श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · पातञ्जल योगदर्शन

पातञ्जल योगदर्शन — साधनपाद

55 मूल पद्य 55 संस्करणसे मिलाये गये

यह भाग क्रियायोग के माध्यम से क्लेशों के निवारण और समाधि की प्राप्ति की प्रक्रिया को समझाता है। इसमें दुःख के कारणों से लेकर अष्टाङ्ग योग के व्यावहारिक अभ्यास तक का क्रमिक विवेचन किया गया है।

2.1 · साधनपाद सूत्र १

सूत्र २.१

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ २.१ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 300

शब्दार्थ — तपः · स्वाध्याय · ईश्वर · प्रणिधानानि · क्रिया · योगः

अर्थ — तप , स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान क्रियायोग है ।

व्यासभाष्य

नातपस्विनो योगः सिद्ध्यति । अनादिकर्मक्लेशवासनाचित्रा प्रत्युपस्थितविषयजाला चाशुद्धिर्नान्तरेण तपः सम्भेदमापद्यत इति तपस उपादानम् । तच्च चित्तप्रसादनमबाधमानमनेनासेव्यमिति मन्यते । स्वाध्यायः प्रणवादिपवित्राणां जपो मोक्षशास्त्राध्ययनं वा ईश्वरप्रणिधानं सर्वक्रियाणां परमगुरावर्पणं तत्फलसंन्यासो वा ॥१॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तप, स्वाध्याय, और ईश्वर प्रणिधान क्रिया योग हैं। न अतपस्विनः योगः सिद्ध्यति। तपस्वी के बिना योग सिद्ध नहीं होता। अनादि कर्म क्लेश वासना चित्रा प्रत्युपस्थित विषय जाला च अशुद्धिः न अन्तरेण तपः सम्भेदम् आपद्यति इति तपसः उपादानम्। अनादिकालीन कर्म, क्लेश, और वासना से चित्रित, प्रत्युपस्थित विषयों के जाल से युक्त अशुद्धि तप के बिना सम्भेद को प्राप्त नहीं होती, इसलिए तप का उपादान है। तत् च चित्त प्रसादनम् अबाधमानम् अनेन असेव्यम् इति मन्यते। वह चित्त को प्रसन्न करने वाला और अबाधमान है, इसे सेवन करना चाहिए, ऐसा माना जाता है। स्वाध्यायः प्रणव आदि पवित्राणाम् जपः मोक्ष शास्त्र अध्ययनम् वा। स्वाध्याय प्रणव आदि पवित्र मंत्रों का जप या मोक्ष शास्त्र का अध्ययन है। ईश्वर प्रणिधानम् सर्व क्रियाणाम् परम गुरौ अर्पणम् तत् फल संन्यासः वा। ईश्वर प्रणिधान सभी क्रियाओं को परम गुरु में अर्पण करना या उनके फल का संन्यास है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — तप का अर्थ शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ और मन को अभ्यास से वशीकार करना है ताकि योगमार्ग में बिना किसी विक्षेप के स्वस्थ शरीर और निर्मल अन्तःकरण के साथ प्रवृत्त रहा जा सके। श्रीव्यासजी महाराज के अनुसार, विषयों में प्रवृत्ति कराने वाले रजस्-तमस के प्रसार का नाश बिना तप के अनुष्ठान के संभव नहीं है। उपनिषदों में भी 'तपसाऽनाशकेन' कहा गया है कि तप ऐसा हो जो शरीर का नाशक न हो और चित्त की प्रसन्नता का हेतु हो।

स्वाध्याय का अर्थ वेद, उपनिषद् आदि सत्-शास्त्रों का नियमपूर्वक अध्ययन और ओंकार सहित मन्त्रों का जाप है। ईश्वर-प्रणिधान के दो अर्थ हैं: पहला, समस्त बाह्य और आभ्यन्तर जीवन को ईश्वर के समर्पण करना जो व्यावहारिक जीवन में सम्प्रज्ञात-समाधि हेतु है, और दूसरा, मानसिक जाप जो समाधिपाद सू. २३ के अनुसार उत्तम अधिकारियों के लिए प्रधान है।

गीता ९.२७ और गीता २.४७ के अनुसार, योगी को अपने समस्त कर्मों को फल की इच्छा त्यागकर ईश्वर को समर्पित करते हुए निष्काम भाव से कर्तव्य रूप शुभ कर्म करने चाहिए। इस पाद में मध्यमाधिकारियों के लिए अष्टाङ्गयोग के तीन नियमों अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान को व्यावहारिक जीवन को शुद्ध बनाने वाले क्रियायोग के रूप में बतलाया गया है।

तप की व्याख्या में आसन, प्राणायाम, सात्त्विक आहार-विहार, प्रत्याह्य, शम और दम को शामिल किया गया है जिसमें युक्त आहार, युक्त कर्मचेष्टा, युक्ताहार-विहार, युक्ताहार-विहार (सोने-जागने का नियम) और वाणी तथा मन का तप सम्मिलित हैं। गीता १६ के अनुसार योग न तो बहुत अधिक खाने वाले को और न ही कोरे उपवासी को प्राप्त होता है, अतः मिताहार और सात्त्विक आहार का पालन आवश्यक है।

वाणी का तप सत्य और प्रिय वचन बोलने में है, जबकि मन का तप हिंसात्मक और अपवित्र विचारों को हटाकर शुद्ध विचारों को धारण करने और चित्त को शून्य करने का अभ्यास है। अंततः, जब प्रत्याह्य द्वारा इन्द्रियाँ अन्तर्मुख होती हैं, तब किसी एक ध्येय विषय पर चित्त को वृत्तिमात्र से ठहराना ही धारणा कहलाती है।

2.2 · साधनपाद सूत्र २

सूत्र २.२

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ २.२ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 306

शब्दार्थ — समाधि · भावन · अर्थः · क्लेश · तनूकरण · अर्थः · च

अर्थ — समाधिकी भावनाके लिये और क्लेशोंके तनू करनेके लिये क्रियायोग है ।

व्यासभाष्य

स ह्यासेव्यमानः समाधिं भावयति क्लेशांश्च प्रतनूकरोति । प्रतनूकृतान्क्लेशान्प्रसङ्ख्यानाग्निना दग्धबीजकल्पानप्रसवधर्मिणः करिष्यतीति । तेषां तनूकरणात्पुनः क्लेशैरपरामृष्टा सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिः सूक्ष्मा प्रज्ञा समाप्ताधिकारा प्रतिप्रसवाय कल्पिष्यत इति ॥२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — समाधि भावन अर्थः क्लेश तनूकरण अर्थः च। यह समाधि की भावना और क्लेशों के तनूकरण के लिए है। इसका सेवन करने से समाधि की भावना होती है और क्लेशों का तनूकरण होता है। प्रतनूकृत क्लेशों को प्रसंख्यान की अग्नि से दग्ध बीज के समान अप्रसव धर्मी बनाएगा। उनके तनूकरण से क्लेशों से अपरामृष्ट सत्त्व और पुरुष की अन्यता की सूक्ष्म प्रज्ञा, समाप्त अधिकार वाली, प्रतिप्रसव के लिए समर्थ होगी।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — समाधि का अर्थ है समाधिरुक्तलक्षण वाले चित्त में बार-बार निवेश लाना जैसा कि भोजवृत्ति में कहा गया है। क्लेशों के स्वकार्य के कारण होने में प्रतिबन्धकता को उनका तनूकरण कहा गया है जिसे भोजवृत्ति में स्पष्ट किया गया है। अविद्या आदि क्लेशों के संस्कारों को शिथिल करने और चित्त को समाधि योग्य बनाने हेतु क्रियायोग का प्रयोग किया जाता है। तप से शरीर, प्राण, इन्द्रिय और मन की अशुद्धि दूर होती है तथा स्वाध्याय से अन्तःकरण शुद्ध होकर समाहित होने की योग्यता प्राप्त करता है। ईश्वरप्रणिधान से क्लेशों की निवृत्ति और समाधि सिद्ध होती है जिसमें क्रियायोग द्वारा क्लेशों को तनू करना मुख्य भाव है। क्लेशों के शिथिल होने पर अभ्यास-वैराग्य से सम्प्रज्ञात-समाधि प्राप्त होती है और विवेक-ख्यातिरूप अग्नि से सूक्ष्म क्लेशों के संस्कार रूप बीज दग्ध हो जाते हैं। परवैराग्य के संस्कारों की वृद्धि से चित्त का विवेकख्याति-अधिकार समाप्त होता है जिससे असम्प्रज्ञात-समाधिका का लाभ प्राप्त होता है। ध्यान वह वृत्ति है जो ध्येय के समान प्रवाह से लगातार उदय होती रहे और किसी अन्य वृत्तिका के बीच में न आए।

अन्य स्रोत: भोजवृत्ति

2.3 · साधनपाद सूत्र ३

सूत्र २.३

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥ २.३ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 307

शब्दार्थ — अविद्या · अस्मिता · राग · द्वेष · अभिनिवेशाः · क्लेशाः

अर्थ — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश क्लेश हैं।

व्यासभाष्य

क्लेशा इति । पञ्च विपर्यया इत्यर्थः । ते स्यन्दमाना गुणाधिकारं द्रढयन्ति, परिणाममवस्थापयन्ति, कार्यकारणस्रोत उन्नमयन्ति, परस्परानुग्रहतन्त्रीभूय कर्मविपाकं चाभिनिर्हरन्तीति ॥३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेशाः क्लेशाः। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश क्लेश हैं। क्लेशाः इति। क्लेशों का अर्थ है। पञ्च विपर्ययाः इति अर्थः। पाँच विपर्यय। ते स्यन्दमानाः गुण अधिकारम् द्रढयन्ति परिणामम् अवस्थापयन्ति कार्य कारण स्रोतः उन्नमयन्ति परस्पर अनुग्रह तन्त्री भूय कर्म विपाकम् च अभिनिर्हरन्ति इति। वे प्रवाहित होते हुए गुणों के अधिकार को दृढ़ करते हैं, परिणाम को स्थापित करते हैं, कार्य-कारण के स्रोत को उन्नत करते हैं, और परस्पर अनुग्रह की तंत्री बनकर कर्म और विपाक को अभिनिर्हार करते हैं।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँचों क्लेश हैं जो बाधनारूप पीड़ा उत्पन्न करते हैं और चित्त में संस्कार रूप गुणों के परिणाम को दृढ़ करते हैं। इन पाँचों क्लेशों का कारण अविद्या ही है, इसलिए इन्हें विपर्यय या मिथ्याज्ञान कहा गया है। जब ध्येयविषयक ध्यान अभ्यास के बल से अपने ध्यानाकार रूप से रहित होकर केवल ध्येय स्वरूप मात्र से प्रकाशित होने लगे तब वह समाधि कहलाता है।

ध्यानावस्था में जो ध्येय आलम्बनवाली वृत्ति प्रवाह से उदय होती है वह ध्यातृ, ध्यान और ध्येय तीनों से मिश्रित रहती है जिसमें ध्यातृ और ध्यान बने रहने के कारण ध्येयाकार वृत्ति अपने विषय को पूर्णता से प्रकाशित नहीं करती। जैसे-जैसे ध्यान बढ़ता है वैसे-वैसे ध्येय-स्वरूपाकारता बढ़ती है और ध्यातृ तथा ध्यान अपने स्वरूप से शून्य-जैसे होते जाते हैं। जब ध्यान इतना प्रबल हो जाए कि ध्यातृ और ध्यान अपने स्वरूप से सर्वथा-जैसे होकर ध्येय-स्वरूपमात्र से भासने लगें तब समाधि की अवस्था होती है।

'अर्थमात्रनिर्भासम्' में 'मात्र' पद से यह बताया गया है कि ध्यान में ध्येय का भान होता है, किंतु समाधि में ध्यान ध्येयमात्र से भासता है। श्रीभोज महाराज समाधिका का अर्थ बताते हैं कि जिसमें मन विक्षेपों को हटाकर यथार्थता से एकाग्र किया जाता है वही समाधि है। योग के अंतिम तीन अंगों में समाधि वह है और धारणा तथा ध्यान उसके अंग हैं। जब किसी विषय में चित्त को ठहराया जाता है तब वह त्रिपुटी सहित होता है जिसमें ध्यातृ, ध्यान और ध्येय शामिल होते हैं।

जब तक इस विषयाकारवृत्ति का भान होता रहे और वह विच्छिन्न हो तब तक वह धारणा कहलाती है, जब यह व्यवधानरहित हो जाए किंतु सदृश वृत्तियों का प्रवाह बना रहे तब तक वह ध्यान कहलाता है। समाधि तब होती है जब इस निर्बाध त्रिपुटी से भासने वाली विषयाकारवृत्ति में केवल ध्येय विषय के स्वरूप का ही भान होता रहे और ध्यातृ तथा ध्यान अपने स्वरूप से शून्य-जैसे भासने लगें।

पहले पाद से इसी त्रिपुटी को सवितर्क और निर्वितर्क समापत्ति में शब्द, अर्थ और ज्ञान से बताया गया है जिसमें शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पों से संयुक्त सवितर्क समापत्ति कहलाती है।

2.4 · साधनपाद सूत्र ४

सूत्र २.४

अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥ २.४ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 308

शब्दार्थ — अविद्या · क्षेत्रम् · उत्तरेषाम् · प्रसुप्त · तनु · विच्छिन्न · उदाराणाम्

अर्थ — प्रसुप्त , तनु , विच्छिन्न और उदार अवस्थावाले अस्मिता आदि क्लेशोंका अविद्या - क्षेत्र है ।

व्यासभाष्य

अत्राविद्या क्षेत्रं प्रसवभूमिरुत्तरेषामस्मितादीनां चतुर्विधकल्पानां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् । तत्र का प्रसुप्तिः ? चेतसि शक्तिमात्रप्रतिष्ठानां बीजभावोपगमः । तस्य प्रबोध आलम्बने सम्मुखीभावः । प्रसङ्ख्यानवतो दग्धक्लेशबीजस्य सम्मुखीभूतेऽप्यालम्बने नासौ पुनरस्ति । दग्धबीजस्य कुतः प्ररोह इति । अतः क्षीणक्लेशः कुशलश्चरमदेह इत्युच्यते । तत्रैव सा गधबीजभावा पञ्चमी क्लेशावस्था नान्यत्रेति ।

सतां क्लेशानां तदा बीजसामर्थ्यं दग्धमिति विषयस्य सम्मुखीभावेऽपि सति न भवत्येषां प्रबोध इति । उक्ता प्रसुप्तिर्दग्धबीजानामप्ररोहश्च । तनुत्वमुच्यते—प्रतिपक्षभावनोपहताः क्लेशास्तनवो भवन्ति । तथा विच्छिद्य विच्छिद्य तेन तेनात्मना पुनः पुनः समुदाचरन्तीति विच्छिन्नाः । कथं ? रागकाले क्रोधस्यादर्शनात। न हि रागकाले क्रोधः समुदाचरति । रागश्च क्वचिद्दृश्यमानो न विषयान्तरे नास्ति । नैकस्यां स्त्रियां चैत्रो रक्त इत्यन्यासु स्त्रीषु विरक्त इति ।

किन्तु तत्र रागो लब्धवृत्तिरन्यत्र तु भविष्यद्वृत्तिरिति । स हि तदा प्रसुप्ततनुविच्छिन्नो भवति । विषये यो लब्धवृत्तिः स उदारः । सर्व एवैते क्लेशविषयत्वं नातिक्रामन्ति । कस्तर्हि विच्छिन्नः प्रसुप्ततनुविच्छिन्नः प्रसुप्ततनुरुदारो वा क्लेश इति । उच्यते—सत्यमेवैतत। किन्तु विशिष्टानामेवेइतेषां विच्छिन्नादित्वम् । यथैव प्रतिपक्षभावनातो निवृत्तस्तथैव स्वव्यञ्जकाञ्जनेनाभिव्यक्त इति । सर्व एवामी क्लेशा अविद्याभेदाः । कस्मात्? सर्वेष्वविद्यैवाभिप्लवते ।

यदविद्यया वस्त्वाकार्यते, तदेवानुशेरते क्लेशा विपर्यासप्रत्ययकाले उपलभ्यन्ते क्षीयमाणां चाविद्यामनु क्षीयन्त इति ॥४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तनु विच्छिन्न उदाराणाम्। अविद्या उत्तरवर्ती क्लेशों—प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, और उदार—का क्षेत्र है। अत्र अविद्या क्षेत्रम् प्रसव भूमिः उत्तरेषाम् अस्मिता आदीनाम् चतुर्विध कल्पानाम् प्रसुप्त तनु विच्छिन्न उदाराणाम्। यहाँ अविद्या अस्मिता आदि के चार प्रकार के कल्पों—प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, और उदार—की प्रसव भूमि है। तत्र का प्रसुप्तिः। प्रसुप्ति क्या है? चेतसि शक्ति मात्र प्रतिष्ठानाम् बीज भाव उपगमः।

चित्त में केवल शक्ति मात्र की प्रतिष्ठा से बीज भाव में जाना। तस्य प्रबोधः आलम्बने सम्मुखी भावः। उसका प्रबोध आलंबन के सम्मुख होने से होता है। प्रसङ्ख्यानवतः दग्ध क्लेश बीजस्य सम्मुखी भूते अपि आलम्बने न असौ पुनः अस्ति। प्रसंख्यान वाले के दग्ध क्लेश बीज का, आलंबन के सम्मुख होने पर भी, पुनः अस्तित्व नहीं होता। दग्ध बीजस्य कुतः प्ररोहः इति। देहः इति उच्यते। इसलिए क्षीण क्लेश वाला कुशल चरम देह वाला कहलाता है। अन्यत्र इति।

वह गध बीज भावा पाँचवी क्लेश अवस्था केवल वहीं है, अन्यत्र नहीं। बीज सामर्थ्यम् दग्धम् इति विषयस्य सम्मुखी भावे अपि सति न भवति एषाम् प्रबोधः इति। क्लेशों का बीज सामर्थ्य दग्ध होने से विषय के सम्मुख होने पर भी उनका प्रबोध नहीं होता। उक्ता प्रसुप्तिः दग्ध बीजानाम् अप्ररोहः च। प्रसुप्ति और दग्ध बीजों का अप्ररोह उक्त है। तनुत्वम् उच्यते प्रतिपक्ष भावना उपहताः क्लेशाः तनवः भवन्ति। तनुत्व कहा जाता है—प्रतिपक्ष भावना से उपहत क्लेश तनु हो जाते हैं।

विच्छिद्य तेन तेन आत्मना पुनः पुनः समुदाचरन्ति इति विच्छिन्नाः। इस प्रकार बार-बार विभिन्न रूपों में समुदाचरण करने वाले विच्छिन्न कहलाते हैं। कथम्। कैसे? राग काले क्रोधस्य अदर्शनह्मनतात्। राग के समय क्रोध का अदर्शन होने से। न हि राग काले क्रोधः समुदाच्छति। राग के समय क्रोध समुदाचरित नहीं होता। रागः च क्वचित् दृश्यमानः न विषय अन्तरे नास्ति। राग कहीं दृष्ट होने पर अन्य विषय में नहीं होता। न एकस्याम् स्त्रियं चैत्रः रक्तः इति अन्यासु स्त्रीषु विरक्तः।

चैत्र एक स्त्री के प्रति रागी है, इसका मतलब यह नहीं कि वह अन्य स्त्रियों के प्रति विरक्त है। किन्तु तत्र रागः लब्ध वृत्तिः अन्यत्र तु भविष्यत् वृत्तिः। बल्कि वहाँ राग लब्धवृत्ति है, अन्यत्र भविष्यद्वृत्ति। सः हि तदा प्रसुप्त तनु विच्छेदः भवति। वह तब प्रसुप्त, तनु, या विच्छिन्न होता है। विषये यः लब्डवृत्तिः सः उदारः। विषय में जो लब्डवृत्ति है, वह उदार है। सर्व एव एते क्लेश विषय नातिक्रामन्ति। ये सभी क्लेश विषय को अतिक्राम नहीं करते।

कः तर्हि विच्छिन्नः प्रसुप्त तनु विच्छिन्नः प्रसुप्त तनम् उदारो वा क्लेशः इति। कौन सा क्लेश विच्छिन्न, प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, या उदार है? उच्यते सत्यम् एव एतत्। कहा जाता है कि यह सत्य है। किन्तु विशिष्टानाम् एव एषाम् विच्छिन्न आदि त्वम्। किन्तु इनका विच्छिन्न आदि त्व विशिष्टों का ही है। जैसे प्रतिपक्ष भावना से निवृत्त होता है, वैसे ही अपने व्यंजक अंजन से अभिव्यक्त होता है। सर्व एव अमी क्लेशाः अविद्या भेदाः। ये सभी क्लेश अविद्या के भेद हैं। क्यों?

सर्वेषु अविद्या एव अभिप्लवति। क्योंकि सभी में अविद्या ही प्रभावित होती है। यत् अविद्यया वस्तु आकार्यते तत् एव अनुशेरते क्लेशाः। जो अविद्या से वस्तु रूपित होता है, उसी का अनुशरण क्लेश करते हैं। विपर्यास प्रत्यय काले उपलभ्यन्ते क्षीयमाणाम् च अविद्याम् अनु क्षीयन्ते इति। विपर्यय प्रत्यय के समय क्लेश उपलब्ध होते हैं और क्षीणमाण अविद्या के साथ क्षीण होते हैं।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अविद्या ही समस्त क्लेशों का मूल कारण है जो भूमि में बीज की तरह स्थित रहते हैं। क्लेशों की चार अवस्थाएँ होती हैं— प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार। प्रसुप्त क्लेश वे हैं जो चित्त में अवस्थित होते हैं परंतु अपने विषय के अभाव में सक्रिय नहीं होते, जबकि तनु क्लेश प्रतिपक्षभावना या क्रियायोग से शिथिल किए गए होते हैं। विच्छिन्न क्लेश किसी दूसरे बलवान क्लेश द्वारा दबे रहते हैं और उदार क्लेश अपने सहायक विषयों को पाकर प्रवृत्त होते हैं। अविद्या के नाश से ये सभी क्लेश समूल नष्ट हो जाते हैं, जिसे 'दग्धबीज' अवस्था कहा गया है। सूत्रकार ने केवल इन चार ही अवस्थाओं का वर्णन किया है क्योंकि पाँचवीं अवस्था यानी दग्धबीज अविद्या की विरोधी होने से उपादेय है। व्याख्या में स्पष्ट किया गया है कि प्रसुप्त क्लेशों के उदाहरण के रूप में विदेह और प्रकृतिलयों को गलत नहीं माना जा सकता क्योंकि वे योगियों की साधना से प्राप्त होते हैं। व्यास भाष्य और भोजवृत्ति के अनुसार भी अविद्या ही इन सभी क्लेशों का मूल कारण है। अंततः, ये सभी क्लेश चित्त को विक्षिप्त करने वाले हैं, इसलिए इनके उच्छेद के लिए योगी को प्रयत्न करना चाहिए।

2.5 · साधनपाद सूत्र ५

सूत्र २.५

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥ २.५ ॥

साधनपाद · सूत्र २.५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 311

शब्दार्थ — अनित्य · अशुचि · दुःख · अनात्मसु · नित्य · शुचि · सुख · आत्म · ख्यातिः · अविद्या

अर्थ — अनित्यमें नित्य , अपवित्रमें पवित्र , दुःखमें और अनात्मामें आत्माका ज्ञान सुख अविद्या है 1 है ।

व्यासभाष्य

अनित्ये कार्ये नित्यख्यातिः । तद्यथा, ध्रुवा पृथिवी, ध्रुवा सचन्द्रतारका द्यौः, अमृता दिवौकस इति । तथाशुचौ परमबीभत्से काये । उक्तं च— स्थानाद्बीजादुपष्ठम्बान्निःस्यन्दान्निधनादपि । कायमाधेयशौचत्वात्पण्डिता ह्यशुचिं विदुः ॥ इत्यशुचौ शरीरे शुचिख्यातिर्दृश्यते । नवेव शशाङ्कलेखाकमनीयेयं कन्या मध्वमृतावयवनिर्मितेव चन्द्रं भित्त्वा निःसृतेव ज्ञायते, नीलोत्पलपत्रियाताक्षी हावगर्भाभ्यां लोचनाभ्यां जीवलोकमाश्वासयन्तीवेति कस्य केनाभिसम्बन्धः ? भवति चैवमशुचौ शुचिविपर्यासप्रत्यय इति ।

एतेनापुण्ये पुण्यप्रत्यायस्तथा एवानर्थे चार्थप्रत्यायो व्याख्यातः। तथा दुःखे सुखख्यातिं वक्ष्यति—परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः [यो.सू. २.१५] इति । तत्र सुखख्यातिरविद्या । तथानात्मन्यात्मख्यातिर्बाह्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु भोगाधिष्ठाने वा शरीरे, पुरुषोपकरणे वा मनस्यनात्मन्यात्मख्यातिरिति ।

तथैतदत्रोक्तम्—व्यक्तमव्यक्तं वा सत्त्वमात्मत्वेनाभिप्रतीत्य तस्य सम्पदमनुनन्दत्यात्मसम्पदं मन्वानस्तस्य व्यापदमनुशोचत्यात्मव्यापदं मन्वानः स सर्वोऽतिबुद्ध इति । एषा चतुष्पदा भवत्यविद्या मूलमस्य क्लेशसन्तानस्य कर्माशयस्य च सविपाकस्यान्मति । तस्याश्चामित्रागोऽष्पदवद्वस्तुसतत्त्वं विज्ञेयम् । यथा नामित्रौ मित्राभावः न मित्रमात्रं किन्तु तद्विरुद्धः सपत्नः । तथा चागोष्पदं न गोष्पदाभावो न गोष्पदमात्रं किन्तु देश एव ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम् ।

एवमविद्या न प्रमाणं न प्रमाणाभावः, किन्तु विद्याविपरीतं ज्ञानान्तरमविद्येति ॥५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अनित्य अशुचि दुःख अनात्मसु नित्य शुचि सुख आत्म ख्यातिः अविद्या। अनित्य, अशुचि, दुःख, और अनात्म में नित्य, शुचि, सुख, और आत्म की ख्याति अविद्या है। अनित्य कार्य में नित्य की ख्याति। जैसे—पृथ्वी ध्रुव है, चन्द्र और तारों सहित द्या ध्रुवा है, देव अमर हैं। वैसे ही परम बीभत्स अशुचि काय में। कायम् माघेय शौचत्वात् पण्डिताः हि अशुचिम् विदुः। कहा गया है—स्थान, बीज, उपष्टम्भ, निःस्यन्द, और निधन से काय को आधार शौचत्व मानने से पंडित इसे अशुचि जानते हैं।

इति अशुचौ शरीरे शुचि ख्यातिः दृश्यते। इस प्रकार अशुचि शरीर में शौच की ख्याति दिखती है। नव एव शशाङ्क लेखा कमनीया इयम् कन्या मधु अमृता अवयव निर्मिता इव चन्द्रम् भित्त्वा निःसृता इव ज्ञायते नील उत्पल पत्र आयता अक्षी हाव गर्भाभ्याम् लोचनाभ्याम् जीव लोकम् आश्वासयन्ती इव इति कस्य केन अभिसम्बन्धः।

जैसे—चन्द्र की लेखा सी कमनीय यह कन्या, मधु और अमृत से निर्मित अवयवों वाली, चन्द्र को भेदकर निकली सी, नीलोत्पल पत्र सी आँखों वाली, हाव गर्भ युक्त लोचनों से जीव लोक को आश्वास देती सी, इसका किसके साथ संबंध है? भवति च एवम् अशुचौ शुचि विपर्यास प्रत्ययः इति। इस प्रकार अशुचि में शौच का विपर्यय प्रत्यय होता है। एतेन अपुण्ये पुण्य प्रत्ययः तथा एव अनर्थे च अर्थ प्रत्ययः व्याख्यातः। इससे अपुण्य में पुण्य और अनर्थ में अर्थ का प्रत्यय व्याख्यात है।

तथा दुःखे सुख ख्यातिम् वक्ष्यति परिणाम ताप संस्कार दुःखैः गुण वृत्ति विरोधात् च दुःखम् एव सर्वम् विवेकिनः इति। वैसे ही दुःख में सुख की ख्याति होगी—परिणाम, ताप, संस्कार दुखों और गुण वृत्ति के विरोध से विवेकी के लिए सर्वं दुखमय है। तत्र स्मुख ख्यातिः अविद्या। वहाँ सुख की ख्याति अविद्या है। तथा अनात्पन्यात् आत्म ख्यातिः बाह्य उपकरणेषु चेतना चेतनेषु भोग अधिष्ठाने वा शरीरे पुरुष उपकरणे वा मनसि अनात्मन्यात् आत्म ख्यातिः इति।

वैसे ही अनात्म में आत्म की ख्याति—बाह्य उपकरणों, चेतन-अचेतन, भोग के अधिष्ठान शरीर, या पुरुष के उपकरण मन में। तथैतत् अत्र उक्तम् व्यक्तम् अव्यक्तम् वा सत्त्वम् आत्मत्वेन अभिप्रतीत्य तस्य सम्पदम् अनुनन्दति आत्म सम्पदम् मन्वानः तस्य व्यापदम् अनुशोचति आत्म व्यापदम् मन्वानः सः सर्वः अतिबुद्धः इति।

यहाँ कहा गया—व्यक्त या अव्यक्त सत्त्व को आत्म मानकर उसकी सम्पदा से आनंदित होता है, उसे आत्म सम्पदा मानता है, उसकी व्यापदा से शोक करता है, उसे आत्म व्यापदा मानता है, वह सर्वथा अतिबुद्ध है। एषा चतुष्पदा भवति अविद्या मूलम् अस्य क्लेश सन्तानस्य कर्म आशयस्य च स विपाकस्य इति। यह चतुष्पदा अविद्या इस क्लेश सन्तान, कर्माशय, और सविपाक का मूल है। तस्याः च अमित्र अगोऽष्पदवत् वस्तु सतत्त्वम् विज्ञेयम्। इसका वस्तु सतत्त्व अमित्र और अगोष्पद की तरह जानना चाहिए।

यथा न अमित्रौ मित्र अभावः न मित्र मात्रम् किन्तु तत् विरुद्धः सपत्नः। जैसे अमित्र मित्र का अभाव या मात्र मित्र नहीं, बल्कि उसका विरोधी सपत्न है। तथा च अगोष्पदम् न गोष्पद अभावः न गोष्पद मात्रम् किन्तु देशः एव ताभ्याम् अन्यत् वस्तु अन्तरम्। वैसे ही अगोष्पद गोष्पद का अभाव या गोष्पद मात्र नहीं, बल्कि उनसे भिन्न एक अन्य वस्तु है। एवम् अविद्या न प्रमाणम् न प्रमाण अभावः किन्तु विद्या विपरीतम् ज्ञान अन्तरम् अविद्या इति।

इसी तरह अविद्या न प्रमाण है, न प्रमाण का अभाव, बल्कि विद्या के विपरीत एक अन्य ज्ञान है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अविद्या का सामान्य लक्षण यह है कि जिसमें जो धर्म नहीं है, उसमें उसका होने का ज्ञान होना। अविद्या के चार प्रकार के भेद हैं जिनमें अनित्य में नित्य का ज्ञान, अपवित्र में पवित्रता का ज्ञान, दुःख में सुख का ज्ञान और अनात्म (जड़) में आत्मज्ञान शामिल हैं, जो बन्धन का मूल कारण हैं।

विशेष विचार सूत्र ५ के अनुसार अविद्या की उत्पत्ति तीनों गुणों के प्रथम विषम परिणाम महत्तत्त्व से होती है, जहाँ सत्त्व की विशुद्धता से समष्टिरूप में शुद्ध सत्त्वमय चित्त बनता है और व्यष्टिरूप में अनन्त जीवों के चित्त बनते हैं। इन व्यष्टि चित्तों में जो लेशमात्र तम है, उसमें ही अविद्या वर्तमान है जिससे चेतन तत्त्व से प्रतिबिम्बित व्यष्टि अस्मिता क्लेश उत्पन्न होता है।

जड़ चित्त और गुणातीत चेतन पुरुष के बीच अभिन्नता की प्रतीति होना ही अस्मिता क्लेश है जिससे राग-द्वेष आदि अन्य क्लेश उत्पन्न होते हैं। अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात-समाधि में अस्मिता का साक्षात्कार होता है, जबकि विवेकख्याति में जड़ चित्त और चेतन पुरुष में भेदज्ञान उत्पन्न होने से अविद्या अन्य क्लेशों सहित दग्धबीजतुल्य हो जाती है। समाधिपाद सूत्र ८ में विपर्यय (अविद्या) को वृत्तिरूप से और यहाँ अविद्या आदि क्लेशों को संस्काररूप से बतलाया गया है।

2.6 · साधनपाद सूत्र ६

सूत्र २.६

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥ २.६ ॥

साधनपाद · सूत्र २.६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 312

शब्दार्थ — दृक् · दर्शन · शक्त्योः · एक · आत्मता · इव · अस्मिता

अर्थ — दृक्शक्ति और दर्शनशक्तिका एक स्वरूप - जैसा भान होना अस्मिता ( क्लेश ) है ।

व्यासभाष्य

पुरुषो दृक्शक्तिर्बुद्धिर्दर्शनशक्तिरित्येतयोरेकस्वरूपापत्तिरिवास्मिता क्लेश उच्यते । भोक्तृभोग्यशक्त्योरत्यन्तविभक्तयोरत्यन्तासङ्कीर्णयोरविभागप्राप्ताविव सत्यां भोगः कल्पते । स्वरूपप्रतिलम्भे तु तयोः कैवल्यमेव भवति कुतो भोग इति । तथा चोक्तं—बुद्धितः परं पुरुषमाकारशीलविद्यादिभिर्विभक्तमपश्यन्कुर्यात्तत्रात्मबुद्धिं मोहेनेति ॥६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — दृक् दर्शन शक्त्योः एक आत्मता इव अस्मिता। दृक् और दर्शन शक्तियों की एक आत्मता जैसी अस्मिता है। पुरुष दृक् शक्ति और बुद्धि दर्शन शक्ति है, इन दोनों की एक स्वरूप प्राप्ति जैसी अस्मिता क्लेश कहलाती है। भोक्ता और भोग्य शक्तियों के अत्यंत विभक्त और असंकीर्ण होने पर भी अविभाग की प्राप्ति जैसी स्थिति में भोग कल्पित होता है। स्वरूप की प्राप्ति में उनका कैवल्य ही होता है, भोग कहाँ से? तथा च उक्तम् बुद्धितः परम् पुरुषम् आकार शील विद्या आदि भिः विभक्तम् अपश्यन् कुर्यात् तत्र आत्म बुद्धिम् मोहेन इति। ऐसा कहा गया—बुद्धि से पर पुरुष को, जो आकार, शील, विद्या आदि से विभक्त है, न देखकर मोह से वहाँ आत्म बुद्धि करता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पुरुष द्रष्टा है और चित्त उसका एक करण है, जहाँ पुरुष चैतन्य, जड़, क्रियारहित, केवल और अपरिणामी है, जबकि चित्त प्रसवधर्मी, परिणामशील और त्रिगुणमय है। ये दोनों अत्यन्त भिन्न हैं, परंतु अविद्या के कारण इनमें भेद की प्रतीति होती रहती है। पञ्चशिखाचार्य के अनुसार, बुद्धि से परे पुरुष को स्वरूपशील और अविद्या आदि क्लेश से अलग न देखता हुआ मोह से बुद्धि में आत्मबुद्धि कर लेना ही अविद्या है। इस प्रकार पुरुष और चित्त में अविद्या के कारण एक जैसा भान होना अस्मिता क्लेश है जिसे हृदय-ग्रन्थि भी कहते हैं। यही असङ्गपुरुष और चित्त का परस्पर अध्यारोप है जिससे आत्मा में बन्धन का आरोप होता है। मुण्डक-उपनिषद् में इस ग्रन्थिके भेदन का उपाय विवेकख्याति बताया गया है, जिससे चेतनरूप पुरुष और जडरूप चित्त के भेद का विवेकपूर्ण साक्षात् होने पर हृदय-ग्रन्थि का भेदन हो जाता है और सारे संशय निवृत्त होते हैं। पुरुष से प्रतिबिम्बित अथवा प्रकाशित चित्त की संज्ञा अस्मिता है और पुरुष एवं चित्त में अभिन्नता की प्रतीति अस्मिता क्लेश है, जबकि पुरुष और चित्त में भेद-ज्ञान विवेकख्याति है।

2.7 · साधनपाद सूत्र ७

सूत्र २.७

सुखानुशयी रागः ॥ २.७ ॥

साधनपाद · सूत्र २.७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 313

शब्दार्थ — सुख · अनुशयी · रागः

अर्थ — सुख - भोगके पीछे जो चित्तमें उसके भोगकी इच्छा रहती है , वह राग है ।

व्यासभाष्य

सुखाभिजातस्य सुखानुस्मृतिपूर्वः सुखे तत्साधने वा यो गर्धस्तृष्णा लोभः स राग इति ॥७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — सुख अनुशयी रागः। सुख का अनुशयी राग है। सुख से अभिजात का, सुख की अनुस्मृति से पूर्व, सुख या उसके साधन में जो गर्ध, तृष्णा, या लोभ है, वही राग है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — शरीर , इन्द्रियों और मनमें आत्माध्यास हो जानेपर जिन वस्तुओं और विषयोंसे सुख उसके प्रतीत होता है , उनमें और उनके प्राप्त करनेके साधनोंमें जो इच्छा - रूप तृष्णा और लोभ पैदा हो जाता है , जो संस्कार चित्तमें पड़ जाते हैं , उसीका नाम राग - क्लेश है । व्यवस्थितौ । इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ परिपन्थिनौ ॥ ( गीता ३ । ३४ ) तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य उन दोनोंके वशमें इन्द्रिय - इन्द्रियके अर्थमें अर्थात् सभी इन्द्रियोंके भोगोंमें स्थित जो राग शत्रु और हैं । द्वेष हैं , नहीं होवे ; क्योंकि वे दोनों ही कल्याणमार्गमें विघ्न करनेवाले महान् जिन वस्तुओंसे (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)

2.8 · साधनपाद सूत्र ८

सूत्र २.८

दुःखानुशयी द्वेषः ॥ २.८ ॥

साधनपाद · सूत्र २.८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 324

शब्दार्थ — दुःख · अनुशयी · द्वेषः

अर्थ — दुःख का अनुशयी द्वेष है।

व्यासभाष्य

दुःखाभिज्ञस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो देस्तत्साधने वा यः प्रतिघो मन्युर्जिघांसा क्रोधः स द्वेष इति ॥८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — दुःख अनुशयी द्वेषः। दुःख का अनुशयी द्वेष है। दुःख से अभिज्ञ का, दुःख की अनुस्मृति से पूर्व, दुःख या उसके साधन में जो प्रतिघ, मन्यु, जिघांसा, या क्रोध है, वही द्वेष है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जिन वस्तुओं अथवा जिन साधनोंसे दुःख प्रतीत हो , उनसे जो घृणा और क्रोध हो , उसके जो संस्कार चित्तमें पड़े , उसको द्वेष - क्लेश कहते हैं ।

2.9 · साधनपाद सूत्र ९

सूत्र २.९

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥ २.९ ॥

साधनपाद · सूत्र २.९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 314

शब्दार्थ — स्वरस · वाही · विदुषः · अपि · तथा · रूढः · अभिनिवेशः

अर्थ — ( जो मरनेका भय हर एक प्राणीमें ) स्वभावतः बह रहा है और विद्वानोंके लिये भी ऐसा ही प्रसिद्ध है ( जैसा कि मूर्खोके लिये ) , वह अभिनिवेश क्लेश है ।

व्यासभाष्य

सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीर्नित्या भवति, मा न भूवं भूयासमिति । न चाननुभूतमरणधर्मकस्यैषा भवत्यात्माशीः । एतया च पूर्वजन्मानुभवः प्रतीयते, स चायमभिनिवेशः क्लेशः स्वरसवाही कृमेरपि जातमात्रस्य प्रत्यक्षानुमानागमैरसम्भावितौ मरणत्रास उच्छेददृष्ट्यात्मकः पूर्वजन्मानुभूतं मरणदुःखमनुमापयति । यथा चायमत्यन्तमूढेषु दृश्यते क्लेशस्तथा विदुषोऽपि विज्ञातपूर्वापरान्तस्य रूढः । कस्मात्समाना हि तयोः कुशलाकुशलयोर्मरणदुःखानुभवादियं वासनेति ॥९॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अभिनिवेशः। स्वरस से वाही, विद्वान में भी उसी तरह रूढ़ अभिनिवेश है। प्रत्येक प्राणी की यह आत्म आशीर्वाद नित्य है—मैं नष्ट न होऊँ, सदा रहूँ। यह आत्म आशीर्वाद अननुभूत मरण धर्म वाले की नहीं होती। इससे पूर्व जन्म का अनुभव प्रतीत होता है, यह अभिनिवेश क्लेश स्वरस वाही है, कीड़े के भी जन्म लेते ही प्रत्यक्ष, अनुमान, और आगम से असम्भावित मरण त्रास, उच्छेद दृष्टि से युक्त, पूर्व जन्म के अनुभूत मरण दुख को अनुमान करता है। जैसे यह क्लेश अत्यंत मूढ़ में दिखता है, वैसे ही पूर्व और अपरांत को जानने वाले विद्वान में भी रूढ़ है। क्यों? क्योंकि कुशल और अकुशल दोनों में मरण दुख के अनुभव से यह वासना समान है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — स्वरसवाही – स्वरस नाम वासनाद्वारा ; वाही नाम प्रवृत्त है अर्थात् मरणभयके संस्कार जो जन्म - जन्मान्तरोंसे प्राणीमात्रके चित्तमें स्वभावसे ही चले आ रहे हैं । विदुषः — यह शब्द यहाँ केवल शब्दोंके जाननेवाले विद्वान् के लिये प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् वह पुरुष जिसने कोरे शास्त्रोंको पढ़ा है और क्रियात्मकरूपसे योगद्वारा अनुभव तथा यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं किया है । अभिनिवेशके अर्थ हैं ' मा न भूयं भूयासमिति ' = ऐसा न हो कि मैं न होऊँ , किंतु मैं बना रहूँ । ' शरीरविषयादिभिः मम वियोगो मा भूदिति ' = शरीर और विषयादि ( रूप - रसादि ) से मेरा वियोग न हो । आत्मा अजर - अमर है , जैसा गीता अध्याय २ में बतलाया है- य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १ ९ ॥

2.10 · साधनपाद सूत्र १०

सूत्र २.१०

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥ २.१० ॥

साधनपाद · सूत्र २.१०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 315

शब्दार्थ — ते · प्रतिप्रसव · हेयाः · सूक्ष्माः

अर्थ — वे पूर्वोक्त पाँच क्लेश , जो क्रिया - योगसे लीन सूक्ष्म होनेसे और निवृत्त प्रसंख्यान करनेयोग्य अग्निसे हैं 1 गये हैं , असम्प्रज्ञात - समाधिद्वारा चित्तके अपने कारणमें ( २ ९ ० )

व्यासभाष्य

ते पञ्चक्लेशा दग्धबीजकल्पा योगिनश्चरिताधिकारे चेतसि प्रलीने सह तेनैवास्तं गच्छन्ति ॥१०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — शीत उन्ना आदि बिः द्‌वन्द्वै: आसन जयात् न अभिभूयति शीत, उष्ण आदि दण्डों से, आसन जय के कारण, अभिभूत नहीं होता। सति आसान जये बायस्य वायोः आचमनं श्वासः कोष्ठीयस्य वायो निःसारणं प्रश्वासः तयो गति विच्छेदः उभय अभावः प्राणायामः आसन जय होने पर बाह्य वायु का आचमन श्वास है। कोशीय वायु का निःसारण प्रश्वास है। उनकी गति का विच्छेद, दोनों का अभाव, प्राणायाम है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — व्यासभाष्य के अनुसार पाँच क्लेश, जो दग्ध-बीज के सदृश हैं, योगी के चरिताधिकार चित्त के अपने कारण में लीन होते समय उसी के साथ लीन हो जाते हैं। जब क्रियायोग या सम्प्रज्ञात समाधि से सूक्ष्म किए गए क्लेश प्रसंख्यान रूप अग्नि से दग्ध-बीज के समान हो जाते हैं, तब असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा समाप्त अधिकार वाले चित्त के अपनी प्रकृति में लीन होने से वे क्लेश भी उसके साथ लीन होकर निवृत्त हो जाते हैं।

प्रतिप्रसव के अतिरिक्त इन क्लेशों के निरोध के लिए किसी अन्य यत्न की आवश्यकता नहीं है क्योंकि पाँचवीं अवस्था वाले दग्ध-बीज रूप क्लेशों की निवृत्ति प्रयत्न का विषय नहीं होती। जब तक चित्त विद्यमान रहता है, तब तक इन क्लेशों की निवृत्ति किसी भी प्रयत्न से नहीं हो सकती, किंतु पर-वैराग्य की दृढ़ता से प्राप्त हुए चित्त के प्रलय होने पर वे क्लेश भी प्रलीन हो जाते हैं।

धर्मी के नाश के बिना संस्कार-रूप सूक्ष्म धर्मों का नाश नहीं होता, इसलिए ये क्लेश प्रतिप्रसव-हेय अर्थात् चित्त के प्रलय से त्यागने योग्य होते हैं। यहाँ चित्त के अपने कारण में लीन होने को 'प्रतिप्रसव' और त्यागने योग्य को 'हेय' कहा गया है। इस प्रक्रिया का क्रम शङ्का, तनूकरण, दग्ध-बीज भाव और प्रतिप्रसव अर्थात् प्रलय है।

2.11 · साधनपाद सूत्र ११

सूत्र २.११

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥ २.११ ॥

साधनपाद · सूत्र २.११पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 316

शब्दार्थ — ध्यान · हेयाः · तत् · वृत्तयः

अर्थ — क्लेशोंकी स्थूल वृत्तियाँ , जो क्रिया - योगसे तनू कर दी गयी हैं , प्रसंख्यान ( विवेकख्याति ) संज्ञक ध्यानसे त्यागनेयोग्य हैं । ( जबतक कि वे सूक्ष्म होकर दग्ध - बीजके सदृश न हो जायँ । )

व्यासभाष्य

क्लेशानां या वृत्तयः स्थूलास्ताः क्रियायोगेन तनूकृताः सत्यः प्रसङ्ख्यानेन ध्यानेन हातव्या यावत्सूक्ष्मीकृता यावद्दग्धबीजकल्पा इति । यथा च वस्त्राणां स्थूलो मलः पूर्वं निर्धूयते पश्चात्सूक्ष्मो यत्नेनोपायेन चापनीयते, तथा स्वल्पप्रतिपक्षाः स्थूला वृत्तयः क्लेशानां, सूक्ष्मास्तु महाप्रतिपक्षा इति ॥११॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — देवताः रक्षयः सिद्धः शः स्वाध्याय शीस्यस्य याचनं गच्छन्ति कार्ये च अस्य वर्तन्ते इति देवता, ऋषि, और सिद्ध स्वाध्यायी के दर्शन को जाते हैं, और उसके कार्य में कार्यरत रहते हैं।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चित्त में स्थित क्लेशों का स्वभाव अंकुर उत्पन्न करने वाले बीज के समान होता है, जिन्हें क्रिया-योग या सम्प्रज्ञात-समाधि द्वारा तनु करके प्रसंख्यान (विवेक-ख्याति) रूप भाव प्राप्त करना चाहिए। जब तक रूप क्रिया-योग से है, तब तक तनु किए हुए क्लेश दग्ध-बीज के सदृश न हों, तब तक प्रसंख्यानविषयक प्रयत्न करते रहना चाहिए। जैसे वस्त्र का स्थूल मल सुगमता से और सूक्ष्म मल विशेष यत्न से दूर होता है, वैसे ही क्लेशों की दो वृत्तियाँ होती हैं: स्थूल वृत्तियाँ जो कम दुःख देने वाली (छोटे शत्रु) हैं और सूक्ष्म वृत्तियाँ जो अधिक दुःखदायी (महान शत्रु) हैं। उदार क्लेशों की वृत्तियाँ स्थूल रूप से ही वर्तमान रहती हैं, जिन्हें क्रिया-योग द्वारा तनु करना चाहिए। इन तनु किए हुए क्लेशों की सूक्ष्म वृत्तियों को प्रसंख्यानध्यान की अग्नि से दग्ध-बीज के सदृश कर देना चाहिए। ये दग्ध-बीज होकर असम्प्रज्ञात-समाधि में चित्त के प्रलय होने पर उसके साथ स्वयं ही प्रलीन हो जाती हैं, जैसा कि पूर्व सूत्र में बतलाया गया है।

2.12 · साधनपाद सूत्र १२

सूत्र २.१२

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥ २.१२ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 317

शब्दार्थ — क्लेश · मूलः · कर्म · आशयः · दृष्ट · अदृष्ट · जन्म · वेदनीयः

अर्थ — क्लेश जिसकी जड़ है ऐसी कर्मोंकी वासना वर्तमान और अगले जन्मोंमें भोगनेयोग्य है ।

व्यासभाष्य

तत्र पुण्यापुण्यकर्माशयः कामलोभमोहक्रोधप्रसवः । स दृष्टजन्मवेदनीयश्चादृष्टजन्मवेदनीयश्च । तत्र तीव्रसंवेगेन मन्त्रतपःसमाधिभिर्निर्वर्तित ईश्वरदेवतामहर्षिमहानुभावानामाराधनाद्वा यः परिनिष्पन्नः स सद्यः परिपच्यते पुण्यकर्माशय इति । तथा तीव्रक्लेशेन भीतव्याधितकृपणेषु विश्वासोपगतेषु वा महानुभावेषु वा तपस्विषु कृतः पुनः पुनरुपकारः स चापि पापकर्माशयः सद्य एव परिपच्यते । यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिणामं हित्वा देवत्वेन परिणतः, तथा नहुषोऽपि देवानामिन्द्रः स्वकं परिणामं हित्वा तिर्यक्त्वेन परिणत इति । तत्र नारकाणां नास्ति दृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशयः । क्षीणक्लेशानामपि नास्त्यदृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशय इति ॥१२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — क्लेश मूलः कर्म आशयः दृष्ट अदृष्ट जन्म वेदनीयः। क्लेश मूल वाला कर्माशय दृष्ट और अदृष्ट जन्म में वेदनीय है। वहाँ पुण्य और अपुण्य कर्माशय काम, लोभ, मोह, और क्रोध से उत्पन्न होता है। वह दृष्ट जन्म और अदृष्ट जन्म में वेदनीय है। तीव्र संवेग से मंत्र, तप, और समाधि द्वारा निर्वर्तित, या ईश्वर, देवता, महर्षि, और महानुभावों की आराधना से जो परिनिष्पन्न है, वह तत्काल परिपक्व होने वाला पुण्य कर्माशय है। वैसे ही तीव्र क्लेश से भयभीत, व्याधित, कृपण, विश्वास प्राप्त, महानुभाव, या तपस्वियों के लिए बार-बार किया गया उपकार भी तत्काल परिपक्व होने वाला पाप कर्माशय है। जैसे नंदीश्वर कुमार ने मनुष्य परिणाम छोड़कर देवत्व में परिणत किया, वैसे ही नहुष, देवों का इंद्र, अपने परिणाम को छोड़कर तिर्यक्त्व में परिणत हुआ। नारकियों का दृष्ट जन्म वेदनीय कर्माशय नहीं होता। क्षीण क्लेश वालों का भी अदृष्ट जन्म वेदनीय कर्माशय नहीं होता।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सूत्र में 'कर्माशय' शब्द से कर्म के स्वरूप को, 'क्लेशमूल' से उसके कारण को और 'दृष्टा-दृष्टजन्मवेदनीयः' से उसके फल को बताया गया है। जिन योगियों ने क्लेशों को निर्बीज समाधि द्वारा उखाड़ दिया है, उनके कर्म निष्काम होते हैं और उन्हें इनका फल भोगना नहीं पड़ता। जब चित्त में क्लेशों के संस्कार जमे होते हैं, तब सकाम कर्म उत्पन्न होते हैं क्योंकि बिना रजोगुण के कोई क्रिया संभव नहीं है।

रजोगुण का सत्त्वगुण के साथ मेल होने पर ज्ञान, धर्म, वैराग्य और ऐश्वर्य जैसे शुभ कर्म होते हैं और तमोगुण के साथ मेल होने पर अज्ञान, अधर्म, अवैराग्य और अनैश्वर्य जैसे अशुभ कर्म होते हैं। इन दोनों प्रकार के मिले हुए कर्मों को ही पाप-पुण्य कहा जाता है और इनके अनुकूल फल भोगने वाले जो संस्कार चित्त में पड़ते हैं, उन्हें ही वासना कहते हैं। मीमांसकों का अपूर्व और नैयायिकों का अदृष्ट ही सूत्र में कर्माशय के नाम से है।

लेखक ने तीन श्रेणियों में बतलाया है कि पुण्यमिश्रित कर्म देवताओं के तुल्य फल देते हैं, पाप मिश्रित कर्म पशु-पक्षी के तुल्य होते हैं और अन्य कर्म शरीर या इन्द्रियों के समान फल देते हैं। मनोवृत्तियाँ अनन्त हैं जिनसे उत्पन्न कर्माशय भी अनन्त होते हैं और यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक कि प्रतिपक्षी या बलवान कर्म उन्हें दबा न दें। कुछ कर्माशय वर्तमान जन्म में, कुछ अगले जन्म में और कुछ दोनों जन्मों में फल देते हैं।

2.13 · साधनपाद सूत्र १३

सूत्र २.१३

सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥ २.१३ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 318

शब्दार्थ — सति · मूले · तत् · विपाकः · जाति · आयुः · भोगाः

अर्थ — अविद्या आदि क्लेशोंकी जड़के होते हुए उस ( कर्माशय ) का फल जाति , आयु और भोग होता है ।

व्यासभाष्य

सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो विपाकारम्भो भवति नोच्छिन्नक्लेशमूलः । यथा तुषावनद्धाः शालितुण्डला अदग्धबीजभावाः प्ररोहसमर्था भवन्ति, नापनीततुषा दग्धबीजभावा वा, तथा क्लेशावनद्धः कर्माशयो विपाकप्ररोही भवति, नापनीतक्लेशो न प्रसङ्ख्यानदग्धक्लेशबीजभावो वेति । स च विपाकस्त्रिविधो जातिरायुर्भोग इति । तत्रेदं विचार्यते—किमेकं कर्मैकस्य जन्मनः कारणमथैकं कर्मानेकं जन्माक्षिपतीति ? द्वितीया विचारणा—किमनेकं कर्मानेकं जन्म निर्वर्तयत्यथानेकं कर्मैकं जन्म निर्वर्तयतीति ?

न तावदेकं कर्मैकस्य जन्मनः कारणम् । कस्मात्? अनादिकालप्रचितस्यासङ्ख्येयस्यावशिष्टस्य कर्मणः साम्प्रतिकस्य च फलक्रमानियमादनाश्वासो लोकस्य प्रसक्तः । स चानिष्ट इति । न चैकं कर्मानेकस्य जन्मनः कारणम् । कस्मात्? अनेकेषु कर्मस्वेकैकमेव कर्मानेकस्य जन्मनः कारणमित्यवशिष्टस्य विपाककालाभावः प्रसक्तः च चाप्यनिष्ट इति । न चानेकं कर्मानेकस्य जन्मनःकारणम् । कस्मात्? तदनेकं जन्म युगपन्न सम्भवतीति क्रमेणैव वाच्यम् । तथा च पूर्वदोषानुषङ्गः ।

तस्माज्जन्मप्रायणान्तरे कृतः पुण्यापुण्यकर्माशयप्रचयो विचित्रः प्रधानोपसर्जनभावेनावस्थितः प्रायणाभिव्यक्त एकप्रघट्टकेन मिलित्वा मरणं प्रसाध्य सम्मूर्च्छित एकमेव जन्म करोति । तच्च जन्म तेनैव कर्मणा लब्धायुष्कं भवति । तस्मिन्नायुषि तेनैव कर्मणा भोगः सम्पद्यत इति । असौ कर्माशयो जन्मायुर्भोगहेतुत्वात्त्रिविधपाकोऽभिधीयत इति । अत एकभविक कर्माशय उक्त इति । दृष्टजन्मवेदनीयस्त्वेकविपाकारम्भी भोगहेतुत्वात्, द्विपाकारम्भी वा भोगायुर्हेतुत्वान्नदीश्वरवन्नहुषवद्वेति ।

क्लेशकर्मविपाकानुभवनिर्वर्तिताभिस्तु वासनाभिरनादिकालसम्मूर्च्छितमिदं चित्तं चित्रीकृतमिव सर्वतो मत्स्यजालं ग्रन्थिभिरिवाततमित्येता अनेकभवपूर्विका वासनाः । यस्त्वयं कर्माशय एष एवैकभविक उक्त इति । ये संस्काराः स्मृतिहेतवस्ता वासनास्ताश्चानादिकालीना इति । यस्त्वसावेकभविकः कर्माशय स नियतविपाकश्चानियतविपाकश्च । तत्रादृष्टजन्मवेदनीयस्य नियतविपाकस्यैवायं नियमो न त्वदृष्टजन्मवेदनीयस्यानियतविपाकस्य । कस्मात्?

यो ह्यदृष्टजन्मवेदनीयोऽनियतविपाकस्तस्य त्रयी गतिः—कृतस्याविपक्वस्य नाशः प्रधानकर्मण्यावापगमनं वा, नियतविपाकप्रधानकर्मणाभिभूतस्य वा चिरमवस्थानमिति । तत्र कृतस्याविपक्वस्य नाशो यथा शुक्लकर्मोदयादिहैव नाशः कृष्णस्य । यत्रेदमुक्तम्— द्वे द्वे ह वै कर्मणी वेदितव्ये पापकस्यैको राशिः पुण्यकृतोऽपहन्ति । तदिच्छस्व कर्माणि सुकृतानि कर्तुं इहैव ते कर्म कवयो वेदयन्ते ॥ प्रधानकर्मण्यावापगमनम् । यत्रेदमुक्तम्—« स्यात्स्वल्पः सङ्गरः सपरिहारः सप्रत्यवमर्षः कुशलस्य नापकर्षायालम् । कस्मात्?

कुशलं हि मे बह्वन्यदस्ति यत्रायमावापं गतः स्वर्गेऽप्यपकर्षमल्पं करिष्यति » इति । नियतविपाकप्रधानकर्मणाभिभूतस्य वा चिरमवस्थानम् । कथमिति ? अदृष्टजन्मवेदनीयस्यैव नियतविपाकस्य कर्मणः समानं मरणमभिव्यक्तिकारणमुक्तम्, न त्वदृष्टजन्मवेदनीयानियतविपाकस्य । यत्त्वदृष्टजन्मवेदनीयं कर्मानियतविपाकं तन्नश्येदावापं वा गच्छेदभिभूतं वा चिरमप्युपासीत, यावत्समानं कर्माभिव्यञ्जकं निमित्तमस्य न विपाकाभिभूतं करोतीति तद्विपाकस्यैव देशकालनिमित्तानवधारणादियं कर्मगतिश्चित्रा दुर्विज्ञाता चेति ।

न चोत्सर्गस्यापवादान्निवृत्तिरित्येकभविकः कर्माशयोऽनुज्ञायत इति ॥१३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — सति मूले तत् विपाकः जाति आयुः भोगाः। मूल के सत् होने पर उसका विपाक जन्म, आयु, और भोग है। क्लेशों के सत् होने पर कर्माशय विपाक का आरम्भ करता है, उच्छिन्न क्लेश मूल वाला नहीं। जैसे तुष से बंधे शालि तुण्डल अदग्ध बीज भाव वाले प्ररोह समर्थ होते हैं, न कि तुष रहित या दग्ध बीज भाव वाले। वैसे ही क्लेश से बंधा कर्माशय विपाक प्ररोही होता है, न कि क्लेश रहित या प्रसंख्यान से दग्ध क्लेश बीज भाव वाला। वह विपाक त्रिविध है—जाति, आयु, और भोग।

यहाँ विचार किया जाता है—क्या एक कर्म एक जन्म का कारण है, या एक कर्म अनेक जन्मों को आकर्षित करता है? द्वितीया विचारणा किम् अनेकम् कर्म अनेकम् जन्म निर्वर्तयति अथ अनेकम् कर्म एकम् जन्म निर्वर्तयति इति। दूसरा विचार—क्या अनेक कर्म अनेक जन्म निर्वर्तित करते हैं, या अनेक कर्म एक जन्म निर्वर्तित करते हैं? न तावत् एकम् कर्म एकस्य जन्मनः कारणम्। एक कर्म एक जन्म का कारण नहीं है। कस्मात्। क्यों?

अनादि काल प्रचितस्य असङ्ख्येयस्य अवशिष्टस्य कर्मणः साम्प्रतिकस्य च फल क्रम नियमात् अनाश्वासः लोकस्य प्रसक्तः। अनादिकाल से संचित, असंख्य अवशिष्ट कर्मों और साम्प्रतिक कर्मों के फल क्रम के नियम से लोक का अनाश्वास प्रसक्त है। सः च अनिष्टः इति। वह अनिष्ट है। न च एकम् कर्म अनेकस्य जन्मनः कारणम्। एक कर्म अनेक जन्मों का कारण भी नहीं है। कस्मात्। क्यों? अनेकेषु कर्मसु एक एकम् एव कर्म अनेकस्य जन्मनः कारणम् इति अवशिष्टस्य विपाक काल अभावः प्रसक्तः च च अपि अनिष्टः इति।

अनेक कर्मों में एक-एक कर्म अनेक जन्मों का कारण होने से अवशिष्ट का विपाक काल अभाव प्रसक्त और अनिष्ट है। न च अनेकम् कर्म अनेकस्य जन्मनः कारणम्। अनेक कर्म अनेक जन्मों का कारण भी नहीं है। कस्मात्। क्यों? तत् अनेकम् जन्म युगपत् न सम्भवति इति क्रमेण एव वाच्यम्। वह अनेक जन्म युगपत् सम्भव नहीं, इसलिए क्रम से ही वाच्य है। पूर्व दोष अनुषङ्गः। इससे पूर्व दोष का अनुषंग है।

पुण्य अपुण्य कर्म आशय प्रचयः विचित्रः प्रधान उपसर्जन भावेन अवस्थितः प्रायण अभिव्यक्त एक प्रघट्टकेन मिलित्वा मरणम् प्रसाध्य सम्मूर्च्छित एकम् एव जन्म करोति। इसलिए जन्म और प्रायण के बीच कृत पुण्य-अपुण्य कर्माशय का विचित्र प्रचय, प्रधान और उपसर्जन भाव से अवस्थित, प्रायण में अभिव्यक्त एक प्रघट्टक से मिलकर मरण को साधकर सम्मूर्च्छित होकर एकमात्र जन्म करता है। कर्मणा लब्ध आयुष्कम् भवति। वह जन्म उसी कर्म से आयु प्राप्त करता है। तस्मिन् आयुषि तेन एव कर्मणा भोगः सम्पद्यति इति।

उस आयु में उसी कर्म से भोग सम्पन्न होता है। असौ कर्म आशयः जन्म आयुः भोग हेतुत्वात् त्रिविध पाकः अभिधीयति इति। वह कर्माशय जन्म, आयु, और भोग का हेतु होने से त्रिविध विपाक कहलाता है। अतः एक भविक कर्म आशयः उक्तः इति। इसलिए एक भविक कर्माशय उक्त है। दृष्ट जन्म वेदनीयः तु एक विपाक आरम्भी भोग हेतुत्वात् द्वि पाक आरम्भी वा भोग आयुः हेतुत्वात् नदीश्वर वत् नहुष वत् वा इति।

दृष्ट जन्म वेदनीय एक विपाक आरम्भी है भोग हेतु होने से, या द्वि विपाक आरम्भी है भोग और आयु हेतु होने से, जैसे नंदीश्वर या नहुष। क्लेश कर्म विपाक अनुभव निर्वर्तिताभिः तु वासनाभिः अनादि काल सम्मूर्च्छितम् इदम् चित्तम् चित्री कृतम् इव सर्वतः मत्स्य जालम् ग्रन्थिभिः इव आततम् इति एताः अनेक भव पूर्विका वासनाः। क्लेश, कर्म, और विपाक अनुभव से निर्वर्तित वासनाओं से यह चित्त अनादिकाल से सम्मूर्च्छित, चित्रित, मत्स्य जाल की तरह ग्रंथियों से आतत है, ये अनेक भव पूर्विका वासनाएँ हैं।

यः तु अयम् कर्म आशयः एषः एव एक भविक उक्तः इति। जो यह कर्माशय है, वह एक भविक ही उक्त है। ये संस्काराः स्मृति हेतवः ताः वासनाः ताः च अनादि कालीनाः इति। जो संस्कार स्मृति के हेतु हैं, वे वासनाएँ हैं, और वे अनादिकालीन हैं। यः तु असौ एक भविकः कर्म आशयः सः नियत विपाकः च अनियत विपाकः च। वह एक भविक कर्माशय नियत और अनियत विपाक वाला है। तत्र अदृष्ट जन्म वेदनीयस्य नियत विपाकस्य एव अयम् नियमः न तु अदृष्ट जन्म वेदनीयस्य अनियत विपाकस्य।

अदृष्ट जन्म वेदनीय नियत विपाक का ही यह नियम है, अनियत विपाक का नहीं। कस्मात्। …

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जाति, आयु और भोग को अलंकार रूप से वर्णन किया गया है जहाँ क्लेश जड़ हैं और उनसे कर्माशय का वृक्ष बढ़ता है। इस वृक्ष में जाति, आयु और भोग तीन प्रकार के फल लगते हैं जो तब तक रहते हैं जब तक अविद्या आदि क्लेश विद्यमान रहते हैं। प्रसंख्यान द्वारा इस जड़ के कट जाने पर कर्माशय, उसके फल तथा सुख-दुःख की निवृत्ति स्वयं ही हो जाती है।

मन की वृत्तियाँ अनन्त हैं जिनसे उत्पन्न संस्कार चित्त में संचित होते हैं और मृत्यु के समय प्रधान कर्माशयों के अनुसार अगला जन्म, आयु और भोग नियत होता है। जिसे 'नियत-विपाक' कहते हैं उसे सूत्र बारह में 'दृष्ट-जन्मवेदनीय' कहा गया है और जो अभी अनियत विपाक वाले हैं उन्हें 'अदृष्टजन्मवेदनीय' कहा गया है।

अनियत विपाक वाले कर्मों की तीन प्रकार की गति होती है—या तो वे स्वयं नष्ट हो जाते हैं, या नियत-विपाक के साथ होते हुए फल देते रहते हैं, या चित्तभूमि में दबे रहकर अवसर मिलने पर जाग उठते हैं। अवस्था भेद से कर्मों को संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण के तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है जिसमें संचित को उपसर्जन कर्माशय और प्रारब्ध को प्रधान कर्माशय कहा गया है।

मनुष्य का नीच योनियों में जाना विकासवाद के विरुद्ध नहीं है क्योंकि जब मनुष्य में हिंसक या अन्य पशुवत मनोवृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं, तो उसका सूक्ष्म शरीर उन योनियों जैसा हो जाता है। ईश्वर की दया और न्यायकारी नियम से ऐसी योनियाँ अंतःकरण के मल धोने के स्थान के रूप में कार्य करती हैं ताकि वह पुनः पवित्र होकर आत्मोन्नति के लिए मनुष्य योनि में आ सके। गीता (८.६) और मुण्डक उपनिषद् (३.२.२) के अनुसार मनुष्य अन्तकाल में जिस भाव को स्मरण करता है उसे प्राप्त होता है।

यह पूरी व्यवस्था ईश्वर की सर्वज्ञता, न्याय और कल्याणकारिता के अंतर्गत एक घड़ी के यंत्रों की तरह व्यवस्थित रूप से चल रही है।

2.14 · साधनपाद सूत्र १४

सूत्र २.१४

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ २.१४ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 322

शब्दार्थ — ते · ह्लाद · परिताप · फलाः · पुण्य · अपुण्य · हेतुत्वात्

अर्थ — वे ( जाति , आयु और भोग ) सुख - दुःखरूपी फलके देनेवाले होते हैं , क्योंकि उनके कारण पुण्य और पाप हैं ।

व्यासभाष्य

ते जन्मायुर्भागाः पुण्यहेतुकाः सुखफला, अपुण्यहेतुकाः दुःखफला इति । यथा चेदं दुःखं प्रतिकूलात्मकमेवं विशेषसुखकालेऽपि दुःखमस्त्येव प्रतिकूलात्मकं योगिनः ॥१४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — कथं तदुपपद्यते ? कथम् तत् उपपद्यते। वह कैसे उपपदति?

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — पिछले सूत्र में बताए गए कर्माशयों के फल यानी जाति, आयु और भोग दो प्रकार के होते हैं, जिनमें एक सुख देने वाले (मीठे स्वाद वाले) और दूसरे दुःख देने वाले (कड़वे स्वाद वाले) हैं। पुण्य अर्थात् अहिंसात्मक कर्मों से सुख मिलता है और पाप अर्थात् हिंसात्मक कर्मों से दुःख मिलता है। जब कर्मों को स्वार्थ छोड़कर दूसरों के कल्याण की मनोवृत्ति से किया जाता है, तब वे कर्ता को सुख पहुँचाते हैं और जब वे स्वार्थवश काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से किए जाते हैं, तब वे करने वाले को दुःख का कारण होते हैं। इसी कारण सर्वयोनियों में सुख-दुःख दोनों देखे जाते हैं क्योंकि जो सुख अथवा दुःख दूसरों को दिए जाते हैं, उनका फल अवश्य मिलता है, चाहे इस योनि में या दूसरी योनियों में। सुख-दुःख पहुँचाने वाले कर्मों में भी मनोवृत्तियाँ ही कारण होती हैं, जैसे डॉक्टर द्वारा फोड़ा चीरना सुख का कारण बनता है जबकि द्वेष से चाकू मारना दुःख का कारण बनता है। अकर्म में भी कर्म होता है और कर्म में भी अकर्म होता है जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के १७वें श्लोक में बताया है।

2.15 · साधनपाद सूत्र १५

सूत्र २.१५

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥ २.१५ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 324

शब्दार्थ — परिणाम · ताप · संस्कार · दुःखैः · गुण · वृत्ति · विरोधात् · च · दुःखम् · एव · सर्वम् · विवेकिनः

अर्थ — परिणाम, ताप, संस्कार दुखों और गुण वृत्ति के विरोध से विवेकी के लिए सब कुछ दुखमय है। सर्वस्य अयम् राग अनुविद्धः चेतना चेतन साधन अधीनः सुख अनुभवः इति तत्र अस्ति रागजः कर्म आशयः। सभी का यह सुख अनुभव राग से युक्त, चेतन और अचेतन साधनों पर निर्भर है, इसलिए वहाँ रागज कर्माशय है।

व्यासभाष्य

सर्वस्यायं रागानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनः सुखानुभव इति तत्रास्ति रागजः कर्माशयः । तथा च द्वेष्टि दुःखसाधनानि मुह्यति चेति द्वेषमोहकृतोऽप्यस्ति कर्माशयः । तथा चोक्तम् । नानुपहत्य भूतान्युपभोगः सम्भवतीति हिंसाकृतोऽप्यस्ति शारीरः कर्माशय इति । विषयसुखं चाविद्येत्युक्तम् । या भोगेष्विन्द्रियाणां तृप्तेरुपशान्तिस्तत्सुखम् । या लौल्यादनुपशान्तिस्तद्दुःखम् । न चेन्द्रियाणां भोगाभ्यासेन वैतृष्ण्यं कर्तुं शक्यम् । कस्मात्?

यतो भोगाभ्यासमनुविवर्धन्ते रागाः कौशलानि चेन्द्रियाणामिति तस्मादनुपायः । सुखस्य भोगाभ्यास इति । स खल्वयं वृश्चिकविषभीत इवाशीविशेण दष्टो यः सुखार्थी विषयानुवासितो महति दुःखपङ्के निमग्न इति । एषा परिणामदुःखता नाम प्रतिकूला सुखान्वस्थायामपि योगिनमेव क्लिश्नाति । अथ का तापदुःखता ? सर्वस्य द्वेषानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनस्तापानुभव इति । तत्रास्ति द्वेषजः कर्माशयः । सुखसाधनानि च प्रार्थयामानः कायेन वाचा मनसा च परिस्पन्दते ।

ततः परमनुगृह्णात्युपहन्ति चेति परानुग्रहपीडाभ्यां धर्माधर्मावुपचिनोति । स कर्माशयो लोभान्मोहाच्च भवतीत्येषा तापदुःखतोच्यते । का पुनः संस्कारदुःखता ? सुखानुभवात्सुखसंस्काराशयो दुःखानुभवादपि दुःखसंस्काराशय इति ? एवं कर्मभ्यो विपाकेऽनुभूयमाने सुखे दुःखे वा पुनः कर्माशयप्रचय इति । एवमिदमनादिदुःखस्रोतो विप्रसृतं योगिनमेव प्रतिकूलात्मकत्वादुद्वेजयति । कस्मात्? अक्षिपात्रकल्पो हि विद्वानिति । यथोर्णातन्तुरक्षिपात्रे न्यस्तः स्पर्शेन दुःखयति न चान्येषु गात्रावयवेषु ।

एवमेतानि दुःखान्यक्षिपात्रकल्पं योगिनमेव क्लिश्नन्ति नेतरं प्रतिपत्तारम् । इतरं तु स्वकर्मोपहृतं दुःखमुपात्तमुपात्तं त्यजन्तं त्यक्तं त्यक्तमुपाददानमनादिवासनाविचित्रया चित्तवृत्त्या समन्ततोऽनुविद्धमिवाविद्यया हातव्य एवाहङ्कारममकारानुपातिनं जातं जातं बाह्याध्यात्मिकोभयनिमित्तास्त्रिपर्वाणस्तापा अनुप्लवन्ते । तदेवमनादिदुःखस्रोतसा व्युह्यमानमात्मानं भूतग्रामं च दृष्ट्वा योगी सर्वदुःखक्षयकारणं सम्यग्दर्शनं शरणं प्रपद्यत इति । गुणवृत्त्यविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ।

प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिरूपा बुद्धिगुणाः परस्परानुग्रहतन्त्रीभूय शान्तं घोरं मूढं वा प्रत्ययं त्रिगुणमेवारम्भन्ते । चलं च गुणवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम् । रूपातिशया वृत्त्यतिशयाश्च परस्परेण विरुद्ध्यन्ते । सामान्यानि त्वतिशयैः सह प्रवर्तन्ते । एवमेते गुणा इतरेतराश्रयेणोपार्जितसुखदुःखमोहप्रत्यया इति सर्वे सर्वरूपा भवति । गुणप्रधानभावकृतस्त्वेषां विशेष इति । तस्माद्दुःखमेव सर्वविवेकिन इति । तदस्य महतो दुःखसमुदायस्य प्रभवबीजमविद्या । तस्याश्च सम्यग्दर्शनमभावहेतुः ।

यथा चिकित्साशास्त्रं चतुर्व्यूहं—रोगो रोगहेतुरारोग्यं भैषज्यमिति । एवमिदमपि शास्त्रं चतुर्व्यूहमेव । तद्यथा—संसारः संसारहेतुर्मोक्षो मोक्षोपाय इति । तत्र दुःखबहुलः संसारो हेयः । प्रधानपुरुषयोः संयोगो हेयहेतुः । संयोगस्यात्यन्तिकी निवृत्तिर्हानम् । हानोपायः सम्यग्दर्शनम् । तत्र हातुः स्वरूपमुपादेयं वा हेयं वा न भवितुमर्हति । हाने तस्योच्छेदवादप्रसङ्गः, उपादाने च हेतुवादः । उभयप्रत्याख्याने च शाश्वतवाद इत्येतत्सम्यग्दर्शनम् ॥१५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — एवमिदमनादिदुःखस्रोतो विप्रसृतं योगिनमेव प्रतिकूलात्मकत्वादुद्वेजयति । कस्मात्? अक्षिपात्रकल्पो हि विद्वानिति । यथोर्णातन्तुरक्षिपात्रे न्यस्तः स्पर्शेन दुःखयति न चान्येषु गात्रावयवेषु । एवमेतानि दुःखान्यक्षिपात्रकल्पं योगिनमेव क्लिश्नन्ति नेतरं प्रतिपत्तारम् ।

इतरं तु स्वकर्मोपहृतं दुःखमुपात्तमुपात्तं त्यजन्तं त्यक्तं त्यक्तमुपाददानमनादिवासनाविचित्रया चित्तवृत्त्या समन्ततोऽनुविद्धमिवाविद्यया हातव्य एवाहङ्कारममकारानुपातिनं जातं जातं बाह्याध्यात्मिकोभयनिमित्तास्त्रिपर्वाणस्तापा अनुप्लवन्ते । तदेवमनादिदुःखस्रोतसा व्युह्यमानमात्मानं भूतग्रामं च दृष्ट्वा योगी सर्वदुःखक्षयकारणं सम्यग्दर्शनं शरणं प्रपद्यत इति । गुणवृत्त्यविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ।

प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिरूपा बुद्धिगुणाः परस्परानुग्रहतन्त्रीभूय शान्तं घोरं मूढं वा प्रत्ययं त्रिगुणमेवारम्भन्ते । चलं च गुणवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम् । सामान्यानि त्वतिशयैः सह प्रवर्तन्ते । एवमेते गुणा इतरेतराश्रयेणोपार्जितसुखदुःखमोहप्रत्यया इति सर्वे सर्वरूपा भवति । गुणप्रधानभावकृतस्त्वेषां विशेष इति । तस्माद्दुःखमेव सर्वविवेकिन इति । तदस्य महतो दुःखसमुदायस्य प्रभवबीजमविद्या । तस्याश्च सम्यग्दर्शनमभावहेतुः ।

यथा चिकित्साशास्त्रं चतुर्व्यूहं—रोगो रोगहेतुरारोग्यं भैषज्यमिति । एवमिदमपि शास्त्रं चतुर्व्यूहमेव । तद्यथा—संसारः संसारहेतुर्मोक्षो मोक्षोपाय इति । तत्र दुःखबहुलः संसारो हेयः । प्रधानपुरुषयोः संयोगो हेयहेतुः । संयोगस्यात्यन्तिकी निवृत्तिर्हानम् । हानोपायः सम्यग्दर्शनम् । तत्र हातुः स्वरूपमुपादेयं वा हेयं वा न भवितुमर्हति । हाने तस्योच्छेदवादप्रसङ्गः, उपादाने च हेतुवादः । उभयप्रत्याख्याने च शाश्वतवाद इत्येतत्सम्यग्दर्शनम् ॥ १५॥

परिणाम ताप संस्कार दुःखैः गुण वृत्ति विरोधात् च दुःखम् एव सर्वम् विवेकिनः। परिणाम, ताप, संस्कार दुखों और गुण वृत्ति के विरोध से विवेकी के लिए सब कुछ दुखमय है। सर्वस्य अयम् राग अनुविद्धः चेतना चेतन साधन अधीनः सुख अनुभवः इति तत्र अस्ति रागजः कर्म आशयः। सभी का यह सुख अनुभव राग से युक्त, चेतन और अचेतन साधनों पर निर्भर है, इसलिए वहाँ रागज कर्माशय है। मुह्यति च इति द्वेष मोह कृतः अपि अस्ति कर्म आशयः। वैसे ही दुख साधनों से द्वेष और मोह से भी कर्माशय उत्पन्न होता है।

अपि अस्ति शारीरः कर्म आशयः इति। कहा गया है—भूतों को हानि पहुँचाए बिना उपभोग संभव नहीं, इसलिए हिंसा से भी शारीरिक कर्माशय होता है। विषय सुखम् च अविद्या इति उक्तम्। विषय सुख को अविद्या कहा गया है। या भोगेषु इन्द्रियाणाम् तृप्तेः उपशान्तिः तत् सुखम्। भोगों में इन्द्रियों की तृप्ति से जो उपशान्ति होती है, वही सुख है। या लौल्याद् अनुपशान्तिः तत् दुःखम्। लोलुपता से जो अनुपशान्ति है, वही दुख है। इन्द्रियों के भोग अभ्यास से वैतृष्ण्य करना संभव नहीं। कस्मात्। क्यों?

यतः भोग अभ्यासम् अनु विवर्धन्ते रागाः कौशलानि च इन्द्रियाणाम् इति तस्मात् अनुपायः। क्योंकि भोग अभ्यास से राग और इन्द्रियों का कौशल बढ़ता है, इसलिए यह सुख का उपाय नहीं। सुखस्य भोग अभ्यासः इति। सुख का भोग अभ्यास। सः खलु अयम् वृश्चिक विष भीतः इव आशीविषेण दष्टः यः सुख अर्थी विषय अनुवासितः महति दुःख पङ्के निमग्नः इति। सुख की इच्छा वाला, विषयों से संनादित, वृश्चिक विष से डरे हुए की तरह आशीविष से दंशित, महान दुख के पंक में निमग्न है।

एषा परिणाम दुःखता नाम प्रतिकूला सुख अन्वस्थायाम् अपि योगिनम् एव क्लिश्नाति। यह परिणाम दुखता, सुख की स्थिति में भी प्रतिकूल होकर योगी को ही क्लेश देती है। अथ का ताप दुःखता। ताप दुखता क्या है? सर्वस्य द्वेष अनुविद्धः चेतना चेतन साधन अधीनः ताप अनुभवः इति। सभी का ताप अनुभव द्वेष से युक्त, चेतन और अचेतन साधनों पर निर्भर है। तत्र अस्ति द्वेषजः कर्म आशयः। वहाँ द्वेषज कर्माशय है। च प्रार्थयामानः कायेन वाचा मनसा च परिस्पन्दति।

सुख साधनों की प्रार्थना करने वाला काय, वाक्, और मन से परिस्पंदन करता है। ततः परम् अनुगृह्णाति उपहन्ति च इति पर अनुग्रह पीडाभ्याम् धर्म अधर्मौ उपचिनोति। इससे दूसरों का अनुग्रह और पीड़ा करके धर्म और अधर्म संचित करता है। सः कर्म आशयः लोभात् मोहात् च भवति इति एषा ताप दुःखता उच्यते। …

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जिस प्रकार विष मिला हुआ स्वादिष्ट पदार्थ बुद्धिमान के लिए त्यागने योग्य है, उसी प्रकार विवेकपूर्ण ज्ञान प्राप्त योगियों को संसार के विषय-सुख भी दुःख ही प्रतीत होते हैं। स्वामी ओमानन्द तीर्थ के अनुसार विषय-सुखों में चार प्रकार के दुःख होते हैं जिन्हें उन्होंने व्याख्या सहित वर्णित किया है। पहले उत्पन्न परिणाम-दुःख है क्योंकि विषयों के भोग से तृप्ति नहीं बल्कि राग होता है, जैसा कि मनुस्मृति (२.९४) में कहा गया है कि कामनाएँ उपभोग से शांत नहीं होतीं बल्कि बढ़ती हैं। दूसरा ताप-दुःख है जिसमें साधन और प्राप्ति में राग व द्वेष के क्लेश उत्पन्न होते हैं, तीसरा संस्कार-दुःख है क्योंकि सुख के भोग से चित्त पर पड़ने वाले संस्कार आवागमन के चक्र में डालते हैं, और चौथा गुण-वृत्ति-विरोध-दुःख है। गुणों की वृत्तियों में जब सत्त्व प्रधान होता है तब सुख, रजस प्रधान होने पर दुःख और तमस प्रधान होने पर मोह उत्पन्न होता है। सांख्य-दर्शन अध्याय ६ के अनुसार विवेकी योगियों का चित्त इतना शुद्ध होता है कि उन्हें लेशमात्र भी क्लेश खटकता है, इसलिए वे संसार के सुखों को त्यागने योग्य समझते हैं।

2.16 · साधनपाद सूत्र १६

सूत्र २.१६

हेयं दुःखमनागतम् ॥ २.१६ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 325

अर्थ — आनेवाले दुःख हेय ( त्यागनेयोग्य ) हैं ।

व्यासभाष्य

दुःखमतीतमुपभोगेनातिवाहितं न हेयपक्षे वर्तते वर्तमानं च स्वक्षणे भोगारूढमिति न तत्क्षणान्तरे हेयतामापद्यते तस्माद्यदेवानागतं दुःखं तदेवाक्षिपात्रकल्पं योगिनं क्लिश्नाति, नेतरं प्रतिपत्तारम् । तदेव हेयतामापद्यते ॥१६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत् एतत् शास्त्रम् चतुर् व्युहम् इति अभिधीयते। यह शास्त्र चतुर्व्यूह कहा जाता है। हेयम् दुःखम् अनागतम्। अनागत दुख हेय है। अतीत दुख उपभोग से अतिवाहित होकर हेय पक्ष में नहीं रहता। वर्तमान दुख स्वक्षण में भोगारूढ़ होने से उस क्षण में हेय नहीं होता। इसलिए केवल अनागत दुख ही अक्षि पात्र के समान योगी को क्लेश देता है, अन्य प्रतिपत्तार को नहीं। वही हेय होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — भूतकाल का दुःख बीत चुका है और वर्तमान दुःख क्षणिक है, इसलिए केवल आने वाला दुःख ही त्यागने योग्य है जिसे विवेकी हटाने का यत्न करते हैं। टिप्पणी सूत्र १६ के अनुसार बौद्ध दर्शन में वैदिक दर्शनों के चार प्रतिपाद्य विषयों को 'चार आर्य-सत्य' के नाम से वर्णित किया गया है। पहला आर्य सत्य 'दुःखम्' है जिसमें जन्म, वृद्धावस्था, मरण, शोक और राग से उत्पन्न पाँचों स्कन्ध (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान) शामिल हैं।

धम्मपद गाथा १४६ के अनुसार यह संसार नित्य जलते हुए घर के समान है जहाँ हँसी और आनन्द संभव नहीं है। दूसरा आर्य सत्य 'दुःख-समुदय' है जिसका अर्थ हेतु है और यहाँ दुःख का वास्तविक हेतु तृष्णा को बताया गया है। मज्झिम निकाय में बुद्ध ने स्पष्ट किया है कि तृष्णा तीन प्रकार की है— (१) कामतृष्णा, (२) भवतृष्णा और (३) विभवतृष्णा। धम्मपद गाथा ३४१ और ३४५ के अनुसार तृष्णा की धाराएँ प्राणियों को प्रिय लगती हैं और वे राग के कारण जन्म-जरा के चक्र में बँध जाते हैं।

धम्मपद गाथा ३४७ के अनुसार राग में रक्त होने के कारण मनुष्य मकड़ी के जाल की तरह अपनी ही बनाई हुई तृष्णा के जाल में फँस जाता है। मज्झिम निकाय बताता है कि समस्त विद्रोह, पाप कर्म और चोरी जैसे कृत्यों का निदान यही तृष्णा है, अतः तृष्णा ही दुःख का कारण है और इसी का समुच्छेद प्रत्येक प्राणी का कर्तव्य है।

2.17 · साधनपाद सूत्र १७

सूत्र २.१७

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ २.१७ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 326

अर्थ — द्रष्टा और दृश्यका संयोग " हेयहेतु ” ( दुःखका कारण ) है ।

व्यासभाष्य

द्रष्टा बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः । दृश्या बुद्धिसत्त्वोपारूढाः सर्वे धर्माः । तदेतद्दृश्यमयस्कान्तमणिकल्पं सन्निधिमात्रोपकारि दृश्यत्वेन स्वं भवति पुरुषस्य दृशिरूपस्य स्वामिनः । अनुभवकर्मविषतामापन्नमन्यस्वरूपेण प्रतिलब्धात्मकम् । स्वतन्त्रमपि परार्थत्वात्परतन्त्रम् । तयोर्दृग्दर्शनशक्त्योरनादिरर्थकृतः संयोगो हेयहेतुउर्दुःखस्य कारणमित्यर्थः । तथा चोक्तम्—तत्संयोगहेतुवर्जनात्स्यादयमात्यन्तिको दुःखप्रतीकारः । कस्मात्? दुःखहेतोः परिहार्यस्य प्रतीकारदर्शनात। तद्यथा पादतलस्य भेद्यता, कण्टकस्य भेत्तृत्वं, परिहारः, कण्टकस्य पादानधिष्ठानं पादत्राणव्यवहितेन वाधिष्ठानम् । एतत्त्रयं यो वेद लोके स तत्र प्रतीकारमारम्भमाणो भेदजं दुःखं नाप्नोति । कस्मात्? त्रित्वोपलब्धिसामर्थ्यादिति । अत्रापि तापकस्य रजसः सत्त्वमेव तप्यम् । कथं तपिक्रियायाः कर्मस्थत्वात्, सत्त्वे कर्मणि तपिक्रिया नापरिणामिनि निष्क्रिये क्षेत्रज्ञे । दर्शितविषयत्वात्सत्त्वे तु तप्यमाने तदाकारानुरोधी पुरुषोऽनुतप्यत इति ॥१७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तस्मात् यत् एव हेयम् इति उच्यते तस्य एव कारणम् प्रतिनिर्दिश्यते। इसलिए जो हेय कहा जाता है, उसका कारण प्रतिनिर्दिष्ट किया जाता है। द्रष्टृ दृश्ययोः संयोगः हेय हेतुः। द्रष्टा और दृश्य का संयोग हेय का हेतु है। द्रष्टा बुद्धि का प्रतिसंवेदी पुरुष है। दृश्य बुद्धि सत्त्व पर आधारित सभी धर्म हैं। यह दृश्य अयस्कान्त मणि के समान, सन्निधि मात्र से उपकारी, दृश्यत्व से पुरुष के दृशि रूप स्वामी का स्व है।

यह अनुभव और कर्म की विषता को प्राप्त, अन्य स्वरूप से प्रतिलब्ध आत्मक है। स्वतंत्र होने पर भी परार्थत्व से परतंत्र है। दृक् और दर्शन शक्तियों का अनादि अर्थ कृत संयोग दुख का कारण और हेय का हेतु है। कहा गया है—उस संयोग हेतु के वर्जन से आत्यंतिक दुख प्रतीकार होगा। कस्मात्। दुख हेतु के परिहार्य होने के प्रतीकार दर्शन से। जैसे पाद तल की भेद्यता, कांटे की भेत्तृता, परिहार, कांटे का पाद पर अनधिष्ठान, या पाद त्राण से व्यवहित अधिष्ठान।

जो लोक में इस त्रय को जानता है, वह प्रतीकार आरम्भ करके भेदज दुख नहीं पाता। कस्मात्। त्रित्व की उपलब्धि सामर्थ्य से। यहाँ भी तापक रजस का सत्त्व ही तपता है। तपि क्रिया कर्मस्थ होने से सत्त्व में कर्म की तपि क्रिया है, न कि अपरिणामी निष्क्रिय क्षेत्रज्ञ में। दर्शित विषयत्व से सत्त्व के तपने पर उस आकार का अनुरोधी पुरुष अनुतपता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — द्रष्टा चेतन पुरुष है जो चित्त का स्वामी होकर उसे देखता है और दृश्य चित्त है जो गुणों के परिणाम स्वरूप पुरुष को संसार दिखाता है। इस पुरुष और चित्त का आसक्तिसहित अविवेकपूर्ण भोग्य-भोक्ता भाव का संयोग ही दुःख का कारण है। गीता १३.२१ के अनुसार प्रकृति में स्थित पुरुष त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण बनता है।

भोजवृत्ति के अनुसार द्रष्टा नाम बुद्धि-प्रतिसंवेदी होकर तदाकारता को धारण करने वाले का है और दृश्य नाम बुद्धि एवं इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किए गए प्रकृती के कार्यों का है। व्यासभाष्य के भाषार्थ (सूत्र १७) के अनुसार यह दृश्य अपने जड़रूप से स्वतंत्र होने पर भी पुरुष के अर्थ से परतंत्र है और इसका स्व-स्वामिभाव ही दुःख उत्पन्न करता है। पञ्चशिखाचार्य के अनुसार इस संयोग के विवर्जन से ही दुःख का नाश होता है क्योंकि यह संयोग ही अस्मिता-क्लेश है जिसका कारण अविद्या है।

जैसे लोक में पैर का तलवा ताप्य, काँटा तापक और जूते पहनना परिहार है, वैसे ही यहाँ सत्त्वप्रधान बुद्धि ताप्य, रजोगुण तापक और विवेकख्याति परिहार है। यद्यपि तापरूप क्रिया कर्मभूत सत्त्व में है, तथापि पुरुष उपाधिक सम्बन्ध से ताप्य बन जाता है और इस प्रकार प्रकृति-पुरुष का संयोग ही दुःख का कारण बनता है।

2.18 · साधनपाद सूत्र १८

सूत्र २.१८

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥ २.१८ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 304

अर्थ — दृश्य स्वरूपम् उच्यते। दृश्य का स्वरूप कहा जाता है। प्रकाश क्रिया स्थिति शीलम् भूत इन्द्रिय आत्मकम् भोग अपवर्ग अर्थम् दृश्यम्। प्रकाश, क्रिया, और स्थिति शील, भूत और इन्द्रिय आत्मक, भोग और अपवर्ग के लिए दृश्य है। प्रकाश शीलम् सत्त्वम्। प्रकाश शील सत्त्व है। क्रिया शीलम् रजः। क्रिया शील रजस है। स्थिति शीलम् तमः इति। स्थिति शील तमस है।

व्यासभाष्य

प्रकाशशीलं सत्त्वम् । क्रियाशीलं रजः । स्थितिशीलं तम इति । एते गुणाः परस्परोपरक्तप्रविभागाः संयोगविभागधर्मणीतरेतरोपाश्रयेणोपार्जितमूर्तयः परस्पराङ्गाङ्गित्वेऽप्यसम्भिन्नशक्तिप्रविभागाः । तुल्यजातीयातुल्यजातीयशक्तिभेदानुपातिनः । प्रधानवेलायामुपदर्शितसन्निधाना गुणत्वेऽपि च व्यापारमात्रेण प्रधानान्तर्नीतानुमितास्तिताः पुरुषार्थकर्तव्यतया प्रयुक्तसामर्थ्याः सन्निधिमात्रोपकारिणोऽयस्कान्तमणिकल्पाः । प्रत्ययमन्तरेणैकतमस्य वृत्तिमनुवर्तमानाः प्रधानशब्दवाच्या भवन्ति ।

एतद्दृश्यमित्युच्यते । तदेतद्दृश्यं भूतेन्द्रियात्मकं भूतभावेन पृथिव्यादिना सूक्ष्मस्थूलेन परिणमते । तथेन्द्रियभावेन श्रोत्रादिना सूक्ष्मस्थूलेन परिणमत इति । तत्तु नाप्रयोजनम्, अपि तु प्रयोजनमुररीकृत्य प्रवर्तत इति भोगापवर्गार्थं हि तद्दृश्यं पुरुषस्येति । तत्रेष्टानिष्टगुणस्वरूपावधारणमविभागापन्नं भोगः । भोक्तुः स्वरूपावधारणमपवर्ग इति द्वयोरतिरिक्तमन्यद्दर्शनं नास्ति ।

तथा चोक्तं—अयं तु खलु त्रिषु गुणेषु कर्तृष्वकर्तरि च पुरुषे तुल्यातुल्यजातीये चतुर्थे तत्क्रियासाक्षिण्युपनीयमानान्सर्वभावानुपपन्नाननुपश्यन्त दर्शनमन्यच्छङ्कत इति । तावेतौ भोगापवर्गौ बुद्धिकृतौ बुद्धावेव वर्तमानौ कथं पुरुषे व्यपदिश्येते इति । यथा च जयः पराजयो वा योद्धृषु वर्तमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते, स हि तस्य फलस्य भोक्तेति । एवं बन्धमोक्षौ बुद्धावेव वर्तमानौ पुरुषे व्यपदिश्येते बुद्धेरेव पुरुषार्थापरिसमाप्तिर्बन्धस्तदर्थावसायो मोक्ष इति ।

एतेन ग्रहणधारणोहापोहतत्त्वज्ञानाभिनिवेशा बुद्धौ वर्तमानाः पुरुषेऽध्यारोपितसद्भावाः । स हि तत्फलस्य भोक्तेति ॥१८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — इन्द्रिय आत्मकम् भोग अपवर्ग अर्थम् दृश्यम्। क्रिया, और स्थिति शील, भूत और इन्द्रिय आत्मक, भोग और अपवर्ग के लिए दृश्य है। प्रकाश शीलम् सत्त्वम्। है। क्रिया शीलम् रजः। क्रिया शील रजस है। स्थिति शीलम् तमः इति। स्थिति शील तमस है। ये गुण परस्पर उपरक्त प्रविभाग वाले, संयोग और विभाग धर्मी, परस्पर आश्रय से उपार्जित मूर्तियाँ, परस्पर अंग-अंगित्व में भी असम्भिन्न शक्ति प्रविभाग वाले हैं। तुल्य और अतुल्य जातीय शक्ति भेद के अनुपाती हैं।

प्रधान वेला में उपदर्शित सन्निधान, गुणत्व में भी व्यापार मात्र से प्रधान में अन्तर्नीत, अनुमित असिता, पुरुषार्थ कर्तव्य के लिए प्रयुक्त सामर्थ्य, सन्निधि मात्र से उपकारी, अयस्कान्त मणि के समान हैं। प्रत्यय के बिना एक की वृत्ति का अनुवर्तन करने वाले प्रधान शब्द वाच्य हो जाते हैं। इसे दृश्य कहा जाता है। यह दृश्य भूत और इन्द्रिय आत्मक, भूत भाव से पृथ्वी आदि सूक्ष्म और स्थूल रूप में परिणमति है। वैसे ही इन्द्रिय भाव से श्रोत्र आदि सूक्ष्म और स्थूल रूप में परिणमति है।

यह अप्रयोजन नहीं, बल्कि प्रयोजन को उररीकृत कर प्रवृत्त होता है। यह दृश्य पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग के लिए है। वहाँ इष्ट और अनिष्ट गुण स्वरूप का अवधारण अविभाग प्राप्त भोग है। भोक्ता का स्वरूप अवधारण अपवर्ग है। दर्शन नहीं है। कहा गया है—तीन गुणों में कर्ता, अकर्ता पुरुष, तुल्य और अतुल्य जातीय, चौथे क्रिया साक्षी में उपनीत सर्व भावों को उपपन्न न देखकर अन्य दर्शन की शंका करता है। ये भोग और अपवर्ग बुद्धि कृत, बुद्धि में वर्तमान, पुरुष में कैसे व्यपदिश्येते हैं?

यथा च जयः पराजयः वा योद्धृषु वर्तमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते सः हि तस्य फलस्य भोक्ता इति। जैसे जय या पराजय योद्धाओं में वर्तमान स्वामी में व्यपदिश्येते, वह फल का भोक्ता है। एवम् बन्ध मोक्षौ बुद्धौ एव वर्तमानौ पुरुषे व्यपदिश्येते। वैसे ही बंध और मोक्ष बुद्धि में वर्तमान पुरुष में व्यपदिश्येते। बुद्धेः एव पुरुष अर्थ अपरिसमाप्तिः बन्धः तत् अर्थ अवसायः मोक्षः इति। बुद्धि का पुरुषार्थ अपरिसमाप्ति बंध और तदर्थ अवसाय मोक्ष है।

एतेन ग्रहण धारण उह अपोह तत्त्व ज्ञान अभिनिवेशाः बुद्धौ वर्तमानाः पुरुषे अध्यारोपित सत् भावाः। इससे ग्रहण, धारण, उह, अपोह, तत्त्व ज्ञान, और अभिनिवेश बुद्धि में वर्तमान, पुरुष में अध्यारोपित सत् भाव हैं। सः हि तत् फलस्य भोक्ता इति। वह उस फल का भोक्ता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सत्त्व, रजस् और तमस् ये तीनों गुण और इनसे निर्मित समस्त दृश्य जगत के आधार हैं। गुणों का स्वभाव क्रमशः प्रकाश, प्रवृत्ति और स्थिति है जो विवेकख्यातिहीन पुरुष के साथ स्व-स्वामी भाव में संयुक्त रहते हैं और विवेकख्यातिवाले पुरुष से विभक्त हो जाते हैं। ये तीनों गुण साम्यावस्था में प्रधान रूप से रहते हैं और विषमावस्थामें अङ्ग-अङ्गीभाव से मिलकर विभिन्न कार्यों को उत्पन्न करते हैं जहाँ एक गुण प्रधान होता है और अन्य दो गौण होते हैं।

दिव्य शरीर के निर्माण में सत्त्व, मनुष्य शरीर में रजस् और कीट-पशु आदि के लिए तमोगुण प्रधान होता है। ये तीनों गुण पुरुष की संनिधि मात्र से केवल पुरुषार्थ यानी अपवर्ग के प्रयोजन हेतु कार्यों का उत्पादन करते हैं। गुणों का परिणाम निष्प्रयोजन है किंतु पुरुष के भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजनवाला है। भोग में दो प्रकार के अनुभव होते हैं जैसे अनिष्ट गुण स्वरूप का अनुभव जो कर्माशय के निवारण हेतु है और इष्ट गुण स्वरूप का अनुभव जो सम्प्रज्ञात-समाधि द्वारा प्राप्त होता है।

अपवर्ग वह स्वरूपावस्थिति है जो विवेकख्याति के पश्चात् प्राप्त होती है और यह पुरुष का परम प्रयोजन है। श्रीव्यासजी महाराज ने पञ्चशिखाचार्य के सूत्र से अपने भाष्य में स्पष्ट किया है कि पुरुष इन तीनों गुणों का कर्ता होते हुए भी उनकी क्रियाओं का साक्षी अकर्त्ता है। बन्ध और मोक्ष जैसे चित्त के धर्मों की भाँति ये सभी मानसिक प्रक्रियाएँ चित्त में वर्तमान होते हुए भी पुरुष में व्यवहार से आरोपित की जाती हैं क्योंकि वह बुद्धिका स्वामी और फल का भोक्ता है।

2.19 · साधनपाद सूत्र १९

सूत्र २.१९

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ २.१९ ॥

साधनपाद · सूत्र २.१९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 304

अर्थ — दृश्यानाम् तु गुणानाम् स्वरूप भेद अवधारण अर्थम् इदम् आरभ्यते। दृश्य के गुणों के स्वरूप भेद के अवधारण के लिए यह आरम्भ किया जाता है। विशेष अविशेष लिङ्ग मात्र अलिङ्गानि गुण पर्वाणि। विशेष, अविशेष, लिंग मात्र, और अलिंग गुण के पर्व हैं। तत्र आकाश वायु अग्नि उदक भूमयः भूतानि शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध तन्मात्राणाम् अविशेषाणाम् विशेषाः। आकाश, वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी भूत, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध तन्मात्रों के अविशेषों के विशेष हैं। तथा श्रोत्र त्वक् चक्षुः जिह्वा घ्राणानि बुद्धि इन्द्रियाणि। …

व्यासभाष्य

तत्राकाशवाय्वग्न्युदकभूमयो भूतानि शब्दस्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्राणामविशेषाणां विशेषाः । तथा श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानि बुद्धीन्द्रियाणि । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि । एकादशं मनः सर्वार्थम् । इत्येतान्यस्मितालक्षणस्याविशेषस्य विशेषाः । गुणानामेष षोडशको विशेषपरिणामः । षडविशेषाः । तद्यथा—शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रं चेत्येकद्वित्रिचतुष्पञ्चलक्षणाः शब्दादयः पञ्चाविशेषाः, षष्ठश्चाविशेषोऽस्मितामात्र इति ।

एते सत्तामात्रस्यात्मनो महतः षदविशेषपरिणामाः । यत्तत्परमविशेषेभ्यो लिङ्गमात्रं महत्तत्त्वं तस्मिन्नेते, सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय विवृद्धिकाष्ठामनुभवन्ति । प्रतिसंमृज्यमानाश्च तस्मिन्नेव सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय यत्तन्निःसत्तासत्तं निःसदसन्निरसदव्यक्तमलिङ्गं प्रधानं तत्प्रतियन्तीति । एष तेषां लिङ्गमात्रः परिणामः । निःसत्ताऽसत्तं चालिङ्गपरिणाम इति । अलिङ्गावस्थायां न पुरुषार्थो हेतुः । नालिङ्गावस्थायामादौ पुरुषार्थता कारणं भवतीति । न तस्याः पुरुषार्थता कारणं भवति ।

नासौ पुरुषार्थकृतेति नित्याख्यायते । त्रयाणां त्ववस्थाविशेषाणामादौ पुरुषार्थता कारणं भवति । स चार्थो हेतुर्निमित्तं कारणं भवतीत्यनित्याख्यायते । गुणास्तु सर्वधर्मानुपातिनो न प्रत्यस्तमयन्ते नोपजायन्ते । व्यक्तिभिरेवातीतानागतव्ययागमवतीभिर्गुणान्वयिनीभिरुपजननापायधर्मका इव प्रत्यवभासन्ते । यथा देवदत्तो दरिद्राति । कस्मात्? यतोऽस्य म्रियन्ते गाव इति । गवामेव मरणात्तस्य दरिद्रता न स्वरूपहानादिति समः समाधिः ।

लिङ्गमात्रमलिङ्गस्य प्रत्यासन्नं, तत्र तत्संसृष्टं विविच्यते क्रमानतिवृत्तेः । तथा षडविशेषा लिङ्गमात्रे संसृष्टा विविच्यन्ते । परिणामक्रमनियमात। तथा तेष्वविशेषेषु भूतेन्द्रियाणि संसृष्टानि विविच्यन्ते । तथा चोक्तं पुरस्तात। न विशेषेभ्यः परं तत्त्वान्तरमस्तीति विशेषाणां नास्ति तत्त्वान्तरपरिणामः । तेषां तु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्यायिष्यन्ते ॥१९॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — आकाश, वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी भूत, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध तन्मात्रों के अविशेषों के विशेष हैं। श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घ्राण बुद्धि इन्द्रिय हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ कर्म इन्द्रिय हैं। ग्यारहवाँ मन सर्वार्थ है। ये अस्मिता लक्षण अविशेष के विशेष हैं। यह गुणों का षोडश विशेष परिणाम है। षट् अविशेषाः। छह अविशेष हैं।

तत् यथा शब्द तन्मात्रम् स्पर्श तन्मात्रम् रूप तन्मात्रम् रस तन्मात्रम् गन्ध तन्मात्रम् च इति एक द्वि त्रि चतुः पञ्च लक्षणाः शब्द आदयः पञ्च अविशेषाः षष्ठः च अविशेषः अस्मिता मात्रः इति। अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध तन्मात्र, एक, दो, तीन, चार, पाँच लक्षण वाले शब्द आदि पाँच अविशेष, और छठा अविशेष अस्मिता मात्र है। एते सत्ता मात्रस्य आत्मनः महतः षट् अविशेष परिणामाः। ये सत्ता मात्र के महत् आत्मा के छह अविशेष परिणाम हैं।

लिङ्ग मात्रम् महत् तत्त्वम् तस्मिन् एते सत्ता मात्रे महति आत्मनि अवस्थाय विवृद्धि काष्ठाम् अनुभवन्ति। परम अविशेषों से लिंग मात्र महत् तत्त्व में ये सत्ता मात्र के महत् आत्मा में अवस्थित होकर विवृद्धि की काष्ठा अनुभव करते हैं। प्रतिसंमृज्यमानाः च तस्मिन् एव सत्ता मात्रे महति आत्मनि अवस्थाय यत् तत् निःसत्ता असत्तम् निःसत् असत् निरसत् अव्यक्तम् अलिङ्गम् प्रधानम् तत् प्रतियन्ति इति।

प्रतिसंमृज्यमान ये सत्ता मात्र के महत् आत्मा में अवस्थित होकर निःसत्ता असत्, निःसत् असत्, निरसत्, अव्यक्त, अलिंग प्रधान की ओर जाते हैं। एषः तेषाम् लिङ्ग मात्रः परिणामः। यह उनका लिंग मात्र परिणाम है। निःसत्ता असत्तम् च अलिङ्ग परिणामः इति। निःसत्ता असत् अलिंग परिणाम है। अलिङ्ग अवस्थायाम् न पुरुष अर्थः हेतुः। अलिंग अवस्था में पुरुषार्थ हेतु नहीं है। न अलिङ्ग अवस्थायाम् आदौ पुरुष अर्थता कारणम् भवति इति। अलिंग अवस्था में आदौ पुरुषार्थता कारण नहीं होती।

न तस्याः पुरुष अर्थता कारणम् भवति। उसकी पुरुषार्थता कारण नहीं होती। न असौ पुरुष अर्थ कृता इति नित्या आख्यायते। वह पुरुषार्थ के लिए कृत नहीं, इसलिए नित्य आख्यायी जाती है। त्रयाणाम् तु अवस्था विशेषाणाम् आदौ पुरुष अर्थता कारणम् भवति। तीन अवस्था विशेषों में आदौ पुरुषार्थता कारण होती है। सः च अर्थः हेतुः निमित्तम् कारणम् भवति इति अनित्या आख्यायते। वह अर्थ हेतु, निमित्त, कारण होने से अनित्य आख्यायी जाती है। गुणाः तु सर्व धर्म अनुपातिनः न प्रत्यस्तमयन्ति न उपजायन्ते।

गुण सर्व धर्मों के अनुपाती हैं, न प्रत्यस्तमित होते हैं, न उत्पन्न होते हैं। व्यक्तिभिः एव अतीत अनागत व्यय आगमवतीभिः गुणान्वयिनीभिः उपजनन अपाय धर्मकाः इव प्रत्यवभासन्ते। व्यक्तियों से अतीत, अनागत, व्यय, और आगमवती, गुणान्वयिनी, उपजनन और अपाय धर्मक जैसे प्रत्यवभासित होते हैं। जैसे देवदत्त दरिद्र होता है। कस्मात्। क्यों? यतः अस्य म्रियन्ते गावः इति। हैं। समः समाधिः। गायों के मरण से उसकी दरिद्रता है, स्वरूप हानि से नहीं, यह सम समाधि है। तत् संसृष्टम् विविच्यते क्रम अनतिवृत्तेः।

लिंग मात्र अलिंग का प्रत्यासन्न है, वहाँ वह संसृष्ट क्रम के अनतिवृत्ति से विवेचित होता है। तथा षट् अविशेषाः लिङ्ग मात्रे संसृष्टाः विविच्यन्ते। वैसे ही छह अविशेष लिंग मात्र में संसृष्ट विवेचित होते हैं। परिणाम क्रम नियमात्। परिणाम क्रम के नियम से। तथा तेषु अविशेषेषु भूत इन्द्रियाणि संसृष्टानि विविच्यन्ते। वैसे ही उन अविशेषों में भूत और इन्द्रिय संसृष्ट विवेचित होते हैं। तथा च उक्तम् पुरस्तात्। ऐसा पहले कहा गया है।

न विशेषेभ्यः परम् तत्त्व अन्तरम् अस्ति इति विशेषाणाम् न अस्ति तत्त्व अन्तर परिणामः। विशेषों से पर तत्त्व अन्तर नहीं है, इसलिए विशेषों का तत्त्व अन्तर परिणाम नहीं है। तेषाम् तु धर्म लक्षण अवस्था परिणामाः व्याख्यायिष्यन्ते। उनके धर्म, लक्षण, और अवस्था परिणाम व्याख्यायित होंगे।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सत्त्व, रजस् और तमस् गुणों की चार अवस्थाएँ हैं जिन्हें विशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग कहा जाता है। विशेषों की संख्या सोलह है जिसमें पाँच महाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय शामिल हैं जो तीनों गुणों के विशेष परिणाम हैं। अविशेष छः हैं जिनमें पाँच तन्मात्राएँ और एक अहंकार शामिल हैं क्योंकि इनमें शान्त, घोर और मूढ़ रूप विशेष धर्म नहीं रहते।

लिङ्गमात्र महत्तत्त्व है जो विशेष-अविशेष से रहित केवल चिह्नमात्र है और अलिङ्ग मूल प्रकृति अर्थात् गुणों की साम्यावस्था है। इन चारों अवस्थाओं में से पहली तीन विषम परिणाम वाली हैं जबकि चौथी अलिङ्ग अवस्था गुणों की साम्य परिणाम वाली होती है जिसे प्रकृति, प्रधान, अव्यक्त और माया भी कहते हैं। उत्पत्ति का क्रम अलिङ्ग से लिङ्ग, फिर अविशेष और अंततः विशेष की ओर होता है क्योंकि विशेषों का कोई नया तत्त्वान्तर परिणाम नहीं होता।

गीता में गुणों को प्रकृति से उत्पन्न बताया गया है क्योंकि वहाँ गुणों की साम्य अवस्था को ही प्रकृति बताया गया है जैसा कि वार्षगण्याचार्य ने कहा है कि गुणों का असली रूप साम्य परिणाम है जो दृष्टिगोचर नहीं होता। सांख्यसूत्र में भी सत्त्व, रजस् और तमस की साम्य अवस्था को ही प्रकृति बताया गया है। गुणपर्वाणि का अर्थ इन चारों विभागों में गुणों के विभक्त होने से है जहाँ अलिङ्ग सूक्ष्म है और विशेष सबसे अधिक स्थूल हैं।

सांख्य और योग में जड़ तत्त्व को तीन भागों में बाँटा गया है जिसमें अलिङ्ग केवल प्रकृति है, महत्तत्त्व और अहंकार प्रकृति-विकृति हैं और सोलह विशेष विकृति-अप्रकृति हैं। गुणों का स्वरूप कभी नष्ट नहीं होता बल्कि उनमें आरोप होने वाले परिणाम ही उत्पन्न और विनाशशील होते हैं। सत्कार्यवाद के सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक परिणाम अपनी उत्पत्ति से पूर्व सूक्ष्म रूप से स्थित होता है और सोलह विशेषों से आगे कोई नया तत्त्व नहीं बनता।

2.20 · साधनपाद सूत्र २०

सूत्र २.२०

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥ २.२० ॥

साधनपाद · सूत्र २.२०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 354

अर्थ — द्रष्टा जो देखनेकी शक्तिमात्र है , निर्विकार होता हुआ भी चित्तकी वृत्तियोंके अनुसार देखनेवाला है ।

व्यासभाष्य

दृशिमात्र इति दृक्शक्तिरेव विशेषणापरामृष्टेत्यर्थः । स पुरुषो बुद्धेः प्रतिसंवेदी । स बुद्धेर्न सरूपो नात्यन्तं विरूप इति । न तावत्सरूपः । कस्मात्? ज्ञाताज्ञातविषयत्वात्परिणामिनी हि बुद्धिः । तस्याश्च विषयो गवादिर्घटादिर्वा ज्ञातश्चाज्ञातश्चेति पर्णामित्वं दर्शयति । सदाज्ञातविषयत्वं तु पुरुषस्यापरिणामित्वं परिदीपयति । कस्मात्? न हि बुद्धिश्च नाम पुरुषविषयश्च स्याद्गृहीता चागृहीता चेति सिद्धं पुरुषस्य सदाज्ञातविषयत्वं ततश्चापरिणामित्वमिति । किं च, परार्था बुद्धिः संहत्यकारित्वात। स्वार्थः पुरुष इति । तथा सर्वार्थाध्यवसायकत्वात्त्रिगुणा बुद्धिस्त्रिगुणत्वादचेतनेति । गुणानां तूपद्रष्टा पुरुष इति । अतो न सरूपः । अस्तु तर्हि विरूप इति । नात्यन्तं विरूपः । कस्मात्? शुद्धोऽप्यसौ प्रत्ययानुपश्यः । यतः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति । तमनुपश्यन्नतदात्मापि तदात्मक इव प्रत्यवभासते । तथा चोक्तं—अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसङ्क्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसङ्क्रान्तेव तद्वृत्तमनुपतति । तस्याश्च प्राप्तचैतन्योपग्रहरूपाया बुद्धिवृत्तेरनुकारमात्रतया बुद्धिवृत्त्यविशिष्टा हि ज्ञानवृत्तिरित्याख्यायते ॥२०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — व्याख्यातम् दृश्यम्। दृश्य व्याख्यात है। अथ द्रष्टुः स्वरूप अवधारण अर्थम् इदम् आरभ्यते। अब द्रष्टा के स्वरूप अवधारण के लिए यह आरम्भ किया जाता है। द्रष्टा दृशि मात्रः शुद्धः अपि प्रत्यय अनुपश्यः। द्रष्टा दृशि मात्र, शुद्ध होने पर भी प्रत्यय का अनुपश्य है। दृशि मात्र का अर्थ दृक् शक्ति ही विशेषणा से अपरामृष्ट है। वह पुरुष बुद्धि का प्रतिसंवेदी है। वह बुद्धि का न सरूप है, न अत्यंत विरूप। वह सरूप नहीं है। कस्मात्। क्यों?

ज्ञाता अज्ञात विषयत्वात् परिणामिनी हि बुद्धिः। क्योंकि बुद्धि परिणामिनी है, ज्ञात और अज्ञात का विषय है। तस्याः च विषयः गौ आदि घट आदि वा ज्ञातः च अज्ञातः च इति परिणामित्वम् दर्शयति। उसका विषय गौ, घट आदि, ज्ञात और अज्ञात, परिणामित्व दर्शाता है। पुरुषस्य अपरिणामित्वम् परिदीपयति। सदा अज्ञात विषयत्व पुरुष का अपरिणामित्व दर्शाता है। कस्मात्। च नाम पुरुष विषयः च स्यात् गृहीता च अगृहीता च इति। बुद्धि पुरुष का विषय हो, गृहीता और अगृहीता हो, ऐसा नहीं।

सिद्धम् पुरुषस्य सदा अज्ञात विषयत्वम् ततः च अपरिणामित्वम् इति। पुरुष का सदा अज्ञात विषयत्व और अपरिणामित्व सिद्ध है। किम् च पर अर्था बुद्धिः संहत्य कारित्वात्। बुद्धि परार्थ है, संहत्य कारित्व से। स्व अर्थः पुरुषः इति। पुरुष स्वार्थ है। कत्वात् त्रिगुणा बुद्धिः त्रिगुणत्वात् अचेतना इति। सर्वार्थ अध्यवसाय कत्व से त्रिगुणा बुद्धि त्रिगुणत्व से अचेतन है। पुरुषः इति। गुणों का उपद्रष्टा पुरुष है। अतः न सरूपः। इसलिए वह सरूप नहीं। अस्तु तर्हि विरूपः इति। तो वह विरूप हो।

न अत्यन्तम् विरूपः। वह अत्यंत विरूप नहीं। कस्मात्। क्यों? शुद्धः अपि असौ प्रत्यय अनुपश्यः। क्योंकि वह शुद्ध होने पर भी प्रत्यय का अनुपश्य है। यतः प्रत्ययम् बौद्धम् अनुपश्यति। क्योंकि वह बौद्ध प्रत्यय को अनुपश्य करता है। तम् अनुपश्यन् अतत् आत्मा अपि तत् आत्मकः इव प्रत्यवभासते। उसे अनुपश्य कर, अतद् आत्मा होने पर भी तद् आत्मक जैसा प्रत्यवभासित होता है। तथा च उक्तम् अपरिणामिनी हि भोक्तृ शक्तिः अप्रतिसङ्क्रमा च परिणामिनि अर्थे प्रतिसङ्क्रान्ता इव तत् वृत्तिम् अनुपतति।

कहा गया है—भोक्तृ शक्ति अपरिणामिनी, अप्रतिसंक्रमा, परिणामिनी अर्थ में प्रतिसंक्रान्त जैसी उसकी वृत्ति का अनुपतन करती है। तस्याः च प्राप्त चैतन्य उपग्रह रूपाया बुद्धि वृत्तेः अनुकार मात्र तया बुद्धि वृत्ति अविशिष्टा हि ज्ञान वृत्तिः इति आख्यायते। उस प्राप्त चैतन्य उपग्रह रूपा बुद्धि वृत्ति के अनुकार मात्र से बुद्धि वृत्ति अविशिष्ट ज्ञान वृत्ति आख्यायी जाती है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — दृशिमात्र का अर्थ है देखने वाली शक्ति जो विशेषणरहित केवल ज्ञानमात्र है, जिसमें कोई परिणाम नहीं होता। उपनिषद् के अनुसार जैसे दीपक छोटा हो या बड़ा प्रकाशरूप ही होता है, वैसे ही सभी प्राणियों में आत्मा को ज्ञानरूप जानो। आत्मा का ज्ञान उसका धर्म नहीं है और न ही वह किसी गुण से युक्त है, बल्कि वह नित्य, शिव और ज्ञानस्वरूप है। प्रत्ययानुपश्य का अर्थ है चित्त की वृत्तियों के अनुसार देखने वाला, जहाँ पुरुष अपने ज्ञानरूपी प्रकाश से चित्त को प्रकाशित करता है। चित्त में ज्ञान, सुख और मोह आदि वृत्तियाँ परिणत होती रहती हैं, परंतु यह परिणाम आत्मा में नहीं होता क्योंकि वह अपरिणामी ज्ञानस्वरूप है। आत्मा का वास्तविक दर्शन विवेकख्याति द्वारा चित्त को अपने से भिन्न देखना और असमप्रज्ञात-समाधि द्वारा स्वरूपस्थिति प्राप्त करना है। चित्त की अन्य वृत्तियों को आसक्ति के साथ देखना अदर्शन है क्योंकि यह अविद्या से होता है और इससे यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं होता। इस सूत्र की व्याख्या स्पष्ट शब्दों में की गई है और इसकी पुष्टि हेतु व्यासभाष्य तथा भोजवृत्ति का भाषार्थ भी दिया गया है।

2.21 · साधनपाद सूत्र २१

सूत्र २.२१

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २.२१ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 361

शब्दार्थ — तत् · अर्थः · एव · दृश्यस्य · आत्मा

अर्थ — उस पुरुषके लिये ही ( यह सारा ) दृश्यका स्वरूप है ।

व्यासभाष्य

दृशिरूपस्य पुरुषस्य कर्मरूपतामापन्नं दृश्यमिति तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा भवति ॥२१॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — आत्मा। दृश्य का आत्मा केवल तदर्थ है। दृशि रूप पुरुष के लिए कर्म रूपता प्राप्त दृश्य, इसलिए दृश्य का आत्मा तदर्थ है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — ऊपर कहे हुए लक्षणानुसार दृश्यका जो स्वरूप है वह पुरुषके प्रयोजनके हेतु है ; क्योंकि प्रकृति अपने किसी भी प्रयोजनकी अपेक्षा न करके केवल पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये प्रवृत्त हो है । इसीको निम्न कारिका स्पष्ट करती है- इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्तः । प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरम्भः ।। इस प्रकार प्रकृतिसे किया हुआ महत्से लेकर विशेषभूतोंतकका आरम्भ प्रत्येक पुरुषके मोक्षके लिये स्वार्थकी नाईं परार्थ है । वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य । पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ।। ५७ ।।

2.22 · साधनपाद सूत्र २२

सूत्र २.२२

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २.२२ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 362

अर्थ — जिसका प्रयोजन सिद्ध हो गया है उसके लिये यह दृश्य नष्ट हुआ भी नष्ट नहीं होता है ; क्योंकि वह दूसरे पुरुषोंके साथ साझेकी वस्तु है ।

व्यासभाष्य

कृतार्थमेकं पुरुषं प्रति दृश्यं नष्टमपि नाशं प्राप्तमप्यनष्टं तदन्यपुरुषसाधारणत्वात। कुशलं पुरुषं प्रति नाशं प्राप्तमप्यकुशलान्पुरुषान्प्रति न कृतार्थमिति तेषां दृशेः कर्मविषयतामापन्नं, लभत एव पररूपेणात्मरूपमिति । अतश्च दृग्दृशशक्त्योर्नित्यत्वादनादिः संयोगो व्याख्यात इति । तथा चोक्तं—धर्मिणामनादिसंयोगाद्धर्ममात्राणामप्यनादिः संयोगः इति ॥२२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — तत् स्वरूपम् तु पर रूपेण प्रतिलब्ध आत्मकम् भोग अपवर्ग अर्थतायाम् कृतायाम् पुरुषेण न दृश्यति इति। उसका स्वरूप पर रूप से प्रतिलब्ध आत्मक, भोग और अपवर्ग अर्थता पूरी होने पर पुरुष द्वारा नहीं देखा जाता। स्वरूप हानात् अस्य नाशः प्राप्तः। स्वरूप हानि से इसका नाश प्राप्त है। न तु विनश्यति। किन्तु यह विनष्ट नहीं होता। कस्मात्। अन्य साधारणत्वात्। कृतार्थ पुरुष के लिए नष्ट होने पर भी अनष्ट है, अन्य के लिए साधारणत्व से।

कृत अर्थम् एकम् पुरुषम् प्रति दृश्यम् नष्टम् अपि नाशम् प्राप्तम् अपि अनष्टम् तत् अन्य पुरुष साधारणत्वात्। एक कृतार्थ पुरुष के लिए दृश्य नष्ट होने पर भी अन्य पुरुषों के लिए साधारण होने से अनष्ट है। कुशलम् पुरुषम् प्रति नाशम् प्राप्तम् अपि अकुशलान् पुरुषान् प्रति न कृत अर्थम् इति तेषाम् दृशेः कर्म विषयताम् आपन्नम् लभत एव पर रूपेण आत्म रूपम् इति।

कुशल पुरुष के लिए नाश प्राप्त होने पर भी अकुशल पुरुषों के लिए कृतार्थ नहीं, इसलिए उनकी दृशि के लिए कर्म विषयता प्राप्त कर पर रूप से आत्म रूप प्राप्त करता है। अतः च दृक् दृश शक्त्योः नित्यत्वात् अनादिः संयोगः व्याख्यातः इति। इससे दृक् और दृश शक्तियों के नित्यत्व से अनादि संयोग व्याख्यात है। तथा च उक्तम् धर्मिणाम् अनादि संयोगात् धर्म मात्राणाम् अपि अनादिः संयोगः इति। कहा गया है—धर्मियों का अनादि संयोग होने से धर्म मात्र का भी अनादि संयोग है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — इस समस्त दृश्य की रचना सभी पुरुषों के भोग और अपवर्ग के लिए है, न कि किसी विशेष पुरुष के लिए। यहाँ पुरुष शब्द का अर्थ जीवात्मा से है और जब गुणों द्वारा निर्मित चित्त का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, तब उसे मुक्ति कहा जाता है। चित्त पुरुष का दृश्यरूप पश्चात् है जो अन्य सब दृश्यों को पुरुष को बोध कराने का साधन है। एक पुरुष के मुक्त होने से सभी मुक्त नहीं हो जाते क्योंकि यह दृश्य अन्यों के प्रयोजन के लिए बना रहता है।

सांख्य-सूत्र के अनुसार 'नात्यन्तोच्छेदः' और श्रुति के अनुसार "पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते" के आधार पर यह दृश्य अपने स्वरूप से सदा रहेगा। व्यासभाष्य के अनुसार, एक कुशल पुरुष के प्रति यह दृश्य नष्ट होता है लेकिन अन्य अकुशल पुरुषों के लिए यह अनष्ट रहता है क्योंकि यह चेतनरूप आत्मा द्वारा लब्ध सत्तावाला है। पञ्चशिखाचार्य के अनुसार गुणों के संयोग के अनादि होने से धर्मभूत महत्तत्त्व का संयोग भी अनादि है।

भोजवृत्ति के अनुसार, यद्यपि विवेकख्यातिपर्यंत भोग-संपादन करने से यह दृश्य कृतार्थ पुरुष के प्रति नष्ट होता है, तथापि अन्यों के लिए यह व्यापाररूप से रहता है। इस प्रकार सम्पूर्ण भोक्ताओं के साधारण होने से प्रकृतिकी कृतप्रयोजनता नहीं होती और न ही उसका कभी नाश होता है।

2.23 · साधनपाद सूत्र २३

सूत्र २.२३

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥ २.२३ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 363

अर्थ — स्व - शक्ति और स्वामी- शक्तिसंज्ञक स्वरूपकी उपलब्धिका शक्तिके स्वरूपकी उपलब्धि ( दृश्य - द्रष्टृका स्व - स्वामिभाव ) संयोग है । अर्थात् कारण स्व - शक्ति है । और स्वामी- ( दृश्य - द्रष्टृके स्व - स्वामिभाव ) संयोगके वियोगका पुरुष इसका स्वामी है ।

व्यासभाष्य

पुरुषः स्वामी दृश्येन स्वेन दर्शनार्थं संयुक्तः । तस्माद्दृश्यस्योपलब्धिर्या स भोगः । या तु द्रष्टुः स्वरूपोपलब्धिः सोऽपवर्गः । दर्शनकार्यावसानः संयोग इति दर्शनं वियोगस्य कारणमुक्तम् । दर्शनमदर्शनस्य प्रतिद्वद्न्वीत्यदर्शनं संयोगनिमित्तमुक्तम् । नात्र दर्शनं मोक्षकारणम् । अदर्शनाभावादेव बन्धाभावः, स मोक्ष इति । दर्शनस्य भावे बन्धकृतस्यादर्शनस्य नाश इत्यतो दर्शनज्ञानं कैवल्यकारणमुक्तम् । किं चेदमदर्शनं नाम ? किं गुणानामधिकारः ?

आहो स्विद्दृशिरूपस्य स्वामिनो दर्शितविषयस्य प्रधानचित्तस्यानुत्पादः ? स्वस्मिन्दृश्ये विद्यमाने यो दर्शनाभावः, किमर्थता गुणानां ? अथोऽविद्या स्वचित्तेन सह निरुद्धा स्वचित्तस्योत्पत्तिबीजं ? किं स्थितिसंस्कारक्षये गतिसंस्काराभिव्यक्तिः ? यत्रेदमुक्तं—प्रधानं स्थित्यैव वर्तमानं विकाराकरणादप्रधानं स्यात। तथा गत्यैव वर्तमानं विकारनित्यत्वादप्रधानं स्यात। उभयथा चास्य प्रवृत्तिः प्रधानव्यवहारं लभते नान्यथा । कारणान्तरेष्वपि कल्पितेष्वेव समानश्चर्चः । दर्शनशक्तिरेवादर्शनमित्येके ।

प्रधानस्यात्मख्यापनार्था प्रवृत्तिरिति श्रुतेः । सर्वबोध्यबोधसमर्थः प्राक्प्रवृत्तेः पुरुषो न पश्यति । सर्वकार्यकरणसमर्थं दृश्यं तदा न दृश्यत इति । उभयस्याप्यदर्शनं धर्म इत्येके । तत्रेदं दर्शन्यस्य स्वात्मभूतमपि दृश्यप्रत्ययापेक्षं पुरुषधर्मत्वेनेवादर्शनमवभासते । दर्शनज्ञानमेवादर्शनमिति केचिदभिदधति । इत्येते शास्त्रगता विकल्पाः । तत्र विकल्पबहुत्वमेतत्सर्वपुरुषाणां गुणानां संयोगे साधारणविषयम् ॥२३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — संयोग स्वरूप अभिधित्सया इदम् सूत्रम् प्रववृते। संयोग स्वरूप की अभिधित्सा से यह सूत्र प्रवृत्त हुआ। स्व स्वामि शक्त्योः स्वरूप उपलब्धि हेतुः संयोगः। स्व और स्वामी शक्तियों की स्वरूप उपलब्धि का हेतु संयोग है। पुरुष स्वामी अपने दृश्य के साथ दर्शन अर्थ संयुक्त है। इसलिए दृश्य की उपलब्धि भोग है। द्रष्टा की स्वरूप उपलब्धि अपवर्ग है। दर्शन कार्य का अवसान संयोग है। दर्शन वियोग का कारण कहा गया है।

अदर्शन का प्रतिद्वंद्वी है, इसलिए अदर्शन संयोग का निमित्त है। यहाँ दर्शन मोक्ष का कारण नहीं। अदर्शन के अभाव से बंध का अभाव, वही मोक्ष है। दर्शन के भाव से बंध कृत अदर्शन का नाश, इसलिए दर्शन ज्ञान कैवल्य का कारण कहा गया है। यह अदर्शन क्या है? किम् गुणानाम् अधिकारः। क्या यह गुणों का अधिकार है? आहो स्वित् दृशि रूपस्य स्वामिनः दर्शित विषयस्य प्रधान चित्तस्य अनुत्पादः। या दृशि रूप स्वामी के दर्शित विषय, प्रधान चित्त का अनुत्पाद?

स्वस्मिन् दृश्ये विद्यमाने यः दर्शन अभावः किम् अर्थता गुणानाम्। स्व में दृश्य विद्यमान होने पर दर्शन का अभाव, गुणों की अर्थता क्या? अथ उ अविद्या स्व चित्तेन सह निरुद्धा स्व चित्तस्य उत्पत्ति बीजम्। या अविद्या स्व चित्त के साथ निरुद्ध, स्व चित्त का उत्पत्ति बीज? किम् स्थिति संस्कार क्षये गति संस्कार अभिव्यक्तिः। क्या स्थिति संस्कार क्षय में गति संस्कार की अभिव्यक्ति? यत्र इदम् उक्तम् प्रधानम् स्थिति एव वर्तमानम् विकार अकरणात् अप्रधानम् स्यात्।

जहाँ कहा गया—प्रधान स्थिति में वर्तमान, विकार न करने से अप्रधान होगा। तथा गति एव वर्तमानम् विकार नित्यत्वात् अप्रधानम् स्यात्। वैसे ही गति में वर्तमान, विकार नित्यत्व से अप्रधान होगा। उभयथा च अस्य प्रवृत्तिः प्रधान व्यवहारम् लभते न अन्यथा। दोनों प्रकार से इसकी प्रवृत्ति प्रधान व्यवहार प्राप्त करती है, अन्यथा नहीं। कारण अन्तरेषु अपि कल्पितेषु एव समानः चर्चः। अन्य कल्पित कारणों में भी समान चर्चा है। दर्शन शक्तिः एव अदर्शनम् इति एके। कुछ कहते हैं—दर्शन शक्ति ही अदर्शन है।

प्रधानस्य आत्म ख्यापन अर्था प्रवृत्तिः इति श्रुतेः। श्रुति से—प्रधान की आत्म ख्यापन अर्थ प्रवृत्ति। सर्व बोध्य बोध समर्थः प्राक् प्रवृत्तेः पुरुषः न पश्यति। सर्व बोध्य बोध समर्थ पुरुष प्रवृत्ति से पूर्व नहीं देखता। सर्व कार्य करण समर्थम् दृश्यम् तदा न दृश्यति इति। सर्व कार्य करण समर्थ दृश्य तब नहीं देखा जाता। उभयस्य अपि अदर्शनम् धर्मः इति एके। कुछ कहते हैं—दोनों का अदर्शन धर्म है। धर्मत्वेन एव अदर्शनम् अवभासते।

वहाँ दर्शन्य का स्व आत्म भूत, दृश्य प्रत्यय अपेक्षित, पुरुष धर्मत्व से अदर्शन अवभासित होता है। दर्शन ज्ञानम् एव अदर्शनम् इति केचित् अभिदधति। कुछ कहते हैं—दर्शन ज्ञान ही अदर्शन है। इति एते शास्त्र गताः विकल्पाः। ये शास्त्रगत विकल्प हैं। तत्र विकल्प बहुत्वम् एतत् सर्व पुरुषाणाम् गुणानाम् संयोगे साधारण विषयम्। इन विकल्पों की बहुत्वता सभी पुरुषों और गुणों के संयोग का साधारण विषय है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — चित्त और समस्त जड़ दृश्य स्व (मिल्कियत) हैं। चेतन शब्द का अर्थ स्वभाव या स्वरूप है, जहाँ दृश्य ज्ञेय है और द्रष्टा ज्ञाता है। दृश्य और द्रष्टा दोनों नित्य और व्यापक हैं, जिनका स्वरूप से भिन्न कोई संयोग नहीं हो सकता। दृश्य में भोग्यत्व और द्रष्टामे भोक्तृत्व का अनादिकाल से चला आ रहा संयोग ही इस जगत की स्थिति है। इस संयोग को हटाने हेतु स्वशक्ति और स्वामिशक्ति के स्वरूप की उपलब्धि की जाती है। दृश्य स्वरूप का विवेकपूर्ण साक्षात् करना भोग है और द्रष्टा के स्वरूप की उपलब्धि अर्थात् पुरुष-दर्शन या स्वरूप-स्थिति अपवर्ग है। गीता में द्रष्टा को क्षेत्रज्ञ और दृश्य को क्षेत्र तथा सांख्यकारिकामें दृश्यरूप जड़ प्रकृति को अन्धे और द्रष्टारूप निष्क्रिय पुरुष को लँगड़े की उपमा देकर इनके परस्पर के संयोग को दिखाया गया है। गीता के १३वें अध्याय के २६वें श्लोक (यावत्संजायते...) के अनुसार सम्पूर्ण जगत् की स्थिति प्रकृति और पुरुष के परस्पर के सम्बन्ध से ही है।

2.24 · साधनपाद सूत्र २४

सूत्र २.२४

तस्य हेतुरविद्या ॥ २.२४ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 370

शब्दार्थ — यः · तु · प्रत्यक् · चेतनस्य · स्व

अर्थ — बुद्धि संयोगः। प्रत्यक् चेतन का स्व बुद्धि संयोग। तस्य हेतुः अविद्या। उसका हेतु अविद्या है। विपर्यय ज्ञान वासना इति अर्थः। इसका अर्थ विपर्यय ज्ञान वासना है।

व्यासभाष्य

विपर्ययज्ञानवासनेत्यर्थः । विपर्ययज्ञानवासनावासिता च न कार्यनिष्ठां पुरुषख्यातिं बुद्धिः प्राप्नोति । साधिकारा पुनरावर्तते । सा तु पुरुषख्यातिपर्यवसानां कार्यनिष्ठां प्राप्नोति । चरिताधिकारा निवृत्तादर्शना बन्धकरणाभावान्न पुनरावर्तते । अत्र कश्चित्षण्डकोपाख्यानेनोद्घाटयति—मुग्धया भार्ययाभिधीयते षण्डकः—आर्यपुत्र ! अपत्यवती मे भगिनी किमर्थं नाहमिति ? स तामाह—मृतस्तेऽहमपत्यमुत्पादयिष्यामीति । तथेदं विद्यमानं ज्ञानं चित्तनिवृत्तिं न करोति विनष्टं करिष्यतीति का प्रत्याशा ? तत्राचार्यदेशीयो वक्ति—ननु बुद्धिनिवृत्तिरेव मोक्षः । अदर्शनकारणाभावाद्बुद्धिनिवृत्तिः । तच्चादर्शनं बन्धकारणं दर्शनान्निवर्तते । तत्र चित्तनिवृत्तिरेव मोक्षः । किमर्थमस्थान एवास्य मतिविभ्रमः ? ॥२४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — यः तु प्रत्यक् चेतनस्य स्व बुद्धि संयोगः। प्रत्यक् चेतन का स्व बुद्धि संयोग। तस्य हेतुः अविद्या। उसका हेतु अविद्या है। है। ख्याति नहीं पाती। स अधिकारा पुनः आवर्तते। है। वह पुरुष ख्याति में पर्यवसान कार्य निष्ठा प्राप्त करती है। चरित अधिकारा, निवृत्त अदर्शना, बंध कारण के अभाव से पुनः आवृत्त नहीं होती। यहाँ कोई षण्डक उपाख्यान से उद्घाटित करता है। है—आर्य पुत्र, मेरी बहन अपत्यवती है, मैं क्यों नहीं? सः ताम् आह मृतः ते अहम् अपत्यम् उत्पादयिष्यामि इति। उत्पन्न करूँगा। तथा इदम् विद्यमानम् ज्ञानम् चित्त निवृत्तिम् न करोति विनष्टम् करिष्यति इति का प्रत्याशा। वैसे ही विद्यमान ज्ञान चित्त निवृत्ति नहीं करता, विनष्ट करेगा, यह क्या प्रत्याशा? तत्र आचार्य देशीयः वक्ति ननु बुद्धि निवृत्तिः एव मोक्षः। आचार्य देशीय कहता है—बुद्धि निवृत्ति ही मोक्ष है। अदर्शन कारण अभावात् बुद्धि निवृत्तिः। अदर्शन कारण के अभाव से बुद्धि निवृत्ति। तत् च अदर्शनम् बन्ध कारणम् दर्शनात् निवर्तते। वह अदर्शन बंध कारण दर्शन से निवृत्त होता है। तत्र चित्त निवृत्तिः एव मोक्षः। वहाँ चित्त निवृत्ति ही मोक्ष है। किम् अर्थम् अस्थाने एव अस्य मति विभ्रमः। इस मति विभ्रम का क्या अर्थ?

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — अदर्शनरूपी संयोगका कारण अविद्या अर्थात् मिथ्या - ज्ञान है ; जिससे आत्मा और विवेक न होनेसे अभिन्नता प्रतीत होती है ; और चित्तकी सुख , दुःख , मोहरूपी वृत्तियोंका पुरुषमें अध्यारोप चित्तमें है । तस्मात् तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् ।

2.25 · साधनपाद सूत्र २५

सूत्र २.२५

तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम् ॥ २.२५ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 373

अर्थ — उसके ( अविद्याके ) अभावसे ( अदर्शनरूपी ) संयोगका अभाव ' हान ' है । वह चिति - शक्तिका कैवल्य है ।

व्यासभाष्य

तस्यादर्शनस्याभावाद्बुद्धिपुरुषसंयोगाभाव आत्यन्तिको बन्धनोपरम इत्यर्थः । एतद्धानम् । तद्दृशेः कैवल्यं पुरुषस्यामिश्रीभावः पुनरसंयोगो गुणैरित्यर्थः । दुःखकारणनिवृत्तौ दुःखोपरमो हानम् । तदा स्वरूपप्रतिष्ठः पुरुष इत्युक्तम् ॥२५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — हेयम् दुःखम्। दुख हेय है। हेय कारणम् च संयोग आख्यम् स निमित्तम् उक्तम्। हेय का कारण संयोग नामक सनिमित्त कहा गया है। अतः परम् हानम् वक्तव्यम्। अब हान कहा जाना चाहिए। तत् अभावात् संयोग अभावः हानम्। उसके अभाव से संयोग का अभाव हान है। कैवल्यम्। वह दृशि का कैवल्य है। अदर्शन के अभाव से बुद्धि और पुरुष संयोग का अभाव, आत्यंतिक बंधन का उपरम है। यह हान है। वह दृशि का कैवल्य, पुरुष का अमिश्री भाव, गुणों से पुनः असंयोग है। दुख कारण की निवृत्ति में दुख का उपरम हान है। तब स्वरूप में प्रतिष्ठित पुरुष कहा गया है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — अविद्या का विरोधी यथार्थ ज्ञान से विच्छेद होने पर अविद्या के कार्य यानी संयोग के अभाव को ही 'हान' कहा जाता है। निराकार वस्तु होने के कारण पुरुष का तुल्य छोड़ना नहीं होता, किंतु अज्ञान से जन्य संयोग विवेकख्यातिके उदय होने पर अपने आप निवृत्त हो जाता है। अदर्शन सूत्र के अनुसार इस अविद्या के नाश से ही 'हान' होती है, जिसका अर्थ है कि दुःख का अपने कारण सहित स्वयं नाश हो जाना। व्यासभाष्य के भाषानुवाद के अनुसार इस अदर्शन के पुरुष सङ्गका अभाव ही अत्यन्त दुःख की निवृत्ति है और यही 'हान' कहलाती है। यह जो संयोग का नाश है, वही नित्य केवली पुरुष का कैवल्य कहलाता है। भोजवृत्तिका के भाषानुवाद के अनुसार अविद्या के अभाव होने पर उसके कार्य संयोग का भी जो अभाव होता है, वही 'हान' कहलाता है। इस प्रकार दुःख के कारण की निवृत्ति होने पर परम हान होती है और पुरुष शुद्ध आत्मस्वरूप में अवस्थित होकर स्वरूप-प्रतिष्ठित हो जाता है।

2.26 · साधनपाद सूत्र २६

सूत्र २.२६

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥ २.२६ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 374

शब्दार्थ — विवेक · ख्यातिः · अविप्लवा · हान · उपायः

अर्थ — शुद्ध विवेकख्याति हानका उपाय है ।

व्यासभाष्य

सत्त्वपुरुषान्व्यताप्रत्ययो विवेकख्यातिः । सा त्वनिवृत्तमिथ्याज्ञाना प्लवते । यदा मिथ्याज्ञानं दग्धबीजभावं बन्ध्यप्रसवं सम्पद्यते, तदा विधूतक्लेशरजसः सत्त्वस्य परे वैशारद्ये परस्यां वशीकारसंज्ञायां वर्तमानस्य विवेकप्रत्ययप्रवाहो निर्मलो भवति । सा विवेकख्यातिरविप्लवा हानस्योपायः । ततो मिथ्याज्ञानस्य दग्धबीजभावोपगमः । पुनश्चाप्रसव इत्येष मोक्षस्य मार्गो हासन्योपाय इति ॥२६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — विवेक ख्यातिः अविप्लवा हान उपायः। अविप्लवा विवेक ख्याति हान का उपाय है। सत्त्व और पुरुष की अन्यता का प्रत्यय विवेक ख्याति है। वह अनिवृत्त मिथ्या ज्ञान से प्लवति है। जब मिथ्या ज्ञान दग्ध बीज भाव, बंध्य प्रसव हो जाता है, तब क्लेश और रजस से विधूत सत्त्व के पर वैशारद्य, पर वशीकार संज्ञा में वर्तमान विवेक प्रत्यय प्रवाह निर्मल हो जाता है। वह अविप्लवा विवेक ख्याति हान का उपाय है। इससे मिथ्या ज्ञान का दग्ध बीज भाव उपगम होता है। पुनः अप्रसव, यह मोक्ष का मार्ग और हान का उपाय है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — विवेकख्याति का अर्थ बुद्धि और पुरुष की भिन्नता का ज्ञान है, जो शास्त्रों के अध्ययन और अनुमान से प्राप्त होने वाला परोक्ष ज्ञान है। मिथ्याज्ञान के संस्कारों के कारण यह विवेकख्याति विप्लवसहित होती है, अर्थात इसमें राजसी और तामसी वृत्तियाँ निरंतर सत्कारपूर्वक उपस्थित रहती हैं। जब यह ज्ञान दीर्घकाल तक अविद्या के विरोधी तत्त्वज्ञान, क्रिया-योग और मध्यस्थता के अनुष्ठान बल से प्राप्त होता है, तब यह अपरोक्ष ज्ञान बनता है।

इस ज्ञान से जब मिथ्याज्ञान दग्धबीज के समान हो जाता है और राजस-तामस मलों से शून्य चित्त होता है, तब सत्त्वगुण के प्रकाश में चेतन का प्रतिबिम्ब साक्षात्कार होता है। गीता (१३.३४) के अनुसार जो पुरुष विवेकख्याति द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को जान लेते हैं, वे परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। अविप्लव विवेकख्याति वह स्थिति है जब यह ज्ञान निरंतर बना रहे, जिसे धर्ममेघ समाधि या जीवनमुक्ति की अवस्था कहा जाता है।

इस आत्मसाक्षात्कार से उत्पन्न वैराग्य से रज और तम दब जाते हैं, जिससे चित्त में केवल आत्मप्रकाश रह जाता है और आत्मा शुद्ध परमात्मा स्वरूप में अवस्थित होती है। व्यासभाष्य के अनुसार, जब बुद्धि-सत्त्व के परवशीकारसंज्ञक वैराग्य में वर्तमान हुए योगी का विवेकज्ञान निर्मल होता है, तब वह अविप्लव कहलाता है। यह विवेकख्याति ही मोक्ष का मार्ग है, जिससे सूक्ष्म मिथ्याज्ञान दग्धबीज हो जाता है और चित्त की निवृत्ति से दुःख का हान होता है।

2.27 · साधनपाद सूत्र २७

सूत्र २.२७

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २.२७ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 377

शब्दार्थ — तस्य · सप्तधा · प्रान्त · भूमिः · प्रज्ञा

अर्थ — उस निर्मल विवेकख्यातिवाले योगीकी सात प्रकारकी सबसे ऊँची अवस्थावाली होती है ।

व्यासभाष्य

तस्येति प्रत्युदितख्यातेः प्रत्याम्नायः । सप्तधेत्यशुद्ध्यावरणमलापगमाच्चित्तस्य प्रत्ययान्तरानुत्पादे सति सप्तप्रकारैव प्रज्ञा विवेकिनो भवति । तद्यथा— (1) परिज्ञानं हेयं नास्य पुनः परिज्ञेयमस्ति । (2) क्षीणाः हेयहेतवो न पुनरेतेषां क्षेतव्यमस्ति । (3) साक्षात्कृतं निरोधसमाधिना हानम् । (4) भावितो विवेकख्यातिरूपो हानोपाय इति । एषा चतुष्टयी कार्यविमुक्तिः प्रज्ञायाः । चित्तविमुक्तिस्तु त्रयी— (5) चरिताधिकारा बुद्धिः । (6) गुणा गिरिशिखरकूटच्युता इव ग्रावाणो निरवस्थानाः स्वकारणे प्रलयाभिमुखाः सह तेनास्तं गच्छन्ति । न चैषां प्रविलीनानां पुनर्सत्युत्पादः प्रयोजनाभावादिति । (7) एतस्यामवस्थायां गुणसम्बन्धातीतः स्वरूपमात्रज्योतिरमलः केवली पुरुष इति । एतां सप्तविधां प्रान्तभूमिप्रज्ञामनुपश्यन्पुरुषः कुशल इत्याख्यायते । प्रतिप्रसवेऽपि चित्तस्य मुक्तः कुशल इत्येव भवति गुणातीतत्वादिति ॥२७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — प्रान्त भूमिः प्रज्ञा। उसकी सात प्रकार की प्रांत भूमि प्रज्ञा है। प्रत्याम्नायः। इसका अर्थ प्रत्युदित ख्याति का प्रत्याम्नाय है। सप्तधा—अशुद्धि आवरण मल के अपगम और चित्त में अन्य प्रत्यय के अनुत्पाद होने पर विवेकी की प्रज्ञा सात प्रकार की होती है। तत् यथा। अर्थात्— परिज्ञानम् हेयम् न अस्य पुनः परिज्ञेयम् अस्ति। हेय का परिज्ञान, इसके लिए पुनः परिज्ञेय नहीं है। क्षीणाः हेय हेतवः न पुनः एतेषाम् क्षेतव्यम् अस्ति।

हेय के हेतु क्षीण हो गए, इन्हें पुनः क्षय करना नहीं है। साक्षात्कृतम् निरोध समाधिना हानम्। निरोध समाधि से हान का साक्षात्कार हुआ। भावितः विवेक ख्याति रूपः हान उपायः इति। विवेक ख्याति रूप हान का उपाय भावित हुआ। एषा चतुष्टयी कार्य विमुक्तिः प्रज्ञायाः। यह प्रज्ञा की चतुष्टयी कार्य विमुक्ति है। चित्त विमुक्तिः तु त्रयी। चित्त विमुक्ति तीन प्रकार की है— चरित अधिकारा बुद्धिः। बुद्धि ने अपना अधिकार पूरा कर लिया।

गुणाः गिरि शिखर कूट च्युता इव ग्रावाणः निरवस्थानाः स्व कारणे प्रलय अभिमुखाः सह तेन अस्तम् गच्छन्ति। गुण पर्वत शिखर से गिरे पत्थरों की तरह निरवस्थान, अपने कारण में प्रलय की ओर जाते हुए उसके साथ अस्त हो जाते हैं। इन प्रविलीन गुणों का प्रयोजन के अभाव से पुनः सत् में उत्पाद नहीं होता। एतस्याम् अवस्थायाम् गुण सम्बन्ध अतीतः स्वरूप मात्र ज्योतिः अमलः केवली पुरुषः इति। इस अवस्था में गुण संबंध से अतीत, स्वरूप मात्र ज्योति, अमल, केवली पुरुष है।

एताम् सप्त विधाम् प्रान्त भूमि प्रज्ञाम् अनुपश्यन् पुरुषः कुशलः इति आख्यायते। इस सप्तविध प्रांत भूमि प्रज्ञा को अनुपश्य करने वाला पुरुष कुशल कहा जाता है। प्रतिप्रसवे अपि चित्तस्य मुक्तः कुशलः इति एव भवति गुण अतीतत्वात् इति। चित्त के प्रतिप्रसव में भी मुक्त पुरुष गुणातीतत्व से कुशल ही होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — निर्मल विवेकख्याति द्वारा योगी के चित्त के अशुद्धि रूप आवरण नष्ट होने पर और सांसारिक ज्ञानों के उत्पन्न न होने पर सात प्रकार की उत्कर्ष अवस्था वाली प्रज्ञा उत्पन्न होती है। इनमें से प्रथम चार प्रकार की प्रज्ञा कार्य से विमुक्त करने वाली हैं जिन्हें 'कार्य-विमुक्ति प्रज्ञा' कहते हैं और अंतिम तीन चित्त से विमुक्त करने वाली हैं जिन्हें 'चित्त-विमुक्ति प्रज्ञा' कहा जाता है। उपर्युक्त चारों प्रज्ञाओं के लाभ से ये तीन प्रज्ञा स्वतः ही लब्ध हो जाती हैं जिनमें हेयशून्य अवस्था, हेयहेतु क्षीण अवस्था, प्राप्यप्राप्त अवस्था और चिकीर्षाशून्य अवस्था शामिल हैं। यह प्रज्ञा पर-वैराग्य की पराकाष्ठा है अर्थात् बुद्धि व्यापार की प्रान्त रेखा है। चित्त-विमुक्ति प्रज्ञा में पाँचवीं चित्तसत्त्व-कृतार्थता, छठी गुणलीनता और सातवीं आत्मस्थिति शामिल हैं। इस सात प्रकार की प्रान्तभूमि प्रज्ञा को अनुभव करता है और चित्त के अपने कारण में लीन होने पर भी कुशल कहलाता है। ये दोनों ही गुणातीत अवस्था को जीवन्मुक्त दशामे ही प्रत्यक्ष कर लेते हैं। इसलिये यह योगी विदेहमुक्त कहलाता है।

2.28 · साधनपाद सूत्र २८

सूत्र २.२८

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेकख्यातेः ॥ २.२८ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 379

अर्थ — सिद्धा भवति विवेक ख्यातिः हान उपायः इति। विवेक ख्याति हान का उपाय सिद्ध होती है। न च सिद्धिः अन्तरेण साधनम् इति एतत् आरभ्यते। बिना साधन के सिद्धि नहीं होती, इसलिए यह आरम्भ किया जाता है। योग अङ्ग अनुष्ठानात् अशुद्धि क्षये ज्ञान दीप्तिः आ विवेक ख्यातेः। योग के अंगों के अनुष्ठान से अशुद्धि के क्षय होने पर ज्ञान की दीप्ति विवेक ख्याति तक होती है। योग अङ्गानि अष्टौ अभिधायिष्यमानानि। योग के आठ अंगों का वर्णन किया जाएगा।

व्यासभाष्य

योगाङ्गान्यष्टावभिधायिष्यमानानि । तेषामनुष्ठानात्पञ्चपर्वणो विपर्यस्याशुद्धिरूपस्य क्षयो नाशः । तत्क्षये सम्यग्ज्ञानस्याभिव्यक्तिः । यथा यथा च साधनान्यनुष्ठीयन्ते, तथा तथा क्षयक्रमानुरोधिनी ज्ञानस्यापि दीप्तिर्विवर्धते । सा खल्वेषा विवृद्धिः प्रकर्षमनुभवत्याविवेकख्यातेः, आ गुणपुरुषस्वरूपविज्ञानादित्यर्थः । योगाङ्गानुष्ठानमशुद्धेर्वियोगकारणम् । यथा परशुश्छेद्यस्य । विवेकख्यातेस्तु प्राप्तिकारणं यथा धर्मः सुखस्य, नान्यथा कारणम् । कति चैतानि कारणानि शास्त्रे भवन्ति ?

नवैवेत्याह— उत्पत्तिस्थित्यभिव्यक्तिविकारप्रत्ययात्ययः । वियोगान्यत्वधृतयः कारणं नवधा स्मृतम् ॥ इति । तत्रोत्पत्तिकारणं मनो भवति विज्ञानस्य । स्थितिकारणं मनसः पुरुषार्थता शरीरस्येवाहार इति । अभिव्यक्तिकारणं यथा रूपस्यालोकस्तथा रूपज्ञानम् । विकारकारणं मनसो विषयान्तरम्, यथाग्निः पाक्यस्य । प्रत्ययकारणं धूमज्ञानमग्निज्ञानस्य । प्राप्तिकारणं योगाङ्गानुष्ठानं विवेकख्यातेः । वियोगकारणं तदेवाशुद्धेः । अन्यत्वकारणं, यथा सुवर्णस्य सुवर्णकारः ।

एवमेकस्य स्त्रीप्रत्ययस्याविद्या मूढत्वे, द्वेषो दुःखत्वे, रागः सुखत्वे, तत्त्वज्ञानं माध्यस्थ्ये । धृतिकारणं शरीरमिन्द्रियाणाम् । तानि च तस्य । महाभूतानि शरीराणाम् । तानि च परस्परं सर्वेषाम् । तैर्यग्यौनमानुषदैवतानि च परस्परार्थत्वादिति । एवं नवकारणानि । तानि च यथासम्भवं पदार्थान्तरेष्वपि योज्यानि । योगाङ्गानुष्ठानं तु द्विधैव कारणत्वं लभत इति ॥२८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — के आठ अंगों का वर्णन किया जाएगा। उनके अनुष्ठान से पांच पर्वों वाले विपर्यय रूपी अशुद्धि का क्षय, नाश होता है। उस क्षय से सम्यक् ज्ञान की अभिव्यक्ति होती है। जैसे-जैसे साधनों का अनुष्ठान होता है, वैसे-वैसे क्षय क्रम के अनुरूप ज्ञान की दीप्ति भी बढ़ती है। वह वृद्धि विवेक ख्याति तक, अर्थात् गुण और पुरुष स्वरूप के विज्ञान तक, प्रकर्ष को अनुभव करती है। योग अंगों का अनुष्ठान अशुद्धि के वियोग का कारण है। जैसे कुल्हाड़ी छेद्य का कारण है।

विवेक ख्याति का प्राप्ति कारण है, जैसे धर्म सुख का कारण है, अन्यथा नहीं। शास्त्र में कितने कारण होते हैं? नव एव इति आह। नौ ही, ऐसा कहा गया। विकार प्रत्यय अत्ययः। वियोग अन्यत्व धृतयः कारणम् नवधा स्मृतम्। उत्पत्ति, स्थिति, अभिव्यक्ति, विकार, प्रत्यय, अत्यय, वियोग, अन्यत्व, और धृति—कारण नौ प्रकार के स्मृत हैं। भवति विज्ञानस्य। कारण मन विज्ञान का है। स्थिति कारणम् मनसः पुरुष अर्थता शरीरस्य इव आहारः इति। स्थिति कारण मन का पुरुषार्थता है, जैसे शरीर का आहार। ज्ञानम्।

अभिव्यक्ति कारण जैसे रूप का प्रकाश, वैसे रूप का ज्ञान। विकार कारणम् मनसः विषय अन्तरम्, यथा अग्निः पाक्यस्य। विकार कारण मन का विषयांतर है, जैसे अग्नि पाक्य का। प्रत्यय कारणम् धूम ज्ञानम् अग्नि ज्ञानस्य। प्रत्यय कारण धूम ज्ञान अग्नि ज्ञान का है। ख्यातेः। प्राप्ति कारण योग अंगों का अनुष्ठान विवेक ख्याति का है। वियोग कारणम् तत् एव अशुद्धेः। वियोग कारण वही अशुद्धि का है। अन्यत्व कारण, जैसे सुवर्ण का सुवर्णकार।

एवम् एकस्य स्त्री प्रत्ययस्य अविद्या मूढत्वे, द्वेषः दुःखत्वे, रागः सुखत्वे, तत्त्व ज्ञानम् माध्यस्थ्ये। इस प्रकार एक स्त्री प्रत्यय की अविद्या मूढत्व में, द्वेष दुखत्व में, राग सुखत्व में, तत्त्व ज्ञान माध्यस्थ्य में। धृति कारणम् शरीरम् इन्द्रियाणाम्। धृति कारण इन्द्रियों का शरीर है। तानि च तस्य। और वे इसके। महा भूतानि शरीराणाम्। महाभूत शरीरों के हैं। तानि च परस्परम् सर्वेषाम्। और वे परस्पर सभी के हैं। तैः यग्यौन मानुष दैवतानि च परस्पर अर्थत्वात् इति।

उनके द्वारा यज्ञ, मानुष, और दैवत परस्पर अर्थत्व से हैं। एवम् नव कारणानि। इस प्रकार नौ कारण हैं। तानि च यथा सम्भवम् पदार्थ अन्तरेषु अपि योज्यानि। और वे यथा संभव पदार्थों में भी योजनीय हैं। योग अङ्ग अनुष्ठानम् तु द्विधा एव कारणत्वम् लभति इति। योग अंगों का अनुष्ठान दो प्रकार से ही कारणत्व प्राप्त करता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — योग के आठ अंगों के अनुष्ठान से क्लेश रूपी अशुद्धि दूर होती है और सम्यक् ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है। योग के अंगों का अनुष्ठान जितना बढ़ता जाता है, उतनी ही क्लेश की निवृत्ति और ज्ञान के प्रकाश की अधिकता होती जाती है, जो विवेकख्याति तक पहुँचती है। टिप्पणी (सूत्र २८) के अनुसार कारण नौ प्रकार के हैं, जिनमें उत्पत्ति-कारण, स्थिति-कारण, अभिव्यक्ति-कारण, विकार-कारण, प्रत्यय-कारण, प्राप्ति-कारण, वियोग-कारण, अन्यत्व-कारण और धृति-कारण शामिल हैं। उत्पत्ति-कारण जैसे बीज वृक्ष का या मन विज्ञान का कारण है, जबकि स्थिति-कारण जैसे आहार शरीर की स्थितिका का कारण है। अभिव्यक्ति-कारण प्रकाश रूप की प्रकटता का कारण है और विकार-कारण अग्नि से पककर चावल का गल जाना है। प्रत्यय-कारण धुएँ का देखना अग्निक ज्ञान का कारण है तथा प्राप्ति-कारण योग के अंगों का अनुष्ठान विवेक-ख्याति की प्राप्तिका कारण है। वियोग-कारण जैसे कुल्हाड़ा लकड़ी के टुकड़ों के वियोग का कारण है, और योग के अंगों का अनुष्ठान अशुद्धि के वियोग का कारण है। अन्यत्व-कारण जैसे सुनार के कुण्डल के लिए दूसरी वस्तु होना है और धृति-कारण जैसे शरीर इंद्रियों के धारने का कारण है जैसा कि व्यासभाष्य में बताया गया है।

2.29 · साधनपाद सूत्र २९

सूत्र २.२९

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥ २.२९ ॥

साधनपाद · सूत्र २.२९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 380

शब्दार्थ — यम, · नियम, · आसन, · प्राणायाम, · प्रत्याहार, · धारणा, · ध्यान,

अर्थ — यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान , समाधि – ( ये ) आठ योगके अङ्ग हैं ।

व्यासभाष्य

यथाक्रममेतेषामनुष्ठानं स्वरूपं च वक्ष्यामः ॥२९॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि—ये आठ अंग हैं। ॥ २९॥ इनके यथाक्रम अनुष्ठान और स्वरूप का वर्णन करेंगे।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — योग के आठ अंग विवेकख्याति के साधन हैं, जिनमें धारणा, ध्यान और समाधि को योग के अंतरंग साधन माना गया है। यम और नियम योग के रुकावटों को दूर कर समाधि सिद्ध करते हैं, जबकि आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार अगले अंगों के लिए सहायक होते हैं। समाधिपाद में बताए गए अभ्यास, वैराग्य, श्रद्धा और वीर्य जैसे तत्व इन आठों अंगों के अंतर्गत आते हैं क्योंकि बिना अभ्यास और वैराग्य के समाधि संभव नहीं है।

क्रियायोग के तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान नियम में आते हैं और महाभारत में भी योग के आठ अंग बताए गए हैं। सूत्र २-९ के अनुसार पुरुष क्लेशों और सकाम कर्मों से दुःखों को प्राप्त होता है, जिसे अष्टांगयोग द्वारा दूर किया जा सकता है।

यम बहिर्मुखता की अंतिम अवस्था है, नियम व्यक्तिगत शुद्धि है, आसन शारीरिक क्रिया है, प्राणायाम प्राण की गति को नियंत्रित करता है, प्रत्याहार इंद्रियों को अंतर्मुखी बनाता है, धारणा चित्त को एक विषय में ठहराती है, ध्यान उस वृत्ति को स्थिर रखता है और समाधि ध्येयाकार रूप से शून्य जैसी अवस्था है। अष्टांगयोग के माध्यम से निचली भूमियों को सात्त्विक और उच्च भूमियों को दिव्य बनाया जाता है। इस साधना की शुरुआत केवल धारणा से संभव है क्योंकि यह अन्य अंगों का आधार है।

2.30 · साधनपाद सूत्र ३०

सूत्र २.३०

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ २.३० ॥

साधनपाद · सूत्र २.३०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 393

शब्दार्थ — अहिंसा · सत्य · अस्तेय · ब्रह्मचर्य · अपरिग्रहाः · यमाः

अर्थ — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह—ये यम हैं।

व्यासभाष्य

तत्राहिंसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोहः । उत्तरे च यमनियमास्तन्मूलास्तत्सिद्धिपरतयैव तत्प्रतिपादनाय प्रतिपाद्यन्ते, तदवदातरूपकरणायैवोपादीयन्ते । तथा चोक्तं—न खल्वयं ब्राह्मणो यथा यथा व्रतानि बहूनि समादित्सते, तथा तथा प्रमादकृतेभ्यो हिंसानिदानेभ्यो निवर्तमानस्तामेवावदातरूपामहिंसां करोति । सत्यं यथार्थे वाङ्मनसे । यथा दृष्टं यथानुमितं यथा श्रुतं, तथा वाङ्मनश्च । परत्र स्वबोधसङ्क्रान्तये वागुक्ता, सा यदि न वञ्चिता भ्रान्ता वा प्रतिपत्तिबन्ध्या वा भवेदिति सत्यम् । यद्यपि सत्यं परहिताय संनादति तथापि यद् दुःखाय संनादति तद् हिंसैव न सत्यम् । यद् हिंसारहितं परहिताय संनादति तदेव सत्यम्, यथा भैषज्यवचनमरिष्टस्य रोगिणः । यद् दृष्टं यदनुमितं यच्छ्रुतं यच्चानुभूतं तत् सर्वं यथावद् वक्तव्यम्, यद्यपि तद् दुःखाय संनादति तथापि यद् हिंसारहितं परहिताय संनादति तदेव सत्यम् । अस्तेयं परस्वानामादानवर्जनमचौर्यं परद्रव्येष्वभिलाषरहितता च । ब्रह्मचर्यं रहस्यमैथुनस्य वर्जनं सर्वथा सर्वदा सर्वावस्थासु विषयविमुखता च । अपरिग्रहः परद्रव्यादौ यद् यदादातव्यम्, तद् तद् यथासम्भवं नादानं यथालब्धेन सन्तुष्टिः । यमाः पञ्चैते सर्वं सर्वं सर्वस्य सर्वदा सर्वथा पालनीयाः ॥३०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — इसमें अहिंसा सभी प्राणियों के प्रति सर्वथा, सर्वदा, और सभी प्रकार से अनभिद्रोह है। इसके बाद के यम और नियम इसके मूल हैं, इसकी सिद्धि के लिए ही इसका प्रतिपादन किया जाता है, और इसे शुद्ध रूप में लाने के लिए ही ये ग्रहण किए जाते हैं। कहा गया है—यह ब्राह्मण नहीं कि जितने अधिक व्रत वह ग्रहण करता है, उतना ही वह प्रमाद से उत्पन्न हिंसा के कारणों से निवृत्त होकर उसी शुद्ध रूप वाली अहिंसा को करता है। सत्य वाणी और मन से यथार्थ है।

जैसा देखा, जैसा अनुमित, जैसा सुना, वैसा ही वाणी और मन होना चाहिए। परत्र स्व बोध संक्रान्तये वाक् उक्ता सा यदि न वञ्चिता भ्रान्ता वा प्रतिपत्ति बन्ध्या वा भवेत् इति सत्यम् दूसरों को अपने बोध का संक्रान्ति करने के लिए कही गई वाणी, यदि वह वंचित, भ्रान्त, या प्रतिपत्ति में बाधक न हो, वही सत्य है। दूसरों के हित के लिए संनादति है, फिर भी जो दुख के लिए संनादति, वह हिंसा ही है, सत्य नहीं।

जो हिंसा रहित होकर दूसरों के हित के लिए संनादति, वही सत्य है, जैसे अरिष्ट रोगी के लिए भैषज्य वचन। अनुभूत हुआ, वह सब यथावत् कहना चाहिए। यद्यपि वह दुख के लिए संनादति, फिर भी जो हिंसा रहित होकर दूसरों के हित के लिए संनादति, वही सत्य है। अस्तेय दूसरों के धन का हरण न करना, चोरी न करना, और पर द्रव्य में अभिलाष रहित होना है। ब्रह्मचर्य गुप्त मैथुन का सर्वथा, सर्वदा, सभी अवस्थाओं में त्याग और विषयों से विमुखता है।

अपरिग्रह दूसरों के द्रव्य आदि जो ग्रहण करने योग्य है, उसे यथासंभव न लेना और प्राप्त से संतुष्ट रहना है। ये पांच यम सर्वं, सर्वं, सभी के लिए, सर्वदा, सर्वथा पालनीय हैं। ते तु वे तो— अपरिग्रह स्थैर्ये जन्म कथमता संबोधः अपरिग्रह के स्थिर होने पर जन्म की कथमता का संबोध। अस्य भवति कोऽहमासं ? कथमहमासं ? किं स्विदिदं ? कथं स्विदिदं ? के वा भविष्यामः ? कथं वा भविष्यामः ? इत्येवमस्य पूर्वान्तपरान्तमध्येष्वात्ममावजिज्ञासा स्वरूपेणेपावर्तते । एता यमस्थैर्ये सिद्धयः ॥ ३०॥

अस्य भवति कः अहम् आसम् कथम् अहम् आसम् किम् स्वत् इदम् कथम् स्वत् इदम् के वा भविष्यामः कथम् वा भविष्यामः इति एवम् अस्य पूर्व अन्त अपर अन्त मध्येषु आत्म भावजातिज्ञासा स्वरूपेण उपावर्तते एता यम स्थैर्ये सिद्धयाः इसके लिए होता है—मैं कौन था? मैं कैसे था? यह क्या है? यह कैसे हुआ? हम क्या होंगे? हम कैसे होंगे?—इस प्रकार इसकी पूर्वान्त, अपरान्त, और मध्य में आत्मभाव की जिज्ञासा स्वरूप से उपावर्तति है। ये यम स्थैर्य में सिद्धियाँ हैं।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — हिंसा का अर्थ शरीर, वाणी या मन से किसी प्राणी को शारीरिक या मानसिक पीड़ा पहुँचाना है और इससे बचना अहिंसा है। पशुओं का उचित पालन-पोषण हिंसा नहीं है, परंतु क्रूरता के साथ सेवा लेना हिंसा है, जबकि बिना द्वेष के कल्याण हेतु दी गई ताड़ना या दंड हिंसा नहीं है। श्रीव्यासजी महाराज के अनुसार सर्वकाल में सभी प्राणियों के प्रति चित्त में द्रोह न करना ही अहिंसा है और पञ्चशिखाचार्यजी के अनुसार व्रतों के पालन से प्राप्त अहिंसा ही निर्मल होती है।

योगियों के लिए अहिंसा का उच्चतम स्वरूप समस्त भूतों में अपनी आत्मा को देखना है, जैसा कि ईशोपनिषद् (ईश ० ६) और गीता (१३ । २ ९) में वर्णित है। सत्य का अर्थ यथार्थ ज्ञान और कर्तव्य है, जिसमें किसी प्राणी की हानि न होने वाली ऐसी वाणी बोलना शामिल है जो उपकार के लिए हो। योगियों के लिए सत्य का उच्चतम स्वरूप आत्म-अनात्म और चेतन-जड़ के बीच विवेकज्ञान से आत्मा को निर्विकार देखना है।

अस्तेय का अर्थ अन्यायपूर्वक धन या अधिकार का हरण करना है, परंतु योगी के लिए किसी वस्तु में राग होना ही अस्तेय है। ब्रह्मचर्य का अर्थ वीर्य की रक्षा करते हुए इंद्रियों पर संयम रखना है, जो कि सबसे उत्तम तप है और इसके द्वारा प्राप्त जीवन-कला से ही समस्त सिद्धियाँ संभव होती हैं। योगियों के लिए ब्रह्मचर्य का वास्तविक स्वरूप प्राणों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करना और ब्रह्मनिष्ठ होना है।

अपरिग्रह का अर्थ अपनी आवश्यकताओं से अधिक वस्तुओं को स्वार्थ से संचय करना है, जबकि योगियों के लिए अविद्या, क्लेश और अहंकार का न रखना ही वास्तविक अपरिग्रह है।

2.31 · साधनपाद सूत्र ३१

सूत्र २.३१

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥ २.३१ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 398

शब्दार्थ — जाति · देश · काल · समय · अनवच्छिन्नाः · सार्वभौमाः · महाव्रतम्

अर्थ — जाति , देश , काल और समयकी हदसे रहित सर्वभूमियोंमें पालन करने योग्य यम महाव्रत कहलाते हैं ।

व्यासभाष्य

तत्राहिंसा जात्यवच्छिन्ना मत्स्यबन्धकस्य मत्स्येष्वेव नान्यत्र हिंसा । सैव देशावच्छिन्ना न तीर्थे हनिष्यामीति । सैव कालावच्छिन्ना न चतुर्दश्यां, न पुण्येऽहनि हनिष्यामीति । सैव त्रिभिरुपरतस्य समयावच्छिन्ना देवब्राह्मणार्थे नान्यथा हनिष्यामीति । यथा च क्षत्रियाणां युद्ध एव हिंसा नान्यत्रेति । एभिर्जातिदेशकालसमयैरनवच्छिन्ना अहिंसादयः सर्वथैव परिपालनीयाः । सर्वभूमिषु सर्वविषयेषु सर्वथैवाविदितव्यभिचाराः सार्वभौमा महाव्रतमित्युच्यते ॥३१॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ते तु— ते तु वे तो— जाति देश काल समय अनवच्छिन्नाः सार्वभौमाः महाव्रतम् जाति, देश, काल, और समय से अवच्छिन्न न होने वाले, सार्वभौम महाव्रत हैं। इसमें अहिंसा जाति से अवच्छिन्न है, जैसे मछुआरे की हिंसा केवल मछलियों के प्रति, अन्यत्र नहीं। देश से अवच्छिन्न है, जैसे तीर्थ में मैं नहीं मारूंगा। काल से अवच्छिन्न है, जैसे चतुर्दशी या पुण्य दिन में मैं नहीं मारूंगा। वही तीनों से उपरत व्यक्ति के लिए समय से अवच्छिन्न है, जैसे देवता या ब्राह्मण के लिए, अन्यथा नहीं मारूंगा। यथा च क्षत्रियाणाम् युद्ध एव हिंसा न अन्यत्र इति और जैसे क्षत्रियों की हिंसा केवल युद्ध में, अन्यत्र नहीं। इन जाति, देश, काल, और समय से अवच्छिन्न न होने वाली अहिंसा आदि सर्वथा पालनीय हैं। सभी भूमियों में, सभी विषयों में, सर्वथा अविदित व्यभिचार वाले, सार्वभौम महाव्रत कहलाते हैं। तत्र— तत्र इसमें—

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — जाति, देश, काल और समय की संकीर्णता से रहित होने का अर्थ है कि किसी भी यम का पालन केवल विशेष परिस्थितियों या व्यक्तियों के लिए नहीं बल्कि समस्त मानवता के लिए सर्वदा और सर्वत्र किया जाए। ये यम किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं बल्कि भूमंडल पर रहने वाली सभी जातियों और अवस्थाओं के लिए पालनीय हैं, इसलिए इन्हें सार्वभौम महाव्रत कहा जाता है।

यमों का संबंध केवल व्यक्तिगत न होकर संपूर्ण मनुष्य-समाज से है और इनका पालन करने से ही संसार की अशांति का नाश संभव है। हिंसा के तीन प्रकार बताए गए हैं— (१) शारीरिक, (२) मानसिक और (३) आध्यात्मिक, जिसमें आध्यात्मिक हिंसा सबसे बड़ी है जैसा कि ईशोपनिषद् में बतलाया गया है। अहिंसा का स्वरूप यह है कि शासकों का कर्तव्य हिंसक तत्वों को नियंत्रित करना है, जो कि अहिंसाव्रत का रक्षक और पोषक है। क्षत्रिय धर्म के अनुसार धर्मयुद्ध और वीरता से अत्याचारों का मुकाबला करना ही वास्तविक अहिंसा है।

सत्य का वास्तविक स्वरूप कर्तव्य है, जिसे राजा हरिश्चन्द्र ने अपने परिवार और प्रजा के प्रति कर्तव्यों का पालन करके सिद्ध किया। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि अज्ञानी केवल शब्दों के स्थूल रूप को देखते हैं जबकि ज्ञानी उनके सूक्ष्म अर्थ को समझकर व्यवहार करते हैं। अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्तव्यरूपी सत्य व्रत का यथार्थ रूप से पालन करना चाहिए ताकि संसार की अशांति दूर हो सके।

2.32 · साधनपाद सूत्र ३२

सूत्र २.३२

शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥ २.३२ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 410

शब्दार्थ — शौच · संतोष · तपः · स्वाध्याय · ईश्वर · प्रणिधानानि · नियमाः

अर्थ — शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वर प्रणिधान—ये नियम हैं।

व्यासभाष्य

तत्र शौचं मृज्जलादिजनितं मेध्याभ्यवहरणादि च बाह्यम्, आभ्यन्तरं चित्तमलानामाक्षालनम् । सन्तोषः सन्निहितसाधनादधिकस्यानुपादित्सा । तपो द्वन्द्वसहनम् । द्वन्द्वश्च जिघत्सापिपासे, शीतोष्णे, स्थानासने, काष्ठमौनाकारमौने च । व्रतानि चैषां यथायोगं कृच्छ्रचान्द्रायणसान्तापनादीनि । स्वाध्यायो मोक्षशास्त्राणामध्ययनं प्रणवजपो वा । ईश्वरप्रणिधानं तस्मिन्परमगुरौ सर्वकर्मार्पणम् । शम्यासनस्थोऽथ पथि व्रजन्वा स्वस्थः परिक्षीणवितर्कजालः । संसारबीजक्षयमीक्षमाणः स्यान्नित्यमुक्तोऽमृतभोगभागी ॥ यत्रेदमुक्तं—ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च [यो.सू. १.२९] इति ॥३२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — इसमें शौच मिट्टी, जल आदि से उत्पन्न, मेध्य भोजन आदि बाह्य, और चित्त के मलों का आक्षालन आभ्यन्तर है। संतोष उपलब्ध साधनों से अधिक का उपादान न करना है। तपः द्वन्द्व सहनम् तप द्वन्द्वों का सहन है। द्वन्द्वः च जिघत्सा पिपासे शीत उष्णे स्थान आसने काष्ठ मौन आकार मौने च और द्वन्द्व हैं—भूख-प्यास, शीत-उष्ण, स्थान-आसन, काष्ठ मौन, और आकार मौन। इनके व्रत यथायोग्य कृच्छ्र, चान्द्रायण, सान्तापन आदि हैं। स्वाध्यायः मोक्ष शास्त्राणाम् अध्ययनम् प्रणव जपः वा स्वाध्याय मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन या प्रणव का जप है। ईश्वर प्रणिधान उस परम गुरु में सर्व कर्म का अर्पण है। शमि आसन में स्थित, या पथ पर चलते हुए, स्वस्थ, वितर्क जाल से परिक्षीण। संसार के बीज का क्षय देखने वाला, नित्य मुक्त, अमृत भोग का भागी हो। जहां यह कहा गया—ततः प्रत्यक् चेतना का अधिगम और अन्तराय का अभाव भी [यो.सू. १.२९]। एतेषां यमनियमानां— एतेषाम् यम नियमाणाम् इन यम और नियमों के—

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — शौच दो प्रकार के होते हैं—बाह्य, जिसमें शरीर और परिवेश की शुद्धि शामिल है, तथा आभ्यन्तर, जिसमें मैत्री द्वारा ईर्ष्या जैसे मलों को दूर करना और विवेक से क्लेशों का नाश करना शामिल है। संतोष का अर्थ आत्मिक प्रसन्नता है, जिसे मनुस्मृति (४.१२) के अनुसार सुख की जड़ माना गया है; जबकि सांख्यकारिका (५०) के अनुसार नौ प्रकार की तुष्टियाँ होती हैं जिनमें चार आध्यात्मिक (प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य) और पाँच बाह्य होती हैं।

तप का अर्थ शरीर, प्राण, इन्द्रियों और मन को वश में करना है ताकि साधक द्वंद्वों से मुक्त होकर योगमार्ग पर चल सके। स्वाध्याय वेदों, उपनिषदों और सांख्य के शास्त्रों का नियमपूर्वक अध्ययन है, जबकि ईश्वरप्रणिधान समस्त कर्मों को फल सहित ईश्वर को समर्पित करना है। शरीर शोधन हेतु हठयोग की छह क्रियाएँ (धौति, वस्ति, नेति, नौली, त्राटक, कपालभाति), प्राकृतिक चिकित्सा, सम्मोहन और संकल्प शक्ति के प्रयोग बताए गए हैं।

इनमें धौति के विभिन्न भेद जैसे वारिधौति, ब्रह्मदातौन और वास-धौति तथा वस्ति के जल और पवन वाले भेद शामिल हैं। आत्मिक शुद्धि हेतु नेति, नौली और त्राटक का अभ्यास महत्वपूर्ण है, जबकि कपालभाति नाड़ी शोधन में सहायक होती है। सम्मोहन शक्ति और संकल्प शक्ति मनुष्य की आंतरिक असीम शक्तियों का आधार हैं, जिनका सही प्रयोग और पवित्र विचार किसी भी रोग या बाधा को दूर कर सकते हैं।

अंततः, जब साधक अपनी संकल्पशक्ति को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है, तब वह निष्काम भाव से समस्त जीवों के कल्याण हेतु कार्य करता है और उसकी आत्मिक शक्तियाँ अगाध हो जाती हैं।

2.33 · साधनपाद सूत्र ३३

सूत्र २.३३

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ २.३३ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 440

शब्दार्थ — वितर्क · बाधने · प्रतिपक्ष · भावनम्

अर्थ — वितर्कोंद्वारा यम और नियमोंका बाध होनेपर प्रतिपक्षका चिन्तन करना चाहिये ।

व्यासभाष्य

यदास्य ब्राह्मणस्य हिंसादयो वितर्का जायेरन्हनिष्याम्यहमपकारिणमनृतमपि वक्ष्यामि, द्रव्यमप्यस्य स्वीकरिष्यामि, दारेषु चास्य व्य्वायी भविष्यामि, परिग्रहेषु चास्य स्वामी भविष्यामीति । एवमुन्मार्गप्रवणवितर्कज्वरेणातिदीप्तेन बाध्यमानस्तत्प्रतिपक्षान्भवयेत। घोरेषु संसाराङ्गारेषु पच्यमानेन मया शरणमुपागतः सर्वभूताभयप्रदानेन योगधर्मः । स खल्वहं त्यक्त्वा वितर्कान्पुनस्ताना ददानस्तुल्यः श्ववृत्तेनेति भावयेत। यथा श्वा वान्तावलेही तथा त्यक्तस्य पुनराददान इति, एवमादि सूत्रान्तरेष्वपि योज्यम् ॥३३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — जब इस ब्राह्मण के हिंसा आदि वितर्क उत्पन्न हों—मैं अपकारी को मारूंगा, अनृत भी कहूंगा, इसका द्रव्य भी स्वीकर करूंगा, इसकी दारों में व्यभिचारी बनूंगा, और इसके परिग्रहों का स्वामी बनूंगा। इस प्रकार उन्मार्ग प्रवण वितर्क के तीव्र ज्वर से बाधित होने पर वह उनके प्रतिपक्ष का भावन करे। घोर संसार के अंगारों में पकते हुए मुझ द्वारा सर्व भूतों को अभय प्रदान करने वाला योग धर्म शरण लिया गया है। वह मैं, वितर्कों को त्यागकर पुनः उन्हें ग्रहण करने वाला, श्वान की वृत्ति के समान है, ऐसा भावन करे। जैसे कुत्ता वमन को चाटता है, वैसे ही त्यक्त को पुनः ग्रहण करने वाला, इस प्रकार अन्य सूत्रों में भी योजनीय है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — वितर्क का अर्थ विरोधी तर्क है, जिसमें यम और नियम के विरुद्ध दस अधर्म जैसे हिंसा, असत्य, स्तेय, ब्रह्मचर्य का पालन न करना, परिग्रह, अशौच, असंतोष, स्वाध्याय का त्याग और ईश्वर से विमुखता शामिल हैं। जब दुर्घटनावश ये वितर्क, तप का अभाव या योगमार्ग के विरोधी अधर्मों के विचार उत्पन्न हों, तब उनके प्रतिपक्षी विचारों का चिन्तन करके उन्हें मन से हटाना चाहिए।

जैसे क्रोध आने पर शांति का चिन्तन करना, वैसे ही हिंसा के विचार आने पर दया के भाव का चिंतन करना आवश्यक है। व्यासभाष्य के अनुसार प्रतिपक्ष भावना का अर्थ यह है कि जब ब्रह्म ज्ञानेच्छुक योगी के चित्त में अहिंसा के विरुद्ध हिंसा जैसे वितर्क उत्पन्न हों, तब उसे उन अधर्मों को त्याग देना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति ज्वर से असत्य बोलने या धन हरण करने जैसे दुर्मार्ग वाले विचार लाता है, तो उसे अग्नि के समान यम और नियमों का बाध नहीं करना चाहिए।

ऐसे में उसे संसार की घोर अग्नि से बचने के लिए बार-बार यह चिन्तन करना चाहिए कि उसने सभी भूतों को अभयदान देकर योगमार्ग की शरण ली है। अधर्मों का पुनः ग्रहण करना कुत्ते के सदृश अपनी ही त्यागी हुई वमन को चाटने जैसा है और योगमार्ग छोड़कर अज्ञान में गिरना अनुचित है। इस प्रकार प्रथम सूत्र यमादि और द्वितीय नियमादि दोनों में वितर्कों की प्रतिपक्षभावना जान लेनी चाहिए।

2.34 · साधनपाद सूत्र ३४

सूत्र २.३४

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ २.३४ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 441

शब्दार्थ — वितर्काः · हिंसा · आदयः · कृत · कारित · अनुमोदिताः · लोभ · क्रोध · मोह · पूर्वकाः · मृदु · मध्य · अधिमात्राः · दुःख · अज्ञान · अनन्त · फलाः · इति · प्रतिपक्ष · भावनम्

अर्थ — वितर्क हिंसा आदि हैं, कृत, कारित, और अनुमोदित, लोभ, क्रोध, और मोह से पूर्वक, मृदु, मध्य, और अधिमात्र, दुख और अज्ञान के अनन्त फल वाले, इस प्रकार प्रतिपक्ष का भावन करना।

व्यासभाष्य

तत्र हिंसा तावत्—कृतकारितानुमोदितेति त्रिधा । एकैका पुनस्त्रिधा—लोभेन मांसचर्मार्थेन, कोर्धेनापकृतमनेनेति, मोहेन धर्मो मे भविष्यतीति । लोभक्रोधमोहाः पुनस्त्रिविधा मृदुमध्याधिमात्रा इति । एवं सप्तत्रिंशतिर्भेदा भवन्ति हिंसायाः । मृदुमध्याधिमात्राः पुनस्त्रिविधाः—मृदुमृदुर्मध्यमृदुस्तीव्रमृदुरिति । तथा मृदुमध्यो मध्यमध्यस्तीव्रमध्य इति । तथा मृदुतीव्रो मध्यतीव्रोऽतिमात्रतीव्र इति । एवमेकाशीतिभेदा हिंसा भवति ।

सा पुनर्नियमविकल्पसमुच्चयभेदादसङ्ख्येया प्राणभृद्भेदस्यापरिसङ्ख्येयत्वादिति । एवमनृतादिष्वपि योज्यम् । ते खल्वमी वितर्काः—दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् । दुःखमज्ञानं चानन्तं फलं येषामिति प्रतिपक्षभावनम् । तथा च हिंसकस्तावत्प्रथमं बध्यस्य वीर्यमाक्षिप्तति, ततश्च शस्त्रादिनिपातेन दुःखयति । ततो जीवितादपि मोचयति । ततो वीर्याक्षेपादस्य चेतनाचेतनमुपकरणं क्षीणवीर्यं भवति । दुःखोत्पादान्नरकतिर्यक्प्रेतादिषु दुःखमनुभवति ।

जीवन्तव्यपरोपणात्प्रतिक्षणं च जीवितात्यये वर्तमानो मरणमिच्छन्नपि दुःखविपाकस्य नियतविपाकवेदनीयत्वात्कथम्चिदेवोच्छ्वसिति । यदि च कथम्चित्पुण्यावापगता हिंसा भवेत्, तत्र सुखप्राप्तौ भवेदल्पायुरिति । एवमनृतादिष्वपि योज्यं यथासम्भवम् । एवं वितर्काणां चामुमेवानुगतं विपाकमनिष्टं भावयन्न वितर्केषु मनः प्रणिदधीत ॥३४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — इसमें हिंसा प्रथम—कृत, कारित, और अनुमोदित, इस प्रकार त्रिविध है। प्रत्येक पुनः त्रिविध—लोभ से मांस और चर्म के लिए, क्रोध से इसने अपकार किया, मोह से मेरा धर्म होगा। लोभ, क्रोध, और मोह पुनः त्रिविध—मृदु, मध्य, और अधिमात्र। इस प्रकार हिंसा के सैंतीस भेद होते हैं। मृदु मध्य अधिमात्राः पुनः त्रिविधाः मृदु मृदुः मध्य मृदुः तीव्र मृदुः इति मृदु, मध्य, और अधिमात्र पुनः त्रिविध—मृदु-मृदु, मध्य-मृदु, तीव्र-मृदु।

तीव्रः इति तथा मृदु-तीव्र, मध्य-तीव्र, अति मात्र-तीव्र। इस प्रकार हिंसा के इक्यासी भेद होते हैं। इति वह पुनः नियम, विकल्प, और समुच्चय भेद से असंख्य है, क्योंकि प्राणियों के भेद अपरिसंख्य हैं। इस प्रकार अनृत आदि में भी योजनीय है। वे ये वितर्क—दुख और अज्ञान के अनन्त फल वाले, इस प्रकार प्रतिपक्ष का भावन। जिनके दुख और अज्ञान अनन्त फल हैं, यह प्रतिपक्ष का भावन।

तथा च हिंसकः तावत् प्रथमम् बध्यस्य वीर्यम् आक्षिप्तति ततः च शस्त्र आदि निपातेन दुःखयति और हिंसक प्रथम बध्य का वीर्य आक्षेप करता है, फिर शस्त्र आदि के प्रहार से दुख देता है। फिर जीवित से भी मुक्त करता है। वीर्य आक्षेप से उसका चेतन और अचेतन उपकरण क्षीण वीर्य हो जाता है। दुख उत्पन्न करने से नरक, तिर्यक, प्रेत आदि में दुख अनुभव करता है। जीवित का अपरोपण करने से प्रतिक्षण जीवित के अत्यय में रहता हुआ, मरण चाहते हुए भी दुख विपाक के नियत वेदनीय होने से किसी प्रकार सांस लेता है।

यदि किसी प्रकार पुण्य प्राप्त करने वाली हिंसा हो, तो सुख प्राप्ति में अल्पायु होता है। इस प्रकार अनृत आदि में भी यथासंभव योजनीय है। इस प्रकार वितर्कों के इस अनिष्ट विपाक का भावन करके मन को वितर्कों में न लगाए।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — स्वामी ओमानन्द तीर्थ हिंसा के उदाहरण से अन्य सभी वितर्कों को समझाने का निर्देश देते हैं। हिंसा तीन प्रकार की होती है—स्वयं की हुई, दूसरों से करायी हुई और दूसरों के किए जाने पर समर्थन की हुई। कारणों के अनुसार इसके तीन भेद होते हैं—लोभ, क्रोध और मोह, जिससे कुल 9 प्रकार की हिंसा बनती है। इन 9 प्रकारों को मृदु, मध्य और अधिमात्रा के भेद से 27 और फिर 81 प्रकारों में विभाजित किया गया है। 'भोजवृत्ति' के अनुसार लोभ का अर्थ तृष्णा है और आत्मभिन्न शरीर आदि का मोह क्लेश का कारण बनता है। अज्ञान या मिथ्याज्ञान का अर्थ संशयात्मक होना है, जो रजोगुण और तमोगुण उत्पन्न कर मनुष्य को दुःख और अज्ञान में डाल देता है। श्रीव्यासजी महाराज बताते हैं कि हिंसक पशु के बल का नाश करता है, जिससे हत्यारे के स्वयं के शरीर, इंद्रिय और धन के उपकरण नष्ट हो जाते हैं। हिंसा से प्राप्त पुण्य का फल भी अल्पायु ही होता है, इसलिए इन सभी वितर्कों के अनिष्ट-फल का चिन्तन करके उनसे मन को हटाना चाहिए।

2.35 · साधनपाद सूत्र ३५

सूत्र २.३५

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ २.३५ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 442

शब्दार्थ — अहिंसा · प्रतिष्ठायाम् · तत् · सन्निधौ · वैर · त्यागः

अर्थ — अहिंसाकी दृढ़ स्थिति हो जानेपर उस ( अहिंसक योगी ) के निकट सब प्राणियोंका वैर छूट जाता है ।

व्यासभाष्य

प्रतिपक्षभावनाहेतोर्हेया वितर्का यदास्य स्युरप्रसवधर्माणः, तदा तत्कृतमैश्वर्यं योगिनः सिद्धिसूचकं भवति । तद्यथा—

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अहिंसा की प्रतिष्ठा में उसके सान्निध्य में वैर का त्याग। सर्वप्राणिनां भवति ॥ ३५॥ सर्व प्राणिनाम् भवति सभी प्राणियों का होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — 'सर्वप्राणिनां भवति' सूत्र के अंत में यह वाक्यशेष है कि जब योगी की अहिंसा-पालन में दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब उसके प्रभाव से निकटवर्ती हिंसक प्राणियों की भी अहिंसक वृत्ति हो जाती है। अहिंसानिष्ठ योगी की सात्त्विक धारा इतनी प्रबल होती है कि वह तामसी हिंसक अन्तःकरण को प्रभावित कर हिंसा त्यागने पर विवश कर देती है। जब दो ऐसे व्यक्तियों का सम्पर्क होता है जिनमें एक में अच्छाई और दूसरे में बुराई के गुण परिपक्व हों, तो उनमें भारी संघर्ष चलता है जिसमें अधिक शक्तिशाली पक्ष दूसरे को परास्त कर देता है। यदि हिंसक स्वभाव प्रबल है, तो वह अहिंसक को भी द्वेषपूर्ण बना देगा, जिसे अहिंसक की हार और हिंसक की जीत समझना चाहिए। इसके विपरीत, यदि अहिंसा का स्वभाव बलवान है, तो वह हिंसक के मन में सद्भावना उत्पन्न कर उसे बदल देगा, जिससे अहिंसा की हिंसा पर विजय प्राप्त होती है। उदाहरणस्वरूप, देश विभाजन के समय महात्मा गाँधी ने अपने प्राणों की बलि देकर साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने का सफल प्रयास किया।

2.36 · साधनपाद सूत्र ३६

सूत्र २.३६

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ २.३६ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 443

शब्दार्थ — सत्य · प्रतिष्ठायाम् · क्रिया · फल · आश्रयत्वम्

अर्थ — सत्यमें दृढ़ स्थिति हो जानेपर क्रिया फलका आश्रय बनती है।

व्यासभाष्य

धार्मिको भूया इति भवति धार्मिकः । स्वर्गं प्राप्नुहीति स्वर्गं प्राप्नोति । अमोघास्य वाग्भवति ॥३६॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — धार्मिक बन, ऐसा कहने से धार्मिक बनता है। स्वर्ग प्राप्त कर, ऐसा कहने से स्वर्ग प्राप्त करता है। उसकी वाणी अमोघ होती है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जिस योगीकी सत्यमें दृढ़ स्थिति हो गयी है, उसकी वाणीसे कभी असत्य नहीं निकलेगा; क्योंकि वह यथार्थ ज्ञानका रखनेवाला हो जाता है। उसकी वाणी अमोघ हो जाती है। उसकी वाणीद्वारा जो क्रिया होती है, उसमें फलका आश्रय होता है अर्थात् जैसे किसीको यज्ञादिक क्रियाके करनेमें उसका फल होता है, इसी प्रकार योगीके केवल वचनसे ही वह फल मिल जाता है। यदि वह किसीसे कहे कि तू धर्मात्मा अथवा सुखी हो जा तो वह ऐसा ही हो जाता है।

सत्यनिष्ठ योगीके निरन्तर ऐसी भावना और धारणा रखनेसे कि उसके मुखसे न केवल भूत और वर्तमानके सम्बन्धमें किंतु भविष्यमें होनेवाली घटनाओंके सम्बन्धमें भी कोई असत्य वचन न निकलने पावे, सत्यकी प्रबलतासे उसका अन्तःकरण इतना स्वच्छ और निर्मल हो जाता है कि उसकी वाणीसे वही बात निकलती है जो क्रियारूपमें होनेवाली होती है।

2.37 · साधनपाद सूत्र ३७

सूत्र २.३७

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥ २.३७ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 443

शब्दार्थ — अस्तेय · प्रतिष्ठायाम् · सर्व · रत्न · उपस्थानम्

अर्थ — अस्तेय की प्रतिष्ठा में सभी रत्नों का उपस्थान।

व्यासभाष्य

सर्वदिक्स्थान्यस्योपतिष्ठन्ते रत्नानि ॥३७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — सभी दिशाओं में स्थित रत्न उसके लिए उपस्थित होते हैं।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जिसने रागको पूर्णतया त्याग दिया है , वह सब प्रकारकी सम्पत्तिका स्वामी है । उसको किसी चीजकी कमी नहीं रहती । इसमें एक आख्यायिका है— किसी निर्धन पुरुषने बड़ी आराधनाके पश्चात् धन - सम्पत्तिकी देवीके दर्शन किये । उसके पैरोंकी एड़ी और मस्तिष्क घिसा हुआ देखकर उसको आश्चर्य हुआ । अपने भक्तकी आग्रहपूर्वक विनयपर उसको बतलाना पड़ा कि जो मुझसे राग रखते हैं और धर्म - अधर्मका विवेक त्यागकर मेरे पीछे मारे - मारे फिरते हैं , उनको ठुकराते हुए पैरकी एड़ी घिस गयी है और जिन्होंने ईश्वर - प्रणिधानका आसरा लेकर मुझमें राग छोड़ दिया है तथा मुझसे दूर भागते हैं , उनको रिझाने और अपनी ओर प्रवृत्त करनेके लिये उनकी चौखटपर रगड़ते - रगड़ते मस्तिष्क घिस गया है ।

2.38 · साधनपाद सूत्र ३८

सूत्र २.३८

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥ २.३८ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 444

शब्दार्थ — ब्रह्मचर्य · प्रतिष्ठायाम् · वीर्य · लाभः

अर्थ — ब्रह्मचर्यकी दृढ़ स्थिति होनेपर वीर्यका लाभ होता है ।

व्यासभाष्य

यस्य लाभादप्रतिघान्गुणानुत्कर्षयति । सिद्धश्च विनेयेषु ज्ञानमाधातुं समर्थो भवतीति ॥३८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — जिसके लाभ से अप्रतिघ गुणों को उत्कर्ष करता है। सिद्ध होकर विनयशीलों में ज्ञान स्थापित करने में समर्थ होता है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — वीर्य ही सब शक्तियोंका मूल कारण है । उसके पूर्णतया रोकनेसे शारीरिक , मानसिक और आत्मिक शक्तियाँ बढ़ जाती हैं । तथा योगमार्गमें बिना रुकावट पूरी उन्नति हो सकती है । वह विनय करनेवाले जिज्ञासुओंको ज्ञान प्रदान करनेमें समर्थ हो जाता है । अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः ॥ ३ ९ ॥

2.39 · साधनपाद सूत्र ३९

सूत्र २.३९

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः ॥ २.३९ ॥

साधनपाद · सूत्र २.३९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 444

अर्थ — अपरिग्रहकी स्थिरतामें जन्मके कैसेपनका साक्षात् होता है ।

व्यासभाष्य

अस्य भवति । कोऽहमासं ? कथमहमासं ? किं स्विदिदं ? कथं स्विदिदं ? के वा भविष्यामः ? कथं वा भविष्यामः ? इत्येवमस्य पूर्वान्तपरान्तमध्येष्वात्मभावजिज्ञासा स्वरूपेणोपावर्तते । एता यम्स्थैर्ये सिद्धयः ॥३९॥

(इस भाष्यांशका हिन्दी अनुवाद इस संस्करणमें नहीं है।)

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — सूत्रके अन्तमें ' अस्य भवति ' शेष है । अपरिग्रहकी व्याख्यामें बतला आये हैं कि योगीके लिये सबसे बड़ा परिग्रह अविद्या , रागादि क्लेश और शरीरमें अहंत्व और ममत्व है । इनके त्यागनेसे उसका चित्त शुद्ध , निर्मल होकर यथार्थ ज्ञान प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है । इससे उसको भूत और भविष्य जन्मका ज्ञान हो जाता है कि इससे पूर्व जन्म क्या था , कैसा था , कहाँ था ? यह जन्म किस प्रकार हुआ , आगे कैसा होगा । इस प्रकार इसकी तीनों कालमें आत्मस्वरूपकी जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है ।

2.40 · साधनपाद सूत्र ४०

सूत्र २.४०

शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥ २.४० ॥

साधनपाद · सूत्र २.४०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 444

शब्दार्थ — शौचात् · स्वाङ्ग · जुगुप्सा · परैर् · असंसर्गः

अर्थ — शौचसे अपने अङ्गोंसे घृणा और दूसरोंसे …

व्यासभाष्य

स्ववाङ्गे जिगुप्सायां शौचमारम्भमाणः कायावद्यदर्शी कायानभिष्वङ्गी यतिर्भवति। किं च, परिरसंसर्गः कायस्वभावावलोकी स्वमपि कायं जिहासुर्मज्जलादिभिराक्षालयन्नपि कायशुद्धिमपश्यन्कथं परकायैरत्यन्तमेवाप्रयतैः संसृज्येत ॥४०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — नामेषु वक्ष्यामाः नियमों में कहेंगे— शौचात् स्वाङ्ग जुगुप्सा परैर् असंसर्गः शौच से स्वांग के प्रति जुगुप्सा और परों से असंसर्ग। स्व अंगी जिगुप्सायां शौचम् आरम्भमाणः काय अवद्य दर्शी काय अनभिष्वङ्गी यतिः भवति किम् च परि असंसर्गः काय स्वभाव अवलोकी स्वम् अपि कायम् जिहासुः मृत् जल आदि बिः आक्षालयन काय शुद्धिम् अपश् यन् कथम पर कायैः अत्यन्तम् एव अप्रयतैः संसृज्येत् स्व अंग में जिगुप्सा होने पर शौच आरम्भ करने वाला, काय के अवद्य को देखकर, काय में अनभिष्वंगी यति बनता है। और क्या, परों से असंसर्ग, काय के स्वभाव को देखकर स्वयं अपने काय को भी त्यागने की इच्छा वाला, मिट्टी और जल आदि से आक्षालयन करने पर भी काय शुद्धि न देखकर, अत्यंत अप्रयत पर कायों से कैसे संसर्ग करेगा।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — संसर्गका अभाव होता है शौचके निरन्तर अभ्याससे योगीका — वस्तुओंके भण्डार इस शरीरकी अशुद्धियाँ दीखने लगती हृदय शुद्ध हो जाता है , उसको मल - मूत्रादि अपवित्र हेतुसे उसका संसर्ग दूसरोंसे भी नहीं रहता । वह इस शरीरसे हैं । इसमें परे सबसे राग और ममत्व छूट जाता है । इसी अलग रहते हुए केवली होनेका यत्न करता है । यह शरीरशुद्धिका फल है ।

2.41 · साधनपाद सूत्र ४१

सूत्र २.४१

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥ २.४१ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 445

शब्दार्थ — सत्त्व · शुद्धि · सौमनस्य · एकाग्र्य · इन्द्रिय · जय · आत्म · दर्शन · योग्यत्वानि · च

अर्थ — चित्तकी शुद्धि , मनकी स्वच्छता , एकाग्रता , इन्द्रियोंका जीतना और आत्मदर्शनकी योग्यता आभ्यन्तर शौचकी सिद्धिसे प्राप्त होती है ।

व्यासभाष्य

भवन्तीति वाक्यशेषः। शुचेः सत्त्वशुद्धिः, ततः सौमनस्यम्, तत ऐकाग्र्यम्, तत इन्द्रियजयः, ततश्चातमदर्शनयोग्येन, बुद्धिसत्त्वस्य भवतीत्येतच्छौचस्थायादधिगम्यति ॥ ११॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — किम् च और क्या, सत्त्व शुद्धि सौमनस्य एकाग्र्य इन्द्रिय जय आत्म दर्शन योग्यत्वानि च सत्त्व शुद्धि, सौमनस्य, एकाग्र्य, इन्द्रिय जय, और आत्म दर्शन की योग्यता भी। यह वाक्य शेष है—शौच से सत्त्व शुद्धि, ततः सौमनस्य, ततः एकाग्र्य, ततः इन्द्रिय जय, और ततः आत्म दर्शन की योग्यता, बुद्धि सत्त्व का होता है, यह शौच के स्थ्य से प्राप्त होता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सूत्र के अंत में 'भवन्ति' शब्द यह दर्शाता है कि आंतरिक शुद्धि की दृढ़ स्थिति होने पर तमस और रजस के आवरण धुल जाने से चित्त निर्मल हो जाता है। मन के स्वच्छ होने से उसकी एकाग्रता बढ़ती है और इस एकाग्रता से इंद्रियों का वशीकार होकर वे बहिर्मुख से अन्तर्मुख हो जाती हैं। कठोपनिषद् (अ०२, वल्ली १, मन्त्र १) के अनुसार सामान्य मनुष्य अपनी इंद्रियों के छेदों को बाहर की ओर करके बाहर देखता है। इसके विपरीत कोई भी धीर पुरुष अमृत की इच्छा से अपनी आँखों यानी इंद्रियों को बंद करके अन्तर्मुख होकर अपने भीतर स्थित आत्मा को देखता है। इस प्रकार इंद्रियों के वश में होने से चित्त में विवेकख्यातिरूपी आत्मदर्शन की योग्यता प्राप्त होती है। अंततः संतोषादनुत्तमसुखलाभः (४२) के अनुसार इससे परम सुख की प्राप्ति होती है।

2.42 · साधनपाद सूत्र ४२

सूत्र २.४२

सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥ २.४२ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 445

शब्दार्थ — संतोषात् · अनुत्तमः · सुख · लाभः

अर्थ — संतोषसे अनुत्तम सुख प्राप्त होता है ।

व्यासभाष्य

तथा चोक्तं— यच्च कामसुखं लोके यच्च तिव्यं महत्सुखम्। तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ इति ॥४२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ऐसा कहा गया—जो काम सुख लोक में और जो तीव्रं महात् सुख है, वे तृषा क्षय सुख की सोलहवीं कला के योग्य नहीं हैं।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — अनुत्तम सुख - उत्तम - से- उत्तम सुख अर्थात् जिससे बढ़कर कोई और सुख न हो । संतोषमें जब पूरी स्थिरता हो जाती है , तब तृष्णाका नितान्त नाश हो जाता है । तृष्णारहित होनेपर जो प्रसन्नता तथा सुख प्राप्त होता है , उसके एक अंशके समान भी बाह्य सुख नहीं हो सकता । व्यासजीका कथन है— यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ संसारमें जो कामसुख है और जो महान् दिव्य सुख है , वह तृष्णाके क्षयके सुखके सोलहवें अंशके समान भी नहीं है । बिन संतोष नहीं कोई राजे । सकल मनोरथ बृथे सब काजे ॥ ( गुरुनानक ) कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥ ४३ ॥

2.43 · साधनपाद सूत्र ४३

सूत्र २.४३

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥ २.४३ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 445

शब्दार्थ — काय · इन्द्रिय · सिद्धिः · अशुद्धि · क्षायात् · तपसः

अर्थ — तपसे अशुद्धिके क्षयके होनेसे शरीर और इन्द्रियोंकी ( ४१ ९ )

व्यासभाष्य

निर्वर्त्यमानमेव तपो हिनस्त्यशुद्ध्यावरणफलम्। तदावरणमलापागमात्कायसिद्धिरणिमाद्या, तथेन्द्रियसिद्धिर्दूराश्रवणदर्शनाद्येति ॥४३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — निर्वाहन करने वाला तप ही अशुद्धि के आवरण फल को नष्ट करता है। उस आवरण मल के अपगम से काय की सिद्धि जैसे अणिमा आदि, और इन्द्रियों की सिद्धि जैसे दूर श्रवण, दर्शन आदि।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — जिस प्रकार लोहेको बार - बार आगपर तपाने और अहिरनपर कूटनेसे उसके मल दूर हो जाते हैं और उसको इच्छानुसार काममें ला सकते हैं , इसी प्रकार तपके निरन्तर अनुष्ठानसे अशुद्धियोंके मलोंकेदूर होनेपर शरीर स्वस्थ , स्वच्छ और लघु हो जाता है , उसमें अणिमा आदि सिद्धियाँ ( ३ । ४४ , ४५ ) आ जाती हैं और इन्द्रियाँ दिव्य - दर्शन , दिव्य - श्रवण , दूर - श्रवण ( ३ । ४८ ) आदि सिद्धियोंको प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाती हैं ।

2.44 · साधनपाद सूत्र ४४

सूत्र २.४४

स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः ॥ २.४४ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 446

शब्दार्थ — स्वाध्यायात् · इष्ट · देवता · संप्रयोगः

अर्थ — स्वाध्यायसे इष्टदेवताका साक्षात् होता है ।

व्यासभाष्य

देवा ऋषयः सिद्धाश्च स्वाध्यायशीलस्य दर्शनं गच्छन्ति, कार्ये चास्य वर्तन्त इति ॥४४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — स्वाध्यायात् इष्ट देवता संप्रयोगः स्वाध्याय से इष्ट देवता का संप्रयोग।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — स्वाध्यायशीलको देवता , ऋषियों और सिद्धोंके दर्शन होते हैं और वे इसके योगकार्योंमें सहायक होते हैं । ( व्यासभाष्य ) इष्ट - मन्त्रके जपरूप स्वाध्यायके सिद्ध होनेपर योगीको इष्टदेवताका योग होता है अर्थात् वह देवता प्रत्यक्ष होता है । ( भोजवृत्ति ) उपासनामें उपास्यके गुणोंको धारण करना , उसमें अवस्थित होना अर्थात् उसके तदाकार होना होता है । उपास्यके जिन इष्ट गुणों अथवा आकारविशेषकी भावनाके साथ किसी विशेष मन्त्र अथवा बिना मन्त्रके धारणा की जाती है तब ध्यानकी परिपक्व अवस्थामें रजस् और तमस्से शून्य हुआ चित्त सात्त्विक प्रकाशमें उस विशेष इष्ट आकारमें परिणत हो जाता है । जैसा कि समाधिपाद सूत्र १८ के विशेष वक्तव्यमें साकार - उपासक भक्तोंके सम्बन्धमें बतलाया गया है । समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥

अन्य स्रोत: व्यासभाष्य, भोजवृत्ति

2.45 · साधनपाद सूत्र ४५

सूत्र २.४५

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ २.४५ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 446

अर्थ — समाधिकी सिद्धि ईश्वर - प्रणिधानसे होती है ।

व्यासभाष्य

ईश्वरार्पितसर्वभावस्य समाधिसिद्धिर्यया सर्वमीप्सितभवितथं जानाति देशान्तरे देहान्तरे कालान्तरे च । ततोऽस्य प्रज्ञा यथाभूतं प्रजानातीति ॥४५॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ईश्वर को समर्पित सर्व भाव वाले की समाधि सिद्धि, जिससे वह देश, देह, और कालान्तरे में सर्व इच्छित भवितव्य को जानता है। इससे उसकी प्रज्ञा यथाभूत जानती है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — ईश्वर की भक्ति और समस्त कर्मों तथा उनके फलों के समर्पण से दूर होकर समाधि शीघ्र सिद्ध हो जाती है। इस समाधिप्रज्ञा से योगी देहान्तर और यहाँ होने वाले अभिमत पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ईश्वर-प्रणिधान से ही योग के अन्य सात अंगों के अनुष्ठान की आवश्यकता पर शंका नहीं करनी चाहिए क्योंकि इन सातों योगांगों का लाभ प्राप्त हो जाता है। ईश्वर-प्रणिधान के भी उपयोगी साधन बिना ईश्वर-प्रणिधान के अनुष्ठान से नाना प्रकार के विघ्न उपस्थित होने से दीर्घकाल में होते हैं। ईश्वर-प्रणिधानरहित सातों अंगों के ईश्वर-प्रणिधानसहित योगांगों के अनुष्ठान से निर्विघ्नता के समाधिका लाभ प्राप्त होता है। अतः योगाभिलाषीजनों को ईश्वर-प्रणिधान सहित योग के साथ शीघ्र ही समाधिसिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसलिए सभी अंगों का अनुष्ठान करना चाहिए।

2.46 · साधनपाद सूत्र ४६

सूत्र २.४६

स्थिरसुखमासनम् ॥ २.४६ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४६पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 446

शब्दार्थ — स्थिर · सुखम् · आसनम्

अर्थ — जो स्थिर और सुखदायी हो वह आसन हो है ; आसनम् । - वह आसन है । ( ४२० )

व्यासभाष्य

तद्यथा तद्मासनम्, वीरसनम्, भद्रसनम्, स्वस्तिकम्, दण्ड्यासनम्, सौपाश्रयम्, परियङ्कम्, क्रौञ्जनिषदनम्, हस्तिनिषदनम्, उष्ट्रनिषदनम्, समसनस्थानम्, स्थिरसुखं यथासुखं चेत्यवमादीनि ॥१६॥

(इस भाष्यांशका हिन्दी अनुवाद इस संस्करणमें नहीं है।)

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — स्वामी ओमानन्द तीर्थ के अनुसार आसन वह है जिसमें बिना किसी कष्ट के सुखपूर्वक और निश्चलता के साथ दीर्घकाल तक बैठा जा सके। हठयोग में शरीर को स्वस्थ और योग-साधन के योग्य बनाने वाले कई आसन हैं, जिनमें से स्वस्तिकासन, सिद्धासन, समासन, पद्मासन, बद्धपद्मासन, वीरासन, गोमुखासन, वज्रासन और सरलासन अधिक उपयोगी हैं। साधक को अपनी सुगमता के अनुसार किसी एक आसन का चयन कर उस पर अभ्यास करना चाहिए।

योगिक क्रियाओं में मूलबन्ध, उड्डीयान-बन्ध, जालन्धर-बन्ध, महाबन्ध, महावेध, खेचरी मुद्रा, महामुद्रा, अश्विनी मुद्रा, शक्तिचालिनी मुद्रा, योनिमुद्रा, योगमुद्रा, शाम्भवी मुद्रा, तड़ागी मुद्रा, विपरीतकरणी मुद्रा, वज्रोली मुद्रा, उन्मुनि मुद्रा और विभिन्न प्रकार के अन्य आसन जैसे भुजङ्गासन, धनुरासन आदि बताए गए हैं। इन आसनों को करते समय शरीर की स्थिति सीधी रखनी चाहिए और मूलबन्ध तथा खेचरी मुद्रा का प्रयोग ध्यान में सहायक होता है।

योग अभ्यास के लिए शुद्ध, शांत और निर्विघ्न स्थान का चयन करना चाहिए और खान-पान में संयम रखना आवश्यक है। स्वामी जी ने विभिन्न आसनों जैसे ताड़ासन, गरुडासन, भुजङ्गासन, शलभासन आदि की विधियाँ और उनके फल विस्तार से बताए हैं। अंत में यह स्पष्ट किया गया है कि केवल शारीरिक क्रियाओं या गुफा में बैठने को ही समाधि समझना गलत है, क्योंकि वास्तविक समाधि योगदर्शन के अनुसार तीव्र वैराग्य और ध्यान द्वारा वृत्तियों के निरोध से प्राप्त होती है।

2.47 · साधनपाद सूत्र ४७

सूत्र २.४७

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥ २.४७ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४७पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 475

शब्दार्थ — प्रयत् · शीथिल्या · अनन्त · समापति · भ्याम्

अर्थ — ( आसन ) प्रयत्नकी शिथिलता और आनन्त्यमें समापत्तिद्वारा सिद्ध होता है ।

व्यासभाष्य

भवतीति वाक्यशेषः । प्रयत्नोपरमात्सिध्यत्यासनं येन नाङ्गमेजयो भवति । अनन्ते वा समापन्नं चित्तमासनं निर्वर्तयतीति ॥४७॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — यह वाच्य शेष है। प्रययना के उपरम से आसन सिद्ध होता है, जिससे अंगों का जाय नहीं होता। या अनंत में समापन्न चित्त आसन को सिद्ध करता है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — सूत्र के अंत में 'भवति' शब्द शेष है, जहाँ प्रयत्न का अर्थ स्वाभाविक शरीर की चेष्टा और उस चेष्टा से अंगमेजयत्व को रोकने की शिथिलता है। इस प्रयत्न की शिथिलता से आसन सिद्ध होता है, जिसका अर्थ है कि चित्त को परिच्छिन्न पदार्थों से हटाकर अपरिच्छिन्न आकाशादि में स्थित अनन्तता के रूप में तदाकार करना चाहिए। शरीर और मन को क्रियारहित करने से शरीर का अध्यास छूट जाता है जिससे साधक भूला जैसा होकर लंबे समय तक सुखपूर्वक स्थिर बैठ सकता है।

टिप्पणी में बताया गया है कि व्यासभाष्य से इस सूत्र का पूर्ण स्पष्टीकरण नहीं होता, इसलिए टीकाकारों ने अनन्त के अर्थ भिन्न-भिन्न बताए हैं जैसे किसी ने अनन्त पदार्थ, किसी ने ईश्वर और वाचस्पति मिश्र तथा विज्ञानभिक्षु ने शेषनाग को कहा है। यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि समाधिसिद्धि से आसनसिद्धि होती है, किंतु समाधि से पूर्व प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान के चार अंगों की पूर्ति शेष रहती है।

चूँकि आसन साधन है और समाधि साध्य है, इसलिए यहाँ साध्य से साधन को सिद्ध करने का तात्पर्य है। लेखक ने इस सूत्र के अर्थ को 'भोजवृत्ति' के अनुसार स्पष्ट किया है कि जब चित्त को आकाश आदि में रहने वाली अनन्तता में व्यवधान-रहित तदाकार किया जाता है, तब उसकी तद्रूपता प्राप्त हो जाने पर शरीराभिमान के अभाव से देह की सुध न रहने से आसन दुःख का उत्पादक नहीं होता।

2.48 · साधनपाद सूत्र ४८

सूत्र २.४८

• ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥ २.४८ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४८पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 476

शब्दार्थ — ततः · त्वन्द्व · अनभिगातः

अर्थ — आसनकी सिद्धिसे द्वन्द्वोंकी चोट नहीं लगती …

व्यासभाष्य

शीतोष्णादिभिर्द्वन्द्वैरासनजयान्नाभिभूयते ॥४८॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — ततः त्वन्द्व अनभिगातः ततः सेना का अभिघात नहीं।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — आसन सिद्ध होनेपर योगीको गर्मी - सर्दी , भूख - प्यास आदि द्वन्द्व नहींसताते ।

2.49 · साधनपाद सूत्र ४९

सूत्र २.४९

तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥ २.४९ ॥

साधनपाद · सूत्र २.४९पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 476

शब्दार्थ — स्मिन् · सति · श् · वास · स् · श्वासकयो · गति · विच्छेदः · प्राणायामः

अर्थ — उसमें होने पर श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद प्राणायाम है।

व्यासभाष्य

सत्यासनजये बाह्यस्य वायोराचमनं श्वासः । कोष्ठ्यस्य वायोर्निःसारणं प्रश्वासः । तयोर्गतिविच्छेद उभयाभावः प्राणायामः ॥४९॥ स तु—

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — स्मिन् सति श् वास स् श्वासकयो गति विच्छेदः प्राणायामः उसमें होने पर श्वास और प्रश्वास की गति का विच्छेद प्राणायाम है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — बाहर की वायु का नासिका द्वारा प्रवेश और निकास को प्रश्वास कहते हैं। श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रेचक, पूरक और कुम्भक द्वारा बाह्य और आंतरिक दोनों स्थानों पर रोकने को प्राणायाम कहा जाता है। रेचक में बाहर की वायु को बाहर ही रोक देने से, पूरक में बाहरी वायु को शरीर के अंदर धारण करने से और कुम्भक में बिना किसी विशेष प्रयत्न के प्राणवायु को एक जगह रोक देने से श्वास-प्रश्वास की गति का अभाव हो जाता है। प्राणायाम इन तीन भेदों (रेचक, पूरक और कुम्भक) का अभ्यास सही आसन में बैठकर करना चाहिए। आश्रम के अनुसार आसन योग का स्वतंत्र अंग नहीं बल्कि प्राणायाम की सिद्धि का उपाय है। इसीलिए 'तस्मिन् सति' शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है आसन सिद्ध होने पर।

2.50 · साधनपाद सूत्र ५०

सूत्र २.५०

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥ २.५० ॥

साधनपाद · सूत्र २.५०पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 476

शब्दार्थ — बाह्य · आभ्यन्तर · स्तम्भ · वृत्तिः · देश · काल · संख्याभिः · परिदृष्टः · दीर्घ · सूक्ष्मः

अर्थ — बाह्य, आभ्यन्तर, और स्तम्भ वृत्ति, देश, काल, और संख्या से परिदृष्ट, दीर्घ और सूक्ष्म।

व्यासभाष्य

यत्र प्रश्वासपूर्वको गत्यभावः स बाह्यः । यत्र श्वासपूर्वको गत्यभावः स आभ्यन्तरः । तृतीयः स्तम्भवृत्तिर्यत्रोभयाभावः सकृत्प्रयन्ताद्भवति । यथा तप्ते न्यस्तमुपले जलं सर्वतः सङ्कोचमापद्यते, तथा द्वयोर्युगपद्भवत्यभाव इति । त्रयोऽप्येते देशेन परिदृष्टाः—इयानस्य विषयो देश इति । कालेन परिदृष्टाः क्षणानामियत्तावधारणेनावच्छिन्ना इत्यर्थः । सङ्ख्याभिः परिदृष्टाः—एतावद्भिः श्वासप्रश्वासैः प्रथम उद्घातस्तद्वन्निगृहीतस्यैतावद्भिर्द्वितीय उद्घात एवं तृतीयः । एवं मृदुरेवं मध्य एवं तीव्र इति सङ्ख्यापरिदृष्टः । स खल्वयमेवमभ्यस्तो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — स तु वह तो— काल संख्याभिः परिदृष्टः दीर्घ सूक्ष्मः बाह्य, आभ्यन्तर, और स्तम्भ वृत्ति, देश, काल, और संख्या से परिदृष्ट, दीर्घ और सूक्ष्म। यत्र प्रश्वास पूर्वकः गति अभावः स बाह्यः जहां प्रश्वास पूर्वक गति का अभाव है, वह बाह्य है। यत्र श्वास पूर्वकः गति अभावः स आभ्यन्तरः जहां श्वास पूर्वक गति का अभाव है, वह आभ्यन्तर है। तृतीयः स्तम्भ वृत्तिः यत्र उभय अभावः सकृत् प्रयन्तात् भवति तृतीय स्तम्भ वृत्ति, जहां दोनों का अभाव एक बार प्रयत्न से होता है।

यथा तप्ते न्यस्तम् उपले जलम् सर्वतः सङ्कोचम् आपद्यते तथा द्वयोः युगपत् भवति अभावः इति जैसे तप्त पत्थर पर रखा जल सर्वतः संकोच को प्राप्त करता है, वैसे ही दोनों का युगपत् अभाव होता है। त्रयः अपि एते देशेन परिदृष्टाः इयान् अस्य विषयः देशः इति तीनों भी देश से परिदृष्ट हैं—इसका विषय इतना देश है। कालेन परिदृष्टाः क्षणानाम् इयत्ता अवधारणेन अवच्छिन्नाः इति अर्थः काल से परिदृष्ट, क्षणों की इयत्ता के अवधारण से अवच्छिन्न, ऐसा अर्थ है।

सङ्ख्याभिः परिदृष्टाः—एतावद्भिः श्वास प्रश्वासैः प्रथम उद्घातः तत् एव तद्वत् निगृहीतस्य एतावद्भिः द्वितीय यद् एव तृतीयः संख्याओं से परिदृष्ट—इतने श्वास-प्रश्वासों से प्रथम उद्घात, उसी प्रकार निगृहीत के इतनों से द्वितीय, और तृतीय। एवम् मृदुः एवम् मध्यः एवम् तीव्रः इति सङ्ख्या परिदृष्टः इस प्रकार मृदु, मध्य, और तीव्र, संख्या से परिदृष्ट। स खलु अयम् एवम् अभ्यस्तः दीर्घ सूक्ष्मः वह यह इस प्रकार अभ्यास करने वाला दीर्घ और सूक्ष्म है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — स्वामी ओमानन्द तीर्थ के अनुसार प्राणायाम का अर्थ श्वास-प्रश्वास की गति को नियमपूर्वक रोकना है, जिसे तीन भेदों में विभाजित किया गया है। प्रथम पूरक या आभ्यन्तर-वृत्ति है जिसमें श्वास को नासिका से भीतर ले जाकर रोका जाता है, द्वितीय रेचक या बाह्य-वृत्ति है जिसमें प्रश्वास को बाहर निकालकर रोका जाता है, और तृतीय कुम्भक या स्तम्भ-वृत्ति है जिसमें श्वास-प्रश्वास दोनों की गति को एक साथ रोक दिया जाता है।

इन तीनों प्रकार के प्राणायामों को देश (दूरी), काल (समय) और संख्या (गिनती) के परिमाण से दीर्घ और सूक्ष्म बनाया जाता है, जिसकी परीक्षा नासिका के सामने रूई रखकर या समय की मात्राओं द्वारा की जाती है। योग का अंतिम लक्ष्य चित्त की वृत्तियों को रोकना है, इसलिए प्राण से संबंधित श्वास की गति को रोकने वाले प्राणायाम को योग का चौथा अंग माना गया है।

स्वामी जी बताते हैं कि पूरक और रेचक के माध्यम से श्वास की गति को रोककर 'पूरकसहित कुम्भक' या 'रेचकसहित कुम्भक' किया जाता है, जबकि बिना पूरक-रेचक के केवल कुम्भक ही किया जाता है। इसके अतिरिक्त एक चौथी विलक्षण क्रिया भी है जिसे योगदर्शन में 'चतुर्थ प्राणायाम' कहा गया है, जिसमें श्वास-प्रश्वास की गति को रोके बिना केवल रेचक पूरा किया जाता है।

पाठ में कुम्भक के आठ प्रकार बताए गए हैं जैसे सहित, सूर्यभेदी, उञ्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और प्लाविनी, जिनमें से भस्त्रिका और भ्रामरी विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। अंततः स्वामी जी कहते हैं कि राजयोगियों के लिए चतुर्थ प्राणायाम का अभ्यास अधिक हितकर है क्योंकि इससे प्राण और मन की स्थिरता प्राप्त होती है और आयु में वृद्धि होती है।

2.51 · साधनपाद सूत्र ५१

सूत्र २.५१

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ २.५१ ॥

साधनपाद · सूत्र २.५१पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 298

शब्दार्थ — बाह्य · आभ्यन्तर · विषय · आक्षेपी · चतुर्थः

अर्थ — बाह्य और आभ्यन्तर विषय का आक्षेपी चतुर्थ।

व्यासभाष्य

देशकालसङ्ख्याभिर्बाह्यविषयः परिदृष्ट आक्षिप्तः, तथाभ्यन्तरविषयाक्षः परिदृष्ट आक्षिप्तः, उभयथा दीर्घसूक्ष्मः । तत्पूर्वको भूमिजयात्क्रमेणोभयोर्गत्यभावश्चतुर्थः प्राणायामः । तृतीयस्तु विषयानालोचितो गत्यभावः सकृदारब्ध एव देशकालसङ्ख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः । चतुर्थस्तु श्वासप्रश्वासयोर्विषयावधारणात्क्रमेण भूमिजयादुभयाक्षेपपूर्वको गत्यभावश्चतुर्थः प्राणायाम इत्ययं विशेषः ॥५१॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — देश, काल, और संख्या से बाह्य विषय परिदृष्ट और आकृष्ट है। परिदृष्ट और आकृष्ट है। उभयथा दीर्घ सूक्ष्मः दोनों प्रकार से दीर्घ और सूक्ष्म। तत् पूर्वकः भूमि जयात् क्रमेण उभयोः गति अभावः चतुर्थः प्राणायामः तत्पूर्वक भूमि जय से क्रमशः दोनों की गति का अभाव चतुर्थ प्राणायाम है। विषय का अनालोचन करने वाला गति अभाव, एक बार आरब्ध, देश, काल, और संख्या से परिदृष्ट, दीर्घ और सूक्ष्म। चतुर्थ तु श्वास और प्रश्वास के विषय का अवधारण करने से क्रमशः भूमि जय।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — - व्यासभाष्य- देशकालसंख्याभिर्बाह्यविषयपरिदृष्ट आक्षिप्तः । तथाऽऽभ्यन्तरविषयपरिदृष्ट आक्षिप्तः । उभयथा दीर्घसूक्ष्मः । तत्पूर्वको भूमिजयात्क्रमेणो भयोर्गत्यभावश्चतुर्थः प्राणायामः । तृतीयस्तु विषयानालोचितो गत्यभावः सकृदारब्ध एव देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः । चतुर्थस्तु श्वासप्रश्वासयोर्विषयावधारणात्क्रमेण भूमिजयादुभयाक्षेपपूर्वको गत्यभावश्चतुर्थः (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)

2.52 · साधनपाद सूत्र ५२

सूत्र २.५२

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ २.५२ ॥

साधनपाद · सूत्र २.५२पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 491

शब्दार्थ — ततः · क्षीयते · प्रकाश · आवरणम्

अर्थ — उससे प्रकाशका आवरण ( विवेक ज्ञानका पर्दा ) क्षीण हो जाता है ।

व्यासभाष्य

प्राणायामानभ्यस्यतोऽस्य योगिनः क्षीयते विवेकज्ञानावरणीयं कर्म, यत्तदाचक्षते—« महामोहमयेनेन्द्रजालेन प्रकाशशीलं सत्त्वमावृत्य तदेवाकार्ये नियुङ्क्ते » इति । तदस्य प्रकाशावरणं कर्म संसारनिबन्धनं प्राणायामाभ्यासाद्दुर्बलं भवति प्रतिक्षणं च क्षीयते । तथा चोक्तम्—तपो न परं प्राणायामात्ततो विशुद्धिर्मलानां दीप्तिश्च ज्ञानस्य इति ॥५२॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — कर्म प्राणायाम का अभ्यास करने वाले इस योगी का विवेक ज्ञान को आवृत करने वाला कर्म क्षीण होता है। जो यह कहते हैं—महा मोह मय इन्द्रजाल से प्रकाशशील सत्त्व को आवृत कर वही अकार्य में नियुक्त करता है। उसका यह प्रकाश को आवृत करने वाला कर्म, संसार का निबंधन, प्राणायाम अभ्यास से दुर्बल होता है और प्रतिक्षण क्षीण होता है। ऐसा कहा गया—प्राणायाम से बढ़कर तप नहीं, ततः मलों की विशुद्धि और ज्ञान की दीप्ति।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — विवेक ज्ञानरूपी प्रकाश तम तथा रजोगुणके कारण अविद्यादि क्लेशोंके मलोंसे ढका हुआ है । प्राणायामके अभ्याससे जब यह आवरण क्षीण हो जाता है , तब वह प्रकाश प्रकट होने लगता है 1 जैसे पञ्चशिखाचार्यने कहा है- तपो न परं प्राणायामात् ततो विशुद्धिर्मलानां दीप्तिश्च ज्ञानस्य ॥ ‘ प्राणायामसे बढ़कर कोई तप नहीं है , उससे मल धुल जाते हैं और ज्ञानका प्रकाश होता है । ' इसी प्रकार मनु भगवान्‌का श्लोक है- दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः । तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ ‘ जैसे अग्निसे धौंके हुए स्वर्ण आदि धातुओंके मल नष्ट हो जाते हैं , इसी प्रकार प्राणायामके करनेसे इन्द्रियोंके मल नष्ट हो जाते हैं । ' (मूल स्कैन यहीं समाप्त हो जाता है)

2.53 · साधनपाद सूत्र ५३

सूत्र २.५३

धारणासु च योग्यता मनसः ॥ २.५३ ॥

साधनपाद · सूत्र २.५३पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 491

शब्दार्थ — धारणासु · च · योग्यता · मनसः

अर्थ — और धारणाओंमें मनकी योग्यता होती है ।

व्यासभाष्य

प्राणायामाभ्यासादेव प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य [यो.सू. १.३५] इति वचनात ॥५३॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — किम् च और क्या, मनसः धारणाओं में भी मन की योग्यता। प्राणायाम अभ्यास से ही, या प्रच्छर्दन और विधारणा से, प्राण का [यो.सू. १.३५] ऐसा वचन है।

व्याख्या · ओमानन्द तीर्थ — प्राणायामसे मन स्थिर होता है । जैसे कि ' प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ' पाद १ सूत्र ३४ में बतलाया है और उसमें धारणाकी ( जिसका वर्णन अगले पादमें किया जायगा ) योग्यता प्राप्त हो जाती है ।

2.54 · साधनपाद सूत्र ५४

सूत्र २.५४

स्वस्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥ २.५४ ॥

साधनपाद · सूत्र २.५४पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 491

शब्दार्थ — स्व · स्व · विषय · असंप्रयोगे · चित्तस्य · स्वरूप · अनुकारः · इव · इन्द्रियाणाम् · प्रत्याहारः

अर्थ — अपने-अपने विषयों के असंप्रयोग में चित्त के स्वरूप का अनुकरण करने जैसे इन्द्रियों का प्रत्याहार।

व्यासभाष्य

स्वविषयसंप्रयोगाभावे चित्तस्वरूपानुकार इवेति चित्तनिरोधे चित्तवन्निरुद्धानीन्द्रियाणि नेतरेद्रियजयवदुपायान्तरमपेक्षन्ते । यथा मधुकर्राजं मक्षिका उत्पतन्तमनूत्पतन्ति, निविशमानमनुनिविशन्ते तथेन्द्रियाणि चित्तनिरोधे निरुद्धानीत्येष प्रत्याहारः ॥५४॥

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — अपने विषय के संप्रयोग के अभाव में चित्त के स्वरूप का अनुकरण जैसे, चित्त निरोध में चित्त की तरह निरुद्ध इन्द्रियाँ, अन्य इन्द्रिय जय की तरह उपायान्तर की अपेक्षा नहीं करतीं। जैसे मधुमक्खी का राजा उड़ता है तो मक्खियाँ अनु उड़ती हैं, बैठता है तो अनु बैठती हैं, वैसे इन्द्रियाँ चित्त निरोध में निरुद्ध होती हैं, यह प्रत्याहार है।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — प्रत्याहार का अर्थ है इंद्रियों का बहिर्मुख विषयों से पीछे हटकर अंतर्मुख होना। जिस प्रकार मधु बनाने वाली मक्खियाँ चित्त के अधीन रहकर काम करती हैं, उसी प्रकार इंद्रियाँ भी चित्त के नियंत्रण में होती हैं। यम, नियम और प्राणायामादि के प्रभाव से जब चित्त बाहर के विषयों से विरक्त होकर समाहित होता है, तब इंद्रियाँ भी उसका अनुकरण करते हुए अंतर्मुख हो जाती हैं। इस अवस्था में चित्त तो आत्मतत्त्व की ओर अग्रसर होता है, परंतु इंद्रियाँ केवल बाह्य विषयों से विमुख होती हैं, इसलिए इसे 'अनुकार इव' यानी नकल जैसा कहा गया है। चित्त के निरुद्ध होने पर इंद्रियों के जीतने के लिए किसी अन्य उपाय की आवश्यकता नहीं रहती। कठोपनिषद् (२ । १ । १) के अनुसार, स्वयम्भूने अर्थात इंद्रियों के छेदों को बाहर की ओर बनाया गया है, जिसके कारण मनुष्य बाहर देखता है। कोई विरला धीर पुरुष अमृत की इच्छा से अपनी आँखों यानी इंद्रियों को बंद करके अंतर्मुख करता है और आंतरिक आत्मा को देखता है।

2.55 · साधनपाद सूत्र ५५

सूत्र २.५५

ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ २.५५ ॥

साधनपाद · सूत्र २.५५पातञ्जल योगप्रदीप (गीता प्रेस)पृ. 492

शब्दार्थ — ततः · परमा · वश्यता · इन्द्रियाणाम्

अर्थ — उस प्रत्याहारसे इन्द्रियोंका उत्कृष्ट वशीकार होता है ।

व्यासभाष्य

शब्दादिष्वव्यसनमिन्द्रियजय इति केचित। सक्तिर्व्यसनं व्यस्यत्येनं श्रेयस इति अविरुद्धा प्रतिपत्तिर्न्याय्या । शब्दादिसम्प्रयोगः स्वेच्छयेत्यन्ये । रागद्वेषाभावे सुखदुःखशून्यं शब्दादिज्ञानमिन्द्रियजय इति केचित। चित्तैकाग्र्यादप्रतिपत्तिरेवेति जैगीषव्यः । ततश्च परमा त्वियं वश्यता यच्चित्तनिरोधे निरुद्धानीन्द्रियाणि नेतरेन्द्रियजयवत्प्रयत्नकृतमुपायान्तरमपेक्षन्ते योगिन इति ॥५५॥ इति पतञ्जलिविरचिते योगसूत्रे द्वितीयः साधनपादः ।

भाष्य का हिन्दी अनुवाद — शब्द आदिषु अव्यसनम् इन्द्रिय जयः इति केचित् शब्द आदि में अव्यसन इन्द्रिय जय है, ऐसा कुछ कहते हैं। सक्तिः व्यसनम् व्यस्यति एनम् श्रेयसः इति अविरुद्धा प्रतिपत्तिः न्याय्या सक्ति व्यसन है, जो इसे श्रेयस से विचलित करता है, यह अविरुद्ध प्रतिपत्ति न्याय्य है। शब्द आदि सम्प्रयोगः स्वेच्छया इति अन्ये शब्द आदि का सम्प्रयोग स्वेच्छा से, ऐसा अन्य कहते हैं। राग द्वेष अभावे सुख दुःख शून्यम् शब्द आदि ज्ञानम् इन्द्रिय जयः इति केचित् राग और द्वेष के अभाव में सुख-दुख शून्य शब्द आदि ज्ञान इन्द्रिय जय है, ऐसा कुछ कहते हैं। चित्त एकाग्र्यात् अप्रतिपत्तिः एव इति जैगीषव्यः चित्त की एकाग्र्य से अप्रतिपत्ति ही, ऐसा जैगीषव्य कहता है। ततः च परमा तु इयम् वश्यता यत् चित्त निरोधे निरुद्धानि इन्द्रियानि न इतररत् इन्द्रिय जयवत् प्रयत्न कृतम् उपायमम अपरम् अपेक्षन्ते योगिनः इति तदनन्तर यह परम वश्यता कि चित्त निरोध में निरुद्ध इन्द्रियाँ, अन्य इन्द्रिय जय की तरह प्रयत्न कृत उपायान्तर की अपेक्षा नहीं करतीं, योगी के लिए।

व्याख्या-सार · ओमानन्द तीर्थ (संक्षेप) — स्वामी ओमानन्द तीर्थ ने सूत्र में वर्णित इन्द्रियों की परमवश्यता को व्याख्यायित करते हुए बताया है कि यह किसी विशेष विषय के प्रति आसक्ति न होने या शास्त्रसम्मत सेवन जैसे लक्षणों से भिन्न, चित्त की एकाग्रता के कारण विषयों में प्रवृत्ति का पूर्ण निरोध है। उन्होंने साधनपाद के उपसंहार में योग के अंगों, क्लेशों, कर्मों और विपाकों के स्वरूप व फलों सहित यम-नियमों, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार के परस्पर संबंधों को स्पष्ट किया है।

व्याख्या में तप, युक्ताहार, युक्ताहिकार, गायत्री मन्त्र की विशेष व्याख्या, अविद्या के उत्पत्तिस्थान, आवागमन और योगियों के अभिमतों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशेष विचार दिए गए हैं। इसमें हठयोग की छह क्रियाओं, पाश्चात्य आधुनिक विज्ञानों और आठ प्रकार के प्राणायामों का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने शरीर शोधन हेतु ओषधियों, कब्ज, जुकाम, दमा, वातविकार, प्रमेह, नींद न आने और आँखों व दाँतों के रोगों जैसे अनेक शारीरिक व्याधियों के उपचार हेतु विभिन्न अनुभूत नुस्खे दिए हैं। पाठ में पारा बाँधने की एक गोपनीय विधि का भी उल्लेख है, जिसे केवल जानकारी के उद्देश्य से दिया गया है। अंततः यह स्पष्ट किया गया है कि योग साधना के पाँच बहिरङ्ग साधन (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार) और तीन अन्तरङ्ग साधन (धारणा, ध्यान, समाधि) मिलकर 'संयम' कहलाते हैं।

उपसंहार

इन सूत्रों में दुःख के मूल कारणों (क्लेशों) को समझने से लेकर उनके उन्मूलन हेतु अष्टाङ्ग योग के अनुशासन तक का मार्ग दिखाया गया है। यह संपूर्ण क्रम साधक को विवेक-ख्याति और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाली एक सुव्यवस्थित आध्यात्मिक यात्रा है।

In English

Yoga Sutras of Patanjali: Sadhana Pada

This text explains the second chapter of the Yoga Sutras, focusing on Kriya Yoga. It describes how practices like austerity, self-study, and devotion help weaken mental afflictions to prepare the mind for Samadhi.

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — पातञ्जल योगदर्शन।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-09-27।

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