श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1241–1250

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1241–1250

पृष्ठ 1241

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कुछ स्त्रियाँ एक ही साथ चार-चार या पाँच- पाँच कन्याएँ पैदा करती हैं । वे कन्याएँ पैदा होते ही नाचती, गाती तथा हँसती हैं ॥ ७ ॥

पृथग्जनस्य सर्वस्य क्षुद्रकाः प्रहसन्ति च ।

नृत्यन्ति परिगायन्ति वेदयन्तो महद् भयम् ॥ ८ ॥

समस्त नीच जातियोंके घरोंमें उत्पन्न हुए काने, कुबड़े आदि बालक भी महान् भयकी सूचना देते हुए जोर - जोर से हँसते, गाते और नाचते हैं ॥ ८ ॥

प्रतिमाश्चालिखन्त्येताः सशस्त्राः कालचोदिताः ।

अन्योन्यमभिधावन्ति शिशवो दण्डपाणयः ॥ ९ ॥

ये सब कालसे प्रेरित हो हाथोंमें हथियार लिये मूर्तियाँ लिखते और बनाते हैं । छोटे - छोटे बच्चे हाथमें डंडा लिये एक- दूसरेपर धावा करते हैं ॥ ९ ॥

अन्योन्यमभिमृद्नन्ति नगराणि युयुत्सवः ।

पद्मोत्पलानि वृक्षेषु जायन्ते कुमुदानि च ॥ १० ॥

और कृत्रिम नगर बनाकर परस्पर युद्धकी इच्छा रखते हुए उन नगरोंको रौंदकर मिट्टीमें मिला देते हैं । पद्म, उत्पल और कुमुद आदि जलीय पुष्प वृक्षोंपर पैदा होते हैं ॥ १० ॥

विष्वग्वाताश्च वान्त्युग्रा रजो नाप्युपशाम्यति ।

अभीक्ष्णं कम्पते भूमिरर्कं राहुरुपैति च ॥ ११ ॥

चारों ओर भयंकर आँधी चल रही है, धूलका उड़ना शान्त नहीं हो रहा है, धरती बारंबार काँप रही है तथा राहु सूर्यके निकट जा रहा है ॥ ११ ॥

श्वेतो ग्रहस्तथा चित्रां समतिक्रम्य तिष्ठति ।

अभावं हि विशेषेण कुरूणां तत्र पश्यति ॥ १२ ॥

केतु चित्राका अतिक्रमण करके स्वातीपर स्थित हो रहा है; * उसकी विशेषरूपसे कुरुवंशके विनाशपर ही दृष्टि है ॥ १२ ॥

धूमकेतुर्महाघोरः पुष्यं चाक्रम्य तिष्ठति ।

सेनयोरशिवं घोरं करिष्यति महाग्रहः ॥ १३ ॥

अत्यन्त भयंकर धूमकेतु पुष्य नक्षत्रपर आक्रमण करके वहीं स्थित हो रहा है । यह महान् उपग्रह दोनों सेनाओंका घोर अमंगल करेगा ॥ १३ ॥

मघास्वङ्गारको वक्रः श्रवणे च बृहस्पतिः ।

भगं नक्षत्रमाक्रम्य सूर्यपुत्रेण पीड्यते ॥ १४ ॥

मंगल वक्र होकर मघा नक्षत्रपर स्थित है, बृहस्पति श्रवण नक्षत्रपर विराजमान है तथा सूर्यपुत्र शनि पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रपर पहुँचकर उसे पीड़ा दे रहा है ॥ १४ ॥

शुक्रः प्रोष्ठपदे पूर्वे समारुह्य विरोचते ।

उत्तरे तु परिक्रम्य सहितः समुदीक्षते ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1242

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शुक्र पूर्वा भाद्रपदापर आरूढ़ हो प्रकाशित हो रहा है और सब ओर घूम--फिरकर परिघ नामक उपग्रहके साथ उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्रपर दृष्टि लगाये हुए है ॥ १५ ॥

श्वेतो ग्रहः प्रज्वलितः सधूम इव पावकः ।

ऐन्द्रं तेजस्वि नक्षत्रं ज्येष्ठामाक्रम्य तिष्ठति ॥ १६ ॥

केतु नामक उपग्रह धूमयुक्त अग्निके समान प्रज्वलित हो इन्द्रदेवतासम्बन्धी तेजस्वी ज्येष्ठा नक्षत्र पर जाकर स्थित है ॥ १६ ॥

ध्रुवं प्रज्वलितो घोरमपसव्यं प्रवर्तते ।

रोहिणीं पीडयत्येवमुभौ च शशिभास्करौ ।

चित्रास्वात्यन्तरे चैव विष्ठितः परुषग्रहः ॥ १७ ॥

चित्रा और स्वातीके बीचमें स्थित हुआ क्रूर ग्रह राहु सदा वक्री होकर रोहिणी तथा चन्द्रमा और सूर्यको पीड़ा पहुँचाता है तथा अत्यन्त प्रज्वलित होकर ध्रुवकी बायीं ओर जा रहा है, जो घोर अनिष्टका सूचक है ॥ १७ ॥

वक्रानुवक्रं कृत्वा च श्रवणं पावकप्रभः ।

ब्रह्मराशिं समावृत्य लोहिताङ्गो व्यवस्थितः ॥ १८ ॥

अग्निके समान कान्तिमान् मंगल ग्रह (जिसकी स्थिति मघा नक्षत्रमें बतायी गयी है ) बारंबार वक्र होकर ब्रह्मराशि ( बृहस्पतिसे युक्त नक्षत्र ) श्रवणको पूर्णरूपसे आवृत करके स्थित है ॥ १८ ॥

सर्वसस्यपरिच्छन्ना पृथिवी सस्यमालिनी ।

पञ्चशीर्षा यवाश्चापि शतशीर्षाश्च शालयः ॥ १ ९ ॥

(इसका प्रभाव खेतीपर अनुकूल पड़ा है ) पृथ्वी सब प्रकारके अनाजके पौधोंसे आच्छादित है, शस्यकी मालाओंसे अलंकृत है, जौमें पाँच - पाँच और जड़हन धानमें सौ - सौ बालियाँ लग रही हैं ॥ १ ९ ॥

प्रधानाः सर्वलोकस्य यास्वायत्तमिदं जगत् ।

ता गावः प्रस्नुता वत्सैः शोणितं प्रक्षरन्त्युत ॥ २० ॥

जो सम्पूर्ण जगत्में माताके समान प्रधान मानी जाती हैं, यह समस्त संसार जिनके अधीन है, वे गौएँ बछड़ोंसे पिन्हा जानेके बाद अपने थनोंसे खून बहाती हैं ॥ २० ॥

निश्चेरुरर्चिषश्चापात् खड्गाश्च ज्वलिता भृशम् ।

व्यक्तं पश्यन्ति शस्त्राणि संग्रामं समुपस्थितम् ॥ २१ ॥

योद्धाओंके धनुषसे आगकी लपटें निकलने लगी हैं, खड्ग अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे हैं मानो सम्पूर्ण शस्त्र स्पष्टरूपसे यह देख रहे हैं कि संग्राम उपस्थित हो गया है ॥ २१ ॥

अग्निवर्णा यथा भासः शस्त्राणामुदकस्य च ।

कवचानां ध्वजानां च भविष्यति महाक्षयः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1243

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शस्त्रोंकी, जलकी, कवचोंकी और ध्वजाओंकी कान्तियाँ अग्निके समान लाल हो गयी हैं; अतः निश्चय ही महान् जनसंहार होगा ॥ २२ ॥

पृथिवी शोणितावर्ता ध्वजोडुपसमाकुला ।

कुरूणां वैशसे राजन् पाण्डवैः सह भारत ॥ २३ ॥

राजन्! भरतनन्दन! जब पाण्डवोंके साथ कौरवोंका हिंसात्मक संग्राम आरम्भ हो जायगा, उस समय धरतीपर रक्तकी नदियाँ बह चलेंगी, उनमें शोणितमयी भँवरें उठेंगी तथा रथकी ध्वजाएँ उन नदियोंके ऊपर छोटी -छोटी डोंगियोंके समान सब ओर व्याप्त दिखायी देंगी ॥ २३ ॥

दिक्षु प्रज्वलितास्याश्च व्याहरन्ति मृगद्विजाः ।

अत्याहितं दर्शयन्तो वेदयन्ति महद् भयम् ॥ २४ ॥

चारों दिशाओंमें पशु और पक्षी प्राणान्तकारी अनर्थका दर्शन कराते हुए भयंकर बोली बोल रहे हैं । उनके मुख प्रज्वलित दिखायी देते हैं और वे अपने शब्दोंसे किसी महान् भयकी सूचना दे रहे हैं ॥ २४ ॥

एकपक्षाक्षिचरणः शकुनिः खचरो निशि ।

रौद्रं वदति संरब्धः शोणितं छर्दयन्निव ॥ २५ ॥

रातमें एक आँख, एक पाँख और एक पैरका पक्षी आकाशमें विचरता है और कुपित होकर भयंकर बोली बोलता है । उसकी बोली ऐसी जान पड़ती है, मानो कोई रक्त वमन कर रहा हो ॥ २५ ॥

शस्त्राणि चैव राजेन्द्र प्रज्वलन्तीव सम्प्रति ।

सप्तर्षीणामुदाराणां समवच्छाद्यते प्रभा ॥ २६ ॥

राजेन्द्र! सभी शस्त्र इस समय जलते - से प्रतीत होते हैं । उदार सप्तर्षियोंकी प्रभा फीकी पड़ती जाती है || २६ ||

संवत्सरस्थायिनौ च ग्रहौ प्रज्वलितावुभौ ।

विशाखायाः समीपस्थौ बृहस्पतिशनैश्चरौ ॥ २७ ॥

वर्षपर्यन्त एक राशिपर रहनेवाले दो प्रकाशमान ग्रह बृहस्पति और शनैश्चर तिर्यग्वेधके द्वारा विशाखा नक्षत्रके समीप आ गये हैं ॥ २७ ॥

चन्द्रादित्यावुभौ ग्रस्तावेकाह्ना हि त्रयोदशीम् ।

अपर्वणि ग्रहं यातौ प्रजासंक्षयमिच्छतः ॥ २८ ॥

( इस पक्षमें तो तिथियोंका क्षय होनेके कारण) एक ही दिन त्रयोदशी तिथिको बिना पर्वके ही राहुने चन्द्रमा और सूर्य दोनोंको ग्रस लिया है । अतः ग्रहणावस्थाको प्राप्त हुए वे दोनों ग्रह प्रजाका संहार चाहते हैं ॥ २८ ॥

अशोभिता दिशः सर्वाः पांसुवर्षैः समन्ततः ।

उत्पातमेघा रौद्राश्च रात्रौ वर्षन्ति शोणितम् ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1244

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चारों ओर धूलकी वर्षा होनेसे सम्पूर्ण दिशाएँ शोभाहीन हो गयी हैं । उत्पातसूचक भयंकर मेघ रातमें रक्तकी वर्षा करते हैं ॥ २ ९ ॥

कृत्तिकां पीडयंस्तीक्ष्णैर्नक्षत्रं पृथिवीपते ।

अभीक्ष्णवाता वायन्ते धूमकेतुमवस्थिताः ॥ ३० ॥

राजन्! अपने तीक्ष्ण ( क्रूरतापूर्ण) कर्मोंके द्वारा उपलक्षित होनेवाला राहु ( चित्रा और स्वातीके बीचमें रहकर सर्वतोभद्रचक्रगतवेधके अनुसार) कृत्तिका नक्षत्रको पीड़ा दे रहा है । बारंबार धूमकेतुका आश्रय लेकर प्रचण्ड आँधी उठती रहती है ॥ ३० ॥

विषमं जनयन्त्येत आक्रन्दजननं महत् ।

त्रिषु सर्वेषु नक्षत्रनक्षत्रेषु विशाम्पते ।

गृध्रः सम्पतते शीर्षं जनयन् भयमुत्तमम् ॥ ३१ ॥

वह महान् युद्ध एवं विषम परिस्थिति पैदा करनेवाली है । राजन्! ( अश्विनी आदि नक्षत्रोंको तीन भागोंमें बाँटनेपर जो नौ- नौ नक्षत्रोंके तीन समुदाय होते हैं, वे क्रमशः अश्वपति, गजपति तथा नरपतिके छत्र कहलाते हैं; ये ही पापग्रहसे आक्रान्त होनेपर क्षत्रियोंका विनाश सूचित करनेके कारण ' नक्षत्र नक्षत्र' कहे गये हैं ) इन तीनों अथवा सम्पूर्ण नक्षत्र- नक्षत्रोंमें शीर्षस्थानपर यदि पापग्रहसे वेध हो तो वह ग्रह महान् भय उत्पन्न करनेवाला होता है; इस समय ऐसा ही कुयोग आया है ॥ ३१ ॥

चतुर्दशीं पञ्चदशीं भूतपूर्वं च षोडशीम् ।

इमां तु नाभिजानेऽहममावास्यां त्रयोदशीम् ।

चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम् ॥ ३२ ॥

एक तिथिका क्षय होनेपर चौदहवें दिन, तिथिक्षय न होनेपर पंद्रहवें दिन और एक तिथिकी वृद्धि होनेपर सोलहवें दिन अमावास्याका होना तो पहले देखा गया है; परंतु इस पक्षमें जो तेरहवें दिन यह अमावास्या आ गयी है, ऐसा पहले भी कभी हुआ है, इसका स्मरण मुझे नहीं है । इस एक ही महीनेमें तेरह दिनोंके भीतर चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों लग गये ॥ ३२ ॥

अपर्वणि ग्रहेणैतौ प्रजाः संक्षपयिष्यतः ।

मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्णचतुर्दशीम् ।

शोणितैर्वक्त्रसम्पूर्णा अतृप्तास्तत्र राक्षसाः ॥ ३३ ॥

इस प्रकार अप्रसिद्ध पर्वमें ग्रहण लगनेके कारण ये सूर्य और चन्द्रमा प्रजाका विनाश करनेवाले होंगे । कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको बड़े जोरसे मांसकी वर्षा हुई थी । उस समय

राक्षसोंका मुँह रक्तसे भरा हुआ था । वे खून पीते अघाते नहीं थे ॥ ३३ ॥

प्रतिस्रोतो महानद्यः सरितः शोणितोदकाः ।

फेनायमानाः कूपाश्च कूर्दन्ति वृषभा इव ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1245

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बड़ी- बड़ी नदियोंके जल रक्तके समान लाल हो गये हैं और उनकी धारा उलटे स्रोतकी ओर बहने लगी है । कुँओंसे फेन ऊपरको उठ रहे हैं, मानो वृषभ उछल रहे हों ॥ ३४ ॥

पतन्त्युल्का सनिर्घाताः शक्राशनिसमप्रभाः ।

अद्य चैव निशां व्युष्टामनयं समवाप्स्यथ ॥ ३५ ॥

बिजलीकी कड़कड़के साथ इन्द्रकी अशनिके समान प्रकाशित होनेवाली उल्काएँ गिर रही हैं । आजकी रात बीतनेपर सबेरेसे ही तुमलोगोंको अपने अन्यायका फल मिलने लगेगा ॥ ३५ ॥

विनिःसृत्य महोल्काभिस्तिमिरं सर्वतोदिशम् ।

अन्योन्यमुपतिष्ठद्भिस्तत्र चोक्तं महर्षिभिः ॥ ३६ ॥

सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार व्याप्त होनेके कारण बड़ी- बड़ी मशालें जलाकर घरसे निकले हुए महर्षियोंने एक- दूसरेके पास उपस्थित हो इन उत्पातोंके सम्बन्धमें अपना मत इस प्रकार प्रकट किया है ॥ ३६ ॥

भूमिपालसहस्राणां भूमिः पास्यति शोणितम् ।

कैलासमन्दराभ्यां तु तथा हिमवता विभो ॥ ३७ ॥

सहस्रशो महाशब्दः शिखराणि पतन्ति च । जान पड़ता है, यह भूमि सहस्रों भूमिपालोंका रक्तपान करेगी। प्रभो! कैलास, मन्दराचल तथा हिमालयसे सहस्रों प्रकारके अत्यन्त भयानक शब्द प्रकट होते हैं और उनके शिखर भी टूट- टूटकर गिर रहे हैं ॥ ३७३ ॥

महाभूता भूमिकम्पे चत्वारः सागराः पृथक् ।

वेलामुद्वर्तयन्तीव क्षोभयन्तो वसुंधराम् ॥ ३८ ॥

भूकम्प होनेके कारण पृथक् - पृथक् चारों सतर वृद्धिको प्राप्त होकर वसुधामें क्षोभ उत्पन्न करते हुए अपनी सीमाको लाँघते हुए- से जान पड़ते हैं ॥ ३८ ॥

वृक्षानुन्मथ्य वान्त्युग्रा वाताः शर्करकर्षिणः ।

आभग्नाः सुमहावातैरशनीभिः समाहताः ॥ ३ ९ ॥

वृक्षाः पतन्ति चैत्याश्च ग्रामेषु नगरेषु च । बालू और कंकड़ खींचकर बरसानेवाले भयानक बवंडर उठकर वृक्षोंको उखाड़ डालते हैं । गाँवों तथा नगरोंमें वृक्ष और चैत्यवृक्ष प्रचण्ड आँधियों तथा बिजलीके आघातोंसे टूटकर गिर रहे हैं ॥ ३ ९ ॥ नीललोहितपीतश्च भवत्यग्निर्हुतो द्विजैः ॥ ४० ॥

वामार्चिर्दुष्टगन्धश्च मुञ्चन् वै दारुणं स्वनम् ।

स्पर्शा गन्धा रसाश्चैव विपरीता महीपते ॥ ४१ ॥

ब्राह्मणलोगोंके आहुति देनेपर प्रज्वलित हुई अग्नि काले, लाल और पीले रंगकी दिखायी देती है । उसकी लपटें वामावर्त होकर उठ रही हैं । उससे दुर्गन्ध निकलती है और

पृष्ठ 1246

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1246 का मूल पृष्ठ
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वह भयानक शब्द प्रकट करती रहती है । राजन्! स्पर्श, गन्ध तथा रस — इन सबकी स्थिति विपरीत हो गयी है ॥ ४०-४१ ॥

धूमं ध्वजाः प्रमुञ्चन्ति कम्पमाना मुहुर्मुहुः ।

मुञ्चन्त्यङ्गारवर्षं च भेर्यश्च पटहास्तथा ॥ ४२ ॥

ध्वज बारंबार कम्पित होकर धूआँ छोड़ते हैं । ढोल, नगाड़े अंगारोंकी वर्षा करते ॥ ४२ ॥

शिखराणां समृद्धानामुपरिष्टात् समन्ततः ।

वायसाश्च रुवन्त्युग्रं वामं मण्डलमाश्रिताः ॥ ४३ ॥

फल- फूलसे सम्पन्न वृक्षोंकी शिखाओंपर बायीं ओरसे घूम- घूमकर सब ओर कौए बैठते हैं और भयंकर काँव -काँवका कोलाहल करते हैं ॥ ४३ ॥

पक्वापक्वेति सुभृशं वावाश्यन्ते वयांसि च ।

निलीयन्ते ध्वजाग्रेषु क्षयाय पृथिवीक्षिताम् ॥ ४४ ॥

बहुत -से पक्षी ' पक्वा पक्वा' इस शब्दका बारंबार जोर- जोरसे उच्चारण करते और

ध्वजाओंके अग्रभागमें छिपते हैं । यह लक्षण राजाओंके विनाशका सूचक है ॥ ४४ ॥

ध्यायन्तः प्रकिरन्तश्च व्याला वेपथुसंयुताः ।

दीनास्तुरङ्गमाः सर्वे वारणाः सलिलाश्रयाः ॥ ४५ ॥

दुष्ट हाथी काँपते और चिन्ता करते हुए भयके मारे मल- मूत्र त्याग कर रहे हैं, घोड़े अत्यन्त दीन हो रहे हैं और सम्पूर्ण गजराज पसीने - पसीने हो रहे हैं ॥ ४५ ॥

एतच्छ्रुत्वा भवानत्र प्राप्तकालं व्यवस्यताम् ।

यथा लोकः समुच्छेदं नायं गच्छेत भारत ॥ ४६ ॥

भारत! यह सुनकर ( और उसके परिणामपर विचार करके ) तुम इस अवसरके अनुरूप ऐसा कोई उपाय करो, जिससे यह संसार विनाशसे बच जाय ॥ ४६ ॥

वैशम्पायन उवाच

पितुर्वचो निशम्यैतद् धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ।

दिष्टमेतत् पुरा मन्ये भविष्यति नरक्षयः ॥ ४७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! अपने पिता व्यासजीका यह वचन सुनकर धृतराष्ट्रने कहा— ‘ भगवन्! मैं तो इसे पूर्वनिश्चित दैवका विधान मानता हूँ; अतः यह जनसंहार होगा ही ॥ ४७ ॥

राजानः क्षत्रधर्मेण यदि वध्यन्ति संयुगे ।

वीरलोकं समासाद्य सुखं प्राप्स्यन्ति केवलम् ॥ ४८ ॥

‘ यदि राजालोग क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्धमें मारे जायँगे तो वीरलोकको प्राप्त होकर केवल सुखके भागी होंगे ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 1247

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इह कीर्तिं परे लोके दीर्घकालं महत् सुखम् ।

प्राप्स्यन्ति पुरुषव्याघ्राः प्राणांस्त्यक्त्वा महाहवे ॥ ४ ९ ॥

'वे पुरुषसिंह नरेश महायुद्धमें प्राणोंका परित्याग करके इहलोकमें कीर्ति तथा परलोकमें दीर्घकालतक महान् सुख प्राप्त करेंगे ' ॥ ४ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तो मुनिस्तत्त्वं कवीन्द्रो राजसत्तम ।

धृतराष्ट्रेण पुत्रेण ध्यानमन्वगमत् परम् ॥ ५० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -नृपश्रेष्ठ! अपने पुत्र धृतराष्ट्रके इस प्रकार यथार्थ बात कहनेपर ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महर्षि व्यास कुछ देरतक बड़े सोच - विचार में पड़े रहे ॥ ५० ॥

स मुहूर्तं तथा ध्यात्वा पुनरेवाब्रवीद् वचः ।

असंशयं पार्थिवेन्द्र कालः संक्षिपते जगत् ॥ ५१ ॥

सृजते च पुनर्लोकान् नेह विद्यति शाश्वतम् । दो घड़ीतक चिन्तन करनेके बाद वे पुनः इस प्रकार बोले- ' राजेन्द्र! इसमें संशय नहीं है कि काल ही इस जगत्‌का संहार करता है और वही पुन: इन सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करता है । यहाँ कोई वस्तु सदा रहनेवाली नहीं है ॥ ५१ ॥

ज्ञातीनां वै कुरूणां च सम्बन्धिसुहृदां तथा ॥ ५२ ॥

धर्म्यं देशय पन्थानं समर्थो ह्यसि वारणे ।

क्षुद्रं जातिवधं प्राहुर्मा कुरुष्व ममाप्रियम् ॥ ५३ ॥

‘ राजन्! तुम अपने जाति- भाई, कौरवों, सगे- सम्बन्धियों तथा हितैषी - सुहृदोंको धर्मानुकूल मार्गका उपदेश करो; क्योंकि तुम उन सबको रोकनेमें समर्थ हो । जाति- वधको अत्यन्त नीच कर्म बताया गया है । वह मुझे अत्यन्त अप्रिय है । तुम यह अप्रिय कार्य न करो ॥ ५२-५३ ॥

कालोऽयं पुत्ररूपेण तव जातो विशाम्पते ।

न वधः पूज्यते वेदे हितं नैव कथंचन ॥ ५४ ॥

‘ महाराज! यह काल तुम्हारे पुत्ररूपसे उत्पन्न हुआ है । वेदमें हिंसाकी प्रशंसा नहीं की गयी है । हिंसासे किसी प्रकार हित नहीं हो सकता ॥ ५४ ॥

हन्यात् स एनं यो हन्यात् कुलधर्मं स्विकां तनुम् ।

कालेनोत्पथगन्तासि शक्ये सति यथाऽऽपदि ॥ ५५ ॥

कुलधर्म अपने शरीरके ही समान है । जो इस कुलधर्मका नाश करता है, उसे वह धर्म ही नष्ट कर देता है । जबतक धर्मका पालन सम्भव है (जबतक तुमपर कोई आपत्ति नहीं आयी है ), तबतक तुम कालसे प्रेरित होकर ही धर्मकी अवहेलना करके कुमार्गपर चल रहे हो, जैसा कि बहुधा लोग किसी आपत्तिमें पड़नेपर ही करते हैं ॥ ५५ ॥

पृष्ठ 1248

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कुलस्यास्य विनाशाय तथैव च महीक्षिताम् ।

अनर्थो राज्यरूपेण तव जातो विशाम्पते ॥ ५६ ॥

' राजन्! तुम्हारे कुलका तथा अन्य बहुत- से राजाओंका विनाश करनेके लिये यह तुम्हारे राज्यके रूपमें अनर्थ ही प्राप्त हुआ है ॥ ५६ ॥

लुप्तधर्मा परेणासि धर्मं दर्शय वै सुतान् ।

किं ते राज्येन दुर्धर्ष येन प्राप्तोऽसि किल्बिषम् ॥ ५७ ॥

'तुम्हारा धर्म अत्यन्त लुप्त हो गया है । अपने पुत्रोंको धर्मका मार्ग दिखाओ । दुर्धर्ष वीर! तुम्हें राज्य लेकर क्या करना है, जिसके लिये अपने ऊपर पापका बोझ लाद रहे हो? ॥ ५७ ॥

यशो धर्मं च कीर्तिं च पालयन् स्वर्गमाप्स्यसि ।

लभन्तां पाण्डवा राज्यं शमं गच्छन्तु कौरवाः ॥ ५८ ॥

' तुम मेरी बात माननेपर यश, धर्म और कीर्तिका पालन करते हुए स्वर्ग प्राप्त कर लोगे । पाण्डवोंको उनके राज्य प्राप्त हों और समस्त कौरव आपसमें संधि करके शान्त हो जायँ' ॥ ५८ ॥

एवं ब्रुवति विप्रेन्द्रे धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।

आक्षिप्य वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यं चैवाब्रवीत् पुनः ॥ ५ ९ ॥

विप्रवर व्यासजी जब इस प्रकार उपदेश दे रहे थे, उसी समय बोलनेमें चतुर अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने बीचमें ही उनकी बात काटकर उनसे इस प्रकार कहा ॥ ५ ९ ॥ धृतराष्ट्रउवाच यथा भवान् वेत्ति तथैव वेत्ता भावाभावौ विदितौ मे यथार्थौ । स्वार्थे हि सम्मुह्यति तात लोको मां चापि लोकात्मकमेव विद्धि ॥ ६० ॥

धृतराष्ट्र बोले- तात! जैसा आप जानते हैं, उसी प्रकार मैं भी इन बातोंको समझता हूँ। भाव और अभावका यथार्थ स्वरूप मुझे भी ज्ञात है, तथापि यह संसार अपने स्वार्थके

लिये मोहमें पड़ा रहता है । मुझे भी संसारसे अभिन्न ही समझें ॥ ६० ॥

प्रसादये त्वामतुलप्रभावं त्वं नो गतिर्दर्शयिता च धीरः । न चापि ते मद्वशगा महर्षे न चाधर्मं कर्तुमर्हा हि मे मतिः ॥ ६१ ॥

आपका प्रभाव अनुपम है । आप हमारे आश्रय, मार्गदर्शक तथा धीर पुरुष हैं । मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ । महर्षे! मेरी बुद्धि भी अधर्म करना नहीं चाहती; परंतु क्या

पृष्ठ 1249

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करूँ? मेरे पुत्र मेरे वशमें नहीं हैं ॥ ६१ ॥

त्वं हि धर्मप्रवृत्तिश्च यशः कीर्तिश्च भारती ।

कुरूणां पाण्डवानां च मान्यश्चापि पितामहः ॥ ६२ ॥

आप ही हम भरतवंशियोंकी धर्मप्रवृत्ति, यश तथा कीर्तिके हेतु हैं । आप कौरवों और पाण्डवों– दोनोंके माननीय पितामह हैं ॥ ६२ ॥

व्यासउवाच

वैचित्रवीर्य नृपते यत् ते मनसि वर्तते ।

अभिधत्स्व यथाकामं छेत्तास्मि तव संशयम् ॥ ६३ ॥

व्यासजी बोले –विचित्रवीर्यकुमार! नरेश्वर! तुम्हारे मनमें जो संदेह है, उसे अपनी

इच्छाके अनुसार प्रकट करो । मैं तुम्हारे संशयका निवारण करूँगा ॥ ६३ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

यानि लिङ्गानि संग्रामे भवन्ति विजयिष्यताम् ।

तानि सर्वाणि भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ६४ ॥

धृतराष्ट्र बोले — भगवन्! युद्धमें निश्चितरूपसे विजय पानेवाले लोगोंको जो शुभ लक्षण दीख पड़ते हैं, उन सबको यथार्थरूपसे सुननेकी मेरी इच्छा है ॥ ६४ ॥

व्यास उवाच प्रसन्नभाः पावक ऊर्ध्वरश्मिः प्रदक्षिणावर्तशिखो विधूमः । पुण्या गन्धाश्चाहुतीनां प्रवान्ति जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ६५ ॥

व्यासजीने कहा— अग्निकी प्रभा निर्मल हो, उसकी लपटें ऊपरकी ओर दक्षिणावर्त होकर उठें और धूआँ बिलकुल न रहे; साथ ही अग्निमें जो आहुतियाँ डाली जायँ, उनकी पवित्र सुगन्ध वायुमें मिलकर सर्वत्र व्याप्त होती रहे - यह भावी विजयका स्वरूप ( लक्षण) बताया गया है ॥ ६५ ॥

गम्भीरघोषाश्च महास्वनाश्च शङ्खा मृदङ्गाश्च नदन्ति यत्र । विशुद्धरश्मिस्तपनः शशी च जयस्यैतद् भाविनो रूपमाहुः ॥ ६६ ॥

जिस पक्षमें शंखों और मृदंगोंकी गम्भीर आवाज बड़े जोर-जोरसे हो रही हो तथा जिन्हें सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें विशुद्ध प्रतीत होती हों, उनके लिये यह भावी विजयका शुभ लक्षण बताया है ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 1250

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इष्टा वाचः प्रसृता वायसानां सम्प्रस्थितानां च गमिष्यतां च । ये पृष्ठतस्ते त्वरयन्ति राजन् ये चाग्रतस्ते प्रतिषेधयन्ति ॥ ६७ ॥

जिनके प्रस्थित होनेपर अथवा प्रस्थानके लिये उद्यत होनेपर कौवोंकी मीठी आवाज फैलती है, उनकी विजय सूचित होती है । राजन्! जो कौवे पीछे बोलते हैं, वे मानो सिद्धिकी सूचना देते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़नेके लिये प्रेरित करते हैं और जो सामने बोलते हैं, वे मानो युद्धमें जानेसे रोकते हैं ॥ ६७ ॥

कल्याणवाचः शकुना राजहंसाः शुकाः क्रौञ्चाः शतपत्राश्च यत्र । प्रदक्षिणाश्चैव भवन्ति संख्ये ध्रुवं जयस्तत्र वदन्ति विप्राः ॥ ६८ ॥

जहाँ शुभ एवं कल्याणमयी बोली बोलनेवाले राजहंस, शुक, क्रौंच तथा शतपत्र ( मोर ) आदि पक्षी सैनिकोंकी प्रदक्षिणा करते हैं ( दाहिने जाते हैं ), उस पक्षकी युद्धमें निश्चितरूपसे विजय होती है, यह ब्राह्मणोंका कथन है ॥ ६८ ॥

अलङ्कारैः कवचैः केतुभिश्च सुखप्रणादैर्हेषितैर्वा हयानाम् । भ्राजिष्मती दुष्प्रतिवीक्षणीया येषां चमूस्ते विजयन्ति शत्रून् ॥ ६ ९ ॥ अलंकार, कवच, ध्वजा- पताका, सुखपूर्वक किये जानेवाले सिंहनाद अथवा घोड़ोंके हिनहिनानेकी आवाजसे जिनकी सेना अत्यन्त शोभायमान होती है तथा शत्रुओंको जिनकी सेनाकी ओर देखना भी कठिन जान पड़ता है, वे अवश्य अपने विपक्षियोंपर विजय पाते हैं ॥ ६ ९ ॥

हृष्टा वाचस्तथा सत्त्वं योधानां यत्र भारत ।

न म्लायन्ति स्रजश्चैव ते तरन्ति रणोदधिम् ॥ ७० ॥

भारत! जिस पक्षके योद्धाओंकी बातें हर्ष और उत्साहसे परिपूर्ण होती हैं, मन प्रसन्न रहता है तथा जिनके कण्ठमें पड़ी हुई पुष्पमालाएँ कुम्हलाती नहीं हैं, वे युद्धरूपी महासागरसे पार हो जाते हैं ॥ ७० ॥

इष्टा वाचः प्रविष्टस्य दक्षिणाः प्रविविक्षतः ।

पश्चात् संधारयन्त्यर्थमग्रे च प्रतिषेधिकाः ॥ ७१ ॥

जिस पक्षके योद्धा शत्रुकी सेनामें प्रवेश करनेकी इच्छा करते समय अथवा उसमें प्रवेश कर लेनेपर अभीष्ट वचन ( मैं तुझे अभी मार भगाता हूँ इत्यादि शौर्यसूचक बातें) बोलते हैं और अपने रणकौशलका परिचय देते हैं, वे पीछे प्राप्त होनेवाली अपनी विजयको पहलेसे