श्रीगणेशाय नमः।

निमित्ताख्यान : अधर्म के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना का मार्ग क्या है?

काल और धर्म का सन्तुलन

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ३ · भीष्मपर्व → जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · पृष्ठ 1239–1253

1,871 शब्द · 10 मिनटका पाठ · 17 श्लोक

व्यास ने धृतराष्ट्र से कहा

आगामी महायुद्ध के अमङ्गलसूचक उत्पातों और विनाशकारी सङ्केतों की चेतावनी देने हेतु

महर्षि व्यास ने धृतराष्ट्र के सम्मुख उन अमङ्गलसूचक उत्पातों का वर्णन करना आरम्भ किया, जो आने वाले भीषण सङ्ग्राम का सङ्केत दे रहे थे। उन्होंने कहा— “राजन्! प्रकृति का क्रम उलट जाएगा। गायों के गर्भ से गदहे पैदा होंगे और पुत्र अपनी माताओं के साथ रमण करेंगे। वन के वृक्ष बिना ऋतु के फूल और फल देने लगेंगे। गर्भवती स्त्रियाँ पुत्र को जन्म न देकर अपने गर्भ से भयङ्कर जीवों को पैदा करती दिखाई देंगी।”

व्यास उवाच

खरा गोषु प्रजायन्ते रमन्ते मातृभिः सुताः ।
अनार्तवं पुष्पफलं दर्शयन्ति वनद्रुमाः ॥

व्यासजीने कहा — राजन्! गायोंके गर्भसे गदहे पैदा होते हैं, पुत्र माताओंके साथ रमण करते हैं । वनके वृक्ष बिना ऋतुके फूल और फल प्रकट करते हैं ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 1पृष्ठ 1240

व्यास जी ने उन विचित्र प्राणियों का चित्रण करते हुए कहा— “ऐसे पशु जन्म लेंगे जिनके तीन सींग, चार नेत्र, पाँच पैर, दो मस्तक, दो पूँछ और अनेक दाढ़ें होंगी। वे मुँह फैलाकर अमङ्गलसूचक वाणी बोलेंगे। गरुड़ पक्षी के मस्तक पर शिखा और सींग दिखाई देंगे और उनके तीन पैर तथा चार दाढ़ें दृश्य होंगी। तुम्हारे नगर में वेदवादी ब्राह्मणों की स्त्रियाँ गरुड़ और मोर को जन्म देंगी। घोड़ी गाय के बछड़े को देगी, कुतिया के पेट से सियार पैदा होगा और हाथी कुत्तों को जन्म देंगे। यहाँ तक कि तोते भी अशुभ बोलियाँ बोलने लगेंगे।”

व्यास उवाच

गोवत्सं वडवा सूते श्वा सृगालं महीपते ।
कुक्कुरान् करभाश्चैव शुकाश्चाशुभवादिनः ॥

भूपाल! घोड़ी गायके बछड़ेको जन्म देती है, कुतियाके पेटसे सियार पैदा होता है, हाथी कुत्तोंको जन्म देते हैं और तोते भी अशुभसूचक बोली बोलने लगे हैं ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 6पृष्ठ 1240

प्रकृति के इस विकृत रूप का वर्णन करते हुए व्यास जी ने कहा— “कुछ स्त्रियाँ एक साथ चार-चार या पाँच-पाँच कन्याओं को जन्म देंगी, जो पैदा होते ही नाचती, गाती और हँसती हैं। नीच जातियों के घरों में उत्पन्न हुए काने और कुबड़े बालक भी हाथों में डण्डा लिए एक-दूसरे पर धावा बोलते हुए, कृत्रिम नगर बनाकर उन्हें रौंदकर मिट्टी में मिला देंगे। जलीय पुष्प जैसे पद्म, उत्पल और कुमुद वृक्षों पर उगने लगेंगे।”

प्रतिमाश्चालिखन्त्येताः सशस्त्राः कालचोदिताः ।
अन्योन्यमभिधावन्ति शिशवो दण्डपाणयः ॥

ये सब कालसे प्रेरित हो हाथोंमें हथियार लिये मूर्तियाँ लिखते और बनाते हैं । छोटे - छोटे बच्चे हाथमें डंडा लिये एक- दूसरेपर धावा करते हैं ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 9पृष्ठ 1241

आकाश मण्डल की स्थिति बताते हुए उन्होंने कहा— “चारों ओर भयङ्कार आँधी चलेगी, धूल का उड़ना शान्त नहीं होगा और धरती बारम्बार काँपेगी। राहु सूर्य के निकट जा रहा है और केतु चित्रा का अतिक्रमण कर स्वाती पर स्थित है; उसकी दृष्टि विशेष रूप से कुरुवंश के विनाश पर है। अत्यन्त भयङ्कर धूमकेतु पुष्य नक्षत्र पर आक्रमण कर रहा है, जो दोनों सेनाओं का घोर अमङ्गल करेगा। मङ्गल वक्र होकर मघा नक्षत्र में है और बृहस्पति श्रवण नक्षत्र में विराजमान है। सूर्यपुत्र शनि पूर्वा फाल्गुनी को पीड़ा दे रहा है। शुक्र उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र पर दृष्टि लगाए हुए है। केतु नामक उपग्रह इन्द्र से सम्बन्धित तेजस्वी ज्येष्ठा नक्षत्र पर जाकर स्थित है।”

धूमकेतुर्महाघोरः पुष्यं चाक्रम्य तिष्ठति ।
सेनयोरशिवं घोरं करिष्यति महाग्रहः ॥

अत्यन्त भयंकर धूमकेतु पुष्य नक्षत्रपर आक्रमण करके वहीं स्थित हो रहा है । यह महान् उपग्रह दोनों सेनाओंका घोर अमंगल करेगा ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 13पृष्ठ 1241

व्यास जी ने ग्रहों के इस क्रूर प्रभाव को समझाते हुए आगे कहा— “राहु सदा वक्री होकर रोहिणी, चन्द्रमा और सूर्य को पीड़ा पहुँचाता है। मङ्गल ग्रह बारम्बार वक्र होकर बृहस्पति युक्त श्रवण को आवृत कर रहा है। दूसरी ओर, पृथ्वी जो अनाज से आच्छादित थी, वहाँ विचित्र दृश्य दिखेंगे; गौएँ बछड़ों से पिन्हा जाने के बाद अपने थनों से खून बहाती नज़र आएंगी। योद्धाओं के धनुष से आग की लपटें निकलने लगेंगी और खड्ग इस प्रकार प्रज्वलित हो उठेंगे मानो वे स्वयं देख रहे हों कि सङ्ग्राम उपस्थित है। शस्त्र, जल, कवच और ध्वजाएँ अग्नि के समान लाल हो जाएँगी। राजन्! जब पाण्डवों के साथ कौरवों का हिंसात्मक सङ्ग्राम आरम्भ होगा, तब धरती पर रक्त की नदियाँ बहेंगी, जिनमें शोणितमयी भँवर उठेंगे और रथों की ध्वजाएँ उन नदियों के ऊपर छोटी डोंगियों के समान व्याप्त दिखेंगी।”

पृथिवी शोणितावर्ता ध्वजोडुपसमाकुला ।
कुरूणां वैशसे राजन् पाण्डवैः सह भारत ॥

राजन्! भरतनन्दन! जब पाण्डवोंके साथ कौरवोंका हिंसात्मक संग्राम आरम्भ हो जायगा, उस समय धरतीपर रक्तकी नदियाँ बह चलेंगी, उनमें शोणितमयी भँवरें उठेंगी तथा रथकी ध्वजाएँ उन नदियोंके ऊपर छोटी -छोटी डोंगियोंके समान सब ओर व्याप्त दिखायी देंगी ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 23पृष्ठ 1243

पक्षी और पशुओं की दशा बताते हुए व्यास बोले— “चारों दिशाओं में पशु-पक्षी प्राणान्तकारी अनर्थ का दर्शन कराते हुए भयङ्कर बोली बोलेंगे। रात में एक आँख, एक पाँख और एक पैर वाला पक्षी आकाश में विचरकर ऐसी बोली बोलेगा मानो कोई रक्त वमन कर रहा हो। सभी शस्त्र जलते हुए प्रतीत होंगे और सप्तर्षियों की प्रभा फीकी पड़ती जाएगी। इस पक्ष में तिथियों का क्षय हुआ है; राहु ने बिना पर्व के ही चन्द्रमा और सूर्य को ग्रस लिया है, जिससे प्रजा का संहार होगा। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को भयङ्कर मांस की वर्षा हुई थी, जहाँ राक्षसों का मुँह रक्त से भरा था।”

अपर्वणि ग्रहेणैतौ प्रजाः संक्षपयिष्यतः ।
मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्णचतुर्दशीम् ।
शोणितैर्वक्त्रसम्पूर्णा अतृप्तास्तत्र राक्षसाः ॥

इस प्रकार अप्रसिद्ध पर्वमें ग्रहण लगनेके कारण ये सूर्य और चन्द्रमा प्रजाका विनाश करनेवाले होंगे । कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको बड़े जोरसे मांसकी वर्षा हुई थी । उस समय राक्षसोंका मुँह रक्तसे भरा हुआ था । वे खून पीते अघाते नहीं थे ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 33पृष्ठ 1244

नदियों और प्राकृतिक आपदाओं का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा— “बड़ी-बड़ी नदियाँ रक्त के समान लाल होकर उलटे स्रोत की ओर बहने लगेंगी। कुँओं से फेन ऊपर को उठकर उछलने लगेगा। बिजली की कड़कड़ाहट के बीच उल्काएँ गिर रही हैं। आज की रात बीतने पर तुम लोगों को अपने अन्याय का फल मिलने लगेगा। महर्षि घोर आशङ्का व्यक्त कर रहे हैं कि यह भूमि सहस्रों राजाओं का रक्तपान करेगी; हिमालय और मन्दराचल से भयानक शब्द गूँजेंगे और पर्वत टूटकर गिरेंगे। बवण्डर वृक्षों को उखाड़ फेंकेंगे। अग्नि की लपटें वामावर्त होकर उठेंगी और उनसे दुर्गन्ध आएगी। वृक्षों पर कौए बैठकर भयङ्कर कोलाहल करेंगे और पक्षी 'पक्वा-पक्वा' बोलकर राजाओं के विनाश का सङ्केत देंगे। दुष्ट हाथी भय से मल-मूत्र त्याग रहे होंगे और घोड़े पसीने से तरबतर होंगे।”

एतच्छ्रुत्वा भवानत्र प्राप्तकालं व्यवस्यताम् ।
यथा लोकः समुच्छेदं नायं गच्छेत भारत ॥

भारत! यह सुनकर ( और उसके परिणामपर विचार करके ) तुम इस अवसरके अनुरूप ऐसा कोई उपाय करो, जिससे यह संसार विनाशसे बच जाय ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 46पृष्ठ 1246

व्यास जी ने अन्त में गम्भीर स्वर में कहा— “भारत! इस अवसर पर ऐसा कोई उपाय करो जिससे यह संसार विनाश से बच जाए।”

कृत्तिकां पीडयंस्तीक्ष्णैर्नक्षत्रं पृथिवीपते ।
अभीक्ष्णवाता वायन्ते धूमकेतुमवस्थिताः ॥

राजन्! अपने तीक्ष्ण ( क्रूरतापूर्ण) कर्मोंके द्वारा उपलक्षित होनेवाला राहु ( चित्रा और स्वातीके बीचमें रहकर सर्वतोभद्रचक्रगतवेधके अनुसार) कृत्तिका नक्षत्रको पीड़ा दे रहा है । बारंबार धूमकेतुका आश्रय लेकर प्रचण्ड आँधी उठती रहती है ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 30पृष्ठ 1244

वैशम्पायन जी कहते हैं कि जनमेजय के सामने व्यास जी का यह वचन सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा— “भगवन! मैं तो इसे पूर्वनिश्चित दैव का विधान मानता हूँ; अतः यह जनसंहार होगा ही। यदि राजा लोग क्षत्रियधर्म के अनुसार युद्ध में मारे जाएँगे, तो वे वीरलोक को प्राप्त होकर केवल सुख के भागी होंगे।”

वैशम्पायन उवाच

राजानः क्षत्रधर्मेण यदि वध्यन्ति संयुगे ।
वीरलोकं समासाद्य सुखं प्राप्स्यन्ति केवलम् ॥

‘ यदि राजालोग क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्धमें मारे जायँगे तो वीरलोकको प्राप्त होकर केवल सुखके भागी होंगे ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 48पृष्ठ 1246

नृपश्रेष्ठ! अपने पुत्र धृतराष्ट्र के इस प्रकार यथार्थ बात कहने पर ज्ञानियों में श्रेष्ठ महर्षि व्यास कुछ देर तक बड़े सोच-विचार में पड़े रहे। वे शान्त भाव से चिन्तन करते रहे, जैसे संसार की नश्वरता को देख रहे हों। दो घड़ी तक गहन चिन्तन करने के बाद उन्होंने पुनः बोलना आरम्भ किया— "राजेन्द्र! इसमें संशय नहीं है कि काल ही इस जगत्‌ का संहार करता है और वही पुन: इन सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि करता है। यहाँ कोई वस्तु सदा रहनेवाली नहीं है। राजन्! तुम अपने जाति-भाई, कौरवों, सगे-सम्बन्धियों तथा हितैषी-सुहृदों को धर्मानुकूल मार्ग का उपदेश करो; क्योंकि तुम उन सबको रोकने में समर्थ हो। जाति-वध को अत्यन्त नीच कर्म बताया गया है और वह मुझे अत्यन्त अप्रिय है। तुम यह अप्रिय कार्य न करो। महाराज! यह काल तुम्हारे पुत्र रूप से उत्पन्न हुआ है। वेद में हिंसा की प्रशंसा नहीं की गयी है और हिंसा से किसी प्रकार हित नहीं हो सकता। कुलधर्म अपने शरीर के ही समान है; जो इस कुलधर्म का नाश करता है, उसे वह धर्म ही नष्ट कर देता है। जब तक तुम पर कोई आपत्ति नहीं आयी है, तब तक तुम काल से प्रेरित होकर ही धर्म की अवहेलना करके कुमार्ग पर चल रहे हो, जैसा कि बहुधा लोग किसी आपत्ति में पड़ने पर ही करते हैं।"

वैशम्पायन उवाच

ज्ञातीनां वै कुरूणां च सम्बन्धिसुहृदां तथा ॥

धर्म्यं देशय पन्थानं समर्थो ह्यसि वारणे ।
क्षुद्रं जातिवधं प्राहुर्मा कुरुष्व ममाप्रियम् ॥

‘ राजन्! तुम अपने जाति- भाई, कौरवों, सगे- सम्बन्धियों तथा हितैषी - सुहृदोंको धर्मानुकूल मार्गका उपदेश करो; क्योंकि तुम उन सबको रोकनेमें समर्थ हो । जाति- वधको अत्यन्त नीच कर्म बताया गया है । वह मुझे अत्यन्त अप्रिय है । तुम यह अप्रिय कार्य न करो ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 52-53पृष्ठ 1247

व्यासजी की दृष्टि गम्भीर थी। उन्होंने धृतराष्ट्र को चेतावनी देते हुए कहा— "राजन्! तुम्हारे कुल का तथा अन्य बहुत-से राजाओं का विनाश करने के लिये यह तुम्हारे राज्य के रूप में अनर्थ ही प्राप्त हुआ है। तुम्हारा धर्म अत्यन्त लुप्त हो गया है। अपने पुत्रों को धर्म का मार्ग दिखाओ। दुर्धर्ष वीर! तुम्हें राज्य लेकर क्या करना है, जिसके लिये अपने ऊपर पाप का बोझ लाद रहे हो? तुम मेरी बात मानने पर यश, धर्म और कीर्ति का पालन करते हुए स्वर्ग प्राप्त कर लोगे। पाण्डवों को उनके राज्य प्राप्त हों और समस्त कौरव आपस में सन्धि करके शान्त हो जाएँ।"

यशो धर्मं च कीर्तिं च पालयन् स्वर्गमाप्स्यसि ।
लभन्तां पाण्डवा राज्यं शमं गच्छन्तु कौरवाः ॥

' तुम मेरी बात माननेपर यश, धर्म और कीर्तिका पालन करते हुए स्वर्ग प्राप्त कर लोगे । पाण्डवोंको उनके राज्य प्राप्त हों और समस्त कौरव आपसमें संधि करके शान्त हो जायँ'

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 58पृष्ठ 1248

विप्रवर व्यासजी जब इस प्रकार उपदेश दे रहे थे, उसी समय बोलने में चतुर अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र ने बीच में ही उनकी बात काटकर उनसे इस प्रकार कहा— "तात! जैसा आप जानते हैं, उसी प्रकार मैं भी इन बातों को समझता हूँ। भाव और अभाव का यथार्थ स्वरूप मुझे भी ज्ञात है, तथापि यह संसार अपने स्वार्थ के लिये मोह में पड़ा रहता है। मुझे भी संसार से अभिन्न ही समझें। आपका प्रभाव अनुपम है। आप हमारे आश्रय, मार्गदर्शक तथा धीर पुरुष हैं। मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। महर्षे! मेरी बुद्धि भी अधर्म करना नहीं चाहती; परन्तु क्या करूँ? मेरे पुत्र मेरे वश में नहीं हैं। आप ही हम भरतवंशियों की धर्मप्रवृत्ति, यश तथा कीर्ति के हेतु हैं। आप कौरवों और पाण्डवों—दोनों के माननीय पितामह हैं।"

धृतराष्ट्र उवाच

यथा भवान् वेत्ति तथैव वेत्ता भावाभावौ विदितौ मे यथार्थौ ।
स्वार्थे हि सम्मुह्यति तात लोको मां चापि लोकात्मकमेव विद्धि ॥

धृतराष्ट्र बोले- तात! जैसा आप जानते हैं, उसी प्रकार मैं भी इन बातोंको समझता हूँ। भाव और अभावका यथार्थ स्वरूप मुझे भी ज्ञात है, तथापि यह संसार अपने स्वार्थके लिये मोहमें पड़ा रहता है । मुझे भी संसारसे अभिन्न ही समझें ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 60पृष्ठ 1248

धृतराष्ट्र के हृदय में एक जिज्ञासा जागी। उन्होंने कहा— "भगवन! युद्ध में निश्चितरूप से विजय पाने वाले लोगों को जो शुभ लक्षण दीख पड़ते हैं, उन सबको यथार्थ रूप से सुनने की मेरी इच्छा है।"

धृतराष्ट्र उवाच

यानि लिङ्गानि संग्रामे भवन्ति विजयिष्यताम् ।
तानि सर्वाणि भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥

धृतराष्ट्र बोले — भगवन्! युद्धमें निश्चितरूपसे विजय पानेवाले लोगोंको जो शुभ लक्षण दीख पड़ते हैं, उन सबको यथार्थरूपसे सुननेकी मेरी इच्छा है ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 64पृष्ठ 1249

व्यासजी ने विजय के लक्षणों का वर्णन करना आरम्भ किया— "अग्नि की प्रभा निर्मल हो, उसकी लपटें ऊपर की ओर दक्षिणावर्त होकर उठें और धुआँ बिलकुल न रहे; साथ ही अग्नि में जो आहुतियाँ डाली जाएँ, उनकी पवित्र सुगन्ध वायु में मिलकर सर्वत्र व्याप्त होती रहे— यह भावी विजय का स्वरूप बताया गया है। जिस पक्ष में शङ्खों और मृदङ्गों की गम्भीर आवाज बड़े जोर-जोर से हो रही हो तथा जिन्हें सूर्य और चन्द्रमा की किरणें विशुद्ध प्रतीत होती हों, उनके लिये यह भावी विजय का शुभ लक्षण है। जिनके प्रस्थान के समय कौवों की मीठी आवाज फैलती है, उनकी विजय सूचित होती है। राजन्! जो कौवे पीछे बोलते हैं, वे मानो सिद्धि की सूचना देते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करते हैं और जो सामने बोलते हैं, वे मानो युद्ध में जाने से रोकते हैं। जहाँ शुभ एवं कल्याणमयी बोली बोलने वाले राजहंस, शुक, क्रौंच तथा मोर आदि पक्षी सैनिकों की प्रदक्षिणा करते हैं, उस पक्ष की विजय निश्चित है।"

व्यास उवाच

प्रसन्नभाः पावक ऊर्ध्वरश्मिः प्रदक्षिणावर्तशिखो विधूमः ।
पुण्या गन्धाश्चाहुतीनां प्रवान्ति जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥

व्यासजीने कहा— अग्निकी प्रभा निर्मल हो, उसकी लपटें ऊपरकी ओर दक्षिणावर्त होकर उठें और धूआँ बिलकुल न रहे; साथ ही अग्निमें जो आहुतियाँ डाली जायँ, उनकी पवित्र सुगन्ध वायुमें मिलकर सर्वत्र व्याप्त होती रहे - यह भावी विजयका स्वरूप ( लक्षण) बताया गया है ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 65पृष्ठ 1249

व्यासजी आगे बोले— "जिसकी सेना में अलङ्कार, कवच, ध्वजा-पताका, सिंहनाद अथवा घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज से शोभा बढ़ती हो, वे अवश्य विजय पाते हैं। जिस पक्ष के योद्धाओं की बातें हर्ष और उत्साह से परिपूर्ण हों, मन प्रसन्न रहे तथा जिनके कण्ठ में पड़ी पुष्पमालाएँ कुम्हलाती न हों, वे युद्धरूपी महासागर से पार हो जाते हैं। जो योद्धा शत्रु सेना में प्रवेश करते समय शौर्यसूचक बातें बोलते हैं, वे अपनी विजय को पहले ही निश्चित कर लेते हैं; जबकि जिन्हें निषेध-सूचक वचन सुनने को मिलते हैं, उनकी पराजय होती है। जिनके शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श निर्विकार एवं शुभ हों तथा जिनके हृदय में सदा उत्साह बना रहे, वे विजयी होते हैं। राजन्! हवा जिनके अनुकूल बहती है, बादल और पक्षी भी जिनके अनुकूल होते हैं, मेघ जिनके पीछे छत्रछाया किये चलते हैं और इन्द्रधनुष भी जिन्हें अनुकूल दिशा में दिखते हैं, वे विजयी होते हैं। इसके विपरीत मरणासन्न मनुष्यों को अशुभ लक्षण दिखायी देते हैं।"

शब्दरूपरसस्पर्शगन्धाश्चाविकृताः शुभाः ।
सदा हर्षश्च योधानां जयतामिह लक्षणम् ॥

जिनके शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श आदि निर्विकार एवं शुभ होते हैं तथा जिन योद्धाओंके हृदयमें सदा हर्ष और उत्साह बना रहता है, उनके विजयी होनेका यही शुभ लक्षण है ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 72पृष्ठ 1251

व्यासजी ने सेना के मनोविज्ञान पर प्रकाश डालते हुए कहा— "सेना छोटी हो या बड़ी, उसमें सम्मिलित सैनिकों का एकमात्र हर्ष ही विजय का लक्षण है। यदि एक सैनिक भी उत्साहहीन होकर पीछे हटे, तो वह अपनी देखा-देखी विशाल सेना को भी भगा देता है। उस सेना के पलायन होने पर बड़े-बड़े शूरवीर भी भागने को विवश होते हैं। जब भारी सेना भागने लगती है, तब उसे रोकना अत्यन्त कठिन होता है; क्योंकि 'सेना भाग रही है'— यह सुनकर युद्धविद्या के विद्वान् भी भागने लगते हैं। इससे सैनिकों का भय बढ़ जाता है और सारी सेना दिशाओं में भागने लगती है। बुद्धिमान राजा को चाहिए कि वह अपनी चतुरङ्गिणी सेना को विशेष सत्कारपूर्वक स्थिर रखे।"

नैव स्थापयितुं शक्या शूरैरपि महाचमूः ।
सत्कृत्य महतीं सेनां चतुरङ्गां महीपतिः ।
उपायपूर्वं मेधावी यतेत सततोत्थितः ॥

उस समय बहुत - से शूरवीर भी उस विशाल वाहिनीको रोककर खड़ी नहीं रख सकते । इसलिये बुद्धिमान् राजाको चाहिये कि वह सतत सावधान रहकर कोई-न- कोई उपाय करके अपनी विशाल चतुरंगिणी सेनाको विशेष सत्कारपूर्वक स्थिर रखनेका यत्न करे ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 80पृष्ठ 1252

अन्त में व्यासजी ने विजय के प्रकार बताते हुए कहा— "राजन्! साम-दान रूप उपाय से जो विजय प्राप्त होती है, उसे श्रेष्ठ बताया गया है। भेदनीति द्वारा शत्रु सेना में फूट डालकर की जाने वाली विजय मध्यम है तथा युद्ध द्वारा मार-काट मचाकर की जाने वाली विजय सबसे निम्न श्रेणी की है। युद्ध महान दोष का भण्डार है और उसमें जनसंहार सबसे प्रधान है। यदि हर्ष और उत्साह से भरे केवल पचास सैनिक भी हों, तो वे बड़ी भारी सेना को धूल में मिला देते हैं; और यदि पीछे पैर न हटाने वाले पाँच, छह या सात ही योद्धा हों, तो वे भी निश्चितरूप से विजयी होते हैं। भारत! सुन्दर पङ्खों वाले गरुड़ भी विशाल सेना का विनाश देखकर अधिक जनसमूह की प्रशंसा नहीं करते। सदा अधिक सेना होने से ही विजय नहीं होती; युद्ध में जीत प्रायः अनिश्चित होती है और उसमें दैव ही सबसे बड़ा सहारा है। जो सङ्ग्राम में विजयी होते हैं, वे ही कृतकार्य होते हैं।"

उपायविजयं श्रेष्ठमाहुर्भेदेन मध्यमम् ।
जघन्य एष विजयो यो युद्धेन विशाम्पते ॥

राजन्! साम - दानरूप उपायसे जो विजय प्राप्त होती है, उसे श्रेष्ठ बताया गया है । भेदनीतिके द्वारा शत्रुसेनामें फूट डालकर जो विजय प्राप्त की जाती है, वह मध्यम है तथा युद्धके द्वारा मार- काट मचाकर जो शत्रुको पराजित किया जाता है, वह सबसे निम्नश्रेणीकी विजय है ।

महाभारत · भीष्मपर्व · जम्बूखण्डविनिर्माणपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 81पृष्ठ 1252

In English

Vyas's Omens of War and Signs of Victory

Vyasa describes terrifying omens of nature and celestial movements to Dhritarashtra to warn him of the coming war between the Kauravas and Pandavas. After Dhritarashtra claims his sons will find glory in battle, Vyasa advises him to seek peace instead and explains the specific signs that indicate a victorious army.

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Also written: Nimittakhyana, Nimitta, Vyasa, Dhritarashtra, Pandava, Kaurava, निमित्ताख्यान