श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1161–1170

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1161–1170

पृष्ठ 1161

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ततस्तेषामहं वाग्भिस्तर्पितः सहसोत्थितः मातरं सरितां श्रेष्ठामपश्यं रथमास्थिताम् ॥ १५ ॥

उन सबने एक साथ ही बार-बार कहा- ' तुम्हारा कल्याण हो । तुम भयभीत न हो । ' उनके वचनामृतोंसे तृप्त होकर मैं सहसा उठकर खड़ा हो गया और देखा, मेरे रथपर सारथिके स्थानमें सरिताओंमें श्रेष्ठ माता गंगा बैठी हुई हैं ॥ १५ ॥

हयाश्च मे संगृहीतास्तयासन् महानद्या संयति कौरवेन्द्र । पादौ जनन्याः प्रतिगृह्य चाहं तथा पितॄणां रथमभ्यरोहम् ॥ १६ ॥

कौरवराज! उस युद्धमें महानदी माता गंगाने मेरे घोड़ोंकी बागडोर पकड़ रखी थी । तब मैं माताके चरणोंका स्पर्श करके और पितरोंके उद्देश्यसे भी मस्तक नवाकर उस रथपर जा बैठा ॥ १६ ॥

ररक्ष सा मां सरथं हयांश्चोपस्कराणि च ।

तामहं प्राञ्जलिर्भूत्वा पुनरेव व्यसर्जयम् ॥ १७ ॥

माताने मेरे रथ, घोड़ों तथा अन्यान्य उपकरणोंकी रक्षा की । तब मैंने हाथ जोड़कर पुनः माताको विदा कर दिया ॥ १७ ॥

ततोऽहं स्वयमुद्यम्य हयांस्तान् वातरंहसः ।

अयुध्यं जामदग्न्येन निवृत्तेऽहनि भारत ॥ १८ ॥

भारत! तदनन्तर स्वयं ही उन वायुके समान वेगशाली घोड़ोंको काबूमें करके मैं जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ युद्ध करने लगा । उस समय दिन प्रायः समाप्त हो चला था ॥ १८ ॥

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ वेगवन्तं महाबलम् ।

अमुञ्चं समरे बाणं रामाय हृदयच्छिदम् ॥ १९ ॥

भरतश्रेष्ठ! उस समरभूमिमें मैंने परशुरामजीकी ओर एक प्रबल एवं वेगवान् बाण चलाया, जो हृदयको विदीर्ण कर देनेवाला था ॥ १ ९ ॥

ततो जगाम वसुधां मम बाणप्रपीडितः ।

जानुभ्यां धनुरुत्सृज्य रामो मोहवशं गतः ॥ २० ॥

मेरे उस बाणसे अत्यन्त पीड़ित हो परशुरामजीने मूर्च्छाके वशीभूत होकर धनुष छोड़ धरतीपर घुटने टेक दिये ॥ २० ॥

ततस्तस्मिन् निपतिते रामे भूरिसहस्रदे ।

आवव्रुर्जलदा व्योम क्षरन्तो रुधिरं बहु ॥ २१ ॥

अनेक सहस्र ब्राह्मणोंको बहुत दान करनेवाले परशुरामजीके धराशायी होनेपर अधिकाधिक रक्तकी वर्षा करते हुए बादलोंने आकाशको ढक लिया ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1162

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उल्काश्च शतशः पेतुः सनिर्घाताः सकम्पनाः ।

अर्कं च सहसा दीप्तं स्वर्भानुरभिसंवृणोत् ॥ २२ ॥

बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सैकड़ों उल्कापात होने लगे । भूकम्प आ गया । अपनी किरणोंसे उद्भासित होनेवाले सूर्यदेवको राहुने सब ओरसे सहसा घेर लिया ॥ २२ ॥

ववुश्च वाताः परुषाश्चलिता च वसुन्धरा ।

गृध्रा बलाश्च कङ्काश्च परिपेतुर्मुदा युताः ॥ २३ ॥

वायु तीव्र वेगसे बहने लगी, धरती डोलने लगी, गीध, कौवे और कंक प्रसन्नतापूर्वक सब ओर उड़ने लगे ॥ २३ ॥

दीप्तायां दिशि गोमायुर्दारुणं मुहुरुन्नदत् ।

अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्भृशनिःस्वनाः ॥ २४ ॥

दिशाओंमें दाह- सा होने लगा, गीदड़ बार- बार भयंकर बोली बोलने लगा, दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही जोर - जोरसे बजने लगीं ॥ २४ ॥

एतदौत्पातिकं सर्वं घोरमासीद् भयंकरम् ।

विसंज्ञकल्पे धरणीं गते रामे महात्मनि ॥ २५ ॥

इस प्रकार महात्मा परशुरामके मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिरते ही ये समस्त उत्पातसूचक अत्यन्त भयंकर अपशकुन होने लगे ॥ २५ ॥

ततो वै सहसोत्थाय रामो मामभ्यवर्तत ।

पुनर्युद्धाय कौरव्य विह्वलः क्रोधमूर्च्छितः ॥ २६ ॥

कुरुनन्दन! इसी समय परशुरामजी सहसा उठकर क्रोधसे मूर्च्छित एवं विह्वल हो पुनः युद्धके लिये मेरे समीप आये ॥ २६ ॥

आददानो महाबाहुः कार्मुकं तालसंनिभम् ।

ततो मय्याददानं तं राममेव न्यवारयन् ॥ २७ ॥

महर्षयः कृपायुक्ताः क्रोधाविष्टोऽथ भार्गवः ।

स मेऽहरदमेयात्मा शरं कालानलोपमम् ॥ २८ ॥

परशुराम ताड़के समान विशाल धनुष लिये हुए थे । जब वे मेरे लिये बाण उठाने लगे, तब दयालु महर्षियोंने उन्हें रोक दिया । वह बाण कालाग्निके समान भयंकर था । अमेयस्वरूप भार्गवने कुपित होनेपर भी मुनियोंके कहनेसे उस बाणका उपसंहार कर लिया ॥ ततो रविर्मन्दमरीचिमण्डलो जगामास्तं पांसुपुञ्जावगूढः । निशाव्यगाहत् सुखशीतमारुता ततो युद्धं प्रत्यवहारयावः ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1163

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तदनन्तर मन्द किरणोंके पुंजसे प्रकाशित सूर्यदेव युद्धभूमिकी उड़ती हुई धूलोंसे

आच्छादित हो अस्ताचलको चले गये । रात्रि आ गयी और सुखद शीतल वायु चलने लगी ।

उस समय हम दोनोंने युद्ध समाप्त कर दिया ॥ २ ९ ॥

एवं राजन्नवहारो बभूव ततः पुनर्विमलेऽभूत् सुघोरम् । कल्यं कल्यं विंशतिं वै दिनानि तथैव चान्यानि दिनानि त्रीणि ॥ ३० ॥

राजन्! इस प्रकार प्रतिदिन संध्याके समय युद्ध बंद हो जाता और प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर पुनः अत्यन्त भयंकर संग्राम छिड़ जाता था । इस प्रकार हम दोनोंके युद्ध करते-करते तेईस दिन बीत गये ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि राम भीष्मयुद्धे द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम- भीष्मयुद्धविषयक एक सौ बयासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८२ ॥

Papa

पृष्ठ 1164

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त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्मको अष्टवसुओंसे प्रस्वापनास्त्रकी प्राप्ति भीष्म उवाच

ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रणम्य शिरसा तदा ।

ब्राह्मणानां पितॄणां च देवतानां च सर्वशः ॥ १ ॥

नक्तंचराणां भूतानां राजन्यानां विशाम्पते ।

शयनं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तयम् ॥ २ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजेन्द्र! तदनन्तर मैं रातके समय एकान्तमें शय्यापर जाकर ब्राह्मणों, पितरों, देवताओं, निशाचरों, भूतों तथा राजर्षिगणोंको मस्तक झुकाकर प्रणाम करनेके पश्चात् मन- ही - मन इस प्रकार चिन्ता करने लगा ॥ १-२ ॥

जामदग्न्येन मे युद्धमिदं परमदारुणम् ।

अहानि च बहून्यद्य वर्तते सुमहात्ययम् ॥ ३ ॥

आज बहुत दिन हो गये, जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ यह मेरा अत्यन्त भयंकर और महान् अनिष्टकारक युद्ध चल रहा है ॥ ३ ॥

न च रामं महावीर्यं शक्नोमि रणमूर्धनि ।

विजेतुं समरे विप्रं जामदग्न्यं महाबलम् ॥ ४ ॥

परंतु मैं महाबली, महापराक्रमी विप्रवर परशुरामजीको समरभूमिमें युद्धके मुहानेपर किसी तरह जीत नहीं सकता ॥ ४ ॥

यदि शक्यो मया जेतुं जामदग्न्यः प्रतापवान् ।

दैवतानि प्रसन्नानि दर्शयन्तु निशां मम ॥ ५ ॥

यदि प्रतापी जमदग्निकुमारको जीतना मेरे लिये सम्भव हो तो प्रसन्न हुए देवगण रात्रिमें मुझे दर्शन दें ॥ ५ ॥

ततो निशि च राजेन्द्र प्रसुप्तः शरविक्षतः ।

दक्षिणेनेह पार्श्वेन प्रभातसमये तदा ॥ ६ ॥

ततोऽहं विप्रमुख्यैस्तैर्यैरस्मि पतितो रथात् ।

उत्थापितो धृतश्चैव मा भैरिति च सान्त्वितः ॥ ७ ॥

त एव मां महाराज स्वप्नदर्शनमेत्य वै ।

परिवार्याब्रुवन् वाक्यं तन्निबोध कुरूद्वह ॥ ८ ॥

राजेन्द्र! ऐसी प्रार्थना करके बाणोंसे क्षत-विक्षत हुआ मैं रात्रिके अन्तमें प्रभातके समय दाहिनी करवटसे सो गया । महाराज! कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जिन ब्राह्मणशिरोमणियोंने रथसे गिरनेपर मुझे थाम लिया और उठाया था तथा 'डरो मत' ऐसा कहकर सान्त्वना दी थी,

पृष्ठ 1165

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उन्हीं लोगोंने मुझे सपनेमें दर्शन दे मेरे चारों ओर खड़े होकर जो बात कही थी, उसे बताता हूँ, सुनो– ॥ ६–८ ॥

उत्तिष्ठ मा भैर्गाङ्गेय न भयं तेऽस्ति किंचन ।

रक्षामहे त्वां कौरव्य स्वशरीरं हि नो भवान् ॥ ९ ॥

‘ गंगानन्दन! उठो! भयभीत न होओ । तुम्हें कोई भय नहीं है । कुरुनन्दन! हम तुम्हारी रक्षा करते हैं, क्योंकि तुम हमारे ही स्वरूप हो ॥ ९ ॥

न त्वां रामो रणे जेता जामदग्न्यः कथंचन ।

त्वमेव समरे रामं विजेता भरतर्षभ ॥ १० ॥

‘ जमदग्निकुमार परशुराम तुम्हें किसी प्रकार युद्धमें जीत नहीं सकेंगे । भरतभूषण! तुम्हीं रणक्षेत्रमें परशुरामपर विजय पाओगे ॥ १० ॥

इदमस्त्रं सुदयितं प्रत्यभिज्ञास्यते भवान् ।

विदितं हि तवाप्येतत् पूर्वस्मिन् देहधारणे ॥ ११ ॥

प्राजापत्यं विश्वकृतं प्रस्वापं नाम भारत ।

न हीदं वेद रामोऽपि पृथिव्यां वा पुमान् क्वचित् ॥ १२ ॥

‘ भारत! यह प्रस्वाप नामक अस्त्र है, जिसके देवता प्रजापति हैं । विश्वकर्माने इसका आविष्कार किया है । यह तुम्हें भी परम प्रिय है । इसकी प्रयोगविधि तुम्हें स्वतः ज्ञात हो जायगी; क्योंकि पूर्वशरीरमें तुम्हें भी इसका पूर्ण ज्ञान था । परशुरामजी भी इस अस्त्रको नहीं जानते हैं । इस पृथ्वीपर कहीं किसी भी पुरुषको इसका ज्ञान नहीं है ॥ ११-१२ ॥

तत् स्मरस्व महाबाहो भृशं संयोजयस्व च ।

उपस्थास्यति राजेन्द्र स्वयमेव तवानघ ॥ १३ ॥

‘ महाबाहो! इस अस्त्रका स्मरण करो और विशेष रूपसे इसीका प्रयोग करो । निष्पाप राजेन्द्र! यह अस्त्र स्वयं ही तुम्हारी सेवामें उपस्थित हो जायगा ॥ १३ ॥

येन सर्वान् महावीर्यान् प्रशासिष्यसि कौरव ।

न च रामः क्षयं गन्ता तेनास्त्रेण नराधिप ॥ १४ ॥

‘ कुरुनन्दन! उसके प्रभावसे तुम सम्पूर्ण महापराक्रमी नरेशोंपर शासन करोगे । राजन्! उस अस्त्रसे परशुरामका नाश नहीं होगा ॥ १४ ॥

एनसा न तु संयोगं प्राप्स्यसे जातु मानद ।

स्वप्स्यते जामदग्न्योऽसौ त्वद्वाणबलपीडितः ॥ १५ ॥

' इसलिये मानद! तुम्हें कभी इसके द्वारा पापसे संयोग नहीं होगा । तुम्हारे अस्त्रके प्रभावसे पीड़ित होकर जमदग्नि कुमार परशुराम चुपचाप सो जायँगे ॥ १५ ॥

ततो जित्वा त्वमेवैनं पुनरुत्थापयिष्यसि ।

अस्त्रेण दयितेनाजौ भीष्म सम्बोधनेन वै ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1166

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‘ भीष्म! तदनन्तर अपने उस प्रिय अस्त्रके द्वारा युद्धमें विजयी होकर तुम्हीं उन्हें सम्बोधनास्त्रद्वारा पुनः जगाकर उठाओगे ॥ १६ ॥

एवं कुरुष्व कौरव्य प्रभाते रथमास्थितः ।

प्रसुप्तं वा मृतं वेति तुल्यं मन्यामहे वयम् ॥ १७ ॥

‘ कुरुनन्दन! प्रातःकाल रथपर बैठकर तुम ऐसा ही करो; क्योंकि हमलोग सोये अथवा मरे हुएको समान ही समझते हैं ॥ १७ ॥

न च रामेण मर्तव्यं कदाचिदपि पार्थिव ।

ततः समुत्पन्नमिदं प्रस्वापं युज्यतामिति ॥ १८ ॥

‘ राजन्! परशुरामकी कभी मृत्यु नहीं हो सकती; अतः इस प्राप्त हुए प्रस्वाप नामक अस्त्रका प्रयोग करो ' ॥

इत्युक्त्वान्तर्हिता राजन् सर्व एव द्विजोत्तमाः ।

अष्टौ सदृशरूपास्ते सर्वे भासुरमूर्तयः ॥ १ ९ ॥

राजन्! ऐसा कहकर वे वसुस्वरूप सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अदृश्य हो गये । वे आठों समान रूपवाले थे । उन सबके शरीर तेजोमय प्रतीत होते थे ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि भीष्मप्रस्वापनास्त्रलाभे त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतउद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें भीष्मको प्रस्वापनास्त्रका प्राप्तिविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८३ ॥

पृष्ठ 1167

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चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्म तथा परशुरामजीका एक- दूसरेपर शक्ति और ब्रह्मास्त्रका प्रयोग भीष्म उवाच

ततो रात्रौ व्यतीतायां प्रतिबुद्धोऽस्मि भारत ।

ततः संचिन्त्य वै स्वप्नमवापं हर्षमुत्तमम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - भारत! तदनन्तर रात बीतनेपर जब मेरी नींद खुली, तब उस स्वप्नकी बातको सोचकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ॥ १ ॥

ततः समभवद् युद्धं मम तस्य च भारत ।

तुमुलं सर्वभूतानां लोमहर्षणमद्भुतम् ॥ २ ॥

भारत! तदनन्तर मेरा और परशुरामजीका भयंकर युद्ध छिड़ गया, जो समस्त प्राणियोंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला और अद्भुत था ॥ २ ॥

ततो बाणमयं वर्षं ववर्ष मयि भार्गवः ।

न्यवारयमहं तच्च शरजालेन भारत ॥ ३ ॥

उस समय भृगुनन्दन परशुरामजीने मुझपर बाणोंकी झड़ी लगा दी । भारत! तब मैंने अपने सायकसमूहोंसे उस बाणवर्षाको रोक दिया ॥ ३ ॥

ततः परमसंक्रुद्धः पुनरेव महातपाः ।

ह्यस्तनेन च कोपेन शक्तिं वै प्राहिणोन्मयि ॥ ४ ॥

तब महातपस्वी परशुराम पुनः मुझपर अत्यन्त कुपित हो गये । पहले दिनका भी कोप था ही । उससे प्रेरित होकर उन्होंने मेरे ऊपर शक्ति चलायी ॥ ४ ॥

इन्द्राशनिसमस्पर्शां यमदण्डसमप्रभाम् ।

ज्वलन्तीमग्निवत् संख्ये लेलिहानां समन्ततः ॥ ५ ॥

उसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान भयंकर था । उसकी प्रभा यमदण्डके समान थी और उस संग्राममें अग्निके समान प्रज्वलित हुई वह शक्ति मानो सब ओरसे रक्त चाट रही थी ॥ ५ ॥

ततो भरतशार्दूल धिष्ण्यमाकाशगं यथा ।

स मामभ्यवधीत् तूर्णं जत्रुदेशे कुरूद्वह ॥ ६ ॥

भरतश्रेष्ठ! कुरुकुलरत्न! फिर आकाशवर्ती नक्षत्रके समान प्रकाशित होनेवाली उस शक्तिने तुरंत आकर मेरे गलेकी हँसलीपर आघात किया ॥ ६ ॥

अथास्रमस्रवद् घोरं गिरेर्गैरिकधातुवत् ।

पृष्ठ 1168

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रामेण सुमहाबाहो क्षतस्य छतजेक्षण ॥ ७ ॥

लाल नेत्रोंवाले महाबाहु दुर्योधन! परशुरामजीके द्वारा किये हुए उस गहरे आघातसे भयंकर रक्तकी धारा बह चली । मानो पर्वतसे गैरिक धातुमिश्रित जलका झरना झर रहा हो ॥ ७ ॥

ततोऽहं जामदग्न्याय भृशं क्रोधसमन्वितः ।

चिक्षेप मृत्युसंकाशं बाणं सर्पविषोपमम् ॥ ८ ॥

तब मैंने भी अत्यन्त कुपित हो सर्पविषके समान भयंकर मृत्युतुल्य बाण लेकर परशुरामजीके ऊपर चलाया ॥ ८ ॥

स तेनाभिहतो वीरो ललाटे द्विजसत्तमः ।

अशोभत महाराज सशृङ्ग इव पर्वतः ॥ ९ ॥

उस बाणने विप्रवर वीर परशुरामजीके ललाटमें चोट पहुँचायी । महाराज! उसके कारण वे शिखरयुक्त पर्वतके समान शोभा पाने लगे ॥ ९ ॥

स संरब्धः समावृत्य शरं कालान्तकोपमम् ।

संदधे बलवत् कृष्य घोरं शत्रुनिबर्हणम् ॥ १० ॥

तब उन्होंने भी रोषमें आकर काल और यमके समान भयंकर शत्रुनाशक बाणको हाथमें ले धनुषको बलपूर्वक खींचकर उसके ऊपर रखा ॥ १० ॥

स वक्षसि पपातोग्रः शरो व्याल इव श्वसन् ।

महीं राजंस्ततश्चाहमगमं रुधिराविलः ॥ ११ ॥

राजन्! उनका चलाया हुआ वह भयंकर बाण फुफकारते हुए सर्पके समान सनसनाता

हुआ मेरी छातीपर आकर लगा । उससे लहूलुहान होकर मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११ ॥

सम्प्राप्य तु पुनः संज्ञां जामदग्न्याय धीमते ।

प्राहिण्वं विमलां शक्तिं ज्वलन्तीमशनीमिव ॥ १२ ॥

पुनः चेतमें आनेपर मैंने बुद्धिमान् परशुरामजीके ऊपर प्रज्वलित वज्रके समान एक उज्ज्वल शक्ति चलायी ॥ १२ ॥

सा तस्य द्विजमुख्यस्य निपपात भुजान्तरे ।

विह्वलश्चाभवद् राजन् वेपथुश्चैनमाविशत् ॥ १३ ॥

वह शक्ति उन ब्राह्मणशिरोमणिकी दोनों भुजाओंके ठीक बीचमें जाकर लगी । राजन्! इससे वे विह्वल हो गये और उनके शरीरमें कँपकँपी आ गयी ॥ १३ ॥

तत एनं परिष्वज्य सखा विप्रो महातपाः ।

अकृतव्रणः शुभैर्वाक्यैराश्वासयदनेकधा ॥ १४ ॥

तब उनके महातपस्वी मित्र अकृतव्रणने उन्हें हृदयसे लगाकर सुन्दर वचनोंद्वारा अनेक प्रकारसे आश्वासन दिया ॥ १४ ॥

समाश्वस्तस्ततो रामः क्रोधामर्षसमन्वितः ।

पृष्ठ 1169

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प्रादुश्चके तदा ब्राह्मं परमास्त्रं महाव्रतः ॥ १५ ॥

तदनन्तर महाव्रती परशुरामजी धैर्ययुक्त हो क्रोध और अमर्षमें भर गये और उन्होंने परम उत्तम ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया ॥ १५ ॥

ततस्तत्प्रतिघातार्थं ब्राह्ममेवास्त्रमुत्तमम् ।

मया प्रयुक्तं जज्वाल युगान्तमिव दर्शयत् ॥ १६ ॥

तब उस अस्त्रका निवारण करनेके लिये मैंने भी उत्तम ब्रह्मास्त्रका ही प्रयोग किया ।

मेरा वह अस्त्र प्रलयकालका - सा दृश्य उपस्थित करता हुआ प्रज्वलित हो उठा ॥ १६ ॥

तयोर्ब्रह्मास्त्रयोरासीदन्तरा वै समागमः ।

असम्प्राप्यैव रामं च मां च भारतसत्तम ॥ १७ ॥

भरतवंशशिरोमणे! वे दोनों ब्रह्मास्त्र मेरे तथा परशुरामजीके पास न पहुँचकर बीचमें ही एक - दूसरे से भिड़ गये ॥ १७ ॥

ततो व्योम्नि प्रादुरभूत् तेज एव हि केवलम् ।

भूतानि चैव सर्वाणि जग्मुरार्तिं विशाम्पते ॥ १८ ॥

प्रजानाथ! फिर तो आकाशमें केवल आगकी ही ज्वाला प्रकट होने लगी । इससे समस्त प्राणियोंको बड़ी पीड़ा हुई ॥ १८ ॥

ऋषयश्च सगन्धर्वा देवताश्चैव भारत ।

संतापं परमं जग्मुरस्त्रतेजोऽभिपीडिताः ॥ १ ९ ॥

भारत! उन ब्रह्मास्त्रोंके तेजसे पीड़ित होकर ऋषि, गन्धर्व तथा देवता भी अत्यन्त संतप्त हो उठे ॥ १ ९ ॥

ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ।

संतप्तानि च भूतानि विषादं जग्मुरुत्तमम् ॥ २० ॥

फिर तो पर्वत, वन और वृक्षोंसहित सारी पृथ्वी डोलने लगी । भूतलके समस्त प्राणी संतप्त हो अत्यन्त विषाद करने लगे ॥ २० ॥

प्रजज्वाल नभो राजन् धूमायन्ते दिशो दश ।

न स्थातुमन्तरिक्षे च शेकुराकाशगास्तदा ॥ २१ ॥

राजन्! उस समय आकाश जल रहा था । सम्पूर्ण दिशाओंमें धूम व्याप्त हो रहा था ।

आकाशचारी प्राणी भी आकाशमें ठहर न सके ॥ २१ ॥

ततो हाहाकृते लोके सदेवासुरराक्षसे ।

इदमन्तरमित्येवं मोक्तुकामोऽस्मि भारत ॥ २२ ॥

प्रस्वापमस्त्रं त्वरितो वचनाद् ब्रह्मवादिनाम् ।

विचित्रं च तदस्त्रं मे मनसि प्रत्यभात् तदा ॥ २३ ॥

तदनन्तर देवता, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण जगत्में हाहाकार मच गया । भारत! ' यही उपयुक्त अवसर है ' ऐसा मानकर मैंने तुरंत ही प्रस्वापनास्त्रको छोड़नेका विचार

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किया । फिर तो उन ब्रह्मवादी वसुओंके कथनानुसार उस विचित्र अस्त्रका मेरे मनमें स्मरण हो आया ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परस्परब्रह्मास्त्रप्रयोगे चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परस्पर ब्रह्मास्त्रयोगविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८४ ॥