व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — मूल, बारह अध्याय
928 मूल पद्य
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति — जिसे निबन्धकार ‘योगियाज्ञवल्क्य’ के नामसे उद्धृत करते हैं — प्रसिद्ध याज्ञवल्क्यस्मृतिसे भिन्न ग्रन्थ है: इसमें व्यवहार नहीं है, और आचारमें भी ओंकार, व्याहृति, गायत्री, संध्या, स्नान, तर्पण, जप, प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यान ही विस्तारसे कहे गये हैं (संस्करणकी प्रस्तावनाके अनुसार)।
यह पाठ कैवल्यधाम, लोणावळाके प्रथम संस्करण (१९५१) का है, जो दो हस्तलिखित प्रतियों — भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिरकी पूर्ण प्रति (आ.) और ब्रिटिश म्यूज़ियमकी खण्डित ताडपत्र प्रति (इ.) — तथा निबन्ध-ग्रन्थोंमें मिले उद्धरणोंसे सम्पादित हुआ। श्लोक-संख्या संस्करणकी है; प्रत्येक श्लोकके नीचे संपादकोंके पाठभेद हैं, जिन्हें ऊपरके बटनसे छिपाया जा सकता है।
प्रथमोऽध्यायः — मन्त्रयोगनिर्णयः
अध्याय-सार — मन्त्रयोगनिर्णय — ग्रन्थका आरम्भ और ढाँचा। मिथिलामें मुनियों, जनक आदि राजाओं और शिष्योंसे घिरे याज्ञवल्क्यके पास ऋषि आते हैं — उन्हीं याज्ञवल्क्यके पास, जिन्होंने यजुर्मन्त्रोंके अभ्यासमें सूर्यको साक्षात् देखा था (१.११)। ऋषियोंके प्रश्न (१.४–१९) पूरे ग्रन्थके विषय हैं: ओंकारसे लेकर ध्यान, संध्या, स्नान, जप और सूर्योपस्थानतक, सूर्यके भीतरका आत्मा, होम और अन्नयज्ञका चिन्तन, विद्या-अविद्या और परम निःश्रेयस। याज्ञवल्क्य वेदान्त, स्मृति और सिद्धान्तोंके सारको कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं (१.२०–२६)। शेष अध्याय (१.२७–४४) सब मन्त्र-कर्मकी भूमिका है: मन्त्रका ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मण जानना क्यों आवश्यक है, इन्हें न जाननेसे फल अल्प होता है, जाननेवालेकी महिमा क्या है, और इन पाँचोंका लक्षण क्या है। आगेके अध्याय प्रत्येक मन्त्रके लिए यही पाँच बातें बताते हैं।
याज्ञवल्क्यवर्णनम्
मिथिलास्थं महात्मानं सर्वयोगीश्वरेश्वरम् ।
भगवन्तं याज्ञवल्क्यं मुनिसङ्घैः समावृतम् ॥ १.१ ॥
मिथिला में स्थित, सब योगीश्वरों के ईश्वर, मुनि-समूहों से घिरे महात्मा भगवान् याज्ञवल्क्य से…
पाठभेद — (पृ. १, पं. ४) ‘श्रीगणेशायनमः ॥’ इति प्रारम्भवाक्यमधिकम् आ.
(पृ. १, पं. ४) ‘ॐ नमो योगेश्वराय’ इति प्रारम्भवाक्यमधिकम्; सर्वयोगेश्वरेश्वरः इ.
(पृ. १, पं. ५) भगवान् याज्ञवल्क्यस्तु मुनि... इ.
जनकाद्यैर्नृपवरैः शिष्यैश्चान्यैर्मुमुक्षुभिः ।
योगसिद्धैस्तथान्यैश्च संवृतं ब्रह्मवादिभिः ॥ १.२ ॥
जनक आदि श्रेष्ठ राजाओं, शिष्यों और अन्य मुमुक्षुओं, योगसिद्धों तथा अन्य ब्रह्मवादियोंसे घिरे (याज्ञवल्क्यसे)…
पाठभेद — (पृ. १, पं. ६) शिष्यैश्चैव मुमुक्षुभिः इ.
(पृ. १, पं. ७) सिद्धैस्तथा योगे इ.
सुखासीनं मुनिवरं ध्यानयोगपरायणम् ।
सर्वसंशयच्छेत्तारं ब्रह्मकल्पं महामुनिम् ॥ १.३ ॥
…सुखपूर्वक बैठे हुए, मुनियोंमें श्रेष्ठ, ध्यानयोगमें तत्पर, सब संशयोंको काटनेवाले, ब्रह्माके समान महामुनिसे —
पाठभेद — (पृ. १, पं. ८) तत्रासीनं इ.
(पृ. १, पं. ९) संशयछेत्तारं आ..., ब्रह्मकल्पाम्महाद्युतिम् इ.
ऋषिप्रश्नाः
तं पृच्छन्ति महात्मानमृषयः संशितव्रताः ।
संसारतारणार्थाय गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ॥ १.४ ॥
…कठोर व्रतवाले ऋषि उन महात्मा से संसारसे पार होनेके लिए सनातन गुह्य ब्रह्म के विषयमें पूछते हैं।
भगवन् सर्वयोगीश ब्रूहि नः संशयो महान् ।
यः सारः सर्ववेदानां वेदान्तानां तथैव च ॥ १.५ ॥
"हे भगवन्! हे सब योगियों के स्वामी! हमें बताइये, हमारा संशय बड़ा है — जो सब वेदों का और उसी प्रकार वेदान्तों का सार है…"
सिद्धान्तानां च सर्वेषां स्मृतीनां च महामुने ।
चतुर्दशानां विद्यानां यस्तु सारः प्रकीर्तितः ॥ १.६ ॥
और सब सिद्धान्तों का तथा स्मृतियों का, हे महामुने! चौदह विद्याओं का जो सार कहा गया है…
आत्मज्ञानं परं यच्च यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
ओंकारं व्याहृतींश्चैव गायत्रीं तच्छिरस्तथा ॥ १.७ ॥
आत्मज्ञान जो परम है और जिसे जानकर अमृत प्राप्त होता है, ओंकार, व्याहृतियाँ और गायत्री तथा उस "गायत्री" का शिरस् (शिरोमन्त्र)…
प्राणायामं तथा ध्यानं संध्योपासनमेव च ।
मार्जनाभ्युक्षणे स्नानं तथैवान्तर्जलं जपम् ॥ १.८ ॥
…प्राणायाम, ध्यान और संध्योपासन; मार्जन और अभ्युक्षण, स्नान तथा अन्तर्जल में जप…
गायत्र्याश्चैव माहात्म्यं जपयज्ञप्रयोजनम् ।
उपस्थानं तथार्कस्य सारूप्यमपि चैव हि ॥ १.९ ॥
गायत्री का माहात्म्य, जपयज्ञ का प्रयोजन, सूर्य का उपस्थान और सारूप्य भी (बताइये) …
तस्या(स्य)चान्तर्गतो ह्यात्मा कथं विज्ञायते तु सः ।
त्वं हि जानासि तत्त्वेन स्वेन योगबलेन च ॥ १.१० ॥
…और उस (सूर्य) के अन्तर्गत जो आत्मा है, वह कैसे जाना जाता है? क्योंकि आप तत्त्व से और अपने योगबल से उसे जानते हैं…
यजूंष्यभ्यस्यमानेन पुरस्ताद्भास्करो ह्ययम् ।
साक्षाद्भगवता दृष्टस्तेन पृच्छामहे वयम् ॥ १.११ ॥
…(आपने) यजुर्मन्त्रोंका अभ्यास करते हुए इस सूर्यको अपने सामने साक्षात् देखा है; इसीलिए हम आपसे पूछते हैं —
आर्षं छन्दश्च मन्त्राणां दैवत्यं ब्राह्मणं तथा ।
विनियोगं च मन्त्राणामोंकारादेश्च यद्विभो ॥ १.१२ ॥
मन्त्रों के ऋषि, छन्द, देवता, ब्राह्मण तथा मन्त्रों का विनियोग और ओंकार आदि भी जो (है), हे विभो!
किमुक्तं भवतीत्येतज्ज्ञातेऽज्ञाते च किं भवेत् ।
ब्राह्मण्यं च भवेत् केन किं वा नित्यमुपास्यते ॥ १.१३ ॥
(इनका) अभिप्राय क्या है, और (इन्हें) जाननेपर तथा न जाननेपर क्या होता है? ब्राह्मणत्व किससे होता है, और नित्य किसकी उपासना की जाती है?
किं वा सत्यं भवेद्ब्रह्म संध्या येन उपास्यते ।
कथं संमार्जनं कुर्यान्मन्त्रैर्वरुणदेवतैः ॥ १.१४ ॥
अथवा वह सत्य ब्रह्म क्या है, जिसके द्वारा संध्याकी उपासना की जाती है? वरुण-देवतावाले मन्त्रोंसे संमार्जन कैसे करे?
अन्तर्जलं च कतमैः कतमैः प्राणसंयमम् ।
सूर्यस्य चाप्युपस्थानं कुर्यान्मन्त्रैः किमात्मकैः ॥ १.१५ ॥
अन्तर्जल (जप) किन-किन (मन्त्रों) से, और प्राणसंयम किन-किन (मन्त्रों) से (करे)? और सूर्यका उपस्थान भी किस स्वरूपवाले मन्त्रोंसे करे?
पाठभेद — (पृ. २, पं. २०) इ.; प्राणसंयमैः आ.
केनाक्षरेण मन्त्रेण धारणा धार्यते कथम् ।
किं ध्यानं किं च वै ध्येयं किं लक्ष्यं किं स्वरूपकम् ॥ १.१६ ॥
किस अक्षर या किस मन्त्र द्वारा धारणा कैसे धारण की जाती है? ध्यान क्या है, ध्येय क्या है, लक्ष्य क्या है और स्वरूप क्या है?
यच्चोपास्य विमुच्येत तत् परं ब्रूहि नो विभो ।
होमकाले तथाग्नौ तु मध्ये किं परिचिन्तयेत् ॥ १.१७ ॥
जिसकी उपासना करके मुक्त हो जाता है, उस परम (तत्त्व) को हे विभो! आप हमें बताइये; तथा होमकाल में अग्नि के मध्य में मनुष्य क्या विचार करे?
यस्य चैवाहुतिं दद्यात् किं ते (तद्) ब्रह्म किमात्मकम् ।
तथान्नयज्ञकाले तु स्वदेहे चिन्तयेत् कथम् ॥ १.१८ ॥
जिसकी आहुति देनी चाहिए, वह ब्रह्म क्या है और किस स्वरूप का है? उसी प्रकार अन्नयज्ञ के समय अपने शरीर में कैसे चिन्तन करे?
पाठभेद — (पृ. ३, पं. ४) कस्य चैवाहुतिं इ.
का विद्या का ह्यविद्या च किं वा निःश्रेयसं परम् ।
किमधीयीत वै विप्र एतत् सर्वं वदस्व नः ॥ १.१९ ॥
विद्या क्या है, अविद्या क्या है, और परम निःश्रेयस क्या है? ब्राह्मण क्या अध्ययन करे? — यह सब हमें बताइये।
याज्ञवल्क्यस्योत्तरप्रतिज्ञा
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं मुनीनां भावितात्मनाम् ।
तथा राजर्षीणां च स्वशिष्याणां तथैव च ॥ १.२० ॥
शुद्ध अंतःकरण वाले मुनियों का, तथा राजर्षियों का और अपने शिष्यों का यह वचन सुनकर…
ब्राह्मणानां हितार्थाय सर्वयोगविदां वरः ।
आविष्कर्तुमनाः प्रश्नं विस्तरेण महामतिः ॥ १.२१ ॥
ब्राह्मणों के हित के लिए, सब योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ, विस्तार से प्रश्न (का उत्तर) प्रकट करने की इच्छा रखने वाले महाबुद्धिमान् याज्ञवल्क्य...
भगवान् याज्ञवल्क्यस्तु प्रत्युवाच मुनींस्तदा ।
श्रूयतां संप्रवक्ष्यामि यत् सारं ज्ञानमुत्तमम् ॥ १.२२ ॥
… तब भगवान् याज्ञवल्क्य ने मुनियों को उत्तर दिया — सुनिए, जो सारभूत उत्तम ज्ञान है उसे मैं भली-भाँति कहूँगा।
वेदान्ताभिहितं यच्च स्मृतिसिद्धान्तयोरपि ।
तत् सर्वं संप्रवक्ष्यामि योगसारसमुच्चयम् ॥ १.२३ ॥
वेदान्त में कहा गया और स्मृतियों तथा सिद्धान्तों में भी जो है, उस योगके सारका संग्रह मैं सब भली-भाँति कहूँगा।
येन यत् क्रियते कर्म नैत्यकं यद्द्विजातिभिः ।
ब्राह्मण्यं लभते येन ब्रह्मसायुज्यतां व्रजेत् ॥ १.२४ ॥
जिस (ज्ञान) से द्विजाति अपना नित्य कर्म करते हैं, जिससे (मनुष्य) ब्राह्मणत्व पाता है और ब्रह्मके सायुज्यको जाता है —
ओंकारो व्याहृतयश्च गायत्री सशिरास्तथा ।
वैदिकं च तथा कर्म अब्लिङ्गं चाघमर्षणम् ॥ १.२५ ॥
— ओंकार, व्याहृतियाँ, शिरस् सहित गायत्री, तथा वैदिक कर्म, अप्-लिङ्ग (जलदेवताके) मन्त्र और अघमर्षण —
प्राणायामस्तथा संध्या मार्जनान्तर्जलं जपः ।
सर्वमेव हि कर्तव्यं ब्राह्मणैर्ब्रह्मचिन्तकैः ॥ १.२६ ॥
प्राणायाम, संध्या, मार्जन, अन्तर्जल और जप — यह सब वास्तव में ब्रह्मका चिन्तन करनेवाले ब्राह्मणोंको करना ही चाहिए।
आर्षच्छन्दादिज्ञानप्रयोजनम्
आर्षं छन्दश्च दैवत्यं विनियोगस्तथैव च ।
वेदितव्यं प्रयत्नेन ब्राह्मणेन विपश्चिता ॥ १.२७ ॥
ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग को उसी प्रकार विद्वान् ब्राह्मण द्वारा प्रयत्नपूर्वक जानना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ४, पं. १) वीमि. परि. ८५, स्मृत. ३८३, ४७६, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४, व्रत. २४७; विनियोगं आ.; छन्दो दैवतं च विनियो... आर. ४*
(पृ. ४, पं. २) ब्राह्मणेन विशेषतः वीमि. २६८. स्मृत. ३८३, ४७६, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४; ब्राह्मणेन प्रयत्नेन वेदितव्यं विपश्चिता आर. ४*
आर्षच्छन्दाद्यज्ञाने फलाल्पत्वम्
अविदित्वा तु यः कुर्याद्याजनाध्यपनं जपम् ।
होममन्तर्जलादीनि तस्य चाल्पं फलं भवेत् ।
आपद्यते स्थाणुगर्ते स्वयं वाऽपि प्रमी(ली)यते ॥ १.२८ ॥
परन्तु जो (इन्हें) जाने बिना यज्ञ कराना, पढ़ाना, जप, होम और अन्तर्जल आदि करता है, उसका फल अल्प होता है; वह ठूँठ या गड्ढेको प्राप्त होता है, अथवा स्वयं मर जाता है।
पाठभेद — (पृ. ४, पं. ३) स्मृत. ३८५, ४७६, आर. ४*; ध्यापनादिकम् वीमि. परि. ८५; ध्ययनं जपम्, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
(पृ. ४, पं. ४) स्मृत. ३८५, ४७६, हे. दान. १०४, व्रत. २४७, आर. ४*; होममन्यत्रयत् किंचित् स्मृत. ४७७
(पृ. ४, पं. ५) गर्तं स्वयं चापि प्रलीयते बृप. २.५०, इ.
यातयामानि च्छन्दांसि भवन्त्यल्पफलान्यपि ।
अन्तर्जलादिके जप्ये इतरेषामजानताम् ॥ १.२९ ॥
(ऐसेके) छन्द (मन्त्र) यातयाम (निःसार) और अल्पफल हो जाते हैं। अन्तर्जल आदि जपमें, (इन्हें) न जाननेवाले अन्य लोगोंका —
पाठभेद — (पृ. ४, पं. ६) भवन्त्यफलदान्यपि बृप. २.५०; ...ल्पबलान्यपि इ.
नाधिकारोस्ति मन्त्राणामेवं श्रुतिनिदर्शनम् ।
अल्पमात्रं फलं तस्य होमादन्तर्जलाज्जपात् ॥ १.३० ॥
— मन्त्रोंपर अधिकार नहीं है, ऐसा श्रुतिका निदर्शन है। उसे होमसे, अन्तर्जलसे और जपसे अल्पमात्र फल (मिलता है) —
आर्षच्छन्दादिज्ञातुर्महिमा
स्वाध्यायाद्याजनाच्चैव भवतीह न संशयः ।
यस्तु जानाति तत्त्वेन आर्षं छन्दश्च दैवतम् ॥ १.३१ ॥
— और स्वाध्याय तथा याजन (यज्ञ कराने) से भी (अल्प फल ही) होता है, इसमें संशय नहीं। परन्तु जो ऋषि, छन्द और देवताको तत्त्वसे जानता है —
पाठभेद — (पृ. ४, पं. ११) यश्च जानाति वीमि. परि. ८६, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४, व्रत. २४७
विनियोगं ब्राह्मणं च मन्त्रार्थं ज्ञानकर्मणी ।
एकैकस्या ऋचः सोऽपि वन्द्यो ह्यतिथिवद्भवेत् ॥ १.३२ ॥
— विनियोग, ब्राह्मण, मन्त्रार्थ, ज्ञान और कर्म — एक-एक ऋचाके (जानता है), वह भी अतिथिकी भाँति वन्दनीय होता है —
पाठभेद — (पृ. ५, पं. १) ज्ञानकर्म च वीमि. परि. ८६, इ., याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४, व्रत. २४७
(पृ. ५, पं. २) एकैकस्य ऋषेः सोऽपि वीमि. परि. ८६; याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४, व्रत. २४८
देवतायाश्च सायुज्यं गच्छत्यत्र न संशयः ।
पूर्वोक्तेन विधानेन ऋष्यादीन् वेत्ति यो द्विजः ॥ १.३३ ॥
और वह द्विज देवता के साथ सायुज्य (एकाकार होना) को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं। जो पूर्वोक्त विधि से ऋषि आदि को जानता है…
पाठभेद — (पृ. ५, पं. ३) वीमि. परि. ८६
(पृ. ५, पं. ४) वीमि. परि. ८६; पूर्वोक्तेन प्रकारेण, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४, व्रत. २४८
अधिकारो भवेत्तस्य रहस्येषु च कर्मसु ।
मन्त्रे मन्त्रे प्रयत्नेन ज्ञातव्यं ब्राह्मणेन तु ॥ १.३४ ॥
उसका रहस्यमय कर्मों में भी अधिकार होता है और ब्राह्मण को प्रत्येक मन्त्र में प्रयत्न से जानना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ५, पं. ५) रहस्यादिषु कर्मसु वीमि. परि. ८६; अधिकारी भवेत्तस्य रहस्यादिषु कर्मसु, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
विज्ञाते परिपूर्णं तु स्वाध्यायफलमश्नुते ।
छन्दांस्ययातयामानि भवन्ति सफलान्यपि ॥ १.३५ ॥
(इनके) जान लिये जाने पर, वह (ब्राह्मण) परिपूर्ण स्वाध्यायफल को प्राप्त करता है और उसके छन्द 'अयातयाम' (सजीव/शक्तिशाली) तथा सफल होते हैं।
श्रेयश्च लभते सोऽपि धर्ममायुश्च विन्दति ।
दिव्यं वर्षसहस्रं तु स्वस्थानमृषिभिः सह ॥ १.३६ ॥
…वह श्रेय भी प्राप्त करता है और धर्म तथा आयु को पाता है; और ऋषियों के साथ हजार दिव्य वर्षों तक (अपने) स्वस्थान में…
संतिष्ठते तु तैः सार्धं तत्तुल्यो वेह जायते ।
फलं चैवापवादं च एवं बुद्ध्वा विधानतः ॥ १.३७ ॥
— उनके साथ (वहाँ) रहता है, अथवा यहाँ उनके समान होकर जन्म लेता है। इस प्रकार फल और अपवाद (दोष) को विधिपूर्वक जानकर —
पाठभेद — (पृ. ५, पं. १२) बुध्वा आ.
आर्षकलक्षणम्
ज्ञातव्यं हि प्रयत्नेन ब्राह्मणेन विशेषतः ।
येन यदृषिणा दृष्टं सिद्धिः प्राप्ता च येन वै ॥ १.३८ ॥
— ब्राह्मणको विशेष रूपसे प्रयत्नपूर्वक (यह) जानना चाहिए। जिस ऋषिने जो (मन्त्र) देखा और जिसने (उससे) सिद्धि पायी —
पाठभेद — (पृ. ५, पं. १४) वीमि. परि. ८६; याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
छन्दपदनिरुक्तिः
मन्त्रेण तस्य तत् प्रोक्तमृषिभावस्तदार्षकम् ।
छादनाच्छन्द उद्दिष्टमाकृतेर्वाससी यथा ॥ १.३९ ॥
— उस मन्त्रका वह (ऋषि) कहा गया है; यह ऋषिभाव ही आर्ष है। ढँकनेके कारण 'छन्द' कहा गया — जैसे दो वस्त्र देहको ढँकते हैं।
पाठभेद — (पृ. ६, पं. १) .... मृषेर्भाव वीमि. परि. ८६; याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
(पृ. ६, पं. २) उद्दिष्टं वाससीवाथ वाऽऽकृतेः बृप. २.४१; वाससी इव चाकृतेः वीमि. परि. ८७; वाससी इव चाकृते, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
आत्मा संछादितो देवैर्मृत्युभीतैश्च वै पुरा ।
आदित्यैर्वसुभी रुद्रैस्तेन च्छन्दांसि तानि वै ॥ १.४० ॥
पूर्वकालमें मृत्युसे डरे हुए देवताओं — आदित्यों, वसुओं और रुद्रों — ने अपनेको (इनसे) ढँका था; इसीलिए वे छन्द कहलाते हैं।
पाठभेद — (पृ. ६, पं. ३) भीतैस्तु वीमि. परि. ८७; याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४, व्रत. २४८
(पृ. ६, पं. ४) वीमि. परि. ८७; .... भिरुद्रैस्तेन छन्दस्तु वै श्रुतम् । आ. याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
दैवतलक्षणम्
यस्य यस्य तु मन्त्रस्य उद्दिष्टा देवता तु या ।
तदाकारं भवेत्तस्य दैवतं देवतोच्यते ॥ १.४१ ॥
जिस-जिस मन्त्र की जो देवता बताई गई है, वह उसी के आकार का होता है; इसलिए उस मन्त्र का दैवत — देवता — कहा जाता है।
पाठभेद — (पृ. ६, पं. ५) वीमि. परि. ८७; याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
(पृ. ६, पं. ६) वीमि. परि. ८७; देवत्वं देवतोच्यते, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
विनियोगलक्षणम्
पुराकल्पे समुद्दिष्टा मन्त्राः कर्मार्थसिद्धये ।
अनेनेदं तु कर्तव्यं विनियोगः स उच्यते ॥ १.४२ ॥
प्राचीन काल में कर्म की सिद्धि के लिए जो मन्त्र उद्दिष्ट किए गए हैं, जिससे यह (कर्म) किया जाना चाहिए, वह 'विनियोग' कहा जाता है।
पाठभेद — (पृ. ६, पं. ७) समुत्पन्ना मन्त्राः कर्मार्थमेव च वीमि. परि. ८७; कर्मार्थ एव च, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
(पृ. ६, पं. ८) वीमि. परि. ८७ स्मृत. ३८७; अनेन चेदं कर्तव्यं, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
ब्राह्मणलक्षणम्
निरुक्तं यत्र मन्त्रस्य समुत्पत्तिः प्रयोजनम् ।
प्रतिष्ठानं स्तुतिश्चैव ब्राह्मणं तदिहोच्यते ॥ १.४३ ॥
जहाँ मन्त्र की समुत्पत्ति, प्रयोजन, प्रतिष्ठा और स्तुति का निरुक्त (व्याख्यान) हो, उसे यहाँ 'ब्राह्मण' कहा जाता है।
पाठभेद — (पृ. ६, पं. ९) वीमि. परि. ८७; निरुक्तं यस्य आ.; नैरुक्तं यच्च मन्त्रस्य विनियोगप्रयोजनम्, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४
(पृ. ६, पं. १०) वीमि. परि. ८७; याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४; ब्राह्मणः सोऽभिधीयते आ.; ब्राह्मणः स विधीयते इ.
आर्षादिस्मरणावश्यकता
एतत् पञ्चविधं योगं जपकाले ह्यनुस्मरेत् ।
होमे चान्तर्जले योगे स्वाध्याये यजने तथा ॥ १.४४ ॥
इस पाँच प्रकारके योग (ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मणके संयोग) का जपके समय स्मरण करे — और होममें, अन्तर्जलमें, योगमें, स्वाध्यायमें तथा यजनमें भी।
पाठभेद — (पृ. ७, पं. १) एवं पञ्च.... ....जप्यकाले वीमि. परि. ८८; एवं ...जयार्थं गृह्यनुस्मरेत्, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४; एतत् पञ्चविधं प्रोक्तं जप्यकाले आ.; जाप्यकाले अनुस्मरेत् इ.
(पृ. ७, पं. २) याजने वीमि. परि. ८८, यागे स्वाध्याये याजने वीमि. २६८, इ., याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०४, व्रत. २४८
इति (श्री) बृहद्योगियाज्ञवल्क्ये (मन्त्रयोगनिर्णयो नाम) प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
पाठभेद — (पृ. ७, पं. ३) अत्र इ. पुस्तके अध्यायसमाप्तिद्योतकं किमपि नास्ति । कुण्डलितः पाठः आदर्शपुस्तके नास्ति ।
द्वितीयोऽध्यायः — ओंकारनिर्णयः
अध्याय-सार — ओंकारनिर्णय (१५८ श्लोक)। सब मन्त्र प्रणवसे आरम्भ होते हैं, उसीसे निकलते हैं और उसीमें लीन होते हैं (२.१); ओंकार परम ब्रह्म और सब मन्त्रोंका नायक है (२.२)। अध्याय उसके ऋषि-छन्द-देवता, प्रत्येक कर्मके आरम्भमें उसके योग, ‘ॐ तत् सत्’ के त्रिविध निर्देश (२.९), उसकी मात्राओं, पर्यायों और नामोंकी निरुक्तियोंसे होता हुआ शब्दब्रह्म और परब्रह्मके भेदपर आता है (२.४७–४९) और पाँच लक्षणवाले प्रणवकी उपासना बताता है। फिर सिद्धान्तोंके मत गिनाये जाते हैं — हिरण्यगर्भ, कपिल, अपान्तरतमा, सनत्कुमार, ब्रह्मिष्ठ, पाशुपत, पाञ्चरात्र और वायुलि — जिनमें ओंकार तिरसठ भेदोंसे गाया जाता है (२.६६–१०६); विष्णुका स्वरूप, ओंकारके दस नाम और उनकी निरुक्तियाँ आती हैं। मात्राओंकी गिनतीपर ऋषियोंके मत देकर याज्ञवल्क्य अपना मत रखते हैं: वे अमात्र ओंकारको मानते हैं — उच्चारित, शब्दमय ओंकार स्थूल है, और अमात्र, अनुच्चार्य ओंकार पर है (२.१३१–१३२)। अध्याय परम व्योमतक ले जानेवाली ओंकार-उपासना, उसकी महिमा और उसके ज्ञानके फलसे समाप्त होता है।
प्रणवस्याद्यमन्त्रत्वम्
प्रणवाद्याः स्मृता मन्त्राश्चतुर्वर्गफलप्रदाः ।
तस्माच्च निःसृताः सर्वे प्रलीयन्ते च तत्र वै ॥ २.१ ॥
प्रणव से आरम्भ होने वाले मन्त्र और चारों पुरुषार्थों का फल देने वाले हैं; सब उसी से निकलते हैं और उसी में लीन होते हैं।
प्रणवस्य माहात्म्यम्
मङ्गल्यः पावनो धन्यः सर्वकामप्रसाधनः ।
ओंकारः परमं ब्रह्म सर्वमन्त्रेषु नायकः ॥ २.२ ॥
मङ्गल करने वाला, पावन करने वाला, धन्य और सब कामनाओं को सिद्ध करने वाला ओंकार ही परम ब्रह्म है तथा सब मन्त्रों का नायक है।
पाठभेद — (पृ. ८, पं. ४) वीमि. २७६, अप. ४४
प्रणवस्यार्षादि
प्रजापतेर्मुखोत्पन्नस्तपःसिद्धस्य वै पुरा ।
तेनोपात्तमतस्तस्य ब्रह्मार्षं (ब्रह्माऽऽर्षं) च स्वयंभुवः ॥ २.३ ॥
(ओंकार) पूर्वकालमें तपसे सिद्ध प्रजापतिके मुखसे उत्पन्न हुआ; उन्होंने उसे ग्रहण किया, इसलिए स्वयम्भू ब्रह्मा उसके ऋषि हैं।
पाठभेद — (पृ. ८, पं. ६) अप. ४४; प्रजापतिर्मु... वीमि. २७६
(पृ. ८, पं. ७) अप. ४५, वीमि. २७६; तेनोपात्तस्य तस्तस्य आ.
सर्वकर्मारम्भे प्रणवयोजना
गायत्री च भवेच्छन्द अग्निर्दैवतमुच्यते ।
आदौ सर्वत्र युञ्जीत विविधेष्वेव कर्मसु ॥ २.४ ॥
उसका छन्द गायत्री है, देवता अग्नि कहा जाता है; विविध-विविध कर्मों में सर्वत्र आरम्भ में (उसका) प्रयोग करे।
पाठभेद — (पृ. ८, पं. ८) वीमि. २७६, अप. ४५; ...च्छन्दोऽग्निदै... आ.
(पृ. ८, पं. ९) वीमि. २७६, अप. ४५
विनियोगः समुद्दिष्टः श्वेतो वर्ण उदाहृतः ।
त्रिमात्रश्च प्रयोक्तव्यः कर्मारम्भेषु सर्वदा ॥ २.५ ॥
विनियोग बताया गया है, उसका वर्ण श्वेत कहा गया है और कर्मों के आरम्भ में सदा त्रिमात्र (तीन मात्रा का) उच्चारण करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ८, पं. १०) वीमि. २७६
प्रणवस्य मात्राभेदः
तिस्रः सार्धास्तु कर्तव्या मन्त्रतत्त्वार्थाचिन्तकैः ।
देवताध्यानकाले तु प्लुतं कुर्यान्न संशयः ॥ २.६ ॥
मन्त्रके तत्त्व और अर्थका चिन्तन करनेवाले साढ़े तीन मात्राएँ करें; देवताके ध्यानके समय प्लुत (उच्चारण) करें, इसमें संशय नहीं।
तैलधारावदच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् ।
अवाग्जं प्रणवास्यान्तं यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २.७ ॥
तेल की धारा के समान अटूट और घन्टा के दीर्घ नाद के समान, वाणी से अजन्मा जो प्रणव का अन्त है, उसे जो जानता है वह वेदविद् है।
पाठभेद — (पृ. ८, पं. १४) बृप. ३.२६; तैलधारामिव च्छिन्नं ध्या. १८
(पृ. ८, पं. १५) बृप. ३.२७; अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं ध्या. १८
वक्रं तद्भवति ह्यादौ ओंकारं चतुरक्षरम् ।
ऋजुत्वं संप्रपद्येत पदं प्राप्य तु पञ्चमम् ॥ २.८ ॥
वह (प्रणव) आदि में वक्र होता है, चार अक्षरों वाला ओंकार है; किन्तु पाँचवें पद को प्राप्त करके वह ऋजु (सरल) हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. ९, पं. १) वक्रं तु भवति बृया. ९.१०
ब्रह्मणस्त्रिविधो निर्देशः
ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २.९ ॥
"ओं तत् सत्" — इस प्रकार का निर्देश ब्रह्म के विषय में तीन प्रकार का स्मृत है; उस (निर्देश) से पूर्वकाल में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ विहित किए गए हैं।
पाठभेद — (पृ. ९, पं. ३–६) गीता. १७.२३-२४
प्रणवस्य कर्मारम्भकत्वम्
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २.१० ॥
इसलिए ब्रह्मवादियोंकी शास्त्रविहित यज्ञ, दान और तपकी क्रियाएँ सदा "ॐ" कहकर ही आरम्भ होती हैं।
पाठभेद — (पृ. ९, पं. ३–६) गीता. १७.२३-२४
पाशुपतसाङ्ख्यमतम्
उद्गीथाक्षरमेद्ब्रह्मविदो ब्रह्मणो योगम् ।
पाशुपताश्च वदन्ति हि साङ्ख्याश्चाध्यात्मतत्त्वज्ञाः ॥ २.११ ॥
उद्गीथाक्षर (ॐ) को ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म का योग कहते, और पाशुपत तथा अध्यात्मतत्त्व के ज्ञाता साङ्ख्य भी यही कहते हैं।
प्रणवमात्रात्रयनामधेयानि
मात्रास्तिस्रो व्यक्ताऽव्यक्ता तथा परा सूक्ष्मा ।
अध्यात्मामधिभूतामथाधिदैवीं विजानीयात् ॥ २.१२ ॥
तीन मात्राएँ हैं, व्यक्त, अव्यक्त तथा परा सूक्ष्म; इन्हें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव के रूप में जाने। ...
प्रणवमाहात्म्यम्
सिद्धान्तानां तु सर्वेषां वेदवेदान्तयोस्तथा ।
अन्येषामपि शास्त्राणां निष्ठाकारमुच्यते ॥ २.१३ ॥
सब सिद्धान्तों का, वेद और वेदान्त का तथा अन्य शास्त्रों का भी (यह ओंकार) निष्ठा का आधार कहा जाता है। ...
प्रणवाद्याः स्मृता वेदाः प्रणवे पर्युपस्थिताः ।
वाङ्मयं प्रणवः सर्वं तस्मात् प्रणवमभ्यसेत् ॥ २.१४ ॥
जिनके आदि में प्रणव है, ऐसे वेद स्मृत हुए हैं और वे प्रणव में ही स्थित हैं; सारा वाङ्मय प्रणव है, इसलिए प्रणव का अभ्यास करे।
पाठभेद — (पृ. ९, पं. १३) ...द्यास्त्रयो वेदाः प्रणवे पर्यवस्थिताः अत्रि. १.९; ...द्यास्तथा वे... पर्यवस्थिताः वसिष्ठस्मृ. २५.१०
(पृ. ९, पं. १४) वसिष्ठस्मृ. २५.१०; प्रणवे सर्वं अत्रि. १.९
प्रणवपर्यायाः
ओंकारः प्रणवस्तारस्त्र्यक्षरस्त्रिगुणः स्मृतः ।
उद्गीथश्च तथादित्यो हंसो नारायणो विभुः ॥ २.१५ ॥
ओंकार, प्रणव, तार, त्र्यक्षर, त्रिगुण, उद्गीथ तथा आदित्य, हंस, नारायण और विभु—ये सब (ओंकार के नाम) स्मृत हुए हैं। ...
पाठभेद — (पृ. ९, पं. १५) ओंकारं प्रणवं तारं त्र्यक्षरं त्रिगुणं स्मरम् इ.
(पृ. ९, पं. १६) उद्गीथं च तथादित्यं हंसं नारायणं विभुम् इ.
सूर्यस्यान्तर्गतं सूक्ष्मं विष्णुं दिव्यं निरञ्जनम् ।
पर्यायैश्च तथा चान्यैः शास्त्रेभ्यः संप्रगीयते ॥ २.१६ ॥
सूर्य के अन्तर्गत सूक्ष्म, दिव्य और निरञ्जन विष्णु (के रूप में भी इसे) तथा अन्य पर्यायों से भी शास्त्रों में गाया जाता है। ...
ओंकारसञ्ज्ञं त्रिगुणं त्र्यक्षरं च त्रिदैवतम् ।
त्रिब्रह्म त्रिरवस्थानं त्रैकाल्यं त्रिप्रतिष्ठितम् ॥ २.१७ ॥
ओंकार नाम वाला त्रिगुण, त्र्यक्षर और त्रिदैवत है; वह त्रिब्रह्म, तीन स्थानोंवाला, त्रैकाल्य और तीन में प्रतिष्ठित है। ...
त्रिप्रज्ञं च त्रिधामं च त्रिरवस्थं त्रिलिङ्गकम् ।
त्रिधातुकं समुद्दिष्टं सर्वगं परमेश्वरम् ॥ २.१८ ॥
(वह) त्रिप्रज्ञ, त्रिधाम, तीन अवस्थाओंवाला, तीन लिङ्गोंवाला और त्रिधातुक कहा गया है — सर्वव्यापी परमेश्वर।
प्रणवविविधनामनिरुक्तिः
सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रिगुणस्तेन स स्मृतः ।
अकारश्चाप्युकारश्च मकारश्चाक्षरत्रयम् ॥ २.१९ ॥
सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीनों गुणों से वह त्रिगुण कहा गया है; अकार, उकार और मकार—ये तीन अक्षर हैं।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रिदैवत्य उदाहृतः ।
अग्निवायुरविभ्यश्च त्रिमात्र इति संज्ञितः ॥ २.२० ॥
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—इन तीनों से "त्रिदैवत" कहा गया है; अग्नि, वायु और रवि से वह "त्रिमात्र" नाम से संज्ञित है।…
ऋग्यजुश्च तथा साम त्रिब्रह्म इति संज्ञितः ।
भूर्भुवः स्वस्त्र्यवस्थानं हृत्कण्ठं तालुकेति च ॥ २.२१ ॥
…ऋक्, यजुः और साम—इन तीनों से "त्रिब्रह्म" नाम से संज्ञित है; भूः, भुवः और स्वः—ये तीन अवस्थाएँ हैं, तथा हृदय, कण्ठ और तालु भी (तीन अवस्थाएँ) हैं।…
तुर्ये प्राणे तथाऽऽदित्ये त्रिषु चैव प्रतिष्ठितम् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च त्रैकाल्यं तेन चोच्यते ॥ २.२२ ॥
तुरीय, प्राण और आदित्य—इन तीनों में प्रतिष्ठित होने के कारण वह "त्रिप्रतिष्ठित" है; भूत, वर्तमान और भविष्य—इन तीनों कालों से वह "त्रैकाल्य" कहा जाता है।…
अन्तःप्रज्ञो बहिःप्रज्ञो घनप्रज्ञ उदाहृतः ।
गार्हपत्यो दक्षिणाग्निराहवनीयस्त्रिधामकम् ॥ २.२३ ॥
अन्तःप्रज्ञ, बहिःप्रज्ञ और घनप्रज्ञ—इन तीनों से "त्रिप्रज्ञ" कहा गया है; गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय—ये तीन धाम हैं।…
शान्तो घोरस्तथा मूढस्त्रिरवस्थ इति स्मृतः ।
स्त्री पुं नपुंसकं चेति त्रिलिङ्ग इति स स्मृतः ॥ २.२४ ॥
…शान्त, घोर और मूढ—इन तीनों से "त्रिअवस्था" स्मृत है; स्त्री, पुरुष और नपुंसक—इन तीनों से वह "त्रिलिङ्ग" स्मृत है।…
पाठभेद — (पृ. १०, पं. १७) शान्तो घोरं तथा मूढं आ.; शान्तघोरं तथा मूढं इ.
वातः पित्तं तथा श्लेष्मा त्रिधातुः समुदाहृतः ।
त्रिप्रकारं विदित्वा तु ओंकारं मुच्यते द्विजः ॥ २.२५ ॥
वात, पित्त और श्लेष्मा — इनसे (वह) त्रिधातु कहा गया है। इस त्रिविध (स्वरूपवाले) ओंकारको जानकर द्विज मुक्त हो जाता है।
प्रणवमात्रास्वरूपम्
एकैका तु भवेन्मात्रा त्रिगुणा सा तु वै पुनः ।
तासां सर्वं वाङ्मयं यदोतं प्रोतं व्यवस्थितम् ॥ २.२६ ॥
एक-एक मात्रा फिर त्रिगुणा होती है; उनमें सारा वाङ्मय ओतप्रोत होकर व्यवस्थित है।…
प्रथमा तस्य अकारो वाक् सत्त्वं भूर्हुताशनो विष्णुः ।
स्थूला जाग्रद्वृत्तिर्विज्ञेया योगतत्त्वज्ञैः ॥ २.२७ ॥
…उसकी प्रथमा मात्रा अकार है जो वाक्, सत्त्व और भूः है तथा अग्नि और विष्णु है; योगतत्त्वज्ञों द्वारा यह स्थूल जाग्रद्वृत्ति वाली जानी जाती है।…
ब्रह्मान्तरिक्षसंज्ञो मनोरजः सोमसंज्ञक उकारः ।
मात्रा स्वप्नविकल्पा (वि)सृष्टिसंज्ञा द्वितीया तु ॥ २.२८ ॥
…उसकी द्वितीया मात्रा उकार है जो ब्रह्मा, अन्तरिक्ष संज्ञा वाली, मनोरज और सोम संज्ञा वाली है; वह स्वप्नविकल्पों वाली सृष्टि संज्ञा वाली है।…
पाठभेद — (पृ. ११, पं. ६) विसृष्टिसंज्ञा द्वितीयस्य इ.
रौद्री मकारसंज्ञा प्राणाख्या तामसी तृतीया तु ।
संहरति जगत् समस्तं (सर्वं) सौषुम्णाख्या महानिद्रा ॥ २.२९ ॥
…तीसरी तामसी प्राणाख्या रौद्री मकारसंज्ञा है; वह समस्त जगत् का संहार करती है, सुषुम्णाख्या महानिद्रा है।…
आद्या परतरा सूक्ष्मा शान्ता गान्धर्वनिरवयवा ।
अनभिलक्ष्या सौम्या मकारसंज्ञा विज्ञानाकाशसंबद्धा ॥ २.३० ॥
…उससे परतर, सूक्ष्म, शान्त, गान्धर्व रूप, निरवयव, अनभिलक्ष्य और सौम्य वाली मकारसंज्ञा विज्ञान आकाश से सम्बद्ध है।…
प्रपञ्चो ब्रह्मणश्चोक्तः सार्धमात्रात्रयं बुधैः ।
अउमिति तिस्रो मात्रा मकारश्चार्धमात्रकः ॥ २.३१ ॥
…बुधों ने साढ़े तीन मात्राओं के साथ ब्रह्म का प्रपञ्च कहा है; 'अ', 'उ' और 'म' ये तीन मात्राएँ हैं तथा मकार अर्धमात्रक है।…
पाठभेद — (पृ. ११, पं. १४) ... मितिस्तिस्रो ... आ.
तिस्रो मात्रा लयं यान्ति अर्धमात्रे न संशयः ।
अर्धमात्रात्वमात्रे तु लयं याति निरामये ॥ २.३२ ॥
तीनों मात्राएँ अर्धमात्रामें लय होती हैं, इसमें संशय नहीं; और अर्धमात्रा निर्मल अमात्र (मात्रारहित) में लय होती है।
अकारे पीड्यमाने तु उकारं प्रतिपद्यते ।
उकारे पीड्यमाने तु मकारं प्रतिपद्यते ॥ २.३३ ॥
अकार के दबाए जाने पर उकार को प्राप्त होता है और उकार के दबाए जाने पर मकार को प्राप्त होता है।…
मकारे पीड्यमाने तु अर्धमात्रा तदा भवेत् ।
जिह्वायां पीड्यमानायां निरालम्बं तदा भवेत् ॥ २.३४ ॥
…मकार के दबाए जाने पर तब अर्धमात्रा होती है; जिह्वा के दबाए जाने पर तब निरालम्ब अवस्था होती है।…
एकमात्रं द्विमात्रं च त्रिमात्रं कृत्स्नमेव च ।
ह्रस्वदीर्घप्लुतं शान्तं शान्तेन मनसोद्धरेत् ॥ २.३५ ॥
एकमात्र, द्विमात्र, त्रिमात्र और पूर्ण ही; ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और शान्त को शान्त मन से ऊपर उठाये...
समाहितमना भूत्वा तत्त्वध्यानपरायणः ।
ओंकारं यस्त्वभिध्यायेदध्यात्मैक इति स्मृतः ॥ २.३६ ॥
समाहित मनवाला होकर तत्त्वध्यान में तत्पर, जो ओंकार का ध्यान करता है, वह अध्यात्ममें एकनिष्ठ कहा गया है।
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति
तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति ।
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ २.३७ ॥
सब वेद जिस पद का प्रतिपादन करते हैं, सब तप जिसे बताते हैं, जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, वह पद मैं तुम्हें संक्षेप में कहता हूँ — "ॐ" इति।
पाठभेद — (पृ. १२, पं. ५–८) कठ. १.२.१५
एतदेवाक्षरं ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम् ।
एतदेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ २.३८ ॥
"ॐ" इति यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही परम है; इस अक्षर को जानकर जो व्यक्ति जिसकी इच्छा करता है, उसे वह प्राप्त होता है...
पाठभेद — (पृ. १२, पं. ९) एतद्ध्येवा... ह्येतदेवाक्षरं कठ. १.२.१६
(पृ. १२, पं. १०) एतद्ध्येवाक्षरं कठ. १.२.१६
प्रणवेन प्रयाणस्य फलम्
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ २.३९ ॥
सब इंद्रियों को संयमित करके और मन को हृदय में रोककर, अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित होकर...
पाठभेद — (पृ. १२, पं. ११–१४) गीता. ८.१२, १३; योगधारणम् आ.; श्लोकद्वयमिदं नास्ति । इ.
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् ॥ २.४० ॥
"ॐ" इस एकाक्षर ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ जो देह छोड़कर जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है।
पाठभेद — (पृ. १२, पं. ११–१४) गीता. ८.१२, १३; योगधारणम् आ.; श्लोकद्वयमिदं नास्ति । इ.
प्रणवमाहात्म्यम्
आद्यं यदक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।
स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ २.४१ ॥
जो आद्य अक्षर ब्रह्म है, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है, वह दूसरा त्रिविध वेद गुह्य है; जो इसे जानता है, वह वेदवित् है।
यथा वै शङ्कुना पर्णं संवृता एव सर्वतः ।
एवं सर्वास्तु वै वाचः संतीर्णाः प्रणवेन तु ॥ २.४२ ॥
जैसे (पत्तेकी) नससे सारा पत्ता सब ओरसे गुँथा रहता है, वैसे ही सारी वाणी प्रणवसे व्याप्त है।
प्रणवस्येश्वरवाचकत्वम्
क्लेशकर्मविपाकैश्च वासनाभिस्तथैव च ।
अपरामृष्टमेवाह पुरुषं हीश्वरं श्रुतिः ॥ २.४३ ॥
क्लेश, कर्म, विपाक और वैसी ही वासनाओं से अछूते ही पुरुष को ही श्रुति ईश्वर कहती है ...
वाच्यो यज्ञेश्वरः प्रोक्तो वाचकः प्रणवः स्मृतः ।
वाचकेन तु विज्ञातो वाच्य एव प्रसीदति ॥ २.४४ ॥
यज्ञेश्वर वाच्य कहा गया है और प्रणव (उसका) वाचक; वाचकसे जाना गया वाच्य ही प्रसन्न होता है।
पाठभेद — (पृ. १३, पं. ३) वाच्यः स ईश्वरः प्रोक्तो स्मृत. ३८३
(पृ. १३, पं. ४) वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव स्मृत. ३८३; वाक्य एव आ.
प्रणवोपासनाफलम्
तदर्थं प्रणवं जप्यं ध्यातव्यं सततं बुधैः ।
ईश्वरः पुरुषाख्यस्तु तेनोपास्तुः(स्तः) प्रसीदति ॥ २.४५ ॥
इसलिए बुद्धिमानों द्वारा प्रणव का निरंतर जप और ध्यान किया जाना चाहिए; पुरुष नाम वाला ईश्वर उससे उपासित होकर प्रसन्न होता है।
यथा हि गौर्वत्सकृतं निशम्य
हुङ्कृत्यवत्साभिमुखी प्रयाति ।
ब्रह्मापि तद्वत् प्रणवोपहूतं
वक्तारमागच्छति आशु वक्त्रे ॥ २.४६ ॥
जैसे गाय बछड़ेकी पुकार सुनकर हुंकार करती हुई बछड़ेकी ओर दौड़ती है, वैसे ही प्रणवसे पुकारा गया ब्रह्म भी शीघ्र वक्ताके मुखमें आ जाता है।
शब्दपरब्रह्मणोर्भेदः
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ २.४७ ॥
दो ब्रह्म जानने योग्य हैं — शब्दब्रह्म, और जो परब्रह्म है; शब्दब्रह्ममें पारंगत (साधक) परब्रह्मको प्राप्त होता है।
पाठभेद — (पृ. १३, पं. ११–१२) मैत्रायणीयमारण्यकम् ६.२२; द्वे विद्ये वेदितव्ये तु श... ...धिगच्छति ब्रह्मबिन्दूपनिषद् १७
अन्तःशरीरप्रभवमुदानप्रेरितं च यत् ।
वागुच्चार्यं श्रोत्रवृत्ति शब्दब्रह्म तदुच्यते ॥ २.४८ ॥
जो शरीरके भीतरसे उत्पन्न होता है, उदानसे प्रेरित होता है, वाणीसे उच्चारा जाता है और श्रोत्रका विषय है — वह शब्दब्रह्म कहा जाता है।
शब्दब्रह्मात् परं ब्रह्म तस्मिन् क्षीणे यदक्षरम् ।
तदक्षरं सदा ध्यायेद्यदीच्छेद्योगमात्मनः ॥ २.४९ ॥
शब्दब्रह्म से परे परं ब्रह्म है, उसके क्षीण होने पर जो अक्षर है; जो अपने लिए योग चाहे, वह उस अक्षर का सदा ध्यान करे...
पञ्चलक्षणः प्रणवः
अकारश्चाप्युकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
मात्रास्तद्विनियोगश्च प्रणवः पञ्चलक्षणः ॥ २.५० ॥
अकार, उकार, मकार, बिन्दु और मात्राएँ, तथा उनका विनियोग — इस प्रकार प्रणव पाँच लक्षणोंवाला है।
प्रणवोपासना
ओंकारः प्रणवे योज्यो ब्रह्माणि प्रणवस्तथा ।
आनन्दं तत् परं ब्रह्म तत् प्रविश्यामृती भवेत् ॥ २.५१ ॥
ओंकार को प्रणव में जोड़े और प्रणव को ब्रह्म में जोड़े; वह आनन्द परं ब्रह्म है, उसमें प्रवेश करके अमर हो जाता है।
वेदादौ यः स्वरः प्रोक्तो वेदान्ते यः प्रतिष्ठितः ।
तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः ॥ २.५२ ॥
वेदों के आदि में जो स्वर कहा गया है और वेदान्त में जो प्रतिष्ठित है, उस प्रकृति में लीन हुए (स्वर) से जो परे है, वह महेश्वर है।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन ॥ २.५३ ॥
जिससे वाणी मन के साथ अप्राप्य होकर लौट आती है, ब्रह्म के उस आनन्द को जाननेवाला विद्वान् किसी से भी नहीं डरता...
पाठभेद — (पृ. १४, पं. ५–६) बिभेति कदाचन तैत्ति. उप. २.४
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ २.५४ ॥
प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है; सावधान होकर (उसे) बेधना चाहिए, और बाणकी भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. १४, पं. ७–८) मुण्डकोपनिषद् २.२.४; गुणवत्तन्मयो इ.
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासादेवं पश्येन्निगूढवत् ॥ २.५५ ॥
अपने देहको अरणि बनाकर और प्रणव को उत्तर अरणि बनाकर, ध्यानरूपी मन्थन के अभ्यास से (उस परमात्मा को) छिपी हुई अग्नि की भाँति देखना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. १४, पं. ९–१०) श्वेताश्वतरोपनिषद् १.१४; ...भ्यासादापश्ये... इ.
शब्दस्पर्शादिभिश्चैव रसरूपैरलक्षितः ।
देवतायाः परस्यास्तु आलम्बः प्रणवः स्मृतः ॥ २.५६ ॥
शब्द, स्पर्श आदि से और रस तथा रूप से भी जो अलक्षित है, उस परम देवता का आलम्बन प्रणव स्मृत है।
पाठभेद — (पृ. १४, पं. १२) आलयं प्रणवं स्मृतम् इ.
कश्चिदाराधनाकामो विष्णोर्भक्त्या करोति वै ।
तदाराधनसिद्ध्यर्थं प्रतिमां व्यञ्जिकां यथा ॥ २.५७ ॥
कोई आराधना का इच्छुक विष्णु की भक्ति से करता है, तो उस आराधना की सिद्धि के लिए प्रतिमा, जैसे — ...
धातुदार्वादिपाषाणैः कृत्वा भावं निवेशयेत् ।
भक्त्या श्रद्धादराभ्यां च तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥ २.५८ ॥
धातु, लकड़ी आदि या पत्थर से बनाकर (उसमें) भाव स्थापित करे; भक्ति, श्रद्धा और आदर से उस पर विष्णु प्रसन्न होते हैं।
आर्यः प्रपूजितो यत्र प्रत्यक्षे च फलप्रदः ।
ओंकारेण तथा ह्यात्मा उपास्तः स प्रसीदति ॥ २.५९ ॥
जैसे वहाँ भलीभाँति पूजित आर्य प्रत्यक्ष रूप में फल देने वाले हैं, वैसे ही ओंकार से उपासित आत्मा प्रसन्न होता है।
पाठभेद — (पृ. १४, पं. १८) उपास्येवं न संशयः इ.
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २.६० ॥
यह आलम्बन श्रेष्ठ है, यह आलम्बन परम है; इस आलम्बनको जानकर (साधक) ब्रह्मभावके योग्य हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. १५, पं. १) कठ. १.२.१७
(पृ. १५, पं. २) ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते कठ. १.२.१७; ॥५९॥, इतः प्रभृत्यादर्शपुस्तके श्लोकसङ्ख्या मुद्रितसङ्ख्यातः एकया न्यूना ।
अदृष्टविग्रहो देवो भावग्राह्यो मनोमयः ।
तस्योंकारः स्मृतो नाम तेनाहूतः प्रसीदति ।
तस्मादोमिति पूर्वं तु कृत्वा युञ्जीत तत्परः ॥ २.६१ ॥
अदृष्ट विग्रह वाले, भाव द्वारा ग्रहण किए जाने वाले और मनोमय देव हैं; उनका नाम ओंकार स्मृत है, उस ओंकार से आहूत होने पर वे प्रसन्न होते हैं; इसलिए पहले "ओम्" इति करके तत्पर होकर (ध्यान में) जुड़ना चाहिए।
ब्रह्मविदोऽनेकविधाः सततं येन प्रवर्तन्ते ।
गूढव्रतस्य हि सदा विशुद्धबुद्धेः स(सु)गूढचित्तस्य ।
प्रणवध्यानपरस्य च स(सु)गूढतपसो भयं नास्ति ॥ २.६२ ॥
जिस (प्रणव) के द्वारा अनेक प्रकार के ब्रह्मवेत्ता सदा प्रवृत्त होते हैं, वह गूढव्रत वाले, सदा विशुद्ध बुद्धि वाले, सुगूढ चित्त वाले और प्रणवध्यान में तत्पर सुगूढ तपस्वी को किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता।
पाठभेद — (पृ. १५, पं. ९) ... परस्य सगूढतपसो इ.
प्रणवप्राणायामसत्यसावित्रीमाहात्म्यम्
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः ।
सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात् सत्यं विशिष्यते ॥ २.६३ ॥
एकाक्षर (ॐ) परम ब्रह्म है, प्राणायाम परम तप है; सावित्री (गायत्री) से बढ़कर कुछ नहीं, और मौनसे सत्य श्रेष्ठ है।
पाठभेद — (पृ. १५, पं. १०–११) अग्नि. २१५.५; नास्ति पावनं परमं स्मृतम् अत्रि. १.११
प्रणवव्याहृतिगायत्र्युपासनाफलम्
प्रणवे नित्ययुक्तस्य व्याहृतीषु च सप्तसु ।
त्रिपदायां च गायत्र्यां न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २.६४ ॥
…प्रणव में नित्य लगे हुए को सप्त व्याहृतियों में और त्रिपदा गायत्री में कहीं भी भय नहीं रहता।
पाठभेद — (पृ. १५, पं. १२) सव्याहृतिषु सप्तसु अत्रि. १.१०; प्रणवेन नियुक्तस्य इ.; ...युक्तः स्यात् वसिष्ठस्मृ. २५.९
(पृ. १५, पं. १३) अत्रि. १.१०, वसिष्ठस्मृ. २५.९; त्रिपदायां तु सावित्र्यां इ.
आद्यास्तु व्याहृतीस्तिस्रो गायत्रींस्वशिरोय(यु)ताम् ।
ओंकारं विन्दते यस्तु स मुनिर्नेतरो जनः ॥ २.६५ ॥
जो आदिकी तीन व्याहृतियों, अपने शिरस् सहित गायत्री और ओंकारको जानता है, वही मुनि है — दूसरा कोई नहीं।
पाठभेद — (पृ. १५, पं. १४) आद्या व्याहृतयस्तिस्रो गायत्री सशिरस्मृताः इ.
प्रणवे सिद्धान्तिनां मतभेदाः
एक एव हि विज्ञेयः प्रणवो योगसाधनम् ।
गृहीतः सप्तसिद्धान्तैरन्यैश्च ब्रह्मवादिभिः ॥ २.६६ ॥
योगका साधन एक प्रणव ही जानने योग्य है, जिसे सात सिद्धान्तों (सम्प्रदायों) ने और अन्य ब्रह्मवादियोंने ग्रहण किया है —
पाठभेद — (पृ. १६, पं. १) एकमेव तु विज्ञेयं प्रणवं योगसाधनम् अप. १३
(पृ. १६, पं. २) गृहीतसप्तसिद्धान्तैरन्यैर्ब्रह्मविदैस्तथा अप. १३
हिरण्यगर्भैः कपिलैरपान्तरतमैस्तथा ।
सनत्कुमारैर्ब्रह्मिष्ठैस्तथा पाशुपतैरपि ॥ २.६७ ॥
…हिरण्यगर्भों द्वारा, कपिलों द्वारा, अपान्तरतमों द्वारा तथा ब्रह्मनिष्ठ सनत्कुमारों और पाशुपतों द्वारा भी।
पाठभेद — (पृ. १६, पं. ३) हैरण्यगर्भैः अप. १३; हैरण्यगर्भैः कापिलैरपा... इ.
(पृ. १६, पं. ४) सानत्कुमारै... अप. १३
पाञ्चरात्रैः सदोद्युक्तैः सिद्धान्तैरपि सप्तभिः ।
भेदैस्त्रिषष्टिभिर्भिन्नमेकैकं नवधा पुनः ॥ २.६८ ॥
…सदा उद्यत पाञ्चरात्र-मतवालों के इन सात सिद्धान्तों द्वारा भी, वह तिरसठ भेदों में भिन्न है और एक-एक फिर नौ प्रकार का है…
पाठभेद — (पृ. १६, पं. ५) पाञ्चरात्रैरपीत्येतैः सिद्धान्तैश्चैव सप्तभिः अप. १३, पाञ्चरात्रैश्च इत्येतैः सिद्धान्तैश्चैव सप्तभिः इ.
हिरण्यगर्भाणां मतम्
त्रिमात्रं चैव त्रिब्रह्म त्र्यक्षरं प्रणवं प्रभुम् ।
हिरण्यगर्भा इच्छन्ति योगसाधननिश्चितम् (...नमुत्तमम्) ॥ २.६९ ॥
हिरण्यगर्भ-मतवाले प्रणव प्रभुको त्रिमात्र, त्रिब्रह्म, त्र्यक्षर और योगका निश्चित साधन मानते हैं।
अग्निर्वायुस्तथादित्यस्तिस्रो मात्राः प्रकीर्तिताः ।
ऋग्यजुश्च तथा साम त्रिब्रह्मेति प्रकीर्तितम् ॥ २.७० ॥
अग्नि, वायु और आदित्य — (ये) तीन मात्राएँ कही गयी हैं; ऋक्, यजुः और साम — (यह) त्रिब्रह्म कहा गया है।
अकारश्चाप्युकारश्च मकारश्चाक्षरत्रयम् ।
ओंकारः परमं धाम ओंकारः परमा गतिः ॥ २.७१ ॥
अकार, उकार और मकार — ये तीन अक्षर हैं; ओंकार परम धाम है, ओंकार ही परम गति है।
कापिलमतम्
ओंकारं विन्दते यस्तु तस्य जन्म न विद्यते ।
त्रिप्रज्ञं च त्रिगुणं त्रिकारणमिति कापिलाः ॥ २.७२ ॥
…जो 'ओंकार' को प्राप्त कर लेता है, उसका जन्म नहीं होता; कापिलाः (सांख्य मत वाले) उसे त्रिप्रज्ञ, त्रिगुण और त्रिकारण कहते हैं…
व्यक्तोऽव्यक्तस्तथाज्ञश्च त्रिप्रज्ञ इति स स्मृतः ।
ओंकारस्त्रिगुणं सर्वं व्यञ्जनं निर्गुणं विदुः ॥ २.७३ ॥
व्यक्त, अव्यक्त और ज्ञ (ज्ञाता पुरुष) — इनसे वह त्रिप्रज्ञ कहा गया है; (वे) ओंकारको सब त्रिगुणको प्रकट करनेवाला और (स्वयं) निर्गुण जानते हैं।
अपान्तरतममतम्
त्रिमुखं च त्रिदैवत्यं त्रिप्रयोजनमेव च ।
अपान्तरतमैश्चैव ओंकारस्तु प्रकीर्तितः ॥ २.७४ ॥
…अपान्तरतममतवालों द्वारा 'ओंकार' को त्रिमुख, त्रिदैवत और त्रिप्रयोजन ही कहा गया है…
गार्हपत्यो दाक्षिणाग्निराहवनीयस्तृतीयकः ।
त्रिमुखः स तु विज्ञेयो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ २.७५ ॥
…गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और तीसरा आहवनीय अग्नि; उसे त्रिमुख जानना चाहिए, वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं…
पाठभेद — (पृ. १७, पं. ४) ब्रह्मा विष्णुस्तथेश्वरः इ.
एतत् त्रिदैवतं ज्ञेयं धर्मश्चैवार्थ एव च ।
कामेन सहितौ ह्येतौ त्रयं प्रोक्तं प्रयोजनम् ॥ २.७६ ॥
…यह त्रिदैवत जानना चाहिए; धर्म और अर्थ तथा काम सहित ये तीनों प्रयोजन कहे गए हैं…
भूर्भुवःस्वरिति चैव चतुर्विंशाक्षरा तथा ।
गायत्री चतुरो वेदा ओंकारः सर्वमेव तु ॥ २.७७ ॥
…'भूः भुवः स्वः' इति तथा चौबीस अक्षरों वाली गायत्री और चारों वेद — यह सब ओंकार ही है…
ऋग्वेदे स्वरितोदात्त एकाक्षर उदाहृतः ।
त्रैस्वर्यं च तथोदात्तो यजुर्वेदे च पठ्यते ॥ २.७८ ॥
ऋग्वेद में स्वरित-उदात्त एकाक्षर कहा गया है; 'त्रैस्वर्यं' तथा उदात्त यजुर्वेद में पढ़ा जाता है…
पाठभेद — (पृ. १७, पं. १०) यजुर्वेदेषु, एतदनन्तरं ‘अथर्ववेदमुद्दिष्टमुदात्तान्नात्र संशयः’ इत्यधिकं, ७९ तमः श्लोको नास्त्येव इ.
दीर्घप्लुतः सामवेदे ओंकारस्तु न संशयः ।
संक्षिप्तोदात्तमेवाहुरेकाक्षर उदाहृतः ॥ २.७९ ॥
…सामवेद में ओंकार दीर्घ-प्लुत है, इसमें संशय नहीं; उसे संक्षिप्त-उदात्त ही कहते हैं — इस प्रकार एकाक्षर कहा गया है…
अकारश्च उकारस्तु प्रविष्टो ह्येकदा यदा ।
अउवर्णसमायोगादोंकारः समपद्यत ॥ २.८० ॥
…अकार और उकार जब एक ही बार प्रविष्ट होते हैं, तब अ और उ वर्णों के समायोग से ओंकार प्राप्त होता है…
अनुस्वारो मकारस्तु ओंकारस्य शिरो यदा ।
प्रकृतिः साधनं कृत्वा व्यञ्जनादौ तु लुप्यते ॥ २.८१ ॥
…अनुस्वार रूप मकार जब ओंकार का शिर है; प्रकृति को साधन बनाकर वह व्यञ्जन आदि में लुप्त हो जाता है…
नपुंसकस्तथोंकारो वेदानां परिकीर्तितः ।
अपांतरतमो ज्ञेयो वेदसिद्धान्तयोरपि ॥ २.८२ ॥
वेदोंमें ओंकार नपुंसक कहा गया है; वेदों और सिद्धान्तोंमें भी इसे अपान्तरतमाका मत जानना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. १७, पं. १८) अपांतरतमं ज्ञेयं वेदसिद्धान्तमेव हि इ.
सनत्कुमारमतम्
त्रिकालं च त्रिलिङ्गं च त्रिसंज्ञं च तथा विदुः ।
सनत्कुमारसिद्धान्ते ओंकारः समुदाहृतः ॥ २.८३ ॥
सनत्कुमारके सिद्धान्तमें ओंकार त्रिकाल, त्रिलिङ्ग और त्रिसंज्ञ कहा गया है — (ज्ञानी) ऐसा जानते हैं।
भूतं भव्यं भविष्यं च कालत्रयमुदाहृतः ।
स्त्रीपुंनपुंसकश्चैव त्रिलिङ्ग इति स स्मृतः ॥ २.८४ ॥
…भूत, वर्तमान और भविष्य — ये तीन काल कहे गये हैं; तथा स्त्री, पुरुष और नपुंसक — ये तीनों लिङ्ग कहे गये हैं, ऐसा वह स्मृत है…
बहिःसंज्ञो मध्यसंज्ञ अन्तःसंज्ञ इति स्मृतः ।
उद्गीथमक्षरं ह्येतदुद्गीथश्च उपास्यते ॥ २.८५ ॥
…बहिःसंज्ञ, मध्यसंज्ञ और अन्तःसंज्ञ कहा गया है; यह अक्षर ही उद्गीथ है और उद्गीथ के रूप में उपास्य होता है…
ब्रह्मिष्ठमतम्
ओमित्युद्गीयते ह्येष भूते भव्ये भविष्यति ।
त्रिस्थानं त्रिपदं चैव त्रिसंज्ञं च प्रकीर्तितम् ॥ २.८६ ॥
"ॐ" — इस रूपमें यह भूत, वर्तमान और भविष्यमें (सामगानमें) ऊँचे स्वरसे गाया जाता है (इसलिए उद्गीथ है); इसे त्रिस्थान, त्रिपद और त्रिसंज्ञ कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. १८, पं. ८) प्रकीर्तितः इ.
ब्रह्मिष्ठानां भवेदेवं गुह्येषूपनिषत्सु च ।
हृत्कण्ठतालुकादीनि स्थानानि समुदाहरेत् ॥ २.८७ ॥
ब्रह्मनिष्ठोंके मतमें और गुह्य उपनिषदोंमें भी ऐसा ही है; हृदय, कण्ठ, तालु आदिको (इसके) स्थान कहे।
जाग्रत् स्वप्नं सुषुप्तं च पदान्येतानि तस्य तु ।
बहिःसंज्ञस्तथान्तश्च घनप्रज्ञः स्वयं विभुः ॥ २.८८ ॥
जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति — ये उसके पद हैं; वह बहिःसंज्ञ, अन्तःसंज्ञ और घनप्रज्ञ है — स्वयं व्यापक।
एतदक्षरमोंकारं भूतं भव्यं भविष्यति ।
त्रिप्रज्ञं त्रिपदं चैव सर्वव्यापि तथोच्यते ॥ २.८९ ॥
यह अक्षर ओंकार भूत, वर्तमान और भविष्य है; वह त्रिप्रज्ञ, त्रिपद और सर्वव्यापी ऐसा कहा जाता है।
बहिःप्रज्ञो विभुर्विश्व अन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।
घनप्रज्ञस्तथा प्रोक्त एक एव त्रिधा भवेत् ॥ २.९० ॥
बहिःप्रज्ञ, व्यापक (जीव) "विश्व" है; अन्तःप्रज्ञ "तैजस" है; और (प्राज्ञ) घनप्रज्ञ कहा गया है — एक ही तीन प्रकारका होता है।
पाठभेद — (पृ. १८, पं. १५–१६) बहिःप्रज्ञो ... ह्यन्तः प्र ... प्राज्ञ एक एव ...स्मृतः मा. आ. १
दक्षिणाग्निमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।
आकाशे तुर्यदप्राज्ञस्त्रिधा देहे व्यवस्थितः ॥ २.९१ ॥
…विश्व स्वरूप वह दक्षिणाग्निमुख में, तैजस स्वरूप मन के अन्तर्गत और प्राज्ञ स्वरूप आकाश में—इस प्रकार देह में तीन प्रकार से व्यवस्थित है…
पाठभेद — (पृ. १८, पं. १७) मा. आ. २
(पृ. १८, पं. १८) आकाशे च हृदि प्रज्ञा इ. आकाशे च हृदि प्राज्ञः मा. आ. २
स्थूलो वैश्वानरो नित्यं तैजसोन्तः प्रकृतिभुक् ।
आनन्दभुक् तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा भवेत् ॥ २.९२ ॥
वैश्वानर (विश्व) सदा स्थूलका भोक्ता है, तैजस भीतर प्रकृति (सूक्ष्म) का भोक्ता है, और प्राज्ञ आनन्दका भोक्ता — एक ही तीन प्रकारका होता है।
पाठभेद — (पृ. १९, पं. १) प्रवृत्तभुक् इ.
(पृ. १९, पं. २) त्रिधा भोगं विजानय इ.; त्रिधा भोगं निबोधत मा. आ. ३
सत्वाश्चैव प्रयत्नेन ब्रह्मा(ह्म)भवति मानवः ।
स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ॥ २.९३ ॥
सत्त्व (शुद्धि) और प्रयत्नसे मनुष्य ब्रह्म होता है। स्थूल (भोग) विश्वको तृप्त करता है, और प्रविविक्त (सूक्ष्म भोग) तैजसको —
पाठभेद — (पृ. १९, पं. ४) मा. आ. ४; स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तस्तु तैजसः इ. स्थूलसंतर्प्यते विश्वं प्रविभक्तं तु तैजसम् आ.
आनन्दश्च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं निबोधत ।
त्रिषु धामसु यद्भोज्यं भोक्ता यस्तु प्रकीर्तितः ॥ २.९४ ॥
…और आनन्द स्वरूप प्राज्ञ को भी (तृप्त करता है), इस प्रकार की त्रिविध तृप्ति को जानो। तीनों धामों में जो भोज्य है और जो भोक्ता कहा गया है —...
पाठभेद — (पृ. १९, पं. ५) आनंदं च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं विजानत आ.
(पृ. १९, पं. ६) यश्च प्रकी.... मा. आ. ५
उभयं विन्दते यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ।
प्रभवः सर्वभूतानां सतामिति विनिश्चयः ॥ २.९५ ॥
…जो इन दोनों को प्राप्त करता है, वह भोगता हुआ भी लिप्त नहीं होता; सब सत् भावों की उत्पत्ति उसी से होती है — यह निश्चय है।
पाठभेद — (पृ. १९, पं. ७) वेदैतदुभयं यस्तु स.... मा. आ. ५
(पृ. १९, पं. ८) सर्वभावानां मा. आ. ६
पाशुपतमतम्
प्रणवः सूयते सर्वं वेत्ता यः पुरुषः स्मृतः ।
व्यवस्थानं त्रिभोक्तारं त्रिभोज्यं च तथा परम् ॥ २.९६ ॥
प्रणव से सब उत्पन्न होता है; जो जाननेवाला है वह पुरुष स्मृत है, (वह प्रणव) तीन व्यवस्थानों वाला, तीन भोक्ताओं वाला, तीन भोज्यों वाला और परम है…
पाठभेद — (पृ. १९, पं. १०) इ.; तथा परा आ.
एवं पाशुपते विद्यात् सिद्धान्ते प्रणवं विभुम् ।
शान्तं घोरं तथा मूढं त्रिरवस्थानमेव तु ॥ २.९७ ॥
…इस प्रकार पाशुपत सिद्धान्त में विभु प्रणव को जानो; शान्त, घोर तथा मूढ — ये तीन अवस्थान ही हैं।
पाठभेद — (पृ. १९, पं. १२) इ.; तथा सूक्ष्मं आ.
शरीरमापः सोमश्च त्रिभोज्यमिति कीर्तितम् ।
प्राणो ह्यग्निस्तथादित्यस्त्रिभोक्ता इति स स्मृतः ॥ २.९८ ॥
शरीर, आपः (जल) और सोम—ये तीन भोज्य कहे गए हैं; और प्राण, अग्नि तथा आदित्य—ये तीन भोक्ता कहे गए हैं।
ओंकारं समभिध्यायेद्हृदि कृत्वा तु धारणाम् ।
ऋषिपुत्रो महातेजा वाग्विशुद्धो महेश्वरः ॥ २.९९ ॥
हृदयमें धारणा करके ओंकारका भली-भाँति ध्यान करे — (ऐसा) ऋषिपुत्र, महातेजस्वी, वाणीसे विशुद्ध महेश्वर (का मत) है।
पाठभेद — (पृ. २०, पं. १) धारणम् इ., आ.
(पृ. २०, पं. २) महाचैष वाग्विशुद्धो इ.
पाञ्चरात्रमतम्
त्रिरात्मा त्रिस्वभावश्च तथा त्रिव्यूह एव च ।
पाञ्चरात्रे स्मृतो ह्येष भगवद्वाचकः स्मृतः ॥ २.१०० ॥
पाञ्चरात्रमें यह (ओंकार) त्रि-आत्मा, त्रि-स्वभाव और त्रि-व्यूह कहा गया है — भगवान्का वाचक कहा गया है।
बलं वीर्यं तथा तेजस्त्रिरात्मा इति संज्ञितः ।
ज्ञानैश्वर्यं तथा शक्तिस्त्रिस्वभाव इति स्मृतः ॥ २.१०१ ॥
बल, वीर्य और तेज—ये तीन आत्मा के नाम हैं; और ज्ञान, ऐश्वर्य तथा शक्ति—ये तीन स्वभाव कहे गए हैं।
सङ्कर्षणोऽथ प्रद्युम्नो(म्नः) अनिरुद्धस्तथैव च ।
त्रिव्यूह इति निर्दिष्ट ओंकारो विष्णुरव्ययः ॥ २.१०२ ॥
सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस प्रकार अविनाशी विष्णु रूपी ओंकार को त्रिव्यूह के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।
वायुलिमतम्
भगवद्वाचकः प्रोक्तः प्रकृतेर्वाचकस्तथा ।
व्यक्ताऽव्यक्तो वासुदेवः प्रभवः प्रलयस्तथा ।
वाथुलेरेकमात्रस्तु ओंकारः समुदाहृतः ॥ २.१०३ ॥
(वह) भगवान्का वाचक कहा गया है, और प्रकृतिका वाचक भी; वासुदेव व्यक्त-अव्यक्त, उत्पत्ति और प्रलय हैं। वाथुलिके (मतमें) ओंकार एकमात्र कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. २०, पं. ११) वाथुलेरित्यादितः १०७ तमश्लोकपूर्वार्धपर्यन्तं नास्ति इ.
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेणाभिधास्ये ॥ २.१०४ ॥
वेदवेत्ता जिस अक्षरको कहते हैं, वीतराग यति जिसमें प्रवेश करते हैं, जिसकी इच्छासे (लोग) ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, वह पद मैं तुम्हें संक्षेपमें कहूँगा —
पाठभेद — (पृ. २०, पं. १२–१४) .... हेण ब्रवीमि गीता. ८.११; ... णाभिधास्ये इति आनन्दवर्धिनीपाठः
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् ॥ २.१०५ ॥
... "ओम्" इस एक अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए, जो मनुष्य शरीर त्यागकर प्रस्थान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
पाठभेद — (पृ. २०, पं. १५–१६) गीता. ८.१३
मतभेदोपसंहारः
एवं त्रिषष्टिभेदैस्तु सिद्धान्तेषु प्रगीयते ।
स्थूलभेदेन चोंकारश्चतुःषष्टि(ष्टि)स्तु निष्कलः ॥ २.१०६ ॥
इस प्रकार तिरसठ भेदों से सिद्धान्तों में (ओंकार) गाया जाता है; स्थूल भेद से और चौंसठवाँ निष्कल है…
विष्णुस्वरूपम्
विष्णुर्निरञ्जनं शान्तमानन्दं सर्वदेहिनाम् ।
अक्षरं तं विजानीयात् स्थूलं च क्षरसंज्ञितम् ॥ २.१०७ ॥
विष्णु, निरञ्जन, शान्त, सब देहधारियोंका आनन्द — उसे अक्षर जाने, और स्थूलको क्षर नामवाला (जाने)।
न च स्थूलं न च ह्रस्वं न च दीर्घं न च प्लुतम् ।
न लोहितं न कृष्णं च सर्ववर्णविवर्जितम् ॥ २.१०८ ॥
वह न स्थूल है, न ह्रस्व (लघु) है, न दीर्घ है और न ही प्लुत है; वह न लाल है और न काला है, सब वर्णों से रहित है।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च तत्त्वैश्च परिवर्जितम् ।
ध्रुवं च शाश्वतं नित्यमचलं लयवर्जितम् ॥ २.१०९ ॥
वह इन्द्रियों से, इन्द्रियार्थों से और तत्त्वों से रहित है; वह ध्रुव (अटल), शाश्वत, नित्य और अचल है तथा लय से रहित है।
अक्षरं चाजरं चैवमनुत्पन्नमनाशि च ।
सर्वमात्राविनिर्मुक्तमानन्दं ब्रह्म निष्कलम् ॥ २.११० ॥
वह अक्षर और अजर है, उत्पन्न न होने वाला और अविनाशी है; सब मात्राओं से मुक्त, आनन्दस्वरूप ब्रह्म निष्कल है।
अघोषमव्यञ्जनमस्वरं च यत् कव्य(ण्ठ)तालव्यमनासिकं च ।
अरेफजातस्वरमोष्ठवर्जितं तदक्षरं स्वरति स्वयं भवम् ॥ २.१११ ॥
जो घोषरहित, व्यञ्जनरहित, स्वररहित है; कण्ठ और तालुसे रहित, नासिकासे रहित; रेफसे न उत्पन्न स्वरवाला और ओष्ठसे रहित है — वह स्वयम्भू अक्षर (अपने-आप) ध्वनित होता है।
पाठभेद — (पृ. २१, पं. १२–१५) अघोष ... यत्तालुकण्ठोष्ठमनासिकं च तत् । अरेफजातमुभयोष्मवर्जितं यदक्षरं न क्षरते कथं चित् ॥ अमृतनादोपनिषद् २५
ओंकारं विपुलमचिन्त्यमप्रमेयं सूक्ष्माकारं ध्रुवमचलं शिवं पुराणम् ।
तद्विष्णोः पद(पदं) मुखपङ्कजप्रसूतं देहान्तःस्थं मनसि च यत् स्थितिं करोति ॥ २.११२ ॥
विपुल, अचिन्त्य, अप्रमेय, सूक्ष्माकार, ध्रुव, अचल, शिव और पुराण ओंकार, वह विष्णु का पद है जो मुखकमल से उत्पन्न है और देह के भीतर स्थित होकर मन में जो स्थिति करता है ...
ओंकारस्य दश नामानि
दश नामानि नैरुक्ता ओंकारस्य प्रचक्षते ।
अन्वर्थकानि तानीह वेदितव्यानि धीमता ॥ २.११३ ॥
ओंकार के दस निरुक्त नाम कहे जाते हैं; वे यहाँ अर्थानुसार बुद्धिमान् को जानने योग्य हैं।
पाठभेद — (पृ. २२, पं. २) अन्वर्थकानि तानीह ... धीमताः इ.
ओंकारं प्रणवं चैव सर्वव्यापिनमेव च ।
अनन्तं च तथा तारं शुक्लं वैद्युतमेव च ॥ २.११४ ॥
(वे नाम हैं) ओंकार, प्रणव, सर्वव्यापी, अनन्त, तार (तारने वाला), शुक्ल और वैद्युत।
हंसं तुर्यं परं ब्रह्म इति नामानि जानत ।
निष्कलस्य तु सर्वज्ञः पर्यायेण हि कीर्तितः ॥ २.११५ ॥
"हंस, तुर्य और परब्रह्म — ये नाम जानो; निष्कल के ही ये पर्याय हैं जिनसे वह सर्वज्ञ कहा गया है।"
ओंकारनामनिरुक्तयः
उच्चार्यमाणः सर्वत्र आपादतलमस्तकम् ।
उन्नामयेच्छरीरं तु ओंकारस्तेन चोच्यते ॥ २.११६ ॥
"सब ओर उच्चारित होता हुआ यह पैर के तलवे से मस्तक तक शरीर को ऊपर उठाता है, इसलिए ओंकार कहलाता है।"
पाठभेद — (पृ. २२, पं. ७) उच्चार्यमाणं सर्वं तु आपाद ... इ.
ऋग्यजुः सामाथर्वाणि देवताश्चाक्षरत्रयम् ।
शरीरं वाङ्मनश्चैव प्राणनात् प्रणवः स्मृतः ॥ २.११७ ॥
ऋक्, यजुः, साम, अथर्व, देवता, तीन अक्षर, शरीर, वाणी और मन — इन (सब) को प्राणित करनेसे (यह) प्रणव कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. २२, पं. ९) सामथर्वाणि आ.
शरीरं चैव विश्वं च विद्यास्थानानि सर्वशः ।
व्याप्य संतिष्ठते यस्मात् सर्वव्यापी ततः स्मृतः ॥ २.११८ ॥
क्योंकि जो समस्त शरीर, विश्व और विद्या के सभी स्थानों को व्याप्त करके स्थित रहता है, इसलिए वह सर्वव्यापी स्मृत है।
अनन्तं नयते स्थानं तस्य चान्तो न लभ्यते ।
ऋषिदेवमनुष्येषु अनन्तस्तेन कीर्तितः ॥ २.११९ ॥
वह अनन्त स्थान को ले जाता है और उसका अन्त नहीं प्राप्त किया जा सकता, इसलिए ऋषियों, देवों और मनुष्यों में वह अनन्त कहलाता है...
सर्वदुखसमुत्थानाद्भवग्राहार्णवाकुलात् ।
चिन्तितस्तारयेद्यस्मात्तेन तारो निगद्यते ॥ २.१२० ॥
क्योंकि वह ध्यान किया जाने पर समस्त दुःखों के उद्गम और संसाररूपी मगरमच्छों से भरे समुद्र से तारता है, इसलिए वह तार कहलाता है।
पाठभेद — (पृ. २२, पं. १६) तारस्तेन निगद्यते इ.
वर्णेन च भवेच्छुक्लः शुद्धं च नयते पदम् ।
त्रिविधं शोषयेत् पापं तेन शुक्ल इति स्मृतः ॥ २.१२१ ॥
वर्ण से वह शुक्ल हो जाता है, शुद्ध पद को ले जाता है और तीनों प्रकार के पापों को सुखा देता है, इसलिए वह शुक्ल स्मृत है।
आविष्करोति स यतेर्ज्योतीरूपं भ्रुवो(र)न्तरे ।
विद्योतते तमो भित्त्वा वैद्युतस्तेन कीर्तितः ॥ २.१२२ ॥
वह यति के भ्रू-अंतरे ज्योतिरूप प्रकट करता है और तमस को भेदकर विद्युत् की भाँति चमकता है, इसलिए वह वैद्युत कहलाता है।
हृदि ध्यानं सदा यस्मादादित्योद्गीथमेव च ।
भित्त्वा शरीरं नयति तस्माद्धंस इति स्मृतः ॥ २.१२३ ॥
…क्योंकि उसका सदा हृदय में ध्यान होता है और वह आदित्य तथा उद्गीथ ही है, तथा शरीर को भेदकर ले जाता है, इसलिए वह हंस स्मृत है…
जाग्रत् स्वप्नं च सुप्तं च तुर्यं चैव चतुर्थकम् ।
ज्ञातस्तु त्रायते यस्मात् तुर्यस्तेन निगद्यते ॥ २.१२४ ॥
जाग्रत्, स्वप्न और सुप्त तथा चौथा तुर्य भी है; क्योंकि जानने पर वह रक्षा करता है, इसलिए वह तुर्य कहा जाता है…
पाठभेद — (पृ. २३, पं. ६) व्यतस्तु त्रायते यस्मात् तुर्यस्तेन इ.
वाङ्मयस्य तु सर्वस्य ब्रह्मणस्त्रिविधस्य च ।
मुखमेतत् समुद्दिष्टं शब्दब्रह्ममयं विभु ॥ २.१२५ ॥
यह शब्दब्रह्ममय विभु (सर्वव्यापक), त्रिविध ब्रह्म और समस्त वाङ्मय का मुख समुद्दिष्ट है।
पाठभेद — (पृ. २३, पं. ८) विभुं आ.
परं ब्रह्म नयत्येव परब्रह्म इति स्मृतः ।
एवं नैरुक्तकैर्दृष्टमृषिभिश्च तथा परैः ॥ २.१२६ ॥
…यह परब्रह्म को ही ले जाता है, इसलिए परब्रह्म स्मृत है; इस प्रकार नैरुक्तकारों और अन्य श्रेष्ठ ऋषियों ने भी इसे देखा है…
प्रणवमात्रायां बाष्कलमतम् · प्रणवमात्राया रुचकायनमतम्
बाष्कलेरेकमात्रस्तु ओंकारः समुदाहृतः ।
रुचकायन आचार्यो द्विमात्रं चेच्छते सदा ॥ २.१२७ ॥
बाष्कलि के मत में एकमात्र ओंकार कहा गया है; आचार्य रुचकायन सदा द्विमात्र मानते हैं…
पाठभेद — (पृ. २३, पं. १२) सालंकायन आचार्यो... इ.
प्रणवमात्रायां नारदमतम् · प्रणवमात्रायां मौद्गल्यमतम्
द्विमात्रश्चार्धमात्रस्तु नारदस्य मतेन तु ।
मौद्गल्यस्य त्रिमात्रस्तु ओंकारो नात्र संशयः ॥ २.१२८ ॥
…नारद के मत से द्विमात्र और अर्धमात्र वाला है; मौद्गल्य के मत से त्रिमात्र ओंकार है, इसमें कोई संशय नहीं है…
प्रणवमात्रायां वसिष्ठमतम् · प्रणवमात्रायां मनुमतम्
वसिष्ठस्य मतेनैव मात्रा चात्र चतस्रिका (?) ।
त्रिमात्रो मनुना चोक्तस्तथान्यैर्ऋषिसत्तमैः ॥ २.१२९ ॥
वसिष्ठ के मत से ही यहाँ चार मात्राएँ हैं; मनु द्वारा तीन मात्रा वाला कहा गया है और अन्य श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा भी...
पाठभेद — (पृ. २३, पं. १६) द्विमात्रो मनुना प्राज्ञैस्तथान्यै.... इ.
प्रणवमात्रायां पाराशरमतम्
पाराशरैश्चतुर्मात्रस्तथा ह्यध्यात्मचिन्तकैः ।
ह्रस्वं दीर्घं प्लुतं शान्तं चतुर्धा संप्रकीर्तितम् ॥ २.१३० ॥
…पाराशर और अन्य अध्यात्मचिन्तक के मत से चतुर्मात्र है; ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और शान्त—ये चार प्रकार से संप्रकीर्तित कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. २३, पं. १७) तथाऽध्यात्मविचिन्तकैः इ.
प्रणवमात्रायां याज्ञवल्क्यमतम्
भवेत् कर्मवशादेवमन्यथा तु त्रिरक्षरम् ।
भगवान् याज्ञवल्क्यस्तु अमात्रं चेच्छते सदा ॥ २.१३१ ॥
…यह कर्म के वश से होता है, अन्यथा तीन अक्षरों वाला है; भगवान् याज्ञवल्क्य तो सदा अमात्र मानते हैं…
यः शब्दमय ओंकार उच्चार्यः स्थूल एव सः ।
अमात्रश्चाप्यनुच्चार्य परोंकारः स उच्यते ॥ २.१३२ ॥
जो शब्दमय, उच्चारित होनेवाला ओंकार है, वह स्थूल ही है; और जो अमात्र तथा अनुच्चार्य है, वह पर (सूक्ष्म) ओंकार कहलाता है।
प्रणवमात्रायां ब्रह्मचिन्तकमतम्
तिस्रः सार्धास्तथा मात्राः स गृह्णाति यथाक्रमम्
परं ब्रह्म तमेवाहुश्चात्मानं ब्रह्मचिन्तकाः ॥ २.१३३ ॥
साढ़े तीन मात्राएँ हैं, उन्हें (साधक) यथाक्रम से ग्रहण करता है; ब्रह्मचिन्तक उसी (अमात्र) को परब्रह्म और आत्मा ही कहते हैं…
पाठभेद — (पृ. २४, पं. ६) ॥१३१॥ इतः प्रभृति श्लोकसङ्ख्या मुद्रितसङ्ख्यातः द्वाभ्यां न्यूना आ.
ओंकारोपासनास्वरूपम्
यत् पूर्वं तु समुद्दिष्टमोंकाराग्रे व्यवस्थितम् ।
अक्षरैश्च पदैश्चैव अतीतं पञ्चमं पदम् ॥ २.१३४ ॥
…जो पहले बताया गया, ओंकार के आगे व्यवस्थित है; अक्षरों और पदों से भी परे वह पञ्चम पद है…
यं(यत्)प्राप्य विन(नि)वर्तन्ते ओंकारस्य पथि स्थिताः ।
मनसात्र समाधाय शरीरं लिङ्गमानवम् ॥ २.१३५ ॥
ओंकारके मार्गपर स्थित (साधक) जिसे पाकर लौटते नहीं। यहाँ मनसे (ध्यान) समाहित करके, लिङ्ग (सूक्ष्म) शरीरको —
पाठभेद — (पृ. २४, पं. ९) ओंकारपथमाश्रिताः इ.
(पृ. २४, पं. १०) मनस्तु प्रसमाधाय शरीरं लिङ्गमातृकम् इ.
संकल्पं व्यवसायं च अभिमानाख्यसंज्ञकम् ।
चेतनाधिष्ठितं सूक्ष्मं तथा सूक्ष्मैः सहैव तु ॥ २.१३६ ॥
…संकल्प, निश्चय और अभिमान नामवाले, चेतना से अधिष्ठित सूक्ष्म शरीर को सूक्ष्म तत्त्वों सहित (योजयेत्)…
पाठभेद — (पृ. २४, पं. ११) इ.; संकल्पोध्यवसायं च अभि...... आ.
ओंकारपद्मनालेन हृद उध्दृत्य योजयेत् ।
परमे व्योम्न्यनन्ताख्ये सर्वसङ्कल्पवर्जिते ॥ २.१३७ ॥
…ओंकाररूपी कमलनालके द्वारा हृदयसे ऊपर निकालकर, सब संकल्पों से रहित 'अनन्ता' नामक परम व्योम में जोड़े…
पाठभेद — (पृ. २४, पं. १३) .....नालेन उध्दृत्य परियोजयेत् इ.
तस्मिंस्तावन्निरोद्धव्यं मनश्चोंकारमेव च ।
यावन्निर्मलतां याति एष योग उदाहृतः ॥ २.१३८ ॥
…उस अनन्ता नामक परम व्योम में, वहाँ मन और ओंकार को तब तक रोके रखना चाहिए जब तक कि वह निर्मलता को प्राप्त न कर ले, यह योग कहा गया है…
मनो युञ्ज्यात्तथोंकारे ओंकारं प्रणवे तथा ।
प्रणवं ब्रह्मणि स्थाप्य न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २.१३९ ॥
…मन को ओंकार में जोड़े, ओंकार को प्रणव में तथा प्रणव को ब्रह्म में स्थापित करके कुछ भी चिन्तन न करे…
पाठभेद — (पृ. २५, पं. ३) युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् मा. आ. २५
प्रणवमाहात्म्यम्
प्रणवो विमलः शुद्धो निःशब्दो व्योमसंज्ञकः ।
तस्मादुत्पद्यते प्राणः पुनस्तत्रैव लीयते ॥ २.१४० ॥
प्रणव निर्मल, शुद्ध, निःशब्द और व्योमसंज्ञक है, उस (प्रणव) से प्राण उत्पन्न होता है और फिर उसी में लीन हो जाता है…
प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ।
दुःखे भयाभिघातार्थे सर्वथा प्रणवं स्मरेत् ॥ २.१४१ ॥
…प्रणव में नित्ययुक्त रहने वाले को कहीं भी भय विद्यमान नहीं होता, दुःख में और भय के आघात को दूर करने के लिए सब प्रकार से प्रणव का स्मरण करे…
पाठभेद — (पृ. २५, पं. ७) मा. आ. २५
प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः ।
प्रणवो ह्यादिः सर्गस्य अन्तो मध्यस्तथैव च ॥ २.१४२ ॥
प्रणव ही अपर ब्रह्म है और प्रणव ही पर (ब्रह्म) कहा गया है; प्रणव ही सृष्टिका आदि, मध्य और अन्त है।
पाठभेद — (पृ. २५, पं. ९) मा. आ. २६
(पृ. २५, पं. १०) ह्यादिसर्गस्य अन्ते मध्य...... आ.; सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च मा. आ. २७
एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा विशन्ति ब्रह्म निष्कलम् ।
अपूर्वोऽनन्तारोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥ २.१४३ ॥
इस प्रकार प्रणव को जानकर वे निष्कल ब्रह्म में प्रवेश करते, वह प्रणव अपूर्व, अनन्तर, अबाह्य, अनपर और अव्यय है…
पाठभेद — (पृ. २५, पं. १२) मा. आ. २६; ...न्तरो बाह्यो ह्यपरः प्रणवोऽलयः आ.; प्रणवोऽव्ययः इ.
प्रणवो हीश्वरो देवो हृदि सर्वस्य धिष्ठितः ।
सर्वव्यापिनमोंकारं मत्त्वा धीरो न सीदति ॥ २.१४४ ॥
…प्रणव ही सबके हृदय में स्थित ईश्वर देव है, उस सर्वव्यापि ओंकार को जानकर धीर पुरुष शोक नहीं करता…
पाठभेद — (पृ. २५, पं. १३) प्रणवं ईश्वरं वेद.... धिष्ठितम् इ.; प्रणवं हीश्वरं विद्यात् सर्वस्य हृदि संस्थितम् मा. आ. २८
(पृ. २५, पं. १४) न शोचति इ., मा. आ. २८
अमात्रं च त्रिमात्रं च अद्वैतं ब्रह्म तत् परम् ।
स्थूलं चाप्यतिसूक्ष्मं च सर्वतः किमपि स्थितम् ॥ २.१४५ ॥
…वह परब्रह्म अमात्र और त्रिमात्र तथा अद्वैत है, वह स्थूल भी है और अति सूक्ष्म भी है तथा सब ओर कुछ भी स्थित है…
ओंकारं विन्दते यस्तु स भवेद्वेदविद्द्विजः ।
यथा पत्रं फलं पुष्पं शङ्कुनैकेन धार्यते ॥ २.१४६ ॥
जो ओंकार को प्राप्त कर लेता है, वह वेदविद् द्विज हो जाता है, जैसे पत्ता, फल और पुष्प एक ही डण्ठल से धारण किए जाते हैं…
पाठभेद — (पृ. २६, पं. २) यथा पर्णं पलाशस्य इ.
तथा जगदिदं सर्वमोंकारेणैव धार्यते ॥
जप्येन दहते पापं प्राणायामैस्तथा मलम् ॥ २.१४७ ॥
उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् ओंकार द्वारा ही धारण किया जाता है; जप से पाप जल जाते हैं और प्राणायाम से मल (अशुद्धि) नष्ट हो जाते हैं।
ध्यानेन जन्म निर्घातं धारणाभिश्च मुच्यते ।
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा ॥ २.१४८ ॥
ध्यानसे जन्म(बन्धन) नष्ट होता है और धारणाओंसे (साधक) मुक्त होता है। वेद(पाठ) के आदि और अन्तमें सदा प्रणव करे।
पाठभेद — (पृ. २६, पं. ६) मनु. २.७४
स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं परस्ताच्च विशीर्यते ।
प्रोक्षणे पोषणे चैव प्रतिष्ठाने प्रतिग्रहे ॥ २.१४९ ॥
… 'ॐ' कहे बिना किया गया पाठ पहले बह जाता है और बाद में बिखर जाता है; प्रोक्षणमें, पोषणमें, प्रतिष्ठाने और प्रतिग्रहमें…
पाठभेद — (पृ. २६, पं. ७) विशीर्यति मनु. २.७४; स्रवत्यनोङ्कृतमितिवचनात् विश्वरूप. १.१५
(पृ. २६, पं. ८) प्रतिष्ठाने च संभवे इ.
आश्रावणे वषट्कारे प्रत्याश्रावे जपेऽपि च ।
सामसु ब्रह्ममुख्येषु ऋग्यजुस्तोत्रशस्त्रयोः ॥ २.१५० ॥
…आश्रावण में, वषट्कार में, प्रत्याश्रावण में और जप में भी; सामों के मुख्य ब्रह्मपाठों में तथा ऋक् और यजुर्वेद के स्तोत्र और शस्त्र में…
पाठभेद — (पृ. २६, पं. ९) प्रत्याश्रावे यजेति च इ.
(पृ. २६, पं. १०) सामसुब्रह्मण्याख्येषु इ.
सर्वमन्त्रप्रयोगेषु ओमित्यादौ प्रयुज्यते ।
तेन संपरिपूर्णानि यथोक्तानि भवन्ति च ॥ २.१५१ ॥
सम्पूर्ण मन्त्र-प्रयोगों में 'ओम्' आदि से प्रयुक्त किया जाता है; उससे (मन्त्र) यथा कहे गए परिपूर्ण हो जाते हैं।
पाठभेद — (पृ. २६, पं. ११) वीमि. परि. ७९; ...मिति प्रथमोच्यते आ.
(पृ. २६, पं. १२) भवन्ति हि वीमि. परि. ७९
सर्वमन्त्राधिराजेन ओंकारेण न संशयः ।
यदूनं चातिरिक्तं च यच्छिद्रं यदयाज्ञिकम् ॥ २.१५२ ॥
सब मन्त्रों के अधिराज ओंकार से — इसमें संशय नहीं — जो कम है, जो अधिक है, जो छिद्र (दोष) है और जो अयाज्ञिक (यज्ञ के अयोग्य) है…
पाठभेद — (पृ. २६, पं. १३) ....धियज्ञेन वीमि. परि. ७९
(पृ. २६, पं. १४) यन्न्यूनमति....द्रं यच्च याज्ञियम् वीमि. परि. ७९
यदमेध्यमशुद्धं वा यातयामं च यद्भवेत् ।
ओंकारेण प्रयुक्तेन सर्वं चाविफ(क)लं भवेत् ॥ २.१५३ ॥
…जो अपवित्र हो, या जो बासी हो, या जो कुछ भी हो; ओंकार से प्रयुक्त किए जाने पर सब कुछ अविकल हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. २७, पं. १) ...मशुद्धं च वीमि. परि. ७९
(पृ. २७, पं. २) तत्तदोंकारयुक्तेन मन्त्रेणाविकलं भवेत् वीमि. परि. ७९; तत्रोंकारप्रयुक्तेन मन्त्रश्चाविकलो भवेत् इ.
अनूनं नातिरिक्तं च अच्छिद्रं याज्ञिकं तथा ।
मेध्यं शुद्धायातयामं पवित्रं मङ्गलं तथा ॥ २.१५४ ॥
…अन्यून, अनतिरिक्त, अच्छिद्र, याज्ञिक, मेध्य, शुद्ध, अयातयाम, पवित्र तथा मंगलमय हो जाता है…
पाठभेद — (पृ. २७, पं. ३) याज्ञियं तथा इ.
प्रणवज्ञानफलम्
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वब्रह्ममयं विभुम् ।
पावनं मोक्षदं पुण्यं सर्वदेवमयं विभुम् ॥ २.१५५ ॥
जो सब मंगलों का भी मंगल है, सब ब्रह्ममय और सर्वव्यापक है, पावन करने वाला, मोक्ष देने वाला, पुण्य स्वरूप और सब देवताओं से युक्त सर्वव्यापक है...
पाठभेद — (पृ. २७, पं. ६) ...मयं स्थितम् इ.
विदित्वा मुच्यते क्षिप्रं जन्मसंसारबन्धनात् ।
मुक्तो न जायते भूयो ब्रह्मभूतः सनातनः ॥ २.१५६ ॥
...उसको जानकर मनुष्य जन्म-संसार के बंधन से शीघ्र मुक्त हो जाता है; वह सनातन ब्रह्मस्वरूप होकर पुनः जन्म नहीं लेता।
ओंकारनिरूपणोपसंहारः
एतत् संक्षेपतः प्रोक्तमोंकारगुणवर्णनम् ।
विस्तरेण न शक्यन्ते वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ २.१५७ ॥
यह ओंकार के गुणों का संक्षेप में कहा गया वर्णन है; जिसे सैकड़ों वर्षों तक विस्तार से कहना भी संभव नहीं है।
योगाचार्येण संचिन्त्य याज्ञवल्क्येन धीमता ।
ओंकारनिर्णयो ह्येष प्रोक्तः शिष्यहितैषिणा ॥
श्लोकानां द्वे शते प्रोक्ते निर्णयः समुदाहृतः ॥ २.१५८ ॥
योगाचार्य, बुद्धिमान्, शिष्योंके हितैषी याज्ञवल्क्यने विचार करके यह ओंकारनिर्णय कहा है। (इसमें) दो सौ श्लोकोंमें निर्णय कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. २७, पं. १३) शते पूर्णे निर्णयं समुदाहृतम् इ.; ॥५६॥ आ.
इति (श्री) बृहद्योगियाज्ञवल्क्ये ओंकारनिर्णयो(नाम)द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
पाठभेद — (पृ. २७, पं. १५) इति बृह...निर्णयो द्वितीयोध्यायः आ.; योगयाज्ञवल्क्य ओंकारनिर्णयो नामाध्यायः प्रथमः ॥*॥ इ.
तृतीयोऽध्यायः — व्याहृतिनिर्णयः
अध्याय-सार — व्याहृतिनिर्णय। पूर्वकल्पमें स्वयम्भूने सात व्याहृतियाँ कहीं (३.१) — भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् — और वे ही सात लोक हैं; उनकी संख्या तीन, चार, पाँच या सात माननेके मत भी दिये गये हैं। चौदह प्रकारकी सृष्टिको देखकर (स्वयम्भूने इन्हें) स्वयं ‘व्याहृत’ किया, इसलिए ये व्याहृतियाँ कहलाती हैं (३.७)। इनके स्मरणका फल, ऋषि, छन्द, देवता और प्राणायाममें इनका विनियोग बताकर अध्याय सात लोकोंका वर्णन करता है; फिर ब्रह्माण्डका, जो सातवें पातालसे ऊपरतक है, नीचेका आधा रजतमय और ऊपरका हिरण्मय (३.२४), और उसकी उत्पत्ति और लयका। ब्रह्मलोकमें रहनेवालोंकी मुक्तिका समय बताया गया है; और जो व्याहृतियोंका उच्चारण करते हुए प्राण छोड़ता है, उसका व्यक्त और अव्यक्त क्षणभरमें पुरुषमें लीन हो जाता है (३.३०)।
व्याहृतिनिर्णयप्रतिज्ञा · व्याहृतिसंख्यायां मतभेदः
अतः परं प्रवक्ष्यामि व्याहृतीनां च निर्णयम् ।
सप्त व्याहृतयः प्रोक्ताः पुराकल्पे स्वयंभुवा ॥ ३.१ ॥
इसके आगे मैं व्याहृतियों का निर्णय कहूँगा। पूर्वकल्प में स्वयम्भू द्वारा सात व्याहृतियाँ कही गई हैं...
तान्येव सप्त च्छन्दांसि लोकाः सप्त प्रकीर्तिताः ।
त्रिधा चतुर्धा विज्ञेया(ः) पंचधा सप्तधा पुनः ॥ ३.२ ॥
वे ही सात छन्द हैं और सात लोक कहे गए हैं; वे तीन, चार, पाँच और पुनः सात प्रकार के जाननी चाहिए।
भूर्भुवःस्वरिति ज्ञेया अव्यस्तास्ताः प्रकीर्तिताः ।
पञ्च व्याहृतयः प्रोक्ताः सामगानां च सामसु ॥ ३.३ ॥
"भूः भुवः स्वः" — इस (तीन) रूपमें (वे) जाननी चाहिए; यह (उनका) अव्यस्त (एक साथ उच्चरित) रूप कहा गया है। सामगायकोंके सामोंमें पाँच व्याहृतियाँ कही गयी हैं —
पुरुषं च तथा सत्यं भूर्भुवःस्वस्तथैव च ।
विद्याप्रकरणापाये यजमानस्तु वै सदा ॥ ३.४ ॥
— पुरुष, सत्य, और भूः भुवः स्वः। विद्या-प्रकरणके अभावमें (?) यजमान तो सदा —
सप्त व्याहृतयः प्रोक्ताः प्राणायामेषु नित्यशः ।
भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यं तथैव च ॥ ३.५ ॥
— प्राणायामोंमें नित्य सात व्याहृतियाँ कही गयी हैं: भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्।
पाठभेद — (पृ. २८, पं. १०) इति सप्त व्याहृतयः प्राणा... आर. ३९; प्राणायामेन नित्यशः स्मृच. १४१
(पृ. २८, पं. ११) आर. ३९
भूराद्याश्चैव सत्यान्ता महाव्याहृतयस्तु वै ।
लोकाह्येतास्तु सप्तैते उपर्युपरि संस्थिताः ॥ ३.६ ॥
भूः से लेकर सत्यम् तक (ये) महाव्याहृतियाँ हैं; ये सात लोक ही हैं, जो एकके ऊपर एक स्थित हैं।
व्याहृतिपदनिरुक्तिः
चतुर्दशविधं सर्गं दृष्ट्वेदं व्याहृतं स्वयम् ।
सप्त लोका भविष्यन्ति तस्माद्व्याहृतयः स्मृतः(ताः) ॥ ३.७ ॥
चौदह प्रकार की सृष्टि को देखकर स्वयं (प्रजापति ने) यह उच्चारा— "सात लोक होंगे"; इसलिए ये व्याहृतियाँ स्मृत हैं।
अव्याहृतमिदं ह्यासीत् सदेवासुरमानुषम् ।
संसत्यं व्याहृतं पूर्वं प्रजापतिरिति श्रुतिः ॥ ३.८ ॥
देव, असुर और मनुष्यों सहित यह (जगत्) पहले अव्याहृत (अप्रकट) था; पहले प्रजापतिने सत्यका उच्चारण किया — ऐसी श्रुति है।
भूर्भुवःस्वस्तथा पूर्वं स्वयमेव स्वयंभुवा ।
व्याहृता ज्ञानदेहेन तेन व्याहृतयः स्मृताः ॥ ३.९ ॥
"भूः", "भुवः", "स्वः" आदि पूर्व में स्वयम्भू ने स्वयं ही उच्चारित किए; ज्ञानमय देह द्वारा उन व्याहृतियों को उच्चारित करने के कारण वे व्याहृतियाँ स्मृत हैं...
पाठभेद — (पृ. २९, पं. १) स्मृत. ३८३
(पृ. २९, पं. २) स्मृत. ३८३
व्याहृतिस्मरणफलम्
एतास्तु व्याहृतीः सप्त यः स्मरेत् प्राणसंयमे ।
उपासितं भवेत्तस्य विश्वं भुवनसप्तकम् ॥ ३.१० ॥
ये सात व्याहृतियाँ हैं, जो कोई प्राणसंयम में इनका स्मरण करता है, उसने सातों भुवनों वाले विश्व की उपासना कर ली है।
पाठभेद — (पृ. २९, पं. ३) य एता व्याहृतीः सप्त स्मृच. १४०, वै. ३२६
(पृ. २९, पं. ४) वै. ३२६; उपासीनं स्मृच. १४०; उपासीनं आ.
सर्वेषु चैव लोकेषु कामचारश्च जायते ।
एषा लोकवती ज्ञेया तनुराद्या प्रजापतेः ॥ ३.११ ॥
— और सब लोकोंमें (उसकी) इच्छानुसार गति होती है। यह (व्याहृति-समूह) प्रजापतिका लोकोंसे युक्त आदि शरीर जानना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. २९, पं. ५) स्मृच. १४०; वै. ३२६
व्याहृतीनां ऋषिः
सप्तान्ता देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः ।
व्याहृतीनां च सर्वासामृषिश्चैव प्रजापतिः ॥ ३.१२ ॥
अमित तेजवाले देवदेव विष्णुका (भी यह शरीर) सात (लोकों) तक फैला है (?); और सब व्याहृतियोंके ऋषि प्रजापति ही हैं।
पाठभेद — (पृ. २९, पं. ७) अप. ४३
(पृ. २९, पं. ८) वीमि. २७६, अप. २४५; सर्वासामार्षं चैव प्रजापतिः स्मृत. ३८६; व्याहृतीनां तु सर्वासामार्षं चैव स्मृच. १४१, सं. ३८; व्याहृतीनां तु वै. ३२५; ...मृषिरेव प्रजापतिः अग्नि. २१६.३६
व्याहृतीनां छन्दांसि
सप्त च्छन्दांसि यान्यासां तानि सम्यक् प्रकीर्तयेत् ।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च ॥ ३.१३ ॥
इनके जो सात छन्द हैं, उन्हें ठीक से कहे: 'गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति...'
पाठभेद — (पृ. २९, पं. ९) स्मृच. १४१; ततश्छन्दांसि...सम्यक् प्रदर्शयेत् अप. ४५; प्रवर्तयेत् वीमि. २७६; सप्त च्छन्दांसि प्रोक्तानि छन्दसानि तु सर्वशः सं. ३८
(पृ. २९, पं. १०) वृद्धहारीतस्मृ. १०.५३, अग्नि. २१६.३९, वीमि. २७६, स्मृच. १४१, अप. ४५, बृप. २.६४; त्रिष्टुबेव च स्मृत. ३८६; ...ष्टुप् च जगती त्रिष्टुबेव च सं. ३८; आग्नेयवचनमिति आर. ४०*
व्याहृतीनां देवताः
त्रिष्टुप् च जगती चैव छन्दांस्येतानि सप्त वै ।
अग्निर्वायुस्तथादित्यो बृहस्पत्याप एव च ॥ ३.१४ ॥
'त्रिष्टुप्' और 'जगती' — ये सात छन्द हैं; अग्नि, वायु तथा आदित्य, बृहस्पति और आपः ही (इनके देवता हैं)...
पाठभेद — (पृ. ३०, पं. १) वीमि. २७६, स्मृच. १४१, अप. ४५; छन्दांस्येतान्यनुक्रमात् बृप. २.६४; पङ्क्तिश्च जगती स्मृत. ३८६; पङ्क्तिश्च बृहती चेति सप्त च्छन्दांसि तानि वै सं. ३८; चेति छन्दांस्याहुरनुक्रमात् अग्नि. २१६.३९. चेति छन्दांस्यनुक्रमात्, आग्नेयवचनमिति आर. ४०*; ...स्येतान्यनुक्रमात् वृद्धहारीतस्मृ. १०.५३
(पृ. ३०, पं. २) वीमि. २७६, स्मृच. १४१, वै. ३२५,...स्तथा सूर्यो बृप. २.६३; ...स्तथा सूर्यो बृहस्पतिरपां पतिः स्मृत. ३८६;...स्तथादित्यो बृहस्पतिरपां पतिः सं. ३८,....स्तथा सूर्यो, आग्नेयवचनमिति आर. ४०*
व्याहृतीनां विनियोगः
इन्द्रश्च विश्वेदेवाश्च देवताः समुदाहृताः ।
अनादिष्टेषु सर्वेषु प्रायश्चित्तेषु सर्वशः ॥ ३.१५ ॥
— इन्द्र और विश्वेदेव — (ये) देवता कहे गये हैं। जिनका विशेष विधान नहीं कहा गया, उन सब प्रायश्चित्तोंमें सब प्रकारसे —
पाठभेद — (पृ. ३०, पं. ३) वीमि. २७६, स्मृच. १४१. वै. ३२५, अप. ४५, सं. ३८ आग्नेयवचनमिति आर. ४०*
(पृ. ३०, पं. ४) वीमि. २७६
व्याहृतिप्रोक्तसप्तलोकवर्णनम्
प्रणायामप्रयोगे च विनियोग उदाहृतः ।
भवन्ति भूयो भूतानि उपभोगक्षये पुनः ॥ ३.१६ ॥
— और प्राणायामके प्रयोगमें (इनका) विनियोग कहा गया है। उपभोग क्षीण होनेपर भूत (प्राणी) फिर-फिर होते (भवन्ति) हैं — (इसलिए भूः) —
पाठभेद — (पृ. ३०, पं. ५) वीमि २७६, स्मृच. १४१, अप. ४५, प्राणस्यायमने चैव स्मृत. ३८६
(पृ. ३०, पं. ६) ॥१७॥ आ. आदर्शपुस्तके श्लोकाङ्काः इतःप्रभृति मुद्रितसङ्ख्यातः एकाधिकाः;
कल्पान्ते ह्युपभोगाय भुवस्तेन प्रकीर्तितम् ।
शीतोष्णवृष्टितेजांसि जायन्त्येतानि वै ततः ॥ ३.१७ ॥
— कल्पान्तमें उपभोगके लिए (वे वहाँ होते हैं), इसलिए वह भुवः कहलाता है; उसीसे शीत, उष्ण, वर्षा और तेज उत्पन्न होते हैं।
आलयः सुकृतीनां च स्वर्लोकः समुदाहृतः ।
अधरोत्तरेभ्यो लोकेभ्यो महांश्च परिमाणतः ॥ ३.१८ ॥
पुण्यात्माओं का आलय स्वर्लोक कहा गया है; जो नीचे और ऊपर के लोकों से परिमाण में महान् है —...
हृदयं सर्वलोकानां महस्तेन निगद्यते ।
कल्पदाहे प्रलीनास्तु प्राणिनस्तु पुनः पुनः ॥ ३.१९ ॥
सब लोकों का हृदय है, इसलिए 'महः' कहा जाता है; कल्प के दाह में लीन हुए प्राणी फिर-फिर...
जायन्ते तु पुनः सर्गे जनस्तेन उदाहृतः ।
सनकाद्यास्तपःसिद्धा ये चान्ये ब्रह्मणः सुताः ॥ ३.२० ॥
नयी सृष्टि में फिर उत्पन्न होते हैं, इसलिए 'जनः' कहा गया है। सनक आदि तप से सिद्ध और जो ब्रह्मा के अन्य पुत्र हैं —...
अधिकारनिवृत्ताश्च तिष्ठन्त्यस्मिंस्ततस्तपः ।
सत्यं तु सप्तमो लोको ब्रह्मणः सदनं हि तत् ॥ ३.२१ ॥
अधिकार से निवृत्त होकर इसमें रहते हैं, इसलिए 'तपः' है; सत्य तो सातवाँ लोक है क्योंकि वह ब्रह्मा का सदन है।
सर्वेषां चैव देवानां मूर्ध्नि संतिष्ठते सदा ।
ज्ञानकर्मस्वनुष्ठानात्तथा सत्यस्य भाषणात् ॥ ३.२२ ॥
सब देवताओं के सिर पर सदा स्थित रहता है; ज्ञान-कर्म के अनुष्ठान से और सत्य के भाषण से —...
पाठभेद — (पृ. ३१, पं. ५) चैव लोकानां....यदा इ.
प्राप्यते चोपभोगार्थं प्राप्य न च्यवते पुनः ।
सत्यं तु सप्तमो लोकस्तस्मादूर्ध्वं न विद्यते ॥ ३.२३ ॥
— उपभोगके लिए (वह) प्राप्त किया जाता है, और पाकर (वहाँसे) फिर गिरता नहीं। सत्य तो सातवाँ लोक है; उससे ऊपर (कोई लोक) नहीं है।
पाठभेद — (पृ. ३१, पं. ८) सत्यस्तु इ.
ब्रह्माण्डस्वरूपम्
आसप्तमात्तु पातालादूर्ध्वमेतदुदाहृतम् ।
अधस्ताद्राजतं ह्यण्डमूर्ध्वमर्धं हिरण्मयम् ॥ ३.२४ ॥
सातवें पातालसे लेकर ऊपरतक यह (ब्रह्माण्ड) कहा गया है; (उसका) नीचेका आधा अण्ड चाँदीका है और ऊपरका आधा सोनेका।
प्रधानादेव संभूतं ब्रह्मनीडं हिरण्मयम् ।
भूराद्यैः सप्तभिर्व्याप्तं सत्यान्तैः पुरुषसंमितैः ॥ ३.२५ ॥
प्रकृतिसे ही उत्पन्न सुवर्णमय ब्रह्मनीड (ब्रह्माका घोंसला — ब्रह्माण्ड), भूः से सत्यम् तक सात (लोकों) से व्याप्त है, जो (विराट्) पुरुषके परिमाणके अनुरूप हैं।
अर्द्धार्द्धं छिद्रितं ह्यण्डं सप्तप्रकृतिलौकिकम् ।
अनन्ताकाशमध्यस्थं जीवभास्करभासितम् ॥ ३.२६ ॥
(वह) अण्ड आधा-आधा विभक्त है, सात प्रकृतियोंवाले लोकोंसे युक्त, अनन्त आकाशके बीचमें स्थित, जीवरूपी सूर्यसे प्रकाशित।
ब्रह्माण्डोत्पत्तिलयौ
अजस्य नाभावुद्भूतं यस्मिन् विश्वं प्रतिष्ठितम् ।
महदादि विशेषान्तमव्यक्ते गच्छते लयम् ॥ ३.२७ ॥
अजन्मा की नाभि से उत्पन्न, जिसमें विश्व प्रतिष्ठित है; महत् से लेकर विशेषों तक सब अव्यक्त में लय हो जाते हैं।
ब्रह्मलोकवर्तिनां मुक्तिसमयः
अपुनर्मरणायैव ब्रह्मणः सदने स्थिताः ।
अधिकारं विना चैव ब्रह्मणः सदृशाश्च ते ॥ ३.२८ ॥
जो ब्रह्माके लोकमें स्थित हैं, वे फिर न मरनेके लिए ही (वहाँ हैं); वे अधिकार (कर्तव्य) के बिना ब्रह्माके समान हैं।
अव्यक्ते वै दिनस्यान्ते मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह ।
विशन्ति परमं धाम पुरुषं भास्करप्रभम् ॥ ३.२९ ॥
(ब्रह्माके) दिनके अन्तमें अव्यक्तमें वे ब्रह्माके साथ मुक्त होते हैं और सूर्यके समान प्रभावाले परम धाम पुरुषमें प्रवेश करते हैं।
पाठभेद — (पृ. ३१, पं. १९) भास्करं परम् इ.
प्रयाणसमये व्याहृतिव्याहरणम्
व्याहृतीर्व्याहरंश्चैव प्राणैर्यदि विमुच्यते ।
विलयं याति च व्यक्तमव्यक्तं पुरुषे क्षणात् ॥ ३.३० ॥
जो व्याहृतियोंका उच्चारण करता हुआ प्राण छोड़ता है, उसका व्यक्त और अव्यक्त क्षणभरमें पुरुषमें लीन हो जाता है।
व्याहृतिनिरूपणोपसंहारः
एष संक्षेपतश्चोक्तः सप्तव्याहृतिनिर्णयः ।
यं ज्ञात्वा मुच्यते विद्वान् भवग्राहाकुलार्णवात् ॥ ३.३१ ॥
यह सात व्याहृतियोंका निर्णय संक्षेपमें कहा गया, जिसे जानकर विद्वान् संसाररूपी मगरोंसे भरे समुद्रसे मुक्त हो जाता है।
निर्णयो व्याहृतीनां तु श्लोका द्वित्रिंशकस्तथा ॥ ३.३२ ॥
व्याहृतियोंका निर्णय (यह है); इसमें बत्तीस श्लोक हैं।
पाठभेद — (पृ. ३२, पं. ५) इदमर्धं नास्ति इ.
इति (श्री) बृहद्योगियाज्ञवल्क्ये व्याहृतिनिर्णयो नाम तृतीयोध्यायः ।
पाठभेद — (पृ. ३२, पं. ६) ...व्याहृतीनिर्णयस्तृतीयोध्यायः आ., योगयाज्ञवल्क्यव्याहृतिनिर्णयो नामाध्यायः द्वितीयः ॥*॥ इ.
चतुर्थोऽध्यायः — गायत्रीनिर्णयः
अध्याय-सार — गायत्रीनिर्णय। ओंकार (अ. २) और व्याहृतियों (अ. ३) के बाद अब गायत्री, जिसे जानकर विप्र ब्रह्मसायुज्य पाता है (४.१)। अध्याय वही क्रम पकड़ता है जो ४.२–३ में गिनाया गया है: ऋषि विश्वामित्र, छन्द गायत्री, देवता सविता, मुख अग्नि, उपनयन और प्राणायाममें विनियोग; शिरस् ‘ओमापो ज्योतिः’, सोलह अक्षरोंका, ऋषि प्रजापति (४.८–१०)। आदिसृष्टिमें स्वयम्भूके मुखसे ओंकारपूर्वा गायत्री निकली; प्रजापतिने तीन वेदोंसे अ-उ-म, भूः-भुवः-स्वः और एक-एक पाद दुहा (४.११–१३)। गायत्री प्रकृति है और ओंकार पुरुष, इन दोनोंके संयोगसे जगत् चलता है; चौबीस अक्षर चौबीस तत्त्व हैं, ओंकार पच्चीसवाँ (४.१७–२०); चौबीसवें अक्षरपर मतभेद है (४.२१–२५)। फिर जपका क्रम, देवीका ध्यान-रूप, आवाहन-विसर्जन, नामोंकी निरुक्तियाँ, और प्रयोजनके अनुसार पाठके भेद (वेदपाठ, जप, प्राणायाम, होम, अभिचार) आते हैं। जपकी संख्याओंके फल और प्रायश्चित्त, चौबीस अक्षरोंके देवता (४.६३–६९) और गायत्रीको न जाननेकी निन्दाके बाद अध्याय सार-परम्परासे समाप्त होता है: उपनिषद् → गायत्री → तीन व्याहृतियाँ → ओंकार, यह ‘त्रिवृत् ब्रह्म’ है (४.७७–७९); तुलापर एक ओर चार वेद और दूसरी ओर गायत्री (४.८०)।
गायत्रीनिर्णयप्रतिज्ञा · गायत्रीज्ञानफलम्
अतः परं प्रवक्ष्यामि गायत्र्या निर्णयं शुभम् ।
यं ज्ञात्वा याति वै विप्रः सायुज्यं ब्रह्मणा सह ॥ ४.१ ॥
इसके आगे मैं गायत्रीका शुभ निर्णय कहूँगा, जिसे जानकर विप्र ब्रह्मके साथ सायुज्यको प्राप्त होता है।
गायत्र्यार्षादिज्ञानमाहात्म्यम्
आर्षं छन्दश्च दैवत्यं विनियोगश्च ब्राह्मणम् ।
शिरश्चाक्षरदैवत्यमावाहनविसर्जनम् ॥ ४.२ ॥
ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, ब्राह्मण, शिरस्, अक्षरों के देवता, आवाहन और विसर्जन…
पाठभेद — (पृ. ३३, पं. ३) विनियोगोऽथ ब्राह्मणम् इ.
ध्यानं जपप्रयोगश्च येषु कर्मसु यादृशम् ।
ज्ञातव्यं ब्राह्मणैर्यत्नाद्ब्राह्मण्यं येन वै भवेत् ॥ ४.३ ॥
— ध्यान, और जिन कर्मोंमें जैसा जपका प्रयोग होता है — यह सब ब्राह्मणोंको यत्नसे जानना चाहिए, जिससे ब्राह्मणत्व होता है।
गायत्र्या देवता ऋष्यादि
सविता देवता ह्यस्या मुखमग्निस्तदित्यृचः ।
विश्वामित्रऋषिश्छन्दो गायत्री तु विधीयते ॥ ४.४ ॥
इसकी देवता सविता है, (इसका) मुख अग्नि है, (मन्त्र) "तत्" से आरम्भ होनेवाली ऋचा है; ऋषि विश्वामित्र हैं और छन्द गायत्री कहा जाता है।
पाठभेद — (पृ. ३३, पं. ७) देवता यस्या...ग्निस्त्रिपाच्च या वीमि. ७७, स्मृच. १४१,...ग्निस्त्रिपात्तथा अप. ४५,...ग्निस्त्रिपात्स्थिता आर. ४०*
(पृ. ३३, पं. ८) इ.; गायत्री सा विशिष्यते वीमि. २७७, स्मृच. १४१, अप. ४५, आर. ४०*; गायत्री सवितेष्यते स्मृत. ३८६
विश्वस्य जगतो मित्रं विश्वामित्रः प्रजापतिः ।
विनियोग उपनये प्राणायामे तथैव च ॥ ४.५ ॥
सारे जगत्का मित्र होनेसे प्रजापति ही विश्वामित्र हैं; इसका विनियोग उपनयन और प्राणायाममें है।
पाठभेद — (पृ. ३३, पं. १०) वीमि. ७७, अप. ४५; विनियोगस्तूपनये स्मृच. १४१; जपहोमोपनयने विनियोगो विधीयते स्मृत. ३८६
गायत्री वा इदं सर्वं ब्रह्माण्डं ब्राह्मणानि तु ।
वेदोपनिषच्छाखासु ब्राह्मणानि विधानतः ॥ ४.६ ॥
यह सारा ब्रह्माण्ड गायत्री ही है; (इसके) ब्राह्मण (व्याख्यान-भाग) वेदों, उपनिषदों और शाखाओंमें विधिपूर्वक (कहे गये) हैं —
पाठभेद — (पृ. ३३, पं. ११) ब्राह्मणं ब्राह्मणानि तु अप. ४५; ब्राह्मणं समुदाहृतम् इ.
(पृ. ३३, पं. १२) वेदोपनिषदोच्छाखा ब्राह्मणान् विविधानि च इ.
पुराणधर्मशास्त्राणि गायत्र्याः पावनानि तु ।
कीर्तितानि त्वनेकानि गायत्र्याः पावनानि च ॥ ४.७ ॥
— पुराण और धर्मशास्त्र गायत्रीकी पावनता बतानेवाले हैं; गायत्रीकी पावनताके अनेक (वचन) कहे गये हैं।
पाठभेद — (पृ. ३४, पं. २) इ.; वेदेषु यान्यनेकानि गायत्र्याः कीर्तितानि तु आ.; वेदेष्वन्यान्यनेकानि गायत्र्याः कीर्तितानि तु अप. ४५
गायत्रीशिरस्तदृष्यादि च
षोडशाक्षरकं ब्रह्म गायत्र्यास्तच्छिरः स्मृतम् ।
ओमापो ज्योतिरित्येष मन्त्रो यः परिकीर्त्यते ॥ ४.८ ॥
सोलह अक्षरोंवाला ब्रह्म (मन्त्र) गायत्रीका शिरस् कहा गया है — "ओमापो ज्योतिः…" यह जो मन्त्र कहा जाता है।
पाठभेद — (पृ. ३४, पं. ३) ...स्तु शिरः स्मृतम् वै. ३२६; स्मृतः आ.; षोडशाक्षरकं देव्या गायत्र्यास्तु स्मृत. ३८५
(पृ. ३४, पं. ४) मन्त्रो वै तैत्तिरीयकः वै. ३२३; मन्त्रो यस्तु प्रकीर्त्यते स्मृच. १४१ अप. ४५; ज्योतिरस इति मन्त्रो यस्तु प्रकीर्त्यते वीमि. २७७; आपो, ज्योतिरित्येष मन्त्रो यस्तु प्र... आर. ४०*
तस्य प्रजापतिश्चर्षिर्यजुश्छन्दो विवर्जि(र्णि)तम् ।
ब्रह्माग्निवायुसूर्याश्च दैवत्यं समुदाहृतम् ॥ ४.९ ॥
उसके ऋषि प्रजापति हैं; वह यजुः है, छन्दसे रहित; ब्रह्मा, अग्नि, वायु और सूर्य उसके देवता कहे गये हैं।
पाठभेद — (पृ. ३४, पं. ५) प्रजापतेरार्षं अप. ४५;...पतिश्चार्षं स्मृच. १४१;...पतिश्चार्षं यजुश्छन्दो विवक्षितम् वीमि. २७७;...श्छन्दोऽधिवर्णितम् आर. ४०
(पृ. ३४, पं. ६) देवताः समुदाहृताः वीमि. २७७, आर. ४०; ब्रह्माग्निर्वायुः सूर्यश्च देवताः समुदाहृताः अप. ४५; ब्रह्मा वायुश्च सूर्यश्च देवताः समुदाहृताः स्मृच. १४१
प्राणस्यायमने चैव विनियोग उदाहृतः ।
गायत्र्याः शिरसा सार्धमेवं श्रुतिनिदर्शनम् ॥ ४.१० ॥
प्राणायाममें गायत्रीके साथ, उसके शिरस् सहित, इसका विनियोग कहा गया है — ऐसा श्रुतिका निदर्शन है।
पाठभेद — (पृ. ३४, पं. ७) स्मृच. १४१; प्राणायामप्रयोगे च अप. ४५
गायत्रीमाहात्म्यम्
तपसा सुसमुद्धृत्य आदिसर्गे स्वयंभुवः ।
ओंकारपूर्वा गायत्री निर्जगाम ततो मुखात् ॥ ४.११ ॥
आदिसृष्टिमें तपसे (उसे) भली-भाँति उद्धृत करनेपर, ओंकारसे आरम्भ होनेवाली गायत्री तब स्वयम्भूके मुखसे निकली।
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः ।
वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवःस्वरितीति च ॥ ४.१२ ॥
प्रजापतिने तीनों वेदोंसे अकार, उकार और मकार, तथा "भूः भुवः स्वः" को दुहा।
पाठभेद — (पृ. ३४, पं. ११–१२) मनु. २.७६
त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमदूदुहत् ।
तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः ॥ ४.१३ ॥
परमेष्ठी प्रजापतिने इस सावित्री — "तत्" ऋचा — का एक-एक पाद तीनों वेदोंसे ही दुहा।
पाठभेद — (पृ. ३५, पं. १–२) मनु. २.७७
यथाग्निर्वै देवतानामृतूनां कुसुमाकरः ।
ब्राह्मणो द्विपदानां च गावश्चैव चतुष्पदं(दाम्) ॥ ४.१४ ॥
जैसे देवताओं में अग्नि, ऋतुओं में वसन्त, द्विपद (दो पैरों वाले) में ब्राह्मण और चौपायों में गौ श्रेष्ठ है …
तेजस्विनां सहस्रांशुरिन्द्रियाणां यथा मनः ।
मेरुः शिखरिणां श्रेष्ठो गायत्री छन्दसां तथा ॥ ४.१५ ॥
— तेजस्वियोंमें सूर्य, इन्द्रियोंमें जैसे मन, और पर्वतोंमें मेरु श्रेष्ठ है, वैसे ही छन्दोंमें गायत्री।
यथा मधु च पुष्पेभ्यो घृतान्मण्डं रसात् पयः ।
एवं हि सर्ववेदानां गायत्री सारमुच्यते ॥ ४.१६ ॥
जैसे फूलोंसे मधु, घीसे मण्ड (सार) और रससे दूध (सार निकलता है), वैसे ही गायत्री सब वेदोंका सार कही जाती है।
पाठभेद — (पृ. ३५, पं. ८) ॥१७॥ इतःपरमस्मिन्नध्याये २३ तमश्लोकपर्यन्तमादर्शपुस्तके श्लोकाङ्काः मुद्रितसङ्ख्यातः एकाधिकाः ।
गायत्री प्रकृतिर्ज्ञेया ओंकारः पुरुषः स्मृतः ।
ताभ्यामुभाभ्यां संयोगात् जगत् सर्वं प्रवर्तते ॥ ४.१७ ॥
गायत्री को प्रकृति जानिये और ओंकार को पुरुष जाना गया है, इन दोनों के संयोग से ही सम्पूर्ण जगत् प्रवर्तित होता है…
संवत्सरतनुर्ह्येषा अरणीति निगद्यते ।
चतुर्विंशत्यात्मिकैषा तत्त्वन(व)त्यपि सा स्मृता ॥ ४.१८ ॥
…यह संवत्सर-रूप शरीरवाली है और अरणि कही जाती है; यह चौबीस तत्त्वों रूप है तथा तत्त्ववती भी स्मृत है…
पाठभेद — (पृ. ३५, पं. १२) चतुर्विंशात्मिका ह्येषा इ.
प्रणवः सर्ववेदानां गायत्री छन्दसामिह ।
अक्षराणि च यान्यस्याः स्मृतान्यङ्गानि तानि तु ॥ ४.१९ ॥
(जैसे) प्रणव सब वेदोंका (प्रधान है, वैसे ही) यहाँ गायत्री छन्दोंकी; इसके जो अक्षर हैं, वे इसके अंग कहे गये हैं।
पाठभेद — (पृ. ३५, पं. १३) प्रणवः सर्ववेदेषु गीता. ७.८; गायत्री छन्दसामहम् गीता १०.३५ एतच्छ्लोकार्धानन्तरं, अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च (गीता १०.३३) इत्यधिकम् इ.
चतुर्विंशति तत्त्वानि ओंकारः पञ्चविंशकः ।
चतुर्विंशाक्षरा देवी त्रिपदाष्टाक्षरं पदम् ॥ ४.२० ॥
चौबीस तत्त्व हैं और ओंकार पच्चीसवाँ है; चौबीस अक्षरों वाली देवी तीन पादों वाली है, जिसका प्रत्येक पाद आठ अक्षर का है।
गायत्रीप्रतिष्ठाक्षराणि
गेयकाले सामगानां यकारोऽस्याः प्रजायते ।
चतुर्विंशः स विज्ञेयो अलक्ष्यः शान्तिमस्तु वः (चान्तिमस्तु सः) ॥ ४.२१ ॥
सामगायकोंके गानके समय इसमें (एक) यकार उत्पन्न होता है (वरेणियम्); वह चौबीसवाँ (अक्षर) जानना चाहिए — अलक्ष्य, और वही अन्तिम है।
केचिदिच्छन्ति निष्क्रान्तं यकारान्ते प्रतिष्ठितम् ।
अन्तिमो यो भवेद्वर्णो व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम् ॥ ४.२२ ॥
कुछ (आचार्य) उस (अक्षर) को निकला हुआ, यकारके अन्तमें स्थित मानते हैं — जो अन्तिम वर्ण होता है, अर्धमात्रावाला व्यञ्जन —
तत्तालुनि निविष्टं तु तुर्याख्यं सोमरूपकम् ।
चतुर्विंशतिसंख्येयमक्षरं ब्रह्म निष्कलम् ॥ ४.२३ ॥
— वह तालुमें स्थित, तुरीय नामवाला, सोमरूप है; चौबीसकी संख्यावाला वह अक्षर निष्कल ब्रह्म है।
तेनैवारभ्यते देवी तेनैवेषा समाप्यते ।
सार्धमात्रिकरूपेण ओंकारान्ते व्यवस्थितम् ॥ ४.२४ ॥
उसीसे देवी (गायत्री) आरम्भ होती है और उसीसे समाप्त होती है; (वह) ओंकारके अन्तमें अर्धमात्राके रूपमें स्थित है।
पाठभेद — (पृ. ३६, पं. ८) अत्रादर्शपुस्तके श्लोकाङ्कः नास्ति स चास्माभिः कल्पितः ।
प्रधानः स तु विज्ञेयस्तत्परः पुरुषः स्मृतः ॥ ४.२५ ॥
उसे प्रधान (प्रकृति) जानना चाहिए; उससे परे पुरुष कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ३६, पं. ९) इतः प्रभृति मुद्रितश्लोकसङ्ख्या आदर्शपुस्तकानुरूपा एव ।
गायत्रीजपविधिः
ओंकारः पूर्वमुच्चार्यो भूर्भुवःस्वस्ततः परम् ।
गायत्री प्रणवश्चान्ते जपे ह्येवमुदाहृतः ॥ ४.२६ ॥
जपमें पहले ओंकार उच्चारित होता है, उसके बाद भूः भुवः स्वः, (फिर) गायत्री, और अन्तमें प्रणव — ऐसा कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ३६, पं. १०) वीमि. २२८; प्रणवं पूर्वमुच्चार्य स्मृत. ३९२; ओंकारं पूर्वमुच्चार्य भूर्भुवस्स्वस्तथैव च अप. ४७, स्मृच. १४९, अग्नि. २१५.१४
(पृ. ३६, पं. ११) ...मुदाहृता स्मृत. ३९२; गायत्रीं प्रणवं चान्ते जप एवमुदाहृतः स्मृच. १४९; जपो ह्येवमुदाहृतः अप. ४७; जपे चैवमुदाहृतम् अग्नि. २१५.१५
गायत्रीस्वरूपम्
श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा ।
श्वेतैर्विलेपनैः पुष्पैरलङ्कारैश्च भूषिता ॥ ४.२७ ॥
वह (देवी) श्वेत वर्ण वाली, कौशेय वस्त्र धारण करने वाली तथा श्वेत लेपनों, पुष्पों और आभूषणों से भूषिता बताई गई है।
पाठभेद — (पृ. ३६, पं. १२) वीमि. २८८, अप. ४६, आर. ४४, ग. २१३.७०
(पृ. ३६, पं. १३) वीमि. २८८, अप. ४६, सं. ६४, आर. ४४
आदित्यमण्डलान्तस्था ब्रह्मलोकगताथवा ।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा ॥ ४.२८ ॥
…वह (देवी) आदित्यमण्डल के भीतर स्थित है, अथवा ब्रह्मलोक में स्थित है; अक्षमाला धारण किये हुए, पद्मासन पर विराजमान, शुभ देवी।…
पाठभेद — (पृ. ३६, पं. १४) वीमि. २८८, स्मृच. १४३;...लोकनिवासिनी अप. ४६;...लोकगता तथा आर. ४४
(पृ. ३६, पं. १५) वीमि. २८८, स्मृच. १४३, आर. ४४, ग. २१३.७०
गायत्र्याऽऽवाहनविसर्जने
आवाह्य यजुषा तेन तेजोसीति विधानतः ।
एतद्यजुः पुरा दृष्टं देवैर्दर्शनकाङ्क्षिभिः ॥ ४.२९ ॥
"तेजोऽसि…" इस यजुःसे विधिपूर्वक (देवीका) आवाहन करके — यह यजुः पूर्वकालमें (देवीके) दर्शनके इच्छुक देवताओंने देखा था।
पाठभेद — (पृ. ३७, पं. १) ग. २१३.७१; यजुषानेन वीमि. २८८, स्मृत. ३८९; आवाह्य यजुषानेन स्मृच. १४३; आवाह्य यजमानो हि ओजोसीति अप. ४६; ओजोसीति इ.
(पृ. ३७, पं. २) पुरा देवैर्दृष्टिदर्शन ग. २१३.७१
तत्रावाह्य जपित्वा तु नमस्कृत्य विसर्जयेत्
प्रणवं भूर्भुवःस्वश्च अङ्गानि हृदयादयः ॥ ४.३० ॥
वहाँ आवाहन करके, जप करके, नमस्कार करके विसर्जन करे। प्रणव, भूः भुवः स्वः, और हृदय आदि अङ्ग —
पाठभेद — (पृ. ३७, पं. ३) तत्र वाह्यं जपित्वा च वीमि. २८८; आवाह्य पूजयित्वा तु अप. ४६; तामावाह्य जपित्वा च स्मृत. ३८९; जपित्वातो — नमस्काराद्विसर्जयेत् ग. २१३.७२
(पृ. ३७, पं. ४) प्रणवो वीमि. २८८; ३१०; याज्ञवल्क्यवचनमिति स्मृत. ३८९
त्रिरावर्त्य ततः पश्चादार्षं छन्दश्च दैवतम् ।
विनियोगस्तथा रूपं ध्यातव्यं क्रमशस्तु वै ॥ ४.३१ ॥
— (इनको) तीन बार दोहराकर, उसके बाद ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और रूप — इनका क्रमसे ध्यान करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ३७, पं. ५) त्रिरावृत्य वीमि. २८८; त्रिराचार्य वीमि. ३१०
(पृ. ३७, पं. ६) वीमि. २८८
गायत्रीनामधेयनिर्वचनानि
सर्वावयवसंपूर्णा ध्याता सिद्धिकरी भवेत् ।
षड्जश्च ऋषभश्चैव धैवतश्च तृतीयकः ॥ ४.३२ ॥
सब अवयवोंसे पूर्ण (रूपमें) ध्यान की गयी (देवी) सिद्धि देनेवाली होती है। षड्ज, ऋषभ और तीसरा धैवत —
पाठभेद — (पृ. ३७, पं. ८) गांधारश्च तृतीयकम् इ.
त्रिभिः स्वरैर्यदा गीता त्रैस्वर्येति ततःस्मृता ।
भूर्लोकश्चान्तरिक्षं च स्वर्लोकश्च तृतीयकः ॥ ४.३३ ॥
…जब इन तीन स्वरों से गायी जाती है, तब वह 'त्रैस्वर्या' कही जाती है; भूर्लोक, अन्तरिक्ष तथा तीसरा स्वर्लोक…
पदैस्त्रिभिर्यदा त्या(व्या)प्ता त्रिपदेति ततः स्मृता ।
सविता देवता यस्मात् सावित्री तेन चोच्यते ॥ ४.३४ ॥
— जब (वह) इन तीन पदों (लोकों) से व्याप्त है, तब त्रिपदा कही जाती है। सविता देवता होनेसे सावित्री कहलाती है।
पाठभेद — (पृ. ३७, पं. ११) यदा व्याप्ता त्रिपदा ततः स्मृता इ.
गायनं(न्तं) त्रायते यस्मात् गायत्रीति ततः स्मृतः(ता) ।
श्येनो भूत्वाऽऽहरत् सोमं त्रिदिवात् स्वेन तेजसा ॥ ४.३५ ॥
क्योंकि (यह) गानेवालेकी रक्षा करती है, इसलिए गायत्री कही गयी। (यह) श्येन बनकर अपने तेजसे स्वर्गसे सोम ले आयी —
प्रयोजनभेदेन गायत्रीपठनभेदाः
छन्दसां पोषणात् तस्मात् गायत्री वा ततः स्मृता ।
वेदेषु पठ्यते चान्या जप्यकालेऽन्यथा पुनः ॥ ४.३६ ॥
— छन्दोंका पोषण करनेसे भी (वह) गायत्री कही गयी है। वेदोंमें (वह) एक प्रकारसे पढ़ी जाती है, और जपके समय फिर दूसरे प्रकारसे —
पाठभेद — (पृ. ३८, पं. २) वेदादौ पठ्यते चान्या जाप्यकाले तु अन्यथा इ.
प्राणायामे तथा ध्याने होमकालेषु चान्यथा ।
निग्रहे चापि शत्रूणामन्यथा परिपठ्यते ॥ ४.३७ ॥
...प्राणायाम में तथा ध्यान में और होम के समय दूसरी प्रकार से, तथा शत्रुओं के निग्रह (दमन) में भी दूसरी प्रकार से परिपठित की जाती है।
ओंकारं व्याहृतीस्तिस्रः प्रथमं संप्रयोजयेत् ।
ओंकाराद्या त्रिरावर्त्या वेदस्यारम्भणे तथा ॥ ४.३८ ॥
पहले ओंकार और तीन व्याहृतियोंका प्रयोग करे; और वेद(पाठ) के आरम्भमें (गायत्री) ओंकारसे आरम्भ करके तीन बार दोहरानी चाहिए।
प्रणवाद्या तु विज्ञेया जप्ये व्याहृतिभिः सह ।
ताभिस्तु सप्तभिः सार्धं सप्तोंकारसमन्विताम् ॥ ४.३९ ॥
जपमें (गायत्री) प्रणवसे आरम्भ होनेवाली, व्याहृतियों सहित जाननी चाहिए। उन सात (व्याहृतियों) के साथ, सात ओंकारोंसे युक्त —
पाठभेद — (पृ. ३८, पं. ८) सप्त व्याहृतिभिः सार्धं...न्वितः इ.
शिरसा सहितां देवीं प्राणायामे प्रयोजयेत् ।
प्रणवव्याहृतिभिः सार्धं स्वाहान्तां होमकर्मणि ॥ ४.४० ॥
— और शिरस् सहित देवीका प्राणायाममें प्रयोग करे; होम-कर्ममें प्रणव और व्याहृतियों सहित, अन्तमें "स्वाहा" वाली (गायत्रीका)।
पाठभेद — (पृ. ३८, पं. १०) व्याहृतीसार्धं स्वाहान्तो होमकर्मणि आर. ४५*
गायत्रीज्ञानमाहात्म्यम्
प्रतिलोमा प्रयोक्तव्या फट्कारान्ताऽऽभिचारिके ।
एवं यस्तु विजानाति गायत्रीं ब्राह्मणस्तु सः ॥ ४.४१ ॥
अभिचारिक कर्म में "फट्" अन्त वाली, प्रतिलोम क्रम से प्रयोग करनी चाहिए; और जो इस प्रकार गायत्री को जानता है, वह ब्राह्मण है।
पाठभेद — (पृ. ३८, पं. ११) प्रकर्तव्या ...भिचारके आर. ४५*
अन्यथा शूद्रधर्मा स्याद्वेदानामपि पारगः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ज्ञातव्या ब्राह्मणेन सा ॥ ४.४२ ॥
अन्यथा वेदों का पारगामी होकर भी शूद्रधर्म वाला होगा; इसलिए ब्राह्मण को सब प्रयत्न से उसे जानना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ३८, पं. १४) ब्राह्मणैस्तु सा इ.
व्याहृत्योंकारसहिता सशिराश्च यथार्थतः ।
सशिराश्चैव गायत्री यैर्विप्रैरवधारिता ॥ ४.४३ ॥
व्याहृतियों और ओंकार सहित, और यथार्थरूपसे शिरस् सहित — जिन विप्रोंने शिरस् सहित गायत्रीको (हृदयमें) धारण किया है —
ते जन्मबन्धनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति वै ।
षोडशाक्षरकं ब्रह्म गायत्री सशिरास्तथा ॥ ४.४४ ॥
— वे जन्मके बन्धनसे मुक्त होकर परब्रह्ममें प्रवेश करते हैं। सोलह अक्षरोंवाला ब्रह्म (शिरस्-मन्त्र) और शिरस् सहित गायत्री —
पाठभेद — (पृ. ३८, पं. १८) द्वादशाक्षरकं इ.
शताक्षरा गायत्री
सकृदावर्तयेद्यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
सोंकारं चतुरावर्त्या विज्ञेया सा शताक्षरा ॥ ४.४५ ॥
जो उसे एक बार भी आवर्तित करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है; ओंकार सहित चार बार आवर्तित करने से वह शताक्षरा जाननी चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ३९, पं. २) सौंकारं आ.
गायत्रीजपफलम्
शताक्षरा(रां) समावर्त्य चतुर्वेदफलं लभेत् ।
ओंकारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः ॥ ४.४६ ॥
शताक्षराको (एक बार) दोहराकर (साधक) चारों वेदोंका फल पाता है। ओंकारसे आरम्भ होनेवाली तीन अविनाशी महाव्याहृतियाँ —
पाठभेद — (पृ. ३९, पं. ३) सर्ववेदफलं इ.
(पृ. ३९, पं. ४) ...व्ययः आ.; अग्नि. २१५.३; मनुवचनमिति वीमि. २५३, मनु. २.८३
त्रिपदा चैव गायत्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ।
योऽधीतेऽहन्यहन्येतां त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः ॥ ४.४७ ॥
… और त्रिपदा गायत्री को ब्रह्म का मुख जानना चाहिए; जो प्रतिदिन बिना आलस्य के तीन वर्ष तक इसका अध्ययन करता है — …
पाठभेद — (पृ. ३९, पं. ५) मनुवचनमिति वीमि. २५३; अग्नि. २१५.३; चैव सावित्री मनु. २.८१
(पृ. ३९, पं. ६) ...हन्येषा इ.; चान्वहं चैतां त्रीणि, योगीश्वरवचनमिति मद. ८२; ...न्यतास्त्रीणि अग्नि. २१५.४
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ।
एतदक्षरमेतां च जपन् व्याहृतिपूर्विकाम् ॥ ४.४८ ॥
— वह वायुरूप होकर, आकाश-शरीरवाला होकर परब्रह्मको प्राप्त होता है। इस अक्षर (ॐ) और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (गायत्री) का जप करता हुआ —
पाठभेद — (पृ. ३९, पं. ७) अग्नि. २१५.४; योगीश्वरवचनमिति मद. ८२
(पृ. ३९, पं. ८) मनु. २.७८
सन्ध्ययोरुभयोर्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ।
सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत् त्रिकं द्विजः ॥ ४.४९ ॥
— विप्र दोनों सन्ध्याओंमें वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है। द्विज (गाँवके) बाहर इस त्रिक (ॐ, व्याहृति, गायत्री) का हजार बार अभ्यास करके —
पाठभेद — (पृ. ३९, पं. ९) मद. ८२; ...योर्वेदविद्विप्रो मनु. २.७८, इ.
(पृ. ३९, पं. १०) मनु. २.७९; .... कृत्वस्तु बहिरप्येतत् त्रिकं द्विजः, योगीश्वरवचनमिति मद. ८२
महतोऽप्येनसो मासात् त्वचेवाहिर्विमुच्यते ।
सप्तावृत्त्या पुनेद्देहं दशभिः प्राप्यते दिवम् ॥ ४.५० ॥
— एक महीनेमें बड़े पापसे भी (वैसे) छूट जाता है, जैसे साँप केंचुलसे। सात आवृत्तियोंसे देहको पवित्र करता है, दससे स्वर्ग पाता है।
पाठभेद — (पृ. ३९, पं. ११) मनु. २.७९; योगीश्वरवचनमिति मद. ८२
(पृ. ३९, पं. १२) सप्तावर्तोद्धरेद्देहं इ.; सप्तावर्तात् पुनात्येव दशभिः प्राप्नुयाद्दिवम्, योगीश्वरवचनमिति मद. ८२; सप्तावर्ता पापहरा दशभिः प्रापयेद्दिवम् अग्नि. २१५.६
विंशावृत्त्या तु सा देवी नयते हीश्वरालयम् ।
अष्टोत्तरशतं जप्त्वा तरते जन्मसागरम् ॥ ४.५१ ॥
किन्तु बीस आवर्तनों से वह देवी ईश्वर के घर (परमधाम) ले जाती है। एक सौ आठ बार जप करके जन्मसागर से तर जाता है।
पाठभेद — (पृ. ४०, पं. १) योगीश्वरवचनमिति मद. ८२; विंशावर्ता तु अग्नि. २१५.६, इ.
(पृ. ४०, पं. २) तारयेज्जन्मसागरात् मद. ८२, इ.; तीर्णः संसारसागरात् अग्नि. २१५.७
तीर्णो भूयो न पश्येत जन्ममृत्युं सुदारुणम्
गायत्रीं जपते यस्तु सोमवद्भासते तु सः ॥ ४.५२ ॥
पार होने के बाद वह फिर से अत्यंत कठिन जन्म और मृत्यु को नहीं देखता। जो गायत्री का जप करता है, वह सोम (चंद्रमा) के समान चमकता है।
पादार्धं पादमर्धं वा समस्तामृचमेव वा ।
सर्वेषां भवपापानां संकरे समुपस्थिते ॥ ४.५३ ॥
आधा पाद, (एक) पाद, आधी (ऋचा) अथवा पूरी ऋचा ही — सब सांसारिक पापोंका संकर (मिश्रण) उपस्थित होनेपर —
पाठभेद — (पृ. ४०, पं. ५) ... मृतमेव वा आ.
(पृ. ४०, पं. ६) सर्वेषां चैव, योगीश्वरवचनमिति मद. ८२; सर्वेषामेव पापानां अत्रि. ८.८, वसिष्ठस्मृ. २५.११
दशसाहस्रिकोऽभ्यासो गायत्र्याः शोधनं परम् ।
रुद्रकूष्माण्डजप्यैश्च जप्यैः सौरार्णकैस्तथा ॥ ४.५४ ॥
— गायत्रीका दस हजार (जप) का अभ्यास परम शोधन है; रुद्र, कूष्माण्ड और सौर(?) मन्त्रोंके जपोंसे —
पाठभेद — (पृ. ४०, पं. ७) योगीश्वरवचनमिति मद. ८२; दशसाहस्रमभ्यस्ता गायत्री अत्रि. ८.८; गायत्र्याः साधनं परं इ.; अभ्यासो दशसाहस्रः सावित्र्याः शोधनं महत् वसिष्ठस्मृ. २५.१२
(पृ. ४०, पं. ८) ...ण्डरूपैश्च जपैस्तैर्विविधैस्तथा अत्रि. ८.९
ऋषिभैर्विरजाजाप्यैर्गायत्री च विशिष्यते ।
ब्रह्महत्यां सुरापानं सुवर्णस्तेयमेव वा ॥ ४.५५ ॥
— (और) ऋषभ (?) तथा विरजा मन्त्रोंके जपसे भी गायत्री श्रेष्ठ है। ब्रह्महत्या, सुरापान अथवा सुवर्णकी चोरी —
पाठभेद — (पृ. ४०, पं. ९) वैराजर्षिभिर्जप्यैश्च गायत्र्यास्तु विशेषतः अत्रि. ८.९
(पृ. ४०, पं. १०) ... हत्या सुरा ... अग्नि. २१५.९
गुरुदारागमं चैव जप्येनैव पुनाति सा ।
यत्र यत्र च संकीर्णमात्मानं मन्यते द्विजः ॥ ४.५६ ॥
… और गुरुपत्नीगमन को भी वह केवल जप से ही पवित्र कर देती है। जहाँ-जहाँ द्विज अपनेको संकीर्ण मानता है —
पाठभेद — (पृ. ४१, पं. १) गुरुदारागमश्चैव अग्नि. २१५.९
(पृ. ४१, पं. २) याज्ञ. ३.३१०, याज्ञवल्क्यवचनमिति स्मृच. १५२; संकीर्णं पश्यत्यात्मन्यसंशयम् लघुशंखस्मृ. ७१
तत्र तत्र तिलैर्होमो गायत्र्या जपनं तथा ।
वायुभक्षो दिवा तिष्ठेत् रात्रिं नीत्वाप्सु सूर्यदृक् ॥ ४.५७ ॥
… वहाँ-वहाँ तिलों से होम और गायत्री का जप करे। दिन में वायु पीकर (उपवास करके) खड़ा रहे, रात्रि जल में बिताकर, सूर्य को देखता हुआ …
पाठभेद — (पृ. ४१, पं. ३) वाचनं तथा याज्ञ. ३.३१०; जप एव वा, याज्ञवल्क्यवचनमिति स्मृच. १५२ गायत्र्यावर्तनं तथा लघुशंखस्मृ. ७१
(पृ. ४१, पं. ४) तिष्ठन् याज्ञ. ३.३११; प्यसूर्यदृक् इ.; दिनं तिष्ठे... मद. ८३; दिनं स्थित्वा रात्रिं नीत्वा तु सूर्यदृक् वै. ३३५
जप्त्वा सहस्रं गायत्र्याः शुध्येद् ब्रह्मवधादृते ।
शतेन गायत्र्याः स्नायात् शतमन्तर्जले जपेत् ॥ ४.५८ ॥
… गायत्री का सहस्र जप करके ब्रह्महत्या के सिवा (अन्य पापों से) शुद्ध हो जाए। सौ गायत्री मन्त्रों से स्नान करे और सौ बार अन्तर्जल में जप करे …
पाठभेद — (पृ. ४१, पं. ५) याज्ञ. ३.३१०, मद. ८३; शुचिर्ब्रह्म... वै. ३३५
(पृ. ४१, पं. ६) स्नायात् शतेन गायत्र्याः वै. ३३५
संध्योपासनमाहात्म्यम्
अपः शतेन पीत्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
सायं प्रातस्तु यः संध्यां सऋक्षां सेवते द्विजः ॥ ४.५९ ॥
… सौ (गायत्री से अभिमन्त्रित) जल पीकर वह सर्वपापों से मुक्त हो जाता है। जो द्विज सायं और प्रातः नक्षत्रों सहित संध्या का सेवन करता है …
पाठभेद — (पृ. ४१, पं. ७) पीत्वा च वै. ३३५; आपः शतेन आ.
(पृ. ४१, पं. ८) संध्यामस्कन्नामुपतिष्ठते वै. ३३५
जपन् वै पावनीं देवीं सावित्रीं लोकमातरम् ।
स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो धूतकिल्बिषः ॥ ४.६० ॥
… लोकमाता पावनी देवी सावित्री का जप करता हुआ, वह ब्राह्मण उस देवी से पवित्र होकर निष्पाप हो जाता है …
पाठभेद — (पृ. ४१, पं. ९) देवीं पवित्रां वेदमातरम् वै. ३३५
(पृ. ४१, पं. १०) धूतकल्मषः वै. ३३५
न सीदेत् प्रतिगृह्णानः पृथिवीं च ससागराम् ।
गोघ्नः पितृघ्नो मातृघ्नो भ्रूणहा गुरुतल्पगः ॥ ४.६१ ॥
— समुद्र सहित पृथ्वीका दान लेता हुआ भी (वह) दोषी नहीं होता। गोहत्यारा, पितृहत्यारा, मातृहत्यारा, भ्रूणहत्यारा, गुरुपत्नीगामी —
पाठभेद — (पृ. ४२, पं. १) वै. ३३५
(पृ. ४२, पं. २) अग्नि. २१५.११
गायत्र्यक्षरदेवताः
ब्रह्महा हेमहारी च यस्तु विप्रः सुरां पिबेत् ।
गायत्र्याः शतसाहस्रे जपे भवति वै शुचिः ॥ ४.६२ ॥
— ब्रह्महत्यारा, सोनेका चोर, और जो विप्र सुरा पीता है — (ये भी) गायत्रीके एक लाख जपसे शुद्ध हो जाते हैं।
पाठभेद — (पृ. ४२, पं. ३) ब्रह्मघ्नः स्वर्णहारी च सुरापो लक्षजप्यतः अग्नि. २१५.११
(पृ. ४२, पं. ४) गायत्र्या लक्षजापेन पातकेभ्यो विमुच्यते वै. ३३५
अक्षराणि च दैवत्यं संप्रवक्ष्याम्यतःपरम् ।
आग्नेयं प्रथमं ज्ञेयं वायव्यं च द्वितीयकम् ॥ ४.६३ ॥
… इसके आगे मैं अक्षरों और उनके देवताओं को कहूँगा: पहला 'आग्नेय' जानना चाहिए और दूसरा 'वायव्य' …
पाठभेद — (पृ. ४२, पं. ५) इतः प्रभृति जप्यकालेषु संचिन्त्य इत्यादि (४.७० पू.) श्लोकार्धपर्यन्तो भागः ब्रह्मोक्तत्वेन निर्दिष्टः स्मृच. १४४
तृतीयं सूर्यदैवत्यं चतुर्थं वैद्युतं स्मृतम् ।
पञ्चमं यमदैवत्यं वारुणं षष्ठमुच्यते ॥ ४.६४ ॥
तृतीय सूर्यदैवत्य है, चौथा वैद्युत स्मृत है, पाँचवाँ यमदैवत्य है और छठा वारुण कहा जाता है।
पाठभेद — (पृ. ४२, पं. ७) तृतीयं शशिदैवतम् बृप. ४.१८
बार्हस्पत्यं सप्तमं च पार्जन्यमष्टमं विदुः ।
ऐन्द्रं तु नवमं ज्ञेयं गांधर्वं दशमं स्मृतम् ॥ ४.६५ ॥
सातवाँ बार्हस्पत्य (बृहस्पतिका) और आठवाँ पार्जन्य (पर्जन्यका) जानते हैं; नवाँ ऐन्द्र जानना चाहिए और दसवाँ गान्धर्व कहा गया है।
पौष्णमेकादशं ज्ञेयं द्वादशं मैत्रवारुणम् ।
त्वाष्ट्रं त्रयोदशं ज्ञेयं वासवं च चतुर्दशम् ॥ ४.६६ ॥
ग्यारहवाँ पौष्ण जानने योग्य है, बारहवाँ मैत्रवारुण, तेरहवाँ त्वाष्ट्र जानने योग्य है और चौदहवाँ वासव है।
पाठभेद — (पृ. ४२, पं. ११) त्वाष्ट्रमेकादशं बृप. ४.२०
(पृ. ४२, पं. १२) पूष्णस्त्रयोदशम् बृप. ४.२१
मारुतं पञ्चदशकं सौम्यं षोडशकं स्मृतम् ।
सप्तदशं त्वाङ्गिरसं वैश्वदेवमतःपरम् ॥ ४.६७ ॥
पन्द्रहवाँ मारुत है और सोलहवाँ सौम्य स्मृत है, सत्रहवाँ आङ्गिरस है तथा उसके बाद अठारहवाँ वैश्वदेव है...
आश्विनं चैकोनविंशं प्राजापत्यं तु विंशकम् ।
सर्वदेवमयं ज्ञेयमेकविंशकमक्षरम् ॥ ४.६८ ॥
उन्नीसवाँ आश्विन और बीसवाँ प्राजापत्य है; एकविंशति (इक्कीसवाँ) अक्षर सर्वदेवमय जानने योग्य है।
पाठभेद — (पृ. ४३, पं. २) एकविंशं कुबेरस्य बृप. ४.२४
रौद्रं द्वाविंशकं प्रोक्तं त्रयोविंशं तु ब्राह्मणम् ।
वैष्णवं तु चतुर्विंशमेता अक्षरदेवताः ॥ ४.६९ ॥
बाईसवाँ रौद्र कहा गया है, तेईसवाँ ब्राह्मण और चौबीसवाँ वैष्णव— ये सब अक्षरदेवताएँ हैं।
पाठभेद — (पृ. ४३, पं. ३) रौद्रं द्वादशकं आ.
अक्षरदेवताचिन्तनफलम्
जप्यकालेषु संचिन्त्य विष्णुसायुज्यतां व्रजेत् ।
एतस्यां ज्ञातमात्रायां वाङ्मयं विदितं भवेत् ॥ ४.७० ॥
(इन्हें) जपके समय चिन्तन करके (साधक) विष्णुसायुज्य पाता है। इस (गायत्री) के जानते ही सारा वाङ्मय जाना हुआ हो जाता है —
गायत्र्यज्ञाननिन्दा
उपासितं भवेत् सर्वं विश्वं भुवनसप्तकम् ।
अज्ञात्वा चैव गायत्रीं ब्राह्मण्यात् परिहीयते ॥ ४.७१ ॥
— (और) सात भुवनोंवाले सारे विश्वकी उपासना हो जाती है। गायत्रीको न जानकर (मनुष्य) ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है —
अपवादेन संयुक्तो भवेच्छ्रुतिनिदर्शनात् ।
येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि ॥ ४.७२ ॥
और श्रुति के निदर्शन के अनुसार अपवाद से युक्त होता है; जिन द्विजों को यथाविधि "सावित्री" का उपदेश नहीं किया गया है —
पाठभेद — (पृ. ४३, पं. १०–११) मनु. ११.१९१
तांश्चारयित्वा त्रीन् कृच्छ्रान् यथाविध्युपनाययेत् ।
एतया चापि संयुक्तः काले च क्रियया स्वया ॥ ४.७३ ॥
उनसे तीन कृच्छ्र करवाकर यथाविधि उपनयन करना चाहिए; और इस (गायत्री) से युक्त होकर, समय पर अपनी क्रिया से स्वयं —...
पाठभेद — (पृ. ४३, पं. १०–११) मनु. ११.१९१
विप्रक्षत्रियविड्योनिर्गृह्णाणां पतिसाधुषु ॥
(?)
ओंकारो व्याहृतीः सप्त सावित्री प्राणसंयमः ॥ ४.७४ ॥
(?) विप्र, क्षत्रिय और वैश्य योनिवालोंमें … (पाठ अस्पष्ट)। ओंकार, सात व्याहृतियाँ, सावित्री, प्राणायाम —
संध्या न वन्दिता येन ब्राह्मण्यं तस्य वै कुतः ॥ ४.७५ ॥
— और संध्या — इनकी वन्दना जिसने नहीं की, उसका ब्राह्मणत्व कहाँ?
सावित्रीं यो न जानाति वृथा तस्य परिश्रमः ॥
गायत्रीमात्रसंतुष्टो वरं विप्रः सुयन्त्रितः ॥ ४.७६ ॥
जो सावित्री को नहीं जानता, उसका परिश्रम व्यर्थ है; केवल गायत्री से ही संतुष्ट और सुयन्त्रित विप्र श्रेष्ठ है…
पाठभेद — (पृ. ४३, पं. १६) सावित्रीमात्रसारोऽपि मनु. २.११८
गायत्रीमाहात्म्यम्
नायन्त्रितश्चतुर्वेदः सर्वाशी सर्वविक्रयी ।
सारभूतास्तु वेदानां गुह्योपनिषदः स्मृताः ॥ ४.७७ ॥
न कि असंयमी चारों वेदों का ज्ञाता, जो सब कुछ खाता और सब कुछ बेचता है; गुह्य उपनिषदें वेदों का सार कही गयी हैं।
पाठभेद — (पृ. ४४, पं. १) नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि मनु. २.११८
ताभ्यः सारं तु गायत्री गायत्र्या व्याहृतित्रयम् ।
व्याहृतिभ्यस्तथोंकारस्त्रिवृद्ब्रह्म स उच्यते ॥ ४.७८ ॥
…उन उपनिषदों का सार तो गायत्री है, गायत्री का तीन व्याहृति है, व्याहृतियों का ओंकार है और वह त्रिवृद्ब्रह्म कहलाता है…
त्रिवृद्ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ।
मधुवत् संभृतं ह्येतद्विप्रासो विष्णुना स्वयम् ॥ ४.७९ ॥
तीन रूपोंवाले (त्रिवृत्) ब्रह्ममें पारंगत (साधक) परब्रह्मको प्राप्त होता है। हे विप्रो! स्वयं विष्णुने इसे मधुकी तरह संचित किया है।
गायत्रीं चैव वेदांश्च तुलया समतोलयत् ।
एकतश्चतुरो वेदान् गायत्रीमेकतः समा(म्) ॥ ४.८० ॥
…गायत्री तथा वेदों को तराजू के समान तुलकर समतुल्य किया—एक ओर चारों वेद और एक ओर गायत्री, दोनों बराबर हुए…
एषा हि त्रिपदा देवी सर्वब्रह्ममयी शुभा ।
तपसा महता दृष्टा विश्वामित्रेण धीमता ॥ ४.८१ ॥
यह त्रिपद वाली देवी सब ब्रह्ममयी और शुभा है, जिसे बुद्धिमान विश्वामित्र ने महान तप से देखा था।
गायत्रीजपफलम्
संवत्सरं वा षण्मासान् यो जपेद्विधिवद्द्विजः ।
सोऽचिरात्सर्वकामांश्च प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥ ४.८२ ॥
जो द्विज विधिपूर्वक एक वर्ष या छः मास तक जप करता है, वह बिना विलंब के सब कामनाओं को प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
गायत्रीनिर्णयश्लोकाः सप्ततिर्नव एव च ।
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये गायत्रीनिर्णयो (नाम) ॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥
पाठभेद — (पृ. ४४, पं. १४) गायत्रीनिर्णयश्चतुर्थोध्यायः आ.; योगयाज्ञवल्क्य गायत्र्या निर्णयं नाम तृतीयप्रकरणम् ॥*॥ इ.
पञ्चमोऽध्यायः — ओंकारगायत्रीन्यासः
अध्याय-सार — ओंकार-गायत्री-न्यास — बारह श्लोकोंका छोटा अध्याय, जिसमें पिछले तीन अध्यायोंके मन्त्र शरीरमें स्थापित किये जाते हैं; न्यास करनेमात्रसे ब्राह्मण ब्रह्मरूप हो जाता है (५.१)। प्रणवके अकारका नाभिमें (सत्त्व), उकारका हृदयमें (रज), मकारका मूर्धामें (तम) न्यास करके ब्रह्मरूप आत्माका ध्यान करे (५.२–३)। सात व्याहृतियाँ पैरोंसे भौंहोंके बीचतक रखी जाती हैं — भूः पैरोंमें, सत्यम् भ्रूमध्यमें; उसके ऊपर हिरण्मय परम कोशमें निष्कल ब्रह्म, ‘ज्योतियोंकी ज्योति’, ध्येय है (५.५–७)। फिर गायत्रीके चौबीस अक्षर पैरके अँगूठेसे सिरतक चौबीस स्थानोंमें, और दूसरे प्रकारसे भी, रखे जाते हैं। जो द्विज यह चतुर्विध न्यास एक बार भी करता है, वह सब पापोंसे छूटकर ब्रह्मसायुज्य पाता है।
न्यासनिरूपणप्रतिज्ञा
न्यासं तु संप्रवक्ष्यामि ओंकारादि यथायथम् ।
येन विन्यस्तमात्रेण ब्रह्मीभवति ब्राह्मणः ॥ ५.१ ॥
मैं ओंकार आदि का यथाविधि न्यास कहूँगा, जिससे केवल विन्यस्त करने मात्र से ही ब्राह्मण ब्रह्मरूप हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. ४५, पं. २) अयमध्यायः इ. पुस्तके नास्ति ।
प्रणवाक्षरन्यासः
अकारं विन्यसेन्नाभ्यां सत्त्वरूपं निरञ्जनम् ।
उकारं हृदये तद्वद्राजसं तद्गुणं स्मृतम् ॥ ५.२ ॥
नाभिमें सत्त्वरूप, निरञ्जन अकारका न्यास करे; वैसे ही हृदयमें उकारका — जो राजस, उस (रजो)गुणवाला कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ४५, पं. ४) अकारं नाभिदेशे तु उकारं हृदि विन्यसेत् आर. २४
मकारं मूर्ध्नि विन्यस्य तमोमात्रं तृतीयकम् ।
ब्रह्मरूपं तदात्मानं ध्यायेद्विगतकल्मषम् ॥ ५.३ ॥
मस्तक पर तृतीय (तीसरा) अक्षर जो तमोमात्र है, मकार का न्यास करके, उस पाप-रहित ब्रह्मरूप आत्मा का ध्यान करे।
पाठभेद — (पृ. ४५, पं. ६) मकारं मूर्ध्नि विन्यस्येदेष न्यासो विमुक्तिदः आर. २४
व्याहृतिन्यासः
कुर्याद्व्याहृतिभिर्न्यासं वक्ष्यमाणक्रमेण तु ।
पूर्वमेव तु याः प्रोक्ता भूराद्यास्ते समासतः ॥ ५.४ ॥
आगे कहे जाने वाले क्रम से व्याहृतियों से न्यास करे — जो भूः आदि पहले ही कही जा चुकी हैं, वे संक्षेप में (ये हैं)...
भूर्लोकं पादयोर्मध्ये भुवर्लोकं तु जानुनोः ।
स्वर्लोकं कटिदेशे तु नाभिदेशे महस्तथा ॥ ५.५ ॥
भूर्लोकका दोनों पैरोंके बीच, भुवर्लोकका घुटनोंमें, स्वर्लोकका कटि-प्रदेशमें, और महर्लोकका नाभि-प्रदेशमें (न्यास करे);
जनलोकं कण्ठदेशे मुखबिम्बे तपस्तथा ।
भ्रुवोर्ललाटसंधौ तु सत्यलोकं प्रतिष्ठितम् ।
हिरण्मये परे कोशे ध्येयः परमनिष्कलः ॥ ५.६ ॥
जनलोकका कण्ठ-प्रदेशमें, तपोलोकका मुखमण्डलमें, और सत्यलोकका भौंहोंके बीच ललाटकी सन्धिमें प्रतिष्ठित (न्यास करे)। सुवर्णमय परम कोशमें परम निष्कल (ब्रह्म) ध्यान करने योग्य है।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ।
गायत्रीं विन्यसेत् पश्चाच्छरीरे चात्मनो बुधः ॥ ५.७ ॥
वह शुभ्र (ब्रह्म) ज्योतियोंकी ज्योति है, जिसे आत्मवेत्ता जानते हैं। उसके पश्चात् बुद्धिमान् अपने शरीरमें गायत्रीका न्यास करे —
गायत्रीन्यासः
चतुर्विंशतिस्थानेषु पादो(द)मूर्धान्तमस्तकम् ।
पादाङ्गुष्ठे तथा गुल्फे जङ्घयोर्जानुनोस्तथा ॥ ५.८ ॥
— पैरसे लेकर सिरकी चोटीतक चौबीस स्थानोंमें: पैरके अँगूठेमें, टखनेमें, पिंडलियोंमें, घुटनोंमें,
पाठभेद — (पृ. ४५, पं. १७) पादोमूर्धान्त आ.
ऊरुभ्यां गुह्यवृषणे कटौ नाभ्यां तथैव च ॥
जठरे स्तने च हृदये कण्ठे वक्त्रे च तालुनि ॥ ५.९ ॥
जाँघों में, गुह्य और वृषण में, कटि में तथा नाभि में भी उसी प्रकार; जठर में, स्तनों में, हृदय में, कण्ठ में, मुख में तथा तालु में...
श्रोत्रे चक्षुर्भ्रुवोर्मध्ये ललाटे पूर्वके मुखे ।
याम्यपश्चिमके चैव उत्तरे च यथाक्रमम् ॥ ५.१० ॥
कानों में, आँखों में, भौंहों के मध्य में, ललाट में, मुख के पूर्व भाग में, दक्षिण में, पश्चिम में तथा उत्तर में यथाक्रम से...
प्रकारान्तरेण गायत्रीन्यासः
अन्तिमं मूर्ध्नि विन्यस्य परब्रह्म स उच्यते ।
गुह्ये चक्षुषि वक्त्रे च समीके (?) हृदये तथा ॥ ५.११ ॥
अन्तिम (अक्षर) का मूर्धामें न्यास करके — वह परब्रह्म कहलाता है। (फिर शिरस्-मन्त्रका) गुह्यमें, आँखमें, मुखमें, समीके (?), और हृदयमें —
न्यासचतुष्टयमाहात्म्यम्
पद्भ्यां नाभ्यां ललाटे तु नवमं मूर्ध्नि विन्यसेत् ।
इदं न्यासचतुष्कं तु सकृन्न्यस्यति यो द्विजः ॥ ५.१२ ॥
— दोनों पैरोंमें, नाभिमें, ललाटमें, और नवाँ मूर्धामें न्यास करे। जो द्विज इस चतुर्विध न्यासका एक बार भी न्यास करता है —
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मसायुज्यमृच्छति ।
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये ओंकारगायत्रीन्यासो (नाम)पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥
पाठभेद — (पृ. ४६, पं. १०) ...गायत्रीन्यासः पंचमोध्यायः आ.
षष्ठोऽध्यायः — संध्यानिर्णयः
अध्याय-सार — संध्यानिर्णय। संध्या दिन-रातके पापसे छुड़ाती है (६.१); जो उसे न जाने और न करे, वह जीते-जी शूद्र है और सब द्विज-कर्मसे बाहर करने योग्य है (६.२–३)। माहात्म्य (६.१२ के मन्देह राक्षसोंके प्रसंग सहित) के बाद तीन संध्याएँ बतायी जाती हैं: प्रातः गायत्री (रक्त), मध्याह्न सावित्री (श्वेत) और सायं सरस्वती (कृष्ण) (६.१७–१८), और ‘संध्या’ पदकी निरुक्ति। फिर अध्यायका केन्द्र आता है — ‘अनूदकी’ संध्या, जो जल, लेप और स्नेहके बिना होती है: हृदयाकाशमें, सुषुम्णामें बँधे दीर्घ घण्टानाद-से ईश्वरका मनसे ध्यान (६.२२–२४)। अन्तमें संध्याका काल, आश्रमके अनुसार स्नानकी संख्या, असमर्थके लिए अनुकल्प और स्नान-मार्जनके निमित्त आते हैं; और ऋषि स्नानकी पूरी विधि पूछते हैं (६.३१), जिसका उत्तर अगला अध्याय है।
संध्योपासननिर्णयप्रतिज्ञा
अतःपरं प्रवक्ष्यामि संध्योपासननिर्णयम् ।
अहोरात्रकृतात् पापात् यामुपास्य विमुच्यते ॥ ६.१ ॥
इसके आगे मैं संध्योपासन का निर्णय कहूँगा, जिसकी उपासना करके मनुष्य अहोरात्र किए हुए पाप से मुक्त हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. ४७, पं. २) वीमि. २५६, स्मृच. १३४
(पृ. ४७, पं. ३) ...कृतैः पापैर्यामु... प्रमुच्यते वीमि. २५६, स्मृच. १३४
संध्यामाहात्म्यम्
संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता ।
जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते ॥ ६.२ ॥
जिसके द्वारा संध्या का विज्ञान न किया गया, जिस संध्या की उपासना नहीं की गई, वह जीवित रहते हुए शूद्र हो जाता है और मरने पर श्वान के रूप में जन्म लेता है।
पाठभेद — (पृ. ४७, पं. ४) संध्या नैवाप्युपासिता वीमि. २५६; ज्ञात्वा नैव (संध्या येन, न च संध्या) ...पासिता बृप. २.८५
(पृ. ४७, पं. ५) श्वा चोपजायते वीमि. २५६; गोभिलवचनमिति वै. ३११
नोपतिष्ठति यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् ।
स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥ ६.३ ॥
जो प्रातःकालकी संध्यामें (सूर्यका) उपस्थान नहीं करता और जो सायंकालकी संध्याकी उपासना नहीं करता, वह शूद्रकी भाँति द्विजोंके सब कर्मोंसे बहिष्कृत करने योग्य है।
पाठभेद — (पृ. ४७, पं. ६) वीमि. २५६; न तिष्ठति तु यः पूर्वां... माम् मनु. २.१०३
(पृ. ४७, पं. ७) वीमि. २५६, मनु. २.१०३
सर्वावस्थोऽपि यो विप्रः संध्योपासनतत्परः ।
ब्राह्मण्याच्च न हीयेत सोऽन्यजन्मगतोऽपि सन् ॥ ६.४ ॥
जो विप्र सब अवस्थाओंमें भी संध्योपासनमें तत्पर रहता है, वह दूसरे जन्ममें जाकर भी ब्राह्मणत्वसे हीन नहीं होता।
पाठभेद — (पृ. ४७, पं. ८) वीमि. २५६; सर्वावस्थासु स्मृच. १३४
(पृ. ४७, पं. ९) अन्यजन्मगतोऽपि सः स्मृच. १३४; अन्य...पि सन् वीमि. २५६
ओंकारो व्याहृतीः सप्त गायत्री सशिरास्तथा ।
आपोहिष्ठा ऋचस्तिस्रः सूक्तं चैवाघमर्षणम् ॥ ६.५ ॥
ओंकार, सात व्याहृतियाँ, शिरस् सहित गायत्री, "आपो हि ष्ठा" आदि तीन ऋचाएँ और अघमर्षण सूक्त —
पाठभेद — (पृ. ४७, पं. १०) प्रणवो व्याहृतीः स्मृत. ३८६
(पृ. ४७, पं. ११) स्मृत. ३८६
आदित्यरक्षणार्थं तु सायंप्रातर्दिने दिने ।
सृष्टं स्वयंभुवा पूर्वं ब्राह्मणानां मुखे स्थितम् ॥ ६.६ ॥
— (यह संध्या-कर्म) प्रतिदिन सायं और प्रातः सूर्यकी रक्षाके लिए पूर्वकालमें स्वयम्भूने रचा, (और यह) ब्राह्मणोंके मुखमें स्थित है।
पाठभेद — (पृ. ४८, पं. १) स्मृत. ३८६
(पृ. ४८, पं. २) ब्रह्मणस्तत् मुखं स्मृतम् स्मृत. ३८६
सातत्यं कर्म विप्राणामहोरात्राघसो(घनो)दनम् ।
पापं तु जायते तस्मादनार्तस्तन्न चोत्सृजेत् ॥ ६.७ ॥
विप्रोंका यह निरन्तर (किया जानेवाला) कर्म दिन-रातके पापोंको दूर करनेवाला है; इसे छोड़नेसे पाप होता है, इसलिए जो पीड़ित (असमर्थ) न हो, वह इसे न छोड़े।
अनार्तश्चोत्सृजेद्यस्तु स विप्रः शूद्रसंमितः ।
प्रायश्चित्तीभवेद्विप्रो लोके भवति निन्दितः ॥ ६.८ ॥
जो पीड़ित न होते हुए भी इसे छोड़ता है, वह विप्र शूद्रके समान है; वह विप्र प्रायश्चित्तका भागी होता है और लोकमें निन्दित होता है।
पाठभेद — (पृ. ४८, पं. ५) वीमि. २५६; याज्ञवल्क्यवचनमिति पमा. १.१.३०१
(पृ. ४८, पं. ६) भवेच्चैव वीमि. २५६, स्मृच. १३९
यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां तु विकर्मस्था द्विजातयः ।
तेषां तु पावनार्थाय संध्या सृष्टा स्वयंभुवा ॥ ६.९ ॥
इस पृथ्वीपर जितने द्विज विकर्म (निषिद्ध कर्म) में स्थित हैं, उनको पवित्र करनेके लिए स्वयम्भूने संध्याकी रचना की।
पाठभेद — (पृ. ४८, पं. ७) वीमि. २५६;...न्तोऽस्यां विकर्मस्थाः पृथिव्यां बालिशा द्विजाः आ.
(पृ. ४८, पं. ८) वीमि. २५६; सृष्टा संध्या स्मृच. १३४; स्वयंभुवः आ.
या संध्या सा तु गायत्री त्रिधा भूत्वा प्रतिष्ठिता ।
संध्या ह्युपासिता येन तेन विष्णुरुपासितः ॥ ६.१० ॥
जो संध्या है, वही गायत्री है, (जो) तीन रूपोंमें होकर प्रतिष्ठित है। जिसने संध्याकी उपासना की, उसने विष्णुकी उपासना कर ली।
ह्रासवृद्धी तु सततं दिवसानां यथाक्रमम् ।
संध्या मुहूर्तमात्रं तु ह्रासे वृद्धौ तु सा समा ॥ ६.११ ॥
दिनोंका घटना-बढ़ना तो क्रमसे निरन्तर होता रहता है; पर संध्या मुहूर्तमात्र (की) है — घटने और बढ़नेमें वह समान रहती है।
पाठभेद — (पृ. ४८, पं. ११) कुल्लू. २.१०१, हे. ३.२. पृ. ६९६
(पृ. ४८, पं. १२) अप. ४९; मासे वृद्धौ आ.; ह्रासे वृद्धौ समा स्मृता वीमि. २६१; च सा स्मृता कुल्लू. २.१०१
त्रिंशत्कोट्यस्तु विख्याता मंदेहा नाम राक्षसाः ।
प्रद्रवन्ति सहस्रांशुमुदयन्तं दिने दिने ॥ ६.१२ ॥
मन्देह नामके तीस करोड़ प्रसिद्ध राक्षस प्रतिदिन उगते हुए सूर्यकी ओर दौड़ते हैं।
पाठभेद — (पृ. ४८, पं. १३) वीमि. २५६, स्मृच. १३४, बृप. २.७४, वै. ३१२
(पृ. ४८, पं. १४) वीमि. २५६, वै. ३१२; प्राद्रवन्ति स्मृच. १३४
अहन्यहनि ते सर्वे सूर्यमिच्छन्ति खादितुम् ।
अथ सूर्यस्य तेषां च युद्धमासीत् सुदारुणम् ॥ ६.१३ ॥
वे सब प्रतिदिन सूर्यको खाना चाहते हैं; तब सूर्य और उनका अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ।
पाठभेद — (पृ. ४९, पं. १) वीमि. २५६, स्मृच. १३४, वै. ३१२
(पृ. ४९, पं. २) वीमि. २५६, वै. ३१२; अतः सूर्यस्य तेषां तु स्मृच. १३४
ततो देवगणाः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ।
संध्येति (संध्यां तु) समुपासीनाः प्रक्षिपन्ति महज्जलम् ॥ ६.१४ ॥
तब सब देवगण और तपोधन ऋषि संध्याकी उपासना करते हुए (अञ्जलिसे) जल फेंकते हैं —
पाठभेद — (पृ. ४९, पं. ३) बृप. २.८२, वीमि. २५६, स्मृच. १३४, वै. ३१२
(पृ. ४९, पं. ४) यत् संध्यां ते उपासन्तः क्षिपन्त्येतज्जलं महत् बृप. २.८१; संध्येति तमुपासीना वीमि. २५६; संध्यां तु समुपासीना यत् क्षिपन्ति स्मृच. १३४; संधौ संध्यामुपासीना यत् क्षिपन्त्यन्वहं जलम् वै. ३१२
ओंकारब्रह्मसंयुक्तं गायत्र्या चाभिमन्त्रितम् ।
तेन दह्यन्ति ते दैत्या वज्रीभूतेन वारिणा ॥ ६.१५ ॥
— ओंकार (रूप) ब्रह्मसे युक्त और गायत्रीसे अभिमन्त्रित; उस वज्ररूप बने जलसे वे दैत्य जल जाते हैं।
पाठभेद — (पृ. ४९, पं. ५) वीमि. २५६, बृप. २.८२, गायत्र्या च समन्वितम् आ.; ब्रह्मव्याहृतिसंयुक्तं स्मृच. १३४, वै. ३१२
(पृ. ४९, पं. ६) वीमि. २५७; दह्येरन् (दह्यन्ते) तेन ते दैत्या बृप. २.८२; दह्यति आ.; वज्रभूतेन स्मृच. १३४; तेनादह्यन्त वै. ३१२
एतद्विदित्वा यो विप्र उपास्ते संशितव्रतः ।
दीर्घमायुः स विन्देत सर्वपापैश्च मुच्यते ॥ ६.१६ ॥
इस विधि को जानकर जो विप्र दृढ व्रत वाला उपासना करता है, वह दीर्घायु प्राप्त करता है और सब पापों से मुक्त हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. ४९, पं. ७) यः संध्यामुपास्ते संशितव्रतः स्मृच. १३४, वै. ३१२
(पृ. ४९, पं. ८) सर्वपापैः प्रमुच्यते वीमि. २५७, स्मृच. १३४, वै. ३१२
संध्यात्रयवर्णनम्
पूर्वा संध्या तु गायत्री सावित्री मध्यमा स्मृता ।
या भवेत् पश्चिमा संध्या सा विज्ञेया सरस्वती ॥ ६.१७ ॥
प्रातःकालकी संध्या गायत्री है, मध्याह्नकी सावित्री कही गयी है, और जो सायंकालकी संध्या है वह सरस्वती जाननी चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ४९, पं. ९) स्मृच. १३५, अप. ४९; च गायत्री स्मृत. ३९०
(पृ. ४९, पं. १०) स्मृच. १३५, अप. ४९; विज्ञेया सा स्मृत. ३९०
रक्ता भवति गायत्री सावित्री श्वेतवर्णिका ।
कृष्णा सरस्वती ज्ञेया संध्यास्तिस्र उदाहृताः ॥ ६.१८ ॥
गायत्री लाल (वर्णकी) होती है, सावित्री श्वेत वर्णकी, और सरस्वती काली जाननी चाहिए — (इस प्रकार) तीन संध्याएँ कही गयी हैं।
पाठभेद — (पृ. ४९, पं. ११) अप. ४९; श्वेता भवति सावित्री गायत्री रक्तवर्णिका वीमि. २५३; श्वेता भवति गायत्री सावित्री शुभ्रवर्णिका स्मृच. १४३; गायत्री तु भवेद्रक्ता सावित्री शुक्लवर्णिका वै. ३१२
(पृ. ५०, पं. १) संध्यात्रयमुदाहृतम् वीमि. २५३, स्मृच. १४३, अप. ५०; सरस्वती तथा कृष्णा उपास्या वर्णभेदतः वै. ३१२
संध्यापदनिरुक्तिः
त्रयाणां चैव देवानां संगमस्तूभयोर्भवेत् ।
मध्यमायां च संध्यायां सर्वदेवसमागमः ॥ ६.१९ ॥
तीनों देवताओं का संगम दोनों (प्रातः और सायंकाल की) संध्याओं में होता है, और मध्यमा संध्या में सब देवताओं का समागम होता है।
पाठभेद — (पृ. ५०, पं. २) ......भयो भवेत् आ.
संधिः सर्वसुराणां च तेन संध्या उदाहृता ।
गरीयसी हि भूतानां तस्मात्यैत्री(त्रैती) तनुर्हि सा ॥ ६.२० ॥
सब देवताओं की सन्धि होने से वह संध्या कही गई है, क्योंकि वह भूतों के लिए गरीयसी है, इसलिए वह त्रैती तनु वाली है।
पाठभेद — (पृ. ५०, पं. ५) तस्मात्यैत्री तनुर्हि सा आ.
संधिते तु परे सूक्ष्मे निर्गुणे गुणबोधिनी ।
प्रधानपुरुषातीते सा संध्या संधिरुच्यते ॥ ६.२१ ॥
किन्तु जो परे (परमात्मा में) संधि होने पर सूक्ष्म, निर्गुण और गुणों को बोध कराने वाली है, वह संध्या 'संधि' कही जाती है, जो प्रधान और पुरुष से भी अतीत है।
अनूदकी संध्या
अनूदकी तु या संध्या लेपस्नेहविवर्जिता ।
संधिनी सर्वभूतानां शोधिनी भवनाशिनी ॥ ६.२२ ॥
अनूदकी नामक संध्या लेप और स्नेह से रहित है; वह सभी भूतों की संधि करने वाली, शुद्ध करने वाली और भव (संसार) को नष्ट करने वाली है।
हृद्याकाशगता सूक्ष्मा आदित्यरश्मिरेखया ।
सोमसूर्याग्निसंस्कृत्या अण्डं भित्त्वा विनिर्गता ॥ ६.२३ ॥
हृदय-आकाश में गमन करने वाली वह सूक्ष्म (संध्या), आदित्य की रश्मि-रेखा द्वारा, सोम, सूर्य और अग्नि के संस्कार से अण्ड को फाड़कर निर्गत हुई है।
बद्धमेतं सुषुम्णायां दीर्घघण्टानिनादवत् ।
ईश्वरं मनसा ध्यायेदेषा संध्या अनूदकी ॥ ६.२४ ॥
सुषुम्णामें बँधे, लंबे घण्टानादकी भाँति (गूँजते) इस ईश्वरका मनसे ध्यान करे — यह अनूदकी (बिना जलकी) संध्या है।
संध्याकालः
संधौ संध्यामुपासीत नास्तगे नोद्गते रवौ ।
संध्यात्रयं तु कर्तव्यं द्विजेनात्मविदा सदा ॥ ६.२५ ॥
संधि(काल) में संध्याकी उपासना करे — सूर्यके अस्त हो जाने या उग आनेपर नहीं। आत्मज्ञानी द्विजको सदा तीनों संध्याएँ करनी चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ५०, पं. १४) हे. ३.१.८८२, पमा. १.१.२६०, २८९, वै. ३१०; नोदिते रवौ स्मृच. १३४; नास्तंगे अप. ५०; सायं संध्यामुपासीत नास्तगे हे. ३.२. पृ. ६९५
(पृ. ५०, पं. १५) वीमि. २५४, २५९, अप. ५०
आश्रमभेदेन स्नानसंख्याभेदः
उभे संध्ये तु स्नातव्यं ब्राह्मणैस्तु गृहाश्रितैः ।
तिसृष्वपि च संध्यासु स्नातव्यं ब्रह्मवादिना ॥ ६.२६ ॥
गृहस्थ ब्राह्मणोंको दोनों संध्याओंमें स्नान करना चाहिए; और ब्रह्मवादी (संन्यासी) को तीनों संध्याओंमें स्नान करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ५०, पं. १६) हे. ३.१. पृ. ७०४; संध्ये च कर्तव्ये ब्राह्मणेऽथ गृहेष्वपि अप. ५०; ब्राह्मणैश्च गृहाश्रितैः वीमि. १५८
(पृ. ५१, पं. १) हे. ३.२. पृ. ७०४; स्नातव्यं च तपस्विना वीमि. २५८
अशक्तस्य स्नानानुकल्पः
कालदोषादसामर्थ्यान्नशक्नोति यदा ह्यसौ ।
तदाऽऽज्ञातो ऋषिभ्यस्तु मन्त्रैर्दृष्टैस्तु मार्जनम् ॥ ६.२७ ॥
…कालदोष के कारण अथवा असमर्थता के कारण जब वह (स्नान) नहीं कर सके, तब ऋषियों द्वारा देखे गए मन्त्रों से मार्जन की अनुमति है।
पाठभेद — (पृ. ५१, पं. २) स्मृच. १३४, वीमि. १९४
(पृ. ५१, पं. ३) स्मृच. १३४; तदा ज्ञात्वा...दृष्टं हि मार्जनम् आ.; तदा ज्ञात्वा ऋषिभिस्तु मन्त्रैर्दृष्टं तु मार्जनम् वीमि. १९४
शन्न आपस्तु द्रुपदा आपोहिष्ठाऽघमर्षणः ।
एतैश्चतुर्भिर्मन्त्रैस्तु मन्त्रस्नानमुदाहृतम् ॥ ६.२८ ॥
"शं नो देवीः", "द्रुपदादिव", "आपो हि ष्ठा" और अघमर्षण — इन चार मन्त्रोंसे (होनेवाला) मन्त्रस्नान कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ५१, पं. ४) ...घमर्षणम् वै. २९१; हे. ३.१. पृ. ८५३
(पृ. ५१, पं. ५) एतैश्च पञ्चभिर्मन्त्रैर्मन्त्र... वै. २९१;...ऋग्मन्त्रैर्मन्त्र... वीमि. १९४, हे. ३.१. पृ. ८५३
स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्मार्जनं प्राणसंयमः ।
अघमर्षणसूक्तेन अश्वमेधावभृत्समम् ॥ ६.२९ ॥
जलदेवता के मन्त्रों से स्नान, मार्जन और प्राणसंयम तथा अघमर्षण सूक्त से (स्नान करना) अश्वमेध के अवभृथ-स्नान के समान कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ५१, पं. ६) वीमि. १९४, याज्ञ. १.२२
(पृ. ५१, पं. ७) वीमि. १९४
स्नानमार्जनानिमित्तानि
अप्रायत्ये समुत्पन्ने स्नानमेव तु कारयेत् ।
पूर्वोद्दिष्टैस्तथा मन्त्रैरन्यथा मार्जनं स्मृतम् ॥ ६.३० ॥
…अशुद्धि उत्पन्न होने पर तो पूर्वोक्त मन्त्रों से स्नान ही करना चाहिए, अन्यथा मार्जन स्मृत है।
पाठभेद — (पृ. ५१, पं. ८) वीमि. १९४; प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने स्नानमेव विधीयते स्मृच. १२१; स्नानमेव तु कारयेत् हे. ३.१. पृ. ८५३
(पृ. ५१, पं. ९) स्मृच. १२१; मार्जनं भवेत् वीमि. १९४, हे. ३.१. पृ. ८५३
ऋषीणां स्नानविषयकः प्रश्नः
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं याज्ञवल्क्यस्य धीमतः ।
ऋषयः संयतात्मानः पृच्छन्ति स्नाननिर्णयम् ॥ ६.३१ ॥
बुद्धिमान याज्ञवल्क्य के इन वचनों को सुनकर, संयत मन वाले ऋषि स्नान का निर्णय पूछते हैं।
पाठभेद — (पृ. ५१, पं. १०) ..त्वाथ वचनं..स्य वै तदा वीमि. २२१;..स्य वै तदा हे. ३.१. पृ. ८८७
(पृ. ५१, पं. ११) संशितात्मानः हे. ३.१. पृ. ८८७; संशितात्मानः पृच्छन्ति स्नाननिश्चयम् वीमि. २२१
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये संध्यानिर्णयो (नाम) षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
पाठभेद — (पृ. ५१, पं. १२) संध्यानिर्णयः षष्ठोध्यायः आ.; समाप्तिद्योतकं किमपि नास्ति इ. पुस्तके ।
सप्तमोऽध्यायः — स्नानतर्पणसंध्योपासनजपादिविधिनिर्णयः
अध्याय-सार — स्नान, तर्पण, संध्योपासन और जपकी विधि — ग्रन्थका दूसरा सबसे बड़ा अध्याय (१९० श्लोक), पूरी तरह कर्मका। ऋषियोंके प्रश्नपर याज्ञवल्क्य स्नानकी सामग्री और विधि बताते हैं: मिट्टी, गोमय और वारुण स्नान, दर्भसे मार्जन, जलके भीतर (अन्तर्जल) जप, और जलमें विष्णुका स्मरण — ‘नारायण’ पदकी निरुक्ति और वैष्णवी गायत्री सहित। फिर वस्त्र-विधि, देव-ऋषि-पितृ तर्पण (हाथके पाँच तीर्थ, तिल), आदित्योपस्थान, जपयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ, देवार्चन, सावित्रीको हवि और अर्कदर्शन। इसके बाद अनेक नियम हैं: पराये जलाशयमें स्नान, पात्र, स्नान-तर्पणका फल, जपमें वर्जित बातें, जपके तीन प्रकार, अक्षमाला, जपके स्थान और आहार, जपके बीच बोलने या अशुचि देखनेका प्रायश्चित्त। ७.१६१ पर स्नानविधि पूरी होती है; फिर असमर्थके लिए मन्त्र-स्नान आदि सात स्नान, अघमर्षण सूक्तका ऋषि आदि और उसकी महिमा, और संध्योपासनमें आचमन तथा मार्जनके मन्त्र आते हैं। अध्याय एक संक्रमणसे समाप्त होता है: इस प्रकार मार्जनसे बाहरी शुद्धि करके, अब भीतरी शुद्धिके लिए प्राणायाम करे (७.१९०)।
ऋषिप्रश्नः
स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्यत्त्वयोक्तं पुराऽनघ ।
तदाचक्ष्व विशेषेण स्नानस्य तु विधिं प्रभो ॥ ७.१ ॥
हे निष्पाप! आपने पहले जलदेवताके मन्त्रोंसे जो स्नान कहा था, हे प्रभो! उस स्नानकी विधि विशेषरूपसे बताइये।
पाठभेद — (पृ. ५२, पं. २) वीमि. २२१, याज्ञ. वीमि. २७०, वीमि. परि. १६, हे. ३.१. पृ. ८८७
(पृ. ५२, पं. ३) वीमि. २२१, हे. ३.१. पृ. ८८७
याज्ञवल्क्यस्य स्नाननिरूपणप्रतिज्ञा
तांस्तु प्रोवाच प्रीतात्मा याज्ञवल्क्यो महामुनिः ।
श्रृणुध्वं वक्ष्यते स्नानं सर्वपापहरं शुभम् ॥ ७.२ ॥
तब प्रसन्नचित्त महामुनि याज्ञवल्क्यने उनसे कहा — सुनो, मैं सब पापोंको हरनेवाला शुभ स्नान कहूँगा।
पाठभेद — (पृ. ५२, पं. ४) प्रीत्यात्मा आ.; तान् प्रत्युवाच... ल्क्योऽमितद्युतिः वीमि. २२१, हे. ३.१. पृ. ८८७
(पृ. ५२, पं. ५) ..पापप्रणाशनम् वीमि. २२१; हे. ३.१. पृ. ८८७; शृणुष्व वक्ष्य... सर्वपापप्रणाशनम् अप. १२८
स्नानविधिसामग्री
मृद्गोमयतिलान् दर्भान् पुष्पाणि सुरभीणि च ।
आहरेत् स्नानकाले तु स्नानार्थी प्रयतः शुचिः ॥ ७.३ ॥
स्नानका इच्छुक, संयत और पवित्र (द्विज) स्नानके समय मिट्टी, गोबर, तिल, कुश और सुगन्धित फूल ले आये।
पाठभेद — (पृ. ५२, पं. ६) ग. २१४; मृत्तिलान् गोमयं दर्भान् वीमि. २२१, स्मृच. १८२; हे. ३.१. पृ. ८७८; मृत्तिका गोमयं दर्भान् अप. १२८; मृत्तिका गोमयं दर्भान् वै. २५९; याज्ञवल्क्यवचनमिति आर. २५
(पृ. ५२, पं. ७) स्नानार्थं स्मृच. १८२, हे. ३.१. पृ. ८७८, वै. २५९; आहरेद्यावदर्थानि स्नानार्थं अप. १२८; आहरेद्यावदर्थानि स्नानार्थे आर. २९
स्नानविधिः
गत्वोदकान्तं विधिवत् स्थापयेत् तत् पृथक् क्षितौ ।
त्रिधा कृत्वा मृदं तां तु गोमयं च विचक्षणः ॥ ७.४ ॥
जलके किनारे जाकर विधिपूर्वक उन्हें भूमिपर अलग-अलग रखे; बुद्धिमान् (द्विज) उस मिट्टी और गोबरके तीन-तीन भाग करके —
पाठभेद — (पृ. ५२, पं. ८) पमा. १.१. २७२, स्मृच. १२८, वै. २५९; ...न्तं विविक्तं स्थाप्य चैतान् पृथक् आ.; ...न्तं विविक्तमास्थाप्यैतत् पृथक् वीमि. २२१; स्थापयेत्तु पृथक् अप. १२८; गन्धोदकान्तं विविक्ते स्थापयेत्तान्यक्षितौ ग. २१४.२; क्रमात् स्थाप्यं पृथक् क्षितौ हे. ३.१. पृ. ८७८
(पृ. ५३, पं. १) ग. १३३.३, वीमि. २२१, स्मृच. १८२, अप. १२८, हे. ३.१. पृ. ८८३; मृदं तां च आ.; त्रिधा कुर्यान्मृदं तां वै. २५९; गोमयं ताद्विचक्षणः पमा. १.१. पृ. २७२
उत्तमाधममध्यानामङ्गानां क्षालनं च तैः ।
भागैः पृथक् पृथक् कुर्यात् क्षालने मृदसंकरः ॥ ७.५ ॥
— उन भागोंसे उत्तम, मध्यम और अधम अंगोंका अलग-अलग प्रक्षालन करे; प्रक्षालनमें मिट्टीका मिश्रण न हो।
पाठभेद — (पृ. ५३, पं. २) अधमोत्तममध्यानामङ्गानां क्षालनं तु वै वीमि. २२१; अधमोत्तम...नं तु तैः पमा. १.१. पृ. २७३, स्मृच. १८२, अप. १२८, हे. ३.१. पृ. ८८९, प्राम. १६
(पृ. ५३, पं. ३) पमा. १.१. पृ. २७२, वीमि. १६७, हे. ३.१. पृ. ८८९; क्षालनं मृदसंकरः स्मृच. १८२, अप. १२८
(पृ. ५३, पं. २–३) अधमोत्तममध्यानामङ्गानां मृदसंकरः वै. २५९
प्रभूते विद्यमाने तु उदके सुमनोहरे ।
नाल्पोदके द्विजः स्नायान्नदींश्चो(चो)त्सृज्य कृत्रिमे ॥ ७.६ ॥
सुन्दर, प्रचुर जल रहनेपर द्विज थोड़े जलमें स्नान न करे, और नदियोंको छोड़कर कृत्रिम (जलाशय) में (स्नान न करे)।
पाठभेद — (पृ. ५३, पं. ४) हे. ३.१. पृ. ८७३, वीमि. १६७, स्मृच. १२९, अप. २३५; स्नानविधिराचार्येणान्यत्र दर्शितः- ‘विद्यमाने प्रभूते हि नाल्पे स्नानं समाचरेत् इति’ विश्वरूपः १.२२; विद्यमानेऽपि, वृद्धयाज्ञवल्क्यवचनमिति आर. २८
(पृ. ५३, पं. ५) वीमि. १६७, अप. २३५; नदीं चो... स्मृच. १२९, हे. ३.१. पृ. ८७३; वृद्धयाज्ञवल्क्यवचनमिति आर. २८
मृद्भिरद्भिश्च चरणौ प्रक्षाल्याचम्य वै शुचिः ।
उरुं हीति ऋचा तोयमुपस्थाय प्रदक्षिणम् ॥ ७.७ ॥
पवित्र (द्विज) मिट्टी और जलसे पैर धोकर, आचमन करके, "उरुं हि राजा…" ऋचासे जलका उपस्थान (स्तुति) करके प्रदक्षिणा करे;
पाठभेद — (पृ. ५३, पं. ६) स्मृच. १८२; अद्भिर्मृद्भिश्च वीमि. १६७, हे. ३.१. पृ. ८८९; अद्भिर्मृद्भिश्च चरणौ प्रक्षाल्य करौ तथा ग. २१४.३
(पृ. ५३, पं. ७) वीमि. २२१; उरुं राजन्यृचा तोय...... ग. २१४.४; हीति त्र्यृचा हे. ३.१. पृ. ८९२
आवर्तयेत्तदुदकं ये ते शतमिति ह्यृचा ।
सुमित्रिया इत्यञ्जलिमुद्धरेद्दैवतं स्मरन् ॥ ७.८ ॥
"ये ते शतम्…" ऋचासे उस जलको घुमाये (आवर्तन करे); "सुमित्रिया (न आप ओषधयः सन्तु)" — इससे देवताका स्मरण करते हुए अञ्जलि (जल) ऊपर उठाये।
पाठभेद — (पृ. ५३, पं. ८) वीमि. २२१, ग. २१४.५;......मिति त्र्यृचा हे. ३.१. पृ. ८९२
(पृ. ५३, पं. ९) वीमि. २२१;.....त्रिया न इत्यञ्जलि.. हे. ३.१. पृ. ८९२
विविधगात्रक्षालनम्
दुर्मित्रिया इति द्वि(द्वे)ष्यं ध्यायंश्चापः प्रसेचयेत् ।
मृद्भिरद्भिश्च गात्राणि क्रमशस्त्ववनेजयेत् ॥ ७.९ ॥
"दुर्मित्रियाः (तस्मै सन्तु…)" — इससे शत्रुका ध्यान करते हुए जल (नीचे) छिड़के; फिर मिट्टी और जलसे क्रमशः अंगोंको धोये।
पाठभेद — (पृ. ५४, पं. १) त्रिया न इति द्वेष्यं हे. ३.१. पृ. ८९२; द्वेष्यं वीमि. २२१; प्रसंचरेत् आ.
(पृ. ५४, पं. २) अद्भिरद्भिश्च गात्राणि क्रमशस्त्ववने जपेत् हे. ३.१. पृ. ८९४; ‘शीर्षाद्यानाभि सर्वाणि स्मरन् विष्णुनाममयम्’ इत्यधिकम्, योगिवचनमिति प्राम. १६, स्वायंभुवं वचनमिति विश्वरूपः ३.३२
एकया च शिरः क्षाल्यं द्वाभ्यां नाभेस्तथोपरि ।
कटिबस्त्यूरुजङ्घे च चरणौ च त्रिभिस्त्रिभिः ॥ ७.१० ॥
एक (अंजलि) से शिरः का क्षालन करे, दो (अंजलि) से नाभि से ऊपर, तीन-तीन (अंजलि) से कटि, उरु, जङ्घा और चरणों का क्षालन करे।
पाठभेद — (पृ. ५४, पं. ३) ... या तु वीमि. २२१, कूर्मपुराणे इति स्मृच. १८३
(पृ. ५४, पं. ४) हे. ३.१. पृ. ८९४; वीमि. २२१; कटिं बस्तिमुरुजङ्घे चरणौ तु त्रिभिस्त्रिभिः आ.; पादौ जङ्घे कटिं चैव पूर्वं मृद्भिस्त्रिभिस्त्रिभिः ग. २१४.८; पादौ जङ्घकटिश्चैव पूर्वं मृद्भिस्त्रिभिस्त्रिभिः इ.
जलनमस्कारः
प्रक्षाल्य हस्तौ चाचम्य नमस्कृत्य जलं ततः ।
यत्किंचिदिति मन्त्रेण नमस्येत् प्रयताञ्जलिः ॥ ७.११ ॥
हाथ धोकर, आचमन करके, फिर जलको नमस्कार करके, अञ्जलि बाँधे हुए "यत्किंचेदं (वरुण दैव्ये जने)…" मन्त्रसे नमस्कार करे।
पाठभेद — (पृ. ५४, पं. ५) ग. २१४.८; जलं तु तत् वीमि. २२२; तथैव हस्तावाचम्य हे. ३.१. पृ. ८९४
(पृ. ५४, पं. ६) यत्किंचेति च वीमि. २२२; ...त्किंचेदमिति मन्त्रेण हे. ३.१. पृ. ८९४ योगिवचनमिति प्राम. १६
स्नानसमये तीर्थविशेषध्याननिर्णयः
यत्र स्थाने च यत्तीर्थं नदी पुण्यतमा च या ।
तां ध्यायन् मनसाऽऽवाह्य अन्यत्रेष्टं विचिन्तयेत् ॥ ७.१२ ॥
उस स्थानमें जो तीर्थ और जो परम पवित्र नदी हो, उसका ध्यान करते हुए मनसे आवाहन करे; दूसरी जगह (स्नान हो तो) अपने अभीष्ट (तीर्थ) का चिन्तन करे।
पाठभेद — (पृ. ५४, पं. ७) वीमि. २२२; च यत्तीर्थे आ.
(पृ. ५४, पं. ८) वीमि. २२२
गङ्गादिपुण्यतीर्थानि कृत्रिमादिषु संस्मरेत् ।
उदुत्यमिति प्रविशेज्जलं तु प्राङ्मुखं शुचिः ॥ ७.१३ ॥
कृत्रिम आदि (जलाशयों) में गङ्गा आदि पुण्य तीर्थोंका स्मरण करे; और पवित्र होकर, पूर्वकी ओर मुँह करके "उदु त्यम्…" मन्त्रसे जलमें प्रवेश करे।
पाठभेद — (पृ. ५४, पं. ९) वीमि. २२२, स्मृच. १८३
(पृ. ५४, पं. १०) उदुत्तममिति विशेत्तज्जलं वीमि. २२२, हे. ३.१. पृ. ८९६
मृदा गात्रालम्भनम्
येन देवाः पवित्रेति कुर्यादालम्भनं त्रिभिः ।
महाव्याहृतिभिः पश्चादाचम्य प्रयतोऽपि सन् ॥ ७.१४ ॥
"येन देवाः पवित्रेण…" (मन्त्र) से, फिर तीनों महाव्याहृतियोंसे (अंगोंका) स्पर्श करे; उसके बाद संयत होते हुए भी आचमन करे।
पाठभेद — (पृ. ५५, पं. १) वीमि. २२२, हे. ३.१. पृ. ८९६
(पृ. ५५, पं. २) दाचमेत् प्र... हे. ३.१. पृ. ८९६; एतदर्धमादर्शपुस्तके गङ्गादि... संस्मरेत् (१३ पू.) इत्यर्धानन्तरं दृश्यते । वीमि. क्रमं प्रमाणीकृत्यास्माभिस्तदत्र निवेशितमिति विभावनीयम् ।
आलभेद्वै मृदाङ्गानि इदं विष्णुरिति त्र्यृचा ।
भास्कराभिमुखो मज्जेदापो अस्मानिति त्र्यृचा ॥ ७.१५ ॥
"इदं विष्णुर्वि चक्रमे…" — इन तीन ऋचाओंसे मिट्टीसे अंगोंका लेपन करे; और सूर्यकी ओर मुँह करके "आपो अस्मान्…" — इन तीन ऋचाओंसे (जलमें) डुबकी लगाये।
पाठभेद — (पृ. ५५, पं. ३) आलभेतु...रिति ऋचा वीमि. २२२; आलभेत मृदा, योगिवचनमिति प्राम. १६, हे. ३.१. पृ. ८९६; मार्जयेद्वै मृदाङ्गानि ग. २१४.१०
(पृ. ५५, पं. ४) हे. ३.१. पृ. ८९६, ग. २१४.१०; निति ऋचा वीमि. २२२
गोमयस्नानम्
ततो निघृष्य गात्राणि निमज्योन्मज्य वै शनैः ।
गोमयेन तु यः स्नायादापादतलमस्तकम् ॥ ७.१६ ॥
फिर अंगोंको मलकर, धीरे-धीरे डुबकी लगाकर और उठकर — जो गोबरसे पैरके तलवेसे मस्तकतक स्नान करता है —
पाठभेद — (पृ. ५५, पं. ५) ततोऽवमृश्य.... वै पुनः वीमि. २२२; ततोऽवघृष्य गात्राणि ग. २१४.२; ततोऽवघृष्य ...वै पुनः हे. ३.१. पृ. ८९७
स स्नातः सर्वतीर्थेषु पूतः संवत्सरं भवेत् ।
आचम्य गोमयेनातो मानस्तोक्या समालभेत् ॥ ७.१७ ॥
— वह सब तीर्थोंमें स्नान किया हुआ, एक वर्षतक पवित्र होता है। (गोबरसे स्नानके) बाद आचमन करके "मा नस्तोके…" ऋचासे (अंगोंका) स्पर्श करे।
पाठभेद — (पृ. ५५, पं. ८) गोमयेनापि वीमि. २२२, हे. ३.१. पृ. ८९७; गोमयेन विलिप्याथ मानस्तोक इत्यृचा ग. २१४.१२
वारुणं स्नानम्
ततोऽभिषिञ्चेन्मन्त्रैस्तु वारुणैश्च यथाक्रमम् ।
इमं मे वरुणेत्यृग्भ्यां त्वन्नः सत्वन्न इत्यपि ॥ ७.१८ ॥
फिर वरुणके मन्त्रोंसे क्रमानुसार अभिषेक करे — "इमं मे वरुण…" (आदि) दो ऋचाओंसे, "त्वं नो अग्ने…" और "स त्वं नो अग्ने…" से भी,
पाठभेद — (पृ. ५५, पं. ९) ततोऽभिषिच्य मन्त्रैस्तु वारुणैस्तु वीमि. २२२; वारुणैस्तु ग. २१४.१४; वारुणैश्च हे. ३.१. पृ. ८९९
(पृ. ५५, पं. १०) वीमि. २२२; वरुण इति द्वाभ्यां आ.; वरुणे द्वाभ्यां त्वन्नः ग. २१४.१४
इदमापउदुत्तममित्येतन्मुञ्चन्त्ववभृथेति च ।
अभिषिञ्च्य तयाऽऽत्मानं निमज्याचम्य वै पुनः ॥ ७.१९ ॥
"इदमापः (प्रवहत)…", "उदुत्तमं (वरुण पाशम्)…", "मुञ्चन्तु (मा शपथ्यात्)…" और "अवभृथ…" — इनसे अपना अभिषेक करके, डुबकी लगाकर फिर आचमन करे।
पाठभेद — (पृ. ५५, पं. ११) ...मिति मुञ्चन्त्ववभृथेति च वीमि. २२२, हे. ३.१. पृ. ८९९
(पृ. ५५, पं. १२) अभिषिच्य तदात्मानं हे. ३.१. पृ. ८९९, वीमि. २२२; तथात्मानं ग. २१४.१७
दर्भैर्मार्जनम्
दर्भैश्च पावयेन्मन्त्रैरब्लिङ्गैः पावनैः शुभैः ।
आपोहिष्ठेति तिसृभिरिदमापो हविष्मतीः ॥ ७.२० ॥
और कुशोंसे, जलदेवताके पवित्र और शुभ मन्त्रोंसे (अपनेको) पवित्र करे — "आपो हि ष्ठा…" इन तीन ऋचाओंसे, "इदमापो हविष्मतीः…" (से),
पाठभेद — (पृ. ५६, पं. १) दर्भैस्तु वीमि. २२२; दर्भैस्तु...रब्लिङ्गैः पाव... हे. ३.१. पृ. ९००; दर्भेण पावयेन्मन्त्रैरब्लिङ्गैः पावनैरिमैः ग. २१४.१७; ...रब्लिङ्गैः पावनैः आ.
(पृ. ५६, पं. २) वीमि. २२२, ग. २१४.१८, हे. ३.१. पृ. ९००
देवीराप इति द्वाभ्यामापो देवा इति त्र्यृचा ।
द्रुपदादिव इत्यृचा शन्नोदेवीरपां रसम् ॥ ७.२१ ॥
"देवीरापः…" इन दो ऋचाओंसे, "आपो देवाः…" इन तीन ऋचाओंसे, "द्रुपदादिव…" ऋचासे, "शं नो देवीः…" और "अपां रसम्…" (से),
पाठभेद — (पृ. ५६, पं. ३) ग. २१४.१८; इति ऋचा वीमि. २२२;...मापो देवीरिति त्र्यृचा हे. ३.१. पृ. ९००
(पृ. ५६, पं. ४) हे. ३.१. पृ. ९००, वीमि. २२२; .... दिव इति च ग. २१४.१९
आपो देवीति नवभिः पावमानीभिरेव च ।
पुनन्तु मायि(पि)तर इति पावमानीः प्रयोजयेत् ॥ ७.२२ ॥
"आपो देवीः…" इन नौ (ऋचाओं) से और पावमानी ऋचाओंसे; "पुनन्तु मा पितरः…" इन पावमानी ऋचाओंका प्रयोग करे।
पाठभेद — (पृ. ५६, पं. ५) आपोदेवीः पावमान्यः पुनन्त्वाद्या ऋचो नव वीमि. २२२, हे. ३.१. पृ. ९००; आपो देवो पावमान्यः पुनन्त्वाद्या ऋचो नव ग. २१४.१९
चित्पतिर्मेति च शनैः पाव्यात्मानं समाहितः ।
हिरण्यवर्णा इति च पावमान्यस्तथाऽपराः ॥ ७.२३ ॥
"चित्पतिर्मा (पुनातु)…" से धीरे-धीरे, समाहित होकर अपनेको पवित्र करे; और "हिरण्यवर्णाः…" तथा दूसरी पावमानी (ऋचाओं) से भी।
पाठभेद — (पृ. ५६, पं. ७) हे. ३.१. पृ. ९००, वीमि. २२२; ह्याव्यात्मानं ग. २१४.२०
(पृ. ५६, पं. ८) ग. २१४.२०; हे. ३.१. पृ. ९००
तरत्समाः शुद्धवत्यः पवित्राणि च शक्तितः ।
वारुणीश्च ऋचः सूक्तं शक्तितश्च प्रयोजयेत् ॥ ७.२४ ॥
"तरत्समन्दी…", शुद्धवती (ऋचाएँ), पवित्र (सूक्त) — यथाशक्ति; और वारुणी ऋचाओं तथा सूक्तका भी यथाशक्ति प्रयोग करे।
पाठभेद — (पृ. ५६, पं. ९) ग. २१४.२१; शुद्धवतीः पवित्राण्यपि वीमि. २२२, हे. ३.१. पृ. ९००
(पृ. ५६, पं. १०) वारुण्या बहवः पुण्याः शक्तितः संप्रयोजयेत् ग. २१४.२१; शक्तितः संप्रयोजयेत् वीमि. २२२; वारुण्यश्च ऋचः सूक्तं शक्तितः संप्रयोजयेत् हे. ३.१. पृ. ९००
जलमध्यास्थितो विप्रः शुद्धभावो हरिं स्मरेत् ।
ओंकारेण व्याहृतिभिर्गायत्र्या च समाहितः ॥ ७.२५ ॥
जलके बीचमें खड़ा विप्र शुद्ध भावसे हरिका स्मरण करे; ओंकार, व्याहृतियों और गायत्रीसे समाहित होकर —
पाठभेद — (पृ. ५६, पं. ११) जलमध्ये हे. ३.१. पृ. ९००; जलमध्यं वीमि. २२२; ...मध्ये स्थितो... भावे हरिं वै. २६१
(पृ. ५६, पं. १२) हे. ३.१. पृ. ९००; ...त्र्या च समन्वितः ग. २१४.२२
आदावन्ते च कुर्वीत अभिषेके यथाक्रमम् ।
अपां मध्यं स्थितस्यैवं मार्जनं तु विधीयते ॥ ७.२६ ॥
— अभिषेकमें (इन्हें) क्रमसे आदि और अन्तमें करे। जलके बीच खड़े (द्विज) के लिए इस प्रकार मार्जनका विधान है।
पाठभेद — (पृ. ५७, पं. १) अभिषेकं ग. २१४.२२, वीमि. २२३, हे. ३.१. पृ. ९००
(पृ. ५७, पं. २) जलमध्यस्थितस्यैव ग. २१४.२३; अपां मध्ये वीमि. २२३; अपां मध्यस्थितस्यैवं हे. ३.१. पृ. ९००
अन्तर्जले जपः
अन्तर्जले जपेन्मग्नस्त्रिः कृत्वस्त्वघमर्षणम् ।
द्रुपदां वा त्रिरभ्यस्येदायं गौरिति वा जपेत् ॥ ७.२७ ॥
जलके भीतर डूबकर तीन बार अघमर्षण (सूक्त) जपे; अथवा "द्रुपदादिव…" को तीन बार दोहराये, अथवा "आयं गौः…" जपे;
पाठभेद — (पृ. ५७, पं. ३) हे. ३.१. पृ. ९०१; त्रिः कृत्वात्वघमर्षणम् वीमि. २२३; जपेन्मन्त्रं त्रिः कृत्वात्वघमर्षणम् ग. २१४.२३
(पृ. ५७, पं. ४) गौरिति वा त्र्यृचम् वीमि. २२३, हे. ३.१. पृ. ९०१; द्रुपदाद्यास्त्रिरावर्तेदयं गौरिति च त्र्यृचम् ग. २१४.२४
हंसः शुचिषदिति च त्रिरावर्त्य जपेदथ ।
अन्यानि चैव सूक्तानि स्मार्तदृष्टान्यनुस्मरेत् ॥ ७.२८ ॥
अथवा "हंसः शुचिषत्…" को तीन बार दोहराकर जपे; और स्मृतियोंमें देखे गये अन्य सूक्तोंका भी स्मरण करे।
पाठभेद — (पृ. ५७, पं. ५) ...पदित्युक्तं त्रिरावृत्य जपेदथ वीमि. २२३; ...पदित्यृचं त्रिरावर्त्य जपेदथ हे. ३.१. पृ. ९०१
(पृ. ५७, पं. ६) हे. ३.१. पृ. ९०१, वीमि. २२३; अन्यांश्चैव तु मन्त्रान् वा स्मृतिदृष्टान् समाहितः ग. २१४.२४
सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं त्रिर्जपेदथ ।
आवर्तयेद्वा प्रणवं स्मरेद्वा विष्णुमव्ययम् ॥ ७.२९ ॥
या व्याहृतियों और प्रणव सहित गायत्रीका तीन बार जप करे; या प्रणवको दोहराये, या अविनाशी विष्णुका स्मरण करे।
पाठभेद — (पृ. ५७, पं. ७) हे. ३.१. पृ. ९०१, वीमि. २२३, गायत्रीं वा जपेद्बुधः ग. २१४.२५
(पृ. ५७, पं. ८) ग. २१४.२५, वीमि. २२३, हे. ३.१. पृ. ९०१
अप्सु विष्णुस्मरणोपपत्तिः
विष्णोरायतनं ह्यापः स एवाप्य(प्यो) निरुच्यते ।
तस्यैव सूनवस्त्वेतास्तस्मात्तं ह्यप्सु संस्मरेत् ॥ ७.३० ॥
जल विष्णुका निवास है, (इसलिए) वह आप्य (जलमें रहनेवाला) कहा जाता है; ये (जल) उसीकी सन्तान हैं, इसलिए जलमें उसीका स्मरण करे।
पाठभेद — (पृ. ५७, पं. ९) त्वापः स एवाप्पतिरुच्यते ग. २१४.२६; स ह्यपां पतिरुच्यते वीमि. २२३, हे. ३.१. पृ. ९०१
(पृ. ५७, पं. १०) वीमि. २२३, ग. २१४.२६; श्चैतास्तस्मात्तं हे. ३.१. पृ. ९०१
नारायणपदनिरुक्तिः
नरादापः प्रसूता वै तेन नारा इति स्मृताः ।
ता एवास्यायनं ह्यापस्तस्मान्नारायणः स्मृतः ॥ ७.३१ ॥
जल नर (परमात्मा) से उत्पन्न हुआ, इसलिए 'नार' कहलाता है; वह जल ही इसका अयन (निवास) है, इसलिए (वह) नारायण कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ५७, पं. ११) वीमि. २२३, हे. ३.१. पृ. ९०१
(पृ. ५७, पं. १२) वीमि. २२३, हे. ३.१. पृ. ९०१
विष्णुध्यानप्रशंसा
यं(यो)हि व्रतानां वेदानां यमस्य नियमस्य च ।
भोक्तारं यज्ञतपासां ध्यायिनां ध्येयमेव च ॥ ७.३२ ॥
जो व्रतों, वेदों, यम और नियमका, यज्ञ और तपका भोक्ता है, और ध्यान करनेवालोंका ध्येय है —
पाठभेद — (पृ. ५८, पं. १) वीमि. २२३; यो हि व्रतानां हे. ३.१. पृ. ९०१
(पृ. ५८, पं. २) वीमि. २२३; ध्यायिनां ध्यानमेव च हे. ३.१. पृ. ९०१
ध्यायेन्नारायणं देवं नित्यं स्नानादिकर्मसु ।
प्रायश्चित्त्यपि सर्वस्माद्दुष्कृतान् मुच्यते पुमान् ॥ ७.३३ ॥
— उस नारायण देवका स्नान आदि कर्मोंमें नित्य ध्यान करे; (इससे) प्रायश्चित्ती (पापी) मनुष्य भी सब दुष्कर्मोंसे छूट जाता है।
पाठभेद — (पृ. ५८, पं. ३) स्मृत. श्रा. १९७; ध्यायन्नारा... वीमि. २२३; ...णं नित्यं स्नानादिषु च कर्मसु हे. ३.१. पृ. ९०१
(पृ. ५८, पं. ४) स्मृत. श्रा. १९७, हे. ३.१. पृ. ९०२; प्रायश्चित्तेषु सर्वेषु वीमि. २२३
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् ।
स्मरणादेव तद्विष्णोः संपूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥ ७.३४ ॥
प्रमादसे कर्म करनेवालोंका यज्ञोंमें जो (अंश) छूट जाता है, वह विष्णुके स्मरणसे ही पूर्ण हो जाता है — ऐसी श्रुति है।
पाठभेद — (पृ. ५८, पं. ५) स्मृत. श्रा. १९७, हे. ३.१. पृ. ९०२; अज्ञानाद्यदि वा मोहात् प्रच्य... वीमि. ७४, २२३
(पृ. ५८, पं. ६) स्मृत. श्रा. १९७, वीमि. २२३; ...दिति स्मृतिः हे. व्रत. ३८
वैष्णवी गायत्री
तद्विष्णोरिति मन्त्रेण मज्जेदप्सु पुनः पुनः ।
गायत्री वैष्णवी ह्येषा विष्णोः संस्मरणाय वै ॥ ७.३५ ॥
"तद्विष्णोः (परमं पदम्)…" मन्त्रसे जलमें बार-बार डुबकी लगाये; यह वैष्णवी गायत्री विष्णुके स्मरणके लिए ही है।
पाठभेद — (पृ. ५८, पं. ७) स्मृत. श्रा. १९७, वीमि. २२३, हे. ३.१. पृ. ९०२, निमज्याप्सु पुनः पुनः ग. २१४.२७; तद्विष्णो इति मन्त्रेण, याज्ञवल्क्यवचनमिति वै. २६१; तद्विष्णोरिति मन्त्रोयं स्मर्तव्यं सर्वकर्मसु वै. ३४१
(पृ. ५८, पं. ८) स्मृत. श्रा. १९७, वीमि. २२३, हे. ३.१. पृ. ९०२, ग. २१४.२७ याज्ञवल्क्यवचनमिति वै. २६१; ह्येषा प्रोक्तेदं विष्णुरित्यपि वै. ३४१
स्नानकाले निषिद्धानि
पादेन पाणिना वापि यष्ट्या वस्त्रेण वोदकम् ।
न हन्यान्नैव रुन्धीत न च प्रक्षोभयेद्द्विजः ॥ ७.३६ ॥
पैर, हाथ, लाठी या वस्त्रसे जलको न पीटे, न रोके और न द्विज (उसे) मथे (क्षुब्ध करे)।
पाठभेद — (पृ. ५८, पं. ९) वस्त्रेण चोदकम् हे. ३.१. पृ. ८६४; पाणिना वापि यद्वा वस्त्रेण (शस्त्रेण) चोदकम् वीमि. २२३, १६८
(पृ. ५८, पं. १०) .. नैव वादेच्च न च प्रक्षोभयेद्बुधः हे. ३.१. पृ. ८६४, वीमि. १६८, २२३
न कुर्यात् कस्यचित् पीडां मनोवाक्कायकर्मभिः ।
आचरन्नाऽभिषेकं च कर्माण्यन्यानि नाचरेत् ॥ ७.३७ ॥
मन, वाणी, शरीर और कर्मसे किसीको पीड़ा न दे; अभिषेक करते हुए दूसरे कर्म न करे।
पाठभेद — (पृ. ५९, पं. १) ... पीडां कर्मणा मनसा गिरा वीमि. १२८, २२३, हे. ३.१. पृ. ८६४
(पृ. ५९, पं. २) आचरेन्नाभिषेकं तु कर्माण्यन्यानि वाऽऽचरन् वीमि. १६८, २२४; आचरेन्नाभिषेकं तु कर्माण्यन्यानि नाचरेत् हे. ३.१. पृ. ८६४; आचरन्नाभिषेकं तु... नि नाचरन् वीमि. परि. ९२
धौतवस्त्रपरिधानम्
स्नात्वैवं वाससी धौते अक्लिष्टे परिधाय च ।
प्रक्षाल्योरू मृदाद्भिश्च हस्तौ प्रक्षालयेत्ततः ॥ ७.३८ ॥
इस प्रकार स्नान करके, धुले हुए, बिना फटे दो वस्त्र पहनकर, मिट्टी और जलसे जाँघें धोकर, फिर हाथ धोये।
पाठभेद — (पृ. ५९, पं. ३) ... धौते अच्छिन्ने ग. २१४.३०, पमा. १.१. पृ. २६३, वीमि. २४७, हे. ३.१. पृ. ९०९, स्मृच. ११३; धृते अक्लिन्ने मद. २७४; धौते अक्लिन्ने आर. ३२
(पृ. ५९, पं. ४) हे. ३.१. पृ. ९०९, पमा. १.१. पृ. २६३, वीमि. २४७, स्मृच. ११३; हस्तौ प्रक्षालयेत्तथा आर. ३२; प्रक्षाल्य च मृदाद्भिश्च हस्तौ प्रक्षाल्य वै तदा ग. २१४.३०; ...ल्योरू मृदा चाद्भिर्हस्तौ प्रक्षाल्य वै पुनः आ.; मृदा चाद्भिर्हस्तौ प्रक्षालयेत्तथा मद. २७४
धौतवस्त्रानुकल्पाः
अभावे धौतवस्त्रस्य शाणक्षौमाविकानि च ।
कुतपं योगपट्टं वा द्विवासा येन वै भवेत् ॥ ७.३९ ॥
धुले वस्त्रके अभावमें सन, रेशम या ऊनके वस्त्र, कम्बल (कुतप) या योगपट्ट — जिससे (वह) दो वस्त्रोंवाला हो जाये।
पाठभेद — (पृ. ५९, पं. ५) हे. ३.१. पृ. ९१५, वीमि. २४४, अप. १३४; शाणक्षौमादिकानि च आ.; जिनानि च मद. २७५, आर. ३३; अलाभे धौत.. वै. २५२, पमा. १.१. २६५
(पृ. ५९, पं. ६) वीमि. २४४; पट्टं च विवासा आ.; येन तद्भवेत् अप. १३४; द्विवासास्तु यथा भवेत् बृप. २.१६१; येन वा भवेत् आर. ३३;...पट्टं च विवासास्तु न वै भवेत् वै. २५२; कुतपं यज्ञसूत्रं वा द्विवासा येन वा भवेत् मद. २७५; कुतपं योगपट्टं च द्विवासास्तु न वै भवेत् पमा. १.१.२६५
तर्पणात् पूर्वं वस्त्रनिष्पीडननिषेधः
यावद्देवान् ऋषींश्चैव पितॄंश्चापि न तर्पयेत् ।
तावन्नपीडयेद्वस्त्रं येन स्नातो न चोदके ॥ ७.४० ॥
जबतक देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण न कर ले, तबतक वह वस्त्र न निचोड़े जिसे पहनकर स्नान किया हो, और न जलमें (निचोड़े)।
पाठभेद — (पृ. ५९, पं. ७) पमा. १.१. पृ. २६३; पितॄंश्चैव वीमि. २४२, हे. ३.१. पृ. ९०७; पितॄंश्चापि स्मृच. १९७, वै. ३८२; पितॄन् वै यो न तर्पयेत् वै. २४९
(पृ. ६०, पं. १) वीमि. २४२; येन स्नातो भवेद्द्विजः स्मृच. १९७; येन स्नातो भवेन्नरः वै. २४९; यो हि स्नातो भवेत् द्विजः वै. ३८३, पमा. १.१. पृ. ३६३
निष्पीडयति यः पूर्वं स्नानवस्त्रं तु तर्पणात् ।
निराशाः पितरस्तस्य यान्ति देवाः सहर्षिभिः ॥ ७.४१ ॥
जो तर्पणसे पहले स्नानका वस्त्र निचोड़ता है, उसके पितर निराश होकर चले जाते हैं, और देवता ऋषियों सहित (चले जाते हैं)।
पाठभेद — (पृ. ६०, पं. २) हे. ३.१. पृ. ९०७, वीमि. २४३; यो विप्रः स्नानवस्त्रमतर्प्य च पमा. १.१. पृ. ३६३; ... यान्ति ये वस्त्रं स्नानवस्त्रमतर्पिते स्मृच. १९७; स्नानवस्त्रमबुद्धिमान् बृप. २.१०७; स्नानवस्त्रं च स्मृत. ३७९; ..यति यो वस्त्रमकृत्वा पितृतर्पणम् वै. ३८३
(पृ. ६०, पं. ३) बृप. २.१०७, स्मृत. ३७९; यान्ति देवैः स.. हे. ३.१. पृ. ९०७; महर्षिभिः वीमि. २४३; पितरो यान्ति शापं दत्वा सुदारुणम् स्मृच. १९७, वै. ३८३, पमा. १.१. पृ. ३६३; पितरो यान्ति स्नानवस्त्रे निपीडिते वै. २४९; एतदर्धानन्तरमधिकम् ‘तस्मान्न पीडयेद्वस्त्रमकृत्वा पितृतर्पणम्’ वै. २४९
न क्लिन्नवासाः स्थलगो जपादीन्याचरेद्बुधः ।
वस्त्रनिष्पीडनं प्रेताः परिचार्य पिबन्ति हि ॥ ७.४२ ॥
बुद्धिमान् भूमिपर गीले वस्त्र पहने जप आदि न करे; (क्योंकि) वस्त्रके निचोड़े जलको प्रेत (उसके) पास आकर पीते हैं।
पाठभेद — (पृ. ६०, पं. ४) जपादीनाचरेद्बुधः वीमि. ३२३, अप. ४८, व्यासवचनमिति वै. ३४१
(पृ. ६०, पं. ५) वस्त्रनिश्चोतनं प्रेताः परिवार्य वीमि. ३२३
व्रतादृते नार्द्रवासा नैकवासाः समाचरेत्
न जीर्णेन न नीलेन परिक्लिष्टेन वा जपेत् ॥ ७.४३ ॥
व्रतके सिवा गीले वस्त्रमें या एक वस्त्रमें (कर्म) न करे; और न पुराने, नीले या मैले वस्त्रसे जप करे।
पाठभेद — (पृ. ६०, पं. ६) वीमि. ३२३, अप. ४८, सं. ७०; नार्द्रवासा आचरेन्नैकवाससा व्यासवचनमिति वै. ३४१
(पृ. ६०, पं. ७) वीमि. ३२३, अप. ४८, वै. ३४१
वस्त्रनिष्पीडनं स्थले कर्तव्यम्
वस्त्रनिष्पीडनं तोयं स्नातस्योच्छिष्टभागिनः ।
भागधेयं श्रुतिः प्राह तस्मान्निष्पीडयेत् स्थले ॥ ७.४४ ॥
श्रुतिने वस्त्रसे निचोड़े जलको स्नान करनेवालेके उच्छिष्टके भागियोंका भाग कहा है; इसलिए (वस्त्र) भूमिपर निचोड़े।
पाठभेद — (पृ. ६०, पं. ८) निष्पीडितं तोयं श्राद्धे तूच्छिष्ट(भोजनम्)भोजिनाम् वै. ३८३; निष्पीडितम् तोयं श्राद्धे चोच्छिष्टभाजिनाम्, स्मृत्यंतरवचनमिति स्मृच. १९७
(पृ. ६०, पं. ९) वै. ३८३
वस्त्रनिष्पीडने केषांचिन्मतम्
पूर्वं निष्पीडनं केचित् प्राग्देवपितृतर्पणात् ।
स्नानवस्त्रस्य नेच्छन्ति तस्मात् पूर्वं न पीडयेत् ॥ ७.४५ ॥
कुछ (आचार्य) देवता और पितरोंके तर्पणसे पहले स्नानके वस्त्रको निचोड़ना नहीं चाहते; इसलिए (तर्पणसे) पहले न निचोड़े।
पाठभेद — (पृ. ६१, पं. २) तस्मादूर्ध्वं निपीडयेत् हे. ३.१. पृ. ९४५
अपसव्येन वस्त्रपीडनम्
अन्नप्रकरवत्तस्य अपसव्येन पीडयेत् ।
पीडयित्वा ततः पश्चाज्जपं कुर्यात् सुविस्तरम् ॥ ७.४६ ॥
अन्न बिखेरनेकी भाँति, उसे (वस्त्रको) अपसव्य (जनेऊ दाहिने कंधेपर) होकर निचोड़े; निचोड़नेके बाद विस्तारपूर्वक जप करे।
वस्त्रपीडनोत्तरं जपः
उदके चोदकस्थस्तु स्थलस्थः स्थलके शुचिः ।
पादौ स्थाप्योभयत्रैव आचम्योभयतः शुचिः ॥ ७.४७ ॥
जलमें हो तो जलमें खड़ा होकर, भूमिपर हो तो भूमिपर (आचमन करे); पवित्र (द्विज) दोनों पैर एक ही स्थानपर रखकर आचमन करे, (तभी) दोनों ओरसे शुद्ध होता है।
उदके तर्पणम्
यत्राशुचिस्थलं वा स्यादुदके देवताः पितॄन् ।
तर्पयेत्तु यथाकाममप्सु सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ७.४८ ॥
जहाँ भूमि अशुद्ध हो, वहाँ जलमें (खड़ा होकर) देवताओं और पितरोंका इच्छानुसार तर्पण करे; (क्योंकि) जलमें सब कुछ प्रतिष्ठित है।
पाठभेद — (पृ. ६१, पं. ७–८) वीमि. ३३८; विष्णुवचनमिति स्मृच. १९२
आचमननिमित्तानि
आचान्तः पुनराचामेन्मन्त्रवत् स्नानभोजने ।
द्रुपदां वा त्रिरावर्त्य तथा चैवाघमर्षणम् ॥ ७.४९ ॥
स्नान और भोजनमें आचमन कर चुका भी मन्त्रपूर्वक फिर आचमन करे — "द्रुपदादिव…" को तीन बार दोहराकर, अथवा अघमर्षणसे —
पाठभेद — (पृ. ६१, पं. ९) वीमि. २४०, ३१७; ...न्मन्त्रं वा स्ना.. आ.; आचान्ते पुनराचामेन्मन्त्रेण स्नानभोजने ग. २१४.३१
(पृ. ६१, पं. १०) वीमि. २४०, ३१७, ग. २१४.३१; त्रिरावर्त्या आ.
गायत्रीं वा त्रिरावर्त्य महाव्याहृतिभिस्तथा ।
सोपांशु प्रणवेनापि आपः पीता अघापहाः ॥ ७.५० ॥
— अथवा गायत्रीको तीन बार दोहराकर, अथवा महाव्याहृतियोंसे, अथवा उपांशु प्रणवसे — (इस प्रकार) पिया गया जल पापोंको दूर करता है।
पाठभेद — (पृ. ६१, पं. १२) वीमि. २४०, ३१७; सोपांशु .... पीत्वा अघापहाः आ.
आदित्योपस्थानम्
आचम्य पाव्य चात्मानं निरायाम्य (त्रिरायम्य) शनैरसून् ।
अथोपतिष्ठेदादित्यमूर्ध्वं पुष्पान्वितं जलम् ॥ ७.५१ ॥
आचमन करके, अपनेको पवित्र करके, धीरे-धीरे प्राणोंका (तीन बार) संयम करके, फिर फूलों सहित जल ऊपर (अर्पित) करके सूर्यका उपस्थान करे।
पाठभेद — (पृ. ६१, पं. १३) पाव्य चात्मानं त्रिरायम्य ग. २१४.३२; पाव्य आत्मानं त्रिरायम्य इ.
(पृ. ६१, पं. १५) ... दित्यं मूर्ध्नि पुष्पान्विताञ्जलिः ग. २१४.३२; ततोपतिष्ठे .. मूर्ध्नि पुष्पान्विताञ्जलिः इ.
जपयज्ञः
प्रक्षिप्योद्वयमुदुत्यं चित्रं तच्चक्षुरित्यपि ।
हंसःशुचिषदेतानि शुभानि पावनानि च ॥ ७.५२ ॥
(जल) अर्पित करके "उद्वयं (तमसस्परि)…", "उदु त्यम्…", "चित्रं (देवानाम्)…", "तच्चक्षुः…" और "हंसः शुचिषत्…" — ये शुभ और पावन (मन्त्र) —
पाठभेद — (पृ. ६१, पं. १६) प्रक्षिप्योदकमुद्धृत्य उदुत्यं चित्रमित्यपि ग. २१४.३३
(पृ. ६२, पं. १) तच्चक्षुर्देव इति च हंसः शुचिषदित्यपि ग. २१४.३३
एतज्जपेदूर्ध्वबाहुः सूर्यमीक्षन् समाहितः ।
गायत्र्या तु यथाशक्ति चोपस्थाय दिवाकरम् ॥ ७.५३ ॥
— भुजाएँ ऊपर उठाये, सूर्यको देखता हुआ, समाहित होकर जपे; और यथाशक्ति गायत्रीसे सूर्यका उपस्थान करके —
पाठभेद — (पृ. ६२, पं. ३) गायत्र्या च यथाशक्त्या उपस्थाय मद. ७६
विभ्राडित्यनुवाकेन सूक्तेन पुरुषस्य तु ।
शिवसंकल्पेन तथा मण्डलब्राह्मणेन तु ॥ ७.५४ ॥
— "विभ्राड्…" अनुवाकसे, पुरुषसूक्तसे, शिवसंकल्प (सूक्त) से, और मण्डलब्राह्मणसे —
पाठभेद — (पृ. ६२, पं. ४) मद. ७६, ग. २१४.३५; पुरुषस्य च वीमि. ३१८
(पृ. ६२, पं. ५) ... ब्राह्मणेन वा वीमि. ३१८; ब्राह्मणेन च मद. ७६;... कल्पेन च तथा मण्डलब्राह्मणेन च ग. २१४.३५
दिवाकीर्त्यैस्तथान्यैश्च सौरैर्मन्त्रैश्च शक्तितः ।
जपयज्ञोऽपि कर्तव्यः सर्ववेदप्रणीतकैः ॥ ७.५५ ॥
— दिनमें कीर्तनीय (सूर्यके) तथा अन्य सौर मन्त्रोंसे यथाशक्ति (उपस्थान करे)। सब वेदोंके मन्त्रोंसे जपयज्ञ भी करना चाहिए —
पाठभेद — (पृ. ६२, पं. ६) दिवाकीर्त्यैश्च सौरैश्च मन्त्रैरन्यैश्च शक्तितः वीमि. ३१८; दिवाकीर्त्या तथान्यैश्च ग. २१४.३६
(पृ. ६२, पं. ७) जपयज्ञो हि कर्तव्यः स्मृच. १८७, वीमि. ३१८;... यज्ञस्तु ग. २१४.३६; सर्ववेदपवित्रकैः इ.
पवित्रैर्विविधैश्चान्यैर्गुह्योपनिषदा तथा ।
अध्यात्मविद्या विविधा जप्तव्या जपसिद्धये ॥ ७.५६ ॥
— विविध पवित्र मन्त्रोंसे, और गुह्य उपनिषद्से; जपकी सिद्धिके लिए विविध अध्यात्मविद्याका जप करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ६२, पं. ८) वीमि. ३१८, मद. ७६; ... पनिषदा, याज्ञवल्क्यवचनमिति वै. ३४८
(पृ. ६२, पं. ९) वीमि. ३१८; जप्यास्तु जपसिद्धये स्मृच. १८७, याज्ञवल्क्यवचनमिति वै. ३४८; अध्यात्मविद्यां विधिवज्जपेद्वा जपसिद्धये ग. २१४.३७
ब्रह्मयज्ञः
प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्योपविश्य च ।
दर्भेषु दर्भपाणिः स्यात् प्राङ्मुखस्तु कृताञ्जलिः ॥ ७.५७ ॥
प्रदक्षिणा करके, नमस्कार करके, कुशोंपर बैठकर, हाथमें कुश लिये, पूर्वकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े हुए —
पाठभेद — (पृ. ६२, पं. १०) पमा. १.१. पृ. ३४६, वीमि. ३१८, वै. ३६९; नमस्कृत्वा ... स्मृच. १८९
(पृ. ६२, पं. ११) वीमि. ३१८; दर्भेषु दर्भपाणिभ्यां संहताभ्यां कृताञ्जलिः पमा. १.१. पृ. ३४६, वै. ३६९, स्मृच. १८९
स्वाध्यायं च यथाशक्ति ब्रह्मयज्ञार्थमाचरेत् ।
आदावारभ्य वेदं तु स्नात्वोपर्युपरि क्रमात् ॥ ७.५८ ॥
— ब्रह्मयज्ञके लिए यथाशक्ति स्वाध्याय करे। स्नान करके वेदको आरम्भसे शुरू करके क्रमसे आगे-आगे —
पाठभेद — (पृ. ६३, पं. १) वीमि. ३१८, स्मृच. १८९, वै. ३६९; तु यथाशक्ति पमा. १.१. पृ. ३४६; ब्रह्मयज्ञार्थमेव च आ.
(पृ. ६३, पं. २) वीमि. ३१८, मद. २८१; वेदे तु स्नात्वोप... आ.; वेदं तु स्नातो... स्मृच. १९० अत्र ‘यदि वा तेऽन्वहं शक्त्या सुसंध्येया इति स्थितिः’ इत्यधिकम् वीमि. ३१८
यदधीतेऽन्वहं शक्त्या स स्वाध्याय इति स्मृतः ।
आकेशादानखाग्राच्च परं संतप्यते तपः ॥ ७.५९ ॥
— जो प्रतिदिन यथाशक्ति पढ़ता है, वह स्वाध्याय कहा गया है; (वह) केशोंसे लेकर नखोंके अग्रभागतक परम तप तपता है।
पाठभेद — (पृ. ६३, पं. ३) स्मृच. १९०, मद. २८१
(पृ. ६३, पं. ४) ... ग्रात् स परमं तप्यते तपः वीमि. ३८१
यस्तु सम्यक् द्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम्
ऋचं यजुर्वा साम वा गाथां ह्याममथापि वा ॥ ७.६० ॥
जो द्विज प्रतिदिन यथाशक्ति भली-भाँति स्वाध्याय करता है — ऋचा, यजुः, साम, गाथा अथवा (और कुछ) भी —
पाठभेद — (पृ. ६३, पं. ५) यः सुरूपि द्विजो वा तैः स्वाध्यायं वीमि. ३१८
देवर्ष्यादितर्पणम्
ततः संतर्पयेद्देवानृषीन् पितृगणांस्तथा ।
संवत्सरं सावयवं देवीरप्सरसस्तथा ॥ ७.६१ ॥
फिर देवताओं, ऋषियों और पितृगणोंका तर्पण करे; अंगों सहित संवत्सरका, देवियोंका और अप्सराओंका भी।
पाठभेद — (पृ. ६३, पं. ७) हे. ३.१. पृ. ९३३; ऋषीन् मर्त्यान् पितॄंस्तथा वीमि. २६५
(पृ. ६३, पं. ८) वीमि. २६५, पमा. १.१. ३५६, स्मृच. १९४, वै. ३८७, मद. २९१; देवीरप्सरसस्तथा वै. ३७८
ब्रह्माणं तर्पयेत् पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम् ।
तथा देवानुगान् नागान् सागरानपि पर्वतान् ॥ ७.६२ ॥
पहले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और प्रजापतिका तर्पण करे; फिर देवताओंके अनुचरों, नागों, समुद्रों और पर्वतोंका भी;
पाठभेद — (पृ. ६३, पं. ९) पमा. १.१. पृ. ३५६, स्मृच. १९४, वीमि. ३६६, हे. ३.१. पृ. ९३३; एतच्छ्लोकार्धमादर्शपुस्तके नास्ति ।
(पृ. ६३, पं. १०) देवानुगान्नागान् सागरान् पर्वतांस्तथा वीमि. ३६६; देवासुरान्नागान् सागरान् पर्वतानपि स्मृच. १९४; देवानुगान्नागान् सागरान् पर्वतांस्तथा अप. १३८; वेदान् छन्दांसि देवांश्च ऋषींश्चैव तपोधनान् पमा. १.१. पृ. ३५६; वै. ३७८; वीमि. ३६७; हे. ३.१. पृ. ९३३; मद. २९१
सरितः सरसीश्चैव यक्षान् रक्षांसि मानुषान् ।
पिशाचांश्च सुपर्णांश्च भूतान्यथ पशूंस्तथा ॥ ७.६३ ॥
नदियों, सरोवरों, यक्षों, राक्षसों, मनुष्यों, पिशाचों, सुपर्णों (गरुडों), भूतों और पशुओंका;
पाठभेद — (पृ. ६४, पं. १) स्मृच. १९४; सरितोऽथ मनुष्यांश्च यक्षरक्षांसि चैव हि वीमि. ३६६; सरितोऽथ मनुष्यांश्च यक्षान् रक्षांसि चैव हि हे. ३.१. पृ. ९३३, मद. २९१, वै. ३७८, पमा. १.१. पृ. ३५६
(पृ. ६४, पं. २) वीमि. ३६६, पमा. १.१. पृ. ३५६, स्मृच. १९४, वै. ३७८, मद. २९१, अप. १३८
वनस्पतीनोषधींश्च भूतग्रामं चतुर्विधम् ।
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ॥ ७.६४ ॥
वनस्पतियों, ओषधियों और चार प्रकारके प्राणिसमूहका; (फिर) मरीचि, अत्रि, अङ्गिरस्, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु,
पाठभेद — (पृ. ६४, पं. ३) स्मृच. १९४, पमा. १.१. पृ. ३५६, हे. ३.१. पृ. ९३३; वनस्पतींश्चोष... अप. १३८, वीमि. ३६६, मद. २९१; भूतग्रामांश्चतुर्विधान् वै. ३७८
(पृ. ६४, पं. ४) ...ङ्गिरसः आ.; मरीचिमत्र्यङ्गि... पद्मपुराणवचनमिति अप. १३८
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ।
सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः ॥ ७.६५ ॥
प्रचेतस्, वसिष्ठ, भृगु और नारद (का)। सनक, सनन्दन और तीसरे सनातन,
पाठभेद — (पृ. ६४, पं. ५) पद्मपुराणवचनमिति अप. १३८
(पृ. ६४, पं. ६) कार्ष्णाजिनिवचनमिति अप. १३८, मद. २९२
कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा ।
एते ब्रह्मसुताः सप्त मनुष्याः परिकीर्तिताः ॥ ७.६६ ॥
कपिल, आसुरि, वोढु और पञ्चशिख — ये सात ब्रह्माके पुत्र 'मनुष्य' (ऋषि) कहे गये हैं।
पाठभेद — (पृ. ६४, पं. ७) कार्ष्णाजिनिवचनमिति मद. २९२; वोढः अप. १३८
(पृ. ६४, पं. ८) कार्ष्णाजिनिवचनमिति मद. २९२, अप. १३८; सुताः पञ्च आ.
ब्रह्माद्यानुपवीती तु देवतीर्थेन तर्पयेत् ।
निवीती कायतीर्थेन मनुष्यान् सनकादिकान् ॥ ७.६७ ॥
ब्रह्मा आदि (देवताओं) का उपवीती (जनेऊ बायें कंधेपर) होकर देवतीर्थ (अँगुलियोंके अग्रभाग) से तर्पण करे; और सनक आदि मनुष्य (ऋषियों) का निवीती (जनेऊ मालाकी भाँति) होकर कायतीर्थ (कनिष्ठिकाके मूल) से।
पाठभेद — (पृ. ६४, पं. ९) वीमि. ३५२
(पृ. ६४, पं. १०) वीमि. ३५२; निवीतिकानृतीर्थेन आ.
अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु ।
तृप्यतामिति सेक्तव्यं नाम्ना तु प्रणवादिना ॥ ७.६८ ॥
दाहिने हाथसे, बायाँ हाथ उसे छूते हुए, प्रणवसे आरम्भ करके (देवताका) नाम लेकर "तृप्यताम्" कहकर (जल) सींचे।
पाठभेद — (पृ. ६४, पं. ११) वीमि. ३४५, ३५१, ३६६, स्मृच. १९५, अप. १३७, हे. ३.१. पृ. ९३७, सव्येन नाम्ना गोत्रेण वाप्यथ, कूर्मपुराणे इति मद. २८४
(पृ. ६५, पं. १) वीमि. ३४५, ३५१, ३६६, स्मृच. १९४; अप. १३७, हे. ३.१. पृ. ९३७, सव्येन नाम्ना गोत्रेण वाप्यथ, कूर्मपुराणे इति मद. २८४
आवाह्य पूर्ववन्मन्त्रैरास्तीर्य च कुशान् शुचीन् ।
प्रागग्रेषु सुरान् सर्वान् दक्षिणाग्रेषु वै पितॄन् ॥ ७.६९ ॥
पहलेकी तरह मन्त्रोंसे आवाहन करके और पवित्र कुश बिछाकर — पूर्वकी ओर अग्रभागवाले (कुशों) पर सब देवताओंका, और दक्षिणकी ओर अग्रभागवाले (कुशों) पर पितरोंका —
पाठभेद — (पृ. ६५, पं. २) वीमि. ३३९, ३३६; कुशाञ्छुभान् स्मृच. १९२, मद. २८६, हे. ३.१. पृ. ९१८, ९३५; पूर्वं तन्मन्त्रै... कुशाञ्छुभान् । गोत्रनामस्वधाकारैस्तर्पयेदनुपूर्वशः वै. श्रा. ७३७
(पृ. ६५, पं. ३) हे. ३.१. पृ. ९१८, अप. १३७, मद. २८६; सुरान् सम्यक् स्मृच. १९२; दक्षिणाग्रे च वै वीमि. ३३९, ३६६
नासनस्तु (आसीनस्तु) स्वधाकारैर्गोत्रेण तु समाहितः ।
दक्षिणे पितृतीर्थेन पितॄणां तृप्तिमावहन् ॥ ७.७० ॥
— (और) बैठकर, स्वधाकारोंसे और गोत्र (के उच्चारण) से, समाहित होकर, दक्षिणकी ओर पितृतीर्थसे पितरोंको तृप्ति पहुँचाते हुए (तर्पण करे)।
सव्यं जानु ततोऽन्वाच्य पाणिभ्यां दक्षिणामुखः ।
तल्लिङ्गैस्तर्पयेन्मन्त्रैः सर्वान् पितृगणांस्तथा ॥ ७.७१ ॥
फिर बायाँ घुटना (भूमिपर) टेककर, दक्षिणकी ओर मुँह करके, दोनों हाथोंसे, उन (पितरों) के लिङ्गवाले (उन्हें सूचित करनेवाले) मन्त्रोंसे सब पितृगणोंका तर्पण करे।
पाठभेद — (पृ. ६५, पं. ६) वीमि. ३६६, हे. ३.१. पृ. ९३५, अप. १३७, वै. ३७८, पमा. १.१. पृ. २५६; जानु तथोऽन्वाच्य आ.
(पृ. ६५, पं. ७) वै. ३७८, पमा. १.१. २५६, हे. ३.१. पृ. ९३५
मातामहांश्च सततं श्रद्धया तर्पयेद्बुधः ।
प्राचीनावीत्युदकं च प्रसिञ्चेद्वै तिलान्वितम् ॥ ७.७२ ॥
बुद्धिमान् (द्विज) श्रद्धासे सदा मातामहों (नानाओं) का भी तर्पण करे; और प्राचीनावीती (जनेऊ दाहिने कंधेपर) होकर तिल मिला जल सींचे।
पाठभेद — (पृ. ६५, पं. ८) ...तर्पयेद्द्विजः वै. ३७८, पमा. १.१. पृ. २५७
यद्युद्धृतं निषिञ्चेत्तु तिलान् संमिश्रयेज्जले ।
अतोऽन्यथा तु सव्येन तिला ग्राह्या विचक्षणैः ॥ ७.७३ ॥
यदि (पात्रमें) निकाला हुआ (जल) सींचे तो तिल जलमें मिला दे; अन्यथा बुद्धिमान् बायें हाथसे तिल लें।
पाठभेद — (पृ. ६५, पं. १०) पमा. १.१. ३५४, स्मृत. ३७६, हे. ३.१. पृ. ९२३; यद्युद्धृतेन सिञ्चेत्तु मद. २८६; यद्युद्धृतान्निषिञ्चेत्तु....येज्जये वै. ३७७
(पृ. ६५, पं. ११) पमा. १.१. ३५४, स्मृत. ३७६, ३७७, हे. ३.१. पृ. ९३५; अन्यथा वामहस्तेन ततस्तर्पणमाचरेत् मद. २८६
दक्षिणे पितृतीर्थेन जलं सिञ्चेद्यथाविधि ।
दक्षिणेनैव गृह्णीयात् पितृतीर्थसमीपतः ॥ ७.७४ ॥
दाहिने (हाथ) के पितृतीर्थसे विधिपूर्वक जल सींचे; और दाहिने (हाथ) से ही पितृतीर्थके पास (तिल) ग्रहण करे।
पाठभेद — (पृ. ६५, पं. १२) मद. २९३, हे. ३.१. पृ. ९३६
(पृ. ६६, पं. १) हे. ३.१. पृ. ९३६; पितृतीर्थेन संयतः मद. २९३
विप्रकरे पञ्च तीर्थानि
पञ्च तीर्थानि विप्रस्य करे तिष्ठन्ति दक्षिणे ।
ब्राह्मं दैवं तथा पैत्रं प्राजापत्यं तु सौमिकम् ॥ ७.७५ ॥
विप्रके दाहिने हाथमें पाँच तीर्थ रहते हैं — ब्राह्म, दैव, पैत्र, प्राजापत्य और सौम्य।
पाठभेद — (पृ. ६६, पं. ३) तथा पित्र्यं हे. ३.१. पृ. ९३०
अङ्गुष्ठमूले ब्राह्मं तु दैवं ह्यङ्गुलमूर्धनि ।
प्राजापत्यं तु मूले स्यात् मध्ये सौम्यं प्रतिष्ठितम् ॥ ७.७६ ॥
अँगूठेके मूलमें ब्राह्म (तीर्थ), अँगुलियोंके अग्रभागमें दैव, (कनिष्ठिकाके) मूलमें प्राजापत्य, और (हथेलीके) बीचमें सौम्य प्रतिष्ठित है।
पाठभेद — (पृ. ६६, पं. ४) वीमि. परि. ७६; त्वङ्गुलिमूर्धनि अप. ३९
(पृ. ६६, पं. ५) वीमि. परि. ७६, अप. ३९; मूलेषु मध्ये आ., हे. ३.१. पृ. ९३०
तिलानुकल्पाः
अङ्गुष्ठस्य प्रदेशिन्या मध्ये पित्र्यं प्रकीर्तितम् ।
तिलानामप्यभावे तु सुवर्णं रजतान्वितम् ॥ ७.७७ ॥
अँगूठे और तर्जनीके बीच पैत्र (तीर्थ) कहा गया है। तिलोंके अभावमें चाँदी सहित सोना (जलमें डाले) —
पाठभेद — (पृ. ६६, पं. ६) हे. ३.१. पृ. ९३०
(पृ. ६६, पं. ७) वीमि. ३६६, स्मृत. ३७७, स्मृच. १९२, याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. ३.१. पृ. ९२०; सुवर्णरजतान्वितम् मद. २९०
तदभावे निषिञ्चेत्तु दर्भैर्मन्त्रेण वाग्यतः ।
कव्यवाडनलः सोमो यमश्चैवार्यमा तथा ॥ ७.७८ ॥
— उसके (भी) अभावमें, मौन रहकर मन्त्रसे कुशोंद्वारा (जल) सींचे। कव्यवाहन अग्नि, सोम, यम और अर्यमा,
पाठभेद — (पृ. ६६, पं. ८) मद. २९०; मन्त्रेण वा पुनः स्मृच. १९२; मन्त्रेण वाप्यथ वीमि. ३६६; दर्भैस्तोयैर्न चान्यथा स्मृत. ३७७
(पृ. ६६, पं. ९) स्मृच. १९६, अप. १३९, पमा. १.१. ३५९; कव्यवाडनलं सोमं यममर्यमणं तथा आ., हे. ३.१. पृ. ९३६; कव्यवाहोऽनलः सोमो, वै. ३७९
तर्पणदेवताः
अग्निष्वात्तान् सोमपाश्च तथा बर्हिषदः पितॄन् ।
यदिस्याज्जीवत्पितृक एतान् दिव्यान् पितॄंस्तथा ॥ ७.७९ ॥
अग्निष्वात्त, सोमप और बर्हिषद् पितर — जिसका पिता जीवित हो, (वह) इन दिव्य पितरोंका (तर्पण करे),
पाठभेद — (पृ. ६६, पं. १०) हे. ३.१. पृ. ९३६; अग्निष्वात्ता बर्हिषदोऽपि च स्मृच. १९६, अप. १३९, मद. २९४, पमा. १.१. पृ. ३५९
(पृ. ६६, पं. ११) हे. ३.१. पृ. ९३६; जीवपितृक एतान् विद्यात्ततः पितॄन् स्मृच. १९६; ... विद्यात्तदा पितॄन् मद. २९४, अप. १३९; यदिस्याज्जीवपितृकस्तान् विद्याच्च तथा पितॄन् वै. ३७९, पमा. १.१. ३५९
तेभ्यो वापि पिता दद्यात् कामतस्तांस्तु तर्पयेत् ।
एतांश्च वक्ष्यमाणांश्च प्रमीतपितृको द्विजः ॥ ७.८० ॥
— अथवा पिता जिन्हें देता हो उन्हें, (या) इच्छानुसार उनका तर्पण करे। जिसका पिता मर चुका हो, वह द्विज इनका और आगे कहे जानेवालोंका (तर्पण करे) —
पाठभेद — (पृ. ६७, पं. १) दद्यात् तेभ्य एव प्रदापयेत् वीमि. ३६६; दद्यात्तेभ्यो वापि प्रदापयेत् स्मृच. १९६; दद्यात्तेभ्यो वापि प्रदापयेत् अप. १३९, मद. २९४, हे. ३.१. पृ. ९३६; दद्यात्तेभ्यो वापि प्रदीयते पमा. १.१. ३५९
(पृ. ६७, पं. २) हे. ३.१. पृ. ९३६, वीमि. ३६६; एतांश्चैव प्रमीतांश्च प्रमीत... स्मृच. १९६, अप. १३९, मद. २९४, वै. ३७९; एतांश्चैव प्रमीतांश्चाप्रमीतपितृको द्विजः पमा. १.१. पृ. ३६०
वसून् रुद्रांस्तथादित्यान् नमस्कारस्वधान्वितान् ।
एते सर्वस्य पितर एष्वायत्ताश्च मानुषाः ॥ ७.८१ ॥
— नमस्कार और स्वधाके साथ वसुओं, रुद्रों और आदित्योंका; ये सबके पितर हैं, और मनुष्य इन्हींके अधीन हैं।
पाठभेद — (पृ. ६७, पं. ३) वीमि. ३६६, अप. १३९, हे. ३.१. पृ. ९३६; नमस्कारसमन्वितान् पमा. १.१. ३५७
(पृ. ६७, पं. ४) वीमि. ३६६, हे. ३.१. पृ. ९३६
आचार्यांश्च पितॄंश्चैव पितृप्रभृतिनामतः ।
मन्त्रैश्च देयमुदकं पितॄणां प्रीतिवर्धनम् ॥ ७.८२ ॥
आचार्योंका, और पितरोंका पिता आदि (के) नामोंसे (तर्पण करे); पितरोंकी प्रीति बढ़ानेवाला जल मन्त्रोंके साथ देना चाहिए —
पाठभेद — (पृ. ६७, पं. ५) वीमि. ३६६;... प्रभृति नामवित् आ.; पितॄन् स्वांश्च पितृ... हे. ३.१. पृ. ९३६
(पृ. ६७, पं. ६) हे. ३.१. पृ. ९२०; प्रीतिवर्धनैः वीमि. ३६६, हे. ३.१. पृ. ९४०
मन्त्रजपः
उदीरतामङ्गिरस आयं रिवरयूर्जमित्यपि ।
पितृभ्यश्चापि ये चेह मधुवाता इति त्र्यृचम् ॥ ७.८३ ॥
"उदीरताम्…", "अङ्गिरसः…", "आयन्तु नः…", "ऊर्जं वहन्तीः…", "पितृभ्यः…", "ये चेह…" और "मधु वाताः…" — इन तीन ऋचाओं (से)।
पाठभेद — (पृ. ६७, पं. ७) वीमि. ३६६; उदीरता स्मृच. १९५, हे. ३.१. पृ. ९४०; उदीरिता.. आ.
(पृ. ६७, पं. ८) पितृभ्य इति ये चेह वीमि. ३६६, स्मृच. १९५, हे. ३.१. पृ. ९४०; इति त्र्यृचा आ.
पितॄन् ध्यायन् प्रसिञ्चेद्वै जपन् मन्त्रान् यथाक्रमम् ।
तृप्यध्वमिति च त्रिर्वै दद्याच्च सलिलाञ्जलिम् ॥ ७.८४ ॥
पितरोंका ध्यान करते हुए, मन्त्रोंको क्रमसे जपते हुए (जल) सींचे; और "तृप्यध्वम्" कहकर तीन बार जलकी अञ्जलि दे।
पाठभेद — (पृ. ६७, पं. ९) स्मृच. १९५; मन्त्रानिमान् क्रमात् हे. ३.१. पृ. ९४०
(पृ. ६७, पं. १०) वीमि. ३६७; दद्यात् प्राञ्जलिरानतः आ.; ततः प्राञ्जलिरानतः हे. ३.१. पृ. ९४०; ... मिति च तृप्यं ततः प्राञ्जलिना ततः स्मृच. १९५
पितृतर्पणविधिः
नमो व इति जप्त्वा वै ततो मातामहान् सखीन् ।
तर्पयेदानृशंसार्थं धर्मं परममास्थितः ॥ ७.८५ ॥
"नमो वः (पितरः)…" जपकर, फिर परम धर्ममें स्थित होकर, सहृदयताके लिए मातामहों और मित्रोंका तर्पण करे;
पाठभेद — (पृ. ६८, पं. १) मातामहानपि स्मृच. १९५, हे. ३.१. पृ. ९४२
(पृ. ६८, पं. २) परममाश्रिताः हे. ३.१. पृ. ९४२
मातृर्मातृष्वसॄः श्वश्रूर्मातुलानि(नीं) पितृष्वसॄः ।
दुहितॄं(तॄ)श्च स्वसॄं(सॄ)श्चैव ज्ञात्यृत्विक्छिष्यबान्धवान् ॥ ७.८६ ॥
माताओं, मौसियों, सासों, मामियों, बुआओं, पुत्रियों, बहनों, जातिवालों, ऋत्विजों, शिष्यों और बन्धुओंका —
पाठभेद — (पृ. ६८, पं. ३) माता मातृष्वसा चैव मातुलानी पितृष्वसा वीमि. ३६७
(पृ. ६८, पं. ४) दुहिता च स्वसा चैव शिष्यर्त्विग् ज्ञातिबान्धवाः वीमि. ३६७
नामतस्तु स्वधाकारैस्तर्पयेदनुपूर्वशः ।
सवर्णेभ्यो जलं देयं नासवर्णे कथंचन ॥ ७.८७ ॥
— नाम लेकर स्वधाकारसे क्रमशः तर्पण करे; सवर्णोंको (ही) जल देना चाहिए, असवर्णको किसी प्रकार नहीं।
पाठभेद — (पृ. ६८, पं. ५) ...... कारैस्तर्प्यास्त्वनुपूर्वशः वीमि. ३६७; नामगोत्रस्वधाकारै... स्मृत. ३७८, हे. ३.१. पृ. ९२०; गोत्रनामस्वधा...... मद. २९३
(पृ. ६८, पं. ६) स्मृत. ३७१; सवर्णेभ्यो स्मृच. १९५; ...... जलं दद्यात् ...... वीमि. ३६७; नासवर्णेभ्य एव च । गोत्रनाम स्वधाकारै......वै. ३७८, पमा. १.१. पृ. ३५८, हे. ३.१. पृ. ९३६
तर्पणाकरणे निन्दा
पूर्वजांश्च पितॄंस्तर्प्य ततोऽन्येषां प्रदीयते ।
नास्तिक्यभावाद्यश्चापि न तर्पयति वै पितॄन् ॥ ७.८८ ॥
पूर्वजों और पितरोंका तर्पण करके फिर दूसरोंको (जल) दिया जाता है। जो नास्तिकभावसे पितरोंका तर्पण नहीं करता —
पाठभेद — (पृ. ६८, पं. ७) संतर्प्य स्वान् पितॄन् पूर्वं पश्चादन्यांश्च तर्पयेत् वीमि. ३६७
(पृ. ६८, पं. ८) वीमि. ३३६, स्मृच. १९६, वै. ३८०; ... वै सुतः वीमि. ३६७, स्मृत. ३७१;... भावाद्यस्तांस्तु पमा. १.१. पृ. ३६२; वासिष्ठवचनमिति वै. २४७
स्नानतर्पणश्राद्धप्रशंसा
पिबन्ति देहनिःस्रावं पितरोऽस्य जलार्थिनः ।
तस्मात् स्नानं प्रशंसन्ति श्रद्धयाऽश्रद्धयापि वा ॥ ७.८९ ॥
— उसके पितर जलके प्यासे होकर उसके शरीरसे टपकता (जल) पीते हैं; इसलिए श्रद्धासे हो या बिना श्रद्धाके, (विद्वान्) स्नानकी प्रशंसा करते हैं।
पाठभेद — (पृ. ६८, पं. ९) वीमि. ३३६, स्मृच. १९६; देहरुधिरं स्मृत. ३७१, पमा. १.१. पृ. ३६२, वासिष्ठवचनमिति वै. २४७, ३८०
विदित्वैव सदा स्नायात् विधिनानेन नित्यशः ।
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा ॥ ७.९० ॥
यह जानकर सदा इस विधिसे नित्य स्नान करे; प्रतिदिन अन्न आदिसे अथवा जलसे श्राद्ध करे —
पाठभेद — (पृ. ६९, पं. २) वीमि. ४३२
तृप्त्यर्थं वै पितॄणां तु आत्मनः श्रेय इच्छता
यदेव तर्पयेदद्भिः पितॄन् स्नात्वा द्विजोत्तमः ॥ ७.९१ ॥
— पितरोंकी तृप्तिके लिए और अपने कल्याणकी इच्छासे। श्रेष्ठ द्विज स्नान करके जो जलसे पितरोंका तर्पण करता है —
पाठभेद — (पृ. ६९, पं. ३) वीमि. ४३२
(पृ. ६९, पं. ४) तर्पयत्यद्भिः मनु. ३.२८३; मनुशातातपयोगयाज्ञवल्क्यवचनमिति हे. ३.१. पृ. ९४६
तेनैव सर्वमाप्नोति पितृयज्ञक्रियाफलम् ।
निष्पीड्य स्नानवस्त्रं तु आचम्य प्रयतः शुचिः ॥ ७.९२ ॥
— उसीसे वह पितृयज्ञ-क्रियाका सारा फल पा लेता है। (फिर) स्नानका वस्त्र निचोड़कर, आचमन करके, संयत और पवित्र होकर —
पाठभेद — (पृ. ६९, पं. ५) मनुशातातपयोगयाज्ञवल्क्यवचनमिति हे. ३.१. पृ. ९४६; कृत्स्नमाप्नोति मनु. ३.२८३
(पृ. ६९, पं. ६) वीमि. ३७७, हे. ३.१. पृ. ९४५, स्मृच. १९७; प्रक्षाल्य प्रयतः अप. १३९
सुरार्चनाविधिः
सुराणामर्चनं कुर्याद्ब्रह्मादीनाममत्सरः ।
ब्राह्मवैष्णवरौद्रैश्च सावित्रैर्मैत्रवारुणैः ॥ ७.९३ ॥
— ईर्ष्यारहित होकर ब्रह्मा आदि देवताओंका अर्चन करे — ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सविता और मित्र-वरुणके मन्त्रोंसे —
पाठभेद — (पृ. ६९, पं. ७) देवानामर्चनं वीमि. ३७७, स्मृच. १९७, अप. १३९, हे. ३.१. पृ. ९४५, वै. ३८४; देवानां सवनं मद. २९९; ...... दीनाममत्सरी ग. २१३.१३७
(पृ. ६९, पं. ८) वीमि. ३७७, ग. २१३.१३७; ब्रह्मवैष्णव आ.; विष्णुर्ब्रह्मा च रुद्रश्च विष्णुर्देवो दिवाकरः अप. १३९
तल्लिङ्गैरर्चयेन्मन्त्रैः सर्वान् देवान् समाहितः ।
ध्यात्वा प्रणवपूर्वं तु दैवतं तु समाहितः ॥ ७.९४ ॥
— उन-उन (देवताओं) के लिङ्गवाले मन्त्रोंसे सब देवताओंका समाहित होकर अर्चन करे; प्रणवपूर्वक देवताका ध्यान करके, समाहित होकर —
पाठभेद — (पृ. ६९, पं. ९) वीमि. ३७७, वै. ३८४; सर्वदेवानमस्य च ग. २१३.१३७
(पृ. ६९, पं. १०) स्नात्वा प्रणव ...... देवतां तु स्मृत. ३९८
नमस्कारेण पुष्पाणि विन्यसेच्च पृथक् पृथक् ।
आवाहनादिकं कर्म यन्न प्रोक्तं मया त्विह ॥ ७.९५ ॥
— नमस्कारके साथ अलग-अलग फूल रखे। आवाहन आदि जो कर्म मैंने यहाँ नहीं कहे —
पाठभेद — (पृ. ६९, पं. ११) विन्यसेत्तु स्मृत. ३९८, ग. २१३.१३८
तत् सर्वं प्रणवेनैव कर्तव्यं चक्रपाणिनः ॥ ७.९६ ॥
— वह सब चक्रपाणि (विष्णु) का (पूजन) प्रणवसे ही करना चाहिए।
दद्यात् पुरुषसूक्तेन यः पुष्पाण्यप एव वा ।
अर्चितं स्याज्जगदिदं तेन सर्वं चराचरम् ॥ ७.९७ ॥
जो पुरुषसूक्तसे फूल या जल ही अर्पित करता है, उसने इस सारे चराचर जगत्की पूजा कर ली।
पाठभेद — (पृ. ७०, पं. १) अप. १४०, आर. ७२, ग. २१३.१३९
(पृ. ७०, पं. २) अप. १४०, मद. २९९, आर. ७२, ग. २१३.१३९
विष्णुर्ब्रह्मा च रुद्रश्च विष्णुर्देवो दिवाकरः ।
तस्मात् पूज्यतमं नान्यमहं मन्ये जनार्दनात् ॥ ७.९८ ॥
विष्णु ही ब्रह्मा और रुद्र हैं, विष्णु ही दिवाकर (सूर्य) देव हैं; इसलिए मैं जनार्दनसे बढ़कर दूसरे किसीको पूजनीय नहीं मानता।
पाठभेद — (पृ. ७०, पं. ३) मद. २९९, अप. १३९
सावित्र्यै हविर्दानम्
विष्णुं वा भास्करं वापि सर्वदैव समर्चयेत् ।
सावित्र्यै च हविर्दद्यात् यथाशक्ति समाहितः ॥ ७.९९ ॥
विष्णुका अथवा सूर्यका सदा ही अर्चन करे; और समाहित होकर यथाशक्ति सावित्रीको हवि दे।
पाठभेद — (पृ. ७०, पं. ५) सर्वदेवमयं विष्णुं भास्करं वाप्यथार्चयेत् ग. २१३.१३८
अर्कदर्शनम्
ततोऽवलोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यृचा ।
स याति ब्रह्मसदनं स्नात्वेक्षेद्योऽनया रविम् ॥ ७.१०० ॥
फिर "हंसः शुचिषत्…" ऋचासे सूर्यको देखे; जो स्नान करके इस (ऋचा) से सूर्यको देखता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है।
पाठभेद — (पृ. ७०, पं. ७) इदमर्धं ‘एवं संपूज्य (१०६ पू.) इत्यर्धानन्तरम्’ दृश्यते स्मृच. २००, अप. १४१, वै. ३९०
(पृ. ७०, पं. ८) स्मृच. २००, अप. १४१
दिवाकरोपस्थानम्
अदृश्रमस्येति मन्त्रैरुपस्थाय दिवाकरम् ।
संवर्चसेति पाणिभ्यां तोयेनाविमृजेन्मुखम् ॥ ७.१०१ ॥
"अदृश्रमस्य (केतवः)…" मन्त्रोंसे सूर्यका उपस्थान करके, "सं वर्चसा…" (मन्त्र) से दोनों हाथोंसे जल लेकर मुँह पोंछे।
दिग्देवतानमस्कारः · ब्रह्मादिभ्यो जलदानपूर्वकं नमस्क्रिया
स्वयंभूरित्युपस्थाय सूर्यस्येति प्रदक्षिणा ।
समावृत्य नमस्कुर्याद्दिशो दिग्देवता अपि ।
ब्रह्मणेऽग्नये पृथिव्यै औषधिभ्यस्तथैव च ॥ ७.१०२ ॥
"स्वयम्भूः…" से उपस्थान करके, "सूर्यस्य (आवृतम्)…" से प्रदक्षिणा करके दिशाओं और दिग्देवताओंको नमस्कार करे; ब्रह्मा, अग्नि, पृथिवी, ओषधियों,
वाचि(चे च) वाचस्पतये विष्णवे महते तथा ॥
एताभ्यो देवताभ्यश्च नमस्कारादि वै जलम् ॥ ७.१०३ ॥
वाणी, वाचस्पति और महान् विष्णुको — इन देवताओंको नमस्कार आदिके साथ जल —
दत्वा नमस्येत् क्रमशस्त्वन्ते वै सर्वकर्मणाम् ।
नमोऽद्भ्यो नमोऽपांपतये वरुणाय नमो नमः ॥ ७.१०४ ॥
— देकर, सब कर्मोंके अन्तमें क्रमसे नमस्कार करे: "जलको नमस्कार, जलोंके स्वामी वरुणको नमस्कार, नमस्कार" —
इत्युक्त्वापो नमस्कृत्यावनौ देवांश्च नामतः ।
इदमापः प्रवहता(त) धाम्नो धाम्नस्तथैव च ॥ ७.१०५ ॥
यह कहकर जलको और (फिर) भूमिपर देवताओंको नाम लेकर नमस्कार करे; "इदमापः प्रवहत…" और "धाम्नो धाम्नः…" (मन्त्रोंसे) —
तीर्थविमोचनमन्त्रः
एवं संपूज्य देवेशं क्षणं ध्यात्वा निरञ्जनम् ।
विमोचनार्थं तीर्थस्य आप्यायस्वेति वै जपेत् ॥ ७.१०६ ॥
— इस प्रकार देवेश्वरकी पूजा करके, क्षणभर निरञ्जनका ध्यान करके, तीर्थको विदा करनेके लिए "आप्यायस्व…" जपे।
पाठभेद — (पृ. ७१, पं. ३) वै. ३९०, स्मृच. २००, अप. १४१, एतदनन्तरं ‘ततोऽवलोकयेद्’ (१०० पू.) इत्यर्धं स्मृच., अप., वै.
अर्घ्यनिवेदनम्, तीर्थदेशप्रक्षालनम्, गृहगमनादि च
देवा गातुविद इति कृत्वा जप्यनिवेदनम् ।
प्रक्षाल्य तीर्थदेशं तु गत्वा स्वं कर्म आचरेत् ॥ ७.१०७ ॥
"देवा गातुविदः…" से जपका निवेदन करके, तीर्थस्थानको धोकर, (घर) जाकर अपना कर्म करे।
पाठभेद — (पृ. ७१, पं. ६) कर्ममाचरेत् आ.
स्नानविधेरावृत्तौ
उपस्थानादिर्यस्तासां मन्त्रवान् कीर्तितो विधिः ।
निवेदनान्तं तत् स्नानमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः ॥ ७.१०८ ॥
उपस्थान आदि जो उन (जलों) की मन्त्रवाली विधि कही गयी, निवेदनतकका (वह सब) स्नान है — ऐसा ब्रह्मवादी कहते हैं।
पाठभेद — (पृ. ७१, पं. ७–८) वीमि. ३४०, हे. ३.१. पृ. ८८३; अयं श्लोकः आदर्शपुस्तके नास्ति
परकीयजलाशयस्नाने कृत्यविशेषः
परकीयनिपानेषु यदि स्नायात् कदाचन ।
सप्त पिण्डान् समुद्धृत्य ततः स्नानं समाचरेत् ॥ ७.१०९ ॥
यदि कभी परकीय (दूसरे के) जलाशय में स्नान करना हो, तो सात पिण्डों को निकालकर उसके बाद स्नान का आचरण करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ७१, पं. ९) वै. २५६, हे. ३.१. पृ. ८७६
(पृ. ७१, पं. १०) सप्त पिण्डांस्ततोद्धृत्य ततः हे. ३.१. पृ. ८७६, हेमाद्रौ योगियाज्ञवल्क्य इति वीमि. १७४, वै. २५६; सप्त पिण्डांस्ततोद्धृत्य ततः स्मृच. १२८
अनुद्धृत्य तु यः स्नायात् परकीयजलाशये ।
वृथा भवति तत् स्नानं कर्तुः पापेन लिप्यते ॥ ७.११० ॥
किन्तु जो परकीय जलाशय में (पिण्डों को) बिना निकालकर स्नान करता है, ऐसा स्नान करने वाले के लिए व्यर्थ होता है और वह पाप से लिप्त होता है।
पाठभेद — (पृ. ७१, पं. ११) स्मृत. ३६७, हेमाद्रिलिखितं शौनकवचनमिति वीमि. १७३
(पृ. ७१, पं. १२) वृथा तस्य भवेत् स्नानं वै. २५६
सोपानत्कस्यापि शुचित्वम्
स्रवन्त्यादिष्वथाचम्य सोपानत्को ह्यसंस्पृशन् ।
आगतः सोदपात्रस्तु यत्नेन शुचिरेव सः ॥ ७.१११ ॥
बहती (नदी) आदिमें आचमन करके, जूते पहने (भूमि आदिको) न छूता हुआ, जलपात्र लिये आया हुआ (द्विज) यत्नसे शुद्ध ही है।
पाठभेद — (पृ. ७१, पं. १३–१४) वीमि. ३७९; उशनावचनमिति हे. ३.१. पृ. ६२७
अभ्युक्षणे ग्राह्यवर्ज्यजलस्वरूपम्
तेनोदकेन द्रव्याणि प्रोक्ष्याचम्य पुनर्गृहे ।
ततः कर्माणि कुर्वीत नित्यं वै यानि कानि चित् ॥ ७.११२ ॥
उस जलसे घरमें द्रव्योंको प्रोक्षित करके, फिर आचमन करके, उसके बाद जो भी नित्य कर्म हों, उन्हें करे।
पाठभेद — (पृ. ७२, पं. १) वीमि. ३७९; द्रव्यादि आ.
(पृ. ७२, पं. २) वीमि. ३७९;...कानिचित् आ.; उशनावचनमिति हे. ३.१. पृ. ६२४
(पृ. ७२, पं. ३) वीमि. ३७९; पात्रादिरहितं, यमवचनमिति हे. ३.१. पृ. ६२६
पात्रादिरहितं तोयमुद्धृतं सव्यपाणिना ।
न तेनाभ्युक्षणं कुर्याद्वस्त्रनिष्पीडनेन च ॥ ७.११३ ॥
बिना पात्रके बायें हाथसे निकाला गया जल — उससे और वस्त्र निचोड़े जलसे अभ्युक्षण (छिड़काव) न करे।
पाठभेद — (पृ. ७२, पं. ४) न तेन प्रोक्षणं वीमि. ३७९, यमवचनमिति हे. ३.१. पृ. ६२६
पात्रलक्षणम्
सौवर्णं राजतं ताम्रं मुख्यं पात्रं प्रकीर्तितम् ।
तदलाभे मृदं पात्रं स्रवते यन्न धारितम् ॥ ७.११४ ॥
सोने, चाँदी और ताँबेका पात्र मुख्य कहा गया है; उनके न मिलनेपर मिट्टीका पात्र, जो (जल) धारण करे, टपके नहीं।
पाठभेद — (पृ. ७२, पं. ५) स्मृच. १५४, वै. ३५३; सौवर्णं राजतं पात्रं स्रवते यन्न धारितम् आ.; मुख्यं पात्रं वीमि. ३७९
(पृ. ७२, पं. ६) स्मृच. १५४; तदलाभे स्मृतं पात्रं......यन्न धारितम् वै. ३५३
स्नानतर्पणफलम्
स्नात्वैवं सर्वभूतानि तर्पयेद्योऽन्वहं द्विजः ।
स गच्छति परं स्थानं तेजोमूर्तिरनामयम् ॥ ७.११५ ॥
जो द्विज इस प्रकार स्नान करके प्रतिदिन सब भूतोंका तर्पण करता है, वह तेजोमूर्ति होकर निर्दोष परम स्थानको जाता है।
स्नानमूलाः क्रियाः सर्वाः श्रुतिस्मृत्युदिता नृणाम् ।
तस्मात् स्नानं निषेवेत श्रीपुष्ट्यारोग्यवर्धनम् ॥ ७.११६ ॥
श्रुति और स्मृतिमें कहे गये मनुष्योंके सब कर्मोंका मूल स्नान है; इसलिए लक्ष्मी, पुष्टि और आरोग्य बढ़ानेवाले स्नानका सेवन करे।
पाठभेद — (पृ. ७२, पं. ९) स्मृच. १०९, वै. २४५, हे. ३.१. पृ. ८५०
(पृ. ७२, पं. १०) वै. २४५; हे. ३.१. पृ. ८५०, श्रीपुण्यायुष्यवर्धनम् स्मृच. १०९. इतःपरं ‘याम्यं हि यातनादुःखं प्रातःस्नायी न पश्यति’ इत्यधिकं वै. २४५; ‘याम्यं......दुःखं नित्यस्नायी’ स्मृच. १०९
प्रातरुत्थाय यो विप्रः संध्यास्नायी सदा भवेत् ।
सप्तजन्मकृतं पापं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥ ७.११७ ॥
जो विप्र प्रातः उठकर सदा संध्याके समय स्नान करता है, वह सात जन्मोंमें किये पापको तीन वर्षोंमें दूर कर देता है।
पाठभेद — (पृ. ७२, पं. ११) प्रातःस्नायी भवेत् सदा, दक्षवचनमिति वीमि. १३८; प्रातःस्नायी सदा भवेत् बृप. २.९३
उषस्युषसि यत् स्नानं संध्यास्वनुदिते रवौ ।
प्राजापत्येन तत्तुल्यं महापातकनाशनम् ॥ ७.११८ ॥
प्रतिदिन उषःकालमें, संध्याओंमें सूर्यके उगनेसे पहले जो स्नान है, वह प्राजापत्य (व्रत) के तुल्य है, महापातकोंका नाशक है।
पाठभेद — (पृ. ७२, पं. १३) संध्यायामुदिते रवौ, दक्षवचनमिति हे. ३.१. पृ. ८४९
(पृ. ७३, पं. १) बृप. २.९२; विष्णुवचनमिति हे. ३.१. पृ. ८४९
सरितां स्नानफलदाने विशेषः
त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः ।
समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः ॥ ७.११९ ॥
जो नदियाँ समुद्रमें नहीं जातीं, वे तीन रातका फल देती हैं; समुद्रमें जानेवाली पखवाड़ेका, और नदियोंका स्वामी (समुद्र) महीनेका।
पाठभेद — (पृ. ७३, पं. २–३) हे. ३.१. पृ. ८४९, वीमि. १८३, स्मृच. १२९, अप. २३५, वै. २५५, आर. २७
स्नानजप्यदानभुक्तिविशेषनिन्दा
वृथा उष्णोदकस्नानं वृथा जप्यमवैदिकम् ।
वृथा त्वश्रोत्रिये दानं वृथा भुक्तमसाक्षिकम् ॥ ७.१२० ॥
गरम जलका स्नान व्यर्थ है, अवैदिक जप व्यर्थ है, श्रोत्रियसे भिन्नको दिया दान व्यर्थ है, और साक्षीके बिना (देवताको अर्पित किये बिना) खाया भोजन व्यर्थ है।
पाठभेद — (पृ. ७३, पं. ४) वृथा तूष्णो... वीमि. १७६, १८३, हे. ३.२. पृ. ७१२, वै. २५८; वृथा ह्युष्णो... बृप. २.१०८; याज्ञवल्क्यवचनमिति स्मृच. १२८. पमा. १.१. पृ. २८७
(पृ. ७३, पं. ५) वै. २५८, वृथा चाश्रोत्रिये बृप. २.१०९, स्मृच. १२८, हे. ३.१. पृ. ८७६
स्नानमाहात्म्यम्
अस्नात्वा नाचरेत् कर्म जपहोमादि किंचन ।
लालास्वेदसमाकीर्णः शयनादुत्थितः पुमान् ॥ ७.१२१ ॥
बिना स्नान किये जप, होम आदि कोई कर्म न करे; बिस्तरसे उठा पुरुष लार और पसीनेसे भरा होता है।
पाठभेद — (पृ. ७३, पं. ६) दक्षवचनमिति वीमि. १३८, बृप. २.९४; विष्णुवचनमिति हे. ३.१. पृ. ८५०
(पृ. ७३, पं. ७) ...दुत्थितो द्विजः दक्ष. २.११; दक्षवचनमिति वीमि. १३८; विष्णुवचनमिति हे. ३.१. पृ. ८५०
क्लिद्यन्ति हि प्रसुप्तस्य इन्द्रियाणि स्रवन्ति च ।
अङ्गानि समतां गच्छन्त्युत्तमान्यधमैः सह ॥ ७.१२२ ॥
सोये हुए (मनुष्य) की इन्द्रियाँ गीली होती और टपकती हैं; उत्तम अंग अधम अंगोंके साथ समान (अशुद्ध) हो जाते हैं।
पाठभेद — (पृ. ७३, पं. ८) विष्णोर्वचनमिति हे. ३.१. पृ. ८५०; चेन्द्रियाणि क्षरन्ति (स्रवन्ति) च दक्ष. २.८; क्लिद्यन्ते हि सुगुप्तानि इन्द्रियाणि क्षरन्ति च बृप. २.९४; क्लिद्यन्ति च सुप्तस्य, दक्षवचनमिति वीमि. १३७
(पृ. ७३, पं. ९) दक्ष. २.८; समतां यान्ति अधमान्युत्तमैः सह आ.; अधमान्युत्तमानि च, दक्षवचनमिति वीमि. १३८; उत्तमान्यधमैः सह बृप. २.९५; उत्तमान्यधमानि च, विष्णुवचनमिति हे. ३.१. पृ. ८५०
अत्यन्तमलिनः कायो नवच्छिद्रसमन्वितः ।
स्रवत्येव दिवारात्रौ प्रातःस्नानं विशोधनम् ॥ ७.१२३ ॥
नौ छिद्रोंवाला यह शरीर अत्यन्त मलिन है, दिन-रात टपकता ही रहता है; प्रातःस्नान (उसका) शोधन है।
पाठभेद — (पृ. ७४, पं. १) दक्ष. २.७; दक्षवचनमिति वीमि. १३७, ग. २१३.५४; विष्णुवचनमिति हे. ३.१. पृ. ८४९
(पृ. ७४, पं. २) स्रवत्येव...स्नानेन शुद्ध्यति बृप. २.९६; स्रवत्येव...प्रातःस्नानं विशोधनम् ग. २१३.५५; विष्णुवचनमिति हे. ३.१. पृ. ८४९
तस्मात् प्रातः प्रशंसन्ति स्नानमेव हि नित्यशः ।
कालमालम्ब्य कर्तव्यं मध्यमे सवने तथा ॥ ७.१२४ ॥
इसलिए (विद्वान्) प्रातःकाल नित्य स्नानकी ही प्रशंसा करते हैं; और समय देखकर मध्याह्न सवनमें भी (स्नान) करना चाहिए।
सवनत्रयं तु यः कुर्यात् स्नानमेव हि नित्यशः ।
स गच्छति परं स्थानं ब्रह्मणः सदनं द्विजः ॥ ७.१२५ ॥
जो द्विज नित्य तीनों सवनोंमें स्नान ही करता है, वह परम स्थान ब्रह्मलोकको जाता है।
स्नानहोमजपाद्याचरणावश्यकता
मनःप्रसादजननं रूपसौभाग्यवर्धनम् ।
शोकदुःस्वप्नहृत् स्नानमोजःप्रह्लादनं तथा ॥ ७.१२६ ॥
स्नान मनको प्रसन्न करता है, रूप और सौभाग्य बढ़ाता है, शोक और दुःस्वप्नको हरता है, ओजको आनन्दित करता है।
पाठभेद — (पृ. ७४, पं. ७) स्मृच. १०९, हे. ३.१. पृ. ८५०, दक्ष. २.१४, मद. २३६, ग. २१३.५५; प्रसादजनकं वै. २४५
(पृ. ७४, पं. ८) दुःखशोकापहं स्नानं मानदं (मौनदं) ज्ञानदं तथा दक्ष. २.१४; शोकदुःस्वप्नहं स्नानं मोक्षदं ह्लादनं तथा स्मृच. १०९, वै. २४५; शौचं दुःस्वप्नहृत् स्नानं मोक्षदं ह्लादनं तथा मद. २३६; शोकदुःस्वप्नहं स्नानं मोक्षदं ज्ञानदं तथा हे. ३.१. पृ. ८५०
स्नानदानजपध्यानादिफलम्
स्नानहोमजपातिथ्यं नाचरेच्छक्तिमांस्तु यः ।
वृथा हि जीवितं तस्य परलोकात् स हीयते ॥ ७.१२७ ॥
जो समर्थ होते हुए भी स्नान, होम, जप और अतिथि-सत्कार नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ है; वह परलोकसे वञ्चित हो जाता है।
स्नानं दानं जपो ध्यानं पितृदेवार्चनं तथा ।
पावनानि मनुष्याणां दुष्कृतस्येह कर्मणः ॥ ७.१२८ ॥
स्नान, दान, जप, ध्यान और पितरों-देवताओंका अर्चन — ये मनुष्योंके यहाँके दुष्कर्मोंको पवित्र करनेवाले हैं।
जपयज्ञविधिनिरूपणप्रतिज्ञा · जपयज्ञप्रशंसा
जपस्येह विधिं वक्ष्ये यथा कार्यं विधानतः ।
ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ७.१२९ ॥
अब मैं यहाँ जपकी विधि कहूँगा, जैसे विधानपूर्वक करनी चाहिए। जो चार पाकयज्ञ विधियज्ञ सहित हैं, वे सब जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं।
पाठभेद — (पृ. ७४, पं. १३) सं. ६८; यथाशक्ति समासतः आर. ४५*
(पृ. ७४, पं. १४) वीमि. ३१३
(पृ. ७५, पं. १) वीमि. ३१४
जप्येनैव हि संसिध्येत् ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ ७.१३० ॥
ब्राह्मण जपसे ही सिद्धि पाता है, इसमें संशय नहीं; वह दूसरा (कर्म) करे या न करे, (सबका) मित्र ब्राह्मण कहलाता है।
पाठभेद — (पृ. ७५, पं. २) ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् ३.४.३८; जप्येनैव तु मनु. २.८७, वीमि. ३१४, वसिष्ठस्मृ. २६.१२, शङ्खस्मृ. १२.२८
(पृ. ७५, पं. ३) वीमि. ३१४, शङ्खस्मृ. १२.२८, मनु. २.८७, वसिष्ठस्मृ. २६.१२; मन्त्रो ब्राह्मण ब्र. सू. शां. भा. ३.४.३८
जपकाले वर्ज्यानि
न च क्रमन्न विहसन्न पार्श्वमवलोकयन् ।
ना(नो)पाश्रितो न जल्पंश्च न प्रावृत्य शिरस्तथा ॥ ७.१३१ ॥
न चलते हुए, न हँसते हुए, न बगलमें देखते हुए, न (किसी चीजका) सहारा लिये, न बात करते हुए, और न सिर ढँककर —
पाठभेद — (पृ. ७५, पं. ४) आर. ४५*; न चङ्क्रमन्न च हसन् स्मृच. १५०, वीमि. ३१४; न च क्रमन्न विह... स्मृत. ३९१; इतः प्रभृति ‘न च संश्रावयन् जपेत् (७.१३२)’ इत्यन्तौ द्वौ श्लोकौ व्यासीयत्वेनोक्तौ स्मृच. १५०; न विकुर्वन्नापि हसन् सं. ६८
(पृ. ७५, पं. ५) स्मृत. ३९१; न प्रावृतशिरास्तथा स्मृच. १५०, सं. ६९, आर. ४५; नोपाश्रितो ... न प्रावृतशिरास्तथा वीमि. ३१४
(पृ. ७५, पं. ६) पादमाक्रम्य ... तथा करौ वीमि. ३१४, सं. ६९; न चैव हि तथा करौ स्मृच. १५०; पादमाक्रम्य...न वै बहिः करौ स्मृतौ स्मृत. ३९१; पादेन पादमाक्रम्य न चैव हि तथा करौ आर. ४५*
न पदा पदमाक्रम्य न चैव हि तथा करे(रौ) ।
न चासमाहितमना न च संश्रावयन् जपेत् ॥ ७.१३२ ॥
— न पैरसे पैर दबाकर, न वैसे ही हाथोंसे; न असमाहित मनसे, और न (दूसरोंको) सुनाते हुए जप करे।
पाठभेद — (पृ. ७५, पं. ७) वीमि. ३१४, स्मृच. १५०; नैवं विधं जपं कुर्यान्न च संश्रावयेज्जपन् आ.; नैवं विधं जपं कुर्यान्न च संश्रावयेज्जपन् सं. ६९, स्मृत. ३९१, आर. ४५
(पृ. ७५, पं. ८–९) वीमि. ३१४; अत्रिवचनमिति स्मृच. १५१; इतःपरमधिकम्:- “उपांशुजपयुक्तस्य शं स्यात् शतगुणो भवेत् । साहस्रो मानसः प्रोक्तो यस्मात् ध्यानमयो हि सः । ओष्ठस्पन्दनमात्रेण यत्रोपांशु तदध्वनि । कृत्वा जिह्वां निर्विकल्पां चिन्तनं तद्धि मानसम् ॥” इतः परम् तिष्ठंश्चेदित्यादि (१३५) श्लोकः वीमि. ३१४
अनन्तफलदानि
प्रच्छन्नानि च दानानि ज्ञानं च निरहङ्कृतम् ।
जप्यानि च सुगुप्तानि तेषां फलमनन्तकम् ॥ ७.१३३ ॥
गुप्त दान, अहंकाररहित ज्ञान और भली-भाँति गुप्त रखे गये जप — इनका फल अनन्त है।
पाठभेद — (पृ. ७५, पं. ८–९) वीमि. ३१४; अत्रिवचनमिति स्मृच. १५१; इतःपरमधिकम्:- “उपांशुजपयुक्तस्य शं स्यात् शतगुणो भवेत् । साहस्रो मानसः प्रोक्तो यस्मात् ध्यानमयो हि सः । ओष्ठस्पन्दनमात्रेण यत्रोपांशु तदध्वनि । कृत्वा जिह्वां निर्विकल्पां चिन्तनं तद्धि मानसम् ॥” इतः परम् तिष्ठंश्चेदित्यादि (१३५) श्लोकः वीमि. ३१४
जपत्रैविध्यम्
मानसः शान्तिकजप उपांशुः पौष्टिकः स्मृतः ।
सशब्दश्चाभिचारश्च जपस्तु त्रिविधः स्मृतः ॥ ७.१३४ ॥
मानस जप शान्तिक (शान्ति देनेवाला), उपांशु पौष्टिक (पुष्टि देनेवाला), और सशब्द (वाचिक) आभिचारिक कहा गया है — (इस प्रकार) जप तीन प्रकारका है।
तिष्ठंश्चेद्वीक्ष्यमाणोऽर्कमासीनः प्राङ्मुखो जपेत् ।
प्रागग्रेषु कुशेष्वेवमासीनश्चासने शुभे ।
नात्युच्छ्रिते नातिनीचे दर्भपाणिः सुसंयतः ॥ ७.१३५ ॥
खड़ा हो तो सूर्यको देखता हुआ, बैठा हो तो पूर्वकी ओर मुँह करके जपे — पूर्वकी ओर अग्रभागवाले कुशोंपर, शुभ आसनपर, जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, हाथमें कुश लिये, भली-भाँति संयत होकर।
पाठभेद — (पृ. ७६, पं. ३) स्मृच. १८५, सं. ६९; उत्तिष्ठन् वीक्ष्यमाणो स्मृत. ३९१; ... माणोऽर्कं जपं कुर्यात् समाहितः अप. ४७, मद. ७७; ‘अन्यथा प्राङ्मुखः कुर्याद्वक्ष्यमाणक्रमेण तु’ इत्यधिकं वीमि. ३००, अप. ४७, मद. ७७
(पृ. ७६, पं. ४) प्राक्कूलेषु वीमि. ३१४; प्राक्कुशेष्वेवमासीनो दर्भो वाससी शुभे स्मृत. ३९१
(पृ. ७६, पं. ५) वीमि. ३१४, आदर्शपुस्तके इदमर्धं नास्ति ।
विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः ।
उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ॥ ७.१३६ ॥
विधियज्ञसे जपयज्ञ दस गुना श्रेष्ठ है; उपांशु (जप) सौ गुना, और मानस हजार गुना कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ७६, पं. ६–११) आरम्भयज्ञाज्जप ... अत्रिस्मृ. २.७, वसिष्ठस्मृ. २६.१०
अक्षमाला तत्फलं च
स्फाटिकेन्द्राक्षरुद्राक्षपुत्रजीवसमुद्भवैः ।
अक्षमाला तु कर्तव्या प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तरा ॥ ७.१३७ ॥
स्फटिक, इन्द्राक्ष, रुद्राक्ष और पुत्रजीव (के दानों) से अक्षमाला बनानी चाहिए; (इनमें) उत्तरोत्तर (बादवाली) अधिक प्रशस्त है।
पाठभेद — (पृ. ७६, पं. ६–११) आरम्भयज्ञाज्जप ... अत्रिस्मृ. २.७, वसिष्ठस्मृ. २६.१०
(पृ. ७६, पं. ८) अप. ४७; रुद्राक्षैः पुत्रजीव... वै. ३४२; स्फाटिकेन्द्राक्षरुद्राक्षैर्बिन्दुमैर्मणिमौक्तिकैः स्मृच. १५२; सुवर्णमणिभिः सम्यक् प्रवालैरथवाब्जकैः इत्यधिकम्, कालिकापुराणवचनमिति वीमि. ३२६
(पृ. ७६, पं. ९) उत्तमा ह्युत्तरोत्तरा स्मृच. १५२; ह्युत्तमा ह्युत्तरोत्तरा वै. ३४२; कर्तव्या देवीप्रीतिकरी परा, कालिकापुराणवचनमिति वीमि. ३२६
कोट्या स्यात्तु भवेद्वृद्धिरनन्ता चात्र संज्ञया ।
जपस्य क्रियमाणस्य तस्माच्छ्रेष्ठा परा परा ॥ ७.१३८ ॥
(पहलीसे) करोड़ गुनी और (अन्तिमसे) अनन्त वृद्धि होती है — जपमें; इसलिए आगे-आगेवाली श्रेष्ठ है।
पाठभेद — (पृ. ७६, पं. ६–११) आरम्भयज्ञाज्जप ... अत्रिस्मृ. २.७, वसिष्ठस्मृ. २६.१०
(पृ. ७६, पं. १०) कोट्यादिका भवेद्वृद्धिरक्षमाला विशेषतः वीमि. ३१४
(पृ. ७७, पं. १) तस्माच्छ्रेष्ठतरा परा वीमि. ३१४
अक्षमालानुकल्पाः
अभावादक्षमालायाः कुशग्रन्थ्याऽथ पाणिना ।
जप एव हि कर्तव्य एकाग्रमनसा तथा ॥ ७.१३९ ॥
अक्षमालाके अभावमें कुशकी गाँठोंसे अथवा हाथ (की पोरों) से एकाग्र मनसे जप ही करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ७७, पं. २) अभावेत्वक्ष...ग्रन्थ्याग्रपाणिना वीमि. ३१४, ३२७, अप. ४७
(पृ. ७७, पं. ३) अप. ४७,...मनसैव तु वीमि. ३१४
जपावधिः
ध्यायेच्च मनसा मन्त्रं जिह्वोष्ठौ न विचालयेत् ।
न कम्पयेच्छिरोग्रीवं दन्तान्नैव प्रकाशयेत् ॥ ७.१४० ॥
मन से मन्त्र का ध्यान करना चाहिए, जिह्वा और ओष्ठ (होठों) को नहीं हिलाना चाहिए, शिरोग्रीव (सिर और गर्दन) को नहीं कंपित करना चाहिए और दाँतों को भी प्रकट नहीं करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ७७, पं. ४) मद. ७५; ध्यायेत मनसा...जिह्वोष्ठौ न च चालयेत् वीमि. ३१४, अप. ४८; ध्यायेत्तु मनसा सं. ७०; न च चालयेत् आर. ४५
(पृ. ७७, पं. ५) अप. ४८, आर. ४५, सं. ७०;...च्छिरोग्रीवां मद. ७५
यक्षराक्षसभूतानि सिद्धविद्याधरोरगाः ।
हरन्ति प्रसभं यस्मात्तस्माद्गुप्तं समाचरेत् ॥ ७.१४१ ॥
क्योंकि यक्ष, राक्षस, भूत, सिद्ध, विद्याधर और सर्प आदि (मन्त्र को) बलपूर्वक हर लेते हैं, इसलिए जप गुप्त रूप से करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ७७, पं. ६) वीमि. ३१४;...विद्याधरगणाः अप. ४८
(पृ. ७७, पं. ७) वीमि. ३१५; गुप्तं तु कारयेत् अप. ४८
जपस्थलानि
जलान्ते वाग्न्यगारे वा जपेद्देवालये तथा ।
पुण्यतीर्थे गवां गोष्ठे सिद्धक्षेत्रेऽथवा गृहे ॥ ७.१४२ ॥
जलके किनारे, अग्निशालामें, देवालयमें, पुण्य तीर्थमें, गोशालामें, सिद्धक्षेत्रमें अथवा घरमें जप करे।
पाठभेद — (पृ. ७७, पं. ८) देवालयेऽपि वा वीमि. ३१५; अग्न्यगारे जलान्ते वा जपेद्विष्ण्वालयेऽपि वा स्मृच. १५०; याज्ञवल्क्यवचनमिति आर. ४५
(पृ. ७७, पं. ९) याज्ञ...वचनमिति आर. ४५*; द्विजक्षेत्रे स्मृच. १५०; गवां गोष्ठे पुण्यतीर्थे सिद्धक्षेत्रेऽथवा गृहे वीमि. ३१५; इदमर्धमादर्शपुस्तके नास्ति ।
गृहे ह्येकगुणं प्रोक्तं नद्यां तु द्विगुणं स्मृतम् ।
गवां गोष्ठे दशगुणमग्न्यगारे दशाधिकम् ।
सिद्धक्षेत्रेषु तीर्थेषु देवतायाश्च संनिधौ ।
सहस्रं शतकोटीनामनन्तं विष्णुसंनिधौ ॥ ७.१४३ ॥
घरमें (जप) एक गुना कहा गया है, नदीमें दो गुना, गोशालामें दस गुना, अग्निशालामें उससे भी अधिक; सिद्धक्षेत्रों, तीर्थों और देवताके सान्निध्यमें हजार और सौ करोड़ गुना, और विष्णुके सान्निध्यमें अनन्त।
पाठभेद — (पृ. ७७, पं. १०) वीमि. ३१५; गृहेत्वेक...शङ्खवचनमिति स्मृच. १५०; इदमर्धमादर्शपुस्तके नास्ति ।
(पृ. ७७, पं. ११) वीमि. ३१५; शङ्खवचनमिति स्मृच. १५०
(पृ. ७७, पं. १२) वीमि. ३१५; शङ्खवचनमिति स्मृच. १५०
(पृ. ७८, पं. १) वीमि. ३१५
जपे भक्ष्याणि
शाकयावकभैक्ष्याणि पयोमूलफलानि च ।
बिसशृङ्गाटशालूक(कं) हविष्यान्नानि यानि तु ।
दधि सर्पिस्तथा ह्यापः प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तरम् ॥ ७.१४४ ॥
शाक, जौका दलिया, भिक्षान्न, दूध, मूल, फल, कमलनाल, सिंघाड़ा, शालूक (कमलकन्द) — जो हविष्य अन्न हैं; और दही, घी तथा जल — (ये) उत्तरोत्तर प्रशस्त हैं।
पाठभेद — (पृ. ७८, पं. ३) वीमि. ३१५; बिसशृङ्गाटकं चैव...यानि च आ.
(पृ. ७८, पं. ४) ...स्तान्युत्तरोत्तरम् वीमि. ३१५
चरवो ह्युपवासश्च भैक्ष्यं नक्तमयाचितम् ।
एतान्येव व्रतान्याहुः शस्तानि जपकर्मणि ॥ ७.१४५ ॥
चरु, उपवास, भिक्षान्न, नक्त (केवल रातमें भोजन) और अयाचित (बिना माँगे मिला) — इन्हें ही जपकर्ममें प्रशस्त व्रत कहते हैं।
पाठभेद — (पृ. ७८, पं. ६) एतान्यनुव्रता ... वीमि. ३१५
जपकाले न भाषेत व्रतहोमादिकेषु च ।
एतेष्वेवावसक्तं तु यद्यागच्छेद्द्विजोत्तमः ।
अभिवाद्य ततो विप्रं योगक्षेमं च कीर्तयेत् ॥ ७.१४६ ॥
जपके समय और व्रत-होम आदिमें न बोले; यदि इनमें लगे रहते (समय) कोई श्रेष्ठ द्विज आ जाये, तो उस विप्रको प्रणाम करके योगक्षेम (कुशल) पूछे।
पाठभेद — (पृ. ७८, पं. ७) अप. ४८; नापभाषेच्च व्रतहोमादिके तथा वीमि. ३१५
(पृ. ७८, पं. ८) ......सक्तस्तु अप. ४८; एतेष्वेवावसानस्य आ.;....ष्वेवावशक्तस्य, व्यासवचनमिति स्मृत. ३९१
(पृ. ७८, पं. ९) अप. ४८; व्यासवचनमिति स्मृत. ३९१
स्त्रीशूद्रपतितांश्चैव पाषण्डिनं रजस्वलाम् ।
जपकाले न भाषेत व्रतहोमादिकेषु च ॥ ७.१४७ ॥
जप, व्रत, होम आदिके समय स्त्री, शूद्र, पतित, पाखण्डी और रजस्वलासे न बोले।
पाठभेद — (पृ. ७८, पं. १०) रासभं च रजस्वलाम् वीमि. ३१५; श्वशूद्र..रासभं च रज...बृ. ३१५; पाषण्डांश्च रज.. सं. ७०
(पृ. ७८, पं. ११) स्नानकाले न संभाषेज्जपहोमा...सं. ७०; स्नानहोमादिकेषु च बृ. ३९
जपकालसंभाषणे निष्कृतिः
यदि वाग्यमलोपः स्याज्जपादिषु कथञ्चन ।
व्याहरेद्वैष्णवं मन्त्रं स्मरेद्वा विष्णुमव्ययम् ॥ ७.१४८ ॥
यदि जप आदिमें किसी प्रकार मौन भंग हो जाये, तो वैष्णव मन्त्र बोले, अथवा अविनाशी विष्णुका स्मरण करे।
पाठभेद — (पृ. ७८, पं. १२) पमा. १.१. पृ. ३०६; वीमि. ३१६; वीमि. परि. ९२; स्मृच. १५०; याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०७; योगीश्वरवचनमिति आर. ५; जपादिषु कदाचन स्मृत. ३९१, वै. ३४१
(पृ. ७९, पं. १) पमा. १.१. पृ. ३०६, वै. ३४१; जपेद्वा विष्णु...वीमि. परि. ९२; स्मरेद्वा विष्णु...वीमि. ३१६, स्मृच. १५०, स्मृत. ३९१; याज्ञवल्क्यवचनमिति हे. दान. १०७, व्रत. ३७
जपकालेऽशुचिदर्शने
तूष्णीमासीत तु जपंश्चाण्डालपतितादिकान् ।
दृष्ट्वा तीर्थमुपस्पृश्य भाष्य स्नात्वा पुनर्जपन् ॥ ७.१४९ ॥
जप करते हुए चाण्डाल, पतित आदिको देखकर चुप रहे; (उनसे) बोलना पड़े तो जलका स्पर्श करके, स्नान करके फिर जप करे।
पाठभेद — (पृ. ७९, पं. २) वीमि. ३१५;...मासीत च आर. ४५;...मासीत तु आ.
(पृ. ७९, पं. ३) वीमि. ३१५; तोयमुपस्पृश्य बृ. ३७; दृष्ट्वा तान् वार्युपस्पृश्याभाष्य स्नात्वा विशुद्ध्यति आर. ४५
आचम्य प्रयतो भूत्वा जपेदशुचिदर्शने ।
सौरान् मन्त्रान् यथोत्साहं पावमानीश्च शक्तितः ॥ ७.१५० ॥
अशुद्धको देखनेपर आचमन करके, संयत होकर, यथाउत्साह सौर मन्त्रोंका और यथाशक्ति पावमानी (ऋचाओं) का जप करे।
पाठभेद — (पृ. ७९, पं. ६) वीमि. ३१५; तेषामाभाषणं कृत्वा स्नानमेव समाचरेत् । आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने सं. ७०
(पृ. ७९, पं. ७) वीमि. ३१५
रौद्रपित्र्यादिमन्त्रजपे विशेषः
रौद्रपित्र्यासुरान् मन्त्रान् राक्षसानाभिचारिकान् ।
व्याहृत्यालभ्य चात्मानमपः स्पृष्ट्वान्यदाचरेत् ॥ ७.१५१ ॥
रुद्र, पितर, असुर और राक्षसोंके तथा आभिचारिक मन्त्र बोलकर, अपनेको स्पर्श करके और जलका स्पर्श करके (ही) दूसरा (कर्म) करे।
पाठभेद — (पृ. ७९, पं. ८–९) वीमि. ३१५; अयं श्लोकः आदर्शपुस्तके नास्ति ।
एतान् व्याहृत्य रौद्रादीनस्पृष्ट्वाऽऽशु जलं द्विजः ।
ऊर्ध्वं यत् कुरुते कर्म तद्भवत्ययथायथम् ॥ ७.१५२ ॥
द्विज इन रौद्र आदि (मन्त्रों) को बोलकर, तुरन्त जलका स्पर्श किये बिना जो आगेका कर्म करता है, वह ठीक नहीं होता।
पाठभेद — (पृ. ७९, पं. १०–११) वीमि. ३१५; इतः परं ‘यदि वाग्यमलोपः स्यादि (७.१४८)’त्यादि श्लोकः आदर्शपुस्तके नास्ति ।
स्नानानर्हा आपः
स्पर्शनाद्भिर्दूषिताभिरुद्धृताभिश्च मानवः ।
स्नानमाचरन्नुष्णाभिर्न विशुद्ध्यति कर्हिचित् ॥ ७.१५३ ॥
स्पर्शसे दूषित, (बर्तनमें) निकाले हुए और गरम जलसे स्नान करनेवाला मनुष्य कभी शुद्ध नहीं होता।
पाठभेद — (पृ. ७९, पं. १२) वीमि. १७८; स्वभावदूषिताद्भिश्च उद्धृताभिश्च मानवः हे. ३.२. पृ. ७१२; अशुचिस्पर्शदुष्टाभिरुद्धृताभिस्तु मानवः हे. ३.१. पृ. ८६९; स्पर्शदुष्टाभिरुद्धृताभिस्तु आ.
(पृ. ८०, पं. १) स्नानं समाचरेद्यस्तु न स शुद्ध्यति कर्हिचित् वीमि. १७८, हे. ३.१. पृ. ८६९; उष्णाभिराचरन् स्नानं न विशुद्ध्यति मानवः हे. ३.२. पृ. ७१२
अग्राह्यास्त्वग्रिमा ह्यापो नद्याः प्रथमवेगगाः ।
प्रक्षोभिताश्च केनापि याश्च तीर्थादिनिःसृताः ॥ ७.१५४ ॥
नदीका अगला, पहले वेगसे बहता हुआ जल, किसीके द्वारा मथा (गँदला किया) गया, और जो तीर्थ आदिसे (बहकर) निकला हो — (वह) ग्रहण करने योग्य नहीं।
पाठभेद — (पृ. ८०, पं. २) ..स्त्वागता ह्यापो...प्रथमवेगिकाः हे. ३.२. पृ. ७०१; ...स्त्वग्रिमा आपो...वेगिकाः स्मृच. १३०, वीमि. १७५; अग्राह्यास्त्वग्रिमा आपो ...वेगिकाः वै. २५८
(पृ. ८०, पं. ३) स्मृच. १३०, वीमि. १७५; हे. ३.२. पृ. ७०१;...द्विनिर्गताः आ.; विक्षोभिता वा केनापि याश्च तीर्थविनाकृताः वै. २५८
स्नानमाहात्म्यम्
अगम्यागमनात् स्तेयात् पापेभ्यश्च प्रतिग्रहात् ।
रहस्याचरितात् पापात् मुच्यते स्नानमाचरन् ॥ ७.१५५ ॥
अगम्यागमन, चोरी, पापियोंसे दान लेने और गुप्त रूपसे किये पापसे (मनुष्य) स्नान करता हुआ मुक्त हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. ८०, पं. ४) स्मृच. १०९, वै. २४५; पापेभ्यश्च.... स्मृत. ३६५, मद. २३६; पापात् पापेभ्यश्च हे. ३.१. पृ. ८५०
(पृ. ८०, पं. ५) मद. २३६, स्मृच. १०९, वै. २४५; स्मृत. ३६५, हे. ३.१. पृ. ८५०; स्नानमाचरेत् आ.
प्रवर्तुमसमर्थश्चेत् जुहोतियजतिक्रियाः ।
स्नानध्यानजपैर्होमैरात्मानं शोधयेद्बुधः ॥ ७.१५६ ॥
यदि (कोई) हवन और यज्ञकी क्रियाएँ करनेमें असमर्थ हो, तो बुद्धिमान् स्नान, ध्यान, जप और होमोंसे अपनेको शुद्ध करे।
पाठभेद — (पृ. ८०, पं. ६) स्मृत. ३६५, हे. ३.१. पृ. ८५०
(पृ. ८०, पं. ७) जपदानैरात्मानं स्मृत. ३६५; जपदानैरा.. हे. ३.१. पृ. ८५०
यदैव कुरुते स्नानं विशुद्धेनान्तरात्मना ।
तेनैव सर्वमाप्नोति विधिं यज्ञक्रियाफलम् ॥ ७.१५७ ॥
जब भी (कोई) विशुद्ध अन्तरात्मासे स्नान करता है, उसीसे वह विधिपूर्वक यज्ञ-क्रियाका सारा फल पा लेता है।
पाठभेद — (पृ. ८०, पं. ८) यदैव कुरुते हे. ३.१. पृ. ८५०
(पृ. ८०, पं. ९) विधियज्ञक्रियाफलम् हे. ३.१. पृ. ८५०
वर्णभेदेन स्नानविधौ विशेषः
ब्रह्मक्षत्रविशां चैव मन्त्रवत् स्नानमिष्यते ।
तूष्णीमेव तु शूद्रस्य सनमस्कारकं स्मृतम् ॥ ७.१५८ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके लिए मन्त्रपूर्वक स्नान अभीष्ट है; शूद्रके लिए मौन रहकर, नमस्कार सहित (स्नान) कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ८०, पं. १०) ग. २१३.१४३; विष्णुवचनमिति स्मृच. १८१, वै. २५४;..विशामेव स्मृत. ३६४, ५०२; नरसिंहपुराणे इति वीमि. २३२; भारते इति आर. २६
(पृ. ८१, पं. १) ग. २१३.१४४, वीमि. २३२;...मेव हि शूद्रस्य...रकं मतम् स्मृत. ३६४, ५०२;...मेव हि शूद्रस्य स्त्रीणां च कुरुनन्दन, विष्णुवचनमिति स्मृच. १८१, आम. २९; शूद्रस्य स्त्रीणां च कुरुनन्दन, विष्णुवचनमिति वै. २५४; हि शूद्रस्य...कं स्मृतम् हे. ३.१. पृ. ८८४
सर्वेषां धर्मसाधनम् · यमनियममाहात्म्यम्
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
दमः शमार्जवं दानं सर्वेषां धर्मसाधनम् ।
गृहीत्वा यमधनुर्वै नियमज्याततं दृढम् ।
संदधीत दमशरं स्वर्गलक्ष्ये प्रयत्नतः ॥ ७.१५९ ॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, दम, शम, आर्जव और दान — (ये) सबके धर्मके साधन हैं। यमरूपी धनुष लेकर, नियमरूपी प्रत्यञ्चा दृढ़तासे चढ़ाकर, दमरूपी बाण स्वर्गरूपी लक्ष्यपर यत्नपूर्वक साधे।
यस्येदमायुधं नास्ति स्वर्गसाधनमुत्तमम् ।
अपि जन्मसहस्रेण न साधयति तत् परम् ॥ ७.१६० ॥
जिसके पास यह स्वर्गका उत्तम साधनरूप आयुध नहीं है, वह हजार जन्मोंमें भी उस परम (लक्ष्य) को सिद्ध नहीं करता।
स्नानविधिनिरूपणोपसंहारः
एष वोऽभिहितः कृत्स्नः स्नानस्य परमो विधिः ।
गुणाश्च तस्याऽऽचरतो दोषाश्चैवानिषेवणात् ॥ ७.१६१ ॥
तुमसे स्नानकी यह सम्पूर्ण परम विधि कही गयी, और उसका आचरण करनेवालेके गुण तथा न करनेवालेके दोष भी।
सप्त स्नानानि
असामर्थ्याच्छरीरस्य कालशक्त्यव्यपेक्षया ।
मन्त्रस्नानादिकान् सप्त केचिदिच्छन्ति सूरयः ॥ ७.१६२ ॥
शरीरकी असमर्थतासे, अथवा काल और शक्तिकी अपेक्षासे, कुछ विद्वान् मन्त्रस्नान आदि सात (स्नान) मानते हैं —
पाठभेद — (पृ. ८१, पं. १०) अप. १३४; कालशक्त्याद्यपेक्षया वीमि. १९४, वीमि. परि. ८१, हे. ३.१. पृ. ८५३, वै. २८९;...स्य वैषम्याद्देशकालयोः वै. ५४९
(पृ. ८१, पं. ११) वै. २८९; स्नानान्येतानि तुल्यानि मंत्रादीनि यथाबलम् वै. ५४९;...दितः सप्त वीमि. १९४, हे. ३.१. पृ. ८५३, अप. १३४; सप्त एक इच्छन्ति वीमि. परि. ८१
मान्त्रं भौमं तथाऽऽग्नेयं वायव्यं दिव्यमेव च ।
वारुणं मानसं चैव सप्त स्नानान्यनुक्रमात् ॥ ७.१६३ ॥
— मान्त्र, भौम, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और मानस — क्रमसे ये सात स्नान हैं।
पाठभेद — (पृ. ८१, पं. १२) वै. २८९, हे. ३.१. पृ. ८५३; तथाग्नेयं स्मृच. १३३, वीमि. १९५, अप. १३४, मद. २७२; मान्त्रं पार्थिवमाग्नेयं बृप. २.८६
(पृ. ८१, पं. १३) स्मृच. १३३, वीमि. १९५, हे. ३.१. पृ. ८५३, अप. १३४, बृप. २.८६; सप्त स्नानं प्रकीर्तितम् आ.; मानसं चेति सप्त वै. २८९, मद. २७२; मानसं यौगिकं चेति सप्त वै. ५४९
आपोहिष्ठेति वै मान्त्रं मृदालम्भश्च पार्थिवम् ।
आग्नेयं भस्मना स्नानं वायव्यं गोरजः स्मृतम् ॥ ७.१६४ ॥
"आपो हि ष्ठा…" (से मार्जन) मान्त्र (स्नान) है, मिट्टीका लेप पार्थिव (भौम), भस्मसे स्नान आग्नेय, और गायोंकी धूलि वायव्य कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ८२, पं. १) वीमि. १९५; मृदालम्भं तु आ.;...हिष्ठादिभिर्मान्त्रं हे. ३.१. पृ. ८५३; शंन आपस्तु वै मान्त्रं मृदालम्भं तु पार्थिवम् बृप. २.८७; मृदालम्भेन पार्थिवम् मद. २७२; आपोहीत्यादिभिर्मान्त्रं....लम्भस्तु वै. २९०;...हिष्ठादिभिर्मान्त्रं... लम्भस्तु वै. ५४९; ... हिष्ठादिभिर्मन्त्रैर्मृदाल ... अप. १३४, स्मृच. १३३, मद. २७२
(पृ. ८२, पं. २) अप. १३४, वीमि. १९५, वै. ५४९, मद. २७२, हे. ३.१. पृ. ८५३; भस्मना स्नानमाग्नेयं गवां रेणुभिरानिलम् बृप. २.८७; स्नानं केचिदिच्छन्ति सूरयः स्मृच. १३३
यत्तु सातपवर्षेण स्नानं तद्दिव्यमुच्यते ।
वारुणं चावगाहस्तु मानसं विष्णुचिन्तनम् ॥ ७.१६५ ॥
धूप रहते वर्षामें जो स्नान है, वह दिव्य कहलाता है; (जलमें) डुबकी वारुण है, और विष्णुका चिन्तन मानस (स्नान) है।
पाठभेद — (पृ. ८२, पं. ३) अप. १३४, हे. ३.१. पृ. ८५३, वीमि. १९५, मद. २७२; दिव्यं तत् स्नानमुच्यते वै. ५४९
(पृ. ८२, पं. ४) स्मृच. १३३, अप. १३४, वै. २९०; चावगाहं तु वीमि. १९५, हे. ३.१. पृ. ८५३; चावगाह्यं तु आ.; चावगाह्यं च मानसं मद. २७२; मानसं ह्यात्मचिन्ता तु यौगिकं विष्णुचिन्तनम् वै. ५४९
शस्तं स्नानं यथोद्दिष्टं मन्त्रस्नानक्रमेण तु ।
कालदोषादसामर्थ्यात् सर्वं तुल्यफलं स्मृतम् ॥ ७.१६६ ॥
जैसा कहा गया (वैसा जलमें) स्नान प्रशस्त है; पर कालदोष या असमर्थताके कारण मन्त्रस्नान आदिके क्रमसे सबका फल समान कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ८२, पं. ५) समुद्दिष्टं अप. १३४; स्नानात् क्रमेण हे. ३.१. पृ. ८५३
(पृ. ८२, पं. ६) कालदेशादसामर्थ्यात् मद. २७२; कालदेशादसा... वीमि. १९५, हे. ३.१. पृ. ८५३
मानसं प्रणवस्नानं केचिदिच्छन्ति सूरयः ।
आत्मतीर्थप्रशंसायां व्यासेन पठितं यतः ॥ ७.१६७ ॥
कुछ विद्वान् प्रणवसे (किये) मानस स्नानको मानते हैं, क्योंकि आत्मतीर्थकी प्रशंसामें व्यासने (ऐसा) पढ़ा है।
पाठभेद — (पृ. ८२, पं. ७) प्रवरं स्नानं अप. १३५, स्मृच. १३३, वीमि. १९५, हे. ३.१. पृ. ८५३; प्रवरं प्रोक्तं सेवितं ब्रह्मवादिभिः बृ. ३१०; प्रवरं स्नानं सर्वे शंसन्ति सूरयः वै. २९०
(पृ. ८२, पं. ८) हे. ३.१. पृ. ८५३; वै. २९०; यौगिकं स्नानमाख्यातं योगो विष्णुविचिन्तनम् आत्मतीर्थ...व्यासेन परिकीर्तितम् बृ. ३१२
अशक्तस्यार्थे स्नानानुकल्पः
योऽसौ विस्तरशः प्रोक्तः स्नानस्य विधिरुत्तमः ।
अशक्तस्तु न कुर्याद्वै तत्रायं विधिरुच्यते ॥ ७.१६८ ॥
स्नानकी जो उत्तम विधि विस्तारसे कही गयी, उसे जो असमर्थ हो वह न करे; उसके लिए यह विधि कही जाती है —
पाठभेद — (पृ. ८३, पं. १) अप. १३४, वीमि. १३६; य एष विस्तरः प्रोक्तः स्मृच. १८५, वै. २६३; य एव विस्तरेणोक्तः आ.; एष विस्तरतः प्रोक्तः मद. २४६, हे. ३.१. पृ. ८८४; य एष विस्तरेणोक्तः आर. ३०; य एष विस्तृतः प्रोक्तः पमा. १.१. पृ. २७६
(पृ. ८३, पं. २) असामर्थ्यान्न कुर्याच्चेत्तत्रायं वीमि. २२४, स्मृच. १८५, मद. २४६, पमा. १.१. पृ. २७६, हे. ३.१. पृ. ८८४, आर. ३०; कुर्याच्चेत्तस्यायं, याज्ञवल्क्यवचनमिति वै. २६३
स्नानमन्तर्जले चैव मार्जनाचमने तथा ।
जलाभिमन्त्रणं चैव तीर्थस्य परिकल्पनम् ॥ ७.१६९ ॥
— अन्तर्जलमें स्नान, मार्जन और आचमन, जलका अभिमन्त्रण और तीर्थकी कल्पना —
पाठभेद — (पृ. ८३, पं. ३) स्मृच. १८५, अप. १३४, पमा. १.१. पृ. २७६, वै. २६३, मद. २४६, हे. ३.१. पृ. ८८४, आर. ३०;...र्जलं चैव वीमि. २२४; चमनं तथा ग. २१३.१४१
(पृ. ८३, पं. ४) वीमि. २२४, स्मृच. १८५, अप. १३४, पमा. १.१. पृ. २७६, वै. २६३, मद. २४६, हे. ३.१. पृ. ८८४; आर. ३०;... मन्त्रणं यच्च...परिकल्पयेत् ग. २१३.१४२
अघमर्षणसूक्तेन त्रिरावृत्तेन नित्यशः ।
अन्यांश्च वारुणान् मन्त्रान् कामतः संप्रयोजयेत् ॥ ७.१७० ॥
— प्रतिदिन तीन बार दोहराये अघमर्षण सूक्तसे; और अन्य वारुण मन्त्रोंका भी इच्छानुसार प्रयोग करे।
पाठभेद — (पृ. ८३, पं. ५) अप. १३४, पमा. १.१. पृ. २७६, स्मृच. १८५, वै. २६३, मद. २४६, आर. ३१*; त्रिवारं त्वेव नित्यशः ग. २१३.१४२; इतःपरं स्नानाचरण (१७१ पू.) मित्यर्धं वीमि. २२४, वै. २६३
(पृ. ८३, पं. ६) आर. ३१*; अन्यांस्तु वीमि. २२४; अन्यान् वा हे. ३.१. पृ. ८८४
यथाकालं यथादेशं ज्ञात्वा ज्ञात्वा विचक्षणः ।
स्नानाचरणमित्येतत् समुद्दिष्टं महात्मभिः ।
वारुणानथवा मन्त्रान् कामतः संप्रयोजयेत् ॥ ७.१७१ ॥
बुद्धिमान् देश और कालको अच्छी तरह जानकर (करे) — महात्माओंने स्नानका आचरण ऐसा बताया है; अथवा इच्छानुसार वारुण मन्त्रोंका प्रयोग करे।
पाठभेद — (पृ. ८३, पं. ९) वीमि. २२४, हे. ३.१. पृ. ८८४; समुद्दिष्टं महात्मभिः पमा. १.१. पृ. २७६, अप. १३४, वै. २६३, आर. ३१*, महर्षिभिः स्मृच. १८५; महात्मानं आ.; स्नानं चारितमित्येतत् ग. २१३.१४३; ... त्येतदुपादिष्टं स्वयंभुवा मद. २४६
अघमर्षणसूक्तार्षादि
अघमर्षणसूक्तस्य ऋषिश्चैवाघमर्षणः ।
अनुष्टुप् च भवेच्छन्दो भाववृत्तं च दैवतम् ॥ ७.१७२ ॥
अघमर्षण सूक्तके ऋषि अघमर्षण हैं, छन्द अनुष्टुप् है, और देवता भाववृत्त है।
पाठभेद — (पृ. ८४, पं. १) आर. ४१;... ऋषिरेवा ... वीमि. २७७, बृप. २.५३, अग्नि २१६.४४;... ऋषिः स्यादघमर्षणः स्मृत. ३८७
(पृ. ८४, पं. २) अनुष्टुभं भवे...वृत्तश्च दैवतम् वीमि. २७७, आर. ४१; वृत्तस्तु दै... स्मृत. ३८७, अग्नि. २१६.४४
अश्वमेधावभृथके विनियोगस्तु कल्पितः ।
सर्वपापापनोदार्थं स्मृतिकारैरुदाहृतम् ॥ ७.१७३ ॥
अश्वमेधके अवभृथमें (इसका) विनियोग कल्पित है; स्मृतिकारोंने सब पापोंको दूर करनेके लिए (इसे) कहा है।
पाठभेद — (पृ. ८४, पं. ३) वीमि. २७७; सौत्रामण्यावभृतके बृप. २.५४; विनियोगः प्रकीर्तितः स्मृत. ३८७; विनियोगोऽस्य कल्पितः आर. ४१
(पृ. ८४, पं. ४) वीमि. २७७; स्मृत. ३८७
ननु भूताण्डपिण्डस्य स्थित्युत्पत्तिलयं तथा ।
सूक्तेऽस्मिन् व्याहृतं सर्वमेतन्मन्त्रार्थमस्य वै ॥ ७.१७४ ॥
इस सूक्तमें प्राणियों और ब्रह्माण्डरूपी पिण्डकी स्थिति, उत्पत्ति और लय — यह सब कहा गया है; यही इसके मन्त्रोंका अर्थ है।
अघमर्षणसूक्तमाहात्म्यम्
हुत्वा लोकानपोमांस्त्रींस्त्रिः पठेदघमर्षणम् ।
यथाश्वमेधावभृथमेवं तन्मनुरब्रवीत् ॥ ७.१७५ ॥
तीन लोकों और जलका हवन करके (?) तीन बार अघमर्षण पढ़े — जैसे अश्वमेधका अवभृथ, वैसा ही यह (फल देता) है — ऐसा मनुने कहा।
पाठभेद — (पृ. ८४, पं. ७) स्मृत. ३८७, वै. २६१;...नपोमांस्तु त्रिः स्मृच. १८३; अपि वाप्सु निमज्जित्वा यः पठेदघ... अत्रि. २.६
(पृ. ८४, पं. ८) स्मृच. १८३; अथाश्व...एवं तं मनुर...वै. २६१;...भृथस्तद्वन्मनु... अत्रि. २.६
अहं तु परमेत्युक्तस्त्रिरह्नो ह्युपपन्नयः ।
(?)
मुच्यते पातकैः सर्वैर्जप्त्वा त्रिरघमर्षणम् ॥ ७.१७६ ॥
(?) "अहं तु परम…" — (पाठ अस्पष्ट); तीन बार अघमर्षणका जप करके (मनुष्य) सब पातकोंसे छूट जाता है।
यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापप्रणोदनः ।
तथाऽघमर्षणं सूक्तं सर्वपापप्रणोदनम् ॥ ७.१७७ ॥
जैसे यज्ञोंका राजा अश्वमेध सब पापोंको दूर करनेवाला है, वैसे ही अघमर्षण सूक्त सब पापोंको दूर करनेवाला है।
पाठभेद — (पृ. ८४, पं. ११) प्रणाशनः शंख. ९.१३; सर्वपापापनोदनः मनु. ११.२६०
(पृ. ८४, पं. १२) सर्वपापप्रणोदनम् आ.; प्रणाशनम् शङ्ख. ९.१३; सर्वपापापनोदनम् मनु. ११.२६०
पुनश्च सूक्तार्षादि
सिंधुद्वीपो भवेदार्षं गायत्री च्छन्द एव हि ।
आपस्तु दैवतं प्रोक्तं विनियोगस्तु मार्जने ॥ ७.१७८ ॥
("आपो हि ष्ठा…" के) ऋषि सिन्धुद्वीप हैं, छन्द गायत्री, देवता आपः (जल) कहे गये हैं, और विनियोग मार्जनमें है।
पाठभेद — (पृ. ८५, पं. १) ... द्वीपभवे ... आ.; गायत्रं छन्द उच्यते वीमि. २७७; गायत्रं छन्द एव च आर. ४१*
(पृ. ८५, पं. २) वीमि. २७७; आपश्च...विनियोगश्च मार्जने आर. ४१*
सर्वत्र मार्जनं कर्म अब्लिङ्गानामुदाहृतम् ।
कोकिलो राजपुत्रश्च द्रुपदामार्षमुच्यते ॥ ७.१७९ ॥
अब्लिङ्ग (जलदेवताके) मन्त्रोंका कर्म सर्वत्र मार्जन कहा गया है। "द्रुपदादिव…" के ऋषि कोकिल राजपुत्र कहे जाते हैं —
पाठभेद — (पृ. ८५, पं. ३) सर्वत्र पावनं वीमि. २७७, २८१
(पृ. ८५, पं. ४) राजपुत्रस्तु वीमि. २७७; गाधिजो (गोभिलो) राजपुत्रस्तु द्रुपदायामृषिर्भवेत् बृप. २.५२
अनुष्टुभं भवेच्छन्द आपश्चैव तु दैवतम् ।
सौत्रामण्यवभृथके स्नाने तद्विनियोजनम् ॥ ७.१८० ॥
— छन्द अनुष्टुप् है और देवता आपः ही; सौत्रामणीके अवभृथ-स्नानमें उसका विनियोग है।
पाठभेद — (पृ. ८५, पं. ५) वीमि. २७७; आनुष्टुभं बृप. २.५२
(पृ. ८५, पं. ६) वीमि. २७७
अघमर्षणसूक्तमाहात्म्यम्
द्रुपदा नाम सावित्री यजुर्वेदे प्रतिष्ठिता ।
अन्तर्जले त्रिरावर्त्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ७.१८१ ॥
"द्रुपदा" नामकी सावित्री यजुर्वेदमें प्रतिष्ठित है; अन्तर्जलमें (उसे) तीन बार दोहराकर (मनुष्य) ब्रह्महत्या (के पाप) को दूर करता है।
पाठभेद — (पृ. ८५, पं. ७) नाम सा देवी स्मृच. १८३; नाम गायत्री वै. २६१; नाम यो मन्त्रो यजुर्वेदे प्रतिष्ठितः, बृहस्पतिवचनमिति सं. ५१
(पृ. ८५, पं. ८) ...र्त्य मुच्यते ब्रह्महत्यया स्मृच. १८३;...र्त्य सर्वपापैः प्रमुच्यते, बृहस्पतिवचनमिति सं. ५१; त्रिरावृत्य मुच्यते ब्रह्महत्यया वै. २६१; सर्वपापहरा जप्तुर्महतोऽप्येनसः स्मृतम् पमा. २.१. पृ. ४२८
आपः पुण्याः समादाय त्रिः पठेद्द्रुपदामृचम् ।
तत्तोयं मूर्ध्नि विन्यस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ७.१८२ ॥
पवित्र जल लेकर "द्रुपदादिव…" ऋचा तीन बार पढ़े; वह जल सिरपर डालकर (मनुष्य) सब पापोंसे छूट जाता है।
पाठभेद — (पृ. ८५, पं. ९) सं. ५१; अपः पाणौ समादाय स्मृच. १८३, भृगुवचनमिति हे. ३.१. पृ. ९०२; आपः पाण्योः वीमि. २८१; अपः प्राणौ वै. २६१
(पृ. ८५, पं. १०) स्मृच. १८३, सं. ५१, वै. २६१; भृगुवचनमिति हे. ३.१. पृ. ९०२
संध्योपासनविधिः
एवं ज्ञात्वा तु मन्त्राणां विनियोगं द्विजोत्तमाः ।
संध्यां यद्वदुपासीत तथा सर्वं निबोधत ॥ ७.१८३ ॥
हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार मन्त्रोंका विनियोग जानकर (द्विज) जैसे संध्याकी उपासना करे, वह सब सुनो।
पाठभेद — (पृ. ८६, पं. १) मन्त्राणां प्रयोगं वै द्वि...वीमि. २६७, २६८, २८१
(पृ. ८६, पं. २) संध्यामुपासते यद्वद्यथावत्तन्निबोधत वीमि. २६८
तत्राचमनम्
ऐशान्यभिमुखो भूत्वा शुचिः प्रयतमानसः ।
आचान्तः पुनराचामेदृतमित्यभिमन्त्र्य च ॥ ७.१८४ ॥
ईशान (उत्तर-पूर्व) की ओर मुँह करके, पवित्र और संयत मनवाला होकर, आचमन कर चुका भी "ऋतं च (सत्यं च)…" से अभिमन्त्रित करके फिर आचमन करे।
पाठभेद — (पृ. ८६, पं. ३) ईशान्याभि...वीमि. २६६, २६८
आन्तरं शुध्यति ह्येवमन्नपानमलीकृतम् ।
त्रिरावर्त्य तु सावित्रीं प्रणवं व्याहृतीस्तथा ॥ ७.१८५ ॥
इस प्रकार झूठे (दूषित) अन्न-पानसे (हुई) भीतरी अशुद्धि शुद्ध होती है। (फिर) सावित्री, प्रणव और व्याहृतियोंको तीन बार दोहराकर —
पाठभेद — (पृ. ८६, पं. ५) वीमि. २६८; शुद्ध्यते...पानं मलीकृतम् आ.
(पृ. ८६, पं. ६) वीमि. २६९; प्रणवव्याहृतिभिः सह आ.
मार्जनमन्त्राः
मार्जनं च तथा कृत्वा आपोहिष्ठेति मार्जयेत् ।
सार्धामृचं तु प्रक्षिप्य ऊर्ध्वं सार्धामधः क्षिपेत् ॥ ७.१८६ ॥
— और उसी प्रकार मार्जन करके, "आपो हि ष्ठा…" से मार्जन करे — डेढ़ ऋचा (पढ़कर जल) ऊपर छिड़के, और डेढ़ (पढ़कर) नीचे।
पाठभेद — (पृ. ८६, पं. ८) वीमि. २६९
अधोभागविसृष्टाभिः कलुषं याति संक्षयम् ।
सर्वतीर्थाभिषेकश्च ऊर्ध्वं संमार्जनाद्भवेत् ॥ ७.१८७ ॥
नीचेकी ओर छोड़े (जल) से पाप नष्ट होता है, और ऊपरकी ओर मार्जनसे सब तीर्थोंका अभिषेक होता है।
पाठभेद — (पृ. ८६, पं. ९) वीमि. २६९;...भिरसुरा यान्ति सं. ४७
(पृ. ८६, पं. १०) वीमि. २६९;...भिषेकं च आ., सं. ४७
अघमर्षणसूक्तेन मार्जनं कारयेत्ततः ।
शन्न आपश्च द्रुपदां कामतः संप्रयोजयेत् ॥ ७.१८८ ॥
फिर अघमर्षण सूक्तसे मार्जन करे; और "शं नो देवीः…" तथा "द्रुपदादिव…" का इच्छानुसार प्रयोग करे।
पाठभेद — (पृ. ८६, पं. ११–१२) वीमि. २६९
ओंकारपूर्वा गायत्री अब्लिङ्गान्यघमर्षणम् ।
ज्ञातव्यं ब्रह्म चैतद्वै पुरा दृष्टं स्वयंभुवा ॥ ७.१८९ ॥
ओंकारसे आरम्भ होनेवाली गायत्री, अप्-लिङ्ग मन्त्र और अघमर्षण — यह ब्रह्म (वेद) जानना चाहिए, जिसे पूर्वकालमें स्वयम्भूने देखा था।
पाठभेद — (पृ. ८६, पं. १३) ...पूर्वा गायत्रीमब्लिङ्गाघम...वीमि. २६९
(पृ. ८६, पं. १४) सातव्यं ब्रह्म आ.; सातत्यं ब्रह्म वीमि. २६९
प्राणायामोपदेशः
एवं संमार्जनं कृत्वा बाह्यशुद्ध्यर्थमात्मनः ।
अथाभ्यन्तरशुद्ध्यर्थं प्राणायामान् समाचरेत् ॥ ७.१९० ॥
इस प्रकार अपनी बाहरी शुद्धिके लिए संमार्जन करके, फिर भीतरी शुद्धिके लिए प्राणायाम करे।
पाठभेद — (पृ. ८७, पं. १) वीमि. २७२, स्मृच. १४१; शुद्ध्यर्थमादरात् वै. ३२३
(पृ. ८७, पं. २) स्मृच. १४१; तथाभ्यन्तर...आ., वीमि. २७२; तथाभ्यन्तर... प्राणायामं समा... वै. ३२३
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये स्नानतर्पणसंध्योपासन- जपादिविधि (निर्णयो नाम) सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
पाठभेद — (पृ. ८७, पं. ४) ...जपादिविधिः सप्तमोऽध्यायः आ. अत्र इ. पुस्तके समाप्तिद्योतकं किमपि चिह्नं नास्ति ।
अष्टमोऽध्यायः — प्राणायामप्रत्याहारनिर्णयः
अध्याय-सार — प्राणायाम-प्रत्याहार-निर्णय। याज्ञवल्क्य प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यानको क्रमसे कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं (८.१); ध्यान अगले अध्यायमें आता है। प्राणायामका लक्षण यह है: व्याहृति और प्रणव सहित गायत्रीका, शिरस्के साथ, प्राण रोककर तीन बार पाठ (८.२–६) — यही मनुका कहा प्राणायाम है (८.८)। पूरक, कुम्भक और रेचक; बारह, चौबीस और छत्तीस मात्राओंसे कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम (८.९–११); मात्राका माप, अतिमात्रा, और निरोधके समय मन्त्रसे गिनती (८.१२–१८); तीनोंके लक्षण (८.१९–२२)।
पूरकमें नाभिमें विष्णु, कुम्भकमें हृदयमें ब्रह्मा और रेचकमें ललाटमें ईश्वर (शिव) का ध्यान करे (८.२३–२५)। लम्बा माहात्म्य है — जैसे धौंकनेसे धातुओंका मल जलता है, वैसे ही प्राण-निग्रहसे इन्द्रियोंके दोष जलते हैं (८.३०) — और फिर धीरे श्वास छोड़ने तथा बादमें आचमनका नियम। यह स्मृतिका प्राणायाम है; सिद्धान्तमें वह ओंकारसे मात्राके प्रमाणपर होता है (८.४७–४९)।
प्रत्याहार इन्द्रियोंकी वृत्तियोंको मनसे खींच लेना है, जैसे कछुआ अंग समेट लेता है (८.५०–५४); जो मनको बार-बार कामनाओंसे हटाकर एक स्थानमें धारण करता है, वह अमृतत्वके योग्य होता है (८.५५)। ८.५६ ‘स्नान-निर्णय’ का उपसंहार करता है और उसकी श्लोक-संख्या तीन सौ अड़तीस बताता है।
प्राणायामप्रत्याहारध्याननिरूपणप्रतिज्ञा
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य लक्षणम् ।
प्रत्याहारं तथा ध्यानं यथावदनुपूर्वशः ।
उच्यमानं निबोधध्वं संक्षेपेण द्विजोत्तमाः ॥ ८.१ ॥
इसके बाद मैं प्राणायामका लक्षण, तथा प्रत्याहार और ध्यान, ठीक-ठीक क्रमसे कहूँगा; हे श्रेष्ठ द्विजो! संक्षेपमें कहे जाते (इस विषय) को सुनो।
प्राणायामलक्षणम्
सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।
त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते ॥ ८.२ ॥
आयतप्राण वाला (व्यक्ति) व्याहृति और प्रणव से युक्त गायत्री का शिरस् (सिर) के साथ तीन बार पाठ करे, वह प्राणायाम कहा जाता है।
पाठभेद — (पृ. ८८, पं. ५) वसिष्ठस्मृ. २५.१३; गायत्रीं च शिरस्तथा अत्रि. १.१२; सव्याहृतिं मनुवचनमिति स्मृच. १४१, पमा. १.१ पृ. २९२, वै. ३२३; सव्याहृतिकां सप्र... बौ. ४.१.२९; शंख. ७.१४, योगीश्वरवचनमिति मद. ६७; स्मृत्यन्तरवचनमिति मेधातिथिः २.७५; याज्ञवल्क्यवचनमिति वीमि. २७४
(पृ. ८८, पं. ६) मनुवचनमिति स्मृच. १४१, वै. ३२३, पमा. १.१. पृ. २९२; बृ. ३१४; शंख. ७.१४; बौ. ४.१.२९; अत्रि. १.१२; योगीश्वरवचनमिति मद. ६७; वसिष्ठवचनमिति वीमि. २७४; वसिष्ठस्मृ. २५.१३
गायत्रीं शिरसा सार्धं जपेद्व्याहृतिपूर्विकाम् ।
प्रतिप्रणवसंयुक्तां त्रिरयं प्राणसंयमः ॥ ८.३ ॥
व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली, (प्रत्येक) प्रणवसे युक्त गायत्रीको शिरस् सहित तीन बार जपे — यह प्राणसंयम है।
पाठभेद — (पृ. ८८, पं. ७–८) याज्ञ. १.२३; मनुवचनमिति स्मृच. १४१; स्मृत्यन्तरवचनमिति मेधातिथिः २.७८
प्राणायामे मन्त्राः
भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यं तथैव च ।
प्रत्योंकारसमायुक्तं तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ८.४ ॥
भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् — (प्रत्येक) ओंकार सहित; (फिर) "तत्सवितुर्वरेण्यम्…" —
पाठभेद — (पृ. ८८, पं. ९) पमा. १.१.२९२, स्मृच. १४१, स्मृत. ३८५, वै. ३२३
(पृ. ८८, पं. १०) समायुक्तस्तथा पमा. १.१. पृ. २९२; वीमि. २७२; स्मृच. १४१, वै. ३२३; स्मृत. ३८५
ओमापो ज्योतिरित्येतच्छिरः पश्चात् प्रयोजयेत् ॥ ८.५ ॥
— (फिर) "ओमापो ज्योतिः…" — यह शिरस् बादमें जोड़े।
पाठभेद — (पृ. ८८, पं. ११) पमा. १.१. पृ. २९२; स्मृच. १४१; वै. ३२३; पश्चाच्च योजयेत् वीमि. २७२; प्रयुज्यते बृप. २.६८; स्मृत. ३८५
एष मन्त्रप्रयोगास्त्रिः प्राणायामे निबोधत ।
त्रिरावर्तनयोगात्तु प्राणायामस्तु शब्दितः ॥ ८.६ ॥
प्राणायाममें मन्त्रका यह प्रयोग तीन बार (होता है) — ऐसा जानो; तीन आवर्तनोंके योगसे ही (वह) प्राणायाम कहलाता है।
पाठभेद — (पृ. ८९, पं. १) पमा. १.१. पृ. २९२
(पृ. ८९, पं. २) स्मृत. ३८५, स्मृच. १४१, वै. ३२३,......यामः प्रकीर्तितः पमा. १.१. पृ. २९२;...यामांस्तु शक्तितः वीमि. २७२
प्राणायामभेदाः
त्रिविधं केचिदिच्छन्ति तथा च नवधा परे ।
मृदुमध्याधिमात्रत्वादेकैकं त्रिविधं भवेत् ॥ ८.७ ॥
कुछ (आचार्य) इसे तीन प्रकारका मानते हैं और दूसरे नौ प्रकारका; मृदु, मध्य और अधिमात्र होनेसे एक-एक (प्रकार) तीन प्रकारका होता है।
पाठभेद — (पृ. ८९, पं. ३) वीमि. २७५, स्मृत. ३८५
मनुप्रोक्तः प्राणायामः
ओंकारं व्याहृतीः सप्त गायत्री सशिरास्तथा ।
प्राणायामोऽयं मनुना वेदेषु कथितः पुरा ॥ ८.८ ॥
ओंकार, सात व्याहृतियाँ और शिरस् सहित गायत्री — यह प्राणायाम पूर्वकालमें मनुने वेदोंमें कहा था।
पूरकः कुम्भकश्चैव रेचकस्तदनन्तरम् ।
प्राणायामस्त्रिधा ज्ञेयः कनीयोमध्यमोत्तमः ॥ ८.९ ॥
पूरक, कुम्भक और उसके बाद रेचक, इस प्रकार प्राणायाम तीन प्रकार का जानना चाहिए— कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम।
पूरकः कुम्भको रेच्यः प्राणायामस्त्रिलक्षणः ।
(कन्यसमध्यममुख्या इति त्रयं प्रोच्यते तज्ज्ञैः) ॥ ८.१० ॥
पूरक, कुम्भक और रेचक, इस प्रकार त्रिलक्षण वाला प्राणायाम... कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम—यह तीन (प्रकार) विद्वानों द्वारा कहे जाते हैं।
पाठभेद — (पृ. ८९, पं. ९) पमा. १.१. पृ. २९२, वीमि. २७३, वै. ३२४; पूरको कुम्भको रेच्यः प्राणायामास्त्रिलक्षणः स्मृच. १४२, स्मृत. ३८५; पूरककुम्भकरेचैः प्राणायामस्त्रिलक्षणो ज्ञेयः आर. ३९; ओं पूरकः कुम्भको रेचकः प्रा...णो ज्ञेयः आ.
(पृ. ८९, पं. १०) कनिष्ठमध्यमोत्तमः स्मृतित्रयं प्रोच्यते तद्ज्ञैः आ.
(द्वादशमात्रः प्रथमो मध्यम उक्तस्तथा तद्द्विगुणः ।
)
(उत्तम उक्तस्त्रिगुणः मात्राभेदाः प्रकीर्तितास्तज्ज्ञैः) ॥ ८.११ ॥
पहला (कनिष्ठ) बारह मात्राओंका, मध्यम उसका दुगुना (चौबीस मात्राओंका) कहा गया है, और उत्तम तिगुना (छत्तीस मात्राओंका) — जानकारोंने मात्राओंके (ये) भेद कहे हैं।
पाठभेद — (पृ. ८९, पं. ११) द्वादशमात्रः कनीयान् मध्यो मात्राश्चतुर्विंशतिः आ.
(पृ. ८९, पं. १२) उत्तमः षड्विंशन्मात्रो मात्राभेदाः प्रकीर्तितास्तद्ज्ञैः आ.
प्राणायाममात्रास्वरूपम्
अङ्गुलिमोक्षत्रितयं जान्वोः परिमार्जनमथापि ।
तत् कालत्रयमपि तज्ज्ञा मात्रासंज्ञां प्रशंसन्ति ॥ ८.१२ ॥
तीन बार चुटकी बजाना, अथवा घुटनोंपर (हाथ) फेरना — उतने समयको जानकार 'मात्रा' नाम देते हैं।
पाठभेद — (पृ. ९०, पं. १) जान्वोः परिमार्जनं वापि अप. १०२२; अङ्गुष्ठाङ्गुलिमोक्षं त्रिस्त्रिर्जानुपरिमार्जनम् हठप्रदी. २.१२
(पृ. ९०, पं. २) तत्तालत्रय...संज्ञं प्र... अप. १०२२; तालत्रयमपि प्राज्ञा मात्रासंज्ञां प्रचक्षते हठप्रदी. २.१२
गोदोहमन्नपाको वा इषुक्षेपो ह्यथापि वा ।
घण्टायाः स्तनितं वाऽपि ह्यतिमात्रा उदाहृताः ॥ ८.१३ ॥
गाय दुहने, अन्न पकने, बाण फेंकने अथवा घण्टेकी गूँजके (समय जितनी) — ये अतिमात्राएँ कही गयी हैं।
अतिमात्रप्राणायामस्वरूपम्
देशकालानुसारेण सेव्यमानः शनैर्यदा ।
स्वेदकम्पादि जनयेदतिमात्रस्तदा भवेत् ॥ ८.१४ ॥
देश और कालके अनुसार धीरे-धीरे अभ्यास किया जाता (प्राणायाम) जब पसीना, कम्पन आदि उत्पन्न करे, तब (वह) अतिमात्र होता है।
प्राणविरोधकाले मात्रागणनप्रकारः
निरोधकाले प्राणस्य मात्राः संकल्पयेत् कथम् ।
तस्मात् स्मृतिप्रतिष्ठं तत् कल्पयित्वा तु योगिभिः ॥ ८.१५ ॥
प्राणके निरोधके समय (साधक) मात्राओंका संकल्प (गिनती) कैसे करे? इसलिए योगियोंने स्मृति (मनमें गिनती) पर आधारित वह (विधि) कल्पित की है —
आदिप्रयत्नं प्रथमं द्वितीयं यत्र चेतसि ।
तृतीयं तु समुद्दिष्टमुद्वयं तमसस्परि ॥ ८.१६ ॥
(?) पहला आदि-प्रयत्न, दूसरा जहाँ (प्राण) चित्तमें (रुके), और तीसरा "उद्वयं तमसस्परि…" कहा गया है —
पूर्वोक्तस्य तु मन्त्रस्य यथासंख्यं प्रकीर्तयेत् ।
मात्रायोगा यथोक्तास्तु कृता एव भवन्ति च ॥ ८.१७ ॥
— पूर्वोक्त मन्त्रका (जप) संख्याके अनुसार करे; (इससे) यथोक्त मात्राओंके योग (अपने-आप) हो जाते हैं।
एतन्मात्राप्रयोगेण प्राणायामत्रयस्य च ।
ग्रहणं धारणोत्सर्गं यथासंख्येन कारयेत् ॥ ८.१८ ॥
इस मात्रा-प्रयोगसे तीनों प्राणायामोंका — ग्रहण (पूरक), धारण (कुम्भक) और उत्सर्ग (रेचक) — संख्याके अनुसार करे।
पूरकप्राणायामलक्षणम्
बाह्यस्थितं नासपुटेन वायुमाकृष्य तेनैव शनैः समन्तात् ।
नाडीश्च सर्वाः प्रतिपूरयेत्तु स पूरको नाम मरुन्निरोधः ॥ ८.१९ ॥
बाहर स्थित वायुको नासापुटसे खींचकर, उसीसे धीरे-धीरे सब ओरकी सब नाडियोंको भर दे — वह पूरक नामक वायुनिरोध है।
पाठभेद — (पृ. ९०, पं. १५) बाह्ये स्थितं घ्रा(प्रा)णपुटेन हठप्रदी. २.७१; माकृष्य यत्नेन शनैः स्मृच. १४२, वै. ३२४; नासापुटेनानिलमेव बाह्यमाकृष्य तेनैव शनैः समस्तम् सं. ४०
(पृ. ९१, पं. १) नाडीषु सर्वासु च पूरयेद्यः स पूरको नाम महानिरोधः सं. ४०; नाडीश्च सर्वाः परिपूरयेद्यः स...महानिरोधः हठप्रदी. २.७१; नाड्यश्च सर्वाः परिपूरणीयाः स...महानि... वै. ३२४, स्मृच. १४२
कुम्भस्वरूपम्
न रेचको नैव च पूरकोऽयं नासाग्रचारी स्थित एव वायुः ।
सुनिश्चितं धार्य यथाक्रमेण कुम्भाख्यमेतत् प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ ८.२० ॥
न रेचक, न पूरक — (जब) नासाग्रमें विचरनेवाला वायु स्थिर ही रहे; उसे क्रमसे निश्चित रूपसे धारण करना — इसे जानकार कुम्भ (कुम्भक) कहते हैं।
पाठभेद — (पृ. ९१, पं. ३) पूरकोऽत्र नासापुटे संस्थित (पुटान्तःस्थित) मेव वायुम् हठप्रदी. २.७१;...चकं नैव तु पूरकं वा नासाग्रभागे स्थितमेव वायुम् सं. ४१
(पृ. ९१, पं. ५) सुनिश्चलं धारयते क्रमेण हठप्रदी. २.७१; सुनिश्चलं धारयति क्रमेण, ख्यमेतं प्रव... सं. ४१
रेचकप्राणायामलक्षणम्
निष्क्राम्य नासाविवरादशेषं प्राणं बहिः शून्यमिवानिलेन ।
निरुच्छ्वसंस्तिष्ठति चोर्द्ध्व(रुद्ध)वायुः स रेचको नाम महानिरोधः ॥ ८.२१ ॥
नासिकाके छिद्रसे सारे प्राणको बाहर निकालकर, (भीतरको) वायुसे शून्य-सा करके, ऊपर रुके वायुवाला (साधक) बिना श्वास लिये ठहरता है — वह रेचक नामक महानिरोध है।
पाठभेद — (पृ. ९१, पं. ७) हठप्रदी. २.७१; निःसार्य नासा... शून्य इवा... सं. ४२
(पृ. ९१, पं. ९) सं. ४२; निरुध्य सं (निरुच्छ्वसं) तिष्ठति रुद्धवायुः हठप्रदी. २.७२
पूरककुम्भकरेचकलक्षणानि
नासिकाकृष्ट उच्छ्वासो ध्मातः पूरक उच्यते
कुम्भको निश्चलश्वासो मुच्यमानस्तु रेचकः ॥ ८.२२ ॥
नासिकासे खींचकर भरा गया श्वास पूरक कहलाता है; निश्चल श्वास कुम्भक है, और छोड़ा जाता (श्वास) रेचक।
पाठभेद — (पृ. ९१, पं. ११) पमा. १.१. पृ. २९२, वीमि. २७३, स्मृच. १४२, वै. ३२४; उच्छ्वासोऽध्मातः पूरक अप. ४५; नासिकागत उच्छ्वासो ध्मातः पूरक स्मृत. ३८५; ... सो धृतः पूरक आर. ३९
(पृ. ९१, पं. १२) स्मृत. ३८५, अप. ४५;...श्वासो रिच्यमानस्तु वीमि. २७३, पमा. १.१. पृ. २९३, स्मृच. १४२, वै. ३२४, आर. ३९
पूरकादौ स्थानविशेषध्यानानि
नीलोत्पलदलश्यामं नाभिमध्ये प्रतिष्ठितम् ।
चतुर्भुजं महात्मानं पूरकेणैव चिन्तयेत् ॥ ८.२३ ॥
पूरकके साथ ही नाभिके बीच प्रतिष्ठित, नीलकमलकी पंखुड़ीके समान श्याम, चतुर्भुज परमात्मा (विष्णु) का चिन्तन करे।
पाठभेद — (पृ. ९२, पं. १) नीलोत्पलश्यामनिभं नाभिदेशे प्रति... वीमि. २७३, अप. ४५; नाभिदेशे व्यवस्थितम् आर. ३९, योगिसंहितावचनमिति याज्ञ. वीमि. ६९; अतसीपुष्पसंकाशं ध्यानबिन्दूप. ३०
(पृ. ९२, पं. २) वीमि. २७३, अप. ४५; पूरकेनैव आ.; पूरकेण विचिन्तयेत् आर. ३९; ध्या. ३०; योगिसंहितावचनमिति याज्ञ. वीमि. ६९
कुम्भकेन हृदि स्थाने ध्यायेच्च कमलासनम् ।
ब्रह्माणं रक्तगौराङ्गं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥ ८.२४ ॥
कुम्भक के द्वारा हृदय के स्थान में, कमल के आसन पर स्थित, लाल-गोरे अंगों वाले चार मुखों वाले पितामह ब्रह्मा का ध्यान करे।
पाठभेद — (पृ. ९२, पं. ३) वीमि. २७३, अप. ४५, आर. ३९, ध्या. ३१
(पृ. ९२, पं. ४) वीमि. २७३; गौरसर्वाङ्गं अप. ४५; ब्रह्माणं गौरवर्णं च चतु... आर. ३९; रक्तगौराभं ध्या. ३१
रेचकेनेश्वरं ध्यायेल्ललाटस्थं त्रिलोचनम् ।
शुद्धस्फटिकसंकाशं निर्मलं पापनाशनम् ॥ ८.२५ ॥
रेचकके साथ ललाटमें स्थित, त्रिनेत्र, शुद्ध स्फटिकके समान, निर्मल, पापनाशक ईश्वर (शिव) का ध्यान करे।
पाठभेद — (पृ. ९२, पं. ५) रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं ध्या. ३२;... श्वरं विद्याल्ललाटस्थं महेश्वरम् वीमि. २७३, अप. ४५, आर. ३९; योगिसंहितावचनमिति याज्ञ. वीमि. ६९
(पृ. ९२, पं. ६) निष्कलं पापनाशनम् ध्या. ३२; वीमि. २७३, अप. ४५, आर. ३९
प्राणायाममाहात्म्यम्
यदा निरोधसंयोगाद्देवतात्रयचिन्तनात् ।
अग्नेर्वायोरपां योगादात्मा शुद्ध्येत वै त्रिभिः ॥ ८.२६ ॥
जब निरोधके योगसे, तीनों देवताओंके चिन्तनसे, और अग्नि, वायु तथा जलके योगसे — इन तीनोंसे आत्मा (अन्तःकरण) शुद्ध होता है —
निरोधाज्जायते वायुर्वायोरग्निश्च जायते ।
अग्नेरापोऽभिजायन्ते ततोऽन्तः शुद्ध्यते त्रिभिः ॥ ८.२७ ॥
निरोधसे वायु उत्पन्न होता है, वायुसे अग्नि, और अग्निसे जल उत्पन्न होता है; उन तीनोंसे भीतर (शरीर) शुद्ध होता है।
पाठभेद — (पृ. ९२, पं. ९) बौ. ४.१.२६; प्रजायते अत्रि. १.६; प्राणरोधात्तु वायुः स्याद्वायोरग्नि... अग्नि. २१६.४६;... ग्निर्हि.... वसिष्ठस्मृ. २५.६
(पृ. ९२, पं. १०) अग्नेरापश्च जायन्ते अत्रि. १.६; अग्नेरापस्ततः शुद्धिस्ततश्चाचमनं चरेत् अग्नि. २१६.४७; अग्नेरापश्च जायन्ते स्मृच. १४२; तापेनापोऽभिजायन्ते बौ. ४.१.२६; तापेनापोऽथ जायन्ते वसिष्ठस्मृ. २५.६
सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश ।
अपि भ्रूणहनं मासात् पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ ८.२८ ॥
व्याहृति और प्रणव सहित सोलह प्राणायाम, प्रतिदिन किये जानेपर, एक महीनेमें भ्रूणहत्यारेको भी पवित्र कर देते हैं।
पाठभेद — (पृ. ९३, पं. १) मनु. ११.२४८; सव्याहृतिकाः बौ. ४.१.२९, शङ्ख. १२.१८, अत्रि. २.५; सव्याहृतिः सप्रणवाः आ.
(पृ. ९३, पं. २) मनु. ११.२४८, शङ्ख. १२.१९; ... रहर्धृताः बौ. ४.१.३१, अत्रि. २.४
प्राणायामा ब्राह्मणेन त्रयोऽपि विधिवत् कृताः ।
व्याहृतिप्रणवैः सार्द्धं(र्धं) विज्ञेयं परमं तपः ॥ ८.२९ ॥
ब्राह्मणके विधिपूर्वक किये तीन प्राणायाम भी, व्याहृतियों और प्रणवके साथ, परम तप जानने चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ९३, पं. ३) ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि मनु. ६.७०
(पृ. ९३, पं. ४) व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता मनु. ६.७०
दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः ।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ ८.३० ॥
जैसे धौंकी जाती धातुओंके मल जल जाते हैं, वैसे ही प्राणके निग्रहसे इन्द्रियोंके दोष जल जाते हैं।
पाठभेद — (पृ. ९३, पं. ५–६) मनु. ६.७१
अह्ना रात्र्या च यान् जन्तून् हिनस्त्यज्ञानतो यतिः ।
तेषां स्नात्वा विशुद्ध्यर्थं प्राणायामान् षडाचरेत् ॥ ८.३१ ॥
यति दिन और रातमें अनजाने जिन जन्तुओंकी हिंसा करता है, उसकी शुद्धिके लिए स्नान करके छः प्राणायाम करे।
पाठभेद — (पृ. ९३, पं. ७) मनु. ६.६९; अह्नरात्र्या आ.
(पृ. ९३, पं. ८) मनु. ६.६९
प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषम् ।
प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥ ८.३२ ॥
प्राणायामोंसे दोषोंको जलाये, धारणाओंसे पापको, प्रत्याहारसे (विषयोंके) संसर्गोंको, और ध्यानसे अनीश्वर (आत्माको पराधीन करनेवाले) गुणोंको।
पाठभेद — (पृ. ९३, पं. ९) मनु. ६.७२; शङ्ख. ६.१३
(पृ. ९३, पं. १०) मनु. ६.७२; ध्यानेनानैश्वरान् शङ्ख. ७.१३
यथा पर्वतधातूनां दोषान् दहति पावकः ।
एवमन्तर्गतं चैनः प्राणायामेन दह्यते ॥ ८.३३ ॥
जैसे अग्नि पर्वतकी धातुओंके दोषोंको जलाती है, वैसे ही भीतरका पाप प्राणायामसे जल जाता है।
विरजं चतुर्गुणं कृत्वा नियतात्मा जितेन्द्रियः ।
प्राणायामैश्चतुर्भिस्तु मुच्यते ह्युपपातकात् ॥ ८.३४ ॥
विरजा (मन्त्र) को चार बार (जपकर), संयतात्मा और जितेन्द्रिय (साधक) चार प्राणायामोंसे उपपातकसे छूट जाता है।
मन्त्रैर्होमैर्मार्जनाभ्युक्षणैश्च प्राणायामैर्योगसिद्धिं जयन्ति ।
निर्धूतपापा विरजा विशुद्धा योगाग्निना दग्धबीजा व्रजन्ति ॥ ८.३५ ॥
मन्त्रों, होमों, मार्जन-अभ्युक्षणों और प्राणायामोंसे (साधक) योगसिद्धि पाते हैं; पापरहित, रजोरहित, विशुद्ध होकर, योगाग्निसे (कर्मके) बीज जलाकर (परम पदको) जाते हैं।
प्राणायामशतं कार्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
उपपातकजातीनामनादिष्टस्य चैव हि ॥ ८.३६ ॥
सौ प्राणायाम करने चाहिए — (ये) सब पापोंका नाश करते हैं: उपपातक-वर्गके (पापोंका) और जिनका (प्रायश्चित्त) नहीं कहा गया उनका भी।
पाठभेद — (पृ. ९४, पं. ७) सर्वपापापनुत्तये याज्ञ. ३.३०५
(पृ. ९४, पं. ८) याज्ञ. ३.३०५
यदह्ना कुरुते पापं कर्मणा मनसा गिरा ।
त्रिकालसंध्याकरणात् प्राणायामैर्व्यपोहति ॥ ८.३७ ॥
मनुष्य दिनमें कर्म, मन और वाणीसे जो पाप करता है, उसे तीनों कालकी संध्या करनेसे (और) प्राणायामोंसे दूर कर देता है।
पाठभेद — (पृ. ९४, पं. ९) यमवचनमिति मिताक्षरा ५.३०७
(पृ. ९४, पं. १०) त्रैकाल्यसंध्याकरणात्तत्सर्वं विप्रणश्यति याज्ञ. ३.३०७
ब्रह्महा च सुरापश्च अगम्यागमने रतः ।
सुवर्णस्तेयि चौरश्च गोघ्नो विस्रम्भघातकः ॥ ८.३८ ॥
ब्रह्महत्यारा, सुरा पीनेवाला, अगम्यागमनमें लगा, सोना चुरानेवाला, चोर, गोहत्यारा, विश्वासघाती,
शरणागतघाती च कूटसाक्षी ह्यकार्यकृत् ।
एवमादिष्वथान्येषु पापेष्वभिरताश्चिरम् ॥ ८.३९ ॥
शरणागतका हत्यारा, झूठा साक्षी, अकार्य करनेवाला — ऐसे और दूसरे पापोंमें लंबे समय तक लगे रहे (लोग भी) —
प्राणायामशतं कुर्युः सूर्यस्योदयनं प्रति ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ८.४० ॥
— सूर्योदयके समय सौ प्राणायाम करें, (तो) निर्मल होकर पुण्यात्मा सज्जनोंकी भाँति स्वर्गको जाते हैं।
पाठभेद — (पृ. ९४, पं. १५) प्राणायामत्रयं कृत्वा स्मृच. १४२, वै. ३२५
(पृ. ९४, पं. १६) स्मृच. १४२
सूर्यस्योदयनं प्राप्य निर्मला गतकिल्बिषाः ।
भवन्ति भास्कराकारा विधूमा इव पावकाः ॥ ८.४१ ॥
सूर्योदय पाकर (वे) निर्मल और निष्पाप होकर सूर्यके समान आकारवाले हो जाते हैं, जैसे धुएँरहित अग्नि।
पाठभेद — (पृ. ९४, पं. १७) धौतकल्मषाः अत्रि. ८.१२
(पृ. ९४, पं. १८) भास्कराभास्ते अत्रि. ८.१२
ध्यानमाहात्म्यम्
ध्यानेन सदृशं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् ।
श्वपाकेष्वपि भुञ्जानो ध्यायी नैव तु लिप्यते ॥ ८.४२ ॥
ध्यानके समान पापकर्मोंका कोई शोधन नहीं है; ध्यान करनेवाला चाण्डालोंके यहाँ भोजन करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।
पाठभेद — (पृ. ९५, पं. १) अत्रि. ८.१३
(पृ. ९५, पं. २) ध्यानेनेह विशुद्ध्यति अत्रि. ८.१३
पूरकादित्रयफलम्
पूरके विष्णुसायुज्यं कुम्भके ब्रह्मणोऽन्तिकं ।
रेचकेन तृतीयेन प्राप्नुयादैश्वरं पदम् ॥ ८.४३ ॥
पूरकसे विष्णुका सायुज्य, कुम्भकसे ब्रह्माका सान्निध्य, और तीसरे रेचकसे ईश्वरका पद पाता है।
पाठभेद — (पृ. ९५, पं. ३) स्मृच. १४२, वै. ३२४
(पृ. ९५, पं. ४) रेकेन स्मृच. १४२, वै. ३२४
प्राणायामविधिः
न प्राणेनाप्यपानेन वेगाद्वायुं समुत्सृजेत् ।
येन सक्तून् करस्थांश्च प्राणा(ण)योगेन चालयेत् ॥ ८.४४ ॥
न प्राणसे, न अपानसे वायुको (इतने) वेगसे छोड़े कि श्वासका झोंका हाथपर रखे सत्तूको भी उड़ा दे।
शनैर्नासापुटैर्वायुमुत्सृजेन्न च वेगतः ।
न कम्पयेच्छरीरं तु स योगी परमो मतः ॥ ८.४५ ॥
नासापुटोंसे वायुको धीरे-धीरे छोड़े, वेगसे नहीं; और शरीरको कँपाये नहीं — वह योगी श्रेष्ठ माना गया है।
पाठभेद — (पृ. ९५, पं. ७) ...न्न तु वेगतः स्मृच. १४२
(पृ. ९५, पं. ८) स्मृच. १४२
प्राणायामोत्तरमाचमनम् · आचमनपदनिर्वचनम्
प्राणस्यायमनं कृत्वा आचमेत् प्रयतोऽपि सन्
आन्तरं स्विद्यते यस्मात्तस्मादाचमनं स्मृतम् ॥ ८.४६ ॥
प्राणायाम करके, संयत होते हुए भी आचमन करे; क्योंकि भीतर (शरीर) पसीजता है, इसलिए (तब) आचमन कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ९५, पं. ९) वीमि. २७७, अप. ४६, स्मृत. ३८६
(पृ. ९५, पं. १०) वीमि. २७७, अप. ४६; अन्तर स्मृत. ३८६
स्मृतिदृष्टं समाप्य सिद्धान्तोक्तप्राणायामनिरूपणप्रतिज्ञा
एवं त्रिविधमुद्दिष्टं प्राणायामस्य लक्षणम् ।
स्मृतिदृष्टं भवेदेतत् सिद्धान्ते त्वेतदन्यथा ॥ ८.४७ ॥
इस प्रकार प्राणायामका त्रिविध लक्षण कहा गया; यह स्मृतियोंमें देखा गया है, सिद्धान्त(शास्त्र) में यह दूसरे प्रकारसे है।
पाठभेद — (पृ. ९५, पं. ११) याज्ञवल्क्यवचनमिति वीमि. २७४
प्राणायामविधिः
मात्राप्रमाणयोगेन प्राणापाननिरोधनात् ।
ओंकारेणैव कर्तव्यः प्राणायामो यथोदितः ॥ ८.४८ ॥
मात्रा के प्रमाण के योग से प्राण और अपान का निरोध करके, जैसा कि ऊपर कहा गया है, ओंकार के द्वारा ही प्राणायाम करना चाहिए …
पाठभेद — (पृ. ९५, पं. १४) ओंकारेणैव आ.
मात्रायोगप्रमाणेन प्रणवं परिचिन्तयेत् ।
मृदुमध्योत्तमत्वाच्च त्रिविधः सोऽपि कथ्यते ॥ ८.४९ ॥
मात्रा के प्रमाण के योग से 'प्रणव' का चिन्तन करना चाहिए; मृदु, मध्य और उत्तम होने के कारण ही वह तीन प्रकार का कहा गया है …
प्रत्याहारनिरूपणप्रतिज्ञा
एवं तु त्रिविधं कृत्वा प्राणायामं विधानतः ।
प्रत्याहारं ततः पश्चाच्चिन्तयेत्तन्निबोधत ॥ ८.५० ॥
… इस प्रकार तीन प्रकार का प्राणायाम विधिपूर्वक करके, उसके पश्चात् प्रत्याहार का चिन्तन करना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ९६, पं. १) इ.; पश्चात्ततेतन्निबोधत आ.
प्रत्याहारलक्षणम्
वायुर्बाह्यो यथा देहे गृहीतस्तत्र (तः स तु) कोष्ठगः ।
शनैः शनैर्निरोद्धव्यः प्रत्याहारः स उच्यते ॥ ८.५१ ॥
जैसे देहमें ग्रहण किया गया बाहरी वायु कोष्ठ (उदर) में जाता है, (वैसे ही इन्द्रियोंको) धीरे-धीरे रोकना चाहिए — वह प्रत्याहार कहलाता है।
पाठभेद — (पृ. ९६, पं. २) कोष्ठगः आ.
इन्द्रियाणां तु सर्वेषां या वृत्तिस्तु प्रकीर्तिता ।
मनसा प्रतिहर्तव्या प्रत्याहारस्ततः स्मृतः ॥ ८.५२ ॥
इन्द्रियों की जो वृत्ति (गति) प्रसिद्ध है, उसे मन से वापस खींच लेना ही प्रत्याहार कहा गया है।
प्रत्याहारविधिः
सर्वाङ्गाणि यथा कूर्मो दृष्ट्वा संकोचयेत् क्षणात्
तथेन्द्रियाणीन्द्रियार्थात् तानि प्रत्याहरेद्बुधः ॥ ८.५३ ॥
जैसे कछुआ देखने पर अपने अंगों को क्षण भर में सिकोड़ लेता है, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति इन्द्रियों को इन्द्रियार्थों से प्रत्याहार कर ले।
संकल्पोऽध्यवसायश्च अभिमानस्तथैव च ।
तथैव वायवः सूक्ष्मा निरोद्धव्याः प्रयत्नतः ॥ ८.५४ ॥
संकल्प, अध्यवसाय और अभिमान तथा उसी प्रकार वायु रूपी सूक्ष्म (प्राणों) को भी प्रयत्नपूर्वक रोकना चाहिए।
प्रत्याहारफलम्
अतीतानागतेभ्यश्च कामेभ्यस्तु पुनः पुनः ।
एकत्र धारयेद्यस्तु सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ८.५५ ॥
जो अतीत और अनागत कामनाओंसे (मनको) बार-बार (हटाकर) एक स्थानमें धारण करता है, वह अमृतत्वके योग्य होता है।
पाठभेद — (पृ. ९६, पं. १०) इ.; कामेभ्यश्च सदैव तु आ.
श्लोकसंख्या स्नाननिर्णयोपसंहारश्च
शतत्रयं तु श्लोकानामष्टात्रिंशाधिकं तथा ।
स्नानस्य निर्णयः प्रोक्तः शिष्याणां हितकाम्यया ॥ ८.५६ ॥
शिष्योंके हितकी इच्छासे तीन सौ अड़तीस श्लोकोंमें स्नानका निर्णय कहा गया।
पाठभेद — (पृ. ९६, पं. १२) शतत्रयेण श्लोकानामष्टात्रिंशाधिकस्तथा इ.
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये प्राणायामप्रत्याहार- निर्णयो (नाम) अष्टमोऽध्यायः ॥८॥
पाठभेद — (पृ. ९६, पं. १५–१६) निर्णयः अष्टमोध्यायः आ.; योगयाज्ञवल्क्ये प्राणायामप्रत्याहारमनेत् (?) इ.
नवमोऽध्यायः — अध्यात्मनिर्णयः
अध्याय-सार — अध्यात्मनिर्णय — ग्रन्थका केन्द्र और सबसे बड़ा अध्याय (१९८ श्लोक; अन्तिम श्लोक इसे ‘ध्यान-प्रकरण’ कहता है)। ध्यान वह चौथा (अंग) है, जिसे करके फिर जन्म नहीं होता (९.१–२)। निर्मल हृदयमें स्थित विष्णुमें मन लगाना ही ध्यान और योग है; हृदयमें ओंकारसे लक्षित आत्माको कमलनालसे ऊपर ले जाकर घण्टानाद-से ओंकारकी उपासना करे (९.३–८)। मूर्धाका बिन्दु, जहाँसे वाणी लौट आती है और जो किसी वर्णका नहीं, हृदयाकाशमें अक्षर है (९.९–२०)। उसीका अंश सनातन जीव है — वही विष्णु, वही भर्ग, जो हृदयमें, सूर्यमें और धुएँरहित अग्निमें तपता है (९.२१–२७)। ज्ञान और कर्म दोनों आवश्यक हैं (९.२८–३४), और अष्टांग योग तथा प्रणव, व्याहृति और सावित्री — इन तीनसे आत्माकी उपासना होती है (९.३५–३९)।
फिर सावित्रीका अर्थ आता है (९.४०–६३): ‘तत्’ में ‘यत्’ निहित है; भर्ग वह पुरुष है जो बुद्धिको प्रेरित करता है; ‘भ-र-ग’ की निरुक्ति; सूर्य, सविता, वरेण्य, देव आदि नामोंकी निरुक्तियाँ; और सूर्यमण्डलका पुरुष, जिसके लिए ईश उपनिषद्के ‘हिरण्मयेन पात्रेण’ और ‘योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्’ उद्धृत हैं। हिरण्यगर्भसे जगत्की उत्पत्ति, अदितिके गर्भसे मार्तण्डका जन्म, उसके दो रस जो देव-मनुष्य और नाग-राक्षस सबको पालते हैं, और एक ही देवके अनेक नाम (९.६४–९५)। इडा और सुषुम्णा किरणें हैं; सूर्यके द्वारसे ब्रह्मवेत्ता उस अविनाशी पुरुषतक जाते हैं (९.९६–१०२)। सूर्य वेदमय है, और मण्डलमें तथा अग्निमें वही पुरुष ध्येय है (९.१०३–११५)।
इसके बाद यज्ञ भीतर आता है: ज्ञानपूर्वक अग्निहोत्र (९.११६–१२२), शरीरमें पाँच अग्नियाँ (९.१२३–१२५), हृदयकी वेदी और पाँच मण्डल (९.१२६–१३५), और भोजनको प्राणाग्निहोत्र बनानेकी विधि — अन्न ही परम तत्त्व है, और बिना जाने खाया अन्न राखमें दी गयी आहुति है (९.१३६–१५१)। परमेश्वर काठसे पत्थरतक सबमें है; एक आत्मा पाँच स्थानोंमें है; ‘आदित्य ब्रह्म है’ सब उपनिषदोंकी उपासना है; सूर्य वेदोंके मधुका छत्ता है (९.१५२–१६७)। हृदयकी नाडियोंसे दो मार्ग निकलते हैं — एक सूर्यमण्डलको भेदकर परम गतितक, बाकी संसारमें (९.१६८–१७७)। ध्यानकी महिमाके बाद अन्तमें उसकी विधि है: इन्द्रियोंको बुद्धिमें, बुद्धि आदिको प्रकृतिमें और प्रकृतिको पुरुषमें लीन करना; आसन, पद्मासन, दीर्घ प्रणव, प्राणायाम, और हृदयमें दीपकी तरह अचल आत्मापर धारणा (९.१८२–१९४); फिर योगसिद्धिके लक्षण और अमृतत्व (९.१९५–१९८)।
ध्यानविधिनिरूपणप्रतिज्ञा
ध्यानस्य तु विधिं वक्ष्ये शृण्वन्तु ऋषयः सदा ।
एभ्यस्तु पुनरावृत्तिः कदाचिदिह दृश्यते ॥ ९.१ ॥
अब मैं ध्यानकी विधि कहूँगा; ऋषिगण सावधान होकर सुनें। इन (साधनों) से (भी) यहाँ कभी-कभी पुनर्जन्म देखा जाता है —
ध्यानफलम्
ध्यानं कृत्वा चतुर्थं तु न भूयो जन्म चाप्नुयात् ।
ततः सम्यक् प्रवक्ष्यामि प्राणायामचतुर्थकम् ॥ ९.२ ॥
— (पर) चौथे (अंग) ध्यानको करके (मनुष्य) फिर जन्म नहीं पाता। इसलिए मैं भली-भाँति (वह) कहूँगा, जो प्राणायामके बाद चौथा है।
ध्यानविधिः
बाह्यस्तु विषयाक्षेपचित्तविक्षेपवर्जितः ।
मानसं विमले शान्ते स्थितं विष्णुं हृदि क्षिपेत् ॥ ९.३ ॥
बाहरके विषयोंके खिंचाव और चित्तके विक्षेपसे रहित होकर, निर्मल और शान्त (हृदय) में स्थित विष्णुमें मनको लगाये।
तद्ध्यानं तत्तु वै योगो मोक्षमार्गप्रसाधकम् ।
ओं भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यमित्येवं ब्रह्म वैदिकम् ॥ ९.४ ॥
वह ध्यान है, वही योग है, (जो) मोक्षमार्गको सिद्ध करता है। "ॐ भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्" — यह वैदिक ब्रह्म है।
एतदाचार्य वै विप्रः परे धाम्नि नियोजयेत् ।
हृद्याग्निश्चैव वायुश्च जीवश्च समुदाहृतः ॥ ९.५ ॥
विप्र इसका आचरण करके (मनको) परम धाममें लगाये। हृदयमें अग्नि, वायु और जीव कहे गये हैं;
एषां ह्यन्तःशरीरस्थं ओंकारेणोपलक्ष्यते ।
ओंकारं पद्मनालेन उद्धृत्योपरि योजयेत् ॥ ९.६ ॥
इनके भीतर, शरीरमें स्थित (आत्मा) ओंकारसे लक्षित होता है। ओंकारको कमलनालके द्वारा (हृदयसे) निकालकर ऊपर जोड़े।
आ(अ)प्राणाच्छून्यभूतं तु चेतोऽङ्गं जीवसंज्ञकम् ।
जप(जाय)ते तु यतस्तस्मात् पुनस्तत्र निवेशयेत् ॥ ९.७ ॥
प्राणसे शून्य (हुआ) चित्त-अंग, जिसका नाम जीव है, जहाँसे उत्पन्न होता है, उसीमें उसे फिर स्थापित करे।
घण्टाशब्दवदोंकारमुपासीत समाहितः ।
पुरुषं निर्मलं शुद्धं पश्यत्यत्र न संशयः ॥ ९.८ ॥
घण्टा के शब्द के समान ओंकार का समाहित होकर उपासना करे। इसमें निर्मल और शुद्ध पुरुष को देखता है, इसमें संशय नहीं है।
आत्मस्वरूपं तत्स्थानं च
कुण्डलाक्रान्तसंस्थानं प्रसुप्तोरगसंनिभम् ।
तन्मध्ये संस्थितो ह्यात्मा धामात्मा बिन्दुलक्षणः ॥ ९.९ ॥
कुण्डलसे घिरा (कुण्डली मारे), सोये हुए सर्पके समान (एक) स्थान है; उसके बीचमें आत्मा स्थित है — धामरूप, बिन्दु-लक्षणवाला।
ओंकारस्य वक्रत्वऋजुत्वे
वक्रं तु भवति ह्यादौ ओंकारं चतुरक्षरम् ।
ऋजुत्वं संप्रपद्येत पदं प्राप्य तु पञ्चमम् ॥ ९.१० ॥
प्रारम्भ में तो चतुरक्षर वाला ओंकार वक्र होता है। पञ्चम पद को प्राप्त करके ऋजुत्व (सरलता) प्राप्त कर लेता है।
पाठभेद — (पृ. ९७, पं. २२) वक्रं तद्भवति बृया. २.८
मध्यमबिन्दुमाहात्म्यम्
मध्यमस्तु भवेद्बिन्दुर्मूर्धन्येवावतिष्ठते ।
तत्र वाचो निवर्तन्ते सर्वे वर्णास्तथैव च ॥ ९.११ ॥
बिन्दु (उसके) मध्यमें होता है, मूर्धामें ही स्थित रहता है; वहाँ वाणी लौट आती है, और उसी प्रकार सब वर्ण भी।
पाठभेद — (पृ. ९८, पं. १) मूर्धन्ये... आ.
तस्मात् सर्वे प्रसूयन्ते वर्णास्तत्र विशन्ति च ।
वर्णात्मा हीनवर्णस्तु सर्ववर्णेषु जीवनम् ॥ ९.१२ ॥
उसीसे सब वर्ण उत्पन्न होते हैं और उसीमें प्रवेश करते हैं; वह वर्णोंका आत्मा (स्वयं) वर्णरहित है, (और) सब वर्णोंमें जीवन है।
पाठभेद — (पृ. ९८, पं. ४) ...सर्वे वर्णेषु... आ.
न घोषं नैव चाघोषं दन्तौष्ठ्यं नैव तालुजम् ।
न मूर्धन्यं न चान्तःस्थं न स्वरं व्यञ्जनं न च ॥ ९.१३ ॥
…न वह घोष है, न ही अघोष है; न दन्तौष्ठ्य है, न तालुज है; न मूर्धन्य है और न अन्तःस्थ है; न स्वर है और न व्यञ्जन है…
न कव्यं(ण्ठ्यं) नैव चोष्माणं न वर्गं न विसर्गिणम् ।
जिह्वामूलमुपध्मानमनुस्वारं न चैव हि ॥ ९.१४ ॥
न कण्ठ्य, न ऊष्म, न वर्ग(व्यञ्जन), न विसर्गवाला; न जिह्वामूलीय, न उपध्मानीय, न अनुस्वार ही —
पाठभेद — (पृ. ९८, पं. ८) जिह्वा आ.
हृद्याकाशनिविष्टस्तु सोऽक्षरत्वं निगच्छति ।
अक्षराणि त्रिषष्टिर्वै स्थानयोगाद्भवन्ति हि ॥ ९.१५ ॥
— हृदयाकाशमें स्थित वह अक्षरत्व (अविनाशी अक्षरभाव) को प्राप्त होता है; स्थानोंके योगसे (उच्चरित) अक्षर तो तिरसठ होते हैं।
पाठभेद — (पृ. ९८, पं. ९) निगच्छति आ.
(पृ. ९८, पं. १०) त्रिषष्टिर्वै आ.
एतत्तु परमं ध्येयं व्योममध्ये व्यवस्थितम् ।
व्योम्नश्चोपरि मध्यस्थमनन्ताकाशमव्ययम् ॥ ९.१६ ॥
यही परम ध्येय है, व्योमके बीच स्थित — और व्योमके भी ऊपर, बीचमें स्थित, अनन्त, अविनाशी आकाश —
पाठभेद — (पृ. ९८, पं. १२) व्योम यस्य च मध्यस्थं इ.
यस्याकाशमयं कोष्ठमनन्तं परमालयम् ।
संयोगश्चेतनोऽस्माकं प्रकाशश्चाग्निसूर्ययोः ॥ ९.१७ ॥
— जिसका कोश आकाशमय, अनन्त, परम आश्रय है; वह हमारी चेतनाका संयोग (आधार) है, और अग्नि तथा सूर्यका प्रकाश है।
पाठभेद — (पृ. ९८, पं. १३) ...कोष्ठामनन्तं आ.
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ ९.१८ ॥
(गीता १५.१२:) जो तेज सूर्यमें स्थित होकर सारे जगत्को प्रकाशित करता है, जो चन्द्रमामें और जो अग्निमें है, उस तेजको मेरा जानो।
पाठभेद — (पृ. ९८, पं. १५) गीता १५.१२
(पृ. ९८, पं. १६) गीता १५.१२; यच्चाग्नौ आ.
अन्तरेऽस्मिन्निमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत् ।
अग्रं च मूलकं ब्रह्म सर्वेषां चान्तरास्थितम् ॥ ९.१९ ॥
इसीके भीतर ये लोक हैं, यह सारा जगत् इसीके भीतर है; (वह) ब्रह्म (सबका) अग्र और मूल है, और सबके भीतर स्थित है।
पाठभेद — (पृ. ९९, पं. १) अनग्रमूलकं ब्रह्म सर्वेषु परिसंस्थितम् इ.
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ९.२० ॥
(गीता १५.६:) उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा, न अग्नि; जिसे पाकर (साधक) लौटते नहीं, वह मेरा परम धाम है।
पाठभेद — (पृ. ९९, पं. २–३) गीता. १५.६
जीवस्वरूपम्
तस्मादंशं विनिष्क्रान्तं जीवभूतं सनातनम् ।
ब्रह्मणः परमं ब्रह्म ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् ॥ ९.२१ ॥
उसीसे निकला हुआ (उसका) अंश सनातन जीव बना है; वह ब्रह्मासे भी परे परम ब्रह्म है, ज्योतियोंकी उत्तम ज्योति।
हृदये सर्वभूतानां जीवभूतः स तिष्ठति ।
स एव भगवान् विष्णुर्वेदान्तैरुपगीयते ॥ ९.२२ ॥
वह जीवभूत सब भूतों के हृदय में स्थित है। वे ही भगवान् विष्णु वेदान्तों द्वारा कहे जाते हैं।
ईश्वरं पुरुषाख्यं तु सत्यधर्माणमव्ययम् ।
भर्गाख्यं विष्णुसंज्ञं तु यं ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥ ९.२३ ॥
पुरुष नामवाले, सत्यधर्मा, अविनाशी ईश्वर — भर्ग नामवाले, विष्णु संज्ञावाले — को जानकर (मनुष्य) अमृत पाता है।
हृद्व्योम्नि तपते ह्येष बाह्ये सूर्यस्य चान्तरे ।
अग्नौ ह्यधूमके ह्येष ज्योतिश्चित्रतरङ्गवत् ॥ ९.२४ ॥
यही हृदय-व्योममें तपता है, बाहर सूर्यके भीतर, और धुएँरहित अग्निमें; यह चित्र-विचित्र तरंगोंवाली ज्योति है।
हृद्याकाशे तु यो जीवः साधकैरुपगीयते ।
स एवाऽऽदित्यरूपेण बहिस्तम(नभ)सि राजते ॥ ९.२५ ॥
हृदयाकाशमें जिस जीवका साधक गान करते हैं, वही आदित्यरूपसे बाहर आकाशमें प्रकाशित होता है।
तस्य चान्तर्गतं धाम सूक्ष्मं प्राकाश्यमेव च ।
स चात्मा सर्वभूतानां चेतोमात्रस्वरूपकः ॥ ९.२६ ॥
उसके भीतर सूक्ष्म, प्रकाशमय धाम है; और वह सब भूतोंका आत्मा है, चेतनामात्र स्वरूपवाला।
एकधा यो विजानाति ज्ञात्वा चैनमुपासते ।
स परं विद्यते व्योम ब्रह्माणं समुपाश्नुते (?) ॥ ९.२७ ॥
जो (उसे) एक रूपसे जानता है और जानकर उसकी उपासना करता है, वह परम व्योमको पाता है और ब्रह्मको प्राप्त होता है (?)।
ज्ञानकर्मसमुच्चयेन परमपुरुषार्थसिद्धिः
ज्ञानकर्मसमायोगात् परमाप्नोति पूरुषम् ।
पृथग्भावे न सिध्येत उभे तस्मात् समाश्रयेत् ॥ ९.२८ ॥
ज्ञान और कर्म के समायोग से वह परम पुरुष को प्राप्त होता है; दोनों के पृथक् भाव से सिद्धि नहीं होती, इसलिए दोनों का ही आश्रय लेना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. ९९, पं. १८) याज्ञ. वीमि. ३६०, दीप. ८९
(पृ. ९९, पं. १९) तात तस्मात् दीप. ८९
ज्ञानं प्रधानं न तु कर्महीनं
कर्म प्रधानं न तु बुद्धिहीनम् ॥
तस्माद्द्वयोरेव भवेत सिद्धिर्न ह्येकपक्षो विहगः प्रयाति ॥ ९.२९ ॥
ज्ञान प्रधान है, किन्तु कर्महीन नहीं; कर्म प्रधान है, किन्तु बुद्धिहीन नहीं। इसलिए दोनों का ही होना चाहिए, क्योंकि एक पक्ष से तो पक्षी उड़ नहीं सकता।
पाठभेद — (पृ. १००, पं. १–४) दीप. ८९
गवां सर्पिः शरीरस्थं न करोत्यङ्गपोषणम् ।
निःसृतं कर्मचरितं पुनस्तस्यैव भेषजम् ॥ ९.३० ॥
गायका घी (उसके) शरीरमें रहते हुए (उसके) अंगोंका पोषण नहीं करता; पर (दूधसे) निकालकर, कर्म(संस्कार) से बनाया हुआ (वही घी) उसीकी औषधि बन जाता है।
पाठभेद — (पृ. १००, पं. ५) स्मृत. ३८२; यथा स...स्थं गवां न कुरुते बलम् ग. २३५.२
(पृ. १००, पं. ६) ...कर्मसंयुक्तं पुनस्तासां तदौषधम् स्मृत. ३८२; निर्गतं कर्मसंयुक्तं दत्तं तासां महाफलम् ग. २३५.३
एवं सति शरीरस्थः सर्पिवत्(र्वत्) परमेश्वरः ।
विना चोपासनादेव न करोति हितं नृषु ॥ ९.३१ ॥
ऐसे ही घीकी भाँति शरीरमें स्थित परमेश्वर उपासनाके बिना मनुष्योंका हित नहीं करता।
पाठभेद — (पृ. १००, पं. ७) तथा विष्णुः शरीरस्थो न करोति हितं नृणाम् ग. २३५.३
(पृ. १००, पं. ८) स्मृत. ३८३; विनाराधनया देवः सर्वगः परमेश्वरः ग. २३५.४
योगाग्निमाहात्म्यम्
कर्माणि ह्यविनाशीनि बीजवत् प्रभवन्ति च ।
तानि योगाग्निदग्धानि न प्ररोहन्ति वै पुनः ॥ ९.३२ ॥
कर्म अविनाशी होते हैं और बीजकी भाँति (फिर) उगते हैं; (पर) योगाग्निसे जले हुए वे फिर अंकुरित नहीं होते।
ध्यानाद्यावश्यकता
एतस्मात् कारणाद्ध्यानं धारणां प्राणसंयमम् ।
कुर्याद्यत्नेन योगज्ञः कर्मसंन्यासचिन्तनम् ॥ ९.३३ ॥
इस कारण योगका जानकार यत्नपूर्वक ध्यान, धारणा, प्राणसंयम और कर्मसंन्यासका चिन्तन करे।
कायक्लेशभयात् कर्मत्यागनिंदा
परिज्ञानाद्भवेन्मुक्तिरेतदालस्यलक्षणम् ।
कायक्लेशभयाच्चैव कर्म नेच्छन्त्यपण्डिताः ॥ ९.३४ ॥
"(केवल) ज्ञानसे मुक्ति होती है" — यह आलस्यका लक्षण है; शरीरके कष्टके भयसे ही मूर्ख कर्म नहीं चाहते।
पाठभेद — (पृ. १००, पं. १३) स्मृत. ३८३; ...रेतज्ज्ञानस्य लक्षणम् आ.
अष्टाङ्गो योगस्तत्फलं च
यमैश्च नियमैश्चैव आसनैः प्राणसंयमैः ।
प्रत्याहारेण ध्यानेन धारणाभिः समाधिना ॥ ९.३५ ॥
यम, नियम, आसन, प्राणसंयम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि के द्वारा...
अष्टाङ्गेन तु योगेन उपास्यात्मा विमुच्यते ।
अणिमादि तथैश्वर्यं प्रत्यक्षं जायते ध्रुवम् ॥ ९.३६ ॥
अष्टाङ्ग योग के द्वारा तो आत्मा की उपासना करके वह मुक्त हो जाता है तथा अणिमादि ऐश्वर्य प्रत्यक्ष रूप से निश्चित ही प्राप्त होता है...
आत्मोपासनामाहात्म्यम्
प्रणवव्याहृतिभ्यां च सावित्र्या त्रितयेन च ।
उपास्यं त्रितयं ब्रह्म आत्मा ह्यत्र प्रतिष्ठितः ॥ ९.३७ ॥
प्रणव, व्याहृतियों और सावित्री (गायत्री) — इस त्रयसे त्रिविध ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिए; यहीं आत्मा प्रतिष्ठित है।
पाठभेद — (पृ. १०१, पं. १) ...गायत्र्या त्रितयेन च स्मृत. ३८३
(पृ. १०१, पं. २) उपास्यं परमं ब्रह्म आत्मा यत्र स्मृत. ३८३
विद्या जपश्च चिन्ता च एतद्धि त्रितयं स्मृतम् ।
एतेन त्रितयेनाथ उपास्यात्मा विमुच्यते ॥ ९.३८ ॥
विद्या, जप और चिन्तन — ये तीन कहे गये हैं; इस त्रयसे उपासना करके आत्मा मुक्त हो जाता है।
प्रणवाद्या भवेद्विद्या प्राणायामस्तपः स्मृतम् ।
ध्यानं च धारणा चैव चिन्ता ह्येषा उदाहृता ॥ ९.३९ ॥
प्रणवसे आरम्भ होनेवाली (गायत्री) विद्या है, प्राणायाम तप कहा गया है, और ध्यान तथा धारणा — यह चिन्तन कहा गया है।
सावित्र्युपासनामहात्म्यम्
सावित्र्याश्चैव माहात्म्यं ज्ञात्वा चैव यथार्थतः ।
तस्यां यदुक्तं चोपास्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ९.४० ॥
सावित्रीका माहात्म्य यथार्थरूपसे जानकर, और उसमें जो कहा गया है उसकी उपासना करके, (मनुष्य) ब्रह्मभावके योग्य होता है।
गायत्रीमन्त्रार्थः
तच्छब्देन तु यच्छब्दो बोद्धव्यः सततं बुधैः ।
उदाहृते तु तच्छब्दे यच्छब्द उदितो भवेत् ॥ ९.४१ ॥
"तत्" शब्दसे बुद्धिमान् सदा "यत्" शब्द समझें; "तत्" शब्दके कहे जानेपर "यत्" शब्द (स्वयं) उदित होता है।
देवस्य सवितुर्यच्च भर्गमन्तर्गतं विभुम् ।
ब्रह्मवादिन एवाहुर्वरेण्यं तच्च धीमहि ॥ ९.४२ ॥
सविता देवके भीतर स्थित जो व्यापक भर्ग है — ब्रह्मवादी उसीको वरेण्य कहते हैं; उसका हम ध्यान करते हैं।
पाठभेद — (पृ. १०१, पं. ११) इ.;...र्यस्य भर्ग... आ.;... सवितुर्वर्चो भर्गमन्त... स्मृत. ३८३
(पृ. १०१, पं. १२) ...ण्यं चास्य धीमहि स्मृत. ३८३
चिन्तयामो वयं भर्गं धियो यो नः प्रचोदयात् ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु बुद्धिवृत्तीः पुनः पुनः ॥ ९.४३ ॥
हम उस भर्गका चिन्तन करते हैं, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें हमारी बुद्धियोंको — बुद्धिकी वृत्तियोंको — बार-बार प्रेरित करे।
पाठभेद — (पृ. १०१, पं. १३) स्मृत. ३८३
(पृ. १०१, पं. १४) स्मृत. ३८३; मदी. २०; बुद्धिवृत्ती... आ.
बुद्धेर्बोधयिता यस्तु चिदात्मा पुरुषो विराट् ।
सवितुस्तद्वरेण्यं तु सत्यधर्माणमीश्वरम् ॥ ९.४४ ॥
जो बुद्धिको बोध देनेवाला चिदात्मा विराट् पुरुष है — सविताका वह वरेण्य, सत्यधर्मा ईश्वर —
पाठभेद — (पृ. १०१, पं. १५) बुद्धेश्चोदयिता स्मृत. ३८३
भर्गपदार्थः
हिरण्यवर्णं पुरुषं ध्यायेम विष्णुसंज्ञकम् ।
भेति भासयते लोकान् रेति रञ्जयते प्रजाः ॥ ९.४५ ॥
— (उस) सुवर्णवर्ण, विष्णु नामवाले पुरुषका हम ध्यान करें। "भ" — (वह) लोकोंको भासित करता है; "र" — प्रजाओंको रञ्जित (प्रसन्न) करता है;
पाठभेद — (पृ. १०१, पं. १८) लोकानितिरंजयते आ. भेति भासयते लोकान् रेति रञ्ज... मदी. २०
गइत्यागच्छतेऽजस्रं भरगा(णा)द्भर्ग उच्यते ।
अग्नीषोमात्मकं बिभ्रद्वैश्वरूपेण कर्मणा ॥ ९.४६ ॥
"ग" — निरन्तर आता-जाता (गति करता) है; (और) भरण करनेसे (भी) भर्ग कहलाता है। (वह) विश्वरूप कर्मसे अग्नि-सोमरूप (जगत्) को धारण करता है।
पाठभेद — (पृ. १०२, पं. १) गत्यागच्छत्यजस्रं यो भगवान् भर्ग उच्यते मदी. २०
सूर्यनामधेयनिर्वचनानि
जगदाधानसिद्ध्यर्थं सूर्यात्मा जगतोऽपि च ।
शश्वत्प्रसूयणात् सूर्यः पावनात् पवनः स्मृतः ॥ ९.४७ ॥
जगत्की स्थापनाकी सिद्धिके लिए (वह) जगत्का आत्मा सूर्य है; निरन्तर प्रसव (उत्पन्न) करनेसे सूर्य, और पवित्र करनेसे पवन कहा गया है।
आप्यायनात्तु वरुणः श्रेष्ठत्वादिन्द्र एव सः ।
भौमान्तरिक्षं दिव्यं च आ(अ)प आहू रवीन्धनम् ॥ ९.४८ ॥
आप्यायन (तृप्त) करनेसे वही वरुण है, श्रेष्ठ होनेसे इन्द्र; भूमिके, अन्तरिक्षके और दिव्य जलको रविका ईंधन कहा गया है।
एता गभस्तिभिः पीता दीप्यन्ते रविमण्डले ।
एतैः पर्यायशब्दैस्तु एक एव सदोच्यते ॥ ९.४९ ॥
ये (जल) किरणोंसे पिये जाकर सूर्यमण्डलमें दीप्त होते हैं। इन पर्याय शब्दोंसे एक ही (देव) सदा कहा जाता है।
भ्राजते च यदा भर्गः पुरुषत्वाच्च पूरुषः ।
सर्वात्मा सर्वभावस्तु आत्मा तेन निगद्यते ॥ ९.५० ॥
क्योंकि (वह) दीप्त होता है (इसलिए) भर्ग, पुरमें रहनेसे पुरुष; (और) सबका आत्मा, सब भावोंवाला (होनेसे) वह आत्मा कहलाता है।
तत्सवितुर्वरेण्यं च चेतनात्मा महेश्वरः ।
आ(अ)पः संक्षिप्य सवितुस्ततः सर्गः प्रवर्तितः ॥ ९.५१ ॥
सविताका वह वरेण्य (तेज) चेतनात्मा महेश्वर है; सविताने जलोंको समेटकर (उत्पन्न करके) तब सृष्टि प्रवर्तित की।
सर्वेषामेव भूतानामापो ज्योतिरिहोच्यते ।
भ्रस्ज पाके भवेद्धातुर्यस्मात् पाचयते ह्यसौ ॥ ९.५२ ॥
यहाँ (मन्त्रमें) सब भूतोंका जल और ज्योति (भर्ग) कहा जाता है; "भ्रस्ज्" धातु पकानेके अर्थमें है, क्योंकि वह (सबको) पकाता है।
पाठभेद — (पृ. १०२, पं. १५) भ्रस्जो पाके आ.
भ्राजते दीप्यते यस्माज्जगदन्ते हरत्यपि ।
कालाग्निरूपमास्थाय सप्तार्चिः सप्तरश्मिभिः ॥ ९.५३ ॥
क्योंकि वह चमकता है, दीप्त होता है, और जगत्के अन्तमें (सबको) हर लेता है — सात ज्वालाओं और सात किरणोंसे कालाग्निका रूप धारण करके।
पाठभेद — (पृ. १०२, पं. १६) ..जगच्चान्ते मदी. २०
भ्राजते स्वेन रूपेण तस्माद्भर्ग इति स्मृतः ।
दीव्यते क्रीडते यस्माद्द्योतते रोचते दिवि ॥ ९.५४ ॥
अपने रूपसे चमकता है, इसलिए भर्ग कहा गया है; क्योंकि स्वर्गमें दीप्त होता है, क्रीडा करता है, प्रकाशित होता है, शोभित होता है —
पाठभेद — (पृ. १०२, पं. १८) भ्राजते तत्स्वरूपेण तस्माद्भर्गः स उच्यते मदी. २०
(पृ. १०२, पं. १९) मदी. १९; दीव्यते क्रीडते यस्मादुद्यते द्योतते दिवि आ.
तस्मादेव इति प्रोक्तस्तूयते सर्वदैवतैः ।
सविता सर्वभूतानां सर्वभावान् प्रसूयते ॥ ९.५५ ॥
— इसलिए (वह) "देव" कहा गया है और सब देवता उसकी स्तुति करते हैं। सविता सब भूतोंके सब भावोंको उत्पन्न करता है —
पाठभेद — (पृ. १०३, पं. १) मदी. १९
(पृ. १०३, पं. २) मदी. १९; सर्वभावांश्च जायते आ.
सवनात् पावनाच्चैव सविता तेन चोच्यते ।
वरेण्यं वरणीयं च जन्मसंसारभीरुभिः ॥ ९.५६ ॥
— सवन (उत्पन्न करने) और पवित्र करनेसे वह सविता कहलाता है। जन्म-संसारसे डरनेवालोंके लिए (वह) वरेण्य — वरण करने योग्य है।
पाठभेद — (पृ. १०३, पं. ३) मदी. १९
(पृ. १०३, पं. ४) स्मृत. ३८३;...संसारभयभीरुभिः मदी. १९
आदित्यान्तर्गतं भर्गः सेव्यते वै मुमुक्षुभिः ।
जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य त्रिविधस्य च ॥ ९.५७ ॥
आदित्यके भीतर स्थित भर्गका मुमुक्षु जन्म-मृत्युके नाश और तीनों प्रकारके दुःखके (नाशके) लिए सेवन करते हैं।
पाठभेद — (पृ. १०३, पं. ५) ...र्गतं यच्च भर्गाख्यं तन्मुमु...स्मृत. ३८३;...गतं यच्च भर्गाख्यं वा मुमु..मदी. २०
(पृ. १०३, पं. ६) त्रितयस्य च स्मृत. ३८३
ध्यानेन पुरुषो यस्तु द्रष्टव्यः सूर्यमण्डले ।
मन्त्रोऽर्थमपि वेदादौ स्थापयत्येवमेव हि ॥ ९.५८ ॥
सूर्यमण्डलमें जिस पुरुषको ध्यानसे देखना चाहिए — वेदके आदिमें मन्त्र भी इसी अर्थको स्थापित करता है —
पाठभेद — (पृ. १०३, पं. ७) यश्च द्रष्टव्यः स्मृत. ३८३
(पृ. १०३, पं. ८) ...मपि चैवायं ज्ञापयत्येवमेव हि स्मृत. ३८३
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्याऽपिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ ९.५९ ॥
(ईश १५ / बृहदारण्यक:) सुवर्णमय पात्रसे सत्यका मुख ढका है; हे पूषन्! सत्यधर्मा (मुझ) को दर्शनके लिए उसे हटा दो।
पाठभेद — (पृ. १०३, पं. ९–१०) ईशा. १५, मैआ. ६.३५
योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम् ।
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ॥ ९.६० ॥
(ईश १६:) जो वह आदित्यमें पुरुष है, वह मैं हूँ। (गीता ८.९:) जो कवि, पुरातन, शासक, अणुसे भी अणु — (उसका) स्मरण करता है —
पाठभेद — (पृ. १०३, पं. ११) मैआ. ६.३५;...दित्यपुरु... आ.
(पृ. १०३, पं. १२–१३) गीता. ८.९
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
भर्गस्तु पुरुषो ह्यात्मा ईश्वराख्यः शुचिस्तथा ॥ ९.६१ ॥
— सबके धारक, अचिन्त्यरूप, सूर्यके समान वर्णवाले, अन्धकारसे परे (उसका)। वह भर्ग ही पुरुष है, आत्मा है, ईश्वर नामवाला और शुचि (पवित्र) है;
पाठभेद — (पृ. १०३, पं. १२–१३) गीता. ८.९
हिरण्यगर्भो विष्णुश्च शुक्रश्चैव ह्यलिङ्गकः ।
ईशिता सर्वभूतानां कर्मदोषाशयैरपि ॥ ९.६२ ॥
(वही) हिरण्यगर्भ, विष्णु और शुक्र है, (और) अलिङ्ग; (वह) सब भूतोंका शासक है, (पर) कर्म, दोष और आशयोंसे भी —
न परामृश्यते यस्माद्विशेषादीश्वरः स्मृतः ।
शोधनाच्छुद्धनाच्चैव अक्लिन्नत्वाच्छुचिः स्मृतः ॥ ९.६३ ॥
— स्पर्श नहीं किया जाता, (इस) विशेषतासे ईश्वर कहा गया है; शोधन करनेसे, शुद्ध होनेसे और अक्लिन्न (निर्लेप) होनेसे शुचि कहा गया है।
हिरण्यगर्भतो जगदुत्पत्तिक्रमः
हिरण्मयस्य गर्भोऽभूत् हिरण्यस्य च गर्भजः ।
तस्माद्धिरण्यगर्भेति पुराणे विनिगद्यते ॥ ९.६४ ॥
(वह) हिरण्मय (अण्ड) का गर्भ हुआ, और हिरण्यके गर्भसे उत्पन्न हुआ; इसलिए पुराणमें 'हिरण्यगर्भ' कहा जाता है।
हैरण्यमण्डं संदीप्तं तपोज्ञानात्तु वै पुरा ।
एकं द्वादशधा गर्भमदितिर्विष्णुमजीजनत् ॥ ९.६५ ॥
पूर्वकालमें तप और ज्ञानसे सुवर्णमय अण्ड प्रज्वलित हुआ; (उस) एक गर्भको अदितिने बारह प्रकारसे — विष्णु (आदित्य) को — उत्पन्न किया।
तस्योल्वा(ल्ब)द्धास्थितो मेरुरुदरात् सप्त सिन्धवः ।
पर्वताश्च जरायुत्था नद्यो धमनिसंज्ञिकाः ॥ ९.६६ ॥
उसकी झिल्लीसे मेरु स्थित हुआ, उदरसे सात समुद्र; जरायुसे पर्वत उठे, और धमनियाँ नदियाँ (बनीं)।
दिवश्च पृथिवी चैव कपाले द्वे व्यवस्थिते ।
मध्येऽन्तरिक्षमभवत् त्रैलोक्यस्यैष संभवः ॥ ९.६७ ॥
द्यौ और पृथिवी — (अण्डके) दो कपाल (आधे भाग) बनकर स्थित हुए; बीचमें अन्तरिक्ष हुआ — यह त्रिलोकीकी उत्पत्ति है।
एते ह्यण्डकपाले द्वे अपां मध्ये निवेशिते ।
एकोऽधस्तात् समभवत् द्वितीयं नन्दनं वनम् ॥ ९.६८ ॥
अण्डके ये दो कपाल जलोंके बीच रखे गये; एक नीचे हुआ, दूसरा नन्दनवन (स्वर्ग)।
मार्तण्डोत्पत्तिस्तन्माहात्म्यं च
तन्मध्याद्यः शिशुर्जातो मार्तण्डः सवितेति सः ।
सर्वाणि चास्य भूतानि ह्युपासन्ते समन्ततः ॥ ९.६९ ॥
उनके बीचसे जो शिशु उत्पन्न हुआ, वह मार्तण्ड — 'सविता' — है; सब भूत चारों ओरसे उसीकी उपासना करते हैं।
एतस्य ब्रह्मणा न्यस्तं स्तूयते स(सा)र्वलो(लौ)किकम् ।
रौद्र(द्रं) तेजः स्वकीयं च अग्नीषोमौ तथैव च ॥ ९.७० ॥
ब्रह्माने इसमें जो स्थापित किया, उस सर्वलौकिक (तेज) की स्तुति की जाती है — रौद्र तेज, अपना (तेज), और उसी प्रकार अग्नि-सोम —
द्वादशानां तु यत्तेजस्तदेकस्य निवेशितम् ।
पौरुषं चैव यद्धाम परमं ह्यत्र तिष्ठति ॥ ९.७१ ॥
— बारहों (आदित्यों) का जो तेज है, वह इस एकमें स्थापित है; और जो पुरुषका परम धाम है, वह यहीं स्थित है।
पाठभेद — (पृ. १०४, पं. २०) इ.; निवेशनम् आ.
(पृ. १०४, पं. २१) इ.; परमात्मं च आ.
अमृतं चैव मृत्युश्च प्राकृतं वैकृतं तथा ।
द्विधा गर्भो भवत्येष हिताय जगतोऽस्य च ॥ ९.७२ ॥
अमृत और मृत्यु, प्राकृत और वैकृत — इस जगत्के हितके लिए यह गर्भ (मार्तण्ड) दो प्रकारका होता है।
वेदाश्चैवात्र चत्वारस्तपन्ते मण्डले स्थिताः ।
ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तु रश्मयस्तस्य शब्दिताः ॥ ९.७३ ॥
यहाँ (सूर्य-)मण्डलमें स्थित होकर चारों वेद तपते हैं; ऋक्, यजुः और साममय (यह) मूर्ति है, और उसकी किरणें (वेदोंके) शब्द कही गयी हैं।
रसानि यानि मेध्यानि रश्मिभिः संप्रकर्षति ।
दिव्याः शिवतमा ह्यापः सौम्यास्ताः संभवन्ति हि ॥ ९.७४ ॥
जो पवित्र रस हैं, उन्हें (वह) किरणोंसे खींचता है; वे दिव्य, परम कल्याणकारी, सौम्य जल बन जाते हैं।
पाठभेद — (पृ. १०५, पं. ५) रसभिः संप्रकर्षति आ.
अक्षत्रेभ्यश्च एतेभ्यो ह्यमेध्याद् गृह्यते रसः ॥
(?)
अथर्वाङ्गिरसेभ्यश्च संभवेदैकृतं जगत् (?) ॥ ९.७५ ॥
(?) और इन (अपवित्र स्थानों) से, अपवित्रसे (भी) रस ग्रहण किया जाता है; (उससे) अथर्वाङ्गिरस (शक्तियों) के द्वारा वैकृत जगत् उत्पन्न होता है (?)।
अश्माशनिरवश्याया नागकूष्माण्डराक्षसाः ।
स्तेनास्तेन हि जीवन्ति सौम्येन सुरमानवाः ॥ ९.७६ ॥
पत्थर, वज्र, ओस (से) — नाग, कूष्माण्ड, राक्षस और चोर उस (वैकृत रस) से जीते हैं; और सौम्य (रस) से देवता और मनुष्य।
अन्नदः सर्वभूतानां भूर्भुवःस्वर्निवासिनाम् ।
द(वृ)ष्टिप्रकाशे(शा)वश्यायनीहाराशनिमारुतैः ॥ ९.७७ ॥
भूः, भुवः, स्वः में रहनेवाले सब भूतोंका (वह) अन्नदाता है — वर्षा, प्रकाश, ओस, कुहरा, वज्र और वायुके द्वारा।
तामसान् यक्षभूतानि नागकूष्माण्डनैर्ऋतान् ।
तदन्नेन बिभर्त्येकोऽमृतवृष्ट्या चराचरान् ॥ ९.७८ ॥
तामस यक्षों, भूतों, नागों, कूष्माण्डों और नैर्ऋतों (राक्षसों) का उस (वैकृत) अन्नसे, और (अन्य) चराचरका अमृतकी वर्षासे — (वह) अकेला भरण करता है।
विविधानि सूर्यनामधेयानि
एष धाता विधाता च ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः ।
धनदः पावकः कालो वरुणेन्द्रानिलाः शशी ॥ ९.७९ ॥
यही धाता, विधाता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर है; धनद (कुबेर), पावक (अग्नि), काल, वरुण, इन्द्र, वायु और चन्द्रमा है;
मित्रो धाता भगस्त्वष्टा पूषार्यमांशुरेव च ।
पर्यायनामभिश्चैष एक एव निगद्यते ॥ ९.८० ॥
मित्र, धाता, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा और अंशु भी — इन पर्याय-नामोंसे यह एक ही कहा जाता है।
सूर्यनामधेयनिर्वचनानि
विशनात् सर्वभूतानां विष्णुरित्यभिधीयते ।
पश्यते सर्वभूतानां कर्म एष शुभाऽशुभम् ॥ ९.८१ ॥
सब भूतोंमें प्रवेश करनेसे (वह) विष्णु कहलाता है; यह सब भूतोंके शुभ-अशुभ कर्मको देखता है;
छिन्दते पूर्वदेहस्थं विपाकं वै शुभाऽशुभम् ।
तस्माद्धाता विधाता च कीर्त्यते वेदचिन्तकैः ॥ ९.८२ ॥
पूर्व देहमें स्थित शुभ-अशुभ विपाकको काटता है; इसलिए वेदका चिन्तन करनेवाले (उसे) धाता और विधाता कहते हैं।
पाठभेद — (पृ. १०६, पं. १) चित्तं यत् पूर्वदेहस्थं विपाके तु शुभाशुभम् इ.
(पृ. १०६, पं. २) कीर्त्यते दैवचिन्तकैः इ.
बृहत्वाद् बृंहणत्वाच्च सामऋग्यजुषां तथा ।
त्रयाणां धारणाच्चैव ब्रह्मा तेन निगद्यते ॥ ९.८३ ॥
बड़ा होनेसे, बढ़ानेसे, और साम, ऋक्, यजुः — इन तीनोंको धारण करनेसे (वह) ब्रह्मा कहलाता है।
रोदनाद्द्रावणाद्रागाद्रंहणाद्रुद्र उच्यते ।
महानीशश्च भूतानां महेश्वर इति स्मृतः ॥ ९.८४ ॥
रुलानेसे, द्रवित करनेसे, रागसे (और) वेगसे रुद्र कहलाता है; भूतोंका महान् ईश होनेसे महेश्वर कहा गया है।
सहस्रकरपन्मूर्तिर्दृश्यते सर्वतो यतः ।
सर्वस्यैवोपरिष्टस्य पूरणात् पुरुषः स्मृतः ॥ ९.८५ ॥
क्योंकि (उसकी) हजारों हाथ-पैरवाली मूर्ति सब ओर दिखायी देती है; सबके ऊपर स्थित (वह) सबको भरनेसे पुरुष कहा गया है।
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ ९.८६ ॥
अग्निमें भली-भाँति डाली गयी आहुति सूर्यको पहुँचती है; सूर्यसे वर्षा होती है, वर्षासे अन्न, और उससे प्रजा।
पाठभेद — (पृ. १०६, पं. ९) मनु. ३.७६
(पृ. १०६, पं. १०) मनु. ३.७६
सविता श्रियः प्रसविता धनदस्तेन चोच्यते ।
वायुः कर्म च कालो च शुद्धेः कर्तॄणि देहिनाम् ॥ ९.८७ ॥
सविता श्री (सम्पत्ति) का उत्पन्न करनेवाला है, इसलिए धनद कहलाता है। वायु, कर्म और काल — (ये) देहधारियोंकी शुद्धिके कर्ता हैं।
पावयेद्रश्मिभिः सर्वं पावकस्तेन चोच्यते ।
सूर्य आत्मा तु जगतः प्राणाख्यो हृदि संस्थितः ॥ ९.८८ ॥
किरणोंसे सबको पवित्र करता है, इसलिए पावक कहलाता है। सूर्य जगत्का आत्मा है, जो प्राण नामसे हृदयमें स्थित है।
सर्वात्मा कथ्यते तज्ज्ञैर्जीवभूतः सनातनः ।
द्वितीयेन तु रूपेण साक्षिवत्तिष्ठते तु सः ॥ ९.८९ ॥
जानकार (उसे) सर्वात्मा, सनातन जीवरूप कहते हैं; और दूसरे रूपसे वह साक्षीकी भाँति स्थित रहता है।
आदानात् सर्वभूतानामादित्य इति कीर्तितः ।
आर्यः स्वाम्यस्य जगतो ह्यर्यमा तेन चोच्यते ॥ ९.९० ॥
सब भूतोंका (रस) ग्रहण करनेसे आदित्य कहा गया है; जगत्का स्वामी (आर्य) होनेसे अर्यमा कहलाता है।
संरक्षिता च भूतानां सविता तेन स स्मृतः ।
भगसंज्ञा धनस्योक्ता स ददाति ततो भगः ॥ ९.९१ ॥
भूतोंकी रक्षा करनेवाला है, इसलिए (वह) सविता कहा गया है; धनका नाम भग है, (और) वह (धन) देता है, इसलिए भग है।
विश्वेषां कर्मणां कर्ता विश्वकर्मा ततः स्मृतः ।
करैर्भासयते विश्वं भास्करस्तेन चोच्यते ॥ ९.९२ ॥
सब कर्मोंका कर्ता है, इसलिए विश्वकर्मा कहा गया है; किरणोंसे विश्वको भासित करता है, इसलिए भास्कर कहलाता है।
पाठभेद — (पृ. १०७, पं. २) इ.; विश्वं करोति कर्माणि आ.
पुष्णाति हि जगत् सर्वं पूषा तेन निगद्यते ।
अंशुभिर्व्याप्यते विश्वमंशुस्तेन उदाहृतः ॥ ९.९३ ॥
सारे जगत्का पोषण करता है, इसलिए पूषा कहलाता है; अंशुओं (किरणों) से विश्व व्याप्त होता है, इसलिए अंशु कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. १०७, पं. ४) पुष्णात्याप्याति जगत्सर्वं आ.
निमेषादि क्षणः कालस्तस्मादुत्पद्यते यदा(तः) ।
कालकर्ता ततो ज्ञेयः कालाख्यो विष्णुरव्ययः ॥ ९.९४ ॥
निमेष आदि क्षणरूप काल उससे उत्पन्न होता है, इसलिए (उसे) कालका कर्ता जानना चाहिए — अविनाशी विष्णु, जिसका नाम काल है।
सहस्रच्छिद्रसंकीर्णे आपो रेतोमया घटे ।
हिरण्मयेऽन्तरे तिष्ठन् रविस्तेन निगद्यते ॥ ९.९५ ॥
हजार छिद्रोंसे भरे घटमें वीर्यमय जल (है); (उसके) सुवर्णमय भीतरी भागमें रहता है, इसलिए (वह) रवि कहलाता है।
पाठभेद — (पृ. १०७, पं. ८) सहस्रछिद्र आ.
नाडीविशेषास्तेन ब्रह्मविद्गमनं च
इडासुषुम्णे द्वे नाड्यौ रश्मिसंज्ञे व्यवस्थिते ।
पाचिकाप्यायिके ह्येते अग्नीषोमात्मके स्मृते ॥ ९.९६ ॥
इडा और सुषुम्णा — दो नाडियाँ किरण नामसे स्थित हैं; ये पचानेवाली और तृप्त करनेवाली हैं, अग्नि-सोमरूप कही गयी हैं।
पाठभेद — (पृ. १०७, पं. १०) आप्यायनाचके ह्येते इ.
एतौ तु पार्श्वगौ ज्ञेयौ पन्थानौ ह्यग्निहोत्रिणाम् ।
देवपित्रात्मकौ ह्येतौ शाश्वतौ जगतः समौ ॥ ९.९७ ॥
इन दोनोंको (मध्यके) पार्श्ववर्ती, अग्निहोत्रियोंके दो मार्ग जानना चाहिए; ये देवता और पितरोंवाले, जगत्के लिए समान रूपसे सनातन हैं।
तयोर्मध्ये अमा ह्येषा यत्र संतिष्ठते शशी ।
कलावशिष्टो भूयोऽपि वृद्धिं गच्छति भास्करात् ॥ ९.९८ ॥
उन दोनोंके बीच यह अमा (अमावस्या-कला) है, जहाँ चन्द्रमा स्थित रहता है; कलामात्र शेष रहकर (वह) सूर्यसे फिर वृद्धिको प्राप्त होता है।
पाठभेद — (पृ. १०७, पं. १४) संतिष्ठते आ.
तत्र तत् परमं धाम उदधेरिव निःसृतम् ।
यस्मिंल्लवणवद्योगी विशत्येवैकतां गतः ॥ ९.९९ ॥
वहाँ वह परम धाम है, समुद्रसे (अमृत) निकला हो जैसे; जिसमें योगी नमककी भाँति (घुलकर) एकत्वको प्राप्त होकर प्रवेश करता है।
सा सूर्ये चैव हृदये परे ब्रह्मणि संस्थिता ।
तया गच्छन्ति विद्वांसो ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ ९.१०० ॥
वह (नाडी) सूर्यमें, हृदयमें और परब्रह्ममें स्थित है; उसके द्वारा ब्रह्मवेत्ता विद्वान् ब्रह्मको जाते हैं।
श्रद्धायुक्ता ये ह्युपासन्ते अरण्ये
शान्ता विद्वांसो ब्रह्मचर्यं चरन्ति ।
ते सूर्यस्य द्वारेण विरजाः प्रयान्ति
यत्रासौ तिष्ठति पुरुषोऽव्ययात्मा ॥ ९.१०१ ॥
(मुण्डक १.२.११:) जो श्रद्धायुक्त, शान्त विद्वान् वनमें उपासना करते हैं, ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, वे निर्मल होकर सूर्यके द्वारसे वहाँ जाते हैं, जहाँ वह अविनाशी पुरुष स्थित है।
पाठभेद — (पृ. १०८, पं. १) तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये मुण्डक. १.२.११
(पृ. १०८, पं. २) विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः मुण्डक. १.२.११
(पृ. १०८, पं. ३) सूर्यद्वारेण ते विरजाः मुण्डक. १.२.११
(पृ. १०८, पं. ४) यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा मुण्डक १.२.११
हंसपदनिर्वचनम्
हन्त्यज्ञानं ततो हंस अश्रान्तपरिवर्तनात् ।
एवं पर्यायशब्दैस्तु एक एव निगद्यते ॥ ९.१०२ ॥
अथक परिक्रमणसे अज्ञानको नष्ट करता (हन्ति) है, इसलिए हंस (कहलाता है)। इस प्रकार पर्याय शब्दोंसे एक ही कहा जाता है।
सूर्यस्य वेदमयत्वम्
ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तु बिम्बं यस्य त्रयीमयम् ।
ऋग्भिस्तु तपते प्रातर्मध्याह्ने यजुभिस्तथा ॥ ९.१०३ ॥
जिसका बिम्ब ऋक्-यजुः-साममय, त्रयीमय है — वह प्रातः ऋचाओंसे तपता है, मध्याह्नमें यजुओंसे,
सामभिश्चापराह्णे वै अथर्वाङ्गिरसो निशि ।
ऋचोऽस्य मण्डलं ह्येतत् सामान्यर्चींषि यानि तु ॥ ९.१०४ ॥
अपराह्णमें सामोंसे, और रात्रिमें अथर्वाङ्गिरस (मन्त्रों) से। ऋचाएँ इसका मण्डल हैं, और साम (इसकी) ज्वालाएँ (अर्चियाँ) —
पाठभेद — (पृ. १०८, पं. १०–११) यजूंषि मण्डले गुह्य सामान्यर्चींषि यानि तु इ.
सूर्यमण्डलस्थपुरुषस्वरूपम्
यजुः शुक्ला च गुह्या च तनुः सूक्ष्मा च मण्डले ।
यश्च मण्डलमध्यस्थो यं च वेत्थ हुताशने ॥ ९.१०५ ॥
— यजुः (उस) मण्डलमें शुक्ल, गुह्य और सूक्ष्म शरीर है; और जो मण्डलके बीचमें स्थित है, जिसे तुम अग्निमें (भी) जानते हो —
पाठभेद — (पृ. १०८, पं. १०–११) यजूंषि मण्डले गुह्य सामान्यर्चींषि यानि तु इ.
(पृ. १०८, पं. १२) यजूंषि शुक्लगुह्यानि तनुः सूक्ष्मा तु मण्डले इ.
पुरुषं मण्डलान्तस्थं दीप्तिमन्तं हिरण्मयम् ।
ज्वालासहस्रसंकीर्णमग्निरूपं समन्ततः ॥ ९.१०६ ॥
— (उस) मण्डलके भीतर स्थित, दीप्तिमान, सुवर्णमय, हजारों ज्वालाओंसे भरे, सब ओर अग्निरूप पुरुष (का ध्यान करे)।
स सूर्ये ज्योतिरित्युक्तं बहिस्तेजो विनिर्गतम् ।
पुरुषान्तर्गतं सूक्ष्मं शुक्लाच्छुक्लतरं हि तत् ॥ ९.१०७ ॥
"सूर्यो ज्योतिः" — यह (मन्त्र) बाहर निकले तेजको कहता है; पुरुषके भीतर स्थित सूक्ष्म (तेज) शुक्लसे भी शुक्लतर है।
भूर्भुवः स्वरिति यः सूर्ये ज्योतिरितीति च ।
अग्निहो(हो)त्रतनुर्ह्येष पुरुषाकृतिमण्डले ॥ ९.१०८ ॥
सूर्यमें जो "भूः भुवः स्वः" और "(सूर्यो) ज्योतिः" है — यही पुरुषाकार मण्डलमें अग्निहोत्रका शरीर है।
ओमापो ज्योतिरित्येतद्यजुश्चात्र प्रतिष्ठितम् ।
अष्टपादं शुभं हंस(सं) त्रिमात्रमजमव्ययम् ॥ ९.१०९ ॥
"ओमापो ज्योतिः…" — यह यजुः भी यहाँ प्रतिष्ठित है; (वह) आठ पादोंवाला, शुभ, हंस, त्रिमात्र, अजन्मा, अविनाशी है।
त्रिरात्मानं तैजसं च सर्वं पश्येत्तमव्ययम् ।
तस्य यद्धृदयावस्थं ज्योतिः सूर्यः स उच्यते ॥ ९.११० ॥
उस अविनाशी, तीन रूपोंवाले, तैजस (आत्मा) को सर्वत्र देखे; उसका जो हृदयमें स्थित ज्योति है, वह सूर्य कहलाता है।
शुक्लं तत् पुरुषं ज्ञेयमलिङ्गं ज्योतिरूपकम् ।
सत्यधर्माण(णं)भर्गं तु ईश्वरं विष्णुसंज्ञकम् ॥ ९.१११ ॥
उस शुक्ल पुरुषको जानना चाहिए — अलिङ्ग, ज्योतिरूप, सत्यधर्मा भर्ग, विष्णु नामवाला ईश्वर।
अग्निस्थपुरुषस्वरूपम्
तस्मिन् प्रतिष्ठितं सर्वं त्रयस्त्रिंशद्गुणं हि तत् ।
अग्निमध्यगतं चैव अग्नौ ज्योतिरुदाहृतम् ॥ ९.११२ ॥
उसमें सब प्रतिष्ठित है; वह तैंतीस गुना (तैंतीस देवोंवाला) है; वह अग्निके मध्यमें भी स्थित है — अग्निमें (वही) ज्योति कहा गया है।
अग्नावग्निः स एवोक्तस्तस्य चैवात्र हूयते ।
अग्निहोत्रे च संप्राप्ते चिन्तयेच्चैकमानसम् ॥ ९.११३ ॥
वही अग्निमें अग्नि कहा गया है, और उसीके लिए यहाँ हवन किया जाता है। अग्निहोत्रका समय आनेपर एकाग्र मनसे (उसका) चिन्तन करे —
पाठभेद — (पृ. १०९, पं. ११) ...च्चैक मानसः इ.
लेलिह्यमानं संदीप्तं निर्धूमं पावकः(कं) सदा ।
ज्योतिश्चित्रतरं ह्येतत्तद्ब्राह्मं वह्निसंज्ञकम् ॥ ९.११४ ॥
— लपलपाते, प्रज्वलित, सदा धुएँरहित अग्निका; यह (अग्नि) अत्यन्त चित्र-विचित्र ज्योति है — वह ब्राह्म (तेज) है, जिसका नाम वह्नि है।
पाठभेद — (पृ. १०९, पं. १२) पावकस्तथा इ.
तदाऽस्य मध्यगं ध्यायेत् पुरुषं चाप्यलिङ्गकम् ।
स सत्यज्योतिर्ब्रह्मा च आदित्यश्च निगद्यते ॥ ९.११५ ॥
तब उसके (अग्नि के) मध्य में स्थित उस अलिङ्गक (बिना लिंग वाले) पुरुष का ध्यान करना चाहिए; वह सत्यज्योति रूपी ब्रह्म और आदित्य कहा जाता है।
विद्वदग्निहोमविधिः
ब्रह्मभूतं हि संचिन्त्य जुहुयात् सुसमाहितः ।
अवमृज्य ततो हस्तावाद्भिरामणिबन्धनात् ॥ ९.११६ ॥
(उसे) ब्रह्मरूप चिन्तन करके भली-भाँति समाहित होकर हवन करे; उसके बाद कलाईतक हाथोंको जलसे धोकर —
दीर्घं प्रणवमुच्चार्य चित्तं तत्र निवेश्य च ।
यजुषा मनसा चैव जुहुयाद्विधिवद् बुधः ॥ ९.११७ ॥
दीर्घ प्रणव (ओंकार) का उच्चारण करके और चित्त को उसमें निवेशित करके; बुद्धिमान पुरुष विधि के अनुसार यजुष से और मन से ही हवन करे।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ ९.११८ ॥
(गीता ४.२४:) अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्निमें ब्रह्मने (ही) आहुति दी है; ब्रह्मकर्ममें समाधि रखनेवालेको ब्रह्म ही प्राप्त होना है।
पाठभेद — (पृ. १०९, पं. २०) गीता ४.२४
ज्योतिषां ज्योतिरित्याहुः सत्यं सत्येषु चैव हि ।
ब्रह्मणः परमं ब्रह्म आदित्यादित्य एव हि ॥ ९.११९ ॥
(उसे) ज्योतियोंकी ज्योति कहते हैं, सत्योंका सत्य; ब्रह्मासे परे परम ब्रह्म, आदित्योंका आदित्य।
तादृशाग्निहोत्रफलम्
एवं यः कुरुते विप्रः अग्निहोत्रमतन्द्रितः ।
शासितं ज्ञानकर्मभ्यामभिसंध्य फलेन च ॥ ९.१२० ॥
इस प्रकार जो विप्र आलस्यरहित होकर ज्ञान और कर्मसे शासित, (और) फलकी अभिसन्धि (कामना) सहित अग्निहोत्र करता है —
स दग्धकिल्बिषो भूत्वा वैश्वानरसमप्रभः ।
विशते पुरुषं दिव्यं शुक्लीभूत्वा ह्यलिङ्गकम् ॥ ९.१२१ ॥
— वह पापोंको जलाकर, वैश्वानर (अग्नि) के समान प्रभावाला होकर, शुक्ल (शुद्ध) होकर अलिङ्ग दिव्य पुरुषमें प्रवेश करता है।
अणिमाद्यैस्तु संयुक्तस्तेनैव सह मोदते ।
न च्यवते न व्यथते पुनर्वा जायते न च ॥ ९.१२२ ॥
वह अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त होकर उसी के साथ आनंद करता है, न वह विचलित होता है न व्याकुल होता है, और न ही पुनर्जन्म लेता है।
एवंविधं चिन्तयेत्तु आत्मयज्ञे ह्युपस्थिते ।
जीवं वैश्वानरं ध्यायेद्धृदये पद्मसंपुटे ॥ ९.१२३ ॥
आत्मयज्ञका (समय) उपस्थित होनेपर इस प्रकार चिन्तन करे; और हृदयकमलके सम्पुटमें वैश्वानर जीवका ध्यान करे।
उदरे गार्हपत्योऽग्निः पृष्ठदेशे तु दक्षिणः ।
आस्ये आहवनीयोऽग्निस्त्रिधा ह्येवं निवेशयेत् ॥ ९.१२४ ॥
उदरमें गार्हपत्य अग्नि, पीठमें दक्षिणाग्नि, और मुखमें आहवनीय अग्नि — इस प्रकार तीन रूपोंमें (उसे) स्थापित करे।
शून्योऽग्निः सत्यसंज्ञस्तु मूर्धन्येवाश्रितः सदा ।
यः पञ्चाग्नीनिमान् वेद आहिताग्निः स उच्यते ॥ ९.१२५ ॥
शून्य (आकाशरूप) अग्नि, जिसका नाम सत्य है, सदा मूर्धामें ही स्थित है; जो इन पाँच अग्नियोंको जानता है, वह आहिताग्नि कहलाता है।
पाठभेद — (पृ. ११०, पं. १४) मूर्धन्ये ...आ.
योगमार्गेणात्मोपासनम्
केशबर्हि(ः)समाच्छन्नमुरोवेद्यां प्रतिष्ठितम् ।
चेतोत्माधाममात्रं तु निर्भासं चात्मभासकम् ॥ ९.१२६ ॥
केशरूपी कुशोंसे ढकी, वक्षरूपी वेदीपर प्रतिष्ठित, चेतनात्माका धाममात्र, प्रकाशमान और आत्माको भासित करनेवाला (ज्योति) —
पाठभेद — (पृ. ११०, पं. १७) लोमबर्हि... इ.
एतद्धि सोममध्यस्थममृतं ज्योतिरूपकम् ।
हृदिस्थः सर्वभूतानां चेतनः श्रूयते ह्यसौ ॥ ९.१२७ ॥
— यही सोमके बीच स्थित अमृत, ज्योतिरूप है; यह सब भूतोंके हृदयमें स्थित चेतन (आत्मा) सुना जाता है।
पञ्चमण्डलमध्यस्थो द्रष्टव्यो योगचक्षुषा ।
रविमध्ये स्थितः सोमः सोममध्ये हुताशनः ॥ ९.१२८ ॥
पाँच मण्डलोंके बीच स्थित (उसे) योगदृष्टिसे देखना चाहिए; सूर्यके बीच चन्द्रमा स्थित है, चन्द्रमाके बीच अग्नि,
तेजोमध्ये स्थितः सत्यः सत्यमध्ये स्थितोऽच्युतः ।
अग्निमध्ये रविस्थानं रविमध्ये च चन्द्रमाः ॥ ९.१२९ ॥
तेजके बीच सत्य स्थित है, सत्यके बीच अच्युत; अग्निके बीच सूर्यका स्थान, और सूर्यके बीच चन्द्रमा।
पाठभेद — (पृ. १११, पं. २) स्थितोऽव्ययः इ.
तस्य मध्येंकुसं(?) विद्यात्ततः सृष्टिः प्रजायते ।
सूर्यं भित्त्वा यथा चन्द्रश्चन्द्रमाश्च तथामृतम् ॥ ९.१३० ॥
उसके बीच अंकुश (?) जाने, उससे सृष्टि होती है; जैसे सूर्यको भेदकर चन्द्रमा, वैसे ही चन्द्रमा (को भेदकर) अमृत —
तन्स्थं (?) च शुभं वर्णं तद्दृष्ट्वाप्यमृती भवेत् ।
अन्नं प्राणो मनश्चैव विज्ञानानन्द एव च ॥ ९.१३१ ॥
— और वहाँ स्थित शुभ वर्ण(रूप) — उसे देखकर भी (मनुष्य) अमर हो जाता है। अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द भी (पाँच मण्डल हैं) —
प्राणो व्यानो ह्यपानश्च समानोदान एव च ।
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमम् ॥ ९.१३२ ॥
प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान भी; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध —
पञ्चमध्यगतः षष्ठो भुङ्क्ते देहगतान् गुणान् ॥ ९.१३३ ॥
पाँचों के मध्य में स्थित छठा (तत्व) देहगत गुणों का भोग करता है।
पाठभेद — (पृ. १११, पं. १०) देहस्थितो गुणान् इ.
पुरुषस्वरूपम्
शब्दादीनां च पञ्चानामुपलब्धिस्तु या स्थिता ।
चेतसा यस्तु गृह्णाति बुद्ध्यवस्थितमीश्वरम् ॥ ९.१३४ ॥
शब्द आदि पाँचोंकी जो उपलब्धि (ज्ञान) स्थित है, (उसे) जो चित्तसे ग्रहण करता है — बुद्धिमें स्थित ईश्वर —
पुरुषाख्यः स विज्ञेयो भोक्तृभावः स उच्यते ।
अव्यक्तेन च रूपेण वैश्वानरमुखेन च ॥ ९.१३५ ॥
— उसे पुरुष नामवाला जानना चाहिए, वह भोक्ताभाव कहलाता है; और अव्यक्तरूपसे, वैश्वानरमुखसे (भी) —
सर्वं परमात्मनो भोगाय
अन्नं रसमयं कृत्स्नं प्रकृत्याऽऽपादितं च यत् ॥
सर्वं प्रत्युपभोगार्थं वर्तते परमात्मनः ॥ ९.१३६ ॥
प्रकृतिसे उत्पन्न जो सारा रसमय अन्न है, वह सब परमात्माके उपभोगके लिए है।
त्रिविधान्ननिरूपणम्
त्रिविधान्नं त्रिधा भोक्ता वेदितव्यं प्रयत्नतः ।
शरीरमापः सोमश्च त्रिविधं ह्यन्नमुच्यते ॥ ९.१३७ ॥
तीन प्रकारका अन्न और तीन प्रकारका भोक्ता प्रयत्नसे जानना चाहिए; शरीर, जल और सोम — (ये) तीन प्रकारका अन्न कहा जाता है;
त्रिभोक्ता
प्राणस्त्वग्निस्तथाऽऽदित्यस्त्रिभोक्ता एवमेव तत् ।
अमृतं कल्पयित्वा च यदन्नं समुपागतम् ॥ ९.१३८ ॥
प्राण, अग्नि और आदित्य — इस प्रकार (ये) तीन भोक्ता हैं। जो अन्न प्राप्त हुआ है, उसे अमृत मानकर —
प्राणाग्निहोत्रविधिः
प्राणाग्निहोत्रविधिना भोज्यं तद्वदघापहम् ।
महाव्याहृतिभिश्चैवमभिमन्त्र्य पुनस्ततः ॥ ९.१३९ ॥
— प्राणाग्निहोत्रकी विधिसे खाना चाहिए; उस प्रकार (वह) पापनाशक है। और महाव्याहृतियोंसे (उसे) अभिमन्त्रित करके, फिर —
पाठभेद — (पृ. ११२, पं. १) प्राणाग्निहोत्रविधिना भोज्यं अन्नं तच्च अघापहम् इ.
उच्छिष्टमिष्टोपहतमित्यनेनाभिमन्त्रयेत् ।
आपोशानं(न)क्रियापूर्वं जुहुयाद्वायवे हविः ॥ ९.१४० ॥
— "उच्छिष्टमिष्टोपहतम्…" — इस (मन्त्र) से अभिमन्त्रित करे; आपोशान (आचमन-जल पीने) की क्रिया पहले करके (प्राण) वायुको हवि दे —
प्राणो व्यानस्तथाऽपानः समानोदान एव च ।
ओंकारपूर्वाःस्वाहान्ताः पञ्च दद्यात्तथाऽऽहुतीः ॥ ९.१४१ ॥
— प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान — (इनको) ओंकारसे आरम्भ और "स्वाहा" से अन्त होनेवाली पाँच आहुतियाँ दे।
पाठभेद — (पृ. ११२, पं. ६) स्वाहान्तैः इ.
वाग्यतः शेषमश्नीयाद्भुक्त्वाऽऽचम्य पुनः पुनः ।
प्राणोऽग्निर्विश्व इत्याभ्यां प्रत्याहारं विचिन्तयेत् ॥ ९.१४२ ॥
(फिर) मौन रहकर शेष (अन्न) खाये; खाकर बार-बार आचमन करे; और "प्राणोऽग्निः…" तथा "विश्वः…" — इन दो (मन्त्रों) से (प्राणोंमें) प्रत्याहारका चिन्तन करे —
पाठभेद — (पृ. ११२, पं. ७) इ.; वाग्यज्ञः आ.
(पृ. ११२, पं. ८) प्राणोऽग्नि विश्वोसीति च द्वाभ्यामात्मानमभिध्यायेत् मैआ. ६.९
ओं प्राणोऽग्निपरात्मानं पञ्चवायुभिरावृतः ।
स ईशः सर्वजगतः प्राणः प्रीणाति विश्वभृत् ॥ ९.१४३ ॥
"ॐ — पाँच वायुओंसे घिरा प्राणाग्नि परमात्मा है; वह सारे जगत्का ईश, विश्वका भरण करनेवाला प्राण (सबको) तृप्त करता है।"
पाठभेद — (पृ. ११२, पं. ९) प्राणोऽग्निः परमात्मा पञ्च...इ.; प्राणोऽग्निः परमात्मा पञ्चवायु...प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् १.१२; प्राणोऽग्निः परमात्मा वै पञ्चवायुः समाश्रितः मैआ. ६.९
(पृ. ११२, पं. १०) स प्रीतः प्रीणातु विश्वं विश्वभुक् मैआ. ६.९
विश्वोसि वैश्वानर विश्वरूप त्वं विश्वमाधारयसि याजमानः ।
विश्वं च पीत्वाहुतयश्च यत्र प्रादेशमात्रः पुरुषः स्मृतस्तु सः ॥ ९.१४४ ॥
"हे वैश्वानर! तुम विश्व हो, विश्वरूप हो; तुम यजमान बनकर विश्वको धारण करते हो" — और जहाँ विश्व और आहुतियाँ पी जाती हैं, वह प्रादेशमात्र (बित्ताभर) पुरुष कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. ११२, पं. ११–१२) विश्वोसि वैश्वानरो विश्वरूपं त्वया धार्यते जायमानम् प्राणाग्निहोत्रोप. २; विश्वोसि वैश्वानरोऽसि विश्वं त्वया धार्यते जायमानम् मैआ. ६.९
(पृ. ११२, पं. १३–१४) विशन्तु त्वामाहुतयश्च सर्वाः प्रजास्तत्र यत्र विश्वामृतोऽसि मैआ. ६.९
एषा विश्वभृतीनां तनुर्विष्णोः सनातनी ।
अन्नरूपेण विज्ञेया ययेदं धार्यते जगत् ॥ ९.१४५ ॥
विश्वका भरण करनेवालोंमें विष्णुका यह सनातन शरीर अन्नरूपसे जानना चाहिए, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।
अन्नकामेन संसृष्टं ब्रह्मणा चाखिलं जगत् ।
तस्मादन्नात् परं तत्त्वं न भूतं न भविष्यति ॥ ९.१४६ ॥
ब्रह्माने अन्नकी कामनासे सारा जगत् रचा; इसलिए अन्नसे बढ़कर (कोई) तत्त्व न हुआ है, न होगा।
अन्नार्थी पवते वायुरन्नार्थी ज्वलतेऽनलः ।
अन्नार्थी चाप्ययं सूर्यो रसान् गृह्णाति रश्मिभिः ॥ ९.१४७ ॥
अन्नके लिए वायु बहता है, अन्नके लिए अग्नि जलती है, और अन्नके लिए ही यह सूर्य किरणोंसे रसोंको ग्रहण करता है।
यथा हि क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।
एवं सर्वाणि भूतानि आत्मयज्ञ(न्यन्न)मुपासते ॥ ९.१४८ ॥
जैसे भूखे बालक माताके चारों ओर बैठते हैं, वैसे ही सब भूत अन्नकी उपासना करते हैं।
पाठभेद — (पृ. ११३, पं. ५–६) यथेह...एवं...भूतान्यग्निहोत्रमुपासते छा. उ. ५.२४.५; बृ. स्मृ. ८
अविद्वद्भोजने दोषः
यो ह्यविद्वान् समश्नाति अन्नं मोहसमन्वितः ।
भस्मनीव हुतं हव्यं तद्वदन्नममन्त्रकम् ॥ ९.१४९ ॥
जो अज्ञानी मोहसे युक्त होकर अन्न खाता है — मन्त्ररहित वह अन्न राखमें डाली गयी आहुतिके समान (व्यर्थ) है।
विद्वद्भोजनफलम्
एवं ज्ञात्वा तु यो विप्रो विधिनान्नं समश्नुते ।
आत्मानं च तथान्नं च दातारं चैव तारयेत् ॥ ९.१५० ॥
इस प्रकार जानकर जो विप्र विधिसे अन्न खाता है, वह अपनेको, अन्नको और दाताको भी तार देता है;
तर्पितं च भवेत्तेन विश्वं भुवनसप्तकम् ।
दैव्ये पित्र्ये च यद्दत्तं तदक्षय्यं भवत्यपि ॥ ९.१५१ ॥
उससे सम्पूर्ण विश्व और सप्त भुवन तृप्त हो जाते हैं; देवताओं और पितरों को जो दिया गया है, वह भी अक्षय हो जाता है...
परमेश्वरस्य सर्वव्यापित्वम्
एवं हि सर्वभावस्थं विदित्वा परमेश्वरम् ।
काष्ठादौ हि तृणान्ते च पाषाणान्तर्गतेऽपि च ॥ ९.१५२ ॥
इस प्रकार सब भावोंमें स्थित परमेश्वरको जानकर — (वह) काठ आदिसे लेकर तिनकेतक और पत्थरके भीतर भी —
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तमेवं व्याप्य स तिष्ठति ।
पाषाणमणिधातूनां तेजोरूपेण संस्थितः ॥ ९.१५३ ॥
— ब्रह्मासे लेकर तृण-स्तम्बतक इस प्रकार व्याप्त होकर स्थित है; पत्थर, मणि और धातुओंमें तेजरूपसे स्थित है;
वृक्षौषधितृणानां च रसरूपेण तिष्ठति ।
तन्मात्रभूतो भूतानां विश्वरूपेण संस्थितः ॥ ९.१५४ ॥
वृक्षों, ओषधियों और तृणोंमें रसरूपसे रहता है; भूतोंका तन्मात्रारूप होकर विश्वरूपसे स्थित है।
आत्मोपासनफलम्
एवं वेत्ति य आत्मानमेकधा संप्रतिष्ठितम् ।
ज्ञात्वा चोपासते सम्यक् सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ९.१५५ ॥
जो इस प्रकार एकरूपसे प्रतिष्ठित आत्माको जानता है और जानकर भली-भाँति उपासना करता है, वह अमृतत्वके योग्य होता है।
पञ्चधा व्यवस्थित आत्मा
आदित्ये हृदये चैवमग्नौ व्योम्नि तथा परे ।
एक एव भवेदात्मा पञ्चधाऽवस्थितस्तु सः ॥ ९.१५६ ॥
आदित्यमें, हृदयमें, अग्निमें, व्योममें और परम (धाम) में — एक ही आत्मा पाँच प्रकारसे स्थित है।
उपनिषत्प्रतिपादिताऽऽत्मोपासना
आदित्ये चैव हृदये चैकीभूतं विचिन्तयेत् ।
सर्वोपनिषदां चैव उपास्त्यैषा उदाहृता ॥ ९.१५७ ॥
आदित्य और हृदयमें (उसे) एक हुआ चिन्तन करे; सब उपनिषदोंकी यही उपासना कही गयी है —
आदित्यो ब्रह्म इत्येतन्मित्राद्युपनिषत्सु च ।
छान्दोग्ये बृहदारण्ये तैत्तिरीये तथैव च ॥ ९.१५८ ॥
— "आदित्यो ब्रह्म" — यह (उपासना) मैत्री आदि उपनिषदोंमें, छान्दोग्यमें, बृहदारण्यकमें और तैत्तिरीयमें भी है।
पाठभेद — (पृ. ११४, पं. ४) छन्दोगे इ.
तत्र मनोरनुमतिः · आदित्यमहिमा
एतदेव मनुप्रोक्तं देवानां चोपजीवनम् ।
पार्श्वे बाह्ये तथा पृष्ठे द्यौरस्य परिकल्पिता ॥ ९.१५९ ॥
यही मनुने कहा है, और (यही) देवताओंकी जीविका है। (उस सूर्यरूप मधुकोशकी) बगलमें, बाहर और पीठपर द्युलोक कल्पित है;
अन्तरिक्षमधश्चैव पुत्राश्चास्य मरीचयः ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः ॥ ९.१६० ॥
नीचे अन्तरिक्ष है, और किरणें इसके पुत्र (मधुमक्खियोंके अंडे) हैं; ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद,
कल्पभाष्यपुराणानि उपवेदास्तथैव च ।
गुह्योपनिषदश्चैव पुपुष्पाणि (पुष्फुसाः) परिकीर्तिताः ॥ ९.१६१ ॥
कल्प, भाष्य, पुराण और उपवेद, तथा गुह्य उपनिषदें — (इसके) फूल कहे गये हैं।
ऋचो यजूंषि सामानि मधून्येतानि कुर्वते ।
तद्वेदैः संभृतं दिव्यं रसं तदमृतं मधु ॥ ९.१६२ ॥
ऋचाएँ, यजुः और साम — ये (मधुमक्खियोंकी भाँति) मधु बनाते हैं; वेदोंसे संचित वह दिव्य रस — वह अमृत है, मधु है।
वसवश्च तथा रुद्रा मरुतोऽङ्गिरसादयः ।
पूर्वादिदिग्विभागेन स्वकीयैः सवनैः स्थिताः ॥ ९.१६३ ॥
वसु, रुद्र, मरुत् और अङ्गिरस् आदि पूर्व आदि दिशाओंके विभागसे अपने-अपने सवनोंमें स्थित हैं —
मुखमेकं समालोक्य रथनीडे स्थिता विभोः ।
तृप्तिं समधिगच्छन्ति नाश्नन्ति न पिबन्ति च ॥ ९.१६४ ॥
— (वे) प्रभुके रथ-नीड (घोंसले) में स्थित होकर उस एक मुखको देखकर ही तृप्ति पाते हैं; न खाते हैं, न पीते हैं;
नीडमध्यगतं सूर्यं न च पश्यन्ति चक्षुषा ॥ ९.१६५ ॥
(पर) नीडके बीच स्थित सूर्यको (वे) आँखसे नहीं देखते —
अर्चींषि केवलान्येव उच्चरन्ति मुहुर्मुहुः ।
संर(ल)क्षयन्ति कुहरे नीडान्तःस्थं घटोपमम् ॥ ९.१६६ ॥
— केवल किरणें ही बार-बार ऊपर उठती हैं; (वे) गुहामें, नीडके भीतर स्थित घटके समान (उस सूर्यकी) रक्षा करते हैं।
हृद्याकाशगतो यो हि पद्मसंपुटमध्यगः ।
अनन्ता रश्मयस्तस्य दीपवद्यो स्थितो हृदि ॥ ९.१६७ ॥
जो हृदयाकाशमें, कमलसम्पुटके बीचमें स्थित है, दीपकी भाँति हृदयमें स्थित — उसकी अनन्त किरणें हैं —
मार्गद्वयनिरूपणम्
सिताऽसिताः कद्रुनीलाः कपिलाः पीतलोहिताः ।
ऊर्ध्वमेकः स्थितस्तेषां यो भित्वा सूर्यमण्डलम् ॥ ९.१६८ ॥
— श्वेत, काली, भूरी-नीली, कपिल, पीली और लाल; उनमें एक ऊपरकी ओर स्थित है, जो सूर्यमण्डलको भेदकर —
ब्रह्मलोकमतिक्रम्य ते यान्ति परमां गतिम् ।
यदस्य स्याद्रश्मिशतमूर्ध्वमेव(क?)मवस्थितः ॥ ९.१६९ ॥
— ब्रह्मलोकको पार कर (जाती है); उससे (योगी) परम गतिको जाते हैं। इसकी जो सौ किरणें ऊपरकी ओर ही स्थित हैं —
तेन देवनिकायानां स्वधामानि प्रपद्यते ।
ये चैकरूपाश्चाधस्ताद्रश्मयोऽस्य मृदुप्रभाः ॥ ९.१७० ॥
— उनसे (साधक) देवसमूहोंके अपने-अपने धामोंको पाता है; और जो एकरूप, मन्द प्रभावाली किरणें इसकी नीचेकी ओर हैं —
इह कर्मप्रभोगाय तैः संसरति सोऽवशः ।
एतद्यो न विजानाति मार्गद्वितयमात्मनः ॥ ९.१७१ ॥
— उनसे वह विवश होकर यहाँ कर्मफल भोगनेके लिए संसारमें घूमता है। जो आत्माके इन दो मार्गोंको नहीं जानता —
देहस्थशिराजालवर्णनम्
दंदशूकः पतङ्गो वा भवेत् कीटोऽथवा क्रिमिः ।
अलाबुतन्तुसदृशं शिराजालं तु संततम् ॥ ९.१७२ ॥
— वह साँप, पतंगा, कीड़ा या कृमि होता है। लौकीके तन्तुओं जैसा शिराओंका जाल फैला है —
देहे आत्मस्थानम्
सपद्मसंपुटं चित्रं छादितं कर्णिकोज्ज्वलम् ।
तस्य मध्यगतो ह्यात्मा रश्मिभिः परिवारितः ॥ ९.१७३ ॥
— (उससे) ढका, विचित्र, कर्णिकासे उज्ज्वल कमलसम्पुट है; उसके बीच किरणोंसे घिरा आत्मा स्थित है —
आत्मपरिमाणं स्वरूपं च
प्रदीपतापप्रकाश्यै(शै)रवाप्नोति न चान्तरम् ।
अङ्गुष्ठपरिमाणं च ज्वलते स्वेन तेजसा ॥ ९.१७४ ॥
— (वह) दीपके ताप और प्रकाशवाली (किरणों) से (बाहरको) पाता है, पर भीतरको नहीं; अँगूठेके बराबर, अपने तेजसे जलता है;
प्रादेशमात्रं तपते वितस्तिं च प्रकाशते ।
तत्प्रदेशस्थितो ह्यात्मा चेतनः सर्वतो विभुः ॥ ९.१७५ ॥
प्रादेशमात्र (बित्ताभर) तपता है, और वितस्तिभर प्रकाशित होता है; उस स्थानमें स्थित आत्मा चेतन है, सब ओर व्यापक है।
तत्त्वानि तत्र वै देवे तिष्ठन्त्यत्र समन्ततः ।
आप्यायन्ते च तेनैव दर्शनान्नात्र संशयः ॥ ९.१७६ ॥
उस देवमें सब तत्त्व चारों ओर स्थित हैं, और उसीसे तृप्त होते हैं — (यह) दर्शनसे (सिद्ध है), इसमें संशय नहीं।
पाठभेद — (पृ. ११५, पं. १७) तिष्ठन्तेऽत्र आ.; तत्त्वानि तत्र वेदे वा तिष्ठन्ति तु समन्ततः इ.
(पृ. ११५, पं. १८) आप्यायनं हि तेनैव दर्शनेनात्र संशयः इ.
आत्मचिन्तनफलम्
न च पश्यन्ति पुरुषं ह्यन्तस्थं परमं विभुम् ।
तं चिन्तयेत् समाधिस्थो यं ज्ञात्वा विप्रमुच्यते ॥ ९.१७७ ॥
(पर वे) भीतर स्थित परम व्यापक पुरुषको नहीं देखते। समाधिमें स्थित होकर उसका चिन्तन करे, जिसे जानकर (मनुष्य) मुक्त हो जाता है।
ध्यानमाहात्म्यम्
मुक्तो न जायते भूयः प्राप्य विष्णोः परं पदम् ।
ध्यानेन सदृशं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् ॥ ९.१७८ ॥
मुक्त होकर, विष्णुके परम पदको पाकर, (वह) फिर जन्म नहीं लेता। पापकर्मोंका ध्यानके समान कोई शोधन नहीं है।
श्वपाकेष्वपि भुञ्जानो ध्यायी नैव तु लिप्यते ।
ध्यानमेव परं ब्रह्म ध्यानमेव परं तपः ॥ ९.१७९ ॥
ध्यान करनेवाला चाण्डालोंके यहाँ भोजन करता हुआ भी लिप्त नहीं होता। ध्यान ही परम ब्रह्म है, ध्यान ही परम तप है;
ध्यानमेव परं शौचं तद्धाम(द्ध्यानं) परमं स्मृतम् ।
सर्वपापप्रसक्तोऽपि ध्यायेन्निमिषमच्युतम् ॥ ९.१८० ॥
ध्यान ही परम शौच है, ध्यान ही परम (धाम) कहा गया है। सब पापोंमें लगा हुआ भी (यदि) पलभर अच्युतका ध्यान करे —
पुनस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावनपावनः ।
ध्यानमेव प्रवक्ष्यामि करणैः क्रियते यथा ॥ ९.१८१ ॥
— (तो) फिर तपस्वी हो जाता है, पंक्तिको पवित्र करनेवालोंको भी पवित्र करनेवाला। अब मैं ध्यान कहूँगा, (वह) करणों (इन्द्रियों-मन) से जैसे किया जाता है।
ध्यानलक्षणम्
बुद्ध्यहंकारमनसां विषयानिन्द्रियाण्यपि ।
एकस्थाननिरोधेन ध्यानमित्यभिधीयते ॥ ९.१८२ ॥
बुद्धि, अहंकार और मन तथा विषयों एवं इन्द्रियों को भी एक ही स्थान पर रोकने से 'ध्यान' कहा जाता है ...
पाठभेद — (पृ. ११६, पं. ८) बुद्ध्यहंकारविषया इन्द्रियाणि मनस्तथा इ.
ध्यानविधिः
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च बुद्धावेव निवेशयेत् ।
मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि प्रकृतावपि ॥ ९.१८३ ॥
इन्द्रियों और इन्द्रियोंके विषयोंको बुद्धिमें ही स्थापित करे; मन, बुद्धि, अहंकार और भूतोंको प्रकृतिमें;
पाठभेद — (पृ. ११६, पं. १०) इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च बहिरेव निवेशयेत् इ.
प्रधानं पुरुषे योज्यं स न्यासः परिकीर्तितः ।
इन्द्रियेभ्यः परे ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः ॥ ९.१८४ ॥
और प्रकृतिको पुरुषमें जोड़े — वह न्यास कहा गया है। (कठ १.३.१०:) इन्द्रियोंसे परे विषय हैं, विषयोंसे परे मन,
पाठभेद — (पृ. ११६, पं. १३) पराह्यर्था कठ. १.३.१०
मनसश्च परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ।
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ॥ ९.१८५ ॥
मनसे परे बुद्धि, बुद्धिसे परे महान् आत्मा; महत्से परे अव्यक्त, अव्यक्तसे परे पुरुष —
पाठभेद — (पृ. ११६, पं. १४) मनसश्च कठ. १.३.१०
(पृ. ११६, पं. १५) कठ. १.३.११
पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ।
ऐशान्यभिमुखो भूत्वा उपविश्याऽऽसने शुभे ॥ ९.१८६ ॥
— पुरुषसे परे कुछ नहीं; वह सीमा है, वह परम गति है। (फिर) ईशान (उत्तर-पूर्व) की ओर मुँह करके, शुभ आसनपर बैठकर —
पाठभेद — (पृ. ११६, पं. १६) कठ. १.३.११
(पृ. ११६, पं. १७) एशान्याभि आ.; ईशान्यभि इ.
नात्युच्छ्रिते नातिनीचे चैलाजिनकुशोत्तरे ।
तत्रोपविश्य सुमु(सु)खं गुरुं चादौ नमस्य च ॥ ९.१८७ ॥
— जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, वस्त्र, मृगचर्म और कुशसे बना हो; वहाँ सुखसे बैठकर, पहले गुरुको नमस्कार करके —
पद्मासनं च बध्वा वै दीर्घं प्रणवमुच्चरेत् ।
ऊरुस्थोत्तानचरणः सव्ये न्यस्येतरं करम् ॥ ९.१८८ ॥
— और पद्मासन बाँधकर दीर्घ प्रणवका उच्चारण करे; जाँघोंपर उत्तान (ऊपर तलवोंवाले) पैर रखकर, बायें (हाथ) पर दूसरा हाथ रखे;
उत्तानं किञ्चिदुन्नाम्य मुखं विष्टभ्य चोरसा ।
निमीलिताक्षः सत्त्वस्थो दन्तैर्दन्तान्न संस्पृशेत् ॥ ९.१८९ ॥
मुँह थोड़ा ऊपर उठाकर, छातीसे (शरीरको) थामे, आँखें मूँदे, सत्त्वमें स्थित होकर, दाँतोंसे दाँतोंको न छुए;
तालुस्थाऽचलजिह्वश्च संवृतास्यः सुनिश्चलः ।
संनियम्येन्द्रियग्रामं पाषाण इव निश्चलः ॥ ९.१९० ॥
जीभ तालुमें अचल स्थित हो, मुख बन्द हो, अत्यन्त निश्चल हो; इन्द्रियसमूहको संयत करके पत्थरकी भाँति अचल (होकर) —
द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्राणायाममुपक्रमेत् ।
ततो ध्येयः स्थितो योऽसौ हृदये दीपवत् प्रभुः ॥ ९.१९१ ॥
— दुगुना या तिगुना प्राणायाम आरम्भ करे; फिर जो प्रभु हृदयमें दीपकी भाँति स्थित है, वह ध्येय है।
धारयेत्तत्र चात्मानं धारणं धारयेद्बुधः ।
मोहजालमपास्याथ पुरुषो दृश्यते हि यः ॥ ९.१९२ ॥
बुद्धिमान् वहाँ आत्माको धारण करे — (यह) धारणा धारण करे; मोहजालको हटाकर तब वह पुरुष दिखायी देता है,
सहस्रकरपन्नेत्रः सूर्यवर्चाः सहस्रधा ।
द्वासप्ततिसहस्राणि हृदयादभिनिःसृताः ॥ ९.१९३ ॥
जो हजारों हाथ-पैर-नेत्रोंवाला, हजारों प्रकारसे सूर्यके समान तेजवाला है। हृदयसे बहत्तर हजार (नाडियाँ) निकली हैं —
हिता नाम हि ता नाड्यस्तासां मध्ये शशिप्रभम् ।
मण्डलं तस्य मध्यस्थ आत्मा दीप इवाचलः ॥ ९.१९४ ॥
— वे हिता नामकी नाडियाँ हैं; उनके बीच चन्द्रमाके समान प्रभावाला मण्डल है, और उसके बीचमें आत्मा दीपकी भाँति अचल स्थित है।
ध्यानफलम् · योगसिद्धिलक्षणानि
स ज्ञेयस्तं विदित्वेह पुनराजायते न तु ।
अन्तर्धानं स्मृतिः कान्तिर्दृष्टिश्रोत्रज्ञता परा ॥ ९.१९५ ॥
उसे जानना चाहिए; उसे यहाँ जानकर (मनुष्य) फिर जन्म नहीं लेता। अन्तर्धान, स्मृति, कान्ति, परम दृष्टि, श्रवण और ज्ञान,
योगेनामृतत्वप्राप्तिः
निजं कायं समुत्सृज्य परकायप्रवेशनम् ।
अर्थानां छन्दतः सृष्टिर्योगसिद्धेस्तु लक्षणम् ॥ ९.१९६ ॥
अपना शरीर छोड़कर दूसरेके शरीरमें प्रवेश, और इच्छानुसार पदार्थोंकी सृष्टि — (ये) योगसिद्धिके लक्षण हैं।
सिद्धे योगे त्यजन् देहममृतत्वाय कल्पते ।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ॥ ९.१९७ ॥
योग सिद्ध होनेपर देह छोड़ता हुआ (योगी) अमृतत्वके योग्य होता है। (गीता १२.१२:) अभ्याससे ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञानसे ध्यान विशिष्ट है;
अभ्यासज्ञानध्यानादिश्रेष्ठत्वपरंपरा
ध्यानात् कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनुत्तमा ।
ध्यानप्रकरणं ह्येतत् षडशीत्यधिकं शतम् ॥ ९.१९८ ॥
ध्यानसे कर्मफलका त्याग, और त्यागसे अनुपम शान्ति (मिलती है)। यह ध्यान-प्रकरण एक सौ छियासी श्लोकोंका है।
पाठभेद — (पृ. ११८, पं. १–२) च्छान्तिरनन्तरम् गीता. १२.१२; इतः परं ‘मार्जनं प्राण...’ इत्यर्धं (१०.१) ध्यानप्रकरणं ह्येतदित्यर्धं (९.१९८) तदनन्तरं ‘योगयाज्ञवल्क्यध्यानप्रकरणं नाम ॥०॥’ इति समाप्तिद्योतकं वाक्यम् इ.
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये अध्यात्मनिर्णयो नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥
पाठभेद — (पृ. ११८, पं. ३–४) इति श्रीयोगयाज्ञवल्क्ये अध्यात्म........आ.
दशमोऽध्यायः — सूर्योपस्थाननिर्णयः
अध्याय-सार — सूर्योपस्थाननिर्णय — बीस श्लोक, जो संध्याको पूरा करते हैं। मार्जन, प्राणायाम और ध्यान कहे जा चुके; अब सूर्यका उपस्थान (१०.१)। प्रतिदिनके अंग हैं: स्नान, मार्जन, प्राणायाम, उपस्थान और गायत्री-जप (१०.२)। ‘उदु त्यम्’, ‘चित्रं देवानाम्’, ‘उद्वयं तमसस्परि’, ‘तच्चक्षुः’ आदि ऋचाओंसे उपस्थान करे और गायत्री दस, तीस या सौ बार जपे (१०.३–७)। प्रातःकी संध्यामें सूर्यके दिखनेतक खड़े होकर जपनेसे रातका पाप जाता है, और सायंकी संध्यामें तारे दिखनेतक बैठकर जपनेसे दिनका (१०.८–१२)। जपयज्ञ विधियज्ञसे दस गुना श्रेष्ठ है, उपांशु जप सौ गुना और मानस जप हजार गुना (१०.१३–१४); ब्राह्मण जपसे ही सिद्ध होता है (१०.१५–१६)। संध्या केवल जल फेंकनेसे सिद्धि नहीं देती (१०.१८); ओंकार, गायत्री, व्याहृति, शिरस्, प्राणायाम, संध्या, मार्जन, जप और ब्रह्मके चिन्तनसे (मनुष्य) अंगों सहित चारों वेदोंका पारगामी होता है (१०.१९–२०)।
सूर्योपस्थाननिरूपणप्रतिज्ञा
मार्जनं प्राणसंरोधो ध्यानं च समुदाहृतम् ।
उपस्थानं प्रवक्ष्यामि सूर्यस्य क्रियते यथा ॥ १०.१ ॥
मार्जन, प्राणायाम और ध्यान (ऊपर) कहे गये; अब मैं सूर्यका उपस्थान कहूँगा, जैसे (वह) किया जाता है।
प्रत्यहं कर्तव्यानि
स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्मार्जनं प्राणसंयमः ।
सूर्यस्य चाप्युपस्थानं गायत्र्याः प्रत्यहं जपः ॥ १०.२ ॥
जलदेवताके मन्त्रोंसे स्नान, मार्जन, प्राणायाम, सूर्यका उपस्थान और प्रतिदिन गायत्रीका जप — (ये संध्याके अंग हैं)।
पाठभेद — (पृ. ११९, पं. ४–५) याज्ञ. १.२२, वीमि. २६९, २७०, योगीश्वरवचनमिति, मद. ६१
उदुत्यं चित्रमित्याभ्यां प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिः ।
गायत्र्यास्तु जपं कृत्वा पूर्वमेव यथाविधि ॥ १०.३ ॥
"उदु त्यम्…" और "चित्रम्…" — इन दो (ऋचाओं) से जलकी अञ्जलि अर्पित करे; पहले ही विधिपूर्वक गायत्रीका जप करके —
उपस्थानमन्त्राः
उपस्थानं स्वकैर्मन्त्रैरादित्यस्य तु कारयेत् ।
वक्ष्यमाणैः प्रयत्नेन सूर्यस्य विषयाद्बुधः ॥ १०.४ ॥
— बुद्धिमान् आगे कहे जानेवाले सूर्यके अपने मन्त्रोंसे यत्नपूर्वक आदित्यका उपस्थान करे।
पाठभेद — (पृ. ११९, पं. ८) सं. ५७, वासिष्ठवचनमिति पमा. १.१. पृ. २९७
उदुत्यं चित्रं देवानामुद्वयं तमसः परि ।
तच्चक्षुर्देव इति च जपं कुर्यात्तु वै ऋचा ॥ १०.५ ॥
"उदु त्यम्…", "चित्रं देवानाम्…", "उद्वयं तमसस्परि…" और "तच्चक्षुर्देवहितम्…" — इन ऋचाओंसे जप करे;
पाठभेद — (पृ. ११९, पं. १०) सं. ५७
(पृ. ११९, पं. ११) ...इति च ह्येकचक्रेति वै धि च सं. ५७
उद्गादित्ययं मन्त्र आकृष्णेनेति वै ऋचा ।
इष्टं मनः प्रयुञ्जीत भक्त्या तानि जपेत् सदा ॥ १०.६ ॥
"उदगादयम्…" मन्त्र, और "आ कृष्णेन…" ऋचा; और "इषे त्वा…"(?) — इनसे मन लगाये; भक्तिसे इनका सदा जप करे।
पाठभेद — (पृ. ११९, पं. १२) सं. ५७
(पृ. ११९, पं. १३) तृप्तात्मा संप्रयुञ्जीत शक्त्यान्यानि जपेत् सदा । संध्याद्वयेऽप्युपस्थानमेवमाहुर्मनीषिणः । तदसंयुक्तपाणिर्वा ह्येकपादो द्विपादपि ॥ सं. ५७
गायत्रीजपसंख्याकल्पाः
एतैर्मन्त्रैः प्रयुञ्जीत शक्त्याऽन्यानि जपेत् सदा ।
दश त्रिंशत् शतं वापि गायत्र्याः परिवर्तयेत् ॥ १०.७ ॥
इन मन्त्रोंसे (उपस्थान) करे, और यथाशक्ति दूसरे (मन्त्र) भी सदा जपे; गायत्रीको दस, तीस या सौ बार दोहराये —
गायत्रीजपसंख्याफलम्
अहोरात्रं कृतं ह्येनस्तत् सर्वं विप्रणश्यति ।
पूर्वां संध्यां जपंस्तिष्ठेन्नैशमेनो व्यपोहति ॥ १०.८ ॥
— (इससे) दिन-रातमें किया हुआ सारा पाप नष्ट हो जाता है। प्रातःकालकी संध्यामें खड़ा होकर जप करता हुआ रातके पापको दूर करता है,
पाठभेद — (पृ. १२०, पं. १) मनु. २.१०२
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ।
जपिनां होमिनां चैव ध्यायिनां तीर्थसेविनाम् ॥ १०.९ ॥
और सायंकालकी (संध्यामें) बैठकर (जप करता हुआ) दिनमें किये मलको नष्ट करता है। जप करनेवालों, होम करनेवालों, ध्यान करनेवालों, तीर्थसेवियों —
पाठभेद — (पृ. १२०, पं. २) मनु. २.१०२
(पृ. १२०, पं. ३) वसिष्ठस्मृ. २६.१३
न पर्युषन्ति पापानि ये च स्नाताः शिरोव्रतैः ।
नास्ति गङ्गासमं तीर्थं न देवः केशवात् परः ॥ १०.१० ॥
— और जो शिरोव्रत (सिरसे स्नान) करके स्नात हैं, उनके पाप टिकते नहीं। गङ्गाके समान कोई तीर्थ नहीं, केशवसे बड़ा कोई देव नहीं,
पाठभेद — (पृ. १२०, पं. ४) न परिवसन्ति वसिष्ठस्मृ. २६.१३
गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति ।
सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम् ॥ १०.११ ॥
(और) गायत्रीसे बढ़कर जपनेयोग्य (मन्त्र) न हुआ, न होगा। हजार (जप) उत्तम, सौ मध्यम और दस अधम (कोटिका) है —
पाठभेद — (पृ. १२०, पं. ६) यमवचनमिति स्मृच. १५१
(पृ. १२०, पं. ७) अत्रि. २.९
गायत्रीं च जपन् विप्रो न स पापेन लिप्यते ।
पूर्वां संध्यां जपंस्तिष्ठेत् सावित्रीमर्कदर्शनात् ।
पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ १०.१२ ॥
— गायत्रीका जप करता हुआ विप्र पापसे लिप्त नहीं होता। प्रातःकालकी संध्यामें सूर्यके दर्शनतक खड़ा होकर सावित्री जपे, और सायंकालकी (संध्यामें) तारोंके भली-भाँति दिखनेतक बैठकर।
पाठभेद — (पृ. १२०, पं. ८) ....त्रीं यो जपेद्विप्रो अत्रि. २.९; ...त्रीं च जपेन्नित्यं सर्वपापप्रणाशिनीम् स्मृच. १५१
ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ १०.१३ ॥
विधियज्ञ सहित जो चार पाकयज्ञ हैं, वे सब जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं।
पाठभेद — (पृ. १२०, पं. ११–१२) मनु. २.८६, वसिष्ठस्मृ. २६.११
जपयज्ञमाहात्म्यम्
विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः ।
उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ॥ १०.१४ ॥
विधियज्ञसे जपयज्ञ दस गुना श्रेष्ठ है; उपांशु (जप) सौ गुना, और मानस हजार गुना कहा गया है।
पाठभेद — (पृ. १२०, पं. १३–१४) मनु. २.८५; आरम्भयज्ञाज्जप...अत्रिस्मृ. २.७, वसिष्ठस्मृ. २६.१
जपेनैव हि संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ १०.१५ ॥
ब्राह्मण जपसे ही सिद्धि पाता है, इसमें संशय नहीं; वह दूसरा (कर्म) करे या न करे, (सबका) मित्र ब्राह्मण कहलाता है।
पाठभेद — (पृ. १२१, पं. १–२) बृया. ७.१३०; जप्येनैव तु... उच्यते मनु. २.८७; वसिष्ठस्मृ. २६.१२; जप्येनैव...मन्त्रो ब्रा.... ब्रह्मसूत्र शां. भा. ४.३.३८
क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः ।
धनेन वैश्यशूद्रौ तु जपहोमैर्द्विजोत्तमः ॥ १०.१६ ॥
क्षत्रिय अपनी भुजाओंके बलसे अपनी विपत्तिको पार करे, वैश्य और शूद्र धनसे, और श्रेष्ठ द्विज जप और होमसे।
पाठभेद — (पृ. १२१, पं. ३–४) अत्रिस्मृ. २.१०; वसिष्ठस्मृ. २६.१७
गायत्रीजप्यनिरता ब्राह्मणा ब्रह्मचिन्तकाः ।
सूर्योपस्थाननिरतास्तस्य सायुज्यभागिनः ॥ १०.१७ ॥
गायत्रीके जपमें लगे, ब्रह्मका चिन्तन करनेवाले, सूर्योपस्थानमें लगे ब्राह्मण उसके (सूर्यके) सायुज्यके भागी होते हैं।
ओंकारादिजपफलम्
एवंविधास्तु ये संध्यामुपतिष्ठन्ति ते द्विजाः ।
नोदकस्य तु विक्षेपात् संध्या भवति सिद्धिदा ॥ १०.१८ ॥
जो द्विज इस प्रकार संध्याका उपस्थान करते हैं, (उनकी) संध्या सिद्धि देती है — केवल जल फेंकनेसे नहीं।
ओंकारस्य तु गायत्र्या व्याहृतीनां शिरस्यपि ।
प्राणायामस्य संध्याया आत्मज्ञानस्य चैव हि ॥ १०.१९ ॥
ओंकार, गायत्री, व्याहृतियों, शिरस्, प्राणायाम, संध्या और आत्मज्ञानके,
मार्जनस्य च जप्यस्य ब्रह्मणः परिचिन्तनात् ।
चतुर्णां चैव वेदानां साङ्गानां पारगो भवेत् ॥ १०.२० ॥
मार्जन और जपके, और ब्रह्मके चिन्तनसे (मनुष्य) अंगों सहित चारों वेदोंका पारगामी हो जाता है।
स भवेत् सर्वविद्यानां पारगो नात्र संशयः ॥४॥ (?)
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये सूर्योपस्थान- निर्णयो नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥
पाठभेद — (पृ. १२१, पं. १३) अत्र आदर्शपुस्तके ॥४॥ इत्ययं संकेतः किमर्थमागत इति न ज्ञायते ।
एकादशोऽध्यायः — योगधर्मनिर्णयः
अध्याय-सार — योगधर्मनिर्णय। सब धर्मोंको छोड़कर योगधर्मका आचरण करे, क्योंकि दूसरे धर्म फिर जन्मके कारण हैं (११.१); गीताके वचन इसकी पुष्टि करते हैं (११.२–३)। आत्मज्ञानी ही सर्वज्ञ है। फिर नाम अपने असली अर्थमें परिभाषित होते हैं: वेदवित् वह है जो वेदके आदिके वर्ण (ॐ) और उसके छठे पदको जाने; पारग वह है जो तत्त्वोंके पार गया हो, न कि स्वाध्यायके; षडङ्गवित् वह है जो हृदयकमलमें छः अंगोंवाले वर्णको जाने (११.९–१४)। असंयमसे पढ़ा वेद रक्षा नहीं करता, और आचारहीनको वेद पवित्र नहीं करते; विद्या और तप रथ और घोड़ोंकी तरह साथ चाहिए (११.१५–२४)। वेद दो प्रकारका है: स्थूल — ऋक्, यजुः और साम — और सूक्ष्म, वह त्र्यक्षर ब्रह्म जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है, जैसे भूसी और चावल (११.२५–३१)। ज्ञान और कर्मके बिना मोक्ष नहीं (११.३३); परम धर्म योगसे आत्मदर्शन है (११.३४)। प्रवृत्ति स्वर्ग देती है और निवृत्ति ब्रह्मभाव (११.३९–४२); किसी भी आश्रमका व्यक्ति, गृहस्थ भी, आत्मज्ञानसे मुक्त होता है, और त्याग नियत कर्मका नहीं, कर्मफलका होता है (११.४४–४९)। अध्याय ध्यानकी महिमा और (मनुके वचनोंसे) शरीरमें देवताओंकी भावनासे परम पुरुषको जाननेके मार्गपर समाप्त होता है (११.५०–५६)।
योगधर्ममाहात्म्यम्
सर्वधर्मान् परित्यज्य योगधर्मं समाचरेत् ।
सर्वे धर्माः सदोषास्तु पुनरुत्पत्तिकारकाः ॥ ११.१ ॥
सब धर्मोंको छोड़कर योगधर्मका आचरण करे; (अन्य) सब धर्म दोषयुक्त हैं, पुनर्जन्मके कारण हैं।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ११.२ ॥
(गीता २.४०:) इसमें आरम्भका नाश नहीं है, उलटा फल (प्रत्यवाय) नहीं है; इस धर्मका थोड़ा-सा (आचरण) भी बड़े भयसे रक्षा करता है।
पाठभेद — (पृ. १२२, पं. ४–५) गीता २.४०
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ११.३ ॥
(गीता २.४६:) सब ओरसे जल भर जानेपर छोटे जलाशयका जितना प्रयोजन रहता है, उतना ही (ब्रह्म) जाननेवाले ब्राह्मणका सब वेदोंमें (प्रयोजन रहता है)।
पाठभेद — (पृ. १२२, पं. ६–७) गीता २.४६
आत्मज्ञानं हि यो वेत्ति स सर्वज्ञः स सर्वकृत् ।
एवं ज्ञात्वा प्रयत्नेन योगयुक्तः सदा भवेत् ॥ ११.४ ॥
…क्योंकि जो आत्मज्ञान को जानता है, वह सब कुछ जानने वाला और सब कुछ करने वाला है; ऐसा जानकर प्रयत्नपूर्वक सदा योगयुक्त होना चाहिए।…
अकृतान्येव यज्ञाश्च दानानि च तपांसि च ।
तेषां फलं तु संयोज्य लोकान् सोमानव(नु?)क्रमात् ॥ ११.५ ॥
(जो) यज्ञ, दान और तप बिना किये ही (योगीके हैं) — उनका फल (उसे) जोड़कर (मिलता है); (वह) क्रमसे सोम आदि लोकोंको —
भुक्त्वा गच्छति तत्स्थानं यद् गत्वा न निवर्तते ।
पुरुषो भुनक्ति भोगाननौपम्यान् गुणोदयान् ॥ ११.६ ॥
— भोगकर उस स्थानको जाता है, जहाँ जाकर लौटता नहीं; (वहाँ) पुरुष अनुपम, (सत्त्व)गुणसे उदित भोगोंको भोगता है;
सर्गप्रलयकाले तु न नश्येन्न भवेत्तु सः ।
ऋचोऽक्षरे परमे व्योम्नि यस्मिन् देवा अधिविश्वे निषेदुः ॥
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ११.७ ॥
सृष्टि और प्रलयके समय वह न नष्ट होता है, न उत्पन्न। (ऋग्वेद १.१६४.३९:) ऋचाएँ उस परम व्योम-अक्षरमें (स्थित हैं), जिसमें सब देवता बैठे हैं; जो उसे नहीं जानता, वह ऋचासे क्या करेगा? जो उसे जानते हैं, वे ये (उसमें) भली-भाँति स्थित हैं।
पाठभेद — (पृ. १२२, पं. १६–१७) ...परमे व्योमन् ऋ. १.१६४.३९
रथ्याघोषेण संतुष्टो वाक्प्रलापरतः सदा ।
रात्रिंदिवं प्रलपते मत्तो मार्जारवद्यथा ॥ ११.८ ॥
(अज्ञानी) गलीके शोरसे सन्तुष्ट, सदा व्यर्थ बकवासमें लगा, रात-दिन मतवाले बिलावकी भाँति बड़बड़ाता रहता है।
वेदविल्लक्षणम्
वेदादौ यो भवेद्वर्णः पञ्चवर्णसमन्वितः ।
तस्यान्ते तु पदं षष्ठं तज्ज्ञात्वा वेदविद्भवेत् ॥ ११.९ ॥
वेदके आदिमें जो वर्ण (ॐ) पाँच वर्णोंसे युक्त है, उसके अन्तमें छठा पद है — उसे जानकर (मनुष्य) वेदवित् होता है।
वेदपारगलक्षणम्
अगतिं च गतिं चैव भूतानां विन्दते तु यः ।
प्रकृतीनां विकाराणां स भवेद्वेदपारगः ॥ ११.१० ॥
जो भूतोंकी अगति और गति, (और) प्रकृतियों तथा विकारोंको जानता है, वह वेदपारग होता है।
पारगलक्षणम्
पारं गतस्तु तत्त्वानां तत्त्वातीतं तु वेत्ति यः ।
स पारग इति प्रोक्तो न स्वाध्यायस्य पारगः ॥ ११.११ ॥
जो तत्त्वोंके पार गया है और तत्त्वोंसे परे (तत्त्व) को जानता है, वह पारग कहा गया है — स्वाध्यायका पारग नहीं।
जितेन्द्रियलक्षणम्
समाम्नायैकदेशं तु गुह्योपनिषदादि च ।
विन्दते पठते चैव ह्यनुतिष्ठति कर्मणा ॥ ११.१२ ॥
(जो) वेदका एक अंश और गुह्य उपनिषद् आदिको जानता है, पढ़ता है और कर्मसे (उसका) अनुष्ठान करता है —
स मे बहुमते(तो) भाति बहुविद्यासुशोभितः ।
स मुक्तिभाक् स एवैकः श्रद्धायुक्तो जितेन्द्रियः ॥ ११.१३ ॥
— वह बहुत विद्याओंसे सुशोभित (ब्राह्मण) मुझे अत्यन्त मान्य लगता है; वही अकेला मुक्तिका भागी है, श्रद्धायुक्त और जितेन्द्रिय।
पाठभेद — (पृ. १२३, पं. ९) सुशोभिकः आ.
षडङ्गविल्लक्षणम्
षडङ्गं षट्पदं वर्णं हृत्पद्मस्थं तु वेद यः ।
षडङ्गवित् स विज्ञेयो नाङ्गयोगी षडङ्गवित् ॥ ११.१४ ॥
जो हृदयकमलमें स्थित छः अंगों और छः पदोंवाले वर्ण (ॐ) को जानता है, उसे षडङ्गवित् जानना चाहिए — (केवल वेदके) अंगोंका अभ्यासी षडङ्गवित् नहीं।
संयमेन वेदाध्ययनप्रशंसा
केवलं लोकवृत्त्यर्थं पठितं वृत्तिहेतुकम् ।
कदर्थयति वेदांश्च कुप्रतिग्रहयाजनैः ॥ ११.१५ ॥
केवल लोकव्यवहार और जीविकाके लिए पढ़ा हुआ (वेद) — (ऐसा पाठक) बुरे दान-ग्रहण और (अयोग्यके) यज्ञ करानेसे वेदोंको अपमानित करता है।
असंयमेन येऽधीता न त्रायन्ति कदाचन ।
ऋगेका संयमश्लेन अधीता पारयत्यपि ॥ ११.१६ ॥
जो (वेद) असंयमसे पढ़े गये हैं, वे कभी रक्षा नहीं करते; संयमशील द्वारा पढ़ी गयी एक ऋचा भी पार लगा देती है।
पाठभेद — (पृ. १२३, पं. १७) संयमश्चेन आ.
आमपात्रे यथा न्यस्तमापो मधु घृतं पयः ।
नश्यन्ति पात्रदौर्बल्याच्च रसास्तस्य भाजनम् ॥ ११.१७ ॥
जैसे कच्चे घड़ेमें रखे जल, मधु, घी और दूध पात्रकी दुर्बलतासे नष्ट हो जाते हैं, और रस (भी, तथा) उसका पात्र (भी) —
एवं ह्यपात्रसंयोगात्तदधीतं विनश्यति ।
पात्रदोषेण संदुष्टमपवित्रं भविष्यति ॥ ११.१८ ॥
— वैसे ही अपात्रके संयोगसे वह पढ़ा हुआ (वेद) नष्ट हो जाता है; पात्रके दोषसे दूषित होकर अपवित्र हो जायेगा।
न वेदबलमाश्रित्य पापं कर्म समाचरेत् ।
अज्ञानाद्धि कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति ॥ ११.१९ ॥
वेदके बलका सहारा लेकर पापकर्म न करे; अज्ञानसे किया गया पाप ही वेदाभ्याससे शुद्ध होता है।
पाठभेद — (पृ. १२४, पं. १) पापकर्मरुचिर्भवेत् मनु. १२.१०१ प्रक्षिप्तः
(पृ. १२४, पं. २) अज्ञानाच्च प्रमादाच्च दहते कर्म नेतरत् मनु. १२.१०१ प्रक्षिप्तः
आचारहीनं न पुनन्ति वेदा
यद्यप्यधीताः सह षड्भिरङ्गैः ।
छन्दांस्येनं मृत्युकाले त्यजन्ति
नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ॥ ११.२० ॥
(वसिष्ठ ६.३:) आचारहीनको वेद पवित्र नहीं करते, चाहे छहों अंगों सहित पढ़े गये हों; मृत्युके समय छन्द उसे वैसे छोड़ देते हैं, जैसे पंख निकल आनेपर पक्षी घोंसलेको।
पाठभेद — (पृ. १२४, पं. ३–६) वसिष्ठस्मृ. ६.३
गायत्रीमात्रसंतुष्टः श्रेयान् विप्रः सुयन्त्रितः ।
नायन्त्रितश्चतुर्वेदः सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥ ११.२१ ॥
(मनु २.११८:) केवल गायत्री जाननेवाला, (पर) संयमी विप्र श्रेष्ठ है — न कि असंयमी चारों वेदोंका ज्ञाता, जो सब कुछ खाता और सब कुछ बेचता है।
पाठभेद — (पृ. १२४, पं. ७) मात्रसारोऽपि वरं विप्रः मनु. २.११८
(पृ. १२४, पं. ८) तस्त्रिवेदोऽपि सर्वाशी मनु. २.११८
न विद्यया केवलया तपसा वा पवित्रता ।
यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्धि पात्रं प्रचक्षते ॥ ११.२२ ॥
न केवल विद्यासे, न (केवल) तपसे पवित्रता होती है; जहाँ (सदा)चार और ये दोनों हों, उसीको पात्र कहते हैं।
यथा रथो विनाश्वैः स्यादश्वाश्च रथिना विना ।
एवं तपो ह्यविद्यस्य विद्या चाप्यतपस्विनः ॥ ११.२३ ॥
जैसे घोड़ोंके बिना रथ और रथीके बिना घोड़े (व्यर्थ हैं), वैसे ही अविद्वान्का तप और तपहीनकी विद्या।
पाठभेद — (पृ. १२४, पं. ११) यथाऽश्वा रथहीनास्तु रथाश्चाश्वैर्विना यथा अत्रि. २.११; हारीतवचनमिति अप. ९६२; यथाऽश्वा रथहीनाः स्यू रथो वाऽश्वैर्विना यथा वसिष्ठस्मृ. २६.१८
(पृ. १२४, पं. १२) एवं तपोऽप्यविद्यस्य अत्रि. २.११; हारीतवचनमिति अप. ९६२; तपस्त्वविद्यस्य विद्या वाप्यतपस्विनः वसिष्ठस्मृ. २६.१८
यथान्नं मधुसर्पिर्भ्यां संयुक्तं स्वादुतां व्रजेत् ।
एवं विद्यातपोयोगैर्ब्राह्मणः पात्रतां व्रजेत् ॥ ११.२४ ॥
जैसे अन्न मधु और घीसे मिलकर स्वादु हो जाता है, वैसे ही विद्या और तपके योगसे ब्राह्मण पात्रताको प्राप्त होता है।
ब्रह्मद्वैविध्यम्
द्विविधं तु समुद्दिष्टं गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
स्थूलसूक्ष्मं च बोद्धव्यं ब्राह्मणेन प्रयत्नतः ॥ ११.२५ ॥
सनातन गुह्य ब्रह्म (वेद) दो प्रकारका कहा गया है — ब्राह्मणको प्रयत्नसे (उसे) स्थूल और सूक्ष्म (रूपमें) जानना चाहिए।
त्रिवृद्वेदस्वरूपम्
ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च ।
एवं ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ ११.२६ ॥
ऋचाएँ, यजुः और दूसरे विविध साम — इस प्रकार (स्थूल) त्रिवृत् वेद जानना चाहिए; जो इसे जानता है वह वेदवित् है।
वेदपिण्डलक्षणम्
आद्यं यत् त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।
स तु ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ ११.२७ ॥
जो आद्य, तीन अक्षरोंवाला ब्रह्म (ॐ) है, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है — वह (सूक्ष्म) त्रिवृत् वेद जानना चाहिए; जो इसे जानता है वह वेदवित् है।
स्थूलसूक्ष्मब्रह्मविवेकः
पलालधान्यशूकादि तुषकणसमन्वितम् ।
यत् स्थूलं तादृशं ज्ञेयं सूक्ष्मं तण्डुलवत् स्मृतम् ॥ ११.२८ ॥
पुआल, धान, बाल (शूक) आदि, भूसी और कणोंसे युक्त — जो स्थूल है, वह वैसा जानना चाहिए; और सूक्ष्म चावलके समान कहा गया है।
स्थूलब्रह्माध्ययनफलम्
वाक्प्रपञ्चं तु यत् स्थूलं शब्दब्रह्म महत्तरम् ।
त्रिवर्गफलदं ज्ञेयं यदि सम्यगधीयते ॥ ११.२९ ॥
वाणीका विस्तार जो स्थूल, महान् शब्दब्रह्म है, वह यदि भली-भाँति पढ़ा जाये, तो त्रिवर्ग(धर्म-अर्थ-काम) का फल देनेवाला जानना चाहिए।
वेदाध्ययनफलम्
वेदोऽधीतो ददच्छुद्धिं भ्रंशितो नरकप्रदः ।
न्यायेनेष्टो ददत् स्वर्गं पुनरावृत्तिकारकम् ॥ ११.३० ॥
पढ़ा गया वेद शुद्धि देता है, (और) भ्रष्ट (भूला) हुआ नरक देता है; न्यायपूर्वक (यज्ञमें) प्रयुक्त (वह) स्वर्ग देता है — (जो) पुनर्जन्मका कारण है।
पाठभेद — (पृ. १२५, पं. १०) ...ष्टो नयेत् स्वर्गं इ.
सूक्ष्मं तत् परमं गुह्यं त्रयं ब्रह्म सनातनम् ।
वेदवेदान्तयोः सारं त्रिविधं ब्रह्मणो मुखम् ॥ ११.३१ ॥
सूक्ष्म (वेद) वह परम गुह्य, त्रिविध सनातन ब्रह्म है — वेद-वेदान्तका सार, ब्रह्म (वेद) का त्रिविध मुख (ॐ, व्याहृति, गायत्री) —
ज्ञानकर्मसमुच्चयप्रशंसा
मोक्षदं तु समुद्दिष्टं विदितं नात्र संशयः ।
षट्कर्मणामनुष्ठानादाश्रमाणां च सेवनात् ॥ ११.३२ ॥
— (वह) मोक्ष देनेवाला कहा गया है, (यह) जाना हुआ (सत्य) है, इसमें संशय नहीं। छः कर्मोंके अनुष्ठानसे, आश्रमोंके सेवनसे,
तपसा वा सुतीव्रेण सर्वविद्याविवेचनात् ।
मोक्षावाप्तिस्तु न भवेदृते ज्ञानाच्च कर्मणः ॥ ११.३३ ॥
अत्यन्त तीव्र तपसे, अथवा सब विद्याओंके विवेचनसे — ज्ञान और कर्मके बिना मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती।
पाठभेद — (पृ. १२५, पं. १५) तपसा याजनात् ध्यानात् इ.
(पृ. १२५, पं. १६) ॥३४॥ आ. इतःपरमादर्शपुस्तके श्लोकसङ्ख्या मुद्रितसङ्ख्यातः एकाधिका
योगेनात्मदर्शनप्रशंसा
इज्याचारो दमोऽहिंसा दानं स्वाध्यायकर्म च ।
अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥ ११.३४ ॥
यज्ञ, आचार, दम, अहिंसा, दान और स्वाध्याय-कर्म (धर्म हैं); पर परम धर्म यह है कि योगसे आत्माका दर्शन हो।
पाठभेद — (पृ. १२५, पं. १७) ...चारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् याज्ञ. १.८
(पृ. १२५, पं. १८) याज्ञ. १.८
धर्मनिर्णायकाः
चत्वारो वेदधर्मज्ञा यत्र त्रैविध(द्य)मेव वा ।
स ब्रूते यः स धर्मः स्यादेको वाध्यात्मवित्तमः ॥ ११.३५ ॥
जहाँ चार वेद और धर्मके जानकार, अथवा तीन वेदोंके जानकार (हों) — वे जो कहें वह धर्म है; अथवा अध्यात्मविदोंमें श्रेष्ठ एक (भी जो कहे)।
पाठभेद — (पृ. १२५, पं. १९) ...धर्मज्ञाः पर्षत्त्रैविद्यमेव... याज्ञ. १.९
(पृ. १२६, पं. १) ब्रूते यं स याज्ञ. १.९
श्रेष्ठश्रेणी
भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः ।
बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥ ११.३६ ॥
(मनु १.९६:) भूतोंमें प्राणी श्रेष्ठ हैं, प्राणियोंमें बुद्धिसे जीनेवाले, बुद्धिमानोंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं, और मनुष्योंमें ब्राह्मण कहे गये हैं;
पाठभेद — (पृ. १२६, पं. २–३) मनु. १.९६
ब्राह्मणेषु तु विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः ।
कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः ॥ ११.३७ ॥
ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि (कर्तव्यका निश्चय करनेवाले), कृतबुद्धियोंमें करनेवाले, और करनेवालोंमें ब्रह्मवेत्ता (श्रेष्ठ हैं)।
पाठभेद — (पृ. १२६, पं. ४–५) मनु. १.९७
आत्मज्ञानस्य सर्वश्रेष्ठत्वम्
सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम् ।
तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः ॥ ११.३८ ॥
इन सबमें भी आत्मज्ञान परम कहा गया है; वह सब विद्याओंमें अग्रणी है, उससे अमृत प्राप्त होता है।
पाठभेद — (पृ. १२६, पं. ६–७) मनु. १.८५; ॥४०॥ आ. इतः परमादर्शपुस्तके श्लोकसङ्ख्या मुद्रितसङ्ख्यातः द्व्यधिका ।
वैदिककर्मद्वैविध्यम्
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च द्विविधं कर्म वैदिकम् ।
निःश्रेयसकरं ज्ञेयं द्विजानामिह सर्वशः ॥ ११.३९ ॥
(मनु १२.८८:) प्रवृत्ति और निवृत्ति — वैदिक कर्म दो प्रकारका है; यहाँ द्विजोंके लिए (वह) सब प्रकारसे कल्याणकारी जानना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. १२६, पं. ८) ...त्तं च निवृत्तं च...मनु. १२.८८
प्रवृत्तकर्मस्वरूपम्
कर्मणां समनुष्ठानमाश्रमाणां च सेवनम् ।
पुत्रदारादिसंसक्तिः प्रवृत्तं कर्म चोच्यते ॥ ११.४० ॥
कर्मोंका अनुष्ठान, आश्रमोंका सेवन और पुत्र-स्त्री आदिमें आसक्ति — (यह) प्रवृत्त कर्म कहलाता है।
निवृत्तकर्मस्वरूपम्
नियमानामनुष्ठानं सम्यगात्मविचिन्तनम् ।
सुतादिष्वनभिष्वङ्गो निवृत्तं कर्म वैदिकम् ॥ ११.४१ ॥
नियमोंका अनुष्ठान, आत्माका सम्यक् चिन्तन और पुत्र आदिमें अनासक्ति — (यह) निवृत्त वैदिक कर्म है।
द्विविधवैदिककर्मफलम्
प्रवृत्तं सेवमानस्तु स्वर्गलोके महीयते ।
निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ११.४२ ॥
(मनु १२.९०:) प्रवृत्त (कर्म) का सेवन करनेवाला स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है; निवृत्तका सेवन करनेवाला ब्रह्मभावके योग्य होता है।
पाठभेद — (पृ. १२६, पं. १४) प्रवृत्तं कर्म संसेव्य देवानामेति साम्यताम् मनु. १२.९०
(पृ. १२६, पं. १५) निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येति पञ्च वै मनु. १२.९०
कर्मयोगप्रशंसा
न तमः कारणं किञ्चिद्योगधर्मे प्रवर्तते ।
आनन्तर्यात् प्रमाणं तु सर्वमेतदकारणम् ॥ ११.४३ ॥
योगधर्ममें कोई (भेद) कारण नहीं बनता (?); अनन्तरतासे प्रमाण (मानें तो) यह सब अकारण है।
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा ।
आत्मज्ञानेन मुच्यन्ते यत्र तत्राऽऽश्रमे रताः ॥ ११.४४ ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा यति — जिस किसी आश्रममें लगे हों, आत्मज्ञानसे मुक्त होते हैं।
स्वकर्मणामनुष्ठानात् सम्यगात्मनि दर्शनात् ।
वेदान्तानां परिज्ञानाद् गृहस्थोऽपि हि मुच्यते ॥ ११.४५ ॥
अपने कर्मोंके अनुष्ठानसे, आत्माके सम्यक् दर्शनसे और वेदान्तोंके ज्ञानसे गृहस्थ भी मुक्त हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. १२७, पं. ३) अप. ९६०; कर्मणां त्वनु...आ.
(पृ. १२७, पं. ४) ...पि विमुच्यते अप. ९६०; गृहसंस्थोऽपि मुच्यते इ.
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमेवार्च्य सिद्धिं प्राप्नोति मानवः ॥ ११.४६ ॥
(गीता १८.४६:) जिससे भूतोंकी प्रवृत्ति है, जिससे यह सब व्याप्त है, अपने कर्मसे उसीकी पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।
पाठभेद — (पृ. १२७, पं. ५–६) तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति गीता. १८.४६
कर्मसंन्यासयोगेन ब्राह्मणः सिद्धिमाप्नुयात् ।
कर्मणां नियतानां तु त्यागो नैव विधीयते ॥ ११.४७ ॥
कर्मसंन्यासयोगसे ब्राह्मण सिद्धि पाये; (पर) नियत कर्मोंका त्याग विहित नहीं है —
पाठभेद — (पृ. १२७, पं. ८) ...तु योगेनैव आ. नियतानां तु कर्माणां त्यागो नैवेह विद्यते इ.
तेषां कर्मफलत्यागः स त्याग इति कीर्त्यते ।
ब्रह्मप्रधानकर्मस्था न सीदन्ति कदाचन ॥ ११.४८ ॥
— उनके कर्मफलका त्याग — वह त्याग कहलाता है। ब्रह्मप्रधान कर्ममें स्थित (लोग) कभी दुःखी नहीं होते।
मृत्तोयैः शुद्ध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुद्ध्यति ।
रजसा स्त्री मनोदुष्टाः संन्यासेन द्विजोत्तमाः ॥ ११.४९ ॥
(मनु ५.१०८:) शुद्ध करने योग्य (वस्तु) मिट्टी और जलसे शुद्ध होती है, नदी वेगसे शुद्ध होती है, मनसे दूषित स्त्री रजसे, और श्रेष्ठ द्विज संन्याससे।
पाठभेद — (पृ. १२७, पं. ११–१२) मनु. ५.१०८
ध्यानमाहात्म्यम्
गण्डोपलादयो भूत्वा पदमन्यदिगच्छति ।
ध्यानेनात्मनि संपश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः ॥ ११.५० ॥
(?) गण्डोपल (पत्थर) आदि होकर (जीव) दूसरे पदको जाता है; ध्यानसे अपने भीतर इस अन्तरात्माकी गतिको देखे।
पाठभेद — (पृ. १२७, पं. १४) ध्यानयोगेन संप...मनु. ६.७३
प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् ।
विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ ११.५१ ॥
प्रियजनोंमें अपना पुण्य और अप्रियोंमें पाप छोड़कर, ध्यानयोगसे (साधक) सनातन ब्रह्मको प्राप्त होता है।
पाठभेद — (पृ. १२७, पं. १५–१६) मनु. ६.७९
ध्यानेनात्मनि पश्येच्च सर्वांश्च सुसमाहितः ।
पश्यन् हि योगयुक्तात्मा मुनिर्मोक्षपरायणः ॥ ११.५२ ॥
ध्यानसे भली-भाँति समाहित होकर आत्मामें सबको देखे; (ऐसा) देखता हुआ योगयुक्तात्मा मुनि मोक्षपरायण होता है।
परमपुरुषज्ञानमार्गः
खं संनिवेशयेत् खेषु चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम् ।
पङ्क्तिदृष्ट्योः परं तेजः स्नेहयोगश्च मूर्तिषु ॥ ११.५३ ॥
(मनु १२.१२०:) शरीरके छिद्रोंमें आकाशको स्थापित (भावित) करे, चेष्टा और स्पर्शमें वायुको, पाचन और दृष्टिमें परम तेजको, और शरीरके स्नेह (द्रव) में जलको;
पाठभेद — (पृ. १२८, पं. ३) मनु. १२.१२०
(पृ. १२८, पं. ४) पक्ति....स्नेहेऽपो गां च मूर्तिषु मनु. १२.१२०
वाच्यग्निं मित्रमुत्सर्गे प्रजने च प्रजापतिम् ।
मनसीन्दुं दिशः श्रोत्रे क्रान्ते विष्णुं बले हरम् ॥ ११.५४ ॥
वाणीमें अग्निको, उत्सर्गमें मित्रको, प्रजननमें प्रजापतिको, मनमें चन्द्रमाको, कानमें दिशाओंको, गतिमें विष्णुको और बलमें हर (इन्द्र) को।
पाठभेद — (पृ. १२८, पं. ५–६) मनु. १२.१२१
प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि ।
रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥ ११.५५ ॥
(मनु १२.१२२:) सबके शासक, अणुसे भी अणु, सुवर्णके समान आभावाले, स्वप्न-सी (एकाग्र) बुद्धिसे ग्राह्य (उस) परम पुरुषको जाने।
पाठभेद — (पृ. १२८, पं. ७–८) मनु. १२.१२२
परमपुरुषनामधेयानि
एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।
इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ११.५६ ॥
इसीको कुछ लोग अग्नि कहते हैं, दूसरे मनु, (कुछ) प्रजापति, कुछ इन्द्र, दूसरे प्राण, और अन्य सनातन ब्रह्म।
पाठभेद — (पृ. १२८, पं. ९–१०) मनु. १२.१२३
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये (योगधर्मनिर्णयो नाम) एकादशोऽध्यायः ॥११॥
पाठभेद — (पृ. १२८, पं. ११) कुण्डलितः पाठः आदर्शपुस्तके नास्ति ।
द्वादशोऽध्यायः — विद्याऽविद्यानिर्णयः
अध्याय-सार — विद्या-अविद्या-निर्णय — ग्रन्थका उपसंहार। वेदशास्त्रसे भिन्न कोई शास्त्र नहीं; सब शास्त्र उसीसे निकले हैं, और ऋषियोंने उन्हें इसलिए रचा कि वेद दुर्बोध है (१२.१–२)। चौदह विद्यास्थान हैं; सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत ‘अतिप्रमाण’ हैं, जिनके कर्ता कपिल, हिरण्यगर्भ, नारायण, अपान्तरतमा और शिव हैं (१२.३–८)। बौद्ध, लोकायत आदि वेदबाह्य मत तामस हैं, और उनका ‘शरीर ही देवता है, परलोक नहीं’ वाला भाव आसुर है (१२.९–१७)। प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र तीनों जानने चाहिए (१२.१९); पर द्विज पहले वेद, वेदांग, वेदान्त और स्मृति पढ़े, और दूसरे सिद्धान्तोंको आत्मज्ञानके लिए ही विचारे — केवल उन्हींको पढ़नेवाला वेदबाह्य हो जाता है (१२.३४–३५)। वेद मूल और तना है, बाकी शास्त्र शाखाएँ (१२.२५); स्मृतियाँ लुप्त शाखाओंके स्मरणसे बनीं (१२.२६)। याज्ञवल्क्यने यही त्रयीका मार्ग दिखाया (१२.४२–४३); १२.४४–४७ ग्रन्थके सब विषयोंको फिरसे गिनाता है; और अन्तिम श्लोक कहता है कि यह शास्त्र उन्हींको दे, जो सब भूतोंको अपनेमें और अपनेको सब भूतोंमें देखते हैं (१२.४९)।
वेदशास्त्रमाहात्म्यम्
न वेदशास्त्रादन्यत्तु किञ्चिच्छास्त्रं हि विद्यते ।
सर्वं विनिःसृतं शास्त्रं वेदशास्त्रात् सनातनात् ॥ १२.१ ॥
वेदशास्त्रों से भिन्न अन्य कोई भी शास्त्र नहीं है, क्योंकि सनातन वेदशास्त्र से ही समस्त शास्त्र प्रकट हुए हैं।
पाठभेद — (पृ. १२९, पं. २) वीमि. परि. २०
(पृ. १२९, पं. ३) निःसृतं सर्वशास्त्रं तु वेद...वीमि. परि. २०
ऋषीणां शास्त्ररचनाप्रयोजनम्
दुर्बोधं तु भवेद्यस्मादध्येतुं नैव शक्यते ।
तस्मादुद्धृत्य सर्वं हि शास्त्रं तु ऋषिभिः कृतम् ॥ १२.२ ॥
क्योंकि वह (वेद) दुर्बोध है और (सबसे) पढ़ा नहीं जा सकता, इसलिए ऋषियोंने (उसीसे) उद्धृत करके सब शास्त्र रचे।
पाठभेद — (पृ. १२९, पं. ४) दुर्बोध्यं वीमि. परि. २०; ... ध्येतुं नैव आ.
(पृ. १२९, पं. ५) वीमि. परि. २०
चतुर्दशविद्यास्थानानि
पुराणतर्कमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः ।
वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ १२.३ ॥
पुराण, तर्क (न्याय), मीमांसा और धर्मशास्त्र, (छहों) अंगोंसे मिले वेद — (ये) चौदह विद्याओं और धर्मके स्थान हैं।
पाठभेद — (पृ. १२९, पं. ६) पुराणन्याय ... याज्ञ. १.३, वीमि. परि. २०
(पृ. १२९, पं. ७) वीमि. परि. २०
अतिप्रमाणानि (शास्त्राणि)
सांख्यं योगं पञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा ।
अतिप्रमाणान्येतानि हेतुभिर्न विचालयेत् ॥ १२.४ ॥
सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — ये अत्यन्त प्रमाण हैं; इन्हें हेतुओं (तर्कों) से विचलित न करे।
पाठभेद — (पृ. १२९, पं. ८) वीमि. परि. २१; योगः पञ्च ... अप. १.७; शान्ति. ३४९.६४
(पृ. १२९, पं. ९) ...र्न विरोधयेत् वीमि. परि. २१; ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै शान्ति. ३४९.६४
संख्यादिकर्तारः
सांख्यस्य कर्ता कपिलः परमार्थः स उच्यते ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ १२.५ ॥
सांख्यके कर्ता कपिल हैं, वे परमर्षि कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, दूसरा कोई पुरातन (वक्ता) नहीं।
पाठभेद — (पृ. १२९, पं. १०) वक्ता कपिलः परमर्षिः स...शान्ति. ३४९.६५, वीमि. परि. २०
(पृ. १२९, पं. ११) वाचस्पतियोगटीका १.१; योगस्य वेत्ता शान्ति. ३४९.६५, वीमि. परि. २१
पञ्चरात्रस्य सर्वस्य वक्ता नारायणः स्वयम् ।
अपांतरतमश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ १२.६ ॥
सारे पाञ्चरात्रके वक्ता स्वयं नारायण हैं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं —
पाठभेद — (पृ. १२९, पं. १२) पाञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वेत्ता तु भगवान् स्वयम् शान्ति. ३४९.६८; वक्ता तु भगवान् वीमि. परि. २१
(पृ. १३०, पं. १) वीमि. परि. २१;...तमाश्चैव शान्ति. ३४९.६६
प्राचीनगर्भं तमृषिं प्रवदन्ति हि केचन ।
उमापतिः पशुपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः ॥ १२.७ ॥
— कुछ लोग उन ऋषिको प्राचीनगर्भ कहते हैं। उमापति, पशुपति, श्रीकण्ठ, ब्रह्माके पुत्र —
पाठभेद — (पृ. १३०, पं. २) वीमि. परि. २१; प्रवदन्तीह शान्ति. ३४९.६७
(पृ. १३०, पं. ३) उमापतिर्भूतपतिः वीमि. परि. २१, शान्ति. ३४९.६७
प्रोक्तवानिदमत्युग्रं ज्ञानं पाशुपतं हरः ।
अत ऊर्ध्वं तु ये केचिद्वेदशास्त्राण्यनेकशः ॥ १२.८ ॥
— हर (शिव) ने यह अत्यन्त उग्र पाशुपत ज्ञान कहा। इसके बाद जो कोई अनेक प्रकारसे वेदशास्त्रोंको —
पाठभेद — (पृ. १३०, पं. ४) उक्तवानिदमव्यग्रो...पतं शिवः वीमि. परि. २१, शान्ति. ३४९.६७
वेदबाह्यानि शास्त्राणि
बौद्धः कापिलकुहको लोकायतिकभिक्षकाः ।
वेदबाह्यास्तथान्ये तु तामसा आशिवास्तु ते ॥ १२.९ ॥
— बौद्ध, कापिल-कुहक (कपटी), लोकायतिक (चार्वाक) और भिक्षुक (कहते हैं) — वे और दूसरे वेदबाह्य तामस और अमंगलकारी हैं;
नैरात्म(त्म्य)वादकुहकैर्मिथ्यादृष्टान्तहेतुभिः ।
वेदशास्त्रं तु बाधन्ते पौरुषेयास्तु ते स्मृताः ॥ १२.१० ॥
नैरात्म्यवादी कपटी, झूठे दृष्टान्तों और हेतुओंसे वेदशास्त्रका बाधन करते हैं — वे पौरुषेय (मनुष्य-रचित मत) कहे गये हैं।
आसुरेयाः पाशुपता बृहस्पतिकृतास्तु ये ।
शुक्रं रूपं समास्थाय देवानां हितकाम्यया ॥ १२.११ ॥
जो आसुर पाशुपत (मत) और जो बृहस्पतिके रचे (मत) हैं — (बृहस्पतिने) देवताओंके हितकी इच्छासे शुक्रका रूप धारण करके (उन्हें रचा) —
प्रजापतिकृताश्चान्ये असुराणां प्रमोहनाः ।
येनेदं वाङ्मयं दुग्धमधर्मे विफलीकृतम् ॥ १२.१२ ॥
— और प्रजापतिके रचे दूसरे (मत) असुरोंको मोहित करनेवाले हैं, जिन्होंने इस वाङ्मयको दुहकर अधर्ममें निष्फल कर दिया।
आत्मानं भूषयेन्नित्यं भोजनाच्छादनादिभिः ।
स्वदेहमेव दैवत्यमन्यन्नैवात्र विद्यते ॥ १२.१३ ॥
(उनका मत है:) अपनेको सदा भोजन, वस्त्र आदिसे सजाओ; अपना शरीर ही देवता है, यहाँ दूसरा कुछ नहीं है।
असत्यमप्रतिष्ठं च जगदाहुरनीश्वरम् ।
अयं लोकोऽस्ति न परः पुनः संभवनं कुतः ॥ १२.१४ ॥
वे जगत्को असत्य, बिना आधारका और ईश्वररहित कहते हैं; यही लोक है, परलोक नहीं, फिर पुनर्जन्म कहाँ?
पाठभेद — (पृ. १३०, पं. १६) गीताकाश्मीरपाठः;...ष्ठं ते जग...गीता. १६.८
जलबुद्बुदवच्चायं संभवेच्च पुनः पुनः ।
स्वेच्छयोत्पद्यते चैव स्वेच्छया च प्रलीयते ॥ १२.१५ ॥
यह (जगत्) जलके बुलबुलेकी भाँति बार-बार उत्पन्न होता है; अपनी इच्छासे उत्पन्न होता है और अपनी इच्छासे लीन होता है।
जातिप्राधान्यकं नास्ति एकजातिसमुद्भवः ।
न वेदा नैव यज्ञाश्च न दानं न तपांसि च ॥ १२.१६ ॥
जातिकी प्रधानता नहीं, (सब) एक ही जातिसे उत्पन्न हैं; न वेद हैं, न यज्ञ, न दान, न तप।
पाठभेद — (पृ. १३१, पं. १) एतावानेव ग्रन्थांशः समुपलभ्यते इ. पुस्तके ।
न कार्यं नैव चाकार्यं सर्वं कुर्यादशङ्कया ।
एतदासुरकं भावं समाश्रित्य विनश्यति ॥ १२.१७ ॥
न कोई कर्तव्य है, न अकर्तव्य, सब कुछ निःशंक होकर करो — इस आसुर भावका आश्रय लेकर (मनुष्य) नष्ट हो जाता है।
नैयायिकार्थमालोक्य तथाहीश्वरकारणम् ।
प्रतिष्ठानानि वेदस्य एते तर्का उदाहृताः ॥ १२.१८ ॥
नैयायिकोंके अर्थ (युक्ति) को देखकर, और उसी प्रकार ईश्वरको कारण (मानकर) — ये तर्क वेदके आधार कहे गये हैं।
धर्मशुद्धिसाधनानि
प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् ।
त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता ॥ १२.१९ ॥
(मनु १२.१०५:) धर्मकी शुद्धि चाहनेवालेको प्रत्यक्ष, अनुमान और विविध आगमरूप शास्त्र — इन तीनोंको भली-भाँति जानना चाहिए।
पाठभेद — (पृ. १३१, पं. ७–८) मनु. १२.१०५
मनोमाहात्म्यम्
यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।
स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ १२.२० ॥
(मनु २.७:) मनुने जिस किसीका जो भी धर्म कहा है, वह सब वेदमें कहा गया है; क्योंकि वह (वेद) सर्वज्ञानमय है।
पाठभेद — (पृ. १३१, पं. ९–१०) मनु. २.७
वेदाध्ययनप्रशंसा
तस्माद्वेदादृते नान्यदध्येतव्यं द्विजन्मना ।
वेदबाह्यं तु यत् किञ्चिन्नाध्येतव्यं कदाचन ॥ १२.२१ ॥
इसलिए द्विजको वेदके सिवा दूसरा (शास्त्र प्रधानतः) नहीं पढ़ना चाहिए; और जो कुछ वेदबाह्य है, उसे कभी नहीं पढ़ना चाहिए।
वेदबाह्यस्मृतिनिन्दा
या वेदबाह्याः स्मृतयो याः काश्च कुदृष्टयः ।
सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ॥ १२.२२ ॥
(मनु १२.९५:) जो वेदबाह्य स्मृतियाँ और जो कोई कुदृष्टियाँ हैं, वे सब मृत्युके बाद निष्फल हैं; वे तमोनिष्ठ कही गयी हैं।
पाठभेद — (पृ. १३१, पं. १३–१४) याश्च काश्च कु...मनु. १२.९५
उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यानि तानि तु कानिचित् ।
एतान्यर्वाक्कालिकानि निष्फलान्यनृतानि च ॥ १२.२३ ॥
(मनु १२.९६:) उससे भिन्न जो कोई (मत) उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं, वे अर्वाचीन, निष्फल और असत्य हैं।
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ॥ १२.२४ ॥
(मनु २.१६८:) जो द्विज वेद न पढ़कर अन्यत्र श्रम करता है, वह जीते-जी ही शीघ्र अपने वंश सहित शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. १३१, पं. १७–१८) मनु. १२.१६८
वेदाध्ययनप्रशंसा
मूलस्तम्भो भवेद्वेदः शाखाश्चान्यानि यानि तु ।
मूले ह्युपासिते सम्यक् फलं भवति नान्यथा ॥ १२.२५ ॥
वेद मूल और तना है, और जो दूसरे (शास्त्र) हैं वे शाखाएँ; मूलकी भली-भाँति सेवा करनेसे ही फल होता है, अन्यथा नहीं।
स्मृतीनामुच्छिन्नशाखामूलत्वम्
उच्छिन्नशाखा याः काश्चित्तथा वेदान्तराणि च ।
अन्तर्धानगतानीह स्मृत्वा तु स्मृतयः कृताः ॥ १२.२६ ॥
जो कुछ शाखाएँ लुप्त हो गयीं और जो वेद-भाग यहाँ अन्तर्धान हो गये, उनका स्मरण करके स्मृतियाँ रची गयीं।
तुल्यबलयोर्विकल्पः
एकमेव हि विज्ञेयं श्रुतिस्मृतिविचक्षणैः ।
तस्मात्तुल्यबलत्वात्तु विकल्पश्च क्वचित् स्मृतः ॥ १२.२७ ॥
श्रुति और स्मृतिके जानकारोंको (दोनोंको) एक ही जानना चाहिए; इसलिए समान बलवाली होनेसे कहीं-कहीं विकल्प कहा गया है।
श्रुतिस्मृत्योर्माहात्म्यम्
श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः ।
ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ १२.२८ ॥
(मनु २.१०:) श्रुति वेदको जानना चाहिए और स्मृति धर्मशास्त्रको; वे सब विषयोंमें तर्कसे परे हैं, क्योंकि उन्हींसे धर्म प्रकट हुआ।
पाठभेद — (पृ. १३२, पं. ६–७) मनु. २.१०
योऽवमन्येत ते तूभे हेतुशास्त्राश्रयो द्विजः ।
स विद्वद्भिर्बहिः कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ १२.२९ ॥
(मनु २.११:) जो द्विज हेतुशास्त्र (कुतर्क) का आश्रय लेकर उन दोनोंका अपमान करे, वह नास्तिक, वेदनिन्दक सज्जनों द्वारा बहिष्कृत करने योग्य है।
पाठभेद — (पृ. १३२, पं. ८) ...ते मूले.. श्रयाद् द्विजः मनु. २.११
(पृ. १३२, पं. ९) साधुभिर्ब...मनु. २.११
हेतुशास्त्राध्ययननिषेधः
हेतुशास्त्राणि योऽधीते वेदबाह्यो भवेद्द्विजः ।
तेन नास्तिक्यभावेन सर्वे(र्वं)मन्येत सोऽन्यथा ॥ १२.३० ॥
जो द्विज (केवल) हेतुशास्त्र पढ़ता है, वह वेदबाह्य हो जाता है; उस नास्तिकभावसे वह सब कुछ उलटा मानता है —
तीर्थं दानं व्रतं यज्ञा वेदा विप्राश्च देवताः ।
स्वर्गापवर्गहेतूनि कुदृष्ट्या पश्यतेऽनृतम् ॥ १२.३१ ॥
— तीर्थ, दान, व्रत, यज्ञ, वेद, विप्र और देवता — स्वर्ग और मोक्षके इन हेतुओंको (वह) कुदृष्टिसे असत्य देखता है।
नास्तिक्यभावान्मूढात्मा पापेषु कुरुते मतिम् ।
श्रुतिस्मृत्युदितं त्यक्त्वा ततो नरकमृच्छति ॥ १२.३२ ॥
नास्तिक भाव के कारण मूर्ख आत्मा पापों में अपनी मति लगाता है । श्रुति और स्मृति द्वारा उद्घोषित को त्यागकर, उसके बाद मनुष्य नरक को प्राप्त होता है ।
अज्ञानतमसाऽन्धानां भ्रामितानां कुदृष्टिभिः ।
न प्रत्यक्षं भवेत्तेषां वेदविद्यान्तरं तु यत् ॥ १२.३३ ॥
अज्ञानके अन्धकारसे अन्धे और कुदृष्टियोंसे भटके हुए लोगोंको वह (तत्त्व) प्रत्यक्ष नहीं होता, जो वेदविद्याके भीतर है।
वैदिकशास्त्राध्ययनमाहात्म्यम्
वेदांश्चैव तु वेदाङ्गान् वेदान्तानि तथा स्मृतिः(तीः) ।
अधीत्य ब्राह्मणः पूर्वं शक्तितोऽन्यांश्च संपठेत् ॥ १२.३४ ॥
ब्राह्मण पहले वेदों, वेदाङ्गों, वेदान्तों और स्मृतियोंको पढ़कर, फिर यथाशक्ति दूसरे (शास्त्र) भी पढ़े।
आत्मज्ञाननिमित्तं तु सिद्धान्तानि विचिन्तयेत् ।
केवलानि तु योऽधीते वेदबाह्यो भवेद् द्विजः ॥ १२.३५ ॥
आत्मज्ञानके लिए सिद्धान्तों (दर्शनों) का चिन्तन करे; पर जो केवल उन्हींको पढ़ता है, वह द्विज वेदबाह्य हो जाता है।
पाठभेद — (पृ. १३२, पं. १९) निमित्तं हि सिद्धान्ता (न् हि) नि...अप. १६
(पृ. १३३, पं. १) केवलानि यदाधीते अप. १७
वेदान्तान्यः पठेद्विप्रश्चतुरश्चानुपूर्वशः ।
तथा शाखोपशाखानि गुह्यान्यादेशकानि च ॥ १२.३६ ॥
जो विप्र चारों वेदान्तों (वेदों) को क्रमसे पढ़े, तथा शाखाओं-उपशाखाओं, गुह्य (उपनिषदों) और आदेशोंको,
सर्ववेदप्रणीतानि मन्त्रांश्चापि पवित्रकान् ।
स सर्वविद्भवेद्विप्रो वेदवेदान्तपारगः ॥ १२.३७ ॥
सब वेदोंके रचे मन्त्रों और पवित्र (सूक्तों) को भी — वह विप्र सर्वज्ञ, वेद-वेदान्तका पारगामी होता है।
आत्मोपासनाफलम्
तथा चात्मगुणैर्युक्त आत्मोपासनतत्परः ।
वेदतुल्यो भवेत् सोऽपि ऋषितुल्यो द्विजोत्तमः ॥ १२.३८ ॥
और जो आत्माके गुणोंसे युक्त, आत्मोपासनामें तत्पर हो, वह श्रेष्ठ द्विज भी वेदके तुल्य, ऋषिके तुल्य होता है।
एकेनापि भवेत्तेन सर्वधर्मविनिश्चयः ।
पङ्क्तिं पावयते चैव उद्धरिष्यत्यनुग्रहात् ॥ १२.३९ ॥
उस एक (ऐसे द्विज) से भी सब धर्मोंका निर्णय हो जाता है; वह पंक्तिको पवित्र करता है, और (अपने) अनुग्रहसे (दूसरोंका) उद्धार करेगा।
वेदशास्त्रमाहात्म्यम्
अनन्तं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रं सनातनम् ।
वेदितव्यं प्रयत्नेन सर्ववर्गफलप्रदम् ॥ १२.४० ॥
सनातन वेदशास्त्र अनन्त और अप्रमेय है; (वह) प्रयत्नसे जानना चाहिए, (वह) सब पुरुषार्थोंका फल देनेवाला है।
वेदमेव समभ्यस्येद्वेदश्चक्षुः सनातनम् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदप्रतिष्ठितम् ॥ १२.४१ ॥
वेदका ही भली-भाँति अभ्यास करे; वेद सनातन नेत्र है; भूत, वर्तमान और भविष्य — सब वेदमें प्रतिष्ठित है।
अनन्तं चाप्रमाणं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति ।
इति संचिन्त्य मुनिना वेदाचार्येण धीमता ॥
याज्ञवल्क्येन विप्राणां त्रयीमार्गः प्रदर्शितः ॥ १२.४२ ॥
अनन्त और अपरिमित सब (कुछ) वेदसे ही सिद्ध होता है — ऐसा विचार करके बुद्धिमान् वेदाचार्य मुनि याज्ञवल्क्यने विप्रोंके लिए त्रयीका मार्ग दिखाया,
येन गच्छन्ति विद्वांसः सत्पथा ब्रह्मणोऽन्तिकम् ।
असत्पथेन विप्रस्य गमनं हि विरुध्यते ॥ १२.४३ ॥
जिससे विद्वान् सन्मार्गसे ब्रह्मके निकट जाते हैं; विप्रका कुमार्गसे जाना (धर्मके) विरुद्ध है।
एतत्स्मृतिप्रतिपादितविषयपरिसङ्ख्यानम्
वेदान्तानां हि सर्वेषां या निष्ठा समुदाहृता ।
उपास्या यादृशी चैव मुनिना समुदाहृता ॥ १२.४४ ॥
सब वेदान्तोंकी जो निष्ठा (निष्कर्ष) कही गयी है, और जैसी उपासना (करनी चाहिए) — (वह) मुनिने कही है:
ओंकारस्याथ गायत्र्या व्याहृतीनां शिरस्य च
स्नानस्य चैव संध्यायाः प्राणायामस्य चैव हि ॥ १२.४५ ॥
ओंकार, गायत्री, व्याहृतियों और शिरस्की, स्नान, संध्या और प्राणायामकी,
प्रत्याहारस्य ध्यानस्य मार्जनान्तर्जलस्य च ।
उपस्थानस्य होमस्य आत्मज्ञानस्य यो विधिः ॥ १२.४६ ॥
प्रत्याहार, ध्यान, मार्जन और अन्तर्जलकी, उपस्थान, होम और आत्मज्ञानकी जो विधि है,
विद्याऽविद्याविचारं च त्रयीविद्याभिशंसनम् ।
तत् सर्वं मुनिना प्रोक्तं विप्राणां हितकाम्यया ॥ १२.४७ ॥
विद्या-अविद्याका विचार और त्रयीविद्याकी प्रशंसा — वह सब मुनिने विप्रोंके हितकी कामनासे कहा।
एतत्स्मृत्यध्ययनफलम्
य इदं धारयेद्विप्रः स्वधीतं शृणुयाच्च यः ।
मया स ते तु यः प्रोक्तं(?) सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १२.४८ ॥
जो विप्र इसे धारण करे, भली-भाँति पढ़े और जो सुने — मैंने (तुमसे) जो कहा है (?) — वह अमृतत्वके योग्य होता है।
एतत्स्मृत्यध्ययनाधिकारी
सर्वाणि भूतानि ममान्तराणि सर्वेषु भूतेष्वहमन्तरस्थः ।
पश्यन्ति ये योगविदो मनुष्यास्तेषां प्रदेयं न तु योऽन्यथा स्यात् ॥ १२.४९ ॥
"सब भूत मेरे भीतर हैं, और मैं सब भूतोंके भीतर स्थित हूँ" — जो योगवेत्ता मनुष्य (ऐसा) देखते हैं, उन्हें (यह शास्त्र) देना चाहिए; जो अन्यथा हो, उसे नहीं।
इति श्रीबृहद्योगियाज्ञवल्क्ये (विद्याऽविद्या- निर्णयो नाम) द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥
पाठभेद — (पृ. १३४, पं. ११) ...ध्यायः समाप्तः आ.; कुण्डलितः पाठः आदर्शपुस्तके नास्ति । ॥श्रीरस्तु॥ ॥कल्याणमस्तु॥ ॥ शुभं भवतु॥ इति वाक्यत्रयमधिकम् आ.
ग्रन्थनामसंक्षेप-चिह्नविशेष-बोधिनी
अग्नि. — अग्निपुराणम्, पुण्यपत्तनस्थाऽऽनंदाश्रममुद्रितम् ।
अत्रि. — अत्रिस्मृतिः, पुण्यपत्तनस्थाऽऽनंदाश्रममुद्रिता ।
अत्रिसं. — अत्रिसंहिता, ”
अथ. — अथर्ववेदसंहिता
अप. — अपरार्कविरचिता याज्ञवल्क्यस्मृतिटीका ।
आ. — आदर्शपुस्तकम्, भाण्डारकरप्राच्यविद्यामंदिरग्रन्थालये 354/of 1875-76 इति संकेतितम् ।
आम. — आचारमयूखः, भट्टनीलकण्ठविरचितः, घारपुरेसंपादितः ।
आर. — आचाररत्नम्, लक्ष्मणभट्टविरचितम्, निर्णयसागरमुद्रितम् ।
आश्रौ. — आश्वलायनश्रौतसूत्रम्
इ. — ब्रिटिशम्यूझियमग्रन्थालये 349 इति संकेतितं पुस्तकम् ।
उ. — उपनिषद्
ऋ. — ऋग्वेदसंहिता
कठ. — काठकोपनिषद्
काश्रौ. — कात्यायनश्रौतसूत्रम्
कासं. — काठकसंहिता
कुल्लू. — मन्वर्थमुक्तावली कुल्लूकभट्टविरचिता ।
खिल. — खिलसूक्तानि
ग. — गरुडमहापुराणम्
गीता. — श्रीमद्भगवद्गीता
छा. उ. — छान्दोग्योपनिषद्
तैआ. — तैत्तिरीयारण्यकम्
तैत्ति. उप. — तैत्तिरीयोपनिषद्
तैब्रा. — तैत्तिरीयब्राह्मणम्
तैसं. — तैत्तिरीयसंहिता
दक्ष. — दक्षस्मृतिः
दान. — दानखण्डः
दीप. — दीपकलिका, शूलपाणिविरचिता, घारपुरेसंपादिता ।
ध्या. — ध्यानबिन्दूपनिषद्
पमा. — पराशरमाधवः, माधवाचार्यविरचिता पराशरस्मृतिव्याख्या, बॉम्बेसंस्कृतसीरीज्-मुद्रिता ।
परि. — परिभाषाप्रकाशः, परिशिष्टम् वा ।
पृ. — पृष्ठम्
प्राणाग्निहोत्रोप. — प्राणाग्निहोत्रोपनिषद्
प्राम. — प्रायश्चित्तमयूखः, घारपुरेसंपादितः ।
बृ. — बृहस्पतिस्मृतिः, रंगस्वामी ऐय्यंगारसंकलिता ।
बृप. — बृहत्पराशरसंहिता
बृया. — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः
बौ. — बौधायनधर्मसूत्रम्
ब्र. सू. शां. भा. — ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्
ब्रह्मसूत्र शां. भा. — ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्
मद. — मदनपारिजातः
मदी. — मंत्रार्थदीपिका (चौखंबा सं. सी.)
मनु. — मनुस्मृतिः
मा. आ. — माण्डूक्यकारिकायामागमप्रकरणम्
मुण्डक. — मुण्डकोपनिषद्
मेधातिथिः — मनुस्मृतिभाष्यम्, मेधातिथिप्रणीतम् ।
मैआ. — मैत्रायणीयमारण्यकम्
मैसं. — मैत्रायणीसंहिता
याज्ञ. — याज्ञवल्क्यस्मृतिः
याज्ञ. वीमि. — याज्ञवल्क्यटीकात्मकः वीरमित्रोदयः
योया. — योगयाज्ञवल्क्यसंहिता (याज्ञवल्क्यगार्गीसंवादरूपा)
लघुशंखस्मृ. — लघुशङ्खस्मृतिः
वासिष्ठस्मृ. — वसिष्ठस्मृतिः
वासं. — वाजसनेयिसंहिता
विश्वरूपः — विश्वरूपाचार्यविरचिता याज्ञवल्क्यस्मृतिटीका
वीमि. — वीरमित्रोदये आह्निकप्रकाशः
वै. — वैद्यनाथीयम्, स्मृतिमुक्ताफले आह्निककाण्डम् ।
व्रत. — व्रतखण्डः
शंख. — शंखस्मृतिः
शतपथ. — शतपथब्राह्मणम्
शान्ति. — शान्तिपर्व (महाभारतीयम्)
श्रा. — श्राद्धकाण्डम्
सं. — संध्यावन्दनविधिः, पं. हरदेवशर्मविरचितः ।
सम. — समयमयूखः, समयप्रकाशः वा ।
स्मृच. — स्मृतिचन्द्रिकायामाह्निकप्रकरणम्, घारपुरेसंपादितम् ।
स्मृत. — स्मृतितत्त्वे आह्निकतत्त्वम्
हठ. — हठप्रदीपिका
हठप्रदी. — हठप्रदीपिकाटीका ज्योत्स्ना ।
हे. — हेमाद्रिविरचितः चतुर्वर्गचिन्तामणिः ।
* — पत्रात्मकपुस्तकस्य निरङ्कपृष्ठद्योतकं चिह्नम्
( ) — मूलसंहितायां संपादककल्पितः पाठः सर्वत्रैवाविधकुण्डलाङ्कितः ।
सूचना — ग्रन्थसंक्षेपस्पष्टीकरणमिषेणात्रानेके पाठभेदार्थमालोचिता ग्रन्थाः सूचिता एव । ततोऽप्यधिका अमृतनादोपनिषद्, ब्रह्मबिन्दूपनिषत्, मिताक्षरा, मुण्डकोपनिषत्, श्वेताश्वतरोपनिषच्चेति पाठभेदार्थमालोचिता इति विज्ञेयम् ।
शोधन-सूची
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पृ. ८, पं. ८: छपा ‘(प्लुतं dropped) तं कुर्यान्न’ → ‘प्लुतं कुर्यान्न’।
पृ. ८८, पं. ८: छपा ‘त्रिरयं प्रायसंयमः’ → ‘त्रिरयं प्राणसंयमः’।
पृ. ८८, पं. ९: छपा ‘तपः सत्वं’ → ‘तपः सत्यं’।
पृ. ९७, पं. १२: छपा ‘जीवशः’ → ‘जीवश्च’।
पृ. ९९, पं. ८: छपा ‘ईश्वरं रुषाख्यं (gap)’ → ‘ईश्वरं पुरुषाख्यं’।
पृ. ११०, fn: छपा ‘१८(?). लोमबर्हि...इ.’ → ‘१७.’।
पृ. ११९, fn: छपा ‘२-३. याज्ञ. १.२२...’ → ‘४-५.’।
पृ. १२२, fn 16-17: छपा ‘ऋ. १., १६४. ९’ → ‘ऋ. १.१६४.३९’।
पृ. १११, पं. ६: छपा ‘तन्स्थं (broken)’ → ‘तन्स्थं (?)’।
पृ. ३९, पं. ११: छपा ‘महताऽप्यनसा (broken type)’ → ‘महतोऽप्येनसो’।
पृ. १८, पं. १७: छपा ‘दक्षिणाग्निमुखे’ → ‘दक्षिणाग्निमुखे’।
विषयानुक्रमणी, 9 विविधानि सूर्यनामधेयानि: छपा अङ्क ७५ (blurred) → ७९।
विषयानुक्रमणी, 9 सूर्यनामधेयनिर्वचनानि: छपा अङ्क ८२ (blurred) → ८१।
विषयानुक्रमणी, 2 प्रणवप्राणायाम...सावित्रीमाहात्म्यम्: छपा अङ्क ६२ (blurred) → ६३।
विषयानुक्रमणी, 7 अघमर्षणसूक्तमाहात्म्यम् (p.84): छपा अङ्क १८१ (as printed; a duplicate of the p.85 row) → १७५।