व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, प्रथमोऽध्यायः
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यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके प्रथमोऽध्यायः — मन्त्रयोगनिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।
प्रथमोऽध्यायः — मन्त्रयोगनिर्णयः
अध्याय-सार — मन्त्रयोगनिर्णय — ग्रन्थका आरम्भ और ढाँचा। मिथिलामें मुनियों, जनक आदि राजाओं और शिष्योंसे घिरे याज्ञवल्क्यके पास ऋषि आते हैं — उन्हीं याज्ञवल्क्यके पास, जिन्होंने यजुर्मन्त्रोंके अभ्यासमें सूर्यको साक्षात् देखा था (१.११)। ऋषियोंके प्रश्न (१.४–१९) पूरे ग्रन्थके विषय हैं: ओंकारसे लेकर ध्यान, संध्या, स्नान, जप और सूर्योपस्थानतक, सूर्यके भीतरका आत्मा, होम और अन्नयज्ञका चिन्तन, विद्या-अविद्या और परम निःश्रेयस। याज्ञवल्क्य वेदान्त, स्मृति और सिद्धान्तोंके सारको कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं (१.२०–२६)। शेष अध्याय (१.२७–४४) सब मन्त्र-कर्मकी भूमिका है: मन्त्रका ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मण जानना क्यों आवश्यक है, इन्हें न जाननेसे फल अल्प होता है, जाननेवालेकी महिमा क्या है, और इन पाँचोंका लक्षण क्या है। आगेके अध्याय प्रत्येक मन्त्रके लिए यही पाँच बातें बताते हैं।
याज्ञवल्क्यवर्णनम्
मिथिलास्थं महात्मानं सर्वयोगीश्वरेश्वरम् ।
भगवन्तं याज्ञवल्क्यं मुनिसङ्घैः समावृतम् ॥ १.१ ॥
मिथिला में स्थित, सब योगीश्वरों के ईश्वर, मुनि-समूहों से घिरे महात्मा भगवान् याज्ञवल्क्य से…
अवतरणिका —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह प्रथम अध्याय 'मन्त्रयोगनिर्णयः' है, जिसमें मन्त्रों के बाह्य प्रयोग और उनके आन्तर योगिक रहस्य का समन्वय किया गया है। ग्रन्थ का आरम्भ उस परिवेश से होता है जहाँ ज्ञान की पिपासा और योग की पूर्णता का मिलन हो रहा है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ऋषयः) मिथिलास्थं महात्मानं सर्वयोगीश्वरेश्वरं भगवन्तं याज्ञवल्क्यं (यः) मुनिसङ्घैः समावृतम् (तं पृच्छन्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• मिथिलास्थं: मिथिला में स्थित। यहाँ 'स्थित' होने का अर्थ केवल भौगोलिक उपस्थिति नहीं, अपितु उस स्थान की चेतना में प्रतिष्ठित होना है।
• महात्मानं: महान आत्मा वाले। जिसकी आत्मा संकुचित अहं से मुक्त होकर विराट स्वरूप में स्थित हो गई हो।
• सर्वयोगीश्वरेश्वरम्: सर्व-योगीश्वर-ईश्वरम्। जो समस्त योगीश्वरों के भी ईश्वर (स्वामी/गुरु) हैं। 'ईश्वर' यहाँ वह है जो अपनी इन्द्रियों और प्राणों पर पूर्ण शासन करता है।
• भगवन्तं: भगवन्तं। वह जो 'भग' (ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य) से युक्त है।
• मुनिसङ्घैः समावृतम्: मुनियों के समूहों से घिरे हुए। 'समावृत' का अर्थ है चारों ओर से घिरा होना, जो यह दर्शाता है कि याज्ञवल्क्य ज्ञान के उस केंद्र बिंदु हैं जहाँ समस्त जिज्ञासु खिंचे चले आते हैं।
भाष्य —
यह श्लोक बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के सम्पूर्ण उपदेश की आधारशिला है। यहाँ वाक्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है; यह एक दीर्घ विशेषण-समूह है जो श्लोक १.४ की क्रिया 'पृच्छन्ति' (पूछते हैं) से जुड़कर पूरा होता है। अर्थात्, "मिथिला में स्थित, योगीश्वरों के ईश्वर, मुनि-समूहों से घिरे भगवान् याज्ञवल्क्य से (ऋषि पूछते हैं)।"
यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य का जो स्वरूप चित्रित किया गया है, वह केवल एक स्मृति-लेखक का नहीं, अपितु एक 'योगीश्वर' का है। वे वही ऋषि हैं जिन्होंने शुक्लयजुर्वेद के मन्त्रों के माध्यम से सूर्य के रहस्य को जाना और बृहदारण्यक के गहन दर्शन को साक्षात् किया। उन्हें 'सर्वयोगीश्वरेश्वर' कहना यह सिद्ध करता है कि उनकी योग-सिद्धि केवल व्यक्तिगत नहीं थी, अपितु वे अन्य योगियों के लिए भी मार्गदर्शक थे।
जब कोई गुरु 'मुनिसङ्घैः समावृतम्' (मुनियों से घिरा) होता है, तो वह केवल भौतिक भीड़ नहीं है, बल्कि यह उस गुरु की 'तेजस' और 'आकर्षण-शक्ति' का प्रतीक है। जो स्वयं पूर्ण है, वही दूसरों की पूर्णता का कारण बनता है। यह स्मृति हमें बताती है कि योग का मार्ग केवल एकांत में नहीं, अपितु एक जीवंत परंपरा और समर्थ गुरु के सान्निध्य में प्रशस्त होता है।
श्रुति-संगति —
इस दृश्य की पृष्ठभूमि श्रुति में स्पष्ट मिलती है:
जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्विदेषाम् ब्राह्मणानामनूचानतम इति ॥ १४.६.१.१ ॥
विदेहके राजा जनकने बहुत दक्षिणावाला यज्ञ किया। उसमें कुरु और पंचाल देशोंके ब्राह्मण एकत्र हुए। उस वैदेह जनकके मनमें यह जाननेकी इच्छा हुई कि इन ब्राह्मणोंमें सबसे बढ़कर अनूचान (वेदका पारंगत प्रवक्ता) कौन है?
श्रुति कहती है कि विदेहराज जनक के यज्ञ में कुरु-पञ्चाल के ब्राह्मण एकत्र हुए थे और जनक के मन में यह जानने की इच्छा हुई कि उनमें सबसे बड़ा 'अनूचान' (वेद का पारंगत प्रवक्ता) कौन है। स्मृति का यह प्रथम श्लोक उसी श्रुति-परम्परा का विस्तार है। जहाँ शतपथ में याज्ञवल्क्य की 'ब्रह्मिष्ठता' और 'वैदिक विद्वत्ता' की परीक्षा होती है, वहीं यह स्मृति उन्हें 'सर्वयोगीश्वरेश्वर' के रूप में प्रतिष्ठित कर उनके योगिक पक्ष को उजागर करती है। श्रुति का वह 'अनूचान' यहाँ 'योगीश्वर' बनकर प्रकट हुआ है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से किसी भी शास्त्र का आरम्भ गुरु के स्वरूप के वर्णन से होना अनिवार्य है, क्योंकि साधक सबसे पहले गुरु के 'गुणों' का ध्यान करता है। जब साधक पढ़ता है 'सर्वयोगीश्वरेश्वरम्', तो वह अपने भीतर उस उच्चतम संभावना का बीज बोता है।
साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह ज्ञान की खोज में उस 'केंद्र' को पहचाने जो स्वयं स्थिर है। याज्ञवल्क्य का 'मिथिलास्थ' होना यह संकेत है कि योग साधना के लिए एक स्थिर आधार आवश्यक है। 'महात्मा' शब्द यहाँ उस अवस्था का बोध कराता है जहाँ साधक का 'स्व' मिटकर 'महात्' में विलीन हो जाता है।
यह श्लोक साधक को 'भक्ति' और 'श्रद्धा' की भूमि पर खड़ा करता है। बिना श्रद्धा के योग का बीज नहीं अंकुरित होता। जब साधक याज्ञवल्क्य के इस स्वरूप का चिंतन करता है, तो वह अपनी चेतना को संकुचित मानसिक स्तर से उठाकर उस 'योगीश्वर' स्तर पर ले जाने का प्रयास करता है, जहाँ समस्त संशय समाप्त हो जाते हैं। यह 'गुरु-ध्यान' की वह प्रथम अवस्था है, जो शिष्य को आगामी गुह्य ब्रह्म के ज्ञान के लिए तैयार करती है।
जनकाद्यैर्नृपवरैः शिष्यैश्चान्यैर्मुमुक्षुभिः ।
योगसिद्धैस्तथान्यैश्च संवृतं ब्रह्मवादिभिः ॥ १.२ ॥
जनक आदि श्रेष्ठ राजाओं, शिष्यों और अन्य मुमुक्षुओं, योगसिद्धों तथा अन्य ब्रह्मवादियोंसे घिरे (याज्ञवल्क्यसे)…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य के उस विराट व्यक्तित्व का परिचय दिया गया, जो समस्त योगीश्वरों के भी स्वामी हैं। वर्तमान श्लोक उसी परिवेश का विस्तार करता है, जहाँ ज्ञान के उस केंद्र बिंदु के चारों ओर उपस्थित जिज्ञासुओं के विविध स्तरों का वर्णन है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (याज्ञवल्क्यं) जनकाद्यैर्नृपवरैः, शिष्यैश्च अन्यैर्मुमुक्षुभिः, योगसिद्धैस्तथ अन्यैश्च ब्रह्मवादिभिः (संवृतम्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• जनकाद्यैर्नृपवरैः: राजा जनक आदि श्रेष्ठ राजाओं द्वारा। 'वर' शब्द यहाँ केवल राजसी ऐश्वर्य के लिए नहीं, अपितु उनके विवेक और ज्ञान-पिपासा के लिए प्रयुक्त है।
• शिष्यैश्च अन्यैर्मुमुक्षुभिः: अन्य शिष्यों और मुमुक्षुओं द्वारा। 'मुमुक्षु' वह है जिसकी एकमात्र अभिलाषा 'मुक्ति' है; जो संसार के बंधनों से विरक्त होकर केवल सत्य की खोज में है।
• योगसिद्धैस्तथ अन्यैश्च: तथा अन्य योगसिद्धों द्वारा। 'योगसिद्ध' वे हैं जिन्होंने योग के अभ्यास से सिद्धियाँ प्राप्त कर ली हैं, किंतु वे अब उन सिद्धियों से परे उस परम तत्व को जानना चाहते हैं।
• ब्रह्मवादिभिः: ब्रह्मवादियों द्वारा। वे जो ब्रह्म-विचार में लीन हैं और शास्त्रार्थ के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करते हैं।
• संवृतं: घिरे हुए। यह शब्द उस आकर्षण को दर्शाता है जो एक पूर्ण गुरु के व्यक्तित्व में होता है, जहाँ भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों के लोग एक ही लक्ष्य के लिए एकत्रित होते हैं।
भाष्य —
यह श्लोक अभी भी एक विशेषण-श्रृंखला का हिस्सा है, जिसका मुख्य क्रिया-पद श्लोक १.४ में 'पृच्छन्ति' (पूछते हैं) के रूप में आता है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य के चारों ओर उपस्थित श्रोतामण्डल का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है।
रहस्य यह है कि सत्य की खोज किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं है। इस सभा में तीन भिन्न स्तरों के साधक उपस्थित हैं: प्रथम, 'नृपवर' (जनक आदि), जो कर्म और सत्ता के शिखर पर होते हुए भी वैराग्य और विवेक से युक्त हैं। द्वितीय, 'मुमुक्षु और शिष्य', जो अभी मार्ग की खोज में हैं और पूर्णतः समर्पित हैं। तृतीय, 'योगसिद्ध और ब्रह्मवादी', जो साधन की उच्च अवस्था (सिद्धियों और शास्त्र-ज्ञान) को प्राप्त कर चुके हैं, किंतु अब वे उस 'अंतिम सत्य' के साक्षात्कार के लिए व्याकुल हैं।
यह विन्यास यह दर्शाता है कि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का उपदेश केवल किसी एक श्रेणी के लिए नहीं, अपितु समस्त मानवता के लिए है—चाहे वह राजमहल में हो, आश्रम में हो या योग की गहन गुफाओं में। जब राजा, शिष्य, सिद्ध और विद्वान एक ही स्थान पर एक ही प्रश्न के लिए एकत्रित होते हैं, तब वह स्थान 'विद्या-केंद्र' बन जाता है। यहाँ याज्ञवल्क्य केवल एक शिक्षक नहीं, अपितु वह सेतु हैं जो स्थूल सत्ता (राजा), सूक्ष्म अभ्यास (योगसिद्ध) और बौद्धिक विमर्श (ब्रह्मवादी) को एक सूत्र में पिरोकर उन्हें 'ब्रह्म' की ओर ले जाते हैं।
श्रुति-संगति —
जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्विदेषाम् ब्राह्मणानामनूचानतम इति ॥ १४.६.१.१ ॥
विदेहके राजा जनकने बहुत दक्षिणावाला यज्ञ किया। उसमें कुरु और पंचाल देशोंके ब्राह्मण एकत्र हुए। उस वैदेह जनकके मनमें यह जाननेकी इच्छा हुई कि इन ब्राह्मणोंमें सबसे बढ़कर अनूचान (वेदका पारंगत प्रवक्ता) कौन है?
श्रुति में भी विदेहराज जनक के उस महान यज्ञ का वर्णन आता है जहाँ कुरु और पंचालों के ब्राह्मण एकत्र हुए थे और जनक के मन में यह जानने की जिज्ञासा थी कि उन सबमें श्रेष्ठ प्रवक्ता कौन है। स्मृति का यह प्रसंग उसी श्रुति-परम्परा का विस्तार है। जहाँ शतपथ में जिज्ञासा 'श्रेष्ठ प्रवक्ता' को खोजने की थी, वहीं इस स्मृति में वह जिज्ञासा 'सनातन गुह्य ब्रह्म' को जानने की है। यह परिवर्तन दर्शाता है कि बाहरी यज्ञों और विद्वता के उत्सव से आगे बढ़कर अब साधक का लक्ष्य केवल आत्म-साक्षात्कार है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'संगत' और 'सत्संग' के महत्व को उद्घाटित करता है। योगिक अभ्यास में केवल एकांत पर्याप्त नहीं है, अपितु एक ऐसे गुरु का सान्निध्य आवश्यक है जिसके समक्ष भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों के साधक अपनी सीमाओं को छोड़कर एक हो सकें।
यहाँ 'मुमुक्षु' भाव वह बीज है, जिससे योग का वृक्ष जन्म लेता है। जब एक योगसिद्ध (जिसने शक्तियों को प्राप्त कर लिया है) भी एक मुमुक्षु की भाँति याज्ञवल्क्य के सम्मुख बैठता है, तो वह यह अनुभव करता है कि 'सिद्धि' लक्ष्य नहीं, बल्कि मार्ग का एक पड़ाव मात्र है। साधक यहाँ यह सीखता है कि ज्ञान के मार्ग पर अहंकार का त्याग अनिवार्य है; चाहे वह सत्ता का अहंकार हो (राजा), ज्ञान का (ब्रह्मवादी) या शक्ति का (योगसिद्ध)। जब ये सभी 'संवृत' (घिरे हुए) होकर मौन होते हैं, तभी हृदय में उस ब्रह्म-ध्वनि को सुनने की पात्रता उत्पन्न होती है। यह श्लोक साधक को 'समर्पण' की उस भूमि पर ले जाता है जहाँ से वास्तविक प्रश्न का आरम्भ होता है।
सुखासीनं मुनिवरं ध्यानयोगपरायणम् ।
सर्वसंशयच्छेत्तारं ब्रह्मकल्पं महामुनिम् ॥ १.३ ॥
…सुखपूर्वक बैठे हुए, मुनियोंमें श्रेष्ठ, ध्यानयोगमें तत्पर, सब संशयोंको काटनेवाले, ब्रह्माके समान महामुनिसे —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य के चारों ओर उपस्थित जिज्ञासुओं के विविध स्तरों का वर्णन किया गया। वर्तमान श्लोक उन महान विभूतियों के सम्मुख विराजमान स्वयं महर्षि याज्ञवल्क्य की उस आंतरिक और बाह्य अवस्था का चित्रण करता है, जो उन्हें एक पूर्ण गुरु और योगेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (भगवन्तं याज्ञवल्क्यं) सुखासीनं, मुनिवरं, ध्यानयोगपरायणम्, सर्वसंशयच्छेत्तारं, ब्रह्मकल्पं महामुनिम् (पृच्छन्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सुखासीनं: सुखपूर्वक बैठे हुए। यहाँ 'सुख' केवल शारीरिक आराम नहीं, अपितु वह 'स्थिरता' है जो योग के अभ्यास से आती है। जब शरीर और प्राण संतुलित होते हैं, तब आसन सुखद हो जाता है।
• मुनिवरं: मुनियों में श्रेष्ठ। 'मुनि' वह है जिसने मन को जीत लिया हो (मनोनिग्रहं यः कुरुते स मुनिः)। याज्ञवल्क्य ऐसे मन-जित मुनियों में भी शिरोमणि हैं।
• ध्यानयोगपरायणम्: जिसका परायण (परम लक्ष्य और स्वभाव) ध्यान-योग है। 'परायण' शब्द दर्शाता है कि ध्यान उनके लिए कोई क्रिया नहीं, अपितु उनकी निरंतर स्थिति है।
• सर्वसंशयच्छेत्तारं: सब संशयों को काटने वाले। 'च्छेत्ता' का अर्थ है वह जो जड़ से काट दे। संशय ज्ञान के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है, जिसे केवल अनुभवसिद्ध ज्ञान ही समाप्त कर सकता है।
• ब्रह्मकल्पं: ब्रह्मा के समान। 'कल्प' का अर्थ है स्वरूप या साम्य। जो ब्रह्म के स्वरूप में स्थित है, जिसका व्यक्तित्व ब्रह्ममय हो गया है, वह ब्रह्मकल्प है।
• महामुनिम्: महान मुनि।
भाष्य —
यह श्लोक भी एक विशेषण-श्रृंखला का विस्तार है, जिसका मुख्य क्रिया-पद श्लोक १.४ में 'पृच्छन्ति' (पूछते हैं) के रूप में आता है। यहाँ याज्ञवल्क्य के उन गुणों का वर्णन है जो एक साधक को 'ब्रह्मज्ञानी' बनाते हैं।
सबसे पहले उन्हें 'सुखासीन' कहा गया है। योगशास्त्र में आसन की स्थिरता का सीधा सम्बन्ध चित्त की स्थिरता से है। जब साधक का प्राण संतुलित होता है, तब शरीर बोझ नहीं लगता और वह 'सुख' की स्थिति में आ जाता है। यह सुख भौतिक नहीं, अपितु योगिक है। इसी सहजता के साथ वे 'ध्यानयोगपरायण' हैं। इसका भाव यह है कि वे केवल ध्यान करते नहीं हैं, बल्कि वे ध्यान में ही स्थित हैं। उनकी चेतना निरंतर उस केंद्र में है जहाँ से समस्त सृष्टि का संचालन होता है।
जब कोई योगी ध्यान की उस पराकाष्ठा पर पहुँचता है, तब वह 'सर्वसंशयच्छेत्ता' बन जाता है। संशय तब तक रहता है जब तक सत्य केवल शब्दों (श्रुति-स्मृति) में हो; जैसे ही सत्य का साक्षात्कार (अनुभव) होता है, संशय स्वतः नष्ट हो जाते हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य के पास वह अनुभव-प्रकाश है, जो जिज्ञासुओं के हृदय में व्याप्त अविद्या के अंधकार और संशयों को क्षण भर में काट देने में समर्थ है।
अंत में उन्हें 'ब्रह्मकल्प' कहा गया है। इसका रहस्य यह है कि याज्ञवल्क्य ने स्वयं को ब्रह्म में लीन कर लिया है। वे स्वयं ब्रह्मा नहीं हैं, अपितु उनका स्वरूप ब्रह्मा के समान हो गया है। जिस प्रकार अग्नि में तपकर लोहा अग्नि जैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म-विद्या के तप से याज्ञवल्क्य का व्यक्तित्व ब्रह्ममय हो गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
संशयों के निवारण और हृदय की ग्रंथियों के खुलने के सम्बन्ध में उपनिषद् कहता है:
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ २.२.८ ॥
उस परावर (कारण और कार्य दोनोंसे परे) के दर्शन होनेपर हृदयकी गाँठ खुल जाती है, सब संशय कट जाते हैं, और इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं।
मुण्डक उपनिषद् के इस अंश से स्पष्ट है कि जब साधक उस 'परावरे' (परम तत्व) का दर्शन कर लेता है, तब हृदय की गाँठें खुल जाती हैं और समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि को 'सर्वसंशयच्छेत्ता' कहना इसी श्रुति-सत्य का प्रमाण है कि उन्होंने उस परावर का दर्शन कर लिया है, इसलिए वे दूसरों के संशयों को काटने में समर्थ हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अवस्था' और 'साधन' के सम्बन्ध को प्रकट करता है। 'सुखासीन' होना इस बात का संकेत है कि जब तक शरीर और प्राण के स्तर पर स्थिरता (स्थिरसुखमासनम्) नहीं आती, तब तक उच्च ध्यान संभव नहीं है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि 'ध्यानयोगपरायण' होने का अर्थ है—साँसों के माध्यम से मन को हृदय के उस केंद्र में ले जाना जहाँ कोई द्वंद्व न हो। जब मन इस शून्य स्थिति में स्थिर होता है, तब संशयों का उदय होना बंद हो जाता है। 'सर्वसंशयच्छेत्ता' वह स्थिति है जहाँ साधक को यह बोध होता है कि प्रश्न और उत्तर दोनों मन की उपज हैं; जब मन शांत होता है, तो केवल 'सत्य' शेष रहता है, संशय नहीं।
इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक पहले अपने आसन को सुखद बनाए (प्राणों के संतुलन से), फिर ध्यान में अपनी निरंतरता (परायणता) स्थापित करे, ताकि वह उस 'ब्रह्मकल्प' स्थिति की ओर बढ़ सके जहाँ वह स्वयं को और संपूर्ण जगत को ब्रह्ममय अनुभव करने लगे।
ऋषिप्रश्नाः
तं पृच्छन्ति महात्मानमृषयः संशितव्रताः ।
संसारतारणार्थाय गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ॥ १.४ ॥
…कठोर व्रतवाले ऋषि उन महात्मा से संसारसे पार होनेके लिए सनातन गुह्य ब्रह्म के विषयमें पूछते हैं।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य की उस योगस्थ अवस्था का वर्णन किया गया, जहाँ वे संशयों के छेदन करने वाले और ब्रह्मस्वरूप के रूप में विराजमान हैं। अब यह श्लोक उन जिज्ञासु ऋषियों की पात्रता और उनके प्रश्न के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: संशितव्रताः ऋषयः तं महात्मानं संसारतारणार्थाय गुह्यं सनातनं ब्रह्म पृच्छन्ति।
पदार्थ और निर्वचन:
• संशितव्रताः: कठोर व्रत का पालन करने वाले। 'संशित' का अर्थ है तीक्ष्ण या प्रखर। यहाँ व्रत केवल बाह्य नियमों का पालन नहीं, अपितु इंद्रिय-निग्रह और प्राणों के संयम की वह तीव्रता है जो साधक को पात्रता प्रदान करती है।
• महात्मानं: महान आत्मा वाले। यहाँ याज्ञवल्क्य के लिए प्रयुक्त यह शब्द उनकी उस स्थिति का सूचक है जहाँ व्यक्तिगत 'अहं' समाप्त हो चुका है और केवल 'महात्मान' (ब्रह्मस्वरूप) शेष है।
• संसारतारणार्थाय: संसार रूपी सागर से पार होने के लिए। 'तारण' का अर्थ है वह संक्रमण, जहाँ जीव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर शाश्वत स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाता है।
• गुह्यं: गुप्त या रहस्यमय। वह ज्ञान जो इंद्रियों के प्रत्यक्ष अनुभव से परे है और केवल योग्य शिष्य के हृदय में ही प्रकट होता है।
• सनातनं ब्रह्म: वह ब्रह्म जो समय और काल की सीमाओं से परे, अनादि और अनंत है।
भाष्य —
श्लोक १.१ से १.४ तक एक ही दीर्घ वाक्य है, जिसकी क्रिया 'पृच्छन्ति' (पूछते हैं) इस चौथे श्लोक में पूर्ण होती है। यह संपूर्ण प्रसंग एक गुरु-शिष्य संवाद की भूमिका है।
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य है कि प्रश्न पूछने वाले केवल साधारण जिज्ञासु नहीं, अपितु 'संशितव्रताः' ऋषि हैं। यह संकेत है कि ब्रह्म-विद्या कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे केवल बौद्धिक जिज्ञासा से प्राप्त किया जा सके। जब साधक कठोर तप और व्रतों के माध्यम से अपने चित्त को शुद्ध कर लेता है, तभी वह उस 'गुह्य' ज्ञान को ग्रहण करने के योग्य होता है।
ऋषियों का प्रयोजन केवल सूचना प्राप्त करना नहीं, अपितु 'संसारतारण' है। संसार वह प्रवाह है जो जीव को निरंतर भटकाता रहता है। इस प्रवाह से पार उतरने के लिए उन्हें उस 'सनातन ब्रह्म' की आवश्यकता है, जो परिवर्तनशील जगत के पीछे का अपरिवर्तनीय सत्य है। याज्ञवल्क्य यहाँ केवल एक शिक्षक नहीं, अपितु उस पार ले जाने वाले 'नाविक' (गुरु) के रूप में प्रतिष्ठित हैं, क्योंकि वे स्वयं उस तट पर पहुँच चुके हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ १.१.३ ॥
महागृहस्थ शौनक विधिपूर्वक अङ्गिराके पास (शिष्य होकर) पहुँचे और पूछा — भगवन्, किसके जान लेनेपर यह सब जाना हुआ हो जाता है?
मुण्डक उपनिषद् में भी यही परंपरा दिखती है जहाँ शौनक ऋषि विधिपूर्वक अङ्गिरा के पास जाकर पूछते हैं कि वह कौन सा तत्त्व है जिसे जान लेने पर सब कुछ जाना हुआ हो जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मुण्डक उपनिषद् दोनों इस बात की पुष्टि करते हैं कि परम ज्ञान की प्राप्ति के लिए 'विधिपूर्वक' गुरु के समीप जाना और पात्रता (व्रत) का होना अनिवार्य है। जहाँ शौनक 'सर्वज्ञता' की जिज्ञासा करते हैं, वहीं यहाँ के ऋषि 'तारण' (मुक्ति) की अभिलाषा रखते हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन-पात्रता' का सूत्र है। योग मार्ग में ज्ञान का उदय तब नहीं होता जब मन्त्र या विधि ज्ञात हो, बल्कि तब होता है जब साधक 'संशितव्रत' हो जाता है। यहाँ व्रत का अर्थ है—प्राण और मन का वह अनुशासन जो चित्त की वृत्तियों को शांत कर उसे एकनिष्ठ बनाता है।
'संसारतारण' का योगिक अर्थ है—चेतना का स्थूल शरीर और प्राणों के बंधन से ऊपर उठकर सूक्ष्म और फिर कारण शरीर को पार कर अक्षर-ब्रह्म में विलीन होना। जब ऋषि 'गुह्य ब्रह्म' पूछते हैं, तो वे वास्तव में उस आंतरिक सूर्य (हृदय-ज्योति) के रहस्य को जानना चाहते हैं, जिसे याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति-साधना से साक्षात् किया था।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि गुरु के सम्मुख समर्पण और कठोर आत्म-अनुशासन ही वह कुंजी है, जिससे 'गुह्य' (गुप्त) रहस्य खुलते हैं। यह स्थिति साधक को 'जिज्ञासा' की भूमि से उठाकर 'मुमुक्षुता' (मुक्ति की तीव्र इच्छा) की भूमि पर ले जाती है।
भगवन् सर्वयोगीश ब्रूहि नः संशयो महान् ।
यः सारः सर्ववेदानां वेदान्तानां तथैव च ॥ १.५ ॥
"हे भगवन्! हे सब योगियों के स्वामी! हमें बताइये, हमारा संशय बड़ा है — जो सब वेदों का और उसी प्रकार वेदान्तों का सार है…"
अवतरणिका —
ऋषियों ने संसार से पार उतरने के लिए सनातन गुह्य ब्रह्म के विषय में प्रश्न किया। अब इस श्लोक से वे अपनी जिज्ञासा को एक विशिष्ट दिशा देते हुए समस्त ज्ञान-परम्परा के निचोड़ या 'सार' की माँग करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (हे) भगवन्! सर्वयोगीश! अस्माकं संशयः महान् (अस्ति), अतः नः ब्रूहि— यः सारः सर्ववेदानां वेदान्तानां तथैव च (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• भगवन्: ऐश्वर्य और ज्ञान से पूर्ण। यहाँ यह संबोधन याज्ञवल्क्य की उस पूर्णता के लिए है, जहाँ वे केवल एक शिक्षक नहीं, अपितु साक्षात् ब्रह्म-स्वरूप के अनुभवदाता हैं।
• सर्वयोगीश: सब योगियों के स्वामी। 'योगीश' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग का अर्थ केवल आसन-प्राणायाम नहीं, अपितु 'युज' धातु से वह सामरस्य है जो जीव को शिव से जोड़ दे। याज्ञवल्क्य उस सामरस्य की पराकाष्ठा (ईश्वर) हैं।
• संशयो महान्: संशय बड़ा है। यहाँ संशय का अर्थ अज्ञान या संदेह नहीं, अपितु 'जिज्ञासा की तीव्रता' है। जब साधक की साधना परिपक्व होती है, तब उसके भीतर एक महान तड़प उठती है कि वह अब विखरे हुए ज्ञान के स्थान पर एक एकीकृत सत्य को प्राप्त करे।
• सारः: निचोड़ या तत्त्व। जैसे अनेक औषधियों के मिश्रण से एक सार-तत्व निकलता है जो रोग को जड़ से मिटाता है, वैसे ही वेदों के विस्तृत कर्मकाण्डों और वेदान्तों के दार्शनिक विमर्शों के पीछे जो एक मूल सत्य है, उसे 'सार' कहा गया है।
• सर्ववेदानां वेदान्तानां: समस्त वेदों और वेदान्तों का। वेदों में जहाँ विधि और उपासना है, वेदान्तों में जहाँ ज्ञान और विश्लेषण है— इन दोनों के समन्वय का प्रश्न यहाँ है।
भाष्य —
इस श्लोक से ऋषियों के प्रश्नों की एक लंबी श्रृंखला आरम्भ होती है, जिसका वाक्य-विस्तार श्लोक १.७ तक चलता है। यहाँ ऋषियों ने याज्ञवल्क्य को 'सर्वयोगीश' कहकर संबोधित किया है, जो यह दर्शाता है कि वे याज्ञवल्क्य को केवल एक स्मृति-शास्त्री या व्याकरण-विज्ञ नहीं, अपितु उस योग-सिद्धि के स्वामी के रूप में देखते हैं जिसने श्रुति के बीजरूप रहस्यों को अनुभव-रूप में रूपांतरित कर लिया है।
ऋषियों का प्रश्न है— "वह सार क्या है?" यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ है। वेद विशाल हैं, उनमें हज़ारों मन्त्र हैं, अनेक यज्ञ हैं और विविध विधियाँ हैं। वेदान्तों में भी अनेक मत हैं। एक साधक जब इस विस्तार में खो जाता है, तो वह दिशाहीन हो सकता है। इसलिए, वे उस 'एक सूत्र' की खोज कर रहे हैं जिसे पकड़कर संपूर्ण वेदों का अर्थ समझा जा सके और जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो।
भाव यह है कि सत्य एक ही है, किन्तु उसे व्यक्त करने वाले ग्रन्थ और मार्ग अनेक हैं। ऋषियों की यह प्रार्थना है कि उन्हें वह 'एक' सत्य बताया जाए, जो समस्त ज्ञान-शाखाओं का मूल है। वे बाहरी विस्तार से हटकर आन्तरिक केन्द्र की ओर बढ़ना चाहते हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १.२.१५ ॥
सब वेद जिस पदका बार-बार वर्णन करते हैं, सब तप जिसे कहते हैं, जिसकी इच्छासे (साधक) ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं — वह पद मैं तुम्हें संक्षेपमें कहता हूँ: वह 'ओम्' है।
कठोपनिषद् में भी इसी प्रकार की जिज्ञासा का समाधान मिलता है, जहाँ यह बताया गया है कि समस्त वेद जिस एक पद का वर्णन करते हैं और समस्त तप जिसे कहते हैं, वह संक्षेप में 'ओम्' है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में भी ऋषियों का प्रश्न इसी दिशा में जा रहा है— वे उस एक 'सार' को खोज रहे हैं, जो आगे चलकर ओंकार, व्याहृति और गायत्री के रूप में प्रकट होगा। उपनिषद् और यह स्मृति दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि ज्ञान का लक्ष्य विस्तार नहीं, अपितु संक्षेपण (एकत्व) है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साधक की पात्रता' और 'एकत्रीकरण' के अभ्यास को दर्शाता है। साधक जब अपनी साधना के प्रारंभिक सोपानों को पार करता है, तो उसके पास बहुत सारी जानकारियाँ एकत्र हो जाती हैं, किन्तु वह 'अनुभव' से दूर रहता है।
यहाँ 'महान् संशय' का अर्थ है— साधक की वह अवस्था जहाँ वह अब विखंडित ज्ञान से संतुष्ट नहीं है। वह 'बहु' से 'एक' की ओर जाना चाहता है। योग का वास्तविक अभ्यास यही है कि मन की बिखरी हुई वृत्तियों को समेटकर एक केन्द्र पर लाया जाए। जिस प्रकार अनेक नदियों का सार समुद्र है, उसी प्रकार समस्त शास्त्रों का सार वह एक 'अक्षर' या 'बिन्दु' है जिसे साधक अपने भीतर अनुभव करता है। साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि साधना का लक्ष्य केवल ग्रंथों का अध्ययन नहीं, अपितु उन ग्रंथों के 'सार' को अपने प्राणों में उतारना है। यह 'बहुत्व' से 'एकत्व' की ओर जाने वाली भूमि का आरम्भ है।
सिद्धान्तानां च सर्वेषां स्मृतीनां च महामुने ।
चतुर्दशानां विद्यानां यस्तु सारः प्रकीर्तितः ॥ १.६ ॥
और सब सिद्धान्तों का तथा स्मृतियों का, हे महामुने! चौदह विद्याओं का जो सार कहा गया है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ऋषियों ने वेदों और वेदान्तों के सार की जिज्ञासा की थी। अब वे अपनी जिज्ञासा का विस्तार करते हुए समस्त शास्त्रीय उपलब्धियों, स्मृतियों और चौदह विद्याओं के उस एक मूल तत्त्व को जानने की इच्छा प्रकट कर रहे हैं, जहाँ समस्त ज्ञान आकर विलीन हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (हे) महामुने! सिद्धान्तानां च सर्वेषां स्मृतीनां च (सर्वेषां), चतुर्दशानां विद्यानां च यस्तु सारः प्रकीर्तितः (अस्ति), (तं नः ब्रूहि)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सिद्धान्तानां सर्वेषां: समस्त सिद्धान्तों का। यहाँ 'सिद्धान्त' का अर्थ केवल तार्किक निष्कर्ष नहीं, अपितु वह सत्य है जो अनुभव द्वारा 'सिद्ध' हो चुका हो। विभिन्न दर्शनों और मतों के बीच जो साझा सत्य है, उसे सिद्धान्त कहा गया है।
• स्मृतीनां: स्मृतियों का। स्मृति वह ज्ञान है जो श्रुति (वेद) के आधार पर याद रखा गया और आचरण में उतारा गया। यहाँ स्मृतियों का अर्थ सामाजिक नियमों से अधिक उस 'स्मरण-शक्ति' से है जो साधक को उसके वास्तविक स्वरूप की याद दिलाती है।
• चतुर्दशानां विद्यानां: चौदह विद्याओं का। इसमें चार वेद, छह वेदाङ्ग, मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र सम्मिलित हैं। ये चौदह विद्याएँ ज्ञान के विभिन्न सोपान हैं जो मनुष्य को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती हैं।
• सारः: निचोड़ या तत्त्व। जैसे दूध का सार घी है, वैसे ही समस्त शास्त्रों का सार वह 'एक' है जिसे जानकर अन्य सब गौण हो जाते हैं।
• प्रकीर्तितः: जो कहा गया है या जिसका वर्णन किया गया है।
भाष्य —
यह श्लोक ऋषियों के उस महान संशय का विस्तार है जो पिछले श्लोक में आरम्भ हुआ था। यहाँ ऋषियों की दृष्टि केवल वेदों तक सीमित नहीं है, अपितु वे समस्त बौद्धिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों के एकीकरण की माँग कर रहे हैं।
वाक्य की संरचना देखें तो यह श्लोक पिछले श्लोक (1.5) से शुरू हुए प्रश्न का ही निरंतरता है। श्लोक 1.5 में 'वेदों और वेदान्तों' की बात थी, श्लोक 1.6 में 'सिद्धान्तों, स्मृतियों और चौदह विद्याओं' का समावेश है, और इसका समापन श्लोक 1.7 के 'आत्मज्ञान' पर होता है। अतः यह पूरा प्रसंग एक ही महा-प्रश्न है: "हे याज्ञवल्क्य! वह एक सत्य क्या है जिसमें यह सारी विविधता समाहित है?"
ऋषियों का यह प्रश्न अत्यंत गहरा है। वे जानते हैं कि ज्ञान की अधिकता कभी-कभी साधक के लिए बाधा बन जाती है। जब साधक चौदह विद्याओं के विस्तार में उलझता है, तो वह 'विधि' को ही 'साध्य' मान लेता है। वेदों के मन्त्र, वेदाङ्गों के नियम, न्याय के तर्क और स्मृतियों के अनुशासन—ये सब मार्ग हैं, गन्तव्य नहीं। ऋषियों की यह पुकार है कि अब हमें मार्ग के विवरण से निकालकर उस गन्तव्य (सार) पर पहुँचाया जाए।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि याज्ञवल्क्य केवल एक स्मृति-कार नहीं, अपितु एक योगेश्वर हैं। वे जानते हैं कि जब तक साधक 'सार' को नहीं पकड़ता, तब तक वह ज्ञान के बोझ तले दबा रहता है। स्मृतियों और सिद्धान्तों का सार वह बिंदु है जहाँ तर्क समाप्त होता है और अनुभव आरम्भ होता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विवेक' और 'एकाग्रता' के अभ्यास का संकेत देता है। साधक जब अपनी साधना के आरम्भिक स्तर पर होता है, तो वह अनेक विधियों, मन्त्रों और शास्त्रों का अध्ययन करता है (यह चौदह विद्याओं का विस्तार है)। किन्तु जैसे-जैसे वह उच्च भूमि की ओर बढ़ता है, उसे अनुभव होता है कि सत्य 'विस्तार' में नहीं, बल्कि 'संक्षेप' में है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि ज्ञान का संचय और ज्ञान का सार दो भिन्न बातें हैं। चौदह विद्याएँ यदि शरीर हैं, तो उनका सार 'प्राण' है। यदि साधक केवल बाहरी विधियों और शास्त्रों के विवरण में उलझा रहे, तो वह 'विद्या' के जाल में फँस सकता है। योग का लक्ष्य है—विखरे हुए चित्त को समेटकर एक बिंदु पर लाना।
इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के समस्त मानसिक द्वन्द्वों, अलग-अलग मतों और सूचनाओं को एक ओर रखकर स्वयं से पूछे— "इन सब का निचोड़ क्या है?" जब वह इस 'सार' की तीव्र खोज करता है, तब उसका मन बाहरी जगत से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है। यह अवस्था 'बहु' से 'एक' की ओर जाने की यात्रा है, जो साधक को ज्ञान-भूमि से अनुभव-भूमि की ओर ले जाती है।
आत्मज्ञानं परं यच्च यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
ओंकारं व्याहृतींश्चैव गायत्रीं तच्छिरस्तथा ॥ १.७ ॥
आत्मज्ञान जो परम है और जिसे जानकर अमृत प्राप्त होता है, ओंकार, व्याहृतियाँ और गायत्री तथा उस "गायत्री" का शिरस् (शिरोमन्त्र)…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ऋषियों ने समस्त सिद्धान्तों, स्मृतियों और चौदह विद्याओं के उस सार की जिज्ञासा की थी, जो संपूर्ण ज्ञान का निचोड़ है। अब वे उस सार के अंतर्गत आने वाले विशिष्ट साधनों और उस परम लक्ष्य का नाम ले रहे हैं, जिसकी प्राप्ति के लिए वे याज्ञवल्क्य से मार्गदर्शन चाहते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ब्रूहि नः) आत्मज्ञानं परं यच्च, यज्ज्ञात्वा अमृतमश्नुते, (तथा) ओंकारं, व्याहृतींश्चैव, गायत्रीं तच्छिरस्तथा (ब्रूहि)।
पदार्थ और निर्वचन:
• आत्मज्ञानं परं: वह परम ज्ञान जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराए। यहाँ 'पर' शब्द यह दर्शाता है कि यह ज्ञान अन्य सभी सांसारिक और बौद्धिक ज्ञानों से ऊपर है।
• यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते: जिसे जानकर अमृत (मृत्युंजय अवस्था या मोक्ष) का अनुभव किया जाता है। 'अश्नुते' का अर्थ है—भोगना या अनुभव करना; अर्थात् अमृत केवल एक विचार नहीं, अपितु एक अनुभूत अवस्था है।
• ओंकारं: प्रणव 'ॐ'। यह समस्त मन्त्रों का बीज और अक्षर ब्रह्म का प्रतीक है।
• व्याहृतींश्चैव: व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः)। वे शब्द जो स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाने वाले द्वार हैं।
• गायत्रीं: वह महान मन्त्र जो बुद्धि को प्रेरित करता है।
• तच्छिरस्तथा: और उस (गायत्री) का शिरस्। 'शिरस्' का अर्थ है मन्त्र का शीर्ष या उसका उच्चतम रहस्योद्घाटन। यहाँ संकेत उस मन्त्र की ओर है— 'आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्'।
भाष्य —
यह श्लोक ऋषियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों की एक सूची का आरम्भ है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऋषियों ने अपनी जिज्ञासा का आरम्भ 'आत्मज्ञान' से किया है। वे सीधे उस लक्ष्य की बात कर रहे हैं जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। यह जिज्ञासा दर्शाती है कि साधक केवल विधि-विधान के लिए नहीं, अपितु उस अंतिम परिणाम के लिए व्याकुल है जहाँ जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।
परम आत्मज्ञान वह है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है। किंतु यह ज्ञान शून्य में नहीं घटित होता; इसके लिए कुछ विशिष्ट 'उपकरणों' या 'साधनों' की आवश्यकता होती है। इसीलिए ऋषियों ने आत्मज्ञान के तुरंत बाद ओंकार, व्याहृतियों और गायत्री का उल्लेख किया है।
यहाँ एक सूक्ष्म क्रम है: सबसे पहले 'ओंकार' (बीज), फिर 'व्याहृतियाँ' (विस्तार), फिर 'गायत्री' (प्रकाश/बुद्धि) और अंत में 'शिरस्' (शिखर)। यह क्रम साधक की चेतना की यात्रा को दर्शाता है—बीज रूपी शून्य से शुरू होकर, व्याहृतियों के माध्यम से विभिन्न लोकों का अतिक्रमण करते हुए, गायत्री के प्रकाश में बुद्धि का शोधन और अंततः शिरोमन्त्र के माध्यम से उस अमृतत्व में विलीन हो जाना।
ऋषियों का प्रश्न यह है कि इन साधनों का वास्तविक प्रयोग कैसे हो, ताकि ये केवल शब्दों का जप न रहकर 'आत्मज्ञान' का द्वार बन जाएँ।
शास्त्र-साक्ष्य —
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १३.१२ ॥
जो जाननेयोग्य है, जिसे जानकर (मनुष्य) अमृत पाता है, वह मैं कहूँगा — वह अनादि परम ब्रह्म है, जो न सत् कहा जाता है न असत्।
भगवद्गीता में भी इसी सत्य की पुष्टि होती है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह अनादि परम ब्रह्म ही वह 'ज्ञेय' है, जिसे जानकर मनुष्य अमृत प्राप्त करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का यहाँ एक ही स्वर है—अमृतत्व का एकमात्र मार्ग 'ज्ञान' है। स्मृति यहाँ उस ज्ञान को प्राप्त करने के व्यावहारिक सोपानों (ओंकार, व्याहृति, गायत्री) को जोड़कर उसे एक पूर्ण योग-पद्धति बना देती है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'लक्ष्य' और 'साधन' के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। साधक के लिए सबसे पहले लक्ष्य का निर्धारण आवश्यक है—वह लक्ष्य है 'अमृतत्व' (आत्मज्ञान)। जब लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है, तब साधन स्वतः सार्थक हो जाते हैं।
साधक यहाँ इस क्रम का अभ्यास करता है:
१. ओंकार: यह मन को एकाग्र कर उसे अक्षर-ब्रह्म में स्थित करने का अभ्यास है।
२. व्याहृति: यह चेतना को स्थूल शरीर (भूः), प्राणमय शरीर (भुवः) और आनंदमय शरीर (स्वः) के स्तरों पर ले जाने का अभ्यास है।
३. गायत्री: यह बुद्धि के शुद्धिकरण और उसे उस दैवीय प्रकाश (सूर्य/परमात्मा) की ओर मोड़ने का अभ्यास है।
४. शिरस्: यह उस अवस्था का अभ्यास है जहाँ साधक मन्त्र के शब्दों से ऊपर उठकर उसके 'रस' और 'अमृत' का अनुभव करता है।
साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि वह केवल एक मन्त्र का जप नहीं कर रहा, बल्कि एक सोपान-क्रम पर चढ़ रहा है। वह 'अक्षर' (ओंकार) से शुरू होकर 'अमृत' (आत्मज्ञान) तक पहुँचने की यात्रा पर है। यह यात्रा उसे बाहरी कर्मकांड से हटाकर आंतरिक अनुभव की भूमि पर ले जाती है।
प्राणायामं तथा ध्यानं संध्योपासनमेव च ।
मार्जनाभ्युक्षणे स्नानं तथैवान्तर्जलं जपम् ॥ १.८ ॥
…प्राणायाम, ध्यान और संध्योपासन; मार्जन और अभ्युक्षण, स्नान तथा अन्तर्जल में जप…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ऋषियों ने आत्मज्ञान, ओंकार, व्याहृतियों और गायत्री के शिरोमन्त्र के विषय में जिज्ञासा की थी। अब इसी प्रश्न-श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए वे उन व्यावहारिक और योगिक साधनों का उल्लेख कर रहे हैं, जो साधक को स्थूल शरीर से सूक्ष्म चैतन्य की ओर ले जाते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ब्रूहि नः) प्राणायामं तथा ध्यानं संध्योपासनमेव च, मार्जनाभ्युक्षणे स्नानं तथैवान्तर्जलं जपम् (च ब्रूहि)।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्राणायामं: प्राण का आयाम (विस्तार या संयम)। यह केवल श्वास-प्रश्वास की क्रिया नहीं, अपितु प्राणशक्ति को एक निश्चित दिशा में मोड़ने का विज्ञान है।
• ध्यानं: चित्त की एकाग्रता। वह अवस्था जहाँ ध्येय और ध्याता के बीच का भेद मिटने लगता है।
• संध्योपासनम्: संध्याकाल में उपासना। यह दिन और रात्रि के संधि-समय पर किया जाने वाला वह पूजन है जो साधक को समय की सीमा से ऊपर उठाता है।
• मार्जन: जल छिड़ककर स्वयं को पवित्र करना। यह बाह्य शुद्धि के साथ-साथ सूक्ष्म शरीर के आवरणों को धोने की क्रिया है।
• अभ्युक्षण: जल के छींटों से पवित्र करना या जल का अर्पण करना।
• स्नानं: जल द्वारा शरीर का प्रक्षालन।
• अन्तर्जलं जपम्: जल के भीतर (निमज्जित होकर या जल के स्पर्श में) किया जाने वाला जप। यह जप की एक गहन और विशेष विधि है।
भाष्य —
यह श्लोक ऋषियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों की उस सूची का विस्तार है, जो श्लोक १.७ से आरम्भ हुई थी। यहाँ ऋषियों ने उन क्रियाओं का उल्लेख किया है जो साधक के व्यक्तित्व के विभिन्न स्तरों—शरीर, प्राण और मन—की शुद्धि से सम्बन्धित हैं।
सबसे पहले 'प्राणायाम' और 'ध्यान' का उल्लेख है। यह संकेत है कि मन्त्रों के बीज (ओंकार, गायत्री) को धारण करने के लिए पात्र (शरीर और मन) का तैयार होना आवश्यक है। प्राणायाम से प्राण शुद्ध होता है और ध्यान से मन स्थिर होता है। इसके पश्चात 'संध्योपासन' आता है, जो समय और दिशा के साथ तालमेल बिठाकर स्वयं को ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से जोड़ने की विधि है।
इसके उपरान्त ऋषियों ने जल-संस्कारों—मार्जन, अभ्युक्षण और स्नान—की जिज्ञासा की है। वैदिक परंपरा में जल केवल भौतिक स्वच्छता का साधन नहीं है, अपितु यह चेतना का वह माध्यम है जो मलिनता को धोकर साधक को 'शुचि' (पवित्र) बनाता है। अंत में 'अन्तर्जलं जपम्' का उल्लेख है। जल के भीतर जप करना इस बात का प्रतीक है कि साधक अपनी चेतना को बाहरी शोर से काटकर अंतर्मुखी हो गया है और अपनी आत्मा के गहरे जल (हृदयाकाश) में उतर गया है।
यहाँ ऋषियों का प्रश्न यह है कि इन समस्त क्रियाओं का वास्तविक प्रयोजन क्या है और इनका योगिक रहस्य क्या है? वे याज्ञवल्क्य से यह जानना चाहते हैं कि कैसे एक साधारण स्नान या जप, आत्मज्ञान की सीढ़ी बन सकता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ २.७८ ॥
इस अक्षर (ॐ) का और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (सावित्री) का दोनों सन्ध्याओंमें जप करनेवाला वेदवेत्ता विप्र वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है।
मनुस्मृति में यह स्पष्ट किया गया है कि ओंकार और व्याहृतियों के साथ सावित्री का जप करने वाला विप्र 'वेदपुण्य' से युक्त होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में भी इसी क्रम को दिखाया गया है—पहले मन्त्रों का ज्ञान (१.७) और फिर उन मन्त्रों को सिद्ध करने के लिए संध्या, स्नान और जप की विधियाँ (१.८)। दोनों स्मृतियाँ इस बात पर सहमत हैं कि मन्त्रों की शक्ति तभी जाग्रत होती है जब वे एक अनुशासित जीवन-चर्या और शुद्धि-विधियों के साथ जुड़े हों।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की यात्रा का मानचित्र है। साधक यहाँ तीन स्तरों पर शुद्धि का अभ्यास करता है:
१. शरीर की शुद्धि: स्नान, मार्जन और अभ्युक्षण के माध्यम से साधक अपने भौतिक शरीर और उसके चारों ओर के प्रभामंडल को शुद्ध करता है। जब तक शरीर की जड़ता समाप्त नहीं होती, तब तक प्राण का प्रवाह बाधित रहता है।
२. प्राण की शुद्धि: प्राणायाम के माध्यम से साधक अपनी प्राणशक्ति को संतुलित करता है। यह अभ्यास उसे 'स्थूल शरीर' से 'प्राणमय शरीर' की ओर ले जाता है।
३. मन की शुद्धि: ध्यान और अन्तर्जल-जप के माध्यम से साधक अपने मन के विक्षेपों को शांत करता है। जल में डूबकर जप करने का आन्तर अर्थ है—अपने हृदय के भीतर स्थित 'अक्षर' में डूब जाना।
साधक इस क्रम से अभ्यास करता है: पहले वह शरीर को शुद्ध करता है (स्नान), फिर प्राण को स्थिर करता है (प्राणायाम), फिर मन को एकाग्र करता है (ध्यान) और अंततः स्वयं को मन्त्र के अर्थ में विलीन कर देता है (जप)। यह प्रक्रिया साधक को बाह्य जगत (बाहरी स्नान) से हटाकर आन्तरिक जगत (अन्तर्जल जप) की ओर ले जाती है, जिससे वह 'अविद्या' के अंधकार से निकलकर 'विज्ञान' के प्रकाश की ओर बढ़ता है।
गायत्र्याश्चैव माहात्म्यं जपयज्ञप्रयोजनम् ।
उपस्थानं तथार्कस्य सारूप्यमपि चैव हि ॥ १.९ ॥
गायत्री का माहात्म्य, जपयज्ञ का प्रयोजन, सूर्य का उपस्थान और सारूप्य भी (बताइये) …
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ऋषियों ने शरीर, प्राण और मन की शुद्धि के साधनों—प्राणायाम, ध्यान, स्नान और अन्तर्जलं जप—के विषय में प्रश्न किया था। अब वे अपनी जिज्ञासा को उस चरम बिंदु पर ले जा रहे हैं जहाँ साधन, साध्य में विलीन होने लगता है और साधक उस परम ज्योति के साथ एकाकार होने की विधि पूछता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ब्रूहि नः) गायत्र्याः च एव माहात्म्यं, जपयज्ञ-प्रयोजनम्, उपस्थानं तथा अर्कस्य, सारूप्यम् अपि च एव हि (ब्रूहि)।
पदार्थ और निर्वचन:
• गायत्र्याः माहात्म्यं: गायत्री मन्त्र की महानता। यहाँ माहात्म्य का अर्थ केवल प्रशंसा नहीं, अपितु उस मन्त्र की वह शक्ति है जो साधक की चेतना को निम्न स्तर से उच्च स्तर पर ले जाती है।
• जपयज्ञ-प्रयोजनम्: जप रूपी यज्ञ का उद्देश्य। जब जप केवल शब्दों का दोहराव न रहकर एक 'यज्ञ' बन जाता है—अर्थात जिसमें साधक अपने अहंकार की आहुति देता है—तब उसका प्रयोजन सिद्ध होता है।
• उपस्थानं (अर्कस्य): सूर्य (अर्क) के सम्मुख उपस्थित होना। बाह्यतः यह सूर्योदय के समय खड़े होकर की जाने वाली स्तुति है, किन्तु आन्तरतः यह अपनी चेतना को हृदय-सूर्य के सम्मुख स्थिर करने की क्रिया है।
• सारूप्यम्: स्वरूप की समानता। वह अवस्था जब उपासक अपने इष्ट (सूर्य/परमात्मा) के समान गुण, तेज और स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
भाष्य —
ऋषियों की यह जिज्ञासा अब केवल विधि-विधान तक सीमित नहीं है, अपितु वे 'फल' और 'परम लक्ष्य' की ओर बढ़ रहे हैं। यह श्लोक १.७ से आरम्भ हुई प्रश्न-श्रृंखला का उपसंहार है, जो १.१० में सूर्य के भीतर स्थित आत्मा की जिज्ञासा में परिणत होगा।
सबसे पहले ऋषियों ने 'गायत्री के माहात्म्य' को पूछा है। याज्ञवल्क्य के लिए गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु वह सेतु है जो साधक को भौतिक जगत से उठाकर दिव्य प्रकाश की ओर ले जाता है। जब ऋषियों ने 'जपयज्ञ' का प्रयोजन पूछा, तो उनका संकेत उस आंतरिक अग्नि की ओर था जहाँ मन्त्रों के जप से चित्त की अशुद्धियाँ भस्म होती हैं। जप जब यज्ञ बन जाता है, तब वह केवल पुण्य अर्जन का साधन नहीं रहता, बल्कि आत्म-साक्षात्कार का मार्ग बन जाता है।
तत्पश्चात 'अर्कस्य उपस्थानम्' का प्रश्न आता है। सूर्य (अर्क) इस सृष्टि का प्रत्यक्ष अधिष्ठाता है। उपस्थान का अर्थ है—उसकी उपस्थिति में स्वयं को समर्पित करना। यह क्रिया साधक को यह अनुभव कराती है कि वह इस विराट तेज का एक अंश है। और इसी उपस्थान की पराकाष्ठा है 'सारूप्य'। सारूप्य वह योगिक उपलब्धि है जहाँ साधक और साध्य के बीच का भेद समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार लौह का टुकड़ा अग्नि में तपकर अग्नि जैसा ही लाल और गर्म हो जाता है, उसी प्रकार सूर्य-उपासक सूर्य के तेज और स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सूर्य के कल्याणकारी रूप के दर्शन और उसके साथ तादात्म्य की यह भावना ईशोपनिषद् में भी स्पष्ट दिखती है:
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः । यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥
हे पोषक, हे एकाकी ऋषि, हे नियन्ता, हे सूर्य, हे प्रजापतिके पुत्र — अपनी किरणोंको हटाओ, तेजको समेटो; तुम्हारा जो कल्याणतम रूप है, उसे मैं देखता हूँ। वह जो (सूर्यमें) पुरुष है, वह मैं हूँ।
यहाँ पूषन और सूर्य से प्रार्थना की गई है कि वे अपने तेज के आवरण (किरणों) को समेट लें ताकि साधक उनके 'कल्याणतम रूप' को देख सके। इस मन्त्र का अंतिम वाक्य 'योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि' (वह जो पुरुष है, वह मैं हूँ) ठीक वही 'सारूप्य' है, जिसकी जिज्ञासा बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषियों ने की है। स्मृति में 'सारूप्य' शब्द का प्रयोग हुआ है और उपनिषद् में 'सोऽहमस्मि' का अनुभव; दोनों का लक्ष्य एक ही है—साधक का अपने ईश्वरीय स्वरूप में प्रतिष्ठित होना।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' से 'साध्य' की यात्रा है।
१. गायत्री-माहात्म्य का अभ्यास: साधक जब गायत्री के माहात्म्य को समझता है, तो उसका अभ्यास केवल होंठों से नहीं, अपितु हृदय से होता है। वह अनुभव करता है कि मन्त्र की शक्ति उसके भीतर के अंधकार को मिटा रही है।
२. जपयज्ञ का अनुभव: यहाँ अभ्यास यह है कि जप को 'यज्ञ' बनाया जाए। साधक प्रत्येक मन्त्र के साथ अपने एक विकार (काम, क्रोध, मोह) को अग्नि में समर्पित करता है। यह 'जपयज्ञ' उसे मानसिक स्थिरता और आंतरिक प्रकाश प्रदान करता है।
३. उपस्थान से सारूप्य: योगिक अभ्यास में 'उपस्थान' का अर्थ है—साक्षी भाव से सूर्य के तेज का ध्यान करना। जब साधक सूर्य के तेज को बाहर देखते हुए उसे अपने भीतर के 'हृदय-सूर्य' में स्थित करता है, तब वह 'सारूप्य' की भूमि पर पहुँचता है।
यह यात्रा 'भक्ति' (उपस्थान) से आरम्भ होकर 'योग' (सारूप्य) पर समाप्त होती है। साधक पहले सूर्य का सेवक बनता है, फिर उसका मित्र और अंततः वह सूर्य के समान ही प्रकाशमान और चैतन्य हो जाता है। यह उसी 'विज्ञानघन' अवस्था की ओर ले जाने वाला मार्ग है, जिसका संकेत याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति में दिया है।
तस्या(स्य)चान्तर्गतो ह्यात्मा कथं विज्ञायते तु सः ।
त्वं हि जानासि तत्त्वेन स्वेन योगबलेन च ॥ १.१० ॥
…और उस (सूर्य) के अन्तर्गत जो आत्मा है, वह कैसे जाना जाता है? क्योंकि आप तत्त्व से और अपने योगबल से उसे जानते हैं…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ऋषियों ने गायत्री के माहात्म्य, जपयज्ञ के प्रयोजन और सूर्य के उपस्थान तथा सारूप्य के विषय में प्रश्न किया था। अब वे अपनी जिज्ञासा को उस चरम बिंदु पर ले जा रहे हैं जहाँ साधक केवल सूर्य के स्वरूप के समान नहीं होना चाहता, अपितु उस ज्योतिपुंज के भीतर छिपे हुए मूल तत्त्व को जानना चाहता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तस्य च अन्तर्गतः हि आत्मा कथं विज्ञायते तु सः? त्वं हि तत्त्वेन (जानासि) स्वेन योगबलेन च (जानासि)।
पदार्थ और निर्वचन:
• तस्य अन्तर्गतः आत्मा: उस (सूर्य) के भीतर स्थित आत्मा। यहाँ 'तस्य' शब्द सूर्य के लिए प्रयुक्त है। 'अन्तर्गत' का अर्थ है—जो केवल बाहरी आवरण में नहीं, अपितु उसके केंद्र या सूक्ष्मतम सार में स्थित है।
• कथं विज्ञायते: कैसे जाना जाता है? 'विज्ञायते' शब्द केवल सूचना प्राप्त करने के लिए नहीं, अपितु 'अनुभवजन्य ज्ञान' के लिए प्रयुक्त हुआ है।
• तत्त्वेन: तत्त्व के द्वारा। इसका अर्थ है—वस्तु के वास्तविक स्वरूप को जानकर, बिना किसी भ्रम या आरोपित गुण के।
• स्वेन योगबलेन: अपने स्वयं के योगबल से। यहाँ 'योगबल' का अर्थ किसी चमत्कारिक शक्ति से नहीं, अपितु चित्त की उस एकाग्रता और स्थिरता से है जो साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाती है।
भाष्य —
ऋषियों की यह जिज्ञासा अब बाह्य क्रियाओं से ऊपर उठकर 'रहस्य-विद्या' में प्रवेश कर चुकी है। श्लोक १.७ से शुरू हुई प्रश्नों की यह लंबी श्रृंखला, जिसमें ओंकार, व्याहृति और गायत्री जैसे साधनों का उल्लेख था, अब अपने लक्ष्य पर पहुँची है। ऋषियों का प्रश्न है कि उस सूर्य के भीतर जो आत्मा है, उसे कैसे जाना जाए?
यहाँ 'सूर्य' के दो अर्थ हैं। प्रथम—आकाश में देदीप्यमान भौतिक सूर्य, जो समस्त जगत का प्रकाशक है। द्वितीय—हृदय के भीतर स्थित 'हृदय-सूर्य', जो चैतन्य का केंद्र है। ऋषियों का प्रश्न इन दोनों के समन्वय पर है। वे जानते हैं कि जिस प्रकार बाहरी सूर्य के बिना जगत अंधकारमय है, उसी प्रकार हृदय के भीतर स्थित आत्मा-सूर्य के बिना जीवन अंधकारमय है। वे यह पूछ रहे हैं कि उस ज्योतिपुंज के भीतर छिपे उस 'अदृश्य द्रष्टा' या 'अन्तर्यामी' को किस विधि से अनुभव किया जा सकता है।
वे याज्ञवल्क्य से यह प्रश्न इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे उन्हें केवल एक शास्त्र-विद्वान नहीं, अपितु एक 'योगीश्वर' के रूप में देखते हैं। ऋषियों का यह कहना कि "आप तत्त्व से और अपने योगबल से उसे जानते हैं", इस बात का संकेत है कि यह ज्ञान केवल पुस्तकों या श्रवण से नहीं मिलता, अपितु इसके लिए 'योगबल' (चित्त की शुद्धि और एकाग्रता) की आवश्यकता होती है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि मन्त्रों का अभ्यास और बाहरी विधियाँ केवल सीढ़ियाँ हैं, वास्तविक लक्ष्य तो उस 'अन्तर्गत आत्मा' का साक्षात्कार है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ १.६.६ ॥
और जो यह आदित्यके भीतर सुवर्णमय पुरुष दिखायी देता है — सुनहरी दाढ़ी, सुनहरे केश, नखोंके सिरेतक सब-का-सब सुवर्ण ही।
छान्दोग्य उपनिषद् में आदित्य के भीतर एक हिरण्मय (स्वर्णमय) पुरुष के दर्शन का वर्णन है, जो नखों के सिरे तक सुवर्णमय है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उसी श्रुति-रहस्य की पुष्टि करता है। जहाँ उपनिषद् उस 'हिरण्मय पुरुष' के स्वरूप का वर्णन करता है, वहीं यह स्मृति उस पुरुष को 'अन्तर्गत आत्मा' कहकर उसे जानने की विधि (कथं विज्ञायते) की जिज्ञासा करती है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, अपितु वह परमात्मा का एक विग्रह है, जिसके भीतर परम आत्मा प्रतिष्ठित है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'बाहर से भीतर' की यात्रा का सूत्र है। सामान्य मनुष्य सूर्य को केवल प्रकाश का स्रोत मानकर उसकी उपासना करता है, किन्तु योगी सूर्य को एक 'द्वार' मानता है।
अभ्यास की दृष्टि से यहाँ दो स्तर हैं:
१. बाह्य स्तर: सूर्य के उपस्थान के समय जब साधक सूर्य की किरणों को देखता है, तो वह केवल भौतिक प्रकाश को नहीं, अपितु उस प्रकाश के स्रोत में स्थित 'चेतन तत्त्व' का ध्यान करता है।
२. आन्तर स्तर: साधक अपनी चेतना को बाहरी सूर्य से हटाकर हृदय-कमल के भीतर स्थित 'आन्तरिक सूर्य' (हृदय-ज्योति) पर केंद्रित करता है।
जब साधक 'तत्त्वेन' (तत्त्व के द्वारा) जाना चाहता है, तो वह यह अनुभव करता है कि जो तेज बाहर सूर्य में है, वही तेज उसके अपने भीतर भी है। 'योगबल' का अर्थ यहाँ वह स्थिति है जहाँ उपासक और उपास्य (सूर्य और साधक) के बीच का भेद मिट जाता है। साधक इस अभ्यास से 'साकार' ज्योति से 'निराकार' आत्मा की ओर बढ़ता है। यह श्लोक साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि आत्मा सूर्य के भीतर भी है और सूर्य आत्मा के भीतर भी; यह एक ही सत्य के दो छोर हैं।
यजूंष्यभ्यस्यमानेन पुरस्ताद्भास्करो ह्ययम् ।
साक्षाद्भगवता दृष्टस्तेन पृच्छामहे वयम् ॥ १.११ ॥
…(आपने) यजुर्मन्त्रोंका अभ्यास करते हुए इस सूर्यको अपने सामने साक्षात् देखा है; इसीलिए हम आपसे पूछते हैं —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ऋषियों ने यह प्रश्न किया था कि सूर्य के भीतर स्थित आत्मा को कैसे जाना जा सकता है, क्योंकि महर्षि याज्ञवल्क्य उसे अपने योगबल और तत्त्वज्ञान से जानते हैं। अब इस श्लोक में ऋषि उस आधार या कारण को प्रकट कर रहे हैं, जिसके कारण वे याज्ञवल्क्य को ही इस गुह्य ज्ञान के लिए योग्य और एकमात्र स्रोत मान रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यजूंषि अभ्यस्यमानेन (त्वया), ह्ययम् भास्करः पुरस्तात् साक्षात् भगवता दृष्टः (अस्ति); तेन (तस्मात्) वयम् त्वां पृच्छामहे।
पदार्थ और निर्वचन:
• यजूंषि अभ्यस्यमानेन: यजुर्मन्त्रों के अभ्यास के समय। 'अभ्यस्यमानेन' शब्द यहाँ निरंतरता और गहनता को दर्शाता है। यह केवल पाठ नहीं, अपितु मन्त्रों का आत्मसात्करण है।
• पुरस्तात्: सामने। इसका अर्थ केवल भौतिक दिशा नहीं, अपितु चेतना के सम्मुख प्रकट होना है।
• भास्करः: सूर्य। 'भास' (प्रकाश) और 'कर' (करने वाला)। यहाँ भास्कर केवल एक ग्रह नहीं, अपितु ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है।
• साक्षात् भगवता दृष्टः: साक्षात् भगवान के रूप में देखा गया। 'भगवता' शब्द यहाँ सूर्य के उस स्वरूप के लिए है जो ऐश्वर्य, तेज और ज्ञान से पूर्ण है। 'दृष्टः' का अर्थ है—वह अनुभव जो संशय से परे और प्रत्यक्ष है।
• तेन पृच्छामहे: इसलिए हम पूछते हैं। यहाँ 'तेन' कारणवाचक है, जो यह सिद्ध करता है कि अनुभवसिद्ध ज्ञान ही वास्तविक गुरु का लक्षण है।
भाष्य —
इस श्लोक में ऋषियों द्वारा याज्ञवल्क्य के प्रति जो श्रद्धा व्यक्त की गई है, वह उनके 'अनुभव' पर आधारित है। ऋषि कहते हैं कि जब आप शुक्ल यजुर्वेद के मन्त्रों का गहन अभ्यास कर रहे थे, तब यह भास्कर (सूर्य) आपके सम्मुख साक्षात् भगवान के रूप में प्रकट हो गए।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य छिपा है। सामान्यतः मन्त्रों का पाठ फल प्राप्ति या कर्मकाण्ड के लिए किया जाता है, किन्तु याज्ञवल्क्य के लिए मन्त्र 'साधन' नहीं, अपितु 'सोपान' (सीढ़ी) बन गए। यजुर्मन्त्रों का अभ्यास जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचा, तो वह अभ्यास 'योग' में बदल गया और साधक का चित्त उस ज्योतिपुंज में विलीन हो गया जिसे हम सूर्य कहते हैं। जब मन्त्र का शब्द, उसका अर्थ और साधक की प्राण-शक्ति एक हो जाती है, तब देवता का साक्षात् दर्शन होता है।
ऋषियों का यह कथन कि "हम आपसे पूछते हैं", यह दर्शाता है कि वे केवल शास्त्र-ज्ञानी की खोज नहीं कर रहे, अपितु उस 'द्रष्टा' की खोज कर रहे हैं जिसने सत्य को जिया है। याज्ञवल्क्य ने सूर्य को देखा, इसका अर्थ है कि उन्होंने उस परम प्रकाश को अनुभव किया जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड का नियंता है। यह दर्शन केवल बाहरी नेत्रों से नहीं, अपितु योग-शक्ति से जागृत आंतरिक दृष्टि से हुआ था। अतः, जो सूर्य के भीतर के आत्मा को जान चुका है, वही इस मन्त्र-योग के रहस्यों को खोलने में समर्थ है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रजापतिर्ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भु ब्रह्मणे नमः ॥ … वागम्भिण्या अम्भिण्यादित्यादादित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते ॥ ६.५.३ ॥
(गुरु-परम्पराके अन्तमें —) वाक्ने अम्भिणीसे, अम्भिणीने आदित्यसे (पाया)। आदित्यसे आये ये शुक्ल यजुः वाजसनेय याज्ञवल्क्यके द्वारा कहे जाते हैं।
इस श्रुति-अंश में स्पष्ट कहा गया है कि आदित्य (सूर्य) से प्राप्त ये शुक्ल यजुः, वाजसनेय याज्ञवल्क्य के द्वारा कहे जाते हैं।
यह स्मृति और श्रुति का अद्भुत मेल है। श्रुति बताती है कि शुक्ल यजुर्वेद का स्रोत 'आदित्य' हैं, और स्मृति इस बात की पुष्टि करती है कि याज्ञवल्क्य ने उन्हीं यजुर्मन्त्रों के अभ्यास से आदित्य का साक्षात् दर्शन किया। इसका अर्थ यह है कि शुक्ल यजुर्वेद केवल शब्दों का संग्रह नहीं, अपितु सूर्य-तत्व तक पहुँचने का एक मार्ग है। जो इस मार्ग पर चलता है, वह उसी प्रकाश को प्राप्त करता है जिससे यह विद्या उत्पन्न हुई है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-योग' के सिद्धांत को स्थापित करता है। योग का अर्थ केवल शारीरिक आसन नहीं, अपितु मन्त्र के माध्यम से देवता के स्वरूप में स्थित होना है।
यहाँ अभ्यास की वह भूमि वर्णित है जहाँ 'वाक्' (मन्त्र) और 'प्रकाश' (देवता) एक हो जाते हैं। जब साधक यजुर्मन्त्रों का अभ्यास करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। मन्त्र का बार-बार जप और उसका चिंतन मन को एकाग्र करता है, और जब यह एकाग्रता 'योगबल' बन जाती है, तब साधक के भीतर का सूर्य (हृदय-ज्योति) और बाहर का सूर्य (भास्कर) एक हो जाते हैं।
इस अवस्था को 'साक्षात् दर्शन' कहा गया है। यह अनुभव साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह जान पाता है कि मन्त्र केवल ध्वनि नहीं, अपितु साक्षात् देवता का स्वरूप हैं। इस श्लोक से साधक यह सीखता है कि मन्त्रों का अभ्यास केवल शब्दों का दोहराव न हो, अपितु वह देवता के साक्षात्कार की एक सचेतन यात्रा हो। जब अभ्यास में ऐसी तीव्रता आती है, तब मन्त्र स्वयं साधक को उस प्रकाश की ओर खींच ले जाता है, जहाँ से अविद्या का नाश होता है।
आर्षं छन्दश्च मन्त्राणां दैवत्यं ब्राह्मणं तथा ।
विनियोगं च मन्त्राणामोंकारादेश्च यद्विभो ॥ १.१२ ॥
मन्त्रों के ऋषि, छन्द, देवता, ब्राह्मण तथा मन्त्रों का विनियोग और ओंकार आदि भी जो (है), हे विभो!
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ऋषियों ने महर्षि याज्ञवल्क्य के उस अनुभव की चर्चा की थी, जिसमें यजुर्मन्त्रों के अभ्यास से उन्हें सूर्य के साक्षात् दर्शन हुए थे। इसी अनुभव-सिद्ध पात्रता के कारण अब ऋषि अपनी जिज्ञासा की दूसरी कड़ी को खोल रहे हैं, जिसमें वे मन्त्रों के बाह्य स्वरूप और उनके प्रयोग के तकनीकी एवं आध्यात्मिक आधार के विषय में प्रश्न कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: विभो! मन्त्राणाम् आर्षं, छन्दः, दैवत्यं, ब्राह्मणं तथा विनियोगं च, (तथा) ओंकारादेशः च यत् (अस्ति), (तत् ब्रूहि)।
पदार्थ और निर्वचन:
• विभो: हे विभो! यह संबोधन महर्षि याज्ञवल्क्य के लिए है। 'विभूति' से युक्त, जो सर्वव्यापक ज्ञान और योगबल से संपन्न हैं।
• आर्षं: ऋषि। मन्त्र के द्रष्टा, जिन्होंने उस ध्वनि को शून्य या समाधि में सुना।
• छन्दः: मन्त्र की लय, गति और अक्षर-विन्यास।
• दैवत्यं: देवता। वह शक्ति या तत्त्व जिसके निमित्त मन्त्र का उच्चारण किया जाता है।
• ब्राह्मणं: मन्त्र का वह व्याख्यात्मक और कर्मकाण्डीय भाग जो उसके अर्थ और प्रयोग की विधि बताता है।
• विनियोगं: मन्त्र का विशिष्ट प्रयोग। किस उद्देश्य के लिए, किस समय और किस विधि से मन्त्र का उपयोग करना है।
• ओंकारादेशः: ओंकार का आदेश। मन्त्र के आरम्भ में प्रणव (ॐ) लगाने का विधान और उसका रहस्य।
भाष्य —
यह श्लोक ऋषियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों की एक विस्तृत श्रृंखला का आरम्भ है। यहाँ वाक्य अधूरा है, जिसकी क्रिया अगले श्लोकों (१.१३–१.१५) में निहित है, जहाँ वे पूछते हैं कि "इनका अभिप्राय क्या है?" और "इन्हें जानने या न जानने से क्या होता है?"
ऋषि यहाँ मन्त्र-साधना के पाँच अनिवार्य अंगों—ऋषि, छन्द, देवता, ब्राह्मण और विनियोग—के साथ-साथ 'ओंकार' के विधान के विषय में पूछ रहे हैं। सामान्यतः लोग मन्त्रों को केवल शब्दों का समूह मानकर जप करते हैं, किन्तु याज्ञवल्क्य जैसे योगीश्वर के लिए मन्त्र एक जीवंत सत्ता है।
ऋषियों की जिज्ञासा यह है कि मन्त्र का केवल उच्चारण पर्याप्त है या उसके 'आर्ष' (द्रष्टा), 'छन्द' (लय), 'देवता' (शक्ति) और 'विनियोग' (प्रयोग) का ज्ञान अनिवार्य है? साथ ही, वे 'ओंकारादेश' के विषय में पूछ रहे हैं, क्योंकि किसी भी मन्त्र के सम्मुख प्रणव का जुड़ना उसे केवल एक शब्द से उठाकर ब्रह्माण्डीय ध्वनि में परिवर्तित कर देता है। यह प्रश्न केवल सूचना प्राप्त करने के लिए नहीं, अपितु यह जानने के लिए है कि मन्त्र की पूर्णता और उसकी सिद्धि इन अंगों के समन्वय से कैसे घटित होती है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'शब्द' से 'अर्थ' और 'अर्थ' से 'अनुभव' की ओर ले जाने वाली प्रक्रिया का संकेत है। साधक के लिए मन्त्र केवल वाणी का व्यायाम नहीं, अपितु एक साधन है।
१. ऋषि (द्रष्टा): जब साधक मन्त्र के ऋषि को जानता है, तो वह केवल शब्द नहीं पढ़ता, बल्कि उस चेतना से जुड़ता है जिसने उस मन्त्र को पहली बार अनुभव किया था। यह 'गुरु-तत्व' या 'द्रष्टा-तत्व' के साथ एकाकार होने का अभ्यास है।
२. छन्द (लय): छन्द मन्त्र की नाड़ी है। जैसे संगीत में लय मन को एकटक करती है, वैसे ही छन्द का ज्ञान साधक के प्राणों को एक निश्चित गति प्रदान करता है, जिससे मन की चंचलता समाप्त होती है।
३. देवता (शक्ति): देवता वह लक्ष्य है। मन्त्र का देवता जानना यह सुनिश्चित करता है कि साधक की एकाग्रता किस केंद्र पर टिकी है। यह 'ध्येय' का निर्धारण है।
४. ब्राह्मण और विनियोग (प्रयोग): यह मन्त्र के क्रियात्मक पक्ष को स्पष्ट करता है। विनियोग यह सिखाता है कि किस मानसिक अवस्था में मन्त्र का बीज बोना है ताकि वांछित फल प्राप्त हो।
५. ओंकार (अक्षर): प्रणव वह सेतु है जो स्थूल मन्त्र को सूक्ष्म ब्रह्म से जोड़ता है। ओंकारादेश का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि प्रत्येक मन्त्र अंततः उसी एक अक्षर (ॐ) में विलीन हो जाता है।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से साधक यह सीखता है कि मन्त्र-साधना में 'जागरूकता' अनिवार्य है। बिना इन अंगों के ज्ञान के जप करना केवल यांत्रिक क्रिया है, किन्तु इनके साथ जप करना 'योग' है, जहाँ शब्द, लय, शक्ति और प्रयोग एक बिंदु पर आकर मिल जाते हैं।
किमुक्तं भवतीत्येतज्ज्ञातेऽज्ञाते च किं भवेत् ।
ब्राह्मण्यं च भवेत् केन किं वा नित्यमुपास्यते ॥ १.१३ ॥
(इनका) अभिप्राय क्या है, और (इन्हें) जाननेपर तथा न जाननेपर क्या होता है? ब्राह्मणत्व किससे होता है, और नित्य किसकी उपासना की जाती है?
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषियों ने मन्त्रों के पाँचों अंगों (ऋषि, छन्द, देवता, ब्राह्मण और विनियोग) तथा ओंकार के आदेश के विषय में प्रश्न किया था। अब वे उन्हीं अंगों के प्रयोजन, उनके ज्ञान के फल और वास्तविक ब्राह्मणत्व की कसौटी के विषय में गहराई से जानना चाहते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तत्र) किमुक्तं भवेत् (इति), तथा एतत् (तत्त्वं) ज्ञातेऽज्ञाते च किं भवेत्? ब्राह्मण्यं च केन भवेत्, किं वा नित्यमुपास्यते?
पदार्थ और निर्वचन:
• किमुक्तं भवतीति: यहाँ 'भवेत्' का अर्थ है 'कहा गया है' या 'अभिप्राय है'। ऋषियों की जिज्ञासा है कि मन्त्रों के इन अंगों (ऋषि, छन्द आदि) के द्वारा वास्तव में क्या सूचित किया गया है।
• ज्ञातेऽज्ञाते च: ज्ञाते (जानने पर) और अज्ञाते (न जानने पर)। यहाँ ज्ञान का अर्थ केवल सूचना नहीं, अपितु मन्त्र के साथ तादात्म्य का अनुभव है।
• किं भवेत्: क्या फल होता है? अर्थात् साधक की चेतना में क्या परिवर्तन आता है?
• ब्राह्मण्यं: ब्राह्मणत्व। यहाँ यह शब्द केवल जाति-सूचक नहीं है, अपितु 'ब्रह्म' के साथ एकरूपता या ब्रह्म-भाव की अवस्था को सूचित करता है।
• केन: किसके द्वारा? किस साधन या पात्रता से?
• नित्यमुपास्यते: जिसकी नित्य उपासना की जाती है। उपासना का अर्थ है—निरन्तर स्मरण और उस तत्त्व में लीन होना।
भाष्य —
यह श्लोक ऋषियों की उस सूक्ष्म जिज्ञासा को प्रकट करता है जहाँ वे मन्त्रों के बाहरी ढाँचे से आगे बढ़कर उनके आन्तर अर्थ और साधक पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना चाहते हैं। यह वाक्य पिछले श्लोक (1.12) से ही जुड़ा हुआ है, जहाँ उन्होंने ऋषि, छन्द और देवता के विषय में पूछा था।
ऋषियों का प्रथम प्रश्न है— "किमुक्तं भवतीति"। वे पूछ रहे हैं कि मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग का वास्तविक अभिप्राय क्या है? मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि एक जीवित ऊर्जा है। ऋषि उस मन्त्र के द्रष्टा हैं, छन्द उसकी लय है, और देवता उसकी शक्ति। इन अंगों का ज्ञान होने पर ही मन्त्र का 'विनियोग' (सही प्रयोग) संभव है।
द्वितीय प्रश्न "ज्ञातेऽज्ञाते च किं भवेत्" अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋषियों का भाव यह है कि यदि कोई साधक केवल मन्त्र का उच्चारण करता है, किन्तु उसके ऋषि, छन्द और देवता के रहस्य को नहीं जानता (अज्ञाते), तो क्या वह मन्त्र फलित होगा? और यदि वह इन रहस्यों को जानकर (ज्ञाते) जप करता है, तो उसकी चेतना में क्या परिवर्तन आएगा? रहस्य यह है कि बिना अंगों के ज्ञान के जप केवल 'वाचिक' रहता है, किन्तु अंगों के ज्ञान के साथ वह 'मानसिक' और फिर 'तन्मात्र' हो जाता है।
तृतीय प्रश्न "ब्राह्मण्यं च भवेत् केन" इस ग्रन्थ के दर्शन को स्पष्ट करता है। यहाँ ब्राह्मणत्व का अर्थ जन्म से नहीं, अपितु 'ब्रह्म-भाव' से है। ऋषियों की जिज्ञासा है कि वह कौन सा गुण, कौन सा अभ्यास या कौन सा ज्ञान है, जो एक मनुष्य को वास्तव में 'ब्राह्मण' (ब्रह्मज्ञानी) बनाता है? क्या यह केवल वेदों के पाठ से होता है, या मन्त्रों के आन्तर रहस्यों के साक्षात्कार से?
अन्तिम प्रश्न "किं वा नित्यमुपास्यते" उस परम लक्ष्य की ओर संकेत करता है। उपासना का अर्थ है—उपासना (उप + अस), अर्थात् समीप जाना। ऋषियों का प्रश्न है कि वह कौन सा तत्त्व है जिसकी उपासना नित्य और अनिवार्य है, ताकि साधक इस संसार के बंधनों से मुक्त होकर उस अक्षर-ब्रह्म में लीन हो सके।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'सूचना' से 'अनुभव' की ओर ले जाने का प्रयास है।
'ब्राह्मण्यं केन' का योगिक अर्थ यह है कि ब्राह्मणत्व एक 'साधना-सिद्धि' है। जब साधक मन्त्र के ऋषि में स्वयं को स्थित करता है, छन्द की लय में अपने प्राणों को मिलाता है और देवता की शक्ति को अपने हृदय में अनुभव करता है, तब वह 'ब्रह्म-भाव' को प्राप्त होता है। यही वास्तविक ब्राह्मणत्व है—स्वयं को ब्रह्म के रूप में पहचानना।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि मन्त्र के अंगों का ज्ञान उसे 'अविद्या' (अज्ञान) से 'विद्या' (ज्ञान) की ओर ले जाता है। 'अज्ञाते' की स्थिति में साधक केवल बाहरी विधि (कर्मकाण्ड) में रहता है, जबकि 'ज्ञाते' की स्थिति में वह मन्त्र के माध्यम से अपने भीतर के सूर्य (आत्मा) से जुड़ जाता है।
नित्य उपासना का अभ्यास यहाँ यह है कि साधक अपने इष्ट या उस परम अक्षर को केवल एक निश्चित समय (संध्या) में ही नहीं, अपितु प्रत्येक श्वास और प्रत्येक विचार में स्थित करे। इस प्रकार वह स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर और अंततः अक्षर-ब्रह्म की भूमि तक पहुँचता है।
किं वा सत्यं भवेद्ब्रह्म संध्या येन उपास्यते ।
कथं संमार्जनं कुर्यान्मन्त्रैर्वरुणदेवतैः ॥ १.१४ ॥
अथवा वह सत्य ब्रह्म क्या है, जिसके द्वारा संध्याकी उपासना की जाती है? वरुण-देवतावाले मन्त्रोंसे संमार्जन कैसे करे?
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषियों ने ब्राह्मणत्व की कसौटी और नित्य उपासना के विषय में प्रश्न किया था। अब वे उपासना के उस परम आधार 'सत्य ब्रह्म' और शुद्धि की बाह्य एवं आन्तर क्रिया 'संमार्जन' के मन्त्र-प्रयोग की जिज्ञासा कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: किं वा सत्यं ब्रह्म भवेत्, येन संध्या उपास्यते? (तथा) वरुण-देवताइः मन्त्रैः संमार्जनं कथं कुर्यात्?
पदार्थ और निर्वचन:
• सत्यं ब्रह्म: वह अपरिवर्तनीय तत्त्व जो जैसा है वैसा ही रहता है। यहाँ 'सत्य' केवल वाणी की सत्यता नहीं, अपितु वह 'अस्तित्व' है जो काल और परिस्थिति से परे है।
• संध्या: दिन और रात्रि का मिलन काल। योगिक दृष्टि से यह वह संधि-अवस्था है जहाँ जाग्रत और सुषुप्त के बीच की चेतना जागृत होती है।
• उपास्यते: जिसकी उपासना की जाती है। उपासना का अर्थ है— 'उप' (निकट) 'आस' (बैठना), अर्थात् उस तत्त्व के समीप स्थित होना।
• संमार्जनं: मार्जन का शाब्दिक अर्थ है 'साफ करना' या 'धोना'। यह जल और मन्त्र के द्वारा शरीर और मन की अशुद्धियों को दूर करने की क्रिया है।
• वरुण-देवताइः: वरुण देव जल के अधिपति हैं। यहाँ वरुण केवल बाह्य जल के देवता नहीं, अपितु शरीर के भीतर व्याप्त 'अप' तत्त्व (द्रव पदार्थ) और चित्त की शुद्धि के अधिष्ठाता हैं।
भाष्य —
इस श्लोक में ऋषियों की जिज्ञासा दो स्तरों पर है— एक परम तत्त्व (ब्रह्म) के विषय में और दूसरा उस तत्त्व तक पहुँचने की पूर्व-तैयारी (शुद्धि) के विषय में।
प्रथम प्रश्न है— "किं वा सत्यं भवेद्ब्रह्म संध्या येन उपास्यते"। ऋषियों का यह प्रश्न अत्यंत गूढ़ है। वे यह नहीं पूछ रहे कि संध्या की विधि क्या है, अपितु यह पूछ रहे हैं कि वह कौन सा 'सत्य ब्रह्म' है जिसके कारण संध्या की उपासना संभव होती है। भाव यह है कि संध्या केवल एक समय-बद्ध कर्मकांड नहीं है, अपितु वह उस सत्य ब्रह्म से जुड़ने का एक द्वार है। यदि उपास्य (जिसकी पूजा की जाए) का स्वरूप ही ज्ञात न हो, तो उपासना केवल एक यांत्रिक क्रिया बनकर रह जाएगी। अतः वे उस 'सत्य' को जानना चाहते हैं जो संध्या के मन्त्रों और क्रियाओं के पीछे छिपा हुआ वास्तविक लक्ष्य है।
द्वितीय प्रश्न है— "कथं संमार्जनं कुर्यान्मन्त्रैर्वरुणदेवतैः"। संध्या और जप से पूर्व शरीर और मन का मार्जन अनिवार्य है। ऋषियों ने विशेष रूप से 'वरुण-देवता' वाले मन्त्रों का उल्लेख किया है। वरुण देव ऋत (ब्रह्माण्डीय नियम) के रक्षक हैं और जल के स्वामी हैं। संमार्जन की क्रिया में जल का प्रयोग होता है, किन्तु मन्त्र उस जल को 'दिव्य' बना देता है। ऋषियों की जिज्ञासा यह है कि वरुण के उन मन्त्रों का प्रयोग किस प्रकार किया जाए कि वह केवल त्वचा की शुद्धि न रहकर, अंतःकरण के मल का मार्जन कर दे।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में कर्म (मार्जन) और ज्ञान (सत्य ब्रह्म) को अलग-अलग नहीं, अपितु एक ही यात्रा के दो सोपान माना गया है। पहले वरुण-मन्त्रों से शुद्धि, फिर संध्या के माध्यम से सत्य ब्रह्म की प्राप्ति।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' और 'लक्ष्य' के सम्बन्ध को स्थापित करता है।
१. संध्या और सत्य ब्रह्म: साधक जब संध्या करता है, तो वह केवल सूर्य को अर्घ्य नहीं देता, अपितु अपने भीतर के 'सूर्य' (आत्मा) को उस 'सत्य ब्रह्म' में विलीन करने का अभ्यास करता है। यहाँ संध्या का अर्थ है— चेतना का वह संधि-स्थल जहाँ साधक स्थूल जगत से हटकर सूक्ष्म सत्य की ओर मुड़ता है। उपास्य वह सत्य ब्रह्म है, जो सूर्य के प्रकाश के रूप में बाहर है और ज्ञान के प्रकाश के रूप में भीतर।
२. वरुण-मार्जन का आन्तर अर्थ: योग में संमार्जन का अर्थ है— 'चित्त-वृत्ति का मार्जन'। वरुण जल के अधिपति हैं और हमारा शरीर तथा मन जल-तत्व से व्याप्त है। जब साधक वरुण-मन्त्रों का जप करते हुए मार्जन करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'अप' (अशुद्धियों, मोह और जड़ता) को धो रहा होता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शरीर' से 'सूक्ष्म शरीर' की ओर ले जाता है।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि बिना आंतरिक शुद्धि (मार्जन) के, परम सत्य (ब्रह्म) का साक्षात्कार संभव नहीं है। वह पहले वरुण-तत्त्व के माध्यम से अपनी पात्रता बढ़ाता है और फिर संध्या के माध्यम से उस सत्य ब्रह्म में स्थित होने का प्रयास करता है। यह यात्रा 'शुद्धि' से 'सिद्धि' की ओर जाने वाली यात्रा है।
अन्तर्जलं च कतमैः कतमैः प्राणसंयमम् ।
सूर्यस्य चाप्युपस्थानं कुर्यान्मन्त्रैः किमात्मकैः ॥ १.१५ ॥
अन्तर्जल (जप) किन-किन (मन्त्रों) से, और प्राणसंयम किन-किन (मन्त्रों) से (करे)? और सूर्यका उपस्थान भी किस स्वरूपवाले मन्त्रोंसे करे?
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषियों ने सत्य ब्रह्म और वरुण-देवता के मन्त्रों द्वारा संमार्जन (शुद्धि) की विधि पूछी थी। अब वे शुद्धि के अगले सोपानों—आन्तर जल, प्राणों के संयम और सूर्य के सम्मुख उपवेशन के मन्त्र-रहस्यों की जिज्ञासा कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अन्तर्जलं च कतमैः (मन्त्रैः) (कुर्यात्), कतमैः (मन्त्रैः) प्राणसंयमम् (कुर्यात्)? सूर्यस्य च अपि उपस्थानं किमात्मकैः मन्त्रैः कुर्यात्?
पदार्थ और निर्वचन:
• अन्तर्जलं: शाब्दिक अर्थ है 'भीतर का जल'। योगिक दृष्टि से यह वह मानसिक जल है जो मन्त्रों के जप से हृदय-आकाश में उत्पन्न होता है, जिससे चित्त की शुद्धि होती है। इसे 'अन्तर्जल-जप' भी कहते हैं।
• प्राणसंयमम्: प्राणों को एक सूत्र में बाँधना या उन्हें स्थिर करना। यहाँ 'संयम' का अर्थ केवल श्वास रोकना नहीं, अपितु मन्त्र के माध्यम से प्राण को नियंत्रित कर उसे उच्च केंद्रों की ओर ले जाना है।
• सूर्यस्य उपस्थानं: सूर्य के समीप बैठना या सूर्य का ध्यान करना। 'उपस्थान' का अर्थ है—साधना के उस चरण में पहुँचना जहाँ साधक का अपना स्वरूप सूर्य (परमात्मा) के स्वरूप में विलीन होने लगे।
• किमात्मकैः: किस स्वरूप वाले (मन्त्रों से)। यहाँ केवल मन्त्रों की संख्या नहीं, अपितु उनके 'आत्मा' अर्थात् उनके बीजरूप, शक्ति और प्रभाव के विषय में पूछा गया है।
भाष्य —
इस श्लोक में ऋषियों की जिज्ञासा बाह्य कर्मकाण्ड से हटकर पूरी तरह आन्तर साधना की ओर मुड़ गई है। वे याज्ञवल्क्य से तीन विशिष्ट योगिक क्रियाओं के मन्त्र-आधार के विषय में पूछ रहे हैं।
प्रथम प्रश्न है— "अन्तर्जलं च कतमैः"। ऋषियों का भाव यह है कि जिस प्रकार बाह्य स्नान से शरीर शुद्ध होता है, उसी प्रकार वह कौन से मन्त्र हैं जिनसे 'अन्तर्जल' का आवाहन किया जा सके? यह अन्तर्जल वास्तव में मन्त्रों की वह ध्वनि-तरंग है जो साधक के भीतर अमृत के समान प्रवाहित होकर मानसिक मलिनता को धो देती है। यह जप की वह अवस्था है जहाँ शब्द केवल जीभ से नहीं, अपितु हृदय की गहराई से गूँजता है।
द्वितीय प्रश्न है— "कतमैः प्राणसंयमम्"। यह इस ग्रन्थ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है। सामान्यतः प्राणसंयम (प्राणायाम) को केवल श्वास की गति के नियमन के रूप में देखा जाता है, किन्तु यहाँ ऋषियों ने पूछा है कि यह 'किन मन्त्रों' से किया जाए। इसका रहस्य यह है कि जब प्राण के साथ मन्त्र का संयोग होता है, तब प्राण केवल वायु नहीं रहता, अपितु वह 'मन्त्र-मय' हो जाता है। मन्त्र प्राण को दिशा देता है और प्राण मन्त्र को शक्ति। इस प्रकार मन्त्रों के सहारे प्राणों को स्थिर करना ही वास्तविक संयम है।
तृतीय प्रश्न है— "सूर्यस्य चाप्युपस्थानं कुर्यान्मन्त्रैः किमात्मकैः"। सूर्योपस्थान केवल सूर्योदय के समय हाथ जोड़कर खड़े होना नहीं है, अपितु यह सूर्य के भीतर स्थित उस 'पुरुष' के साथ तादात्म्य स्थापित करने की क्रिया है। ऋषियों की जिज्ञासा है कि वे मन्त्र किस स्वरूप (किमात्मकैः) के होने चाहिए जो साधक की चेतना को भौतिक सूर्य से उठाकर उस आत्म-सूर्य तक ले जाएँ, जिसे याज्ञवल्क्य ने साक्षात् देखा था।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की यात्रा का मार्ग है।
1. अन्तर्जल-जप: यह अभ्यास साधक को 'मन' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। यहाँ मन्त्र का अभ्यास चित्त की तरंगों को शांत कर उसे दर्पण जैसा स्वच्छ बनाने के लिए किया जाता है।
2. प्राणसंयम: यहाँ साधक 'प्राण' की भूमि पर आता है। श्वास और मन्त्र का एक लय में जुड़ना (जैसे पूरक में मन्त्र का आरम्भ और रेचक में उसका समापन) साधक को मानसिक स्थिरता से ऊपर उठाकर प्राणिक ऊर्जा के नियंत्रण तक ले जाता है। यह अभ्यास मन और प्राण के बीच की दूरी को समाप्त करता है।
3. सूर्योपस्थान: यह उच्चतम भूमि है—'अक्षर' या 'ज्योति' की भूमि। यहाँ मन्त्र केवल साधन नहीं रहता, अपितु वह स्वयं प्रकाश बन जाता है। साधक अनुभव करता है कि उसके हृदय का सूर्य और आकाश का सूर्य एक ही ज्योति के दो प्रतिबिंब हैं।
इस प्रकार, यह श्लोक दर्शाता है कि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में मन्त्र केवल पाठ करने के लिए नहीं, अपितु शरीर के जल (अन्तर्जल), वायु (प्राण) और अग्नि (सूर्य) को शुद्ध कर उन्हें ब्रह्म-स्वरूप बनाने के उपकरण हैं।
केनाक्षरेण मन्त्रेण धारणा धार्यते कथम् ।
किं ध्यानं किं च वै ध्येयं किं लक्ष्यं किं स्वरूपकम् ॥ १.१६ ॥
किस अक्षर या किस मन्त्र द्वारा धारणा कैसे धारण की जाती है? ध्यान क्या है, ध्येय क्या है, लक्ष्य क्या है और स्वरूप क्या है?
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषियों ने अन्तर्जल-जप, प्राणसंयम और सूर्योपस्थान के मन्त्रों की जिज्ञासा की थी। अब वे साधना के और अधिक सूक्ष्म सोपानों—धारणा, ध्यान और स्वरूप-बोध के मन्त्र-आधार और उनकी प्रक्रिया के विषय में प्रश्न कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: केन अक्षरेण (अथवा) केन मन्त्रेण धारणा कथम् धार्यते? किम् ध्यानम् (अस्ति), किम् च वै ध्येयम् (अस्ति), किम् लक्ष्यम् (अस्ति), किम् स्वरूपकम् (अस्ति)?
पदार्थ और निर्वचन:
• केनाक्षरेण: किस अक्षर से। यहाँ 'अक्षर' का अर्थ केवल वर्ण नहीं, अपितु वह अविनाशी ध्वनि है जो मन को स्थिर करने का सामर्थ्य रखती है।
• धारणा: चित्त को किसी एक निश्चित स्थान या विचार पर टिकाने की क्रिया।
• धार्यते: धारण किया जाता है। यहाँ 'कथम्' शब्द प्रक्रिया की ओर संकेत करता है कि केवल मन्त्र का ज्ञान पर्याप्त नहीं, उसे धारण करने की विधि क्या है।
• ध्यान: ध्येय के प्रति चित्त की निरंतरता।
• ध्येय: वह विषय या तत्त्व जिसका ध्यान किया जाता है।
• लक्ष्य: वह अंतिम बिंदु या गंतव्य जहाँ साधक की दृष्टि स्थिर हो जाती है।
• स्वरूपकम्: साधक का अपना वास्तविक स्वरूप या उस परम तत्त्व का स्वरूप जिसमें विलीन होना है।
भाष्य —
इस श्लोक में ऋषियों के प्रश्न कर्मकाण्ड से ऊपर उठकर पूर्णतः 'योग-विज्ञान' की ओर अग्रसर हो गए हैं। वे याज्ञवल्क्य से उस सूक्ष्म सेतु के विषय में पूछ रहे हैं जो स्थूल मन को सूक्ष्म आत्मा से जोड़ता है।
प्रथम प्रश्न है— "केनाक्षरेण मन्त्रेण धारणा धार्यते कथम्"। ऋषियों का भाव यह है कि मन चंचल है, वह स्वभावतः भटकता है। इस चंचलता को रोकने के लिए किसी एक 'अक्षर' या 'मन्त्र' की आवश्यकता होती है, जो एक लंगर की भाँति चित्त को थाम ले। वे पूछ रहे हैं कि वह विशिष्ट अक्षर कौन सा है और उस अक्षर के माध्यम से धारणा की प्रक्रिया कैसे संपन्न होती है? यहाँ 'अक्षर' और 'मन्त्र' दोनों का उल्लेख है, क्योंकि अक्षर बीज है और मन्त्र उसका विस्तार।
द्वितीय प्रश्न ध्यान की त्रयी से सम्बन्धित है— "किं ध्यानं किं च वै ध्येयं"। यहाँ ऋषियों ने 'ध्यान' (क्रिया) और 'ध्येय' (विषय) के बीच के सूक्ष्म भेद को पहचाना है। ध्यान वह प्रवाह है जो साधक के भीतर चलता है, जबकि ध्येय वह लक्ष्य है जिस पर वह प्रवाह केंद्रित होता है। बिना ध्येय के ध्यान संभव नहीं और बिना ध्यान के ध्येय की प्राप्ति नहीं।
तृतीय और चतुर्थ प्रश्न— "किं लक्ष्यं किं स्वरूपकम्"। लक्ष्य वह बिंदु है जहाँ ध्यान की एकाग्रता चरम पर पहुँचती है, और 'स्वरूप' वह अवस्था है जहाँ ध्याता (साधक), ध्यान (प्रक्रिया) और ध्येय (विषय) का भेद समाप्त हो जाता है। ऋषियों की यह जिज्ञासा दर्शाती है कि वे केवल मानसिक शांति नहीं, अपितु आत्म-साक्षात्कार के उस स्वरूप को जानना चाहते हैं जिसे याज्ञवल्क्य ने सूर्य के साक्षात्कार के समय अनुभव किया था।
शास्त्र-साक्ष्य —
धारणा के विषय में पातञ्जल योगसूत्र कहता है:
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ (भाष्य —) नाभिचक्रे हृदयपुण्डरीके मूर्ध्नि ज्योतिषि नासिकाग्रे जिह्वाग्र इत्येवमादिषु देशेषु बाह्ये वा विषये चित्तस्य वृत्तिमात्रेण बन्ध इति धारणा ॥ ३.१ ॥
चित्तको (किसी) देशमें बाँधना धारणा है। (भाष्य —) नाभिचक्र, हृदयकमल, मूर्धाकी ज्योति, नासिकाका अग्र, जिह्वाका अग्र — इत्यादि (शरीरके) स्थानोंमें, अथवा किसी बाहरी विषयमें, चित्तका केवल वृत्तिके द्वारा बँधना धारणा है।
यहाँ धारणा का लक्षण 'देशबन्ध' अर्थात् चित्त को किसी एक स्थान पर बाँधना बताया गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषियों का प्रश्न इसी 'देशबन्ध' के साधन (अक्षर/मन्त्र) के विषय में है। यदि चित्त को बाँधना है, तो वह 'डोर' कौन सी ध्वनि या अक्षर होगा, यही यहाँ पूछा गया है।
ध्यान और ध्येय के भेद पर योगसूत्र कहता है:
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥ (भाष्य —) तस्मिन्देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशः प्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम् ॥ ३.२ ॥
वहाँ (धारणाके देशमें) प्रत्ययकी एकतानता ध्यान है। (भाष्य —) उस देशमें ध्येयको आलम्बन बनानेवाले प्रत्ययका एक-सा प्रवाह, जिसे कोई दूसरा प्रत्यय न छुए — वह ध्यान है।
यहाँ धारणा के बाद आने वाली अवस्था 'ध्यान' को 'प्रत्ययैकतानता' (एकतत्व की निरंतरता) कहा गया है। स्मृति में ऋषियों द्वारा 'ध्यान' और 'ध्येय' को अलग-अलग पूछना इसी तथ्य की पुष्टि करता है कि पहले एक आलम्बन (ध्येय) का चयन होता है और फिर उस पर चित्त का एकतत्व (ध्यान) स्थापित होता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' से 'साध्य' की ओर जाने की यात्रा है।
१. धारणा का अभ्यास: साधक जब किसी एक अक्षर (जैसे ओंकार या कोई बीजमन्त्र) को पकड़ता है, तो वह वास्तव में अपने बिखरे हुए प्राणों और विचारों को एक केंद्र पर समेट रहा होता है। यह 'अक्षर' मन के लिए एक स्थिर बिंदु बन जाता है। अभ्यास यह है कि जब भी मन भटके, उसे पुनः उसी अक्षर की ध्वनि पर लाया जाए।
२. ध्यान और ध्येय का समन्वय: ध्येय वह 'सूर्य' या 'ज्योति' हो सकती है जो हृदय में स्थित है। जब साधक उस ज्योति को आलम्बन बनाकर निरंतरता में ठहर जाता है, तो वह 'ध्यान' बन जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि ध्येय (विषय) केवल बाहर न हो, अपितु वह भीतर के प्रकाश के रूप में अनुभव हो।
३. लक्ष्य और स्वरूप: जब ध्यान इतना गहरा हो जाए कि साधक केवल उस 'लक्ष्य' को ही देखे और अंततः यह अनुभव करे कि "मैं ही वह स्वरूप हूँ", तब वह स्वरूप-बोध की भूमि पर पहुँच जाता है।
यह श्लोक साधक को इस क्रम में ले जाता है: अक्षर (ध्वनि) → धारणा (स्थिरता) → ध्यान (प्रवाह) → लक्ष्य (केंद्र) → स्वरूप (एकत्व)। ऋषियों ने इस पूरी श्रृंखला को एक ही श्लोक में पिरोकर याज्ञवल्क्य से उसकी कुंजी माँगी है।
यच्चोपास्य विमुच्येत तत् परं ब्रूहि नो विभो ।
होमकाले तथाग्नौ तु मध्ये किं परिचिन्तयेत् ॥ १.१७ ॥
जिसकी उपासना करके मुक्त हो जाता है, उस परम (तत्त्व) को हे विभो! आप हमें बताइये; तथा होमकाल में अग्नि के मध्य में मनुष्य क्या विचार करे?
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषियों ने धारणा, ध्यान, ध्येय और स्वरूप के विषय में प्रश्न किए थे। अब वे साधना के उस चरम लक्ष्य की जिज्ञासा कर रहे हैं जहाँ उपासना केवल एक क्रिया न रहकर मुक्ति का द्वार बन जाती है, साथ ही वे कर्म और ज्ञान के समन्वय के लिए होम-क्रिया के समय होने वाले आन्तरिक चिन्तन के विषय में पूछ रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: हे विभो! यत् (तत्त्वं) उपास्य विमुच्येत, तत् परं (तत्त्वं) नो ब्रूहि। तथा होमकाले अग्नौ तु मध्ये किं परिचिन्तयेत्?
पदार्थ और निर्वचन:
• उपास्य: उपासना करके। यहाँ उपासना का अर्थ केवल पूजा नहीं, अपितु 'उप' (समीप) + 'आस' (बैठना) है—अर्थात् उस तत्त्व के समीप होकर उसमें लीन हो जाना।
• विमुच्येत: मुक्त हो जाए। यह केवल जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति नहीं, अपितु अविद्या और सीमित अहंकार से विमुक्ति है।
• परं: परम तत्त्व। जो श्रेष्ठ है, जो अंतिम है और जिसके परे और कुछ नहीं।
• होमकाले: होम के समय। जब बाहरी अग्नि में आहुति दी जा रही हो।
• अग्नौ तु मध्ये: अग्नि के मध्य में। यहाँ 'मध्य' शब्द संकेत है कि अग्नि की लौ के केंद्र में किसी सूक्ष्म सत्ता का चिन्तन करना है।
• परिचिन्तयेत्: क्या विचार करे या क्या चिन्तन करे। 'परि' उपसर्ग यहाँ पूर्णता और चारों ओर व्याप्त बोध को दर्शाता है।
भाष्य —
इस श्लोक में ऋषियों की जिज्ञासा दो स्तरों पर है—एक पूर्णतः आध्यात्मिक (मुक्ति) और दूसरा कर्म-प्रधान (होम), किंतु दोनों का लक्ष्य एक ही है: 'चिन्तन'।
प्रथम प्रश्न है— "यच्चोपास्य विमुच्येत तत् परं ब्रूहि नो विभो"। ऋषियों का भाव यह है कि अनेक देवताओं और स्वरूपों की उपासना प्रचलित है, किंतु वह कौन सा 'परम' तत्त्व है जिसकी उपासना का फल केवल सुख या स्वर्ग नहीं, अपितु 'विमुक्ति' है? वे याज्ञवल्क्य से उस विशिष्ट उपसन्य-विधि और उस परम लक्ष्य के स्वरूप को जानना चाहते हैं जो साधक को समस्त बंधनों से मुक्त कर दे। यह प्रश्न संकेत करता है कि उपासना जब 'पर' (परमात्मा/परब्रह्म) की ओर मुड़ती है, तभी वह मुक्ति का साधन बनती है।
द्वितीय प्रश्न है— "होमकाले तथाग्नौ तु मध्ये किं परिचिन्तयेत्"। होम एक स्थूल वैदिक कर्म है, जिसमें अग्नि में आहुति दी जाती है। किंतु याज्ञवल्क्य जैसे योगीश्वर के लिए कोई भी कर्म केवल बाहरी क्रिया नहीं होता। ऋषियों को यह ज्ञात है कि यदि होम के समय केवल सामग्री की आहुति दी जाए, तो वह केवल एक संस्कार है; परंतु यदि अग्नि के मध्य में किसी विशिष्ट तत्त्व का 'परिचिन्तन' किया जाए, तो वह कर्म 'योग' बन जाता है। वे पूछ रहे हैं कि अग्नि की उस प्रज्वलित लौ के केंद्र में किस स्वरूप का ध्यान किया जाए कि वह बाहरी होम, आन्तरिक यज्ञ में परिवर्तित हो जाए। यहाँ 'मध्य' का अर्थ उस बिंदु से है जहाँ अग्नि की उष्णता और प्रकाश एक केंद्र पर मिलते हैं, जो साधक के हृदय-केंद्र का प्रतीक है।
शास्त्र-साक्ष्य —
होम के समय आन्तरिक चिन्तन के महत्त्व को उपनिषद् इस प्रकार स्पष्ट करते हैं:
अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ ५.२४.२ ॥
और जो इसे इस प्रकार जानकर अग्निहोत्र करता है, उसका हवन सब लोकोंमें, सब भूतोंमें, सब आत्माओंमें हुआ होता है।
अंश: अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥
अर्थ: और जो इसे इस प्रकार जानकर अग्निहोत्र करता है, उसका हवन सब लोकोंमें, सब भूतोंमें, सब आत्माओंमें हुआ होता है।
यह साक्ष्य स्पष्ट करता है कि जब साधक 'विद्वान' होकर (अर्थात् सही चिन्तन के साथ) अग्निहोत्र करता है, तो उसकी आहुति केवल भौतिक अग्नि तक सीमित नहीं रहती, अपितु वह समस्त चराचर जगत और आत्माओं में व्याप्त हो जाती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी 'विद्वत्ता' या 'चिन्तन' की विधि को पूछ रहा है। स्मृति यहाँ कर्म को मिटाती नहीं, बल्कि उसे चिन्तन के माध्यम से व्यापक बनाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म-योग' और 'ज्ञान-योग' के मिलन बिंदु पर है।
१. परम उपासना: साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि मुक्ति किसी बाहरी देवता की कृपा से नहीं, अपितु उस 'परम' तत्त्व की उपासना से मिलती है जो स्वयं के भीतर स्थित है। यहाँ उपासना का अभ्यास 'साक्षी भाव' में स्थित होना है।
२. अग्नि-चिन्तन: बाहरी होम के समय अग्नि के मध्य का चिन्तन वास्तव में 'जठराग्नि' और 'हृदय-अग्नि' का जागरण है। जब साधक अग्नि की लौ के केंद्र में उस परम पुरुष या अक्षर का चिन्तन करता है, तो वह बाहरी अग्नि को अपने भीतर के प्रकाश (ज्योति) से जोड़ देता है।
अभ्यास यह है कि कर्म करते समय भी चित्त को बाहरी क्रिया (सामग्री, मंत्र, अग्नि) में न उलझकर, उस क्रिया के 'केंद्र' (मध्य) में स्थित ध्येय पर टिकाया जाए। यह अभ्यास साधक को 'क्रिया-प्रधान' भूमि से 'चिन्तन-प्रधान' भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ कर्म स्वयं एक ध्यान बन जाता है।
यस्य चैवाहुतिं दद्यात् किं ते (तद्) ब्रह्म किमात्मकम् ।
तथान्नयज्ञकाले तु स्वदेहे चिन्तयेत् कथम् ॥ १.१८ ॥
जिसकी आहुति देनी चाहिए, वह ब्रह्म क्या है और किस स्वरूप का है? उसी प्रकार अन्नयज्ञ के समय अपने शरीर में कैसे चिन्तन करे?
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषियों ने उस परम तत्त्व की जिज्ञासा की थी जिसकी उपासना से मुक्ति संभव है और होम-अग्नि के मध्य होने वाले चिन्तन के विषय में पूछा था। अब वे उसी यज्ञ-तत्व को विस्तार देते हुए आहुति के वास्तविक अधिष्ठाता और अन्न-भोजन रूपी यज्ञ के आन्तरिक रहस्य को जानना चाहते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यस्य च अहूतिं दद्यात्, (तत्) ब्रह्म किम्, किमात्मकम्? तथा अन्नयज्ञकाले तु स्वदेहे कथम् चिन्तयेत्?
पदार्थ और निर्वचन:
• अहुतिं (आहुतिं): आहुति। वह द्रव्य जो अग्नि में समर्पित किया जाता है। योगिक दृष्टि से यह 'अहं' (अहंकार) और 'प्राण' का समर्पण है।
• दद्यात्: देना चाहिए। यहाँ 'विधिलिङ्' का प्रयोग है, जो यह दर्शाता है कि आहुति देना केवल एक कर्म नहीं, अपितु एक अनिवार्य साधना है।
• ब्रह्म: वह विराट सत्ता। यहाँ प्रश्न है कि वह कौन सा ब्रह्म है जो आहुतियों को ग्रहण करता है।
• किमात्मकम्: किस स्वरूप का है? 'आत्मा' शब्द यहाँ स्वरूप, सार और अधिष्ठाता के अर्थ में है।
• अन्नयज्ञकाले: अन्नयज्ञ के समय। भोजन करने की क्रिया को जब यज्ञ के रूप में देखा जाता है, तो वह 'अन्नयज्ञ' कहलाती है।
• स्वदेहे: अपने शरीर में। यह शब्द संकेत करता है कि यज्ञ केवल बाहरी वेदी पर नहीं, अपितु देह रूपी वेदी पर भी संपन्न होता है।
• चिन्तयेत्: चिन्तन करे। केवल भोजन करना शारीरिक क्रिया है, किंतु भोजन करते समय चेतना को कहाँ स्थिर करना है, यह 'चिन्तन' है।
भाष्य —
ऋषियों की यह जिज्ञासा अत्यंत सूक्ष्म है। वे याज्ञवल्क्य से पूछ रहे हैं कि जब हम अग्नि में आहुति देते हैं, तो वह आहुति वास्तव में किस सत्ता को प्राप्त होती है? बाहरी रूप से वह अग्नि है, किंतु उस अग्नि के भीतर जो 'ब्रह्म' है, उसका स्वरूप क्या है? यदि साधक उस ब्रह्म के स्वरूप को नहीं जानता, तो उसकी आहुति केवल एक भौतिक क्रिया बनकर रह जाती है। अतः यहाँ 'किमात्मकम्' पूछकर वे उस अधिष्ठाता देव के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहते हैं।
इसके पश्चात, ऋषियों ने एक अत्यंत व्यावहारिक किंतु गहन प्रश्न किया है— "तथान्नयज्ञकाले तु स्वदेहे चिन्तयेत् कथम्"। सामान्यतः मनुष्य भोजन को केवल क्षुधा-तृप्ति का साधन मानता है। किंतु वैदिक परंपरा में भोजन करना भी एक 'यज्ञ' है। शरीर एक वेदी है, जठराग्नि वह अग्नि है और अन्न वह आहुति है। ऋषियों का प्रश्न है कि इस अन्नयज्ञ के समय साधक को अपने शरीर में किस प्रकार का चिन्तन करना चाहिए?
यहाँ भाव यह है कि यदि भोजन करते समय चेतना केवल स्वाद में लीन रहे, तो वह केवल 'भोग' है। किंतु यदि चेतना इस बोध में रहे कि यह अन्न प्राण-शक्ति में परिवर्तित होकर उस विराट ब्रह्म को तृप्त कर रहा है, तो वही 'योग' बन जाता है। साधक अपने भीतर की अग्नि और उस अग्नि में स्थित पुरुष का चिन्तन कैसे करे, यही इस प्रश्न का सार है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अन्नयज्ञ और शरीर में आहुति के विषय में छान्दोग्य उपनिषद् का यह मत है:
तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥ ५.१९.१ ॥
इसलिए जो भोजन पहले आये, वह होमके योग्य है। वह जो पहली आहुति दे, उसे "प्राणाय स्वाहा" कहकर दे; (इससे) प्राण तृप्त होता है।
यहाँ स्पष्ट किया गया है कि भोजन का प्रथम अंश जो ग्रहण किया जाता है, वह वास्तव में होम है। जब साधक "प्राणाय स्वाहा" कहकर भोजन का प्रथम ग्रास लेता है, तो वह केवल पेट नहीं भरता, अपितु अपने भीतर के 'प्राण' को तृप्त करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति-विधान के व्यावहारिक प्रयोग की जिज्ञासा करता है कि इस 'प्राणाय स्वाहा' के समय देह के भीतर का वास्तविक चिन्तन और अनुभव क्या होना चाहिए।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'कर्म' को 'योग' में बदलने की विधि है। योगिक अभ्यास की दृष्टि से इसके दो सोपान हैं:
१. आहुति का आन्तर अर्थ: जब साधक बाहरी अग्नि में आहुति देता है, तो उसे अनुभव करना चाहिए कि वह अपने सीमित अहंकार (अहं) को विराट ब्रह्म की अग्नि में समर्पित कर रहा है। जिस क्षण 'मैं' की आहुति होती है, उसी क्षण वह 'ब्रह्म' का स्वरूप हो जाता है।
२. अन्नयज्ञ का अभ्यास: भोजन करते समय साधक यह अनुभव करे कि उसका शरीर एक पवित्र वेदी है। अन्न केवल पदार्थ नहीं, अपितु ऊर्जा है। जब यह अन्न जठराग्नि में समर्पित होता है, तो वह प्राण में परिवर्तित होता है। साधक का चिन्तन यह होना चाहिए कि "यह अन्न मेरे भीतर के उस सूर्य (जठराग्नि/हिरण्यगर्भ) को तृप्त कर रहा है, जो मुझे चैतन्य रखता है।"
इस प्रकार, भोजन की क्रिया 'उपभोग' से उठकर 'उपासना' बन जाती है। साधक इस अभ्यास से अपनी देह के प्रति आसक्ति को समाप्त कर उसे ईश्वर का यंत्र मानने लगता है। वह इस भूमि पर पहुँच जाता है जहाँ उसकी हर श्वास और हर ग्रास एक आहुति बन जाती है, जिससे शरीर का शुद्धिकरण होता है और चेतना ऊपर की ओर अग्रसर होती है।
का विद्या का ह्यविद्या च किं वा निःश्रेयसं परम् ।
किमधीयीत वै विप्र एतत् सर्वं वदस्व नः ॥ १.१९ ॥
विद्या क्या है, अविद्या क्या है, और परम निःश्रेयस क्या है? ब्राह्मण क्या अध्ययन करे? — यह सब हमें बताइये।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में ऋषियों ने बाहरी यज्ञों (होम और अन्नयज्ञ) के आन्तरिक अधिष्ठाता और देह-चिन्तन के रहस्य को पूछा था। अब वे अपनी जिज्ञासा को चरम सीमा पर ले जाते हुए ज्ञान और कर्म के मूलभूत भेद तथा जीवन के अंतिम लक्ष्य के विषय में प्रश्न कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: का विद्या, का ह्यविद्या च, किं वा निःश्रेयसं परम्? विप्र एतत् सर्वं किं अधीयीत? (हे विभो!) नः वदस्व।
पदार्थ और निर्वचन:
• विद्या: वह ज्ञान जो आत्मा के स्वरूप को प्रकाशित करे। यहाँ यह केवल सूचना नहीं, अपितु वह 'साक्षात्कार' है जो साधक को मुक्त करता है।
• अविद्या: सामान्यतः इसे अज्ञान माना जाता है, किंतु यहाँ इसका अर्थ 'कर्म-ज्ञान' या 'सांसारिक विद्या' से है। वह ज्ञान जो देह, जगत और विधि-विधानों से सम्बन्धित है।
• निःश्रेयसं परम्: 'श्रेय' का अर्थ है कल्याण। 'निःश्रेयस' वह स्थिति है जहाँ अब और किसी कल्याण की इच्छा शेष न रहे, क्योंकि पूर्णता प्राप्त हो चुकी है। यही 'परम पद' या मोक्ष है।
• अधीयीत: अध्ययन करे। 'धी' धातु का अर्थ है चिन्तन करना या मनन करना। अतः यहाँ केवल पुस्तकों को पढ़ना नहीं, अपितु उस सत्य को अपने भीतर उतारना है।
• विप्र: वह जो विप्रत्व (ब्रह्म-भाव) में स्थित हो; शुद्ध अन्तःकरण वाला ब्राह्मण।
भाष्य —
ऋषियों की यह प्रश्न-माला अब अपने उपसंहार की ओर है। वे याज्ञवल्क्य से तीन मुख्य प्रश्न कर रहे हैं: प्रथम, 'विद्या' क्या है? द्वितीय, 'अविद्या' क्या है? और तृतीय, वह 'परम निःश्रेयस' क्या है जिसे प्राप्त करने के बाद साधक पुनः लौटकर संसार में नहीं आता?
यहाँ 'अविद्या' शब्द का प्रयोग नकारात्मक अर्थ में नहीं, अपितु एक सोपान के रूप में हुआ है। ऋषियों का प्रश्न यह है कि क्या केवल ज्ञान (विद्या) पर्याप्त है, या कर्म और विधि (अविद्या) का भी अपना कोई महत्व है? वे यह जानना चाहते हैं कि एक विप्र (साधक) के लिए अध्ययन का सही क्रम क्या होना चाहिए। क्या उसे पहले कर्म-काण्ड और शरीर-शुद्धि की 'अविद्या' का अभ्यास करना चाहिए, या सीधे आत्म-ज्ञान की 'विद्या' में उतरना चाहिए?
अंत में, वे 'परम निःश्रेयस' की जिज्ञासा करते हैं। यह प्रश्न इस बात का प्रमाण है कि ऋषियों का लक्ष्य केवल स्वर्ग या भौतिक सुख नहीं, अपितु वह पूर्णता है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है। यह संपूर्ण प्रश्न-माला यह दर्शाती है कि याज्ञवल्क्य केवल एक विधि-विशेष के ज्ञाता नहीं, अपितु वे उस महा-विद्या के स्वामी हैं जो कर्म और ज्ञान के समन्वय से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥
जो विद्या (उपासना-ज्ञान) और अविद्या (कर्म) — दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह अविद्या (कर्म) से मृत्युको पार करके विद्यासे अमृतको पाता है।
इस उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि जो विद्या और अविद्या दोनों को साथ जानता है, वह अविद्या (कर्म) से मृत्यु को पार कर विद्या (ज्ञान) से अमृत को प्राप्त करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी सत्य की पुष्टि करता है। यहाँ अविद्या का अर्थ 'अज्ञान' नहीं, अपितु वह 'सांसारिक और कर्मकाण्डीय ज्ञान' है जो शरीर और प्राणों को शुद्ध कर उन्हें विद्या (आत्म-साक्षात्कार) के योग्य बनाता है। स्मृति और उपनिषद् दोनों का मत एक है कि कर्म (अविद्या) और ज्ञान (विद्या) एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधना के सोपानों' का निर्धारण करता है। योग में 'अविद्या' वह प्रारंभिक अवस्था है जहाँ साधक शरीर, प्राण और मन के अनुशासन (यम-नियम-आसन-प्राणायाम) का अभ्यास करता है। यह 'अविद्या' इसलिए है क्योंकि यह अभी भी 'रूप' और 'विधि' से बंधी है, किंतु यह अनिवार्य है क्योंकि बिना शरीर और प्राण की शुद्धि के 'विद्या' (समाधि या आत्म-साक्षात्कार) संभव नहीं है।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसे कर्मों का त्याग नहीं, अपितु कर्मों का 'विद्या' में रूपांतरण करना है। जब वह बाहरी विधि (अविद्या) को आन्तरिक अनुभव (विद्या) में बदल देता है, तब वह 'निःश्रेयस' की भूमि पर पहुँचता है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी हर क्रिया को—चाहे वह संध्या हो, जप हो या भोजन—एक यज्ञ मानकर उसमें उस परम तत्त्व का चिन्तन करे। इस प्रकार वह अविद्या के माध्यम से विद्या की ओर और विद्या के माध्यम से निःश्रेयस की ओर अग्रसर होता है।
याज्ञवल्क्यस्योत्तरप्रतिज्ञा
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं मुनीनां भावितात्मनाम् ।
तथा राजर्षीणां च स्वशिष्याणां तथैव च ॥ १.२० ॥
शुद्ध अंतःकरण वाले मुनियों का, तथा राजर्षियों का और अपने शिष्यों का यह वचन सुनकर…
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में ऋषियों ने मन्त्रों के बाह्य प्रयोग से लेकर विद्या, अविद्या और परम निःश्रेयस तक के गहन प्रश्न पूछे थे। अब इस श्लोक में उन जिज्ञासुओं की स्थिति और याज्ञवल्क्य जी की उनकी वाणी के प्रति प्रतिक्रिया का वर्णन है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: भावितात्मनाम् मुनीनां, तथा राजर्षीणां च, तथैव च स्वशिष्याणां (इति) वचनं तु एतत् श्रुत्वा... (भगवान् याज्ञवल्क्यस्तु प्रत्युवाच)।
पदार्थ और निर्वचन:
• भावितात्मनाम्: जिनका अंतःकरण भावित है। 'भावित' का अर्थ है—संस्कारित, शुद्ध और स्थिर। जिन्होंने अपनी आत्मा को साधना के माध्यम से परिष्कृत कर लिया है।
• राजर्षीणां: वे राजा जो ऋषि तुल्य हैं। जिन्होंने ऐश्वर्य के बीच रहते हुए भी वैराग्य और ज्ञान का समन्वय किया है।
• स्वशिष्याणां: याज्ञवल्क्य जी के अपने शिष्य, जो उनके मार्गदर्शन में योग-साधना कर रहे हैं।
• वचनं: यहाँ 'वचन' का अर्थ केवल शब्द नहीं, अपितु ऋषियों की वह तीव्र जिज्ञासा और प्रश्न-माला है जो पिछले श्लोकों (१.१५ से १.१९) में प्रस्तुत की गई।
भाष्य —
यह श्लोक एक सेतु के समान है, जो जिज्ञासुओं के प्रश्नों और योगेश्वर याज्ञवल्क्य के उत्तर के बीच स्थित है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह वाक्य अपने आप में पूर्ण नहीं है; इसकी क्रिया अगले श्लोकों (१.२१-१.२२) में आती है। इसका पूर्ण भाव यह है कि "शुद्ध अंतःकरण वाले मुनियों, राजर्षियों और अपने शिष्यों के इन वचनों को सुनकर, भगवान् याज्ञवल्क्य ने उन्हें उत्तर दिया।"
यहाँ वक्ताओं के तीन वर्ग बताए गए हैं: मुनि, राजर्षि और शिष्य। यह इस बात का संकेत है कि याज्ञवल्क्य जी का यह योग-ज्ञान किसी एक वर्ग के लिए नहीं, अपितु समस्त साधकों के लिए है—चाहे वे पूर्णतः विरक्त मुनि हों, राजधर्म का पालन करने वाले राजर्षि हों, या अभी सीखना आरम्भ करने वाले शिष्य हों।
विशेषण 'भावितात्मनाम्' अत्यंत महत्वपूर्ण है। याज्ञवल्क्य जी केवल उन्हीं के प्रश्नों को ग्रहण करते हैं जिनका अंतःकरण 'भावित' है। योग की दृष्टि में, जब तक चित्त की शुद्धि नहीं होती, तब तक उच्च ज्ञान का बीजारोपण संभव नहीं है। इन ऋषियों ने पहले अपनी आत्मा को शुद्ध किया, उसके बाद प्रश्न किए, इसलिए वे याज्ञवल्क्य जी के उत्तर के पात्र बने।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक में 'श्रवण' और 'धैर्य' का रहस्य छिपा है। याज्ञवल्क्य जी ने ऋषियों के प्रश्नों की एक लंबी श्रृंखला (मन्त्र, धारणा, ध्यान, विद्या, अविद्या) को बिना बीच में टोके, पूर्ण धैर्य के साथ सुना।
योग का प्रथम सोपान 'श्रवण' है, किन्तु वह श्रवण केवल कानों से सुनना नहीं, अपितु 'भावितात्मा' होकर सुनना है। जब गुरु शिष्य की जिज्ञासा को पूर्णता तक सुनने के बाद उत्तर देते हैं, तब वह उत्तर केवल सूचना नहीं, अपितु 'दीक्षा' बन जाता है। साधक यहाँ यह सीखता है कि किसी भी गंभीर ज्ञान की प्राप्ति के लिए पहले अपने अंतःकरण को भावित (शुद्ध) करना अनिवार्य है और फिर पूर्ण समर्पण के साथ जिज्ञासा प्रकट करनी चाहिए।
ब्राह्मणानां हितार्थाय सर्वयोगविदां वरः ।
आविष्कर्तुमनाः प्रश्नं विस्तरेण महामतिः ॥ १.२१ ॥
ब्राह्मणों के हित के लिए, सब योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ, विस्तार से प्रश्न (का उत्तर) प्रकट करने की इच्छा रखने वाले महाबुद्धिमान् याज्ञवल्क्य...
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में मुनियों, राजर्षियों और शिष्यों की जिज्ञासा और उनके द्वारा पूछे गए गहन प्रश्नों का उल्लेख था। अब इस श्लोक में उन प्रश्नों के प्रति महर्षि याज्ञवल्क्य की मानसिक स्थिति और उनके उपदेश के मूल उद्देश्य का वर्णन है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सर्वयोगविदां वरः, महामतिः, (यः) ब्राह्मणानां हितार्थाय (तस्य) प्रश्नं विस्तरेण आविष्कर्तुम् अनाः (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सर्वयोगविदां वरः: समस्त योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ। यहाँ 'योग' केवल शारीरिक आसनों का नाम नहीं, अपितु श्रुति, स्मृति और अनुभव का वह समन्वय है जिससे जीव अक्षर-ब्रह्म में लीन होता है। याज्ञवल्क्य जी उस पूर्ण योग के ज्ञाता हैं, इसलिए वे 'वर' (श्रेष्ठ) हैं।
• हितार्थाय: हित के लिए। योगेश्वर के लिए 'हित' का अर्थ भौतिक सुख नहीं, अपितु साधक का 'निःश्रेयस' (मोक्ष) और उसकी आध्यात्मिक उन्नति है।
• आविष्कर्तुम् अनाः: प्रकट करने की इच्छा रखने वाले। 'आविष्कर्तुम्' का अर्थ है—जो गुप्त है उसे स्पष्ट करना। मन्त्रों और योग के रहस्य गुप्त होते हैं, उन्हें पात्रता के अनुसार खोलना ही 'आविष्करण' है।
• विस्तरेण: विस्तार से। इसका अर्थ है कि उत्तर केवल संक्षिप्त या संकेत मात्र नहीं होंगे, अपितु उनमें विधि, रहस्य और फल का पूर्ण विवरण होगा।
• महामतिः: महान बुद्धि वाले। वह बुद्धि जो केवल तर्क नहीं करती, अपितु जिसमें 'विज्ञानघन' स्वरूप की प्रज्ञा विद्यमान है।
भाष्य —
यह श्लोक याज्ञवल्क्य जी के व्यक्तित्व और उनकी करुणा को रेखांकित करता है। यह वाक्य पिछले श्लोक (१.२०) से शुरू हुए प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए अगले श्लोक (१.२२) की क्रिया 'प्रत्युवाच' (उत्तर दिया) की ओर ले जाता है।
यहाँ याज्ञवल्क्य जी को 'सर्वयोगविदां वरः' कहा गया है। एक योगी जब पूर्णता को प्राप्त करता है, तो उसके भीतर 'करुणा' का उदय होता है। वह अपनी सिद्धि का उपयोग स्वयं के लिए नहीं, अपितु दूसरों के उत्थान के लिए करता है। "ब्राह्मणानां हितार्थाय" वाक्यांश यह स्पष्ट करता है कि यह उपदेश केवल बौद्धिक विलास नहीं है, बल्कि साधकों के कल्याण का एक साधन है।
महर्षि याज्ञवल्क्य जानते हैं कि ऋषियों ने जो प्रश्न पूछे हैं (जैसे—अक्षर क्या है, ध्यान क्या है, विद्या और अविद्या में क्या भेद है), वे अत्यंत सूक्ष्म हैं। इन रहस्यों को केवल एक शब्द में नहीं समझाया जा सकता, इसलिए वे 'विस्तरेण' अर्थात् विस्तार से उत्तर देने का संकल्प करते हैं। यह विस्तार साधक को स्थूल कर्म (विधि) से सूक्ष्म ज्ञान (रहस्य) की ओर ले जाने के लिए आवश्यक है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'गुरु-तत्व' और 'सेवा-भाव' के अभ्यास का संकेत देता है। योग की उच्च भूमियों में पहुँचकर साधक जब 'हितार्थ' (परहित) के भाव में स्थित होता है, तभी उसका ज्ञान पूर्ण होता है।
यहाँ 'महामति' शब्द का योगिक अर्थ है—वह चित्त जो पूर्णतः एकाग्र और शुद्ध है, जिसमें सत्य का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखता है। साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि ज्ञान का संचय करना पर्याप्त नहीं है, अपितु उस ज्ञान को पात्रता के अनुसार दूसरों के कल्याण के लिए 'आविष्कृत' (प्रकट) करना ही वास्तविक योग है। यह उपदेश देने की इच्छा स्वयं में एक योगिक अवस्था है, जहाँ गुरु और शिष्य के बीच ज्ञान का प्रवाह बिना किसी अवरोध के होता है।
भगवान् याज्ञवल्क्यस्तु प्रत्युवाच मुनींस्तदा ।
श्रूयतां संप्रवक्ष्यामि यत् सारं ज्ञानमुत्तमम् ॥ १.२२ ॥
… तब भगवान् याज्ञवल्क्य ने मुनियों को उत्तर दिया — सुनिए, जो सारभूत उत्तम ज्ञान है उसे मैं भली-भाँति कहूँगा।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में मुनियों और शिष्यों की जिज्ञासा तथा महर्षि याज्ञवल्क्य की करुणा और उनकी महाबुद्धि का वर्णन था। अब इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी उन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तत्पर होते हुए उपदेश का आरम्भ करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तदा भगवान् याज्ञवल्क्यः मुनींस्तदा प्रत्युवाच — (यूयं) श्रूयताम्, (अहं) यत् सारं ज्ञानमुत्तमम् (तत्) संप्रवक्ष्यामि।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्रत्युवावाच: उत्तर दिया। यह क्रिया पिछले श्लोक (१.२१) के 'आविष्कर्तुम् अनाः' (प्रकट करने की इच्छा) का फल है। जब जिज्ञासा और पात्रता का मिलन होता है, तब गुरु का उत्तर प्रकट होता है।
• श्रूयताम्: सुनिए। यह केवल सुनने की आज्ञा नहीं, अपितु 'श्रवण' नामक साधना का आह्वान है। वैदिक परम्परा में ज्ञान का प्रथम सोपान श्रवण है।
• सारं ज्ञानम्: सारभूत ज्ञान। 'सार' वह है जो अनावश्यक विस्तार से मुक्त हो और जिसमें तत्त्व का निचोड़ हो। जैसे दूध का सार घी है, वैसे ही समस्त वेदों और योगों का निचोड़ यह 'सार-ज्ञान' है।
• उत्तमम्: श्रेष्ठ। जो ज्ञान साधक को केवल भौतिक उन्नति नहीं, अपितु 'निःश्रेयस' (मोक्ष) तक ले जाए, वही उत्तम है।
• संप्रवक्ष्यामि: भली-भाँति कहूँगा। 'सम्' उपसर्ग पूर्णता और स्पष्टता का बोध कराता है। इसका अर्थ है कि रहस्य को बिना किसी संशय के, पूर्णता के साथ प्रकट करना।
भाष्य —
यह श्लोक गुरु और शिष्य के बीच उस संवाद की कड़ी है जहाँ प्रश्न समाप्त होते हैं और समाधान आरम्भ होता है। यह वाक्य यहाँ से आरम्भ होकर अगले श्लोक (१.२३) तक विस्तृत है, जहाँ वे यह स्पष्ट करते हैं कि यह ज्ञान वेदान्त, स्मृति और सिद्धान्तों का समुच्चय है।
यहाँ याज्ञवल्क्य जी स्वयं को 'भगवान्' के रूप में संबोधित किया गया है। योग की दृष्टि से 'भगवान्' वह है जिसने अपनी समस्त इंद्रियों और प्राणों को वश में कर लिया है और जो पूर्ण विज्ञानघन है। जब वे कहते हैं "श्रूयताम्" (सुनिए), तो वे मुनियों को केवल कान से सुनने के लिए नहीं, अपितु चित्त को एकाग्र कर 'श्रुति' (सुना हुआ ज्ञान) को हृदय में उतारने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
वे जिस 'सारभूत उत्तम ज्ञान' की बात कर रहे हैं, वह केवल सूचना नहीं है। यह वह ज्ञान है जो याज्ञवल्क्य जी ने अपनी श्रुति (शुक्ल यजुर्वेद) में बीज रूप में देखा और जिसे उन्होंने अपने योग-अनुभव से सिद्ध किया। यह ज्ञान 'उत्तम' इसलिए है क्योंकि यह साधक को बाह्य कर्मकाण्डों के जाल से निकालकर उनके आन्तर अर्थों (प्राण, सूर्य, अक्षर) से जोड़ता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक में 'श्रवण' का गहरा रहस्य है। योग मार्ग में ज्ञान की प्राप्ति तीन सोपानों से होती है: श्रवण, मनन और निदिध्यासन। यहाँ 'श्रूयताम्' शब्द श्रवण का प्रतीक है।
१. श्रवण का अभ्यास: साधक जब गुरु के वचनों को सुनता है, तो उसे केवल शब्दों का अर्थ नहीं खोजना चाहिए, अपितु उस ध्वनि के पीछे छिपे 'नाद' और गुरु की चेतना के स्पन्दन को ग्रहण करना चाहिए। जब चित्त शांत होता है, तब श्रवण 'श्रुति' बन जाता है।
२. सार का अनुभव: 'सारं ज्ञानम्' का अर्थ है—वह बिंदु जहाँ पहुँचकर सब विविधताएँ समाप्त हो जाती हैं। साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि साधना का लक्ष्य विस्तार नहीं, अपितु 'संकोचन' है—अर्थात अनेकता से एकत्व की ओर जाना।
३. भूमि का परिवर्तन: यह श्लोक साधक को 'जिज्ञासा' की भूमि से 'ग्रहण' की भूमि पर ले जाता है। जब तक प्रश्न थे, साधक खोज में था; अब जब उत्तर आरम्भ हो रहा है, तो साधक को 'शून्यता' और 'समर्पण' के भाव में आना है ताकि उत्तम ज्ञान उसके भीतर प्रतिष्ठित हो सके।
वेदान्ताभिहितं यच्च स्मृतिसिद्धान्तयोरपि ।
तत् सर्वं संप्रवक्ष्यामि योगसारसमुच्चयम् ॥ १.२३ ॥
वेदान्त में कहा गया और स्मृतियों तथा सिद्धान्तों में भी जो है, उस योगके सारका संग्रह मैं सब भली-भाँति कहूँगा।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मुनियों को संबोधित करते हुए 'उत्तम सार-ज्ञान' को कहने की प्रतिज्ञा की थी। वर्तमान श्लोक में वे उस ज्ञान के स्रोत और उसकी प्रकृति को स्पष्ट कर रहे हैं कि यह उपदेश किसी व्यक्तिगत मत पर आधारित नहीं, अपितु संपूर्ण वैदिक ज्ञान-परम्परा का निचोड़ है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: वेदान्ताभिहितं यच्च (ज्ञानं), स्मृति-सिद्धान्तयोरपि (अभिहितं तत्), (अहं) तत् सर्वं योगसारसमुच्चयम् संप्रवक्ष्यामि।
पदार्थ और निर्वचन:
• वेदान्ताभिहितं: वेदान्त में कहा गया। 'वेदान्त' का अर्थ है वेदों का अंतिम लक्ष्य या उपनिषद्। जो ज्ञान वेदों के अंतिम लक्ष्य (ब्रह्म-साक्षात्कार) के रूप में घोषित है, वह यहाँ आधार है।
• स्मृति-सिद्धान्तयोरपि: स्मृतियों और सिद्धान्तों में भी। 'स्मृति' वह ज्ञान है जो ऋषियों के अनुभव और श्रुति के आधार पर याद रखा गया और संहिताबद्ध हुआ। 'सिद्धान्त' वह निष्कर्ष है जो तर्क, अनुभव और प्रमाण द्वारा स्थिर (सिद्ध) हो चुका है।
• योगसारसमुच्चयम्: योग के सार का संग्रह। 'योग' यहाँ केवल शारीरिक आसन नहीं, अपितु आत्मा का परमात्मा से मिलन और मन्त्र-प्राण-चित्त का एकरूप होना है। 'सार' वह तत्त्व है जो अनावश्यक विस्तार से मुक्त है, और 'समुच्चय' का अर्थ है—विभिन्न स्रोतों से संकलित एक पूर्ण व्यवस्था।
• संप्रवक्ष्यामि: भली-भाँति कहूँगा। यह क्रिया पिछले श्लोक (१.२२) के 'संप्रवक्ष्यामि' का ही विस्तार है, जो यह दर्शाता है कि यह एक ही वाक्य का प्रवाह है।
भाष्य —
यह श्लोक बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के संपूर्ण स्वरूप और उसकी प्रमाणिकता का घोषणा-पत्र है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे जो कुछ भी कहने जा रहे हैं, वह तीन स्तरों पर प्रमाणित है: प्रथम—वेदान्त (श्रुति), द्वितीय—स्मृति और तृतीय—सिद्धान्त।
जब याज्ञवल्क्य 'योगसारसमुच्चय' शब्द का प्रयोग करते हैं, तो उनका संकेत उस गुप्त विद्या की ओर है जो बाहरी कर्मकाण्ड को आन्तरिक साधना में बदल देती है। वेदान्त लक्ष्य बताता है, स्मृतियाँ उस लक्ष्य तक पहुँचने की मर्यादा और विधि बताती हैं, और सिद्धान्त उस विधि के पीछे के तर्क और अनुभव को पुष्ट करते हैं। इन तीनों का संगम ही 'योग' है।
यह स्मृति कोई नया मत या दर्शन प्रस्तुत नहीं कर रही, अपितु यह उस प्राचीन और शाश्वत योग-परम्परा का संग्रह है जो शुक्लयजुर्वेद की श्रुति में बीजरूप में विद्यमान थी। यहाँ 'योग' का अर्थ है—मन्त्र, प्राण और ध्यान का ऐसा समन्वय जिससे साधक स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर और अंततः अक्षर-ब्रह्म तक की यात्रा करता है। याज्ञवल्क्य जी का यह वचन साधक को विश्वास दिलाता है कि आगे आने वाली विधियाँ (जैसे ओंकार, गायत्री, प्राणायाम) केवल रीति-रिवाज नहीं, अपितु वेदान्त के लक्ष्य को प्राप्त करने के सिद्ध साधन हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १.२.१५ ॥
सब वेद जिस पदका बार-बार वर्णन करते हैं, सब तप जिसे कहते हैं, जिसकी इच्छासे (साधक) ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं — वह पद मैं तुम्हें संक्षेपमें कहता हूँ: वह 'ओम्' है।
कठोपनिषद् में भी यही रीति दिखती है जहाँ कहा गया है कि सब वेद जिस पद का वर्णन करते हैं और सब तप जिसे कहते हैं, उसे 'संग्रहण' (संक्षेप) में बताया गया है। जिस प्रकार कठोपनिषद् में समस्त वेदों का सार 'ओम्' के रूप में संग्रहित है, उसी प्रकार बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में समस्त वेदान्त और स्मृतियों का सार 'योग-समुच्चय' के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह इस बात का प्रमाण है कि वैदिक परम्परा में 'सार' या 'संग्रह' का विशेष महत्त्व है ताकि साधक विस्तार में भटकने के बजाय सीधे लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सके।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'श्रद्धा' और 'समर्पण' की भूमि का निर्माण करता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके गुरु द्वारा बताया गया मार्ग वेदान्त, स्मृति और सिद्धान्तों से पुष्ट है, तो उसके भीतर का संशय समाप्त हो जाता है।
यहाँ 'योगसार' का अभ्यास यह है कि साधक अपनी समस्त बिखरी हुई वृत्तियों को एक केंद्र पर ले आए। जिस प्रकार याज्ञवल्क्य जी ने विभिन्न शास्त्रों के ज्ञान को 'समुच्चय' (एकत्र) किया, वैसे ही साधक को अपने प्राण, मन और बुद्धि को 'एकत्र' करना है। यह श्लोक साधक को उस मानसिक स्थिति में लाता है जहाँ वह केवल बाहरी विधि को नहीं देखता, बल्कि उस विधि के पीछे छिपे 'वेदान्त' (परम लक्ष्य) को अनुभव करता है। यह 'संग्रह' की अवस्था है, जहाँ साधक अनेकता से एकात्मकता की ओर बढ़ता है।
येन यत् क्रियते कर्म नैत्यकं यद्द्विजातिभिः ।
ब्राह्मण्यं लभते येन ब्रह्मसायुज्यतां व्रजेत् ॥ १.२४ ॥
जिस (ज्ञान) से द्विजाति अपना नित्य कर्म करते हैं, जिससे (मनुष्य) ब्राह्मणत्व पाता है और ब्रह्मके सायुज्यको जाता है —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेदान्त, स्मृति और सिद्धान्तों के योग-सार को प्रकट करने की प्रतिज्ञा की थी। वर्तमान श्लोक में वे उस ज्ञान की उपयोगिता और उसके लक्ष्य को स्पष्ट कर रहे हैं, जिससे यह ज्ञात हो कि यह उपदेश केवल सैद्धान्तिक नहीं, अपितु साधक के जीवन को रूपांतरित करने वाला व्यावहारिक मार्ग है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तत् ज्ञानं) येन यत् (नित्यकर्म) द्विजातिभिः क्रियते (तत्) नैत्यकं (कर्म), (तथा) येन (मनुष्यः) ब्राह्मण्यं लभते, (तथा) येन ब्रह्मसायुज्यतां व्रजेत् (तत् सर्वं संप्रवक्ष्यामि)।
पदार्थ और निर्वचन:
• नैत्यकं: नित्य कर्म। वे कर्म जो काल-निरपेक्ष होकर प्रतिदिन किए जाते हैं (जैसे संध्या, स्नान, जप)। योग की दृष्टि में 'नित्य' का अर्थ है—वह निरंतरता जो साधक को परमात्मा से जोड़े रखे।
• द्विजातिभिः: द्विज जाति के द्वारा। यहाँ 'द्विज' केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं, अपितु वह है जिसका दूसरा जन्म (ज्ञान-दीक्षा द्वारा) हुआ है।
• ब्राह्मण्यं: ब्राह्मणत्व। यह केवल सामाजिक स्थिति नहीं, अपितु 'ब्रह्म' को जानने की योग्यता और उस अवस्था को प्राप्त करना है जहाँ व्यक्ति का चित्त शुद्ध और सात्विक हो जाता है।
• ब्रह्मसायुज्यतां: ब्रह्म के साथ सायुज्य (एकता)। 'सायुज्य' का अर्थ है—परमात्मा के साथ पूर्णतः लय हो जाना, जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है।
• व्रजेत्: प्रविष्टि हो या प्राप्त करे।
भाष्य —
यह श्लोक एक अपूर्ण वाक्य का अंश है, जिसका प्रारंभ श्लोक १.२२ के 'संप्रवक्ष्यामि' (कहूँगा) से होता है और जिसका समापन श्लोक १.२६ के 'कर्तव्यं' (करना चाहिए) पर होता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस 'उत्तम ज्ञान' के तीन सोपानों का वर्णन कर रहे हैं:
प्रथम सोपान है—नित्य कर्म (नैत्यकं)। द्विज के लिए नित्य कर्म केवल बाहरी विधि नहीं, अपितु अनुशासन है। जब साधक प्रतिदिन निर्धारित समय पर मन्त्रों और क्रियाओं का अभ्यास करता है, तो उसका बिखरा हुआ मन एक केंद्र पर टिकने लगता है। यह 'नित्य' अभ्यास ही चित्त की वृत्तियों को शांत कर उसे योग के योग्य बनाता है।
द्वितीय सोपान है—ब्राह्मणत्व (ब्राह्मण्यं)। जब नित्य कर्म केवल क्रिया न रहकर 'साधना' बन जाते हैं, तब साधक में 'ब्राह्मण्य' का उदय होता है। यहाँ ब्राह्मणत्व का अर्थ है—ब्रह्म-भाव की प्राप्ति। जब व्यक्ति के भीतर अहंकार का नाश होता है और वह स्वयं को केवल एक शरीर न मानकर चैतन्य स्वरूप अनुभव करने लगता है, तब वह वास्तविक ब्राह्मण कहलाता है।
तृतीय और अंतिम सोपान है—ब्रह्म-सायुज्य। यह योग की पराकाष्ठा है। जिस ज्ञान और विधि का वर्णन महर्षि यहाँ करने जा रहे हैं, उसका अंतिम लक्ष्य केवल पुण्य अर्जन या स्वर्ग प्राप्ति नहीं, अपितु ब्रह्म में विलीन हो जाना है।
महर्षि यह संकेत दे रहे हैं कि नित्य कर्म और ब्रह्म-सायुज्य दो अलग-अलग छोर नहीं हैं, बल्कि एक ही यात्रा के पड़ाव हैं। जो नित्य कर्मों को योग की दृष्टि से (आन्तर अर्थ सहित) करता है, वही ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है और अंततः ब्रह्म में लीन हो जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि 'नित्य कर्म' ही 'मुक्ति का मार्ग' है। प्रायः यह भ्रम रहता है कि नित्य कर्म (पूजा-पाठ) सांसारिक हैं और योग या समाधि अलग है। याज्ञवल्क्य इस भ्रम को तोड़ते हैं।
योगिक अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक प्रतिदिन ओंकार, गायत्री और प्राणायाम (जिनका उल्लेख अगले श्लोकों में है) का अभ्यास करता है, तो वह वास्तव में अपने स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर और सूक्ष्म से कारण शरीर की ओर बढ़ता है।
• नित्य कर्म का अभ्यास: यह 'आरम्भिक भूमि' है, जहाँ अनुशासन और शुद्धि होती है।
• ब्राह्मणत्व का अनुभव: यह 'मध्य भूमि' है, जहाँ साधक को अपने भीतर के साक्षी भाव का अनुभव होता है।
• ब्रह्म-सायुज्य: यह 'परम भूमि' है, जहाँ साधक का अस्तित्व अक्षर-ब्रह्म में विलीन हो जाता है।
अतः साधक को चाहिए कि वह अपने दैनिक कर्मों को बोझ न समझे, बल्कि उन्हें ब्रह्म-सायुज्य की सीढ़ी माने। रोज का छोटा-सा अभ्यास ही वह बीज है जो अंततः सायुज्य रूपी विशाल वृक्ष बनता है।
ओंकारो व्याहृतयश्च गायत्री सशिरास्तथा ।
वैदिकं च तथा कर्म अब्लिङ्गं चाघमर्षणम् ॥ १.२५ ॥
— ओंकार, व्याहृतियाँ, शिरस् सहित गायत्री, तथा वैदिक कर्म, अप्-लिङ्ग (जलदेवताके) मन्त्र और अघमर्षण —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस उत्तम ज्ञान की उपयोगिता बताई थी, जिससे मनुष्य ब्राह्मणत्व और ब्रह्मसायुज्य को प्राप्त करता है। अब वर्तमान श्लोक से वे उस व्यावहारिक मार्ग की सूची प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे एक ब्रह्मचिन्तक को अपने नित्य-जीवन में आत्मसात करना चाहिए।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ब्रह्मचिन्तकैः) ओंकारः, व्याहृतयः, सशिराः गायत्री, (तथा) वैदिकं कर्म, अब्लिङ्गं च, अघमर्षणं (च कर्तव्यम्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• ओंकारः: प्रणव (ॐ)। समस्त मन्त्रों का बीज और ब्रह्म का वाचक।
• व्याहृतयः: भूः, भुवः, स्वः। वे शब्द जो स्थूल जगत (पृथ्वी), अन्तरिक्ष और स्वर्ग के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
• सशिराः गायत्री: 'शिरस्' का अर्थ है मस्तक या शीर्ष। यहाँ 'सशिरा' का तात्पर्य उस गायत्री मन्त्र से है जो अपने पूर्ण स्वरूप (शिरस् यानी प्रणव और व्याहृतियों सहित) में जप किया जाता है।
• वैदिकं कर्म: वेदों में निर्देशित नित्य कर्म, जो केवल बाह्य क्रियाएँ नहीं, अपितु चेतना के उत्थान के साधन हैं।
• अब्लिङ्गं: 'अप्' का अर्थ है जल और 'लिङ्ग' का अर्थ है चिन्ह या प्रतीक। जल-देवता के वे मन्त्र जो शरीर और मन की शुद्धि के लिए प्रयुक्त होते हैं (जैसे 'आपो हि ष्ठा' आदि)।
• अघमर्षणम्: 'अघ' (पाप/अज्ञान) का 'मर्षण' (धोना या मिटाना)। वह मन्त्र या विधि जो साधक के अंतःकरण पर जमी अविद्या की धूल को साफ करती है।
भाष्य —
यह श्लोक एक विस्तृत वाक्य का मध्य भाग है। वाक्य का आरम्भ श्लोक १.२२ के 'संप्रवक्ष्यामि' (कहूँगा) से हुआ है और इसका समापन श्लोक १.२६ के 'कर्तव्यं' (करना चाहिए) पर होगा। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उन अनिवार्य सोपानों की सूची दे रहे हैं, जिनके बिना योग-साधना अधूरी है।
यहाँ महर्षि ने सबसे पहले 'ओंकार' को रखा है, क्योंकि समस्त वैदिक विद्या का प्रस्थान-बिन्दु प्रणव है। उसके पश्चात 'व्याहृतियाँ' आती हैं, जो साधक को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाती हैं। फिर 'सशिरा गायत्री' का उल्लेख है; गायत्री को 'सशिरा' कहना इस बात का संकेत है कि मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत शरीर है, जिसमें प्रणव उसका मस्तक है।
इसके उपरान्त 'वैदिक कर्म' का विधान है, जो अनुशासन सिखाता है। 'अब्लिङ्ग' और 'अघमर्षण' का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि उच्चतर योग-साधना से पूर्व 'शुद्धि' अनिवार्य है। जल के मन्त्रों द्वारा बाह्य और सूक्ष्म शरीर का शोधन और अघमर्षण द्वारा मानसिक संस्कारों का क्षय, साधक को उस पात्रता तक ले जाता है जहाँ वह ब्रह्मचिन्तन में स्थिर हो सके।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ २.७८ ॥
इस अक्षर (ॐ) का और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (सावित्री) का दोनों सन्ध्याओंमें जप करनेवाला वेदवेत्ता विप्र वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है।
मनुस्मृति में भी नित्य कर्मों का यही क्रम मिलता है, जहाँ ओंकार, व्याहृतिपूर्वक सावित्री और संध्या के जप को वेद-पुण्य का आधार माना गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि मन्त्रों का यह क्रम केवल कर्मकाण्ड नहीं, अपितु विप्रत्व (ब्रह्मवेत्ता होने) की अनिवार्य शर्त है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक की 'तैयारी' का मार्ग है। एक योगी के लिए यह सूची एक क्रमबद्ध यात्रा है:
१. ओंकार: यह ध्वनि-योग है, जहाँ साधक अपनी चेतना को बीज-अक्षर में विलीन करता है।
२. व्याहृति: यह विस्तार है, जहाँ वह अपनी चेतना को भूः, भुवः और स्वः के माध्यम से त्रैलोक्य में विस्तृत करता है।
३. सशिरा गायत्री: यह प्रकाश-योग है, जहाँ वह अपनी बुद्धि (धी) को उस परम ज्योति से जोड़ता है।
४. वैदिक कर्म: यह अनुशासन है, जो मन को चंचल होने से रोकता है।
५. अब्लिङ्ग और अघमर्षण: यह शोधन-प्रक्रिया है। जिस प्रकार दर्पण की धूल साफ होने पर ही प्रतिबिंब दिखता है, वैसे ही अघमर्षण के अभ्यास से जब चित्त के मल (पाप/अविद्या) धुल जाते हैं, तब हृदय में आत्मा का साक्षात्कार होता है।
साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि उसकी साधना 'शून्य' से नहीं, बल्कि 'ध्वनि' (ओंकार) से आरम्भ होकर 'शुद्धि' (अघमर्षण) तक जाती है। यह क्रम साधक को स्थूल देह से उठाकर सूक्ष्म प्राण और फिर अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है।
प्राणायामस्तथा संध्या मार्जनान्तर्जलं जपः ।
सर्वमेव हि कर्तव्यं ब्राह्मणैर्ब्रह्मचिन्तकैः ॥ १.२६ ॥
प्राणायाम, संध्या, मार्जन, अन्तर्जल और जप — यह सब वास्तव में ब्रह्मका चिन्तन करनेवाले ब्राह्मणोंको करना ही चाहिए।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन अनिवार्य सोपानों की सूची आरम्भ की थी, जिनमें प्रणव, व्याहृति और गायत्री जैसे बीज-मन्त्र सम्मिलित थे। वर्तमान श्लोक में वे उस सूची को पूर्ण करते हुए इन समस्त क्रियाओं के पीछे के उद्देश्य और उनके योग्य पात्र का निर्धारण कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: प्राणायामः, तथा संध्या, मार्जनम्, अन्तर्जलं, जपः (च) । (एतत्) सर्वमेव हि ब्राह्मणैर्ब्रह्मचिन्तकैः कर्तव्यम् ।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्राणायामः: प्राण का आयाम (विस्तार या संयम)। यह केवल श्वास की गति को नियंत्रित करना नहीं, अपितु प्राण को उसके मूल स्रोत (अक्षर) में विलीन करने की प्रक्रिया है।
• संध्या: दिन और रात्रि के मिलनकाल की उपासना। योगिक दृष्टि से यह स्थूल और सूक्ष्म, तथा जाग्रत और सुषुप्त अवस्थाओं के बीच की 'संधि' का अभ्यास है।
• मार्जनम्: बाह्यतः जल का छिड़काव, परन्तु आन्तरिकतः मन के विकारों का प्रक्षालन।
• अन्तर्जलं: शरीर के भीतर के जल-तत्व (रस, रक्त, वीर्य) का मन्त्रों द्वारा शुद्धिकरण। इसे 'अन्तः-स्नान' भी कहा जाता है।
• जपः: मन्त्र का बार-बार उच्चारण। यह मन को एकाग्र कर उसे शब्द से अर्थ और अर्थ से अर्थातीत (ब्रह्म) तक ले जाने का साधन है।
• ब्रह्मचिन्तकैः: वे ब्राह्मण जो केवल कर्मकाण्ड में लीन नहीं हैं, अपितु जिनका निरंतर चिंतन 'ब्रह्म' (परम तत्त्व) का है। यहाँ 'ब्राह्मण' जातिवाचक नहीं, अपितु गुणवाचक है—वह जो ब्रह्म को जानता है या उसकी खोज में है।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (१.२५) से शुरू हुए वाक्य का उपसंहार है। वाक्य का पूर्ण विस्तार इस प्रकार है: "ओंकार, व्याहृति, सशिरा गायत्री, वैदिक कर्म, अब्लिङ्ग और अघमर्षण (१.२५) तथा प्राणायाम, संध्या, मार्जन, अन्तर्जल और जप (१.२६)—यह सब वास्तव में ब्रह्म का चिन्तन करने वाले ब्राह्मणों द्वारा किया जाना चाहिए।"
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण समन्वय स्थापित कर रहे हैं। सामान्यतः यह माना जाता है कि जो 'ब्रह्मचिन्तक' (ज्ञानी) है, उसे बाह्य क्रियाओं की आवश्यकता नहीं। परन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ये कर्म 'कर्तव्यं' हैं—अर्थात् अनिवार्य हैं। इसका कारण यह है कि ये क्रियाएँ केवल शरीर की शुद्धि के लिए नहीं, अपितु चेतना के परिष्कार के लिए हैं।
जब एक ब्रह्मचिन्तक प्राणायाम करता है, तो वह केवल वायु को नहीं रोकता, अपितु प्राण के माध्यम से ब्रह्म का अनुभव करता है। जब वह संध्या करता है, तो वह समय की सीमाओं को लाँघकर कालातीत अवस्था में प्रवेश करता है। मार्जन और अन्तर्जल की क्रियाएँ उसके लिए केवल जल का प्रयोग नहीं, अपितु अपने भीतर के सूक्ष्म तत्त्वों को चैतन्य करने का विज्ञान हैं। जप उसके लिए शब्दों का दोहराव नहीं, अपितु उस 'अक्षर' की ओर बढ़ने की यात्रा है जिसका वह चिन्तन कर रहा है। अतः ये समस्त कर्म ब्रह्म-सायुज्य के मार्ग में बाधक नहीं, बल्कि सहायक सोपान हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
संध्या और जप की महत्ता के विषय में मनुस्मृति में उल्लेख मिलता है:
पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ २.१०२ ॥
प्रातःसन्ध्यामें खड़े होकर (सावित्रीका) जप करनेवाला रातके पापको दूर करता है, और सायंसन्ध्यामें बैठकर (जप करनेवाला) दिनमें किये मलको नष्ट करता है।
यहाँ मनुस्मृति संध्या और जप के शारीरिक (खड़े होकर या बैठकर) और उनके द्वारा पाप-नष्टि (शुद्धिकरण) पर बल देती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विधि को स्वीकार करते हुए उसे 'ब्रह्मचिन्तन' से जोड़ देती है। जहाँ मनुस्मृति इसे 'मल' और 'पाप' की निवृत्ति का साधन मानती है, वहीं यह स्मृति इसे ब्रह्म-सायुज्य की तैयारी मानती है। दोनों का लक्ष्य शुद्धि ही है, परन्तु एक का दृष्टिकोण कर्मकाण्डीय है और दूसरे का योगिक।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य 'ब्रह्मचिन्तकैः' शब्द में छिपा है। याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि यदि ये कर्म बिना ब्रह्म-चिन्तन के किए जाएँ, तो वे केवल यांत्रिक क्रियाएँ बनकर रह जाएँगी, जिनका फल अल्प होगा।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह जब प्राणायाम करे, तो अनुभव करे कि प्राण ही ब्रह्म का विस्तार है। जब वह जप करे, तो शब्द के पीछे छिपे उस मौन को सुने जो ब्रह्म है। मार्जन और अन्तर्जल के समय वह यह अनुभव करे कि उसके भीतर का अज्ञान रूपी मल धुल रहा है और वह शुद्ध चैतन्य में परिवर्तित हो रहा है।
यह श्लोक साधक को 'क्रिया' से 'चिन्तन' की भूमि पर ले जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि बाह्य विधि को मिटाए बिना, उसके भीतर के आन्तर अर्थ (प्राण, मन, हृदय) को जाग्रत किया जाए। जब कर्म और चिन्तन एक हो जाते हैं, तब वह 'कर्म' नहीं रहता, बल्कि 'योग' बन जाता है। इस प्रकार साधक स्थूल शरीर की शुद्धि से आरम्भ कर, प्राण के संयम से होते हुए, अंततः ब्रह्म-सायुज्य की भूमि तक पहुँचता है।
आर्षच्छन्दादिज्ञानप्रयोजनम्
आर्षं छन्दश्च दैवत्यं विनियोगस्तथैव च ।
वेदितव्यं प्रयत्नेन ब्राह्मणेन विपश्चिता ॥ १.२७ ॥
ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग को उसी प्रकार विद्वान् ब्राह्मण द्वारा प्रयत्नपूर्वक जानना चाहिए।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों (१.२५–१.२६) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन नित्य कर्मों और मन्त्रों की सूची दी, जो एक ब्रह्मचिन्तक ब्राह्मण के लिए अनिवार्य हैं। अब ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि इन मन्त्रों का केवल यांत्रिक उच्चारण पर्याप्त नहीं है, अपितु उनके स्वरूप का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है।
अन्वय और पदार्थ —
आर्षं, छन्दश्च, दैवत्यं, विनियोगस्तथैव च ।
एतत् (चतुष्टयम्) विपश्चिता ब्राह्मणेन प्रयत्नेन वेदितव्यम् ॥
पदार्थ और निर्वचन:
• आर्षं — ऋषि का ज्ञान। वह द्रष्टा जिसने मन्त्र के बीज-रूप को अपनी समाधि में देखा और उसे शब्दों में उतारा।
• छन्दश्च — छन्द का ज्ञान। मन्त्र की वह लय, गति और नाद-संरचना जिसमें वह प्रतिष्ठित है।
• दैवत्यं — देवता का ज्ञान। मन्त्र का वह अधिष्ठान या वह शक्ति जिसके स्वरूप का मन्त्र वर्णन करता है या जिसे वह जाग्रत करता है।
• विनियोगस्तथैव च — विनियोग का ज्ञान भी। मन्त्र का वह विशिष्ट प्रयोग या वह प्रयोजन जिसके लिए उसका जप या होम किया जा रहा है।
• विपश्चिता — वह जो केवल शास्त्र-पण्डित नहीं, अपितु जिसकी बुद्धि सूक्ष्म है, जो शब्दों के पीछे छिपे अर्थ को पकड़ने में समर्थ है (विवेकशील)।
• प्रयत्नेन — प्रयत्नपूर्वक। यह संकेत है कि यह ज्ञान केवल सुनने से नहीं, अपितु साधना, स्वाध्याय और गुरु-निदेश के सक्रिय प्रयास से प्राप्त होता है।
• वेदितव्यम् — जानना चाहिए। यहाँ 'वेदितव्य' शब्द का प्रयोग केवल सूचना के लिए नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान के लिए हुआ है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र-साधना के चार अनिवार्य स्तम्भों—ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग—के ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित कर रहे हैं। यह श्लोक पिछले श्लोकों में बताई गई 'विधि' और अगले श्लोकों में बताए जाने वाले 'फल' के बीच की कड़ी है।
भाव यह है कि मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक जीवित ऊर्जा है। जिस प्रकार किसी औषधि का प्रभाव तभी पूर्ण होता है जब उसका गुण, उसकी मात्रा और उसके प्रयोग का समय ज्ञात हो, उसी प्रकार मन्त्र का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब साधक उसके इन चार अंगों को जान ले।
एक 'विपश्चित' ब्राह्मण, जो ब्रह्मचिन्तन में लगा है, वह यह समझता है कि मन्त्र का 'ऋषि' उसका मूल स्रोत है, 'छन्द' उसका वाहन है, 'देवता' उसका लक्ष्य है और 'विनियोग' उसका मार्ग है। यदि इनमें से एक भी अंग अज्ञात रहे, तो साधना अधूरी रहती है। महर्षि यहाँ 'प्रयत्न' पर बल दे रहे हैं क्योंकि मन्त्रों का आन्तरिक रहस्य केवल शब्दों के पाठ से नहीं, अपितु गहन मनन और योगिक एकाग्रता से खुलता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से, मन्त्र का जप करने से पूर्व उसके परिचय (ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग) का स्मरण करना 'चित्त-संस्कार' की एक प्रक्रिया है।
साधक जब 'ऋषि' का स्मरण करता है, तो वह स्वयं को उस प्राचीन ज्ञान-परम्परा और उस द्रष्टा की चेतना से जोड़ता है। जब वह 'छन्द' का विचार करता है, तो उसका मन मन्त्र की लय में ढलने के लिए तैयार होता है। 'देवता' का स्मरण उसे मन्त्र के लक्ष्य (दिव्य स्वरूप) पर केंद्रित करता है और 'विनियोग' उसे यह बोध कराता है कि वह इस समय किस विशिष्ट उद्देश्य के लिए अपनी प्राण-शक्ति को दिशा दे रहा है।
यह प्रक्रिया साधक को 'अविज्ञ' (अनजान) की भूमि से उठाकर 'विज्ञ' (जानकार) की भूमि पर ले जाती है। बिना इस परिचय के जप करना केवल वाक-जाल है, किन्तु इन चारों के ज्ञान के साथ जप करना 'मन्त्र-योग' बन जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि मन्त्र के उच्चारण से पूर्व, साधक अपने हृदय में इन चारों तत्त्वों को स्थापित करे, जिससे मन्त्र का प्रभाव केवल कंठ तक सीमित न रहकर हृदय और प्राण तक उतर जाए।
आर्षच्छन्दाद्यज्ञाने फलाल्पत्वम्
अविदित्वा तु यः कुर्याद्याजनाध्यपनं जपम् ।
होममन्तर्जलादीनि तस्य चाल्पं फलं भवेत् ।
आपद्यते स्थाणुगर्ते स्वयं वाऽपि प्रमी(ली)यते ॥ १.२८ ॥
परन्तु जो (इन्हें) जाने बिना यज्ञ कराना, पढ़ाना, जप, होम और अन्तर्जल आदि करता है, उसका फल अल्प होता है; वह ठूँठ या गड्ढेको प्राप्त होता है, अथवा स्वयं मर जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (१.२७) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग के ज्ञान की अनिवार्यता बताई। अब इस श्लोक में वे इस ज्ञान के अभाव में किए गए कर्मों के दुष्परिणामों और उनकी निरर्थकता का वर्णन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
परन्तु तु यः (ऋषि-छन्द-देवता-विनियोगं) अविदित्वा कुर्यात् याजनम्, अध्यापनम्, जपम्, होमम्, अन्तर्जलादीनि, तस्य अल्पं फलं भवेत् । सः स्थाणुगर्ते आपद्यते अथवा स्वयं वाऽपि प्रमीलीयते ॥
पदार्थ और निर्वचन:
• अविदित्वा — बिना जाने। यहाँ 'जानने' का अर्थ केवल बौद्धिक सूचना नहीं, अपितु मन्त्र के अधिष्ठान और उसकी शक्ति के साथ तादात्म्य का अभाव है।
• याजनम् — यज्ञ कराना। दूसरों को मन्त्रों के माध्यम से देव-यज्ञ में प्रतिष्ठित करना।
• अध्यापनम् — पढ़ाना। वेदमन्त्रों का उपदेश देना।
• अन्तर्जलादीनि — अन्तर्जल आदि। शरीर के भीतर जल के मन्त्रों का मानसिक जप या आंतरिक शुद्धि की क्रिया।
• अल्पं फलं — न्यून फल। वह फल जो केवल स्थूल स्तर पर मिले, किन्तु साधक को सूक्ष्म या कारण स्तर की सिद्धि न दे।
• स्थाणुगर्ते — 'स्थाणु' का अर्थ है खम्भा या ठूँठ और 'गर्त' का अर्थ है गड्ढा। यह एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में 'स्थाणुगर्त' उस स्थिति को कहते हैं जहाँ व्यक्ति अपनी योग्यता खोकर पतन को प्राप्त होता है या जहाँ उसकी साधना एक ऐसे अवरोध (ठूँठ) से टकराती है जिससे वह आगे नहीं बढ़ पाता।
• प्रमीलीयते — नष्ट हो जाना, विलीन हो जाना या मृत्यु को प्राप्त होना। यहाँ इसका अर्थ केवल शारीरिक मृत्यु नहीं, अपितु आध्यात्मिक पतन या अपनी तपस्या के तेज का क्षय होना भी है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक गंभीर चेतावनी दे रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग के रहस्यों को जाने बिना यांत्रिक रूप से यज्ञ कराता है, वेदों का अध्यापन करता है, जप या होम करता है, तो वह साधना पूर्ण नहीं होती।
मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक विशिष्ट 'ध्वनि-शक्ति' है। जब साधक ऋषि (द्रष्टा) को जानता है, तो वह उस चेतना से जुड़ता है जिसने मन्त्र देखा। जब वह छन्द को जानता है, तो वह उस नाद-लय में प्रवेश करता है। जब वह देवता को जानता है, तो वह उस शक्ति के स्वरूप में स्थित होता है और विनियोग से वह उस शक्ति को सही दिशा में प्रवाहित करता है। इन चारों के बिना मन्त्र केवल 'शब्द' रह जाता है, 'शक्ति' नहीं बनता।
अतः, ऐसे व्यक्ति का फल 'अल्प' होता है। अल्प फल का अर्थ है कि उसे शायद कुछ भौतिक लाभ मिल जाए, किन्तु वह 'ब्रह्मसायुज्य' या 'योग-सिद्धि' को प्राप्त नहीं कर पाता। और भी गंभीर बात यह है कि अज्ञानवश मन्त्रों का गलत प्रयोग या उनके स्वरूप की उपेक्षा करने से साधक 'स्थाणुगर्त' में गिरता है। जिस प्रकार एक गड्ढे में गिरा हुआ व्यक्ति स्वयं को बाहर नहीं निकाल पाता, उसी प्रकार अज्ञानी साधक अपनी ही गलत साधना के जाल में फंसकर आध्यात्मिक जड़ता (ठूँठ) को प्राप्त हो जाता है। 'प्रमीलीयते' का भाव यह है कि बिना ज्ञान के किया गया अहंकारपूर्ण कर्म साधक के स्वयं के तेज और प्राणशक्ति को नष्ट कर देता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'सावधानी' और 'सजगता' का अभ्यास है। साधक के लिए यह संदेश है कि साधना में 'अंधानुकरण' घातक है।
जब हम किसी मन्त्र का जप करते हैं, तो हमारा मन उस मन्त्र के देवता (अधिष्ठान) में लीन होना चाहिए। यदि हम केवल शब्दों को दोहरा रहे हैं और हमारा मन कहीं और है, या हमें यह ज्ञात ही नहीं कि यह मन्त्र किस शक्ति का आवाहन कर रहा है, तो हम केवल 'वाचिक' स्तर पर हैं। योग का लक्ष्य 'वाचिक' से 'मानसिक' और फिर 'पास्य' (अनुभवजन्य) स्तर पर जाना है।
बिना ज्ञान के किया गया जप मन में केवल विक्षेप पैदा करता है, एकाग्रता नहीं। 'स्थाणुगर्त' का योगिक अर्थ है—साधना के मार्ग में आने वाले वे अवरोध जहाँ साधक अपनी अज्ञानता के कारण अटक जाता है और उसकी प्रगति रुक जाती है। अतः साधक को चाहिए कि वह किसी भी मन्त्र या क्रिया को अपनाने से पूर्व उसके 'तत्व' (ऋषि-छन्द-देवता-विनियोग) को समझ ले, ताकि उसकी ऊर्जा व्यर्थ न जाए और वह सुरक्षित रूप से सूक्ष्म भूमियों की ओर अग्रसर हो सके।
यातयामानि च्छन्दांसि भवन्त्यल्पफलान्यपि ।
अन्तर्जलादिके जप्ये इतरेषामजानताम् ॥ १.२९ ॥
(ऐसेके) छन्द (मन्त्र) यातयाम (निःसार) और अल्पफल हो जाते हैं। अन्तर्जल आदि जपमें, (इन्हें) न जाननेवाले अन्य लोगोंका —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (१.२८) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग के ज्ञान के बिना कर्म करने वाले के पतन और अल्प फल की चेतावनी दी थी। वर्तमान श्लोक उसी चेतावनी का विस्तार है, जहाँ वे मन्त्रों के 'निःसार' होने की स्थिति और उसके प्रभाव को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
इतरेषामजानताम् (ऋषि-छन्द-देवता-विनियोगं) अन्तर्जलादिके जप्ये (पि), छन्दांसि यातयामानि च अल्पफलान्यपि भवन्ति ॥
पदार्थ और निर्वचन:
• इतरेषामजानताम् — अन्य लोगों के, जो (इन तत्वों को) नहीं जानते। यहाँ 'इतरे' वे हैं जो केवल यांत्रिक रूप से मन्त्रों का उच्चारण करते हैं, किन्तु उनके अधिष्ठान से अनभिज्ञ हैं।
• अन्तर्जलादिके — अन्तर्जल आदि क्रियाओं में। अन्तर्जल वह साधना है जिसमें जल के मन्त्रों द्वारा शरीर के भीतर की शुद्धि की जाती है।
• जप्ये — जप किए जाने पर। यह क्रियावाचक शब्द है, जो मन्त्र के बार-बार उच्चारण की प्रक्रिया को दर्शाता है।
• यातयामानि — निःसार, बासी या शक्तिहीन। जिस प्रकार भोजन समय बीत जाने पर अपना पोषण मूल्य खोकर 'बासी' हो जाता है, उसी प्रकार जब मन्त्र अपने ऋषि, छन्द और देवता के बोध से रहित होकर केवल शब्दों का समूह बन जाता है, तो वह 'यातयाम' कहलाता है।
• अल्पफलान्यपि — अत्यंत न्यून फल देने वाले। यहाँ 'अपि' का प्रयोग यह दर्शाने के लिए है कि फल तो मिलता है (क्योंकि शब्द-शक्ति शेष रहती है), किन्तु वह फल अत्यंत तुच्छ और केवल स्थूल होता है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र-योग के एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं। मन्त्र केवल ध्वनि की तरंगें नहीं हैं, अपितु वे विशिष्ट चेतना-स्थितियाँ हैं। जब कोई साधक ऋषि (द्रष्टा), छन्द (लय/गति), देवता (शक्ति) और विनियोग (प्रयोजन) को जाने बिना जप करता है, तो वह मन्त्र उसके लिए 'यातयाम' हो जाता है।
'यातयाम' का अर्थ है—वह मन्त्र जो अपनी प्राण-शक्ति खो चुका हो। मन्त्र की शक्ति उसके 'अर्थ' और 'भाव' के मिलन में होती है। जब साधक को यह ज्ञात ही नहीं कि इस मन्त्र को किस ऋषि ने किस अवस्था में अनुभव किया था (ऋषि), इसकी आंतरिक लय क्या है (छन्द), यह किस दिव्य शक्ति का आवाहन कर रहा है (देवता) और इसे किस विशिष्ट उद्देश्य के लिए प्रयुक्त करना है (विनियोग)—तब वह जप केवल एक यांत्रिक व्यायाम बन जाता है।
विशेषतः 'अन्तर्जल' जैसी आंतरिक शुद्धि की क्रियाओं में, जहाँ मन्त्र को शरीर के भीतर प्राणों के साथ जोड़ना होता है, वहाँ यह अज्ञानता और भी घातक होती है। बाहरी कर्मों में शायद कुछ स्थूल फल मिल जाए, किन्तु जब जप अन्तर्मुखी होता है, तो बिना ज्ञान के वह मन्त्र साधक के भीतर जाग्रत नहीं होता, अपितु 'बासी' या निःसार बना रहता है। ऐसा जप साधक को उस ऊँचाई तक नहीं ले जा सकता जहाँ वह ब्रह्मसायुज्य या आत्म-साक्षात्कार कर सके। यह वाक्य अगले श्लोक (१.३०) तक विस्तृत है, जहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसे अज्ञानी का मन्त्रों पर वास्तविक 'अधिकार' नहीं होता।
शास्त्र-साक्ष्य —
मन्त्रों के 'यातयाम' होने और उन्हें पुनः प्राणवान बनाने का रहस्य गोपथ ब्राह्मण में मिलता है:
सैषैकाक्षरर्ग्ब्रह्मणस्तपसोऽग्रे प्रादुर्बभूव ब्रह्मवेदस्याथर्वणं शुक्रम् अत एव मन्त्राः प्रादुर्बभूवुः स तु खलु मन्त्राणां अतपसासुश्रूषानध्यायाध्ययनेन यदूनं च विरिष्टं च यातयामं च करोति तदथर्वणां तेजसा प्रत्याप्याययेत् मन्त्राश्च मां अभिमुखीभवेयुर्गर्भा इव मातरं अभिजिघांसुः पुरस्तादोंकारं प्रयुङ्क्ते एतयैव तदृचा प्रत्याप्यायेत् एषैव यज्ञस्य पुरस्ताद्युज्यते एषा पश्चात् सर्वत एतया यज्ञस्तायते तदप्येतदृचोक्तम् या पुरस्ताद्युज्यत ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्निति तदेतदक्षरं ब्राह्मणो यं कामं इच्छेत्त्रिरात्रोपोषितः प्राङ्मुखो वाग्यतो बर्हिष्युपविश्य सहस्रकृत्व आवर्तयेत् सिध्यन्त्यस्यार्थाः सर्वकर्माणि चेति ब्राह्मणं ॥ १.२२ ॥
यह एकाक्षर ऋक् (ओंकार) ब्रह्मके तपसे सबसे पहले प्रकट हुई — ब्रह्मवेद (अथर्ववेद) का उज्ज्वल सार; इसीसे मन्त्र प्रकट हुए। जो मन्त्रोंका (प्रयोग करनेवाला) तपके अभाव, सेवाके अभाव, अनध्यायमें अध्ययन आदिसे (उनमें) कुछ कम, बिगड़ा और यातयाम (बासी, निःसार) कर देता है, उसे अथर्वणोंके तेजसे फिर भर दे — 'मन्त्र मेरे सम्मुख हों, जैसे गर्भ माताकी ओर' — (इसलिए) आगे ओंकारका प्रयोग करता है; इसी ऋक् (ओंकार) से फिर भरता है। यही यज्ञके आगे जोड़ी जाती है, यही पीछे; इसीसे यज्ञ सब ओर फैलाया जाता है। यह ऋचामें भी कहा है — 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्' (ऋचाएँ परम व्योममें अक्षरमें स्थित हैं)। जो ब्राह्मण जिस कामनाको चाहे, तीन रात उपवास करके, पूर्वमुख, मौन, कुशोंपर बैठकर इस अक्षरको हजार बार आवृत्त करे — उसके अर्थ और सब कर्म सिद्ध होते हैं।
यहाँ गोपथ ब्राह्मण स्पष्ट कहता है कि जो व्यक्ति तप, सेवा और सही अध्ययन के अभाव में मन्त्रों को 'यातयाम' (निःसार) कर देता है, उसे पुनः 'अथर्वणों के तेज' से भरना पड़ता है। इसका उपाय 'ओंकार' (एकाक्षर ब्रह्म) का प्रयोग है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गोपथ ब्राह्मण का यहाँ अद्भुत मेल है। स्मृति बताती है कि ज्ञान के अभाव में मन्त्र निःसार हो जाते हैं, और गोपथ ब्राह्मण उस निःसारता को दूर करने का साधन 'ओंकार' को बताता है। यह सिद्ध करता है कि मन्त्रों की शक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उस 'अक्षर' (ओंकार) में है जिससे समस्त ऋचाएँ उत्पन्न हुई हैं। यदि मन्त्र बासी हो जाए, तो उसे पुनः उस मूल स्रोत (परम व्योम/अक्षर) से जोड़कर ही जीवित किया जा सकता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से, मन्त्र का 'यातयाम' होना साधक की उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ उसका मन मन्त्र के शब्दों में तो है, किन्तु उसकी चेतना मन्त्र के भाव से नहीं जुड़ी है। जब तक साधक मन्त्र के 'ऋषि' (उस अवस्था) को प्राप्त नहीं करता, मन्त्र केवल कंठ तक सीमित रहता है, हृदय तक नहीं पहुँचता।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह जप को केवल संख्यात्मक न बनाए। जब वह किसी मन्त्र का जप करे, तो पहले उस मन्त्र के देवता और ऋषि का स्मरण करे, ताकि मन्त्र 'ताज़ा' (प्राणवान) रहे। यदि साधक अनुभव करे कि जप के दौरान मन विचलित है या मन्त्र निष्प्राण लग रहा है, तो उसे गोपथ ब्राह्मण के संकेत के अनुसार 'ओंकार' का आश्रय लेना चाहिए। ओंकार वह बीज है जो किसी भी मृतप्राय मन्त्र में पुनः प्राण फूँक सकता है।
इस अभ्यास से साधक 'अल्प फल' की भूमि से उठकर 'पूर्ण फल' की भूमि की ओर बढ़ता है। वह केवल शब्दों का उच्चारण करने वाला 'यांत्रिक' नहीं रहता, बल्कि मन्त्र का 'अधिकारी' बन जाता है, जिससे मन्त्र उसके भीतर एक जीवंत ज्योति के रूप में प्रज्ज्वलित होता है।
नाधिकारोस्ति मन्त्राणामेवं श्रुतिनिदर्शनम् ।
अल्पमात्रं फलं तस्य होमादन्तर्जलाज्जपात् ॥ १.३० ॥
— मन्त्रोंपर अधिकार नहीं है, ऐसा श्रुतिका निदर्शन है। उसे होमसे, अन्तर्जलसे और जपसे अल्पमात्र फल (मिलता है) —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (१.२९) में ऋषि, छन्द और देवता के ज्ञान के बिना मन्त्रों के 'यातयाम' या शक्तिहीन हो जाने की बात कही गई थी। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य इस बात को केवल अपना मत न बताकर, इसे श्रुति के प्रमाण से पुष्ट कर रहे हैं और यह स्पष्ट कर रहे हैं कि बिना अधिकार के किए गए कर्मों का परिणाम क्या होता है।
अन्वय और पदार्थ —
मन्त्राणाम् एवम् नाधिकारः अस्ति, (इति) श्रुतिनिदर्शनम् । तस्य (अजानतः) होमादन्तर्जलाज्जपात् अल्पमात्रं फलं (भवेत्) ॥
पदार्थ और निर्वचन:
• नाधिकारोस्ति — अधिकार नहीं है। यहाँ 'अधिकार' का अर्थ केवल सामाजिक या जातिगत पात्रता नहीं, अपितु 'समर्थता' और 'पात्रता' है। मन्त्र के मर्म को जानने की योग्यता ही वास्तविक अधिकार है।
• श्रुतिनिदर्शनम् — श्रुति का प्रमाण या उदाहरण। ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि मन्त्रों के बिना अधिकार के प्रयोग का निषेध या उसकी न्यूनता वेदों (श्रुति) में भी वर्णित है।
• होमादन्तर्जलाज्जपात् — होम, अन्तर्जल और जप आदि से। 'आ' प्रत्यय यहाँ अन्य कर्मों का भी बोध करा रहा है। होम (बाह्य अग्निहोत्र), अन्तर्जल (भीतरी शुद्धि) और जप (मन्त्रों का पुनरावृत्ति-नियम) — ये तीनों साधना के भिन्न स्तर हैं।
• अल्पमात्रं फलं — अत्यंत न्यून फल। यहाँ 'मात्रम्' शब्द फल की तुच्छता को दर्शाता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक गंभीर चेतावनी दे रहे हैं। वे कहते हैं कि मन्त्रों का केवल उच्चारण कर लेना पर्याप्त नहीं है; उन पर 'अधिकार' होना अनिवार्य है। अधिकार का अर्थ है—मन्त्र के ऋषि (जिसने उसे साक्षात्कार किया), छन्द (जिसकी लय में वह स्थित है) और देवता (जिसकी चेतना वह मन्त्र है) का पूर्ण बोध। जब साधक इन तत्वों से अनभिज्ञ होता है, तो वह मन्त्र के साथ 'एक' नहीं हो पाता, बल्कि केवल शब्दों का दोहराव करता है।
ऋषि कहते हैं कि यह कोई व्यक्तिगत मत नहीं, अपितु श्रुति का निदर्शन है। श्रुति के अनुसार, जिस व्यक्ति के पास मन्त्र का वास्तविक ज्ञान (अधिकार) नहीं है, वह मन्त्र की उस सूक्ष्म शक्ति को जाग्रत नहीं कर सकता जो साधक को अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाती है।
ऐसे अधिकार-रहित व्यक्ति के लिए तीन प्रमुख क्रियाओं का उल्लेख है:
१. होम: जब वह बाह्य अग्नि में आहुति देता है, तो वह केवल एक भौतिक क्रिया बनकर रह जाती है। वह अग्नि-होत्र तो है, किन्तु 'अग्नि-योग' नहीं।
२. अन्तर्जल: जब वह शरीर की भीतरी शुद्धि के लिए मन्त्रों का प्रयोग करता है, तो वह केवल मानसिक शांति पा सकता है, किन्तु प्राणों की वह गहन शुद्धि नहीं होती जो उसे उच्च भूमियों में ले जाए।
३. जप: उसका जप केवल वाक्-जप (जीभ का हिलना) रह जाता है, वह 'अजपा-जप' या हृदय-स्पंदन में परिवर्तित नहीं होता।
परिणामस्वरूप, उसे 'अल्पमात्र फल' प्राप्त होता है। यह फल स्थूल जगत की कामनाओं की पूर्ति तो कर सकता है, किन्तु वह आध्यात्मिक उत्थान या मोक्ष का कारण नहीं बनता। जैसे बिना बीज के बोई गई मिट्टी से अंकुर नहीं फूटता, वैसे ही बिना अधिकार के जपे गए मन्त्रों से सिद्धियों या शांति का पूर्ण उदय नहीं होता।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से 'अधिकार' का अर्थ है—साधक की वह चेतना-स्थिति जो मन्त्र के देवता के समान हो जाए। मन्त्र एक सेतु है; यदि सेतु का एक सिरा (साधक का ज्ञान) टूटा हुआ है, तो वह उस पार (देवता या अक्षर) नहीं पहुँच सकता।
साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि वह केवल मन्त्रों की संख्या पर ध्यान न दे, बल्कि मन्त्र के 'अधिष्ठान' पर ध्यान केंद्रित करे। जब वह यह अनुभव करता है कि मन्त्र केवल शब्द नहीं, बल्कि एक जीवित सत्ता है, तब उसका अभ्यास 'यांत्रिक' से 'योगिक' हो जाता है।
अधिकार ज्ञान से आता है, और ज्ञान तब आता है जब साधक मन्त्र के ऋषि में स्वयं को स्थित करता है। जो साधक केवल फल की इच्छा से जप करता है, वह 'अल्प फल' की भूमि में रहता है। किन्तु जो मन्त्र के रहस्य (ऋषि-छन्द-देवता) को जानकर अभ्यास करता है, वह स्थूल फल से ऊपर उठकर 'सायुज्य' की भूमि की ओर अग्रसर होता है। यहाँ अभ्यास यह है कि जप के समय मन्त्र के देवता का ध्यान हृदय में किया जाए, जिससे शब्द-शक्ति प्राण-शक्ति में बदल सके।
आर्षच्छन्दादिज्ञातुर्महिमा
स्वाध्यायाद्याजनाच्चैव भवतीह न संशयः ।
यस्तु जानाति तत्त्वेन आर्षं छन्दश्च दैवतम् ॥ १.३१ ॥
— और स्वाध्याय तथा याजन (यज्ञ कराने) से भी (अल्प फल ही) होता है, इसमें संशय नहीं। परन्तु जो ऋषि, छन्द और देवताको तत्त्वसे जानता है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (१.३०) में यह स्पष्ट किया गया कि ऋषि, छन्द और देवता के ज्ञान के बिना मन्त्रों पर अधिकार नहीं होता और फलस्वरूप होम, अन्तर्जल तथा जप से अत्यंत न्यून फल की प्राप्ति होती है। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य इस बात को और अधिक गहराई से समझाते हुए स्वाध्याय और याजन की सीमाओं तथा 'तत्त्व-ज्ञान' की महत्ता को प्रतिपादित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
स्वाध्यायात् याजनाच्चैव (अल्पं फलं) भवतीह न संशयः । यस्तु आर्षं छन्दश्च दैवतम् तत्त्वेन जानाति (सः...) ॥
पदार्थ और निर्वचन:
• स्वाध्यायात् — स्वाध्याय से। यहाँ स्वाध्याय का अर्थ केवल मन्त्रों का पाठ करना या उन्हें याद करना है।
• याजनाच्चैव — और याजन से भी। याजन का अर्थ है यज्ञ कराना या कर्मकाण्ड का संपादन करना।
• भवतीह — यहाँ (इस लोक में या इस साधना-मार्ग में) होता है।
• न संशयः — कोई संदेह नहीं है। यह एक निश्चित सत्य है।
• तत्त्वेन — तत्त्वपूर्वक, वास्तव में, या स्वरूप-बोध के साथ। यह इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, जो केवल सूचना और साक्षात्कार के बीच का भेद बताता है।
• आर्षं छन्दश्च दैवतम् — ऋषि (आर्ष), छन्द और देवता।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधना के दो स्तरों का अंतर स्पष्ट कर रहे हैं। प्रथम स्तर है—केवल क्रियात्मकता। जब कोई साधक केवल मन्त्रों का पाठ करता है (स्वाध्याय) या विधिपूर्वक यज्ञ करता है (याजन), तो उसे कुछ फल अवश्य मिलता है, क्योंकि कर्म की अपनी एक शक्ति होती है। परन्तु ऋषि कहते हैं कि यह फल 'अल्प' होता है। इसमें कोई संशय नहीं है कि केवल शब्दों के दोहराव या बाहरी कर्मकाण्ड से पूर्णता नहीं आती।
यहाँ 'अल्प फल' का अर्थ यह है कि जब तक मन्त्र के पीछे की चेतना से जुड़ाव नहीं होता, तब तक साधक केवल मन्त्र के 'शब्द-शरीर' के साथ खेल रहा होता है, उसके 'प्राण' तक नहीं पहुँच पाता।
द्वितीय स्तर है—तत्त्व-ज्ञान। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो व्यक्ति ऋषि, छन्द और देवता को 'तत्त्वेन' यानी उनके वास्तविक स्वरूप में जानता है, उसकी स्थिति भिन्न होती है।
• ऋषि को तत्त्व से जानने का अर्थ है—उस चेतना की अवस्था को पहचानना जिसमें वह मन्त्र पहली बार प्रकट हुआ था।
• छन्द को तत्त्व से जानने का अर्थ है—उस मन्त्र की आंतरिक लय और स्पन्दन को अपने भीतर अनुभव करना।
• देवता को तत्त्व से जानने का अर्थ है—यह अनुभव करना कि मन्त्र जिस देवता का संबोधन कर रहा है, वह देवता वास्तव में साधक के अपने ही भीतर की कौन सी दिव्य शक्ति या ज्योति है।
यह वाक्य अगले श्लोक (१.३२) तक विस्तृत है, जहाँ यह बताया गया है कि ऐसा तत्त्व-ज्ञानी व्यक्ति अतिथिवत् वन्दनीय होता है। अतः, केवल कर्म करना पर्याप्त नहीं है, कर्म के पीछे के 'रहस्य' को जानना ही उसे पूर्ण बनाता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'वाचिक' साधना से 'मानसिक' और 'तत्विक' साधना की ओर संक्रमण का संकेत है। साधक जब मन्त्र जप शुरू करता है, तो वह 'स्वाध्याय' और 'याजन' की भूमि पर होता है, जहाँ वह शब्दों और विधियों का अभ्यास करता है। यह प्रारंभिक भूमि है।
परन्तु 'तत्त्वेन' शब्द साधक को 'साक्षात्कार' की भूमि पर ले जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक मन्त्र के शब्दों को केवल जीभ से न बोले, बल्कि यह विचार करे कि:
१. इस मन्त्र का 'ऋषि' कौन है? अर्थात्, मेरी चेतना किस स्तर पर पहुँचे कि मैं भी उस ऋषि की भाँति इस सत्य को देख सकूँ?
२. इसका 'छन्द' क्या है? अर्थात्, मेरे प्राणों की गति इस मन्त्र की लय के साथ कैसे एकाकार हो?
३. इसका 'देवता' कौन है? अर्थात्, मेरे हृदय-आकाश में कौन सा सूर्य या ज्योति इस मन्त्र के माध्यम से जाग्रत हो रही है?
जब साधक नाम को रटने के स्थान पर स्वरूप को जानने का प्रयास करता है, तब मन्त्र 'शब्द' न रहकर 'शक्ति' बन जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ से साधक अल्प फल की सीमा को लाँघकर पूर्णता की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास साधक को केवल एक 'पाठक' से बदलकर एक 'योगी' बना देता है।
विनियोगं ब्राह्मणं च मन्त्रार्थं ज्ञानकर्मणी ।
एकैकस्या ऋचः सोऽपि वन्द्यो ह्यतिथिवद्भवेत् ॥ १.३२ ॥
— विनियोग, ब्राह्मण, मन्त्रार्थ, ज्ञान और कर्म — एक-एक ऋचाके (जानता है), वह भी अतिथिकी भाँति वन्दनीय होता है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (१.३१) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि केवल यांत्रिक स्वाध्याय और याजन से प्राप्त फल अल्प होता है, जबकि ऋषि, छन्द और देवता का तत्त्व-ज्ञान साधक को पूर्णता की ओर ले जाता है। वर्तमान श्लोक में वे इस ज्ञान-सूची का विस्तार करते हुए उन सूक्ष्म अंगों का वर्णन कर रहे हैं, जो एक मन्त्र को केवल शब्द से उठाकर 'विद्या' बना देते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(यः) विनियोगं ब्राह्मणं च मन्त्रार्थं ज्ञानकर्मणी (जानाति), एकैकस्याः ऋचः (सः) सोऽपि वन्द्यो ह्यतिथिवद्भवेत् ॥
पदार्थ और निर्वचन:
• विनियोगं — विनियोग का अर्थ है मन्त्र का विशिष्ट प्रयोग। यह मन्त्र के उद्देश्य और उसकी शक्ति को किसी विशेष कर्म या मानसिक अवस्था से जोड़ने की विधि है।
• ब्राह्मणं — यहाँ 'ब्राह्मण' का अर्थ व्यक्ति नहीं, अपितु 'मन्त्र-ब्राह्मण' है। यह मन्त्र की व्याख्या, उसकी उत्पत्ति, प्रयोजन और उसके पीछे छिपे अर्थों का विस्तृत विवरण है।
• मन्त्रार्थं — मन्त्र का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ।
• ज्ञानकर्मणी — ज्ञान और कर्म का समुच्चय। मन्त्र का वह भाग जो बोध (ज्ञान) कराता है और वह भाग जो क्रिया (कर्म) का निर्देश देता है।
• एकैकस्याः ऋचः — एक-एक ऋचा के। यहाँ 'एकैक' शब्द पर बल है, जो यह दर्शाता है कि साधक को सामान्य ज्ञान नहीं, बल्कि प्रत्येक मन्त्र की सूक्ष्मता का ज्ञान होना चाहिए।
• वन्द्यो ह्यतिथिवद्भवेत् — वास्तव में अतिथिकी भाँति वन्दनीय होता है। 'अतिथि' वह है जिसकी कोई तिथि निश्चित न हो, अर्थात जो समय और स्थान से परे, ईश्वरीय कृपा से आता है। ऐसा ज्ञानवान व्यक्ति समाज और साधना-मार्ग में उसी सम्मान का पात्र है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र-साधना के पूर्ण विज्ञान को उद्घाटित कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने ऋषि, छन्द और देवता की बात की थी, जो मन्त्र के 'बाह्य और सूक्ष्म ढाँचे' हैं। अब वे मन्त्र के 'आन्तर और क्रियात्मक' पक्ष की चर्चा कर रहे हैं।
ऋषि कहते हैं कि यदि कोई साधक किसी एक-एक ऋचा के विनियोग, उसके ब्राह्मण, उसके अर्थ और उसके ज्ञान-कर्म के सम्बन्ध को जानता है, तो वह केवल एक विद्वान नहीं, अपितु एक वन्दनीय व्यक्तित्व बन जाता है। यहाँ 'विनियोग' का अर्थ है यह जानना कि इस मन्त्र की शक्ति को किस दिशा में मोड़ना है। जैसे अग्नि का उपयोग भोजन बनाने और स्वर्ण तपाने, दोनों में हो सकता है, वैसे ही मन्त्र का विनियोग उसे विशिष्ट फल की ओर ले जाता है।
'ब्राह्मण' का ज्ञान मन्त्र को आधार प्रदान करता है। बिना ब्राह्मण के मन्त्र एक बिना जड़ के वृक्ष के समान है। जब साधक मन्त्र के ब्राह्मण को जानता है, तो उसे मन्त्र की उत्पत्ति और उसके प्रयोजन का बोध होता है, जिससे मन्त्र के प्रति उसकी श्रद्धा और एकाग्रता गहन हो जाती है।
सबसे महत्वपूर्ण है 'मन्त्रार्थ' और 'ज्ञान-कर्म' का समन्वय। मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं है; उसका एक अर्थ है (मन्त्रार्थ) और उस अर्थ का एक व्यावहारिक अनुप्रयोग है (ज्ञान-कर्म)। ज्ञान वह है जो साधक के भीतर बोध जगाए, और कर्म वह है जो उस बोध को आचरण में उतारे। जब साधक यह जान लेता है कि इस ऋचा का कौन सा पद उसे किस मानसिक अवस्था में ले जाएगा (ज्ञान) और उसे किस विधि से जपना है (कर्म), तब वह मन्त्र उसके लिए 'जीवंत' हो उठता है।
ऐसे साधक को 'अतिथिवत् वन्दनीय' कहा गया है। अतिथि वह होता है जो बिना किसी पूर्व-नियत समय के आता है और जिसके आने से घर में मंगल होता है। इसी प्रकार, जिस व्यक्ति ने मन्त्रों के इस रहस्य को आत्मसात कर लिया है, उसके भीतर एक ऐसी ईश्वरीय आभा प्रकट होती है जो उसे समय और परिस्थिति से ऊपर उठा देती है। वह केवल शास्त्रों का ज्ञाता नहीं रहता, बल्कि वह स्वयं एक 'सिद्ध' की भाँति पूजनीय हो जाता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-साधना' को 'मन्त्र-योग' में बदलने की प्रक्रिया है। साधारण जप केवल 'कर्म' है, परन्तु जब साधक विनियोग और मन्त्रार्थ को जोड़ता है, तो वह 'ध्यान' बन जाता है।
साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह मन्त्र को केवल ध्वनि न माने, बल्कि उसके प्रत्येक पद के अर्थ (मन्त्रार्थ) को अपने हृदय में उतारे। जब साधक 'एकैक ऋचः' (एक-एक ऋचा) के रहस्य को खोलता है, तो वह स्थूल मन से सूक्ष्म बुद्धि की ओर बढ़ता है। विनियोग का अभ्यास साधक को 'संकल्प-शक्ति' प्रदान करता है—यह तय करना कि अब इस मन्त्र की शक्ति को मैं अपने भीतर के किस दोष को मिटाने या किस गुण को जगाने के लिए प्रयुक्त करूँगा।
मन्त्रार्थ का ज्ञान साधक को 'भाव-समाधि' की ओर ले जाता है। जब मन्त्र का अर्थ हृदय में गूँजता है, तब शब्द विलीन हो जाते हैं और केवल 'अर्थ' (भाव) शेष रहता है। यही वह स्थिति है जहाँ ज्ञान और कर्म एक हो जाते हैं। जो साधक इस भूमि को प्राप्त करता है, वह बाह्य जगत के लिए वन्दनीय होता है, क्योंकि उसके भीतर मन्त्रों की शक्ति जागृत हो चुकी होती है। यह अभ्यास साधक को 'अल्प फल' की स्थिति से निकालकर 'पूर्णत्व' की ओर ले जाता है।
देवतायाश्च सायुज्यं गच्छत्यत्र न संशयः ।
पूर्वोक्तेन विधानेन ऋष्यादीन् वेत्ति यो द्विजः ॥ १.३३ ॥
और वह द्विज देवता के साथ सायुज्य (एकाकार होना) को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं। जो पूर्वोक्त विधि से ऋषि आदि को जानता है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि जो साधक मन्त्र के विनियोग, ब्राह्मण और अर्थ को तत्त्व से जानता है, वह समाज में वन्दनीय होता है। अब वे इस ज्ञान के उस पारलौकिक और आध्यात्मिक फल का उद्घाटन कर रहे हैं, जहाँ साधक केवल सम्मान नहीं, अपितु स्वयं उस सत्ता में विलीन हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) देवतायाश्च सायुज्यं गच्छति, अत्र न संशयः। यो द्विजः पूर्वोक्तेन विधानेन ऋष्यादीन् वेत्ति (सः सायुज्यं गच्छति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• देवतायाश्च: मन्त्र के अधिष्ठात्री देवता के साथ। यहाँ देवता केवल बाहरी देव नहीं, अपितु मन्त्र की वह शक्ति है जो साधक के भीतर जाग्रत होती है।
• सायुज्यं: 'युज' धातु से बना शब्द, जिसका अर्थ है—एक होना, मिलना या एकाकार हो जाना। जब साधक और इष्ट के बीच का भेद समाप्त हो जाता है, तब वह सायुज्य की अवस्था कहलाती है।
• न संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं है। यह ऋषि का दृढ़ आश्वासन है कि यह फल अनिवार्य है, बशर्ते विधि पूर्ण हो।
• पूर्वोक्तेन विधानेन: पूर्व में कही गई विधि से। यहाँ 'विधि' का अर्थ केवल रटना नहीं, बल्कि ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मण के परस्पर सम्बन्ध को समझकर उनका अभ्यास करना है।
• ऋष्यादीन्: ऋषि और अन्य अंगों (छन्द, देवता, विनियोग, ब्राह्मण) को।
• द्विजः: वह जो दूसरी बार जन्मा है। बाह्यतः यह उपनयन संस्कार से संबंधित है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से 'द्विज' वह है जिसने मन्त्र-ज्ञान के द्वारा अपने अविद्या-रूप प्रथम जन्म को त्यागकर ज्ञान-रूप द्वितीय जन्म प्राप्त किया है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र-साधना के सर्वोच्च शिखर 'सायुज्य' की चर्चा कर रहे हैं। वाक्य की संरचना देखें तो यह पिछले श्लोक (१.३२) से जुड़ा हुआ है। पिछले श्लोक में मन्त्र के अंगों को जानने वाले की सामाजिक प्रतिष्ठा (वन्द्यो ह्यतिथिवद्भवेत्) बताई गई थी, किन्तु यहाँ उसकी आध्यात्मिक उपलब्धि का वर्णन है।
ऋषि कहते हैं कि जो द्विज पूर्वोक्त विधि से मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता आदि का ज्ञान प्राप्त करता है, वह उस मन्त्र के देवता के साथ सायुज्य को प्राप्त होता है। सायुज्य का अर्थ है—वह स्थिति जहाँ साधक का व्यक्तित्व मन्त्र की शक्ति में विलीन हो जाता है। मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं है, वह एक विशिष्ट 'ध्वनि-शरीर' है। जब साधक ऋषि (द्रष्टा), छन्द (लय/गति) और देवता (लक्ष्य) को जान लेता है, तब वह मन्त्र के साथ एक लयबद्ध सम्बन्ध स्थापित करता है। इस लयबद्धता के कारण उसकी चेतना उस देवता के स्वरूप में रूपांतरित होने लगती है।
यहाँ "न संशयः" कहकर याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट करते हैं कि यह कोई काल्पनिक फल नहीं, अपितु एक निश्चित विज्ञान है। जिस प्रकार अग्नि में लोहा डालने पर लोहा अग्नि के समान तप्त और देदीप्यमान हो जाता है, वैसे ही मन्त्र के अंगों के पूर्ण ज्ञान के साथ किया गया जप साधक को देवता के समान बना देता है। यह केवल मरणोपरांत मिलने वाला फल नहीं है, अपितु साधना के दौरान अनुभव होने वाली वह अवस्था है जहाँ साधक स्वयं को मन्त्र के देवता के रूप में अनुभव करने लगता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'उपासना' से 'सायुज्य' की यात्रा है। साधक जब मन्त्र का जप करता है, तो वह प्रायः 'भक्त' और 'भगवान' (साधक और देवता) के भेद में रहता है। किन्तु जब वह मन्त्र के ऋषि, छन्द और देवता को तत्त्व से जान लेता है, तो वह इस भेद को मिटा देता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक मन्त्र के 'ऋषि' में अपनी चेतना को स्थित करे (यह अनुभव करना कि मैं वही द्रष्टा हूँ जिसने इस मन्त्र को देखा), फिर 'छन्द' की लय में अपने प्राणों को मिलाए और अंततः 'देवता' के स्वरूप में स्वयं को विलीन कर दे। जब मन्त्र का अर्थ और उसका विनियोग हृदय में स्पष्ट हो जाता है, तब जप केवल वाणी का व्यायाम नहीं रहता, बल्कि एक आन्तरिक योग बन जाता है।
साधक यहाँ 'साधक-भूमि' से उठकर 'सिद्धि-भूमि' की ओर बढ़ता है। सायुज्य का अनुभव यह है कि मन्त्र का देवता बाहर कहीं स्थित नहीं है, अपितु वह साधक के अपने ही स्वरूप का उच्चतम विस्तार है। इस प्रकार, पूर्वोक्त विधि से मन्त्र के अंगों का ज्ञान साधक को स्थूल जगत से उठाकर सूक्ष्म सत्ता के साथ एकाकार कर देता है।
अधिकारो भवेत्तस्य रहस्येषु च कर्मसु ।
मन्त्रे मन्त्रे प्रयत्नेन ज्ञातव्यं ब्राह्मणेन तु ॥ १.३४ ॥
उसका रहस्यमय कर्मों में भी अधिकार होता है और ब्राह्मण को प्रत्येक मन्त्र में प्रयत्न से जानना चाहिए।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि जो द्विज ऋषि, छन्द और देवता आदि के तत्त्व को जानता है, वह देवता के साथ सायुज्य (एकाकार) हो जाता है। अब वे इस सायुज्य की अवस्था के व्यावहारिक और आध्यात्मिक प्रभाव का वर्णन करते हुए मन्त्र-साधना के 'अधिकार' और 'प्रयत्न' के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तस्य) रहस्येषु च कर्मसु अधिकारो भवेत्। मन्त्रे मन्त्रे (ऋष्यादीन्) प्रयत्नः ज्ञातव्यं ब्राह्मणेन तु।
पदार्थ और निर्वचन:
• रहस्येषु: 'रहस्य' वह है जो छिपा हुआ है। मन्त्रों के वे आन्तरिक अर्थ, प्रयोग और प्रभाव जो केवल दीक्षा और अनुभव से प्राप्त होते हैं, रहस्य कहलाते हैं।
• कर्मसु: यहाँ 'कर्म' केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, अपितु मन्त्रों के माध्यम से किए जाने वाले सूक्ष्म संस्कार और योगिक क्रियाएँ हैं।
• अधिकारो भवेत्: अधिकार का अर्थ यहाँ केवल 'हक' नहीं, अपितु 'योग्यता' है। जब साधक मन्त्र के अंगों को जान लेता है, तब वह उस मन्त्र की सूक्ष्म शक्ति को संभालने के योग्य हो जाता है।
• मन्त्रे मन्त्रे: प्रत्येक मन्त्र में। यह शब्द इस बात पर बल देता है कि ज्ञान सामान्य नहीं, अपितु विशिष्ट होना चाहिए। हर मन्त्र की अपनी प्रकृति और अपना वेग होता है।
• प्रयत्नेन: प्रयत्न से। यहाँ प्रयत्न का अर्थ केवल कठिन परिश्रम नहीं, अपितु 'साधना' और 'सतर्कता' है—मन्त्र के अक्षर, स्वर और भाव के बीच सामंजस्य बिठाने का निरंतर प्रयास।
• ज्ञातव्यं: जानना चाहिए। यह विधिलिङ् है, जो एक अनिवार्य निर्देश देता है।
• ब्राह्मणेन: ब्राह्मण द्वारा। यहाँ ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को जानने की इच्छा रखता है और मन्त्र-साधना के मार्ग पर अग्रसर है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो साधक मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मण को जान लेता है, उसका 'रहस्य-कर्मों' में अधिकार हो जाता है।
रहस्य-कर्म वे क्रियाएँ हैं जहाँ मन्त्र केवल ध्वनि नहीं, अपितु एक जीवित शक्ति बन जाता है। जब तक साधक मन्त्र के अंगों से अनभिज्ञ रहता है, वह मन्त्र का प्रयोग केवल एक यांत्रिक विधि के रूप में करता है, जिससे फल अल्प होता है (जैसा कि श्लोक १.३० में कहा गया)। किन्तु जब वह यह जान लेता है कि इस मन्त्र का दृष्टा कौन ऋषि है, इसका छंद (लय) क्या है और इसका अधिष्ठात्री देवता कौन है, तब वह मन्त्र के 'रहस्य' के द्वार खोल लेता है। यह अधिकार उसे उस सूक्ष्म स्तर पर ले जाता है जहाँ वह मन्त्र के माध्यम से अपनी चेतना को देवता के साथ एकाकार कर सकता है।
श्लोक का दूसरा भाग—"मन्त्रे मन्त्रे प्रयत्नेन ज्ञातव्यं ब्राह्मणेन तु"—साधक के लिए एक चेतावनी और निर्देश है। मन्त्र-साधना में 'सामान्य ज्ञान' पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक मन्त्र की अपनी एक विशिष्ट कुंजी होती है। एक मन्त्र का विनियोग दूसरे से भिन्न होता है, एक का ब्राह्मण (व्याख्या) दूसरे से अलग। यदि साधक सभी मन्त्रों को एक ही ढर्रे पर जपेगा, तो वह मन्त्रों के वास्तविक प्रभाव को नहीं पा सकेगा। इसलिए, प्रत्येक मन्त्र के साथ उसके अंगों का परिचय दोहराना अनिवार्य है। यह 'प्रयत्न' ही साधक को स्थूल जप से सूक्ष्म ध्यान की ओर ले जाता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से 'मन्त्रे मन्त्रे' का अर्थ है—साधना की सूक्ष्मता। साधक जब किसी मन्त्र का जप करता है, तो उसे केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करना चाहिए, अपितु उस मन्त्र के साथ जुड़े ऋषि (चेतना), छन्द (प्राण-लय), देवता (ऊर्जा) और विनियोग (उद्देश्य) को अपने भीतर जाग्रत करना चाहिए।
जब साधक 'प्रयत्न' पूर्वक प्रत्येक मन्त्र के इन अंगों को जानता है, तो वह मन्त्र उसके लिए केवल एक वाक्य नहीं रहता, बल्कि एक 'यंत्र' बन जाता है। यह अभ्यास साधक को 'अधिकार' की भूमि पर ले जाता है। अधिकार का अर्थ है—मन्त्र की शक्ति को सहने और उसे दिशा देने की क्षमता। बिना इस ज्ञान के मन्त्र का जप करना वैसा ही है जैसे बिना मानचित्र के वन में चलना; लक्ष्य मिल सकता है, किन्तु समय अधिक लगता है और मार्ग कठिन होता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि मन्त्र का बाहरी आवरण (शब्द) और उसका आन्तरिक मज्जा (रहस्य) अलग-अलग हैं। जब वह प्रत्येक मन्त्र के अंगों को जान लेता है, तो वह शब्द से परे उस 'अक्षर' की ओर बढ़ता है, जहाँ मन्त्र स्वयं साधक बन जाता है और साधक मन्त्र। यही वह बिंदु है जहाँ वह रहस्य-कर्मों का अधिकारी बनता है और अपनी चेतना को सूर्य-पुरुष के साथ जोड़ने का सामर्थ्य प्राप्त करता है।
विज्ञाते परिपूर्णं तु स्वाध्यायफलमश्नुते ।
छन्दांस्ययातयामानि भवन्ति सफलान्यपि ॥ १.३५ ॥
(इनके) जान लिये जाने पर, वह (ब्राह्मण) परिपूर्ण स्वाध्यायफल को प्राप्त करता है और उसके छन्द 'अयातयाम' (सजीव/शक्तिशाली) तथा सफल होते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्रों के अंगों के ज्ञान से प्राप्त होने वाले 'अधिकार' और 'रहस्यमय कर्मों' की योग्यता का निर्देश दिया। अब वे इस ज्ञान के व्यावहारिक और आध्यात्मिक फल का वर्णन कर रहे हैं कि जब एक साधक मन्त्र के ऋषि, छन्द और देवता आदि को पूर्णतः जान लेता है, तब उसके स्वाध्याय की प्रकृति और परिणाम में क्या परिवर्तन आता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ऋष्यादीन्) विज्ञाते, (सः) परिपूर्णं तु स्वाध्यायफलमश्नुते। (तस्य) छन्दांस्ययातयामानि भवन्ति, सफलान्यपि (भवन्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• विज्ञाते: 'विज्ञ' धातु से। केवल सूचनात्मक ज्ञान नहीं, अपितु 'अनुभवजन्य ज्ञान'। जब ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मण का ज्ञान केवल बौद्धिक न रहकर अनुभव में उतर आता है।
• परिपूर्णं स्वाध्यायफलम्: स्वाध्याय का फल वह है जो मन्त्र के निरंतर पाठ से मिलता है। 'परिपूर्ण' का अर्थ है कि मन्त्र की शक्ति का कोई अंश शेष न रहे, वह पूर्णता में प्राप्त हो।
• अश्नुते: उपभोग करता है या प्राप्त करता है।
• छन्दांस्ययातयामानि: यहाँ 'अयातयाम' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। 'यातयाम' का अर्थ होता है—जो शिथिल हो गया हो, बासी हो गया हो, जिसकी शक्ति क्षीण हो गई हो या जो प्रभावहीन हो गया हो। 'अयातयाम' वह है जो शिथिल नहीं है, अर्थात् जो सजीव, ओजस्वी और प्राणवान है।
• सफलानि: जो इच्छित फल को देने में समर्थ हों।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र-साधना के एक सूक्ष्म सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। सामान्यतः लोग मन्त्रों का पाठ केवल शब्दों के दोहराव के रूप में करते हैं। ऐसा पाठ 'यातयाम' होता है—अर्थात् वह मन्त्र केवल ध्वनि बनकर रह जाता है, उसमें वह 'तेज' नहीं होता जो साधक के चित्त को परिवर्तित कर सके।
जब साधक यह जान लेता है कि इस मन्त्र का दृष्टा (ऋषि) कौन है, इसकी लय (छन्द) क्या है, इसका अधिष्ठाता (देवता) कौन है और इसका प्रयोजन (विनियोग) क्या है, तब मन्त्र के अक्षर केवल शब्द नहीं रहते, बल्कि 'शक्ति' बन जाते हैं। विज्ञाते (पूर्ण ज्ञान) होने पर स्वाध्याय का फल 'परिपूर्ण' होता है क्योंकि अब साधक मन्त्र के साथ एकाकार हो चुका है।
यहाँ 'छन्दों' का अयातयाम होना यह दर्शाता है कि मन्त्र की जो आंतरिक लय है, वह साधक के प्राणों की लय से मिल गई है। जब लय का मिलन होता है, तब मन्त्र 'सजीव' हो उठता है। सजीव मन्त्र ही 'सफल' होता है, क्योंकि वह केवल कान तक नहीं पहुँचता, बल्कि हृदय और प्राणों में स्पंदन पैदा करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
मन्त्रों के शिथिल होने और उन्हें पुनः प्राणवान बनाने के विषय में गोपथ ब्राह्मण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है:
सैषैकाक्षरर्ग्ब्रह्मणस्तपसोऽग्रे प्रादुर्बभूव ब्रह्मवेदस्याथर्वणं शुक्रम् अत एव मन्त्राः प्रादुर्बभूवुः स तु खलु मन्त्राणां अतपसासुश्रूषानध्यायाध्ययनेन यदूनं च विरिष्टं च यातयामं च करोति तदथर्वणां तेजसा प्रत्याप्याययेत् मन्त्राश्च मां अभिमुखीभवेयुर्गर्भा इव मातरं अभिजिघांसुः पुरस्तादोंकारं प्रयुङ्क्ते एतयैव तदृचा प्रत्याप्यायेत् एषैव यज्ञस्य पुरस्ताद्युज्यते एषा पश्चात् सर्वत एतया यज्ञस्तायते तदप्येतदृचोक्तम् या पुरस्ताद्युज्यत ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्निति तदेतदक्षरं ब्राह्मणो यं कामं इच्छेत्त्रिरात्रोपोषितः प्राङ्मुखो वाग्यतो बर्हिष्युपविश्य सहस्रकृत्व आवर्तयेत् सिध्यन्त्यस्यार्थाः सर्वकर्माणि चेति ब्राह्मणं ॥ १.२२ ॥
यह एकाक्षर ऋक् (ओंकार) ब्रह्मके तपसे सबसे पहले प्रकट हुई — ब्रह्मवेद (अथर्ववेद) का उज्ज्वल सार; इसीसे मन्त्र प्रकट हुए। जो मन्त्रोंका (प्रयोग करनेवाला) तपके अभाव, सेवाके अभाव, अनध्यायमें अध्ययन आदिसे (उनमें) कुछ कम, बिगड़ा और यातयाम (बासी, निःसार) कर देता है, उसे अथर्वणोंके तेजसे फिर भर दे — 'मन्त्र मेरे सम्मुख हों, जैसे गर्भ माताकी ओर' — (इसलिए) आगे ओंकारका प्रयोग करता है; इसी ऋक् (ओंकार) से फिर भरता है। यही यज्ञके आगे जोड़ी जाती है, यही पीछे; इसीसे यज्ञ सब ओर फैलाया जाता है। यह ऋचामें भी कहा है — 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्' (ऋचाएँ परम व्योममें अक्षरमें स्थित हैं)। जो ब्राह्मण जिस कामनाको चाहे, तीन रात उपवास करके, पूर्वमुख, मौन, कुशोंपर बैठकर इस अक्षरको हजार बार आवृत्त करे — उसके अर्थ और सब कर्म सिद्ध होते हैं।
गोपथ ब्राह्मण के इस अंश से स्पष्ट है कि जो साधक तप, सेवा और सही अध्ययन के अभाव में मन्त्रों को 'यातयाम' (बासी या निःसार) कर देता है, उसे पुनः 'अक्षर' (ओंकार) के तेज से भरना पड़ता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ इसी बात का पूरक पक्ष रख रही है कि यदि मन्त्र के अंगों (ऋषि, छन्द आदि) का 'विज्ञान' (अनुभवजन्य ज्ञान) हो, तो मन्त्र स्वतः ही 'अयातयाम' (सजीव) रहते हैं। गोपथ ब्राह्मण जहाँ मन्त्रों के क्षय के बाद उनके पुनरुद्धार की बात करता है, वहीं यह स्मृति मन्त्रों को प्रारंभ से ही सजीव और सफल रखने की विधि (अंगों का ज्ञान) बता रही है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-प्राण' के संबंध को स्पष्ट करता है। मन्त्र केवल वाणी का व्यायाम नहीं है, अपितु एक सूक्ष्म यंत्र है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह मन्त्र को केवल 'जपे' नहीं, बल्कि मन्त्र के 'भाव' में प्रवेश करे। जब साधक मन्त्र के ऋषि का ध्यान करता है, तो वह उस ऋषि की चेतना में प्रवेश करता है। जब वह छन्द को समझता है, तो वह मन्त्र की आंतरिक कंपन को अपने प्राणों में उतारता है।
मन्त्र 'सजीव' तब होता है जब जपने वाला यह जानता है कि वह क्या जप रहा है और क्यों जप रहा है। बिना ज्ञान के जप 'जड़' है, ज्ञान के साथ जप 'चेतन' है। साधक जब इस भूमि पर पहुँचता है, तो उसके भीतर का 'स्वाध्याय' केवल पुस्तकों का पाठ नहीं रहता, बल्कि स्वयं के स्वरूप का अध्ययन बन जाता है। इस अवस्था में मन्त्र के अक्षर साधक के भीतर के सूर्य (आंतरिक प्रकाश) को जाग्रत करते हैं, जिससे स्वाध्याय का फल परिपूर्ण होकर प्राप्त होता है। यह स्थिति साधक को 'जड़' से 'चेतन' और 'शिथिल' से 'ऊर्जित' अवस्था की ओर ले जाती है।
श्रेयश्च लभते सोऽपि धर्ममायुश्च विन्दति ।
दिव्यं वर्षसहस्रं तु स्वस्थानमृषिभिः सह ॥ १.३६ ॥
…वह श्रेय भी प्राप्त करता है और धर्म तथा आयु को पाता है; और ऋषियों के साथ हजार दिव्य वर्षों तक (अपने) स्वस्थान में…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि मन्त्र के अंगों के पूर्ण ज्ञान से स्वाध्याय का फल परिपूर्ण होता है और मन्त्र की शक्ति सजीव (अयातयाम) हो जाती है। अब वे इस सिद्धि के उस पारलौकिक और आध्यात्मिक फल का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को इस लोक के उपरांत या उच्चतर चेतना की अवस्था में प्राप्त होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) श्रेयश्च लभते सोऽपि, धर्मम् आयुश्च विन्दति। (तथा) दिव्यं वर्षसहस्रं तु स्वस्थानं मृषिभिः सह (विन्दति/लभते)।
पदार्थ और निर्वचन:
• श्रेयः: 'श्रेय' का अर्थ केवल भौतिक लाभ नहीं, अपितु वह परम कल्याण है जो साधक को संसार के बंधनों से मुक्त कर आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। यह 'प्रेय' (प्रिय लगने वाले) के विपरीत 'श्रेय' (जो वास्तव में कल्याणकारी है) का मार्ग है।
• धर्मम्: यहाँ धर्म का अर्थ केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, अपितु 'धृति' और 'धारण' से है—वह आत्म-स्वरूप जो स्थिर है और जिसे साधक अपनी साधना से धारण करता है।
• आयुः: यह केवल शारीरिक जीवन की अवधि नहीं, अपितु 'दिव्य आयु' है। योग की दृष्टि से यह वह प्राण-शक्ति है जो मन्त्र-सिद्धि से विस्तारित होती है और साधक को काल के प्रभाव से ऊपर उठाती है।
• दिव्यं वर्षसहस्रं: यह समय की एक गणना मात्र नहीं, अपितु एक विशिष्ट 'दिव्य अवस्था' का संकेत है। हजार वर्ष पूर्णता और स्थिरता के प्रतीक हैं।
• स्वस्थानम्: वह स्थान जो साधक का अपना है। इसका अर्थ है वह चेतना-स्तर या लोक जहाँ साधक की पात्रता उसे प्रतिष्ठित करती है।
• मृषिभिः सह: उन ऋषियों के साथ जिन्होंने उस मन्त्र का साक्षात्कार किया था।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में मन्त्र-योग के चरम फल का उद्घाटन कर रहे हैं। जब साधक मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग को जान लेता है, तब वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, बल्कि उस मन्त्र के मूल स्रोत (ऋषि) और उसकी शक्ति (देवता) से जुड़ जाता है। इस जुड़ाव का परिणाम तीन स्तरों पर होता है: श्रेय, धर्म और आयु।
प्रथम, वह 'श्रेय' प्राप्त करता है। जब मन्त्र का आन्तर अर्थ हृदय में उतरता है, तब साधक की दृष्टि भौतिकता से हटकर सूक्ष्मता की ओर मुड़ती है। यही वास्तविक कल्याण है। द्वितीय, वह 'धर्म' को पाता है। मन्त्र-सिद्धि से साधक के भीतर वह अनुशासन और स्थिरता आती है जिससे वह अपने वास्तविक स्वरूप को धारण कर लेता है। तृतीय, वह 'आयु' प्राप्त करता है। मन्त्रों का सही प्रयोग प्राणों को पुष्ट करता है, जिससे साधक की जीवनी-शक्ति दिव्य हो जाती है।
इसके पश्चात, महर्षि उस स्थिति का वर्णन करते हैं जहाँ साधक 'दिव्य वर्षसहस्रं' ऋषियों के साथ अपने 'स्वस्थान' में व्यतीत करता है। इसका रहस्य यह है कि मन्त्र का जो ऋषि होता है, वह उस मन्त्र का 'द्रष्टा' होता है। जब साधक मन्त्र के ऋषि को जान लेता है, तो वह उस ऋषि की चेतना के साथ एकाकार हो जाता है। वह 'स्वस्थान' वास्तव में वह उच्च चेतना-भूमि है जहाँ मन्त्र के मूल दृष्टा (ऋषि) निवास करते हैं। वहाँ समय की गणना भौतिक नहीं, दिव्य होती है, जहाँ साधक ऋषियों के सान्निध्य में रहकर उस ज्ञान का साक्षात्कार करता है जो शब्दों से परे है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'फल-श्रुति' है, जो अभ्यास के प्रति उत्साह जगाती है। योगिक अभ्यास में जब साधक मन्त्र के अंगों का चिंतन करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को तीन स्तरों पर ले जाता है:
१. शब्द-स्तर: मन्त्र का पाठ (बाहरी विधि)।
२. अर्थ-स्तर: ऋषि, छन्द और देवता का ज्ञान (आन्तरिक विधि)।
३. अनुभव-स्तर: ऋषि के साथ सायुज्य (परम सिद्धि)।
यहाँ 'स्वस्थान' का अर्थ है वह अवस्था जहाँ मन पूरी तरह शांत होकर अपने मूल स्रोत में स्थित हो जाता है। जब साधक मन्त्र के 'ऋषि' का ध्यान करता है, तो वह केवल एक व्यक्ति का स्मरण नहीं कर रहा होता, बल्कि उस 'ऋषि-भाव' (द्रष्टा-भाव) को अपने भीतर जाग्रत कर रहा होता है। इस अभ्यास से साधक की चेतना 'अहं' से ऊपर उठकर 'ऋषि-चेतना' में विलीन होती है। 'दिव्य वर्षसहस्र' का अनुभव वह गहन समाधि है, जहाँ काल का बोध समाप्त हो जाता है और केवल अनंत आनंद और ज्ञान शेष रहता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक केवल मन्त्र का पाठक नहीं, बल्कि मन्त्र का सह-द्रष्टा बन जाता है।
संतिष्ठते तु तैः सार्धं तत्तुल्यो वेह जायते ।
फलं चैवापवादं च एवं बुद्ध्वा विधानतः ॥ १.३७ ॥
— उनके साथ (वहाँ) रहता है, अथवा यहाँ उनके समान होकर जन्म लेता है। इस प्रकार फल और अपवाद (दोष) को विधिपूर्वक जानकर —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र-अंगों के ज्ञान से प्राप्त होने वाले श्रेय, धर्म, आयु और ऋषियों के साथ दिव्य लोक में वास की चर्चा की थी। वर्तमान श्लोक उसी फल की परिणति और साधना की समग्रता को स्पष्ट करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) तु तैः सार्धं संतिष्ठते, (अथवा) तत्तुल्यो वेह जायते। फलं चैवापवादं च एवं बुद्ध्वा विधानतः (ज्ञातव्यं/चिन्तनीयम्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• तैः सार्धं संतिष्ठते: 'तैः' शब्द उन ऋषियों के लिए है जिन्होंने मन्त्र का साक्षात्कार किया। 'सार्धं संतिष्ठते' का अर्थ है उनके साथ उस दिव्य चेतना-स्तर (स्वस्थान) में प्रतिष्ठित हो जाना।
• तत्तुल्यो: उनके समान। यहाँ 'तुल्यता' केवल गुणों की नहीं, अपितु उस आध्यात्मिक पात्रता और संस्कार की है जो ऋषियों के समान हो।
• वेह: 'वे' (यहाँ) और 'इह' (इस लोक में) का संयोग है। इसका अर्थ है पृथ्वी लोक पर पुनः जन्म लेना।
• जायते: जन्म लेता है।
• फलं: मन्त्र-अंगों के ज्ञान से प्राप्त होने वाला सकारात्मक परिणाम (सिद्धि)।
• अपवादं: 'अपवाद' का अर्थ यहाँ दोष या अभाव से है। जो मन्त्र-अंगों को नहीं जानता, उसके लिए जो हानि या फल की न्यूनता होती है, वह 'अपवाद' है।
• विधानतः: शास्त्र-विधि के अनुसार, या जिस क्रम में मन्त्र-योग का विधान बताया गया है, उस रीति से।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधक की दो स्थितियों का वर्णन कर रहे हैं। प्रथम स्थिति वह है जहाँ साधक मन्त्र के ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मण के पूर्ण ज्ञान से उस सूक्ष्म तरंग के साथ एकाकार हो जाता है। वह उस दिव्य लोक में उन ऋषियों के साथ प्रतिष्ठित (संतिष्ठते) हो जाता है, जिन्होंने उस मन्त्र को दृष्ट किया था। यह 'सायुज्य' की अवस्था है, जहाँ साधक और सिद्ध-ऋषि के बीच का भेद मिट जाता है।
द्वितीय स्थिति वह है जब साधक उस दिव्य लोक के सुखों का उपभोग करने के पश्चात पुनः इस मृत्युलोक में लौटता है। यहाँ रहस्य यह है कि मन्त्र-योग का प्रभाव केवल एक जन्म तक सीमित नहीं रहता। जो साधक ऋषियों के साथ दिव्य वास कर चुका है, वह जब पुनः जन्म लेता है, तो वह 'तत्तुल्यो' अर्थात् ऋषियों के समान ही पात्रता लेकर जन्म लेता है। वह किसी साधारण कुल या चेतना में नहीं, अपितु ऐसे वातावरण में आता है जहाँ उसकी पूर्व साधना पुनः जाग्रत हो सके।
अतः याज्ञवल्क्य कहते हैं कि साधक को 'फल' (सिद्धि) और 'अपवाद' (अज्ञान का दोष) दोनों को विधिपूर्वक जानकर साधना करनी चाहिए। यह चेतावनी है कि यदि मन्त्र के अंगों का तिरस्कार किया गया, तो फल अल्प होगा और छन्द 'यातयाम' (शक्तिहीन) हो जाएगा। जब साधक यह जान लेता है कि मन्त्र का पूर्ण ज्ञान उसे ऋषियों की श्रेणी में खड़ा कर सकता है, तब उसकी साधना में एक नई तीव्रता और अनुशासन आता है। यह वाक्य पिछले श्लोकों से शुरू होकर यहाँ पूर्ण होता है, जहाँ फल और दोष का तुलनात्मक ज्ञान साधक को पूर्णता की ओर प्रेरित करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
मन्त्र-योग के इस फल की पुष्टि भगवद्गीता में भी मिलती है:
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ६.४१ ॥
योगसे भ्रष्ट (साधक) पुण्य करनेवालोंके लोकोंको पाकर, वहाँ बहुत वर्षोंतक रहकर, पवित्र और श्रीमान् लोगोंके घरमें जन्म लेता है।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो योग से भ्रष्ट हो जाता है, वह पुण्यलोकों में रहकर पुनः पवित्र और श्रीमान् लोगों के घर जन्म लेता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'तत्तुल्यो वेह जायते' और गीता का 'शुचीनां श्रीमतां गेहे' एक ही सत्य के दो पक्ष हैं। स्मृति जहाँ ऋषियों के समान पात्रता (तुल्यता) पर बल देती है, वहीं गीता उस पात्रता के अनुकूल वातावरण (शुचि-श्रीमान् कुल) की बात करती है। दोनों ही शास्त्र इस बात का प्रमाण हैं कि मन्त्र और योग के संस्कार अविनाशी हैं और वे अगले जन्म में भी साधक का मार्गदर्शन करते हैं।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार-सिद्धि' का बोध कराता है। साधक जब मन्त्र के बाहरी अंगों (ऋषि, छन्द आदि) को उनके आन्तर अर्थों के साथ जोड़कर जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा होता, बल्कि उन ऋषियों की चेतना के साथ अपना 'संलयन' कर रहा होता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि मन्त्र एक सेतु है। जब वह मन्त्र के देवता और ऋषि को जानता है, तो वह अपनी व्यक्तिगत सीमित चेतना से उठकर उस 'ऋषि-चेतना' में प्रवेश करता है। अभ्यास यह है कि जप के समय केवल शब्द न बोलें, बल्कि उस मन्त्र के दृष्टा (ऋषि) के भाव में स्थित होने का प्रयास करें। इससे साधक की भूमि 'साधारण' से 'आर्ष' (ऋषि-तुल्य) की ओर बढ़ती है। यदि वह इस जन्म में पूर्णता को प्राप्त नहीं भी करता, तो भी उसकी सूक्ष्म देह में वह 'तुल्यता' अंकित हो जाती है, जो उसे अगले जन्म में पुनः उसी बिंदु से साधना आरम्भ करने का अवसर देती है जहाँ उसने इसे छोड़ा था। यह श्लोक साधक को मन्त्र के सूक्ष्म अंगों के प्रति सजग रहने का अभ्यास कराता है, ताकि वह 'अपवाद' (दोष) से बचकर पूर्ण फल की ओर अग्रसर हो।
आर्षकलक्षणम्
ज्ञातव्यं हि प्रयत्नेन ब्राह्मणेन विशेषतः ।
येन यदृषिणा दृष्टं सिद्धिः प्राप्ता च येन वै ॥ १.३८ ॥
— ब्राह्मणको विशेष रूपसे प्रयत्नपूर्वक (यह) जानना चाहिए। जिस ऋषिने जो (मन्त्र) देखा और जिसने (उससे) सिद्धि पायी —
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र-अंगों के ज्ञान से प्राप्त होने वाले दिव्य फल और ऋषियों के साथ सायुज्य की चर्चा की थी। अब वे उन अंगों के लक्षणों की व्याख्या आरम्भ कर रहे हैं, ताकि साधक केवल फल की इच्छा न करे, अपितु उस पात्रता को प्राप्त करे जिससे मन्त्र वास्तव में जाग्रत हो।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ब्राह्मणेन विशेषतः प्रयत्नेन हि ज्ञातव्यं (तत्), येन यदृषिणा दृष्टं (मन्त्रं) और येन सिद्धिः प्राप्ता च।
पदार्थ और निर्वचन:
• ब्राह्मणेन: यहाँ 'ब्राह्मण' शब्द केवल जन्मज जाति के लिए नहीं, अपितु 'ब्रह्म' (परमतत्त्व) के ज्ञान की अभिलाषा रखने वाले और उस मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए प्रयुक्त है।
• विशेषतः प्रयत्नेन: 'विशेषतः' का अर्थ है—साधारण अभ्यास से ऊपर उठकर, एकाग्रता और जिज्ञासा के साथ। 'प्रयत्नेन' का अर्थ है—तप और साधना के द्वारा किया गया निरंतर प्रयास।
• ज्ञातव्यं: जानना चाहिए। यह विधिलिङ् है, जो इसे एक अनिवार्य साधना-विधि बनाता है।
• यदृषिणा दृष्टं: 'यदृषिणा' का अर्थ है—जिस किसी ऋषि द्वारा। 'दृष्टं' का अर्थ है—देखा गया। मन्त्रों के संदर्भ में 'देखना' (दर्शन) का अर्थ है—उस ध्वनि-तरंग या दिव्य प्रकाश का साक्षात्कार करना जो अनादि काल से विद्यमान है।
• सिद्धिः प्राप्ता: सिद्धि प्राप्त करना। यहाँ सिद्धि का अर्थ केवल चमत्कार नहीं, अपितु मन्त्र के स्वरूप में स्थित होकर उसके फल को अनुभव करना और उस शक्ति के साथ तादात्म्य स्थापित करना है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र-साधना की पहली और अनिवार्य शर्त 'ऋषि-ज्ञान' की नींव रख रहे हैं। वे कहते हैं कि एक साधक (ब्राह्मण) को विशेष प्रयत्नपूर्वक यह जानना चाहिए कि किस मन्त्र का साक्षात्कार किस ऋषि ने किया और उस मन्त्र के माध्यम से उन्होंने किस सिद्धि को प्राप्त किया।
यहाँ 'ज्ञातव्यं' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं है, अपितु एक जीवंत शक्ति है। जब तक साधक यह नहीं जानता कि इस मन्त्र का 'ऋषि' कौन है, वह उस मन्त्र की मूल चेतना से नहीं जुड़ पाता। ऋषि वह सेतु है जो साधक को मन्त्र के मूल स्रोत से जोड़ता है।
महर्षि यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि मन्त्रों का कोई 'लेखक' नहीं होता। मन्त्र अनादि हैं, वे श्रुति हैं। ऋषि उन्हें रचते नहीं, अपितु अपनी तपस्या और अंतर्दृष्टि से उन्हें 'देखते' (दृष्टं) हैं। जैसे सूर्य पहले से विद्यमान है, किन्तु उसे देखने के लिए नेत्रों का खुला होना आवश्यक है, वैसे ही मन्त्र विद्यमान हैं, किन्तु उन्हें अनुभव करने के लिए ऋषि-दृष्टि की आवश्यकता होती है। जब साधक यह जानता है कि "इस मन्त्र को उस महान ऋषि ने देखा था और उन्होंने इससे यह सिद्धि प्राप्त की थी", तब साधक के भीतर भी उसी ऋषि के समान पात्रता जाग्रत होने लगती है। यह ज्ञान मन्त्र के प्रति श्रद्धा और विश्वास को गहन करता है, जिससे मन्त्र का प्रभाव बढ़ जाता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार-संक्रमण' की प्रक्रिया है। ऋषि मन्त्र के रचयिता नहीं, अपितु उसके 'द्रष्टा' और 'सिद्ध' हैं। जब साधक मन्त्र के ऋषि का चिंतन करता है, तो वह वास्तव में उस ऋषि की चेतना-अवस्था का आह्वान कर रहा होता है।
साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह मन्त्र जप से पूर्व उस ऋषि के स्वरूप और उनकी सिद्धि का ध्यान करे। इससे साधक की बुद्धि उस स्तर पर उन्नत होती है जहाँ वह मन्त्र को केवल 'बोलता' नहीं, अपितु 'अनुभव' करने लगता है। यह अभ्यास साधक को 'अधिकार-भूमि' से 'अनुभव-भूमि' की ओर ले जाता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि जिस ऋषि ने इस मन्त्र को देखा, वह चेतना आज भी उपलब्ध है, तब वह स्वयं भी उस मन्त्र का द्रष्टा बनने की दिशा में अग्रसर होता है। यह मन्त्र-योग की वह विधि है जहाँ ध्वनि के माध्यम से साधक उस दिव्य व्यक्तित्व (ऋषि) के साथ एकाकार होकर सिद्धि की ओर बढ़ता है।
छन्दपदनिरुक्तिः
मन्त्रेण तस्य तत् प्रोक्तमृषिभावस्तदार्षकम् ।
छादनाच्छन्द उद्दिष्टमाकृतेर्वाससी यथा ॥ १.३९ ॥
— उस मन्त्रका वह (ऋषि) कहा गया है; यह ऋषिभाव ही आर्ष है। ढँकनेके कारण 'छन्द' कहा गया — जैसे दो वस्त्र देहको ढँकते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र के प्रथम अंग 'ऋषि' के लक्षण को स्पष्ट करते हुए बताया कि जिस द्रष्टा ने मन्त्र का साक्षात्कार किया और उससे सिद्धि प्राप्त की, वही उसका ऋषि है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए अब वे 'ऋषिभाव' की महत्ता और मन्त्र के द्वितीय अंग 'छन्द' के व्युत्पत्ति-मूल का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तस्य मन्त्रेण तत् ऋषिभावः प्रोक्तः, तत् (ऋषिभावः) अार्षकम् (अथवा आर्षम्) । छादनात् छन्द उद्दिष्टम्, यथा वाससी आकृतेः (देहस्य) छादनम्।
पदार्थ और निर्वचन:
• तस्य मन्त्रेण तत् प्रोक्तम्: उस मन्त्र के साथ जो (नाम) जुड़ा है, वह उस मन्त्र का ऋषि कहा गया है।
• ऋषिभावः: ऋषि होने की अवस्था या वह चेतना-स्तर जिसमें मन्त्र का साक्षात्कार संभव होता है।
• आर्षम् (अार्षकम्): ऋषियों से संबंधित या ऋषियों के समान। यहाँ इसका अर्थ है कि मन्त्र का प्रभाव केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उस 'ऋषि-भाव' में है जो मन्त्र के साथ प्रवाहित होता है।
• छादनात्: ढँकने के कारण। 'छद्' धातु का अर्थ है आच्छादित करना या छिपाना।
• उद्दिष्टम्: कहा गया है या संकेत किया गया है।
• वाससी: वस्त्र।
• आकृतेः: यहाँ 'आकृति' का अर्थ देह या शरीर के स्वरूप से है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य मन्त्र के दो अत्यंत सूक्ष्म अंगों—ऋषि और छन्द—के आंतरिक अर्थ को स्पष्ट कर रहे हैं।
प्रथम पंक्ति में वे कहते हैं कि किसी भी मन्त्र के साथ जो ऋषि का नाम जुड़ा होता है, वह केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम नहीं है, अपितु वह उस मन्त्र की 'ऋषि-अवस्था' (ऋषिभाव) का संकेत है। जब हम कहते हैं कि यह मन्त्र 'आर्ष' है, तो इसका अर्थ यह है कि इस मन्त्र की शक्ति उस ऋषि की चेतना से उत्पन्न हुई है। मन्त्र केवल ध्वनि नहीं, अपितु एक जीवंत अनुभव है। जो साधक मन्त्र का जप करता है, यदि वह केवल शब्दों को दोहराता है, तो वह केवल बाहरी क्रिया है; किन्तु यदि वह उस 'ऋषिभाव' को जाग्रत करता है जिसने इस मन्त्र को पहली बार देखा था, तब वह मन्त्र उसके लिए 'आर्ष' हो जाता है और सिद्धि का द्वार खुलता है।
द्वितीय पंक्ति में महर्षि 'छन्द' शब्द की निरुक्ति कर रहे हैं। सामान्यतः छन्द का अर्थ कविता के मीटर या लय से लिया जाता है, किन्तु यहाँ वे उसके योगिक और आध्यात्मिक अर्थ को उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि 'छादन' (ढँकने) के कारण इसे 'छन्द' कहा गया है। जिस प्रकार वस्त्र शरीर के आकृति को ढँक लेते हैं और उसे बाहरी वातावरण से सुरक्षित रखते हैं, उसी प्रकार छन्द मन्त्र की उस प्रचंड शक्ति को ढँककर रखता है जिसे साधारण मनुष्य सहन नहीं कर सकता। छन्द वह आवरण है जो दिव्य ध्वनि को एक निश्चित लय और अनुशासन में बाँधता है, ताकि साधक धीरे-धीरे उस शक्ति को आत्मसात कर सके। बिना छन्द के मन्त्र की ऊर्जा अनियंत्रित अग्नि के समान होगी; छन्द उसे एक दिशा और मर्यादा प्रदान करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
छन्द के इस 'छादन' या ढँकने वाले स्वरूप की पुष्टि उपनिषदों में भी मिलती है:
देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिरच्छादयंस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ १.४.२ ॥
मृत्युसे डरते हुए देवता त्रयी विद्यामें प्रविष्ट हुए; उन्होंने अपनेको छन्दोंसे ढँक लिया। जिनसे ढँका, यही छन्दोंका छन्दपन है।
यहाँ छान्दोग्य उपनिषद् स्पष्ट करता है कि मृत्यु के भय से त्रस्त देवताओं ने स्वयं को छन्दों से ढँक लिया था। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और उपनिषद् दोनों यहाँ एक ही सत्य को कह रहे हैं—छन्द केवल काव्य-शास्त्र नहीं है, अपितु एक सुरक्षा-कवच है। जहाँ उपनिषद् इसे देवताओं के संदर्भ में 'मृत्यु' से बचने का साधन बताता है, वहीं यह स्मृति इसे साधक के लिए मन्त्र की शक्ति को व्यवस्थित करने वाले 'वस्त्र' के समान बताती है। दोनों ही दृष्टियाँ छन्द को एक 'आवरण' के रूप में देखती हैं जो सूक्ष्म को स्थूल के साथ जोड़ता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास अत्यंत गहरा है। साधक के लिए यहाँ दो मुख्य बिंदु हैं:
१. ऋषि-भाव का आवाहन: साधक जब मन्त्र जप करे, तो वह स्वयं को केवल एक 'पुनरावृत्ति करने वाला' न माने। वह यह अनुभव करे कि वह उसी चेतना-स्तर (ऋषिभाव) में प्रवेश कर रहा है जहाँ उस मन्त्र का जन्म हुआ था। अभ्यास यह है कि—"मैं वही दृष्टि प्राप्त करूँ जिससे ऋषि ने इस मन्त्र को देखा था।" जब साधक का भाव ऋषिका भाव से मिलता है, तब मन्त्र 'जाग्रत' होता है।
२. छन्द का अनुशासन: छन्द को 'वस्त्र' के समान मानना यह सिखाता है कि साधना में 'लय' और 'अनुशासन' का क्या महत्त्व है। जैसे वस्त्र के बिना शरीर असुरक्षित है, वैसे ही छन्द (लय/मीटर) के बिना मन्त्र का जप मानसिक बिखराव पैदा कर सकता है। साधक जब मन्त्र की लय में डूबता है, तो वह छन्द के आवरण के भीतर सुरक्षित होकर अपनी आंतरिक यात्रा करता है। यह लय ही मन को एकाग्र कर उसे अक्षर की ओर ले जाने वाली सीढ़ी बनती है। यहाँ छन्द का अभ्यास मन के वेग को नियंत्रित करने और उसे एक निश्चित दिशा में मोड़ने का अभ्यास है।
आत्मा संछादितो देवैर्मृत्युभीतैश्च वै पुरा ।
आदित्यैर्वसुभी रुद्रैस्तेन च्छन्दांसि तानि वै ॥ १.४० ॥
पूर्वकालमें मृत्युसे डरे हुए देवताओं — आदित्यों, वसुओं और रुद्रों — ने अपनेको (इनसे) ढँका था; इसीलिए वे छन्द कहलाते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र के अंगों में से 'ऋषि' के लक्षण को स्पष्ट किया और 'छन्द' की व्युत्पत्ति का संकेत देते हुए बताया कि जिस प्रकार वस्त्र देह को ढँकते हैं, उसी प्रकार छन्द मन्त्र के अर्थ को आच्छादित करते हैं। वर्तमान श्लोक इसी 'छादन' (ढँकने) की घटना के पीछे के दैवीय रहस्य और उसके प्रयोजन को उद्घाटित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: पुरा वै मृत्युभीतैः आदित्यैः वसुभिः रुद्रैः च देवैः आत्मा संछादितः । तेन (तस्मात्) तानि वै छन्दांसि (उद्दिष्टानि) ।
पदार्थ और निर्वचन:
• पुरा: प्राचीन काल में, या सृष्टि के आरम्भिक समय में जब अस्तित्व के स्वरूपों में परिवर्तन हो रहा था।
• मृत्युभीतैः: मृत्यु के भय से ग्रस्त। यहाँ 'मृत्यु' का अर्थ केवल देह का अंत नहीं, अपितु अपने अस्तित्व का विलोपन या अपनी शक्ति का क्षय होना है।
• आदित्यैः वसुभिः रुद्रैः च: आदित्य (सौर शक्तियाँ), वसु (स्थिर संपदा और तत्व) और रुद्र (संहार और परिवर्तन की शक्तियाँ)। ये तीनों देव-समूह सृष्टि के संपूर्ण ऊर्जा-मंडल का प्रतिनिधित्व करते हैं।
• आत्मा संछादितः: यहाँ 'आत्मा' का अर्थ व्यक्तिगत जीवात्मा नहीं, अपितु देवताओं का अपना 'स्व-स्वरूप' या उनकी 'दिव्य सत्ता' है। 'संछादितः' का अर्थ है पूरी तरह से ढँक लिया गया या सुरक्षित कर लिया गया।
• तेन: उस कारण से या उस प्रक्रिया के द्वारा।
• छन्दांसि: वे लयबद्ध ढाँचे जिन्होंने देवताओं को आच्छादित किया।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में छन्द की निरुक्ति को एक पौराणिक और आध्यात्मिक घटना से जोड़ रहे हैं। वे बताते हैं कि पूर्वकाल में जब देवताओं—आदित्य, वसु और रुद्रों—पर मृत्यु का भय व्याप्त हुआ, तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिए स्वयं को 'आच्छादित' कर लिया। यह आच्छादन किसी भौतिक वस्तु से नहीं, अपितु मन्त्रों की विशेष लय और छंदबद्ध स्वरूप से था। इसी कारण इन रक्षा-कवचों को 'छन्द' कहा गया।
यहाँ 'मृत्यु' का भय वास्तव में उस विस्मृति या पतन का भय है, जहाँ देवता अपनी दिव्य चेतना खोकर जड़ता में गिर सकते थे। जब वे मन्त्रों के छन्दों में प्रविष्ट हुए, तो वे उस लय का हिस्सा बन गए। छन्द केवल कविता का मीटर नहीं है, अपितु वह ध्वनि का एक ऐसा अनुशासन है जो बिखरी हुई ऊर्जा को एक सूत्र में बाँध देता है। जिस प्रकार वस्त्र शरीर की रक्षा करता है और उसे बाहरी प्रहारों से बचाता है, उसी प्रकार छन्द ने देवताओं की सत्ता को सुरक्षित रखा।
इस स्मृति का यह वचन वास्तव में उस रहस्य का विस्तार है कि मन्त्र की शक्ति केवल उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी 'लय' (छन्द) में निहित है। बिना छन्द के मन्त्र केवल शब्द रहता है, किन्तु छन्द के साथ वह एक 'कवच' बन जाता है जो साधक और देवता दोनों की रक्षा करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिरच्छादयंस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ १.४.२ ॥
मृत्युसे डरते हुए देवता त्रयी विद्यामें प्रविष्ट हुए; उन्होंने अपनेको छन्दोंसे ढँक लिया। जिनसे ढँका, यही छन्दोंका छन्दपन है।
छान्दोग्य उपनिषद् का यह अंश स्पष्ट करता है कि मृत्यु से भयभीत होकर देवता त्रयी विद्या (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद) में प्रविष्ट हुए और उन्होंने स्वयं को छन्दों से ढँक लिया। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और छान्दोग्य उपनिषद् यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। स्मृति यहाँ उन देवताओं के नाम (आदित्य, वसु, रुद्र) स्पष्ट करके यह संकेत दे रही है कि सृष्टि की समस्त शक्तियाँ—चाहे वे प्रकाशमय (आदित्य) हों, स्थिर (वसु) हों या उग्र (रुद्र) हों—सबकी रक्षा का एकमात्र साधन 'छन्द' या 'मन्त्र-लय' ही है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि-कवच' के अभ्यास का संकेत देता है। साधक जब मन्त्र का जप करता है, तो वह केवल अर्थ का चिंतन नहीं करता, बल्कि मन्त्र के छन्द (लय) में स्वयं को विलीन करता है।
यहाँ 'मृत्यु' का अर्थ है—मन का चंचल होना, इंद्रियों का बिखरना और चेतना का क्षय होना। जब साधक मन्त्र की लयबद्धता (छन्द) में स्थित होता है, तो वह अपनी चेतना को बाहरी जगत के विक्षेपों से 'ढँक' लेता है। यह 'छादन' अज्ञान का पर्दा नहीं है, बल्कि एक सुरक्षा-कवच है। जिस प्रकार देवता छन्दों में छिपकर मृत्यु से बच गए, वैसे ही योगी मन्त्र की लय में छिपकर संसार के दुखों और मानसिक मृत्यु (अवसाद, मोह, भय) से मुक्त हो जाता है।
साधक इस अभ्यास से 'लय-भूमि' में प्रवेश करता है। वह अनुभव करता है कि जब श्वास और मन्त्र की लय एक हो जाती है, तब एक ऐसा आभामंडल निर्मित होता है जिसे 'छन्द' कहा जा सकता है। इस अवस्था में साधक का अस्तित्व सुरक्षित हो जाता है और वह सूक्ष्म जगत की शक्तियों (आदित्य, वसु, रुद्र) के साथ एकाकार होने की क्षमता प्राप्त करता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शब्दों से उठाकर ध्वनि के सूक्ष्म कंपन तक ले जाता है, जहाँ वह स्वयं एक 'छन्द' बन जाता है।
दैवतलक्षणम्
यस्य यस्य तु मन्त्रस्य उद्दिष्टा देवता तु या ।
तदाकारं भवेत्तस्य दैवतं देवतोच्यते ॥ १.४१ ॥
जिस-जिस मन्त्र की जो देवता बताई गई है, वह उसी के आकार का होता है; इसलिए उस मन्त्र का दैवत — देवता — कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र के अंगों में से 'ऋषि' के स्वरूप और 'छन्द' की निरुक्ति को स्पष्ट किया। अब वे मन्त्र के तीसरे अनिवार्य अंग 'देवता' के लक्षण और उसकी मन्त्र के साथ अंतर्संबंध की व्याख्या कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यस्य यस्य तु मन्त्रस्य या देवता उद्दिष्टा (अस्ति), तस्य (मन्त्रस्य) तदाकारं भवेत् । तस्मात् (तदर्थात्) तद् दैवतं देवतोच्यते ।
पदार्थ और निर्वचन:
• यस्य यस्य: जिस-जिस (पुनरुक्ति शब्द यहाँ यह दर्शाता है कि प्रत्येक मन्त्र की अपनी विशिष्ट देवता होती है, कोई एक सामान्य देवता सभी मन्त्रों के लिए नहीं है)।
• उद्दिष्टा: बताया गया, निर्दिष्ट किया गया या श्रुति-परम्परा में घोषित।
• तदाकारं: उसी के आकार का। यहाँ 'आकार' का अर्थ केवल स्थूल भौतिक आकृति नहीं, अपितु उस देवता की विशिष्ट ऊर्जा, गुण, कंपन और स्वरूप है।
• भवेत्: होता है या बन जाता है। यह मन्त्र और देवता के अभेद संबंध को दर्शाता है।
• दैवतं देवतोच्यते: उसे 'दैवत' या 'देवता' कहा जाता है। 'दैवत' वह है जो मन्त्र के माध्यम से साक्षात् होता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र और देवता के बीच के तादात्म्य का रहस्य खोल रहे हैं। सामान्यतः साधक यह मानता है कि मन्त्र एक साधन है और देवता एक लक्ष्य, जिसे मन्त्र के माध्यम से प्राप्त करना है। किन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि भिन्न है। वे कहते हैं कि जिस मन्त्र की जो देवता बताई गई है, वह मन्त्र वास्तव में उसी देवता का 'आकार' है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि मन्त्र और देवता दो अलग-अलग सत्ताएँ नहीं हैं। मन्त्र देवता का 'शब्द-रूप' है और देवता मन्त्र का 'अर्थ-रूप' या 'ऊर्जा-रूप' है। जिस प्रकार जल और उसकी शीतलता को अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार मन्त्र के अक्षरों के विन्यास में उस देवता की पूरी शक्ति और आकार निहित होता है। जब हम कहते हैं कि मन्त्र देवता के आकार का है, तो इसका अर्थ है कि मन्त्र की ध्वनि-तरंगें वही प्रभाव उत्पन्न करती हैं जो उस देवता का साक्षात् स्वरूप करता है। इसीलिए, मन्त्र के उस विशिष्ट स्वरूप को 'दैवत' कहा गया है।
बाहरी विधि में हम देवता की प्रतिमा या मानसिक छवि का ध्यान करते हैं, किन्तु आन्तरिक विधि में मन्त्र का शुद्ध उच्चारण ही उस देवता के आकार की स्थापना है। यदि मन्त्र का उच्चारण शुद्ध है, तो देवता का आकार अपने आप साधक के भीतर प्रकट हो जाता है, क्योंकि मन्त्र ही उस देवता का बीज और विस्तार है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-सायुज्य' का मार्ग प्रशस्त करता है। साधक जब इस सत्य का अनुभव करता है कि "मन्त्र ही देवता का आकार है", तब उसकी साधना 'प्रार्थना' से ऊपर उठकर 'तादात्म्य' में बदल जाती है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि जप के समय वह मन्त्र को केवल शब्दों का समूह न माने, बल्कि यह अनुभव करे कि प्रत्येक अक्षर उस देवता की एक विशिष्ट शक्ति या अंग है। जब वह मन्त्र का जप करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर उस देवता के आकार को गढ़ रहा होता है। यहाँ मन्त्र 'यंत्र' बन जाता है।
साधक इस अनुभव से इस भूमि पर जाता है जहाँ शब्द (मन्त्र) और अर्थ (देवता) एक हो जाते हैं। जब मन्त्र का आकार और देवता का आकार एक हो जाता है, तब साधक के भीतर उस देवता के गुणों का उदय होने लगता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल कल्पना से हटाकर सूक्ष्म कंपन की भूमि पर ले जाता है, जहाँ मन्त्र का नाद ही साक्षात् देवता का दर्शन बन जाता है।
विनियोगलक्षणम्
पुराकल्पे समुद्दिष्टा मन्त्राः कर्मार्थसिद्धये ।
अनेनेदं तु कर्तव्यं विनियोगः स उच्यते ॥ १.४२ ॥
प्राचीन काल में कर्म की सिद्धि के लिए जो मन्त्र उद्दिष्ट किए गए हैं, जिससे यह (कर्म) किया जाना चाहिए, वह 'विनियोग' कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र के अंगों में से ऋषि, छन्द और देवता के लक्षणों को स्पष्ट किया। अब वे मन्त्र के चौथे अनिवार्य अंग 'विनियोग' की परिभाषा दे रहे हैं, जो मन्त्र की शक्ति को एक विशिष्ट दिशा और प्रयोजन प्रदान करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: पुराकल्पे कर्मार्थसिद्धये मन्त्राः समुद्दिष्टाः (सन्ति), अनेन (मन्त्रेण) इदं (कर्म) तु कर्तव्यम् — विनियोगः स उच्यते ।
पदार्थ और निर्वचन:
• पुराकल्पे: प्राचीन काल में या पूर्वकल्प में। यहाँ 'पुराकल्प' उस आदि-समय का संकेत है जब ऋषियों ने तपस्या के माध्यम से मन्त्रों का साक्षात्कार किया और उन्हें व्यवस्थित किया।
• कर्मार्थसिद्धये: कर्म के अर्थ (प्रयोजन) की सिद्धि के लिए। 'अर्थ' यहाँ केवल भौतिक लाभ नहीं, अपितु उस विशिष्ट फल या अवस्था की प्राप्ति है जिसके लिए मन्त्र का निर्माण हुआ है।
• समुद्दिष्टाः: स्पष्ट रूप से बताए गए या उद्घोषित।
• अनेनेदं तु कर्तव्यं: 'इस (मन्त्र) से यह (कर्म) करना चाहिए'। यह विनियोग का मूल सूत्र है। 'अनेन' (इस मन्त्र द्वारा) साधन है और 'इदं' (यह विशिष्ट कर्म/फल) साध्य है।
• विनियोगः स उच्यते: उसे 'विनियोग' कहा जाता है। विनियोग का शाब्दिक अर्थ है—विशेष रूप से नियुक्त करना या लगाना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र की प्रयोग-विधि यानी 'विनियोग' का लक्षण बता रहे हैं। वे कहते हैं कि प्राचीन काल में जब मन्त्रों का प्रकटीकरण हुआ, तो वे केवल शब्दों के समूह के रूप में नहीं, अपितु विशिष्ट 'कर्मार्थसिद्धि' के लिए उद्दिष्ट किए गए थे। प्रत्येक मन्त्र एक विशिष्ट ऊर्जा का पुंज है और उस ऊर्जा का एक निश्चित लक्ष्य होता है।
जब साधक यह जानता है कि "इस मन्त्र का प्रयोग इस विशिष्ट कार्य की सिद्धि के लिए करना है", तो वह ज्ञान 'विनियोग' कहलाता है। विनियोग मन्त्र और कर्म के बीच की वह कड़ी है जो मन्त्र की शक्ति को बिखरने से रोककर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करती है। यदि मन्त्र 'अस्त्र' है, तो विनियोग उस अस्त्र को चलाने का 'निशाना' है। बिना विनियोग के मन्त्र का जप केवल एक मानसिक व्यायाम हो सकता है, किन्तु विनियोग के साथ वह एक निश्चित लक्ष्य की ओर अग्रसर 'योग' बन जाता है।
यहाँ 'कर्म' शब्द का अर्थ व्यापक है। बाहरी स्तर पर यह यज्ञ, तर्पण या पूजन की विधि हो सकती है, किन्तु आन्तर स्तर पर यह चित्त की शुद्धि, प्राण का उत्थान या किसी विशेष मानसिक अवस्था की प्राप्ति का कर्म है। याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि मन्त्रों की शक्ति उनकी संरचना में है, किन्तु उनकी सफलता उनके सही विनियोग में है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से विनियोग 'संकल्प' का सूक्ष्म रूप है। जब साधक विनियोग का उच्चारण करता है, तो वह अपने अवचेतन मन को यह निर्देश दे रहा होता है कि इस मन्त्र की संपूर्ण शक्ति को किस विशिष्ट दिशा में प्रवाहित करना है।
साधक के लिए इसका अभ्यास यह है कि वह मन्त्र के केवल शब्दों में न उलझे, बल्कि उस 'प्रयोजन' (इदं) के साथ एकाकार हो जाए जिसके लिए मन्त्र दिया गया है। जब 'अनेन' (साधन/मन्त्र) और 'इदं' (साध्य/कर्म) के बीच का भेद मिट जाता है, तब साधक उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ मन्त्र स्वयं कर्म बन जाता है।
अभ्यास की विधि यह है कि जप से पूर्व विनियोग के समय साधक अपने हृदय में उस फल या अवस्था का स्पष्ट अनुभव करे जिसे वह प्राप्त करना चाहता है। इससे मन्त्र की शक्ति दिशाहीन नहीं रहती, बल्कि एक लेजर किरण की भाँति सीधे लक्ष्य पर प्रहार करती है। यह अभ्यास साधक को 'भ्रम' से 'निश्चितता' की भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ उसे ज्ञात होता है कि किस मन्त्र से कौन सी आंतरिक गाँठ खुलनी है और किस मन्त्र से कौन सा प्रकाश जागृत करना है।
ब्राह्मणलक्षणम्
निरुक्तं यत्र मन्त्रस्य समुत्पत्तिः प्रयोजनम् ।
प्रतिष्ठानं स्तुतिश्चैव ब्राह्मणं तदिहोच्यते ॥ १.४३ ॥
जहाँ मन्त्र की समुत्पत्ति, प्रयोजन, प्रतिष्ठा और स्तुति का निरुक्त (व्याख्यान) हो, उसे यहाँ 'ब्राह्मण' कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र के अंगों में से ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग के लक्षणों को स्पष्ट किया। अब वे मन्त्र के पाँचवें और अंतिम अनिवार्य अंग 'ब्राह्मण' की परिभाषा दे रहे हैं, जो मन्त्र के बाह्य प्रयोग को आंतरिक बोध से जोड़ता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यत्र मन्त्रस्य निरुक्तं समुत्पत्तिः, प्रयोजनम्, प्रतिष्ठानं स्तुतिश्चैव (भवति), तद् ब्राह्मणं इह उच्यते ।
पदार्थ और निर्वचन:
• निरुक्तं: व्याकरणिक व्याख्या या शब्दों के वास्तविक अर्थ का उद्घाटन। निरुक्त का अर्थ है—शब्द के मूल स्रोत तक जाकर उसके अर्थ को स्पष्ट करना।
• समुत्पत्तिः: मन्त्र की उत्पत्ति। वह मन्त्र कहाँ से आया, किस तप या किस दिव्य अवस्था में प्रकट हुआ।
• प्रयोजनम्: मन्त्र के प्रयोग का उद्देश्य। वह मन्त्र किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए रचा गया है।
• प्रतिष्ठानं: मन्त्र की स्थापना। वह मन्त्र शरीर के किस अंग में, किस समय या किस देवता में प्रतिष्ठित है।
• स्तुतिश्चैव: स्तुति और उसका अर्थ। मन्त्र में जिस देव या तत्त्व की स्तुति की गई है, उसका स्वरूप क्या है।
• ब्राह्मणं तदिहोच्यते: उसे यहाँ 'ब्राह्मण' कहा जाता है। यहाँ 'ब्राह्मण' शब्द किसी व्यक्ति के लिए नहीं, अपितु मन्त्र के उस व्याख्यात्मक ग्रन्थ या ज्ञान के लिए प्रयुक्त हुआ है जो मन्त्र के रहस्य को खोलता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य मन्त्र के उस आधारभूत ज्ञान की व्याख्या कर रहे हैं जिसे 'ब्राह्मण' कहा जाता है। सामान्यतः लोग मन्त्र को केवल शब्दों का समूह मानकर जप करते हैं, किन्तु मन्त्र केवल ध्वनि नहीं, अपितु एक जीवंत शक्ति है। इस शक्ति को जाग्रत करने के लिए उसके 'ब्राह्मण' का ज्ञान होना अनिवार्य है।
महर्षि के अनुसार, जिस व्याख्या में मन्त्र की चार बातें स्पष्ट हों, वही वास्तव में 'ब्राह्मण' है। प्रथम—समुत्पत्ति, जिससे साधक को यह ज्ञात होता है कि यह मन्त्र किसी ऋषि के तप से प्रकट हुआ है, अतः इसमें तप की अग्नि निहित है। द्वितीय—प्रयोजन, जिससे साधक का लक्ष्य निर्धारित होता है; बिना प्रयोजन के जप केवल शब्दों का दोहराव है, साधना नहीं। तृतीय—प्रतिष्ठान, जो मन्त्र को एक आधार देता है। जैसे सूर्योपस्थान में मन्त्र का प्रतिष्ठाण सूर्य में है, वैसे ही आंतरिक योग में मन्त्र का प्रतिष्ठाण हृदय या प्राण में होता है। चतुर्थ—स्तुति, जिससे साधक उस देव-तत्त्व के गुणों का चिंतन करता है और स्वयं को उसी स्वरूप में ढालने का प्रयास करता है।
जब इन चारों का 'निरुक्त' (गहन विश्लेषण) किया जाता है, तब मन्त्र का बाह्य आवरण हट जाता है और उसका बीज-रूप प्रकट होता है। शतपथ ब्राह्मण इसी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ मन्त्रों के केवल प्रयोग नहीं बताए गए, अपितु उनके पीछे के दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्यों को खोला गया है। अतः मन्त्र और उसका ब्राह्मण एक ही सत्य के दो पक्ष हैं—मन्त्र 'बीज' है और ब्राह्मण उसका 'विस्तार'।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से, मन्त्र का केवल विनियोग जानना 'साधन' है, किन्तु उसके ब्राह्मण को जानना 'साधना' है। एक साधारण जप करने वाला केवल ध्वनि से जुड़ता है, किन्तु एक योगी जब मन्त्र के साथ उसके ब्राह्मण का स्मरण करता है, तो वह मन्त्र के 'अर्थ' और 'प्रयोजन' में लीन हो जाता है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह जप के समय केवल शब्दों को न दोहराए, अपितु मन्त्र की उत्पत्ति (तप), उसके प्रयोजन (लक्ष्य), उसकी प्रतिष्ठा (स्थान) और उसकी स्तुति (स्वरूप) का चिंतन करे। जब साधक मन्त्र के ब्राह्मण का अनुभव करता है, तब मन्त्र उसके लिए केवल एक ध्वनि नहीं रह जाता, बल्कि एक 'अनुभव' बन जाता है। यह प्रक्रिया साधक को 'वाचिक जप' से उठाकर 'मानसिक जप' और फिर 'अजपा-जप' की भूमि की ओर ले जाती है। मन्त्र का ब्राह्मण वह सेतु है जो साधक को स्थूल कर्मकाण्ड से सूक्ष्म योग-साधना में प्रवेश कराता है। जब मन्त्र का अर्थ (निरुक्त) हृदय में स्पष्ट होता है, तब वह मन्त्र प्राणों में स्पंदित होने लगता है और साधक अक्षर-ब्रह्म की ओर अग्रसर होता है।
आर्षादिस्मरणावश्यकता
एतत् पञ्चविधं योगं जपकाले ह्यनुस्मरेत् ।
होमे चान्तर्जले योगे स्वाध्याये यजने तथा ॥ १.४४ ॥
इस पाँच प्रकारके योग (ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मणके संयोग) का जपके समय स्मरण करे — और होममें, अन्तर्जलमें, योगमें, स्वाध्यायमें तथा यजनमें भी।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र के पाँच अनिवार्य अंगों—ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मण—के लक्षणों को परिभाषित किया। अब वे यह बता रहे हैं कि इन पाँचों का व्यावहारिक प्रयोग किन-किन साधनाओं में और किस प्रकार किया जाना चाहिए।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: जपकाले ह्यनुस्मरेत् एतत् पञ्चविधं योगं; (तथा) होमे च, अन्तर्जले, योगे, स्वाध्याये, यजने तथा (अनुस्मरेत्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• पञ्चविधं योगं: यहाँ 'योग' शब्द का अर्थ अष्टाङ्ग योग या अन्य किसी योग-पद्धति से नहीं, अपितु 'संयोग' (जुड़ाव) से है। ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और ब्राह्मण—इन पाँचों का मन्त्र के साथ जो सामंजस्य है, वही 'पञ्चविध योग' है।
• अनुस्मरेत्: केवल याद करना नहीं, अपितु मन्त्र के साथ उन तत्त्वों का साक्षात्कार करते हुए उन्हें चेतना में लाना।
• जपकाले: मन्त्र के मानसिक या वाचिक जप के समय।
• होमे: अग्निहोत्र या हवन के समय।
• अन्तर्जले: यह एक गूढ़ शब्द है। बाह्य जल से तर्पण या स्नान के अतिरिक्त, शरीर के भीतर प्रवाहित होने वाले प्राण-जल या अमृत-धारा के प्रवाह में मन्त्र का प्रयोग।
• योगे: समाधि या ध्यान की अवस्था में जब साधक मन्त्र को आधार बनाकर सूक्ष्मता की ओर बढ़ता है।
• स्वाध्याये: वेदों के अध्ययन और उनके मन्त्रों के सस्वर पाठ के समय।
• यजने: किसी भी प्रकार के यज्ञ या अनुष्ठान के संपादन के समय।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र-साधना की पूर्णता का सूत्र दे रहे हैं। मन्त्र केवल शब्दों की आवृत्ति नहीं है, अपितु वह एक दिव्य यंत्र है। जिस प्रकार किसी यंत्र को चलाने के लिए उसके निर्माण, उसके उद्देश्य और उसकी कार्यविधि का ज्ञान आवश्यक है, उसी प्रकार मन्त्र की शक्ति को जाग्रत करने के लिए उसके पाँचों अंगों का स्मरण अनिवार्य है।
ऋषि वह दृष्टा है जिसने मन्त्र को देखा; छन्द वह आवरण है जिसने देवता को सुरक्षित रखा; देवता वह स्वरूप है जिसका मन्त्र आकार है; विनियोग वह मार्ग है जिससे कर्म सिद्ध होता है; और ब्राह्मण वह ज्ञान है जो मन्त्र के रहस्य को खोलता है। जब साधक इन पाँचों को एक साथ जोड़कर मन्त्र का जप करता है, तब वह केवल शब्द नहीं बोलता, बल्कि उस सम्पूर्ण दिव्य संरचना (पञ्चविध योग) के साथ जुड़ जाता है।
महर्षि कहते हैं कि इस संयोग का स्मरण केवल जप तक सीमित न रहे। 'होमे' (अग्निहोत्र) में जब आहुति दी जाती है, तब मन्त्र के देवता और विनियोग का बोध आहुति को सिद्ध बनाता है। 'अन्तर्जले' का अर्थ अत्यंत रहस्यमय है; जब साधक अपनी अंतःकरण की शुद्धि करता है या प्राणों के प्रवाह को संतुलित करता है, तब मन्त्र के इन पाँचों अंगों का स्मरण उस आंतरिक जल (प्राण-शक्ति) को पवित्र कर देता है। 'योग' में जब मन एकाग्र होता है, तब मन्त्र का 'ऋषि-भाव' साधक को उस अवस्था तक ले जाता है जहाँ मन्त्र का साक्षात्कार हुआ था। 'स्वाध्याय' और 'यजन' में यह स्मरण मन्त्र को यांत्रिक क्रिया से उठाकर एक जीवंत अनुभव बना देता है।
अतः मन्त्र का वह प्रयोग जो इन पाँचों अंगों से रहित है, वह अधूरा है। वह वैसा ही है जैसे बिना प्राण के शरीर। जब मन्त्र अपने इन पाँचों अंगों के साथ जुड़ता है, तभी वह साधक के भीतर और बाहर पूर्ण फल प्रदान करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-योग' की विधि है। साधारण जप में मन भटकता है क्योंकि वह केवल शब्दों को दोहराता है। किन्तु जब साधक जप से पूर्व और जप के दौरान इन पाँचों का स्मरण करता है, तो उसका मन पाँच स्तरों पर केंद्रित होता है:
१. ऋषि-स्मरण से वह अपनी चेतना को उस दिव्य दृष्टा के साथ जोड़ता है।
२. छन्द-स्मरण से वह मन्त्र की लय और उसकी सुरक्षात्मक शक्ति को अनुभव करता है।
३. देवता-स्मरण से वह मन्त्र के वास्तविक स्वरूप का ध्यान करता है।
४. विनियोग-स्मरण से वह अपने लक्ष्य (प्रयोजन) के प्रति सजग रहता है।
५. ब्राह्मण-स्मरण से वह मन्त्र के गूढ़ अर्थ और उसकी उत्पत्ति के रहस्य में उतरता है।
यह अभ्यास साधक को 'शब्द' से 'अर्थ' की ओर और 'अर्थ' से 'अनुभव' की ओर ले जाता है। जब जप के समय यह पञ्चविध योग घटित होता है, तब मन्त्र केवल जिह्वा का व्यायाम नहीं रहता, बल्कि वह हृदय और सूर्य (आंतरिक ज्योति) में प्रतिष्ठित होकर साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाने वाला सेतु बन जाता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ मन्त्र और मंत्र-सिद्ध ऋषि एक हो जाते हैं।