श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 401–410

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 401 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना बृहदश्वउवाच

सा नमस्कृत्य देवेभ्यः प्रहस्य नलमब्रवीत् ।

प्रणयस्व यथाश्रद्धं राजन् किं करवाणि ते ॥ १ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं -राजन्! दमयन्तीने अपनी श्रद्धाके अनुसार देवताओंको नमस्कार करके नलसे हँसकर कहा - ' महाराज! आप ही मेरा पाणिग्रहण कीजिये और बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥ १ ॥

अहं चैव हि यच्चान्यन्ममास्ति वसु किंचन ।

तत् सर्वं तव विश्रब्धं कुरु प्रणयमीश्वर ॥ २ ॥

‘ नरेश्वर! मैं तथा मेरा जो कुछ दूसरा धन है, वह सब आपका है । आप पूर्ण विश्वस्त होकर मेरे साथ विवाह कीजिये ॥ २ ॥

हंसानां वचनं यत् तु तन्मां दहति पार्थिव ।

त्वत्कृते हि मया वीर राजानः संनिपातिताः ॥ ३ ॥

' भूपाल! हंसोंकी जो बात मैंने सुनी ' वह ( मेरे हृदयमें कामाग्नि प्रज्वलित करके सदा ) मुझे दग्ध करती रहती है । वीर! आपहीको पानेके लिये मैंने यहाँ समस्त राजाओंका सम्मेलन कराया है ॥ ३ ॥

यदि त्वं भजमानां मां प्रत्याख्यास्यसि मानद ।

विषमग्निं जलं रज्जुमास्थास्ये तव कारणात् ॥ ४ ॥

‘ मानद! आपके चरणोंमें भक्ति रखनेवाली मुझ दासीको यदि आप स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं आपके ही कारण विष, अग्नि, जल अथवा फाँसीको निमित्त बनाकर अपना प्राण त्याग दूँगी ' ॥ ४ ॥

एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलस्तां प्रत्युवाच ह ।

तिष्ठत्सु लोकपालेषु कथं मानुषमिच्छसि ॥ ५ ॥

दमयन्तीके ऐसा कहनेपर राजा नलने उससे पूछा— ' ( तुम्हें पानेके लिये उत्सुक ) लोकपालोंके होते हुए तुम एक साधारण मनुष्यको कैसे पति बनाना चाहती हो? ॥ ५ ॥

येषामहं लोककृतामीश्वराणां महात्मनाम् ।

न पादरजसा तुल्यो मनस्ते तेषु वर्तताम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 402

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 402 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘जिन लोकस्रष्टा महामना ईश्वरोंके चरणोंकी धूलके समान भी मैं नहीं हूँ, उन्हींकी ओर तुम्हें मन लगाना चाहिये ॥ ६ ॥

विप्रियं ह्याचरन् मर्त्यो देवानां मृत्युमृच्छति ।

त्राहि मामनवद्याङ्गि वरयस्व सुरोत्तमान् ॥ ७ ॥

‘ निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! देवताओंके विरुद्ध चेष्टा करनेवाला मानव मृत्युको प्राप्त हो जाता है; अतः तुम मुझे बचाओ और उन श्रेष्ठ देवताओंका ही वरण करो ॥

विरजांसि च वासांसि दिव्याश्चित्राः स्रजस्तथा ।

भूषणानि तु मुख्यानि देवान् प्राप्य तु भुङ्क्ष्व वै ॥ ८ ॥

' तथा देवताओंको ही पाकर निर्मल वस्त्र, दिव्य एवं विचित्र पुष्पहार तथा मुख्य- मुख्य आभूषणोंका सुख भोगो ॥ ८ ॥

य इमां पृथिवीं कृत्स्नां संक्षिप्य ग्रसते पुनः ।

हुताशमीशं देवानां का तं न वरयेत् पतिम् ॥ ९ ॥

'जो इस सारी पृथ्वीको संक्षिप्त करके पुनः अपना ग्रास बना लेते हैं, उन देवेश्वर अग्निको कौन नारी अपना पति न चुनेगी? ॥ ९ ॥

यस्य दण्डभयात् सर्वे भूतग्रामाः समागताः ।

धर्ममेवानुरुध्यन्ति का तं न वरयेत् पतिम् ॥ १० ॥

‘ जिनके दण्डके भयसे संसारमें आये हुए समस्त प्राणिसमुदाय धर्मका ही पालन करते हैं, उन यमराजको कौन अपना पति नहीं वरेगी? ॥ १० ॥

धर्मात्मानं महात्मानं दैत्यदानवमर्दनम् ।

महेन्द्रं सर्वदेवानां का तं न वरयेत् पतिम् ॥ ११ ॥

' दैत्यों और दानवोंका मर्दन करनेवाले धर्मात्मा महामना सर्वदेवेश्वर महेन्द्रका कौन नारी पतिरूपमें वरण न करेगी? ॥ ११ ॥

क्रियतामविशङ्केन मनसा यदि मन्यसे ।

वरुणं लोकपालानां सुहृद्वाक्यमिदं शृणु ॥ १२ ॥

' यदि तुम ठीक समझती हो तो लोकपालोंमें प्रसिद्ध वरुणको निःशंक होकर अपना पति बनाओ । यह एक हितैषी सुहृद्वा वचन है, इसे सुनो ' ॥ १२ ॥

नैषधेनैवमुक्ता सा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् ।

समाप्लुताभ्यां नेत्राभ्यां शोकजेनाथ वारिणा ॥ १३ ॥

तदनन्तर निषधराज नलके ऐसा कहनेपर दमयन्ती शोकाश्रुओंसे भरे हुए नेत्रोंद्वारा देखती हुई इस प्रकार बोली- ॥ १३ ॥

देवेभ्योऽहें नमस्कृत्य सर्वेभ्यः पृथिवीपते ।

वृणे त्वामेव भर्तारं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १४ ॥

पृष्ठ 403

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 403 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ पृथ्वीपते! मैं सम्पूर्ण देवताओंको नमस्कार करके आपहीको अपना पति चुनती हूँ ।

यह मैंने आपसे सच्ची बात कही है ' ॥ १४ ॥

तामुवाच ततो राजा वेपमानां कृताञ्जलिम् ।

दौत्येनागत्य कल्याणि तथा भद्रे विधीयताम् ॥ १५ ॥

ऐसा कहकर दमयन्ती दोनों हाथ जोड़े थर - थर काँपने लगी । उस अवस्थामें राजा नलने उससे कहा — ‘ कल्याणि! मैं इस समय दूतका कार्य करनेके लिये आया हूँ; अतः भद्रे! इस समय वही करो जो मेरे स्वरूपके अनुरूप हो ॥ १५ ॥

कथं ह्यहं प्रतिश्रुत्य देवतानां विशेषतः ।

परार्थे यत्नमारभ्य कथं स्वार्थमिहोत्सहे ॥ १६ ॥

' मैं देवताओंके सामने प्रतिज्ञा करके विशेषतः परोपकारके लिये प्रयत्न आरम्भ करके अब यहाँ स्वार्थ- साधनके लिये कैसे उत्साहित हो सकता हूँ? ॥ १६ ॥

एष धर्मो यदि स्वार्थो ममापि भविता ततः ।

एवं स्वार्थं करिष्यामि तथा भद्रे विधीयताम् ॥ १७ ॥

' यदि यह धर्म सुरक्षित रहे तो उससे मेरे स्वार्थकी भी सिद्धि हो सकती है । भद्रे! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे मैं इस प्रकार धर्मयुक्त स्वार्थकी सिद्धि करूँ' ॥ १७ ॥

ततो बाष्पाकुलां वाचं दमयन्ती शुचिस्मिता ।

प्रत्याहरन्ती शनकैर्नलं राजानमब्रवीत् ॥ १८ ॥

उपायोऽयं मया दृष्टो निरपायो नरेश्वर ।

येन दोषो न भविता तव राजन् कथंचन ॥ १ ९ ॥

यह सुनकर पवित्र मुसकानवाली दमयन्ती राजा नलसे धीरे- धीरे अश्रुगद्गदवाणीमें बोली — ‘ नरेश्वर! मैंने उस निर्दोष उपायको ढूँढ़ निकाला है, राजन्! जिससे आपको किसी प्रकार दोष नहीं लगेगा ॥ १८-१९ ॥

त्वं चैव हि नरश्रेष्ठ देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः ।

आयान्तु सहिताः सर्वे मम यत्र स्वयंवरः ॥ २० ॥

‘ नरश्रेष्ठ! आप और इन्द्र आदि सब देवता एक ही साथ उस रंगमण्डपमें पधारें, जहाँ मेरा स्वयंवर होनेवाला है ॥ २० ॥

ततोऽहं लोकपालानां संनिधौ त्वां नरेश्वर ।

वरयिष्ये नरव्याघ्र नैवं दोषो भविष्यति ॥ २१ ॥

‘ नरेश्वर! नरव्याघ्र! तदनन्तर मैं उन लोकपालोंके समीप ही आपका वरण कर लूँगी ।

ऐसा करनेसे ( आपको कोई) दोष नहीं लगेगा' ॥ २१ ॥

एवमुक्तस्तु वैदर्भ्या नलो राजा विशाम्पते ।

आजगाम पुनस्तत्र यत्र देवाः समागताः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 404

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 404 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युधिष्ठिर! विदर्भराजकुमारीके ऐसा कहनेपर राजा नल पुनः वहीं लौट आये, जहाँ देवताओंसे उनकी भेंट हुई थी ॥ २२ ॥

तमपश्यंस्तथाऽऽयान्तं लोकपाला महेश्वराः दृष्ट्वा चैनं ततोऽपृच्छन् वृत्तान्तं सर्वमेव तम् ॥ २३ ॥

महान् शक्तिशाली लोकपालोंने इस प्रकार राजा नलको लौटते देखा और उन्हें देखकर उनसे सारा वृत्तान्त पूछा— ॥ २३ ॥

कच्चिद् दृष्टा त्वया राजन् दमयन्ती शुचिस्मिता ।

किमब्रवीच्च नः सर्वान् वद भूमिप तेऽनघ ॥ २४ ॥

‘ राजन्! क्या तुमने पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीको देखा है? पापरहित भूपाल! हम सब लोगोंको उसने क्या संदेश दिया, बताओ ' ॥ २४ ॥

नल उवाच

भवद्भिरहमादिष्टो दमयन्त्या निवेशनम् ।

प्रविष्टः सुमहाकक्षं दण्डिभिः स्थविरैर्वृतम् ॥ २५ ॥

नलने कहा— देवताओ! आपकी आज्ञा पाकर मैं दमयन्तीके महलमें गया । उसकी ड्योढ़ी विशाल थी और दण्डधारी बूढ़े रक्षक उसे घेरकर पहरा दे रहे थे ॥ २५ ॥

प्रविशन्तं च मां तत्र न कश्चिद् दृष्टवान् नरः ।

ऋते तां पार्थिवसुतां भवतामेव तेजसा ॥ २६ ॥

आपलोगोंके प्रभावसे उसमें प्रवेश करते समय मुझे वहाँ उस राजकन्या दमयन्तीके सिवा दूसरे किसी मनुष्यने नहीं देखा ॥ २६ ॥

सख्यश्चास्या मया दृष्टास्ताभिश्चाप्युपलक्षितः ।

विस्मिताश्चाभवन् सर्वा दृष्ट्वा मां विबुधेश्वराः ॥ २७ ॥

दमयन्तीकी सखियोंको भी मैंने देखा और उन सखियोंने भी मुझे देखा । देवेश्वरो! वे सब मुझे देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं ॥ २७ ॥

वर्ण्यमानेषु च मया भवत्सु रुचिरानना ।

मामेव गतसंकल्पा वृणीते सा सुरोत्तमाः ॥ २८ ॥

श्रेष्ठ देवताओ! जब मैं आपलोगोंके प्रभावका वर्णन करने लगा, उस समय सुमुखी दमयन्तीने मुझमें ही अपना मानसिक संकल्प रखकर मेरा ही वरण किया ॥ २८ ॥

अब्रवीच्चैव मां बाला आयान्तु सहिताः सुराः ।

त्वया सह नरव्याघ्र मम यत्र स्वयंवरः ॥ २ ९ ॥

उस बालाने मुझसे यह भी कहा कि ' नरव्याघ्र! सब देवता आपके साथ उस स्थानपर पधारें, जहाँ मेरा स्वयंवर होनेवाला है ॥ २९ ॥

तेषामहं संनिधौ त्वां वरयिष्यामि नैषध ।

पृष्ठ 405

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 405 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एवं तव महाबाहो दोषो न भवितेति ह ॥ ३० ॥

‘ निषधराज! मैं उन देवताओंके समीप ही आपका वरण कर लूँगी । महाबाहो! ऐसा होनेपर आपको दोष नहीं लगेगा' ॥ ३० ॥

एतावदेव विबुधा यथावृत्तमुपाहृतम् ।

मयाऽशेषे प्रमाणं तु भवन्तस्त्रिदशेश्वराः ॥ ३१ ॥

देवताओ! दमयन्तीके महलका इतना ही वृत्तान्त है, जिसे मैंने ठीक- ठीक निवेदन कर दिया । देवेश्वरगण! अब इस सम्पूर्ण विषयमें आप सब देवतालोग ही प्रमाण हैं, अर्थात् आप ही साक्षी हैं ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकर्तृकदेवदौत्ये षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकर्तृक देवदौत्यविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 406

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 406 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल- दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन बृहदश्वउवाच

अथ काले शुभे प्राप्ते तिथौ पुण्ये क्षणे तथा ।

आजुहाव महीपालान् भीमो राजा स्वयंवरे ॥ १ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! तदनन्तर शुभ समय, उत्तम तिथि तथा पुण्यदायक अवसर आनेपर राजा भीमने समस्त भूपालोंको स्वयंवरके लिये बुलाया ॥ १ ॥

तच्छ्रुत्वा पृथिवीपालाः सर्वे हृच्छयपीडिताः ।

त्वरिताः समुपाजग्मुर्दमयन्तीमभीप्सवः ॥ २ ॥

यह सुनकर सब भूपाल कामपीड़ित हो दमयन्तीको पानेकी इच्छासे तुरंत चल दिये ॥ २ ॥

कनकस्तम्भरुचिरं तोरणेन विराजितम् ।

विविशुस्ते नृपा रङ्गं महासिंहा इवाचलम् ॥ ३ ॥

रंगमण्डप सोनेके खम्भोंसे सुशोभित था । तोरणसे उसकी शोभा और बढ़ गयी थी । जैसे बड़े - बड़े सिंह पर्वतकी गुफामें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार उन नरेशोंने रंगमण्डपमें प्रवेश किया ॥ ३ ॥

पृष्ठ 407

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 407 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Gmmier नलकी पहचानके लिये दमयन्तीकी लोकपालोंसे प्रार्थना तत्रासनेषु विविधेष्वासीनाः पृथिवीक्षितः ।

पृष्ठ 408

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 408 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुरभिस्रग्धराः सर्वे प्रमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ ४ ॥

वहाँ सब भूपाल भिन्न - भिन्न आसनोंपर बैठ गये । सबने सुगन्धित फूलोंकी माला धारण कर रखी थी और सबके कानोंमें विशुद्ध मणिमय कुण्डल झिलमिला रहे थे ॥ ४ ॥

तां राजसमितिं पुण्यां नागैर्भोगवतीमिव ।

सम्पूर्णां पुरुषव्याघ्रैर्व्याघ्रैर्गिरिगुहामिव ॥ ५ ॥

व्याघ्रोंसे भरी हुई पर्वतकी गुफा तथा नागोंसे सुशोभित भोगवती पुरीकी भाँति वह पुण्यमयी राजसभा नरश्रेष्ठ भूपालोंसे भरी दिखायी देती थी ॥ ५ ॥

तत्र स्म पीना दृश्यन्ते बाहवः परिघोपमाः ।

आकारवर्णसुश्लक्ष्णाः पञ्चशीर्षा इवोरगाः ॥ ६ ॥

वहाँ भूमिपालोंकी ( पाँच अँगुलियोंसे युक्त ) परिघ - जैसी मोटी भुजाएँ आकार-प्रकार और रंगमें अत्यन्त सुन्दर तथा पाँच मस्तकवाले सर्पके समान दिखायी देती थीं ॥ ६ ॥

सुकेशान्तानि चारूणि सुनासाक्षिभ्रुवाणि च ।

मुखानि राज्ञां शोभन्ते नक्षत्राणि यथा दिवि ॥ ७ ॥

जैसे आकाशमें तारे प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार सुन्दर केशान्तभागसे विभूषित एवं रुचिर नासिका, नेत्र और भौंहोंसे युक्त राजाओंके मनोहर मुख सुशोभित हो रहे थे ॥ ७ ॥

दमयन्ती ततो रङ्गं प्रविवेश शुभानना ।

मुष्णन्ती प्रभया राज्ञां चक्षूंषि च मनांसि च ॥ ८ ॥

तदनन्तर अपनी प्रभासे राजाओंके नयनोंको लुभाती और चित्तको चुराती हुई सुन्दर मुखवाली दमयन्तीने रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥

तस्या गात्रेषु पतिता तेषां दृष्टिर्महात्मनाम् ।

तत्र तत्रैव सक्ताऽभून्न चचाल च पश्यताम् ॥ ९ ॥

वहाँ आते ही दमयन्तीके अंगोंपर उन महामना नरेशोंकी दृष्टि पड़ी । उसे देखनेवाले राजाओंमेंसे जिसकी दृष्टि दमयन्तीके जिस अंगपर पड़ी, वहीं लग गयी, वहाँसे हट न सकी ॥ ९ ॥

ततः संकीर्त्यमानेषु राज्ञां नामसु भारत ।

ददर्श भैमी पुरुषान् पञ्चतुल्याकृतीनिह ॥ १० ॥

भारत! तत्पश्चात् राजाओंके नाम, रूप, यश और पराक्रम आदिका परिचय दिया जाने लगा । भीमकुमारी दमयन्तीने आगे बढ़कर देखा, यहाँ तो एक जगह पाँच पुरुष एक ही आकृतिके बैठे हुए हैं ॥ १० ॥

तान् समीक्ष्य ततः सर्वान् निर्विशेषाकृतीन् स्थितान् ।

संदेहादथ वैदर्भी नाभ्यजानान्नलं नृपम् ॥ ११ ॥

उन सबके रूप-रंग आदिमें कोई अन्तर नहीं था । वे पाँचों नलके ही समान दिखायी देते थे । उन्हें एक जगह स्थित देखकर संदेह उत्पन्न हो जानेसे विदर्भराजकुमारी वास्तविक

पृष्ठ 409

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 409 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राजा नलको पहचान न सकी ॥ ११ ॥

यं यं हि ददृशे तेषां तं तं मेने नलं नृपम् ।

सा चिन्तयन्ती बुद्धयाथ तर्कयामास भाविनी ॥ १२ ॥

वह उनमेंसे जिस - जिस व्यक्तिपर दृष्टि डालती, उसी - उसीको राजा नल समझने लगती थी । वह भाविनी राजकन्या बुद्धिसे सोच - विचारकर मन-ही- मन तर्क करने लगी ॥ १२ ॥

कथं हि देवाञ्जानीयां कथं विद्यां नलं नृपम् ।

एवं संचिन्तयन्ती सा वैदर्भी भृशदुःखिता ॥ १३ ॥

अहो! मैं कैसे देवताओंको जानूँ और किस प्रकार राजा नलको पहिचानूँ । ' इस चिन्तामें पड़कर विदर्भराजकुमारी दमयन्तीको बड़ा दुःख हुआ ॥ १३ ॥

श्रुतानि देवलिङ्गानि तर्कयामास भारत ।

देवानां यानि लिङ्गानि स्थविरेभ्यः श्रुतानि मे ॥ १४ ॥

तानीह तिष्ठतां भूमावेकस्यापि न लक्षये ।

सा विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ॥ १५ ॥

शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत । भारत! उसने अपने सुने हुए देवचिह्नोंपर भी विचार किया । वह मन- ही- मन कहने लगी ‘ मैंने बड़े - बूढ़े पुरुषोंसे देवताओंकी पहचान करानेवाले जो लक्षण या चिह्न सुन रखे हैं, उन्हें यहाँ भूमिपर बैठे हुए इन पाँच पुरुषोंमेंसे किसी एकमें भी नहीं देख पाती हूँ। ' उसने अनेक प्रकारसे निश्चय और बार- बार विचार करके देवताओंकी शरणमें जाना ही समयोचित कर्तव्य समझा ॥ १४-१५३ ॥ वाचा च मनसा चैव नमस्कारं प्रयुज्य सा ॥ १६ ॥

देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमब्रवीत् ।

हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नैषधो वृतः ।

पतित्वे तेन सत्येन देवास्तं प्रदिशन्तु मे ॥ १७ ॥

तत्पश्चात् मन एवं वाणीद्वारा देवताओंको नमस्कार करके दोनों हाथ जोड़कर काँपती हुई वह इस प्रकार बोली- ' मैंने हंसोंकी बात सुनकर निषधनरेश नलका पतिरूपमें वरण कर लिया है । इस सत्यके प्रभावसे देवतालोग स्वयं ही मुझे राजा नलकी पहचान करा दें ॥

मनसा वचसा चैव यथा नाभिचराम्यहम् ।

तेन सत्येन विबुधास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥ १८ ॥

‘ यदि मैं मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा कभी सदाचारसे च्युत नहीं हुई हूँ तो उस सत्यके प्रभावसे देवतालोग मुझे राजा नलकी ही प्राप्ति करावें ॥ १८ ॥

यथा देवैः स मे भर्ता विहितो निषधाधिपः ।

तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 410

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 410 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' यदि देवताओंने उन निषधनरेश नलको ही मेरा पति निश्चित किया हो तो उस सत्यके प्रभावसे देवता- लोग मुझे उन्हींको बतला दें ॥ १ ९ ॥

यथेदं व्रतमारब्धं नलस्याराधने मया ।

तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥ २० ॥

‘ यदि मैंने नलकी आराधनाके लिये ही यह व्रत आरम्भ किया हो तो उस सत्यके प्रभावसे देवता मुझे उन्हींको बतला दें ॥ २० ॥

स्वं चैव रूपं कुर्वन्तु लोकपाला महेश्वराः ।

यथाहमभिजानीयां पुण्यश्लोकं नराधिपम् ॥ २१ ॥

‘ महेश्वर लोकपालगण अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे मैं पुण्यश्लोक महाराज नलको पहचान सकूँ' ॥ २१ ॥

निशम्य दमयन्त्यास्तत् करुणं प्रतिदेवितम् ।

निश्चयं परमं तथ्यमनुरागं च नैषधे ॥ २२ ॥

मनोविशुद्धिं बुद्धिं च भक्तिं रागं च नैषधे ।

यथोक्तं चक्रिरे देवाः सामर्थ्यं लिङ्गधारणे ॥ २३ ॥

दमयन्तीका वह करुण विलाप सुनकर तथा उसके अन्तिम निश्चय, नलविषयक वास्तविक अनुराग, विशुद्ध हृदय, उत्तम बुद्धि तथा नलके प्रति भक्ति एवं प्रेम देखकर देवताओंने दमयन्तीके भीतर वह यथार्थ शक्ति उत्पन्न कर दी, जिससे उसे देवसूचक लक्षणोंका निश्चय हो सके ॥ २२-२३ ॥

सापश्यद् विबुधान् सर्वानस्वेदान् स्तब्धलोचनान् ।

हृषितस्रग्रजोहीनान् स्थितानस्पृशतः क्षितिम् ॥ २४ ॥

अब दमयन्तीने देखा – सम्पूर्ण देवता स्वेदरहित हैं— उनके किसी अंगमें पसीनेकी बूँद नहीं दिखायी देती, उनकी आँखोंकी पलकें नहीं गिरती हैं । उन्होंने जो पुष्पमालाएँ पहन रखी हैं, वे नूतन विकाससे युक्त हैं –कुम्हलाती नहीं हैं । उनपर धूल - कण नहीं पड़ रहे हैं । वे सिंहासनोंपर बैठे हैं, किंतु अपने पैरोंसे पृथ्वीतलका स्पर्श नहीं करते हैं और उनकी परछाईं नहीं पड़ती है ॥ २४ ॥