श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1821–1830

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1821–1830

पृष्ठ 1821

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वषट्कारः प्रतोदोऽभूद् गायत्री शीर्षबन्धना ॥ ३५ ॥

वषट्कार घोड़ोंका चाबुक हुआ और गायत्री उस रथके ऊपरी भागकी बन्धन-रज्जु बनीं ॥ ३५ ॥

यो यज्ञे विहितः पूर्वमीशानस्य महात्मनः ।

संवत्सरो धनुस्तद् वै सावित्री ज्या महास्वना ॥ ३६ ॥

पूर्वकालमें जो महात्मा महादेवजीके यज्ञमें निर्मित हुआ था, वह संवत्सर ही उनके लिये धनुष बना और सावित्री उस धनुषकी महान् टंकार करनेवाली प्रत्यंचा बनी ॥ ३६ ॥

दिव्यं च वर्म विहितं महार्हं रत्नभूषितम् ।

अभेद्यं विरजस्कं वै कालचक्रबहिष्कृतम् ॥ ३७ ॥

महादेवजीके लिये एक दिव्य कवच तैयार किया गया जो बहुमूल्य, रत्नभूषित, रजोगुणरहित ( अथवा धूलरहित स्वच्छ), अभेद्य तथा कालचक्रकी पहुँचसे परे था ॥ ३७ ॥

ध्वजयष्टिरभून्मेरुः श्रीमान् कनकपर्वतः ।

पताकाश्चाभवन् मेघास्तडिद्भिः समलङ्कृताः ॥ ३८ ॥

रेजुरध्वर्युमध्यस्था ज्वलन्त इव पावकाः । कान्तिमान् कनकमय मेरुपर्वत रथके ध्वजका दण्ड बना था। बिजलियोंसे विभूषित बादल ही पताकाओंका काम दे रहे थे, जो यजुर्वेदी ऋत्विजोंके बीचमें स्थित हुई अग्नियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३८३ ॥

क्लृप्तं तु तं रथं दृष्ट्वा विस्मिता देवताऽभवन् ॥ ३ ९ ॥

सर्वलोकस्य तेजांसि दृष्ट्वैकस्थानि मारिष ।

युक्तं निवेदयामासुर्देवास्तस्मै महात्मने ॥ ४० ॥

मान्यवर! वह रथ क्या था, सम्पूर्ण जगत्के तेजका पुंज एकत्र हो गया था । उसे निर्मित हुआ देख सम्पूर्ण देवता आश्चर्यचकित हो उठे । फिर उन्होंने महात्मा महादेवजीसे यह निवेदन किया कि रथ तैयार है ॥ ३ ९-४० ॥

एवं तस्मिन् महाराज कल्पिते रथसत्तमे ।

देवैर्मनुजशार्दूल द्विषतामभिमर्दने ॥ ४१ ॥

स्वान्यायुधानि मुख्यानि न्यदधाच्छङ्करो रथे ।

ध्वजयष्टिं वियत् कृत्वा स्थापयामास गोवृषम् ॥ ४२ ॥

पुरुषसिंह! महाराज! इस प्रकार देवताओंद्वारा शत्रुओंका मर्दन करनेवाले उस श्रेष्ठ रथका निर्माण हो जानेपर भगवान् शंकरने उसके ऊपर अपने मुख्य- मुख्य अस्त्र- शस्त्र रख दिये और ध्वजदण्डको आकाशव्यापी बनाकर उसके ऊपर अपने वृषभ नन्दीको स्थापित कर दिया ॥ ४१-४२ ॥

ब्रह्मदण्डः कालदण्डो रुद्रदण्डस्तथा ज्वरः ।

परिस्कन्दा रथस्यासन् सर्वतोदिशमुद्यताः ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 1822

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तत्पश्चात् ब्रह्मदण्ड, कालदण्ड, रुद्रदण्ड तथा ज्वर- ये उस रथके पार्श्वरक्षक बनकर चारों ओर शस्त्र लेकर खड़े हो गये ॥ ४३ ॥

अथर्वाङ्गिसावास्तां चक्ररक्षौ महात्मनः ।

ऋग्वेदः सामवेदश्च पुराणं च पुरःसराः ॥ ४४ ॥

अथर्वा और अंगिरा महात्मा शिवके उस रथके पहियोंकी रक्षा करने लगे । ऋग्वेद, सामवेद और समस्त पुराण उस रथके आगे चलनेवाले योद्धा हुए ॥ ४४ ॥

इतिहासयजुर्वेदौ पृष्ठरक्षौ बभूवतुः ।

दिव्या वाचश्च विद्याश्च परिपार्श्वचराः स्थिताः ॥ ४५ ॥

इतिहास और यजुर्वेद पृष्ठरक्षक हो गये तथा दिव्य वाणी और विद्याएँ पार्श्ववर्ती बनकर खड़ी हो गयीं ॥ ४५ ॥

स्तोत्रादयश्च राजेन्द्र वषट्कारस्तथैव च ।

ओंकारश्च मुखे राजन्नतिशोभाकरोऽभवत् ॥ ४६ ॥

राजेन्द्र! स्तोत्र- कवच आदि, वषट्कार तथा ओंकार -ये मुखभागमें स्थित होकर अत्यन्त शोभा बढ़ाने लगे ॥ ४६ ॥

विचित्रमृतुभिः षड्भिः कृत्वा संवत्सरं धनुः ।

छायामेवात्मनश्चक्रे धनुर्ज्यामक्षयां रणे ॥ ४७ ॥

छहों ऋतुओंसे युक्त संवत्सरको विचित्र धनुष बनाकर अपनी छायाको ही महादेवजीने उस धनुषकी प्रत्यंचा बनायी, जो रणभूमिमें कभी नष्ट होनेवाली नहीं थी ॥ ४७ ॥

कालो हि भगवान् रुद्रस्तस्य संवत्सरो धनुः ।

तस्माद् रौद्री कालरात्रिर्ज्या कृता धनुषोऽजरा ॥ ४८ ॥

भगवान् रुद्र ही काल हैं, अतः कालका अवयवभूत संवत्सर ही उनका धनुष हुआ । कालरात्रि भी रुद्रका ही अंश है, अतः उसीको उन्होंने अपने धनुषकी अटूट प्रत्यंचा बना लिया ॥ ४८ ॥

इषुश्चाप्यभवद् विष्णुर्ज्वलनः सोम एव च ।

अग्नीषोमौ जगत् कृत्स्नं वैष्णवं चोच्यते जगत् ॥ ४ ९ ॥

भगवान् विष्णु, अग्नि और चन्द्रमा- ये ही बाण हुए थे; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोमका ही स्वरूप है । साथ ही सारा संसार वैष्णव ( विष्णुमय ) भी कहा जाता है ॥ ४ ९ ॥

विष्णुश्चात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः ।

तस्माद् धनुर्ज्यासंस्पर्शं न विषेहुर्हरस्य ते ॥ ५० ॥

अमिततेजस्वी भगवान् शंकरके आत्मा हैं विष्णु । अतः वे दैत्य भगवान् शिवके धनुषकी प्रत्यंचा एवं बाणका स्पर्श न सह सके ॥ ५० ॥

तस्मिन् शरे तिग्ममन्युं मुमोचासह्यमीश्वरः ।

पृष्ठ 1823

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भृग्वङ्गिरोमन्युभवं क्रोधाग्निमतिदुःसहम् ॥ ५१ ॥

महेश्वरने उस बाणमें अपने असह्य एवं प्रचण्ड कोपको तथा भृगु और अंगिराके रोषसे उत्पन्न हुई अत्यन्त दुःसह क्रोधाग्निको भी स्थापित कर दिया ॥ ५१ ॥

स नीललोहितो धूम्रः कृत्तिवासाभयंकरः ।

आदित्यायुतसंकाशस्तेजोज्वालावृतो ज्वलन् ॥ ५२ ॥

तत्पश्चात् धूम्रवर्ण, व्याघ्रचर्मधारी, देवताओंको अभय तथा दैत्योंको भय देनेवाले, सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी नीललोहित भगवान् शिव तेजोमयी ज्वालासे आवृत हो प्रकाशित होने लगे ॥ ५२ ॥

दुशच्यावच्यावनो जेता हन्ता ब्रह्मद्विषां हरः ।

नित्यं त्राता च हन्ता च धर्माधर्माश्रितान् नरान् ॥ ५३ ॥

जिस लक्ष्यको मार गिराना अत्यन्त कठिन है, उसको भी गिरानेमें समर्थ, विजयशील, ब्रह्मद्रोहियोंके विनाशक भगवान् शिव धर्मका आश्रय लेनेवाले मनुष्योंकी सदा रक्षा और पापियोंका विनाश करनेवाले हैं ॥ ५३ ॥

प्रमाथिभिर्भीमबलैर्भीमरूपैर्मनोजवैः ।

विभाति भगवान् स्थाणुस्तैरेवात्मगुणैर्वृतः ॥ ५४ ॥

उनके जो अपने उपयोगमें आनेवाले रथ आदि गुणवान् उपकरण थे, वे शत्रुओंको मथ डालनेमें समर्थ, भयानक बलशाली, भयंकररूपधारी और मनके समान वेगवान् थे । उनसे घिरे हुए भगवान् शिवकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥

तस्याङ्गानि समाश्रित्य स्थितं विश्वमिदं जगत् ।

जङ्गमाजङ्गमं राजन् शुशुभेऽद्भुतदर्शनम् ॥ ५५ ॥

राजन्! उनके पंचभूतस्वरूप अंगोंका आश्रय लेकर ही यह अद्भुत दिखायी देनेवाला सारा चराचर जगत् स्थित एवं सुशोभित है ॥ ५५ ॥

दृष्ट्वा तु तं रथं युक्तं कवची स शरासनी ।

बाणमादाय तं दिव्यं सोमविष्ण्वग्निसम्भवम् ॥ ५६ ॥

उस रथको जुता हुआ देख भगवान् शंकर कवच और धनुषसे युक्त हो चन्द्रमा, विष्णु और अग्निसे प्रकट हुए उस दिव्य बाणको लेकर युद्धके लिये उद्यत हुए ॥ ५६ ॥

तस्य राजंस्तदा देवाः कल्पयाञ्चक्रिरे प्रभो ।

पुण्यगन्धवहं राजन् श्वसनं देवसत्तमम् ॥ ५७ ॥

राजन्! प्रभो! उस समय देवताओंने पवित्र सुगन्ध वहन करनेवाले देवश्रेष्ठ वायुको उनके लिये हवा करनेके कामपर नियुक्त किया ॥ ५७ ॥

तमास्थाय महादेवस्त्रासयन् दैवतान्यपि ।

आरुरोह तदा यत्तः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ५८ ॥

पृष्ठ 1824

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तब महादेवजी दानवोंके वधके लिये प्रयत्नशील हो देवताओंको भी डराते और पृथ्वीको कम्पित करते हुए - से उस रथको थामकर उसपर चढ़ने लगे ॥ ५८ ॥

तमारुरुक्षं देवेशं तुष्टुवुः परमर्षयः ।

गन्धर्वा दैवसङ्घाश्च तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५ ९ ॥

देवेश्वर शिव रथपर चढ़ना चाहते हैं, यह देखकर महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओंके समुदायोंने उनकी स्तुति की ॥ ५ ९ ॥

ब्रह्मर्षिभिः स्तूयमानो वन्द्यमानश्च वन्दिभिः ।

तथैवाप्सरसां वृन्दैर्नृत्यद्भिर्नृत्यकोविदैः ॥ ६० ॥

स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी ।

हसन्निवाब्रवीद् देवान् सारथिः को भविष्यति ॥ ६१ ॥

ब्रह्मर्षियोंद्वारा प्रशंसित, वन्दीजनोंद्वारा वन्दित तथा नाचती हुई नृत्य- कुशल अप्सराओंसे सुशोभित होते हुए वरदायक भगवान् शिव खड्ग, बाण और धनुष ले देवताओंसे हँसते हुए - से बोले — ' मेरा सारथि कौन होगा? ' ॥ ६०-६१ ॥

तमब्रुवन् देवगणा यं भवान् संनियोक्ष्यते ।

स भविष्यति देवेश सारथिस्ते न संशयः ॥ ६२ ॥

यह सुनकर देवताओंने उनसे कहा – ' देवेश! आप जिसको इस कार्यमें नियुक्त करेंगे, वही आपका सारथि होगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥ ६२ ॥

तानब्रवीत् पुनर्देवो मत्तः श्रेष्ठतरो हि यः ।

तं सारथिं कुरुध्वं मे स्वयं संचिन्त्य मा चिरम् ॥ ६३ ॥

तब महादेवजीने फिर कहा- ' तुमलोग स्वयं ही सोच- विचारकर जो मुझसे भी श्रेष्ठतर हो, उसे मेरा सारथि बना दो, विलम्ब न करो ' ॥ ६३ ॥

एतच्छ्रुत्वा ततो देवा वाक्यमुक्तं महात्मना ।

गत्वा पितामहं देवाः प्रसाद्येदं वचोऽब्रुवन् ॥ ६४ ॥

उन महात्माके कहे हुए इस वचनको सुनकर सब देवता ब्रह्माजीके पास गये और उन्हें प्रसन्न करके इस प्रकार बोले- ॥ ६४ ॥

यथा त्वत्कथितं देव त्रिदशारिविनिग्रहे ।

तथा च कृतमस्माभिः प्रसन्नो नो वृषध्वजः ॥ ६५ ॥

‘ देव! देवशत्रुओंका दमन करनेके विषयमें आपने जैसा कहा था, वैसा ही हमने किया है । भगवान् शंकर हमलोगोंपर प्रसन्न हैं ॥ ६५ ॥

रथश्च विहितोऽस्माभिर्विचित्रायुधसंवृतः ।

सारथिं च न जानीमः कः स्यात् तस्मिन् रथोत्तमे ॥ ६६ ॥

' हमने उनके लिये विचित्र आयुधोंसे सम्पन्न रथ तैयार कर दिया है; परंतु उस उत्तम रथपर कौन सारथि होकर बैठेगा? यह हम नहीं जानते हैं ' ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 1825

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तस्माद् विधीयतां कश्चित् सारथिर्देवसत्तम ।

सफलां तां गिरं देव कर्तुमर्हसि नो विभो ॥ ६७ ॥

‘ अतः देवश्रेष्ठ प्रभो! आप किसीको सारथि बनाइये । देव! आपने हमें जो वचन दिया है, उसे सफल कीजिये ॥

एवमस्मासु हि पुरा भगवन्नुक्तवानसि ।

हितकर्तास्मि भवतामिति तत् कर्तुमर्हसि ॥ ६८ ॥

‘ भगवन्! आपने पहले हमलोगोंसे कहा था कि ' मैं तुमलोगोंका हित करूँगा । ' अतः उसे पूर्ण कीजिये ॥ स देव युक्तो रथसत्तमो नो दुराधरो द्रावणः शात्रवाणाम् । पिनाकपाणिर्विहितोऽत्र योद्धा विभीषयन् दानवानुद्यतोऽसौ ॥ ६ ९ ॥ ‘ देव! हमारा तैयार किया हुआ वह श्रेष्ठ रथ शत्रुओंको मार भगानेवाला और दुर्धर्ष है । पिनाकपाणि भगवान् शंकरको उसपर योद्धा बनाकर बैठा दिया गया है और वे दानवोंको भयभीत करते हुए युद्धके लिये उद्यत हैं ॥ ६ ९ ॥ तथैव वेदाश्चतुरो हयाग्रया धरा सशैला च रथो महात्मनः । नक्षत्रवंशानुगतो वरूथी हरो योद्धा सारथिर्नाभिलक्ष्यः ॥ ७० ॥

' इसी प्रकार चारों वेद उन महात्माके उत्तम घोड़े हैं और पर्वतोंसहित पृथ्वी उनका उत्तम रथ बनी हुई है । नक्षत्रसमुदायरूपी ध्वजसे युक्त तथा आवरणसे सुशोभित भगवान् शिव उस रथपर रथी योद्धा बनकर बैठे हुए हैं; परंतु कोई सारथि नहीं दिखायी देता ॥ ७० ॥

तत्र सारथिरेष्टव्यः सर्वैरेतैर्विशेषवान् ।

तत्प्रतिष्ठो रथो देव हया योद्धा तथैव च ॥ ७१ ॥

‘ देव! उस रथके लिये ऐसे सारथिका अनुसंधान करना चाहिये जो इन सबसे बढ़कर हो; क्योंकि रथ, घोड़े और योद्धा इन सबकी प्रतिष्ठा सारथिपर ही निर्भर है ॥ ७१ ॥

कवचानि सशस्त्राणि कार्मुकं च पितामह ।

त्वामृते सारथिं तत्र नान्यं पश्यामहे वयम् ॥ ७२ ॥

त्वं हि सर्वगुणैर्युक्तो दैवतेभ्योऽधिकः प्रभो । ‘पितामह! कवच, शस्त्र और धनुषकी सफलता भी सारथिपर ही निर्भर है । हमलोग आपके सिवा दूसरे किसीको वहाँ सारथि होनेके योग्य नहीं देखते हैं । प्रभो! क्योंकि आप सभी देवताओंसे श्रेष्ठ और सर्वगुणसम्पन्न हैं ॥ ७२३ ॥

पृष्ठ 1826

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(त्वं देव शक्तो लोकेऽस्मिन् नियन्तुं प्रद्रुतानिमान् ।

वेदाश्वान् सोपनिषदः सारथिर्भव नः स्वयम् ॥

‘देव! आप ही इस जगत्में इन भागते हुए उपनिषद्सहित वेदरूपी अश्वोंको नियन्त्रणमें रख सकते हैं; अतः आप स्वयं ही सारथि हो जाइये ।

योद्धुं बलेन सत्त्वेन वीर्येण विनयेन च ।

अधिकः सारथिः कार्यो नास्ति चान्दोऽधिको भवात् ॥

‘ बल, धैर्य, पराक्रम और विनय इन सभी गुणोंद्वारा जो रथीसे भी श्रेष्ठ हो, उसे ही युद्धके लिये सारथि बनाना चाहिये; दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो भगवान् शंकरसे भी बढ़कर

स भवांस्तारयत्वस्मान् कुरु सारथ्यमव्ययम् ।

भवानभ्यधिकस्त्वत्तो नान्योऽस्तीह पितामह ॥

‘ पितामह! आप अक्षय सारथिकर्म कीजिये और हमें इस संकटसे उबारिये । आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं; आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है । त्वं हि देवेश सर्वैस्तु विशिष्टो वदतां वर । ) स रथं तूर्णमारुह्य संयच्छ परमान् हयान् ॥ ७३ ॥

जयाय त्रिदेवेशानां वधाय त्रिदशद्विषाम् । ‘ वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर! आप सभी गुणोंसे श्रेष्ठ हैं; इसलिये देवद्रोहियोंके वध और देवताओंकी विजयके लिये तुरंत रथपर आरूढ़ होकर इन उत्तम घोड़ोंको काबूमें रखिये ॥ ७३ ॥

( तव प्रसादाद् वध्येरन् देव दैवतकण्टकाः ।

स नो रक्ष महाबाहो दैत्येभ्यो महतो भयात् ॥

‘ देव! आपके प्रसादसे देवताओंके लिये यह कण्टकरूप दैत्य मारे जायँगे । महाबाहो! आप दैत्योंके महान् भयसे हमारी रक्षा करें । त्वं हि नो गतिरव्यग्र त्वं नो गोप्ता महाव्रत । त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे पूज्यन्ते त्रिदिवे प्रभो ॥ ) ' व्यग्रताशून्य महान् व्रतधारी प्रभो! आप ही हमारे आश्रय तथा संरक्षक हैं; आपकी

कृपासे ही समस्त देवता स्वर्गलोकमें पूजित होते हैं ' ।

इति ते शिरसा गत्वा त्रिलोकेशं पितामहम् ॥ ७४ ॥

देवाः प्रसादयामासुः सारथ्यायेति नः श्रुतम् । इस प्रकार देवताओंने तीनों लोकोंके ईश्वर पितामह ब्रह्माजीके आगे मस्तक टेककर

उन्हें सारथि बननेके लिये प्रसन्न किया । यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ ७४३ ॥

पितामहउवाच

पृष्ठ 1827

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नात्र किंचिन्मृषा वाक्यं यदुक्तं त्रिदिवौकसः ॥ ७५ ॥

संयच्छामि हयानेष युध्यतो वै कपर्दिनः । पितामह बोले – देवताओ! तुमने जो कुछ कहा है, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है । मैं युद्ध करते समय भगवान् शंकरके घोड़ोंको काबूमें रखूँगा ॥ ७५३ ॥

ततः स भगवान् देवो लोकस्रष्टा पितामहः ॥ ७६ ॥

(एवमुक्त्वा जटाभारं संयम्य प्रपितामहः ।

परिधायाजिनं गाढं संन्यस्य च कमण्डलुम् ॥

प्रतोदपाणिर्भगवानारुरोह रथ तदा । ) तदनन्तर लोकस्रष्टा भगवान् पितामह देवने जो जगत्के प्रपितामह हैं, उपर्युक्त बात कहकर अपनी जटाओंके बोझको बाँध लिया और मृगचर्मके वस्त्रको अच्छी तरह कसकर कमण्डलुको अलग रख दिया । तत्पश्चात् वे भगवान् ब्रह्मा हाथमें चाबुक लेकर तत्काल उस रथपर जा चढ़े ॥ ७६ ||

सारथ्ये कल्पितो देवैरीशानस्य महात्मनः ।

तस्मिन्नारोहति क्षिप्रं स्यन्दने लोकपूजिते ॥ ७७ ॥

शिरोभिरगमन् भूमिं ते हया वातरंहसः । इस प्रकार देवताओंने भगवान् शंकरके सारथिके पदपर उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया । जब उस लोकपूजित रथपर ब्रह्माजी चढ़ रहे थे, उस समय वायुके समान वेगशाली घोड़े धरतीपर माथा टेककर बैठ गये थे ॥ ७७३ ॥

आरुह्य भगवान् देवो दीप्यमानः स्वतेजसा ॥ ७८ ॥

अभीषून् हि प्रतोदं च संजग्राह पितामहः । अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए भगवान् ब्रह्माने रथारूढ़ होकर घोड़ोंकी बागडोर और चाबुक दोनों वस्तुएँ अपने हाथमें ले लीं ॥ ७८ ॥

तत उत्थाप्य भगवांस्तान् हयाननिलोपमान् ॥ ७९ ॥

बभाषे च तदा स्थाणुमारोहेति सुरोत्तमः । तत्पश्चात् वायुके समान तीव्रगतिवाले उन घोड़ोंको उठाकर सुरश्रेष्ठ भगवान् ब्रह्माने महादेवजीसे कहा — ‘ अब आप रथपर आरूढ़ होइये ' ॥ ७ ९ ॥ ततस्तमिषुमादाय विष्णुसोमाग्निसम्भवम् ॥ ८० ॥

आरुरोह तदा स्थाणुर्धनुषा कम्पयन् परान् । तब विष्णु, चन्द्रमा और अग्निसे उत्पन्न हुए उस बाणको हाथमें लेकर महादेवजी अपने धनुषके द्वारा शत्रुओंको कम्पित करते हुए उस रथपर चढ़ गये ॥ ८० ॥

तमारूढं तु देवेशं तुष्टुवुः परमर्षयः ॥ ८१ ॥

गन्धर्वा देवसंघाश्च तथैवाप्सरसां गणाः ।

पृष्ठ 1828

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रथपर आरूढ़ हुए देवेश्वर शिवकी महर्षियों, गन्धर्वों, देवसमूहों तथा अप्सराओंके समुदायोंने स्तुति की ॥ ८१३ ॥

स शोभमानो वरदः खड्गी बाणी शरासनी ॥ ८२ ॥

प्रदीपयन् रथे तस्थौ त्रीँल्लोकान् स्वेन तेजसा । खड्ग, धनुष और बाण लेकर शोभा पाते हुए वरदायक महादेवजी अपने तेजसे तीनों लोकोंको प्रकाशित करते हुए रथपर स्थित हो गये ॥ ८२३ ॥

ततो भूयोऽब्रवीद् देवो देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ८३ ॥

न हन्यादिति कर्तव्यो न शोको वः कथञ्चन ।

हतानित्येव जानीत बाणेनानेन चासुरान् ॥ ८४ ॥

तब महादेवजीने पुनः इन्द्र आदि देवताओंसे कहा - ' शायद ये दैत्योंको न मारें ' ऐसा समझकर तुम्हें किसी प्रकार भी शोक नहीं करना चाहिये । तुमलोग असुरोंको इस बाणसे ' मरा हुआ ' ही समझो ' ॥ ८३-८४ ॥

ते देवाः सत्यमित्याहुर्निहता इति चाब्रुवन् ।

न च तद् वचनं मिथ्या यदाह भगवान् प्रभुः ॥ ८५ ॥

इति संचिन्त्य वै देवाः परां तुष्टिमवाप्नुवन् । यह सुनकर उन देवताओंने कहा- ' प्रभो! आपका कथन सत्य है । अवश्य ही वे दैत्य मारे गये । शक्तिशाली भगवान् जो कुछ कह रहे हैं, वह वचन मिथ्या नहीं हो सकता ' यह सोचकर देवताओंको बड़ा संतोष हुआ ॥ ८५३ ॥

ततः प्रयातो देवेशः सर्वैर्देवगणैर्वृतः ॥ ८६ ॥

रथेन महता राजन्नुपमा नास्ति यस्य ह । राजन्! तदनन्तर जिसकी कहीं उपमा नहीं थी, उस विशाल रथके द्वारा देवेश्वर महादेवजी समस्त देवताओंसे घिरे हुए वहाँसे चल दिये ॥ ८६ ॥

स्वैश्च पारिषदैर्देवः पूज्यमानो महायशाः ॥ ८७ ॥

नृत्यद्भिरपरैश्चैव मांसभक्षैर्दुरासदैः ।

धावमानैः समन्ताच्च तर्जमानैः परस्परम् ॥ ८८ ॥

उस समय उनके अपने पार्षद भी महायशस्वी महादेवजीकी पूजा कर रहे थे । शिवके वे दुर्धर्ष पार्षद नृत्य करते और परस्पर एक- दूसरेको डाँटते हुए चारों ओर दौड़ लगाते थे । अन्य कितने ही पार्षद ( भूत- प्रेतादि) मांसभक्षी थे ॥ ८७-८८ ॥

ऋषयश्च महाभागास्तपोयुक्ता महागुणाः ।

आशंसुर्वै जना देवा महादेवस्य सर्वशः ॥ ८ ९ ॥

महान् भाग्यशाली और उत्तम गुणसम्पन्न तपस्वी ऋषियों, देवताओं तथा अन्य लोगोंने भी सब प्रकारसे महादेवजीकी विजयके लिये शुभाशंसा की ॥ ८ ९ ॥ एवं प्रयाते देवेशे लोकानामभयंकरे ।

पृष्ठ 1829

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1829 का मूल पृष्ठ
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तुष्टमासीज्जगत् सर्वं देवताश्च नरोत्तम ॥ ९ ० ॥ नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंको अभय देनेवाले देवेश्वर महादेवजीके इस प्रकार प्रस्थान

करनेपर सारा जगत् संतुष्ट हो गया । देवता भी बड़े प्रसन्न हुए ॥ ९ ० ॥

ऋषयस्तत्र देवेशं स्तुवन्तो बहुभिः स्तवैः ।

तेजश्चास्मै वर्धयन्तो राजन्नासन् पुनः पुनः ॥ ९ १ ॥

राजन्! ऋषिगण नाना प्रकारके स्तोत्रोंका पाठ करके देवेश्वर महादेवकी स्तुति करते हुए बारंबार उनका तेज बढ़ा रहे थे ॥ ९ १ ॥

गन्धर्वाणां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।

वादयन्ति प्रयाणेऽस्य वाद्यानि विविधानि च ॥ ९ २ ॥

उनके प्रस्थानके समय सहस्रों, लाखों और अरबों गन्धर्व नाना प्रकारके बाजे बजा रहे थे ॥ ९ २ ॥

ततोऽधिरूढे वरदे प्रयाते चासुरान् प्रति ।

साधु साध्विति विश्वेशः स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ ९ ३ ॥

रथपर आरूढ़ हो वरदायक भगवान् शंकर जब असुरोंकी ओर चले, तब वे विश्वनाथ ब्रह्माजीको साधुवाद देते हुए मुसकराकर बोले— ॥ ९ ३ ॥

याहि देव यतो दैत्याश्चोदयाश्वानतन्द्रितः ।

पश्य बाह्वोर्बलं मेऽद्य निघ्नतः शात्रवान् रणे ॥ ९ ४ ॥

‘ देव! जिस ओर दैत्य हैं, उधर ही चलिये और सावधान होकर घोड़ोंको हाँकिये । आज रणभूमिमें जब मैं शत्रुसेनाका संहार करने लगूँ, उस समय आप मेरी इन दोनों भुजाओंका बल देखियेगा ' ॥ ९ ४ ॥

ततोऽश्वांश्चोदयामास मनोमारुतरंहसः ।

येन तत् त्रिपुरं राजन् दैत्यदानवरक्षितम् ॥ ९ ५ ॥

राजन्! तब ब्रह्माजीने मन और पवनके समान वेगशाली घोड़ोंको उसी ओर बढ़ाया, जिस ओर दैत्यों और दानवोंद्वारा सुरक्षित वे तीनों पुर थे ॥ ९ ५ ॥

पिबद्भिरिव चाकाशं तैर्हयैर्लोकपूजितैः ।

जगाम भगवान् क्षिप्रं जयाय त्रिदिवौकसाम् ॥ ९ ६ ॥

वे लोकपूजित अश्व ऐसे तीव्र वेगसे चल रहे थे, मानो सारे आकाशको पी जायँगे । उस समय भगवान् शिव उन अश्वोंके द्वारा देवताओंकी विजयके लिये बड़ी शीघ्रताके साथ जा रहे थे ॥ ९ ६ ॥

प्रयाते रथमास्थाय त्रिपुराभिमुखे भवे ।

ननाद सुमहानादं वृषभः पूरयन् दिशः ॥ ९७ ॥

रथपर आरूढ़ हो जब महादेवजी त्रिपुरकी ओर प्रस्थित हुए, उस समय नन्दी वृषभने सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए बड़े चोरसे सिंहनाद किया ॥ ९ ७ ॥

पृष्ठ 1830

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1830 का मूल पृष्ठ
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वृषभस्यास्य निनदं श्रुत्वा भयकरं महत् ।

विनाशमगमंस्तत्र तारकाः सुरशत्रवः ॥ १८ ॥

उस वृषभका वह अत्यन्त भयंकर सिंहनाद सुनकर बहुत - से देवशत्रु तारक नामवाले दैत्यगण वहीं विनष्ट हो गये ॥ ९ ८ ॥

अपरेऽवस्थितास्तत्र युद्धायाभिमुखास्तदा ।

ततः स्थाणुर्महाराज शूलधृक् क्रोधमूर्च्छितः ॥ ९९ ॥

दूसरे जो दैत्य वहाँ खड़े थे, वे युद्धके लिये महादेवजीके सामने आये । महाराज! तब त्रिशूलधारी महादेवजी क्रोधसे आतुर हो उठे ॥ ९९ ॥

त्रस्तानि सर्वभूतानि त्रैलोक्यं भूः प्रकम्पते ।

निमित्तानि च घोराणि तत्र संदधतः शरम् ॥ १०० ॥

तस्मिन् सोमाग्निविष्णूनां क्षोभेण ब्रह्मरुद्रयोः ।

स रथो धनुषः क्षोभादतीव ह्यवसीदति ॥ १०१ ॥

फिर तो समस्त प्राणी भयभीत हो उठे । सारी त्रिलोकी और भूमि काँपने लगी । जब वे वहाँ धनुषपर बाणका संधान करने लगे, तब उसमें चन्द्रमा, अग्नि, विष्णु, ब्रह्मा और रुद्रके क्षोभसे बड़े भयंकर निमित्त प्रकट हुए। धनुषके क्षोभसे वह रथ अत्यन्त शिथिल होने लगा ॥ १००-१०१ ॥

ततो नारायणस्तस्माच्छरभागाद् विनिःसृतः ।

वृषरूपं समास्थाय उज्जहार महारथम् ॥ १०२ ॥

तब भगवान् नारायणने उस बाणके एक भागसे बाहर निकलकर वृषभका रूप धारण करके भगवान् शिवके विशाल रथको ऊपर उठाया ॥ १०२ ॥

सीदमाने रथे चैव नर्दमानेषु शत्रुषु ।

स सम्भ्रमात् तु भगवान् नादं चक्रे महाबलः ॥ १०३ ॥

जब रथ शिथिल होने लगा और शत्रु गर्जना करने लगे, तब महाबली भगवान् शिवने बड़े वेगसे घोर गर्जना की ॥ १०३ ॥

वृषभस्य स्थितो मूर्ध्नि हयपृष्ठे च मानद ।

तदा स भगवान् रुद्रो निरैक्षद् दानवं पुरम् ॥ १०४ ॥

वृषभस्यास्थितो रुद्रो हयस्य च नरोत्तम ।

स्तनांस्तदाऽशातयत खुरांश्चैव द्विधाकरोत् ॥ १०५ ॥

मानद! उस समय वे वृषभके मस्तक और घोड़ेकी पीठपर खड़े थे । नरोत्तम! भगवान् रुद्रने वृषभ तथा घोड़ेकी भी पीठपर सवार हो उस दानव नगरको देखा । तब उन्होंने वृषभके खुरोंको चीरकर उन्हें दो भागोंमें बाँट दिया और घोड़ोंके स्तन काट डाले ॥ १०४-१०५ ॥ ततःप्रभृति भद्रं ते गवां द्वैधीकृताः खुराः ।