श्रीगणेशाय नमः।

त्रिपुरवधोपाख्यान : अतिशयोक्तिपूर्ण शक्ति प्राप्त करने हेतु किस प्रकार के समर्पण की आवश्यकता होती है?

तपस्या और आत्म-संयम का मार्ग

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ४ · कर्णपर्व · अध्याय 34 · पृष्ठ 1815–1838

2,791 शब्द · 14 मिनटका पाठ · 27 श्लोक

दुर्योधन ने शल्य से कहा

युद्ध की रणनीति और कर्ण की शक्ति पर चर्चा के समय

दुर्योधन ने शल्य से कहा— "राजन्! जब परमात्मा शिव ने देवताओं, पितरों तथा ऋषियों के समुदाय को अभय दे दिया, तब ब्रह्माजी ने उन भगवान् शङ्कर का सत्कार करके यह लोक-हितकारी वचन कहा था।"

दुर्योधन उवाच

पितृदेवर्षिसंघेभ्योऽभये दत्ते महात्मना ।
सत्कृत्य शङ्करं प्राह ब्रह्मा लोकहितं वचः ॥

दुर्योधन बोला— राजन्! परमात्मा शिवने जब देवताओं, पितरों तथा ऋषियोंके समुदायको अभय दे दिया, तब ब्रह्माजीने उन भगवान् शंकरका सत्कार करके यह लोक-हितकारी वचन कहा—

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 1पृष्ठ 1816

ब्रह्माजी ने कहा— “देवेश्वर! आपके आदेश से इस प्रजापतिपद पर स्थित रहते हुए मैंने दानवों को एक महान् वर दे दिया है। वे मर्यादा का उल्लङ्घन कर चुके हैं। हे भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी महेश्वर! आपके सिवा दूसरा कोई भी उनका संहार नहीं कर सकता; उनके वध के लिये आप ही प्रतिपक्षी शत्रु हो सकते हैं। देव! हम सब देवता आपकी शरण में आकर याचना करते हैं। देवेश्वर शङ्कर! आप हम पर कृपा कीजिये और इन दानवों को मार डालिये। हे मानद! आपके प्रसाद से सम्पूर्ण जगत् सुखपूर्वक उन्नति करता आया है, लोकेश्वर! आप ही आश्रयदाता हैं; इसलिये हम आपकी शरण में आये हैं।"

दुर्योधन उवाच

स त्वं देव प्रपन्नानां याचतां च दिवौकसाम् ।
कुरु प्रसादं देवेश दानवाञ्जहि शङ्कर ॥

' देव! हम सब देवता आपकी शरणमें आकर याचना करते हैं । देवेश्वर शंकर! आप हमपर कृपा कीजिये और इन दानवोंको मार डालिये ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 4पृष्ठ 1816

भगवान् शिव ने देवताओं से कहा— “देवताओ! मेरा ऐसा विचार है कि तुम्हारे सभी शत्रुओं का वध किया जाय; परन्तु मैं अकेला ही उन सबको नहीं मार सकता, क्योंकि वे देवद्रोही दैत्य बड़े बलवान् हैं। अतः तुम सब लोग एक साथ सङ्घ बनाकर मेरे आधे तेज से पुष्ट होकर युद्ध में उन शत्रुओं को जीत लो; क्योंकि जो सङ्घटित होते हैं, वे महान् बलशाली हो जाते हैं।"

दुर्योधन उवाच

तवातिसर्गाद् देवेश प्राजापत्यमिदं पदम् ।
मयाधितिष्ठता दत्तो दानवेभ्यो महान् वरः ॥

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 2पृष्ठ 1816

देवताओं ने सङ्कोचवश कहा— “प्रभो! युद्ध में हमलोगों का जितना भी तेज और बल है, उससे दूना उन दैत्यों का है, ऐसा हम मानते हैं; क्योंकि हमने उनके तेज और बल को देख लिया है।" भगवान् शिव बोले— “देवताओ! जो पापी तुम लोगों के अपराधी हैं, वे सब प्रकार से वध के ही योग्य हैं। मेरे तेज और बल के आधे भाग से युक्त होकर तुम समस्त शत्रुओं को मार डालो।"

परन्तु देवताओं ने विवशता प्रकट करते हुए कहा— "महेश्वर! हम आपका आधा बल धारण नहीं कर सकते; अतः आप ही हम सबका आधा बल लेकर शत्रुओं का वध कीजिये।" तब भगवान् शिव बोले— “देवगण! यदि मेरे बल को धारण करने में तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है, तो मैं ही तुम लोगों के आधे तेज से परिपुष्ट होकर इन दैत्यों का वध करूँगा।" तदनन्तर देवताओं ने 'तथास्तु' कह दिया और सबके तेज का आधा भाग लेकर वे अधिक तेजस्वी हो गये। वे देवबल द्वारा उन सबकी अपेक्षा अधिक बलशाली हो गये; इसलिये उसी समय से भगवान् शङ्कर का नाम 'महादेव' विख्यात हो गया।

तत्पश्चात् महादेवजी ने कहा— “देवताओ! मैं धनुष-बाण धारण करके रथ पर बैठकर युद्धस्थल में तुम्हारे शत्रुओं का वध करूँगा। अतः तुम लोग मेरे लिये रथ और धनुष-बाण की खोज करो, जिससे आज इन दैत्यों को भूतल पर मार गिराऊँ?" देवताओं ने उत्तर दिया— "देवेश्वर! हम तीनों लोकों के तेज की सारी मात्राओं को एकत्र करके आपके लिये परम तेजस्वी रथ का निर्माण करेंगे।"

विश्वकर्मा द्वारा बुद्धिपूर्वक बनाया गया वह रथ अत्यन्त सुन्दर था। देवसङ्घों ने रथ का निर्माण किया और विष्णु, चन्द्रमा तथा अग्नि को उसके बाण बनाया। उस बाण का शृङ्ग (गाँठ) अग्नि हुआ, उसका भल्ल (फल) चन्द्रमा हुआ और उस श्रेष्ठ बाण के अग्रभाग में स्वयं भगवान् विष्णु प्रतिष्ठित हुए। देवताओं ने बड़े-बड़े नगरों से सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपों से युक्त पृथ्वीदेवी को आधार बनाकर रथ बनाया। मन्दराचल पर्वत उस रथ का धुरा बना; महानदी गङ्गा उसकी जङ्घा बनी; दिशाएँ और विदिशाएँ उसके आवरण बनीं। नक्षत्रों का समूह ईषादण्ड बना और कृतयुग जूए का रूप धारण कर गया। नागराज वासुकि उस रथ का कूबर बने; हिमालय पर्वत उसका अपस्कर (पीछे का काष्ठ) बना तथा उदयाचल और अस्ताचल ने पहियों का आधारभूत काष्ठ बनाया।

गङ्गा, सरस्वती और सिन्धु नदियों के साथ आकाश को त्रिवेणु-काष्ठयुक्त धुरे का भाग बनाया गया। रथ के बन्धन की सामग्री जल और सम्पूर्ण नदियाँ थीं। दिन, रात, कला, काष्ठा और छहों ऋतुएँ उसका अनुकर्ष (नीचे का काष्ठ) बनीं; चमकते हुए ग्रह और तारे उसके वरूथ बने। धर्म, अर्थ और काम को संयुक्त करके रथ की बैठक बनाई गई तथा ओषधियों एवं लताओं से घण्टा बनाया गया। सूर्य और चन्द्रमा को दोनों पहिये बनाकर रात्रि और दिन को पूर्वपक्ष और अपरपक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।

धृतराष्ट्र आदि दस नागराजों को ईषादण्ड में स्थान दिया गया और बड़े-बड़े सर्पों को रथ की जोत बनाया गया। द्युलोक को भी जूए में स्थान मिला; प्रलयकाल के मेघ युगचर्म बने। कालपृष्ठ, नहुष, कर्कोटक, धनञ्जय तथा अन्य नाग घोड़ों के केसर बाँधने की रस्सी बने। दिशाओं और विदिशाओं ने बागडोर का रूप लिया। सन्ध्या, धृति, मेधा, स्थिति और सन्नति सहित आकाश को, जो ग्रह-नक्षत्रों से शोभायमान है, रथ का चर्म बनाया गया।

इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर— इन चार लोकपालों को देवताओं ने रथ के घोड़े बनाए। सिनीवाली, अनुमति, कुहू तथा उत्तम व्रत की राका इनकी अधिष्ठात्री देवियाँ बनीं और इनके अधिकारी देवताओं को घोड़ों की लगाम के काँटे बनाया गया। धर्म, सत्य, तप और अर्थ को लगाम बनाया गया। रथ की आधारभूमि मन हुआ और सरस्वती देवी मार्ग बनीं। बिजली और इन्द्रधनुष से बँधे हुए देदीप्यमान रथ पर नाना रङ्गों की पताकाएँ पवन से प्रेरित होकर फहरा रही थीं। वषट्कार घोड़ों का चाबुक हुआ और गायत्री रथ के ऊपरी भाग की बन्धन-रज्जु बनी।

पूर्वकाल में महात्मा महादेव के यज्ञ में निर्मित 'संवत्सर' ही उनका धनुष बना और सावित्री उस धनुष की महान् टङ्कार करने वाली प्रत्यञ्चा बनी। महादेव के लिये एक दिव्य कवच तैयार किया गया जो रत्नभूषित, अभेद्य और कालचक्र से परे था। स्वर्णमय मेरु पर्वत रथ का ध्वज-दण्ड बना; बिजली से विभूषित बादल पताकाओं के समान प्रकाशित हो रहे थे।

वह रथ सम्पूर्ण जगत् के तेज का पुञ्ज था। उसे निर्मित देख देवता आश्चर्यचकित होकर बोले— "पुरुषसिंह! महाराज!" जब देवताओं ने रथ तैयार होने की सूचना दी, तब महादेव ने उस पर अपने मुख्य अस्त्र-शस्त्र रख दिये और ध्वज-दण्ड पर अपने वृषभ नन्दी को स्थापित कर दिया। ब्रह्मदण्ड, कालदण्ड, रुद्रदण्ड तथा ज्वर उसके पार्वाक्षक बनकर खड़े हो गये। अथर्वा और अङ्गिरा पहियों की रक्षा करने लगे; ऋग्वेद, सामवेद और समस्त पुराण योद्धा हुए; इतिहास और यजुर्वेद पृष्ठरक्षक बने तथा दिव्य वाणी और विद्याएँ पार्श्ववर्ती खड़ी हुईं।

छह ऋतुओं से युक्त संवत्सर ही उनका धनुष था और काल (समय) स्वयं रुद्र थे। कालरात्रि को उन्होंने अपनी अटूट प्रत्यञ्चा बना लिया। भगवान् विष्णु, अग्नि और चन्द्रमा ही उनके बाण हुए; क्योंकि सारा संसार वैष्णव (विष्णुमय) भी कहा जाता है।

महेश्वर ने उस बाण में अपना असह्य और प्रचण्ड कोप स्थापित कर दिया; भृगु और अङ्गिरा के रोष से उत्पन्न वह दुःसह क्रोधाग्नि अब लक्ष्य की ओर बढ़ रही थी। जिस लक्ष्य को मार गिराना अत्यन्त कठिन हो, उसे भी गिराने में समर्थ हैं वे विजयशील महादेव। जो धर्म का आश्रय लेने वाले मनुष्यों की सदा रक्षा करते हैं और पापियों का विनाश करते हैं। उनके रथ के उपकरण शत्रुओं को मथ डालने वाले, भयानक बलशाली और मन के समान वेगवान थे। उन दिव्य उपकरणों से घिरे हुए भगवान शिव की बड़ी शोभा हो रही थी।

राजन्! उनके पञ्चभूतस्वरूप अङ्गों का आश्रय लेकर ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सुशोभित है। उस रथ को जुता हुआ देख, कवच और धनुष से युक्त होकर चन्द्रमा, विष्णु और अग्नि उस दिव्य बाण को लेकर युद्ध के लिए उद्यत हुए। देवताओं ने पवित्र सुगन्ध वहन करने वाले वायु को उनके लिए हवा करने हेतु नियुक्त किया। तब महादेव दानवों के वध के लिए प्रयत्नशील होने लगे; वे देवताओं को डराते और पृथ्वी को कम्पित करते हुए उस रथ को थामकर उस पर चढ़ने लगे।

देवेश्वर शिव को रथ पर चढ़ते देख महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओं ने उनकी स्तुति करनी शुरू कर दी। ब्रह्मर्षियों द्वारा प्रशंसित और नृत्य-कुशल अप्सराओं से सुशोभित होते हुए वरदायक महादेव ने हँसते हुए पूछा— "मेरा सारथि कौन होगा?" देवताओं ने कहा— "देवेश! आप जिसको इस कार्य में नियुक्त करेंगे, वही आपका सारथि होगा।" तब महादेव ने पुनः कहा— "तुम लोग स्वयं ही सोच-विचार कर, जो मुझसे भी श्रेष्ठतर हो, उसे मेरा सारथि बना दो। विलम्ब न करो।"

यह सुनकर समस्त देवता ब्रह्माजी के पास पहुँचे। उन्होंने ब्रह्माजी को प्रसन्न करते हुए कहा— "देव! हमने आपके कहे अनुसार विचित्र आयुधों से सम्पन्न रथ तैयार कर दिया है; परन्तु उस उत्तम रथ पर कौन सारथि होकर बैठेगा, यह हम नहीं जानते। अतः आप किसी को सारथि बनाइये। आपने वचन दिया था कि आप हमारा हित करेंगे, उसे पूर्ण कीजिये।" देवताओं ने आगे कहा— "हमारा तैयार किया हुआ वह श्रेष्ठ रथ शत्रुओं को मार भगाने वाला और दुर्धर्ष है। पिनाकपाणि भगवान शिव उस पर योद्धा बनकर बैठे हैं और वे दानवों को भयभीत करते हुए युद्ध के लिए उद्यत हैं। चारों वेद उनके उत्तम घोड़े हैं और पर्वतों सहित पृथ्वी उनका रथ बनी हुई है। नक्षत्रों रूपी ध्वज से सुशोभित महादेव उस रथ पर रथी होकर बैठे हैं, परन्तु कोई सारथि दिखाई नहीं देता। हे पितामह! रथ, घोड़े और योद्धा की सफलता सारथि पर ही निर्भर करती है। आपके सिवा हम किसी दूसरे को वहाँ सारथि होने के योग्य नहीं देखते। आप ही इस सङ्कट से हमें उबारिये। आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं। आप तुरन्त रथ पर आरूढ़ होकर इन उत्तम घोड़ों को काबू में कीजिये, क्योंकि आपकी कृपा से ही समस्त देवता स्वर्ग में पूजित होते हैं।"

इस प्रकार देवताओं ने तीनों लोकों के ईश्वर ब्रह्माजी के सामने मस्तक टेककर उन्हें सारथि बनने के लिए प्रार्थना की। ब्रह्माजी बोले— "देवताओं! तुमने जो कहा है, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। मैं युद्ध करते समय भगवान शङ्कर के घोड़ों को काबू में रखूँगा।" इसके पश्चात, लोकस्रष्टा ब्रह्माजी ने अपनी जटाओं के बोझ को बाँध लिया, मृगचर्म के वस्त्र को ठीक किया और कमण्डलु को अलग रखकर हाथ में चाबुक लेकर तत्काल उस रथ पर चढ़ गए।

जब वह लोकपूजित रथ चला, तब वायु के समान वेगशाली घोड़े धरती पर माथा टेककर बैठ गए। ब्रह्माजी ने अपने तेज से प्रकाशित होते हुए घोड़ों की बागडोर और चाबुक थाम लिया। उन्होंने महादेव से कहा— "अब आप रथ पर आरूढ़ होइये।" तब विष्णु, चन्द्रमा और अग्नि से उत्पन्न उस दिव्य बाण को हाथ में लेकर महादेव अपने धनुष के कम्पन के साथ रथ पर चढ़ गए।

महादेव के रथ पर आरूढ़ होते ही महर्षियों, गन्धर्वों और अप्सराओं ने उनकी स्तुति की। तीनों लोकों को अपने तेज से प्रकाशित करते हुए महादेव रथ पर स्थित हो गए। उन्होंने देवताओं से कहा— "शायद ये दैत्य मारे न जाएँ, इसलिए शोक मत करना। तुम इन असुरों को इस बाण से 'मरा हुआ' ही समझो।" यह सुनकर देवताओं को बड़ा सन्तोष हुआ।

तदनन्तर, उस विशाल रथ के द्वारा महादेव समस्त देवताओं से घिरे हुए वहाँ से चल दिए। उनके पार्षद भी महायशस्वी महादेव की पूजा कर रहे थे; वे दुर्धर्ष पार्षद नृत्य करते और परस्पर एक-दूसरे को डाँटते हुए चारों ओर दौड़ लगाते थे। सम्पूर्ण जगत महादेव के प्रस्थान पर सन्तुष्ट और प्रसन्न था। ऋषिगण स्तोत्रों का पाठ कर उनका तेज बढ़ा रहे थे और लाखों गन्धर्व बाजे बजा रहे थे।

रथ पर आरूढ़ होकर जब भगवान शङ्कर असुरों की ओर बढ़े, तो ब्रह्माजी को साधुवाद देते हुए मुस्कुराकर बोले— "देव! जिस ओर दैत्य हैं, उधर ही चलिये और सावधान होकर घोड़ों को हाँकिये। आज रणभूमि में जब मैं शत्रुसेना का संहार करने लगूँ, तब आप मेरी इन दोनों भुजाओं का बल देखियेगा।"

ब्रह्माजी ने मन और पवन के समान वेगशाली घोड़ों को उन तीन पुरों की ओर मोड़ दिया। वे अश्व इतने तीव्र वेग से चल रहे थे मानो सारा आकाश पी जाएँगे। जैसे ही महादेव त्रिपुर की ओर बढ़े, नन्दी वृषभ ने सम्पूर्ण दिशाओं को गुँजाते हुए एक भयङ्कर सिंहनाद किया। उस गर्जना को सुनकर अनेक दैत्य वहीं विनष्ट हो गए।

जब अन्य दैत्य युद्ध के लिए सामने आए, तब त्रिशूलधारी महादेव क्रोध से आतुर हो उठे। उनके क्रोध से समस्त प्राणी भयभीत हो गए और पूरी त्रिलोकी काँपने लगी। जब उन्होंने धनुष पर बाण का सन्धान किया, तो उसमें चन्द्रमा, अग्नि, विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र के क्षोभ से भयङ्कर निमित्त प्रकट हुए। धनुष के कम्पन से रथ शिथिल होने लगा; तब भगवान नारायण ने वृषभ का रूप धारण कर उस विशाल रथ को ऊपर उठाया।

जब रथ डगमगाने लगा और शत्रु गर्जना करने लगे, तब महाबली शिव ने एक घोर गर्जना की। उस समय वे वृषभ और घोड़े की पीठ पर खड़े थे। महादेव ने वृषभ के खुरों को चीरकर दो भाग कर दिए और घोड़ों के स्तन काट डाले।

महादेव ने वृषभ के खुरों को चीरकर दो भाग कर दिए और घोड़ों के स्तन काट डाले। उस समय महादेव ने पाशुपतास्त्र का चिन्तन किया और तीनों पुरों के एक होने की मानसिक तैयारी की। काल की प्रेरणा से वे तीनों पुर मिलकर एक हो गए और त्रिपुर-भाव प्राप्त हुए। जैसे ही तीनों पुर एक होकर एकत्र हुए, महामनस्वी देवताओं को बड़ा हर्ष हुआ। उस समय समस्त देवता, महर्षि और सिद्धगण महेश्वर की स्तुति करते हुए उनकी जय-जयकार करने लगे।

तेऽनुज्ञाता भगवता जग्मुः सर्वे यथागतम् कृतकामाः प्रयत्नेन प्रजापतिमुखाः सुराः ॥

फिर भगवान्की आज्ञा लेकर अपने प्रयत्नसे पूर्णकाम हुए प्रजापति आदि सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 118पृष्ठ 1832

तभी असुरों का संहार करते हुए, अवर्णनीय भयङ्कर रूप वाले असह्य तेजस्वी महादेवजी के सामने उन तीनों पुरों का समुदाय सहसा प्रकट हो गया। भगवान रुद्र ने अपने उस दिव्य धनुष को खींचकर उस पर रखे हुए त्रिलोकी के सारभूत बाण को त्रिपुर की ओर छोड़ दिया। उस श्रेष्ठ बाण के छूटते ही भूतल पर गिरते हुए उन तीनों पुरों का महान आर्तनाद गूँज उठा। भगवान ने उन असुरों को भस्म करके पश्चिम समुद्र में डाल दिया। इस प्रकार तीनों लोकों का हित चाहने वाले महेश्वर ने कुपित होकर उन तीनों पुरों तथा उनमें निवास करने वाले दानवों को दग्ध कर दिया।

त्वं हि कृष्णाच्च कर्णाच्च फाल्गुनाच्च विशेषतः ।
विशिष्टो राजशार्दूल नास्ति तत्र विचारणा ॥

नृपश्रेष्ठ! आप श्रीकृष्णसे, कर्णसे और अर्जुनसे भी श्रेष्ठ हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 122पृष्ठ 1832

जब उनके क्रोध से अग्नि प्रकट हुई, तब त्रिलोचन महादेव ने 'हा-हा' कहकर उसे रोक दिया और कहा— "तू सम्पूर्ण जगत् को भस्म न कर।" इसके पश्चात समस्त देवता, महर्षि तथा तीनों लोकों के प्राणी स्वस्थ हो गए और सबने श्रेष्ठ वचनों द्वारा अप्रतिम शक्तिशाली महादेवजी का स्तवन किया। भगवान की आज्ञा लेकर प्रजापति आदि सम्पूर्ण देवता अपने प्रयोजनों से वैसे ही चले गए जैसे वे आए थे। इस प्रकार जगत्स्रष्टा भगवान महेश्वर ने तीनों लोकों का कल्याण किया।

एवं स भगवान् देवो लोकस्रष्टा महेश्वरः ।
देवासुरगणाध्यक्षो लोकानां विदधे शिवम् ॥

इस प्रकार देवताओं तथा असुरोंके भी अध्यक्ष जगत्स्रष्टा भगवान् महेश्वर देवने तीनों लोकोंका कल्याण किया था ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 119पृष्ठ 1832

दुर्योधन ने शल्य की ओर देखते हुए कहा, "वहाँ विश्वविधाता ब्रह्माजी ने जिस प्रकार रुद्र का सारथि-कर्म किया और उनके घोड़ों की बागडोर सँभाली, उसी प्रकार आप भी इस महामनस्वी राधापुत्र कर्ण के घोड़ों को काबू में कीजिये। नृपश्रेष्ठ! आप श्रीकृष्ण, कर्ण और अर्जुन से भी श्रेष्ठ हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है। यह कर्ण युद्धक्षेत्र में रुद्र के समान है और आप नीति में ब्रह्माजी के तुल्य हैं; अतः आप उन असुरों की भाँति मेरे शत्रुओं को जीतने में समर्थ हैं। मद्रराज! आप पर ही मेरी राज्यप्राप्ति की अभिलाषा और जीवन की आशा निर्भर है। आपके द्वारा कर्ण का सारथिकर्म सम्पादित होने पर आज विजय मिलने वाली है, जिसकी सफलता भी आप पर ही है। आप पर ही कर्ण, राज्य, हम और हमारी विजय प्रतिष्ठित है; इसलिए आज सङ्ग्राम में इन उत्तम घोड़ों को अपने वश में कीजिये।"

यथैव भगवान् ब्रह्मा लोकधाता पितामहः ।
सारथ्यमकरोत्तत्र रुद्रस्य परमोऽव्ययः ॥

तथा भवानपि क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः ।
संयच्छतु हयानस्य राधेयस्य महात्मनः ॥

वहाँ विश्वविधाता सर्वोत्कृष्ट अविनाशी पितामह भगवान् ब्रह्माने जिस प्रकार रुद्रका सारथि - कर्म किया था तथा जिस प्रकार उन पितामहने रुद्रदेवके घोड़ोंकी बागडोर सँभाली थी, उसी प्रकार आप भी शीघ्र ही इस महामनस्वी राधापुत्र कर्णके घोड़ोंको काबूमें कीजिये ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 120-121पृष्ठ 1832

दुर्योधन ने आगे कहा, "राजन्! आप मुझसे यह दूसरा इतिहास सुनिये जो एक धर्मज्ञ ब्राह्मण ने मेरे पिता के समीप कहा था। शल्य! इस विचित्र ऐतिहासिक वार्ता को सुनकर आप अच्छी तरह सोच-विचार कर मेरा कार्य करें, आपके मन में कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिए।"

इमं चाप्यपरं भूय इतिहासं निबोध मे ।
पितुर्मम सकाशे यद् ब्राह्मणः प्राह धर्मवित् ॥

राजन्! आप मुझसे फिर यह दूसरा इतिहास भी सुनिये, जिसे एक धर्मज्ञ ब्राह्मणने मेरे पिताके समीप कहा था ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 127पृष्ठ 1833

उस कथा के अनुसार, भार्गव वंश में महायशस्वी महर्षि जमदग्नि प्रकट हुए थे, जिनके तेजस्वी पुत्र परशुराम के नाम से विख्यात हैं। उन्होंने अस्त्र प्राप्ति के लिए मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर भारी तपस्या की। उनकी भक्ति से सन्तुष्ट होकर महादेवजी ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए और कहा— "राम! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें यह सब प्राप्त हो जाएगा, जब तुम पवित्र हो जाओगे; तब मैं तुम्हें अस्त्र दूँगा। अपात्र और असमर्थ पुरुष को तो ये अस्त्र जलाकर भस्म कर डालते हैं।"

महेश्वर उवाच

दास्यामि ते तदास्त्राणि यदा पूतो भविष्यसि ।
अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि भार्गव ॥

जब तुम पवित्र हो जाओगे, तब तुम्हें अपने अस्त्र दूँगा, भृगुनन्दन! अपात्र और असमर्थ पुरुषको तो ये अस्त्र जलाकर भस्म कर डालते हैं ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 133पृष्ठ 1834

परशुराम ने मस्तक झुकाकर कहा— "यदि आप देवेश्वर प्रभु मुझे दिव्यास्त्र धारण करने का पात्र समझें, तभी मुझ सेवक को प्रदान करें।" इसके बाद परशुराम ने बहुत वर्षों तक तपस्या, इन्द्रिय-संयम और मन्त्र जप के माध्यम से शिव की आराधना की। महादेव प्रसन्न होकर पार्वती देवी से कहने लगे— "ये दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले परशुराम मेरे प्रति सदा भक्तिभाव रखते हैं।"

प्रसन्नश्च महादेवो भार्गवस्य महात्मनः ॥

अब्रवीत् तस्य बहुशो गुणान् देव्याः समीपतः ।
भक्तिमानेष सततं मयि रामो दृढव्रतः ॥

इससे महादेवजी महात्मा परशुरामपर प्रसन्न हो गये और उन्होंने पार्वती देवीके समीप उनके गुणोंका बारंबार वर्णन किया- 'ये दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले परशुराम मेरे प्रति सदा भक्तिभाव रखते हैं '

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 137-138पृष्ठ 1835

उसी समय दैत्य लोग बलवान होकर देवताओं को सताने लगे थे। देवताओं ने महादेव के पास जाकर प्रार्थना की— "प्रभो! हमारे शत्रुओं का संहार कीजिये।" तब महादेव ने कहा— "भार्गव! तुम मेरी प्रसन्नता के लिए देवताओं के इन शत्रुओं का वध करो।" परशुराम ने विनम्रता से कहा— "देवेश्वर! मैं तो अस्त्रविद्या का ज्ञाता नहीं हूँ, मुझमें क्या शक्ति है?" किन्तु महादेव ने कहा— "तुम निश्चय ही विजय पाओगे।"

एवं तस्य गुणान् प्रीतो बहुशोऽकथयत् प्रभुः ।
देवतानां पितॄणां च समक्षमरिसूदन ॥

शत्रुसूदन! इसी प्रकार प्रसन्न हुए भगवान् शिवने देवताओं और पितरोंके समक्ष भी बारंबार प्रसन्नतापूर्वक उनके गुणोंका वर्णन किया ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 139पृष्ठ 1835

परशुराम युद्ध में उतरे और दैत्यों का वध करने लगे। दानवों ने उनके शरीर को क्षत-विक्षत कर डाला, परन्तु महादेव के स्पर्श पाते ही परशुराम के सारे घाव तत्काल दूर हो गए। प्रसन्न होकर शिव ने उनसे कहा— "भृगुनन्दन! तुम्हारे शरीर में जो चोट पहुँची है, उससे तुम्हारा मानवोचित कर्म नष्ट हो गया है; अतः अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार दिव्यास्त्र ग्रहण करो।"

वरान् प्रादाद् बहुविधान् भार्गवाय महात्मने ।
उक्तश्च देवदेवेन प्रीतियुक्तेन शूलिना ॥

उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शिवने बड़ी प्रसन्नताके साथ महात्मा भार्गवको नाना प्रकारके वर प्रदान किये ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 153पृष्ठ 1837

परशुराम ने समस्त दिव्य अस्त्र पाकर महादेव को प्रणाम किया और चले गए। दुर्योधन ने शल्य से कहा, "राजन्! यह पुरातन वृत्तान्त मेरे पिता ने सुना था। जिस प्रकार परशुराम ने प्रसन्न हृदय से कर्ण को दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया है, मैं इस बात पर विश्वास नहीं करता कि कर्ण सूतकुल में उत्पन्न हुआ है। मैं इसे क्षत्रिय कुल का देवपुत्र मानता हूँ। क्या कोई हरिणी अपने पेट से बाघ को जन्म दे सकती है? इसकी मोटी भुजाएँ और विशाल वक्ष:स्थल सूचित करते हैं कि यह कोई प्राकृत पुरुष नहीं है।"

यथा ह्यस्य भुजौ पीनौ नागराजकरोपमौ ॥

वक्षः पश्य विशालं च सर्वशत्रुनिबर्हणम् ।
न त्वेष प्राकृतः कश्चित् कर्णो वैकर्तनो वृषः ।
महात्मा ह्येष राजेन्द्र रामशिष्यः प्रतापवान् ॥

राजेन्द्र! गजराजके शुण्डदण्डके समान जैसी इसकी मोटी भुजाएँ हैं तथा समस्त शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ जैसा इसका विशाल वक्षःस्थल है, उससे सूचित होता है कि परशुरामजीका यह प्रतापी शिष्य महामनस्वी धर्मात्मा वैकर्तन कर्ण कोई प्राकृत पुरुष नहीं है ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 34 · श्लोक 162-163पृष्ठ 1838

In English

The Creation of Shiva's Divine Chariot

To defeat powerful demons, Lord Shiva receives half of his radiance from the gods to become Mahadeva. The deities construct a cosmic chariot for him using elements of the universe, such as mountains and rivers, and ask Brahma to serve as his charioteer.

This page answers

  • How did shiva become known as mahadeva?
  • What are the components of shivas divine chariot?
  • Who served as the charioteer for lord shiva?
  • How did the gods prepare for the war against the demons?

Also written: Tripuravadhopakhyana, Tripuravadha, Brahma, Nandi, Narayana, Parashurama, Shalya, Duryodhana, Karna, त्रिपुरवधोपाख्यान