सौभवधोपाख्यान : श्रीकृष्ण द्वारकापुरी से अनुपस्थित रहकर किस महान कार्य की सिद्धि कर रहे थे?
शत्रु दमन और धर्म रक्षा
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → अर्जुनाभिगमनपर्व · अध्याय 14–22 · पृष्ठ 140–188
सूत ने युधिष्ठिर से कहा
पाण्डवों के वनगमन के समय युधिष्ठिर के प्रश्नों के उत्तर हेतु
युधिष्ठिर ने पूछा— "वृष्णिकुल को आनन्दित करने वाले श्रीकृष्ण! जब यहाँ द्यूतक्रीडा का आयोजन हो रहा था, तब तुम द्वारका में क्यों अनुपस्थित रहे? उन दिनों तुम्हारा निवास कहाँ था और उस प्रवास द्वारा तुमने कौन-सा कार्य सिद्ध किया?"
असांनिध्यं कथं कृष्ण तवासीद् वृष्णिनन्दन ।
क्व चासीद् विप्रवासस्ते किं चाकार्षीः प्रवासतः ॥
युधिष्ठिरने कहा- वृष्णिकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीकृष्ण! जब यहाँ द्यूतक्रीडाका आयोजन हो रहा था, उस समय तुम द्वारकामें क्यों अनुपस्थित रहे? उन दिनों तुम्हारा निवास कहाँ था और उस प्रवासके द्वारा तुमने कौन- सा कार्य सिद्ध किया?
श्रीकृष्ण बोले— "भरतवंश शिरोमणे! कुरुकुलभूषण! मैं उन दिनों शाल्व के 'सौभ' नामक नगराकार विमान को नष्ट करने के लिए गया हुआ था। इसका क्या कारण था, वह बतलाता हूँ, सुनिये। भरतश्रेष्ठ! आपके राजसूय यज्ञ में अग्रपूजा के प्रश्न को लेकर जो क्रोध के वशीभूत इस कार्य को नहीं सह सका था और इसीलिये जिस दुरात्मा, महातेजस्वी, महाबाहु एवं महायशस्वी दमघोषनन्दन वीर राजा शिशुपाल को मैंने मार डाला था; उसकी मृत्यु का समाचार सुनकर शाल्व प्रचण्ड रोष से भर गया। भारत! मैं तो यहाँ हस्तिनापुर में था और वह हमलोगों से सूनी द्वारकापुरी में जा पहुँचा। राजन्! वहाँ वृष्णिवंश के श्रेष्ठ कुमारों ने उसके साथ युद्ध किया। वह इच्छानुसार चलने वाले 'सौभ' नामक विमान पर बैठकर आया और क्रूर मनुष्य की भाँति यादवों की हत्या करने लगा।"
"उस खोटी बुद्धि वाले शाल्व ने वृष्णिवंश के बहुतेरे बालकों का वध करके नगर के सब बगीचों को उजाड़ डाला। महाबाहो! उसने यादवों से पूछा— 'वह वृष्णिकुल का कलङ्क, मन्दात्मा वसुदेवपुत्र वासुदेव कहाँ है? उसे युद्ध की बड़ी इच्छा रहती है, आज उसके घमण्ड को मैं चूर कर दूँगा। आनर्त निवासियों! सच-सच बतला दो कि वह कहाँ है? जहाँ होगा, वहीं जाऊँगा और कंस तथा केशी का संहार करने वाले उस कृष्ण को मारकर ही लौटूंगा। मैं अपने अस्त्र-शस्त्रों को छूकर सत्य की सौगन्ध खाता हूँ कि अब कृष्ण को मारे बिना नहीं लौटूंगा!' सौभ विमान का स्वामी शाल्व सङ्ग्रामभूमि में मेरे साथ युद्ध की इच्छा रखकर चारों ओर दौड़ता और सबसे यही पूछता था— 'वह कहाँ है, कहाँ है?'"
"राजन्! साथ ही वह यह भी कहता था— 'आज उस नीच पापाचारी और विश्वासघाती कृष्ण को शिशुपाल वध के अमर्ष के कारण मैं यमलोक भेज दूँगा। उस पापी ने मेरे भाई राजा शिशुपाल को मार गिराया है, अतः मैं भी उसका वध करूँगा। मेरा भाई शिशुपाल अभी छोटी अवस्था का था, दूसरे वह राजा था, तीसरे युद्ध के मुहाने पर खड़ा नहीं था, चौथे असावधान था; ऐसी दशा में उस वीर की जिसने हत्या की है, उस जनार्दन को मैं अवश्य मारूँगा!' कुरुनन्दन! महाराज! इस प्रकार शिशुपाल के लिये विलाप करके मुझपर आक्षेप करता हुआ वह इच्छानुसार चलने वाले सौभ विमान द्वारा आकाश में ठहरा हुआ था।"
भ्राता बालश्च राजा च न च संग्राममूर्धनि ।
प्रमत्तश्च हतो वीरस्तं हनिष्ये जनार्दनम् ॥
‘ मेरा भाई शिशुपाल अभी छोटी अवस्थाका था, दूसरे वह राजा था, तीसरे युद्धके मुहाने पर खड़ा नहीं था, चौथे असावधान था, ऐसी दशामें उस वीरकी जिसने हत्या की है, उस जनार्दनको मैं अवश्य मारूँगा '
"कुरुश्रेष्ठ! यहाँ से द्वारका जाने पर मैंने मार्तिकावतक देश के निवासी दुष्टात्मा एवं दुर्बुद्धि राजा शाल्व ने मेरे प्रति जो दुष्टतापूर्ण बर्ताव किया था और जो आक्षेपपूर्ण बातें कही थीं, वह सब कुछ सुना। कुरुनन्दन! तब मेरा मन भी रोष से व्याकुल हो उठा। राजन्! फिर मन ही मन कुछ निश्चय करके मैंने शाल्व के वध का विचार किया। कुरुप्रवर! पृथ्वीपते! उसने आनर्त देश में जो महान संहार मचा रखा था, मुझ पर जो आक्षेप करता था तथा उस पापाचारी का घमण्ड जो बहुत बढ़ गया था, वह सब सोचकर मैं सौभ नगर का नाश करने के लिये प्रस्थित हुआ। मैंने सब ओर उसकी खोज की तो वह मुझे समुद्र के एक द्वीप में दिखाई दिया। नरेश्वर! तदनन्तर मैंने पाञ्चजन्य शङ्ख बजाकर शाल्व को समरभूमि में बुलाया और स्वयं भी युद्ध के लिये उपस्थित हुआ। वहाँ सौभ निवासियों के दानवों के साथ दो घड़ी तक मेरा युद्ध हुआ और मैंने सबको वश में करके पृथ्वी पर मार गिराया।"
आनर्तेषु विमर्दं च क्षेपं चात्मनि कौरव ।
प्रवृद्धमवलेपं च तस्य दुष्कृतकर्मणः ॥
ततः सौभवधायाहं प्रतस्थे पृथिवीपते ।
समया सागरावर्ते दृष्ट आसीत् परीप्सता ॥
कुरुप्रवर! पृथ्वीपते! उसने आनर्त देशमें जो महान् संहार मचा रखा था, वह मुझपर जो आक्षेप करता था तथा उस पापाचारीका घमंड जो बहुत बढ़ गया था, वह सब सोचकर मैं सौभनगरका नाश करनेके लिये प्रस्थित हुआ । मैंने सब ओर उसकी खोज की तो वह मुझे समुद्रके एक द्वीपमें दिखायी दिया ।
"महाबाहो! यही कार्य उपस्थित हो गया था, जिससे मैं उस समय यहाँ न आ सका। लौटने पर ज्यों ही सुना कि हस्तिनापुर में दुर्योधन की उद्दण्डता के कारण जुआ खेला गया और पाण्डव उसमें सब कुछ हारकर वन को चले गये; तब अत्यन्त दुःख में पड़े हुए आपलोगों को देखने के लिये मैं तुरन्त यहाँ चला आया।"
युधिष्ठिर ने कहा— "महाबाहो! वसुदेवनन्दन! महामते! तुम सौभ विमान के नष्ट होने का समाचार विस्तारपूर्वक कहो। मैं तुम्हारे मुख से इस प्रसङ्ग को सुनते-सुनते तृप्त नहीं हो रहा हूँ।"
वासुदेव महाबाहो विस्तरेण महामते ।
सौभस्य वधमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यतः ॥
युधिष्ठिरने कहा - महाबाहो! वसुदेवनन्दन! महामते! तुम सौभ विमानके नष्ट होनेका समाचार विस्तारपूर्वक कहो । मैं तुम्हारे मुखसे इस प्रसंगको सुनते - सुनते तृप्त नहीं हो रहा हूँ ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले— "महाबाहो! नरेश्वर! भरतश्रेष्ठ! श्रुतश्रवा के पुत्र शिशुपाल के मारे जाने का समाचार सुनकर शाल्व ने द्वारकापुरी पर चढ़ाई की। पाण्डुनन्दन! उस दुष्टात्मा शाल्व ने सेना द्वारा द्वारकापुरी को सब ओर से घेर लिया था। वह स्वयं आकाशचारी विमान 'सौभ' पर व्यूहरचनापूर्वक विराजमान हो रहा था। उसी पर रहकर राजा शाल्व द्वारकापुरी के लोगों से युद्ध करता था। वहाँ भारी युद्ध छिड़ा हुआ था और उसमें सभी दिशाओं से अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार हो रहे थे।"
हतं श्रुत्वा महाबाहो मया श्रौतश्रवं नृप ।
उपायाद् भरतश्रेष्ठ शाल्वो द्वारवतीं पुरीम् ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाबाहो! नरेश्वर! भरतश्रेष्ठ! श्रुतश्रवा* के पुत्र शिशुपालके मारे जानेका समाचार सुनकर शाल्वने द्वारकापुरीपर चढ़ाई की ।
"द्वारकापुरी में सब ओर पताकाएँ फहरा रही थीं। ऊँचे-ऊँचे गोपुर वहाँ चारों दिशाओं में सुशोभित थे। जगह-जगह सैनिकों के समुदाय युद्ध के लिये प्रस्तुत थे। सैनिकों के आत्मरक्षापूर्वक युद्ध की सुविधा के लिये स्थान-स्थान पर बुर्ज बने हुए थे। युद्धयोगी यन्त्र वहाँ बैठाए गये थे; तथा सुरङ्ग द्वारा नये-नये मार्ग निकालने के काम में भी बहुत से लोग जुटे हुए थे। सड़कों पर लोहे के विषाक्त काँटे अदृश्य रूप से बिछाए गये थे। अट्टालिकाओं और गोपुरों में पर्याप्त अन्न का सङ्ग्रह किया गया था। शत्रुपक्ष के प्रहारों को रोकने के लिये जगह-जगह मोर्चेबन्दी की गई थी। शत्रुओं के चलाये हुए जलते गोले और अलात—प्रज्वलित लौहमय अस्त्र—को भी विफल करके नीचे गिरा देने वाली शक्तियाँ सुसज्जित थीं। अस्त्रों से भरे हुए मिट्टी और चमड़े के असङ्ख्य पात्र रखे गये थे। भरतश्रेष्ठ! ढोल, नगारे और मृदङ्ग आदि जुझाऊ बाजे भी बज रहे थे।"
"राजन्! तोमर, अङ्कुश, शतघ्नी, लाङ्गल, भुशुण्डी, पत्थर के गोले, अन्या अन्य अस्त्र-शस्त्र, फरसे, बहुत सी सुदृढ़ ढालें और गोला-बारूद से भरी हुई तोपें यथास्थान तैयार रखी गयी थीं। कुरुश्रेष्ठ! शत्रुओं का सामना करने में समर्थ गद, साम्ब और उद्धव आदि अनेक वीर पुरुष नाना प्रकार के बहुसङ्ख्यक रथों द्वारा पुरी की रक्षामें दत्तचित थे। जो अत्यन्त विख्यात कुलों में उत्पन्न थे तथा युद्ध के अवसरों पर जिनके बल-वीर्य का परिचय मिल चुका था, ऐसे वीर रक्षक मध्यम गुल्म में स्थित होकर पुरी की पूर्णतः रक्षा कर रहे थे। सबको प्रमाद से बचाने वाले उग्रसेन और उद्धव आदि ने शत्रुओं के गुल्मों को नष्ट करने की शक्ति रखने वाले घुड़सवारों के हाथ में झण्डे देकर समूचे नगर में यह घोषणा करा दी थी कि किसी को भी मद्यपान नहीं करना चाहिये; क्योंकि मदिरा से उन्मत्त हुए लोगों पर राजा शाल्व घातक प्रहार कर सकता है। यह सोचकर वृष्णि और अन्धक वंश के सभी योद्धा पूरी सावधानी के साथ युद्ध में डटे हुए थे।"
प्रमत्तेष्वभिघातं हि कुर्याच्छाल्वो नराधिपः ।
इति कृत्वाप्रमत्तास्ते सर्वे वृष्ण्यन्धकाः स्थिताः ॥
क्योंकि मदिरासे उन्मत्त हुए लोगोंपर राजा शाल्व घातक प्रहार कर सकता है । यह सोचकर वृष्णि और अन्धकवंशके सभी योद्धा पूरी सावधानीके साथ युद्धमें डटे हुए थे ।
"धन सङ्ग्रह की रक्षा करने वाले यादवों ने आनर्त देशीय नटों, नर्तकों तथा गायकों को शीघ्र ही नगर से बाहर कर दिया था। कुरुनन्दन! द्वारकापुरी में आने के लिये जो पुल मार्ग में पड़ते थे वे सब तोड़ दिये गये। नौकाएँ रोक दी गयी थीं और खाइयों में काँटे बिछा दिये गये थे। कुरुश्रेष्ठ! द्वारकापुरी के चारों ओर एक कोसतक के चारों ओर के कुएँ इस प्रकार जलशून्य कर दिये गये थे मानो भाड़ हों और उतनी दूर की भूमि भी लौह-कण्टक आदि से व्याप्त कर दी गयी थी।"
"निष्पाप नरेश! द्वारका एक तो स्वभाव से ही दुर्गम्य, सुरक्षित और अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न है, तथापि उस समय इसकी विशेष व्यवस्था कर दी गयी थी। भरतश्रेष्ठ! द्वारकानगर इन्द्रभवन की भाँति ही सुरक्षित, सुगुप्त और सम्पूर्ण आयुधों से भरा-पूरा है। राजन्! सौभ निवासियों के साथ युद्ध होते समय वृष्णि और अन्धक वंशी वीरों के उस नगर में कोई भी राजमुद्रा के बिना न तो बाहर निकल सकता था और न बाहर से नगर के भीतर ही आ सकता था। कुरुनन्दन राजेन्द्र! वहाँ प्रत्येक सड़क और चौराहे पर बहुत-से हाथीसवारों और घुड़सवारों से युक्त विशाल सेना उपस्थित रहती थी।"
न चामुद्रोऽभिनिर्याति न चामुद्रः प्रवेश्यते ।
वृष्ण्यन्धकपुरे राजंस्तदा सौभसमागमे ॥
राजन्! सौभनिवासियोंके साथ युद्ध होते समय वृष्णि और अन्धकवंशी वीरोंके उस नगरमें कोई भी राजमुद्रा ( पास ) के बिना न तो बाहर निकल सकता था और न बाहरसे नगरके भीतर ही आ सकता था ।
"महाबाहो! उस समय सेना के प्रत्येक सैनिक को पूरा वेतन और भत्ता चुका दिया गया था। सबको नये-नये हथियार और पोशाकें दी गयी थीं और उन्हें विशेष पुरस्कार आदि देकर उनका प्रेम और विश्वास प्राप्त कर लिया गया था। कोई भी सैनिक ऐसा नहीं था जिसे सोने-चाँदी के सिवा ताँबा आदि वेतन के रूप में दिया जाता हो अथवा जिसे समय पर वेतन प्राप्त न हुआ हो। किसी भी सैनिक को दयावश सेना में भर्ती किया गया था तथा ऐसा कोई न था जिसका पराक्रम बहुत दिनों से देखा न गया हो। कमलनयन राजन्! जिसमें बहुत-से दक्ष मनुष्य निवास करते थे, उस द्वारकानगरी की रक्षा के लिये इस प्रकार की व्यवस्था की गयी थी। वह राजा उग्रसेन के द्वारा भलीभाँति सुरक्षित थी।"
एवं सुविहिता राजन् द्वारका भूरिदक्षिणा ।
आहुकेन सुगुप्ता च राज्ञा राजीवलोचन ॥
कमलनयन राजन्! जिसमें बहुत- से दक्ष मनुष्य निवास करते थे उस द्वारकानगरीकी रक्षाके लिये इस प्रकारकी व्यवस्था की गयी थी । वह राजा उग्रसेनके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित थी ।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - राजेन्द्र! सौभ विमानका स्वामी राजा शाल्व अपनी बहुत बड़ी सेनाके साथ, जिसमें हाथीसवारों तथा पैडलोंकी सङ्ख्या अधिक थी, द्वारकापुरीपर चढ़ आया और उसके निकट आकर ठहरा जहाँ अधिक जलसे भरा हुआ जलाशय था, वहीं समतल भूमिमें उसकी सेनाने पड़ाव डाला । उसमें हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल चारों प्रकारके सैनिक थे । स्वयं राजा शाल्व उसका संरक्षक था। श्मशानभूमि, देवमन्दिर, बाँबी और चैत्यवृक्षको छोड़कर सभी स्थानोंमें उसकी सेना फैलकर ठहरी हुई थी।
सेनाओंके विभागपूर्वक पड़ाव डालनेसे सारे रास्ते घिर गये थे। राजन्! शाल्वके शिविरमें प्रवेश करनेका कोई मार्ग नहीं रह गया था। नरश्रेष्ठ! राजा शाल्वकी वह सेना सब प्रकारके आयुधोंसे सम्पन्न, सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंके सञ्चालनमें निपुण, रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई तथा पैदल सिपाहियों और ध्वजा- पताकाओंसे व्याप्त थी। उसका प्रत्येक सैनिक हृष्ट- पुष्ट एवं बलवान् था। सबमें वीरोचित लक्षण दिखायी देते थे। उसके सिपाही विचित्र ध्वजा तथा कवच धारण करते थे। उनके रथ और धनुष भी विचित्र थे। कुरुनन्दन! द्वारकाके समीप उस सेनाको ठहराकर राजा शाल्वने उसे वेगपूर्वक द्वारकाकी ओर बढ़ाया; मानो पक्षिराज गरुड़ अपने लक्ष्यकी ओर उड़े जा रहे हों।
अनीकानां विभागेन पन्थानः संवृताऽभवन् ।
प्रवणाय च नैवासञ्छाल्वस्य शिविरे नृप ॥
सेनाओंके विभागपूर्वक पड़ाव डालनेसे सारे रास्ते घिर गये थे । राजन्! शाल्वके शिविरमें प्रवेश करनेका कोई मार्ग नहीं रह गया था ।
शाल्वराजकी उस सेनाको आती देख उस समय वृष्णिकुलको आनन्दित करनेवाले कुमार नगरसे बाहर निकलकर युद्ध करने लगे। कुरुनन्दन! शाल्वराजके उस आक्रमणको वे सहन न कर सके। चारुदेष्ण, साम्ब और महारथी प्रद्युम्न — ये सब कवच, विचित्र आभूषण तथा ध्वजा धारण करके रथोंपर बैठकर शाल्वराजके अनेक श्रेष्ठ योद्धाओंके साथ भिड़ गये। हर्षमें भरे हुए साम्बने धनुष धारण करके शाल्वके मन्त्री तथा सेनापति क्षेमवृद्धिके साथ युद्ध किया।
भरतश्रेष्ठ! जाम्बवतीकुमारने उसके ऊपर भारी बाणवर्षा की, मानो इन्द्र जलकी वर्षा कर रहे हों। महाराज! सेनापति क्षेमवृद्धिने साम्बकी उस भयङ्कर बाणवर्षाको हिमालयकी भाँति अविचल रहकर सहन किया। राजेन्द्र! तदनन्तर क्षेमवृद्धिने स्वयं भी साम्बके ऊपर मायानिर्मित बाणोंकी भारी वर्षा प्रारम्भ की। साम्बने उस मायामय बाणजालको मायासे ही छिन्न - भिन्न करके क्षेमवृद्धिके रथपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगा दी। सेनापति क्षेमवृद्धिने साम्बके बाणोंसे घायल होकर, वह पीड़ा में शीघ्रगामी अश्वोंकी सहायतासे रणभूमि छोड़कर भाग गया।
ततः स विद्धः साम्बेन क्षेमवृद्धिश्चमूपतिः ।
अपायाज्जवनैरश्वैः साम्बबाणप्रपीडितः ॥
साम्बने सेनापति क्षेमवृद्धिको अपने बाणोंसे घायल कर दिया । वह साम्बकी बाणवर्षासे पीड़ित हो शीघ्रगामी अश्वोंकी सहायतासे ( लड़ाईका मैदान छोड़कर) भाग गया ।
राजेन्द्र! वृष्णिवंशका भार वहन करनेवाला वीर साम्ब वेगवान्के वेगको सहन करते हुए धैर्यपूर्वक उसका सामना करने लगा। राजन्! उस गदासे आ\\आहत होकर वेगवान् इस प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो जीर्ण हुई जड़वाला पुराना वृक्ष हवाके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो। उस वीर महादैत्यके मारे जानेपर मेरा पुत्र साम्ब शाल्वकी विशाल सेनामें घुसकर युद्ध करने लगा। महाराज! चारुदेष्ण के साथ महारथी एवं महान् धनुर्धर विविन्ध्य नामक दानव शाल्वकी आज्ञासे युद्ध कर रहा था।
तया त्वभिहतो राजन् वेगवान् न्यपतद् भुवि ।
वातरुग्ण इव क्षुण्णो जीर्णमूलो वनस्पतिः ॥
राजन्! उस गदासे आहत होकर वेगवान् इस प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो जीर्ण हुई जड़वाला पुराना वृक्ष हवाके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो ।
राजन्! तदनन्तर चारुदेष्ण और विविन्ध्यमें वैसा ही भयङ्कर युद्ध होने लगा, जैसा पहले इन्द्र और वृत्रासुरमें हुआ था। वे दोनों एक- दूसरेपर कुपित हो बाणोंसे परस्पर आघात कर रहे थे और महाबली सिंहोंकी भाँति जोर- जोरसे गर्जना करते थे। तदनन्तर रुक्मिणीनन्दन चारुदेष्णने अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी शत्रुनाशक बाणको महान् दिव्य अस्त्रसे अभिमन्त्रित करके अपने धनुषपर सन्धान किया। राजन्! तत्पश्चात् मेरे उस महारथी पुत्रने क्रोधमें भरकर विविन्ध्यपर वह बाण चलाया। उसके लगते ही विविन्ध्य प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा।
ततः सुतुमुलं युद्धं चारुदेष्णविविन्ध्ययोः ।
वृत्रवासवयो राजन् यथा पूर्वं तथाभवत् ॥
राजन्! तदनन्तर चारुदेष्ण और विविन्ध्यमें वैसा ही भयंकर युद्ध होने लगा, जैसा पहले इन्द्र और वृत्रासुरमें हुआ था ।
विविन्ध्यको मारा गया और सेनाको तहस - नहस हुई देख शाल्व इच्छानुसार चलनेवाले सौभ विमानद्वारा फिर वहाँ आया। महाबाहु नरेश्वर! उस समय सौभ विमानपर बैठे हुए शाल्वको देखकर द्वारकाकी सारी सेना भयसे व्याकुल हो उठी। महाराज कुरुनन्दन! तब प्रद्युम्नने निकलकर आनर्तवासियोंकी उस सेनाको धीरज बँधाया और इस प्रकार कहा—
ततो व्याकुलितं सर्वं द्वारकावासि तद् बलम् ।
दृष्ट्वा शाल्वं महाबाहो सौभस्थं नृपते तदा ॥
महाबाहु नरेश्वर! उस समय सौभ विमानपर बैठे हुए शाल्वको देखकर द्वारकाकी सारी सेना भयसे व्याकुल हो उठी ।
"यादवो! आप सब लोग चुपचाप खड़े रहें और मेरे पराक्रमको देखें; मैं किस प्रकार युद्धमें राजा शाल्वके सहित सौभ विमानकी गतिको रोक देता हूँ। यदुवंशियो! मैं अपने धनुर्दण्डसे छूटे हुए लोहेके सर्पतुल्य बाणोंद्वारा सौभपति शाल्वकी सेनाको अभी नष्ट किये देता हूँ। आप धैर्य धारण करें, भयभीत न हों, सौभराज अभी नष्ट हो रहा है। दुष्टात्मा शाल्व मेरा सामना होते ही सौभ विमानसहित नष्ट हो जायगा।"
सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु सर्वे पश्यन्तु मां युधि ।
निवारयन्तं संग्रामे बलात् सौभं सराजकम् ॥
‘ यादवो! आप सब लोग ( चुपचाप) खड़े रहें और मेरे पराक्रमको देखें; मैं किस प्रकार युद्धमें राजा शाल्वके सहित सौभ विमानकी गतिको रोक देता हूँ ।
वीर पाण्डुनन्दन! हर्षमें भरे हुए प्रद्युम्नके ऐसा कहने पर वह सारी सेना स्थिर हो पूर्ववत् प्रसन्नता और उत्साहके साथ युद्ध करने लगी। रथके घोड़े ऐसे चलते थे, मानो आकाशमें उड़े जा रहे हों। ऐसे अश्वोंसे जुते हुए रथके द्वारा महाबली प्रद्युम्नने शत्रुओंपर आक्रमण किया। वे अपने श्रेष्ठ धनुषको बारम्बार खींचकर उसकी टङ्कार फैलाते हुए आगे बढ़े। उन्होंने पीठपर तरकस और कमरमें तलवार बाँध ली थी। उनमें शौर्य भरा था और उन्होंने गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहन रखे थे। वे अपने धनुषको एक हाथसे दूसरे हाथमें ले लिया करते थे। उस समय वह धनुष बिजलीके समान चमक रहा था। उन्होंने उस धनुषके द्वारा सौभ विमानमें रहनेवाले समस्त दैत्योंको मूर्च्छित कर दिया।
वे बारम्बार धनुषको खींचते, उसपर बाण रखते और उसके द्वारा शत्रुसैनिकोंको युद्धमें मार डालते थे। उनकी उक्त क्रियाओंमें किसीको थोड़ा- सा भी अन्तर नहीं दिखायी देता था। उनके मुखका रङ्ग तनिक भी नहीं बदलता था। उनके अङ्ग भी विचलित नहीं होते थे। सब ओर गर्जना करते हुए प्रद्युम्नका उत्तम और अद्भुत बल- पराक्रमका सूचक सिंहनाद सब लोगोंको सुनाई दे रहा था। शाल्वकी सेनाके ठीक सामने प्रद्युम्नके श्रेष्ठ रथपर उनकी उत्तम ध्वजा फहराती हुई शोभा पा रही थी। उस ध्वजाके सुवर्णमय दण्डके ऊपर सब तिमि नामक जल-जन्तुओंको प्रमथन करनेवाले मुँह बाये एक मगरमच्छका चिह्न था। वह शत्रुसैनिकोंको अत्यन्त भयभीत कर रहा था।
नरेश्वर! तदनन्तर शत्रुहन्ता प्रद्यmन तुरन्त आगे बढ़कर राजा शाल्वके साथ युद्धकरनेकी इच्छासे उसीकी ओर दौड़े। कुरुकुलतिलक! उस महासङ्ग्राममें वीर प्रद्युम्नके द्वारा किया हुआ वह आक्रमण क्रुद्ध हुए राजा शाल्व ने सहन न किया। शाल्व तथा वृष्णिवंशी वीर प्रद्युम्न में बलि और इन्द्रके समान घोर युद्ध होने लगा। उस समय सब लोग एकत्र होकर उन दोनोंका युद्ध देखने लगे।
तयोः सुतुमुलं युद्धं शाल्ववृष्णिप्रवीरयोः ।
समेता ददृशुर्लोका बलिवासवयोरिव ॥
शाल्व तथा वृष्णिवंशी वीर प्रद्युम्नमें बलि और इन्द्रके समान घोर युद्ध होने लगा । उस समय सब लोग एकत्र होकर उन दोनोंका युद्ध देखने लगे ।
वीर! शाल्वके पास सुवर्णभूषित मायामय रथ था। वह रथ ध्वजा, पताका, अनुकर्ष और तरकससे युक्त था। प्रभो कुरुनन्दन! श्रीमान् महाबली शाल्वने उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो प्रद्युम्नपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ की। तब प्रद्युम्न भी युद्धभूमिमें अपनी भुजाओंके वेगसे शाल्वको मोहित करते हुए उसके ऊपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंकी बौछार करने लगे।
सौभ विमानका स्वामी राजा शाल्व युद्धमें प्रद्युम्नके बाणोंसे घायल होनेपर यह सहन नहीं कर सका— वह अमर्षमें भर गया और मेरे पुत्रपर प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बाण छोड़ने लगा। महाबली प्रद्युम्नने उन बाणोंको आते ही काट गिराया। तत्पश्चात् शाल्वने मेरे पुत्रपर और भी बहुत- से प्रज्वलित बाण छोड़े।
तमापतन्तं बाणौघं स चिच्छेद महाबलः ।
ततश्चान्याञ्छरान् दीप्तान् प्रचिक्षेप सुते मम ॥
महाबली प्रद्युम्नने उन बाणोंको आते ही काट गिराया । तत्पश्चात् शाल्वने मेरे पुत्रपर और भी बहुत - से प्रज्वलित बाण छोड़े ।
राजेन्द्र! शाल्वके बाणोंसे घायल होकर रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नने तुरन्त ही उस युद्धभूमिमें शाल्वपर एक ऐसा बाण चलाया, जो मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाला था। मेरे पुत्रके चलाये हुए उस बाणने शाल्वके कवचको छेदकर उसके हृदयको बींध डाला। इससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। वीर! शाल्वराजके अचेत होकर गिर जानेपर उसकी समस्त सेनामें हाहाकार मच गया और उसके दानव पृथ्वीको विदीर्ण करके पातालमें पलायन कर गये।
तस्मिन् निपतिते वीरे शाल्वराजे विचेतसि ।
सम्प्राद्रवन् दानवेन्द्रा दारयन्तो वसुंधराम् ॥
वीर शाल्वराजके अचेत होकर गिर जानेपर उसकी सेनाके समस्त दानवराज पृथ्वीको विदीर्ण करके पातालमें पलायन कर गये ।
कुरुश्रेष्ठ! जब महाबली शाल्व ने देखा कि प्रद्युम्न मूर्च्छित होकर गिर पड़े हैं, तो वह सहसा उठकर उन पर बाणों की वर्षा करने लगा। शाल्व के वे दुर्धर्ष बाण प्रद्युम्न के कण्ठ के मूलभाग में गहरे आघात कर गए। अत्यन्त घायल होकर महाबाहु वीर प्रद्युम्न उस समय अपने रथ पर ही मूर्च्छित हो गिरे। प्रद्युम्न को इस प्रकार घायल देखकर शाल्व सिंहनाद करने लगा; उसकी वह गर्जना सुनकर वहाँ की समस्त पृथ्वी गूँज उठी। वह रुकने के बजाय उन पर और भी बहुत-से बाण शीघ्रतापूर्वक छोड़ने लगा। देखते ही देखते प्रद्युम्न अनेक बाणों से आहत होकर रणाङ्गण में निश्चेष्ट पड़े रहे।
स तैरभिहतो बाणैर्बहुभिस्तेन मोहितः ।
निश्चेष्टः कौरवश्रेष्ठ प्रद्युम्नोऽभूद् रणाजिरे ॥
कौरवश्रेष्ठ! इस प्रकार बहुत- से बाणोंसे आहत होनेके कारण प्रद्युम्न उस रणांगणमें मूर्च्छित एवं निश्चेष्ट हो गये ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—जब बलवानों में श्रेष्ठ प्रद्युम्न शाल्व के बाणों से पीड़ित होकर मूर्छित हो गए, तब वहाँ उपस्थित वृष्णिवंशी वीरों का उत्साह भङ्ग हो गया और उन सबको बड़ा दुःख हुआ। प्रद्युम्न के इस हाल को देखकर वृष्णि और अन्धक वंश की समस्त सेना में हाहाकार मच गया, जबकि शत्रु पक्ष अत्यन्त प्रसन्नता से खिल उठा। दारुक का पुत्र प्रद्युम्न का सुशिक्षित सारथि था; उसने जब अपने स्वामी को इस प्रकार मूर्छित देखा, तो वह तुरन्त वेगशाली अश्वों द्वारा उन्हें लेकर रणभूमि से बाहर ले गया।
अभी वह रथ अधिक दूर जा भी नहीं पाया था कि बड़े-बड़े रथियों को परास्त करने वाले प्रद्युम्न सचेत हो गए। उन्होंने हाथ में धनुष लिया और अपने सारथि से बोले—"सूतपुत्र! आज तूने क्या सोचा है? क्यों युद्ध से मुँह मोड़कर भागा जा रहा है? युद्ध से पलायन करना वृष्णिवंशी वीरों का धर्म नहीं है। सूतनन्दन! इस महासङ्ग्राम में राजा शाल्व को देखकर तुझे मोह तो नहीं हो गया है? अथवा युद्ध देखकर तुझे विषाद तो नहीं होता? मुझसे ठीक-ठीक बता, तेरे इस प्रकार भागने का क्या कारण है?"
सौते किं ते व्यवसितं कस्माद् यासि पराङ्मुखः ।
नैष वृष्णिप्रवीराणामाहवे धर्म उच्यते ॥
' सूतपुत्र! आज तूने क्या सोचा है? क्यों युद्धसे मुँह मोड़कर भागा जा रहा है? युद्धसे पलायन करना वृष्णिवंशी वीरोंका धर्म नहीं है ।
सूतपुत्र ने उत्तर दिया—"जनार्दनकुमार! न मुझे मोह हुआ है और न मेरे मन में भय समाया है। केशवनन्दन! मुझे ऐसा मालूम होता है कि यह राजा शाल्व आपके लिए अत्यन्त भार हो रहा है। वीरवर! मैं धीरे-धीरे रणभूमि से दूर इसलिए जा रहा हूँ क्योंकि यह पापी शाल्व बड़ा बलवान है। सारथिका यह धर्म है कि यदि शूरवीर रथी सङ्ग्राम में मूर्छित हो जाए, तो वह किसी प्रकार उसके प्राणों की रक्षा करे। आयुष्मन्! मुझे आपकी और आपको मेरी सदा रक्षा करनी चाहिए। रथी का सारथि द्वारा रक्षा करना कर्तव्य है, इसी विचार से मैं लौट रहा हूँ। महाबाहो! आप अकेले हैं और इन दानवों की सङ्ख्या बहुत है; इतने विपक्षियों का सामना करना अकेले आपके लिए कठिन है।"
आयुष्मंस्त्वं मया नित्यं रक्षितव्यस्त्वयाप्यहम् ।
रक्षितव्यो रथी नित्यमिति कृत्वापयाम्यहम् ॥
आयुष्मन्! मुझे आपकी और आपको मेरी सदा रक्षा करनी चाहिये । रथी सारथिके द्वारा सदा रक्षणीय है, इस कर्तव्यका विचार करके ही मैं रणभूमिसे लौट रहा हूँ ।
कुरुनन्दन! सूत के ऐसे कहने पर प्रद्युम्न ने कहा—"दारुककुमार! तू रथ को पुनः युद्धभूमि की ओर लौटा ले चल। आज से फिर कभी मेरे जीते-जी रथ को रणभूमि से बाहर न ले जाना। वृष्णिवंश में ऐसा कोई वीर पैदा नहीं हुआ जो युद्ध छोड़कर भाग जाए या गिरे हुए और 'मैं आपका हूँ' कहने वाले को मारे। यहाँ तक कि स्त्री, बालक, वृद्ध, रथहीन या शस्त्र नष्ट हो चुके लोगों पर हथियार उठाना भी हमारे कुल में नहीं देखा गया। तू सूतकुल में जन्मा है और तूने सूतकर्म की शिक्षा पा ली है, पर वृष्णिवंशी वीरों का युद्ध धर्म तुझे ज्ञात होना चाहिए।
तू फिर कभी युद्ध से न लौटना! जब मेरी पीठ पर शत्रु के बाण लगे हों, तब यदि मैं भाग जाऊँगा, तो मेरे पिता भगवान माधव मुझसे क्या कहेंगे? पिताजी के बड़े भाई बलरामजी जब यहाँ पघपेंगे, तब वे मुझसे क्या कहेंगे? हे सारथे! दुर्धर्ष वीर चारुदेष्ण, गद, सारण और महाबाहु अक्रूर मुझसे क्या कहेंगे? मैं एक शूरवीर, शान्त स्वभाव वाला माना जाता हूँ; यदि मैं युद्ध छोड़कर भागा, तो मेरी स्त्रियों में भी लोग कहेंगे कि प्रद्युम्न भयभीत होकर भागा आ रहा है। मुझे धिक्कार दिया जाएगा। मेरे लिए किसी की धिक्कारयुक्त वाणी मृत्यु से भी अधिक कष्टदायी है।
मेरे पिता मधुसूदन यहाँ की रक्षा का भार मुझ पर रखकर धर्मराज युधिष्ठिर के यज्ञ में गए हैं; आज का यह अपराध वे कभी क्षमा नहीं कर सकेंगे। वीर कृतवर्मा शाल्व का सामना करने के लिए पुरी से बाहर आ रहे थे, किन्तु मैंने उन्हें रोककर कहा था कि 'आप यहीं रहें, मैं शाल्व को परास्त करूँगा'। आज जब मैं युद्ध छोड़कर मिलूँगा, तो उन्हें क्या जवाब दूँगा? शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले अजेय भगवान पुरुषोत्तम जब यहाँ आएँगे, तब मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? सात्यकि, बलरामजी और अन्य वीरों से मैं क्या कहूँगा? तू मुझे कायर समझकर युद्ध से मत भाग। जहाँ युद्ध हो रहा है, वहीं चल!"
उपयान्तं दुराधर्षं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
पुरुषं पुण्डरीकाक्षं किं वक्ष्यामि महाभुजम् ॥
‘ शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले कमलनयन महाबाहु एवं अजेय वीर भगवान् पुरुषोत्तम जब यहाँ मेरे निकट पदार्पण करेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रद्युम्न के ऐसा कहने पर सूतपुत्र ने मधुरतापूर्वक कहा—"रुक्मिणीनन्दन! घोड़ों की बागडोर सम्भालते हुए मुझे भय नहीं है। मैंने सारथ्य का वही उपदेश माना कि रथी की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि आप बहुत पीड़ित थे। अब आप सचेत हो गए हैं, तो देखिए मुझे कैसी शिक्षा मिली है। मैं निर्भय होकर राजा शाल्व की सेना में प्रवेश करता हूँ।"
ऐसा कहकर उस सूतपुत्र ने घोड़ों की बागडोर थामी और उन्हें युद्धभूमि की ओर हाँक दिया। रथ तीव्र गति से दौड़ने लगा, मानो आकाश में उड़ रहा हो। दारुक पुत्र के हस्तलाघव को देखकर वे घोड़े प्रज्वलित अग्नि की भाँति दमकते हुए ऐसे जा रहे थे, मानो पृथ्वी का स्पर्श ही न कर रहे हों। उसने अनायास ही शाल्व की सेना को दाहिनी ओर (अपसव्य) कर दिया। यह अद्भुत दृश्य था!
सोऽपसव्यां चमूं तस्य शाल्वस्य भरतर्षभ ।
चकार नातियत्नेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥
भरतकुलभूषण! दारुकके पुत्रने अनायास ही शाल्वकी उस सेनाको अपसव्य ( दाहिने ) कर दिया । यह एक अद्भुत बात हुई ।
सौभराज शाल्व इस बात को सह न सका और उसने तीन बाण चलाकर प्रद्युम्न के सारथी को घायल कर दिया। परन्तु दारुक ने बिना किसी चिन्ता के रथ को आगे बढ़ाया। उधर, शत्रुवीरों का संहार करने वाले प्रद्युम्न अपने हाथों की फुर्ती दिखाते हुए शाल्व के बाणों को बीच में ही काट रहे थे। जब शाल्व ने देखा, तो उसने भयङ्कर आसुरी माया का सहारा लेकर बहुत-से बाण बरसाए।
प्रद्युम्न ने शाल्व के शक्तिशाली दैत्यास्त्र को पहचान लिया और ब्रह्मास्त्र के द्वारा उसे बीच में ही काट डाला। उन बाणों ने शाल्व के अस्त्रों का नाश कर दिया और उसके मस्तक, छाती तथा मुख को बींध डाला, जिससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
ते तदस्त्रं विधूयाशु विव्यधू रुधिराशनाः ।
शिरस्युरसि वक्त्रे च स मुमोह पपात च ॥
वे सभी बाण शत्रुओंका रक्त पीनेवाले थे । उन बाणोंने शाल्वके अस्त्रोंका नाश करके उसके मस्तक, छाती और मुखको बींध डाला, जिससे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।
मूर्छित शाल्व को देखकर प्रद्युम्न ने अपने धनुष पर एक उत्तम बाण का सन्धान किया। वह बाण विषैले सर्प के समान विषाक्त और प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशमान था। जैसे ही उस बाण को प्रत्यञ्चा पर देखा गया, अन्तरिक्ष लोक में हाहाकार मच गया। तब इन्द्र और कुबेर सहित देवताओं ने देवर्षि नारद और वायुदेव को सन्देश भेजा—"वीरवर! यह राजा शाल्व तुम्हारा वध्य नहीं है; इस बाण को लौटा लो, क्योंकि विधाता ने श्रीकृष्ण के हाथ से ही इसकी मृत्यु निश्चित की है।"
मृत्युरस्य महाबाहो रणे देवकिनन्दनः ।
कृष्णः संकल्पितो धात्रा तन्मिथ्या न भवेदिति ॥
‘ महाबाहो! विधाताने युद्धमें देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके हाथसे ही इसकी मृत्यु निश्चित की है । उनका वह संकल्प मिथ्या नहीं होना चाहिये'
यह सुनकर प्रद्युम्न प्रसन्न हुए और उस श्रेष्ठ बाण को उतारकर पुनः तरकस में रख लिया। तदनन्तर, शाल्व अत्यन्त दुःखित मन से अपनी सेना सहित तुरन्त भाग गया। वह द्वारका छोड़कर अपने 'सौभ' नामक विमान में बैठकर आकाश में जा पहुँचा।
स द्वारकां परित्यज्य क्रूरो वृष्णिभिरार्दितः ।
सौभमास्थाय राजेन्द्र दिवमाचक्रमे तदा ॥
महाराज! उस समय वृष्णिवंशियोंसे पीड़ित हो क्रूर स्वभाववाला शाल्व द्वारकाको छोड़कर अपने सौभ नामक विमानका आश्रय ले आकाशमें जा पहुँचा ।
राजन्! आपका राजसूय महायज्ञ समाप्त होने पर मैं शाल्व से विमुक्त होकर आनर्तनगर—अर्थात् द्वारका में गया। वहाँ पहुँचकर मैंने देखा कि द्वारका श्रीहीन हो रही है। वहाँ न तो स्वाध्याय होता था, न वषट्कार। वह पुरी आभूषणों से रहित किसी सुन्दरी नारी की भाँति उदास लग रही थी। द्वारका के वन-उपवन भी ऐसे हो रहे थे, मानो उन्हें पहचाना ही न जा सके। यह सब देखकर मेरे मन में बड़ी शङ्का हुई और मैंने कृतवर्मा से पूछा— ‘नरश्रेष्ठ! इस वृष्णिवंश के प्रायः सभी स्त्री-पुरुष अस्वस्थ दिखाई देते हैं, इसका क्या कारण है? मैं यह ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ।’
नृपश्रेष्ठ! मेरे इस प्रकार पूछने पर कृतवर्मा ने शाल्व द्वारा द्वारकापुरी पर घेरा डालने और फिर उसे छोड़कर भाग जाने का सब समाचार विस्तारपूर्वक सुनाया। भरतवंशशिरोमणे! यह सारा वृत्तान्त पूर्ण रूप से सुनकर मैंने शाल्वराज के विनाश का निश्चय कर लिया। तदनन्तर मैं नगरनिवासियों को आश्वासन देकर, राजा उग्रसेन, पिता वसुदेव तथा सम्पूर्ण वृष्णिवंशियों का हर्ष बढ़ाते हुए बोला— ‘यदुकुल के श्रेष्ठ पुरुषों! आप लोग नगर की रक्षा के लिए सदा सावधान रहें। मैं शाल्वराज का नाश करने के लिये यहाँ से प्रस्थान करता हूँ। आप यह निश्चय जानें; मैं शाल्व का वध किये बिना द्वारकापुरी को नहीं लौटूंगा। शाल्व सहित सौभनगर का नाश कर लेने पर ही मैं पुनः आप लोगों का दर्शन करूँगा। अब शत्रुओं को भयभीत करने वाले इस नगाड़े को तीन बार बजाइये!’
ते मयाऽऽश्वासिता वीरा यथावद् भरतर्षभ ।
सर्वे मामब्रुवन् हृष्टाः प्रयाहि जहि शात्रवान् ॥
भरतकुलभूषण! मेरे इस प्रकार आश्वासन देनेपर सभी यदुवंशी वीरोंने प्रसन्न होकर मुझसे कहा – ' जाइये और शत्रुओंका विनाश कीजिये '
मेरे इस प्रकार आश्वासन देने पर सभी यदुवंशी वीर प्रसन्न होकर कहने लगे— ‘जाइये और शत्रुओं का विनाश कीजिये!’ तदनन्तर शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ों से जुते हुए अपने रथ द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए, मैंने श्रेष्ठ शङ्ख पाञ्चजन्य को बजाया और विशाल सेना के साथ रण के लिये प्रस्थान किया। मेरी उस व्यूहरचना से युक्त और नियन्त्रित सेना में हाथी, घोड़े, रथी और पैदल— चारों ही अङ्ग मौजूद थे। वह सेना विजय से सुशोभित हो रही थी। मैं बहुत-से देशों, असङ्ख्य वृक्षों से हरे-भरे पर्वतों, सरोवरों और सरिताओं को लाँघता हुआ मार्तिकावत में जा पहुँचा।
वहाँ मैंने सुना कि शाल्व सौभविमान पर बैठकर समुद्र के निकट जा रहा है; तब मैं उसी के पीछे लग गया। समुद्र के निकट पहुँचकर उत्ताल तरङ्गों वाले महासागर की कुक्षिके अन्तर्गत उसके नाभिदेश नामक द्वीप पर राजा शाल्व अपने सौभविमान पर ठहरा हुआ था। वह दुष्टात्मा दूर से ही मुझे देखकर मुसकराता और बारम्बार युद्ध के लिये ललकारने लगता। मेरे शार्ङ्ग धनुष से छूटे हुए बहुत-से मर्मभेदी बाण शाल्व के विमान तक नहीं पहुँच सके, जिससे मैं रोष में भर गया।
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैर्बहुभिर्मर्मभेदिभिः ।
पुंर नासाद्यत शरैस्ततो मां रोष आविशत् ॥
मेरे शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए बहुत- से मर्मभेदी बाण शाल्वके विमानतक नहीं पहुँच सके । इससे मैं रोषमें भर गया ।
नीच दैत्य शाल्व स्वभाव से ही पापाचारी था। उसने मेरे ऊपर सहस्रों बाणधाराएँ बरसायीं। उसने मेरे सारथि, घोड़ों तथा सैनिकों पर भी बाणों की झड़ी लगा दी। उन असुरों ने अपने मर्मवेधी बाणों द्वारा मेरे घोड़ों, रथ और दारुक को भी ढक दिया। उस समय मेरे घोड़े, रथ, सारथि दारुक, मैं और मेरे सभी सैनिक— बाणों से आच्छादित होकर अदृश्य हो गए थे। तब मैंने भी अपने धनुष से दिव्य विधि से अभिमन्त्रित किए हुए कई हजार बाण बरसाये। शाल्व का सौभविमान आकाश में इस प्रकार प्रवेश कर गया था कि वह सैनिकों की दृष्टि में आता ही नहीं था, मानो एक कोस दूर चला गया हो। उन सैनिकों ने रङ्गशाला में बैठे दर्शकों की भाँति मेरे युद्ध का दृश्य देखकर सिंहनाद और करतलध्वनि से मेरा हर्ष बढ़ाया।
न तत्र विषयस्त्वासीन्मम सैन्यस्य भारत ।
खे विषक्तं हि तत् सौभं क्रोशमात्र इवाभवत् ॥
भारत! शाल्वका सौभविमान आकाशमें इस प्रकार प्रवेश कर गया था कि मेरे सैनिकोंकी दृष्टिमें आता ही नहीं था, मानो एक कोस दूर चला गया हो ।
मेरे हाथों से छूटे हुए मनोहर पङ्ख वाले बाण दानवों के अङ्गों में शलभों की भाँति घुसने लगे। कन्धे और भुजाएँ कट जाने से वे दानव कबन्ध की आकृति में भयङ्कर नाद करते हुए समुद्र में गिरने लगे; जो गिरते, उन्हें समुद्र के जीव निगल जाते। तत्पश्चात् मैंने गोदुग्ध, कुन्दपुष्प, चन्द्रमा, मृणाल तथा चाँदी की कान्ति वाले पाञ्चजन्य शङ्ख को बड़े जोर से फूँका। उन दानवों को गिरते देख सौभराज शाल्व महान मायायुद्ध के द्वारा मेरा सामना करने लगा। मेरे ऊपर गदा, हल, प्रास, शूल, शक्ति, फरसे, खड्ग, वज्र, पाश और बाणों की निरन्तर वर्षा होने लगी।
मैंने शाल्व की उस माया को अपनी माया द्वारा ही नष्ट कर दिया। उसके माया-नाश होने पर वह पर्वत के शिखरों द्वारा युद्ध करने लगा। कभी अन्धकार हो जाता, कभी प्रकाश; कभी मेघ आकाश को घेर लेते, तो कभी बादलों के छिन्न-भिन्न होने से सुन्दर दिन प्रकट हो जाता। कभी सर्दी और कभी गर्मी पड़ने लगती; अङ्गार और धूल की वर्षा के साथ शस्त्रों की भी वृष्टि होने लगती। मैंने समय पर युद्ध करते हुए बाणों से शाल्व की सेना को सब ओर से सन्तप्त कर दिया।
तदुपरान्त आकाश सौ सूर्यों से उद्भासित जैसा दिखने लगा। उसमें सैकड़ों चन्द्रमा और करोड़ों तारे दिखाई देने लगे! यह समझ पाना कठिन था कि दिन है या रात्रि; दिशाओं का ज्ञान भी नहीं हो रहा था। इस मोह की स्थिति में मैंने प्रज्ञास्त्र का सन्धान किया। उस अस्त्र ने सारी माया को वैसे ही उड़ा दिया जैसे हवा रूई को उड़ा देती है। इसके बाद शाल्व के साथ अत्यन्त भयङ्कर और रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा।
ततस्तदस्त्रं कौन्तेय धूतं तूलमिवानिलैः ।
तथा तदभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
लब्धालोकस्तु राजेन्द्र पुनः शत्रुमयोधयम् ॥
कुन्तीकुमार! तब उस अस्त्रने उस सारी मायाको उसी प्रकार उड़ा दिया, जैसे हवा रूईको उड़ा देती है । इसके बाद शाल्वके साथ हमलोगोंका अत्यन्त भयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध होने लगा । राजेन्द्र! सब ओर प्रकाश हो जानेपर मैंने पुनः शत्रुसे युद्ध प्रारम्भ कर दिया ।
जब सब ओर प्रकाश हो गया, तब मैंने पुनः शत्रु से युद्ध प्रारम्भ किया। शाल्वराज पुनः आकाश में चला गया था; मैंने तुरन्त शीघ्रगामी बाणों द्वारा उन्हें रोककर गगनचारी शत्रुओं को आकाश में ही मार डालने का निश्चय किया। मैंने उन सबके दो-दो और तीन-तीन टुकड़े कर डाले, जिससे अन्तरिक्ष में भारी आर्त्तनाद हुआ। तदनन्तर शाल्व ने लाखों बाणों के प्रहार से मेरे सारथि दारुक, घोड़ों तथा रथ को आच्छादित कर दिया।
तानाशुगैरापततोऽहमाशु निवार्य हन्तुं खगमान् ख एव ।
द्विधा त्रिधा चाच्छिदमाशुमुक्तै- स्ततोऽन्तरिक्षे निनदो बभूव ॥
उनके आते ही मैंने तुरंत शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उन्हें रोककर उन गगनचारी शत्रुओंको आकाशमें ही मार डालनेका निश्चय किया और शीघ्र छोड़े हुए बाणोंद्वारा उन सबके दो -दो तीन- तीन टुकड़े कर डाले । इससे अन्तरिक्षमें बड़ा भारी आर्त्तनाद हुआ ।
उस समय दारुक व्याकुल होकर मुझसे बोला— ‘प्रभो! युद्ध में डटे रहना चाहिए; इस कर्तव्य का स्मरण करके ही मैं यहाँ ठहरा हूँ। किन्तु शाल्व के बाणों से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण मुझमें खड़े रहने की भी शक्ति नहीं रह गयी है। मेरा अङ्ग शिथिल होता जा रहा है।’
उस सारथि के करुण वचन सुनकर मैंने उसकी ओर देखा। उसके मस्तक, छाती और भुजाओं में ऐसे स्थान नहीं थे जहाँ बाण न चुभे हों। जैसे वर्षा से पर्वत लाल पानी बहाने लगते हैं, वैसे ही वह अपने अङ्गों से भयङ्कर रक्त की धारा बहा रहा था। मैंने उसे ढाढ़स बँधाया, इतने में ही द्वारका का एक सेवक मेरे रथ पर चढ़ा और दुःखी होकर गद्गद कण्ठ से सन्देश सुनाया— ‘केशव! आपके पिता के सखा उग्रसेन ने कहा है कि यहाँ आ जाओ; क्योंकि शाल्व ने द्वारकापुरी में आकर शूरनन्दन वसुदेवजी को बलपूर्वक मार डाला है। अब युद्ध करके क्या लेना है? लौट आओ और द्वारका की ही रक्षा करो।’
इत्यहं तस्य वचनं श्रुत्वा परमदुर्मनाः ।
निश्चयं नाधिगच्छामि कर्तव्यस्येतरस्य च ॥
दूतका यह वचन सुनकर मेरा मन उदास हो गया । मैं कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें कोई निश्चय नहीं कर पाता था ।
यह सुनकर मेरा मन उदास हो गया। मैं कर्तव्य और अकर्तव्य के बीच निर्णय नहीं ले पा रहा था। उस अप्रिय वृत्तान्त को सुनकर मैं मन ही मन सात्यकि, बलरामजी और प्रद्युम्न की निन्दा करने लगा। मैंने सोचा— क्या बलरामजी जीवित हैं? क्या सात्यकि और प्रद्युम्न आदि जीवन धारण करते हैं? इन वीरों के जीते-जी तो इन्द्र भी वसुदेवजी को नहीं मार सकते थे; अवश्य ही वे सब प्राण त्याग चुके हैं।
इसी बीच मैंने देखा कि सौभविमान से मेरे पिता वसुदेवजी नीचे गिर रहे हैं! यह देखकर शाल्व की माया से मुझे मूर्च्छा सी आ गयी। गिरते हुए मेरे पिता का स्वरूप ऐसा था मानो पुण्य क्षय होने पर स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरने वाले राजा ययाति हों। उनकी पगड़ी बिखर गई थी, वस्त्र अस्त-व्यस्त थे और बाल बिखरे हुए थे; वे गिरते समय पुण्यहीन ग्रह की भाँति दिख रहे थे।
विशीर्णमलिनोष्णीषः प्रकीर्णाम्बरमूर्धजः ।
प्रपतन् दृश्यते ह स्म क्षीणपुण्य इव ग्रहः ॥
उनकी मलिन पगड़ी बिखर गयी थी, शरीरके वस्त्र अस्त - व्यस्त हो गये थे और बाल बिखर गये थे । वे गिरते समय पुण्यहीन ग्रहकी भाँति दिखायी देते थे ।
उनकी यह अवस्था देखकर मेरे हाथ से श्रेष्ठ शार्ङ्ग धनुष छूटकर गिर गया और मैं शाल्व की माया से मोहित होकर रथ के पिछले भाग में चुपचाप बैठ गया। मुझे प्राणरहित पड़ा देख मेरी सेना हाहाकार करने लगी। गिरते हुए मेरे पिता का शरीर मरकर गिरने वाले पक्षी के समान था। शत्रु सैनिक हाथों में शूल और पट्टिश लिये उनके ऊपर बारम्बार प्रहार कर रहे थे; इस क्रूर कृत्य ने मेरे हृदय को कम्पित कर दिया।
तं पतन्तं महाबाहो शूलपट्टिशपाणयः ।
अभिघ्नन्तो भृशं वीर मम चेतो ह्यकम्पयन् ॥
वीरवर महाबाहो! गिरते समय शत्रु सैनिक हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये उनके ऊपर बारंबार प्रहार कर रहे थे । उनके इस क्रूर कृत्यने मेरे हृदयको कम्पित- सा कर दिया ।
"वीरवर! तदनन्तर दो घड़ी के बाद जब मैं सचेत होकर देखता हूँ, तब उस महासमर में न तो सौभविमान का पता है, न मेरा शत्रु शाल्व ही दिखाई देता है और न मेरे बूढ़े पिता ही दृष्टिगोचर होते हैं। तब मेरे मन में यह निश्चय हो गया कि यह वास्तव में माया ही थी। तब मैंने सजग होकर सैकड़ों बाणों की वर्षा प्रारम्भ की।"
ततो ममासीन्मनसि मायेयमिति निश्चितम् ।
प्रबुद्धोऽस्मि ततो भूयः शतशोऽवाकिरं शरान् ॥
तब मेरे मनमें यह निश्चय हो गया कि यह वास्तवमें माया ही थी । तब मैंने सजग होकर सैकड़ों बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— "भरतश्रेष्ठ! तब मैं अपना सुन्दर धनुष उठाकर बाणों द्वारा सौभविमान से देवद्रोही दानवों के मस्तक काट-काटकर गिराने लगा। तत्पश्चात् शार्ङ्ग धनुष से छूटे हुए विषैले सर्पों के समान प्रतीत होने वाले, सुन्दर पङ्खों से सुशोभित, प्रचण्ड तेजस्वी तथा अनेक ऊर्ध्वगामी बाण मैंने राजा शाल्व पर चलाये। परन्तु उस समय सौभविमान माया से अदृश्य हो गया, अतः किसी प्रकार दिखाई नहीं देता था। इससे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।"
"भरतवंशी महाराज! तदनन्तर जब मैं निर्भय और अचल भाव से स्थित हुआ तथा उन पर शस्त्र प्रहार करने लगा, तब विकृत मुख और केश वाले सौभनिवासी दानवगण जोर-जोर से चिल्लाने लगे। तब मैंने उनके वध के लिये उस महान सङ्ग्राम में बड़ी उतावली के साथ शब्दवेधी बाण का सन्धान किया। यह देख उनका कोलाहल शान्त हो गया। जिन दानवों ने पहले कोलाहल किया था, वे सब सूर्य के समान तेजस्वी शब्दवेधी बाणों द्वारा मारे गये। महाराज! वह कोलाहल शान्त होने पर फिर दूसरी ओर उनका शब्द सुनाई दिया। तब मैंने उधर भी बाणों का प्रहार किया। भारत! इस तरह वे असुर इधर-उधर, ऊपर-नीचे दसों दिशाओं में कोलाहल करते और मेरे हाथ से मारे जाते थे।"
"तदनन्तर इच्छानुसार चलने वाला सौभविमान प्राग्ज्योतिषपुर के निकट जाकर मेरे नेत्रों को भ्रम में डालता हुआ फिर दिखाई दिया। तत्पश्चात् लोकान्तकारी भयङ्कर आकृति वाले दानव ने आकर सहसा पत्थरों की भारी वर्षा के द्वारा मुझे आवृत कर दिया। राजन्! मेरे चारों ओर शिलाखण्ड जमा हो गये थे। मैं घोड़ों और सारथिसहित प्रस्तरखण्डों से चुना-सा गया था, जिससे दिखाई नहीं देता था। यह देख वृष्णिकुल के श्रेष्ठ वीर जो मेरे सैनिक थे, भय से आर्त होकर सहसा चारों दिशाओं में भाग चले। राजन्! उस समय मेरे सभी सुहृद् खिन्नचित्त हो दुःख-शोक में डूबकर रोने और चिल्लाने लगे। शत्रुओं में उल्लास छा गया और मित्रों में शोक। अपनी मर्यादा से च्युत न होने वाले वीर युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा शाल्व एक बार मुझ पर विजयी हो चुका था। यह बात मैंने सचेत होने पर पीछे सारथी के मुँह से सुनी थी।"
द्विषतां च प्रहर्षोऽभूदार्तिश्चाद्विषतामपि ।
एवं विजितवान् वीर पश्चादश्रौषमच्युत ॥
शत्रुओंमें उल्लास छा गया और मित्रोंमें शोक । अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले वीर युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा शाल्व एक बार मुझपर विजयी हो चुका था । यह बात मैंने सचेत होनेपर पीछे सारथिके मुँहसे सुनी थी ।
"तब मैंने सब प्रकार के प्रस्तरों को विदीर्ण करने वाले इन्द्र के प्रिय आयुध वज्र का प्रहार करके उन समस्त शिलाखण्डों को चूर-चूर कर दिया। महाराज! उस समय पर्वतखण्डों के भार से पीड़ित हुए मेरे घोड़े कम्पित से हो रहे थे; उनकी बलसाध्य चेष्टाएँ बहुत कम हो गयी थीं। जैसे आकाश में बादलों के समुदाय को छिन्न-भिन्न करके सूर्य उदित होता है, उसी प्रकार शिलाखण्डों को हटाकर मुझे प्रकट हुआ देख मेरे सभी बन्धु-बान्धब पुनः हर्ष से खिल उठे।"
"तदनन्तर प्रस्तरखण्डों के भार से पीड़ित तथा धीरे-धीरे प्राणसाध्य चेष्टा करने वाले घोड़ों को देखकर सारथि ने मुझसे यह समयोचित बात कही— ‘वार्ष्णेय! वह देखिये, सौभराज शाल्व वहाँ खड़ा है। श्रीकृष्ण! इसकी उपेक्षा करने से कोई लाभ नहीं। इसके वध का कोई उचित उपाय कीजिये। महाबाहु केशव! अब शाल्व की ओर से कोमलता और मित्रभाव हटा लीजिये। इसे मार डालिये, जीवित न रहने दीजिये। शत्रुहन्ता वीरवर! आपको सारा पराक्रम लगाकर इस शत्रु का वध कर डालना चाहिये। कोई कितना ही बलवान क्यों न हो, उसे अपने दुर्बल शत्रु की भी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायों से इस शत्रु को मार डालिये। वृष्णिवंशावतंस! इस कार्य में आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह मृदुतापूर्ण उपाय से वश में आने वाला नहीं है। वास्तव में यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरी को तहस-नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये।’"
"कुन्तीनन्दन! सारथी के मुख से इस तरह की बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है। यह विचार कर मैंने शाल्वराज का वध करने और सौभविमान को मार गिराने के लिये युद्ध में मन लगा दिया। वीर! तत्पश्चात् मैंने दारुक से कहा— ‘सारथे! दो घड़ी और ठहरो (फिर तुम्हारी इच्छा पूरी हो जाएगी)।’ तदनन्तर मैंने कहीं भी कुण्णित न होने वाले दिव्य, अभेद्य, अत्यन्त शक्तिशाली, सब कुछ सहन करने में समर्थ, प्रिय तथा परम कान्तिमान आग्नेयास्त्र का अपने धनुष पर सन्धान किया। वह अस्त्र युद्ध में दानवों का अन्त करने वाला था। इतना ही नहीं, वह यक्षों, राक्षसों, दानवों तथा विपक्षी राजाओं को भी भली-भाँति भस्म कर डालने वाला और महान था। वह आग्नेयास्त्र (सुदर्शन) चक्र के रूप में था। उसके परिधि भाग में सब ओर तीखे छुरे लगे हुए थे। वह उज्ज्वल अस्त्र काल, यम और अन्तक के समान भयङ्कर था।"
दारुकं चाब्रुवं वीर मुहूर्तं स्थीयतामिति ।
ततोऽप्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवत् ॥
आग्नेयमस्त्रं दयितं सर्वसाहं महाप्रभम् ।
योजयं तत्र धनुषा दानवान्तकरं रणे ॥
वीर! तत्पश्चात् मैंने दारुकसे कहा- ' सारथे! दो घड़ी और ठहरो (फिर तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी ) । ' तदनन्तर मैंने कहीं भी कुण्ठित न होनेवाले दिव्य, अभेद्य, अत्यन्त शक्तिशाली, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ, प्रिय तथा परम कान्तिमान् आग्नेयास्त्रका अपने धनुषपर संधान किया । वह अस्त्र युद्धमें दानवोंका अन्त करनेवाला था ।
"उस शत्रुनाशक अनुपम अस्त्र को अभिमन्त्रित करके मैंने कहा— ‘तुम अपनी शक्ति से सौभविमान और उस पर रहने वाले मेरे शत्रुओं को मार डालो।’ ऐसा कहकर अपने बाहुबल से रोषपूर्वक मैंने वह अस्त्र सौभविमान की ओर चलाया। आकाश में जाते ही उस सुदर्शन चक्र का स्वरूप प्रलयकाल में उगने वाले द्वितीय सूर्य के समान प्रकाशित हो उठा। उस दिव्यास्त्र ने सौभनगर में पहुँचकर उसे श्रीहीन कर दिया और जैसे आरा ऊँचे काठ को चीर डालता है, उसी प्रकार सौभविमान को बीच से काट डाला। सुदर्शन चक्र की शक्ति से कटकर दो टुकड़ों में बँटा हुआ सौभविमान महादेव के बाणों से छिन्न-भिन्न हुए त्रिपुर की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा।"
द्विधा कृतं ततः सौभं सुदर्शनबलाद्धतम् ।
महेश्वरशरोद्धूतं पपात त्रिपुरं यथा ॥
सुदर्शन चक्रकी शक्तिसे कटकर दो टुकड़ोंमें बँटा हुआ सौभविमान महादेवजीके बाणोंसे छिन्न - भिन्न हुए त्रिपुरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ।
"सौभविमान के गिरने पर चक्र फिर मेरे हाथ में आ गया। मैंने फिर उसे लेकर वेगपूर्वक चलाया और कहा— ‘अबकी बार शाल्व को मारने के लिये तुम्हें छोड़ रहा हूँ।’ तब उस चक्र ने महासमर में बड़ी भारी गदा घुमाने वाले शाल्व के सहसा दो टुकड़े कर दिये और वह तेज से प्रज्वलित हो उठा। वीर शाल्व के मारे जाने पर दानवों के मन में भय समा गया। वे मेरे बाणों से पीड़ित होकर हाहाकार करते हुए सब दिशाओं में भाग गये। तब मैंने सौभविमान के समीप अपने रथ को खड़ा करके प्रसन्नतापूर्वक शङ्ख बजाकर सभी सुहृदों को हर्ष में निमग्न कर दिया।"
"मेरुपर्वत के शिखर के समान आकृति वाले सौभ-नगर की अट्टालिका और गोपुर सभी नष्ट हो गये। उसे जलते देख उस पर रहने वाली स्त्रियाँ इधर-उधर भाग गयीं। धर्मराज! इस प्रकार युद्ध में सौभविमान तथा राजा शाल्व को नष्ट करके मैं पुनः आनर्तनगर (द्वारका) में लौट आया और सुहृदों का हर्ष बढ़ाया। राजन्! यही कारण है, जिससे मैं उन दिनों हस्तिनापुर में न आ सका। शत्रुवीरों का नाश करने वाले धर्मराज! मेरे आने पर या तो जूआ नहीं होता या दुर्योधन जीवित नहीं रह पाता। जैसे बाँध टूट जाने पर पानी को कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार आज जबकि सब कुछ बिगड़ चुका है, तब मैं क्या कर सकूँगा?"
तदेतत् कारणं राजन् यदहं नागसाह्वयम् ।
नागमं परवीरघ्न न हि जीवेत् सुयोधनः ॥
मय्यागतेऽथवा वीर द्यूतं न भविता तथा ।
अद्याहं किं करिष्यामि भिन्नसेतुरिवोदकम् ॥
राजन्! यही कारण है, जिससे मैं उन दिनों हस्तिनापुरमें न आ सका । शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले धर्मराज! मेरे आनेपर या तो जूआ नहीं होता या दुर्योधन जीवित नहीं रह पाता । जैसे बाँध टूट जानेपर पानीको कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार आज जबकि सब कुछ बिगड़ चुका है, तब मैं क्या कर सकूँगा ।
वैशम्पायन जी कहते हैं— "जनमेजय! ऐसा कहकर पुरुषों में श्रेष्ठ महाबाहु श्रीमान् मधुसूदन कुरुनन्दन युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर द्वारका की ओर चले। अर्जुन ने उनको हृदय से लगाया और नकुल-सहदेव ने उनके चरणों में प्रणाम किया। पुरोहित धौम्य जी ने उनका सम्मान किया तथा द्रौपदी ने अपने आँसुओं से उनकी अर्चना की। पाण्डवों से सम्मानित श्रीकृष्ण सुभद्रा और अभिमन्यु को अपने सुवर्णमय रथ पर बैठाकर स्वयं भी उस पर आरूढ़ हुए। उस रथ में शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़े जुते हुए थे और वह सूर्य के समान तेजस्वी प्रतीत होता था। युधिष्ठिर को आश्वासन देकर श्रीकृष्ण उसी रथ के द्वारा द्वारकापुरी की ओर चल दिये। श्रीकृष्ण के चले जाने के पश्चात द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न ने भी द्रौपदी कुमारों को साथ ले अपनी राजधानी की ओर प्रस्थान किया। चेदिराज धृष्टकेतु भी अपनी बहिन करेणुमती को, जो नकुल की भार्या थी, अपने साथ ले पाण्डवों से मिल-जुलकर अपनी सुरम्य राजधानी शुक्तिमतीपुरी को चले गये। भारत! केकयराजकुमार भी अमित तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर समस्त पाण्डवों से विदा लेकर अपने नगर को चले गये। युधिष्ठिर के राज्य में रहने वाले ब्राह्मण तथा वैश्य बार-बार विदा करने पर भी पाण्डवों को छोड़कर जाना नहीं चाहते थे।"
केकयाश्चाप्यनुज्ञाताः कौन्तेयेनामितौजसा ।
आमन्त्र्य पाण्डवान् सर्वान् प्रययुस्तेऽपि भारत ॥
भारत! केकयराजकुमार भी अमित तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पा समस्त पाण्डवोंसे विदा लेकर अपने नगरको चले गये ।
In English
Krishna and the destruction of Shalbha's Saubha Vimana
After Krishna killed Shishupala, King Shalva attacked Dwarka using a flying machine called Saubha to seek revenge. Krishna traveled to an island to fight Shalva and his army, eventually defeating them and destroying the flying machine.
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