श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 391–400

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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एवमुक्ता तु हंसेन दमयन्ती विशाम्पते ॥ ३१ ॥

अब्रवीत् तत्र तं हंसं त्वमप्येवं नले वद ।

तथेत्युक्त्वाण्डजः कन्यां विदर्भस्य विशाम्पते ।

पुनरागम्य निषधान् नले सर्वं न्यवेदयत् ॥ ३२ ॥

राजन्! हंसके इस प्रकार कहनेपर दमयन्तीने उससे कहा – 'पक्षिराज! तुम नलके निकट भी ऐसी ही बातें कहना' । राजन्! विदर्भराजकुमारी दमयन्तीसे ' तथास्तु ' कहकर वह हंस पुनः निषधदेशमें आया और उसने नलसे सब बातें निवेदन कीं ॥ ३१-३२ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि हंसदमयन्तीसंवादे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें हंसदमयन्तीसंवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

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चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः स्वर्गमें नारद और इन्द्रकी बातचीत, दमयन्तीके स्वयंवरके लिये राजाओं तथा लोकपालोंका प्रस्थान बृहदश्वउवाच

दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वचो हंसस्य भारत ।

ततः प्रभृति न स्वस्था नलं प्रति बभूव सा ॥१ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं- भारत! दमयन्तीने जबसे हंसकी बातें सुनीं, तबसे राजा नलके प्रति अनुरक्त हो जानेके कारण वह अस्वस्थ रहने लगी ॥ १ ॥

ततश्चिन्तापरा दीना विवर्णवदना कृशा ।

बभूव दमयन्ती तु निःश्वासपरमा तदा ॥ २ ॥

तदनन्तर उसके मनमें सदा चिन्ता बनी रहती थी । स्वभावमें दैन्य आ गया । चेहरेका रंग फीका पड़ गया और दमयन्ती दिन- दिन दुबली होने लगी । उस समय वह प्रायः लंबी साँसें खींचती रहती थी ॥ २ ॥

ऊर्ध्वदृष्टिर्ध्यानपरा बभूवोन्मत्तदर्शना ।

पाण्डुवर्णा क्षणेनाथ हृच्छयाविष्टचेतना ॥ ३ ॥

ऊपरकी ओर निहारती हुई सदा नलके ध्यानमें परायण रहती थी । देखनेमें उन्मत्त - सी जान पड़ती थी । उसका शरीर पाण्डुवर्णका हो गया । कामवेदनाकी अधिकतासे उसकी चेतना क्षण- क्षणमें विलुप्त सी हो जाती थी ॥ ३ ॥

न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् ।

न नक्तं न दिवा शेते हाहेति रुदती पुनः ॥ ४ ॥

उसकी शय्या, आसन तथा भोग- सामग्रियोंमें कहीं भी प्रीति नहीं होती थी । वह न तो

रातमें सोती और न दिनमें ही । बारंबार ' हाय - हाय' करके रोती ही रहती थी ॥ ४ ॥

तामस्वस्थां तदाकारां सख्यस्ता जज्ञुरिङ्गितैः ।

ततो विदर्भपतये दमयन्त्याः सखीजनः ॥ ५ ॥

न्यवेदयत् तामस्वस्थां दमयन्तीं नरेश्वरे ।

तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भीमो दमयन्तीं सखीगणात् ॥ ६ ॥

चिन्तयामास तत् कार्यं सुमहत् स्वां सुतां प्रति ।

किमर्थं दुहिता मेऽद्य नातिस्वस्थेव लक्ष्यते ॥ ७ ॥

उसकी वैसी आकृति और अस्वस्थ अवस्थाका क्या कारण है, यह सखियोंने संकेतसे जान लिया । तदनन्तर दमयन्तीकी सखियोंने विदर्भनरेशको उसकी उस अस्वस्थ अवस्थाके

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विषयमें सूचना दी । सखियोंके मुखसे दमयन्तीके विषयमें वैसी बात सुनकर राजा भीमने बहुत सोचा- विचारा, परंतु अपनी पुत्रीके लिये कोई विशेष महत्त्वपूर्ण कार्य उन्हें नहीं सूझ पड़ा । वे सोचने लगे कि ' क्यों मेरी पुत्री आजकल स्वस्थ नहीं दिखायी देती है? ' ॥ ५— ७ ॥

स समीक्ष्य महीपालः स्वां सुतां प्राप्तयौवनाम् ।

अपश्यदात्मना कार्यं दमयन्त्याः स्वयंवरम् ॥ ८ ॥

राजाने बहुत सोचने - विचारनेके बाद यह निश्चय किया कि मेरी पुत्री अब युवावस्थामें प्रवेश कर चुकी, अतः दमयन्तीके लिये स्वयंवर रचाना ही उन्हें अपना विशेष कर्तव्य दिखायी दिया ॥ ८ ॥

स संनिमन्त्रयामास महीपालान् विशाम्पतिः ।

एषोऽनुभूयतां वीराः स्वयंवर इति प्रभो ॥ ९ ॥

राजन्! विदर्भनरेशने सब राजाओंको इस प्रकार निमन्त्रित किया— 'वीरो! मेरे यहाँ

कन्याका स्वयंवर है । आपलोग पधारकर इस उत्सवका आनन्द लें ' ॥ ९ ॥

श्रुत्वा तु पार्थिवाः सर्वे दमयन्त्याः स्वयंवरम् ।

अभिजग्मुस्ततो भीमं राजानो भीमशासनात् ॥ १० ॥

हस्त्यश्वरथघोषेण पूरयन्तो वसुन्धराम् ।

विचित्रमाल्याभरणैर्बलैर्दृश्यैः स्वलंकृतैः ॥ ११ ॥

दमयन्तीका स्वयंवर होने जा रहा है, यह सुनकर सभी नरेश विदर्भराज भीमके आदेशसे हाथी, घोड़ों तथा रथोंकी तुमुल ध्वनिसे पृथ्वीको गुँजाते हुए उनकी राजधानीमें गये । उस समय उनके साथ विचित्र माला एवं आभूषणोंसे विभूषित बहुत - से सैनिक देखे जा रहे थे ॥ १०-११ ॥

तेषां भीमो महाबाहुः पार्थिवानां महात्मनाम् ।

यथार्हमकरोत् पूजां तेऽवसंस्तत्र पूजिताः ॥ १२ ॥

महाबाहु राजा भीमने वहाँ पधारे हुए उन महामना नरेशोंका यथायोग्य पूजन किया ।

तत्पश्चात् वे उनसे पूजित हो वहीं रहने लगे ॥ १२ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु सुराणामृषिसत्तमौ ।

अटमानौ महात्मानाविन्द्रलोकमितो गतौ ॥ १३ ॥

नारदः पर्वतश्चैव महाप्राज्ञौ महाव्रतौ ।

देवराजस्य भवनं विविशाते सुपूजितौ ॥ १४ ॥

इसी समय देवर्षिप्रवर महान् व्रतधारी महाप्राज्ञ नारद और पर्वत दोनों महात्मा इधरसे घूमते हुए इन्द्रलोकमें गये । वहाँ उन्होंने देवराजके भवनमें प्रवेश किया । उस भवनमें उनका विशेष आदर- सत्कार एवं पूजन किया गया ॥ १३-१४ ॥ तावर्चयित्वा मघवा ततः कुशलमव्ययम् ।

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पप्रच्छानामयं चापि तयोः सर्वगतं विभुः ॥ १५ ॥

उन दोनोंकी पूजा करके भगवान् इन्द्रने उनसे उन दोनोंके तथा सम्पूर्ण जगत्के कुशल-मंगल एवं स्वस्थताका समाचार पूछा ॥ १५ ॥

नारद उवाच

आवयोः कुशलं देव सर्वत्रगतमीश्वर ।

लोके च मघवन् कृत्स्ने नृपाः कुशलिनो विभो ॥ १६ ॥

तब नारदजीने कहा – प्रभो! देवेश्वर! हमलोगोंकी सर्वत्र कुशल है और समस्त लोकमें भी राजालोग सकुशल हैं ॥ १६ ॥

बृहदश्वउवाच

नारदस्य वचः श्रुत्वा पप्रच्छ बलवृत्रहा ।

धर्मज्ञाः पृथिवीपालास्त्यक्तजीवितयोधिनः ॥ १७ ॥

शस्त्रेण निधनं काले ये गच्छन्त्यपराङ्मुखाः ।

अयं लोकोऽक्षयस्तेषां यथैव मम कामधुक् ॥ १८ ॥

बृहदश्व कहते हैं - राजन्! नारदकी बात सुनकर बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रने उनसे पूछा — ' मुने! जो धर्मज्ञ भूपाल अपने प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते हैं और पीठ न दिखाकर लड़ते समय किसी शस्त्रके आघातसे मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनके लिये हमारा यह स्वर्गलोक अक्षय हो जाता है और मेरी ही तरह उन्हें भी यह मनोवांछित भोग प्रदान करता है ॥ १७-१८ ॥

क्व नु ते क्षत्रियाः शूरा न हि पश्यामि तानहम् ।

आगच्छतो महीपालान् दयितानतिथीन् मम ॥ १ ९ ॥

एवमुक्तस्तु शक्रेण नारदः प्रत्यभाषत । ‘ वे शूरवीर क्षत्रिय कहाँ हैं? अपने उन प्रिय अतिथियोंको आजकल मैं यहाँ आते नहीं देख रहा हूँ ' इन्द्रके ऐसा पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया ॥ १ ९ ३ ॥ नारद उवाच शृणु मे मघवन् येन न दृश्यन्ते महीक्षितः ॥ २० ॥

विदर्भराज्ञो दुहिता दमयन्तीति विश्रुता रूपेण समतिक्रान्ता पृथिव्यां सर्वयोषितः ॥ २१ ॥

नारदजी बोले – मघवन्! मैं वह कारण बताता हूँ, जिससे राजालोग आजकल यहाँ नहीं दिखायी देते, सुनिये । विदर्भनरेश भीमके यहाँ दमयन्ती नामसे प्रसिद्ध एक कन्या उत्पन्न हुई है, जो मनोहर रूप- सौन्दर्यमें पृथ्वीकी सम्पूर्ण युवतियोंको लाँघ गयी है ॥ २०-२१ ॥

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तस्याः स्वयंवरः शक्र भविता न चिरादिव ।

तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥ २२ ॥

इन्द्र! अब शीघ्र ही उसका स्वयंवर होनेवाला है, उसीमें सब राजा तथा राजकुमार जा रहे हैं ॥ २२ ॥

तां रत्नभूतां लोकस्य प्रार्थयन्तो महीक्षितः ।

काङ्क्षन्ति स्म विशेषेण बलवृत्रनिषूदन ॥ २३ ॥

बल और वृत्रासुरके नाशक इन्द्र! दमयन्ती सम्पूर्ण जगत्का एक अद्भुत रत्न है ।

इसलिये सब राजा उसे पानेकी विशेष अभिलाषा रखते हैं ॥ २३ ॥

एतस्मिन् कथ्यमाने तु लोकपालाश्च साग्निकाः ।

आजग्मुर्देवराजस्य समीपममरोत्तमाः ॥ २४ ॥

यह बात हो ही रही थी कि देवश्रेष्ठ लोकपालगण अग्निसहित देवराजके समीप आये ॥ २४ ॥

ततस्ते शुश्रुवुः सर्वे नारदस्य वचो महत् ।

श्रुत्वैव चाब्रुवन् हृष्टा गच्छामो वयमप्युत ॥ २५ ॥

तदनन्तर उन सबने नारदजीकी ये विशिष्ट बातें सुनीं । सुनते ही वे सब--के -सब हर्षोल्लाससे परिपूर्ण हो बोले — ' हमलोग भी उस स्वयंवरमें चलें ' ॥ २५ ॥

ततः सर्वे महाराज सगणाः सहवाहनाः ।

विदर्भानभिजग्मुस्ते यतः सर्वे महीक्षितः ॥ २६ ॥

महाराज! तदनन्तर वे सब देवता अपने सेवकगणों और वाहनोंके साथ विदर्भदेशमें गये, जहाँ समस्त भूपाल एकत्र हुए थे ॥ २६ ॥

नलोऽपि राजा कौन्तेय श्रुत्वा राज्ञां समागमम् ।

अभ्यगच्छददीनात्मा दमयन्तीमनुव्रतः ॥ २७ ॥

कुन्तीनन्दन! उदारहृदय राजा नल भी विदर्भनगरमें समस्त राजाओंका समागम सुनकर दमयन्तीमें अनुरक्त हो वहाँ गये ॥ २७ ॥

अथ देवाः पथि नलं ददृशुर्भूतले स्थितम् ।

साक्षादिव स्थितं मूर्त्या मन्मथं रूपसम्पदा ॥ २८ ॥

उस समय देवताओंने पृथ्वीपर मार्गमें खड़े हुए राजा नलको देखा। रूप- सम्पत्तिकी दृष्टिसे वे साक्षात् मूर्तिमान् कामदेव- से जान पड़ते थे ॥ २८ ॥

तं दृष्ट्वा लोकपालास्ते भ्राजमानं यथा रविम् ।

तस्थुर्विगतसंकल्पा विस्मिता रूपसम्पदा ॥ २ ९ ॥

सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले महाराज नलको देखकर वे लोकपाल उनके रूप-वैभवसे चकित हो दमयन्तीको पानेका संकल्प छोड़ बैठे ॥ २ ९ ॥ ततोऽन्तरिक्षे विष्टभ्य विमानानि दिवौकसः ।

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अब्रुवन् नैषधं राजन्नवतीर्य नभस्तलात् ॥ ३० ॥

राजन्! तब उन देवताओंने अपने विमानोंको आकाशमें रोक दिया और वहाँसे नीचे उतरकर निषधनरेशसे कहा- ॥ ३० ॥

भो भो निषधराजेन्द्र नल सत्यव्रतो भवान् ।

अस्माकं कुरु साहाय्यं दूतो भव नरोत्तम ॥ ३१ ॥

‘ निषधदेशके महाराज नरश्रेष्ठ नल! आप सत्य व्रती हैं, हमलोगोंकी सहायता कीजिये ।

हमारे दूत बन जाइये ' ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि इन्द्रनारदसंवादे चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें इन्द्रनारदसंवादविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना बृहदश्व उवाच

तेभ्यः प्रतिज्ञाय नलः करिष्य इति भारत ।

अथैतान् परिपप्रच्छ कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥ १ ॥

के वै भवन्तः कश्चासौ यस्याहं दूत ईप्सितः ।

किं च तद् वो मया कार्यं कथयध्वं यथातथम् ॥ २ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - भारत! देवताओंसे उनकी सहायता करनेकी प्रतिज्ञा करके राजा नलने हाथ जोड़ पास जाकर उनसे पूछा - ' आपलोग कौन हैं? और वह कौन व्यक्ति है, जिसके पास जानेके लिये आपने मुझे दूत बनानेकी इच्छा की है तथा आपलोगोंका वह कौन- सा कार्य है, जो मेरे द्वारा सम्पन्न होनेयोग्य है, यह ठीक -ठीक बताइये ’ ॥ १-२ ॥

एवमुक्तो नैषधेन मघवानभ्यभाषत ।

अमरान् वै निबोधास्मान् दमयन्त्यर्थमागतान् ॥ ३ ॥

निषधराज नलके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रने कहा- ' भूपाल! तुम हमें देवता समझो, हम दमयन्तीको प्राप्त करनेके लिये यहाँ आये हैं' ॥ ३ ॥

अहमिन्द्रोऽयमग्निश्च तथैवायमपां पतिः ।

शरीरान्तकरो नृणां यमोऽयमपि पार्थिव ॥ ४ ॥

त्वं वै समागतानस्मान् दमयन्त्यै निवेदय ।

लोकपाला महेन्द्राद्याः समायान्ति दिदृक्षवः ॥ ५ ॥

' मैं इन्द्र हूँ, ये अग्निदेव हैं, ये जलके स्वामी वरुण और ये प्राणियोंके शरीरका नाश करनेवाले साक्षात् यमराज हैं । आप दमयन्तीके पास जाकर उसे हमारे आगमनकी सूचना दे दीजिये और कहिये— महेन्द्र आदि लोकपाल तुम्हें देखनेके लिये आ रहे हैं ॥ ४-५ ॥

प्राप्तुमिच्छन्ति देवास्त्वां शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ।

तेषामन्यतमं देवं पतित्वे वरयस्व ह ॥ ६ ॥

‘ इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम - ये देवतालोग तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं । तुम उनमेंसे किसी एक देवताको पतिरूपमें चुन लो ' ॥ ६ ॥

एवमुक्तः स शक्रेण नलः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।

एकार्थं समुपेतं मां न प्रेषयितुमर्हथ ॥ ७ ॥

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इन्द्रके ऐसा कहनेपर नल हाथ जोड़कर बोले— ' देवताओ! मेरा भी एकमात्र यही प्रयोजन है, जो आपलोगोंका है; अतः एक ही प्रयोजनके लिये आये हुए मुझे दूत बनाकर न भेजिये ' ॥ ७ ॥

कथं तु जातसंकल्पः स्त्रियमुत्सृजते पुमान् ।

परार्थमीदृशं वक्तुं तत् क्षमन्तु महेश्वराः ॥ ८ ॥

‘ देवेश्वरो! जिसके मनमें किसी स्त्रीको प्राप्त करनेका संकल्प हो गया है, वह पुरुष उसी स्त्रीको दूसरेके लिये कैसे छोड़ सकता है? अतः आपलोग ऐसी बात कहनेके लिये मुझे क्षमा करें ' ॥ ८ ॥

देवा ऊचुः

करिष्य इति संश्रुत्य पूर्वमस्मासु नैषध ।

न करिष्यसि कस्मात् त्वं व्रज नैषध मा चिरम् ॥ ९ ॥

देवताओंने कहा – निषधनरेश! तुम पहले हमलोगों से हमारा कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रतिज्ञा कर चुके हो, फिर तुम उस प्रतिज्ञाका पालन कैसे नहीं करोगे? इसलिये निषधराज! तुम शीघ्र जाओ; देर न करो ॥ ९ ॥

बृहदश्वउवाच

एवमुक्तः स देवैस्तैर्नैषधः पुनरब्रवीत् ।

सुरक्षितानि वेश्मानि प्रवेष्टुं कथमुत्सहे ॥ १० ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं -राजन्! उन देवताओंके ऐसा कहनेपर निषधनरेशने पुनः उनसे पूछा — ‘ विदर्भराजके सभी भवन ( पहरेदारोंसे ) सुरक्षित हैं । मैं उनमें कैसे प्रवेश कर सकता हूँ?' ॥ १० ॥

प्रवेक्ष्यसीति तं शक्रः पुनरेवाभ्यभाषत ।

जगाम स तथेत्युक्त्वा दमयन्त्या निवेशनम् ॥ ११ ॥

तब इन्द्रने पुनः उत्तर दिया- ' तुम वहाँ प्रवेश कर सकोगे । ' तत्पश्चात् राजा नल ‘ तथास्तु ' कहकर दमयन्तीके महलमें गये ॥ ११ ॥

ददर्श तत्र वैदर्भी सखीगणसमावृताम् ।

देदीप्यमानां वपुषा श्रिया च वरवर्णिनीम् ॥ १२ ॥

वहाँ उन्होंने देखा, सखियोंसे घिरी हुई परम सुन्दरी विदर्भराजकुमारी दमयन्ती अपने सुन्दर शरीर और दिव्य कान्तिसे अत्यन्त उद्भासित हो रही है ॥ १२ ॥

अतीवसुकुमाराङ्गीं तनुमध्यां सुलोचनाम् ।

आक्षिपन्तीमिव प्रभां शशिनः स्वेन तेजसा ॥ १३ ॥

उसके अंग परम सुकुमार हैं, कटिके ऊपरका भाग अत्यन्त पतला है और नेत्र बड़े सुन्दर हैं एवं वह अपने तेजसे चन्द्रमाकी प्रभाको भी तिरस्कृत - सी कर रही है ॥ १३ ॥

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तस्य दृष्ट्वैव ववृधे कामस्तां चारुहासिनीम् ।

सत्यं चिकीर्षमाणस्तु धारयामास हृच्छयम् ॥ १४ ॥

उस मनोहर मुसकानवाली राजकुमारीको देखते ही नलके हृदयमें कामाग्नि प्रज्वलित हो उठी; तथापि अपनी प्रतिज्ञाको सत्य करनेकी इच्छासे उन्होंने उस कामवेदनाको मनमें ही रोक लिया ॥ १४ ॥

ततस्ता नैषधं दृष्ट्वा सम्भ्रान्ताः परमाङ्गनाः ।

आसनेभ्यः समुत्पेतुस्तेजसा तस्य धर्षिताः ॥ १५ ॥

निषधराजको वहाँ आये देख अन्तःपुरकी सारी सुन्दरी स्त्रियाँ चकित हो गयीं और उनके तेजसे तिरस्कृत हो अपने आसनोंसे उठकर खड़ी हो गयीं ॥ १५ ॥

प्रशशंसुश्च सुप्रीता नलं ता विस्मयान्विताः ।

न चैनमभ्यभाषन्त मनोभिस्त्वभ्यपूजयन् ॥ १६ ॥

अत्यन्त प्रसन्न और आश्चर्यचकित होकर उन सबने राजा नलके सौन्दर्यकी प्रशंसा की ।

उन्होंने उनसे वार्तालाप नहीं किया; परंतु मन- ही- मन उनका बड़ा आदर किया ॥ १६ ॥

अहो रूपमहो कान्तिरहो धैर्यं महात्मनः ।

कोऽयं देवोऽथवा यक्षो गन्धर्वो वा भविष्यति ॥ १७ ॥

वे सोचने लगीं — ‘ अहो! इनका रूप अद्भुत है, कान्ति बड़ी मनोहर है तथा इन महात्माका धैर्य भी अनूठा है । न जाने ये हैं कौन? सम्भव है, देवता, यक्ष अथवा गन्धर्व हों' ॥ १७ ॥

न तास्तं शक्नुवन्ति स्म व्याहर्तुमपि किंचन ।

तेजसा धर्षितास्तस्य लज्जावत्यो वराङ्गना ॥ १८ ॥

नलके तेजसे प्रतिहत हुई वे लजीली सुन्दरियाँ उनसे कुछ बोल भी न सकीं ॥ १८ ॥

अथैनं स्मयमानं तु स्मितपूर्वाभिभाषिणी ।

दमयन्ती नलं वीरमभ्यभाषत विस्मिता ॥ १ ९ ॥

तब मुसकराकर बातचीत करनेवाली दमयन्तीने विस्मित होकर मुसकराते हुए वीर नलसे इस प्रकार पूछा— ॥ १ ९ ॥

कस्त्वं सर्वानवद्याङ्ग मम हृच्छयवर्धन ।

प्राप्तोऽस्यमरवद् वीर ज्ञातुमिच्छामि तेऽनघ ॥ २० ॥

कथमागमनं चेह कथं चासि न लक्षितः ।

सुरक्षितं हि मे वेश्म राजा चैवोग्रशासनः ॥ २१ ॥

एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलस्तां प्रत्युवाच ह ।

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‘ आप कौन हैं? आपके सम्पूर्ण अंग निर्दोष एवं परम सुन्दर हैं । आप मेरे हृदयकी कामाग्निको बढ़ा रहे हैं । निष्पाप वीर! आप देवताओंके समान यहाँ आ पहुँचे हैं । मैं आपका परिचय पाना चाहती हूँ । आपका इस रनिवासमें आना कैसे सम्भव हुआ? आपको किसीने देखा कैसे नहीं? मेरा यह महल अत्यन्त सुरक्षित है और यहाँके राजाका शासन बड़ा कठोर है — वे अपराधियोंको बड़ा कठोर दण्ड देते हैं । ' विदर्भराजकुमारीके ऐसा पूछनेपर नलने इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २०-२१३ ॥ नल उवाच नलं मां विद्धि कल्याणि देवदूतमिहागतम् ॥ २२ ॥

देवास्त्वां प्राप्तुमिच्छन्ति शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ।

तेषामन्यतमं देवं पतिं वरय शोभने ॥। २३ ॥

नलने कहा — कल्याणि! तुम मुझे नल समझो । मैं देवताओंका दूत बनकर यहाँ आया हूँ । इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम देवता तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं । शोभने! तुम उनमेंसे किसी एकको अपना पति चुन लो ॥ २२-२३ ॥

तेषामेव प्रभावेण प्रविष्टोऽहमलक्षितः ।

प्रविशन्तं न मां कश्चिदपश्यन्नाप्यवारयत् ॥ २४ ॥

उन्हीं देवताओंके प्रभावसे मैं इस महलके भीतर आया हूँ और मुझे कोई देख न सका है । भीतर प्रवेश करते समय न तो किसीने मुझे देखा है और न रोका ही है ॥ २४ ॥

एतदर्थमहं भद्रे प्रेषितः सुरसत्तमैः ।

एतच्छ्रुत्वा शुभे बुद्धिं प्रकुरुष्व यथेच्छसि ॥ २५ ॥

भद्रे! इसीलिये श्रेष्ठ देवताओंने मुझे यहाँ भेजा है । शुभे! इसे सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा निश्चय करो ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलस्य देवदौत्ये पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलके देवदूत बनकर दमयन्तीके पास जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचपनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥