शिबिचरित : परम धर्म की रक्षा हेतु मनुष्य को क्या त्याग करना चाहिए?
आत्मोत्सर्ग और परम धर्म
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 194–198 · पृष्ठ 1350–1370
2,491 शब्द · 13 मिनटका पाठ · 22 श्लोक
मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा
पाण्डवों द्वारा क्षत्रियों के माहात्म्य की जिज्ञासा के कारण
वैशम्पायनजी बोले— हे जनमेजय! जब पाण्डवों ने पुनः मार्कण्डेयजी से क्षत्रियों के माहात्म्य के विषय में प्रश्न किया, तब उन्होंने कथा सुनाई।
ततः पाण्डवाः पुनर्मार्कण्डेयमूचुः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर पाण्डवोंने पुनः मार्कण्डेयजीसे प्रश्न किया ।
कुरुवंशी क्षत्रियों में सुहोत्र नाम के एक प्रसिद्ध राजा हुए। एक दिन वे महर्षियों का सत्सङ्ग करके लौट रहे थे, तभी उनके सामने रथ पर बैठे उशीनरपुत्र राजा शिबि आए। दोनों राजा एक-दूसरे के समीप पहुञ्चे और अपनी अवस्था के अनुसार एक-दूसरे का सम्मान किया। किन्तु, गुण की दृष्टि से स्वयं को बराबर समझकर, दोनों में से किसी ने भी दूसरे के लिए मार्ग नहीं छोड़ा। वे वहीं खड़े होकर एक-दूसरे का मार्ग रोकते रहे।
कथितं ब्राह्मणमहाभाग्यं राजन्यमहाभाग्यमिदानीं शुश्रूषामह इति तानुवाच मार्कण्डेयो महर्षिः श्रूयता- मिति इदानीं राजन्यानां महाभाग्यमिति ।
कुरूणामन्य-तमः सुहोत्रो नाम राजा महर्षीनभिगम्य निवृत्य रथस्थमेव राजानमौशीनरं शिबिं ददर्शाभिमुखं तौ समेत्य परस्परेण यथावयः पूजां प्रयुज्य गुणसाम्येन परस्परेण तुल्यात्मानौ विदित्वान्योन्यस्य पन्थानं न ददतुस्तत्र नारदः प्रादुरासीत् किमिदं भवन्तौ परस्परस्य पन्थानमावृत्य तिष्ठत इति ॥
- ' अच्छा सुनो । अब मैं क्षत्रियोंके माहात्म्यका वर्णन करता हूँ । कुरुवंशी क्षत्रियोंमें सुहोत्र नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं । एक दिन वे महर्षियोंका सत्संग करके जब वहाँसे लौट रहे थे, उस समय उन्होंने अपने सामने ही रथपर बैठे हुए उशीनरपुत्र राजा शिबिको देखा । निकट आनेपर उन दोनोंने अवस्थाके अनुसार एक- दूसरेका सम्मान किया । परंतु गुणमें अपनेको बराबर समझकर एकने दूसरेके लिये राह नहीं दी । इतनेहीमें वहाँ देवर्षि नारदजी प्रकट हो गये और पूछ बैठे ' यह क्या बात है ' जो कि तुम दोनों इस तरह एक -दूसरेका मार्ग रोककर खड़े हो? '
तभी वहाँ देवर्षि नारदजी प्रकट हुए। उन्होंने उन दोनों को देखकर पूछा, "यह क्या बात है? तुम दोनों इस तरह एक-दूसरे का मार्ग रोककर क्यों खड़े हो?"
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेय समास्यापर्वमें ब्राह्मणोंके माहात्म्यके सम्बन्धमें बक- इन्द्रसंवादविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥
उन दोनों ने नारदजी से कहा, "भगवन्! ऐसी बात नहीं है। पूर्वकाल के धर्म-व्यवस्थापकों ने यह उपदेश दिया है कि जो अपने से बड़ा या अधिक शक्तिशाली हो, उसे ही मार्ग देना चाहिए। हम दोनों मित्र भाव से मिले हैं, किन्तु विचार करने पर हम यह निर्णय नहीं कर पा रहे कि हममें से कौन अत्यन्त श्रेष्ठ है और कौन उसकी अपेक्षा छोटा?"
क्रूरः कौरव्य मृदवे मृदुः क्रूरे च कौरव ।
साधुश्चासाधवे साधुः साधवे नाप्नुयात् कथम् ॥
नारदजी ने उन्हें समझाने के लिए तीन श्लोक कहे। उन्होंने कहा कि क्रूर मनुष्य भी कोमल बन सकता है; वह क्रूरतापूर्ण बर्ताव तो दुष्टों के प्रति करता है, परन्तु एक साधु पुरुष दुष्टों के प्रति भी सदा साधुता का ही व्यवहार करता है। फिर वह साधु पुरुषों के साथ साधुता का बर्ताव कैसे नहीं अपनाएगा?
जयेत् कदर्यं दानेन सत्येनानृतवादिनम् ।
क्षमया क्रूरकर्माण- मसाधुं साधुना जयेत् ॥
'नीच प्रकृतिवाले मनुष्यको दान देकर वशमें करे । असत्यवादीको सत्य भाषणसे जीते । क्रूरको क्षमासे और दुष्टको उत्तम व्यवहारसे अपने वशमें करे ।
नारदजी ने आगे कहा, "मनुष्य चाहे तो अपने ऊपर किए गए उपकार का बदला सौ गुना करके चुका सकता है। देवताओं में ही यह प्रत्युपकार का भाव होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। सुहोत्र! उशीनरपुत्र शिबिका शील और स्वभाव तुमसे कहीं अधिक श्रेष्ठ है।"
तदेतद् राज्ञो महाभाग्यमप्युक्तवान् नारदः ॥
‘ इस प्रकार साक्षात् नारदजीने राजा शिबिकी महत्ताका अपने मुखसे वर्णन किया'
उन्होंने दोनों को परामर्श दिया— "नीच प्रकृति वाले मनुष्य को दान देकर वश में करो; असत्यवादी को सत्य भाषण से जीतो; क्रूर को क्षमा से और दुष्ट को उत्तम व्यवहार से वश में करो। अतः तुम दोनों ही उदार हो; इस समय तुममें से जो अधिक उदार है, वह मार्ग छोड़कर हट जाए; यही उदारता का आदर्श है।"
इदमन्यच्छूयतां ययातिर्नाहुषो राजा राज्यस्थः पौरजनावृत आसांचक्रे गुर्वर्थी ब्राह्मण उपेत्याब्रवीद् भो राजन् गुर्वर्थं भिक्षेयं समयादिति ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! अब एक- दूसरे क्षत्रिय नरेशका महत्त्व सुनो-नहुषके पुत्र राजा ययाति जब पुरवासी मनुष्योंसे घिरे हुए राजसिंहासन पर विराजमान थे, उन्हीं दिनोंकी बात है, एक ब्राह्मण गुरु- दक्षिणा देनेके लिये भिक्षा माँगनेकी इच्छासे उनके पास आकर बोला — ‘ राजन्! मैं गुरु - दक्षिणा देनेके लिये भिक्षा चाहता हूँ, किंतु उसके साथ एक शर्त है '
यह कहकर नारदजी चुप हो गए। उनकी बातें सुनकर कुरुवंशी राजा सुहोत्र ने शिबिको अपनी दायीं ओर करके मार्ग दे दिया। वे शिबिका अनेक सत्कर्मों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए अपनी राजधानी की ओर चले गए। इस प्रकार साक्षात् नारदजी ने राजा शिबिका महत्ता का वर्णन किया।
तदुभावेव भवन्तावुदारौ व इदानीं भवद्भयामन्यतमः सोऽपसर्पतु एतद् वै निदर्शनमित्युक्त्वा तूष्णीं नारदो बभूव ।
एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यः शिबिं प्रदक्षिणं कृत्वा पन्थानं दत्त्वा बहुकर्मभिः प्रशस्य प्रययौ ॥
‘ अतः तुम दोनों ही उदार हो; इस समय तुम दोनोंमें से एक, जो अधिक उदार हो, वह मार्ग छोड़कर हट जाय; यही उदारताका आदर्श है । ' ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये । यह सुनकर कुरुवंशी राजा सुहोत्रने शिबिको अपनी दायीं ओर करके मार्ग दे दिया और उनके अनेक सत्कर्मोंका उल्लेख करके उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करते हुए वे अपनी राजधानीको चले गये ।
मार्कण्डेयजी ने युधिष्ठिर से कहा— "हे महाराज! अब एक-दूसरे क्षत्रिय नरेशों का महत्त्व सुनो। नहुष के पुत्र राजा ययाति जब पुरवासी मनुष्यों से घिरे राजसिंहासन पर विराजमान थे, उन्हीं दिनों की बात है। एक ब्राह्मण गुरु-दक्षिणा देने के लिए भिक्षा माँगने की इच्छा से उनके पास आया और बोला— 'राजन! मैं गुरु-दक्षिणा के लिए भिक्षा चाहता हूँ, किन्तु उसके साथ एक शर्त है। इस संसार में प्रायः देखा जाता है कि जब किसी से कोई वस्तु माँगी जाती है, तब वह माँगने वाले से द्वेष करने लगता है। अतः राजन! मैं आपसे पूछता हूँ कि आज आप मुझे मेरी प्रिय वस्तु कैसे दे सकते हैं?'"
विद्वेषणं परमं जीवलोके कुर्यान्नरः पार्थिव याच्यमानः ।
तं त्वां पृच्छामि कथं तु राजन् दद्याद् भवान् दयितं च मेऽद्य ॥
ब्राह्मण बोला— भूपाल! इस संसारमें प्रायः देखा जाता है कि जब किसी मनुष्यसे कोई वस्तु माँगी जाती है, तब वह उस माँगनेवालेसे अत्यन्त द्वेष करने लगता है । अतः राजन्! मैं आपसे पूछता हूँ कि आज आप मुझे मेरी प्रिय वस्तु कैसे दे सकते हैं?
राजा ययाति ने उत्तर दिया— "दान लेने के अधिकारी ब्राह्मणदेव! मैं कोई वस्तु देकर उसकी बार-बार चर्चा नहीं करता। मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो आपके माँगने योग्य न हो। जो प्राप्त की जा सकती है, उसे देने की प्रतिज्ञा कर लेने पर मैं उसे देकर ही सुखी होता हूँ। मैं आपको लाल रङ्ग की एक हजार गौएँ देता हूँ; क्योंकि न्याययुक्त याचना करने वाला ब्राह्मण मुझे बहुत प्रिय है। मेरे मन में याचक के लिए कभी क्रोध नहीं आता और न ही मैं दिए हुए धन के लिए पश्चात्ताप करता हूँ।" ऐसा कहकर राजा ने ब्राह्मण को एक हजार गौएँ दे दीं और ब्राह्मण ने उन सहस्रों गौओं को ग्रहण कर लिया।
मार्कण्डेयजी ने आगे कहा— "हे युधिष्ठिर! पूर्वकाल में वृषदर्भ और सेदुक नामक दो राजा थे। दोनों ही नीति के मार्ग पर चलने वाले और अस्त्र-उपास्त्रों की विद्या में निपुण थे। वृषदर्भ ने बचपन से ही एक गुप्त व्रत ले रखा था कि ब्राह्मण को सोना-चाँदी के सिवा कुछ नहीं देना चाहिए। सेदुक इस व्रत को जानते थे।
एक दिन कोई वेदाध्ययन सम्पन्न ब्राह्मण राजा सेदुक के पास आया और उन्हें आशीर्वाद देकर गुरु-दक्षिणा हेतु भली-भान्ति बोला— 'राजन! आप मुझे एक हजार घोड़े दीजिए।' तब सेदुक ने उस ब्राह्मण से कहा— 'ब्रह्मन्! आपकी अभीष्ट गुरु-दक्षिणा देना मेरे लिए सम्भव नहीं है। अतः आप वृषदर्भ के पास चले जाइए। वे बड़े धर्मज्ञ हैं, आप उन्हीं से याचना कीजिए; वे आपकी वस्तु अवश्य दे देंगे, क्योंकि यह उनका गुप्त नियम है'।"
स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम् ।
राजा परम धर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व ।
स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति ॥
‘ अतः आप वृषदर्भके पास चले जाइये । ब्राह्मण! राजा वृषदर्भ बड़े धर्मज्ञ हैं । आप उन्हींसे याचना कीजिये । वे आपकी अभीष्ट वस्तु अवश्य दे देंगे। यह उनका गुप्त नियम है '
जब ब्राह्मण देवता वृषदर्भ के पास पहुँचे, तो उन्होंने उनसे एक हजार घोड़े माँगे। यह सुनकर राजा वृषदर्भ क्रोधित हो उठे और वे उस ब्राह्मण को कोड़े से पीटने लगे। पीड़ा से व्याकुल होकर ब्राह्मण ने उनसे पूछा— 'राजन्! मुझ निरपराध को आप क्यों मार रहे हैं?'
जब ब्राह्मण देवता शाप देने के लिए उद्यत हुए, तब राजा ने उन्हें रोकते हुए कहा— 'विप्रवर! क्या जो आपको अपना धन न दे, उसको शाप देना ही उचित है? अथवा यही ब्राह्मणोचित कर्म है?'
एवमुक्त्वा तं शपन्तं राजाऽऽह ।
विप्र किं यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत् ॥
'ऐसा कहकर ब्राह्मण देवता शाप देनेको उद्यत हो गये । तब राजाने उनसे कहा —‘विप्रवर! क्या जो आपको अपना धन न दे, उसको शाप देना ही उचित है? अथवा यही ब्राह्मणोचित कर्म है? '
ब्राह्मण ने उत्तर दिया— 'राजाधिराज! आपके पास राजा सेदुक ने मुझे भेजा है, तभी आपसे गुरु-दक्षिणा माँगने आया हूँ। उनके उपदेश के अनुसार ही मैंने आपसे याचना की है।'
राजाधिराज तव समीपं सेदुकेन प्रेषितो भिक्षितु- मागतः ।
तेनानुशिष्टेन मया त्वं भिक्षितोऽसि ॥
ब्राह्मणने कहा — ‘ राजाधिराज! आपके पास राजा सेदुकने मुझे भेजा है, तभी आपसे गुरु- दक्षिणा माँगने आया हूँ । उनके उपदेशके अनुसार ही मैंने आपसे याचना की है '
राजा बोले— 'ब्रह्मन्! आज जो भी राजकीय कर मेरे पास आए, उसे कल पूर्वाह्न में ही आपको दे दूँगा। जिसे कोड़े से पीटा जाए, उसे खाली हाथ कैसे लौटाया जा सकता है?' ऐसा कहकर राजा ने ब्राह्मण को एक दिन की आय दे दी। इस प्रकार उन्होंने एक हजार से अधिक घोड़ों का मूल्य ही प्रदान कर दिया।
इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय दैवसिकामुत्पत्तिं प्रादात् ।
अधिकस्याश्वसहस्रस्य मूल्यमेवादादिति ॥
ऐसा कहकर राजाने ब्राह्मणको एक दिनकी आय दे दी । इस प्रकार उन्होंने एक हजारसे अधिक घोड़ोंका मूल्य ही दिया* ।
मार्कण्डेय जी कहते हैं— युधिष्ठिर! एक समय देवताओं में परस्पर यह बातचीत हुई कि 'पृथ्वी पर चलकर हम उशीनर के पुत्र राजा शिबि की श्रेष्ठता की परीक्षा करें।' ऐसा कहने के साथ ही अग्नि और इन्द्र वहाँ जाने के लिए उद्यत हुए। अग्निदेव कबूतर का रूप धारण करके मानो अपने प्राण बचाने के लिए राजा के पास भागते हुए गये और इन्द्र ने बाज पक्षी का रूप धारण कर मांस के लिए उस कबूतर का पीछा किया।
राजा शिबि अपने दिव्य सिंहासन पर बैठे हुए थे, तभी वह कबूतर अचानक आकर उनकी गोद में जा गिरा। यह देखकर वहाँ उपस्थित पुरोहित ने व्याकुल होकर कहा— 'महाराज! यह कबूतर बाज के डर से अपने प्राणों की रक्षा के लिए आपकी शरण में आया है। किसी तरह प्राण बच जाएँ— यही इसका प्रयोजन है। परन्तु विद्वान् पुरुष कहते हैं कि इस तरह कबूतर का आकर गिरना भयङ्कर अनिष्ट का सूचक है। आपकी मृत्यु निकट जान पड़ती है; अतः आपको इस उत्पात की शान्ति करनी चाहिए। आप धन दान करें।'
ततपश्चात उस कबूतर ने राजा से प्रार्थना की— 'महाराज! मैं बाज के डर से प्राण बचाने के लिए प्राणार्थी होकर आपकी शरण में आया हूँ। मैं वास्तव में कबूतरा नहीं, ऋषि हूँ। मैंने स्वेच्छा से पूर्व शरीर से यह शरीर बदल लिया है। प्राणरक्षक होने के कारण आप ही मेरे प्राण हैं। मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे बचाइये! मुझे ब्रह्मचारी समझिये। मैंने वेदों का स्वाध्याय करते हुए अपने शरीर को दुर्बल किया है। मैं तपस्वी और जितेन्द्रिय हूँ। आचार्य के प्रतिकूल कभी कोई बात नहीं करता। इस प्रकार मुझे योगयुक्त और निष्पाप जानिये। मैं वेदों का प्रवचन और छन्दों का सङ्ग्रह करता हूँ। मैंने सम्पूर्ण वेदों के एक-एक अक्षर का अध्ययन किया है। मैं श्रोत्रिय विद्वान् हूँ। मुझ जैसे व्यक्ति को किसी भूखे प्राणी की भूख बुझाने के लिये उसके हवाले कर देना उत्तम दान नहीं है। अतः आप मुझे बाज को न सौंपिये। मैं कबूतर नहीं हूँ।'
तभी बाज ने राजा से कहा— 'महाराज! प्रायः सभी जीवों को बारी-बारी से विभिन्न योनियों में जन्म लेकर रहना पड़ता है। मालूम होता है कि आप इस सृष्टि-परम्परा में पहले कभी इस कबूतर से जन्म ग्रहण कर चुके हैं; तभी तो इसे अपने आश्रय में ले रहे हैं! राजन्! मैं आग्रहपूर्वक कहता हूँ, आप इस कबूतर को लेकर मेरे भोजन के कार्य में विघ्न न डालें।'
यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित रह गए और बोले— 'अहो! आज से पहले किसने कभी भी किसी पक्षी के मुख से ऐसी उत्तम संस्कृत भाषा का उच्चारण देखा या सुना है, जैसी कि ये कबूतर और बाज बोल रहे हैं? किस प्रकार इन दोनों का स्वरूप जानकर इनके प्रति न्यायोचित बर्ताव किया जा सकता है?'
राजा ने आगे कहा— 'जो राजा अपनी शरण में आये हुए भयभीत प्राणी को उसके शत्रु के हाथ में दे देता है, उसके देश में समय पर वर्षा नहीं होती। उसके बोये हुए बीज भी समय पर नहीं उगते हैं। वह कभी सङ्कट के समय जब अपनी रक्षा चाहता है, तब उसे कोई रक्षक नहीं मिलता। जो राजा शरण में आये हुए भयभीत प्राणी को उसके शत्रु के हाथ में दे देता है, उसकी पैदा हुई सन्तान छोटी अवस्था में ही मर जाती है। उसके पितरों को कभी पितृलोक में रहने के लिये स्थान नहीं मिलता और देवता उसका दिया हुआ हविष्य नहीं ग्रहण करते। वह अनुदार हृदय का मनुष्य शीघ्र ही स्वर्गलोक से भ्रष्ट हो जाता है और इन्द्र आदि देवता उसके ऊपर वज्र का प्रहार करते हैं।'
मोघमन्नं विन्दति चाप्रचेताः स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति शीघ्रमेव ।
भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ॥
जो राजा शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसका खाना- पीना निष्फल है । वह अनुदार हृदयका मनुष्य शीघ्र ही स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हो जाता है और इन्द्र आदि देवता उसके ऊपर वज्रका प्रहार करते हैं ।
राजा शिबि ने बाज को सम्बोधित कर कहा— 'बाज! इस कबूतर के बदले मेरे सेवक ले जाएँ, तुम्हारी पुष्टिके लिये मैं भात के साथ ऋषभकन्द पकाकर दूँगा। तुम जिस स्थान पर प्रसन्नतापूर्वक रह सको, वहीं चलकर रहो। ये शिबिवंशी क्षत्रिय वहीं तुम्हारे लिये भात और ऋषभकन्द का गूदा पहुँचा देंगे।'
बाज ने उत्तर दिया— 'राजन्! मैं आपसे ऋषभकन्द नहीं माँगता और न मुझे इस कबूपर से अधिक कोई दूसरा मांस ही चाहिये। आज दूसरे पक्षियों के अभाव में यह कबूतर ही मेरे लिये देवताओं का दिया हुआ भोजन है। अतः यही मेरा आहार होगा। इसे ही मुझे दे दीजिये।'
नोक्षाणं राजन् प्रार्थयेयं न चान्य- दस्मान्मांसमधिकं वा कपोतात् ।
देवैर्दत्तः सोऽद्य ममैष भक्ष- स्तन्मे ददस्व शकुनानामभावात् ॥
बाज बोला— राजन्! मैं आपसे ऋषभकन्द नहीं माँगता और न मुझे इस कबूतरसे अधिक कोई दूसरा मांस ही चाहिये । आज दूसरे पक्षियोंके अभाव में यह कबूतर ही मेरे लिये देवताओंका दिया हुआ भोजन है । अतः यही मेरा आहार होगा । इसे ही मुझे दे दीजिये ।
राजा ने फिर कहा— 'बाज! उक्षा अथवा वेहत नामक औषधियाँ बड़ी पुष्टिकारक होती हैं। मेरे सेवक जाकर उनकी खोज करें और पर्याप्त मात्रा में भात के साथ उन्हें पकाकर तुम्हारे पास पहुँचा दें। भयभीत कपोत के बदले में मेरे पास से मिलने वाला यह उचित मूल्य होगा। इसे ले लो, किन्तु इस कबूतर को न मारो। मैं अपने प्राण दे दूँगा, किन्तु इस कबूतर को नहीं दूँगा। बाज! क्या तुम नहीं जानते, यह कितना सुन्दर और स्वयं कैसा भोला-भाला है? सौम्य! अब तुम यहाँ व्यर्थ कष्ट न उठाओ। मैं इस कबूतर को किसी तरह तुम्हारे हाथ में नहीं दूँगा।'
त्यजे प्राणान् नैव दद्यां कपोतं सौम्यो ह्ययं किं न जानासि श्येन ।
यथा क्लेशं मा कुरुष्वेह सौम्य नाहं कपोतमर्पयिष्ये कथंचित् ॥
मैं अपने प्राण दे दूँगा, किंतु इस कबूतरको नहीं दूँगा । बाज! क्या तुम नहीं जानते, यह कितना सुन्दर स्वयं कैसा भोला - भाला है? सौम्य! अब तुम यहाँ व्यर्थ कष्ट न उठाओ । मैं इस कबूतरको किसी तरह तुम्हारे हाथमें नहीं दूँगा ।
तब राजा ने एक प्रस्ताव रखा— 'बाज! जिस कर्म से शिबि देश के लोग प्रसन्न होकर मुझे साधुवाद देते हुए मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करें और जिससे मेरे द्वारा तुम्हारा भी प्रिय कार्य बन सके, वह बताओ। उसी के लिये मुझे आज्ञा दो। मैं वही करूँगा।'
बाज बोला— 'राजन्! अपनी दायीं जाँघ से उतना ही मांस काटकर दो, जितना इस कबूतर के बराबर हो सके। ऐसा करने से कबूतर की भली-भाँति रक्षा हो सकती है। इसी से शिबि देश की प्रजा आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करेगी और मेरा भी प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायेगा।'
ऊरोर्दक्षिणादुत्कृत्य स्वपिशितं तावद् राजन् यावन्मांसं कपोतेन समम् ।
तथा तस्मात् साधु त्रातः कपोतः प्रशंसेयुश्च शिबयः कृतं च प्रियं स्यान्ममेति ॥
बाज बोला— राजन्! अपनी दायीं जाँघसे उतना ही मांस काटकर दो, जितना इस कबूतरके बराबर हो सके । ऐसा करनेसे कबूतरकी भलीभाँति रक्षा हो सकती है । इसीसे शिबिदेशकी प्रजा आपकी भूरि- भूरि प्रशंसा करेगी और मेरा भी प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा ।
तत्पश्चात राजा ने अपनी दायीं जाँघ से मांस काटकर उसे तराजू के एक पलड़े पर रखा, किन्तु कबूतर के साथ तौलने पर वही अधिक भारी निकला। राजा ने फिर दूसरी बार अपने शरीर का मांस काटकर रखा, तो भी कबूतर का ही पलड़ा भारी रहा। इस प्रकार क्रमशः उन्होंने अपने सभी अङ्गों का मांस काट-काटकर तराजू पर चढ़ाया, तो भी कबूतर ही भारी रहा। अन्ततः राजा स्वयं ही तराजू पर चढ़ गये। ऐसा करते समय उनके मन में कोई क्लेश नहीं हुआ।
यह अद्भुत दृश्य देखकर बाज बोल उठा— 'हो गयी कबूतर की प्राणरक्षा।' ऐसा कहकर वह वहीं अन्तर्धान हो गया। अब राजा शिबि ने व्याकुल होकर कबूतर से पूछा— 'कपोत! ये शिबिलोग तो तुम्हें कबूतर ही समझते थे। पक्षिप्रवर! मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, यह बाज कौन था? ईश्वर के सिवा दूसरा कोई कभी ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य नहीं कर सकता। भगवन्! मेरे इस प्रश्न का यथावत् उत्तर दो।'
कबूतर ने कहा— 'राजन्! मैं धूममयी ध्वजा से विभूषित वैश्वानर अग्नि हूँ और उस बाज के रूप में साक्षात् वज्रधारी शचीपति इन्द्र थे। सुरथानन्दन! तुम एक श्रेष्ठ पुरुष हो। हम दोनों तुम्हारी श्रेष्ठता की परीक्षा लेने के लिये यहाँ आये थे। राजन्! तुमने मेरी रक्षा के लिये जो तलवार से काटकर अपना यह मांस दिया है, मैं अभी इसके घावों को अच्छा कर देता हूँ। यहाँ की चमड़ी का रङ्ग सुन्दर और सुनहरा हो जायेगा तथा इससे बड़ी पवित्र सुगन्ध फैलती रहेगी; यही तुम्हारा राजचिह्न होगा।'
वैश्वानरोऽहं ज्वलनो धूमकेतु- रथैव श्येनो वज्रहस्तः शचीपतिः ।
साधु ज्ञातुं त्वामृषभं सौरथेय नौ जिज्ञासया त्वत्सकाशं प्रपन्नौ ॥
कबूतर बोला— राजन्! मैं धूममयी ध्वजासे विभूषित वैश्वानर अग्नि हूँ और उस बाजके रूपमें साक्षात् वज्रधारी शचीपति इन्द्र थे । सुरथानन्दन! तुम एक श्रेष्ठ पुरुष हो । हम दोनों तुम्हारी श्रेष्ठताकी परीक्षाके लिये यहाँ आये थे ।
वैशम्पायन जी ने कहा— हे जनमेजय! जब पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय मुनि से पुनः क्षत्रिय नरेशों के माहात्म्य का वर्णन करने की प्रार्थना की, तब उन मुनि ने शिबिचरित का वह अद्भुत प्रसङ्ग सुनाया।
मार्कण्डेय जी बोले— 'धर्मराज! अष्टक के तीन भाई थे— प्रतर्दन, वसुमना तथा उशीनर-पुत्र शिबि। एक बार जब वे स्वर्ग की ओर जा रहे थे, तब देवर्षि नारद उन्हें मिले। नारद जी ने बताया कि स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने वाले महान राजाओं में अष्टक सबसे पहले उतरेगा, क्योंकि वह अपनी दान की हुई गौओं का आत्मश्लाघा करता था। उसके बाद प्रतर्दन आएगा, जिसने ब्राह्मणों को अश्व तो दिए परन्तु उनकी निन्दा भी की। फिर वसुमना आएगा, जिसने छल से रथ प्राप्त किया था। किन्तु नारद जी ने कहा कि यदि इन सबके बीच केवल शिबि ही स्वर्ग जा रहे हों, तो सबसे पहले शिबि उतरेंगे और मैं स्वयं उनके पीछे आऊँगा।'
अथैकेन यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् पुनर्नारद आह शिबिर्यायादहमवतरेयमत्र किं कारणमित्यब्रवीत् असावहं शिबिना समो नास्मि यतो ब्राह्मणःकश्चिदेनमब्रवीत् ॥
शिबे अन्नार्थ्यस्मीति तमब्रवीच्छिबिः किं क्रियतामाज्ञापयतु भवानिति ॥
‘ यदि आपके साथ हममेंसे एकमात्र शिबिको ही स्वर्गलोकमें जाना हो तो वहाँसे पहले कौन उतरेगा? ' ऐसा प्रश्न होनेपर नारदजीने फिर कहा - ' शिबि जायँगे और मैं उतरूंगा । ‘ इसमें क्या कारण है? ' यह पूछे जानेपर देवर्षि नारदने कहा- ' मैं राजा शिबिके समान नहीं हूँ, क्योंकि एक दिन एक ब्राह्मणने शिबिसे कहा - ' शिबे! मैं भोजन करना चाहता हूँ । ' राजाने पूछा — ‘ आपके लिये क्या रसोई बनायी जाय, आज्ञा कीजिये '
युधिष्ठिर ने जिज्ञासा की— 'मुनिराज! ऐसा क्या कारण है कि शिबि सबसे पहले उतरेंगे?'
मार्कण्डेय जी ने गम्भीर स्वर में कहा— 'हे धर्मराज! शिबि के समान कोई दूसरा नहीं है। एक बार एक ब्राह्मण ने शिबि से भोजन की याचना की। राजा ने पूछा— "आपके लिए क्या रसोई बनायी जाए?" तब उस ब्राह्मण ने अत्यन्त कठिन शर्त रखी— "तुम्हारा पुत्र बृहद्गर्भ मारा जाए, उसका दाह-संस्कार किया जाए और तत्पश्चात् अन्न तैयार करके मेरी प्रतीक्षा की जाए।"'
अथैनं ब्राह्मणोऽब्रवीद् य एष ते पुत्रो बृहद्गर्भो नाम एष प्रमातव्य इति तमेनं संस्कुरु अन्नं चोपपादय ततोऽहं प्रतीक्ष्य इति ।
ततः पुत्रं प्रमाथ्य संस्कृत्य विधिना साधयित्वा पात्र्यामर्पयित्वा शिरसा प्रतिगृह्य ब्राह्मणममृगयत् ॥
‘ तब इनसे ब्राह्मणने कहा – ' यह जो तुम्हारा पुत्र बृहद्गर्भ है, इसे मार डालो । ' फिर उसका दाह - संस्कार करो । तत्पश्चात् अन्न तैयार करो और मेरी प्रतीक्षा करो। ' तब राजाने पुत्रको मारकर उसका दाह - संस्कार कर दिया और फिर विधिपूर्वक अन्न तैयार करके उसे बटलोईमें डालकर (और ढक्कनसे ढककर) अपने सिरपर रख लिया, फिर वे उस ब्राह्मणकी खोज करने लगे ।
'राजा शिबि ने विचलित हुए बिना अपने पुत्र को मारकर उसका दाह-संस्कार कर दिया। उन्होंने विधिपूर्वक अन्न तैयार किया और उसे ढक्कन से ढककर अपने सिर पर रखा। वे व्याकुल होकर उस ब्राह्मण की खोज करने लगे। तभी किसी ने आकर सूचना दी कि वह ब्राह्मण नगर में घुसकर राजा के कोषागार, शस्त्रागार और अश्वशाला में आग लगा रहा है। इतना सब सुनकर भी राजा शिबि के मुख की कान्ति स्थिर रही, उनके मन में तनिक भी विकार नहीं आया। वे सीधे नगर में गए और बोले— "भगवन्! आपका भोजन तैयार है।"'
'ब्राह्मण ने आश्चर्य से मुँह नीचा किए देखा और फिर कहा— "तुम स्वयं यह सब खा जाओ।" तब शिबि ने प्रसन्नतापूर्वक उनकी आज्ञा मानी, किन्तु जैसे ही उन्होंने ढक्कन हटाया, ब्राह्मण ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा— "राजन्! तुमने क्रोध को जीत लिया है। तुम्हारे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं जो तुम ब्राह्मण को न दे सको।"'
अथास्य ब्राह्मणो हस्तमगृह्णात् ।
अब्रवीच्चैनं जितक्रोधोऽसि न ते किञ्चिदपरित्याज्यं ब्राह्मणार्थे ब्राह्मणोऽपि तं महाभागं सभाजयत् ॥
‘ तब ब्राह्मणने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा - ' राजन्! तुमने क्रोधको जीत लिया है । तुम्हारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुम ब्राह्मणके लिये न दे सको । ' ऐसा कहकर ब्राह्मणने भी उन महाभाग नरेशका समादर किया ।
'तभी राजा ने देखा कि उनका पुत्र बृहद्गर्भ दिव्य वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर खड़ा था और उसके शरीर से पवित्र सुगन्ध आ रही थी। साक्षात् विधाता ब्राह्मण के वेश में शिबि की परीक्षा लेने आए थे। जब देवता अन्तर्धान हुए, तो मन्त्रियों ने पूछा— "महाराज! आपने यह दुःसाहसपूर्ण कार्य क्यों किया?" तब शिबि ने कहा— "मैं यह दान यश, धन या भोग के लिए नहीं करता, बल्कि धर्म के मार्ग पर चलने के लिए करता हूँ। श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्ग से चले हैं, वही उत्तम है।"'
शिबिरुवाच नैवाहमेतद् यशसे ददानि न चार्थहेतोर्न च भोगतृष्णया ।
पापैरनासेवित एष मार्ग इत्येवमेतत् सकलं करोमि ॥
शिबि बोले- मैं यशके लिये यह दान नहीं देता । धनके लिये अथवा भोगकी लिप्सासे भी दान नहीं करता । यह धर्मात्माओंका मार्ग है । पापी मनुष्य इसपर नहीं चल सकते । ऐसा समझकर ही मैं यह सब कुछ करता रहता हूँ ।
'इस प्रकार राजा शिबि के दाहिने पार्श्व से एक पुत्र उत्पन्न होगा जिसका नाम 'कपोतरोमा' होगा; वह प्रजा का पालक और यशस्वी होने के साथ-साथ देवर्षियों का अत्यन्त आदरपात्र बनेगा।'
In English
The Greatness of Kshatriya Kings
Markandeya tells Yudhishthira stories of virtuous kings to demonstrate their character. These include King Suhotra yielding the way to King Shibi, King Yayati's generosity toward a Brahmin, and King Shibi's sacrifice to protect a pigeon from a hawk.
This page answers
- Why did suhotra give way to shibi?
- How did king yayati help the brahmin?
- What did king shibi do to save the pigeon from the hawk?
- Why did the hawk ask king shibi for meat from his thigh?
Also written: Shibicharita, Shibi, Markandeya, Suhotra, Yayati, Seduka, Vrishadarbha, Indra, Agni, Yudhishthira, Ashtaka, Pratardana, Vasumana, Brihadgarbha, शिबिचरित