श्रीगणेशाय नमः।

सौभर्याख्यान : विषयों के भोग और तपस्या के बीच सन्तुलन कैसे स्थापित करें?

तृष्णा का त्याग और आत्मबोध

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · पृष्ठ 47–71

545 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

श्रीशुकदेव ने परीक्षित से कहा

राजा को धर्म और संयम का बोध कराने हेतु

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित से कहा— हे राजन! अम्बरीष के तीन पुत्र थे— विरूप, केतुमान् और शम्भु। विरूप के वंश में पृषदश्व और उसका पुत्र रथीतर हुआ, जो सन्तानहीन था। वंश की रक्षा हेतु उसने अङ्गिरा ऋषि से प्रार्थना की, जिससे उसकी पत्नी से अनेक पुत्र उत्पन्न हुए। यद्यपि वे उसकी अपनी सन्तान थे, किन्तु उनका गोत्र आङ्गिरस कहलाया क्योंकि वे क्षत्रोपेत ब्राह्मण थे।

श्रीशुक उवाच

विरूपः केतुमाञ्छम्भुरम्बरीषसुतास्त्रयः ।
विरूपात् पृषदश्वोऽभूत् तत्पुत्रस्तु रथीतरः ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अम्बरीषके तीन पुत्र थे - विरूप, केतुमान् और शम्भु । विरूपसे पृषदश्व और उसका पुत्र रथीतर हुआ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · श्लोक 1पृष्ठ 48

इक्ष्वाकु के वंश की कथा भी अत्यन्त विलक्षण है। मनुजी के छींकने से इक्ष्वाकु का जन्म हुआ और उनके सौ पुत्र हुए, जिनमें विकुक्षि सबसे बड़े थे। एक बार जब विकुक्षि ने श्राद्ध के समय मांस ग्रहण किया, तो गुरुजी ने उसे रोकते हुए कहा— "यह मांस दूषित है और श्राद्ध के अयोग्य है।" जब राजा इक्ष्वाकु को अपने पुत्र की इस मर्यादा-भङ्ग वाली करतूत का पता चला, तो उन्होंने क्रोधवश विकुक्षि को अपने देश से निकाल दिया। तदनन्तर राजा ने वसिष्ठ मुनि से ज्ञान की चर्चा की और योग द्वारा शरीर त्याग कर परमपद प्राप्त किया। विकुक्षि ने पुनः राजधानी लौटकर शासन सम्भाला और बड़े यज्ञों द्वारा भगवान की आराधना कर संसार में 'शशाद' के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनके वंश में पुरञ्जय हुए, जिन्होंने दैत्यों का विनाश कर इन्द्र को उनका धन और ऐश्वर्य लौटा दिया। इसी कारण उन्हें 'पुरञ्जय', 'इन्द्रवाह' और 'ककुत्स्थ' जैसे नामों से जाना गया।

स तु विप्रेण संवादं जापकेन समाचरन् ।
त्यक्त्वा कलेवरं योगी स तेनावाप यत् परम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · श्लोक 10पृष्ठ 49

उसी वंश में युवनाश्व के पुत्र मान्धाता थे। सूर्य के उदय और अस्त होने वाले समस्त भूभाग पर मान्धाता का अधिकार था। एक समय सौभरि ऋषि राजा मान्धाता के पास पहुञ्चे और उनकी पचास कन्याओं में से एक कन्या माङ्गी। राजा ने बड़ी चतुराई से उत्तर दिया— "ब्रह्मन्! कन्या स्वयंवर में आपको चुन ले, तो आप उसे ले लीजिये।" सौभरि ऋषि ने इस उत्तर को अपने वृद्ध होने का सङ्केत समझा। उन्होंने सोचा— 'राजा ने मुझे ऐसा सूखा जवाब दिया है क्योंकि मैं बूढ़ा हो गया हूँ, शरीर में झुर्रियाँ पड़ गई हैं और बाल पक गए हैं। अब कोई स्त्री मुझसे प्रेम नहीं कर सकती! अच्छी बात है! मैं स्वयं को इतना सुन्दर बनाऊँगा कि राजकन्याएं तो क्या, देवाङ्गनाएं भी मेरे लिए लालायित हो जाएंगी।'

पितर्युपरतेऽभ्येत्य विकुक्षिः पृथिवीमिमाम् ।
शासदीजे हरिं यज्ञैः शशाद इति विश्रुतः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · श्लोक 11पृष्ठ 49

सौभरि जी ने वैसा ही किया। उन्होंने पचास कन्याओं से विवाह किया और गृहस्थी के सुख में लीन हो गए। उनके वैभव को देखकर सप्तद्वीपवती के स्वामी मान्धाता भी आश्चर्यचकित रह गए। सुन्दर वस्त्राभूषण, सेवा करते स्त्री-पुरुष और पक्षियों का कलरव— सब कुछ अत्यन्त मनमोहक था। किन्तु सौभरि जी की यह तृष्णा घी की बूंदों से आग बुझाने जैसी थी; उन्हें विषयों में सन्तोष नहीं मिला। उन्हें ग्लानि होने लगी कि कैसे मत्स्यराज के सङ्ग होने से उनकी तपस्या नष्ट हो गई। उन्होंने विचार किया— 'मैं पहले एकान्त में तपस्या करता था, फिर जल में मछली का सङ्ग देख विवाह कर पचास पत्नियां लीं और अब पाञ्च हजार सन्तानें हैं। माया के गुणों ने मेरी बुद्धि हर ली है।'

पुरंजयस्तस्य सुत इन्द्रवाह इतीरितः ।
ककुत्स्थ इति चाप्युक्तः १ शृणु नामानि कर्मभिः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · श्लोक 12पृष्ठ 65

अन्ततः, सौभरि ऋषि ने विरक्त होकर सन्न्यास ले लिया और वन की यात्रा पर निकल पड़े। उनके पीछे-पीछे उनकी पत्नियां भी चल दीं। वन में जाकर उन्होंने परम संयमी होकर घोर तपस्या की और अपने शरीर को सुखा दिया। अन्त में उन्होंने आहवनीय आदि अग्नियों के साथ स्वयं को परमात्मा में लीन कर दिया। जब उनकी पत्नियों ने उनके इस आध्यात्मिक उत्कर्ष को देखा, तो वे भी ज्वालाओं के शान्त अग्नि में लीन होने जैसी— उन्हीं के प्रभाव से सती होकर उन्हीं की गति को प्राप्त हुईं।

In English

The Lineages of Ambarisha, Ikshvaku, and Saubhari

The text describes the lineage of Virupa through the help of Angira Rishi, the exile of Vikukshi from the Ikshvaku dynasty, and the life of Saubhari Rishi. Saubhari Rishi leaves his many wives to perform intense asceticism in the forest before merging into the supreme reality.

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  • How did virupa's lineage continue through angira rishi?
  • Why was vikukshi exiled by king ikshvaku?
  • What happened to saubhari rishi and his wives at the end of his life?

Also written: Saubharyakhyana, Saubharya, Ikshvaku, Vikukshi, Puranjaya, Yuvanashva, Saubhari, Bindumati, Matsyaraja, Mandhata, सौभर्याख्यान