सारस्वतोपाख्यान : कुरुक्षेत्र की भूमि को राजा कुरु ने किस प्रयोजन से जोता था?
तपस्या और पुण्य की भूमि
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ४ · शल्यपर्व → गदापर्व · अध्याय 37–54 · पृष्ठ 2743–2880
10,003 शब्द · 51 मिनटका पाठ · 43 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
महाभारत के प्रसङ्गों का वर्णन
वैशम्पायन जी ने कहा—"राजन्! उदपानतीर्थ से चलकर हलधारी बलराम विनशनतीर्थ में आए। उस स्थान पर शूद्रों और आभीरों के प्रति द्वेष होने के कारण सरस्वती नदी विनष्ट होकर अदृश्य हो गई है, इसीलिए ऋषिगण उसे सदा 'विनशनतीर्थ' कहते हैं।
तान् क्रतून् भरतश्रेष्ठ शतकृत्वो महाद्युतिः ।
पूरयामास विधिवत् ततः ख्यातः शतक्रतुः ॥
भरतश्रेष्ठ! महातेजस्वी इन्द्रने उन यज्ञोंको सौ बार विधिपूर्वक पूर्ण किया, इसलिये इन्द्र शतक्रतु नामसे विख्यात हो गये ।
वहाँ से आगे बढ़कर महाबली बलराम सुभूमिक तीर्थ में गए। सरस्वती के सुन्दर तट पर स्थित उस तीर्थ में गौरवर्ण और निर्मल मुख वाली सुन्दरी अप्सराएँ, आलस्य त्यागकर नाना प्रकार की विमल क्रीड़ाओं द्वारा मनोरञ्जन करती हैं। वह पुण्य तीर्थ ब्राह्मणों द्वारा सेवित है, जहाँ गन्धर्वों सहित देवता भी प्रतिमास आया करते हैं। वहाँ गन्धर्वगण और अप्सराएँ एक साथ मिलकर सुखपूर्वक विचरण करती दिखाई देती हैं। देवता और पितर वहाँ लता-वेलों के साथ आमोदित होते हैं और उन पर सदा पवित्र एवं दिव्य पुष्पों की वर्षा बारम्बार होती रहती है। सरस्वती के सुन्दर तट पर स्थित वह अप्सराओं की मङ्गलमयी क्रीडाभूमि 'सुभूमिक' नाम से विख्यात है।
रोहिणीसुत बलराम ने वहाँ स्नान करके ब्राह्मणों को धन दान किया और दिव्य गीत तथा वाद्यों की ध्वनि सुनकर देवताओं, गन्धर्वों तथा राक्षसों की अनेक मूर्तियों का दर्शन किया। तत्पश्चात् वे गन्धर्वतीर्थ में गए। वहाँ तपस्या में लगे हुए विश्वावसु आदि गन्धर्व अत्यन्त मनोरम नृत्य, वाद्य और गीत का आयोजन करते रहते हैं।
वहाँ बलरामजी ने ब्राह्मणों को भेड़, बकरी, गाय, गदहा, ऊँट और सोना-चाँदी जैसे नाना प्रकार के धन देकर उन्हें इच्छानुसार भोजन कराया। प्रचुर धन से सन्तुष्ट करके वे ब्राह्मणों के साथ वहाँ से प्रस्थान करने लगे; उस समय ब्राह्मण लोग बलरामजी की बड़ी स्तुति कर रहे थे। जनमेजय! वहाँ तपस्या से पवित्र अन्तःकरण वाले महात्मा वृद्ध गर्ग ने सरस्वती के उस शुभ तीर्थ में काल का ज्ञान, ग्रहों और नक्षत्रों के उलट-फेर तथा शुभ लक्षणों की जानकारी प्राप्त की थी। उन्हीं के नाम से वह तीर्थ 'गर्गस्रोत' कहलाता है। वहाँ उत्तम व्रत का पालन करने वाले ऋषियों ने कालज्ञान के लिए सदा महाभाग गर्गमुनि की उपासना की थी।
उत्पाता दारुणाश्चैव शुभाश्च जनमेजय ॥
सरस्वत्याः शुभे तीर्थे विदिता वै महात्मना ।
तस्य नाम्ना च तत् तीर्थं गर्गस्रोत इति स्मृतम् ॥
जनमेजय! वहाँ तपस्यासे पवित्र अन्तःकरणवाले महात्मा वृद्ध गर्गने सरस्वतीके उस शुभ तीर्थमें कालका ज्ञान, कालकी गति, ग्रहों और नक्षत्रोंके उलट - फेर, दारुण उत्पात तथा शुभ लक्षण– इन सभी बातोंकी जानकारी प्राप्त कर ली थी । उन्हींके नामसे वह तीर्थ गर्गस्रोत कहलाता है ।
श्वेत-चन्दन से चर्चित और नीलाम्बर धारण किए हुए महायशस्वी बलरामजी ने विशुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षियों को विधिपूर्वक धन देकर और ब्राह्मणों को नाना प्रकार के भक्ष्य-भोज्य पदार्थ समर्पित करके शङ्खतीर्थ की ओर प्रस्थान किया। सरस्वती के तट पर बलरामजी ने 'महाशङ्ख' नामक एक वृक्ष देखा, जो ताल-चिह्नित ध्वजा वाला था और महान् मेरुपर्वत के समान ऊँचा तथा श्वेताचल के समान उज्ज्वल था। उस वृक्ष के नीचे ऋषियों का समूह निवास करता था; वह वृक्ष सरस्वती के तट पर ही उत्पन्न हुआ था। उस वृक्ष के आस-पास यक्ष, विद्याधर, अत्यन्त तेजस्वी राक्षस, अनन्त बलशाली पिशाच और सहस्रों की सङ्ख्या में सिद्धगण निवास करते थे। वे सब अन्न छोड़कर व्रत और नियमों का पालन करते हुए समय-समय पर उसी वृक्ष का फल खाया करते थे। वे मनुष्य से अदृश्य रहकर पृथक्-पृथक् विचरते थे। वह वनस्पति विश्व में अत्यन्त विख्यात थी। यदुश्रेष्ठ बलराम ने उस तीर्थ में दूध देने वाली गौओं के साथ ताँबे और लोहे के बर्तन तथा नाना प्रकार के वस्त्र ब्राह्मणों को दान किए। ब्राह्मणों का पूजन करके वे स्वयं भी तपस्वी मुनियों द्वारा पूजित हुए।
पवित्र द्वैतवन में आकर बलरामजी ने नाना वेशधारी मुनियों के दर्शन किए, जल में गोता लगाया और ब्राह्मणों का पूजन किया। प्रचुर भोगसामग्री अर्पित कर वे वहाँ से दक्षिण दिशा की ओर सरस्वती के तट पर यात्रा करने लगे। थोड़ी ही दूर जाकर महाबाहु बलराम नागधन्वा नामक तीर्थ में पहुँचे, जहाँ महातेजस्वी नागराज वासुकि अपनी बहुसङ्ख्यक सर्पों की सेना से घिरे हुए निवास करते हैं। वहाँ चौदह हजार ऋषि रहते हैं। देवताओं ने आकर सर्पों में श्रेष्ठ वासुकि को समस्त सर्पों के राजा के पद पर विधिपूर्वक अभिषिक्त किया था। उस तीर्थ में किसी को सर्पों से भय नहीं होता। वहाँ भी बलरामजी ने ब्राह्मणों को रत्न देकर पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान किया, जहाँ पग-पग पर अनेक प्रसिद्ध तीर्थ प्रकट हुए हैं।
गत्वा चैवं महाबाहुर्नातिदूरे महायशाः ॥
धर्मात्मा नागधन्वानं तीर्थमागमदच्युतः ।
यत्र पन्नगराजस्य वासुकेः संनिवेशनम् ॥
महाद्युतेर्महाराज बहुभिः पन्नगैर्वृतम् ।
ऋषीणां हि सहस्राणि तत्र नित्यं चतुर्दश ॥
महाराज! इस प्रकार थोड़ी ही दूर जाकर महाबाहु, महायशस्वी धर्मात्मा भगवान् बलराम नागधन्वा नामक तीर्थमें पहुँच गये, जहाँ महातेजस्वी नागराज वासुकिका बहुसंख्यक सर्पोंसे घिरा हुआ निवासस्थान है । वहाँ सदा चौदह हजार ऋषि निवास करते हैं ।
उन तीर्थों में स्नान करके उन्होंने ऋषियों के बताए नियमों के अनुसार व्रत-उपवास किए। सब प्रकार के दान देकर और तीर्थनिवासी मुनियों को मस्तक नवाकर वे पुनः उसी स्थान की ओर चल दिए, जहाँ सरस्वती हवा की मारी हुई वर्षा के समान पुनः पूर्व दिशा की ओर लौट पड़ी है।
नैमिषारण्य निवासी महात्माओं के दर्शन के लिए पूर्व दिशा की ओर लौटी हुई सरिताओं में श्रेष्ठ सरस्वती का दर्शन करके श्वेत-चन्दन चर्चित बलरामजी आश्चर्यचकित हो उठे। वैशम्पायन जी कहते हैं—राजन्! सत्ययुग की बात है, वहाँ बारह वर्षों में पूर्ण होने वाले एक महान यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ किया गया था। उस सत्र में नैमिषारण्य के तपस्वी मुनि और अन्य ऋषि पधारे थे। वे उस द्वादश-वर्षीय यज्ञ में दीर्घकाल तक रहे। जब वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब बहुत से महर्षि तीर्थसेवन के लिए वहाँ आए। ऋषियों की सङ्ख्या अधिक होने के कारण सरस्वती के दक्षिण तट पर जितने तीर्थ थे, वे सभी नगरों के समान प्रतीत होने लगे। चारों ओर प्रकाशित उन महात्माओं के यज्ञों से सरस्वती की बड़ी शोभा बढ़ रही थी।
निवृत्तां तां सरिच्छ्रेष्ठां तत्र दृष्ट्वा तु लाङ्गली ।
बभूव' विस्मितो राजन् बलः श्वेतानुलेपनः ॥
राजन्! नैमिषारण्यनिवासी महात्मा मुनियोंके दर्शनके लिये पूर्वदिशाकी ओर लौटी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका दर्शन करके श्वेत- चन्दनचर्चित हलधारी बलराम आश्चर्यचकित हो उठे ।
उस निकटवर्ती तट पर प्रसिद्ध तपस्वी—वालखिल्य, अश्मकुट्ट, दन्तोलूखली, प्रसङ्ख्यान और केवल जलपान तथा पत्तों के आहार पर निर्वाह करने वाले मुनि विराजमान थे। वे वेदी पर शयन करते थे और सरस्वती के उसी तट पर शोभा बढ़ा रहे थे, जैसे देवतुल्य ऋषि गङ्गाजी के तट पर रहते हैं। सैकड़ों महान व्रतधारी ऋषि उस यज्ञ में सम्मिलित हुए थे, परन्तु उन्होंने सरस्वती के तट पर अपने रहने के लिए स्थान नहीं देखा।
जब उन ऋषियों ने यज्ञोपवीत धारण कर तीर्थ का निर्माण किया और नाना प्रकार के कर्मों का अनुष्ठान किया, तब उस ऋषिसमूह को निराश और चिन्तित जानकर सरस्वती ने उनकी अभीष्ट-सिद्धि के लिए उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए। उन पुण्यतपस्वियों पर करुणा करके सरस्वती अनेक कुञ्जों का निर्माण करते हुए पीछे लौट पड़ीं। वह महानदी यह सोचकर कि मैं इन ऋषियों के आगमन को सफल बनाकर पुनः पश्चिम मार्ग से ही लौट जाऊँगी, पीछे मुड़ गई। इस प्रकार वह कुञ्ज 'नैमिषीय' नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एवं स कुञ्जो राजन् वै नैमिषीय इति स्मृतः ।
कुरुश्रेष्ठ कुरुक्षेत्रे कुरुष्व महतीं क्रियाम् ॥
नरेश्वर! इस प्रकार वह कुंज नैमिषीय नामसे प्रसिद्ध हुआ । कुरुश्रेष्ठ! तुम भी कुरुक्षेत्रमें महान् कर्म करो ।
वहाँ बहुत से कुञ्जों और लौटी हुई सरस्वती का दर्शन करके बलरामजी को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने विधिपूर्वक स्नान और आचमन किया तथा ब्राह्मणों को धन और नाना प्रकार के बर्तन दान किए। केले के बगीचों, पारिजात और अन्य वृक्षों से सुशोभित उस मनमोहक तीर्थ में वायु, जल और पत्ते चबाकर रहने वाले बहुत से वानप्रस्थ मुनि भरे हुए थे। वहाँ वेदों के स्वाध्याय की गम्भीर ध्वनि गूँज रही थी और मृगों के सैकड़ों समूह सब ओर फैले हुए थे। हिंसारहित धर्मपरायण मनुष्य ही उस तीर्थ का सेवन करते थे। वहीं सिद्ध महामुनि मङ्कणक ने बड़ी भारी तपस्या की थी।"
राजन्! उन दिनों समृद्धिशाली एवं पुण्यमय उत्तर कोसल प्रान्त में सब ओर से मुनि-मण्डली एकत्र हुई थी। यज्ञ करते हुए महात्मा उद्दालक ने पूर्वकाल में सरस्वती देवी का ध्यान किया, तब मुनियों के कार्य सिद्ध करने के लिए सरिताओं में श्रेष्ठ सरस्वती उस देश में आयीं। वहाँ वल्कल और मृगचर्मधारी मुनियों द्वारा पूजित होने के कारण उनका नाम 'मनोरमा' पड़ा; क्योंकि उन्होंने मन के द्वारा उनका चिन्तन किया था।
राजर्षियों से सेवित पुण्यमय ऋषभद्वीप और कुरुक्षेत्र में जब महात्मा राजा कुरु यज्ञ कर रहे थे, तब सरिताओं में श्रेष्ठ महाभागा सरस्वती वहाँ आयीं और उनका नाम 'सुरेणु' हुआ। गङ्गाद्वार में यज्ञ करते समय जब दक्ष प्रजापति ने सरस्वती का स्मरण किया था, तब भी वे शीघ्रगामिनी सरस्वती के रूप में वहाँ बहती हुई विख्यात हुईं। इसी प्रकार महात्मा वसिष्ठ ने भी कुरुक्षेत्र में दिव्य सलिला सरस्वती का आवाहन किया था, जिससे वे 'ओघवती' नाम से प्रसिद्ध हुईं।
ब्रह्माजी ने एक बार फिर पुण्यमय हिमालय पर्वत पर यज्ञ किया था। उस समय उनके आवाहन करने पर भगवती सरस्वती 'विमलोदका' नाम से वहाँ पदार्पण कर आईं। ये सातों सरस्वतियाँ एकत्र होकर उस तीर्थ में आयीं, इसीलिए इस भूतल पर इसे 'सप्तसारस्वत तीर्थ' के नाम से जाना जाता है।
विमलोदा भगवती ब्रह्मणा यजता पुनः ॥
समाहूता ययौ तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ । ब्रह्माजीने एक बार फिर पुण्यमय हिमालयपर्वतपर यज्ञ किया था । उस समय उनके आवाहन करनेपर भगवती सरस्वतीने विमलोदका नामसे प्रसिद्ध होकर वहाँ पदार्पण किया था ।
भरतनन्दन! एक समय की बात है, कोई सुन्दर नेत्रों वाली अनिन्द्य सुन्दरी सरस्वती के जल में स्नान कर रही थी। दैवयोग से महातपस्वी मुनि मङ्कणक की दृष्टि उस पर पड़ गयी और उनका वीर्य स्खलित होकर जल में गिर पड़ा। उस महातपस्वी मुनि ने उस वीर्य को एक कलश में ले लिया। वह वीर्य कलश में स्थित होने पर सात भागों में विभक्त हो गया और उन सात अंशों से सात ऋषि उत्पन्न हुए, जो मूलभूत मरुद्गण कहलाए—वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल, वायुज्वाल, वायुरेता और शक्तिशाली वायुचक्र। ये सभी उन चालीस मरुद्गणों के जन्मदाता 'मरुत' कहलाए।
राजन्! महर्षि मङ्कणक का यह तीनों लोकों में विख्यात अद्भुत चरित्र है। सुना है कि एक बार उनका हाथ कुश के अग्रभाग से छिद गया था, जिससे रक्त के स्थान पर शाक का रस चूने लगा। वह दृश्य देखकर मुनि हर्ष के आवेश में मतवाले होकर नृत्य करने लगे। उनके इस नृत्य को देखकर स्थावर और जङ्गम, दोनों प्रकार के प्राणी उनके तेज से मोहित होकर नाचने लगे।
तब ब्रह्मा आदि देवताओं और तपोधन महामुनियों ने महादेवजी से निवेदन किया— 'देव! आप ऐसा कोई उपाय करें जिससे ये मुनि नृत्य न करें।' मुनि को हर्ष के आवेश में अत्यन्त मतवाला देख महादेवजी ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और देवताओं के हित के लिए उनसे पूछा— 'तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम! धर्मज्ञ ब्राह्मण! आप किसलिए नृत्य कर रहे हैं? मुने! आपके लिये अधिक हर्ष का कौन-सा कारण उपस्थित हो गया है? आप तो सदा धर्म के मार्ग पर स्थित रहने वाले तपस्वी हैं, फिर आप क्यों इस प्रकार उन्मत्त हो रहे हैं?'
ऋषि ने उत्तर दिया— 'ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथ से शाक का रस चू रहा है? प्रभो! उसी को देखकर मैं महान हर्ष से नाचने लगा हूँ।' यह सुनकर महादेवजी ठठाकर हँस पड़े और उन आसक्ति से मोहित मुनि से बोले— 'विप्रवर! मुझे तो यह देखकर विस्मय नहीं हो रहा है। मेरी ओर देखो!' इतना कहकर बुद्धिमान महादेवजी ने अपनी अङ्गुलिके अग्रभाग से अपने अँगूठे में घाव कर दिया। उस घाव से बर्फ के समान सफेद भस्म झड़ने लगी।
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वङ्गुष्ठस्ताडितोऽभवत् ।
ततो भस्म क्षताद् राजन् निर्गतं हिमसंनिभम् ॥
राजेन्द्र! मुनिश्रेष्ठ मंकणकसे ऐसा कहकर बुद्धिमान् महादेवजीने अपनी अंगुलिके अग्रभागसे अँगूठेमें घाव कर दिया। उस घावसे बर्फके समान सफेद भस्म झड़ने लगा ।
यह देखकर मुनि लजा गए और महादेवजी के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने पहचान लिया कि वे स्वयं त्रिशूलधारी महादेव हैं, जिन्होंने इस सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि की है। मुनि ने अत्यन्त भावुक होकर कहा— 'भगवन्! मैं रुद्रदेव के सिवा दूसरे किसी देवता को परम महान नहीं मानता। आप सर्वस्वरूप हैं। आपके प्रसाद से ही सम्पूर्ण देवता यहाँ निर्भय होकर आनन्द का अनुभव करते हैं। हे महेश्वर! कमलनयन! आपकी कृपा कभी व्यर्थ नहीं होती। मैं सर्वव्यापी भगवान् शङ्कर की शरण में आता हूँ।'
महादेव की स्तुति करके मुनि नतमस्तक हुए और बोले— 'देव! मैंने जो अहङ्कार आदि प्रकट करने की चपलता की है, उसके लिये क्षमा माँगते हुए आपसे प्रसन्न होने की प्रार्थना करता हूँ। मेरी तपस्या नष्ट न हो!' महादेवजी का मन प्रसन्न हुआ और वे बोले— 'विप्रवर! मेरे प्रसाद से तुम्हारी तपस्या सहस्रगुनी बढ़ जाय। मैं इस आश्रम में सदा तुम्हारे साथ निवास करूँगा। जो इस सप्तसारस्वत तीर्थ में मेरी पूजा करेगा, उसे इहलोक या परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा; वे सारस्वत लोक में जाएंगे।'
स निर्विण्णस्ततो राजंस्तपस्तेपे महातपाः ।
ततो वै तपसा तेन प्राप्य वेदाननुत्तमान् ॥
स विद्वान् वेदयुक्तश्च सिद्धश्चाप्यृषिसत्तमः ।
तत्र तीर्थे वरान् प्रादात् त्रीनेव सुमहातपाः ॥
नरेश्वर! इससे महातपस्वी आर्ष्टिषेण खिन्न एवं विरक्त हो उठे, फिर उन्होंने सरस्वतीके उसी तीर्थमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की । उस तपके प्रभावसे उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके वे ऋषिश्रेष्ठ विद्वान् वेदज्ञ और सिद्ध हो गये । तदनन्तर उन महातपस्वीने उस तीर्थको तीन वर प्रदान किये—
इस प्रकार महातेजस्वी मङ्कणक मुनि का चरित्र बताया गया है। वे वायु के पुत्र थे। इसके पश्चात बलरामजी ने उस तीर्थ में रहकर आश्रमवासी ऋषियों का पूजन किया और उन्हें दान दिया। प्रातःकाल उठकर उन्होंने पुनः तीर्थ के जल में स्नान किया और अन्य तीर्थों की ओर प्रस्थान कर दिया।
बलरामजी सर्वप्रथम औशनस तीर्थ पहुँचे, जिसे कपालमोचन तीर्थ भी कहा जाता है। वहाँ महामुनि महोदर का एक दुख था—एक राक्षस का विशाल सिर उनकी जाँघ में चिपक गया था, जिससे वे अत्यन्त वेदना से पीड़ित थे और किसी तीर्थ में सुगमता से नहीं जा सकते थे। उस मस्तक से दुर्गन्धयुक्त पीब बहती थी। उन मुनियों ने सुना था कि 'सरस्वती का औशनस तीर्थ सम्पूर्ण पापों को नष्ट करने वाला है।' जब महोदर मुनि वहाँ पहुँचे और जल से स्नान किया, तब वह कपाल उनकी जाँघ से छूटकर पानी के भीतर गिर पड़ा। उस कपाल से मुक्त होकर वे निष्पाप और पवित्र अन्तःकरण वाले होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रम लौट आए। इस घटना के बाद वहाँ के ऋषियों ने उस तीर्थ का नाम 'कपालमोचन' रख दिया।
ततस्त्वौशनसं तीर्थमाजगाम हलायुधः ।
कपालमोचनं नाम यत्र मुक्तो महामुनिः ॥
महता शिरसा राजन् ग्रस्तजङ्घो महोदरः ।
राक्षसस्य महाराज रामक्षिप्तस्य वै पुरा ॥
तदनन्तर हलधारी बलराम औशनसतीर्थमें आये, जिसका दूसरा नाम कपालमोचनतीर्थ भी है । महाराज! पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामने एक राक्षसको मारकर उसे दूर फेंक दिया था । उसका विशाल सिर महामुनि महोदरकी जाँघमें चिपक गया था । वे महामुनि इस तीर्थमें स्नान करनेपर उस कपालसे मुक्त हुए थे ।
वहाँ रहकर बलरामजी ने ब्राह्मणों को विधिपूर्वक धन का दान दिया और फिर वे रुषङ्गु मुनि के आश्रम पहुँचे। वहीं आर्ष्टिषेण मुनि ने घोर तपस्या की थी और वहीं महामुनि विश्वामित्र ने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था। बलरामजी उन ब्राह्मणों से घिरकर उस स्थान पर गए जहाँ रुषङ्गु मुनि ने अपना शरीर छोड़ा था।
वृद्ध मुनि रुषङ्गु ने एक समय देह त्याग का विचार किया और अपने पुत्रों को बुलाकर कहा— 'मुझे पृथूदक तीर्थ में ले चलो।' उनके पुत्र उन्हें सरस्वती के उस उत्तम तीर्थ में ले आए। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करने के बाद वे अपने पुत्रों से बोले— 'जो सरस्वती के उत्तर तट पर पृथूदक तीर्थ में जप करते हुए शरीर त्यागता है, उसे भविष्य में पुनः मृत्यु का कष्ट नहीं भोगना पड़ता।'
तत्पश्चात् प्रतापी बलरामजी ने ब्राह्मणों को बहुत धन दान किया और फिर उस तीर्थ में आए जहाँ आर्ष्टिषेण ने तप किया था। जनमेजय ने पूछा— 'मुनि! आर्ष्टिषेण ने वहाँ किस प्रकार तप किया था?' वैशम्पायनजी ने कहा— 'राजन्! आर्ष्टिषेण सदा गुरुकुल में रहते थे, किन्तु वे सम्पूर्ण वेद नहीं पढ़ सके थे। इस कारण वे निराश होकर सरस्वती के उसी तीर्थ में गए और भारी तपस्या की। उस तप के प्रभाव से उन्हें वेदों का ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने तीन वर दिए—इस तीर्थ में स्नान करने वाले को अश्वमेध यज्ञ का फल मिलेगा, यहाँ किसी को सर्प से भय नहीं होगा और थोड़े समय के सेवन से बहुत अधिक फल प्राप्त होगा।' ऐसा कहकर वे सिद्धि प्राप्त कर स्वर्ग चले गए। उन्हीं दिनों वहाँ सिन्धुद्वीप और देवापि ने भी तप करके ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था।
आप्लुतो वाजिमेधस्य फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥
अद्यप्रभृति नैवात्र भयं व्यालाद् भविष्यति ।
अपि चाल्पेन कालेन फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥
‘ आजसे जो मनुष्य महानदी सरस्वतीके इस तीर्थमें स्नान करेगा, उसे अश्वमेध - यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा। आजसे इस तीर्थमें किसीको सर्पसे भय नहीं होगा । थोड़े समयतक ही इस तीर्थके सेवनसे मनुष्यको बहुत अधिक फल प्राप्त होगा'
कुशिकवंशी विश्वामित्र भी वहीं निरन्तर इन्द्रिय-संयम के साथ तप करते थे। उन्होंने वहीं से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। वे पहले क्षत्रिय राजा गाधि के पुत्र थे। गाधि स्वयं महान योगी थे, जिन्होंने अपने पुत्र को राज्य देकर शरीर त्यागने का विचार किया था, किन्तु प्रजा ने उनसे आग्रह किया कि वे यहीं रहकर उनकी रक्षा करें।"
राजा गाधि ने अपनी प्रजा को ढाढस बँधाते हुए कहा— 'मेरा पुत्र सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करने वाला होगा, अतः तुम्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।' यह वचन देकर राजा गाधि उन्हें राजसिंहासन पर बिठाकर स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान कर गए।
इत्युक्त्वा तु ततो गाधिर्विश्वामित्रं निवेश्य च ।
जगाम त्रिदिवं राजन् विश्वामित्रोऽभवनृपः ॥
राजन्! यों कहकर राजा गाधि विश्वामित्रको राजसिंहासनपर बिठाकर स्वर्गलोकको चले गये । तत्पश्चात् विश्वामित्र राजा हुए ।
तत्पश्चात् विश्वामित्र राजा बने। वे सत्ता में तो आए, किन्तु प्रयत्नशील होने के बावजूद सम्पूर्ण भूमण्डल की रक्षा करने में असमर्थ रहे। एक दिन जब उन्हें समाचार मिला कि प्रजा राक्षसों के भय से त्रस्त है, तब वे तुरन्त अपनी चतुरङ्गिणी सेना लेकर नगर से निकल पड़े। लम्बा मार्ग तय करते हुए वे वसिष्ठ के आश्रम के समीप पहुँचे। वहाँ उनके सैनिकों ने बहुत से अन्याय और अत्याचार किए।
तदनन्तर पूज्य ब्रह्मर्षि वसिष्ठ कहीं से अपने आश्रम लौटे। उन्होंने देखा कि उनका वह विशाल वन सैनिकों द्वारा उजाड़ किया जा रहा है। यह दृश्य देखकर मुनिवर वसिष्ठ अत्यन्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपनी गौ नन्दिनी से कहा— 'तुम भयङ्कर भील जाति के सैनिकों की सृष्टि करो।' उनकी आज्ञा पाते ही होमधेनु ने ऐसे भयानक पुरुषों को उत्पन्न किया, जिन्होंने विश्वामित्र की सेना पर आक्रमण कर उनके सैनिकों को दिशा-दिशाओं में मार भगाया।
जब गाधिनन्दन विश्वामित्र ने सुना कि उनकी सेना भाग गई है, तो उन्होंने तप को ही सबसे प्रबल मानकर अपनी तपस्या में मन लगा लिया। उन्होंने सरस्वती के उस श्रेष्ठ तीर्थ में चित्त को एकाग्र किया और नियमों तथा उपवासों द्वारा अपने शरीर को सुखाना आरम्भ कर दिया। वे कभी केवल जल पीकर रहते, कभी वायु को अपना आहार बनाते, तो कभी केवल पत्ते चबाकर जीवन व्यतीत करते। वे सदा भूमि की वेदी बनाकर उस पर सोते थे और तपस्या के अन्य कठिन नियमों का पृथक्-पृथक् पालन करते थे। देवताओं ने उनके व्रत में बारम्बार विघ्न डाले, परन्तु उस महात्मा की बुद्धि अपने नियम से विचलित नहीं हुई।
महान प्रयत्न और नाना प्रकार की तपस्या के पश्चात गाधिनन्दन विश्वामित्र का तेज सूर्य के समान प्रकाशित होने लगा। उनकी इस उग्र तपस्या को देखकर वरदायक ब्रह्माजी ने उन्हें वर देने का विचार किया।
विश्वामित्र ने ब्रह्माजी से यह वर माँगा— 'मैं ब्राह्मण हो जाऊँ।' सम्पूर्ण लोकों के पितामह ने कहा— 'तथास्तु!' और उन्हें वह वर दे दिया। उस उग्र तपस्या द्वारा ब्राह्मणत्व पाकर महायशस्वी विश्वामित्र देवता के समान समस्त भूमण्डल में विचरने लगे।
तपसा तु तथा युक्तं विश्वामित्रं पितामहः ॥
अमन्यत महातेजा वरदो वरमस्य तत् । विश्वामित्रको ऐसी तपस्या से युक्त देख महातेजस्वी एवं वरदायक ब्रह्माजीने उन्हें वर देनेका विचार किया ।
इस प्रकार शल्यपर्व के गदापर्व के अन्तर्गत बलदेवजी की तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग में सारस्वतोपाख्यान का चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
क्रोध से व्याकुल और अत्यन्त प्रतापी धर्मात्मा वसिष्ठ के पश्चात, बलरामजी 'अवाकीर्ण' तीर्थ में पहुँचे। वहाँ एक महान तपस्वी, दलभपुत्र बक ने घोर तपस्या द्वारा अपने शरीर को सुखाते हुए विचित्र वीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्र के राष्ट्र की आहुति दी थी।
प्राचीन काल में नैमिषारण्य के ऋषियों ने बारह वर्षों तक चलने वाले एक सत्र का आरम्भ किया था। जब वह यज्ञ पूर्ण हुआ, तब वे सभी ऋषि पाञ्चाल देश में पहुँचे। वहाँ उन्होंने दक्षिणा के रूप में धन की याचना की। उन महर्षियों ने पाञ्चालों से इक्कीस बलवान और नीरोग बछड़े प्राप्त किए। तब उन पशुओं में से दल्भपुत्र बक ने अन्य ऋषियों से कहा— 'आप लोग इन पशुओं को बाँट लें; मैं इन्हें छोड़कर किसी श्रेष्ठ राजा से दूसरे पशु माँग लूँगा।'
यह कहकर वह प्रतापी ब्राह्मण राजा धृतराष्ट्र के भवन पर पहुँचा। जब उसने राजा से पशुओं की याचना की, तो राजा कुपित हो उठे। उनके यहाँ कुछ गौएँ दैवेच्छा से मर गई थीं, जिन्हें देखकर उन्होंने क्रोधपूर्वक कहा— 'ब्रह्मबन्धो! यदि पशु चाहते हो, तो इन मरे हुए पशुओं को ही शीघ्र ले जाओ।'
स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥
अयाचत पशून् दाल्भ्यः स चैनं रुषितोऽब्रवीत् ।
यदृच्छया मृता दृष्ट्वा गास्तदा नृपसत्तमः ॥
एतान् पशून् नय क्षिप्रं ब्रह्मबन्धो यदीच्छसि । निकट जाकर दल्भ्यने कौरवनरेश धृतराष्ट्रसे पशुओंकी याचना की । यह सुनकर नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्र कुपित हो उठे । उनके यहाँ कुछ गौएँ दैवेच्छासे मर गयी थीं । उन्हींको लक्ष्य करके राजाने क्रोधपूर्वक कहा– 'ब्रह्मबन्धो! यदि पशु चाहते हो तो इन मरे हुए पशुओंको ही शीघ्र ले जाओ '
राजा के इन कठोर वचनों को सुनकर धर्मज्ञ ऋषि चिन्ता में डूब गए। उन्होंने सोचा— 'अहो! बड़े खेद की बात है कि इस राजा ने भरी सभा में मुझसे ऐसा वचन कहा है।' दो घड़ी तक इस चिन्ता में रहने के बाद, क्रोध से भरे हुए दल्भ्य ने राजा धृतराष्ट्र के विनाश का विचार किया। वे उन मृत पशुओं के मांस को काटकर राजा के राष्ट्र की आहुति देने लगे।
सरस्वती के अवाकीर्ण तीर्थ में अग्नि प्रज्वलित कर, महातपस्वी बक मुनि ने उन मृत पशुओं के मांस द्वारा राजा के राष्ट्र का हवन करना आरम्भ किया। जैसे-जैसे वह यज्ञ आगे बढ़ा, धृतराष्ट्र का राज्य क्षीण होने लगा। वह स्थिति ऐसी थी मानो कोई बड़ा भारी वन कुल्हाड़ी से काट रहा हो; उनका राज्य सङ्कट में फँसकर अचेत हो गया।
अवाकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम् ॥
बको दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थितः ।
स तैरेव जुहावास्य राष्ट्रं मांसैर्महातपाः ॥
महाराज! सरस्वतीके अवाकीर्णतीर्थमें अग्नि प्रज्वलित करके महातपस्वी दल्भपुत्र बक उत्तम नियमका आश्रय ले उन मृत पशुओंके मांसोंद्वारा ही उनके राष्ट्रका हवन करने लगे ।
जब राजा अपने राष्ट्र को इस प्रकार सङ्कटमग्न देखते हुए दुखी हुए, तो उन्होंने प्राश्निकों (भविष्य बताने वालों) को बुलाकर कारण पूछा। प्राश्निकों ने बताया— 'आपने पशु माँगने वाले बक मुनि का तिरस्कार किया है; इसलिए वे मृत पशुओं के मांस द्वारा आपके राष्ट्र की आहुति दे रहे हैं। यह उनकी तपस्या का प्रभाव है। हे भूपाल! सरस्वती के कुञ्ज में जल के समीप वे मुनि विराजमान हैं, आप उन्हें प्रसन्न कीजिए।'
राजा तुरन्त सरस्वती के तट पर पहुँचे और वहाँ बक मुनि के चरणों में माथा टेककर हाथ जोड़कर बोले— 'भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। मैं मुझ दीन, लोभी और मूर्खता से हतबुद्धि हुए अपराधी को क्षमा कर दें। आप ही मेरी गति हैं, आप ही मेरे रक्षक हैं; मुझ पर अवश्य कृपा करें।'
निपत्य शिरसा भूमौ प्राञ्जलिर्भरतर्षभ ।
प्रसादये त्वां भगवन्नपराधं क्षमस्व मे ॥
मम दीनस्य लुब्धस्य मौर्व्येण हतचेतसः ।
त्वं गतिस्त्वं च मे नाथः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
भरतश्रेष्ठ! वे पृथ्वीपर माथा टेक हाथ जोड़कर बोले— ' भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ । आप मुझ दीन, लोभी और मूर्खतासे हतबुद्धि हुए अपराधीके अपराधको क्षमा कर दें । आप ही मेरी गति हैं । आप ही मेरे रक्षक हैं । आप मुझपर अवश्य कृपा करें'
राजा के इस विलाप और शोक को देखकर बक मुनि के मन में दया जागी। उन्होंने क्रोध त्याग दिया और राजा के राज्य को सङ्कट से मुक्त कर पुनः पशु लेकर प्रसन्नचित्त होकर नैमिषारण्य लौट गए। धृतराष्ट्र भी स्वस्थचित्त होकर अपने समृद्धिशाली नगर वापस आ गए।
उसी तीर्थ में उदारबुद्धि बृहस्पतिजी ने असुरों के विनाश और देवताओं की उन्नति के लिए मांसों द्वारा यज्ञ किया था, जिससे असुर क्षीण हो गए। इसके पश्चात, बलरामजी ने वहाँ ब्राह्मणों को रथ, रत्न और धन का दान देकर 'यायात तीर्थ' की यात्रा की। वहाँ पूर्वकाल में राजा ययाति ने यज्ञ किया था, जहाँ सरस्वती ने उनके लिए दूध और घी का स्रोत बहाया था।
ययाति ने वहाँ यज्ञ करके पुण्यलोक प्राप्त किया। जब वे शक्तिशाली राजा यज्ञ कर रहे थे, तब उनकी उदारता देखकर सरस्वती ने वहाँ आए ब्राह्मणों के लिए पृथक्-पृथक् गृह, शय्या, आसन और भोजन की व्यवस्था कर दी। उन ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर राजा ययाति को शुभ आशीर्वाद दिया।
परन्तु, तपस्या की इस होड़ में विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच भारी वैर उत्पन्न हो गया था। सरस्वती के स्थाणुतीर्थ के पूर्व तट पर वसिष्ठ का आश्रम था और पश्चिम तट पर विश्वामित्र का। दोनों प्रतिदिन अत्यन्त कठोर तप करते थे।
विश्वामित्र का तेज देखकर वे चिन्ता में पड़ जाते थे। उनके मन में यह विचार आया कि 'यह सरस्वती नदी वसिष्ठ को मेरे समीप बहा ले आएगी, जिससे मैं उनका वध कर सकूँगा।' इस सोच से उनके नेत्र क्रोध से रक्तवर्ण हो गए। उन्होंने सरस्वती का स्मरण किया।
तस्य बुद्धिरियं ह्यासीद् धर्मनित्यस्य भारत ।
इयं सरस्वती तूर्णं मत्समीपं तपोधनम् ॥
आनयिष्यति वेगेन वसिष्ठं तपतां वरम् ।
इहागतं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः ॥
भरतनन्दन! सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले विश्वामित्र मुनिके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि यह सरस्वती तपोधन वसिष्ठको अपने जलके वेगसे तुरंत ही मेरे समीप ला देगी और यहाँ आ जानेपर तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ विप्रवर वसिष्ठका मैं वध कर डालूँगा; इसमें संशय नहीं है ।
विश्वामित्र के विचारों से व्याकुल होकर सरस्वती की कान्ति फीकी पड़ गई। वह हाथ जोड़कर थर-थर काँपती हुई विश्वामित्र के पास उपस्थित हुई। वह किसी विधवा नारी की भाँति दुखी होकर बोली— 'प्रभो! बताइए, मैं आपकी किस आज्ञा का पालन करूँ?'
क्रोधित मुनि ने कहा— 'वसिष्ठ को शीघ्र यहाँ बहाकर ले आओ!' यह सुनकर सरस्वती व्यथित हो उठी और वायु के झकोरे से हिलती हुई लता की तरह भयभीत होकर काँपने लगी। मुनि ने बिना किसी विचार के आदेश दिया— 'तुम वसिष्ठ को मेरे पास ले आओ।'
वसिष्ठ ने जब सरस्वती की इस दशा को देखा, तो उन्होंने कहा— 'हे सरस्वती! तुम शीघ्र गति से प्रवाहित होकर मुझे बहा ले चलो और अपनी रक्षा करो; अन्यथा विश्वामित्र तुम्हें शाप दे देंगे। कोई दूसरा विचार मत करना।'
पाह्यात्मानं सरिच्छ्रेष्ठे वह मां शीघ्रगामिनी ।
विश्वामित्रः शपेद्धि त्वां मा कृथास्त्वं विचारणाम् ॥
वसिष्ठ बोले — सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! तुम शीघ्र गतिसे प्रवाहित होकर मुझे बहा ले चलो और अपनी रक्षा करो, अन्यथा विश्वामित्र तुम्हें शाप दे देंगे; इसलिये तुम कोई दूसरा विचार मनमें न लाओ ।
वसिष्ठ के वचनों को सुनकर सरस्वती सोचने लगी कि वसिष्ठ ने मुझ पर बड़ी दया की है, अतः मुझे उनका हित ही करना चाहिए। उसने अपने तट को तोड़कर वेग से बहाना आरम्भ किया। बहते हुए किनारे के साथ वसिष्ठजी भी बहने लगे।
बहते समय वसिष्ठ मुनि ने सरस्वती की स्तुति की— 'सरस्वती! तुम ब्रह्माजी के सरोवर से प्रकट हुई हो, इसीलिए तुम्हारा नाम सरस्वती है। तुम ही आकाश में मेघों में जल की सृष्टि करती हो और तुम ही समस्त प्राणियों में चार रूपों में निवास करती हो।'
इस स्तुति को सुनकर सरस्वती ने वसिष्ठ को विश्वामित्र के आश्रम तक पहुँचा दिया और उनसे निवेदन किया— 'मुनि उपस्थित हैं।' जब विश्वामित्र ने वसिष्ठ को देखा, तो वे कुपित होकर उनके जीवन का अन्त करने हेतु हथियार ढूँढ़ने लगे।
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥
अब्रवीद् दुःखसंक्रुद्धो विश्वामित्रो ह्यमर्षणः ।
यस्मान्मां त्वं सरिच्छ्रेष्ठे वञ्चयित्वा पुनर्गता ॥
शोणितं वह कल्याणि रक्षोग्रामणिसम्मतम् । मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको पुनः अपनेसे दूर बहाया गया देख अमर्षशील विश्वामित्र दुःखसे अत्यन्त कुपित हो बोले- ' सरिताओंमें श्रेष्ठ कल्याणमयी सरस्वती! तुम मुझे धोखा देकर फिर चली गयी, इसलिये अब जलकी जगह रक्त बहाओ, जो राक्षसोंके समूहको अधिक प्रिय है '
बुद्धिमान विश्वामित्र के कुपित होने पर, जब उन्होंने सरस्वती नदी को शाप दे दिया, तब वह उज्ज्वल एवं श्रेष्ठ तीर्थ रक्त की धारा से भर गया। उस पावन तीर्थ में जल के स्थान पर रक्त बहने लगा और देखते ही देखते वहाँ अनेक राक्षस आ पहुँचे। वे राक्षस उस रक्त को पीकर अत्यन्त सुखी, तृप्त और निश्चिन्त होकर नाचने-हँसने लगे, मानो उन्होंने स्वर्गलोक को जीत लिया हो।
कुछ काल व्यतीत हुआ, तब बहुत से तपोधन मुनि तीर्थयात्रा के लिए सरस्वती के तट पर पधारे। वे सभी ऋषि, जो पूर्वोक्त अन्य तीर्थों में गोता लगाकर अपनी तपस्या पूर्ण कर चुके थे, उसी रक्तमिश्रित तीर्थ की ओर बढ़े। वहाँ पहुँचकर उन महाभाग मुनियों ने देखा कि उस पवित्र तीर्थ की दशा अत्यन्त दारुण हो गई है; सरस्वती का जल रक्त से ओतप्रोत है और अनेक राक्षस उसका पान कर रहे हैं।
कठोर व्रत का पालन करने वाले उन मुनियों ने सरस्वती के इस तीर्थ की रक्षा के लिए महान प्रयत्न शुरू किए। उन्होंने काँपते हुए स्वर में पूछा— 'कल्याणि! तुम्हारा यह कुण्ड इस प्रकार रक्त से मिश्रित क्यों हो गया? इसका क्या कारण है? बताओ, ताकि हम कोई उपाय सोच सकें।' तब काँपती हुई सरस्वती ने सारा वृत्तान्त यथार्थ रूप से सुनाया। उसे दुःखी देखकर मुनि बोले— 'निष्पाप सरस्वती! हमने शाप और उसका कारण सुन लिया है। ये सभी तपोधन इस विषय में समयोचित कर्तव्य का पालन करेंगे।'
कारणं श्रुतमस्माभिः शापश्चैव श्रुतोऽनघे ।
करिष्यन्ति तु यत् प्राप्तं सर्व एव तपोधनाः ॥
‘ निष्पाप सरस्वती! हमने शाप और उसका कारण सुन लिया । ये सभी तपोधन इस विषयमें समयोचित कर्तव्यका पालन करेंगे '
उन मुनियों ने आपस में विचार किया कि वे मिलकर इस सरस्वती को शाप से छुटकारा दिलाएँगे। तदनन्तर, उन ब्राह्मणों ने तप, नियम, उपदेश, उपवास और नाना प्रकार के संयम तथा कष्टसाध्य व्रतों द्वारा पशुपति विश्वनाथ महादेव की आराधना की। उनके प्रभाव से सरस्वती देवी को उस शाप से मुक्ति मिली और उनका जल पूर्ववत् स्वच्छ हो गया। जब मुनियों ने जल को शुद्ध कर दिया, तो भूखे हुए राक्षस उनकी शरण में आए।
वे राक्षस अत्यन्त पीड़ा में थे। वे उन कृपालु मुनियों के पास जाकर हाथ जोड़कर कहने लगे— 'महात्माओ! हम बहुत भूखे हैं। हम सनातन धर्म से भ्रष्ट हो गए हैं। हम जो भी पापाचार करते हैं, वह हमारा स्वेच्छाचार नहीं है। आप जैसे महात्माओं की हम पर कभी कृपा नहीं हुई और हम सदा दुष्कर्म ही करते चले आए। इससे हमारे पाप की निरन्तर वृद्धि होती जा रही है और हम ब्रह्मराक्षस बन गए हैं। हे विप्रवर! आप यहाँ हमारा उद्धार करें, क्योंकि आप लोग सम्पूर्ण लोकों का उद्धार करने में समर्थ हैं।'
उन राक्षसों के वचन सुनकर एकाग्रचित्त महर्षियों ने उनकी मुक्ति के लिए महानदी सरस्वती का स्तवन किया। उन्होंने कहा कि जो अन्न जूठा हो, जिसमें कीड़े पड़े हों, जो तिरस्कारपूर्वक प्राप्त हुआ हो या जिसे कुत्ते छू चुके हों, वह सारा अन्न राक्षसों का भाग है; इसलिए विद्वान पुरुष ऐसे अन्न का त्याग करें। मुनियों ने तीर्थ की शुद्धि कर सरस्वती नदी से उन राक्षसों की मुक्ति हेतु अनुरोध किया।
क्षुतं कीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाचितं भवेत् ।
सकेशमवधूतं च रुदितोपहतं च यत् ॥
स्वभिः संसृष्टमन्नं च भागोऽसौ रक्षसामिह ।
तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वानेतान् यत्नाद् विवर्जयेत् ॥
राक्षसान्नमसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यन्नमीदृशम् । ‘जिस अन्नपर थूक पड़ गयी हो, जिसमें कीड़े पड़े हों, जो जूठा हो, जिसमें बाल गिरा हो, जो तिरस्कारपूर्वक प्राप्त हुआ हो, जो अश्रुपातसे दूषित हो गया हो तथा जिसे कुत्तोंने छू दिया हो, वह सारा अन्न इस जगत्में राक्षसोंका भाग है । अतः विद्वान् पुरुष सदा समझ-बूझकर इन सब प्रकारके अन्नोंका प्रयत्नपूर्वक परित्याग करे । जो ऐसे अन्नको खाता है, वह मानो राक्षसोंका अन्न खाता है '
महर्षियों का यह मत जानकर सरस्वती अपनी ही स्वरूपभूता 'अरुणा' को लेकर आईं। उस अरुणा तीर्थ में स्नान करके वे राक्षस अपने पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक चले गए। जनमेजय ने पूछा— 'हे ब्रह्मन्! भगवान इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप कैसे लगा और वे इस तीर्थ में स्नान करके कैसे मुक्त हुए?' वैशम्पायनजी बोले— 'हे जनेश्वर! पूर्वकाल में इन्द्र ने नमुचि के साथ अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी थी। इन्द्र ने मित्रता करते हुए कहा था कि वह न तो गीले हथियार से, न सूखे से, न दिन में और न रात में नमुचि को मारेगा। किन्तु इन्द्र ने कुहासा देखकर पानी के फेन से उसका सिर काट दिया। मरते समय नमुचि ने उसे 'मित्रघ्न' शाप दिया। इन्द्र ने ब्रह्माजी से इस पाप के निवारण हेतु पूछा, तब ब्रह्माजी ने कहा कि 'अरुणा' तीर्थ में यज्ञ कर वहाँ स्नान करो।'
नमुचिर्वासवाद् भीतः सूर्यरश्मिं समाविशत् ॥
तेनेन्द्रः सख्यमकरोत् समयं चेदमब्रवीत् ।
न चार्द्रेण न शुष्केण न रात्रौ नापि चाहनि ॥
वधिष्याम्यसुरश्रेष्ठ सखे सत्येन ते शपे । पहलेकी बात है, नमुचि इन्द्रके भयसे डरकर सूर्यकी किरणोंमें समा गया था । तब इन्द्रने उसके साथ मित्रता कर ली और यह प्रतिज्ञा की ' असुरश्रेष्ठ! मैं न तो तुम्हें गीले हथियारसे मारूँगा न सूखेसे । न दिनमें मारूँगा न रातमें । सखे! मैं सत्यकी सौगन्ध खाकर यह बात तुमसे कहता हूँ'
इन्द्र ने सरस्वती के कुञ्ज में यज्ञ किया और अरुणा में स्नान कर ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होकर स्वर्ग चले गए। वहीं नमुचि का मस्तक भी उसी तीर्थ में गोता लगाकर अक्षय लोकों में चला गया। इसके पश्चात, बलरामजी उस तीर्थ में स्नान कर और दान देकर सोम के महान तीर्थ में गए, जहाँ स्कन्द ने तारकासुर का वध किया था।
जनमेजय ने कौतूहलवश पूछा— 'हे द्विजश्रेष्ठ! मुझे कुमार कार्तिकेय के अभिषेक का वर्णन सुनाइये।' वैशम्पायनजी बोले— 'हे जनमेजय! भगवान शिव का तेजोमय वीर्य अग्नि में गिर पड़ा था, जिसे अग्निदेव धारण नहीं कर सके। ब्रह्माजी की आज्ञा से उन्होंने उस दिव्य गर्भ को गङ्गा में डाल दिया। गङ्गा ने भी उसे धारण करने में असमर्थता जताते हुए हिमालय के शिखर पर सरकण्डों में छोड़ दिया। उस बढ़ते हुए शिशु को छह कृत्तिकाओंओं ने देखा। उनके वात्सल्य को देखकर स्कन्द ने छह मुख प्रकट कर उनके स्तनों से दूध पी लिया।
उस दिव्य बालक ने वहाँ की भूमि को सुवर्णमय बना दिया, जिससे वहाँ के पर्वत सोने की खान बन गए। वह कुमार कार्तिकेय के नाम से विख्यात हुआ। वह बालक गन्धर्वों और मुनियों की स्तुति सुनते हुए सो रहा था। गङ्गा और पृथ्वी देवी ने उसे अपने अङ्क में लिया। बृहस्पति ने उसके संस्कार किए और वेद उसकी सेवा में उपस्थित हुए। उस बालक को देखने के लिए साध्य, विश्व, मरुद्गण, वसु, पितर, रुद्र, आदित्य, सिद्ध, भुजङ्ग, दानव, पक्षी, ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र स्वयं पधारे थे।'
रुद्रादित्यास्तथा सिद्धा भुजगा दानवाः खगाः ।
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् सपुत्रः सह विष्णुना ॥
शक्रस्तथाभ्ययाद् द्रष्टुं कुमारवरमच्युतम् । प्रजानाथ! वहाँ सात मातृकाएँ* आ गयी थीं । साध्य, विश्व, मरुद्गण, वसुगण, पितर, रुद्र, आदित्य, सिद्ध, भुजंग, दानव, पक्षी, पुत्रसहित स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा, श्रीविष्णु तथा इन्द्र अपने नियमोंसे च्युत न होनेवाले उस श्रेष्ठ कुमारको देखनेके लिये पधारे थे ।
महामति ब्रह्मा ने जगत् के भिन्न-भिन्न पदार्थों के ऊपर देवता, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, भूत, नाग और पक्षियों का आधिपत्य पहले से ही निर्धारित कर रखा था। उन्होंने कुमार को भी इन सब पर आधिपत्य करने में समर्थ माना। ततपरान्त, ब्रह्मा जी ने दो घड़ी तक गहन चिन्तन किया और देवगणों के मङ्गल-सम्पादन हेतु सम्पूर्ण देवताओं के राजरूप में कार्तिकेय को सबका सेनापति नियुक्त कर दिया।
ब्रह्मा आदि देवता अभिषेक के लिए कुमार को लेकर एक साथ गिरिराज हिमालय पर पधारे। वहाँ वे उन समस्त सरिताओं में श्रेष्ठ पुण्यसलिला सरस्वती देवी के तट पर पहुँचे, जो समन्त-पञ्चक तीर्थ में प्रवाहित होकर तीनों लोकों में विख्यात है। उस पवित्र तट पर देवताओं और गन्धर्वों ने एकत्र होकर अभिषेक की तैयारी की।
बृहस्पति जी ने सम्पूर्ण अभिषेक सामग्री का सङ्ग्रह किया और शास्त्रीय पद्धति से प्रज्वलित की हुई अग्नि में विधिपूर्वक होम किया। तत्पश्चात्, हिमवान द्वारा दिए गए उत्तम मणियों से सुशोभित तथा दिव्य रत्नों से जटित पवित्र सिंहासन पर कुमार कार्तिकेय विराजमान हुए। उस समय उनके पास सम्पूर्ण माङ्गलिक उपकरणों के साथ, विधि और मन्त्रोच्चारण के बीच समस्त देवता वहाँ पधारे।
इन्द्र, विष्णु, सूर्य, चन्द्रमा, धाता, विधाता, वायु और अग्नि; रुद्र, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार—ये सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेय को घेरे हुए खड़े थे। उनके साथ सर्प, विद्याधर, विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्यगण, पितृगण, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, नाग और असङ्ख्य देवर्षि तथा ब्रह्मर्षि भी उपस्थित थे। वहाँ वनवासी मुनि, वालखिल्य ऋषि, भृगु और अङ्गिरा के वंशज, महात्मा यतिगण, सूर्य की किरणों का पान करने वाले मुनि और अन्य अनेक दिव्य शक्तियाँ कार्तिकेय को घेरे खड़ी थीं।
वहाँ हिमवान, विन्ध्य, मेरुगिरि, ऐरावत, उच्चैःश्रवा अश्व, नागराज वासुकि, गरुड़, धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु और उनके अनुचर—ये सभी एक साथ वहाँ पधारे थे। सङ्ख्या इतनी अधिक थी कि सबके नाम बताना कठिन था। उन सभी देवताओं ने अभिषेक के पात्र और माङ्गलिक द्रव्य हाथों में ले रखे थे। हर्ष से उत्फुल्ल देवता, पवित्र और दिव्य जल वाली सातों सरस्वती नदियों के जल से भरे स्वर्णमय कलशों द्वारा उस महातेजस्वी कुमार कार्तिकेय का सेनापति पद पर अभिषेक करने लगे।
दिव्यसम्भारसंयुक्तैः कलशैः काञ्चनैर्नृप ।
सरस्वतीभिः पुण्याभिर्दिव्यतोयाभिरेव तु ॥
अभ्यषिञ्चन् कुमारं वै सम्प्रहृष्टा दिवौकसः ।
सेनापतिं महात्मानमसुराणां भयंकरम् ॥
नरेश्वर! हर्षसे उत्फुल्ल देवता पवित्र एवं दिव्य जलवाली सातों सरस्वती नदियोंके जलसे भरे हुए, दिव्य सामग्रियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय कलशोंद्वारा असुर- भयंकर महामनस्वीकुमार कार्तिकेयका सेनापतिके पदपर अभिषेक करने लगे ।
जैसे पूर्वकाल में जल के स्वामी वरुण का अभिषेक किया गया था, वैसे ही सर्वलोकपितामह ब्रह्मा, महातेजस्वी कश्यप और अन्य विश्वविख्यात महर्षियों ने कार्तिकेय का अभिषेक किया। उस समय भगवान ब्रह्मा ने अत्यन्त सन्तुष्ट होकर कार्तिकेय को वायु के समान वेगशाली, इच्छानुसार शक्तिधारी, बलवान और सिद्ध चार महान अनुचर प्रदान किए—नन्दिसेन, लोहिताक्ष, घण्टाकर्ण और कुमुदमाली।
फिर वहाँ महातेजस्वी भगवान शङ्कर ने स्कन्द को एक महान असुर समर्पित किया, जो सैकड़ों मायाओं को धारण करने वाला और दैत्यों का संहार करने में समर्थ था। देवताओं ने उन्हें देव-शत्रुओं का विनाश करने वाली, अजेय और विष्णुरूपिणी सेना भी प्रदान की। इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, मुनियों तथा पितरों ने जय-जयकार की।
तथा देवा ददुस्तस्मै सेनां नैऋतसंकुलाम् ।
देवशत्रुक्षयकरीमजय्यां विष्णुरूपिणीम् ॥
इसी प्रकार देवताओंने उन्हें देव शत्रुओंका विनाश करनेवाली, अजेय एवं विष्णुरूपिणी सेना प्रदान की, जो नैर्ऋतोंसे भरी हुई थी ।
इसके उपरान्त यमराज ने उन्हें दो अनुचर दिए—उन्माथ और प्रमाथ, जो काल के समान महापराक्रमी थे। प्रतापी सूर्य ने अपने अनुचर सुभ्राज और भास्वर को कार्तिकेय की सेवा में दे दिया। चन्द्रमा ने भी कैलास शिखर के समान श्वेत वर्ण वाले दो अनुचर, मणि और सुमणि प्रदान किए। अग्निदेव ने अपने पुत्र ज्वालाजिह्व तथा ज्योति नामक दो शूर सेवक दिए।
अंश ने बुद्धिमान स्कन्द को पाँच अनुचर प्रदान किए—परिघ, वट, महाबली भीम, दहति और दहन। इन्द्र ने भी उन्हें उत्क्रोश और पञ्चक नामक दो शूर सेवक दिए, जो वज्र और दण्ड धारण करते थे। मित्र ने सुव्रत और सत्यसन्ध नामक दो तपस्वी और विद्यावान सेवक दिए। पूषा ने पाणीतक और कालिक नाम के दो पार्षद प्रदान किए। वरुण ने यम और अतियम नामक दो महाबली पार्षद दिए। मेरु पर्वत ने स्थिर और अतिस्थिर नामक दो पार्षद दिए, जबकि विन्ध्य पर्वत ने उच्छृङ्ग और अतिशृङ्ग नामक दो पार्षद प्रदान किए। समुद्र ने भी गदाधारी सङ्ग्रह और विग्रह नामक दो पार्षद दिए।
इस प्रकार साध्य, रुद्र, वसु, पितृगण, समुद्र, सरिताओं और महाबली पर्वतों ने उन्हें विभिन्न दिव्य आयुधों से सुसज्जित अनेक सेनापति अर्पित किए। ये सभी पार्षद योगयुक्त, महामना और ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले थे। ब्रह्माजी के दिए हुए महापार्षदों के अतिरिक्त सहस्रों अन्य तरुण एवं वृद्ध पार्षद भी वहाँ उपस्थित थे।
मन्मथकर, शक्तिशाली सूचीवक्त्र, श्वेतवक्त्र, सुवक्त्र, चारुवक्त्र, पाण्डुर, दण्डबाहु, सुबाहु, रज, कोकिलक, अचल, कनकाक्ष, बालस्वामी, संचारक, कोकनद, गृध्रपत्र, जम्बुक, लोहवक्त्र, अजवक्त्र, जवन, कुम्भवक्त्र, कुम्भक, स्वर्णग्रीव, कृष्णौजा, हंसवक्त्र, चन्द्रभ, पाणिकूर्च, शम्बूक, पंचवक्त्र, शिक्षक, चापवक्त्र, जम्बूक, शाकवक्त और कुंजल ॥ ५६— ७६ ॥ योगयुक्ता महात्मानः सततं ब्राह्मणप्रियाः ।
पैतामहा महात्मानो महापारिषदाश्च ये ॥
यौवनस्थाश्च बालाश्च वृद्धाश्च जनमेजय ।
सहस्रशः पारिषदाः कुमारमवतस्थिरे ॥
जनमेजय! ये सब पार्षद योगयुक्त, महामना तथा निरन्तर ब्राह्मणोंसे प्रेम रखनेवाले हैं । इनके सिवा, पितामह ब्रह्माजीके दिये हुए जो महामना महापार्षद हैं, वे तथा दूसरे बालक, तरुण एवं वृद्ध सहस्रों पार्षद कुमारकी सेवामें उपस्थित हुए ।
उन पार्षदों के मुख अत्यन्त विचित्र और विविध थे। कुछ के मुख कछुओं, मुर्गों, खरगोशों, उल्लुओं, गधों, ऊँटों और सूअरों के समान थे। किन्हीं के मुख बिल्ली और नेवले के समान थे, तो किन्हीं के हाथी के समान भयानक। कुछ के मुख मगर, गरुड़, भेड़िए और कौओं जैसे दिखते थे। कुछ के मुख गाय, गदहा और वनबिलाव के समान थे।
किन्हीं के पेट, पैर और अन्य अङ्ग विशाल थे और आँखें तारों के समान चमकती थीं। किन्हीं के मुख कबूतर, बैल, कोयल, बाज और तीतरों के समान थे। कुछ के मुख गिरगिट जैसे थे, तो कुछ के सर्प के समान। किन्हीं के मुख पर अत्यन्त क्रोध था, तो किन्हीं पर सौम्य भाव। कुछ के शरीर में हाथी की खाल थी और कोई काला मृगछाला पहने हुए था।
कुछ पार्षदों के मुख कन्धों पर, कुछ पेट में, कुछ पीठ में, दाढ़ी में और कुछ जाँघों में स्थित थे। किन्हीं के मुख सर्पाकार थे और कोई लताओं से ढका हुआ था। वे नाना प्रकार के सुनहरे वस्त्र, माला और चन्दन धारण करते थे। उनके सिर पर कभी पगड़ी तो कभी मुकुट सुशोभित था। कोई दो, तीन या सात शिखाएँ रखता था।
वे सभी लड़ाई-झगड़े में रस लेने वाले और श्रेष्ठ देवताओं के लिए भी अजेय थे। किन्हीं के मुख हड्डियों के ढाञ्चे मात्र थे, तो किन्हीं की पीठ बहुत बड़ी थी। कुछ बौने थे तो कुछ अत्यन्त स्थूलकाय। उनकी नाक हाथी, कछुए या भेड़िए जैसी थी। उनके शरीर के अङ्ग विविध और दीप्तिमान थे। उनके नेत्र पिङ्गल वर्ण के, कान शङ्कु के समान और नासिका लाल रङ्ग की थी।
हस्तिनासाः कूर्मनासा वृकनासास्तथा परे ।
दीर्घोच्छ्वासा दीर्घजङ्घा विकराला ह्यधोमुखाः ॥
किन्हींकी नाक हाथी - जैसी, किन्हींकी कछुओंके समान और किन्हींकी भेड़ियों- जैसी थी । कोई लंबी साँस लेते थे। किन्हींकी जाँघें बहुत बड़ी थीं । किन्हींका मुख नीचेकी ओर था और वे विकराल दिखायी देते थे ।
वे महापार्षदगण हर्ष में भरकर चारों ओर से दौड़े चले आ रहे थे। उनके मस्तक, हाथ, पैर और नख बड़े-बड़े थे। उनकी आँखें भूरी थीं और कण्ठ में नीले रङ्ग का चिह्न था। उनके शरीर के रङ्ग विचित्र और चितकबरे थे। कुछ के शरीर पर श्वेत और लाल रङ्गों की पङ्क्तियाँ थीं और किन्हीं की कान्ति मोरों के समान थी।
भरतनन्दन! कुमार कार्तिकेय के अभिषेक के समय वहाँ उपस्थित पार्षदगण अत्यन्त ओजस्वी और महावेगशाली थे। वे अपने हाथों में नाना प्रकार के भयङ्कर अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए थे—किन्हीं के हाथों में शतघ्नी थी, तो किन्हीं के चक्र; कोई मुसल लिए था, तो कोई तलवार, मुद्गर और डण्डे लेकर खड़ा था; कुछ गदा, तोमर और भुशुण्डि से सुशोभित थे। वे महामनस्वी पार्षदगण अत्यन्त हर्षित होकर नृत्य कर रहे थे। उनके अङ्गों में छोटी-छोटी घण्टियों से युक्त जालीदार वस्त्र शोभा दे रहे थे। ये सहस्रों, लाखों और अरबों पार्षदगण अभिषेक के पश्चात महात्मा स्कन्द को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गए।
गदाभुशुण्डिहस्ताश्च तथा तोमरपाणयः ।
आयुधैर्विविधैर्घोरैर्महात्मानो महाजवाः ॥
किन्हींके हाथोंमें गदा, तोमर और भुशुण्डि शोभा पा रहे थे । वे महावेगशाली महामनस्वी पार्षद नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र- शस्त्रोंसे सम्पन्न थे ।
देवताओं की आज्ञा पाकर देवलोक, अन्तरिक्षलोक तथा भूलोक के वायुतुल्य वेगशाल शूरवीर पार्षद स्कन्द के अनुचर हुए थे। इस प्रकार श्रीमहाभारत के शल्यपर्व के अन्तर्गत गदापर्व में बलरामजी की तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यान के प्रसङ्ग में स्कन्द का अभिषेक विषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— वीर नरेश! अब मैं उन मातृकाओं के नाम बता रहा हूँ, जो शत्रुओं का संहार करने वाली तथा कुमार कार्तिकेय की अनुचरी हैं। भरतनन्दन! तुम उन यशस्वी मातृकाओं के नाम सुनो, जो कल्याणकारिणी देवियाँ विभागपूर्वक तीनों लोकों को व्याप्त किए हुए हैं। ये सहस्रों मातृकाएँ हैं जो कुमार कार्तिकेय का अनुसरण करती हैं। इनके नख, दाँत और मुख विशाल हैं; ये सबला, सुन्दरी और युवावस्था से सम्पन्न हैं तथा वस्त्राभूषणों से विभूषित हैं। इनकी महिमा बड़ी है—ये अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाली हैं। इनमें से कुछ मातृकाओं के शरीर केवल हड्डियों के ढाँचे हैं, जिनमें मांस का पता नहीं है; कुछ श्वेतवर्ण की हैं, तो कितनों की कान्ति सुवर्ण के समान है। कुछ कृष्णमेघ के समान काली, कुछ धूम्रवर्ण की और कितनों की कान्ति अरुणवर्ण की है। इनके केश बड़े-बड़े और वस्त्र उज्ज्वल हैं; ये ऊपर की ओर वेणी धारण करने वाली, भूरी आँखों से सुशोभित और लम्बी मेखला से अलङ्कृत हैं। इनमें से किन्हीं के उदर, कान तथा स्तन लम्बे हैं; कितनों की आँखें ताँबे के समान लाल हैं और कितनों के शरीर की कान्ति ताम्रवर्ण की है। बहुतों की आँखें काले रङ्ग की हैं।
ये वर देने में समर्थ, अपनी इच्छा के अनुसार चलने वाली और सदा आनन्द में निमग्न रहती हैं। शत्रुओं को सन्ताप देने वाली इन मातृकाओं में कुछ यम की शक्तियाँ हैं, कुछ रुद्र की; कुछ सोम की और कुछ कुबेर की। कुछ वरुण की, कुछ इन्द्र की, कुछ अग्नि, वायु, कुमार, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा भगवान् वराह की महाबलशालिनी शक्तियाँ हैं, जो रूप में अप्सराओं के समान मनोहारिणी हैं। वे मीठी वाणी बोलने में कोयल के समान और धन-समृद्धि में कुबेर के समान हैं। युद्ध में इन्द्र के सदृश पराक्रम दिखाने वाली और अग्नि के समान तेजस्विनी ये मातृकाएँ युद्ध छिड़ जाने पर शत्रुओं के लिए भयदायिनी होती हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करने वाली और वायु के समान वेगशालिनी हैं; इनका बल और पराक्रम अचिन्त्य है। ये वृक्षों, चबूतरों, चौराहों, गुफाओं, श्मशानों, पर्वतों और झरनों में निवास करती हैं। ये नाना प्रकार के आभूषण, पुष्पहार और वस्त्र धारण करती हैं और अनेक प्रकार की भाषाएँ बोलती हैं। ये समस्त शक्तियाँ देवेन्द्र की सम्मति से महात्मा स्कन्द का अनुसरण करने लगीं।
तदनन्तर भगवान् पाकशासन ने देवद्रोहियों के विनाश के लिये कुमार कार्तिकेय को 'शक्ति' नामक अस्त्र प्रदान किया। इसके साथ ही उन्होंने एक विशाल घण्टा भी दिया, जो अपनी उज्ज्वल प्रभा से प्रकाशित हो रहा था। पशुपति ने उन्हें सूर्य के समान प्रकाशमान एक पताका और अपने सम्पूर्ण भूतगणों की विशाल सेना प्रदान की। वह भयङ्कर सेना 'धनञ्जय' नाम से विख्यात थी, जिसमें तीस हजार रुद्रगण शामिल थे। सेना के अन्य देवताओं ने भी उपहार दिए—विष्णु ने बल बढ़ाने वाली वैजयन्ती माला दी, उमा ने विरजसी वास: प्रदान किया, गङ्गा ने अमृत प्रकट करने वाला दिव्य कमण्डलु दिया और बृहस्पतिजी ने दण्ड प्रदान किया। गरुड ने अपना प्रिय पुत्र मयूर भेंट किया और अरुण ने अपने पुत्र ताम्रचूड को समर्पित किया, जिसका पैर ही आयुध था। राजा वरुण ने बल और वीर्य से सम्पन्न एक नाग भेंट किया और भगवान् ब्रह्मा ने ब्राह्मणहितैषी कुमार को काला मृगचर्म तथा युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया।
गङ्गा कमण्डलुं दिव्यममृतोद्भवमुत्तमम् ।
ददौ प्रीत्या कुमाराय दण्डं चैव बृहस्पतिः ॥
गंगाने कुमारको प्रसन्नतापूर्वक एक दिव्य और उत्तम कमण्डलु दिया, जो अमृत प्रकट करनेवाला था । बृहस्पतिजीने दण्ड प्रदान किया ।
देवताओं का सेनापति पाकर तेजस्वी स्कन्द अग्नि के समान प्रज्वलित होने लगे। अपने पार्षदों और मातृकागणों के साथ वे दैत्यों के विनाश के लिये प्रस्थान कर गए। उनकी विशाल वाहिनी की पताकाएँ फहरा रही थीं और उनके गण भेरी, शङ्ख तथा नगाड़े बजा रहे थे। इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवता कुमार की स्तुति करने लगे। इससे प्रसन्न होकर महासेन ने वर दिया— "जो आप लोगों का वध करना चाहते हैं, मैं आपके उन समस्त शत्रुओं का समराङ्गण में संहार कर डालूँगा।" यह वर पाकर देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपने शत्रुओं को मरा हुआ ही मानने लगे।
प्रतिगृह वरं देवास्तस्माद् विबुधसत्तमात् ।
प्रीतात्मानो महात्मानो मेनिरे निहतान् रिपून् ॥
उन सुरश्रेष्ठ कुमारसे वह वर पाकर महामनस्वी देवता बड़े प्रसन्न हुए और अपने शत्रुओंको मरा हुआ ही मानने लगे ।
जब विशाल सेना युद्ध के लिए आगे बढ़ी, तो उसके सैनिकों के आगे-आगे व्यवसाय, विजय, धर्म, सिद्धि, लक्ष्मी, धृति और स्मृति चलने लगे। वह सेना सिंह के समान दहाड़ रही थी। उन्हें देखकर सम्पूर्ण दैत्य, दानव और राक्षस भय से व्याकुल होकर सब ओर भागने लगे। देवता अपने अस्त्र लेकर उनका पीछा करने लगे। यह देखकर भगवान् स्कन्द कुपित हो उठे और उन्होंने 'शक्ति' नामक भयानक अस्त्र का बारम्बार प्रयोग किया। उस शक्ति में उन्होंने अपना तेज स्थापित कर दिया था; वह घी से प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रही थी। जैसे प्रलय के समय भयङ्कर गर्जना के साथ वज्र पृथ्वी पर गिरते हैं, वैसे ही उस शक्ति का भीषण गर्जना के साथ वजनों के रूप में उत्पात होने लगा।
अग्निपुत्र कार्तिकेय ने जब एक बार भयङ्कर शक्ति छोड़ी, तो उससे करोड़ों शक्तियाँ प्रकट होकर गिरने लगीं। भगवान् महासेन ने बड़े प्रसन्नता से उस दैत्यराज तारक का वध किया, जो एक लाख बलवान योद्धाओं से घिरा हुआ था। उन्होंने आठ पद्म दैत्यों से घिरे महिषासुर का और दस लाख असुरों से सुरक्षित त्रिपादका तथा दस निखर्व योद्धाओं से घिरे ह्रदोदरका का भी उनके अनुचरों सहित वध कर डाला। जब शत्रु मारे जाने लगे, तब कुमार के अनुचर दसों दिशाओं में गर्जना करने लगे और आनन्द में नाचने-कूदने लगे। उस शक्ति की ज्वालाओं से सारी त्रिलोकी थर्रा उठी। सहस्रों दैत्य उस आग में जलकर भस्म हो गए; कुछ तो कार्तिकेय के सिंहनाद से ही डरकर प्राण त्याग बैठे।
राजा बलिका का पुत्र बाणासुर, जो क्रौंच पर्वत का आश्रय लेकर देवताओं को कष्ट पहुँचाता था, वह भी कार्तिकेय के भय से पर्वत की शरण में जा छिपा। इससे भगवान् कार्तिकेय को महान क्रोध आया। उन्होंने अग्नि द्वारा दी गई 'शक्ति' से उस गूँजते हुए क्रौंच पर्वत को विदीर्ण कर डाला। शक्ति के प्रहार से पर्वत के शिखर पर रहने वाले विद्याधर और किन्नर उद्विग्न होकर आकाश में उड़ गए। पर्वत के टूटने से वहाँ के जीव-जन्तु और वन्य जीव भयभीत होकर भागने लगे, जिससे वह पर्वत अत्यन्त शोचनीय दशा में आ गया; किन्तु वह अब भी सुशोभित ही था।
उस जलते हुए पर्वत से हजारों दैत्य निकल पड़े, जिन्हें कार्तिकेय के पार्षदों ने मार गिराया। भगवान् ने कुपित होकर वृत्रासुर को मारने वाले इन्द्र के समान उस दैत्यराज के पुत्र को उसके छोटे भाई सहित शीघ्र ही मार डाला। उन्होंने स्वयं को अनेक रूपों में प्रकट करके शक्ति द्वारा क्रौंच पर्वत को विदीर्ण कर दिया। रणभूमि में बार-बार चलाई जाने वाली उनकी शक्ति शत्रुओं का संहार करके पुनः उनके हाथ में लौट आती थी।
तदनन्तर, देवशत्रुओं का संहार करके और देवताओं से सेवित होकर भगवान् स्कन्द अत्यन्त आनन्दित हुए। दिव्य फूलों की सुगन्ध के साथ पवित्र वायु चलने लगी। गन्धर्व और महर्षि उनकी स्तुति करने लगे। कोई उन्हें ब्रह्माजी का पुत्र कहता, तो कोई महादेव का, कोई पार्वती का या गङ्गा का। वे महाबली योगेश्वर स्कन्द देवताओं को अनेक रूपों में दिखाई देते हैं।
बभूव तीर्थप्रवरं हतेषु सुरशत्रुषु ।
कुमारेण महाराज त्रिविष्टपमिवापरम् ॥
महाराज! कुमार कार्तिकेयके द्वारा देवशत्रुओंके मारे जानेपर वह श्रेष्ठ तीर्थ दूसरे स्वर्गके समान सुखदायक हो गया ।
राजन्! यह मैंने तुम्हें कार्तिकेय के अभिषेक का प्रसङ्ग सुनाया है। अब तुम सरस्वती के उस श्रेष्ठ तीर्थ की पावनता का वर्णन सुनो; क्योंकि कुमार कार्तिकेय द्वारा देवशत्रुओं के मारे जाने पर वह श्रेष्ठ तीर्थ दूसरे स्वर्ग के समान सुखदायक हो गया है।
जनमेजय ने पूछा— "ब्रह्मन्! इस तीर्थ में देवताओं ने पहले जल के स्वामी वरुण का अभिषेक किस प्रकार किया था? वह सब मुझे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करने में कुशल हैं।"
वैशम्पायनजी बोले— "राजन्! इस विचित्र प्रसङ्ग को यथार्थ रूप से सुनो। यह पूर्वकल्प की बात है, जब आदि कृतयुग चल रहा था। उस समय सम्पूर्ण देवताओं ने वरुण के पास जाकर कहा— 'जैसे देवराज इन्द्र सदा हमलोगों की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप भी समस्त सरिताओं के अधिपति हो जाइये। हे देव! मकरालय समुद्र में आपका सदा निवास स्थान होगा और यह नदीपति समुद्र सदा आपके वश में रहेगा।'
तैजसं नाम तत् तीर्थं यत्र पूर्वमपां पतिः ।
अभिषिक्तः सुरगणैर्वरुणो भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह तैजस नामका तीर्थ है, जहाँ पहले जलके स्वामी वरुणदेवका देवताओंद्वारा अभिषेक किया गया था ।
वरुण ने उत्तर दिया— 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)। इस प्रकार देवताओं की अनुमति पाकर, सबने मिलकर शास्त्रीय विधिक के अनुसार वरुण को जल का राजा बना दिया। तब देवता अपने-अपने स्थानों पर चले गए। देवताओं द्वारा अभिषिक्त होकर महायशस्वी वरुण देवगणों की रक्षा करने वाले इन्द्र के समान सरिताओं, सागरों और नदियों का भी विधिपूर्वक पालन करने लगे।"
"राजन्! प्रतापी बलरामजी उस तीर्थ में स्नान करके और नाना प्रकार के धन का दान करके 'अग्नितीर्थ' में पहुँचे। उस समय अग्निदेव शमी के गर्भ में छिप जाने के कारण अदृश्य हो गए थे, जिससे सम्पूर्ण जगत् के प्रकाश की शक्ति नष्ट होने वाली थी। जब देवताओं ने ब्रह्माजी से इसकी शिकायत की, तब उन्होंने बताया कि अग्निदेव महर्षि भृगु के शाप से भयभीत होकर शमी के भीतर जाकर छिप गए हैं। इन्द्र सहित सभी देवता बहुत दुखी थे। किन्तु जब वे अग्नितीर्थ पहुँचे और अग्निदेव को देखा, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए।
उसी तीर्थ में गोता लगाकर बुद्धिमान बलरामजी 'ब्रह्मयोनि' तीर्थ में गए, जहाँ भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की थी। वहाँ स्नान करने के पश्चात उन्होंने ब्राह्मणों को विधिपूर्वक धन का दान दिया। तदुपरान्त वे 'कुबेरतीर्थ' गए, जहाँ पूर्वकाल में यक्षराज कुबेर ने घोर तपस्या कर धन का स्वामित्व और देवत्व प्राप्त किया था। वहाँ बलरामजी ने स्नान करके ब्राह्मणों को धन का दान किया और फिर उस स्थान के दर्शन किए जहाँ कुबेर ने बड़ी भारी तपस्या की थी।
कौबेरं प्रययौ तीर्थं तत्र तप्त्वा महत्तपः ।
धनाधिपत्यं सम्प्राप्तो राजन्नैलविलः प्रभुः ॥
राजन्! उस तीर्थमें स्नान और नाना प्रकारके धनका दान करके बलरामजी कुबेरतीर्थमें गये, जहाँ बड़ी भारी तपस्या करके भगवान् कुबेरने धनाध्यक्षका पद प्राप्त किया था ।
इसके पश्चात, श्वेत चन्दन धारण किए हुए बलरामजी 'बदरपाचन' नामक शुभ तीर्थ में पहुँचे। यह वन फूलों और फलों से लदा हुआ था। वहाँ भरद्वाज ऋषि की पुत्री श्रुतावती नामक कन्या अत्यन्त उग्र तपस्या कर रही थी। उसका एकमात्र सङ्कल्प था— 'देवराज इन्द्र मेरे पति हों।' वह कठिन नियमों का पालन करते हुए अनेक वर्ष व्यतीत कर चुकी थी।
उसकी भक्ति देखकर भगवान इन्द्र (पाकशासन) अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने एक ब्राह्मण के रूप में वसिष्ठ ऋषि का रूप धारण किया और उसके आश्रम पर आए। श्रुतावती ने उनका पूजन किया और कहा— 'मुनिश्रेष्ठ! आज मैं आपको सब कुछ दूँगी, परन्तु इन्द्र के प्रति अपने अनुराग के कारण अपना हाथ आपको नहीं दे सकूँगी; क्योंकि मुझे उन्हें ही सन्तुष्ट करना है।'
इन्द्र ने मुस्कुराते हुए उसे सान्त्वना दी— 'कल्याणि! तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा। तपस्या से सब कुछ प्राप्त होता है। अब तुम ये पाँच बेर के फल पका लो।' ऐसा कहकर इन्द्र पास के तीर्थ में स्नान करने चले गए। श्रुतावती ने उन बेरों को आग पर रखा, किन्तु वे पक नहीं रहे थे। ईंधन समाप्त होने पर उसने अपने दोनों पैरों को आग में डाल दिया, पर उसके चेहरे की कान्ति में कोई परिवर्तन नहीं आया। वह तपस्या में लीन रही। अन्ततः इन्द्र ने उसे अपना वास्तविक रूप दिखाया और कहा— 'मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम यह शरीर त्यागकर स्वर्ग में मेरे पास रहोगी। तुम्हारा यह तीर्थ 'बदरपाचन' नाम से प्रसिद्ध होगा।'
तपसा लभ्यते सर्वं यथाभूतं भविष्यति ॥
यथा स्थानानि दिव्यानि विबुधानां शुभानने ।
तपसा तानि प्राप्याणि तपोमूलं महत् सुखम् ॥
‘ शुभानने! तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है । तुम्हारा मनोरथ भी यथावत् रूपसे सिद्ध होगा । देवताओंके जो दिव्य स्थान हैं, वे तपस्यासे प्राप्त होनेवाले हैं । महान् सुखका मूल कारण तपस्या ही है ।
उसी समय, हिमालय पर सप्तर्षि निवास करते थे। वहाँ बारह वर्षों तक वर्षा नहीं हुई थी। उस समय अरुन्धती नामक तपस्विनी भी वहीं रहकर कठोर नियम का पालन कर रही थी। महादेव ने ब्राह्मण का रूप धरकर उससे भिक्षा माँगी। अरुन्धती ने कहा— 'विप्रवर! अन्न समाप्त हो गया है, ये बेर ही खाइये।' महादेव ने कहा— 'इन बेरों को पका दो।'
अरुति ने उन बेरों को आग पर रखा और दिव्य कथाएँ सुनते-सुनते बारह वर्ष व्यतीत कर दिए। अन्त में महादेव ने उसे अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया और कहा— 'हे धर्मज्ञे! तुम इन ऋषियों के पास जाओ। मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। जो इच्छा हो, माँग लो।'
ततः प्रोवाच भगवांस्तामेवारुन्धतीं पुनः ।
वरं वृणीष्व कल्याणि यत् तेऽभिलषितं हृदि ॥
‘इसके बाद भगवान् शंकरने पुनः अरुन्धतीसे कहा -' कल्याणि! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुसार कोई वर माँग लो '
तब अरुन्धती ने महादेव से प्रार्थना की— 'भगवान! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो यह स्थान 'बदरपाचन' नाम से प्रसिद्ध होकर सिद्धों और देवर्षियों का प्रिय अद्भुत तीर्थ बन जाए!'"
वैशम्पायन बोले— हे राजन! कठोर व्रत का पालन करने वाली उस महाभागे अरुन्धती देवी ने यहाँ परम सिद्धि प्राप्त की थी, जैसी तुमने मेरे लिए तप करके प्राप्त की है। कल्याणि! महात्मा भगवान शङ्कर ने अरुन्धती को जो वर दिया था, तुम्हारे तेज और प्रभाव से मैं उससे भी बढ़कर उत्तम वर देता हूँ— जो इस तीर्थ में एकाग्रचित्त होकर एक रात निवास करेगा, वह यहाँ स्नान करके देह-त्याग के पश्चात् उन पुण्यलोकों में जाएगा जो दूसरों के लिए अत्यन्त दुर्लभ हैं।
इन्द्रदेव ने श्रुतावती को यह वरदान देकर स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान किया। उस पावन क्षण में सुगन्धित पवित्र वायु बहने लगी और शुभलक्षणा श्रुतावती ने अपना शरीर त्यागकर इन्द्र की भार्या के रूप में उनके साथ रमण करना प्रारम्भ किया।
राजन्! भरतश्रेष्ठ! वज्रधारी इन्द्रके चले जानेपर वहाँ पवित्र सुगन्धवाले दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी और महान् शब्द करनेवाली देवदुन्दुभियाँ बज उठीं ॥ मारुतश्च ववौ पुण्यः पुण्यगन्धो विशाम्पते ।
उत्सृज्य तु शुभा देहं जगामास्य च भार्यताम् ॥
तपसोग्रेण तं लब्ध्वा तेन रेमे सहाच्युत । प्रजानाथ! पावन सुगंधसे युक्त पवित्र वायु चलने लगी । शुभलक्षणा श्रुतावती अपने शरीरको त्यागकर इन्द्रकी भार्या हो गयी । अच्युत! वह अपनी उग्र तपस्यासे इन्द्रको पाकर उनके साथ रमण करने लगी ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— हे राजन! एक दिन विशाल नेत्रों वाली घृताची नामक अप्सरा कहीं से आ रही थी। उसे देखकर महात्मा महर्षि भरद्वाज का वीर्य स्खलित हो गया। जप करने वाले ऋषियों में श्रेष्ठ भरद्वाज ने उस वीर्य को अपने हाथ में लिया, परन्तु वह तत्काल ही एक पत्ते के दोने में गिर पड़ा। वहीं उस कन्या का जन्म हुआ। तपस्या के धनी धर्मात्मा महामुनि भरद्वाज़ ने उसके जातकर्म आदि संस्कार करके देवर्षियों की सभा में उसका नाम 'श्रुतावती' रखा और फिर वे उस कन्या को अपने आश्रम में रखकर हिमालय के जङ्गल में चले गए।
तदुपरान्त, वृष्णिवंश के प्रतापी बलरामजी उस तीर्थ में स्नान कर और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धन का दान देकर एकाग्रचित्त होकर इन्द्र-तीर्थ की ओर चल दिए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने विधिपूर्वक ब्राह्मणों को धन और रत्नों का दान किया। उस तीर्थ में देवराज इन्द्र ने सौ यज्ञों का अनुष्ठान किया था और बृहस्पतिजी को प्रचुर धन दिया था। वे वेदों के पारङ्गत विद्वानों के साथ बिना किसी बाधा के अपने यज्ञ पूर्ण कर चुके थे, इसीलिए वे 'शतक्रतु' कहलाए और उन्हीं के नाम से वह पुण्य तीर्थ 'इन्द्रतीर्थ' प्रसिद्ध हुआ।
मुसलधारी बलरामजी वहाँ से शुभ तीर्थ 'रामतीर्थ' की ओर बढ़े। वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान किया, उत्तम भोजन-वस्त्र द्वारा ब्राह्मणों का पूजन किया और फिर 'यमुनातीर्थ' पहुँचे। उस तीर्थ में वरुणजी ने राजसूय यज्ञ किया था। जनमेजय! वह यज्ञ समाप्त होने पर देवताओं और दानवों के बीच भयङ्कर सङ्ग्राम हुआ था। उसके पश्चात बलरामजी ने वहाँ ऋषियों का पूजन कर अन्य याचकों को धन दान किया और 'आदित्यतीर्थ' की ओर चले गए। वहाँ उन्होंने स्वयं यज्ञ करके ज्योतिर्मय भगवान भास्कर का आधिपत्य प्राप्त किया था।
वहाँ से वे 'सरस्वती तीर्थ' पहुँचे। उस परम उत्तम कल्याणकारी तीर्थ में पहले मधु और कैटभ नामक असुरों का वध करके भगवान विष्णु ने स्नान किया था। इसके पश्चात धर्मात्मा द्वैपायन व्यास ने भी वहाँ गोता लगाया, जिससे उन्होंने परम योग प्राप्त कर लिया।
हे राजन! प्राचीन काल की बात है, उसी तीर्थ में तपस्या के धनी धर्मात्मा असित देवल मुनि निवास करते थे। वे सदा धर्मपरायण, पवित्र और जितेन्द्रिय थे। उनके मन में क्रोध नहीं था; वे सोना हो या मिट्टी का ढेला, दोनों को समान दृष्टि से देखते थे। वे प्रतिदिन देवताओं और ब्राह्मणों सहित अतिथियों का आदर-सत्कार करते थे।
एक दिन बुद्धिमान सन्न्यासी जैगीषव्य मुनि योग के आश्रय लेकर उस तीर्थ में आए और एकाग्रचित्त होकर रहने लगे। देवल मुनि उन्हें देखकर अत्यन्त गौरव और प्रेम प्रकट करते तथा शास्त्रीय विधि से उनका पूजन करते। बहुत वर्ष बीत गए, परन्तु जैगीषव्य ने कभी बात नहीं की। एक दिन देवल मुनि के मन में भारी चिन्ता हुई— 'इनकी पूजा करते हुए मुझे बहुत वर्ष बीत गए, परन्तु ये आलसी भिक्षु आज तक एक बात भी नहीं बोले।'
चिन्तावश देवल मुनि जल से भरा कलश लेकर आकाश मार्ग से समुद्र तट की ओर चल दिए। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने देखा कि जैगीषव्य मुनि तो पहले से ही वहाँ उपस्थित हैं! वे आश्चर्यचकित रह गए— 'इन्होंने तो अभी समुद्र में स्नान किया है, फिर ये आश्रम में कैसे पहुँच गए?'
देवल मुनि ने सोचा कि शायद यह भिक्षु की परीक्षा लेने का उनका कोई तरीका है। वे आकाश मार्ग से उड़ चलते ताकि जैगीषव्य की परीक्षा ले सकें। ऊपर जाकर उन्होंने देखा कि जैगीषव्य विभिन्न लोकों में विचरण कर रहे हैं। उन्होंने उन्हें पितृलोक, यमलोक और फिर अग्निहोत्रियों के लोकों में देखा। वे उन तपोधनों के लोकों में भी पहुँचे जो पूर्णिमा के यज्ञ करते हैं, और फिर पशु-याग करने वालों के लोकों में भी दिखे।
देवल मुनि ने देखा कि जैगीषव्य मुनि अपने तेज से ऊँचे-ऊँचे लोकों को लाँघकर जा रहे हैं। उन्होंने उन्हें ब्रह्म-यज्ञ करने वालों, राजसूय और पुण्डरीक यज्ञ करने वालों तथा अश्वमेध और नरमेध करने वालों के लोकों में भी देखा। अन्ततः वे उन लोकों में पहुँचे जहाँ दुर्लभ सर्वमेध और सौत्रामणि यज्ञ किए जाते हैं। उसके बाद उन्होंने जैगी//विषव्य को मित्र, वरुण और आदित्यों के लोकों में देखा। वे रुद्र, वसु और बृहस्पतिके स्थानों को लाँघकर ऊपर उठे।
अन्त में देवल मुनि ने देखा कि जैगीषव्य मुनि अपने तेज से तीन लोकों को लाँघकर पतिव्रताओं के लोक की ओर जा रहे हैं। इसके बाद वे कहीं दिखाई नहीं दिए— वे अदृश्य हो गए थे।
देवल मुनि ने उनके प्रभाव और अनुपम योग-सिद्धि के विषय में विचार किया। उन्होंने हाथ जोड़कर आकाश में स्थित सिद्धों से पूछा— 'महात्माओ! मैं महातेजस्वी जैगीषव्य को अब देख नहीं पा रहा हूँ, कृपया उनका पता बतावें। मेरे मन में उन्हें जानने की बड़ी उत्कण्ठा है।'
सिद्धों ने कहा— 'हे देवल! सुनो, हम तुम्हें सत्य बता रहे हैं। जैगीषव्य मुनि सनातन ब्रह्मलोक में जा पहुँचे हैं।'
यह सुनकर देवल मुनि तुरन्त ऊपर की ओर उछले, परन्तु वे वापस नीचे गिर पड़े। तब सिद्धों ने कहा— 'तपोधन देवल! जहाँ जैगीषव्य गए हैं, उस ब्रह्मलोक में जाने की शक्ति तुममें नहीं है।'
देवल मुनि पुनः विभिन्न लोकों से होते हुए नीचे उतरे और अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ उन्होंने जैगीषव्य को बैठा पाया। वे समझ गए कि यह उनकी योग-सिद्धि का प्रभाव है। वे धर्मयुक्त बुद्धि से विचार करते हुए महात्मा जैगीषव्य के पास गए और विनीत भाव से बोले—
राजा जब जैगीषव्य के आश्रम पहुँचे, तो वहाँ की शान्ति और मुनि की योग-सिद्धि ने उन्हें विस्मित कर दिया। राजा ने विनीत भाव से कहा— "भगवन्! मैं मोक्षधर्म का आश्रय लेना चाहता हूँ।"
मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेयं भगवन्नहम् ।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः ॥
विधिं च योगस्य परं कार्याकार्यस्य शास्त्रतः ।
संन्यासकृतबुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः ॥
सर्वाश्चास्य क्रियाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा । ‘ भगवन्! मैं मोक्षधर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ । ' उनकी वह बात सुनकर महातपस्वी जैगीषव्यने उनका संन्यास लेनेका विचार जानकर उन्हें ज्ञानका उपदेश किया । साथ ही योगकी उत्तम विधि बताकर शास्त्रके अनुसार कर्तव्य - अकर्तव्यका भी उपदेश दिया । इतना ही नहीं, उन्होंने शास्त्रीय विधिके अनुसार उनके संन्यासग्रहणसम्बन्धी समस्त कार्य ( दीक्षा और संस्कार आदि ) किये ।
महातपस्वी जैगीषव्य ने जब राजा का सन्न्यास लेने का विचार सुना, तो उन्होंने केवल उपदेश ही नहीं दिए, बल्कि शास्त्र के अनुसार दीक्षा और समस्त संस्कारों के माध्यम से उनके सन्न्यास सम्बन्धी सभी कार्य पूर्ण किए। किन्तु जैसे ही यह समाचार फैला, संसार में एक करुण विलाप छा गया। पितरों सहित समस्त प्राणी रोने लगे और कहने लगे— "अब हमें विभागपूर्वक अन्नदान कौन करेगा?" दसों दिशाओं में इस शोक की गूँज सुनाई देने लगी।
जब देवल ने इन प्राणियों के करुण वचनों को सुना, तो उनका मन डोल गया। उन्होंने सोचा कि क्या मोक्षधर्म अपनाना ही उचित है? वे सोचने लगे— "मोक्ष और गार्हस्थ्यधर्म, इनमें से मेरे लिए श्रेयस्कर क्या होगा?" अन्ततः उन्होंने अपने मन को स्थिर किया और गार्हस्थ्यधर्म का त्याग कर मोक्षधर्म को ही चुना। इस निश्चय के फलस्वरूप उन्हें परम सिद्धि और उत्तम योग प्राप्त हुआ।
ततो बुद्धया व्यगणयद् देवलो धर्मयुक्तया ।
दृष्ट्वा प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम् ॥
तब देवलने जैगीषव्यकी तपस्याका वह योगजनित प्रभाव देखकर धर्मयुक्त बुद्धिसे उसपर विचार किया ।
जैगीषव्य की इस सिद्धि को देखकर बृहस्पति आदि देवता और तपस्वी वहाँ एकत्र हुए और उनके तप की प्रशंसा करने लगे। तभी वहां उपस्थित ज्ञानी नारद मुनि ने देवताओं से कहा— "जैगीषव्य में वह तप नहीं है; वे तो असित मुनियों को अपने प्रभाव से आश्चर्यचकित कर रहे हैं।" किन्तु देवताओं ने उत्तर दिया— "हे नारद! आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि प्रभाव, तेज, तपस्या और योग की दृष्टि से इन महात्मा से बढ़कर दूसरा कोई नहीं है।"
उसी समय, महाबली बलराम जी तीर्थयात्रा करते हुए सोम के महान तीर्थ में पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्नान किया और ब्राह्मणों को धन का दान देकर धर्म का फल प्राप्त किया। इसके पश्चात वे उस विख्यात तीर्थ में गए जहाँ कभी एक वृद्ध कन्या निवास करती थी।
जनमेजय ने वैशम्पायन जी से पूछा— "हे भगवन! पूर्वकाल में वह कन्या किसलिए तपस्या में संलग्न हुई थी? उसका नियम क्या था?"
वैशम्पायन जी बोले— "हे राजन्! प्राचीन काल में कुणिर्गर्ग नामक एक महान और यशस्वी ऋषि थे। उन्होंने भारी तपस्या करके अपने मन से एक अत्यन्त सुन्दर कन्या उत्पन्न की। उस कन्या को देखकर मुनि प्रसन्न हुए और कुछ समय पश्चात अपना शरीर त्यागकर स्वर्गलोक चले गए। वह कन्या, जिसके नेत्र कमल के समान सुन्दर थे, उसने स्वयं के लिए एक आश्रम बनाया और अत्यन्त कठोर तप तथा उपवास के साथ देवताओं और पितरों की पूजा करने लगी।
सुभूः सा ह्यथ कल्याणी पुण्डरीकनिभेक्षणा ॥
महता तपसोग्रेण कृत्वाऽऽश्रममनिन्दिता ।
उपवासैः पूजयन्ती पितॄन् देवांश्च सा पुरा ॥
तदनन्तर कमलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी सती साध्वी सुन्दरी कन्या पूर्वकालमें अपने लिये आश्रम बनाकर बड़ी कठोर तपस्या तथा उपवासके साथ - साथ देवताओं और पितरोंका पूजन करती हुई वहाँ रहने लगी ।
उसने अपने जीवन में किसी वर की इच्छा नहीं की। जब वह वृद्ध और दुर्बल हो गई, तो उसने परलोक जाने का विचार किया। वह निर्जन वन में रहकर केवल तपस्या ही करती रही।"
तपस्या के उस कठिन कालखण्ड में, जब संसार में बारह वर्षों तक भयङ्कर अनावृष्टि हुई, तब सभी ऋषि भूख से व्याकुल होकर जीविका की खोज में इधर-उधर भटकने लगे। उस समय सरस्वती नदी के तट पर रहने वाले 'सारस्वत मुनि' ने देखा कि सभी महर्षि सङ्कट में हैं।
सरस्वती देवी ने उनसे कहा— "पुत्र! तुम्हें यहाँ से कहीं नहीं जाना चाहिए। मैं तुम्हें सदा भोजन के लिए उत्तम मछलियाँ दूँगी; तुम यहीं रहो।" इस आश्वासन के बाद, सारस्वत मुनि वहीं रहकर देवताओं और पितरों को तृप्त करने लगे।
इत्युक्तः प्रतिजग्राह प्रीतिं चावाप पुष्कलाम् ॥
स्वसुतं चाप्यजिघ्रत् तं मूर्ध्नि प्रेम्णा द्विजोत्तमः ।
परिष्वज्य चिरं कालं तदा भरतसत्तम ॥
सरस्वत्यै वरं प्रादात् प्रीयमाणो महामुनिः ।
विश्वेदेवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥
तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा । उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस पुत्रको ग्रहण कर लिया और वे बड़े प्रसन्न हुए । भरतभूषण! उन द्विजश्रेष्ठने बड़े प्रेमसे अपने उस पुत्रका मस्तक सूँघा और दीर्घ- कालतक छातीसे लगाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए महामुनिने सरस्वतीको वर दिया — ' सुभगे! तुम्हारे जलसे तर्पण करनेपर विश्वेदेव, पितृगण तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय सभी तृप्ति - लाभ करेंगे '
जब अनावृष्टि समाप्त हुई, तब महर्षि पुनः स्वाध्याय करने लगे। उस समय भूख के कारण कई ऋषि वेदों का ज्ञान भूल चुके थे। तब उन महर्षियों ने जाकर सुना कि एक बालक सारस्वत मुनि निर्जन वन में रहकर सदा स्वाध्याय करते हैं। वे सभी महर्षि उनके पास आए और बोले— "मुने! हमें वेद पढ़ाइये।"
सारस्वत मुनि ने कहा— "आप लोग विधिपूर्वक मेरी शिष्यता ग्रहण करें।" कुछ वृद्ध मुनियों ने आपत्ति जताई— "बेटा! तुम तो अभी बालक हो, हम तुम्हारे शिष्य कैसे हो सकते हैं?" तब सारस्वत मुनि ने उन्हें समझाया— "न बहुत वर्षों की अवस्था से, न धन से और न भाइयों से कोई बड़ा होता है। ऋषियों ने यह धर्म निश्चित किया है कि जो वेदों का प्रवचन कर सके, वही महान है।"
इस ज्ञान को सुनकर सभी महर्षि पुनः धर्म के मार्ग पर चलने लगे। साठ हजार मुनियों ने उस बालक सारस्वत की शिष्यता ग्रहण की। इस प्रकार, वे सभी बड़े-बड़े महर्षि उस बालक के आसन के लिए एक-एक मुट्ठी कुश लाकर देते थे।
गालव के पुत्र शृङ्गवान् ऋषिने उस कन्या के समक्ष विवाह की इच्छा प्रकट करते हुए एक शर्त रखी— 'शोभने! मैं एक शर्त के साथ आज तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा। विवाह के बाद तुम्हें एक रात मेरे साथ रहना होगा। यदि यह स्वीकार हो तो मैं तैयार हूँ।' तब उस सुन्दरी ने 'बहुत अच्छा' कहकर मुनि के हाथ में अपना हाथ सौंप दिया। शृङ्गवान् ने शास्त्रोक्त रीति से विधिपूर्वक अग्नि में हवन किया और उसका पाणिग्रहण कर विवाह संस्कार सम्पन्न किया। रात्रि में वह तरुणी दिव्य वस्त्राभूषणों से विभूषित और सुगन्धित अङ्गराग से अलङ्कृत होकर परम सुन्दरी बन गई। अपनी कान्ति से सब ओर प्रकाश फैलाती उस कन्या को देखकर गालव कुमार अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसके साथ एक रात निवास किया। भोर होते ही वह मुनि से बोली— 'तपस्वी मुनियों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! आपने जो शर्त की थी, उसके अनुसार मैं आपके साथ रह चुकी। आपका मङ्गल हो, कल्याण हो। अब आज्ञा दीजिये, मैं जाती हूँ।' जाते-जाते उसने एक रहस्यमयी बात कही— 'जो अपने चित्त को एकाग्र कर इस तीर्थ में स्नान और देवताओं का तर्पण करके एक रात निवास करेगा, उसे अट्ठावन वर्षों तक विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन करने का फल प्राप्त होगा।' इतना कहकर वह साध्वी तपस्विनी देह त्यागकर स्वर्गलोक चली गई। मुनि उसके दिव्य रूप के वियोग में अत्यन्त दुखी हुए, किन्तु उन्होंने शर्त के अनुसार उसकी तपस्या का आधा भाग बड़े कष्ट से स्वीकार किया और अन्ततः वे भी अपने शरीर का परित्याग कर उसी के पथ पर चल पड़े।
सा निर्गताब्रवीद् भूयो योऽस्मिंस्तीर्थे समाहितः ।
वसते रजनीमेकां तर्पयित्वा दिवौकसः ॥
चत्वारिंशतमष्टौ च द्वौ चाष्टौ सम्यगाचरेत् ।
यो ब्रह्मचर्यं वर्षाणि फलं तस्य लभेत सः ॥
यों कहकर वह वहाँसे चल दी । जाते-जाते उसने फिर कहा- 'जो अपने चित्तको एकाग्र कर इस तीर्थमें स्नान और देवताओंका तर्पण करके एक रात निवास करेगा, उसे अट्ठावन वर्षोंतक विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य पालन करनेका फल प्राप्त होगा'
यही वह महान चरित्र है जो ब्रह्मचर्य पालन और स्वर्ग की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। वहीं दूसरी ओर, जब यदुवंश के राजा शल्य मारे गए, तब वहां उपस्थित महात्माओं ने बलराम जी को कुरुक्षेत्र के फल के विषय में विस्तार से बताया। ऋषियों ने कहा— 'बलराम जी! समन्तपञ्चक क्षेत्र एक सनातन तीर्थ है, जिसे प्रजापतिकी उत्तरवेदी भी कहते हैं। प्राचीन काल में महान वरदायक देवताओं ने यहाँ बड़े यज्ञ किए थे। इस क्षेत्र को तेजस्वी राजर्षि कुरु ने बहुत वर्षों तक जोता था, इसीलिए इस जगत में इसका नाम कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हो गया।' \बलराम जी ने जिज्ञासावश पूछा— 'तपोधनो! महात्मा कुरु ने इस क्षेत्र को किसलिए जोता था? मैं आप लोगों के मुख से यह कथा सुनना चाहता हूँ।' ऋषियों ने उत्तर दिया— 'हे राम! सुना जाता है कि जब राजा कुरु इस भूमि को जोत रहे थे, तब इन्द्र स्वर्ग से आकर उनसे प्रश्न करने लगे। इन्द्र ने पूछा— राजन्! आप इस महान प्रयत्न के साथ क्या कर रहे हैं? आप क्या चाहते हैं जिसके लिए यह भूमि जोत रहे हैं?' तब कुरु ने कहा था— 'जो मनुष्य इस क्षेत्र में मरेंगे, वे पुण्यात्माओं के पापरहित लोकों में जाएंगे।' यह सुनकर इन्द्र ने उनका उपहास किया और स्वर्ग लौट गए, किन्तु राजा कुरु उदासीन नहीं हुए और कार्य करते रहे। बार-बार इन्द्र आते और हँसकर चले जाते, पर कुरु विरत नहीं हुए। अन्ततः इन्द्र ने देवताओं से कहा कि यदि यहाँ के मानव यज्ञों द्वारा हमारा पूजन किए बिना ही स्वर्ग चले जाएंगे, तो हमारा भाग नष्ट हो जाएगा। तब इन्द्र स्वयं आए और बोले— 'नरेश्वर! आप व्यर्थ कष्ट क्यों उठाते हैं? जो मनुष्य और पशु-पक्षी यहाँ निराहार रहकर देह त्याग करेंगे अथवा युद्ध में मारे जाएंगे, वे स्वर्गलोक के भागी होंगे।' राजा कुरु ने कहा— 'देवराज! ऐसा ही हो।' इसके बाद इन्द्र प्रसन्न होकर स्वर्ग चले गए। इस प्रकार देवताओं ने इस भूमि को वरदान दिया कि यहाँ मृत्यु पाने वाले ब्रह्मलोक प्राप्त करेंगे और यहाँ दिए गए दान का फल सहस्र गुना होगा। जो यहाँ निवास करेंगे, उन्हें कभी यमराज का राज्य नहीं देखना पड़ेगा। यहाँ तक कि कुरुक्षेत्र की धूलियाँ भी पापी को परमपद दिलाती हैं।"
कुरुरुवाच इह ये पुरुषाः क्षेत्रे मरिष्यन्ति शतक्रतो ।
ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान् ॥
कुरुने कहा- शतक्रतो! जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मरेंगे, वे पुण्यात्माओंके पापरहित लोकोंमें जायँगे ।
ऋषियों ने बताया कि तरन्तुक, अरन्तुक, रामह्रद तथा मचक्रुक के बीच का यह भाग ही समन्तपञ्चक है। यहाँ ब्राह्मणों और नरेशों ने महान यज्ञ कर उत्तम गति प्राप्त की। बलराम जी ने कुरुक्षेत्र के दर्शन किए, वहां धन दान किया और फिर एक दिव्य आश्रम में पहुञ्चे। वह आश्रम महुआ, आम, पाकड़, बरगद, चिलबिल, कटहल और अर्जुन के वृक्षों से शोभायमान था। ऋषियों ने बताया कि प्राचीन काल में यहाँ भगवान विष्णु ने तपस्या की थी और यहीं कुमारावस्था वाली तपस्विनी शाण्डिल्य की पुत्री ने घोर तप कर स्वर्गलोक की प्राप्ति की थी।
ऋषियों का वचन सुनकर बलराम जी हिमालय के पार्श्व भाग में उन ऋषियों को प्रणाम कर आगे बढ़े। वहां उनकी दृष्टि 'प्लक्षप्रस्रवण' नामक तीर्थ पर पड़ी, जो सरस्वती नदी का उत्पत्ति स्थान है। इसके बाद वे 'कारपवन' नामक तीर्थ पहुञ्चे, जहाँ उन्होंने पवित्र जल में गोता लगाकर ब्राह्मणों को दान दिया और देवताओं व पितरों का तर्पण किया। उसके पश्चात वे यमुना के तट पर स्थित 'मित्र-वरुण' के पवित्र आश्रम में रुके। वहाँ बैठकर वे ऋषियों के साथ उत्तम कथाएँ सुनने लगे।
तभी देवर्षि नारद, जो स्वर्ण वस्त्र और कमण्डलु धारण किए हुए थे, वहां पहुञ्चे। उन्होंने बलराम जी का पूजन किया और उनसे कौरवों का समाचार पूछा। नारद जी ने अत्यन्त गम्भीर स्वर में कहा— 'रोहिणी नन्दन! भीष्मजी मारे गए। जयद्रथ, द्रोण, कर्ण और उसके पुत्र भी मारे गए। भूरिश्रवा और शल्य भी मारे जा चुके हैं। दुर्योधन की सेना के वे महाबली राजा और राजकुमार जो युद्ध से पीछे हटने वाले नहीं थे, उन्होंने विजय के लिए अपने प्राण त्याग दिए और स्वर्ग चले गए। अब केवल कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा ही शेष रह गए हैं। शल्य के जाने के बाद दुर्योधन अत्यन्त दुखी होकर द्वैपायन सरोवर में छिप गया है। वहां पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ उसे कष्ट दे रहे हैं, जिससे वह क्रोधित होकर विशाल गदा लेकर भीम से युद्ध करने निकल पड़ा है।'
अहतांस्तु महाबाहो शृणु मे तत्र माधव ॥
धार्तराष्ट्रबले शेषास्त्रयः समितिमर्दनाः ।
कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ॥
महाबाहु माधव! जो वहाँ नहीं मारे गये हैं, उनके नाम भी मुझसे सुन लो । दुर्योधनकी सेनामें कृपाचार्य, कृतवर्मा और पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा-ये शत्रुदलका मर्दन करनेवाले तीन ही वीर शेष रह गये हैं ।
नारद जी ने आगे कहा— 'महाबाहु माधव! यदि तुम चाहो तो अपने दोनों शिष्यों का वह भयङ्कर युद्ध अपनी आँखों से देख सकते हो।' बलराम जी ने ब्राह्मणों को विदा किया और अपने सेवकों को द्वारका जाने का आदेश दिया। फिर वे प्लक्षप्रस्रवण पर्वत से नीचे उतरे और सरस्वती नदी के तट पर निवास करने के परम आनन्द को याद करते हुए इस श्लोक का गगान किया— 'सरस्वती नदी के तट पर निवास करने में जो सुख और आनन्द है, वह अन्यत्र कहाँ मिल सकता है? सरस्वती सब नदियों में पवित्र है। उसे पाकर मनुष्य इहलोक और परलोक में कभी पापों के लिए शोक नहीं करते।'
सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या सरस्वती लोकशुभावहा सदा ।
सरस्वतीं प्राप्य जनाः सुदुष्कृतं सदा न शोचन्ति परत्र चेह च ॥
‘ सरस्वती सब नदियोंमें पवित्र है । सरस्वती सदा सम्पूर्ण जगत्का कल्याण करनेवाली है । सरस्वतीको पाकर मनुष्य इहलोक और परलोकमें कभी पापोंके लिये शोक नहीं करते हैं'
इसके पश्चात, शत्रुओं को सन्ताप देने वाले बलराम जी अपने उज्ज्वल रथ पर सवार होकर तुरन्त अपने दोनों शिष्यों का युद्ध देखने के लिए वहां पहुञ्चे।
In English
The Travels of Balarama along the Saraswati River
Balarama travels through various holy sites along the banks of the Saraswati river, performing rituals and donating wealth to Brahmins. The text describes several sacred locations he visits, including Subhumika, Gargasrota, and Nagadhvan, and explains how the river changed its course to create the Naimisharanya groves. It also recounts a story about the sage Mankanaka and his encounter with Lord Shiva.
This page answers
- What are the different holy sites visited by balarama?
- Why did the saraswati river change its direction?
- How were the seven marut sages born?
- Why did lord shiva appear to the sage mankanaka?
- What is the significance of the सप्तसारस्वत (saptasarasvata) pilgrimage?
Also written: Sarasvatopakhyana, Sarasvata, Balarama, Janamejaya, Vaishampayana, Rishigana, Sarasvati, Valkhilya, Ashmakutta, Dantolukhali, Mankanaka, Brahma, Mahadeva, Arshtishena, Vishvamitra, Rushangu, Mahodara, Vasishtha, Sindhudvipa, Devapina, Kaushika, Gadhi, Dhritarashtra, Indra, Namuchi, Ganga, Krittika, Kartikeya, Parvati, Kashyapa, Vishnu, Surya, Chandra, Shiva, Agni, Vayu, Skanda, Papashasana, Pashupati, Uma, Brahaspati, Garuda, Aruna, Varuna, Brahama, Taraka, Mahishasura, Banasura, Kubera, Shrutavati, Arundhati, Saptarshi, Dadhicha, Alambusha, Shakra, Bhrigu, Kunirgarga, Galava, Shringavana, Kuru, Bhima, Duryodhana, सारस्वतोपाख्यान