श्रीगणेशाय नमः।

ऽम्बरीषचरित : भक्त की रक्षा हेतु भगवान स्वयं क्यों व्याकुल होते हैं?

भक्त और भगवान का अनन्य सम्बन्ध

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · नवम स्कन्ध · अध्याय 4–5 · पृष्ठ 17–46

3,823 शब्द · 20 मिनटका पाठ · 32 श्लोक

श्रीशुकदेवजी ने राजा परीक्षित से कहा

राजा परीक्षित को धर्म-मर्म समझाने हेतु

श्रीशुकदेवजी बोले — हे परीक्षित! जब सुद्युम्न तपस्या करने के लिए वन में चले गए, तब वैवस्वत मनु ने पुत्र की कामना के लिए यमुना के तट पर पूरे सौ वर्ष तक घोर तपस्या की। इस कठिन तप के पश्चात उन्होंने सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि की आराधना की और अपने समान ही दस पुत्र प्राप्त किए, जिनमें सबसे बड़े इक्ष्वाकु थे।

श्रीशुक उवाच

ततोऽयजन्मनुर्देवमपत्यार्थं हरिं प्रभुम् ।
इक्ष्वाकुपूर्वजान् पुत्राँल्लेभे स्वसदृशान् दश ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इस प्रकार जब सुद्युम्न तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये, तब वैवस्वत मनुने पुत्रकी कामनासे यमुनाके तटपर सौ वर्षतक तपस्या की || १ || इसके बाद उन्होंने सन्तानके लिये सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरिकी आराधना की और अपने ही समान दस पुत्र प्राप्त किये, जिनमें सबसे बड़े इक्ष्वाकु थे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 2पृष्ठ 17

मनु के पुत्रों में पृषध का प्रसङ्ग अत्यन्त विशेष है। एक रात घनघोर वर्षा हो रही थी। चारों ओर अन्धकार था और आकाश घनी घटाओं से ढका हुआ था, जिससे तारे भी दिखाई नहीं दे रहे थे। उस समय गौशाला में गायों के झुण्ड के बीच अचानक एक बलवान बाघ घुस आया। बाघ को देखकर सोई हुई गौएँ भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं। उस बाघ ने एक गाय को पकड़ लिया और वह गाय अत्यन्त भयभीत होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगी। गाय का वह करुण क्रन्दन सुनकर पृषध दौड़कर उसके पास पहुँचा।

एवंवृत्तो वनं गत्वा दृष्ट्वा दावाग्निमुत्थितम् ।
तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं मुनिः ॥

इस प्रकारका जीवन व्यतीत करता हुआ वह एक दिन वनमें गया । वहाँ उसने देखा कि दावानल धधक रहा है । मननशील पृषध्र अपनी इन्द्रियोंको उसी अग्निमें भस्म करके परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गया ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 14पृष्ठ 18

अन्धेरे के कारण उसे कुछ स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। उसने हाथ में तलवार उठाई और अनजाने में ही बड़े वेग से गाय का सिर काट दिया। उसे लगा कि उसने बाघ को मार गिराया है। वास्तव में, तलवार की नोक से बाघ का कान कट गया था और वह भयभीत होकर खून गिराता हुआ वहाँ से भाग निकला। जब सुबह हुई और पृषध ने देखा कि उसने बाघ को नहीं बल्कि एक गाय को मार डाला है, तो वह अत्यन्त दुखी हुआ। यद्यपि उसने यह अपराध जान-बूझकर नहीं किया था, फिर भी कुलपुरोहित वसिष्ठ जी ने उसे शाप दे दिया— "तुम इस कर्म से क्षत्रिय नहीं रहोगे; जाओ, शूद्र हो जाओ।" पृषध ने अपने गुरुदेव के इस शाप को अञ्जलि बाँधकर स्वीकार किया। इसके पश्चात उसने मुनियों को प्रिय लगने वाले नैष्ठिक ब्रह्मचर्य व्रत को धारण कर लिया। वह समस्त प्राणियों का अहैतुक हितैषी और सबके प्रति समान भाव रखने वाला बन गया। उसकी सारी आसक्तियाँ मिट गईं, वृत्तियाँ शान्त हो गईं और इन्द्रियाँ वश में हो गईं। वह किसी भी प्रकार का सङ्ग्रह-परिग्रह नहीं रखता था; जो कुछ दैववश प्राप्त होता, उसी से अपना जीवन निर्वाह करता। वह आत्मज्ञान से सन्तुष्ट होकर अपने चित्त को परमात्मा में स्थित कर प्रायः समाधिस्थ रहता था। कभी-कभी वह जड़, अन्धे और बहरे के समान पृथ्वी पर विचरण करता था। एक दिन जब वह वन में गया, तो वहाँ उसने धधकती हुई दावानल देखी। उस मननशील पृषध ने अपनी इन्द्रियों को उसी अग्नि में भस्म कर दिया और परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लिया।

आत्मन्यात्मानमाधाय ज्ञानतृप्तः १ समाहितः ।
विचचार महीमेतां जडान्धबधिराकृतिः ॥

वह आत्मज्ञानसे सन्तुष्ट एवं अपने चित्तको परमात्मामें स्थित करके प्रायः समाधिस्थ रहता । कभी - कभी जड, अंधे और बहरेके समान पृथ्वीपर विचरण करता ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 13पृष्ठ 18

मनु के वंश का विस्तार अत्यन्त विस्तृत रहा। उनके सबसे छोटे पुत्र कवि थे, जो विषयों से निस्पृह थे और अपने बन्धुओं के साथ वन चले गए थे। उन्होंने किशोर अवस्था में ही स्वयं को परमात्मा में लीन कर परम पद प्राप्त किया। मनु के पुत्र करूष से कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्न हुए, जो ब्राह्मणभक्त और धर्मप्रेमी थे। धृष्टके वंश में धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए, जो अन्ततः ब्राह्मण बन गए। उनके वंश में सुमति, भूतज्योति, वसु, प्रतीक, ओघवान् और ओघवती जैसी अनेक पीढ़ियाँ हुईं। ओघवती का विवाह सुदर्शन से हुआ। वहीं नरिष्यन्त के वंश में चित्रसेन, ऋक्ष, मीढ्वान, कूर्च और इन्द्रसेन जैसे अनेक पात्र हुए। इन्द्रसेन से सत्यश्रवा, उरुश्रवा और देवदत्त की उत्पत्ति हुई। भलन्दन और वत्सप्रीतिका के वंश में भी कई पीढ़ियाँ चलीं। मरुत्त के वंश में भी अनेक राजा हुए, जिनमें मरुत्त ने एक अत्यन्त भव्य यज्ञ कराया था। उस यज्ञ के पात्र सोने के बने थे और इन्द्र तथा ब्राह्मण उसमें तृप्त थे। मरुत्त के वंश में दम, राज्यवर्धन, सुधृति और नर जैसे राजा हुए। नर से बन्धुमान्, वेगवान्, बन्धु और अन्ततः राजा तृणबिन्दु का जन्म हुआ। तृणबिन्दु ने लोकपाल कुबेर को पुत्र रूप में उत्पन्न किया। तृणबिन्दु के वंश में विशाल, वंशधर, हेमचन्द्र, धूम्राक्ष, संयम, कृशाश्व, सोमदत्त, सुमति और जनमेजय जैसे अनेक राजा हुए, जिन्होंने अपनी कीर्ति बढ़ाई।

कविः कनीयान् विषयेषु निःस्पृहो विसृज्य राज्यं सह बन्धुभिर्वनम् ।
निवेश्य चित्ते पुरुषं स्वरोचिषं विवेश कैशोरवयाः परं गतः ॥

मनुका सबसे छोटा पुत्र था कवि । विषयोंसे वह अत्यन्त निःस्पृह था । वह राज्य छोड़कर अपने बन्धुओंके साथ वनमें चला गया और अपने हृदयमें स्वयंप्रकाश परमात्माको विराजमान कर किशोर अवस्थामें ही परम पदको प्राप्त हो गया ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 15पृष्ठ 18

इसी क्रम में मनु के पुत्र शर्याति वेदों के निष्ठावान विद्वान थे। उन्होंने अङ्गिरा गोत्र के ऋषियों के यज्ञ में दूसरे दिन का कर्म बताया था। उनकी राजधानी में सुकन्या का प्रसङ्ग आता है। शर्याति ने अपनी कन्या सुकन्या को च्यवन मुनि को समर्पित किया था। सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनि की सेवा बड़ी सावधानी से करती थी और उनकी मनोवृत्ति के अनुसार ही व्यवहार करती थी।

कस्यचित् त्वथ कालस्य नासत्यावाश्रमागतौ ।
तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्वरौ ॥

ग्रहं ग्रहीष्ये सोमस्य यज्ञे वामप्यसोमपोः ।
क्रियतां मे वयो रूपं प्रमदानां यदीप्सितम् ॥

राजधानीमें चले आये ॥९ ॥ इधर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनिको अपने पतिके रूपमें प्राप्त करके बड़ी सावधानीसे उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्न करने लगी । वह उनकी मनोवृत्तिको जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी ॥ १० ॥ कुछ समय बीत जानेपर उनके आश्रमपर दोनों अश्विनीकुमार आये । च्यवन मुनिने उनका यथोचित सत्कार किया और कहा कि ‘ आप दोनों समर्थ हैं, इसलिये मुझे युवा अवस्था प्रदान कीजिये । मेरा रूप एवं अवस्था ऐसी कर दीजिये, जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हैं । मैं जानता हूँ कि आपलोग सोमपानके अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञमें सोमरसका भाग दूँगा '

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 11-12पृष्ठ 24

एक समय उनके आश्रम पर अश्विनीकुमार आए। च्यवन मुनि ने उनका सत्कार किया और उनसे प्रार्थना की— "आप दोनों समर्थ हैं, इसलिए मुझे युवा अवस्था प्रदान कीजिये। मेरा रूप और अवस्था ऐसी कर दीजिये जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हों। मैं जानता हूँ कि आप लोग सोमपान के अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञ में सोमरस का भाग दूँगा।" यह कहकर वे उन्हें लेकर कुण्ड में प्रवेश कर गए। उसी समय कुण्ड से तीन पुरुष बाहर निकले। वे तीनों कमलों की माला, कुण्डल और सुन्दर वस्त्र पहने हुए थे। वे अत्यन्त सुन्दर और स्त्रियों को प्रिय लगने वाले थे। जब साध्वी सुकन्या ने देखा कि ये तीनों एक ही आकृति के और सूर्य के समान तेजस्वी हैं, तो उसने अपने पति को न पहचानते हुए अश्विनीकुमारों की शरण ली। सुकन्या के पातिव्रत्य से अश्विनीकुमार बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने उसे उसके पति का परिचय दिया और फिर च्यवन मुनि से आज्ञा लेकर विमान द्वारा स्वर्ग चले गए।

राजा शर्याति के इस प्रकार कहने पर, उनकी पुत्री सुकन्या ने अपने चेहरे पर एक पवित्र मुस्कान लाते हुए कहा— "पिताजी! ये आपके जामाता स्वयं भृगुनन्दन महर्षि च्यवन ही हैं।" इसके बाद उसने बड़े प्रेम से अपने पिता को महर्षि च्यवन के उस यौवन और दिव्य सौंदर्य की प्राप्ति का पूरा वृत्तान्त सुनाया। यह सब सुनकर राजा शर्याति अत्यन्त विस्मित रह गए और उन्होंने अपनी पुत्री को स्नेहपूर्वक गले से लगा लिया।

इसके पश्चात, महर्षि च्यवन ने वीर शर्याति से सोमयज्ञ का अनुष्ठान करवाया। यद्यपि वे स्वयं सोमपान के अधिकारी नहीं थे, फिर भी अपने प्रभाव से उन्होंने अश्विनीकुमारों को सोमपान कराया। इन्द्र अत्यन्त शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं, इसलिए उन्हें यह बात सहन नहीं हुई। उन्होंने चिढ़कर शर्यातिको मारने के लिए अपना वज्र उठाया, किन्तु महर्षि च्यवन ने अपने प्रताप से उनके हाथ को वहीं स्तम्भित कर दिया। तब सभी देवताओं ने अश्विनीकुमारों को सोम का भाग देना स्वीकार कर लिया; क्योंकि वैद्य होने के कारण उन लोगों ने पहले अश्विनीकुमारों के सोमपान का बहिष्कार कर रखा था।

राजा शर्याति के तीन पुत्र थे—उत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण। आनर्त से रेवत हुए। महाराज रेवत ने समुद्र के भीतर 'कुशस्थली' नाम की एक नगरी बसाई थी, जहाँ वे आनर्त आदि देशों का राज्य करते थे। उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े ककुद्मी थे। ककुद्मी अपनी कन्या रेवती को लेकर उसके लिए वर पूछने के उद्देश्य से ब्रह्माजी के पास गए। उस समय ब्रह्मलोक का मार्ग ऐसे लोगों के लिए बेरोक-टोक था। वहाँ गाने-बजाने की भारी धूम मची हुई थी, जिस कारण बातचीत के लिए अवसर न मिलने पर वे कुछ क्षण वहीं ठहर गए।

उत्सव के अन्त में ब्रह्माजी को नमस्कार करके उन्होंने अपना अभिप्राय निवेदन किया। उनकी बात सुनकर भगवान ब्रह्माजी ने हँसकर कहा— "महाराज! तुमने अपने मन में जिन लोगों के विषय में सोच रखा था, वे सब तो काल के गाल में चले गए। अब उनके पुत्र, पौत्र अथवा नातियों की तो बात ही क्या है, गोत्रों के नाम भी नहीं सुनाई पड़ते।"

भगवान ब्रह्माजी ने आगे कहा— "भगवान नारायण के अंशावतार महाबली बलदेव जी पृथ्वी पर विद्यमान हैं। हे राजन्! उन्हीं नर-रत्न को यह कन्या-रत्न तुम समर्पित कर दो। जिनके नाम और लीलाओं का श्रवण-कीर्तन बड़ा ही पवित्र है, वे ही प्राणियों के जीवन सर्वस्व होकर पृथ्वी का भार उतारने के लिए अपने अंश से अवतीर्ण हुए हैं।" राजा ककुद्मी ने ब्रह्माजी का यह आदेश प्राप्त कर उनके चरणों की वन्दना की और अपने नगर लौट आए। उनके वंशजों ने यक्षों के भय से वह नगरी छोड़ दी थी और वे जहाँ-तहाँ निवास कर रहे थे। राजा ककुद्मी ने अपनी सर्वाङ्गसुन्दरी पुत्री को परम बलशाली बलराम जी को सौंप दिया और स्वयं तपस्या करने के लिए भगवान नर-नारायण के आश्रम बदरीवन की ओर चल दिए।

श्रीशुकदेवजी कहते हैं— परीक्षित! मनुपुत्र नाभाग का पुत्र था नाभाग। जब वह दीर्घकाल तक ब्रह्मचर्य का पालन करके लौटा, तब उसके बड़े भाइयों ने अपने से छोटे किन्तु विद्वान् भाई को हिस्से में केवल पिता को ही दिया, क्योंकि सम्पत्ति तो उन्होंने पहले ही आपस में बाँट ली थी। उसने अपने भाइयों से पूछा— "भाइयो! आप लोगों ने मुझे हिस्से में क्या दिया है?" उन्होंने उत्तर दिया— "हम तुम्हारे हिस्से में पिताजी को ही तुम्हें देते हैं।" नाभाग ने जाकर अपने पिता से कहा— "पिताजी! मेरे बड़े भाइयों ने मेरे लिए आपको ही दिया है।"

तब उसके पिता ने कहा— "बेटा! तुम उनकी बात न मानो। देखो, ये बड़े बुद्धिमान आङ्गिरस गोत्र के ब्राह्मण इस समय एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। परन्तु मेरे विद्वान् पुत्र! वे प्रत्येक छठे दिन अपने कर्म में भूल कर बैठते हैं। तुम उन महात्माओं के पास जाकर उन्हें वैश्व-देव सम्बन्धी दो सूक्त बता दो; जब वे स्वर्ग जाने लगेंगे, तब यज्ञ से बचा हुआ अपना सारा धन तुम्हें दे देंगे। इसलिये अब तुम उन्हीं के पास चले जाओ।"

नाभाग ने पिता की आज्ञा मानकर वैसा ही किया। उन आङ्गिरस गोत्री ब्राह्मणों ने यज्ञ का बचा हुआ धन उसे दे दिया और वे स्वर्ग चले गए। जब नाभाग उस धन को लेने लगा, तब उत्तर दिशा से एक काले रङ्ग का पुरुष आया और बोला— "इस यज्ञभूमि में जो कुछ बचा हुआ है, वह सब धन मेरा है।" नाभाग ने कहा— "ऋषियों ने यह धन मुझे दिया है, इसलिये मेरा है।" इस पर उस पुरुष ने कहा— "हमारे विवाद के विषय में तुम्हारे पिता से ही प्रश्न किया जाए।"

नाभाग ने जाकर अपने पिता से पूछा। पिता ने कहा— "एक बार दक्ष प्रजापतिके यज्ञ में ऋषि लोग यह निश्चय कर चुके हैं कि यज्ञभूमि में जो कुछ बच रहता है, वह सब रुद्रदेव का हिस्सा है। इसलिये वह धन तो महादेव जी को ही मिलना चाहिये।" नाभाग ने उस काले रङ्ग के पुरुष, जो स्वयं रुद्र भगवान थे, उन्हें प्रणाम किया और कहा— "प्रभो! यज्ञ-भूमिका की सभी वस्तुएँ आपकी हैं, मेरे पिता ने ऐसा ही कहा है। भगवन! मुझसे अपराध हुआ, मैं सिर झुकाकर आपसे क्षमा माँगता हूँ।"

तब भगवान रुद्र ने कहा— "तुम्हारे पिता ने धर्म के अनुकूल निर्णय दिया है और तुमने भी मुझसे सत्य ही कहा है। तुम वेदों का अर्थ तो पहले से ही जानते हो। अब मैं तुम्हें सनातन ब्रह्म-तत्त्व का ज्ञान देता हूँ। यहाँ यज्ञ में बचा हुआ मेरा जो अंश है, यह धन भी मैं तुम्हें ही दे रहा हूँ; तुम इसे स्वीकार करो।" इतना कहकर सत्यप्रेमी भगवान रुद्र अन्तर्धान हो गए। जो मनुष्य प्रातः और सायङ्काल एकाग्रचित्त से इस आख्यान का स्मरण करता है, वह प्रतिभाशाली एवं वेदज्ञ तो होता ही है, साथ ही अपने स्वरूप को भी जान लेता है।

नाभाग के पुत्र हुए अम्बरीष। वे भगवान के बड़े प्रेमी एवं उदार धर्मात्मा थे। जो ब्रह्म-शाप कभी कहीं रोका नहीं जा सका, वह भी अम्बरीष का स्पर्श कर न सका। राजा परीक्षित ने पूछा— "हे भगवन! मैं परमज्ञानी राजर्षि अम्बरीष का चरित्र सुनना चाहता हूँ।" एक ब्राह्मण ने क्रोधित होकर उन्हें ऐसा दण्ड दिया था जिसे किसी प्रकार टाला नहीं जा सकता था; परन्तु वह भी उनका कुछ न बिगाड़ सका।

धन-वैभव के लोभ में पड़कर मनुष्य घोर नरक में जाता है, वह केवल चार दिन की चाँदनी है और उसका दीपक बुझा-बुझाया है। राजा अम्बरीष का परम प्रेम भगवान श्रीकृष्ण में था। उनके प्रेम के प्राप्त हो जाने पर तो यह सारा विश्व और इसकी समस्त सम्पत्तियाँ मिट्टी के ढेले के समान जान पड़ती थीं। उन्होंने अपने मन को श्रीकृष्ण चन्द्र के चरण-अरविन्द युगल में, वाणी को भगवद्-गुणानुवर्णन में, हाथों को श्रीहरि-मन्दिर के मार्जन-सेचन में और अपने कानों को भगवान अच्युत की मङ्गलमयी कथा के श्रवण में लगा रखा था।

उन्होंने अपने नेत्र मुकुन्द-मूर्ति एवं मन्दिरों के दर्शनों में, अङ्ग स्वयं भगवद्भक्तों के शरीर-स्पर्श में, नासिका श्रीमती तुलसी के दिव्य गन्ध में और जिह्वा को भगवान के प्रति अर्पित नैवेद्य-प्रसाद में संलग्न कर दिया था। वे किसी समय बड़े प्रेम से भगवान के उत्तम चरित्रों का श्रवण करतीं और किसी समय उनका गान करतीं। इस प्रकार उनके राज्य के मनुष्य देवताओं के अत्यन्त प्यारे स्वर्ग की भी इच्छा नहीं करते थे। वे अपने हृदय में अनन्त प्रेम का दान करने वाले श्रीहरि के नित्य-निरन्तर दर्शन करते रहते थे। इसलिये उन्हें वह भोग-सामग्री भी हर्षित नहीं कर पाती थी, जो बड़े-बड़े सिद्धों को भी दुर्लभ है; वे वस्तुएँ उनके आत्मानन्द के सामने अत्यन्त तुच्छ और तिरस्कृत थीं।

राजा अम्बरीष इस प्रकार तपस्या से युक्त भक्तियोग और प्रजापालन रूप स्वधर्म के द्वारा भगवान को प्रसन्न करने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने सब प्रकार की आसक्तियों का परित्याग कर दिया। उनका यह दृढ़ निश्चय था कि घर, स्त्री, पुत्र, भाई-बन्धु, हाथी, रथ, घोड़े, चतुरङ्गिणी सेना, अक्षय रत्न और आभूषण—ये सब असत्य हैं। उनकी अनन्य प्रेममयी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उनकी रक्षा के लिये सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर दिया था, जो विरोधियों को भयभीत करने वाला और भक्तों की रक्षा करने वाला है।

प्राग्दिष्टं भृत्यरक्षायां पुरुषेण महात्मना ।
ददाह कृत्यां तां चक्रं क्रुद्धाहिमिव पावकः ॥

परमपुरुष परमात्माने अपने सेवककी रक्षाके लिये पहलेसे ही सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर रखा था । जैसे आग क्रोधसे गुर्राते हुए साँपको भस्म कर देती है, वैसे ही चक्रने दुर्वासाजीकी कृत्याको जलाकर राखका ढेर कर दिया ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 48पृष्ठ 36

वे ब्राह्मणों की पूजा वस्त्र, आभूषण, चन्दन और माला आदि से करते थे। यद्यपि महा-भाग्यवान ब्राह्मणों को इस पूजा की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि वे सिद्ध थे, तथापि राजा अम्बरीष ने भक्ति भाव से उनका पूजन किया। तत्पश्चात् उन्होंने ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन कराया और साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। उन गौओं के सींग सुवर्ण से और खुर चाँदी से मढ़े हुए थे; वे सुन्दर-सुन्दर वस्त्र पहने हुए थीं, सुशील थीं और खूब दूध देने वाली थीं।

प्रतिनन्द्य स तद्याच्ञां' कर्तुमावश्यकं गतः ।
निममज्ज बृहद् ध्यायन् कालिन्दीसलिले शुभे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 37पृष्ठ 35

जब ब्राह्मणों को सब कुछ मिल गया, तब राजा ने उनसे आज्ञा लेकर व्रत का पारण करने की तैयारी की। उसी समय स्वयं दुर्वासा जी अतिथि के रूप में वहाँ पधारे। राजा अम्बरीष उन्हें देखते ही उठकर खड़े हो गए, आसन देकर बैठाया और विविध सामग्रियों से उनकी पूजा की। अपने चरणों में प्रणाम करके उन्होंने भोजन के लिए प्रार्थना की।

मुहूर्तार्धावशिष्टायां द्वादश्यां पारणं प्रति ।
चिन्तयामास धर्मज्ञो द्विजैस्तद्धर्मसंकटे ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 38पृष्ठ 35

इधर द्वादशी केवल घड़ी भर शेष रह गई थी। धर्मज्ञ अम्बरीष धर्म-सङ्कट में पड़कर ब्राह्मणों के साथ परामर्श करने लगे। उन्होंने कहा— "ब्राह्मण-देवताओ! ब्राह्मण को बिना भोजन कराए स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते पारण न करना—दोनों ही दोष हैं। इसलिये इस समय जैसा करने से मेरी भलाई हो और मुझे पाप न लगे, ऐसा काम करना चाहिये।"

यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्त्र्य च ।
अदत्त्वा भुक्तवांस्तस्य सद्यस्ते दर्शये फलम् ॥

देखो, मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ। इसने अतिथि सत्कार करनेके लिये मुझे निमन्त्रण भी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही खा लिया है। अच्छा देख, 'तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ'

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 45पृष्ठ 36

तब ब्राह्मणों के साथ विचार करके उन्होंने निश्चय किया— "श्रुतियों में ऐसा कहा गया है कि जल पी लेना भोजन करना भी है और नहीं करना भी। इसलिये इस समय केवल जल से ही पारण कर लेता हूँ।" ऐसा निश्चय करके मन ही मन भगवान का चिन्तन करते हुए राजर्षि अम्बरीष ने जल पी लिया और वे दुर्वासा जी के आने की बाट देखने लगे।

अम्भसा केवलेनाथ करिष्ये व्रतपारणम् ।
प्राहुरब्भक्षणं विप्रा ह्यशितं नाशितं च तत् ॥

तब ब्राह्मणोंके साथ विचार करके उन्होंने कहा- 'ब्राह्मणो! श्रुतियोंमें ऐसा कहा गया है कि जल पी लेना भोजन करना भी है, नहीं भी करना है । इसलिये इस समय केवल जलसे पारण किये लेता हूँ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 40पृष्ठ 35

दुर्वासा जी आवश्यक कर्मों से निवृत्त होकर यमुनातट से लौट आए। जब राजा ने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया, तब उन्होंने अनुमान से ही समझ लिया कि राजा ने पारण कर लिया है। उस समय दुर्वासा जी बहुत भूखे थे; यह जानकर वे क्रोध से थर-थर काँपने लगे। उनकी भौंहें चढ़ गईं और मुँह विकट हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर खड़े अम्बरीष से डाँटकर कहा— "अहो! देखो तो सही, यह कितना क्रूर है! यह धन के मद में मतवाला हो रहा है। भगवान की भक्ति तो इसे छूत नहीं गयी और यह अपने आप को बड़ा समर्थ मानता है! आज इसने धर्म का उल्लङ्घन करके बड़ा अन्याय किया है। देखो, मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ। इसने अतिथि सत्कार करने के लिये मुझे निमन्त्रण भी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही खा लिया है। अच्छा देख, तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ!"

मन्युना प्रचलद्गात्रो भ्रुकुटीकुटिलाननः ।
बुभुक्षितश्च सुतरां कृतांजलिमभाषत ॥

उस समय दुर्वासाजी बहुत भूखे थे । इसलिये यह जानकर कि राजाने पारण कर लिया है, वे क्रोधसे थर- थर काँपने लगे । भौंहोंके चढ़ जानेसे उनका मुँह विकट हो गया । उन्होंने हाथ जोड़कर खड़े अम्बरीषसे डाँटकर कहा ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 43पृष्ठ 36

दुर्वासा ऋषि क्रोध से जल उठे। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और उससे राजा अम्बरीष को मार डालने के लिए एक भयङ्कर कृत्या उत्पन्न कर दी। वह कृत्या प्रलयकाल की आग के समान दहक रही थी। हाथ में तलवार लेकर वह आग के समान जलती हुई राजा अम्बरीष पर टूट पड़ी। उस समय उसके पैरों की धमक से पूरी पृथ्वी काँप रही थी, परन्तु राजा अम्बरीष उसे देखकर तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे ज्यों के त्यों एक पग भी पीछे हटे बिना खड़े रहे।

तामापतन्तीं ज्वलतीमसिहस्तां४ पदा भुवम् ।
वेपयन्तीं समुद्वीक्ष्य न चचाल पदान्नृपः ॥

वह आगके समान जलती हुई, हाथमें तलवार लेकर राजा अम्बरीषपर टूट पड़ी । उस समस उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी काँप रही थी । परन्तु राजा अम्बरीष उसे देखकर उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए । वे एक पग भी नहीं हटे, ज्यों- के - त्यों खड़े रहे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 47पृष्ठ 36

परमपुरुष परमात्मा ने अपने सेवक की रक्षा के लिये पहले से ही सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर रखा था। जैसे आग क्रोध से गुर्राते हुए साँप को भस्म कर देती है, वैसे ही उस चक्र ने दुर्वासा जी की कृत्या को जलाकर राख का ढेर कर दिया। जब दुर्वासा जी ने देखा कि उनकी बनाई हुई कृत्या जल रही है और चक्र उनकी ओर आ रहा है, तब वे भयभीत होकर अपने प्राण बचाने के लिये एकाएक भाग निकले। जैसे ऊँची-ऊँची लपटों वाला दावानल साँप के पीछे दौड़ता है, वैसे ही भगवान का वह चक्र उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। जब दुर्वासा जी ने देखा कि चक्र उनके पीछे लग गया है, तो वे सुमेरु पर्वत की गुफाओं में प्रवेश करने के लिये उसी ओर दौड़ पड़े।

तमन्वधावद् भगवद्रथांगं दावाग्निरुद्धूतशिखो यथाहिम् ।
तथानुषक्तं' मुनिरीक्षमाणो गुहां विविक्षुः प्रससार मेरोः ॥

जैसे ऊँची -ऊँची लपटोंवाला दावानल साँपके पीछे दौड़ता है, वैसे ही भगवान्‌का चक्र उनके पीछे - पीछे दौड़ने लगा । जब दुर्वासाजीने देखा कि चक्र तो मेरे पीछे लग गया है? तब सुमेरु पर्वतकी गुफामें प्रवेश करनेके लिये वे उसी ओर दौड़ पड़े ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 50पृष्ठ 37

दुर्वासा जी दिशा, आकाश, पृथ्वी, अतल-वितल आदि नीचे के लोक, समुद्र, लोकपाल और उनके द्वारा सुरक्षित लोक एवं स्वर्ग तक पहुँचे; परन्तु जहाँ-जहाँ वे गए, वहीं-वहीं उन्होंने उस असह्य तेज वाले सुदर्शन चक्र को अपने पीछे लगा देखा। जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला, तब वे और भी डर गए। अपने लिये त्राण ढूँढ़ते हुए वे देवशिरोमणि ब्रह्माजी के पास पहुँचे और बोले— "ब्रह्माजी! आप स्वयम्भू हैं। भगवान् के इस तेजोमय चक्र से मेरी रक्षा कीजिये!"

श्रीरुद्र उवाच

वयं न तात प्रभवाम भूम्नि यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशाः ।
भवन्ति काले न भवन्ति हीदृशाः सहस्रशो यत्र वयं भ्रमामः ॥

श्रीमहादेवजीने कहा — ' दुर्वासाजी! जिन अनन्त परमेश्वरमें ब्रह्मा- जैसे जीव और उनके उपाधिभूत कोश, इस ब्रह्माण्डके समान ही अनेकों ब्रह्माण्ड समयपर पैदा होते हैं और समय आनेपर फिर उनका पता भी नहीं चलता, जिनमें हमारे जैसे हजारों चक्कर काटते रहते हैं— उन प्रभुके सम्बन्धमें हम कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 56पृष्ठ 38

परन्तु ब्रह्माजी ने कहा— "जब मेरी दो परार्ध की आयु समाप्त होगी और कालस्वरूप भगवान् अपनी यह सृष्टिलीला समेटने लगेंगे और इस जगत् को जलाना चाहेंगे, उस समय उनके भ्रूभङ्ग मात्र से यह सारा संसार और मेरा यह लोक भी लीन हो जाएगा। मैं, शङ्करजी, दक्ष भृगु आदि प्रजापति, भूतेश्वर, देवेश्वर आदि सब जिनके बनाये नियमों में बँधे हैं तथा जिनकी आज्ञा शिरोधार्य करके हम लोग संसार का हित करते हैं, उनके भक्त के द्रोही को बचाने के लिये हम समर्थ नहीं हैं।"

प्रत्याख्यातो विरिंचेन विष्णुचक्रोपतापितः ।
दुर्वासाः शरणं यातः शर्वं कैलासवासिनम् ॥

जब ब्रह्माजीने इस प्रकार दुर्वासाको निराश कर दिया, तब भगवान्‌के चक्रसे संतप्त होकर वे कैलासवासी भगवान् शंकरकी शरणमें गये ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 55पृष्ठ 38

जब ब्रह्माजी ने इस प्रकार दुर्वासा को निराश कर दिया, तब चक्र से सन्तप्त होकर वे कैलासवासी भगवान् शङ्कर की शरण में गए। महादेव ने कहा— "दुर्वासा जी! जिन अनन्त परमेश्वर में ब्रह्मा जैसे जीव और उनके उपाधिभूत कोश, इस ब्रह्माण्ड के समान ही अनेकों ब्रह्माण्ड समय पर पैदा होते हैं और समय आने पर फिर उनका पता भी नहीं चलता, जिनमें हमारे जैसे हजारों चक्कर काटते रहते हैं— उन प्रभु के सम्बन्ध में हम कुछ भी करने की सामर्थ्य नहीं रखते। मैं, सनत्कुमार, नारद, ब्रह्मा, कपिलदेव, अपान्तरतम, देवल, धर्म, आसुरि तथा मरीचि आदि अन्य सर्वज्ञ सिद्धेश्वर— हम सभी भगवान् की माया को नहीं जान सकते, क्योंकि हम उसी माया के घेरे में हैं। यह चक्र उन विश्वेश्वर का शस्त्र है। यह हम लोगों के लिये असह्य है। तुम उन्हीं की शरण में जाओ। वे भगवान् ही तुम्हारा मङ्गल करेंगे।"

श्रीरुद्र उवाच

मरीचिप्रमुखाश्चान्ये सिद्धेशाः पारदर्शनाः ।
विदाम न वयं सर्वे यन्मायां माययाऽऽवृताः ॥

मैं, सनत्कुमार, नारद, भगवान् ब्रह्मा, कपिलदेव, अपान्तरतम, देवल, धर्म, आसुरि तथा मरीचि आदि दूसरे सर्वज्ञ सिद्धेश्वर– ये हम सभी भगवान्‌की मायाको नहीं जान सकते । क्योंकि हम उसी मायाके घेरेमें हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 58पृष्ठ 38

वहाँ से भी निराश होकर दुर्वासा भगवान् के परमधाम वैकुण्ठ पहुँचे, जहाँ लक्ष्मीपति भगवान् लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं। दुर्वासा जी भगवान् के चक्र की आग से जल रहे थे। वे काँपते हुए भगवान् के चरणों में गिर पड़े और बोले— "हे अच्युत! हे अनन्त! आप सन्तों के एकमात्र वाञ्छनीय हैं। प्रभो! विश्व के जीवनदाता! मैं अपराधी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये। आपका परम प्रभाव न जानने के कारण ही मैंने आपके प्यारे भक्त का अपराध किया है। प्रभो! आप मुझे उससे बचाइये। आपके तो नाम का ही उच्चारण करने से नारकी जीव भी मुक्त हो जाता है!"

साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् ।
मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥

दुर्वासाजी! मैं आपसे और क्या कहूँ, मेरे प्रेमी भक्त तो मेरे हृदय हैं और उन प्रेमी भक्तोंका हृदय स्वयं मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते तथा मैं उनके अतिरिक्त औरकुछभी नहीं जानता ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 68पृष्ठ 40

श्रीभगवान् ने कहा— "दुर्वासा जी! मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ। मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है। मेरे सीधे-सादे सरल भक्तों ने मेरे हृदय को अपने हाथ में कर रखा है। भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे प्रेम करता हूँ। जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक— सबको छोड़कर केवल मेरी शरण में आ गये हैं, उन्हें छोड़ने का सङ्कल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ? जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्य से सदाचारी पति को वश में कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदय को प्रेम-बन्धन से बाँध रखने वाले समदर्शी साधु भक्त मुझे अपने वश में कर लेते हैं। मेरे अनन्य प्रेमी भक्त सेवा से ही अपने को परिपूर्ण—कृतकृत्य मानते हैं; जब उन्हें मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं, तब वे उन्हें भी स्वीकार नहीं करना चाहते। दुर्वासा जी! सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ। जिसका अनिष्ट करने की चेष्टा आपने की है, आप उसी के पास जाइये। निरपराध साधुओं का अनिष्ट करने वाले का ही अमङ्गल होता है। ब्राह्मणों के लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणकारी है, परन्तु यदि वे उद्दण्ड और अन्यायी हो जायें, तो वे ही उल्टा फल देने लगते हैं। आपका कल्याण हो! आप राजा अम्बरीष के पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये। तब आपको शान्ति मिलेगी।"

ब्रह्मंस्तद् गच्छ भद्रं ते नाभागतनयं नृपम् ।
क्षमापय महाभागं ततः शान्तिर्भविष्यति ॥

दुर्वासाजी! आपका कल्याण हो । आप नाभाग- नन्दन परम भाग्यशाली राजा अम्बरीषके पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये । तब आपको शान्ति मिलेगी ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 71पृष्ठ 40

जब भगवान् ने इस प्रकार आज्ञा दी, तब सुदर्शन चक्र की ज्वाला से जलते हुए दुर्वासा लौटकर राजा अम्बरीष के पास आए और उन्होंने अत्यन्त दुःखी होकर राजा के पैर पकड़ लिए। दुर्वासा जी की यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकड़ने से लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान् के चक्र की स्तुति करने लगे। उनका हृदय दयावश पीड़ित हो रहा था।

श्रीशुक उवाच

एवं भगवताऽऽदिष्टो दुर्वासाश्चक्रतापितः ।
अम्बरीषमुपावृत्य तत्पादौ दुःखितोऽग्रहीत् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 1पृष्ठ 42

अम्बरीष ने कहा— "प्रभो सुदर्शन! आप अग्निस्वरूप हैं। आप ही परम समर्थ सूर्य हैं। समस्त नक्षत्रमण्डल के अधिपति चन्द्रमा भी आपके स्वरूप हैं। जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, पञ्चतन्मात्रा और सम्पूर्ण इन्द्रियों के रूप में भी आप ही हैं। आप ही धर्म हैं, मधुर एवं सत्य वाणी हैं; आप ही समस्त यज्ञों के अधिपति और स्वयं यज्ञ भी हैं। आप समस्त लोकों के रक्षक एवं सर्वलोकस्वरूप भी हैं। आप परमपुरुष परमात्मा के श्रेष्ठ तेज हैं। आप समस्त धर्मों की मर्यादा के रक्षक हैं। अधर्म करने वाले असुरों को भस्म करने के लिये आप साक्षात् अग्नि हैं। आपकी गति मन के वेग के समान है और आपके कर्म अद्भुत हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। गदाधारी भगवान् ने दुष्टों के नाश के लिये ही आपको नियुक्त किया है। कृपा करके हमारे कुल के भाग्योदय के लिये दुर्वासा जी का कल्याण कीजिये। यदि मैंने कोई दान या यज्ञ किया हो, अथवा हमारे वंश के लोग ब्राह्मणों को ही आराध्य समझते रहे हों, तो उनकी जलन मिट जाय। यदि मैंने समस्त प्राणियों के आत्मा के रूप में भगवान् को देखा है और वे मुझ पर प्रसन्न हैं, तो दुर्वासा जी की जलन मिट जाय।"

मुनिस्तद्दर्शनाकांक्षो राजाऽब्भक्षो बभूव ह ॥

परीक्षित्! जब सुदर्शन चक्र से भयभीत होकर दुर्वासाजी भगे थे, तबसे लेकर उनके लौटनेतक एक वर्षका समय बीत गया । इतने दिनोंतक राजा अम्बरीष उनके दर्शनकी आकांक्षासे केवल जल पीकर ही रहे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 23पृष्ठ 46

जब राजा अम्बरीष ने इस प्रकार स्तुति की, तब चक्र शान्त हो गया। जब दुर्वासा जी चक्र की आग से मुक्त होकर स्वस्थ हुए, तो उन्होंने राजा अम्बरीष को अनेकानेक आशीर्वाद देते हुए कहा— "धन्य है! आज मैंने भगवान् के प्रेमी भक्तों का महत्त्व देखा। राजन्! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मङ्गल कामना कर रहे हैं। आपका हृदय करुणाभाव से परिपूर्ण है। आपने मेरे अपराध को भुलाकर मेरे प्राणों की रक्षा की है!"

दुर्वासा उवाच

अहो अनन्तदासानां महत्त्वं दृष्टमद्य मे ।
कृतागसोऽपि यद् राजन् मंगलानि समीहसे ॥

दुर्वासाजीने कहा — धन्य है! आज मैंने भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका महत्त्व देखा । राजन्! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मंगल कामना ही कर रहे हैं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 14पृष्ठ 44

राजा अम्बरीष ने एक वर्ष तक दुर्वासा जी के दर्शन की प्रतीक्षा में केवल जल पीकर अपना समय व्यतीत किया था। अब उन्होंने आदर से अतिथिके योग्य समस्त भोजन-सामग्री लाकर दुर्वासा जी का विधिपूर्वक सत्कार किया और उन्हें भोजन कराया। तृप्त होकर दुर्वासा जी ने कहा— "राजन्! अब आप भी भोजन कीजिये। आपके दर्शन, स्पर्श और आतिथ्य से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। स्वर्ग की देवाङ्गनाएँ आपके इस उज्ज्वल चरित्र का गान करेंगी और यह पृथ्वी आपकी पुण्यमयी कीर्तिका सङ्कीर्तन करती रहेगी।"

प्रशशंस तमुर्वीशं युञ्जानः परमाशिषः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 13पृष्ठ 44

जब दुर्वासा जी चले गये, तब राजा अम्बरीष ने अपने भोजन से बचे हुए अत्यन्त पवित्र अन्न का सेवन किया। उन्होंने इस पूरी घटना को स्वयं के कारण नहीं, बल्कि भगवान् की महिमा समझा। राजा अम्बरीष ने अपने ही समान भक्त पुत्रों पर राज्य का भार छोड़ दिया और स्वयं वन में चले गये। वहाँ वे बड़ी धीरता के साथ आत्मस्वरूप भगवान् में अपना मन लगाकर संसार से मुक्त हो गये।

चरणावुपसंगृह्य प्रसाद्य समभोजयत् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · श्लोक 18पृष्ठ 45

In English

The Lineage of Manu and the Stories of His Descendants

This text traces the lineage of Vaivasvata Manu through his many sons, including the stories of Rishadha, Sharyati, and Kakudmi. It details how Rishadha lost his status after accidentally killing a cow, how Chyavana regained his youth through the Ashwini Kumaras, and how Kakudmi offered his daughter Revati to Balarama.

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  • Why did vashistha curse prishadh?
  • How did chyavana become young again?
  • Who was revati's husband?
  • How did nabha receive wealth from rudra?

Also written: Mbarishacharita, Mbarisha, Prishadha, Vasishtha, Nabhaga, Rudra, Ambarisha, Sharyati, Sukanya, Chyavana, Durvasa, Brahma, Shankara, ऽम्बरीषचरित