श्रीगणेशाय नमः।

चिरकारिकोपाख्यान : धर्मयुक्त किन्तु हिंसापूर्ण कर्तव्य पर विचार कैसे करें?

विवेक और धर्म का सन्तुलन

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · पृष्ठ 1707–1721

1,743 शब्द · 9 मिनटका पाठ · 15 श्लोक

सूत ने युधिष्ठिर से कहा

धार्मिक दुविधा के समाधान हेतु

युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछा— "पितामह! आप मेरे परम गुरु हैं। कृपया यह बताइये कि यदि कभी सर्वथा ऐसा कार्य उपस्थित हो जाय, जो गुरुजनों की आज्ञा के कारण अवश्य कर्तव्य हो, परन्तु हिंसायुक्त होने के कारण दुष्कर एवं अनुचित प्रतीत होता हो, तो ऐसे अवसर पर उस कार्य की परख कैसे करनी चाहिये? उसे शीघ्र कर डाले या देर तक उस पर विचार करता रहे?"

युधिष्ठिर उवाच

कथं कार्यं परीक्षेत शीघ्रं वाथ चिरेण वा ।
सर्वथा कार्यदुर्गेऽस्मिन् भवान् नः परमो गुरुः ॥

युधिष्ठिरने पूछा – पितामह! आप मेरे परम गुरु हैं । कृपया यह बतलाइये कि यदि कभी सर्वथा ऐसा कार्य उपस्थित हो जाय, जो गुरुजनोंकी आज्ञाके कारण अवश्य कर्तव्य हो, परंतु हिंसायुक्त होनेके कारण दुष्कर एवं अनुचित प्रतीत होता हो तो ऐसे अवसरपर उस कार्यकी परख कैसे करनी चाहिये? उसे शीघ्र कर डाले या देरतक उसपर विचार करता रहे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 1पृष्ठ 1708

भीष्मजी ने उत्तर दिया— "बेटा! इस विषय में जानकार लोग इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जो पहले आङ्गिरस-कुल में उत्पन्न चिरकारी पर बीत चुका है।"

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
चिरकारेस्तु यत् पूर्वं वृत्तमाङ्गिरसे कुले ॥

भीष्मजीने कहा- बेटा! इस विषयमें जानकार लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जो पहले आंगिरस-कुलमें उत्पन्न चिरकारीपर बीत चुका है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 2पृष्ठ 1708

कहते हैं, महर्षि गौतम के एक महाज्ञानी पुत्र थे, जिनका नाम था चिरकारी। वह कर्तव्य-विषयों का भलीभाँति विचार करके सारे कार्य विलम्ब से किया करते थे। वे सभी विषयों पर बहुत देर तक विचार करते थे, चिरकाल तक जागते थे और चिरकाल तक सोते थे तथा चिर-विलम्ब के बाद ही कार्य पूर्ण करते थे; इसलिये सब लोग उन्हें 'चिरकारी' कहने लगे। जो दूतक की बात नहीं सोच सकते, ऐसे मन्दबुद्धि मानवों ने उन्हें आलसी की उपाधि दे दी और उन्हें दुर्बुद्धि कहा जाने लगा।

एक दिन की बात है, गौतम ने अपनी स्त्री के द्वारा किये गये किसी व्यभिचार पर कुपित होकर अपने दूसरे पुत्रों को न कहकर चिरकारी से कहा— "बेटा! तू अपनी इस पापिनी माता को मार डाल!" उस समय बिना बिचारे ही ऐसी आज्ञा देकर, जप करने वालों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि महाभाग गौतम वन में चले गये।

इत्युक्त्वा स तदा विप्रो गौतमो जपतां वरः ।
अविमृश्य महाभागो वनमेव जगाम सः ॥

उस समय बिना बिचारे ही ऐसी आज्ञा देकर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि महाभाग गौतम वनमें चले गये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 8पृष्ठ 1709

चिरकारी ने अपने स्वभाव के अनुसार देर करके कहा— "बहुत अच्छा।" चिरकारी तो वह था ही, वह चिरकाल तक उस बात पर विचार करता रहा। उसने सोचा कि मैं किस उपाय से काम लूँ जिससे पिता की आज्ञा का पालन भी हो जाय और माता का वध भी न करना पड़े? धर्म के बहाने यह मेरे ऊपर महान सङ्कट आ गया है। भला, अन्य असाधु पुरुषों की भाँति मैं भी इसमें डूबने का कैसे साहस करूँ?

स तथेति चिरेणोक्त्वा स्वभावाच्चिरकारिकः ।
विमृश्य चिरकारित्वाच्चिन्तयामास वै चिरम् ॥

चिरकारीने अपने स्वभावके अनुसार देर करके कहा, ' बहुत अच्छा' । चिरकारी तो वह था ही, चिरकालतक उस बातपर विचार करता रहा ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 9पृष्ठ 1709

उसने मन ही मन विचार किया— "पिता की आज्ञा का पालन परम धर्म है और माता की रक्षा करना पुत्र का प्रधान धर्म है। पुत्र कभी स्वतन्त्र नहीं होता, वह सदा माता-पिता के अधीन ही रहता है; अतः क्या करूँ जिससे मुझे धर्म की हानिरूप पीड़ा न हो? एक तो स्त्री-जाति, दूसरे माता का वध करके कौन पुत्र कभी भी सुखी हो सकता है? पिता की अवहेलना करके भी कौन प्रतिष्ठा पा सकता है? पिता का अनादर उचित नहीं है, साथ ही माता की रक्षा करना भी पुत्र का धर्म है। ये दोनों ही धर्म उचित और योग्य हैं। मैं किस प्रकार इनका उल्लङ्घन न करूँ?"

पितुराज्ञा परो धर्मः स्वधर्मो मातृरक्षणम् ।
अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं किं तु मां नानुपीडयेत् ॥

‘ पिताकी आज्ञाका पालन परम धर्म है और माताकी रक्षा करना पुत्रका प्रधान धर्म है । पुत्र कभी स्वतन्त्र नहीं होता, वह सदा माता - पिताके अधीन ही रहता है, अतः क्या करूँ जिससे मुझे धर्मकी हानिरूप पीड़ा न हो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 11पृष्ठ 1709

उसने अपने अस्तित्व के आधारों को टटोला— "पिता स्वयं अपने शील, सदाचार, कुल और गोत्र की रक्षा के लिये स्त्री के गर्भ में अपना ही आधान करता और पुत्र रूप में उत्पन्न होता है। अतः मुझे माता और पिता— दोनों ने ही पुत्र के रूप में जन्म दिया है। मैं इन दोनों को ही अपनी उत्पत्तिका कारण समझता हूँ। जातकर्म-संस्कार और उपनयन संस्कार के समय पिता ने जो आशीर्वाद दिया है, वह पिता के गौरव का निश्चय करने में पर्याप्त एवं सुदृढ़ प्रमाण है। पिता भरण-पोषण करने तथा शिक्षा देने के कारण पुत्र का प्रधान गुरु है। वह परम धर्म का साक्षात् स्वरूप है। पिता जो कुछ आज्ञा दे, उसे ही धर्म समझकर स्वीकार करना चाहिये। वेदों में भी उसी को धर्म निश्चित किया गया है।"

गुरुरग्र्यः परो धर्मः पोषणाध्यापनान्वितः ।
पिता यदाह धर्मः स वेदेष्वपि सुनिश्चितः ॥

‘ पिता भरण- पोषण करने तथा शिक्षा देनेके कारण पुत्रका प्रधान गुरु है । वह परम धर्मका साक्षात् स्वरूप है । पिता जो कुछ आज्ञा दे, उसे ही धर्म समझकर स्वीकार करना चाहिये । वेदोंमें भी उसीको धर्म निश्चित किया गया है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 17पृष्ठ 1710

चिरकारी के विचार गहरे होते गए— "पुत्र पिता की सम्पूर्ण प्रीतिरूप है और पिता पुत्र का सर्वस्व है। केवल पिता ही पुत्र को देह आदि सम्पूर्ण देने योग्य वस्तुओं को देता है। इसलिये पिता के आदेश का पालन करना चाहिये, उस पर कभी कोई विचार नहीं करना चाहिये; जो पिता की आज्ञा का पालन करने वाला है, उसके पातक भी नष्ट हो जाते हैं। पुत्र के भोग्य, भोज्य, प्रवचन, सम्पूर्ण लोक-व्यवहार की शिक्षा तथा समस्त संस्कारों के सम्पादन में पिता ही प्रभु है। इसलिये पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है और पिता ही सबसे बड़ी तपस्या है। पिता के प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हो जाते हैं। पिता पुत्र से यदि कुछ कठोर बातें कह देता है तो वे आशीर्वाद बनकर उसे अपना लेती हैं और यदि वह मीठे वचन बोलकर प्यार दिखाता है तो इससे पुत्र के सम्पूर्ण पापों का प्रायश्चित्त हो जाता है। फूल डण्ठल से अलग हो जाता है, फल वृक्ष से अलग हो जाता है; परन्तु पिता कितने ही कष्ट में क्यों न हो, अपने पुत्र को कभी नहीं छोड़ता।"

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः ।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः ॥

‘ इसलिये पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है और पिता ही सबसे बड़ी तपस्या है । पिताके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हो जाते हैं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 21पृष्ठ 1711

अब उसने माता के विषय में सोचना प्रारम्भ किया— "मेरे लिये जो यह पाञ्चभौतिक मनुष्य शरीर मिला है, उसके उत्पन्न होने में मेरी माता ही मुख्य हेतु है। जैसे अग्निके प्रकट होने का मुख्य आधार अरणी-काष्ठ है, माता मनुष्यों के शरीर रूपी अग्निको प्रकट करने वाली अरणी है। संसार के समस्त आर्त प्राणियों को सुख और सान्त्वना प्रदान करने वाली माता ही है। जब तक माता जीवित रहती है, मनुष्य अपने को सनाथ समझता है और उसके न रहने पर वह अनाथ हो जाता है। जो अपनी माँ को पुकारता हुआ घर में जाता है, वह निर्धन होने पर भी मानो माता अन्नपूर्णा के पास चला जाता है। पुत्र असमर्थ हो या समर्थ, माता उसका पालन करती ही है। जब माता से विछोह हो जाता है, उसी समय मनुष्य अपने को बूढ़ा समझने लगता है और उसके लिये सारा संसार सूना प्रतीत होने लगता है।

माता के समान दूसरी कोई छाया नहीं है, न ही दूसरा कोई सहारा है। वह शिशु की शुश्रूषा करके 'शुश्रू' कहलाती है। माता अपना निकटतम शरीर है। जिसका मस्तिष्क विचार शून्य नहीं हो गया है, ऐसा कोई सचेतन मनुष्य कभी अपनी माता की हत्या नहीं कर सकता। पति और पत्नी मैथुन काल में सुयोग्य पुत्र की अभिलाषा करते हैं, यद्यपि वह पिता और माता दोनों धारण करते हैं, तथापि वास्तव में वह अभिलाभ माता में ही प्रतिष्ठित होती है। पुत्र का गोत्र क्या है? यह माता जानती है। पिता का तो अपनी सन्तान पर प्रभुत्व मात्र है।

दम्पत्योः प्राणसंश्लेषे योऽभिसंधिः कृतः किल ।
तं माता च पिता चेति भूतार्थो मातरि स्थितः ॥

‘ पति और पत्नी मैथुनकालमें सुयोग्य पुत्र होनेके लिये जो अभिलाषा करते हैं, उसे यद्यपि पिता और माता- दोनों धारण करते हैं तथापि वास्तवमें वह अभिलाषा मातामें ही प्रतिष्ठित होती है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 34पृष्ठ 1712

वास्तव में स्त्री का कोई अपराध नहीं होता, पुरुष ही अपराध करता है। व्यभिचार का महान पाप पुरुष ही करता है, इसलिये वही अपराधी है। मेरी माता ने ऐसे पुरुष को आत्मसमर्पण किया है जो वेशभूषा से पिताजी के समान ही था। सभी कार्यों में अबला होने के कारण स्त्रियों को अपराध के लिये विवश कर दिया जाता है, अतः वे अपराधिनी नहीं हैं। स्त्री के द्वारा सङ्केत न करने पर भी उसके काम को उद्दीप्त करने वाले पुरुष को अधर्म की प्राप्ति होती है। मेरी पूजनीया माता का गौरव पिता से भी बढ़कर है क्योंकि मनीषी पुरुष जानते हैं कि पिता देवताओं का समूह है, परन्तु माता के भीतर स्नेहवश समस्त मनुष्यों और देवताओं का समुदाय स्थित रहता है।"

एवं स्त्री नापराध्नोति नर एवापराध्यति ।
व्युच्चरंश्च महादोषं नर एवापराध्यति ॥

' वास्तवमें स्त्रीका कोई अपराध नहीं होता है, पुरुष ही अपराध करता है । व्यभिचारका महान् पाप पुरुष ही करता है, इसलिये वही अपराधी है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 38पृष्ठ 1713

विलम्ब करने का स्वभाव होने के कारण चिरकारी इसी सोच-विचार में लगा रहा। इतने में ही उसके पिता वन से लौट आये। महाज्ञानी तपोनिष्ठ गौतम उस समय पत्नी के वध के अनौचित्य पर विचार करके अधिक सन्तप्त हो गये। वे दुःख से आँसू बहाते हुए और पश्चात्ताप करते हुए मन ही मन कहने लगे— "अहो! त्रिभुवन का स्वामी इन्द्र ब्राह्मण का रूप धारण करके मेरे आश्रम पर आया था। मैंने अतिथि-सत्कार के गृहस्थोचित व्रत का आश्रय लेकर उसे मीठे वचनों द्वारा सान्त्वना दी, उसका स्वागत किया और यथोचित अर्घ्य-पाद्य निवेदन करके स्वयं ही उसकी विधिवत् पूजा की।"

युधिष्ठिर ने जब यह प्रश्न किया कि यदि कोई कार्य धर्मयुक्त परन्तु हिंसापूर्ण हो, तो उस पर विचार कैसे करें, तब सूत जी ने कहा— हे कुरुनन्दन! यह कथा महर्षि गौतम के जीवन की है।

एकान्त वन में उस आश्रम के भीतर रहने वाले महामना गौतम ने अपनी पत्नी तथा एकाग्रचित्त पुत्र चिरकारी को कभी अपने से अलग नहीं किया था। किन्तु एक बार आवश्यक कर्म, जप और ध्यान आदि के लिये महर्षि गौतम को आश्रम से बाहर जाना पड़ा। अपने पिता के जाने के पश्चात, चिरकारी हाथ में हथियार लेकर खड़ा तो था, परन्तु वह माता की रक्षा के लिए विनीत भाव से कुछ सोचता-विचार करता रहा। उसे अपने पिता का वह आदेश प्राप्त हुआ था जिसमें उन्होंने माता का वध करने को कहा था। किन्तु वह बालक धर्म और पितृ-आज्ञा के द्वन्द्व में उलझा हुआ था।

हन्या इति समादेशः शस्त्रपाणौ सुते स्थिते ।
विनीते प्रसवत्यर्थे विवासे चात्मकर्मसु ॥

अपने आवश्यक कर्म जप ध्यान आदिके लिये महर्षि गौतमके बाहर चले जानेपर उनका पुत्र चिरकारी यद्यपि हाथमें हथियार लेकर खड़ा था तथापि माताकी रक्षाके लिये वह विनीतभावसे कुछ सोचता- विचारता रहा । इसीलिये माताको मार डालनेका जो आदेश प्राप्त हुआ था, वह पालित न हो सका ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 63पृष्ठ 1718

महर्षि गौतम जब वापस लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनका पुत्र चिरकारी हाथ में शस्त्र लेकर खड़ा है, परन्तु उसने अभी तक माता को मारने का आदेश पालित नहीं किया है। पिता ने सोचा कि सम्भवतः चिरकारी भय के मारे हथियार उठाने की चपलता को छिपा रहा है। उधर, चिरकारी के मन में यह विचार चल रहा था कि माता ही समस्त प्राणियों की सनाथ है और वह एक सचेतन मनुष्य होने के नाते अपनी माता की हत्या नहीं कर सकता।

बुद्धिश्चासीत् सुतं दृष्ट्वा पितुश्चरणयोर्नतम् ।
शस्त्रग्रहणचापल्यं संवृणोति भयादिति ॥

पुत्रको अपने चरणोंमें नतमस्तक हुआ देख गौतमके मनमें यह विचार हुआ कि सम्भवतः चिरकारी भयके मारे हथियार उठानेकी चपलताको छिपा रहा है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 64पृष्ठ 1718

जैसे ही चिरकारी ने अपने पिता को उपस्थित देखा, वह अत्यन्त दुखी हुआ। उसने हाथ से शस्त्र त्याग दिया और भूमि पर मस्तक टेककर अपने पिता के चरणों में झुक गया। महर्षि गौतम ने जब देखा कि उनका पुत्र पृथ्वी पर माथा टेककर पड़ा है और उनकी पत्नी लज्जा के मारे निश्चेष्ट खड़ी है, तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई।

गौतम ने प्रेम और हर्ष से भरे हुए अपने पुत्र का अभिनन्दन किया। उन्होंने उसे उठाकर अपनी दोनों भुजाओं से खींचकर हृदय से लगा लिया और देर तक उसका मस्तक सूँघा। पिता ने आशीर्वाद देते हुए कहा— "बेटा चिरकारी! तेरा कल्याण हो। तू चिरकाल तक चिरकारी एवं चिरञ्जीवी बना रह। सौम्य! यदि तू चिरकाल तक ऐसे ही अपने स्वभाव का बना रहा, तो मैं दीर्घकाल तक कभी दुखी नहीं होऊँगा।"

चिरकारिक भद्रं ते चिरकारी चिरं भव ।
चिराय यदि ते सौम्य चिरमस्मि न दुःखितः ॥

‘ बेटा चिरकारी! तेरा कल्याण हो । तू चिरकालतक चिरकारी एवं चिरंजीवी बना रह । सौम्य! यदि तू चिरकालतक ऐसे ही स्वभावका बना रहा तो मैं दीर्घकालतक कभी दुखी नहीं होऊँगा '

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 67पृष्ठ 1719

महर्षि गौतम ने अपने पुत्र की प्रशंसा करते हुए कहा— "बेटा! आज विलम्ब करके तू वास्तव में चिरकारी बन गया है। तूने मेरी, अपनी माता की तथा मैंने जो तप का उपार्जन किया है, उसकी रक्षा कर ली है। आज तूने वास्तव में चिरकारिता को सफल कर दिया।"

सहजं चिरकारित्वमतिप्रज्ञतया तव ।
सफलं तत् तथा तेऽस्तु भवाद्य चिरकारिकः ॥

‘ अत्यन्त बुद्धिमान् होनेके कारण तुझमें जो चिरकारिताका सहज गुण है, वह इस समय सफल हो । आज तू वास्तवमें चिरकारी बन ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 56पृष्ठ 1717

तदनन्तर विद्वान् मुनि श्रेष्ठ गौतम ने कुछ गाथाएँ गाईं। उन्होंने बताया कि जो पुरुष राग, दर्प, अभिमान, द्रोह, पापाचरण और किसी का अप्रिय करने में विलम्ब करता है, उसकी प्रशंसा की जाती है। उन्होंने कहा कि बन्धुओं, सुहृदों, सेवकों और स्त्रियों के छिपे हुए अपराधों के विषय में निर्णय करते समय जो जल्दबाजी नहीं करता, वही श्रेष्ठ है।

बन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च ।
अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते ॥

‘ बन्धुओं, सुहृदों, सेवकों और स्त्रियोंके छिपे हुए अपराधोंके विषयमें कुछ निर्णय करनेमें भी जो जल्दबाजी न करके दीर्घकालतक सोच - विचार करता है, उसीकी प्रशंसा की जाती है '

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 71पृष्ठ 1719

गौतम ने समझाया— "हे वत्स! जो पुरुष सभी कार्यों में दीर्घकाल तक सोच-विचार करके निश्चय पर पहुँचता है, वह पश्चात्ताप से मुक्त रहता है। जो रोष को अपने भीतर दबाकर रखता है और क्रोधपूर्ण कर्म करने में विलम्ब करता है, उसके द्वारा ऐसा कोई कर्म नहीं होता जो पश्चात्ताप कराने वाला हो। जो दीर्घकाल तक बड़ों की सेवा करे, धर्म का अनुसन्धान करे और अपने मन को वश में रखे, वह सम्मान का भागी होता है।"

चिरं धारयते रोषं चिरं कर्म नियच्छति ।
पश्चात्तापकरं कर्म न किंचिदुपपद्यते ॥

जो चिरकालतक रोषको अपने भीतर ही दबाये रखता है और रोषपूर्वक किये जानेवाले कर्मको देरतक रोके रहता है, उसके द्वारा कोई कर्म ऐसा नहीं बनता, जो पश्चात्ताप करानेवाला हो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 266 · श्लोक 74पृष्ठ 1720

इस प्रकार, महर्षि गौतम अपने पुत्र के विलम्बपूर्वक कार्य करने के गुण से अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे उस आश्रम में बहुत वर्षों तक रहे और अन्त में अपने पुत्र चिरकारी के साथ ही स्वर्गलोक को सिधारे।

In English

The Story of Chirakari and Rishi Gautama

Yudhisthira asks Bhishma how to handle a difficult command from a teacher that involves violence. Bhishma tells the story of Chirakari, whose father, Rishi Gautama, ordered him to kill his mother. Chirakari delays the act to reflect on his duty to both parents, ultimately choosing not to kill her.

This page answers

  • How did chirakari decide whether to obey his father?
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Also written: Chirakarikopakhyana, Chirakarika, Bhishma, Chirakari, चिरकारिकोपाख्यान