गङ्गोपाख्यान : गङ्गा को पृथ्वी पर क्यों भेजा गया और उनका वास्तविक स्वरूप क्या है?
गङ्गा का दिव्य मूल
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 11–13 · पृष्ठ 362–388
3,248 शब्द · 17 मिनटका पाठ · 29 श्लोक
श्रीकृष्ण ने नारद से कहा
नारद के प्रश्न पर गङ्गा के उत्पत्ति और उनके गोलोक प्रस्थान की कथा सुनाने हेतु
हे नारद! राजराजेश्वर श्रीमान् सगर सूर्यवंशी राजा हो चुके हैं। उनकी दो मनोहर भार्याएँ थीं—एक वैदर्भी और दूसरी शैव्या। उनकी दूसरी पत्नी वैदर्भी ने पुत्र की तीव्र कामना की और उसके लिए भगवान् शङ्कर की घोर आराधना की। शिवजी के वरदान से उसने गर्भ धारण किया, किन्तु पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर उसने एक मांस-पिण्ड को जन्म दिया। वह मांस-पिण्ड देखकर तथा शिव का ध्यान करके वह बार-बार ऊँचे स्वर में विलाप करने लगी।
श्रुतं पृथिव्युपाख्यानमतीव सुमनोहरम् ।
गङ्गोपाख्यानमधुना वद वेदविदांवर ॥
तब भगवान् शङ्कर वहाँ ब्राह्मण का रूप धारण करके आए। उन्होंने उस मांस-पिण्ड को बराबर-बराबर साठ हजार भागों में विभक्त कर दिया और वे सभी टुकड़े पुत्ररूप में परिवर्तित हो गए। वे सभी महान् बल तथा पराक्रम से सम्पन्न थे; उनके शरीर की कान्ति ग्रीष्म ऋतु के मध्याह्नकालीन सूर्य की प्रभा को भी तिरस्कृत कर देने वाली थी। किन्तु, कपिल मुनि के शाप से वे सभी जलकर भस्म हो गए। यह समाचार सुनकर राजा सगर अत्यन्त दुखी हुए और वे घोर जङ्गल में चले गए। तदनन्तर उनके पुत्र असमञ्ज गङ्गा को लाने के निमित्त तपस्या करने लगे। इस प्रकार एक लाख वर्ष तक तप करने के पश्चात् वे कालयोग से मृत्यु को प्राप्त हुए।
कथं कुत्र युगे केन प्रार्थिता प्रेरिता पुरा ।
तत्क्रमं श्रोतुमिच्छामि पापघ्नं पुण्यदं शुभम् ॥
यह परम मनोहर उपाख्यान मैं सुन चुका; अब आप गंगाका उपाख्यान कहिये । सुरेश्वरी, विष्णुस्वरूपा और स्वयं विष्णुपदी - इस नामसे विख्यात वे श्रेष्ठ गंगा प्राचीनकालमें सरस्वतीके शापसे भारतवर्ष में किस प्रकार, किस युगमें तथा किसके द्वारा प्रार्थित और प्रेरित होकर गयीं । मैं इस पापनाशक, पुण्यप्रद तथा मंगलकारी प्रसंगको क्रमसे सुनना चाहता हूँ ।
असमञ्ज के पुत्र अंशुमान ने भी गङ्गा को पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से एक लाख वर्ष तक तप किया, किन्तु वे भी कालयोग से मृत्यु को प्राप्त हुए। अन्ततः भगीरथ ने घोर तपस्या की। जब वह रत्नमय आभूषणों से सुशोभित भगवान् श्रीकृष्ण के सम्मुख उपस्थित हुए, तो उन्होंने बार-बार प्रणाम कर उनकी स्तुति की। इस प्रकार भगीरथ ने लीलापूर्वक श्रीकृष्ण से अपने पूर्वजों को तारने वाला अपना अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया। उस समय भगवान् की स्तुति करने से उनका रोम-रोम पुलकित हो गया था।
तस्मै ददामि सालोक्यं करोमि तं च पार्षदम् ।
अन्यत्र वा त्यजेत्प्राणांस्त्वन्नामस्मृतिपूर्वकम् ॥
तस्मै ददामि सालोक्यं यावद्वै ब्रह्मणो वयः ।
अन्यत्र वा त्यजेत्प्राणांस्त्वन्नामस्मृतिपूर्वकम् ॥
तस्मै ददामि सारूप्यमसंख्यं प्राकृतं लयम् ।
रत्नेन्द्रसारनिर्माणयानेन सह पार्षदैः ॥
सद्यः प्रयाति गोलोकं मम तुल्यो भवेद् ध्रुवम् ।
तीर्थेऽप्यतीर्थे मरणे विशेषो नास्ति कश्चन ॥
मन्मन्त्रोपासकानां तु नित्यं नैवेद्यभोजिनाम् ।
पूतं कर्तुं सशक्तो हि लीलया भुवनत्रयम् ॥
रत्नेन्द्रसारयानेन गोलोकं सम्प्रयान्ति च ।
मद्भक्ता बान्धवा येषां तेऽपि पश्वादयोऽपि हि ॥
प्रयान्ति रत्नयानेन गोलोकं चातिदुर्लभम् ।
यत्र यत्र स्मृतास्ते च ज्ञानेन ज्ञानिनः सति ॥
जीवन्मुक्ताश्च ते पूता मद्भक्तेः संविधानतः । स्कन्ध ३५ ९ जो मनुष्य ज्ञान तथा भक्तिसे युक्त होकर मेरे नामका स्मरण करते हुए तुम्हारे जलमें अपने प्राणोंका त्याग करेंगे, वे श्रीहरिके लोकमें जायँगे और वहाँपर दीर्घ-कालतक उनके श्रेष्ठ पार्षदोंके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे और वे असंख्य प्राकृतिक प्रलय देखेंगे ।
श्रीभगवान् बोले— "हे सुरेश्वरी! सरस्वती के शाप के प्रभाव से आप शीघ्र ही भारतवर्ष में जाइये और मेरी आज्ञा से राजा सगर के सभी पुत्रों को पवित्र कीजिये। आपसे स्पर्शित वायु का संयोग पाकर वे सब पवित्र हो जाएँगे और मेरा स्वरूप धारण करके दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर मेरे लोक को प्राप्त होंगे। वे जन्म-जन्मान्तर में किये गये कर्मों के फलों का समूल उच्छेद करके सर्वथा निर्विकार भाव से युक्त होकर मेरे पार्षद के रूप में प्रतिष्ठित होंगे।"
अ ० ११ ] नवम अंशुमांस्तस्य तनयो गङ्गानयनकारणात् ।
तपः कृत्वा लक्षवर्षं ममार कालयोगतः ॥
जब देवेश्वर श्रीहरि चुप हुए, तब गङ्गा ने भक्तिभाव से अपना मस्तक झुकाकर पूछा— "हे नाथ! हे राजेन्द्र! भारती के पूर्व शाप और आपकी आज्ञा तथा भगीरथ की तपस्या के कारण मैं इस समय भारतवर्ष में जा रही हूँ। किन्तु हे प्रभो! वहाँ जाने पर पापी लोग मुझमें स्नान करके अपने जो कुछ पाप मुझे दे देंगे, वे मेरे पाप किस प्रकार नष्ट होंगे? इसका उपाय मुझे बताइये। हे देवेश! मुझे भारतवर्ष में कितने समय तक रहना होगा और पुनः भगवान् विष्णु के परम धाम को मैं कब प्राप्त होऊँगी? हे सर्वज्ञ! मेरा अन्य जो कुछ भी अभिलषित है, वह सब आप जानते ही हैं; अतः मेरे उन अभीष्टों के पूर्ण होने का उपाय बतला दीजिये।"
भगवान् ने कहा— "हे शुभे! तुम सरस्वती आदि श्रेष्ठ नदियों के साथ भारतवर्ष में निवास करोगी और वहाँ प्राणियों को पाप से मुक्त करती रहोगी। जहाँ तुम्हारे गुणों का कीर्तन होगा, वह स्थान तत्काल तीर्थ बन जाएगा। तुम्हारे रज:कण का स्पर्श मात्र हो जाने से पापी भी पवित्र हो जाएगा और उन रज:कणों की जितनी सङ्ख्या होगी, उतने वर्षों तक वह निश्चित रूप से देवीलोक में निवास करेगा। जो मनुष्य ज्ञान तथा भक्ति से युक्त होकर मेरे नाम का स्मरण करते हुए तुम्हारे जल में अपने प्राण त्याग करेंगे, वे मेरे लोक में दीर्घकाल तक श्रेष्ठ पार्षदों के रूप में प्रतिष्ठित होंगे। यदि कोई अज्ञानी मनुष्य भी तुम्हारे जल का स्पर्श करके प्राण त्याग करता है, तो मैं उसे सालोक्य मुक्ति प्रदान कर देता हूँ।"
अ ० ११ ] नवम ज्ञानेन त्वयि ये भक्त्या मन्नामस्मृतिपूर्वकम् ॥
"शिवं ज्ञानाय ज्ञानेशं शिवां च मुक्तिसिद्धये ॥ सम्पूज्यैताँल्लभेत्प्राज्ञो विपरीतमतोऽन्यथा । दध्यावनेन ध्यानेन तद्ध्यानं शृणु नारद ॥"
अ ० १२ ] नवम स्कन्ध ३६१ शरत्पूर्णेन्दुशतकमृष्टशोभाकरां पराम् ।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ॥
भगवान् श्रीकृष्ण ने भगीरथ से कहा— "अब आप भक्तिपूर्वक इन गङ्गा की स्तुति तथा पूजा कीजिये।"
नारदजी बोले - हे देवेश! हे लक्ष्मीकान्त! ।
हे जगत्पते! अब मैं भगवान् विष्णुकी चिरसंगिनी विष्णुपदी गंगाके पापनाशक तथा पुण्यदायक स्तोत्रका श्रवण करना चाहता हूँ ॥
श्रीकृष्ण के ये वचन सुनकर राजा भगीरथ ने कौथुमशाख में बताए गए ध्यान और स्तोत्र के माध्यम से अत्यन्त भक्तिभाव से गङ्गा की बार-बार स्तुति और पूजन आरम्भ किया। जब भगीरथ और गङ्गा ने परमेश्वर श्रीकृष्ण को प्रणाम किया, तब वे प्रभु अन्तर्धान हो गये।
नारायणप्रियां शान्तां तत्सौभाग्यसमन्विताम् ।
बिभ्रतीं कबरीभारं मालतीमाल्यसंयुतम् ॥
नारदजी ने पूछा— "हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! राजा भगीरथ ने किस ध्यान, किस स्तोत्र तथा किस पूजाविधि से गङ्गा का पूजन किया? मुझे विस्तार से बताइये।"
सिन्दूरबिन्दुललितं सार्धं चन्दनबिन्दुभिः ।
कस्तूरीपत्रकं गण्डे नानाचित्रसमन्वितम् ॥
श्रीभगवान् नारायण बोले— "हे नारद! सुनो, राजा भगीरथ ने सर्वप्रथम अपनी नित्य-क्रियाओं से निवृत्त होकर, स्नान कर दो स्वच्छ वस्त्र धारण किए। उन्होंने अपनी इन्द्रियों को पूर्णतः नियन्त्रित करते हुए भक्तिभाव से गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और भगवती शिवा— इन छह देवताओं की विधिवत पूजा की। हे नारद! जो व्यक्ति इन छह देवताओं की सम्यक पूजा करता है, वही गङ्गा पूजन का अधिकारी होता है। अग्नि के लिए अग्नि की, लक्ष्मी प्राप्ति के लिए विष्णु की, ज्ञान के लिए ज्ञानेश्वर शिव की तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए भगवती शिवा की पूजा अनिवार्य है। इसके बिना अन्य पूजों में सफलता नहीं मिलती।"
मुक्तिप्रदं मुमुक्षूणां कामिनां सर्वभोगदम् ।
वरां वरेण्यां वरदां भक्तानुग्रहकारिणीम् ॥
श्रीभगवान् ने आगे कहा— "अब उस ध्यान को सुनिये, जिससे भगीरथ ने गङ्गा का ध्यान किया था। वह देवी-ध्यान समस्त पापों का नाश करने वाला है। भगीरथ ने इस प्रकार ध्यान किया: 'श्वेत-पङ्कज के समान वर्ण वाली, कृष्ण विग्रह से सम्भूत, परम सुन्दरी और समस्त पापों का नाश करने वाली माँ गङ्गा! जो रत्न-आभूषणों से सुशोभित हैं, जिनका मुख शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान शोभायमान है, जो सात गुणी दैर्घ्य वाली हैं और जो ध्रुवलोक को आवृत करती हैं— मैं उन गङ्गा को प्रणाम करता हूँ।'
श्रीविष्णोः पददात्रीं च भजे विष्णुपदीं सतीम् ।
इत्यनेनैव ध्यानेन ध्यात्वा त्रिपथगां शुभाम् ॥
गङ्गा की पूजा के लिए सोलह उपचार बताए गए हैं, जिनमें चन्दन, आचमन और मनोहर शय्या का अर्पण प्रमुख है। जो मनुष्य इस विधि से गङ्गा की पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त करता है।"
अमूल्यरत्ननिर्माणं लक्ष्मीः कनककुण्डलम् ।
विष्णुमाया भगवती मूलप्रकृतिरीश्वरी ॥
दुर्गा नारायणीशाना ब्रह्मभक्तिं सुदुर्लभाम् ।
धर्मबुद्धिं च धर्मश्च यशश्च विपुलं भवे ॥
वह्निशुद्धांशुकं वह्निर्वायुश्च मणिनूपुरान् ।
एतस्मिन्नन्तरे शम्भुर्ब्रह्मणा प्रेरितो मुहुः ॥
जौ श्रीकृष्णसङ्गीतं रासोल्लाससमन्वितम् ।
मूर्च्छा प्रापुः सुराः सर्वे चित्रपुत्तलिका यथा ॥
कष्टेन चेतनां प्राप्य ददृशू रासमण्डले ।
स्थलं सर्वं जलाकीर्णं राधाकृष्णविहीनकम् ॥
अत्युच्चै रुरुदुः सर्वे गोपा गोप्यः सुरा द्विजाः ।
ध्यानेन ब्रह्मा बुबुधे सर्वं तीर्थमभीप्सितम् ॥
गतश्च राधया सार्धं श्रीकृष्णो द्रवतामिति ।
ततो ब्रह्मादयः सर्वे तुष्टुवुः परमेश्वरम् ॥
स्कन्ध ३६५ श्रीनारायण बोले - – एक समयकी बात है-कार्तिक पूर्णिमाके अवसरपर राधा - महोत्सव मनाया जा रहा था । भगवान् श्रीकृष्ण राधाकी विधिवत् पूजा करके रासमण्डलमें विराजमान थे । तत्पश्चात् ब्रह्मा आदि देवता तथा शौनक आदि ऋषिगण श्रीकृष्णके द्वारा पूजित उन राधाकी प्रसन्नचित्त होकर विधिवत् पूजा करके वहीं पर स्थित हो गये ।
श्रीभगवान् नारायण बोले— "हे नारद! अब मैं उस पापनाशक स्तोत्र को कहता हूँ जिसे सुनकर भगीरथ ने गङ्गा का पूजन किया। मैं उन गङ्गा को प्रणाम करता हूँ जो भगवान शिव के सङ्गीत से मुग्ध होकर श्रीकृष्ण के अङ्ग से आविर्भूत हुईं और राधा के अङ्ग-द्रव से सम्पन्न हैं। जो सृष्टि के आरम्भ में गोलोक के रासमण्डल में प्रकट हुईं और जो सदा शङ्कर के सान्निध्य में रहती हैं, उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ।
जो गोलोक करोड़ योजन चौड़ाई तथा उससे ॥
जो कार्तिक पूर्णिमा के शुभ अवसर पर राधा-महोत्सव में गोप-गोपियों के मध्य विद्यमान रहती हैं, उन गङ्गा को मैं प्रणाम करता हूँ। जो लाख गुनी लम्बाई में फैली हुई हैं, जो साठ लाख योजन चौड़ाई और उससे चार गुनी लम्बाई में वैकुण्ठ लोक में व्याप्त हैं, उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ। जो ब्रह्मलोक में तीन लाख योजन चौड़ी और पाँच गुनी लम्बी हैं, जो शिवलोक में तीन लाख योजन चौड़ी और चार गुनी लम्बी हैं, जो ध्रुवलोक में एक लाख योजन चौड़ी और सात गुनी लम्बी हैं, जो स्वर्गे नित्य क्षीर-आभा वाली हैं— उन सबको मैं प्रणाम करता हूँ।
जो चन्द्रलोक में एक लाख योजन चौड़ी और पाँच गुनी लम्बी हैं, जो सूर्यलोक में साठ हजार योजन चौड़ी और दस गुनी लम्बी हैं, जो तपोलोक में एक लाख योजन चौड़ी और पाँच गुनी लम्बी हैं, जो जनलोक में एक हजार योजन चौड़ी और दस गुनी लम्बी हैं, जो महर्लोक में दस लाख योजन चौड़ी और पाँच गुनी लम्बी हैं, जो कैलास पर एक हजार योजन चौड़ी और सौ गुनी लम्बी हैं, जो इन्द्रलोक में 'मन्दाकिनी' नाम से सौ योजन चौड़ी और दस गुनी लम्बी हैं, और जो पाताल लोक में 'भोगवती' नाम से दस योजन चौड़ी और दस गुनी लम्बी हैं— उन सबको मैं प्रणाम करता हूँ।
जो पृथ्वी लोक में 'अलकनन्दा' नाम से एक कोसभर चौड़ी हैं, जिनकी प्रभा स्वर्ग की भाँति दुग्ध जैसी श्वेत है, जिनके जल-कणों का स्पर्श होते ही करोड़ों जन्मों के ब्रह्महत्या आदि पाप भस्म हो जाते हैं— उन भगवती गङ्गा को मैं प्रणाम करता हूँ।"
कार्तिक्यां पूर्णिमायां तु राधायाः सुमहोत्सवः ॥
भगीरथ ने इस दिव्य स्तोत्र से गङ्गा की पूजा की और उन्हें अपने साथ लेकर उस स्थान पर पहुँचे जहाँ सगर के पुत्र जलकर भस्म हो गये थे। जैसे ही गङ्गा का स्पर्श हुआ और बहने वाली वायु उनके सम्पर्क में आई, वे सगर-पुत्र तत्काल वैकुण्ठ चले गये। चूँकि वे भगीरथ द्वारा लाई गयी थीं, इसलिए वे 'भागीरथी' कहलाईं।
कृष्णः सम्पूज्य तां राधामुवास रासमण्डले ।
कृष्णेन पूजितां तां तु सम्पूज्य हृष्टमानसाः ॥
मैंने इस प्रकार पुण्यप्रद 'गङ्गोपाख्यान' का वर्णन कर दिया है।"
ऊषुर्ब्रह्मादयः सर्वे ऋषयः शौनकादयः ।
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णसङ्गीता च सरस्वती ॥
नारदजी ने जिज्ञासावश पूछा— "हे प्रभो! तीन मार्गों से सञ्चरण करने वाली और समस्त लोकों को पवित्र करने वाली गङ्गा किसलिए, कहाँ और किस प्रकार आविर्भूत हुईं? वहाँ कौन-कौन उपस्थित थे और उन्होंने क्या किया? कृपया विस्तार से बताइये।"
जगौ सुन्दरतालेन वीणया च मनोहरम् ।
तुष्टो ब्रह्मा ददौ तस्यै रत्नेन्द्रसारहारकम् ॥
श्रीभगवान् बोले— "एक समय की बात है, कार्तिक पूर्णिमा का अवसर था और गोलोक में राधा-महोत्सव मनाया जा रहा था। भगवान श्रीकृष्ण ने विधिवत राधा की पूजा की और वे रासमण्डल में विराजमान हुए। उसके पश्चात ब्रह्मा आदि देवताओं ने भी प्रसन्नचित्त होकर राधा की पूजा की और वहीं स्थित हो गये।
शिवो मणीन्द्रसारं तु सर्वब्रह्माण्डदुर्लभम् ।
कृष्णः कौस्तुभरत्नं च सर्वरत्नात्परं वरम् ॥
उसी समय देवी सरस्वती वीणा लेकर सुन्दर ताल-स्वर के साथ मनोहर गीत गाने लगीं। उस सङ्गीत के प्रभाव से देवता मदमस्त होकर नृत्य करने लगे। जब वे नृत्य कर लौटे, तो उन्होंने देखा कि सम्पूर्ण रासमण्डल जलमय हो गया है और वह राधा तथा श्रीकृष्ण से रहित है। इस अभाव के कारण ब्रह्माजी का यह ब्रह्माण्ड निष्फल हो जाएगा।"
अमूल्यरत्ननिर्माणं हारसारं च राधिका ।
नारायणश्च भगवान् ददौ मालां मनोहराम् ॥
आकाशवाणी के रूप में इस प्रकार कहकर सनातन श्रीकृष्ण चुप हो गये। उनकी वाणी सुनकर जगत् की व्यवस्था करने वाले ब्रह्माजी ने उन भगवान् शिव से प्रसन्नतापूर्वक वह बात कही। ब्रह्माजी की बात सुनकर ज्ञानियों में श्रेष्ठ ज्ञानेश्वर उन भगवान् शिव ने हाथ में गङ्गाजल लेकर आज्ञा का पालन करना स्वीकार कर लिया।
अ ० १३ ] नवम स्कन्ध ३६७ इत्येवमुक्त्वा गगने विरराम सनातनः ॥
गोलोक में देवसभाओं में, जैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण ने शिवजी को आदेश दिया, वे वहाँ राधाष्टमी के पावन अवसर पर भगवती राधा के साथ प्रकट हो गये। उन्हें प्रत्यक्ष देखकर समस्त देवता परम आनन्द से भर उठे और हर्षित होकर पुनः उत्सव मनाने लगे। इस प्रकार मैंने आपसे वह अत्यन्त गोपनीय और दुर्लभ प्रसङ्ग कह दिया, जिसमें गङ्गा गोलोक से आविर्भूत हुई हैं। वे राधा और श्रीकृष्ण के विग्रह से उत्पन्न भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। परमेश्वर श्रीकृष्ण ने स्वयं स्थान-स्थान पर उन गङ्गा की स्थापना की है और श्रीकृष्ण स्वरूपा ये अतिश्रेष्ठ गङ्गा समस्त ब्रह्माण्डों में पूजी जाती हैं।
तच्छ्रुत्वा जगतां धाता तमुवाच शिवं मुदा ।
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा ज्ञानेशो ज्ञानिनां वरः ॥
हे सुरेश्वर! कलिके पाँच हजार कलेः पञ्चसहस्त्राब्दे समतीते... नारदजी ने पूछा— हे महाभाग! पाँच हजार वर्ष बीत जाने पर वे गङ्गा कहाँ चली गयीं? मुझे वह प्रसङ्ग बताने की कृपा कीजिये। श्रीनारायण बोले— हे नारद! सरस्वती के शाप के प्रभाव से वे गङ्गा भारतवर्ष में आयीं और पुनः शाप की अवधि बीत जाने पर श्रीहरि की इच्छा से वैकुण्ठ चली गयीं। इसी प्रकार सरस्वती और पद्मावती नदी स्वरूपिणी लक्ष्मी भी शाप के अन्त में भारत छोड़कर विष्णु लोक में चली गयीं। हे ब्रह्मन्! गङ्गा, सरस्वती और लक्ष्मी— ये तीनों ही भगवान् श्रीहरि की भार्याएँ हैं।
इत्येवं कथितं सर्वं सुगोप्यं च सुदुर्लभम् ।
स एव द्रवरूपा सा गङ्गा गोलोकसम्भवा ॥
हे भगवन! गङ्गा विष्णु के चरण-कमलों से प्रकट होकर ब्रह्मा के कमण्डलु में कैसे स्थित हुईं? वे शिव की प्रिया के रूप में कैसे विख्यात हुईं और भगवान् नारायण की प्रेयसी कैसे बनीं? नारदजी के इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए श्रीनारायण बोले— प्राचीन काल में द्रवरूपिणी गङ्गा गोलोक में विराजमान थीं। राधा और श्रीकृष्ण के अङ्ग से आविर्भूत वे गङ्गा उन्हीं के अंश और स्वरूप वाली हैं।
राधाकृष्णाङ्गसम्भूता भुक्तिमुक्तिफलप्रदा ।
स्थाने स्थाने स्थापिता सा कृष्णेन च परात्मना ।
कृष्णस्वरूपा परमा सर्वब्रह्माण्डपूजिता ॥
जब गङ्गा ने पृथ्वी लोक पर अनुपम रूप धारण किया, तो उनका विग्रह नूतन यौवन से सम्पन्न और समस्त अलङ्कारों से सुशोभित था। शरद् ऋतु के मध्याह्न काल में खिले हुए कमल के समान उनका मुखमण्डल मुस्कान से युक्त अत्यन्त मनोहर था। उनके शरीर का वर्ण तप्त स्वर्ण की आभा जैसा और कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमा के समान थी। वे स्निग्ध प्रभा वाली देवी दयालु मुद्रा में थीं, उनका स्वरूप शुद्ध और सात्त्विक था।
परन्तु उस समय गङ्गा अत्यन्त भयभीत थीं। राधा के रोष के कारण उनके ओष्ठ काँप रहे थे। वे डर के मारे झुककर खड़ी थीं; उनके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये थे। उन्होंने ध्यानपूर्वक भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल की शरण ली। अपने हृदय कमल पर स्थित उन भयभीत देवी को देखकर श्रीकृष्ण ने उन्हें अभय प्रदान किया, जिससे गङ्गा का चित्त शान्त हुआ।
परमानन्दपूर्णाश्च चक्रुश्च पुनरुत्सवम् ।
कालेन शम्भुर्भगवान् मुक्तिदीपं चकार सः ॥
तदनन्तर गङ्गा ने देखा कि राधिका जी ऊँचे आसन पर विराजमान हैं। उनका रूप परम मनोहर था और वे ब्रह्मतेज से देदीप्यमान हो रही थीं। वे सनातन देवी, जो सृष्टि के आरम्भ में असङ्ख्य ब्रह्माओं की रचना करने वाली हैं, सदा बारह वर्ष की अवस्था में रहती हैं। सम्पूर्ण विश्व में उनके समान कोई नहीं है; वे परम शान्त, कल्याणमयी और अपने स्वामी के सौभाग्य से सम्पन्न हैं। वे श्रीकृष्ण की अर्धाङ्गिनी हैं और उनमें तेज तथा कान्ति श्रीकृष्ण के सदृश ही है।
वे राधिका परमात्मा श्रीकृष्णकी प्रभामयी सभाको ३७ अपनी कान्तिसे सदा आच्छादित किये रहती हैं ।
वे सखियोंके द्वारा प्रदत्त दुर्लभ ताम्बूलका सदा सेवन करती रहती हैं ॥
गङ्गा उन रासेश्वरी राधिका को अपलक नेत्रों से निहार रही थीं। तभी राधिका जी ने पूछा— "हे प्राणेश! पास में बैठकर, मुस्कराकर तिरछी दृष्टि से देखती हुई यह कामनायुक्त सुन्दरी कौन है? अपना मुख वस्त्र से ढँककर जो बार-बार आपके रूप को देख रही है और जिसका शरीर पुलकित हो रहा है, वह कौन है? आप भी उसकी ओर देखकर हँस रहे हैं। मेरे जीवित रहते गोलोक में ऐसी दुर्वृत्त वाली स्त्री कैसे आयी?"
मुने! इसी बीच शान्त तथा विनम्र स्वभाववाली राधा मुसकराकर मधुर वाणीमें जगदीश्वर श्रीकृष्णसे कहने लगीं ॥
राधा ने आगे कहा— "कोमल स्वभाव की जाति होने के कारण मैं आपको क्षमा कर रही हूँ। हे कामी व्रजेश्वर! अपनी इस अभीष्ट प्रेयसी को लेकर आप अभी गोलोक से चले जाइये, अन्यथा आपका कल्याण नहीं है। एक बार पूर्व में मैंने आपको चन्दनवन में देखा था, तब भी सखियों के वचन मानकर मैंने आपको क्षमा किया था। तब आपने उस सुन्दरी का शरीर त्याग कर उसे नदी का रूप दे दिया था। वह देवी आज भी एक करोड़ योजन चौड़ाई वाली आपकी सत्कीर्तिस्वरूपिणी नदी के रूप में विद्यमान है।"
राधा ने रुँधे हुए कण्ठ से कहा— "मेरे घर चले जाने पर आप पुनः उसके पास जाकर 'विरजे! विरजे!' कहते हुए जोर-जोर से रोने लगे थे। तब उस सिद्धयोगिनी ने योगबल से जल से बाहर निकलकर अलङ्कारयुक्त सुन्दरी के रूप में दर्शन दिए थे। उस समय आपने उसमें अपना तेज आधान किया था, जिससे सात समुद्र उत्पन्न हुए।"
राधा का स्वर और गम्भीर हुआ— "इसी प्रकार मैंने आपको शोभा नामक गोपी के साथ चम्पक वन में देखा था। तब भी मेरी ध्वनि सुनकर आप छिप गये थे और उसने देह त्याग कर चन्द्रमण्डल में निवास किया। तत्पश्चात् आपने उस तेज को विभक्त करके रत्न, स्वर्ण, मणियाँ, वृक्षों के नए पत्ते, फल, फसलें, राजाओं के महल और दुग्ध आदि में वितरित कर दिया था।"
"इसी प्रकार वृन्दावन में प्रभा नामक गोपी के साथ भी आपने ऐसा ही किया था। वह देह त्यागकर सूर्यमण्डल में चली गयी और आपने उसका तेज यक्षों, देवताओं, ब्राह्मणों, तपस्वियों और सौभाग्यवती स्त्रियों को प्रदान कर दिया था। उस समय आप एक रत्ननिर्मित महल में, पुष्प की शय्या पर विराजमान थे। हे विभो! उस निद्राग्रस्त सुन्दरी के साथ आप सुखपूर्वक क्रीड़ा कर रहे थे। उसी समय पहुँचकर मैंने उसे जगाया था— स्मरण कीजिये!"
"हे प्रभो! उस समय मैंने आपका पीताम्बर, मनोहर मुरली, वनमाला, कौस्तुभ और बहुमूल्य रत्नमय कुण्डल ले लिया था। किन्तु बाद में सखियों के प्रेमपूर्वक कहने पर उसे आपको लौटा दिया था। हे प्रभो! उस समय आप लज्जा तथा पाप से कृष्णवर्ण के हो गये थे। तत्पश्चात् लज्जा के कारण क्षमा अपना शरीर त्यागकर पृथ्वी में समा गयी और उसका शरीर उत्तम गुणों के रूप में परिणत हो गया। तब रोते हुए आपने उस क्षमा का विभाजन करके उसे प्रेमपूर्वक अनेक लोगों को दे दिया। उसका कुछ अंश विष्णु को, कुछ विष्णुभक्तों को, कुछ धार्मिक पुरुषों को, कुछ धर्म को, कुछ दुर्बलों को, कुछ तपस्वियों को, कुछ देवताओं को और कुछ भाग पण्डितों को दिया था।"
लालकमल के समान नेत्रों वाली राधा ने, लज्जित गङ्गा से नीचे की ओर मुख किए हुए, श्रीकृष्ण को यह सब बता दिया। तभी सिद्धयोगिनी गङ्गा, योग के द्वारा सभी रहस्य समझकर सभा के मध्य में अन्तर्धान हो गयीं और अपने जल में ही प्रविष्ट हो गयीं। सिद्धयोगिनी राधा ने योगबल के प्रभाव से इस रहस्य को जान लिया और सर्वत्र विद्यमान उन जलस्वरूपिणी गङ्गा को अञ्जलि से उठाकर मुँह से पान करने लगीं। तत्पश्चात् वे भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमल में प्रवेश कर गईं और उनके शरणागत हो गईं।
राधा ने गोलोक, वैकुण्ठ तथा ब्रह्मलोक आदि सभी स्थानों में गङ्गा को खोजा, किन्तु उन्हें कहीं भी गङ्गा दिखाई नहीं दीं। उस समय सर्वत्र जल का अभाव हो गया था; केवल सूखा कीचड़ और गोला दिखाई दे रहा था, जो जलचर जन्तुओं के मृत शरीरों से युक्त था।
तभी सुवासित ताम्बूल का सेवन करते हुए, उन परिपूर्णतम सुरेश्वर भगवान की स्तुति करके, उन्हें रासमण्डल में विराजमान देखा गया। यह देखकर सभी मुनि, स्वायम्भुव आदि मनु, सिद्ध और तपस्वी महात्मा अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गये; उन्हें महान् आश्चर्य हुआ। वे एक-दूसरे को देखकर जगत्प्रभु चतुर्मुख ब्रह्मा से अपना वाञ्छित अभिप्राय कहने लगे।
श्रीकृष्ण बोले – हे ब्रह्मन्! आप गंगाको ग्रहण कीजिये ।
हे विष्णो! हे महेश्वर! हे ब्रह्मन्! १२६ आपलोग ध्यानपूर्वक कालका वृत्तान्त मुझसे सुनिये ॥
उनका वचन सुनकर ब्रह्माजी, भगवान विष्णु को दाहिने और महादेव को बायें लेकर, परम आनन्द से परिपूर्ण श्रीकृष्ण तथा परमानन्दस्वरूपिणी राधा के पास पहुँचे। वहाँ ब्रह्माजी इस असमञ्ज में थे कि कौन से पुरुष की सेवा करें और कौन सेवक है; क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण क्षणभर में तेजः स्वरूप हो जाते थे और क्षण क्षण में ही विग्रहवान होकर आसन पर विराजित हो जाते थे। ब्रह्माजी ने एक ही क्षण में उनके साकार तथा निराकार दोनों प्रकार के रूपों को देखा। वह रहस्य कि प्रभु कौन से पुरुष रूप में हैं, उसे जानने में वे ब्रह्मा भी अक्षम हो गये।
तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने अपने हृदय-कमल पर विराजमान श्रीकृष्ण का ध्यान किया और ध्यान-नेत्रों से उनका दर्शन करते हुए, स्त्री-पुङ्गव विषयक संशय का निराकरण कर भक्तिपूर्वक उनका स्तवन किया। भगवान की आज्ञा से जब उन्होंने नेत्र खोले, तो देखा कि अद्वितीय श्रीकृष्ण राधिका के वक्ष:स्थल पर स्थित हैं और अपने पार्षदों तथा गोपिकाओं के समुदाय से सुशोभित हो रहे हैं। ब्रह्मा आदि देवताओं ने श्रीकृष्ण को प्रणाम कर उनकी स्तुति की।
तभी चतुरानन ब्रह्मा ने राधा से कहा— "हे अम्बिके! भगवान शङ्कर की सङ्गीत-ध्वनि से मुग्ध होकर आपके तथा प्रभु श्रीकृष्ण के द्रवरूप में परिणत हुए अङ्ग से वह गङ्गा रासमण्डल में प्रकट हुई थीं। आपकी प्रिय पुत्री के तुल्य ये गङ्गा आपका मन्त्र ग्रहण करके आपकी पूजा करें। इसके फलस्वरूप वैकुण्ठ के अधिपति चतुर्भुज भगवान श्रीहरि इनको पति के रूप में प्राप्त होंगे और जब ये अपनी एक कला लेकर भूमण्डल पर जाएँगी, तब लवणसमुद्र भी इनके पति बनेंगे। अम्बिके! ये गङ्गा जैसे गोलोक में हैं, वैसे ही इन्हें सर्वत्र रहना चाहिए। आप देवेश्वरी इनकी माता हैं और वे सदा आपकी पुत्री हैं।"
ब्रह्मा का यह वचन सुनकर राधा ने हँसते हुए सब स्वीकार कर लिया। तभी गङ्गा श्रीकृष्ण के चरण के अङ्गूठे के नख के अग्रभाग से बाहर निकलीं। वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने उनका सत्कार किया और वे सबके मध्य शान्त होकर स्थित हुईं। तब जल-स्वरूपा गङ्गा की अधिष्ठात्री देवी प्रकट होकर वहीं विराजमान हो गईं। ब्रह्माजी ने गङ्गा का कुछ जल अपने कमण्डलु में रख लिया और कुछ चन्द्रशेखर भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया।
ब्रह्माजी ने गङ्गा को राधा के स्तोत्र, कवच, ध्यान और पूजा की विधि तथा पुरश्चर्याक्रम के विषय में बताया। इन नियमों के द्वारा गङ्गा ने विधिवत राधा की पूजा की और नारायण के साथ वैकुण्ठ के लिए प्रस्थान किया।
भगवान श्रीकृष्ण ने हँसकर ब्रह्मा को यह सूक्ष्म वृत्तान्त सुनाया— "हे पद्मज! इस समय सम्पूर्ण विश्व जल में डूबा हुआ है। अन्य ब्रह्माण्डों में रहने वाले ब्रह्मा आदि देवता मुझमें विलीन हो गये हैं। इस समय केवल वैकुण्ठ को छोड़कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जल में डूबा है। आप जाकर ब्रह्मलोक आदि लोकों की पुनः सृष्टि कीजिये और अपने ब्रह्माण्ड की रचना कीजिये; इसके बाद गङ्गा वहाँ जाएगी।"
इत्युक्त्वा राधिकानाथो जगामान्तःपुरे मुने ।
देवा गत्वा पुनः सृष्टिं चक्रुरेव प्रयत्नतः ॥
श्रीकृष्ण ने आगे कहा— "इसी सृष्टिका अवसर पर मैं अन्य ब्रह्माण्डों में भी ब्रह्मा आदि की रचना का प्रयत्न कर रहा हूँ। अब आप देवताओं के साथ यहाँ से शीघ्र जाइये, आपका बहुत समय बीत चुका है।" ऐसा कहकर राधिकानाथ श्रीकृष्ण अन्तःपुर में चले गये और ब्रह्मा आदि देवता प्रयत्नपूर्वक सृष्टिकार्य में संलग्न हो गये।
अ ० १४ ] नवम स्कन्ध ३७ ९ एवमन्येषु विश्वेषु सृष्टौ ब्रह्मादिकं पुनः ।
करोम्यहं पुनः सृष्टिं गच्छ शीघ्रं सुरैः सह ॥
गतो बहुतरः कालो युष्माकं च चतुर्मुखाः ।
गताः कतिविधास्ते च भविष्यन्ति च वेधसः ॥
इसी प्रकार इस सृष्टिके अवसरपर मैं अन्य ब्रह्माण्डों में भी ब्रह्मा आदिकी रचनाका प्रयत्न कर रहा हूँ । अब आप देवताओंके साथ यहाँसे शीघ्र जाइये । आपका बहुत समय बीत चुका है, न जाने कितने ब्रह्मा समाप्त हो गये और न जाने कितने ब्रह्मा अभी होंगे ।
तदनन्तर, परमात्मा श्रीकृष्ण ने जिस-जिस स्थान पर गङ्गा को रहने की आज्ञा दी थी— चाहे वह गोलोक हो, वैकुण्ठ हो, शिवलोक हो या ब्रह्मलोक— गङ्गा वहाँ चली गईं। वे भगवान विष्णु के चरणकमल से निकली हैं, इसलिए उन्हें 'विष्णुपदी' कहा गया।
हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे गङ्गा के इस सर्वोत्तम, सुखदायक और मोक्षप्रद उपाख्यान का वर्णन कर दिया। अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं?
In English
The Descent of the Ganges
King Sagara's sons are turned to ash by a curse, prompting Bhagiratha to perform intense penance to bring the river Ganges to earth. Through his devotion and the help of Krishna, Bhagiratha brings the river down to purify his ancestors' souls.
This page answers
- How did the sons of sagara die?
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- What is the origin of the river ganga?
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