पृथुचरित : मनुष्य अपनी आत्मा को कैसे पहचान सकता है और दुखों से मुक्त हो सकता है?
आत्मज्ञान और कर्तव्य निष्ठा
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14–22 · पृष्ठ 777–850
7,224 शब्द · 37 मिनटका पाठ · 53 श्लोक
सूत ने शौनक से कहा
महाराज पृथु के आत्मज्ञानी बनने की कथा सुनाने हेतु
शौनकजी! श्रीमैत्रेय मुनि के मुख से ध्रुवजी के विष्णुपद पर आरूढ़ होने का वृत्तान्त सुनकर विदुरजी के हृदय में भगवान् विष्णु की भक्तिका उद्रेक हो आया और उन्होंने फिर मैत्रेयजी से प्रश्न करना आरम्भ किया। विदुरजी ने पूछा— "भगवत्परायण मुने! ये प्रचेता कौन थे? किसके पुत्र थे? किसके वंशमें प्रसिद्ध थे और इन्होंने कहाँ यज्ञ किया था?"
श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः ।
नेच्छंस्तत्रात्मनाऽऽत्मानं सन्तुष्ट इति सिध्यति ॥
भगवान् के दर्शनसे कृतार्थ नारदजी परम भागवत हैं— ऐसा मैं मानता हूँ। उन्होंने पाञ्चरात्रका निर्माण करके श्रीहरिकी पूजापद्धतिरूप क्रियायोग का उपदेश किया है। जिस समय प्रचेतागण स्वधर्मका आचरण करते हुए भगवान् यज्ञेश्वर की आराधना कर रहे थे, उसी समय भक्तप्रवर नारदजी ने ध्रुवका गुणगान किया था। ब्रह्मन्! उस स्थानपर उन्होंने भगवान् की जिन-जिन लीला-कथाओं का वर्णन किया था, वे सब पूर्णरूपसे मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुननेकी बड़ी इच्छा है।
निशम्य कौषारविणोपवर्णितं ध्रुवस्य वैकुण्ठपदाधिरोहणम् ।
प्ररूढभावो भगवत्यधोक्षजे प्रष्टुं पुनस्तं विदुरः प्रचक्रमे ॥
श्रीसूतजी कहते हैं - शौनकजी! श्रीमैत्रेय मुनिके मुखसे ध्रुवजीके विष्णुपदपर आरूढ़ होनेका वृत्तान्त सुनकर विदुरजीके हृदयमें भगवान् विष्णुकी भक्तिका उद्रेक हो आया और उन्होंने फिर मैत्रेयजीसे प्रश्न करना आरम्भ किया ।
ध्रुवजी के इस महान् चरित्र का कीर्तन करने से गुणों की प्राप्ति होती है, जो महत्त्व चाहते हैं उन्हें महत्त्व की प्राप्ति कराई जाती है, जो तेज चाहते हैं उन्हें तेज प्राप्त होता है और मनस्वियों का मान बढ़ता है। पवित्र कीर्ति ध्रुवजी के इस चरित्र को प्रातः और सायङ्काल ब्राह्मणादि द्विजातियों के समाज में एकाग्र चित्तसे कीर्तन करना चाहिए। जो पुरुष भगवान् के परम पवित्र चरणों की शरण में रहकर इसे निष्कामभावसे पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र या रविवार जैसे विशेष दिनों में श्रद्धालु पुरुषों को सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मा में सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है।
इदं मया तेऽभिहितं कुरूद्वह ध्रुवस्य विख्यातविशुद्धकर्मणः ।
हित्वार्भकः क्रीडनकानि मातु-र्गृहं च विष्णुं शरणं यो जगाम ॥
ध्रुवजीके कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्थामें ही माताके घर और खिलौनोंका मोह छोड़कर श्रीविष्णुभगवान्की शरणमें चले गये थे । कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया ।
विदुरजी! ध्रुवजी के कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्था में ही माता के घर और खिलौनों का मोह छोड़कर श्रीविष्णु भगवान् की शरण में चले गये थे। कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया।
के ते प्रचेतसो नाम कस्यापत्यानि सुव्रत ।
कस्यान्ववाये प्रख्याताः कुत्र वा सत्रमासत ॥
श्रीसूतजी कहते हैं— शौनकजी! विदुरजी के प्रश्न सुनकर मैत्रेय मुनि ने कथा आरम्भ की। वे बताते हैं कि कुछ लोग अपनी आत्मा को सम्पूर्ण लोकों में स्थित देखते थे; उनके अन्तःकरण का मल अखण्ड योगाग्नि से भस्म हो गया था। इस प्रकार वे अपनी आत्मा को विशुद्ध बोधरस के साथ अभिन्न, आनन्दमय और सर्वत्र व्याप्त देखते थे। सब प्रकार के भेद से रहित प्रशान्त ब्रह्म को ही वे अपना स्वरूप समझते थे और अपनी आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं देखते थे।
ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम् ।
कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते ॥
यह साक्षात् भगवद्विषयक अमृतमय ज्ञान है; जो लोग भगवन्मार्गके मर्मसे अनभिज्ञ हैं —उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, उस दीनवत्सल कृपालु पुरुषपर देवता अनुग्रह करते हैं ।
परन्तु जो अज्ञानियों के लिए है, वह उन्हें बिना लपट की आग के समान मूर्ख, अन्धा, बहिरा या पागल प्रतीत होता था— वास्तव में ऐसा था नहीं। इस वंशक्रम में राजा अङ्ग के वंशज हुए। वेनकी पत्नी स्वर्वीथिका के गर्भसे पुष्पार्ण, तिग्मकेतु, इष, ऊर्ज, वसु और जय नामके छ: पुत्र हुए। पुष्पार्ण की दो स्त्रियाँ थीं— प्रभा और दोषा। प्रभा से प्रातः, मध्यन्दिन और सायं नामक तीन पुत्र हुए; तथा दोषा से प्रदोष, निशीथ और व्युष्ट हुए। व्युष्ट ने अपनी पत्नी पुष्करिणीसे सर्वतेजा नामका पुत्र उत्पन्न किया। उसकी पत्नी आकूतिसे चक्षुः नामक पुत्र हुआ, जो चाक्षुष मन्वन्तर में वही मनु हुआ। चक्षु मनु की स्त्री नड्वला से पुरु, कुत्स, त्रित, द्युम्न, सत्यवान्, ऋत, व्रत, अग्निष्टोम, अतिरात्र, प्रद्युम्न, शिबि और उल्मुक नामक बारह सत्त्वगुणी बालक उत्पन्न हुए। इनमें से उल्मुकने अपनी पत्नी पुष्करिणीसे अङ्ग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अङ्गिरा और गय नामक छ: पुत्र किये।
यमङ्ग शेपुः कुपिता वाग्वज्रा मुनयः किल ।
गतासोस्तस्य भूयस्ते ममन्थुर्दक्षिणं करम् ॥
प्यारे विदुरजी! मुनियोंके वाक्य वज्रके समान अमोघ होते हैं; उन्होंने कुपित होकर वेनको शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा न रहनेके कारण लोकमें लुटेरोंके द्वारा प्रजाको बहुत कष्ट होने लगा । यह देखकर उन्होंने वेनकी दाहिनी भुजाका मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णुके अंशावतार आदिसम्राट् महाराज पृथु प्रकट हुए ।
अङ्ग की पत्नी सुनीथा ने क्रूरकर्मा वेन को जन्म दिया, जिसकी दुष्टता से उद्विग्न होकर राजर्षि अङ्ग नगर छोड़कर चले गये थे। प्यारे विदुरजी! मुनियों के वाक्य वज्र के समान अमोघ होते हैं। उन्होंने कुपित होकर वेन को शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा न रहने के कारण लोक में लुटेरों द्वारा प्रजा को बहुत कष्ट होने लगा। यह देखकर उन्होंने वेन की दाहिनी भुजा का मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णु के अंशावतार आदिसम्राट् महाराज पृथु प्रकट हुए। वे महात्मा थे; उनके वेन जैसे दुष्ट पुत्र कैसे हुए, जिसके कारण मुनियों को दुःखी होकर नगर छोड़ना पड़ा?
अराजके तदा लोके दस्युभिः पीडिताः प्रजाः ।
जातो नारायणांशेन पृथुराद्यः क्षितीश्वरः ॥
प्यारे विदुरजी! मुनियोंके वाक्य वज्रके समान अमोघ होते हैं; उन्होंने कुपित होकर वेनको शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा न रहनेके कारण लोकमें लुटेरोंके द्वारा प्रजाको बहुत कष्ट होने लगा । यह देखकर उन्होंने वेनकी दाहिनी भुजाका मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णुके अंशावतार आदिसम्राट् महाराज पृथु प्रकट हुए ।
राजदण्डधारी वेन का भी ऐसा क्या अपराध था, जो धर्मज्ञ मुनीश्वरों ने उसके प्रति शापरूप ब्रह्मदण्ड का प्रयोग किया? प्रजा का कर्तव्य है कि वह प्रजापालक राजा से कोई पाप बन जाए तो भी उसका तिरस्कार न करे, क्योंकि वह अपने प्रभाव से आठ लोकपालों के तेज को धारण करता है। हे ब्रह्मन्! आप भूत-भविष्य की बातें जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं, इसलिये मुझे सुनीथा के पुत्र वेन की सब करतूतें सुनाइये। मैं आपका श्रद्धालु भक्त हूँ।
अलक्षयन्तः पदवीं प्रजापते-र्हतोद्यमाः प्रत्युपसृत्य ते पुरीम् ।
ऋषीन् समेतानभिवन्द्य साश्रवो न्यवेदयन् पौरव भर्तृविप्लवम् ॥
जब उन्हें अपने स्वामीका कहीं पता न लगा, तब वे निराश होकर नगरमें लौट आये और वहाँ जो मुनिजन एकत्रित हुए थे, उन्हें यथावत् प्रणाम करके उन्होंने आँखोंमें आँसू भरकर महाराजके न मिलनेका वृत्तान्त सुनाया ।
विदुरजी! मुनियों के वाक्य वज्र के समान होते हैं। जब वेन मर गया और राज्य में कोई राजा न रहा, तब प्रजा को लुटेरों ने कष्ट दिया। यह देखकर मुनियों ने वेन की दाहिनी भुजा का मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णु के अंश से महाराज पृथु प्रकट हुए।
तत्प्रष्टुं व्यसृजद्वाचं सदस्यांस्तदनुज्ञया ॥
विदुरजी! राजा अङ्ग पुत्रहीन थे। उनके मन्त्रियों ने कहा— "आपका कल्याण हो! आप सुपुत्र प्राप्त करने हेतु यज्ञ कीजिये। जब सन्तान के लिये साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीहरि का आवाहन किया जाएगा, तब देवता स्वयं अपना भाग ग्रहण करेंगे।" इस प्रकार राजा अङ्ग को पुत्र प्राप्ति कराने का निश्चय कर ऋत्विजों ने पशु में यज्ञरूप से रहने वाले श्रीविष्णु भगवान् के पूजन के लिये पुरोडाश नामक चरु समर्पण किया।
स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः ।
हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥
अग्नि में आहुति डालते ही अग्निकुण्ड से सोने के हार और शुभ्र वस्त्रों से विभूषित एक पुरुष प्रकट हुए, जो स्वर्णपात्र में सिद्ध खीर लिये हुए थे। उदार बुद्धि राजा अङ्ग ने वह खीर ले ली और अपनी पत्नी को दे दी। रानी ने वह खीर खाकर गर्भ धारण किया और उससे एक पुत्र हुआ। वह बालक बाल्यावस्था से ही अधर्म के वंश में उत्पन्न हुए अपने नाना की मृत्यु का अनुगामी था; क्योंकि सुनीथा मृत्यु की ही पुत्री थी, इसलिये वह भी अधार्मिक हुआ।
विज्ञाय निर्विद्य गतं पतिं प्रजाः पुरोहितामात्यसुहृद्गणादयः ।
विचिक्युरुर्व्यामतिशोककातरा यथा निगूढं पुरुषं कुयोगिनः ॥
महाराज विरक्त होकर घरसे निकल गये हैं, यह जानकर सभी प्रजाजन, पुरोहित, मन्त्री और सुहृद्गण आदि अत्यन्त शोकाकुल होकर पृथ्वीपर उनकी खोज करने लगे । ठीक वैसे ही जैसे योगका यथार्थ रहस्य न जाननेवाले पुरुष अपने हृदयमें छिपे हुए भगवान्को बाहर खोजते हैं ।
मैत्रेयजी कहते हैं— जिसकी करनी से माता-पिता का सारा सुयश मिट्टी में मिल जाए और जो घर को दुःखदायी बना दे, ऐसी सन्तान के लिये कौन समझदार पुरुष ललचाएगा? मैं तो सपूत की अपेक्षा कुपूत को ही अच्छा समझता हूँ; क्योंकि सपूत को छोड़ने में बड़ा क्लेश होता है, पर कुपूत से सहज ही छुटकारा हो जाता है।
इस प्रकार सोचते-सोचते राजा अङ्ग को रात में नींद नहीं आयी। उनका चित्त गृहस्थी से विरक्त हो गया। वे आधी रात के समय बिछौने से उठे और चुपचाप राजमहल से निकलकर वन को चल दिये। जब उन्हें अपने स्वामी का कहीं पता न चला, तो वे निराश होकर नगर लौटे और आँखों में आँसू भरकर मुनियों को सब बताया।
भृगु आदि मुनियों ने देखा कि अङ्ग के चले जाने से अब पृथ्वी की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है और लोग पशुओं के समान उच्छृङ्खल हो रहे हैं। उन्होंने माता सुनीथा की सम्मतिसे वेन को राजा बनाया था, किन्तु अब प्रजा को उससे भय होने लगा। मुनियों ने सोचा— "हमने जान-बूझकर दुराचारी वेन को राजा बनाया था, किन्तु यदि समझाने पर भी वह बात न मानेगा, तो हम उसे अपने तेज से भस्म कर देंगे।"
मुनि वेन के पास गये और कहा— "राजन्! ध्यान दीजिये, इससे आपकी आयु और कीर्ति बढ़ेगी। धर्म का आचरण करने से स्वर्गादि मिलते हैं। प्रजा का कल्याणरूप धर्म नष्ट नहीं होना चाहिए। जब आपके राज्य में ब्राह्मण यज्ञ करेंगे, तब देवता आपको मनचाहा फल देंगे। अतः यज्ञादि धर्मानुष्ठान बन्द करके देवताओं का तिरस्कार मत कीजिये।"
हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः ।
जीवञ्जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद् ध्रुवम् ॥
वेन ने कहा— "भक्ति है, वह यज्ञपुरुष कौन है? यह तो ऐसी बात है जैसे कुलटा स्त्रियाँ पति को छोड़कर किसी और में आसक्त हो जाती हैं। विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य... ये सब राजा के शरीर में रहते हैं। इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंश मात्र हैं। हे ब्राह्मणों! तुम मत्सरता छोड़कर मेरा ही पूजन करो।"
मुनियों की वह भीषण हुङ्कार सुनकर वे अत्यन्त कुपित हो गए। उन्होंने क्रोधित होकर कहा, ‘मार डालो! इस स्वभाव से ही इस दुष्ट पापी को मार डालो! यह यदि जीवित रह गया, तो कुछ ही दिनों में संसार को भस्म कर डालेगा। यह दुराचारी किसी प्रकार राज-सिंहासन के योग्य नहीं है, क्योंकि यह निर्लज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णु भगवान की निन्दा करता है। अहो! जिनकी कृपा से इसे ऐसा ऐश्वर्य मिला, उन श्रीहरि की निन्दा इस अभागे वेन को छोड़कर और कौन कर सकता है?’
इस प्रकार अपना छिपा हुआ क्रोध प्रकट करते हुए मुनियों ने उसे मारने का निश्चय कर लिया। वह तो भगवान की निन्दा करने के कारण पहले ही मर चुका था, इसलिए केवल अपनी भीषण हुङ्कारों से ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया। जब मुनिगण अपने-अपने आश्रमों को चले गए, तब इधर वेन की शोकाकुल माता सुनीथा मन्त्रों के बल और अन्य युक्तियों से अपने पुत्र के शव की रक्षा करने में लग गई।
एक दिन मुनिगण सरस्वती के पवित्र जल में स्नान कर और अग्निहोत्र से निवृत्त होकर नदी के तीर पर बैठे हुए हरि-चर्चा कर रहे थे। उन दिनों लोकों में आतङ्क फैलाने वाले बहुत से उपद्रव देखकर वे आपस में कहने लगे, ‘आजकल पृथ्वी का कोई रक्षक नहीं है; क्या चोर-डाकुओं के कारण इसका कुछ अमङ्गल होने वाला है?’ ऋषियों ने अभी ऐसा विचार ही किया था कि उन्होंने सब दिशाओं में धावा करने वाले चोरों और डाकुओं के कारण उठी हुई धूल की एक बड़ी भारी राशि देखी।
तद् दृष्ट्वा मिथुनं जातमृषयो ब्रह्मवादिनः ।
ऊचुः परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम् ॥
ब्रह्मवादी ऋषि उस जोड़ेको उत्पन्न हुआ देख और उसे भगवान्का अंश जान बहुत प्रसन्न हुए और बोले ।
उस धूल के बीच से एक पुरुष प्रकट हुआ जो कौए के समान काला था। उसके सभी अङ्ग, विशेषकर भुजाएँ बहुत छोटी थीं, जबड़े बड़े, टाँगें छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश ताँबे के रङ्ग के थे। उसने अत्यन्त दीनता और नम्र भाव से ऋषियों से पूछा, ‘मैं क्या करूँ?’ ऋषियों ने उसे कहा— ‘निषीद (बैठ जा)।’ इसी कारण वह 'निषाद' कहलाया। उसने जन्म लेते ही राजा वेन के भयङ्कर पापों को अपने ऊपर ले लिया था; इसीलिए उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा और लूट-पाट जैसे पापकर्मों में रत रहते हैं और गाँव या नगर में न टिककर वन और पर्वतों में निवास करते हैं।
ऋषय ऊचुः एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपालिनी ।
इयं च लक्ष्म्याः सम्भूतिः पुरुषस्यानपायिनी ॥
श्रीमैत्रेय जी कहते हैं— हे विदुर! इसके बाद ब्राह्मणों ने पुत्रहीन राजा वेन की जाँघों का मन्थन किया, जिससे एक स्त्री और पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। ब्रह्मवादी ऋषियों ने उस जोड़े को उत्पन्न होते देख उन्हें भगवान का अंश जानकर बहुत प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने घोषणा की— ‘यह स्त्री उन परम पुरुष की अनपायिनी शक्ति लक्ष्मीजी का अवतार है। इनमें से जो पुरुष है, वह अपने सुयश का विस्तार करने के कारण परम यशस्वी ‘पृथु’ नामक सम्राट होगा; राजाओं में यही सबसे पहला होगा। यह सुन्दरी, जो गुण और आभूषणों से विभूषित है, इन पृथु को ही अपना पति बनाएगी; इसका नाम अर्चि होगा।’ पृथु के रूप में साक्षात् श्रीहरि ने संसार की रक्षा के लिए अवतार लिया है और अर्चिके के रूप में उनकी नित्य सहचरी लक्ष्मीजी प्रकट हुई हैं।
अथ तस्य पुनर्विप्रैरपुत्रस्य महीपतेः ।
बाहुभ्यां मथ्यमानाभ्यां मिथुनं समपद्यत ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! इसके बाद ब्राह्मणोंने पुत्रहीन राजा वेनकी? मन्थन किया, तब उनसे एक स्त्री - पुरुषका जोड़ा प्रकट हुआ ।
विदुर! उस समय ब्राह्मण लोग पृथु की स्तुति करने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्वों ने गुणगान किया, सिद्धों ने पुष्प वर्षा की और अप्सराएँ नाचने लगीं। आकाश में शङ्ख, तुरही, मृदङ्ग और दुन्दुभि जैसे बाजे बजने लगे। समस्त देवता, ऋषि और पितर अपने-अपने लोकों से वहाँ पधारे। जगद्गुरु ब्रह्माजी भी देवता और देवेश्वरों के साथ आए। उन्होंने वेनकुमार पृथु के दाहिने हाथ में भगवान विष्णु की हस्तरेखाएँ और चरणों में कमल का चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरि का ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथ में दूसरी रेखाओं से बिना कटा हुआ चक्र का चिह्न होता है, वह भगवान का ही अंश होता है।
पादयोररविन्दं च तं वै मेने हरेः कलाम् ।
यस्याप्रतिहतं चक्रमंशः स परमेष्ठिनः ॥
वेदवादी ब्राह्मणों ने महाराज पृथु के अभिषेक का आयोजन किया और सब लोग सामग्री जुटाने में लग गए। उस समय नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग, स्वर्ग और पृथ्वी सहित समस्त प्राणियों ने उन्हें तरह-तरह के उपहार भेंट किए। सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से अलङ्कृत महाराज पृथु का विधिवत राज्याभिषेक हुआ। वे अपनी महारानी अर्चिके के साथ दूसरे अग्निदेव के सदृश जान पड़ते थे। आकाश के देवता ने नित्य नवीन पुष्पों की माला भेंट की; सिद्ध-गन्धर्वों ने नाचने-गाने और अन्तर्धान होने की शक्तियाँ दीं; ऋषियों ने अमोघ आशीर्वाद दिए। समुद्र ने अपना शङ्ख दिया और सातों समुद्र, पर्वत तथा नदियों ने उनके रथ के लिए मार्ग उपहार में दिए। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करने के लिए उपस्थित हुए।
ब्रह्मा ब्रह्ममयं वर्म ३ भारती हारमुत्तमम् ।
हरिः सुदर्शनं चक्रं तत्पत्न्यव्याहतां श्रियम् ॥
तब उन स्तुति करने वालों का अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परम प्रतापी महाराज पृथु ने हँसते हुए, मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा— ‘हे सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोक में मेरा कोई गुण प्रकट नहीं हुआ है। फिर तुम किन गुणों को लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषय में तुम्हारी वाणी व्यर्थ नहीं होनी चाहिए। इसलिए मुझसे भिन्न किसी और की स्तुति करो।’ वे समझते थे कि इस प्रकार तो लोग उनका उपहास ही कर रहे हैं। जिस प्रकार लज्जाशील और उदार पुरुष अपने किसी निन्दित पराक्रम की चर्चा को बुरा समझते हैं, उसी प्रकार समर्थ पुरुष अपनी स्तुति को भी निन्दित मानते हैं।
नालं वयं ते महिमानुवर्णने यो देववर्योऽवततार मायया ।
वेनांगजातस्य च पौरुषाणि ते वाचस्पतीनामपि बभ्रमुर्धियः ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— महाराज पृथुने जब इस प्रकार कहा, तब उनके वचनामृतका आस्वादन करके सूत आदि गायकलोग बड़े प्रसन्न हुए । फिर वे मुनियोंकी प्रेरणासे उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे || १ || ' आप साक्षात् देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं ' जो अपनी मायासे अवतीर्ण हुए हैं; हम आपकी महिमाका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं । आपने जन्म तो राजा वेनके मृतक शरीरसे लिया है, किन्तु आपके पौरुषोंका वर्णन करनेमें साक्षात् ब्रह्मादिकी बुद्धि भी चकरा जाती है ।
अथाप्युदारश्रवसः पृथोहरेः कलावतारस्य कथामृतादृताः ।
यथोपदेशं मुनिभिः प्रचोदिताः श्लाघ्यानि कर्माणि वयं वितन्महि ॥
तथापि आपके कथामृतके आस्वादनमें आदर - बुद्धि रखकर मुनियोंके उपदेशके अनुसार उन्हींकी प्रेरणासे हम आपके परम प्रशंसनीय कर्मोंका कुछ विस्तार करना चाहते हैं, आप साक्षात् श्रीहरिके कलावतार हैं और आपकी कीर्ति बड़ी उदार है ।
एष धर्मभृतां श्रेष्ठो लोकं धर्मेऽनुवर्तयन् ।
गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता तत्परिपन्थिनाम् ॥
एष वै लोकपालानां बिभर्त्येकस्तनौ तनूः ।
काले काले यथाभागं लोकयोरुभयोर्हितम् ॥
वसु काल उपादत्ते काले चायं विमुंचति ।
समः सर्वेषु भूतेषु प्रतपन् सूर्यवद्विभुः ॥
तितिक्षत्यक्रमं वैन्य उपर्याक्रमतामपि ।
भूतानां करुणः शश्वदार्तानां क्षितिवृत्तिमान् ॥
देवेऽवर्षत्यसौ देवो नरदेववपुर्हरिः ।
कृच्छ्रप्राणाः प्रजा ह्येष रक्षिष्यत्यंजसेन्द्रवत् ॥
आप्याययत्यसौ लोकं वदनामृतमूर्तिना ।
सानुरागावलोकेन विशदस्मितचारुणा ॥
अव्यक्तवर्त्येष निगूढकार्यो गम्भीरवेधा उपगुप्तवित्तः ।
अनन्तमाहात्म्यगुणैकधामा पृथुः प्रचेता इव संवृतात्मा ॥
दुरासदो दुर्विषह आसन्नोऽपि विदूरवत् ।
नैवाभिभवितुं शक्योवेनारण्युत्थितोऽनलः ॥
‘ महाराज पृथु वेनरूप अरणिके मन्थनसे प्रकट हुए अग्निके समान हैं । शत्रुओंके लिये ये अत्यन्त दुर्धर्ष और दुःसह होंगे । ये उनके समीप रहनेपर भी, सेनादिसे सुरक्षित रहनेके कारण, बहुत दूर रहनेवाले - से होंगे । शत्रु कभी इन्हें हरा न सकेंगे ।
अन्तर्बहिश्च भूतानां पश्यन् कर्माणि चारणैः ।
उदासीन इवाध्यक्षो वायुरात्मेव देहिनाम् ॥
नादण्डयं दण्डयत्येष सुतमात्मद्विषामपि ।
दण्डयत्यात्मजमपि दण्ड्यं धर्मपथे स्थितः ॥
अस्याप्रतिहतं चक्रं पृथोरामानसाचलात् ।
वर्तते भगवानर्को यावत्तपति गोगणैः ॥
रंजयिष्यति यल्लोकमयमात्मविचेष्टितैः ।
अथामुमाहू राजानं मनोरंजनकैः प्रजाः ॥
इस स्तुतिके श्लोक 2–33 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →
उन्होंने आगे कहा— ‘हे सूतगण! अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मों द्वारा लोक में अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अब तक ऐसा कोई काम नहीं किया है जिसकी प्रशंसा की जा सके। तब तुम लोगों से बच्चों के समान अपनी कीर्तिका कैसे गान करावें?’ महाराज पृथु के इन वचनों का आस्वादन करके सूत आदि गायक लोग बड़े प्रसन्न हुए और मुनियों की प्रेरणा से उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे— ‘आप साक्षात् देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं जो अपनी माया से अवतीर्ण हुए हैं। हम आपकी महिमा का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। आपने जन्म तो राजा वेन के मृतक शरीर से लिया है, किन्तु आपके पौरुष का वर्णन करने में साक्षात् ब्रह्मा आदि की बुद्धि भी चकरा जाती है।
इति ब्रुवाणं नृपतिं गायका मुनिचोदिताः ।
तुष्टुवुस्तुष्टमनसस्तद्वागमृतसेवया ॥
तथापि, आपके कथामृत के आस्वादन में हम मुनियों के उपदेशानुसार आपकी प्रशंसा करना चाहते हैं। आप साक्षात् श्रीहरि के कलावतार हैं और आपकी कीर्ति बड़ी उदार है। आप राजवेषधारी इन्द्र की भाँति जल बरसाकर अनायास ही प्रजा की रक्षा कर लेंगे। अपने अमृतमय मुख-चन्द्र की मनोहर मुस्कान और प्रेमभरी चितवन से आप सम्पूर्ण लोकों को आनन्दमग्न कर देंगे। आपकी गति को कोई समझ नहीं सकेगा, आपके कार्य गुप्त होंगे और उन्हें सम्पन्न करने का ढङ्ग बहुत गम्भीर होगा। आपका धन सदा सुरक्षित रहेगा। आप अनन्त माहात्म्य और गुणों के एकमात्र आश्रय होंगे। इस प्रकार मनस्वी पृथु साक्षात् वरुण के समान होंगे।
महाराज पृथु वेन रूपी अरणिके के मन्थन से प्रकट हुए अग्निक समान हैं। शत्रुओं के लिए ये अत्यन्त दुर्धर्ष और दुःसह होंगे; वे इनके समीप रहकर भी सेना आदि से सुरक्षित रहेंगे क्योंकि ये उनसे बहुत दूर होंगे। शत्रु कभी इन्हें हरा न सकेंगे, प्रजा इन्हें ‘राजा’ कहेगी। ये बड़े दृढ़सङ्कल्प, सत्यप्रतिज्ञ, ब्राह्मणभक्त, वृद्धों की सेवा करने वाले, शरणागत-वत्सल और सब प्राणियों को मान देने वाले होंगे। ये दीनों पर दया करेंगे, परस्त्री में माता के समान भक्ति रखेंगे और पत्नी को अपने आधे अङ्ग के समान मानेंगे। प्रजा पर पिता के समान प्रेम रखेंगे और ब्रह्मवादियों के सेवक होंगे।
दूसरे प्राणी इन्हें उतना ही चाहेंगे जितना अपने शरीर को। ये सुहृदों के आनन्द को बढ़ाएंगे और सर्वदा वैराग्यवान पुरुषों से विशेष प्रेम करेंगे। दुष्टों को ये दण्डपाणि यमराज के समान दण्ड देंगे। तीनों गुणों के अधिष्ठाता साक्षात् श्रीनारायण ने ही इनके रूप में अपना अंश लिया है, जिसे पण्डित लोग अविद्यावश मिथ्या समझते हैं। ये अद्वितीय वीर और एकछत्र सम्राट होकर अकेले ही उदयाचल पर्यन्त समस्त भूमण्डल की रक्षा करेंगे और अपने जयशील रथ पर चढ़कर, धनुष हाथ में लिए सूर्य के समान सर्वत्र प्रदक्षिणा करेंगे। उस समय जहाँ-तहाँ सभी लोकपाल और पृथ्वीपाल इन्हें भेंटें समर्पण करेंगे, इनकी स्त्रियाँ गुणगान करेंगी और इन आदिराज को साक्षात् श्रीहरि ही समझेंगी।
ये प्रजापालक राजाधिराज होकर प्रजा के जीवन-निर्वाह के लिए गोरूपधारिणी पृथ्वी का दोहन करेंगे और इन्द्र के समान अपने धनुष के कोनों से पर्वतों को तोड़-फोड़कर पृथ्वी को समतल कर देंगे। रणभूमि में कोई भी इनका वेग नहीं सह सकेगा। जिस समय ये जङ्गल में पूँछ उठाकर विचरते हुए सिंह के समान अपने ‘आजगव’ धनुष का टङ्कार करते हुए भूमण्डल में घूमेंगे, तब सभी दुष्टजन इधर-उधर छिप जाएंगे। इनके महल के बगीचे में इनकी एक बार भगवान सनत्कुमार से भेंट होगी। अकेले उनकी भक्तिपूर्वक सेवा करके ये वह निर्मल ज्ञान प्राप्त करेंगे जिससे परब्रह्म की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जब इनका पराक्रम जनता के सामने आएगा, तब ये परम प्रतापी महाराज जहाँ-तहाँ अपने चरित्र की ही चर्चा सुनेंगे। इनकी आज्ञा का विरोध कोई नहीं कर सकेगा और ये अपने तेज से प्रजा के क्लेशरूप काँटे को निकालकर सम्पूर्ण भूमण्डल के शासक होंगे। उस समय देवता और असुर भी इनके विपुल प्रभाव का वर्णन करेंगे।’"
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं - इस प्रकार जब वन्दीजन ने महाराज पृथु के गुण और कर्मों का बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उनकी बड़ाई करके तथा उन्हें मनचाही वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया। उन्होंने ब्राह्मणादि चारों वर्णों, सेवकों, मन्त्रियों, पुरोहितों, पुरवासियों, देशवासियों, भिन्न-भिन्न व्यवसायियों तथा अन्यान्य आज्ञानुवर्तियों का भी सत्कार किया।
विदुरजी ने पूछा – "ब्रह्मन्! पृथ्वी तो अनेक रूप धारण कर सकती है, उसने गौ का रूप ही क्यों धारण किया? और जब महाराज पृथु ने उसे दुहा, तब बछड़ा कौन बना? और दुहने का पात्र क्या हुआ? पृथ्वी देवी तो पहले स्वभाव से ही ऊँची-नीची थी। उसे उन्होंने समतल किस प्रकार किया और इन्द्र उनके यज्ञसम्बन्धी घोड़े को क्यों हर ले गये? ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमारजी से ज्ञान और विज्ञान प्राप्त करके वे राजर्षि किस गति को प्राप्त हुए?" पृथुरूप से सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने ही अवतार ग्रहण किया था; अतः पुण्यकीर्ति श्रीहरिके उस पृथु अवतार से सम्बन्ध रखने वाले जो और भी पवित्र चरित्र हों, वे सभी आप मुझसे कहिये। मैं आपका और श्रीकृष्णचन्द्र का बड़ा अनुरक्त भक्त हूँ।
जब विदुरजी ने इस प्रकार प्रेरणा दी, तब श्रीमैत्रेयजी प्रसन्नचित्त से उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे। श्रीमैत्रेयजी ने कहा – "विदुरजी! ब्राह्मणों ने महाराज पृथु का राज्याभिषेक करके उन्हें प्रजा का रक्षक उद्घोषित किया। इन दिनों पृथ्वी अन्नहीन हो गयी थी, इसलिये भूख के कारण प्रजाजनों के शरीर सूखकर काँटे हो गये थे। उन्होंने अपने स्वामी पृथु के पास आकर कहा: 'राजन्! जिस प्रकार कोटर में सुलगती हुई आग से पेड़ जल जाता है, उसी प्रकार हम पेट की भीषण ज्वाला से जले जा रहे हैं। आप शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं और हमारे अन्नदाता प्रभु बनाये गये हैं, इसलिये हम आपकी शरण में आये हैं। आप समस्त लोकों की रक्षा करने वाले हैं, आप ही हमारी जीविका के भी स्वामी हैं। अतः राजराजेश्वर! आप हम क्षुधापीड़ितों को शीघ्र ही अन्न देने का प्रबन्ध कीजिये; ऐसा न हो कि अन्न मिलने से पहले ही हमारा अन्त हो जाय'।"
अपामुपस्थे मयि नाव्यवस्थिताः प्रजा भवानद्य रिरक्षिषुः किल ।
स वीरमूर्तिः समभूद्धराधरो यो मां पयस्युग्रशरो जिघांससि ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — "कुरुवर! प्रजा का करुण क्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देर तक विचार करते रहे। अन्त में उन्हें अन्नाभाव का कारण मालूम हो गया कि पृथ्वी ने स्वयं ही अन्न एवं औषधादिक को अपने भीतर छिपा लिया है। अपनी बुद्धि से इस बात का निश्चय करके उन्होंने अपना धनुष उठाया और त्रिपुरविनाशक भगवान् शङ्कर के समान अत्यन्त क्रोधित होकर पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर बाण चढ़ाया। उन्हें शस्त्र उठाए देख पृथ्वी काँप उठी और जिस प्रकार व्याध के पीछा करने पर हरिणी भागती है, उसी प्रकार वह डरकर गौ का रूप धारण करके भागने लगी। उसे त्रिलोकी में वेनपुत्र पृथु से बचाने वाला कोई भी न मिला। तब वह अत्यन्त भयभीत होकर दु:खित चित्त से पीछे की ओर लौटी और महाभाग पृथुजी से कहने लगी: 'धर्म के तत्त्व को जानने वाले शरणागत वत्सल राजन्! आप तो सभी प्राणियों की रक्षा करने में तत्पर हैं, आप मेरी भी रक्षा कीजिये। मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्री का वध आप कैसे कर सकेंगे? स्त्रियाँ कोई अपराध करें, तो साधारण जीव भी उन पर हाथ नहीं उठाते; फिर आप जैसे करुणामय और दीनवत्सल तो ऐसा कर ही कैसे सकते हैं? मैं तो एक सुदृढ़ नौका के समान हूँ, सारा जगत् मेरे ही आधार पर स्थित है। मुझे तोड़कर आप अपने को और अपनी प्रजा को जल के ऊपर कैसे रखेंगे? और अब मेरी भी परवा न करके उन्हें अपने गर्भ से निकालती नहीं।'
स वै भवानात्मविनिर्मितं जगद् भूतेन्द्रियान्तःकरणात्मकं विभो ।
संस्थापयिष्यन्नज मां रसातला-दभ्युज्जहाराम्भस आदिसूकरः ॥
महाराज पृथु ने कहा: 'अब मैं अपने बाणों से तुझे छिन्न-भिन्न कर तेरे मेदे से इन क्षुधातुर और दीन प्रजाजनों का करुण-क्रन्दन शान्त करूँगा। जो दुष्ट अपना ही पोषण करने वाला तथा अन्य प्राणियों के प्रति निर्दय हो— वह पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक कोई भी हो - उसका मारना राजाओं के लिये न मारने के ही समान है। तू बड़ी गर्वीली और मदोन्मत्ता है; इस समय माया से ही यह गौ का रूप बनाये हुए है। मैं बाणों से तेरे टुकड़े-टुकड़े करके अपने योगबल से प्रजा को धारण करूँगा।'
इस समय महाराज पृथु काल की भाँति क्रोधमयी मूर्ति धारण किये हुए थे। उनके ये शब्द सुनकर धरती काँपने लगी और उसने अत्यन्त विनीत भाव से हाथ जोड़कर कहा: 'नूनं जनैरीहितमीश्वराणा-मस्मद्विधैस्तद्गुणसर्गमायया। न ज्ञायते मोहितचित्तवर्त्मभि'-स्तेभ्यो नमो वीरयशस्करेभ्यः॥ आपने धराधर नाम पाया था; आज वही आप वीरमूर्ति से जल के ऊपर नौका के समान स्थित मेरे ही आश्रय रहने वाली प्रजा की रक्षा करने के अभिप्राय से पैने-पैने बाण चढ़ाकर दूध न देने के अपराध में मुझे मारना चाहते हैं? इस त्रिगुणात्मक सृष्टिकी रचना करने वाली आपकी माया से मेरे - जैसे साधारण जीवों के चित्त मोहग्रस्त हो रहे हैं; मुझ - जैसे लोग तो आपके भक्तों की लीलाओं का भी आशय नहीं समझ सकते, फिर आपकी किसी क्रिया का उद्देश्य न समझें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः जो इन्द्रिय-संयमादिके द्वारा वीरोचित यज्ञ का विस्तार करते हैं, ऐसे आपके भक्तों को भी नमस्कार है। लोकरक्षक! आप राजालोगों ने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया; इसलिये सब लोग चोरों के समान हो गये हैं। इसीसे यज्ञ के लिये ओषधियों को मैंने अपने में छिपा लिया। अब अधिक समय हो जाने से अवश्य ही वे धान्य मेरे उदर में जीर्ण हो गये हैं; आप उन्हें पूर्वाचार्यों के बतलाये हुए उपाय से निकाल लीजिये। लोकपालक वीर! यदि आपको समस्त प्राणियों के अभीष्ट एवं बल की वृद्धि करने वाले अन्न की आवश्यकता है तो आप मेरे योग्य बछड़ा, दोहन पात्र और दुहने वाले की व्यवस्था कीजिये; मैं उस बछड़े के स्नेह से पिन्हाकर दूध के रूप में आपको सभी अभीष्ट वस्तुएँ दे दूँगी। राजन्! एक बात और है; आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा ऋतु जाने पर भी मेरे ऊपर इन्द्र का बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे - मेरे भीतर की आर्द्रता सूख न पावे। यह आपके लिये बहुत मङ्गलकारक होगा'।"
फिर महाराज पृथु ने सङ्गीत माधुर्य और सौन्दर्य से पृथ्वी को दुहा। श्राद्ध के अधिष्ठाता महाभाग पितृगणों के लिये अर्यमा नाम के पित्रीश्वर को वत्स बनाया तथा मिट्टी के कच्चे पात्र में श्रद्धापूर्वक कव्य रूप दूध दुहा। फिर कपिलदेवजी को बछड़ा बनाकर आकाश रूप पात्र में सिद्धों ने अणिमादि अष्ट सिद्धि तथा विद्याधरों ने आकाशगमन आदि विद्याओं को दुहा। किम्पुरुषादि अन्य मायावियों ने मयदानव को बछड़ा बनाया तथा अन्तर्धान होना, विचित्र रूप धारण कर लेना आदि सङ्कल्पमयी मायाओं को दुग्धरूप से दुहा और उन्होंने अपनी कन्या के रूप में स्वीकार कर लिया।
फिर राजाधिराज पृथु ने अपने धनुष की नोक से पर्वतों को फोड़कर इस सारे भूमण्डल को प्रायः समतल कर दिया। वे पिता के समान अपनी प्रजा के पालन-पोषण की व्यवस्था में लगे हुए थे। उन्होंने इस समतल भूमि में प्रजावर्ग के लिये जहाँ-तहाँ यथायोग्य निवासस्थानों का विभाग किया। अनेकों गाँव, कस्बे, नगर, दुर्ग, अहीरों की बस्ती, पशुओं के रहने के स्थान, छावनियाँ, खानें, किसानों के गाँव और पहाड़ों की तलहटी के गाँव बसाये। महाराज पृथु से पहले इस पृथ्वीतल पर पुर-ग्रामादिक का विभाग नहीं था; सब लोग अपने-अपने सुभीते के अनुसार बेखटके जहाँ-तहाँ बस जाते थे।
उस यज्ञ में यज्ञसामग्री देने वाली भूमि स्वयं कामधेनु के समान होकर यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण कर रही थी। नदियाँ दाख और ईख आदि रसों को बहा लाती थीं, तो बड़े-बड़े वृक्ष दूध, दही, अन्न और घृत जैसी विविध सामग्रियाँ अर्पित कर रहे थे। समुद्र रत्नों की राशि दे रहा था और पर्वत भक्ष्य, भोज्य, चोष्य तथा लेह्य—इन चार प्रकार के अन्न प्रदान कर रहे थे। सम्पूर्ण लोक अपने विभिन्न उपहारों के साथ इस यज्ञ में सम्मिलित था।
अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः ।
ब्रह्मावर्ते मनोः क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती ॥
तभी, आकाश मार्ग से एक अश्व पर सवार कोई अत्यन्त शीघ्रता से जा रहा था। वह दृश्य देखकर भगवान अत्रिके की दृष्टि उन पर पड़ी। उनके कहने पर महाराज पृथु के महारथी पुत्र इन्द्र को मारने के लिए पीछे दौड़े और क्रोध में चिल्लाए, 'अरे खड़ा रह! खड़ा रह!'
तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मनः ।
शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥
इन्द्र ने उस समय सिर पर जटाजूट धारण कर रखी थी और शरीर पर भस्म लगाई हुई थी। उनका यह वेष देखकर पृथुकुमार को लगा कि वे तो मूर्तिमान धर्म हैं, इसलिए उन्होंने उन पर बाण नहीं छोड़ा। किन्तु जब वह बिना वार किए लौट आए, तब महर्षि अत्रि ने पुनः उन्हें प्रेरित किया— 'वत्स! इस देवताधम इन्द्रने तुम्हारे यज्ञ में विघ्न डाला है, तुम इसे मार डालो।'
स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापते सङ्कल्पनं विश्वसृजां पिपीपृहि ।
ऐन्द्री च मायामुपधर्ममातरं प्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो जहि ॥
आप साक्षात् विष्णुके अंश हैं । वेनके दुराचारसे धर्म लुप्त हो रहा था, उस समयोचित धर्मकी रक्षाके लिये ही आपने उसके शरीरसे अवतार लिया है ॥ ३७ ॥ अतः प्रजापालक पृथुजी! अपने इस अवतारका उद्देश्य विचारकर आप भृगु आदि विश्वरचयिता मुनीश्वरोंका संकल्प पूर्ण कीजिये । यह प्रचण्ड पाखण्ड - पथरूप इन्द्रकी माया अधर्मकी जननी है । आप इसे नष्ट कर डालिये '
अत्रि मुनि के इस प्रोत्साहन से पृथुकुमार का क्रोध तीव्र हो गया। इन्द्र बड़ी तेजी से आकाश में भाग रहे थे और पृथुकुमार उनके पीछे वैसे ही दौड़ पड़े जैसे रावण के पीछे जटायु दौड़ता है। स्वर्गपति इन्द्र ने जब देखा कि वह वीर अपने पीछे आ रहा है, तो उन्होंने अपना वेष और घोड़ा छोड़कर वहीं अन्तर्धान होना उचित समझा। इस प्रकार वह वीर अपना यज्ञपशु लेकर पिता की यज्ञशाला में लौट आया।
उपसृज्य तमस्तीव्रं जहाराश्वं पुनर्हरिः ।
चषालयूपतश्छन्नो हिरण्यरशनं विभुः ॥
शक्तिशाली विदुर! उस अद्भुत पराक्रम को देखकर महर्षियों ने उसका नाम 'विजिताश्व' रखा। यज्ञपशु को चषाल और यूप में बाँध दिया गया था, किन्तु शक्तिशाली इन्द्र ने घोर अन्धकार फैलाकर छिपकर उस घोड़े को उसकी सोने की जञ्जीर समेत चुरा लिया। अत्रि मुनि ने उन्हें फिर आकाश में तेजी से जाते देखा, किन्तु जब उन्होंने देखा कि राजकुमार के पास कपाल और खट्वाङ्ग है, तो उन्होंने मार्ग में कोई बाधा नहीं डाली।
इन्द्राय कुपितो बाणमादत्तोद्यतकार्मुकः ॥
तभी अत्रि मुनि ने पुनः राजकुमार को उकसाया। इस बार क्रोध में भरकर पृथुकुमार ने इन्द्र को लक्ष्य बनाकर अपना बाण चढ़ाया। यह देखते ही देवराज उस वेष और घोड़े को छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गए। इन्द्र ने अश्व-हरण के लिए जो-जो रूप धारण किए थे, वे पाप के खण्ड होने के कारण पाखण्ड कहलाए। इस प्रकार के नग्न, रक्ताम्बर और कापालिक आचारों में मनुष्यों की बुद्धि मोहित हो जाती है, क्योंकि ये नास्तिक मत देखने में सुन्दर लगते हैं, पर वास्तव में ये उपधर्म मात्र हैं।
यं जिघांसथ यज्ञेन यस्येष्टास्तनवः सुराः ॥
इन्द्र की इस कुचाल का पता चलते ही महाराज पृथु अत्यन्त क्रोधित हुए और अपना धनुष उठाकर उन पर बाण चढ़ाया। उस समय वे इतने क्रोध में थे कि उनकी ओर देखा भी नहीं जा सकता था। जब ऋत्विजों ने देखा कि महाराज इन्द्र का वध करने को तैयार हैं, तो उन्होंने उन्हें रोकते हुए कहा— 'राजन्! आप बुद्धिमान हैं। यज्ञ-दीक्षा लेने के बाद शास्त्रविहित यज्ञपशु को छोड़कर किसी का वध करना उचित नहीं है। यह इन्द्र आपके सुयश से ईर्ष्यावश निस्तेज हो रहा है। हम मन्त्रों द्वारा उसे यहीं बुलाकर अग्नि में हवन कर देंगे। आपका यज्ञ निर्विघ्न समाप्त होगा, आप चिन्ता न करें। जो विधाता के बिगाड़े हुए काम को बनाने का विचार करता है, वह क्रोध और मोह में फँस जाता है। इस यज्ञ को बन्द कर दीजिए, क्योंकि इन्द्र के इन पाखण्डों से धर्म का नाश हो रहा है। देखिए, कैसे जनता इन मनोहर पाखण्डों की ओर खिञ्ची चली जा रही है। आप तो साक्षात् विष्णु के अंश हैं; वेन के दुराचार से धर्म लुप्त हो रहा था, इसलिए आपने अवतार लिया। अपने उद्देश्य को याद करें और इस पाखण्ड-रूपी अधर्म को नष्ट कर दें।'
भवान् परित्रातुमिहावतीर्णो धर्मं जनानां समयानुरूपम् ।
वेनापचारादवलुप्तमद्य तद्देहो विष्णुकलासि वैन्य ॥
लोकगुरु ब्रह्मा जी के इस समझाने पर महाराज पृथु ने यज्ञ का आग्रह छोड़ दिया और इन्द्र के साथ प्रीतिपूर्वक सन्धि कर ली। जब वे यज्ञान्त स्नान करके निवृत्त हुए, तब देवताओं ने उन्हें अभीष्ट वर दिए। महाराज पृथु ने श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दक्षिणा दी और प्रसन्न होकर ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया— 'महाबाहो! आपके बुलाने से जो पितर, देवता और ऋषि आए थे, आपने उनका खूब सत्कार किया है।'
श्रीभगवानुवाच एष तेऽकारषीद्भङ्गं हयमेधशतस्य ह ।
क्षमापयत आत्मानममुष्य क्षन्तुमर्हसि ॥
श्रीभगवान्ने कहा – राजन्! ( इन्द्रने ) तुम्हारे सौ अश्वमेध पूरे करनेके संकल्पमें विघ्न डाला है । अब ये तुमसे क्षमा चाहते हैं, तुम इन्हें क्षमा कर दो ।
महाराज पृथु के निन्यानबे यज्ञों से भगवान विष्णु भी अत्यन्त सन्तुष्ट हुए। वे इन्द्र सहित वहाँ उपस्थित हुए और बोले— 'राजन्! तुम्हारे सौ अश्वमेध यज्ञों में विघ्न डालने के कारण इन्द्र क्षमा चाहते हैं, तुम उन्हें क्षमा कर दो। जो श्रेष्ठ मानव होते हैं, वे दूसरे जीवों से द्रोह नहीं करते क्योंकि यह शरीर ही आत्मा नहीं है।'
भगवानपि वैकुण्ठः साकं मघवता विभुः ।
यज्ञैर्यज्ञपतिस्तुष्टो यज्ञभुक् तमभाषत ॥
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! महाराज पृथुके निन्यानबे यज्ञोंसे यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुको भी बड़ा सन्तोष हुआ । उन्होंने इन्द्रके सहित वहाँ उपस्थित होकर उनसे कहा ।
भगवान ने आगे कहा— 'ज्ञानवान पुरुष इस शरीर को अविद्या और कर्म का पुतला समझकर इसमें आसक्त नहीं होता। यह आत्मा शुद्ध, स्वयम्प्रकाश और सर्वव्यापक है; यह शरीर से भिन्न है। जो इस देहस्थित आत्मा को शरीर से भिन्न जानता है, वह प्रकृति के गुणों से लिप्त नहीं होता। राजन्! जो बिना किसी कामना के अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए मेरी आराधना करता है, उसका चित्त शुद्ध हो जाता है और उसे तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है। यही परम शान्ति है। जो यह जान लेता है कि आत्मा शरीर, ज्ञान और मन का साक्षी होकर भी उनसे निर्लिप्त है, वह मोक्ष पा लेता है। मुझमें दृढ़ अनुराग रखने वाले बुद्धिमान पुरुष हर्ष-शोक के वशीभूत नहीं होते। तुम पूर्व परम्परा से प्राप्त धर्म को अपनाओ और पृथ्वी का न्यायपूर्वक पालन करो; तब तुम्हें घर बैठे ही सनकादि सिद्धों के दर्शन होंगे। तुम्हारे गुणों ने मुझे वश में कर लिया है, अतः जो इच्छा हो, वर माँग लो। मैं तो उन्हीं के हृदय में रहता हूँ जिनके चित्त में समता रहती है।'
य एवं सन्तमात्मानमात्मस्थं वेद ।
पूरुषः नाज्यते प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः स मयि स्थितः ॥
महाराज पृथु ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। देवराज इन्द्र अपने कर्म से लज्जित होकर चरणों में गिरना चाहते थे, पर राजा ने उन्हें प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया। फिर महाराज पृथु ने भगवान का पूजन किया और भक्तिभाव में डूबकर प्रभु के चरण पकड़ लिए। श्रीहरि वहाँ से जाना चाहते थे, किन्तु पृथु के वात्सल्य ने उन्हें रोक लिया। वे अपने कमलदल जैसे नेत्रों से देखते ही रह गए।
समः समानोत्तममध्यमाधमः सुखे च दुःखे च जितेन्द्रियाशयः ।
मयोपक्लृप्ताखिललोकसंयुतो विधत्स्व वीराखिललोकरक्षणम् ॥
आदिराज पृथु की आँखों में जल भर आया था; वे न कुछ बोल सके और न दर्शन कर सके। वे हृदय से प्रभु को पकड़े रहे और हाथ जोड़े खड़े रहे। प्रभु के चरण पृथ्वी को स्पर्श किए हुए थे। महाराज पृथु ने आँसू पोंछकर कहा— 'प्रभो! मुझे कान दे दीजिए, जिनसे मैं आपकी लीलाएँ सुनता रहूँ। आपके चरणकमल के मकरन्दरूपी अमृत के कणों से जो वायु निकलती है, वह हम कुयोगियों को पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। हमें अन्य वरों की आवश्यकता नहीं है। उत्तम कीर्ति वाले प्रभो! सत्सङ्ग में आपके सुयश को सुनकर कोई पशुबुद्धि पुरुष भी तृप्त हो जाए, तो गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? स्वयं लक्ष्मी जी भी आपके सुयश को सुनना चाहती हैं।'
स आदिराजो रचिताञ्जलिर्हरिं विलोकितुं नाशकदश्रुलोचनः ।
न किञ्चनोवाच स बाष्पविक्लवो हृदोपगुह्यामुमधादवस्थितः ॥
"अब लक्ष्मीजी के समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकता से आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तम की सेवा ही करना चाहता हूँ। किन्तु ऐसा न हो कि एक ही पति की सेवा प्राप्त करने की होड़ होने के कारण आपके चरणों में ही मन को एकाग्र करने वाले हम दोनों में कलह छिड़ जाए। आपने जो मुझसे कहा कि 'वर माँग', तो आपकी इस वाणी को तो मैं संसार को मोह में डालने वाली ही मानता हूँ। यही क्या, आपकी वेदरूपा वाणी ने भी तो जगत् को बाँध रखा है; यदि उस वेदवाणी रूप रस्सी से लोग बँधे न होते, तो वे मोहवश सकाम कर्म क्यों करते? प्रभो! आपकी माया से ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप से आपसे विमुख होकर अज्ञानवश अन्य स्त्री-पुत्रादि की इच्छा करता है। फिर भी जिस प्रकार पिता पुत्र की प्रार्थना की अपेक्षा न रखकर अपने आप ही पुत्र का कल्याण करता है, उसी प्रकार आप भी हमारी इच्छा की अपेक्षा न करके हमारे हित के लिये स्वयं ही प्रयत्न करें।"
अप्यावयोरेकपतिस्पृधोः कलि-र्न स्यात्कृतत्वच्चरणैकतानयोः ॥
अब लक्ष्मीजीके समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकतासे आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तमकी सेवा ही करना चाहता हूँ । किन्तु ऐसा न हो कि एक ही पतिकी सेवा प्राप्त करनेकी होड़ होनेके कारण आपके चरणोंमें ही मनको एकाग्र करनेवाले हम दोनोंमें कलह छिड़ जाय ।
श्रीमैत्रेय जी कहते हैं— आदिराज पृथु के इस प्रकार स्तुति करने पर सर्वसाक्षी श्रीहरि ने उनसे कहा, ‘राजन्! तुम्हारी मुझमें भक्ति हो। बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हारे चित्त इस प्रकार मुझमें लगा हुआ है। ऐसा होने पर तो पुरुष सहज में ही मेरी उस माया को पार कर लेता है, जिसको छोड़ना या जिसके बन्धन से छूटना अत्यन्त कठिन है। अब तुम सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करते रहो। प्रजापालक नरेश! जो पुरुष मेरी आज्ञा का पालन करता है, उसका सर्वत्र मङ्गल होता है।'
जगज्जनन्यां जगदीश वैशसं स्यादेव यत्कर्मणि नः समीहितम् ।
करोषि फल्ग्वप्युरु दीनवत्सलः स्व एव धिष्ण्येऽभिरतस्य किं तया ॥
वहाँ से चलने को तैयार हुए। महाराज पृथु ने वहाँ जो देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्नर, अप्सरा, मनुष्य और पक्षी आदि अनेक प्रकार के प्राणी आये थे, उन सभी का भगवद्बुद्धि से भक्तिपूर्वक वाणी और धन के द्वारा हाथ जोड़कर पूजन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानों को चले गये। भगवान अच्युत भी राजा पृथु एवं उनके पुरोहितों का चित्त चुराते हुए अपने धाम को सिधारे। तदनन्तर अपना स्वरूप दिखाकर अन्तर्धान हुए देवाधिदेव भगवान को नमस्कार करके राजा पृथु भी अपनी राजधानी में चले आये।
तत् त्वं कुरु मयाऽऽदिष्टमप्रमत्तः प्रजापते ।
मदादेशकरो लोकः सर्वत्राप्नोति शोभनम् ॥
श्रीमैत्रेय जी कहते हैं— विदुरजी! उस समय महाराज पृथु का नगर सर्वत्र मोतियों की लड़ियों, फूलों की मालाओं, रङ्ग-बिरङ्गे वस्त्रों, सोने के दरवाजों और अत्यन्त सुगन्धित धूपों से सुशोभित था। उसकी गलियाँ, चौक और सड़कें चन्दन और अरगजे के जल से सींच दी गयी थीं तथा उसे पुष्प, अक्षत, फल, यवाङ्कुर, खील और दीपक आदि माङ्गलिक द्रव्यों से सजाया गया था। वेदध्वनि होने लगी और वन्दीजनों ने स्तुति गान आरम्भ कर दिया। यह सब देख और सुनकर भी उन्हें किसी प्रकार का अहङ्कार नहीं हुआ। इस प्रकार वीरवर पृथु ने राजमहल में प्रवेश किया। मार्ग में जहाँ-तहाँ पुरवासी और देशवासियों ने उनका अभिनन्दन किया। परम यशस्वी महाराज ने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अभीष्ट वर देकर सन्तुष्ट किया। महाराज पृथु महापुरुष और सभी के पूजनीय थे। उन्होंने इसी प्रकार के अनेकों उदार कर्म करते हुए पृथ्वी का शासन किया और अन्त में अपने विपुल यश का विस्तार कर भगवान का परमपद प्राप्त किया।
सूतजी कहते हैं— मुनिवर शौनकजी! इस प्रकार भगवान् मैत्रेय के मुख से आदिराज पृथु का अनेक प्रकार के गुणों से सम्पन्न और गुणवानों द्वारा प्रशंसित विस्तृत सुयश सुनकर परम भागवत विदुरजी ने उनका अभिनन्दन करते हुए कहा। विदुरजी बोले— "ब्रह्मन्! ब्राह्मणों ने पृथु का अभिषेक किया। समस्त देवताओं ने उन्हें उपहार दिये। उन्होंने अपनी भुजाओं में वैष्णव तेज को धारण किया और उससे पृथ्वी का दोहन किया। उनके उस पराक्रम के उच्छिष्ट रूप विषय भोगों से ही आज भी सम्पूर्ण राजा तथा लोकपालों के सहित समस्त लोक इच्छानुसार जीवन निर्वाह करते हैं। भला, ऐसा कौन समझदार होगा जो उनकी पवित्र कीर्ति सुनना न चाहेगा? अतः अभी आप मुझे उनके कुछ और भी पवित्र चरित्र सुनाइये।"
महाराज पृथु का शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग की शोभा अपने स्वाभाविक रूप में स्पष्ट झलक रही थी। वे शरीर पर कृष्णमृग का चर्म और हाथों में कुशा धारण किये हुए थे, जिससे उनके शरीर की कान्ति और भी बढ़ गयी थी। वे अपने सारे नित्यकृत्य यथाविधि सम्पन्न कर चुके थे। राजा पृथु ने मानो सारी सभा को हर्ष से सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रों से चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया। उनका भाषण अत्यन्त सुन्दर, विचित्र पदों से युक्त, स्पष्ट, मधुर, गम्भीर एवं निश्शङ्क था; मानो उस समय वे सबका उपकार करने के लिये अपने अनुभव का ही अनुवाद कर रहे हों।
"परलोक दोनों ही जगह— कोई-कोई शरीर बड़े तेजोमय देखे जाते हैं। मनु, उत्तानपाद, महीपति धर्ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अङ्ग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इस कोटिके अन्यान्य महानुभावों के मत में तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और अपवर्ग के स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूप से भगवान् गदाधर की आवश्यकता है ही। इस विषय में तो केवल मृत्यु के दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगों का ही मतभेद है, अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता। तत्काल नष्ट कर देती है— जिनके चरणतल का आश्रय लेने वाला पुरुष सब प्रकार के मानसिक दोषों को धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्कार रूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्र में नहीं पड़ता; और जिनके चरण कमल सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं— उन प्रभु को आप लोग अपनी-अपनी आजीविका के उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजा आदि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओं के द्वारा भजें। हृदय में किसी भी प्रकार का कपट न रखें और यह निश्चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा।"
"कर्ममार्ग में जौ-चावल आदि विविध द्रव्य, शुक्लादि गुण, अवघात (कूटना) आदि क्रिया एवं मन्त्रों के द्वारा और अर्थ, आशय (सङ्कल्प), लिङ्ग (पदार्थ-शक्ति) तथा ज्योतिष्टोम आदि नामों से सम्पन्न होने वाले अनेक विशेषण युक्त यज्ञ के रूप में प्रकाशित होते हैं। जिस प्रकार एक ही अग्नि भिन्न-भिन्न काष्ठों में उन्हीं के आकारादिक के अनुरूप भासती है, उसी प्रकार वे सर्वव्यापक प्रभु परमानन्द स्वरूप होते हुए भी प्रकृति, काल, वासना और अदृष्ट से उत्पन्न हुए शरीर में विषयाकार बनी हुई बुद्धि में स्थित होकर उन यज्ञ-यागादि क्रियाओं के फलरूप से अनेक प्रकार के जान पड़ते हैं।"
"अहो! इस पृथ्वीतल पर मेरे जो प्रजाजन यज्ञ-भोक्ताओं के अधीश्वर सर्वगुरु श्रीहरि का एकनिष्ठ भाव से अपने-अपने धर्मों के द्वारा निरन्तर पूजन करते हैं, वे मुझ पर बड़ी कृपा करते हैं। सहनशीलता, तपस्या और ज्ञान— इन विशिष्ट विभूतियों के कारण वैष्णव और ब्राह्मणों के वंश स्वभावतः ही उज्ज्वल होते हैं। उन पर राजकुल का तेज, धन, ऐश्वर्य आदि समृद्धियों के कारण अपना प्रभाव न डालें। ब्रह्मादि समस्त महापुरुषों में अग्रगण्य, ब्राह्मणभक्त, पुराणपुरुष श्रीहरि ने भी निरन्तर इन्हीं के चरणों की वन्दना करके अविचल लक्ष्मी और संसार को पवित्र करने वाली कीर्ति प्राप्त की है। आप लोग भगवान् के लोकसङ्ग्रह रूप धर्म का पालन करने वाले हैं और सर्वान्तर्यामी, स्वयम्प्रकाश, ब्राह्मणप्रिय श्रीहरि विप्रवंश की सेवा करने से ही परम सन्तुष्ट होते हैं; अतः आप सभी को सब प्रकार से विनयपूर्वक ब्राह्मणकुल की सेवा करनी चाहिये।"
पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् ।
यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ॥
इनकी नित्य सेवा करनेसे शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जानेके कारण मनुष्य स्वयं ही ( ज्ञान और अभ्यास आदिके बिना ही ) परम शान्तिरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है । अतः लोकमें इन ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोजी देवताओंका मुख हो सके?
"इनकी नित्य सेवा करने से शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जाने के कारण मनुष्य स्वयं ही— ज्ञान और अभ्यास आदि के बिना ही— परम शान्ति रूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अतः लोक में इन ब्राह्मणों से बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोगी देवताओं का मुख हो सके? उन ब्राह्मणों के चरण कमलों की धूलि को मैं आयुपर्यन्त अपने मुकुट पर धारण करूँ; क्योंकि उसे सर्वदा सिर पर चढ़ाते रहने से मनुष्य के सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण गुण उसकी सेवा करने लगते हैं। उस गुणवान्, शीलसम्पन्न, कृतज्ञ और गुरुजनों की सेवा करने वाले पुरुष के पास सारी सम्पदाएँ अपने आप आ जाती हैं। अतः मेरी तो यही अभिलाषा है कि ब्राह्मणकुल, गोवंश और भक्तों के सहित श्रीभगवान मुझ पर सदा प्रसन्न रहें।"
तेषामहं पादसरोजरेणु-मार्या वहेयाधिकिरीटमाऽऽयुः ।
यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति ॥
यथार्थ है कि पापी वेन ब्राह्मणों के शाप से मारा गया था; फिर भी इनके पुण्यबल से उसका नरक से निस्तार हो गया। इसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान की निन्दा करने के कारण नरकों में गिरने वाला ही था कि अपने पुत्र प्रह्लाद के प्रभाव से उन्हें पार कर गया।
हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः ।
विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥
विदुरजी! राजा पृथु के ये युक्तियुक्त, गम्भीर, परिमित और मधुर वचन सुनकर श्रीसनत्कुमारजी बड़े प्रसन्न हुए और कुछ मुसकराते हुए कहने लगे। श्रीसनत्कुमारजी ने कहा— "महाराज! आपने सब कुछ जानते हुए भी समस्त प्राणियों के कल्याण की दृष्टि से बड़ी अच्छी बात पूछी है। सच है, साधु पुरुषों की बुद्धि ऐसी ही हुआ करती है।"
"जो आत्मवान् पुरुषों में 'आत्मा' रूपसे प्रकाशित होते हैं और उपासकों के हृदय में अपने स्वरूप को प्रकट करने वाले हैं, वे अजन्मा भगवान नारायण ही अपने भक्तों पर कृपा करने के लिये आप जैसे सिद्ध पुरुषों के रूप में इस पृथ्वी पर विचरा करते हैं। जो लोग संसार-अनल से सन्तप्त जीवों के परम सुहृद् हैं, इसलिये आपमें यह विश्वास करके मैं यह पूछना चाहता हूँ कि इस संसार में मनुष्य का किस प्रकार सुगमता से कल्याण हो सकता है?"
सनत्कुमारजी ने आगे कहा— "यह निश्चय है कि जो मनुष्य—सन्तुष्ट रहते हुए एकान्त सेवन में प्रेम रखने से, किसी भी जीव को कष्ट न देने से, निवृत्ति-निष्ठा से, आत्महित का अनुसन्धान करते रहने से, श्रीहरि के पवित्र चरित्र रूप श्रेष्ठ अमृत का आस्वादन करने से, निष्काम भाव से यम-नियमों का पालन करने से, कभी किसी की निन्दा न करने से, योग-क्षेम के लिये प्रयत्न न करने से, शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहन करने से, भक्तजनों के कानों को सुख देने वाले श्रीहरि के गुणों का बार-बार वर्णन करने से और बढ़ते हुए भक्तिभाव से—इस प्रकार करते हैं, तो उनका कार्य-कारण रूप सम्पूर्ण जड़ प्रपञ्च से वैराग्य हो जाता है और आत्मस्वरूप निर्गुण परब्रह्म में अनायास ही उनकी प्रीति हो जाती है।"
"वैराग्य के प्रबल वेग के कारण वासनाओं से शून्य हुए अपने अविद्यादि पाँच प्रकार के क्लेशों से युक्त अहङ्कारात्मक लिङ्ग-शरीर को वह उसी प्रकार भस्म कर देता है, जैसे अग्नि लकड़ी से प्रकट होकर फिर उसी को जला डालती है। इस प्रकार लिङ्ग देह का नाश हो जाने पर वह उसके कर्तृत्वादि सभी गुणों से मुक्त हो जाता है। फिर तो जैसे स्वप्नावस्था में तरह-तरह के पदार्थ देखने पर भी जगने पर उनमें से कोई चीज़ दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार वह पुरुष शरीर के बाहर दिखाई देने वाले घट-पटादि और भीतर अनुभव होने वाले सुख-दुःखादि को भी नहीं देखता; ये पदार्थ ही जीवात्मा और परमात्मा के बीच रहकर उनका भेद कर रहे थे। जब तक अन्तःकरण रूप उपाधि रहती है, तभी तक पुरुष को जीवालिसा-इन्द्रियों के विषय और अहङ्कार का अनुभव होता है। बाह्य जगत् में भी जल और दर्पण जैसे निमित्तों के रहने पर ही बिम्ब और प्रतिबिम्ब का भेद दिखाई देता है।"
"जो लोग विषय-चिन्तन में लगे रहते हैं, उनकी इन्द्रियाँ विषयों में फँस जाती हैं तथा मन को भी उन्हीं की ओर खींच ले जाती हैं। जिस प्रकार जलाशय के तीर पर उगे हुए कुशादि अपनी जड़ों से जल खींचते रहते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियासक्त मन बुद्धिकी विचार-शक्ति को क्रमशः हर लेता है। विचार-शक्ति के नष्ट हो जाने पर स्मृति चली जाती है और ज्ञान का नाश हो जाता है। इस ज्ञान के नाश को ही पण्डितजन 'अपने आप अपना नाश करना' कहते हैं। जिसकी चिन्ता से मनुष्य ज्ञान-विज्ञान से भ्रष्ट होकर स्थावर योनियों में जन्म पाता है, उससे बढ़कर लोक में जीव की कोई हानि नहीं है। इसलिये जिसे अज्ञानान्धकार से पार होने की इच्छा हो, उसे विषयों में आसक्ति कभी नहीं करनी चाहिए; क्योंकि यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति में बड़ी बाधक है। इन चार पुरुषार्थों में सबसे श्रेष्ठ मोक्ष ही माना जाता है, क्योंकि अन्य तीन में सर्वदा काल का भय रहता है। प्रकृति में गुण-क्षोभ होने के बाद जितने भी भाव प्रकट हुए हैं, उनमें कुशल से रह सके ऐसा कोई नहीं है; काल भगवान उन सभी के कुशलों को कुचलते रहते हैं। समस्त इन्द्रियों का प्रत्याहार करने वाले सन्न्यासी भी वैसा नहीं कर पाते। तुम उन सर्वाश्रय भगवान वासुदेव का भजन करो। जो लोग मन और इन्द्रियों के मगरों से भरे इस संसार-सागर को पार करना चाहते हैं, उनका पहुँचना कठिन है क्योंकि उन्हें कर्णधार रूप श्रीहरि का आश्रय नहीं है। अतः तुम भगवान के आराधनीय चरणकमलों को नौका बनाकर अनायास ही इस दुस्तर समुद्र को पार कर लो।"
श्री मैत्रेयजी कहते हैं— विदुरजी! ब्रह्माजी के पुत्र आत्मज्ञानी सनत्कुमारजी से इस प्रकार आत्म-तत्त्व का उपदेश पाकर महाराज पृथु ने उनकी बहुत प्रशंसा की। वे बोले— "लोकों के शासन का अधिकार वेद-शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों को ही है। ब्राह्मण अपना ही खाता है, अपना ही पहनता है और अपनी ही वस्तु दान देता है; दूसरे क्षत्रिय तो उसी की कृपा से अन्न खाने पाते हैं। आप लोग वेद के पारगामी हैं, आपने हमें निश्चित रूप से समझा दिया है कि भगवान के प्रति अभेद-भक्ति ही उनकी उपलब्धि का प्रधान साधन है। आप लोग परम कृपालु हैं, अतः अपने इस दीनोद्धार रूप कर्म से ही सदैव सन्तुष्ट रहें। आपके इस उपकार का बदला कोई क्या दे सकता है? उसके लिये प्रयत्न करना भी अपनी हँसी कराना ही है।"
विदुरजी! फिर आदिराज पृथु ने आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ सनकादिकी की पूजा की और वे उनके शील की प्रशंसा करते हुए सबके सामने आकाश मार्ग से चले गये। महात्माओं में अग्रगण्य महाराज पृथु ने उनसे उपदेश पाकर, चित्त की एकाग्रता से आत्मा में ही स्थित रहने के कारण अपने को कृतकृत्य अनुभव किया। वे ब्रह्म-अर्पण बुद्धि से समय, स्थान, शक्ति और धन के अनुसार सभी कर्म करते थे। समस्त कर्मों का फल परमात्मा को अर्पण करके और आत्मा को साक्षी मानकर वे सर्वथा निर्लिप्त रहे। जिस प्रकार सूर्यदेव सर्वत्र प्रकाश करने पर भी वस्तुओं के गुण-दोष से निर्लेप रहते हैं, उसी प्रकार सार्वभौम साम्राज्य-लक्ष्मी से सम्पन्न और गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी अहङ्कार शून्य होने के कारण वे इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं हुए।
इस प्रकार आत्मनिष्ठ होकर सभी कर्तव्य-कर्मों का यथोचित अनुष्ठान करते हुए उन्होंने अपनी भार्या अर्चिके गर्भ से अपने अनुरूप पाँच पुत्र उत्पन्न किये। वे कर-रूप से प्रजा का धन लेकर उसे दुष्काल के समय मुक्त हस्त से प्रजा के हित में लगा देते थे और सब पर अपना प्रभाव जमाये रखते थे। वे तेज में अग्निके समान दुर्धर्ष, इन्द्रके समान अजेय, पृथ्वी के समान क्षमाशील और स्वर्ग के समान मनुष्यों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाले थे। वे प्रजा को तृप्त करने के लिये मेघ के समान अपने अभीष्ट अर्थों को खुले हाथ से लुटाते रहते थे। वे समुद्र के समान गम्भीर और पर्वतराज सुमेरु के समान धैर्यवान थे। वे स्वभाव में भगवान शङ्कर के समान तेजस्वी, सौन्दर्य में कामदेव के समान, उत्साह में सिंह के समान, वात्सल्य में मनु के समान और आधिपत्य में ब्रह्माजी के समान थे। ब्रह्म-विचार में बृहस्पति, इन्द्रिय-जय में साक्षात् श्रीहरि तथा गौ, ब्राह्मण, गुरुजन एवं भक्तों की भक्ति, लज्जा, विनय और परोपकार आदि गुणों में वे अपने ही समान अनुपम थे। लोग त्रिलोकी में सर्वत्र उच्च स्वर से उनकी कीर्तिका गाते थे; जिससे उनकी कीर्ति स्त्रियों के कानों में भी वैसे ही प्रवेश पाती थी जैसे सत्पुरुषों के हृदय में श्रीराम।"
कीर्त्योर्ध्वगीतया पुम्भिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह ।
प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ॥
समान और तेजकी असह्यतामें भगवान् शंकरके समान थे ॥ ६० ॥ सौन्दर्यमें कामदेवके समान, उत्साहमें सिंहके समान, वात्सल्यमें मनुके समान और मनुष्योंके आधिपत्यमें सर्वसमर्थ ब्रह्माजीके समान थे ॥ ६१ ॥ ब्रह्मविचारमें बृहस्पति, इन्द्रियजयमें साक्षात् श्रीहरि तथा गौ, ब्राह्मण, गुरुजन एवं भगवद्भक्तोंकी भक्ति, लज्जा, विनय, शील एवं परोपकार आदि गुणोंमें अपने ही समान ( अनुपम ) थे ॥६२ ॥ लोग त्रिलोकीमें सर्वत्र उच्च स्वरसे उनकी कीर्तिका गान करते थे, इससे वे स्त्रियोंतकके कानोंमें वैसे ही प्रवेश पाये हुए थे जैसे सत्पुरुषोंके हृदयमें श्रीराम ।
In English
The Story of King Vena and the Birth of Prithu
After the wicked King Vena insults the gods and ignores the sages, he is killed by their wrath. To restore order to the world, the sages churn the limbs of Vena to produce a divine couple: the goddess Lakshmi and the great king Prithu. Prithu emerges as an incarnation of Vishnu to protect and rule the earth.
This page answers
- How was king prithu born?
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- Who are the parents of prithu?
- What happened after king vena died?
Also written: Prithucharita, Prithu, Vidura, Maitreya, Vena, Sunitha, Rishiyon, Nishada, Venaki, Archi, Brahma, Suta, Magadha, Vandi, Prithvi, Indra, Rudra, Ritvija, Sanaka, Munigana, Bhagavan, Hiranyakashipu, Prahlada, Sanatkumara, पृथुचरित