श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1171–1180
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1171–1180
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पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः देवताओंके मना करनेसे भीष्मका प्रस्वापनास्त्रको प्रयोगमें न लाना तथा पितर, देवता और गंगाके आग्रहसे भीष्म और परशुरामके युद्धकी समाप्ति भीष्म उवाच
ततो हलहलाशब्दो दिवि राजन् महानभूत् ।
प्रस्वापं भीष्म मा स्राक्षीरिति कौरवनन्दन ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! कौरवनन्दन! तदनन्तर ' भीष्म! प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग न करो ' इस प्रकार आकाशमें महान् कोलाहल मच गया ॥ १ ॥
अयुञ्जमेव चैवाहं तदस्त्रं भृगुनन्दने ।
प्रस्वापं मां प्रयुञ्जानं नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
तथापि मैंने भृगुनन्दन परशुरामजीको लक्ष्य करके उस अस्त्रको धनुषपर चढ़ा ही लिया । मुझे प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग करते देख नारदजीने इस प्रकार कहा- ॥२ ॥
एते वियति कौरव्य दिवि देवगणाः स्थिताः ।
ते त्वां निवारयन्त्यद्य प्रस्वापं मा प्रयोजय ॥ ३ ॥
‘ कुरुनन्दन! ये आकाशमें स्वर्गलोकके देवता खड़े हैं । ये सब- के - सब इस समय तुम्हें मना कर रहे हैं, तुम प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग न करो ॥ ३ ॥
रामस्तपस्वी ब्रह्मण्यो ब्राह्मणश्च गुरुश्च ते ।
तस्यावमानं कौरव्य मा स्म कार्षीः कथंचन ॥ ४ ॥
' परशुरामजी तपस्वी, ब्राह्मणभक्त, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण और तुम्हारे गुरु हैं । कुरुकुलरत्न! तुम किसी तरह भी उनका अपमान न करो ' ॥ ४ ॥
ततोऽपश्यं दिविष्ठान् वै तानष्टौ ब्रह्मवादिनः ।
ते मां स्मयन्तो राजेन्द्र शनकैरिदमब्रुवन् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् मैंने आकाशमें खड़े हुए उन आठों ब्रह्मवादी वसुओंको देखा । वे मुसकराते हुए मुझसे धीरे - धीरे इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
यथाऽऽह भरतश्रेष्ठ नारदस्तत् तथा कुरु ।
एतद्धि परमं श्रेयो लोकानां भरतर्षभ ॥ ६ ॥
' भरतश्रेष्ठ! नारदजी जैसा कहते हैं, वैसा करो । भरतकुलतिलक! यही सम्पूर्ण जगत्के लिये परम कल्याणकारी होगा ' ॥ ६ ॥
ततश्च प्रतिसंहृत्य तदस्त्रं स्वापनं महत् ।
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ब्रह्मास्त्रं दीपयांचक्रे तस्मिन् युधि यथाविधि ॥ ७ ॥
तब मैंने उस महान् प्रस्वापनास्त्रको धनुषसे उतार लिया और उस युद्धमें विधिपूर्वक ब्रह्मास्त्रको ही प्रकाशित किया ॥ ७ ॥
ततो रामो हृषितो राजसिंह
दृष्ट्वा तदस्त्रं विनिवर्तितं वै ।
जितोऽस्मि भीष्मेण सुमन्दबुद्धि- रित्येव वाक्यं सहसा व्यमुञ्चत् ॥ ८ ॥
राजसिंह! मैंने प्रस्वापनास्त्रको उतार लिया है - यह देखकर परशुरामजी बड़े प्रसन्न हुए। उनके मुखसे सहसा यह वाक्य निकल पड़ा कि ' मुझ मन्दबुद्धिको भीष्मने जीत लिया ' ॥ ८ ॥
ततोऽपश्यत् पितरं जामदग्न्यः पितुस्तथा पितरं चास्य मान्यम् । ते तत्र चैनं परिवार्य तस्थु- रूचुश्चैनं सान्त्वपूर्वं तदानीम् ॥ ९ ॥
इसके बाद जमदग्निकुमार परशुरामने अपने पिता जमदग्निको तथा उनके भी माननीय पिता ऋचीक मुनिको देखा । वे सब पितर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये और उस समय उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले ॥ ९ ॥
पितर ऊचुः
मा स्मैवं साहसं तात पुनः कार्षीः कथंचन ।
भीष्मेण संयुगं गन्तुं क्षत्रियेण विशेषतः ॥ १० ॥
पितरोंने कहा – तात! फिर कभी किसी प्रकार भी ऐसा साहस न करना । भीष्म और विशेषतः क्षत्रियके साथ युद्धभूमिमें उतरना अब तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ १० ॥
क्षत्रियस्य तु धर्मोऽयं यद् युद्धं भृगुनन्दन ।
स्वाध्यायो व्रतचर्याथ ब्राह्मणानां परं धनम् ॥ ११ ॥
भृगुनन्दन! क्षत्रियका तो युद्ध करना धर्म ही है; किंतु ब्राह्मणोंके लिये वेदोंका स्वाध्याय तथा उत्तम व्रतोंका पालन ही परम धर्म है ॥ ११ ॥
इदं निमित्ते कस्मिंश्चिदस्माभिः प्रागुदाहृतम् ।
शस्त्रधारणमत्युग्रं तच्चाकार्यं कृतं त्वया ॥ १२ ॥
यह बात पहले भी किसी अवसरपर हमने तुमसे कही थी । शस्त्र उठाना अत्यन्त भयंकर कर्म है; अतः तुमने यह न करनेयोग्य कार्य ही किया है ॥ १२ ॥
वत्स पर्याप्तमेतावद् भीष्मेण सह संयुगे ।
विमर्दस्ते महाबाहो व्यपयाहि रणादितः ॥ १३ ॥
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महाबाहो! वत्स! भीष्मके साथ युद्धमें उतरकर जो तुमने इतना विध्वंसात्मक कार्य
किया है, यही बहुत हो गया । अब तुम इस संग्रामसे हट जाओ ॥ १३ ॥
पर्याप्तमेतद् भद्रं ते तव कार्मुकधारणम् ।
विसर्जयैतद् दुर्धर्ष तपस्तप्यस्व भार्गव ॥ १४ ॥
एष भीष्मः शान्तनवो देवैः सर्वैर्निवारितः ।
निवर्तस्व रणादस्मादिति चैव प्रसादितः ॥ १५ ॥
रामेण सह मा योत्सीर्गुरुणेति पुनः पुनः ।
न हि रामो रणे जेतुं त्वया न्याय्यः कुरूद्वह ॥ १६ ॥
मानं कुरुष्व गाङ्गेय ब्राह्मणस्य रणाजिरे । भृगुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो । दुर्धर्ष वीर! तुमने जो धनुष उठा लिया, यही पर्याप्त है । अब इसे त्याग दो और तपस्या करो । देखो, इन सम्पूर्ण देवताओंने शान्तनु-नन्दन भीष्मको भी रोक दिया है । वे उन्हें प्रसन्न करके यह बात कह रहे हैं कि ' तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ । परशुराम तुम्हारे गुरु हैं । तुम उनके साथ बार- बार युद्ध न करो । कुरुश्रेष्ठ! परशुरामको युद्धमें जीतना तुम्हारे लिये कदापि न्यायसंगत नहीं है । गंगानन्दन! तुम इस समरांगणमें अपने ब्राह्मणगुरुका सम्मान करो ' ॥ १४–१६३ ॥ वयं तु गुरवस्तुभ्यं तस्मात् त्वां वारयामहे ॥ १७ ॥
भीष्मो वसूनामन्यतमो दिष्ट्या जीवसि पुत्रक । बेटा परशुराम! हम जो तुम्हारे गुरुजन - आदरणीय पितर हैं । इसलिये तुम्हें रोक रहे हैं । पुत्र! भीष्म वसुओंमेंसे एक वसु हैं। तुम अपना सौभाग्य ही समझो कि उनके साथ युद्ध करके अबतक जीवित हो ॥ १७३ ॥
गाङ्गेयः शान्तनोः पुत्रो वसुरेष महायशाः ॥ १८ ॥
कथं शक्यस्त्वया जेतुं निवर्तस्वेह भार्गव । भृगुनन्दन! गंगा और शान्तनुके ये महायशस्वी पुत्र भीष्म साक्षात् वसु ही हैं । इन्हें तुम कैसे जीत सकते हो? अतः यहाँ युद्धसे निवृत्त हो जाओ ॥ १८३ ॥
अर्जुनः पाण्डवश्रेष्ठः पुरंदरसुतो बली ॥ १ ९ ॥ नरः प्रजापतिर्वीरः पूर्वदेवः सनातनः ।
सव्यसाचीति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ।
भीष्ममृत्युर्यथाकालं विहितो वै स्वयम्भुवा ॥ २० ॥
प्राचीन सनातन देवता और प्रजापालक वीरवर भगवान् नर इन्द्रपुत्र महाबली पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनके रूपमें प्रकट होंगे तथा पराक्रमसम्पन्न होकर तीनों लोकोंमें सव्यसाचीके नामसे विख्यात होंगे । स्वयम्भू ब्रह्माजीने उन्हींको यथासमय भीष्मकी मृत्युमें कारण बनाया है ॥ १ ९ -२० ॥
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भीष्म उवाच
एवमुक्तः स पितृभिः पितृन् रामोऽब्रवीदिदम् ।
नाहं युधि निवर्तेयमिति में व्रतमाहितम् ॥ २१ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! पितरोंके ऐसा कहनेपर परशुरामजीने उनसे इस प्रकार कहा — ' मैं युद्धमें पीठ नहीं दिखाऊँगा। यह मेरा चिरकालसे धारण किया हुआ व्रत है ॥ २१ ॥
न निवर्तितपूर्वश्च कदाचिद् रणमूर्धनि ।
निवर्त्यतामापगेयः कामं युद्धात् पितामहाः ॥ २२ ॥
न त्वहं विनिवर्तिष्ये युद्धादस्मात् कथंचन । ‘ आजसे पहले भी मैं कभी किसी युद्धसे पीछे नहीं हटा हूँ। अतः पितामहो! आपलोग अपनी इच्छाके अनुसार पहले गंगानन्दन भीष्मको ही युद्धसे निवृत्त कीजिये । मैं किसी प्रकार पहले स्वयं ही इस युद्धसे पीछे नहीं हटूंगा ' ॥ २२ ॥
ततस्ते मुनयो राजन्नृचीकप्रमुखास्तदा ॥ २३ ॥
नारदेनैव सहिताः समागम्येदमब्रुवन् ।
निवर्तस्व रणात् तात मानयस्व द्विजोत्तमम् ॥ २४ ॥
राजन्! तब वे ऋचीक आदि मुनि नारदजीके साथ मेरे पास आये और इस प्रकार बोले - ' तात! तुम्हीं युद्धसे निवृत्त हो जाओ और द्विजश्रेष्ठ परशुरामजीका मान रखो ' ॥
इत्यवोचमहं तांश्च क्षत्रधर्मव्यपेक्षया ।
मम व्रतमिदं लोके नाहं युद्धात् कदाचन ॥ २५ ॥
विमुखो विनिवर्तेयं पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ।
नाहं लोभान्न कार्पण्यान्न भयान्नार्थकारणात् ॥ २६ ॥
त्यजेयं शाश्वतं धर्ममिति मे निश्चिता मतिः । तब मैंने क्षत्रियधर्मको लक्ष्य करके उनसे कहा - ' महर्षियो! संसारमें मेरा यह व्रत प्रसिद्ध है कि मैं पीठपर बाणोंकी चोट खाता हुआ कदापि युद्धसे निवृत्त नहीं हो सकता । मेरा यह निश्चित विचार है कि मैं लोभसे, कायरता या दीनतासे, भयसे अथवा किसी स्वार्थके कारण भी क्षत्रियोंके सनातन धर्मका त्याग नहीं कर सकता' ॥ २५-२६ ॥ ततस्ते मुनयः सर्वे नारदप्रमुखा नृप ॥ २७ ॥
भागीरथी च मे माता रणमध्यं प्रपेदिरे ।
तथैवात्तशरो धन्वी तथैव दृढनिश्चयः ।
स्थिरोऽहमाहवे योद्धुं ततस्ते राममब्रुवन् ॥ २८ ॥
समेत्य सहिता भूयः समरे भृगुनन्दनम् ।
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इतना कहकर मैं पूर्ववत् धनुष-बाण लिये दृढ़ निश्चयके साथ समरभूमिमें युद्ध करनेके लिये डटा रहा । राजन्! तब वे नारद आदि सम्पूर्ण ऋषि और मेरी माता गंगा सब लोग उस रणक्षेत्रमें एकत्र हुए और पुनः एक साथ मिलकर उस समरांगणमें भृगुनन्दन परशुरामजीके पास जाकर इस प्रकार बोले – ॥ २७-२८३ ॥ नावनीतं हि हृदयं विप्राणां शाम्य भार्गव ॥ २ ९ ॥
राम राम निवर्तस्व युद्धादस्माद् द्विजोत्तम ।
अवध्यो वै त्वया भीष्मस्त्वं च भीष्मस्य भार्गव ॥ ३० ॥
' भृगुनन्दन! ब्राह्मणोंका हृदय नवनीतके समान कोमल होता है; अतः शान्त हो जाओ । विप्रवर परशुराम! इस युद्धसे निवृत्त हो जाओ । भार्गव! तुम्हारे लिये भीष्म और भीष्मके लिये तुम अवध्य हो ' ॥ २ ९ -३० ॥
एवं ब्रुवन्तस्ते सर्वे प्रतिरुध्य रणाजिरम् ।
न्यासयांचक्रिरे शस्त्रं पितरो भृगुनन्दनम् ॥ ३१ ॥
इस प्रकार कहते हुए उन सब लोगोंने रणस्थलीको घेर लिया और पितरोंने भृगुनन्दन परशुरामसे अस्त्र - शस्त्र रखवा दिया ॥ ३१ ॥
ततोऽहं पुनरेवाथ तानष्टौ ब्रह्मवादिनः ।
अद्राक्षं दीप्यमानान् वै ग्रहानष्टाविवोदितान् ॥ ३२ ॥
इसी समय मैंने पुनः उन आठों ब्रह्मवादी वसुओंको आकाशमें उदित हुए आठ ग्रहोंकी भाँति प्रकाशित होते देखा ॥ ३२ ॥
ते मां सप्रणयं वाक्यमब्रुवन् समरे स्थितम् ।
प्रैहि रामं महाबाहो गुरुं लोकहितं कुरु ॥ ३३ ॥
उन्होंने समरभूमिमें डटे हुए मुझसे प्रेमपूर्वक कहा- ' महाबाहो! तुम अपने गुरु परशुरामजीके पास जाओ और जगत्का कल्याण करो ' ॥ ३३ ॥
दृष्ट्वा निवर्तितं राम सुहृद्वाक्येन तेन वै ।
लोकानां च हितं कुर्वन्नहमप्याददे वचः ॥ ३४ ॥
अपने सुहृदोंके कहने से परशुरामजीको युद्धसे निवृत्त हुआ देख मैंने भी लोककी भलाई करनेके लिये उन महर्षियोंकी बात मान ली ॥ ३४ ॥
ततोऽहं राममासाद्य ववन्दे भृशविक्षतः ।
रामश्चाभ्युत्स्मयन् प्रेम्णा मामुवाच महातपाः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर मैंने परशुरामजीके पास जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया । उस समय मेरा शरीर बहुत घायल हो गया था । महातपस्वी परशुराम मुझे देखकर मुसकराये और प्रेमपूर्वक इस प्रकार बोले— ॥ ३५ ॥
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन् क्षत्रियः पृथिवीचरः ।
गम्यतां भीष्म युद्धेऽस्मिंस्तोषितोऽहं भृशं त्वया ॥ ३६ ॥
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' भीष्म! इस जगत्में भूतलपर विचरनेवाला कोई भी क्षत्रिय तुम्हारे समान नहीं है ।
जाओ, इस युद्धमें तुमने मुझे बहुत संतुष्ट किया है ' ॥ ३६ ॥
मम चैव समक्षं तां कन्यामाहूय भार्गवः ।
उक्तवान् दीनया वाचा मध्ये तेषां महात्मनाम् ॥ ३७ ॥
फिर मेरे सामने ही उन्होंने उस कन्याको बुलाकर उन सब महात्माओंके बीच दीनतापूर्ण वाणीमें उससे कहा ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि युद्धनिवृत्तौ पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें युद्धनिवृत्तिविषयक एक सौपचासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८५ ॥
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भीष्म और परशुरामके युद्धमें नारदजीद्वारा बीच- बचाव
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षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः अम्बाकी कठोर तपस्या राम उवाच
प्रत्यक्षमेतल्लोकानां सर्वेषामेव भाविनि ।
यथाशक्त्या मया युद्धं कृतं वै पौरुषं परम् ॥ १ ॥
- परशुराम बोले – भाविनि! यह सब लोगोंने प्रत्यक्ष देखा है कि मैंने ( तेरे लिये ) पूरी शक्ति लगाकर युद्ध किया और महान् पुरुषार्थ दिखाया है ॥ १ ॥
न चैवमपि शक्नोमि भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् ।
विशेषयितुमत्यर्थमुत्तमास्त्राणि दर्शयन् ॥ २ ॥
परंतु इस प्रकार उत्तमोत्तम अस्त्र प्रकट करके भी मैं शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मसे अपनी अधिक विशिष्टता नहीं दिखा सका ॥ २ ॥
एषा मे परमा शक्तिरेतन्मे परमं बलम् ।
यथेष्टं गम्यतां भद्रे किमन्यद् वा करोमि ते ॥ ३ ॥
मेरी अधिक- से - अधिक शक्ति, अधिक- से - अधिक बल इतना ही है । भद्रे! अब तेरी जहाँ इच्छा हो, चली जा, अथवा बता, तेरा दूसरा कौन -सा कार्य सिद्ध करूँ? ॥ ३ ॥
भीष्ममेव प्रपद्यस्व न तेऽन्या विद्यते गतिः ।
निर्जितो ह्यस्मि भीष्मेण महास्त्राणि प्रमुञ्चता ॥ ४ ॥
अब तू भीष्मकी ही शरण ले। तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है; क्योंकि महान् अस्त्रोंका प्रयोग करके भीष्मने मुझे जीत लिया है ॥ ४ ॥
एवमुक्त्वा ततो रामो विनिःश्वस्य महामनाः ।
तूष्णीमासीत् ततः कन्या प्रोवाच भृगुनन्दनम् ॥ ५ ॥
ऐसा कहकर महामना परशुराम लंबी साँस खींचते हुए मौन हो गये । तब राजकन्या अम्बाने उन भृगुनन्दनसे कहा— ॥ ५ ॥
भगवन्नेवमेवैतद् यथाऽऽह भगवांस्तथा ।
अजेयो युधि भीष्मोऽयमपि देवैरुदारधीः ॥ ६ ॥
‘ भगवन्! आपका कहना ठीक है । वास्तवमें ये उदारबुद्धि भीष्म युद्धमें देवताओंके लिये भी अजेय हैं ॥
यथाशक्ति यथोत्साहं मम कार्यं कृतं त्वया ।
अनिवार्य रणे वीर्यमस्त्राणि विविधानि च ॥ ७ ॥
‘ आपने अपनी पूरी शक्ति लगाकर पूर्ण उत्साहके साथ मेरा कार्य किया है । युद्धमें ऐसा पराक्रम दिखाया है, जिसे भीष्मके सिवा दूसरा कोई रोक नहीं सकता था । इसी प्रकार
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आपने नाना प्रकारके दिव्यास्त्र भी प्रकट किये हैं ॥ ७ ॥
न चैव शक्यते युद्धे विशेषयितुमन्ततः ।
न चाहमेनं यास्यामि पुनर्भीष्मं कथंचन ॥ ८ ॥
‘ परंतु अन्ततोगत्वा आप युद्धमें उनकी अपेक्षा अपनी विशेष्यता स्थापित न कर सके ।
मैं भी अब किसी प्रकार पुनः भीष्मके पास नहीं जाऊँगी ॥ ८ ॥
गमिष्यामि तु तत्राहं यत्र भीष्मं तपोधन ।
समरे पातयिष्यामि स्वयमेव भृगूद्वह ॥ ९ ॥
' भृगुश्रेष्ठ तपोधन! अब मैं वहीं जाऊँगी, जहाँ ऐसी बन सकूँ कि समरभूमिमें स्वयं ही भीष्मको मार गिराऊँ' ॥ ९ ॥
एवमुक्त्वा ययौ कन्या रोषव्याकुललोचना ।
तापस्ये धृतसंकल्पा सा मे चिन्तयती वधम् ॥ १० ॥
ऐसा कहकर रोषभरे नेत्रोंवाली वह राजकन्या मेरे वधके उपायका चिन्तन करती हुई तपस्याके लिये दृढ़ संकल्प लेकर वहाँसे चली गयी ॥ १० ॥
ततो महेन्द्रं सह तैर्मुनिभिर्भृगुसत्तमः ।
यथाऽऽगतं तथा सोऽगान्मामुपामन्त्र्य भारत ॥ ११ ॥
भारत! तदनन्तर भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी उन महर्षियोंके साथ मुझसे विदा ले जैसे आये थे, वैसे ही महेन्द्र पर्वतपर चले गये ॥ ११ ॥
ततो रथं समारुह्य स्तूयमानो द्विजातिभिः ।
प्रविश्य नगरं मात्रे सत्यवत्यै न्यवेदयम् ॥ १२ ॥
यथावृत्तं महाराज सा च मां प्रत्यनन्दत ।
पुरुषांश्चादिशं प्राज्ञान् कन्यावृत्तान्तकर्मणि ॥ १३ ॥
महाराज! तत्पश्चात् मैंने भी ब्राह्मणके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए रथपर आरूढ़ हो हस्तिनापुरमें आकर माता सत्यवतीसे सब समाचार यथार्थरूपसे निवेदन किया । माताने भी मेरा अभिनन्दन किया । इसके बाद मैंने कुछ बुद्धिमान् पुरुषोंको उस कन्याके वृत्तान्तका पता लगानेके कार्यमें नियुक्त कर दिया ॥ १२-१३ ॥
दिवसे दिवसे ह्यस्या गतिजल्पितचेष्टितम् ।
प्रत्याहरंश्च मे युक्ताः स्थिताः प्रियहिते सदा ॥ १४ ॥
मेरे लगाये हुए गुप्तचर सदा मेरे प्रिय एवं हितमें संलग्न रहनेवाले थे । वे प्रतिदिन उस कन्याकी गतिविधि, बोलचाल और चेष्टाका समाचार मेरे पास पहुँचाया करते थे ॥ १४ ॥
यदैव हि वनं प्रायात् सा कन्या तपसे धृता ।
तदैव व्यथितो दीनो गतचेता इवाभवम् ॥ १५ ॥
जिस दिन वह कन्या तपस्याका निश्चय करके वनमें गयी, उसी दिन मैं व्यथित, दीन और अचेत - सा हो गया ॥ १५ ॥
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न हि मां क्षत्रियः कश्चिद् वीर्येण व्यजयद् युधि ।
ऋते ब्रह्मविदस्तात तपसा संशितव्रतात् ॥ १६ ॥
तात! जो तपस्याके द्वारा कठोर व्रतका पालन करनेवाले हैं, उन ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण परशुरामजीको छोड़कर कोई भी क्षत्रिय अबतक युद्धमें मुझे पराजित नहीं कर सका है ॥ १६ ॥
अपि चैतन्मया राजन् नारदेऽपि निवेदितम् ।
व्यासे चैव तथा कार्यं तौ चोभौ मामवोचताम् ॥ १७ ॥
न विषादस्त्वया कार्यो भीष्म काशिसुतां प्रति ।
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमुत्सहेत् ॥ १८ ॥
राजन्! मैंने यह वृत्तान्त देवर्षि नारद और महर्षि व्याससे भी निवेदन किया था । उस समय उन दोनोंने मुझसे कहा- ' भीष्म! तुम्हें काशिराजकी कन्याके विषयमें तनिक भी विषाद नहीं करना चाहिये। दैवके विधानको पुरुषार्थके द्वारा कौन टाल सकता है? ' ॥ १७-१८ ॥
सा कन्या तु महाराज प्रविश्याश्रममण्डलम् ।
यमुनातीरमाश्रित्य तपस्तेपेऽतिमानुषम् ॥ १ ९ ॥
महाराज! फिर उस कन्याने आश्रममण्डलमें पहुँचकर यमुनाके तटका आश्रय ले ऐसी कठोर तपस्या की, जो मानवीय शक्तिसे परे है ॥ १ ९ ॥
निराहारा कृशा रुक्षा जटिला मलपङ्किनी ।
षण्मासान् वायुभक्षा च स्थाणुभूता तपोधना ॥ २० ॥
उसने भोजन छोड़ दिया, वह दुबली तथा रुक्ष हो गयी । सिरपर केशोंकी जटा बन गयी । शरीरमें मैल और कीचड़ जम गयी । वह तपोधना कन्या छः महीनोंतक केवल वायु पीकर ठूंठे काठकी भाँति निश्चलभावसे खड़ी रही ॥ २० ॥
यमुनाजलमाश्रित्य संवत्सरमथापरम् ।
उदवासं निराहारा पारयामास भाविनी ॥ २१ ॥
फिर एक वर्षतक यमुनाजीके जलमें घुसकर बिना कुछ खाये- पीये वह भाविनी राजकन्या जलमें ही रहकर तपस्या करती रही ॥ २१ ॥
शीर्णपर्णेन चैकेन पारयामास सा परम् ।
संवत्सरं तीव्रकोपा पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठिता ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् तीव्र क्रोधसे युक्त हुई अम्बाने पैरके अँगूठेके अग्रभागपर खड़ी हो अपने-आप झड़कर गिरा हुआ केवल एक सूखा पत्ता खाकर एक वर्ष व्यतीत किया ॥
एवं द्वादश वर्षाणि तापयामास रोदसी ।
निवर्त्यमानापि च सा ज्ञातिभिर्नैव शक्यते ॥ २३ ॥