श्रीगणेशाय नमः।

भरतोपाख्यान : संसार रूपी दुर्गम वन में जीव किस प्रकार भटकता रहता है?

संसार-वन का भयावह सत्य

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · पृष्ठ 1006–1023

2,051 शब्द · 11 मिनटका पाठ · 18 श्लोक

श्रीशुकदेव जी ने राजा रहूगण से कहा

राजा को आत्म-तत्त्व और संसार की वास्तविकता समझाने हेतु

महापुरुषों के समाज में सदा श्रीहरि की पवित्र कीर्ति का गुणगान होता रहता है, जिससे विषय-वासनाएँ पास भी नहीं फटक पातीं। जब भगवत्कथा का नित्य सेवन किया जाता है, तब वह मोक्षाकाङ्क्षी पुरुष की बुद्धि को भगवान वासुदेव में लगा देती है। राजा भरत ने स्वयं परमार्थ से भ्रष्ट होकर अगले जन्म में मृग योनि को प्राप्त किया, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण की आराधना के प्रभाव से उस मृग योनि में भी उनकी पूर्वजन्म की स्मृति लुप्त नहीं हुई। इसी स्मृति के बल पर वे जन-संसर्ग के डर से सर्वदा असङ्गभाव से गुप्तरूप से विचरते रहे।

अहं पुरा भरतो नाम राजा विमुक्तदृष्टश्रुतसङ्गबन्धः ।
आराधनं भगवत ईहमानो मृगोऽभवं मृगसङ्गाद्धतार्थः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 14पृष्ठ 1006

जडभरत ने राजा रहूगण को सम्बोधित करते हुए कहा— "राजन्! यह जीवसमूह सुखरूप धन में आसक्त उन व्यापारियों के दल के समान है, जो देश-देशान्तर में घूम-फिरकर व्यापार करने के लिए भटकते हैं। माया ने इन्हें इतने दुस्तर प्रवृत्तिमार्ग में लगा दिया है कि इनकी दृष्टि केवल सात्त्विक, राजस और तामस कर्मों के भेदों पर ही जाती है। इन कर्मों के पीछे भागते-भागते यह जीव संसार रूपी इस घने जङ्गल में पहुँच जाता है, जहाँ इसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती।"

ब्राह्मण उवाच

दुरत्ययेऽध्वन्यजया निवेशितो रजस्तमःसत्त्वविभक्तकर्मदृक् ।
स एष सार्थोऽर्थपरः परिभ्रमन् भवाटवीं याति न शर्म विन्दति ॥

जडभरतने कहा — राजन्! यह जीवसमूह सुखरूप धनमें आसक्त देश - देशान्तरमें घूम-फिरकर व्यापार करनेवाले व्यापारियोंके दलके समान है । इसे मायाने दुस्तर प्रवृत्तिमार्गमें लगा दिया है; इसलिये इसकी दृष्टि सात्त्विक, राजस, तामस भेदसे नाना प्रकारके कर्मोंपर ही जाती है । उन कर्मोंमें भटकता - भटकता यह संसाररूप जंगलमें पहुँच जाता है । वहाँ इसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 1पृष्ठ 1008

"महाराज! उस जङ्गल में छह डाकू हैं और इस वणिक-समाज का नायक बड़ा दुष्ट है। जब यह जीव उसके नेतृत्व में वहाँ पहुँचता है, तब ये लुटेरे बलात् इसका सारा माल-मत्ता लूट लेते हैं। जिस प्रकार भेड़िये भेड़ों के झुण्ड में घुसकर उन्हें खींच ले जाते हैं, उसी प्रकार इसके आसपास रहने वाले गीदड़ ही इसे असावधान देखकर इसका धन इधर-उधर खींचने लगते हैं।"

सा मां स्मृतिर्मृगदेहेऽपि वीर कृष्णार्चनप्रभवा नो जहाति ।
अथो अहं जनसङ्गादसङ्गो विशङ्कमानोऽविवृतश्चरामि ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 15पृष्ठ 1006

"वह जङ्गल अत्यन्त दुर्गम है; उसमें घनी लताएँ, घास और झाड़-झङ्खाड़ भरे हैं। वहाँ तीव्र डाँस और मच्छर जीव को चैन नहीं लेने देते। कभी उसे गन्धर्वनगर दिखाई देने लगता है, तो कभी चञ्चल अगिया-बेताल की आँखें सामने आकर उसे झुलसा देती हैं। कभी यक्ष लोग इसके प्राण खींच लेते हैं जिससे यह खिन्न हो जाता है। कभी अपने से बलवान लोग इसका धन छीन लेते हैं, तब वह दुःखी होकर शोक और मोह में अचेत हो जाता है; तो कभी गन्धर्वनगर पहुँचकर वह क्षण भर के लिए सब दुःख भूलकर खुशी मनाने लगता है।"

ब्राह्मण उवाच

यस्यामिमे षण्नरदेव दस्यवः सार्थं विलुम्पन्ति कुनायकं बलात् ।
गोमायवो यत्र हरन्ति सार्थिकं प्रमत्तमाविश्य यथोरणं वृकाः ॥

महाराज! उस जंगलमें छ: डाकू हैं । इस वणिक्- -समाजका नायक बड़ा दुष्ट है । उसके नेतृत्वमें जब यह वहाँ पहुँचता है, तब ये लुटेरे बलात् इसका सब माल - मत्ता लूट लेते हैं तथा भेड़िये जिस प्रकार भेड़ोंके झुंडमें घुसकर उन्हें खींच ले जाते हैं, उसी प्रकार इसके साथ रहनेवाले गीदड़ ही इसे असावधान देखकर इसके धनको इधर - उधर खींचने लगते हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 2पृष्ठ 1008

"कभी पर्वतों पर चढ़ने की इच्छा करता है, तो काँटे और कङ्कड़ों से पैर चलनी हो जाने पर उदास हो जाता है। जब कुटुम्ब बढ़ जाता है और उदरपूर्ति का साधन नहीं होता, तब भूख की ज्वाला से तप्त होकर वह अपने ही बन्धु-बान्धवों पर खीझने लगता है। कभी उसे कोई सुध-बुध नहीं रहती; दूसरे विषैले जन्तु उसे काटते हैं और उसके विष के प्रभाव से अन्धा होकर वह किसी अन्धे कुएँ में गिर पड़ता है और घोर दुःखमय अन्धकार में बेहोश पड़ा रहता है।"

ब्राह्मण उवाच

प्रभूतवीरुत्तृणगुल्मगह्वरे कठोरदंशैर्मशकैरुपद्रुतः ।
क्वचित्तु गन्धर्वपुरं प्रपश्यति क्वचित्क्वचिच्चाशुरयोल्मुकग्रहम् ॥

वह जंगल बहुत - सी लता, घास और झाड़ - झंखाड़के कारण बहुत दुर्गम हो रहा है । उसमें तीव्र डाँस और मच्छर इसे चैन नहीं लेने देते । वहाँ इसे कभी तो गन्धर्वनगर दीखने लगता है और कभी - कभी चमचमाता हुआ अति चंचल अगिया - बेताल आँखोंके सामने आ जाता है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 3पृष्ठ 1008

"कभी मधु खोजने पर मक्खियाँ उसके नाक में दम कर देती हैं और उसका सारा अभिमान नष्ट हो जाता है। यदि कठिनाइयों को सहकर वह मिल भी जाए, तो दूसरे लोग उसे बलात् छीन लेते हैं। कभी शीत, धूप, आँधी और वर्षा से वह स्वयं की रक्षा करने में असमर्थ हो जाता है। कभी आपस में थोड़ा-बहुत व्यापार करता है, तो धन के लोभ में दूसरों को धोखा देकर वैर ठान लेता है। संसार-वन में जब इसका धन नष्ट हो जाता है, तब इसके पास शय्या, आसन, रहने का स्थान और सवारी तक नहीं रहती; तब वह दूसरों से याचना करता है। पर जब उसे अभिलषित वस्तु नहीं मिलती, तो परायी वस्तुओं पर अनुचित दृष्टि रखने के कारण उसे बड़ा तिरस्कार सहना पड़ता है।"

क्वचिच्च शीतातपवातवर्ष-प्रतिक्रियां कर्तुमनीश आस्ते ।
क्वचिन्मिथो विपणन् यच्च किञ्चिद् विद्वेषमृच्छत्युत वित्तशाठ्यात् ॥

समय इसे कोई सुध - बुध नहीं रहती । कभी दूसरे विषैले जन्तु इसे काटने लगते हैं तो उनके विषके प्रभावसे अंधा होकर किसी अंधे कुएँ में गिर पड़ता है और घोर दुःखमय अन्धकारमें बेहोश पड़ा रहता है || ९ || कभी मधु खोजने लगता है तो मक्खियाँ इसके नाकमें दम कर देती हैं और इसका सारा अभिमान नष्ट हो जाता है । यदि किसी प्रकार अनेकों कठिनाइयोंका सामना करके वह मिल भी गया तो बलात् दूसरे लोग उसे छीन लेते हैं ॥१० ॥ कभी शीत, घाम, आँधी और वर्षासे अपनी रक्षा करनेमें असमर्थ हो जाता है । कभी आपसमें थोड़ा - बहुत व्यापार करता है, तो धनके लोभसे दूसरोंको धोखा देकर उनसे वैर ठान लेता है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 11पृष्ठ 1010

"व्यावहारिक सम्बन्धों के कारण द्वेष बढ़ते हुए भी यह वणिक-समूह आपस में विवाहादि सम्बन्ध स्थापित करता है और फिर कष्टों तथा धनक्षय को भोगते-भोगते मृतकवत हो जाता है। साथियों में से जो मरते जाते हैं, उन्हें वहीं छोड़कर नवीन उत्पन्न हुए लोगों को साथ लिए यह समूह आगे बढ़ता रहता है। वीरवर! उनमें से कोई न आज तक वापस लौटा है और न ही किसी ने इस सङ्कटपूर्ण मार्ग को पार कर परमानन्दमय योग की शरण ली है।"

आसाद्य दावं क्वचिदग्नितप्तो निर्विद्यते क्व च यक्षैर्हृतासुः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 6पृष्ठ 1009

"यदि इसे किसी प्रकार आपत्ति से छुटकारा मिल भी जाए, तो यह फिर अपने गोल में मिल जाता है। जो मनुष्य माया की प्रेरणा से इस मार्ग पर पहुँच गया, वह भटकते-भटकते अन्त तक अपने परम पुरुषार्थ का पता नहीं लगा पाता। रहूगण! तुम भी इसी मार्ग में भटक रहे हो; इसलिए अब प्रजा को दण्ड देने के बजाय समस्त प्राणियों के सुहृद् बन जाओ। विषयों में अनासक्त होकर ज्ञान रूपी खड्ग से इस मार्ग को पार कर लो।"

दष्टः स्म शेते क्व च दन्दशूकै-धोऽन्धकूपे पतितस्तमित्रे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 9पृष्ठ 1010

राजा रहूगण ने कहा— "अहो! समस्त योनियों में यह मनुष्य जन्म ही श्रेष्ठ है। अन्य लोकों में प्राप्त होने वाले देवादि उत्कृष्ट जन्मों से क्या लाभ, जहाँ भगवान हृषीकेश के पवित्र यश से शुद्ध अन्तःकरण वाले आप जैसे महात्माओं का समागम नहीं मिलता? आपके चरण कमलों की रज से जिनके सारे पाप नष्ट हो गए हैं, उन महानुभावों को भगवान की विशुद्ध भक्ति प्राप्त होना कोई विचित्र बात नहीं है। आपके मात्र दो घड़ी के सत्सङ्ग से ही मेरा सारा कुतर्कमूलक अज्ञान नष्ट हो गया है।"

तैर्वञ्चितो हंसकुलं समाविश-न्नरोचयन् शीलमुपैति वानरान् ।
तज्जातिरासेन सुनिर्वृतेन्द्रियः १ परस्परोद्वीक्षणविस्मृतावधिः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 17पृष्ठ 1011

"ब्रह्मज्ञानियों में जो वृद्ध हैं उन्हें नमस्कार है; जो शिशु हैं उन्हें नमस्कार है; जो युवा हैं उन्हें नमस्कार है। जो क्रीड़ारत बालक हैं, उन्हें भी नमस्कार है। जो ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण अवधूत वेष में पृथ्वी पर विचरते हैं, उनसे हम जैसे ऐश्वर्योन्मत्त राजाओं का कल्याण हो।"

द्रुमेषु रंस्यन् सुतदारवत्सलो व्यवायदीनो विवशः स्वबन्धने ।
क्वचित्प्रमादागिरिकन्दरे पतन् वल्लीं गृहीत्वा गजभीत आस्थितः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 18पृष्ठ 1011

श्रीशुकदेव जी कहते हैं कि उन परम प्रभावशाली ब्रह्मर्षि पुत्र ने अपमान करने वाले राजा रहूगण को भी करुणावश आत्म-तत्त्व का उपदेश दिया। तब राजा रहूगण ने दीन भाव से उनके चरणों की वन्दना की। वे अब परिपूर्ण समुद्र के समान शान्त चित्त होकर पृथ्वी पर विचरने लगे। सत्सङ्ग से परमेश्वर का ज्ञान पाकर राजा रहूगण ने अपने अन्तःकरण में अविद्यावश आरोपित देहात्म-बुद्धि का त्याग कर दिया। जो लोग भगवदाश्रित अनन्य भक्तों की शरण लेते हैं, उनके पास अविद्या ठहर नहीं सकती।

राजोवाच अहो नृजन्माखिलजन्मशोभनं किं जन्मभिस्त्वपरैरप्यमुष्मिन् ।
न यद्धृषीकेशयशः कृतात्मनां महात्मनां वः प्रचुरः समागमः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 21पृष्ठ 1012

राजा परीक्षित ने कहा— "महाभागवत मुनिश्रेष्ठ! आप परम विद्वान् हैं। आपने रूपक द्वारा जिस संसार मार्ग का वर्णन किया है, उसकी कल्पना केवल विवेकी पुरुषों ने ही की है; अल्पबुद्धि वाले इसे समझ नहीं सकते। अतः मेरी प्रार्थना है कि इस दुर्बोध विषय को स्पष्टीकरण वाले शब्दों से खोलकर समझाइये।"

श्रीशुक उवाच

इत्येवमुत्तरामातः स वै ब्रह्मर्षिसुतः सिन्धुपतय आत्मसतत्त्वं ' विगणयतः परानुभावः परमकारुणिकतयोपदिश्य रहूगणेन सकरुणमभि - वन्दितचरण आपूर्णार्णव इव निभृतकरणो - यिशयो धरणिमिमां विचचार || २४ || सौवीरपतिरपि सुजनसमवगतपरमात्मसतत्त्व आत्मन्यविद्याध्यारोपितां च देहात्ममतिं विससर्ज ।
एवं हि नृप भगवदाश्रिताश्रितानुभावः ४ ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 25पृष्ठ 1013

शुकदेव जी ने राजा रहूगण को संसार-रूपी मार्ग की वह भयङ्कर वास्तविकता सुनाई, जो माया के वशीभूत जीव को दिखाई नहीं देती। उन्होंने कहा, "हे राजन्! यह संसार एक ऐसे बीहड़ और दुर्गम वन के समान है, जहाँ मनुष्य भूलकर भटक जाता है। यहाँ जीव उन धन के लोभी बनिजारों की भाँति है, जो मार्ग भूलकर भयङ्कर वन में भटकते रहते हैं। इस संसार-वन में माया की प्रेरणा से जीव ऐसे दुर्गम मार्गों में जा पड़ता है जहाँ उसे अपने ही कर्मों का फल भोगना पड़ता है। यहाँ अनेक विघ्न आते हैं और जीव को अपने व्यापार में सफलता भी नहीं मिलती; फिर भी वह श्रीहरि और गुरुदेव के चरणों के मकरन्द का पान करने वाले रसिक भक्तों के मार्ग का अनुसरण नहीं करता। इस संसार-वन में मन सहित ये छह इन्द्रियाँ ही डाकुओं की तरह जीव के सुखों को लूट ले जाती हैं।"

शुकदेव जी ने आगे कहा, "इस संसार-वन में रहने वाले कुटुम्बी—जिन्हें नाम से स्त्री और पुत्र कहा जाता है—वे वास्तव में भेड़ियों और गीदड़ों के समान होते हैं। वे अर्थलोलुप होकर देखते-ही-देखते जीव का धन छीन ले जाते हैं, जैसे भेड़िये गड़रियों की सुरक्षित भेड़ों को उठा ले जाते हैं। यह गृहस्थाश्रम भी एक ऐसी कर्मभूमि है जहाँ कामनाओं की पिटारी भरी रहती है। यहाँ धन रूपी प्राणों को नीच पुरुष डाँस और मच्छरों की तरह काटते रहते हैं, और टिड्डी, पक्षी, चोर तथा चूहे इसकी क्षति करते रहते हैं। अविद्या और कामना से कलुषित चित्त वाला जीव इस मर्त्य लोक को सत्य समझने लगता है, जो वास्तव में गन्धर्वों के नगर की भाँति असत् है। रजोगुण की धूल भरे नेत्रों से बुद्धि ऐसी मलिन हो जाती है कि वह अपने कर्मों के साक्षी देवताओं को भी भुला देता है।"

सुवर्णमुपादित्सत्यग्निकामकातर इवोल्मुक - पिशाचम् ॥७ ॥ अथ कदाचिन्निवासपानीय - द्रविणाद्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततः परिधावति || ८ || क्वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोहमारोपित- स्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादो- रजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति || ९ || क्वचित्सकृदवगतविषयवैतथ्यः स्वयं पराभिध्यानेन विभ्रंशितस्मृतिस्तयैव मरीचि - तोयप्रायांस्तानेवाभिधावति ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 10पृष्ठ 1016

"हे राजन्! कभी-कभी विषयों का मिथ्यात्व जान लेने पर भी, विवेक नष्ट होने के कारण जीव फिर उन्हीं मरुमरीचिका तुल्य विषयों की ओर दौड़ने लगता है। यहाँ शत्रु प्रत्यक्ष रूप से उल्लू की भाँति और परोक्ष रूप से झींगुरों की भाँति डराते हैं। पूर्व पुण्य क्षीण होने पर मनुष्य जीवित ही मुर्दे के समान हो जाता है, जो उन विषैले कुओं और पापवृक्षों का आश्रय लेता है जिनका धन न इस लोक में काम आता है न परलोक में। जब उसे दूसरों को सताकर भी अन्न नहीं मिलता, तब वह अपने ही सगे पिता-पुत्रों को फाड़ खाने के लिए तैयार हो जाता है। कभी दावानल की भाँति प्रिय विषयों से शून्य और दुःखमय घर पहुँचकर वह इष्टजनों के वियोग में शोक की आग में जलने लगता है। काल रूपी राक्षस उसके प्राण हर लेते हैं और वह निर्जीव हो जाता है।"

"इस गृहस्थाश्रम का मार्ग किसी ऊँचे पर्वत की कठिन चढ़ाई के समान है। लोग दूसरों को देखकर इस मार्ग पर बढ़ते हैं और अन्ततः काँटों और कङ्कड़ों भरी भूमि में पड़े व्यक्ति की तरह दुखी हो जाते हैं। कभी पेट की असह्य ज्वाला से व्याकुल होकर वह अपने ही कुटुम्ब पर बिगड़ने लगता है। फिर जब वह निद्रा रूपी अजगर के चङ्गुल में फँस जाता है, तब अज्ञान के घोर अन्धकार में डूबा हुआ वह वन में फेंके गए मुर्दे की भाँति सोया रहता है; उसे किसी बात की सुधि नहीं रहती। जीव विषयों के मधुकणों को ढूँढ़ते हुए जब परस्त्री या परधन को उड़ाना चाहता है, तब राजा के हाथों पिटकर वह ऐसे नरक में गिर जाता है जिसका कोई छोर नहीं है।"

क्वापि देवमायया स्त्रिया भुजलतोपगूढः प्रस्कन्नविवेकविज्ञानो यद्विहारगृहारम्भाकुल- हृदयस्तदाश्रयावसक्तसुतदुहितृकलत्रभाषिताव-लोकविचेष्टितापहृतहृदय आत्मानमजितात्मा -ऽपारेऽन्धे तमसि प्रहिणोति ॥

( इस विघ्नबहुल मार्गमें इस प्रकार भटकता हुआ यह जीव ) किसी समय देवमायारूपिणी स्त्रीके बाहुपाशमें पड़कर विवेकहीन हो जाता है । तब उसीके लिये विहारभवन आदि बनवानेकी चिन्तामें ग्रस्त रहता है तथा उसीके आश्रित रहनेवाले पुत्र, पुत्री और अन्यान्य स्त्रियोंके मीठे - मीठे बोल, चितवन और चेष्टाओंमें आसक्त होकर, उन्हींमें चित्त फँस जानेसे वह इन्द्रियोंका दास अपार अन्धकारमय नरकोंमें गिरता है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 28पृष्ठ 1019

"राजन्! इस मार्ग में सुख-दुख, राग-द्वेष, भय, अभिमान, शोक, मोह, लोभ और ईर्ष्या जैसे अनगिनत विघ्न हैं। जीव देवमाया रूपी स्त्री के बाहुपाश में पड़कर विवेक खो देता है और उसके लिए विहार भवन बनाने की चिन्ता में लगा रहता है। वह पुत्र-पत्नियों के मीठे बोलों में फँसकर इन्द्रियों का दास बन जाता है और अन्धकारमय नरकों में गिरता चला जाता है। वह ब्राह्मणों की शरण तो लेता है, पर यज्ञ और शास्त्रोक्त आचार उसे अच्छा नहीं लगता; इस कारण वह कर्मशून्य शूद्र कुल में प्रवेश कर जाता है, जहाँ उसकी बुद्धि केवल भोग-विलास में लीन रहकर नष्ट हो जाती है। वह वृक्षों के समान उन घरों में सुख मानता है जिनका फल केवल लौकिक सुख है। रोग रूपी गुफा में फँसकर वह मृत्यु रूपी हाथी से डरता रहता है।"

मिषतां वित्रस्तहृदयस्तमेवेश्वरं कालचक्रनिजायुधं साक्षाद्भगवन्तं यज्ञपुरुषमनादृत्य पाखण्डदेवताः कङ्कगृध्रबकवटप्राया आर्यसमयपरिहृताः साङ्केत्येनाभिधत्ते ॥ २ ९ || यदा पाखण्डिभिरात्मवञ्चितैस्तैरुरु वञ्चितो ब्रह्मकुलं समावसंस्तेषां शीलमुपनयनादिश्रौतस्मार्त - कर्मानुष्ठानेन भगवतो यज्ञपुरुषस्याराधनमेव तदरोचयन् शूद्रकुलं भजते निगमाचारेऽशुद्धितो यस्य मिथुनीभावः कुटुम्बभरणं यथा वानर - जातेः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 30पृष्ठ 1019

"वह जीव कभी धन की कमी होने पर चोरी जैसे बुरे उपाय अपनाता है, जिससे उसे अपमानित होना पड़ता है। वह अपनी पूर्व वासनाओं से विवश होकर सम्बन्धों को बनाता और छोड़ता रहता है। वह कभी किसी का दुःख देखकर मूर्च्छित होता है, तो कभी किसी के वियोग से भयभीत होकर रोने-चिल्लाने लगता है। साधुजन उसके पास कभी नहीं आते और वह सदा साधु-सङ्ग से वञ्चित रहता है। वह निरन्तर आगे ही बढ़ रहा है, पर जिस परमात्मा के पास उसे पहुँचना है, वहाँ तक उसकी यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। परमात्मा तक तो योगशास्त्र की भी गति नहीं है; केवल वे निवृत्तिपरायण संयतात्मा मुनिजन ही उसे प्राप्त कर पाते हैं जिन्होंने समस्त दण्डों का त्याग कर दिया है।"

जनादभिलभते ॥३६ || एवं वित्तव्यतिषङ्गविवृद्धवैरानुबन्धोऽपि पूर्ववासनया मिथ उद्वहत्यथापवहति ॥३७ ॥ एतस्मिन् संसाराध्वनि नानाक्लेशोपसर्गबाधित आपन्नविपन्नो यत्र यस्तमु ह वावेतरस्तत्र विसृज्य जातं जातमुपादाय शोचन्मुह्यन् बिभ्यद्विवदन् क्रन्दन् संहृष्यन्गायन्नह्यमानः साधुवर्जितो नैवावर्ततेऽद्यापि यत आरब्ध एष नरलोकसार्थो यमध्वनः पारमुपदिशन्ति || ३८ || यदिदं योगानुशासनं न वा एतदवरुन्धते यन्न्यस्तदण्डा मुनय उपशमशीला उपर - तात्मानः समवगच्छन्ति ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 39पृष्ठ 1020

"हे राजन्! जो बड़े-बड़े यज्ञ करने वाले राजर्षि हैं, उनकी भी वहाँ तक गति नहीं है। वे सङ्ग्रामभूमि में शत्रुओं का सामना करके केवल प्राण त्यागते हैं और 'यह मेरा है' का अभिमान लेकर उसी पृथ्वी पर शरीर छोड़कर चले जाते हैं। यदि कोई अपने पुण्य की लता के सहारे इन आपत्तियों से बच भी जाए, तो वह फिर संसार मार्ग में ही भटकता रहता है। यही दशा स्वर्गादि ऊर्ध्वलोकों में जाने वालों की भी है।"

यदपि दिगिभजयिनो यज्विनो ये वै राजर्षयः किं तु परं मृधे शयीरन्नस्यामेव ममेयमिति कृतवैरानुबन्धा यां विसृज्य स्वयमुपसंहृताः || ४० || कर्मवल्लीमवलम्ब्य तत आपदः कथञ्चिन्नरकाद्विमुक्तः पुनरप्येवं संसाराध्वनि वर्तमानो नरलोकसार्थमुपयाति एवमुपरि गतोऽपि ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 41पृष्ठ 1021

"परन्तु राजन्! राजर्षि भरत के विषय में पण्डितजन ऐसा कहते हैं— 'जैसे गरुड़ की होड़ कोई मक्खी नहीं कर सकती, वैसे ही भरत के मार्ग का अनुसरण कोई अन्य राजा मन से भी नहीं कर सकता।' उन्होंने पुण्यकीर्ति श्रीहरि में अनुरक्त होकर अपनी युवावस्था में ही अति मनोरम स्त्री, पुत्र, मित्र और राज्य को विष्ठा के समान त्याग दिया था। उन्होंने उस दुस्त्यज पृथ्वी, सम्पत्ति और उस लक्ष्मी का भी लेशमात्र त्याग कर दिया, जिसके लिए बड़े-बड़े देवता लालायित रहते हैं और जो स्वयं उनकी दयादृष्टि चाहती थी। यह उनके लिए उचित था, क्योंकि जिनका चित्त मधुसूदन की सेवा में अनुरक्त हो गया है, उनके लिए मोक्षपद भी तुच्छ है।"

तस्येदमुपगायन्ति– आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसापि महात्मनः ।
नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 42पृष्ठ 1021

"जब उन्हें मृग शरीर छोड़ने की इच्छा हुई, तब उन्होंने उच्च स्वर से कहा था— 'धर्म की रक्षा करने वाले, यज्ञ में निपुण, साङ्ख्य के प्रतिपाद्य और प्रकृति के अधीश्वर, सर्वान्तर्यामी श्रीहरि को मेरा नमस्कार है!' हे राजन्! भरत के ये पवित्र गुण और कर्म बड़े कल्याणकारी हैं। उनका यह चरित्र आयु और धन बढ़ाने वाला, यश बढ़ाने वाला तथा अन्त में स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जो पुरुष इस चरित्र को सुनता या सुनाता है और इसका अभिनन्दन करता है, उसकी समस्त कामनाएँ स्वयं ही पूर्ण हो जाती हैं; उसे किसी से कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं पड़ती।"

In English

The Allegory of the Forest and the Merchants

Jadabharata uses a metaphor of a dangerous forest and traveling merchants to explain the hardships of worldly life to King Rahugana. He describes how human beings are trapped by their senses and desires, wandering through suffering without reaching spiritual peace.

This page answers

  • What is the allegory of the merchant in the forest?
  • How did jadabharata teach king rahugana?
  • Why is worldly life compared to a dangerous forest?
  • What are the six robbers mentioned by jadabharata?

Also written: Bharatopakhyana, Bharata, Shrishuka, Paramatma, Rajarshi, भरतोपाख्यान