व्याख्या · पातञ्जल योगदर्शन
पातञ्जल योगदर्शन — कैवल्यपाद
34 मूल पद्य 34 संस्करणसे मिलाये गये
यह अध्याय मोक्ष की पराकाष्ठा और पुरुष की स्वतंत्रता के विषय में है। इसमें सिद्धियों के उपरांत चित्त की प्रवृत्तियों, वासनाओं के सूक्ष्म स्वरूप और विवेक-ज्ञान के क्रमिक विकास का वर्णन किया गया है। पाठक को यहाँ से आत्म-साक्षात्कार और द्वैत के पूर्ण निवृत्ति की यात्रा प्राप्त होगी।
4.1 · कैवल्यपाद सूत्र १
जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ॥ ४.१ ॥
शब्दार्थ — जन्म · औषधि · मन्त्र · तपः · समाधि · जाः · सिद्धयः
अर्थ — जन्म , ओषधि , मन्त्र , तप और समाधिसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धियाँ हैं ।
व्यासभाष्य
देहान्तरिता जन्मना सिद्धिः । औषधिभिरसुरभवनेषु रसायनेनेत्येवऽदि । मन्त्रैराकाशगमनाणिमादिलाभः । तपसा सङ्कल्पसिद्धिः कामरूपी यत्र तत्र कामग इत्येवमादि । समाधिजाः सिद्धयो व्याख्याः ॥१॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — देहांतरिता जन्म से सिद्धि। औषधियों से असुर भवनों में रसायन द्वारा, इस प्रकार आदि। मंत्रों से आकाश गमन, अणिमा आदि की प्राप्ति। तप से संकल्प सिद्धि, कामरूपी, जहाँ तहाँ काम गमन, इस प्रकार आदि। समाधि से उत्पन्न सिद्धियाँ व्याख्यात हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — 'अर्थ' शब्द का अर्थ अधिकार अर्थात् आरम्भवाचक और मङ्गलार्थक है, जिसके द्वारा लक्षण, भेद, उपाय और फलों सहित शिक्षा दी जाए उसे अनुशासन कहते हैं। योग समाधिको कहते हैं और समाधि सारी भूमियों में चित्त का धर्म है, जिसमें से तीन भूमियाँ दबा रहती हैं और केवल दो प्रकट होती हैं।
चित्त की पाँच भूमियाँ—क्षित्प, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध—में से क्षिप्त और मूढ़ तथा विक्षिप्त भूमि योगरूप नहीं हैं क्योंकि इनमें योग का गन्ध या स्थिरता नहीं होती। एकाग्र चित्त वह है जिसमें एक ही विषय पर विलक्षण वृत्तियों के व्यवधान से रहित प्रवाह होता है, जिसे सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं जिसके चार भेद—वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत—हैं। निरुद्ध चित्त में असम्प्रज्ञात समाधि होती है और इसके लक्षण को प्रकाशित करने की इच्छा से अगला सूत्र बना है।
महर्षि पतञ्जलि ने 'अर्थ' के माध्यम से अनुबन्ध-चतुष्टय अर्थात् विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्बन्ध का वर्णन किया है कि इस शास्त्र का विषय योग है, प्रयोजन स्वरूप-स्थिति (मोक्ष) कराना है, अधिकारी जिज्ञासु साधक हैं और यह योग का प्रतिपादक है। यहाँ योग साधन है और स्वरूप-स्थिति साध्य है, जहाँ अधिकारी और योग का कर्तृ-कर्तव्यभाव है। 'योग' शब्द युक्ति अर्थात् मेल तथा 'युज् समाधौ' से समाधिके अर्थ में प्रयुक्त होता है जिसे श्रीव्यासजी महाराज ने इस दर्शन में सर्वत्र प्रयोग किया है।
4.2 · कैवल्यपाद सूत्र २
जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥ ४.२ ॥
शब्दार्थ — जाति · अन्तर · परिणामः · प्रकृति · आपूरात्
अर्थ — एक जातिसे दूसरी जातिमें बदल जाना प्रकृतियोंके भरनेसे होता है ।
व्यासभाष्य
पूर्वपरिणामापाये उत्तरपरिणामोपजनस्तेषामपूर्वावयवानुप्रवेशाद्भवति, कायेन्द्रियप्रकृतयश्च स्वं स्वं विकारमनुगृह्णन्त्यापूरेण धर्मादिनिमित्तमपेक्षमाणा इति ॥२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत्र काय इन्द्रियाणाम् अन्य जातीय परिणतानाम् वहाँ काय और इन्द्रियों के अन्य जातीय परिणत— अंतर का परिणाम प्रकृति के आपूर से। पूर्व परिणाम अपाये उत्तर परिणाम उपजनः तेषाम् अपूर्व अवयव अनुप्रवेशात् भवति पूर्व परिणाम के अपाय पर उत्तर परिणाम का उपजन, उनके अपूर्व अवयव के अनुप्रवेश से होता है। काय इन्द्रिय प्रकृतयः च स्वं स्वं विकारम् अनुगृह्णन्ति आपूरेण धर्म आदि निमित्तम् अपेक्षमाणाः इति काय और इन्द्रिय की प्रकृतियाँ अपने अपने विकार को आपूर द्वारा धर्म आदि निमित्त की अपेक्षा करते हुए अनुगृह्णति हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जात्यन्तरपरिणाम का अर्थ है औषधि, मंत्र आदि के अनुष्ठान से शरीर और इन्द्रियों का विलक्षण शक्तिवाला होकर एक जाति से दूसरी जाति में बदल जाना। प्रकृत्यापूरात् का अर्थ है कि शरीर की प्रकृति (पृथ्वी, जल आदि पाँच भूत) और इन्द्रियों की प्रकृति (अस्मिता) के कारणरूप अवयवों का कार्यरूप अवयवों के आकार में प्रवेश करना।
इस प्रकृतिकी 'आपूर' पूर्ण होने से जात्यन्तर परिणाम होता है, जिसका भाव यह है कि योगी के शरीर और इन्द्रियों का पहले रूप से विलक्षण शक्तिवाला होना प्रकृतियों के अपूर्व अवयवों के समूह से होता है। जैसे शुष्क तृणों में व्याप्त अग्नि की एक कणिका से प्रचण्ड ज्वालारूप उत्पन्न होता है, वैसे ही योगी के शरीर और इन्द्रियों के राजसी व तामसी अवयवों के स्थान पर ज्यों-ज्यों सात्त्विक अवयव भरते हैं, त्यों-त्यों वे विलक्षण शक्तिवाले होते जाते हैं।
इस प्रकार उस जाति के अनुकूल अवयव भरते रहने से दूसरी जाति बन जाती है, जिसमें निमित्त योगज धर्म है जिसे योगी मन्त्र और तप आदि से सिद्ध करता है। भोजवृत्तिका के भाषार्थ के अनुसार यहाँ शङ्का होती है कि नन्दीश्वरादिका का जात्यादि परिणाम उसी जन्म में देखा गया है, तो दूसरे जन्मों के अभ्यास को कैसे कहें।
इस शङ्का का उत्तर यह है कि एक जन्म में ही प्राप्त देवत्व प्रकृतिके अवयव प्रवेश या सर्वत्र व्याप्त होने से हुआ है और पिछले जन्म की ही प्रकृति इस जन्म में अपने विकारों को प्रवेश करके जाति विशेषाकार से परिणत होती है। शिवपुराणीय सनत्कुमारसंहिता के ४५ अध्याय में वर्णन है कि शिलादमुनिका नन्दी ने उग्र उपासना द्वारा मनुष्य-शरीर को त्यागकर उसी जन्म में देवदेह को प्राप्त किया था।
4.3 · कैवल्यपाद सूत्र ३
निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥ ४.३ ॥
शब्दार्थ — निमित्तम् · अप्रयोजकं · प्रकृतीनां · वरण · भेदः · तु · ततः · क्षेत्रिकवत्
अर्थ — निमित्त प्रकृतियों का प्रयोजक नहीं है, किंतु ततः क्षेत्रिक की तरह वरण का भेद।
व्यासभाष्य
न हि धर्मादि निमित्तं प्रयोजकं प्रकृतीनां भवति । न कार्येण कारणं प्रवर्त्यते इति । कथं तर्हि ? वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत। यथा क्षेत्रिकः केदारादपां पूरणात्केदारान्तरं पिप्लावयिषुः समं निम्नं निम्नतरं वा नापः पाणिनापकर्षत्यावरणं त्वासां भिनत्ति, तस्मिन्भिन्ने स्वयमेवापः केदारान्तरमाप्लावयन्ति । तथा धर्मः प्रकृतीनामावरणमधर्मं भिनत्ति, तस्मिन्भिन्ने स्वयमेव प्रकृतयः स्वं स्वं विकारमाप्लावयन्ति । यथा वा स एव क्षेत्रिकस्तस्मिन्नेव केदारे न प्रभवत्यौदकान्भौमान्वा रसान्धान्यमूलान्यनुप्रवेशयितुम् । किं तर्हि ? मुद्गगवेधुकश्यामाकादींस्ततोऽपकर्षति । अपकृष्टेषु तेषु स्वयमेव रसा धान्यमूलान्यनुप्रविशन्ति । तथा धर्मो निवृत्तिमात्रे कारणमधर्मस्य । शुद्ध्यशुद्ध्योरत्यन्तविरोधात। न तु प्रकृतिप्रवृत्तौ धर्मो हेतुर्भवतीति । अत्र नन्दीश्वरादय उदाहार्याः । विपर्ययेणाप्यधर्मो धर्मं बाधते । ततश्चाशुद्धिपरिणाम इति । अत्रापि नहुषाजगरादय उदाहार्याः ॥३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — न हि धर्म आदि निमित्तं प्रयोजकं प्रकृतीनां भवति न ही धर्म आदि निमित्त प्रकृतियों का प्रयोजक होता है। कारण प्रवृत्त नहीं होता। कथं तर्हि फिर कैसे? वरण भेदः तु ततः क्षेत्रिकवत् किंतु ततः क्षेत्रिक की तरह वरण का भेद। समं निम्नं निम्नतरं वा न अपः पाणिना अपकर्षति आवरणं तु आसां भिनत्ति जैसे क्षेत्रिक केदार से जल के पूरण से दूसरे केदार को सिंचने की इच्छा रखते हुए सम, निम्न, या निम्नतर को जल को हाथ से नहीं खींचता, किंतु उसका आवरण भेदता है।
तस्मिन् भिन्ने स्वयम् एव अपः केदार अन्तरम् आप्लावयन्ति उस आवरण के भेदन पर स्वयं ही जल दूसरा केदार आप्लावित करता है। तथा धर्मः प्रकृतीनाम् आवरणम् अधर्मं भिनत्ति वैसे ही धर्म प्रकृतियों के आवरण अधर्म को भेदता है। तस्मिन् भिन्ने स्वयम् एव प्रकृतयः स्वं स्वं विकारम् आप्लावयन्ति उसमें भेद होने पर स्वयं ही प्रकृतियाँ अपने अपने विकार को आप्लावित करती हैं।
यथा वा स एव क्षेत्रिकः तस्मिन् एव केदारे न प्रभवति औदकान् भौमान् वा रसान् धान्य मूलानि अनुप्रवेशयितुम् अथवा वही क्षेत्रिक उसी केदार में जल या भौम रसों को धान्य मूलों में अनुप्रवेश कराने में समर्थ नहीं होता। क्या? मुद्ग गवेधुक श्यामाक आदि ततः अपकर्षति मुद्ग, गवेधुक, श्यामाक आदि को उससे अपकर्षित करता है। अपकृष्टेषु तेषु स्वयम् एव रसाः धान्य मूलानि अनुप्रविशन्ति उनको अपकर्षित करने पर स्वयं ही रस धान्य मूलों में प्रवेश करते हैं।
तथा धर्मः निवृत्ति मात्रे कारणम् अधर्मस्य वैसे ही धर्म अधर्म की निवृत्ति में मात्र कारण है। शुद्धि अशुद्ध्योः अत्यन्त विरोधात् शुद्धि और अशुद्धि के अत्यंत विरोध के कारण। प्रवृत्तौ धर्मः हेतुः भवति इति किंतु प्रकृति की प्रवृत्ति में धर्म हेतु नहीं होता। अत्र नन्दीश्वर आदयः उदाहार्याः यहाँ नन्दीश्वर आदि उदाहरण हैं। विपर्ययेण अपि अधर्मः धर्मं बाधते विपर्यय से भी अधर्म धर्म को बाधित करता है। ततः च अशुद्धि परिणामः इति और ततः अशुद्धि का परिणाम।
अत्र अपि नहुष अजगर आदयः उदाहार्याः यहाँ भी नहुष, अजगर आदि उदाहरण हैं। तदा तु योगी बहून्कायान्निर्मिमीते तदा किमेकमनस्कास्ते भवन्त्यथानेकमनस्का इति ? तदा तु योगी बहून् कायान् निर्मिमीते तदा किम् एक मनस्काः ते भवन्ति अथ अनेक मनस्काः इति तब योगी बहुत से कायों का निर्माण करता है, तब क्या वे एक मनस्क होते हैं या अनेक मनस्क?
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — धर्मादि निमित्त प्रकृतियों के उपादान-कारण नहीं होते क्योंकि कार्य स्वयं कारण का प्रवर्तक नहीं होता। जिस प्रकार किसान जल को हाथ से ले जाने के बजाय खेत की मेड़ तोड़ देता है और जल स्वयं बह जाता है, उसी प्रकार धर्म अधर्म रूपी प्रतिबन्धक को नष्ट कर देता है जिससे प्रकृतियाँ स्वयं अपने कार्य को पूर्ण करती हैं। धर्म और अधर्म में अत्यधिक विरोध होने के कारण धर्म केवल विरोधी अधर्म की निवृत्ति मात्र करने में निमित्त है।
जब धर्म से अधर्म रूपी रुकावट दूर होती है तब शुद्ध परिणाम होता है और जब अधर्म से धर्म रूपी प्रतिबन्ध हटता है तब अशुद्ध परिणाम होता है। भोजवृत्तिका भाषानुवाद के अनुसार, प्रकृतियों के अर्थांतर परिणाम में धर्मादि केवल निमित्त हैं क्योंकि वे प्रकृतियों के ही कार्य हैं। सूत्र ३ के अनुसार चित्तभूमि जन्म-जन्मान्तरों के कर्माशयों से चित्रित है जहाँ प्रधान रूप से कार्य करने वाले कर्माशय विरोधी उपसर्जन कर्माशयों को निचली भूमियों में दबाकर रखते हैं।
सूत्र में हुए निमित्त धर्मों का केवल इतना काम होता है कि वे उन प्रकृतियों के विरोधी प्रधान कर्माशयों को हटा देते हैं जिससे दबे हुए उपसर्जन कर्माशय अपने प्रतिबन्धक के हटने पर अभिमत प्रकृतियों के भर देने का काम आरम्भ कर देते हैं। इसी कारण कभी-कभी एक अधर्मी धर्मात्मा बन जाता है और कभी-कभी धर्मात्मा अधर्मी हो जाता है क्योंकि यह परिणाम उनकी उपादान कारण प्रकृतिके भर देने से होता है।
4.4 · कैवल्यपाद सूत्र ४
निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥ ४.४ ॥
अर्थ — अस्मितामात्रसे निर्माण - चित्त होते हैं ।
व्यासभाष्य
अस्मितामात्रं चित्तकारणमुपादाय निर्माणचित्तानि करोति, ततः सचित्तानि भवन्ति ॥४॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — मात्र को चित्त का कारण उपादान करके निर्माण चित्त बनाता है। ततः वे सचित्त होते हैं।
व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — चित्तके कारण अस्मितामात्रको लेकर चित्तोंको निर्माण करता है उससे सचिन्त होते हैं । — ( व्यासभाष्य ) अर्थात् योगी अस्मितामात्रसे निर्माण - चित्तोंको अपने संकल्पमात्रसे निर्मित करता है । ( बनाता है ) इन निर्माण - चित्तोंसे योगीके बनाये हुए सब शरीर चित्तसंयुक्त होते हैं । भोजवृत्तिमें इस सूत्रकी सङ्गति तथा सूत्रार्थ निम्न प्रकार दिये हैं- भोगनेके लिये अपनी (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)
अन्य स्रोत: व्यासभाष्य
4.5 · कैवल्यपाद सूत्र ५
प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥ ४.५ ॥
शब्दार्थ — प्रवृत्ति · भेदे · प्रयोजकं · चित्तम् · एकम् · अनेकेषाम्
अर्थ — प्रवृत्तिके भेदोंमें एक चित्त अनेकोंका प्रेरनेवाला होता है ।
व्यासभाष्य
बहूनां चित्तानां कथमेकचित्ताभिप्रायपुरःसा प्रवृत्तिरिति सर्वचित्तानां प्रयोजकं चित्तमेकं निर्मिमीते, ततः प्रवृत्तिभेदः ॥५॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — प्रवृत्ति भेदे प्रयोजकं चित्तम् एकम् अनेकेषाम् प्रवृत्ति के भेद में प्रयोजक चित्त एक अनेक का। अनेक चित्तों की एक चित्त के अभिप्राय के साथ प्रवृत्ति कैसे होती है? सर्व चित्तानां प्रयोजकं चित्तम् एकं निर्मिमीते सभी चित्तों का प्रयोजक एक चित्त निर्मित करता है। भेदः ततः प्रवृत्ति का भेद।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — एक चित्त से अनेक चित्तों की अभिप्रायपूर्वक प्रवृत्ति होने की शंका के उत्तर में व्यासभाष्य कहता है कि सब चित्तों का प्रवर्त्तक एक ही चित्त होता है जिससे प्रवृत्तिभेद होता है। उन अनेक चित्तों के वृत्तिभेद में एक ही चित्त अधिष्ठाता होकर प्रेरणा करने वाला होता है, जिससे अनेक चित्तों का मतभेद नहीं होता। भोजवृत्ति के अनुसार जैसे एक मन अपने शरीर का अधिष्ठाता बनकर चक्षु-हस्तादिको इच्छापूर्वक प्रेरणा करता है, वैसे ही अन्य कार्यों में भी प्रेरक माना जाता है। विशेष विचार के अनुसार सूत्र की व्याख्या यह है कि ऊपर बताए गए पाँचों निर्माणचित्तों को नाना प्रकार की प्रवृत्ति में लगाने वाला अस्मिता अर्थात् अधिष्ठाता चित्त है। इन चित्तों की सारी प्रवृत्तियाँ उसी एक अधिष्ठाता चित्त के अधीन हैं।
अन्य स्रोत: व्यासभाष्य, भोजवृत्ति
4.6 · कैवल्यपाद सूत्र ६
तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥ ४.६ ॥
शब्दार्थ — तत्र · ध्यान · जम् · अनाशयम्
अर्थ — उन पाँच प्रकारके जन्म , ओषधि आदिसे उत्पन्न हुए पाँचों ( ५६० )
व्यासभाष्य
पञ्चविधं निर्माणचित्तं—जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धय इति । तत्र यदेव ध्यानजं चित्तं तदेवानाशयं तस्यैव नास्त्याशयो रागादिप्रवृत्तिर्नातः पुण्यपापाभिसम्बन्धः । क्षीणक्लेशत्वाद्योगिन इति । इतरेषां तु विद्यते कर्माशयः ॥६॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — पांच प्रकार का है—जन्म, औषधि, मंत्र, तप, और समाधि से उत्पन्न सिद्धियाँ। तत्र यद् एव ध्यान जं चित्तं तद् एव अनाशयं वहाँ जो ध्यान से उत्पन्न चित्त है, वही अनाशय है। उसका ही आशय, राग आदि प्रवृत्ति नहीं, अतः पुण्य-पाप से संबंध नहीं। योगी के क्षीण क्लेश होने के कारण। किंतु अन्य के लिए कर्माशय विद्यमान है। यतः— यतः क्योंकि—
व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — समाधिसे उत्पन्न होनेवाला चित्त वासनाओंसे रहित होता है । जन्म , ओषधि , मन्त्र , तप और समाधिसे उत्पन्न जो पाँच प्रकारके सिद्धनिर्माण - चित्त हैं , उनमें जो ध्यान ( समाधि ) से उत्पन्न हुआ चित्त है , वही वासनारहित है । उसमें ही रागादि प्रवृत्ति और वासनाएँ नहीं होतीं । इस कारण क्लेश नष्ट होनेसे योगीका पुण्य - पापसे सम्बन्ध नहीं होता । दूसरों ( चार — जन्म , ओषधि , मन्त्र और तपसे उत्पन्न होनेवाले ) सिद्ध - निर्माण - चित्तोंकी तो कर्म और वासनाएँ विद्यमान रहती हैं । — ( व्यासभाष्य ) ध्यानजं अर्थात् समाधिसे उत्पन्न हुआ जो चित्त है , वह उन पाँचों ( सिद्धनिर्माण चित्तोंमें ) अनाशय अर्थात् कर्मकी वासना और संस्कारोंसे रहित होता है — यह अभिप्राय है । ( भोजवृत्ति )
4.7 · कैवल्यपाद सूत्र ७
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥ ४.७ ॥
शब्दार्थ — कर्म · अशुक्ल · अकृष्णं · योगिनः · त्रिविधम् · इतरेषाम्
अर्थ — योगीका कर्म अशुक्लाकृष्ण ( न शुक्ल न कृष्ण अर्थात् निष्काम ) होता है , दूसरोंका तीन प्रकारका ( पाप , पुण्य और पाप - पुण्य - मिश्रित ) होता है ।
व्यासभाष्य
चतुष्पदी खल्वियं कर्मजातिः—कृष्णा शुक्लकृष्णा, शुक्लाशुक्लाकृष्णा चेति । तत्र कृष्णा दुरात्मनाम् । शुक्लकृष्णा बहिःसाधनसाध्या, तत्र परपीडानुग्रहद्वारेणैव कर्माशयप्रचयः । शुक्ला तपःस्वाध्यायध्यानवताम् । सा हि केवले मनस्यायत्तत्वाद्बहिःसाधनाधीना न परान्पीडयित्वा भवति । अशुक्लाकृष्णा संन्यासिनां क्षीणक्लेशानां चरमदेहानामिति । तत्राशुक्लं योगिन एव फलसंन्यासादकृष्णं चानुपादानात। इतरेषां तु भूतानां पूर्वमेव त्रिविधमिति ॥७॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — यह कर्म जाति चार प्रकार की है—कृष्णा, शुक्ल-कृष्णा, शुक्ला, और अशुक्ल-अकृष्णा। दुरात्माओं की। शुक्ल कृष्णा बहिः साधन साध्या तत्र पर पीडा अनुग्रह द्वारेण एव कर्माशय प्रचयः शुक्ल-कृष्णा बाह्य साधनों से साध्य है, वहाँ परपीडा और अनुग्रह के द्वार से ही कर्माशय का प्रचय। शुक्ला तपः स्वाध्याय ध्यानवताम् शुक्ला तप, स्वाध्याय, और ध्यान वालों की। सा हि केवल मनसि आयत्तत्वात् बहिः साधन अधीना न परान् पीडयित्वा भवति वह केवल मन पर निर्भर होने के कारण बाह्य साधनों पर आधीन होकर दूसरों को पीडित किए बिना होती है। अशुक्ल अकृष्णा संन्यासिनां क्षीण क्लेशानां चरम देहानाम् इति अशुक्ल-अकृष्णा संन्यासियों, क्षीण क्लेश वालों, और चरम देह वालों की। तत्र अशुक्लं योगिनः एव फल संन्यासात् अकृष्णं च अनुपादानात् वहाँ योगी का ही अशुक्ल फल संन्यास से और अकृष्ण अनुपादान से। इतरेषां तु भूतानां पूर्वम् एव त्रिविधम् इति किंतु अन्य भूतों का पहले ही त्रिविध।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — कर्म चार प्रकार के होते हैं जिनमें पाप रूप हिंसा आदि दूसरों को हानि पहुँचाने वाले 'कृष्ण' कर्म, पुण्यकर्म अहिंसा आदि लाभ पहुँचाने वाले 'शुक्ल' कर्म, और किसी को हानि या लाभ वाले 'कृष्ण-शुक्ल' मिश्रित कर्म शामिल हैं। चौथे प्रकार के कर्म 'अशुक्ल-अकृष्ण' कहलाते हैं जो न पुण्य वाले होते हैं और न ही पाप वाले, अर्थात् ये फलों की वासना रहित निष्काम शुद्ध कर्म होते हैं।
योगियों के कर्म अशुक्ल-अकृष्ण होते हैं क्योंकि वे पापकर्मों का त्याग करते हैं और शुक्लकर्मों को निष्काम भाव से फल त्यागकर करते हैं। सामान्य मनुष्यों के विपरीत योगियों को अविद्या जैसे क्लेश नहीं होते, बल्कि वे स्वयं को और अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करके केवल उसके आज्ञापालन में कर्तव्य समझकर कार्य करते हैं। गीता ५.१०-१२ के उद्धरण के अनुसार जो पुरुष परमात्मा में अर्पण करके आसक्ति का त्याग करता है वह पाप से लिप्त नहीं होता।
निष्काम कर्मयोगी शरीर, मन, बुद्धि और इंद्रियों द्वारा आत्मशुद्धि के लिए फल त्यागकर कर्म करते हैं ताकि वे शांति प्राप्त कर सकें। इसके विपरीत सकामी पुरुष फलों में आसक्त होकर कामना के कारण बँध जाता है। सामान्य मनुष्यों के तीन प्रकार के कर्म शुक्ल, कृष्ण और मिश्रित होते हैं जिनके कारण वे चित्त में फलों की वासना पैदा करते हैं।
4.8 · कैवल्यपाद सूत्र ८
ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥ ४.८ ॥
शब्दार्थ — ततः · तत् · विपाक · अनुगुणानाम् · एव · अभिव्यक्तिः · वासनानाम्
अर्थ — उन तीन प्रकारके कर्मोंसे उनके फलके अनुकूल ही वासनाओंकी अभिव्यक्ति ( प्रादुर्भाव ) होती है ।
व्यासभाष्य
तत इति त्रिविधात्कर्मणः । तद्विपाकानुगुणानामेवेति । यज्जातीयस्य कर्मणो यो विपाकस्तस्यानुगुणा या वासनाः कर्मविपाकमनुशेरते, तासामेवाभिव्यक्तिः । न हि दैवं कर्म विपच्यमानं नारकतिर्यङ्मनुष्यवासनाभिव्यक्तिनिमित्तं भवति । किन्तु दैवानुगुणा एवास्य वासना व्यज्यते । नारकतिर्यङ्मनुष्येषु चैवं समानश्चर्चः ॥८॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अनुगुणानाम् एव अभिव्यक्तिः वासनानाम् ततः उस विपाक के अनुगुण वासनाओं की ही अभिव्यक्ति। ततः इति त्रिविधात् कर्मणः ततः त्रिविध कर्म से। तत् विपाक अनुगुणानाम् एव इति उस विपाक के अनुगुण ही। यत् जातीयस्य कर्मणः यः विपाकः तस्य अनुगुणा या वासनाः कर्म विपाकम् अनुशेरते तासाम् एव अभिव्यक्तिः जिस जातीय कर्म का जो विपाक है, उसकी अनुगुण जो वासनाएँ कर्म विपाक को अनुसरती हैं, उनकी ही अभिव्यक्ति। न हि दैवं कर्म विपच्यमानं नारक तिर्यक् मनुष्य वासना अभिव्यक्ति निमित्तं भवति न ही दैव कर्म विपच्यमान नारक, तिर्यक, मनुष्य वासना अभिव्यक्ति का निमित्त होता है। किन्तु दैव अनुगुणा एव अस्य वासना व्यज्यते किंतु दैव के अनुगुण ही उसकी वासना व्यक्त होती है। नारक तिर्यक् मनुष्येषु च एवम् समानः चर्चः नारक, तिर्यक, और मनुष्यों में भी ऐसा ही समान चर्च।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सकामी पुरुष फलों की वासना से कर्म करते हैं क्योंकि जैसे कर्म होते हैं, वैसे ही उनके फलों के अनुकूल गुणों वाली वासनाएँ उत्पन्न होती हैं। इन वासनाओं से फिर वैसे ही कर्म और उनसे पुनः उसी प्रकार की वासनाएँ बनती रहती हैं। चित्त में दो प्रकार की वासनाएँ संस्कार रूप से होती हैं, जिनमें स्मृति मात्र फलवाली और जाति, आयु, भोग-फलवाली शामिल हैं। जब कोई कर्म फल देता है, तो उसके फल के अनुकूल ही सारी वासनाएँ प्रकट हो जाती हैं। उदाहरणस्वरूप, यदि कर्मों का फल मनुष्य-जन्म होता है, तो वह स्मृति-फलवाली वासनाओं को जगा देता है जिससे अन्य जाति, आयु और भोग वाली वासनाएँ चित्तभूमि में दबी रहती हैं। इसी प्रकार यदि कर्मविपाक कोई पशुयोनि हो, तो उस जाति-आयु और भोग की वासनाओं को स्मृति-फलवाली वासनाएँ जगा देती हैं और वे अपना फल देने लगती हैं। इसका विस्तारपूर्वक विवरण २ । १२ । १३ सूत्र में आवागमन के सम्बन्ध में किया गया है।
4.9 · कैवल्यपाद सूत्र ९
जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं, स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात ॥ ४.९ ॥
शब्दार्थ — जाति · देश · काल · व्यवहितानाम् · अपि · आनन्तर्यम् · स्मृति · संस्कारयोः · एक · रूपत्वात्
अर्थ — जाति, देश, काल से व्यवहित होने पर भी आनन्तर्य, स्मृति और संस्कार के एकरूपत्व से।
व्यासभाष्य
वृषदंशविपाकोदयः स्वव्यञ्जकाञ्जनाभिव्यक्तः । स यदि जातिशतेन वा दूरदेशतया वा कल्पशतेन वा व्यवहितः पुनश्च स्वव्यञ्जकाञ्जन एवोदियात्द्रागित्येव पूर्वणुभूतवृषदंशविपाकाभिसंस्कृता वासना उपादाय व्यज्येत । कस्मात्? यतो व्यवहितानामप्यासां सदृशं करं ःअभिव्यञ्जकं निमित्तीभूतमित्यानन्तर्यमेव । कुतश्च ? स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात। यथानुभवास्तथा संस्काराः । ते च कर्मवासनानुरूपाः । यथा च वासनास्तथा स्मृतिरिति जातिदेशकालव्यवहितेभ्यः संस्कारेभ्यः स्मृतिः । स्मृतेश्च पुनः संस्कारा इत्येवमेते स्मृतिसंस्काराः कर्माशयवृत्तिलाभवशाद्व्यज्यन्ते । अतश्च व्यवहितानामपि निमित्तनैमित्तिकभावानुच्छेदादानन्तर्यमेव सिद्धमिति ॥९॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विपाक का उदय स्वयं व्यंजक अंजन से अभिव्यक्त। वह यदि सौ जन्मों, दूर देश, या सौ कल्पों से व्यवहित हो, फिर भी स्वयं व्यंजक अंजन ही शीघ्र उदित हो, इस प्रकार पूर्व अनुभूत वृषदंश विपाक से संस्कृत वासना उपादान कर व्यक्त हो। क्योंकि व्यवहित होने पर भी इनका सदृश कर्म अभिव्यंजक निमित्त बनता है, इसलिए आनन्तर्य ही। कुतः च और क्यों? स्मृति संस्कारयोः एक रूपत्वात् स्मृति और संस्कार के एकरूपत्व से। ते च कर्म वासना अनुरूपाः वे कर्म वासना के अनुरूप। यथा च वासनाः तथा स्मृतिः इति और जैसे वासनाएँ, वैसे स्मृति। जाति देश काल व्यवहितेभ्यः संस्कारेभ्यः स्मृतिः जाति, देश, काल से व्यवहित संस्कारों से स्मृति। स्मृतेः च पुनः संस्काराः इति और स्मृति से पुनः संस्कार। एवम् एते स्मृति संस्काराः कर्माशय वृत्ति लाभ वशात् व्यज्यन्ते इस प्रकार ये स्मृति और संस्कार कर्माशय की वृत्ति लाभ के वश व्यक्त होते हैं। अतः च व्यवहितानाम् अपि निमित्त नैमित्तिक भाव अनुच्छेदात् आनन्तर्यम् एव सिद्धम् इति अतः व्यवहितों के भी निमित्त-नैमित्तिक भाव के अनुच्छेद से आनन्तर्य ही सिद्ध।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जाति, देश और काल का निकट होना वासनाओं के संस्कारों के प्रकट होने का कारण नहीं होता है। उनके प्रकट होने का वास्तविक कारण उनका अपना-अपना अभिव्यंजक होता है। कोई भी संस्कार चाहे कितने ही पिछले जन्मों का हो या उसमें कितना भी समय और स्थान का अंतर हो, वह अभिव्यंजक मिलने पर तुरंत प्रकट हो जाता है। उदाहरणस्वरूप, यदि किसी मनुष्य का कर्मफल पशु योनि में जाना हो, तो उस जाति के बनाने वाले या भोगे जाने वाले सभी संस्कार जाग जाते हैं। ये संस्कार चाहे सैकड़ों जन्म पहले के बने हों या सहस्रों वर्ष बीत गए हों और कितने ही दूर देशों के क्यों न हों, यह व्यवधान उनके प्रकट होने में रुकावट नहीं डाल सकते। स्मृति संस्दोंदृश उत्पन्न संस्कारों की होती है, अर्थात जैसे संस्कार होते हैं वैसी ही स्मृति होती है।
4.10 · कैवल्यपाद सूत्र १०
तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥ ४.१० ॥
शब्दार्थ — तासाम् · अनादित्वं · च · आशिषः · नित्यत्वात्
अर्थ — उन वासनाओंको आशिष ( अपने कल्याणकी इच्छा ) के नित्य होनेसे अनादित्व भी है ।
व्यासभाष्य
तासां वासनानामाशिषो नित्यत्वादनादित्वम् । येयमात्माशीर्मा न भूवं भूयासमिति सर्वस्य दृश्यते, सा न स्वाभाविकी । कस्मात्? जातमात्रस्य जन्तोरननुभूतमरणधर्मकस्य द्वेषो दुःखानुस्मृतिनिमित्तो मरणत्रासः कथं भवेत्? न च स्वाभाविकं वस्तु निमित्तमुपादत्ते । तस्मादनादिवासनानुविद्धमिदं चित्तं निमित्तवशात्कश्चिदेव वासनाः प्रतिलभ्य पुरुषस्य भोगायोपवर्तत इति । घटप्रासादप्रदीपकल्पं सङ्कोचविकाशि चित्तं शरीरपरिमाणाकारमात्रमित्यपरे प्रतिपन्नाः । तथा चान्तराभावः संसारश्च युक्त इति । वृत्तिरेवास्य विभुनश्चित्तस्य सङ्कोचविकाशिनीत्याचार्यः । तच्च धर्मादिनिमित्तापेक्षम् । निमित्तं च द्विविधं—बाह्यमाध्यात्मिकं च । शरीरादिसाधनापेक्षं बाह्यं स्तुतिदानाभिवादनादि । चित्तमात्राधीनं श्रद्धाद्याध्यात्मिकम् । तथा चोक्तं—ये चेइते मैत्र्यादयो ध्यायिनां विहारास्ते बाह्यसाधननिरनुग्रहात्मः प्रकृष्टं धर्ममभिनिवर्तयन्ति । तयोर्मानसं बलीयः । कथं ? ज्ञानवैराग्ये केनातिशय्येते ? दण्डकारण्यं च चित्तबलव्यतिरेकेण कः शरीरेण कर्मणा शून्यं कर्तुमुत्सहेत, समुद्रमगस्त्यवद्वा पिबेत ॥१०॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — वासनाओं का आशिष के नित्यत्व से अनादित्व। यह आत्म आशिष कि मैं न भूँ, फिर होऊँ, जो सर्वत्र दिखती है, वह स्वाभाविक नहीं। प्राणी, जिसने मरण धर्म का अनुभव नहीं किया, उसका दुःख स्मृति निमित्त मरण का त्रास कैसे हो? न च स्वाभाविकं वस्तु निमित्तम् उपादत्ते और स्वाभाविक वस्तु निमित्त को ग्रहण नहीं करता। प्रतिलभ्य पुरुषस्य भोगाय उपवर्तति इति इसलिए अनादि वासना से युक्त यह चित्त निमित्त के वश कुछ वासनाएँ ग्रहण कर पुरुष के भोग के लिए उपस्थित होता है।
घट प्रासाद प्रदीप कल्पं सङ्कोच विकाशि चित्तं शरीर परिमाण आकार मात्रम् इति अपरे प्रतिपन्नाः घट, प्रासाद, प्रदीप की तरह संकोच-विकास करने वाला चित्त शरीर के परिमाण और आकार मात्र है, ऐसा कुछ मानते हैं। तथा च अन्तर अभावः संसारः च युक्तः इति और इस प्रकार अंतर का अभाव और संसार युक्त है। वृत्तिः एव अस्य विभोः चित्तस्य सङ्कोच विकाशिनी इति आचार्यः इस विभु चित्त की वृत्ति ही संकोच-विकास करने वाली है, ऐसा आचार्य कहते हैं।
तत् च धर्म आदि निमित्त अपेक्षम् और यह धर्म आदि निमित्त की अपेक्षा करता है। निमित्तं च द्विविधं बाह्यम् आध्यात्मिकं च निमित्त दो प्रकार का है—बाह्य और आध्यात्मिक। शरीर आदि साधनों पर निर्भर बाह्य, जैसे स्तुति, दान, अभिवादन आदि। अधीनं श्रद्धा आदि आध्यात्मिकम् चित्त मात्र पर निर्भर श्रद्धा आदि आध्यात्मिक।
तथा च उक्तं ये च एते मैत्री आदयः ध्यायिनां विहाराः ते बाह्य साधन निरनुग्रह आत्मः प्रकृष्टं धर्मम् अभिनिवर्तयन्ति और ऐसा कहा गया कि मैत्री आदि ध्यायियों के विहार बाह्य साधनों के निरनुग्रह स्वरूप प्रकृष्ट धर्म को अभिनिवर्तित करते हैं। तयोः मानसं बलीयः उनमें मानसिक बलवत्तर है। कथं कैसे? ज्ञान वैराग्ये केन अतिशय्येते ज्ञान और वैराग्य किससे अतिशयित होते हैं?
दण्डकारण्यं च चित्त बल व्यतिरेकेण कः शरीरेण कर्मणा शून्यं कर्तुम् उत्सहेत समुद्रम् अगस्त्यवत् वा पिबेत् और दण्डकारण्य को चित्त बल के बिना कौन शरीर या कर्म से शून्य कर सकता है, या अगस्त्य की तरह समुद्र पी सकता है?
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अपने सुख-साधन के सदैव बने रहने की इच्छा ही समस्त वासनाओं का कारण है और इस इच्छा के अनादि होने से वासनाओं का भी अनादित्व सिद्ध होता है। सूत्र १० के भाष्य में चित्त के परिमाण की विशेषता बताई गई है, जहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि चित्त अनादि वासनाओं से बँधा हुआ है और पुरुष के भोग हेतु निमित्त के रूप में कार्य करता है। यहाँ दो प्रकार के निमित्त बताए गए हैं—बाह्य (जैसे स्तुति, दान) और आध्यात्मिक (जैसे श्रद्धा, समाधि), जिनमें आध्यात्मिक बल अधिक प्रबल माना गया है। न्याय और वैशेषिक दर्शन के अनुसार मन को अणु परिमाण का माना गया है, जबकि योगदर्शन के अनुसार चित्त विभु है और उसकी वृत्ति ही संकोच-विकास वाली होती है। सांख्य दर्शन के अनुसार मन एक विकृति होने के कारण मध्यम परिमाण वाला है, किंतु मुण्डक उपनिषद् में मन को विभु बताया गया है। व्याख्या का निष्कर्ष यह है कि वृत्ति, परिणाम, धर्म और विकृति जैसे शब्द एकार्थक हैं और अहंकार भी विभु चित्त की ही वृत्ति है।
4.11 · कैवल्यपाद सूत्र ११
हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥ ४.११ ॥
शब्दार्थ — हेतु · फल · आश्रय · आलम्बनैः · संगृहीतत्वात् · एषाम् · अभावे · तत् · अभावः
अर्थ — हेतु , फल , आश्रय और आलम्बनमें वासनाओंके संगृहीत होनेसे इनके ( हेतु , फल , आश्रय और आलम्बनके ) अभावसे उन ( वासनाओं ) का अभाव होता है ।
व्यासभाष्य
हेतुः धर्मात्सुखमधर्माद्दुःखम् । सुखाद्रागो दुःखाद्द्वेषः । ततश्च प्रयत्नः । तेन मनसा वाचा कायेन वा परिस्पन्दमानः परमनुगृह्णात्युपहन्ति वा । ततः पुनर्धर्माधर्मौ सुखदुःखे, रागद्वेषाविति प्रवृत्तमिदं षडरं संसारचक्रम् । अस्य च प्रतिक्षणमावर्तमानस्याविद्या नेत्री, मूलं सर्वक्लेशानामित्येष हेतुः । फलं तु यमाश्रित्य यस्य प्रत्युत्पन्ना धर्मादेः, न ह्यपूर्वोपजनः । मनस्तु साधिकारमाश्रयो वासनानाम् । न ह्यवसिताधिकारे मनसि निराश्रया वासनाः स्थातुमुत्सहन्ते । यदभिमुखीभूतं वस्तु यां वासनां व्यनक्ति, तस्यास्तदालम्बनम् । एवं हेतुफलाश्रयालम्बनैरेतैः सङ्गृहीताः सर्वा वासनाः । एषामभावे तत्संश्रयाणामपि वासनानामभावः ॥११॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — हेतु धर्म से सुख, अधर्म से दुःख। सुख से राग, दुःख से द्वेष। ततः च प्रयत्नः और ततः प्रयत्न। इससे मन, वचन, या काय से परिस्पंदन करता हुआ पर को अनुग्रह या उपहति करता है। ततः पुनः धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, राग-द्वेष, इस प्रकार यह छः अरों वाला संसार चक्र प्रवृत्त। अस्य च प्रति क्षणम् आवर्तमानस्य अविद्या नेत्री मूलं सर्व क्लेशानाम् इति एष हेतुः और इस प्रति क्षण आवर्तमान का अविद्या नेत्री, सर्व क्लेशों का मूल, यही हेतु। फल वह है जिसके आश्रय से धर्म आदि प्रत्युत्पन्न, न कि अपूर्व का उपजन। मनः तु साधिकारम् आश्रयः वासनानाम् मन साधिकार वासनाओं का आश्रय। अवसित अधिकार वाले मन में निराश्रय वासनाएँ स्थिर रहने में समर्थ नहीं। जिस वासना को व्यक्त करता है, वह उसका आलंबन। इस प्रकार हेतु, फल, आश्रय, और आलंबन से सभी वासनाएँ संगृहीत। इनके अभाव में उन पर आश्रित वासनाओं का भी अभाव। नास्त्यसतः सम्भवो न चास्ति सतो विनाश इति द्रव्यत्वेन सम्भवत्यः कथं निवर्तिष्यन्ते वासनाः ? इति— न अस्ति असतः सम्भवः न च अस्ति सतः विनाशः इति द्रव्यत्वेन सम्भवत्यः कथं निवर्तिष्यन्ते वासनाः इति असत् का सम्भव नहीं, और सत् का विनाश नहीं, इस प्रकार द्रव्यत्व से सम्भव वासनाएँ कैसे निवृत्त होंगी?
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — वासनाओं का हेतु अविद्या आदि क्लेश, फल जाति, आयु और भोग, आश्रय अधिकारसहित चित्त तथा आलम्बन इन्द्रियों के विषय हैं। यद्यपि वासनाएँ अनादि और अनन्त हैं, फिर भी वे इन चार तत्वों के सहारे रहती हैं और इनके अभाव में नष्ट हो जाती हैं। व्यासभाष्य के भाषानुवाद के अनुसार धर्म से सुख और अधर्म से दुःख होता है, जिससे राग-द्वेष और प्रयत्न उत्पन्न होते हैं जो संसार चक्र को चलाते हैं। यह चक्र निरंतर घूमते हुए राग-द्वेष पैदा करता है और क्लेशों का मूल होने से अनन्त वासनाओं का हेतु बनता है। चित्त की फलभोग रूप सामर्थ्य समाप्त होने पर वासनाएँ निराश्रय नहीं रह सकतीं और इन्द्रिय विषय उनके आलम्बन होते हैं। भोजवृत्तिका के भाषानुवाद के अनुसार, वासनाओं का नाश करने का उपाय उनका वर्तमान ज्ञान है क्योंकि राग-द्वेष का कारण अविद्या है। जब ज्ञान और योग से इन हेत्वादिकों को जले हुए बीज के बराबर कर दिया जाता है, तो जड़ न रहने के कारण वासनाएँ नहीं उगतीं और इस प्रकार अनन्त वासनाओं का नाश हो जाता है।
4.12 · कैवल्यपाद सूत्र १२
अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥ ४.१२ ॥
शब्दार्थ — अतीत · अनागतं · स्वरूपतः · अस्ति · अध्व · भेदात् · धर्माणाम्
अर्थ — अतीत और अनागत स्वरूप से हैं, धर्मों के अध्व भेद से।
व्यासभाष्य
भविष्यद्व्यक्तिकमनागतम् । अनुभूतव्यक्तिकमतीतम् । स्वव्यापारोपारूढं वर्तमानम् । त्रयं चैतद्वस्तु ज्ञानस्य ज्ञेयम् । यदि चैतत्स्वरूपतो नाभविष्यन्नेदं निर्विषयं ज्ञानमुदपत्स्यत । तस्मादतीतानागतं स्वरूपतोऽस्तीति । किं च, भोगभागीयस्य वापवर्गभागीयस्य वा कर्मणः फलमुत्पित्सु यदि निरुपाख्यमिति तदुद्देशेन तेन निमित्तेन कुशलानुष्ठानं न युज्येत । सतश्च फलस्य निमित्तं वर्तमानीकरणे समर्थं, नापूर्वोपजनने । सिद्धं निमित्तं नैमित्तिकस्य विशेषानुग्रहणं कुरुते, नापूर्वमुत्पादयति । धर्मी चानेकधर्मस्वभावः । तस्य चाध्वभेदेन धर्माः प्रत्यवस्थिताः । न च यथा वर्तमानं व्यक्तिविशेषापन्नं द्रवत्योऽस्त्येवमतीतमनागतं वा । कथं तर्हि ? स्वेनैव व्यङ्ग्येन स्वरूपेणानागतमस्ति । स्वेन चानुभूतव्यक्तित्वेन स्वरूपेणातीतमिति । वर्तमानस्यैवाध्वनः स्वरूपव्यक्तिरिति, न सा भवत्यतीतानागतयोरध्वनोः । एकस्य चाध्वनः समये द्वावध्वानौ धर्मिसमन्वागतौ भवत एवेति, नाभूत्वा भावस्त्रयाणामध्वनामिति ॥१२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — व्यक्तिक अनागत। अनुभूत व्यक्तिकम् अतीतम् अनुभूत व्यक्तिक अतीत। स्व व्यापार उपारूढं वर्तमानम् स्व व्यापार पर आरूढ वर्तमान। त्रयं च एतत् वस्तु ज्ञानस्य ज्ञेयम् यह तीनों वस्तु ज्ञान का ज्ञेय। न अभविष्यत् न इदं निर्विषयं ज्ञानम् उदपत्स्यत यदि यह स्वरूप से न होता, तो यह निर्विषय ज्ञान उत्पन्न न होता। तस्मात् अतीत अनागतं स्वरूपतः अस्ति इति इसलिए अतीत और अनागत स्वरूप से हैं।
किं च भोग भागीयस्य वा अपवर्ग भागीयस्य वा कर्मणः फलम् उत्पित्सु यदि निरुपाख्यम् इति तत् उद्देशेन तेन निमित्तेन कुशल अनुष्ठानं न युज्येत और भोग या अपवर्ग भागीय कर्म का फल उत्पन्न होने की इच्छा में यदि निरुपाख्य हो, तो उस उद्देश्य से उस निमित्त से कुशल अनुष्ठान युक्त न हो। सतः च फलस्य निमित्तं वर्तमानी करणे समर्थं न अपूर्व उपजनने और सत् फल का निमित्त वर्तमान करने में समर्थ, अपूर्व उपजन में नहीं।
सिद्धं निमित्तं नैमित्तिकस्य विशेष अनुग्रहणं कुरुते न अपूर्वम् उत्पादयति सिद्ध निमित्त नैमित्तिक का विशेष अनुग्रह करता है, अपूर्व उत्पन्न नहीं करता। धर्मी च अनेक धर्म स्वभावः धर्मी अनेक धर्म स्वभाव वाला। तस्य च अध्व भेदेन धर्माः प्रत्यवस्थिताः और उसके अध्व भेद से धर्म प्रत्यवस्थित। न च यथा वर्तमानं व्यक्ति विशेष आपन्नं द्रवति अस्ति एवम् अतीतम् अनागतं वा और जैसा वर्तमान व्यक्त विशेष प्राप्त द्रवति है, वैसा अतीत या अनागत नहीं। कथं तर्हि फिर कैसे?
स्वेन एव व्यङ्ग्येन स्वरूपेण अनागतम् अस्ति स्वयं व्यंग्य स्वरूप से अनागत है। स्वेन च अनुभूत व्यक्तित्वेन स्वरूपेण अतीतम् इति और स्वयं अनुभूत व्यक्तित्व स्वरूप से अतीत। सा भवति अतीत अनागतयोः अध्वनोः केवल वर्तमान अध्व की स्वरूप व्यक्ति, वह अतीत और अनागत अध्व की नहीं। अध्वानौ धर्मि समन्वागतौ भवतः एव इति और एक अध्व के समय दो अध्व धर्मी के साथ संनादति हैं। न अभूत्वा भावः त्रयाणाम् अध्वनाम् इति तीनों अध्वों का अभूत्वा भाव नहीं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — वासनाएँ और उनके फल किसी समय के अभाव में नष्ट नहीं होते, बल्कि वे वर्तमान अवस्था को छोड़कर भूत अवस्था में चले जाते हैं। जब तक धर्म भविष्यत् काल में रहते हैं तब तक वे अपना कार्य प्रकट नहीं करते और केवल वर्तमान में ही अपना कार्य दिखाते हैं। नैयायिकों तथा वैशेषिकों ने अभाव को पाँच प्रकार का माना है: १. प्रागभाव, २. प्रध्वंसाभाव, ३. अन्योन्याभाव, ४. अत्यन्ताभाव और ५. सामयिकाभाव। वेदांत, योग और सांख्य के अनुसार सत्कार्यवाद यह है कि कार्य की उत्पत्ति नहीं होती बल्कि केवल अभिव्यक्ति होती है क्योंकि कार्य पहले से ही कारण में विद्यमान होता है। गीता के अनुसार असत् वस्तु का भाव और सत् वस्तु का अभाव नहीं होता, अर्थात कार्य अपनी सत्ता रखता है और वह कभी भी नष्ट नहीं होता। कार्य और कारण एक-दूसरे के पर्याय हैं जो अपने स्वरूप से बने रहते हैं और केवल वर्तमान काल में स्थूल रूप से व्यक्त होते हैं। इस प्रकार किसी भी वस्तु की उत्पत्ति या नाश नहीं होता क्योंकि सत् और असत् का मेल संभव नहीं है। अतः चित्त जैसे धर्म तीनों कालों में एकरूप रहते हैं और मोक्ष तक अलग नहीं किए जा सकते।
4.13 · कैवल्यपाद सूत्र १३
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥ ४.१३ ॥
शब्दार्थ — ते · व्यक्त · सूक्ष्माः · गुण · आत्मानः
अर्थ — वे धर्म प्रकट और सूक्ष्म गुणस्वरूप हैं ।
व्यासभाष्य
ते खल्वमी त्र्यध्वानो धर्मा वर्तमाना व्यकात्मानोऽतीतानागताः सूक्ष्मात्मानः । सर्वमिदं गुणानां सन्निवेशविशेषमात्रमिति परमार्थतो गुणात्मानः । तथा च शास्त्रानुशासनम्— गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथं ऋच्छति । यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायेव सुतुच्छकम् ॥ इति ॥१३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ये तीन अध्वों के धर्म वर्तमान में व्यक्त स्वरूप, अतीत और अनागत में सूक्ष्म स्वरूप। यह सब गुणों के सन्निवेश विशेष मात्र है, परमार्थतः गुण स्वरूप। तथा च शास्त्र अनुशासनम् गुणानां परमं रूपं न दृष्टि पथं ऋच्छति यत् तु दृष्टि पथं प्राप्तं तत् माया इव सु तुच्छकम् इति और शास्त्र का अनुशासन है—गुणों का परम रूप दृष्टि पथ में नहीं आता, जो दृष्टि पथ में प्राप्त हुआ, वह माया की तरह अति तुच्छ। यदा तु सर्वे गुणाः, कथमेकः शब्द एकमिन्द्रियम् इति ? यदा तु सर्वे गुणाः कथम् एकः शब्दः एकम् इन्द्रियम् इति जब सभी गुण हैं, तो एक शब्द और एक इन्द्रिय कैसे?
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सभी धर्म तीनों मार्गों वाले होते हैं जिनमें वर्तमान मार्ग में व्यक्त या स्थूल और अतीत तथा अनागत मार्ग में अव्यक्त या सूक्ष्म होते हैं। ये सभी धर्म महत्तत्त्व से लेकर स्थूलभूतों तक केवल तीन गुणों के ही परिणाम विशेष हैं। वास्तव में देखा जाए तो सब पदार्थ महत्तत्त्व से लेकर भूत-भौतिक तक गुणों का संनिवेश मात्र होने से गुणस्वरूप ही हैं। पृथ्वी आदि पाँचों स्थूलभूत पञ्चतन्मात्रा-स्वरूप हैं, पञ्चतन्मात्रा तथा एकादश इन्द्रियाँ अहंकार-स्वरूप हैं और अहंकार महत्तत्त्व स्वरूप है। महत्तत्त्व प्रधान यानी मूलप्रकृति स्वरूप है और प्रधान गुण-त्रय स्वरूप है, इस प्रकार परम्परा से यह सारा प्रपञ्च गुणस्वरूप ही है। गुणों का असली स्वरूप हमारी दृष्टिगोचर नहीं होता जैसा कि भगवान वार्षगण्य का वचन है— गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति। यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायेव सुतुच्छकम् अर्थात् गुणों का असली रूप दिखायी नहीं देता और जो दृष्टिगोचर होता है वह माया अथवा इन्द्रजाल की तरह तुच्छ है। भाव यह है कि यह सब कार्य गुणत्रयात्मक रूप अपने कारण प्रधान स्वरूप ही हैं।
4.14 · कैवल्यपाद सूत्र १४
परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥ ४.१४ ॥
शब्दार्थ — परिणाम · एकत्वात् · वस्तु · तत्त्वम्
अर्थ — परिणामके एक होनेसे वस्तुकी एकता होती है ।
व्यासभाष्य
प्रख्याक्रियास्थितिशीलानां गुणानां ग्रहणात्मकानां करणभावेनैकः परिणामः श्रोत्रमिन्द्रियम्, ग्राह्यात्मकानां शब्दभावेनैकः परिणामः शब्दो विषय इति । शब्दादीनां मूर्तिसमानजातीयानामेकः परिणामः पृथिवीपरमाणुस्तन्मात्रावयवः । तेषां चैकः परिणामः पृथिवी गौर्वृक्षः पर्वत इत्येवमादिर्भूतान्तरेष्वपि स्नेहौष्ण्यप्रणामित्वावकाशदानान्युपादाय सामान्यमेकविकारारम्भः समाधेयः । नास्त्यर्थो विज्ञानविसहचरः, अस्ति तु ज्ञानमर्थविसहचरः स्वप्नादौ कल्पितमिति अनया दिशा ये वस्तुस्वरूपमपह्नुवते, ज्ञानपरिकल्पनामात्रं वस्तु स्वप्नविषयोपमं न परमार्थतोऽस्तीत्य आहुः, ते तथेति प्रत्युपस्थितमिदं स्वमाहात्म्येन वस्तु कथमप्रमाणात्मकेन विकल्पज्ञानबलेन वस्तुस्वरूपमुत्सृज्य तदेवापलपन्तः श्रद्धेयवचनाः स्युः ? ॥१४॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — क्रिया, स्थिति शील गुणों के ग्रहणात्मक करण भाव से एक परिणाम श्रोत्र इन्द्रिय। भाव से एक परिणाम शब्द विषय। शब्द आदि मूर्ति समानजातीय का एक परिणाम पृथिवी परमाणु, तन्मात्र अवयव। तेषां च एकः परिणामः पृथिवी गौः वृक्षः पर्वतः इति एवम् आदि भूत अन्तरेषु अपि स्नेह औष्ण्य प्रणामित्व अवकाश दानानि उपादाय सामान्यम् एक विकार आरम्भः समाधेयः और उनका एक परिणाम पृथिवी, गौ, वृक्ष, पर्वत आदि, अन्य भूतों में भी स्नेह, औष्ण्य, प्रणामित्व, अवकाश दान को उपादान कर सामान्य एक विकार आरम्भ समाधेय। अर्थ विज्ञान का सहचर नहीं। किंतु ज्ञान स्वप्न आदि में कल्पित अर्थ का सहचर। इस दिशा से जो वस्तु स्वरूप का अपहनन करते हैं, कहते हैं कि वस्तु ज्ञान परिकल्पना मात्र, स्वप्न विषय की तरह, परमार्थतः नहीं। वे इस प्रकार प्रत्युपस्थित इस स्वमहिमा से वस्तु को अप्रामाणिक विकल्प ज्ञान के बल से वस्तु स्वरूप को त्याग कर अपलाप करने वाले श्रद्धेय कैसे हों? कुतश्चैतदन्याय्यं ? कुतः च एतत् अन्याय्यं और यह अन्याय्य क्यों?
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — तीनों गुण सभी पदार्थों के कारण होते हैं, परंतु वे अपने स्वभाव से अंग-अंगीभाव में गति करते हैं। गुणों की प्रधानता और गौणता के कारण ही परिणाम की एकता से वस्तु एक ही कही जाती है, किंतु उनके भिन्न परिणामों से वस्तुएँ भिन्न धर्मों वाली होती हैं। सांख्यकारिका १३ के अनुसार सत्त्व हल्का और प्रकाशक, रजस् उत्तेजक और चल तथा तम भारी और रोकनेवाला है। इस प्रक्रिया में पाँच प्रकार के भेद आते हैं जैसे कि प्रधान मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच तन्मात्राएँ। अहंकार के सत्त्वप्रधान अंश से मन, रजःप्रधान अंश से ज्ञानेन्द्रियाँ और तमःप्रधान अंश से कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। तन्मात्राओं में भी गुणों की न्यून-अधिकता से पाँचों स्थूल भूत परस्पर भेदवाले होते हैं। इन स्थूल भूतों के धर्म सत्त्वगुण की प्रधानता में प्रकाश देने वाले, रजस की प्रधानता में उत्तेजक और तमस की प्रधानता में प्रमाद उत्पन्न करने वाले होते हैं। जैसे बत्ती, तेल और अग्नि मिलकर अलग-अलग वस्तुओं को भिन्न रूप में काम देते हैं, वैसे ही तीनों गुण मिलकर पुरुष के उपयोग के लिए विभिन्न वस्तुएँ उत्पन्न करते हैं।
4.15 · कैवल्यपाद सूत्र १५
वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥ ४.१५ ॥
शब्दार्थ — वस्तु · साम्ये · चित्त · भेदात् · तयोः · विभक्तः · पन्थाः
अर्थ — वस्तुके एक होनेपर भी चित्तके भेदसे उन दोनों ( चित्त और वस्तु ) का अलग - अलग मार्ग है | …
व्यासभाष्य
बहुचित्तावलम्बिनीभूतमेकं वस्तु साधारणम् । तत्खलु नैकचित्तपरिकल्पितं नाप्यनेकचित्तपरिकल्पितं, किन्तु स्वप्रतिष्ठितम् । कथं ? वस्तुसाम्ये चित्तभेदात। धर्मापेक्षं चित्तस्य वस्तुसाम्येऽपि सुखज्ञानं भवति । अधर्मापेक्षं तत एव दुःखज्ञानं, अविद्यापेक्षं तत एव मूढज्ञानं, सम्यग्दर्शनापेक्षं तत एव माध्यस्थ्यज्ञानमिति । कस्य तच्चित्तेन परिकल्पितं ? न चान्यचित्तपरिकल्पितेनार्थेनान्यस्य चित्तोपरागो युक्तः । तस्माद्वस्तुज्ञानयोर्ग्राह्यग्रहणभेदभिन्नयोर्विभक्तः पन्थाः । नानयोः सङ्करगन्धोऽप्यस्तीति । साङ्ख्यपक्षे पुनर्वस्तु त्रिगुणम् । चलं च गुणवृत्तमिति धर्मादिनिमित्तापेक्षं चित्तैरभिसम्बध्यते, निमित्तानुरूपस्य च प्रत्ययस्योत्पद्यमानस्य तेन तेनात्मना हेतुर्भवति ॥१५॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — बहु चित्त अवलम्बिनी भूतम् एकं वस्तु साधारणम् अनेक चित्तों के आलंबन वाला एक वस्तु साधारण। तत् खलु न एक चित्त परिकल्पितं न अपि अनेक चित्त परिकल्पितं किन्तु स्व प्रतिष्ठितम् वह न एक चित्त से परिकल्पित, न अनेक चित्त से परिकल्पित, किंतु स्वप्रतिष्ठित। साम्ये चित्त भेदात् वस्तु के साम्य में चित्त भेद से। धर्म अपेक्षं चित्तस्य वस्तु साम्ये अपि सुख ज्ञानं भवति धर्म की अपेक्षा से चित्त का वस्तु साम्य में भी सुख ज्ञान होता है।
अधर्म अपेक्षं ततः एव दुःख ज्ञानं अविद्या अपेक्षं ततः एव मूढ ज्ञानं सम्यक् दर्शन अपेक्षं ततः एव माध्यस्थ्य ज्ञानम् इति अधर्म की अपेक्षा से उसी से दुःख ज्ञान, अविद्या की अपेक्षा से उसी से मूढ ज्ञान, सम्यक् दर्शन की अपेक्षा से उसी से माध्यस्थ्य ज्ञान। कस्य तत् चित्तेन परिकल्पितं वह किसके चित्त से परिकल्पित? न च अन्य चित्त परिकल्पितेन अर्थेन अन्यस्य चित्त उपरागः युक्तः और अन्य चित्त से परिकल्पित अर्थ से अन्य का चित्त उपराग युक्त नहीं।
ज्ञानयोः ग्राह्य ग्रहण भेद भिन्नयोः विभक्तः पन्थाः इसलिए वस्तु और ज्ञान के ग्राह्य-ग्रहण भेद से भिन्न होने से पन्था विभक्त। न अनयोः सङ्कर गन्धः अपि अस्ति इति इनमें सङ्कर का गंध भी नहीं। साङ्ख्य पक्षे पुनः वस्तु त्रिगुणम् साङ्ख्य पक्ष में वस्तु त्रिगुण। चलं च गुण वृत्तम् इति धर्म आदि निमित्त अपेक्षं चित्तैः अभिसम्बध्यते और गुण वृत्ति चल, इसलिए धर्म आदि निमित्त की अपेक्षा से चित्तों से संनादति।
अनुरूपस्य च प्रत्ययस्य उत्पद्यमानस्य तेन तेन आत्मना हेतुः भवति और निमित्त के अनुरूप उत्पन्न होने वाले प्रत्यय का वह वह आत्मा से हेतु होता है। केचिदाहुः—ज्ञानसहभूरेवार्थो भोग्यत्वात्सुखादिवदिति । वस्तुस्वरूपमेवापह्नुवते— केचित् आहुः ज्ञान सहभूः एव अर्थः भोग्यत्वात् सुखादि वत् इति कुछ कहते हैं—ज्ञान के साथ उत्पन्न ही अर्थ, भोग्यत्व से सुख आदि की तरह।
ते एतया द्वारा साधारणत्वं बाधमानाः पूर्व उत्तरेषु क्षणेषु वस्तु स्वरूपम् एव अपह्नुवते वे इस द्वारा साधारणत्व को बाधित करते हुए पूर्व और उत्तर क्षणों में वस्तु स्वरूप का ही अपहनन करते हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — प्रत्येक वस्तु अपने स्वरूप में स्थिर है और वह चित्त की कल्पना से नहीं बल्कि चित्त से भिन्न और स्वतंत्र सत्ता रखती है। भोजवृत्तिका भाषानुवाद (सूत्र १५) के अनुसार, यदि ज्ञान से भिन्न पदार्थ होते तो एक या अनेक वस्तु कहना चाहिए था, किंतु एक ही विज्ञान (चित्त) के संस्कार से घट-पटादिरूप से भासने पर भी यह सिद्ध होता है कि ज्ञान और ज्ञेय का भिन्न मार्ग है।
उदाहरण स्वरूप, एक स्त्री रूपी वस्तु को देखकर पतिको सुख, सपत्नी को दुःख, कामी को मोह और संन्यासी को उपेक्षा प्राप्त होती है, जिससे स्पष्ट होता है कि वस्तु एक है परंतु चित्त की वृत्तियाँ चार प्रकार की होती हैं। यदि वस्तु चित्त का कार्य होती, तो वह दूसरे के चित्त में लगने पर वस्तु ही न रहती, अतः वस्तु ज्ञान से भिन्न है। यदि अनेक चित्तों द्वारा निर्मित वस्तुएं विलक्षण नहीं होतीं, तो जगत को बिना कारण के या एकाकार मानना पड़ता, जो कि तर्कसंगत नहीं है।
इस शंका का समाधान यह है कि विज्ञान और अर्थ के स्वरूप में भेद होने के कारण ही कार्य-कारण भाव संभव है। विशेष वक्तव्य (सूत्र १५) के अनुसार बुद्धि, चित्त और विज्ञान एकार्थक हैं और ज्ञान विषयी है जबकि ज्ञेय विषय है। अंततः, जब तक चित्त में धर्म, अधर्म और अविद्या का सम्बन्ध रहता है, तब तक सत्त्व, रजस् और तम की अधिकता से सुख, दुःख और मोह के भाव उत्पन्न होते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि अर्थ विज्ञान से भिन्न है।
4.16 · कैवल्यपाद सूत्र १६
न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥ ४.१६ ॥
शब्दार्थ — न · च · एक · चित्त · तन्त्रं · वस्तु · तत् · अप्रमाणकं · तदा · किं · स्यात्
अर्थ — ग्राह्य वस्तु एक चित्तके अधीन नहीं है ; क्योंकि वह ( वस्तु ) बिना प्रमाण ( चित्त होगी ) के । उस समय क्या होगी ?
व्यासभाष्य
एकचित्ततन्त्रं चेत्वस्तु स्यात्, तदा चित्ते व्यग्रे निरुद्धे वा स्वरूपमेव तेनापरामृष्टामन्यस्याविषयीभूतमप्रमाणकमगृहीतस्वभावकं केनचित्, तदानीं किं तत्स्यात्? सम्बध्यमानं च पुनश्चित्तेन कुतुत्पद्येत ? ये चास्यानुपस्थिता भागास्ते चास्य न स्युः, एवं नास्ति पृष्ठमित्युदरमपि न गृह्येत । तस्मात्स्वतन्त्रोऽर्थः सर्वपुरुषसाधारणः । स्वतन्त्राणि च चित्तानि प्रतिपुरुषं प्रवर्तन्ते । तयोः सम्बन्धादुपलब्धिः पुरुषस्य भोग इति ॥१६॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तंत्र हो। तब चित्त के व्यग्र या निरुद्ध होने पर स्वरूप ही उससे अस्पृष्ट, अन्य का अविषयी, अप्रामाणिक, अगृहीत स्वभाव, तब वह क्या हो? सम्बध्यमानं च पुनः चित्तेन कुतः उत्पद्येत और पुनः चित्त से संनादति वह कहाँ से उत्पन्न हो? ये च अस्य अनुपस्थिता भागाः ते च अस्य न स्युः और जो इसके अनुपस्थित भाग, वे भी इसके न हों। एवं न अस्ति पृष्ठम् इति उदरम् अपि न गृह्येत इस प्रकार पृष्ठ नहीं, तो उदर भी न गृहीत हो। तस्मात् स्वतन्त्रः अर्थः सर्व पुरुष साधारणः इसलिए स्वतंत्र अर्थ सर्व पुरुष साधारण। स्वतन्त्राणि च चित्तानि प्रति पुरुषं प्रवर्तन्ते और स्वतंत्र चित्त प्रत्येक पुरुष में प्रवर्तते। तयोः सम्बन्धात् उपलब्धिः पुरुषस्य भोगः इति उनके संबंध से उपलब्धि, पुरुष का भोग।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — यदि किसी वस्तु को केवल एक चित्त के अधीन माना जाए, तो चित्त के दूसरे विषय में लगने या रुकने पर उस वस्तु का अभाव हो जाना चाहिए। परंतु वास्तव में ऐसी स्थिति नहीं होती और वस्तु विद्यमान रहती है। शरीर के अंगों जैसे हाथ या पीठ के उदाहरण से स्पष्ट होता है कि जब वे दिखाई नहीं देते तब भी वे अविद्यमान नहीं होते। इस प्रकार वस्तु की सत्ता स्वतंत्र है और वह चित्त के अधीन नहीं है। व्यासभाष्य का भाषानुवाद ॥ १६ ॥ यह स्पष्ट करता है कि यदि वस्तु ज्ञान के साथ ही उत्पन्न होती, तो दूसरे विषय पर चित्त लगने पर वह अप्रमाणिक हो जाती और उसका स्वरूप ग्रहण करने वाला कोई न रहता। इससे सिद्ध होता है कि वस्तु स्वतंत्र है और सभी पुरुषों के लिए साधारण है, तथा चित्त भी प्रत्येक पुरुष में स्वतंत्र है। वस्तु और चित्त के संबंध से जो उपलब्धि होती है, वह वास्तव में पुरुष का भोग है।
4.17 · कैवल्यपाद सूत्र १७
तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ॥ ४.१७ ॥
शब्दार्थ — तत् · उपराग · अपेक्षत्वात् · चित्तस्य · वस्तु · ज्ञात · अज्ञातम्
अर्थ — चित्तको वस्तुके जाननेमें उसके उपराग ( विषयका चित्तमें प्रतिबिम्ब पड़ना ) की अपेक्षा होती है इसलिये उसको ( चित्तको ) वस्तु ज्ञात और अज्ञात होती है । ( ५७४ )
व्यासभाष्य
अयस्कान्तमणिकल्पा विषया अयःसधर्मकं चित्तमभिसम्बध्योपरञ्जयन्ति । येन च विषयेणोपरक्तं चित्तं स विषयो ज्ञातस्ततोऽन्यः पुनरज्ञातः । वस्तुनो ज्ञाताज्ञातस्वरूपत्वात्परिणामि चित्तम् ॥१७॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अयस्कान्त मणि जैसे विषय आयस स्वरूप चित्त से संनादति और उपरंजन करते हैं। विषय से चित्त उपरक्त, वह विषय ज्ञात, उससे अन्य पुनः अज्ञात। वस्तु के ज्ञात-अज्ञात स्वरूपत्व से चित्त परिणामी।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — इन्द्रिय-सन्निकर्ष द्वारा जो विषय चित्त में प्रतिबिम्ब पाता है, उसे उपराग कहते हैं। यहाँ विषय अयस्कान्तमणि के समान और चित्त लोहे के समान है, जहाँ विषय अपने आकार से चित्त को चित्रित कर देता है। इस प्रकार वस्तु का ज्ञात या अज्ञात होना चित्त परिणामी है, न कि वह स्वयं उत्पन्न करने वाला है। जब विषयाकार चित्त होता है तब उसमें चेतन प्रतिबिम्बरूप स्फुरण होता है जिसे पुरुष अपने प्रतिबिम्ब द्वारा जानता है।
भोजवृत्ति के भाषानुवाद के अनुसार, ज्ञान प्रकाशक होने से ग्रहणरूप है और घटादि वस्तु ग्राह्यरूप होती हैं, किंतु सब वस्तुओं का एक साथ ग्रहण न होने का कारण यह है कि किसी भी वस्तु के ज्ञात या अज्ञात होने के लिए चित्त की और सामग्री की अपेक्षा आवश्यक है। नीलादि ज्ञान अपनी उत्पत्ति में इन्द्रिय प्रणाली द्वारा चित्त में समाये हुए अर्थ-सम्बन्ध की सहकारिकारणरूप से अपेक्षा करता है क्योंकि बिना सम्बन्ध के कोई ग्रहण नहीं हो सकता।
जो वस्तु अपने प्रतिबिम्बस्वरूप को चित्त के लिए देती है, वही ज्ञात कहलाती है और अन्य अज्ञात रहती हैं। जब किसी जानी हुई वस्तु में सादृश्यादि सहकारी कारण मिल जाते हैं, तभी उसका स्मरण होता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान और स्मृति सर्वत्र नहीं होती।
4.18 · कैवल्यपाद सूत्र १८
सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् ॥ ४.१८ ॥
शब्दार्थ — सदा · ज्ञाताः · चित्त · वृत्तयः · तत् · प्रभोः · पुरुषस्य · अपरिणामित्वात्
अर्थ — सदा ज्ञात चित्त वृत्तियाँ, उस प्रभु पुरुष के अपरिणामित्व से।
व्यासभाष्य
यदि चित्तवत्प्रभुरपि पुरुषः परिणमेत, ततस्तद्विषयाश्चित्तवृत्तयः शब्दादिविषयवज्ज्ञाताज्ञाताः स्युः । सदाज्ञातत्वं तु मनसस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वमनुमापयति ॥१८॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — यदि चित्तवत् प्रभुः अपि पुरुषः परिणमेत् यदि चित्त की तरह प्रभु पुरुष भी परिणमे। ततः उस विषय की चित्त वृत्तियाँ शब्द आदि विषय की तरह ज्ञात-अज्ञात हों। किंतु मन का सदा ज्ञातत्व उस प्रभु पुरुष के अपरिणामित्व को अनुमानित करता है। स्यादाशङ्का—चित्तमेव स्वाभासं विषयाभासं च वैनाशिकानां चित्तात्मवादिनां भविष्यति अग्निवत् स्यात् आशङ्का चित्तम् एव स्वाभासं विषय अभासं च वैनाशिकानां चित्त आत्म वादिनां भविष्यति अग्निवत् आशंका हो कि चित्त ही स्वाभास और विषयाभास, वैनाशिक और चित्त आत्म वादियों के लिए अग्नि की तरह होगा।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चित्त जब बाहरी विषय के साथ संबंध रखता है तो उसकी वृत्तियाँ ज्ञात होती हैं और जब संबंध नहीं होता तब वे अज्ञात होती हैं। चित्त इन दोनों अवस्थाओं में बदलता विषय को जानता है, इसलिए वह परिणामी है, परंतु पुरुष में ऐसा परिणाम नहीं होता क्योंकि वह सदा चित्त की वृत्तियों का साक्षी रहता है। जैसे आकार में परिणत होकर चित्त अपने स्वामी चिदित (पुरुष) के विषय से संबंध रखता है, वैसे ही पुरुष अपने चित्त को वृत्ति सहित सर्वदा जानता है।
पुरुष को चित्त के ऐसे विषय और घटादि हैं, परंतु पुरुष का विषय वृत्तिसहित चित्त है जिसमें विषयों के होने पर परिणाम नहीं होता। भोग्यरूप चित्तवृत्तियों के लिए पुरुष को परिणामशून्य ज्ञान में अर्थाकारतारूप सम्बन्ध की आवश्यकता होती है, किंतु पौरुषेय ज्ञान में पुरुष अर्थाकार जतलाता है। यद्यपि चित्त जड़ है, तथापि जैसे लोहपिण्ड में अग्नि के प्रवेश से वह प्रकाशरूप होता है, वैसे ही ज्ञानरूप पुरुष के साथ भोग्यता-सम्बन्ध होने से चित्त में ज्ञान कहा जाता है।
भोजवृत्तिका भाषानुवाद (सूत्र १८) के अनुसार, जो प्रमाण-विपर्ययादिरूप चित्त की वृत्तियाँ होती हैं, उन्हें ग्रहण करनेवाला अधिष्ठाता पुरुष सब काल में ही जानता है क्योंकि पुरुष परिणामी नहीं होता। तात्पर्य यह है कि चैतन्यरूप पुरुष चित्त का सर्वदा स्वामी है और निर्मल अन्तःकरण भी उसके साथ सदैव रहता है।
4.19 · कैवल्यपाद सूत्र १९
न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥ ४.१९ ॥
शब्दार्थ — न · तत् · स्वाभासम् · दृश्यत्वात्
अर्थ — वह स्वाभास नहीं, दृश्यत्व से।
व्यासभाष्य
यथेतराणीन्द्रियाणि शब्दादयश्च दृश्यत्वान्न स्वाभासानि, तथा मनोऽपि प्रत्येतय्वम् । न चाग्निरत्र डः । न ह्यग्निरात्मस्वरूपमप्रकाशं पूर्व्कार्य। प्रकाशश्चायं प्रकाश्यप्रकाशकसंयोगे दृष्टः । न च स्वरूपमात्रेऽस्ति संयोगः । किं च, स्वाभासं चित्तमित्यग्राह्यमेव कस्यचिदिति शब्दार्थः । तद्यथा—स्वात्मप्रतिष्ठमाकाशं न परप्रतिष्ठमित्यर्थः । स्वबुद्धिप्रचारप्रतिसंवेदनात्सत्त्वानां प्रवृत्तिर्दृश्यते । क्रुद्धोऽहं, भीतोऽहं, अमुत्र मे रोगोऽमुत्र मे क्रोध इति । एतत्स्वबुद्धेरग्रहणे न युक्तमिति ॥१९॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — जैसे अन्य इन्द्रियाँ और शब्द आदि दृश्यत्व से स्वाभास नहीं। वैसे ही मन भी प्रत्येतव्य। न च अग्निः अत्र डः और अग्नि यहाँ उदाहरण नहीं। क्योंकि अग्नि आत्म स्वरूप अप्रकाश और पूर्व कार्य नहीं। प्रकाशः च अयं प्रकाश्य प्रकाशक संयोगे दृष्टः और यह प्रकाश प्रकाश्य और प्रकाशक के संयोग में दृष्ट। न च स्वरूप मात्रे अस्ति संयोगः और स्वरूप मात्र में संयोग नहीं। किं च स्वाभासं चित्तम् इति अग्राह्यम् एव कस्यचित् इति शब्द अर्थः और स्वाभास चित्त अग्राह्य ही है, यह शब्द का अर्थ। आत्म प्रतिष्ठ आकाश, पर प्रतिष्ठ नहीं, यह अर्थ। स्व बुद्धि प्रचार प्रतिसंवेदनात् सत्त्वानां प्रवृत्तिः दृश्यते स्व बुद्धि के प्रचार और प्रतिसंवेदन से सत्त्वों की प्रवृत्ति दिखती है। क्रुद्ध हूँ मैं, भयभीत हूँ मैं, यहाँ मेरा रोग, वहाँ मेरा क्रोध। यह स्व बुद्धि के अग्रहण में युक्त नहीं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जिस प्रकार अन्य इंद्रियाँ और शब्द दृश्य होने के कारण स्वप्रकाश नहीं होते, उसी प्रकार चित्त भी दृश्य होने के कारण स्वप्रकाश नहीं है। अग्नि का दृष्टान्त यहाँ लागू नहीं होता क्योंकि अग्नि जड़ है और उसे जानने के लिए किसी अन्य ज्ञान वाले की आवश्यकता होती है। चित्त के दृश्य होने का प्रमाण यह है कि उसमें उत्पन्न होने वाले सुख, दुःख, भय और क्रोध जैसे परिणाम दूसरे से देखे जाते हैं। भोजवृत्ति के भाषानुवाद के अनुसार, इन अवस्थाओं को देखने वाला उससे अतिरिक्त चेतन पुरुष है। यदि सत्त्वगुण की प्रधानता से चित्त को ही प्रकाशक मान लिया जाए, तो 'यह घट है' जैसे व्यवहार हो जाएंगे और पुरुष को मानने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इस शंका को दूर करने के लिए यह सूत्र स्पष्ट करता है कि वह चित्त स्वभास अर्थात् अपने स्वरूप का स्वयं प्रकाशक नहीं है, बल्कि पुरुष से प्रकाश्य है। जो-जो दृश्य है, वह द्रष्टा से प्रकाश्य है, यह व्याप्ति है। जैसे घटादि दृश्य हैं और द्रष्टा से प्रकाश्य हैं, वैसे ही चित्त भी दृश्य है और इससे स्वयं प्रकाशक नहीं हो सकता।
4.20 · कैवल्यपाद सूत्र २०
एकसमये चोभयानवधारणम् ॥ ४.२० ॥
शब्दार्थ — एक · समये · च · उभय · अनवधारणम्
अर्थ — और एक समयमें दोनों विषय और चित्तका ज्ञान नहीं हो सकता ।
व्यासभाष्य
न चैकस्मिन्क्षणे स्वपररूपावधारणं युक्तम् । क्षणिकवादिनो यद्भवनं सैव क्रिया, तदेव च कारकमित्यभ्युपगमः ॥२०॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — क्षण में स्व और पर रूप का अवधारण युक्त नहीं। क्षणिक वादिनः यत् भवनं सा एव क्रिया तत् एव च कारकम् इति अभ्युपगमः क्षणिक वादियों का अभ्युपगम है कि जो भवन, वही क्रिया, वही कारक। स्यान्मतिः—स्वरसनिरुद्धं चित्तं चित्तान्तरेण समनन्तरेण गृह्यत इति । स्यात् मतिः स्वरस निरुद्धं चित्तं चित्त अन्तरेण समनन्तरेण गृह्यते इति मत हो कि स्वरस से निरुद्ध चित्त चित्तान्तर द्वारा समनन्तर गृहीत होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — यदि यह कहा जाए कि केवल चित्त ही विषय का ज्ञान प्राप्त करता है, तो इसमें दोष आता है कि एक समय में दो ज्ञान संभव नहीं हैं। इस कारण से चित्त से अतिरिक्त इसके साक्षी के रूप में अन्य चेतन पुरुष का मानना अनिवार्य है जैसा कि भोजवृत्ति के भाषानुवाद (सूत्र २०) में कहा गया है। यहाँ दो शंकाएँ उत्पन्न होती हैं कि चित्त का दृश्यत्व सिद्ध नहीं हुआ और बुद्धिकी फिर बुद्धिको ही स्वप्रकाशक क्यों न माना जाए।
इन दोनों शंकाओं का उत्तर इस बात में है कि व्यवहार की योग्यता करने वाला वस्तु-सम्बन्धी बुद्धिका वृत्तिरूप व्यापार होता है और 'मैं सुखी हूँ' जैसे व्यवहार का एक वृत्तिरूप व्यापार दूसरा होता है। चित्त अपने स्वरूप को और वस्तुओं को निश्चित नहीं कर सकता, क्योंकि दो विरोधी व्यापारों का एक ही क्षण में होना असम्भव है। फलों का भान होने के कारण पुरुष बहिर्मुखरूप से ही वृत्तियों द्वारा अपने में रहने वाले चित्त को जानता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि फल पुरुष में है, चित्त में नहीं।
वृत्तिका का तात्पर्य है कि घट और चित्त दोनों का एक ही क्षण में ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए इन दोनों का साक्षी पृथक् पुरुष है। 'घटमहमद्राक्षम्' जैसा स्मृतिज्ञान चित्त और घट के अनुभव से उत्पन्न होता है जो एक चित्त के क्षण में नहीं हो सकता।
4.21 · कैवल्यपाद सूत्र २१
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च ॥ ४.२१ ॥
शब्दार्थ — चित्त · अन्तर · दृश्ये · बुद्धि · बुद्धेः · अतिप्रसङ्गः · स्मृति · संकरः · च
अर्थ — यदि पहले चित्तको दूसरे चित्तका दृश्य माना जाय तो चित्त ( ज्ञान ) के चित्त ( ज्ञान ) का अनवस्था दोष होगा और स्मृतियोंका संकर भी हो जायगा ।
व्यासभाष्य
अथ चित्तं चेच्चित्तान्तरेण गृह्येत, बुद्धिबुद्धिः केन गृह्यते ? साप्यन्यया साप्यन्ययेत्यतिप्रसङ्गः । स्मृतिसंकरश्च—यावन्तो बुद्धिबुद्धीनामनुभवास्तावत्यः स्मृतयः प्राप्नुवन्ति । तत्सङ्कराच्चैकस्मृत्यनवधारणं च स्यादित्येवं बुद्धिप्रतिसंवेदिनं पुरुषमपलपद्भिर्वैनाशिकैः सर्वमेवाकुलीकृतम् । ते तु भोक्तृस्वरूपं यत्र क्वचन कल्पयन्तो न न्यायेन सङ्गच्छते । केचित्सत्त्वमात्रमपि परिकल्प्यास्ति, स सत्त्वो य एतान्पञ्च स्कन्धान्निक्षिप्यान्यांश्च प्रतिसन्दधातीत्युक्त्वा, तत एव पुनस्त्रस्यन्ति । तथा स्कन्धानां महानिर्वेदाय विरागायानुत्पादाय प्रशान्तये गुरुरन्तिके ब्रह्मचर्यं चरिष्यामीत्युक्त्वा सत्त्वस्य पुनः सत्त्वमेवापह्नुवते । साङ्ख्ययोगादयस्तु प्रवादाः, स्वशब्देन पुरुषमेव स्वामिनं चित्तस्य भोक्तारमुपयन्तीति ॥२१॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — चित्त चित्तान्तर से गृहीत हो, तो बुद्धि-बुद्धि किससे गृहीत हो? सा अपि अन्यया सा अपि अन्यया इति अतिप्रसङ्गः वह भी अन्य से, वह भी अन्य से, इस प्रकार अतिप्रसंग। स्मृति संकरः च यावन्तः बुद्धि बुद्धीनाम् अनुभवाः तावत्यः स्मृतयः प्राप्नुवन्ति और स्मृति संकर, जितने बुद्धि-बुद्धियों के अनुभव, उतनी स्मृतियाँ प्राप्त होती हैं। तत् सङ्करात् च एक स्मृति अनवधारणं च स्यात् उस सङ्कर से एक स्मृति का अनवधारण हो।
इति एवम् बुद्धि प्रतिसंवेदिनं पुरुषम् अपलपद्भिः वैनाशिकैः सर्वम् एव आकुलीकृतम् इस प्रकार बुद्धि प्रतिसंवेदी पुरुष का अपलाप करने वाले वैनाशिकों ने सब कुछ आकुल कर दिया। ते तु भोक्तृ स्वरूपं यत्र क्वचन कल्पयन्तः न न्यायेन सङ्गच्छते वे भोक्तृ स्वरूप को कहीं भी कल्पित कर न्याय से नहीं संनादति।
केचित् सत्त्व मात्रम् अपि परिकल्प्य अस्ति स सत्त्वः यः एतान् पञ्च स्कन्धान् निक्षिप्य अन्यान् च प्रतिसन्दधाति इति उक्त्वा ततः एव पुनः त्रस्यन्ति कुछ सत्त्व मात्र को भी कल्पित कर कहते हैं कि वह सत्त्व जो इन पांच स्कंधों को निक्षिप्त कर अन्य को प्रतिसंदधाति, फिर उसी से त्रसते हैं।
तथा स्कन्धानां महानिर्वेदाय विरागाय अनुत्पादाय प्रशान्तये गुरु अन्तिके ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि इति उक्त्वा सत्त्वस्य पुनः सत्त्वम् एव अपह्नुवते और स्कंधों के महानिर्वेद, विराग, अनुत्पाद, प्रशांति के लिए गुरु के पास ब्रह्मचर्य चरने की बात कहकर सत्त्व का सत्त्व ही अपह्नव करते हैं। साङ्ख्य योगादयः तु प्रवादाः स्व शब्देन पुरुषम् एव स्वामिनं चित्तस्य भोक्तारम् उपयन्ति इति किंतु साङ्ख्य और योग आदि प्रवाद स्व शब्द से पुरुष को ही चित्त का स्वामी और भोक्ता उपगच्छति।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — यदि चित्त निरंतर बदलता रहे तो अनवस्था और स्मृति संकर का दोष उत्पन्न होगा, इसलिए चित्त से अतिरिक्त द्रष्टा पुरुष को मानना आवश्यक है। यदि बुद्धियों के ग्रहण की श्रृंखला मानी जाए तो वह भी अनंत होगी और स्मृतियों के मेल से विभक्त ज्ञान संभव नहीं होगा, अतः बुद्धि से भिन्न पुरुष मानना चाहिए। इस प्रकार चित्त दृश्य है और पुरुष द्रष्टा है। योगदर्शन के अनुसार चित्त की वृत्तियों का निरोध ही समाधि है और अविद्या का अर्थ क्लेशों के आवरण से दबा रहना है। चित्त की पाँच अवस्थाएँ मूढावस्था, क्षिप्तावस्था, विक्षिप्तावस्था, एकाग्रावस्था और निरुद्धावस्था हैं। योग के अंतर्गत साधनों जैसे तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान द्वारा समाधि प्राप्त करने का वर्णन है। योग के आठ अंगों में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि सम्मिलित हैं। अंततः पुरुष अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होता है और योग का लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार व मुक्ति है।
4.22 · कैवल्यपाद सूत्र २२
चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥ ४.२२ ॥
शब्दार्थ — चितेः · अप्रतिसंक्रमायाः · तत् · आकार · अपत्तौ · स्व · बुद्धि · संवेदनम्
अर्थ — पुरुषको , जो क्रिया अथवा परिणामरहित है , स्वप्रतिबिम्बित चित्तके आकारकी प्राप्ति होनेपर अपने विषयभूत चित्तका ज्ञान होता है ।
व्यासभाष्य
अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुपतन्ति । तस्याश्च प्राप्तचैतन्योपग्रहस्वरूपाया बुद्धिवृत्तेरनुकार्यमात्रतया बुद्धिवृत्त्यविशिष्टा हि ज्ञानवृत्तिराख्यायते । तथा चोक्तम्— न पातालं न च विवरं गिरीणां नैवान्धकारं कुक्षयो नोदधीनाम् । गुहा यस्यां निहितं ब्रह्म शाश्वतं बुद्धिवृत्तिमविशिष्टां कवयो वेदयन्ते ॥ इति ॥२२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अपरिणामिनी भोक्तृ शक्ति अप्रतिसंक्रमा होकर परिणामी अर्थ में प्रतिसंक्रांति की तरह उसकी वृत्ति का अनुपतन करती है। तस्याः च प्राप्त चैतन्य उपग्रह स्वरूपायाः बुद्धि वृत्तेः अनुकार्य मात्रतया बुद्धि वृत्ति अविशिष्टा हि ज्ञान वृत्तिः आख्यायते और उस प्राप्त चैतन्य उपग्रह स्वरूप वाली बुद्धि वृत्ति के अनुकार्य मात्र होने से बुद्धि वृत्ति से अविशिष्ट ज्ञान वृत्ति कही जाती है। तथा च उक्तम् न पातालं न च विवरं गिरीणां न एव अन्धकारं कुक्षयः न उदधीनाम् गुहा यस्याम् निहितं ब्रह्म शाश्वतं बुद्धि वृत्तिम् अविशिष्टां कवयः वेदयन्ति इति और कहा गया—न पाताल, न गिरियों का विवर, न उदधियों का अंधकार कुक्षि, जिसमें शाश्वत ब्रह्म निहित, बुद्धि वृत्ति से अविशिष्ट, कवि वेदन करते हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अपरिनामी और निर्लेप पुरुष जब विषयाकार परिणामी बुद्धि में प्रतिबिंबित होता है, तब वह उस बुद्धि की वृत्तिका अनुपाती हो जाता है। इस प्रकार चैतन्य प्रतिबिम्बित ग्राहिणी बुद्धि-वृत्ति के अनुकारमात्र होने से ही चेतन ज्ञान-वृत्ति कहलाता है, जबकि परमार्थ में वह चेतन ज्ञाता नहीं है।
क्योंकि चेतन के प्रतिबिम्बिका आधार होने से जो चित्त का चेतनाकार होना है वह तदाकारापत्ति है और केवल इस तदाकारापत्ति के कारण ही उसे द्रष्टा कहा जाता है, जबकि वास्तव में यह दृशिमात्र ही है। जैसे निर्मल जल में प्रतिबिम्बित चंद्रमा अपनी चंचलता के बिना ही जलरूप उपाधिकी चंचलता से युक्त भासता है, वैसे ही चित्त-प्रतिबिम्बित चेतन भी स्वाभाविक ज्ञातृत्व और भोक्तृत्व के बिना केवल प्रति-बिम्बाधार चित्त के विषयाकार होने से तदाकार भासता है।
इस प्रकार चैतन्य-प्रतिबिम्बित चित्त ही चिदाकार हुआ अपने दृश्य और चेतन को द्रष्टा कर देता है, क्योंकि पुरुष वास्तव में द्रष्टा नहीं बल्कि केवल ज्ञानस्वरूप है। उपर्युक्त व्याख्या व्यासभाष्यनुसार है और इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि यद्यपि बुद्धि का क्रिया द्वारा घट आदि से संबंध होता है, तथापि चिति परिणामशून्य होने के कारण बुद्धिक के साथ उसका संयोग नहीं होता।
सूर्य के जल में प्रतिबिम्ब पड़ने की तरह जब चिति बुद्धि में प्रतिबिम्ब पड़ता है, तब बुद्धिको चिदाकारता प्राप्त होती है और चित्त को बुद्धिवृत्ति सहित बुद्धिका भान होता है। भोजवृत्तिका भाषानुवाद के अनुसार, जैसे सत्त्व, रजस् आदि गुण अपने प्रधान गुण से रूप धारण कर लेते हैं या परमाणु एक विषय बना देते हैं, वैसे ही चैतन्य शक्ति के संग होने से जब बुद्धि चैतन्य-सी होती है, तब चित्त को अपने स्वरूप का ज्ञान होता है।
4.23 · कैवल्यपाद सूत्र २३
द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥ ४.२३ ॥
शब्दार्थ — द्रष्टृ · दृश्य · उपरक्तं · चित्तं · सर्व · अर्थम्
अर्थ — – द्रष्टा और दृश्यसे रँगा हुआ चित्त सारे अर्थोंवाला होता है ।
व्यासभाष्य
मनो हि मन्तव्येनार्थेनोपरक्तम् । तत्स्वयं च विषयत्वाद्विषयिणा पुरुषेणात्मीयया वृत्त्याभिसम्बद्धम् । तदेतच्चित्तमेव द्रष्टृदृश्योपरक्तं विषयविषयिनिर्भासं चेतनाचेतनस्वरूपापन्नम्, विषयात्मकमप्यविषयात्मकमिवाचेतनं चेतनमिव स्फटिकमणिकल्पं सर्वार्थमित्युच्यते । तदनेन चित्तसारूप्येण भ्रान्ताः केचित्तदेव चेतनमित्याहुः । अपरे चित्तमात्रमेवेदं सर्वं नास्ति खल्वयं गवादिर्घटादिश्च सकारुणो लोक इति । अनुकम्पनीयास्ते । कस्मात्? अस्ति हि तेषां भ्रान्तिबीजं सर्वरूपाकारनिर्भासं चित्तमिति । समाधिप्रज्ञायां प्रज्ञेयोऽर्थः प्रतिबिम्बीभूतस्तस्यालम्बनीभूतत्वादन्यः । स चेदर्थश्चित्तमात्रं स्यात्कथं प्रज्ञयैव प्रज्ञारूपमवधार्येत । तस्मात्प्रतिबिम्बीभूतोऽर्थः प्रज्ञायां येनावधार्यते स पुरुष इति । एवं ग्रहीतृग्रहणग्राह्यस्वरूपचित्तभेदात्त्रयमप्येतज्जातितः प्रविभजन्ते ते सम्यग्दर्शिनस्तैरधिगतः पुरुष इति ॥२३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अर्थ से उपरक्त। वह स्वयं विषयत्व से विषयी पुरुष से आत्मीय वृत्ति से संनादति। वह चित्त ही द्रष्टृ-दृश्य उपरक्त, विषय-विषयी निर्भास, चेतन-अचेतन स्वरूप प्राप्त। विषयात्मक होकर भी अविषयात्मक की तरह, अचेतन चेतन की तरह, स्फटिक मणि जैसा सर्व अर्थ कहा जाता है। इस चित्त सारूप्य से भ्रांत कुछ कहते हैं कि वह ही चेतन। कहते हैं कि यह सब चित्त मात्र, गौ, घट आदि सकारुण लोक नहीं। वे अनुकम्पनीय। क्योंकि उनका भ्रान्ति बीज सर्व रूप आकार निर्भास चित्त। समाधि प्रज्ञा में प्रज्ञेय अर्थ प्रतिबिम्बी, उसके आलंबनी होने से अन्य। यदि वह अर्थ चित्त मात्र हो, तो प्रज्ञा से प्रज्ञा रूप कैसे अवधारित हो? तस्मात् प्रतिबिम्बी भूतः अर्थः प्रज्ञायां येन अवधार्यते स पुरुषः इति इसलिए प्रज्ञा में प्रतिबिम्बी अर्थ जिससे अवधारित, वह पुरुष। एवं ग्रहीतृ ग्रहण ग्राह्य स्वरूप चित्त भेदात् त्रयम् अपि एतत् जातितः प्रविभजन्ते इस प्रकार ग्रहीतृ, ग्रहण, ग्राह्य स्वरूप चित्त भेद से यह तीनों जातितः प्रविभक्त। वे सम्यक् दर्शी, उनके द्वारा पुरुष अधिगत। कुतश्चैतत्? कुतः च एतत् और यह क्यों?
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चित्त गुणों का प्रथम सात्त्विक विषम परिणाम, प्रसवधर्मी, परिणामी और अचेतन है। पुरुष से प्रतिबिम्बित होकर यह चेतन प्रतीत होता है और बाह्य विषयों से प्रतिबिम्बित होकर दृश्य जैसा भासने लगता है। वास्तव में चित्त, बाह्य जगत्, वस्तुएँ और पुरुष तीनों अलग-अलग सत्ता रखते हैं, किंतु अपनी वृत्ति द्वारा यह सर्वार्थ प्रतीत होता है।
इस प्रकार चित्तों के तीन रूप होते हैं—ग्रहणस्वरूप, गृहीता (पुरुष के प्रतिबिम्ब से) और ग्राह्याकार (विषय के प्रतिबिम्ब से)। लंकावतार सूत्र के अनुसार चित्त ही एकमात्र तत्त्व है जो देह और भोग के रूप में प्रतिष्ठित रहता है, परंतु यह कहना कि चित्त ही सब कुछ है, गलत है क्योंकि इसमें ज्ञाता और ज्ञेया भी भिन्न हैं। भोजवृत्तिका के अनुसार, गृहीता, ग्रहण और ग्राह्य तीनों भिन्न-भिन्न हैं और केवल भ्रान्त दृष्टिवाला व्यक्ति ही इन्हें एक समझकर भ्रमित होता है।
इस शास्त्र में दो प्रकार की चिच्छक्ति मानी गई हैं—नित्योदित और अभिव्यंग्य (प्रकाश होने योग्य)। जड़ प्रकृति में पुरुषार्थ-कर्तव्यता नामक स्वाभाविक परिणाम होते हैं, जिनका उपयोग मुमुक्षु पुरुष मोक्ष के लिए शास्त्रों के माध्यम से करता है। अंततः, चित्त ही वह माध्यम है जो विषयों का निश्चय करके समस्त व्यवहारों को चलाता है और पुरुष के प्रतिबिम्ब द्वारा चेतन जैसा प्रतीत होता है।
4.24 · कैवल्यपाद सूत्र २४
तदसंख्येयवासनाचित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात ॥ ४.२४ ॥
शब्दार्थ — तत् · असंख्येय · वासना · चित्रम् · अपि · पर · अर्थं · संहत्य · कारित्वात्
अर्थ — चित्त अनगिनत वासनाओंसे चित्रित हुआ भी परार्थ है ; क्योंकि वह संहत्यकारी है ।
व्यासभाष्य
तदेतच्चित्तमसंख्येयाभिर्वासनाभिरेव चित्रीकृतमपि परार्थं परस्य भोगापवर्गार्थं, न स्वार्थं संहत्यकारित्वात्गृहवत। संहत्यकारिणा चित्तेन न स्वार्थेन भवितव्यम् । न सुखचित्तं सुखार्थं, न ज्ञानं ज्ञानार्थमुभयमप्येतत्परार्थम् । यश्च भोगेनापवर्गेण चार्थेनार्थवान्पुरुषः । स एव परो न परः सामान्यमात्रम् । यत्तु किञ्चित्परं सामान्यमात्रं स्वरूपेणोदाहरेद्वैनाशिकस्तत्सर्वं संहत्यकारित्वात्परार्थमेव स्यात। यस्त्वसौ परो विशेषः स न संहत्यकारी पुरुष इति ॥२४॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — यह चित्त असंख्य वासना से चित्रित होकर भी पर के भोग और अपवर्ग के लिए परार्थ। स्वार्थ के लिए नहीं, गृह की तरह संहत्य कारित्व से। संहत्यकारी चित्त से स्वार्थ नहीं होना चाहिए। न सुख चित्त सुख के लिए, न ज्ञान ज्ञान के लिए, दोनों परार्थ। यः च भोगेन अपवर्गेण च अर्थेन अर्थवान् पुरुषः और जो भोग और अपवर्ग से अर्थवान्, वह पुरुष। वही पर, न कि सामान्य मात्र। जो वैनाशिक सामान्य मात्र को स्वरूप से उदाहृत करे, वह सब संहत्य कारित्व से परार्थ ही हो। जो वह पर विशेष है, वह संहत्यकारी पुरुष नहीं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जो वस्तु कई चीजों के मेल से बनी होती है, वह संहत्यकारी कहलाती है और वह अपने लिए नहीं बल्कि किसी दूसरे के लिए होती है। इसी प्रकार चित्त भी सत्त्व, रज और तम गुणों के अङ्ग-अङ्गीभाव के मेल से बना है, इसलिए वह भी संहत्यकारी है और पुरुष के ही भोग-अपवर्ग के लिए है। यद्यपि अनन्त वासनाओं के कारण चित्त को भोक्ता माना जा सकता है, तथापि जड़ संहत्यकारी होने के कारण यह परार्थ है और केवल पुरुष ही असंहत है।
भोजवृत्ति के भाषानुवाद के अनुसार, यदि इस प्रकार के चित्त से सब व्यवहार चलते हैं, तो प्रमाणरहित द्रष्टा क्यों माना जाता है? इस शङ्का के कारण द्रष्टामें प्रमाण देते हुए कहा गया कि जो-जो मिलकर कार्य करते हैं वे अन्य के लिए होते हैं और इनसे भिन्न वह पुरुष है। यह तर्क कि दृष्टान्त से शरीरवाला ही 'पर' सिद्ध होता है, तब खारिज होता है जब सत्त्वादि गुणों से विलक्षण कोई अन्य धर्मी होने का विचार किया जाता है।
जैसे काष्ठों से घिरे पर्वत में विलक्षण धूम से अग्नि अनुमित होती है, वैसे ही भोग्य सत्त्व गुण से परार्थता का अनुमान करने पर उससे विलक्षण ही भोक्ता, स्वामी, चेतनरूप और असंहत सिद्ध होता है। यदि उस पुरुष में सर्वोत्कृष्टत्व माना जाए, तो भी शरीर से उत्तम इन्द्रियाँ हैं और उन इन्द्रियों से भी उत्तम चित्तसत्त्व है, जिसका प्रकाशक केवल चेतनरूप ही है जिसमें मेल कहाँसे हो सकता है।
4.25 · कैवल्यपाद सूत्र २५
विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ ४.२५ ॥
शब्दार्थ — विशेष · दर्शिनः · आत्म · भाव · भावना · विनिवृत्तिः
अर्थ — विवेकख्यातिद्वारा पुरुष और चित्तमें भेदके देखनेवालेकी आत्मभावकी भावना निवृत्त जाती है । हूँ , क्या था , आगे क्या …
व्यासभाष्य
यदा प्रवृषि तृणाङ्कुरस्योद्भेदेन तद्बीजसत्तानुमीयते, तथा मोक्षमार्गश्रवणेन यस्य रोमहर्षाश्रुपातौ दृश्येते तत्रापि अस्ति विशेषदर्शनबीजमपवर्गभागीयं कर्माभिनिर्वर्तितमित्यनुमीयते । तस्यात्मभावभावना स्वाभाविकी प्रवर्तते । यस्याभावादिदमुक्तम्—स्वभावं मुक्त्वा दोषादेषां पूर्वपक्षे रुचिर्भवत्यरुचिश्च निर्णये भवति । तत्रात्मभावभावना, « कोऽहमासं, कथमहमासं ? किं स्विदिदं ? कथं स्विदिदं ? के भविष्यामः ? कथं वा भविष्यामः ? » इति । सा तु विशेषदर्शिनो निवर्तते । कुतः ? चित्तस्यैवैष विचित्रः परिणामः । पुरुषस्त्वसत्यामविद्यायां शुद्धश्चित्तधर्मैरपरामृष्ट इति । ततोऽस्यात्मभावभावना कुशलस्य निवर्तते इति ॥२५॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विशेष दर्शिनः आत्म भाव भावना विनिवृत्तिः विशेष दर्शी की आत्म भाव की भावना का विनिवृत्ति। ? के भविष्यामः ? कथं वा भविष्यामः ? » इति । सा तु विशेषदर्शिनो निवर्तते । कुतः ? चित्तस्यैवैष विचित्रः परिणामः । पुरुषस्त्वसत्यामविद्यायां शुद्धश्चित्तधर्मैरपरामृष्ट इति । ततोऽस्यात्मभावभावना कुशलस्य निवर्तते इति ॥ २५॥ यदा प्रवृषि तृण अङ्कुरस्य उद्भेदेन तत् बीज सत्ता अनुमीयते जब वर्षा में तृण अंकुर के उद्भेद से उस बीज की सत्ता अनुमानित होती है।
हर्ष अश्रु पातौ दृश्येते तत्र अपि अस्ति विशेष दर्शन बीजम् अपवर्ग भागीयं कर्म अभिनिवर्तितम् इति अनुमीयते वैसे ही मोक्ष मार्ग के श्रवण से जिसके रोम हर्ष और अश्रु पात दिखते हैं, वहाँ भी विशेष दर्शन का बीज, अपवर्ग भागीय कर्म से अभिनिवर्तित, अनुमानित होता है। तस्य आत्म भाव भावना स्वाभाविकी प्रवर्तते उसकी आत्म भाव की भावना स्वाभाविक प्रवृत्त होती है।
यस्य अभावात् इदम् उक्तम् स्वभावं मुक्त्वा दोषात् एषां पूर्व पक्षे रुचिः भवति अरुचिः च निर्णये भवति जिसके अभाव से कहा गया—स्वभाव को छोड़कर दोष से इनका पूर्व पक्ष में रुचि और निर्णय में अरुचि होती है। तत्र आत्म भाव भावना को अहम् आसं कथम् अहम् आसं किं स्वित् इदं कथं स्वित् इदं के भविष्यामः कथं वा भविष्यामः इति वहाँ आत्म भाव की भावना—मैं कौन था, मैं कैसे था, यह क्या है, यह कैसे है, हम क्या होंगे, हम कैसे होंगे? सा तु विशेष दर्शिनः निवर्तते वह विशेष दर्शी की निवृत्त होती है।
विचित्रः परिणामः यह चित्त का ही विचित्र परिणाम है। पुरुषः तु असत्याम् अविद्यायां शुद्धः चित्त धर्मैः अपरामृष्टः इति पुरुष अविद्या के असत्य होने पर शुद्ध, चित्त धर्मों से अस्पृष्ट। ततः अस्य आत्म भाव भावना कुशलस्य निवर्तते इति ततः कुशल की आत्म भाव की भावना निवृत्त होती है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — आत्मभावभावना का अर्थ है कि मैं कौन हूँ और कैसा होऊँगा जैसी चिन्ता करना, जिसे विवेकज्ञानी विशेषदर्शिन ही करता है। जब योगी को विवेकख्याति द्वारा पुरुष और चित्त का भेद साक्षात् होता है, तब उसकी आत्मभाव-भावना परिणामों से निवृत्त होकर केवल अपरिणामी ज्ञानस्वरूप अनुभव बन जाती है। जिस पुरुष के चित्त में यह भावना होती है, वही आत्मज्ञान के उपदेश का अधिकारी है और योगाभ्यास द्वारा विवेक-ज्ञान का सम्पादन करता है। जिसे यह आत्मभाव-भावना ही नहीं, उसे न तो आत्मज्ञान के उपदेश का अधिकार मिलता है, न विवेकज्ञान उत्पन्न होता है और न ही आत्मभाव-भावना की निवृत्ति होती है। भाष्यकार ने अनुमान बताया है कि जैसे वर्षा ऋतु में तृणों के अंकुर देखकर बीजों की सत्ता का अनुमान किया जाता है, वैसे ही जिस पुरुष को मोक्षमार्ग-श्रवण से रोमाञ्च, हर्ष और अश्रुपात होता है, उसने पूर्वजन्म में शुभ कर्मों का अनुष्ठान कर लिया है। ऐसे पुरुष के चित्त में आत्मभाव-भावना का उदय हुआ है, जबकि जिन पुरुषों की केवल पूर्व पक्ष में रुचि हो और सिद्धान्त में अरुचि हो, उनके चित्त में यह भावना नहीं होती।
4.26 · कैवल्यपाद सूत्र २६
तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥ ४.२६ ॥
शब्दार्थ — तदा · विवेक · निम्नं · कैवल्य · प्राग्भारं · चित्तम्
अर्थ — विशेषदर्शनके उदय होनेपर विशेषदर्शीका चित्त विवेक - मार्ग - संचारी होकर कैवल्यके अभिमुख होता है । – निम्न – जलके प्रवाहके संचारयोग्य जो ढलवान् अर्थात् झुका हुआ प्रदेश है वह निम्न …
व्यासभाष्य
तदानीं यदस्य चित्तं विषयप्राग्भारमज्ञाननिम्नमासीत्तदस्यान्यथा भवति, कैवल्यप्राग्भारं विवेकजज्ञाननिम्नमिति ॥२६॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तब इसका चित्त विषय की ओर प्राग्भार और अज्ञान की ओर निम्न था। वह इसका अन्यथा होता है, कैवल्य की ओर प्राग्भार और विवेकज ज्ञान की ओर निम्न।
व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — है कहलाता । प्राग्भार- – ऐसी उठी हुई भूमि अर्थात् ऊँचे प्रदेशको जहाँ जलका प्रवाह रुक जाता है प्राग्भार कहते हैं ? यहाँ चित्तकी उपमा बहते हुए जलसे दी गयी है , जिस प्रकार पानी नीचेकी ओर प्रकार योगीका चित्त जो पहले अविवेकके मार्गमें बहता हुआ विषयोंकी ओर जा रहा बहता है इसी वह मार्ग बंद हो जाता है और चित्तका प्रवाह आत्मानात्मरूप विवेक - ज्ञानके मार्गकी था विशेषदर्शनसे कैवल्य - प्राग्भारके अभिमुख हो जाता है । अर्थात् चित्त अज्ञानके कारण जो ओर निम्न होकर था , विशेषदर्शनद्वारा विवेक - ज्ञान होनेपर उसकी प्रवृत्ति कैवल्यकी ओर हो जाती संसारी विषयोंमें लगा हुआ है । इसी प्रकारकी उपमा १। १२ में दी गयी है ।
4.27 · कैवल्यपाद सूत्र २७
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ ४.२७ ॥
शब्दार्थ — तत् · छिद्रेषु · प्रत्यय · अन्तराणि · संस्कारेभ्यः
अर्थ — उसके छिद्रों में अन्य प्रत्यय संस्कारों से।
व्यासभाष्य
प्रत्ययविवेकनिम्नस्य सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रप्रवाहिनीश्चित्तस्य तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि अस्मीति वा ममेति वा जानामीति वा न जानामीति वा । कुतः ? क्षीयमानबीजेभ्यः पूर्वसंस्कारेभ्य इति ॥२७॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — प्रत्यय विवेक की ओर निम्न और सत्त्व-पुरुष अन्यता ख्याति मात्र में प्रवाह करने वाले चित्त के। उसके छिद्रों में अन्य प्रत्यय—मैं हूँ, मेरा है, मैं जानता हूँ, मैं नहीं जानता। क्षीण होने वाले बीजों वाले पूर्व संस्कारों से।
व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — छिद्र = विवेकज्ञानके बीचमें कभी - कभी होनेवाला विवेक - अभावरूप अवकाश , अन्तराल अथवा अवसर । जबतक चित्तमें पुरुष और चित्तकी भिन्नताका ज्ञान प्रबलतासे रहता है तबतक उसकी प्रवृत्ति कैवल्यकी ओर रहती है , पर जब - जब इस विवेकज्ञानमें शिथिलता आने लगती है , तब - तब व्युत्थानके संस्कार अर्थात् व्युत्थानकी ममता और अहंताकी वृत्तियाँ ' यह मेरा है ' ' मैं सुखी हूँ‘मैं द : खी हूँ ' इत्यादि उत्पन्न हो जाती है । यह प्रत्यान्तराणि अर्थात् समाधिकी वृत्तियोंसे भिन्न व्युत्थानकी वृत्तियाँ इसलिये बीचमें उत्पन्न होती हैं कि विवेकख्याति ( विशेषदर्शन ) अभी अत्यन्त परिपक्व नहीं हुई है और अनादिकालसे प्रवृत्त व्युत्थानके संस्कार अभी किंचित् बलवान् हैं ।
4.28 · कैवल्यपाद सूत्र २८
हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥ ४.२८ ॥
शब्दार्थ — हानम् · एषां · क्लेशवत्
अर्थ — उन ( व्युत्थानके संस्कारों ) की निवृत्ति क्लेशोंकी निवृत्तिके तुल्य कही गयी जानना चाहिये ।
व्यासभाष्य
यथा क्लेशा दग्धबीजभावा न प्ररोहसमर्था भवन्ति, तथा ज्ञानाग्निना दग्धबीजभावः पूर्वसंस्कारो न प्रत्ययप्रसूर्भवति । ज्ञानसंस्कारास्तु चित्ताधिकारसमाप्तिमनुशेरत इति न चिन्त्यन्ते ॥२८॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — क्लेश दग्ध बीज स्वरूप होकर प्ररोह में समर्थ नहीं होते। वैसे ही ज्ञान अग्नि से दग्ध बीज स्वरूप पूर्व संस्कार प्रत्यय प्रसू नहीं होता। किंतु ज्ञान संस्कार चित्त के अधिकार की समाप्ति का अनुसरण करते हैं, अतः चिंतित नहीं होते।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — स्वामी ओमानन्द तीर्थ के अनुसार जैसे दूसरे पादके दसवें और ग्यारहवें सूत्रों में क्लेशों का नाश बताया गया है, वैसे ही व्युत्थान के संस्कारों का भी नाश जान लेना चाहिए। जिस प्रकार प्रसंख्यान रूप अग्नि से क्लेश दग्ध-बीज बनकर अंकुरन में असमर्थ हो जाते हैं, वैसे ही विवेक-अभ्यास रूप प्रसंख्यान अग्नि से पूर्व के जन्मों के व्युत्थान के संस्कार भी दग्ध-बीज होकर व्युत्थान की वृत्तियों को उत्पन्न नहीं करते। अपरिपक्व विवेकनिष्ठ चित्त में ही व्युत्थान के संस्कारों का प्रादुर्भाव होता है, जबकि परिपक्व ज्ञाननिष्ठ चित्त में नहीं होता। इसलिए पहले विवेक-ज्ञान के अभ्यास से विवेक-ज्ञान के संस्कारों का सम्पादन करके व्युत्थान के संस्कारों का निरोध करना चाहिए। फिर निरोध-संस्कारों से विवेक के संस्कारों का क्षय करना चाहिए और उसके पश्चात् निरोध के संस्कारों का भी असमप्रज्ञात समाधि द्वारा लय कर देना चाहिए। अंत में केवल विवेक-ज्ञान में ही अपने को कृतकृत्य समझ लेना चाहिए।
4.29 · कैवल्यपाद सूत्र २९
प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः ॥ ४.२९ ॥
शब्दार्थ — प्रसंख्याने · अपि · अकुसीदस्य · सर्वथा · विवेक · ख्यातेः · धर्म · मेघः · समाधिः
अर्थ — प्रसंख्यान में भी अकुसीद के लिए सर्वथा विवेक ख्याति से धर्म मेघ समाधि।
व्यासभाष्य
यदायं ब्राह्मणः प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदः, ततोऽपि न किञ्चित्प्रार्थयते, तत्रापि विरक्तस्य सर्वथा विवेकख्यातिरेव भवतीति संस्कारबीजक्षयान्नास्य प्रत्ययान्तराणु उत्पद्यन्ते, तदास्य धर्ममेघो नाम समाधिर्भवति ॥२९॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — जब यह ब्राह्मण प्रसंख्यान में भी अकुसीद। तब भी कुछ प्रार्थना नहीं करता। वहाँ भी विरक्त के लिए सर्वथा विवेक ख्याति ही होती है। बीज के क्षय से इसके अन्य प्रत्यय उत्पन्न नहीं होते। तब इसका धर्म मेघ नामक समाधि होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — प्रसंख्यान का अर्थ है कि जितने तत्व परस्पर विलक्षण स्वरूप वाले हैं, उनका यथाक्रम है और इसे भोजवृत्ति के अनुसार विवेकज्ञान भी कहा जाता है। धर्ममेघ वह परम पुरुषार्थ का साधक है जो पुण्य-पाप से रहित धर्म की वर्षा करता है जैसा कि भोजवृत्ति में बताया गया है। यहाँ कुसीद शब्द का प्रयोग उस योगी के लिए हुआ है जो प्रसंख्यान की लिप्सावाला है और अकुसीद शब्द का प्रयोग उस योगी के लिए हुआ है जो फल की इच्छा से विरक्त है।
जब ब्रह्मनिष्ठ योगी पर वैराग्य द्वारा प्रसंख्यान अर्थात् विवेक ज्ञान से भी किसी फल (सर्वज्ञत्वादि जिनको ३ | ४ ९ में बतलाये गये हैं) की इच्छा नहीं रहती, तब उस पर वैराग्यशील योगी की सर्वथा विवेक-ख्याति उदय होती है। इस अवस्था में निरन्तर विवेकज्ञान का प्रवाह बहने लगता है जिससे व्युत्थान के संस्कारों के बीज भस्म हो जाते हैं और व्युत्थान की वृत्तियाँ उत्पन्न नहीं होतीं।
ज्ञान की इस परिपक्व अवस्था को धर्ममेघ समाधि कहते हैं, जो सम्प्रज्ञात समाधिकी सबसे ऊँची अवस्था विवेक-ख्याति (प्रसंख्यान) है। विवेक-ख्याति की परिपक्व अर्थात् निरन्तर रहनेवाली अवस्था धर्ममेघ समाधि कहलाती है। इसकी पराकाष्ठा ज्ञानप्रसाद-नामी पर-वैराग्य है जिसका फल असम्प्रज्ञात अर्थात् निर्बीज समाधि है।
4.30 · कैवल्यपाद सूत्र ३०
ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ४.३० ॥
शब्दार्थ — ततः · क्लेश · कर्म · निवृत्तिः
अर्थ — उस धर्ममेघ समाधिसे क्लेश और कर्मोंकी निवृत्ति होती है ।
व्यासभाष्य
तल्लाभादविद्यादयः क्लेशाः समूलकाषं कषिता भवन्ति । कुशलाकुशलाश्च कर्माशयाः समूलघातं हता भवन्ति । क्लेशकर्मनिवृत्तौ जीवन्नेव विद्वान्विमुक्तो भवति । कस्मात्? यस्माद्विपर्ययो भवस्य कारणम् । न हि क्षीणविपर्ययः कश्चित्केनचित्क्वचिच्च जातो दृश्यत इति ॥३०॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — उस लाभ से अविद्या आदि क्लेश समूल काषित हो जाते हैं। कुशल अकुशलाः च कर्माशयाः समूल घातं हताः भवन्ति कुशल और अकुशल कर्माशय समूल घात से नष्ट हो जाते हैं। क्लेश और कर्म की निवृत्ति में जीवित ही विद्वान् विमुक्त होता है। क्योंकि विपर्यय भव का कारण। क्षीण विपर्यय वाला कोई कहीं किसी से उत्पन्न नहीं दिखता।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — धर्ममेघ समाधिकी प्राप्ति पर अविद्या आदि पाँचों क्लेश और शुक्ल, कृष्ण तथा मिश्रित तीनों प्रकार के सकाम कर्म और उनकी वासनाएँ मूलसहित नष्ट हो जाती हैं। क्लेश और कर्मों के अभाव में योगी जीवन्मुक्त होकर विचरता है और शरीर त्यागने के पश्चात् विदेह मुक्त पद को प्राप्त होता है जिससे वह पुनः जन्म नहीं लेता। भाष्यकार के अनुसार विपर्यय ज्ञान अर्थात् अविद्या ही संसार का कारण है, इसलिए जिसके अविद्या आदि क्लेश नष्ट हो गए हैं ऐसा पुरुष किसी भी कारण से कहीं भी उत्पन्न हुआ नहीं देखा जाता। महर्षि गौतम ने भी न्याय-दर्शन में 'वीतरागजन्मादर्शनात्' (३।१।२५) के माध्यम से यही कहा है कि जिसके राग बीत गए हैं उसका संसार में जन्म नहीं देखा जाता।
4.31 · कैवल्यपाद सूत्र ३१
तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् ॥ ४.३१ ॥
शब्दार्थ — तदा · सर्व · आवरण · मल · अपेतस्य · ज्ञानस्य · आनन्त्यात् · ज्ञेयम् · अल्पम्
अर्थ — तब सब क्लेशकर्मोंके क्षय - कालमें सर्व आवरणरूप मलोंसे प्रकाशके अनन्त होनेसे ज्ञेय पदार्थ अल्प हो जाता है । रहित होकर चित्तरूप ( ५८ ९ )
व्यासभाष्य
सर्वैः क्लेशकर्मावरणैर्विमुक्तस्य ज्ञानस्यानन्त्यं भवति । आवरकेण तमसाभिभूतमावृतज्ञानसत्त्वं क्वचिदेव रजसा प्रवर्तितमुद्घाटितं ग्रहणसमर्थ्यं भवति । तत्र यदा सर्वैरावरणमलैरपगतममलं भवति, तदा भवत्यस्यानन्त्यम् । ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पं सम्पद्यते, यथाकाशे खद्योतः । यत्रेदमुक्तम्— अन्धो मणिमविध्यत्तमनङ्गुकिरावयत। अग्रीवस्तं प्रत्यमुञ्चत्तमजिह्वोऽभ्यपूजयत॥ इति ॥३१॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — सर्व क्लेश और कर्म आवरणों से विमुक्त ज्ञान का आनन्त्य होता है। आवरक तमस से अभिभूत और आवृत ज्ञान सत्त्व कहीं रजस से प्रवर्तित और उद्घाटित होकर ग्रहण में समर्थ होता है। वहाँ जब सर्व आवरण मलों से रहित अमल होता है, तब इसका आनन्त्य होता है। ज्ञान के आनन्त्य से ज्ञेय अल्प हो जाता है, जैसे आकाश में खद्योत। जहाँ यह कहा गया—अंधा मणि को छेदता है, अनंगु किर उसे बुनता है, अग्रीव उसे मुक्त करता है, अजिह्व उसकी पूजा करता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चित्त सत्त्वप्रधान सूर्य के समान प्रकाशशील है, जिस पर रजस्-तमस्-मूलक अविद्या और सकाम कर्म की वासनाएँ बादलों की तरह आवरण डालती हैं। जब धर्ममेघ समाधि द्वारा ये मल का पर्दा हट जाता है, तब चित्त के अपरिमित ज्ञान का प्रकाश चारों दिशाओं में फैल जाता है। इस अवस्था में जानने योग्य कोई वस्तु अज्ञात नहीं रहती क्योंकि विषय बहुत न्यून और परिच्छिन्न हो जाते हैं जबकि ज्ञान का प्रकाश अनन्त अपरिच्छिन्न हो जाता है। ज्ञेय सांसारिक वस्तुएँ योगी की दृष्टि में जुगनू के समान अल्प या तुच्छ हो जाती हैं। श्रीव्यासजी महाराज इस अवस्था को समझाने के लिए एक दृष्टान्त देते हैं जिसमें एक अंधा मणि को भेदता है, बिना अंगुली वाला धागा पिरोता है, ग्रीवारहित के गले में वह डाली जाती है और जिह्वारहित उसकी प्रशंसा करता है। यह वाक्य अत्यंत आश्चर्यजनक जान पड़ता है और इसी प्रकार की आश्चर्यपूर्ण दशा योगी की इस काल में होती है।
4.32 · कैवल्यपाद सूत्र ३२
ततः कृतार्थानां परिणामक्रमपरिसमाप्तिर्गुणानाम् ॥ ४.३२ ॥
शब्दार्थ — ततः · कृत · अर्थानां · परिणाम · क्रम · परिसमाप्तिः · गुणानाम्
अर्थ — तब कृतार्थ हुए गुणोंके परिणामके क्रमकी समाप्ति हो जाती है ।
व्यासभाष्य
तस्य धर्ममेघस्योदयात्कृतार्थानां गुणानां परिणामक्रमः परिसमाप्यते । न हि कृतभोगापवर्गाः परिसमाप्तक्रमाः क्षणमप्यवस्थातुमुत्सहन्ते ॥३२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — उसके धर्म मेघ के उदय से कृतार्थ गुणों का परिणाम क्रम परिसमाप्त होता है। कृत भोग और अपवर्ग वाले परिसमाप्त क्रम क्षण भी अवस्थित होने में समर्थ नहीं। अथ कोऽयं क्रमो नामेति ? अथ कः अयं क्रमः नाम इति अब यह क्रम नामक क्या है?
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — गुणों की प्रवृत्ति पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिए होती है, जिसके लिए वह शरीर और इंद्रियों जैसे परिणाम के क्रम को जारी रखता है। धर्ममेघ समाधि से क्लेश और कर्मों की निवृत्ति होती है जिससे रजस्-तमस् गुणों का आवरण हट जाता है। इसके फलस्वरूप ज्ञान अनंत हो जाता है जो प्रकृति के दोषों को दिखाने वाला पर-वैराग्य रूप होता है। इस उत्कृष्ट वैराग्य के बाद गुणों का जो अनुलोमतया (सृष्टि-उन्मुख) और प्रतिलोमतया (प्रलय-उन्मुख) प्रधान-अप्रधान भाव से स्थित परिणाम होता है, उसके क्रम की पुरुष के प्रति समाप्ति हो जाती है। धर्ममेघ समाधि के पश्चात् जब पुरुष के भोग और अपवर्ग प्रयोजन कृतार्थ सिद्ध होते हैं, तो गुणों का उस पुरुष के लिए कोई कार्य शेष नहीं रहता। इस कारण वह अपना परिणाम-क्रम समाप्त करके दूसरे पुरुषों के कर्तव्य करने में लगे रहते हैं जैसा कि २.२२ में कहा गया है।
4.33 · कैवल्यपाद सूत्र ३३
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥ ४.३३ ॥
शब्दार्थ — क्षण · प्रतियोगी · परिणाम · अपरान्त · निर्ग्राह्यः · क्रमः
अर्थ — प्रतिक्षण होनेवाली परिणामकी समाप्तिपर जानी जानेवाली ( गुणोंकी अवस्थाविशेषका नाम ) क्रम है ।
व्यासभाष्य
क्षणानन्तर्यात्मा परिणामस्यापरान्तेनावसानेन गृह्यते क्रमः । न ह्यननुभूतक्रमक्षणा नवस्य पुराणता वस्त्रस्यान्ते भवति । नित्येषु च क्रमो दृष्टः । द्वयी चेयं नित्यता । कूटस्थनित्यता परिणामिनित्यत्या च । तत्र कूटस्थनित्यता पुरुषस्य, परिणामिनित्यत्या गुणानाम् । यस्मिन्परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम् । उभयस्य च तत्त्वानभिघातान्नित्यत्वम् । तत्र गुणधर्मेषु बुद्ध्यादिषु परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमो लब्धपर्यवसानः । नित्येषु धर्मिषु गुणेष्वलब्धपर्यवसानः ।
कूटस्थनित्येषु स्वरूपमात्रप्रतिष्ठेषु मुक्तपुरुषेषु स्वरूपास्तिता क्रमेणैवानुभूयत इति तत्राप्यलब्धपर्यवसानः, शब्दपृष्ठेनास्तिक्रियामुपादाय कल्पित इति । अथास्य संसारस्य स्थित्या गत्या च गुणेषु वर्तमानस्यास्ति क्रमसमाप्तिर्न वेति ? अवचनीयमेतत। कथं ? अस्ति प्रश्न एकान्तवचनीयः सर्वो जातौ मरिष्यति ? ओं भो इति । अथ सर्वो मृत्वा जनिष्यत इति । विभज्यवचनीयमेतत। प्रत्युदितख्यातिः क्षीणतृष्णः कुशलो न जनिष्यते, इतरस्तु जनिष्यते । तथा मनुष्यजातिः श्रेयसी ? न वा श्रेयसी ?
इत्येवं परिपृष्टं विभज्यवचनीयः प्रश्नः, पशूनुद्दिश्य श्रेयसी देवानृषींश्चाधिकृत्य नेति । अयं त्ववचनीयः प्रश्नः—संसारोऽयमन्तवानथानन्त इति ? कुशलस्यास्ति संसारक्रमसमाप्तिर्नेतरस्येत्यन्यतरावधारणेऽदोषः । तस्माद्व्याकरणीय एवायं प्रश्न इति ॥३३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — क्षण के अनन्तर्य स्वरूप से परिणाम के अपरान्त अवसान से क्रम गृहीत होता है। अननुभूत क्रम क्षणों से नव वस्त्र की पुराणता अंत में नहीं होती। नित्येषु च क्रमः दृष्टः और नित्य में क्रम देखा गया। द्वयी च इयं नित्यता और यह नित्यता दो प्रकार की। कूटस्थ नित्यता परिणामि नित्यत्या च कूटस्थ नित्यता और परिणामी नित्यता। वहाँ कूटस्थ नित्यता पुरुष की, परिणामी नित्यता गुणों की। जिसमें परिणमने पर तत्त्व का हनन नहीं, वह नित्य।
नित्यत्वम् और दोनों के तत्त्व के अनभिघात से नित्यत्व। वहाँ गुण धर्मों में बुद्धि आदि में परिणाम अपरान्त से निर्ग्राह्य क्रम पर्यवसान प्राप्त। नित्य धर्मी गुणों में अल्ब्ध पर्यवसान। मात्र प्रतिष्ठ मुक्त पुरुषों में स्वरूप अस्तिता क्रम से ही अनुभूत होती है। वहाँ भी अल्ब्ध पर्यवसान, शब्द पृष्ठ से क्रिया उपादान कर कल्पित। इस संसार की स्थिति और गति से गुणों में वर्तमान की क्रम समाप्ति है या नहीं? अवचनीयम् एतत् यह अवचनीय। कथं कैसे?
अस्ति प्रश्नः एकान्त वचनीयः सर्वः जातौ मरिष्यति ओं भो इति प्रश्न एकान्त वचनीय है—सर्व जन्म में मरेगा, ओं भो। फिर सर्व मृत्यु के बाद जन्मेगा। विभज्य वचनीयम् एतत् यह विभज्य वचनीय। प्रत्युदित ख्यातिः क्षीण तृष्णः कुशलः न जनिष्यते इतरः तु जनिष्यते प्रत्युदित ख्याति, क्षीण तृष्ण कुशल जन्म नहीं लेगा, अन्य लेगा। तथा मनुष्य जातिः श्रेयसी न वा श्रेयसी इति एवम् परिपृष्टं विभज्य वचनीयः प्रश्नः और मनुष्य जाति श्रेयसी है या नहीं, ऐसा प्रश्न विभज्य वचनीय।
पशून् उद्दिश्य श्रेयसी देवान् ऋषीन् च अधिकृत्य न इति पशुओं के लिए श्रेयसी, देव और ऋषियों के लिए नहीं। अथ अनन्तः इति किंतु यह अवचनीय प्रश्न—यह संसार अन्तवान् या अनन्त? कुशलस्य अस्ति संसार क्रम समाप्तिः न इतरस्य इति अन्यतर अवधारणे अदोषः कुशल की संसार क्रम समाप्ति है, अन्य की नहीं, इस अन्यतर अवधारण में दोष नहीं। तस्मात् व्याकरणीयः एव अयं प्रश्नः इति इसलिए यह प्रश्न व्याकरणीय ही है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — परिणामों की निरंतर परंपरा को परिणामक्रम कहते हैं, जिसमें प्रत्येक क्षण में सूक्ष्म रूप से होने वाले परिणाम अंत में स्थूल रूप में दिखाई देते हैं। किसी क्रम का आरंभिक क्षण पूर्वान्त और अंतिम क्षण अपरान्त कहलाता है, जो धर्म, लक्षण और अवस्था तीनों परिणामों में पाया जाता है। गुणों की नित्यता के संदर्भ में व्याख्या स्पष्ट करती है कि अतीतावस्था से शून्य होना ही नित्य का लक्षण है, न कि अपरिणामी होना। यहाँ नित्यता के दो प्रकार बताए गए हैं: १. कूटस्थ नित्यता, जो पुरुष की है और जिसमें स्वरूप से सदा एक बने रहने पर कोई परिणाम नहीं होता, तथा २. परिणामी नित्यता, जो गुणों की है जहाँ वे अवस्था से परिणाम होते हुए भी स्वरूप से नष्ट नहीं होते। गुणों के क्रम की समाप्ति के विषय में भाष्यकार ने इसे अवचनीय प्रश्न कहा है क्योंकि इसका उत्तर एकान्त रूप से देने योग्य नहीं है। आगमप्रमाण के अनुसार ज्ञानियों के संसार-क्रम की समाप्ति होती है और अज्ञानी का संसार समाप्त नहीं होता। ज्ञानी संसार के अंत होने पर मुक्त होकर कैवल्यपद प्राप्त करते हैं। टिप्पणी में बताया गया है कि भोजवृत्ति में यह सूत्र कुछ पाठान्तरों के साथ लिखा गया है।
4.34 · कैवल्यपाद सूत्र ३४
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं, स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरेति ॥ ४.३४ ॥
शब्दार्थ — पुरुष · अर्थ · शून्यानां · गुणानां · प्रतिप्रसवः · कैवल्यं · स्वरूप · प्रतिष्ठा · वा · चिति · शक्तिः · इति
अर्थ — पुरुषार्थसे शून्य हुए गुणोंका अपने कारणमें लीन हो जाना कैवल्य है शक्तिका अपने स्वरूपमें अवस्थित हो जाना कैवल्य है । अथवा चिति — गुणोंकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग - अपवर्गके लिये है ।
व्यासभाष्य
इति पतञ्जलिविरचिते योगसूत्रे चतुर्थः कैवल्यपादः । ॥ इति पातञ्जलयोगसूत्राणि ॥ कृतभोगापवर्गाणां पुरुषार्थशून्यानां यः प्रतिप्रसवः कार्यकारणात्मनां गुणानां तत्कैवल्यम् । स्वरूपप्रतिष्ठा पुनर्बुद्धिसत्त्वानभिसम्बन्धात्पुरुषस्य चितिशक्तिरेव केवला, तस्याः सदा तथैवावस्थानं कैवल्यमिति ॥३४॥ इति श्रीपातञ्जले साङ्ख्यप्रवचने योगशास्त्रे श्रीमद्व्यासभाष्ये कैवल्यपादश्चतुर्थः ।
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — कृतभोगापवर्गाणां पुरुषार्थशून्यानां यः प्रतिप्रसवः कार्यकारणात्मनां गुणानां तत्कैवल्यम् । स्वरूपप्रतिष्ठा पुनर्बुद्धिसत्त्वानभिसम्बन्धात्पुरुषस्य चितिशक्तिरेव केवला, तस्याः सदा तथैवावस्थानं कैवल्यमिति ॥ ३४॥ कृत भोग अपवर्गाणां पुरुष अर्थ शून्यानां यः प्रतिप्रसवः कार्य कारण आत्मनां गुणानाम् तत् कैवल्यम् कृत भोग और अपवर्ग वाले पुरुषार्थ शून्य गुणों का कार्य-कारण स्वरूप का जो प्रतिप्रसव, वह कैवल्य। स्वरूप प्रतिष्ठा पुनः बुद्धि सत्त्व अनभिसम्बन्धात् पुरुषस्य चिति शक्तिः एव केवला स्वरूप प्रतिष्ठा पुनः बुद्धि सत्त्व से असंबंध से पुरुष की चिति शक्ति ही केवला। तस्याः सदा तथैव अवस्थानं कैवल्यम् इति उसका सदा वैसे ही अवस्थान कैवल्य। चतुर्थः कैवल्य पादः इस प्रकार पतंजलि द्वारा रचित योग सूत्र में चतुर्थ कैवल्य पाद। ॥ इति पातञ्जलयोगसूत्राणि ॥ इस प्रकार पातंजल योग सूत्र। इति श्रीपातञ्जले साङ्ख्यप्रवचने योगशास्त्रे श्रीमद्व्यासभाष्ये कैवल्यपादश्चतुर्थः । इति श्री पातञ्जले साङ्ख्य प्रवचने योग शास्त्रे श्रीमत् व्यास भाष्ये कैवल्य पादः चतुर्थः इस प्रकार श्री पातंजल के साङ्ख्य प्रवचन योग शास्त्र में श्रीमत् व्यास भाष्य में कैवल्य पाद चतुर्थ।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पुरुषार्थ के लिए गुण शरीर, इन्द्रिय और बुद्धि में परिणत होते हैं तथा अपवर्ग प्राप्त होने पर इनका कोई कार्य शेष नहीं रहता। जब पुरुष का प्रयोजन भोग और अपवर्ग रूप से सिद्ध हो जाता है, तब गुणों का अपने कारण में लीन होना ही कैवल्य कहलाता है। इस प्रकार चितिशक्ति का अपने स्वरूप में अवस्थित होना ही मुक्ति है, जिसे योगशास्त्र की व्याख्या के अनुसार दो लक्षणों में कहा गया है। भोजवृत्तिका के भाषानुवाद के अनुसार मोक्ष वह है जब वृत्तियों के तुल्यरूप की निवृत्ति होने पर चेतनशक्तिका अपने स्वरूपमात्र में स्थिति होती है। आत्मा का संसार-दशा और मुक्ति-अवस्था में एक ही रूप है क्योंकि आत्मभाव एकरस से रहना है। योगोक्त मत के अनुसार आत्मा को केवल चिद्रूप अधिष्ठाता मानना चाहिए, न कि अहं प्रतीतिका विषय या परिणामी। आत्मा विमर्शरूप से चेतन नहीं है क्योंकि विचार बिना अस्मिता के संभव नहीं है। सभी दर्शनों में चिति-शक्तिका कैवल्य का अर्थ वृत्तियों के सदृश रूपों को छोड़कर अपने स्वरूप में स्थित होना ही है। इस प्रकार योगप्रदीप में कैवल्यपद की व्याख्या समाप्त हुई।
उपसंहार
इन सूत्रों का सार यह है कि जब साधक विवेक-ख्याति के माध्यम से संस्कारों और क्लेशों का क्षय कर देता है, तब वह समस्त गुणों के परिवर्तन से मुक्त हो जाता है। यह यात्रा चित्त के सूक्ष्म रूपांतरण से शुरू होकर पुरुष की अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठा तक पहुँचती है, जहाँ द्वैत का पूर्ण अभाव होता है।
In English
Yoga Sutra: Kaivalya Pada
This text explains the final chapter of the Yoga Sutras, focusing on liberation and the nature of spiritual powers. Through the commentary of Omananda Tirtha, it describes how various practices like mantra and austerity lead to transformations in one's physical and mental nature.
This article answers
- Yoga sutra kaivalya pada meaning?
- How are siddhis obtained in yoga?
- Process of transformation through prakriti?
- Role of dharma in overcoming adharma?