वृत्रगीता : दुखों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का वास्तविक मार्ग क्या है?
आत्मज्ञान और भक्ति का मार्ग
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 279–280 · पृष्ठ 1796–1818
3,122 शब्द · 16 मिनटका पाठ · 28 श्लोक
युधिष्ठिर से कहा गया
पाण्डवों के दुखों और मोक्ष की जिज्ञासा निवारण हेतु
युधिष्ठिर ने पितामह की ओर देखते हुए अत्यन्त भारी मन से कहा— "पितामह! सभी लोग हमलोगोंको धन्य-धन्य कहते हैं, परन्तु हमलोगोंसे बढ़कर अत्यन्त दुखी दूसरा कोई मनुष्य नहीं है। कुरुश्रेष्ठ पितामह! देवताओंद्वारा मानवलोकमें जन्म पाकर तथा सब लोगोंद्वारा सम्मानित होकर भी हमें यहाँ महान् दुःख प्राप्त हुआ है। कुरुश्रेष्ठ! संसारी मनुष्य जिसे दुःख कहते है, उस सन्न्यासका अवलम्बन हमलोग कब करेंगे? हमें तो इन शरीरोंका धारण करना ही दुःख जान पड़ता है।"
कदा वयं करिष्यामः संन्यासं दुःखसंज्ञकम् ।
दुःखमेतच्छरीराणां धारणं कुरुसत्तम ॥
कुरुश्रेष्ठ! संसारी मनुष्य जिसे दुःख कहते हैं, उस संन्यासका अवलम्बन हमलोग कब करेंगे? हमें तो इन शरीरोंका धारण करना ही दुःख जान पड़ता है ।
युधिष्ठिर के स्वर में संसार की निष्ठुरता का बोध था। उन्होंने आगे कहा— "पितामह! पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्च प्राण, मन और बुद्धि – ये सत्रह तत्त्व; काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न – ये संसारके पाँच हेतु; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँच विषय; सत्त्व, रज और तम–ये तीन गुण तथा पाँच भूतोंसहित अविद्या, अहङ्कार और कर्म — ये आठ तत्त्वोंके समुदाय सब मिलाकर अड़तीस तत्त्व होते हैं। इन सबसे मुक्त हुए तीक्ष्ण व्रतधारी मुनि पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते हैं। परन्तप पितामह! हमलोग भी कब अपना राज्य छोड़कर इसी स्थितिको प्राप्त होंगे?"
विमुक्ताः सप्तदशभिर्हेतुभूतैश्च पञ्चभिः ।
इन्द्रियार्थैर्गुणैश्चैव अष्टाभिश्च पितामह ॥
न गच्छन्ति पुनर्भावं मुनयः संशितव्रताः ।
कदा वयं गमिष्यामो राज्यं हित्वा परंतप ॥
पितामह! पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, मन और बुद्धि – ये सत्रह तत्त्व; काम, क्रोध, लोभ, भय और स्वप्न – ये संसारके पाँच हेतु; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँच विषय; सत्त्व, रज और तम–ये तीन गुण तथा पाँच भूतोंसहित अविद्या, अहंकार और कर्म — ये आठ तत्त्वोंके समुदाय सब मिलाकर अड़तीस तत्त्व होते हैं । इन सबसे मुक्त हुए तीक्ष्ण व्रतधारी मुनि पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते हैं । परंतप पितामह! हमलोग भी कब अपना राज्य छोड़कर इसी स्थितिको प्राप्त होंगे ।
भीष्म ने युधिष्ठिर के संशयों को शान्त करते हुए कहा— "महाराज! दुःख अनन्त नहीं हैं। जगत्की सभी वस्तुएँ सङ्ख्याकी सीमामें ही हैं — असङ्ख्य नहीं हैं। पुनर्जन्म भी नश्वरताके लिये विख्यात ही है। तात्पर्य यह कि इस जगत्में कोई भी वस्तु अचल या स्थायी नहीं है। तुम जो ऐसा मानते हो कि ऐश्वर्य दोषकारक होता है, क्योंकि वह आसक्तिका हेतु होनेके कारण मोक्षका प्रतिबन्धक है तो तुम्हारी यह मान्यता ठीक नहीं है; क्योंकि तुम सब लोग धर्मके ज्ञाता हो। स्वयं ही उद्योग करके शम, दम आदि साधनोंद्वारा कुछ ही कालमें मोक्ष प्राप्त कर सकते हो।"
न चापि मन्यसे राजन्नेष दोषः प्रसङ्गतः ।
उद्योगादेव धर्मज्ञाः कालेनैव गमिष्यथ ॥
तुम जो ऐसा मानते हो कि ऐश्वर्य दोषकारक होता है, क्योंकि वह आसक्तिका हेतु होनेके कारण मोक्षका प्रतिबन्धक है तो तुम्हारी यह मान्यता ठीक नहीं है; क्योंकि तुम सब लोग धर्मके ज्ञाता हो । स्वयं ही उद्योग करके शम, दम आदि साधनोंद्वारा कुछ ही कालमें मोक्ष प्राप्त कर सकते हो ।
भीष्म ने आत्मा की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा— "नरेश्वर! यह जीवात्मा पुण्य और पाप के फल सुख और दुःख भोगनेमें स्वतन्त्र नहीं है, उन पुण्य और पापोंसे उत्पन्न संस्काररूप अन्धकारसे यह आच्छन्न हो जाता है। जैसे अन्धकारमयी वायु मैनसिलके लाल- पीले चूर्णमें प्रवेश करके उसीके रङ्गसे युक्त सम्पूर्ण दिशाओंको रँगती दिखायी देती है, उसी प्रकार स्वभावतः वर्णविहीन यह जीवात्मा तमोमय अज्ञानसे आवृत और कर्मफलसे रञ्जित हो वही वर्ण ग्रहण कर अर्थात् विभिन्न शरीरोंके धर्मोंको स्वीकार करके समस्त प्राणियोंके शरीरोंमें घूमता रहता है। जब जीव तत्त्वज्ञानद्वारा अज्ञानजनित अन्धकारको दूर कर देता है, तब उसके हृदयमें सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है। ऋषि-मुनि कहते हैं कि ब्रह्मकी प्राप्ति किसी क्रियात्मक यत्नसे साध्य नहीं है। इसके लिये तो देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्को और तुमको उन पुरुषोंकी उपासना करनी चाहिये, जो जीवन्मुक्त हैं; अतएव मैं महर्षियोंके समुदायको नमस्कार करता हूँ।"
ज्ञानेन हि यदा जन्तुरज्ञानप्रभवं तमः ।
व्यपोहति तदा ब्रह्म प्रकाशति सनातनम् ॥
जब जीव तत्त्वज्ञानद्वारा अज्ञानजनित अन्धकारको दूर कर देता है, तब उसके हृदयमें सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है ।
भीष्म ने कथा के प्रवाह को एक प्राचीन इतिहास की ओर मोड़ा— "नरेश्वर! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास कहा जाता है। उसे एकचित्त होकर सुनो। भरतनन्दन! पूर्वकालमें वृत्रासुर पराजित और ऐश्वर्य- भ्रष्ट हो गया था। उसका कोई सहायक नहीं रह गया था। देवताओंने उसका राज्य छीन लिया था। उस दशामें पड़कर भी उस असुरने जैसी चेष्टा की थी, उसीका इस कथामें वर्णन है। वह शत्रुओंके बीचमें रहकर भी आसक्तिशून्य बुद्धिका आश्रय ले शोक नहीं करता था।"
नेशेऽयं सततं देही नृपते पुण्यपापयोः ।
तत एव समुत्थेन तमसा रुध्यतेऽपि च ॥
नरेश्वर! यह जीवात्मा पुण्य और पापके फल सुख और दुःख भोगनेमें स्वतन्त्र नहीं है, उन पुण्य और पापोंसे उत्पन्न संस्काररूप अन्धकारसे यह आच्छन्न हो जाता है ।
भीष्म ने आगे बताया— "पूर्वकालकी बात है कि वृत्रासुरको ऐश्वर्यभ्रष्ट हुआ देख शुक्राचार्यने उससे पूछा — 'दानवराज! तुम्हें देवताओंने पराजित कर दिया है तो भी आजकल तुम्हारे चित्तमें किसी प्रकारकी व्यथा नहीं है; इसका क्या कारण है?' वृत्रासुरने कहा — 'ब्रह्मन्! मैंने सत्य और तपके प्रभावसे जीवोंके आवागमनका रहस्य निश्चितरूपसे जान लिया है; इसलिये मैं उसके विषयमें हर्ष और शोक नहीं करता हूँ। कालसे प्रेरित हुए जीव अपने पापकर्मोंके फलस्वरूप विवश होकर नरकमें डूबते हैं और पुण्य के फलसे वे सब - के - सब स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ आनन्द भोगते हैं। ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। इस प्रकार स्वर्ग अथवा नरकमें कर्मफलभोगद्वारा निश्चित समय व्यतीत करके भोगनेसे बचे हुए कर्म- सहित कालकी प्रेरणासे वे बारम्बार इस संसारमें जन्म लेते रहते हैं। कामनाओंके बन्धनमें बँधकर विवश हुए कितने ही जीव सहस्रों बार तिर्यक्योनि तथा नरकमें पड़कर पुनः वहाँसे निकलते हैं। इस प्रकार मैंने सभी जीवोंको जन्म- मरणके चक्कर में पड़ा हुआ देखा है। शास्त्रका भी ऐसा सिद्धान्त है कि जैसा कर्म होता है, वैसा ही फल मिलता है ॥ प्राणी पहले ही सुख- दुःख तथा प्रिय और अप्रिय विषयोंमें विचरण करके कर्मके अनुसार नरक, तिर्यग्योनि, मनुष्ययोनि अथवा देवयोनिमें जाते हैं। समस्त जीव जगत्- विधाताके विधानसे ही परिचालित हो सुख-दुःख पाता है और समस्त प्राणी सदा चले हुए मार्गपर ही चलते हैं'।"
क्षपयित्वा तु तं कालं गणितं कालचोदिताः ।
सावशेषेण कालेन सम्भवन्ति पुनः पुनः ॥
इस प्रकार स्वर्ग अथवा नरकमें कर्मफलभोगद्वारा निश्चित समय व्यतीत करके भोगनेसे बचे हुए'कर्म- सहित कालकी प्रेरणासे वे बारंबार इस संसारमें जन्म लेते रहते हैं ।
वृत्रासुर के इन वचनों को सुनकर भगवान् शुक्राचार्य ने कहा — "तात! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो, फिर ये असुरभावके विपरीत दोषयुक्त निरर्थक वचन कैसे कह रहे हो?" वृत्रासुर ने उत्तर दिया — "ब्रह्मन्! आपने तथा दूसरे मनीषी महानुभावोंने यह तो प्रत्यक्ष देखा है कि मैंने पहले विजयके लोभसे बड़ी भारी तपस्या की थी। मैं बलमें बहुत बढ़ा - चढ़ा था; अतः मैंने अपने ही तेजसे तीनों लोकोंपर आक्रमण करके दूसरे प्राणियोंको धूलमें मिलाकर उनके उपभोगकी गन्ध और रस आदि विविध वस्तुएँ छीन ली थीं। मेरे शरीरसे आगकी लपटें निकलती थीं और मैं ज्वालामालाओंसे घिरकर सदा आकाशमें निर्भय विचरता हुआ समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गया था। भगवन्! इस प्रकार मैंने तपस्याके प्रभावसे जो ऐश्वर्य प्राप्त किया था, वह मेरे अपने ही कर्मोंसे नष्ट हो गया। तथापि मैं धैर्य धारण करके उसके लिये शोक नहीं करता हूँ। महामनस्वी पुरुषप्रवर देवराज इन्द्र जब युद्धकी इच्छासे मेरे सामने आये, उस समय उनके साथ उन्हींकी सहायताके लिये आये हुए सबके प्रभु भगवान् श्रीनारायण हरिका मैंने दर्शन किया था। भगवन्! अवश्य ही मेरी उस तपस्याका कोई अंश अब भी शेष रह गया है, अतः मैं उस कर्मफलके विषयमें प्रश्न करना चाहता हूँ। अणिमा आदि ऐश्वर्य और महद् ब्रह्म किस वर्ण में प्रतिष्ठित हैं? तथा वह उत्तम ऐश्वर्य कैसे नष्ट हो जाता है? प्राणी किस हेतुसे जीवन धारण करते हैं? तथा किस कारणसे कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं? जीव किस परम फलको पाकर अविनाशी एवं सनातनरूपसे प्रतिष्ठित होता है? विप्रखवर! किस कर्म अथवा ज्ञानसे उस फलको प्राप्त किया जा सकता है? यह मुझे बताने कृपा करें।"
केन वा कर्मणा शक्यमथ ज्ञानेन केन वा ।
तदवाप्तुं फलं विप्र तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
विप्रवर! किस कर्म अथवा ज्ञानसे उस फलको प्राप्त किया जा सकता है? यह मुझे बताने कृपा करें ।
सूत ने कहा— "राजसिंह! पुरुषप्रवर युधिष्ठिर! उसके ऐसा प्रश्न करनेपर मुनिवर शुक्राचार्यने उस समय उसे जो उत्तर दिया, उसे मैं बता रहा हूँ, तुम अपने भाइयोंके साथ एकाग्रचित्त होकर सुनो। शुक्राचार्य और वृत्रासुरमें ये बातें हो ही रही थीं कि वहाँ महामुनि धर्मात्मा सनत्कुमार उनके संशयका निवारण करनेके लिये आ पहुँचे। असुरराज वृत्र और मुनि शुक्राचार्यके द्वारा पूजित हो मुनिवर सनत्कुमार एक बहुमूल्य सिंहासनपर विराजमान हुए। जब महाज्ञानी सनत्कुमार आरामसे बैठ गये, तब शुक्राचार्यने उनसे कहा — ‘भगवन्! आप इस दानवराजको भगवान् विष्णुका उत्तम माहात्म्य बताइये'।"
तमासीनं महाप्रज्ञमुशना वाक्यमब्रवीत् ।
ब्रूह्यस्मै दानवेन्द्राय विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ॥
जब महाज्ञानी सनत्कुमार आरामसे बैठ गये, तब शुक्राचार्यने उनसे कहा — ‘ भगवन्! आप इस दानवराजको भगवान् विष्णुका उत्तम माहात्म्य बताइये '
सनत्कुमारजी के आगमन पर शुक्राचार्य ने वृत्रासुर को भगवान् विष्णु की महिमा सुनाने का आग्रह किया। सनत्कुमार ने बोलना आरम्भ किया— "तात! आकाशसहित यह सारी पृथ्वी जिनकी भुजाओंके बलपर स्थित है, महान् प्रभावशाली उन भगवान् विष्णुदेवको नमस्कार है। दानवश्रेष्ठ! जिनका मस्तक और स्थान भी अनन्त है, उनका उत्तम माहात्म्य मैं तुम्हें बताऊँगा।"
प्रत्याह यत् तच्छृणु राजसिंह ।
मयोच्यमानं पुरुषर्षभ त्व- मनन्यचित्तः सह सोदरीयैः ॥
राजसिंह! पुरुषप्रवर युधिष्ठिर! उसके ऐसा प्रश्न करनेपर मुनिवर शुक्राचार्यने उस समय उसे जो उत्तर दिया, उसे मैं बता रहा हूँ, तुम अपने भाइयोंके साथ एकाग्रचित्त होकर सुनो ।
सनत्कुमार ने बोलना आरम्भ किया— "तात! आकाशसहित यह सारी पृथ्वी जिनकी भुजाओं के बल पर स्थित है, महान् प्रभावशाली उन भगवान् विष्णुदेव को नमस्कार है। दानवश्रेष्ठ! जिनका मस्तक और स्थान भी अनन्त है, उनका उत्तम माहात्म्य मैं तुम्हें बताऊँगा।"
शृणु सर्वमिदं दैत्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।
विष्णौ जगत् स्थितं सर्वमिति विद्धि परंतप ॥
‘ शत्रुओंको संताप देनेवाले दैत्य! भगवान् विष्णुका यह सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य सुनो— तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि यह समस्त संसार भगवान् विष्णुमें ही स्थित है ।
"शत्रुओं को सन्ताप देने वाले दैत्य! भगवान् विष्णु का यह सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य सुनो— तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि यह समस्त संसार भगवान् विष्णु में ही स्थित है। हे महाबाहो! ये श्रीविष्णु ही सम्पूर्ण चराचर प्राणिसमूह की सृष्टि करते हैं और ये ही समय आने पर उसका विनाश करते हैं एवं समय आने पर पुनः सृष्टि भी करते हैं। समस्त प्राणी इन्हीं में लय को प्राप्त होते हैं और इन्हीं से प्रकट भी होते हैं।"
सृजत्येष महाबाहो भूतग्रामं चराचरम् ।
एष चाक्षिपते काले काले विसृजते पुनः ॥
‘ पर महाबाहो! ये श्रीविष्णु ही सम्पूर्ण चराचर प्राणिसमुदायकी सृष्टि करते हैं और ये ही समय आनेपर उसका विनाश करते हैं एवं समय आनेपर पुनः सृष्टि भी करते हैं ।
सनत्कुमार के स्वर में गम्भीरता थी, उन्होंने आगे कहा— "इन्हें कोई शास्त्रज्ञान, तपस्या और यज्ञ के द्वारा भी नहीं पा सकता; केवल इन्द्रियों के संयम से ही उनकी उपलब्धि हो सकती है। जो बाह्य कर्मों—जैसे यज्ञ आदि—और आभ्यन्तर कर्मों—जैसे शम और दम आदि—में प्रवृत्त होकर मन में स्थिरता प्राप्त कर लेता है और बुद्धि को निर्मल बना लेता है, वही परलोक में अक्षय सुख यानी मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।"
अस्मिन् गच्छन्ति विलयमस्माच्च प्रभवन्त्युत ।
नैष ज्ञानवता शक्यस्तपसा नैव चेज्यया ।
सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणां तु संयमेनैव शक्यते ॥
' समस्त प्राणी इन्हींमें लयको प्राप्त होते हैं और इन्हींसे प्रकट भी होते हैं । इन्हें कोई शास्त्रज्ञान, तपस्या और यज्ञके द्वारा भी नहीं पा सकता । केवल इन्द्रियोंके संयमसे ही उनकी उपलब्धि हो सकती है ।
उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, "जैसे सोनार बारम्बार किए हुए अपने महान् प्रयत्न के द्वारा चाँदी को आग में डालकर शुद्ध करता है, उसी प्रकार जीव सैकड़ों जन्मों में अपने मन को शुद्ध कर पाता है; परन्तु यदि वह शम-दम आदि कर्मों द्वारा महान् प्रयत्न करे, तो एक ही जन्म में शुद्ध हो जाता है। जैसे शरीर से धूल को मनुष्य साधारण चेष्टा से झाड़ देता है, वैसे ही महान् प्रयत्न से राग-द्वेष के दोष दूर हो सकते हैं। किन्तु ध्यान रहे, जैसे थोड़े-से पुष्पों से वासित किया हुआ तिल या सरसों का तेल अपनी गन्ध नहीं छोड़ता, वैसे ही अल्प प्रयास से न तो दोष दूर होते हैं और न सूक्ष्म ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। वह तेल तभी सुगन्धित होता है जब उसे बहुत-से सुगन्धित पुष्पों द्वारा बारम्बार वासित किया जाए। उसी प्रकार सैकड़ों जन्मों के संसर्ग और गुणों के दोषों से बुद्धि और अभ्यासजनित यत्न द्वारा ही मुक्ति मिलती है।"
यथा हिरण्यकर्ता वै रूप्यमग्नौ विशोधयेत् ।
बहुशोऽतिप्रयत्नेन महताऽऽत्मकृतेन ह ॥
तद्वज्जाति शतैर्जीवः शुद्ध्यतेऽनेन कर्मणा ।
यत्नेन महता चैवाप्येकजातौ विशुद्ध्यते ॥
‘ जैसे सोनार बारंबार किये हुए अपने महान् प्रयत्नके द्वारा चाँदीको आगमें डालकर उसे शुद्ध करता है, उसी प्रकार जीव सैकड़ों जन्मोंमें अपने मनको शुद्ध कर पाता है; परंतु इस यज्ञ आदि और शम-दम आदि कर्मों द्वारा यदि वह महान् प्रयत्न करे तो एक ही जन्ममें शुद्ध हो जाता है ।
सनत्कुमार ने वृत्रासुर की दृष्टि अपनी ओर करते हुए कहा, "दनुनन्दन! कर्म से अनुरक्त और विरक्त होने वाले प्राणियों के विषय में मैं तुम्हें क्रमशः बताऊँगा। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। श्रीमान् भगवान् नारायण हरि और अन्त से रहित हैं। वे ही सम्पूर्ण प्राणियों की रचना करते हैं। वे ही समस्त प्राणियों में क्षर और अक्षर रूप से विद्यमान हैं। ग्यारह इन्द्रियों का जो वैकारिक सर्ग है, वह भी उन्हीं का स्वरूप है। वे अपनी चैतन्यमयी किरणों द्वारा सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त हो रहे हैं।"
कर्मणा स्वनुरक्तानि विरक्तानि च दानव ।
यथा कर्मविशेषांश्च प्राप्नुवन्ति तथा शृणु ॥
‘ दनुनन्दन! कर्मसे अनुरक्त और कर्मसे विरक्त होनेवाले प्राणिसमूह जिस प्रकार राग और विरागके हेतुभूत विभिन्न कर्मोंको प्राप्त होते हैं, वह सुनो ।
भगवान के विराट स्वरूप का वर्णन करते हुए सनत्कुमार बोले, "दैत्यराज! इस पृथ्वी को भगवान् विष्णु के दोनों चरण समझो, स्वर्गलोक को उनका मस्तक जानो। ये चारों दिशाएँ उनकी चार भुजाएँ हैं; आकाश उनके कान हैं, तेजस्वी सूर्य उनका नेत्र है, मन चन्द्रमा है और बुद्धि उनकी नित्य ज्ञानवृत्ति है। जल उनकी रसनेन्द्रिय है। सम्पूर्ण ग्रह उनकी दोनों भौंहों के बीच स्थित हैं और नक्षत्रमण्डल उनके नेत्रों से प्रकट हुआ है। यह पृथ्वी उनके चरणों में स्थित है।"
पादौ तस्य महीं विद्धि मूर्धानं दिवमित्युत ।
बाहवस्तु दिशो दैत्य श्रोत्रमाकाशमेव च ॥
तस्य तेजोमयः सूर्यो मनश्चन्द्रमसि स्थितम् ।
बुद्धिर्ज्ञानगता नित्यं रसस्त्वप्सु प्रतिष्ठितः ॥
‘ दैत्यराज! पृथ्वीको भगवान् विष्णुके दोनों चरण समझो, स्वर्गलोकको मस्तक जानो, ये चारों दिशाएँ उनकी चार भुजाएँ हैं, आकाश कान है, तेजस्वी सूर्य उनका नेत्र है, मन चन्द्रमा है, बुद्धि ( महत्तत्त्व ) उनकी नित्य ज्ञानवृत्ति है और जल रसनेन्द्रिय है ।
"हे दानवप्रवर! तुम उन्हें सम्पूर्ण भूतस्वरूप, इस जगत् का आदिकारण और परमेश्वर समझो। रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण—इन तीनों को नारायणमय ही मानो। समस्त आश्रमों का फल वे ही हैं। सन्न्यास का फल भी वे ही अविनाशी परमात्मा हैं। वेद-मन्त्र उनके रोम हैं और प्रणव उनकी वाणी है। हृदय में आश्रित धर्म भी उन्हीं का स्वरूप है। वे ही ब्रह्म हैं, वे ही तप और सदसत्स्वरूप हैं। श्रुति, शास्त्र और यज्ञ भी वे ही हैं। वे ही ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर हैं। उनका दर्शन पृथक्-पृथक् होने पर भी एक ही एकता को जानता है। तुम इस सम्पूर्ण जगत् को एक ही परमात्मदेव के अधीन समझो।"
बह्वाश्रयो बहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रितः ।
स ब्रह्म परमो धर्मस्तपश्च सदसच्च सः ॥
'बहुत - से वर्ण और आश्रम उनके आश्रय हैं, उनके अनेक मुख हैं । हृदयमें आश्रित धर्म भी उन्हींका स्वरूप है । वे ही ब्रह्म हैं । वे ही आत्मदर्शनरूप परम धर्म हैं । वे ही तप और सदसत्स्वरूप हैं ।
सनत्कुमार ने जीवों की गतियों का रहस्य खोलते हुए कहा, "दैत्यराज! जीव विज्ञानबल से ही ब्रह्म का साक्षात्कार करता है। कितने ही जीव करोड़ों कल्पों तक स्थावर रूप में एक स्थान पर रहते हैं और कितने इधर-उधर विचरते हैं। प्रजा के सृष्टिका परिमाण कई हजार बावड़ियों की सङ्ख्या के समान है। प्राणियों के वर्ण छः प्रकार के हैं— कृष्ण, धूम्र, नील, रक्त, हरिद्रा और शुक्ल। इनमें से कृष्ण, धूम्र और नील वर्ण का सुख मध्यम होता है। रक्तवर्ण विशेष रूप से सहन करने योग्य है, जबकि हरिद्रा जैसा पीला वर्ण सुख देने वाला है और शुक्ल वर्ण अत्यन्त सुखदायक होता है।"
अकमर्णः फलं चैव स एव परमव्ययः ।
छन्दांसि यस्य रोमाणि ह्यक्षरं च सरस्वती ॥
' कर्मोंका त्यागरूप जो संन्यास है, उसका फल भी वे ही अविनाशी परमात्मा हैं । वेद- मन्त्र उनके रोम हैं तथा प्रणव उनकी वाणी है ।
"दानवराज! शुक्ल वर्ण निर्मल और शोकहीन होने के कारण सिद्धिकारक है। जीव सहस्रों योनियों में जन्म लेने के बाद मनुष्य योनि में आकर सिद्धि प्राप्त करता है। देवराज इन्द्र ने जिस गति और दर्शन का वर्णन किया है, वह शुक्ल वर्ण वालों के लिए है। जीव के चौदह करण होते हैं—पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार। इन्हीं के भेद से चौदह लाख प्रकार की गतियां होती हैं।"
शतं सहस्राणि चतुर्दशेह परागतिर्जीवगणस्य दैत्य ।
आरोहणं तत्कृतमेव विद्धि स्थानं तथा निःसरणं च तेषाम् ॥
( पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – ये चौदह करण हैं । इन्हींके भेदसे चौदह प्रकारकी गति होती है । फिर विषयभेदसे वृत्तिभेद होनेके कारण चौदह लाख प्रकारकी गति होती है । ) जीवका जो ऊर्ध्वलोकोंमें गमन होता है, वह भी उन्हीं चौदह करणोंद्वारा सम्पादित होता है । विभिन्न स्थानोंमें जो स्थिरतापूर्वक निवास है, वह और उन स्थानोंसे जो उन जीवोंका अधःपतन होता है, वह भी उन्हींके सम्बन्धसे होता है । इस बातको तुम अच्छी तरह जान लो ( अतः इन चौदह करणोंको सात्त्विक मार्गाभिमुखी बनाना चाहिये )
"कृष्ण वर्ण की गति नीच बताई गई है; वह जीव नरक की आग में पकाया जाता है क्योंकि वह निषिद्ध कर्मों में आसक्त होता है। उसके बाद वह लाखों वर्षों तक दुःख सहकर धूम्र वर्ण पाता है, जो पशु-पक्षी आदि योनि है। फिर तप के प्रभाव से वह सत्त्वगुण की ओर बढ़ता है। जब वह अपने कल्याण हेतु प्रयत्न करता है, तब रक्त वर्ण प्राप्त करता है और अन्ततः नील वर्ण पाकर मनुष्य लोक में आता है। पीत वर्ण उसे देवता बनाता है, जहाँ सैकड़ों कल्प व्यतीत करने के पश्चात वह पुनः मनुष्य बनता है।"
कृष्णस्य वर्णस्य गतिर्निकृष्टा स सज्जते नरके पच्यमानः ।
स्थानं तथा दुर्गतिभिस्तु तस्य प्रजाविसर्गान् सुबहून् वदन्ति ॥
‘ कृष्णवर्णकी गति नीच बतायी गयी है । वह नरक प्रदान करनेवाले निषिद्ध कर्मोंमें आसक्त होता है, इसीलिये नरककी आगमें पकाया जाता है । वह कुमार्ग में प्रवृत्त हुए पूर्वोक्त चौदह करणोंद्वारा पापाचार करनेके कारण अनेक कल्पोंतक नरकमें ही निवास करता है-ऐसा ऋषि -मुनि कहते हैं ।
'दैत्य! सहस्रों कल्पोंतक देवरूपसे विचरते रहनेपर भी जीव विषयभोगसे मुक्त नहीं होता तथा प्रत्येक कल्पमें किये हुए अशुभ कर्मोंके फलोंको नरकमें रहकर भोगता हुआ जीव उन्नीस हजार विभिन्न गतियोंको प्राप्त होता है। तत्पश्चात् उसे नरकसे छुटकारा मिलता है। मनुष्यके सिवा अन्य सभी योनियोंमें केवल सुख-दुःखके भोग प्राप्त होते हैं। मोक्षका सुयोग हाथ नहीं लगता है। इस बातको तुम्हें भलीभाँति समझ लेना चाहिये।'
'वह जीव निरन्तर देवलोकमें विहार करता है और वहाँसे भ्रष्ट होनेपर मनुष्ययोनिको प्राप्त होता है। मर्त्यलोकमें वह आठ सौ कल्पोंतक बारम्बार जन्म लेता रहता है। तत्पश्चात् शुभकर्म करके वह पुनः देवभावको प्राप्त करता है। यह आवागमनका चक्र तभीतक चलता है, जब तक जीवको परमज्ञान या अनन्य भक्तिकी प्राप्ति नहीं हो जाती; उसकी प्राप्ति होनेपर तो वह मुक्त या परमात्माको प्राप्त हो जाता है।'
स देवलोके विहरत्यभीक्ष्णं ततश्च्युतो मानुषतामुपैति ।
संहारविक्षेपशतानि चाष्टौ मर्त्येषु तिष्ठत्यमृतत्वमेति ॥
‘ वह जीव निरन्तर देवलोकमें विहार करता है और वहाँसे भ्रष्ट होनेपर मनुष्ययोनिको प्राप्त होता है । मर्त्यलोकमें वह आठ सौ कल्पोंतक बारंबार जन्म लेता रहता है । तत्पश्चात् शुभकर्म करके वह पुनः देवभावको प्राप्त करता है ( यह आवागमनका चक्र तभीतक चलता है, जबतक जीवको परमज्ञान या अनन्य भक्तिकी प्राप्ति नहीं हो जाती, उसकी प्राप्ति होनेपर तो वह मुक्त या परमात्माको प्राप्त हो जाता है । )
'असुरोंके प्रमुख वीर! वह जीव कालक्रमसे अशुभ कर्म करके कभी-कभी मर्त्यलोकसे भी नीचे गिर जाता है और सबसे निकृष्ट, तलप्रदेशकी भाँति निम्नतम, कृष्णवर्ण स्थावर योनि में जन्म ग्रहण करके स्थित होता है। इस प्रकार उत्थान-पतनके चक्र में पड़े हुए इस जीवसमूहको जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त होती है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ।'
सोऽस्मादथ भ्रश्यति कालयोगात् कृष्णे तले तिष्ठति सर्वकृष्टे ।
यथा त्वयं सिद्ध्यति जीवलोक- स्तत् तेऽभिधास्याम्यसुरप्रवीर ॥
' असुरोंके प्रमुख वीर! वह जीव कालक्रमसे अशुभ कर्म करके कभी - कभी मर्त्यलोकसे भी नीचे गिर जाता है और सबसे निकृष्ट, तलप्रदेशकी भाँति निम्नतम, कृष्णवर्ण ( स्थावर योनि) में जन्म ग्रहण करके स्थित होता है । इस प्रकार उत्थान- पतनके चक्रमें पड़े हुए इस जीवसमूहको जिस प्रकार सिद्धि ( मुक्ति) प्राप्त होती है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ ।
'क्रमशः रक्तवर्ण (अनुग्राहक देवता), हरिद्रावर्ण (देवता) तथा शुक्लवर्ण (सनकादिकुमारों जैसा सिद्ध शरीरधारी) होकर वह जीव बारी-बारीसे सात सौ दिव्य शरीरोंका आश्रय ले भू आदि सात उत्तमोत्तम लोकोंमें विचरण करके पूर्व पुण्यके प्रभावसे वेगपूर्वक विशुद्ध ब्रह्मलोक में चला जाता है। महानुभाव वृत्रासुर! प्रकृति, महत्तत्त्व, अहङ्कार और पञ्चतन्मात्राएँ — ये आठ, तथा दूसरे साठ तत्त्व और इनकी जो सैकड़ों वृत्तियाँ हैं - ये सब महातेजस्वी योगियों के मनके द्वारा अवरुद्ध की हुई होती हैं तथा सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणोंको भी वे अवरुद्ध कर देते हैं। अतः शुक्लवर्णवाले (सनकादिकों के समान सिद्ध) पुरुष को जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वही उन योगियों को मिलती है।'
'जो परमगति छठे शुक्ल वर्णके साधकको मिलती है, उसे पाने का अधिकार भ्रष्ट करके भी जो असिद्ध हो रहा है एवं जिसके समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं ऐसा योगी भी यदि योगजनित ऐश्वर्यके सुखभोग की वासनाका त्याग करनेमें असमर्थ है तो वह न चाहनेपर भी एक कल्पतक अपनी साधनाके फलरूप महर, जन, तप और सत्य — इन चारों लोकोंमें क्रमशः निवास करता है। किन्तु जो भलीभाँति योगसाधनमें असमर्थ है, वह योगभ्रष्ट पुरुष सौ कल्पोंतक ऊपरके सात लोकोंमें निवास करता है। फिर बचे हुए कर्मसंस्कारोंके सहित वहाँसे लौटकर मनुष्यलोकमें पहलेसे बढ़कर महत्त्व सम्पन्न हो मनुष्यशरीरको पाता है। तदनन्तर मनुष्ययोनिसे निकलकर वह उत्तरोत्तर श्रेष्ठ देवादि योनियोंकी ओर अग्रसर होता है एवं सातों लोकोंमें प्रभावशाली होकर एक कल्पतक निवास करता है। मनुष्यलोकमें भलीभाँति शोक-मोहसे रहित होकर निवास करता है। तदनन्तर शरीरका अन्त होनेपर वह अव्यय एवं अनन्त स्थान को प्राप्त कर लेता है। वह अव्यय एवं अनन्त स्थान किसीके मतमें महादेवजीका कैलासधाम है; किसीके मतमें भगवान् विष्णुका वैकुण्ठधाम है; किसीके मतमें ब्रह्माजीका सत्यलोक है; कोई-कोई उसे भगवान् शेष या अनन्तका धाम बताते हैं; कोई वह जीवका ही परमधाम है - ऐसा कहते हैं और कोई-कोई उसे सर्वव्यापी चिन्मय प्रकाशसे युक्त परब्रह्मका स्वरूप बताते हैं।'
शेषस्य चैवाथ नरस्य चैव देवस्य विष्णोः परमस्य चैव ॥
मनुष्यलोकमें भलीभाँति ( शोक -मोहसे रहित होकर) निवास करता है । तदनन्तर शरीरका अन्त होनेपर वह अव्यय ( अविनाशी या निर्विकार) एवं अनन्त (देश, काल और वस्तुकृत परिच्छेदसे शून्य ) स्थान ( परब्रह्मपद) को प्राप्त होता है । वह अव्यय एवं अनन्त स्थान किसीके मतमें महादेवजीका कैलासधाम है । किसीके मतमें भगवान् विष्णुका वैकुण्ठधाम है । किसीके मतमें ब्रह्माजीका सत्यलोक है । कोई- कोई उसे भगवान् शेष या अनन्तका धाम बताते हैं । कोई वह जीवका ही परमधाम है - ऐसा कहते हैं और कोई - कोई उसे सर्वव्यापी चिन्मय प्रकाशसे युक्त परब्रह्मका स्वरूप बताते हैं ।
'ज्ञानाग्निके द्वारा जिनके सूक्ष्म, स्थूल और कारण- शरीर दग्ध हो गये हैं, वे प्रजाजन अर्थात् योगी लोग प्रलयकालमें सदा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। एवं जो ब्रह्मलोकसे नीचेके लोकोंमें रहनेवाले साधनशील दैवी प्रकृतिसे सम्पन्न साधक हैं, वे सब परब्रह्मको प्राप्त हो जाते हैं। प्रलयकालमें जो जीव देवभावको प्राप्त थे, वे यदि अपने सम्पूर्ण कर्मफलोंका उपभोग समाप्त करनेसे पहले ही लयको प्राप्त हो जाते हैं तो कल्पान्तर में पुनः प्रजाकी सृष्टि होनेपर वे शेष फलका उपभोग करनेके लिये उन्हीं स्थानोंको प्राप्त करते हैं, जो उन्हें पूर्वकल्पमें प्राप्त थे; किन्तु जो कल्पान्तमें उस योनिसम्बन्धी कर्मफल- भोगको पूर्ण कर चुके हैं, वे स्वर्गलोकका नाश हो जानेपर दूसरे कल्पमें उनके जैसे कर्म हैं, उसी के सदृश अन्य प्राणियोंकी भाँति मनुष्य योनिको ही प्राप्त होते हैं। जो योगी सिद्धलोकसे गिरकर मृत्युलोकमें आये हैं, उनके समान साधनबलसे सम्पन्न जो अन्य योगी हैं, वे भी एक लोकसे दूसरे लोकमें ऊपर उठते हुए क्रमशः उन सिद्ध पुरुषोंकी गतिको प्राप्त करते हैं। परन्तु जो वैसे नहीं हैं, वे विपरीतभावके कारण अपनी-अपनी गतिको प्राप्त होते हैं। विशुद्धभावसे सम्पन्न सिद्ध पुरुष जबतक पञ्चेन्द्रियरूप इस करणसमुदायका संयम करके शेष प्रारब्ध कर्मका उपभोग करता है, तबतक उसके शरीरमें समस्त प्रजागणोंका अर्थात् इन्द्रियोंके देवताओंका तथा अपरा और परा विद्याका निवास रहता है। जो साधक सदा शुद्ध मनसे उस विशुद्ध परमगतिका अनुसन्धान करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर अविकारी, दुर्लभ एवं सनातन ब्रह्मपदको प्राप्त करके वह उसीमें प्रतिष्ठित हो जाता है। उत्कृष्ट बलशाली दैत्यराज! इस प्रकार यहाँ मैंने तुमसे यह भगवान् नारायणका बल एवं प्रभाव बताया है।'
इत्येतदाख्यातमहीनसत्त्व नारायणस्येह बलं मया ते ॥
‘ उत्कृष्ट बलशाली दैत्यराज! इस प्रकार यहाँ मैंने तुमसे यह भगवान् नारायणका बल एवं प्रभाव बताया है '
वृत्रासुर बोला — "उदारचित्त महात्मा सनत्कुमारजी! यदि ऐसी बात है तो मुझे कोई विषाद नहीं है। मैं आपके वचनको अच्छी तरह समझता और इसे यथार्थ मानता हूँ। आज मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि आपकी इस वाणीको सुनकर मेरे सारे पाप और कलुष दूर हो गये। भगवन्! महर्षे! महातेजस्वी, अनन्त एवं सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका यह अमित शक्तिशाली संसारचक्र चल रहा है। यह भगवान् विष्णुका वह सनातन स्थान है, जहाँसे सारी सृष्टियोंका आरम्भ होता है। महात्मा विष्णु पुरुषोत्तम हैं। उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है।"
महाद्युतेश्चक्रमनन्तवीर्यम् ।
विष्णोरनन्तस्य सनातनं तत् स्थानं सर्गा यत्र सर्वे प्रवृत्ताः ।
सवै महात्मा पुरुषोत्तमो वै तस्मिन् जगत् सर्वमिदं प्रतिष्ठितम् ॥
भगवन्! महर्षे! महातेजस्वी, अनन्त एवं सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका यह अमित शक्तिशाली संसारचक्र चल रहा है । यह भगवान् विष्णुका वह सनातन स्थान है, जहाँसे सारी सृष्टियोंका आरम्भ होता है । महात्मा विष्णु पुरुषोत्तम हैं । उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ।
भीष्मजी कहते हैं – कुन्तीनन्दन! ऐसा कहकर वृत्रासुरने अपने आत्माको परमात्मामें लगाकर उन्हींका ध्यान करते हुए प्राण त्याग दिये और परमेश्वरके परमधामको प्राप्त कर लिया।
एवमुक्त्वा स कौन्तेय वृत्रः प्राणानवासृजत् ।
योजयित्वा तथाऽऽत्मानं परं स्थानमवाप्तवान् ॥
भीष्मजी कहते हैं – कुन्तीनन्दन! ऐसा कहकर वृत्रासुरने अपने आत्माको परमात्मामें लगाकर उन्हींका ध्यान करते हुए प्राण त्याग दिये और परमेश्वरके परमधामको प्राप्त कर लिया ।
युधिष्ठिरने पूछा- "पितामह! पूर्वकालमें महात्मा सनत्कुमारने वृत्रासुरसे जिनके स्वरूपका वर्णन किया था, वे भगवान् विष्णु - ये हमारे जनार्दन श्रीकृष्ण ही तो हैं?"
भीष्मजीने कहा - "युधिष्ठिर! मूल कारणरूपसे स्थित, महान् देव, महामनस्वी भगवान् नारायण हैं। वे अपने उस चिन्मय स्वरूपमें स्थित होकर अपने प्रभावसे नाना प्रकारके सम्पूर्ण पदार्थोंकी सृष्टि करते हैं। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले इन भगवान् श्रीकृष्णको तुम उस श्रीनारायणके एक चतुर्थ अंशसे सम्पन्न समझो। बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपने उस चतुर्थ अंशसे ही तीनों लोकोंकी रचना करते हैं। जो परवर्ती सनातन नारायण प्रलयकालमें भी विद्यमान हैं, वे ही अत्यन्त बलशाली और सबके अधीश्वर भगवान् श्रीहरि कल्पान्तमें जलके भीतर शयन करते हैं तथा वे प्रसन्नात्मा सृष्टिकर्ता ईश्वर उन समस्त शाश्वत लोकोंमें विचरण करते हैं। अनन्त एवं सनातन भगवान् श्रीहरि समस्त कारणोंको सत्ता और स्फूर्ति देकर परिपूर्ण करते और लीलावपु धारण करके लोकोंमें विचरण करते हैं। उन महापुरुषकी गतिको कोई रोक नहीं सकता। वे ही इस जगत्की सृष्टि करते हैं। उन्हींमें यह सम्पूर्ण विचित्र विश्व प्रतिष्ठित है।"
सर्वाण्यशून्यानि करोत्यनन्तः सनातनः संचरते च लोकान् ।
स चानिरुद्धः सृजते महात्मा तत्स्थं जगत् सर्वमिदं विचित्रम् ॥
अनन्त एवं सनातन भगवान् श्रीहरि समस्त कारणोंको सत्ता और स्फूर्ति देकर परिपूर्ण करते और लीलावपु धारण करके लोकोंमें विचरण करते हैं । उन महापुरुषकी गतिको कोई रोक नहीं सकता । वे ही इस जगत्की सृष्टि करते हैं । उन्हींमें यह सम्पूर्ण विचित्र विश्व प्रतिष्ठित है ।
युधिष्ठिरने कहा - "परमार्थतत्त्वके ज्ञाता पितामह! मैं समझता हूँ कि वृत्रासुरने आत्माके शुभ एवं यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार कर लिया था; इसलिये वह सुखी था, शोक नहीं करता था। निष्पाप पितामह! वह शुद्ध कुलमें उत्पन्न हुआ था और स्वभावसे भी शुद्ध था। जान पड़ता है वह साध्य नामक देवता ही था; इसलिये पुनः संसारमें नहीं लौटा। वह पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकसे छुटकारा पा गया। पृथ्वीनाथ! पीतवर्णवाले देवसर्गमें तथा रक्तवर्णवाले अनुग्रहसर्गमें विद्यमान प्राणी कभी तामस कर्मोंसे आवृत होकर तिर्यग्योनिका भी दर्शन कर सकता है। हमलोग तो और भी अधिक आपत्तिसे घिरे हुए हैं। दुःख- सुखसे मिश्रित भावमें अथवा केवल दुःखमय भावमें आसक्त हैं। ऐसी दश में पता नहीं हमें किस गतिकी प्राप्ति होगी। हम नीलवर्णवाली मानव-योनिमें पड़ेंगे या कृष्णवर्णवाली स्थावर योनिसे भी हीन दशाको जा पहुँचेंगे।"
शुक्लः शुक्लाभिजातीयः साध्यो नावर्ततेऽनघ ।
तिर्यग्गतेश्च निर्मुक्तो निरयाच्च पितामह ॥
निष्पाप पितामह! वह शुद्ध कुलमें उत्पन्न हुआ था और स्वभावसे भी शुद्ध था । जान पड़ता है वह साध्य नामक देवता ही था; इसीलिये पुनः संसारमें नहीं लौटा । वह पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकसे छुटकारा पा गया ।
भीष्मजीने कहा - "युधिष्ठिर! तुम सभी पाण्डव विशुद्ध कुलसे सम्पन्न और तीक्ष्ण व्रतोंका भलीभाँति पालन करनेवाले हो; अतः देवताओंके लोकोंमें विहार करके पुनः मनुष्य-शरीरको ही प्राप्त करोगे। तुम सब लोग यथासमय सुखसे सन्तानोत्पन्न करके देवलोकोंमें जाकर सुख भोगोगे। तत्पश्चात् सुखपूर्वक सिद्धि प्राप्त करके सिद्धोंमें गिने जाओगे। तुम्हारे मनमें दुर्गतिका भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि तुम सब लोग निर्मल एवं निष्पाप हो।"
शुद्धाभिजनसम्पन्नाः पाण्डवाः संशितव्रताः ।
विहृत्य देवलोकेषु पुनर्मानुषमेष्यथ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! तुम सभी पाण्डव विशुद्ध कुलसे सम्पन्न और तीक्ष्ण व्रतोंका भलीभाँति पालन करनेवाले हो; अतः देवताओंके लोकोंमें विहार करके पुनः मनुष्य- शरीरको ही प्राप्त करोगे ।
In English
The Wisdom of Bhishma and the Story of Vritrasura
Yudhisthira expresses his suffering and desire for renunciation to Bhishma. Bhishma explains the nature of the soul and tells a story about the demon Vritrasura, who remained unattached even after losing his kingdom. The sage Sanatkumara then arrives to explain the greatness of Lord Vishnu and how to achieve liberation.
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