बन जाता है। इस भूमि पर पहुँचकर साधक यह अनुभव करता है कि वह अब किसी बाहरी फल का याचक नहीं, बल्कि स्वयं फलस्वरूप हो गया है। वह सोम (चन्द्र/आनंद) की अवस्था से होते हुए उस परम पद की ओर बढ़ता है जहाँ से पुनरागमन नहीं होता।

श्लोक ११.६

भुक्त्वा गच्छति तत्स्थानं यद् गत्वा न निवर्तते ।

पुरुषो भुनक्ति भोगाननौपम्यान् गुणोदयान् ॥ ११.६ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२२

— भोगकर उस स्थानको जाता है, जहाँ जाकर लौटता नहीं; (वहाँ) पुरुष अनुपम, (सत्त्व)गुणसे उदित भोगोंको भोगता है;

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह बताया गया कि योगी बिना बाहरी कर्म किए ही यज्ञ, दान और तप के फलों को प्राप्त करता है और सोम आदि लोकों के क्रम से आगे बढ़ता है। वर्तमान श्लोक उसी यात्रा की परिणति और उस परम गंतव्य का वर्णन करता है जहाँ पहुँचकर पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (पुरुषः) भोगान् भुक्त्वा तत्स्थानं गच्छति, यद् गत्वा (सः) न निवर्तते। (तत्र) पुरुषो गुणोदयान् अनुपम्यान् भोगान् भुनक्ति।

पदार्थ और निर्वचन:

• तत्स्थानं: वह स्थान। यहाँ उस परम पद या अवस्था का संकेत है जो भौतिक भूगोल से परे, चेतना का उच्चतम शिखर है।

• न निवर्तते: लौटकर नहीं आता। अर्थात् पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाना।

• गुणोदयान्: गुणों के उदय से उत्पन्न। यहाँ 'गुण' का अर्थ प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से विशेषतः 'सत्त्व' गुण की पराकाष्ठा से है, जिससे प्रकाश और आनंद का उदय होता है।

• अनुपम्यान्: जिसकी कोई उपमा न हो; अतुलनीय। सांसारिक सुखों से सर्वथा भिन्न, अलौकिक आनंद।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक योगधर्म के अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' और उस अवस्था के स्वरूप को स्पष्ट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि योगी जब पिछले श्लोक में वर्णित सोम आदि लोकों के क्रम को पार कर लेता है, तब वह उस 'तत्स्थान' (परम स्थान) को प्राप्त करता है, जहाँ से फिर लौटकर इस दुखमय संसार में आना नहीं पड़ता।

साधारण मनुष्य जब पुण्य कर्म करता है, तो वह स्वर्ग आदि लोकों में जाता है, किन्तु पुण्य क्षीण होने पर उसे पुनः मृत्युलोक में लौटना पड़ता है। परन्तु योगी का मार्ग भिन्न है। वह केवल पुण्यों का संचय नहीं करता, अपितु आत्मज्ञान के माध्यम से उस मूल स्रोत से जुड़ जाता है। जब वह उस परम पद को प्राप्त करता है, तो वह 'निवृत्ति' की अवस्था में होता है, जहाँ वासनाओं का अभाव है, इसलिए वहाँ से वापसी का कोई कारण ही नहीं बचता।

यहाँ एक सूक्ष्म प्रश्न उठता है कि यदि वह मुक्त हो गया, तो फिर 'भोग' कैसा? श्लोक कहता है— "पुरुषो भुनक्ति भोगाननौपम्यान् गुणोदयान्"। यहाँ 'भोग' शब्द का अर्थ इंद्रिय-विषय भोग नहीं है। यह 'सत्त्व-गुण' के पूर्ण उदय से उत्पन्न वह आनंद है जो आत्मा का अपना स्वभाव है। यह आनंद अनुपम है क्योंकि यह किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर के प्रकाश का अनुभव है। यह वह अवस्था है जहाँ पुरुष अपनी शुद्धतम चेतना में स्थित होकर उस परमानंद का आस्वादन करता है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस 'न निवर्तने' (न लौटने) के रहस्य की पुष्टि भगवद्गीता में भी मिलती है:

भगवद्गीता

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ १५.६ ॥

उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा, न अग्नि; जहाँ जाकर (जीव) लौटते नहीं, वह मेरा परम धाम है।

भगवद्गीता १५.६गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 369

"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥"

गीता में भगवान श्रीकृष्ण अपने परम धाम के विषय में कहते हैं कि जहाँ जाकर जीव लौटकर नहीं आते, वह मेरा परम धाम है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का मत एक ही है—परम पद वह है जहाँ पहुँचकर पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) समाप्त हो जाती है। अंतर केवल इतना है कि स्मृति यहाँ उस अवस्था में 'गुणोदयान् भोगान' की बात कर रही है, जो यह दर्शाता है कि वह शून्य नहीं, अपितु आनंद से पूर्ण अवस्था है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साध्य' का दर्शन कराता है। योगी जब अभ्यास के माध्यम से स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है, तो वह पहले निम्न लोकों के सुखों को पार करता है। इस श्लोक का अभ्यास साधक को यह विश्वास दिलाता है कि उसकी साधना का अंत केवल शून्यता नहीं, बल्कि एक 'अनुपम आनंद' है।

साधक जब हृदय में स्थित सूर्य-पुरुष का ध्यान करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके भीतर एक ऐसा प्रकाश (गुणोदय) है जो कभी अस्त नहीं होता। वह इस श्लोक के माध्यम से अपनी चेतना को उस 'न निवर्तते' वाली स्थिति में स्थिर करने का प्रयास करता है। अभ्यास यह है कि वर्तमान क्षण में ही उस आनंद का अनुभव करना जो बाहरी विषयों से स्वतंत्र हो। जब साधक का चित्त बाहरी भोगों से हटकर आंतरिक 'अनुपम भोग' (परमानंद) में लीन होने लगता है, तब वह वास्तव में उस स्थान की ओर अग्रसर होता है जहाँ से संसार में लौटना असंभव हो जाता है।

श्लोक ११.७

सर्गप्रलयकाले तु न नश्येन्न भवेत्तु सः ।

ऋचोऽक्षरे परमे व्योम्नि यस्मिन् देवा अधिविश्वे निषेदुः ॥

यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ११.७ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२२

सृष्टि और प्रलयके समय वह न नष्ट होता है, न उत्पन्न। (ऋग्वेद १.१६४.३९:) ऋचाएँ उस परम व्योम-अक्षरमें (स्थित हैं), जिसमें सब देवता बैठे हैं; जो उसे नहीं जानता, वह ऋचासे क्या करेगा? जो उसे जानते हैं, वे ये (उसमें) भली-भाँति स्थित हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में योगी के उस परम गंतव्य का वर्णन था जहाँ पहुँचकर वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है। वर्तमान श्लोक उस मुक्ति-स्थान के स्वरूप और वेदों के वास्तविक आश्रय 'अक्षर' के रहस्य को उद्घाटित करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (सः पुरुषः) सर्ग-प्रलय-काले तु न नश्येत्, न भवेत् तु सः। ऋचः परमे व्योम्नि अक्षरे यस्मिन् (तत्र) अधिविश्वे देवाः निषेदुः (तत्र तिष्ठन्ति)। यः तम् (अक्षरं) न वेद, (सः) किम् ऋचा करिष्यति? यः इत् तद् विदुः, ते इमे (तस्मिन् अक्षरे) समासते।

पदार्थ और निर्वचन:

• सर्गप्रलयकाले: सृष्टि (उत्पत्ति) और प्रलय (विनाश) के समय।

• न नश्येन्न भवेत्तु सः: न वह नष्ट होता है और न ही (नये शरीर में) उत्पन्न होता है। यह 'अव्यय' अवस्था का संकेत है।

• परमे व्योम्नि: परम आकाश में। यहाँ 'व्योम' केवल शून्य नहीं, अपितु वह चेतना-आकाश है जो सर्वव्यापी है।

• अक्षरे: अक्षर में। 'अक्षर' के दो अर्थ हैं— प्रथम, जो अविनाशी है (न क्षरति); द्वितीय, वह बीज-ध्वनि 'ॐ' जो समस्त वेदों का मूल है।

• अधिविश्वे देवाः: समस्त देवता। यहाँ देवता का अर्थ केवल पौराणिक देव नहीं, अपितु इंद्रियों के अधिष्ठाता और ब्रह्मांडीय शक्तियाँ हैं।

• समासते: भली-भाँति स्थित हैं; लीन हैं; एकाकार हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को कर्मकांड की बाहरी परिधि से उठाकर उस केंद्र की ओर ले जाता है जहाँ ज्ञान और अस्तित्व एक हो जाते हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो योगी आत्मज्ञान के माध्यम से उस परम पद को प्राप्त कर चुका है, वह काल के प्रभाव से मुक्त हो जाता है। सृष्टि के आरम्भ (सर्ग) में वह उत्पन्न नहीं होता और प्रलय के समय वह नष्ट नहीं होता; वह 'अविनाशी' हो जाता है।

यहाँ ऋषि ऋग्वेद (१.१६४.३९) के मन्त्र का उद्धरण करते हुए एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोलते हैं। वे कहते हैं कि समस्त 'ऋचाएँ' (वेदों के मन्त्र) उस 'परम व्योम-अक्षर' में स्थित हैं। भाव यह है कि मन्त्र केवल शब्द या ध्वनि नहीं हैं, बल्कि वे उस परम चेतना (अक्षर) के विभिन्न विवर्त हैं। जिस प्रकार सागर की लहरें सागर से भिन्न नहीं होतीं, उसी प्रकार समस्त वैदिक ज्ञान उस एक 'अक्षर' में समाहित है। यहाँ 'अक्षर' का अर्थ उस ओङ्कार-नाद से है जो सृष्टि के पूर्व भी था और प्रलय के बाद भी रहेगा।

इस श्लोक में एक कठोर चेतावनी और एक आश्वासन दोनों हैं। चेतावनी यह है कि "यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति" — जो उस मूल 'अक्षर' को नहीं जानता, वह मन्त्रों के जप या पाठ से क्या करेगा? बिना मूल (अक्षर) के, शाखाओं (ऋचाओं) का ज्ञान व्यर्थ है। यदि साधक केवल शब्दों का उच्चारण करता है किन्तु उस ध्वनि के पीछे छिपे अविनाशी तत्त्व का अनुभव नहीं करता, तो वह केवल बाहरी क्रिया कर रहा है, योग नहीं।

वहीं आश्वासन यह है कि "य इत्तद्विदुस्त इमे समासते" — जो उस अक्षर को जान लेते हैं, वे उसी में स्थित हो जाते हैं। वे अब मन्त्रों के माध्यम से ईश्वर को खोजते नहीं, बल्कि स्वयं उस मन्त्र-रूप अक्षर में लीन हो जाते हैं। वे अब 'कर्ता' नहीं रहते, अपितु 'साक्षी' बन जाते हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शब्द-ब्रह्म' से 'अक्षर-ब्रह्म' की यात्रा है। योग का अभ्यास यहाँ यह है कि साधक जब किसी मन्त्र का जप करता है, तो वह धीरे-धीरे शब्दों (ऋचाओं) से हटकर उस मौन और अविनाशी ध्वनि (अक्षर) की ओर बढ़े।

यहाँ 'अक्षर' के दो स्तरों का अभ्यास निहित है:

१. ध्वनि रूप: जप के दौरान जब शब्द समाप्त हो जाते हैं और केवल एक गूँज शेष रहती है, वह 'ॐ' या अक्षर है। साधक इस गूँज में स्थित होकर अपने अस्तित्व को उसमें विलीन करता है।

२. तत्त्व रूप: जब साधक यह अनुभव करता है कि वह स्वयं वही अविनाशी तत्त्व है जो प्रलय और सृष्टि से परे है, तब वह 'न नश्येन्न भवेत्तु सः' की अवस्था में पहुँचता है।

अभ्यास यह है कि मन्त्र को केवल 'साधन' न मानकर उसे 'साध्य' (अक्षर) में बदल देना। जो साधक ऋचाओं के अर्थों में उलझा रहता है, वह अभी मार्ग में है; जो ऋचाओं को छोड़कर उस 'परम व्योम' (हृदयाकाश के उस शून्य में जहाँ अक्षर गूँजता है) में स्थित हो जाता है, वही वास्तव में 'समासते' अर्थात् स्थित होता है। यह अवस्था साधक को स्थूल देह के बोध से उठाकर उस विराट पुरुष के बोध में ले जाती है जहाँ समस्त देवता (शक्तियाँ) लीन हैं।

श्लोक ११.८

रथ्याघोषेण संतुष्टो वाक्प्रलापरतः सदा ।

रात्रिंदिवं प्रलपते मत्तो मार्जारवद्यथा ॥ ११.८ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२२

(अज्ञानी) गलीके शोरसे सन्तुष्ट, सदा व्यर्थ बकवासमें लगा, रात-दिन मतवाले बिलावकी भाँति बड़बड़ाता रहता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषियों ने उस 'परम व्योम-अक्षर' का संकेत दिया था, जिसमें समस्त ऋचाएँ और देवता स्थित हैं और जिसे न जानने वाले के लिए वेदों का ज्ञान निष्प्रयोजन है। वर्तमान श्लोक उसी अज्ञानी की मानसिक और वाचिक अवस्था का चित्रण करता है, जो अक्षर-तत्व से विमुख होकर केवल शब्दों के जाल में फँसा रहता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (सः अज्ञानी पुरुषः) रथ्याघोषेण संतुष्टः, वाक्प्रलापरतः सदा (तिष्ठति), रात्रौ दिनं च (सः) प्रलपते, यथा मत्तः मार्जारः रवते।

पदार्थ और निर्वचन:

• रथ्याघोषेण: 'रथ्य' का अर्थ है गली या मार्ग; 'घोष' का अर्थ है शोर। यहाँ 'रथ्याघोष' का तात्पर्य संसार के सतही शोर, लोक-प्रसिद्धि और बाहरी चकाचौंध से है।

• संतुष्टो: संतुष्ट। वह व्यक्ति जो सूक्ष्म सत्य के स्थान पर स्थूल शोर में ही तृप्ति अनुभव करता है।

• वाक्प्रलापरतः: 'वाक्' (वाणी) और 'प्रलाप' (व्यर्थ की बातें)। जो निरंतर ऐसी वाणी का प्रयोग करता है जिसका कोई आध्यात्मिक लक्ष्य या गम्भीरता न हो।

• रात्रिंदिवं: रात और दिन। यह समय की निरंतरता को दर्शाता है, अर्थात उसकी यह वृत्ति स्वभाव बन चुकी है।

• मत्तो मार्जारवद्यथा: 'मत्तः' (मतवाला या उन्मत्त), 'मार्जार' (बिलाव/बिल्ली), 'रव' (ध्वनि)। जैसे एक मदमस्त बिलाव बिना किसी कारण के रात-दिन चिल्लाता रहता है, वैसे ही अज्ञानी की स्थिति है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक कठोर चेतावनी है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस व्यक्ति की मानसिक दरिद्रता को उजागर कर रहे हैं, जो वेदों को केवल शब्दों के समूह (शब्द-जाल) के रूप में देखता है, उनके मूल 'अक्षर' (ॐ) के रूप में नहीं।

जब साधक उस परम अक्षर को नहीं जानता, तो उसके लिए वेदों का पाठ, शास्त्रार्थ और धार्मिक चर्चाएँ केवल 'रथ्याघोष' यानी गली के शोर के समान हो जाती हैं। वह व्यक्ति बाहरी प्रशंसा, शास्त्र-विवाद और बौद्धिक विलासिता से संतुष्ट हो जाता है। उसे लगता है कि वह बहुत ज्ञान अर्जित कर रहा है, परंतु वास्तव में वह केवल वाणी का विलास कर रहा होता है।

यहाँ 'मतवाले बिलाव' का दृष्टान्त अत्यंत सूक्ष्म है। बिलाव जब मदमस्त होता है, तो वह चिल्लाता तो है, परंतु उसकी उस ध्वनि का कोई अर्थ या उद्देश्य नहीं होता; वह केवल एक आवेग है। ठीक उसी प्रकार, जो व्यक्ति बिना योग-अभ्यास और बिना अक्षर-साक्षात्कार के केवल शब्दों का प्रलाप करता है, उसकी वाणी में ओज नहीं, केवल शोर होता है। वह रात-दिन शास्त्रों की बातें तो करता है, किंतु उसका हृदय उस मौन से अनभिज्ञ है जहाँ ऋचाएँ वास्तव में निवास करती हैं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि बिना अनुभव के शास्त्र-ज्ञान केवल एक मानसिक व्याधि है, जो साधक को सत्य से दूर ले जाकर उसे शब्दों के अहंकार में उलझा देती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

बृहदारण्यक उपनिषद्

तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥ ४.४.२१ ॥

धीर ब्राह्मण उसीको जानकर (उसीमें) प्रज्ञा करे; बहुत शब्दोंका चिन्तन न करे, वह तो वाणीको थकाना है।

बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.२१उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 392

यह उपनिषद् का वचन इस स्मृति के भाव की पुष्टि करता है कि बहुत अधिक शब्दों का चिंतन करना केवल 'विग्लापनं' यानी वाणी को थकाना है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति जहाँ अज्ञानी की तुलना 'उन्मत्त बिलाव' से करके उसकी स्थिति की निरर्थकता दिखाती है, वहीं बृहदारण्यक उपनिषद् यह निर्देश देता है कि धीर ब्राह्मण को शब्दों के विस्तार के बजाय उस एक 'तत्व' (अक्षर) को जानकर प्रज्ञा करनी चाहिए। दोनों ही शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि सत्य शब्दों के विस्तार में नहीं, बल्कि उनके मूल बिंदु (अक्षर) में निहित है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्-शुद्धि' और 'मौन' के महत्व को रेखांकित करता है। साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह अपनी वाणी के प्रलाप को पहचाने। जब तक मन बाहरी शोर (रथ्याघोष) से संतुष्ट रहता है, तब तक वह अंतर्मुखी नहीं हो सकता।

जो साधक केवल मंत्रों का यांत्रिक जप करता है और उनके आन्तर अर्थ (प्राण, सूर्य, अक्षर) से नहीं जुड़ता, वह भी अनजाने में इसी 'प्रलाप' की श्रेणी में आता है। योगी इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि शब्दों का संचय ज्ञान नहीं है, बल्कि शब्दों का विसर्जन कर उस 'अक्षर' में लीन होना ही वास्तविक विद्या है। अभ्यास यह है कि वाणी को बाहरी शोर से हटाकर हृदय के उस शून्य में ले जाया जाए जहाँ ऋचाएँ स्थित हैं। जब तक साधक 'मत्तो मार्जार' की भाँति शब्दों के आवेग में बहता रहेगा, वह उस 'परम व्योम' का अनुभव नहीं कर पाएगा। अतः, यहाँ 'वाक्-संयम' का अभ्यास ही साधक को प्रलाप से प्रज्ञा की ओर ले जाता है।

वेदविल्लक्षणम्

श्लोक ११.९

वेदादौ यो भवेद्वर्णः पञ्चवर्णसमन्वितः ।

तस्यान्ते तु पदं षष्ठं तज्ज्ञात्वा वेदविद्भवेत् ॥ ११.९ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

वेदके आदिमें जो वर्ण (ॐ) पाँच वर्णोंसे युक्त है, उसके अन्तमें छठा पद है — उसे जानकर (मनुष्य) वेदवित् होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस अज्ञानी की स्थिति का वर्णन किया जो परम अक्षर से विमुख होकर संसार के शोर में संतुष्ट रहता है। अब इस श्लोक से एक नए खण्ड का आरम्भ होता है, जहाँ ऋषि 'वेदवित्' जैसे पारिभाषिक शब्दों का वास्तविक और योगिक अर्थ स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक केवल शब्दों के ज्ञान को ही वेदों का ज्ञान न मान ले।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: वेदस्य आदौ यः वर्णः पञ्चवर्णैः समन्वितः भवति, तस्य अन्ते तु षष्ठं पदं (अस्ति); तत् ज्ञात्वा (मनुष्यः) वेदवित् भवेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• वेदादौ: वेद के आदि में। यहाँ 'आदि' का अर्थ केवल पुस्तक का आरम्भ नहीं, अपितु उस मूल स्रोत या बीज से है जिससे समस्त ज्ञान प्रस्फुटित होता है।

• वर्णः: यहाँ 'वर्ण' का अर्थ अक्षर या ध्वनि है। यह उस आदि-नाद (ॐ) की ओर संकेत है जो समस्त वेदों का मूल है।

• पञ्चवर्णसमन्वितः: पाँच वर्णों से युक्त। यह उस मूल वर्ण (ॐ) की आंतरिक संरचना या उसके पाँचों आयामों के समन्वय को दर्शाता है।

• पदं षष्ठं: छठा पद। वह अवस्था या बिंदु जो पाँचों वर्णों के पूर्ण होने के बाद अंत में प्रकट होता है।

• वेदवित्: 'वेद' + 'वित्' (जानने वाला)। वह जो वास्तव में वेदों के मर्म को जानता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक 'वेदवित्' की एक अत्यंत सूक्ष्म और योगिक परिभाषा प्रस्तुत करता है। सामान्यतः समाज में उसे 'वेदवित्' माना जाता है जिसने वेदों का पाठ किया हो या उनके व्याकरण और कर्मकाण्डों में दक्षता प्राप्त की हो। किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि वेदों का वास्तविक ज्ञान बाहरी शब्दों के संकलन में नहीं, अपितु उस 'आदि वर्ण' के रहस्य में है जिससे वेदों की उत्पत्ति हुई है।

ऋषि कहते हैं कि वेद के आदि में एक वर्ण (ॐ) है। यह वर्ण स्वयं में पाँच वर्णों (तत्वों या आयामों) के समन्वय से बना है। यह समन्वय स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक प्रक्रिया है। जब साधक इस आदि-वर्ण के भीतर के पाँचों आयामों को साध लेता है, तब उसे उस 'छठे पद' का अनुभव होता है जो इन सबके अंत में स्थित है। यह छठा पद वह शून्य या पूर्णता है जहाँ पहुँचकर शब्द समाप्त हो जाते हैं और केवल अनुभव शेष रहता है। जो इस छठा पद को जान लेता है, वही वास्तव में 'वेदवित्' है, क्योंकि उसने वेदों के फल को प्राप्त कर लिया है, न कि केवल उनके शब्दों को।

यहाँ 'पाँच वर्ण' और 'छठे पद' का रहस्य यह है कि वेदों का विस्तार तो अनंत है, किन्तु उनका संक्षेप वह एक वर्ण (ॐ) है। जब तक साधक उस वर्ण की आंतरिक परतों को पार नहीं करता, वह केवल 'पठित' है, 'वित्' (ज्ञानी) नहीं।

शास्त्र-साक्ष्य —

कठ उपनिषद्

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १.२.१५ ॥

सब वेद जिस पदका बार-बार वर्णन करते हैं, सब तप जिसे कहते हैं, जिसकी इच्छासे (साधक) ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं — वह पद मैं तुम्हें संक्षेपमें कहता हूँ: वह 'ओम्' है।

कठ उपनिषद् १.२.१५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 66

कठोपनिषद् स्पष्ट करता है कि समस्त वेद जिस एक पद का बार-बार वर्णन करते हैं और जिसकी प्राप्ति के लिए तप तथा ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है, वह संक्षेप में 'ओम्' ही है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि केवल 'ओम्' को जानना पर्याप्त नहीं है, अपितु उस ओम् के भीतर निहित पाँचों आयामों को पार कर उस 'छठे पद' (परम तत्व) में स्थित होना ही वास्तविक वेद-ज्ञान है। जहाँ कठोपनिषद् ॐ को लक्ष्य बताता है, वहीं यह स्मृति उस लक्ष्य के भीतर की सूक्ष्म यात्रा और उसके अंतिम पड़ाव (छठे पद) का संकेत देती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'नाद-योग' और 'अक्षर-साधना' है। साधक जब ॐ का जप करता है, तो वह केवल ध्वनि नहीं करता, बल्कि उस वर्ण के भीतर की सूक्ष्म गतियों का अनुभव करता है।

अभ्यास यह है कि ॐ के उच्चारण और ध्यान के समय, वह उसकी पाँचों अवस्थाओं (जो संभवतः मात्राओं, प्राणों या तत्वों के समन्वय रूप में हों) को अनुभूत करे। जब ये पाँचों आयाम संतुलित और लयबद्ध हो जाते हैं, तब एक गहन मौन या 'छठा पद' प्रकट होता है। यह छठा पद वह 'तुरीय' अवस्था है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है। साधक इस अभ्यास से शब्द-भूमि से ऊपर उठकर अर्थ-भूमि में और अंततः अक्षर-भूमि (परम पद) में प्रविष्ट होता है। यही वह बिंदु है जहाँ वह 'वेदवित्' बनता है, अर्थात वह अब वेदों को पढ़ता नहीं, बल्कि वेदों के रूप में स्वयं को अनुभव करता है।

वेदपारगलक्षणम्

श्लोक ११.१०

अगतिं च गतिं चैव भूतानां विन्दते तु यः ।

प्रकृतीनां विकाराणां स भवेद्वेदपारगः ॥ ११.१० ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

जो भूतोंकी अगति और गति, (और) प्रकृतियों तथा विकारोंको जानता है, वह वेदपारग होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'वेदवित्' की परिभाषा देते हुए उसे प्रणव के षष्ठ पद के ज्ञान से जोड़ा। अब वे 'वेदपारग' शब्द का वास्तविक अर्थ स्पष्ट कर रहे हैं, जो केवल शब्दों के ज्ञान से नहीं, अपितु सृष्टि और जीव के स्वभाव के साक्षात्कार से सिद्ध होता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यः भूतानां गतिं च अगतिं च एव विन्दते, (तथा) प्रकृतीनां विकाराणां (विन्दते), स (पुरुषः) वेदपारगः भवेत्।

पदार्थ:

• भूतानाम्: समस्त चराचर प्राणियों का, या पंचमहाभूतों का।

• गतिम्: गति का अर्थ है—सांसारिक यात्रा, जन्म-मृत्यु का चक्र और वह मार्ग जिससे जीव उच्चतर अवस्था की ओर बढ़ता है।

• अगतिम्: वह अवस्था जहाँ गति रुक जाती है; मोक्ष, स्थिरता या वह जड़ता जिसमें जीव अविद्यावश फँसा रहता है।

• प्रकृतीनाम्: मूल प्रकृतियों का (सत्त्व, रज, तम)।

• विकाराणाम्: प्रकृति के परिवर्तनों का; जैसे बीज से वृक्ष होना, या आत्मा का शरीर और मन के रूप में परिणमन।

• वेदपारगः: वह जो वेदों के पार उतर गया हो। 'पारग' का अर्थ है—नदी के उस पार पहुँचना, अर्थात् शब्दों और कर्मों की नदी को पार कर तत्त्व में स्थित होना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जिसे 'वेदपारग' कहा गया है। सामान्य दृष्टि में वेदपारग उसे माना जाता है जिसने वेदों का संपूर्ण अध्ययन कर लिया हो, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य के लिए वेदों का अध्ययन केवल एक साधन है, साध्य नहीं। साध्य है—सृष्टि के विधान और जीव की स्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव।

यहाँ 'भूतों की गति और अगति' को जानने का अर्थ है—यह समझना कि जीव किन कारणों से एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकता है (गति) और वह कौन सी स्थिति है जहाँ यह भटकन समाप्त हो जाती है (अगति)। जब साधक यह जान लेता है कि आत्मा वास्तव में अचल है, किन्तु संस्कारों के कारण गतिशील प्रतीत होती है, तब वह 'अगति' के रहस्य को समझता है।

साथ ही, 'प्रकृतियों और विकारों' का ज्ञान अनिवार्य है। प्रकृति वह मूल शक्ति है जो निरंतर बदलती रहती है। विकार उस परिवर्तन का नाम है। जो पुरुष यह देख लेता है कि यह सारा संसार केवल प्रकृति का एक खेल है, और वह स्वयं इन विकारों से पृथक एक दृष्टा है, वही वास्तव में वेदों के मर्म को पा सका है। वेदों का सार ही यही है कि जीव प्रकृति के विकारों से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करे। अतः जो इन सूक्ष्म प्रवृत्तियों को जान लेता है, वह वेदों के शब्दों के पार जाकर उस सत्य में स्थित हो जाता है जिसे 'वेदपारग' कहा गया है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'साक्षी भाव' के अभ्यास का निर्देश है। जब साधक अपने भीतर उठने वाले विचारों, भावनाओं और शारीरिक संवेदनाओं को 'प्रकृति के विकार' के रूप में देखना आरम्भ करता है, तब वह उनसे जुड़ना बंद कर देता है।

अभ्यास यह है कि वह अपने मन की 'गति' (चंचलता) और 'अगति' (शून्यता या स्थिरता) का अवलोकन करे। जब वह अनुभव करता है कि वह न तो गति है और न अगति, बल्कि इन दोनों का ज्ञाता है, तब वह 'वेदपारग' की भूमि की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल जगत के मोह से हटाकर सूक्ष्म बोध की ओर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को प्रकृति के परिवर्तनों से ऊपर एक स्थिर चैतन्य के रूप में अनुभव करता है।

पारगलक्षणम्

श्लोक ११.११

पारं गतस्तु तत्त्वानां तत्त्वातीतं तु वेत्ति यः ।

स पारग इति प्रोक्तो न स्वाध्यायस्य पारगः ॥ ११.११ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

जो तत्त्वोंके पार गया है और तत्त्वोंसे परे (तत्त्व) को जानता है, वह पारग कहा गया है — स्वाध्यायका पारग नहीं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'वेदपारग' की परिभाषा देते हुए उसे भूतों की गति-अगति और प्रकृति-विकारों के ज्ञान से जोड़ा। अब वे 'पारग' शब्द की सूक्ष्मता को और अधिक गहराई से खोल रहे हैं, ताकि साधक शब्दों के जाल और स्वाध्याय के अहंकार से मुक्त होकर वास्तविक तत्त्व-साक्षात्कार की ओर बढ़े।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यः तत्त्वानां पारं गतः, (तथा) यः तत्त्वातीतं तु वेत्ति, स पारग इति प्रोक्तः, (सः) स्वाध्यायस्य पारगः न (अस्ति)।

पदार्थ:

• तत्त्वानाम्: पंचमहाभूतों, इंद्रियों, मन और बुद्धि जैसे समस्त भौतिक और सूक्ष्म तत्त्वों का।

• पारं गतः: पार उतर गया है; अर्थात् इन तत्त्वों की सीमा को पहचानकर उनसे ऊपर उठ गया है।

• तत्त्वातीतम्: जो तत्त्वों से परे है; वह निराकार, निर्गुण ब्रह्म या शुद्ध चैतन्य जो इन सभी तत्त्वों का आधार है।

• वेत्ति: जानता है; यहाँ 'जानने' का अर्थ सूचना नहीं, अपितु अनुभव है।

• पारगः: वह जो नदी के उस पार पहुँच गया हो। यहाँ 'नदी' संसार और शब्दों का प्रवाह है।

• स्वाध्यायस्य: वेदों के पाठ, मन्त्रों के उच्चारण और शास्त्र-अध्ययन का।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान की उस अवस्था का वर्णन करता है जहाँ साधक 'जानने' से 'होने' की स्थिति में प्रवेश करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक बहुत बड़ा भेद स्पष्ट कर रहे हैं—अध्ययन और साक्षात्कार का भेद।

श्लोक का प्रथम चरण कहता है—'पारं गतस्तु तत्त्वानां'। इसका अर्थ है कि साधक ने पहले उन तत्त्वों को जाना जिनमें वह स्थित है। उसने देखा कि शरीर पृथ्वी है, प्राण वायु है, मन जल और अग्नि का सम्मिश्रण है, और बुद्धि आकाश है। जब साधक इन तत्त्वों के स्वभाव को पूरी तरह जान लेता है, तब वह पाता है कि वह स्वयं इन तत्त्वों से भिन्न है। तत्त्वों के स्वभाव को जानकर उनसे 'पार' जाना ही वास्तविक योग है।

द्वितीय चरण 'तत्त्वातीतं तु वेत्ति यः' उस परम लक्ष्य की ओर संकेत करता है। तत्त्वों के पार जाने के बाद जो शेष बचता है, वही 'तत्त्वातीत' है। वह वह प्रकाश है जिसके कारण ये सभी तत्त्व प्रकाशित होते हैं। जो इस तत्त्वातीत (परब्रह्म) को अनुभव करता है, वही वास्तव में 'पारग' है।

अंतिम वाक्य 'न स्वाध्यायस्य पारगः' एक कठोर चेतावनी और सत्य है। अक्सर लोग वेदों का बहुत अध्ययन कर लेते हैं, उन्हें कंठस्थ कर लेते हैं, व्याकरण में निपुण हो जाते हैं और स्वयं को 'पारग' समझने लगते हैं। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि केवल स्वाध्याय (पढ़ने-पढ़ाने) में निपुण होना 'पारग' होना नहीं है। शब्दों का पार होना केवल बौद्धिक उपलब्धि है, जबकि तत्त्वों का पार होना आध्यात्मिक उपलब्धि है। शब्द केवल संकेत हैं, वे गंतव्य नहीं हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

छान्दोग्य उपनिषद्

सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मवित् ॥ ७.१.३ ॥

(नारद:) भगवन्, मैं केवल मन्त्रोंका जाननेवाला हूँ, आत्माका जाननेवाला नहीं।

छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.३उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 276

यहाँ नारद मुनि की स्थिति इस स्मृति के वचन की पुष्टि करती है। नारद कहते हैं कि वे 'मन्त्रविद्' (मन्त्रों के ज्ञाता) तो हैं, किन्तु 'आत्मवित्' (आत्मा के ज्ञाता) नहीं हैं। यह स्पष्ट करता है कि शास्त्र-साक्ष्य और मन्त्रों का ज्ञान होना एक बात है, और उस तत्त्व को जानना जिससे मन्त्र उत्पन्न हुए हैं, दूसरी बात। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी अंतर को स्पष्ट कर 'पारग' की सही परिभाषा दे रही है कि मन्त्रों का ज्ञाता केवल विद्वान हो सकता है, किन्तु तत्त्वातीत का ज्ञाता ही पारग है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'विभेकात्मक ज्ञान' का अभ्यास है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह न तो यह स्थूल शरीर है, न प्राण, न मन और न ही बुद्धि। वह इन सभी तत्त्वों के पार जाने का प्रयास करता है।

अभ्यास की विधि यह है कि साधक पहले अपने भीतर के तत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को साक्षी भाव से देखे और फिर यह अनुभव करे कि "मैं इन सबका दृष्टा हूँ, अतः मैं इनसे परे हूँ।" जब साधक शब्दों (स्वाध्याय) के सहारे को छोड़कर सीधे उस 'तत्त्वातीत' चैतन्य में स्थित होता है, तब वह 'पारग' की भूमि पर पहुँचता है।

यहाँ 'नामों' का असली अर्थ रटना नहीं, बल्कि उनमें 'पहुँचना' है। जैसे 'ॐ' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह ध्वनि है जो साधक को तत्त्वों से पार ले जाकर तत्त्वातीत से मिलाती है। इस श्लोक से साधक यह सीखता है कि ज्ञान जब तक केवल मस्तिष्क में है, वह 'स्वाध्याय' है; जब वह हृदय और अनुभव में उतर आता है, तब वह 'पारग' होना है।

जितेन्द्रियलक्षणम्

श्लोक ११.१२

समाम्नायैकदेशं तु गुह्योपनिषदादि च ।

विन्दते पठते चैव ह्यनुतिष्ठति कर्मणा ॥ ११.१२ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

(जो) वेदका एक अंश और गुह्य उपनिषद् आदिको जानता है, पढ़ता है और कर्मसे (उसका) अनुष्ठान करता है —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'पारग' की परिभाषा देते हुए स्पष्ट किया कि वास्तविक पारग वह है जो तत्त्वों के पार जाकर तत्त्वातीत को जान ले। अब वे इस ज्ञान की प्राप्ति के व्यावहारिक मार्ग और उसकी पूर्णता के लक्षणों को बता रहे हैं कि केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं, अपितु शास्त्र, उपनिषद् और आचरण का समन्वय अनिवार्य है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यः) समाम्नायैकदेशं तु विन्दते, पठते च, (तथा) गुह्योपनिषदादि (विन्दते, पठते), च ह्यनुतिष्ठति (तद्) कर्मणा।

पदार्थ:

• समाम्नायैकदेशम्: 'सम' (पूर्ण) + 'आमनाय' (वेद) + 'एकदेशम्' (एक अंश)। यहाँ इसका अर्थ है वेद का वह विशिष्ट भाग जो साधक की पात्रता और उसकी साधना के अनुकूल हो।

• गुह्योपनिषदादि: गुह्य (रहस्यमय) उपनिषदों आदि का ज्ञान। उपनिषद् वे ग्रंथ हैं जो ब्रह्मविद्या का सार हैं और जिन्हें केवल योग्य शिष्यों को ही गुप्त रूप से दिया जाता था।

• विन्दते: जानता है; यहाँ जानने का अर्थ है—विषय का बोध होना।

• पठते: पढ़ता है; इसका अर्थ है निरंतर स्वाध्याय और मन्त्रों का श्रवण-मनन करना।

• अनुतिष्ठति कर्मणा: कर्म के द्वारा अनुष्ठान करता है; अर्थात् जो पढ़ा और जाना, उसे अपने जीवन के आचरण और क्रियाओं में उतारना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान और कर्म के उस सेतु का वर्णन करता है जिसे पार किए बिना मुक्ति संभव नहीं है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल वेद का एक अंश जानना या केवल उपनिषदों का दार्शनिक चिंतन करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ज्ञान की एक त्रयी है—विन्दते (बोध), पठते (स्वाध्याय) और अनुतिष्ठति (आचरण)।

श्लोक का प्रथम भाग 'समाम्नायैकदेशं तु' संकेत करता है कि संपूर्ण वेदों के शब्द-जाल में उलझने के बजाय, साधक को अपनी साधना के अनुसार वेद के उस 'एक अंश' या विशिष्ट विद्या को पकड़ना चाहिए जो उसे परमात्मा की ओर ले जाए। यह 'एक अंश' वह बीज-मन्त्र या वह विद्या है जो साधक के लिए द्वार खोलती है।

तदुपरांत, 'गुह्योपनिषदादि' का उल्लेख है। वेद का बाहरी भाग (कर्मकाण्ड) यदि शरीर है, तो उपनिषद् उसकी आत्मा हैं। 'गुह्य' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो ज्ञान सबके लिए खुला है, वह केवल सूचना है; जो 'गुह्य' है, वह रहस्य है। यह रहस्य केवल शब्दों में नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से अनुभव में उतरता है।

किन्तु, याज्ञवल्क्य यहाँ एक चेतावनी और विधि दोनों दे रहे हैं—'अनुतिष्ठति कर्मणा'। अक्सर साधक केवल 'पठते' (पढ़ने) और 'विन्दते' (जानने) तक सीमित रह जाता है। वह उपनिषदों के महावाक्यों को रट लेता है, किन्तु उसके जीवन में वे नहीं उतरते। महर्षि कहते हैं कि जब तक वह ज्ञान 'कर्मणा' अर्थात् आचरण में परिवर्तित नहीं होता, तब तक वह ज्ञान केवल बोझ है। यहाँ 'कर्म' का अर्थ केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, अपितु ज्ञान के अनुरूप जीवन जीना है। यदि उपनिषद् कहते हैं कि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (सब कुछ ब्रह्म है), तो कर्म का अर्थ होगा—प्रत्येक जीव में उस ब्रह्म का दर्शन करना और वैसा ही व्यवहार करना।

यह श्लोक पिछले श्लोकों की कड़ी को पूर्ण करता है। यदि पिछला श्लोक 'पारग' होने की स्थिति बता रहा था, तो यह श्लोक उस स्थिति तक पहुँचने की विधि बता रहा है। यह वाक्य अगले श्लोक (11.13) तक विस्तृत है, जहाँ इस प्रकार के साधक को 'बहुमते' (मान्य) और 'मुक्तिभाक्' (मुक्ति का भागी) कहा गया है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ज्ञान-योग' और 'कर्म-योग' के समन्वय का अभ्यास है। यहाँ तीन स्तरों पर साधना बताई गई है:

१. विन्दते (बोध): यह संकल्प का स्तर है। साधक यह पहचानता है कि उसके लिए कौन सा मार्ग (वेद का कौन सा अंश) उपयुक्त है। यह 'विवेक' की अवस्था है।

२. पठते (स्वाध्याय): यह मनन का स्तर है। मन्त्रों और उपनिषदों का निरंतर पाठ मन को एकाग्र करता है और चित्त को शुद्ध करता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाता है।

३. अनुतिष्ठति (साक्षात्कार/आचरण): यह अनुभव का स्तर है। जब पढ़ा हुआ मन्त्र और जाना हुआ उपनिषद् साधक के श्वासों और व्यवहार में घुल जाता है, तब वह 'कर्मणा' अनुष्ठान कहलाता है।

साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि केवल शास्त्र-पठन से अहंकार बढ़ता है, किन्तु जब वही शास्त्र आचरण (कर्म) में उतरता है, तब वह अहंकार को मिटाकर साधक को 'जितेन्द्रिय' बनाता है। यह अभ्यास साधक को 'श्रुति' (सुना हुआ) से 'अनुभूति' (अनुभवात्मक सत्य) की भूमि पर ले जाता है।

श्लोक ११.१३

स मे बहुमते(तो) भाति बहुविद्यासुशोभितः ।

स मुक्तिभाक् स एवैकः श्रद्धायुक्तो जितेन्द्रियः ॥ ११.१३ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

— वह बहुत विद्याओंसे सुशोभित (ब्राह्मण) मुझे अत्यन्त मान्य लगता है; वही अकेला मुक्तिका भागी है, श्रद्धायुक्त और जितेन्द्रिय।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि केवल शास्त्र का ज्ञान पर्याप्त नहीं है, अपितु उपनिषदों के गुप्त तत्त्वों को जानकर उन्हें कर्म (आचरण) में उतारना अनिवार्य है। अब वे उस आदर्श साधक के व्यक्तित्व का वर्णन कर रहे हैं, जो ज्ञान और आचरण के इस समन्वय से सुशोभित है और वास्तव में मुक्ति का अधिकारी है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: बहुविद्यासुशोभितः स मे बहुमते भाति। श्रद्धायुक्तः जितेन्द्रियः स एवैकः मुक्तिभाक् (अस्ति), (तस्मात्) स मे बहुमते भाति।

पदार्थ:

• बहुविद्यासुशोभितः: अनेक विद्याओं से सुशोभित। यहाँ 'बहुविद्या' का अर्थ केवल अनेक विषयों का संग्रह नहीं, अपितु ज्ञान के विभिन्न स्तरों (जैसे वैदिका, योगिक और आध्यात्मिक विद्याओं) का साधक के व्यक्तित्व में परिपक्व होना है।

• बहुमते: बहुत मान्य, आदरणीय या श्रेष्ठ।

• भाति: प्रतीत होता है, चमकता है।

• मुक्तिभाक्: मुक्ति का भागी; वह जो बंधन से मुक्त हो चुका है या मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर है।

• एवैकः: 'एव' (ही) + 'एकः' (अकेला)। यह शब्द इस बात पर बल देता है कि केवल वही व्यक्ति वास्तव में मुक्त होता है जिसमें ज्ञान के साथ संयम का मेल हो।

• श्रद्धायुक्तः: श्रद्धा से युक्त। यहाँ श्रद्धा का अर्थ अंधविश्वास नहीं, अपितु उस सत्य में अटूट विश्वास है जिसे उसने अनुभव किया है।

• जितेन्द्रियः: जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक पूर्ण योगी के लक्षणों को उद्घाटित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो साधक विभिन्न विद्याओं से सुशोभित है, वह मुझे अत्यंत मान्य प्रतीत होता है। यहाँ 'सुशोभित' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; विद्या जब तक केवल स्मृति या बौद्धिक संग्रह होती है, वह बोझ होती है, लेकिन जब वह साधक के आचरण, वाणी और स्वभाव में उतर आती है, तब वह 'शोभा' बन जाती है। जैसे पुष्प की सुगंध उसकी शोभा है, वैसे ही विद्या का आचरण में उतरना विद्वान की शोभा है।

किन्तु ऋषि यहाँ एक गंभीर चेतावनी और भेद भी कर रहे हैं। वे कहते हैं कि केवल विद्याओं का संग्रह व्यक्ति को 'विद्वान' तो बना सकता है, परन्तु 'मुक्त' नहीं। मुक्ति का भागी वही 'एक' व्यक्ति होता है जो श्रद्धायुक्त और जितेन्द्रिय है।

श्रद्धा वह सेतु है जो ज्ञान को अनुभव में बदलती है। बिना श्रद्धा के ज्ञान केवल तर्क है, और तर्क कभी मुक्ति नहीं दिला सकता। श्रद्धा का अर्थ है—अपने गुरु के वचनों पर, शास्त्र के मन्त्रों पर और अपनी अंतरात्मा की पुकार पर ऐसा विश्वास कि साधक स्वयं को पूरी तरह उस मार्ग को सौंप दे।

इसके साथ ही 'जितेन्द्रिय' होना अनिवार्य है। इन्द्रियाँ बहिर्मुखी होती हैं और मन को बाहर की ओर खींचती हैं। यदि साधक ने बहुत सी विद्याएँ पढ़ ली हैं, परन्तु उसकी इन्द्रियाँ अभी भी विषयों के अधीन हैं, तो वह ज्ञान केवल अहंकार का पोषण करेगा। जब इन्द्रियाँ वश में होती हैं, तब ज्ञान 'प्रकाश' बनता है और साधक को उस अक्षर (ब्रह्म) की ओर ले जाता है जिसकी चर्चा इस स्मृति के पूर्व अध्यायों में की गई है। अतः, ज्ञान (विद्या), विश्वास (श्रद्धा) और अनुशासन (इन्द्रिय-जय) का यह त्रिकोण ही मुक्ति का एकमात्र द्वार है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'पात्रता' के निर्माण का सूत्र है। योग मार्ग में अक्सर यह भ्रम होता है कि अधिक ग्रंथों का अध्ययन या अधिक मन्त्रों का ज्ञान ही प्रगति है। परन्तु याज्ञवल्क्य जी यहाँ संकेत कर रहे हैं कि 'थोड़ा जानना और उसे पूर्णतः जीना', बहुत कुछ रटने से कहीं श्रेष्ठ है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह अपनी अर्जित विद्या को 'शोभा' में बदले। यदि उसने प्राणायाम सीखा है, तो वह केवल एक क्रिया न रहे, बल्कि उसके स्वभाव में स्थिरता बन जाए। यदि उसने उपनिषदों का अध्ययन किया है, तो वह केवल चर्चा का विषय न रहे, बल्कि उसके हृदय में शांति बनकर उतरे।

इस श्लोक का योगिक अनुभव यह है कि जब ज्ञान (विद्या) श्रद्धा के साथ मिलता है, तो वह 'संकल्प' बनता है, और जब वह संकल्प इन्द्रिय-जय (संयम) के साथ मिलता है, तो वह 'समाधि' की ओर ले जाता है। साधक इस अवस्था में पहुँचता है जहाँ वह बाहरी जगत की विद्याओं का उपयोग तो करता है, परन्तु उनमें बँधता नहीं। वह 'बहुविद्यासुशोभित' होते हुए भी भीतर से 'एक' (अद्वैत) में स्थित रहता है। यही वह भूमि है जहाँ से साधक बंधन से मुक्त होकर 'मुक्तिभाक्' बनता है।

षडङ्गविल्लक्षणम्

श्लोक ११.१४

षडङ्गं षट्पदं वर्णं हृत्पद्मस्थं तु वेद यः ।

षडङ्गवित् स विज्ञेयो नाङ्गयोगी षडङ्गवित् ॥ ११.१४ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

जो हृदयकमलमें स्थित छः अंगों और छः पदोंवाले वर्ण (ॐ) को जानता है, उसे षडङ्गवित् जानना चाहिए — (केवल वेदके) अंगोंका अभ्यासी षडङ्गवित् नहीं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उपनिषदों के ज्ञान और कर्म के समन्वय से सुशोभित, जितेन्द्रिय और श्रद्धायुक्त साधक को ही मुक्ति का वास्तविक अधिकारी बताया। अब वे 'षडङ्गवित्' शब्द की एक ऐसी सूक्ष्म परिभाषा दे रहे हैं, जो बाह्य पाण्डित्य और आन्तरिक साक्षात्कार के भेद को स्पष्ट करती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यः वेद (जानता है) हृत्पद्मस्थं षट्पदं षडङ्गं वर्णं, स विज्ञेयो षडङ्गवित्। नाङ्गयोगी षडङ्गवित्।

पदार्थ:

• हृत्पद्मस्थं: हृदय-कमल में स्थित। यहाँ 'हृत्पद्म' शरीर के भौतिक हृदय का नहीं, अपितु उस सूक्ष्म चैतन्य केंद्र का प्रतीक है जहाँ आत्मा का प्रकाश प्रतिबिंबित होता है।

• षट्पदं: छह पदों वाला। यह उस वर्ण (ॐ) की उस अवस्था का संकेत है जहाँ वह अपने पूर्ण विस्तार में प्रकट होता है।

• षडङ्गं: छह अंगों वाला। सामान्यतः वेदों के छह अंग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) माने जाते हैं, किन्तु यहाँ 'षडङ्ग' का अर्थ उस एक वर्ण (ॐ) के आंतरिक छह आयामों या स्वरूपों से है।

• वर्णं: यहाँ 'वर्ण' का अर्थ अक्षर या ध्वनि है, जो कि प्रणव (ॐ) है।

• विज्ञेयो: जानना चाहिए, जिसे समझा जाना चाहिए।

• नाङ्गयोगी: वह जो केवल (वेद के) अंगों का अभ्यासी है या जो केवल बाह्य अंगों के योग (संयोजन) में लगा है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक 'विद्या' और 'पाण्डित्य' के बीच की एक गहरी रेखा खींचता है। संसार में 'षडङ्गवित्' उसे कहा जाता है जिसने वेदों के छह अंगों (शिक्षा आदि) का अध्ययन कर लिया हो। किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस शब्द को एक नया, आन्तरिक और योगिक अर्थ देते हैं।

वे कहते हैं कि वास्तव में षडङ्गवित् वह है जो हृदय-कमल में स्थित उस 'वर्ण' (ॐ) को जानता है, जिसके स्वयं के छह अंग और छह पद हैं। यहाँ रहस्य यह है कि बाह्य वेदों के छह अंग वास्तव में उस एक अक्षर (ॐ) के ही बाह्य विस्तार हैं। जिस प्रकार एक वृक्ष की शाखाएँ अनेक होती हैं, किन्तु मूल एक ही होता है, वैसे ही वेदों के छह अंग उस एक प्रणव के ही विभिन्न रूप हैं। जो साधक बाह्य अंगों के अध्ययन में उलझा रहता है, वह केवल 'अङ्गयोगी' है—अर्थात वह केवल बाहरी ढांचे या अंगों के साथ योग (जुड़ाव) कर रहा है। वह विद्वान तो हो सकता है, किन्तु 'विज्ञ' (साक्षात्कारी) नहीं।

सच्चा षडङ्गवित् वह है जिसने बाह्य अंगों के माध्यम से यात्रा करते हुए उस केंद्र को पा लिया है जहाँ वह वर्ण (ॐ) अपने छह पदों के साथ हृदय-आकाश में गुंजायमान है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, अपितु अनुभवजन्य है। जब साधक हृदय-कमल में स्थित उस अक्षर के छह आयामों को पहचान लेता है, तब वह वेदों के समस्त ज्ञान के मूल स्रोत से जुड़ जाता है। इस प्रकार, महर्षि याज्ञवल्क्य बाह्य विधि (वेदांग अध्ययन) को मिटाते नहीं, बल्कि उसे एक सीढ़ी बनाकर साधक को उसके गंतव्य—हृदयस्थ अक्षर—तक ले जाते हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

छान्दोग्य उपनिषद्

अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ ८.१.१ ॥

इस ब्रह्मपुर (शरीर) में जो यह छोटा-सा कमल-रूप घर (हृदय) है, उसमें एक छोटा-सा आकाश है; उसके भीतर जो है, उसीको खोजना चाहिए, उसीको जाननेकी इच्छा करनी चाहिए।

छान्दोग्य उपनिषद् ८.१.१उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 292

छान्दोग्य उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि इस शरीर रूपी ब्रह्मपुर में जो छोटा-सा कमल-रूप घर (हृदय) है, उसके भीतर के आकाश में जो स्थित है, उसी को खोजना चाहिए।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी उपनिषद् वाक्य की व्यावहारिक सिद्धि है। जहाँ छान्दोग्य उपनिषद् उस 'दहर पुण्डरीक' (हृदय-कमल) में खोजने का निर्देश देता है, वहीं यह स्मृति बताती है कि वहाँ खोजने योग्य वस्तु वह 'षट्पद वर्ण' (ॐ) है। स्मृति यहाँ यह जोड़ती है कि जब तक खोज बाह्य अंगों (वेदांगों) तक सीमित है, तब तक वह केवल 'अङ्गयोग' है, और जब वह खोज हृदय-कमल के भीतर उस वर्ण तक पहुँच जाती है, तब वह वास्तविक 'षडङ्ग-विद्या' बन जाती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अध्ययन' से 'साक्षात्कार' की ओर संक्रमण का सूत्र है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को बाह्य जगत और बाह्य शास्त्रों के शब्दों से हटाकर हृदय-कमल (दहर पुण्डरीक) में ले जाए।

साधक जब प्रणव (ॐ) का जप करता है, तो वह केवल ध्वनि का उच्चारण नहीं करता, बल्कि उस ध्वनि को हृदय के सूक्ष्म आकाश में स्थित होते हुए अनुभव करता है। 'छः अंगों और छः पदों' का अनुभव वह अवस्था है जहाँ अक्षर अपनी पूर्णता में प्रकट होता है और साधक के चित्त का विलीन होना आरम्भ होता है। यह अभ्यास साधक को 'अक्षर-भूमि' की ओर ले जाता है। जो केवल शास्त्रों के अंगों को रटता है, वह केवल सूचनाओं का संग्रह करता है, किन्तु जो हृदय-स्थ वर्ण को जानता है, वह उस अक्षर में स्थित हो जाता है। इस प्रकार, साधक 'अङ्गयोगी' (बाहरी अभ्यास) से ऊपर उठकर 'षडङ्गवित्' (आन्तरिक दृष्टा) बनता है।

संयमेन वेदाध्ययनप्रशंसा

श्लोक ११.१५

केवलं लोकवृत्त्यर्थं पठितं वृत्तिहेतुकम् ।

कदर्थयति वेदांश्च कुप्रतिग्रहयाजनैः ॥ ११.१५ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

केवल लोकव्यवहार और जीविकाके लिए पढ़ा हुआ (वेद) — (ऐसा पाठक) बुरे दान-ग्रहण और (अयोग्यके) यज्ञ करानेसे वेदोंको अपमानित करता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'षडङ्गवित्' की परिभाषा देते हुए स्पष्ट किया कि वास्तविक ज्ञान बाह्य अंगों के पाण्डित्य में नहीं, अपितु हृदय-कमल में स्थित प्रणव के साक्षात्कार में है। अब वे उस ज्ञान के दुरुपयोग और विद्या के प्रति दूषित दृष्टिकोण के दुष्परिणामों का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यः केवलं लोकवृत्त्यर्थं वृत्तिहेतुकं (वेदं) पठितं, (स) कुप्रतिग्रहया जनैः (सह) कदा (किम्) अर्थयति वेदांश्च।

पदार्थ:

• लोकवृत्त्यर्थं: सांसारिक व्यवहार, सामाजिक प्रतिष्ठा या केवल दुनियादारी के लिए।

• वृत्तिहेतुकम्: जीविका (आजीविका/धनोपार्जन) के साधन के रूप में। यहाँ 'वृत्ति' का अर्थ है—वह साधन जिससे पेट भरा जा सके।

• अर्थयति: यहाँ 'अर्थयति' का अर्थ है—अपमानित करना, मूल्य गिराना या केवल भौतिक लाभ के लिए उपयोग करना (अर्थ के पीछे भागना)।

• कुप्रतिग्रहया: अनुचित या दूषित दान-ग्रहण की रीति से। 'कु' (बुरा) + 'प्रतिग्रह' (ग्रहण करना)।

• जनैः: लोगों के द्वारा (यहाँ उन अयोग्य या लोभी लोगों का संकेत है जिनके लिए ऐसा पाठक कार्य करता है)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक विद्या के 'साध्य' और 'साधन' के बीच के भ्रामक अंतर को उजागर करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ चेतावनी दे रहे हैं कि जब वेद, जो कि साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप हैं, केवल 'वृत्ति' (जीविका) का साधन बन जाते हैं, तो वे ज्ञान नहीं रह जाते, बल्कि एक व्यापार बन जाते हैं।

ऋषि कहते हैं कि वह व्यक्ति जिसने वेदों का अध्ययन केवल इसलिए किया ताकि वह समाज में अपनी स्थिति बना सके या धन कमा सके, वह वास्तव में वेदों का अध्ययन नहीं करता, बल्कि उनका उपभोग करता है। ऐसा पाठक जब 'कुप्रतिग्रह' में लिप्त होता है—अर्थात ऐसे लोगों से दान लेता है जो अधर्मी हैं, या ऐसे लोगों के लिए यज्ञ संपन्न कराता है जिनके हृदय में श्रद्धा नहीं, केवल प्रदर्शन है—तो वह वेदों की गरिमा को नष्ट करता है।

बाहरी विधि के अनुसार, यह श्लोक एक ब्राह्मण या विद्वान के आचरण की मर्यादा बताता है कि उसे अयोग्य और दूषित स्रोतों से धन ग्रहण नहीं करना चाहिए। किन्तु इसका आन्तर अर्थ यह है कि जब साधक की बुद्धि केवल 'अर्थ' (भौतिक लाभ) में अटक जाती है, तो उसकी चेतना का विस्तार रुक जाता है। वेद 'अक्षर' हैं, और अक्षर का अर्थ है जो कभी नष्ट न हो। किन्तु जब वे केवल जीविका का साधन बनते हैं, तो वे 'क्षर' (नष्ट होने वाले) बन जाते हैं। जो ज्ञान केवल पेट भरने के लिए है, वह हृदय के द्वार नहीं खोल सकता।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च । न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥ २.९७ ॥

दूषित भाववालेके लिए वेद, त्याग, यज्ञ, नियम और तप कभी सिद्धि नहीं देते।

मनुस्मृति २.९७मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 180

मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि दूषित भाव वाले व्यक्ति के लिए वेद, त्याग, यज्ञ, नियम और तप कभी सिद्धि नहीं देते। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी भाव को विस्तार देती है। जहाँ मनुस्मृति 'सिद्धि' के अभाव की बात करती है, वहीं याज्ञवल्क्य यह दिखाते हैं कि जीविका के लिए पढ़ा गया वेद न केवल सिद्धि नहीं देता, बल्कि वह वेदों का 'अपमान' (अर्थयति) भी है। दोनों शास्त्रों का मत एक है—विद्या की शक्ति उसके 'भाव' और 'पवित्रता' में है, न कि केवल शब्दों के रटने में।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधक की पात्रता' और 'संकल्प की शुद्धि' का विषय है। साधक जब किसी मन्त्र या विद्या का अभ्यास शुरू करता है, तो उसका 'संकल्प' ही उसकी गंतव्य दिशा तय करता है। यदि संकल्प 'वृत्ति' (लाभ) का है, तो वह अभ्यास केवल मानसिक व्यायाम बनकर रह जाता है; वह योग नहीं बनता।

यहाँ 'कुप्रतिग्रह' का योगिक अर्थ है—अशुद्ध प्रवृत्तियों का ग्रहण करना। यदि साधक अपनी साधना का उपयोग अहंकार की तुष्टि या सांसारिक प्रभाव बढ़ाने के लिए करता है, तो वह अपनी ऊर्जा को नीचे की ओर (अपान की दिशा में) धकेलता है, जिससे उसकी आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती है। साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि वेद और मन्त्र 'साधन' नहीं, बल्कि 'साध्य' के द्वार हैं। जब तक विद्या का उद्देश्य 'स्व' का लाभ है, तब तक वह बंधन है; जब उद्देश्य 'सत्य' का साक्षात्कार है, तभी वह मुक्ति का मार्ग बनती है।

श्लोक ११.१६

असंयमेन येऽधीता न त्रायन्ति कदाचन ।

ऋगेका संयमश्लेन अधीता पारयत्यपि ॥ ११.१६ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

जो (वेद) असंयमसे पढ़े गये हैं, वे कभी रक्षा नहीं करते; संयमशील द्वारा पढ़ी गयी एक ऋचा भी पार लगा देती है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चेतावनी दी थी कि जो व्यक्ति वेदों का अध्ययन केवल जीविका चलाने या सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए करता है, वह वास्तव में वेदों की गरिमा को गिराता है। अब इस श्लोक में वे उस 'पात्रता' के मूल तत्व 'संयम' की चर्चा कर रहे हैं, जिसके बिना वेदों का ज्ञान केवल शब्दों का बोझ है, शक्ति नहीं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ये (वेदाः) असंयमेन ये अधीताः (सन्ति), (ताः) कदाचन न त्रायन्ते। (परन्तु) संयमशलेन अधीताः (एकः) ऋक् (अपि) पारयति।

पदार्थ और निर्वचन:

• असंयमेन: 'संयम' का अर्थ है इंद्रिय-निग्रह, मन का अनुशासन और प्राणों का नियंत्रण। 'असंयम' वह अवस्था है जहाँ ज्ञान तो है, किन्तु उसे धारण करने वाला चरित्र और अनुशासन नहीं है।

• न त्रायन्ते: 'त्रायन्ते' का अर्थ है रक्षा करना या तारना। यहाँ रक्षा का अर्थ केवल भौतिक सुरक्षा नहीं, अपितु संसार के बंधनों और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाना है।

• संयमशलेन: 'शले' शब्द यहाँ संयम की सूक्ष्मता और तीव्रता को दर्शाता है। जिस प्रकार एक सूक्ष्म शलाका गहराई तक प्रवेश करती है, वैसे ही संयमयुक्त अध्ययन हृदय की गहराई तक उतरता है।

• ऋगेका: 'ऋक्' का अर्थ है वेद की एक ऋचा (मंत्र)। 'एका' संख्या है—अर्थात् केवल एक मंत्र।

• पारयत्यपि: 'पारयति' का अर्थ है संसार-सागर से पार उतार देना, मोक्ष प्रदान करना।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ ज्ञान और आचरण के अविभाज्य संबंध को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वेदों का अध्ययन यदि 'असंयम' के साथ किया गया है—अर्थात् यदि साधक अपनी इंद्रियों का दास है, मन विचलित है और प्राण अनियंत्रित हैं—तो वह समस्त ज्ञान संकट के समय निष्फल हो जाता है। ऐसा ज्ञान केवल बौद्धिक विलास है, वह 'त्रायते' नहीं करता। जब मनुष्य माया के जाल में फँसता है या मृत्यु के सम्मुख खड़ा होता है, तब उसकी स्मृति में रटे हुए हज़ारों श्लोक उसे नहीं बचाते, बल्कि उसकी वह 'साधना' बचाती है जो उन श्लोकों के पीछे छिपी थी।

इसके विपरीत, यदि एक साधक ने संयम का पालन किया है, तो उसके द्वारा पढ़ी गई केवल 'एक' ऋचा भी उसे भवसागर से पार उतारने के लिए पर्याप्त है। यहाँ महर्षि यह संकेत दे रहे हैं कि वेदों की शक्ति मात्रा में नहीं, बल्कि उसकी गहराई और साधक की पात्रता में है। एक संयमी व्यक्ति जब एक मंत्र का जप करता है, तो वह मंत्र केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि एक जीवित शक्ति बन जाता है क्योंकि वह संयम के द्वारा संचित प्राण-ऊर्जा से पुष्ट होता है।

अतः, वेदों का अध्ययन केवल कंठस्थ करना नहीं है, बल्कि उन वेदों के मर्म को अपने जीवन में उतारना है। बिना संयम के वेद वैसे ही हैं जैसे बिना आग के ईंधन—दिखने में तो ढेर है, किन्तु ताप (प्रकाश) शून्य है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च । न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥ २.९७ ॥

दूषित भाववालेके लिए वेद, त्याग, यज्ञ, नियम और तप कभी सिद्धि नहीं देते।

मनुस्मृति २.९७मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 180

मनुस्मृति में भी यही भाव व्यक्त किया गया है कि दूषित भाववाले व्यक्ति के लिए वेद, त्याग, यज्ञ और तप कभी सिद्धि नहीं देते। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ एक ही सत्य पर सहमत हैं कि बाहरी क्रिया (पठन, यज्ञ, तप) तब तक निष्फल है जब तक कि आंतरिक भाव और संयम शुद्ध न हो। यदि भाव दूषित है या संयम का अभाव है, तो वेद केवल एक पुस्तक बनकर रह जाते हैं, वे 'विद्या' नहीं बन पाते।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का रहस्य यह है कि 'संयम' ही वह सेतु है जो 'शब्द' को 'अनुभव' में बदलता है। जब साधक असंयमी होता है, तो उसका मन बिखरा हुआ होता है; वह मंत्र पढ़ता तो है, किन्तु वह मंत्र मन की ऊपरी सतह पर तैरता रहता है। वह हृदय तक नहीं पहुँचता, इसलिए वह रक्षा नहीं करता।

परन्तु जब साधक संयम का अभ्यास करता है, तो उसकी मानसिक ऊर्जा केंद्रित हो जाती है। ऐसी स्थिति में जब वह 'एक ऋचा' का उच्चारण करता है, तो वह ध्वनि उसके भीतर के सूर्य (हृदय-ज्योति) से जुड़ जाती है। योगिक अभ्यास में इसे 'शब्द-ब्रह्म' का साक्षात्कार कहते हैं। साधक यहाँ इस अनुभव से गुजरता है कि हज़ारों ग्रंथों को पढ़ने से अधिक प्रभावशाली वह एक मंत्र है, जिसे पूर्ण संयम और एकाग्रता के साथ जपा गया हो। यह अभ्यास साधक को 'बौद्धिक ज्ञान' की भूमि से उठाकर 'अनुभवात्मक ज्ञान' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ एक अक्षर भी मोक्ष का द्वार खोल देता है।

श्लोक ११.१७

आमपात्रे यथा न्यस्तमापो मधु घृतं पयः ।

नश्यन्ति पात्रदौर्बल्याच्च रसास्तस्य भाजनम् ॥ ११.१७ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

जैसे कच्चे घड़ेमें रखे जल, मधु, घी और दूध पात्रकी दुर्बलतासे नष्ट हो जाते हैं, और रस (भी, तथा) उसका पात्र (भी) —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि असंयम से किया गया अध्ययन रक्षा नहीं करता, जबकि संयमयुक्त एक ऋचा भी साधक को पार लगा देती है। अब वे इस सत्य को एक दृष्टान्त के माध्यम से समझा रहे हैं कि ज्ञान की रक्षा ज्ञान स्वयं नहीं, अपितु उसे धारण करने वाला 'पात्र' (साधक का व्यक्तित्व) करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: आमपात्रे यथा मधु, घृतं, पयः, अपो न्यस्तम्, (तथा) पात्रदौर्बल्याच्च रसाः तस्य (एवं) भाजनम् (अपि) नश्यन्ति।

पदार्थ और निर्वचन:

• आमपात्रे: 'आम' का अर्थ है कच्चा, जो अग्नि द्वारा पकाया न गया हो। यहाँ 'आमपात्र' वह साधक है जिसने तप और संयम की अग्नि में स्वयं को तपाकर परिपक्व नहीं किया है।

• मधु, घृतं, पयः, अपो: ये चार पदार्थ—मधु (शहद), घृत (घी), पय (दूध) और अप (जल)—सर्वोत्तम रसों और पोषक तत्वों के प्रतीक हैं। यहाँ ये वेदों के गूढ़ रहस्यों, मन्त्रों की शक्ति और आध्यात्मिक अनुभवों के प्रतीक हैं।

• न्यस्तम्: रखे हुए या स्थापित।

• पात्रदौर्बल्याच्च: 'पात्र-दौर्बल्य' अर्थात् पात्र की कमजोरी के कारण। यहाँ दौर्बल्य का अर्थ शारीरिक कमजोरी नहीं, अपितु मानसिक अस्थिरता, इंद्रिय-असंयम और चारित्रिक दुर्बलता है।

• रसास्तस्य: उसके रस (मधु, घी आदि)।

• भाजनम्: वह पात्र या बर्तन।

• नश्यन्ति: नष्ट हो जाना, रिस जाना या व्यर्थ हो जाना।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार एक कच्चा घड़ा, जो अग्नि में तपकर कठोर नहीं हुआ है, वह जल या मधु को धारण करने में असमर्थ होता है; उसमें रखे हुए बहुमूल्य रस धीरे-धीरे रिसकर बाहर निकल जाते हैं और अंततः वह कच्चा घड़ा स्वयं भी गलकर नष्ट हो जाता है, ठीक वैसे ही असंयमी साधक की स्थिति होती है।

इस श्लोक में 'मधु, घृत, पय और अप' केवल खाद्य पदार्थ नहीं हैं, बल्कि वे 'विद्या' के विभिन्न स्तर हैं। वेद का ज्ञान मधु की भाँति मधुर है, घी की भाँति ओजस्वी है, दूध की भाँति पवित्र है और जल की भाँति जीवनदायी है। किन्तु, यदि साधक का व्यक्तित्व (पात्र) 'आम' है—अर्थात् वह अभी भी वासनाओं, क्रोध और मोह के कच्चेपन में है—तो वह इस उच्च ज्ञान को धारण नहीं कर पाएगा।

यहाँ एक गंभीर चेतावनी है: "रसास्तस्य भाजनम् नश्यन्ति"। जब पात्र दुर्बल होता है, तो केवल रस (ज्ञान) ही नष्ट नहीं होता, बल्कि वह पात्र (साधक का स्वयं का अस्तित्व और उसकी पात्रता) भी नष्ट हो जाता है। जो व्यक्ति उच्च विद्या का अध्ययन तो करता है, किन्तु उसे आचरण में नहीं उतारता, वह ज्ञान उसके भीतर अहंकार का विष भर देता है, जिससे उसका मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक पतन निश्चित हो जाता है। अतः ज्ञान का अर्जन करने से पूर्व 'पात्र' को पकाना, अर्थात् स्वयं को संयम और तप से सुदृढ़ करना अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'पात्रता' के निर्माण का अभ्यास है। योग में ज्ञान का अर्थ केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि 'धारण' शक्ति का विकास है।

१. तप की अग्नि: जिस प्रकार मिट्टी का घड़ा अग्नि में तपकर 'पक्व' (पका हुआ) होता है, वैसे ही साधक को प्राणायाम, नियम और संयम की अग्नि में स्वयं को तपाना पड़ता है। बिना तप के प्राप्त ज्ञान 'आम' रहता है, जो केवल बौद्धिक विलास है, योग नहीं।

२. धारण शक्ति: साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि यदि उसका मन चंचल है और प्राण अस्थिर हैं, तो वह गहन ध्यान या मन्त्रों के प्रभाव को हृदय में रोक नहीं पाएगा। वह ज्ञान रिसकर बाहर निकल जाएगा।

३. अभ्यास: साधक को चाहिए कि वह पहले अपनी 'भाजन' (इंद्रियों और मन) की दुर्बलता को पहचाने। वह यह देखे कि कहाँ से उसका संयम रिस रहा है। जब तक पात्र (चरित्र और संकल्प) दृढ़ नहीं होता, तब तक उच्च विद्याओं का संचय करना जोखिम भरा है।

यह श्लोक साधक को 'सूचना' से 'अनुभूति' की ओर ले जाने के लिए पहले 'संयम' की भूमि तैयार करने का निर्देश देता है। यह अगले श्लोक (११.१८) की भूमिका है, जहाँ यह बताया जाएगा कि अपात्र के संयोग से विद्या कैसे अपवित्र हो जाती है।

श्लोक ११.१८

एवं ह्यपात्रसंयोगात्तदधीतं विनश्यति ।

पात्रदोषेण संदुष्टमपवित्रं भविष्यति ॥ ११.१८ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२३

— वैसे ही अपात्रके संयोगसे वह पढ़ा हुआ (वेद) नष्ट हो जाता है; पात्रके दोषसे दूषित होकर अपवित्र हो जायेगा।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने कच्चे घड़े के दृष्टान्त से यह समझाया कि जिस प्रकार अग्नि में न तपा हुआ पात्र रसों को धारण नहीं कर सकता, वैसे ही असंयमी साधक वेदों के मन्त्रों और उनके प्रभाव को अपने भीतर सुरक्षित नहीं रख पाता। अब इस श्लोक में वे उस दृष्टान्त का निष्कर्ष निकालते हुए यह बता रहे हैं कि ज्ञान का नष्ट होना केवल उसकी हानि नहीं, अपितु ज्ञान का दूषित और अपवित्र हो जाना है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: एवं ह्यपात्र-संयोगात् तदधीतं विनश्यति। पात्र-दोषेण संदुष्टम् (तदधीतं) अपवित्रं भविष्यति।

पदार्थ और निर्वचन:

• एवं: इस प्रकार (पिछले श्लोक के कच्चे घड़े के दृष्टान्त के अनुसार)।

• अपात्र-संयोगात्: 'अपात्र' वह है जो ज्ञान को धारण करने के योग्य नहीं है—अर्थात् जिसमें संयम, श्रद्धा और चरित्र की शुद्धि नहीं है। 'संयोग' का अर्थ है यहाँ उस ज्ञान का ऐसे व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया जाना।

• तदधीतं: वह पढ़ा हुआ (वेद या शास्त्र)।

• विनश्यति: नष्ट हो जाता है। यहाँ नष्ट होने का अर्थ केवल भूल जाना नहीं, अपितु मन्त्रों की शक्ति (सिद्धी) का समाप्त हो जाना है।

• पात्र-दोषेण: साधक के भीतर विद्यमान दोषों (काम, क्रोध, लोभ, मोह और असंयम) के कारण।

• संदुष्टम्: दूषित या विकृत। जब शुद्ध ज्ञान अशुद्ध मन में प्रवेश करता है, तो वह मन के विकारों के अनुसार मुड़ जाता है।

• अपवित्रं भविष्यति: अपवित्र हो जाएगा। वेद स्वयं पवित्र हैं, किन्तु जब वे अपात्र के माध्यम से लोक-व्यवहार या स्वार्थ के लिए प्रयुक्त होते हैं, तो उनकी गरिमा नष्ट हो जाती है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ ज्ञान के 'धारण' और 'उपयोग' के बीच के सूक्ष्म भेद को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वेद या मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं हैं, अपितु वे सूक्ष्म ऊर्जा और दैवीय स्पंदन हैं। जब कोई साधक बिना संयम के, केवल बौद्धिक विलास या जीविका के लिए वेदों का अध्ययन करता है, तो वह 'अपात्र' कहलाता है। ऐसे अपात्र के संयोग में आने पर वह अध्ययन 'विनश्यति' अर्थात् नष्ट हो जाता है।

यहाँ 'नष्ट' होने का अर्थ यह है कि मन्त्र का वह प्रभाव समाप्त हो जाता है जो साधक को मोक्ष या आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जा सके। जिस प्रकार कच्चे घड़े से जल रिसकर मिट्टी में मिल जाता है और न जल बचता है न घड़ा, वैसे ही असंयमी के भीतर मन्त्रों की शक्ति रिसकर इंद्रिय-भोगों और सांसारिक कामनाओं में विलीन हो जाती है।

इससे भी अधिक गंभीर बात महर्षि यह कहते हैं कि ज्ञान केवल नष्ट नहीं होता, बल्कि 'संदुष्ट' और 'अपवित्र' हो जाता है। इसका भाव यह है कि जब एक उच्च कोटि का ज्ञान (वेद) एक निम्न कोटि के संस्कार वाले व्यक्ति (अपात्र) के पास जाता है, तो वह व्यक्ति उस ज्ञान का प्रयोग अपने अहंकार की तुष्टि, दूसरों को नीचा दिखाने या अनुचित धनार्जन के लिए करने लगता है। इस प्रकार, जो ज्ञान मुक्ति का साधन था, वही अब बंधन का कारण बन जाता है। ज्ञान स्वयं पवित्र है, किन्तु पात्र के दोष के कारण उसका 'प्रकटीकरण' अपवित्र हो जाता है। यह उसी प्रकार है जैसे शुद्ध गंगाजल यदि किसी गंदे पात्र में डाला जाए, तो वह जल अपनी पवित्रता खोकर पात्र की गंदगी को ग्रहण कर लेता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'पात्र' का अर्थ है—संयम से पका हुआ मन। मन वह पात्र है जिसमें ज्ञान का अमृत रखा जाता है। यदि मन वासनाओं और चंचलता से भरा है, तो वह 'आमपात्र' (कच्चा घड़ा) है। साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास यह है कि वह ज्ञान के संचय से अधिक 'पात्र-शुद्धि' पर ध्यान दे।

साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि मन्त्रों का जप या वेदों का पाठ केवल जीभ का व्यायाम नहीं है, अपितु वह हृदय के पात्र को शुद्ध करने की प्रक्रिया है। जब साधक संयम (इंद्रिय-निग्रह) का अभ्यास करता है, तब उसका मन 'अग्नि' (तप) में तपकर कठोर और सुदृढ़ होता है। ऐसा सुदृढ़ मन ही 'पात्र' बनता है, जिसमें ज्ञान रिसता नहीं, बल्कि संचित होता है।

अभ्यास यह है कि साधक स्वयं से पूछे—"क्या मेरा मन इस ज्ञान को धारण करने योग्य है?" यदि अध्ययन के बाद भी क्रोध, अहंकार और लोभ बढ़ रहा है, तो यह संकेत है कि पात्र दोषपूर्ण है और ज्ञान अपवित्र हो रहा है। अतः, मन्त्रों की शक्ति को जाग्रत रखने के लिए संयम का अभ्यास अनिवार्य है। जो साधक अपने मन को संयम की अग्नि में तपाता है, उसके लिए एक ऋचा भी पर्याप्त होती है, क्योंकि उसका पात्र अब 'पका हुआ' और 'अक्षय' है।

श्लोक ११.१९

न वेदबलमाश्रित्य पापं कर्म समाचरेत् ।

अज्ञानाद्धि कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति ॥ ११.१९ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२४

वेदके बलका सहारा लेकर पापकर्म न करे; अज्ञानसे किया गया पाप ही वेदाभ्याससे शुद्ध होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि जिस प्रकार कच्चे घड़े में रस नहीं ठहरते, वैसे ही असंयमी व्यक्ति के भीतर वेदों का ज्ञान टिक नहीं पाता और अपवित्र हो जाता है। अब इस श्लोक में वे एक अत्यंत गंभीर चेतावनी दे रहे हैं कि वेद-ज्ञान को अपनी ढाल बनाकर अधर्म के मार्ग पर चलना आत्मघातक है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: न वेदबलम् आश्रित्य पापं कर्म समाचरेत्। अज्ञानात् कृतं पापं (तु) वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति।

पदार्थ और निर्वचन:

• वेदबलम्: वेदों का प्रभाव, उनकी शक्ति या यह अहंकार कि "मैं वेदों का ज्ञाता हूँ"।

• आश्रित्य: सहारा लेकर या आश्रय लेकर। यहाँ इसका अर्थ है—ज्ञान के अहंकार को सुरक्षा-कवच मान लेना।

• पापं कर्म: वह कर्म जो प्रकृति के विरुद्ध हो, जो आत्म-स्वरूप को ढक दे या जो दूसरों के धर्म का हनन करे।

• समाचरेत्: आचरण करे या करे। (विधिलिङ् का प्रयोग यहाँ निषेध के साथ 'न' के कारण चेतावनी के रूप में हुआ है)।

• अज्ञानात्: अज्ञान के कारण। वह स्थिति जहाँ साधक को सही-गलत का विवेक नहीं था।

• वेदाभ्यासेन: वेदों के निरंतर अध्ययन, मनन और उनके मन्त्रों के अनुष्ठान से।

• शुद्ध्यति: शुद्ध होता है। यहाँ पाप का क्षय और चित्त की शुद्धि दोनों का संकेत है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में ज्ञान के दुरुपयोग और उसकी उपचारात्मक शक्ति के बीच का भेद बता रहे हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि कुछ लोग शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद यह अहंकार पाल लेते हैं कि अब वे 'वेदवित्' हो गए हैं, अतः अब वे जो भी करेंगे, वह शास्त्र-सम्मत होगा या उनके ज्ञान का प्रभाव उनके पापों को स्वतः नष्ट कर देगा। ऋषि चेतावनी देते हैं कि वेद के बल का आश्रय लेकर पापकर्म करना सबसे बड़ा अपराध है।

वेद केवल शब्द नहीं, अपितु एक 'शक्ति' (बल) हैं। जब कोई व्यक्ति जानबूझकर, यह सोचकर पाप करता है कि "मैं तो ज्ञानी हूँ, मुझे कुछ नहीं होगा", तो वह ज्ञान उसके लिए सुरक्षा-कवच नहीं, बल्कि उसके पतन का कारण बन जाता है। ऐसा ज्ञान 'अपात्र' के संयोग जैसा है, जो साधक को और अधिक अंधा कर देता है।

किन्तु, ऋषि यहाँ करुणा का द्वार भी खोलते हैं। वे कहते हैं कि यदि किसी ने 'अज्ञान' वश पाप किया है—अर्थात् जिसे यह बोध नहीं था कि यह कर्म आत्म-हानि कारक है—तो ऐसा पाप वेदाभ्यास से शुद्ध हो सकता है। यहाँ 'वेदाभ्यास' का अर्थ केवल पठन नहीं, अपितु वेदों के मन्त्रों का वह आंतरिक जप और मनन है जो चित्त के मलों को धो देता है। जब अज्ञानी व्यक्ति ज्ञान के प्रकाश में आता है, तो उसका पश्चात्ताप और शुद्ध ज्ञान का अभ्यास उसके पुराने संस्कारों (पापों) को भस्म कर देता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विवेक' और 'शुद्धि' का अभ्यास है। योग में पाप का अर्थ केवल सामाजिक अपराध नहीं, अपितु वे मानसिक विकार हैं जो साधक को उसकी मूल प्रकृति से दूर ले जाते हैं।

साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि ज्ञान (वेद) एक अग्नि के समान है। यदि यह अग्नि संयम के साथ जलाई जाए, तो यह अज्ञान के पापों को जलाकर भस्म कर देती है। किन्तु यदि इसी अग्नि का प्रयोग अहंकार की तुष्टि के लिए किया जाए, तो यह साधक के अपने ही आध्यात्मिक आधार को जला देती है।

अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के 'अज्ञान' को पहचाने और वेदाभ्यास (मन्त्रों के आंतरिक गुंजन और उनके अर्थ के मनन) के माध्यम से चित्त की शुद्धि करे। जब साधक यह अनुभव करता है कि वह स्वयं कुछ नहीं है, केवल वह 'अक्षर' (ॐ) ही सत्य है, तब उसका अहंकार मिट जाता है और अज्ञानजन्य पाप स्वतः विलीन हो जाते हैं। यह श्लोक साधक को 'ज्ञान के अहंकार' से हटाकर 'ज्ञान की विनम्रता' की भूमि पर ले जाता है।

श्लोक ११.२०

आचारहीनं न पुनन्ति वेदा

यद्यप्यधीताः सह षड्भिरङ्गैः ।

छन्दांस्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति

नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ॥ ११.२० ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२४

(वसिष्ठ ६.३:) आचारहीनको वेद पवित्र नहीं करते, चाहे छहों अंगों सहित पढ़े गये हों; मृत्युके समय छन्द उसे वैसे छोड़ देते हैं, जैसे पंख निकल आनेपर पक्षी घोंसलेको।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में यह स्पष्ट किया गया कि वेद-बल का अहंकार लेकर पापकर्म करना विनाशकारी है और केवल अज्ञानवश किए गए पाप ही वेदाभ्यास से शुद्ध होते हैं। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस बात को और अधिक गहराई से समझा रहे हैं कि यदि आचरण शुद्ध नहीं है, तो वेदों का केवल बौद्धिक ज्ञान या शास्त्रीय दक्षता किसी काम की नहीं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: आचारहीनं वेदा न पुनन्ति, यद्यपि (ते) सह षड्भिरङ्गैः अधीताः (भवन्ति)। जातपक्षाः शकुन्ता इव नीडं (त्यजन्ति), एवं छन्दांसि मृत्युकाले एनं त्यजन्ति।

पदार्थ और निर्वचन:

• आचारहीनं: वह व्यक्ति जिसका आचरण शास्त्र-सम्मत नहीं है, जो संयमशून्य है और जिसके कर्म उसके ज्ञान के विपरीत हैं।

• न पुनन्ति: पवित्र नहीं करते। 'पुन' धातु का अर्थ है शुद्ध करना या धोना। यहाँ अर्थ है कि वेद-ज्ञान उस व्यक्ति के चित्त के मैल को नहीं धो पाता।

• सह षड्भिरङ्गैः: वेदों के छह अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष) के साथ। यह पूर्ण शास्त्रीय दक्षता का प्रतीक है।

• छन्दांसि: यहाँ 'छन्द' का अर्थ केवल काव्य-लक्षण नहीं, अपितु वेदों के मन्त्र और उनकी वह शक्ति है जो साधक को उच्च लोकों में ले जाती है।

• मृत्युकाले: प्राण त्यागने के समय, जब केवल अनुभव और संस्कार साथ रहते हैं, शब्द नहीं।

• नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः: जैसे पंख विकसित हो जाने पर पक्षी घोंसले को छोड़ देता है, वैसे ही मन्त्र साधक को छोड़ देते हैं।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत कठोर सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वेद केवल शब्दों का समूह या सूचनाओं का संग्रह नहीं हैं, बल्कि वे 'जीवंत ऊर्जा' हैं। यदि कोई व्यक्ति वेदों को उनके छहों अंगों (षडङ्ग) सहित पूर्णता से पढ़ ले, व्याकरण और ज्योतिष में निपुण हो जाए, किंतु उसका आचरण (आचार) दूषित रहे, तो वह ज्ञान उसके लिए केवल एक बौद्धिक बोझ है। वह ज्ञान उसे पवित्र नहीं कर सकता क्योंकि पवित्रता 'पठन' से नहीं, बल्कि 'पाटन' (अहंकार के गिरने) और 'आचरण' से आती है।

ऋषि यहाँ एक विलक्षण दृष्टान्त देते हैं—पक्षी और घोंसले का। घोंसला पक्षी के लिए तब तक आवश्यक है जब तक उसके पंख नहीं आते। पंख आते ही घोंसला निरर्थक हो जाता है और पक्षी उसे त्याग कर अनंत आकाश की ओर उड़ जाता है। इसी प्रकार, वेदों के मन्त्र (छन्द) साधक के लिए एक 'नीड़' या आधार की तरह होते हैं, जो उसे सत्य की ओर ले जाने का साधन बनते हैं। किंतु, यदि साधक ने अपने जीवन में 'संयम' और 'शुद्ध आचरण' के पंख विकसित नहीं किए, तो मृत्यु के समय—जब बाहरी इंद्रियाँ और बौद्धिक तर्क समाप्त हो जाते हैं—वे मन्त्र उसे सहारा नहीं देते। वे उसे वैसे ही त्याग देते हैं जैसे विकसित पंखों वाला पक्षी पुराने घोंसले को छोड़ देता है।

भाव यह है कि मन्त्रों की शक्ति केवल उनके उच्चारण में नहीं, बल्कि उनके अनुरूप जीने में है। जो मन्त्रों को केवल जीभ पर रखता है, हृदय में नहीं, वह अंत समय में स्वयं को अकेला पाता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से, वेदों का अध्ययन 'साधन' है और आचरण 'साधना' है। षडङ्गों का ज्ञान स्थूल बुद्धि का विस्तार है, किंतु आचार की शुद्धि सूक्ष्म शरीर का परिष्कार है। साधक जब मन्त्रों का जप करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर एक ऊर्जा-केंद्र (नीड़) बना रहा होता है। यदि उसका आचरण शुद्ध है, तो वह मन्त्र उसके भीतर 'संयम' के पंख विकसित करता है, जिससे वह मृत्यु के समय देह और नाम-रूप के बंधन से मुक्त होकर 'अक्षर' की ओर उड़ जाता है।

परंतु, यदि आचरण दूषित है, तो वह मन्त्र केवल एक बाहरी आवरण बनकर रह जाता है। मृत्यु के समय जब प्राण शरीर छोड़ते हैं, तब केवल वही संस्कार साथ जाते हैं जिन्हें हमने आचरण में उतारा है। जो केवल पढ़ा गया, वह स्मृति के साथ नष्ट हो जाता है। अतः साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह पढ़े हुए एक-एक शब्द को अपने व्यवहार में उतारे, ताकि मन्त्र उसके लिए बोझ नहीं, बल्कि उसे ऊपर उठाने वाले पंख बन जाएँ।

श्लोक ११.२१

गायत्रीमात्रसंतुष्टः श्रेयान् विप्रः सुयन्त्रितः ।

नायन्त्रितश्चतुर्वेदः सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥ ११.२१ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२४

(मनु २.११८:) केवल गायत्री जाननेवाला, (पर) संयमी विप्र श्रेष्ठ है — न कि असंयमी चारों वेदोंका ज्ञाता, जो सब कुछ खाता और सब कुछ बेचता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह चेतावनी दी कि आचारहीन व्यक्ति के लिए वेदों का ज्ञान वैसा ही निष्फल है जैसे पंख आने पर पक्षी घोंसले को त्याग देता है। अब वे इस विचार को और सूक्ष्म करते हुए यह बता रहे हैं कि ज्ञान की मात्रा से अधिक ज्ञान का संयम महत्वपूर्ण है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: सुयन्त्रितः विप्रः गायत्रीमात्रसंतुष्टः श्रेयान् (भवति), (परन्तु) सर्वाशी सर्वविक्रयी नायन्त्रितः चतुर्वेदः (न श्रेयान् भवति) ।

पदार्थ और निर्वचन:

• गायत्रीमात्रसंतुष्टः: वह जो केवल गायत्री मन्त्र के ज्ञान और उसके अनुभव में ही संतुष्ट है। यहाँ 'संतुष्ट' का अर्थ है—जिसने गायत्री के सार को आत्मसात कर लिया हो और उसे किसी अन्य बाहरी विस्तार की आवश्यकता न रही हो।

• सुयन्त्रितः: जिसका मन, प्राण और इन्द्रियाँ पूरी तरह वश में हों। 'यन्त्र' का अर्थ है वह अनुशासन जिससे चंचल मन को एक दिशा में स्थिर किया जा सके।

• श्रेयान्: श्रेष्ठ या कल्याणकारी।

• नायन्त्रितः: असंयमी; जिसकी वृत्तियाँ अनियंत्रित हैं और जो इन्द्रिय-भोगों के अधीन है।

• चतुर्वेदः: चारों वेदों (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व) का ज्ञाता। यहाँ यह शब्द केवल किताबी ज्ञान या पाण्डित्य का प्रतीक है।

• सर्वाशी: 'सर्व' + 'आशी' (खाने वाला)। वह जो केवल भौतिक अन्न ही नहीं, अपितु दूसरों के दोषों, धन और वासनाओं का भी भक्षी है।

• सर्वविक्रयी: वह जो अपने ज्ञान का विक्रय करता है; जो सत्य और धर्म को लोभ या स्वार्थ के लिए बेच देता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पाण्डित्य और पात्रता के बीच का मौलिक भेद स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई विप्र केवल एक मन्त्र—गायत्री—को जानता है, किन्तु वह 'सुयन्त्रित' है, तो वह उस व्यक्ति से कहीं अधिक श्रेष्ठ है जिसने चारों वेदों का अध्ययन किया है परन्तु वह 'नायन्त्रित' है।

यहाँ 'गायत्रीमात्रसंतुष्ट' होने का गहरा अर्थ है। गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु समस्त वेदों का सार है। जब साधक गायत्री के माध्यम से उस 'भर्ग' (दिव्य ज्योति) का साक्षात्कार कर लेता है, तो वह ज्ञान के उस शिखर पर पहुँच जाता है जहाँ बाहरी विस्तार गौण हो जाता है। याज्ञवल्क्य जी का संकेत है कि ज्ञान का मूल्य इस बात में नहीं है कि आपने कितना पढ़ा है, बल्कि इस बात में है कि आपने पढ़े हुए को अपने जीवन में कितना उतारा है।

इसके विपरीत, 'चतुर्वेदी' होने पर भी यदि व्यक्ति असंयमी है, तो वह ज्ञान उसके लिए बोझ या अहंकार का कारण बन जाता है। 'सर्वाशी' और 'सर्वविक्रयी' शब्दों के माध्यम से ऋषि उस विप्र की निंदा कर रहे हैं जिसने वेदों को केवल जीविका का साधन बना लिया है। जो व्यक्ति अपने ज्ञान का व्यापार करता है और लोभवश किसी भी प्रकार के भौतिक सुखों का भक्षी बन जाता है, उसके भीतर का 'वेद' मृत हो जाता है। ऐसा व्यक्ति वेदों का ज्ञाता तो हो सकता है, किन्तु वह 'वेदवित्' (वेदों का वास्तव में जानने वाला) नहीं है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

सावित्रीमात्रसारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः । नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥ २.११८ ॥

केवल सावित्री (के ज्ञान) को सार माननेवाला भी, भली-भाँति संयमी विप्र श्रेष्ठ है; पर तीनों वेद जाननेवाला भी असंयमी, सब कुछ खानेवाला, सब कुछ बेचनेवाला (श्रेष्ठ) नहीं।

मनुस्मृति २.११८मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 250

मनुस्मृति में भी यही भाव व्यक्त किया गया है कि केवल सावित्री (गायत्री) के ज्ञान को सार मानने वाला संयमी विप्र श्रेष्ठ है, जबकि तीनों वेदों का ज्ञाता होने पर भी असंयमी व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं माना जाता। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ मनु के मत की पुष्टि करती है और उसे और विस्तार देती है। मनु जहाँ 'त्रिवेद' की बात करते हैं, वहाँ याज्ञवल्क्य 'चतुर्वेद' का उल्लेख कर यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान चाहे कितना भी व्यापक क्यों न हो, बिना संयम के वह शून्य है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'अल्प-ज्ञान-पूर्ण-अनुभव' बनाम 'पूर्ण-ज्ञान-शून्य-अनुभव' का द्वन्द्व है। साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह ज्ञान के विस्तार के पीछे भागने के बजाय, एक ही मन्त्र या एक ही तत्त्व की गहराई में उतरे।

गायत्री का जप जब 'सुयन्त्रित' मन से किया जाता है, तो वह केवल वाणी का उच्चारण नहीं रहता, बल्कि प्राणों का एक लयबद्ध प्रवाह बन जाता है। जब साधक गायत्री के 'तत्' और 'यत्' के सम्बन्ध को अनुभव करता है, तो उसका चित्त स्थिर हो जाता है। यह स्थिरता ही 'संयम' है।

एक असंयमी चतुर्वेदी का मन बिखरा हुआ है; उसकी ऊर्जा अनेक दिशाओं में नष्ट हो रही है (सर्वाशी)। इसके विपरीत, गायत्री में संतुष्ट संयमी का मन एकनिष्ठ है। वह 'एकं' को जानता है। साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि साधना में 'एकत्व' का महत्व 'बहुत्व' से अधिक है। जो एक मन्त्र को जी लेता है, वह समस्त वेदों के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक ११.२२

न विद्यया केवलया तपसा वा पवित्रता ।

यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्धि पात्रं प्रचक्षते ॥ ११.२२ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२४

न केवल विद्यासे, न (केवल) तपसे पवित्रता होती है; जहाँ (सदा)चार और ये दोनों हों, उसीको पात्र कहते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि चारों वेदों के पाण्डित्य से अधिक मूल्यवान एक संयमी विप्र का गायत्री-संतोष है। अब वे इस संयम के स्वरूप को और अधिक विस्तार देते हुए यह बता रहे हैं कि केवल बौद्धिक ज्ञान या केवल शारीरिक-मानसिक तपस्या पर्याप्त नहीं है, अपितु पात्रता के लिए एक त्रिकोणीय समन्वय आवश्यक है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: न केवलया विद्यया, न (केवल) तपसा पवित्रता (भवति) । यत्र वृत्तमिमे चोभे (विद्या तपश्च) वृत्तम्, तद्धि पात्रं प्रचक्षते ।

पदार्थ और निर्वचन:

• विद्यया: यहाँ विद्या का अर्थ केवल शास्त्रों का पाठ नहीं, अपितु उस ज्ञान से है जो साधक को सत्य की ओर ले जाए।

• तपसा: तप का अर्थ है इंद्रिय-निग्रह, अनुशासन और कठिन साधना। यह वह अग्नि है जो अशुद्धियों को जलाती है।

• पवित्रता: शुद्धता या शुद्धि। यहाँ पवित्रता का अर्थ केवल बाह्य स्वच्छता नहीं, अपितु चित्त की वह निर्मलता है जिसमें आत्मा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई दे।

• वृत्तम्: सदाचार, आचरण या चरित्र। 'वृत्त' का अर्थ है वह जीवन-शैली जो शास्त्र-सम्मत हो और जिसमें कथनी और करनी की एकता हो।

• पात्रं: योग्य व्यक्ति। जिस प्रकार एक सुदृढ़ और स्वच्छ पात्र ही बहुमूल्य रस को धारण कर सकता है, उसी प्रकार केवल 'पात्र' व्यक्ति ही ब्रह्म-विद्या को धारण कर सकता है।

• प्रचक्षते: कहा जाता है या संज्ञा दी जाती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पात्रता की अनिवार्य शर्त निर्धारित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि पवित्रता—जो कि मोक्ष और आत्म-साक्षात्कार की पहली सीढ़ी है—वह केवल विद्या से नहीं आती और न ही केवल तप से।

यदि कोई व्यक्ति अत्यंत विद्वान है, उसने समस्त शास्त्रों का अध्ययन कर लिया है, किंतु उसका आचरण दूषित है, तो वह ज्ञान उसके लिए बोझ बन जाता है। वह ज्ञान उसे अहंकार की ओर ले जाता है, पवित्रता की ओर नहीं। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति कठोर तप करता है, मौन रहता है या शरीर को कष्ट देता है, किंतु उसके पास सही विद्या (विवेक) नहीं है, तो उसका तप अंध-विश्वास या केवल शारीरिक हठयोग बनकर रह जाता है। बिना विद्या के तप दिशाहीन है और बिना तप के विद्या निष्प्राण है।

ऋषि यहाँ 'वृत्त' (आचार) को केंद्र में रखते हैं। विद्या और तप जब 'वृत्त' यानी सदाचार के धरातल पर उतरते हैं, तभी वे साधक को 'पात्र' बनाते हैं। पात्रता वह अवस्था है जहाँ साधक का व्यक्तित्व इतना स्थिर और शुद्ध हो जाता है कि वह परमात्मा के ज्ञान को बिना किसी विरूपण के ग्रहण कर सके। यदि पात्र में छेद हो (अर्थात् आचरण में दोष हो), तो विद्या और तप रूपी अमृत उसमें टिक नहीं पाएगा। अतः पवित्रता का अर्थ है—विद्या का बोध, तप का अनुशासन और आचरण की शुचिता का संगम।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ ५.१०९ ॥

जलसे अंग शुद्ध होते हैं, सत्यसे मन, विद्या और तपसे भूतात्मा, और ज्ञानसे बुद्धि शुद्ध होती है।

मनुस्मृति ५.१०९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 319

मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि जल से शरीर शुद्ध होता है और सत्य से मन, किंतु 'भूतात्मा' (संपूर्ण अस्तित्व) की शुद्धि विद्या और तप के संयोग से ही संभव है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार को और आगे बढ़ाते हुए कहती है कि विद्या और तप की यह शुद्धि तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक वह 'वृत्त' (आचरण) में परिवर्तित न हो जाए। मनुस्मृति जहाँ शुद्धि के साधनों का वर्णन करती है, वहीं यह स्मृति उस शुद्धि को 'पात्रता' में बदलने की विधि बताती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साधन-त्रय' का अभ्यास कराता है।

१. विद्या का अभ्यास: यह 'विवेक' है। साधक यह अनुभव करता है कि क्या नित्य है और क्या अनित्य।

२. तप का अभ्यास: यह 'इच्छा-शक्ति' का परिष्कार है। साधक अपनी वृत्तियों को नियंत्रित कर उन्हें एक दिशा में केंद्रित करता है।

३. वृत्त का अभ्यास: यह 'स्थिरता' है। जब विद्या और तप केवल मानसिक व्यायाम न रहकर साधक के स्वभाव में ढल जाते हैं, तब वह 'पात्र' बनता है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि वह केवल सूचनाओं का संग्रह (विद्या) या केवल शारीरिक अनुशासन (तप) का अभ्यासी न बने, बल्कि अपने संपूर्ण जीवन को एक यज्ञ बना ले। जब ज्ञान, तप और आचरण एक बिंदु पर मिलते हैं, तब साधक की आंतरिक अशुद्धियाँ समाप्त होती हैं और वह उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ 'अक्षर' का साक्षात्कार संभव है। यह अवस्था साधक को केवल एक 'अध्येता' से उठाकर एक 'सिद्ध पात्र' बना देती है।

श्लोक ११.२३

यथा रथो विनाश्वैः स्यादश्वाश्च रथिना विना ।

एवं तपो ह्यविद्यस्य विद्या चाप्यतपस्विनः ॥ ११.२३ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२४

जैसे घोड़ोंके बिना रथ और रथीके बिना घोड़े (व्यर्थ हैं), वैसे ही अविद्वान्‌का तप और तपहीनकी विद्या।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि केवल विद्या या केवल तप पर्याप्त नहीं है, अपितु जहाँ सदाचार के साथ ये दोनों मिलते हैं, वहीं व्यक्ति 'पात्र' कहलाता है। इसी पात्रता के अनिवार्य समन्वय को एक सटीक दृष्टान्त के माध्यम से पुष्ट करने के लिए यह श्लोक आता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यथा विना अश्वैः रथः स्यात्, अश्वाश्च विना रथिना (स्यान्), एवं अविद्यस्य तपः ह्यविद्यस्य (व्यर्थं भवति), विद्या च अपतपस्विनः (व्यर्थं भवति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• रथः: यहाँ रथ का अर्थ है वह शरीर और बुद्धि रूपी वाहन, जो साधक को गंतव्य (मोक्ष) तक ले जाता है।

• अश्वैः: अश्व (घोड़े) यहाँ 'तप' और 'इच्छा-शक्ति' के प्रतीक हैं, जो रथ को गति प्रदान करते हैं।

• रथिना: रथी वह सारथी या चालक है जो दिशा निर्धारित करता है। यहाँ रथी 'विद्या' (विवेकपूर्ण ज्ञान) का प्रतीक है।

• अविद्यस्य: जिसके पास विद्या (सही दिशा और बोध) नहीं है।

• अतपस्विनः: जिसके पास तप (अनुशासन और ऊर्जा) का अभाव है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य को रथ के दृष्टान्त से समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार एक भव्य रथ यदि बिना घोड़ों के खड़ा हो, तो वह केवल एक जड़ वस्तु है—उसमें गति नहीं है। ठीक उसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति के पास तप (अनुशासन, इंद्रिय-निग्रह, कठिन साधना) तो है, किंतु विद्या (सही ज्ञान और विवेक) नहीं है, तो उसका तप दिशाहीन है। वह तप उसे अहंकार की ओर ले जा सकता है या किसी गलत मार्ग पर, क्योंकि उसे यह बोध ही नहीं कि उसे जाना कहाँ है।

दूसरी ओर, यदि घोड़े तो शक्तिशाली हैं, किंतु रथ पर कोई रथी (सारथी) नहीं है, तो वे घोड़े अपनी स्वेच्छा से कहीं भी दौड़ेंगे और अंततः रथ को गड्ढे में गिरा देंगे या उसे नष्ट कर देंगे। यही स्थिति उस व्यक्ति की है जिसके पास विद्या (शास्त्र-ज्ञान, बौद्धिक क्षमता) तो बहुत है, किंतु तप (संयम और अभ्यास) का अभाव है। ऐसी विद्या केवल 'सूचना' बनकर रह जाती है; वह अनुभव में नहीं बदलती। तप के बिना विद्या केवल शब्दों का जाल है, जो साधक को वास्तव में ऊपर नहीं उठाती, बल्कि उसे केवल बौद्धिक अहंकार में बांध देती है।

अतः महर्षि का भाव यह है कि तप 'शक्ति' है और विद्या 'दिशा'। शक्ति बिना दिशा के विनाशकारी है और दिशा बिना शक्ति के निष्क्रिय है। जब तप की ऊर्जा और विद्या का विवेक एक साथ मिलते हैं, तभी जीवन-रथ मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अभ्यास' और 'विवेक' के संतुलन का सूत्र है। योग मार्ग में केवल शारीरिक आसनों या कठिन तपस्याओं (तप) में लीन होना पर्याप्त नहीं है; यदि उसके साथ आत्म-बोध की विद्या नहीं है, तो साधक केवल शारीरिक स्वास्थ्य या मानसिक दृढ़ता तक सीमित रह जाएगा, वह 'अक्षर' तक नहीं पहुँचेगा।

इसी प्रकार, केवल उपनिषदों को पढ़ना या शास्त्रों का विश्लेषण करना (विद्या) योग नहीं है। जब तक उस ज्ञान को तप के माध्यम से आचरण में नहीं उतारा जाता, वह ज्ञान केवल मस्तिष्क की एक अवस्था है, हृदय का रूपांतरण नहीं। साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसे अपनी साधना में 'विवेक' (विद्या) और 'प्रयत्न' (तप) का समान समन्वय करना है। जब तप से चित्त शुद्ध होता है और विद्या से लक्ष्य स्पष्ट होता है, तब साधक 'अविद्य' और 'अतपस्विन' की अवस्था से ऊपर उठकर वास्तविक 'योगी' की भूमि में प्रवेश करता है।

श्लोक ११.२४

यथान्नं मधुसर्पिर्भ्यां संयुक्तं स्वादुतां व्रजेत् ।

एवं विद्यातपोयोगैर्ब्राह्मणः पात्रतां व्रजेत् ॥ ११.२४ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२४

जैसे अन्न मधु और घीसे मिलकर स्वादु हो जाता है, वैसे ही विद्या और तपके योगसे ब्राह्मण पात्रताको प्राप्त होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने रथ और अश्वों के दृष्टान्त से यह सिद्ध किया कि विद्या और तप एक-दूसरे के पूरक हैं; एक के बिना दूसरा निष्फल है। अब इसी समन्वय की अनिवार्यता को एक और अधिक सूक्ष्म और रसपूर्ण दृष्टान्त के माध्यम से स्पष्ट करते हुए वे 'पात्रता' के वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यथा अन्नं मधु-सर्पिभ्यां संयुक्तं स्वादुतां व्रजेत्, एवं विद्या-तपो-योगैर्ब्राह्मणः पात्रतां व्रजेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• मधु-सर्पिभ्यां: मधु (शहद) और सर्पि (घी)। यहाँ मधु 'आनंद' और 'मधुरता' का, तथा सर्पि 'तेज' और 'स्नेहन' (शुद्धि) का प्रतीक है।

• स्वादुतां: स्वाद या रसात्मकता। केवल पेट भरना अन्न का उद्देश्य नहीं, अपितु उसका रसात्मक होना उसकी पूर्णता है।

• विद्या-तपो-योगैः: विद्या (ज्ञान), तप (अनुशासन/तपस्या) और योग (इन दोनों का समन्वय या संयोग)। यहाँ 'योग' शब्द केवल शारीरिक आसन नहीं, अपितु 'संयोग' या 'मिलन' के अर्थ में है।

• पात्रताम्: पात्रता का अर्थ है—वह योग्यता जिससे साधक उच्चतर आध्यात्मिक अनुभूतियों और ईश्वरीय ज्ञान को धारण करने के योग्य बनता है।

• व्रजेत्: प्राप्त होता है या उस अवस्था में प्रवेश करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक भौतिक उदाहरण के माध्यम से एक महान आध्यात्मिक सत्य को समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि अन्न अपने आप में जीवन का आधार है, किंतु यदि वह केवल साधारण अन्न हो, तो वह केवल शरीर का पोषण करता है। जब उसी अन्न में मधु (शहद) और सर्पि (घी) का मिश्रण होता है, तब वह 'स्वादु' हो जाता है। यहाँ स्वाद का अर्थ केवल जिह्वा का सुख नहीं, अपितु अन्न की वह श्रेष्ठ अवस्था है जहाँ वह ओज और रस से परिपूर्ण हो जाता है।

इसी प्रकार, एक ब्राह्मण (अर्थात् वह जो ब्रह्म की खोज में लगा है) के लिए केवल 'विद्या' (शास्त्र ज्ञान) या केवल 'तप' (कठोर अनुशासन) पर्याप्त नहीं है। विद्या यदि केवल सूचना है, तो वह शुष्क है; तप यदि केवल कष्ट है, तो वह कठोर है। जब विद्या (बोध) और तप (साधना) का 'योग' (संयोग) होता है, तब साधक के भीतर 'पात्रता' का उदय होता है।

पात्रता वह आंतरिक स्थिति है जहाँ ज्ञान केवल मस्तिष्क की धारणा नहीं रहता, बल्कि तप के प्रभाव से वह हृदय में उतरकर अनुभव बन जाता है। जैसे घी अन्न को सुपाच्य और तेजस्वी बनाता है और शहद उसे मधुर बनाता है, वैसे ही तप विद्या को 'तेज' प्रदान करता है और विद्या तप को 'दिशा' और 'मधुरता' देती है। बिना तप की विद्या अहंकार उत्पन्न करती है, और बिना विद्या का तप अंधविश्वास या मानसिक विकृति का कारण बन सकता है। अतः इन दोनों के मिलन से ही वह 'पात्रता' आती है, जिसमें ब्रह्म-विद्या सुरक्षित रह सके।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'समन्वय' के अभ्यास का निर्देश देता है। योगिक मार्ग पर चलते हुए साधक अक्सर दो अतिवादों में फँसता है—एक वह जो केवल ग्रंथों के अध्ययन (विद्या) में लीन रहता है, और दूसरा वह जो केवल कठिन क्रियाओं और तपस्या (तप) में लगा रहता है।

इस श्लोक का रहस्य यह है कि साधक को अपने भीतर 'ज्ञान' और 'ऊर्जा' का संतुलन बनाना है। विद्या यहाँ 'विवेक' है और तप 'इच्छा-शक्ति' है। जब विवेक और इच्छा-शक्ति एक साथ मिलते हैं, तब साधक की चेतना में वह 'स्वाद' या 'आनंद' प्रकट होता है, जिसे योग में 'प्रसाद' या 'सात्विक स्थिति' कहा जाता है।

अभ्यास यह है कि स्वाध्याय के समय उसमें तप का अनुशासन हो और तप के समय उसमें विद्या का बोध हो। जब ज्ञान और साधना एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं, तब साधक 'पात्र' बनता है। यह पात्रता ही उसे उस भूमि तक ले जाती है जहाँ वह सूक्ष्म ब्रह्म को ग्रहण करने के योग्य होता है। यह अवस्था शुष्क ज्ञान से रसपूर्ण अनुभव की ओर संक्रमण है।

ब्रह्मद्वैविध्यम्

श्लोक ११.२५

द्विविधं तु समुद्दिष्टं गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।

स्थूलसूक्ष्मं च बोद्धव्यं ब्राह्मणेन प्रयत्नतः ॥ ११.२५ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२४

सनातन गुह्य ब्रह्म (वेद) दो प्रकारका कहा गया है — ब्राह्मणको प्रयत्नसे (उसे) स्थूल और सूक्ष्म (रूपमें) जानना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने विद्या और तप के समन्वय से 'पात्रता' प्राप्त करने का सूत्र दिया। अब वे उस पात्रता के चरम लक्ष्य, अर्थात् 'ब्रह्म' के स्वरूप की व्याख्या कर रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि जिस वेद-विद्या को वह अर्जित कर रहा है, उसका वास्तविक विस्तार और गहराई क्या है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: सनातनं गुह्यं ब्रह्म तु द्विविधं समुद्दिष्टं; (तद्) स्थूल-सूक्ष्मं च ब्राह्मणेन प्रयत्नतः बोद्धव्यम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• सनातनम्: जो आदि-अन्त से रहित है, जिसका कोई प्रारंभ नहीं और जो सदैव विद्यमान है।

• गुह्यम्: रहस्यमय या गुप्त। वह जो इंद्रिय-बोध से परे है और केवल साधना के माध्यम से ही प्रकट होता है।

• ब्रह्म: यहाँ 'ब्रह्म' शब्द का प्रयोग 'वेद' के अर्थ में है, क्योंकि वेद ही ब्रह्म का वाङ्मय स्वरूप हैं।

• समुद्दिष्टम्: स्पष्ट रूप से कहा गया है या निर्दिष्ट किया गया है।

• स्थूल-सूक्ष्मम्: स्थूल वह है जो शब्दों, मंत्रों और कर्मकांडों के रूप में प्रत्यक्ष है; सूक्ष्म वह है जो इन सबके मूल में स्थित चेतना या अक्षर रूप है।

• प्रयत्नतः: केवल बौद्धिक जिज्ञासा से नहीं, अपितु साधना, तप और एकाग्रता के यत्न से।

• बोद्धव्यम्: जानना चाहिए। यहाँ 'बोध' का अर्थ सूचना प्राप्त करना नहीं, अपितु अनुभव करना है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ब्रह्म (वेद) के दो आयामों का उद्घाटन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वह सनातन और गुप्त ब्रह्म दो रूपों में निर्दिष्ट है—स्थूल और सूक्ष्म।

प्रथम दृष्टया, वेद का अर्थ है—ऋक्, यजुः और साम। यह 'स्थूल' ब्रह्म है क्योंकि यह शब्दों, छंदों और विधियों के रूप में हमारे सम्मुख है। इसमें यज्ञ, संस्कार और सामाजिक धर्म की व्यवस्था है। यह वह सोपान है जिससे मनुष्य संसार में धर्मपूर्वक जीना सीखता है और स्वर्ग आदि लोकों की प्राप्ति करता है। किंतु याज्ञवल्क्य इसे केवल 'गुह्य' (गुप्त) ब्रह्म का बाहरी आवरण मानते हैं।

द्वितीय आयाम 'सूक्ष्म' ब्रह्म का है। यह वह बीज है जिससे त्रयी (तीन वेद) उत्पन्न हुए हैं। यह वह अक्षर (ॐ) है, जो शब्दों के पार है। सूक्ष्म ब्रह्म का अर्थ है—वह शुद्ध चेतना, वह आत्म-तत्व जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता।

ऋषि यहाँ 'प्रयत्नतः' शब्द पर बल दे रहे हैं। स्थूल वेद को तो केवल अध्ययन और श्रवण से जाना जा सकता है, किंतु सूक्ष्म ब्रह्म का बोध केवल 'प्रयत्न' से होता है। यह प्रयत्न बाहरी नहीं, अपितु आंतरिक है—मन का निग्रह, प्राणों का संयम और हृदय की शुद्धि। ब्राह्मण (अर्थात् ब्रह्म को जानने की इच्छा रखने वाला साधक) के लिए यह अनिवार्य है कि वह केवल शब्दों के जाल (स्थूल) में न उलझे, अपितु उस शब्द के पीछे छिपे मौन (सूक्ष्म) को खोजे।

यह श्लोक वास्तव में एक सेतु है, जो साधक को कर्मकाण्ड (स्थूल) से ज्ञानकाण्ड (सूक्ष्म) की ओर ले जाता है। याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वेद केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं, अपितु एक जीवंत अनुभव है जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा कराता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मुण्डक उपनिषद्

द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ १.१.४ ॥

दो विद्याएँ जाननी चाहिए — ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते हैं — परा और अपरा।

मुण्डक उपनिषद् १.१.४उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 97

मुण्डक उपनिषद् में भी इसी सत्य का प्रतिपादन किया गया है कि ब्रह्मवेत्ता दो विद्याओं को जानने की बात करते हैं—परा और अपरा। यहाँ 'अपरा विद्या' का मेल स्मृति के 'स्थूल ब्रह्म' से है, जिसमें व्याकरण, ज्योतिष और कर्मकाण्ड आते हैं। वहीं 'परा विद्या' का मेल 'सूक्ष्म ब्रह्म' से है, जिसके द्वारा उस अविनाशी ब्रह्म को जाना जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मुण्डक उपनिषद् दोनों इस बात पर सहमत हैं कि पूर्णता के लिए दोनों का ज्ञान आवश्यक है, किंतु लक्ष्य 'परा' या 'सूक्ष्म' ही है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साधन' और 'साध्य' का भेद समझाता है। स्थूल ब्रह्म 'साधन' है और सूक्ष्म ब्रह्म 'साध्य'।

साधक जब मंत्रों का जप करता है, तो वह स्थूल स्तर पर होता है। किंतु जब वही मंत्र जपते हुए वह मंत्र के शब्दों को विलीन कर उसके पीछे की ध्वनि और अंततः उस 'शून्य' या 'अक्षर' में स्थित हो जाता है, तब वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर प्रस्थान करता है। अभ्यास यह है कि साधक बाहरी विधि (स्थूल) को त्यागने के बजाय उसे सूक्ष्म में परिवर्तित करे। जिस प्रकार बीज (सूक्ष्म) से वृक्ष (स्थूल) बनता है, उसी प्रकार साधक को वृक्ष से वापस बीज की ओर लौटना है। यह 'प्रयत्न' ही योग है—शब्द से अर्थ की ओर, अर्थ से भाव की ओर और भाव से शुद्ध चैतन्य की ओर जाना।

त्रिवृद्वेदस्वरूपम्

श्लोक ११.२६

ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च ।

एवं ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ ११.२६ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

ऋचाएँ, यजुः और दूसरे विविध साम — इस प्रकार (स्थूल) त्रिवृत् वेद जानना चाहिए; जो इसे जानता है वह वेदवित् है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने ब्रह्म (वेद) के दो स्वरूपों—स्थूल और सूक्ष्म—का निर्देश करते हुए ब्राह्मण को प्रयत्नपूर्वक उन्हें जानने का उपदेश दिया। अब इस श्लोक में वे 'स्थूल' वेद के स्वरूप को परिभाषित कर रहे हैं कि जिसे सामान्यतः त्रयी कहा जाता है, उसका विस्तार क्या है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ऋचः, यजूंषि च अन्यानि, सामानि विविधानि च (इति) एवं (ज्ञेयः) त्रिवृद्वेदः; यः (एवं) वेदैनं (त्रिवृद्वेदं) स वेदवित्।

पदार्थ और निर्वचन:

• ऋचः: ऋग्वेद की ऋचाएँ। यह ज्ञान का मूल और प्रकाश का स्वरूप है।

• यजूंषि च अन्यानि: यजुर्वेद के मंत्र। 'अन्यानि' शब्द यहाँ यजुर्वेद की विविधता और उसके कर्मकाण्डीय विस्तार को दर्शाता है, क्योंकि यजुः केवल मंत्र नहीं, अपितु यज्ञ की विधि और क्रिया का विधान है।

• सामानि विविधानि च: सामवेद के विविध गान। साम का अर्थ है संगीतबद्ध मंत्र, जो हृदय के भावों को जाग्रत करते हैं।

• त्रिवृद्वेदः: तीन वेदों का समूह (ऋक्, यजुः, साम)। यहाँ 'वृत्' शब्द विस्तार और परिधि को सूचित करता है।

• वेदवित्: जो इन वेदों का ज्ञाता है। यहाँ 'वित्' का अर्थ केवल रट लेना नहीं, अपितु उनके अर्थ और प्रयोग का बोध होना है।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस 'स्थूल' ज्ञान की व्याख्या कर रहे हैं जिसे संसार 'वेद' समझता है। वे कहते हैं कि ऋचाएँ (ज्ञान), यजुः (क्रिया) और विविध साम (भक्ति/आनन्द)—इन तीनों का समुच्चय ही स्थूल त्रिवृत् वेद है। जो व्यक्ति इन तीनों का अध्ययन और ज्ञान प्राप्त करता है, उसे 'वेदवित्' कहा जाता है।

यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि याज्ञवल्क्य जी ने 'त्रिवृत्' शब्द का प्रयोग किया है। यह संकेत है कि यह वेद का वह विस्तार है जो वाणी (वाक्) के माध्यम से प्रकट होता है। यह वह सोपान है जहाँ साधक शब्द-ब्रह्म के माध्यम से सत्य की खोज करता है। ऋचाएँ बुद्धि को प्रदीप्त करती हैं, यजुः शरीर और प्राण को अनुशासित करता है, और साम हृदय को शुद्ध करता है। अतः स्थूल वेद का ज्ञान केवल बौद्धिक उपलब्धि नहीं, अपितु व्यक्तित्व के तीन स्तरों—बुद्धि, प्राण और हृदय—का परिष्कार है।

किंतु, यह ज्ञान केवल बाहरी विधिकता तक सीमित नहीं है। याज्ञवल्क्य जी की दृष्टि में, जब कोई साधक ऋचाओं का जप करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के प्रकाश को जगा रहा होता है; जब वह यजुः का पालन करता है, तो वह अपने जीवन को एक यज्ञ बना रहा होता है; और जब वह साम का गान करता है, तो वह अपनी चेतना को लयबद्ध कर रहा होता है। यह 'वेदवित्' होने की पहली सीढ़ी है, जो साधक को आगे सूक्ष्म वेद की ओर ले जाती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मुण्डक उपनिषद्

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ १.१.५ ॥

उनमें अपरा — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष; और परा वह, जिससे उस अक्षरकी प्राप्ति होती है।

मुण्डक उपनिषद् १.१.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 98

मुण्डक उपनिषद् में विद्या के दो स्तर बताए गए हैं—'अपरा' और 'परा'। अपरा विद्या के अंतर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और छह वेदांगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) को रखा गया है।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक मुण्डक उपनिषद् के इस विचार के साथ पूर्ण संगति रखता है। जहाँ मुण्डक उपनिषद् इन वेदों को 'अपरा' कहता है, वहीं यह स्मृति इन्हें 'स्थूल' कहती है। यहाँ 'अपरा' और 'स्थूल' शब्दों का प्रयोग किसी ऊँच-नीच या स्तर को कम बताने के लिए नहीं, अपितु एक ही तत्त्व के दो भिन्न आयामों को दर्शाने के लिए किया गया है। मुण्डक उपनिषद् की दृष्टि से 'अपरा' वह है जो विषय-सापेक्ष है और साधक के लिए प्रथम सोपान है; वहीं इस स्मृति की दृष्टि से 'स्थूल' वह है जो वाणी और क्रिया के माध्यम से अभिव्यक्त है। दोनों ही शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि यह ज्ञान अनिवार्य है, क्योंकि यह वह आधारभूमि है जिस पर 'परा' या 'सूक्ष्म' ब्रह्म का अनुभव टिका होता है। बिना स्थूल के परिष्कार के सूक्ष्म की प्राप्ति संभव नहीं है, अतः ये दोनों दृष्टियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'वाक्-शुद्धि' और 'मानसिक अनुशासन' का अभ्यास कराता है। स्थूल वेद का अध्ययन वास्तव में शब्द-ब्रह्म का अभ्यास है। जब साधक ऋचाओं, यजुः और सामों का सही उच्चारण और मनन करता है, तो उसकी वाणी और विचार शुद्ध होने लगते हैं।

साधक यहाँ 'अक्षर' के स्थूल रूप का अनुभव करता है। ऋचाएँ 'ज्ञान' की भूमि हैं, यजुः 'साधन' की भूमि है और साम 'भाव' की भूमि है। जब ये तीनों संतुलित होते हैं, तब साधक की पात्रता विकसित होती है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक बाहरी जगत के नियमों (धर्म) को समझकर अपने भीतर के द्वंद्वों को शांत करता है। इस श्लोक का अभ्यास साधक को उस भूमि पर लाता है जहाँ वह यह समझ पाता है कि शब्द केवल संकेत हैं, और इन संकेतों के पार एक 'सूक्ष्म' सत्य है, जिसकी ओर उसे अब अग्रसर होना है।

वेदपिण्डलक्षणम्

श्लोक ११.२७

आद्यं यत् त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।

स तु ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ ११.२७ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

जो आद्य, तीन अक्षरोंवाला ब्रह्म (ॐ) है, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है — वह (सूक्ष्म) त्रिवृत् वेद जानना चाहिए; जो इसे जानता है वह वेदवित् है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने ऋक्, यजुः और साम के समुच्चय को 'स्थूल' त्रिवृत् वेद कहकर उसके ज्ञाता को 'वेदवित्' माना। अब इस श्लोक में वे उस 'सूक्ष्म' वेद का उद्घाटन कर रहे हैं, जो स्थूल वेदों का मूल आधार और उनका बीज है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यत् आद्यं त्र्यक्षरं ब्रह्म (अस्ति), त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता, स तु (ज्ञेयः) त्रिवृद्वेदः; यः एनं वेद स वेदवित्।

पदार्थ और निर्वचन:

• आद्यं: जो आदि है, अर्थात् सबसे प्रथम। यह काल से पूर्व और सृष्टि के आरम्भ का कारण है।

• त्र्यक्षरं ब्रह्म: तीन अक्षरों वाला ब्रह्म। यहाँ 'त्र्यक्षर' का अर्थ 'अ', 'उ' और 'म' (ॐ) है। यह केवल ध्वनि नहीं, अपितु वह परम तत्त्व है जिससे संपूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है।

• त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता: जिसमें त्रयी (ऋक्, यजुः, साम) प्रतिष्ठित है। 'प्रतिष्ठिता' का अर्थ है कि तीनों वेद इसी ओंकार के विस्तार हैं; जैसे एक बीज में पूरा वृक्ष निहित होता है, वैसे ही ओंकार में संपूर्ण वेद निहित हैं।

• स तु ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो: वह (सूक्ष्म ओंकार) ही वास्तव में जानने योग्य 'त्रिवृत् वेद' है। यहाँ 'तु' शब्द का प्रयोग स्थूल और सूक्ष्म वेद के बीच भेद स्पष्ट करने के लिए किया गया है।

• वेदवित्: जो इस सूक्ष्म ब्रह्म को जानता है, वही वास्तविक वेदवित् है।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ज्ञान की उस पराकाष्ठा की बात कर रहे हैं जहाँ शब्द समाप्त होते हैं और अनुभव आरम्भ होता है। पिछले श्लोक (११.२६) में उन्होंने ऋचाओं, यजुषों और सामों के ज्ञान को 'वेदवित्' होने की संज्ञा दी थी, किंतु इस श्लोक में वे एक उच्चतर स्तर का संकेत दे रहे हैं। वे कहते हैं कि जो 'आद्य त्र्यक्षर ब्रह्म' (ॐ) है, वही वास्तविक और सूक्ष्म वेद है।

इस कथन का गहरा रहस्य यह है कि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—ये तीनों वास्तव में ओंकार के ही तीन आयाम हैं। ऋक् (ज्ञान), यजुः (क्रिया) और साम (आनन्द) अलग-अलग नहीं, अपितु उसी एक अक्षर के प्रस्फुटन हैं। जब साधक स्थूल शब्दों के जाल से निकलकर उस मूल ध्वनि (ॐ) में स्थित हो जाता है, तब वह केवल वेदों का ज्ञाता नहीं रहता, अपितु वह 'वेदवित्' हो जाता है—अर्थात् वह उस सत्ता को जान लेता है जिसने वेदों को जन्म दिया।

यहाँ 'त्रिवृत्' शब्द का प्रयोग पुनः हुआ है। स्थूल वेद में 'त्रिवृत्' का अर्थ तीन ग्रंथों का समूह था, किंतु सूक्ष्म वेद में 'त्रिवृत्' का अर्थ उस एक ब्रह्म से है जो तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) से ऊपर उठकर स्थित है। अतः, जो इस सूक्ष्म ओंकार के स्वरूप को जान लेता है, उसने वास्तव में समस्त वेदों का सार जान लिया।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन्प्रतिष्ठिता । स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ॥ ११.२६५ ॥

जो आदि तीन-अक्षरी ब्रह्म (ओंकार) है, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है, वह गुह्य दूसरा त्रिवृत् वेद है; जो उसे जानता है, वही वेदवित् है।

मनुस्मृति ११.२६५मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 581

मनुस्मृति में भी ठीक इसी प्रकार कहा गया है कि जो आद्य त्र्यक्षर ब्रह्म है, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है, वही 'गुह्य' (गुप्त) दूसरा त्रिवृत् वेद है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ इस बात पर सहमत हैं कि वेदों का बाह्य ज्ञान पर्याप्त नहीं है; जब तक वह 'गुह्य' या सूक्ष्म ओंकार तक नहीं पहुँचता, तब तक पूर्णता नहीं आती।

मुण्डक उपनिषद्

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ १.१.५ ॥

उनमें अपरा — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष; और परा वह, जिससे उस अक्षरकी प्राप्ति होती है।

मुण्डक उपनिषद् १.१.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 98

मुण्डक उपनिषद् में 'अपरा' और 'परा' विद्या का भेद बताया गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद आदि 'अपरा' (बाह्य/स्थूल) विद्या हैं, जबकि 'परा' वह है जिससे उस 'अक्षर' की प्राप्ति होती है। याज्ञवल्क्य जी का 'सूक्ष्म त्रिवृत् वेद' ही मुण्डक का 'परा विद्या' है। दोनों शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना ही वास्तविक ज्ञान की यात्रा है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से ये दो श्लोक (११.२६ और ११.२७) योग की दो अलग-अलग भूमियों का वर्णन करते हैं। दोनों श्लोकों का अंतिम पद एक ही है—"यो वेदैनं स वेदवित्", किंतु दोनों का स्तर भिन्न है।

११.२६ का 'वेदवित्' वह है जो शब्दों के स्तर पर प्रवीण है। वह शास्त्र-ज्ञानी है, विधि-विधान जानता है और कर्मकाण्ड में निपुण है। यह 'अपर' विद्या की भूमि है।

११.२७ का 'वेदवित्' वह योगी है जिसने शब्दों को विसर्जित कर दिया है। वह अब ऋचाओं को पढ़ता नहीं, बल्कि उन्हें 'ॐ' के रूप में अनुभव करता है। उसके लिए ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि वह ध्रुव-बिन्दु है जहाँ समस्त ज्ञान (ऋक्), समस्त क्रिया (यजुः) और समस्त आनन्द (साम) विलीन हो जाते हैं।

साधक यहाँ 'शब्द-ब्रह्म' से 'अक्षर-ब्रह्म' की ओर बढ़ता है। अभ्यास यह है कि जप के समय जब साधक 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह यह अनुभव करे कि इस एक ध्वनि में ही संपूर्ण वेदों का ज्ञान समाहित है। वह स्थूल वेदों के विस्तार से सिमटकर उस एक सूक्ष्म बिंदु (आद्य ब्रह्म) में स्थित होने का प्रयास करता है। यह यात्रा 'विस्तार' से 'संकुचन' की ओर है, जो अंततः साधक को उस स्थिति में ले जाती है जहाँ वह स्वयं ही वेद बन जाता है।

स्थूलसूक्ष्मब्रह्मविवेकः

श्लोक ११.२८

पलालधान्यशूकादि तुषकणसमन्वितम् ।

यत् स्थूलं तादृशं ज्ञेयं सूक्ष्मं तण्डुलवत् स्मृतम् ॥ ११.२८ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

पुआल, धान, बाल (शूक) आदि, भूसी और कणोंसे युक्त — जो स्थूल है, वह वैसा जानना चाहिए; और सूक्ष्म चावलके समान कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने 'आद्य त्र्यक्षर ब्रह्म' (ॐ) को सूक्ष्म वेद कहकर उसे वास्तविक वेदवित् का आधार बताया। अब इस श्लोक में वे एक अत्यंत सरल और सटीक दृष्टान्त के माध्यम से स्थूल और सूक्ष्म के इस भेद को स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक शब्दों के जाल में न उलझकर तत्त्व को पहचान सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: पलाल-धान्य-शूकादि तुषकण-समन्वितम् यत् (अस्ति), (तत्) स्थूलं तादृशं ज्ञेयं; (परन्तु) सूक्ष्मं तण्डुलवत् स्मृतम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• पलाल: पुआल या धान का वह बाहरी हिस्सा जो उपयोगहीन प्रतीत होता है।

• धान्य: वह दाना जो अभी अपनी बाहरी परत (छिलके) में बंद है।

• शूक: धान की बाली।

• तुषकण: भूसी के छोटे-छोटे कण।

• समन्वितम्: युक्त या सम्मिलित। यहाँ अर्थ है कि स्थूल वेद में शब्द, व्याकरण, छंद, विधि और कर्मकाण्ड की वह समस्त बाहरी परतें सम्मिलित हैं जो मूल तत्त्व को ढके हुए हैं।

• तादृशं ज्ञेयं: वैसा ही जानना चाहिए। अर्थात् स्थूल रूप में वेद का स्वरूप वैसा ही विस्तृत और भारी है जैसा कि धान की बाली और पुआल का समूह होता है।

• तण्डुलवत्: चावल के समान। 'तण्डुल' वह शुद्ध दाना है जो भूसी और छिलके के हटने के बाद शेष रहता है। यह शुद्धता, सार और पोषण का प्रतीक है।

• स्मृतम्: कहा गया है या स्मरण किया गया है।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक गृहस्थ के लिए सहज बोधगम्य उदाहरण दे रहे हैं। वे कहते हैं कि जब हम खेत में धान देखते हैं, तो हमें क्या दिखता है? हमें पुआल दिखता है, बालियाँ दिखती हैं, छिलके दिखते हैं और बहुत सारी भूसी दिखती है। यह सब मिलकर एक 'स्थूल' पुंज बनाते हैं। इसी प्रकार, जब हम वेदों को देखते हैं, तो हमें हज़ारों ऋचाएँ, कठिन व्याकरण, विस्तृत यज्ञ-विधियाँ और अनेक कर्मकाण्ड दिखाई देते हैं। यह 'वाक्-प्रपञ्च' है—शब्दों का विस्तार। यह विस्तार आवश्यक है, क्योंकि यह उस सत्य की रक्षा करता है, किंतु यह स्वयं वह अंतिम सत्य नहीं है।

ऋषि कहते हैं कि जो 'स्थूल' है, उसे वैसा ही जानना चाहिए—अर्थात् विस्तृत, भारी और बाहरी आवरणों से युक्त। किंतु 'सूक्ष्म' क्या है? सूक्ष्म है 'तण्डुल'—वह शुद्ध चावल का दाना। जिस प्रकार धान की बाली, पुआल और भूसी के भीतर वह छोटा सा चावल का दाना छिपा होता है, जो वास्तव में जीवन का पोषण करता है, उसी प्रकार ऋचाओं और विधियों के इस स्थूल विस्तार के भीतर वह 'त्र्यक्षर ब्रह्म' (ॐ) छिपा है।

यहाँ रहस्य यह है कि तण्डुल (सूक्ष्म) बिना धान (स्थूल) के प्राप्त नहीं हो सकता। यदि धान न हो, तो चावल कहाँ से आएगा? इसी प्रकार, यदि स्थूल वेद (कर्म, विधि, मंत्र) न हों, तो साधक उस सूक्ष्म ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग नहीं खोज पाएगा। स्थूल वेद वह 'कवच' है जिसने सूक्ष्म सत्य को सुरक्षित रखा है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विवेक' का अभ्यास है। योग का अर्थ केवल क्रिया नहीं, बल्कि 'भेद' को समझना है। साधक जब मंत्र जप करता है, तो वह प्रारंभ में 'पलाल' और 'शूक' के स्तर पर होता है—अर्थात् वह शब्दों, ध्वनियों और उनके बाहरी अर्थों में लीन रहता है। यह स्थूल अवस्था है।

अभ्यास यह है कि साधक को इस स्थूलता का तिरस्कार नहीं करना है। जिस प्रकार भूसी को फेंक दिया जाता है, किंतु यह याद रखना चाहिए कि चावल उसी भूसी के भीतर रहकर विकसित हुआ था; उसी प्रकार कर्मकाण्ड और शब्दों का तिरस्कार किए बिना, उनके भीतर छिपे 'सार' (तण्डुल) की खोज करनी है।

साधक जब मंत्र के शब्दों (स्थूल) से ऊपर उठकर उस मौन और बीज-ध्वनि (सूक्ष्म) में स्थित होता है, तब वह 'तण्डुल' का अनुभव करता है। यह अनुभव उसे 'शब्द-ब्रह्म' से 'पर-ब्रह्म' की ओर ले जाता है। जो केवल पुआल (बाहरी विधि) को पकड़कर बैठा रहता है, वह कभी तृप्त नहीं होता; और जो बिना धान के चावल खोजता है, वह भ्रमित रहता है। वास्तविक योगी वह है जो स्थूल के माध्यम से सूक्ष्म में प्रवेश करता है और अंततः केवल उस 'सूक्ष्म तण्डुल' (शुद्ध चैतन्य) का ही उपभोग करता है। यह यात्रा 'विस्तार' से 'बिंदु' की ओर जाने की यात्रा है।

स्थूलब्रह्माध्ययनफलम्

श्लोक ११.२९

वाक्प्रपञ्चं तु यत् स्थूलं शब्दब्रह्म महत्तरम् ।

त्रिवर्गफलदं ज्ञेयं यदि सम्यगधीयते ॥ ११.२९ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

वाणीका विस्तार जो स्थूल, महान् शब्दब्रह्म है, वह यदि भली-भाँति पढ़ा जाये, तो त्रिवर्ग(धर्म-अर्थ-काम) का फल देनेवाला जानना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने धान और चावल के दृष्टान्त से यह स्पष्ट किया कि जिस प्रकार भूसी के भीतर शुद्ध चावल छिपा होता है, उसी प्रकार स्थूल वेदों के शब्दों और विधियों के भीतर सूक्ष्म ब्रह्म (ॐ) निहित है। अब इस श्लोक में वे उस 'स्थूल' रूप के प्रयोजन और उसके फल का विवेचन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: वाक्प्रपञ्चं तु यत् स्थूलं (तत्) शब्दब्रह्म महत्तरम्, (तत्) यदि सम्यगधीयते, (तर्हि तत्) त्रिवर्गफलदं ज्ञेयं।

पदार्थ और निर्वचन:

• वाक्प्रपञ्चं: वाणी का विस्तार। 'प्रपञ्च' का अर्थ है वह सब कुछ जो विस्तृत है, जो अनेक रूपों में फैला हुआ है। यहाँ इसका तात्पर्य वेदों के समस्त मन्त्रों, व्याख्याओं, शाखाओं और कर्मकाण्डों के विशाल संग्रह से है।

• स्थूलं: जो इंद्रियों द्वारा ग्राह्य हो, जो प्रत्यक्ष हो। यहाँ शब्दों का वह रूप जो कान से सुना जाता है और जिह्वा से बोला जाता है, वह स्थूल है।

• शब्दब्रह्म महत्तरम्: महान् शब्दब्रह्म। यहाँ 'महत्तरम्' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि स्थूल वेद केवल बाहरी खोल नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं 'ब्रह्म' का ही एक रूप हैं, जो अपनी व्यापकता (विस्तार) के कारण 'महान्' हैं।

• सम्यगधीयते: भली-भाँति पढ़ा जाए। 'सम्यक्' का अर्थ है—विधिपूर्वक, श्रद्धापूर्वक और सही गुरु के मार्गदर्शन में। केवल शब्दों का पाठ करना 'अध्ययन' नहीं है, बल्कि उनके अर्थ और प्रयोजन को समझना सम्यक् अध्ययन है।

• त्रिवर्गफलदं: त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) का फल देने वाला।

• ज्ञेयं: जानना चाहिए या निश्चित रूप से समझना चाहिए।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद कर रहे हैं। वे स्थूल वेदों को 'निरर्थक' या 'केवल बाहरी' नहीं कह रहे, अपितु उन्हें 'शब्दब्रह्म' कहकर सम्मानित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यह वाणी का जो विस्तार (वाक्प्रपञ्च) है, यह वास्तव में ब्रह्म का ही वह रूप है जो जगत के कल्याण के लिए शब्दों के माध्यम से प्रकट हुआ है।

इस स्थूल शब्दब्रह्म का प्रयोजन 'त्रिवर्ग' की प्राप्ति है। धर्म (नैतिकता और कर्तव्य), अर्थ (भौतिक समृद्धि और संसाधन) और काम (इच्छाओं की मर्यादित पूर्ति)—ये तीनों मानव जीवन के आधार स्तंभ हैं। महर्षि का स्पष्ट मत है कि यदि कोई साधक इन स्थूल वेदों का सम्यक् अध्ययन करता है और उनके अनुसार आचरण करता है, तो वह इस संसार में सुखी, समृद्ध और धर्मपरायण जीवन जी सकता है।

किन्तु यहाँ एक चेतावनी भी निहित है: यह फल तभी मिलता है जब अध्ययन 'सम्यक्' हो। यदि अध्ययन केवल अहंकार के लिए या जीविका के लिए हो (जैसा कि पिछले श्लोकों में बताया गया), तो वह त्रिवर्ग का फल भी नहीं देता। स्थूल शब्दब्रह्म वह सीढ़ी है जो मनुष्य को संसार के दुखों से निकालकर मर्यादा में लाती है, ताकि वह आगे बढ़कर उस 'सूक्ष्म' ब्रह्म की ओर प्रस्थान कर सके। यह मार्ग 'कर्म' का मार्ग है, जहाँ शब्द क्रिया में बदलते हैं और क्रिया फल में।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'वाक्प्रपञ्च' का अर्थ है—मन की वह अवस्था जहाँ विचार और शब्द निरंतर चलते रहते हैं। साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास दो स्तरों पर है:

प्रथम, बाहरी स्तर पर वह वेदों के मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण और विधि-विधान करता है। यह अभ्यास उसकी वाणी को अनुशासित करता है और मन को एक केंद्र पर लाना सिखाता है।

द्वितीय, आन्तर स्तर पर साधक यह अनुभव करता है कि जो शब्द वह बोल रहा है, वह केवल ध्वनि नहीं, बल्कि 'शब्दब्रह्म' है। जब वह 'सम्यक्' अध्ययन करता है, तो वह शब्दों के अर्थ से ऊपर उठकर उस ध्वनि के पीछे छिपे स्पंदन को पकड़ता है। त्रिवर्ग का फल यहाँ केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि मानसिक शांति (धर्म), प्राणिक ऊर्जा की प्रचुरता (अर्थ) और इंद्रियों का संतोष (काम) है।

साधक इस भूमि पर होता है जहाँ वह यह समझ जाता है कि स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा अचानक नहीं होती; पहले स्थूल शब्दब्रह्म के माध्यम से चित्त की शुद्धि होती है, फिर वह सूक्ष्म 'त्र्यक्षर ब्रह्म' (ॐ) में लीन होने का पात्र बनता है। यह श्लोक साधक को 'कर्म' और 'ज्ञान' के बीच सेतु बनाना सिखाता है।

वेदाध्ययनफलम्

श्लोक ११.३०

वेदोऽधीतो ददच्छुद्धिं भ्रंशितो नरकप्रदः ।

न्यायेनेष्टो ददत् स्वर्गं पुनरावृत्तिकारकम् ॥ ११.३० ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

पढ़ा गया वेद शुद्धि देता है, (और) भ्रष्ट (भूला) हुआ नरक देता है; न्यायपूर्वक (यज्ञमें) प्रयुक्त (वह) स्वर्ग देता है — (जो) पुनर्जन्मका कारण है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने स्पष्ट किया कि स्थूल शब्दब्रह्म, यदि सम्यक् पढ़ा जाए, तो वह त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) का फल देने वाला है। अब इस श्लोक में वे अध्ययन की निरंतरता, उसके विस्मरण के दोष और कर्मकाण्ड के माध्यम से प्राप्त स्वर्ग की सीमितता का विवेचन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यः) वेदोऽधीतो (सः) शुद्धिं ददति, (यः) भ्रंशितः (सः) नरकप्रदः (भवति)। (यः) न्यायेनेष्टो (सः) स्वर्गं ददति, (यः) पुनरावृत्तिकारकम् (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• वेदोऽधीतो: पढ़ा गया वेद। यहाँ 'अधीत' का अर्थ केवल कंठस्थ करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारना और उसके अनुशासन में रहना है।

• शुद्धिं ददति: शुद्धि देता है। यह शुद्धि चित्त की वह स्वच्छता है जो साधक को अगले उच्च सोपान (सूक्ष्म वेद) की ओर ले जाती है।

• भ्रंशितो: भ्रष्ट हुआ या भूला हुआ। इसका अर्थ केवल स्मृति से ओझल होना नहीं, बल्कि ज्ञान को जानकर भी आचरण में न लाना या उस मर्यादा का त्याग कर देना है।

• नरकप्रदः: नरक देने वाला। यहाँ नरक केवल एक लोक नहीं, बल्कि वह मानसिक और शारीरिक क्लेश है जो मर्यादा-हीनता और अविद्या के कारण उत्पन्न होता है।

• न्यायेनेष्टो: न्यायपूर्वक प्रयुक्त। 'न्याय' का अर्थ यहाँ विधि-सम्मत (शास्त्रोक्त) होना है। 'इष्ट' का अर्थ है—यज्ञ में आहुति देना या विधिपूर्वक अनुष्ठान करना।

• पुनरावृत्तिकारकम्: पुनरावृत्ति का कारण। वह फल जो आत्मा को पुनः संसार के चक्र में वापस ले आता है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ ज्ञान और कर्म के फल के बीच एक अत्यंत गंभीर रेखा खींच रहे हैं। वे कहते हैं कि वेदों का अध्ययन जब तक जीव के भीतर जीवित है, वह उसे 'शुद्धि' प्रदान करता है। यह शुद्धि वह पात्रता है जिसके बिना सूक्ष्म ब्रह्म (ॐ) का साक्षात्कार असंभव है। परंतु, यदि कोई व्यक्ति वेदों को पढ़कर भी उन्हें विस्मृत कर देता है या उनके सिद्धांतों से भ्रष्ट हो जाता है, तो वह ज्ञान उसके लिए बोझ बन जाता है और वह नरक के क्लेशों को प्राप्त होता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी ने औषधि तो ली, परंतु उसे सही ढंग से ग्रहण नहीं किया, जिससे वह लाभ के स्थान पर हानि पहुँचाने लगी।

आगे महर्षि एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य खोलते हैं। वे कहते हैं कि यदि वेदों का प्रयोग केवल 'न्यायेनेष्टो' अर्थात् विधिपूर्वक कर्मकाण्ड और यज्ञों के लिए किया जाए, तो उसका फल 'स्वर्ग' है। सामान्य मनुष्य स्वर्ग को परम लक्ष्य मानता है, परंतु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में स्वर्ग एक बंधन है। स्वर्ग का आनंद सीमित है और वह 'पुनरावृत्तिकारक' है। अर्थात्, जैसे ही स्वर्ग के पुण्यों का क्षय होता है, जीव को पुनः इसी दुखमय संसार में लौटना पड़ता है।

यहाँ महर्षि यह संकेत दे रहे हैं कि स्थूल वेदों का कर्मकाण्ड केवल एक प्रारंभिक सीढ़ी है। यदि साधक केवल इसी सीढ़ी पर रुक गया और स्वर्ग की कामना करने लगा, तो वह जन्म-मृत्यु के चक्र से कभी मुक्त नहीं हो पाएगा। वेदों का वास्तविक प्रयोजन केवल स्वर्ग प्राप्ति नहीं, बल्कि उस 'सूक्ष्म' को जानना है जो मोक्ष देता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

यज्ञों और कर्मकाण्डों के माध्यम से प्राप्त फल की अनित्यता के विषय में मुण्डक उपनिषद् स्पष्ट कहता है:

मुण्डक उपनिषद्

प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ १.२.७ ॥

ये यज्ञरूप नावें अदृढ़ हैं, जिनमें अठारह (ऋत्विज आदि) पर आश्रित अवर कर्म कहा गया है; जो मूढ़ इसीको श्रेय मानकर अभिनन्दन करते हैं, वे फिर-फिर जरा-मृत्युको पाते हैं।

मुण्डक उपनिषद् १.२.७उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 100

यहाँ यज्ञों को 'अदृढ़ नावें' कहा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी सत्य की पुष्टि करता है कि न्यायपूर्वक किए गए कर्म स्वर्ग तो देते हैं, परंतु वे मोक्ष के द्वार नहीं खोलते, क्योंकि वे पुनरावृत्ति (जन्म-मृत्यु) का कारण हैं।

इसी भाव को श्रीमद्भगवद्गीता में भी देखा जा सकता है:

भगवद्गीता

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ ९.२१ ॥

वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मर्त्यलोकमें लौट आते हैं; इस प्रकार त्रयी-धर्मका आश्रय लेनेवाले, कामनाओंके इच्छुक आवागमन पाते हैं।

भगवद्गीता ९.२१गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 238

यहाँ स्पष्ट है कि त्रयी-धर्म (स्थूल वेद) का आश्रय लेकर कामनाओं की पूर्ति करने वाले लोग स्वर्गलोक का भोग तो करते हैं, परंतु पुण्य क्षीण होते ही पुनः मर्त्यलोक में लौट आते हैं। स्मृति और गीता दोनों का मत एक है—कर्मफल अस्थायी है और वह जीव को संसार से मुक्त नहीं करता।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'जागरूकता' का अभ्यास है।

१. शुद्धि का अभ्यास: साधक जब वेदों का अध्ययन करता है, तो उसे यह देखना चाहिए कि क्या उसके भीतर 'शुद्धि' आ रही है? यदि अध्ययन के बाद भी क्रोध, लोभ और मोह बना हुआ है, तो वह 'अधीत' नहीं है।

२. भ्रंश से बचाव: योग में 'भ्रंश' का अर्थ है—साधना के बीच में मन का विचलित होना या प्राप्त अनुभव को अहंकार में बदल लेना। साधक को निरंतर सजग रहना चाहिए कि वह ज्ञान के मार्ग से विचलित न हो।

३. स्वर्ग से ऊपर उठना: साधक जब ध्यान या जप के दौरान सूक्ष्म अनुभूतियों या दिव्य सुखों (जो कि मानसिक स्वर्ग हैं) का अनुभव करता है, तो उसे यह स्मरण रखना चाहिए कि यह 'पुनरावृत्तिकारक' है। यदि वह इन सुखों में अटक गया, तो उसकी यात्रा रुक जाएगी।

अतः इस श्लोक का योगिक मर्म यह है कि स्थूल शुद्धि (आचार-विचार) को आधार बनाकर, स्वर्ग (सीमित सुखों) की लालसा का त्याग कर, उस सूक्ष्म अक्षर की ओर बढ़ना ही वास्तविक धर्म है।

श्लोक ११.३१

सूक्ष्मं तत् परमं गुह्यं त्रयं ब्रह्म सनातनम् ।

वेदवेदान्तयोः सारं त्रिविधं ब्रह्मणो मुखम् ॥ ११.३१ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

सूक्ष्म (वेद) वह परम गुह्य, त्रिविध सनातन ब्रह्म है — वेद-वेदान्तका सार, ब्रह्म (वेद) का त्रिविध मुख (ॐ, व्याहृति, गायत्री) —

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्थूल वेद के अध्ययन और उसके फल (शुद्धि, नरक और स्वर्ग) का विवेचन किया। अब वे उस 'सूक्ष्म वेद' के स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं, जिसे उन्होंने पिछले खण्ड में 'तण्डुल' (चावल) के समान शुद्ध और सारभूत बताया था।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: तत् (सूक्ष्मं वेदं) सूक्ष्मं, परमं, गुह्यं, सनातनं त्रयं ब्रह्म (अस्ति) । (तत्) वेद-वेदान्तयोः सारं (अस्ति), (तत्) त्रिविधं ब्रह्मणो मुखम् (अस्ति) ।

पदार्थ और निर्वचन:

• सूक्ष्मं: जो इंद्रियों और स्थूल बुद्धि से अगोचर है; वह बीज-रूप ज्ञान।

• परमं गुह्यं: अत्यंत गोपनीय। 'गुह्य' वह है जो केवल योग्य साधक के लिए ही प्रकट होता है, सामान्य जिज्ञासा से नहीं।

• त्रयं ब्रह्म: यहाँ 'त्रयं' शब्द तीन तत्वों के समूह को सूचित करता है। यह वह त्रित्व है जिसमें संपूर्ण ज्ञान समाहित है।

• सनातनम्: जो काल की सीमाओं से परे, अनादि और अनंत है।

• वेद-वेदान्तयोः सारं: वेद (कर्मकाण्ड/विधि) और वेदान्त (ज्ञानकाण्ड/ब्रह्मविद्या) दोनों का निचोड़ या निष्कर्ष।

• ब्रह्मणो मुखम्: 'मुख' का अर्थ है वह द्वार जिससे ब्रह्म का साक्षात्कार हो या जिससे ब्रह्म स्वयं को अभिव्यक्त करता है। यहाँ 'ब्रह्म' शब्द का प्रयोग 'वेद' (शब्दब्रह्म) के लिए हुआ है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ उस रहस्य को खोल रहे हैं जो उनकी श्रुति में बीजरूप में विद्यमान है। उन्होंने पूर्व में कहा था कि आद्य त्र्यक्षर ब्रह्म (ॐ) वह आधार है जिसमें त्रयी (ऋक्, यजुः, साम) प्रतिष्ठित है। अब वे स्पष्ट करते हैं कि यह सूक्ष्म वेद वास्तव में 'त्रिविध सनातन ब्रह्म' है।

यह 'त्रिविध' स्वरूप क्या है? यह कोई संख्या मात्र नहीं, अपितु साधना के तीन सोपान हैं— ओंकार (प्रणव), व्याहृति और गायत्री।

प्रथम, ओंकार वह बीज है जिससे समस्त सृष्टि और शब्द उत्पन्न हुए। द्वितीय, व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः) वह सेतु हैं जो स्थूल जगत को सूक्ष्म जगत से जोड़ती हैं। तृतीय, गायत्री वह प्रकाश है जो बुद्धि को ऋत (सत्य) की ओर प्रेरित करता है। इन तीनों के समुच्चय को ही 'ब्रह्म का मुख' कहा गया है, क्योंकि जिस प्रकार मुख से वाणी प्रकट होती है, उसी प्रकार इन तीनों के माध्यम से साधक का संपर्क उस परम तत्व से होता है।

यह सूक्ष्म वेद 'परम गुह्य' इसलिए है क्योंकि यह केवल शब्दों का पाठ नहीं, अपितु एक अनुभव है। स्थूल वेद (चार वेद) जहाँ बाह्य यज्ञों और विधियों का विस्तार करते हैं, वहीं यह सूक्ष्म वेद उन विधियों के आंतरिक मर्म को प्रकट करता है। यह वेद और वेदान्त दोनों का सार है—वेद की 'विधि' और वेदान्त का 'बोध' जब एक बिंदु पर मिलते हैं, तो वह 'त्रिविध ब्रह्म' के रूप में प्रकट होता है। जो साधक केवल स्थूल शब्दों में उलझा रहता है, वह केवल त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) तक सीमित रहता है, किंतु जो इस 'मुख' (प्रवेश द्वार) को पहचान लेता है, वह सनातन सत्य की ओर अग्रसर होता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

ओङ्कारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः । त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः । स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ २.८१–८२ ॥

ओंकारसे आरम्भ होनेवाली तीन अविनाशी महाव्याहृतियाँ और त्रिपदा सावित्री — इन्हें ब्रह्म (वेद) का मुख जानना चाहिए। जो इनका प्रतिदिन, बिना आलस्यके, तीन वर्ष तक अध्ययन (जप) करता है, वह वायुरूप, आकाश-शरीरवाला होकर परब्रह्मको प्राप्त होता है।

मनुस्मृति २.८१–८२मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 177

मनुस्मृति में भी इसी सत्य की पुष्टि की गई है कि ओंकार, तीन महाव्याहृतियाँ और त्रिपदा सावित्री को 'ब्रह्मणो मुखम्' जानना चाहिए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। अंतर केवल इतना है कि यहाँ याज्ञवल्क्य इसे 'वेद-वेदान्त का सार' कहकर इसकी दार्शनिक गहराई को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। मनुस्मृति जहाँ इसके निरंतर जप से 'वायुभूत' होकर परब्रह्म प्राप्ति की बात करती है, वहीं यह स्मृति इसे सूक्ष्म वेद के रूप में परिभाषित कर ज्ञान और कर्म के समन्वय का मार्ग दिखा रही है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की यात्रा का मानचित्र है। साधक जब तक ऋचाओं और मंत्रों के बाह्य अर्थों (स्थूल वेद) में रहता है, वह केवल शुद्धि प्राप्त करता है। किंतु जब वह अभ्यास के माध्यम से इन शब्दों को 'त्रिविध ब्रह्म' (ॐ, व्याहृति, गायत्री) में विलीन करना सीख जाता है, तब वह 'सूक्ष्म वेद' की भूमि पर प्रवेश करता है।

अभ्यास यह है कि साधक प्रणव (ॐ) से अपनी चेतना को स्थिर करे, व्याहृतियों के माध्यम से अपने अस्तित्व के विभिन्न स्तरों (पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्युलोक) को शुद्ध करे और गायत्री के माध्यम से अपनी बुद्धि को उस परम ज्योति में विलीन कर दे। यह प्रक्रिया साधक को 'शब्द' से 'अर्थ' की ओर और 'अर्थ' से 'अर्थातीत' (शब्द और अर्थ से परे) की ओर ले जाती है। यहाँ 'ब्रह्म का मुख' वह बिंदु है जहाँ साधक की व्यक्तिगत चेतना और सार्वभौमिक चेतना का मिलन होता है। यह श्लोक साधक को संकेत दे रहा है कि मोक्ष का द्वार किसी विस्तृत ग्रंथ के पन्नों में नहीं, अपितु इन तीन सूक्ष्म बीजों के साक्षात्कार में है।

ज्ञानकर्मसमुच्चयप्रशंसा

श्लोक ११.३२

मोक्षदं तु समुद्दिष्टं विदितं नात्र संशयः ।

षट्कर्मणामनुष्ठानादाश्रमाणां च सेवनात् ॥ ११.३२ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

— (वह) मोक्ष देनेवाला कहा गया है, (यह) जाना हुआ (सत्य) है, इसमें संशय नहीं। छः कर्मोंके अनुष्ठानसे, आश्रमोंके सेवनसे,

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'सूक्ष्म वेद' को वेद-वेदान्त का सार और ब्रह्म का त्रिविध मुख बताया। अब वे इस सूक्ष्म ज्ञान की प्रयोजनता और उसकी प्राप्ति के व्यावहारिक मार्ग का निरूपण कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तत् सूक्ष्मं ब्रह्म) मोक्षदं तु समुद्दिष्टं (अस्ति), (तत्) विदितं (अस्ति), नात्र संशयः। (तत् मोक्षं) षट्कर्मणाम् अनुष्ठानात्, आश्रमाणां च सेवनात् (प्राप्यते)।

पदार्थ और निर्वचन:

• मोक्षदं: मोक्ष प्रदान करने वाला। यहाँ मोक्ष का अर्थ केवल देह-त्याग नहीं, अपितु अविद्या के बंधनों से पूर्ण मुक्ति और स्वरूप-सिद्धि है।

• समुद्दिष्टं: शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट या स्पष्ट रूप से कहा गया।

• विदितं: अनुभवजन्य सत्य; जिसे ऋषियों ने जाना है और जो प्रमाणित है।

• संशयः: संदेह। जब ज्ञान 'विदित' (अनुभूत) हो जाता है, तब संशय का अवकाश नहीं रहता।

• षट्कर्मणाम्: यहाँ 'षट्कर्म' ब्राह्मण के उन छह अनिवार्य कर्तव्यों को सूचित करते हैं— यजन (यज्ञ करना), याजन (यज्ञ कराना), अध्ययन (शास्त्र पढ़ना), अध्यापन (शिक्षा देना), दान और प्रतिग्रह (दान देना और लेना)।

• आश्रमाणां सेवनात्: चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) के मर्यादापूर्ण पालन और उनके आंतरिक मर्म के सेवन से।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण समन्वय स्थापित कर रहे हैं। उन्होंने पिछले श्लोकों में 'स्थूल वेद' (शब्दब्रह्म) और 'सूक्ष्म वेद' (त्र्यक्षर ब्रह्म) के भेद को स्पष्ट किया था। अब वे यह बता रहे हैं कि उस सूक्ष्म वेद का फल 'मोक्ष' है। वे कहते हैं कि यह सत्य शास्त्रों में कहा गया है (समुद्दिष्टं) और ऋषियों द्वारा अनुभव किया गया है (विदितं), अतः इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है कि सूक्ष्म ब्रह्म का ज्ञान ही मुक्ति का द्वार है।

किन्तु, यहाँ एक गंभीर प्रश्न उठता है: यदि मोक्ष केवल सूक्ष्म ज्ञान से मिलता है, तो स्थूल कर्मों और आश्रमों की क्या आवश्यकता? इसी का समाधान महर्षि इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में देते हैं। वे कहते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति 'षट्कर्मों के अनुष्ठान' और 'आश्रमों के सेवन' से होती है।

प्रथम दृष्टि में यह विरोधाभास लग सकता है कि एक ओर 'सूक्ष्म ब्रह्म' की बात है और दूसरी ओर 'षट्कर्म' जैसे बाह्य कर्तव्यों की। परन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में बाह्य विधि और आन्तर साधना अलग नहीं हैं। षट्कर्म केवल सामाजिक या धार्मिक क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि वे चित्त की शुद्धि के साधन हैं। अध्ययन और अध्यापन से बुद्धि प्रखर होती है, यजन और याजन से अहंकार का विसर्जन होता है, और दान-प्रतिग्रह से आसक्ति का क्षय होता है। इसी प्रकार, आश्रमों का सेवन साधक को जीवन के विभिन्न सोपानों से गुजारते हुए अंततः संन्यास (पूर्ण विरक्ति) की ओर ले जाता है।

भाव यह है कि बिना कर्म के ज्ञान नहीं होता और बिना ज्ञान के कर्म केवल स्वर्ग-नरक का चक्र घुमाता है। षट्कर्म और आश्रम वह आधारभूमि तैयार करते हैं, जिस पर 'सूक्ष्म वेद' का बीज अंकुरित हो सके। जब साधक बाह्य अनुशासन (आश्रम) और कर्तव्य (षट्कर्म) को पूर्णता से निभाता है, तब उसका चित्त उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ वह सूक्ष्म ब्रह्म को 'विदित' कर सके। अतः मोक्ष केवल एक विचार नहीं, बल्कि अनुष्ठान और अनुभव का समुच्चय है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। षट्कर्म और आश्रम यहाँ 'चित्त-शुद्धि' के अभ्यास हैं। योग में जब तक अंतःकरण शुद्ध नहीं होता, तब तक सूक्ष्म ब्रह्म का साक्षात्कार संभव नहीं है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसके दैनिक कर्तव्य (कर्म) और जीवन की अवस्थाएँ (आश्रम) बाधाएँ नहीं, बल्कि सीढ़ियाँ हैं। षट्कर्मों का अनुष्ठान वास्तव में प्राण और मन को अनुशासित करने की प्रक्रिया है। जब साधक अपनी इंद्रियों और वृत्तियों को इन मर्यादाओं में बांधता है, तब उसकी ऊर्जा बिखरने के बजाय संचित होने लगती है। यह संचित ऊर्जा ही उसे स्थूल शब्दब्रह्म से ऊपर उठाकर उस 'सूक्ष्म त्र्यक्षर ब्रह्म' में प्रतिष्ठित करती है, जहाँ संशय का अंत होता है और मोक्ष का अनुभव होता है। यह यात्रा 'बाह्य अनुशासन' से 'आन्तर प्रकाश' की ओर जाने की यात्रा है।

श्लोक ११.३३

तपसा वा सुतीव्रेण सर्वविद्याविवेचनात् ।

मोक्षावाप्तिस्तु न भवेदृते ज्ञानाच्च कर्मणः ॥ ११.३३ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

अत्यन्त तीव्र तपसे, अथवा सब विद्याओंके विवेचनसे — ज्ञान और कर्मके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि सूक्ष्म वेद का फल मोक्ष है और उसकी प्राप्ति षट्कर्मों के अनुष्ठान तथा आश्रमों के सेवन से होती है। अब इस श्लोक में वे उन भ्रांतियों का निराकरण कर रहे हैं जहाँ साधक केवल तप या केवल बौद्धिक विवेचन को ही मुक्ति का एकमात्र द्वार मान लेते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (मोक्षावाप्तिस्तु) तपसा वा सुतीव्रेण (अथवा) सर्वविद्याविवेचनात् (अपि) न भवति, इदृते ज्ञानाच्च कर्मणः।

पदार्थ और निर्वचन:

• तपसा सुतीव्रेण: 'सुतीव्र' का अर्थ है अत्यंत तीव्र, कठोर या उग्र तप। यहाँ शरीर को अत्यधिक कष्ट देने वाले या केवल बाह्य प्रदर्शन वाले तप की ओर संकेत है।

• सर्वविद्याविवेचनात्: समस्त विद्याओं (शास्त्रों, कलाओं, तर्कशास्त्र) के केवल बौद्धिक विश्लेषण या विमर्श से।

• मोक्षावाप्तिस्तु न भवेत्: मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।

• इदृते: इसके बिना; इन दोनों के अभाव में।

• ज्ञानाच्च कर्मणः: ज्ञान और कर्म दोनों के (समुच्चय के) बिना। यहाँ 'च' का प्रयोग यह दर्शाता है कि ज्ञान और कर्म परस्पर विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण सिद्धांत को प्रतिपादित कर रहे हैं। प्रायः साधकों में यह भ्रम रहता है कि या तो केवल कठोर तपस्या (तप) से या फिर केवल शास्त्रों के गहन अध्ययन और तर्क-वितर्क (विवेचन) से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। महर्षि कहते हैं कि यदि तप 'सुतीव्र' (उग्र) हो परंतु उसमें ज्ञान का प्रकाश न हो, तो वह केवल देह का दमन है, आत्मा का जागरण नहीं। उसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति समस्त विद्याओं का विवेचन कर ले, परंतु उसका वह ज्ञान कर्म (आचरण और अनुशासन) में न उतरे, तो वह केवल एक बौद्धिक व्यायाम है, मुक्ति का मार्ग नहीं।

रहस्य यह है कि मोक्ष न तो केवल 'तप' की अग्नि से मिलता है और न ही केवल 'विवेचन' की चतुराई से; अपितु यह 'ज्ञान' और 'कर्म' के सुंदर समन्वय से प्राप्त होता है। यहाँ 'कर्म' का अर्थ केवल लौकिक कार्य नहीं, अपितु वह संस्कार और अनुशासन है जो साधक को ज्ञान के योग्य बनाता है, और 'ज्ञान' वह बोध है जो कर्मों को फलरहित (निष्काम) कर देता है। जब कर्म ज्ञान से पवित्र होता है और ज्ञान कर्म से पुष्ट होता है, तभी मोक्ष का द्वार खुलता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

ईश उपनिषद्

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥

जो विद्या (उपासना-ज्ञान) और अविद्या (कर्म) — दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह अविद्या (कर्म) से मृत्युको पार करके विद्यासे अमृतको पाता है।

ईश उपनिषद् ११उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 46

ईश उपनिषद् में कहा गया है कि जो विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) दोनों को साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार कर विद्या से अमृत को प्राप्त करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी उपनिषद्-तत्व का विस्तार है। जहाँ ईशोपनिषद् 'विद्या-अविद्या' के समन्वय की बात करता है, वहीं यह स्मृति उसे 'ज्ञान-कर्म' के रूप में स्पष्ट करती है। दोनों ही शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि केवल एक पक्ष को पकड़कर चलना अधूरा मार्ग है; कर्म के बिना ज्ञान शुष्क है और ज्ञान के बिना कर्म अंधा है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक चेतावनी और दिशा-निर्देश दोनों है। योग मार्ग में 'तप' और 'विवेचन' दो साधन हैं, परंतु लक्ष्य 'मोक्ष' है।

१. तप का योगिक अर्थ: यदि साधक केवल शरीर को कष्ट देकर या कठिन आसनों में लीन रहकर यह सोचे कि वह मुक्त हो रहा है, तो वह 'सुतीव्र तप' के जाल में है। वास्तविक तप वह है जो चित्त की शुद्धि करे।

२. विवेचन का योगिक अर्थ: शास्त्रों के अर्थों में उलझना या केवल मानसिक विश्लेषण करना 'विवेचनात्' है। जब तक यह विश्लेषण अनुभव (ज्ञान) में न बदले, यह बंधन ही बढ़ाता है।

अभ्यास यह है कि साधक अपने जीवन में 'ज्ञान' (स्व-स्वरूप का बोध) और 'कर्म' (नियत धर्म का पालन और अनुशासन) को एक साथ लेकर चले। वह अपनी बौद्धिक क्षमता (विवेचन) को तप की अग्नि में तपाकर उसे 'ज्ञान' बनाए और उस ज्ञान को अपने दैनिक आचरण (कर्म) में उतारकर जीवन को ही एक यज्ञ बना दे। जब साधक ज्ञान और कर्म के इस संतुलन को अनुभव करता है, तब वह केवल एक भूमि से दूसरी भूमि पर नहीं जाता, बल्कि वह उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ कर्म बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति का साधन बन जाते हैं।

योगेनात्मदर्शनप्रशंसा

श्लोक ११.३४

इज्याचारो दमोऽहिंसा दानं स्वाध्यायकर्म च ।

अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥ ११.३४ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

यज्ञ, आचार, दम, अहिंसा, दान और स्वाध्याय-कर्म (धर्म हैं); पर परम धर्म यह है कि योगसे आत्माका दर्शन हो।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि ज्ञान और कर्म के समुच्चय के बिना मोक्ष संभव नहीं है। अब इस श्लोक में वे धर्म की एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था प्रस्तुत कर रहे हैं, जहाँ वे सामान्य धर्मों और 'परम धर्म' के बीच का भेद स्पष्ट करते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: इज्याचारः, दमः, अहिंसा, दानम्, स्वाध्यायकर्म च (एते धर्मः सन्ति); परं तु अयं धर्मः यत् योगेन आत्मदर्शनम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• इज्याचारः: 'इज्या' का अर्थ है वह यज्ञ जो श्रद्धापूर्वक और शास्त्रविधि से किया जाए। 'आचार' का अर्थ है श्रेष्ठ आचरण या सदाचार। यहाँ यज्ञ और आचार को एक साथ रखा गया है, क्योंकि बाह्य कर्म (यज्ञ) जब श्रेष्ठ आचरण (आचार) से जुड़ता है, तभी वह सार्थक होता है।

• दमः: इंद्रियों का दमन या संयम। मन को विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना 'दम' है।

• अहिंसा: केवल शारीरिक हिंसा का अभाव नहीं, अपितु मन, वाणी और शरीर से किसी को कष्ट न देना।

• दानम्: त्याग की भावना। अपनी पात्रता और सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की सहायता करना।

• स्वाध्यायकर्म: वेदों का अध्ययन और उनके अनुसार नियत कर्मों का पालन।

• परमो धर्मः: वह धर्म जो सर्वोच्च है, जिसका कोई दूसरा विकल्प नहीं और जो समस्त धर्मों का लक्ष्य है।

• योगेन आत्मदर्शनम्: योग के माध्यम से आत्मा का साक्षात्कार। यहाँ 'योग' का अर्थ उस साधना से है जो साधक को विखरे हुए मन से समेता हुआ और फिर उस समेता हुआ मन आत्मा में लीन करता है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ धर्म की एक विस्तृत परिभाषा दे रहे हैं। वे कहते हैं कि यज्ञ, श्रेष्ठ आचरण, इंद्रिय-संयम, अहिंसा, दान और स्वाध्याय—ये सभी धर्म हैं। ये साधक के व्यक्तित्व को परिष्कृत करते हैं, उसे सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से योग्य बनाते हैं। ये 'साधन-धर्म' हैं। इनके बिना चित्त की शुद्धि संभव नहीं है और बिना शुद्धि के उच्चतर साधना संभव नहीं होती।

परंतु, महर्षि यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण भेद करते हैं। वे कहते हैं—'अयं तु परमो धर्मो' (परंतु यह परम धर्म है)। यहाँ 'परम' शब्द यह संकेत देता है कि पूर्वोक्त सभी धर्म इस एक लक्ष्य की ओर ले जाने वाली सीढ़ियाँ हैं। यदि कोई व्यक्ति केवल दान करता है या केवल स्वाध्याय करता है, तो वह पुण्य अर्जित करता है, परंतु वह अभी भी 'साधन' के स्तर पर है। जब यही साधक योग के माध्यम से अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) का दर्शन कर लेता है, तब वह 'साध्य' को प्राप्त होता है।

भाव यह है कि बाह्य धर्म (यज्ञ, दान, आचार) स्थूल शरीर और मन की शुद्धि के लिए हैं, जबकि योग द्वारा आत्मदर्शन सूक्ष्म शरीर और आत्मा की मुक्ति के लिए है। जिस प्रकार अनेक नदियाँ अंततः सागर में मिलती हैं, उसी प्रकार सभी धर्मों का अंतिम गंतव्य आत्मदर्शन ही है। जो केवल बाहरी विधियों में अटक गया, वह धर्म के आवरण में तो है, परंतु उसके केंद्र (आत्मा) तक नहीं पहुँचा।

शास्त्र-साक्ष्य —

बृहदारण्यक उपनिषद्

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि ॥ २.४.५ ॥

अरी मैत्रेयी, आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन करने योग्य है।

बृहदारण्यक उपनिषद् २.४.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 395

बृहदारण्यक उपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से कहते हैं कि आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन करने योग्य है।

इस उपनिषद् के वचन और इस स्मृति के श्लोक में पूर्ण संगति है। जहाँ उपनिषद् में आत्मा को 'द्रष्टव्य' (देखने योग्य) कहकर उसे समस्त जिज्ञासाओं का केंद्र बनाया गया है, वहीं इस स्मृति में उस दर्शन को 'परम धर्म' कहा गया है। यह स्पष्ट है कि याज्ञवल्क्य के लिए धर्म का अर्थ केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि स्वयं के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करना है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक 'मानचित्र' की भाँति है। साधक सबसे पहले यज्ञ, आचार, दम और अहिंसा के माध्यम से अपने 'बाह्य व्यक्तित्व' को शुद्ध करता है। दान और स्वाध्याय से वह 'अहंकार' का विसर्जन करता है और बुद्धि को प्रखर बनाता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक 'धर्म' का अभ्यास करता है।

परंतु, वास्तविक योग तब आरम्भ होता है जब वह इन सभी धर्मों को एक 'उपकरण' मानकर उनसे ऊपर उठता है। यहाँ 'योग' का अर्थ है—चित्त की वह एकाग्रता जिससे वह 'द्रष्टा' और 'दृश्य' के भेद को मिटाकर स्वयं में स्थित हो जाता है।

अभ्यास यह है कि साधक अपने दैनिक धर्म-कर्मों (जैसे स्वाध्याय या दान) को केवल क्रिया न मानकर, उन्हें आत्मदर्शन की तैयारी माने। जब वह स्वाध्याय करे, तो शब्द से परे उस 'अक्षर' को खोजे; जब वह दम (संयम) का अभ्यास करे, तो उस शून्य को अनुभव करे जहाँ केवल आत्मा शेष रहती है। इस प्रकार वह 'साधारण धर्म' से 'परम धर्म' की ओर प्रवृत्त होता है। वह इस अनुभव से गुजरता है कि बाहरी शुद्धि (आचार) केवल द्वार है, और भीतर का प्रकाश (आत्मदर्शन) ही गंतव्य है।

धर्मनिर्णायकाः

श्लोक ११.३५

चत्वारो वेदधर्मज्ञा यत्र त्रैविध(द्य)मेव वा ।

स ब्रूते यः स धर्मः स्यादेको वाध्यात्मवित्तमः ॥ ११.३५ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२५

जहाँ चार वेद और धर्मके जानकार, अथवा तीन वेदोंके जानकार (हों) — वे जो कहें वह धर्म है; अथवा अध्यात्मविदोंमें श्रेष्ठ एक (भी जो कहे)।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि यज्ञ, दान और स्वाध्याय जैसे कर्म धर्म तो हैं, किंतु योग द्वारा आत्मदर्शन ही 'परम धर्म' है। अब इस श्लोक में वे यह बताते हैं कि जब साधक के सम्मुख धर्म के स्वरूप या उसके पालन को लेकर संशय उत्पन्न हो, तो उस धर्म का निर्णय या निश्चय किस आधार पर किया जाना चाहिए।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यत्र चत्वारः वेदधर्मज्ञाः (सन्ति), त्रैविधं (वेदज्ञः) एव वा (सन्ति), ते यः ब्रूते स धर्मः स्यात्; अथवा एकः वा अध्यात्मवित्तमः (यः ब्रूते स धर्मः स्यात्)।

पदार्थ:

• वेदधर्मज्ञाः: वे जो केवल वेदों के शब्दों के ज्ञाता नहीं, अपितु वेदों में निहित 'धर्म' (नियम और लक्ष्य) के वास्तविक बोध रखने वाले हैं।

• त्रैविधम्: तीन वेदों (ऋक्, यजुः, साम) का ज्ञान रखने वाले। यहाँ संख्या का अर्थ है कि यदि चार वेदों के पूर्ण ज्ञाता उपलब्ध न हों, तो तीन वेदों के ज्ञाताओं की परिषद् का निर्णय मान्य है।

• ब्रूते: कहना या प्रतिपादित करना। यहाँ 'ब्रूते' का अर्थ केवल बोलना नहीं, अपितु शास्त्र-प्रमाण के आधार पर धर्म का निश्चय करना है।

• अध्यात्मवित्तमः: अध्यात्म के ज्ञान में अत्यंत श्रेष्ठ। 'वित्तम' शब्द संकेत करता है कि वह व्यक्ति जिसने केवल शास्त्र नहीं पढ़े, बल्कि स्वयं के भीतर उस सत्य का अनुभव किया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक धर्म-निर्णय की प्रक्रिया और उसकी प्रमाणिकता को स्पष्ट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक व्यवस्था दे रहे हैं कि जब किसी विषय पर धर्म का संशय हो, तो निर्णय का आधार क्या हो।

प्रथम विकल्प में वे 'परिषद्' या समूह की बात करते हैं। जहाँ चार वेद-धर्मज्ञ हों, या तीन वेदों के ज्ञाता हों, उनका सामूहिक मत धर्म माना जाना चाहिए। यह बाहरी विधि है, जो सामाजिक और शास्त्रोक्त व्यवस्था को बनाए रखने के लिए है। यहाँ वेदों की संख्या (चार या तीन) ज्ञान की व्यापकता को दर्शाती है। जब विद्वानों का समूह एकमत होकर किसी बात को धर्म कहता है, तो वह सामान्य साधक के लिए मार्गदर्शक बन जाता है।

किंतु, महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण विकल्प और जोड़ते हैं— "एको वा अध्यात्मवित्तमः"। भाव यह है कि यदि समूह में विद्वान तो हों, परंतु उनमें वह प्रगाढ़ अनुभव न हो, तो एक ऐसा व्यक्ति जो 'अध्यात्मवित्तम' (अध्यात्म के ज्ञान में सर्वश्रेष्ठ) है, उसका निर्णय उन समस्त समूहों के निर्णय से ऊपर है।

यहाँ 'वेदज्ञ' और 'अध्यात्मवित्' के बीच एक सूक्ष्म भेद है। वेदज्ञ वह है जो श्रुति के शब्दों और विधियों का ज्ञाता है, जबकि अध्यात्मवित् वह है जिसने उन शब्दों के पीछे छिपे 'अर्थ' को अपने भीतर अनुभव कर लिया है। याज्ञवल्क्य स्वयं योगीश्वर हैं, इसलिए वे जानते हैं कि शास्त्र का अक्षर केवल तब तक प्रमाण है जब तक वह अनुभव से पुष्ट न हो जाए। अतः, एक सिद्ध अध्यात्मविद् का वचन, जो आत्म-साक्षात्कार की भूमि पर स्थित है, वह किसी भी संख्यात्मक बहुमत से अधिक प्रमाणिक होता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः ॥ १२.११३ ॥

वेद जाननेवाला एक भी श्रेष्ठ द्विज जिस धर्मका निश्चय करे, वही परम धर्म जानना चाहिए — दस हजार अज्ञानियोंका कहा हुआ नहीं।

मनुस्मृति १२.११३मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 601

मनुस्मृति में भी यही सिद्धांत प्रतिपादित है कि एक भी वेदवित् यदि धर्म का निश्चय करे, तो वह मान्य है, जबकि हज़ारों अज्ञानियों का मत व्यर्थ है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात को और आगे ले जाकर 'अध्यात्मवित्तम' शब्द का प्रयोग करती है। मनुस्मृति जहाँ 'वेदविद' (वेद जानने वाले) पर बल देती है, वहीं यह स्मृति 'अध्यात्मवित्' (स्वयं के स्वरूप को जानने वाले) को सर्वोच्च स्थान देती है। यह इस तथ्य की पुष्टि करता है कि यह ग्रन्थ केवल आचार-संहिता नहीं, अपितु योग-साधना का मार्ग है, जहाँ अनुभव को शास्त्र के शब्दों से ऊपर रखा गया है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'गुरु-तत्व' और 'विवेक' का अभ्यास है। योग के मार्ग पर चलते हुए साधक के मन में अनेक संशय उठते हैं। यह श्लोक सिखाता है कि धर्म का निर्णय बाहरी भीड़ या केवल किताबी ज्ञान से नहीं, अपितु उस व्यक्ति के मार्गदर्शन में होना चाहिए जिसने स्वयं उस मार्ग को तय किया है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि 'अध्यात्मवित्तम' वह है जिसने अपने भीतर के सूर्य (आत्मा) का दर्शन कर लिया है। जब साधक किसी ऐसे गुरु के सान्निध्य में होता है जो स्वयं आत्मज्ञानी है, तो उसे हज़ारों शास्त्रों के विवेचन की आवश्यकता नहीं रहती; गुरु का एक शब्द उसके संशयों का निवारण कर देता है। यह श्लोक साधक को 'बहुश्रुत' (बहुत सुनने वाले) से 'अनुभवी' बनने की ओर प्रेरित करता है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी बुद्धि को उस स्तर पर ले जाए जहाँ वह स्वयं धर्म और अधर्म का निर्णय अपने भीतर के प्रकाश (अध्यात्म-ज्ञान) से कर सके।

श्रेष्ठश्रेणी

श्लोक ११.३६

भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः ।

बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥ ११.३६ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२६

(मनु १.९६:) भूतोंमें प्राणी श्रेष्ठ हैं, प्राणियोंमें बुद्धिसे जीनेवाले, बुद्धिमानोंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं, और मनुष्योंमें ब्राह्मण कहे गये हैं;

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने धर्म-निर्णय के लिए वेदज्ञों की परिषद् अथवा एक श्रेष्ठ अध्यात्मवित् के प्रमाण को मान्य बताया। अब वे इस 'श्रेष्ठता' के मापदण्ड को परिभाषित कर रहे हैं कि वास्तव में श्रेष्ठ कौन है, ताकि साधक यह समझ सके कि उसे किसका मार्गदर्शन लेना चाहिए और स्वयं को किस दिशा में विकसित करना है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः, प्राणिनां बुद्धिजीविनः (श्रेष्ठाः), बुद्धिजीविनः (बुद्धिमत्सु) नराः श्रेष्ठाः, नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः।

पदार्थ:

• भूत: समस्त चराचर जगत, जिसमें जड़ और चेतन दोनों सम्मिलित हैं।

• प्राणि: वे जिनमें 'प्राण' (चेतना का स्पंदन) है। जड़ भूतों की तुलना में प्राणी श्रेष्ठ हैं क्योंकि उनमें अनुभव और गति की क्षमता है।

• बुद्धिजीविनः: वे प्राणी जो केवल सहज वृत्ति या प्रवृत्तियों के अधीन नहीं हैं, बल्कि 'बुद्धि' (विवेक और निर्णय शक्ति) के द्वारा जीवन जीते हैं।

• नराः: मनुष्य। यहाँ 'नर' शब्द उस प्राणी के लिए प्रयुक्त है जिसमें बुद्धि के साथ-साथ आत्म-जागरूकता और आध्यात्मिक जिज्ञासा का बीज है।

• ब्राह्मणाः: यहाँ ब्राह्मण शब्द केवल जन्म-जाति का सूचक नहीं है, अपितु 'ब्रह्म' को जानने वाले या ब्रह्म की खोज में रत व्यक्ति का सूचक है। जो ब्रह्म-विद्या में प्रतिष्ठित है, वही वास्तव में ब्राह्मण है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक सृष्टि के सोपान को दर्शाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ चेतना के क्रमिक उत्थान का वर्णन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि इस संपूर्ण ब्रह्माण्ड में श्रेष्ठता का आधार 'चेतना की सूक्ष्मता' और 'विवेक की प्रखरता' है।

सर्वप्रथम, समस्त भूतों (जड़ और चेतन) में 'प्राणिनः' श्रेष्ठ हैं। पत्थर, मिट्टी या धातु जैसे जड़ तत्वों में चेतना सुप्त है, जबकि प्राणियों में वह जागृत है। अतः प्राण का होना ही प्रथम श्रेष्ठता है।

द्वितीय सोपान में, प्राणियों में 'बुद्धिजीविनः' श्रेष्ठ हैं। पशु-पक्षियों में भी प्राण हैं, किंतु वे केवल भूख, प्यास और भय जैसी मूल प्रवृत्तियों से संचालित होते हैं। जो प्राणी बुद्धि का प्रयोग कर अपने जीवन को दिशा दे सकता है, वह साधारण प्राणी से ऊपर उठ जाता है।

तृतीय सोपान में, बुद्धिमानों में 'नराः' (मनुष्य) श्रेष्ठ हैं। मनुष्य की बुद्धि केवल भौतिक उत्तरजीविता के लिए नहीं, बल्कि 'मैं कौन हूँ?' जैसे मौलिक प्रश्नों के उत्तर खोजने में सक्षम है। मनुष्य ही वह कड़ी है जो पशुत्व से देवत्व की ओर बढ़ सकता है।

अंतिम सोपान में, मनुष्यों में 'ब्राह्मणाः' श्रेष्ठ कहे गए हैं। यहाँ ब्राह्मण का अर्थ उस व्यक्ति से है जिसने अपनी बुद्धि को संसार के विषयों से हटाकर 'ब्रह्म' (परम सत्य) की ओर मोड़ दिया है। जो मनुष्य केवल भौतिक बुद्धि से ऊपर उठकर आध्यात्मिक प्रज्ञा को प्राप्त कर लेता है, वही इस सृष्टि की श्रेष्ठतम श्रेणी में आता है।

यह श्लोक हमें यह समझाता है कि श्रेष्ठता का मार्ग 'जड़ से चेतन' और 'चेतन से ब्रह्म' की ओर जाने का मार्ग है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक के लिए 'चेतना के आरोहण' का मानचित्र है। साधक इस श्लोक के माध्यम से अपने वर्तमान स्तर को पहचानता है और उच्चतर भूमि की ओर अग्रसर होता है।

१. भूत से प्राणी: यह उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ साधक केवल शरीर (जड़) के प्रति आसक्त न रहकर, अपने भीतर के 'प्राण' के प्रति सजग होता है।

२. प्राणी से बुद्धिजीवी: यहाँ साधक अपनी इंद्रियों के आवेगों को नियंत्रित कर विवेक का अभ्यास करता है। यह 'प्रत्याहार' की प्रारंभिक अवस्था है, जहाँ मन बाहरी विषयों के बजाय आंतरिक विश्लेषण में लगता है।

३. बुद्धिजीवी से नर: यहाँ साधक भौतिक बुद्धि को 'सात्त्विक बुद्धि' में परिवर्तित करता है। वह समझता है कि बुद्धि केवल साधन है, साध्य नहीं।

४. नर से ब्राह्मण: यह वह भूमि है जहाँ साधक 'अहंकार' का विसर्जन कर 'ब्रह्म-भाव' में प्रतिष्ठित होता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह स्वयं से पूछे—"क्या मैं अभी भी केवल प्रवृत्तियों (प्राणी) के अधीन हूँ, या मैं विवेक (बुद्धिजीवी) का प्रयोग कर रहा हूँ, या मैं उस परम तत्व (ब्राह्मण) की खोज में हूँ?" यह श्लोक साधक को स्थूल शरीर से सूक्ष्म बुद्धि और फिर सूक्ष्म बुद्धि से अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है। यह यात्रा वास्तव में 'अविद्या' के अंधकार से 'विद्या' के प्रकाश की ओर गमन है।

श्लोक ११.३७

ब्राह्मणेषु तु विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः ।

कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः ॥ ११.३७ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२६

ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि (कर्तव्यका निश्चय करनेवाले), कृतबुद्धियोंमें करनेवाले, और करनेवालोंमें ब्रह्मवेत्ता (श्रेष्ठ हैं)।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चेतना के क्रमिक विकास का वर्णन करते हुए भूतों से मनुष्यों और मनुष्यों से ब्राह्मणों तक की श्रेष्ठता की श्रेणी बताई। अब इस श्लोक में वे ब्राह्मण श्रेणी के भीतर और अधिक सूक्ष्म विभाजन कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि केवल जन्म या कुल से नहीं, अपितु आंतरिक योग्यता और अनुभूति से श्रेष्ठता का निर्धारण होता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ब्राह्मणेषु तु विद्वांसो (श्रेष्ठाः), विद्वांसु कृतबुद्धयः (श्रेष्ठाः), कृतबुद्धिषु कर्तारः (श्रेष्ठाः), कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः (श्रेष्ठाः)।

पदार्थ:

• विद्वांसो (विद्वान्): वे जो वेदों के ज्ञान, शास्त्रों के अर्थ और विधि-विधानों के ज्ञाता हैं। यहाँ 'विद्वत्ता' का अर्थ सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि शास्त्र-सम्मत ज्ञान है।

• कृतबुद्धयः: 'कृत' का अर्थ है निश्चित या परिपक्व। कृतबुद्धि वे हैं जिन्होंने ज्ञान को केवल सुना नहीं है, बल्कि विवेक द्वारा उसका निश्चय कर लिया है। वे जानते हैं कि किस समय, किस परिस्थिति में, कौन सा कर्म करना उचित है।

• कर्तारः: वे जो केवल निश्चय नहीं करते, बल्कि उस निश्चय को आचरण में उतारते हैं। जिन्हें ज्ञान और विवेक का समन्वय प्राप्त है और जो धर्मानुसार कर्म करने में समर्थ हैं।

• ब्रह्मवेदिनः: वे जिन्होंने 'ब्रह्म' (परम तत्त्व) का साक्षात् अनुभव कर लिया है। वे केवल शास्त्र-विद्वान या कर्मकाण्डी नहीं, अपितु उस सत्य के दृष्टा हैं जिसके लिए शास्त्र लिखे गए हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को एक सोपान (सीढ़ी) प्रदान करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि आध्यात्मिक यात्रा में 'जानने' और 'होने' के बीच एक लंबी दूरी है।

प्रथम सोपान 'विद्वत्ता' का है। ब्राह्मणों में विद्वान श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे अंधकार से निकलकर प्रकाश की ओर बढ़े हैं। उनके पास शास्त्र का आलोक है। किंतु केवल शास्त्र-ज्ञान पर्याप्त नहीं है, क्योंकि ज्ञान जब तक केवल बौद्धिक रहता है, वह अहंकार का कारण बन सकता है।

द्वितीय सोपान 'कृतबुद्धि' का है। विद्वानों में कृतबुद्धि श्रेष्ठ हैं। कृतबुद्धि होने का अर्थ है—ज्ञान का संस्कारित होना। जब शास्त्र का ज्ञान 'विवेक' में बदल जाता है और साधक यह निश्चय कर लेता है कि "मेरा लक्ष्य क्या है और उसे कैसे प्राप्त करना है", तब वह कृतबुद्धि कहलाता है। यह वह अवस्था है जहाँ संशय समाप्त हो जाता है।

तृतीय सोपान 'कर्तृत्व' का है। कृतबुद्धियों में कर्तार श्रेष्ठ हैं। निश्चय करना एक बात है, किंतु उस निश्चय के अनुसार जीवन जीना दूसरी बात। जो व्यक्ति अपने विवेकपूर्ण निश्चय को कर्म में बदल देता है, जो धर्म के मार्ग पर अडिग होकर चलता है, वही वास्तव में श्रेष्ठ है। यहाँ 'कर्तृत्व' का अर्थ सांसारिक भागदौड़ नहीं, अपितु शास्त्र-सम्मत और योग-सम्मत क्रियान्वयन है।

अंतिम और सर्वोच्च सोपान 'ब्रह्मवेदन' का है। करनेवालों में ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ हैं। कर्म कितने ही शुद्ध क्यों न हों, वे एक समय के बाद फल देकर समाप्त हो जाते हैं। किंतु ब्रह्मवेत्ता वह है जिसने कर्मों के पार जाकर उस 'अक्षर' को जान लिया है। वह अब कर्मों का कर्ता नहीं, अपितु साक्षी है। वह उस स्थिति में है जहाँ ज्ञान, निश्चय और कर्म तीनों एक होकर ब्रह्म में विलीन हो गए हैं।

इस प्रकार, महर्षि याज्ञवल्क्य हमें बताते हैं कि श्रेष्ठता की यात्रा सूचना (विद्वत्ता) से शुरू होकर, निश्चय (कृतबुद्धि) और आचरण (कर्तृत्व) से गुजरते हुए, साक्षात् अनुभूति (ब्रह्मवेदन) पर समाप्त होती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक की 'भूमि' का वर्णन करता है। साधक जब शास्त्र पढ़ता है, तो वह 'विद्वान्' की भूमि पर होता है। जब वह ध्यान और मनन से उस ज्ञान को अपने हृदय में उतारता है और संकल्प को दृढ़ करता है, तब वह 'कृतबुद्धि' की भूमि पर पहुँचता है। जब वह उस संकल्प को प्राण और मन के अनुशासन (योग) में बदल देता है, तब वह 'कर्ता' बनता है।

परंतु, योग का अंतिम लक्ष्य 'कर्ता' बने रहना नहीं, बल्कि 'कर्तृत्व' से मुक्त होना है। जब साधक अपनी समस्त क्रियाओं को ईश्वर या ब्रह्म को समर्पित कर देता है और स्वयं को केवल एक निमित्त अनुभव करता है, तब वह 'ब्रह्मवेत्ता' हो जाता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह केवल बौद्धिक चर्चाओं (विद्वत्ता) में न उलझे, बल्कि अपने ज्ञान को निश्चय में बदले, निश्चय को आचरण में उतारे और अंततः आचरण के माध्यम से उस शून्य या पूर्ण (ब्रह्म) में स्थित हो जाए। इस श्लोक का रहस्य यह है कि जन्म से प्राप्त ब्राह्मणत्व केवल एक संभावना है, किंतु 'ब्रह्मवेत्ता' होना एक उपलब्धि है, जो केवल योग और अनुभव से ही संभव है।

आत्मज्ञानस्य सर्वश्रेष्ठत्वम्

श्लोक ११.३८

सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम् ।

तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः ॥ ११.३८ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२६

इन सबमें भी आत्मज्ञान परम कहा गया है; वह सब विद्याओंमें अग्रणी है, उससे अमृत प्राप्त होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने श्रेष्ठता की एक सोपान-श्रेणी प्रस्तुत की थी, जिसमें उन्होंने ब्रह्मवेत्ता को समस्त मनुष्यों और विद्वानों में सर्वोच्च स्थान दिया। अब इस श्लोक में वे उस 'ब्रह्मविद्या' या 'आत्मज्ञान' के स्वरूप और उसकी अनिवार्यता को स्पष्ट कर रहे हैं कि वह क्यों अन्य सभी विद्याओं से ऊपर है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: सर्वेषामपि चैतेषां (विद्यानां) आत्मज्ञानं परं स्मृतम्। तत् हि अग्र्यं सर्वविद्यानां, ततः ह्यमृतं प्राप्यते।

पदार्थ:

• सर्वेषामपि चैतेषां: 'एतेषां' शब्द यहाँ उन समस्त विद्याओं और योग्यताओं के लिए प्रयुक्त है जिनका उल्लेख पिछले श्लोकों में आया—जैसे वेदों का ज्ञान, विवेक (कृतबुद्धि), और शास्त्र-सम्मत कर्म (कर्तृत्व)।

• परं: सर्वोच्च, अंतिम या लक्ष्य। जो स्वयं किसी अन्य पर आश्रित न हो।

• अग्र्यं: अग्रणी या प्रथम। वह विद्या जो अन्य सभी विद्याओं का मूल है और जिनके बिना अन्य विद्याएँ अपूर्ण हैं।

• अमृतं: वह अवस्था जहाँ मृत्यु (परिवर्तन और विनाश) का अभाव हो। यह केवल शारीरिक दीर्घायु नहीं, अपितु जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और शाश्वत आनंद की स्थिति है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान के शिखर की घोषणा करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यद्यपि वेदों का अध्ययन, यज्ञ-विधि, तप और नैतिक आचरण (जो पिछले श्लोकों में वर्णित थे) अत्यंत मूल्यवान हैं, किंतु वे सब 'साधन' हैं, 'साध्य' नहीं। 'परं' शब्द का प्रयोग यह संकेत देता है कि आत्मज्ञान वह अंतिम गंतव्य है जहाँ पहुँचकर साधक की खोज समाप्त हो जाती है।

जब ऋषि कहते हैं कि आत्मज्ञान 'अग्र्यं' (अग्रणी) है, तो इसका अर्थ यह है कि अन्य सभी विद्याएँ—चाहे वे लौकिक हों या पारलौकिक—मनुष्य को केवल सुख, स्वर्ग या विशिष्ट योग्यताओं तक ले जा सकती हैं, किंतु आत्मज्ञान उसे उसके वास्तविक स्वरूप से मिलाता है। अन्य विद्याएँ 'विषय' का ज्ञान कराती हैं, जबकि आत्मज्ञान 'ज्ञाता' का ज्ञान कराता है।

इस श्लोक का मुख्य फल 'अमृत' की प्राप्ति बताया गया है। यहाँ रहस्य यह है कि अमृत कोई बाहरी औषधि नहीं, बल्कि आत्मा का अपना स्वभाव है। जब अविद्या का आवरण हटता है, तब साधक अनुभव करता है कि वह सदैव से ही अमृत स्वरूप है। अतः आत्मज्ञान अमृत को 'पैदा' नहीं करता, बल्कि उसे 'उद्घाटित' करता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

यह श्लोक मनुस्मृति के वचन से पूर्णतः मेल खाता है:

मनुस्मृति

सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम् । तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः ॥ १२.८५ ॥

इन सबमें आत्मज्ञान परम कहा गया है; वह सब विद्याओंमें अग्रणी है, उससे अमृत प्राप्त होता है।

मनुस्मृति १२.८५मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 596

यहाँ मनु और याज्ञवल्क्य दोनों एक ही सत्य की पुष्टि करते हैं कि समस्त विद्याओं की परिणति आत्मज्ञान में ही है।

इसी भाव को भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने और अधिक सूक्ष्मता से कहा है:

भगवद्गीता

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ४.३८ ॥

यहाँ ज्ञानके समान पवित्र कुछ नहीं; योगमें सिद्ध हुआ (साधक) समय पाकर उसे स्वयं अपने भीतर पाता है।

भगवद्गीता ४.३८गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 138

जहाँ मनुस्मृति और बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति आत्मज्ञान को 'परम' और 'अग्रणी' बताकर उसके फल (अमृत) पर बल देते हैं, वहीं गीता इस ज्ञान की 'पवित्रता' और उसकी प्राप्ति के साधन 'योग' तथा 'समय' (कालेनात्मनि) की ओर संकेत करती है। दोनों ही शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि आत्मज्ञान कोई बौद्धिक सूचना नहीं, बल्कि एक आंतरिक उपलब्धि है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विद्या' से 'अविद्या' के पार ले जाने का निर्देश है। साधक जब तक बाहरी विधियों, मंत्रों और शास्त्रों के विवेचन में रहता है, वह 'स्थूल वेद' के क्षेत्र में होता है। इस श्लोक का अभ्यास करते समय साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि उसकी समस्त शिक्षा, तप और साधना का अंतिम लक्ष्य केवल स्वयं को जानना है।

साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह अपनी चेतना को 'जानने वाले' (द्रष्टा) पर केंद्रित करे। जब वह यह अनुभव करता है कि "मैं वह हूँ जो सब कुछ जानता है, न कि वह जो जाना जा रहा है", तब वह 'अग्र्य विद्या' की भूमि पर प्रवेश करता है। यह स्थिति साधक को ज्ञान-भूमि से अनुभव-भूमि की ओर ले जाती है, जहाँ वह स्वयं को सीमित शरीर और मन से ऊपर उठाकर उस 'अक्षर' (अविनाशी) रूप में देखता है, जिसे अमृत कहा गया है।

वैदिककर्मद्वैविध्यम्

श्लोक ११.३९

प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च द्विविधं कर्म वैदिकम् ।

निःश्रेयसकरं ज्ञेयं द्विजानामिह सर्वशः ॥ ११.३९ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२६

(मनु १२.८८:) प्रवृत्ति और निवृत्ति — वैदिक कर्म दो प्रकारका है; यहाँ द्विजोंके लिए (वह) सब प्रकारसे कल्याणकारी जानना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने आत्मज्ञान को समस्त विद्याओं में अग्रणी और अमृत का द्वार बताया था। अब वे इस ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग और व्यावहारिक जीवन में उसके समन्वय को स्पष्ट करने हेतु वैदिक कर्मों के वर्गीकरण की ओर बढ़ रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च द्विविधं कर्म वैदिकम्। (एतत्) निःश्रेयसकरं ज्ञेयं द्विजानामिह सर्वशः।

पदार्थ:

• प्रवृत्तिः: संसार के धर्मों, कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए उन्नति की ओर बढ़ना।

• निवृत्तिः: बाह्य आसक्तियों का त्याग कर अंतर्मुखी होना और आत्मा में लीन होना।

• द्विविधं कर्म वैदिकम्: वेदों द्वारा निर्देशित कर्म दो प्रकार के हैं। यहाँ 'वैदिक' शब्द यह दर्शाता है कि ये दोनों मार्ग विपरीत नहीं, अपितु एक ही श्रुति-परम्परा के दो सोपान हैं।

• निःश्रेयसकरं: वह जो परम कल्याण या मोक्ष प्रदान करे। 'श्रेयस' भौतिक सुख है, किंतु 'निःश्रेयस' वह अवस्था है जहाँ किसी भी प्रकार के अभाव या दुख की संभावना शेष न रहे।

• द्विजानाम्: यहाँ 'द्विज' केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं, अपितु वे साधक हैं जिनका 'दूसरा जन्म' ज्ञान और संस्कार से हुआ है।

• इह: इस लोक में, या इस वर्तमान जीवन काल में।

• सर्वशः: सब प्रकार से, अर्थात् हर परिस्थिति और हर आश्रम में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक कर्म और ज्ञान के बीच के सेतु का निर्माण करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वेद केवल कर्मकाण्ड की पुस्तक नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के दो भिन्न आयामों—प्रवृत्ति और निवृत्ति—का पूर्ण मार्गदर्शन करते हैं।

साधारणतः लोग समझते हैं कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ या संसार का त्याग है, किंतु ऋषि कहते हैं कि 'वैदिक कर्म' द्विविध है। एक वह जो हमें समाज, परिवार और प्रकृति के साथ जोड़कर हमें परिष्कृत करता है (प्रवृत्ति), और दूसरा वह जो हमें इन सब से ऊपर उठाकर स्वयं के शुद्ध स्वरूप से मिलाता है (निवृत्ति)।

यहाँ 'निःश्रेयसकरं' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाव यह है कि चाहे साधक प्रवृत्त मार्ग पर हो या निवृत्त मार्ग पर, यदि वह वैदिक मर्यादा और योगिक दृष्टि से कर्म करता है, तो दोनों ही मार्ग अंततः उसे परम कल्याण (मोक्ष) की ओर ले जाते हैं। यह स्मृति यहाँ यह स्थापना कर रही है कि गृहस्थ जीवन (प्रवृत्ति) और संन्यास (निवृत्ति) परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक ही यात्रा के दो चरण हैं। द्विजों के लिए यह जानना अनिवार्य है कि संसार में रहते हुए भी निवृत्ति का भाव कैसे रखा जाए और निवृत्ति में रहते हुए भी लोक-कल्याण की प्रवृत्ति कैसे बनी रहे।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

सुखाभ्युदयिकं चैव नैःश्रेयसिकमेव च । प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ॥ १२.८८ ॥

सुख और अभ्युदय देनेवाला तथा निःश्रेयस देनेवाला — प्रवृत्त और निवृत्त — वैदिक कर्म दो प्रकारका है।

मनुस्मृति १२.८८मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 597

मनुस्मृति में भी स्पष्ट कहा गया है कि वैदिक कर्म दो प्रकार के हैं—एक जो सुख और अभ्युदय (भौतिक उन्नति) देता है और दूसरा जो निःश्रेयस (मोक्ष) देता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार का विस्तार करती है और इसे 'द्विजों' के लिए 'सर्वशः' (सब प्रकार से) कल्याणकारी बताती है। जहाँ मनुस्मृति इन दोनों के फलों (सुख और निःश्रेयस) पर बल देती है, वहीं यह स्मृति इन दोनों को 'वैदिक कर्म' के एक ही वृत्तांत के रूप में प्रस्तुत कर साधक को यह बोध कराती है कि वह जिस भी अवस्था में हो, वैदिक मार्ग का अनुसरण कर परम लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति' बाहर की क्रियाएँ नहीं, बल्कि चित्त की दो अवस्थाएँ हैं।

साधक जब 'प्रवृत्ति' में होता है, तो वह अपने कर्मों को ईश्वर या विराट पुरुष को समर्पित कर देता है; वह कर्म करता है, किंतु कर्ताभाव से मुक्त रहता है। यह 'कर्मयोग' की भूमि है।

जब साधक 'निवृत्ति' में जाता है, तो वह अपनी समस्त इंद्रियों को विषयों से हटाकर अंतःकरण में स्थिर करता है। यह 'ध्यानयोग' की भूमि है।

इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक अपने जीवन में इन दोनों का संतुलन बनाए। वह बाहरी तौर पर कर्तव्यों का पालन करे (प्रवृत्ति), किंतु भीतर से स्वयं को साक्षी भाव में रखे (निवृत्ति)। जब प्रवृत्ति और निवृत्ति का यह द्वंद्व समाप्त हो जाता है और साधक 'कर्म करते हुए भी अकर्ता' हो जाता है, तब वह 'निःश्रेयस' की स्थिति को प्राप्त करता है। यह वह भूमि है जहाँ से साधक स्थूल कर्मों के बंधन को काटकर सूक्ष्म आत्म-अनुभव की ओर बढ़ता है।

प्रवृत्तकर्मस्वरूपम्

श्लोक ११.४०

कर्मणां समनुष्ठानमाश्रमाणां च सेवनम् ।

पुत्रदारादिसंसक्तिः प्रवृत्तं कर्म चोच्यते ॥ ११.४० ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२६

कर्मोंका अनुष्ठान, आश्रमोंका सेवन और पुत्र-स्त्री आदिमें आसक्ति — (यह) प्रवृत्त कर्म कहलाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वैदिक कर्मों को 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति' नामक दो धाराओं में विभाजित किया था। अब वे स्पष्ट कर रहे हैं कि वास्तव में 'प्रवृत्ति' के अंतर्गत कौन-कौन से व्यवहार और मानसिक वृत्तियाँ आती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: कर्मणां समनुष्ठानम्, आश्रमाणां च सेवनम्, पुत्र-दारादि-संसक्तिः (च)— (एतत्) प्रवृत्तं कर्म चोच्यते।

पदार्थ:

• कर्मणां समनुष्ठानम् — वेदों द्वारा निर्देशित विहित कर्मों का यथाविधि और निरंतर पालन करना।

• आश्रमाणां सेवनम् — चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) के धर्मों का पालन करते हुए उनमें स्थित होना।

• पुत्र-दारादि-संसक्तिः — पुत्र, पत्नी आदि परिजनों के प्रति मोह, अनुराग और उनके कल्याण की इच्छा में बंधे रहना।

• प्रवृत्तं कर्म — वह कर्म जो साधक को बाहरी जगत, सामाजिक संबंधों और कामनाओं की ओर प्रवृत्त करता है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ 'प्रवृत्ति' की परिभाषा दे रहे हैं। उनके अनुसार, जब मनुष्य वेदों द्वारा बताए गए सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यों का पालन करता है, तो वह प्रवृत्त मार्ग पर होता है। इसमें तीन मुख्य बातें कही गई हैं: पहला, 'कर्मों का अनुष्ठान'—अर्थात् यज्ञ, दान और नित्य-नैमित्तिक कर्मों को करना। दूसरा, 'आश्रमों का सेवन'—अर्थात् जीवन के विभिन्न चरणों में निर्धारित मर्यादाओं का पालन करना। और तीसरा, 'संसक्ति'—अर्थात् परिवार और प्रियजनों के प्रति भावनात्मक लगाव।

यहाँ ध्यान देने योग्य रहस्य यह है कि ऋषि ने केवल 'कर्म' या 'आश्रम' को ही प्रवृत्त नहीं कहा, अपितु 'संसक्ति' (आसक्ति) को भी इसमें सम्मिलित किया है। इसका भाव यह है कि बाहरी क्रियाएँ (जैसे पूजा या गृहस्थ धर्म) तब तक केवल 'प्रवृत्ति' हैं, जब तक उनके साथ 'आसक्ति' जुड़ी है। जब तक साधक यह मानता है कि "यह मेरा पुत्र है", "यह मेरी पत्नी है", तब तक वह प्रवृत्त कर्म के बंधन में है।

यह स्मृति यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि प्रवृत्त कर्म बुरा नहीं है, क्योंकि यह वैदिक है और समाज के संचालन के लिए आवश्यक है। किन्तु, यह 'निवृत्ति' की तुलना में एक प्रारंभिक सोपान है। प्रवृत्त मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति धर्म का पालन तो करता है, किन्तु उसकी दृष्टि अभी भी 'अहं' और 'मम' (मैं और मेरा) के घेरे में होती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

इह चामुत्र वा काम्यं प्रवृत्तं कर्म कीर्त्यते । निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमुपदिश्यते ॥ १२.८९ ॥

इस लोक या परलोककी कामनासे किया कर्म प्रवृत्त कहलाता है; निष्काम और ज्ञानपूर्वक (किया कर्म) निवृत्त कहा जाता है।

मनुस्मृति १२.८९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 597

मनुस्मृति के इस अंश में प्रवृत्त कर्म का आधार 'कामना' को बताया गया है। मनु कहते हैं कि इस लोक या परलोक की कामना से किया गया कर्म प्रवृत्त है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात को और विस्तार देते हुए बताती है कि यह कामना केवल भौतिक सुख तक सीमित नहीं है, बल्कि पुत्र-स्त्री आदि के प्रति 'संसक्ति' के रूप में हमारे स्वभाव में गहरे तक समाई हुई है। जहाँ मनु 'कामना' (इच्छा) पर बल देते हैं, वहीं याज्ञवल्क्य 'संसक्ति' (लगाव) और 'आश्रम-सेवन' (सामाजिक व्यवस्था) को प्रवृत्त कर्म का लक्षण बताते हैं। दोनों का मेल यह है कि प्रवृत्त मार्ग वह है जहाँ कर्ता स्वयं को संबंधों और फलों से अलग नहीं देख पाता।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'प्रवृत्ति' का अर्थ है— चित्त का बहिर्मुखी होना। जब साधक का मन बाहरी कर्मों, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक प्रतिष्ठा में लगा रहता है, तो उसकी प्राण-शक्ति का प्रवाह बाहर की ओर होता है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसकी वर्तमान स्थिति क्या है। यदि वह अभी भी पुत्र-स्त्री आदि के मोह में बँधा है और केवल बाहरी विधियों के अनुष्ठान में लीन है, तो वह 'प्रवृत्त' भूमि पर है। इस भूमि पर अभ्यास यह है कि कर्मों को 'समनुष्ठान' (यथाविधि) तो किया जाए, किन्तु धीरे-धीरे उस 'संसक्ति' को पहचानकर उसे ढीला किया जाए। यह प्रवृत्त कर्म से निवृत्त कर्म की ओर जाने की पहली सीढ़ी है—जहाँ साधक यह देखना शुरू करता है कि बाहरी कर्म और आंतरिक आसक्ति के बीच क्या संबंध है।

निवृत्तकर्मस्वरूपम्

श्लोक ११.४१

नियमानामनुष्ठानं सम्यगात्मविचिन्तनम् ।

सुतादिष्वनभिष्वङ्गो निवृत्तं कर्म वैदिकम् ॥ ११.४१ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२६

नियमोंका अनुष्ठान, आत्माका सम्यक् चिन्तन और पुत्र आदिमें अनासक्ति — (यह) निवृत्त वैदिक कर्म है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'प्रवृत्ति' के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए बताया कि बाहरी कर्मों का अनुष्ठान और परिजनों के प्रति संसक्ति मनुष्य को प्रवृत्त मार्ग पर रखती है। अब वे इसके विपरीत 'निवृत्ति' के स्वरूप का विवेचन कर रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि वैदिक कर्म करते हुए भी निवृत्त कैसे रहा जा सकता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: नियमानाम् अनुष्ठानम्, सम्यक्-आत्मविचिन्तनम्, सुतादिषु अनभिष्वङ्गो (च)— (एतत्) निवृत्तं वैदिकं कर्म (अस्ति)।

पदार्थ:

• नियमानाम् अनुष्ठानम् — यहाँ 'नियम' का अर्थ केवल बाहरी मर्यादा नहीं, अपितु वे आंतरिक अनुशासन और संयम हैं जो चित्त को स्थिर करते हैं। उनका अनुष्ठान करना अर्थात् उन्हें जीवन में उतारना।

• सम्यक्-आत्मविचिन्तनम् — आत्मा का सही और निरंतर चिंतन। 'सम्यक्' शब्द यहाँ महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है—वह चिंतन जो भ्रमरहित हो और साधक को 'अहम्' (अहंकार) से हटाकर 'अहम्' (शुद्ध चैतन्य) की ओर ले जाए।

• सुतादिषु अनभिष्वङ्गो — 'सुत' (पुत्र) आदि प्रियजनों में 'अनभिष्वङ्ग' होना। 'अभिष्वङ्ग' का अर्थ है—पूरी तरह लिप्त हो जाना या चिपक जाना। अतः इसका अर्थ है—परिजनों के प्रति प्रेम तो रहे, किंतु मोह और आसक्ति का अभाव हो।

• निवृत्तं वैदिकं कर्म — वह वैदिक कर्म जो साधक को बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद प्रकट कर रहे हैं। सामान्यतः यह माना जाता है कि 'निवृत्ति' का अर्थ है कर्मों का त्याग कर देना या घर-बार छोड़ देना। किंतु ऋषि कहते हैं कि निवृत्ति कर्मों के त्याग में नहीं, अपितु 'भाव' के परिवर्तन में है। वे निवृत्त वैदिक कर्म के तीन अनिवार्य अंग बताते हैं:

प्रथम, नियमानाम् अनुष्ठानम्। निवृत्ति का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं है। वास्तव में, निवृत्त मार्ग पर चलने वाले के लिए नियम और भी कठोर और सूक्ष्म हो जाते हैं। यहाँ नियम का अर्थ है—इन्द्रिय निग्रह और चित्त की शुद्धि। जब साधक नियमों का पालन केवल फल की इच्छा से नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि के लिए करता है, तब वह अनुष्ठान उसे बंधन से मुक्त करने लगता है।

द्वितीय, सम्यक्-आत्मविचिन्तनम्। यह इस श्लोक का हृदय है। प्रवृत्त व्यक्ति का चिंतन 'विषयों' में होता है, जबकि निवृत्त व्यक्ति का चिंतन 'आत्मा' में होता है। वह कर्म तो करता है, किंतु उसका केंद्र बिंदु आत्मा रहती है। वह निरंतर इस बोध में रहता है कि "मैं यह शरीर या कर्ता नहीं, अपितु साक्षी चैतन्य हूँ।"

तृतीय, सुतादिषु अनभिष्वङ्गो। ऋषि यह नहीं कह रहे कि पुत्र या पत्नी का त्याग कर दो, अपितु 'अभिष्वङ्ग' (लिप्तता) का त्याग करो। प्रवृत्त मार्ग में व्यक्ति परिजनों को 'मेरा' मानकर उनमें बँध जाता है, जबकि निवृत्त मार्ग में वह उन्हें ईश्वर का अंश या आत्मा का विस्तार मानकर प्रेम करता है, पर उनसे बँधता नहीं।

अतः, निवृत्त वैदिक कर्म वह है जहाँ क्रिया बाहरी रूप से वैसी ही दिखती है जैसी प्रवृत्त की, किंतु आंतरिक रूप से वह पूर्णतः भिन्न होती है। वह कर्म करते हुए भी अकर्ता रहता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

इह चामुत्र वा काम्यं प्रवृत्तं कर्म कीर्त्यते । निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमुपदिश्यते ॥ १२.८९ ॥

इस लोक या परलोककी कामनासे किया कर्म प्रवृत्त कहलाता है; निष्काम और ज्ञानपूर्वक (किया कर्म) निवृत्त कहा जाता है।

मनुस्मृति १२.८९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 597

मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि कामना से किया गया कर्म 'प्रवृत्त' है और निष्काम एवं ज्ञानपूर्वक किया गया कर्म 'निवृत्त' है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात की पुष्टि करती है कि निवृत्ति का आधार 'ज्ञान' और 'निष्कामता' है। जहाँ मनुस्मृति इसे संक्षिप्त रूप में 'निष्काम' कहती है, वहीं याज्ञवल्क्य उसे 'सम्यक्-आत्मविचिन्तन' और 'अनभिष्वङ्ग' के रूप में विस्तार देते हैं, जिससे साधक को यह स्पष्ट हो सके कि निष्कामता का व्यावहारिक अनुभव क्या है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का रहस्य यह है कि 'भेद कर्म में नहीं, आसक्ति में है'। योग का अर्थ कर्म का अभाव नहीं, अपितु कर्म के साथ 'आसक्ति का अभाव' है।

साधक यहाँ इस अभ्यास का करता है कि वह अपने दैनिक कर्तव्यों (नियमों) को निभाते हुए भी अपने भीतर एक 'साक्षी' को जगाए रखे। जब वह परिवार के बीच हो, तब भी उसका एक अंश 'सम्यक्-आत्मविचिन्तन' में लीन रहे। वह अनुभव करता है कि जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से नहीं भीगता, वैसे ही वह संसार में रहकर भी 'अनभिष्वङ्ग' (अलिप्त) रह सकता है।

यह अवस्था साधक को 'कर्म-भूमि' से 'ज्ञान-भूमि' की ओर ले जाती है। यहाँ अभ्यास यह है कि जब भी मन पुत्र या प्रियजनों के प्रति मोह (संसक्ति) में जाए, तब तुरंत उसे 'आत्मा' के चिंतन में मोड़ दिया जाए। इस प्रकार, बाहरी क्रियाएँ (वैदिक कर्म) अब बंधन का कारण नहीं, बल्कि मुक्ति का साधन बन जाती हैं क्योंकि वे 'ज्ञान-पूर्वक' हो चुकी हैं।

द्विविधवैदिककर्मफलम्

श्लोक ११.४२

प्रवृत्तं सेवमानस्तु स्वर्गलोके महीयते ।

निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ११.४२ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२६

(मनु १२.९०:) प्रवृत्त (कर्म) का सेवन करनेवाला स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है; निवृत्तका सेवन करनेवाला ब्रह्मभावके योग्य होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वैदिक कर्म के दो रूपों—प्रवृत्ति और निवृत्ति—की परिभाषा दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाहरी अनुष्ठान और आसक्ति 'प्रवृत्ति' है, जबकि आंतरिक अनुशासन, आत्म-चिन्तन और अनासक्ति 'निवृत्ति' है। अब इस श्लोक में वे इन दोनों मार्गों के गंतव्य और उनके फल का निर्णय कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यः) प्रवृत्तं (कर्म) सेवमानः (सः) तु स्वर्गलोके महीयते । (यः) निवृत्तं (कर्म) सेवमानः (सः) तु ब्रह्मभूयाय कल्पते ।

पदार्थ:

• प्रवृत्तं सेवमानः — वह जो प्रवृत्त कर्मों का सेवन करता है। यहाँ 'सेवन' का अर्थ है—कर्मों को उनके फल की इच्छा से करना और उनमें लिप्त रहना।

• स्वर्गलोके महीयते — स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित या सम्मानित होता है। 'महीयते' का अर्थ है—महान होना या उच्च स्थान प्राप्त करना। यह फल अस्थायी है, क्योंकि यह पुण्य के संचय पर आधारित है।

• निवृत्तं सेवमानः — वह जो निवृत्त कर्म का सेवन करता है। अर्थात् वह जो कर्म तो करता है, किंतु फल की आसक्ति और 'कर्ता' भाव से मुक्त होकर उसे ईश्वरार्पण या आत्म-साक्षात्कार के लिए करता है।

• ब्रह्मभूयाय कल्पते — ब्रह्मभाव (ब्रह्महोना) के योग्य होता है। 'कल्पते' का अर्थ है—योग्य होना या उस अवस्था को प्राप्त करने का सामर्थ्य रखना। यह स्थायी मुक्ति और पूर्णता की अवस्था है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को कर्म के फल के प्रति सचेत कर रहे हैं। वे बताते हैं कि वैदिक कर्म दो भिन्न दिशाओं में ले जा सकते हैं।

पहला मार्ग 'प्रवृत्ति' का है। जब मनुष्य वेदों द्वारा निर्देशित कर्मों को केवल सांसारिक समृद्धि, पारिवारिक सुख या दैवीय कृपा (स्वर्ग) की लालसा से करता है, तो वह प्रवृत्त मार्ग पर होता है। ऐसा साधक अनुशासित तो होता है, किंतु वह अभी भी 'कामना' के बंधन में है। उसका गंतव्य 'स्वर्गलोक' है। स्वर्ग कोई अंतिम लक्ष्य नहीं, अपितु एक उच्चतर मानसिक और सूक्ष्म अवस्था है जहाँ पुण्य का भोग होता है। किंतु यह स्थिति तब तक रहती है जब तक पुण्य शेष है; पुण्य क्षीण होते ही पुनः संसार का चक्र आरम्भ हो जाता है।

दूसरा मार्ग 'निवृत्ति' का है। निवृत्ति का अर्थ कर्मों का पूर्ण त्याग नहीं, अपितु कर्म के साथ अपने सम्बन्ध का त्याग है। जब साधक नियमों का पालन करता है, आत्मा का चिन्तन करता है और प्रियजनों में अनासक्ति विकसित करता है, तब वह 'निवृत्त' कहलाता है। ऐसा साधक कर्म को 'साधन' मानता है, 'साध्य' नहीं। उसका लक्ष्य स्वर्ग का सुख नहीं, बल्कि स्वयं का ब्रह्मत्व है। वह 'ब्रह्मभूयाय' योग्य हो जाता है, क्योंकि उसने अपने चित्त को कामनाओं के वेग से मुक्त कर लिया है।

रहस्य यह है कि प्रवृत्त मार्ग 'सगुण' और 'साकार' की उपासना का विस्तार है, जबकि निवृत्त मार्ग 'निर्गुण' और 'अक्षर' की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है। प्रवृत्त व्यक्ति 'कर्ता' बना रहता है, जबकि निवृत्त व्यक्ति 'साक्षी' बनने की दिशा में अग्रसर होता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति में इस विषय का समर्थन करते हुए कहा गया है:

मनुस्मृति

प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति साम्यताम् । निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै ॥ १२.९० ॥

प्रवृत्त कर्मका सेवन करके (मनुष्य) देवताओंकी समानता पाता है; निवृत्तका सेवन करनेवाला पाँचों भूतोंको लाँघ जाता है।

मनुस्मृति १२.९०मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 597

यहाँ मनु का कथन कि प्रवृत्त व्यक्ति 'देवताओं की समानता' पाता है, बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के 'स्वर्गलोके महीयते' के समान ही है। दोनों ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्रवृत्त मार्ग साधक को उच्च लोकों तक तो ले जाता है, किंतु वह पूर्ण मुक्ति नहीं है। वहीं, 'पाँचों भूतों को लाँघ जाना' (भूतान्यत्येति पञ्च वै) सीधे तौर पर 'ब्रह्मभूयाय' होने का ही संकेत है, जहाँ शरीर और प्रकृति के बंधन समाप्त हो जाते हैं।

इसी प्रकार भगवद्गीता में प्रवृत्त मार्ग के फल की अनित्यता बताई गई है:

भगवद्गीता

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ ९.२१ ॥

वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मर्त्यलोकमें लौट आते हैं; इस प्रकार त्रयी-धर्मका आश्रय लेनेवाले, कामनाओंके इच्छुक आवागमन पाते हैं।

भगवद्गीता ९.२१गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 238

गीता स्पष्ट करती है कि कामनाओं से प्रेरित होकर त्रयी-धर्म (वैदिक कर्म) का आश्रय लेने वाले लोग स्वर्ग का भोग तो करते हैं, किंतु पुण्य क्षीण होने पर पुनः मर्त्यलोक में लौट आते हैं। यह साक्ष्य इस स्मृति के उस कथन को पुष्ट करता है कि प्रवृत्त का फल केवल स्वर्ग है, जो कि आवागमन के चक्र का ही एक हिस्सा है, जबकि निवृत्ति का फल 'ब्रह्मभाव' है, जो इस चक्र का अंत है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अभ्यास' और 'अवस्था' के भेद को समझाता है।

प्रवृत्त मार्ग का अभ्यास 'चित्त-शुद्धि' के लिए आवश्यक है। जब तक साधक के भीतर संस्कार प्रबल हैं, वह निष्काम भाव से कर्म नहीं कर सकता। अतः वह पहले प्रवृत्त होकर मर्यादाओं का पालन करता है, जिससे उसका मन अनुशासित होता है।

परंतु, योग की उच्च भूमि 'निवृत्ति' है। यहाँ साधक का अभ्यास 'अनासक्ति' का होता है। वह कर्म करता है, किंतु हृदय में यह भाव रखता है कि "मैं कर्ता नहीं हूँ, यह केवल प्रकृति का खेल है।" जब वह सुतादि (पुत्र आदि) में अनभिष्वङ्ग (अनासक्त) होता है, तो उसकी ऊर्जा बाहरी जगत से खिंचकर भीतर की ओर मुड़ने लगती है।

इस श्लोक का योगिक अनुभव यह है कि साधक अपनी चेतना को 'भोग' (स्वर्ग) से हटाकर 'योग' (ब्रह्मभाव) में स्थित करे। वह यह अनुभव करता है कि स्वर्ग एक मानसिक अवस्था है जो सुखों पर टिकी है, जबकि ब्रह्मभाव एक चैतन्य अवस्था है जो स्वयं में पूर्ण है। साधक इस अभ्यास से 'कामना-युक्त कर्म' से 'कामना-रहित कर्म' की भूमि पर जाता है।

कर्मयोगप्रशंसा

श्लोक ११.४३

न तमः कारणं किञ्चिद्योगधर्मे प्रवर्तते ।

आनन्तर्यात् प्रमाणं तु सर्वमेतदकारणम् ॥ ११.४३ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२६

योगधर्ममें कोई (भेद) कारण नहीं बनता (?); अनन्तरतासे प्रमाण (मानें तो) यह सब अकारण है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रवृत्त और निवृत्त कर्मों के भेद तथा उनके भिन्न-भिन्न फलों—स्वर्ग और ब्रह्मभाव—का वर्णन किया। अब इस श्लोक में वे इस भेद की सूक्ष्मता और योगधर्म की उस अवस्था का संकेत दे रहे हैं जहाँ ये द्वैत समाप्त हो जाते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: योगधर्मे प्रवर्तते (तत्र) न किञ्चिद् तमः कारणम् । प्रमाणं तु आनन्तर्यात् (यत्) सर्वमेतदकारणम् ।

पदार्थ:

• योगधर्मे प्रवर्तते — योगधर्म में प्रवृत्त होने पर या योगधर्म के मार्ग पर चलने पर।

• न किञ्चिद् तमः कारणम् — 'तमः' यहाँ अविद्या या अंधकार रूपी भेद का सूचक है। अर्थात्, योगधर्म की स्थिति में (प्रवृत्ति और निवृत्ति के बीच) कोई भी अंधकारमय कारण या भेद शेष नहीं रहता।

• आनन्तर्यात् — अनन्तरता से। 'अनन्तर' का अर्थ है—जहाँ कोई अंतराल न हो, जो अविभाज्य हो। जब दो वस्तुएँ एक-दूसरे से अलग न हों, तो उसे अनन्तर कहा जाता है।

• प्रमाणं तु सर्वमेतदकारणम् — प्रमाण यह है कि यह सब 'अकारण' है। यहाँ 'अकारण' का अर्थ है—कारण-कार्य के बंधन से मुक्त या उस परम स्थिति में स्थित जहाँ द्वैत का कोई कारण नहीं बचता।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं। पूर्व श्लोकों में उन्होंने साधक की सुविधा के लिए 'प्रवृत्ति' (स्वर्गगामी) और 'निवृत्ति' (मोक्षगामी) का भेद दिखाया, किंतु अब वे स्पष्ट कर रहे हैं कि जब साधक वास्तविक 'योगधर्म' में प्रविष्टि करता है, तो यह भेद लुप्त हो जाता है।

भाव यह है कि योगधर्म में कोई 'तमः' (अंधकार या अज्ञान) कारण नहीं बनता। सामान्यतः मनुष्य कर्म और फल, या बंधन और मोक्ष के बीच भेद करता है, और यही भेद अविद्या का कारण है। किंतु योगधर्म की स्थिति में साधक यह अनुभव करता है कि जिसे वह 'प्रवृत्ति' कह रहा था और जिसे 'निवृत्ति', वे वास्तव में एक ही सत्य के दो छोर थे।

इसकी सिद्धि का प्रमाण 'आनन्तरता' है। जब साधक अपनी चेतना को सूक्ष्म करता है, तो वह पाता है कि आत्मा और ब्रह्म के बीच कोई अंतराल नहीं है। यदि आत्मा और ब्रह्म अनन्तर हैं, तो फिर बंधन और मोक्ष का भेद किस कारण से था? इस अनुभूति में यह बोध होता है कि यह सारा द्वैत—प्रवृत्ति और निवृत्ति का यह खेल—वास्तव में 'अकारण' था। अर्थात्, वह केवल अविद्या के कारण प्रतीत होता था, वास्तव में उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था।

अतः, योगधर्म वह स्थिति है जहाँ कर्म (प्रवृत्ति) और ज्ञान (निवृत्ति) का विरोध समाप्त हो जाता है और साधक अकारण-अद्वैत की स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाता है।

योग-रहस्य —

साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि वह स्वयं को न केवल 'निवृत्त' (त्यागी) माने, बल्कि उस अवस्था में जाए जहाँ त्याग और भोग का भेद ही मिट जाए। वह अनुभव करता है कि उसकी चेतना और परम अक्षर के बीच कोई अंतराल नहीं है। इस 'अनन्तरता' के अनुभव से वह द्वैत की भूमि से ऊपर उठकर उस अकारण स्थिति में जाता है, जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।

श्लोक ११.४४

ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा ।

आत्मज्ञानेन मुच्यन्ते यत्र तत्राऽऽश्रमे रताः ॥ ११.४४ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२७

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा यति — जिस किसी आश्रममें लगे हों, आत्मज्ञानसे मुक्त होते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह रहस्योद्घाटन किया कि योगधर्म की उच्च अवस्था में प्रवृत्ति और निवृत्ति का द्वैत समाप्त हो जाता है और सब कुछ 'अकारण' हो जाता है। इसी सूत्र को विस्तार देते हुए अब वे स्पष्ट कर रहे हैं कि मुक्ति के लिए किसी विशेष बाह्य अवस्था या आश्रम का होना अनिवार्य नहीं है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ब्रह्मचारी (वा) गृहस्थो (वा) वानप्रस्थो (वा) यतिस्तथा (वा) — यत्र तत्र आश्रमे रताः (ते) आत्मज्ञानेन मुच्यन्ते ।

पदार्थ:

• ब्रह्मचारी, गृहस्थो, वानप्रस्थो, यतिः — ये चारों वर्ण-आश्रम व्यवस्था के सोपान हैं। ब्रह्मचारी (विद्यार्थी), गृहस्थ (पारिवारिक कर्तव्यों में रत), वानप्रस्थ (इन्द्रिय-निग्रह की ओर अग्रसर) और यति (पूर्णतः संन्यासी)।

• यत्र तत्र आश्रमे रताः — 'यत्र तत्र' का अर्थ है—जिस किसी भी आश्रम में। 'रताः' का अर्थ है—लगे हुए या संलग्न। अर्थात्, साधक जिस भी सामाजिक या आध्यात्मिक स्थिति में वर्तमान में स्थित है।

• आत्मज्ञानेन — आत्मज्ञान के द्वारा। यहाँ 'ज्ञान' केवल सूचना नहीं, अपितु उस चैतन्य का साक्षात्कार है जो शरीर, मन और बुद्धि से पृथक है।

• मुच्यन्ते — मुक्त होते हैं। यह क्रिया 'आत्मज्ञान' के साधन से सिद्ध होती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य एक क्रांतिकारी सत्य उद्घाटित कर रहे हैं। सामान्यतः यह धारणा रही है कि मुक्ति केवल 'यति' (संन्यासी) की बपौती है, क्योंकि संन्यास में बाह्य बंधनों का त्याग होता है। किंतु याज्ञवल्क्य जी स्पष्ट करते हैं कि मुक्ति का वास्तविक कारण 'आश्रम' (बाह्य स्थिति) नहीं, अपितु 'आत्मज्ञान' (आन्तरिक बोध) है।

भाव यह है कि आश्रम केवल साधन हैं, साध्य नहीं। ब्रह्मचर्य अनुशासन सिखाता है, गृहस्थ धर्म कर्तव्य और त्याग का समन्वय सिखाता है, वानप्रस्थ वैराग्य की तैयारी है और यति पद पूर्ण समर्पण है। किंतु यदि कोई गृहस्थ रहते हुए भी अपनी चेतना को उस 'अक्षर' में स्थित कर ले, तो वह उसी क्षण मुक्त है। मुक्ति का द्वार किसी विशेष वस्त्र, किसी विशेष निवास या किसी विशेष सामाजिक स्थिति से नहीं खुलता, वह केवल आत्मज्ञान की कुंजी से खुलता है।

यहाँ 'मुच्यन्ते' शब्द महत्वपूर्ण है। मुक्ति का अर्थ यहाँ संसार से पलायन नहीं, अपितु संसार में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहना है। जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से नहीं भीगता, उसी प्रकार आत्मज्ञानी व्यक्ति गृहस्थ या ब्रह्मचारी के कर्तव्यों का पालन करते हुए भी बंधनमुक्त रहता है। यह स्मृति हमें बताती है कि धर्म का बाह्य आचरण (आश्रम) और आन्तरिक साधना (योग) एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ ३.२० ॥

जनक आदि कर्मसे ही सिद्धिको प्राप्त हुए; लोकसंग्रहको देखते हुए भी तुझे कर्म करना चाहिए।

भगवद्गीता ३.२०गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 94

इस शास्त्र-साक्ष्य में भगवद्गीता स्पष्ट करती है कि महाराज जनक, जो एक समृद्ध साम्राज्य के स्वामी और गृहस्थ थे, उन्होंने कर्मों के माध्यम से ही सिद्धि प्राप्त की। यह इस स्मृति के वचन की पुष्टि करता है कि गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी आत्मज्ञान और निष्काम कर्म द्वारा मुक्ति संभव है। जहाँ सामान्य स्मृतियाँ आश्रमों के कठोर नियमों पर बल देती हैं, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति ज्ञान की सर्वोपरिता को स्थापित करती है, जो सभी आश्रमों में समान रूप से फलदायी है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक महान मानसिक बोझ को उतार देता है। साधक अक्सर इस द्वंद्व में रहता है कि क्या उसे साधना के लिए परिवार और समाज का त्याग करना होगा? याज्ञवल्क्य जी उसे समझाते हैं कि तुम्हारी 'भूमि' (आश्रम) चाहे जो भी हो, तुम्हारा 'अभ्यास' केवल एक होना चाहिए—आत्मज्ञान।

योगिक अभ्यास की दृष्टि से यहाँ 'आत्मज्ञान' का अर्थ है—हृदय के भीतर उस साक्षी पुरुष का अनुभव करना जो हर परिस्थिति में अपरिवर्तित रहता है। ब्रह्मचारी जब अध्ययन करता है, गृहस्थ जब परिवार का पोषण करता है, या यति जब मौन रहता है—यदि इन सबके पीछे यह बोध है कि "मैं यह शरीर या यह भूमिका नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य हूँ", तो वह क्रिया ही योग बन जाती है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि मुक्ति किसी भविष्य की घटना नहीं है जिसे संन्यास के बाद प्राप्त किया जाएगा, बल्कि यह 'अभी और यहीं' संभव है। अभ्यास यह है कि जिस भी आश्रम में आप हैं, वहाँ के कर्तव्यों को 'अक्षर' (परमात्मा) की सेवा मानकर करें। जब कर्म, ज्ञान के प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है, तब गृहस्थी भी तपस्या बन जाती है और बंधन, मुक्ति का मार्ग।

श्लोक ११.४५

स्वकर्मणामनुष्ठानात् सम्यगात्मनि दर्शनात् ।

वेदान्तानां परिज्ञानाद् गृहस्थोऽपि हि मुच्यते ॥ ११.४५ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२७

अपने कर्मोंके अनुष्ठानसे, आत्माके सम्यक् दर्शनसे और वेदान्तोंके ज्ञानसे गृहस्थ भी मुक्त हो जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि मुक्ति किसी विशेष आश्रम की बपौती नहीं है, अपितु आत्मज्ञान से किसी भी आश्रम में स्थित व्यक्ति मुक्त हो सकता है। इसी विचार को विस्तार देते हुए, अब वे गृहस्थ जीवन के विशेष संदर्भ में मुक्ति के त्रिविध साधनों का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (मनुष्यः) स्वकर्मणाम् अनुष्ठानात्, सम्यग्-आत्मनि दर्शनात्, वेदान्तानाम् परिज्ञानात्, गृहस्थः अपि हि मुच्यते ॥

पदार्थ और निर्वचन:

• स्वकर्मणाम् अनुष्ठानात्: अपने स्वाभाविक और नियत कर्मों के अनुष्ठान से। 'अनुष्ठान' का अर्थ है केवल क्रिया करना नहीं, अपितु शास्त्रसम्मत विधि और अनुशासन के साथ उसे पूर्ण करना।

• सम्यग्-आत्मनि दर्शनात्: आत्मा में सम्यक् दर्शन से। यहाँ 'सम्यक्' शब्द महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है—भ्रमरहित, शुद्ध और वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार।

• वेदान्तानाम् परिज्ञानात्: वेदान्तों के परिज्ञान से। 'परिज्ञान' का अर्थ है पूर्ण ज्ञान, जिसमें केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभव सम्मिलित हो। वेदान्त यहाँ उपनिषदों के उस सार को कहते हैं जो ब्रह्मविद्या का उपसंहार करता है।

• गृहस्थः अपि हि मुच्यते: गृहस्थ भी निश्चित रूप से मुक्त हो जाता है। 'अपि' शब्द इस बात पर बल देता है कि जिसे संसार का सबसे अधिक बंधन माना जाता है, वह गृहस्थ अवस्था भी मुक्ति का द्वार बन सकती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक कर्म और ज्ञान के समन्वय का शिखर है। सामान्यतः यह माना जाता है कि गृहस्थ जीवन कामनाओं का क्षेत्र है और मुक्ति केवल विरक्ति (निवृत्ति) में संभव है। किंतु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ यह रहस्य खोलते हैं कि गृहस्थी बंधन नहीं, बल्कि एक साधना-भूमि हो सकती है, यदि उसमें तीन तत्वों का संगम हो: नियत कर्म, आत्म-साक्षात्कार और वेदान्त का ज्ञान।

प्रथम साधन है—स्वकर्मणाम् अनुष्ठानात्। याज्ञवल्क्य के अनुसार, कर्मों का त्याग मुक्ति का मार्ग नहीं है, बल्कि कर्मों का 'शुद्धिकरण' मार्ग है। जब एक गृहस्थ अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यों को 'स्वधर्म' समझकर, बिना फल की आसक्ति के पूर्णता से करता है, तो वह कर्म उसे बाँधता नहीं, बल्कि उसके चित्त को शुद्ध करता है। यह बाहरी विधि है, किंतु इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपने प्राणों और इंद्रियों के वेग को कर्म के माध्यम से अनुशासित करता है।

द्वितीय साधन है—सम्यग्-आत्मनि दर्शनात्। केवल कर्म पर्याप्त नहीं है; कर्म के साथ-साथ यह बोध अनिवार्य है कि "मैं यह शरीर या कर्ता नहीं, अपितु दृष्टा आत्मा हूँ।" जब गृहस्थ जीवन की हलचल के बीच भी साधक का ध्यान अपनी अंतरात्मा पर टिका रहता है, तब वह 'सम्यक् दर्शन' की स्थिति में होता है। यह वह बिंदु है जहाँ कर्मयोग, ज्ञानयोग में परिवर्तित हो जाता है।

तृतीय साधन है—वेदान्तानाम् परिज्ञानात्। वेदान्त वह ज्ञान है जो बताता है कि यह दृश्य जगत और इसके भीतर का जीव वास्तव में एक ही ब्रह्म के स्वरूप हैं। जब गृहस्थ यह जान लेता है कि उसके परिवार के सदस्य और समस्त प्राणी उसी एक अक्षर-ब्रह्म के विस्तार हैं, तो उसकी आसक्ति 'मोह' से बदलकर 'प्रेम' और 'करुणा' में बदल जाती है।

इस प्रकार, जब नियत कर्म (शुद्धि), आत्म-दर्शन (बोध) और वेदान्त-ज्ञान (विस्तार) एक साथ मिलते हैं, तो गृहस्थी का बंधन टूट जाता है और वह 'मुच्यते' अर्थात् मुक्त हो जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

गृहस्थ जीवन में कर्म करते हुए भी बंधनमुक्त रहने का यह सिद्धांत ईशोपनिषद् में भी प्रतिध्वनित होता है:

ईश उपनिषद्

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥

यहाँ कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीनेकी इच्छा करे। (देहाभिमानी) तुम्हारे लिए इसके सिवा दूसरा मार्ग नहीं है; इस प्रकार (किया हुआ) कर्म मनुष्यको लिप्त नहीं करता।

ईश उपनिषद् २उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 45

यहाँ 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि' का अर्थ है कि कर्मों का परित्याग नहीं, बल्कि कर्म करते हुए भी उनमें लिप्त न होना ही मुक्ति का मार्ग है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी 'अलिप्तता' को 'स्वकर्म' और 'आत्मदर्शन' के माध्यम से सिद्ध करती है।

इसी प्रकार, कर्म के माध्यम से सिद्धि की प्राप्ति का प्रमाण भगवद्गीता में मिलता है:

भगवद्गीता

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ ३.२० ॥

जनक आदि कर्मसे ही सिद्धिको प्राप्त हुए; लोकसंग्रहको देखते हुए भी तुझे कर्म करना चाहिए।

भगवद्गीता ३.२०गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 94

जिस प्रकार राजा जनक गृहस्थ होते हुए भी कर्मों के माध्यम से सिद्ध हुए, उसी प्रकार याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि गृहस्थ आश्रम भी ब्रह्मभाव की प्राप्ति में बाधक नहीं है, यदि साधक वेदान्त के परिज्ञान से युक्त हो।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'प्रवृत्ति' के भीतर 'निवृत्ति' खोजने का अभ्यास कराता है। साधक के लिए यहाँ तीन स्तरों का अभ्यास है:

१. कर्म स्तर (प्राण): अपने दैनिक कार्यों को प्राणमय यज्ञ बनाना। जब कर्म अनुष्ठान बन जाता है, तो वह चित्त की वृत्तियों को शांत करता है।

२. दर्शन स्तर (मन): बाहरी क्रियाओं के बीच भी मन को अंतर्मुखी कर 'आत्मा' में स्थित करना। यह अभ्यास साधक को 'साक्षी भाव' की भूमि पर ले जाता है।

३. ज्ञान स्तर (अक्षर): वेदान्त के माध्यम से स्वयं को उस 'अक्षर' (अविनाशी) में विलीन देखना।

साधक इस अभ्यास से इस अनुभव तक पहुँचता है कि मुक्ति किसी स्थान परिवर्तन (वन जाना या गुफा में रहना) में नहीं, बल्कि दृष्टि परिवर्तन में है। गृहस्थी का प्रत्येक कर्म जब वेदान्त के प्रकाश में किया जाता है, तो वह कर्म बंधन नहीं, बल्कि मोक्ष का साधन बन जाता है। साधक यहाँ 'कर्मयोगी' से 'ज्ञानी' और अंततः 'मुक्त' की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ११.४६

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।

स्वकर्मणा तमेवार्च्य सिद्धिं प्राप्नोति मानवः ॥ ११.४६ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२७

(गीता १८.४६:) जिससे भूतोंकी प्रवृत्ति है, जिससे यह सब व्याप्त है, अपने कर्मसे उसीकी पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी वेदान्त के परिज्ञान और आत्म-दर्शन से मुक्ति संभव है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस सूक्ष्म विधि का उद्घाटन कर रहे हैं जिसके द्वारा सांसारिक कर्म ही आध्यात्मिक साधना में परिवर्तित हो जाते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यतः भूतानां प्रवृत्तिः (अस्ति), येन इदं सर्वं ततम्, तमेव (परमात्मानं) मानवः स्वकर्मणा अर्च्य (अर्चयित्वा), सिद्धिं प्राप्नोति ॥

पदार्थ और निर्वचन:

• यतः प्रवृत्तिर्भूतानां: जिससे समस्त भूतों (प्राणियों) की प्रवृत्ति है। 'प्रवृत्ति' यहाँ दो अर्थों में है—प्रथम, सृष्टि का आरम्भ (उत्पत्ति) और द्वितीय, जीवन का संचालन (क्रियाशीलता)। वह मूल कारण जिससे चेतना का प्रस्फुटन हुआ।

• येन सर्वमिदं ततम्: जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त है। 'ततम्' का अर्थ है विस्तार। वह सत्ता जो केवल सृजनकर्ता नहीं, अपितु सृजित वस्तु के कण-कण में अंतर्यामी रूप से व्याप्त है।

• स्वकर्मणा: अपने स्वाभाविक, नियत और धर्मसम्मत कर्मों के द्वारा। यहाँ 'स्व' का अर्थ केवल व्यक्तिगत कार्य नहीं, अपितु वह कर्म है जो व्यक्ति के स्वभाव और उसकी सामाजिक-आध्यात्मिक स्थिति (वर्ण-आश्रम) के अनुकूल हो।

• तमेवार्च्य: उसी की पूजा करके। 'अर्च्य' का अर्थ यहाँ केवल फूल-दीप चढ़ाना नहीं, अपितु कर्म को ही अर्पण बना देना है।

• सिद्धिं प्राप्नोति: पूर्णता या परम लक्ष्य को प्राप्त करता है। सिद्धि का अर्थ यहाँ केवल सिद्धियाँ प्राप्त करना नहीं, अपितु आत्मा का परमात्मा में विलीन होना या स्वरूप-सिद्धि है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक कर्मयोग का वह मर्म है जहाँ 'कर्म' और 'पूजा' के बीच का भेद समाप्त हो जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस परम तत्त्व की ओर संकेत कर रहे हैं जो सृष्टि का बीज भी है और उसका विस्तार भी। वह तत्त्व जो भूतों की प्रवृत्ति का कारण है, वही इस दृश्य जगत के रूप में व्याप्त है।

साधारण दृष्टि में कर्म संसार का बंधन है, किंतु योगीश्वर की दृष्टि में कर्म ही वह सेतु है जो साधक को उस व्याप्त तत्त्व तक ले जाता है। यहाँ 'स्वकर्मणा' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब मनुष्य अपने नियत कर्मों को केवल जीविका या अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं, अपितु उस सर्वव्यापी पुरुष की सेवा मानकर करता है, तब वह कर्म 'पूजा' बन जाता है।

इसका रहस्य यह है कि जो परमात्मा संपूर्ण जगत में व्याप्त है, वह उसी कर्म के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा है। अतः जब साधक अपने कर्म को उस व्याप्त सत्ता को समर्पित कर देता है, तो वह कर्म उसे बंधन में नहीं डालता, बल्कि उसे उस सत्ता के साथ एकाकार कर देता है। यही वह 'सिद्धि' है जहाँ मनुष्य कर्म करते हुए भी अकर्ता रहता है और संसार में रहते हुए भी मुक्त रहता है। यह विधान विधिक कर्मकाण्ड को ज्ञान की अग्नि में तपाकर उसे योग में बदलने की प्रक्रिया है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'कर्म-रूपा-अर्चन' है। योगिक दृष्टि से इसका अर्थ है—बाहरी क्रिया को आंतरिक साधना में बदलना।

साधक जब अपने दैनिक कार्यों को करता है, तो वह यह अनुभव करे कि कार्य करने वाला वह स्वयं नहीं, अपितु वह 'व्याप्त तत्त्व' ही उसके माध्यम से कार्य कर रहा है। जब 'मैं' (अहंकार) हट जाता है और केवल 'वह' (परमात्मा) शेष रहता है, तब प्रत्येक श्वास, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक क्रिया एक मन्त्र बन जाती है।

अभ्यास यह है कि साधक अपने हृदय में उस सूर्य-पुरुष का ध्यान रखे जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है, और फिर उस भाव के साथ अपने कर्मों को संपन्न करे जैसे वह उस पुरुष की आरती उतार रहा हो। इस अवस्था में साधक 'प्रवृत्ति' (संसार) में रहते हुए भी 'निवृत्ति' (शांति) का अनुभव करता है। वह इस भूमि से उस भूमि पर जाता है जहाँ कर्म बंधन नहीं, अपितु मोक्ष का साधन बन जाते हैं। यहाँ सिद्धि का अर्थ है—अपने कर्मों में ही उस व्याप्त ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेना।

श्लोक ११.४७

कर्मसंन्यासयोगेन ब्राह्मणः सिद्धिमाप्नुयात् ।

कर्मणां नियतानां तु त्यागो नैव विधीयते ॥ ११.४७ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२७

कर्मसंन्यासयोगसे ब्राह्मण सिद्धि पाये; (पर) नियत कर्मोंका त्याग विहित नहीं है —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि अपने स्वाभाविक कर्मों के द्वारा उस सर्वव्यापी परमात्मा की पूजा करने से मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य 'कर्मसंन्यास' की उस सूक्ष्म परिभाषा को स्पष्ट कर रहे हैं, जहाँ कर्म का त्याग और कर्म का पालन एक ही बिंदु पर मिलते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ब्राह्मणः कर्मसंन्यासयोगेन सिद्धिमाप्नुयात्, (परन्तु) नियतानां कर्मणां तु त्यागो नैव विधीयते ॥

पदार्थ और निर्वचन:

• कर्मसंन्यासयोगेन: कर्मसंन्यास के योग से। यहाँ 'संन्यास' का अर्थ कर्मों को भौतिक रूप से छोड़ देना नहीं, अपितु 'सम्यक ज्ञान' के साथ कर्मों के प्रति आसक्ति का त्याग करना है। 'योग' का अर्थ है—उस अवस्था में स्थित होना जहाँ कर्म करते हुए भी कर्ताभाव शून्य हो।

• सिद्धिमाप्नुयात्: सिद्धि को प्राप्त करे। सिद्धि का अर्थ है—स्व-स्वरूप का साक्षात्कार, जहाँ साधक यह जान लेता है कि वह कर्म करने वाला शरीर नहीं, अपितु साक्षी चैतन्य है।

• नियतकर्मणां: नियत कर्मों का। 'नियत' वे कर्म हैं जो शास्त्र-सम्मत, वर्ण-धर्म के अनुकूल और आत्मा की शुद्धि के लिए अनिवार्य हैं (जैसे संध्या, स्वाध्याय, पितृ-तर्पण आदि)।

• त्यागो नैव विधीयते: त्याग विहित नहीं है। 'विधीयते' का अर्थ है—शास्त्र द्वारा आदेशित या उचित होना। अर्थात्, अनिवार्य कर्तव्यों को छोड़ना आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग नहीं है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक के सम्मुख एक महान द्वंद्व का समाधान करता है: एक ओर 'संन्यास' की पुकार है और दूसरी ओर 'कर्तव्य' का बंधन। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ब्राह्मण (जो यहाँ केवल जाति नहीं, अपितु ब्रह्म-जिज्ञासु साधक का प्रतीक है) के लिए सिद्धि का मार्ग 'कर्मसंन्यास-योग' है।

यहाँ 'कर्मसंन्यास' का अर्थ कर्मों का विसर्जन नहीं, बल्कि कर्मों के 'फल' और 'कर्तापन' का विसर्जन है। जब साधक यह अनुभव करता है कि समस्त क्रियाएँ प्रकृति के गुणों द्वारा संचालित हैं और वह केवल दृष्टा है, तब वह कर्म करते हुए भी संन्यासी हो जाता है। यही वह 'योग' है जो उसे सिद्धि तक ले जाता है।

परन्तु, इस योग के नाम पर यदि कोई अपने 'नियत कर्मों' का त्याग कर देता है, तो वह योग नहीं, अपितु मोह और आलस्य है। नियत कर्म वे हैं जो साधक के चित्त को शुद्ध करते हैं। यदि एक साधक संध्या-वंदन या अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को यह कहकर छोड़ दे कि "मैं संन्यासी हूँ", तो वह वास्तव में अपनी शुद्धि के साधन को ही नष्ट कर रहा है। अतः, बाहरी क्रिया (विधि) बनी रहे, किन्तु उसके पीछे की मानसिक वृत्ति (भाव) बदल जाए—यही याज्ञवल्क्य की दृष्टि है।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ १८.७ ॥

नियत कर्मका संन्यास उचित नहीं; मोहसे उसका त्याग तामस कहा गया है।

भगवद्गीता १८.७गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 411

भगवद्गीता में भी यही सिद्धांत प्रतिपादित है कि नियत कर्मों का संन्यास उचित नहीं है और मोहवश उनका त्याग करना तामस प्रवृत्ति कहलाती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर बल देते हैं कि कर्म का त्याग 'कर्म' में नहीं, बल्कि 'कर्मफल' की इच्छा में होना चाहिए। जहाँ गीता इसे 'निष्काम कर्म' कहती है, वहीं यह स्मृति इसे 'कर्मसंन्यास-योग' के रूप में परिभाषित करती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'दृष्टा-भाव' का अभ्यास है। जब साधक अपने नियत कर्मों (जैसे जप, ध्यान या दैनिक कार्य) को करता है, तो वह मन में यह भाव स्थापित करे कि "यह शरीर और यह प्राण कर्म कर रहे हैं, मैं केवल इस पूरी प्रक्रिया का साक्षी हूँ।"

अभ्यास की यह भूमि 'कर्म' से 'योग' की ओर ले जाती है। जब नियत कर्म बिना किसी फल की इच्छा के, केवल ईश्वर-अर्पण भाव से किए जाते हैं, तो वे कर्म 'बंधन' नहीं रहते, बल्कि 'मोक्ष के साधन' बन जाते हैं। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी विधि (नियत कर्म) वास्तव में उसके भीतर के मानसिक विकारों को धोने वाली एक प्रक्रिया है। इस प्रकार वह कर्म के स्थूल स्तर से उठकर योग के सूक्ष्म स्तर पर प्रतिष्ठित होता है, जहाँ क्रिया होते हुए भी शांति बनी रहती है। यह अवस्था उसे उस भूमि पर ले जाती है जहाँ कर्म और संन्यास का भेद मिट जाता है।

श्लोक ११.४८

तेषां कर्मफलत्यागः स त्याग इति कीर्त्यते ।

ब्रह्मप्रधानकर्मस्था न सीदन्ति कदाचन ॥ ११.४८ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२७

— उनके कर्मफलका त्याग — वह त्याग कहलाता है। ब्रह्मप्रधान कर्ममें स्थित (लोग) कभी दुःखी नहीं होते।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि नियत कर्मों का त्याग विहित नहीं है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस 'त्याग' की वास्तविक परिभाषा दे रहे हैं, जो कर्मों के भौतिक परित्याग से भिन्न, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर घटित होता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: तेषां कर्मफलत्यागः स त्याग इति कीर्त्यते। (ये) ब्रह्मप्रधानकर्मस्था न सीदन्ति कदाचन ॥

पदार्थ और निर्वचन:

• तेषां: उनके। यहाँ 'तेषाम्' शब्द उन साधकों के लिए है जो पिछले श्लोक के अनुसार नियत कर्मों का पालन करते हुए भी सिद्धि की इच्छा रखते हैं।

• कर्मफलत्यागः: कर्म के फल का त्याग। कर्म की क्रिया का त्याग नहीं, अपितु उस क्रिया से उत्पन्न होने वाले मानसिक और भौतिक लाभ की आसक्ति का विसर्जन।

• कीर्त्यते: कहा जाता है या पुकारा जाता है। अर्थात् शास्त्र की दृष्टि में वास्तविक 'त्यागी' वही है।

• ब्रह्मप्रधानकर्मस्था: ब्रह्म-प्रधान कर्मों में स्थित। वह स्थिति जहाँ कर्म तो किए जा रहे हैं, परन्तु उन सबका केंद्र 'ब्रह्म' है। यहाँ 'प्रधान' का अर्थ है—सर्वोपरि। जब कर्म का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ न होकर ब्रह्म-प्राप्ति या ईश्वर-अर्पण हो जाता है, तब वह 'ब्रह्मप्रधान कर्म' बन जाता है।

• न सीदन्ति: दुःखी नहीं होते। 'सीदन' का अर्थ है—गि रहना, हताश होना या शोक करना।

• कदाचन: कभी भी।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक 'कर्म' और 'संन्यास' के बीच के सेतु का निर्माण करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह रहस्य खोल रहे हैं कि संन्यास कोई बाहरी वस्त्र या स्थान परिवर्तन नहीं है, अपितु एक आंतरिक मानसिक अवस्था है।

साधारण मनुष्य कर्म करता है और उसके फल (सुख-दुःख, लाभ-हानि) से बँध जाता है। जब फल की इच्छा प्रबल होती है, तो विफलता मिलने पर वह 'सीदति' अर्थात् दुःखी होकर गिर जाता है। याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि वास्तविक त्याग कर्मों को छोड़ना नहीं, बल्कि कर्म के फल की पिपासा को समाप्त कर देना है। जब साधक यह जान लेता है कि वह केवल निमित्त है और फल उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, तब वह 'त्यागी' कहलाता है।

द्वितीय पंक्ति में 'ब्रह्मप्रधानकर्मस्था' शब्द अत्यंत गंभीर है। इसका भाव यह है कि साधक अपने प्रत्येक कार्य को—चाहे वह गृहस्थ का दायित्व हो या आध्यात्मिक अनुष्ठान—ब्रह्म की सेवा मानकर करे। जब कर्म का लक्ष्य 'अहं' (मैं कर रहा हूँ) से हटकर 'ब्रह्म' (यह ब्रह्म द्वारा हो रहा है) पर टिक जाता है, तब वह कर्म बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति का साधन बन जाता है। ऐसा व्यक्ति सफलता में उन्मत्त नहीं होता और विफलता में टूटता नहीं, इसलिए वह 'कदाचन' अर्थात् कभी भी दुःखी नहीं होता।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ १८.११ ॥

देहधारीके लिए कर्मोंको पूरी तरह छोड़ना सम्भव नहीं; जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी कहलाता है।

भगवद्गीता १८.११गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 413

यहाँ भगवद्गीता और बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति की पूर्ण संगति दिखती है। गीता स्पष्ट करती है कि देहधारी के लिए कर्मों का पूर्ण त्याग संभव नहीं है, अतः 'कर्मफलत्याग' ही एकमात्र व्यावहारिक मार्ग है। स्मृति इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए उसे 'ब्रह्मप्रधान' होने की अवस्था से जोड़ती है। जहाँ गीता फल के त्याग पर बल देती है, वहीं यह स्मृति उस त्याग के बाद की स्थिति—'न सीदन्ति' (दुःख से मुक्ति)—और उस स्थिति के आधार 'ब्रह्म-प्रधानता' को रेखांकित करती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'कर्ताभाव' से 'साक्षीभाव' की ओर ले जाता है। इस ग्रन्थ के आरम्भ (११.१) में 'सब धर्मों को छोड़ने' की बात कही गई थी, जिसका रहस्य यहाँ खुलता है। वह 'धर्म' बाहरी आचरण नहीं, बल्कि वह 'मानसिक आग्रह' और 'अधिकार-भाव' है जो हमें कर्मों से बाँधता है।

साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह कर्म की क्रिया में पूर्णतः तल्लीन रहे (यह उसकी विहित विधि है), परन्तु हृदय में एक सूक्ष्म दूरी बनाए रखे। वह अनुभव करता है कि शरीर और मन कर्म कर रहे हैं, परन्तु उसकी वास्तविक सत्ता (आत्मा) केवल एक दृष्टा है। जब साधक अपने कर्मों को 'ब्रह्म-प्रधान' करता है, तो वह अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं (संकल्पों) को ब्रह्म-इच्छा में विलीन कर देता है।

यह अभ्यास साधक को 'कामना-भूमि' से उठाकर 'संतोष-भूमि' और अंततः 'स्थितप्रज्ञ-भूमि' तक ले जाता है। यहाँ योग का अर्थ है—कर्म और ब्रह्म का एकरूप होना। जब कर्म ही पूजा बन जाए, तब साधक कर्म करते हुए भी संन्यासी की शांति का अनुभव करता है।

श्लोक ११.४९

मृत्तोयैः शुद्ध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुद्ध्यति ।

रजसा स्त्री मनोदुष्टाः संन्यासेन द्विजोत्तमाः ॥ ११.४९ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२७

(मनु ५.१०८:) शुद्ध करने योग्य (वस्तु) मिट्टी और जलसे शुद्ध होती है, नदी वेगसे शुद्ध होती है, मनसे दूषित स्त्री रजसे, और श्रेष्ठ द्विज संन्याससे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि वास्तविक त्याग कर्मफल का विसर्जन है और ब्रह्म-प्रधान कर्म में स्थित साधक कभी दुःखी नहीं होता। अब महर्षि याज्ञवल्क्य शुद्धि के विभिन्न स्तरों का वर्णन कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जिस 'ब्रह्म-प्रधान' स्थिति की चर्चा की गई, वहाँ पहुँचने के लिए अंतःकरण की शुद्धि अनिवार्य है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: मृत्तोयैः शोध्यं शुद्ध्यते, नदी वेगेन शुद्ध्यति। रजसा मनोदुष्टाः स्त्रियः (शुद्ध्यन्ति), द्विजोत्तमाः संन्यासेन (शुद्ध्यन्ति) ॥

पदार्थ और निर्वचन:

• मृत्तोयैः: मिट्टी और जल के संयोग से। 'मृत्' (मिट्टी) और 'तोय' (जल)।

• शोध्यं: जो शुद्ध करने योग्य है। यहाँ उन स्थूल वस्तुओं या शरीर के अंगों का संकेत है जिन्हें भौतिक अशुद्धि लगी है।

• वेगेन: वेग से। नदी के संदर्भ में यह प्रवाह और तीव्रता का सूचक है।

• रजसा: रज (मसाला/रंग/धूल) से। यहाँ यह एक विशिष्ट विधिक शुद्धि का प्रतीक है।

• मनोदुष्टाः: मन से दूषित। जिनके चित्त में विकार या मल व्याप्त हो गया हो।

• द्विजोत्तमाः: श्रेष्ठ द्विज। वे साधक जिन्होंने वेदों का अध्ययन किया है और जो आत्म-साक्षात्कार की पात्रता रखते हैं।

• संन्यासेन: संन्यास से। यहाँ संन्यास का अर्थ केवल गृह-त्याग नहीं, अपितु समस्त आसक्तियों के विसर्जन और 'अहं' के त्याग से है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक शुद्धि के क्रमिक सोपानों को दर्शाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह समझा रहे हैं कि जिस प्रकार भिन्न-भिन्न वस्तुओं की शुद्धि के लिए भिन्न-भिन्न साधनों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मा और बुद्धि की शुद्धि का साधन भी विशिष्ट होता है।

प्रथम चरण में स्थूल शुद्धि है—मिट्टी और जल से। यह शरीर और बाहरी उपकरणों की शुद्धि है। द्वितीय चरण में नदी के वेग का उदाहरण है; जिस प्रकार वेगवती नदी अपने प्रवाह से तटों और तल की गंदगी को बहा ले जाती है, उसी प्रकार साधना का तीव्र वेग मानसिक जड़ता को समाप्त करता है। तृतीय चरण में मन से दूषित स्त्री की रज से शुद्धि का उल्लेख है, जो एक विशिष्ट सामाजिक और विधिक परंपरा का संकेत है।

किन्तु, इस श्लोक का मुख्य लक्ष्य 'द्विजोत्तमाः' अर्थात् श्रेष्ठ साधकों की शुद्धि है। द्विज वह है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो—अर्थात् जिसने ज्ञान के संस्कार से अपने पुराने स्वभाव को बदला हो। ऐसे श्रेष्ठ साधकों के लिए केवल जल या बाहरी क्रियाएँ पर्याप्त नहीं हैं। उनके लिए 'संन्यास' ही एकमात्र शुद्धि का साधन है।

यहाँ संन्यास का अर्थ है—वह अवस्था जहाँ साधक यह जान लेता है कि वह शरीर, मन या बुद्धि नहीं है, अपितु शुद्ध चैतन्य है। जब तक साधक स्वयं को 'कर्ता' और 'भोक्ता' मानता है, तब तक उसके अंतःकरण में सूक्ष्म मल (राग-द्वेष) बना रहता है। संन्यास इस 'कर्तृत्व-भाव' का विसर्जन है। जब 'मैं' का भाव मिटता है, तब वह अशुद्धि भी मिट जाती है जो जन्मों से संचित थी। अतः श्रेष्ठ द्विज के लिए संन्यास केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि चित्त की वह परम स्वच्छता है जो उसे ब्रह्म-साक्षात्कार के योग्य बनाती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ ५.१०९ ॥

जलसे अंग शुद्ध होते हैं, सत्यसे मन, विद्या और तपसे भूतात्मा, और ज्ञानसे बुद्धि शुद्ध होती है।

मनुस्मृति ५.१०९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 319

मनुस्मृति में शुद्धि के इन स्तरों का और अधिक विस्तार मिलता है, जहाँ कहा गया है कि अंगों की शुद्धि जल से, मन की सत्य से, भूतात्मा की विद्या और तप से, तथा बुद्धि की ज्ञान से होती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति के इन वचनों में पूर्ण संगति है। जहाँ मनुस्मृति शुद्धि के साधनों को अलग-अलग विभाजित करती है, वहीं याज्ञवल्क्य संन्यास को 'द्विजोत्तमाः' के लिए समग्र शुद्धि का साधन बताते हैं। इसका कारण यह है कि संन्यास में सत्य, तप, विद्या और ज्ञान—ये चारों समाहित हो जाते हैं। जब साधक संन्यासी (आसक्ति-रहित) होता है, तो वह स्वतः ही सत्यनिष्ठ, तपस्वी और ज्ञानमय हो जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'स्थूल से सूक्ष्म' की यात्रा कराता है। साधक पहले शरीर की शुद्धि (बाह्य स्नान) करता है, फिर प्राणों और मन के वेग से आंतरिक मल का शोधन करता है। परन्तु अंतिम शुद्धि 'संन्यास' के माध्यम से होती है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के 'कर्ता' को देखे। जब वह अनुभव करता है कि "मैं कर्म नहीं कर रहा, अपितु प्रकृति के गुण कार्य कर रहे हैं", तब वह संन्यास की भूमि में प्रवेश करता है। यह संन्यास 'अक्षर' (ओम्कार) में लीन होने की प्रक्रिया है। जिस प्रकार नदी का वेग सब कुछ बहा ले जाता है, उसी प्रकार जब साधक का ध्यान एकाग्र होकर अंतर्मुखी होता है, तो वह वेग उसके समस्त संस्कारों को धो देता है। इस अवस्था में साधक 'शुद्ध सत्व' में स्थित होकर उस स्थिति को प्राप्त करता है जहाँ से वह अगले श्लोक में वर्णित 'अन्तरात्मा की गति' को देखने में सक्षम होता है। संन्यास यहाँ मानसिक रिक्तता नहीं, बल्कि पूर्णता की ओर ले जाने वाली शुद्धि है।

ध्यानमाहात्म्यम्

श्लोक ११.५०

गण्डोपलादयो भूत्वा पदमन्यदिगच्छति ।

ध्यानेनात्मनि संपश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः ॥ ११.५० ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२७

(?) गण्डोपल (पत्थर) आदि होकर (जीव) दूसरे पदको जाता है; ध्यानसे अपने भीतर इस अन्तरात्माकी गतिको देखे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने भौतिक और मानसिक शुद्धि के विभिन्न साधनों का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट किया कि श्रेष्ठ द्विज के लिए संन्यास (आसक्ति-त्याग) ही परम शुद्धि है। अब वे इस शुद्धि के पश्चात साधक को उस 'ध्यान' की ओर ले जा रहे हैं, जिससे जीव अपनी वास्तविक गति और प्रकृति को पहचान सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (जीवः) गण्डोपलादयो भूत्वा पदम् अन्यद् इगच्छति। (अतः) ध्यानेन आत्मनि संपश्येत् गतिम् अस्य अन्तरात्मनः ॥

पदार्थ और निर्वचन:

• गण्डोपलादयो: गण्डोपल (पत्थर/कंकड़) आदि। यहाँ 'गण्डोपल' जड़ता और अज्ञान का प्रतीक है।

• भूत्वा: होकर। यह स्थिति परिवर्तन का सूचक है।

• पदम् अन्यद्: दूसरा पद या दूसरा स्थान। यहाँ 'पद' का अर्थ जन्म-मरण के चक्र में मिलने वाले विभिन्न योनियों के स्थानों से है।

• इगच्छति: जाता है। 'इ' धातु का अर्थ है गति करना।

• ध्यानेन: ध्यान के माध्यम से। यहाँ ध्यान वह साधन है जो दृष्टि को स्थूल से सूक्ष्म की ओर मोड़ता है।

• आत्मनि: अपने भीतर, स्वयं में। यह स्थान (सप्तमी विभक्ति) है, जो यह बताता है कि खोज बाहर नहीं, भीतर करनी है।

• संपश्येत्: भली-भाँति देखे या साक्षात्कार करे। यह विधिलिङ् लकार है, जो साधक के लिए एक निर्देश है।

• गतिम्: गति, मार्ग या प्रवाह।

• अन्तरात्मनः: अन्तरात्मा की। वह सूक्ष्म सत्ता जो शरीर और मन के भीतर स्थित है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक जीव की विस्मृति और उसकी वास्तविक यात्रा के रहस्य को उद्घाटित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस दुखद सत्य की ओर संकेत कर रहे हैं कि अज्ञानवश जीव अपनी दिव्य प्रकृति को भूलकर जड़ता के स्तर तक गिर जाता है।

श्लोक के पूर्वार्ध में कहा गया है कि जीव 'गण्डोपल' आदि होकर अन्य पदों को प्राप्त होता है। इसका भाव यह है कि जब साधक अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी नहीं करता और केवल कामनाओं के वशीभूत रहता है, तो वह सूक्ष्म से स्थूल की ओर गिरता है। 'गण्डोपल' (पत्थर) होना उस चरम जड़ता का प्रतीक है जहाँ चेतना इतनी मंद हो जाती है कि वह केवल भौतिक शरीर के बंधनों में सिमट कर रह जाती है। अज्ञान के कारण जीव एक योनि से दूसरी योनि में, एक पद से दूसरे पद पर भटकता रहता है, किंतु इस भटकन में वह यह भूल जाता है कि वह वास्तव में कौन है।

इसी भ्रम को तोड़ने के लिए महर्षि निर्देश देते हैं— 'ध्यानेन आत्मनि संपश्येत् गतिमस्यान्तरात्मनः'। वे कहते हैं कि इस अंतहीन भटकन को रोकने का एकमात्र उपाय 'ध्यान' है। जब साधक बाहरी जगत के विषयों से दृष्टि हटाकर अपने भीतर (आत्मनि) स्थिर होता है, तब वह उस 'अन्तरात्मा की गति' को देख पाता है। यहाँ 'गति' का अर्थ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान जाना नहीं है, बल्कि चेतना का वह प्रवाह है जो जीव को देह-अभिमान से मुक्त कर शुद्ध चैतन्य की ओर ले जाता है।

यह श्लोक हमें बताता है कि जो जीव बाहर भटक रहा है, वह वास्तव में अपने ही भीतर की यात्रा का विस्मृत पथिक है। ध्यान वह आलोक है जो इस अंधकार को मिटाकर यह दिखाता है कि अन्तरात्मा की वास्तविक गति बाहर की योनियों में नहीं, बल्कि भीतर के अनंत आकाश में है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयामकृतात्मभिः । ध्यानयोगेन संपश्येद्गतिमस्यान्तरात्मनः ॥ ६.७३ ॥

ऊँचे-नीचे प्राणियोंमें (जानेवाली), अशुद्धचित्तवालोंके लिए दुर्ज्ञेय, इस अन्तरात्माकी गतिको ध्यानयोगसे देखे।

मनुस्मृति ६.७३मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 808

मनुस्मृति में भी इसी सत्य का प्रतिपादन किया गया है कि अशुद्ध चित्त वालों के लिए इस अन्तरात्मा की गति को जानना अत्यंत कठिन (दुर्ज्ञेय) है, इसलिए ध्यानयोग का आश्रय लेना चाहिए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ एक ही बिंदु पर मिलते हैं— कि बिना ध्यान के जीव अपनी वास्तविक स्थिति और अपनी गति को नहीं पहचान सकता। अंतर केवल इतना है कि यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य 'गण्डोपल' के उदाहरण से जीव की उस जड़ता को भी दिखा रहे हैं, जिससे उसे बाहर निकलना है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'साक्षी भाव' के अभ्यास का सूत्र है। सामान्यतः मनुष्य स्वयं को शरीर मानता है, इसलिए वह शरीर की गतियों (जन्म, रोग, मृत्यु) को ही अपनी गति मान लेता है। योगिक अभ्यास यह है कि साधक ध्यान में बैठकर यह अनुभव करे कि वह न तो यह शरीर है और न ही वह जड़ पत्थर की भाँति अचेतन है।

साधक जब 'आत्मनि' (अपने भीतर) दृष्टि लगाता है, तो वह पहले अपने विचारों के प्रवाह को देखता है, फिर प्राणों की गति को, और अंततः उस स्थिर अन्तरात्मा को देखता है जो इन सब गतियों का द्रष्टा है। इस अभ्यास से साधक 'जड़ता' (गण्डोपल भाव) से ऊपर उठकर 'चेतनता' की भूमि पर आता है। यह अभ्यास उसे इस बोध की ओर ले जाता है कि उसकी वास्तविक गति 'बाहर' नहीं, बल्कि 'भीतर' की ओर है। जब यह अनुभव गहरा होता है, तब साधक अन्य पदों (योनियों) की लालसा छोड़ देता है और अपनी मूल प्रकृति में स्थित हो जाता है।

श्लोक ११.५१

प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् ।

विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ ११.५१ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२७

प्रियजनोंमें अपना पुण्य और अप्रियोंमें पाप छोड़कर, ध्यानयोगसे (साधक) सनातन ब्रह्मको प्राप्त होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अविद्या के कारण जीव की जड़ योनियों में भटकने वाली गति का वर्णन किया और साधक को ध्यान के माध्यम से इस अन्तरात्मा की गति को देखने का निर्देश दिया। अब ऋषि उस मानसिक और भावनात्मक बोझ को हटाने की विधि बता रहे हैं, जो साधक को इस गति से मुक्त कर सनातन ब्रह्म की ओर ले जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) प्रियेषु स्वेषु सुकृतम्, अप्रियेषु च दुष्कृतम् विसृज्य, ध्यानयोगेन सनातनम् ब्रह्म अभ्येति।

पदार्थ:

• प्रियेषु स्वेषु: अपने प्रियजनों के प्रति (अनुरागवश) किए गए कार्यों में।

• सुकृतम्: पुण्य या शुभ कर्मों के फल की आसक्ति।

• अप्रियेषु च दुष्कृतम्: और अप्रियजनों के प्रति (द्वेषवश) किए गए दुष्कर्मों या उनके प्रति रखे गए पाप-भावों को।

• विसृज्य: त्यागकर, विसर्जित कर या पूरी तरह छोड़कर।

• ध्यानयोगेन: ध्यान की योग-अवस्था के द्वारा (चित्त की एकाग्रता और साक्षी भाव से)।

• ब्रह्माभ्येति: ब्रह्म को प्राप्त होता है।

• सनातनम्: वह जो सदा से है, जिसका न आदि है न अंत; कालातीत सत्य।

भाष्य —

इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधना के उस सूक्ष्म अवरोध की चर्चा कर रहे हैं जिसे 'संस्कार' और 'आसक्ति' कहा जाता है। सामान्यतः मनुष्य अपने प्रियजनों के प्रति किए गए शुभ कार्यों (सुकृत) को अपना 'पुण्य' मानकर उसमें गौरव का अनुभव करता है और अप्रियजनों के प्रति किए गए बुरे कार्यों या उनके द्वारा दिए गए कष्टों को 'पाप' या 'घृणा' के रूप में हृदय में संचित रखता है।

ऋषि कहते हैं कि जब तक साधक के भीतर यह द्वैत है—कि "यह मेरा पुण्य है" और "वह मेरा पाप है"—तब तक वह बंधन में है। पुण्य का अहंकार और पाप का ग्लानि-भाव, दोनों ही चित्त को भारी बनाते हैं और उसे संसार की गति में बांधे रखते हैं। 'विसृज्य' शब्द का अर्थ यहाँ केवल बाहरी त्याग नहीं, बल्कि आंतरिक विसर्जन है। इसका भाव यह है कि साधक यह अनुभव करे कि न तो पुण्य मेरा है और न ही पाप; ये सब प्रकृति के गुणों के खेल हैं। जब वह प्रिय और अप्रिय के भेद को मिटाकर, उनसे जुड़ी समस्त मानसिक स्मृतियों और उनके फलों की आसक्ति को विसर्जित कर देता है, तब उसका चित्त शून्य और हल्का हो जाता है।

यही वह अवस्था है जहाँ 'ध्यानयोग' प्रभावी होता है। जब चित्त राग-द्वेष के बोझ से मुक्त होता है, तब वह स्वाभाविक रूप से उस 'सनातन ब्रह्म' की ओर मुड़ता है जो समय और संबंधों से परे है। यह ब्रह्म वह मूल तत्व है जिसमें पहुँचकर समस्त व्यक्तिगत पहचान (मैं और मेरा) समाप्त हो जाती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् । विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ ६.७९ ॥

प्रियजनोंमें अपना पुण्य और अप्रियोंमें पाप छोड़कर ध्यानयोगसे (यति) सनातन ब्रह्मको प्राप्त होता है।

मनुस्मृति ६.७९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 343

यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति के यतिधर्म-प्रकरण से मेल खाता है। मनुस्मृति में यह निर्देश विशेष रूप से यति (संन्यासी) के लिए दिया गया है, किंतु बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में इसे 'ध्यानयोग' के साथ जोड़कर एक व्यापक योगिक प्रक्रिया बनाया गया है। मनु जहाँ इसे यति के धर्म के रूप में देखते हैं, वहीं याज्ञवल्क्य इसे उस मानसिक शुद्धि की विधि बताते हैं जिसके बिना ध्यान में गहराई संभव नहीं है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि ब्रह्म-प्राप्ति के लिए राग (प्रिय) और द्वेष (अप्रिय) का पूर्ण विसर्जन अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-शुद्धि' और 'वैराग्य' का अभ्यास है। योगिक मार्ग पर चलते हुए साधक अक्सर बाहरी कर्मों का त्याग तो कर लेता है, किंतु हृदय के भीतर 'पुण्य-पाप' का सूक्ष्म लेखा-जोखा चलता रहता है। यह लेखा-जोखा ही उसे पुनः संसार की ओर खींचता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक ध्यान की अवस्था में अपने हृदय के भावों का अवलोकन करे। जब प्रिय की स्मृति आए, तो उस पुण्य-भाव को 'ईश्वर' या 'ब्रह्म' को समर्पित कर दे; और जब अप्रिय की स्मृति या ग्लानि आए, तो उसे भी उसी अनंत में विसर्जित कर दे। यह अभ्यास साधक को 'साक्षी भाव' की भूमि पर ले जाता है। जब वह स्वयं को न तो पुण्य का कर्ता मानता है और न ही पाप का भोक्ता, तब वह द्वैत से अद्वैत की ओर बढ़ता है। यह प्रक्रिया साधक को उस स्थिति में पहुँचाती है जहाँ वह केवल 'होने' का अनुभव करता है, 'करने' का नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ से सनातन ब्रह्म की यात्रा आरम्भ होती है।

श्लोक ११.५२

ध्यानेनात्मनि पश्येच्च सर्वांश्च सुसमाहितः ।

पश्यन् हि योगयुक्तात्मा मुनिर्मोक्षपरायणः ॥ ११.५२ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२८

ध्यानसे भली-भाँति समाहित होकर आत्मामें सबको देखे; (ऐसा) देखता हुआ योगयुक्तात्मा मुनि मोक्षपरायण होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने साधक को राग और द्वेष के सूक्ष्म बंधनों—प्रियजनों के प्रति पुण्य-भाव और अप्रियजनों के प्रति पाप-भाव—को विसर्जित कर सनातन ब्रह्म की ओर अग्रसर होने का निर्देश दिया। अब ऋषि उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ यह विसर्जन पूर्ण होकर 'सर्व-आत्म-भाव' में परिवर्तित हो जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) ध्यानेन, सुसमाहितः आत्मनि सर्वांश्च पश्येत्। पश्यन् हि मोक्षपरायणः मुनिः योगयुक्तात्मा (भवति)।

पदार्थ:

• ध्यानेन: ध्यान के माध्यम से (चित्त को एक बिंदु पर स्थिर करने की प्रक्रिया से)।

• सुसमाहितः: भली-भाँति समाहित होकर; वह अवस्था जहाँ चित्त की चंचलता पूर्णतः शांत हो गई हो और वह केवल एक ही लक्ष्य में लीन हो।

• आत्मनि: अपनी आत्मा में; यहाँ 'आत्मा' का अर्थ केवल व्यक्तिगत अहम् नहीं, अपितु वह चैतन्य स्वरूप है जो सर्वव्यापी है।

• सर्वांश्च: सबको; समस्त प्राणियों, वस्तुओं और प्रपंचों को।

• पश्येत्: देखे; यह देखना भौतिक नेत्रों से नहीं, अपितु ज्ञान-चक्षु या प्रज्ञा से अनुभव करना है।

• योगयुक्तात्मा: वह जिसकी आत्मा योग (समरसता) में स्थित है; जो स्वयं को और जगत को एक ही तत्त्व का विस्तार देखता है।

• मोक्षपरायणः: मोक्ष को ही अपना एकमात्र लक्ष्य बनाने वाला या मोक्ष की प्राप्ति के अत्यंत निकट।

भाष्य —

इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ध्यान की उस पराकाष्ठा का वर्णन कर रहे हैं जहाँ साधक 'द्वैत' से 'अद्वैत' की ओर प्रस्थान करता है। पिछले श्लोक में उन्होंने राग-द्वेष के त्याग की बात की थी; यहाँ वे उस रिक्त स्थान को 'पूर्णता' से भरने की विधि बता रहे हैं।

ऋषि कहते हैं कि जब साधक सुसमाहित होता है, तब वह केवल शून्य नहीं होता, बल्कि वह अपनी आत्मा में 'सबको' देखने लगता है। इसका अर्थ यह है कि वह अनुभव करता है कि जिस चैतन्य स्वरूप से वह स्वयं निर्मित है, वही चैतन्य स्वरूप अन्य सभी प्राणियों और जड़ पदार्थों का भी आधार है। जब साधक यह देखता है कि "जो मुझमें है, वही सबमें है और जो सबमें है, वही मुझमें है", तब उसके भीतर का 'मैं' और 'तू' का भेद समाप्त हो जाता है।

यह 'देखना' (पश्येत्) एक आंतरिक साक्षात्कार है। जब साधक अपनी आत्मा को सर्वव्यापी अनुभव करता है, तब संसार उसके लिए पराया नहीं रहता। वह समस्त जगत को अपने ही विस्तार के रूप में देखता है। ऐसा योगयुक्तात्मा मुनि, जो अब किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति में सुख या दुःख नहीं खोजता, अपितु सबमें उसी एक आत्म-तत्त्व का दर्शन करता है, वह स्वाभाविक रूप से मोक्षपरायण हो जाता है। यहाँ मोक्ष केवल मृत्यु के बाद की अवस्था नहीं, बल्कि इसी जीवन में राग-द्वेष से मुक्त होकर सर्व-एकत्व का अनुभव करना है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

सर्वमात्मनि संपश्येत्सच्चासच्च समाहितः । सर्वं ह्यात्मनि संपश्यन्नाधर्मे कुरुते मनः ॥ १२.११८ ॥

समाहित होकर सत् और असत् सबको आत्मामें देखे; सबको आत्मामें देखनेवाला अधर्ममें मन नहीं लगाता।

मनुस्मृति १२.११८मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 601

मनुस्मृति में भी यही निर्देश मिलता है कि साधक समाहित होकर सत् और असत् सबको आत्मा में देखे। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ एक ही सत्य की पुष्टि करते हैं कि जब मनुष्य सबको अपनी आत्मा में देखता है, तब वह अधर्म से मुक्त हो जाता है। भेद ही अधर्म का मूल है; जहाँ भेद समाप्त होता है, वहाँ केवल धर्म (शाश्वत सत्य) शेष रहता है। स्मृति यहाँ स्पष्ट करती है कि 'सर्व-आत्म-दर्शन' ही वह कुंजी है जो साधक को बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'साक्षी-भाव' और 'विस्तार' का योग है। अभ्यास यह है कि ध्यान में स्थित होकर पहले अपनी आत्मा के प्रकाश को अनुभव करें, और फिर उस प्रकाश को धीरे-धीरे विस्तारित करें—पहले अपने शरीर में, फिर अपने प्रियजनों में, फिर अप्रियजनों में और अंततः समस्त चराचर जगत में।

जब साधक यह अनुभव करता है कि सामने वाला व्यक्ति या वस्तु वास्तव में उसकी अपनी ही आत्मा का एक प्रतिबिंब है, तब उसके हृदय में करुणा और समता का उदय होता है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार-भूमि' से उठाकर 'ब्रह्म-भूमि' की ओर ले जाता है। यहाँ 'सुसमाहित' होने का अर्थ है चित्त का वह बिंदु जहाँ विचार रुक जाते हैं और केवल 'होने' का बोध शेष रहता है। इसी बोध में सबको देखना ही योगयुक्तात्मा होने की लक्षण है।

परमपुरुषज्ञानमार्गः

श्लोक ११.५३

खं संनिवेशयेत् खेषु चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम् ।

पङ्क्तिदृष्ट्योः परं तेजः स्नेहयोगश्च मूर्तिषु ॥ ११.५३ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२८

(मनु १२.१२०:) शरीरके छिद्रोंमें आकाशको स्थापित (भावित) करे, चेष्टा और स्पर्शमें वायुको, पाचन और दृष्टिमें परम तेजको, और शरीरके स्नेह (द्रव) में जलको;

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने साधक को सुसमाहित होकर अपनी आत्मा में सबको देखने का निर्देश दिया, जिससे वह मोक्षपरायण हो जाता है। अब ऋषि उस 'सर्व-आत्म-भाव' को शरीर के स्थूल स्तर पर उतारकर, देह के भीतर ही पंचमहाभूतों और दैवीय शक्तियों के विन्यास का बोध करा रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) खं खेषु संनिवेशयेत्, चेष्टन-स्पर्शने अनिलम्, पङ्क्ति-दृष्ट्योः परं तेजः, (तथा) मूर्तिषु स्नेहयोगम् (संनिवेशयेत्)।

पदार्थ:

• खं: आकाश तत्त्व को; यहाँ 'ख' का अर्थ शून्य या व्यापकता है।

• खेषु: शरीर के छिद्रों में; जैसे कान, नासिका, नेत्र और अन्य सूक्ष्म रंध्र।

• संनिवेशयेत्: स्थापित करे या भाव करे; यह केवल कल्पना नहीं, अपितु ध्यान के माध्यम से उस तत्त्व की उपस्थिति का अनुभव करना है।

• चेष्टन-स्पर्शने: चेष्टा (गतिविधि) और स्पर्श (संवेदन) में।

• अनिलम्: वायु तत्त्व को।

• पङ्क्ति-दृष्ट्योः: पङ्क्ति (यहाँ पाचन क्रिया या अन्न के मार्ग की पंक्ति) और दृष्टि (देखने की शक्ति) में।

• परं तेजः: परम तेज या अग्नि तत्त्व को।

• स्नेहयोगश्च: स्नेह के योग में; शरीर के तरल पदार्थों (रस, रक्त, स्नेह) के सम्मिश्रण में।

• मूर्तिषु: शरीर के अंगों या भौतिक स्वरूपों में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य देह को केवल हाड़-मांस का पुंज न मानकर उसे ब्रह्माण्ड का लघु-रूप सिद्ध कर रहे हैं। जब साधक पिछले श्लोक के अनुसार 'सबको आत्मा में' देख लेता है, तब उसे यह बोध होता है कि यह शरीर भी उन्हीं विराट तत्त्वों से निर्मित है जिनसे यह सृष्टि बनी है।

ऋषि निर्देश देते हैं कि साधक अपने शरीर के समस्त छिद्रों (खेषु) में आकाश तत्त्व का संनिवेश करे। इसका भाव यह है कि शरीर के भीतर जो भी रिक्त स्थान है, वह वास्तव में उस अनंत आकाश का ही विस्तार है। जब साधक इस भाव में स्थित होता है, तो उसकी संकीर्णता समाप्त हो जाती है और वह स्वयं को व्यापक अनुभव करने लगता है।

तदुपरांत, शरीर की समस्त चेष्टाओं और स्पर्श की संवेदनाओं में वायु तत्त्व का अनुभव करना चाहिए। क्योंकि गति और स्पर्श दोनों ही वायु की प्रकृति हैं। जब साधक अपनी हर हरकत में 'अनिल' को देखता है, तो वह शरीर के कर्तापन से मुक्त होकर प्रकृति के प्रवाह को अनुभव करता है।

पाचन की अग्नि (पङ्क्ति) और नेत्रों की ज्योति (दृष्टि) में 'परम तेज' का संनिवेश करना है। यहाँ 'परम' शब्द महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल भौतिक अग्नि नहीं, अपितु वह चैतन्य प्रकाश है जो शरीर के भीतर अन्न को पचाता है और बाहर जगत को प्रकाशित करता है।

अंत में, शरीर के अंगों (मूर्तिषु) में व्याप्त स्नेह और द्रव्यों में जल तत्त्व की भावना करनी चाहिए। जल ही वह सूत्र है जो शरीर के विभिन्न अंगों को जोड़ता है और तरलता प्रदान करता है।

इस प्रकार, शरीर के भीतर इन तत्त्वों का संनिवेश करने का अर्थ है—स्थूल देह के माध्यम से सूक्ष्म ब्रह्माण्ड की ओर यात्रा करना। यह विधि साधक को इस बोध की ओर ले जाती है कि वह शरीर नहीं, अपितु इन तत्त्वों का एक समन्वित स्वरूप है, जिसका मूल आधार वह शुद्ध चैतन्य है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

आत्मैव देवताः सर्वाः सर्वमात्मन्यवस्थितम् । आत्मा हि जनयत्येषां कर्मयोगं शरीरिणाम् ॥ १२.११९ ॥

आत्मा ही सब देवता है, सब आत्मामें स्थित है; आत्मा ही इन देहधारियोंके कर्मयोगको उत्पन्न करता है।

मनुस्मृति १२.११९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 602

यह ग्रन्थ कहता है कि आत्मा ही सब देवता है और सब कुछ आत्मा में ही स्थित है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी सिद्धांत को व्यावहारिक साधना में बदलती है। जहाँ मनुस्मृति यह घोषणा करती है कि 'सब आत्मा में स्थित है', वहीं याज्ञवल्क्य उसे अनुभव करने की विधि बताते हैं कि कैसे शरीर के अंगों में आकाश, वायु, तेज और जल जैसे दैवीय तत्त्वों को स्थापित किया जाए। यह 'देवता-भाव' ही साधक को देह-अभिमान से मुक्त कर उसे विराट पुरुष के साथ एकाकार करता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'काया-कल्प' और 'तत्व-शुद्धि' का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य शरीर को एक बोझ या केवल भौतिक यंत्र मानता है, किंतु इस अभ्यास से वह शरीर को 'यज्ञ-वेदी' बना लेता है।

साधक जब छिद्रों में आकाश, गति में वायु, दृष्टि में तेज और स्नेह में जल का अनुभव करता है, तो वह 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास उसे इस भूमि पर ले जाता है जहाँ शरीर की सीमाएँ समाप्त होने लगती हैं। जब दृष्टि में 'परम तेज' का अनुभव होता है, तब वह केवल बाहरी वस्तुओं को नहीं देखता, बल्कि वस्तुओं के भीतर के प्रकाश को देखने लगता है। यह अभ्यास साधक को उस अवस्था में ले जाता है जहाँ वह स्वयं को पंचतत्त्वों का स्वामी नहीं, बल्कि उन्हीं का एक चैतन्य प्रतिबिंब अनुभव करता है। यह 'संनिवेश' वास्तव में चित्त का विस्तार है, जो उसे आगामी श्लोकों में वर्णित 'परम पुरुष' के साक्षात्कार के लिए तैयार करता है।

श्लोक ११.५४

वाच्यग्निं मित्रमुत्सर्गे प्रजने च प्रजापतिम् ।

मनसीन्दुं दिशः श्रोत्रे क्रान्ते विष्णुं बले हरम् ॥ ११.५४ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२८

वाणीमें अग्निको, उत्सर्गमें मित्रको, प्रजननमें प्रजापतिको, मनमें चन्द्रमाको, कानमें दिशाओंको, गतिमें विष्णुको और बलमें हर (इन्द्र) को।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर के भीतर पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी) के विन्यास का बोध कराया। अब ऋषि इस स्थूल तत्त्व-विभाजन से आगे बढ़कर, शरीर के विशिष्ट अंगों और क्रियाओं में अधिष्ठित दैवीय शक्तियों के साक्षात्कार का मार्ग बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) वाचि अग्निम्, उत्सर्गे मित्रम्, प्रजने प्रजापतिम्, मनसि इन्दुम्, श्रोत्रे दिशः, क्रान्ते विष्णुम्, बले हरम् (संनिवेशयेत्/भावयेत्)।

पदार्थ:

• वाचि अग्निम्: वाणी में अग्नि को; यहाँ अग्नि का अर्थ केवल दाहक अग्नि नहीं, अपितु वह तेज है जो शब्दों को अर्थ देता है और ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।

• उत्सर्गे मित्रम्: उत्सर्ग (त्याग, विसर्जन या शरीर से बाहर निकलने वाली क्रियाओं) में मित्र देवता को; मित्र सौर-शक्ति के उस रूप का प्रतीक है जो मैत्री और पोषण करता है।

• प्रजने प्रजापतिम्: प्रजनन (सृजन, संतानोत्पत्ति या किसी नए विचार के जन्म) में प्रजापति को; जो समस्त प्रजा के पालक और सृजनकर्ता हैं।

• मनसि इन्दुम्: मन में इन्दु (चन्द्रमा) को; चन्द्रमा शीतलता, स्मृति और मन का अधिष्ठाता है।

• श्रोत्रे दिशः: श्रोत्र (कानों) में दिशाओं को; यहाँ दिशाओं का अर्थ है सर्वव्यापकता, जिससे साधक हर दिशा से आने वाली ध्वनि और संकेत को ग्रहण कर सके।

• क्रान्ते विष्णुम्: क्रान्ते (गति, चलन या संचरण) में विष्णु को; विष्णु का अर्थ है 'विष्णुत्' अर्थात् सर्वत्र व्याप्त होना; जो शरीर की हर गति को संचालित करते हैं।

• बले हरम्: बल (शारीरिक और मानसिक शक्ति) में हर को; 'हर' यहाँ संभवतः इन्द्र या शिव के उस रूप को संकेत करता है जो अज्ञान और जड़ता का हरण कर शक्ति प्रदान करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक को 'देह-ब्रह्माण्ड' की एकता का अनुभव करा रहे हैं। यह विधि केवल एक मानसिक कल्पना नहीं है, अपितु यह एक सूक्ष्म न्यास है, जहाँ साधक अपने शरीर के अंगों को देवताओं के स्वरूप में परिवर्तित कर देता है।

जब साधक अपनी वाणी का प्रयोग करता है, तो वह यह भाव करे कि यह शब्द उसके कंठ से नहीं, अपितु उस 'अग्नि' से निकल रहे हैं जो सत्य और प्रकाश का प्रतीक है। जब वह शरीर से किसी वस्तु का त्याग करता है या विसर्जन करता है, तो वह 'मित्र' के भाव में हो, ताकि त्याग में भी मैत्री और शुभता बनी रहे। सृजन की हर क्रिया में वह स्वयं को 'प्रजापति' के रूप में देखे, जिससे उसका कर्म केवल व्यक्तिगत न रहकर लोक-कल्याणकारी बन जाए।

मन की चंचलता को शांत करने के लिए ऋषि 'इन्दु' (चन्द्रमा) के ध्यान का निर्देश देते हैं। मन जब चन्द्रमा के समान शीतल और निर्मल होता है, तभी वह ब्रह्म-चिंतन के योग्य बनता है। कानों में दिशाओं का भाव करने का अर्थ है कि साधक अपनी श्रवण-शक्ति को केवल बाहरी शोर तक सीमित न रखे, बल्कि वह समस्त दिशाओं से आने वाले ईश्वरीय संकेतों और नाद के प्रति सजग हो जाए। शरीर की गति में विष्णु का भाव उसे यह बोध कराता है कि वह जहाँ भी चलता है, वह उस सर्वव्यापक पुरुष के ही विस्तार में चल रहा है। अंततः, शरीर और मन के बल में 'हर' का भाव उसे जड़ता से मुक्त कर दिव्य ऊर्जा से जोड़ देता है।

यह प्रक्रिया साधक को स्थूल शरीर के मोह से ऊपर उठाकर उसे यह अनुभव कराती है कि यह देह वास्तव में देवताओं का एक मंदिर है, जहाँ हर क्रिया एक यज्ञ है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'अंग-न्यास' और 'देव-संन्यास' का एक उच्च स्तर है। साधक यहाँ 'अहंकार' (मैं कर रहा हूँ) से 'देव-भाव' (देवता कर रहे हैं) की ओर बढ़ता है।

अभ्यास की विधि यह है कि साधक अपनी चेतना को शरीर के उन विशिष्ट केंद्रों पर ले जाए जहाँ ये क्रियाएँ घटित होती हैं। जब वह बोले, तो कंठ में अग्नि का अनुभव करे; जब चले, तो पैरों और संचरण में विष्णु की व्यापकता को महसूस करे। यह अभ्यास साधक को 'साक्षी भाव' में प्रतिष्ठित करता है।

इस अभ्यास से साधक की भूमि बदलती है; वह केवल एक शरीर-धारी मनुष्य नहीं रहता, बल्कि वह स्वयं को एक 'दिव्य यंत्र' के रूप में अनुभव करने लगता है। जब शरीर के अंगों में देवताओं का वास प्रतिष्ठित हो जाता है, तब बाहरी पूजा और आंतरिक साधना का भेद समाप्त हो जाता है। यह साधना साधक को उस स्थिति तक ले जाती है जहाँ वह अगले श्लोकों में वर्णित 'परम पुरुष' के साक्षात्कार के लिए तैयार हो जाता है, क्योंकि अब उसका शरीर उस परम पुरुष के प्रतिबिंबों (देवताओं) से आलोकित हो चुका है।

श्लोक ११.५५

प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि ।

रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥ ११.५५ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२८

(मनु १२.१२२:) सबके शासक, अणुसे भी अणु, सुवर्णके समान आभावाले, स्वप्न-सी (एकाग्र) बुद्धिसे ग्राह्य (उस) परम पुरुषको जाने।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक ने शरीर के विभिन्न अंगों और क्रियाओं में देवताओं का विन्यास कर स्थूल शरीर को दैवीय स्वरूप में परिवर्तित किया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम सत्ता का परिचय दे रहे हैं, जो इन समस्त देवताओं और शक्तियों का मूल अधिष्ठान है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) सर्वेषाम् प्रशासितारम्, मनोरपि अणीयांसम्, रुक्माभम्, स्वप्नधीगम्यम्, तम् पुरुषं परम् विद्यात्।

पदार्थ:

• सर्वेषाम् प्रशासितारम्: समस्त चराचर जगत और शरीर के भीतर स्थित सभी इंद्रियों, प्राणों और देवताओं के शासक को।

• मनोरपि अणीयांसम्: मन से भी अधिक सूक्ष्म (अणु से भी अणु)। यहाँ 'अणु' आकार का नहीं, अपितु सूक्ष्मता और भेदन-शक्ति का प्रतीक है।

• रुक्माभम्: रुक्म (स्वर्ण) के समान आभा वाले। स्वर्ण शुद्धता, प्रकाश और अविनाशी तत्त्व का प्रतीक है।

• स्वप्नधीगम्यम्: स्वप्न-सी बुद्धि से ग्राह्य। यहाँ 'स्वप्नधी' का अर्थ निद्रा नहीं, अपितु वह एकाग्र और सूक्ष्म बुद्धि है जो स्थूल जगत के विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो गई हो।

• विद्यात्: जाने, अनुभव करे या साक्षात्कार करे। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु अपरोक्ष अनुभूति का निर्देश है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि उस 'परम पुरुष' का लक्षण बता रहे हैं, जिसे प्राप्त करना योग का अंतिम लक्ष्य है। जब साधक पिछले श्लोकों की विधि से शरीर के अंगों में देवताओं को स्थापित कर लेता है, तब वह इस योग्य होता है कि उन विविध देवताओं के पीछे छिपे एक ही 'शासक' को देख सके।

वह परम पुरुष 'प्रशासितार' है; अर्थात् शरीर की हर चेष्टा, मन का हर विचार और ब्रह्मांड की हर गति उसी के आदेश से संचालित है। वह 'मनोरपि अणीयांसम्' है। मन सूक्ष्म है, विचार उससे भी सूक्ष्म, किंतु वह पुरुष मन की सूक्ष्मता से भी परे है, इसलिए वह मन के द्वारा पकड़ा नहीं जा सकता, बल्कि मन जब शांत होकर विलीन होता है, तब वह प्रकट होता है।

उसकी आभा 'रुक्माभ' यानी स्वर्णिम है। यह स्वर्ण-आभा उस आत्म-ज्योति का संकेत है जो न सूर्य की है, न चंद्रमा की, बल्कि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है। अंत में ऋषि उसे 'स्वप्नधीगम्यम्' कहते हैं। सामान्यतः स्वप्न भ्रम है, किंतु योग की भाषा में 'स्वप्न-बुद्धि' वह अवस्था है जहाँ बाहरी इंद्रियाँ निद्रा में होती हैं और केवल अंतःकरण जागृत रहता है। जब बुद्धि बाहरी जगत के शोर से मुक्त होकर एकाग्र हो जाती है, तब वह उस परम पुरुष को ग्रहण करने में सक्षम होती है।

यह श्लोक साधक को स्थूल शरीर (अंगों) → सूक्ष्म शरीर (देवता/प्राण) → कारण शरीर (मन) और अंततः उस 'परम पुरुष' (आत्मा) की ओर ले जाने वाली यात्रा का उपसंहार है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि । रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥ १२.१२२ ॥

सबके शासक, अणुसे भी अणु, स्वर्णकी आभावाले, स्वप्न-सी बुद्धिसे ग्राह्य उस परम पुरुषको जाने।

मनुस्मृति १२.१२२मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 602

यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति के इस अंश से मेल खाता है। मनुस्मृति और बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति दोनों यहाँ एक ही सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं कि परमात्मा आकार में सूक्ष्मतम है, किंतु प्रभाव में सर्वोपरि (शासक) है। जहाँ मनु इसे एक धर्म-शास्त्रीय लक्षण के रूप में प्रस्तुत करते हैं, वहीं याज्ञवल्क्य इसे योग-साधना के क्रम में रखते हैं—पहले अंगों में देवताओं का न्यास (11.53-54) और फिर उस परम पुरुष का साक्षात्कार (11.55)।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'सूक्ष्मता की ओर गति' है।

१. शासक भाव: साधक अनुभव करता है कि वह स्वयं कर्ता नहीं है, बल्कि उसके भीतर एक 'प्रशासितार' है जो सब संचालित कर रहा है। इससे अहंकार का विसर्जन होता है।

२. सूक्ष्मता का अभ्यास: 'मनोरपि अणीयांसम्' का अभ्यास करते हुए साधक अपने ध्यान को मन के स्तर से नीचे ले जाकर उस बिंदु पर केंद्रित करता है जहाँ विचार समाप्त हो जाते हैं और केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है।

३. स्वर्णाभ ज्योति का ध्यान: साधक अंतःहृदय में एक स्वर्णिम प्रकाश की कल्पना करता है, जो धीरे-धीरे उसकी अपनी आभा बन जाता है।

४. एकाग्र बुद्धि (स्वप्नधी): साधक जाग्रत अवस्था में भी 'स्वप्न-सी' एकाग्रता विकसित करता है, जहाँ बाहरी संसार ओझल हो जाता है और केवल आंतरिक पुरुष की उपस्थिति का अनुभव होता है।

इस अभ्यास से साधक 'साक्षी भाव' की भूमि से उठकर 'साक्षात्कार' की भूमि में प्रवेश करता है।

परमपुरुषनामधेयानि

श्लोक ११.५६

एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।

इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ११.५६ ॥

एकादशोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२८

इसीको कुछ लोग अग्नि कहते हैं, दूसरे मनु, (कुछ) प्रजापति, कुछ इन्द्र, दूसरे प्राण, और अन्य सनातन ब्रह्म।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस परम पुरुष के स्वरूप का वर्णन किया जो मन से भी सूक्ष्म, स्वर्ण के समान आभायुक्त और एकाग्र बुद्धि से ग्राह्य है। अब इस श्लोक में वे स्पष्ट कर रहे हैं कि विभिन्न ऋषियों और शास्त्रों ने अपनी-अपनी अनुभूति और दृष्टि के अनुसार इसी एक सत्ता को किन-किन नामों से पुकारा है।

अन्वय और पदार्थ —

एतम् (परम पुरुषम्) एके वदन्ति अग्निम्, अन्ये मनुम्, (अन्ये) प्रजापतिम्, एके इन्द्रम्, परे प्राणम्, अपरें ब्रह्म शाश्वतम्।

पदार्थ:

• एतम्: उस परम पुरुष को, जिसका वर्णन पिछले श्लोक (११.५५) में किया गया है।

• एके वदन्ति: कुछ (साधक या ऋषि) कहते हैं।

• अग्निम्, मनुम्, प्रजापतिम्, इन्द्रम्, प्राणम्: ये विभिन्न नाम उस एक ही सत्ता के विभिन्न आयामों या शक्तियों के सूचक हैं।

• ब्रह्म शाश्वतम्: वह सनातन, अविनाशी और अनंत तत्त्व।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक सत्य की 'एकता' और उसके 'विविध नामकरण' का रहस्य खोलता है। जब साधक पिछले श्लोकों की विधि से शरीर के अंगों में देवताओं का विन्यास करता है और फिर उस परम पुरुष के स्वर्ण-आभा वाले स्वरूप का साक्षात्कार करता है, तब उसे यह बोध होता है कि जिसे वह अब तक अलग-अलग देवताओं के रूप में पूज रहा था, वे वास्तव में एक ही सत्ता के विभिन्न प्रतिबिंब हैं।

यहाँ 'अग्नि' केवल भौतिक आग नहीं, अपितु वह दिव्य तेज है जो अविद्या को भस्म करता है। 'मनु' उस आदि-मानव या प्रथम चेतना के प्रतीक हैं जिन्होंने धर्म और मर्यादा का विधान किया। 'प्रजापति' वह सृजनात्मक शक्ति है जिससे समस्त प्रपंच उत्पन्न हुआ। 'इन्द्र' उस सर्वोच्च इंद्रिय-शक्ति और ऐश्वर्य का नाम है जो मन और प्राणों पर शासन करता है। 'प्राण' वह सूक्ष्म जीवन-शक्ति है जो स्थूल शरीर और सूक्ष्म आत्मा के बीच की कड़ी है। और अंततः, जब साधक समस्त नामों और रूपों के पार जाता है, तब वह उसे 'शाश्वत ब्रह्म' के रूप में अनुभव करता है।

भाव यह है कि सत्य एक ही है, किंतु साधक की योग्यता, उसकी दृष्टि और उसके अनुभव की भूमि के अनुसार वह अलग-अलग नामों से प्रकट होता है। कोई उसे उसकी 'तप' शक्ति के कारण अग्नि कहता है, कोई उसकी 'सृजन' शक्ति के कारण प्रजापति, तो कोई उसकी 'जीवन' शक्ति के कारण प्राण। यह विविधता केवल शब्दों में है, तत्त्व में नहीं।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ १२.१२३ ॥

इसीको कुछ अग्नि कहते हैं, कुछ मनु, कुछ प्रजापति, कुछ इन्द्र, कुछ प्राण और कुछ शाश्वत ब्रह्म।

मनुस्मृति १२.१२३मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 29

यह श्लोक मनुस्मृति के वचन के साथ पूर्णतः मेल खाता है। मनुस्मृति भी इसी सत्य की उद्घोषणा करती है कि एक ही परम सत्ता को विभिन्न ऋषियों ने अग्नि, मनु, प्रजापति, इन्द्र, प्राण और शाश्वत ब्रह्म कहा है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस साक्ष्य के माध्यम से यह सिद्ध करती है कि योग का मार्ग केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, अपितु समस्त वैदिक और स्मृतिक परंपराओं का निचोड़ है। जहाँ कर्मकांडी उसे विभिन्न देवताओं के रूप में देखता है, वहीं योगी उसे एक ही 'परम पुरुष' के विविध नाम मानता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'नाम-रूप' से 'नाम-रूप रहित' की ओर जाने की यात्रा है। योग में इसे 'विवेक' कहते हैं। जब साधक शरीर के अंगों में देवताओं का ध्यान करता है, तब वह 'नाम' और 'रूप' के स्तर पर होता है। किंतु जैसे ही वह इस श्लोक के भाव को आत्मसात करता है, वह अनुभव करता है कि उसके भीतर जो प्राण स्पंदित हो रहा है, वही वास्तव में अग्नि है, वही इन्द्र है और वही शाश्वत ब्रह्म है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसके भीतर की 'प्राण-शक्ति' ही वास्तव में वह 'परम पुरुष' है। अभ्यास यह है कि जब भी वह किसी देवता का स्मरण करे, तो अंततः उसे उसी एक शाश्वत ब्रह्म में विलीन कर दे। यह अभ्यास साधक को 'बहुत्व' से 'एकत्व' की भूमि पर ले जाता है। वह समझ जाता है कि बाहरी पूजा और आंतरिक योग में कोई भेद नहीं है; बाहरी देवता केवल उस आंतरिक ब्रह्म तक पहुँचने के सोपान (सीढ़ियाँ) हैं। इस अनुभूति से साधक के भीतर समस्त भेदों का नाश होता है और वह 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (यह सब कुछ वास्तव में ब्रह्म ही है) की अवस्था को प्राप्त करता है।

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-10-04।

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