व्याख्या · पातञ्जल योगदर्शन
पातञ्जल योगदर्शन — समाधिपाद
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यह भाग योग साधना के सर्वोच्च लक्ष्य की व्याख्या करता है, जहाँ चित्त की वृत्तियों को रोकने की प्रक्रिया और समाधि के विभिन्न स्तरों का वर्णन है। इसमें साधक की मानसिक अवस्थाओं से लेकर ईश्वर प्रणिधान और समाधि के बीजयुक्त एवं निर्बीज रूपों तक के क्रमिक विकास को दर्शाया गया है।
1.1 · समाधिपाद सूत्र १
अथ योगानुशासनम् ॥ १.१ ॥
शब्दार्थ — अथ · योग · अनुशासनम्
अर्थ — अब योगकी शिक्षा देनेवाले ग्रन्थको आरम्भ करते हैं ।
व्यासभाष्य
अथेत्ययमधिकारार्थः । योगानुशासनं शास्त्रमधिकृतं वेदितव्यम् । योगः समाधिः । स च सार्वभौमश्चित्तस्य धर्मः । क्षिप्तं, मूढं, विक्षिप्तम्, एकाग्रं, निरुद्धमिति चित्तभूमयः । तत्र विक्षिप्ते चेतसि विक्षेपोपसर्जनीभूतः समाधिर्न योगपक्षे वर्तते । यस्त्वेकाग्रे चेतसि सद्भूतमर्थं प्रद्योतयति, क्षिणोति च क्लेशान्, कर्मबन्धनानि श्लथयति, निरोधमभिमुखं करोति, स सम्प्रज्ञातो योग इत्याख्यायते । स च वितर्कानुगतः, विचारानुगतः, आनन्दानुगतोऽस्मितानुगत इत्युपरिष्ठात्प्रवेदयिष्यामः । सर्ववृत्तिनिरोधे त्वसम्प्रज्ञातः समाधिः ॥१॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — योगः समाधिः। योग का अर्थ समाधि है। सः च सार्वभौमः चित्तस्य धर्मः। वह समाधि चित्त का सार्वभौमिक धर्म है। क्षिप्तम् मूढम् विक्षिप्तम् एकाग्रम् निरुद्धम् इति चित्त भूमयः। चित्त की पाँच भूमियाँ हैं: क्षिप्त (उद्विग्न), मूढ (मोहग्रस्त), विक्षिप्त (विचलित), एकाग्र (एकाग्रता), और निरुद्ध (निरोध अवस्था)। तत्र विक्षिप्ते चेतसि विक्षेप उपसर्जनी भूतः समाधिः न योग पक्षे वर्तते। विक्षिप्त चित्त में, जहाँ विक्षेप प्रमुख होता है, वहाँ समाधि योग का हिस्सा नहीं माना जाता। यः तु एकाग्रे चेतसि सत् भूतम् अर्थम् प्रद्योतयति क्षिणोति च क्लेशान् कर्म बन्धनानि श्लथयति निरोधम् अभिमुखम् करोति सः सम्प्रज्ञातः योगः इति आख्यायते। जो एकाग्र चित्त में सत्य को प्रकाशित करता है, क्लेशों को नष्ट करता है, कर्म बंधनों को शिथिल करता है, और निरोध की ओर ले जाता है, उसे सम्प्रज्ञात योग कहते हैं। सः च वितर्क अनुगतः विचार अनुगतः आनन्द अनुगतः अस्मिता अनुगतः इति उपरिष्ठात् प्रवेदयिष्यामः। यह सम्प्रज्ञात योग वितर्क, विचार, आनंद, और अस्मिता के साथ होता है, जैसा कि आगे बताया जाएगा। जब सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है, तब असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — 'अथ' शब्द का अर्थ अधिकार और आरम्भवाचक है, जिसके द्वारा लक्षण, भेद, उपाय और फलों सहित योग की शिक्षा दी जाती है। योग का अर्थ समाधि है और समाधि चित्त की पाँच भूमियों—क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध—में से होती है। क्षिप्त और मूढ़ तथा विक्षिप्त भूमि योग रूप नहीं हैं, जबकि एकाग्र चित्त सम्प्रज्ञात समाधि और निरुद्ध चित्त असम्प्रज्ञात समाधि कहलाता है।
महर्षि पतञ्जलि ने 'अथ' के माध्यम से अनुबन्ध-चतुष्टय अर्थात् विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्बन्ध को स्पष्ट किया है जिसमें योग का विषय, मोक्ष का प्रयोजन, जिज्ञासु साधक का अधिकारी और योग का प्रतिपादन का सम्बन्ध है। इस शास्त्र में योग का अर्थ समाधि से है क्योंकि समाधि योग का मुख्य अंग और साधन है। योग की प्राचीन परंपरा के अनुसार श्रीपतञ्जलि महाराज ने योग शिक्षा को श्रुति और स्मृति से प्राप्त बताया है।
महाभा० (१२।३४), श्रीमद्भा० (५।१.९), ऋ० (१०।१२.१), छान्दो० (१।६.६) और अद्भुतरामा० (१५|६) के उद्धरणों से स्पष्ट होता है कि हिरण्यगर्भ ही योग के आदि-वक्ता और जगत् के अन्तरात्मा हैं। अंत में श्वेताश्वतर उपनिषद् का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि शरीर को स्थिर कर इंद्रियों को मन से हृदय में स्थित करना योग का विषय है।
1.2 · समाधिपाद सूत्र २
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ १.२ ॥
शब्दार्थ — योगः · चित्त · वृत्ति · निरोधः
अर्थ — चित्तकी वृत्तियोंका रोकना योग है ।
व्यासभाष्य
सर्वशब्दाग्रहणात्सम्प्रज्ञातोऽपि योग इत्याख्यायते । चित्तं हि प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलत्वात्त्रिगुणम् । प्रख्यारूपं हि चित्तसत्त्वं रजस्तमोभ्यां संसृष्टमैश्वर्यविषयप्रियं भवति । तदेव तमसानुविद्धमधर्माज्ञानावैराग्यानैश्वर्योपगं भवति । तदेव प्रक्षीणमोहावरणं सर्वतः प्रद्योतमानमनुविद्धं रजोमात्रया धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपगं भवति । तदेव रजोलेशमालेपनं स्वरूपप्रतिष्ठं सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रं धर्ममेघध्यानोपगं भवति । तत्परं प्रसङ्ख्यानमित्याचक्षते ध्यायिनः । चितिशक्तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा दर्शितविषया शुद्धा चानन्ता च । सत्त्वगुणात्मिका चेयम्, अतो विपरीता विवेकख्यातिरिति । अतस्तस्यां विरक्तं चित्तं तामपि ख्यातिं निरुणद्धि । तदवस्थं चित्तं संस्कारोपगं भवति । स निर्बीजः समाधिः । न तत्र किञ्चित्सम्प्रज्ञायत इत्यसम्प्रज्ञातः । द्विविधः स योगश्चित्तवृत्तिनिरोध इति ॥२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — सर्व शब्द के कारण सम्प्रज्ञात योग भी योग की परिभाषा में आता है। चित्त प्रख्या, प्रवृत्ति, और स्थिति के स्वभाव के कारण सत्त्व, रजस्, और तमस् तीन गुणों से युक्त है। चित्त का सत्त्वगुण, जो प्रख्या रूप है, रजस् और तमस् से मिलकर ऐश्वर्य और विषयों में रुचि उत्पन्न करता है। वही चित्त तमस् से प्रभावित होकर अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, और अनैश्वर्य की ओर ले जाता है।
वही चित्त जब मोह के आवरण से मुक्त होकर रजस् की मात्रा से युक्त होता है, तब वह सर्वत्र प्रकाशमान होकर धर्म, ज्ञान, वैराग्य, और ऐश्वर्य की ओर उन्मुख होता है। वही चित्त जब रजस् के सूक्ष्म प्रभाव से भी मुक्त होकर स्वरूप में स्थिर होता है, तब वह सत्त्व और पुरुष के भेद को समझने वाली विवेकख्याति तक पहुँचता है, जिसे धर्ममेघ ध्यान कहते हैं। ध्यानी लोग इसे परम प्रसंख्यान कहते हैं। चिति शक्ति अपरिणामी, अप्रतिसंक्रामी, दर्शित विषयों वाली, शुद्ध, और अनंत है।
यह चिति शक्ति सत्त्वगुण से युक्त है, इसलिए इसके विपरीत विवेकख्याति होती है। इस कारण चित्त उस विवेकख्याति से भी विरक्त होकर उसे भी रोक देता है। वह चित्त उस अवस्था में केवल संस्कारों से युक्त हो जाता है। वह निर्बीज समाधि है। वहाँ कुछ भी संज्ञान नहीं होता, इसलिए इसे असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। इस प्रकार योग दो प्रकार का है, जो चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — योग का स्वरूप बहिर्मुख चित्तवृत्तियों को रोककर उन्हें अंतर्मुख करके अपने कारण में लीन कर देना है। सूत्र में केवल 'चित्तवृत्तिनिरोध' शब्द होने के कारण इसमें सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात दोनों प्रकार की समाधियों को योग बताया गया है। चित्त सत्त्वप्रधान परिणाम है, जिसमें रजस् और तम के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली विभिन्न वृत्तियाँ कहलाती हैं।
जब चित्त बाह्य और अभ्यन्तर विषयों का त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित होता है, तब उसे चित्तवृत्तिनिरोध कहते हैं। चित्त की पाँच अवस्थाएँ निम्न प्रकार हैं— १. मूढावस्था, २. क्षिप्तावस्था, ३. विक्षिप्तावस्था, ४. एकाग्रावस्था और ५. निरुद्धावस्था। एकाग्रता को सम्प्रज्ञात-समाधि कहते हैं जिसमें प्रकृती के सभी कार्यों का साक्षात्कार होता है, जबकि निरोधावस्था में विवेक-ख्याति सहित समस्त वृत्तियों का निरोध होने पर इसे असम्प्रज्ञात या निर्बीज-समाधि कहा जाता है।
योग के विषय को समझने हेतु सृष्टिक्रम का ज्ञान आवश्यक है जिसमें चेतन तत्त्व (पुरुष) और जड़ तत्त्व (प्रकृति) के भेद को स्पष्ट किया गया है। पुरुष का प्रयोजन भोग और अपवर्ग है, जबकि चित्त वह दर्पण है जो पुरुष को विषयों का साक्षात्कार कराने का साधन प्रदान करता है। सृष्टि की रचना में महत्तत्त्व से अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्राएँ और पाँच स्थूलभूतों के विषम-परिणाम होते हैं जिनमें रजस् और तम का प्रभाव क्रमशः बढ़ता जाता है।
1.3 · समाधिपाद सूत्र ३
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ १.३ ॥
शब्दार्थ — तदा · द्रष्टुः · स्वरूपे · अवस्थानम्
अर्थ — तब द्रष्टाकी ( शुद्ध परमात्म ) स्वरूपमें अवस्थिति ( होती है ) ।
व्यासभाष्य
तदवस्थे चेतसि विषयाभावाद्बुद्धिबोधात्मा पुरुषः किंस्वभावः ? इति— स्वरूपप्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिर्यथा कैवल्ये । व्युत्थानचित्ते तु सति तथापि भवन्ती न तथा ॥३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — उस अवस्था में चित्त में विषयों के अभाव के कारण बुद्धि और बोध का स्वरूप वाला पुरुष कैसा है? ऐसा प्रश्न उठता है। उस समय चिति शक्ति स्वरूप में स्थिर हो जाती है, जैसा कि कैवल्य अवस्था में होता है। किन्तु व्युत्थान चित्त में ऐसा नहीं होता, यद्यपि वहाँ भी चिति शक्ति विद्यमान रहती है। तदवस्थे चेतसि विषयाभावाद्बुद्धिबोधात्मा पुरुषः किंस्वभावः ? इति— स्वरूपप्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिर्यथा कैवल्ये । व्युत्थानचित्ते तु सति तथापि भवन्ती न तथा । कथं तर्हि ? दर्शितविषयत्वात्— तदा द्रष्टुः स्वरूपे अवस्थानम्। उस समय द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थिर रहता है। तत् अवस्थे चेतसि विषय अभावात् बुद्धि बोध आत्मा पुरुषः किम् स्वभावः इति। उस अवस्था में चित्त में विषयों के अभाव के कारण बुद्धि और बोध का स्वरूप वाला पुरुष कैसा है? ऐसा प्रश्न उठता है। स्वरूप प्रतिष्ठा तदानीम् चिति शक्तिः यथा कैवल्ये। उस समय चिति शक्ति स्वरूप में स्थिर हो जाती है, जैसा कि कैवल्य अवस्था में होता है। व्युत्थान चित्ते तु सति तथापि भवन्ती न तथा। किन्तु व्युत्थान चित्त में ऐसा नहीं होता, यद्यपि वहाँ भी चिति शक्ति विद्यमान रहती है। कथम् तर्हि दर्शित विषयत्वात्। यह कैसे होता है? क्योंकि विषय दर्शित होते हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — द्रष्टा या पुरुष की चित्तवृत्ति निरुद्धकाल में वैसी ही चेतनमात्र स्वरूप में स्थित होती है जैसी कैवल्य में होती है। चित्त की व्युत्थान अवस्था में भी पुरुष अपने स्वाभाविक असङ्ग चेतनरूप में स्थित होता है, परंतु चित्त की उपाधि से वृत्ति शांत, घोर और मूढादि प्रतीत होती है। वृत्तियों के निरोध से पुरुष का निरोध नहीं होता, बल्कि जब औपाधिक रूपों का अभाव होता है तब पुरुष अपने उपाधिरहित रूप में अवस्थित होता है।
विवेक-ख्याति उत्पन्न होने पर वस्तु आकार में परिणाम से रहित चित्त में कर्तापन का अभिमान जैसे 'मैं करता हूँ' आदि का निवृत्त हो जाता है और बुद्धि में वृत्तिरूप परिणाम रुक जाता है। जिस प्रकार भ्रम दूर होने पर सीप और चाँदी के बीच केवल अस्ति-नास्ति का व्यवहार होता है, वैसे ही चिति-शक्ति सर्वदा एकरस होती है किंतु व्युत्थानकाल में अविवेक के कारण अन्यरूप से भान होती है।
विवेक-ख्याति सबसे अन्तिम सात्त्विक वृत्ति है जिसमें चित्त द्वारा आत्मा का साक्षात्कार होता है और यह पुरुषार्थ का विषय है। इस आत्मसाक्षात्कार से चित्त की सात्त्विकता बढ़ जाती है जिससे आसक्ति हट जाती है जिसे परवैराग्य कहते हैं। अंततः जब चित्त में किसी प्रकार की कोई भी वृत्ति न रहने पर द्रष्टा की शुद्ध परमात्मस्वरूप में अवस्थिति होती है।
1.4 · समाधिपाद सूत्र ४
वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ १.४ ॥
शब्दार्थ — वृत्ति · सारूप्यम् · इतरत्र
अर्थ — दूसरी अर्थात् निरोधसे भिन्न व्युत्थान- अवस्थामें द्रष्टाकी वृत्तियोंके समानरूपता होती है अर्थात् द्रष्टा वृत्तियोंके समान रूपवाला प्रतीत होता है ।
व्यासभाष्य
व्युत्थाने याश्चित्तवृत्तयस्तदवशिष्टवृत्तिः पुरुषः । तथा च सूत्रं—एकमेव दर्शनं, ख्यातिरेव दर्शनमिति । चित्तमयस्कान्तमणिकल्पं सन्निधिमात्रोपकारि दृश्यत्वेन स्वं भवति पुरुषस्य स्वामिनः । तस्माच्चित्तवृत्तिबोधे पुरुषस्यानादिः सम्बन्धो हेतुः ॥४॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — व्युत्थान अवस्था में जो चित्त की वृत्तियाँ होती हैं, पुरुष उनके साथ अवशिष्ट रूप में रहता है। इस प्रकार सूत्र कहता है कि एकमात्र दर्शन ही है, और ख्याति ही दर्शन है। चित्त चुंबक मणि के समान है, जो केवल सन्निधि मात्र से कार्य करता है और दृश्य रूप में पुरुष के स्वामी के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है। इसलिए चित्तवृत्तियों के बोध में पुरुष का अनादि संबंध कारण है। ताः पुनः निरोद्धव्या बहुत्वे सति चित्तस्य। उन चित्तवृत्तियों को, जो बहुत्व के कारण उत्पन्न होती हैं, पुनः निरोध करना चाहिए।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — व्युत्थानकाल में द्रष्टा वृत्तियों के लक्षण के अनुसार, पञ्चशिखाचार्य के अनुसार एक ही दर्शन है और ख्याति ही दर्शन है। पुरुष वैसा ही प्रतीत होता है जैसा चित्त की वृत्तियाँ होती हैं, इसलिए सुख-दुःख, मोह, सत्त्व, रज और तम गुणों के आधार पर पुरुष का स्वरूप जाना जाता है।
यद्यपि परमार्थतः पुरुष असङ्ग और निर्लेप है, तथापि वह चुम्बक और पत्थर के समान केवल संनिधि मात्र से चित्तरूप दृश्य के साथ भोग-अपवर्ग सम्पादन हेतु अनादि स्वस्वामिभाव सम्बन्ध रखता है। इस कारण पुरुष शांत, घोर या मूढ़ आकार की वृत्ति विशिष्ट चित्त की संनिधि से स्वयं को चित्त से भिन्न न जानकर उसमें अपने में चित्त के धर्मों का आरोप कर लेता है।
बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार आत्मा बुद्धिके समान होकर तादात्म्याध्यास प्राप्त होती है, जैसे मलिन दर्पण में प्रतिबिम्बित मुख में मलिनता का आरोप करने वाला अविवेकी व्यक्ति शोक करता है। पुरुष में भोक्तृत्व-द्रष्टृत्व की शक्ति और चित्त में दृश्यत्व-भोग्यत्व की शक्ति की योग्यता-लक्षण-संनिधि से ही चित्त को स्व कहा जाता है और पुरुष को स्वामी कहा जाता है।
यह जो पुरुष के भोग का हेतु स्व-स्वामि-भाव सम्बन्ध है, वह चित्त से ही अपने निजरूप के अविवेक प्रयुक्त होने और वासना के प्रवाह के कारण होता है। जैसे जलाशय में तरंगों के समय चन्द्र-प्रतिबिम्ब स्थिर नहीं भाता और तरंगें रुकने पर स्वच्छ रूप से प्रकाशमान होता है, वैसे ही जब चित्त की वृत्तियाँ विषयाकार होती हैं तब चेतन निरुप में नहीं भासता, किंतु जब वृत्तियाँ निरुद्ध होती हैं तब वह अपने स्थिर रूप में स्थित हो जाता है। यह इस व्याख्या का तीसरा और चौथा सूत्र का फलितार्थ है।
1.5 · समाधिपाद सूत्र ५
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टा अक्लिष्टाः ॥ १.५ ॥
शब्दार्थ — वृत्तयः · पञ्चतय्यः · क्लिष्टा · अक्लिष्टाः
अर्थ — वृत्तियाँ पाँच प्रकारकी होती हैं । क्लिष्ट अर्थात् रागद्वेषादि क्लेशोंकी हेतु और अक्लिष्ट अर्थात् राग - द्वेषादि क्लेशोंकी नाश करनेवाली । ( १५५ )
व्यासभाष्य
क्लेशहेतुकाः कर्माशयप्रचयक्षेत्रीभूताः क्लिष्टाः । ख्यातिविषया गुणाधिकारविरोधिन्योऽक्लिष्टाः । क्लिष्टप्रवाहपतिता अप्यक्लिष्टाः । क्लिष्टच्छिद्रेष्वप्यक्लिष्टा भवन्ति । अक्लिष्टच्छिद्रेषु क्लिष्टा इति । तथाजातीयकाः संस्कारा वृत्तिभिरेव क्रियते, संस्कारैश्चैव वृत्तय इति । एवं वृत्तिसंस्कारचक्रमनिशमावर्तते । तदेवंभूतं चित्तमवसिताधिकारमात्मकल्पेन व्यवतिष्ठते प्रलयं वा गच्छतीति । ताः क्लिष्टाश्चाक्लिष्टाश्च पञ्चधा वृत्तयः ॥५॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टा अक्लिष्टाः। चित्त की वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं, जो क्लिष्ट और अक्लिष्ट होती हैं। क्लेशों से उत्पन्न होती हैं और कर्माशय के संचय के लिए क्षेत्र बनती हैं। ख्याति (विवेक) को विषय बनाती हैं और गुणों के अधिकार का विरोध करती हैं। क्लिष्ट वृत्तियों के प्रवाह में पड़कर भी कुछ वृत्तियाँ अक्लिष्ट हो सकती हैं। क्लिष्ट वृत्तियों के अंतराल में भी अक्लिष्ट वृत्तियाँ हो सकती हैं। अक्लिष्ट वृत्तियों के अंतराल में क्लिष्ट वृत्तियाँ भी हो सकती हैं। इस प्रकार की वृत्तियों से संस्कार बनते हैं और संस्कारों से ही वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। इस तरह वृत्ति और संस्कार का चक्र निरंतर घूमता रहता है। ऐसा चित्त अपने अधिकार को समाप्त करके आत्मरूप में स्थिर हो जाता है या प्रलय को प्राप्त होता है। इस प्रकार क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — बाह्य पदार्थों की अधिकता के कारण उनसे उत्पन्न होने वाली वृत्तियाँ भी असंख्य होती हैं, जिन्हें सुगमता से ज्ञान हेतु पाँच श्रेणियों में विभक्त किया गया है। इन पाँच प्रकार की वृत्तियों में से सत्त्व-प्रधान अक्लिष्ट और तमस्प्रधान क्लिष्ट होती हैं।
अविद्या आदि पाँच क्लेशों के कारण कर्माशय के समूह की उत्पत्तिकी भूमियाँ बनने वाली वृत्तियाँ क्लिष्ट कहलाती हैं, जबकि अविद्या आदि पाँचों क्लेशों की नाशक और गुणाधिकार की विरोधी विवेकख्यातिरूप वृत्ति अक्लिष्ट कहलाती है। पहले अक्लिष्ट वृत्तियों को ग्रहण करके क्लिष्ट वृत्तियों का निरोध करना चाहिए और फिर परवैराग्य से उस अक्लिष्ट वृत्तिका भी निरोध हो जाता है।
यद्यपि क्लिष्ट वृत्तियों के संस्कार गहरे होते हैं, तथापि सत्-शास्त्र और गुरुजनों के उपदेश से अभ्यास और वैराग्यरूप अक्लिष्ट वृत्तियाँ उनके छिद्रों में वर्तमान रहकर अक्लिष्ट संस्कारों को उत्पन्न करती हैं। वृत्तियों का स्वभाव अपने सदृश संस्कारों को उत्पन्न करना है, अतः यह चक्र निरंतर चलने से क्लिष्ट वृत्तियों का निरोध हो जाता है। इन सूक्ष्म रूप से बचे हुए क्लिष्ट संस्कारों का नाश निर्बीज समाधिके अभ्यास (२ ।
१०) से होता है और उपर्युक्त विधिके अनुसार जब क्लिष्ट वृत्तियाँ दब जाती हैं, तब अक्लिष्ट वृत्तियों का भी परवैराग्य से निरोध हो जाता है। इन सब वृत्तियों का निरोध असम्प्रज्ञात योग है।
1.6 · समाधिपाद सूत्र ६
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥ १.६ ॥
शब्दार्थ — प्रमाण · विपर्यय · विकल्प · निद्रा · स्मृतयः
अर्थ — चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, और स्मृति।
1.7 · समाधिपाद सूत्र ७
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ १.७ ॥
शब्दार्थ — प्रत्यक्ष · अनुमान · आगमाः · प्रमाणानि
अर्थ — प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम - भेदसे तीन प्रकारकी प्रमाण - वृत्ति है ।
व्यासभाष्य
इन्द्रियप्रणालिकया चित्तस्य बाह्यवस्तूपरागात्तद्विषया सामान्यविशेषात्मनोऽर्थस्य विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः प्रत्यक्षं प्रमाणम् । फलमविशिष्टः पौरुषेयश्चित्तवृत्तिबोधः । बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुष इत्युपरिष्टादुपपादयिष्यामः । अनुमेयस्य तुल्यजातीयेष्वनुवृत्तो भिन्नजातीयेभ्यो व्यावृत्तः सम्बन्धो यस्तद्विषया सामान्यावधारणप्रधाना वृत्तिरनुमानम् । यथा देशान्तरप्राप्तेर्गतिमच्चन्द्रतारकं चैत्रवत्, विन्ध्यश्चाप्राप्तिरगतिः । आप्तेन दृष्टोऽनिम्तो वार्थः परत्र स्वबोधसङ्क्रान्तये शब्देनोपदिश्यते । शब्दात्तदर्थविषया वृत्तिः श्रोतुरागमः । यस्याश्रद्धेयार्थो वक्ता न दृष्टानुमितार्थः स आगमः प्लवते । मूलवक्तरि तु दृष्टानुमितार्थे निर्विप्लवः स्यात ॥७॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — प्रत्यक्ष अनुमान आगमाः प्रमाणानि। प्रत्यक्ष, अनुमान, और आगम प्रमाण हैं। प्रमाणम्। इन्द्रियों के माध्यम से चित्त का बाह्य वस्तु से संनादन होने पर उस विषय की सामान्य और विशेष स्वरूप वाली वस्तु की विशेष अवधारणा करने वाली वृत्ति प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसका फल अविशिष्ट और पुरुष से संबंधित चित्तवृत्ति का बोध है। बुद्धि का प्रतिसंवेदी पुरुष है, यह आगे सिद्ध किया जाएगा। अनुमेय वस्तु का समान जाति में अनुवृत्ति और भिन्न जाति से व्यावृत्ति वाला संबंध जो है, उस विषय की सामान्य अवधारणा करने वाली वृत्ति अनुमान है। उदाहरण के लिए, देशान्तर को प्राप्त करने वाला चन्द्र-तारक चैत्र की तरह गतिमान है, और विन्ध्य अप्राप्ति के कारण अगति है। आप्त पुरुष द्वारा दृष्ट या अनुमित अर्थ को दूसरों तक अपने बोध को संक्रान्त करने के लिए शब्द द्वारा उपदिष्ट किया जाता है। शब्द से उत्पन्न उस अर्थ की विषय वाली वृत्ति श्रोता का आगम है। जिस वक्ता का अर्थ अश्रद्धेय है और न दृष्ट न अनुमित है, वह आगम अस्थिर होता है। किन्तु मूल वक्ता के दृष्ट या अनुमित अर्थ में आगम स्थिर होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — प्रमा का अर्थ यथार्थ ज्ञान है और जिस चित्तवृत्ति से यह उत्पन्न होता है उसे प्रमाण कहते हैं। प्रमा के लक्षण अनधिगत, अबाधित और पौरुषेय ज्ञान हैं, जिसे प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द या आगम प्रमाण के रूप में तीन प्रकार से वर्गीकृत किया गया है। प्रत्यक्ष प्रमाण इन्द्रियों द्वारा विषय के संनिकर्ष से उत्पन्न होता है, जिसमें घट जैसे आकार वाली चित्तवृत्ति को प्रमाण और उस पर आधारित पुरुषनिष्ठ बोध को प्रत्यक्ष प्रमा कहा जाता है। अनुमान प्रमाण लिङ्ग और लिङ्गी के सामान्य संबंध (व्याप्ति) से प्राप्त होता है, जिसे तीन प्रकार यानी पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट में बाँटा गया है। आगम या शब्द प्रमाण वेदों, शास्त्रों और आप्त-पुरुषों के दोषरहित वचनों को सुनकर प्राप्त होने वाला ज्ञान है। प्रत्यक्ष प्रमाण के संदर्भ में पाँच पदार्थ माने गए हैं—प्रमाण, प्रमेय, प्रमा, प्रमाता और साक्षी। विज्ञानभिक्षु ने योगवार्तिक में स्पष्ट किया है कि शुद्ध चेतन को प्रमाता मानना अयुक्त है क्योंकि जीवात्मा ही प्रमा का आधार है। अंततः उपमान, अर्थापत्ति, सम्भव, अभाव और संकेत जैसे अन्य प्रकारों को भी प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम के अंतर्गत ही समाहित माना गया है।
1.8 · समाधिपाद सूत्र ८
विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ १.८ ॥
शब्दार्थ — विपर्ययः · मिथ्या · ज्ञानम् · अतत् · रूप · प्रतिष्ठम्
अर्थ — विपर्यय मिथ्या ज्ञान है , जो उस पदार्थके रूपमें प्रतिष्ठित नहीं है ।
व्यासभाष्य
स कस्मान्न प्रमाणं ? यतः प्रमाणेन बोध्यते, भूतार्थविषयत्वात्प्रमाणस्य । तत्र प्रमाणेन बाधनमप्रमाणस्य दृष्टम् । तद्यथा द्विचन्द्रदर्शनं सद्विषयेणैकचन्द्रदर्शनेन बाध्यत इति । सेयं पञ्चपर्वा भवत्यविद्या, अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशा इति । एत एव स्वसंज्ञाभिस्तमो मोहो महामोहस्तामिस्रोऽन्धतामिस्र इति । एते चित्तमलप्रसङ्गेनाभिधास्यन्ते ॥८॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विपर्ययः मिथ्या ज्ञानम् अतत् रूप प्रतिष्ठम्। विपर्यय मिथ्या ज्ञान है, जो वस्तु के वास्तविक स्वरूप पर आधारित नहीं होता। क्यों नहीं है? क्योंकि यह प्रमाण द्वारा बाधित होता है, क्योंकि प्रमाण का विषय सत्य अर्थ होता है। वहाँ अप्रमाण का प्रमाण द्वारा बाधन देखा जाता है। उदाहरण के लिए, दो चन्द्रमा का दर्शन सत्य विषय वाले एक चन्द्रमा के दर्शन से बाधित होता है। यह अविद्या पाँच प्रकार की होती है, जो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश—ये क्लेश हैं। ये ही अपनी संज्ञाओं से तमस्, मोह, महामोह, तामिस्र, और अंधतामिस्र कहलाते हैं। ये चित्त के मल के प्रसंग में आगे वर्णित होंगे।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सूत्र में 'विपर्यय' लक्ष्य, 'मिथ्या-ज्ञान' लक्षण और 'अतद्रूपप्रतिष्ठम्' हेतु दोष का है। विकल्प-वृत्ति में अतिव्याप्ति के कारण विपर्यय से भिन्नता दिखाने के लिए विपर्यय-वृत्तिके 'मिथ्या-ज्ञानम्' पद दिया गया है। विषय के समान आकार से परिणत चित्तवृत्ति प्रमाण और विषय से विलक्षण आकार वाली वृत्ति विपर्यय कहलाती है। जो ज्ञान वस्तु के यथार्थ रूप को प्रकाशित करता है वह 'तद्रूपप्रतिष्ठित' होता है, जबकि जो वस्तु के स्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं होता वह 'अतद्रूपप्रतिष्ठित' होने के कारण विपर्यय-ज्ञान कहलाता है। जैसे पिघली धातु साँचे के आकार से परिणत होती है, वैसे ही चित्त भी बाह्य वस्तु से सम्बद्ध होकर उसका आकार ले लेता है। यदि यह वृत्ति किसी दोष के कारण विषय के समानाकार न हो, तो वह दूषित या भ्रान्त ज्ञान कहलाती है। विपर्यय-ज्ञान रूपाप्रतिष्ठित होने के कारण संशय भी इसके अन्तर्गत आता है। इस विपर्यय-संज्ञक चित्त की वृत्ति ही अविद्या कही जाती है जो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक पाँच प्रकार की होती है। यह विपर्यय-वृत्ति अक्लिष्ट रूप से तब धारण करती है जब वह जडतत्त्व से आत्माध्यास हटाने में साधन के रूप में सहायक होती है।
1.9 · समाधिपाद सूत्र ९
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥ १.९ ॥
शब्दार्थ — शब्द · ज्ञान · अनुपाती · वस्तु · शून्यः · विकल्पः
अर्थ — शब्दसे उत्पन्न जो ज्ञान , उसके पीछे चलनेका जिसका स्वभाव हो और जो वस्तुकी सत्ताकी अपेक्षा न रखता हो इस प्रकारका ज्ञान विकल्प कहलाता है 1 वह …
व्यासभाष्य
स न प्रमाणोपारोही, न विपर्ययोपारोही च । वस्तुशून्यत्वेऽपि शब्दज्ञानमाहात्म्यनिबन्धनो व्यवहारो दृश्यते, तद्यथा चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति । यदा चितिरेव पुरुषस्तदा किमत्र केन व्यपदिश्यते ? भवति च व्यपदेशे वृत्तिः, यथा चैत्रस्य गौरिति । तथा प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा निष्क्रियः पुरुषः, तिष्ठति बाणः, स्थास्यति, स्थित इति गतिनिवृत्तौ धात्वर्थमात्रं गम्यते । तथानुत्पत्तिधर्मा पुरुष इति उत्पत्तिधर्मस्याभावमात्रमवगम्यते, न पुरुषान्वयी धर्मः । तस्माद्विकल्पितः स धर्मस्तेन चास्ति व्यवहार इति ॥९॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — शब्द ज्ञान अनुपाती वस्तु शून्यः विकल्पः। विकल्प वह है जो शब्दज्ञान से उत्पन्न होता है और वस्तु से शून्य होता है। यह न तो प्रमाण पर आधारित है और न ही विपर्यय पर। वस्तु शून्य होने पर भी शब्दज्ञान के महत्व के कारण व्यवहार देखा जाता है, जैसे कि चैतन्य पुरुष का स्वरूप है। जब चिति ही पुरुष है, तब यहाँ क्या और किसके द्वारा व्यपदिष्ट होता है? भवति च व्यपदेशे वृत्तिः यथा चैत्रस्य गौः इति। व्यपदेश में भी वृत्ति होती है, जैसे चैत्र का गौ। तथा प्रतिषिद्ध वस्तु धर्मा निष्क्रियः पुरुषः तिष्ठति बाणः स्थास्यति स्थितः इति गति निवृत्तौ धातु अर्थ मात्रम् गम्यते। उसी तरह निष्क्रिय पुरुष, जिसके लिए वस्तुधर्म निषिद्ध हैं, जैसे बाण तिष्ठति, स्थास्यति, स्थित है—गति की निवृत्ति में केवल धातु का अर्थ समझा जाता है। तथा अनुत्पत्ति धर्मा पुरुषः इति उत्पत्ति धर्मस्य अभाव मात्रम् अवगम्यते न पुरुष अन्वयी धर्मः। इसी तरह अनुत्पत्तिधर्मा पुरुष में उत्पत्ति धर्म का अभाव मात्र समझा जाता है, न कि पुरुष का कोई अन्वयी धर्म। तस्मात् विकल्पितः सः धर्मः तेन च अस्ति व्यवहारः इति। इसलिए वह धर्म विकल्पित है, और उसके द्वारा व्यवहार होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — शब्द के ज्ञान के अनन्तर उदय होने वाला जो निर्विषयक चित्त का तदाकार परिणाम है, वह विकल्पवृत्ति कहलाता है। यह वृत्ति प्रमाणवृत्ति से भिन्न है क्योंकि यह निर्विषय होती है और विपर्यय से भी भिन्न है क्योंकि बोध होने पर भी इसका व्यवहार चलता रहता है। 'पुरुष का चैतन्यरूप है' या 'अनुत्पत्तिधर्मा पुरुषः' जैसे ज्ञानों में कोई अभाव-पदार्थ नहीं होता, अतः ये विकल्पवृत्ति हैं। प्रमाण वस्तु के यथार्थ ज्ञान को कहते हैं जो स्थिर होता है, जबकि विपर्यय वस्तु के मिथ्या-ज्ञान को कहते हैं जो अस्थिर होता है। विकल्प इन दोनों से विलक्षण है क्योंकि यह न तो यथार्थ ज्ञान है और न ही मिथ्या-ज्ञान, बल्कि केवल शब्दज्ञान के अनन्तर उदय होने वाला निर्विषय ज्ञान है। विकल्पवृत्ति वहाँ होती है जहाँ अभेद में भेद या भेद में अभेद का आरोप किया जाता है, जैसे पुरुष और चैतन्य के अभेद में भेद का आरोप करना। 'अहं' वृत्ति, पल, घड़ी, दिन आदि की ज्ञानरूप वृत्तियाँ और गौ आदि शब्दों में शब्द, अर्थ और ज्ञान के भेद में अभेद से भासने वाली वृत्ति भी विकल्प-वृत्तियाँ हैं। विज्ञानभिक्षु ने (३।५२) सूत्र का अर्थ यह किया है कि शब्द और ज्ञान जिसके पीछे आते हैं वह वस्तु से शून्य है और वह विकल्प है।
1.10 · समाधिपाद सूत्र १०
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १.१० ॥
शब्दार्थ — अभाव · प्रत्यय · आलम्बना · वृत्तिः · निद्रा
अर्थ — निद्रा वह वृत्ति है जो अभाव प्रत्यय को आलंबन बनाती है।
व्यासभाष्य
सा च सम्प्रबोधे प्रत्यवमर्शात्प्रत्ययविशेषः । कथं ? सुखमहमस्वाप्सम्, प्रसन्नं मे मनः प्रज्ञां मे विशारदीकरोति । दुःखमहमस्वाप्सम्, स्त्यानं मे मनो भ्रमत्यनवस्थितम् । गाढं मूढोऽहमस्वाप्सम् । गुरूणि मे गात्राणि, क्लान्तं मे चित्तम् । अलसं मुषितमिव तिष्ठतीति । स खल्वयं प्रबुद्धस्य प्रत्यवमर्शो न स्यादसति प्रत्ययानुभवे । तदाश्रिताः स्मृतयश्च तद्विषया न स्युः । तस्मात्प्रत्ययविशेषो निद्रा । सा च समाधावितरप्रत्ययवन्निरोद्धव्येति ॥१०॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अभाव प्रत्यय आलम्बना वृत्तिः निद्रा। निद्रा वह वृत्ति है जो अभाव प्रत्यय को आलंबन बनाती है। यह जागने पर प्रत्यवमर्श से प्रत्यय का विशेष रूप है। मेरा मन प्रसन्न है, और मेरी प्रज्ञा को यह विशारद बनाता है। मैंने दुखपूर्वक सोया, मेरा मन स्थिर नहीं है और भटकता है। मैंने गहरी मूढ़ता में सोया। मेरे अंग भारी हैं, मेरा चित्त क्लांत है, और यह आलसी और खोया हुआ-सा प्रतीत होता है। यह प्रबुद्ध पुरुष का प्रत्यवमर्श प्रत्यय के अनुभव के बिना नहीं होगा। उस पर आश्रित स्मृतियाँ भी उस विषय की नहीं होंगी। इसलिए निद्रा प्रत्यय का विशेष रूप है। और इसे समाधि में अन्य प्रत्ययों की तरह निरोध करना चाहिए।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — निद्रा एक वृत्ति ही है जिसे सूत्र में वृत्ति ग्रहण के रूप में सूचित किया गया है। योग के आचार्य आत्मस्थिति से अतिरिक्त चित्त की प्रत्येक अवस्था को वृत्ति मानते हैं। जाग्रत अवस्था में रजोगुण प्रधान होता है जो सत्त्वगुण को अपना सहकारी बनाकर क्रिया में प्रवृत्त होता है, जबकि सुषुप्ति में तमोगुण रजस् तथा सत्त्व को दबा देता है।
तमोगुण के कारण चित्त में अभाव की प्रतीति होती है जिसमें रजोगुण का तनिक मात्रा में रहना ही निद्रा-वृत्ति कहलाता है। इस वृत्ति के संस्कार से स्मृति उत्पन्न होती है जैसे 'मैं सोया और मैंने कुछ नहीं जाना' और इसमें तीन प्रकार की स्मृतियाँ होती हैं—सत्त्व सहित तमोगुण वाली, रजस सहित तमोगुण वाली और केवल तमोगुण वाली। चूंकि वृत्तिका के प्रत्यक्ष न होने पर संस्कार और स्मृति नहीं हो सकती, इसलिए निद्रा एक वृत्ति है न कि मात्र अभाव।
श्रुति और स्मृतियों ने भी जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को गुणों से बुद्धिवृत्तियाँ माना है। तमोमयी होने से यह समाधिकी विरोधी वृत्तिके ही अन्तर्गत है और नशा या क्लोरोफार्म से उत्पन्न मूर्च्छित अवस्था भी निद्रा के समान ही होती है। वाचस्पति मिश्र ने प्रत्यय पद का अर्थ 'कारण' मानकर व्याख्या की है कि जाग्रत तथा स्वप्न की वृत्तियों के अभाव का कारण तमोगुण या अज्ञान ही वह आलम्बन है जिसे निद्रा कहते हैं।
1.11 · समाधिपाद सूत्र ११
अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥ १.११ ॥
शब्दार्थ — अनुभूत · विषय · असंप्रमोषः · स्मृतिः
अर्थ — अनुभव किये हुए विषयका फिर चित्तमें आरोहपूर्वक उससे अधिक नहीं , किंतु तन्मात्रविषयक ज्ञान होना स्मृति है * ।
व्यासभाष्य
किं प्रत्ययस्य चित्तं स्मरत्याहोस्विद्विषयस्येति ? ग्राह्योपरक्तः प्रत्ययो ग्राह्यग्रहणोभयाकारनिर्भासस्तथाजातीयकं संस्कारमारभते । स संस्कारः स्वव्यञ्जकाञ्जनस्तदाकारामेव ग्राह्यग्रहणोभयात्मिकां स्मृतिं जनयति । तत्र ग्रहणाकारपूर्वा बुद्धिः, ग्राह्याकारपूर्वा स्मृतिः । सा च द्वयी—भावितस्मर्तव्या चाभावितस्मर्तव्या च । स्वप्ने भावितस्मर्तव्या, जाग्रत्समये त्वभावितस्मर्तव्येति । सर्वाश्चैताः स्मृतयः प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतीनामनुभवात्प्रभवन्ति । सर्वाश्चैता वृत्तयः सुखदुःखमोहात्मिकाः । सुखदुःखमोहाश्च क्लेशेषु व्याख्येयाः । सुखानुशयी रागः, दुःखानुशयी द्वेषः, मोहः, पुनरविद्येति । एताः सर्वाः वृत्तयो निरोद्धव्याः । आसां निरोधे सम्प्रज्ञातो वा समाधिर्भवत्यसम्प्रज्ञातो वा ॥११॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अनुभूत विषय असंप्रमोषः स्मृतिः। स्मृति वह है जो अनुभूत विषय का संप्रमोष (विस्मरण) न होने से होती है। क्या चित्त प्रत्यय को स्मरण करता है या विषय को? ग्राह्य उपरक्तः प्रत्ययः ग्राह्य ग्रहण उभय आकार निर्भासः तथा जातीयकम् संस्कारम् आरभते। ग्राह्य से उपरक्त प्रत्यय, जो ग्राह्य और ग्रहण दोनों के आकार से निर्भासित होता है, वैसा ही संस्कार उत्पन्न करता है। सः संस्कारः स्व व्यञ्जक अञ्जनः तत् आकाराम् एव ग्राह्य ग्रहण उभय आत्मिकाम् स्मृतिम् जनयति।
वह संस्कार अपने व्यंजक अंजन के रूप में उसी आकार की ग्राह्य और ग्रहण दोनों से युक्त स्मृति को उत्पन्न करता है। पूर्वा स्मृतिः। वहाँ ग्रहण आकार से युक्त बुद्धि होती है, और ग्राह्य आकार से युक्त स्मृति होती है। सा च द्वयी भावित स्मर्तव्या च अभावित स्मर्तव्या च। यह स्मृति दो प्रकार की है—भावित स्मर्तव्या और अभावित स्मर्तव्या। स्वप्ने भावित स्मर्तव्या जाग्रत् समये तु अभावित स्मर्तव्या इति। स्वप्न में भावित स्मर्तव्या और जाग्रत समय में अभावित स्मर्तव्या होती है।
सर्वाः च एताः स्मृतयः प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृतीनाम् अनुभवात् प्रभवन्ति। ये सभी स्मृतियाँ प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, और स्मृति के अनुभव से उत्पन्न होती हैं। सर्वाः च एताः वृत्तयः सुख दुःख मोह आत्मिकाः। ये सभी वृत्तियाँ सुख, दुःख, और मोह से युक्त होती हैं। सुख दुःख मोहाः च क्लेशेषु व्याख्येयाः। सुख, दुःख, और मोह क्लेशों में व्याख्या किए जाएँगे। सुख अनुशयी रागः दुःख अनुशयी द्वेषः मोहः पुनः अविद्या इति।
सुख से अनुशयी राग, दुःख से अनुशयी द्वेष, और मोह पुनः अविद्या है। एताः सर्वाः वृत्तयः निरोद्धव्याः। ये सभी वृत्तियाँ निरोध करने योग्य हैं। आसाम् निरोधे सम्प्रज्ञातः वा समाधिः भवति असम्प्रज्ञातः वा। इनके निरोध से सम्प्रज्ञात या असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — स्मृति से भिन्न ज्ञान का नाम अनुभव है और अनुभव से ज्ञात वस्तु को अनुभूत कहते हैं। जब किसी दृष्ट या श्रुत वस्तु का ज्ञान होता है, तब चित्त पर एक संस्कार पड़ता है जो उद्बोधक सामग्री के उपस्थित होने पर प्रफुल्लित होकर स्मृति-वृत्ति का परिणाम देता है। प्रमाण, विपर्यय और विकल्प द्वारा जाग्रत अवस्था में अनुभव से उत्पन्न संस्कार ही स्मृति होते हैं, जिसमें स्मृतिका विषय अनुभूति से कम या उसके बराबर हो सकता है, अधिक नहीं।
'असम्प्रमोषः' के अर्थ 'न खोया जाना' लगाने पर सूत्र का अर्थ यह होता है कि अनुभव किए हुए का संस्कार प्रफुल्लित होना ही स्मृति है। यहाँ स्मरण-ज्ञान का पिता अनुभव है और स्मृतिका विषय अनुभूत विषय से अधिक प्रकाश नहीं कर सकता क्योंकि वह चोरी (सम्प्रमोष) नहीं है। चित्त केवल विषय मात्र या ज्ञान मात्र का नहीं, बल्कि ग्राह्य-ग्रहण दोनों स्वरूप वाली स्मृतिको उत्पन्न करता है, जैसा कि 'अहं घटं जानामि' के अनुभव में घट और ज्ञान दोनों का भान होता है।
यह स्मृति दो प्रकार की होती है: एक भावित-स्मर्तव्य अर्थात् मिथ्या पदार्थ विषयक जो स्वप्न में होती है, और दूसरी अभावित-स्मर्तव्य अर्थात् यथार्थ पदार्थ को विषय करने वाली जो जाग्रत काल में होती है। उपर्युक्त सूत्रों में बतलायी हुई वृत्तियाँ सात्त्विक, राजस और तामस वृत्तियाँ हैं जो सुख, दुःख और मोहस्वरूप होने से क्लेशस्वरूप हैं और इनका निरोध ही योग है।
स्वप्न भी अन्तःकरण के गुणभेद से तीन प्रकार के होते हैं: तामसिक, राजसिक और सात्त्विक, जिनमें से सात्त्विक स्वप्न को भावित-स्मर्तव्य स्मृतिकी कोटि में नहीं रखना चाहिए क्योंकि वह अनुभव जैसा होता है।
1.12 · समाधिपाद सूत्र १२
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १.१२ ॥
शब्दार्थ — अभ्यास · वैराग्याभ्याम् · तत् · निरोधः
अर्थ — अभ्यास और वैराग्यसे उन वृत्तियोंका निरोध होता है ।
व्यासभाष्य
चित्तनदी नामोभयतो वाहिनी । वहति कल्याणाय वहति पापाय च । या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा, संसारप्राग्भाराविवेकविषयनिम्ना पापवहा । तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिलीक्रियते, विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्घाट्यत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥१२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अभ्यास वैराग्याभ्याम् तत् निरोधः। अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चित्तवृत्तियों का निरोध होता है। चित्त नदी दोनों ओर बहने वाली है। यह कल्याण और पाप की ओर ले जाती है। जो कैवल्य की ओर ले जाने वाली और विवेक विषय में निम्न है, वह कल्याणकारी है, और जो संसार की ओर ले जाने वाली और अविवेक विषय में निम्न है, वह पापकारी है। वहाँ वैराग्य से विषय का स्रोत बंद किया जाता है, और विवेक दर्शन के अभ्यास से विवेक का स्रोत खोला जाता है, इस प्रकार चित्तवृत्ति का निरोध दोनों पर निर्भर है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चित्तवृत्ति निरुद्ध करने के दो उपाय हैं— अभ्यास और वैराग्य, जिसमें वैराग्य बहिर्मुख प्रवाह को रोकता है और अभ्यास आत्मोन्मुख आंतरिक प्रवाह को स्थिर करता है। व्यासदेवजी ने एक रूपक द्वारा बताया है कि चित्त एक नदी की तरह है जिसकी दो धाराएँ होती हैं, एक संसार-सागर की ओर और दूसरी कल्याण-सागर की ओर।
संसारी लोगों की पहली धारा जन्म से खुली होती है जिसे वैराग्य के बंधन से रोका जाता है, जबकि दूसरी धारा को शास्त्र, गुरु, आचार्य और ईश्वरचिन्तन से खोलकर अभ्यास के बेलचे से गहरा खोदकर विवेक-स्रोत में डाल दिया जाता है। इस प्रकार पक्षी के उड़ने की तरह चित्त की वृत्तियों का निरोध केवल एक साधन से नहीं बल्कि अभ्यास और वैराग्य दोनों के समुच्चय से होता है।
तमोगुण की अधिकता से उत्पन्न आलस्य आदि दोषों को अभ्यास से और रजोगुण से उत्पन्न चञ्चलतारूप विक्षेप को वैराग्य से नियंत्रित किया जाता है। योग के आठ अंगों में से पाँच बहिरङ्ग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार) की सिद्धि में अभ्यास सहायक है और तीन अन्तरङ्ग (धारणा, ध्यान, समाधि) में वैराग्य आवश्यक है। गीता (६.३५) में भगवान श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को बताया है कि चंचल मन को अभ्यास और वैराग्य के द्वारा ही वश में किया जा सकता है।
गीता (६.३६) के अनुसार असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः, अर्थात मन को वश में न करने वाले पुरुष के लिए योग कठिन है, किंतु स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से प्राप्त हो सकता है।
1.13 · समाधिपाद सूत्र १३
तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १.१३ ॥
शब्दार्थ — तत्र · स्थितौ · यत्नः · अभ्यासः
अर्थ — उनमेंसे चित्तकी स्थितिके विषयमें यत्न करना अभ्यास है ।
व्यासभाष्य
चित्तस्यावृत्तिकस्य प्रशान्तवाहिना स्थितिः, तदर्थः प्रयन्तो वीर्यमुत्साहः । तत्सम्पिपादयिषया तत्साधनानुष्ठानमभ्यासः ॥१३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — यत्नः अभ्यासः। वहाँ चित्त की स्थिति के लिए किया गया यत्न अभ्यास है। अवृत्तिक चित्त की प्रशांत प्रवाह वाली स्थिति के लिए प्रयत्न, वीर्य, और उत्साह है। उसे प्राप्त करने की इच्छा से उसके साधनों का अनुष्ठान अभ्यास है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चित्त के वृत्तिरहित होकर शांत प्रवाह में बहने की स्थिति को अभ्यास कहते हैं। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए पूर्ण सामर्थ्य और उत्साहपूर्वक यत्न करना आवश्यक है। योग के आठ अंगों जैसे यम और नियम का बार-बार अनुष्ठान करना अभ्यास का स्वरूप है और चित्तवृत्तियों का निरोध इसका प्रयोजन है। पठन, लेखन, पाक, क्रय-विक्रय, सीवन, नृत्य-गायन आदि सभी कार्य अभ्यास से ही सिद्ध होते हैं। अभ्यास के बल से नट और अन्य पशु भी अपनी प्रकृति के विरुद्ध कठिन कार्य करने में सफल होते हैं। इस प्रकार अभ्यास के द्वारा दुःसाध्य कार्य भी सिद्ध किए जा सकते हैं। अतः जब मुमुक्षु चित्त की स्थिरता के लिए अभ्यासनिष्ठ होगा, तब वह स्थिरता उसे अवश्य प्राप्त होगी और चित्त वशीभूत हो जाएगा क्योंकि अभ्यास के आगे कोई कार्य दुष्कर नहीं है।
1.14 · समाधिपाद सूत्र १४
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः ॥ १.१४ ॥
शब्दार्थ — सः · तु · दीर्घ · काल · नैरन्तर्य · सत्कार · आसेवितः · दृढ · भूमिः
अर्थ — किन्तु वह पूर्वोक्त अभ्यास दीर्घ कालपर्यन्त निरन्तर व्यवधानरहित ठीक - ठीक श्रद्धा , वीर्य , भक्तिपूर्वक अनुष्ठान किया हुआ दृढ़ अवस्थावाला हो जाता है ।
व्यासभाष्य
दीर्घकालसेवितो निरन्तरसेवितः सत्कारासेवितः । तपसा ब्रह्मचर्येण विद्यया श्रद्धया च सम्पादितः सत्कारवान्दृढभूमिर्भवति । व्युत्थानसंस्कारेण द्रागित्येवानभिभूतविषय इत्यर्थः ॥१४॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — आसेवितः दृढ भूमिः। वह अभ्यास दीर्घकाल, निरंतरता, और सत्कार से सेवित होने पर दृढ़भूमि वाला होता है। सेवितः। दीर्घकाल तक, निरंतर, और सत्कार के साथ सेवित। तप, ब्रह्मचर्य, विद्या, और श्रद्धा से सम्पादित होने पर वह सत्कार युक्त और दृढ़भूमि वाला होता है। इसका अर्थ है कि व्युत्थान संस्कारों से शीघ्र प्रभावित न होने वाला विषय।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — मनुष्य के चित्त में अनादि काल से विषयभोग और वासनाजन्य व्युत्थान के संस्कार पड़े हुए हैं, जिन्हें थोड़े समय में नष्ट करना कठिन है। इन संस्कारों को दबाने हेतु अभ्यास को दृढ़ भूमि बनाने के लिए धैर्य के साथ दीर्घ काल तक श्रद्धा और उत्साहपूर्वक प्रयत्न करना चाहिए। सूत्र में तीन विशेषणों द्वारा किया गया अभ्यास दृढ़ अवस्थावाला बताया गया है।
पहला विशेषण 'दीर्घकाल' है, जिसमें योगियों की भिन्नता के कारण समय का कोई निश्चित नियम नहीं है, अतः निराश हुए बिना चिरकाल तक एकाग्रता से अभ्यास करना चाहिए। दूसरा विशेषण 'नैरन्तर्य' है, जिसका अर्थ है कि अभ्यास बिना किसी व्यवधान के निरंतर किया जाना चाहिए क्योंकि रुक-रुक कर किया गया अभ्यास दृढ़ भूमि नहीं होता। तीसरा विशेषण 'सत्कारासेवितः' है, अर्थात अभ्यास श्रद्धा, भक्ति, वीर्य, ब्रह्मचर्य और उत्साह सहित सत्कारपूर्वक किया जाना चाहिए।
इन तीनों विशेषणों से युक्त अभ्यास ही राजस-तामस वृत्तियों को तिरोघत करके चित्त की स्थिरता प्राप्त करने में समर्थ होगा। उपनिषद् के अनुसार श्रद्धा तीन प्रकार की होती है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक, जिनमें से विशुद्ध ज्ञानमूलक सात्त्विक श्रद्धा ही श्रेष्ठ है। सूत्र में इसी सात्त्विक श्रद्धा का 'सत्कार' शब्द से अनुष्ठान करना बताया गया है।
1.15 · समाधिपाद सूत्र १५
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १.१५ ॥
शब्दार्थ — दृष्ट · आनुश्रविक · विषय · वितृष्णस्य · वशीकार · संज्ञा · वैराग्यम्
अर्थ — – दृष्ट और आनुश्रविक विषयोंमें जिसको तृष्णा नहीं रही है , उसका वैराग्य वशीकार नामवाला अर्थात् अपर - वैराग्य है ।
व्यासभाष्य
स्त्रियोऽन्नं पानमैश्वर्यमिति दृष्टविषये वितृष्णस्य स्वर्गवैदेह्यप्रकृतिलयत्वप्राप्तावानुश्रविकविषये वितृष्णस्य, दिव्यादिव्यविषयसम्प्रयोगेऽपि चित्तस्य विषयदोषदर्शिनः प्रसङ्ख्यान अबलादनाभोगात्मिका हेयोपादेयशून्या वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — दृष्ट आनुश्रविक विषय वितृष्णस्य वशीकार संज्ञा वैराग्यम्। दृष्ट और आनुश्रविक विषयों से तृष्णारहित होने का नाम वशीकार वैराग्य है। स्त्री, अन्न, पान, और ऐश्वर्य जैसे दृष्ट विषयों और स्वर्ग, वैदेह्य, प्रकृतिलय प्राप्ति जैसे आनुश्रविक विषयों से तृष्णारहित। दिव्य और अदिव्य विषयों के संप्रयोग में भी चित्त का विषय दोष देखने वाला, प्रसंख्यान के बल से अनाभोग स्वरूप, हेय और उपादेय से शून्य, यह वशीकार संज्ञा वाला वैराग्य है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — विषय दो प्रकार के हैं— दृष्ट जो इस लोक में दृष्टिगोचर होते हैं और आनुश्रविक जो वेद और शास्त्रों द्वारा सुने गए हैं। आनुश्रविक वेद्य भी दो प्रकार के होते हैं— शरीरान्तर-वेद्य जैसे देवलोक आदि और अवस्थान्तर-वेद्य जैसे दिव्य गन्ध-रस आदि। जब चित्त प्रसंख्यान इन विषयों को ग्रहण करता है, तब इनके दोषों को देखकर सङ्ग-दोष से सर्वथा रहित राग हो जाना ही वैराग्य है।
किसी विषय के केवल त्यागने का नाम वैराग्य नहीं है, क्योंकि यह भय या लोभ के कारण भी हो सकता है; वास्तविक वैराग्य विवेक द्वारा विषयों को अनन्त दुःखरूप समझकर उनमें पूर्णतया अरुचिका होना है। भर्तृहरिजी के अनुसार भोगों से तृष्णा शांत नहीं होती बल्कि हम स्वयं ही जीर्ण हो जाते हैं। वैराग्य की चार संज्ञाएँ हैं— यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार।
यतमान में राग-द्वेष का बार-बार चिन्तन कर इन्द्रियों को विषयों में प्रवृत्त न करना, व्यतिरेक में मलों के निवृत्त होने का ज्ञान, और एकेन्द्रिय में जब मल बाह्य इन्द्रियों को तो रोक दें पर सूक्ष्म रूप से मन में बने रहें, तब यह अवस्था आती है। वशीकार वह परम अवस्था है जहाँ चित्त के मलों की पूर्ण निवृत्ति हो जाती है और दिव्य-अदिव्य विषयों की उपस्थिति में भी उपेक्षा-बुद्धि रहती है।
ये पहली तीन भूमियाँ निरोध का साक्षात् हेतु नहीं हैं, केवल चौथी भूमि वाला वशीकार ही साक्षात् हेतु है जिसे अपर-वैराग्य भी कहा जाता है। इस वैराग्य का फल सम्प्रज्ञात-समाधि है, जबकि इससे विरक्त होना पर-वैराग्य है जिसका फल असम्प्रज्ञात-समाधि है।
1.16 · समाधिपाद सूत्र १६
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १.१६ ॥
शब्दार्थ — तत् · परम् · पुरुष · ख्यातेः · गुण · वैतृष्ण्यम्
अर्थ — विवेकख्यातिद्वारा गुणोंसे तृष्णारहित हो जाना पर - वैराग्य है ।
व्यासभाष्य
दृष्टानुश्रविकविषयदोषदर्शी विरक्तः पुरुषदर्शनाभ्यासात्तच्छुद्धिप्रविवेकाप्यायितबुद्धिर्गुणेभ्यो व्यक्ताव्यक्तधर्मकेभ्यो विरक्त इति । तद्द्वयं वैराग्यम् । तत्र यदुत्तरं तज्ज्ञानप्रसादमात्रं, यस्योदये प्रत्युदितख्यातिरेवं मन्यते—प्राप्तं प्रापनीयं, क्षीणाः क्षेतव्याः क्लेशाः । छिन्नः श्लिष्टपर्वा भवसङ्क्रमः, यस्याविच्छेदाज्जनित्वा म्रियते । मृत्वा च जायत इति । ज्ञानस्यैव पराकाष्ठा वैराग्यम् । एतस्यैव हि नान्तरीयकं कैवल्यमिति ॥१६॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत् परम् पुरुष ख्यातेः गुण वैतृष्ण्यम्। उससे परम वैराग्य पुरुष की ख्याति से गुणों से तृष्णारहित होना है। दृष्ट आनुश्रविक विषय दोष दर्शी विरक्तः पुरुष दर्शन अभ्यासात् तत् शुद्धि प्रविवेक आप्यायित बुद्धिः गुणेभ्यः व्यक्त अव्यक्त धर्मकेभ्यः विरक्तः इति। दृष्ट और आनुश्रविक विषयों के दोष देखने वाला विरक्त, पुरुष दर्शन के अभ्यास से शुद्धि और प्रविवेक से युक्त बुद्धि, व्यक्त और अव्यक्त धर्म वाले गुणों से विरक्त होता है। तत् द्वयम् वैराग्यम्।
यह वैराग्य दो प्रकार का है। तत्र यत् उत्तरम् तत् ज्ञान प्रसाद मात्रम् यस्य उदये प्रत्युदित ख्यातिः एवम् मन्यते प्राप्तम् प्रापनीयम् क्षीणाः क्षेतव्याः क्लेशाः। उसमें उत्तर (परम) वैराग्य ज्ञान के प्रसाद मात्र से है, जिसके उदय से प्रत्युदित ख्याति ऐसा मानती है—प्रापनीय प्राप्त हो गया, क्षय करने योग्य क्लेश क्षीण हो गए। छिन्नः श्लिष्ट पर्वा भव सङ्क्रमः यस्य अविच्छेदात् जनित्वा म्रियते मृत्वा च जायति इति।
भव का श्लिष्ट पर्वा संक्रम छिन्न हो गया, जिसके अविच्छेद से जन्म लेकर मृत्यु होती है और मृत्यु के बाद जन्म। ज्ञानस्य एव पराकाष्ठा वैराग्यम्। ज्ञान की पराकाष्ठा ही वैराग्य है। एतस्य एव हि न अन्तरीयकम् कैवल्यम् इति। इसके ही साथ कैवल्य प्राप्त होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अपर-वैराग्य का अर्थ दिव्य और अदिव्य विषयों में तृष्णारहित होना है, जहाँ योगी गुणों के अधिकार वाले विषयों से विरक्त होकर चित्त को एकाग्र करता है। इस एकाग्रता से सम्प्रज्ञात-समाधि प्राप्त होती है जिसकी उच्चतम अवस्था पुरुषख्याति, सत्त्वपुरुषान्यता-ख्याति तथा विवेकख्याति कहलाती है। जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ता है, चित्त निर्मल होता जाता है और अंततः यह विवेकख्याति भी केवल एक सात्त्विक वृत्ति और गुणों का ही परिणाम प्रतीत होने लगती है। इस प्रकार गुणों से भी तृष्णारहित होना पर-वैराग्य कहलाता है जिसे ज्ञानप्रसाद-मात्र कहते हैं क्योंकि इसमें रजस्-तमस गुण का गन्ध मात्र नहीं रहता। भाष्यकार के शब्दानुसार धर्ममेघ समाधिनिष्ठ यह मानता है कि पाँच क्लेश नष्ट हो गए और संसार का संक्रम टूट गया है। सूत्र १६ - गुणवैतृष्ण्यम् के अनुसार यह त्रिगुणात्मक बुद्धि का कार्य होने के कारण योगी के लिए हेय-कोटि में है, अतः साधनपाद सूत्र २६ के अनुसार अविप्लव विवेकख्याति ही मनुष्य का प्रयत्न है। इस विवेकख्याति से आसक्ति हटने पर चित्त सर्ववृत्तिशून्य हो जाता है जिसे पुरुष स्वरूपप्रतिष्ठित या असम्प्रज्ञात-समाधि कहा जाता है।
1.17 · समाधिपाद सूत्र १७
वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्संप्रज्ञातः ॥ १.१७ ॥
अर्थ — वितर्क , विचार , आनन्द और अस्मिता नामक स्वरूपोंके सम्बन्धसे जो चित्तकी वृत्तियोंका निरोध है , वह सम्प्रज्ञात - समाधि कहलाता है अर्थात् वितर्कके सम्बन्धसे जो समाधि होती है , उसका नाम वितर्कानुगत ; विचारके सम्बन्धसे विचारानुगत ; आनन्दके सम्बन्धसे आनन्दानुगत और अस्मिताके सम्बन्धसे होनेवाली समाधिका नाम अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात - समाधि है ।
व्यासभाष्य
वितर्कश्चित्तस्यालम्बने स्थूल आभोगः, सूक्ष्मो विचारः, आनन्दो ह्लादः, एकात्मिका संविदस्मिता । तत्र प्रथमश्चतुष्टयानुगतः समाधिः सवितर्कः । द्वितीयो वितर्कविकलः सविचारः । तृतीयो विचारविकलः सानन्दः । चतुर्थस्तद्विकलोऽस्मितामात्र इति । सर्व एते सालम्बनाः समाधयः ॥१७॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अथ उपाय द्वयेन निरुद्ध चित्त वृत्तेः कथम् उच्यते सम्प्रज्ञातः समाधिः इति। अब दो उपायों से निरुद्ध चित्तवृत्ति वाला सम्प्रज्ञात समाधि कैसे कहा जाता है? वितर्क विचार आनन्द अस्मिता रूप अनुगमात् सम्प्रज्ञातः। वितर्क, विचार, आनंद, और अस्मिता रूप के अनुगमन से सम्प्रज्ञात समाधि होती है। वितर्क चित्त का स्थूल आलंबन पर आभोग है, सूक्ष्म विचार है, आनंद ह्लाद है, और एक आत्मिका संविद अस्मिता है। प्रथम समाधि, जो इन चारों से युक्त है, सवितर्क कहलाता है। दूसरा, जो वितर्क से रहित है, सविचार है। तीसरा, जो विचार से रहित है, सानंद है। चौथा, जो उससे भी रहित है, केवल अस्मिता मात्र है। ये सभी समाधियाँ सआलंबन हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सूत्र के अंत में शेष रहे समाधि शब्द को जोड़ने पर यह स्पष्ट होता है कि ध्येय वस्तु के यथार्थ रूप को संशय और विपर्यय से रहित होकर जानने की भावना को सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। यह चार प्रकार की होती है— वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत। इस भावना का विषयभूत जो भाव्य है वह ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीतृ भेद से तीन प्रकार का है, जिनमें स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार होते हैं।
योगीजन पहले स्थूल वस्तु का साक्षात् करके फिर सूक्ष्म ध्येय की भावना में प्रवृत्त होते हैं, जहाँ पाँचों स्थूलभूत-विषयक तथा स्थूल इन्द्रिय-विषयक ग्राह्य भावना को वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहा गया है। जब चित्त स्थूल आकार के बाद पाँचों सूक्ष्मभूतों और तन्मात्राओं का साक्षात् करता है, तो उसे विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं, जिसमें तन्मात्राओं के कारण सत्त्व-प्रधान अहङ्कार की ग्रहण-भावना को आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहा गया है।
यदि योगी आगे बढ़कर चित्त की एकाग्रता से बीजरूप अहङ्कार सहित अस्मिता में धारण करने से यथार्थ रूप साक्षात् करता है, तो उसे अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। ये चारों प्रकार की समाधियाँ सालम्बन और सबीज भी कहलाती हैं क्योंकि ये किसी ध्येय का आलम्बन बनाकर की जाती हैं। इन चारों में वितर्क समाधि चतुष्टयानुगत, विचारानुगत त्रितयानुगत, आनन्दानुगत द्वयानुगत और अस्मितानुगत एकानुगत होती है।
अंततः, आत्मनि. प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान यच्छेद्वाङ्कनसी ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छे्छान्त आत्मनि ॥ (कठ ० १ । ३ । १३) के अनुसार कोशों द्वारा अन्तर्मुख होते हुए स्वरूप-स्थिति प्राप्त करने की प्रक्रिया बताई गई है। इसमें पाँच कोशों— आनन्दमय, विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय और अन्नमय— के माध्यम से आत्माध्यास को हटाकर शुद्ध चैतन्य ज्ञानस्वरूप आत्मज्योति को प्राप्त करने का वर्णन है।
1.18 · समाधिपाद सूत्र १८
विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥ १.१८ ॥
अर्थ — सर्ववृत्तियोंके निरोधका कारण जो पर - वैराग्य है , उसके पुनः - पुनः अनुष्ठानरूप अभ्याससे जो उसके संस्कार शेष रह जाते हैं , वह असम्प्रज्ञात -समाधि है।
व्यासभाष्य
सर्ववृत्तिप्रत्ययस्तमये संस्कारशेषो निरोधश्चित्तस्य समाधिरसम्प्रज्ञातः । तस्य परं वैराग्यमुपायः । सालम्बनो ह्यभ्यासस्तत्साधनाय न कल्पत इति विरामप्रत्ययो निर्वस्तुक आलम्बनीक्रियते । स चार्थशून्यः । तदभ्यासपूर्वचित्तं निरालम्बनमभावप्राप्तमिव भवतीत्येष निर्बीजः समाधिरसम्प्रज्ञातः । स खल्वयं द्विविधः—उपायप्रत्ययो भवप्रत्ययश्च । तत्रोपायप्रत्ययो योगिनां भवति ॥१८॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — असम्प्रज्ञातः समाधिः किम् उपायः किम् स्वभावः वा इति। असम्प्रज्ञात समाधि का उपाय और स्वभाव क्या है? विराम प्रत्यय अभ्यास पूर्वः संस्कार शेषः अन्यः। विराम प्रत्यय के अभ्यास से पूर्व और केवल संस्कार शेष रहने वाला दूसरा (समाधि) है। सभी वृत्तियों और प्रत्ययों के तमय (लय) होने पर संस्कार शेष रहने वाला चित्त का निरोध असम्प्रज्ञात समाधि है। इसका उपाय परम वैराग्य है। सआलंबन अभ्यास इसके साधन के लिए उपयुक्त नहीं है, इसलिए निर्वस्तुक विराम प्रत्यय को आलंबन बनाया जाता है। वह अर्थ से शून्य है। उस अभ्यास के द्वारा चित्त निरालंबन और अभाव प्राप्त जैसा हो जाता है, यह निर्बीज असम्प्रज्ञात समाधि है। यह दो प्रकार का है—उपाय प्रत्यय और भव प्रत्यय। उनमें उपाय प्रत्यय योगियों का होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सूत्र में 'विराम-प्रत्यय' से असमप्रज्ञात-समाधि का उपाय, 'संस्कारशेषः' से उसका लक्षण और 'अन्यः' से लक्ष्य का निर्देश किया गया है। सम्प्रज्ञात-समाधिकी पराकाष्ठा विवेकख्याति है जिसमें चित्त द्वारा पुरुष का साक्षात्कार होता है, किंतु यह भी एक चित्त की वृत्ति ही है। इस वृत्ति से तृष्णारहित होने को वैराग्य कहते हैं और वैराग्य से ही विवेकख्यातिरूपी अन्तिम वृत्तिका का निरोध होता है।
'विराम-प्रत्यय' अर्थात् पर-वैराग्य का अभ्यास 'नेति-नेति' के माध्यम से किया जाता है जिससे जब एकाग्र वृत्ति का निरोध होता है, तब असमप्रज्ञात-समाधि होती है जिसे निर्बीज-समाधि भी कहते हैं। इस अवस्था में पुरुष की शुद्ध चेतन स्वरूप में अवस्थिति होती है और इसमें केवल निरोध के संस्कार ही शेष रहते हैं। चित्त का परिणाम चार प्रकार का होता है— व्युत्थान, समाधि-प्रारम्भ, एकाग्रता और निरोध, जिनमें क्रमशः तम, रज, सत्त्व और निरोध के संस्कार प्रधान होते हैं।
जब निरोध से उत्पन्न हुए संस्कार एकाग्रता के संस्कारों को नष्ट करके स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं, तब इस संस्कारशेष की निवृत्तिका का नाम ही कैवल्य है। असमप्रज्ञात-समाधिकी साधना निरालम्ब्य और निर्बीज होने के कारण पर-वैराग्य का पुनः-पुनः अनुष्ठानरूप अभ्यास करना चाहिए। सूत्रकार ने विशेष वक्तव्य में सम्प्रज्ञात-समाधिकी चार भूमियों— वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत समाधि का वर्णन किया है।
इनमें से विचारानुगत और आनन्दानुगत समाधियों में प्राप्त होने वाले सूक्ष्म आनंद या दिव्य लोकों को भी बंधन ही माना गया है क्योंकि वास्तविक मुक्ति आत्मा के शुद्ध ज्ञानस्वरूप में निष्क्रियता है।
1.19 · समाधिपाद सूत्र १९
भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १.१९ ॥
शब्दार्थ — भव · प्रत्ययः · विदेह · प्रकृति · लयानाम्
अर्थ — विदेह और प्रकृतिलयोंको जन्मसे ही असम्प्रज्ञात - समाधिकी प्रतीति होती है ।
व्यासभाष्य
विदेहानां देवानां भवप्रत्ययः । ते हि स्वसंस्कारमात्रोपयोगेन चित्तेन कैवल्यपदमिवानुभवन्तः स्वसंस्कारविपाकं तथाजातीयकमतिवाहयन्ति । तथा प्रकृतिलयाः साधिकारे चेतसि प्रकृतिलीने कैवल्यपदमिवानुभवन्ति, यावन्न पुनरावर्ततेऽधिकारवशाच्चित्तमिति ॥१९॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — भव प्रत्ययः विदेह प्रकृति लयानाम्। विदेह और प्रकृतिलय वालों का समाधि भवप्रत्यय से होता है। विदेह, अर्थात् देवताओं का, समाधि भवप्रत्यय से होता है। वे अपने संस्कारों के मात्र उपयोग से चित्त द्वारा कैवल्य पद का सा अनुभव करते हुए अपने संस्कारों के विपाक को उसी प्रकार से अतिवाहन करते हैं। इति। इसी तरह प्रकृतिलय वाले, अधिकार युक्त चित्त के प्रकृति में लीन होने पर कैवल्य पद का सा अनुभव करते हैं, जब तक कि अधिकार के वश में चित्त पुनः आवर्तन नहीं करता।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सत्रहवें सूत्र के अनुसार विदेह वे योगी हैं जिन्होंने विचारानुगत तथा आनन्दानुगत समाधि सिद्ध करके शरीर से आत्माध्यास छोड़ दिया है और प्रकृतिलय वे योगी हैं जिन्होंने सातों प्रकृतियों का साक्षात् करते हुए अस्मितानुगत समाधि का अभ्यास किया है।
कुछ योगी इन दोनों समाधियों की आनंदमय अवस्थाओं को ही आत्मस्थिति समझकर उनमें मग्न रह जाते हैं, किंतु यह वास्तविक मुक्ति नहीं है क्योंकि सांख्यदर्शन (५.७४) के अनुसार 'नानन्दाभिव्यक्तिर्मुक्तिर्निर्धर्मत्वात्' अर्थात आनंद का प्रकट होना मुक्ति नहीं है। सांख्यदर्शन (३.५४) के अनुसार कारण में लय होने से पुरुष को कृतकृत्यता नहीं हो सकती, इसलिए विदेह और प्रकृतिलयों को आत्मस्थिति प्राप्त करने के लिए फिर जन्म लेना पड़ता है और उनकी समाधि 'भवप्रत्यय' कहलाती है।
भवप्रत्यय का अर्थ है कि इनका चित्त पूर्वजन्म के योग-सिद्धिके संस्कार के कारण जन्म से ही असमप्रजात योग में प्रवृत्त होता है। इन योगियों को श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा जैसे साधनों की इस जन्म में आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उन्होंने इनका अभ्यास पूर्वजन्म में कर लिया है। वे पिछले जन्म के संस्कारों के बल पर 'विराम-प्रत्यय' के अभ्यास से असमप्रजात समाधि सिद्ध कर लेते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में ऐसे योगियों को, जिन्होंने शरीर-त्याग से पूर्व स्वरूपावस्था प्राप्त नहीं की, 'योगभ्रष्ट' कहा है।
1.20 · समाधिपाद सूत्र २०
श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ १.२० ॥
अर्थ — दूसरे योगी जो विदेह और प्रकृतिलय नहीं हैं , उनको श्रद्धा , वीर्य , स्मृति , समाधि और प्रज्ञापूर्वक असम्प्रज्ञात - समाधि सिद्ध होती है ।
व्यासभाष्य
उपायप्रत्ययो योगिनां भवति । श्रद्धा चेतसः सम्प्रसादः । सा हि जननीव कल्याणी योगिनं पाति । तस्य हि श्रद्दधानस्य विवेकार्थिनो वीर्यमुपजायते । समुपजातवीर्यस्य स्मृतिरुपतिष्ठते । स्मृत्युपस्थाने अ चित्तमनाकुलं समाधीयते । समाहितचित्तस्य प्रज्ञाविवेक उपावर्तते । येन यथावद्वस्तु जानन्ति । तदभ्यासात्तद्विषयाच्च वैराग्यादसम्प्रज्ञातः समाधिर्भवति ॥२०॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — श्रद्धा वीर्य स्मृति समाधि प्रज्ञा पूर्वकः इतरेषाम्। अन्य योगियों के लिए समाधि श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, और प्रज्ञा से पूर्व होती है। उपाय प्रत्ययः योगिनाम् भवति। योगियों का समाधि उपाय प्रत्यय से होता है। श्रद्धा चेतसः सम्प्रसादः। श्रद्धा चित्त का सम्प्रसाद है। सा हि जननीव कल्याणी योगिनम् पाति। वह माता की तरह कल्याणकारी होकर योगी की रक्षा करती है। तस्य हि श्रद्दधानस्य विवेक अर्थिनः वीर्यम् उपजायते। श्रद्धावान और विवेक की इच्छा रखने वाले के लिए वीर्य उत्पन्न होता है। समुपजात वीर्यस्य स्मृतिः उपतिष्ठते। समुपजात वीर्य वाले के लिए स्मृति उपस्थित होती है। स्मृति उपस्थाने अ चित्तम् अनाकुलम् समाधीयते। स्मृति के उपस्थान से चित्त अनाकुल होकर समाधि में स्थिर होता है। समाहित चित्तस्य प्रज्ञा विवेकः उपावर्तते। समाहित चित्त में प्रज्ञा और विवेक उपजता है। येन यथावत् वस्तु जानन्ति। जिससे यथार्थ वस्तु का ज्ञान होता है। तत् अभ्यास तत् विषयात् च वैराग्यात् असम्प्रज्ञातः समाधिः भवति। उस अभ्यास और उस विषय से वैराग्य के द्वारा असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — विदेह और प्रकृतिलयों से भिन्न योगियों की असम्प्रज्ञात-समाधि श्रद्धा आदि के उपायों द्वारा प्राप्त होती है। योग के विषय में चित्त की प्रसन्नता श्रद्धा, उत्साह वीर्य, पूर्व अनुभव की स्मृति, एकाग्रता समाधि और ज्ञेय का ज्ञान प्रज्ञा कहलाता है। श्रद्धा से वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्य से साधन में तत्परता आती है, जिससे पिछले जन्मों के संस्कारों की स्मृति जागृत होती है।
इस स्मृति से चित्त एकाग्र होकर समाधि प्राप्त करता है और अंततः विवेक-ज्ञान से वस्तु का यथार्थ स्वरूप ज्ञात होता है। सूत्र २० के अनुसार कर्माशय चित्त-भूमि में दो प्रकार से रहते हैं—प्रधान रूप (प्रारब्ध) और उपसर्जन रूप (संचित)। जन्म-जन्मान्तरों में संचित योग के संस्कार निचले स्तर पर दबे होते हैं, जिन्हें श्रद्धा और वीर्य जैसे निमित्त कारणों द्वारा जाग्रत किया जाता है।
यहाँ श्रद्धा-वीर्य केवल रुकावट हटाने वाले निमित्त मात्र हैं, जबकि वास्तविक उपादान कारण निचली भूमियों में संचित योग के संस्कार ही हैं। कैवल्यपाद सूत्र २ के अनुसार एक जाति से दूसरी जाति में परिवर्तन प्रकृतियों (उपादान कारणों) के भरने से होता है। जैसे किसान मेड़ काटकर पानी को खेत में आने देता है, वैसे ही श्रद्धा-वीर्य केवल रुकावट हटाते हैं और योग के संस्कार स्वयं प्रकट होकर प्रधान रूप धारण कर लेते हैं।
1.21 · समाधिपाद सूत्र २१
तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ १.२१ ॥
शब्दार्थ — तीव्र · संवेगानाम् · आसन्नः
अर्थ — तीव्र संवेग ' और अधिमात्र उपायवाले योगियोंको समाधि - लाभ शीघ्रतम होता है ।
व्यासभाष्य
ते खलु नव योगिनो मृदुमध्याधिमात्रोपायो भवन्ति, तद्यथा—मृदूपायो मध्योपायोऽधिमात्रोपाय इति । तत्र मृदूपायस्त्रिविधः—मृदुसंवेगो मध्यसंवेगस्तीव्रसंवेग इति । तथा मध्योपायस्तथाधिमात्रोपाय इति । तत्राधिमात्रोपायानां— समाधिलाभः समाधिफलं च भवतीति ॥२१॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तीव्र संवेगानाम् आसन्नः। तीव्र संवेग वालों के लिए समाधि निकट है। नौ प्रकार के योगी होते हैं—मृदु, मध्य, और अधिमात्र उपाय वाले, जैसे कि मृदु उपाय, मध्य उपाय, और अधिमात्र उपाय। प्रकार का है—मृदु संवेग, मध्य संवेग, और तीव्र संवेग। इसी तरह मध्य उपाय और अधिमात्र उपाय भी। अधिमात्र उपाय वालों के लिए समाधि की प्राप्ति और समाधि का फल होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — भाष्यकारों ने इस सूत्र के आदि में 'अधिमात्रोपायानाम्' और 'समाधिलाभः समाधिफलं च भवति इति' को सम्बद्ध किया है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिनका उपाय अधिमात्र और संवेग तीव्र है, उन उपाय-प्रत्यय योगियों को समाधि तथा उसके फल यानी कैवल्य का लाभ शीघ्रतम प्राप्त होता है। उपर्युक्त नौ प्रकार के उपाय-प्रत्यय योगियों में से उन्हें सबसे अधिक शीघ्रता से समाधि और उसका फल प्राप्त होता है। इनकी अपेक्षा अधिमात्र उपाय मध्य संवेगवालों को कुछ विलम्ब से और इनसे अधिक विलम्ब से अधिमात्र उपाय मृदु संवेगवालों को प्राप्त होगा। इसी प्रकार जितनी उपायों और संवेग की न्यूनता होती है, उतना ही विलम्ब से समाधिलाभ होता है। जितनी उपायों और संवेग की अधिकता होती है, उतना ही शीघ्र समाधिलाभ होता है।
1.22 · समाधिपाद सूत्र २२
मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः ॥ १.२२ ॥
शब्दार्थ — मृदु · मध्य · अधिमात्रत्वात् · ततः · अपि · विशेषः
अर्थ — मृदु , मध्य , अधिमात्र – ये तीन भेद होनेसे मृदु तीव्र संवेगवालों और मध्य तीव्र संवेगवालोंके समाधि - लाभसे भी अधिमात्र तीव्र संवेगवालोंको समाधिलाभमें विशेषता है ।
व्यासभाष्य
मृदुतीव्रो मध्यतीव्रोऽधिमात्रतीव्र इति । ततोऽपि विशेषः, तद्विशेषान्मृदुतीव्रसंवेगस्यासन्नः, ततो मध्यतीव्रसंवेगस्यासन्नतरः, तस्मादधिमात्रतीव्रसंवेगस्याधिमात्रोपायस्याप्यासन्नतमः समाधिलाभः समाधिफलं चेति ॥२२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — मृदु मध्य अधिमात्रत्वात् ततः अपि विशेषः। मृदु, मध्य, और अधिमात्र होने से उसमें भी विशेषता है। मृदु तीव्र, मध्य तीव्र, और अधिमात्र तीव्र। उसमें भी विशेषता है, उस विशेषता से मृदु तीव्र संवेग वाले के लिए समाधि निकट है, मध्य तीव्र संवेग वाले के लिए और निकटतर, और अधिमात्र तीव्र संवेग और अधिमात्र उपाय वाले के लिए सबसे निकटतम समाधि की प्राप्ति और समाधि का फल होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पूर्व सूत्र में बताए गए तीव्र संवेग के तीन भेद होते हैं, जो मृदु, मध्य और अधिमात्र हैं। वाचस्पति मिश्र ने संवेग का अर्थ वैराग्य माना है, किंतु विज्ञानभिक्षु के योगवार्तिक तथा भोजवृत्ति में इसका अर्थ उपाय के अनुष्ठान में शीघ्रता और क्रिया हेतु दृढ़तर संस्कार बताया गया है। इस प्रकार तीव्र संवेग के तीन प्रकार हुए। इसमें बताया गया है कि अधिमात्र-उपाय मध्य संवेग वाले आठवें श्रेणी के योगियों की अपेक्षा से अधिमात्र-उपाय मृदु-तीव्र संवेग वाले योगियों को शीघ्र समाधि-लाभ होता है। साथ ही, अधिमात्र-उपाय मध्य-तीव्र संवेग वाले योगियों को शीघ्रतर और अधिमात्र-उपाय अधिमात्र-तीव्र संवेग वाले योगियों को शीघ्रतम समाधिलाभ प्राप्त होता है। इन अधिमात्रोपाय अधिमात्र तीव्र संवेग वाले योगियों में पूर्व के दोनों योगियों से यह अत्यन्त शीघ्रतारूप समाधि-लाभ में विशेषता है।
1.23 · समाधिपाद सूत्र २३
ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ १.२३ ॥
शब्दार्थ — ईश्वर · प्रणिधानात् · वा
अर्थ — अथवा ईश्वर - प्रणिधानसे शीघ्रतम समाधि - लाभ होता है ।
व्यासभाष्य
किमेतस्मादेवासन्नतमः समाधिर्भवत्यथास्य लाभे भवत्यन्योऽपि कश्चिदुपायः, न वेति ? प्रणिधानाद्भक्तिविशेषादावर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णात्यभिध्यानमात्रेण । तदभिध्यानमात्रादपि योगिन आसन्नतमः समाधिलाभः समाधिफलं च भवतीति ॥२३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ईश्वर प्रणिधानात् वा। ईश्वर प्रणिधान से भी समाधि प्राप्त होती है। क्या केवल इससे ही सबसे निकटतम समाधि प्राप्त होती है, या इसके लाभ के लिए कोई अन्य उपाय भी है, या नहीं? प्रणिधानात् भक्ति विशेषात् आवर्जितः ईश्वरः तम् अनुगृह्णाति अभिध्यान मात्रेण। विशेष भक्ति के प्रणिधान से आवर्जित ईश्वर केवल अभिध्यान मात्र से उसका अनुग्रह करता है। तत् अभिध्यान मात्रात् अपि योगिनः आसन्नतमः समाधि लाभः समाधि फलम् च भवति इति। उस अभिध्यान मात्र से भी योगी को सबसे निकटतम समाधि की प्राप्ति और समाधि का फल प्राप्त होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — इस सूत्र में 'विशेष' पद का पूर्वसूत्र से अनुवर्तन होने पर शीघ्रतम समाधि-लाभ प्राप्त होता है। पूर्वोक्त अधिमात्र उपाय के तीव्र संवेग से या सत्य-संकल्प द्वारा ईश्वर में भक्ति विशेष करने से, अर्थात् कायिक, वाचिक, मानसिक क्रियाओं को उसके अधीन करने और कर्मों व फलों को समर्पित करने तथा उसके गुणों व स्वरूप का चिन्तन करने से शीघ्रतम समाधि-लाभ होता है। साधनपाद सूत्र १ एवं ३२ में ईश्वर-प्रणिधान का सामान्य अर्थ ईश्वर की भक्ति विशेष और शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण, अन्तःकरण आदि सब करणों, उनसे होने वाले सारे कर्मों और उनके फलों अर्थात् सारे बाह्य और आभ्यन्तर जीवन को ईश्वर को समर्पित कर देना है। किंतु विशेष रूप से यहाँ ईश्वर-प्रणिधान से जो सूत्रकार का अभिप्राय है, वह अट्ठाईसवें सूत्र में कहा जाएगा।
1.24 · समाधिपाद सूत्र २४
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ १.२४ ॥
शब्दार्थ — क्लेश · कर्म · विपाक · आशयैः · अपरामृष्टः · पुरुष · विशेषः · ईश्वरः
अर्थ — क्लेश , कर्म , कर्मोंके फल और वासनाओंसे असम्बद्ध , अन्य पुरुषोंसे विशेष ( विभिन्न उत्कृष्ट ) चेतन ईश्वर है ।
व्यासभाष्य
अविद्यादयः क्लेशाः । कुशलाकुशलानि कर्माणि । तत्फलं विपाकः । तदनुगुणा वासना आशयः । ते च मनसि वर्तमानाः पुरुषे व्यपदिश्यन्ते । स हि तत्फलस्य भोक्तेति । यथा जयः पराजयो वा योद्धृषु वर्तमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते । यो ह्यनेन भोगेनापरामृष्टः स पुरुषविशेष ईश्वरः । कैवल्यं प्राप्तास्तर्हि सन्ति च बहवः केवलिनः । ते हि त्रीणि बन्धनानि छित्त्वा कैवल्यं प्राप्ताः । ईश्वरस्य च तत्सम्बन्धो न भूतो न भावी । यथा मुक्तस्य पूर्वा बन्धकोटिः प्रज्ञायते, नैवमीश्वरस्य ।
यथा वा प्रकृतिलीनस्योत्तरा बन्धकोटिः सम्भाव्यते, नैवमीश्वरस्य । स तु सदैव मुक्तः सदैवेश्वर इति । योऽसौ प्रकृष्टसत्त्वोपादानादीश्वरस्य शाश्वतिक उत्कर्षः, स किं सनिमित्त आहो स्विन्निर्निमित्त इति ? तस्य शास्त्रं निमित्तम् । शास्त्रं पुनः किंनिमित्तं ? प्रकृष्टसत्त्वनिमित्तम् । एतयोः शास्त्रोत्कर्षयोरीश्वरसत्त्वे वर्तमानयोरनादिः सम्बन्धः । एतस्मादेतद्भवति सदैवेश्वरः सदैव मुक्त इति । तच्च तस्यैश्वर्यं साम्यातिशयविनिर्मुक्तम् । न तावदैश्वर्यान्तरेण तदतिशय्यते ।
यदेवातिशयि स्यात्तदेव तत्स्यात। तस्माद्यत्र काष्ठाप्राप्तिरैश्वर्यस्य स ईश्वरः । न च तत्समानमैश्वर्यमस्ति । कस्मात्? द्वयोस्तुल्ययोरेकस्मिन्युगपत्कामितेऽर्थे नवमिदमस्तु पुराणमिदमस्त्वित्येकस्य सिद्धावितरस्य प्राकाम्यविधातादूनत्वं प्रसक्तम् । द्वयोश्च तुल्ययोर्युगपत्कामितार्थप्राप्तिर्नास्ति । अर्थस्य विरुद्धत्वात। तस्माद्यस्य साम्यातिशयैर्विनिर्मुक्तमैश्वर्यं स एवेश्वरः । स च पुरुषविशेष इति ॥२४॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — क्लेश कर्म विपाक आशयैः अपरामृष्टः पुरुष विशेषः ईश्वरः। क्लेश, कर्म, विपाक, और आशय से अपरामृष्ट पुरुष विशेष ही ईश्वर है। अविद्या आदि क्लेश हैं। कुशल और अकुशल कर्म हैं। उनका फल विपाक है। उनके अनुगुण वासना आशय है। वे मन में विद्यमान होकर पुरुष में व्यपदिष्ट होते हैं। वह उनका फल भोक्ता है। जैसे जय या पराजय योद्धाओं में होकर स्वामी में व्यपदिष्ट होती है। जो इस भोग से अपरामृष्ट है, वही पुरुष विशेष ईश्वर है। कैवल्य प्राप्त करने वाले बहुत से केवलिन हैं।
उन्होंने तीन बंधनों को छेदकर कैवल्य प्राप्त किया। ईश्वर का उससे संबंध न भूतकाल में था न भविष्य में होगा। जैसे मुक्त पुरुष की पूर्व बंधन सीमा प्रज्ञायमान होती है, वैसे ईश्वर की नहीं। जैसे प्रकृतिलीन की उत्तर बंधन सीमा सम्भावित होती है, वैसे ईश्वर की नहीं। वह सदा मुक्त और सदा ईश्वर है। ईश्वर का वह शाश्वत उत्कर्ष, जो प्रकृष्ट सत्त्व के उपादान से है, क्या वह सनिमित्त है या निर्निमित्त? तस्य शास्त्रम् निमित्तम्। उसका निमित्त शास्त्र है। शास्त्रम् पुनः किम् निमित्तम्। है।
एतयोः शास्त्र उत्कर्षयोः ईश्वर सत्त्वे वर्तमानयोः अनादिः सम्बन्धः। इन शास्त्र और उत्कर्ष का ईश्वर सत्त्व में विद्यमान अनादि संबंध है। एतस्मात् एतत् भवति सदैव ईश्वरः सदैव मुक्तः इति। इससे वह सदा ईश्वर और सदा मुक्त होता है। तत् च तस्य ऐश्वर्यम् साम्य अतिशय विनिर्मुक्तम्। उसका ऐश्वर्य साम्य और अतिशय से मुक्त है। न तावत् ऐश्वर्य अन्तरेण तत् अतिशय्यते। अन्य ऐश्वर्य से अतिशयित नहीं होता। जो अतिशय करने वाला हो, वही वह होगा। तस्मात् यत्र काष्ठा प्राप्तिः ऐश्वर्यस्य सः ईश्वरः।
इसलिए जहाँ ऐश्वर्य की काष्ठा प्राप्ति है, वही ईश्वर है। न च तत् सामानम् ऐश्वर्यम् अस्ति। उसके समान ऐश्वर्य नहीं है। कस्मात्। द्वयोः तुल्ययोः एकस्मिन् युगपत् कामिते अर्थे नवम् इदम् अस्तु पुराणम् इदम् अस्तु इति एकस्य सिद्धौ इतरस्य प्राकाम्य विधातात् ऊनत्वम् प्रसक्तम्। दो समान ऐश्वर्य वालों में एक साथ कामित अर्थ में यह नया हो, यह पुराना हो, इस प्रकार एक की सिद्धि में दूसरे की प्राकाम्य की कमी प्रसक्त होती है। द्वयोः च तुल्ययोः युगपत् कामित अर्थ प्राप्तिः न अस्ति।
दो समान वालों की एक साथ कामित अर्थ की प्राप्ति नहीं होती। अर्थ के विरुद्ध होने से। तस्मात् यस्य साम्य अतिशयैः विनिर्मुक्तम् ऐश्वर्यम् सः एव ईश्वरः। इसलिए जिसका ऐश्वर्य साम्य और अतिशय से मुक्त है, वही ईश्वर है। सः च पुरुष विशेषः इति। वह पुरुष विशेष है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — क्लेश वे दुःख देने वाले तत्व हैं जो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—इन पाँच प्रकार के होते हैं। सूत्र (२.३) में इन क्लेशों से धर्म-अधर्म अर्थात् शुभ-अशुभ उत्पन्न होने का वर्णन है। सकाम कर्मों के फल सुख-दुःख रूप जाति, आयु और भोग को विपाका कहते हैं, जबकि अभी तक फल न दे पाने वाले संस्कार वासना या आशय कहलाते हैं। ईश्वर वह विशेष चेतन है जो क्लेश, कर्म, विपाका और वासनाओं से तीनों काल में पूर्णतः रहित है। ईशनशील अर्थात् इच्छा मात्र से संपूर्ण जगत के उद्धार करने में समर्थ ईश्वर का यह ऐश्वर्य अनादि विशुद्ध सत्त्वगुणमय चित्त और उत्कृष्ट ज्ञान के साथ अनादि योग से है। मुक्त पुरुष क्लेशयुक्त होकर साधन द्वारा मुक्ति प्राप्त करते हैं, जबकि ईश्वर सदा ही क्लेशों से अपरामृष्ट होने के कारण सदैव मुक्त है। उपनिषदों में भी बताया गया है कि ईश्वर का ज्ञान, बल और क्रिया स्वाभाविक और नित्य हैं। जड़ पदार्थ बिना चेतन की प्रेरणा के कार्य नहीं कर सकता, इसलिए शुद्ध सत्त्वोपाधिक नित्य-ज्ञान-क्रियैश्वर्यशाली चेतनभूत ईश्वर को मानना ही पड़ेगा। ईश्वर वह विशेष पुरुष है जो तीनों काल में क्लेशादिके सम्बन्ध से रहित है और जिसका ऐश्वर्य अन्यों से भिन्न एवं अनादि है।
1.25 · समाधिपाद सूत्र २५
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥ १.२५ ॥
शब्दार्थ — तत्र · निरतिशयम् · सर्वज्ञ · बीजम्
अर्थ — उस पूर्वोक्त ईश्वरमें सर्वज्ञताका बीज अतिशय ( बढ़ती ) - सर्वज्ञताका बीज है । रहित है ।
व्यासभाष्य
यदिदमतीतानागतप्रत्युत्पन्नप्रत्येकसमुच्चयातीन्द्रियग्रहणमल्पं बह्विति सर्वज्ञबीजमेतद्धि वर्धमानं यत्र निरतिशयं स सर्वज्ञः । अस्ति काष्ठाप्राप्तिः सर्वज्ञबीजस्य सातिशयत्वात्परिमाणवदिति । यत्र काष्ठाप्राप्तिर्ज्ञानस्य स सर्वज्ञः । स च पुरुषविशेष इति । सामान्यमात्रोपसंहारे च कृतोपक्षयमनुमानं न विशेषप्रतिपत्तौ समर्थमिति । यस्य संज्ञादिविशेषप्रतिपत्तिरागमतः पर्यन्वेष्या, तस्यात्मानुग्रहाभावेऽपि भूतानुग्रहः प्रयोजनं, ज्ञानधर्मोपदेशेन कल्पप्रलयमहाप्रलयेषु संसारिणः पुरुषानुद्धरिष्यामीति । तथा चोक्तं—आदिविद्वान्निर्माणचित्तमधिष्ठाय कारुण्याद्भगवान्परमर्षिरासुरये जिज्ञासमानाय तन्त्रं प्रोवाच इति ॥२५॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत्र निरतिशयम् सर्वज्ञ बीजम्। वहाँ निरतिशय सर्वज्ञता का बीज है। एतत् हि वर्धमानम् यत्र निरतिशयम् सः सर्वज्ञः। जो अतीत, अनागत, प्रत्युत्पन्न, प्रत्येक, समुच्चय, और अतीन्द्रिय ग्रहण अल्प और बहुत है, वह सर्वज्ञता का बीज है, जो वर्धमान होकर जहाँ निरतिशय है, वह सर्वज्ञ है। अस्ति काष्ठा प्राप्तिः सर्वज्ञ बीजस्य सातिशयत्वात् परिमाणवत् इति। सर्वज्ञ बीज की काष्ठा प्राप्ति सातिशय होने के कारण परिमाणवत् है। यत्र काष्ठा प्राप्तिः ज्ञानस्य सः सर्वज्ञः।
जहाँ ज्ञान की काष्ठा प्राप्ति है, वह सर्वज्ञ है। सः च पुरुष विशेषः इति। वह पुरुष विशेष है। सामान्यमात्र उपसंहारे च कृत उपक्षयम् अनुमानम् न विशेष प्रतिपत्तौ समर्थम् इति। सामान्य मात्र के उपसंहार में अनुमान विशेष की प्राप्ति में समर्थ नहीं है। यस्य संज्ञा आदि विशेष प्रतिपत्तिः आगमातः पर्यन्वेष्या तस्य आत्म अनुग्रह अभावे अपि भूत अनुग्रहः प्रयोजनम् ज्ञान धर्म उपदेशेन कल्प प्रलय महाप्रलयेषु संसारिणः पुरुषान् उद्धरिष्यामि इति।
जिसकी संज्ञा आदि विशेष की प्राप्ति आगम से अन्वेषणीय है, उसका आत्मानुग्रह के अभाव में भी भूतों का अनुग्रह प्रयोजन है, ज्ञान और धर्म के उपदेश से कल्प, प्रलय, और महाप्रलय में संसारी पुरुषों का उद्धार करूँगा। चित्तम् अधिष्ठाय कारुण्यात् भगवान् परमर्षिः आसुरये जिज्ञासमानाय तन्त्रम् प्रोवाच इति। ऐसा कहा गया है कि आदि विद्वान् परमर्षि ने कारुण्य से निर्माण चित्त को अधिष्ठाय जिज्ञासु आसुरि को तंत्र का उपदेश दिया।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अतीत, अनागत और वर्तमान के अतीन्द्रिय पदार्थों का सत्त्वगुण की न्यूनाधिकता के कारण होने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान सर्वज्ञता का बीज है। किसी योगी का एक या अधिक अतीन्द्रिय वस्तुओं का प्रत्यक्ष ज्ञान सातिशय कहलाता है, जो वृद्धिको प्राप्त होते हुए जहाँ सीमा (काष्ठा) को प्राप्त होता है, वह निरतिशय हो जाता है। जिस प्रकार अणु और महत् परिमाण की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं, वैसे ही सर्वज्ञता का बीजरूप सातिशय ज्ञान बढ़ते हुए परम काष्ठा पर पहुँचकर निरतिशय बन जाता है और वही सर्वज्ञ, सदा मुक्त ईश्वर है। भाष्यकार के अनुसार यह सामान्य दृष्टि से अनुमान द्वारा ईश्वर के सर्वज्ञ होने का समाधान है, जबकि उसकी विशेष प्राप्ति वेदों में खोजनी चाहिए। संसार की रचना में जीवों के भोग-अपवर्गरूप अनुग्रह का प्रयोजन है, जिसके कारण ईश्वर दयालुता से सृष्टि के आरम्भ में वेदों का उपदेश करता है। जैसे कपिलमुनि ने योगबल से निर्मित चित्त को आश्रयण कर जिज्ञासुों के कल्याणार्थ पच्चीस तत्त्वों वाले सांख्य दर्शन का उपदेश दिया, वैसे ही ईश्वर भी ज्ञान और धर्मोपदेश द्वारा मनुष्यों का उद्धार करता है।
1.26 · समाधिपाद सूत्र २६
स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात ॥ १.२६ ॥
शब्दार्थ — सः · पूर्वेषाम् · अपि · गुरुः · कालेन · अनवच्छेदात्
अर्थ — वह ईश्वर पूर्व उत्पन्न हुए ब्रह्मादिकोंका भी गुरु है ; क्योंकि वह कालसे परिच्छिन्न ( परिमित ) नहीं है ।
व्यासभाष्य
पूर्वं हि गुरवः कालेनावच्छिद्यन्ते । यत्रावच्छेदार्थेन कालो नोपावर्तते, स एष पूर्वेषामपि गुरुः । यथास्य सर्गस्यादौ प्रकर्षगत्या सिद्धस्तथातिक्रान्तसर्गादिष्वपि प्रत्येतव्यः ॥२६॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — वह काल से अनवच्छिन्न होने के कारण पूर्वजनों का भी गुरु है। पूर्व के गुरु काल से अवच्छिन्न होते हैं। जहाँ काल अवच्छेद के अर्थ में नहीं आता, वह पूर्वजनों का भी गुरु है। जैसे इस सर्ग के आदि में प्रकर्ष गति से सिद्ध है, वैसे ही अतिक्रान्त सर्गों में भी प्रत्येतव्य है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — ईश्वर काल से अपरिच्छिन्न और सर्वदा विद्यमान होने के कारण ही वह ब्रह्मा आदि सृष्टि के सृजनकर्ता और ज्ञान का आधार है। यजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद् के अनुसार ईश्वर ने ही ब्रह्मा को वेद-ज्ञान का प्रकाश दिया, अतः वह समस्त गुरुओं का गुरु और उपदेष्टा है। गुरु-शिष्य का संबंध केवल आध्यात्मिक होता है जिसमें आत्मोन्नति ही उद्देश्य होता है, इसलिए ईश्वर को ही परम गुरु की भावना से उपासना करना चाहिए। योग मार्ग में पथदर्शक ऐसा होना चाहिए जो किसी संकीर्ण उपासना या स्वार्थ से परे होकर केवल एक सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और निःस्वार्थ परमेश्वर का उपासक हो। सच्चा पथदर्शक वह है जो राग-द्वेष और पाखंडों से मुक्त होकर बिना किसी वैयक्तिक लगाव के सभी की आत्मोन्नति में सहायता करने वाला हो। साधकों को स्वयं का आत्मपरीक्षण करना चाहिए कि उनकी जिज्ञासा सच्ची है या वे केवल सांसारिक कामनाओं और स्वार्थ के कारण इस मार्ग पर आए हैं। तुलसीकृत रामायण और बाबूराम 'ब्रह्म' की पंक्तियों के माध्यम से गुरु की महिमा बताते हुए कहा गया है कि गुरु ही साक्षात् ब्रह्म हैं और उनके चरणों में समर्पित होकर ही जीव का उद्धार संभव है।
1.27 · समाधिपाद सूत्र २७
तस्य वाचकः प्रणवः ॥ १.२७ ॥
शब्दार्थ — तस्य · वाचकः · प्रणवः
अर्थ — उस ईश्वरका बोधक शब्द ओ ३ म् है ।
व्यासभाष्य
वाच्य ईश्वरः प्रणवस्य । किमस्य सङ्केतकृतं वाच्यवाचकत्वमथ प्रदीपप्रकाशवदवत्स्थितमिति । स्थितोऽस्य वाच्यस्य वाचकेन सह सम्बन्धः । सङ्केतस्त्वीश्वरस्य स्थितमेवार्थमभिनयति । यथावस्थितः पितापुत्रयोः सम्बन्धः सङ्केतेनावद्योत्यते, अयमस्य पिता, अयमस्य पुत्र इति । सर्गान्तरेष्वपि वाच्यवाचकशक्त्यपेक्षस्तथैव सङ्केतः क्रियते । सम्प्रतिपत्तिनित्यतया नित्यः शब्दार्थसम्बन्ध इत्यागमिनः प्रतिजानते ॥२७॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तस्य वाचकः प्रणवः। उसका वाचक प्रणव है। प्रणव का वाच्य ईश्वर है। क्या इसका वाच्य-वाचकत्व संकेत से निर्मित है या प्रदीप और प्रकाश की तरह अवस्थित है? स्थितः अस्य वाच्यस्य वाचकेन सह सम्बन्धः। वाच्य का वाचक के साथ संबंध अवस्थित है। अर्थम् अभिनयति। संकेत ईश्वर के अवस्थित अर्थ का ही अभिनय करता है। यथा अवस्थितः पिता पुत्रयोः सम्बन्धः सङ्केतेन अवद्योत्यते अयम् अस्य पिता अयम् अस्य पुत्रः इति। जैसे पिता और पुत्र का अवस्थित संबंध संकेत से अवद्योतित होता है—यह इसका पिता है, यह इसका पुत्र है। सर्ग अन्तरेषु अपि वाच्य वाचक शक्ति अपेक्षः तथा एव सङ्केतः क्रियते। सर्गांतरों में भी वाच्य-वाचक शक्ति की अपेक्षा से वैसा ही संकेत किया जाता है। सम्प्रतिपत्ति नित्यतया नित्यः शब्द अर्थ सम्बन्धः इति आगमिनः प्रतिजानते। सम्प्रतिपत्ति की नित्यता से शब्द और अर्थ का संबंध नित्य है, ऐसा आगम वाले प्रतिज्ञा करते हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जिस शब्द से कोई अर्थ बोध होता है वह वाचक कहलाता है और उस शब्द से जो बोध्य अर्थ होता है वह वाच्य कहलाता है। भोजवृत्ति के अनुसार 'प्रणव' अर्थात 'ओ३म्' वह शब्द है जिसकी उत्तमता से भक्त स्तुति करते हैं। ईश्वर व्यापक ऐश्वर्यवाला वाच्य है और ओ३म वाचक है, जिनका आपसी संबंध नित्य है। यह संबंध संकेत-जन्य नहीं बल्कि प्रकाश मात्र है, जैसे पिता-पुत्र का संबंध केवल बतलाया जाता है, उत्पन्न नहीं होता। सूत्र २७ की व्याख्या में वाच्य ईश्वर और वाचक प्रणव के अनादि संबंध को दिखाया गया है। यद्यपि वास्तविक प्रणव केवल ध्यान द्वारा अनुभव योग्य है, फिर भी उपासना हेतु वर्णात्मक ओ३म (अ, उ, म्) का प्रयोग किया जाता है। इस वाचक प्रणव और वाच्य ईश्वर में अविमिश्र संबंध है, जहाँ से योगी समाधि प्राप्त करने में सहायक होता है। योगमार्ग पर चलने वालों के लिए 'ओ३म्' ही मुख्य अनादि नाम है क्योंकि अन्य सभी अर्थ गौण हैं। मु. २.४ के अनुसार प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है जिसे सावधानी से भेदना चाहिए।
अन्य स्रोत: भोजवृत्ति
1.28 · समाधिपाद सूत्र २८
तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ १.२८ ॥
शब्दार्थ — तत् · जपः · तत् · अर्थ · भावनम्
अर्थ — उस ओ ३ म् शब्दका जप और उसके अर्थभूत ईश्वरका ध्यान करना ( पुनः - पुनः चिन्तन करना ) ईश्वर - प्रणिधान है ।
व्यासभाष्य
विज्ञातवाच्यवाचकत्वस्य योगिनः— प्रणवस्य जपः प्रणवाभिधेयस्य चेश्वरस्य भावनम् । तदस्य योगिनः प्रणवं जपतः प्रणवार्थं च भावयतश्चित्तमेकाग्रं सम्पद्यते । तथा चोक्तम्— स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत्। स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्म प्रकाशते ॥ इति ॥२८॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत् जपः तत् अर्थ भावनम्। उस (प्रणव) का जप और उसके अर्थ की भावना। वाच्य-वाचकत्व को जानने वाले योगी के लिए प्रणव का जप और प्रणव के अभिधेय ईश्वर की भावना। इससे योगी का, प्रणव का जप करते और प्रणव के अर्थ की भावना करते हुए, चित्त एकाग्र हो जाता है। ऐसा कहा गया है—स्वाध्याय से योग प्राप्त करें, योग से स्वाध्याय लाएँ, स्वाध्याय और योग की सम्पत्ति से परमात्मा प्रकाशित होता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — ओ ३ म्का मानसिक जप और उसके अर्थ यानी ईश्वर के गुणों की बार-बार भावना करना ही ईश्वर-प्रणिधान है। इस भावना से चित्त के क्लेश, सकाम कर्म और वासनाओं के संस्कार धुल जाते हैं और सात्त्विक शुद्ध ज्ञान के संस्कार उदय होते हैं। श्रीव्यासजी महाराज ने अपने भाष्य में बतलाया है कि स्वाध्याय से योग प्राप्त होता है और योग से स्वाध्याय प्राप्त होता है, जिससे परमात्मा प्रकाशित होते हैं।
ईश्वर-प्रणिधान से शीघ्रतम असम्प्रज्ञात-समाधि प्राप्त होती है, जिसमें ओ ३ म्का जाप के साथ पहले सूत्र २४, २५ और २६ में बताए गए गुणों की भावना और फिर एकाग्र वृत्ति से मानसिक जाप करना शामिल है। सूत्र २८ के अनुसार, जाग्रत अवस्था में स्थूल शरीर के संबंध से आत्मा का शबल स्वरूप 'विश्व' है, स्वप्न या सम्प्रज्ञात-समाधि में सूक्ष्म शरीर के संबंध से 'तेजस' है, और सुषुप्ति या विवेकख्याति में कारण-शरीर के संबंध से 'प्राज्ञ' है।
इसी प्रकार समस्त संसार के संबंध से परमात्मा के शबल स्वरूप की संज्ञा क्रमशः 'विराट', 'हिरण्यगर्भ' और 'ईश्वर' है। ऋग्वेद के अनुसार परमात्मा इन सब से कहीं बड़ा है, जहाँ सारे भूत उसका एक पाद हैं और तीन पाद अमृत स्वरूप अपने प्रकाश में हैं। ओ ३ म्का की व्याख्या में अकार विराट का बोधक है, उकार हिरण्यगर्भ का, मकार ईश्वर का और विराम शुद्ध निर्गुण परमात्मास्वरूप का है।
माण्डूक्योपनिषद् के अनुसार ओ ३ म्के चार पाद हैं जिनमें प्रथम पाद में अकार (विराट, विश्व, अग्नि), दूसरे पाद में उकार (हिरण्यगर्भ, तैजस, वायु), तीसरे पाद में मकार (ईश्वर, प्राज्ञ, आदित्य) और चौथे पाद में मात्रारहित विराम शामिल है। ओ ३ म्का की उपासना के अंतर्गत पहले पाद में अकार का जाप, दूसरे पाद में दो मात्रा वाले उकार का मानसिक जाप, तीसरे पाद में तीन मात्रा वाले पूरे ओ३म का ध्यान और चौथे पाद में मात्रारहित विराम यानी शुद्ध परमात्मास्वरूप में अवस्थिति शामिल है।
अंततः जब साधक पूर्ण वैराग्य प्राप्त कर लेता है और सत्त्व गुण रजस को दबा देता है, तब विवेकख्याति के माध्यम से आत्मा का साक्षात् होता है और परम लक्ष्य आत्मस्थिति या समाधि प्राप्त होती है।
1.29 · समाधिपाद सूत्र २९
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ १.२९ ॥
शब्दार्थ — ततः · प्रत्यक् · चेतना · अधिगमः · अपि · अन्तराय · अभावः · च
अर्थ — उस ईश्वर - प्रणिधानसे प्रत्यक्चेतनाका ज्ञान भी होता है और अन्तरायों ( विघ्नों अभाव होता है । - प्रत्यक्चेतना = प्राज्ञ | …
व्यासभाष्य
ये तावदन्तराया व्याधिप्रभृतयस्ते तावदीश्वरप्रणिधानान्न भवन्ति । स्वरूपदर्शनमप्यस्य भवति । यथैवेश्वरः पुरुषः शुद्धः प्रसन्नः केवलोऽनुपसर्गस्तथायमपि बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुष इत्येवमधिगच्छति ॥२९॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ततः प्रत्यक् चेतना अधिगमः अपि अन्तराय अभावः च। इससे प्रत्यक् चेतना का अधिगम और अंतरायों का अभाव होता है। जो व्याधि आदि अंतराय हैं, वे ईश्वर प्रणिधान से नहीं होते। इसका स्वरूप दर्शन भी होता है। जैसे ईश्वर पुरुष शुद्ध, प्रसन्न, केवल, और अनुपसर्ग है, वैसे ही यह भी बुद्धि का प्रतिसंवेदी पुरुष है, ऐसा अधिगम करता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — भोजवृत्ति के अनुसार जो दृक्शक्ति विषयों को छोड़कर अपने अन्तःकरण में सम्मुख प्रवृत्त होती है, वह प्रत्यक्चेतना है। ईश्वर-प्रणिधान से केवल शीघ्रतम समाधि ही नहीं मिलती, बल्कि योग-विघ्नों की निवृत्ति के साथ-साथ प्रत्यक्चेतना के स्वरूप का भी साक्षात्कार हो जाता है। उपास्य के गुणों की भावना करने से उपासक में उन गुणों का समावेश होता है क्योंकि जीव और ईश्वर चेतन, कूटस्थ, नित्य और क्लेशादि रहित होने में सदृश हैं। वाचस्पति मिश्र के अनुसार जो विपरीत जानता और चेतन है वह प्रत्यक्चेतन है, अर्थात अविद्याविशिष्ट जीव। चूंकि जीव ईश्वर से चेतनता धर्म में सदृश है, इसलिए ईश्वरोपासना से जीव-ईश्वर दोनों का ज्ञान होता है। विशेष वक्तव्य सूत्र २९ के अनुसार प्रत्यक्-चेतना प्राज्ञ का बोधक है और प्रतिबिम्बित चित्त अर्थात् कारण-शरीर के सम्बन्ध से आत्मा का नाम है। तीन मात्रा वाले पूरे ओम् की उपासना की अस्मिता-भूमि में प्रत्यक्चेतना का साक्षात्कार होता है। चित्त की उच्चतम एकाग्रता से रजस्-तमस का आवरण हट जाने पर सत्त्व की निर्मलता और योग के अन्तरायों का अभाव होता है, जो असमप्रजाप्त-समाधि से पूर्व ईश्वर-प्रणिधान का विशेष फल है।
1.30 · समाधिपाद सूत्र ३०
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ १.३० ॥
शब्दार्थ — व्याधि · स्त्यान · संशय · प्रमाद · आलस्य · अविरति · भ्रान्ति · दर्शन · अलब्ध · भूमिकत्व · अनवस्थितत्वानि · चित्त · विक्षेपाः · ते · अन्तरायाः
अर्थ — व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, और अनवस्थितत्व—ये चित्त के विक्षेप और अंतराय हैं। नव अन्तरायाः चित्तस्य विक्षेपाः। नौ अंतराय चित्त के विक्षेप हैं। सह एते चित्त वृत्तिभिः भवन्ति। ये चित्तवृत्तियों के साथ होते हैं।
व्यासभाष्य
नवान्तरायाश्चित्तस्य विक्षेपाः । सहैते चित्तवृत्तिभिर्भवन्ति । एतेषामभावे न भवन्ति पूर्वोक्ताश्चित्तवृत्तयः । तत्र व्याधिर्धातुरसकरणवैषम्यम् । स्त्यानमकर्मण्यता चित्तस्य । संशय उभयकोटिस्पृग्विज्ञानं स्यादिदमेवं नैवं स्यादिति । प्रमादः समाधिसाधनानामभावनम् । आलस्यं कायस्य चित्तस्य च गुरुत्वादप्रवृत्तिः । अविरतिश्चित्तस्य विषयसम्प्रयोगात्मा गर्धः । भ्रान्तिर्दर्शनं विपर्ययज्ञानम् । अलब्धभूमिकत्वं समाधिभूमेरलाभः अनवस्थितत्वं लब्धायां भूमौ चित्तस्याप्रतिष्ठा । समाधिप्रतिलम्भे हि सति तदवस्थितं स्यादिति । एते चित्तविक्षेपा नव योगमला योगप्रतिपक्षा योगान्तराया इत्यभिधीयन्ते ॥३०॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — व्याधि स्त्यान संशय प्रमाद आलस्य अविरति भ्रान्ति दर्शन अलब्ध भूमिकत्व अनवस्थितत्वानि चित्त विक्षेपाः ते अन्तरायाः। व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व, और अनवस्थितत्व—ये चित्त के विक्षेप और अंतराय हैं। नौ अंतराय चित्त के विक्षेप हैं। ये चित्तवृत्तियों के साथ होते हैं। इनके अभाव में पूर्वोक्त चित्तवृत्तियाँ नहीं होतीं। व्याधि धातुओं और करणों का वैषम्य है। स्त्यान चित्त की अकर्मण्यता है। इति। संशय दोनों कोटियों को स्पर्श करने वाला विज्ञान है—यह ऐसा हो, या ऐसा न हो। प्रमाद समाधि के साधनों की अभावना है। आलस्य शरीर और चित्त के गुरुत्व से अप्रवृत्ति है। अविरति चित्त का विषय सम्प्रयोग में गर्ध है। भ्रान्तिदर्शन विपर्यय ज्ञान है। अलब्धभूमिकत्व समाधि भूमि का अलाभ है। अनवस्थितत्व प्राप्त भूमि में चित्त की अप्रतिष्ठा है। समाधि की प्राप्ति होने पर चित्त अवस्थित होगा। ये चित्त के विक्षेप, नौ योग मल, योग के प्रतिपक्ष, और योग के अंतराय कहलाते हैं।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — धातु, रस और करण की विषमता से उत्पन्न होने वाले ज्वरादिक रोगों को व्याधि कहा जाता है। वात, पित्त और कफ को दोष तथा रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र को सात धातुएँ माना गया है। भोजन के सही रूप से न पचने पर रस की विषमता होती है और इंद्रियों के कम कार्य करने को करण की विषमता कहते हैं। चित्त की अकर्मण्यता को स्त्यान, दो प्रकार के संदेहों को संशय, साधनों का अनुष्ठान न करना प्रमाद और भारीपन के कारण ध्यान न लगना आलस्य कहा गया है। विषयों में तृष्णा बने रहने को अविरति, मिथ्या ज्ञान को भ्रान्तिदर्शन, समाधि न पा लेना अलब्ध और समाधि पाकर भी उसमें न ठहरने को अनवस्थितत्व कहते हैं। ये नौ विघ्न एकाग्रता को हटाने वाले होते हैं और चित्त की वृत्तियों के साथ होते हैं। इन कारणों से ही चित्त के विक्षेपों को योग के मल, योग के अन्तराय और योग के प्रतिपक्षी कहा जाता है।
1.31 · समाधिपाद सूत्र ३१
दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥ १.३१ ॥
शब्दार्थ — दुःख · दौर्मनस्य · अङ्गमेजयत्व · श्वास · प्रश्वासाः · विक्षेप · सहभुवः
अर्थ — दुःख , दौर्मनस्य , अङ्गमेजयत्व , श्वासप्रश्वास — होनेसे ये पाँच प्रतिबन्धक भी उपस्थित हो जाते हैं ।
व्यासभाष्य
दुःखमाध्यात्मिकमाधिभौतिकमाधिदैविकं च । येनाभिहताः प्राणिनस्तदुपघाताय प्रयतन्ते, तद्दुःखम् । दौर्मनस्यमिच्छाविघाताच्चेतसः क्षोभः । यदङ्गान्येजयति कम्पयति तदङ्गमेजयत्वम् । प्राणो यद्बाह्यं वायुमाचामति स श्वासः । यत्कोष्ठ्यं वायुं निःसारयति स प्रश्वासः । एते विक्षेपसहभुवः, विक्षिप्तचित्तस्यैते भवन्ति । समाहितचित्तस्यैते न भवन्ति ॥३१॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — दुःख दौर्मनस्य अङ्गमेजयत्व श्वास प्रश्वासाः विक्षेप सहभुवः। दुःख, दौर्मनस्य, अंगमेजयत्व, श्वास, और प्रश्वास विक्षेपों के सहभू हैं। दुःख आध्यात्मिक, आधिभौतिक, और आधिदैविक है। जिससे प्राणी अभिहत होकर उपघात के लिए प्रयत्न करते हैं, वह दुःख है। इच्छा के विघटित होने से चित्त का क्षोभ है। जो अंगों को कम्पित करता है, वह अंगमेजयत्व है। प्राण जो बाह्य वायु को आचमति है, वह श्वास है। जो कोष्ठीय वायु को निःसारित करता है, वह प्रश्वास है। ये विक्षेपों के सहभू हैं, विक्षिप्त चित्त में ये होते हैं। समाहित चित्त में ये नहीं होते।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — दुःख वह पीड़ा है जिसकी चोट खाकर उसके नाश करने का यत्न किया जाता है और यह आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक भेद से तीन प्रकार का होता है। इनमें काम, क्रोध आदिजन्य मानस परिताप और व्याधि आदिजन्य शारीरिक परिताप आध्यात्मिक दुःख कहलाते हैं जहाँ आत्मा का अर्थ मन तथा शरीर से है। सिंह, सर्प आदि भूतों से जन्य दुःख आधिभौतिक हैं जिनमें भूत शब्द प्राणियों के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। विद्युत्पात, अति-वर्षण, अग्नि, अति-वायु आदि दैविक शक्तियों से जन्य दुःख आधिदैविक कहलाते हैं। इच्छा की पूर्ति न होने पर मन में क्षोभ होना दौर्मनस्य कहलाता है। शरीर के अंगों का काँपना अङ्गमेजयत्व और बिना इच्छा के बाहर की वायु का नासिका द्वारा अंदर आना श्वास कहलाता है। बिना इच्छा के भीतर की वायु का नासिका छिद्रों द्वारा बाहर निकलना प्रश्वास कहलाता है। ये सभी विक्षेपों के साथ होने वाले उपविक्षेप अथवा उपविघ्न हैं।
1.32 · समाधिपाद सूत्र ३२
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ १.३२ ॥
शब्दार्थ — तत् · प्रतिषेध · अर्थम् · एक · तत्त्व · अभ्यासः
अर्थ — उन पूर्वोक्त विक्षेप तथा उपविक्षेपोंको दूर करनेके लिये एकतत्त्वका अभ्यास करना चाहिये अर्थात् किसी अभिमत एक तत्त्वद्वारा चित्तकी स्थितिके लिये यत्न करना चाहिये ।
व्यासभाष्य
अथैते विक्षेपाः समाधिप्रतिपक्षास्ताभ्यामेवाभ्यासवैराग्याभ्यां निरोद्धव्याः । तत्राभ्यासस्य विषयमुपसंहरन्निदमाह— विक्षेपप्रतिषेधार्थमेकतत्त्वावलम्बनं चित्तमभ्यसेत। यस्य तु प्रत्यर्थनियतं प्रत्ययमात्रं क्षणिकं च चित्तं तस्य सर्वमेव चित्तमेकाग्रं नास्त्येव विक्षिप्तम् । यदि पुनरिदं सर्वतः प्रयाहृत्यैकस्मिनर्थे समाधीयते, तदा भवत्येकाग्रमित्यतो न प्रत्यर्थनियतम् ।
योऽपि सदृशप्रत्ययप्रवाहेण चित्तमेकाग्रं मन्यते, तस्यैकाग्रता यदि प्रवाहचित्तस्य धर्मस्तदैकं नास्ति प्रवाहचित्तं क्षणिकत्वात। अथ प्रवाहांशस्यैव प्रत्ययस्य धर्मः स सर्वः सदृशप्रत्ययप्रवाही वा विसदृशप्रत्ययप्रवाही वा प्रत्यर्थनियतत्वादेकाग्र एवेति विक्षिप्तचित्तानुपपत्तिः । तस्मादेकमनेकार्थमवस्थितं चित्तमिति । यदि च चित्तेनैकेनानन्विताः स्वभावभिन्नाः प्रत्यया जायेरन्नथ कथमन्यप्रत्ययदृष्टस्यान्यः स्मर्ता भवेत्? अन्यप्रत्ययोपचितस्य च कर्माशयस्यान्यः प्रत्यय उपभोक्ता भवेत।
कथम्चित्समाधीयमानमप्येतद्गोमयपायसीयं न्यायमाक्षिपति । किं च, स्वात्मानुभवापह्नवश्चित्तस्यान्यत्वे प्राप्नोति । कथं ? यदहमद्राक्षं तत्स्पृशामि, यच्चाप्रक्षं तत्पश्यामीत्यहमिति प्रत्ययः सर्वस्य प्रत्ययस्य भेदे सति प्रत्ययिन्यभेदेनोपस्थितः । एकप्रत्ययविषयोऽयमभेदात्माहमिति प्रत्ययः कथमत्यन्तभिन्नेषु चित्तेषु वर्तमानं सामान्यमेकं प्रत्ययिनमाश्रयेत्? स्वानुभवग्राह्यश्चायमभेदात्माहमिति प्रत्ययः । न च प्रत्यक्षस्य माहात्म्यं प्रमाणान्तरेणाभिभूयते ।
प्रमाणान्तरं च प्रत्यक्षबलेनैव व्यवहारं लभते । तस्मादेकमनेकार्थमवस्थितं च चित्तम् ॥३२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत् प्रतिषेध अर्थम् एक तत्त्व अभ्यासः। विक्षेपों के प्रतिषेध के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए। ये विक्षेप समाधि के प्रतिपक्ष हैं, इन्हें अभ्यास और वैराग्य से ही निरोध करना चाहिए। अभ्यास के विषय को उपसंहरते हुए यह कहा गया—विक्षेप प्रतिषेध के लिए चित्त को एक तत्त्व का अवलंबन लेकर अभ्यास करना चाहिए। जिसका चित्त प्रत्यर्थ नियत, केवल प्रत्यय, और क्षणिक है, उसका चित्त सर्वथा एकाग्र नहीं, बल्कि विक्षिप्त ही है।
यदि यह सर्वत्र से संनादित होकर एक अर्थ में समाधि में स्थिर हो, तब एकाग्र होता है, इसलिए यह प्रत्यर्थ नियत नहीं है। जो सदृश प्रत्यय प्रवाह से चित्त को एकाग्र मानता है, उसकी एकाग्रता यदि प्रवाह चित्त का धर्म है, तो एक नहीं है, क्योंकि प्रवाह चित्त क्षणिक है। अथवा प्रवाह के अंश का ही प्रत्यय का धर्म है, वह सर्वथा सदृश या विसदृश प्रत्यय प्रवाही होकर प्रत्यर्थ नियत होने से एकाग्र ही है, इसलिए विक्षिप्त चित्त की अनुपपत्ति है। इसलिए चित्त एक, अनेक अर्थ वाला, और अवस्थित है।
यदि एक चित्त से अनन्वित और स्वभाव से भिन्न प्रत्यय उत्पन्न हों, तो दूसरा प्रत्यय देखा हुआ अन्य कैसे स्मरण करता? अन्य प्रत्यय उपचितस्य च कर्म आशयस्य अन्यः प्रत्ययः उपभोक्ता भवेत्। और अन्य प्रत्यय से उपचित कर्माशय का अन्य प्रत्यय उपभोक्ता होगा। कथम् चित् समाधीयमानम् अपि एतत् गोमय पायसीयम् न्यायम् आक्षिपति। समाधि में स्थिर होने पर भी यह गोमय और पायस के न्याय को आकर्षित करता है। किम् च स्व आत्म अनुभव अपह्नवः चित्तस्य अन्यत्वे प्राप्नोति।
और स्वात्म अनुभव का अपह्नव चित्त के अन्यत्व में प्राप्त होता है। कथम् यत् अहम् अद्राक्षम् तत् स्पृशामि यत् च अप्रक्षम् तत् पश्यामि इति अहम् इति प्रत्ययः सर्वस्य प्रत्ययस्य भेदे सति प्रत्ययिनि अभेदेन उपस्थितः। कैसे? जो मैंने देखा, उसे स्पर्श करता हूँ, और जो नहीं देखा, उसे देखता हूँ, यह ‘अहम्’ प्रत्यय सभी प्रत्ययों के भेद होने पर भी प्रत्ययिनी में अभेद से उपस्थित है।
एक प्रत्यय विषयः अयम् अभेद आत्मा अहम् इति प्रत्ययः कथम् अत्यन्त भिन्नेषु चित्तेषु वर्तमानम् सामान्यम् एकम् प्रत्ययिनम् आश्रयेत्। एक प्रत्यय का विषय यह अभेद आत्मा ‘अहम्’ प्रत्यय अत्यंत भिन्न चित्तों में वर्तमान सामान्य एक प्रत्ययिनी को कैसे आश्रय देता है? स्व अनुभव ग्राह्यः च अयम् अभेद आत्मा अहम् इति प्रत्ययः। यह अभेद आत्मा ‘अहम्’ प्रत्यय स्व अनुभव से ग्राह्य है। न च प्रत्यक्षस्य माहात्म्यम् प्रमाण अन्तरेण अभिभूयते। प्रत्यक्ष का माहात्म्य अन्य प्रमाण से अभिभूत नहीं होता।
प्रमाण अन्तरम् च प्रत्यक्ष बलेन एव व्यवहारम् लभते। अन्य प्रमाण प्रत्यक्ष के बल से ही व्यवहार प्राप्त करता है। तस्मात् एकम् अनेक अर्थम् अवस्थितम् च चित्तम्। इसलिए चित्त एक, अनेक अर्थ वाला, और अवस्थित है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — विक्षेपों को दूर करने के लिए किसी एक इष्ट तत्त्व में चित्त को बार-बार लगाना चाहिए जिससे एकाग्रता उत्पन्न होती है। इस हेतु सबसे उत्तम उपाय ईश्वर-प्रणिधान है, जिसे योगवार्त्तिककार विज्ञानभिक्षु तथा भोजवृत्तिकार ने एक तत्त्व अभ्यास माना है और वाचस्पति मिश्र ने प्रधान तत्त्व को ईश्वर मानकर व्याख्या की है। सूत्र ३४ से ३९ तक बताए गए इष्ट उपाय अभिमत तत्त्व के ही अर्थ हैं।
व्यास-भाष्य के आधार पर वाचस्पति मिश्र ने बौद्ध धर्म के क्षणिकवाद को हटाकर यह स्पष्ट किया कि एक ही चित्त अनेक विषयों का ग्रहण करने वाला है। वैनाशिक लोग मानते हैं कि चित्त और सभी पदार्थ क्षणिक हैं, परंतु यदि चित्त क्षणिक होगा तो एकाग्रता संभव नहीं होगी और बुद्ध का उपदेश व्यर्थ सिद्ध होगा। यदि चित्त भिन्न-भिन्न क्षणिक प्रत्यय मात्र होंगे, तो एक चित्त के कर्म का फल दूसरे को प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि उनमें कोई हेतु नहीं है।
साथ ही, क्षणिक-प्रत्यय मात्र आत्मा मानने से बाल्य और यौवनावस्था की क्रियाओं का एक ही कर्ता (अहं पद) संभव नहीं होगा। अतः आत्म-अनुभव के लिए एक स्थायी चित्त का होना आवश्यक है जो अनेक पदार्थों को विषय करने वाला हो। भगवान बुद्ध ने असम्प्रज्ञात-समाधि में गुणों के शून्य होने पर भी आत्मसत्ता के अस्तित्व को सिद्ध किया है, जिसे उनके शिष्यों ने गलत समझकर क्षणिकवाद बना दिया।
श्री व्यास जी महाराज ने ५२ सूत्र की व्याख्या में स्पष्ट किया है कि गुण परिणामशील हैं और विज्ञानरूप चित्त भी क्षणिक ही है।
1.33 · समाधिपाद सूत्र ३३
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ १.३३ ॥
शब्दार्थ — मैत्री · करुणा · मुदिता · उपेक्षाणाम् · सुख · दुःख · पुण्य · अपुण्य · विषयाणाम् · भावनातः · चित्त · प्रसादनम्
अर्थ — सुख, दुःख, पुण्य, और अपुण्य विषयों की मैत्री, करुणा, मुदिता, और उपेक्षा की भावना से चित्त का प्रसादन होता है।
व्यासभाष्य
यस्य चित्तस्यावस्थितस्येदं शास्त्रेण परिकर्म निर्दिश्यते तत्कथं ? तत्र सर्वप्राणिषु सुखसम्भोगापन्नेषु मैत्रीं भावयेत। दुःखितेषु करुणाम् । पुण्यात्मकेषु मुदिताम् । अपुण्यशीलेषूपेक्षाम् । एवमस्य भावयतः शुक्लो धर्म उपजायते । ततश्च चित्तं प्रसीदति । प्रसन्नमेकाग्रं स्थितिपदं लभते ॥३३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षाणाम् सुख दुःख पुण्य अपुण्य विषयाणाम् भावनातः चित्त प्रसादनम्। सुख, दुःख, पुण्य, और अपुण्य विषयों की मैत्री, करुणा, मुदिता, और उपेक्षा की भावना से चित्त का प्रसादन होता है। अवस्थित चित्त के लिए शास्त्र द्वारा यह परिकर्म निर्दिष्ट है, वह कैसे? तत्र सर्व प्राणिषु सुख सम्भोग अपन्नेषु मैत्रीम् भावयेत्। सभी प्राणियों में सुख सम्भोग से युक्त होने पर मैत्री भावना करे। दुःखितेषु करुणाम्। दुखियों में करुणा। पुण्य आत्मकेषु मुदिताम्। पुण्यात्मक में मुदिता। अपुण्य शीलेषु उपेक्षाम्। अपुण्य शील में उपेक्षा। एवम् अस्य भावयतः शुक्लः धर्मः उपजायते। इस प्रकार भावना करने से श्वेत धर्म उत्पन्न होता है। ततः च चित्तम् प्रसीदति। इससे चित्त प्रसन्न होता है। प्रसन्नम् एकाग्रम् स्थिति पदम् लभते। प्रसन्न चित्त एकाग्र होकर स्थिति पद प्राप्त करता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — राग, ईर्ष्या, परापकार-चिकीर्षा, असूया, द्वेष और अमर्ष—ये छः धर्म चित्त को विक्षिप्त करके कलुषित कर देते हैं। राग-कालुष्य सुख के अनन्तर 'यह सुख मुझको सर्वदा प्राप्त हो' जैसी राजस वृत्ति है, ईर्ष्या-कालुष्य दूसरों की संपत्ति देखकर उत्पन्न क्षोभ है, परापकार-चिकीर्षा किसी का बुरा करने की इच्छा है, असूया-कालुष्य दूसरों के गुणों में दोष आरोप करना है, द्वेष-कालुष्य कोप-प है और अमर्ष-कालुष्य अपमान का बदला लेने की चेष्टा है।
इन मलों से चित्त मलिन होकर एकाग्र नहीं हो पाता, अतः इनसे निवृत्त होने के लिए चार उपाय बताए गए हैं। प्रथम, सुखी मनुष्यों में मित्रता की भावना करने से राग तथा ईर्ष्या-कालुष्य की निवृत्ति होती है। द्वितीय, दुःखी जनों पर करुणा करने से परापकार-चिकीर्षा का अभाव होता है, जैसा कि उपनिषद् के अनुसार साधुजन अपने प्राणों के समान दूसरों पर दया करते हैं।
तृतीय, पुण्यात्माओं के प्रति हर्ष की भावना करने से असूया मल की निवृत्ति होती है और चतुर्थ, पापियों में उपेक्षा की भावना करने से द्वेष तथा अमर्षक या घृणा रूप मल की निवृत्ति होती है। भोज महाराज ने इस सूत्र की व्याख्या करते हुए मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा को क्रमशः सुखियों, दुःखियों, पुण्यवालों और पापियों में व्यवहार करने का निर्देश दिया है।
अंततः, जब इन चारों भावनाओं के अनुष्ठान से चित्त के मल धुल जाते हैं, तब निर्मल चित्त प्रसन्नता प्राप्त करता है और एकाग्रता का लाभ होता है।
1.34 · समाधिपाद सूत्र ३४
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ १.३४ ॥
शब्दार्थ — प्रच्छर्दन · विधारणाभ्याम् · वा · प्राणस्य
अर्थ — अथवा कोष्ठस्थित ( कोठामें रहनेवाली ) वायुको नासिकापुटद्वारा ( प्रयत्नविशेषसे ) बाहर फेंकने और बाहर रोकने – दोनोंसे मनकी स्थितिको सम्पादन करे ।
व्यासभाष्य
कोष्ठ्यस्य वायोर्नासिकापुटाभ्यां प्रयत्नविशेषाद्वमनं प्रच्छर्दनम् । विधारणं प्राणायामः । ताभ्यां वा मनसः स्थितिं सम्पादयेत ॥३४॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — प्रच्छर्दन विधारणाभ्याम् वा प्राणस्य। प्रच्छर्दन और विधारण से प्राण की स्थिति होती है। कोष्ठीय वायु का नासिका पुटों से विशेष प्रयत्न द्वारा वमन प्रच्छर्दन है। विधारण प्राणायाम है। इन दोनों से मन की स्थिति सम्पादित करे।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — व्यासभाष्य के अनुसार कोष्ठस्थित वायु को विशेष प्रयत्न से नासिका के दोनों छिद्रों द्वारा बाहर फेंकने को प्रच्छर्दन और उसे वहीं रोक देने को विधारण कहते हैं। प्राणायाम के तीन भेद— रेचक, पूरक और कुम्भक बताए गए हैं, जिनमें इस सूत्र में केवल दो भेद यानी रेचक (प्रच्छर्दन) और बाह्य कुम्भक (विधारण) का वर्णन है।
प्रच्छर्दन की विधि में सुखासन से मूलबन्ध और उड्डीयान बन्ध लगाकर नाभिक उठाकर वायु को बाहर फेंकना शामिल है, जबकि विधारण में श्वास को बाहर ही रोक देना शामिल है। इस प्राणायाम के माध्यम से मन की एकाग्रता प्राप्त होती है क्योंकि प्राणों के वशीकार से मन का निरोध सुगम हो जाता है। उपनिषदों और अन्य ग्रंथों के अनुसार प्राण वह जड़तत्त्व है जिससे समस्त सृष्टि संचालित होती है और यह सभी इंद्रियों की वृत्तियों को रोकने में समर्थ है।
शरीर में दस प्रकार की वायुएं होती हैं जिनमें मुख्य रूप से पाँच— प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान हैं, जिनका स्थान और कार्य अलग-अलग निर्धारित हैं। योग साधना में सुषुम्णा नाड़ी, इडा और पिङ्गला का विशेष महत्व है, जहाँ से स्वर बदलने की क्रिया द्वारा योग अभ्यास किया जाता है। अंततः कुण्डलिनी शक्ति के जाग्रत होने और चक्रों के भेदन की प्रक्रिया को बताते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि साधक को भयमुक्त होकर द्रष्टा भाव से आत्म-साक्षात्कार हेतु साधना करनी चाहिए।
अन्य स्रोत: व्यासभाष्य
1.35 · समाधिपाद सूत्र ३५
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी ॥ १.३५ ॥
शब्दार्थ — विषयवती · वा · प्रवृत्तिः · उत्पन्ना · मनसः · स्थिति · निबन्धिनी
अर्थ — अथवा( गन्ध , रस , स्पर्श , शब्द ) विषयोंवाली प्रवृत्ति उत्पन्न हुई मनकी स्थितिको . बाँधनेवाली होती है ।
व्यासभाष्य
नासिकाग्रे धारयतोऽस्य या दिव्यगन्धसंवि सा गन्धप्रवृत्तिः । जिह्वाग्रे रससंवित। तालुनि रूपसंवित। जिह्वामध्ये स्पर्शसंवित। जिह्वामूले शब्दसंविदित्येताः वृत्तय उत्पन्नाश्चित्तं स्थितौ निबध्नन्ति, संशयं विधमन्ति, समाधिप्रज्ञायां च द्वारीभवन्ति । एतेन चन्द्रादित्यग्रहमणिप्रदीपरत्नादिषु प्रवृत्तिरुत्पन्ना विषयवत्येव वेदितव्या । यद्यपि हि तत्तच्छास्त्रानुमानाचार्योपदेशैरवगतमर्थतत्त्वं सद्भूतमेव भवति, एतेषां यथाभूतार्थप्रतिपादनसामर्थ्यात्, तथापि यावदेकदेशोऽपि कश्चिन्न स्वकरणसंवेद्यो भवति, तावत्सर्वं परोक्षमिवापवर्गादिषु सूक्ष्मेष्वर्थेषु न वृढां बुद्धिमुत्पादयति । तस्माच्छास्त्रानुमानाचार्योपदेशोपोद्वलनार्थमेवावश्यं कश्चिदर्थविशेषः प्रत्यक्षीकर्तव्यः । तत्र तदुपदिष्टार्थैकदेशप्रत्यक्षत्वे सति सर्वं सूक्ष्मविषयमप्यापवर्गाच्छ्रद्धीयते । एतदर्थमेवेदं चित्तपरिकर्म निर्दिश्यते । अनियतासु वृत्तिषु तद्विषयायां वशीकारसंज्ञायामुपजातायां चित्तं समर्थं स्यात्, तस्य तस्यार्थस्य प्रत्यक्षीकरणायेति । तथा च सति श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधयोऽस्याप्रतिबन्धेन भविष्यन्तीति ॥३५॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विषयवती वा प्रवृत्तिः उत्पन्ना मनसः स्थिति निबन्धिनी। उत्पन्न विषयवती प्रवृत्ति मन की स्थिति को बाँधने वाली है। नासिका के अग्र पर धारण करने से जो दिव्य गंध की संविद होती है, वह गंध प्रवृत्ति है। जिह्वा के अग्र पर रस संविद। तालु पर रूप संविद। जिह्वा के मध्य में स्पर्श संविद। जिह्वा के मूल में शब्द संविद—ये उत्पन्न वृत्तियाँ चित्त को स्थिति में बाँधती हैं, संशय को नष्ट करती हैं, और समाधि प्रज्ञा में द्वार बनती हैं।
इससे चन्द्र, सूर्य, ग्रह, मणि, प्रदीप, रत्न आदि में उत्पन्न प्रवृत्ति विषयवती ही समझी जाए। यद्यपि शास्त्र, अनुमान, और आचार्य उपदेश से अवगत अर्थ तत्त्व सत्य ही होता है, उनके यथाभूत अर्थ प्रतिपादन की सामर्थ्य से। तथापि जब तक कोई एक देश भी स्वकरण से संवेद्य नहीं होता, तब तक अपवर्ग आदि सूक्ष्म अर्थों में परोक्ष सा होने से वृद्ध बुद्धि उत्पन्न नहीं करता। इसलिए शास्त्र, अनुमान, और आचार्य उपदेश के उद्बलन के लिए अवश्य ही कोई विशेष अर्थ प्रत्यक्ष करना चाहिए।
वहाँ उपदिष्ट अर्थ का एक देश प्रत्यक्ष होने पर सूक्ष्म विषय भी अपवर्ग से श्रद्धित होता है। परिकर्म निर्दिष्ट है। अनियत वृत्तियों में उस विषय की वशीकार संज्ञा उत्पन्न होने पर चित्त उस उस अर्थ के प्रत्यक्षीकरण के लिए समर्थ होता है। ऐसा होने पर श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, और समाधि अप्रतिबंधित होकर होंगे।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — नासिका के अग्रभाग में गन्ध, जिह्वा के अग्रभाग में रस, तालु में रूप, जिह्वा के मध्य भाग में स्पर्श और जिह्वा के मूल में शब्द का साक्षात्कार होता है जिन्हें क्रमशः गन्धप्रवृत्ति, रसप्रवृत्ति, रूपप्रवृत्ति, स्पर्श-प्रवृत्ति और शब्दप्रवृत्ति कहते हैं। ये प्रवृत्तियाँ चित्त की स्थिति को बाँधती हैं, संशय का नाश करती हैं और समाधिप्रज्ञा की उत्पत्ति में द्वाररूप होती हैं।
भाष्यकार के अनुसार शास्त्र, अनुमान और आचार्य के उपदेशों पर दृढ़ विश्वास हेतु किसी एक सूक्ष्म या विप्रकृष्ट पदार्थ का साक्षात्कार आवश्यक है क्योंकि जब एक सूक्ष्म विषय प्रत्यक्ष होता है तब कैवल्यपर्यंत के सभी सूक्ष्म विषयों में श्रद्धा उत्पन्न होती है। इन विषयवती प्रवृत्तियों के लाभ से योगी को शास्त्रोक्त अर्थ में वशीकारिता प्राप्त होती है जिससे श्रद्धा, वीर्य, स्मृति और समाधि का निर्विघ्न लाभ होता है।
सूत्र ३५ की व्याख्या में इन पाँचों स्थानों पर स्थूल विषयों का ध्यान करने से वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है। यदि एकाग्रता बढ़ाकर सूक्ष्म तन्मात्राओं तक साक्षात्कार हो तो वह विचारानुगत सम्प्रजात समाधि कहलाती है और राग छोड़कर अंतर्मुख होने पर अहंकार का आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि होता है।
इसमें राग छोड़कर और अंदर जाने पर अस्मितानुगत सम्प्रजात समाधि होती है जिसमें आत्मतत्त्व की प्रतीति होती है और इसकी उच्चतम अवस्था विवेकख्याति है जहाँ चित्त से भिन्न आत्मा का साक्षात्कार होता है। अंततः सभी वृत्तियों के निरोध होने पर स्वरूपावस्थिति होती है जिसे धैर्य और निरंतर अभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है।
1.36 · समाधिपाद सूत्र ३६
विशोका वा ज्योतिष्मती ॥ १.३६ ॥
शब्दार्थ — विशोका · वा · ज्योतिष्मती
अर्थ — —अथवा शोकरहित प्रकाशवाली प्रवृत्ति उत्पन्न हुई मनकी स्थितिको बाँधनेवाली होती है ।
व्यासभाष्य
प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनीत्यनुवर्तते । हृदयपुण्डरीके धारयतो या बुद्धिसंवित्बुद्धिसत्त्वं हि भास्वरमाकाशकल्पं, तत्र स्थितिवैशारद्यात्प्रवृत्तिः सूर्येन्दुग्रहमणिप्रभारूपाकारेण विकल्पते । तथाऽस्थितायां समापन्नं चित्तं निस्तरङ्गमहोदधिकल्पं शान्तमनन्तमस्मितामात्रं भवति । यत्रेदमुक्तं—तमणुमात्रमात्मानमनुविद्यास्मीत्येवं तावत्सम्प्रजानीते इति । एषा द्वयी विशोका, विषयवती अस्मितामात्रा च प्रवृत्तिर्ज्योतिष्मतीत्युच्यन्ते । यया योगिनश्चित्तं स्थितिपदं लभत इति ॥३६॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विशोका वा ज्योतिष्मती। विशोका या ज्योतिष्मती प्रवृत्ति भी (चित्त को स्थिर करती है)। उत्पन्न प्रवृत्ति मन की स्थिति को बाँधने वाली है, यह अनुवर्तित है। हृदय पुण्डरीक में धारण करने से जो बुद्धि संविद है, वह बुद्धि सत्त्व भास्वर और आकाश के समान है। वहाँ स्थिति के वैशारद्य से प्रवृत्ति सूर्य, चन्द्र, ग्रह, और मणि की प्रभा के रूप में विकल्पित होती है। उस अस्थित अवस्था में समापन्न चित्त निस्तरंग महासागर के समान, शांत, अनंत, और अस्मिता मात्र हो जाता है। जहाँ यह कहा गया—उस अणु मात्र आत्मा को अनुविद्या मैं हूँ, ऐसा सम्प्रजानता है। यह द्वयी विशोका, विषयवती, और अस्मिता मात्र प्रवृत्ति ज्योतिष्मती कहलाती है। जिससे योगी का चित्त स्थिति पद प्राप्त करता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सूत्र में 'उत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी' का अर्थ है कि उत्पन्न हुए मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है। सात्त्विक अभ्यास से रजोगुण का परिणाम दूर होने पर जो सात्त्विक प्रकाश होता है, वह ज्योतिष्मती प्रवृत्ति कहलाता है। जिस प्रकार विषयवती प्रवृत्ति मन को स्थिर करती है, वैसे ही 'विशोका ज्योतिष्मती' प्रवृत्ति भी चित्त को स्थिर करती है।
जहाँ विषयवती प्रवृत्तिका पाँच विशेष स्थान हैं, वहीं विशोका ज्योतिष्मती प्रवृत्तिका सुषुम्णा नाड़ी में विद्यमान मणिपूरक, अनाहत, आज्ञा आदि सात पद्म अर्थात् चक्र विशेष स्थान हैं। भाष्यकारियों के अनुसार हृदय-कमल यानी अनाहत चक्र में धारणा करने से बुद्धि-संवित् प्राप्त होती है, जिसमें स्थितिकी दृढ़ता से प्रवृत्ति सूर्य, चन्द्र, मणि और प्रभा रूपाकार से विकल्पित होती है।
इसी भाँति जब चित्त निस्तरङ्ग समुद्र के सदृश शांत होकर 'तमणुमात्रमात्मानमनुविद्यास्मीत्येवं तावत् सम्प्रजानीते' के अनुसार केवल अणुमात्र आत्मा को जानता है, तब उसे अस्मिता मात्र ज्योतिष्मती कहते हैं। इस विषय में पञ्चशिखाचार्य का सूत्र है कि उस अणुमात्र अस्मिता का धारणापूर्वक अनुभव 'हूँ' इस प्रकार जानता है।
यह दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं— प्रथम जो बुद्धि-संवित् है वह विषयवती ज्योतिष्मती प्रवृत्ति और दूसरी जो अस्मिता-स्वरूप चित्त की प्रवृत्ति है वह अस्मिता मात्र ज्योतिष्मती कहलाती है। ये दोनों प्रवृत्तियाँ विशोका हैं क्योंकि ये रजोगुण से शून्य हैं और इनके उत्पन्न होने से योगी का चित्त स्थितिपद की योग्यता प्राप्त कर लेता है।
1.37 · समाधिपाद सूत्र ३७
वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ १.३७ ॥
शब्दार्थ — वीत · राग · विषयम् · वा · चित्तम्
अर्थ — अथवा रागरहित योगी - गणके चित्तविषयक संयम करनेवाला ( आलम्बनवाला ) चित्त मनकी स्थितिको बाँधनेवाला होता है ।
व्यासभाष्य
वीतरागचित्तालम्बनोपरक्तं वा योगिनश्चित्तं स्थितिपदं लभत इति ॥३७॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — वीतराग विषय वाला चित्त भी (स्थिति प्राप्त करता है)। वीत राग चित्त आलम्बन उपरक्तम् वा योगिनः चित्तम् स्थिति पदम् लभति इति। वीतराग चित्त को आलंबन से उपरक्त होने पर योगी का चित्त स्थिति पद प्राप्त करता है।
व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — ' मनसः स्थितिनिबन्धिनी ' – मनकी स्थितिको बाँधनेवाला होता है— इतना मिलानेसे सूत्रका अर्थ पूरा होता है । महान् योगियोंने विषयोंकी अभिलाषा पूर्णतया छोड़ दी है , जिसके कारण उनके चित्तसे जिन अविद्यादि क्लेशोंके संस्कार मिट गये हैं , उनके चित्तका ध्यान करनेवाले चित्तमें भी वैसे ही सात्त्विक संस्कार उत्पन्न होते हैं और वह सुगमतासे एकाग्र हो जाता है । सूत्रका यह भी अर्थ निकल सकता है कि साधक यदि क्रमशः विषयरागरहित अवस्थाको प्राप्त करके पूर्ण वैराग्यकी भूमिपर पहुँच जाय तो भी मनकी स्थितिको बाँधनेमें समर्थ हो जाता है ।
1.38 · समाधिपाद सूत्र ३८
स्वप्रनिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥ १.३८ ॥
शब्दार्थ — स्वप्न · निद्रा · ज्ञान · आलम्बनम् · वा
अर्थ — अथवा स्वप्नज्ञान और निद्राज्ञानको आश्रय करनेवाला चित्त मनकी स्थितिको बाँधनेवाला होता है ।
व्यासभाष्य
स्वप्नज्ञानालम्बनं वा निद्राज्ञानालम्बनं वा तदाकारं योगिनश्चित्तं स्थितिपदं लभत इति ॥३८॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — स्वप्न और निद्रा ज्ञान को आलंबन बनाने वाला चित्त भी (स्थिति प्राप्त करता है)। ज्ञान आलम्बनम् वा तत् आकारम् योगिनः चित्तम् स्थिति पदम् लभति इति। स्वप्न ज्ञान या निद्रा ज्ञान को आलंबन बनाने वाला तदाकार योगी का चित्त स्थिति पद प्राप्त करता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — 'चित्तं मनसः स्थितिनिबन्धनम्' सूत्र का अर्थ है कि चित्त मन की स्थिति को बांधने वाला होता है। जाग्रत अवस्था में रजोगुण के कारण वृत्तियाँ बहिर्मुख होती हैं, स्वप्न में तमोगुण के कारण अन्तर्मुख होती हैं और निद्रा में तमोगुण द्वारा रजोगुण दब जाने से केवल अभाव की प्रतीति होती है।
इस सूत्र का एक अर्थ यह है कि जिस प्रकार स्वप्न और निद्रा में गुण प्रधानता से विशेष अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार ध्यान में सत्त्वगुण की प्रधानता से एकाग्रता उत्पन्न कर वस्तु का यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि जाग्रत अवस्था से भूलते हुए वृत्तियों को अन्तर्मुख करने से चित्त एकाग्र हो जाता है।
विज्ञानभिक्षु ने इस सूत्र की व्याख्या करते हुए प्रपञ्च-ज्ञान को 'दीर्घस्वप्रमिमं विद्धि दीर्घं वा चित्तविभ्रमम्' के अनुसार लंबा स्वप्न या चित्त का भ्रम माना है। उन्होंने जाग्रत ज्ञान को क्षणभंगुर गुणों से दृष्टिरूप और निद्रारूप ज्ञान को आलम्बन जिसका चित्त स्थिर हो जाता है, कहा है। विज्ञानभिक्षु के अनुसार विस्मृतरूप सब जीवों में सुषुप्ति दृष्टिवाला चित्त स्थिर हो जाता है।
उन्होंने 'ब्रह्माद्यं स्थावरान्तं च प्रसुप्तं यस्य मायया' जैसे उद्धरणों के माध्यम से स्पष्ट किया कि जो पुरुष चराचर को लय की भाँति प्रसुप्त देखता है, वह मिथ्या व्यवहार में विरक्त हो जाता है।
1.39 · समाधिपाद सूत्र ३९
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ १.३९ ॥
शब्दार्थ — यथा · अभिमत · ध्यानात् · वा
अर्थ — अथवा जो जिसको अभिमत ( इष्ट ) हो , उसके ध्यानसे मनकी स्थिति …
व्यासभाष्य
यदेवाभिमतं तदेव ध्यायेत। तत्र लब्धस्थितिकमन्यत्रापि स्थितिपदं लभत इति ॥३९॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — यथाभिमत ध्यान से भी (चित्त की स्थिति होती है)। एव ध्यायेत्। जो अभिमत है, उसी का ध्यान करे। वहाँ स्थिति प्राप्त करने वाला अन्यत्र भी स्थिति पद प्राप्त करता है।
व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — मनुष्योंकी भिन्न - भिन्न रुचियाँ होती हैं , इस कारण जिसकी जिसमें शास्त्रीय मर्यादानुसार सात्त्विक श्रद्धा हो , उसमें ध्यान लगानेसे चित्त एकाग्र हो जाता है । सकते हैं । इस प्रकार जब चित्तमें एकाग्रताकी योग्यता प्राप्त हो जाय तो उसको जहाँ चाहें लगा फल बतलाते हैं— (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)
1.40 · समाधिपाद सूत्र ४०
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ १.४० ॥
शब्दार्थ — परमाणु · परम · महत्त्व · अन्तः · अस्य · वशीकारः
अर्थ — परमाणु से परम महत्त्व तक इसका वशीकार है।
व्यासभाष्य
सूक्ष्मे निर्विशमानस्य परमाण्वन्तं स्थितिपदं लभत इति । स्थूले निर्विशमानस्य परममहत्त्वान्तं स्थितिपदं चित्तस्य । एवं तावुभयीं कोटिमनुधावतो योऽस्याप्रतिघातः स परो वशीकारः । तद्वशीकारात्परिपूर्णं योगिनश्चित्तं न पुनरभ्यासकृतं परिकर्मापेक्षत इति ॥४०॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — परमाणु परम महत्त्व अन्तः अस्य वशीकारः। परमाणु से परम महत्त्व तक इसका वशीकार है। सूक्ष्मे निर्विशमानस्य परमाणु अन्तम् स्थिति पदम् लभति इति। सूक्ष्म में निर्विशमान का चित्त परमाणु तक स्थिति पद प्राप्त करता है। स्थूले निर्विशमानस्य परम महत्त्व अन्तम् स्थिति पदम् चित्तस्य। स्थूल में निर्विशमान का चित्त परम महत्त्व तक स्थिति पद प्राप्त करता है। एवम् तावत् उभयीम् कोटिम् अनुधावतः यः अस्य अप्रतिघातः सः परः वशीकारः। इस प्रकार दोनों कोटियों का अनुधावन करने वाले का जो अप्रतिघात है, वही पर वशीकार है। तत् वशीकारात् परिपूर्णम् योगिनः चित्तम् न पुनः अभ्यास कृतम् परिकर्म अपेक्षति इति। उस वशीकार से योगी का चित्त परिपूर्ण होकर पुनः अभ्यास कृत परिकर्म की अपेक्षा नहीं करता।
व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जब ऊपर बतलाये हुए उपायोंसे चित्तमें एकाग्र होनेकी योग्यता प्राप्त हो जाती है , तब वह पूर्णतया वशमें हो जाता है और छोटे - से - छोटे तथा बड़े - से - बड़े विषयमें बिना रुकावटके लगाया जा सकता है । फिर अन्य किसी उपायकी आवश्यकता नहीं रहती । सूक्ष्म विषयोंकी अवधि परमाणु है और बृहत् विषयोंकी अवधि आकाश है । जब इन दोनोंमें चित्त स्थित हो जाता है , तब स्थिरता चित्तके वशीभूत हो जाती है अर्थात् इच्छानुसार चित्तको स्थिर किया जा सकता है । इस प्रकार दोनों कोटियोंमें जा हु चित्तका जो रुकावटका न होना है , वह चित्तका परम वशीकार कहलाता है । इस वशीकारसे परिपूर्ण हुआ योगीका चित्त पुनः किसी अन्य अभ्यास - साध्य - स्थिति - उपायकी अपेक्षा नहीं रखता ।
1.41 · समाधिपाद सूत्र ४१
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः ॥ १.४१ ॥
शब्दार्थ — क्षीण · वृत्तेः · अभिजातस्य · इव · मणेः · ग्रहीतृ · ग्रहण · ग्राह्येषु · तत् · स्थ · तत् · अञ्जनता · समापत्तिः
अर्थ — राजस - तामस वृत्तिरहित स्वच्छ चित्तकी उत्तम जातीय ( अति - निर्मल ) मणिके समान ग्रहीता ( अस्मिता ) , ग्रहण ( इन्द्रियाँ ) , ग्राह्य ( स्थूल तथा सूक्ष्म विषयों ) में स्थित होकर उनके तन्मय हो जाना ( उनके स्वरूपको प्राप्त हो जाना ) समापत्ति ( तद्रूप होना ) है ।
व्यासभाष्य
क्षीणवृत्तेरिति प्रत्यमितप्रत्ययस्येत्यर्थः । अभिजातस्येव मणेरिति दृष्टान्तोपादानम् । यथा स्फटिक उपाश्रयभेदात्तत्तद्रूपोपरक्त उपाश्रयरूपाकारेण निर्भासते, तथा ग्राह्यालम्बनोपरक्तं चित्तं ग्राह्यसमापन्नं ग्राह्यस्वरूपाकारेण निर्भासते । तथा भूतसूक्ष्मोपरक्तं भूतसूक्ष्मसमापन्नं भूतसूक्ष्मस्वरूपाभासं भवति । तथा विश्वभेदोपरक्तं विश्वभेदसमापन्नं विश्वरूपाभासं भवति । तथा ग्रहणेष्वपीन्द्रियेष्वपि द्रष्टव्यम् । ग्रहणालम्बनोपरक्तं ग्रहणसमापन्नं ग्रहणस्वरूपाकारेण निर्भासते । तथा ग्रहीतृपुरुषालम्बनोपरक्तं ग्रहीतृपुरुषसमापन्नं ग्रहीतृपुरुषस्वरूपाकारेण निर्भासते । तथा मुक्तपुरुषालम्बनोपरक्तं मुक्तपुरुषसमापन्नं मुक्तपुरुषस्वरूपाकारेण निर्भासत इति । तदेवमभिजातमणिकल्पस्य चेतसो ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु पुरुषेन्द्रियभूतेषु या तत्स्थतदञ्जनता तेषु स्थितस्य तदाकारापत्तिः सा समापत्तिरित्युच्यते ॥४१॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अञ्जनता समापत्तिः। क्षीण वृत्ति वाले चित्त की, अभिजात मणि के समान, ग्रहीता, ग्रहण, और ग्राह्य में तत्स्थ तदञ्जनता समापत्ति है। क्षीण वृत्तेः इति प्रत्यमित प्रत्ययस्य इति अर्थः। क्षीण वृत्ति का अर्थ है प्रत्यमित प्रत्यय। अभिजातस्य इव मणेः इति दृष्टान्त उपादानम्। अभिजात मणि के समान यह दृष्टान्त उपादान है। यथा स्फटिकः उपाश्रय भेदात् तत् तत् रूप उपरक्तः उपाश्रय रूप आकारेण निर्भासति।
जैसे स्फटिक उपाश्रय के भेद से तत्तद्रूप से उपरक्त होकर उपाश्रय के रूपाकार में निर्भासित होता है। तथा ग्राह्य आलम्बन उपरक्तम् चित्तम् ग्राह्य समापन्नम् ग्राह्य स्वरूप आकारेण निर्भासति। वैसे ही ग्राह्य आलंबन से उपरक्त चित्त ग्राह्य में समापन्न होकर ग्राह्य स्वरूप के आकार में निर्भासित होता है। तथा भूत सूक्ष्म उपरक्तम् भूत सूक्ष्म समापन्नम् भूत सूक्ष्म स्वरूप अभासम् भवति।
वैसे ही भूत और सूक्ष्म से उपरक्त चित्त भूत और सूक्ष्म में समापन्न होकर भूत और सूक्ष्म स्वरूप का अभास होता है। तथा विश्व भेद उपरक्तम् विश्व भेद समापन्नम् विश्व रूप अभासम् भवति। वैसे ही विश्व भेद से उपरक्त चित्त विश्व भेद में समापन्न होकर विश्व रूप का अभास होता है। तथा ग्रहणेषु अपि इन्द्रियेषु अपि द्रष्टव्यम्। ग्रहण और इन्द्रियों में भी ऐसा ही द्रष्टव्य है। ग्रहण आलम्बन उपरक्तम् ग्रहण समापन्नम् ग्रहण स्वरूप आकारेण निर्भासति।
ग्रहण आलंबन से उपरक्त चित्त ग्रहण में समापन्न होकर ग्रहण स्वरूप के आकार में निर्भासित होता है। तथा ग्रहीतृ पुरुष आलम्बन उपरक्तम् ग्रहीतृ पुरुष समापन्नम् ग्रहीतृ पुरुष स्वरूप आकारेण निर्भासति। वैसे ही ग्रहीता पुरुष के आलंबन से उपरक्त चित्त ग्रहीता पुरुष में समापन्न होकर ग्रहीता पुरुष स्वरूप के आकार में निर्भासित होता है। तथा मुक्त पुरुष आलम्बन उपरक्तम् मुक्त पुरुष समापन्नम् मुक्त पुरुष स्वरूप आकारेण निर्भासति इति।
वैसे ही मुक्त पुरुष के आलंबन से उपरक्त चित्त मुक्त पुरुष में समापन्न होकर मुक्त पुरुष स्वरूप के आकार में निर्भासित होता है। तत् एवम् अभिजात मणि कल्पस्य चेतसः ग्रहीतृ ग्रहण ग्राह्येषु पुरुष इन्द्रिय भूतेषु या तत् स्थ तत् अञ्जनता तेषु स्थितस्य तत् आकार अपत्तिः सा समापत्तिः इति उच्यते। इस प्रकार अभिजात मणि के समान चित्त की ग्रहीता, ग्रहण, और ग्राह्य—पुरुष, इन्द्रिय, और भूतों में जो तत्स्थ तदञ्जनता है, उसमें स्थित तदाकार की प्राप्ति समापत्ति कहलाती है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — स्वच्छ हुए चित्त की उपमा अति-निर्मल स्फटिक से दी गई है, जिसके सामने रखी जाने वाली वस्तु अपने मूल वर्ण में ही प्रतीत होती है। जब चित्त की सभी राजस-तामस वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं, तब वह सत्त्व के प्रकाश और सात्त्विकता के बढ़ने से इतना स्वच्छ हो जाता है कि उसे जिस वस्तु में लगावें, वह तदाकार होकर उसे साक्षात् करा देता है। यह साक्षात् कराना इस प्रकार होता है कि चित्त उस वस्तु के स्वरूप को धारण कर लेता है। चित्त के इस प्रकार तदाकार होने का नाम समापत्ति अर्थात् सम्प्रज्ञात-समाधि है। यद्यपि अनुष्ठान के क्रम से ग्राह्य, ग्रहण, ग्रहीतृ होना चाहिए था, तथापि ध्येय की और समाधिकी उत्कृष्टता-अपकृष्टता बतलाने के अभिप्राय से सूत्र में इसे ग्रहीतृ, ग्रहण, ग्राह्य इस क्रम से बतलाया गया है।
1.42 · समाधिपाद सूत्र ४२
तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥ १.४२ ॥
शब्दार्थ — तत्र · शब्द · अर्थ · ज्ञान · विकल्पैः · संकीर्णा · सवितर्का · समापत्तिः
अर्थ — वहाँ शब्द, अर्थ, और ज्ञान के विकल्पों से संकीर्ण सवितर्क समापत्ति है।
व्यासभाष्य
तद्यथा गौरिति शब्दो गौरित्यर्थो गौरिति ज्ञानमित्यविभागेन विभक्तानामपि ग्रहणं दृष्टम् । विभज्यमानाश्चान्ये शब्दधर्मा अन्येऽर्थधर्मा अन्ये ज्ञानधर्मा इति एतेषां विभक्तः पन्थाः । तत्र समापन्नस्य योगिनो यो गवाद्यर्थः समाधिप्रज्ञायां समारूढः स चेच्छब्दार्थज्ञानविकल्पानुविद्ध उपावर्तते सा संकीर्णा समापत्तिः सवितर्केत्युच्यते ॥४२॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत्र शब्द अर्थ ज्ञान विकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः। वहाँ शब्द, अर्थ, और ज्ञान के विकल्पों से संकीर्ण सवितर्क समापत्ति है। जैसे गौ शब्द, गौ अर्थ, और गौ ज्ञान अविभाग से भी विभक्त होने पर ग्रहण दृष्ट होता है। विभज्यमान होने पर अन्य शब्द धर्म, अन्य अर्थ धर्म, और अन्य ज्ञान धर्म होते हैं, इनका पथ विभक्त है। वहाँ समापन्न योगी का जो गौ आदि अर्थ समाधि प्रज्ञा में समारूढ है, यदि वह शब्द, अर्थ, और ज्ञान विकल्पों से अनुविद्ध होकर उपावर्तित होता है, वह संकीर्ण सवितर्क समापत्ति कहलाती है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — शब्द वह है जो कर्णेन्द्रिय से ग्रहण किया जा सके या अर्थों का विशेष योजना-रूप हो, जैसे 'गौ' शब्द। अर्थ शब्द की जाति आदि जैसे 'गौ' पशु-विशेष है, और ज्ञान इन दोनों का प्रकाश करने वाली सत्त्वप्रधान बुद्धिवृत्ति है। ये तीनों भिन्न हैं परंतु अभ्यास से मिले हुए प्रतीत होते हैं, जहाँ समाधिस्थ चित्त में इन तीनों के भेद से वह मिला हुआ भासे तो उसे सवितर्क समापत्ति या सविकल्प कहते हैं।
जब शब्द और ज्ञान का विकल्प जाता रहे और केवल 'गौ' अर्थ ही चित्त में भासता रहे तब वह निर्वितर्क समापत्ति कहलाती है। शब्द, अर्थ और ज्ञान परस्पर भिन्न होते हुए भी शब्द-संकेत की स्मृति से एक का ज्ञान होने पर दूसरे दोनों का भी साथ ही भान होता है।
संकेत-स्मृतिपूर्वक सवितर्क-समाधि में जो शब्द और ज्ञान से मिश्रित स्थूलभूत पदार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है वह विकल्परूप होने से अप्रत्यक्ष है, जबकि संकेत-स्मृतिके परित्यागपूर्वक निर्वितर्क समापत्ति में जो अर्थमात्र का प्रत्यक्ष होता है उसे पर-प्रत्यक्ष कहते हैं। यह पर-प्रत्यक्ष ही आगम और अनुमान ज्ञान का बीज है क्योंकि इस पर-प्रत्यक्ष के बल से ही योगीजन उपदेश करते हैं और उपदिष्ट अर्थ का अनुमान द्वारा निश्चय कराते हैं।
महर्षि कपिल, भगवान् पतञ्जलि और याज्ञवल्क्य जैसे योगीजनों ने इसी पर-प्रत्यक्ष के बल से शब्दसंकेत के बोधन द्वारा शास्त्र-स्मृति आदि रूप प्रथम उपदेश किया था। अतः योगी को निर्वितर्क-समाधि से उत्पन्न हुआ पर-प्रत्यक्ष ज्ञान दूसरे प्रमाणों से असम्बद्ध होता है क्योंकि आगम और अनुमान ज्ञान के पश्चात् पर-प्रत्यक्ष नहीं होता बल्कि उसके आश्रित होते हैं।
1.43 · समाधिपाद सूत्र ४३
स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥ १.४३ ॥
शब्दार्थ — स्मृति · परिशुद्धौ · स्वरूप · शून्या · इव · अर्थ · मात्र · निर्भासा · निर्वितर्का
अर्थ — स्मृतिके शुद्ध हो जानेपर ( अर्थात् आगम - अनुमानके कारणीभूत शब्द - संकेत स्मरणके निवृत्त होनेसे ) अर्थमात्र - सी भासनेवाली अपने ( ग्रहण आकार ज्ञानात्मक ) रूपसे रहित ( चित्तवृत्ति ) निर्वितर्क समापत्ति है। ।
व्यासभाष्य
यदा पुनः शब्दसङ्केतस्मृतिपरिशुद्धौ श्रुतानुमानज्ञानविकल्पशून्यायां समाधिप्रज्ञायां स्वरूपमात्रेणावस्थितोऽर्थस्तत्स्वरूपाकारमात्रतयैवावच्छिद्यते, सा च निर्वितर्का समापत्तिः । तत्परं प्रत्यक्षम् । तच्च श्रुतानुमानयोर्बीजम् । ततः श्रुतानुमाने प्रभवतः । न च श्रुतानुमानज्ञानसहभूतं तद्दृष्टान्तम् । तस्मादसङ्कीर्णं प्रमाणान्तरेण योगिनो निर्वितर्कसमाधिजं दर्शनमिति । निर्वितर्कायाः समापत्तेरस्याः सूत्रेण लक्षणं द्योत्यते— या शब्दसङ्केतश्रुतानुमानज्ञानविकल्पस्मृतिपरिशुद्धौ ग्राह्यस्वरूपोपरक्ता प्रज्ञा स्वमिव प्रज्ञास्वरूपं ग्रहणात्मकं त्यक्त्वा पदार्थमात्रस्वरूपा ग्राह्यस्वरूपापन्नेव भवति, सा तदा निर्वितर्का समापत्तिः । तथा च व्याख्यातम् । तस्या एकबुद्ध्युपक्रमो ह्यर्थात्माणुप्रचयविशेषात्मा गवादिर्घटादिर्वा लोकः । स च संस्थानविशेषो, भूत्सूक्ष्माणां साधारणो धर्मः, आत्मभूतः फलेन शून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥४३॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — स्वरूप शून्या इव अर्थ मात्र निर्भासा निर्वितर्का। स्मृति के परिशुद्ध होने पर स्वरूप शून्य और केवल अर्थ मात्र से निर्भासित निर्वितर्क समापत्ति है। जब शब्द, संकेत, और स्मृति के परिशुद्ध होने पर, श्रुति और अनुमान ज्ञान के विकल्पों से शून्य समाधि प्रज्ञा में, अर्थ स्वरूप मात्र से अवस्थित होकर केवल तद्स्वरूप आकार से अवच्छिदित होता है, वह निर्वितर्क समापत्ति है। वह परम प्रत्यक्ष है। वह श्रुति और अनुमान का बीज है। इससे श्रुति और अनुमान प्रभवित होते हैं।
वह दृष्टान्त श्रुति और अनुमान ज्ञान के सहभूत नहीं है। इसलिए वह योगी का निर्वितर्क समाधि से उत्पन्न असंकीर्ण दर्शन अन्य प्रमाण से नहीं है। निर्वितर्क समापत्ति का लक्षण इस सूत्र से द्योतित होता है—जो शब्द, संकेत, श्रुति, अनुमान, ज्ञान, और विकल्प स्मृति के परिशुद्ध होने पर ग्राह्य स्वरूप से उपरक्त प्रज्ञा, स्वयं प्रज्ञा स्वरूप और ग्रहणात्मक को त्यागकर केवल पदार्थ स्वरूप और ग्राह्य स्वरूप में अपन्न हो जाती है, वह तब निर्वितर्क समापत्ति है। ऐसा ही व्याख्यात है।
उसका एक बुद्धि उपक्रम ही अर्थ आत्मा, अणु प्रचय विशेष आत्मा, गौ, घट आदि या लोक है। वह संस्थान विशेष, भूत और सूक्ष्म का साधारण धर्म, आत्मभूत, फल से शून्य, केवल अर्थ मात्र से निर्भासित निर्वितर्क है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — 'स्वरूपशून्या इव' में 'इव' शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए हुआ है कि चित्त अपने ग्रहणात्मक स्वरूप से पूर्णतः शून्य नहीं होता, बल्कि वह केवल इतना तदाकार हो जाता है कि स्वयं के ग्रहणात्मक स्वरूप से शून्य जैसा प्रतीत होता है। सवितर्क समापत्ति में शब्द, अर्थ और ज्ञान तीनों भासते रहते हैं, जहाँ एकाग्रता बढ़ने पर बाह्यवृत्ति अन्तर्मुख होती जाती है।
जब एकाग्रता इतनी बढ़ जाए कि शब्द और ज्ञान की स्मृति भी न रहे और चित्त केवल ध्येय वस्तु के तदाकार हो जाए, तो उसे निर्वितर्क या निर्विकल्प समापत्ति कहते हैं क्योंकि इसमें शब्द और समापत्तिको ज्ञान का विकल्प नहीं रहता। सूत्र ४२ के अनुसार वितर्क का अर्थ विशेष तर्क है जिसमें विकल्पों को भेद में अभेद और अभेद में भेद ज्ञान बताया गया है।
जब चित्त तीन आकार वाला होता है तब वह सवितर्क या सविकल्प समापत्ति कहलाती है, किंतु जब सत्त्व का प्रकाश रज और तम को दबाकर उसे एकाकार कर दे, तब वह निर्वितर्क या निर्विकल्प समापत्ति कहलाती है। सूत्र ४३ के अनुसार विशेष विचार यानी सवितर्क-समापत्ति से निर्वितर्क-समापत्ति में भेदबोधक 'अर्थमात्रनिर्भासा' पद का अर्थ यह है कि इसमें शब्द और ज्ञान विषय नहीं रहते, केवल ग्राह्य वस्तुविषयक ही चित्त स्थिर रहता है।
इस समापत्ति में ग्रहणाकार ज्ञानात्मक चित्तवृत्ति भी रहती है परंतु वह अपने रूप से भान नहीं होती बल्कि ध्येयरूप ही हो जाती है। 'स्मृतिपरिशुद्धौ' पद यह स्पष्ट करता है कि यदि विकल्पात्मक आगम-अनुमान ज्ञान के कारणभूत शब्द-संकेत का स्मरण रहता तो शब्द और ज्ञान का भी भान होता, परंतु इस दशा में वह स्मरण की निवृत्ति हो गई है। टिप्पणी में भाष्यकार ने बताया है कि यहाँ विषयभूत स्थूल 'गो', 'घटादि' पदार्थ न तो अणु-समुदायरूप हैं और न ही ज्ञानस्वरूप हैं।
यह सिद्धान्त संज्ञक बौद्धमत वालों का है कि घट पुञ्ज ही दृष्टिगोचर घट है, जिसे अनन्त परमाणु ही मिले हुए हैं, जबकि परमाणु संघातवाद कहता है कि परमाणुओं का कार्य परिणाम नहीं है। योगाचार-संज्ञक विज्ञानवादी बौद्धों का मत है कि ये सब घट और अणुओं से उत्पन्न भिन्न कार्यस्वरूप हैं, किंतु 'यह घट है' इस एकबुद्धिके उत्पन्न करनेवाले अणुओं का स्थूल परिणाम विशेष है।
1.44 · समाधिपाद सूत्र ४४
एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥ १.४४ ॥
शब्दार्थ — एतया · एव · सविचारा · निर्विचारा · च · सूक्ष्म · विषया · व्याख्याता
अर्थ — इस सवितर्क और निर्वितर्क समापत्तिके निरूपणसे ही सविचार और निर्विचार समापत्तियाँ सूक्ष्म विषयमें व्याख्यान की हुई समझनी चाहिये ।
(इन सूत्रोंपर व्यासभाष्य इस संस्करणमें अलगसे नहीं है।)
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जब सूक्ष्म विषय के प्रति चित्त देश, काल और निमित्त के विचार से मिला हुआ होता है, तब उसे सविचार समापत्ति कहते हैं। जब चित्त एकाग्रता के कारण इन विशेषणों की स्मृति से शुद्ध होकर केवल धर्ममात्र स्वरूप से प्रकाश पाता है, तब वह निर्विचार समापत्ति कहलाती है।
जैसे स्थूल पदार्थों में शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पों से संकीर्ण सवितर्क समापत्ति होती है, वैसे ही सूक्ष्म परमाणुओं में देश-काल-कार्य के अनुभव से मिश्रित समापत्ति सविचार समापत्ति है। उदाहरण स्वरूप सूक्ष्म पृथ्वी गन्धतन्मात्र प्रधान है, जल रसतन्मात्र प्रधान है, अग्नि रूपतन्मात्र प्रधान है, वायु स्पर्शतन्मात्र प्रधान है और आकाश शब्द तन्मात्र प्रधान है।
इस प्रकार स्थूल पदार्थ-विषयक सवितर्क-निर्वितर्क और सूक्ष्म पदार्थ-विषयक सविचार-निर्विचार रूप से समापत्ति चार प्रकार की होती है। टिप्पणी सूत्र ४४ के अनुसार सविचार समापत्ति को सविकल्प और निर्विचार समापत्ति को निर्विकल्प भी कहते हैं। निर्विकल्प को असम्प्रज्ञात समाधि समझना भूल है क्योंकि इसमें संसार का बीज बना रहता है जबकि असम्प्रज्ञात समाधि में शुद्ध परमात्मस्वरूप होता है। सवितर्क और सविचार समापत्ति ध्यान से उत्तर एवं समाधिकी पूर्व अवस्था है जिसे तटस्थ समापत्ति भी कहते हैं।
1.45 · समाधिपाद सूत्र ४५
सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ १.४५ ॥
शब्दार्थ — सूक्ष्म · विषया · च · अ · लिङ्ग · पर्यवसानम्
अर्थ — सूक्ष्मविषयता अलिङ्ग प्रकृतिपर्यन्त है ।
(इन सूत्रोंपर व्यासभाष्य इस संस्करणमें अलगसे नहीं है।)
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सूक्ष्म विषयों की सूक्ष्मता परमाणुओं में समाप्त नहीं होती, बल्कि यह प्रकृति पर्यन्त है जिसमें पाँचों स्थूलभूतों से सूक्ष्मभूतों की सूक्ष्मता का तारतम्य चला गया है। सूक्ष्म विषयों के अन्तर्गत रसतन्मात्रा, अग्नि-परमाणु, वायु-परमाणु, आकाश-परमाणु, पञ्चतन्मात्राओं का कारणीभूत अहंकार, अहंकार का कारणीभूत लिङ्ग-संज्ञक महत्तत्त्व और महत्तत्त्व का कारण अलिङ्ग-संज्ञक प्रकृति सम्मिलित हैं।
यद्यपि 'अव्यक्तात्पुरुषः परः' इस श्रुति से पुरुष सूक्ष्म है, तथापि जड़-ग्राह्य परिणामी उपादान-कारण सहित सूक्ष्मता की विश्रान्ति यहाँ प्रकृति में बतलायी गयी है। सूक्ष्मभूतों से लेकर प्रकृति पर्यन्त जितने सूक्ष्म पदार्थ हैं, वे सब विचार समापत्तिके विषय हैं, जबकि आनन्दानुगत और अस्मितानुगत निर्विचार समापत्तिकी ग्रहण और ग्रहीता रूप उच्चतर तथा उच्चतम अवस्थाएँ हैं।
विशेष वक्तव्य सूत्र ४५ में केवल सूक्ष्म विषयों की सूक्ष्मता की पराकाष्ठा बतलायी गयी है, जिससे यह न समझना चाहिये कि अलिङ्ग मूल प्रकृति भी योगी के संयम का विषय बन सकती है। इस प्रकार के साधक के लिए चार भूमियाँ बतलायी गयी हैं: वितर्कानुगत में स्थूल भूतों का, विचारानुगत में सूक्ष्म भूतों का तन्मात्राओंतक, आनन्दानुगत में अहंकार का और अस्मितानुगत में अस्मिता का साक्षात्कार होता है।
अलिङ्ग-मूल-प्रकृति गुणों की साम्यावस्था का नाम है, जिसका पुरुष के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है और यह किसी भी समाधि द्वारा साक्षात्कार का विषय नहीं है। कई अभ्यासियों के सम्बन्ध में जो मूल प्रकृतिका साक्षात्कार का कहा जाता है, वह वास्तव में विचारानुगत सम्प्रज्ञात-समाधिकी ही प्रकाशमय अवस्थामे होने लगता है।
1.46 · समाधिपाद सूत्र ४६
ता एव सबीजः समाधिः ॥ १.४६ ॥
शब्दार्थ — ता · एव · स · बीजः · समाधिः
अर्थ — ये पूर्वोक्त चारों समापत्तियाँ ही सबीज समाधि कहलाती हैं ।
(इन सूत्रोंपर व्यासभाष्य इस संस्करणमें अलगसे नहीं है।)
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — बाह्य अनात्मवस्तु अर्थात् कार्यसहित प्रकृति जो ग्राह्य-ग्रहण और ग्रहीतृरूप दृश्यवर्ग है, उसे बीज तथा आलम्बन माना जाता है। इस प्रकार इन वस्तुओं के साथ होने वाली समाधियाँ सबीज-समाधि कहलाती हैं क्योंकि सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार और निर्विचार समापत्तियाँ सभी आश्रयसहित होती हैं।
सत्रहवें सूत्र में बतलायी हुई आनन्दानुगत ग्रहणरूप और अस्मितानुगत ग्रहीतृरूप दोनों समाधियाँ निर्विचार की ही उच्चतर और उच्चतम अवस्थाएँ हैं जिन्हें सम्मिलित करने से सबीज-समाधिके छः भेद होते हैं। इन छह भेदों में (१) सवितर्क समापत्ति, (२) निर्वितर्क, (३) सविचार, (४) निर्विचार, (५) आनन्दानुगत और (६) अस्मितानुगत अवस्थाएँ आती हैं। वाचस्पति मिश्र ने सूत्र ४६ के विशेष वक्तव्य के आधार पर इन भेदों को दो-दो अवान्तर भेद करके सबीज-समाधिके आठ भेद बतलाये हैं।
उनका कथन है कि 'ता एव' का अर्थ यह नहीं है कि केवल चार ही सबीज-समाधियाँ हैं, बल्कि इसमें ग्रहण और ग्रहीतृ समापत्तियों के भी दो-दो भेद शामिल हैं। विज्ञानभिक्षु ने सबीज-समाधिके छः भेद दिखलाये हैं जो मूलसूत्र, व्यासभाष्य तथा अनुभव के आधार पर अधिक उचित प्रतीत होते हैं। क्योंकि निर्विचार की उत्कृष्ट भूमियों में विकल्पों की संभावना नहीं होती और अतः वितर्क तथा विचार जैसे दो-दो भेद आनन्द और अस्मिता समापत्ति के साथ नहीं किए जा सकते।
1.47 · समाधिपाद सूत्र ४७
निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥ १.४७ ॥
शब्दार्थ — निर्विचार · वैशारद्ये · अध्यात्म · प्रसादः
अर्थ — निर्विचार समाधिकी वैशारद्य ( प्रवीणता ) होनेपर अध्यात्म ( प्रज्ञा ) की निर्मलता होती है ।
(इन सूत्रोंपर व्यासभाष्य इस संस्करणमें अलगसे नहीं है।)
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — शुद्ध स्थितिका प्रवाह को वैशारद्य कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो आत्मा अर्थात् बुद्धि में स्थित रहता है। अध्यात्म-प्रसाद का अर्थ है बुद्धि में रहने वाली प्रसन्नता या निर्मलता। जब निर्विचार समाधिकी उच्चतम अवस्था में रज और तम रूप मल एवं आवरणों के क्षय होने पर प्रकाशस्वरूप बुद्धि के सत्त्वगुण की प्रधानता से रजस्-तमस् से अनभिभूत स्वच्छ स्थिरता-रूप एकाग्र प्रवाह निरंतर बहता रहता है, तो इसे वैशारद्य कहते हैं। इससे योगी को प्रकृति-पर्यन्त सब पदार्थों का एक ही काल में साक्षात्कार हो जाता है, जिसे अध्यात्म प्रसाद, स्फुट-प्रज्ञा-लोक तथा प्रज्ञाप्रासाद भी कहा जाता है। श्रीव्यासजी महाराज ने इस अवस्था का वर्णन करते हुए बताया है कि प्रज्ञारूपी प्रासाद पर चढ़कर शोक-रहित ज्ञानी योगी शोक में पड़े जनों को ऐसे देखता है जैसे पहाड़ की चोटी पर खड़ा मनुष्य नीचे पृथ्वी पर खड़े मनुष्यों को देखता है। यहाँ निर्विचार के अन्तर्गत ही आनन्दानुगत और अस्मितानुगत भूमियाँ आ गई हैं।
1.48 · समाधिपाद सूत्र ४८
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥ १.४८ ॥
शब्दार्थ — ऋतंभरा · तत्र · प्रज्ञा
अर्थ — अध्यात्म - प्रसादके लाभ होनेपर जो प्रज्ञा ( समाधिजन्य बुद्धि ) उत्पन्न होती है , उसका नाम ऋतम्भरा प्रज्ञा ( सच्चाईको धारण करनेवाली अविद्यादिसे रहित बुद्धि ) है ।
व्यासभाष्य
तस्मिन्समाहितचित्तस्य या प्रज्ञा जायते, तस्या र्तंभरेति संज्ञा भवति । अन्वर्था च सा, सत्यमेव बिभर्ति । न च तत्र विपर्यासज्ञानगन्धोऽप्यस्तीति । तथा चोक्तं— आगमेनानुमानेन ध्यानाभ्यासरसेन च । त्रिधा प्रकल्पयन्प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम् ॥ इति ॥४८॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा। वहाँ ऋतंभरा प्रज्ञा होती है। समाहित चित्त में जो प्रज्ञा उत्पन्न होती है, उसकी संज्ञा ऋतंभरा है। वह अन्वर्थ है और केवल सत्य को धारण करती है। वहाँ विपर्यास ज्ञान का गंध भी नहीं है। ऐसा कहा गया है—आगम, अनुमान, और ध्यान अभ्यास के रस से त्रिविध रूप से प्रज्ञा की प्रकल्पना कर योगी उत्तम योग प्राप्त करता है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — निर्विकार समाधिकी विशारदतासे जन्य अध्यात्म-प्रसाद के होने पर जो समाहित-चित्त योगी की प्रज्ञा उत्पन्न होती है, उसका नाम ऋतम्भरा प्रज्ञा है। 'ऋत' का अर्थ सत्य और 'भरा' का अर्थ धारण करनेवाली है, अर्थात यह प्रज्ञा सत्य को ही धारण करने वाली होती है जिसमें अविद्या का कोई अंश नहीं होता। इस प्रज्ञा के होने से ही उत्तम योग का लाभ होता है जैसा कि श्रीव्यासजी ने कहा है कि आगम, अनुमान और ध्यानाभ्यास से तीन प्रकार से प्रज्ञा का सम्पादन करके योगी उत्तम योग प्राप्त करता है। यहाँ सत्य और ऋत में यह भेद समझना चाहिए कि आगम और अनुमान द्वारा प्राप्त यथार्थ ज्ञान (Conceptual fact) वह सत्य है। साक्षात् करने के पश्चात् जो यथार्थ ज्ञान (Perceptual fact) प्राप्त होता है, वह ऋत है। अतः ऋत का अर्थ साक्षात् अनुभूत सत्य है।
1.49 · समाधिपाद सूत्र ४९
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ १.४९ ॥
शब्दार्थ — श्रुति · अनुमान · प्रज्ञाभ्याम् · अन्य · विषया · विशेष · अर्थत्वात्
अर्थ — आगम और अनुमानकी प्रज्ञासे ऋतम्भरा प्रज्ञाका विषय अलग है , विशेषरूपसे अर्थका साक्षात्कार करनेसे ।
व्यासभाष्य
श्रुतमागमविज्ञानं तत्सामान्यविषयम् । न ह्यागमेन शक्यो विशेषोऽभिधातुम् । कस्मात्? न हि विशेषेण कृतसङ्केतः शब्द इति । तथानुमानं सामान्यविषयमेव । यत्र प्राप्तिस्तत्र गतिः, यत्र न प्राप्तिस्तत्र न गतिरित्युक्तम् । अनुमानेन च सामान्येनोपसंहारः । तस्माच्छ्रुतानुमानविषयो न विशेषः कश्चिदस्तीति । न चास्य सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टस्य वस्तुनो लोकप्रत्यक्षेण ग्रहणमस्ति । न चास्य विशेषस्याप्रमाणकस्याभावोऽस्तीति समाधिप्रज्ञानिर्ग्राह्य ग्रहणमस्ति । न चास्य विशेषस्याप्रमाणकस्याभावोऽस्तीति समाधिप्रज्ञानिर्ग्राह्य एव स विशेषो भवति । भूतसूक्ष्मगतो वा पुरुषगतो वा । तस्माच्छ्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया सा प्रज्ञा विशेषार्थत्वादिति ॥४९॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — श्रुति अनुमान प्रज्ञाभ्याम् अन्य विषया विशेष अर्थत्वात्। श्रुति और अनुमान की प्रज्ञा से भिन्न विषय वाली प्रज्ञा विशेष अर्थ के कारण होती है। श्रुति आगम का विज्ञान है, वह सामान्य विषय है। आगम से विशेष का अभिधान नहीं हो सकता। कस्मात्। क्यों? न हि विशेषेण कृत सङ्केतः शब्दः इति। क्योंकि शब्द विशेष के साथ संकेत नहीं करता। एव। अनुमान भी केवल सामान्य विषय है। यत्र प्राप्तिः तत्र गतिः यत्र न प्राप्तिः तत्र न गतिः इति उक्तम्।
जहाँ प्राप्ति है, वहाँ गति है, जहाँ प्राप्ति नहीं, वहाँ गति नहीं, ऐसा कहा गया। अनुमानेन च सामान्येन उपसंहारः। अनुमान से सामान्य का उपसंहार होता है। श्रुति अनुमान विषया न विशेषः कश्चित् अस्ति इति। इसलिए श्रुति और अनुमान का विषय कोई विशेष नहीं है। न च अस्य सूक्ष्म व्यवहित विप्रकृष्टस्य वस्तुनः लोक प्रत्यक्षेण ग्रहणम् अस्ति। इस सूक्ष्म, व्यवहित, और विप्रकृष्ट वस्तु का लोक प्रत्यक्ष से ग्रहण नहीं है।
न च अस्य विशेषस्य अप्रामाणकस्य अभावः अस्ति इति समाधि प्रज्ञा निर्ग्राह्य ग्रहणम् अस्ति। इस अप्रामाणिक विशेष का अभाव नहीं है, इसलिए समाधि प्रज्ञा से निर्ग्राह्य ग्रहण है। न च अस्य विशेषस्य अप्रामाणकस्य अभावः अस्ति इति समाधि प्रज्ञा निर्ग्राह्य एव सः विशेषः भवति। इस अप्रामाणिक विशेष का अभाव नहीं है, इसलिए समाधि प्रज्ञा से निर्ग्राह्य ही वह विशेष होता है। भूत सूक्ष्म गतः वा पुरुष गतः वा। भूत, सूक्ष्म, या पुरुष में गत हो।
तस्मात् श्रुति अनुमान प्रज्ञाभ्याम् अन्य विषया सा प्रज्ञा विशेष अर्थत्वात् इति। इसलिए वह प्रज्ञा श्रुति और अनुमान की प्रज्ञा से भिन्न विषय वाली है, विशेष अर्थ के कारण।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पदार्थ के दो रूप होते हैं, एक सामान्य जो सभी पदार्थों में पाया जाता है और दूसरा विशेष जो प्रत्येक व्यक्ति का अपना रूप होता है। आगम-जन्य ज्ञान केवल वस्तु के सामान्य रूप को विषय करता है क्योंकि विशेष के साथ शब्द का वाच्य वाचक भाव संबंध नहीं होता है। शास्त्र किसी वस्तु को सामान्य रूप से ही बोध करता है, जैसे गो और वृक्षादि शब्दों के सुनने से उनका सामान्य ज्ञान होता है न कि विशेष ज्ञान। अनुमान भी सामान्य रूप से ही ज्ञान उत्पन्न कराता है क्योंकि इसमें लिंग से लिङ्गी का ज्ञान होता है। केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही वस्तु के विशेष रूप को दिखाने में समर्थ होता है, किंतु इंद्रिय-जन्य प्रत्यक्ष केवल स्थूल वस्तुओं तक सीमित है। पञ्चतन्मात्राएँ, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति और पुरुष जैसे सूक्ष्म पदार्थों में प्रत्यक्ष की पहुँच नहीं है और इनका विशेष रूप केवल निर्विचार समाधिकी विशारदता में होने वाली ऋतम्भराप्रज्ञा से ही साक्षात्कार हो सकता है। यह प्रज्ञा श्रुत-अनुमान से अन्य और उत्कृष्ट है क्योंकि यह विशेष विषयक है और इसे प्रसंख्यान अर्थात् विवेक-ख्याति के तुल्य समझना चाहिए। आगम वस्तु के यथार्थ स्वरूप को बताता है और इसी का अनुमान किया जाता है।
1.50 · समाधिपाद सूत्र ५०
तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥ १.५० ॥
शब्दार्थ — तत् · जः · संस्कारः · अन्य · संस्कार · प्रतिबन्धी
अर्थ — उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न होनेवाला संस्कार अन्य सब व्युत्थानके संस्कारोंका बाधक ( रोकनेवाला ) होता है ।
व्यासभाष्य
समाधिप्रज्ञाप्रभवः संस्कारो व्युत्थानसंस्काराशयं बाधते । व्युत्थानसंस्काराभिभवात्तत्प्रभवाः प्रत्यया न भवन्ति । प्रत्ययनिरोधे समाधिरुपतिष्ठते । ततः समाधिजा प्रज्ञा, ततः प्रज्ञाकृताः संस्कारा इति नवो नवः संस्काराशयो जायते । ततश्च प्रज्ञा ततश्च संस्कारा इति । कथमसौ संस्कारातिशयश्चित्तं साधिकारं न करिष्यतीति ? न ते प्रज्ञाकृताः संस्काराः क्लेशक्षयहेतुत्वाच्चित्तमधिकारविशिष्टं कुर्वन्ति । चित्तं हि ते स्वकार्यादवसादयन्ति । ख्यातिपर्यवसानं हि चित्तचेष्टितमिति ॥५०॥
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत् जः संस्कारः अन्य संस्कार प्रतिबन्धी। उससे उत्पन्न संस्कार अन्य संस्कारों का प्रतिबंधी है। समाधि प्रज्ञा से उत्पन्न संस्कार व्युत्थान संस्कार के आशय को बाधित करता है। व्युत्थान संस्कार के अभिभव से उससे प्रभवित प्रत्यय नहीं होते। प्रत्यय के निरोध से समाधि उपस्थित होती है। इससे समाधि से उत्पन्न प्रज्ञा, और प्रज्ञा से कृत संस्कार, इस प्रकार नया नया संस्कार आशय उत्पन्न होता है। इससे प्रज्ञा और इससे संस्कार। कैसे वह संस्कार अतिशय चित्त को साधिकार नहीं बनाएगा? न ते प्रज्ञा कृताः संस्काराः क्लेश क्षय हेतुत्वात् चित्तम् अधिकार विशिष्टम् कुर्वन्ति। वे प्रज्ञा कृत संस्कार क्लेश क्षय के हेतु होने से चित्त को अधिकार विशिष्ट नहीं बनाते। चित्तम् हि ते स्व कार्यात् अवसादयन्ति। वे चित्त को उसके कार्य से अवसादित करते हैं। इति। चित्त का चेष्टित ख्याति में पर्यवसान है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — समाधि से पूर्व चित्त केवल व्युत्थान के संस्कारों से संस्कृत होता है, किंतु समाधि अवस्था में होने वाले अनुभव के संस्कार अधिक बलवान होते हैं क्योंकि समाधि-प्रज्ञा अधिक निर्मल होती है। इस प्रज्ञा से उत्पन्न संस्कार व्युत्थान के संस्कारों और वृत्तियों को दबा देते हैं जिससे समाधि उत्पन्न होती है और यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक निर्विचार-समाधि उपस्थित न हो जाए।
निर्विचार-समाधि से प्राप्त ऋतम्भरा प्रज्ञा से निरोध-संस्कार पुष्ट होकर व्युत्थान के संस्कारों को सर्वथा रोक देते हैं। जब समाधि-प्रज्ञा-जन्य संस्कार विद्यमान रहते हैं, तब वे चित्त को अधिकार-विशिष्ट नहीं करते क्योंकि केवल वासना-जनित संस्कार ही क्लेश देने की योग्यता वाले होते हैं। वास्तव में ये संस्कार क्लेश-क्षय के हेतु होने से चित्त को अधिकार से रहित करते हैं और समाधि-जन्य संस्कार क्लेशादि वासना से मुक्त चित्त को विवेक-ख्याति अधिकारवाला बनाते हैं।
चित्त के दो कार्यों में अधिकार होता है, एक शब्द-रूप-रसादि विषयों का पुरुष को भोग देना और दूसरा विवेक-ख्याति उत्पन्न करना। इनमें पहले प्रकार का अधिकार योग का हेतु है, न कि दूसरे का। विवेक-ख्याति के उदय होने से भोगाधिकार की समाप्ति हो जाती है क्योंकि चित्त की चेष्टा केवल विवेक-ख्याति के उत्पादन तक ही रहती है।
1.51 · समाधिपाद सूत्र ५१
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥ १.५१ ॥
शब्दार्थ — तस्य · अपि · निरोधे · सर्व · निरोधात् · निर्बीजः · समाधिः
अर्थ — पर - वैराग्यद्वारा उस ऋतम्भरा प्रज्ञा - जन्य संस्कारके भी निरोध हो जानेपर पुरातन - नूतन सब संस्कारोंके निरोध हो जानेसे निर्बीज - समाधि होती है ।
व्यासभाष्य
इति पतञ्जलिविरचिते योगसूत्रे प्रथमः समाधिपादः । स न केवलं समाधिप्रज्ञाविरोधी । प्रज्ञाकृतानामपि संस्काराणां प्रतिबन्धी भवति । कस्मात्? निरोधजः संस्कारः समाधिजान्संस्कारान्बाधत इति । निरोधस्थितिकालक्रमानुभवेन निरोधचित्तकृतसंस्कारास्तित्वमनुमेयम् । व्युत्थाननिरोधसमाधिप्रभवैः सह कैवल्यभागीयैः संस्कारैश्चित्तं स्वस्यां प्रकृताववस्थितायां प्रविलीयते । तस्मात्ते संस्काराश्चित्तस्याधिकारविरोधिनो न स्थितिहेतवो भवन्तीति । यस्मादवसिताधिकारं सह कैवल्यभागीयैः संस्कारैश्चित्तं निवर्तते । तस्मिन्न्निवृत्ते पुरुषः स्वरूपमात्रप्रतिष्ठोऽतः शुद्धः केवलो मुक्त इत्युच्यत इति ॥५१॥ इति श्रीपातञ्जले साङ्ख्यप्रवचने योगशास्त्रे श्रीमद्व्यासभाष्ये समाधिपादः प्रथमः ।
भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तस्य अपि निरोधे सर्व निरोधात् निर्बीजः समाधिः। उसके भी निरोध से सर्व निरोध होने पर निर्बीज समाधि होती है। सः न केवलम् समाधि प्रज्ञा विरोधी। वह केवल समाधि प्रज्ञा का विरोधी नहीं है। प्रज्ञा कृतानाम् अपि संस्काराणाम् प्रतिबन्धी भवति। प्रज्ञा कृत संस्कारों का भी प्रतिबंधी होता है। कस्मात्। क्यों? निरोध जः संस्कारः समाधि जान् संस्कारान् बाधति इति। निरोध से उत्पन्न संस्कार समाधि से उत्पन्न संस्कारों को बाधित करता है। तित्वम् अनुमेयम्।
निरोध स्थिति के काल क्रम के अनुभव से निरोध चित्त कृत संस्कारों का तित्व अनुमेय है। व्युत्थान निरोध समाधि प्रभवैः सह कैवल्य भागीयैः संस्कारैः चित्तम् स्वस्याम् प्रकृतौ अवस्थितायाम् प्रविलीयते। व्युत्थान, निरोध, और समाधि से प्रभवित कैवल्य भागीय संस्कारों के साथ चित्त अपनी प्रकृति में अवस्थित होकर प्रविलीय जाता है। तस्मात् ते संस्काराः चित्तस्य अधिकार विरोधिनः न स्थिति हेतवः भवन्ति इति। इसलिए वे संस्कार चित्त के अधिकार के विरोधी हैं, स्थिति के हेतु नहीं होते।
भागीयैः संस्कारैः चित्तम् निवर्तते। क्योंकि अवसित अधिकार के साथ कैवल्य भागीय संस्कारों के साथ चित्त निवृत्त होता है। मात्र प्रतिष्ठः अतः शुद्धः केवलः मुक्तः इति उच्यते इति। उस निवृत्ति में पुरुष स्वरूप मात्र में प्रतिष्ठित होकर शुद्ध, केवल, और मुक्त कहलाता है। इति पतञ्जलिविरचिते योगसूत्रे प्रथमः समाधिपादः । इति पतञ्जलि विरचिते योग सूत्रे प्रथमः समाधि पादः। इस प्रकार पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्र में प्रथम समाधिपाद समाप्त हुआ।
इति श्रीपातञ्जले साङ्ख्यप्रवचने योगशास्त्रे श्रीमद्व्यासभाष्ये समाधिपादः प्रथमः । इति श्री पातञ्जले साङ्ख्य प्रवचने योग शास्त्रे श्रीमत् व्यास भाष्ये समाधि पादः प्रथमः। इस प्रकार श्री पातंजलि के सांख्य प्रवचन योग शास्त्र में श्रीमद् व्यास भाष्य के साथ समाधिपाद प्रथम समाप्त हुआ। उद्दिष्टः समाहितचित्तस्य योगः । कथं व्युत्थितचित्तोऽपि योगयुक्तः स्यादित्येतदारभ्यते— उद्दिष्टः समाहित चित्तस्य योगः। समाहित चित्त वाले के लिए योग का उल्लेख किया गया है।
कथम् व्युत्थित चित्तः अपि योग युक्तः स्यात् इति एतत् आरभ्यते। व्युत्थित चित्त वाला भी योग युक्त कैसे हो, इसकी चर्चा यहाँ शुरू की जाती है।
व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पर-वैराग्य द्वारा जो समस्त वृत्ति और संस्कार प्रवाह का निरोध होता है, वह निर्बीज-समाधि कहलाती है। सम्प्रज्ञात-समाधि किसी ध्येय को आलम्बन बनाकर की जाती है जिसे बीज कहते हैं, जबकि असम्प्रजात-समाधि में आलम्बन का अभाव होता है। यह निरोध केवल समाधि-जन्य प्रज्ञा का ही नहीं बल्कि प्रज्ञाजन्य संस्कारों का भी विरोधी है जैसा कि सूत्र में 'अपि' शब्द से स्पष्ट होता है।
यद्यपि सर्ववृत्ति-निरोध का प्रत्यक्ष प्रमाण संभव नहीं है, फिर भी चित्त की निरुद्धावस्था के कालक्रम से निरोध-संस्कारों का अनुमान होता है। इस निरोधावस्थ में चित्त अपनी प्रकृति में प्रविलय होकर अवस्थित हो जाता है और इस असम्प्रजात-समाधि से ही योगी जीवन्मुक्त पद प्राप्त करता है। सूत्र ५१ के अनुसार, चित्त में दो प्रकार के परिणाम होते हैं: एक आन्तरिक जो सत्त्वचित्त में होता है और दूसरा बाह्य जो वृत्तियों में होता है।
जब चित्त की वृत्तियाँ रुक जाती हैं, तब केवल आन्तरिक परिणाम रहता है जिससे पुरुष शुद्ध परमात्मस्वरूप में अवस्थित रहता है। श्रीमान हरिभजनजी के अनुसार, जब तक चित्त को किसी साधन से निरुद्ध किया जाता है, वह केवल 'निरुद्धावस्था' है, न कि 'स्वरूप-स्थिति'। वास्तविक स्वरूप-स्थिति वह है जब चित्त बिना किसी प्रयत्न के सहज ही निरुद्ध रहने लगे और पुरुष अपने स्वरूप में स्थित हो जाए।
इस स्थिति में यदि भोगवश कोशमयी अवस्था भी आए, तो वह उसकी स्थायी स्वरूप-स्थिति ही कहलाएगी क्योंकि वह भोग के बाद पुनः स्वरूप में ही रहता है। अंततः, जब चित्त की वृत्तियों का निरोध स्थायी और स्वाभाविक रूप से प्रतिक्षण बना रहे, तभी उसे 'स्वरूपस्थिति' कहा जाता है।
उपसंहार
इन सूत्रों के माध्यम से चित्त की स्थिरता और एकाग्रता की यात्रा स्पष्ट होती है, जो अभ्यास और वैराग्य से प्रारंभ होकर परम शांति की ओर ले जाती है। यह संपूर्ण क्रम साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाते हुए अंततः निर्बीज समाधि में प्रतिष्ठित करता है।
In English
Yoga Sutras of Patanjali: Samadhi Pada
This text explains the first chapter of the Yoga Sutras, focusing on the nature of Samadhi and the cessation of mental fluctuations. Through the commentary of Omananda Tirtha, it describes the five states of the mind and the distinction between Sampragnyata (with seed) and Asampragnyata (without seed) meditation.
This article answers
- What are the five states of the mind in yoga?
- Difference between samprajnata and asamprajnata samadhi?
- Meaning of yoga chitta vritti nirodhah?
- What happens to the seer when mental fluctuations cease?