श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1181–1190

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1181–1190

पृष्ठ 1181

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इस प्रकार बारह वर्षोंतक कठोर तपस्यामें संलग्न हो उसने पृथ्वी और आकाशको संतप्त कर दिया । उसके जातिवालोंने आकर उसे उस कठोर व्रतसे निवृत्त करनेकी चेष्टा की; परंतु उन्हें सफलता न मिल सकी ॥ २३ ॥

ततोऽगमद् वत्सभूमिं सिद्धचारणसेविताम् ।

आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम् ॥ २४ ॥

तत्र पुण्येषु तीर्थेषु साऽऽप्लुताङ्गी दिवानिशम् ।

व्यचरत् काशिकन्या सा यथाकामविचारिणी ॥ २५ ॥

तदनन्तर वह सिद्धों और चारणोंद्वारा सेवित वत्सदेशकी भूमिमें गयी और वहाँ पुण्यशील तपस्वी महात्माओंके आश्रमोंमें विचरने लगी । काशिराजकी वह कन्या दिन - रात वहाँके पुण्य तीर्थोंमें स्नान करती और अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र विचरती रहती थी ॥

नन्दाश्रमे महाराज तथोलूकाश्रमे शुभे ।

चवनस्याश्रमे चैव ब्रह्मणः स्थान एव च ॥ २६ ॥

प्रयागे देवयजने देवारण्येषु चैव ह ।

भोगवत्यां महाराज कौशिकस्याश्रमे तथा ॥ २७ ॥

माण्डव्यस्याश्रमे राजन् दिलीपस्याश्रमे तथा ।

रामह्रदे च कौरव्य पैलगर्गस्य चाश्रमे ॥ २८ ॥

एतेषु तीर्थेषु तदा काशिकन्या विशाम्पते ।

आप्लावयत गात्राणि व्रतमास्थाय दुष्करम् ॥ २ ९ ॥

महाराज! शुभकारक नन्दाश्रम, उलूकाश्रम, च्यवनाश्रम, ब्रह्मस्थान, देवताओंके यज्ञस्थान प्रयाग, देवारण्य, भोगवती, कौशिकाश्रम, माण्डव्याश्रम, दिलीपाश्रम, रामह्रद और पैलगर्गाश्रम— क्रमशः इन सभी तीर्थोंमें उन दिनों काशिराजकी कन्याने कठोर व्रतका आश्रय ले स्नान किया ॥ २६–२९ ॥

तामब्रवीच्च कौरव्य मम माता जले स्थिता ।

किमर्थं क्लिश्यसे भद्रे तथ्यमेव वदस्व मे ॥ ३० ॥

कुरुनन्दन! उस समय मेरी माता गंगाने जलमें प्रकट होकर अम्बासे कहा — ' भद्रे! तू

किसलिये शरीरको इतना क्लेश देती है । मुझे ठीक- ठीक बता ' ॥

सैनामथाब्रवीद् राजन् कृताञ्जलिरनिन्दिता ।

भीष्मेण समरे रामो निर्जितश्चारुलोचने ॥ ३१ ॥

कोऽन्यस्तमुत्सहेज्जेतुमुद्यतेषं महीपतिः ।

साहं भीष्मविनाशाय तपस्तप्स्ये सुदारुणम् ॥ ३२ ॥

राजन्! तब साध्वी अम्बाने हाथ जोड़कर गंगाजीसे कहा- ' चारुलोचने! भीष्मने युद्धमें परशुरामजीको परास्त कर दिया; फिर दूसरा कौन ऐसा राजा है, जो धनुष- बाण

पृष्ठ 1182

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लेकर खड़े हुए भीष्मको युद्धमें परास्त कर सके? अतः मैं भीष्मके विनाशके लिये अत्यन्त कठोर तपस्या कर रही हूँ ॥ ३१-३२ ॥

विचरामि महीं देवि यथा हन्यामहं नृपम् ।

एतद् व्रतफलं देवि परमस्मिन् यथा हि मे ॥ ३३ ॥

‘ देवि! मैं इस भूतलपर विभिन्न तीर्थोंमें इसीलिये विचर रही हूँ कि योग्य बनकर मैं स्वयं ही भीष्मको मार सकूँ । भगवति! इस जगत्में मेरे व्रत और तपस्याका यही सर्वोत्तम फल है, जैसा मैंने आपको बताया है ' ॥ ३३ ॥

ततोऽब्रवीत् सागरगा जिह्मं चरसि भाविनि ।

नैष कामोऽनवद्याङ्गि शक्यः प्राप्तुं त्वयाबले ॥ ३४ ॥

तब सतरगामिनी गंगानदीने उससे कहा- 'भाविनि! तू कुटिल आचरण कर रही है ।

सुन्दर अंगोंवाली अबले! तेरा यह मनोरथ कभी पूर्ण नहीं हो सकता ॥

यदि भीष्मविनाशाय काश्ये चरसि वै व्रतम् ।

व्रतस्था च शरीरं त्वं यदि नाम विमोक्ष्यसि ॥ ३५ ॥

नदी भविष्यसि शुभे कुटिला वार्षिकोदका ।

दुस्तीर्था न तु विज्ञेया वार्षिकी नाष्टमासिकी ॥ ३६ ॥

‘ काशिराजकन्ये! यदि भीष्मके विनाशके लिये तू प्रयत्न कर रही है और व्रतमें स्थित रहकर ही यदि तू अपना शरीर छोड़ेगी तो शुभे! तुझे टेढ़ी - मेढ़ी नदी होना पड़ेगा । केवल बरसातमें ही तेरे भीतर जल दिखायी देगा । तेरे भीतर तीर्थ या स्नानकी सुविधा बड़ी कठिनाईसे होगी । तू केवल बरसातकी नदी समझी जायगी । शेष आठ महीनोंमें तेरा पता नहीं लगेगा ॥

भीमग्राहवती घोरा सर्वभूतभयङ्करी ।

एवमुक्त्वा ततो राजन् काशिकन्यां न्यवर्तत ॥ ३७ ॥

माता मम महाभागा स्मयमानेव भाविनी ।

कदाचिदष्टमे मासि कदाचिद् दशमे तथा ।

न प्राश्नीतोदकमपि पुनः सा वरवर्णिनी ॥ ३८ ॥

‘ बरसातमें भी भयंकर ग्राहोंसे भरी रहनेके कारण तू समस्त प्राणियोंके लिये अत्यन्त भयंकर और घोरस्वरूपा बनी रहेगी । ' राजन्! काशिराजकी कन्यासे ऐसा कहकर मेरी परम सौभाग्यशालिनी माता गंगा देवी मुसकराती हुई लौट गयीं । तदनन्तर वह सुन्दरी कन्या पुनः कठोर तपस्यामें प्रवृत्त हो कभी आठवें और कभी दसवें महीनेतक जल भी नहीं पीती थी ॥ ३७-३८ ॥

सा वत्सभूमिं कौरव्य तीर्थलोभात् ततस्ततः ।

पतिता परिधावन्ती पुनः काशिपतेः सुता ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 1183

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कुरुनन्दन! काशिराजकी वह कन्या तीर्थसेवनके लोभसे वत्सदेशकी भूमिपर इधर-उधर दौड़ती फिरती थी ॥

सा नदी वत्सभूम्यां तु प्रथिताम्बेति भारत ।

वार्षिकी ग्राहबहुला दुस्तीर्था कुटिला तथा ॥ ४० ॥

भारत! कुछ कालके पश्चात् वह वत्सदेशकी भूमिमें अम्बा नामसे प्रसिद्ध नदी हुई, जो केवल बरसातमें जलसे भरी रहती थी । उसमें बहुत- से ग्राह निवास करते थे । उसके भीतर उतरना और स्नान आदि तीर्थकृत्योंका सम्पादन बहुत ही कठिन था । वह नदी टेढ़ी - मेढ़ी होकर बहती थी ॥ ४० ॥

सा कन्या तपसा तेन देहार्धेन व्यजायत ।

नदी च राजन् वत्सेषु कन्या चैवाभवत् तदा ॥ ४१ ॥

राजन्! राजकन्या अम्बा उस तपस्याके प्रभावसे आधे शरीरसे तो अम्बा नामकी नदी हो गयी और आधे अंगसे वत्सदेशमें ही एक कन्या होकर प्रकट हुई ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि अम्बातपस्यायां षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अम्बाका तपस्याविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥

पृष्ठ 1184

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सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः अम्बाका द्वितीय जन्ममें पुनः तप करना और महादेवजीसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उसका चिताकी आगमें प्रवेश भीष्म उवाच

ततस्ते तापसाः सर्वे तपसे धृतनिश्चयाम् ।

दृष्ट्वा न्यवर्तयंस्तात किं कार्यमिति चाब्रुवन् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - तात! उस जन्ममें भी उसे तपस्या करनेका ही दृढ़ निश्चय लिये देख सब तपस्वी महात्माओंने उसे रोका और पूछा - ' तुझे क्या करना है? ' ॥ १ ॥

तानुवाच ततः कन्या तपोवृद्धानृषींस्तदा ।

निराकृतास्मि भीष्मेण भ्रंशिता पतिधर्मतः ॥ २ ॥

तब उस कन्याने उन तपोवृद्ध महर्षियोंसे कहा- ' भीष्मने मुझे ठुकराया है और मुझे पतिकी प्राप्ति एवं उसकी सेवारूप धर्मसे वंचित कर दिया है ॥ २ ॥

वधार्थं तस्य दीक्षा मे न लोकार्थं तपोधनाः ।

निहत्य भीष्मं गच्छेयं शान्तिमित्येव निश्चयः ॥ ३ ॥

‘ तपोधनो! मेरी यह तपकी दीक्षा पुण्यलोकोंकी प्राप्तिके लिये नहीं, भीष्मका वध करनेके लिये है । मेरा यह निश्चय है कि भीष्मको मार देनेपर मेरे हृदयको शान्ति मिल जायगी ॥ ३ ॥

यत्कृते दुःखवसतिमिमां प्राप्तास्मि शाश्वतीम् ।

पतिलोकाद् विहीना च नैव स्त्री न पुमानिह ॥ ४ ॥

नाहत्वा युधि गाङ्गेयं निवर्तिष्ये तपोधनाः ।

एष मे हृदि संकल्पो यदिदं कथितं मया ॥ ५ ॥

‘ जिसके कारण मैं सदाके लिये इस दुःखमयी परिस्थितिमें पड़ गयी हूँ और पतिलोकसे वंचित होकर इस जगत्में न तो स्त्री रह गयी हूँ न पुरुष ही । उस गंगापुत्र भीष्मको युद्धमें मारे बिना तपस्यासे निवृत्त नहीं होऊँगी । तपोधनो! यही मेरे हृदयका संकल्प है, जिसे मैंने स्पष्ट बता दिया ॥ ४-५ ॥

स्त्रीभावे परिनिर्विण्णा पुंस्त्वार्थे कृतनिश्चया ।

भीष्मे प्रतिचिकीर्षामि नास्मि वार्येति वै पुनः ॥ ६ ॥

‘ मुझे स्त्रीके स्वरूपसे विरक्ति हो गयी है, अतः पुरुषशरीरकी प्राप्तिके लिये दृढ़ निश्चय लेकर तपस्यामें प्रवृत्त हुई हूँ। भीष्मसे अवश्य बदला लेना चाहती हूँ, अतः आपलोग मुझे रोकें नहीं' ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1185

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तां देवो दर्शयामास शूलपाणिरुमापतिः ।

मध्ये तेषां महर्षीणां स्वेन रूपेण तापसीम् ॥ ७ ॥

तब शूलपाणि उमावल्लभ भगवान् शिवने उन महर्षियोंके बीचमें अपने साक्षात् स्वरूपसे प्रकट होकर उस तपस्विनीको दर्शन दिया ॥ ७ ॥

छन्द्यमाना वरेणाथ सा वव्रे मत्पराजयम् ।

हनिष्यसीति तां देवः प्रत्युवाच मनस्विनीम् ॥ ८ ॥

फिर इच्छानुसार वर माँगनेका आदेश देनेपर उसने मेरी पराजयका वर माँगा । तब महादेवजीने उस मनस्विनीसे कहा- ' तू अवश्य भीष्मका वध करेगी' ॥ ८ ॥

ततः सा पुनरेवाथ कन्या रुद्रमुवाच ह ।

उपपद्येत कथं देव स्त्रिया युधि जयो मम ॥ ९ ॥

यह सुनकर उस कन्याने भगवान् रुद्रसे पुनः पूछा— ' देव! मैं तो स्त्री हूँ । मुझे युद्धमें विजय कैसे प्राप्त हो सकती है? ॥ ९ ॥

स्त्रीभावेन च मे गाढं मनः शान्तमुमापते ।

प्रतिश्रुतश्च भूतेश त्वया भीष्मपराजयः ॥ १० ॥

‘ उमापते! भूतनाथ! स्त्रीरूप होनेके कारण मेरा मन बहुत निस्तेज है । इधर आपने मेरे द्वारा भीष्मके पराजित होनेका वरदान दिया है ॥ १० ॥

यथा स सत्यो भवति तथा कुरु वृषध्वज ।

यथा हन्यां समागम्य भीष्मं शान्तनवं युधि ॥ ११ ॥

‘ वृषध्वज! आपका यह वरदान जिस प्रकार सत्य हो, वैसा कीजिये, जिससे मैं युद्धमें शान्तनुपुत्र भीष्मका सामना करके उन्हें मार सकूँ' ॥ ११ ॥

तामुवाच महादेवः कन्यां किल वृषध्वजः ।

न मे वागनृतं प्राह सत्यं भद्रे भविष्यति ॥ १२ ॥

तब वृषभध्वज महादेवजीने उन कन्यासे कहा- ' भद्रे! मेरी वाणीने कभी झूठ नहीं कहा है; अतः मेरी बात सत्य होकर रहेगी ॥ १२ ॥

हनिष्यसि रणे भीष्मं पुरुषत्वं च लप्स्यसे ।

स्मरिष्यसि च तत् सर्वं देहमन्यं गता सती ॥ १३ ॥

‘ तू रणक्षेत्रमें भीष्मको अवश्य मारेगी और इसके लिये आवश्यकतानुसार पुरुषत्व भी प्राप्त कर लेगी । दूसरे शरीरमें जानेपर तुझे इन सब बातोंका स्मरण भी बना रहेगा ॥ १३ ॥

द्रुपदस्य कुले जाता भविष्यसि महारथः ।

शीघ्रास्त्रश्चित्रयोधी च भविष्यसि सुसम्मतः ॥ १४ ॥

'तु द्रुपदके कुलमें उत्पन्न हो महारथी वीर होगी । तुझे शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेकी कलामें निपुणता प्राप्त होगी । साथ ही तू विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाली सम्मानित योद्धा होगी ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1186

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यथोक्तमेव कल्याणि सर्वमेतद् भविष्यति ।

भविष्यसि पुमान् पश्चात् कस्माच्चित्कालपर्ययात् ॥ १५ ॥

‘ कल्याणि! मैंने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा होगा। तू पहले तो कन्यारूपमें ही उत्पन्न होगी; फिर कुछ कालके पश्चात् पुरुष हो जायगी' ॥ १५ ॥

एवमुक्त्वा महादेवः कपर्दी वृषभध्वजः ।

पश्यतामेव विप्राणां तत्रैवान्तरधीयत ॥ १६ ॥

ऐसा कहकर जटाजूटधारी वृषभध्वज महादेवजी उन सब ब्राह्मणोंके देखते - देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १६ ॥

ततः सा पश्यतां तेषां महर्षीणामनिन्दिता ।

समाहृत्य वनात् तस्मात् काष्ठानि वरवर्णिनी ॥ १७ ॥

चितां कृत्वा सुमहतीं प्रदाय च हुताशनम् ।

प्रदीप्ते ऽग्नौ महाराज रोषदीप्तेन चेतसा ॥ १८ ॥

उक्त्वा भीष्मवधायेति प्रविवेश हुताशनम् ।

ज्येष्ठा काशिसुता राजन् यमुनामभितो नदीम् ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर उन महर्षियोंके देखते - देखते उस साध्वी एवं सुन्दरी कन्याने उस वनसे बहुत-सी लकड़ियोंका संग्रह किया और एक विशाल चिता बनाकर उसमें आग लगा दी । महाराज! जब आग प्रज्वलित हो गयी, तब वह क्रोधसे जलते हुए हृदयसे भीष्मके वधका संकल्प बोलकर उस आगमें प्रवेश कर गयी । राजन्! इस प्रकार काशिराजकी वह ज्येष्ठ पुत्री अम्बा दूसरे जन्ममें यमुनानदीके किनारे चिताकी आगमें जलकर भस्म हो गयी ॥ १७ -१ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि अम्बाहुताशनप्रवेशे सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अम्बाका अग्निमें प्रवेशविषयक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८७ ॥

पृष्ठ 1187

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1187 का मूल पृष्ठ
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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः अम्बाका राजा द्रुपदके यहाँ कन्याके रूपमें जन्म, राजा तथा रानीका उसे पुत्ररूपमें प्रसिद्ध करके उसका नाम शिखण्डी रखना दुर्योधन उवाच

कथं शिखण्डी गाङ्गेय कन्या भूत्वा पुरा तदा ।

पुरुषोऽभूद् युधिश्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

दुर्योधनने पूछा- समरश्रेष्ठ गंगानन्दन पितामह! शिखण्डी पहले कन्यारूपमें उत्पन्न होकर फिर पुरुष कैसे हो गया, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

भार्या तु तस्य राजेन्द्र द्रुपदस्य महीपतेः ।

महिषी दयिता ह्यासीदपुत्रा च विशाम्पते ॥ २ ॥

= भीष्मने कहा – प्रजापालक राजेन्द्र! राजा द्रुपदकी प्यारी पटरानीके कोई पुत्र नहीं था ॥ २ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु द्रुपदो वै महीपतिः ।

अपत्यार्थे महाराज तोषयामास शङ्करम् ॥ ३ ॥

महाराज! इसी समय भूपाल द्रुपदने संतानकी प्राप्तिके लिये भगवान् शंकरको संतुष्ट किया ॥ ३ ॥

अस्मद्वधार्थं निश्चित्य तपो घोरं समास्थितः ।

ऋते कन्यां महादेव पुत्रो मे स्यादिति ब्रुवन् ॥ ४ ॥

भगवन् पुत्रमिच्छामि भीष्मं प्रतिचिकीर्षया ।

इत्युक्तो देवदेवेन स्त्रीपुमांस्ते भविष्यति ॥ ५ ॥

निवर्तस्व महीपाल नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । हमलोगोंके वधके लिये पुत्र पानेका निश्चित संकल्प लेकर उन्होंने यह कहते हुए घोर तपस्या की थी कि ' महादेव! मुझे कन्या नहीं, पुत्र प्राप्त हो। भगवन्! मैं भीष्मसे बदला लेनेके लिये पुत्र चाहता हूँ' । यह सुनकर देवाधिदेव महादेवजीने कहा- ' भूपाल! तुम्हें पहले कन्या प्राप्त होगी, फिर वही पुरुष हो जायगी । अब तुम लौटो । मैंने जो कहा है वह कभी मिथ्या नहीं हो सकता' ॥ ४-५३ ॥ स तु गत्वा च नगरं भार्यामिदमुवाच ह ॥ ६ ॥

कृतो यत्नो महादेवस्तपसाऽऽराधितो मया ।

पृष्ठ 1188

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कन्या भूत्वा पुमान् भावी इति चोक्तोऽस्मि शम्भुना ॥ ७ ॥

पुनः पुनर्याच्यमानो दिष्टमित्यब्रवीच्छिवः ।

न तदन्यच्च भविता भवितव्यं हि तत् तथा ॥ ८ ॥

तब राजा द्रुपद नगरको लौट गये और अपनी पत्नीसे इस प्रकार बोले — ‘ देवि! मैंने बड़ा प्रयत्न किया । तपस्याके द्वारा महादेवजीकी आराधना की । तब भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर कहा – पहले तुम्हें पुत्री होगी; फिर वही पुत्रके रूपमें परिणत हो जायगी । मैंने बार-बार केवल पुत्रके लिये याचना की; परंतु भगवान् शिवने इसे दैवका विधान बताया है और

कहा — ‘ यह बदल नहीं सकता । जो कहा गया है, वही होगा' ॥ ६–८ ॥

ततः सा नियता भूत्वा ऋतुकाले मनस्विनी ।

पत्नी द्रुपदराजस्य द्रुपदं प्रविवेश ह ॥ ९ ॥

लेभे गर्भं यथाकालं विधिदृष्टेन कर्मणा ।

पार्षतस्य महीपाल यथा मां नारदोऽब्रवीत् ॥ १० ॥

ततो दधार सा देवी गर्भं राजीवलोचना । तदनन्तर द्रुपदराजकी मनस्विनी पत्नीने नियमपूर्वक रहकर द्रुपदके साथ संयोग किया । शास्त्रीय विधिसे गर्भाधान- संस्कार होनेपर यथासमय उसने गर्भ धारण किया । राजन्! जैसा कि मुझसे नारदजीने कहा था । द्रुपदकी कमलनयनी रानीने इसी प्रकार गर्भ धारण किया ॥ ९ -१०३ ॥ तां स राजा प्रियां भार्यां द्रुपदः कुरुनन्दन ॥ ११ ॥

पुत्रस्नेहान्महाबाहुः सुखं पर्यचरत् तदा ।

सर्वानभिप्रायकृतान् भार्यालभत कौरव ॥ १२ ॥

कुरुनन्दन! महाबाहु द्रुपदने भावी पुत्रके प्रति स्नेह होनेके कारण अपनी प्यारी पत्नीको बड़े सुखसे रखा । उसका आदर- सत्कार किया । कुरुकुलरत्न! रानीको जिन - जिन वस्तुओंकी इच्छा हुई, वे सब उनके सामने प्रस्तुत की गयीं ॥ ११-१२ ॥

अपुत्रस्य सतो राज्ञो द्रुपदस्य महीपतेः ।

यथाकालं तु सा देवी महिषी द्रुपदस्य ह ॥ १३ ॥

कन्यां प्रवररूपां तु प्राजायत नराधिप । नरेश्वर! पुत्रहीन राजा द्रुपदकी उस महारानीने समय आनेपर एक परम सुन्दरी कन्याको जन्म दिया ॥ १३३ ॥

अपुत्रस्य तु राज्ञः सा द्रुपदस्य मनस्विनी ॥ १४ ॥

ख्यापयामास राजेन्द्र पुत्रो ह्येष ममेति वै । राजेन्द्र! तब पुत्रहीन राजा द्रुपदकी मनस्विनी रानीने यह घोषणा करा दी कि यह मेरा पुत्र है ॥ १४३ ॥

ततः स राजा द्रुपदः प्रच्छन्नाया नराधिप ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1189

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पुत्रवत् पुत्रकार्याणि सर्वाणि समकारयत् ।

रक्षणं चैव मन्त्रस्य महिषी द्रुपदस्य सा ॥ १६ ॥

चकार सर्वयत्नेन ब्रुवाणा पुत्र इत्युत ।

न च तां वेद नगरे कश्चिदन्यत्र पार्षतात् ॥ १७ ॥

नरेन्द्र! इसके बाद राजा द्रुपदने छिपाकर रखी हुई उस कन्याके सभी संस्कार पुत्रके ही समान कराये । द्रुपदकी रानीने सब प्रकारका प्रयत्न करके इस रहस्यको गुप्त रखनेकी व्यवस्था की । वह उस कन्याको पुत्र कहकर ही पुकारती थी । सारे नगरमें केवल द्रुपदको छोड़कर दूसरा कोई नहीं जानता था कि वह कन्या है ॥ १५–१७ ॥

श्रद्दधानो हि तद्वाक्यं देवस्याच्युततेजसः ।

छादयामास तां कन्या पुमानिति च सोऽब्रवीत् ॥ १८ ॥

जिनका तेज कभी क्षीण नहीं होता, उन महादेवजीके वचनोंपर श्रद्धा रखनेके कारण राजा द्रुपदने उसके कन्याभावको छिपाया और पुत्र होनेकी घोषणा कर दी ॥

जातकर्माणि सर्वाणि कारयामास पार्थिवः ।

पुंवद्विधानयुक्तानि शिखण्डीति च तां विदुः ॥ १ ९ ॥

राजाने बालकके सम्पूर्ण जातकर्म पुत्रोचित विधानसे ही करवाये, लोग उसे ‘शिखण्डी ’ के नामसे जानते थे ॥ १ ९ ॥

अहमेकस्तु चारेण वचनान्नारदस्य च ।

ज्ञातवान् देववाक्येन अम्बायास्तपसा तथा ॥ २० ॥

केवल मैं गुप्तचरके दिये हुए समाचारसे, नारदजीके कथनसे, महादेवजीके वरदान-वाक्यसे तथा अम्बाकी तपस्यासे शिखण्डीके कन्या होनेका वृत्तान्त जान गया था ॥ २० । इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि शिखण्ड्युत्पत्ती अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमेंशिखण्डीका उत्पत्तिविषयक एक सौ अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८८ ॥

पृष्ठ 1190

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एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः शिखण्डीका विवाह तथा उसके स्त्री होनेका समाचार पाकर उसके श्वशुर दशार्णराजका महान् कोप भीष्म उवाच

चकार यत्नं द्रुपदः सुतायाः सर्वकर्मसु ।

ततो लेख्यादिषु तथा शिल्पेषु च परंतप ॥ १ ॥

भीष्म कहते हैं - तदनन्तर द्रुपदने अपनी पुत्रीको लेखनशिक्षा और शिल्पशिक्षा आदि सभी कार्योंकी योग्यता प्राप्त करानेके लिये विशेष प्रयत्न किया ॥ १ ॥

इष्वस्त्रै चैव राजेन्द्र द्रोणशिष्यो बभूव ह ।

तस्य माता महाराज राजानं वरवर्णिनी ॥ २ ॥

चोदयामास भार्यार्थं कन्यायाः पुत्रवत् तदा ।

ततस्तां पार्षतो दृष्ट्वा कन्यां सम्प्राप्तयौवनाम् ।

स्त्रियं मत्वा ततश्चिन्तां प्रपेदे सह भार्यया ॥ ३ ॥

राजेन्द्र! धनुर्विद्याके लिये शिखण्डी द्रोणाचार्यका शिष्य हुआ । महाराज! शिखण्डीकी सुन्दरी माताने राजा द्रुपदको प्रेरित किया कि वे उसके पुत्रके लिये बहू ला दें । वह अपनी कन्याका पुत्रके समान ब्याह करना चाहती थी । द्रुपदने देखा, मेरी बेटी जवान हो गयी तो भी अबतक स्त्री ही बनी हुई है ( वरदानके अनुसार पुरुष नहीं हो सकी ), इससे पत्नीसहित उनके मनमें बड़ी चिन्ता हुई ॥ २-३ ॥ द्रुपदउवाच

कन्या ममेयं सम्प्राप्ता यौवनं शोकवर्धिनी ।

मया प्रच्छादिता चेयं वचनाच्छूलपाणिनः ॥ ४ ॥

द्रुपद बोले - देवि! मेरी यह कन्या युवावस्थाको प्राप्त होकर मेरा शोक बढ़ा रही है । मैंने भगवान् शंकरके कथनपर विश्वास करके अबतक इसके कन्याभावको छिपा रखा था ॥ ४ ॥

भार्योवाच

न तन्मिथ्या महाराज भविष्यति कथंचन ।

त्रैलोक्यकर्ता कस्माद्धि वृथा वक्तुमिहार्हति ॥ ५ ॥

यदि ते रोचते राजन् वक्ष्यामि शृणु मे वचः ।

श्रुत्वेदानीं प्रपद्येथाः स्वां मतिं पृषतात्मज ॥ ६ ॥