श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 191–200

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

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यः स्पर्धयायजच्छक्रं देवराजं पुरंदरम् ।

शक्रप्रियैषी यं विद्वान् प्रत्याचष्ट बृहस्पतिः ॥ २० ॥

संवर्तो याजयामास यवीयान् स बृहस्पतेः । ‘ उन्होंने देवराज इन्द्रसे स्पर्धा रखनेके कारण अपने यज्ञ- वैभवद्वारा उन्हें पराजित कर दिया था। इन्द्रका प्रिय चाहनेवाले बृहस्पतिजीने जब उनका यज्ञ करानेसे इन्कार कर दिया, तब उन्हींके छोटे भाई संवर्तने मरुत्तका यज्ञ कराया था ॥ २० ॥

यस्मिन् प्रशासति महीं नृपतौ राजसत्तम ।

अकृष्टपच्या पृथिवी विबभौ चैत्यमालिनी ॥ २१ ॥

नृपश्रेष्ठ! राजा मरुत्त जब इस पृथ्वीका शासन करते थे, उस समय यह बिना जोते - बोये ही अन्न पैदा करती थी और समस्त भूमण्डलमें देवालयोंकी माला- सी दृष्टिगोचर होती थी, जिससे इस पृथ्वीकी बड़ी शोभा होती थी ॥ २१ ॥

आविक्षितस्य वै सत्रे विश्वेदेवाः सभासदः ।

मरुतः परिवेष्टारः साध्याश्चासन् महात्मनः ॥ २२ ॥

‘ महामना मरुत्तके यज्ञमें विश्वेदेवगण सभासद थे और मरुद्गण तथा साध्यगण रसोई परोसनेका काम करते थे ॥ २२ ॥

मरुद्गणा मरुत्तस्य यत् सोममपिबंस्ततः ।

देवान् मनुष्यान् गन्धर्वानत्यरिच्यन्त दक्षिणाः ॥ २३ ॥

‘ मरुद्गणोंने मरुत्तके यज्ञमें उस समय खूब सोमरसका पान किया था । राजाने जो दक्षिणाएँ दी थीं, वे देवताओं, मनुष्यों और गन्धर्वोंके सभी यज्ञोंसे बढ़कर थीं ॥

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ २४ ॥

- ‘ सृजय! धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य– इन चारों बातोंमें राजा मरुत्त तुमसे बढ़-चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये, तब औरोंकी क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो ॥ २४ ॥

सुहोत्रं चैवातिथिनं मृतं संजय शुश्रुम ।

यस्मिन् हिरण्यं ववृषे मघवा परिवत्सरम् ॥ २५ ॥

‘ सृजय! अतिथिसत्कारके प्रेमी राजा सुहोत्र भी जीवित नहीं रहे, ऐसा सुननेमें आया है । उनके राज्यमें इन्द्रने एक वर्षतक सोनेकी वर्षा की थी ॥ २५ ॥

सत्यनामा वसुमती यं प्राप्यासीज्जनाधिपम् ।

हिरण्यमवहन् नद्यस्तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥ २६ ॥

' राजा सुहोत्रको पाकर पृथ्वीका वसुमती नाम सार्थक हो गया था । जिस समय वे जनपदके स्वामी थे, उन दिनों वहाँकी नदियाँ अपने जलके साथ- साथ सुवर्ण बहाया करती थीं ॥ २६ ॥

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कूर्मान् कर्कटकान् नक्रान् मकराञ्छिंशुकानपि ।

नदीष्वपातयद् राजन् मघवा लोकपूजितः ॥ २७ ॥

‘ राजन्! लोकपूजित इन्द्रने सोनेके बने हुए बहुत - से कछुए, केकड़े, नाके, मगर, सूँस और मत्स्य उन नदियोंमें गिराये थे ॥ २७ ॥

हिरण्यान् पातितान् दृष्ट्वा मत्स्यान् मकरकच्छपान् ।

सहस्रशोऽथ शतशस्ततोऽस्मयदथोऽतिथिः ॥ २८ ॥

' उन नदियोंमें सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें सुवर्णमय मत्स्यों, ग्राहों और कछुओंको गिराया गया देख अतिथिप्रिय राजा सुहोत्र आश्चर्यचकित हो उठे थे ॥

तद्धिरण्यमपर्यन्तमावृतं कुरुजाङ्गले ।

ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यः समार्पयत् ॥ २ ९ ॥

‘ वह अनन्त सुवर्णराशि कुरुजांगल देशमें छा गयी थी । राजा सुहोत्रने वहाँ यज्ञ किया और उसमें वह सारी धनराशि ब्राह्मणोंमें बाँट दी ॥ २ ९ ॥

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ३० ॥

अदक्षिणमयज्वानं श्वैत्य संशाम्य मा शुचः । ‘श्वेतपुत्र संजय! वे धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य–इन चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़ - चढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये, तब दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो । उसने न तो कोई यज्ञ किया था और न दक्षिणा ही बाँटी थी, अतः उसके लिये शोक न करो, शान्त हो जाओ ॥ ३० ॥

अङ्गं बृहद्रथं चैव मृतं संजय शुश्रुम ॥ ३१ ॥

यः सहस्रं सहस्राणां श्वेतानश्वानवासृजत् ।

सहस्रं च सहस्राणां कन्या हेमपरिष्कृताः ॥ ३२ ॥

ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् । ‘ सृजय! अंगदेशके राजा बृहद्रथकी भी मृत्यु हुई थी, ऐसा हमने सुना है । उन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमें दस लाख श्वेत घोड़े और सोनेके आभूषणोंसे भूषित दस लाख कन्याएँ दक्षिणारूपमें बाँटी थीं ॥ ३१-३२३ ॥ यः सहस्रं सहस्राणां गजानां पद्ममालिनाम् ॥ ३३ ॥

ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् । 'इसी प्रकार यजमान बृहद्रथने उस विस्तृत यज्ञमें सुवर्णमय कमलोंकी मालाओंसे अलंकृत दस लाख हाथी भी दक्षिणामें बाँटे थे ॥ ३३ ॥

शतं शतसहस्राणि वृषाणां हेममालिनाम् ॥ ३४ ॥

गवां सहस्रानुचरं दक्षिणामत्यकालयत् ।

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‘ उन्होंने उस यज्ञमें एक करोड़ सुवर्णमालाधारी गाय, बैल और उनके सहस्रों सेवक दक्षिणारूपमें दिये थे ॥ अङ्गस्य यजमानस्य तदा विष्णुपदे गिरौ ॥ ३५ ॥

अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः । ‘ यजमान अंग जब विष्णुपद पर्वतपर यज्ञ कर रहे थे, उस समय इन्द्र वहाँ सोमरस पीकर मतवाले हो उठे थे और दक्षिणाओंसे ब्राह्मणोंपर भी आनन्दोन्माद छा गया था ॥ ३५ ¾ ॥ यस्य यज्ञेषु राजेन्द्र शतसंख्येषु वै पुरा ॥ ३६ ॥

देवान् मनुष्यान् गन्धर्वानत्यरिच्यन्त दक्षिणाः । ' राजेन्द्र! प्राचीन कालमें अंगराजने ऐसे - ऐसे सौ यज्ञ किये थे और उन सबमें जो दक्षिणाएँ दी गयी थीं, वे देवताओं, गन्धर्वों और मनुष्योंके यज्ञोंसे बढ़ गयी थीं ॥ न जातो जनिता नान्यः पुमान् यः सम्प्रदास्यति ॥ ३७ ॥

यदङ्गः प्रददौ वित्तं सोमसंस्थासु सप्तसु । ‘ अंगराजने सातों सोम- संस्थाओं में जो धन दिया था, उतना जो दे सके, ऐसा दूसरा न तो कोई मनुष्य पैदा हुआ है और न पैदा होगा ॥ ३७३ ॥

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ॥ ३८ ॥

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः । ' सृजय! पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे बृहद्रथ तुमसे बहुत बढ़े - चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये तो दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये संतप्त न होओ ॥ ३८३ ॥

शिबिमौशीनरं चैव मृतं सृजय शुश्रुम ॥ ३ ९ ॥ य इमां पृथिवीं सर्वां चर्मवत्समवेष्टयत् । ‘ सृजय! जिन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीको चमड़ेकी भाँति लपेट लिया था ( सर्वथा अपने अधीन कर लिया था ), वे उशीनरपुत्र राजा शिबि भी मरे थे, यह हमने सुना है ॥ ३ ९ ३ ॥ महता रथघोषेण पृथिवीमनुनादयन् ॥ ४० ॥

एकच्छत्रां महीं चक्रे जैत्रेणैकरथेन यः । ‘ वे अपने रथकी गम्भीर ध्वनिसे पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए एकमात्र विजयशील रथके द्वारा इस भूमण्डलका एकछत्र शासन करते थे ॥ ४० ॥

यावदद्य गवाश्वं स्यादारण्यैः पशुभिः सह ॥ ४१ ॥

तावतीः प्रददौ गाः स शिबिरौशीनरोऽध्वरे । ‘ आज संसारमें जंगली पशुओंसहित जितने गाय- बैल और घोड़े हैं, उतनी संख्यामें उशीनरपुत्र शिबिने अपने यज्ञमें केवल गौओंका दान किया ॥ ४१ ॥

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न वोढारं धुरं तस्य कश्चिन्मेने प्रजापतिः ॥ ४२ ॥

न भूतं न भविष्यं च सर्वराजसु सृजय ।

अन्यत्रौशीनराच्छैब्याद् राजर्षेरिन्द्रविक्रमात् ॥ ४३ ॥

‘ सृजय! प्रजापति ब्रह्माने इन्द्रके तुल्य पराक्रमी उशीनरपुत्र राजा शिबिके सिवा सम्पूर्ण राजाओंमें भूत या भविष्यकालके दूसरे किसी राजाको ऐसा नहीं माना, जो शिबिका कार्यभार वहन कर सकता हो ॥ ४२-४३ ॥ अदक्षिणमयज्वानं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ४४ ॥

‘ सृजय! राजा शिबि पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े- चढ़े थे । तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये तब दूसरेकी क्या बात है, अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक मत करो । उसने न तो कोई यज्ञ किया था, न दक्षिणा ही दी थी; अतः उस पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ४४ ॥

भरतं चैव दौष्यन्तिं मृतं सृजय शुश्रुम ।

शाकुन्तलं महात्मानं भूरिद्रविणसंचयम् ॥ ४५ ॥

' संजय! दुष्यन्त और शकुन्तलाके पुत्र महाधनी महामनस्वी भरत भी मृत्युके अधीन हो गये, यह हमने सुना था ॥ ४५ ॥

यो बद्ध्वा त्रिशतं चाश्वान् देवेभ्यो यमुनामनु ।

सरस्वतीं विंशतिं च गङ्गामनु चतुर्दश ॥ ४६ ॥

अश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च ।

इष्टवान् स महातेजा दौष्यन्तिर्भरतः पुरा ॥ ४७ ॥

'उन महातेजस्वी दुष्यन्तकुमार भरतने पूर्वकालमें देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यमुनाके तटपर तीन सौ, सरस्वतीके तटपर बीस और गंगाके तटपर चौदह घोड़े बाँधकर उतने - उतने अश्वमेध यज्ञ किये थे । उन्होंने अपने जीवनमें एक सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ सम्पन्न किये थे ॥ ४६-४७ ॥

भरतस्य महत् कर्म सर्वराजसु पार्थिवाः ।

खं मर्त्या इव बाहुभ्यां नानुगन्तुमशक्नुवन् ॥ ४८ ॥

'जैसे मनुष्य दोनों भुजाओंसे आकाशको तैर नहीं सकते, उसी प्रकार सम्पूर्ण राजाओंमें भरतका जो महान् कर्म है, उसका दूसरे राजा अनुकरण न कर सके ॥ ४८ ॥

परं सहस्राद् यो बद्धान् हयान् वेदीर्वितत्य च ।

सहस्रं यत्र पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ ॥ ४ ९ ॥

‘ उन्होंने सहस्रसे भी अधिक घोड़े बाँधे और यज्ञ वेदियोंका विस्तार करके अश्वमेध यज्ञ किये । उसमें भरतने आचार्य कण्वको एक हजार सुवर्णके बने हुए कमल भेंट

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किये ॥ ४ ९ ॥

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ५० ॥

'सृजय! वे साम, दान, दण्ड और भेद - इन चार कल्याणमयी नीतियों अथवा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य–इन चार मंगलकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रकी

अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मर गये, तब दूसरा कौन जीवित रह सकता है ।

अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ५० ॥

रामं दाशरथिं चैव मृतं सृजय शुश्रुम ।

योऽन्वकम्पत वै नित्यं प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ॥ ५१ ॥

' सृजय! सुननेमें आया है कि दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामजी भी यहाँसे परम धामको चले गये थे, जो सदा अपनी प्रजापर वैसी ही कृपा रखते थे, जैसे -पिता अपने औरस पुत्रोंपर रखता है ॥ ५१ ॥

विधवा यस्य विषये नानाथाः काश्चनाभवन् ।

सदैवासीत् पितृसमो रामो राज्यं यदन्वशात् ॥ ५२ ॥

‘ उनके राज्यमें कोई भी स्त्री अनाथ-विधवा नहीं हुई। श्रीरामचन्द्रजीने जबतक राज्यका शासन किया, तबतक वे अपनी प्रजाके लिये सदा ही पिताके समान कृपालु बने रहे ॥ ५२ ॥

कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि समपादयत् ।

नित्यं सुभिक्षमेवासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५३ ॥

‘ मेघ समयपर वर्षा करके खेतीको अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता था — उसे बढ़ने और फूलने -फलनेका अवसर देता था । रामके राज्य- शासनकालमें सदा सुकाल ही रहता था ( कभी अकाल नहीं पड़ता था) ॥

प्राणिनो नाप्सु मज्जन्ति नान्यथा पावकोऽदहत् ।

रुजाभयं न तत्रासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५४ ॥

' रामके राज्यका शासन करते समय कभी कोई प्राणी जलमें नहीं डूबते थे, आग अनुचितरूपसे कभी किसीको नहीं जलाती थी तथा किसीको रोगका भय नहीं होता था ॥ ५४ ॥

आसन् वर्षसहस्रिण्यस्तथा वर्षसहस्रकाः ।

अरोगाः सर्वसिद्धार्था रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५५ ॥

' श्रीरामचन्द्रजी जब राज्यका शासन करते थे, उन दिनों हजार वर्षतक जीनेवाली स्त्रियाँ और सहस्रों वर्षतक जीवित रहनेवाले पुरुष थे । किसीको कोई रोग नहीं सताता था, सभीके सारे मनोरथ सिद्ध होते थे ॥ नान्योऽन्येन विवादोऽभूत् स्त्रीणामपि कुतो नृणाम् ।

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धर्मनित्याः प्रजाश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५६ ॥

‘स्त्रियोंमें भी परस्पर विवाद नहीं होता था; फिर पुरुषोंकी तो बात ही क्या है? श्रीरामके राज्य - शासनकालमें समस्त प्रजा सदा धर्ममें तत्पर रहती थी ॥

संतुष्टाः सर्वसिद्धार्था निर्भयाः स्वैरचारिणः ।

नराः सत्यव्रताश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५७ ॥

‘ श्रीरामचन्द्रजी जब राज्य करते थे, उस समय सभी मनुष्य संतुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वाधीन और सत्यव्रती थे ॥ ५७ ॥

नित्यपुष्पफलाश्चैव पादपा निरुपद्रवाः ।

सर्वा द्रोणदुघा गावो रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५८ ॥

‘ श्रीरामके राज्यशासनकालमें सभी वृक्ष बिना किसी विघ्न- बाधाके सदा फले - फूले रहते थे और समस्त गौएँ एक- एक दोन दूध देती थीं ॥ ५८ ॥

स चतुर्दशवर्षाणि वने प्रोष्य महातपाः ।

दशाश्वमेधान् जारूथ्यानाजहार निरर्गलान् ॥ ५ ९ ॥

‘महातपस्वी श्रीरामने चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करके राज्य पानेके अनन्तर दस ऐसे अश्वमेध यज्ञ किये, जो सर्वथा स्तुतिके योग्य थे तथा जहाँ किसी भी याचकके लिये दरवाजा बंद नहीं होता था ॥ ५ ९ ॥

युवा श्यामो लोहिताक्षो मातङ्ग इव यूथपः ।

आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥ ६० ॥

' श्रीरामचन्द्रजी नवयुवक और श्याम वर्णवाले थे । उनकी आँखोंमें कुछ - कुछ लालिमा शोभा देती थी । वे यूथपति गजराजके समान शक्तिशाली थे । उनकी बड़ी- बड़ी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं । उनका मुख सुन्दर और कंधे सिंहके समान थे ॥ ६० ॥

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।

अयोध्याधिपतिर्भुत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥ ६१ ॥

‘ श्रीरामने अयोध्याके अधिपति होकर ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था ॥ ६१ ॥

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ६२ ॥

‘ सृजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े - चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी यहाँ रह न सके, तब दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम्हें अपने पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ६२ ॥

भगीरथं च राजानं मृतं सृजय शुश्रुम ।

यस्येन्द्रो वितते यज्ञे सोमं पीत्वा मदोत्कटः ॥ ६३ ॥

असुराणां सहस्राणि बहूनि सुरसत्तमः ।

अजयद् बाहुवीर्येण भगवान् पाकशासनः ॥ ६४ ॥

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' सृजय! राजा भगीरथ भी कालके गालमें चले गये, ऐसा हमने सुना है । जिनके विस्तृत यज्ञमें सोम पीकर मदोन्मत्त हुए सुरश्रेष्ठ भगवान् पाकशासन इन्द्रने अपने बाहुबलसे कई सहस्र असुरोंको पराजित किया ॥

यः सहस्रं सहस्राणां कन्या हेमविभूषिताः ।

ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ॥ ६५ ॥

‘ जिन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित दस लाख कन्याओंका दक्षिणारूपमें दान किया था ॥ ६५ ॥

सर्वा रथगताः कन्या रथाः सर्वे चतुर्युजः ।

शतं शतं रथे नागाः पद्मिनो हेममालिनः ॥ ६६ ॥

‘ वे सभी कन्याएँ अलग- अलग रथमें बैठी हुई थीं । प्रत्येक रथमें चार- चार घोड़े जुते हुए थे । हर एक रथके पीछे सोनेकी मालाओंसे विभूषित तथा मस्तकपर कमलके चिह्नोंसे अलंकृत सौ -सौ हाथी थे ॥ ६६ ॥

सहस्रमश्वा एकैकं हस्तिनं पृष्ठतोऽन्वयुः ।

गवां सहस्रमश्वेऽश्वे सहस्त्रं गव्यजाविकम् ॥ ६७ ॥

‘ प्रत्येक हाथीके पीछे एक-एक हजार घोड़े, हर एक घोड़के पीछे हजार-हजार गायें और एक- एक गायके साथ हजार- हजार भेड़ - बकरियाँ चल रही थीं ॥ ६७ ॥

उपह्वरे निवसतो यस्याङ्के निषसाद ह ।

गङ्गा भागीरथी तस्मादुर्वशी चाभवत् पुरा ॥ ६८ ॥

' तटके निकट निवास करते समय गंगाजी राजा भगीरथकी गोदमें आ बैठी थीं ।

इसलिये वे पूर्वकालमें भागीरथी और उर्वशी नामसे प्रसिद्ध हुईं ॥ ६८ ॥

भूरिदक्षिणमिक्ष्वाकुं यजमानं भगीरथम् ।

त्रिलोकपथगा गङ्गा दुहितृत्वमुपेयुषी ॥ ६ ९ ॥

‘ त्रिपथगामिनी गंगाने पुत्रीभावको प्राप्त होकर पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले इक्ष्वाकुवंशी यजमान भगीरथको अपना पिता माना ॥ ६ ९ ॥

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ७० ॥

संजय! वे पूर्वोक्त चारों बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े- चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे अधिक पुण्यात्मा थे, जब वे भी कालसे न बच सके तो दूसरोंके लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो ॥

दिलीपं च महात्मानं मृतं सृजय शुश्रुम ।

यस्य कर्माणि भूरीणि कथयन्ति द्विजातयः ॥ ७१ ॥

‘ सृजय! महामना राजा दिलीप भी मरे थे, यह सुननेमें आया है । उनके महान् कर्मोंका आज भी ब्राह्मणलोग वर्णन करते हैं ॥ ७१ ॥

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य इमां वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः ।

ददौ तस्मिन् महायज्ञे ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥ ७२ ॥

'एकाग्रचित्त हुए उन नरेशने अपने उस महायज्ञमें रत्न और धनसे परिपूर्ण इस सारी पृथ्वीका ब्राह्मणोंके लिये दान कर दिया था ॥ ७२ ॥

यस्येह यजमानस्य यज्ञे यज्ञे पुरोहितः ।

सहस्रं वारणान् हैमान् दक्षिणामत्यकालयत् ॥ ७३ ॥

‘ यजमान दिलीपके प्रत्येक यज्ञमें पुरोहितजी सोनेके बने हुए एक हजार हाथी दक्षिणारूपमें पाकर उन्हें अपने घर ले जाते थे ॥ ७३ ॥

यस्य यज्ञे महानासीद् यूपः श्रीमान् हिरण्मयः ।

तं देवाः कर्म कुर्वाणाः शक्रज्येष्ठा उपाश्रयन् ॥ ७४ ॥

‘ उनके यज्ञमें सोनेका बना हुआ कालियुक्त बहुत बड़ा यूप शोभा पाता था । यज्ञकर्म करते हुए इन्द्र आदि देवता सदा उसी यूपका आश्रय लेकर रहते थे ॥ ७४ ॥

चषाले यस्य सौवर्णे तस्मिन् यूपे हिरण्मये ।

ननृतुर्देवगन्धर्वाः षट् सहस्राणि सप्तधा ॥ ७५ ॥

अवादयत् तत्र वीणां मध्ये विश्वावसुः स्वयम् ।

सर्वभूतान्यमन्यन्त मम वादयतीत्ययम् ॥ ७६ ॥

‘ उनके उस सुवर्णमय यूपमें जो सोनेका चषाल ( घेरा ) बना था, उसके ऊपर छः हजार देवगन्धर्व नृत्य किया करते थे । वहाँ साक्षात् विश्वावसु बीचमें बैठकर सात स्वरोंके अनुसार वीणा बजाया करते थे । उस समय सब प्राणी यही समझते थे कि ये मेरे ही आगे बाजा बजा रहे हैं ॥ ७५-७६ ॥

एतद् राज्ञो दिलीपस्य राजानो नानुचक्रिरे ।

यस्येभा हेमसंछन्नाः पथि मत्ताः स्म शेरते ॥ ७७ ॥

राजानं शतधन्वानं दिलीपं सत्यवादिनम् ।

येऽपश्यन् सुमहात्मानं तेऽपि स्वर्गजितो नराः ॥ ७८ ॥

‘ राजा दिलीपके इस महान् कर्मका अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सके । उनके सुनहरे साज- बाज और सोनेके आभूषणोंसे सजे हुए मतवाले हाथी रास्तेपर सोये रहते थे । सत्यवादी शतधन्वा महामनस्वी राजा दिलीपका जिन लोगोंने दर्शन किया था, उन्होंने भी स्वर्गलोकको जीत लिया ॥ ७७-७८ ॥

त्रयः शब्दा न जीर्यन्ते दिलीपस्य निवेशने ।

स्वाध्यायघोषो ज्याघोषो दीयतामिति वै त्रयः ॥ ७ ९ ॥

‘ महाराज दिलीपके भवनमें वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष, शूरवीरोंके धनुषकी टंकार तथा ‘ दान दो' की पुकार– ये तीन प्रकारके शब्द कभी बंद नहीं होते थे ॥ ७ ९ ॥ स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

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पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ८० ॥

‘ सृजय! वे राजा दिलीप चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़कर थे । तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा` थे । जब वे भी मर गये तो दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ८० ॥

मान्धातारं यौवनाश्वं मृतं सृजय शुश्रुम ।

यं देवा मरुतो गर्भं पितुः पार्श्वादपाहरन् ॥ ८१ ॥

' सृजय! जिन्हें मरुत् नामक देवताओंने गर्भावस्थामें पिताके पार्श्वभागको फाड़कर निकाला था, वे युवनाश्वके पुत्र मान्धाता भी मृत्युके अधीन हो गये, यह हमारे सुननेमें आया है ॥ ८१ ॥

समृद्धो युवनाश्वस्य जठरे यो महात्मनः ।

पूषदाज्योद्भवः श्रीमांस्त्रिलोकविजयी नृपः ॥ ८२ ॥

‘ त्रिलोकविजयी श्रीमान् राजा मान्धाता पृषदाज्य ( दधिमिश्रित घी जो पुत्रोत्पत्तिके लिये तैयार करके रखा गया था ) से उत्पन्न हुए थे । वे अपने पिता महामना युवनाश्वके पेटमें ही पले थे ॥ ८२ ॥

यं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शयानं देवरूपिणम् ।

अन्योन्यमब्रुवन् देवाः कमयं धास्यतीति वै ॥ ८३ ॥

' जब वे शिशु - अवस्थामें पिताके पेटसे पैदा हो उनकी गोदमें सो रहे थे, उस समय उनका रूप देवताओंके बालकोंके समान दिखायी देता था । उस अवस्थामें उन्हें देखकर देवता आपसमें बात करने लगे ' यह मातृहीन बालक किसका दूध पीयेगा' ॥ ८३ ॥

मामेव धास्यतीत्येवमिन्द्रोऽथाभ्युपपद्यत ।

मान्धातेति ततस्तस्य नाम चक्रे शतक्रतुः ॥ ८४ ॥

'यह सुनकर इन्द्र बोल उठे ' मां धाता - मेरा दूध पीयेगा । ' जब इन्द्रने इस प्रकार उसे पिलाना स्वीकार कर लिया, तबसे उन्होंने ही उस बालकका नाम ' मान्धाता ' रख दिया ॥ ८४ ॥

ततस्तु पयसो धारां पुष्टिहेतोर्महात्मनः ।

तस्यास्ये यौवनाश्वस्य पाणिरिन्द्रस्य चास्रवत् ॥ ८५ ॥

‘ तदनन्तर उस महामनस्वी बालक युवनाश्वकुमारकी पुष्टिके लिये उसके मुखमें इन्द्रके हाथसे दूधकी धारा झरने लगी ॥ ८५ ॥

तं पिबन् पाणिमिन्द्रस्य शतमह्ना व्यवर्धत ।

स आसीद् द्वादशसमो द्वादशाहेन पार्थिवः ॥ ८६ ॥

' इन्द्रके उस हाथको पीता हुआ वह बालक एक ही दिनमें सौ दिनके बराबर बढ़ गया । बारह दिनोंमें राजकुमार मान्धाता बारह वर्षकी अवस्थावाले बालकके समान हो गये ॥ ८६ ॥

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तमिमं पृथिवी सर्वा एकाह्ना समपद्यत ।

धर्मात्मानं महात्मानं शूरमिन्द्रसमं युधि ॥ ८७ ॥

‘ राजा मान्धाता बड़े धर्मात्मा और महामनस्वी थे । युद्धमें इन्द्रके समान शौर्य प्रकट करते थे । यह सारी पृथ्वी एक ही दिनमें उनके अधिकारमें आ गयी थी ॥

यश्चाङ्गारं तु नृपतिं मरुत्तमसितं गयम् ।

अङ्गं बृहद्रथं चैव मान्धाता समरेऽजयत् ॥ ८८ ॥

‘ मान्धाताने समरांगणमें राजा अंगार, मरुत्त, असित, गय तथा अंगराज बृहद्रथको भी पराजित कर दिया था ॥

यौवनाश्वो यदाङ्गारं समरे प्रत्ययुध्यत ।

विस्फारैर्धनुषो देवा द्यौरभेदीति मेनिरे ॥ ८ ९ ॥

'जिस समय युवनाश्वपुत्र मान्धाताने रणभूमिमें राजा अङ्गारके साथ युद्ध किया था, उस समय देवताओंने ऐसा समझा कि ' उनके धनुषकी टंकारसे सारा आकाश ही फट पड़ा है ' ॥ ८९ ॥

यत्र सूर्य उदेति स्म यत्र च प्रतितिष्ठति ।

सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ ९ ० ॥

'जहाँ सूर्य उदय होते हैं वहाँसे लेकर जहाँ अस्त होते हैं वहाँतकका सारा देश युवनाश्वपुत्र मान्धाताका ही राज्य कहलाता था ॥ ९ ० ॥

अश्वमेधशतेनेष्ट्वा राजसूयशतेन च ।

अददाद् रोहितान् मत्स्यान् ब्राह्मणेभ्यो विशाम्पते ॥ ९ १ ॥

हैरण्यान योजनोत्सेधानायतान् दशयोजनम् ।

अतिरिक्तान् द्विजातिभ्यो व्यभजंस्त्वितरे जनाः ॥ ९ २ ॥

‘प्रजानाथ! उन्होंने सौ अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे तथा एक

योजन ऊँचे बहुत- से सोनेके रोहित नामक मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणोंको दान किये थे ।

ब्राह्मणोंके ले जानेसे जो बच गये, उन्हें दूसरे लोगोंने बाँट लिया ॥ ९ १ - ९ २ ॥

स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रनुतप्यथाः ॥ ९ ३ ॥

‘ सृजय! राजा मान्धाता चारों कल्याणमय गुणोंमें तुमसे बढ़े- चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे । जब वे भी मारे गये, तब तुम्हारे पुत्रकी क्या बिसात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ॥

ययातिं नाहुषं चैव मृतं सृजय शुश्रुम ।

य इमां पृथिवीं कृत्स्नां विजित्य सहसागराम् ॥ ९ ४ ॥

शम्यापातेनाभ्यतीयाद् वेदीभिश्चित्रयन् महीम् ।

ईजानः क्रतुभिर्मुख्यैः पर्यगच्छद् वसुन्धराम् ॥ ९ ५ ॥