व्याख्या
प्रशस्तपादभाष्य — प्राक्कथन और भूमिका
0 मूल पद्य
प्राक्कथन
भारतीय परम्परा के अनुसार वेद सम्पूर्ण ज्ञान के निधान माने जाते हैं । वेद तथा उनके अन्तिम भाग उपनिषद् आस्तिक दर्शनों के स्रोत हैं । मूलतः तीन दर्शन परिगणनीय होते हैं -१ , सांख्य , २. वैशेषिक तथा ३. पूर्वमीमांसा यद्यपि उक्त तीनों दर्शन वेद का प्रामाण्य स्वीकृत करने के कारण आस्तिक हैं , तथापि ये ईश्वर को नहीं मानते । पद्मपुराण में इन्हें वेदवाह्य कहा गया है । इनके सेश्वरत्व के लिए पुरक रूप में अन्य तीन दर्शनों का अवतार हुआ । वे हैं क्रमशः -१ . योगदर्शन , २. न्यायदर्शन तथा ३. उत्तरमीमांसा ( वेदान्तदर्शन ) । उक्त दर्शनों के जो तत्त्ववीज वेदों में संनिहित हैं , उन्हीं को सूत्ररूप में प्रस्तुत करने का कार्य किया है— कपिल , पतञ्जलि , कणाद , गोतम , जैमिनि तथा व्यास ने ।
कणाद के वैशेषिक सूत्र ( चतुर्थ तथा सप्तम अध्याय ) में भौतिक जगत् का आधार परमाणुओं में संनिहित बताया गया है । पदार्थों के स्वरूप निर्णय के लिए भारतीय विद्या वेत्ताओं को वैशेषिक दर्शन का ज्ञान उसी प्रकार अनिवार्य है , जिस प्रकार पदसाधुत्व के निर्णय के लिए पाणिनीय व्याकरण का अनुशीलन । जिस प्रकार योगसूत्र के प्रथम सूत्र ' अथ योगानुशासनम् ' में योग शब्द के उल्लेख के कारण योगसूत्र तथा ब्रह्मसूत्र के प्रथम सूत्र ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' में ब्रह्म शब्द के उल्लेख के कारण ग्रन्थ का नामकरण ब्रह्मसूत्र हुआ , उसी प्रकार वैोकदर्शन के प्रथम सूत्र ' अवातो धर्म व्याख्यास्यामः ' के अनुसार यद्यपि इसका नामकरण धर्मसूत्र होना चाहिए था , तथापि चतुर्थ सूत्र में वर्णित पदार्थों के मध्य ' विशेष ' पदार्थ के कारण यह दर्शन प्रसिद्ध हुआ है । सांख्य दर्शन की अपेक्षा विशिष्ट होने के कारण इसका नाम वैशेषिक दर्शन पड़ा — ऐसी भी कुछ विद्वानों - की मान्यता है ।
यद्यपि महाभारत के शान्तिपर्व ( अ ० ३२० , २२ ) में वैशेषिक शब्द का स्पष्ट उल्लेख हुआ है—
यस्माच्चैतन्मया प्राप्तं ज्ञानं वैशेषिकं पुरा ।
यस्य नान्यः प्रवक्ताऽस्ति मोक्षं तदपि मे शृणु ।।
तथापि व्याख्याकारों में पर्याप्त मतभेद है । परमानन्द महाभारत की अपनी व्याख्या में ' वैशेषिक ' का अर्थ करते हैं— ' आरमनो यो विशेषस्तत्प्रकाशकम् । केवल अर्जुन मिश्र ( महा ) भारताचं ( प्र ) दीपिका नामक अपनी व्याख्या में वैशेषिक शब्द को स्पष्टतः कणादकृत वैशेषिक दर्शन बताते हैं- ' वैशेषिकम् = पदार्थस्वरूपनिरूपणद्वारा हेयोपादेयफलम् हेयोपादानाभ्यामात्मतत्वविवेकफलं कणादप्रणीतशास्त्रम् । किन्तु उन्होंने अपने द्वारा किये गये उक्त अर्थ के प्रति अरुचि दिखाते हुए ' यद्वा विशेषाय प्रवृतं सांख्यपदेन प्रसिद्धमेव शास्त्रं वैशेषिकम् ' लिखा । महाभारत के उक्त श्लोक के पूर्व प्रथम तथा चतुर्थ
( ख ) श्लोकों में ' छत्रादिषु विशेषेण मुक्तं मां विद्धि तत्वत : ' तथा ' जनकोऽप्युत्स्मयन् राजा भावमस्या विशेषयन् ' कहकर जनक एवं संन्यासिनी के मध्य प्रचलित दार्शनिक प्रसङ्ग में ' विशेष ' शब्द साभिप्राय रखा गया है । विद्वज्जनों को इस पर विचार करना चाहिए कि उक्त प्रसङ्ग में ' विशेष ' शब्द को लेकर जिस दर्शन पर विचार किया गया है , क्या वह कणाद प्रणीत वैशेषिक दर्शन है अथवा सांख्यदर्शन ।
' ऋतूक्थादिसूत्रान्ताट्ठक् ' ( ४-२-१० ) सूत्र के गणपाठ में पाणिनि ने ' भ्याय उक्थ लोकायत , ज्योतिष , संहिता , निरुक्त , वृत्ति , आयुर्वेद ' इत्यादि का उल्लेख किया है , ' विशेष ' शब्द का नहीं । ' विनयादिभ्यष्ठक् ' ( ५-४-३४ ) सूत्र के गणपाठ में यद्यपि ' विशेष ' शब्द का पाठ हुआ है , तथापि उक्त सूत्र स्वार्थ में प्रत्यय - विधान करता है । ' विशेषमधिकृत्य कृते ग्रन्थे ' इस अर्थ में ' अधिकृत्य कृते ग्रन्थे ' ( ४-३-८७ ) सूत्र से ठक् प्रत्यय होकर ' वैशेषिक ' शब्द निष्पन्न होता है । यद्यपि इस प्रकार पर्यालोचना करने पर ज्ञात होता है कि पाणिनि को ' वैशेषिक दर्शन ' अज्ञात था , तथापि पाणिनि के ' परेरभितोभावि मण्डलम् ' ( ६ , २ , १८२ ) सूत्र में ' परिमण्डल ' शब्द वैशेषिक दर्शन के ' नित्यं परिमण्डलम् '
७,२,२० ) सूत्र - गत परिमण्डल शब्द के सदृश परमाणुपरिमाण अर्थ में प्रयुक्त हुआ है ।
वायुपुराण के महेश्वरावतारयोग नामक तेईसवें अध्याय में अक्षपाद , कणाद , उलूक तथा वत्स को सोमशर्मा का पुत्र बताया गया है । छब्बीसवें परिवर्त में वैद्युत एवं आश्वलायन की उत्पत्ति तथा सत्ताइसवें परिवर्त में अक्षपाद , कणाद इत्यादि के जन्म का उल्लेख किया गया है । जातूकर्ण्य व्यास के काल में सोमशर्मा की स्थिति प्रभासतीर्थ में बतायी गयी है । वह प्रभासपतन के नाम से गुजरात में अवस्थित है । है । - १. कणाद , २. गौतम , ३. शक्ति , ४. उपमन्यु , ५ जैमिनि ६. कपिल , पद्मपुराण ( उत्तरखण्ड ) के २६३ वें अध्याय में दस ऋषियों को तामस कहा गया ७. दुर्वासा , ८. मृकण्डु , ६. बृहस्पति तथा १०. भृगुवंशोत्पन्न जमदग्नि । इन्हें भावशक्त्यावेशावतार बताया गया है । इनके द्वारा रचित शास्त्रों को वेदबाह्य तथा तामस कहा गया है ( २६२ , ६६-१८ ) -
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमम् ।
येषां स्मरणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि ॥
प्रथमं हि मया चोक्तं शंबं पाशुपतादिकम् ।
मच्छवस्थावेशितैविप्रः प्रोक्तानि च ततः शृणु ।।
कणादेन तु संप्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत् ।
गौतमेन तथा न्यायं सांख्यं तु कपिलेन वै ।।
वायुपुराण के अनुसार जातूकर्ण्य व्यास सत्ताइसवें परिवर्त में तथा कृष्णद्वैपायन व्यास अठ्ठाइसवें परिवर्त में हुए थे । इस प्रकार बातूकण्यं व्यास के समय उत्पन्न सोमशर्मा के पुत्र कणाद द्वैपायन व्यास से पूर्ववर्ती ठहरते हैं ।
( ग )
जैनों की तत्त्वसमीक्षा वैशेषिक पदार्थ निरूपण से प्रभावित है । मिलिन्दप्रश्न जैसे प्राचीन बौद्धग्रन्थों में वैशेषिक दर्शन का बारम्बार उल्लेख हुआ है । वेद और ईश्वर को प्रमाणकोटि में न रखे जाने के कारण बौद्धों में वैशेषिक सूत्रों के प्रति विशेषतः समादर की दृष्टि बनी प्रतीत होती है । वैशेषिकों के लिए ' वैशेषिका अर्धवैनाशिक : ' की प्रसिद्ध उक्ति भी उक्त बात को पुष्ट करती है ।
प्रशस्तपाद ने ' पदार्थधर्मसंग्रह ' नामक अपने स्वोपज्ञ ग्रन्थ में वैशेषिक दर्शन के तत्त्वों के निरूपणार्थ तथा ' अर्धवेनाशिकाः ' की लोकधारणा के निराकरणार्थ महनीय कार्य किया है । वैशेषिक दर्शन को सेश्वरता को प्रतिष्ठापित करने का श्रेय प्रशस्तपाद को ही प्राप्त है । पदार्थधर्मंसंग्रह की अपनी सर्वाङ्गपूर्णता के कारण वैशेषिक दर्शन पर रचित रावणकृत भाष्य लुप्त हो गया । इस की विशिष्टता तथा महनीयता इसी से समझी जा सकती है कि ' संग्रह ' होते हुए भी परवर्ती आचार्यों ने इसे भाष्य के रूप में मान्यता प्रदान की है ।
प्रशस्तपाद ने कणाद मुनि को नमस्कार किया है । सूत्रों का आधार लेकर उन्होंने कुछ स्थलों पर व्याख्या की है । ' अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः ' सूत्र के ' धर्मम् ' का आधार लेकर अपने ग्रन्थ का नाम ' पदार्थधर्म संग्रह ' रखा है ।
चतुर्थ सूत्र ' धर्मविशेषणप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् ' के आधार पर ( १५ पृ ० पर ) इस प्रकार लिखा है - ' द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसहेतु : ' ( १५ पृ ० ) ' यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ' सूत्र के आधार पर उन्होंने ' ईश्वर ' शब्द जोड़ते हुए लिखा- ' तच्चेश्वरचोदनाभिव्यक्ताद् धर्मादेव ' ( पृ ० १८ ) | कणाद के सूत्रों का आधार लेने पर भी ' पदार्थधर्म संग्रह ' स्वतन्त्र ग्रन्थ है , व्याख्या ग्रन्थ नहीं ।
इसके अतिरिक्त इसमें कई मौलिक उद्भावनाएँ दृष्टिगोचर होती हैं । परमाणुवाद , प्रमाण , २४ गुण तथा जगत् की उत्पत्ति एवं विनाश का विशद और प्रामाणिक विवेचन यहाँ मिलता है । न्यायदर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन ने अपने भाष्य में ' पदार्थधर्म संग्रह ' ( प्रशस्तपाद भाष्य ) से सहायता ली है । अनीश्वरवादी बौद्धों पर इसकी प्रतिक्रिया हुई और बौद्ध विद्वान् वसुबन्धु ने प्रशस्तपाद द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों का खण्डन करने की चेष्टा की ।
प्रशस्तपाद के ' पदार्थधर्म संग्रह ' पर छठी से सोलहवीं शताब्दी तक व्याख्याएं लिखी गयीं । छठी शताब्दी में व्योमशिवाचार्य ने ' व्योमवती ' नामक व्याख्या लिखी । दसवीं शताब्दी में दो प्रौढ व्याख्याएँ उदयनाचार्य तथा श्रीधराचार्य द्वारा रची गयीं - १. किरणावली , एवं २. न्यायकन्दली । उदयनाचार्य ने वैशेषिक दर्शन पर ' लक्षणावली ' नामक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ की भी रचना की है । ' व्योमवती ' तथा ' किरणावली ' की अपेक्षा ' न्यायकन्दली ' अधिक प्रौढ एवं विशद व्याख्या है । इसमें कई स्थापनाएँ नवीन हैं । तम के आरोपित नील रूप मानने के सिद्धान्त के उपज्ञाता के रूप में श्रीधराचार्य की प्रसिद्धि है । रावणकृत वैशेषिक दर्शन के भाष्य का नाम ' वैशेषिक कन्दली ' ( वैशेषिककटन्दी ) था | अधिक सम्भव है कि श्रीधराचार्य ने रावणभाष्य की स्मृति को जगाये रखने के साथ साथ अपनी व्याख्या की प्रसिद्धि के लिए उसका नामकरण ' कन्दली ' किया । ' वैशेषिक ' के स्थान पर श्रीधर ने
( घ ) ' न्याय ' शब्द का प्रयोग बड़ी सूझबूझ के साथ किया है । फलतः परवर्ती काल में गगेशोपाध्याय से पहले न्याय और वैशेषिक दोनों सिद्धान्तों के निरूपण के लिए शिवादित्य ने ' सप्तपदार्थी ' नामक ग्रन्थ की रचना की । केशवमिश्र की ' तर्कभाषा ' गङ्गेशोपाध्याय के परवर्ती काल की रचना है । श्रीधर के परवर्ती श्रीवत्स तथा वल्लभाचार्य ने भी प्रशस्तपाद पर रची गयी अपनी व्याख्याओं के नामों में ' न्याय ' शब्द को सम्बद्ध किया है । श्रीधराचार्य की व्याख्या को अधिक स्पष्ट करने के लिए पद्मनाभ मिश्र ने ' न्यायकन्दलोसार ' और जैन पण्डित राजशेखर ने ' न्यायकन्दली पञ्जिका ' नामक टीकाओं की रचना की है ।
न्यायकन्दली व्याख्या की विशिष्टता के निदर्शन के लिए अधोलिखित विषय अवलोकना है- १. महोदय शब्द की व्याख्याएँ ( ६० ) , श्रेयः सम्बन्ध में मण्डनमत का खण्डन ( १६५० ) ; बौद्धों के अर्थक्रियाकारित्व ' का खण्डन ( ३३ ५० ) , अनुतसिद्ध पदार्थ का विचार ( ३७ पु ० ) , उद्योतकर के मत का खण्डन ( ७१ ५० ) , शरीरारम्भ से कारणता का विचार ( ८३ पृ ० ) , अनुमानाङ्ग के सम्बन्ध में बौद्धों के मत का खण्डन १८४५० ) , अन्तःकरणत्व का साधन ( २१८ पृ ० ) , प्रदेशवृत्तित्वका व्याख्यान ( २४७ पृ ० ) , द्वित्व की उत्पत्ति इत्यादि का निरूपण ( २५-३१३० ) , सत् अथवा असत् की कारणता का विचार ( ३३६ १० ) , विपर्यय का समर्थन ( ४३० ५० ) , निर्विकल्पक साधन ( ४४६ ५० ) , युक्तों की व्याख्या ( ४६५ ५० ) , ' यदनुमेयेन ' की व्याख्या ( ४८१ पु ० ) , ' विधिस्तु ' की व्याख्या ( ४११ ० ) , भाध्य की उवा ( ५०३० ) , ' आम्नायविधातृणाम् की व्याख्या पर विचार ( ६२७ पृ ० ) इत्यादि ।
प्रशस्तपाद की इस व्याख्या के महत्व के कारण वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय के अनुसन्धान संस्थान ने अपने अन्यतम अनुसन्धान सहायक श्रीदुर्गाधर झा को हिन्दी अनुवाद करने का कार्य सन् १६६० में सौंपा । न्याय - वैशेषिक दर्शन के उद्भट विद्वान् श्रीझा ने इस गुरुतर कार्य का निर्वाह प्रत्यग्रन्थिभेदपूर्वक सफलता के साथ किया । सन् १ ९ ३३ में इस ग्रन्थ का प्रकाशन अनुसन्धान संस्थान से किया गया । इस अनुवाद की उपादेयता का भान इसी से होता है कि कुछ ही वर्षों में ग्रन्थ की सभी प्रतियाँ विक्रीत हो गयीं । न्यायकन्दली के पुनः प्रकाशन के लिए जिज्ञासुओं के द्वारा कई वर्षों से निरन्तर प्रार्थना की जाती रही है । फलतः स्वापकन्दली सहित प्रशस्तपाद की हिन्दी व्याख्या का यह संशोधित द्वितीय संस्करण जिज्ञासुओं और विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत है । अनुसन्धान संस्थान के अन्यतम अनुसन्धान सहायक डॉ ० उमाशंकर त्रिपाठी ने इस प्रन्य का संशोधन कार्य बड़ी तत्परता के साथ किया है । मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह जिज्ञापुओं का उपकारक और विद्वज्जनों को मनोमोदकर सिद्ध होगा ।
वाराणसी भागीरथप्रसाद त्रिपाठी ' वागीश शास्त्री ' मकरसंक्रान्तिः २०३४ वे . निदेशक , ( १४-१-७८ ई ० शनिवार ) अनुसन्धान संस्थान
विज्ञप्तिः
गङ्गानाथान् गुरून् नत्वा बहुग्रन्थानुवादकान् ।
तन्नाम्ना ग्रन्थमालायाः प्रक्रमं करवाण्यहम् ॥
प्रशस्तपादभाष्यस्य कन्दलीटीकया सह ।
प्रकाशः क्रियतेऽस्माभिरनुद्य देशभाषया ॥
संशोधनं कृतं यत्नैहिंन्दी भाषानुवादिना ।
अस्मत्सहायकेनैव श्रीदुर्गाधरशर्मणा ॥
लिखिता भूमिकाप्येका न्यायशास्त्रविदाऽसुना ।
वैशेषिकपदार्थानां सम्यग् बोधो यथा भवेत् ॥
मालायाः सुमनश्चाद्यं सौमनश्यं प्रसारयेत् ।
प्रार्थना काशिकापूर्या क्षेत्रेशचन्द्रशर्मणः ॥
शास्त्रज्ञ पण्डितों के अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त अथवा हिन्दी भाषा के वेत्ता साधारण बुद्धिमान् जनता में अवा विद्वानों में प्राचीन भारतीय दर्शनों के प्रति विशेष रुचि आजकल पाई जाती है । परन्तु संस्कृत भाषा में पूर्ण ज्ञान न होने के कारण वे मूल ग्रन्थों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं । इस त्रुटि की पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि हमारे मुख्य मुख्य दार्शनिक तथा अन्य शास्त्रों के ग्रन्थों का प्रामाणिक अनुवाद के साथ प्रकाशन हो , जैसे ग्रीक तथा लातिन भाषा की लोएब क्लैसिकल लाइब्रेरी ( LOEB_CLASSICAL LIBRARY ) में हुआ है । काशी से प्रकाशित ' अच्युतप्रन्थमाला ' ने अंशतः यह कार्य किया है । परन्तु इस ग्रन्थमाला में कुछ ही शास्त्रों का समावेश हुआ । यह ग्रन्थमाला भी इधर बन्द हो गई ।
सन् १ ९ ५८ में काशी राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के " वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय " में परिणत होने पर अनुसंधान संचालक के पद पर जब मेरी नियुक्ति हुई , मैंने प्रथम उपकुलपति श्री आदित्यनाथ झा जी से प्रार्थना की कि ऐसी एक ग्रन्थमाला हम भी प्रकाशित करें और उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकृत किया । ग्रन्थमाला का नाम रखा गया ' गङ्गानाथझा ग्रन्थमाला ' । इस नामकरण के दो कारण थे - ( १ ) हमारे दिवङ्गत गुरु विद्यासागर महामहोपाध्याय डा ० श्री गङ्गानाथ झा जी ने बहुत संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद किया था और ( २ ) गुरुजी के अनुवादों के कारण हमारे देश में और विदेशों में भारतीय दर्शन का ज्ञान पर्याप्त मात्रा में फैला ।
( ख )
इस ग्रन्थमाला का प्रथम पुष्प है श्रीधरकृत " न्यायकन्दली " टीका सहित प्रशस्तपादाचार्य कृत ' पदार्थधर्मसंग्रह ' नाम का वैशेषिक भाष्य । इन पुस्तकों का संशोधन और अनुवाद विश्वविद्यालय के अनुसंधान सहायक न्यायाचार्य श्री दुर्गावर झा ने किया है । “ पदार्थधर्मसंग्रह " वैशेषिक शास्त्र में एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है , कणाद कृत वैशेषिक सूत्रों की क्रमिक व्याख्या नहीं । यह ग्रन्थ इतना प्रामाणिक समझा गया कि इसके आगे सूत्र का प्रचार कम हो गया । पदार्थधर्मसंग्रह के ऊपर विद्वानों ने टीकायें लिखीं । ऐसी तीन टीकायें बहुत प्रसिद्ध हैं - श्रीधरकृत ' न्यायकन्दली ' . उदयनकृत ' किरणावली ' और व्योमशिवाचार्यकृत ' व्योमवती ' । इनमें ' न्यायकन्दली ' , ग्रन्थ लगाने की दृष्टि से सर्वोत्तम है | इस कारण से इस टीका का और उसके अनुवाद का यहाँ समावेश किया गया है ।
आगे इस ग्रन्थमाला में उदयन कृत ' न्यायकुसुमाञ्जलि ' ( गद्य और पद्य ) और अन्य ग्रन्थों का प्रकाशन होगा । दर्शन शास्त्र के अतिरिक्त अन्य शास्त्रों के भी ग्रन्थ प्रकाशित किये जायेंगे । १४-१२-१६६३ क्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय
भूमिका
न्यायकन्दली सहित प्रशस्तपादभाष्य को हिन्दी अनुवाद तथा टिप्पणियों के साथ पण्डितों के समक्ष उपस्थित करते हुए मुझे विशेष हर्ष हो रहा है । हर्ष दो कारणों से है ( १ ) वर्तमानकाल में दुर्लभ इस टीका के साथ प्रशस्तपादभाष्य की पुस्तक मूल संस्कृत पुस्तकों के चाहनेवालों के लिए सुलभ हो जायगी । ( २ ) एवं प्रशस्तपादभाष्य और न्यायकन्दली का अर्थ हिन्दी संसार के सामने स्पष्ट हो जायगा ।
पुस्तकका सम्पादक हो या अनुवादक , सब के लिए यह अलिखित कर्त्तव्य निर्दिष्ट सा हो गया है कि पुस्तक के साथ वह कोई भूमिका अवश्य लिखे । तदनुसार मैं भी एक भूमिका लिख रहा हूँ ।
शास्त्रों से ज्ञान - लाभ करने के लिए पद और पदार्थों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है । इनमें पद- ज्ञान के लिए जिस प्रकार व्याकरणशास्त्र का शरण लेना अनिवार्य है , उसी प्रकार पदार्थज्ञान के लिए कणादनिर्मित इस दर्शन की भी आवश्यकता है । वैशेषिक दर्शन की इस आवश्यकता को " काणादं पाणिनीयञ्च सर्वशास्त्रोपकारकम् " इत्यादि उक्तियाँ भी समर्थन करती हैं । अत एव वैशेषिक दर्शन की उपादेयता में तो कोई सन्देह ही नहीं है |
वैशेषिकदर्शन और इसके सूत्र
इस के तीन नाम अधिक प्रसिद्ध हैं - ( १ ) वैशेषिकदर्शन , ( २ ) औलूक्यदर्शन और ( ३ ) काणाददर्शन |
इन में ' वैशेषिक ' नाम के प्रसङ्ग में ६ प्रकार की युक्तियाँ प्रचलित हैं - ( १ ) ' अन्यत्र अन्त्येभ्यो विशेषेभ्य : ' ( १-२-६ ) इस सूत्र के अनुसार ' अन्त्य ' विशेष पदार्थ के साथ सम्बद्ध जो ' दर्शन ' वही ' वैशेषिकदर्शन ' है , क्योंकि दूसरे किसी भी दर्शन में इस प्रकार का विशेष ' पदार्थ स्वीकृत नहीं है । अतः ' विशेष ' रूप स्वतन्त्र पदार्थ के निरूपण के द्वारा यह अन्य दर्शनों से अलग समझा जा सकता है । अतः दूसरे दर्शनों से इसको अलग समझानेवाली यह ' वैशेषिकदर्शन ' संज्ञा है ।
( २ ) न्यायदर्शन में दुःखों की पूर्ण निवृत्ति को ' मोक्ष ' कहा गया है । इस दर्शन में आत्मा के सभी विशेष गुणों के पूर्ण विनाश को ' अपवर्ग ' माना गया है । अतः सभी दर्शनों के द्वारा समान प्रतिपाद्य मोक्ष के प्रसङ्ग में यह ' विशेषगुण ' को अवलम्बन कर उस के मूलतः उच्छेद को ' मुक्ति ' माना है , अतः ' विशेष एवं वैशेषिकः ' इस स्वार्थिक प्रत्यय के द्वारा निष्पन्न ' वैशेषिक ' शब्द के द्वारा मोक्ष के प्रसङ्ग में इस का उक्त असाधारण्य ही प्रतिपादित होता है , अतः इस का नाम ' वैशेषिकदर्शन ' है । फलतः ' विशेष ' से , अर्थात् विशेषगुण ' से मोक्ष के प्रसङ्ग में जो शास्त्र सम्बद्ध हो वही ' वैशेषिक ' दर्शन है |
( ३ ) ' विगतः शेषो यस्य तत् विशेषम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार निर्विशेष ही प्रकृत ' विशेष ' शब्द का अर्थ है । विशेष एव वैशेषिकम् ' इस प्रकार स्वार्थिक प्रत्यय करके यह ' वैशेषिक ' शब्द निष्पन्न है । अर्थात् नैयायिकादि पदार्थों की षोडशादि संख्याओं को स्वीकार कर प्रमाणादि जिन पदार्थों को स्वीकार किया है , वे सभी वैशेषिकों से स्वीकृत सात पदार्थों में ही ' निरवशेष ' होकर अन्तर्भूत हो जाते हैं । कोई भी अन्तर्भूत होने से अवशिष्ट नहीं रहते , अतः इस दर्शन का नाम ' वैशेषिक दर्शन ' है ।
( ४ ) ' विशेषणं विशेष : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार लक्षणपरीक्षादि के क्रम से पदार्थों का प्रतिपादन ही प्रकृत में ' विशेष ' शब्द का अभिप्रेत अर्थ है । उक्त प्रतिपादन रूप कार्य जिस शास्त्र के द्वारा हो वही ' वैशेषिकदर्शन ' है । इस प्रकार से व्याख्या करनेवालों का अभिप्राय है कि सांख्य , वेदान्तादि दर्शनों में मोक्ष के लिये साक्षात् उपयोगी आत्मा एवं अन्तःकरणादि पदार्थ और सृष्टितत्त्व प्रभृति ही विशेष रूप से विवेचित हुए हैं । इससे जगत् के और पदार्थों के तत्त्व यथावत् परिस्फुट नहीं होते । आत्मतत्त्व को समझने के लिये भी आत्मा के सजातीय और विजातीय दोनों प्रकार के पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है । अतः आत्मा और उन के सजातीय और विजातीय सभी पदार्थों की ओर ' विशेष ' रूप से मुमुक्षुओं की दृष्टि आकृष्ट करने के कारण ही इस दर्शन का नाम वैशेषिकदर्शन ' है ।
( ५ ) प्रकृत ' विशेष ' शब्द के ' भेद ' और विशेष गुण ' दोनों ही अर्थ हैं । इन दोनों अर्थों के साथ सम्बद्ध जो दर्शन वही ' वैशेषिकदर्शन ' है । वेदान्तदर्शन के अनुसार आत्मा में भेद और विशेष गुण ये दोनों ही नहीं हैं । इस दर्शन में आत्माओं में परस्पर भेद और ज्ञान , इच्छा प्रभृति विशेष गुण दोनों ही स्वीकृत हैं । सांख्यदर्शन में आत्माओं में परस्पर भेद यद्यपि स्वीकृत है , फिर भी वे आत्मा में विशेष गुण की सत्ता नहीं मानते । तस्मात् आत्मा में उक्त भेद और विशेष गुण इन दोनों ' विशेषों ' का प्रतिपादन करते हुए महर्षि कणाद ने इस नाम के द्वारा यह सूचित किया है कि वेदान्त और सांख्यदर्शन से यह दर्शन गतार्थ नहीं है । "
( ६ ) ' विशेष ' शब्द का प्रयोग परमाणु अर्थ में भी होता है , तदनुसार परमाणु की सत्ता और तन्मूलक सृष्टि जिस दर्शन में स्वीकृत हो वही ' वैशेषिकदर्शन ' है । कुछ विद्वानों की ऐसी भी सम्मति है ।
औलूक्यदर्शन
महर्षि कणाद किसी उलूक नाम के महर्षि के वंश में थे , अतः उनका ' औलूक्य ' नाम भी था । इसी कारण कणाद - निर्मित दर्शन को ' औलूक्यदर्शन ' भी कहते हैं |
काणाददर्शन
महर्षि कणाद के द्वारा रचित होने के कारण इसे काणाददर्शन भी कहते हैं ।
१. टिप्पणी -- ये पाँच व्युत्पत्तियां म ० म ० विद्वद्वर श्रीयुत कालीपदतर्फाचार्य महोदय के द्वारा सम्पादित सूक्ति और उनकी टीका के साथ संस्कृतसाहित्यपरिषद् से प्रकाशित ' प्रशस्तपादभाष्य ' की भूमिका से ली गयी हैं । अतः उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूँ ।
वैशेषिकसूत्र और उसकी टीकाओं की परम्परा
वैशेषिकसूत्र के ऊपर प्रशस्तपादकृत भाष्य से पहिले की टीकाउपलब्ध नहीं हैं । रावणकृत भाष्य एवं भारद्वाजकृत वृत्ति की बातें सुनने में आती हैं , किन्तु वे अपने स्वरूप में उपलब्ध नहीं हैं । ग्रन्थान्तरों में उनकी चर्चा अवश्य मिलती है । प्रशस्तपादकृतभाष्य के द्वारा सभी सूत्रों के अर्थ प्रकाशित नहीं होते । अतः शङ्कर मिश्रकृत ' उपस्कार ' टीका के द्वारा ही इतने दिनों तक सूत्रों के प्रसङ्ग में जो कुछ भी कहा जाता रहा है ।
इधर दरभङ्गा विद्यापीठ से अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य विद्वान् की टीका प्रकाशित हुई है । उस ग्रन्थ के सम्पादक उसे उपस्कार से प्राचीन और किरणावली से अर्वाचीन मानते हैं । गायकवाड़ औरियण्टल सिरीज से अभी चन्द्रानन्द नाम के किसी विद्वान् की एक वृत्ति निकली है । पं ० श्रीजयनारायण भट्टाचार्य और पं ० श्रीचन्द्रकान्त तर्कालङ्कार की टीकायें प्राय : इसी शताब्दी की हैं । सूत्र की संख्याओं के सम्बन्ध में प्रथमोक्त तीन टीकाओं में काफी अन्तर है ।
शेष दोनों अर्वाचीन टीकायें इस के सम्बन्ध में श्री शङ्कर मिश्र के अनुयायी हैं । उपस्कार के अनुसार सूत्र की संख्या है ३७० और मिथिला विद्यापीठवाली पुस्तक के अनुसार ६ अ ० के पहिले आह्निक तक सूत्रों की संख्या ही ३२४ है । इस पुस्तक में आगे का अंश नहीं है , क्योंकि टीका उतनी ही उपलब्ध थी । अगर इसके आगे के उपस्कारानुयायी सूत्रों को जोड़ देते हैं तो उनकी संख्या ३५३ तक ही पहुँचती है । इस प्रकार सूत्रों के सम्बन्ध में मतान्तर चले आ रहे हैं ।
स्थिति यह मालूम होती है कि प्रशस्तपाद को भाष्यरचना के बाद उसके सौष्ठव के कारण सूत्र की तरफ से सबका ध्यान ही हट गया और वैशेषिकदर्शन के सम्बन्ध में जितने भी कुछ विचार हुए या ग्रन्थ रचनायें हुईं सभी प्रशस्तपादभाष्य की आधार मानकर ही होने लगीं । मिथिला विद्यापीठ से और बड़ौदा से प्रकाशित पूर्वोक्त वैशेषिकसूत्र की दोनों पुस्तकों के छपने के बाद एक बात और सामने आयी है । उन दोनों ही पुस्तकों में " धर्मविशेषप्रसूतात् " ( १-१-३ ) इत्यादि उपक्रम सूत्र नहीं है ।
किन्तु धर्मनिरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षण लिखने के बाद हठात् ' पृथिव्यापस्तेजो वायुः ' ( १-१-५ ) इस सूत्र के द्वारा पदार्थों के विभाग से जो असङ्गति की आपत्ति आती है , उसको उन दोनों टीकाकारों ने अपनी अपनी टीका में जिस युक्ति से समर्थन किया है , वह युक्ति ' धर्मविशेषप्रसूतात् ' इत्यादि सूत्र के द्वारा कही हुई युक्तियों से अधिक भिन्न नहीं है ।
इस प्रसङ्ग में दो ही बातें संभव जान पड़ती हैं -- ( १ ) जिन लोगों ने " धर्मविशेषप्रसूतात् ' इत्यादि को सूत्र नहीं माना है , उन लोगों के हाथ में जो सूत्रावली आई उसके मूल लेखक से प्रमादवश उक्त सूत्र छूट गया हो और उस के बाद से उसी सूत्रावली का प्रचार उस क्षेत्र में हो गया हो ।
अथवा ( २ ) धर्मव्याख्या की प्रतिज्ञा और लक्षण कहने के बाद हठात् पदार्थ निरूपण करने से जो असंगति आती है , उसकी पूर्ति किसी विद्वान् ने अपनी सूत्रपाठ की पुस्तक में " घर्मविशेषप्रसूताद् ' इत्यादि शब्दों के द्वारा टिप्पणी रूप में कर दो हो । आगे उस पुस्तक के आधार पर लिखनेवाले किसी दूसरे लेखक ने भ्रमवश उस टिप्पणी को सूत्र समझ कर पृथक् सूत्र के रूप में लिख दिया हो ।
भ्रम और प्रमाद इन दोनों की संभावनाओं में से प्रकृत में किस संभावना की कल्पना में लाघव और स्वारस्य है , इसे पण्डितगण विचार कर देखें ।
वैशेषिकदर्शन और ईश्वर
सभी जानते हैं कि न्याय और वैशेषिकदर्शन के आचार्यों ने ईश्वर साधन के प्रसङ्ग में बहुत कुछ लिखा है । किन्तु वैशेषिक दर्शन के कणादरचित सूत्र में ईश्वर शब्द का स्पष्ट उल्लेख न रहने के कारण एवं सष्ट रूप से ईश्वर - साधन का कोई प्रकरण न रहने के कारण कुछ विद्वानों का कहना है कि कणाद के समय से लेकर प्रशस्तपाद से पहिले तक वैशेषिकदर्शन में ईश्वर स्वीकृत नहीं थे । अतः मूलतः यह दर्शन ईश्वर नहीं है ।
वैशेषिक दर्शन को ईश्वर - परक माननेवालों की दृष्टि इस प्रसङ्ग में कुछ भिन्न प्रकार की है । उनका कहना है कि किसी वस्तु का स्पष्ट उल्लेख न करना ही उस वस्तु के अभाव का साधक नहीं हो सकता , किसी वस्तु को अस्वीकृत करना है तो फिर उन के लिए उस प्रसङ्ग में केवल मौन साधन से ही काम नहीं चल सकता । उसके लिए उक्त वस्तु की सत्ता के विरुद्ध युक्तियों का स्पष्ट रूप से निर्देश आवश्यक है | क्योंकि किसी वस्तु की अनुक्ति ही उसकी विरुद्धोक्ति नहीं हो सकतो । अनुक्ति और विरुद्धोंक्ति में बहुत अन्तर है ।
अतः प्रशस्तपाद प्रभृति आचायों ने एवं उनके अनुयायी उदयनादि आचायों ने ईश्वर साधन के प्रसङ्ग में अपनी चरम प्रतिभा का परिचय दिया है । एवं इस दर्शन में ईश्वर को सिद्ध मानकर उपपादन किया है । शङ्करमिश्र प्रभृत्ति सूत्र के टीकाकारों ने सूत्र के द्वारा ही ईश्वरसिद्धि का भी प्रयास किया है । उन लोगों का कहना है कि किसी विषय का सष्ट उल्लेख न होने पर भी उसके अन्य उपपादनों से विषय में उस विषय में उस व्यक्ति की अनुमति का पता चल जाता है । जैसे व्याकरणशास्त्र में योगविभागादि के द्वारा सूत्र में अनुद्दिष्ट विधानों का भी आपेक्ष होता है । इसी प्रकार प्रकृत में ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ' ( १-१-३ ) संज्ञाकर्मत्वस्मद्विशिष्टानां लिङ्गम् ( २-१-१८ ) प्रत्यक्षप्रवृत्तत्वात्संज्ञाकर्मणः ( २-१-१६ ) इत्यादि सूत्रों के द्वारा आनुषङ्गिक रूप में ईश्वरसिद्धि का प्रयास शङ्कर मिश्रादि टीकाकारों के द्वारा किया गया है ।
धर्म और वैशेषिकदर्शन
वैशेषिकदर्शन का आरम्भ ' धर्मव्याख्या ' की प्रतिज्ञा से हुआ है । उसके दूसरे सूत्र के द्वारा अवसर प्राप्त धर्म का लक्षण कहा गया है । और तीसरे सूत्र के द्वारा धर्म के कारणीभूत यागादि के प्रतिपादक वेदों में प्रामाण्य का प्रतिपादन हुआ है । ' धर्मविशेषप्रसूतात् ' इत्यादि चौथे सूत्र के द्वारा यह उपपादन किया गया है कि द्रव्यादि छः पदार्थों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य सहित तत्त्वज्ञान के द्वारा ही निःश्रेयस का लाभ होता है । उक्त तत्त्वज्ञान निवृत्तिलक्षण विशेष प्रकार के धर्म से उत्पन्न होता है । फलतः निःश्रयेस के लिये धर्म अत्यन्त आवश्यक है , अतः उसका निरूपण भी आवश्यक है , जिसके लिए इस शास्त्र का आरम्भ उचित है । फिर इसके बाद धर्म के सम्बन्ध में विशेष चर्चा नहीं दीख पड़ती है । क्कम के अनुसार और पदार्थों की तरह धर्म का भी निरूपण किया गया है । पदार्थों के निरूपण से ग्रन्थ की समाप्ति हो जाती है ।
इस प्रसङ्ग में कुछ लोगों का आक्षेप है कि धर्म निरूपण के लिए प्रवृत्त शास्त्र में धर्म की इतनी सी चर्चा हो और उससे असम्बद्ध द्रव्यादि पदार्थों का इतना विस्तृत वर्णन हो यह कुछ ठीक नहीं जनता इसी आक्षेप की प्रतिध्वनि ' धर्म ' व्याख्यातुकामस्य षट्पद थपवर्णनम् । सागरं गन्तुकामस्य हिमवद्गमनोपमम् ' इत्यादि वचनों से होती है ।
इस प्रसङ्ग में वैशेषिक सिद्धान्त के अनुयायियों का यह कहना है कि इस शास्त्र में जिस धर्म की व्याख्या की प्रतिशा की गयी है वह पूर्वमीमांसा के प्रतिज्ञासूत्र में कथित ' धर्म ' से भिन्न है । मीमांसको ने धर्म शब्द से यागादि क्रियायों को लिया है । ये क्रियायें केवल वेदों के द्वारा ही प्रमित हो सकती हैं । फलतः केवल वेद ही धर्मरूप क्रिया कलाप के ज्ञापक हेतु है , किन्तु इन क्षणिक क्रियाकलापों को स्वर्गादि कालपर्यन्त रहने की सम्भावना नहीं है , अतः मध्य ती एक अतीन्द्रिय अपूर्व की कल्पना मीमांसक भी करते हैं । वैशेषिक गण इस अपूर्व को ही धर्म करते हैं । यह ' धर्म ' केवल अनुमानं से ही समझा जा सकता है । अतः जिस प्रकार मीमांसकों ने यागादि कर्मकलाप रूप धर्म के शापक प्रमाण रूप वेदों के अर्थ के निर्णय में ही अपना सारा श्रम व्यय किया है , उसी प्रकार अगर वैशेषिकगण आत्मनिष्ठ उक्त अपूर्व रूप गुण के एकमात्र साधक अनुमान और आवश्यक पदार्थ निरूपण के प्रसङ्ग में अधिक जागरूक हों तो उनके ऊपर प्रतिज्ञात अर्थ से असम्बद्ध अर्थ के अभिधान का दोष नहीं मढ़ा जा सकता ।
दूसरी बात यह है कि अगर वैशेषिक दर्शन के उपक्रमस्थ धर्म शब्द से भी गादि क्रियाकलापों को ही लें , तथापि द्रव्यादि के निरूपण को यागादि से सर्वथा असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । हेतु दो प्रकार के होते हैं एक ज्ञापक और दूसरा उत्पादक । दण्ड घट का उत्पादक कारण है और धूम वह्नि का शापक कारण है । इसी कारणत्वासाम्य से दोनों प्रकार के हेतु बोधक पदों से हेतु में पञ्चमी विभक्ति होती है । जैसे ' दण्डाद् घटः , धूमाद् वह्निः ' इत्यादि । प्रकृत में विधिवाक्य रूप वेद धर्म के ज्ञापक कारण हैं और द्रव्यादि पदार्थ उनके उत्पादक कारण हैं I क्योंकि ब्रीहि प्रभूति द्रव्य , आरण्यादि गुण , उत्खन अवहननादि कर्म , ब्राह्मणत्वादि सामान्य इन सबों को मीमांसासाशास्त्र में भी यागादि का सम्पादक मान गया है । इसी प्रकार इनके तत्त्वज्ञान में सहायक विशेष और समवाय का तत्वज्ञान भी परम्परया यांग में उपकारक है फिर धर्म व्याख्या के प्रसङ्ग में द्रव्यादि पदार्थों के निरूपण करनेवालों को सागर जाने की इच्छा से हिमालय जानेवालों की उपमा देना कहां तक उचित है ?
इस दर्शन के ऊपर सबसे अधिक प्रहार हुये हैं और हो रहे हैं , अपने थूथ दार्शनिकों द्वारा और त्रयीबाह्य बौद्धादि के द्वारा भी । किन्तु इन सभी विरोधियों ने इस शास्त्र के प्रसङ्ग में आचार्य महर्षि प्रशस्तपाद को ही सत्र से प्रामाणिक व्याख्याता रूप में मानते चले आ रहे हैं । अतः प्रशस्तपादभाष्य का महत्त्व तो निर्विवाद है । तब रही बात यह भाष्य है ? या स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ है ?
इस प्रसङ्ग में ' सूत्रार्थों वर्ण्यते येन ' भाष्य का यह लक्षण पूर्व रूप से संघटित न होने के कारण ही विवाद उपस्थित होता है | किन्तु यह भी ध्यान देने की बात है इस दर्शन में या और दर्शनों मैं भी स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थों की कमी नहीं है । उन सभी के ऊपर दृष्टिपात करने पर प्रशस्तपाद भाष्य को स्वतन्त्र निबन्ध मानने में भी कुछ कठिनाई होती है ।
क्योंकि इस ग्रन्थ में जिस प्रकार अपने सभी मन्तव्यों को प्रतिपद सूत्र के द्वारा प्रतिपन्न करने की चेष्टा की गई है , वैसी चेष्टा और स्वतन्त्र निवन्धग्रन्थों में नहीं देखी जाती । अतः इसे भाष्य न मानने वालों को भी इसे और स्वतन्त्र निबन्धग्रन्थों से भिन्न प्रकार का मानना ही होगा । अतः हम यथास्थितिपालकों का कहना है कि यह वैशेषिकसूत्रों का भाष्य ही है । ' भाष्य के सभी लक्षण इसमें पूर्णरूप से संघटित नहीं होते ' यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है ।
क्योंकि पदों के जितने भी अर्थ होते हैं , वे सभी अविकल रूप से सभी अभिधेयों में नहीं घटते । यह बात भाष्य पद से निर्विवाद रूप से समझे जाने वाले ग्रन्थों में भी देखी जा सकती है कि सभी भाष्य कहाने वालों ग्रन्थों में उक्त सूत्रानुवर्तिता समान नहीं है , थोड़ा बहुत अन्तर है हो । तस्मात् यह ग्रन्थ भाष्य के पूर्ण लक्षण से युक्त न होने पर भी भाष्य ही है , प्रामाणिकता में तो किसी भाष्य ग्रन्थ से न्यून है ही नहीं ।
इसके बाद तो फिर वैशेषिक दर्शन के प्रसङ्ग में जो कुछ भी टीकादि ग्रन्थों का निर्माण हुआ , सब इसी ग्रन्थ को आधार मानकर हुआ । जिनमें ( १ ) मिथिला के श्री उदयनाचार्य की किरणावली ( २ ) वङ्गकुलालङ्कार श्री श्रीधरभट्ट की न्यायकन्दली और ( ३ ) विद्वत्कुलालङ्करण श्री व्योमशिवाचार्य की व्योमवती ये तीन प्राचीन टीकार्ये अधिक प्रसिद्ध हुईं । इनमें भी किरणावली टीका सम्पूर्ण न होने पर भी सबसे अधिक मान्य हुई और इसकी टीका और उपटीकाओं की एक लम्बी परम्परा बन गयी । न्यायकन्दली पर भी टीका की रचनायें हुई , किन्तु वे उतनी प्रसिद्धि न पा सक गुजरात प्रान्त में इसका प्रचलन अधिक सुना जाता है । न्यायकन्दलीटीका की सबसे खूबी यह है कि वह सम्पूर्ण प्रशस्तपाद भाष्य के ऊपर है , और मूल ग्रन्थप्राय के प्रत्येक पद को सादे शब्दों में समझाने में अधिक तत्पर है । व्योमवती टीका प्रायः दक्षिण में अधिक प्रचलित है । इन तीनों से भिन्न पद्मनाभमिश्रकृत सेतु और जगदीश तर्कालङ्कार की सूक्ति टीका भी है , किन्तु दोनों ही असम्पूर्ण हैं |
वैशेषिकदर्शन के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण
वैशेषिकदर्शन का आरम्भ ' धर्म ' व्याख्या की प्रतिज्ञां से हुआ है । सभी प्रकार के ऐहिक और पारलौकिक इष्टों और मोक्ष के साधन को ही इस दर्शन में धर्म कहते हैं । यह धर्म ( १ ) प्रवृत्तिलक्षण और ( २ ) निवृत्तिलक्षण भेद से दो प्रकार का है । प्रवृत्तिलक्षण धर्म से ऐहिक तथा पारलौकिक स्वर्गादि सुखों की प्राप्ति होती है ।
एवं निवृत्तिलक्षण रूप ' विशेष ' धर्म के द्वारा ( १ ) द्रव्य , ( २ ) गुण , ( ३ ) कर्म , ( ४ ) सामान्य ( ५ ) विशेष ( ६ ) समवाय और ( ७ ) अभाव इन सात पदार्थों का साधर्म्य और वैधर्म्य रूप से तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है , उसी से मुक्ति होती है । अर्थात् निवृत्तिलक्षण धर्म के द्वारा मुक्ति के सम्पादन में द्रव्यादि पदार्थों का और उनके परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य का ज्ञान मध्यवर्ती व्यापार हैं ।
यद्यपि ' आत्मा वारे श्रोतव्यः , तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति ' इत्यादि श्रुतियों के द्वारा आत्मतत्त्व ज्ञान को ही मोक्ष का कारण माना गया है , किन्तु आत्मा को अच्छी तरह समझने के लिये भी संसार के और सभी पदार्थों को समझना आवश्यक है । अपने सहधर्मियों से और विरुद्वधर्मियों से विविक्त होकर किसी व्यक्ति को समझे बिना उसका तत्त्व समझना सम्भव नहीं है । संसार की प्रत्येक वस्तु अन्य सभी वस्तुओं के साथ किसी न किसी प्रकार सादृश्य या वैसादृश्य सेयुक्त हैं , अतः परस्पर सम्बद्ध है ।
अतः एक वस्तु को समझने के लिये और सभी वस्तुओं को भी समझना आवश्यक है । सुतराम् आत्मा को समझने के लिये भी संसार के अन्य सभी वस्तुओं को समझना आवश्यक है । किन्तु संसार के असंख्य वस्तुओं को अलग अलग प्रत्येकशः समझना साधारणजनों के लिये सम्भव नहीं है । अतः महर्षि कणाद ने समझने की सुविधा के लिये जगत् को द्रव्यादि सात भागों में विभक्त किया है । फलतः इनके मत से संसार की सभी वस्तुयै द्रव्यादि खात पदार्थों में से ही कोई हो सकती हैं ।
द्रव्य
द्रव्य उसे कहते हैं जिसमें गुण हो या क्रिया हो । इसका यह अर्थ नहीं कि सभी द्रव्यों में सभी अवस्थाओं में गुण या कर्म रहते ही हैं , क्योंकि उत्पत्ति समय उत्पत्तिशील पृथिव्यादि द्रव्यों में भी गुण या कर्म नहीं रहते । गुण और कर्म का समवायिकारण आश्रयीभूत द्रव्य ही हैं जो अपनी उत्पत्ति से पहिले नहीं रह सकता । अतः उत्पत्ति के समय द्रव्य बिना गुण या बिना कर्म के ही रहते हैं । उत्पत्ति के बाद उनमें गुण या क्रिया की उत्पत्ति होती है । आकाशादि विभुद्रव्यों में तो क्रियायें कभी रहती ही नहीं | अतः ' गुण या क्रिया से युक्त जो पदार्थ वही द्रव्य है ' इस लक्षण का * अर्थ इतना ही है कि गुण और कर्म द्रव्यों में ही रहते हैं , द्रव्य से भिन्न गुणादि में नहीं ।
वस्तुतः ' द्रव्यत्व ' जाति ही द्रव्य का लक्षण है । यह द्रव्यत्व जाति कहाँ रहती है ? इस को समझाने के लिए ही कर्म का विशेषतः गुण का सहारा लिया जाता है । विभिन्न व्यक्तियों को किसी एक रूप से समझने के लिए उन सभी व्यक्तियों में किसी सादृश्य की आवश्यकता होती है । सभी मनुष्यपरस्पर भिन्न हैं , किन्तु ठीक एक ही आकार के दो मनुष्य नहीं मिल सकते । किन्तु सभी मनुष्यों में कुछ आन्तर और बाह्य सादृश्य भी है , जिनके चलते सभी मनुष्यों में ' यह मनुष्य है ' इस एक तरह का व्यवहार होता है ।
इस प्रकार जिन सभी व्यक्तियों में ' यह द्रव्य है ' इस प्रकार का व्यवहार होता है , उन सभी द्रव्यों में कोई सादृश्य अवश्य ही होना चाहिये , इस सादृश्य के लिये संयोग और विभाग नाम के गुण को आचार्यों ने उपस्थित किया है । संयोग सभी द्रव्यों में समान रूप से रहनेवाला गुण है और विभाग भी अतः सभी द्रव्य संयोग या विभाग के समवायिकारण हैं । संयोग और विभाग का समवायिकारण होना या समवायिकारणत्व नाम का धर्म ही द्रव्यत्वजाति का ज्ञापक है ।
संयोग और विभाग का यह समवायिकारणत्व गुणादि पदार्थों में नहीं है , अतः गुणादि पदार्थ संयोग और विभाग के समवायिकारण नहीं है , अतः उनमें द्रव्यत्व नहीं है । इसी प्रकार गुणत्वादि सभी पदार्थविभाजकथमों में समझना चाहिए ।
पृथिवी , जल , तेज , वायु , आकाश , काल , दिक , आत्मा और मन ये द्रव्य के नौ सकता प्रकार ( द ) हैं । इन सभी द्रव्यों को नित्य और अनित्य भेद से दो भागों में बाँटा जा है । पृथिवी , जल , तेज , वायु इन चार द्रव्यों के परमाणु और आकाश , काल , दिक् , द्रव्य आत्मा के और मन ये सभी द्रव्य नित्य हैं । एवं कथित परमाणुओं से भिन्न पृथिव्यादि चारों सभी प्रभेद उत्पत्तिशील होने के कारण अनित्य हैं । अनित्य द्रव्यों में से पृथिव्यादि तीन द्रव्यों को शरीर , इन्द्रिय और विषय इन तीन भागों में विभक्त किय गया है । किन्तु वायु का इन तीनों से भिन्न ' प्राण ' नाम का एक चौथा भेद भी है ।
आत्मा विभु है , अतः सभी मूर्त्त द्रव्यों के साथ उसका संयोग है , किन्तु सुख दुःखों का अनुभव , अर्थात् भोग वह शरीर में ही करता है अतः शरीर के साथ उसका और मूर्त्त द्रव्यों से विलक्षण प्रकार का अवच्छेदकत्व नाम का सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध के ही कारण शरीर को आत्मा के भोग करने का ' आयतन ' कहा जाता है । फलतः आत्मा के भोग का आयतन ही ' शरीर ' है । यह शरीर भी पार्थिव , जलीय , तैजस और वायवीय भेद से चार प्रकार का है ।
इनमें मानव शरीर पार्थिव है , क्योंकि इस शरीर का उपादान पृथिवी रूप द्रव्य ही है । यद्यपि जलादि और द्रव्यों का भी सम्बन्ध इसमें प्रतीत होता है , फिर भी वे इसके उपादान या समवायिकारण नहीं है , निमित्तकारण हैं । पृथिवी से लेकर आकाशपर्यन्त सभी भूतद्रव्य शरीर के बनने में हेतु हैं , अतः यह शरीर पाञ्चभौतिक भी कहलाता है । अस्मदादि के शरीर का उपादान कारण या समवायिकारण पृथिवी रूप द्रव्य ही है , अतः उसे पार्थिव कहा जाता है । वैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार शरीर का समवायिकारण पृथिवी , जल ।
, अतः तेज , वायु इन चारों में से कोई एक ही है , शेष चार उसके निमित्तकारण हैं के ( १ ) पृथिवी रूप उपादान से उत्पन्न हम लोगों का शरीर पार्थिव है । पार्थिव शरीर योनिज ओर ( २ ) अयोनिज दो भेद हैं । योनिज शरीर के भी दो भेद हैं ( १ ) के जरायुज शरीर और ( २ ) अण्डज । जरायुज मानुषादि के शरीर हैं , और पशुपक्षी आदि कृमि प्रभृति और उद्भिज्ज हैं वृक्षादि । नारकीय शरीर भी अयोनिज ही है । है , जो अण्डज हैं । स्वेदज और उद्भिज्जादि के शरीर अयोनिज हैं ।
जल स्वेदज रूप हैं समवायिकारण और शेष चार भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से उत्पन्न शरीर जलीय शरीर निमित्त' वरुणलोक ' में प्रसिद्ध है । तेज रूप समवायिकारण और शेष चार भूत द्रव्य रूप है | कारणों से उत्पन्न शरीर ' तैजस शरीर ' कहलाता है , जो ' सूर्यलोक ' में प्रसिद्ध शरीर का वायु रूप समवायिकारण और शेष चारों भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से जिस शरीर है । निर्माण होता है , वह वायवीय शरीर कहलाता है । पिशाचादि का शरीर वायवीय प्रभृति शरीर के अवयव मात्र हैं , इन्द्रिय नहीं ।
इनमें श्रोत्र आकाश रूप है , अतः नित्य तेज घ्राण , रसना , चक्षुः , त्वचा , श्रोत्र और मन ये छः इन्द्रियाँ हैं । हाथ , पैर है । और मन परमाणु रूप है , अतः नित्य है । चक्षुरादि शेष चार इन्द्रियाँ क्रमशः पृथिवी जलीय , जल है , , चक्षु और वायु रूप द्रव्य से उत्पन्न होती हैं । इनमें घ्राण पार्थिव है , रसना है , चक्षु तेज तेजस है और त्वचा वायवीय है । फलतः घ्राण पृथिवी है , रसना जल है और त्वचा वायु है ।
इस प्रकार घ्राण प्रभृति चार इन्द्रियाँ पृथिवी प्रभृति चार भूतों से उत्पन्न होने के कारण ' भौतिक ' हैं । श्रवणेन्द्रिय आकाश रूप है आकाश से उत्पन्न नहीं , क्योंकि आकाश नित्य है । नित्य द्रव्य किसी द्रव्य का समवायिकारण नहीं हो सकता , अतः ' श्रवणेन्द्रिय ' स्वयं भूत - द्रव्य होने के कारण ही ' भौतिक ' कहलाता है । मन भौतिक नहीं है ।
मिट्टी प्रभृति ' विषय ' रूप पृथिवी हैं , सरिता , समुद्रादि ' विषय ' रूप जल हैं । वह्नि एवं सुवर्णादि ' विषय ' रूप तेज हैं । जिससे आँधी प्रभृति होती हैं , वे सभी वायु विषय रूप हैं । शरीरादि तीनों प्रकारों से भिन्न वायु का ' प्राण ' नाम का चौथा प्रकार भी है । शरीर के भीतर चलनेवाली वायु को ' प्राण ' कहते हैं । किन्तु कार्य - भेद से और स्थान- भेद से उसके प्राण , अपान , समान और व्यान ये चार नाम प्रसिद्ध हैं । शाखादि के कम्प से वायु का केवल अनुमान ही होता है , प्रत्यक्ष नहीं । क्योंकि रूपी द्रव्य का ही प्रत्यक्ष होता है । किसी का मत है कि वायु का भी स्पार्शनप्रत्यक्ष होता है । द्रव्य के चाक्षुषप्रत्यक्ष के लिए ही द्रव्य में रूप का रहना आवश्यक है ।
नित्य द्रव्यों में पृथिव्यादि चारों प्रकार के परमाणुओं का उल्लेख कर चुके हैं । वैशेषिकों का कहना है कि घटादि कार्यद्रव्यों का नाश प्रत्यक्षसिद्ध है । विनाश की परम्परा का विश्राम कहीं पर मानना आवश्यक है । ऐसा न मानने पर राई और पर्वत दोनों को एक परिमाण का मानना पड़ेगा । क्योंकि राई का विनाश भी अनन्त खण्डों में होगा और पहाड़ का भी विनाश अनन्त खण्डों में होगा । अतः दोनों अनन्त खण्डों से निर्मित होने के कारण समान परिमाण के होंगे ।
किन्तु यह प्रत्यक्ष विरुद्ध है , अतः विनाश - परम्परा का कहीं विश्राम मानना आवश्यक है । जहाँ पर उसका विश्राम होगा उसको ही ' परमाणु ' कहते हैं । इसे मान लेने पर राई और पर्वत के समान परिमाण का प्रसङ्ग उपस्थित नहीं होता है , क्योंकि दोनों के परमाणुओं में संख्या का तारतम्य ही दोनों के परिमाण में भी न्यूनाधिक का ज्ञापक होगा । परमाणु को नित्य मानना भी आवश्यक है , क्योंकि परमाणुओं को अनित्य मानने पर ऐसे द्रव्य रूप कार्यों को भी मानना पड़ेगा , जिनके अवयव नहीं हैं ।
किन्तु यह प्रत्यक्ष विरुद्ध होने के कारण उचित नहीं है । इस प्रकार दो परमाणुओं से द्वयणुक और तीन द्वणुकों सेव्यसरेणु वा त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है । व्यसरेणु में महत्त्व आ जाता है । फिर आगे की सृष्टि होती है । वैशेषिकमत के अनुसार अवयवों से जिस अवयवी की उत्पत्ति होती है , वह अवयवों से सर्वथा भिन्न वस्तु है , और उत्पत्ति से पूर्व उसकी और किसी रूप में सत्ता नहीं रहती है । इसी को ' असत्कार्यवाद ' या ' आरम्भवाद ' कहते हैं ।
आकाश , काल , दिक् , आत्मा और मन इन पाँच द्रव्यों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । अतः इनके विवरण से पहिले इनकी सत्ता में अनुमान को प्रमाण रूप में उपस्थित करने की आवश्यकता होती है । क्योंकि सभी शब्दप्रमाणों में सबों की आस्था नहीं होती । किसी वस्तु की सत्ता को जहाँ अनुमान के द्वारा स्थापित करना होता है , वहाँ थोड़ा कौशल का अवलम्बन आवश्यक होता है । क्योंकि सीधे विवादास्पद वस्तु को पक्ष बनाकर अनुमान की उपस्थित नहीं किया जा सकता । जैसे कि ' आकाशः अस्ति शब्दाश्र यत्वात् ' यह अनुमान नहीं हो सकता , क्योंकि पक्ष को अपने स्वरूप ( पक्षतावच्छेदक ) से युक्त होकर पहिले से सिद्ध रहना चाहिए । जैसे ' पर्वतो बह्निमान् धूमात् ' इत्यादि स्थलों में पर्वतत्वादि से युक्त पर्वतादि पहिले प्रत्यक्ष के द्वारा सिद्ध रहता है । अतः इस प्रकार के स्थलों में परिशेषानुमान का अवलम्बन करना पड़ता है । I
आकाश नाम के एक स्वतन्त्र द्रव्य के साधक परिशेषानुमानों की परम्परा इस प्रकार है कि चक्षु से न दीखनेवाले , अथ च रखनादि और बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होनेवाले गुण सामान्यगुण नहीं होते , विशेषगुण ही होते हैं - यह बात स्पर्श को दृष्टान्त मानकर अच्छी तरह समझा जा सकता है , क्योंकि स्पर्शगुण का चक्षु से ग्रहण नहीं हो सकता , अथ च वह त्वचा रूप बहिरिन्यि से गृहीत होता है , अतः वह विशेषगुण है |
इसी प्रकार शब्द भी विशेषगुण ही है , क्योंकि उसका ग्रहण चक्षु से नहीं हो सकता , अथ च श्रोत्र रूप बहिरिन्द्रिय से उसका ग्रहण होता है । अतः शब्द विशेषगुण ही है , सामान्य गुण नहीं । यह पहिले सिद्धवत् समझ लेना चाहिए कि दिक ; काल और मन इन तीन द्रव्यों में विशेषगुण नहीं रहते , अतः शब्द कालादि के गुण नहीं हो सकते । आकाश अभी विवादास्पद है । अतः आकाश को न मानने की स्थिति में शब्द अगर विशेष गुण है तो फिर पृथिवी , जल , तेज , वायु और आत्मा इन्हीं में से किसी का वह विशेष गुण होगा ।
इनमें से पृथिवी , जल , तेज और वायु ये चार स्पर्श से युक्त हैं । स्पर्श से युक्त द्रव्यों के जितने प्रत्यक्ष दीखनेवाले विशेष गुण है उनका यह स्वभाव है किया तो वे अग्नि के संयोग से उत्पन्न हों , जैसे कि पके हुए घट का रक्त रूप या फिर कारण के गुण से उत्पन्न हो , जैसे कि पट का रक्त रूप तन्तु के रक्त रूप से उत्पन्न होता है ।
अगर शब्द को स्पर्श से युक्त द्रव्य का विशेषगुण मानेंगे तो फिर शब्द की उत्पत्ति भी अग्नि के संयोग से या उपादान कारणों में रहनेवाले गुणों से ही माननी होगी , किन्तु दोनों में से कोई भी सम्भव नहीं है , क्योकि संयोग और विभाग से शब्द की उत्पत्ति प्रत्यक्ष से सिद्ध है ।
जिस प्रकार सुख रूप विशेष गुण कारणगुणपूर्वक और अग्निसंयोगासमवायिकारणक न होने से स्पर्श से युक्त पृथिव्यादि चार द्रव्यों का विशेष गुण नहीं हो सकता , उसी प्रकार शब्द भी स्पर्श से युक्त पृथिव्यादि चार द्रव्यों का विशेष गुण नहीं हो सकता । क्योंकि आत्मा के विशेष गुण ग्रहीत नहीं होते , शब्द का ग्रहण क्षेत्र रूप बाह्य इन्द्रिय से होता है , अतः वह आत्मा का विशेष गुण नहीं हो सकता ।
तस्मात् पृथिवी , जल , तेज , वायु , काल , दिक , आत्मा और मन इन आठ द्रव्यों से भिन्न कोई द्रव्य मानना होगा , जो शब्द का उपादान या समवायिकरण हो । इसी द्रव्य का नाम ' आकाश ' है । आकाश स्वरूप श्रोत्रेन्द्रिय की चर्चा कर चुके हैं । यह ( श्रोत्रेन्द्रिय ) नित्य , विभु , आकाश स्वरूप के उपाधि होने के के कारण एक ही है । किन्तु प्राणियों के अङ्ग विशेष ( कर्णशष्कुली ) कारण भिन्न- भिन्न हैं ।
अव उनके भेद से श्रोत्रेन्द्रिय परस्पर भिन्न प्रतीत होते हैं और एक के अवणेन्द्रिय से दूसरे की आत्मा में शब्द का प्रत्यक्ष नहीं होता ।
' इदानीं घटः , तदानीं घटः ' इत्यादि प्रतीतियों की उपपत्ति के लिए ' काल ' नाम के एक द्रव्य की सत्ता माननी पड़ती है । क्योंकि ' इदानीम् , तदानीम् ' इत्यादि प्रतीतियों का विषय यद्यपि सूर्य नक्षत्रादि की क्रियायें प्रतीत होती हैं , किन्तु सूर्यादि नक्षत्रों का साक्षात् सम्बन्ध घटादि विषयों के साथ नहीं है , अतः एक काल रूप अतिरिक्त द्रव्य मानकर उसके द्वारा सूर्यादि नक्षत्रों की क्रिया द्वारा उक्त प्रतीतियों की उपपत्ति होती है । अतः काल नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य अवश्य है । उत्पन्न होनेवाले सभी पदार्थों के साथ इसका सम्बन्ध एवं अन्वय है , अतः वह सभी जन्यों का कारण भी है और आश्रय भी । यद्यपि क्षण मूहूर्त्तादि से लेकर मन्वन्तरादि अनेक रूपों में इसका व्यवहार होता है , फिर भी वे विभिन्न प्रतीतियों औपाधिक ही हैं । काल वस्तुतः एक ही है । काल के द्वारा हो नये और पुराने का व्यवहार या ज्येष्ठत्व कनिष्ठत्व का व्यवहार , अर्थात् कालिक परत्व और कालिक अपरत्व का व्यवहार भी होता है ।
पाटलिपुत्र से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है एवं प्रयाग की अपेक्षा पाटलिपुत्र से काशी समीप है -- इस दूरत्व और समीपत्व की प्रतीति के लिए ' दिकू ' नाम का एक द्रव्य माना जाता है । इसी कारण उक्त प्रतीतियाँ होती हैं । यह भी एकही ही है और नित्य भी है । पूर्व , पश्चिम , दक्षिण , उत्तर प्रभृति के जो विभिन्न व्यवहार होते हैं वे सभी उपाधिमूलक हैं । अगर दिशा के प्राच्यादि भेद वास्तविक होते हो तो पूर्व में सदा पूर्वत्व का ही व्यवहार होता और पश्चिम में सदा पश्चिमत्व का ही । किन्तु सो नहीं होता , क्योंकि जिसमें एक की अपेक्षा पूर्वत्व का व्यवहार होता है , उसीमें उस से भी पूर्व में रहनेवाले की अपेक्षा पश्चिमत्व का व्यवहार होता है । इसी प्रकार पश्चिम में भी किसी पश्चिमेतर की अपेक्षा पूर्वत्व का व्यवहार होता है , अतः दिशा के पूर्वपश्चिमादि भेद औषाधिक हैं , वास्तविक नहीं । अतः दिक् भी एक ही है ।
‘ अहं सुखी , अहं दु : खी , अहं जानामि ' इत्यादि प्रत्यक्षात्मक प्रतीति सार्वजनीन हैं । इन प्रत्यक्षों के द्वारा ही सुखदुःखादि के आश्रय रूप आत्मा की सिद्धि होती है , फिर भी सुखदुःखादि के आश्रय शरीर या इन्द्रिय अथवा मन क्यों नहीं हैं ? ये प्रश्न रह जाते हैं । इन प्रश्नों के उत्तर के बिना आत्मा तत्त्वतः ज्ञात नहीं हो सकता । अतः ' शरीरादि आत्मा नहीं हैं ' यह समझना आवश्यक है 1
शरीर को ही आत्मा माननेवालों का कहना है कि आत्मा कोई प्रत्यक्षदृष्ट वस्तु नहीं है । जो सम्प्रदाय आत्मा को स्वीकार करते हैं वे भी सुखादि प्रत्यक्ष के लिए आत्मा में शरीर का सम्बन्ध आवश्यक मानते हैं । अत एव वे शरीर को आत्मा के भोग का ' आयतन ' कहते हैं । ऐसी स्थिति में शरीर के साथ जब सुखादि का अन्वय और व्यतिरेक सर्वसिद्ध है , अतब शरीर को सुखादि का कारण सभी को मानना आवइयक है | अतः शरीर का ही समवायिकारण क्यों न स्वीकार कर लें ? सुतराम् ' अहं सुखी ' इत्यादि वाक्य का ' अहम् ' शब्द का अर्थ शरीर ही है , फलतः शरीर ही आत्मा है | आत्मा नाम का कोई अतिरिक्त स्वतन्त्र द्रव्य नहीं है । यह पक्ष सांसारिक साधारण जनों से स्वीकृत होने के कारण अधिक सरल है । वस्तुतः हम सभी सांसारिक प्राणि शरीरात्मवादी ही हैं । इसी पक्ष के अनुसार हमारे सभी व्यवहार चलते हैं । अतः इसकी विशेष रूप से समीक्षा आवश्यक है ।
ज्ञान ही वस्तुतः चैतन्य है । चैतन्य से युक्त वस्तु ही चेतन कहलाता है । शरीर पाञ्चभौतिक है , पाँच भूतों में से कोई भी चेतन नहीं है । फिर भी उनकी समष्टि में चैतन्य की उत्पत्ति शरीरात्मवादी इस प्रकार करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में जो धर्म नहीं भी रहता है , समूह में वह धर्म रह सकता है । जैसे कि मदिरा के उपादानों में से किसी एक मैं मादक शक्ति न रहने पर भी उस समूह से निर्मित मदिरा में मादक शक्ति रहती है , उसी प्रकार पृथिवी प्रभृति पाँच भूतों में से प्रत्येक में चैतन्य के न रहने पर भी उन पाँचों से निर्मित शरीर में चैतन्य रह सकता है ।
शरीर को आत्मा न माननेवाले या शरीर में चैतन्य न माननेवालों का कहना हैं कि शरीर को अगर चैतन्यस्वभाव का माना जाय तो फिर मृत शरीर में भी चैतन्य मानना पड़ेगा क्योंकि मृतशरीर भी तो शरीर ही हैं । अतः शरीर में चैतन्य नहीं माना जा सकता । शरीर को चेतन मानने के पक्ष में दूसरी बाधा यह उपस्थित होती है कि इस पक्ष में शरीर के प्रत्येक अवयव में चैतन्य मानना पड़ेगा ! या फिर सम्पूर्ण शरीर में ? इन दोनों में से पहिला पक्ष इसलिए नहीं मान सकते कि शरीर के हाथ रूप अवयव के द्वारा अनुभूत विषय का उसके कट जाने पर स्मरण नहीं हो सकेगा , क्योंकि स्मरण के प्रति जो पूर्वानुभव कारण है उसमें समानतृ कत्व भी आवश्यक है । अर्थात् जिस पुरुष को जिस विषय का पूर्व में अनुभव रहेगा उसी पुरुष को उस अनुभवजनित उपयुक्त संस्कार के द्वारा समय आने पर उस विषय का स्मरण होगा , किसी अन्य पुरुष को नहीं जैसा कि देवदत्त के पूर्वानुभव से यज्ञदत्त को स्मरण नहीं हो सकता । इस कार्यकारणभाव के अनुसार शरीर के हाथ रूप अवयव के द्वारा अनुभव के बाद उस हाथ रूप अनुभविता के नष्ट हो जाने पर उस विषय का अगर स्मरण मानेंगे तो एक के द्वारा अनुभूत विषय का स्मरण दूसरे से मानना पड़ेगा , अतः शरीर के प्रत्येक अवयव में चैतन्य या ज्ञान नहीं माना जा सकता ।
एवं शरीर रूप अवयवी में भी चैतन्य नहीं माना जा सकता । क्योंकि प्रत्येक अवयवी एक क्षण में उत्पन्न होकर दूसरे क्षण में रहकर तीसरे क्षण में नष्ट हो जाता है । आगे फिर इसी प्रकार उत्पत्ति और विनाश का क्रम चलता है । ( बौद्धों के क्षणिकत्व सिद्धान्त में और वैशेषिकों के क्षणिकत्व सिद्धान्त में यही अन्तर है कि वैशेषिक लोग कुछ पदार्थों को नित्य भी मानते हैं । और एक क्षण में उत्पत्ति दूसरे क्षण में स्थिति और तीसरे क्षण में नष्ट हो जाने को क्षणिकत्व कहते हैं ।
बौद्धलोग सभी पदार्थो को क्षणिक ही मानते हैं किसी पदार्थ को नित्य नहीं मानते और क्षणिक उस उत्पत्ति विनाश की परम्परा को कहते हैं जिसमें पदार्थ एक क्षण में उत्पन्न होकर दूसरे ही क्षण में विनाश को प्राप्त होता है ) वैशेत्रिक लोग अवयवियों को क्षणिक इसलिए मानते हैं कि उत्पन्न होने के बाद उसमें ह्रास और वृद्धि देखी जाती है । एक ही मनुष्यशरीर कभी दुबला और मोटा कभी छोटा और कभी बड़ा देखा जाता है । किन्तु एकही आदमी छोटे और बड़े परिमाण का आश्रय नहीं हो सकता ।
क्योंकि अवयव के परिणाम और अवयवों की संख्या ही अवयवी में रहने वाले परिमाण के कारण हैं । कुछ नियमित संख्या के अवयवों से निर्मित होनेवाले अवयवियों में अवयवों के एक प्रकार की संख्या और एक परिमाणों से अवयवी में विभिन्न प्रकार के परिमाणों की उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
अतः यही मानना पड़ेगा कि विभिन्न प्रकार के परिमाणवाले अवयविओं की उत्पत्ति एक प्रकार की संख्यावाले और एक समान परिमाणवाले अवयवों से नहीं हो सकती , अतः देवदत्तादि एक ही नाम से प्रत्यभिज्ञात होने पर भी विभिन्न परिमाण के देवदत्तादि के शरीर विभिन्न संख्यक और विभिन्न परिमाणवाले अवयवों से ही उत्पन्न होते हैं । विभिन्न संख्यक अवयवों से निर्मित अवयवी कभी एक नहीं हो सकते ।
अतः देवदत्तादि के मोटे और पतले शरीर रूप अवयवी भी विभिन्न ही हैं , क्योंकि विभिन्न परिमाणों के होने के कारण विभिन्न संख्यकों और विभिन्न परिमाण के अवयवों से उत्पन्न हैं । उत्पत्ति और विनाश का या शरीर के छोटे बड़े होने का या मोटा और दुबला होने का यह क्रम इतना सूक्ष्म है कि उसे परख नहीं सकते । यह तो प्रत्यक्ष है कि एक पाँच साल का लड़का जिस ऊँचाई पर की वस्तु को छू नहीं सकता था वही दश वर्ष का होने पर उसे आसानी से ' छू सकता है । किन्तु उसकी ऊँचाई में यह वृद्धि कब हुई ?
यह कोई देख नहीं सकता । ऐसा तो होता नहीं कि एक रात पहिले जिस उँचाई की वस्तु को छूने में पाँच अङ्गल की कमी थी , वह प्रातः होते ही छूट जाती है और वह उस वस्तु को छू लेता है । तस्मात् यह वृद्धि और नाश प्रतिक्षण होता है अतः प्रत्येक वृद्धि को या प्रत्येक विनाश को देखा नहीं जा सकता , क्योंकि क्षण अत्यन्त सूक्ष्म है ।
अतः ' अहं गौर : ' इत्यादि प्रतीतियों के वाचक ' अहम् ' शब्द से शरीर का बोध लाक्षणिक ही है । शरीर आत्मशब्द का मुख्यार्थ नहीं है । उसका मुख्यार्थ कोई अतिरिक्त द्रव्य ही है , जिसके सम्बन्ध के कारण आत्मा शब्द से शरीर का भी गौणव्यवहार होता है । तस्मात् शरीर आत्मा नहीं है ।
किसी सम्प्रदाय का कहना है कि जिस प्रकार ' अहं गौर : ' इस प्रकार की प्रतीति होती है , उसी प्रकार ' अहं काणः ' ' अहं बधिरः ' इत्यादि प्रतीतियाँ भी होती हैं , काणत्व बधिरत्वादि चक्षुरादि इन्द्रियों के ही धर्म हैं , अतः उन प्रतीतियों में अहम् शब्द से चक्षुरादि इन्द्रियों का ही भान उचित है । अतः इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं । सभी ज्ञानों में इन्द्रियाँ किसी न किसी प्रकार अपेक्षित हैं ही । उन्हें आत्मा मान लेने में केवल इतना अधिक होता है कि उन्हें ज्ञानों का निमित्तकारण न मानकर समवायिकारण मानते हैं । अतः इन्द्रियाँ ही आत्मा हैं । वे ही अपने अपने से उत्पन्न ज्ञानों के आश्रय हैं । अतः इन्द्रियों से अतिरिक्त आत्मा नाम का कोई अतिरिक्त द्रव्य नहीं है ।
आत्मा को इन्द्रियों से भिन्न अतिरिक्त पदार्थ माननेवाले सिद्धान्तियों का कहना है कि शरीर को आत्मा मानने में जो स्मरणानुपपत्ति प्रभृति दोष दिखला आये हैं , वे सभी अनित्य इन्द्रियों को आत्मा मान लेने के पक्ष में भी हैं । उसकी रीति यह है कि आँखों के रहते जिसने जिन वस्तुओं को देखा है , अन्धा हो जाने पर भी उस व्यक्ति को उन वस्तुओं का स्मरण होता है । किन्तु इन्द्रियों को आत्मा मान लेने के पक्ष में यह स्मरण सम्भव नहीं है । क्योंकि इस स्मरण का आश्रय ( समवायिकारण ) चक्षु रूप इन्द्रिय सर्वदा के लिए नष्ट हो चुका है । अतः यह मानना पड़ता है कि इन्द्रियों से होनेवाले ज्ञानों का आश्रय कोई और ही द्रव्य है , जो इन्द्रियों के नष्ट होने पर भी विद्यमान रहता है । वही आत्मा है ।
इन्द्रियात्मवाद के पक्ष में कोई कहते हैं कि ये सभी आपत्तियाँ इन्द्रियों के अनित्य होने के कारण उठती हैं । भोत्रेन्द्रिय आकाश रूप होने पर भी पूर्ण नित्य नहीं है , क्योंकि निरुपाधिक आकाश इन्द्रिय नहीं है । कर्णशष्कुली प्रभृति उपाधि से युक्त आकाश ही इन्द्रिय है , अतः उपाधि में दोष आ जाने से स्वरूपतः आकाश रूप क्षेत्र का नाश न होने पर भी उसका इन्द्रियत्व नष्ट हो जाता है । अतः श्रोत्रेन्द्रिय भी फलतः अनित्य ही है ।
ऐसी स्थिति में मन रूप इन्द्रिय को आत्मा मान लेने से उक्त सभी आपत्तियाँ हट जाती हैं । क्योंकि मन नित्य है एवं सभी ज्ञानों में मन की अपेक्षा भी है ही । तस्मात् सभी ज्ञानों के प्रति मन को ही समवायिकारण मान लें । तद्भिन्न आत्मा नाम के किसी द्रव्य को मानने की आवश्यकता नहीं है । इस प्रसन में सिद्धान्तियों का कहना है कि मन की सिद्धि जिस हेतु से की जाती है , वही उसको अतीन्द्रिय भी सिद्ध करता है । मन को अगर विभु मान लिया जाय तो फिर उसका कुछ भी प्रयोजन नहीं रह जाता ।
क्योंकि एक समय एक आश्रय में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती है । किन्तु चक्षुषाणादि इन्द्रियों का अपने विषयों के साथ एक ही समय सम्बन्ध हो सकते हैं । ज्ञान के समवायिकारण को जो लोग विभु मानते हैं उनके मत में एक ही साथ अनेक विषयों के साथ उसका सम्बन्ध होना कोई बड़ी बात नहीं है । अतः मध्यवर्ती एक ऐसे इन्द्रिय की कल्पना करनी पड़ती है जो अपनी सूक्ष्मता के कारण एक समय एक ही वहिरिन्द्रिय के साथ सम्बद्ध हो सके वही इन्द्रिय ' मन ' है ।
फलतः जिस बहिरिन्द्रिय के साथ जिस समय मन रूप इन्द्रिय का सम्बन्ध रहेगा , उस समय उसी बहिरिन्द्रिय के विषय का ग्रहण होगा , और इन्द्रियों के विषयों का नहीं । अगर मन को विभु मान लें तो फिर एक ही समय अनेक बहिरिन्द्रियों के साथ वह सम्बद्ध हो सकता है । अतः एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की ( ज्ञानयोगपद्य की ) आपत्ति जैसी की तैसी रहेगी । अतः मन की सत्ता के साधक प्रमाण ( धमिंग्राहक प्रमाण ) के द्वारा ही मन काअणुत्व भी सिद्ध है । ।
मन के इस अणुत्व अव के कारण ही ज्ञान का आश्रय मन नहीं हो सकता , क्योंकि ऐसा मान लेने पर ज्ञान - सुखादि का प्रत्यक्ष न हो सकेगा । क्योंकि गुणप्रत्यक्ष के प्रति आश्रय का महत्त्व भी कारण है चूँकि मन अणु है , अतः उसमें रहनेवाले ज्ञान - सुखादि का प्रत्यक्ष संभव नहीं होगा । तस्मात् मन भी आत्मा नहीं है । अतः पृथिव्यादि आठों द्रव्यों से अतिरिक्त आत्मा नाम का एक स्वतन्त्र द्रव्य मानना आवश्यक है ।
यह आत्मा ईश्वर और जीव मेद से दो प्रकार का है । ईश्वर एक ही है और सर्वत्यादि गुणों से विभूषित है । जीव अदृष्टादि गुणों के द्वारा बद है और प्रत्येक शरीर में अलग अलग होने के कारण अनन्त है । मन रूप नवम द्रव्य के प्रसङ्ग में जानने योग्य सभी बातें आत्मनिरूपण के प्रसङ्ग में अधिकतर कह दी गयी हैं ।
गुण
रूप , रस , गन्ध , स्पर्श , संख्या , परिमाण , पृथकत्व , संयोग , विभाग , परत्व , अपरस्य , बुद्धि , सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष , वस्तु , गुरुत्व , द्रवत्व , स्नेह , संस्कार , धर्म , अधर्म , और शब्द ये चौबीस गुण हैं ।
रूप
केवल आँखों से ही दीखने वाला गुण ' रूप ' है । द्रव्य भी वही आँखों से देखा जाता है जिसमें कि रूप हो । आकाशादि में रूप नहीं है , ) अतः वे नहीं देखे जाते । सुतराम् द्रव्य के चाक्षुन प्रत्यक्ष में भी रूप सहायककारण है । केवल द्रव्य ही नहीं जिस किसी का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष हो - रूप किसी न किसी प्रकार अपेक्षित होगा ही । फलतः चक्षु से सभी ज्ञानकार्यों के सम्पादन में रूप सहायककारण है । यह शुक्ल , नील , पीत , हरित , रक्त , कपिश , और चित्र मेद से सात प्रकार का है ।
चित्र रूप के प्रसङ्ग में कुछ विवाद है । कुछ लोग कथित नीलादि रूपों से भिन्न चित्र नाम का कोई अतिरिक्त रूप नहीं मानते । सिद्धान्तियों का कहना है कि संयोग की तरह रूप अपने किसी आश्रय के एक अंश में रहे और दूसरे भंश में नहीं ऐसा नहीं होता ( रूप अव्याप्यवृत्ति नहीं है ) किन्तु रूप अपने आश्रय के सभी अंशों में रहता है ( अतः वह व्याप्यवृत्ति है ) इस नियम के अनुसार जो छींट प्रभृति अनेक रङ्गों के कपड़े हैं , उनमें कोई रूप सभी अंशों में नहीं है । किन्तु वे भी रूपवाले द्रव्य हैं क्योंकि उनका चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है । तस्मात् उनमें नीलादि से भिन्न कोई रूप मानना पड़ेगा । वही चित्र रूप है ।
पृथिवी में ये सभी रूप रहते हैं । जल और तेज इन दोनों में केवल शुक्ल रूप
। शुक्ल रूप को छोड़कर और किसी रूप के आवान्तर वास्तविक भेद नहीं हैं । शुक्ल रूप भास्वर और अभास्वर भेद से दो प्रकार का है । जल में अभास्वर शुक्लरूप है , और तेज में भास्वर शुक्ल रूप है ।
रस
केवल रसनेन्द्रिय से ज्ञात होनेवाले गुण को रस कहते हैं । यह मधुर अम्ल लवण कटु कपाय और तिक्त भेद से छः प्रकार का है । यह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में ही रहता है । पृथिवी में सभी प्रकार के रस रहते हैं , और जल में केवल मधुर रस ही रहता है ।
गन्ध
प्राण से ज्ञात होनेवाले गुण को ' गन्ध ' कहते हैं । यह सुगन्ध और दुर्गन्ध भेद से दो प्रकार का है , एवं यह केवल पृथिवो में ही रहता है ।
स्पर्ध
केवल त्वचा रूप इन्द्रिय से शांत हो सकनेवाले गुण को स्पर्श कहते हैं । यह पृथिवो , जल , तेज , ओर वायु इन चार द्रव्यों में रहता है । शीत उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से यह चार प्रकार का है । शीतस्पर्श जल में , उष्णस्पर्श तेज में , अनुष्णाशीत स्पर्श पृथिवी और वायु में रहता है । अनुष्णाशीत स्पर्श भी पाकज और अपाकज भेद से दो प्रकार का है । इनमें पाकज अनुष्णाशीत स्पर्श पृथिवी में ( पाक से पृथिवी का अनुष्णाशीतस्पर्श परिवर्तित हो सकता है ) और अपाकज अनुष्णाशीत स्पर्श वायु रहता है ।
इनमें से जल के परमाणुओं में रहनेवाले रूप रस और स्पर्श एवं तेज के परमाणुओं में रहनेवाले रूप और स्पर्श और वायु के परमाणुओं में रहनेवाले स्पर्श नित्य हैं । एवं कार्य रूप जलादि में रहनेवाले रूपादि अनित्य हैं । किन्तु पृथिवी के परमाणुओं में रहनेवाले रूप रस गन्ध और स्पर्श भी अनित्य ही हैं । कार्य रूप पृथिवी में रहनेवाले रूपादि तो अनित्य हैं ही ।
इसका यह हेतु है कि पाक के द्वारा पृथिवी में रहनेवाले रूप रस गन्ध और स्पर्श का परिवर्तित होना प्रत्यक्ष से सिद्ध है । अवयवियों के रूपादि का यह परिवर्तन परमावयव परमाणुओं में रूपादि परिवर्तन के बिना संभव नहीं है । अतः पार्थिव परमाणुओं के रूपादि को अनित्य मानना पड़ता है । यह वैशेषिक दर्शन का खास विषय है , अतः इस विषय का विवरण कुछ विस्तृत रूप से देता हूँ ।
पाकजरूपादि
समवायिकारणों में रहनेवाले गुण ही जन्यद्रव्यों में रहनेवाले गुणों का असमवायिकारण है । शतशः देखी हुई यह व्याप्ति ही ' कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते ' इस न्याय में पर्यवसित हुई है । जब तक सूत लाल न हों तब तक कपड़े लाल नहीं होते । श्याम कपालों से श्याम घट ही उत्पन्न होते हैं । किन्तु श्यामकपाल से उत्पन्न श्यामघट ह आग में पकने पर लाल हो जाता है । अतः प्रत्यक्ष दृष्ट रक्तघट की उत्पत्ति उक्त न्याय से रक्तकपालों से ही माननी पड़ेगी ।
फलतः कपालों का रक्त रूप ही घट में दीखनेवाले रक्त रूप का असमवायिकारण है । रक्त रूप की उत्पत्ति की यह प्रणाली घटक उत्पादक व्यसरेणु तक अबाधित गति से चलेगी । उक्त रीति के अनुसार घट के उत्पादक द्वय्णुक में रहनेवाले रक्त रूप की उत्पत्ति द्वणुक के उत्पादक दोनों परमाणुओं में रहनेवाले रेक्त रूप से होगी । किन्तु प्रश्न यह है कि उन परमाणुओं में रक्त रूप आया कहाँ से ? क्योंकि श्यामघट के उत्पादक परमाणु ही इस रक्त घट के भी उत्पादक हैं ।
उन परमाणुओं में श्याम रूप का अनुमान घट की श्यामता से निरबाध है 1 अतः यही एक कल्पना अवशिष्ट रह जाती है कि अग्नि के विशेष प्रकार के संयोग ( पाक ) से उन परमाणुओं की श्यामता नष्ट हो जाती है , और उनमें रक्त रूप की उत्पत्ति होती है । किन्तु घट के बन जाने पर घट के उत्पादक परमाणुओं की स्वतन्त्र सत्ता है कहाँ ? वे तो अपने कार्य द्वणुकों को अपने में समेट कर अपनी स्वतन्त्रता खो चुके हैं ।
अ : द्व्यणुकों में समवेतत्व सम्बन्ध से विद्यमान परमाणुओं में रहनेवाले श्याम रूप का नाश पाक नहीं हो सकता । अतः उन परमाणुओं में रक्त रूप की उत्पत्ति की सम्भावना ही नहीं है । अतः यह कल्पना करनी पड़ती है कि जिन अवयवियों की परम्परा से श्याम घट का निर्माण हुआ था , द्वयणुक पर्यन्त के वे सभी अवयवी अग्नि के संयोग से बिनष्ट जाते हैं । नित्य होने के कारण परमाणु विनष्ट नहीं होते ।
इस प्रकार उक्त श्याम घट के आरम्भक सभी परमाणुओं के अलग हो जाने पर उनमें से प्रत्येक परमाणु में पाक से श्याम रूप का नाश हो जाता है । और पाक से ही उनमें रक्त रूप की उत्पत्ति होती है 1 । . इसी प्रकार पहिले के रस गन्ध और स्पर्श भी नष्ट हो जाते हैं और उनमें दूसरे रसादि की उत्पत्ति होती है । इन दूसरे रूप रस गन्ध और स्पर्श से युक्त परमाणुओं के द्वारा पुनः द्वयणुकादि के क्रम से दूसरे पक्व घट की उत्पत्ति होती है । उसमें कथित कारणगुण क्रम से ही रक्तरूपादि की उत्पत्ति होती है ।
इस पके हुए घट में ' यही वही घट है जिसे पकने के लिए दिया गया था ' इस प्रकार की जो प्रत्यभिज्ञा होती है , उसका कारण पके हुए और बिना पके हुए दोनों घटों का ऐक्य नहीं है । ऐक्य न रहने पर भी सादृश्य के कारण प्रत्यभिज्ञा होती है । जैसे कि ' सेयं दीपज्वाला ' इत्यादि स्थलों में होती है । वैशेषिकों का यह सिद्धान्त ' पिलुपाकवाद के ' नाम से प्रख्यात है । ' पिल ' परमाणुओं का ही दूसरा नाम 1
किन्तु नैयायिक लोग इस बात को नहीं मानते । उन लोगों का कहना है कि पका हुआ घट और बिना पका हुआ घट - दोनों एक ही हैं । इस ऐक्य से ही ‘ सोऽयं घट : ’ इत्यादि प्रत्यभिज्ञायें होती हैं । सम्भव होने पर किसी प्रतोति का गौणार्थक मानना उचित नहीं है । अतः उक्त प्रत्यभिज्ञा वस्तुतः ऐक्यमूलक ही है , सादृश्य - मूलक नहीं । तदनुसार सम्पूर्ण घट रूप अवयवी में ही पाक होता है भट्ठी में डाले गये घट का छिद्र से देखने पर प्रत्यक्ष भी होता है । अतः उक्त स्थल में घट का विनाश मानना प्रत्यक्षविरुद्ध भी है । उक्त प्रत्यभिज्ञा स विरुद्ध होने के कारण ' कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते ' इस नियम को पाकज रूपादि से अतिरिक्त विषय के लिए सङ्कुचित करना पड़ेगा ।
प्रत्येक अवयवी अनन्तछिद्रों से युक्त है , अतः उन छिद्रों के द्वारा अति तीक्ष्ण तेज भीतर प्रविष्ट होकर अवयवी को बाहर और भीतर पका देता है । अतः अनुभव से विरुद्ध कच्चे घट का विनाश और पके घट की उत्पत्ति मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
संख्या
‘ यह एक है , ये दो हैं , ये तीन हैं ' इत्यादि व्यवहार जिस गुण से उत्पन्न हों , वहीं ' संख्या ' है । यह एकत्व और द्वित्वादि से लेकर परार्द्ध पर्यन्त अनन्त प्रकार की है । इनमें एकत्त्र संख्या की नित्यता और अनित्यता उसके आश्रय की नित्यता और अनित्यता के अनुसार होती है घट अनित्य है अतः उसमें रहनेवाली एकत्व संख्या भी अनित्य है , आकाश नित्य है , अतः उसमें रहनेवाली एकत्व संख्या भी नित्य हैं , किन्तु द्वित्वादि सभी संख्यायें अनित्य ही हैं , चाहे उनके आश्रय नित्य हों या अनित्य ।
क्योंकि इन संख्याओं के व्यवहार करनेवाले पुरुषों की बुद्धि से इसकी उत्पत्ति होती है । जिस घट में पट को साथ लेकर कोई पुरुष द्वित्व का व्यवहार करता है , उसी घट में पट और दण्ड को साथ लेकर कोई तीसरा पुरुष त्रित्व का व्यवहार भी करता है । द्वित्व को दृष्टान्त रूप में लेकर समझने में सरलता होगी ।
जब किसी पुरुष को दो घंटों में से प्रत्येक में ' यह एक है , यह एक है ' इस प्रकार की बुद्धि उत्पन्न होती है , तभी दो एकत्वों की उक्त बुद्धि से उक्त दोनों घटों में द्वित्व संख्या की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार अनेक एकत्व विषयक बुद्धि की ' अपेक्षा ' द्वित्व की उत्पत्ति में है , अतः उक्त बुद्धि को ' अपेक्षा बुद्धि ' कहते हैं । सभी बुद्धियाँ क्षणिक हैं , अतः अपेक्षा बुद्धि भी क्षणिक ही है । अतः उनसे उत्पन्न होनेवाली द्वित्वादि सभी संख्यायें अनित्य हैं ।
पहिले कह चुके हैं कि एक क्षण में उत्पत्ति , द्वितीय क्षण में स्थिति और तृतीय क्षण में जिस वस्तु का नाश हो , उसे ही वैशेषिक लोग ' क्षणिक ' कहते हैं । किन्तु अपेक्षा - बुद्धि का क्षणिकत्व उक्त क्षणिकत्व से थोड़ा सा भिन्न है । अपेक्षाबुद्धि की एक क्षण में उत्पत्ति उसके बाद दो क्षणों तक उसकी स्थिति और चौथे क्षण में विनाश मानना होगा , अतः अपेक्षाबुद्धि का क्षणिकत्व चतुर्थ क्षण में नष्ट होना है ।
अगर ऐसा न मानें , अपेक्षा बुद्धि का भी और बुद्धियों की तरह तीसरे ही क्षण में विनाश मार्ने ? तो उससे उत्पन्न होनेवाले द्वित्व का सविनल्पक प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा । क्योंकि वर्त्तमान विषयों का ही प्रत्यक्ष होता है । प्रत्यक्ष के प्रति विषय कारण हैं । तदनुसार द्वित्व विषयक प्रत्यक्ष के प्रति भी द्वित्व कारण है । अगर द्वित्व के कारणीभूत उक्त अपेक्षाबुद्धि की सत्ता तीन क्षणों तक न मानें तो द्वित्व जनित उक्त प्रत्यक्ष अनुपपन्न हो जाएगा ।
द्वित्व प्रत्यक्ष की रीति यह है कि द्वित्व के आश्रयीभूत दोनों व्यक्तियों में अलग - अलग ' अयमेकः , अयमेकः ' इत्यादि आकार की अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न होती है । इस अपेक्षाबुद्धि से द्वित्व की उत्पत्ति होती है फिर द्वित्व में विशेषणीभूत द्वित्वत्व विषयक निर्विकल्पक प्रत्यक्ष होता है । इसके बाद द्वित्व का विशिष्टप्रत्यक्ष होता है । उसके बाद के क्षण में द्वित्व का विनाश होता है ।
क्योंकि विशिष्टज्ञान के लिए पहिले विशेषण का ज्ञान आवश्यक है , अतः द्वित्वत्व विशिष्ट द्वित्व के प्रत्यक्ष के लिए द्वित्वत्व का निर्विकल्पक ज्ञान मानना आवश्यक है । अगर उक्त अपेक्षाबुद्धि की और साधरण ज्ञानों की तरह दूसरे क्षण तक ही स्थिति मानें , तो द्वित्व की उत्पत्ति के आगे के क्षण में ही अपेक्षा बुद्धि का विनाश हो जाएगा ।
अतः जिस क्षण में द्वित्वत्व का निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कहा गया है , उसी क्षण में अपेक्षा बुद्धि का विनाश होगा | फिर उसके आगे के क्षण में द्वित्व के सविकल्पक प्रत्यक्ष की अपेक्षा द्वित्व का ही नाश हो जाएगा । क्योंकि अपेक्षा बुद्धिका विनाश ही द्वित्व का विनाशक है । फिर द्वित्व विनाश के बाद द्वित्व का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता , क्योंकि प्रत्यक्ष के अव्यवहित पूर्वक्षण में विषय का रहना आवश्यक है ।
अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश और बुद्धियों की तरह तीसरे क्षण में न मानकर उत्पत्ति के चौथे क्षण में मानना पड़ता है ।
परिमाण
लम्बा और चौड़ा एवं भारी और हल्का ये व्यवहार जिस गुण के कारण हो उस गुण को ' परिमाण ' कहते हैं । दोनों में पहिले से लम्बाई चौड़ाई का बोध होता है , और दूसरे से भारीपन और हलकापन का बोध होता है । इनमें पहिला भी दो प्रकार का है , एक दीर्घ और दूसरा ह्रस्व । दूसरे प्रकार का वह परिमाण है जिससे द्रव्य का भारीपन और हल्क पन प्रतीति हो । यह भी अणु और महत् भेद से दो प्रकार का है । इसकी भी नित्यता और अनित्यता अपने आश्रय की नित्यता और अनित्यता के अधीन है ।
अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाला परिमाण नित्य है और अनित्य द्रव्य में रहनेवाला परिमाण अनित्य है । अनित्यपरिमाण तीन कारणों से उत्पन्न होता है ( १ ) अवयवों के परिमाण से ( २ ) अवयवों की संख्या से और ( ३ ) ( अवयवों के प्रशिथिलसंयोगरूप ) प्रचय से । दोनों कलापों के परिमाण से घट में परिमाण की उत्पत्ति होती है । किन्तु उसी परिणाम के तीन कलापों से जिस घट की उत्पत्ति होगी , उस घट का परिमाण दो कलापों से उत्पन्न घट के परिमाण से भिन्न होगा ।
इस विलक्षण परिमाण का कारण तीनों कपालों का परिमाण नहीं हो सकता , क्योंकि इन तीनों कपालों का परिमाण भी पहिले घट के उत्पादक दोनों कपालों के समान ही है । अतः उक्त तीन कपालों से उत्पन्न घट में जो उक्त दोनों कपालों से उत्पन्न घट के परिमाण से विलक्षण परिमाण उपलब्ध होता है , उसका कारण व पालों की त्रित्व संख्या ही है । अतः संख्या भी परिमाण का कारण है ।
इस प्रकार संख्या में स्वीकृत परिमाण की कारणता के अनुसार ही अणुपरिमाणों में किसी भी वस्तु की कारणता का अस्वीकार करना वैशेषिकों के लिए संभव होता है । वैशेषिकों के सिद्धान्त के अनुसार अणुपरिमाण किसी के भी कारण नहीं हैं । परमाणुओं के परिमाण और द्वयणुकों के परिमाण ही अणुपरिमाण है । ये अगर कारण होंगे तो परमाणु के परिमाण द्वयगुणों के परिमाण के कारण होंगे , और द्वयणुकों के परिमाण व्यसरेणु के परिमाण के कारण होंगे ।
किन्तु सो संभव नहीं है , क्योंकि परिमाणों में यह नियम देखा जाता है कि वे अपने समान जाति के अपने से उत्कृष्ट परिमाण को ही उत्पन्न करते है । कपालों में महत् परिमाण हैं उसके परिमाणों से घट का जो परिमाण उत्पन्न होता है वह कपाल परिमाण से महत्तर होता है । अर्थात् कपाल परिमाण में रहनेवाली महत्त्व जाति भी उसमें है और कपाल परिमाण से वह बड़ा भी है ।
इस नियम के अनुसार परमाणुओं के परिमाणों से द्वणुकों के परिमाणों की उत्पत्ति मानने से द्वयगुणक के परिमाणों में अणुत्व जाति के साथ साथ परमाणुओं के परिणाम से न्यूनता भी माननी पड़ेगी । क्योंकि जिस प्रकार महत्परिमाण के उत्पन्न होववाले परिमाण महत्तर होते हैं उसी प्रकार अणुपरिमाण से उत्पन्न होनवाले परिमाण अणुतर होंगे । इसी प्रकार दणुकों में रहनेवाले अणुपरिमाणों से अगर व्यसरेणु परिमाण की उत्पत्ति मानें तो वह द्वणुक के परिमाण से छोटा होगा । फलतः व्यसरेणु का प्रत्यक्ष न हो सकेगा ।
जिससे आगे की प्रत्यक्ष धारा ही रुक जाएगी । जो जगत् के अप्रत्यक्ष में परिणत हो जाएगी । तस्मात् द्वयणुक परिमाण के उत्पादक दोनों परमाणुओं की द्वित्व संख्या ही है , एवं तीन द्वयणुकों से उत्पन्न होनवाले व्यसरेणु के परिमाण का उसके उपादानभूत तीनों द्वयणुकों की त्रित्व संख्या ही कारण है । घटादि के विशेष प्रकार के परिमाणों के लिए भी संख्या की अपेक्षा का उपपादन कर चुके हैं । अतः जन्य अणुपरिमाणों के लिए वह कोई नवीन कल्पना भी नहीं है ।
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' प्रचय ' भी परिमाण का कारण है । इसी से सेर भर लोहे की लम्बाई चौड़ाई और सेर भर रूई की लम्बाई चौड़ाई में अन्तर उपलब्ध होता है । यह अन्तर अवयवों के परिमाण या अवयवों की संख्या से उपपन्न नहीं हो सकते । कथित लौहखण्ड और तुलखण्डों के अवयवों की संख्या और परिमाण समान हैं । अतः उक्त अन्तर की उपपत्ति के लिए यही कल्पना करनी चाहिए कि लोहे के अवयवों के संयोग संघटित हैं और रूई के अवयवों के संयोग शिथिल ( ढीले ) हैं । अवयवों के इस शिथिल संयोग को ही ' प्रचय ' कहते हैं ।
पृथकृत्व
घट पट से पृथक है ( अयमस्मात् पृथक् ) इस आकार की प्रतीति जिस गुण से हो उसे ' पृथक्त्व ' कहते हैं । यह भिन्न द्रव्यों में एक दो या इनसे अधिक द्रव्यों को अवधि मानकर शेष द्रव्यों में रहता है । इस प्रकार यह भेद या अन्योन्याभाव सा ही दीखता है । किन्तु अन्योन्याभाव की प्रतीति का आकार ' घटभिन्नः पटः इत्यादि प्रकार के होते हैं , अतः भेद से पृथक्त्व भिन्न है । अर्थात् भेद की प्रतोति के अभिलापक वाक्य में प्रयुक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के लिए प्रथमान्त पद का ही प्रयोग होता है । किन्तु पृथकत्व की प्रतीति के लिए उनमें से अवधिभूत एक अर्थ का पञ्चम्यन्त पद से उपादान किया जाता है ।
संयोग
असम्बद्ध दो द्रव्यों के परस्पर सम्बन्ध को ही ' संयोग ' कहते हैं । यह तीन प्रकार का है । ( १ ) दोनों सम्बन्धियों में से एकमात्र की क्रिया से उत्पन्न । जैसे पहाड़ और पक्षी का संयोग केवल पक्षी की क्रिया से उत्पन्न होता है । ( २ ) दोनों सम्बन्धियों की क्रिया से उत्पन्न जैसे लड़ते हुए दो पहलवानों का संयोग ( ३ ) तीसरा संयोग संयोग से ही उत्पन्न होता है । जैसे हाथ और पुस्तक के संयोग से शरीर और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है ।
वैशेषिकों के सिद्धान्त में अवयव और अवयवी परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं । अतः शरीर रूप अवयवी और हाथ पैर प्रभृति अवयव परस्पर भिन्न हैं । अतः जिस प्रकार पट की क्रिया से भूतल और पट का सयोग उत्पन्न नहीं हो सकता , उसी प्रकार हाथ की क्रिया से शरीर और पुस्तक का संयोग भी उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु शरीर में क्रिया के न रहने पर भी हाथ की क्रिया से पुस्तक के साथ जो हाथ और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है , उसके बाद शरीर के साथ पुस्तक के संयोग की प्रतीति होती है ।
प्रतीति का अलाप नहीं किया जा सकता । अतः शरीर और पुस्तक में भी संयोग मानना पड़ेगा । किन्तु यह संयोग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो पुस्तक की क्रिया या शरीर की क्रिया या फिर उन्हीं दोनों की क्रिया से उत्पन्न होगा , किन्तु न शरीर में और न पुस्तक में ही क्रिया है । अतः प्रकृत में शरीर और पुस्तक के संयोग का कारण क्रिया को नहीं माना जा सकता । किन्तु असमवायिकारण तो क्रिया या गुण इन दोनों में से ही कोई होगा ।
प्रकृत में किया असमवायिकारण नहीं हो सकती , अतः उसके असमवायिकारण होने की बात ही नहीं उठती | सुतराम् प्रकृत में हाथ और शरीर इन दोनों के लिए गुण रूप किसी असमवायिकारण की कल्पन आवश्यक है । यह गुण उक्त संयोग से अव्यवहित पूर्वेक्षण में नियत रूप से रहनेवाले हाथ और पुस्तक के संयोग को छोड़ कर दूसरा नहीं हो सकता । अतः हाथ और पुस्तक की क्रिया से उत्पन्न संयोग से ही शरीर और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । सुतराम् संयोगजसंयोग का मानना आवश्यक है ।
( १ ) नोदन और ( २ ) अभिघात संयोग के ये दो और प्रकार भी हैं । जिस संयोग से शब्द की उत्पत्ति न हो उसे ' नोदन ' कहते हैं । एवं इसके विपरीत जिस संयोग से शब्द की उत्पत्ति हो उसे ' अभिघात ' कहते हैं ।
विभाग
संयोग को विनष्ट करनेवाले गुण का नाम ' विभाग ' है । संयोग की तरह यह भी ( १ ) एक क्रिया से उत्पन्न ( २ ) दो क्रियाओं से उत्पन्न और ( २ ) विभाग से उत्पन्न भेद से तीन प्रकार का है । पर्वत से पक्षी का विभाग केवल पक्षी में रहनेवाली क्रिया से ही उत्पन्न होता है । परस्पर गुथे हुए दो पहलवानों का विभाग दोनों पहलवानों में से प्रत्येक में रहनेवाली अलग अलग दो क्रियाओं से उत्पन्न होता है ।
संयोगजसंयोग की तरह ' विभागजविभाग ' का भी मानना आवश्यक है । क्योंकि किसी व्यक्ति के हाथ का संयोग अगर किसी वृक्ष के साथ था , और हाथ की क्रिया से उस संयोग के छूट जाने पर वृक्ष से हाथ का विभाग हो जाता है ।हाथ और वृक्ष के इस विभाग के उत्पन्न होने पर वृक्ष से शरीर के विभाग की भी प्रतीति होती है । शरीर और वृक्ष का विभाग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो फिर शरीर की क्रिया से या वृक्ष की क्रिया से अथवा दोनों की क्रिया से ही उत्पन्न हो सकता है ।
प्रकृत में क्रिया केवल हाथ में ही है , पूरे शरीर में नहीं वृक्ष में तो है ही नहीं हाथ अवयव है शरीर अवयवी , अतः दोनों भिन्न हैं । सुतराम् घट की क्रिया से जैसे कि पट और दण्ड का विभाग उत्पन्न नहीं हो सकता , उसी प्रकार हाथ को क्रिया से शरीर और वृक्ष का भी विभाग नहीं उत्पन्न हो सकता । अतः हाथ और वृक्ष का विभाग हो शरीर और वृक्ष के विभाग का कारण है । अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है । इसी हेतु से विभाग को संयोगध्वंस रूप न मानकर स्वतन्त्र गुणरूप भाव पदार्थ मानना पड़ता है ।
अगर ऐसा न मानें अर्थात् विभाग को संयोगध्वंस रूप ही मानें तो हाथ और तक के विभाग के बाद जो शरीर और तरु के विभाग की प्रतीति होती है , वह न हो सकेगी , क्योंकि शरीर और तरु का विभाग शरीर और तरु के संयोग का ही विनाश रूप होगा । शरीर में किया है नहीं , किया है हाथ में हाथ की किया से शरीर के संयोग का विनाश कैसे होगा ? हाथ की क्रिया से जिस संयोगविनाश की उत्पत्ति होगी वह तो हाथ में ही रहेगी , शरीर में नहीं । अतः विभाग संयोग का अभाव रूप नहीं , है , किन्तु गुण रूप भाव ही है ।
विभाग को भाव रूप मान लेने से प्रतीतियों की उपपत्ति दिखलाया जा चुकी है ।
विभागजविभाग भी दो प्रकार का है । ( १ ) कारणमात्रजन्य और ( २ ) कारणाकारण विभागजन्य | जिस विभाग की उत्पत्ति होगी , उस विभाग के समवायिकारणीभूत द्रव्यों के ही विभाग से जो विभाग उत्पन्न हो उसे ' कारणमात्रविभागजन्य विभाग ' कहते हैं । घट - नाश से लेकर उसके उत्पादक कर्मनाश पर्यन्त के पर्यालोचन से यहाँ की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी । उसका यह क्रम है कि पहिले घट के अवयव रूप दोनों कपालों में क्रिया ( हलचल ) की उत्पत्ति होती है । फिर घट के उत्पादक दोनों कपालों में विभाग उत्पन्न होता है ।
कपालों के इस विभाग से घट के उत्पादक कपालों के संयोग का नाश होता है । चूँकि कपालों का संयोग घट का असमवायिकारण है , अतः इसके नाश से घट का नाश होता है । तब तक कपालों में क्रिया रहती ही है । घट - नाश के बाद कर्म से युक्त उन कपालों का संयोग पहिले के जिस देश के आकाश के साथ था , उस देश से कपालों का विभाग उत्पन्न होता है । आकाश के साथ कपालों के इस विभाग का असमवायिकारण पहिले कहा गया दोनों कपालों का क्रियाजनित विभाग ही है ।
पूर्व देशों के आकाश से एक दूसरे से विभक्त दोनों कपालों का यह विभाग ही " कारणमात्र विभागजन्य विभागजविभाग " है । क्योंकि इस विभाग के समवायिकारण दोनों कपाल और पूर्वदेशों का आकाश है । अतः दोनों कपाल भी इस विभाग के समवायिकारण हैं । अतः प्रकृत विभाग के समवायिकारणीभूत केवल दोनों कपालों के विभाग से ही वह उत्पन्न होता है , किसी और द्रव्यों के विभाग से नहीं | इसके बाद विभागजविभाग से कपालों का जिस पूर्वदेश के साथ पहिले संयोग था , उस संयोग का नाश होता है ।
फिर दूसरे देशों के आकाश ( उत्तरदेश ) के साथ इन विभक्त कपालों का संयोग होता है । कालों को उस क्रिया का नाश होता है , जिससे दोनों कपालों का विभाग उत्पन्न हुआ था ।
इस प्रसङ्ग में इन दो विषयों को भी समझना आवश्यक है । ( १ ) जिस क्रिया से कपालों का परस्पर विभाग उत्पन्न होता है , उस क्रिया से ही विभक्त कपालों का पूर्वदेश के आकाश के साथ कथित विभाग को उत्पत्ति क्यों नहीं मानते ? क्योंकि क्रिया में विभाग की हेतुता स्वीकृत है । एवं क्रिया को सत्ता इस विभाग के कई क्षणों बाद तक रहती है । फिर विभाग में विभाग की हेतुता की नयी कल्पना क्यों की जाती है ? दूसरी बात यह है कि अगर उक्त दूसरे विभाग की उत्पत्ति विभाग से ही मान भी लें तो यह पहिला विभाग दूसरे विभाग का असमवायिकारण ही होगा । असमवायिकारण का संचलन हो जाने पर कार्य की उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं रह जाती है । फिर अवयवों के विभाग के बाद ही अवयवी के नाश से पूर्व ही उक्त दूसरे देश के साथ अवयवों का ( विभागज ) विभाग क्यों नहीं उत्पन्न हो जाता ? इसके लिए घट के उत्पादक संयोग का विनाश और घट का विनाश इन दो कार्यों के लिए अपेक्षित दो क्षणों का विलम्ब सहने की क्या आवश्यकता है ?
इन दोनों में प्रथम प्रश्न का यह समाधान है कि अगर उक्त दूसरे विभाग को भी क्रियाजन्य मानें तो कमल खिलने की अपेक्षा विनष्ट ही हो जाएँगे । क्योंकि संयोग दो प्रकार के हैं । एक संयोग से अवयवी की उत्पत्ति होती है , जैसे दोनों कपाओं का कथित संयोग । इसे ' आरम्भक ' संयोग कहते हैं । क्योंकि यह संयोग घट रूप अवयवी द्रव्य का ' आरम्भक ' अर्थात् ' उत्पादक ' है । दूसरा संयोग है अनारम्भक संयोग , जैसे विभक्त कपालों का दूसरे देश के आकाश के साथ संयोग । इससे किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती है ।
अतः इसे ' अनारम्भक ' संयोग कहते हैं । फलतः वे दोनों संयोग परस्पर विरोधी हैं , अतः एक क्रिया रूप कारण से उन दोनों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । अगर इसे मानने का हठ करें तो फूलते हुए कमल के विनाश की उक्त आपत्ति होगी । क्योंकि कमल पत्रों का ऊपर की ओर जो परस्पर संयोग है , यह कमल का उत्पादक संयोग नहीं है । उस संयोग को नष्ट करनेवाला विभाग ही कमल का फूलना है । जो सूर्य किरणों के संयोग से उत्पन्न होनेवाली पत्रों की क्रिया से होती है ।
कमल के पत्रों काही नीचे की ओर डण्टी के ऊपर अंश में भी परस्पर संयोग है । जो कमल का उत्पादक संयोग है | इस संयोग का विनाश उन रविकिरणों के उक्त क्रियाजनित विभाग नहीं होता है । यदि आग्रहवश ऐसा मानें तो कमल का विनाश मानना पड़ेगा , क्योंकि अवयवों का विशेष प्रकार संयोग ही अवयवी का उत्पादक है । एवं उक्त संयोग का विनाश ही अवयवी का विनाशक है । तस्मात् अवयवियों के उत्पादक संयोग के विनाशक विभाग और उक्त संयोग के अविनाशक विभाग दोनों की उत्पत्ति एक क्रिया से नहीं हो सकती ।
अतः प्रकृत में कपालों के संयोग को नष्ट करनेवाले विभाग की उत्पत्ति क्रिया से मानते हैं । और उन्हीं विभक्त कपालों का पूर्वदेशसंयोग के विनाशक विभाग की उत्पत्ति कपालों के उक्त विभाग से मानते हैं । अतः विभागजविभाग का मानना आवश्यक है ।
दूसरे प्रश्न का यह समाधान है कि कथित आरम्भक संयोग के विरोधी विभाग से युक्त अवयवों का दूसरे आकाशादि देशों के साथ तब तक संयोग नहीं हो सकता जब तक की अवयवी विनष्ट नहीं हो जाता । अतः क्रिया से विभाग विभाग से पूर्व ( आरम्भक ) संयोग का नाश , संयोग के इस नाश से घट का नाश जब हो जाएगा तभी घट के उत्पादक उक्त विभक्त कपालों का दूसरे देशों के साथ संयोग उत्पन्न हो सकता है । अतः उक्त रोति माननी पड़ती है ।
परत्व और अपरत्व
परत्व और अपरत्व ये दोनों ही दैशिक और कालिक भेद से दो दो प्रकार के हैं । एक वस्तु से दूसरी वस्तु की दूरी दैशिक परत्व है और एक वस्तु का दूसरे वस्तु से समीप होना दैशिक अपरत्व है । ये दोनों ही आपेक्षिक हैं , अतः अपेक्षाबुद्धि ही इनके कारण हैं और तीसरे अवधि की भी अपेक्षा होती है । जैसे कि पटना से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है । एवं पटना से प्रयाग की अपेक्षा काशी समीप है ।
कालिक परत्व का ही दूसरा नाम ज्येष्ठत्व है । एवं कालिक अपरत्व का ही दूसरा नाम कनिष्ठत्व है । कालिक परत्व और अपरत्व भी आपेक्षिक हैं । क्योंकि जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से ज्येष्ठ होता है , वही अपने से पूर्ववर्त्ती की अपेक्षा कनिष्ठ भी होता है । एवं जो कोई व्यक्ति एक व्यक्ति से कनिष्ठ होता है वही अपने से
४ पश्चाद्वर्ती की अपेक्षा ज्येष्ठ भी होता है । अतः इनमें भी अपेक्षाबुद्धि की आवश्यकता होती है । अतः अपेक्षाबुद्धि के नाश से इनका नाश होता है ।
परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धिसापेक्ष हैं । अतः इनके निरूपण के बाद ही आकर ग्रन्थों में बुद्धि का निरूपण किया गया है । तदनुसार मैं भी अब बुद्धि का निरूपण प्रारम्भ करता हूँ । बुद्धि के निरूपण में नव्यन्याय की दृष्टि से भी कुछ विषयों को समझाने का मैंने प्रयास किया है ।
बुद्धि
संसार के सभी व्यवहारों के मूल में बुद्धि ही काम करती है । संक्षेपतः ( १ ) प्रमा ( विद्या ) और ( २ ) अप्रमा ( अविद्या ) इसके दो भेद हैं । इनमें अप्रमा के ( १ ) संशय ( २ ) विपर्यय ( ३ अनध्यवसाय और ( ४ ) तर्क , ये चार भेद हैं ।
ज्ञान या बुद्धि को अच्छी तरह से समझने के लिए उसके विशिष्ट स्वरूप के प्रत्येक अंश को अच्छी तरह समझ लेना आवश्यक है । नैयायिकों और वैशेषिकों के मत में ज्ञान किसी विषय का ही होता है । बिना विषय के ज्ञान नहीं होते । ज्ञान में भासित होनेवाले विषय ( १ ) विशेषण ( २ ) विशेष्य और ( ३ ) उन दोनों के संसर्ग , ये तीन प्रकार के हैं । ' विषय ' का एक चौथा प्रकार भी है जो निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होता है ।
' घवद्भूतलम् ' इस ज्ञान में मुख्यतः घट विशेषण है , और भूतल विशेष्य है , एवं संसर्ग वह संयोग । जिसके कारण भूतल में घट का रहना सम्भव होता है । वैसे तो इसी ज्ञान में घट में घटत्व भी भासित होता है । अतः घटत्व भी विशेषण है , और घट भी विशेष्य है , एवं इन दोनों का समवाय भी संसर्ग है । इसी प्रकार भूतल में भूतलत्व और संयोग में संयोगत्व के भान होने के कारण भूतलत्व संयोगत्वादि और भी विशेषण हैं एवं घट भूतलादि और भी विशेष्य हैं । किन्तु ये गौण हैं । विशेषण को ही ' प्रकार ' कहते हैं ।
ज्ञान के इन विषयों में ज्ञानीय ' विषयता ' नाम का एक धर्म भी है जो विषयों के प्रकारविशेष्यादि के विभेदों के कारण ( १ ) प्रकारता ( २ ) विशेष्यता और ( ३ ) संसर्गता भेद से तीन प्रकार का है । निर्विकल्पज्ञान के चौथे प्रकार के विषयों में रहनेवाली इन तीनों विषयताओं से भिन्न एक चौथी विषयता भी है । उक्त प्रकारता ही उस स्थिति में प्रायशः विधेयता कहलाती है जिसमें कि उसका आश्रय पहिले से ज्ञात न हो । विशेष्यता ही स्थिति विशेष में उद्देश्यता कहलाती है ।
ऊपर जिस संसर्ग की चर्चा की गयी है वह विभिन्न दो व्यक्तियों में क्रमशः विशेष्यविशेषणभाव का सम्पादक वस्तु विशेष रूप है , ' दण्डी पुरुषः ' इत्यादि स्थलों में चूँकि दण्ड का संयोग संसर्ग या सम्बन्ध पुरुष में है इसीलिए दण्ड विशेषण है और पुरुष विशेष्य है । सम्बन्ध ( १ ) साक्षात् और ( २ ) परम्परा भेद से दो प्रकार का है । साक्षात् सम्बन्ध संयोग समवाय स्वरूपादि भेद से अनेक प्रकार के हैं । जिस सम्बन्ध के निर्माण में दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता हो उसे परम्परा सम्बन्ध कहते हैं । यह
( २५. ) अनन्त प्रकार का हो सकता है । इसकी कोई संख्या निर्णित नहीं हो सकती । यह सम्बन्ध ऐसे दो वस्तुओं का भी हो सकता है , जिन्हें साधारण सम्बन्ध से कभी परस्पर सम्बद्ध होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती । ( १ ) वृत्तितानियामक और ( २ ) वृत्तिता का अनियामक भेद से सम्बन्ध दो प्रकार का है । जिस सम्बन्ध से आधार - आधेयभाव की प्रतीति हो उसे ' वृत्तिता का नियामक ' सम्बन्ध कहते हैं । ये संयोग समवायादि नियमित प्रकार के ही हैं । जिससे दो सम्बन्धियों में केवल सम्बद्ध मात्र होने की प्रतीति हो उसे वृत्तिता का अनियानक सम्बन्ध कहते हैं ।
जिस ज्ञान के विशेष्य में विक्षेषण की सत्ता वस्तुतः रहे उसी ज्ञान को ' प्रमा ' कहते हैं यथार्थ चाँदी में जो ' इदं रजतम् ' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है वह ' प्रमा ' ज्ञान है , क्योंकि ज्ञान का विशेष्य या उद्देश्य है चाँदी ( रजत ) उसमें रजतत्व रूप विशेषण की या प्रकार की वस्तुतः सत्ता है , अतः उक्त ज्ञान ' प्रमा ' है । किस वस्तु में किस वस्तु की यथार्थ सत्ता है ? इस प्रश्न का यह समाधान यह है जिस विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध की सत्ता रहे , उसी विशेष्य विशेषण की यथार्थ सत्ता है । प्रकुत उदाहरण के रजत रूप विशेष्य में रजतत्व जाति का समवाय सम्बन्ध है अतः रजत्व की सत्ता रजत में है । शुक्तिका में जो इदं रजतम् ' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है वह ' प्रमा ' इस लिए नहीं है कि इस ज्ञान के विशेष्य शुक्तिका में रजतत्व का समवाय नहीं है । अतः शुक्तिका में रजत्व का ज्ञान प्रमा न होकर ' अप्रमा ' है । फलतः प्रमा के विपरोत अर्थात् जिस ज्ञान के विशेष्य में विशेषण की सत्ता न रहे उस ज्ञान को ही ' अप्रमा ' या अविद्या या भ्रम कहते हैं ।
अयथार्थ ज्ञान के भेदादि इस ग्रन्थ में विस्तृत रूप से वर्णित हैं । कथित प्रमाज्ञान या यथार्थज्ञान के दो भेद हैं ( १ ) प्रत्यक्ष और ( २ ) अनुमिति । शब्दादिजन्य जितने भी प्रमाज्ञान हैं वे सभी प्रायः अनुमिति में ही अन्तर्भूत हैं । फलतः प्रमाकरण भी अर्थात् प्रमाण भी ( १ ) प्रत्यक्ष और ( ३ ) अनुमान भेद से दो ही प्रकार के हैं , शब्दादि जितने भी प्रकार के प्रमाज्ञान हैं , वे सभी इन्हीं दोनों में से किसी करण से उत्पन्न होते हैं ।
प्रत्यक्ष शब्द ' प्रति ' शब्द और ' अक्ष ' शब्द से ' प्रतिगतम् अक्षि ' या ' अक्ष्याक्षिप्रति वर्त्तते ' इन दोनों व्युत्पत्तिओं के द्वारा निष्पन्न होता है । प्रकृत में अर्थ के साथ सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष शब्द से अभीष्ट है । अर्थात् विषय के साथ सम्बद्ध इन्द्रिय ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । इस प्रमाण के द्वारा उत्पन्नयथार्थ ज्ञान ही ' प्रत्यक्ष ' रूप प्रमिति है । फलतः इन्द्रिय ओर अर्थ के संनिकर्ष जो यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो वह है प्रत्यक्ष - प्रमिति और इस प्रमिति का कारण ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रत्यक्ष के प्रसङ्ग में और विशद विवेचन इस ग्रन्थ में देखना चाहिए ।
' अनु ' पूर्वक ' मा ' धातु से अनुमान शब्द बना है । ' अनु ' शब्द का अर्थ है पश्चात् । ' पश्चात् ' शब्द अपने अर्थबोध के लिए किसी और अवधि की आकांक्षा रखता है । प्रकृत में वह अवधि है ' लिङ्गपरामर्श ' । अर्थात् लिङ्गपरामर्श के पश्चात् ही जो ज्ञान उत्पन्न हो उसे ‘ अनुमिति ' कहते हैं । इसी दृष्टी से ' परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः ' इस प्रकार अनुमिति के लक्षण मिलते हैं । व्याप्तिज्ञान और पक्षधर्मताज्ञान इन दोनों परामर्श उत्पन्न होता है । हेतु के आश्रय में साध्य का नियमित से रहना ही व्याप्ति है । पक्ष में हेतु का रहना ही पक्षधर्मता है । ' साध्यव्याप्यो हेतुः ' यही व्याप्तिज्ञान का आकार है , और ' हेतुमान् पक्षः ' यह पक्षधर्मताज्ञान का आकार है । अतः मिलकर इन दोनों से उत्पन्न परामर्श का स्वभावतः ‘ साध्यव्याप्यहेतुमान् पक्षः ' यह आकार होता है । इस परामर्श को ही ' तृतीयलिङ्गपरामर्श ' भी कहते हैं । इस दृष्टि से पक्षधर्मता - ज्ञान हेतु का प्रथम ज्ञान है , और व्यातिविशिष्टहेतु का ज्ञान हेतु का दूसरा ज्ञान है , व्याप्ति और पक्षधर्मता इन दोनों रूपों से हेतु का परामर्श रूप तीसरा ज्ञान होता है , अतः उसे " तृतीय लिङ्गपरामर्श " कहते हैं । इसके बाद ही अनुमति की उत्पत्ति होती है ।
पक्षता
इस प्रसङ्ग में एक विचार उठता है कि प्रायः सभी ज्ञान दो क्षणों तक रहते हैं , तीसरे क्षण में उनका विनाश होता है । कथित परामर्श भी ज्ञान है , अतः वह भी दो क्षणों तक रहेगा । जिस क्षण में वह उत्पन्न होगा , उसके अव्यवहित उत्तरक्षण में जिस प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा , इस अनुमिति के अगले क्षण में भी उसी प्रकार की अनुमिति को वह क्यों नहीं उत्पन्न करता ? क्योंकि कथित दूसरी अनुमिति के अव्यवहित पूर्वक्षण में अर्थात् पहिली अनुमिति की उत्पत्तिक्षण में परामर्श की सत्ता है ।
एवं परामर्श अनुमिति का अन्यनिरपेक्ष कारण है । परामर्श संबलन के बाद अनुमिति के लिए और किसी की अपेक्षा नहीं रह जाती । सुतराम् परामर्श अगर अपनी उत्पत्तिक्षण के अव्यवहित उत्तरक्षण में जिस विषय की जिस आकार प्रकार की अनुमिति को उत्पन्न करेगा , उसी आकार प्रकार की उसी विषय की दूसरी अनुमिति को भी अपने स्थितिक्षण के अव्यवहित उत्तरक्षण में फलतः पहिली अनुमिति के अव्यवहित उत्तरक्षण में उत्पन्न करने में कोई बाधा तो नहीं है ? किन्तु ऐसी बात होती नहीं है ।
अनुमान को जितने माननेवाले दार्शनिक हैं , उनमें से कोई भी एक आकार प्रकार की अनुमिति के रहते हुए उसी आकार प्रकार की दूसरी अनुमिति की सत्ता को स्वीकार नहीं करते । किन्तु किसी की स्वीकृति और अस्वीकृति मात्र पर वस्तु के सामर्थ्य को अन्यथा नहीं किया जा सकता । फलतः एक अनुमिति रूप सिद्धि के रहते हुए परामर्श के रहने पर भी दूसरी अनुमिति न हो सके , इसके लिए परामर्श के सामान ही अनुमिति का एक और साक्षात् कारण माना गया है जिसका नाम है ' पक्षता ' ।
इसका ऐसा स्वरूप या लक्षण होना चाहिए , जिससे एक अनुमिति या अन्य किसी प्रकार की सिद्धि के रहते हुए कथित दूसरी अनुमिति की आपत्ति न हो सके । इसी प्रयोजन को सामने रखकर पक्षता के अनेक लक्षण किए गये हैं । जैसे कि ( १ ) सध्य का संशय ही पक्षता है । ( २ ) अनुमित्सा ही पक्षता है । ( ३ ) अथवा अनुमित्सा की योग्यता पक्षता है । ( ४ ) सिद्धि का अभाव ही पक्षता है ।
पक्षता के इन सभी लक्षण करनेवालों की यहीं दृष्टि रही है कि अनुमिति या अन्य किसी भी प्रकार की सिद्धि के रहते हुए उक्त प्रकार के लक्षणों से आक्रान्त किसी भी पक्षता रूप कारण का रहना संभव न हो । क्योंकि सभी के साथ सिद्धि का विरोध है । अतः सिद्धि के रहते हुए पक्षता रूप कारण का संचलन संभव ही नहीं है । अतः एक अनुमिति बाद दूसरी अनुमिति की आपत्ति नहीं दी जा सकती ।
पक्षता के ये जितने भी लक्षण कहे गये हैं , उन सभी लक्षणों का तत्त्वचिन्तामणिकार ने खण्डन किया है । खण्डन की युक्तियों को विस्तृत रूप से चिन्तामणि के पक्षता प्रकरण में देखना चाहिए । संक्षेप में तत्त्वचिन्तामणिकार कहना है कि एक अनुमिति के रहते हुए परामर्शादि सभी कारणों के रहने पर भी जब दूसरी अनुमति नहीं होती है , तो पहली अनुमिति या सिद्धि को दूसरी अनुमिति का प्रतिबन्धक मानना पड़ेगा ।
क्योंकि और सभी कारणों के रहने पर भो जिसके रहते कार्य उत्पन्न न हो सके , उसे ही कार्य का प्रतिबन्धक कहा जाता है । प्रतिबन्धक का अभाव भी कार्य का एक कारण ही है । अतः प्रकृत में सिद्धि का अभाव भी अनुमिति का एक कारण है । जिसके चलते एक अनुमिति के बाद तुरत दूसरी अनुमिति नहीं हो जाती । अतः सिद्धि का अभाव ही पक्षता है । किन्तु कभीकभी एक सिद्धि के रहते हुए भी विषय को विशेष प्रकार की जानने की इच्छा से तुरत दूसरी अनुमति होती है ।
जैसे की आत्मा को विशेष प्रकार से सजाने की इच्छा से आत्मा के श्रवण रूप सिद्धि के बाद भी मनन ( अनुमिति ) का विधान ' आत्मा वारे श्रोतव्यो मन्तव्यः ' इत्यादि श्रुतियों के द्वारा किया गया है । अगर जिस किसी भी प्रकार की भी सिद्धि के रहने पर दूसरी अनुमिते रूप सिद्धि बिलकुल ही न हो , तो फिर उक्त विधान असङ्गत हो जाएगा । अतः इतना इसमें जोड़ना आवश्यक है कि विशेष प्रकार की अनुमिति या सिद्धि की इच्छा रहने पर एक सिद्धि के रहने पर भी दूसरी अनुमिति होती है ।
अतः सामान्य रूप से सभी सिद्धियाँ अनुमिति की विरोधिनी नहीं हैं , किन्तु अनुमिति की इच्छा से असंश्लिष्ट अथवा यों कहिये कि सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि की अनुमिति की विरोधिनी है । फलतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त जो सिद्धि , उसका अभाव हो अनुमिती का पक्षता रूप कारण है । इसको समझने के लिए अनुमिति की इन तीन स्थितियों को समझना आवश्यक है । ( १ ) जहां परामर्श के बाद केवल अनुमिति रूप सिद्धि रहेगी वहां उस सिद्धि के अव्यवहित उत्तर क्षण में अनुमिति नहीं होगी ।
क्योंकि यहां कथित पक्षता रूप कारण नहीं है । यह सिद्धि अनुमित्सा या सिषाधयिषा से युक्त नहीं है , सिषाधयिषा के विरह से युक्त है । अतः यह सिद्धि अनुमिति का प्रतिबन्धक है । सुतराम् प्रतिबन्धकाभाव रूप कारण या कथित पक्षता रूप कारण के न रहने से अनुमिति का प्रतिरोध होता है । ( २ ) जहाँ परामर्शादि कारणों के साथ अगर सिषाधयिषा भी है तो फिर उक्त परामर्शजनित अनुमिति रूप सिद्धि के बाद पुनः अनुमिति होगी ।
क्योंकि यह अनुमिति रूप सिद्धि सिषाधयिषा से युक्त है , सिषाधयिषा के विरह से युक्त नहीं है । अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त न होने के कारण यह सिद्धि अनुमिति का प्रतिबन्धक नहीं है । अनुमिति का प्रतिबन्धक कोई दूसरी सिद्धि है , जिसमें सिषाधविषा का सम्बन्ध नहीं है । उसका यहाँ अभाव है , अतः पक्षता रूप कारण के रहने से अनुमति होगी । ( ३ ) जहाँ सिद्धि नहीं है वहाँ सिषाधयिषा रहे या न रहे — दोनों ही स्थितियों में अनुमिति होगो ही ।
क्योंकि यहाँ कोई भी सिद्धि नहीं है , अतः सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि भी नहीं है । सुतराम् सिषाधयिषा के विरह से युक्त सिद्धि का अभाव भी अवश्य है । अतः अनुमिति होगी । विस्तृत ज्ञान के लिए अध्यापकों का सहाय्य अपेक्षित है ।
हेत्वाभास
किस भी विषय के तत्त्व को अनुमान के द्वारा समझने के लिए जिस प्रकार हेतुओं को समझना आवश्यक है , उसी प्रकार जो हेतु नहीं हैं किन्तु हेतु की तरह दीखते हैं , उन हेत्वाभासों को भी समझना आवश्यक है । अगर ऐसा न मानें तो हेतुओं और हेत्वाभासों के संमिश्रण से कदाचित् अतत्त्व भी तत्त्व की तरह प्रतिभात होकर अन्त में अभीष्ट प्रवृत्ति को विफल कर देंगे , और अनभीष्ट स्थिति में भी डाल देंगे | अतः हेतुओं की तरह विशेष रूप से आचार्यों ने हेत्वाभासों का भी निरूपण किया है ।
' हेत्वाभास ' शब्द दो व्युत्पत्तिओं से निष्पन्न होता है । ( ६ ) हेतोरभासा हेत्वाभासाः और ( २ ) हेतुवदाभासन्ते इति हेत्वाभासाः । इन में पहिली व्युत्पत्ति के अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है ' हेतु का दोष ' ।
महर्षि गौतम ने हेत्वाभासों को ( १ ) सव्यभिचार ( २ ) विरुद्ध ( ३ ) प्रकरणसम ( ४ ) साध्यसम और ( ५ ) कालात्ययापादिष्ट भेद से पाँच प्रकारों का माना है , और सव्यभिचार हेत्वाभास को समझाने के लिए ' अनैकान्तिकः सव्यभिचारः इस सूत्र की रचना की है । जो हेतु साध्य या साध्याभाव इन दोनों में से किसी एक के साथ नियमित रूप से सम्बन्ध न हो , वही हेतु ' अनैकान्तिक ' है । अर्थात् जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहे केवल साध्य के ही साथ न रहे , वही हेतु ' अनैकान्तिक ' है । सव्यभिचारशब्द के अर्थ की आलोचना से भी इसी अर्थ की पुष्टि होती है । ' व्यभिचारेण सहितः सव्याभिचारः ' इस व्युत्पत्ति से सव्यभिचार शब्द बना है । ' व्यभिचार ' शब्द ' वि ' ' अभि ' और ' चार ' इन तीन शब्दों से बना है । इनमें ' वि ' शब्द विरुद्धार्थक है और ' अभि ' शब्द उभयार्थक है । ' चार ' शब्द सम्बन्ध का बोधक है । इसके अनुसार परस्पर विरोधी दो वस्तुओं के . साथ अर्थात् साध्य और साध्याभाव के साथ किसी आश्रय में हेतु का रहना ही व्यभिचार है । यह व्यभिचार अर्थात् साध्याधिकरण और साध्याभावाधिकरण दोनों में समान रूप से रहना जिस हेतु का हो , वही ' सव्यभिचार ' है I
साध्य के साथ नियत सम्बन्ध ही हेतु की व्याप्ति है । इस व्याप्ति के बल से ही हेतु साध्य का ज्ञापक होता है । जो हेतु उक्त प्रकार से सव्यभिचार या अनैकान्तिक होगा वह कभी कथित रीति से व्यासियुक्त नहीं हो सकता । अतः व्यभिचार युक्त हेतु ' सव्यभिचार ' नाम का हेत्वाभास है , हेतु नहीं |
किन्तु बाद में सूक्ष्म निरूपण से यह निष्पन्न हुआ कि व्याप्ति का उक्त स्वरूप ठीक नहीं है । किन्तु हेतु के नियत सम्बन्ध से युक्त साध्य के साथ सपक्षों में हेतु का रहना ही हेतु की व्याप्त है । इस प्रकार व्याप्तिशरीर के दो अंश माने गये , एक तो साध्य में हेतु का नियत सम्बन्ध अर्थात् व्यापकत्व , दूसरा हेतु के व्यापकीभूत साध्य का सपक्षों में हेतु के साथ रहना अर्थात् सामानाधिकरण्य । इस स्थिति में साध्य में हेतु के व्यापकत्ववाला जो अंश है , उसका विरोध परोक्ष रूप से ही सही , कथित व्यभिचार करेगा । क्योंकि जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहेगा , उस हेतु की व्यापकता उस साध्य में नहीं जा सकती । व्यापक होने के लिए यह आवश्यक है कि व्याप्य के अधिकरण में व्यापक का अभाव न रहे । कथित व्यभिचारी हेतु के आश्रय में तो साध्य का अभाव रहता है । अतः साध्य कभी भी व्यभिचारी हेतु का व्यापक नहीं हो सकता । इस प्रकार व्याप्ति के उक्त स्वरूप मानने के पक्ष में भी कथित व्यभिचार दोष से युक्त हेतु अवश्य ही सव्यभिचार हेत्वाभास होगा ।
किन्तु उक्त व्यासिशरीर का एक अंश और है ' व्यापकीभूत साध्य का हेतु साथ सपक्षों में रहना ' । इस अंश को विघटित करनेवाला दोष भी अगर हेतु में रहेगा तो भी वह ' व्यभिचार ' दोष से ही युक्त होने के कारण ' सव्यभिचार ' हेत्वाभास होगा क्योंकि सामान्यतः व्याप्ति का विघटन ही व्यभिचार होता है ।
व्याप्ति के उक्त द्वितीय अंश का विघटन दो प्रकारों से सम्भव । जिस स्थल में कोई सपक्ष या विपक्ष नहीं है वहाँ साध्य का हेतु के साथ सपक्ष में रहना संभव नहीं होगा क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है । एवं जहाँ संसार के सभी पदार्थ पक्ष होंगे , वहाँ भी सपक्ष का मिलना सम्भव नहीं होगा । अतः , ऐसे स्थलों में भी हेतु के साथ साध्य का सामानाधिकरण्य सपक्ष में सम्भव नहीं होगा । पहिले का उदाहरण है ' शब्दो नित्यः शब्दत्वात् ' । यहाँ शब्दत्व हेतु केवल शब्द में ही है । शब्द ही पक्ष है ।
पक्ष में साध्य अनिर्णीत रहता है । सपक्ष में साध्य और हेतु दोनों जो पहिले से निश्चित रहना चाहिए । नित्यत्व निर्णीत है आकाशादि में , वहाँ शब्दत्व हेतु नहीं है । शब्दस्य निर्णीत है शब्द में , वहाँ नित्यत्वरूप साध्य ही निर्णीत नहीं है । अतः ऐसे स्थलों में सपक्ष न मिलने के कारण सपक्ष में साध्य और हेतु का सामानाधिकरण्य संभव न होने से व्याप्ति सम्भव न होगा । अतः शब्दत्व हेतु में भी सव्यभिचार हेत्वाभास होगा ।
किन्तु नित्यत्व रूप साध्य का अभाव निर्णीत है घटादि अनित्यवस्तुओं में , वहाँ शब्दत्व भी नहीं है । अतः पूर्व कथित व्यभिचार दोष यहाँ सम्भव नहीं है । सुतराम् यहाँ नित्यत्व हेतु का केवल पक्ष में रहना किसी सपक्ष या विपक्ष में न रहना ही व्याप्ति का विघटक है । इसको ' असाधारण ' नाम का व्यभिचार कहते . | क्योंकि यह हेत्वाभास साध्य के अधिकरण और साध्याभाव के अधिकरण दोनों में साधारण रूप से सामान्य रूप से नहीं है , जैसे कि साधारण हेत्वाभास रहता है ।
यह शब्दत्व हेतु केवल शब्द रूप पक्ष में ही है , अतः उक्त शब्दत्व हेतु ' असाधारण ' नाम का व्यभिचार है ।
इसी प्रकार जिस स्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष होंगे जैसे ' सर्वमभिधेय प्रमेयत्वात् ' , ऐसे स्थलों के हेतु में भी उक्त समानाधिकरण्य संभव नहीं होगा । क्योंकि प्रकृतस्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष के अन्तर्गत आ गये हैं । सपक्ष के लिए कोई नहीं बचा है । पक्ष को पक्ष से भिन्न होना चाहिए । अतः ऐसे स्थलों में भी हेतु के व्यापक साध्य का किसी सपक्ष में हेतु के साथ रहना संभव नहीं होगा । अतः इस प्रकार के हेतुओं में भी व्याप्ति नहीं रह सकती । फलतः व्यभिचार रहेगा । किन्तु कथित साधारण या असाधारण व्यभिचार यहाँ संभव नहीं है । अतः ' अनुपसंहारी ' नाम का अतिरिक्त ही व्यभिचार दोष माना गया है । जिससे उक्त हेतु ' अनुपसंहार ' नाम का तीसरा सव्यभिचार होगा ।
अतः तत्त्वचिन्तामणिकार ने अपने सव्यभिचार प्रकरण में लक्षण करने से भी पहिले ' सव्यभिचारस्त्रिविधः संधारणासाधारणानुपसंहारिभेदात् ' यह विभाग वाक्य ही लिखा है । यद्यपि सूत्र - भाष्यादि में इस त्रैविध्य की चर्चा नहीं है
फलितार्थ यह है कि सव्यभिचार ( १ साधारण ( २ ) असाधारण ( ३ ) और अनुपसंहारी भेद से तीन प्रकार का है । इनमें जो हेतु साध्य और साध्याभाव दोनों के साथ रहे . उसे साधारण कहते हैं । जैसे कि ' धूमवान् वह्नेः ' का ह्नि हेतु । वह्नि धूम - के साथ भी महानसादि में है , और धूमाभाव के साथ भी तप्त अयःपिण्डादि में है । जो हेतु केवल पक्ष में ही रहे , सपक्ष या विपक्ष में जो न रहे उस हेत को ' असाधारण ' सव्यभिचार कहते । जैसे कि ' शब्दो नित्यः शब्दत्वात् ' इस अनुमान का शब्दत्व हेतु । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्द रूप पक्ष में ही है । न आकाशादि सपक्षों में है , और न घटादि विपक्षों में । अतः शब्दत्व हेतु ' असाधारण ' सव्यभिचार है । जिस धर्म का सभी वस्तुओं में केवल अन्वय ही रहे , व्यतिरेक या अभाव किसी भी वस्तु में न रहे उस धर्म को केवलान्वयि धर्म कहते हैं , केवलान्वयि धर्म जिस पक्ष का विशेषण ( अवच्छेदक ) हो उस पक्ष के अनुमान का हेतु भी ' व्यभिचारी ' है , क्योंकि इस अनुमान में भी कोई सपक्ष नहीं हो सकता , चूँकि सभी पदार्थ पक्ष के अन्तर्गत आ जाते हैं । अतः उक्त अनुमान के हेतु का व्यापकत्व साध्य में रहने पर भी व्यापकीभूत वह साध्य किसी सपक्ष में हेतु के साथ नहीं रह सकता , क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है ।
जो हेतु साध्य के बदले साध्याभाव के साथ ही नियमित रूप से रहे , उस हेतु को ' विरुद्ध ' हेत्वाभास कहते हैं । अर्थात् हेतु का साध्याभाव के साथ नियमित रूप से रहना ' विरोध ' नाम का हेतुदोष है जिस दोष से युक्त हेतु ' विरुद्ध ' नाम का हेत्वाभास है । ' वि ' अर्थात् विशेष रूप से साध्य की अनुमिति को जो ' रुद्ध ' करें , अर्थात् साध्य के साथ नियत रूप से न रहकर साध्यभाव के साथ ही नियमित होकर व्यतिरेकव्याप्ति को विघटित करते हुए जो अनुमिति को विघटित करे , वही विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है । नियमत : साध्य के साथ ही रहनेवाले हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही ' विरोध ' दोष है , इस विरोध दोष से युक्त हेतु ही ' विरुद्ध ' नाम का हेत्वाभास है । जैसे कि ‘ हृदो वह्निमान् जलात् ' इस अनुमिति का जल हेतु ' विरुद्ध ' हेत्वाभास है , क्योंकि जल रूप हेतु वह्नि रूप साध्य के साथ न रहकर वह्नि अभाव के साथ ही नियमित रूप से रहता है । अतः जल रूप हेतु का अभाव वह्नि का व्यापकीभूत अभाव है , इस अभाव का प्रतियोगित्व कथित जल में है ।
जिस प्रकार हेतु के साथ साध्य का नियमित रूप से रहना व्याप्ति का प्रयोजक है , उसी प्रकार साध्याभाव के साथ हेत्वभाव का नियमित रूप से रहना भी व्याप्त का एक प्रयोजक है । जिसे व्यतिरेक व्याप्ति कहते हैं । साध्याभाव के साथ नियमित रूप से रहनेवाले ( साध्याभाव व्यापकीभूत ) हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही व्यतिरेकव्याप्ति है । है । इस व्याप्ति के शरीर में साध्याभावव्यापकीभूताभाववाला जो अंश है , उसी को विरोध दोष अपने साध्यव्यापकीभूताभाववाले अंश के द्वारा विघटित कर व्यतिरेक व्याप्ति को विघटित कर देता है । इस विरोध दोष के प्रसङ्ग में एवं विरुद्ध हेत्वाभास के प्रसङ्ग में बाद में भी अधिक परिवर्तन नहीं हुआ ।
जिस हेतु के प्रयोग करने पर ' प्रकरण ' की अर्थात् परस्पर विरुद्ध दो पक्षों की ' चिन्ता ' अर्थात् संशय ही उपस्थित हो , उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष का निर्णय संभव न हो , वह हेतु अगर उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष के निर्णय के लिए प्रयुक्त हो , तो वह हेतु ' प्रकरणसम ' नाम का हेत्वाभास होगा ।
शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए नैयायिक अगर नित्यधर्मानुपलब्धि ' को हेतु रूप से उपस्थित करें तो उनका यह हेतु ' प्रकरणसम ' नाम का हेत्वाभास होगा । क्योंकि प्रतिपक्षी मीमांसक भी तुल्य युक्ति से शब्द में नित्यत्व साधन के ' अनित्यधर्मा - नुपलब्धि ' हेतु को उपस्थित कर सकते हैं । ऐसी स्थिति में शब्द में अनित्यत्व या नित्यत्व का निर्णय नहीं होगा , किन्तु शब्द में नित्यत्व और अनित्यत्व का संशय ही होगा | अतः उक्त ' नित्यधर्मानुपलब्धि ' या ' अनित्यधर्मानुपलब्धि ' रूप हेतु प्रकरणसम वाभास होगा । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि उक्त विवरण के अनुसार साध्यधर्म की अनुपलब्धि ही अगर हेतु रूप से उपस्थित किया जाएगा तो वह ' प्रकरणसम ' हेत्वाभास होगा । और कोई हेतु प्रकरणसम नहीं होगा ।
किन्तु श्री वाचस्पति मिश्र ने तात्पर्यटीका में प्रकरणसम के उक्त लक्षण को असपूर्ण ठहराया है , और प्रकरणसम को सत्प्रतिपक्ष का नामान्तर कहा है । ‘ सन् प्रतिपक्षो यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस हेतु का प्रतिपक्ष अर्थात् विरोधी दूसरा हेतु रहे वही हेतु सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रस्त है ।
वादी अगर किसी पक्ष में किसी साध्य की सिद्धि के लिए एक हेतु का प्रयोग करता है , उसके बाद ही कोई प्रतिवादी अगर उसी पक्ष में उसी साध्य के अभाव की सिद्धि के लिए दूसरे हेतु का प्रयोग करता है , तो फिर ये दोनों हेतु सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रस्त समझे जाएँगे । अगर दोनों हेतु अर्थात् हेतु और प्रतिहेतु दोनों समानबल के हों । अर्थात् दोनों में व्याप्ति और पक्षता समान रूप से रहे , तो वे दोनों सत्प्रतिपक्ष दोष से ग्रसित होंगे और दोनों ही हेतु न होकर ' सत्प्रतिपक्षित ' नाम के हेत्वाभास होंगे ।
इसी बात को दृष्टि में रखकर ' समान बलों सत्प्रतिपक्षौ ' यह लक्षणवाक्य प्रचलित हैं । इन दोनों हेतुओं में से अगर एक हेतु व्याप्ति और पक्षधर्मता से युक्त होने के कारण प्रबल रहेगा और दूसरा उन दोनों से रहित होने के कारण दुर्बल रहेगा तो फिर वहाँ सत्प्रतिपक्ष दोष नहीं होगा । दुर्बल हेतु में केवल व्यमिचार या स्वरूपासिद्धि दोष होगा । और सबल हेतु से अभीष्ट अनुमिति हो जाएगी ।
प्राचीन नैयायिकों ने सत्प्रतिपक्ष को अनित्य दोष माना है । उन लोगों का अभिप्राय है कि जब तक कि हेतुलिङ्गकपरामर्श और प्रतिहेतुलिङ्गकपरामर्श इन दोनों
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( ३२ > में से किसी एक परामर्श के किसी भी अंश में भ्रमत्व का निश्चय नहीं हो जाता , तब तक ही उक्त दोनों हेतु सत्प्रतिपक्षित रहेंगे , उक्त भ्रमत्व निश्चय के बाद नहीं । अतः कुछ नियमित समय में ही रहने के कारण सत्प्रतिपक्ष अनित्य दोष है । इस मत में सद्धेतु स्थल में भी अगर विरोधी प्रतिहेतु का भ्रमात्मक परामर्श भी है , तो सद्धेतु भी तक तक सत्प्रतिपक्षित रहेगा , जब तक कि उक्त भ्रमात्मक विरोधी प्ररामर्श का भ्रमत्व ज्ञात नहीं हो जाता ।
नव्य नैयायिकों के मत से सत्प्रतिपक्ष नित्य दोष हैं । क्योंकि किसी हेतु को सत्प्रतिपक्षित होने के लिए इतना ही आवश्यक है कि प्रकृत हेतु से जिस पक्ष में साध्य का साधन इष्ट है , उस पक्ष में उक्त साध्य के अभाव की व्याप्ति से युक्त दूसरा ( प्रतिहेतु ) अगर विद्यमान है , तो वह पहिला हेतु सत्प्रतिपक्षित होगा । जल में वह्नि के साधक सभी हेतु सत्प्रतिपक्षित होंमे । क्योंकि वह्नि के अभाव की व्याप्ति जलत्व में है , एवं जल मेंवह्नयभावव्याप्यजलत्व सर्वदा ही विद्यमान है । अतः इस प्रकार का हेतु सदा ही सत्प्रतिपक्षित रहेगा । अतः सत्प्रतिपक्ष नित्य दोष है ।
महर्षि गौतम ने चौथे हेत्वाभास का नाम ' साध्यसम ' कहा है । और उसके स्वरूप को समझाने के लिए ' साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः ' यह सूत्र लिखा है । पहिले से जो सिद्ध नहीं रहता है वहीं ' साध्य ' कहलाता है । हेतु के लिए यह आवश्यक है कि वह पहिले से ' सिद्ध ' रहे । अर्थात् उसमें असाध्य की व्याप्ति सिद्ध रहे । एवं ( साध्यव्याप्ति से युक्त ) हेतु स्वयं पक्ष में सिद्ध रहे । किन्तु जिस अनुमान का हेतु पहिले से सिद्ध नहीं है , वह हेतु साध्य के समान ही है , अतः उसे ' साध्यसम ' कहा गया है । अगर कोई ' छाया द्रव्य है क्योंकि वह गतिशील है ' इस प्रकार से अनुमान का प्रयोग करे तो यहाँ ' गतिशीलत्व ' हेतु ' साध्यसम ' हेत्वाभास होगा । क्योंकि ' छाया में गति है ' यही पहिले से सिद्ध नहीं है । अतः छाया में द्रव्यत्व की सिद्धि की तरह छाया में गति की भी सिद्धि अपेक्षित है ।
' साध्यसम ' हेत्वाभास को ही नव्य नैयायिकों ने ' असिद्ध ' शब्द से व्यक्त किया है । एवं ( १ ) आश्रयासिद्ध ( २ ) स्वरूपासिद्ध और ( ३ ) व्याप्यत्वासिद्ध इसके ये तीन भेद किये हैं । जिसमें साध्य की सिद्धि अभिप्रेत हो उसे पक्ष कहते हैं । पक्ष को ही ' आश्रय ' भी कहते हैं । आश्रय अगर सिद्ध नहीं रहेगा तो अनुमान कहाँ होगा ? अगर कोई साधारण फूलों के दृष्टान्त से आकाशकुसुम में गन्ध का अनुमान करे तो वहाँ के सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे । एवं स्वर्णमय पर्वत में अगर कोई वह्नि का अनुमान करे तो वहाँ के भी सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे । यद्यपि पर्वत असिद्ध नहीं है , किन्तु पर्वत में स्वर्णमयत्व असिद्ध है | अतः स्वर्णमयपर्वतरूप विशिष्टपक्ष भी असिद्ध है ।
हेतु यदि कथित पक्ष में विद्यमान न रहे तो वह हेतु ' स्वरूपासिद्ध ' हेत्वाभास होगा | जैसे कि जल में कोई धूम हेतु से भी वह्नि का अनुमान करना चाहेगा तो वहाँ का धूम हेतु स्वरूपा सिद्ध हेत्वाभास होगा । क्योंकि जल रूप पक्ष में धूम हेतु नहीं है । भाष्यकार ने जो असिद्ध का उदाहरण दिया है , वह स्वरूपासिद्ध का ही उदाहरण है , क्योंकि छाया या अन्धकार में गति रूप हेतु नहीं है । इससे ऐसा भान होता है कि वात्स्यायनादि प्राचीन नैयायिकों ने केवल स्वरूपासिद्ध को ही असिद्ध मानते थे । असिद्ध और भेद बाद में किये गये ।
हेतु में उसके विशेषणीभूत धर्म ( हेतुतावच्छेदक ) के अभाव और साध्य में साध्यतावच्छेदक के अभाव को व्याप्यत्वासिद्धि दोष कहते हैं । इस दोष से युक्त हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास है । ' पर्वतो वह्निमान् काञ्चनमयधूमात् ' इस अनुमान के हेतु - धूम काञ्चनमयत्व रूप हेतुतावच्छेदक नहीं है । अतः वह ( हेत्वप्रसिद्धि रूप ) व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास है । एवं ' पर्वतः काञ्चनमयवह्निमान् धूमात् ' इस अनुमान के साध्य वह्नि में काञ्चनमयत्व रूप साध्यतावच्छेदक नहीं है , अतः यह हेतु ( साध्या प्रसिद्ध रूप ) ब्याप्यत्वासिद्ध है । इसी प्रकार व्याप्ति में अनुपयोगी ( व्यर्थ ) विशेषणादि से युक्त हेतु भी व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास ही है , जैसे कि ' पर्वतो वह्निमान् नीलधूमात् ' इत्यादि स्थलों का नीलधूम रूप हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है , क्योंकि धूम का नील विशेषण व्यर्थ है । यह ध्यान रहना चाहिए कि दोष जहाँ कहीं भी रहे , किन्तु दुष्टता हेतु में ही आवेगी ।
पाँचवें हेत्वाभास को महर्षि ने ' कालातीत ' की संज्ञा दी है , और इसके परिचय के लिए " कालात्ययापदिष्टः कालातीतः ” इस सूत्र का निर्माण किया है ।
पक्ष में पूर्ण रूप से निश्चित साध्य के लिए अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती है । एवं पक्ष में जिस साध्य का अभाव ही पूर्णरूप से निश्चित है , उस साध्य के लिए भी न्याय की प्रवृत्ति नहीं होती है । किन्तु जो साध्य पक्ष में सन्दिग्ध रहता है , उस साध्य को उस पक्ष में निश्चित रूप से समझाने के लिए ही न्याय का प्रयोग होता है । हेतुवाक्य का प्रयोग भी न्याय के ही अन्तर्गत है ।
जिस समय जिस पक्ष में जिस साध्य का सन्देह वर्त्तमान है , वही समय हेतुप्रयोग के लिए उपयुक्त है । यदि उस समय उस पक्ष में उप साध्य का अभाव दूसरे किसी बलवत् प्रमाण से निश्चित है , तो उस समय उस पक्ष में साध्य का सन्देह नहीं रह सकता । साध्यसन्देह का समय पक्ष में साध्याभाव निश्चय के पूर्व ही था , जो ' अतीत ' हो चुका है । अतः जिस पक्ष में जिस साध्य का अभाव किसी बलवत् प्रमाण से निश्चित है , उस पक्ष में उस साध्य की अनुमिति के लिए अगर कोई हेतु का प्रयोग करे तो वह हेतु व्याप्ति - पक्षधर्मता प्रभृति से युक्त होने पर भी ' कालातीत ' नाम का हेत्वाभास होगा | उससे प्रमा अनुमिति नहीं हो सकती । इसका अतीतकाल ' नाम भी प्राचीन ग्रन्थों में है ।
नवीननैयायिक इस हेत्वाभास को ही ' बाधित ' और उसके विशेषणीभूत दोष को ' बाध ' कहते हैं | पक्ष में बलवत् प्रमाण के द्वारा निश्चित साध्य के अभाव का निश्चित रहना ही बाध है । फलतः पक्ष में साध्याभाव का रहना ही बाघ दोष है । जिस किसी भी सम्बन्ध के द्वारा इस बाध दोष से युक्त हेतु ही ' बाधित ' नाम का हेत्वाभास है ।
दूसरी व्युत्पत्ति के अनुसार हेत्वाभास शब्द का अर्थ होता है ' दुष्टहेतु ' । दोषों से युक्त हेतु ही दुष्ट हेतु है । फलतः कथित दोष ही दुष्ट हेतुओं को सद्धेतुओं से पृथक् करते है । अतः दुष्टहेतु रूप हेत्वाभासों को समझने के लिए हेतु के दोषों को समझना पहिले आवश्यक है । दोषों को समझ लेने के बाद ' इस दोष से युक्त ही दुष्ट हेतु है ' इस प्रकार दुष्टहेतुओं को समझना सुलभ हो जाता है । इसी दृष्टि से ' हेतोरभासा हेत्वाभासाः ' इस व्युत्पत्ति से लभ्य हेतु के दोषों का ही लक्षण आकर ग्रन्थों में किया गया है ।
हेतुओं के ये दोष दो प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं । एक सीधे ही अनुमिति को रोकते हैं । जैसे कि सत्प्रतिपक्ष और बाध | कुछ हेत्वाभास अनुमिति के कारण व्याप्ति या पक्षधर्मता का विघटन करते हुए अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं , जैसे कि व्यभिचार एवं स्वरूपासिद्धि | कुछ हेत्वाभास ऐसे भी हैं जो उक्त दोनों ही प्रकार से अनुमिति का प्रतिरोध करते हैं , जैसे कि आश्रयासिद्धि एवं साध्याप्रसिद्धि ।
हेत्वाभास की संख्याओं में और नामों में भी मतभेद देखा जाता है । जैसे कि वैशेषिकदर्शन के सूत्र में इसके तीन ही भेद कहे गये हैं , किन्तु भाष्यकार ने उनमें अनध्यवसित नाम को जोड़कर निम्नलिखित चार भेद किया है । ( १ ) असिद्ध ( २ ) विरुद्ध ( ३ ) सन्दिग्ध और ( ४ ) अनध्यवसित । न्यायमत में ( १ ) सव्यभिचार ( २ ) विरुद्ध ( ३ ) सत्प्रतिपक्ष ( ४ ) असिद्ध और ( ५ ) बाध ये पाँच हेत्वाभास के मुख्य भेद माने गये हैं । मीमांसकों ने महर्षि कणाद की रीति से इसके तीन ही भेद किये हैं ।
इस प्रकार ज्ञान के परिशोधन के अभिप्राय से आचार्यों ने हेतु की तरह हेत्वाभासों को भी समझाने में बहुत श्रम किया है । जिसका लाभ हम लोगों को उठाना चाहिए । एक पक्ष के स्थापन के लिए विरुद्ध पक्ष के हेतुओं में दोषों का प्रदर्शन आवश्यक है । जो आज भी न्यायालयों के व्यवस्थाओं को सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर अवगत हो सकता है । प्राचीन समय के धर्मशास्त्रानुयायी व्यवस्थाओं को देखने से तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है । जिसके लिए भारतीय व्यवहार के द्वैतपरिशिष्टादि निबन्ध ग्रन्थों के व्यवहारप्रकरणों को देखना उपयोगी होगा ।
सुख
जिस इच्छा के लिए और किसी इच्छा की आवश्यकता न हो उसे ' सुख ' कहते हैं । सुख की इच्छा से ही चन्दनवनितादि सभी विषयों की इच्छा होती है । अर्थात् चन्दनादि विषय चूँकि सुख के कारण हैं , इसीलिए उनकी इच्छा होती हैं । सुख की इच्छा के लिए किसी और इच्छा की आवश्यकता नहीं होती । अतः किसी और इच्छा के अनधीन इच्छा का विषय ही ' सुख ' है ।
दुःख
इसी प्रकार जिसमें द्वेष उत्पन्न होने के लिए मध्य में दूसरे विषयों के द्वेष की अपेक्षा न हो वही ' दुःख ' है । मुख्यतः जीवों को दुःखों से ही द्वेष है । फिर ' ये मुझे न मिलें ' इस प्रकार की धारणा से जिनसे साक्षात् या परम्परा से दुःख मिलने की सम्भावना समझ में आती है , उन सभी वस्तुओं से द्वेष उत्पन्न होता है |
इच्छा
अपने लिए अथवा दूसरे के लिए किसी अप्राप्त वस्तु की ' मुझे यह मिले या उसे यह मिले ' इस प्रकार की जो प्रार्थना , उसे ही ' इच्छा ' कहते हैं । काम अभिला • बादि इसके अनेक अवान्तर भेद हैं ।
द्वेष
आत्मा के जिस गुणके द्वारा जीव अपने को जलता सा अनुभव करे वही ' द्वेष ' हैं । क्रोध द्रोहादि इसी के अवान्तर भेद हैं ।
प्रयत्न
उत्साह को ही ‘ प्रयत्न ' कहते हैं । यह तीन प्रकार का है ( १ ) जीवनधारणोपयोगी ( या जीवनयोनि ) ( २ ) इच्छा से उत्पन्न और ( ३ ) द्वेष से उत्पन्न | इनमें जीवनयोनि यत्न से सोते हुए जीव के प्राणादि वायुओं की क्रियायें उत्पन्न होती हैं । एवं जागते हुए पुरुष का इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होता है । अपने अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के लिए आवश्यक क्रिया का कारण ही इच्छाजनित ' प्रयत्न ' है । इस इच्छाजनित प्रयत्न के कारण ही शरीर का पतन नहीं होता । एवं अहित वस्तुओं से बचने के लिए जो व्यापार होते हैं , उनका कारण भी प्रयत्न ही है , जो द्वेष से उत्पन्न होता है ।
बुद्धि से लेकर प्रयत्न तक कहे गये ये १७ गुण ही महर्षि कणाद के सूत्रों के द्वारा कहे गये हैं 1 । गुरुत्व , द्रवत्व , स्नेह , संस्कार , धर्म अधर्म और शब्द इन सात वस्तुओं में गुणत्व की व्यवस्था भाष्यकार प्रशस्तपाद ने की है । और इसे कथित सत्रह गुणों के विधायक सूत्र में पटित ' च ' शब्द के द्वारा सूत्रकार का अनुमत माना है ।
गुरुत्व
पृथिवी और जल का पहिला पतन जिस गुण के कारण हो उसे ' गुरुत्व ' कहते हैं । यह ' गुरुत्व ' नाम का गुण केवल पृथिवी और जल में ही रहता है । गुरुत्व से पतन का सिद्धान्त पृथ्वी के मध्याकर्षणवाले आधुनिक सिद्धान्त से बिलकुल विपरीत है ।
स्नेह
जो केवल जल का ही विशेषगुण हो उसे ' स्नेह ' कहते हैं । स्नेह के हीकारण आटा प्रभृति पिसे हुए द्रव्यों की गोल आकृति बन सकती हैं । घृतादि जिन पार्थिवद्रव्यों से उक्त आकृतियाँ बनती हैं , वहाँ भी घृतादि में जल सम्बन्ध के कारण ही वैसा होता है ।
संस्कार
' संस्कार ' नाम का भी एक गुण है जिसके ( १ ) वेग ( २ ) भावना और ( ३ ) स्थितिस्थापक ये तीन भेद हैं । ( १ ) वेग नाम संस्कार क्रिया से उत्पन्न होता है और पृथिवी , जल , तेज , वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में रहता है । ( २ ) ' भावना ' नाम का संस्कार आत्मा में रहता है । इसी के बल से स्वयं तीसरे क्षण में ही विनष्ट हो जाने पर भी पूर्वानुभव स्मृति को उत्पन्न करता है । ( ३ स्थितिस्थापक संस्कार के कारण ही बाँस प्रभृति द्रव्यों के अग्रभाग को बलात् नीचे से ले आकर छोड़ देने बाद वे फिर अपनी पहिले की स्थिति में आ जाते हैं ।
धर्म
जीव के उस गुण को धर्म कहते हैं , जिससे उसे सुख मिलता है , इसी का दूसरा नाम पुण्य है । ' किन क्रियाओं से धर्म की उत्पत्ति होती है ? ' इसको श्रुति स्मृति ही ही धर्म ' विहितकर्मजन्यो धर्मः ' धर्म का लक्षण किया समझा सकते हैं । तदनुसार ' श्रुत्यादि प्रमाणों के द्वारा निर्दिष्ट क्रियाओं से उत्पन्न गुण ' ' है इस प्रकार यह जाता है ।
अधर्म
अधर्म भी जीव का ही विशेष प्रकार का गुण है । जिससे जीवों को दुःख मिलता है । शास्त्रों में निषिद्ध जीवहत्यादि क्रियाओं से इसकी उत्पत्ति होती है ।
शब्द
श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले गुण को ही शब्द कहते हैं । यह संयोग से विभाग से और शब्द से उत्पन्न होता है । दण्ड और भेरी के संयोग से शब्द की उत्पत्ति होती है । एवं बाँस प्रभृति के विभाग से भी शब्द की उत्पत्ति होती है । किन्तु संयोग और विभाग से उत्पन्न शब्दव्यक्ति का श्रवण संभव नहीं है , क्योंकि प्रत्यक्ष के लिए विषय के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध आवश्यक है । शब्द रूप विषय का ग्राहक श्रवणेन्द्रिय है । यह आकाश रूप है । आकाश अमूर्त्त होने के कारण कहीं जा नहीं सकता । अतः शब्द की उत्पत्ति जिस देशावच्छिन्न आकाश में होता है , वहाँ श्रवणेन्द्रिय जा नहीं सकता । किन्तु उस शब्द का प्रत्यक्ष तो होता है । इसलिए यह कल्पना करनी पड़ती है कि संयोग या विभाग से जिस शब्दव्यक्ति की उत्पत्ति होती है , उसी शब्द से उसी शब्द के सदृश दूसरे शब्द की उत्पत्ति अनन्तर प्रदेश में होती है । इस प्रकार एक शब्द से दूसरे शब्द की उत्पत्ति , और दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति की धारा जल की तरङ्गों की तरह चलती है । उस धारा के अन्तर्गत जब किसी की उत्पत्ति कर्णवाले आकाश प्रदेश में होती है , तो उस शब्द का प्रत्यक्ष होता है । अतः संयोग और विभाग की तरह शब्द से भी शब्द की उत्पत्ति माननी पड़ती है ।
कर्म
सभी प्रकार के चलने को या गतियों को ' कर्म ' कहते हैं । ऊपर की तरफ उछालने की क्रिया को उत्क्षेपण एवं निचे की तरफ गिराने की क्रिया को अपक्षेपण ' कहते हैं । समेटने की क्रिया को ' आकुञ्चन ' , और सामने बाहर की तरफ फैलाने की क्रिया को प्रसारण कहते हैं । शेष सभी क्रियाओं का ' गमन ' कहते हैं । क्रियाओं का ऐसा विशद एवं सूक्ष्म वर्णन और किसी दर्शन में नहीं है । उसे इस मूल ग्रन्थ में देखा जा सकता है ।
सामान्य
सभी व्यक्तियों के कुछ असाधारण धर्म होते हैं , जो उसी व्यक्ति में रहते हैं । इसके द्वारा ही जगत् के और सभी वस्तुओं से उस व्यक्ति को अलग रूप में समझा जाता है । इसी प्रकार कुछ ऐसे भी धर्म हैं जिनके कारण पदार्थ व्यक्तिशः भिन्न होते हुए भी एक आकार की प्रतोति के विषय होते हैं । जैसे सभी घट व्यक्तियाँ अलग - अलग हैं । किन्तु ' अयं घट : ' इस एक ही प्रकार से सब की प्रतीति होती है । विभिन्न व्यक्तियों की यह एक आकार की प्रतीति का कोई प्रयोजक अवश्य है । उस प्रयोजक को ही ' सामान्य ' कहते हैं । अतः जो समान आकृत्यादिवाले विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति का कारण हो वहीं ' सामान्य ' है । इसे जाति भी कहते हैं ।
बौद्धों का इस प्रसङ्ग में कहना है कि कोई भी व्यक्ति केवल अपने से भिन्न और सभी व्यक्तियों से विभिन्न रूप में ही प्रतीति होती है । अतः घटव्यक्ति में घंटों से भिन्न पटादि सभी व्यक्तियों का जो भेद है , वही विभिन्न घटों में " यह घट है " इस प्रकार की प्रतीति से भासित होता है , क्योंकि सभी घटों में घट से भिन्न और सभी पदार्थों का भेद समान रूप से विद्यमान है । इस समान विषयक प्रतीति का सम्पादक है यह तद्भिन्नभिन्नत्व या अपोह , इससे ही उक्त विभिन्न व्यक्तियों में समान आकार की प्रतीतियों का सम्पादन होता है । इसके लिए अलग जाति का नाम के भाव पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है ।
विशेष
' विशेष ' नाम का भी एक पदार्थ वैशेषिक लोग मानते हैं । इसे केवल वैशेषिक लोग ही मानते हैं । इसको मानने में वे इस युक्ति का प्रयोग करते हैं कि जिस प्रकार घटपटादि दृश्य पदार्थों में परस्पर भेद मानते हैं उसी प्रकार उनके उत्पादक परमाणुओं में और आकाशकालादि विभु पदार्थों में भी भेद मानना होगा । किन्तु घट पटादि सावयव पदार्थों में परस्पर भेद के नियामक उनके अवयवों के भेद हैं । अर्थात् घट पट से भिन्न इसलिए हैं कि घट के उत्पादक कपाल और पट के उत्पादक तन्तु परस्पर भिन्न हैं । जिनके उत्पादक अवयव परस्पर भिन्न जाति के होते हैं , वे सभी द्रव्य भी परस्पर भिन्न जाति के ही होते हैं । किन्तु निरवयव परमाणु और आकाशादि के तो अवयव नहीं हैं । अवयवों के भेद से उसमें परस्पर भेद का नियम नहीं किया जा सकता । अतः निरवयव द्रव्यों में परस्पर भेद का नियामक कोई पदार्थ मानना पड़ेगा । इसी पदार्थ का नाम ' विशेष ' है । अर्थात् जो अपने - अपने आश्रयीभूत द्रव्य को अपने से भिन्न सभी वस्तुओं से ' विशेष ' रूप में या भिन्न रूप में समझावे वहीं ' विशेष ' है । यह प्रत्येक निरवय द्रव्य में अलग अलग है फलतः अनन्त है ।
किन्तु इस प्रसङ्ग में यह समझना शेष रहता है कि एक परमाणु में एक विशेष है , दूसरे परमाणु में दूसरा विशेष है । अतः एक परमाणु से दूसरा परमाणु भिन्न है । फलतः दोनों परमाणुओं में रहनेवाले दोनों विशेषों के परस्पर भेद ही दोनों परमाणु में परस्पर भेद के प्रयोजक हैं । किन्तु इन दोनों विशेषों में परस्पर भेद है ? इसका ही कौन नियामक है ? इस प्रसङ्ग में वैशेषिकों का कहना है कि ये विशेष ' स्वतः व्यावृत्त ' इनमें परस्पर भेद के लिए किसी दूसरे नियामक की आवश्यकता नहीं है ।
इस ' स्वतोव्यावृत्ति ' वाली दुर्बलता के कारण ही नव्यवैशिषकों ने ' विशेष ' पदार्थ को अस्वीकार कर दिया है । उन लोगों का कहना है कि अगर परमाणु प्रभृति निरवयव द्रव्यों में रहनेवाले विशेषों को स्वतः व्यावृत्त मानते हैं , तो फिर परमाणुप्रभृति सभी निरवयव द्रव्यों को ही स्वतोव्यावृत्त क्यों नहीं मान लेते ? इसमें क्या लाभ है कि निरवय पदार्थों में परस्पर भेद के लिए उनमें स्वतोव्यावृत्तस्वभाववाले विशेषों की कल्पना की जाय ?
समवाय
समवाय नाम का एक पष्ठ पदार्थ भी महर्षि ने माना है । संयोग की तरह समवाय भी सम्बन्ध रूप है , क्योंकि यह भी विशेष्यविशेषणभाव का नियामक है । संयोग सम्बन्ध से समवाय सम्बन्ध में यह अन्तर है कि यह अपने आधार और आधेय इन दोनों में से एक के विनष्ट होने तक बना रहता है । संयोग में यह बात नहीं है । यह अपने आधार और आधेय दोनों के बने रहने पर भी विनष्ट हो जाता है । आधार या आधेय के सत्ता पर्यन्त समवाय का रहना ही वस्तुतः समवाय की नित्यता है । यद्यपि आकाशादि की तरह समवाय की नित्यता का भी उपपादन किया गया है !
विशेष्यविशेषणभाव का नियामक ही सम्बन्ध है । ' घटवद्भूतलम् ' इत्यादि स्थल में घट का संयोग भूतल में है , अतः घट विशेषण है । एवं भूतल विशेष्य इसलिए है कि भूतानुयोगिक संयोग घट में है । इसी प्रकार महर्षि कणाद ने समवाय का लक्षण करते हुए लिखा है कि ' इहेदमिति यतः कार्यकारणयोः सम्बन्धः स समवायः ' ( ७-२-२६ )
' इह कुण्डे दधि ' , ' इह कुण्डे वदराणि ' इत्यादि प्रतीतियों में जिस प्रकार कुण्ड और दही एवं कुण्ड और बेर इन विशेष्य और विशेषणों को छोड़कर दोनों के संयोग सम्बन्ध भी विषय होते हैं ; उसी प्रकार ' इह तन्तुषु पट ' ' इह वीरणेषु कटः ' , ' इह द्रव्ये द्रव्य गुणकर्माणि ' , ' इह गवि गोत्वम् ' , ' इहात्मनि ज्ञानम् , ' इहाकाशे शब्द : ' इत्यादि प्रतीतियों में भी तन्तु आधारों और पट प्रभृति आधेयो से अतिरिक्त कोई सम्बन्ध अवश्य ही भासित होता है ।
क्योंकि कोई भी विशिष्टबुद्धि विशेष्य और विशेषण के सम्बन्ध के बिना उत्पन्न ही नहीं हो सकती । ' इह तन्तुषु पट : ' इत्यादि प्रतीतियों का नियामक यह सम्बन्ध संयोग हो नहीं सकता , क्योंकि संयोग तो अन्यतरकर्मज होगा , अथवा उभयकर्मज होगा किं वा संयोगज होगा । प्रकृत में तन्तु प्रभृति में पट प्रभृति के सम्बन्ध की उत्पत्ति उक्त कर्मादि से नहीं होती है । दूसरी बात यह है कि जिन दो वस्तुओं का संयोग होता है , उन दोनों का विभाग भी अवश्य होता है ।
किन्तु तन्तु प्रभृति का प्रयादि के साथ कभी विभाग नहीं होता । जब तक पट की सत्ता रहेगी , तब तक वह तन्तु के साथ सम्बद्ध ही रहेगा । अतः संयोग से भिन्न समवाय नाम का भी सम्बन्धात्मक एक स्वतन्त्र पदार्थ वैशेषिक लोग मानते हैं । वैशेषिक सम्प्रदाय से भिन्न नैयायिक और मीमांसक ( प्रभाकर ) भी इसे मानते हैं । किन्तु इसके स्वरूप में कुछ मतभेद है । जैसे कि वैशेषिकगण इसे अतीन्द्रिय और नित्य मानते हैं , किन्तु नैयायिक इसे नित्य मानते हुए भी प्रत्यक्षवेद्य मानते हैं ।
प्रभाकर इसकी नित्यता को ही अस्वीकार करते हैं । वेदान्ती और सांख्यदर्शन के अनुयायी इसके कट्टर विरोधी हैं ।
सभी सम्बन्धों के प्रतियोगी और अनुयोगी होते हैं । तदनुसार इसके भी प्रतियोगी और अनुयोगी हैं । द्रव्य , गुण , कर्म , सामान्य और विशेष इसके प्रतियोगी हैं । एवं द्रव्य , गुण और कर्म ये तीन ही इसके अनुयोगी हैं । अर्थात् कथित द्रव्यादि पाँच पदार्थ ही समवाय सम्बन्ध से रहते हैं , और द्रव्य , गुण और कर्म में ही रहते हैं ।
संयोग सम्बन्ध को दृष्टान्त मानकर इसकी सिद्धि की गयी है । संयोग अपने अनुयोगियों और प्रतियोगियों में समवाय सम्बन्ध से रहकर ही विशिष्ट बुद्धि का सम्पादन करता है । अतः समवाय को अगर विशिष्टबुद्धि के नियामक रूप से स्वीकार करते हैं , तो यह भी निर्णय करना होगा कि वह अपने प्रतियोगी और अनुयोगी में किस सम्बन्ध से रहकर उक्त विशिष्टबुद्धियों का सम्पादन करेगा ? समवायवादियों के ऊपर इसके विरोधी इसी प्रश्न के द्वारा अपना चरम प्रहार करते हैं । विरोधियों का अभिप्राय है कि अगर • समवाय के रहने के लिए किसी दूसरे सम्बन्ध की कल्पना करेंगे तो फिर उस सम्बन्ध के रहने के लिए भी दूसरे सम्बन्ध की कल्पना आवश्यक होगी , जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । यदि स्वरूप सम्बन्ध से उसके प्रतियोगी और अनुयोगी में समवाय की सत्ता मानेंगे , तो फिर द्रव्यादि जिन पाँच पदार्थों का समवाय सम्बन्ध मान रहे हैं , उनका स्वरूप सम्बन्ध ही क्यों नहीं मान लेते ?
इस आक्षेप का उत्तर समवायवादी वैशेषिकादि इस प्रकार देते हैं कि घटादि द्रव्यों में रूपादि गुण यायादि का अगर स्वरूप सम्बन्ध से ही रहना मानें , तो फिर यह निर्णय करना कठिन होगा कि ये सम्बन्ध किसके स्वरूप हैं ? क्योंकि घटादि भी अनन्त हैं , और उनमें रहनेवाले गुण एवं क्रियादि भी अनन्त हैं । सम्बन्ध को अनन्त पदार्थ स्वरूप मानना सम्भव नहीं है । हमलोग अगर इसके लिए अलग समवाय नाम का सम्बन्ध मान लेते हैं , तो फिर इस प्रकार की कोई भी आपत्ति नहीं रह जाती है । क्योंकि वह अपने सभी प्रतियोगियों और अनुयोगियों में एक ही है , और स्वाभिन्न स्वरूप सम्बन्ध से ही है । एवं समवाय में रहनेवाला सम्बन्ध भी चूँकि समवाय रूप ही है , अतः आगे विभिन्न सम्बन्ध की कल्पना की धारा ही रुक जाती है । अतः इस पक्ष में न अनवस्था दोष है , और न कल्पना का गौरवदोष है । अतः समवाय का मानना आवश्यक है ।
अभाव
अभाव पदार्थ को महर्षि कणाद के द्वारा उनके सूत्रों से स्वीकृत मानकर मैं उसका विवरण दे रहा हूँ । इस प्रकरण के अन्त में ' अभाव पदार्थ भी महर्षि कणाद को अभीष्ट था ' इसकी उपपत्ति यथामति दे दी है ।
प्रथमतः अभाव के ( १ ) अन्योन्याभाव और ( २ ) संसर्गाभाव ये दो भेद हैं । तादात्म्य नाम का एक सम्बन्ध है , जिसके द्वारा इस सम्बन्ध के प्रतियोगी का अभेद उसके अनुयोगी में प्रतीत होता है । जैसे कि ' नरः सुन्दरः ' इस बुद्धि में भासित होनेवाले तादात्म्य सम्बन्ध के द्वारा नर ' और ' सुन्दर ' में अभेद प्रतीत होता है । जिस अभाव की प्रतियोगिता इस तादात्म्य सम्बन्ध से नियमित हो या अविच्छिन्न हो , उस प्रतियोमिता के आश्रयीभूत वस्तु का अभाव ही अन्योन्याभाव है । इस अभिप्राय से ही ' तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिताको भावोऽन्योन्याभाव ' अन्योन्याभाव का यह लक्षण प्रसिद्ध है । ' अन्योन्याभाव का ही दूसरा नाम ' भेद ' है ।
' अन्योन्यस्मिन् अन्योन्यस्याभाव : ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो अभाव जिस अनुयोगी में रहे , अगर उस अनुयोगी का अभाव भी प्रथमोक्त अभाव के प्रतियोगी में रहे तो वह अभाव ' अन्योन्याभाव है ' । जैसे कि ' घटो न ' इस आकार का अन्योन्याभाव पट में है । यतः अनुयोगीभूत इस पट का भी अन्योन्याभाव घट में है । अन्योन्याभाव के बोधक वाक्य में उसके प्रतियोगी के योषकपद और अनुयोगी के बोधकपद दोनों ही प्रथमान्त होते हैं , जैसे कि ' घटो न पटः । किन्तु संसर्गभाव के अभिलापक वाक्य प्रतियोगि के बोधक पद तो प्रथमान्त होते हैं , किन्तु अनुयोगी के बोधक पद प्रायः सप्तम्यन्त होते हैं , जैसे कि ' भूतले घटो नास्ति ' ।
अन्योन्याभाव को छोड़कर ओर सभी अभाव संसर्गाभाव कहलाते हैं । संसर्गाभाव के द्वारा अनुयोगी में प्रतियोगी के संसर्ग का ही प्रतिषेध होता है ' भूतले घटो नास्ति ' यहाँ पर यद्यपि भूतल में घट के निषेध का ही व्यवहार होता है , " किन्तु सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर वह प्रतिषेध भूतल में घटसंयोग का ही प्रतिषेध प्रतिपन्न होता है । क्योंकि भूतल में यतः घट का संयोग है , अतः भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट की सत्ता है । सुतराम् भूतल में घट संयोग की सत्ता ही घटना का नियामक है । अतः भूतल में घट संयोग की असत्ता ही घट की असत्ता की प्रयोजिका होगी ।
( १ ) प्रागभाव ( २ ) प्रध्वंसाभाव और ( ३ ) अत्यन्ताभाव भेद से संसर्गाभाव तीन प्रकार का है । कार्य की उत्पत्ति से पहिले उपादानकारण में कार्य के जिस अभाव का व्यवहार होता है वह ' प्रागभाव ' है जैसे कि तन्तु में पट का अभाव दूध में दही का अभाव इत्यादि । यह यद्यपि अनादि है , किन्तु इसका विनाश होता है । क्योंकि पट की उत्पत्ति के बाद तन्तु में पुनः इस अभाव की प्रतीति नहीं होती है ।
( ४ ९ )
मुद्गरादि के प्रहार से घटादि के नाश को ही प्रध्वंस या ध्वंश कहते हैं । इस की उत्पत्ति तो होती है , किन्तु विनाश होता । ध्वंस का विनाश मानने पर फूटे हुए घड़े की पुनः उत्पत्ति माननी पड़ेगी , क्योंकि घटादि के ध्वंस का ध्वंस घटादि के उत्पत्ति स्वरूप हो हो सकता है । अतः ध्वंस सादि होने पर भी अनन्त है ।
संसर्गभावों में जो अभाव नित्य हो उसे ही ' अत्यन्ताभाव ' कहते हैं । अत्यन्ताभाव की न उत्पत्ति होती है ' न उसका विनाश ही होता है जैसे कि वायु में रूपादि का अभाव अन्तन्ताभाव है , भूतल में घटाभाव भी अत्यन्तामाव ही है । ।
इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठता है कि अत्यन्ताभाव यदि नित्य है तो वह अपने आश्रयों में बराबर रहेगा । अतः भूतल में घट की सत्त्वदशा में भी घटाभाव की प्रमा प्रतीति होनी चाहिए । किन्तु भूतल में घट की स्थिति दशा में घटाभाव की प्रतीति को प्रमा नहीं स्वीकार किया जा सकता ।
इसको दो उत्तर दिये जाते हैं । ( १ ) कुछ लोगों का कहना है , अत्यन्ताभाव नित्य और अनित्यभेद से दोनों प्रकार का है । वायु में रहनेवाला रूप का अत्यन्ताभाव नित्य है । एवं भूतलादि में रहनेवाला घटाभाव अनित्य है , क्योंकि भूतल में घट के न रहने पर वह उसन्न होता है , पुनः घट के आ जाने पर वह घटाभाव नष्ट हो जाता है । अतः उस समय भूतल में घटाभाव नहीं है ।
( २ ) कुछ लोगों का कहना है कि सभी अत्यन्ताभाव नित्य हैं । अगर ऐसी बात . न हो , भूतल में घट के आ जाने पर घटात्यन्ताभाव का नाश मान लिया जाय तो उस समय अन्यत्र भी घटात्यन्ताभाव की सत्ता न रह पायेगी । जिससे भूतल की तरह और सभी आश्रयों में भी जहाँ कि उस समय घट की सत्ता नहीं है - घटाभाव की प्रतीति प्रमा न हो सकेगी ।
अतः सभी अत्यन्ताभाव नित्य ही है भूतल में घट की स्थिति दशा में जो घटाभाव की प्रतीति प्रमा नहीं होती है , उसका कारण है उस समय भूतल में घटाभाव के सम्बन्ध का न रहना सम्बन्ध के रहने से ही सम्बद्ध वस्तुओं की सत्ता होती है । भूतल में घट का संयोग है , अतः संयोग सम्बन्ध से भूतल में घट है । तन्तुओं में पट का समवाय सम्बन्ध है , अतः समवाय सम्बन्ध से तन्तुओं में पट की सत्ता है । भूतल में घटाभाव की सत्ता का प्रयोजक स्वरूप सम्बन्ध केवल साधारण भूतल स्वरूप ' नहीं है ।
किन्तु घट का असमानकालिक जो भूतल , तत्स्वरूप है । जिस है , समय असमान- भूतल में घट की सत्ता रहती है , , उस समय का भूतल घट का समानकालिक कालिक नहीं । अतः उस समय भूतल में घटाभाव की सत्ता का उपयुक्त स्वरूप सम्बन्ध नहीं है । सुतराम् उस समय अन्यत्र घटाभाव की सत्ता रहते हुए भी भूतल में घटाभाव की सत्ता नहीं है । अतः उस समय भूतल में होनेवाली घटाभाव की प्रतीति प्रमा नहीं होती है । सुतराम् किसी भी अत्यन्ताभाव को अनित्य मानने की आवश्यकता नहीं है ।
सभी अत्यन्ताभाव उत्पत्ति और विनाश से रहित है , अतः पूर्णरूप से नित्य है ।
अभाव के प्रसन में नव्य नैयायिकों ने इतना अधिक विचार किया है कि उसके कुछ अंशों को भी जाने बिना अभाव का ज्ञान अधूरा ही रहेगा । अतः तदनुसार मैं अभाव को प्रकृत रूप से समझने के लिए उससे सम्बद्ध कुछ विषयों का परिचय देना आवश्यक समझता हूँ ।
जिस प्रकार संयोगादि सभी सम्बन्धों का एक प्रतियोगी और एक अनुयोगी होता है उसी प्रकार सभी अभावों के भी प्रतियोगी और अनुयोगी होते हैं । प्रतियोगी शब्द यहाँ प्रतिपक्षी का बोधक है । अतः जो अभाव जिसका विरोधी अर्थात् प्रतिपक्ष होगा वही उसका प्रतियोगी होगा । फलतः अभाव जिस वस्तु का होगा , वही वस्तु उस अभाव का प्रतियोगी होगा । जैसे कि ' घट का अभाव पट का अभाव , रूप का अभाव ' इत्यादि रीति से जिसके सम्बन्ध से युक्त होकर जिस अभाव की प्रतीति होती है , वही उस अभाव का प्रतियोगी होता है । जैसे कि जहाँ पर घटाभाव रहेगा , वहाँ घट नहीं रहेगा , अतः घटाभाव घट का विरोधी है । एवं घट का अभाव ही घटाभाव है " , अतः घटाभाव का प्रतियोगी घट है । एवं पटाभाव का प्रतियोगी पंट है , रूपाभाव का प्रतियोगी रूप है ।
जो अभाव जिस आश्रयीभूत वस्तु में रहेगा , वही वस्तु उस अभाव का अनुयोगी हाँगा । जैसे किं वायु रूपाभाव का अनुयोगी है , घटादि जड़ पदार्थ ज्ञानाभाव के अनुयोगी हैं ।
कथित प्रतियोगी में रहनेवाला धर्म ही प्रतियोगित्व या प्रतियोगिता है , एवं कथित अनुयोगी में रहनेवाला धर्म ही अनुयोगिता है ।
इस प्रसन्न में यह विशेष रूप से विचारणीय है कि एक स्थान में एक सम्बन्ध विद्यमान वस्तु का भी दूसरे सम्बन्ध से उसी स्थान में अभाव रहता है । जैसे कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहने पर भी समवाय सम्बन्ध से भूतल में घट का अमाव रहता है । इसी प्रकार एक स्थान में एक रूप से एक वस्तु की सत्ता रहने पर भी दूसरे रूप से उसी वस्तु का अभाव उसी आश्रय में रहता है । जैसे कि किसी गृह में पटत्व रूप से शुक्ल पट के रहने पर भी नीलपट रूप विशेष रूप से पट नहीं रहता , अतः उक्त शुक्लपट के आश्रय गृह में ' नीलपटत्वेन पटो नास्ति ' यह ( विशेष रूप ' सामान्याभाव ) अभाव रहता है । क्योंकि शुक्ल पट की सत्ता गृह में है , इससे नीलपट की सत्ता गृह में नहीं रह जाती । एवं वही पट जब घर से बाहर रहता है , उस समय उसमें बहिर्वृत्तित्व रूप धर्म रहता है । इस बहिर्वृत्तित्व रूप से पट कभी भी घर मैं नहीं रह सकता । अतः घर में पट की सत्स्व दशा में पटत्वेन पट के रहते हुए भी
तित्वेन पट का अभाव रहता है । एवं जिस समय घर में पट तो है , किन्तु घट नहीं है , उस समय केवल घट के रहने पर भी घट पट दोनों नहीं है । अतः पटत्वेन पट की सत्ता घर में रहने पर भी घटपटोभयत्वेन पट की सत्ता नहीं है । क्योंकि ऐसा तो नहीं कह सकते कि घट है इस लिए घट और पट दोनों ही है । अतः उभयाभाव के एक प्रतियोगी के रहने पर भी उमयत्वेन उसी प्रतियोगी का अभाव रहता है । इसको ही ' एकसत्वेऽपि द्वयं नास्ति ' इस वाक्य के द्वारा व्यवहार करते हैं । इस प्रकार सम्बन्ध के द्वारा और धर्म के द्वारा अभावों में वैलक्षण्य होता है ।
किन्तु प्रतियोगिता के द्वारा ही अभावों में वैलक्षण्य आ सकता है । अतः यह कहा जाता है कि अभाव की प्रतियोगितायें किसी सम्वन्ध से एवं किसी धर्म से नियमित ( अविच्छिन्न ) होती हैं । जो प्रतियोगिता जिस सम्बन्ध से एवं जिस धर्म से अविच्छिन्न ( नियमित ) होगी , वही सम्बन्ध और वही धर्म उस प्रतियोगिता का अवच्छेदक होगा । जैसे कि ' समवायेन घटो नास्ति " इस अभाव की प्रतियोगिता समवाय सम्बन्ध और घटत्व धर्म से अवच्छिन्न है । अतः उक्त अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध समवाय है , और प्रतियोगितावच्छेदक धर्म घटत्व है । तदनुसार नवीन नैयायिक ‘ समवायेन घटों नास्ति ' इस वाक्य का अर्थ करते हैं -- " समवायसम्बन्धावच्छिन्नघटत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावोऽस्ति " |
सम्बन्ध को अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक मानने में यह युक्ति है कि सामान्यतः किसी भी वस्तु का अभाव कहीं भी नहीं है । अन्ततः कालिक सम्बन्ध से सभी वस्तुएँ सभी जगह वर्तमान हैं । अतः जब भी किसी वस्तु का अभाव कहीं व्यवहृत होता है , तो उसके मध्य में कोई विशेष प्रकार का सम्बन्ध कार्य करता रहता है । सम्बन्ध का यह कार्य प्रतियोगिता में वैलक्षण्य सम्पादन के द्वारा ही हो सकता है , और किसी प्रकार नहीं ।
जिस सम्बन्ध से जो वस्तु जहाँ नहीं है , वहीं सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता में और अभाव की प्रतियोगिताओं से वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अतः वही सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता का ' अवच्छेदक ' है । एवं वह प्रतियोगिता उस सम्बन्ध से अवच्छिन्ना होती हैं ।
जैसे कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए समवायेन घटो नास्ति ' इस प्रकार का जो अभाव रहता है , उस अभाव की प्रतियोगिता में समवाय सम्बन्ध ही ( संयोगसम्बन्धावच्छिन्नघट निष्ठप्रतियोगिता की अपेक्षा ) वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अगर समवाय सम्बन्ध उक्त प्रतियोगिता में वैलक्षण्य का प्रयोजक न हो तो फिर घटनिष्ठ सभी प्रतियोगिताएँ समान रह जाएगी ।
जिससे जिस प्रकार भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए संयोगेन घटो नास्ति ' यह प्रतीति नहीं होती है , उसी प्रकार ' समवायेन घटो नास्ति ' यह प्रतीति भी न हो सकेगी । अतः ' समवायेन घटो नास्ति ' इस अभाव की प्रतियोगिता में और प्रतियोगिताओं से वैलक्षण्य का सम्पादक समवाय सम्बन्ध को मानना पड़ेगा । सम्बन्धों में प्रतियोगिताओं का यह ' विशेषकत्व ' ही सम्बन्ध का प्रतियोगितावच्छेकत्व है ।
धर्म को प्रतियोगिता का नियामक ( अवच्छेदक ) मानने में यह युक्ति है कि किस अभाव की प्रतियोगिता कहाँ कहाँ है ? एवं कहाँ नहीं ? इसके लिए प्रतियोगिता का कोई ऐसा नियामक ( अवच्छेदक ) धर्म मानना पड़ेगा जो सभी प्रतियोगियों में रहे एवं अप्रतियोगिभूत वस्तुओं में न रहे । इसी नियामक धर्म को प्रतियोगिता का ' अवच्छेदक धर्म ' कहते हैं , जो इस नियामक के द्वारा नियमित होता है , वह उस धर्म से ' अवच्छिन्न ' होता है । जैसे कि घटाभाव की प्रतियोगिता कहाँ कहाँ है ? एवं कहाँ कहाँ नहीं ?
इस प्रश्न का यही उत्तर है कि घटत्वधर्म जहाँ कहीं भी है , उन सभी स्थानों में अर्थात् सभी घटों में घटाभाव की प्रतियोगिता है । एवं जिन सब स्थानों में घटत्व नहीं है अर्थात् घट से भिन्न पटादि सभी वस्तुओं में वह प्रतियोगिता नहीं है । अतः घटत्व ही घटाभाव की प्रतियोगिता की स्थिति का नियामक है । एवं घटाभाव की प्रतियोगिता घटत्व से नियम्य है । वस्तुतः नियामकत्व ही अवच्छेदकत्व है और नियम्यत्व ही अवच्छिन्नत्व है ।
इस दृष्टि से यद्यपि ' अच्छेदक ' पद के स्थान में ' नियामक ' पद का और ' अवच्छिन्न ' पद के स्थान में ' नियम्य ' पद का भी प्रयोग किया जा सकता है , किन्तु ' अवच्छेदक ' पद ही उक्त अर्थ में परम्परा से प्रयुक्त है , अतः उसके स्थान में दूसरे पदों की प्रयुक्ति से झटिति बोध में बाधा पहुँचेगी और अप्रयुक्तत्व दोष प्रयोक्ता के ऊपर आ पड़ेगा ।
सप्तपदार्थी
इधर वैशेषिकदर्शन के मूर्द्धन्य प्रकरण ग्रन्थों के प्रभाव से विद्वानों की यह धारणा चली आ रही है कि महर्षि कणाद और उनके अनुयायी द्रव्य , गुण , कर्म , सामान्य , विशेष , समवाय और अभाव इन सात पदार्थों की सत्ता मानते थे ।
किन्तु महर्षि कणाद ने " धर्मप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् ” ( अ१- आ -१ - सू ० ४ ) इस पदार्थोद्देश्य सूत्र में पदार्थ का उल्लेख नहीं किया है । एवं वैशेषिक दर्शन के सब से प्रामाणिक भाष्यकार प्रशस्तपाद ने भी अभाव पदार्थ का उल्लेख नहीं किया है । एवं विपक्षियों के
धर्मं व्याख्यातुकामस्य षटपदार्थोपवर्णनम् ।
सागरं गन्तुकामस्य हिमबद्गमनोपम् ॥
( अर्थात् " धर्म की व्याख्या के लिए प्रवृत्त पुरुष के द्वारा छः पदार्थों का वर्णन वैसा ही अयुक्त है जैसा कि समुद्र की ओर जानेवाले पुरुष के लिए हिमालय पर जाना अयुक्त है ) | " इत्यादि उक्तियों से भी इस धारणा को बल मिला है कि महर्षि कणाद द्रव्यादि छः भावपदार्थों को ही मूलतः मानते थे । पीछे आकर उपपत्ति की दृष्टि से आवश्यक समझकर आचार्यों ने ' अभाव ' को भी वैशेषिक दर्शन के द्वारा अभिमत स्वतन्त्र पदार्थों में गणना कर ली , और तब से ही वैशेषिकदर्शन को सप्तपदार्थवादी माना जाने लगा ।
अत एव किरणावलीकार उदयनाचार्य न्यायकन्दलीकार श्रीधर भट्ट , न्यायलीलावतीकार वल्लभाचार्य प्रभृति वैशेषिकदर्शन के सभी प्रमुख आचार्यों को इसकी उपपत्ति देनी पड़ी है कि “ पदार्थोद्देश " सूत्र में अभाव पदार्थ की अनुक्ति से उसका महर्षि कणाद के द्वारा अस्वीकृति का समर्थन नहीं किया जा सकता । किन्तु महर्षि कणाद के द्वारा निर्मित सूत्रों में निम्नलिखित पाँच सूत्र ऐसे हैं , जिनसे अभाव पदार्थ का स्वातन्त्र्य और उसके प्रागभावादि चार भेदों का स्पष्टतः उल्लेख है ।
एवं ये पाँच सूत्र उन सभी सूत्र व्याख्याताओं के द्वारा स्वीकृत है जो अभी तक उपलब्ध हैं । कणाद सूत्र की अभीतक तीन प्राचीन स्वतन्त्र टीकाएँ उपलब्ध है ( १ ) अनेकशः प्रकाशित शङ्कर मिश्र कृत उपस्कार टीका , ( २ ) मिथिला विद्यापीठ के द्वारा प्रकाशित अज्ञातनामा किसी दाक्षिणात्य विद्वान् की टीका , एवं ( ३ ) बड़ौदा से प्रकाशित चन्द्रानन्द पंडित कृत टीका । इन सभी टीकाकारों के द्वारा ये पाँच सूत्र स्वीकृत हैं और इनकी व्याख्या भी प्रायः उक्त सभी टीकाओं में एक सी
। पं . जयनारायण तर्कपञ्चानन की विवृति और चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार के भाष्य ये दो वैशेषिक सूत्र की अर्वाचीन टीकाएँ हैं । इन दोनों में भी उक्त पाँच सूत्र हैं । इन उपपत्तियों से अपने निर्णय पर पहुँचने के बाद मैंने चौखम्बा सिरीज से प्रकाशित शङ्कर मिश्र कृत ‘ कणादरहस्य ' के अन्त में चन्द्रकान्त तर्कालङ्कार महाशय कृत वैशेषिक दर्शनभाष्य की एक आलोचना छपी देवी है , आलोचक का नाम उसमें नहीं है , इस आलोचना के अन्त में स्वतन्त्र रूप से इन पाँच सूत्रों का उल्लेख किया गया है , और व्याख्या लिखी गय है | और उन्होंने लिखा है कि ' अभाव को कणाद के द्वारा अस्वीकृति का जो आक्षेप किया जाता है , उसके निराकरण के लिए ही मैंने इन सूत्रों की व्याख्या की है ' । अतः इन पाँच सूत्रों की प्रामाणिकता में कोई सन्देह नहीं है | सूत्र हैं—
( १ ) क्रियागुणव्यपदेशाभावात् ( ६-१-१ ) । उत्पत्ति से पहिले ( घटादि कार्य ) असत् हैं , क्योंकि उस समय उनमें क्रियाओं का और गुणों का व्यवहार नहीं होता ।
( २ ) सदसत् ( ६-१-२ ) । पहिले से विद्यमान मी घटादि कार्य नाश के बाद असत् हैं ( क्योंकि नाश के बाद भी उनमें गुण क्रियादि का व्यवहार नहीं होता ) ।
( ३ ) असतः क्रियागुणव्यपदेशाभावादर्थान्तरम् । अविद्यमान पदार्थों में यतः क्रियादि का व्यवहार नहीं होता है , अतः अभाव पदार्थ द्रव्यादि भावपदार्थों से भिन्न पदार्थ है ।
( ४ ) सच्चासत् ( E - १-४ ) । सत् अर्थात् विद्यमान घटादि का भी प्रतिपेध होता है ( यह प्रतिषेध ही अन्योन्याभाव हैं ) ।
( ५ ) यच्चान्यदसतस्तदसत् ( ६-१-५ ) । कथित तीनों प्रकार के अभावों से भिन्न अभाव भी हैं ( यही अत्यन्ताभाव है ) ।
इनमें तीसरे सूत्र से अभाव को द्रव्यादि छः पदार्थों से भिन्न ठहराया गया है , और शेष चार सूत्रों में से पहिला प्रागभाव का , दूसरा ध्वंस का चौथा अन्योन्याभाव का एवं पाँचवाँ अत्यन्ताभाव का ज्ञापक है । अतः इन सूत्रों के द्वारा अभाव का इत्यादि छः पदार्थों से स्वातन्त्र्य और उसके प्रागभावादि चारों भेद सुव्यवस्थ हैं ।
सुतराम् उद्देश्य सूत्र में अभाव पदार्थ का पृथक रूप से उल्लेख न रहने के कारण सूत्रकार के ऊपर न्यूनता का ही आक्षेप कथञ्चित् हो सकता है । इससे अभाव के प्रसङ्ग में उनकी असम्मति नहीं मानी जा सकती । उपसंहार सूत्रों के अनुसार भी उपक्रम सूत्र में ह्रासवृद्धि अनेक स्थानों में देखी जाती है ।
इस बात यह है कि मिथिलाविद्यापीठ से और बड़ौदा से जो वैशेषिकसूत्र छपे हैं , उन दोनों में ही " द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानाम् " इत्यादि उद्देशसूत्र हैं ही नहीं । अतः इस सूत्र का प्रामाण्य ही सन्दिग्ध है । अतः सन्दिग्धप्रामाण्यवाले सूत्र के द्वारा किसी निश्चित प्रणाम पर नहीं पहुँचा जा सकता ।
वैशेषिक दर्शन के प्रसङ्ग में षट्पदार्थ प्रतिपादक और जितने भी वाक्य हैं , वे सभी कथित बैशेषिक सूत्रों से दुर्बल ही हैं । अतः प्रवादों के बल पर अभाव की वैशेषिकशास्त्रीय स्वीकृति काटी नहीं जा सकती है ।
इन सभी उपपत्तियों के अनुसार मेरी सम्मति में अभाव पदार्थ भी महर्षि कणाद | के द्वारा स्वीकृत है ।
इस पुस्तक के पाठ के प्रसङ्ग में मैंने साधारणतः मुद्रित न्यायकन्दली का ही अनुसरण किया है । किन्तु जहाँ कहीं मुझे ऐसे पाठ मिले , जिससे प्रकृत अर्थ का बोध ही संभव नहीं था , उनको यथामति संशोधन करके तदनुसार ही अनुवाद किया है । किन्तु मूल में यथावत् प्रायः मुद्रित पुस्तक के पाठ को ही रहने दिया है । नीचे टिप्पणी में उपपत्ति सहित उन पाठभेदों का उल्लेख कर दिया है । विद्वान् लोग इस पर अवश्य ष्ट करें |
अनुवाद में मैंने अर्थ को स्पष्ट करने के अभिप्राय से कुछ अधिक शब्दों के प्रयोग का स्वातन्त्र्य ग्रहण किया है । इतने बड़े आकार के ग्रन्थ में न्यूनता के अतिरिक्त भ्रम और प्रमाद की पूरी संभावना है । अतः विद्वानों से क्षमा याचना पूर्वक प्रार्थना है कि ऐसे स्थलों से मुझे अवश्य अवगत करावें । जिससे अगर इसका पुनः संस्करणं संभव हुआ तो उन अवगतियों से लाभ उठाया जा सके |
द्विद्वांसोऽनुगृह्णन्तु चित्तश्रौत्रः प्रसादिभिः ।
सन्तः प्रणयिवाक्यानि गृह्णन्ति ह्यनसूयवः ॥
आचार्य कुमारिलभट्ट के इस श्लोक के साथ मैं इस भूमिका को समाप्त करता हूँ ।
दुर्गाधर झा
अनुसन्धान सहायक ,
वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय ,
वाराणसी ।
संशोधक निवेदनम्
श्रीमद्भिर्गवेषणालय निदेशकै : डॉ ० भागीरथप्रसादत्रिपाठि - ( वागीशः शास्त्री ) महाभागैराज्ञप्तेन मया न्यायकन्दलीटीकायुतस्यास्य प्रशस्तपादभाष्यग्रन्थस्य यथाशक्यं यथाशीघ्रं च पुनर्मुद्रणक्षमं संशोधनं विहितम् ।
यद्यप्यत्र न्यायकन्दल्यां तत्सहकृत - हिन्दीभाषानुवादे चानुच्छेदादिव्यवस्था नास्ति समीचीना , अतः पाठकांना सौविध्याय आपेक्षिका नुच्छेद । दिविधेरवश्यम्भावादपि ग्रन्थस्य मुद्रण प्रकाशन शैयविधिसम्भवात् पुनः पूर्वसदृश एवायं ग्रन्थः संस्कृत :; तथापि समेत्रां भाष्य - कन्दली भाषानुवादानां प्रतीकानुसारं पृष्ठबन्धने ऐक्यरूप्यापादनाय यत्र तत्र यथासम्भवं कियत्प्रयासस्तरसा कृतोऽपि ।
ग्रन्थेऽस्मिन् संशोधनविधकर्मणा सप्ततिपृष्ठे ( पृ ० ७० ) ' प्रशस्तपादभाष्यम् ' इत्यस्योपरि अथ द्रव्यपदार्थनिरूपणम् इति नूतनं शीर्षकं विधाय ' पृथिवी प्रकरणम् ' इत्युपशीर्षकात् पूर्वं स्वल्पस्थानभावाद् द्रव्येषु इतिकर्तव्यस्थाने केवलं ' द्रव्ये ' इति पदं योजितम् । तथैव गुणपदार्थनिरूपण प्रकरणे पञ्चाशदुत्तर- द्विशततमपृष्ठत : ( पृ ० २५० ) ग्रन्थोपशीर्षकात् पूर्वं गुणेषु - इतिकर्तव्यस्थाने केवलं ' गुणे ' इति पदं योजितम् ।
एकचत्वारिंशदुत्तर - सप्तशततमपृष्ठे ( पृ ० ७४१ ) उपरि मुद्रितम् ' प्रशस्तपादभाष्यम् ' पदं मुद्रितात् अथ सामान्यपदार्थनिरूपणम् शीर्षकादधः कृतम् । तथैव पञ्चषष्ट्युतरसप्तशततमपृष्ठे ( पृ ० ७६५ ) मुद्रितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ' पदं मुद्रितात् अथ विशेषपदार्थनिरूपणम् गीर्घकाल , तथा त्र्यधिकसप्तत्युत्तर - सप्तशततमपृष्ठे ( पृ ० ७७३ ) मुद्रितात् अथ समवायपदार्थनिरूपणम् शीर्षकाच्चाघः कृतम् । प्रतीकानुसारं च केषाञ्चित् प्रशस्तपादभाष्यांशानां न्यायकन्दल्यंशानां च पृष्ठपरिवर्तनम् -
यथा सप्तपञ्चाशदुत्तर- षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ६५७ ) मुद्रितः स्थितिस्थापकस्तु ... घनावयवमन्त्रि भाष्यांशोऽष्टपञ्चाशदुत्तर- षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ६५८ ) कृतः तद्धिन्दीभाषानुवादोऽपि तत्रैव विहितः ।
नवपञ्चाशदुत्तर- षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ६५६ ) मुद्रितः धर्मः पुरुषगुणः विशुद्धाभिसन्धिजः ' भाष्यांशः षष्ट्युत्तर- षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ६६० ) परिवर्तितः । तथात्रस्थ : ( पृ ० ६६० ) ' समवेतसमवायिकारणं स स्थितिस्थापक : ' इत्यादिकन्दल्यंशो नवपञ्चाशदुत्तर- षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ६५६ ) कदल्यंशे निवेशितः ।
पञ्चषष्ट्युत्तर- षड्ाततमपृष्ठे ( पृ ० ६६५ ) तत्र सामान्यानि विशिष्टदेवताभक्तिरुपवासोऽप्रपादश्च ' इति भाष्यांशः सर्वत्रेव भाषानुवादेन सह् षट्षष्ट्युत्तर - पट्ाततमपृष्ठे ( पृ ० ६६६ ) कृतोऽयं पंवादात् । तथात्रस्यः ( पृ . ६६६ ) ' ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानाम् . ' ' संस्काराः भाष्यांशः सप्तषष्ट्युत्तर- षट्ा । तमपृष्ठे ( पृ ० ६६७ ) परिवर्तितः ।
( आ )
एवमेव सप्तषष्ट्युत्तर- षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ३६७ ) मुद्रितः क्षत्रियस्य सम्यक् " स्वकीयाश्च संस्काराः ' भाष्यांशोऽष्टषष्ट्युत्तर- षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ६६८ ) मुद्रितः ' शूद्रस्य पूर्ववर्णपारतन्त्र्यम् ' अभ्यञ्जनादिवर्जनं च ' भाष्यांशो नवषष्ट्युत्तर- षट् शततमपृष्ठे ( पृ ० ३६६ ) विहितः ।
तथा च नवषष्ट्युत्तर- षट्शनतमपृष्ठे ( पृ ० ६६ ९ ) मुद्रितः ' विद्याव्रत स्नातकस्य ... महायज्ञानां ' भाष्यांशः सर्वत्रैव भाषानुवादेन सह सप्तत्युत्तर षट्ाततमपृष्ठे ( पृ ० ६७० ) , एवमेव एकसप्तत्युत्तर- षट्शततमपृष्ठस्थः ( पृ ० ६७१ ) ' ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा .....वानप्रस्थस्य ' भाष्यांशस्तथा द्वयधिकसप्तत्युत्तर- षट्शततमपृष्ठस्थः ( पृ ० ६७२ ) ' वनस्थस्य धर्मसाधनं कथयति - हुतशेष भोजनम् ' कन्दल्यंशश्च सर्वश्रेव द्वयधिकसप्तत्युत्तर- षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ६७२ ) परिवर्तितः ।
इत्थमेव सप्तनवत्युत्तर - षट्शततमपृष्ठे ( पृ ० ६६७ ) शिवस्तव बोधकस्य ' जगदरबीजाय ...... चन्द्रायार्धेन्दुमौलये ' इति कन्दलीस्थश्लोकस्य स्पष्टार्थावगमको हिन्दीभाषानवानुवादो वाक्येनैकेनाङ्गितः । हेतवः तन्निषेधार्थमाह- ' इति कन्दल्यंशादधोलिखित : ' मणियों का चोर की तरफ एकचत्वारिंशदुत्तर - सप्तशततमपृष्ठे ( पृ ० ७४१ ) ' जयन्ति जगदुत्पत्ति स्थितिसंहृतिजाना ' कर्मनिरूपण समाप्त हुआ ' इति हिन्दीभाषानुवादांशस्तव पृष्ठे ' च प्रक्षोभणं चलनम् ' ' कर्मपदार्थः समाप्तः ' इति कन्दल्यं शादधस्तदर्थं सङ्गत्या परिवर्तितः ।
तथैव पञ्चषष्ट्युत्तर सप्तशततमपृष्ठे ( पृ ० ७६५ ) ' चतुयुं गचतुविद्या उत्पादविना- ' इति कन्दल्यंशस्तत्रैव पृष्ठे ' अप्रत्यक्ष व्यक्तियों में भी प्रवृत्ति सामान्यनिरूपण समाप्त हुआ ' इति हिन्दी भाषानुवादांशादधो न्यायकन्दलीति लिखित्वा परिवर्तितः ।
प्रकृतग्रन्थे मूलं प्रशस्तपादभाष्यं तदुरवग्राह्यार्थावबोधिका न्यायकन्दलीति टीका च भूतपूर्वानुसन्धान सहायक : श्रीदुर्गाधरझा - महोदयैरपि तदुभय भाव्यटीकयोः सम्यगर्थावबोधायातिसरलहिन्दीभाषानुवादेनालङ्कृता । अत्र प्राचीनपरम्परया कि- अगरमगर प्रभृतियावनभाषामिश्रितशब्दानां प्रयोगो बाहुल्येन कृतो विद्यते , इतः पूर्वं तेषामेव मिश्रित भाषा शब्दानां हिन्दी भाषाप्राशस्त्यात् । अतः क्वचन तत्तत्स्थलेषु यतः - यदि - किन्तु - प्रभृतिशब्दानां प्रयोगप्रयासः कृतो वर्तते ।
ईक्प्रशस्त ग्रन्थविषयविशेषे सहयोगिनस्तथा ग्रन्थमुद्रणकालमध्ये ममातकितास्वस्थतायां प्रायो मासद्वयं यावदीक्ष्यपत्र - संशोधनकर्मदत्तावघानाश्चेमे प ० श्रीरामगोविन्दशुक्लमहोदयास्तेऽवश्यं धन्यवादार्हाः । तथैव ग्रन्थस्यास्य प्रशस्त प्रकाशनकर्मणि शेत्र्योत्पादनाय प्रकाशनाधिकारि- डॉ ० हरिश्चन्द्रमणि त्रिपाठि महोदयाश्चापि सततं साधुवादाहः सन्तीति निवेदयते ।
वसन्त पञ्चमी उमाशङ्कर त्रिपाठी
२०३४ वैक्रम दे अनुसन्धान सहायकः १२-२-७८ खैस्ताब्दे सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयः
In English
Introduction to Prasastapada's Commentary
This article serves as an introduction to the work of Prasastapada, specifically regarding his text Padartha Dharma Sangraha. It explains the origins of the Vaisheshika philosophy, its relationship to the Vedas, and how Prasastapada established the concept of Ishvara (God) within this school of thought.
This article answers
- Origin of vaisheshika darshana?
- Meaning of vaishesika in mahabharata?
- Role of prasastapada in establishing isvaratva?
- Relationship between kanada and prasastapada?
- History of nyayakandali commentary?