श्रीगणेशाय नमः।

षोडशराजोपाख्यान : पुत्र के शोक से मुक्ति पाने का मार्ग क्या है?

शोक से मुक्ति का सत्पथ

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · पृष्ठ 186–208

4,150 शब्द · 21 मिनटका पाठ · 30 श्लोक

नारद ने सञ्जय से कहा

पुत्र-शोक से पीड़ित सञ्जय को सान्त्वना देने हेतु

वैशम्पायनजी बोले— हे जनमेजय! जब सबके समझाने-बुझाने पर भी धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर मौन ही रह गये, तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा।

वैशम्पायन उवाच

अव्याहरति राजेन्द्रे धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे ।
गुडाकेशो हृषीकेशमभ्यभाषत पाण्डवः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! सबके समझाने -बुझानेपर भी जब धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर मौन ही रह गये, तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 1पृष्ठ 187

अर्जुन बोले— "हे माधव! शत्रुओं को सन्ताप देने वाले ये धर्मपुत्र युधिष्ठिर स्वयं अपने भाई-बन्धुओं के शोक से इतने सन्तप्त हैं कि शोक के समुद्र में डूब गये हैं। आप इन्हें धीरज बँधाइये।"

वैशम्पायन उवाच

अनतिक्रमणीयो हि धर्मराजस्य केशवः ।
बाल्यात् प्रभृति गोविन्दः प्रीत्या चाभ्यधिकोऽर्जुनात् ॥

धर्मराज युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं कर सकते थे; क्योंकि श्रीकृष्ण बाल्यावस्थासे ही उन्हें अर्जुनसे भी अधिक प्रिय थे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 5पृष्ठ 187

वैशम्पायनजी कहते हैं— हे राजन्! महामना अर्जुन के ऐसे कहने पर, अपनी महिमा से कभी च्युत न होने वाले कमलनयन भगवान गोविन्द राजा युधिष्ठिर की ओर घूमे और उनके सम्मुख हुए। धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा का कभी उल्लङ्घन नहीं कर सकते थे; क्योंकि श्रीकृष्ण उन्हें बाल्यावस्था से ही अर्जुन से भी अधिक प्रिय थे। महाबाहु गोविन्द ने युधिष्ठिर की पत्थर के बने हुए खम्भे जैसी चन्दन-चर्चित भुजा को हाथ में लेकर, उनका मनोरञ्जन करते हुए बोलना आरम्भ किया। उस समय युधिष्ठिर का मुखारविन्द, जो सुन्दर दाँतों और मनोहर नेत्रों से युक्त था, सूर्योदय के समय पूर्णतः विकसित हुए कमल के समान शोभा पा रहा था।

सम्प्रगृह्य महाबाहुर्भुजं चन्दनभूषितम् ।
शैलस्तम्भोपमं शौरिरुवाचाभिविनोदयन् ॥

महाबाहु गोविन्दने युधिष्ठिरकी पत्थरके बने हुए खम्भे जैसी चन्दनचर्चित भुजाको हाथमें लेकर उनका मनोरंजन करते हुए इस प्रकार बोलना आरम्भ किया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 6पृष्ठ 188

भगवान श्रीकृष्ण बोले— "हे पुरुषसिंह! तुम शोक न करो। शोक तो शरीर को सुखा देने वाला होता है। इस समराङ्गण में जो वीर मारे गये हैं, वे फिर सहज ही मिल सकें, यह सम्भव नहीं है। राजन्! जैसे सपने में मिले हुए धन जगने पर मिथ्या हो जाते हैं, उसी प्रकार जो क्षत्रिय महासमर में नष्ट हो गये हैं, उनका दर्शन अब दुर्लभ है। सङ्ग्राम में शोभा पाने वाले वे सभी शूरवीर शत्रुओं का सामना करते हुए पराजित हुए हैं; उनमें से कोई भी पीठ पर चोट खाकर या भागता हुआ नहीं मारा गया है। हे वीर! सभी शूरवीर महायुद्ध में जूझते हुए अपने प्राणों का परित्याग करके, अस्त्र-शस्त्रों से पवित्र होकर स्वर्गलोक में गये हैं, अतः तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये।

वासुदेव उवाच

मा कृथाः पुरुषव्याघ्र शोकं त्वं गात्रशोषणम् ।
न हि ते सुलभा भूयो ये हतास्मिन् रणाजिरे ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले - पुरुषसिंह! तुम शोक न करो । शोक तो शरीरको सुखा देनेवाला होता है । इस समरांगणमें जो वीर मारे गये हैं, वे फिर सहज ही मिल सकें, यह सम्भव नहीं है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 8पृष्ठ 188

मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन्! हे राजन्! क्षत्रिय-धर्म में तत्पर रहने वाले और वेद-वेदाङ्गों के पारङ्गत वे शूरवीर नरेश पुण्यमयी वीर-गति को प्राप्त हुए हैं। पहले के मरे हुए महानुभाव भूपतियों का चरित्र सुनकर तुम्हें अपने उन बन्धुओं के लिये भी शोक नहीं करना चाहिये। इस विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है, जैसा कि इन देवर्षि नारदजी ने पुत्र-शोक से पीड़ित हुए राजा सञ्जयसे कहा था— 'सृजय! मैं, तुम और ये समस्त प्रजावर्ग के लोग, कोई भी सुख और दुःखों के बन्धन से मुक्त नहीं हैं तथा एक दिन हम सब लोग मरेंगे भी। फिर इसके लिये शोक क्या करना है? हे नरेश्वर! तुम सावधान हो जाओ, मैं पूर्ववर्ती राजाओं के महान सौभाग्य का वर्णन करता हूँ। इससे तुम्हारा दुःख दूर हो जायेगा। मरे हुए महानुभाव भूपतियों के नाम सुनकर ही तुम अपने मानसिक सन्ताप को शान्त कर लो और मुझसे विस्तारपूर्वक उन सबका परिचय सुनो। उन पूर्ववर्ती राजाओं का श्रवण करनेयोग्य मनोहर वृत्तान्त बहुत ही उत्तम, क्रूर ग्रहों को शान्त करने वाला और आयु को बढ़ाने वाला है'।"

वासुदेव उवाच

स्वप्नलब्धा यथा लाभा वितथाः प्रतिबोधने ।
एवं ते क्षत्रिया राजन् ये व्यतीता महारणे ॥

राजन्! जैसे सपनेमें मिले हुए धन जगनेपर मिथ्या हो जाते हैं, उसी प्रकार जो क्षत्रिय महासमरमें नष्ट हो गये हैं, उनका दर्शन अब दुर्लभ है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 9पृष्ठ 188

श्रीकृष्ण ने आगे कहा— "सृजय! हमने सुना है कि अविक्षित के पुत्र वे राजा मरुत्त भी मर गये, जिन महात्मा नरेश के यज्ञ में इन्द्र तथा वरुण सहित सम्पूर्ण देवता और प्रजापतिगण बृहस्पतिको आगे करके पधारे थे। उन्होंने देवराज इन्द्र से स्पर्धा रखने के कारण अपने यज्ञ-वैभव द्वारा उन्हें पराजित कर दिया था। इन्द्र का प्रिय चाहने वाले बृहस्पतिजी ने जब उनका यज्ञ कराने से इन्कार कर दिया, तब उन्हीं के छोटे भाई संवर्तने ने मरुत्त का यज्ञ कराया था।

आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ॥

यस्य सेन्द्राः सवरुणा बृहस्पतिपुरोगमाः ।
देवा विश्वसृजो राज्ञो यज्ञमीयुर्महात्मनः ॥

' सृजय! हमने सुना है कि अविक्षित्के पुत्र वे राजा मरुत्त भी मर गये, जिन महात्मा नरेशके यज्ञमें इन्द्र तथा वरुणसहित सम्पूर्ण देवता और प्रजापतिगण बृहस्पतिको आगे करके पधारे थे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 18-19पृष्ठ 189

हे नृपश्रेष्ठ! राजा मरुत्त जब इस पृथ्वी का शासन करते थे, उस समय यह बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी और समस्त भूमण्डल में देवालयों की माला-सी दृष्टि गोचर होती थी, जिससे इस पृथ्वी की बड़ी शोभा होती थी। महामना मरुत्त के यज्ञ में विश्वेदेवगण सभासद थे और मरुद्गण तथा साध्यगण रसोई परोसने का काम करते थे। मरुद्गणों ने मरुत्त के यज्ञ में उस समय खूब सोमरस का पान किया था। राजा ने जो दक्षिणाएँ दी थीं, वे देवताओं, मनुष्यों और गन्धर्वों के सभी यज्ञों से बढ़कर थीं। हे सृजय! धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य— इन चारों बातों में राजा मरुत्त तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब औरों की क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो।"

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥

अदक्षिणमयज्वानं श्वैत्य संशाम्य मा शुचः । ‘श्वेतपुत्र संजय! वे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य–इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़ - चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये, तब दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो । उसने न तो कोई यज्ञ किया था और न दक्षिणा ही बाँटी थी, अतः उसके लिये शोक न करो, शान्त हो जाओ ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 30पृष्ठ 192

श्रीकृष्ण ने बोलना जारी रखा— "सृजय! अतिथिसत्कार के प्रेमी राजा सुहोत्र भी जीवित नहीं रहे, ऐसा सुनने में आया है। उनके राज्य में इन्द्र ने एक वर्ष तक सोने की वर्षा की थी। राजा सुहोत्र को पाकर पृथ्वी का वसुमती नाम सार्थक हो गया था। जिस समय वे जनपद के स्वामी थे, उन दिनों वहाँ की नदियाँ अपने जल के साथ-साथ सुवर्ण बहाया करती थीं। लोक-पूजित इन्द्र ने सोने के बने हुए बहुत से कछुए, केकड़े, नाके, मगर, सूँस और मत्स्य उन नदियों में गिराये थे। उन नदियों में सैकड़ों और हजारों की सङ्ख्या में सुवर्णमय मत्स्यों, ग्राहों और कछुओं को गिराया गया देख अतिथिप्रिय राजा सुहोत्र आश्चर्यचकित हो उठे थे। वह अनन्त सुवर्ण-राशि कुरुजाङ्गल देश में छा गयी थी। राजा सुहोत्र ने वहाँ यज्ञ किया और उसमें वह सारी धनराशि ब्राह्मणों में बाँट दी। हे श्वेतपुत्र सञ्जय! वे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य— इन चारों कल्याणकारी गुणों में तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब दूसरों की क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो, शान्त हो जाओ।"

यः स्पर्धयायजच्छक्रं देवराजं पुरंदरम् ।
शक्रप्रियैषी यं विद्वान् प्रत्याचष्ट बृहस्पतिः ॥

संवर्तो याजयामास यवीयान् स बृहस्पतेः । ‘ उन्होंने देवराज इन्द्रसे स्पर्धा रखनेके कारण अपने यज्ञ- वैभवद्वारा उन्हें पराजित कर दिया था। इन्द्रका प्रिय चाहनेवाले बृहस्पतिजीने जब उनका यज्ञ करानेसे इन्कार कर दिया, तब उन्हींके छोटे भाई संवर्तने मरुत्तका यज्ञ कराया था ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 20पृष्ठ 191

भगवान ने आगे कहा— "सृजय! अङ्ग देश के राजा बृहद्रथ की भी मृत्यु हुई थी, ऐसा हमने सुना है। उन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञ में दस लाख श्वेत घोड़े और सोने के आभूषणों से भूषित दस लाख कन्याएँ दक्षिणारूप में बाँटी थीं। इसी प्रकार यजमान बृहद्रथ ने उस विस्तृत यज्ञ में सुवर्णमय कमलों की मालाओं से अलङ्कृत दस लाख हाथी भी दक्षिणा में बाँटे थे। उन्होंने एक करोड़ सुवर्ण-मालाधारी गाय, बैल और उनके सहस्रों सेवक दक्षिणा रूप में दिये थे।

यस्मिन् प्रशासति महीं नृपतौ राजसत्तम ।
अकृष्टपच्या पृथिवी विबभौ चैत्यमालिनी ॥

नृपश्रेष्ठ! राजा मरुत्त जब इस पृथ्वीका शासन करते थे, उस समय यह बिना जोते - बोये ही अन्न पैदा करती थी और समस्त भूमण्डलमें देवालयोंकी माला- सी दृष्टिगोचर होती थी, जिससे इस पृथ्वीकी बड़ी शोभा होती थी ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 21पृष्ठ 191

राजेंद्र! प्राचीन काल में अङ्गराज ने ऐसे-ऐसे सौ यज्ञ किये थे और उन सब में जो दक्षिणाएँ दी गयी थीं, वे देवताओं, गन्धर्वों और मनुष्यों के यज्ञों से बढ़ गयी थीं। अङ्गराज ने सातों सोम-संस्थाओं में जो धन दिया था, उतना जो दे सके, ऐसा दूसरा न तो कोई मनुष्य पैदा हुआ है और न पैदा होगा। हे सृजय! पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी गुणों में वे बृहद्रथ तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तो दूसरों की क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्र के लिये सन्तप्त न होओ।"

अङ्गं बृहद्रथं चैव मृतं संजय शुश्रुम ॥

यः सहस्रं सहस्राणां श्वेतानश्वानवासृजत् ।
सहस्रं च सहस्राणां कन्या हेमपरिष्कृताः ॥

ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् । ‘ सृजय! अंगदेशके राजा बृहद्रथकी भी मृत्यु हुई थी, ऐसा हमने सुना है । उन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमें दस लाख श्वेत घोड़े और सोनेके आभूषणोंसे भूषित दस लाख कन्याएँ दक्षिणारूपमें बाँटी थीं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 31-323पृष्ठ 192

अन्त में श्रीकृष्ण बोले— "सृजय! जिन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वी को चमड़े की भाँति लपेट लिया था— अर्थात सर्वथा अपने अधीन कर लिया था— वे उशीनरपुत्र राजा शिबि भी मरे थे। वे अपने रथ की गम्भीर ध्वनि से पृथ्वी को प्रतिध्वनित करते हुए, एकमात्र विजयशील रथ के द्वारा इस भूमण्डल का एकछत्र शासन करते थे। आज संसार में जङ्गली पशुओं सहित जितने गाय, बैल और घोड़े हैं, उतनी सङ्ख्या में उशीनरपुत्र शिबिने अपने यज्ञ में केवल गौओं का दान किया था।"

यावदद्य गवाश्वं स्यादारण्यैः पशुभिः सह ॥

तावतीः प्रददौ गाः स शिबिरौशीनरोऽध्वरे । ‘ आज संसारमें जंगली पशुओंसहित जितने गाय- बैल और घोड़े हैं, उतनी संख्यामें उशीनरपुत्र शिबिने अपने यज्ञमें केवल गौओंका दान किया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 41पृष्ठ 193

‘सृजय! उशीनरपुत्र राजा शिबिके सिवा सम्पूर्ण राजाओं में भूत या भविष्यकाल के दूसरे किसी राजा को ऐसा नहीं माना, जो शिबिका कार्यभार वहन कर सकता हो। वे पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी बातों में तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तो दूसरे की क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्र के लिये शोक मत करो। उसने न तो कोई यज्ञ किया था, न दक्षिणा ही दी थी; अतः उस पुत्र के लिये शोक नहीं करना चाहिये।’

न वोढारं धुरं तस्य कश्चिन्मेने प्रजापतिः ॥

न भूतं न भविष्यं च सर्वराजसु सृजय ।
अन्यत्रौशीनराच्छैब्याद् राजर्षेरिन्द्रविक्रमात् ॥

‘ सृजय! प्रजापति ब्रह्माने इन्द्रके तुल्य पराक्रमी उशीनरपुत्र राजा शिबिके सिवा सम्पूर्ण राजाओंमें भूत या भविष्यकालके दूसरे किसी राजाको ऐसा नहीं माना, जो शिबिका कार्यभार वहन कर सकता हो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 42-43पृष्ठ 194

‘सञ्जय! दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र महाधनी, महामनस्वी भरत भी मृत्यु के अधीन हो गये, यह हमने सुना था। वे महातेजस्वी दुष्यन्तकुमार भरत पूर्वकाल में देवताओं की प्रसन्नता के लिये यमुना के तट पर तीन सौ, सरस्वती के तट पर बीस और गङ्गा के तट पर चौदह घोड़े बाँधकर उतने-उतने अश्वमेध यज्ञ किये थे। उन्होंने अपने जीवन में एक सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ सम्पन्न किये थे। जैसे मनुष्य दोनों भुजाओं से आकाश को तैर नहीं सकते, उसी प्रकार सम्पूर्ण राजाओं में भरत का जो महान कर्म है, उसका दूसरे राजा अनुकरण न कर सके। उन्होंने सहस्र से भी अधिक घोड़े बाँधे और यज्ञ वेदियों का विस्तार करके अश्वमेध यज्ञ किये; उसमें भरत ने आचार्य कण्व को एक हजार सुवर्ण के बने हुए कमल भेंट किये थे।’

अदक्षिणमयज्वानं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥

‘ सृजय! राजा शिबि पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े- चढ़े थे । तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये तब दूसरेकी क्या बात है, अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक मत करो । उसने न तो कोई यज्ञ किया था, न दक्षिणा ही दी थी; अतः उस पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 44पृष्ठ 194

‘सृजय! वे साम, दान, दण्ड और भेद—इन चार कल्याणमयी नीतियों अथवा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इन चार मङ्गलकारी गुणों में तुमसे बहुत बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्र की अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब दूसरा कौन जीवित रह सकता है? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्र के लिये शोक नहीं करना चाहिये। सृजय! सुनने में आया है कि दशरथ-नन्दन भगवान श्रीरामजी भी यहाँ से परम धाम को चले गये थे, जो सदा अपनी प्रजा पर वैसी ही कृपा रखते थे, जैसे पिता अपने औरस पुत्रों पर रखता है। उनके राज्य में कोई भी स्त्री अनाथ या विधवा नहीं हुई। श्रीरामचन्द्रजी ने जब तक राज्य का शासन किया, तब तक वे अपनी प्रजा के लिये सदा ही पिता के समान कृपालु बने रहे।

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥

'सृजय! वे साम, दान, दण्ड और भेद - इन चार कल्याणमयी नीतियों अथवा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य–इन चार मंगलकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये, तब दूसरा कौन जीवित रह सकता है । अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 50पृष्ठ 195

उनका राज्य ऐसा था कि मेघ समय पर वर्षा करके खेती को अच्छे ढङ्ग से सम्पन्न करता था और उसे बढ़ने तथा फूलने-फलने का अवसर देता था। राम के राज्य-शासनकाल में सदा सुकाल ही रहता था, कभी अकाल नहीं पड़ता था। उनके राज्य में कभी कोई प्राणी जल में डूबते नहीं थे, आग अनुचित रूप से किसी को जलाती नहीं थी तथा किसी को रोग का भय नहीं होता था। श्रीरामचन्द्रजी के शासनकाल में हजार वर्ष तक जीने वाली स्त्रियाँ और सहस्रों वर्ष तक जीवित रहने वाले पुरुष थे। किसी को कोई रोग नहीं सताता था और सभी के सारे मनोरथ सिद्ध होते थे। स्त्रियों में भी परस्पर विवाद नहीं होता था, तो फिर पुरुषों की क्या बात! समस्त प्रजा सदा धर्म में तत्पर रहती थी। सभी मनुष्य सन्तुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वाधीन और सत्यव्रती थे। उनके राज्य में समस्त वृक्ष बिना किसी विघ्न-बाधा के सदा फले-फूले रहते थे और समस्त गौएँ एक-एक दोन दूध देती थीं। महातपस्वी श्रीराम ने चौदह वर्षों तक वन में निवास करके, राज्य पाने के अनन्तर दस ऐसे अश्वमेध यज्ञ किये जो सर्वथा स्तुतिके योग्य थे और जहाँ किसी भी याचक के लिये दरवाजा बन्द नहीं होता था। वे नवयुवक और श्याम वर्ण वाले थे; उनकी आँखों में कुछ-कुछ लालिमा शोभा देती थी। वे यूथपति गजराज के समान शक्तिशाली थे, उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी थीं और उनका मुख सुन्दर तथा कन्धे सिंह के समान थे। उन्होंने अयोध्या के अधिपति होकर ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य किया था। सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणों में तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे; जब वे भी यहाँ रह न सके, तो दूसरों की क्या बात है? अतः तुम्हें अपने पुत्र के लिये शोक नहीं करना चाहिये।’

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥

‘ सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े - चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी यहाँ रह न सके, तब दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम्हें अपने पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 62पृष्ठ 196

‘सृजय! राजा भगीरथ भी काल के गाल में चले गये, ऐसा हमने सुना है। जिनके विस्तृत यज्ञ में सोम पीकर मदोन्मत्त हुए सुरश्रेष्ठ भगवान् पाकशासन इन्द्र ने अपने बाहुबल से कई सहस्र असुरों को पराजित किया था। उन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञ में सोने के आभूषणों से विभूषित दस लाख कन्याओं को दक्षिणारूप में दान किया था। वे सभी कन्याएँ अलग-अलग रथ में बैठी हुई थीं, प्रत्येक रथ में चार-चार घोड़े जुते हुए थे। हर एक रथ के पीछे सोने की मालाओं से विभूषित तथा मस्तक पर कमल के चिह्नों से अलङ्कृत सौ-सौ हाथी थे। प्रत्येक हाथी के पीछे एक-एक हजार घोड़े, प्रत्येक घोड़े के पीछे हजार-हजार गायें और एक-एक गाय के साथ हजार-हजार भेड़-बकरियाँ चल रही थीं। जब तटके के निकट निवास करते समय गङ्गाजी राजा भगीरथ की गोद में आ बैठीं, तब वे पूर्वकाल में भागीरथी और उर्वशी नाम से प्रसिद्ध हुईं। त्रिपथगामिनी गङ्गा ने पुत्रीभाव को प्राप्त करके पर्याप्त दक्षिणा देने वाले इक्ष्वाकुवंशी यजमान भगीरथ को अपना पिता माना। सञ्जय! वे पूर्वोक्त चारों बातों में तुमसे बहुत बढ़े हुए थे और तुम्हारे पुत्र से अधिक पुण्यात्मा थे; जब वे भी काल से बच नहीं सके, तो दूसरों के लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने पुत्र के लिये शोक न करो।’

यस्येह यजमानस्य यज्ञे यज्ञे पुरोहितः ।
सहस्रं वारणान् हैमान् दक्षिणामत्यकालयत् ॥

‘ यजमान दिलीपके प्रत्येक यज्ञमें पुरोहितजी सोनेके बने हुए एक हजार हाथी दक्षिणारूपमें पाकर उन्हें अपने घर ले जाते थे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 73पृष्ठ 198

‘सृजय! महामना राजा दिलीप भी मरे थे, यह सुनने में आया है। उनके महान कर्मों का आज भी ब्राह्मण लोग वर्णन करते हैं। एकाग्रचित्त हुए उन नरेश ने अपने उस महायज्ञ में रत्न और धन से परिपूर्ण इस सारी पृथ्वी का ब्राह्मणों के लिये दान कर दिया था। यजमान दिलीप के प्रत्येक यज्ञ में पुरोहितजी सोने के बने हुए एक हजार हाथी दक्षिणारूप में पाकर उन्हें अपने घर ले जाते थे। उनके यज्ञ में सोने का बना हुआ कालियुक्त बहुत बड़ा यूप शोभा पाता था। यज्ञकर्म करते हुए इन्द्र आदि देवता सदा उसी यूप का आश्रय लेकर रहते थे। उस सुवर्णमय यूप में जो सोने का घेरा बना था, उसके ऊपर छ: हजार देव-गन्धर्व नृत्य किया करते थे। वहाँ साक्षात् विश्वावसु बीच में बैठकर सात स्वरों के अनुसार वीणा बजाया करते थे; उस समय सब प्राणी यही समझते थे कि ये मेरे ही आगे बाजा बजा रहे हैं। राजा दिलीप के इस महान कर्म का अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सके। उनके सुनहरे साज-बाज और सोने के आभूषणों से सजे हुए मतवाले हाथी रास्ते पर सोये रहते थे। सत्यवादी शतधन्वा महामनस्वी राजा दिलीप के जिन लोगों ने दर्शन किए थे, उन्होंने भी स्वर्गलोक को जीत लिया था। महाराज दिलीप के भवन में वेदों के स्वाध्याय का गम्भीर घोष, शूरवीरों के धनुष की टङ्कार तथा ‘दान दो’ की पुकार—ये तीन प्रकार के शब्द कभी बन्द नहीं होते थे। सृजय! वे राजा दिलीप चारों कल्याणकारी गुणों में तुमसे बढ़कर थे और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे; जब वे भी मर गये, तो दूसरों की क्या बिसात है? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्र के लिये शोक नहीं करना चाहिये।’

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥

‘ सृजय! वे राजा दिलीप चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़कर थे । तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा` थे । जब वे भी मर गये तो दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 80पृष्ठ 199

‘सृजय! जिन्हें मरुत् नामक देवताओं ने गर्भावस्थ में पिता के पार्श्वभाग को फाड़कर निकाला था, वे युवनाश्व के पुत्र मान्धाता भी मृत्यु के अधीन हो गये, यह हमने सुना है। त्रिलोकविजयी श्रीमान् राजा मान्धाता पृषदाज्य से उत्पन्न हुए थे; वे अपने पिता महामना युवनाश्व के पेट में ही पले थे। जब वे शिशु अवस्था में पिता के पेट से पैदा हुए और उनकी गोद में सो रहे थे, उस समय उनका रूप देवताओं के बालकों के समान दिखता था। उन्हें देखकर देवता आपस में बात करने लगे—"यह मातृहीन बालक किसका दूध पीयेगा?" यह सुनकर इन्द्र बोल उठे—"मान्धाता—मेरा दूध पीयेगा!" जब इन्द्र ने इस प्रकार उसे पिलाना स्वीकार कर लिया, तबसे उन्होंने ही उस बालक का नाम 'मान्धाता' रख दिया। तदनन्तर उस महामनस्वी बालक युवनाश्वकुमार की पुष्टिके लिये उसके मुख में इन्द्र के हाथ से दूध की धारा झरने लगी। इन्द्र के उस हाथ को पीता हुआ वह बालक एक ही दिन में सौ दिन के बराबर बढ़ गया और बारह दिनों में राजकुमार मान्धाता बारह वर्ष की अवस्था वाले बालक के समान हो गये।

मामेव धास्यतीत्येवमिन्द्रोऽथाभ्युपपद्यत ।
मान्धातेति ततस्तस्य नाम चक्रे शतक्रतुः ॥

'यह सुनकर इन्द्र बोल उठे ' मां धाता - मेरा दूध पीयेगा । ' जब इन्द्रने इस प्रकार उसे पिलाना स्वीकार कर लिया, तबसे उन्होंने ही उस बालकका नाम ' मान्धाता ' रख दिया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 84पृष्ठ 199

राजा मान्धाता बड़े धर्मात्मा और महामनस्वी थे; युद्ध में इन्द्र के समान शौर्य प्रकट करते थे। यह सारी पृथ्वी एक ही दिन में उनके अधिकार में आ गयी थी। जब युवनाश्वपुत्र मान्धाता ने रणभूमि में राजा अङ्गार के साथ युद्ध किया, तब देवताओं ने ऐसा समझा कि उनके धनुष की टङ्कार से सारा आकाश ही फट पड़ा है। जहाँ सूर्य उदय होते हैं वहाँ से लेकर जहाँ अस्त होते हैं, वहाँ तक का सारा देश युवनाश्वपुत्र मान्धाता का ही राज्य कहलाता था। उन्होंने सौ अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लम्बे तथा एक योजन ऊँचे बहुत-से सोने के रोहित नामक मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान किये थे; जो ब्राह्मणों के ले जाने से बच गये, उन्हें दूसरे लोगों ने बाँट लिया। सृजय! राजा मान्धाता चारों कल्याणमय गुणों में तुमसे बढ़े हुए थे और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे; जब वे भी मारे गये, तो तुम्हारे पुत्र की क्या बिसात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो।’

य इमां वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः ।
ददौ तस्मिन् महायज्ञे ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥

'एकाग्रचित्त हुए उन नरेशने अपने उस महायज्ञमें रत्न और धनसे परिपूर्ण इस सारी पृथ्वीका ब्राह्मणोंके लिये दान कर दिया था ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 72पृष्ठ 198

‘सृजय! नहुषपुत्र राजा ययाति भी जीवित न रह सके—यह हमने सुना है। उन्होंने समुद्रों सहित इस सारी पृथ्वी को जीतकर शम्यापात के द्वारा पृथ्वी को नाप-नापकर यज्ञ की वेदियाँ बनायीं, जिनसे भूतल की विचित्र शोभा होने लगी। उन्हीं वेदियों पर मुख्य-मुख्य यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए उन्होंने सारी भारतभूमि की परिक्रमा कर डाली। उन्होंने एक हजार श्रीतयज्ञों और सौ वाजपेय यज्ञों का अनुष्ठान किया तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सोने के तीन पर्वत दान करके पूर्णतः सन्तुष्ट किया। नहुषपुत्र ययाति ने व्यूह-रचनायुक्त आसुर युद्ध के द्वारा दैत्यों और दानवों का संहार करके यह सारी पृथ्वी अपने पुत्रों को बाँट दी थी; किनारे के प्रदेशों पर अपने तीन पुत्र—यदु, द्रुह्यु तथा अनु—को स्थापित करके मध्य भारत के राज्य पर पूरु को अभिषिक्त किया; फिर अपनी स्त्रियों के साथ वे वन में चले गये। सृजय! वे तुम्हारी अपेक्षा चारों कल्याणमय गुणों में बढ़े हुए थे और तुम्हारे पुत्र से भी अधिक पुण्यात्मा थे; जब वे भी मर गये, तो तुम्हारा पुत्र किस गिनती में है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो।’

मान्धातारं यौवनाश्वं मृतं सृजय शुश्रुम ।
यं देवा मरुतो गर्भं पितुः पार्श्वादपाहरन् ॥

' सृजय! जिन्हें मरुत् नामक देवताओंने गर्भावस्थामें पिताके पार्श्वभागको फाड़कर निकाला था, वे युवनाश्वके पुत्र मान्धाता भी मृत्युके अधीन हो गये, यह हमारे सुननेमें आया है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 81पृष्ठ 199

‘सृजय! हमने सुना है कि नाभाग के पुत्र अम्बरीष भी मृत्यु के अधीन हो गये थे। उन नृपश्रेष्ठ अम्बरीष को सारी प्रजा ने अपना पुण्यमय रक्षक माना था। ब्राह्मणों के प्रति अनुराग रखने वाले राजा अम्बरीष ने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञ-मण्डप में दस लाख ऐसे राजाओं को उन ब्राह्मणों की सेवा में नियुक्त किया था, जो स्वयं भी दस-दस हजार यज्ञ कर चुके थे।’

यत्र सूर्य उदेति स्म यत्र च प्रतितिष्ठति ।
सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥

'जहाँ सूर्य उदय होते हैं वहाँसे लेकर जहाँ अस्त होते हैं वहाँतकका सारा देश युवनाश्वपुत्र मान्धाताका ही राज्य कहलाता था ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 90पृष्ठ 200

उन यज्ञकुशल ब्राह्मणों ने राजा अम्बरीष की सराहना करते हुए कहा था कि ऐसा यज्ञ न तो पहले के राजाओं ने किया है और न भविष्य में होने वाले ही करेंगे। उनके यज्ञ में एक लाख दस हजार राजा सेवाकार्य करते थे। वे सभी अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर दक्षिणायन के पश्चात् आने वाले उत्तरायण मार्ग से ब्रह्मलोक में चले गये थे।

हिरण्यकवचाः सर्वे सर्वे चोत्तमधन्विनः ॥

शतं कन्या राजपुत्रमेकैकं पृथगन्वयुः ।
कन्यां कन्यां शतं नागा नागं नागं शतं रथाः ॥

‘ वे सभी राजकुमार सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले और उत्तम धनुर्धर थे । एक-एक राजकुमारको अलग - अलग सौ- सौ कन्याएँ ब्याही गयी थीं । प्रत्येक कन्याके साथ सौ - सौ हाथी प्राप्त हुए थे । हर एक हाथीके पीछे सौ -सौ रथ मिले थे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 106-107पृष्ठ 202

सञ्जय ने कहा— "हे सृजय! राजा अम्बरीष चारों कल्याणकारी गुणों में तुमसे बढ़कर थे और तुम्हारे पुत्र से बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी जीवित न रह सके, तो दूसरे के लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्र के लिये शोक न करो। हम सुनते हैं कि चित्ररथ के पुत्र शशबिन्दु भी मृत्यु से अपनी रक्षा न कर सके। उन महामना नरेश की एक लाख रानियाँ थीं और उनके गर्भ से दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी राजकुमार सुवर्णमय कवच धारण करने वाले और उत्तम धनुर्धर थे। प्रत्येक राजकुमार को अलग-अलग सौ-सौ कन्याएँ ब्याही गयी थीं और प्रत्येक कन्या के साथ सौ-सौ हाथी प्राप्त हुए थे। हर एक हाथी के पीछे सौ-सौ रथ मिले थे। प्रत्येक रथ के साथ स्वर्णमालाधारी सौ-सौ देशीय घोड़े थे और हर एक अश्व के साथ सौ गायें तथा एक-एक गाय के साथ सौ-सौ भेड़-बकरियाँ प्राप्त हुई थीं। महाराज! राजा शशबिन्दु ने यह अनन्त धनराशि अश्वमेध नामक महायज्ञ में ब्राह्मणों को दान कर दी थी। वे चारों कल्याणकारी गुणों में तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्र से बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे; जब वे भी मृत्यु से बच न सके, तब तुम्हारे पुत्र के लिये क्या कहा जाय? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्र के लिये शोक नहीं करना चाहिये।"

रथे रथे शतं चाश्वा देशजा हेममालिनः ।
अश्वे अश्वे शतं गावो गवां तद्वदजाविकम् ॥

‘ प्रत्येक रथके साथ सुवर्णमालाधारी सौ- सौ देशीय घोड़े थे। हर एक अश्वके साथ सौ गायें और एक- एक गायके साथ सौ - सौ भेड़ - बकरियाँ प्राप्त हुई थीं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 108पृष्ठ 202

"सृजय! सुनने में आया है कि अमूर्तरया के पुत्र राजा गय की भी मृत्यु हुई थी। उन्होंने सौ वर्षों तक होम से अवशिष्ट अन्न का ही भोजन किया। एक समय अग्निदेव ने उन्हें वर माँगने के लिये कहा, तब राजा गय ने ये वर माँगे— 'अग्निदेव! आपकी कृपा से दान करते हुए मेरे पास अक्षय धन का भण्डार भरा रहे, धर्म में मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे और मेरा मन सदा सत्य में ही अनुरक्त रहे।' सुना है कि उन्हें अग्निदेव से वे सभी मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो गये थे। उन्होंने एक हजार वर्षों तक बारम्बार दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य तथा अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया था। वे हजार वर्षों तक प्रतिदिन सुबह उठकर एक-एक लाख गौओं और सौ-सौ खच्चरों का दान करते थे। उन्होंने सोमरस से देवताओं को, धन से ब्राह्मणों को, श्राद्धकर्म से पितरों को और कामभोग द्वारा स्त्रियों को तृप्त किया था। राजा गय ने महायज्ञ अश्वमेध में दस व्याम—पचास हाथ चौड़ी और इससे दूनी लम्बी—सोने की पृथ्वी बनवाकर दक्षिणा रूप से दान कर दी थी। महाराज! गङ्गाजी में जितने बालू के कण हैं, अमूर्तरया के पुत्र गय ने उतनी ही गौओं का दान किया था। वे चारों कल्याणकारी गुणों में तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्र से बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे; जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्र की क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो।"

गयं चामूर्तरयसं मृतं शुश्रुम सृजय ।
यः स वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् ॥

‘ सृजय! सुननेमें आया है कि अमूर्तरयाके पुत्र राजा गयकी भी मृत्यु हुई थी । उन्होंने सौ वर्षोंतक होमसे अवशिष्ट अन्नका ही भोजन किया ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 111पृष्ठ 203

"सृजय! सङ्कृतिके पुत्र राज रन्तिदेव भी काल के गाल में चले गये, यह हमारे सुनने में आया है। उन महातपस्वी नरेश ने इन्द्र की अच्छी तरह आराधना करके उनसे यह वर माँगा था— 'हमारे पास अन्न बहुत हो, हम सदा अतिथियों की सेवा का अवसर प्राप्त करें, हमारी श्रद्धा दूर न हो और हम किसी से कुछ भी न माँगें।' कठोर व्रत का पालन करने वाले यशस्वी महात्मा राजा रन्तिदेव के पास गाँवों और जङ्गलों के पशु अपने-आप यज्ञ के लिये उपस्थित हो जाते थे। वहाँ भीगी चर्मराशि से जो जल बहता था, उससे एक विशाल नदी प्रकट हो गयी, जो चर्मण्वती के नाम से विख्यात हुई। राजा अपने विशाल यज्ञ में ब्राह्मणों को सोने के निष्क दिया करते थे। वहाँ द्विजलोग पुकार-पुकारकर कहते थे— 'ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिये निष्क है, यह तुम्हारे लिये निष्क है!' परन्तु कोई लेने वाला आगे नहीं बढ़ता था। फिर वे यह कहकर कि 'तुम्हारे लिये एक सहस्र निष्क है', लेने वाले ब्राह्मणों को उपलब्ध कर पाते थे। बुद्धिमान राजा रन्तिदेव के उस यज्ञ में अन्वाहार्य अग्नि में आहुति देने के लिये जो उपकरण थे तथा द्रव्य सङ्ग्रह के लिये जो घड़े, पात्र, कड़ाहे और कठौते आदि सामान थे, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं था जो सोने का बना हुआ न हो। जिस रात को अतिथियों का समुदाय निवास करता था, उस समय उन्हें बीस हजार एक सौ गौएँ छूकर दी जाती थीं। वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किए रसोइये पुकार-पुकारकर कहते थे— 'आपलोग खूब दाल-भात खाइये, आज का भोजन पहले जैसा नहीं है!' सञ्जय! रन्तिदेव तुमसे पूर्वोक्त चारों गुणों में बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्र से बहुत अधिक पुण्यात्मा थे; जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्र की क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो।"

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥

'संजय! रन्तिदेव तुमसे पूर्वोक्त चारों गुणोंमें बढ़े- चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 129पृष्ठ 205

"सृजय! इक्ष्वाकुवंशी पुरुषसिंह महामना सगर भी मरे थे, ऐसा सुनने में आया है। उनका पराक्रम अलौकिक था। जैसे वर्षा के अन्त में बादलों से रहित आकाश के भीतर तारे चन्द्रमा का अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार राजा सगर जब युद्ध आदि के लिये यात्रा करते थे, तो उनके साठ हजार पुत्र उन नरेश के पीछे-पीछे चलते थे। पूर्वकाल में राजा के प्रताप से एकछत्र पृथ्वी उनके अधिकार में आ गयी थी। उन्होंने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ करके देवताओं को तृप्त किया था। उन्होंने सोने के खम्भों से युक्त पूर्णतः सोने का बना हुआ महल, जो कमल के समान नेत्रों वाली सुन्दरी स्त्रियों की शय्याओं से सुशोभित था, तैयार कराकर योग्य ब्राह्मणों को दान कर दिया और उनके आदेश से ब्राह्मणों ने सारा धन आपस में बाँट लिया। एक समय क्रोध में आकर उन्होंने समुद्र से चिह्नित सारी पृथ्वी खुदवा डाली थी; उन्हीं के नाम पर समुद्र की 'सागर' सञ्ज्ञा हो गयी। सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणों में तुमसे बढ़े हुए थे और तुम्हारे पुत्र से बहुत अधिक पुण्यात्मा थे; जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्र की क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो।"

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥

‘ सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े हुए थे । तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये, तब तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 136पृष्ठ 206

"सृजय! उनके पुत्र महाराज पृथु को भी अपने शरीर का त्याग करना पड़ा था। महर्षियों ने महान वन में एकत्र होकर उनका राज्याभिषेक किया था। ऋषियों ने यह सोचकर कि सब लोकों में धर्म की मर्यादा स्थापित करेंगे, उनका नाम 'पृथु' रखा था। वे दुःख से सबका त्राण करते थे, इसलिये क्षत्रिय कहलाये। समस्त प्रजाओं ने उन्हें देखकर एक साथ कहा— 'हम इनमें अनुरक्त हैं।' इस प्रकार प्रजा का रञ्जन करने के कारण ही उनका नाम 'राजा' हुआ। पृथु के शासनकाल में पृथ्वी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी, वृक्षों के पुट-पुट में रस भरा था और सारी गौएँ एक-एक दोन दूध देती थीं। मनुष्य नीरोग थे और उन्हें कभी किसी चीज से भय नहीं होता था। जब वे समुद्र की ओर यात्रा करते थे, तब उसका जल स्थिर हो जाता था और नदियों की बाढ़ शान्त हो जाती थी। राजा पृथु ने अश्वमेध नामक महायज्ञ में चार सौ हाथ ऊँचे इक्कीस सुवर्णमय पर्वत ब्राह्मणों को दान किये थे। सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणों में तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्र की अपेक्षा बहुत अधिक पुण्यात्मा थे; जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्र की क्या बात है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्र के लिये शोक न करो।"

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुप्यथाः ॥

‘ सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े -चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा बहुतअधिक पुण्यात्मा भी थे । जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक न करो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 144पृष्ठ 207

नारद जी ने पूछा— "सृजय! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो? राजन्! मेरी इस बात को क्यों नहीं सुनते हो? जैसे मरणासन्न पुरुष के ऊपर ओषधि व्यर्थ जाती है, उसी प्रकार मेरा यह सारा प्रवचन निष्फल तो नहीं हो गया?"

किं वा तूष्णीं ध्यायसे सृजय त्वं न मे राजन् वाचमिमां शृणोषि ।
न चेन्मोघं विप्रलप्तं ममेदं पथ्यं मुमूर्षोरिव सुप्रयुक्तम् ॥

‘ सृजय! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो । राजन्! मेरी इस बातको क्यों नहीं सुनते हो? जैसे मरणासन्न पुरुषके ऊपर अच्छी तरह प्रयोगमें लायी हुई ओषधि व्यर्थ जाती है, उसी प्रकार मेरा यह सारा प्रवचन निष्फल तो नहीं हो गया? '

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 145पृष्ठ 207

सञ्जय ने कहा— "नारद! पवित्र गन्धवाली माला के समान विचित्र अर्थ से भरी हुई आपकी इस वाणी को मैं सुन रहा हूँ। पुण्यात्मा महामनस्वी और कीर्तिशाली राजर्षियों के चरित्र से युक्त आपका यह वचन सम्पूर्ण शोकों का विनाश करने वाला है। महर्षि नारद! आपका दर्शन करके ही मैं शोकरहित हो गया हूँ। मैं आपका यह प्रवचन सुनना चाहता हूँ, पर मैं उससे तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ। प्रभो! आपका दर्शन अमोघ है। मैं पुत्र-शोक के सन्ताप से दग्ध हो रहा हूँ। यदि आप मुझ पर कृपा करें तो मेरा पुत्र फिर जीवित हो सकता है और आपके प्रसाद से मुझे पुनः पुत्र-मिलन का सुख मिल जाएगा।"

अमोघदर्शिन् मम चेत् प्रसादं संतापदग्धस्य विभो प्रकुर्याः ।
सुतस्य सञ्जीवनमद्य मे स्यात् तव प्रसादात् सुतसङ्गमश्च ॥

प्रभो! आपका दर्शन अमोघ है । मैं पुत्रशोकके संतापसे दग्ध हो रहा हूँ । यदि आप मुझपर कृपा करें तो मेरा पुत्र फिर जीवित हो सकता है और आपके प्रसादसे मुझे पुनः पुत्र-मिलनका सुख सुलभ हो जायगा ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 148पृष्ठ 208

तब नारद जी बोले— "राजन्! तुम्हारे यहाँ जो यह सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था और जिसे पर्वत मुनि ने तुम्हें दिया था, वह तो चला गया। अब मैं पुनः हिरण्यनाभ नामक एक पुत्र दे रहा हूँ, जिसकी आयु एक हजार वर्षों की होगी।"

नारद उवाच

यस्ते पुत्रो गमितोऽयं विजातः स्वर्णष्ठीवी यमदात् पर्वतस्ते ।
पुनस्तु ते पुत्रमहं ददामि हिरण्यनाभं वर्षसहस्रिणं च ॥

नारदजी कहते हैं - राजन्! तुम्हारे यहाँ जो यह सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था और जिसे पर्वत मुनिने तुम्हें दिया था, वह तो चला गया। अब मैं पुनः हिरण्यनाभ नामक एक पुत्र दे रहा हूँ, जिसकी आयु एक हजार वर्षोंकी होगी ।

महाभारत · शान्तिपर्व · राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 29 · श्लोक 149पृष्ठ 208

In English

Krishna comforts Yudhishthira with stories of ancient kings

Krishna consoles a grieving Yudhishthira by explaining that all great men eventually die. He tells Sanjay about legendary rulers like Marutta, Suhotra, Brihadratha, Shibi, Bharata, and Rama to show that even the most virtuous kings cannot escape death.

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