श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · पातञ्जल योगदर्शन

पातञ्जल योगदर्शन — विभूतिपाद

55 मूल पद्य 55 संस्करणसे मिलाये गये

इन सूत्रों में चित्त की एकाग्रता से लेकर अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति तक की यात्रा का वर्णन है। यहाँ धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से संयम की प्रक्रिया को समझाया गया है, जिससे साधक को विभिन्न दिव्य शक्तियों और ज्ञान का अनुभव होता है।

3.1 · विभूतिपाद सूत्र १

सूत्र ३.१

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ ३.१ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 515

शब्दार्थ — देश · बन्धः · चित्तस्य · धारणा

अर्थ — चित्तका वृत्तिमात्रसे किसी स्थानविशेषमें बाँधना ' धारणा ' कहलाता है ।

व्यासभाष्य

नाभिचक्रे, हृदयपुण्डरीके, मूर्ध्नि ज्योतिषि, नासिकाग्रे, जिह्वाग्रे, इत्यादिमादिषु देशेषु, बाह्ये वा विषये चित्तस्य वृत्तिमात्रेण बन्ध इति धारणा ॥१॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — नाभि चक्र, हृदय पुण्डरीक, मूर्ध्नि ज्योतिष, नासिका अग्र, जिह्वा अग्र, इत्यादि देशों में, या बाह्य विषय में, चित्त की वृत्ति मात्र से बंधन धारणा है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — शरीर, इन्द्रियों और चित्त की प्रकृति में विलक्षण परिवर्तन होने को सिद्धि कहते हैं। इन सिद्धियों के पाँच निमित्त और प्रकार हैं—जन्मजा सिद्धि, ओषधिजा सिद्धि, मन्त्रजा सिद्धि, तपोजा सिद्धि और समाधिजा सिद्धि। जन्मजा सिद्धि में पक्षियों का उड़ना या कपिल आदि महर्षियों का पूर्व पुण्यों से प्राप्त स्वाभाविक ज्ञान शामिल है। ओषधिजा सिद्धि पारे जैसे रसायनों के सेवन से शरीर को युवा बनाने जैसी होती है, जबकि मन्त्रजा सिद्धि स्वाध्याय और एकाग्रता से प्राप्त होती है। तपोजा सिद्धि में तप से अशुद्धि दूर होकर शरीर और इन्द्रियों की सिद्धि होती है और समाधिजा सिद्धि केवल कैवल्य के लिए उपयोगी है। श्रीभोज महाराज ने भोजवृत्तिका भाषानुवाद में स्पष्ट किया है कि जन्म, ओषधि और मन्त्र आदि केवल निमित्तमात्र हैं और ये सिद्धियाँ पूर्व जन्मों में क्लेशों को नष्ट करने वालों को ही प्राप्त होती हैं। अंततः, अन्य सभी सिद्धियों का वास्तविक कारण पूर्व जन्मों में अभ्यस्त समाधि ही है।

3.2 · विभूतिपाद सूत्र २

सूत्र ३.२

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥ ३.२ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 515

शब्दार्थ — तत्र · प्रत्यय · एक · तानता · ध्यानम्

अर्थ — उसमें वृत्तिका एक - सा ( घटोऽयं घटोऽयम् आदि ) बना रहना ध्यान है ।

व्यासभाष्य

तस्मिन्देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशः प्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम् ॥२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — उस स्थान में ध्येय के आलंबन वाले प्रत्यय की एक तानता, सदृश प्रवाह, अन्य प्रत्यय से अपरामृष्ट, ध्यान है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — तत्र = उस प्रदेश अर्थात् ध्येय विषयमें जिसमें चित्तको वृत्तिमात्रसे ठहराया है । प्रत्यय - ध्येयकी आलोचना करनेवाली वृत्ति अर्थात् वह वृत्ति जो धारणामें ध्येयके तदाकार होकर उसके स्वरूपसे भासती है 1 । एकतानता = एक - सा बना रहना अर्थात् उस ध्येय आलम्बनवाली वृत्तिका समान प्रवाहसे लगातार उदय होते रहना और किसी अन्य वृत्तिका बीचमें न आना । धारणामें चित्त जिस वृत्तिमात्रसे ध्येयमें लगता है , जब वह वृत्ति इस प्रकार समान प्रवाहसे लगातार उदय होती रहे कि दूसरी कोई और वृत्ति बीचमें न आये , तब उसको ध्यान कहते हैं । तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥ ३ ॥

3.3 · विभूतिपाद सूत्र ३

सूत्र ३.३

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥ ३.३ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 516

शब्दार्थ — तत् · एव · अर्थ · मात्र · निर्भासम् · स्वरूप · शून्यम् · इव · समाधिः

अर्थ — वह ध्यान ही समाधि कहलाता है , जब उसमें केवल ध्येय अर्थमात्रसे भासता है और उसका ( ध्यानका ) स्वरूप शून्य- जैसा हो जाता है ।

व्यासभाष्य

ध्यानमेव ध्येयाकारनिर्भासं प्रत्ययात्मकेन स्वरूपेण शून्यमिव यदा भवति, ध्येयस्वभावावेशात्तदा समाधिरित्युच्यते ॥३ तदेतद्धारणाध्यानसमाधित्रयमेकत्र संयमः— त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ध्यानम् एव ध्येय आकार निर्भासम् प्रत्यय आत्मकेन स्वरूपेण शून्यम् इव यदा भवति ध्येय स्वभाव आवेशात् तदा समाधिः इति उच्यते ध्यान ही ध्येय के आकार का निर्भास, प्रत्यय आत्मक स्वरूप से शून्य जैसा, जब होता है, ध्येय स्वभाव के आवेश से, तब समाधि कहा जाता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अभ्यास के बल से जब ध्येय विषय का ध्यान अपने ध्यानाकार रूप से रहित होकर केवल ध्येय स्वरूप मात्र से प्रकाशित होने लगे, तब वह समाधि कहलाता है। ध्यानावस्था में जो ध्येय आलम्बनवाली वृत्ति प्रवाह से उदय होती है, वह ध्यातृ, ध्यान और ध्येय तीनों से मिश्रित होती है, जिसमें ध्यातृ और ध्यान बने रहने के कारण ध्येयाकार वृत्ति अपने विषय को पूर्णता से प्रकाशित नहीं करती।

जैसे-जैसे ध्यान बढ़ता है, ध्येय-स्वरूपाकारता बढ़ती जाती है और ध्यातृ तथा ध्यान अपने स्वरूप से शून्य-जैसे होते जाते हैं। जब ध्यान इतना प्रबल हो जाए कि ध्यातृ और ध्यान अपने स्वरूप से सर्वथा-जैसे होकर केवल ध्येय-स्वरूप मात्र से भासने लगें और ध्येय का स्वरूप उनसे अभिन्न होकर ध्येयाकार वृत्ति में पूर्णता से भासने लगे, तो यह समाधि कहलाती है।

'अर्थमात्रनिर्भासम्' में 'मात्र' पद से यह बताया गया है कि ध्यान में ध्येय का भान होता है, किंतु समाधि में ध्यान ध्येय मात्र से भासता है और 'स्वरूपशून्यम् इव' पद यह स्पष्ट करता है कि समाधिकी अवस्था में ध्यान का सर्वथा अभाव नहीं होता, बल्कि वह ध्येय से अभिन्न होने के कारण स्वरूप से शून्य-जैसा हो जाता है। श्रीभोज महाराज समाधिका का अर्थ इस प्रकार करते हैं कि जिसमें मन विक्षेपों को हटाकर यथार्थता से एकाग्र किया जाता है, वही समाधि है।

योग के अंतिम तीन अंगों में धारणा और ध्यान समाधि के अंग हैं, जहाँ चित्त की त्रिपुटी ध्यातृ, ध्यान और ध्येय रूप होती है। जब तक यह त्रिपुटी से भान होने वाली विषयाकार वृत्ति व्यवधानसहित विच्छिन्न रहे, वह धारणा कहलाती है; जब यह निर्बाध हो जाए किंतु सदृश वृत्तियों का प्रवाह बना रहे, तब तक वह ध्यान कहलाता है; और जब इस त्रिपुटी का भान जाता रहे और ध्यातृ तथा ध्यान अपने स्वरूप से शून्य-जैसे भासने लगें, तब वह समाधि कहलाती है।

पहले पाद से इस त्रिपुटी को सवितर्क और निर्वितर्क समापत्ति में शब्द, अर्थ और ज्ञान से बताया गया है, जिसमें शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पों से संयुक्त सवितर्का समापत्ति को ध्यान की अवस्था और स्मृति से परिशुद्ध होकर स्वरूप से शून्य-जैसे केवल अर्थमात्र से भासने वाली निर्वितर्का समापत्ति को समाधिकी अवस्था समझना चाहिए।

यह सम्प्रज्ञात योग अथवा सबीज समाधि है, क्योंकि इसमें त्रिपुटी का अभाव होने पर भी संसार का बीज विषय के ध्येयाकार वृत्तिरूप से विद्यमान रहता है, जबकि जब इस ध्येयाकार वृत्तिका भी अभाव हो जाए और समस्त वृत्तियों का निरोध हो जाए, तब वह असमाज्ञात योग अथवा निर्बीज समाधि होती है।

3.4 · विभूतिपाद सूत्र ४

सूत्र ३.४

त्रयमेकत्र संयमः ॥ ३.४ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 517

अर्थ — तीनों ( धारणा , ध्यान और समाधि ) का एक विषयमें होना संयम कहलाता है ।

व्यासभाष्य

एकविषयाणि त्रीणि साधनानि संयम इत्युच्यते । तदस्य त्रयस्य तान्त्रिकी परिभाषा संयम इति ॥४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत् एतत् धारणा ध्यान समाधि त्रयम् एकत्र संयमः वह यह धारणा, ध्यान, और समाधि का त्रय एकत्र संयम है— त्रयम् एकत्र संयमः त्रय एकत्र संयम है। एक विषय पर तीन साधन संयम कहलाते हैं। इस त्रय की तान्त्रिकी परिभाषा संयम है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — समाधि अङ्गी है और धारणा , ध्यान उसके अङ्ग हैं । धारणा और ध्यान समाधिकी ही प्रथम अवस्था है । विभूति आदिमें इन तीनोंकी ही आवश्यकता होती है । इसीलिये योग - शास्त्रकी परिभाषामें इन तीनोंके समुदायको संयम कहा जाता है । जब धारणा , ध्यान और समाधि एक ही विषयमें करनी हों तब उसकी संयम संज्ञा होती है अर्थात् उसको संयम शब्दसे कहते हैं ।

3.5 · विभूतिपाद सूत्र ५

सूत्र ३.५

तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥ ३.५ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 517

शब्दार्थ — तत् · जयात् · प्रज्ञा · आलोकः

अर्थ — उस जय से प्रज्ञा का आलोक।

व्यासभाष्य

तस्य संयमस्य जयात्समाधिप्रज्ञाया भवत्यालोकः । यथा यथा संयमः स्थिरपदो भवति, तथा तथा समाधिप्रज्ञा विशारदी भवति ॥५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — उस संयम के जय से समाधि प्रज्ञा का आलोक होता है। जैसे-जैसे संयम स्थिरपद होता है, वैसे-वैसे समाधि प्रज्ञा विशारदी होती है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — तज्जय = संयमजय — अभ्यासके बलसे संयमका दृढ़ - परिपक्व हो जाना संयम - जय है । प्रज्ञालोक = अन्य विजातीय प्रत्ययोंके अभावपूर्वक केवल ध्येय - विषयक शुद्ध , सात्त्विक प्रवाहरूपसे बुद्धिका स्थिर होना प्रज्ञालोक है । जब संयम अर्थात् धारणा , ध्यान समाधिको एक विषयपर ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे लगानेका अभ्यास परिपक्व हो जाय , तब समाधि - प्रज्ञा उत्पन्न होती है , जिससे ध्येयका ज्ञान यथार्थरूपसे होने लगता है और नाना प्रकारकी विभूतियाँ सिद्ध होने लगती हैं । अन्तमें विवेकख्यातिका साक्षात् होने लगता है ।

3.6 · विभूतिपाद सूत्र ६

सूत्र ३.६

तस्य भूमिषु विनियोगः ॥ ३.६ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 518

शब्दार्थ — तस्य · भूमिषु · विनियोगः

अर्थ — उस संयमका भूमियोंमें विनियोग करना चाहिये ।

व्यासभाष्य

तस्य संयमस्य जितभूमेर्यानन्तरा भूमिस्तत्र विनियोगः । न ह्यजिताधरभूमिरनन्तरभूमिं विलङ्घ्य प्रान्तभूमिषु संयमं लभते । तदभावाच्च कुतस्तस्य प्रज्ञालोकः ? ईश्वरप्रसादाज्जितोत्तरभूमिकस्य च नाधरभूमिषु परचित्तज्ञानादिषु संयमो युक्तः । कस्मात्? तदर्थस्यान्यत एवावगतत्वात। भूमेरस्या इयमनन्तरा भूमिरित्यत्र योग एवोपाध्यायः । कथं ? एवं ह्युक्तम्— योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते । योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगे रमते चिरम् ॥ इति ॥६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — उस संयम का जित भूमि में जो अनन्तर भूमि है, वहाँ विनियोग है। निश्चय ही अजित अधर भूमि अनन्तर भूमि को लाँघकर प्रान्त भूमियों में संयम प्राप्त नहीं करता। उसके अभाव से उस प्रज्ञा का आलोक कहाँ से? ईश्वर प्रसादात् जित उत्तर भूमिकस्य च न अधर भूमिषु पर चित्त ज्ञान आदिषु संयमः युक्तः ईश्वर प्रसाद से जित उत्तर भूमि वाले का अधर भूमियों में पर चित्त ज्ञान आदि में संयम युक्त नहीं। कस्मात् तत् अर्थस्य अन्यतः एव अवगतत्वात् क्यों? क्योंकि उस अर्थ का अन्यत्र से ही अवगत होने से। भूमेः अस्याः इयम् अनन्तरा भूमिः इति अत्र योगः एव उपाध्यायः इस भूमि की यह अनन्तर भूमि है, इसमें योग ही उपाध्याय है। कथम् एवम् हि उक्तम् योगेन योगः ज्ञातव्यः योगः योगात् प्रवर्तते यः अप्रमत्तः तु योगेन स योगे रमति चिरम् इति कैसे? ऐसा कहा गया—योग से योग जाना जाता है, योग से योग प्रवर्तित होता है, जो अप्रमत्त है वह योग से योग में चिरकाल रमता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — भूमि से अभिप्राय चित्तभूमि से है, जिसमें संयम का अर्थ स्थूल-सूक्ष्म आलम्बन भेद से होती हुई चित्त की वृत्तियों में विनियोग करना है। योगी को पहले नीची भूमि यानी स्थूल वृत्ति वाली भूमि विजय करनी चाहिए और फिर उससे ऊँची सूक्ष्म वृत्ति वाली भूमि में संयम करना चाहिए क्योंकि निचले स्तरों को जीते बिना उच्च स्तरों पर संयम करने से विवेक-ज्ञान रूपी फल प्राप्त नहीं होता।

जैसे धनुर्धारी क्रम से स्थूल और सूक्ष्म लक्ष्य का वेधन करते हैं, वैसे ही योगी को पहले वितर्क अनुगत, फिर विचार अनुगत, फिर आनन्द अनुगत और फिर अस्मिता अनुगत या पहले ग्राह्य, फिर ग्रहण, फिर ग्रहीतृ इत्यादि प्रकार से पहली-पहली भूमि जीतकर उच्च भूमियों में संयम करना चाहिए।

यदि ईश्वर के अनुग्रह से योगी का चित्त पूर्व ही उत्तर भूमियों में लगने योग्य हो गया हो तो पूर्व भूमियों में लगाने की आवश्यकता नहीं है और यह ज्ञान योग द्वारा प्राप्त होता है जैसा कि 'योगेन योगो ज्ञातव्यो' जैसे श्लोक में कहा गया है।

सूत्र ६ के अनुसार धारणा, ध्यान और समाधि तीनों क्रिया के भाग हैं जिनमें किसी विषय में चित्त को ठहराने का नाम 'धारणा', एक ही संयम रूप में ठहरने को 'ध्यान' और जब वही ध्यान इतना सूक्ष्म और तल्लीनता के साथ हो जाए कि ध्येय विषय के अतिरिक्त कुछ न रहे तब उसे 'समाधि' कहते हैं।

इस संयम की क्रिया से आध्यात्मिक भूमियों की विजय, असम्प्रजाप्त वशीकरण और आत्मोन्नति जैसे लाभ प्राप्त होते हैं, किंतु इसके दुरुपयोग से अधोगति और आत्म-समाधि यानी स्वरूपावस्थिती के अवनतिकी सम्भावना भी होती है क्योंकि यह प्रयोग पर निर्भर करता है। संयम को परमाणुबम सदृश समझ लेना चाहिए जिसमें अद्भुत शक्तियाँ होती हैं; उदाहरणस्वरूप सूक्ष्म परमाणुओं का उपयोग उन्नति के लिए होता है किंतु उनका दुरुपयोग विनाशकारी भी हो सकता है।

चित्त गुणों का प्रथम विषम परिणाम है और सबसे सूक्ष्म होने के कारण सबमें प्रविष्ट होकर यथोचित परिणाम कर सकता है, इसलिए संयम में चित्त का ही सारा खेल होता है। बाजीगरों या कुछ साधुओं द्वारा किए जाने वाले चमत्कार वास्तव में एक प्रकार के संयम ही हैं, परंतु पिशाच-सिद्धि या भूत-सिद्धिके अभिलाषी जो तामसी मन्त्रों से चित्त को भूत-पिशाचाकार में परिणत करते हैं, वह अधोगति है।

श्रीमद्भगवद्गीता (१७.४-६) और गीता (९.२५) के उद्धरणों के अनुसार सात्त्विक पुरुष देवताओं को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष-राक्षसों को और तामस पुरुष भूतों को पूजते हैं, अतः जो अज्ञानियों से शरीर और अन्तरात्मा को कष्ट देते हैं वे आसुरी स्वभाव वाले होते हैं।

3.7 · विभूतिपाद सूत्र ७

सूत्र ३.७

त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥ ३.७ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 521

शब्दार्थ — त्रयम् · अन्तरङ्गम् · पूर्वेभ्यः

अर्थ — पहलोंकी अपेक्षासे तीनों ( धारणा , ध्यान और समाधि ) अन्तरङ्ग हैं ।

व्यासभाष्य

तदेतद्धारणाध्यानसमाधित्रयमन्तरङ्गं सम्प्रज्ञातस्य समाधेः पूर्वेभ्यो यमादिभ्यः पञ्चभ्यः साधनेभ्य इति ॥७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — वह यह धारणा, ध्यान, और समाधि का त्रय सम्प्रज्ञात समाधि का अन्तरंग है, यम आदि पाँच साधनों से।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — पहले पादमें बताये हुए यम , नियम , आसन , प्राणायाम और प्रत्याहारकी अपेक्षासे ये तीनों धारणा , ध्यान और समाधि सम्प्रज्ञात - समाधिके अन्तरङ्ग हैं अर्थात् साधनीय सम्प्रज्ञात - समाधिका जो विषय है वही धारणादिका विषय है , इसलिये समान विषय होनेसे ये धारणादि तीनों सम्प्रज्ञात - समाधिके अन्तरङ्ग हैं और यम - नियमादि पाँचों यद्यपि चित्तको निर्मल बनाकर योगके उपयोगी बनाते हैं तथापि समान विषय न होनेसे बहिरङ्ग हैं , इसलिये इन पाँचोंको साधनपादमें और धारणादि तीनोंको विभूतिपादमें वर्णन किया । * यहाँ सांख्यकी निष्ठावाले अहङ्कारादेश ' माम् और मद् ' शुद्ध परब्रह्म परमात्माके बोधक हैं । ( विशेष षड्दर्शन - समन्वयके तीसरे और चौथे प्रकरणमें देखें ) ।

3.8 · विभूतिपाद सूत्र ८

सूत्र ३.८

तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥ ३.८ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 522

शब्दार्थ — तत् · अपि · बहिरङ्गम् · निर्बीजस्य

अर्थ — वह धारणा , ध्यान , समाधि भी असम्प्रज्ञात - समाधिका बाहरका अङ्ग है ।

व्यासभाष्य

तदप्यन्तरङ्गं साधनत्रयं निर्बीजस्य योगस्य बहिरङ्गं भवति । कस्मात्? तदभावे भावादिति ॥८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — वह भी अन्तरंग साधन त्रय निर्बीज योग का बहिरंग होता है। इति क्यों? उसके अभाव में भाव होने से।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — धारणा, ध्यान और समाधि सम्प्रज्ञात-समाधिके के अन्तरङ्ग हैं, परंतु असम्प्रज्ञात-समाधिके के ये बहिरङ्ग साधन हैं। जिस प्रकार यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार परम्परासे उपकारक होते हुए भी समान विषय न होने से सम्प्रजात-समाधिके के बहिरङ्ग साधन हैं, उसी प्रकार धारणा, ध्यान और समाधि भी ऐसे ही हैं। साक्षात् साधन पर वैराग्य ही उसका अन्तरङ्ग है। जो साधन असम्प्रज्ञात-साध्य के समान विषयवाला होता है अथवा जिसके दृढ़ होने के अनन्तर साध्य की सिद्धि अवश्य होती है, वह अन्तरङ्ग होता है। धारणा, ध्यान आदि सालम्बन (किसीको आलम्बन या सहारा ध्येय बनाकर) ध्येयरूप समान विषयवाले होते हैं और उनके दृढ़ होने पर सम्प्रजात-योग सिद्ध होता है, इसलिये वे सम्प्रजात-समाधिके के अन्तरङ्ग हैं। किंतु असम्प्रजात-समाधि निरालम्बन (बिना आलम्बन) निर्विषय होती है और धारणा आदि संयम के दृढ़ होने पर असम्प्रजात-योग अवश्य ही सिद्ध हो जाए, ऐसा भी कोई निश्चित नियम नहीं है। इसलिये निर्बीज समाधिके के प्रति धारणा आदि तीनों बहिरङ्ग हैं। इसका अन्तरङ्ग परवैराग्य है जो निर्बीज समाधिके सदृश निरालम्ब और निर्विषय है और जिसके दृढ़ होने पर असम्प्रजात-समाधि अवश्य ही सिद्ध होती है।

3.9 · विभूतिपाद सूत्र ९

सूत्र ३.९

निरोधपरिणामः ॥ ३.९ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 523

शब्दार्थ — व्युत्थान · संस्काराः · चित्त · धर्माः

अर्थ — व्युत्थानके संस्कारका दबना और निरोधके संस्कारका प्रकट होना , यह जो निरोधकालमें होनेवाले चित्तका दोनों संस्कारोंमें अनुगत होना है , यह निरोध - परिणाम कहा जाता है ।

व्यासभाष्य

व्युत्थानसंस्काराश्चित्तधर्मा न ते प्रत्ययात्मका इति प्रत्ययनिरोधे न निरुद्धाः । नोरोधसंस्कारा अपि चित्तधर्माः, तयोरभिभवप्रादुर्भावौ । व्युत्थानसंस्कारा हीयन्ते, निरोधसंस्कारा आधीयन्ते । निरोधक्षणं चित्तमन्वेति । तदेकस्य चित्तस्य प्रतिक्षणमिदं संस्कारान्यथात्वं निरोधपरिणामः । तदा संस्कारशेषं चित्तमिति निरोधसमाधौ व्याख्यातम् ॥९॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अभिभव प्रादुर्भावौ निरोध क्षण चित्त अन्वयः निरोध परिणामः व्युत्थान और निरोध संस्कारों का अभिभव और प्रादुर्भाव, निरोध क्षण चित्त का अन्वय, निरोध परिणाम है। व्युत्थानसंस्काराश्चित्तधर्मा न ते प्रत्ययात्मका इति प्रत्ययनिरोधे न निरुद्धाः । तयोरभिभवप्रादुर्भावौ । व्युत्थानसंस्कारा हीयन्ते, निरोधसंस्कारा आधीयन्ते । निरोधक्षणं चित्तमन्वेति । प्रतिक्षणमिदं संस्कारान्यथात्वं निरोधपरिणामः । तदा संस्कारशेषं चित्तमिति निरोधसमाधौ व्याख्यातम् ॥ ९॥

व्युत्थान संस्काराः चित्त धर्माः न ते प्रत्यय आत्मकाः इति प्रत्यय निरोधे न निरुद्धाः व्युत्थान संस्कार चित्त के धर्म हैं, वे प्रत्यय आत्मक नहीं, इसीलिए प्रत्यय निरोध में निरुद्ध नहीं होते। निरोध संस्काराः अपि चित्त धर्माः तयोर् अभिभव प्रादुर्भावौ निरोध संस्कार भी चित्त के धर्म हैं, उन दोनों का अभिभव और प्रादुर्भाव। व्युत्थान संस्काराः हीयन्ते निरोध संस्काराः आधीयन्ते व्युत्थान संस्कार ह्रास होते हैं, निरोध संस्कार आधृत होते हैं।

निरोध क्षणम् चित्तम् अन्वेति निरोध क्षण चित्त का अन्वय करता है। तत् एकस्य चित्तस्य प्रतिक्षणम् इदम् संस्कार अन्यथात्वम् निरोध परिणामः वह एक चित्त का प्रतिक्षण यह संस्कार का अन्यथात्व निरोध परिणाम है। तदा संस्कार शेषम् चित्तम् इति निरोध समाधौ व्याख्यातम् तब संस्कार शेष चित्त, ऐसा निरोध समाधि में व्याख्यात है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — व्युत्थान का अर्थ यहाँ एकाग्रता अर्थात् सम्प्रज्ञात-समाधि से है और निरोध के तीन अर्थ हैं—पर-वैराग्य, वृत्तियों का रुक जाना और पर-वैराग्य का संस्कार। अभिभव का अर्थ छिपना या वर्तमान से भूत में जाना है तथा प्रादुर्भाव का अर्थ अनागत से वर्तमान में प्रकट होना है। सूत्रकार ने योग की सिद्धियों की व्याख्या हेतु क्रम से तीन परिणामों को कहा है जिसमें निरोध-परिणाम का वर्णन है।

चित्त धर्मी है और व्युत्थान तथा निरोध के संस्कार उसके धर्म हैं जो वृत्तिरूप नहीं होते, इसलिए वृत्तियों के रुकने पर भी ये संस्कार नहीं रुकते। निर्बीज समाधि के निरोधक्षण में एक धर्म का दबना और दूसरे का प्रकट होना परिणाम होता है जहाँ व्युत्थान के संस्कार भूतरूप हो जाते हैं और निरोध के संस्कार वर्तमानरूप से प्रादुर्भूत होते हैं। शंका यह है कि जब वृत्तियाँ संस्कारों के निमित्त कारण हैं, तो उनके निरोध होने पर संस्कार कैसे शेष रहते हैं।

इसका समाधान यह है कि वृत्तियाँ केवल निमित्त कारण हैं जबकि उपादान कारण धर्मी-चित्त है जो विद्यमान रहता है। अतः निरोधक्षण में पर-वैराग्य की वृत्ति निवृत्त हो जाती है परंतु निरोध के संस्कार शेष रहते हैं क्योंकि उनका उपादान कारण चित्त विद्यमान रहता है। व्यासभाष्यकार ने कहा है कि व्युत्थान संस्कार चित्त धर्म हैं और प्रत्ययात्मका अर्थात् वृत्तिरूप नहीं हैं।

3.10 · विभूतिपाद सूत्र १०

सूत्र ३.१०

तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ ३.१० ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 525

शब्दार्थ — तस्य · प्रशान्त · वाहिता · संस्कारात्

अर्थ — निरोध - संस्कारसे चित्तकी शान्त - प्रवाहवाली गति होती है ।

व्यासभाष्य

निरोधसंस्कारान्निरोधसंस्काराभ्यासपाटवापेक्षा प्रशान्तवाहिता चित्तस्य भवति । तत्संस्कारमान्द्ये व्युत्थानधर्मिणा संस्कारेण निरोधधर्मः संस्कारोऽभिभूयत इति ॥१०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — निरोध संस्कारात् निरोध संस्कार अभ्यास पाटव अपेक्षा प्रशान्त वाहिता चित्तस्य भवति निरोध संस्कार से, निरोध संस्कार अभ्यास की कुशलता की अपेक्षा, चित्त की प्रशान्त वाहिता होती है। उस संस्कार के मन्द होने पर व्युत्थान धर्म वाले संस्कार से निरोध धर्म का संस्कार अभिभूत होता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — प्रशान्तवाहिता निरोध - संस्कारके अभ्याससे जब निरोध- संस्कार प्रबल होता है , तब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और व्युत्थान - संस्काररूप मलसे रहित जो निर्मल निरोध - संस्कारोंकी परम्परा प्रवृत्ति होती है , यही चित्तका प्रशान्त या एकरस बहना , चित्तकी प्रशान्तवाहिता स्थिति है । भाष्यकार इस सूत्रका आशय यह बतलाते हैं कि निरोध - संस्कारोंके अभ्यासको दृढ़ करनेकी आवश्यकता है , जिससे चित्तकी प्रशान्तवाहिता स्थिति हो जाय ; क्योंकि निरोधके संस्कार मन्द होते ही व्युत्थानके संस्कार उनको फिर दबा लेते हैं । यहाँ यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि निरोध - समाधिके भङ्गतक , जो चित्तमें उन्हीं संस्कारोंके दृढ़ और दुर्बल होते हुए प्रशान्त प्रवाहका बहना है , वह उसका अवस्था - परिणाम है ।

3.11 · विभूतिपाद सूत्र ११

सूत्र ३.११

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ३.११ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.११पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 528

शब्दार्थ — सर्वार्थता · एकाग्रतयोः · क्षय · उदयौ · चित्तस्य · समाधि · परिणामः

अर्थ — सर्वार्थता और एकाग्रता का क्षय और उदय चित्त का समाधि परिणाम है।

व्यासभाष्य

सर्वार्थता चित्तधर्मः । एकाग्रतापि चित्तधर्मः । सर्वार्थतायाः क्षयस्तिरोभाव इत्यर्थः । एकाग्रताया उदय आविर्भाव इत्यर्थः । तयोर्धर्मित्वेनानुगतं चित्तम् । तदिदं चित्तमपायोपजननयोः स्वात्मभूतयोर्धर्मयोरनुगतं समाधीयते, स चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — सर्वार्थता चित्त का धर्म है। एकाग्रता भी चित्त का धर्म है। सर्वार्थता का क्षय तिरोभाव है, ऐसा अर्थ है। एकाग्रता का उदय आविर्भाव है, ऐसा अर्थ है। उन दोनों के धर्मित्व से अनुगत चित्त है। वह यह चित्त अपाय और उपजनन के स्व आत्म भूत धर्मों से अनुगत होकर समाधित होता है, वह चित्त का समाधि परिणाम है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सर्वार्थता का अर्थ है चित्त की विक्षेप अवस्था जहाँ सत्त्वगुण प्रधान होने पर भी रजोगुण सक्रिय रहता है और चित्त सभी विषयों की ओर जाता है। समाधि के आरम्भ काल में यह अवस्था होती है, जबकि एकाग्रता वह स्थिति है जिसमें चित्त सभी विषयों को त्यागकर एक ही आलम्बन पर टिक जाता है। विक्षिप्तता और एकाग्रता दोनों ही चित्त के धर्म हैं और चित्त इन दोनों में अनुगत-धर्मी है। जब विक्षिप्तता का धर्म दब जाता है और एकाग्रता का धर्म प्रकट होता है, तब सम्प्रज्ञात-समाधि काल में चित्त का यह परिणाम प्राप्त होता है। एकाग्रता जो पहले सर्वार्थता में छिपी हुई थी, वह अब वर्तमान रूप में आ जाती है और चित्त-धर्मी का वर्तमान लक्षण बनती है। निरोध-परिणाम और समाधि-परिणाम में भेद यह है कि निरोध में संस्कारों का अभिभव होता है जबकि समाधि में व्युत्थान रूपी विक्षेप का क्षय और एकाग्रता का उदय होता है। प्रथम सम्प्रज्ञात में व्युत्थान का क्षय और एकाग्रता का उदय किया जाता है, फिर असम्प्रज्ञात में निरोध-संस्कारों के प्रादुर्भाव से एकाग्रता के संस्कारों का भी तिरोभाव होता है।

3.12 · विभूतिपाद सूत्र १२

सूत्र ३.१२

ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥ ३.१२ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 531

शब्दार्थ — ततः · पुनः · शान्त · उदितौ · तुल्य · प्रत्ययौ · चित्तस्य · एकाग्रता · परिणामः

अर्थ — ततः पुनः शान्त और उदित तुल्य प्रत्यय चित्त का एकाग्रता परिणाम है।

व्यासभाष्य

समाहितचित्तस्य मूर्ण्यप्रत्ययः शान्तः उत्तरस्तत्सदृशः उदितः । समाहितचित्तमुभयोरनुगतं पुनस्तथैवासमाधिभ्रंशात् । स खल्वयं धर्मिणः चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥१२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — समाहित चित्तस्य मूर्व प्रत्ययाये शान्तः उत्तरः तत् सदृशः उदितः समाहित चित्त का पूर्व प्रत्यय शान्त है, उत्तर तत्सदृश उदित है। समाहित चित्त दोनों का अनुगत है, पुनः वैसे ही असमाधि भ्रंश से। वह यह धर्मी चित्त का एकाग्रता परिणाम है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — समाहित चित्त की वृत्ति विशेष ही एक प्रत्यय कहलाती है, जो अतीत मार्ग में प्रविष्ट हुई शांत और वर्तमान मार्ग में वर्तती हुई उदित होती है। ये दोनों ही चित्त के समाहित होने के कारण तुल्य अर्थात् एक विषय को ही आलम्बन करने से सदृश-प्रत्यय हैं। इन दोनों में समाहित चित्त का अन्वयी भाव से रहना एकाग्रता-परिणाम कहलाता है। समाधि-परिणाम के अभ्यासबल से जब चित्त का विक्षेप बिल्कुल दब जाता है, तब वह समाहित हो जाता है। इस अवस्था में भी चित्त बराबर बदलता रहता है, किंतु यह विक्षेप की तरह एक वस्तु को छोड़कर दूसरी को नहीं पकड़ता बल्कि जिस वस्तु को पकड़ता है उसी में लगा रहता है। चित्त के बदलने के कारण वृत्तियाँ बदलती तो हैं पर जैसी वृत्ति दबती है वैसी ही उदय होती रहती है जब तक समाधि भंग न हो जाए। यह धर्मी-चित्त का एकाग्रता-परिणाम है जिसमें समाधि के भंग तक एकाग्रता प्रबल होती है और उसके पश्चात् दुर्बल होती जाती है, जो उसकी अवस्था का बदलना यानी अवस्था-परिणाम है। योगी को सावधान रहना चाहिए कि वह सम्प्रज्ञात-समाधिकी प्राप्ति से ही अपने-आपको कृतकृत्य व्युत्थान के विक्षेप की निवृत्ति के लिए असम्प्रज्ञात-समाधिका का अनुष्ठान करना चाहिए न मान बैठे।

3.13 · विभूतिपाद सूत्र १३

सूत्र ३.१३

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥ ३.१३ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 535

शब्दार्थ — एतेन · भूत · इन्द्रियेषु · धर्म · लक्षण · अवस्थ · परिणामाः · व्याख्याताः

अर्थ — इससे भूत और इन्द्रियों में धर्म, लक्षण, और अवस्था परिणाम व्याख्यात हैं।

व्यासभाष्य

एतेन पूर्वोक्तेन चित्तपरिणामेन धर्मलक्षणावस्थारूपेण भूतेन्द्रियेषु धर्मपरिणामो लक्षणपरिणामोऽवस्थापरिणामश्चोक्तो वेदितव्यः । तत्र व्युत्थाननिरोधयोर्धर्मयोरभिभवप्रादुर्भावौ धर्मिणि धर्मपरिणामः । लक्षणपरिणामश्च निरोधस्त्रिलक्षणस्त्रिभिरध्वभिर्युक्तः । स खल्वनागतलक्षणमध्वानं प्रथमं हित्वा धर्मत्वमनन्तिक्रान्तो वर्तमानं लक्षणं प्रतिपन्नो, यत्रास्य स्वरूपेणाभिव्यक्तिः । एषोऽस्य द्वितीयोऽध्वा । न चातीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तः ।

तथा व्युत्थानं त्रिलक्षणं तिर्भिरध्वभिर्युक्तं वर्तमानं लक्षणं हित्वा धर्मत्वमनतिक्रान्तमतीतलक्षणं प्रतिपन्नम् । यत्रास्य स्वरूपाभिव्यक्तौ सत्यां व्यापारः, एषोऽस्य द्वितीयोऽध्वा । न चातीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तमिति । एवं पुनर्निरोध एवं पुनर्व्युत्थानमिति तथावस्थापरिणामः, तत्र निरोधक्षणेषु निरोधसंस्कारा बलवन्तो भवन्ति दुर्बला व्युत्थानसंस्कारा इति । एष धर्माणामवस्थापरिणामः ।

तत्र धर्मिणो धर्मैः परिणामो धर्माणां त्र्यध्वनां लक्षणैः परिणामो लक्षणानामप्यवस्थाभिः परिणाम इति । एवं धर्मलक्षणावस्थापरिणामैः शून्यं न क्षणमपि गुणवृत्तमवतिष्ठते । चलं च गुणवृत्तम् । गुणस्वाभाव्यं तु प्रवृत्त्कारणमुक्तं गुणानामिति । एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मधर्मिभेदात्त्रिविधः परिणामो वेदितव्यः । परमार्थतस्त्वेक एव परिणामः धर्मिस्वरूपमात्रो हि धर्मो धर्मिविक्रियैवैषा धर्मद्वारा प्रपञ्च्यतिति ।

तत्र धर्मस्य धर्मिणि वर्तमानस्यैवाध्वस्वतीतानागतवर्तमानेषु भावान्यथात्वं भवति, न तु द्रव्यान्यथात्वम् । यथा सुवर्णभाजनस्य भित्त्वाऽन्यथाक्रियमाणस्य भावान्यथात्वं भवति, न सुवर्णान्यथात्वमिति । अपर आह—धर्मानभ्यधिको धर्मो, पूर्वतत्त्वानतिक्रमा, पूर्वापरावस्थाभेदमनुपतितः कौटस्त्व्येन विपरिवर्तेत यद्यन्वयी स्यादिति । अयमदोषः । कस्मात्? एकान्ततानभ्युपगमात। तदेतत्त्रैलोक्यं व्यक्तेरपैति । कस्मात्? नित्यप्रतिषेधात। अपेतमप्यस्ति विनाशप्रतिषेधात। संसर्गाच्चास्य सौक्ष्म्यम् ।

सौक्ष्म्याच्चानुपलभ्दिरिति । लक्षणपरिणामो धर्मोऽध्वसु वर्तमानोऽतीतोऽतीतलक्षणयुक्तोऽनागतवर्तमानाभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्तः । तथा वर्तमानोऽनागतलक्षणयुक्तो वर्तमानातीताभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्तः । तथा वर्तमानो वर्तमानलक्षणयुक्तोऽतीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्त इति । यथा—पुरुष एकस्यां स्त्रियां रक्तो न शेषासु विरक्तो भवतीति । अत्र लक्षणपरिणामे सर्वस्य सर्वलक्षणयोगादध्वसङ्करः प्राप्नोतीति परैर्दोषश्चोद्यत इति । तस्य परिहारः—धर्माणां धर्मत्वमप्रसाध्यम् ।

सति च धर्मत्वे लक्षणभेदोऽपि वाच्यो न वर्तमानसमय एवास्य धर्मत्वम् । एव्घि न चित्तं रागधर्मकं स्यात्, क्रोधकाले रागस्यासमुदाचारादिति । किं च, त्रयाणां लक्षणानां युगपदेकस्यां व्यक्तौ नास्ति सम्भवः । क्रमेण तु स्वव्यञ्जकाञ्जनस्य भावो भवेदिति । उक्तं च—रूपातिशया वृत्त्यतिशयाश्च परस्परेण विरुध्यन्ते । सामान्यानि त्वतिशयैः सह प्रवर्तन्ते । तस्मादसङ्करः । यथा रागस्यैव क्वचित्समुदाचार इति न तदानीमन्यत्राभावः ।

किन्तु केवलं सामान्येन समन्वागत इत्यस्ति तदा तत्र तस्य भावः, तथा लक्षणस्येति । न धर्मी त्र्यध्वा । धर्मास्तु त्र्यध्वानः । ते लक्षिता अलक्षिताश्च तां तामवस्थां प्राप्नुवन्तोऽन्यत्वेन प्रतिनिर्दिश्यन्तेऽवस्थन्तरतो न द्रव्यान्तरतः, यथैका रेखा शतस्थाने शतं दशस्थाने दशैकं चैकस्थाने । यथा चैकत्वेऽपि स्त्री माता चोच्यते दुहिता च स्वसा चेति । अवस्थापरिणामे कौटस्थ्यप्रसङ्गदोषः कैश्चिदुक्तः । कथं ? अध्वनो व्यापारेण व्यवहितत्वात।

यदा धर्मः स्वव्यापारं न करोति, तदानापगतो, यदा करोति तदा वर्तमानो, यदा कृत्वा निवृत्तस्तदातीत इत्येवं धर्मधर्मिणोर्लक्षणानामवस्थानां च कौटस्थ्यं प्राप्नोतीति परैर्दोष उच्यते । नासौ दोषः । कस्मात्? गुणिआनांअत्वेऽपि गुणानां विमर्दवैचित्र्यात। यथा संस्थानमादिमद्धर्ममात्रं शब्दादीनां गुणानां विनाश्यविनाशिनामेवं लिङ्गमादिमद्धर्ममात्रं सत्त्वादीनां गुणानां विनाश्यविनाशिनाम् । तस्मिन्विकारसंज्ञेति ।

तत्रेदमुदाहरणम्—मृद्धर्मी पिण्डाकारोऽनागतं लक्षणं हित्वा वर्तमानलक्षणं प्रतिपद्यत इति लक्षणतः परिणमते । घटो नवपुराणतां प्रतिलक्षणमनुभवन्नवस्थापरिणामं प्रतिपद्यत इति । धर्मिणोऽपि धर्मान्तरमवस्था, धर्मस्यापि लक्षणान्तरमवस्थेत्येक एव द्रव्यपरिणामो भेदेनोपदर्शित इति । एवं पदार्थान्तरेष्वपि योज्यमिति । त एते धर्मलक्षणावस्थापरिणामा धर्मिस्वरूपमनतिक्रान्ता इत्येक एव परिणामः सर्वानमून्विशेषानभिप्लवते । अथ कोऽयं परिणामः ?

अवस्थितस्य द्रव्यस्य पूर्वधर्मनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिः परिणामः ॥१३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — चित्त परिणाम से, धर्म, लक्षण, और अवस्था रूप में, भूत और इन्द्रियों में धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम, और अवस्था परिणाम कहा और समझना चाहिए। वहाँ व्युत्थान और निरोध के धर्मों का अभिभव और प्रादुर्भाव धर्मी में धर्म परिणाम है। लक्षण परिणाम निरोध है, तीन लक्षणों वाला, तीन अध्वनों से युक्त। वह निश्चय ही अनागत लक्षण अध्व को पहले छोड़कर धर्मत्व को अनतिक्रान्त, वर्तमान लक्षण को प्राप्त करता है, जहाँ इसका स्वरूप से अभिव्यक्ति होती है। यह इसका दूसरा अध्वा है।

न च अतीत अनागताभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तः और अतीत और अनागत लक्षणों से वियुक्त नहीं है। अनतिक्रान्तम् अतीत लक्षणम् प्रतिपन्नम् येतथा व्य्युना त्रिलक्षण, तीन अध्वनों से युक्त, वर्तमान लक्षण को छोड़कर धर्मव से अनतिक्रान्त, अतीत लक्षण को प्राप्त करता है। यत्र अस्य स्वरूप अभिव्यक्तौ सत्यं व्यापारः, एषः अस्य द्वितीयः अध्वा जहाँ इसके स्वरूप की अभिव्यक्ति में व्यापार है, यह इसका दूसरा अध्वा है। न च अतीत अनागताभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तम् इति और अतीत और अनागत लक्षणों से वियुक्त नहीं।

तथवस्था अवस्थ परिणामः इस प्रकार फिर निरोध, फिर व्युत्थान, यह अवस्था परिणाम है। तत्रा निरोध क्षणकेषु निरोध संस्काराः बलवन्तः भवन्ति दुर्बलाः व्युत्थान संस्काराः इति वहाँ निरोध क्षणों में निरोध संस्कार बलवान होते हैं, व्युत्थान संस्कार दुर्बल। एष धर्मण् अवाम् अवस्था परिणामः यह धर्मों का अवस्था परिणाम है।

तत्र धर्मिनः धर्मैः स परिणामः धर्मणां त्र्यध्वनं लक्षणैः स परिणामः लक्षणण् अम् अवि अव्यस्थ्या परिणामः इति वहाँ धर्मी के धर्मों से परिणाम, धर्मों का तीन अध्वनों के लक्षणों से परिणाम, लक्षणों का अवस्थाओं से परिणाम। एवं धर्म लक्षण अवस्थ्य परिणामैः शून्यं न क्षणमं अपि गुण वृत्तमं अवतिष्ठते इस प्रकार धर्म, लक्षण, और अवस्था परिणामों से गुण वृत्ति एक क्षण भी शून्य नहीं रहती। चलं च गुण वृत्तमम् और गुण वृत्ति चलता है।

प्रवृत्ति कारणम् उक्तं गुणानाम् इति गुण स्वाभाव्य प्रवृत्ति का कारण कहा गया गुणों का। एतेन भूत इन्द्रियेषु धर्म धर्मि भेदात् त्रिविधः परिणामः वेदितव्यः इससे भूत और इन्द्रियों में धर्म और धर्मी के भेद से त्रिविध परिणाम समझना चाहिए। मात्रः हि धर्मः धर्मि विक्रिया एव एषा धर्म द्वारा प्रपञ्च्यति इति परमार्थ से एक ही परिणाम है, धर्मी स्वरूप मात्र ही धर्म है, यह धर्मी की विक्रिया ही है जो धर्म के द्वार से प्रपञ्चित होती है।

तत्र धर्मस्य धर्मिणी वर्तमानस्य एव अध्वस्व तीति अनागत वर्तमानेषु भाव अन्यथात्वं भवति न तु द्रव्य अन्यथात्वम् वहाँ धर्म का धर्मी में वर्तमान का ही अतीत, अनागत, वर्तमान में भावान्यता होती है, द्रव्य की नहीं। यथा सुवर्ण भाजनस्य भित्वा अन्यथा क्रिया माणस्य भाव यथ् अन्यथात्वं भवति न सुवर्ण अन्यथात्व म् इति जैसे सुवर्ण के पात्र को तोड़कर अन्यथा करने से भाव का अन्यथात्व होता है, न कि सुवर्ण का।

तिक्रमा त्व पूर्वापर अवस्था भेदम् अनुपतितः कौटस्थ्येन विपरिवर्तेत यद् यदि अन्वयी स्याद् इति दूसरा कहता है—धर्म से अधिक धर्मी, पूर्व तत्त्व को न लांघता, पूर्व और पर अवस्था भेद का अनुसरण, कौटस्थ्य से परिवर्तित होता यदि अन्वयी हो। अयम् दोषः न कस्मात् एकान्तता न अभ्युपगमात् यह दोष नहीं, क्योंकि एकान्तता का अभ्युपगम नहीं। तत् एतत् त्रैलोक्यं व्यक्तेः अपैति कस्मात् नित्य प्रतिषेधात् वह यह त्रैलोक्य व्यक्त से हटता है, क्योंकि नित्य का प्रतिषेध है।

अपेतम् अपि अस्ति विनाश प्रतिषेधात् हटने पर भी है, विनाश के प्रतिषेध से। संसर्गात् च अस्य सौक्ष्म्यम् सौक्ष्म्याच् च अनुपलब्धिः इति संसर्ग से इसका सूक्ष्मता, और सूक्ष्मता से अनुपलब्धि। अतीतः अतीत लक्षण युक्तः अनागत वर्तमान अभ्यां लक्षणच्‍छायाम् अवियुक्तः लक्षण परिणाम धर्म है, अध्वनों में वर्तमान, अतीत, अतीत लक्षण युक्त, अनागत और वर्तमान लक्षणों से अवियुक्त।

अनागत लक्षण युक्तः वर्तमान अतीत अभ्यां लक्षण च्छायाम् अवियुक्तः वैसे वर्तमान, अनागत लक्षण युक्त, वर्तमान और अतीत लक्षणों से अवियुक्त। तथा वर्तमानः वर्तमान लक्षण युक्तः अतीत अनागत च्छायाम् अवियुक्त इति वैसे वर्तमान, वर्तमान लक्षण युक्त, अतीत और अनागत लक्षणों से अवियुक्त। …

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जैसे चित्त के धर्म, लक्षण और अवस्था-परिणाम होते हैं, वैसे ही पाँचों भूतों और इन्द्रियों में भी समझना चाहिए। यहाँ धर्म-परिणाम का अर्थ है धर्मी के अवस्थित रहते हुए पूर्व धर्म की निवृत्ति होने पर अन्य धर्म की प्राप्ति होना, जैसा कि भोजवृत्ति में बताया गया है। लक्षण-परिणाम का अर्थ है काल के तीन भेदों (अनागत, उदित और अतीत) से युक्त धर्मों का वर्तमान काल में प्रकट होना या छिप जाना।

अवस्था-परिणाम वह प्रतिक्षण परिणाम है जो एक धर्म के अनागत से वर्तमान तक दृढ़ होने और वर्तमान से अतीत तक दुर्बल होने की प्रक्रिया में घटित होता है। धर्मी का स्वरूप मात्र ही धर्म है और उसके विकार ही धर्म कहलाते हैं, जिसमें द्रव्य का अन्यथापन नहीं होता बल्कि केवल भाव का अन्यथात्व होता है। व्याख्या में स्पष्ट किया गया है कि गुणों की वृत्ति चंचल स्वभाव वाली होती है और यह एक ही परिणाम के विभिन्न विशेषों को व्याप्त करती है।

यहाँ किसी अन्य ग्रन्थ के मत पर टिप्पणी करते हुए व्यासभाष्य का भाषानुवाद दिया गया है कि धर्म से धर्मी अन्यूनाधिक नहीं होता क्योंकि वह पूर्व तत्त्व का अतिक्रम नहीं करता। अंत में मिट्टी के घट बनने के उदाहरण द्वारा समझाया गया है कि यह सब एक ही द्रव्य को परिणाम-भेद से दिखाता है और किसी भी स्थिति में धर्मी के स्वरूप का उल्लंघन नहीं होता।

3.14 · विभूतिपाद सूत्र १४

सूत्र ३.१४

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥ ३.१४ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 538

शब्दार्थ — शान्त · उदित · अव्यपद्य · धर्म · शक्तिः · अन्वयी · धर्मी · शांत,

अर्थ — ( उन परिणामोंके ) अतीत , वर्तमान और भविष्यत् धर्मोंमें अनुगत धर्मी ।

व्यासभाष्य

योग्यतावच्छिन्ना धर्मिणः शक्तिरेव धर्मः । स च फलप्रसवभेदानुमितसद्भाव एकस्यान्योऽन्यश्च परिदृष्टः । तत्र वर्तमानः स्वव्यापारमनुभवन्धर्मो धर्मानतरेभ्यः शान्तेभ्यश्चाव्यपदेशेभ्यश्च भिद्यते । यदा तु सामान्येन समन्वागतो भवति, तदा धर्मिस्वरूपमात्रत्वात्कोऽसौ केन भिद्यते ? तत्र त्रयः खलु धर्मिणो धर्माः शान्ता उदिता अव्यपदेश्याश्चेति । तत्र शान्ता ये कृत्वा व्यापारानुपरताः । सव्यापारा उदिताः । ते चानागतस्य लक्षणस्य समनन्तराः । वर्तमानस्यानन्तरा अतीताः ।

किमर्थमतीतस्यानन्तरा न भवन्ति वर्तमानाः ? पूर्वपश्चिमताया अभावात्। यथानागतवर्तमानयोः पूर्वपश्चिमता नैवमतीतस्य । तस्मान्नातीतस्यास्ति समनन्तरः । तदनागत एव समनन्तरो भवति वर्तमानस्य । अथाव्यपदेश्याः के ? सर्वं सर्वात्मकमित्यति । यथोक्तं जलभूम्योः पारिणामिकं रसादिवैश्वरूप्यं स्थावरेषु दृष्टं, तत्था स्थावराणां जङ्गमेषु जङ्गमानां स्थावरेष्वति । ह्यं वं जन्मानुच्छेदेन सर्वं सर्वात्मकमति। देशकालाकारनिमित्तासम्वन्धान्न खलु समानकालमात्मनामभिव्यक्तिरति ।

य एतेष्वभिव्यक्तानभिव्यक्तेषु धर्मेष्वनुपाती सामान्यविशेषात्मा सोऽन्वयी धर्मी । यस्य तु धर्ममात्रमेवेदं निरन्वयं तस्य भोगाभावः । कस्मात्? अन्येन विज्ञानेन कृतस्य कर्मणोऽन्यत्कथं भोकृत्वेनाधिक्रियेत ? तत्स्मृत्यभावश्च नान्यदृष्टस्य स्मरणमन्यस्यास्तीति । वस्तुप्रत्यभिज्ञानाच्च स्थितोऽन्वयी धर्मी यो धर्मान्यथात्वमभ्युपगतः प्रत्यभिज्ञायते । तस्मान्नेदं धर्ममात्रं निरन्वयमित्यति ॥१४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — योग्यता से अवच्छेदित धर्मी की शक्ति ही धर्म है। वह फल प्रसव के भेद से अनुमित सत्य भाव, एक का अन्य और दूसरा परिदृश्य है। व्यापार का अनुभव करता हुआ धर्म, अन्य शांत और अव्यपद्येश्य धर्मों से भिन्न होता है। जब सामान्य से समन्वित होता है, तब धर्मी स्वरूप मात्र होने से वह कौन है और किससे भिन्न होता है? तत्र त्रयः खलु धर्मिणीः धर्माः शान्ताः उदिताः अव्यपदेश्याः च इति वहाँ तीन धर्मी के धर्म हैं—शांत, उदित, और अव्यपदेश्य।

कृत्वा व्यापारान् उपरताः वहाँ शांत वे हैं जो व्यापार कर उपरत हो गए। स व्यापारा उदिताः व्यापार युक्त उदित हैं। ते च अनागतस्य लक्षणस्य समनन्तराः वे अनागत लक्षण के समनन्तर हैं। वर्तमानस्य अन्तराः अतीताः वर्तमान के अनन्तर अतीत हैं। किम् अर्थम् अतीतस्य अन्तराः न भवन्ति वर्तमानाः क्यों अतीत के अनन्तर वर्तमान नहीं होते? पूर्व पश्चिम तायाः अभावात् पूर्व—पश्चिमता के अभाव से।

यथा अनागत वर्तमानयोः पूर्व पश्चिमता न एवम् अतीतस्य जैसे अनागत और वर्तमान में पूर्व—पश्चिमता है, वैसे अतीत में नहीं। तस्मात् न अतीतस्य अस्ति समनन्तरः इसलिए अतीत का समनन्तर नहीं है। तद् अनागतः एव समनन्तरः भवति वर्तमानस्य अनागत ही वर्तमान का समनन्तर होता है। अथ अव्यपदेश्याः के अव्यपदेश्य कौन से हैं? सर्वं सर्वात्मकं इति सर्वं सर्वात्मक है।

रस आदि वैश्वरूप्यं स्थावरेषु दृष्टं, तथा तस्थ वावरराणां जंगमेषु जंगमानां स्थावरेष्व इति जैसे कहा—जल और भूमि का पारिणामिक रस आदि वैश्वरूप्य स्थावरों में दृष्ट है, वैसे स्थावरों का जंगमों में और जंगमों का स्थावरों में। इस प्रकार जन्म से अनुच्छेद के साथ सर्वं सर्वात्मक है। देश काल आकार निमित्त असंबंधात् न खलु समकाल आत्मनाम् अभिव्यक्ति इति देश, काल, आकार, और निमित्त के असंबंध से समकाल में आत्माओं की अभिव्यक्ति नहीं होती।

यः एतेषु अभिव्यक्त्य अनभिव्यक्तेषु धर्मस्य अनुपाती सामान्य विशेष आत्मा सः अन्वयी धर्मी जो अभिव्यक्त और अनभिव्यक्त धर्मों में अनुपाती सामान्य और विशेष आत्मा है, वह अन्वयी धर्मी है। यस्य तु धर्म मातरमः एव इदं निरन्व्यं तस्य भोग अभावः जिसका केवल धर्ममात्र है, वह निरन्व्यं, उसका भोग से अभाव है। कस्मात् अन्येन विज्ञानेन कृतस्य कर्मणः अन्यत् कथं भोकृत्वेन अधिक्रियेत क्यों? अन्य के विज्ञान से कृत कर्म का अन्य कैसे भोक्तृत्व से अधिकृत हो?

तत् स्मृति अभावः च न अन्य दृष्टस्य स्मरणम् अन्यस्य अस्ति इति उस स्मृति का अभाव है, अन्य ने जो नहीं देखा, उसका स्मरण अन्य का नहीं है। वस्तु प्रत्यभिज्ञानात् च स्थितः अन्वयी धर्मी यः धर्म अन्यथात्वम् अभ्युपगतः प्रत्यभिज्ञायति वस्तु की प्रत्यभिज्ञा से सिद्ध अन्वयी धर्मी, जो धर्म का अन्यथात्व स्वीकार करता है, प्रत्यभिज्ञान होता है। तस्मात् न इदं धर्म मातरं निरन्वयं इति इसलिए यह केवल धर्म नहीं, निरन्वयं नहीं है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — व्यासभाष्य के अनुसार मिट्टी जैसे द्रव्य में घट जैसे विशेष रूप उसके धर्म हैं और सामान्य रूप से मिट्टी जो इन सबमें अनुगत है वह धर्मी है। धर्मी की शक्ति ही धर्म पदार्थ है जिसके तीन भेद हैं— शान्त, उदित और अव्यपदेश्य। शान्त वे धर्म हैं जो अपना व्यापार करके अतीत मार्ग में चले गए, उदित वे हैं जो वर्तमान में प्रकट हो रहे हैं और अव्यपदेश्य वे हैं जो भविष्य में शक्ति रूप से छिपे रहते हैं। धर्मी के भीतर घट जैसे अनागत धर्म रहते हैं क्योंकि यदि वे न हों तो मिट्टी में घट का बनना संभव नहीं होता। अतीत धर्म वर्तमान में वापस नहीं आते क्योंकि वर्तमान के कारण केवल अनागत धर्म होते हैं, जबकि उदित धर्मों को प्रकट करने और शान्त होने में चेतन पुरुष, देश, काल और संयोग निमित्त कारण होते हैं। योगदर्शन में धर्मी और धर्म शब्द कार्य और उपादान कारण के लिए प्रयुक्त हुए हैं जहाँ अव्यपदेश्य धर्म शक्ति मात्र रूप से छिपे रहते हैं। जब सामान्य से समन्वागत होता है तब धर्मी स्वरूपमात्र होने से किसी से भिन्न नहीं होता। अंततः यह सिद्ध होता है कि प्रपंच धर्ममात्र निरन्वय नहीं है क्योंकि इसमें अन्वयी धर्मी विद्यमान है जो वस्तु के प्रत्यभिज्ञान से स्थित होती है।

अन्य स्रोत: व्यासभाष्य

3.15 · विभूतिपाद सूत्र १५

सूत्र ३.१५

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ ३.१५ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 544

शब्दार्थ — क्रम · अन्यत्वं · परिणाम · अन्यत्वे · हेतुः

अर्थ — क्रमोंका भेद परिणामके भेदमें हेतु है ।

व्यासभाष्य

एकस्य धर्मिण एक एव परिणाम इति प्रसक्ते क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुर्भवतीति । तद्यथा—चूर्णमृत्, पिण्डमृत्, घटमृत्, कणमृदिति च क्रमः । यो यस्य धर्मस्य समनन्तरो धर्मः स तस्य क्रमः । पिण्डः प्रच्यवते घट उपजायति इति धर्मपरिणामक्रमः । लक्षणपरिणामक्रमो घटस्यानागतभावाद्वर्तमानभावक्रमः । तथा पिण्डस्य वर्तमानभावादतीतभावक्रमः । नातीतस्यास्ति क्रमः । कस्मात्? पूर्वपरतायां सत्यां समनन्तरत्वम् । सा तु नास्त्यतीतस्य । तस्माद्द्वयोरेव लक्षणयोः क्रमः । तथावस्थापरिणामक्रमोऽपि । घटस्याभिनवस्य प्रान्ते पुराणता दृश्यते । सा च क्षणपरम्परानुपातिना क्रमेणाभिव्यज्यमाना परां व्यक्तिमापद्यति इति । धर्मलक्षणाभ्यां च विशिष्टोऽयं तृतीयः परिणाम इति । त एते क्रमा धर्मधर्मिभेदे सति प्रतिलब्धस्वरूपाः । धर्मोऽपि धर्मी भवत्यन्यधर्मस्वरूपापेक्षयेति । यदा तु परमार्थतो धर्मिण्यभेदोपचारस्तद्द्वारेण स एवाभिधीयते धर्मस्तदायमेकत्वेनैव क्रमः प्रत्यवभासते । चित्तस्य द्वये धर्माः परिदृष्टाश्चापरिदृष्टाश्च । तत्र प्रत्ययात्मकाः परिदृष्टाः । वस्तुमात्रात्मकाः अपरिदृष्टाः । ते च सप्तैव भवत्यनुमानेन प्रापितवस्तुमात्रसद्भावाः । निरोधधर्मसंस्काराः परिणामोऽथ जीवनम् । चेष्टा शक्तिश्च चित्तस्य धर्मा दर्शनवर्जिताः ॥ इति ॥१५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — एक धर्मी का एक ही परिणाम होने पर क्रम का अन्यत्व परिणाम के अन्यत्व का हेतु होता है। चूर्ण मृत्, पिण्ड मृत्, घट मृत्, कण मृत्, यह क्रम है। जो जिस धर्म का समनन्तर धर्म है, वह उसका क्रम है। पिण्ड नष्ट होता है, घट उत्पन्न होता है, यह धर्म परिणाम क्रम है। क्रम—घट का अनागत भाव से वर्तमान भाव क्रम। वैसे पिण्ड का वर्तमान भाव से अतीत भाव क्रम। अतीत का क्रम नहीं है। क्यों? पूर्व और पर की स्थिति में समनन्तरत्व है। वह अतीत में नहीं है।

इसलिए केवल दो लक्षणों का क्रम है। अवस्था परिणाम क्रम भी। नवीन घट के अंत में पुराणता दिखाई देती है। वह क्षण परम्परा के अनुपात से क्रम में अभिव्यक्त होकर परम व्यक्तिम् प्राप्त करती है। धर्म और लक्षण से विशिष्ट यह तृतीय परिणाम है। त एते क्रमाः धर्म धर्मि भेदे सति प्रतिलब्ध स्वरूपाः वे क्रम धर्म और धर्मी के भेद में अपने स्वरूप को प्राप्त करते हैं। धर्म भी अन्य धर्म स्वरूप की अपेक्षा से धर्मी होता है।

जब परमार्थ से धर्मी में अभेद उपचार होता है, तब उसके द्वारा वही धर्म कहा जाता है, तब यह एकत्व से ही क्रम प्रत्यवभासित होता है। चित्तस्य द्वये धर्माः परिदृष्टाः च अपरिदृष्टाः च चित्त के दो धर्म हैं—परिदृश्य और अपरिदृश्य। परिदृश्य हैं। मात्र आत्मक अपरिदृश्य हैं। वे सात ही हैं, अनुमान से प्राप्त वस्तु मात्र सत्य भाव वाले। निरोध, धर्म, संस्कार, परिणाम, जीवन, चेष्टा, और शक्ति चित्त के धर्म हैं, दर्शन से रहित।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — एक क्रम से एक परिणाम होता है और जितने प्रकार के क्रम होते हैं उतने ही उनके परिणाम होते हैं। किसी धर्म के पीछे जो होता है वह उसका क्रम है, जैसे पिण्ड नष्ट होकर बर्तन का उत्पन्न होना या वर्तमान भाव से अतीत लक्षण का परिणाम होना। यहाँ यह समझना चाहिए कि धर्म प्रतिक्षण बदलता रहता है जिससे कभी-कभी परिणाम होते हैं, परंतु अवस्था-परिणाम प्रतिक्षण सूक्ष्म रूप से होते रहते हैं जो स्थूल भाव को प्राप्त होकर प्रकट होते हैं।

इस प्रकार क्रमों के भेद से एक धर्मी के अनेक धर्म-परिणामों का, धर्म के तीन प्रकार के लक्षण-परिणामों का और वर्तमान धर्मों के क्षण-क्षण में होने वाले असंख्यात अवस्था-परिणामों का निश्चय होता है। वास्तव में यह एक ही प्रधान धर्मी के परिणाम हैं क्योंकि पृथ्वी आदि विकारों से लेकर महत्तत्त्व तक के सभी धर्म-धर्मी भाव सापेक्ष हैं और केवल प्रधान ही निरपेक्ष रूप से मुख्य धर्मी है।

बाह्य पदार्थों की तरह चित्त में भी अनेक प्रकार के धर्म-परिणाम होते हैं जो दो प्रकार के हैं—एक परिदृष्ट (प्रत्यक्ष) और दूसरा अपरिदृष्ट (परोक्ष)। प्रमाणादि चित्त की वृत्तियाँ प्रत्यักษ हैं, जबकि निरोधादि चित्त के सात धर्म परोक्ष हैं जैसा कि श्रीभगवान् व्यासजी ने अपने श्लोक में बतलाया है।

ये सात परोक्ष धर्म निम्नलिखित हैं: (१) असम्प्रज्ञात-समाधिकी अवस्था में समस्त वृत्तियों का निरोध, (२) पुण्य-पाप, (३) संस्काररूप धर्म, (४) क्षण-क्षण होने वाला परिणाम, (५) जीवनरूप धर्म, (६) चेष्टा और (७) कार्यों की सूक्ष्म शक्ति। ये सभी सात धर्म प्रत्यक्ष से नहीं जाने जाते बल्कि शास्त्र अथवा अनुमान द्वारा ही ज्ञात होते हैं।

3.16 · विभूतिपाद सूत्र १६

सूत्र ३.१६

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥ ३.१६ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 546

शब्दार्थ — परिणाम · त्रय · संयमात् · अतीत · अनागत · ज्ञानम्

अर्थ — तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे भूत और भविष्यत्‌का ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

धर्मलक्षणावस्थापरिणामेषु संयमाद्योगिनां भवत्यतीतानागतज्ञानम् । धारणाध्यानसमाधित्रयमेकत्र संयम उक्तः । तेन परिणामत्रयं साक्षात्क्रियमाणमतीतानागतज्ञानं तेषु सम्पादयति ॥१६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — परिणाम त्रय संयमात् अतीत अनागत ज्ञानम् परिणाम त्रय के संयम से अतीत और अनागत का ज्ञान। ॥ १६॥ धर्म लक्षण अवस्था परिणामेषु संयमात् योगिनां भवति अतीत अनागत ज्ञानम् धर्म, लक्षण, और अवस्था परिणामों में संयम से योगियों को अतीत और अनागत का ज्ञान होता है। धारणा ध्यान समाधि त्रयम् एकत्र संयमः उक्तः धारणा, ध्यान, और समाधि का त्रय एकत्र संयम कहा गया। तेन परिणाम त्रयं साक्षात् क्रियामाणम् अतीत अनागत ज्ञानं तेषु सम्पादयति इससे परिणाम त्रय का साक्षात्कार होने पर उनमें अतीत और अनागत का ज्ञान सम्पादित होता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — पिछले सूत्रमें बतलाया गया है कि क्रमोंसे परिणाम होते हैं इसलिये तीनों कालोंमें होनेवाले संसारके समस्त पदार्थ धर्म , लक्षण और अवस्था - परिणामके अन्तर्गत रहते हैं । इसलिये जब योगी किसी वस्तुके इन तीनों परिणामोंको लक्ष्यमें रखकर संयम करता है तो उसका इन तीनों परिणामोंके साक्षात् होनेसे उस वस्तुके सब क्रमोंका अर्थात् जिस - जिस अवस्थामें होकर वह वस्तु इस रूपमें पहुँची है और आगे जिस - जिस अवस्थामें पहुँचेगी और जितने - जितने कालमें पहुँचेगी , सब ज्ञान हो जाता है (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)

3.17 · विभूतिपाद सूत्र १७

सूत्र ३.१७

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संस्करः, तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ ३.१७ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 546

शब्दार्थ — शब्द · अर्थ · प्रत्ययानाम् · इतरेतर · अध्यासात् · संस्करः · तत् · प्रविभाग · संयमात् · सर्व · भूत · रुत · ज्ञानम्

अर्थ — शब्द , अर्थ और ज्ञानके परस्परके अध्याससे अभेद भासना होता है । उनके विभागमें संयम करनेसे सब प्राणियोंके शब्दका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

तत्र वाग्वर्णेष्वेवार्थवती । श्रोत्रं च ध्वनिपरिणाममात्रविषयम् । पदं पुनर्नादानुसंहारबुद्धिनिर्ग्राह्यमिति । वर्णा एकसमयासम्भवित्वात्परस्परनिरन्गुग्रहात्मानः । ते पदमसंस्पृश्यानुपस्थाप्याविर्भूतास्तिरोभूताश्चेति प्रत्येकमपदस्वरूपा उच्यन्ते । वर्णः पुनरेकैकः पदात्मा सर्वाभिधानशक्तिप्रचितः सहकारिवर्णान्तरप्रतियोगित्वाद्वैश्वरूप्यमिवापन्नः । पूर्वश्चोत्तरेणोत्तरश्च पूर्वेण विशेषेऽवस्थापित इति ।

एवं बहवो वर्णाः क्रमानुरोधिनोऽर्थसङ्केतेनावच्छिन्ना इयन्त एते सर्वाभिधानशक्तिपरिवृता गकारौकारविसर्जनीयाः सास्नादिमन्तमर्थं द्योतयन्तीति । तदेतेषामर्थसङ्केतेनावच्छिन्नानामुपसंहृतध्वनिक्रमाणां य एको बुद्धिनिर्भासस्तत्पदं वाचकं वाच्यस्य सङ्केत्यते । तदेकं पदमेकबुद्धिविषयमेकप्रयत्नाक्षिप्तमभागमक्रममवर्णम् ।

बौद्धमन्त्यवर्णप्रत्ययव्यापारोपस्थापितम्, परत्र प्रतिपिपादयिषया वर्णैरेवाभिधीयमानैः श्रूयमाणैश्च श्रोतृभिरनादिवाग्व्यवहारवासनानुविद्धया लोकबुद्ध्या सिद्धवत्सं प्रतिपत्त्या प्रतीयते । तस्य सङ्केतबुद्धितः प्रविभागः । एतावतामेवंजातीयकोऽनुसंहार एतस्यार्थस्य वाचक इति । सङ्केतस्तु पदपदार्थयोरितरेतराध्यासरूपः स्मृत्यात्मको योऽयं शब्दः सोऽयमर्थः । योऽर्थः स शब्द इति । एवमितरेतराध्यासरूपः सङ्केतो भवतीति ।

एवमेते शब्दार्थप्रत्यया इतरेतराध्यासात्सङ्कीर्णाः—गौरिति शब्दो गौरित्यर्थो गौरिति ज्ञानम् । य एषां प्रविभागज्ञस्स सर्ववित। सर्वपदेषु चास्ति वाक्यशक्तिः । वृक्ष इत्युक्तेऽस्तीति गम्यते । न सत्तां पदार्थौ व्यभिचरतीति । तथा न ह्यसाधना क्रियास्तीति । तथा च पचतीत्युक्ते सर्वकारकाणामाक्षेपः । नियमार्थोऽनुवादः कर्तृकरणकर्मणां चैत्राग्नितण्डुलानामिति । दृष्टं च वाक्यार्थे पदरचनं श्रोत्रियश्छन्दोऽधीते, जीवति प्राणान्धारयति ।

तत्र वाक्ये पदार्थाभिव्यक्तिस्ततः पदं प्रविभज्य व्याकरणीयं क्रियावाचकं वा कारकवाचकं वा । अन्यथा भवत्यश्वोऽजापय इत्येवमादिषु नामाख्यातसारूप्यादनिर्ज्ञातं कथं क्रियायां कारके वा व्याक्रियेतेति । तेषां शब्दार्थप्रत्ययानां प्रविभागः । तद्यथा—वेतते प्रासाद इति क्रियार्थः । श्वेतः प्रासाद इति कारकार्थः शब्दः । क्रियाकारकात्मा तदर्थः प्रत्ययश्च । कस्मात्? सोऽयमित्यभिसम्बन्धादेकाकार एव प्रत्ययः सङ्केत इति । यस्तु श्वेतोऽर्थः स शब्दप्रत्यययोरालम्बनीभूतः ।

स हि स्वाभिरवस्थाभिर्विक्रियमाणो न शब्दसहगतो न बुद्धिसहगतः । एवं शब्द एवं प्रत्ययो नेतरेतरसहगत इत्यन्यथा शब्दोऽन्यथार्थोऽन्यथा प्रत्यय इति विभागः । एवं तत्प्रविभागसंयमाद्योगिनः सर्वभूतरुतज्ञानं सम्पद्यत इति ॥१७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — वहाँ वाक् वर्णों में ही अर्थवती है। श्रोतं च ध्वनिपरिणाममात्रविषयम् और श्रोत्र ध्वनि परिणाम मात्र का विषय है। पद पुनः नाद के अनुसंधान से बुद्धि द्वारा ग्राह्य है। वर्ण एक समय में असंभव होने से परस्पर निरंग ग्रहण आत्मक हैं। ते पदम् असंस्पृश्य अनुपस्थाप्य आविर्भूताः तिरोभूताः च इति प्रत्येकम् अपद स्वरूपाः उच्यन्ते वे पद को न स्पर्श करते हुए, अनुपस्थापित, आविर्भूत और तिरोभूत, प्रत्येक अपद स्वरूप कहे जाते हैं। वर्णः पुनः एकैकः पञ्चमः सर्व अभिधान शक्ति प्रचितः सहकारी वर्णान्तर प्रतियोगित्वात् विश्वरूप्यम् इव अपन्नः वर्ण पुनः एक—एक पंचम, सर्व अभिधान शक्ति से युक्त, सहकारी वर्णान्तर के प्रतियोगित्व से विश्वरूप प्राप्त हुआ है। पूर्व उत्तर से और उत्तर पूर्व से विशेष में अवस्थित है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — शब्द वह वाचक है जिसे जिह्वा से उच्चारण करते हैं और कानों से सुनते हैं, जबकि अर्थ वह वाच्य है जो शब्द से जाना जाता है। प्रत्यय या ज्ञान वह विषयाकार चित्त की वृत्ति है जो शब्द और अर्थ दोनों को मिलाकर ज्ञान कराने वाली होती है। ये तीनों अलग-अलग अपनी सत्ता रखते हैं, जहाँ शब्द वक्ता के वागिन्द्रिय में, अर्थ गोशाला या गोचर में और ज्ञान श्रोता के मन में रहता है। निरंतर अभ्यास के कारण ये तीनों मिले हुए प्रतीत होते हैं, जिससे सामान्य व्यक्ति इनमें भेद नहीं कर पाता, किंतु विदेशी पुरुष जो शब्द नहीं सुना हो, वह अनुमान से ही इनका भेद समझ लेता है। सभी प्राणियों की बोली में शब्द, अर्थ और ज्ञान तीनों होते हैं। योगी संयम और अभ्यास से समाधि-प्रज्ञा प्राप्त करके शब्द, अर्थ और शब्द-अर्थ के ज्ञान के विभाग में संयम करने से सब प्राणियों की बोली को समझ लेता है। इस सूत्र के प्रसङ्ग में भाष्यकारों ने स्फोटवाद का विस्तार से विचार किया है जिसे योग-जिज्ञासुओं के लिए उपयुक्त न होने के कारण व्याख्या में छोड़ दिया गया है। पाठकों के लिए भोजवृत्ति, व्यासभाष्य तथा वार्तिक का भाषानुवाद और अंत में इनका संक्षेप विशेष वर्णन रूप में दिया गया है।

3.18 · विभूतिपाद सूत्र १८

सूत्र ३.१८

संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥ ३.१८ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 555

शब्दार्थ — संस्कार · साक्षात्करणात् · पूर्व · जाति · ज्ञानम्

अर्थ — – संस्कारके साक्षात् करनेसे पूर्वजन्मका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

द्वये खल्वमी संस्काराः स्मृतिक्लेशहेतवो वासनारूपाः विपाकहेतवो धर्माधर्मरूपाः । ते पूर्वभवाभिसंस्कृताः परिणामचेष्टानिरोधशक्तिजीवनधर्मवदपरिद्श्रीआश्चित्तधर्माः । तेषु संयमः संस्कारसाक्षत्क्रियायै समर्थः । न च देशकालनिमित्तानुभवैर्विना तेषामस्ति साक्षात्करणम् । तदित्थं संस्कारसाक्षत्करणात्पूर्वजातिज्ञानमुत्पद्यते योगिनः । परत्राप्येवमेव संस्कारसाक्षात्करणात्परजातिसंवेदनम् ।

अत्रेदमाख्यानं श्रूयते—भगवतो जैगीषव्यस्य संस्कारसाक्षात्करणात्दशसु महासर्गेषु जन्मपरिणामक्रममनुपश्यतो विवेकजं ज्ञानं प्रादुरभवत। अथ भगवानावट्यस्तनुधरस्तमुवाच—दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन त्वया नरकतिर्यग्गर्भसम्भवं दुःखं सम्पश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन सुखदुःखयोः किमधिकमुपलब्धं ? इति ।

भगवन्तमावट्यं जैगीषव्य उवाच—दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन मया नरकतिर्यग्भवं दुःखं सम्पश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन यत्किञ्चिदनुभूतं तत्सर्वं दुःखमेव प्रत्यवैमि । भगवानावट्य उवाच—यदिदमायुष्मतः प्रधानवशित्वमनुत्तमं च सन्तोषसुखं किमिदमपि दुःखपक्षे निक्षिप्तं ? इति । भगवान्जैगीषव्य उवाच—विषयसुखापेक्षयैवेदमनुत्तमं सन्तोषसुखमुक्तं कैवल्यापेक्षया दुःखमेव । बुद्धिसत्त्वस्यायं धर्मस्त्रिगुणः । त्रिगुणश्च प्रत्ययो हेयपक्षे न्यस्त इति ।

दुःखरूपस्तृष्णातन्तुः । तृष्णादुःखसन्तानापगमात्तु प्रसन्नमबाधं सर्वानुकूलं सुखमिदमुक्तमिति ॥१८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — निश्चय ही ये संस्कार दो प्रकार के हैं—स्मृति और क्लेश के हेतु वासना रूप, और विपाक के हेतु धर्म—अधर्म रूप। चित्त धर्माः वे पूर्व जन्म में संस्कृत, परिणाम, चेक्षा, निरोध, शक्ति, और जीवन धर्म की तरह अपरिदृश्य चित्त के धर्म हैं। तेषु संयमः संस्कार साक्षात्क्रियायै समर्थः उनमें संयम संस्कार के साक्षात्कार के लिए समर्थ है। न च देश काल निमित्त अनुभवैः विना तेषाम् अस्ति साक्षात्करणम् और देश, काल, निमित्त के अनुभव के बिना उनका साक्षात्करण नहीं है। तत् इदम् संस्कार साक्षात्करणात् पूर्व जाति ज्ञानम् उत्पद्यते योगिनः इससे संस्कार के साक्षात्करण से योगी में पूर्व जन्म का ज्ञान उत्पन्न होता है। परत्रा अपि एवमः एव संस्कार साक्षात्करणात् पर जाति संवेदनम् और पर जन्म का भी इसी प्रकार संस्कार साक्षात्करण से संवेदन होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — संस्कार दो प्रकार के होते हैं, जिनमें से एक स्मृति और क्लेशों के कारण स्मृतिके बीजरूप रहते हैं तथा दूसरे जन्म, आयु, भोग और सुख-दुःख के कारण वासनारूप रहते हैं। ये संस्कार धर्म और अधर्म रूप में पिछले जन्मों के कर्मों से बनते हैं और ग्रामोफोन की प्लेट के रिकॉर्ड सदृश चित्त में चित्रित रहते हैं। ये परिणाम, चेष्टा, निरोध, शक्ति, जीवन और धर्म की भाँति अपरिदृष्ट चित्त के धर्म हैं, जिनका संयम से साक्षात्कार होने पर पूर्वजन्म का ज्ञान प्राप्त होता है। विज्ञान-भिक्षु के अनुसार दूसरों के संस्कारों के साक्षात् करने से उनके पूर्वजन्म का भी ज्ञान हो जाता है। योगिराज जैगीषव्य के साथ संवाद में यह स्पष्ट किया गया है कि दस महाकल्पों के अनुभव से ज्ञात होता है कि संसार दुःख-बहुल है क्योंकि विषय-सुख दुःखरूप होते हैं। संतोष को अनुत्तम सुख कहा गया है क्योंकि वह तृष्णा रूप दुःख का नाश करता है, परंतु कैवल्य की अपेक्षा से यह भी दुःखरूप ही है।

3.19 · विभूतिपाद सूत्र १९

सूत्र ३.१९

प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥ ३.१९ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.१९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 556

शब्दार्थ — प्रत्ययस्य · पर · चित्त · ज्ञानम्

अर्थ — दूसरेके चित्तकी वृत्तिके साक्षात् करनेसे दूसरेके चित्तका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

प्रत्यये संयमात्प्रत्ययस्य साक्षात्करणात्ततः परचित्तज्ञानम् ॥१९॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — प्रत्यये संयमात् प्रत्ययस्य साक्षात्करणात् ततः पर चित्त ज्ञानम् प्रत्यय में संयम से, प्रत्यय के साक्षात्करण से, ततः पर चित्त का ज्ञान।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जब योगी किसीके चेहरे तथा नेत्र आदिकी आकृति देखकर उसके चित्तकी वृत्तिमें संयम करता है तो उसको उस चित्तका साक्षात् हो जाता है । इससे उसको ज्ञान हो जाता है कि चित्त राग , द्वेषादि संसारकी वासनाओंसे रँगा हुआ है अथवा वैराग्ययुक्त है । इस समय उसका (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)

3.20 · विभूतिपाद सूत्र २०

सूत्र ३.२०

न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥ ३.२० ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 556

शब्दार्थ — न · च · तत् · स · आलम्बनम् · तस्य · अविषयी · भूतत्वात्

अर्थ — और वह सांलंबन नहीं, क्योंकि वह विषय नहीं बनता।

व्यासभाष्य

रक्तं प्रत्ययं जानात्यमुष्मिन्नालम्बने रक्तमिति न जानाति । परप्रत्ययस्य यदालम्बनं तद्योगिचित्तेन नालम्बनीकृतम् । परप्रत्ययमात्रं तु योगिचित्तस्य आलम्बनीभूतमिति ॥२०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — प्रत्यय को जानता है, इस आलंबन में रक्त है, यह नहीं जानता। पर प्रत्ययस्य यत् आलम्बनम् तत् योगि चित्तेन न आलम्बनीकृतम् पर प्रत्यय का जो आलमन है, वह योगी के चित द्वारा आलंबन नहीं किया जाता। केवल पर प्रत्यय ही योगी चित का आलंबन बनता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पिछले सूत्र में दूसरे के चित्त की वृत्ति में संयम करने से केवल यह ज्ञान होता है कि चित्त राग-द्वेष से युक्त है या वीतराग, परंतु राग-द्वेष के विषयों का ज्ञान नहीं होता। क्योंकि ये उस संयम के विषय नहीं थे और संयम द्वारा केवल वही साक्षात् होता है जिसे पहले किसी प्रकार से जान लिया गया हो। बाहरी चिह्नों जैसे नेत्र या चेहरे की आकृति से केवल राग-द्वेष तो जाने जा सकते हैं, किंतु उनके विषय नहीं। अतः वे सालम्बन चित्त के संयम के विषय नहीं बन सकते। यदि राग-द्वेष आदि आभ्यन्तर लिङ्गों द्वारा संयम किया जाए, तो उनके विषयों का अर्थात् सालम्बन चित्त का भी ज्ञान हो सकता है। टिप्पणी में बताया गया है कि विज्ञान भिक्षु ने इस सूत्र को भाष्य मानकर उन्नीसवें सूत्र में सम्मिलित कर दिया है। जबकि भोज और वाचस्पति मिश्र ने इसे अलग सूत्र माना है।

3.21 · विभूतिपाद सूत्र २१

सूत्र ३.२१

कायरूपसंयमात्तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥ ३.२१ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 557

अर्थ — अपने शरीरके रूपमें संयम करनेसे रूपकी ग्राह्य - शक्ति रुक जाती है । इससे दूसरेके आँखोंके प्रकाशसे योगीके शरीरका संनिकर्ष न होनेके कारण योगीके शरीरका अन्तर्धान ( छिप जाना ) हो जाता है ।

व्यासभाष्य

कायस्य रूपे संयमाद्रूपस्य या ग्राह्या शक्तिस्तां प्रतिबध्नाति । ग्राह्यशक्तिस्तम्भे सति चक्षुःप्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानमित्युत्पद्यते योगिनः । एतेन शब्दाद्यन्तर्धानमुक्तं वेदितव्यम् ॥२१॥

(इस भाष्यांशका हिन्दी अनुवाद इस संस्करणमें नहीं है।)

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — चक्षु ग्रहण - शक्ति है और रूप ग्राह्य - शक्ति है । इन दोनों शक्तियोंके संयोगसे ही देखनेका काम होता है । इन दोनोंमेंसे किसी एककी शक्तिके रुक जानेसे देखनेका कार्य बंद हो जाता है । योगी संयमद्वारा शरीरके रूपकी ग्राह्य - शक्तिको रोक देता है । उस कारण चक्षुकी ग्रहण - शक्ति होते हुए भी दूसरे पुरुष उसके शरीरको नहीं देख सकते । यह उस योगीका अन्तर्धान अर्थात् छिप जाना है । इसी प्रकार शब्द , स्पर्श , रस और गन्धमें संयम करनेसे उस - उसकी ग्राह्य - शक्ति रुक जाती है और उनके वर्तमान हुए भी वे अपने विषय करनेवाली इन्द्रियोंसे ग्रहण नहीं किये जा सकते । रहते सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥ २२ ॥

3.22 · विभूतिपाद सूत्र २२

सूत्र ३.२२

सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म, तत्संयमादपरान्तज्ञानम्, अरिष्टेभ्यो वा ॥ ३.२२ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 557

शब्दार्थ — स · उपक्रमम् · निरुपक्रमम् · च · कर्म · तत् · संयमात् · अपरान्त · ज्ञानम् · अरिष्टेभ्यः · वा

अर्थ — सौपक्रम और निरुपक्रम कर्म, उसके संयम से अपरान्त ज्ञान, या अरिष्टों से।

व्यासभाष्य

आयुर्विपाकं कर्म द्विविधं सोपक्रमं निरुपक्रमं च । तत्र यथार्द्रवस्त्रं वितानितं लघीयसा कालेन शुष्येत्, तथा सोपक्रमम् । यथा च तदेव सम्पिण्डितं चिरेण संशुष्येदेवं निरुपक्रमम् । यथा चाग्निः शुष्के कक्षे मुक्तो वातेन समन्ततो युक्तं क्षेपीयसा कालेन दहेत्, तथा सोपक्रमम् । यथा वा स एवाग्निस्तृणराशौ क्रमतोऽवयवेषु न्यस्तश्चिरेण दहेत्, तथा निरुपक्रमम् । तत्संयमादपरान्तज्ञानम्, अरिष्टेभ्यो वा ॥२२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — आयु का विपाक कर्म दो प्रकार का है—सौपक्रम और निरुपक्रम। वहाँ जैसे गीला वस्त्र फैलाया हुआ थोड़े समय में सूख जाता है, वैसे सौपक्रम। यथा च तद् एव सम्पिण्डितं चिरेण संशुष्येत् एवम् निरुपक्रमम् और जैसे वही वस्त्र संकुचित होकर लंबे समय में सूखता है, वैसे निरुपक्रम। यथा च अग्निः शुष्के कक्षे मुक्तः वातेन समन्ततः युक्तं क्षेपीयसा कालेन दहेत् तथा स उपक्रमम् और जैसे अग्नि सूखे घास में छोड़ी गई, वायु से चारों ओर युक्त, थोड़े समय में जलाती है, वैसे सौपक्रम। वही अग्नि तृण के ढेर में क्रम से अवयवों में रखी गई लंबे समय में जलाती है, वैसे निरुपक्रम। उसका संयम से अपरान्त ज्ञान, या अरिष्टों से।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — आयु नियत करने वाले पूर्वजन्म के कर्म दो प्रकार के होते हैं, जिनमें सोपक्रम अर्थात् शीघ्र फल देने वाले कर्म और निरुपक्रम अर्थात् विलम्ब से फल देने वाले कर्म आते हैं। गीले वस्त्र के सूखने या तृणों के जलने के उदाहरणों द्वारा इन दोनों कर्मों की गति को स्पष्ट किया गया है। अपरान्त शरीर के वियोग को जानने के लिए योगी संयम द्वारा यह जान लेते हैं कि उनकी आयु कितनी शेष रही है और किस काल व देश में मृत्यु होगी।

इसके अतिरिक्त अरिष्टों अर्थात् मृत्यु के बतलाने वाले चिह्नों से भी अपनी मृत्यु का ज्ञान होता है, जो तीन प्रकार के होते हैं— आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक। आध्यात्मिक में अभ्यास के बावजूद आंतरिक ध्वनियों या प्रकाश का न दिखना, आधिभौतिक में मृत पुरुषों का दिखाई देना और आधिदैविक में सिद्धों या नक्षत्रों का उल्टा-पुल्टा दिखना सम्मिलित है। प्रकृति के बदलने या विपरीत ज्ञान होने जैसे परिवर्तन भी अरिष्ट अर्थात् मरण के चिह्न माने जाते हैं।

जहाँ संयम द्वारा मृत्यु का ज्ञान केवल योगियों को होता है, वहीं अरिष्टों द्वारा योगियों और साधारण मनुष्यों को भी यह ज्ञान प्राप्त होता है। अंततः अयोगियों को इन चिह्नों से संशयात्मक ज्ञान होता है, जबकि योगियों को संशय-रहित प्रत्यक्ष के तुल्य देश और काल सहित मृत्यु का ज्ञान होता है।

3.23 · विभूतिपाद सूत्र २३

सूत्र ३.२३

मैत्र्यादिषु बलानि ॥ ३.२३ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 558

शब्दार्थ — मैत्री · आदिषु · बलानि

अर्थ — – मैत्री आदिमें संयम करनेसे मैत्री आदि बल प्राप्त होता है ।

व्यासभाष्य

मैत्रीकरुणामुदितेति तिस्रो भावनाः । तत्र भूतेषु सुखितेषु मैत्रीं भावयित्वा करुणाबलं लभते । पुण्यशीलेषु मुदितां भावयित्वा मुदिताबलं लभते । भावनातः समाधिर्यः स संयमः । ततो बलान्यबन्ध्यवीर्याणि जायन्ते । पापशीलेषूपेक्षा न तु भावना । ततश्च तस्यां नास्ति समाधिरित्यतो न बलमुपेक्षातस्तत्र संयमाभावादिति ॥२३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — करुणा, और मुदिता—ये तीन भावनाएँ हैं। वहाँ सुखी भूतों में मैत्री भावना से करुणा बल प्राप्त होता है। पुण्यशीलों में मुदिता भावना से मुदिता बल प्राप्त होता है। भावना से जो समाधि है, वह संयम है। इससे निर्विघ्न वीर्य वाले बल उत्पन्न होते हैं। पापशीलों में उपेक्षा है, न कि भावना। इति इसलिए उसमें समाधि नहीं है, अतः उपेक्षा से बल नहीं, क्योंकि वहाँ संयम का अभाव है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — पहिले पादके तैंतीसवें सूत्रमें मैत्री , करुणा, मुदिता , उपेक्षा- -चार भावनाएँ बतलायी गयी हैं । इनमेंसे पहली तीन भावनाओंमें साक्षात् पर्यन्त संयम करनेसे योगीका मुदिता बल बढ़ जाता है । अर्थात् योगीको मैत्री आदि ऐसी उत्कृष्ट हो जाती है कि क्रमानुसार सबकी मित्रता मैत्री , आदिको करुणा , प्राप्त होता है । जब मैत्रीमें संयम करता है तो सब प्राणियोंका सुखकारी मित्र बन करनेसे दुःखियोंके दुःख दूर करनेकी शक्ति आ जाती है । मुदितामें संयम जाता है । करुणामें संयम चौथा उपेक्षा अर्थात् उदासीनता अभावात्मक पदार्थ है , इस कारण करनेसे पक्षपाती नहीं होता । वह संयमका विषय नहीं बन सकता ।

3.24 · विभूतिपाद सूत्र २४

सूत्र ३.२४

बलेषु हस्तिबलादीनि ॥ ३.२४ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 559

शब्दार्थ — बलेषु · हस्ति · बल · आदीनि

अर्थ — हाथी आदिके बलोंमें संयम करनेसे हाथी आदिके बल प्राप्त होते हैं ।

व्यासभाष्य

हस्तिबले संयमाद्धस्तिबलो भवति । वैनतेयबले संयमाद्वैनतेयबलो भवति । वायुबले संयमाद्वायुबल इत्येवमादि ॥२४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — हस्ती के बल में संयम से हस्ती का बल प्राप्त होता है। वैनतेय बले संयमात् वैनतेय बलः भवति वैनतेय के बल में संयम से वैनतेय का बल प्राप्त होता है। वायु के बल में संयम से वायु का बल, इस प्रकार आदि।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जब योगी हाथी , सिंह आदिके बल और वायु आदिके वेगमें तदाकार होकर साक्षात् - पर्यन्त संयम करता है तो उन - जैसे बलोंको प्राप्त होता है अर्थात् जिसके बलमें संयम किया जाता है वही बल प्राप्त होता है । प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥ २५ ॥

3.25 · विभूतिपाद सूत्र २५

सूत्र ३.२५

प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥ ३.२५ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 559

शब्दार्थ — प्रवृत्ति · आलोक · न्यासात् · सूक्ष्म · व्यवहित · विप्रकृष्ट · ज्ञानम्

अर्थ — प्रवृत्तिके प्रकाश डालनेसे सूक्ष्म , व्यवहित और विप्रकृष्ट वस्तुका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

ज्योतिष्मती प्रवृत्तिरुक्ता मनसः । तस्यां य आलोकस्तं योगी सूक्ष्मे वा व्यवहिते वा विप्रकृष्टे वार्थे विन्यस्य तमर्थमधिगच्छति ॥२५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ज्योतिष्मती प्रवृत्ति मन की कही गई है। उसमें जो आलोक है, उसे योगी सूक्ष्म, व्यवहित, या विप्रकृष्ट अर्थ में न्यस्त कर उस अर्थ को प्राप्त करता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — -पहले पादके छत्तीसवें सूत्रमें बतलायी हुई मनकी ज्योतिष्मती प्रवृत्तिके प्रकाशको जब योगी संयमद्वारा किसी सूक्ष्म ( इन्द्रियातीत ) जैसे अदृश्य परमाणु आदि , व्यवहित ( ढके हुए ) जैसे भूमिके अंदर दबी हुई खानें , दीवारकी ओटमें छिपी हुई वस्तुएँ , शरीरके अंदरके भाग इत्यादि , विप्रकृष्ट - दूरस्थ वस्तुपर , जहाँ आँख नहीं पहुँचती , डालता है तब उनका उसको प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है । जैसे सूर्यादिके प्रकाशसे घटादि प्रत्यक्ष होते हैं वैसे ही ज्योतिष्मतीके प्रकाशमें सूक्ष्म , व्यवहित और विप्रकृष्ट वस्तुका ज्ञान होता है भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥ २६ ॥

3.26 · विभूतिपाद सूत्र २६

सूत्र ३.२६

भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥ ३.२६ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 559

शब्दार्थ — भुवन · ज्ञानम् · सूर्ये · संयमात्

अर्थ — सूर्यमें संयम करनेसे भुवनका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

तत्प्रसारः सप्तलोकाः । तत्रावीचेः प्रभृति मेरुपृष्ठं यावदित्येव भूर्लोकः । मेरुपृष्ठादारभ्याध्रुवाद्ग्रहनक्षत्रताराविचित्रोऽन्तरिक्षलोकः । तत्परः स्वर्लोकः पञ्चविधो माहेन्द्रस्तृतीयो लोकः । चतुर्थः प्राजापत्यो महर्लोकः । त्रिविधो ब्राह्मः, तद्यथा—जनलोकः, तपोलोकः, सत्यलोक इति । ब्राह्मस्त्रिभूमिको लोकः प्राजापत्यस्ततो महान। माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिवि तारा भुवि प्रजाः ॥ इति सङ्ग्रहश्लोकः ।

तत्रावीचेरुपर्युपरि निविष्टाः षण् महानरकभूमयो घनसलिलानलाकाशतमःप्रतिष्ठा महाकालाम्बरीषरौरवमहारौरवकालसूत्रान्धतमिस्राः । यत्र स्वकर्मोपार्जितदुःखवेदनाः प्राणिनः कष्टमायुर्दीर्घमाक्षिप्य जायन्ते । ततो महातलरसातलातलसुतलवितलतलातलपातालाख्यानि सप्त पातालानि । भूमिरियमष्टमी सप्तद्वीपा वसुमती, यस्या सुमेरुर्मध्ये पर्वतराजः काञ्चनः । तस्य राजतवैदूर्यस्फटिकहेममणिमयानि शृङ्गाणि । तत्र वैदूर्यप्रभानुरागान्नीलोत्पलपत्रश्यामो नभसो दक्षिणो भागः ।

श्वेतः पूर्वः, स्वच्छः पश्चिमः, कुरुण्डकाभ उत्तरः । दक्षिणपार्श्वे चास्य जम्बूः । यतोऽयं जम्बूद्वीपः तस्य सूर्यप्रचाराद्रात्रिन्दिवं लग्नमिव विवर्तते । तस्य नीलश्वेतशृङ्गस्य उदीचीनास्त्रयः पर्वता द्विसहस्रायामाः । तदन्तरेषु त्रीणि वर्षाणि नवनवयोजनसाहस्राणि रमणकं हिरण्मयमुत्तराः कुरव इति । निषधहेमकूटहिमशैला दक्षिणतो द्विसाहस्रायामाः । तदन्तरेषु त्रीणि वर्षाणि नवनवयोजनसाहस्राणि हरिवर्षं किम्पुरुषं भारतमिति । सुमेरोः प्राचीना भद्राश्वा माल्यवत्सीमानः ।

प्रतीचीनाः केतुमाला गन्धमादनसीमानः । मध्ये वर्षमिलावृतम् । तदेतद्योजनशतसाहस्रं, सुमेरोर्दिशि दिशि तदर्धेन व्यूढम् । स खल्वयं शतसाहस्रायामो जम्बूद्वीपस्ततो द्विगुणेन लवणोदधिना वलयाकृतिना वेष्टितः । ततश्च द्विगुणा द्विगुणा शाककुशक्रौञ्चशाल्मलमगधपुष्करद्वीपाः सप्तसमुद्राश्च सर्षपराशिकल्पाः सविचित्रशैलावतंसा इक्षुरससुरासर्पिर्दधिमण्डक्षीरस्वादूदकाः । सप्तसमुद्रपरिवेष्टिताः वलयाकृतयो लोकालोकपर्वतपरिवाराः पञ्चाचद्योजनकोटिपरिसङ्ख्याताः ।

तदेतत्सर्वं सुप्रतिष्ठितसंस्थानमण्डमध्ये व्यूढम् । अण्डं च प्रधानस्थाणुरवयवो यथाकाशे खद्योत इति । तत्र पाताले जलधौ पर्वतेष्वेतेषु देवनिकाया असुरगन्धर्वकिन्नरकिम्पुरुषयक्षराक्षसभूतप्रेतपिशाचापस्मारकाप्सरोब्रह्मराक्षसकूष्माण्डविनायकाः प्रतिवसन्ति । सर्वेषु द्वीपेषु पुण्यात्मानो देवमनुष्याः । सुमेरुस्त्रिदशानामुद्यानभूमिः । तत्र मिश्रवनं नन्दनं चैत्ररथं सुमानसमित्युद्यानानि । सुधर्मा देवसभा । सुदर्शनं पुरम् । वैजयन्तः प्रासादः ।

ग्रहनक्षत्रतारकास्तु ध्रुवे निबद्धा वायुविक्षेपनियमेनोपलक्षितप्रचाराः सुमेरोरुपर्युपरि सन्निविष्टा विपरिवर्तन्ते । माहेन्द्रनिवासिनः षड्देवनिकायाः—त्रिदशाः, अग्निष्वात्ताः, याम्याः, तुषिताः, अपरिनिर्मितवशवर्तिनः, परिनिर्मितवशवर्तिनश्चेति । ते सर्वे सङ्कल्पसिद्धा अणिमाद्यैश्वर्योपपन्नाः कल्पायुषो वृन्दारकाः कामभोगिन औपपादिकदेहा उत्तमानुकूलाभिरप्सरोभिः कृतपरिवाराः । महति लोके प्राजापत्ये पञ्चविधो देवनिकायः—कुमुदाः, ऋभवः, प्रतर्दनाः, अञ्जनाभाः, प्रचिनाभा इति ।

एते महाभूतवशिनो ध्यानाहाराः कल्पसहस्रायुषः । प्रथमे ब्रह्मणो जनलोके चतुर्विधो देवनिकायः—ब्रह्मपुरोहिताः, ब्रह्मकायिकाः, ब्रह्ममहाकायिकाः, अजरामरा इति । एते भूतेन्द्रियवशिनो द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः । द्वितीये तपसि लोके त्रिविधो देवनिकायः—आभास्वराः, महाभास्वराः, सत्यमहाभास्वरा इति । एते भूतेन्द्रियप्रकृतिवशिनो द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः । सर्वे ध्यानाहाराः ऊर्ध्वरेतस ऊर्ध्वमप्रतिहतज्ञाना अधरभूमिष्वनावृतज्ञानविषयाः ।

तृतीये ब्रह्मणः सत्यलोके चत्वारो देवनिकायः—अच्युताः, शुद्धनिवासाः, सत्याभाः संज्ञासंज्ञिनश्चेति । अकृतभवनन्यासाः स्वप्रतिष्ठा उपर्युपरिस्थिताः प्रधानवशिनो यावत्सर्गायुषः । तत्राच्युताः सवितर्कध्यानसुखाः । शुद्धनिवासाः सविचारध्यानसुखाः । सत्याभा आनन्दमात्रध्यानसुखाः । संज्ञासंज्ञिनश्चास्मितामात्रध्यानसुखाः । तेऽपि त्रैलोक्यमध्ये प्रतितिष्ठन्ति । त एते सप्त लोकाः सर्व एव ब्रह्मलोकाः । विदेहप्रकृतिलयास्तु मोक्षपदे वर्तन्ते, न लोकमध्ये न्यस्ता इति ।

एतद्योगिनां साक्षात्कर्तव्यं सूर्यद्वारे संयमं कृत्वा, ततोऽन्यत्रापि एवं तावदभ्यसेद्यावदिदं सर्वं दृष्टमिति ॥२६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — लोक हैं। वहाँ अवीचि से प्रारंभ होकर मेरु पृष्ठ तक, यह भूः लोक है। मेरु पृष्ठ से प्रारंभ होकर ध्रुव तक, ग्रह, नक्षत्र, तारा विचित्र, यह अन्तरिक्ष लोक है। उसके पर स्वः लोक है, पांच प्रकार का, माहेन्द्र तृतीय लोक है। चौथा प्राजापत्य महः लोक है। है, जैसे—जन लोक, तपः लोक, सत्य लोक। (इस संस्करणमें भाष्यके केवल एक अंशका हिन्दी अनुवाद है — मूल भाष्य ३५९१ अक्षरका है।)

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — प्रकाशमय सूर्य में साक्षात् पर्यन्त संयम करने से भू, भुवः, स्वः आदि सातों लोकों के विशेष हदवाले स्थानों का यथावत् ज्ञान होता है। पिछले पच्चीसवें सूत्र में सात्त्विक प्रकाश के आलम्बन से संयम कहा गया है, जबकि इस सूत्र में भौतिक सूर्य के प्रकाश द्वारा संयम बताया गया है। यहाँ सूर्य का अर्थ सूर्यद्वार से लेना चाहिए, जिसका अभिप्राय सुषुम्ना है और श्री व्यासजी ने भी सूर्य के अर्थ सूर्यद्वार से ही किए हैं। मुण्डक में भी 'सूर्यद्वारेण ते विरजा' के रूप में सूर्यद्वार का वर्णन है। कई टीकाकारों ने सूर्य का अर्थ पिंगला नाड़ी से लगाया है, पर यह अर्थ भाष्यकार, वृत्तिकार और प्रसङ्ग से संबंधित नहीं है। भाष्यकार ने इस सूत्र की व्याख्या में अनेक लोकों का विस्तार से वर्णन किया है जिसे उपयोगी न समझकर व्याख्या में छोड़ दिया गया है। भोजवृत्ति के अनुसार इस भाष्य के संबंध में कई एकों का मत है कि यह व्यासकृत नहीं है, इसलिए भोजवृत्ति में इसका कोई अंश नहीं मिलता है। अलंकाररूप से वर्णित तथा संदेहजनक बातों के स्पष्टीकरण के साथ व्यासभाष्य का भाषार्थ पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत किया गया है।

3.27 · विभूतिपाद सूत्र २७

सूत्र ३.२७

चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥ ३.२७ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 565

शब्दार्थ — चन्द्रे · तारा · व्यूह · ज्ञानम्

अर्थ — चन्द्रमामें संयम करनेसे ताराओंके व्यूहका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

चन्द्रे संयमं कृत्वा ताराव्यूहं विजानीयात ॥२७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — चन्द्र में संयम करके ताराओं के व्यूह को जानना चाहिए।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — ताराओं की स्थिति का यथावत् ज्ञान चंद्रमा में संयम करने से प्राप्त होता है। पृथ्वी एक वर्ष में बारह राशियों का चक्कर लगाती है, जबकि चंद्रमा अपने चंद्रमास में एक बार ही पृथ्वी के चारों ओर घूमकर बारह राशियों को पार कर लेता है। इस कारण चंद्रमा में संयम द्वारा योगियों को राशि-चक्र का ज्ञान सुगम रीति से हो सकता है। ज्योतिष का यह सिद्धांत है कि चंद्रमा किसी भी राशि पर सबसे कम समय तक रहता है, इसलिए प्रत्येक तारा-विकर्षण व्यूह राशि की शक्ति के आकर्षण-विकर्षण के साथ चंद्रमा का अतिघनिष्ठ संबंध है। अतः उस आकर्षण आलम्बन से युक्त तारा व्यूह के ज्ञान में चंद्रमा की सहायता ली जा सकती है। टिप्पणी में उल्लेख है कि कई टीकाकारों ने चंद्रमा से इडा नाड़ी का अर्थ लिया है जो सुषुम्ना के वाम ओर से संबंधित है। यह अर्थ व्यासभाष्य और भोजवृत्ति के अभिमत नहीं हैं और न ही इसका प्रकरण से कोई संबंध है।

3.28 · विभूतिपाद सूत्र २८

सूत्र ३.२८

ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥ ३.२८ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 566

शब्दार्थ — ध्रुवे · तत् · गति · ज्ञानम्

अर्थ — ध्रुवमें संयम करनेसे ताराओंकी गतिका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

ततो ध्रुवे संयमं कृत्वा ताराणां जानीयात। ऊर्ध्वविमानेषु कृतसंयमस्तानि जानीयात ॥२८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ततः ध्रुवे संयमं कृत्वा ताराणां जानीयात् ततः ध्रुव में संयम करके ताराओं को जानना चाहिए। ऊर्ध्व विमानों में संयम करके उन्हें जानना चाहिए।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — ध्रुव सब ताराओंमें प्रधान और निश्चल है । इसीलिये उसमें संयम करनेसे प्रत्येक ताराकी गतिका ज्ञान , नियत काल और नियत देश - सहित हो जाता है । अर्थात् इतने समयमें यह तारा अमुक राशि , अमुक नक्षत्रमें जायगा । टिप्पणी - कई टीकाकारोंने ध्रुवसे सुषुम्ना नाड़ी अर्थ लिया है जो मेरुदण्डमें मूलाधारसे लेकर सहस्रदलतक चली गयी है । पूर्व सूत्रकी टिप्पणीमें इस सम्बन्धमें जो लिख आये हैं वही यहाँ भी समझना चाहिये । व्यासभाष्यमें इतना और है- ऊर्ध्व ( आकाशमें उड़नेवाले ) विमानोंमें संयम करनेसे उनका ज्ञान होता है ।

3.29 · विभूतिपाद सूत्र २९

सूत्र ३.२९

नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥ ३.२९ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.२९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 566

शब्दार्थ — नाभि · चक्रे · काय · व्यूह · ज्ञानम्

अर्थ — नाभि - चक्रमें संयम करनेसे शरीरके व्यूहका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

नाभिचक्रे संयमं कृत्वा कायव्यूहं विजानीयात। वातपित्तश्लेष्माणस्त्रयो दोषाः सन्ति । धातवः सप्त त्वग्लोहितमांसस्नाय्वस्थिमज्जाशुक्राणि । पूर्वं पूर्वमेषां बाह्यमित्येष विन्यासः ॥२९॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विज्ञानाय भवति नाभि में संयम करके काय का जो व्यूह है, वह उसके ज्ञान के लिए होता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — सोलह अरों ( सिरों ) वाला नाभिचक्र , शरीरके मध्यमें है और सब ओर फैली हुई नाड़ियों आदिका विशेष स्थान है । इसीलिये इसमें संयम करनेसे शरीरमें रहनेवाली वात , पित्त , कफ – तीनों दोष और त्वचा , रक्त , मांस , नाड़ी , हड्डी , चरबी , वीर्य - सातों धातुओं की स्थिति आदिका पूरा - पूरा ज्ञान हो जाता है । कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥ ३० ॥

3.30 · विभूतिपाद सूत्र ३०

सूत्र ३.३०

कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥ ३.३० ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 566

शब्दार्थ — कण्ठ · कूपे · क्षुत् · पिपासा · निवृत्तिः

अर्थ — कण्ठ - कूपमें संयम करनेसे क्षुधा और पिपासा ( भूख - प्यास ) की निवृत्ति होती है ।

व्यासभाष्य

जिह्वाया अधस्तात्तन्तुः । ततोऽधस्तात्कण्ठः । ततोऽधस्तात्कूपः । तत्र संयमात्क्षुत्पिपासे च बाधेते ॥३०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — कण्ठ कूपे संयमं कृत्वा क्षुत् तृष्णा निवृत्तिं लभते कण्ठ कूप में संयम करके क्षुधा और तृष्णा की निवृत्ति प्राप्त करता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जिह्वाके नीचे सूतके समान एक नस है , उसके नीचे कण्ठ है । उस कण्ठके नीचे जो गढ़ा है उसे कण्ठकूप कहते हैं । उस स्थानमें प्राणादिका स्पर्श होनेसे पुरुषको भूख - प्यास लगती है । इसलिये इस कण्ठ - कूपमें संयमद्वारा प्राणादिके स्पर्शकी निवृत्ति हो जानेसे योगीको भूख - प्यास नहीं लगती है । कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥ ३१ ॥

3.31 · विभूतिपाद सूत्र ३१

सूत्र ३.३१

कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥ ३.३१ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 566

शब्दार्थ — कूर्म · नाड्यां · स्थैर्यम्

अर्थ — कूर्म - नाड़ीमें संयम करनेसे स्थिरता होती है ।

व्यासभाष्य

कूपादध उरसि कूर्माकारा नाडी । तस्यां कृतसंयमः स्थिरपदं लभते । यथा सर्पो गोधा वेति ॥३१॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — कूर्म नाड्यां संयमं कृत्वा स्थैर्यं लभते कूर्म नाडी में संयम करके स्थैर्य प्राप्त करता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — कण्ठ - कूपके नीचे छातीमें कछुवेके आकारवाली एक नाड़ी है । उसे कूर्म उसमें संयम करनेसे स्थिरताकी प्राप्ति होती है । जैसे सर्प और गोह स्थिर - नाड़ी कहते हैं । वास्तविक घटना भी है — सर्प छिद्रमें आधा घुसा हो तो आधेको पकड़कर होते हैं । ( प्रसिद्ध भी है और वह ऐसा जम जाता है कि चाहे टूट जाये परंतु खिंचता नहीं । यही बात कितना ही बलपूर्वक खींचे प्रायः चोर किसी छतपर चढ़नेके निमित्त गोहके कमरमें रस्सी बाँधकर गोहके सम्बन्धमें भी प्रसिद्ध है । उसको ऊपर चढ़ा देते हैं । जब वह मुँडेरपर पहुँच जाती है तब पैर जमा लेती है और चोर रस्सीके सहारे ऊपर चढ़ जाते हैं । श्रीअङ्गदजीके पैर न उठनेकी बात भी इसी संयमकी सिद्धिकी सूचक हो सकती है । )

3.32 · विभूतिपाद सूत्र ३२

सूत्र ३.३२

मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥ ३.३२ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 567

शब्दार्थ — मूर्ध · ज्योतिषि · सिद्ध · दर्शनम्

अर्थ — मूर्धाकी ज्योतिमें संयम करनेसे सिद्धोंका दर्शन होता है है ।

व्यासभाष्य

शिरःकपालेऽन्तश्छिद्रं प्रभास्वरं ज्योतिः । तत्र संयमात्सिद्धानां द्यावापृथिव्योरन्तरालचारिणां दर्शनम् ॥३२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — मूर्ध्नि ज्योतिषि संयमं कृत्वा सिद्धानां दर्शनं लभते मूर्ध के ज्योतिष में संयम करके सिद्धों का दर्शन प्राप्त करता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — शरीरके कपालमें ब्रह्म- रन्ध्र नामक एक छिद्र है । उसमें जो प्रकाशवाली ज्योति है वह मूर्धा - ज्योति कहलाती है । उसमें संयम करनेसे सिद्धोंके दर्शन होते हैं । द्यौ और पृथिवीलोकमें विचरनेवाले सिद्ध ( व्यासभाष्य ) द्यौ और पृथिवीलोकके अन्तरालमें विचरनेवाले सिद्ध , अर्थात् दिव्य - पुरुष जो दूसरे प्राणियोंको अदृश्य रहते हैं , योगी उनको ध्यानावस्थामें देखता है और उनके साथ भाषण करता है । ( भोजवृत्ति ) विशेष विचार — इस ज्योतिका सम्बन्ध भ्रुकुटी अर्थात् आज्ञाचक्रसे है । इसलिये ब्रह्मरन्ध्रमें प्राण तथा मनको स्थिर करनेके पश्चात् जब आज्ञाचक्रमें ध्यान किया जाता है तो इस मूर्धा - ज्योतिके सत्त्वगुणके प्रकाशमें सूक्ष्म जगत्का अनुभव होने लगता है । विशेष १ । ३४ के वि ॰ व ॰ में देखो ।

अन्य स्रोत: व्यासभाष्य, भोजवृत्ति

3.33 · विभूतिपाद सूत्र ३३

सूत्र ३.३३

प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥ ३.३३ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 567

शब्दार्थ — प्रातिभात् · वा · सर्वम्

अर्थ — अथवा प्रातिभ - ज्ञानसे योगी सब कुछ जान लेता है ।

व्यासभाष्य

प्रातिभं नाम तारकम् । तद्विवेकजस्य ज्ञानस्य पूर्वरूपम् । यथोदये प्रभा भास्करस्य । तेन वा सर्वमेव जानाति योगी, प्रातिभस्य ज्ञानस्योत्पत्ताविति ॥३३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — प्रकृष्टं तेजः प्रातिभं तत् वति प्रातिभः प्रकृष्ट तेज प्रातिभ है, वह जिसमें है, वह प्रातिभ। यद् वा प्रत्यय विशेषः प्रातिभः अथवा विशेष प्रत्यय प्रातिभ है। यद् वा यद्यपि न संयमेन कृतं तथापि प्रभाति सर्वं यस्य सः प्रातिभः अथवा यद्यपि संयम से नहीं किया, तथापि जिसके लिए सर्वं प्रभाति, वह प्रातिभ। सर्वं योगी प्रजानाति इसलिए योगी सर्वं जानता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — प्रातिभ ( Intutional insight ) वह प्रकाश अथवा ज्ञान है जो बिना किसी बाहरके निमित्तके स्वयं अंदरसे प्राप्त हो । प्रातिभ ही तारक - ज्ञान ( ३-५४ ) का नाम है , यह विवेकज्ञानका प्रथम रूप है । जिस प्रकार सूर्यके उदय होनेका प्रथम ज्ञापक चिन्ह प्रभा है , इसी प्रकार प्रसंख्यानके उदय होनेका प्रथम लिङ्ग प्रातिभज्ञान है । जैसे सूर्यकी प्रभाके उत्पन्न होनेपर सब कुछ जाना जा सकता है इसी प्रकार प्रातिभ - ज्ञानकी उत्पत्ति होनेपर योगी बिना संयमके ही सब कुछ जान लेते हैं । वा ( अथवा ) शब्द इस अभिप्रायसे लगाया गया है कि इससे पूर्व जो - जो संयम कहा गया है उससे जिन - जिन विषयोंका ज्ञान होता है यह सब प्रातिभ - ज्ञानसे हो जाता है । हृदये चित्तसंवित् ॥ ३४ ॥

3.34 · विभूतिपाद सूत्र ३४

सूत्र ३.३४

हृदये चित्तसंवित् ॥ ३.३४ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 567

शब्दार्थ — हृदये · चित्त · संवित्

अर्थ — हृदयमें संयम करनेसे चित्तका ज्ञान होता है ।

व्यासभाष्य

यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म, तत्र विज्ञानम् । तस्मिन्संयमाच्चित्तसंवित ॥३४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — लभते हृदय में संयम करके चित्त का संवेदन प्राप्त करता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — हृदयकमल चित्तका निवासस्थान है , उसमें संयम करनेसे वृत्तिसहित चित्तका साक्षात्कार होता है । विशेष व्याख्या १ । ३४ के वि ० व ॰ में अनाहतचक्र देखें । टिप्पणी — हृदय शरीरमें विशेष स्थान है ; उसमें सूक्ष्म कमलाकार जिसका मुख नीचेको है उसके अंदर अन्तःकरण चित्तका स्थान है । उसमें जिस योगीने संयम किया है , उसको अपने और दूसरेके चित्तका ज्ञान उत्पन्न होता है । अपने चित्तमें प्रविष्ट सब वासनाओं और दूसरेके चित्तमें प्रविष्ट रागादिको जान लेता है । यह अर्थ है भोजवृत्ति । सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थान्य- (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)

3.35 · विभूतिपाद सूत्र ३५

सूत्र ३.३५

सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थत्वात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् ॥ ३.३५ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 568

शब्दार्थ — सत्त्व · पुरुषयोः · अत्यन्त · असंकीर्णयोः · प्रत्यय · अविशेषः · भोगः · पर · अर्थत्वात् · स्व · अर्थ · संयमात् · पुरुष · ज्ञानम्

अर्थ — चित्त और पुरुष जो परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं , इन दोनोंकी प्रतीतियोंका अभेद भोग है । उनमेंसे परार्थ - प्रतीतिसे भिन्न जो स्वार्थ - प्रतीति है उसमें संयम करनेसे पुरुषका ज्ञान होता है अर्थात् पुरुष - विषयक प्रज्ञा उत्पन्न होती है ।

व्यासभाष्य

बुद्धिसत्त्वं प्रख्याशीलं समानसत्त्वोपनिबन्धने रजस्तमसौ वशीकृत्य सत्त्वापुरुषयान्यताप्रत्ययेन परिणतम् । तस्माच्च सत्त्वात्परिणामिनोऽत्यन्तविधर्मा विशुद्धोऽन्यश्चितिमात्ररूपः पुरुषः । तयोरत्यन्तासङ्कीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः पुरुषस्य, दर्शितविषयत्वात। स भोगप्रत्ययः सत्त्वस्य परार्थत्वाद्दृश्यः । यस्तु तस्माद्विशिष्टश्चितिमात्ररूपोऽन्यः पौरुषेयः प्रत्ययस्तत्र संयमात्पुरुषविषया प्रज्ञा जायते । न च पुरुषप्रत्ययेन बुद्धिसत्त्वात्मना पुरुषो दृश्यते । पुरुष एव तं प्रत्ययं स्वात्मावलम्बं पश्यति । तथा ह्युक्तम्—विज्ञातारमरे केन विजानीयात्[बृ.आ.उ. २.४.१४] इति ॥३५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — सत्त्वं चित्तं पुरुषः च इति उभौ संनादति संकीर्णौ सत्त्व चित्त है और पुरुष, दोनों संनादति संकीर्ण हैं। तयोः प्रत्यय अविशेषः सत्त्वस्य भोगः उनके प्रत्यय का अविशेष सत्त्व का भोग है। सत्त्वं हि पर अर्थं पुरुषस्य प्रकाशनाय सत्त्व परार्थ है, पुरुष के प्रकाशन के लिए। तस्मात् स्व अर्थे संयमात् पुरुषस्य ज्ञानं लभते इसलिए स्वार्थ में संयम से पुरुष का ज्ञान प्राप्त करता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सत्त्व अर्थात् चित्त प्रकाश और सुखरूप होने से तथा पुरुष ज्ञानस्वरूप होने से तुल्य प्रतीत होते हैं, किंतु वास्तव में ये दोनों भिन्न हैं क्योंकि चित्त परिणामी, जड़ और भोग्यरूप है और पुरुष निर्विकार, चैतन्य और भोक्ता-स्वरूप है।

इस जड़ चित्त में चैतन्य पुरुष से प्रतिबिम्बित होकर जो सुख, दुःख और मोहरूपी वृत्तियों का उदय होता है, वह प्रत्ययाविशेष है क्योंकि इससे चित्त के धर्म सुख, दुःख और मोह आदि का चित्त में प्रतिबिम्बित चैतन्य पुरुष में अध्यारोप होता है। यह भोगरूप प्रत्यय यद्यपि चित्त का धर्म है तथापि चित्त को परार्थत्वात् पुरुष के अर्थवाला होने से और पुरुष का चित्त का भोक्ता होने से यह भोगरूप प्रत्यय भी परार्थ अर्थात् पुरुष के अर्थ है।

इस परार्थ जड़-भोग से भिन्न जो पुरुष का प्रतिबिम्बित रूप प्रत्यय है वह स्वार्थ कहलाता है, जिसे पौरुषेय-बोध भी कहते हैं। इस स्वार्थ-प्रत्यय में संयम करने से पुरुष (विषयक) पौरुषेय-ज्ञान-प्रत्यय और अर्थात् पुरुष को विषय करने वाली प्रज्ञा उत्पन्न होती है। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि पुरुष ज्ञान से जाना जाता है, क्योंकि ज्ञाता पुरुष ज्ञेय मानना पड़ेगा और ज्ञाता और ज्ञेय में अत्यन्त भेद है। बृहदारण्यकोपनिषद् के अनुसार पुरुष का वास्तविक स्वरूप किसी से नहीं जाना जा सकता।

वाचस्पति आदि ने सूत्र ३५ में "परार्थस्वार्थसंयमात्" पाठ पढ़कर शब्द का अध्याहार किया है, जबकि भोजवृत्ति का पाठ “परार्थान्यस्वार्थसंयमात्” अन्य अध्याहार की अपेक्षा नहीं रखता।

3.36 · विभूतिपाद सूत्र ३६

सूत्र ३.३६

ततः प्रातिभश्रावणवेदनाऽऽदर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥ ३.३६ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 569

शब्दार्थ — ततः · प्रातिभ · श्रावण · वेदना · दर्श · आस्वाद · वार्ता · जायन्ते

अर्थ — उस स्वार्थ - संयमके अभ्याससे प्रातिभ , श्रावण , वेदना , आदर्श , आस्वाद और वार्ता - ज्ञान उत्पन्न होता है ।

व्यासभाष्य

प्रातिभात्सूक्ष्मव्यहितविप्रकृष्टातीतानागतज्ञानम् । श्रावणाद्दिव्यशब्दश्रवणम् । वेदनाद्दिव्यस्पर्शाधिगमः । आदर्शाद्दिव्यरूपसंवित। आस्वादाद्दिव्यरससंवित। वार्तातो दिव्यगन्धविज्ञानमित्येतानि नित्यं जायन्ते ॥३६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — पुरुष ज्ञानात् प्रातिभं तेजः श्रावणं श्रोत्रस्य वेदना स्पर्शस्य दर्शनं चक्षुषः आस्वादः जिह्वायाः वार्ता घ्राणस्य इति योगिनः जायन्ते इसलिए पुरुष के ज्ञान से प्रातिभ तेज, श्रावण श्रोत्र का, वेदना स्पर्श का, दर्शन चक्षु का, आस्वाद जिह्वा का, और वार्ता घ्राण का—ये योगी में उत्पन्न होते हैं।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पुरुष जब संयम के अभ्यास से ज्ञान उत्पन्न करता है, तब निम्न प्रकार की छः सिद्धियाँ प्रकट होती हैं। पहली सिद्धि 'प्रातिभ' है, जो मन में सूक्ष्म, अव्यहत, विप्रकृष्ट, अतीत और अनागत वस्तुओं को जानने की अतीन्द्रिय योग्यता है। दूसरी सिद्धि 'श्रावण' है, जो श्रोत्रेन्द्रिय की दिव्य और दूर के शब्द सुनने की योग्यता है। तीसरी सिद्धि 'वेदना' है, जिसे भोजवृत्ति के अनुसार स्पर्शेन्द्रिय में उत्पन्न ज्ञान की संज्ञा दी गई है। चौथी सिद्धि 'आदर्श' है, जिसे भोजवृत्ति के अनुसार नेत्रेन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान का नाम दिया गया है। पाँचवीं सिद्धि 'आस्वाद' है, जो रसनेन्द्रिय की दिव्य रस जानने की योग्यता है। छठी सिद्धि 'वार्ता' है, जिसे भोजवृत्ति के अनुसार घ्राणेन्द्रिय से उत्पन्न हुआ ज्ञान कहा जाता है। शास्त्रीय परिभाषामें वृत्ति शब्द घ्राणेन्द्रिय का वाची है और नासिकाग्रवर्ती घ्राणेन्द्रिय कहलाती है।

3.37 · विभूतिपाद सूत्र ३७

सूत्र ३.३७

ते समाधावुपसर्गाः, व्युत्थाने सिद्धयः ॥ ३.३७ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 570

शब्दार्थ — ते · समाधौ · उपसर्गाः · व्युत्थाने · सिद्धयः

अर्थ — वे उपर्युक्त छः सिद्धियाँ समाधि ( पुरुष - दर्शन ) में विघ्न हैं , व्युत्थानमें सिद्धियाँ हैं ।

व्यासभाष्य

ते प्रतिभादयः समाहितचित्तस्योत्पद्यमाना उपसर्गाः, तद्दर्शनप्रत्यनीकत्वात। व्युत्थितचित्तस्योत्पद्यमानाः सिद्धयः ॥३७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विघ्न कर्तारः उपसर्गाः प्रातिभ आदि समाधि में विघ्न करने वाले उपसर्ग हैं। भवन्ति किंतु व्युत्थान में चित्त की सिद्धियाँ होती हैं।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — -पिछले सूत्रमें बतलायी हुई छः सिद्धियाँ एकाग्र चित्तवालोंको समाधि- प्राप्ति ( पुरुषदर्शन ) में विघ्नकारक हैं ; क्योंकि उनमें हर्ष , गौरव , आश्चर्यादि करनेसे समाधि शिथिल होती है , पर व्युत्थान - दशामें विशेष फलदायक होनेसे सिद्धिरूप होती हैं अर्थात् जैसे जन्मका कँगला अत्यल्प द्रव्यको पाकर ही अपने - आपको कृतार्थ समझने लगता है वैसे ही विक्षिप्त चित्तवालोंको ही पुरुष - ज्ञानसे पूर्व होनेवाले उपर्युक्त प्रातिभादि छः ऐश्वर्य सिद्धिरूप दीखते हैं । समाहित चित्तवाला योगी इन प्राप्त ऐश्वर्योंसे दोष- दृष्टिद्वारा उपराम होकर इनको समाधिमें रुकावट जानकर अपने अन्तिम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कारके लिये स्वार्थ - संयमका निरन्तर प्रमाद - रहित होकर अभ्यास करता रहे ।

3.38 · विभूतिपाद सूत्र ३८

सूत्र ३.३८

बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥ ३.३८ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 570

शब्दार्थ — बन्ध · कारण · शैथिल्यात् · प्रचार · संवेदनात् · च · चित्तस्य · पर · शरीर · आवेशः

अर्थ — बंध के कारण के शिथिल होने से और प्रचार के संवेदन से चित्त का पर शरीर में आवेश।

व्यासभाष्य

लोकीभूतस्य मनसोऽप्रतिष्ठस्य शरीरे कर्माशयवशात्बन्धः प्रतिष्ठेत्यर्थः । तस्य कर्मणो बन्धकारणस्य शैथिल्यं समाधिबलाद्भवति । प्रचारसंवेदनं च चित्तस्य समाधिजमेव । कर्मबन्धक्षयात्स्वचित्तस्य प्रचारसंवेदनाच्च योगी चित्तं स्वशरीरान्निष्कृष्य शरीरान्तरेषु निक्षिपति । निक्षिप्तं चित्तं चेन्द्रियाण्यनुपतन्ति । यथा मधुकरराजानं मक्षिका उत्पतन्तमनूत्पतन्ति निविशमानमनुनिविशन्ते तथेन्द्रियाणि परशरीरावेशे चित्तमनुविधीयन्त इति ॥३८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — बन्धस्य कारणं चित्तस्य स्वरूप प्रतिष्ठायां शैथिल्यं यदा भवति तदा प्रचारः संवेदति बंध का कारण चित्त की स्वरूप प्रतिष्ठा में शिथिल होने पर तब प्रचार संवेदन करता है। ततः च पर शरीरे चित्तस्य आवेशः स्यात् और ततः पर शरीर में चित्त का आवेश होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चित्त का शरीर में बँधने का कारण सकाम कर्म और उनकी वासनाएँ हैं। योगी जब धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास से इन सकाम कर्मों को छोड़कर नाड़ियों में संयम करता है, तब वह बन्धों के कारणों को शिथिल कर देता है। भोजवृत्तिका भाषार्थ (सूत्र ३८) के अनुसार आत्मा और चित्त व्यापक हैं, परंतु नियत कर्मों के वश से ही शरीर के भीतर बँध जाते हैं। जब समाधि से ये कर्म शिथिल हो जाते हैं, तब योगी को हृदय से लेकर इन्द्रियों तक के मार्ग का ज्ञान होता है कि यह वह नाड़ी है जिससे चित्त बहता है। यह नाड़ी रस और प्राणादिको बहाने वाली नाड़ियों से भिन्न होती है। जब अपने और दूसरों के शरीर में चित्त के संचार का ज्ञान हो जाता है, तब योगी दूसरे के मृतक शरीर में प्रवेश कर जाता है। चित्त के पीछे अन्य सब इन्द्रियाँ भी साथ चली जाती हैं, जैसे रानी मक्खी के पीछे अन्य मक्खियाँ। क्योंकि चित्त और पुरुष दोनों व्यापक हैं, इसलिए यदि समाधि से कर्म हट जाए तो स्वतन्त्रता के कारण सर्वत्र भोग-सम्पादन हो सकता है।

3.39 · विभूतिपाद सूत्र ३९

सूत्र ३.३९

उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥ ३.३९ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.३९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 571

शब्दार्थ — उदान · जयात् · जल · पङ्क · कण्टक · आदिषु · असङ्गः · उत्क्रान्तिः · च

अर्थ — ( संयमद्वारा ) उदानके जीतनेसे जल , कीचड़ , काँटों आदिमें असङ्ग रहना और ऊर्ध्व गति होती है ।

व्यासभाष्य

समस्तेन्द्रियवृत्तिः प्राणादिलक्षणः जीवनम् । तस्य क्रिया पञ्चतयी । प्राणो मुखनासिकागतिराहृदयवृत्तिः । समं नयनात्समानश्चानाभिवृत्तिः । अपनयनादपान आपादतलवृत्तिः । उन्नयनादुदान आशिरोवृत्तिः । व्यापी व्यान इति । तेषां प्रधानं प्राणः । उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्गः, उत्क्रान्तिश्च प्रयाणकाले भवति । तां वशित्वेन प्रतिपद्यते ॥३९॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — उदानं प्राण विशेषः उदान प्राण का विशेष है। तस्य जये जल पङ्क कण्टक आदिषु चित्तस्य असङ्गः उसके जय से जल, पंक, कांटक आदि में चित्त का असंग। यथा कमल पत्रं जलेन न संनादति तथैव चित्तं तद्वत् असङ्गं भवति जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं चिपकता, वैसे ही चित्त उसी प्रकार असंग होता है। उत्क्रान्तिः च भवति और उत्क्रांति भी होती है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — शरीर में समस्त इन्द्रियों में बर्तने वाले जीवन का आधार प्राणवायु है, जिसके क्रियाभेद से पाँच मुख्य नाम—प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—निर्धारित होते हैं। इनमें प्राण मुख और नासिका द्वारा गति करने वाला है, अपान नाभि से पादतल तक अवस्थित है, समान खान-पान के रस को शरीर में पहुँचाने वाला है, व्यान व्यापक रूप से गति करने वाला है और उदान ऊपर की गतिका हेतु कण्ठ से शिर तक बर्तने वाला है।

सांख्यकारिका (२.९) के अनुसार अन्तःकरण की दो प्रकार की वृत्तियाँ होती हैं—बुद्धि, चित्त, अहंकार और मन का अलग-अलग कार्य बाह्य वृत्ति है तथा इनका साझा काम आभ्यन्तर वृत्ति कहलाता है। यह जीवन रूप प्रयत्न ही शरीर में उपगृहीत वायु की क्रियाओं का कारण बनता है जिससे प्राण आदि पाँचों वायुओं की उत्पत्ति होती है।

मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर उदान द्वारा स्थूल शरीर से बाहर निकलता है और प्रश्नोपनिषद् (३-७) के अनुसार पुण्य से पुण्यलोक, पाप से पापलोक और मिश्रित कर्मों से मनुष्यलोक प्राप्त होता है। यजुर्वेद (१.९.४७) और ऋग्वेद (१०.८८.१५) के अनुसार संसारी पुण्यात्माओं के लिए दो मार्ग हैं—देवयान और पितृयाण। गीता (८.२३) और (८.२६) के अनुसार शुक्ल और कृष्ण यानी देवयान और पितृयाण मार्ग सनातन हैं, जिनमें से एक पीछे न आने वाली गति प्रदान करता है और दूसरे से जन्म-मृत्यु का चक्र चलता है।

सकाम कर्मयोगियों का सूक्ष्म शरीर चंद्रलोक जाकर वापस लौटता है जिसे गीता (८.२५) में धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन जैसे अन्धकार के समय और मार्गों से संबंधित बताया गया है।

3.40 · विभूतिपाद सूत्र ४०

सूत्र ३.४०

समानजयात्प्रज्वलनम् ॥ ३.४० ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 577

शब्दार्थ — समान · जयात् · प्रज्वलनम्

अर्थ — – ( संयमद्वारा ) समानके जीतनेसे योगीका दीप्तिमान् होना होता है ।

व्यासभाष्य

जितसमानस्तेजस उपध्मानं कृत्वा ज्वलति ॥४०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — समानं प्राण विशेषः समान प्राण का विशेष है। उसके जय से तेज का प्रज्वलन होता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जब संयमद्वारा योगी समानवायुको वशमें कर लेता है , तब समान प्राणके अधीन जो शारीरिक अग्नि है , उसके उत्तेजित होनेसे उसका शरीर अग्निके समान चमकता हुआ दिखायी देता है ।

3.41 · विभूतिपाद सूत्र ४१

सूत्र ३.४१

श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ॥ ३.४१ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 577

शब्दार्थ — श्रोत्र · आकाशयोः · सम्बन्ध · संयमात् · दिव्यं · श्रोत्रम्

अर्थ — श्रोत्र और आकाशके सम्बन्धमें संयम करनेसे दिव्य श्रोत्र होता है ।

व्यासभाष्य

सर्व्श्रोत्राणामाकाशं प्रतिष्ठा सर्वशब्दानां च । यथोक्तम्—तुल्यदेशश्रवणानामेकदेशश्रुतित्वं सर्वेषां भवतीति । तच्चैतदाकाशस्य लिङ्गमनावरणं चोक्तम् । तथामूर्तस्यानावरणदर्शनाद्विभुत्वमपि प्रख्यातमाकाशस्य । शब्दग्रहणानुमितं श्रोत्रम् । बधिराबधिरयोरेकः शब्दं गृह्णात्यपरो न गृह्णातीति, तस्माच्छोर्त्रमेव शब्दविषयम् । श्रोत्राकाशयोः संबन्धे कृतसंयमस्य योगिनो दिव्यं श्रोत्रं प्रवर्तते ॥४१॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — श्रोत्रस्य आकाशेन संनादति सम्बन्धः श्रोत्र का आकाश से संनादति संबंध है। तस्मिन् संयमं कृत्वा दिव्यं श्रोत्रं लभते उसमें संयम करके दिव्य श्रोत्र प्राप्त करता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — शब्दकी ग्राहक श्रोत्रेन्द्रिय अहंकारसे उत्पन्न हुई है और अहंकारसे उत्पन्न हुए शब्दतन्मात्राका कार्य आकाश है । इन दोनोंका सम्बन्ध देश - देशी आश्रयाश्रयिभावसे है । इस सम्बन्धमें संयम करनेसे योगीको दिव्य श्रोत्र प्राप्त होता है , जिससे वह दिव्य , सूक्ष्म , व्यवहित ( आवृत्त ) और विप्रकृष्ट अर्थात् दूरस्थ शब्दोंको सुन सकता है । इसी प्रकार ( त्वचा - वायु , चक्षु - तेज , रसना -जल , घ्राण - पृथ्वी ) के सम्बन्धमें संयम करनेसे दिव्य त्वचा , दिव्य नेत्र , दिव्य रसना और दिव्य घ्राण प्राप्त होता है । ये सब सिद्धियाँ सूत्र छत्तीसमें पुरुष - ज्ञानसे पूर्व भी बतलायी गयी हैं । कायाकाशयोःसम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ॥ ४२ ॥

3.42 · विभूतिपाद सूत्र ४२

सूत्र ३.४२

कायाकाशयोः संबन्धसंयमाल् लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ॥ ३.४२ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 577

शब्दार्थ — काय · आकाशयोः · सम्बन्ध · संयमात् · लघु · तूल · समापत्तेः · च · आकाश · गमनम्

अर्थ — काय और आकाश के संबंध में संयम से और लघु तूल की समापत्ति से आकाश गमन।

व्यासभाष्य

यत्र कायस्तत्राकाशं तस्यावकाशदानात्कायस्य, तेन सम्बन्धः प्राप्तिः । तत्र कृतसंयमो जित्वा तत्सम्बन्धं लघुषु तूलादिष्वापरमाणुभ्यः समापत्तिं लब्ध्वा जितसम्बन्धो लघुः । लघुत्वाच्च जले पादाभ्यां विहरति, ततस्तूर्णनाभितन्तुमात्रे विहृत्य रश्मिषु विहरति, ततो यथेष्टमाकाशगतिरस्य भवतीति ॥४२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — कायस्य आकाशेन संनादति सम्बन्धः काय का आकाश से संनादति संबंध है। तस्मिन् संयमं कृत्वा लघु तूलवत् भावति उसमें संयम करके लघु तूल की तरह होता है। ततः च आकाशे गमनं लभते और ततः आकाश में गमन प्राप्त करता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जहाँ शरीर है वहीं उसको अवकाश देनेवाला आकाश है , इस प्रकार इन दोनोंमें . आधेय - आधार व्याप्य - व्यापक भावका सम्बन्ध है । इस सम्बन्धमें संयम करनेसे अथवा रूई -सदृश हलकी वस्तुओंमें समापत्ति ( १-४१ ) करनेसे ( तदाकार होनेसे ) योगीका शरीर लघुताको प्राप्त करता है । इसलिये जलपर पाँव रखता हुआ चल सकता है । इसके पश्चात् मकड़ीके जाले - सदृश सूक्ष्म तारोंपर चलनेकी सामर्थ्य आ जाती है । अन्तमें शरीरके अति सूक्ष्म हो जानेसे आकाशगमनकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)

3.43 · विभूतिपाद सूत्र ४३

सूत्र ३.४३

बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥ ३.४३ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 578

शब्दार्थ — बहिः · अकल्पिता · वृत्तिः · महा · विदेहा · ततः · प्रकाश · आवरण · क्षयः

अर्थ — शरीरसे बाहर कल्पना न की हुई वृत्ति महाविदेहा है , उससे प्रकाशके आवरणका नाश होता है ।

व्यासभाष्य

शरीराद्बहिर्मनसो वृत्तिलाभो विदेहा नाम धारणा । सा यदि शरीरप्रतिष्ठस्य मनसो बहिर्वृत्तिमात्रेण भवति, सा कल्पितेत्युच्यते । या तु शरीरनिरपेक्षा बहिर्भूतस्यैव मनसो बहिर्वृत्तिः, सा खल्वकल्पिता । तत्र कल्पितया साधयत्यकल्पितां महाविदेहामिति, यया परशरीराण्याविशन्ति योगिनः । ततश्च धारणातः प्रकाशात्मनो बुद्धिसत्त्वस्य यदावरणं क्लेशकर्मविपाकत्रयं रजस्तमोमूलं तस्य च क्षयो भवति ॥४३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — बहिः अकल्पिता या वृत्तिः सा महा विदेहा नाम बाहर की अकल्पिता जो वृत्ति है, वह महाविदेहा नाम है। तस्यां संयमं कृत्वा प्रकाशस्य आवरणं चित्तस्य क्षीयते उसमें संयम करके चित्त के प्रकाश का आवरण क्षीण होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — मन को शरीर से बाहर धारण करने को "विदेहा-वृत्ति" या मन की "विदेहा धारणा" कहा जाता है। जब तक मन शरीर के अंदर स्थित रहकर केवल वृत्ति मात्र से बाहर किया जाता है, तब तक वह "कल्पित" कहलाता है। अभ्यास के परिपक्व होने पर बिना कल्पना के मन यथार्थ रूप से शरीर से बाहर स्थित हो जाता है, जिसे "अकल्पित" या "महाविदेहा" कहते हैं। यह योगियों को पर-शरीर-आवेश तथा लोक-लोकान्तरों में सूक्ष्म-शरीर से भ्रमण करने में सहायक होता है। इन दोनों में कल्पित-विदेहा-धारणा साधन है और अकल्पित-विदेहा-धारणा साध्य है, क्योंकि पहले कल्पित का अभ्यास किया जाता है और उसके पश्चात अकल्पित को साधा जाता है। इस अभ्यास से चित्त के प्रकाश को रोकने वाले अविद्या आदि क्लेश और कर्मविपाक आदि रजस् के मूलक मल नष्ट हो जाते हैं। अंततः चित्त में निरावरण होने के कारण यथेच्छ विचरने की सामर्थ्य हो जाती है।

3.44 · विभूतिपाद सूत्र ४४

सूत्र ३.४४

स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः ॥ ३.४४ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 578

शब्दार्थ — स्थूल · स्वरूप · सूक्ष्म · अन्वय · अर्थवत्त्व · संयमात् · भूत · जयः

अर्थ — पाँचों भूतोंके स्थूल , स्वरूप , सूक्ष्म , अन्वय और अर्थवत्त्वमें संयम करनेसे भूतोंका जय होता है । या - पृथ्वी आदि पाँच भूतोंके पाँच - पाँच रूप हैं- …

व्यासभाष्य

तत्र पार्थिवाद्याः शब्दादयो विशेषाः सहाकारादिभिर्धर्मैः स्थूलशब्देन परिभाषिताः । एतद्भूतानां प्रथमं रूपम् । द्वितीयं रूपं स्वसामान्यम् । मूर्तिर्भूमिः, स्नेहो जलम्, वह्निरुष्णता, वायुः प्रणामी, सर्वतोगतिराकाश इत्येतत्स्वरूपशब्देनोच्यते । अस्य सामान्यस्य शब्दादयो विशेषाः । तथा चोक्तम्—एकजातिसमन्वितानामेषां धर्ममात्रव्यावृत्तिः इति सामान्यविशेषसमुदायोऽत्र द्रव्यम् । द्विष्ठो हि समूहः । प्रत्यस्तमितभेदावयवानुगतः । शरीरं वृक्षो यूथं वनमिति । शब्देनोपात्तभेदावयवानुगतः समूहः ।

उभये देवमनुष्याः । समूहस्य देवा एको भागो मनुष्या द्वितीयो भागस्ताभ्यामेवाभिधीयते समूहः । स च भेदाभेदविवक्षितः । आम्राणां वनं ब्राह्मणानां सङ्घः, आम्रवनं ब्राह्मणसङ्घः इति । स पुनर्द्विविधो युतसिद्धावयवः सङ्घातः शरीरं वृक्षः परमाणुरिति । अयुतसिद्धावयवभेदानुगतः समूहो द्रव्यमिति पतञ्जलिः । एतत्स्वरूपमित्युक्तम् । अथ किमेषां सूक्ष्मरूपं ? तन्मात्रं भूतकारणं, तस्यैकोऽवयवः परमाणुः सामान्यविशेषात्मायुतसिद्धाव्यवभेदानुगतः समुदाय इति । एवं सर्वतन्मात्राणि एतत्द्वितीयम् ।

अथ भूतानां चतुर्थं रूपं ख्यातिक्रियास्थितिशीला गुणाः कार्यस्वभावानुपातिनोऽन्व्यशब्देनोक्ताः । अथैषां पञ्चमं रूपमर्थवत्त्वं भोगापवर्गार्थ्ता गुणेष्वेवान्वयिनी गुणास्तन्मात्रभूतभौतिकेष्विति सर्वमर्थवत। तेष्विदानीम्भूतेषु पञ्चसु पञ्चरूपेषु संयमात्तस्य तस्य रूपस्य स्वरूपदर्शनं जयश्च प्रादुर्भवति । तत्र पञ्चभूतस्वरूपाणि जित्वा भूतजयो भवति, तज्जयाद्वत्सानुसारिण्य इव गावोऽस्य सङ्कल्पानुविधायिन्यो भूतप्रकृतयो भवन्ति ॥४४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — च अर्थवं च भूतानां स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय, और अर्थवं भूतों के हैं। पं चमं तनमात्रं तस्मिन् संयमं कृत्वा भूत जयं लभते पंचम तन्ममात्र में संयम करके भूत जय प्राप्त करता है। (इस संस्करणमें भाष्यके केवल एक अंशका हिन्दी अनुवाद है — मूल भाष्य १३५९ अक्षरका है।)

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पाँचों भूतों के पाँच रूप हैं जिनमें स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व शामिल हैं। स्थूल रूप में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के विशिष्ट आकार और उनके शब्द जैसे मूर्ति, स्नेह, उष्णता, गति और अवकाश आते हैं। स्वरूप रूप में इन भूतों के सामान्य धर्म जैसे कठिनता, चिकनापन, पवित्रता आदि का 'अयुतसिद्धावयव समुदाय' आता है जिसे पतञ्जलि मुनिके मतमें द्रव्य कहा गया है। सूक्ष्म रूप में पाँचों भूतों के कारण उत्पन्न होने वाली पञ्चतन्मात्राएँ और परमाणुओं का समुदाय आता है। अन्वय रूप में प्रकाश, क्रिया और स्थिति के तीन गुण होते हैं जो पाँचों भूतों में अन्वयीभाव से मिले रहते हैं। अर्थवत्त्व रूप वह प्रयोजन है जिसके लिए ये भूत कार्यों में लगे हुए हैं जैसे पुरुष का भोग और अपवर्ग। इन पाँचों रूपों के क्रम से साक्षात्पर्यन्त संयम करने से योगी को पाँचों भूतों का सम्यक्ज्ञान और उन पर पूरा वशीकार प्राप्त होता है। इस प्रकार भूतजयी योगी की प्रकृतियाँ उसके संकल्पानुसार हो जाती हैं जैसा कि पूज्यपाद परमहंस श्रीविशुद्धानन्दजी महाराज के जीवन में देखा गया।

3.45 · विभूतिपाद सूत्र ४५

सूत्र ३.४५

ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ॥ ३.४५ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 581

शब्दार्थ — ततः · अणिमा · आदि · प्रादुर्भावः · काय · संपत् · धर्म · अनभिघातः · च

अर्थ — उस भूतजयसे अणिमा आदि आठ सिद्धियोंका प्रादुर्भाव और कायसम्पत् होती है और उन पाँचों भूतोंके धर्मोंसे रुकावट नहीं होती ।

व्यासभाष्य

तत्राणिमा भवत्यणु । लघिमा लघुर्भवति । महिमा महान्भवति । प्राप्तिरङ्गुल्यग्रेणापि स्पृशति चन्द्रमसम् । प्राकाम्यमिच्छानभिघातः । भूमावुन्मज्जति निमज्जति यथोदके । वशित्वं भूतभौतिकेषु वशी भवत्यवश्यश्चान्येषाम् । ईशितृत्वं तेषां प्रभवाप्ययव्यूहानामीष्टे । यत्र कामावसायित्वं सत्यसङ्कल्पता यथा सङ्कल्पस्तथा भूतप्रकृतीनामवस्थानम् । न च शक्तोऽपि पदार्थविपर्यासं करोति । कस्मात्? अन्यस्य यत्र कामावसायिनः पूर्वसिद्धस्य तथाभूतेषु सङ्कल्पादिति । एतान्यष्टावैश्वर्याणि । कायसम्पद वक्ष्यमाणा । तद्धर्मानभिघातश्च पृथ्वी मूर्त्या न निरुणद्धि योगिनः शृङ्गारादिक्रियां, शिलामप्यनुप्रविशतीति । नापः स्निग्धाः क्लेदयन्ति । नाग्निरुष्णो दहति । न वायुः प्रणामी वहति । अनावरणात्मकेऽप्याकारो भवत्यावृतकायः सिद्धानामप्यदृश्यो भवति ॥४५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तस्मात् भूत जयात् अणिमा लघिमा महिमा च कायस्य संपत्तिः च धर्मणां च अनभिघातः च भवति इसलिए भूत जय से अणिमा, लघिमा, महिमा, काय की संपत्ति, और धर्मों का अनभिघात होता है। (इस संस्करणमें भाष्यके केवल एक अंशका हिन्दी अनुवाद है — मूल भाष्य ७११ अक्षरका है।)

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चौवालीसवें सूत्र में बताए गए भूतों के माध्यम से आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं जिनमें अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, यत्रकामावसायित्व और कायसम्पत् शामिल हैं। ये सिद्धियाँ भूतों में संयम करने से प्राप्त होती हैं जैसे अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति और प्राकाम्य पाँचों भूतों के स्वरूप में संयम से सिद्ध होते हैं।

ईशित्व सिद्धि अन्वय में संयम से प्राप्त होती है जिसमें भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति और विनाश का सामर्थ्य होता है। यत्रकामावसायित्व सिद्धि अर्थवत्त्व में संयम से प्राप्त होती है जिससे योगी जैसा संकल्प करे उसके अनुसार भूतों के स्वभाव की अवस्था बदल जाती है।

भगवत्-भाष्यकार कामावसायी योगी के संबंध में लिखते हैं कि यह योगी सर्वसामर्थ्यवाला होते हुए भी पदार्थों की शक्तियों को विपरीत करता है न कि स्वयं पदार्थों को क्योंकि पदार्थों का विपरीत होना नित्यसिद्ध ईश्वर के संकल्प के विरुद्ध होता है। कामावसायी योगी शुद्धचित्त और न्यायकारी होते हैं जिनका संकल्प ईश्वर-संकल्प और उसकी आज्ञा के विपरीत नहीं होता है।

तद्धर्मानभिघातः के अंतर्गत ये पाँचों भूत योगी की क्रिया में रुकावट नहीं डालते जिससे वह शिला में प्रवेश कर जाता है, जल से गीला नहीं होता, अग्नि से जलता नहीं, वायु से उड़ता नहीं और आकाश में अदृश्य हो जाता है।

3.46 · विभूतिपाद सूत्र ४६

सूत्र ३.४६

रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत ॥ ३.४६ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 582

शब्दार्थ — रूप · लावण्य · बल · वज्र · संहननत्वं · काय · संपत्

अर्थ — रूप , लावण्य , बल , वज्रकी - सी बनावट । कायसम्पत् ( शरीरकी सम्पदा ) कहलाती है ।

व्यासभाष्य

दर्शनीयः, कान्तिमान्, अतिशयबलो वज्रसंहननश्चेति ॥४६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — च कायस्य संपत्तिः भवति रूप, लावण्य, बल, और वज्र संहननत्व काय की संपत्ति होती है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — १ रूप- -मुखकी आकृतिका अच्छा और दर्शनीय हो जाना । २ लावण्य- - सारे अङ्गोंमें कान्तिका हो जाना । ३ बल - बलका अधिक हो जाना । ४ वज्रसंहननत्वानि — शरीरके प्रत्येक अङ्गका वज्रके सदृश दृढ़ और पुष्ट हो जाना । यह कायसम्पत् कहलाती है ।

3.47 · विभूतिपाद सूत्र ४७

सूत्र ३.४७

ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ॥ ३.४७ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 583

शब्दार्थ — ग्रहण · स्वरूप · अस्मिता · अन्वय · अर्थवत्त्व · संयमात् · इन्द्रिय · जयः

अर्थ — ग्रहण , स्वरूप , अस्मिता , अन्वय और अर्थवत्त्वमें संयम करनेसे इन्द्रियजय होता है ।

व्यासभाष्य

सामान्यविशेषात्मा शब्दादिर्ग्राह्यः । तेष्विन्द्रियाणां वृत्तिर्ग्रहणम् । न च तत्सामान्यमात्रग्रहणाकारम् । कथमनालोचितः स विषयविशेष इन्द्रियेण मनसानुव्यवसीयेतेति ? स्वरूपं पुनः प्रकाशात्मनो बुद्धिसत्त्वस्य सामान्यविशेषयोरयुतसिद्धावयवभेदानुगतः समूहो द्रव्यमिन्द्रियम् । तेषां तृतीयं रूपमस्मितालक्षणोऽहङ्कारः । तस्य सामान्यस्येन्द्रियाणि विशेषाः । चतुर्थं रूपं व्यवसायात्मकाः प्रकाशक्रियास्थितिशीला गुणाः । येषामिन्द्रियाणि साहङ्काराणि परिणामाः । पञ्चमं रूपं गुणेषु यदनुगतं पुरुषार्थवत्त्वमिति । पञ्चस्वेवेत्ष्विन्द्रियरूपेषु यथाक्रमं संयमस्तत्र तत्र जयं कृत्वा पञ्चरूपजयादिन्द्रियजयः प्रादुर्भवति योगिनः ॥४७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ग्रहणं स्वरूपं अस्मिता च अन्वयः च अर्थवं च इन्द्रियाणां ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय, और अर्थवं इन्द्रियों के हैं। पंचं तनमात्रं तस्मिन् संयमं कृत्वा इन्द्रिय जयं लभते पंचम तन्ममात्र में संयम करके इन्द्रिय जय प्राप्त करता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — इन्द्रियों के पाँच रूप होते हैं जिनमें क्रम से साक्षात्पर्यन्त संयम करने से इन्द्रिय-जय-सामार्थ्य प्राप्त होती है। प्रथम रूप ग्रहण है, जो इन्द्रियों की सामान्य और विशेष दोनों विषयों वाली वृत्ति है क्योंकि बाह्य इन्द्रियों के अधीन ही मन बाह्य विषयों में अनुव्यवसायवाला होता है। दूसरा रूप स्वरूप है, जो सात्त्विक अहंकार का कार्यरूप से अनुगत प्रकाशस्वरूप द्रव्य 'इन्द्रिय' है। तीसरा रूप अस्मिता है, जिसमें सामान्य रूप अहंकार के विशेष परिणाम स्वरूप इन्द्रियाँ हैं। चौथा रूप अन्वय है, जहाँ महत्तत्त्व के गुणों के परिणाम स्वरूप तीनों गुण इन्द्रियों में अनुगत हैं। पाँचवाँ रूप अर्थवत्त्व है, जो गुणों में अनुगत पुरुष के भोग-अपवर्ग-सम्पादन की सामर्थ्य है। व्यासभाष्य के स्पष्टीकरण के साथ सूत्र ४७ की व्याख्या करते हुए स्वामी ओमानन्द तीर्थ कहते हैं कि इन पाँचों रूपों में संयम करने से उस-उस रूप के जय द्वारा पाँचों रूपों का जय होने से योगी को इन्द्रियजय प्राप्त होती है।

3.48 · विभूतिपाद सूत्र ४८

सूत्र ३.४८

ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥ ३.४८ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 584

शब्दार्थ — ततः · मनः · जवित्वं · विकरण · भावः · प्रधान · जयः · च

अर्थ — इन्द्रियजयसे मनोजवित्व , विकरणभाव और प्रधानका जय होता है ।

व्यासभाष्य

कायस्यानुत्तमो गतिलाभो मनोजवित्वम् । विदेहानामिन्द्रियाणामभिप्रेतदेशकालविषयापेक्षो वृत्तिलाभो विकरणभावः । सर्वप्रकृत्क्विकारवशित्वं प्रधानजय इति । एतास्तिस्रः सिद्धयो मधुप्रतीका उच्यन्ते । एताश्च करणपञ्चकरूपजयादधिगम्यन्ते ॥४८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — जवित्वं चित्तस्य विकरण भावः च प्रधानस्य च जयः भवति इसलिए इन्द्रिय जय से चित्त की मनोजवित्व, विकरण भाव, और प्रधान का जय होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — इन्द्रियजय से तीन मुख्य फल प्राप्त होते हैं जिनमें मनोजवित्व, विकरणभाव और प्रधानजय शामिल हैं। मनोजवित्व का अर्थ है ग्रहण के संयम से मन के समान शरीर का वेगवाला होना। विकरणभाव का अर्थ है स्वरूप में संयम से बिना शरीर की परवाह के इन्द्रियों में काम करने की शक्ति आ जाना और दूर के व बाहर के अर्थों का जान लेना। इसके साथ ही अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व में संयम से प्रकृति के सब विकारों का वशीकार होता है। प्रधानजय जैसी सिद्धियाँ केवल जितेन्द्रिय पुरुष से ही प्राप्त की जा सकती हैं। योगशास्त्र में इन तीनों सिद्धियों को मधुप्रतीका कहा जाता है क्योंकि इन्हें प्राप्त होने पर योगी को प्रत्येक सिद्धि में मधु जैसा स्वाद प्रतीत होता है। योग से उत्पन्न ऋतम्भरा प्रज्ञा का नाम 'मधु' है और इस मधु का प्रतीक अर्थात् कारण जिससे प्रत्यक्ष किया जाए, वह मधुप्रतीक कहलाता है।

3.49 · विभूतिपाद सूत्र ४९

सूत्र ३.४९

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥ ३.४९ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.४९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 585

शब्दार्थ — सत्त्व · पुरुष · अन्यता · ख्याति · मात्रस्य · सर्व · भाव · अधिष्ठातृत्वं · सर्व · ज्ञातृत्वं · च

अर्थ — सत्त्व और पुरुष की अन्यता की ख्याति मात्र से सर्व भाव का अधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व।

व्यासभाष्य

निर्धूतरजस्तमोमलस्य बुद्धिसत्त्वस्य परे वैशारद्ये परस्यां वशीकारसंज्ञायां वर्तमानस्य सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्ररूपप्रतिष्ठस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वम् । सर्वात्मानो गुणा व्यवसायव्यवसेयात्मकाः स्वामिनं क्षेत्रज्ञं प्रत्यशेषदृश्यात्मत्वेनोपतिष्ठन्त इत्यर्थः । सर्वज्ञातृत्वं सर्वात्मनां गुणानां शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मत्वेन व्यवस्थितानामक्रमोपारूढं विवेकजं ज्ञानमित्यर्थः । इत्येषा विशोका नाम सिद्धिर्यां प्राप्य योगी सर्वज्ञः क्षीणक्लेशबन्धनो वशी विहरति ॥४९॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — सत्त्वं चित्तं पुरुषः च इति अन्यता यस्याः ख्यातिः तस्याः मात्रस्य सत्त्व चित्त है और पुरुष, उनकी अन्यता की ख्याति मात्र से। सर्वं भावति अधिष्ठाता सर्वं च जानाति सर्व भाव का अधिष्ठाता होता है और सर्व जानता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — गुणों का कर्तृत्व अभिमान शिथिल होने पर प्राप्त होता है और पुरुष को उनके प्रति स्वामी के समान व्यवहार करना चाहिए। वर्तमान, अतीत और भविष्य में गुणों के परिणामों का यथार्थ विवेकपूर्ण ज्ञान 'सर्वज्ञातृत्व' कहलाता है। सूत्र के अनुसार गुणों का बीजरूप अवस्थित रहना महत्तत्त्व अर्थात् समष्टि चित्त में होता है। पुरुष के व्यष्टि चित्त ग्रहीतृरूप हैं जिनके द्वारा गुणों के परिणामों का ज्ञान प्राप्त करके स्वरूप अवस्थित होते हैं। अविवेक के कारण आत्मा का चित्त पर अध्यारोप ही सभी क्लेशों की मूल अविद्या है। सात्त्विक चित्त के प्रकाश में संयम करने से विवेक-ख्याति उत्पन्न होती है जिससे पुरुष स्वयं को चित्त से पृथक् देखता हुआ गुणों का अधिष्ठाता बन जाता है। श्रुति 'आत्मनो वा अरे दर्शनेन' के माध्यम से पुष्टि करती है कि पुरुष-दर्शन होने पर ही सर्वज्ञातृत्व प्राप्त होता है। इस सिद्धि को 'विशोका' कहते हैं क्योंकि इससे क्लेशों के बंधन क्षीण होते हैं और आत्मा का यह साक्षात् ज्ञान होता है कि सारा व्यवहार त्रिगुणात्मक है जबकि आत्मा इनसे भिन्न, असङ्ग, निर्लेप, अजर, अमर, अप्रसवधर्मी, निष्क्रिय, ज्ञानस्वरूप कूटस्थ-नित्य है।

3.50 · विभूतिपाद सूत्र ५०

सूत्र ३.५०

तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥ ३.५० ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.५०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 586

शब्दार्थ — तत् · वैराग्यात् · अपि · दोष · बीज · क्षये · कैवल्यम्

अर्थ — विवेक - ख्यातिसे भी वैराग्य होनेपर दोषोंके बीज …

व्यासभाष्य

यदास्यैवं भवति क्लेशकर्मक्षये सत्त्वस्यायं विवेकप्रत्ययो धर्मः । सत्त्वं च हेयपक्षे न्यस्तं पुरुषश्चापरिणामी शुद्धोऽन्यः सत्त्वादिति । एवमस्य ततो विरज्यमानस्य यानि क्लेशबीजानि दग्धशालिबीजकल्पान्यप्रसवसमर्थानि तानि सह मनसा प्रत्यस्तं गच्छन्ति । तेषु प्रलीनेषु पुरुषः पुनरिदं तापत्रयं न भुङ्क्ते । तदेतेषां गुणानां मनसि कर्मक्लेशविपाक—स्वरूपेणाभिव्यक्तानां चरितार्थानां प्रतिप्रसवे पुरुषस्यात्यन्तिको गुणवियोगः कैवल्यम् । तदा स्वरूपप्रतिष्ठा चितिशक्तिरेव पुरुष इति ॥५०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तस्याः ख्यातेः वैराग्यात् दोषस्य बीजं क्षीयते उस ख्याति के वैराग्य से दोष का बीज क्षीण होता है। ततः कैवल्यं भवति ततः कैवल्य होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — विवेक-ख्याति वह ज्ञान है जिससे योगी सर्वभाव-अधिष्ठातृत्व का क्षय करके होने पर सर्वज्ञातृत्व यानी कैवल्य प्राप्त करता है। इस विवेक-ख्याति से शुद्ध, अपरिणामी और ज्ञान-स्वरूप को त्रिगुणात्मक प्राप्त होता और करके देखा जाता है, जो चित्त का एक धर्म और परिणाम है। चूंकि यह स्वरूप वास्तविक और जड़ चित्त से अलग नहीं है, इसलिए अपने वास्तविक शुद्ध स्वरूप में अवस्थित होने के लिए इस विवेक-ख्याति से भी विरक्त हो जाता है, जिसे परवैराग्य कहते हैं। जब परवैराग्य पूर्ण तथा परिपक्व होता है, तब चित्त को बनाने वाले गुण पुरुष को भोग-अपवर्ग दिलाने के कार्य को पूर्ण करके अपने कारण में लीन हो जाते हैं। उनके साथ ही अविद्या आदि क्लेशों के संस्कार भी विवेक-ख्याति द्वारा दग्धबीज के सदृश उत्पत्तिके अयोग्य होकर लीन हो जाते हैं, तब आत्मा के सामने कोई दृश्य नहीं रहता। यह पुरुष का गुणों से अत्यन्त पृथक् होकर अपने केवलीस्वरूप में अवस्थित होना ही कैवल्य है।

3.51 · विभूतिपाद सूत्र ५१

सूत्र ३.५१

स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनः अनिष्टप्रसङ्गात ॥ ३.५१ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.५१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 587

शब्दार्थ — स्थानि · उपनिमन्त्रणे · सङ्ग · स्मय · अकरणं · पुनः · अनिष्ट · प्रसङ्गात्

अर्थ — स्थानवालोंके आदर - भाव करनेपर लगाव एवं घमंड नहीं करना चाहिये ; क्योंकि ( इसमें ) फिर अनिष्टके प्रसङ्गका भय है ।

व्यासभाष्य

चत्वारः खल्वमी योगिनः । प्रथमकल्पिको मधुभूमिकः प्रजाज्योतिरतिक्रान्तभावनीयश्चेति । तत्राभ्यासी प्रवृत्तमात्रज्योतिः प्रथमः । ऋतम्भरप्रज्ञो द्वितीयः । भूतेन्द्रियजयी तृतीयः । सर्वेषु भावितेषु भावनीयेषु कृतरक्षाबन्धः कृतकर्तव्यसाधनादिमान। चतुर्थो यस्त्वतिक्रान्तभावनीयस्तस्य चित्तप्रतिसर्ग एकोऽर्थः । सप्तविधास्य प्रान्तभूमिप्रज्ञा । तत्र मधुमतीं भूमिं साक्षात्कुर्वओ ब्राह्मणस्य स्थानिनो देवाः सत्त्वशुद्धिमनुपश्यन्तः स्थानैरुपनिमन्त्रयन्ते—भोः !

इहास्यतामिह रम्यतां, कमनीयोऽयं भोगः । कमनीयेयं कन्या । रसायनमिदं जरामृत्यू बाधते । वैहायसमिदं यानममी कल्पद्रुमाः, पुण्या मन्दाकिनी, सिद्धा महर्षयः, उत्तमा अनुकूला अप्सरसो, दिव्ये ऋओत्रचक्षुषी, वज्रोपमः कायः । स्वगुणैः सर्वमिदमुपार्जितमायुष्मता । प्रतिपद्यतामिदमक्षयमजरस्थानं देवानां प्रियमिति । एवमभिधीयमानः सङ्गदोषान्भावयेत्घोरेषु । संसाराङ्गारेषु पच्यमानेन मया जननमरणान्धकारे विपरित्वर्तमानेन कथञ्चिदासादितः क्लेशतिमिरविनाशो योगप्रदीपः ।

तस्य चैते तृष्णायोनयो विषयवायवः प्रतिपक्षाः । स खल्वहं लब्धालोकः कथमनया विषयमृगतृष्णाया वञ्चितस्तस्यैव पुनः प्रदीप्तस्य संसाराग्नेरात्मानमिन्धनीकुर्यामिति । स्वस्ति वः स्वप्नोपमेभ्यः कृपणजनप्रार्थईयेभ्यो विषयेभ्य इत्येवं निश्चितमतिः समाधिं भावयेत। सङ्गमकृत्वा स्मयमपि न कुर्यादेवमहं देवानामपि प्रार्थईय इति । स्मयादयं सुस्थितंमन्यतया मृत्युना केशेषु गृहीतमिवात्मानं न भावयिष्यति । तथा चास्य च्छिद्रान्तरप्रेक्षी आनांइअं यत्नोपचर्यः प्रमादो लब्धविवरः क्लेशानुत्तम्भयिष्यति ।

ततः पुनरनिष्टप्रसङ्गः, एवमस्य सङ्गस्मयावकुर्वतो भाविनांतोऽर्थो दृढीभविष्यति । भावनीयश्चार्थोऽभिमुखीभविष्यतीति ॥५१॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — स्थानिनां देवनां उपनिमन्त्रणे सङ्गं स्मयं च न कुर्यात् स्थानियों देवों के उपनिमंत्रण में संग और स्मय नहीं करना चाहिए। पुनः अनिष्टं प्रसङ्गति यतः क्योंकि पुनः अनिष्ट का प्रसंग होता है। (इस संस्करणमें भाष्यके केवल एक अंशका हिन्दी अनुवाद है — मूल भाष्य १४७४ अक्षरका है।)

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — योगियों को उनकी साधना की स्थिति के अनुसार चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है, जो प्रथम काल्पिक (सवितर्क समाधिका अभ्यास), द्वितीय मधु-भूमिका (निर्वितर्क समाधि द्वारा भूत-इन्द्रियों की विजय), तृतीय प्रज्ञा-ज्योति (सविचार समाधि और स्वार्थ-संयम) तथा चतुर्थ अतिक्रान्तभावनीय (निर्विचार समाधि द्वारा विरक्ति) हैं।

ये श्रेणियाँ भाष्यों के आधार पर लिखी गई हैं, जिन्हें सुगमता के लिए वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत तथा विवेकख्यातिकी जैसी श्रेणियों में भी विभक्त किया जा सकता है। प्रज्ञावाले योगियों को सात प्रकार की प्रान्त-भूमि प्राप्त होती है जैसा कि उपनिषद् (२।२७) में वर्णित है। अपनी-अपनी भूमियों के स्थानपति देवता योगियों को नाना प्रकार के भोग, ऐश्वर्य और दिव्य विषयों के प्रलोभन देते हैं।

योगियों को इन प्रलोभनों से सदा सावधान रहना चाहिए क्योंकि इनमें फंसने पर सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा। इन प्रलोभनों को देखकर या उन्हें हटाने की सामर्थ्य समझकर अभिमान नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे उन्नति रुक जाती है और पतन होने लगता है। प्रथम भूमि वाले अभ्यासी के लिए ये प्रलोभन आने योग्य ही नहीं होते और तीसरे व चौथे भूमि वाले अभ्यासी इतने योग्य हो जाते हैं कि वे आसानी से इनके फंदे में नहीं आ सकते।

दूसरी भूमि वाले योगियों के गिरने की बहुत संभावना होती है, इसलिए उन्हें सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।

3.52 · विभूतिपाद सूत्र ५२

सूत्र ३.५२

क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥ ३.५२ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.५२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 588

शब्दार्थ — क्षण · तत् · क्रमयोः · संयमात् · विवेक · जं · ज्ञानम्

अर्थ — क्षण और इसके क्रमोंमें संयम करनेसे विवेकज - ज्ञान उत्पन्न होता है ।

व्यासभाष्य

यथापकर्षपर्यन्तं परं ब्रह्माणुरेवं परमापकर्षपर्यन्तः कालः क्षणः । यावता वा समयेन चलितः परमाणुः पूर्वदेशं जह्यातुत्तरदेशमुपसम्पद्येत स कालः क्षणः । तत्प्रवाहाविच्छेदस्तु क्रमः । क्षणतत्क्रमयोर्नास्ति वस्तुसमाहार इति बुद्धिसमाहारो मुहूर्ताहोरात्रादयः । स खल्वयं कालो वस्तुशून्यो बुद्धिनिर्माणः शब्दज्ञानानुपाती लैकिकानां व्युत्थितदर्शनानां वस्तुस्वरूप इवावभासते । क्षणस्तु वस्तुपतितः क्रमावलम्बी, क्रमश्च क्षणानन्तर्यात्मा । तं कालविदः काल इत्याचक्षते योगिनः । न च द्वौ क्षणौ सह भवतः । क्रमश्च न द्वयोः सहभुवोरसम्भवात। पूर्वस्मादुत्तरभाविनो यदानन्तर्यं क्षणस्य स क्रमः । तस्माद्वर्तमान एवैकः क्षणो न पूर्वोत्तरक्षणाः सन्तीति । तस्मान्नास्ति तत्समाहारः । ये तु भूतभाविनः क्षणास्ते परिणामान्विता व्याख्येआः । तेनैकेन क्षणेन कृत्स्नो लोकः परिणाममनुभवति । तत्क्षणोपारूढाः खल्वमी धर्माः । तयोः क्षणतत्क्रमयोः संयमात्तयोः साक्षात्करणम् । ततश्च विवेकजं ज्ञानं प्रादुर्भवति ॥५२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — क्षणं तु तत् क्रमं तस्मिन् संयमं कृत्वा विवेक जं ज्ञानं लभते क्षण और उसके क्रम में संयम करके विवेचन से उत्पन्न ज्ञान प्राप्त करता है। (इस संस्करणमें भाष्यके केवल एक अंशका हिन्दी अनुवाद है — मूल भाष्य ८६८ अक्षरका है।)

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जिस प्रकार द्रव्य का सबसे छोटा विभागरहित विभाग परमाणु है, वैसे ही समय की सबसे छोटी विभागरहित गति क्षण है। क्षणों के प्रवाह का विच्छेद न होना क्रम कहलाता है, किंतु क्षण और उसका क्रम एक वस्तु नहीं हैं क्योंकि दो क्षण या दो क्रम एक साथ नहीं हो सकते। काल वास्तव में वस्तु से शून्य है और केवल बुद्धि द्वारा निर्मित मुहूर्त, दिन, रात आदि को लोग विकल्प (१.९) से व्यवहार में वस्तु के समान जानते हैं। वर्तमान क्षण के पीछे दूसरे क्षण का आना ही काल कहलाता है, परंतु वह एक वर्तमान भी नहीं है बल्कि अतीत और परिणाम को प्राप्त होता है। नैयायिकों की भांति जो सूक्ष्म द्रव्य रूप क्षण को परमाणु मानते हैं, वैसे ही योगाचार्य प्रवाह के अविच्छेद को क्रम कहते हैं, किंतु यह क्रम केवल कल्पित है। वास्तव में केवल एक वर्तमान क्षण ही सत्य है और इस पूरे ब्रह्माण्ड का परिणाम वही एक वर्तमान क्षण है। इस एक वर्तमान क्षण और उसके कल्पित क्रम में संयम करने से विवेक-ज्ञान उत्पन्न होता है। विवेक-ज्ञान शब्द योग का पारिभाषिक शब्द है जिसका लक्षण सूत्र ५४ में बताया जाएगा।

3.53 · विभूतिपाद सूत्र ५३

सूत्र ३.५३

जातिलक्षणदेशैरन्यताऽनवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ ३.५३ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.५३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 589

शब्दार्थ — जाति · लक्षण · देशैः · अन्यता · अनवच्छेदात् · तुल्ययोः · ततः · प्रतिपत्तिः

अर्थ — एक - दूसरेसे जाति , लक्षण , देशसे भेदका निश्चय न होनेसे दो तुल्य वस्तुओंका , विवेकज - ज्ञानसे निश्चय होता है ।

व्यासभाष्य

तुल्ययोस्र्देशलक्षणसारूप्ये जातिभेदोऽन्यताया हेतुर्गौरियं बडवेयमिति । तुल्यदेशजातीयत्वे लक्षणमन्यत्वकरं—कालाक्षी गौः, स्वस्तिमती गौरिति । द्वयोरामलकयोर्जातिलक्षणसारूप्याद्देशभेदोऽन्यत्वकरः—इदं पूर्वमिदमुत्तरमिति । यदा तु पूर्वमामलकमन्यव्यग्रस्य ज्ञातुरुत्तरदेश उपावर्त्यते, तदा तुल्यदेशत्वे पूर्वमेतदुत्तरमेतदिति प्रविभागानुपपत्तिः । असन्दिग्धेन च तत्त्वज्ञानेन भवितव्यमित्यत इदमुक्तं ततः प्रतिपत्तिर्विवेकजज्ञानादिति । कथं ? पूर्वामलकसहक्षणो देश उत्तरामलकसहक्षणदेशाद्भिन्नः । ते चामलके स्वदेशक्षणानुभवभिन्ने । अन्यदेशक्षणानुभवस्तु तयोरन्यत्वे हेतुरिति । एतेन दृष्टान्तेन परमाणोस्तुल्यजातिलक्षणदेशस्य पूर्वपरमाणुदेशसहलक्षणसाक्षात्करणादुत्तरस्य परमाणोस्तद्देशानुपपत्तावुत्तरस्य तद्देशानुभवो भिन्नः सहक्षणभेदात्तयोरीश्वरस्य योगिनोऽन्यत्वप्रत्ययो भवतीति । अपरे तु वर्णयन्ति—येऽन्त्या विशेषास्तेऽन्यताप्रत्ययं कुर्वन्तीति । तत्रापि देशलक्षणभेदो मूर्तिव्यवधिजातिभेदश्चान्यत्वहेतुः । क्षणभेदस्तु योगिबुद्धिगम्य एवेति । अत उक्तं—« मूर्तिव्यवधिजातिभेदाभावान्नास्ति मूलपृथक्त्वं » इति वार्षगण्यः ॥५३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — जातिः लक्षणं देशः च यैः अन्यत् अन्यत् न अवच्छिद्यते तुल्यं तस्मात् जाति, लक्षण, और देश, जिनसे अन्य एक दूसरे से नहीं अवच्छिन्न होता, तुल्य में। ततः प्रतिपत्तिः भवति ततः प्रतिपत्ति होती है। (इस संस्करणमें भाष्यके केवल एक अंशका हिन्दी अनुवाद है — मूल भाष्य ९९१ अक्षरका है।)

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अनेक व्यक्तियों में अनुगत सामान्य धर्म को जाति कहते हैं और समान वस्तुओं को पृथक् करने वाले असाधारण धर्म को लक्षण कहा जाता है। पदार्थों के एक-दूसरे से भेद निश्चित कराने के लिए जाति, लक्षण और देश होते हैं। यदि किसी वस्तु की जाति और देश समान हों तो उसका भेद लक्षण से होता है और यदि जाति व लक्षण समान हों तो भेद देश से होता है। दो समान आँवलों के बीच के सूक्ष्म अंतर को केवल विवेक-ज्ञान से प्राप्त योगी ही क्षण-सहित अनुभव करके जान सकता है। वैशेषिक सिद्धान्त के अनुसार विशेष पदार्थ द्रव्यों का भेदक है, जिसमें पाँच प्रकार के विशेष होते हैं जैसे (१) देश, (२) लक्षण, (३) मूर्ति, (४) व्यवधि और (५) जाति। जहाँ जाति आदि से पदार्थों का भेद-ज्ञान होना तो साधारण है, वहीं क्षण-भेद से भेद-ज्ञान होना केवल योगी की बुद्धि से ही संभव है। वार्षगण्याचार्य ने उपनिषद् के संदर्भ में कहा है कि मूल प्रकृति में भेद नहीं हो सकता क्योंकि उसमें मूर्ति, व्यवधि और जाति जैसे भेद के कारणों का अभाव होता है।

3.54 · विभूतिपाद सूत्र ५४

सूत्र ३.५४

तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥ ३.५४ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.५४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 589

शब्दार्थ — तारकं · सर्व · विषयं · सर्वथा · विषयम · क्रमं · च · इति · विवेक · जं · ज्ञानम्

अर्थ — तारक, सर्व विषय, सर्वथा विषय, और अक्रमम, यह विवेचन से उत्पन्न ज्ञान।

व्यासभाष्य

तारकमिति स्वप्रतिमोत्थमनौपदेशिकमित्यर्थः । सर्वविषयं नास्य किञ्चिदविषयीभूतमित्यर्थः । सर्वथाविषयमतीतानागतप्रत्युत्पन्नं सर्वं सर्वथा जानातीत्यर्थः । अक्रममित्येकक्षणोपरूढं सर्वं सर्वथा गृह्णातीत्यर्थः । एतद्विवेकजं ज्ञानं परिपूर्णम् । अस्यैवांशो योगप्रदीपो मधुमतीभूमिमुपादाय यावदस्य परिसमाप्तिरिति ॥५४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विषयति सर्वं सर्वथा विषयति अक्रमं च यत् तत् तारक जो सर्व को विषय करता है, सर्व को सर्वथा विषय करता है, और अक्रमम है, वह। विवेक जं ज्ञानं भवति विवेचन से उत्पन्न ज्ञान होता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — विवेकज - ज्ञान चार लक्षणोंवाला होता है । १ तारकम् — बिना बाह्य निमित्तके अपनी प्रभासे स्वयं उत्पन्न होनेवाला और संसारसागरसे तारनेवाला । २ सर्वविषयम् — महदादिपर्यन्त सब तत्त्वोंका विषय करनेवाला । ३ सर्वथाविषयम् —– सब तत्त्वोंको सब अवस्थामें स्थूल , सूक्ष्म आदि भेदसे उनके तीनों परिणामोंसहित सब प्रकारसे विषय करनेवाला । ४ अक्रमम् – क्रमकी अपेक्षारहित होकर सबको एक क्षणमें सब प्रकारसे विषय करनेवाला ये सम्पूर्ण विवेक - ज्ञान हैं । इक्यावनवें सूत्रमें बतलायी हुई ऋतम्भरा । एक अंश है । उससे ज्ञानकी वृद्धि करता हुआ योगी इस अवस्थातक प्रज्ञावाली मधुमती भूमि इसका पहुँचता है । यह ज्ञानकी अन्तिम गति है ; क्योंकि इसमें कोई वस्तु इसका (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)

3.55 · विभूतिपाद सूत्र ५५

सूत्र ३.५५

सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥ ३.५५ ॥

विभूतिपाद · सूत्र ३.५५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 512

शब्दार्थ — सत्त्व · पुरुषयोः · शुद्धि · साम्ये · कैवल्यम्

अर्थ — सत्त्व और पुरुष की शुद्धि के साम्य में कैवल्य।

व्यासभाष्य

यदा निर्धूतरजस्तमोमलं बुद्धिसत्त्वं सत्त्वपुरुषस्यान्यताप्रत्ययमात्राधिकारं दग्धक्लेशबीजं भवति, तदा पुरुषस्य शुद्धिसारूप्यमिवापन्नं भवति । तदा पुरुषस्योपचरितभोगाभावः शुद्धिः । एतस्यामवस्थायां कैवल्यं भवतीश्वरस्यानीश्वरस्य वा विवेकजज्ञानभागिन इतरस्य वा । न हि दग्धक्लेशबीजस्य ज्ञाने पुनरपेक्षा काचिदस्ति । सत्त्वशुद्धिद्वारेणैतत्समाधिजमैश्वर्यं च ज्ञानं चोपक्रान्तम् । परमार्थतस्तु ज्ञानाददर्शनं निवर्तते । तस्मिन्निवृत्ते न सन्त्युत्तरे क्लेशाः । क्लेशाभावात्कर्मविपाकाभावः । चरिताधिकाराश्चैत्स्यामवस्थायां गुणा न पुरुषस्य दृश्यत्वेन पुनरुपतिष्ठन्ते । तत्पुरुषस्य कैवल्यम् । तदा पुरुषः स्वरूपमात्रज्योतिरमलः केवली भवति ॥५५॥ इति पतञ्जलिविरचिते योगसूत्रे तृतीयो विभूतिपादः

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — कैवल्यं भवति ॥ ५५॥ सत्त्वं चित्तं पुरुषः च ययोः शुद्धिः साम्या भवति सत्त्व चित्त और पुरुष, जिनकी शुद्धि साम्य हो जाती है। ततः कैवल्यं भवति ततः कैवल्य होता है। इति पतञ्जलिविरचिते योगसूत्रे तृतीयो विभूतिपदः इति पतञ्जलि विरचिते योग सूत्रे तृतीयः विभूति पादः पतंजलि द्वारा रचित योग सूत्र में तृतीय विभूति पाद।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सत्त्व का अर्थ है कि चित्त पुरुष के समान शुद्ध हो जाए ताकि गुणों के परिणामों का यथार्थ ज्ञान हो और पुरुष अपने स्वरूप को साक्षात् जान सके। पुरुष की शुद्धि तब होती है जब आत्म-अध्यास के कारण पुरुष के भोग को अपना समझने वाला भ्रम विवेक-ज्ञान से नष्ट हो जाता है, जिसे ही कैवल्य कहते हैं।

इस पाद में बताई गई विभूतियाँ कैवल्य प्राप्ति में सहायक हो सकती हैं पर वे अनिवार्य नहीं हैं क्योंकि कैवल्य के लिए केवल पुरुष और चित्त में यथार्थ भेद कराने वाला विवेक-ज्ञान आवश्यक है। विवेक-ज्ञान से अविद्या का नाश होता है जिससे अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश जैसे क्लेश नष्ट हो जाते हैं और सकाम कार्यों व उनके फलों की भावना का भी अंत हो जाता है।

इस प्रकार गुणों का प्रयोजन समाप्त हो जाता है और पुरुष अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाता है जिसे कैवल्य, अपवर्ग, निर्वाण, मुक्ति, मोक्ष, स्वरूपावस्थिति, गुणाधिकार-समाप्ति, परमधाम और परमपद जैसे एकार्थक शब्दों से पुकारा जाता है। स्वामी ओमानन्द तीर्थ ने समाधि के तीन अंगों (धारणा, ध्यान और समाधि) को संयम संज्ञा देकर उनके परिणामों, भुवन-ज्ञान व कायव्यूह-ज्ञान जैसी सिद्धियों और मुक्ति की अवस्थाओं की व्याख्या की है।

सूत्र २६ की टिप्पणी में व्यासभाष्य का भाषार्थ अलंकार रूप से वर्णित है और सूत्र ३९ विशेष वक्तव्य में मृत्यु की सूक्ष्म अवस्थाओं जैसे पितृयान व देवयान का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। योग के स्वरूप, साधन और सिद्धियों के बाद चौथे पाद में कैवल्य को बताते हुए उपयोगी चित्त के निर्णय हेतु पाँच प्रकार की सिद्धियाँ और उनसे उत्पन्न होने वाले पाँच सिद्ध चित्तों को बताया गया है।

उपसंहार

ये सूत्र साधक की आंतरिक प्रज्ञा के विकास और उसके द्वारा प्राप्त होने वाली विशिष्ट क्षमताओं को क्रमबद्ध रूप में दर्शाते हैं। यह यात्रा मानसिक अनुशासन से शुरू होकर अंततः प्रकृति और पुरुष के विवेक-ज्ञान तथा कैवल्य की परम अवस्था में पूर्ण होती है।

In English

Yoga Sutras of Patanjali: Vibhuti Pada

This text explains the process of concentration through Dharana (fixation), Dhyana (meditation), and Samadhi (absorption). It describes how applying these three stages to a single object constitutes Samyama, which leads to the light of wisdom and the attainment of various powers.

This article answers

  • Difference between dharana dhyana and samadhi?
  • What is samyama in yoga sutras?
  • How to achieve samadhi through concentration?
  • Meaning of pragyaloka in patanjali yoga?
  • Types of siddhis according to omananda tirtha?

प्रामाणिकता

उद्धरण
55
संस्करणसे मिले
55
पाठभेद
0
छोड़े गये
0

मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — पातञ्जल योगदर्शन।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

मूल ग्रन्थ पढ़ें