श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1711–1720
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1711–1720
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पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः ।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः ॥ २१ ॥
‘ इसलिये पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है और पिता ही सबसे बड़ी तपस्या है । पिताके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हो जाते हैं ॥ २१ ॥
आशिषस्ता भजन्त्येनं परुषं प्राह यत् पिता ।
निष्कृतिः सर्वपापानां पिता यच्चाभिनन्दति ॥ २२ ॥
' पिता पुत्रसे यदि कुछ कठोर बातें कह देता है तो वे आशीर्वाद बनकर उसे अपना लेती हैं और पिता यदि पुत्रका अभिनन्दन करता है - मीठे वचन बोलकर उसके प्रति प्यार और आदर दिखाता है तो इससे पुत्रके सम्पूर्ण पापोंका प्रायश्चित्त हो जाता है ॥ २२ ॥
मुच्यते बन्धनात् पुष्पं फलं वृक्षात् प्रमुच्यते ।
क्लिश्यन्नपि सुतं स्नेहैः पिता पुत्रं न मुञ्चति ॥ २३ ॥
‘ फूल डंठलसे अलग हो जाता है, फल वृक्षसे अलग हो जाता है; परंतु पिता कितने ही कष्टमें क्यों न हो, लाड़- प्यारसे पाले हुए अपने पुत्रको कभी नहीं छोड़ता है अर्थात् पुत्र कभी पितासे अलग नहीं हो सकता ॥ २३ ॥
एतद् विचिन्तितं तावत् पुत्रस्य पितृगौरवम् ।
पिता नाल्पतरं स्थानं चिन्तयिष्यामि मातरम् ॥ २४ ॥
' पुत्रके निकट पिताका कितना गौरव होना चाहिये, इस बातपर पहले विचार किया है । विचार करनेसे यह बात स्पष्ट हो गयी कि पिता पुत्रके लिये कोई छोटा - मोटा आश्रय नहीं है । अब मैं माताके विषयमें सोचता हूँ ॥ २४ ॥
यो ह्ययं मयि संघातो मर्त्यत्वे पाञ्चभौतिकः ।
अस्य मे जननी हेतुः पावकस्य यथारणिः ॥ २५ ॥
‘ मेरे लिये जो यह पाञ्चभौतिक मनुष्यशरीर मिला है, इसके उत्पन्न होनेमें मेरी माता ही मुख्य हेतु है । जैसे अग्निके प्रकट होनेका मुख्य आधार अरणी- काष्ठ है ॥ २५ ॥
माता देहारणिः पुंसां सर्वस्यार्तस्य निर्वृतिः ।
मातृलाभे सनाथत्वमनाथत्वं विपर्यये ॥ २६ ॥
' माता मनुष्योंके शरीररूपी अग्निको प्रकट करनेवाली अरणी है । संसारके समस्त आर्त प्राणियोंको सुख और सान्त्वना प्रदान करनेवाली माता ही है । जबतक माता जीवित रहती है, मनुष्य अपनेको सनाथ समझता है और उसके न रहनेपर वह अनाथ हो जाता है ॥ २६ ॥
न च शोचति नाप्येनं स्थाविर्यमपकर्षति ।
श्रिया हीनोऽपि यो गेहमम्बेति प्रतिपद्यते ॥ २७ ॥
‘ माताके रहते मनुष्यको कभी चिन्ता नहीं होती है, बुढ़ापा उसे अपनी ओर नहीं खींचता है । जो अपनी माँको पुकारता हुआ घरमें जाता है, वह निर्धन होनेपर भी मानो
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माता अन्नपूर्णाके पास चला जाता है ॥ २७ ॥
पुत्रपौत्रोपपन्नोऽपि जननीं यः समाश्रितः ।
अपि वर्षशतस्यान्ते स द्विहायनवच्चरेत् ॥ २८ ॥
' पुत्र और पौत्रोंसे सम्पन्न होनेपर भी जो अपनी माताके आश्रयमें रहता है, वह सौ वर्षकी अवस्थाके बाद भी उसके पास दो वर्षके बच्चेके समान आचरण करता है ॥ २८ ॥
समर्थं वासमर्थं वा कृशं वाप्यकृशं तथा ।
रक्षत्येव सुतं माता नान्यः पोष्टा विधानतः ॥ २ ९ ॥
‘ पुत्र असमर्थ हो या समर्थ, दुर्बल हो या हृष्ट- पुष्ट, माता उसका पालन करती ही है । माताके सिवा दूसरा कोई विधिपूर्वक पुत्रका पालन-न- पोषण नहीं कर सकता ॥ २ ९ ॥
तदा स वृद्धो भवति तदा भवति दुःखितः ।
तदा शून्यं जगत् तस्य यदा मात्रा वियुज्यते ॥ ३० ॥
‘ जब मातासे विछोह हो जाता है, उसी समय मनुष्य अपनेको बूढ़ा समझने लगता है, दुखी हो जाता है और उसके लिये सारा संसार सूना प्रतीत होने लगता है ॥
नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः ।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रिया ॥ ३१ ॥
‘ माताके समान दूसरी कोई छाया नहीं है अर्थात् माताकी छत्रछायामें जो सुख है, वह कहीं नहीं है । माताके तुल्य दूसरा सहारा नहीं है, माताके सदृश अन्य कोई रक्षक नहीं है तथा बच्चेके लिये माँके समान दूसरी कोई प्रिय वस्तु नहीं है ॥ ३१ ॥
कुक्षिसंधारणाद् धात्री जननाज्जननी स्मृता ।
अङ्गानां वर्धनादम्बा वीरसूत्वेन वीरसूः ॥ ३२ ॥
' वह गर्भाशयमें धारण करनेके कारण धात्री, जन्म देनेके कारण जननी, शिशुका अङ्गवर्धन ( पालन - पोषण ) करनेसे अम्बा तथा वीर- संतानका प्रसव करनेके कारण वीरसू कही गयी है ॥ ३२ ॥
शिशोः शुश्रूषणाच्छुश्रूर्माता देहमनन्तरम् ।
चेतनावान् नरो हन्याद् यस्य नासुषिरं शिरः ॥ ३३ ॥
'वह शिशुकी शुश्रूषा करके शुश्रू नाम धारण करती है । माता अपना निकटतम शरीर है । जिसका मस्तिष्क विचार शून्य नहीं हो गया है, ऐसा कोई सचेतन मनुष्य कभी अपनी माताकी हत्या नहीं कर सकता ॥ ३३ ॥
दम्पत्योः प्राणसंश्लेषे योऽभिसंधिः कृतः किल ।
तं माता च पिता चेति भूतार्थो मातरि स्थितः ॥ ३४ ॥
‘ पति और पत्नी मैथुनकालमें सुयोग्य पुत्र होनेके लिये जो अभिलाषा करते हैं, उसे यद्यपि पिता और माता- दोनों धारण करते हैं तथापि वास्तवमें वह अभिलाषा मातामें ही प्रतिष्ठित होती है ॥ ३४ ॥
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माता जानाति यद्गोत्रं माता जानाति यस्य सः ।
मातुर्भरणमात्रेण प्रीतिः स्नेहः पितुः प्रजाः ॥ ३५ ॥
' पुत्रका गोत्र क्या है? यह माता जानती है । वह किस पिताका पुत्र है? यह भी माता ही जानती है । माता बालकको अपने गर्भमें धारण करती है, इसलिये उसीका उसपर अधिक
स्नेह और प्रेम होता है । पिताका तो अपनी संतानपर प्रभुत्वमात्र है ॥ ३५ ॥
पाणिबन्धं स्वयं कृत्वा सह धर्ममुपेत्य च ।
यदा यास्यन्ति पुरुषाः स्त्रियो नार्हन्ति वाच्यताम् ॥ ३६ ॥
‘ जब स्वयं ही पत्नीका पाणिग्रहण करके साथ - साथ धर्माचरण करनेकी प्रतिज्ञा लेकर भी पुरुष परायी स्त्रियोंके पास जायँगे ( और उनपर बलात्कार करेंगे ), तब इसके लिये स्त्रियोंको दोषी नहीं ठहराया जा सकता ॥ ३६ ॥
भरणाद्धि स्त्रियो भर्ता पालनाद्धि पतिस्तथा ।
गुणस्यास्य निवृत्तौ तु न भर्ता न पुनः पतिः ॥ ३७ ॥
' पुरुष अपनी स्त्रीका भरण - पोषण करनेसे भर्ता और पालन करनेके कारण पति कहलाता है । इन गुणोंके न रहनेपर वह न तो भर्ता है और न पति ही कहलाने योग्य है ॥ ३७ ॥
एवं स्त्री नापराध्नोति नर एवापराध्यति ।
व्युच्चरंश्च महादोषं नर एवापराध्यति ॥ ३८ ॥
' वास्तवमें स्त्रीका कोई अपराध नहीं होता है, पुरुष ही अपराध करता है । व्यभिचारका महान् पाप पुरुष ही करता है, इसलिये वही अपराधी है ॥ ३८ ॥
स्त्रिया हि परमो भर्ता दैवतं परमं स्मृतम् ।
तस्यात्मना तु सदृशमात्मानं परमं ददौ ॥ ३ ९ ॥
' स्त्रीके लिये पति ही परम आदरणीय है, वही उसका सबसे बड़ा देवता माना गया है । मेरी माताने ऐसे पुरुषको आत्मसमर्पण किया है, जो शरीरसे, वेशभूषासे पिताजीके समान ही था ॥ ३ ९ ॥
नापराधोऽस्ति नारीणां नर एवापराध्यति ।
सर्वकार्यापराध्यत्वान्नापराध्यन्ति चाङ्गनाः ॥ ४० ॥
' ऐसे अवसरोंपर स्त्रियोंका अपराध नहीं होता, पुरुष ही अपराधी होता है । सभी कार्योंमें अबला होनेके कारण स्त्रियोंको अपराधके लिये विवश कर दिया जाता है, अतः पराधीन होनेके कारण वे अपराधिनी नहीं हैं ॥ ४० ॥
यश्च नोक्तोऽथ निर्देशः स्त्रिया मैथुनतृप्तये ।
तस्य स्मारयतो व्यक्तमधर्मो नास्ति संशयः ॥ ४१ ॥
'स्त्रीके द्वारा मैथुनजनित सुखसे तृप्त होनेके लिये कोई संकेत न करनेपर भी उसके कामको उद्दीप्त करनेवाले पुरुषको स्पष्ट ही अधर्मकी प्राप्ति होती है । इसमें संशय नहीं
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है ॥ ४१ ॥
एवं नारीं मातरं च गौरवे चाधिके स्थिताम् ।
अवध्यां तु विजानीयुः पशवोऽप्यविचक्षणाः ॥ ४२ ॥
' इस प्रकार विचार करनेसे एक तो वह नारी होनेके कारण ही अवध्य है, दूसरे मेरी पूजनीया माता है । माताका गौरव पितासे भी बढ़कर है, जिसमें मेरी माँ प्रतिष्ठित है । नासमझ पशु भी स्त्री और माताको अवध्य मानते हैं (फिर मैं समझदार मनुष्य होकर भी उसका वध कैसे करूँ? ) ॥
देवतानां समावायमेकस्थं पितरं विदुः ।
मर्त्यानां देवतानां च स्नेहादभ्येति मातरम् ॥ ४३ ॥
' मनीषी पुरुष यह जानते हैं कि पिता एक स्थानपर स्थित सम्पूर्ण देवताओंका समूह है; परंतु माताके भीतर उसके स्नेहवश समस्त मनुष्यों और देवताओंका समुदाय स्थित रहता है ( अतः माताका गौरव पितासे भी अधिक है ) ॥ ४३ ॥
एवं विमृशतस्तस्य चिरकारितया बहु ।1
दीर्घःकालो व्यतिक्रान्तस्ततोऽस्याभ्यागमत् पिता ॥ ४४ ॥
विलम्ब करनेका स्वभाव होनेके कारण चिरकारी इस प्रकार सोचता - विचारता रहा । इसी सोच - विचारमें बहुत अधिक समय व्यतीत हो गया । इतनेमें ही उसके पिता वनसे लौट आये ॥ ४४ ॥
मेधातिथिर्महाप्राज्ञो गौतमस्तपसि स्थितः ।
विमृश्य तेन कालेन पत्न्याः संस्थाव्यतिक्रमम् ॥ ४५ ॥
सोऽब्रवीद्भृशसंतप्तो दुःखेनाश्रूणि वर्तयन् ।
श्रुतधैर्यप्रसादेन पश्चात्तापमुपागतः ॥ ४६ ॥
महाज्ञानी तपोनिष्ठ मेधातिथि गौतम उस समय पत्नीके वधके अनौचित्यपर विचार करके अधिक संतप्त हो गये । वे दुःखसे आँसू बहाते हुए वेदाध्ययन और धैर्यके प्रभावसे किसी तरह अपनेको सँभाले रहे और पश्चात्ताप करते हुए मन- ही - मन इस प्रकार कहने लगे ॥ ४५-४६ ॥
आश्रमं मम सम्प्राप्तस्त्रिलोकेशः पुरंदरः ।
अतिथिव्रतमास्थाय ब्राह्मणं रूपमास्थितः ॥ ४७ ॥
स मया सान्त्वितो वाग्भिः स्वागतेनाभिपूजितः ।
अर्घ्यं पाद्यं यथान्यायं मया च प्रतिपादितः ॥ ४८ ॥
‘ अहो! त्रिभुवनका स्वामी इन्द्र ब्राह्मणका रूप धारण करके मेरे आश्रमपर आया था । मैंने अतिथि- सत्कारके गृहस्थोचित व्रतका आश्रय लेकर उसे मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना दी, उसका स्वागत - सत्कार किया और यथोचित रूपसे अर्घ्य पाद्य आदि निवेदन करके मैंने स्वयं ही उसकी विधिवत् पूजा की ॥ ४७-४८ ॥
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परवानस्मि चेत्युक्तः प्रणयिष्यति तेन च ।
अत्र चाकुशले जाते स्त्रिया नास्ति व्यतिक्रमः ॥ ४ ९ ॥
‘ मैंने विनयपूर्वक कहा— ' भगवन्! मैं आपके अधीन हूँ । आपके पदार्पणसे मैं सनाथ हो गया । ' मुझे आशा थी कि मेरे इस सद्व्यवहारसे संतुष्ट होकर अतिथिदेवता मुझसे प्रेम करेंगे; परंतु यहाँ इन्द्रकी विषयलोलुपताके कारण दुःखद घटना घटित हो गयी । इसमें मेरी स्त्रीका कोई अपराध नहीं ॥ ४ ९ ॥
एवं न स्त्री न चैवाहं नाध्वगस्त्रिदशेश्वरः ।
अपराध्यति धर्मस्य प्रमादस्त्वपराध्यति ॥ ५० ॥
'इस प्रकार न तो स्त्री अपराधिनी है, न मैं अपराधी हूँ और न एक पथिक ब्राह्मणके वेशमें आया हुआ देवताओंका राजा इन्द्र ही अपराधी है । मेरे द्वारा धर्मके विषयमें जो स्त्रीवधरूप प्रमाद हुआ है, वही इस अपराधकी जड़ है ॥ ५० ॥
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जग चिरकारी शस्त्र त्यागकर अपने पिताको प्रणाम कर रहे हैं
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ईर्ष्याजं व्यसनं प्राहुस्तेन चैवोर्ध्वरेतसः ।
ईर्ष्यया त्वहमाक्षिप्तो मग्नो दुष्कृतसागरे ॥ ५१ ॥
' ऊर्ध्वरता मुनि उस प्रमादके ही कारण ईर्ष्याजनित संकटकी प्राप्ति बताते हैं; ईर्ष्याने मुझे पापके समुद्रमें ढकेल दिया है और मैं उसमें डूब गया हूँ ॥ ५१ ॥
हत्वा साध्वीं च नारीं च व्यसनित्वाच्च वासिताम् ।
भर्तव्यत्वेन भार्यां च को नु मां तारयिष्यति ॥ ५२ ॥
‘जिसे मैंने पत्नीके रूपमें अपने घरमें आश्रय दिया था । जो एक सती - साध्वी नारी थी और भार्या होनेके कारण मुझसे भरण- पोषण पानेकी अधिकारिणी थी, उसीका मैंने प्रमादरूपी व्यसनके वशीभूत होनेके कारण वध करा डाला । अब इस पापसे मेरा कौन उद्धार करेगा? ॥
अन्तरेण मयाऽऽज्ञप्तश्चिरकारीत्युदारधीः ।
यद्यद्य चिरकारी स्यात् स मां त्रायेत पातकात् ॥ ५३ ॥
‘ परंतु मैंने उदारबुद्धि चिरकारीको उसकी माताके वधके लिये आज्ञा दी थी । यदि उसने इस कार्यमें विलम्ब करके अपने नामको सार्थक किया हो तो वही मुझे स्त्रीहत्याके पापसे बचा सकता है ॥ ५३ ॥
चिरकारिक भद्रं ते भद्रं ते चिरकारिक ।
यद्यद्य चिरकारी त्वं ततोऽसि चिरकारिकः ॥ ५४ ॥
‘ बेटा चिरकारी! तेरा कल्याण हो । चिरकारी! तेरा मंगल हो । यदि आज भी तूने विलम्बसे कार्य करनेके अपने स्वभावका अनुसरण किया हो तभी तेरा चिरकारी नाम सफल हो सकता है ॥ ५४ ॥
त्राहि मां मातरं चैव तपो यच्चार्जितं मया ।
आत्मानं पातकेभ्यश्च भवाद्य चिरकारिकः ॥ ५५ ॥
' बेटा! आज विलम्ब करके तू वास्तवमें चिरकारी बन और मेरी, अपनी माताकी तथा मैंने जो तपका उपार्जन किया है, उसकी भी रक्षा कर । साथ ही अपने -आपको भी पातकोंसे बचा ले ॥ ५५ ॥
सहजं चिरकारित्वमतिप्रज्ञतया तव ।
सफलं तत् तथा तेऽस्तु भवाद्य चिरकारिकः ॥ ५६ ॥
‘ अत्यन्त बुद्धिमान् होनेके कारण तुझमें जो चिरकारिताका सहज गुण है, वह इस समय सफल हो । आज तू वास्तवमें चिरकारी बन ॥ ५६ ॥
चिरमाशंसितो मात्रा चिरं गर्भेण धारितः ।
सफलं चिरकारित्वं कुरु त्वं चिरकारिक ॥ ५७ ॥
‘ तेरी माता चिरकालसे तेरे जन्मकी आशा लगाये बैठी थी । उसने चिरकालतक तुझे गर्भमें धारण किया है, अतः बेटा चिरकारी! आज तू अपनी माताकी रक्षा करके
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चिरकारिताको सफल कर ले ॥ ५७ ॥
चिरायते च संतापाच्चिरं स्वपिति वारितः ।
आवयोश्चिरसंतापादवेक्ष्य चिरकारिकः ॥ ५८ ॥
' मेरा बेटा चिरकारी कोई दुःख या संताप प्राप्त होनेपर भी कार्य करनेमें विलम्ब करनेका स्वभाव नहीं छोड़ता है । मना करनेपर भी चिरकालतक सोता रहता है । आज हम दोनों माता-- पिताका चिरसंताप देखकर वह अवश्य चिरकारी बने ' ॥ ५८ ॥
एवं स दुःखितों राजन् महर्षिर्गोतमस्तदा ।
चिरकारिं ददर्शाथ पुत्रं स्थितमथान्तिके ॥ ५९ ॥
राजन्! इस प्रकार दुखी हुए महर्षि गौतमने घर आनेपर अपने पुत्र चिरकारीको पास ही खड़ा देखा ॥
चिरकारी तु पितरं दृष्ट्वा परमदुःखितः ।
शस्त्रं त्यक्त्वा ततो मूर्ध्ना प्रसादायोपचक्रमे ॥ ६० ॥
पिताको उपस्थित देख चिरकारी बहुत दुखी हुआ । वह हथियार फेंककर उनके चरणोंमें मस्तक झुका उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगा ॥ ६० ॥
गौतमस्तं ततो दृष्ट्वा शिरसा पतितं भुवि ।
पत्नीं चैव निराकारां परामभ्यागमन्मुदम् ॥ ६१ ॥
गौतमने देखा, चिरकारी पृथ्वीपर माथा टेककर पड़ा है और पत्नी लज्जाके मारे निश्चेष्ट खड़ी है । यह देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ६१ ॥
न हि सा तेन सम्भेदं पत्नी नीता महात्मना ।
विजने चाश्रमस्थेन पुत्रश्चापि समाहितः ॥ ६२ ॥
एकान्त वनमें उस आश्रमके भीतर रहनेवाले महामना गौतमने अपनी पत्नी तथा एकाग्रचित्त पुत्र चिरकारीको कभी अपनेसे अलग नहीं किया ॥ ६२ ॥
हन्या इति समादेशः शस्त्रपाणौ सुते स्थिते ।
विनीते प्रसवत्यर्थे विवासे चात्मकर्मसु ॥ ६३ ॥
अपने आवश्यक कर्म जप ध्यान आदिके लिये महर्षि गौतमके बाहर चले जानेपर उनका पुत्र चिरकारी यद्यपि हाथमें हथियार लेकर खड़ा था तथापि माताकी रक्षाके लिये वह विनीतभावसे कुछ सोचता- विचारता रहा । इसीलिये माताको मार डालनेका जो आदेश प्राप्त हुआ था, वह पालित न हो सका ॥ ६३ ॥
बुद्धिश्चासीत् सुतं दृष्ट्वा पितुश्चरणयोर्नतम् ।
शस्त्रग्रहणचापल्यं संवृणोति भयादिति ॥ ६४ ॥
पुत्रको अपने चरणोंमें नतमस्तक हुआ देख गौतमके मनमें यह विचार हुआ कि सम्भवतः चिरकारी भयके मारे हथियार उठानेकी चपलताको छिपा रहा है ॥ ६४ ॥
ततः पित्रा चिरं स्तुत्वा चिरं चाघ्राय मूर्धनि ।
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चिरं दोर्भ्यां परिष्वज्य चिरं जीवेत्युदाहृतः ॥ ६५ ॥
तब पिताने चिरकालतक उसकी प्रशंसा करके देरतक उसका मस्तक सूँघा और चिरकालतक दोनों भुजाओंसे खींचकर उसे हृदयसे लगाये रखा और आशीर्वाद देते हुए कहा — ' बेटा! चिरंजीवी हो ' ॥ ६५ ॥
एवं स गौतमः पुत्रं प्रीतिहर्षगुणैर्युतः ।
अभिनन्द्य महाप्राज्ञ इदं वचनमब्रवीत् ॥ ६६ ॥
महामते! इस प्रकार प्रेम और हर्षसे भरे हुए गौतमने पुत्रका अभिनन्दन करके यह बात कही— ॥६६ ॥
चिरकारिक भद्रं ते चिरकारी चिरं भव ।
चिराय यदि ते सौम्य चिरमस्मि न दुःखितः ॥ ६७ ॥
‘ बेटा चिरकारी! तेरा कल्याण हो । तू चिरकालतक चिरकारी एवं चिरंजीवी बना रह । सौम्य! यदि तू चिरकालतक ऐसे ही स्वभावका बना रहा तो मैं दीर्घकालतक कभी दुखी नहीं होऊँगा ' ॥ ६७ ॥
गाथाश्चाप्यब्रवीद् विद्वान् गौतमो मुनिसत्तमः ।
चिरकारिषु धीरेषु गुणोद्देशसमाश्रयाः ॥ ६८ ॥
तदनन्तर विद्वान् मुनिश्रेष्ठ गौतमने कुछ गाथाएँ गायीं । चिरकालतक सोच - विचारकर काम करनेवाले धीर पुरुषोंमें जो गुण होते हैं, उनसे सम्बन्ध रखनेवाली वे गाथाएँ इस प्रकार हैं— ॥ ६८ ॥
चिरेण मित्रं बध्नीयाच्चिरेण च कृतं त्यजेत् ।
चिरेण हि कृतं मित्रं चिरं धारणमर्हति ॥ ६ ९ ॥
चिरकालतक सोच - विचार करके किसीके साथ मित्रता जोड़नी चाहिये और जिसे मित्र बना लिया, उसे सहसा नहीं छोड़ना चाहिये । यदि छोड़नेकी आवश्यकता पड़ ही जाय तो उसके परिणामपर चिरकालतक विचार कर लेना चाहिये । दीर्घकालतक सोच - विचार करके बनाया हुआ जो मित्र है, उसीकी मैत्री चिरकालतक टिक पाती है ॥
रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि ।
अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते ॥ ७० ॥
' राग, दर्द, अभिमान, द्रोह, पापाचरण और किसीका अप्रिय करनेमें जो विलम्ब करता है, उसकी प्रशंसा की जाती है ॥ ७० ॥
बन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च ।
अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते ॥ ७१ ॥
‘ बन्धुओं, सुहृदों, सेवकों और स्त्रियोंके छिपे हुए अपराधोंके विषयमें कुछ निर्णय करनेमें भी जो जल्दबाजी न करके दीर्घकालतक सोच - विचार करता है, उसीकी प्रशंसा की जाती है ' ॥ ७१ ॥
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एवं स गौतमस्तत्र प्रीतः पुत्रस्य भारत ।
कर्मणा तेन कौरव्य चिरकारितया तथा ॥ ७२ ॥
भारत! कुरुनन्दन! इस प्रकार गौतम वहाँ अपने पुत्रके विलम्बपूर्वक कार्य करनेके कारण बहुत प्रसन्न हुए थे
एवं सर्वेषु कार्येषु विमृश्य पुरुषस्ततः ।
चिरेण निश्चयं कृत्वा चिरं न परितप्यते ॥ ७३ ॥
इस प्रकार सभी कार्योंमें विचार करके चिर- कालके पश्चात् किसी निश्चयपर पहुँचनेवाले पुरुषको दीर्घकालतक पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता ॥ ७३ ॥
चिरं धारयते रोषं चिरं कर्म नियच्छति ।
पश्चात्तापकरं कर्म न किंचिदुपपद्यते ॥ ७४ ॥
जो चिरकालतक रोषको अपने भीतर ही दबाये रखता है और रोषपूर्वक किये जानेवाले कर्मको देरतक रोके रहता है, उसके द्वारा कोई कर्म ऐसा नहीं बनता, जो पश्चात्ताप करानेवाला हो ॥ ७४ ॥
चिरं वृद्धानुपासीत चिरमन्वास्य पूजयेत् ।
चिरं धर्मं निषेवेत कुर्याच्चान्वेषणं चिरम् ॥ ७५ ॥
दीर्घकालतक बड़े - बूढ़ोंकी सेवा करे। दीर्घकालतक उनका संग करके उनकी पूजा ( आदर- सत्कार) करे । चिरकालतक धर्मका सेवन और दीर्घकालतक उसका अनुसंधान करे ॥ ७५ ॥
चिरमन्वास्य विदुषश्चिरं शिष्टान् निषेव्य च ।
चिरं विनीय चात्मानं चिरं यात्यनवज्ञताम् ॥ ७६ ॥
अधिक समयतक विद्वानोंका संग करके चिरकालतक शिष्ट पुरुषोंकी सेवामें रहे तथा चिरकालतक अपने मनको वशमें रखे । इससे मनुष्य चिरकालतक अवज्ञाका नहीं किंतु सम्मानका भागी होता है ॥ ७६ ॥
ब्रुवतश्च परस्यापि वाक्यं धर्मोपसंहितम् ।
चिरं पृष्टोऽपि च ब्रूयाच्चिरं न परितप्यते ॥ ७७ ॥
धर्मोपदेश करनेवाले पुरुषसे यदि कोई प्रश्न करे तो उसे देरतक सोच - विचार कर ही उत्तर देना चाहिये । ऐसा करनेसे उसको देरतक पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता है ॥
उपास्य बहुलास्तस्मिन्नाश्रमे सुमहातपाः ।
समाः स्वर्गं गतो विप्रः पुत्रेण सहितस्तदा ॥ ७८ ॥
वे महातपस्वी ब्रह्मर्षि गौतम उस आश्रममें बहुत वर्षोंतक रहकर अन्तमें पुत्र चिरकारीके साथ ही स्वर्गलोकको सिधारे ॥ ७८ ॥