श्रीगणेशाय नमः।

ध्रुवचरित : बाल्यावस्था में अपमान सहकर भी परमपद प्राप्त करने का मार्ग क्या है?

तपस्या और अनन्य भक्ति

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8–12 · पृष्ठ 728–777

5,346 शब्द · 27 मिनटका पाठ · 48 श्लोक

मैत्रेय ने विदुर से कहा

अधर्म के त्याग और पुण्य-सम्पादन हेतु

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— दक्ष प्रजापतियों के नायक थे। उन्होंने भगवान का त्रिकाल यज्ञ द्वारा पूजन किया और फिर अङ्गभूत तथा प्रधान, दोनों प्रकार के यज्ञों से अन्य सभी देवताओं का अर्चन किया। इसके पश्चात, उन्होंने एकाग्रचित्त होकर भगवान शङ्कर का यज्ञशेष रूप से यजन किया। अन्त में 'उदवसान' नामक कर्म द्वारा अन्य सोमपायी देवताओं का यजन कर, ऋत्विजों सहित अवभृथ-स्नान के साथ यज्ञ का उपसंहार किया। उन दक्ष प्रजापतियों को, जिन्हें अपने पुरुषार्थ से सिद्धियाँ प्राप्त थीं, भगवान ने आशीर्वाद दिया— "तुम्हारी सदा धर्म में बुद्धि रहे", और तब समस्त देवता स्वर्गलोक चले गए।

आधारं महदादीनां प्रधानपुरुषेश्वरम् ।
ब्रह्म धारयमाणस्य त्रयो लोकाश्चकम्पिरे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 78पृष्ठ 742

विदुरजी! सुना है कि दक्षसुता सतीजी ने अपना पूर्वशरीर त्यागकर हिमालय की पत्नी मेना के गर्भ से पुनर्जन्म लिया था। जिस प्रकार प्रलयकाल में लीक हुई शक्ति सृष्टि के आरम्भ में पुनः ईश्वर का ही आश्रय लेती है, उसी प्रकार अनन्यपरायणा श्रीअम्बिकाजी ने उस जन्म में भी अपने एकमात्र आश्रय और प्रियतम भगवान शङ्कर को ही वरण किया। दक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले भगवान शिव का यह पावन चरित्र यश और आयु बढ़ाने वाला तथा पापपुञ्ज को नष्ट करने वाला है। जो पुरुष भक्तिभाव से इसका नित्यप्रति श्रवण और कीर्तन करता है, वह अपने पापों का नाश कर देता है।

तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो द्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया ।
लोका निरुच्छ्वासनिपीडिता भृशं सलोकपालाः शरणं ययुर्हरिम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 80पृष्ठ 742

कुरुनन्दन! मैं तुम्हें सङ्क्षेप में अधर्म के उस वंश की कथा सुनाता हूँ जिसने प्रलयकाल में दुरीति से भय और मृत्यु को उत्पन्न किया, जिससे यातना और नरक का जोड़ा पैदा हुआ। इस अधर्म का त्याग कराकर पुण्य-सम्पादन में यह कथा हेतु बनती है; अतः इसका तीन बार श्रवण करने से मनुष्य अपने मन की मलिनता दूर कर लेता है। अब मैं श्रीहरि के अंश से उत्पन्न हुए पवित्र कीर्ति महाराज स्वायम्भुव मनु के पुत्रों के वंश का वर्णन करता हूँ। महारानी शतरूपा और उनके पति स्वायम्भुव मनु से दो पुत्र हुए— प्रियव्रत और उत्तानपाद। भगवान वासुदेव की कला से उत्पन्न होने के कारण ये दोनों संसार की रक्षा में तत्पर रहते थे।

स्तुति

देवा ऊचुः नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं चराचरस्याखिलसत्त्वधाम्नः ।
विधेहि तन्नो वृजिनाद्विमोक्षं प्राप्ता वयं त्वां शरणं शरण्यम् ॥

देवताओंने कहा — भगवन्! समस्त स्थावर - जंगम जीवोंके शरीरोंका प्राण एक साथ ही रुक गया है ऐसा तो हमने पहले कभी अनुभव नहीं किया । आप शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले हैं, अपनी शरणमें आये हुए हमलोगोंको इस दुःखसे छुड़ाइये ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 81पृष्ठ 742

राजा उत्तानपाद की दो पत्नियाँ थीं— सुनीति और सुरुचि। उनमें सुरुचि राजा को अधिक प्रिय थी; सुनीति, जिसका पुत्र ध्रुव था, उन्हें वैसी प्रियता प्राप्त नहीं थी। एक दिन राजा उत्तानपाद सुरुचिके पुत्र उत्तम को अपनी गोद में बिठाकर बड़े प्यार से सहला रहे थे। उसी समय ध्रुव ने भी राजा की गोद में बैठने का प्रयास किया, परन्तु राजा ने उसका स्वागत नहीं किया। यह देखकर घमण्ड से भरी हुई सुरुचि ने अपने सौत के पुत्र ध्रुव को राजा की गोद में आते देख, उसके सामने ही डाहभरे शब्दों में कहा— "बच्चे! तू राजसिंहासन पर बैठने का अधिकारी नहीं है। तू भी राजा का ही बेटा है, इससे क्या हुआ; तुझको मैंने तो अपनी कोख में धारण नहीं किया। तू अभी नादान है, तुझे पता नहीं है कि तूने किसी दूसरी स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है; तभी तो ऐसे दुर्लभ विषय की इच्छा कर रहा है। यदि तुझे राजसिंहासन की इच्छा है, तो तपस्या करके परम पुरुष श्रीनारायण की आराधना कर और उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म ले।"

आतिष्ठ तत्तात विमत्सरस्त्व-मुक्तं समात्रापि यदव्यलीकम् ।
आराधयाधोक्षजपादपद्मं यदीच्छसेऽध्यासनमुत्तमो यथा ॥

बेटा! सुरुचिने तेरी सौतेली माँ होनेपर भी बात बिलकुल ठीक कही है; अतः यदि राजकुमार उत्तमके समान राजसिंहासनपर बैठना चाहता है तो द्वेषभाव छोड़कर उसीका पालन कर । बस, श्रीअधोक्षजभगवान्‌के चरणकमलोंकी आराधनामें लग जा ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 19पृष्ठ 733

यह सुनकर ध्रुव सन्तप्त होकर मुरझा गया और विलाप करने लगा। सौत के कटु वचनों को याद करके उसके कमल-सदृश नेत्र आँसुओं से भर आए। उस बेचारी का दुःख देखकर उसे कहीं कोई अन्त दिखाई नहीं दे रहा था। उसने गहरी साँस ली और ध्रुव से कहा— "बेटा! तू दूसरों के लिए किसी प्रकार के अमङ्गल की कामना मत कर। जो मनुष्य दूसरों को दुःख देता है, उसे स्वयं ही उसका फल भोगना पड़ता है। सुरुचि ने जो कुछ कहा है, वह ठीक ही है; क्योंकि महाराज मुझे 'पत्नी' तो क्या, 'दासी' स्वीकार करने में भी लज्जा करते हैं। तूने मुझ मन्दभागिनी के गर्भ से जन्म लिया है और मेरे ही दूध से पला है। बेटा! सुरुचिने तेरी सौतेली माँ होने पर भी बात बिलकुल ठीक कही है; अतः यदि राजकुमार उत्तम के समान राजसिंहासन पर बैठना चाहता है, तो द्वेषभाव छोड़कर उसी का पालन कर। बस, श्रीअधोक्षज भगवान के चरणकमलों की आराधना में लग जा।"

तथा चिकीर्षमाणं तं सपत्न्यास्तनयं ध्रुवम् ।
सुरुचिः शृण्वतो राज्ञः सेर्ष्यमाहातिगर्विता ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 10पृष्ठ 731

सुनीति ने आगे कहा— "बेटा! तू भी उन भक्तवत्सल श्रीभगवान का ही आश्रय ले। जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटने की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु निरन्तर उन्हीं के चरणकमलों के मार्ग की खोज करते हैं। तू अपने धर्म का पालन करते हुए पवित्र चित्त में श्रीपुरुषोत्तम भगवान को बैठा ले और अन्य सबका चिन्तन छोड़कर केवल उन्हीं का भजन कर। उन कमल-दल-लोचन श्रीहरि को छोड़कर मुझे तेरे दुःख को दूर करने वाला कोई दूसरा दिखाई नहीं देता। देख, जिन्हें प्रसन्न करने के लिए ब्रह्मा आदि देवता ढूँढ़ते रहते हैं, वे श्रीलक्ष्मीजी भी दीपक की भाँति हाथ में कमल लिए निरन्तर उन्हीं श्रीहरि की खोज करती रहती हैं।"

निशम्य तत्पौरमुखान्नितान्तं सा विव्यथे यद्गदितं सपत्न्या ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 15पृष्ठ 732

माता सुनीति के ये वचन ध्रुव को मार्ग दिखाने वाले थे। उन्हें सुनकर ध्रुव ने बुद्धि से अपने चित्त का समाधान किया और पिता के नगर से निकल पड़ा। जब ध्रुव वन की ओर जा रहा था, तब उसकी यह स्थिति जानकर नारदजी वहाँ आए। उन्होंने ध्रुव के मस्तक पर अपना पापनाशक कमल फेरा और मन ही मन विस्मित होकर बोले— "अहो! क्षत्रियों का कैसा अद्भुत तेज है! वे थोड़ा सा भी मान-भङ्ग नहीं सह सकते। देखो, अभी तो यह नन्हा सा बच्चा है, फिर भी इसके हृदय में सौतेली माता के कटु वचन घर कर गए हैं।"

यस्याङ्घ्रिपद्मं परिचर्य विश्व-विभावनायात्तगुणाभिपत्तेः ।
अजोऽध्यतिष्ठत्खलु पारमेष्ठ्यं पदं जितात्मश्वसनाभिवन्द्यम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 20पृष्ठ 733

नारदजी ने ध्रुव से कहा— "बेटा! अभी तू बच्चा है और खेल-कूद में मस्त रहता है; हम नहीं समझते कि इस उम्र में तेरा सम्मान या अपमान हो सकता है। यदि तुझे मान-अपमान का विचार ही आता है, तो जान ले कि मनुष्य के असन्तोष का कारण मोह ही है। संसार में मनुष्य अपने कर्मानुसार ही सुख-दुःख प्राप्त करता है। तत! भगवान की गति बड़ी विचित्र है; इसलिए बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि दैववश उसे जैसी भी परिस्थिति मिले, उसी में सन्तुष्ट रहे। तू जिस योगसाधन द्वारा भगवान की कृपा प्राप्त करने चला है, मेरे विचार से साधारण पुरुषों के लिए उन्हें प्रसन्न करना अत्यन्त कठिन है। योगी अनेक जन्मों तक कठोर साधना करते हैं, फिर भी मार्ग नहीं पाते। इसलिए तू यह व्यर्थ का हठ छोड़ दे और घर लौट जा; बड़ा होने पर परमार्थ-साधन कर लेना।"

अहो तेजः क्षत्रियाणां मानभंगममृष्यताम् ।
बालोऽप्ययं हृदा धत्ते यत्समातुरसद्वचः ॥

' अहो! क्षत्रियोंका कैसा अद्भुत तेज है, वे थोड़ा - सा भी मान भंग नहीं सह सकते । देखो, अभी तो यह नन्हा सा बच्चा है; तो भी इसके हृदयमें सौतेली माताके कटु वचन घर कर गये हैं '

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 26पृष्ठ 734

ध्रुव ने उत्तर दिया— "भगवन! सुख-दुःख से चित्त को शान्त करने का आपने बहुत अच्छा उपाय बताया, परन्तु मुझ जैसे अज्ञानियों की दृष्टि यहाँ तक नहीं पहुँच पाती। मुझे घोर क्षत्रिय स्वभाव प्राप्त हुआ है, जिससे मुझमें विनय का अभाव रहता है; सुरुचिने अपने कटु वचन रूपी बाणों से मेरे हृदय को विदीर्ण कर डाला है। इसलिए आपका यह उपदेश मुझ पर ठहर नहीं पाता। हे ब्रह्मन्! मैं उस पद पर अधिकार करना चाहता हूँ जो त्रिलोकी में सबसे श्रेष्ठ है और जिस पर मेरे बाप-दादे भी आरूढ़ नहीं हो सके। आप ब्रह्माजी के पुत्र हैं और संसार के कल्याण हेतु वीणा बजाते सूर्य की भाँति विचरा करते हैं; कृपया मुझे उसका मार्ग बताइये।"

न विदुर्मृगयन्तोऽपि तीव्रयोगसमाधिना ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 31पृष्ठ 735

ध्रुव की बात सुनकर नारदजी बड़े प्रसन्न हुए और कहा— "पुरुषार्थ की अभिलाषा हो, तो एकमात्र उपाय श्रीहरि के चरणों का सेवन ही है। बेटा! तेरा कल्याण होगा। अब तू श्रीयमुना के तटवर्ती पवित्र मधुवन जा। वहाँ श्रीहरि का नित्य निवास है। वहाँ कालींदी के निर्मल जल में तीनों समय स्नान कर, नित्यकर्म से निवृत्त होकर यथाविधि आसन बिछाकर बैठना। फिर रेचक, पूरक और कुम्भक— इन तीन प्रकार के प्राणायामों से धीरे-धीरे अपने प्राण, मन और इन्द्रियों के दोषों को दूर करना और धैर्ययुक्त मन से परमगुरु श्रीभगवान का ध्यान करना। उनके नेत्र और मुख सदैव प्रसन्न रहते हैं; उन्हें देखने से ऐसा लगता है कि वे भक्त को वर देने के लिए उद्यत हैं। उनकी नासिका, भौंहें और कपोल बड़े ही सुहावने हैं; वे समस्त देवताओं में परम सुन्दर हैं।"

अथापि मेऽविनीतस्य क्षात्त्रं घोरमुपेयुषः ।
सुरुच्या दुर्वचोबाणैर्न भिन्ने श्रयते हृदि ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 36पृष्ठ 736

राजकुमार! नारदजी के उपदेश को सुनकर ध्रुव ने उन्हें प्रणाम किया और फिर भगवान के चरण-चिह्नों से अङ्कित उस परम पवित्र मधुवन की ओर प्रस्थान किया। वहां पहुँचकर उन्होंने यमुना में स्नान किया और उसी रात, पवित्रतापूर्वक उपवास रखकर, श्रीनारदजी के बताए मार्ग पर चलते हुए एकाग्रचित्त होकर परमपुरुष श्रीनारायण की उपासना आरम्भ कर दी।

दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 49पृष्ठ 738

ध्रुव ने अपने शरीर के निर्वाह के लिए कठिन साधना का मार्ग चुना। पहले महीने में उन्होंने तीन-तीन रात्रियों के अन्तराल पर केवल कैथ और बेर के फल खाकर भगवान का भजन किया। दूसरे महीने में उन्होंने छह-छछ दिन के पश्चात सूखे घास और पत्तों के आहार से तपस्या जारी रखी। तीसरे महीने में उन्होंने नौ-नौ दिनों तक केवल जल पीकर समाधियोग द्वारा श्रीहरि की आराधना की। चौथे महीने में उन्होंने अपनी श्वास को जीतकर बारह-बारह दिनों के अन्तराल पर केवल वायु पीकर ध्यानयोग का अभ्यास किया।

पद्भ्यां नखमणिश्रेण्या विलसद्भ्यां समर्चताम् ' ।
हृत्पद्मकर्णिकाधिष्ण्यमाक्रम्यात्मन्यवस्थितम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 50पृष्ठ 738

जब पाँचवाँ मास आया, तब राजकुमार ध्रुव ने अपनी श्वास पर विजय प्राप्त कर ली और वे एक पैर से खम्भे के समान निश्चल भाव से खड़े हो गए। उन्होंने शब्दादि विषयों और इन्द्रियों के नियामक अपने मन को सब ओर से खींच लिया था। उनका सारा चित्त हृदय में स्थित श्रीहरि के स्वरूप में लीन था; वे मन को किसी दूसरी ओर जाने ही नहीं दे रहे थे। जिस क्षण उन्होंने महदादि सम्पूर्ण तत्त्वों के आधार और प्रकृति-पुरुष के अधीश्वर परब्रह्म की धारणा की, उस समय उनके तेज को सह न पाने के कारण तीनों लोक काँप उठे।

स्मयमानमभिध्यायेत्सानुरागावलोकनम् ।
नियतेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 51पृष्ठ 738

जब ध्रुव एक पैर पर खड़े हुए, तब उनके अँगूठे के दबाव से आधी पृथ्वी इस प्रकार झुक गई, जैसे किसी गजराज के चढ़ जाने पर नाव डगमगाने लगती है। ध्रुवजी ने अपनी इन्द्रियों और प्राणों को रोककर अनन्यबुद्धि से विश्वात्मा श्रीहरि का ध्यान किया। उनकी इस समाधि के कारण समस्त जीवों का श्वास-प्रश्वास रुक गया। इससे समस्त लोक और लोकपाल अत्यन्त पीड़ावान होकर घबरा गए और वे सब भागकर श्रीहरि की शरण में पहुँचे।

सलिलैःशुचिभिर्माल्यैर्वन्यैर्मूलफलादिभिः ।
शस्ताङ्कुरांशुकैश्चार्चेत्तुलस्या प्रियया प्रभुम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 55पृष्ठ 739

देवताओं ने व्याकुल होकर कहा— “हे भगवन्! समस्त स्थावर और जङ्गम जीवों के शरीरों का प्राण एक साथ ही रुक गया है; ऐसा हमने पहले कभी नहीं देखा। आप शरणागतों के रक्षक हैं, कृपया हमें इस दुःख से छुड़ाइये!”

राजोवाच सुतो मे बालको ब्रह्मन् स्त्रैणेनाकरुणात्मना ।
निर्वासितः पंचवर्षः सह मात्रा महान्कविः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 65पृष्ठ 740

तब श्रीभगवान ने उन्हें ढाँढस बँधाते हुए कहा— “हे देवताओं! डरो मत। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने अपने चित्त को मुझ विश्वात्मा में लीन कर दिया है। इस समय उसकी मेरे साथ अभेद धारणा सिद्ध हो गई है, इसी कारण उसके प्राण-निरोध से तुम सबका प्राण भी रुक गया है। अब तुम अपने-अपने लोकों को जाओ, मैं उस बालक को इस दुष्कर तप से निवृत्त कर दूँगा।”

तत्प्रभावमविज्ञाय प्रावृङ्क्ते यद्यशो जगत् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 68पृष्ठ 741

उस समय ध्रुवजी की दशा ऐसी थी मानो वे नेत्रों से प्रभु को पी जाना चाहते हों, उन्हें चूमना चाहते हों और अपनी भुजाओं में कस लेना चाहते हों। वे हाथ जोड़े प्रभु के सामने खड़े थे और उनकी स्तुति करना चाहते थे, परन्तु समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे करें। सर्वान्तर्यामी हरि उनके मन की बात जान गए; उन्होंने कृपापूर्वक अपने वेदमय शङ्ख को ध्रुव के गाल से स्पर्श करा दिया।

पंचमे मास्यनुप्राप्ते जितश्वासो नृपात्मजः ।
ध्यायन् ब्रह्म पदैकेन तस्थौ स्थाणुरिवाचलः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 76पृष्ठ 742

ध्रुवजी भविष्य में अविचल पद प्राप्त करने वाले थे। उस क्षण शङ्ख का स्पर्श होते ही उन्हें वेदमयी दिव्यवाणी प्राप्त हो गई और जीव तथा ब्रह्म के स्वरूप का निश्चय भी हो गया। अब वे अत्यन्त भक्तिभाव से धैर्यपूर्वक विश्वविख्यात श्रीहरि की स्तुति करने लगे।

मैत्रेय उवाच

त एवमुत्सन्नभया उरुक्रमे कृतावनामाः प्रययुस्त्रिविष्टपम् ।
सहस्रशीर्षापि ततो गरुत्मता मधोर्वनं भृत्यदिदृक्षया गतः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 1पृष्ठ 744

ध्रुवजी बोले— “प्रभो! आप सर्वशक्तिसम्पन्न हैं; आप ही मेरे अन्तःकरण में प्रवेशकर अपने तेज से मेरी इस सोयी हुई वाणी को सजीव करते हैं और मेरी इन्द्रियों एवं प्राणों को चेतनता प्रदान करते हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। संसार में संसर्ग से उत्पन्न सुख तो मनुष्यों को नरक में भी मिल सकता है, जो लोग केवल विषय-सुख के लिए आपकी उपासना करते हैं, उनकी बुद्धि आपकी माया ने ठग ली है। नाथ! आपके चरण कमलों का ध्यान करने और आपके भक्तों के पवित्र चरित्र सुनने से जो आनन्द मिलता है, वह निजानन्दस्वरूप ब्रह्म में भी नहीं है। जिन्हें काल की तलवार काट देती है, उन स्वर्गीय विमानों से गिरने वाले पुरुषों को यह सुख कैसे मिल सकता है?

स्तुति श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध
ध्रुव उवाच

योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना ।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥

ध्रुवजीने कहा - प्रभो! आप सर्वशक्तिसम्पन्न हैं; आप ही मेरे अन्तःकरणमें प्रवेशकर अपने तेजसे मेरी इस सोयी हुई वाणीको सजीव करते हैं तथा हाथ, पैर, कान और त्वचा आदि अन्यान्य इन्द्रियों एवं प्राणोंको भी चेतनता देते हैं । मैं आप अन्तर्यामी भगवान्को प्रणाम करता हूँ ।

श्लोक 6पृष्ठ 744

एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्त्या मायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषम् ।
सृष्ट्वानुविश्य पुरुषस्तदसद्गुणेषु ।
नानेव दारुषु विभावसुवद्विभासि ॥

श्लोक 7पृष्ठ 745

त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वं सुप्तप्रबुद्ध इव नाथ भवत्प्रपन्नः ।
तस्यापवर्ग्यशरणं तव पादमूलं विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो ॥

श्लोक 8पृष्ठ 745

नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया ते ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतोः ।
अर्चन्ति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य-मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नॄणाम् ॥

श्लोक 9पृष्ठ 745

ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।
सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात् ॥

संसर्गसे उत्पन्न सुख तो मनुष्योंको नरकमें भी मिल सकता है । जो लोग इस विषयसुखके लिये लालायित रहते हैं और जो जन्म - मरणके बन्धनसे छुड़ा देनेवाले कल्पतरुस्वरूप आपकी उपासना भगवत् - प्राप्तिके सिवा किसी अन्य उद्देश्यसे करते हैं, उनकी बुद्धि अवश्य ही आपकी मायाके द्वारा ठगी गयी है ॥९ ॥ नाथ! आपके चरणकमलोंका ध्यान करनेसे और आपके भक्तोंके पवित्र चरित्र सुननेसे प्राणियोंको जो आनन्द प्राप्त होता है, वह निजानन्दस्वरूप ब्रह्ममें भी नहीं मिल सकता । फिर जिन्हें कालकी तलवार काटे डालती है उन स्वर्गीय विमानोंसे गिरनेवाले पुरुषोंको तो वह सुख मिल ही कैसे सकता है ।

श्लोक 10पृष्ठ 746

भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसंगो भूयादनन्त महताममलाशयानाम् ।
येनांजसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्तः ॥

श्लोक 11पृष्ठ 746

ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः ।
ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द-सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसंगाः ॥

श्लोक 12पृष्ठ 746

तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य-मर्त्यादिभिः परिचितं सदसद्विशेषम् ।
रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं नातः परं परम वेद्मि न यत्र वादः ॥

श्लोक 13पृष्ठ 747

त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांत्र्यधीशः ।
यद्बुद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से ॥

श्लोक 15पृष्ठ 747

यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् ।
तद्ब्रह्म विश्वभवमेकमनन्तमाद्य-मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥

श्लोक 16पृष्ठ 747

सत्याऽऽशिषो हि भगवंस्तव पादपद्म-माशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः ।
अप्येवमर्य भगवान् परिपाति दीनान् वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् ॥

श्लोक 17पृष्ठ 747
मैत्रेय उवाच

अथाभिष्टुत एवं वै सत्संकल्पेन धीमता ।
भृत्यानुरक्तो भगवान् प्रतिनन्द्येदमब्रवीत् ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! जब शुभ संकल्पवाले मतिमान् ध्रुवजीने इस प्रकार स्तुति की तब भक्तवत्सल भगवान् उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे ।

श्लोक 18पृष्ठ 748

अनन्त परमात्मन्! मुझे तो उन विशुद्ध हृदय महात्मा भक्तों का सङ्ग दीजिये, जिनका आपमें अविच्छिन्न भक्तिभाव है। उनके सङ्ग में मैं आपके गुणों और लीलाओं की कथा-सुधा पीकर उन्मत्त हो जाऊँगा और इस भयङ्कर संसारसागर के पार पहुँच जाऊँगा। हे कमलनाभ! जिनके चित्त आपके चरणों की सुगन्ध में लुभाए हुए हैं, वे अपने प्रिय शरीर, पुत्र, मित्र और गृह की सुधि भी नहीं लेते।

हे अजन्मा परमेश्वर! मैं तो इस स्थूल विश्वरूप को जानता हूँ जो पशु, पक्षी, देवता और मनुष्य से परिपूर्ण है; किन्तु इससे परे जो आपका परम स्वरूप है, जिसमें वाणी की गति नहीं, उसका मुझे ज्ञान नहीं है। हे भगवन्! कल्प के अन्त में जो परमपुरुष इस विश्व को अपने उदर में लीन कर लेते हैं और जिनके नाभि-समुद्र से प्रकट हुए सुवर्णवर्ण कमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, वे आप ही हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ!”

“हे भगवन्! आप कारण, अखण्ड, अनादि, अनन्त और आनन्दमय निर्विकार ब्रह्मस्वरूप हैं। मैं आपकी शरण हूँ!” ध्रुव के हृदय से निकली यह स्तुति जब पूर्ण हुई, तब वातावरण में एक अलौकिक शान्ति व्याप्त हो गई। ध्रुव ने कहा, “स्वामी! यद्यपि संसार के भोगों की इच्छा रखने वाले लोग आपके चरणकमलों की प्राप्ति को ही सच्चा फल मानते हैं, किन्तु जिस प्रकार एक गौ अपने नवजात बछड़े को दूध पिलाकर व्याघ्रों से रक्षा करती है, उसी प्रकार आप भक्तों पर कृपा करने के लिए सदैव विकल रहते हैं। हम जैसे सकाम जीवों के संसार-भय को दूर करते हुए हमारी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं।”

जब शुभ सङ्कल्प वाले ध्रुव ने इस प्रकार स्तुति की, तब भक्तवत्सल भगवान स्वयं प्रकट हुए। श्रीभगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले राजकुमार! मैं तेरे हृदय के सङ्कल्प को जानता हूँ। यद्यपि वह पद प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, फिर भी मैं तुझे वह देता हूँ। तेरा कल्याण हो!”

मैत्रेय उवाच

श्रीभगवानुवाच वेदाहं ते व्यवसितं हृदि राजन्यबालक ।
तत्प्रयच्छामि भद्रं ते दुरापमपि सुव्रत ॥

श्रीभगवान्ने कहा — उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजकुमार! मैं तेरे हृदयका संकल्प जानता हूँ । यद्यपि उस पदका प्राप्त होना बहुत कठिन है, तो भी मैं तुझे वह देता हूँ । तेरा कल्याण हो ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 19पृष्ठ 748

भगवान ने ध्रुव को एक ऐसे तेजोमय और अविनाशी लोक का वरदान दिया, जिसे आज तक किसी ने प्राप्त नहीं किया। उस लोक के चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागण उसी प्रकार चक्कर काटते हैं जैसे मेढ़ के चारों ओर दवरी के बैल घूमते हैं। वह लोक अन्य लोकों के नाश होने पर भी स्थिर रहता है, जहाँ सप्तर्षिगण और नक्षत्र दक्ष प्रजापति, अग्नि, कश्यप तथा शुक्र की प्रदक्षिणा करते हैं। भगवान ने कहा, “मैं तुझे ध्रुवलोक देता हूँ। तू वर्षतक धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करेगा और तेरी इन्द्रियों की शक्ति ज्यों की त्यों बनी रहेगी। आगे चलकर तेरा भाई उत्तम शिकार खेलते हुए मारा जाएगा, तब उसकी माता सुरुचि पुत्र-प्रेम में पागल होकर उसे खोजने हेतु दावानल में प्रवेश कर जाएगी। तू अनेक बड़े यज्ञों के द्वारा मेरा यजन करेगा और यहाँ उत्तम भोग भोगकर अन्त में मेरा ही स्मरण करेगा। इस प्रकार तू सम्पूर्ण लोकों का वन्दनीय बनकर सप्तर्षियों से भी ऊपर मेरे निज धाम को प्राप्त करेगा।”

मैत्रेय उवाच

नान्यैरधिष्ठितं भद्र यद्भ्राजिष्णु ध्रुवक्षिति ' ।
यत्र ग्रहर्क्षताराणां ज्योतिषां चक्रमाहितम् ॥

भद्र! जिस तेजोमय अविनाशी लोकको आजतक किसीने प्राप्त नहीं किया, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागणरूप ज्योतिश्चक्र उसी प्रकार चक्कर काटता रहता है जिस प्रकार मेढीके * चारों ओर दवरीके बैल घूमते रहते हैं । अवान्तर कल्पपर्यन्त रहनेवाले अन्य लोकोंका नाश हो जानेपर भी जो स्थिर रहता है तथा तारागणके सहित धर्म, अग्नि, कश्यप और शुक्र आदि नक्षत्र एवं सप्तर्षिगण जिसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, वह ध्रुवलोक मैं तुझे देता हूँ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 20पृष्ठ 748

भगवान श्रीगरुडध्वज ध्रुव को अपना पद प्रदान कर उसके देखते-देखते अपने लोक को चले गए। यद्यपि ध्रुव का सङ्कल्प पूर्ण हो चुका था, किन्तु उसका चित्त विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। वह अपने नगर की ओर लौट गया।

मैत्रेय उवाच

मेढ्यां गोचक्रवत्स्थास्नु परस्तात्कल्पवासिनाम् ।
धर्मोऽग्निः कश्यपः शुक्रो मुनयो ये वनौकसः ।
चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत्सतारकाः ॥

भद्र! जिस तेजोमय अविनाशी लोकको आजतक किसीने प्राप्त नहीं किया, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागणरूप ज्योतिश्चक्र उसी प्रकार चक्कर काटता रहता है जिस प्रकार मेढीके * चारों ओर दवरीके बैल घूमते रहते हैं । अवान्तर कल्पपर्यन्त रहनेवाले अन्य लोकोंका नाश हो जानेपर भी जो स्थिर रहता है तथा तारागणके सहित धर्म, अग्नि, कश्यप और शुक्र आदि नक्षत्र एवं सप्तर्षिगण जिसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं, वह ध्रुवलोक मैं तुझे देता हूँ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 21पृष्ठ 748

विदुरजी ने पूछा, “हे ब्रह्मन्! मायापति श्रीहरि का परमपद तो अत्यन्त दुर्लभ है और वह केवल उनके चरणकमलों की उपासना से ही मिलता है। ध्रुवजी के पास तो पूर्ण विवेक था; फिर एक ही जन्म में परमपद पा लेने पर भी उन्होंने अपने आप को अकृतार्थ क्यों समझा?”

इष्ट्वा मां यज्ञहृदयं यज्ञैः पुष्कलदक्षिणैः ।
भुक्त्वा चेहाशिषः सत्या अन्ते मां संस्मरिष्यसि ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 24पृष्ठ 749

मैत्रेयजी ने उत्तर दिया, “विदुरजी! ध्रुव का हृदय अपनी सौतेली माता के वाग्बाणों से बिन्ध गया था। वर माँगते समय भी उन्हें उनका स्मरण रहा, इसीलिए उन्होंने मुक्तिदाता श्रीहरि से मुक्ति नहीं माँगी। अब जब भगवद्दर्शन से वह मनोमालिन्य दूर हो गया, तो उन्हें अपनी भूल पर पश्चात्ताप होने लगा।”

सुदुर्लभं यत्परमं पदं हरे-र्मायाविनस्तच्चरणार्चनार्जितम् ।
लब्ध्वाप्यसिद्धार्थमिवैकजन्मना कथं स्वमात्मानममन्यतार्थवित् ॥

विदुरजीने पूछा— ब्रह्मन्! मायापति श्रीहरिका परमपद तो अत्यन्त दुर्लभ है और मिलता भी उनके चरणकमलोंकी उपासनासे ही है । ध्रुवजी भी सारासारका पूर्ण विवेक रखते थे; फिर एक ही जन्ममें उस परमपदको पा लेनेपर भी उन्होंने अपनेको अकृतार्थ क्यों समझा?

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 28पृष्ठ 750

ध्रुव मन ही मन सोचने लगे, “अहो! जिन्हें सनकादि ऊर्ध्वरेता सिद्ध भी अनेक जन्मों की समाधि के बाद प्राप्त कर पाते हैं, मैंने उनके चरणों की छाया छह महीने में ही पा ली। किन्तु चित्त में दूसरी वासना रहने के कारण मैं फिर उनसे दूर हो गया। मुझ मन्दभाग्य की मूर्खता तो देखो! मैंने संसार-पाश को काटने वाले प्रभु के पादपद्मों में पहुँचकर भी नाशवान वस्तु की ही याचना की!”

मैत्रेय उवाच

मातुः सपत्न्या वाग्बाणैर्हृदि विद्धस्तु तान् स्मरन् ।
नैच्छन्मुक्तिपतेर्मुक्तिं तस्मात्तापमुपेयिवान् ॥

श्रीमैत्रेयजीने कहा – ध्रुवजीका हृदय अपनी सौतेली माताके वाग्बाणोंसे बिंध गया था तथा वर माँगनेके समय भी उन्हें उनका स्मरण बना हुआ था; इसीसे उन्होंने मुक्तिदाता श्रीहरिसे मुक्ति नहीं माँगी । अब जब भगवद्दर्शनसे वह मनोमालिन्य दूर हो गया तो उन्हें अपनी इस भूलके लिये पश्चात्ताप हुआ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 29पृष्ठ 750

ध्रुव स्वयं को कोसते हुए कहने लगे, “देवताओं को स्वर्ग भोगने के पश्चात् फिर नीचे गिरना होता है, इसलिए वे मेरी भगवत्प्राप्ति रूप उच्च स्थिति को सहन नहीं कर सके और उन्होंने ही मेरी बुद्धिको नष्ट कर दिया। तभी तो मैंने नारदजी की यथार्थ बात भी स्वीकार नहीं की। जिन्हें प्रसन्न करना अत्यन्त कठिन है, उन्हीं विश्वात्मा श्रीहरि को तपस्या द्वारा प्रसन्न करके मैंने जो कुछ माँगा है, वह सब व्यर्थ है; ठीक उसी तरह जैसे गतायु पुरुष के लिए चिकित्सा व्यर्थ होती है। मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ! संसार-बन्धन का नाश करने वाले प्रभु से मैंने संसार ही माँगा!”

दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् ।
तये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 33पृष्ठ 751

ध्रुव ने स्वयं को अपराधी मानते हुए कहा, “मैं बड़ा पुण्यहीन हूँ! जिस प्रकार कोई कँगला किसी चक्रवर्ती सम्राट को प्रसन्न करके उससे तुषसहित चावलों की कनी माँगता है, उसी प्रकार मैंने भी आत्मानन्द प्रदान करने वाले श्रीहरि से मूर्खतावश उच्च पदादि ही माँगे हैं।”

ब्राह्मणैः कुलवृद्धैश्च पर्यस्तोऽमात्यबन्धुभिः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 39पृष्ठ 752

मैत्रेयजी ने कहा, “तात! तुम्हारी तरह जो लोग श्रीमुकुन्द के चरण-रसमय मधुकर हैं और जिनका मन स्वयं आई परिस्थितियों में सन्तुष्ट रहता है, वे भगवान से उनकी सेवा के सिवा कुछ नहीं माँगते।”

मैत्रेय उवाच

प्रजापतेर्दुहितरं शिशुमारस्य वै ध्रुवः ।
उपयेमे भ्रमिं नाम तत्सुतौ कल्पवत्सरौ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! ध्रुवने प्रजापति शिशुमारकी पुत्री भ्रमिके स् किया, उससे उनके कल्प और वत्सर नामके दो पुत्र हुए ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · श्लोक 1पृष्ठ 757

जब ध्रुव अपने नगर पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य अत्यन्त भव्य था। राजा उत्तानपाद अपने पुत्र को देखने के लिए बहुत दिनों से उत्कण्ठित थे। जैसे ही उन्होंने ध्रुव को देखा, वे तुरन्त रथ से उतर पड़े और प्रेमातुर होकर, लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए ध्रुव को अपनी भुजाओं में भर लिया। प्रभु के परमपुनीत पादपद्मों का स्पर्श होते ही ध्रुव के समस्त पाप-बन्धन कट गए थे। राजा ने बार-बार पुत्र का सिर सूँघा और आनन्द के आँसुओं से उसे नहला दिया।

सुनीतिः सुरुचिश्चास्य महिष्यौ रुक्मभूषिते ।
आरुह्य शिबिकां सार्धमुत्तमेनाभिजग्मतुः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 41पृष्ठ 753

तदनन्तर ध्रुव ने अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया और दोनों माताओं को भी प्रणाम किया। राजा उत्तानपाद ने अश्रुगद्गद वाणी से ‘चिरञ्जीवी रहो’ का आशीर्वाद दिया। इधर भाई उत्तम और ध्रुव भी प्रेम से विह्वल होकर मिले; एक-दूसरे के अङ्गों को स्पर्श कर दोनों के शरीर में रोमाञ्च हो गया और नेत्रों से आँसुओं की धारा बहने लगी। ध्रुव की माता सुनीति अपने प्राणप्रिय पुत्र को गले लगाकर सारा सन्ताप भूल गई।

अभिवन्द्य े पितुः पादावाशीर्भिश्चाभिमन्त्रितः ३ ।
ननाम मातरौ शीर्ष्णा सत्कृतः सज्जनाग्रणीः ॥

तदनन्तर सज्जनोंमें अग्रगण्य ध्रुवजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया और उनसे आशीर्वाद पाकर, कुशल - प्रश्नादिसे सम्मानित हो दोनों माताओंको प्रणाम किया ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 45पृष्ठ 753

नगरवासी भी उनकी प्रशंसा कर रहे थे, “महारानीजी! आपका लाल लौट आया है, यह सबका दुःख दूर करने वाला है। इसने निश्चय ही श्रीहरि की उपासना की है।” जब सभी लोग ध्रुव के प्रति लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे, तब महाराज उत्तानपाद ने उसे भाई उत्तम सहित हथिनी पर चढ़ाकर हर्ष के साथ राजधानी में प्रवेश किया। नगर को स्वर्ण सामग्रियों से सजाया गया था और गलियों में चन्दन का छिड़काव किया गया था। मार्ग में शीलवती सुन्दरियाँ उन्हें देखकर वात्सल्यभाव से पुष्पों और फलों की वर्षा कर रही थीं।

तां शशंसुर्जना राज्ञीं दिष्ट्या ते पुत्र आर्तिहा ।
प्रतिलब्धश्चिरं नष्टो रक्षिता मण्डलं भुवः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 51पृष्ठ 754

ध्रुव जब अपने महल पहुँचे, तो वहाँ के दृश्य अद्भुत थे—सुन्दर स्वर्ण-कामदार परदे, बहुमूल्य आसन और स्फटिक व पन्ने की दीवारों में जगमगाते मणिमय दीपक। महल के चारों ओर दिव्य वृक्षों से सुशोभित उद्यान थे, जिनमें हंस और सारस पक्षी क्रीड़ा कर रहे थे।

महामणिव्रातमये स तस्मिन् भवनोत्तमे ।
लालितो नितरां पित्रा न्यवसद्दिवि देववत् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · श्लोक 60पृष्ठ 755

राजर्षि उत्तानपाद ने ध्रुव के प्रभाव की बातें नारदजी से पहले ही सुनी थीं, पर प्रत्यक्ष देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। जब उन्होंने देखा कि ध्रुव अब तरुण अवस्था में है और प्रजा का उन पर अनुराग है, तो उन्होंने उन्हें निखिल भूमण्डल के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। किन्तु ध्रुव ने अपनी वृद्धावस्था आते देख, आत्मस्वरूप का चिन्तन करने हेतु संसार से विरक्त होकर वन की ओर प्रस्थान किया।

ध्रुव ने प्रजापति शिशुमार की पुत्री भ्रमिका से विवाह किया, जिससे उनके 'कल्प' और 'वत्सर' नाम के दो पुत्र हुए।

ध्रुव की दूसरी स्त्री वायुपुत्री इला थी। उनसे उनके उत्कल नाम के एक पुत्र और एक कन्या रत्न का जन्म हुआ।

विदुरजी! ध्रुव के जीवन में एक अत्यन्त दुखद मोड़ आया। उनके पुत्र उत्तम का अभी विवाह भी नहीं हुआ था कि एक दिन शिकार खेलते समय हिमालय पर्वत पर एक बलवान यक्ष ने उसे मार डाला। उस अनहोनी के साथ उसकी माता भी परलोक सिधार गई। जब ध्रुव को अपने भाई के मारे जाने का समाचार मिला, तो वे शोक, क्रोध और उद्वेग से भर उठे। वे तुरन्त एक विजयप्रद रथ पर सवार हुए और यक्षों के देश की ओर निकल पड़े।

भल्लैः संछिद्यमानानां शिरोभिश्चारुकुण्डलैः ।
ऊरुभिर्हेमतालाभैर्दोर्भिर्वलयवल्गुभिः ॥

हारकेयूरमुकुटैरुष्णीषैश्च महाधनैः ।
आस्तृतास्ता रणभुवो रेजुर्वीरमनोहराः ॥

बाणोंकी वर्षा करके उनके अस्त्र - शस्त्रोंको इस प्रकार छिन्न - भिन्न कर दिया, जैसे आँधी बादलोंको तितर - बितर कर देती है ॥ १६ ॥ उनके धनुषसे छूटे हुए तीखे तीर यक्ष - राक्षसोंके कवचोंको भेदकर इस प्रकार उनके शरीरोंमें घुस गये, जैसे इन्द्रके छोड़े हुए वज्र पर्वतोंमें प्रवेश कर गये थे ॥१७ ॥ विदुरजी! महाराज ध्रुवके बाणोंसे कटे हुए यक्षोंके सुन्दर कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे, सुनहरी तालवृक्षके समान जाँघोंसे, वलयविभूषित बाहुओंसे, हार, भुजबन्ध, मुकुट और बहुमूल्य पगड़ियोंसे पटी हुई वह वीरोंके मनको लुभानेवाली समरभूमि बड़ी शोभा पा रही थी ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · श्लोक 18-19पृष्ठ 759

उत्तर दिशा में हिमालय की घाटियों में पहुँचकर उन्होंने अलकापुरी देखी, जो यक्षों से भरी हुई थी। वहाँ अनेक भूत-प्रेत और पिशाच जैसे रुद्रानुचर निवास करते थे। ध्रुव ने वहाँ पहुँचकर अपना शङ्ख बजाया। उस शङ्खनाद ने पूरे आकाश और दिशाओं को गुँजा दिया। शङ्ख की वह भयानक ध्वनि सुनकर यक्ष-पत्नियों की आँखें भय से कातर हो उठीं और वे डर गईं।

महाबलवान यक्ष-वीरों को ध्रुव का वह शङ्खनाद सहन न हुआ। वे तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लेकर नगर के बाहर निकल आए और ध्रुव पर टूट पड़े। महारथी ध्रुव एक प्रचण्ड धनुर्धर थे। उन्होंने एक ही क्षण में प्रत्येक शत्रु पर तीन-तीन बाण चला दिए। जब यक्षों ने अपने मस्तकों पर उन बाणों के प्रहार देखे, तो उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी हार निश्चित है। वे ध्रुव के इस अद्भुत पराक्रम की प्रशंसा करने लगे।

परन्तु, जैसे सर्प किसी के पैरों का आघात नहीं सहते, वैसे ही उन यक्षों ने भी ध्रुव के पराक्रम को सहन नहीं किया। उन्होंने जवाब में एक ही साथ ध्रुव पर दुगुने—छह-छह बाण छोड़े। वे कुपित होकर रथ और सारथी सहित उन पर परिघ, खड्ग, प्रास, त्रिशूल, फरसा, शक्ति, ऋष्टि और विचित्र पङ्खदार बाणों की वर्षा करने लगे। इस भीषण शस्त्र-वर्षा से ध्रुवजी पूरी तरह ढक गए; उन्हें देखना वैसा ही हो गया जैसे भारी वर्षा में पर्वत ओझल हो जाता है। आकाश में स्थित सिद्धगण यह देखकर कहने लगे—'आज यक्ष-रूपी समुद्र में डूबकर यह मानव-सूर्य अस्त हो गया।'

यक्ष लोग अपनी विजय की घोषणा करते हुए सिंह की तरह गरजने लगे। तभी, कुहरे से सूर्य के निकलने जैसा दृश्य हुआ; ध्रुवजी का रथ अचानक प्रकट हुआ। उन्होंने बाणों की वर्षा कर यक्षों के अस्त्र-शस्त्रों को वैसे ही छिन्न-भिन्न कर दिया जैसे आँधी बादलों को तितर-बितर कर देती है। उनके तीखे तीर यक्षों के कवचों को भेदकर ऐसे घुस गए, जैसे इन्द्र के वज्र पर्वतों में प्रवेश करते हैं। युद्धभूमि वीरों के कटे हुए अङ्गों, मुकुटों और बहुमूल्य पगड़ियों से भर गई थी। जो कुछ यक्ष जीवित बचे थे, वे सिंह से परास्त हुए गजराज की तरह मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।

जब रणभूमि में कोई शत्रु शेष नहीं रहा, तब ध्रुवजी की इच्छा अलकापुरी देखने की हुई। किन्तु वे पुरी के भीतर नहीं गए। उन्होंने अपने सारथि से कहा—"ये मायावी क्या करना चाहते हैं, इसका मनुष्य को पता नहीं लग सकता।" वे सावधान होकर रथ में बैठे रहे। तभी उन्हें समुद्र की गर्जना जैसी भीषण आँधी और उड़ती धूल दिखाई दी। क्रोधपूर्ण नेत्रों वाली आग की चिनगारियाँ उगलते हुए हाथी, सिंह और बाघ के झुण्ड उनकी ओर दौड़ पड़े। प्रलयकाल के समान भयङ्कर समुद्र अपनी उत्ताल तरङ्गों से पृथ्वी को डुबाता हुआ उनकी ओर बढ़ रहा था। असुरों ने अपनी आसुरी माया का वह भयानक कौतुक रचा था।

यह देखकर वहाँ उपस्थित मुनियों ने ध्रुवजी के लिए मङ्गल कामना की और कहा—"उत्तानपादनन्दन ध्रुव! शरणागत-भयभञ्जन शार्ङ्गपाणि भगवान् नारायण तुम्हारे शत्रुओं का संहार करें।" उन्होंने बताया कि भगवान का नाम लेने मात्र से मनुष्य मृत्यु के मुख से बच जाता है। ऋषियों की बात सुनकर ध्रुवजी ने आचमन किया और श्रीनारायण द्वारा बनाए गए 'नारायणास्त्र' को धनुष पर चढ़ा लिया। उस बाण के चढ़ते ही यक्षों की माया क्षण भर में नष्ट हो गई, जैसे ज्ञान के उदय होने पर अविद्या मिट जाती है।

हेलनं गिरिशभ्रातुर्धनदस्य त्वया कृतम् ।
यज्जघ्निवान् पुण्यजनान् भ्रातृघ्नानित्यमर्षितः ॥

राजन्! जिस प्रकार ओषधिसे रोग शान्त किया जाता है— उसी प्रकार मैंने तुम्हें जो कुछ उपदेश दिया है, उसपर विचार करके अपने क्रोधको शान्त करो । क्रोध कल्याणमार्गका बड़ा ही विरोधी है । भगवान् तुम्हारा मंगल करें || ३१ || क्रोधके वशीभूत हुए पुरुषसे सभी लोगोंको बड़ा भय होता है; इसलिये जो बुद्धिमान् पुरुष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणीको भय न हो और मुझे भी किसीसे भय न हो, उसे क्रोधके वशमें कभी न होना चाहिये ॥३२ ॥ तुमने जो यह समझकर कि ये मेरे भाईके मारनेवाले हैं, इतने यक्षोंका संहार किया है, इससे तुम्हारे द्वारा भगवान् शंकरके सखा कुबेरजीका बड़ा अपराध हुआ है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · श्लोक 33पृष्ठ 767

तभी बड़े-बड़े सर्प फन उठाकर उनकी ओर दौड़ पड़े। उन्हें सामने देख ध्रुवजी ने अपने बाणों से उनकी भुजाएँ, जाँघें और उदर छिन्न-भिन्न कर उन्हें सत्यलोक भेज दिया। यह देखकर उनके पितामह स्वायम्भुव मनु वहाँ पहुँचे। वे बहुत से ऋषियों के साथ आए थे। उन्होंने ध्रुव को रोकते हुए कहा—"बेटा! तुम्हारा अपने भाई पर अनुराग ठीक है, परन्तु इस जड़ शरीर को आत्मा मानकर हिंसा करना साधुजनों का मार्ग नहीं है। तुमने तो बचपन में ही श्रीहरि की आराधना कर परमपद प्राप्त किया था, फिर यह निन्दनीय कर्म क्यों?"

मनु ने आगे समझाया—"हे वत्स! सम्पूर्ण सृष्टि में काल भगवान समान रूप से व्याप्त हैं। वे ही जीव को उत्पन्न करते हैं और मृत्यु द्वारा उनका संहार करते हैं। उनका न कोई मित्र है, न शत्रु। वे भक्तों के लिए अमृत और अभक्तों के लिए मृत्यु हैं। तुम पाँच वर्ष की आयु में अपनी सौतेली माता के वाग्बाणों से घायल होकर वन चले गए थे, वहीं तुमने तपस्या कर त्रिलोकी से ऊपर ध्रुवपद प्राप्त किया था। उस निर्गुण, अविनाशी परमात्मा को अपने अन्तःकरण में ढूँढो। क्रोध कल्याण मार्ग का विरोधी है; इसे त्याग दो। तुमने इन यक्षों को मारकर कुबेरजी का अपराध किया है। शीघ्र ही विनम्रता से उन्हें प्रसन्न कर लो।"

स्वायम्भुव मनु के इस उपदेश को सुनकर ध्रुवजी ने उन्हें प्रणाम किया और फिर वे महर्षियों के साथ अपने लोक को लौट गए।

मैत्रेय जी कहते हैं—हे विदुर! जब ध्रुवजी का क्रोध शान्त हो गया और वे यक्षों के वध से निवृत्त हो गए, तब भगवान कुबेर वहाँ पधारे। उस समय यक्ष, चारण और किन्नर लोक उनकी स्तुति कर रहे थे। कुबेर को देखते ही ध्रुवजी हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

कुबेरजी ने उन्हें देखकर कहा—"शुद्ध हृदय क्षत्रिय कुमार! तुमने अपने दादा के उपदेश से ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग दिया; इससे मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। वास्तव में न तुमने यक्षों को मारा है और न यक्षों ने तुम्हारे भाई को। समस्त जीवों की उत्पत्ति और विनाश का कारण तो एकमात्र काल ही है।" कुबेरजी ने आगे समझाते हुए कहा—"यह आदि मिथ्या बुद्धि तो जीव को अज्ञानवश स्वप्न के समान शरीरादिक को ही आत्मा मानने से उत्पन्न होती है, जिससे मनुष्य को बन्धन और दुःखादि विपरीत अवस्थाओं की प्राप्ति होती है। ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान तुम्हारा मङ्गल करें। तुम संसार-पाश से मुक्त होने के लिए सब जीवों में समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान श्रीहरि का भजन करो। वे संसार-पाश का छेदन करने वाले हैं तथा संसार की उत्पत्ति आदि के लिये अपनी त्रिगुणात्मिका मायाशक्ति से युक्त होकर भी वास्तव में उससे रहित हैं। उनके चरण कमल ही सबके लिये भजन करने योग्य हैं।"

कुबेरजी ने आग्रह करते हुए कहा—"प्रियवर! हमने सुना है कि तुम सर्वदा भगवान कमलनाभ के चरण कमलों के समीप रहने वाले हो; इसलिये तुम अवश्य ही वर पाने योग्य हो। ध्रुव! तुम्हें जिस वर की इच्छा हो, मुझसे निःसङ्कोच एवं निःशङ्क होकर माँग लो।"

महाभागवत महामति ध्रुवजी ने कुबेरजी से यही माँगा कि—"मुझे श्रीहरि की अखण्ड स्मृति बनी रहे," जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसार-सागर को पार कर जाता है। वहाँ रहते हुए उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञों से भगवान यज्ञपुरुष की आराधना की; क्योंकि भगवान ही द्रव्य, क्रिया और देवता सम्बन्धी समस्त कर्म और उसके फल हैं तथा वे ही कर्मफल के दाता भी हैं। सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्री अच्युत में प्रबल वेगयुक्त भक्ति भाव रखते हुए ध्रुवजी अपने में और समस्त प्राणियों में सर्वव्यापक श्रीहरि को ही विराजमान देखने लगे।

ध्रुवजी बड़े ही शील सम्पन्न, ब्राह्मण भक्त, दीनवत्सल और धर्म मर्यादा के रक्षक थे; उनकी प्रजा उन्हें साक्षात् पिता के समान मानती थी। अनुष्ठान से पाप का क्षय करते हुए उन्होंने छत्तीस हजार वर्ष तक पृथ्वी का शासन किया। जितेन्द्रिय महात्मा ध्रुव ने इसी तरह अर्थ, धर्म और काम के सम्पादन में बहुत से वर्ष बिताकर अपने पुत्र उत्कल को राजसिंहासन सौंप दिया।

इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्च को अविद्या रचित स्वप्न और गन्धर्व नगर के समान माया से अपने में ही कल्पित मानकर—यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरा-पूरा खजाना, जनासे भरे महल, सुरम्य विहार भूमि और समुद्र पर्यन्त भूमण्डल का राज्य ये सभी काल के गाल में पड़े हुए हैं—वे बदरिकाश्रम को चले गए। विषयों से हटाकर मन को भगवान के स्थूल विराट स्वरूप में स्थिर कर दिया। उसी विराट रूप का चिन्तन करते-करते वे अन्त में ध्याता और ध्येय के भेद से शून्य निर्विकल्प समाधि में लीन हो गए और उस अवस्था में विराट रूप का भी परित्याग कर दिया।

इस प्रकार भगवान श्रीहरि के प्रति निरन्तर भक्ति भाव का प्रवाह चलते रहने से उनके नेत्रों में बार-बार आनन्दाश्रुओं की बाढ़ सी आ जाती थी। इससे उनका हृदय द्रवीभूत हो गया और शरीर में रोमाञ्च हो आया। फिर देहाभिमान गलित हो जाने से उन्हें 'मैं ध्रुव हूँ' इसकी स्मृति भी न रही।

इसी समय ध्रुवजी ने आकाश से एक बड़ा ही सुन्दर विमान उतरते देखा। वह अपने प्रकाश से दसों दिशाओं को आलोकित कर रहा था; मानो पूर्णिमा का चन्द्र ही उदय हुआ हो। उसमें दो श्रेष्ठ पार्षद गदाओं का सहारा लिये खड़े थे। उनके चार भुजाएँ थीं, सुन्दर श्याम शरीर था, किशोर अवस्था थी और अरुण कमल के समान नेत्र थे। वे सुन्दर वस्त्र, किरीट, हार, भुजबन्ध और अति मनोहर कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्हें पुण्यश्लोक श्रीहरि के सेवक जान ध्रुवजी हड़बड़ाहट में पूजा आदि का क्रम भूलकर सहसा खड़े हो गए और यह समझकर कि ये भगवान के पार्षदों में प्रधान हैं, उन्होंने श्री मधुसूदन के नामों का कीर्तन करते हुए उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

ध्रुवजी का मन भगवान के चरण कमलों में तल्लीन हो गया और वे हाथ जोड़कर बड़ी नम्रता से सिर नीचा किए खड़े रह गए। तब श्रीहरि के प्रिय पार्षद सुनन्द और नन्द ने उनके पास जाकर मुसकराते हुए कहा—"सप्तर्षि भी वहाँ तक नहीं पहुँच सके, वे नीचे से केवल उसे देखते रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र एवं तारागण भी उसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं। चलिए, आप उसी विष्णु धाम में निवास कीजिये। प्रियवर! आज तक आपके पूर्वज तथा और कोई भी उस पद पर कभी नहीं पहुँच सके। भगवान विष्णु का वह परम धाम सारे संसार का वन्दनीय है, आप वहाँ चलकर विराजमान हों। आयुष्मान्! यह श्रेष्ठ विमान पुण्यश्लोक शिखामणि श्रीहरि ने आपके लिये ही भेजा है, आप इस पर चढ़ने योग्य हैं।"

नारद उवाच

नूनं सुनीतेः परिदेवताया-स्तपःप्रभावस्य सुतस्य तां गतिम् ।
दृष्ट्वाभ्युपायानपि वेदवादिनो नैवाधिगन्तुं प्रभवन्ति किं नृपाः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · श्लोक 41पृष्ठ 775

महाभागवत ध्रुवजी ने पार्षदों के इन अमृतमय वचनों को सुनकर स्नान किया, फिर सन्ध्या-वन्दना आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर माङ्गलिक अलङ्कारादि धारण किये। बदरिकाश्रम में रहने वाले मुनियों को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद उस श्रेष्ठ विमान की पूजा और प्रदक्षिणा कर पार्षदों को प्रणाम किया और सुवर्ण के समान कान्तिमान दिव्य रूप धारण कर उस पर चढ़ने को तैयार हुए।

विमान पर बैठकर ध्रुवजी य्यों ही भगवान के धाम को जाने के लिये तैयार हुए, त्यों ही उन्हें अपनी माता सुनीति का स्मरण आया। वे सोचने लगे—"क्या मैं बेचारी माता को छोड़कर अकेला ही दुर्लभ वैकुण्ठ धाम को जाऊँगा?"

परन्तु उस दिव्य विमान पर बैठकर धराण ध्रुवजी त्रिलोकी को पार कर सप्तर्षि मण्डल से भी ऊपर भगवान विष्णु के नित्य धाम में पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की। यह दिव्य धाम अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है; इसी के प्रकाश से तीनों लोक प्रकाशित हैं। इसमें जीवों पर निर्दयता करने वाले पुरुष नहीं जा सकते। यहाँ तो उन्हीं की पहुँच होती है जो दिन-रात प्राणियों के कल्याण के लिये शुभ कर्म ही करते रहते हैं। जो शान्त, शुद्ध समदर्शी और सब प्राणियों को प्रसन्न रखने वाले हैं तथा भगवद्भक्तों को ही अपना एकमात्र सच्चा सुहृद् मानते हैं—ऐसे लोग सुगमता से ही इस भगवद् धाम को प्राप्त कर लेते हैं।

शान्ताः समदृशः शुद्धाः सर्वभूतानुरंजनाः ।
यान्त्यञ्जसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवाः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · श्लोक 37पृष्ठ 774

इस प्रकार उत्तानपाद के पुत्र भगवत्परायण श्री ध्रुवजी तीनों लोकों के ऊपर उसकी निर्मल चूडामणि के समान विराजमान हुए। कुरुनन्दन! जिस प्रकार दायें चलाने के समय खम्भे के चारों ओर बैल घूमते हैं, उसी प्रकार यह गम्भीर वेग वाला ज्योतिश्चक्र उस अविनाशी लोक के आश्रय ही निरन्तर घूमता रहता है।

इसकी महिमा देखकर देवर्षि नारद ने प्रचेताओं की यज्ञशाला में वीणा बजाकर ये तीन श्लोक गाये थे। नारद जी ने कहा था—"इसमें सन्देह नहीं कि पतिपरायणा सुनीति के पुत्र ध्रुव ने तपस्या द्वारा अद्भुत शक्ति सञ्चित करके जो गति पायी है, उसे भागवत धर्मों की आलोचना करके वेदवादी मुनिगण भी नहीं पा सकते; फिर राजाओं की तो बात ही क्या है! अहो! वे पाँच वर्ष की अवस्था में ही सौतेली माता के वाग्बाणों से मर्माहत होकर दुःखी हृदय से वन में चले गये और मेरे उपदेश के अनुसार आचरण करके ही उन अजेय प्रभु को जीत लिया, जो केवल अपने भक्तों के गुणों से ही वश में होते हैं। ध्रुवजी ने तो पाँच-छह वर्ष की अवस्था में कुछ दिनों की तपस्या से ही भगवान को प्रसन्न करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया; किन्तु उनके अधिकृत किये हुए इस पद को भूमण्डल में कोई दूसरा क्षत्रिय क्या वर्षों तक तपस्या करके भी पा सकता है? गुणों की प्राप्ति होती है, जो महत्त्व चाहते हैं उन्हें महत्त्व की प्राप्ति कराने वाला स्थान मिलता है; जो तेज चाहते हैं उन्हें तेज प्राप्त होता है और मनस्वियों का मान बढ़ता है। पवित्र कीर्ति ध्रुवजी के इस महान चरित्र का प्रातः और सायङ्काल ब्राह्मणादि द्विजातियों के समाज में एकाग्र चित्त से कीर्तन करना चाहिये।"

भगवान के परम पवित्र चरणों की शरण में रहने वाला जो पुरुष इसे निष्काम भाव से पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, सङ्क्रान्ति अथवा रविवार के दिन श्रद्धालु पुरुषों को सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है। यह साक्षात् भगवद् विषयक अमृतमय ज्ञान है। जो लोग भगवद् मार्ग के मर्म से अनभिज्ञ हैं, उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, वे दीनवत्सल कृपालु पुरुष पर देवता अनुग्रह करते हैं। ध्रुवजी के कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्था में ही माता के घर और खिलौनों का मोह छोड़कर श्रीविष्णु भगवान की शरण में चले गये थे। कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया।

ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम् ।
कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते ॥

यह साक्षात् भगवद्विषयक अमृतमय ज्ञान है; जो लोग भगवन्मार्गके मर्मसे अनभिज्ञ हैं —उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, उस दीनवत्सल कृपालु पुरुषपर देवता अनुग्रह करते हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · श्लोक 51पृष्ठ 777

In English

The Penance of Dhruva

After being insulted by his stepmother Suruci for not being her own child, the young prince Dhruva leaves his father Uttanapada's palace to seek a higher position. Guided by Narada, Dhruva performs intense meditation and austerity in the Madhuvan forest to worship Lord Vishnu. His extreme penance causes a disturbance in the universe until Lord Vishnu intervenes to grant him a divine vision.

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