बिसस्तैन्योपाख्यान : अत्यधिक भूख और प्रलोभन के समय आत्मिक शुद्धि कैसे बनी रहे?
लोभ का त्याग और संयम
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 93 · पृष्ठ 790–814
3,221 शब्द · 17 मिनटका पाठ · 29 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
धर्म की व्याख्या हेतु प्रसङ्ग सुनाना
भीष्मजी ने कहा— "राजन्! जो लोग पन्द्रह दिन या एक महीने तक उपवास करके उसे तपस्या मानते हैं, वे व्यर्थ ही अपने शरीर को कष्ट देते हैं। वास्तव में केवल उपवास करने वाले न तपस्वी होते हैं और न धर्मज्ञ। मुनि सदा वेदों का स्वाध्याय करते हैं। त्याग का सम्पादन ही सबसे उत्तम तपस्या है। ब्राह्मण को सदा उपवासी, ब्रह्मचारी, मुनि और वेदों का स्वाध्यायी होना चाहिए।"
सा कृत्या कालरात्रीव कृताञ्जलिरुपस्थिता ।
वृषादर्भि नरपतिं किं करोमीति चाब्रवीत् ॥
कालरात्रिके समान विकराल रूप धारण करनेवाली वह कृत्या हाथ जोड़कर राजाके पास उपस्थित हुई और बोली – ' महाराज! मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ? '
युधिष्ठिर ने जिज्ञासावश पूछा— "पृथ्वीनाथ! ब्राह्मण कैसे सदा उपवासी और ब्रह्मचारी होवे? तथा किस प्रकार वह विघसाशी एवं अतिथिप्रिय हो सकता है?"
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी च पार्थिव ।
विघसाशी कथं च स्यात् कथं चैवातिथिप्रियः ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पृथ्वीनाथ! ब्राह्मण कैसे सदा उपवासी और ब्रह्मचारी होवे? तथा किस प्रकार वह विघसाशी एवं अतिथिप्रिय हो सकता है?
भीष्मजी बोले— "युधिष्ठिर! जो मनुष्य केवल प्रातःकाल और सायङ्काल ही भोजन करता है, बीच में कुछ नहीं खाता, उसे सदा उपवासी समझना चाहिए। जो केवल ऋतुकाल में धर्मपत्नी के साथ सहवास करता है, वह ब्रह्मचारी माना जाता है। जो सदा दान देने वाला है, वही सत्यवादी है। जो मांस नहीं खाता, वह अमांसाशी कहलाता है और जो सदा दान देने वाला है, वह पवित्र माना जाता है। जो दिन में नहीं सोता, उसे सदा जागने वाला कहा जाता है। युधिष्ठिर! जो अपने भृत्यों और अतिथियों के भोजन कर लेने के बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करता है, उसे अमृताशी समझना चाहिए। जब तक ब्राह्मण भोजन न कर लें, तब तक जो अन्न नहीं ग्रहण करता, वह मनुष्य अपने इस व्रत द्वारा स्वर्गलोक पर विजय पाता है। नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों और आश्रितों को भोजन कराने के बाद बचे हुए अन्न को ही खाता है, उसे विघसाशी कहते हैं। ऐसे मनुष्यों को ब्रह्मधाम में अक्षय लोकों की प्राप्ति होती है और गन्धर्वों सहित अप्सराएँ उनकी सेवा में उपस्थित रहती हैं। जो देवताओं और अतिथियों सहित पितरों के लिए अन्न का भाग देकर स्वयं भोजन करते हैं, वे इस जगत में पुत्र-पौत्रों के साथ आनन्द भोगते हैं और मृत्यु के पश्चात उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है।"
अभक्षयन् वृथा मांसममांसाशी भवत्युत ।
दानं ददत् पवित्री स्यादस्वप्नश्च दिवास्वपन् ॥
जो मांस नहीं खाता, वह अमांसाशी होता है और जो सदा दान देनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है । जो दिनमें नहीं सोता वह सदा जागनेवाला माना जाता है ।
युधिष्ठिर ने पुनः पूछा— "पितामह! लोग ब्राह्मणों को नाना प्रकार की वस्तुएँ दान करते हैं। दान देने और लेने वाले पुरुषों में क्या विशेषता होती है?"
भृत्यातिथिषु यो भुंक्ते भुक्तवत्सु नरः सदा ।
अमृतं केवलं भुंक्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! जो सदा भृत्यों * और अतिथियोंके भोजन कर लेनेके बाद ही स्वयं भोजन करता है, उसे केवल अमृत भोजन करनेवाला ( अमृताशी ) समझना चाहिये ।
भीष्मजी बोले— "राजन्! जो ब्राह्मण साधु अर्थात् उत्तम गुण-आचरण वाले पुरुष से तथा असाधु अर्थात् दुर्गुण और दुराचार वाले पुरुष से दान ग्रहण करता है, उनमें सद्गुणी पुरुष से दान लेना अल्प दोष है। किन्तु दुर्गुण और दुराचार वाले से दान लेने वाला पाप में डूब जाता है। भारत! इस विषय में राजा वृषादर्भि और सप्तर्षियों के संवाद रूप एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है।"
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वृषादर्भेश्च संवादं सप्तर्षीणां च भारत ॥
भारत! इस विषयमें राजा वृषादर्भि और सप्तर्षियोंके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।
उस समय पृथ्वी पर अरुन्धती और पतिव्रता देवी सहित ये सभी ऋषि समाधिके द्वारा सनातन ब्रह्मलोक की इच्छा से तपस्या करते हुए विचर रहे थे। उनकी सेवा के लिए 'गण्डा' नामक दासी थी, जो पशुसख नामक शूद्र के साथ वहाँ रहती थी। तभी पृथ्वी पर भीषण अकाल पड़ा। दीर्घकाल तक वर्षा न होने के कारण सारा जगत भूख से पीड़ित हो उठा और लोग बड़ी कठिनाई से अपने प्राणों की रक्षा कर रहे थे।
वृषादर्भिरुवाच (प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां सृष्टा वृत्तिरनिन्दिता ।
) प्रतिग्रहस्तारयति पुष्टिर्वै प्रतिगृह्यताम् ।
मयि यद् विद्यते वित्तं तद् वृणुध्वं तपोधनाः ॥
तब वृषादर्भि बोले—प्रतिग्रह ब्राह्मणोंके लिये उत्तम वृत्ति नियत किया गया है । तपोधन! प्रतिग्रह दुर्भिक्ष और भूखके कष्टसे ब्राह्मणकी रक्षा करता है तथा पुष्टिका उत्तम साधन है । अत: मेरे पास जो धन है उसे आप स्वीकार करें और ले लें ।
उस दुर्भिक्ष के समय राजा वृषादर्भि ने सप्तर्षियों को सम्बोधित करते हुए कहा— "प्रतिग्रह ब्राह्मणों के लिए उत्तम है। तपोधन! प्रतिग्रह इस भूख के कष्ट से ब्राह्मण की रक्षा करता है। अतः मेरे पास जो धन है, उसे आप स्वीकार करें। जो ब्राह्मण मुझसे याचना करता है, वह मुझे बहुत प्रिय लगता है। मैं आप लोगों में से प्रत्येक को एक हजार खच्चर देता हूँ और सभी को सफेद रोएँ वाली, शीघ्रगामिनी और ब्यायी हुई गौएँ प्रदान करने को उद्यत हूँ। साथ ही, दस हजार भारवाहक सफेद बैल भी दे रहा हूँ। इतना ही नहीं, मैं आपको जवान, मोटी-ताजी और श्रेष्ठ दुधारू गौएँ भी देता हूँ। इसके अतिरिक्त मैं आपको अच्छे गाँव, धान, रस, जौ और रत्न जैसी दुर्लभ वस्तुएँ भी दे सकता हूँ। बताइए, मैं आपको क्या दूँ? आप इस अभक्ष्य वस्तु के भक्षण में मन न लगावें।"
कस्मिंश्चिच्च पुरा यज्ञे शैब्येन शिबिसूनुना ।
दक्षिणार्थेऽथ ऋत्विग्भ्यो दत्तः पुत्रः पुरा किल ॥
पूर्वकालमें शिबिके पुत्र शैब्यने किसी यज्ञमें दक्षिणाके रूपमें अपना एक पुत्र ही ऋत्विजोंको दे दिया था ।
ऋषियों ने उत्तर दिया— "राजन्! राजा का दिया हुआ दान ऊपर से मधु के समान मीठा जान पड़ता है, परन्तु परिणाम में विष के समान भयङ्कर हो जाता है। इस बात को जानते हुए भी आप हमें क्यों प्रलोभन दे रहे हैं? ब्राह्मण का शरीर देवताओं का निवास है। यदि वह तपस्या से सन्तुष्ट हो, तो सम्पूर्ण देवताओं को प्रसन्न करता है। किन्तु राजा का दान उस तप को दावानल की भाँति नष्ट कर देता है। राजन्! आप यह दान उन्हीं को दें जो इसे लेना चाहते हों।" ऐसा कहकर वे दूसरे मार्ग से चल दिए।
प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानो दद्यामहं वोऽश्वतरीसहस्रम् ।
एकैकशः सवृषाः सम्प्रसूताः सर्वेषां वै शीघ्रगाः श्वेतरोमाः ॥
क्योंकि जो ब्राह्मण मुझसे याचना करता है, वह मुझे बहुत प्रिय लगता है। मैं आपलोगोंमेंसे प्रत्येकको एक हजार खच्चरियाँ देता हूँ तथा सभीको सफेद रोएँवाली शीघ्रगामिनी एवं ब्यायी हुई गौएँ साँडोंसहित देनेको उद्यत हूँ ।
तभी राजा के मन्त्रियों ने वन में जाकर गूलर के फलों में सुवर्ण मुद्राएँ भर दीं और सेवक उन भारी फलों को लेकर ऋषियों के पीछे दौड़े। महर्षि अत्रि ने उन्हें देख लिया और बोले— "ये गूलर हमारे लेने योग्य नहीं हैं। हमारी बुद्धि मन्द नहीं हुई है और न ही हम सो रहे हैं। हमें ज्ञात है कि इनके भीतर सुवर्ण भरा पड़ा है। यदि आज हमने इन्हें स्वीकार किया, तो परलोक में इसका कटा परिणाम भोगना पड़ेगा।"
क्षेत्रं हि दैवतमिदं ब्राह्मणान् समुपाश्रितम् ।
अमलो ह्येष तपसा प्रीतः प्रीणाति देवताः ॥
ब्राह्मणोंका शरीर देवताओंका निवासस्थान है, उसमें सभी देवता विद्यमान रहते हैं । यदि ब्राह्मण तपस्यासे शुद्ध एवं संतुष्ट हो तो वह सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करता है ।
वसिष्ठ ने कहा— "एक निष्क का दान लेने से सौ हजार निष्कों के दान लेने का दोष लगता है। ऐसा करने वाले घोर पापमयी गति में गिरते हैं।" कश्यप ने कहा— "सुवर्ण और पशु पाकर भी मनुष्य को सन्तोष नहीं होता; विद्वान पुरुष अपनी तृष्णा शान्त करें।" गौतम ने कहा— "संसार में ऐसा कोई द्रव्य नहीं जो मनुष्य की आशा का पेट भर सके; पुरुष की आशा समुद्र के समान है जो कभी नहीं भरती।" विश्वामित्र बोले— "इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म लेती है और तृष्णा तीर की तरह मन पर चोट करती रहती है।"
शतेन निष्कगणितं सहस्रेण च सम्मितम् ।
तथा बहु प्रतीच्छन् वै पापिष्ठां पतते गतिम् ॥
वसिष्ठ बोले – एक निष्क ( स्वर्णमुद्रा) का दान लेनेसे सौ हजार निष्कोंके दान लेनेका दोष लगता है । ऐसी दशामें जो बहुत-से निष्क ग्रहण करता है, उसको तो घोर पापमयी गतिमें गिरना पड़ता है ।
अत्रि ने कहा— "भोगों की कामना आग में घी डालने जैसी है, जो उसे और बढ़ा देती है।" जमदग्नि ने कहा— "प्रतिग्रह न लेने से ही ब्राह्मण अपनी तपस्या सुरक्षित रख सकता है। जो लौकिक धन के लिए लोभ करता है, उसका तपरूपी धन नष्ट हो जाता है।" अरुन्धती ने भी कहा कि धन सङ्ग्रह से श्रेष्ठ तपस्या का सञ्चय है। पशुसख ने कहा कि धर्ममय धन की प्राप्ति ही श्रेष्ठ है।
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
सर्वं तन्नालमेकस्य तस्माद् विद्वान् शमं चरेत् ॥
कश्यपने कहा — इस पृथ्वीपर जितने धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब किसी एक पुरुषको मिल जायँ तो भी उसे संतोष न होगा; यह सोचकर विद्वान् पुरुष अपने मनकी तृष्णाको शान्त करे ।
ऋषियों ने कहा— "जो राजा कपटयुक्त फल देने के लिए ले आया है, वह कुशल रहे।" यह कहकर वे समस्त व्रतधारी महर्षि उन फलों का परित्याग कर अन्यत्र चले गए। जब मन्त्रियों ने उन्हें बताया कि ऋषियों ने छल समझकर परित्याग कर दिया है, तो राजा वृषादर्भि को बड़ा क्रोध आया।
इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि हित्वा तानि फलानि वै ।
ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव धृतव्रताः ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! यह कहकर उन सुवर्णयुक्त फलोंका परित्याग करके वे समस्त व्रतधारी महर्षि वहाँसे अन्यत्र चले गये ।
वह राजधानी लौट गया और अत्यन्त कठोर नियमों के साथ आहवनीय अग्नि में आहुति देने लगा। तब कालरात्रिके समान विकराल रूप वाली 'यातुधानी' प्रकट हुई। उसने हाथ जोड़कर पूछा— "महाराज! मैं आपकी किस आज्ञा का पालन करूँ?"
राजा ने आदेश दिया— "यातुधानी! तुम वन में जाओ और अरुन्धती सहित सातों ऋषियों, उनकी दासी और उसके पति का नाम व तात्पर्य समझकर उन्हें मार डालो।"
भीष्म कहते हैं— राजन्! राजा की यह आज्ञा पाकर यातुधानी ने 'तथास्तु' कहकर उसे स्वीकार कर लिया और उस वन में चली गई, जहाँ वे महर्षि विचरा करते थे। उन दिनों अत्रि आदि महर्षि उस वन में फल-मूल का आहार करते हुए इधर-उधर घूमते थे।
एक दिन उन महर्षियों की दृष्टि एक सन्न्यासी पर पड़ी, जो एक कुत्ते के साथ वहाँ विचर रहा था। उसका शरीर बहुत मोटा और सुडौल था; उसके कन्धे, हाथ, पैर, मुख और पेट—सभी अङ्ग अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट थे। उस सुन्दर सन्न्यासी को देखकर ऋषियों ने आपस में चर्चा शुरू कर दी। वसिष्ठजी बोले— "हमें इस बात की चिन्ता नहीं कि आज हमारा अग्निहोत्र हुआ या नहीं, सुबह-शाम अग्निहोत्र करना पड़ता है; इसीलिए यह कुत्ते के साथ खूब मोटा-ताजा हो गया है।"
अत्रि ने कहा— "हमारी तरह इसकी सारी शक्ति भूख के मारे नष्ट नहीं हुई है और न ही वेदों का अध्ययन करने में इसने हमारे समान कष्ट सहा है; इसीलिए यह इतना मोटा है।" विश्वामित्र ने अपनी बात जोड़ते हुए कहा— "हमारा तो भूख के कारण सनातन शास्त्र विस्मृत हो गया है और धर्म भी क्षीण हो चला है, पर इसकी दशा ऐसी नहीं है। यह केवल पेट की भूख मिटाने में लगा हुआ एक आलसी और मूर्ख व्यक्ति है।" जमदग्नि बोले— "इसे हमारी तरह वर्षभर के भोजन और ईंधन को जुटाने की चिन्ता नहीं है।" कश्यप ने कहा— "हमें तो भारी कुटुम्ब के भोजन-वस्त्र की चिन्ता करनी पड़ती है, पर इस सन्न्यासी को यह कष्ट नहीं है।" गौतम ने भी कहा— "इसे हमारी तरह तीन-तीन वर्षों तक कुश की रस्सी से बनी मेखला और मृगचर्म धारण नहीं करना पड़ता।"
जब उस कुत्ते सहित आए हुए सन्न्यासी ने महर्षियों को देखा, तो वह उनके पास आया और सन्न्यास की मर्यादा के अनुसार उनका हाथ स्पर्श किया। फिर उसने अपना कुशल-समाचार देते हुए कहा— "हम अपनी भूख मिटाने के लिए इस वन में भ्रमण कर रहे हैं" और वह समूह वहीं से चल पड़ा।
वे सभी महर्षि फल-मूल का सङ्ग्रह करके उस वन में विचर रहे थे कि एक दिन उन्हें एक सुन्दर सरोवर दिखाई पड़ा। उसका जल अत्यन्त स्वच्छ और पवित्र था। उसके चारों ओर सघन वृक्षों की पङ्क्तियाँ थीं और प्रातःकालीन सूर्य के समान अरुण रङ्ग के कमलपुष्प उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। तालाब के चारों ओर वैदूर्यमणि जैसी कान्ति वाले कमलिनी के पत्ते फैले थे, जिनमें अनेक पक्षी आकर जल पीते थे। उस सरोवर में उतरने के लिए सुन्दर सीढ़ियाँ बनी थीं, जहाँ न तो कहीं काई थी और न ही कीचड़।
परन्तु उस सरोवर की रक्षा के लिए राजा वृषादर्भ की भेजी हुई भयानक आकार वाली यातुधानी कृत्या वहाँ खड़ी थी। जब पशुसख के साथ वे सभी महर्षि मृणाल लेने के लिए उस तट पर पहुँचे, तो उस विकराल यातुधानी को देखकर वे बोले— "अरी! तू कौन है और यहाँ अकेली क्यों खड़ी है? इस सरोवर के तट पर रहकर तू कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहती है?"
ततस्ते यातुधानीं तां दृष्ट्वा विकृतदर्शनाम् ।
स्थितां कमलिनीतीरे कृत्यामूचुर्महर्षयः ॥
सरोवरके तटपर खड़ी हुई उस यातुधानी कृत्याको जो बड़ी विकराल दिखायी देती थी, देखकर वे सब महर्षि बोले-—
यातुधानी ने उत्तर दिया— "तपस्वियो! मैं जो कोई भी होऊँ, तुम्हें मेरे विषय में पूछने का अधिकार नहीं है। तुम इतना ही जान लो कि मैं इस सरोवर की रक्षा करने वाली हूँ।"
ऋषियों ने कहा— "भद्रे! हम भूख से व्याकुल हैं और हमारे पास खाने के लिए दूसरी कोई वस्तु नहीं है। यदि तुम अनुमति दो, तो हम इस सरोवर से कुछ मृणाल ले लें।"
यातुधानी ने एक शर्त रख दी— "ऋषियों! तुम इच्छानुसार मृणाल ले सकते हो, पर एक शर्त है। एक-एक करके आओ, अपना नाम और उसका तात्पर्य मुझे बताओ और फिर मृणाल ले लो।"
यातुधान्युवाच समयेन बिसानीतो गृह्णीध्वं कामकारतः ।
एकैको नाम मे प्रोक्त्वा ततो गृह्णीत माचिरम् ॥
यातुधानीने कहा —ऋषियो! एक शर्तपर तुम इस सरोवरसे इच्छानुसार मृणाल ले सकते हो । एक- एक करके आओ और मुझे अपना नाम और तात्पर्य बताकर मृणाल ले लो । इसमें विलम्ब करनेकी आवश्यकता नहीं है ।
महर्षि अत्रि समझ गए कि यह कोई राक्षसी कृत्या है जो ऋषियों का वध करने आई है, फिर भी भूख के कारण उन्होंने उत्तर दिया। अत्रि बोले— "मैं अरात्रि और अत्रि कहलाता हूँ। मैं उस परमात्म-तत्त्व में सदा जाग्रत रहता हूँ जो समस्त प्राणियों के लिए अज्ञात है; अतः वह मेरे लिए अरात्रिके समान है।" यातुधानी ने कहा— "तेजस्वी महर्षे! आपके नाम का तात्पर्य समझना कठिन है। आप तालाब में उतरिये।"
विज्ञाय यातुधानीं तां कृत्यामृषिवधैषिणीम् ।
अत्रिः क्षुधापरीतात्मा ततो वचनमब्रवीत् ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! उसकी यह बात सुनकर महर्षि अत्रि यह समझ गये कि ‘ यह राक्षसी कृत्या है और हम सब ऋषियोंका वध करनेकी इच्छासे यहाँ आयी हुई है । ' तथापि भूखसे व्याकुल होनेके कारण उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया ।
वसिष्ठ बोले— "मेरा नाम वसिष्ठ है। मैं गृहस्थ आश्रम में वास करता हूँ, इसलिए मुझे वसिष्ठ समझो।" यातुधानी बोली— "मुने! आपके नाम के अक्षरों का उच्चारण करना भी कठिन है, मैं इसे याद नहीं रख सकती। आप तालाब में प्रवेश कीजिये।"
कश्यप ने कहा— "मैं प्रत्येक शरीर में अन्तर्यामी बनकर रक्षा करता हूँ, इसलिए कश्यप हूँ। मेरा देह काश के फूल की भाँति उज्ज्वल है, अतः मुझे 'काश्य' भी कहते हैं।" यातुधानी ने फिर कहा— "महर्षे! आपका तात्पर्य समझना कठिन है। आप तालाब में जाइये।"
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते ।
दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥
यातुधानी बोली- महर्षे! आपके नामका तात्पर्य समझना मेरे लिये बहुत कठिन है । आप भी कमलोंसे भरी हुई बावड़ीमें जाइये ।
भरद्वाज बोले— "मैं अपने पुत्रों, शिष्यों, देवताओं और ब्राह्मणों का भरण-पोषण करता हूँ, इसलिए भरद्वाज कहलाता हूँ।" यातुधानी बोली— "मुनिवर! आपके नाम के अक्षरों का उच्चारण करना मेरे लिए क्लेशकारी है। आप भी सरोवर में उतरिये।"
गौतम ने कहा— "मैंने इन्द्रियों का संयम किया है, इसलिए 'गोदम' कहलाता हूँ। मेरी कान्ति अन्धकार को दूर भगाने वाली है, अतः मुझे गौतम समझो।" यातुधानी ने फिर वही कहा— "महामुने! मैं आपकी व्याख्या नहीं समझ सकती। आप पोखरे में प्रवेश कीजिये।"
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥
यातुधानी बोली – महामुने! आपके नामकी व्याख्या भी मैं नहीं समझ सकती । जाइये, पोखरेमें प्रवेश कीजिये ।
विश्वामित्र बोले— "मैं विश्वेदेव और सम्पूर्ण विश्व का मित्र हूँ, इसलिए विश्वामित्र प्रसिद्ध हूँ।" यातुधानी बोली— "महर्षे! आपके नाम के एक अक्षर का उच्चारण करना भी मेरे लिए असम्भव है। आप सरोवर में जाइये।"
जमदग्नि ने कहा— "मैं देवताओं की आहवनीय अग्नि से उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिए मुझे जमदग्नि समझो।" यातुधानी ने पुनः कहा— "महामुने! इसे समझना कठिन है। अब आप तालाब में उतरिये।"
यातुधान्युवाच यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥
यातुधानी बोली - महामुने! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बतलाया है, उसको समझना मेरे लिये बहुत कठिन है । अब आप सरोवरमें प्रवेश कीजिये ।
अन्त में अरुन्धती ने कहा— "मैं पर्वत, पृथ्वी और द्युलोक को धारण करती हूँ और अपने स्वामी के अनुसार चलती हूँ, इसलिए मेरा नाम अरुन्धती है।" यातुधानी ने अन्तिम बार कहा— "देवि! आपके नाम का एक अक्षर भी मेरे लिए याद रखना कठिन है। आप तालाब में प्रवेश कीजिये।"
गण्ड ने कहा— "अग्नि से उत्पन्न होने वाली कृत्ये! गडि धातु से गण्ड शब्द की सिद्धि होती है, यह मुख के एक देश—कपोल का वाचक है। मेरा कपोल ऊँचा है, इसलिए लोग मुझे गण्डा कहते हैं।"
यातुधानी ने उत्तर दिया— "तुम्हारे नाम की व्याख्या का उच्चारण करना भी मेरे लिए कठिन है। अतः इसे याद रखना असम्भव है। जाओ, तुम भी बावड़ी में उतरो।"
यातुधान्युवाच नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥
यातुधानी बोली- तुमने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके अक्षरोंका उच्चारण करना भी मेरे लिये कष्टप्रद है । अतः इसको याद नहीं रख सकती; अब तुम भी पोखरेमें जाओ ।
पशुसख ने कहा— "आग से पैदा हुई कृत्ये! मैं पशुओं को प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय सखा हूँ; इस गुण के अनुसार मेरा नाम पशुसख है।"
यातुधानी बोली— "तुमने जो अपने नाम की व्याख्या की है, उसके अक्षरों का उच्चारण करना भी मेरे लिए कष्टप्रद है। अतः इसे याद नहीं रख सकती; अब तुम भी पोखरे में जाओ।"
तभी उस सन्न्यासी शुनःसख ने कहा— "यातुधानी! इन ऋषियों ने जिस प्रकार अपना नाम बताया है, उस तरह मैं नहीं बता सकता। तू मेरा नाम 'शुनःसख' समझ ले।"
सकृदुक्तं मया नाम न गृहीतं त्वया यदि ।
तस्मात् त्रिदण्डाभिहता गच्छ भस्मेति मा जिरम् ॥
शुनःसखने कहा- मैंने एक बार अपना नाम बता दिया फिर भी यदि तूने उसे ग्रहण नहीं किया तो इस प्रमादके कारण मेरे इस त्रिदण्डकी मार खाकर अभी भस्म हो जा— इसमें विलम्ब न हो ।
यातुधानी ने सन्देह से पूछा— "नाम सन्दिग्ध है। यह वाक्य मेरे लिए अस्पष्ट है। अतः अब फिर स्पष्ट रूप से अपने नाम की व्याख्या कीजिये।"
सन्न्यासी के स्वर में गम्भीरता आ गई। उन्होंने कहा— "मैंने एक बार अपना नाम बता दिया, फिर भी यदि तूने उसे ग्रहण नहीं किया, तो इस प्रमाद के कारण मेरे इस त्रिदण्ड की मार खाकर अभी भस्म हो जा— इसमें विलम्ब न हो!"
यह कहकर उस सन्न्यासी ने अपने ब्रह्मदण्ड के समान त्रिदण्ड से उसके मस्तक पर ऐसा प्रहार किया कि वह यातुधानी पृथ्वी पर गिर पड़ी और तुरन्त भस्म हो गई। महाबलवती राक्षसी का वध करके शुनःसख ने अपना त्रिदण्ड पृथ्वी पर रख दिया और स्वयं भी वहीं घास से ढकी भूमि पर बैठ गए।
तदनन्तर वे सभी महर्षि इच्छानुसार कमल के फूल और मृणाल लेकर प्रसन्नतापूर्वक सरोवर से बाहर निकले। बहुत परिश्रम करने के उपरान्त उन्होंने अलग-अलग बोझे बाँधे और उन्हें किनारे पर रखकर वे सरोवर के जल से तर्पण करने लगे। थोड़ी देर बाद जब वे पुरुषप्रवर पानी से बाहर निकले, तो उन्हें रखे हुए अपने मृणाल दिखाई नहीं दिए।
मृणालों के गायब होते ही उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों में व्याकुलता फैल गई। वे एक-दूसरे से पूछने लगे— "अरे! हम सब लोग भूख से व्याकुल थे और अब भोजन करना चाहते थे। ऐसे समय में किस निर्दयी ने हमारे मृणाल चुरा लिये?" शत्रुसूदन! वे श्रेष्ठ ब्राह्मण आपस में सन्देह करते हुए एक-दूसरे से पूछताछ करने लगे और अन्त में बोले— 'हम सब लोग मिलकर शपथ करें!'
शपथ की बात सुनकर भूख और परिश्रम से थके हुए उन मुनियों ने एक स्वर में कहा— 'बहुत अच्छा!' वे सभी शपथ लेने को तैयार हो गए।
त उक्त्वा बाढमित्येवं सर्व एव तदा समम् ।
क्षुधार्ताः सुपरिश्रान्ताः शपथायोपचक्रमुः ॥
शपथकी बात सुनकर सब- के - सब बोल उठे - ' बहुत अच्छा ' । फिर वे भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे थके - माँदे ब्राह्मण एक साथ ही शपथ खानेको तैयार हो गये ।
वसिष्ठ बोले— "जिसने मृणाल चुराये हों, उसे निषिद्ध समय में वेद पढ़ने, कुत्ते लेकर शिकार खेलने, सन्न्यासी होकर मनमाना बर्ताव करने, शरणागत को मारने, अपनी कन्या बेचकर जीविका चलाने तथा किसान के धन छीन लेने का पाप लगे।"
अनध्याये पठेल्लोके शुनः सः परिकर्षतु ।
परिव्राट् कामवृत्तस्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
शरणागतं हन्तु स वै स्वसुतां चोपजीवतु ।
अर्थान् कांक्षतु कीनाशाद् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
वसिष्ठ बोले — जिसने मृणाल चुराये हों उसे निषिद्ध समयमें वेद पढ़ने, कुत्ते लेकर शिकार खेलने, संन्यासी होकर मनमाना बर्ताव करने, शरणागतको मारने, अपनी कन्या बेचकर जीविका चलाने तथा किसानके धन छीन लेनेका पाप लगे ।
कश्यप ने कहा— "जिसने मृणालों की चोरी की हो, उसे सब जगह हर तरह की बातें कहने, दूसरों की धरोहर हड़प लेने और झूठी गवाही देने का पाप लगे। जो मृणालों की चोरी करता हो, उसे मांसाहार का पाप लगे, उसका दान व्यर्थ चला जाए और उसे दिन में स्त्री के साथ समागम करने का पाप लगे।"
भरद्वाज बोले— "जिसने मृणाल चुराया हो, उस निर्दयी को धर्म के परित्याग का दोष लगे। वह स्त्रियों, कुटुम्बीजनों तथा गौओं के साथ पापपूर्ण बर्ताव करने का दोषी हो और ब्राह्मण को वाद-विवाद में पराजित करने का पाप लगे। जो चोरी करे, उसे उपाध्याय को नीचे बैठाकर उनसे वेदों का अध्ययन करने और घास-फूस की आग में आहुति डालने का पाप लगे।"
जमदग्नि ने कहा— "जिसने मृणालों का अपहरण किया हो, उसे पानी में मलत्याग करने का पाप लगे; गाय मारने अथवा उसके साथ द्रोह करने का तथा ऋतुकाल आए बिना स्त्री के साथ समागोम का पाप लगे। जिसने चोरी की हो, उसे सबके साथ द्वेष करने, स्त्री की कमाई पर जीने, भाई-बन्धुओं से दूर रहने और एक-दूसरे के घर अतिथि होने का पाप लगे।"
जमदग्निरुवाच पुरीषमुत्सृजत्वप्सु हन्तु गां चैव द्रुह्यतु ।
अनृतौ मैथुनं यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
जमदग्नि बोले –जिसने मृणालोंका अपहरण किया हो, उसे पानीमें मलत्याग करनेका पाप लगे, गाय मारनेका अथवा उसके साथ द्रोह करनेका तथा ऋतुकाल आये बिना ही स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे ।
गौतम बोले— "जिसने मृणाल चुराये हों, उसे वेदों को पढ़कर त्यागने का, तीनों अग्नियों का परित्याग करने का और सोमरस का विक्रय करने का पाप लगे। उसे वही लोक मिले जो एक ही कूप में पानी भरने वाले, गाँव में रहने वाले और शूद्र की पत्नी से संसर्ग रखने वाले ब्राह्मण को मिलता है।"
विश्वामित्र ने कहा— "जो इन मृणालों को चुरा ले गया हो, जिस पुरुष के जीवित रहने पर उसके गुरु, माता तथा पिता का दूसरा पुरुष पोषण करे; जिसकी कुगति हुई हो तथा जिसके बहुत-से पुत्र हों, उसे जो पाप लगता है वह लगे। जिसने अपहरण किया हो, उसे अपवित्र रहने, वेद को मिथ्या मानने, धन का घमण्ड करने, ब्राह्मण होकर खेत जोतने और दूसरों से डाह रखने का पाप लगे। जो चोरी करे, उसे वर्षाकाल में परदेश की यात्रा करने, ब्राह्मण होकर वेतन लेकर काम करने तथा राजा के पुरोहित या यज्ञ के अनधिकारी से यज्ञ कराने का पाप लगे।"
वर्षाचरोऽस्तु भृतको राज्ञश्चास्तु पुरोहितः ।
अयाज्यस्य भवेदृत्विग् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
जिसने मृणाल चुराये हों, उसे वर्षाकालमें परदेशकी यात्रा करनेका, ब्राह्मण होकर वेतन लेकर काम करनेका, राजाके पुरोहित तथा यज्ञके अनधिकारीसे भी यज्ञ करानेका पाप लगे ।
अरुन्धती बोलीं— "जो स्त्री मृणालों की चोरी करती हो, उसे प्रतिदिन सास का तिरस्कार करने का, पति का दिल दुखाने का और अकेली स्वादिष्ट वस्तुएँ खाने का पाप लगे। जो चोरी करे, उसे कुटुम्बीजनों का अपमान करके रहने, कलङ्किनी होने के कारण पति के उपभोग में न आने का और ब्राह्मणी होकर भी क्षत्राणियों के समान उग्र स्वभाव वाले वीर पुत्र की जननी होने का दोष लगे।"
ज्ञातीनां गृहमध्यस्था सक्तूनतु दिनक्षये ।
अभोग्या वीरसूरस्तु बिसस्तैन्यं करोति या ॥
जिसने मृणालोंकी चोरी की हो, उस स्त्रीको कुटुम्बीजनोंका अपमान करके घरमें रहनेका, दिन बीत जानेपर सत्तू खानेका, कलंकिनी होनेके कारण पतिके उपभोगमें न आनेका और ब्राह्मणी होकर भी क्षत्राणियोंके समान उग्र स्वभाववाले वीर पुत्रकी जननी होनेका पाप लगे ।
गण्डा ने कहा— "जिस स्त्री ने मृणाल चुराया हो, उसे सदा झूठ बोलने, भाई-बन्धुओं से लड़ने और शुल्क लेकर कन्यादान करने का पाप लगे। उसे रसोई बनाकर अकेली भोजन करने का, दूसरों की गुलामी करते हुए बूढ़ी होने का और पापकर्म करके मृत्यु के मुख में पड़ने का पाप लगे।"
पशुसख बोले— "जिसने चोरी की हो, उसे दूसरे जन्म में भी दासी के घर पैदा होने, सन्तानहीन, निर्धन होने तथा देवताओं को नमस्कार न करने का पाप लगे।"
दास एव प्रजायेतामप्रसूतिरकिंचनः ।
दैवतेष्वनमस्कारो बिसस्तैन्यं करोति यः ॥
पशुसख बोला – जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे दूसरे जन्ममें भी दासीके ही घरमें पैदा होने, संतानहीन और निर्धन होने तथा देवताओंको नमस्कार न करनेका पाप लगे ।
तभी शुनःसख ने कहा— "जिसने मृणालों को चुराया हो, वह ब्रह्मचर्य व्रत पूर्ण करके आए हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वान् को कन्यादान दे अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेद का अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाए।"
अध्वर्यवे दुहितरं वा ददातु च्छन्दोगे वा चरितब्रह्मचर्ये ।
आथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः स्नायीत वा यो हरते बिसानि ॥
शुनःसखने कहा — जिसने मृणालोंको चुराया हो वह ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वान्को कन्यादान दे अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ।
यह सुनकर ऋषियों ने कहा— "शुनःसख! तुमने जो शपथ ली है, वह तो ब्राह्मणों को अभीष्ट ही है। अतः जान पड़ता है कि हमारे मृणालों की चोरी तुमने ही की है।"
शुनःसख ने मुस्कुराते हुए स्वीकार किया— "मुनिवरो! आपका कहना ठीक है। वास्तव में आपका भोजन मैंने ही रख लिया था। आप लोग जब तर्पण कर रहे थे, तब आपकी दृष्टि इधर नहीं थी; तभी मैंने वह सब लेकर रख लिया था। अतः आपका यह कथन कि मैंने चोरी की है, सत्य है। मैंने उन मृणालों को यहाँ छिपा दिया था। देखिए, ये रहे आपके मृणाल! निष्पाप मुनियों! मैंने यह सब आपकी परीक्षा के लिए किया था। मैं आप लोगों की रक्षा करने आया था, क्योंकि वह यातुधानी अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाली कृत्या थी और वह आपका वध करना चाहती थी।"
भीष्म कहते हैं— "युधिष्ठिर! इन्द्र की बात सुनकर महर्षियों को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने देवराज से 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर वे सब के सब देवेन्द्र के साथ ही स्वर्गलोक चले गये। उन महात्माओं ने अत्यन्त भूखे होने पर और बड़े-बड़े भोगों द्वारा लालच दिए जाने पर भी उस समय लोभ नहीं किया। इसी से उन्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई।"
एवमेते महात्मानो भोगैर्बहुविधैरपि ।
क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभिः ॥
नैव लोभं तदा चक्रुस्ततः स्वर्गमवाप्नुवन् ॥
इस प्रकार उन महात्माओंने अत्यन्त भूखे होनेपर और बड़े - बड़े लोगोंके अनेक प्रकारके भोगोंद्वारा लालच देनेपर भी उस समय लोभ नहीं किया । इसीसे उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई ।
"राजन्! इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सभी दशाओं में लोभ का त्याग करे, क्योंकि यही सबसे बड़ा धर्म है। जो मनुष्य इस पवित्र चरित्र का कीर्तन करता है, वह धन और मनोवाञ्छित वस्तु का भागी होता है और कभी सङ्कट में नहीं पड़ता। देवता, ऋषि और पितर उसके ऊपर प्रसन्न होते हैं। वह इहलोक में यश, धर्म और धन का भागी होता है तथा मृत्यु के पश्चात् उसे स्वर्गलोक सुलभ होता है।"
एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥
राजन्! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा धर्म है । अतः लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ।
In English
The Test of the Saptarishis and King Vrishadhari
Bhishma explains the duties of a Brahmin to Yudhishthira. The text then tells how King Vrishadhari attempted to bribe the Saptarishis with wealth during a famine, but the sages refused the deceptive gift. In anger, the king summoned the demoness Yatudhani to kill the sages and her maid, Arundhati.
This page answers
- What are the characteristics of a brahmin according to bhishma?
- Why did the saptarishis refuse the gifts from king vrishadhari?
- Who is yatudhani and why did king vrishadhari send her?
- How did the sages react to the golden fruits in the trees?
Also written: Bisastainyopakhyana, Bisastainya, Bhishma, Yudhishthira, Saptarshi, Ganda, Pashusakha, Yatudhani, Atri, Vasishtha, Kashyapa, Bharadvaja, Gautama, Vishvamitra, Jamadagni, Arundhati, Shunahsakha, बिसस्तैन्योपाख्यान