श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 551–560
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560
पृष्ठ 551
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Humay
स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृप ।
प्रययौ पुष्करो हृष्टःस्वपुरं स्वजनावृतः ॥ २ ९ ॥
महत्या सेनया सार्धं विनीतैः परिचारकैः ।
भ्राजमान इवादित्यो वपुषा पुरुषर्षभ ॥ ३० ॥
नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! राजा नलके द्वारा इस प्रकार सत्कार पाकर पुष्कर एक मासतक वहाँ टिका रहा और फिर आत्मीय जनोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपनी राजधानीको चला गया । उसके साथ विशाल सेना और विनयशील सेवक भी थे । वह शरीरसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था ॥ २ ९ -३० ॥
प्रस्थाप्य पुष्करं राजा वित्तवन्तमनामयम् ।
प्रविवेश पुरं श्रीमानत्यर्थमुपशोभिताम् ॥ ३१ ॥
पुष्करको धन — वित्तके साथ सकुशल घर भेजकर श्रीमान् राजा नलने अपने अत्यन्त शोभासम्पन्न नगरमें प्रवेश किया ॥ ३१ ॥
प्रविश्य सान्त्वयामास पौरांश्च निषधाधिपः ।
पौरा जानपदाश्चापि सम्प्रहृष्टतनूरुहाः ॥ ३२ ॥
पृष्ठ 552
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रवेश करके निषधनरेशने पुरवासियोंको सान्त्वना दी । नगर और जनपदके लोग बड़े प्रसन्न हुए । उनके शरीरमें रोमांच हो आया ॥ ३२ ॥
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सामात्यप्रमुखा जनाः ।
अद्य स्म निर्वृता राजन् पुरे जनपदेऽपि च ।
उपासितुं पुनः प्राप्ता देवा इव शतक्रतुम् ॥ ३३ ॥
मन्त्री आदि सब लोगोंने हाथ जोड़कर कहा -' महाराज! आज हम नगर और जनपदके निवासी संतोषसे साँस ले सके हैं । जैसे देवता देवराज इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार अब हमें पुनः आपकी उपासना करने — आपके पास बैठनेका शुभ अवसर प्राप्त हुआ है ' ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि पुष्करपराभवपूर्वकं राज्यप्रत्यानयने अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें पुष्करको हराकर राजा नलके अपने नगरमें आनेसे सम्बन्ध रखनेवाला अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
पृष्ठ 553
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकोनाशीतितमोऽध्यायः राजा नलके आख्यानके कीर्तनका महत्त्व, बृहदश्व मुनिका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा द्यूतविद्या और अश्वविद्याका रहस्य बताकर जाना बृहदश्वउवाच
प्रशान्ते तु पुरे हृष्टे सम्प्रवृत्ते महोत्सवे ।
महत्या सेनया राजा दमयन्तीमुपानयत् ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! जब नगरमें शान्ति छा गयी और सब लोग प्रसन्न हो गये, सर्वत्र महान् उत्सव होने लगा, उस समय राजा नल विशाल सेनाके साथ जाकर दमयन्तीको विदर्भदेशसे बुला लाये ॥ १ ॥
दमयन्तीमपि पिता सत्कृत्य परवीरहा ।
प्रास्थापयदमेयात्मा भीमो भीमपराक्रमः ॥ २ ॥
दमयन्तीके पिता भयंकर पराक्रमी भीम अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न थे, शत्रुपक्षके वीरोंका हनन करनेमें समर्थ थे । उन्होंने अपनी पुत्री दमयन्तीको बड़े सत्कारके साथ विदा किया ॥ २ ॥
आगतायां तु वैदर्भ्यां सपुत्रायां नलो नृपः ।
वर्तयामास मुदितो देवराडिव नन्दने ॥ ३ ॥
तथा प्रकाशतां यातो जम्बुद्वीपे स राजसु ।
पुनः शशास तद् राज्यं प्रत्याहृत्य महायशाः ॥ ४ ॥
पुत्र और पुत्रीसहित दमयन्तीके आ जानेपर राजा नल सब बर्ताव- व्यवहार बड़े आनन्दसे सम्पन्न करने लगे । जैसे नन्दनवनमें देवराज इन्द्र शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे जम्बूद्वीपके समस्त राजाओंमें प्रकाशमान हो रहे थे । वे महायशस्वी नरेश अपने राज्यको पुनः वापस लेकर उसका न्यायपूर्वक शासन करने लगे ॥ ३-४ ॥
ईजे च विविधैर्यज्ञैर्विधिवच्चाप्तदक्षिणैः ।
तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुहृद् यक्ष्यसेऽचिरात् ॥ ५ ॥
उन्होंने पर्याप्त दक्षिणासे युक्त विविध प्रकारके यज्ञोंद्वारा विधिपूर्वक भगवान्का यजन किया । राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी पुनः अपना राज्य पाकर सुहृदोंसहित शीघ्र ही यज्ञका अनुष्ठान करोगे ॥ ५ ॥
दुःखमेतादृशं प्राप्तो नलः परपुरंजयः ।
देवनेन नरश्रेष्ठ सभार्यो भरतर्षभ ॥ ६ ॥
पृष्ठ 554
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भरतश्रेष्ठ! पुरुषोत्तम! शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज नल जूआ खेलनेके कारण अपनी पत्नीसहित इस प्रकारके महान् संकटमें पड़ गये थे ॥ ६ ॥
एकाकिनैव सुमहन्नलेन पृथिवीपते ।
दुःखमासादितं घोरं प्राप्तश्चाभ्युदयः पुनः ॥ ७ ॥
पृथ्वीपते! राजा नलने अकेले ही यह भयंकर और महान् दुःख प्राप्त किया था; उन्हें पुनः अभ्युदयकी प्राप्ति हुई ॥ ७ ॥
त्वं पुनर्भ्रातृसहितः कृष्णया चैव पाण्डव ।
रमसेऽस्मिन् महारण्ये धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥ ८ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम तो अपने सभी भाइयों और महारानी द्रौपदीके साथ इस महान् वनमें भ्रमण करते हो और निरन्तर धर्मके ही चिन्तनमें लगे रहते हो ॥ ८ ॥
ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ।
नित्यमन्वास्यसे राजंस्तत्र का परिदेवना ॥ ९ ॥
राजन्! महान् भाग्यशाली वेद - वेदांगोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण सदा तुम्हारे साथ रहते हैं; फिर तुम्हारे लिये इस परिस्थितिमें शोककी क्या बात है? ॥ ९ ॥
कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च ।
ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम् ॥ १० ॥
कर्कोटक नाग, दमयन्ती, नल तथा राजर्षि ऋतुपर्णकी चर्चा कलियुगके दोषका नाश करनेवाली है ॥ १० ॥
इतिहासमिमं चापि कलिनाशनमच्युत ।
शक्यमाश्वसितुं श्रुत्वा त्वद्विधेन विशाम्पते ॥ ११ ॥
महाराज! तुम्हारे - जैसे लोगोंको यह कलिनाशक इतिहास सुनकर आश्वासन प्राप्त हो सकता है ॥ ११ ॥
अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा ।
तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमर्हसि ॥ १२ ॥
पुरुषको प्राप्त होनेवाले सभी विषय सदा अस्थिर एवं विनाशशील हैं । यह सोचकर उनके मिलने या नष्ट होनेपर तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ १२ ॥
श्रुत्वेतिहासं नृपते समाश्वसिहि मा शुचः ।
व्यसने त्वं महाराज न विषीदितुमर्हसि ॥ १३ ॥
नरेश! इस इतिहासको सुनकर तुम धैर्य धारण करो, शोक न करो, महाराज! तुम्हें संकटमें पड़नेपर विषादग्रस्त नहीं होना चाहिये ॥ १३ ॥
विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते ।
विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः ॥ १४ ॥
पृष्ठ 555
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जब दैव ( प्रारब्ध ) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते ॥ १४ ॥
ये चेदं कथयिष्यन्ति नलस्य चरितं महत् ।
श्रोष्यन्ति चाप्यभीक्ष्णं वै नालक्ष्मीस्तान् भजिष्यति ॥ १५ ॥
अर्थास्तस्योपपत्स्यन्ते धन्यतां च गमिष्यति । जो राजा नलके इस महान् चरित्रका वर्णन करेंगे अथवा निरन्तर सुनेंगे, उन्हें दरिद्रता नहीं प्राप्त होगी । उनके सभी मनोरथ सिद्ध होंगे और वे संसारमें धन्य हो जायँगे ॥ १५३ || इतिहासमिमं श्रुत्वा पुराणं शश्वदुत्तमम् ॥ १६ ॥
पुत्रान् पौत्रान् पशूंश्चापि लभते नृषु चाग्र्यताम् ।
आरोग्यप्रीतिमांश्चैव भविष्यति न संशयः ॥ १७ ॥
इस प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका सदा ही श्रवण करके मनुष्य पुत्र, पौत्र, पशु तथा मानवोंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है । साथ ही वह नीरोग और प्रसन्न होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥
भयात् त्रस्यसि यच्च त्वमाह्वयिष्यति मां पुनः ।
अक्षज्ञ इति तत् तेऽहं नाशयिष्यामि पार्थिव ॥ १८ ॥
राजन्! तुम जो इस भयसे डर रहे हो कि कोई द्यूतविद्याका ज्ञाता मनुष्य पुनः मुझे जू के लिये बुलायेगा ( उस दशामें पुनः पराजयका कष्ट देखना पड़ेगा) । तुम्हारे उस भयको मैं दूर कर दूँगा ॥ १८ ॥
वेदाक्षहृदयं कृत्स्नमहं सत्यपराक्रम ।
उपपद्यस्व कौन्तेय प्रसन्नोऽहं ब्रवीमि ते ॥ १ ९ ॥
सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन! मैं द्यूतविद्याके सम्पूर्ण हृदय ( रहस्य ) को जानता हूँ, तुम उसे ग्रहण कर लो । मैं प्रसन्न होकर तुम्हें बतलाता हूँ ॥ १ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच
ततो हृष्टमना राजा बृहदश्वमुवाच ह ।
भगवन्नक्षहृदयं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने प्रसन्नचित्त हो बृहदश्वसे कहा– ' भगवन्! मैं द्यूतविद्याके रहस्यको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ' ॥ २० ॥
ततोऽक्षहृदयं प्रादात् पाण्डवाय महात्मने ।
दत्त्वा चाश्वशिरोऽगच्छदुपस्प्रष्टुं महातपाः ॥ २१ ॥
पृष्ठ 556
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तब महातपस्वी मुनिने महात्मा पाण्डुनन्दनको द्यूतविद्याका रहस्य बताया और उन्हें अश्वविद्याका भी उपदेश देकर वे स्नान आदि करनेके लिये चले गये ॥
बृहदश्वे गते पार्थमश्रौषीत् सव्यसाचिनम् ।
वर्तमानं तपस्युग्रे वायुभक्षं मनीषिणम् ॥ २२ ॥
ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यः सम्पतद्भयस्ततस्ततः ।
तीर्थशैलवनेभ्यश्च समेतेभ्यो दृढव्रतः ॥ २३ ॥
इति पार्थो महाबाहुर्दुरापं तप आस्थितः ।
न तथा दुष्टपूर्वोऽन्यः कश्चिदुग्रतपा इति ॥ २४ ॥
बृहदश्व मुनिके चले जानेपर दृढव्रती राजा युधिष्ठिरने इधर- उधरके तीर्थों, पर्वतों और वनोंसे आये हुए तपस्वी ब्राह्मणोंके मुखसे सव्यसाची अर्जुनका यह समाचार सुना कि ' मनीषी अर्जुन वायुका आहार करके कठोर तपस्यामें लगे हैं । महाबाहु कुन्तीकुमार बड़ी दुष्कर तपस्यामें स्थित हैं । ऐसा कठोर तपस्वी आजसे पहले दूसरा कोई नहीं देखा गया है ॥ २२–२४ ॥
यथा धनंजयः पार्थस्तपस्वी नियतव्रतः ।
मुनिरेकचरः श्रीमान् धर्मो विग्रहवानिव ॥ २५ ॥
‘ कुन्तीकुमार धनंजय जिस प्रकार नियम और व्रतका पालन करते हुए तपस्यामें संलग्न हैं, वह अद्भुत है । वे मौनभावसे रहते और अकेले ही विचरते हैं । श्रीमान् अर्जुन धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते हैं ' ॥
तं श्रुत्वा पाण्डवो राजंस्तप्यमानं महावने ।
अन्वशोचत कौन्तेयः प्रियं वै भ्रातरं जयम् ॥ २६ ॥
राजन्! उस महान् वनमें अपने प्रिय भाई अर्जुनको तपस्या करते सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर उनके लिये बार- बार शोक करने लगे ॥ २६ ॥
दह्यमानेन तु हृदा शरणार्थी महावने ।
ब्राह्मणान् विविधज्ञानान् पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ २७ ॥
अर्जुनके वियोगमें संतप्त हृदयवाले वे युधिष्ठिर निर्भय आश्रयकी इच्छा रखते हुए उस महान् वनमें रहते थे और अनेक प्रकारके ज्ञानसे सम्पन्न ब्राह्मणोंसे अपना मनोगत अभिप्राय पूछा करते थे ॥ २७ ॥
(प्रतिगृह्याक्षहृदयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
आसीद्धृष्टमना राजन् भीमसेनादिभिर्युतः ॥
राजन्! द्यूतविद्याका रहस्य जानकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर भीमसेन आदिके साथ मन-ही -मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ स्वभ्रातॄन् सहितान् पश्यन् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अपश्यन्नर्जुनं तत्र बभूवाश्रुपरिप्लुतः ।
पृष्ठ 557
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
संतप्यमानः कौन्तेयो भीमसेनमुवाच ह ॥ उन्होंने एक साथ बैठे हुए सब भाइयोंकी ओर देखा, उस समय वहाँ अर्जुनको न देखकर उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये और वे अत्यन्त संतप्त हो भीमसेनसे बोले ॥ युधिष्ठिरउवाच
कदा द्रक्ष्यामि वै भीम पार्थमत्र तवानुजम् ।
मत्कृते हि कुरुश्रेष्ठस्तप्यते दुश्चरं तपः ॥
युधिष्ठिरने कहा- भीमसेन! मैं तुम्हारे छोटे भाई अर्जुनको कब देखूँगा? कुरुश्रेष्ठ अर्जुन मेरे ही लिये अत्यन्त कठोर तपस्या करते हैं ॥
तस्याक्षहृदयज्ञानमाख्यास्यामि कदा न्वहम् ।
स हि श्रुत्वा हृदयं समुपात्तं मया विभो ॥
प्रहृष्टः पुरुषव्याघ्रो भविष्यति न संशयः । ) मैं उन्हें अक्षहृदय ( द्यूतविद्याके रहस्य ) - का ज्ञान कब कराऊँगा । भीम! मेरे द्वारा ग्रहण किये हुए अक्षहृदयको सुनकर पुरुषसिंह अर्जुन बहुत प्रसन्न होंगे, इसमें संशय नहीं है । इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि बृहदश्वगमने एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें बृहदश्वगमनविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं )
पृष्ठ 558
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
(तीर्थयात्रापर्व) अशीतितमोऽध्यायः अर्जुनके लिये द्रौपदीसहित पाण्डवोंकी चिन्ता जनमेजय उवाच
भगवन् काम्यकात् पार्थे गते मे प्रपितामहे ।
वाण्डवाः किमकुर्वंस्ते तमृते सव्यसाचिनम् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा- भगवन्! मेरे प्रपितामह अर्जुनके काम्यकवनसे चले जानेपर उनसे अलग रहते हुए शेष पाण्डवोंने कौन- सा कार्य किया? ॥ १ ॥
स हि तेषां महेष्वासो गतिरासीदनीकजित् ।
आदित्यानां यथा विष्णुस्तथैव प्रतिभाति मे ॥ २ ॥
वे सैन्यविजयी, महान् धनुर्धर अर्जुन ही उन सबके आश्रय थे। जैसे आदित्योंमें विष्णु हैं, वैसे ही पाण्डवोंमें मुझे धनंजय जान पड़ते हैं ॥ २ ॥
तेनेन्द्रसमवीर्येण संग्रामेष्वनिवर्तिना ।
विनाभूता वने वीराः कथमासन् पितामहाः ॥ ३ ॥
वे संग्रामसे कभी पीछे न हटनेवाले और इन्द्रके समान पराक्रमी थे । उनके बिना मेरे अन्य वीर पितामह वनमें कैसे रहते थे? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
गते तु पाण्डवे तात काम्यकात् सत्यविक्रमे ।
बभूवुः पाण्डवेयास्ते दुःखशोकपरायणाः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -तात! सत्यपराक्रमी पाण्डुकुमार अर्जुनके काम्यकवनसे चले जानेपर सभी पाण्डव उनके लिये दुःख और शोकमें मग्न रहने लगे ॥ ४ ॥
आक्षिप्तसूत्रा मणयश्छिन्नपक्षा इव द्विजाः ।
अप्रीतमनसः सर्वे बभूवुरथ पाण्डवाः ॥ ५ ॥
जैसे मणियोंकी मालाका सूत टूट जाय अथवा पक्षियोंके पंख कट जायँ, वैसी दशामें
उन मणियों और पक्षियोंकी जो अवस्था होती है, वैसी ही अर्जुनके बिना पाण्डवोंकी थी ।
उन सबके मनमें तनिक भी प्रसन्नता नहीं थी ॥ ५ ॥
वनं तु तदभूत् तेन हीनमक्लिष्टकर्मणा ।
पृष्ठ 559
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कुबेरेण यथा हीनं वनं चैत्ररथं तथा ॥ ६ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अर्जुनके बिना वह वन उसी प्रकार शोभाशून्य - सा हो गया, जैसे कुबेरके बिना चैत्ररथ वन ॥ ६ ॥
तमृते ते नरव्याघ्राः पाण्डवा जनमेजय ।
मुदमप्राप्नुवन्तो वै काम्यके न्यवसंस्तदा ॥ ७ ॥
जनमेजय! अर्जुनके बिना वे नरश्रेष्ठ पाण्डव आनन्दशून्य हो काम्यकवनमें रह रहे थे ॥ ७ ॥
ब्राह्मणार्थे पराक्रान्ताः शुद्धैर्बाणैर्महारथाः ।
निघ्नन्तो भरतश्रेष्ठ मेध्यान् बहुविधान् मृगान् ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे महारथी वीर शुद्ध बाणोंद्वारा ब्राह्मणोंके ( बाघम्बर आदिके ) लिये पराक्रम करके नाना प्रकारके पवित्र* मृगोंको मारा करते थे ॥ ८ ॥
नित्यं हि पुरुषव्याघ्रा वन्याहारमरिंदमाः ।
उपाकृत्य उपाहृत्य ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयन् ॥ ९ ॥
वे नरश्रेष्ठ और शत्रुदमन पाण्डव प्रतिदिन ब्राह्मणोंके लिये जंगली फल - मूलका आहार संगृहीत करके उन्हें अर्पित करते थे ॥ ९ ॥
सर्वे संन्यवसंस्तत्र सोत्कण्ठाः पुरुषर्षभाः ।
अहृष्टमनसः सर्वे गते राजन् धनंजये ॥ १० ॥
राजन्! धनंजयके चले जानेपर वे सभी नरश्रेष्ठ वहाँ खिन्नचित्त हो उन्हींके लिये उत्कण्ठित होकर रहते थे ॥ १० ॥
विशेषतस्तु पाञ्चाली स्मरन्ती मध्यमं पतिम् ।
उद्विग्नं पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ११ ॥
विशेषतः पांचालराजकुमारी द्रौपदी अपने मझले पति अर्जुनका स्मरण करती हुई सदा उद्विग्न रहनेवाले पाण्डवशिरोमणि युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोली- ॥ ११ ॥
योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना ।
तमृते पाण्डवश्रेष्ठ वनं न प्रतिभाति मे ॥ १२ ॥
‘ पाण्डवश्रेष्ठ! जो दो भुजावाले अर्जुन सहस्रबाहु अर्जुनके समान पराक्रमी हैं, उनके बिना यह वन मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ १२ ॥
शून्यामिव प्रपश्यामि तत्र तत्र महीमिमाम् ।
बह्वाश्चर्यमिदं चापि वनं कुसुमितद्रुमम् ॥ १३ ॥
न तथा रमणीयं वै तमृते सव्यसाचिनम् ।
नीलाम्बुदसमप्रख्यं मत्तमातङ्गगामिनम् ॥ १४ ॥
तमृते पुण्डरीकाक्षं काम्यकं नातिभाति मे । यस्य वा धनुषो घोषः श्रूयते चाशनिस्वनः ।
पृष्ठ 560
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
न लभे शर्म वै राजन् स्मरन्ती सव्यसाचिनम् ॥ १५ ॥
‘ मैं यत्र - तत्र यहाँकी जिस -जिस भूमिपर दृष्टि डालती हूँ, सबको सूनी- सी ही पाती हूँ । यह अनेक आश्चर्यसे भरा हुआ और विकसित कुसुमोंसे अलंकृत वृक्षोंवाला काम्यकवन भी सव्यसाची अर्जुनके बिना पहले जैसा रमणीय नहीं जान पड़ता है । नीलमेघके समान कान्ति और मतवाले गजराजकी - सी गतिवाले उन कमलनयन अर्जुनके बिना यह काम्यकवन मुझे तनिक भी नहीं भाता है । राजन्! जिनके धनुषकी टंकार बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देती है, उन सव्यसाचीकी याद करके मुझे तनिक भी चैन नहीं मिलता' ॥ १३–१५ ॥
तथा लालप्यमानां तां निशम्य परवीरहा ।
भीमसेनो महाराज द्रौपदीमिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥
महाराज! इस प्रकार विलाप करती हुई द्रौपदीकी बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भीमसेनने उससे इस प्रकार कहा ॥ १६ ॥
भीम उवाच
मनःप्रीतिकरं भद्रे यद् ब्रवीषि सुमध्यमे ।
तन्मे प्रीणाति हृदयममृतप्राशनोपमम् ॥ १७ ॥
भीमसेन बोले- भद्रे! सुमध्यमे! तुम जो कुछ कहती हो, वह मेरे मनको प्रसन्न करनेवाला है । तुम्हारी बात मेरे हृदयको अमृतपानके तुल्य तृप्ति प्रदान करती है ॥ १७ ॥
यस्य दीर्घौ समौ पीनौ भुजौ परिघसंनिभौ ।
मौर्वीकृतकिणौ वृत्तौ खड्गायुधधनुर्धरौ ॥ १८ ॥
निष्काङ्गदकृतापीडौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ ।
मृते पुरुषव्याघ्रं नष्टसूर्यमिवाम्बरम् ॥ १ ९ ॥
जिनकी दोनों भुजाएँ लम्बी, मोटी, बराबर- बराबर तथा परिघके समान सुशोभित होनेवाली हैं, जिनपर प्रत्यञ्चाकी रगड़का चिह्न बन गया है, जो गोलाकार हैं और जिनमें खड्ग एवं धनुष सुशोभित होते हैं, सोनेके भुजबन्दोंसे विभूषित होकर जो पाँच- पाँच फनवाले दो सर्पोंके समान प्रतीत होती है उन पाँचों अंगुलियोंसे युक्त दोनों भुजाओंसे विभूषित नरश्रेष्ठ अर्जुनके बिना आज यह वन सूर्यहीन आकाशके समान श्रीहीन दिखलायी देता है ॥ १८-१९ ॥
यमाश्रित्य महाबाहुं पाञ्चालाः कुरवस्तथा ।
सुराणामपि मत्तानां पृतनासु न बिभ्यति ॥ २० ॥
यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः ।
मन्यामहे जितानाजौ परान् प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ २१ ॥
तमृते फाल्गुनं वीरं न लभे काम्यके धृतिम् ।