श्रीगणेशाय नमः।

ऋषभगीता : आशा का भञ्जन मनुष्य को किस प्रकार दुर्बल करता है?

आशा और दुर्बलता का सम्बन्ध

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 125–128 · पृष्ठ 827–843

1,736 शब्द · 9 मिनटका पाठ · 15 श्लोक

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा

दुर्योधन द्वारा आशा भङ्ग किए जाने पर युधिष्ठिर के संशय निवारण हेतु

युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह की ओर दृष्टिपात करते हुए पूछा— "पितामह! आपने पुरुष में शील को ही प्रधान बताया है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आशा की उत्पत्ति कैसे हुई? आशा क्या है? यह भी मुझे बताइये। शत्रु-नगरी पर विजय पाने वाले पितामह! मेरे मन में यह महान संशय उत्पन्न हुआ है। इसका निवारण करने वाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। पितामह! दुर्योधन पर मेरी बड़ी भारी आशा थी कि युद्ध का अवसर उपस्थित होने पर वह उचित कार्य करेगा। प्रभो! मैं समझता था कि वह युद्ध किए बिना ही मुझे आधा राज्य लौटा देगा। प्रायः सभी मनुष्यों के हृदय में कोई न कोई बड़ी आशा पैदा होती ही है। उसके भङ्ग होने पर महान दुःख होता है। किसी-किसी की मृत्यु तक हो जाती है, इसमें संशय नहीं है। राजेन्द्र! उस दुरात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र ने मुझ दुर्बुद्धि को हताश कर दिया है। देखिये, मैं कैसा मन्दभाग्य हूँ।"

युधिष्ठिर उवाच

सोऽहं हताशो दुर्बुद्धिः कृतस्तेन दुरात्मना ।
धार्तराष्ट्रेण राजेन्द्र पश्य मन्दात्मतां मम ॥

राजेन्द्र! उस दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रने मुझ दुर्बुद्धिको हताश कर दिया । देखिये, मैं कैसा मन्दभाग्य हूँ ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 125 · श्लोक 5पृष्ठ 829

युधिष्ठिर भावुक होकर आगे बोले— "राजन्! मैं आशा को वृक्ष सहित पर्वत से भी बहुत बड़ी मानता हूँ अथवा वह आकाश से भी बढ़कर अप्रमेय है। वह अचिन्त्य और परम दुर्लभ है— उसे जीतना कठिन है। उसके दुर्लभ या दुर्जय होने के कारण ही मैं उसे इतनी बड़ी देखता और समझता हूँ। भला, आशा से बढ़कर दुर्लभ और क्या है?"

भीष्म ने युधिष्ठिर को शान्त करते हुए कहा— "युधिष्ठिर! इस विषय में मैं राजा सुमित्र तथा ऋषभ मुनि का पूर्व-घटित इतिहास तुम्हें बताऊँगा। उसे ध्यान देकर सुनो।"

युधिष्ठिर उवाच

शीलं प्रधानं पुरुषे कथितं ते पितामह ।
कथं त्वाशा समुत्पन्ना या चाशा तद् वदस्व मे ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! आपने पुरुषमें शीलको ही प्रधान बताया है । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आशाकी उत्पत्ति कैसे हुई? आशा क्या है? यह भी मुझे बताइये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 125 · श्लोक 1पृष्ठ 829

राजर्षि सुमित्र हयवंशी राजा थे। एक दिन वे शिकार खेलने के लिए वन में गए। वहाँ उन्होंने झुकी हुई गाँठ वाले बाण से एक मृग को घायल किया और उसका पीछा करना आरम्भ किया। वह मृग बहुत तेज दौड़ने वाला था; राजा का बाण लिए ही वह भाग निकला। राजा ने भी बलपूर्वक उस मृग के यूथपতির तुरन्त पीछा किया। वह वेगशाली मृग नीची भूमि की ओर दौड़ा और देखते ही देखते समतल मार्ग पर भागने लगा। राजा नौजवान थे और हार्दिक बल से सम्पन्न थे। उन्होंने कवच बाँध रखा था और वे धनुष-बाण तथा तलवार लिए उस मृग के पीछे दौड़ पड़े।

भीष्म उवाच

ततः स राजा तारुण्यादौरसेन बलेन च ।
ससार बाणासनभृत् सखड्गोऽसौ तनुत्रवान् ॥

राजा भी नौजवान और हार्दिक बलसे सम्पन्न थे, उन्होंने कवच बाँध रखा था । वे धनुष -बाण और तलवार लिये उसका पीछा करने लगे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 125 · श्लोक 12पृष्ठ 830

उधर वह वन में विचरने वाला मृग अकेला ही अनेकों नदों, नदियों, गड्ढों और जङ्गलों को लाँघता हुआ आगे भागता जा रहा था। वह मृग अपने शरीर में राजा के बहुत से बाण लगने के बाद भी, खेल करता हुआ बार-बार बड़े वेग से राजा के निकट आकर पुनः दूर तक की भूमि लाँघकर आगे निकल जाता था। तब राजा सुमित्र ने एक बड़ा भयङ्कर तीखा बाण हाथ में लिया, जो मर्मस्थलों को विदीर्ण कर देने वाला था। उन्होंने उस श्रेष्ठ बाण को धनुष पर रखा। यह देख मृग का वह यूथपति राजा के बाण का मार्ग छोड़कर दो कोस दूर जा पहुँचा और हँसता हुआ सा खड़ा हो गया। जब राजा का वह तेजस्वी बाण पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब मृग एक महान वन में घुस गया। राजा ने उस समय भी उसका पीछा नहीं छोड़ा।

तस्मिन् निपतिते बाणे भूमौ ज्वलिततेजसि ।
प्रविवेश महारण्यं मृगो राजाप्यथाद्रवत् ॥

जब राजाका वह तेजस्वी बाण पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब मृग एक महान् वनमें घुस गया, राजाने उस समय भी उसका पीछा नहीं छोड़ा ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 125 · श्लोक 19पृष्ठ 831

राजा सुमित्र उस महान वन में प्रवेश कर तपस्वियों के आश्रम पर जा पहुँचे और वहाँ थककर बैठ गए। वे परिश्रम से पीड़ित और भूख से व्याकुल हो रहे थे। उस अवस्था में धनुष धारण किए राजा को देखकर बहुत-से ऋषि उनके पास आए और सबने मिलकर उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया। ऋषियों द्वारा किए गए उस सत्कार को ग्रहण करके राजा ने उन तपस्वियों से उनकी तपस्या की वृद्धि के विषय में पूछा।

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि युधिष्ठिर निबोध तत् ।
इतिहासं सुमित्रस्य निर्वृत्तमृषभस्य च ॥

भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषयमें मैं राजा सुमित्र तथा ऋषभ मुनिका पूर्वघटित इतिहास तुम्हें बताऊँगा । उसे ध्यान देकर सुनो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 125 · श्लोक 8पृष्ठ 830

उन तपस्या के धनी महर्षियों ने राजा के वचनों को सुनकर उनका आगमन का प्रयोजन पूछा— "कल्याणस्वरूप नरेश्वर! किस सुख के लिए आप इस तपोवन में तलवार बाँधे, धनुष और बाण लिये पैदल ही चले आए हैं? मानद! हम यह सब सुनना चाहते हैं। आप कहाँ से पधारे हैं? किस कुल में आपका जन्म हुआ है? तथा आपका नाम क्या है? ये सारी बातें हमें बताइये।"

भीष्म उवाच

ते तस्य राज्ञो वचनं सम्प्रगृह्य तपोधनाः ।
ऋषयो राजशार्दूलं तमपृच्छन् प्रयोजनम् ॥

उन तपस्याके धनी महर्षियोंने राजाके वचनोंको सादर ग्रहण करके उन नृपश्रेष्ठके वहाँ आनेका प्रयोजन पूछा ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 126 · श्लोक 4पृष्ठ 832

राजा सुमित्र ने उन समस्त ब्राह्मणों से कहा— "तपोधनो! मेरा जन्म हय कुल में हुआ है। मैं मित्रों का आनन्द बढ़ाने वाला राजा सुमित्र हूँ और सहस्रों बाणों के आघात से मृग समूहों का विनाश करता हुआ विचर रहा हूँ। मेरे साथ बहुत बड़ी सेना थी, जिससे मैं सुरक्षित था; परन्तु मेरे बाणों से घायल एक मृग बाण सहित इधर ही भाग निकला। उस भागते हुए मृग के पीछे मैं अकस्मात् इस वन में आप लोगों के समीप आ पहुँचा हूँ। मेरी सारी शोभा नष्ट हो गयी है। मैं हताश होकर भारी परिश्रम से कष्ट पा रहा हूँ।

नगर और राजचिह्नों का परित्याग मुझे उतना तीव्र कष्ट नहीं दे रहा, जितना कि मेरी भग्न हुई आशा दे रही है। महान पर्वत हिमालय अथवा अगाध समुद्र अपनी विशालता से आशा की समानता नहीं कर सकते। तपस्या में श्रेष्ठ तपोधनो! जैसे आकाश का कहीं अन्त नहीं है, उसी प्रकार मैं आशा का अन्त नहीं पा सका हूँ। आप सर्वज्ञ मुनि हैं; इसलिए मैं आपसे अपने मन का सन्देह पूछता हूँ। एक ओर आशावान् पुरुष हो और दूसरी ओर अनन्त आकाश हो, तो जगत् में महत्ता की दृष्टि से आप लोगों को कौन बड़ा जान पड़ता है? यदि आपके पास बातचीत का समय हो, तो मेरे इस प्रश्न का समाधान करें।"

इह द्रक्ष्यामि तं पुत्रं द्रक्ष्यामीहेति पार्थिवः ।
एवमाशाहृतो राजा चरन् वनमिदं पुरा ॥

यहाँ उस पुत्रको अवश्य देखूँगा । यहाँ वह निश्चय ही दिखायी देगा । इसी आशासे बँधे हुए पृथ्वीपति राजा वीरद्युम्न उन दिनों उस वनमें विचर रहे थे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 127 · श्लोक 15पृष्ठ 836

भीष्म बोले— "युधिष्ठिर! तदनन्तर उन समस्त ऋषियों में से मुनि श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि ऋषभ ने विस्मित होकर कहा— 'नृपश्रेष्ठ! पहले की बात है, मैं सब तीर्थों में विचरण करता हुआ भगवान नर-नारायण के दिव्य आश्रम में जा पहुँचा था। उस वैहायस कुण्ड में स्नान करके मैंने विधिपूर्वक देवताओं और पितरों का तर्पण किया और उसके बाद उस आश्रम में प्रवेश किया जहाँ मुनि नर और नारायण नित्य निवास करते हैं।'

ऋषभ मुनि ने आगे कहा— 'उस आश्रम से निकट ही एक दूसरे आश्रम में मैं ठहरने के लिए गया। वहाँ मुझे तनु नाम वाले एक तपोधन ऋषि आते दिखाई दिए, जो चीर और मृगचर्म धारण किए हुए थे। उनका शरीर बहुत ऊँचा और अत्यन्त दुर्बल था।'"

मैं उन महर्षिका शरीर दूसरे मनुष्यों से आठ गुना लम्बा देख रहा था। राजर्षे! मैंने उनकी जैसी दुर्बलता कहीं भी नहीं देखी। उनका शरीर कनिष्ठिका अङ्गुली के समान पतला था; उनकी गर्दन, दोनों भुजाएँ, दोनों पैर और सिर के बाल भी अद्भुत दिखाई देते थे। उनके मस्तक, कान और नेत्र भी शरीर के अनुरूप ही थे। मैं उन दुबले-पतले ब्राह्मण को देखकर डर गया और मन ही मन बहुत दुखी हो गया; फिर उनके चरणों में प्रणाम करके, दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ा हो गया। मैंने अपना नाम, गोत्र और पिता का परिचय दिया और उन्हीं के दिए हुए आसन पर धीरे से बैठ गया।

दृष्ट्वाहं तं कृश विप्रं भीतः परमदुर्मनाः ।
पादौ तस्याभिवाद्याथ स्थितः प्राञ्जलिरग्रतः ॥

मैं उन दुबले - पतले ब्राह्मणको देखकर डर गया और मन- ही- मन बहुत दुखी हो गया; फिर उनके चरणोंमें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ा हो गया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 127 · श्लोक 10पृष्ठ 836

तनु ऋषियों के बीच बैठकर वे धर्म और अर्थ से युक्त कथा कहने लगे। उनके कथा कहते समय ही कमल के समान नेत्रों वाले एक नरेश वेगशाली घोड़ों द्वारा अपनी सेना और अन्तःपुर के साथ वहाँ आ पहुँचे। उनका पुत्र जङ्गल में खो गया था। उसकी याद करके वे बहुत दुखी हो रहे थे। उनके पुत्र का नाम भूरिद्युम्न था और वे उसके महायशस्वी पिता श्रीमान् वीरद्युम्न थे।

'यहाँ उस पुत्र को अवश्य देखूँगा। यहाँ वह निश्चय ही दिखाई देगा।' इसी आशा से बँधे हुए पृथ्वीपति राजा वीरद्युम्न उन दिनों उस वन में विचर रहे थे। वे बार-बार यही दुहराते थे— 'वह बड़ा धर्मात्मा था। अब उसका दर्शन होना अवश्य ही मेरे लिये दुर्लभ है। एक ही बेटा था, वह भी इस विशाल वन में खो गया।'

राजा की व्याकुलता देख उन्होंने स्वयं से कहा— 'मेरे लिये उसका दर्शन दुर्लभ है तो भी मेरे मन में उसके मिलने की बड़ी भारी आशा लगी हुई है। उस आशा ने मेरे सम्पूर्ण शरीर पर अधिकार कर लिया है। इसमें सन्देह नहीं कि मैं उसके लिये मौत को भी स्वीकार कर लेना चाहता हूँ।'

दुर्लभः स मया द्रष्टुमाशा च महती मम ।
तया परीतगात्रोऽहं मुमूर्षुर्नात्र संशयः ॥

‘ मेरे लिये उसका दर्शन दुर्लभ है तो भी मेरे मनमें उसके मिलनेकी बड़ी भारी आशा लगी हुई है । उस आशाने मेरे सम्पूर्ण शरीरपर अधिकार कर लिया है । इसमें संदेह नहीं कि मैं उसके लिये मौतको भी स्वीकार कर लेना चाहता हूँ'

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 127 · श्लोक 17पृष्ठ 837

राजा की यह बात सुनकर मुनियों में श्रेष्ठ भगवान् तनु दो घड़ी तक चुपचाप ध्यानमग्न बैठे रहे। उन्हें चिन्तन करते देख दीनहृदय नरेश मन्द-मन्द वाणी में बारम्बार कहने लगे— 'देवर्षे! कौन वस्तु दुर्लभ है? और आशा से भी बड़ा क्या है? यदि आपकी दृष्टि में यह बात मुझसे छिपाने योग्य न हो, तो आप इसे अवश्य बतावें।'

तब मुनि ने कहा— 'राजन्! आपके उस पुत्र ने पहले कभी मूढ़ बुद्धिका आश्रय लेकर अपने दुर्भाग्य के कारण एक पूजनीय महर्षिका अपमान कर दिया था। वे आपसे एक सुवर्णमय कलश और वल्कल माँग रहे थे, किन्तु आपके पुत्र ने अवहेलना करके उनकी वह इच्छा पूरी नहीं की; इससे वे विप्र ऋषि अत्यन्त खिन्न और निराश हो गये थे।'

एवमुक्तोऽभिवाद्याथ तमृषिं लोकपूजितम् ।
श्रान्तोऽवसीदद् धर्मात्मा यथा त्वं नरसत्तम ॥

(ऋषभ कहते हैं— ) नरश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर उन लोकपूजित महर्षिको प्रणाम करके धर्मात्मा राजा वीरद्युम्न तुम्हारे ही समान थककर शिथिल हो गये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 127 · श्लोक 23पृष्ठ 838

उन महर्षिको वचन सुनकर धर्मात्मा राजा वीरद्युम्न थककर शिथिल हो गये। तत्पश्चात् उन महर्षियों ने राजा को पाद्य और अर्घ्य आदि सब वस्तुएँ अर्पित कीं। सभी मुनि उन्हें घेरकर बैठ गये और पूछा कि वे इस आश्रम पर क्यों आए हैं। राजा ने कहा— 'मैं विख्यात वीरद्युम्न हूँ और अपने खोये हुए पुत्र भूरिद्युम्न की खोज में वन में आया हूँ। मेरा एक ही पुत्र था, वह भी बालक ही था, जो इस वन में कहीं दिखाई नहीं दे रहा।'

अर्घ्यं ततः समानीय पाद्यं चैव महानृषिः ।
आरण्येनैव विधिना राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥

तत्पश्चात् उन महर्षिने तपोवनमें प्रचलित शिष्टाचारकी विधिसे राजाको पाद्य और अर्घ्य आदि सब वस्तुएँ अर्पित कीं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 127 · श्लोक 24पृष्ठ 838

राजा के कहने पर मुनि पुनः चुप हो गये। पूर्वकाल में राजा ने उन्हीं ऋषि की आशा भङ्ग कर दी थी, जिसके कारण वे मुनि यह निश्चय करके दीर्घकालीन तपस्या में लग गये थे कि— 'मैं किसी प्रकार से किसी राजा या दूसरे वर्ण के लोगों का दिया हुआ दान ग्रहण नहीं करूँगा।'

राजा ने पुनः प्रश्न किया— 'विप्रवर! आप धर्म और अर्थ के ज्ञाता हैं, अतः बतावें कि आशा से बढ़कर दुर्बलता क्या है? और इस पृथ्वी पर सबसे दुर्लभ क्या है?'

मुनि ने कहा— 'नरेश्वर! आशावान की दुर्बलता के समान और किसी की दुर्बलता नहीं है। जो याचक धैर्य धारण कर सके अर्थात् आवश्यकता होने पर भी किसी से याचना न करे, वह दुर्लभ है; और जो याचक की अवहेलना न करके उसकी इच्छा पूर्ण करे, वह संसार में अत्यन्त दुर्लभ है। जब मनुष्य सत्कार करके आशा दिलाकर भी उपकार नहीं करता, तब वह आशा मुझसे भी अत्यन्त कृश होती है। इकलौते बेटे के बाप की आशा, वृद्ध नारियों के हृदय की आशा, धनियों की धनलाभ की आशा और कन्याओं की विवाह की आशा— ये सब मुझसे भी अत्यन्त दुर्बल करती हैं।'

कृश उवाच

दुर्लभोऽप्यथवा नास्ति योऽर्थी धृतिमवाप्नुयात् ।
स दुर्लभतरस्तात योऽर्थिनं नावमन्यते ॥

दुर्बल शरीरवाले मुनिने कहा - तात! जो याचक धैर्य धारण कर सके अर्थात् किसी वस्तुकी आवश्यकता होनेपर भी उसके लिये किसीसे याचना न करे, वह दुर्लभ है एवं जो याचना करनेवाले याचककी अवहेलना न करे – आदरपूर्वक उसकी इच्छा पूर्ण करे, ऐसा पुरुष संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 128 · श्लोक 13पृष्ठ 841

राजा अपनी रानी के साथ उनके चरणों को स्पर्श कर वहीं गिर पड़े और बोले— 'भगवन्! आपका यह सारा कथन सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। मुझे अपने पुत्र से मिलने की बड़ी इच्छा है।'

संस्पृश्य पादौ शिरसा निपपात द्विजर्षभम् ॥

राजन्! ब्राह्मणश्रेष्ठ उस ऋषिकी वह बात सुनकर राजा अपनी रानीके साथ उनके चरणोंका मस्तकसे स्पर्श करके वहीं गिर पड़े ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 128 · श्लोक 19पृष्ठ 842

तब भगवान् तनु ने हँसकर कहा— 'पुत्रमस्यानयत् क्षिप्रं तपसा च श्रुतेन च।'

तनु मुनि ने अपनी तपस्या और शास्त्रज्ञान के प्रभाव से राजकुमार को शीघ्र ही वहाँ बुला लिया। उन्होंने अपने पुत्र को वहाँ बुलाकर तथा राजा को उलाहना देकर उन्हें अपने साक्षात् धर्मस्वरूप का दर्शन कराया। दिव्य स्वरूप दिखाकर वे निकटवर्ती वन में चले गये।

स दर्शयित्वा चात्मानं दिव्यमद्भुतदर्शनम् ।
विपाप्मा विगतक्रोधश्चचार वनमन्तिकात् ॥

दिव्य और अद्भुत दिखायी देनेवाले अपने स्वरूपका उन्हें दर्शन कराकर क्रोध और पापसे रहित तनु मुनि निकटवर्ती वनमें चले गये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 128 · श्लोक 23पृष्ठ 842

ऋषभ मुनि कहते हैं— 'राजन्! मैंने यह सब अपनी आँखों से देखा है। तुम भी इस मृगविषयक दुराशा को शीघ्र ही त्याग दो।' महात्मा ऋषभ के कहने पर सुमित्र ने शरीर को दुर्बल बनाने वाली वह आशा तुरन्त ही त्याग दी।

एतद् दृष्टं मया राजंस्तथा च वचनं श्रुतम् ।
आशामपनयस्वाशु ततः कृशतरीमिमाम् ॥

ऋषभ मुनि कहते हैं — राजन्! मैंने यह सब कुछ अपनी आँखों देखा है और मुनिका वह कथन भी अपने कानों सुना है । ऐसे ही तुम भी शरीरको अत्यन्त कृश बना देनेवाली इस मृगविषयक दुराशाको शीघ्र ही त्याग दो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 128 · श्लोक 24पृष्ठ 842

In English

The Origin and Nature of Hope

Yudhisthira asks Bhishma about the nature of hope after feeling disappointed by Duryodhana. Bhishma tells a story about King Sumitra, who became exhausted while chasing a deer, and the sage Rishabha, who recounts how King Viradyumna suffered because of his intense hope to find his lost son.

This page answers

  • What is the meaning of hope according to bhishma?
  • How did king sumitra become exhausted in the forest?
  • Why was king viradyumna searching the forest?
  • What did sage tanu teach about the weakness of hope?

Also written: Rishabhagita, Rishabha, Sumitra, Tanu, Viradyumna, Bhuridyumna, ऋषभगीता