व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, द्वितीयोऽध्यायः
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यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके द्वितीयोऽध्यायः — ओंकारनिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।
द्वितीयोऽध्यायः — ओंकारनिर्णयः
अध्याय-सार — ओंकारनिर्णय (१५८ श्लोक)। सब मन्त्र प्रणवसे आरम्भ होते हैं, उसीसे निकलते हैं और उसीमें लीन होते हैं (२.१); ओंकार परम ब्रह्म और सब मन्त्रोंका नायक है (२.२)। अध्याय उसके ऋषि-छन्द-देवता, प्रत्येक कर्मके आरम्भमें उसके योग, ‘ॐ तत् सत्’ के त्रिविध निर्देश (२.९), उसकी मात्राओं, पर्यायों और नामोंकी निरुक्तियोंसे होता हुआ शब्दब्रह्म और परब्रह्मके भेदपर आता है (२.४७–४९) और पाँच लक्षणवाले प्रणवकी उपासना बताता है। फिर सिद्धान्तोंके मत गिनाये जाते हैं — हिरण्यगर्भ, कपिल, अपान्तरतमा, सनत्कुमार, ब्रह्मिष्ठ, पाशुपत, पाञ्चरात्र और वायुलि — जिनमें ओंकार तिरसठ भेदोंसे गाया जाता है (२.६६–१०६); विष्णुका स्वरूप, ओंकारके दस नाम और उनकी निरुक्तियाँ आती हैं। मात्राओंकी गिनतीपर ऋषियोंके मत देकर याज्ञवल्क्य अपना मत रखते हैं: वे अमात्र ओंकारको मानते हैं — उच्चारित, शब्दमय ओंकार स्थूल है, और अमात्र, अनुच्चार्य ओंकार पर है (२.१३१–१३२)। अध्याय परम व्योमतक ले जानेवाली ओंकार-उपासना, उसकी महिमा और उसके ज्ञानके फलसे समाप्त होता है।
प्रणवस्याद्यमन्त्रत्वम्
प्रणवाद्याः स्मृता मन्त्राश्चतुर्वर्गफलप्रदाः ।
तस्माच्च निःसृताः सर्वे प्रलीयन्ते च तत्र वै ॥ २.१ ॥
प्रणव से आरम्भ होने वाले मन्त्र और चारों पुरुषार्थों का फल देने वाले हैं; सब उसी से निकलते हैं और उसी में लीन होते हैं।
अवतरणिका — प्रथम अध्याय में ऋषियों के प्रश्नों के माध्यम से साधना की आधारभूमि तैयार की गई। अब द्वितीय अध्याय में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्रों के मूल स्रोत 'ओंकार' के स्वरूप और उसकी महिमा का विवेचन कर रहे हैं, जिससे साधक मन्त्रों के बाह्य जप से ऊपर उठकर उनके बीज-तत्त्व को पहचान सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: मन्त्राः प्रणवाद्याः स्मृताः (च) चतुर्वर्गफलप्रदाः (सन्ति)। सर्वे तस्मात् निःसृताः (च) तत्र वै प्रलीयन्ते।
पदार्थ:
• प्रणवाद्याः: प्रणव (ॐ) से आरम्भ होने वाले। 'प्रणव' वह ध्वनि है जो प्राणों को नवीनीकृत करती है और ब्रह्म का साक्षात् नाद है।
• चतुर्वर्गफलप्रदाः: चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) का फल प्रदान करने वाले।
• निःसृताः: निःसृत का अर्थ है—निकलना या उद्भूत होना। जैसे बीज से वृक्ष निकलता है, वैसे ही ओंकार से समस्त मन्त्रों की उत्पत्ति हुई है।
• प्रलीयन्ते: लीन होना या विलीन हो जाना। यह लय की प्रक्रिया है, जहाँ मन्त्र अपनी शक्ति सहित पुनः अपने मूल स्रोत में समाहित हो जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस प्रथम श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने समस्त मन्त्र-शास्त्र का सार एक सूत्र में बाँध दिया है। वे घोषणा करते हैं कि समस्त मन्त्र 'प्रणव' (ओंकार) से आरम्भ होते हैं। यहाँ 'आरम्भ' का अर्थ केवल शब्दों का क्रम नहीं है, अपितु अस्तित्वगत उद्गम है।
बाह्य दृष्टि से हम देखते हैं कि अधिकांश वैदिक मन्त्रों के पूर्व 'ॐ' लगाया जाता है, किंतु याज्ञवल्क्य योगीश्वर की दृष्टि में यह केवल एक विधि नहीं, बल्कि एक सत्य है। मन्त्र वास्तव में ओंकार की ही विभिन्न तरंगें हैं। जिस प्रकार समुद्र की लहरें समुद्र से ही उठती हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड की समस्त ध्वनियाँ और मन्त्र इस परम नाद 'ॐ' से निःसृत हुए हैं और अंततः इसी में लय हो जाते हैं।
यह स्मृति स्पष्ट करती है कि जो मन्त्र प्रणव से युक्त होते हैं, वे 'चतुर्वर्गफलप्रदाः' होते हैं। इसका रहस्य यह है कि प्रणव स्वयं पूर्ण ब्रह्म है। जब किसी मन्त्र के साथ ओंकार जुड़ता है, तो वह मन्त्र केवल एक यांत्रिक ध्वनि न रहकर उस पूर्णता से जुड़ जाता है। अतः वह साधक को धर्म (नैतिकता), अर्थ (समृद्धि), काम (इच्छाओं की पूर्ति) और अंततः मोक्ष (मुक्ति) की ओर ले जाने में समर्थ होता है। यदि मन्त्र से प्रणव का सम्बन्ध टूट जाए, तो वह केवल शब्दों का समूह रह जाता है, उसकी 'प्राण-शक्ति' लुप्त हो जाती है।
यहाँ 'प्रलीयन्ते' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधना की यात्रा केवल मन्त्र को जपने (उत्पत्ति) तक सीमित नहीं है, बल्कि मन्त्र के प्रभाव को अपने भीतर विलीन करने (लय) तक है। जब साधक मन्त्र के अंत में मौन होता है या ओंकार में लौटता है, तब वह मन्त्र की शक्ति को अपने हृदय में आत्मसात करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओंकार की इस आदि-शक्ति और मन्त्रों के उद्गम के विषय में अन्य शास्त्र भी इसी मत की पुष्टि करते हैं:
सैषैकाक्षरर्ग्ब्रह्मणस्तपसोऽग्रे प्रादुर्बभूव ब्रह्मवेदस्याथर्वणं शुक्रम् अत एव मन्त्राः प्रादुर्बभूवुः स तु खलु मन्त्राणां अतपसासुश्रूषानध्यायाध्ययनेन यदूनं च विरिष्टं च यातयामं च करोति तदथर्वणां तेजसा प्रत्याप्याययेत् मन्त्राश्च मां अभिमुखीभवेयुर्गर्भा इव मातरं अभिजिघांसुः पुरस्तादोंकारं प्रयुङ्क्ते एतयैव तदृचा प्रत्याप्यायेत् एषैव यज्ञस्य पुरस्ताद्युज्यते एषा पश्चात् सर्वत एतया यज्ञस्तायते तदप्येतदृचोक्तम् या पुरस्ताद्युज्यत ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्निति तदेतदक्षरं ब्राह्मणो यं कामं इच्छेत्त्रिरात्रोपोषितः प्राङ्मुखो वाग्यतो बर्हिष्युपविश्य सहस्रकृत्व आवर्तयेत् सिध्यन्त्यस्यार्थाः सर्वकर्माणि चेति ब्राह्मणं ॥ १.२२ ॥
यह एकाक्षर ऋक् (ओंकार) ब्रह्मके तपसे सबसे पहले प्रकट हुई — ब्रह्मवेद (अथर्ववेद) का उज्ज्वल सार; इसीसे मन्त्र प्रकट हुए। जो मन्त्रोंका (प्रयोग करनेवाला) तपके अभाव, सेवाके अभाव, अनध्यायमें अध्ययन आदिसे (उनमें) कुछ कम, बिगड़ा और यातयाम (बासी, निःसार) कर देता है, उसे अथर्वणोंके तेजसे फिर भर दे — 'मन्त्र मेरे सम्मुख हों, जैसे गर्भ माताकी ओर' — (इसलिए) आगे ओंकारका प्रयोग करता है; इसी ऋक् (ओंकार) से फिर भरता है। यही यज्ञके आगे जोड़ी जाती है, यही पीछे; इसीसे यज्ञ सब ओर फैलाया जाता है। यह ऋचामें भी कहा है — 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्' (ऋचाएँ परम व्योममें अक्षरमें स्थित हैं)। जो ब्राह्मण जिस कामनाको चाहे, तीन रात उपवास करके, पूर्वमुख, मौन, कुशोंपर बैठकर इस अक्षरको हजार बार आवृत्त करे — उसके अर्थ और सब कर्म सिद्ध होते हैं।
गोपथ ब्राह्मण के अनुसार, यह एकाक्षर ऋक् (ओंकार) ब्रह्म के तप से सबसे पहले प्रकट हुआ और इसी से समस्त मन्त्रों का प्रादुर्भाव हुआ। यहाँ यह स्पष्ट है कि ओंकार केवल एक अक्षर नहीं, बल्कि वह 'तेज' है जो मन्त्रों को सक्रिय करता है। यदि मन्त्रों का प्रयोग तप और सेवा के अभाव में त्रुटिपूर्ण हो जाए, तो पुनः ओंकार के प्रयोग से उन्हें पुनः जीवित और सिद्ध किया जा सकता है। यह बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस कथन का समर्थन करता है कि सब मन्त्र इसी से निकलते हैं।
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् ॥ २.२३.३ ॥
प्रजापतिने लोकोंको तपाया; तपाये हुए उनसे त्रयी विद्या (तीनों वेद) बह निकली। उसे तपाया; तपायी हुई उससे ये अक्षर बह निकले — "भूः, भुवः, स्वः"। उन्हें तपाया; तपाये हुए उनसे ओंकार बह निकला।
छान्दोग्य उपनिषद् में सृजन का क्रम बताया गया है—प्रजापति के तप से त्रयी (वेद) निकले, त्रयी से व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः) और अंततः उन व्याहृतियों के तप से ओंकार प्रकट हुआ। यह क्रम दर्शाता है कि ओंकार समस्त ज्ञान और ध्वनि का वह अंतिम और शुद्धतम निचोड़ है, जिसमें सब कुछ समाहित है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'नाद-योग' की दिशा में पहला कदम है। जप की प्रक्रिया में साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि मन्त्र शून्य से नहीं, बल्कि ओंकार की एक गहरी गूँज से उठ रहा है।
अभ्यास की विधि यह है कि जब भी किसी मन्त्र का जप किया जाए, तो उसके आरम्भ में 'ॐ' का उच्चारण केवल एक शब्द की तरह न हो, बल्कि वह एक ऐसी ध्वनि हो जिससे पूरा अस्तित्व स्पंदित हो रहा है। मन्त्र के शब्दों के बीच में और मन्त्र के अंत में, साधक को उस 'मौन-ध्वनि' को सुनना चाहिए जिसमें मन्त्र वापस लीन हो रहा है।
जब मन्त्र ओंकार से उठता है और ओंकार में ही लय होता है, तब साधक की चेतना स्थूल शब्दों (मन्त्र) से हटकर सूक्ष्म नाद (प्रणव) में स्थित हो जाती है। यह अभ्यास साधक को 'वाचिक' भूमि से उठाकर 'मानस' और फिर 'तुरीय' भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ केवल अक्षर शेष रहता है और शब्द विलीन हो जाते हैं।
प्रणवस्य माहात्म्यम्
मङ्गल्यः पावनो धन्यः सर्वकामप्रसाधनः ।
ओंकारः परमं ब्रह्म सर्वमन्त्रेषु नायकः ॥ २.२ ॥
मङ्गल करने वाला, पावन करने वाला, धन्य और सब कामनाओं को सिद्ध करने वाला ओंकार ही परम ब्रह्म है तथा सब मन्त्रों का नायक है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि समस्त मन्त्रों का उद्गम और लय केवल प्रणव में है। अब इस दूसरे श्लोक में वे ओंकार के उन विशिष्ट गुणों का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को इस नाद के प्रति श्रद्धा और विश्वास से जोड़ते हैं, ताकि वह इसे केवल एक शब्द न मानकर साक्षात् ब्रह्म के रूप में अनुभव कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओंकारः मङ्गल्यः, पावनः, धन्यः (अस्ति), (तथा) सर्वकामप्रसाधनः (अस्ति)। (सः) ओंकारः परमं ब्रह्म (अस्ति) (तथा) सर्वमन्त्रेषु नायकः (अस्ति)।
पदार्थ:
• मङ्गल्यः: कल्याण करने वाला। जो साधक के जीवन में शुभता का संचार करे और विघ्नों का नाश करे।
• पावनः: पवित्र करने वाला। जो चित्त की मलिनता, पाप और अविद्या को धोकर उसे शुद्ध करे।
• धन्यः: जिसे प्राप्त कर साधक धन्य हो जाए; जो स्वयं में पूर्ण और गौरवशाली है।
• सर्वकामप्रसाधनः: समस्त कामनाओं को सिद्ध करने वाला। यहाँ 'काम' का अर्थ केवल भौतिक इच्छा नहीं, अपितु आत्मा की वह उच्चतम अभिलाषा भी है जो मोक्ष की ओर ले जाती है। 'प्रसाधन' का अर्थ है—सिद्ध करना या पूर्ण करना।
• परमं ब्रह्म: वह सर्वोच्च तत्त्व जो सत्य, चित्त और आनंद स्वरूप है।
• नायकः: नेतृत्व करने वाला, आगे चलने वाला या अधिपति।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के बाह्य प्रभाव और उसके आन्तर तत्त्व का समन्वय कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ओंकार 'मङ्गल्य' और 'पावन' है। बाह्य विधि में हम किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में ओंकार का उच्चारण करते हैं ताकि कार्य सिद्ध हो, किंतु इसका आन्तर अर्थ यह है कि जब साधक अपने भीतर ओंकार के नाद को जगाता है, तब उसके हृदय के समस्त विकार नष्ट होने लगते हैं। यह शुद्धि ही वास्तविक 'पावन' होना है।
जब ऋषि इसे 'सर्वकामप्रसाधनः' कहते हैं, तो वे यह संकेत दे रहे हैं कि ओंकार वह कुंजी है जिससे ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियों के द्वार खुलते हैं। चूँकि समस्त मन्त्र ओंकार से ही निःसृत हुए हैं, इसलिए जो ओंकार को सिद्ध कर लेता है, वह उन सभी मन्त्रों की शक्ति को स्वतः प्राप्त कर लेता है।
इस श्लोक का मुख्य उद्घोष यह है कि "ओंकारः परमं ब्रह्म"। यहाँ ओंकार केवल ब्रह्म का प्रतीक नहीं है, अपितु वह साक्षात् ब्रह्म का नाद-रूप है। यह वही रहस्य है जो श्रुति में 'अक्षर' के रूप में वर्णित है। जब यह ओंकार 'सर्वमन्त्रेषु नायकः' कहा जाता है, तो इसका अर्थ है कि जिस प्रकार एक सेना का नायक सेना को दिशा देता है और उसका नेतृत्व करता है, उसी प्रकार ओंकार समस्त मन्त्रों का अधिपति है। कोई भी मन्त्र बिना ओंकार के पूर्णता प्राप्त नहीं करता; वह ओंकार के पीछे चलता है, ओंकार उसे शक्ति प्रदान करता है और उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १.२.१६ ॥
यही अक्षर ब्रह्म है, यही अक्षर परम है; इसी अक्षरको जानकर जो जिसकी इच्छा करता है, उसे वह मिलता है।
कठ उपनिषद् में कहा गया है कि यही अक्षर ब्रह्म है और यही परम है, इसे जानकर मनुष्य अपनी इच्छित सिद्धि प्राप्त करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी उपनिषद्-वचन का विस्तार है। जहाँ कठ उपनिषद् इसे 'परम अक्षर' कहकर इसकी महत्ता बताता है, वहीं यह स्मृति इसे 'मन्त्रों का नायक' और 'सर्वकामप्रसाधन' कहकर साधक के लिए इसके व्यावहारिक और योगिक लाभों को स्पष्ट करती है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि ओंकार की उपलब्धि ही समस्त सिद्धियों और परम लक्ष्य की प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'नाद-अनुसंधान' है। साधक जब ओंकार का जप करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि 'नायक' (ओंकार) आगे चल रहा है और उसका मन और मन्त्र उसके पीछे अनुगामी हैं।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह ओंकार के उच्चारण में केवल ध्वनि को न सुने, बल्कि उस 'पावन' तत्त्व को अनुभव करे जो उसके अंतःकरण को शुद्ध कर रहा है। जब वह 'परमं ब्रह्म' के भाव से ओंकार में स्थित होता है, तब वह स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म नाद की ओर बढ़ता है। यहाँ 'नायक' होने का रहस्य यह है कि ओंकार साधक की चेतना को खींचकर ऊपर की ओर ले जाता है। जिस प्रकार एक नायक अपने अनुयायियों को गंतव्य तक पहुँचाता है, उसी प्रकार ओंकार का निरंतर अभ्यास साधक को नाम-रूप की दुनिया से निकालकर उस 'अक्षर' (अविनाशी) ब्रह्म में विलीन कर देता है। इस अवस्था में साधक की समस्त कामनाएँ (सर्वकाम) शांत हो जाती हैं, क्योंकि उसे उस परम धन्य तत्त्व की प्राप्ति हो जाती है जिसमें सब कुछ समाहित है।
प्रणवस्यार्षादि
प्रजापतेर्मुखोत्पन्नस्तपःसिद्धस्य वै पुरा ।
तेनोपात्तमतस्तस्य ब्रह्मार्षं (ब्रह्माऽऽर्षं) च स्वयंभुवः ॥ २.३ ॥
(ओंकार) पूर्वकालमें तपसे सिद्ध प्रजापतिके मुखसे उत्पन्न हुआ; उन्होंने उसे ग्रहण किया, इसलिए स्वयम्भू ब्रह्मा उसके ऋषि हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार को समस्त मन्त्रों का नायक और साक्षात् परम ब्रह्म सिद्ध किया। अब इस तीसरे श्लोक में वे इस महानाद के प्रादुर्भाव और उसके 'ऋषि' का परिचय दे रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि इस मन्त्र की शक्ति का स्रोत क्या है और यह किस चेतना के माध्यम से मानवता तक पहुँचा।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) पुरा तपःसिद्धस्य प्रजापतेः मुखात् उत्पन्नः। तेन (ओंकारः) उपात्तम्, अतः तस्य (ओंकारस्य) ऋषिः स्वयंभुवः ब्रह्मार्षः (अस्ति)।
पदार्थ:
• तपःसिद्धस्य: तप द्वारा सिद्ध हुए। यहाँ 'तप' का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट नहीं, अपितु चित्त की वह एकाग्रता और ऊष्मा है जो सत्य के साक्षात्कार के लिए आवश्यक है।
• मुखोत्पन्नः: मुख से उत्पन्न। इसका बाह्य अर्थ उच्चारण है, किन्तु आन्तर अर्थ है—परम चेतना का शब्द-रूप में प्रकट होना।
• उपात्तम्: ग्रहण किया। जब कोई ऋषि मन्त्र को केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उसे अपने अनुभव में उतार लेता है, तब वह 'उपात्त' कहलाता है।
• ब्रह्मार्षः (ब्रह्माऽऽर्षं): ब्रह्म-ऋषि। वह ऋषि जो साक्षात् ब्रह्म के स्वरूप को जान ले या ब्रह्म के द्वारा ही दृष्टा हो।
• स्वयंभुवः: जो स्वयं से उत्पन्न हो, जो किसी अन्य कारण पर निर्भर न हो।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के आर्ष-परम्परा (ऋषि-परम्परा) का उद्घाटन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ओंकार कोई मानव-निर्मित शब्द नहीं है, अपितु यह पूर्वकाल में तप से सिद्ध प्रजापति के मुख से प्रकट हुआ।
यहाँ 'मुख' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैदिक दृष्टि में मुख वह द्वार है जहाँ से प्राण और वाक् का मिलन होता है। जब प्रजापति ने गहन तप के माध्यम से अपनी चेतना को शून्य में विलीन किया, तब उस मौन के विच्छेद से जो प्रथम नाद गूँजा, वही 'ओंकार' था। यह मन्त्र प्रजापति के तप का फल है, अतः यह सिद्ध करता है कि बिना तप के इस नाद की वास्तविक शक्ति का अनुभव नहीं किया जा सकता।
आगे ऋषि कहते हैं कि प्रजापति ने इस नाद को 'उपात्त' किया, अर्थात् उन्होंने इसे केवल सुना नहीं, बल्कि इसे अपनी आत्मा में आत्मसात कर लिया। इसी कारण ओंकार के ऋषि 'स्वयंभुव ब्रह्मा' कहे गए हैं। मन्त्र-शास्त्र में 'ऋषि' वह नहीं है जिसने मन्त्र लिखा, बल्कि वह है जिसने उस मन्त्र के देवता का साक्षात्कार किया और उस ध्वनि के पीछे छिपे सत्य को 'देखा' (दृष्टुः)। चूँकि स्वयंभुव ब्रह्मा ने इस अक्षर के माध्यम से संपूर्ण सृष्टि के रहस्य को जाना, इसलिए वे इस मन्त्र के आदि-ऋषि हैं।
यह श्लोक हमें संकेत देता है कि ओंकार का संबंध सीधे उस सृजनात्मक चेतना से है जिससे यह ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में उसी सृजनात्मक शक्ति (ब्रह्मा) के साथ एकाकार होने का प्रयास करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ब्रह्म ह वै ब्रह्माणं पुष्करे ससृजे स खलु ब्रह्मा सृष्टश्चिन्तां आपेदे केनाहं एकेनाक्षरेण सर्वांश्च कामान्त्सर्वांश्च लोकान्त्सर्वांश्च देवान्त्सर्वांश्च वेदान्त्सर्वांश्च यज्ञान्त्सर्वांश्च शब्दान्त्सर्वाश्च व्युष्टीः सर्वाणि च भूतानि स्थावरजङ्गमान्यनुभवेयं इति स ब्रह्मचर्यं अचरत् स ओं इत्येतदक्षरं अपश्यद्द्विवर्णं चतुर्मात्रं सर्वव्यापि सर्वविभ्वयातयामब्रह्म ब्राह्मीं व्याहृतिं ब्रह्मदैवताम् तया सर्वांश्च कामान्त्सर्वांश्च लोकान्त्सर्वांश्च देवान्त्सर्वांश्च वेदान्त्सर्वांश्च यज्ञान्त्सर्वांश्च शब्दान्त्सर्वाश्च व्युष्टीः सर्वाणि च भूतानि स्थावरजङ्गमान्यन्वभवत् तस्य प्रथमेन वर्णेनापः स्नेहं चान्वभवत् तस्य द्वितीयेन वर्णेन तेजो ज्योतींष्यन्वभवत् ॥ १.१६ ॥
ब्रह्मने ब्रह्माको (सृष्टिके) पुष्करमें रचा। रचे जानेपर ब्रह्मा चिन्तामें पड़े — "किस एक अक्षरसे मैं सब कामनाओं, सब लोकों, सब देवों, सब वेदों, सब यज्ञों, सब शब्दों, सब उषाओं (व्युष्टि) और स्थावर-जङ्गम सब भूतोंका अनुभव (प्राप्ति) करूँ?" उन्होंने ब्रह्मचर्यका आचरण किया और "ओम्" इस अक्षरको देखा — दो वर्णोंवाला, चार मात्राओंवाला, सर्वव्यापी, सर्वविभु, कभी बासी न होनेवाला ब्रह्म, ब्रह्मदेवतावाली ब्राह्मी व्याहृति। उससे उन्होंने सब कामनाओं … सब भूतोंका अनुभव किया। उसके पहले वर्णसे जल और स्नेहका, दूसरे वर्णसे तेज और ज्योतियोंका अनुभव किया।
गोपथ ब्राह्मण का यह अंश इस स्मृति के वचन की पूर्ण पुष्टि करता है। वहाँ बताया गया है कि ब्रह्मा (प्रजापति) ने यह चिन्ता की कि किस एक अक्षर से वे समस्त कामनाओं, लोकों, वेदों और भूतों का अनुभव कर सकें। इसके लिए उन्होंने 'ब्रह्मचर्य' (तप) का आचरण किया और तब उन्होंने 'ओम्' इस अक्षर को देखा।
स्मृति कहती है "तपःसिद्धस्य प्रजापतेः", और गोपथ ब्राह्मण स्पष्ट करता है कि उस तप (ब्रह्मचर्य) के फलस्वरूप ही उन्हें यह 'द्विवर्णं चतुर्मात्रं' (दो वर्णों और चार मात्राओं वाला) अक्षर प्राप्त हुआ। दोनों ग्रंथों का मेल यह है कि ओंकार की प्राप्ति आकस्मिक नहीं, अपितु गहन तप और आंतरिक शुद्धि का परिणाम है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि ओंकार का द्वार 'तप' है। जिस प्रकार प्रजापति के मुख से ओंकार प्रकट हुआ, उसी प्रकार जब साधक अपने भीतर तप (इन्द्रिय-निग्रह और चित्त-स्थिरता) को प्रज्वलित करता है, तब उसके हृदय-आकाश में भी यह अनाहत नाद गूँजने लगता है।
अभ्यास की दृष्टि से साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं कर रहा, बल्कि वह उस 'स्वयंभु' चेतना को जाग्रत कर रहा है जो उसके भीतर ही स्थित है। यहाँ 'मुखोत्पन्न' होने का योगिक अर्थ है—प्राण का ऊपर की ओर उठकर शब्द-ब्रह्म में परिवर्तित होना। साधक जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह इस भाव में रहता है कि वह उसी तपःसिद्ध अवस्था में जा रहा है जहाँ से सृष्टि का आरम्भ हुआ था। इस प्रकार, वह अपनी चेतना को 'साधारण मनुष्य' की भूमि से उठाकर 'ऋषि' की भूमि तक ले जाता है, जहाँ मन्त्र केवल ध्वनि नहीं, बल्कि साक्षात् अनुभव बन जाता है।
सर्वकर्मारम्भे प्रणवयोजना
गायत्री च भवेच्छन्द अग्निर्दैवतमुच्यते ।
आदौ सर्वत्र युञ्जीत विविधेष्वेव कर्मसु ॥ २.४ ॥
उसका छन्द गायत्री है, देवता अग्नि कहा जाता है; विविध-विविध कर्मों में सर्वत्र आरम्भ में (उसका) प्रयोग करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ओंकार के प्रादुर्भाव और उसके ऋषि 'स्वयंभुवः' का परिचय दिया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस महामन्त्र के छन्द और देवता का निर्धारण कर रहे हैं, ताकि साधक इसकी शास्त्रीय पूर्णता के साथ इसका प्रयोग कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारस्य) छन्दः गायत्री भवेत्, अग्निः (तस्य) दैवतम् उच्यते। विविधेषु एव कर्मसु आदौ सर्वत्र (ओंकारं) युञ्जीत।
पदार्थ:
• छन्द गायत्री: यहाँ गायत्री केवल एक छन्द (२४ अक्षर) नहीं, अपितु उस शक्ति का नाम है जो प्राणों की रक्षा करती है और चेतना को ऊपर उठाती है।
• अग्निर्दैवतम्: अग्नि यहाँ केवल भौतिक पावक नहीं, अपितु वह 'वैश्वानर' या 'जठराग्नि' और 'ज्ञानग्नि' है जो अविद्या को भस्म करती है।
• विविधेषु कर्मसु: यहाँ कर्म का अर्थ केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, अपितु मन, वाणी और शरीर की प्रत्येक चेष्टा है।
• युञ्जीत: जोड़ना या लगाना। मन्त्र को कर्म के साथ एकाकार करना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ओंकार के स्वरूप को पूर्णता प्रदान कर रहे हैं। किसी भी मन्त्र की सिद्धि के लिए उसके ऋषि, छन्द और देवता का ज्ञान अनिवार्य है। पूर्व श्लोक में ऋषि (स्वयंभुवः) का वर्णन हुआ, अब वे कहते हैं कि ओंकार का छन्द 'गायत्री' है और देवता 'अग्नि' है।
जब वे 'गायत्री' छन्द कहते हैं, तो इसका संकेत उस मूल शक्ति की ओर है जो साधक के धियः (बुद्धि) को प्रेरित करती है। गायत्री का अर्थ है—वह जो प्राणों की रक्षा करे और उन्हें उच्चतर लक्ष्य की ओर ले जाए। ओंकार जब गायत्री के भाव में उच्चारित होता है, तब वह केवल एक ध्वनि नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसी तरंग बन जाता है जो साधक की प्रज्ञा को जाग्रत करती है।
देवता के रूप में 'अग्नि' का उल्लेख अत्यंत गूढ़ है। अग्नि वह तत्त्व है जो रूपांतरण करता है। जिस प्रकार अग्नि ईंधन को भस्म कर उसे ऊर्जा में बदल देती है, उसी प्रकार ओंकार का देवता अग्नि होने का अर्थ है कि यह नाद साधक के भीतर के तामसिक और राजसिक संस्कारों को जलाकर उन्हें सात्विक प्रकाश में बदल देता है। यह अग्नि वह 'अन्तर्ज्योति' है जो हृदय में स्थित है।
अंतिम पंक्ति में याज्ञवल्क्य एक व्यावहारिक और योगिक विधि बताते हैं: "विविधेषु एव कर्मसु आदौ सर्वत्र युञ्जीत"। इसका अर्थ है कि जीवन की हर क्रिया, चाहे वह शास्त्र-अनुष्ठान हो या लौकिक कार्य, उसका आरम्भ ओंकार से होना चाहिए। जब हम किसी कार्य के आरम्भ में ओंकार को जोड़ते हैं, तो हम वास्तव में उस कर्म को 'अहं' (मैं कर रहा हूँ) से हटाकर 'ब्रह्म' (यह ब्रह्म द्वारा हो रहा है) में समर्पित कर देते हैं। यह कर्म को बंधन से मुक्त कर उसे यज्ञ बना देता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा । स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं परस्ताच्च विशीर्यति ॥ २.७४ ॥
वेद(पाठ) के आरम्भ और अन्तमें सदा प्रणव लगाये; जिसके आरम्भमें ओंकार न हो वह बह जाता है, और जिसके अन्तमें न हो वह बिखर जाता है।
मनुस्मृति में भी यह विधान मिलता है कि वेद के आरम्भ और अन्त में सदा प्रणव का प्रयोग करना चाहिए, अन्यथा वह ज्ञान बिखर जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विधान को और अधिक विस्तार देते हुए इसे केवल वेद-पाठ तक सीमित न रखकर "विविध कर्मों" (सभी प्रकार के कार्यों) तक ले जाते हैं। जहाँ मनुस्मृति शास्त्र-पठन की मर्यादा बताती है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे जीवन-पद्धति और योग-साधना का अंग बना देते हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'चेतना के विस्थापन' का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य किसी भी कर्म को अपनी वासना या इच्छा के वशीभूत होकर आरम्भ करता है, जिससे वह कर्म उसे बंधन में बाँधता है। याज्ञवल्क्य यहाँ 'युञ्जीत' शब्द के माध्यम से एक योगिक तकनीक दे रहे हैं—कर्म के प्रथम क्षण में ओंकार का समावेश।
अभ्यास यह है कि जब भी साधक किसी कार्य की ओर बढ़े, वह एक क्षण रुककर ओंकार का उच्चारण करे। यह एक छोटा सा अंतराल साधक को 'स्वचालित प्रतिक्रिया' से हटाकर 'सचेत क्रिया' में ले आता है।
यहाँ 'अग्नि' का ध्यान करते हुए ओंकार का जप करने से साधक के भीतर की जड़ता समाप्त होती है। जब कर्म का आरम्भ ओंकार से होता है, तो वह कर्म 'अक्षर' (अविनाशी) के साथ जुड़ जाता है। साधक अनुभव करता है कि वह कर्ता नहीं, अपितु उस परम चेतना का एक उपकरण मात्र है। इस प्रकार, वह हर कर्म के माध्यम से 'अध्यात्म-भूमि' की ओर अग्रसर होता है, जहाँ कर्म ही उसकी पूजा बन जाता है।
विनियोगः समुद्दिष्टः श्वेतो वर्ण उदाहृतः ।
त्रिमात्रश्च प्रयोक्तव्यः कर्मारम्भेषु सर्वदा ॥ २.५ ॥
विनियोग बताया गया है, उसका वर्ण श्वेत कहा गया है और कर्मों के आरम्भ में सदा त्रिमात्र (तीन मात्रा का) उच्चारण करना चाहिए।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के मन्त्र-अंगों—गायत्री छन्द और अग्नि देवता—का निर्धारण करते हुए उसे समस्त कर्मों के आरम्भ में जोड़ने का निर्देश दिया था। अब इस पाँचवें श्लोक में वे ओंकार के विनियोग, उसके विशिष्ट वर्ण और व्यावहारिक प्रयोग के लिए मात्रा-निर्धारण का विधान बता रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारस्य) विनियोगः समुद्दिष्टः, (तस्य) वर्णः श्वेतो उदाहृतः। सर्वदा सर्वकर्मारम्भेषु (ओंकारः) त्रिमात्रः प्रयोक्तव्यः।
पदार्थ:
• विनियोगः समुद्दिष्टः: विनियोग का अर्थ है किसी मन्त्र का विशिष्ट उद्देश्य के साथ प्रयोग करना। 'समुद्दिष्ट' का अर्थ है कि ओंकार का प्रयोग किस हेतु, किस समय और किस भाव से करना है, यह शास्त्र में स्पष्ट रूप से निर्देशित है।
• श्वेतो वर्णः: श्वेत वर्ण यहाँ केवल रंग नहीं, अपितु सात्त्विकता, शुद्धता और प्रकाश का प्रतीक है। यह उस मानसिक अवस्था का संकेत है जिसमें साधक को स्थित होना चाहिए।
• त्रिमात्रः: तीन मात्राओं वाला उच्चारण। यहाँ 'मात्रा' समय की वह इकाई है जो नाद के विस्तार को निर्धारित करती है।
• कर्मारम्भेषु सर्वदा: किसी भी कार्य के आरम्भ में, चाहे वह लौकिक हो या आध्यात्मिक, निरंतर।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ओंकार के प्रयोग की विधि को और अधिक सूक्ष्म बना रहे हैं। किसी भी मन्त्र का फल तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक उसका 'विनियोग' सही न हो। विनियोग साधक के चित्त को उस लक्ष्य की ओर मोड़ देता है जिसके लिए मन्त्र का जप किया जा रहा है। यहाँ ओंकार का विनियोग 'समुद्दिष्ट' है, अर्थात यह स्पष्ट है कि प्रणव का प्रयोग केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं, अपितु स्वयं को उस परम ब्रह्म से जोड़ने की एक सचेत प्रक्रिया है।
इसके पश्चात ऋषि ओंकार के 'श्वेत वर्ण' का उल्लेख करते हैं। मन्त्रों के साथ वर्णों का सम्बन्ध उनके प्रभाव और देवता की प्रकृति से होता है। श्वेत वर्ण सात्त्विक गुण का परिचायक है। जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो उसे अपने अंतःकरण में एक धवल, निर्मल और प्रकाशमय ज्योति का अनुभव करना चाहिए। यह श्वेत वर्ण उस 'शुक्ल यजुः' की शुद्धता का भी प्रतीक है, जिसके द्रष्टा याज्ञवल्क्य स्वयं हैं। यह वर्ण साधक को रज और तम से ऊपर उठाकर सत्व में प्रतिष्ठित करता है, जिससे बुद्धि स्थिर और एकाग्र होती है।
अंत में, महर्षि कर्मों के आरम्भ के लिए 'त्रिमात्र' ओंकार का विधान करते हैं। किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पूर्व तीन मात्राओं वाला ओंकार (अ-उ-म) उच्चारित करना चाहिए। यह विधान इसलिए है क्योंकि सृष्टि का आधार भी त्रिगुणमय है और जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति—ये तीन अवस्थाएँ हैं। जब साधक त्रिमात्र ओंकार का प्रयोग करता है, तो वह अपनी समस्त चेतना को एकीकृत कर कार्य में लगाता है। यह 'त्रिमात्र' उच्चारण कर्म और कर्ता के बीच के अंतराल को भर देता है, जिससे कर्म 'अहंकार' से मुक्त होकर 'ईश्वर-अर्पण' बन जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक बाहरी विधि से आंतरिक अनुभव की ओर ले जाने वाला है।
प्रथम, 'विनियोग' का अभ्यास यह है कि साधक किसी भी कार्य को करने से पहले एक क्षण के लिए रुककर यह संकल्प करे कि "मैं यह कार्य उस परम चैतन्य के निमित्त कर रहा हूँ।" यही वास्तविक विनियोग है।
द्वितीय, 'श्वेत वर्ण' का अभ्यास ध्यान की भूमि है। जब साधक ओंकार का जप करे, तो वह अपनी भ्रूमध्य या हृदय-आकाश में एक श्वेत, उज्ज्वल प्रकाश की कल्पना करे। यह श्वेत प्रकाश मन के विकारों को धोकर उसे दर्पण की भाँति स्वच्छ कर देता है। जैसे-जैसे श्वेत वर्ण का अनुभव गहरा होता है, साधक की वृत्ति सात्त्विक होती जाती है और वह मानसिक चंचलता से मुक्त होकर स्थिरता की ओर बढ़ता है।
तृतीय, 'त्रिमात्र' उच्चारण का योगिक अभ्यास प्राण के संतुलन से जुड़ा है। 'अ' का उच्चारण जब नाभि से, 'उ' का हृदय से और 'म' का मस्तक से अनुभूत होता है, तब यह त्रिमात्र नाद पूरे शरीर के प्राण-तन्त्र को जाग्रत कर देता है। कर्मारम्भ में इसका प्रयोग करने से साधक की ऊर्जा बिखरती नहीं, बल्कि केंद्रित हो जाती है। वह इस अभ्यास से 'क्रिया' को 'योग' में बदल देता है, जहाँ प्रत्येक कार्य एक साधना बन जाता है।
प्रणवस्य मात्राभेदः
तिस्रः सार्धास्तु कर्तव्या मन्त्रतत्त्वार्थाचिन्तकैः ।
देवताध्यानकाले तु प्लुतं कुर्यान्न संशयः ॥ २.६ ॥
मन्त्रके तत्त्व और अर्थका चिन्तन करनेवाले साढ़े तीन मात्राएँ करें; देवताके ध्यानके समय प्लुत (उच्चारण) करें, इसमें संशय नहीं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने कर्मों के आरम्भ में त्रिमात्र ओंकार के प्रयोग का विधान बताया था। अब इस छठे श्लोक में वे साधक की मानसिक अवस्था और साधना के प्रयोजन के अनुसार प्रणव के उच्चारण की अवधि (मात्रा) में परिवर्तन का रहस्य समझा रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: मन्त्रतत्त्वार्थाचिन्तकैः (ओंकारः) सार्धास्तु (तिस्रः) कर्तव्या। देवताध्यानकाले तु (ओंकारः) प्लुतं कुर्यात्, (तस्मिन्) न संशयः।
पदार्थ:
• मन्त्रतत्त्वार्थाचिन्तकैः: जो मन्त्र के तत्त्व (उसकी सूक्ष्म शक्ति) और अर्थ (उसके अभिप्राय) का चिन्तन करने वाले हैं।
• सार्धास्तु (तिस्रः): तीन के साथ आधा, अर्थात् साढ़े तीन मात्राएँ।
• कर्तव्या: किया जाना चाहिए (यह विधि विधान है)।
• देवताध्यानकाले: जब साधक का चित्त इष्ट देवता के ध्यान में लीन हो।
• प्लुतं: स्वर का विस्तार, जहाँ नाद को अधिक समय तक खींचकर ले जाया जाता है।
• न संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं है; यह एक निश्चित और सिद्ध विधि है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि प्रणव का उच्चारण केवल एक यांत्रिक क्रिया नहीं है, अपितु यह साधक की चेतना के स्तर के अनुरूप बदलता है। उन्होंने यहाँ तीन स्तरों पर ओंकार के प्रयोग को बाँटा है: पहला कर्म-आरम्भ के लिए (जो पिछले श्लोक में त्रिमात्र बताया गया), दूसरा तत्त्व-चिन्तन के लिए और तीसरा देवता-ध्यान के लिए।
जब साधक केवल कर्म आरम्भ करता है, तो वह त्रिमात्र ओंकार से अपनी ऊर्जा को केंद्रित करता है। किन्तु, जब साधक 'मन्त्रतत्त्वार्थाचिन्तक' होता है—अर्थात् वह केवल शब्द का उच्चारण नहीं कर रहा, बल्कि यह विचार कर रहा है कि यह ओंकार किस तत्त्व से बना है और इसका वास्तविक अर्थ क्या है—तब उसे 'सार्धा' अर्थात् साढ़े तीन मात्राओं का प्रयोग करना चाहिए। यहाँ वह अतिरिक्त 'अर्धमात्रा' केवल समय का विस्तार नहीं है, बल्कि वह उस सूक्ष्म अंतराल का प्रतीक है जहाँ शब्द समाप्त होता है और अर्थ का उदय होता है। यह अर्धमात्रा साधक को स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म बोध की ओर ले जाती है।
इसके पश्चात, साधना की उच्चतम अवस्था 'देवता-ध्यान' की आती है। जब साधक का लक्ष्य केवल अर्थ का चिन्तन नहीं, बल्कि साक्षात् देवता के स्वरूप में लीन होना होता है, तब ओंकार को 'प्लुत' किया जाता है। प्लुत उच्चारण में नाद को तब तक विस्तार दिया जाता है जब तक कि वह बाहरी ध्वनि न रहकर एक आंतरिक गूँज बन जाए। याज्ञवल्क्य जी 'न संशयः' कहकर इस बात पर बल देते हैं कि ध्यान की गहराई और नाद के विस्तार का सीधा सम्बन्ध है। जितना अधिक स्वर का विस्तार (प्लुत) होगा, मन उतना ही अधिक बाहरी जगत से कटकर भीतर की ओर प्रविष्ट होगा।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'नाद-योग' और 'चित्त-वृत्ति' के सम्बन्ध को दर्शाता है। साधक के लिए उच्चारण की लम्बाई उसके प्रयोजन के अनुसार बदलती है:
१. त्रिमात्र (कर्म): यह संकल्प की अवस्था है। यहाँ ओंकार मन को एकाग्र कर कार्य की ओर मोड़ता है।
२. साढ़े तीन मात्रा (चिन्तन): यह विश्लेषण और बोध की अवस्था है। यहाँ साधक ध्वनि और अर्थ के बीच के सेतु को पार करता है। वह अर्धमात्रा उसे 'शब्द-ब्रह्म' से 'अर्थ-ब्रह्म' की ओर ले जाती है।
३. प्लुत (ध्यान): यह लय की अवस्था है। जब स्वर प्लुत होता है, तो वह मन की चंचलता को सोख लेता है। ध्वनि का यह दीर्घ विस्तार साधक को विस्मृति की उस स्थिति में ले जाता है जहाँ केवल 'द्रष्टा' और 'दृश्य' (देवता) शेष रह जाते हैं।
साधक इस अभ्यास से अनुभव करता है कि जैसे-जैसे वह ध्वनि को विस्तार देता है, उसका चित्त स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है। यह यात्रा 'कर्म' (तीन मात्रा) से 'ज्ञान' (साढ़े तीन मात्रा) और अंततः 'समाधि' (प्लुत) की ओर जाने वाली सोपान-श्रेणी है। ध्वनि जितनी लम्बी और स्थिर होगी, मन उतना ही गहरा भीतर की ओर उतरेगा।
तैलधारावदच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् ।
अवाग्जं प्रणवास्यान्तं यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २.७ ॥
तेल की धारा के समान अटूट और घन्टा के दीर्घ नाद के समान, वाणी से अजन्मा जो प्रणव का अन्त है, उसे जो जानता है वह वेदविद् है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने साधना के प्रयोजन के अनुसार प्रणव की मात्राओं (साढ़े तीन और प्लुत) का विधान बताया था। अब इस सातवें श्लोक में वे उच्चारण की उस सूक्ष्म अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ नाद अपनी भौतिक सीमा को लाँघकर परा-शक्ति में विलीन हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (प्रणवः) तैलधारावदच्छिन्नं, दीर्घघण्टानिनादवत् (अस्ति)। (सा प्रथमा) अवाग्जं प्रणवास्यान्तं यः (सह) वेद, स वेदवित् (अस्ति)।
पदार्थ:
• तैलधारावदच्छिन्नं: तेल की धारा के समान अटूट; जिस प्रकार तेल जब पात्र से गिरता है, तो उसमें कोई विच्छेद या अंतराल नहीं होता, वैसा ही निरंतर प्रवाह।
• दीर्घघण्टानिनादवत्: घण्टे के दीर्घ नाद के समान; जब घण्टा बजता है, तो एक तीव्र ध्वनि के बाद एक सूक्ष्म गूँज लंबे समय तक बनी रहती है, वैसा ही विस्तार।
• अवाग्जं: वाणी से अजन्मा; जो वाक्-शक्ति (ध्वनि) के द्वारा उत्पन्न न हुआ हो, अपितु वाणी के मौन होने पर भी शेष रहे।
• प्रणवास्यान्तं: प्रणव का अन्त; यहाँ 'अन्त' का अर्थ समाप्ति नहीं, बल्कि वह चरम बिंदु है जहाँ शब्द अपनी परिणति पाकर ब्रह्म में लीन हो जाता है।
• वेदवित्: वेदों का वास्तविक ज्ञाता; वह जो केवल शब्दों को नहीं, बल्कि वेदों के सार (ब्रह्म) को जानता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्रणव के उस स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं जो स्थूल उच्चारण से परे है। उन्होंने यहाँ दो उपमाओं का प्रयोग किया है—तैलधारा और घण्टानाद।
प्रथम उपमा 'तैलधारा' यह दर्शाती है कि प्रणव का अभ्यास खंड-खंड में नहीं, बल्कि एक अखंड प्रवाह में होना चाहिए। जब साधक 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह ध्वनि टूटी हुई नहीं होनी चाहिए, अपितु एक निरंतर धारा की तरह प्रवाहित होनी चाहिए। यह अखंडता मन की एकाग्रता का परिचायक है।
द्वितीय उपमा 'दीर्घघण्टानिनाद' उस सूक्ष्म गूँज की ओर संकेत करती है जो उच्चारण के समाप्त होने के बाद भी भीतर बनी रहती है। घण्टे की चोट एक क्षणिक घटना है, किन्तु उसका नाद दीर्घ होता है। इसी प्रकार, 'अ' 'उ' और 'म' के उच्चारण के बाद जो अनहद नाद शेष रहता है, वही वास्तविक साधना का केंद्र है।
महर्षि कहते हैं कि यह अवस्था 'अवाग्जं' है, अर्थात् वाणी से अजन्मी। हमारी वाणी केवल स्थूल ध्वनियों का निर्माण कर सकती है, किन्तु प्रणव का वह 'अन्त' (परकाष्ठा) वाणी के वश में नहीं है। जब शब्द समाप्त हो जाता है और केवल शून्य या मौन शेष रहता है, उसी मौन में जो स्पंदन अनुभव होता है, वही 'प्रणवास्यान्तं' है। जो साधक इस शब्द-रहित नाद को जान लेता है, उसे ही 'वेदवित्' कहा गया है, क्योंकि वेदों का अंतिम लक्ष्य भी वही अक्षर-ब्रह्म है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'शब्द' से 'अशब्द' की ओर जाने की विधि है। सामान्यतः मनुष्य केवल उच्चारण (वाचिक जप) तक सीमित रहता है, किन्तु योगी उस ध्वनि के पीछे छिपे मौन को पकड़ता है।
अभ्यास यह है कि जब साधक प्लुत ओंकार का उच्चारण करे, तो वह अपना पूरा ध्यान उस ध्वनि के विस्तार पर लगाए। जैसे-जैसे ध्वनि क्षीण होती जाए, साधक को उस क्षीण होती ध्वनि के साथ अपने चित्त को भीतर की ओर खींचना चाहिए। जब बाहरी ध्वनि पूरी तरह समाप्त हो जाए, तब भी हृदय के आकाश में एक सूक्ष्म गूँज बनी रहती है। इसी 'अटूट धारा' (तैलधारा) पर मन को टिकाए रखना है।
यह अभ्यास साधक को 'वाचिक' भूमि से 'मानसिक' और फिर 'तुरीय' भूमि की ओर ले जाता है। यहाँ 'प्रणव का अन्त' जानने का अर्थ है—ध्वनि के विलोप के बाद उस परम तत्व का अनुभव करना जो ध्वनि का आधार है। जब साधक इस अवाग्ज (वाणी-रहित) नाद में स्थित होता है, तब वह अनुभव करता है कि वह स्वयं ही वह अखंड नाद है। यही वह बिंदु है जहाँ स्मृति का विधान श्रुति के उस रहस्य से मिल जाता है जहाँ आत्मा को 'विज्ञानघन' और 'प्रज्ञानघन' कहा गया है।
वक्रं तद्भवति ह्यादौ ओंकारं चतुरक्षरम् ।
ऋजुत्वं संप्रपद्येत पदं प्राप्य तु पञ्चमम् ॥ २.८ ॥
वह (प्रणव) आदि में वक्र होता है, चार अक्षरों वाला ओंकार है; किन्तु पाँचवें पद को प्राप्त करके वह ऋजु (सरल) हो जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के उस अखंड और अवाग्ज स्वरूप का वर्णन किया था, जहाँ नाद वाणी की सीमा को लाँघकर शून्य में विलीन हो जाता है। अब इस आठवें श्लोक में वे प्रणव की उस संरचनात्मक यात्रा का रहस्य खोल रहे हैं, जिसमें साधक स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म मौन की ओर अग्रसर होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तद् (ओंकारः) ह्यादौ चतुरक्षरम् ओंकारं वक्रं भवति । (तद्) तु पञ्चमं पदं प्राप्य ऋजुत्वं संप्रपद्येत ।
पदार्थ:
• वक्रं: टेढ़ा, घुमावदार या क्रमबद्ध। यहाँ इसका अर्थ है वह मार्ग जो सीधा न होकर विभिन्न चरणों (मात्राओं) से होकर गुजरता है।
• आदौ: आरम्भ में; जब साधक उच्चारण और ध्वनि के स्तर पर अभ्यास करता है।
• चतुरक्षरम्: चार अक्षरों वाला। इसमें 'अ', 'उ', 'म' और वह 'अर्धमात्रा' सम्मिलित है, जो ध्वनि के रूप में अभिव्यक्त होती है।
• ऋजुत्वं: सीधापन, सरलता या अद्वैत स्थिति। जहाँ कोई घुमाव या भेद न रहे।
• संप्रपद्येत: प्राप्त हो जाता है या उस अवस्था में स्थित हो जाता है।
• पञ्चमं पदं: पाँचवाँ पद। यह वह अवस्था है जो चार मात्राओं के बाद आती है—अर्थात् 'अमात्र' या पूर्ण मौन की स्थिति।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्रणव के 'वक्र' और 'ऋजु' होने के गूढ़ रहस्य को स्पष्ट कर रहे हैं।
वे कहते हैं कि आरम्भ में ओंकार 'वक्र' होता है। यहाँ 'वक्र' का अर्थ किसी दोष से नहीं, अपितु 'क्रम' से है। जब हम 'ॐ' का उच्चारण करते हैं, तो हम एक निश्चित मार्ग का अनुसरण करते हैं: पहले 'अ' (उत्पत्ति), फिर 'उ' (स्थिति), फिर 'म' (लय) और अंत में वह सूक्ष्म गूँज या अर्धमात्रा। यह एक सीढ़ी की तरह है, जहाँ साधक एक पद से दूसरे पद पर जाता है। जब तक साधक इन चार अक्षरों (मात्राओं) के भेद में है, उसकी यात्रा 'वक्र' है, क्योंकि वह अभी भी ध्वनि और आकार के माध्यम से ब्रह्म तक पहुँचने का प्रयास कर रहा है। यह मार्ग घुमावदार इसलिए है क्योंकि इसमें नाम, रूप और ध्वनि का सहारा लिया जा रहा है।
किन्तु, जैसे ही साधक इस चतुरक्षर यात्रा को पूर्ण कर 'पञ्चम पद' को प्राप्त करता है, वह 'ऋजु' हो जाता है। यह पाँचवाँ पद कोई अक्षर नहीं, बल्कि वह 'अमात्र' स्थिति है जहाँ ध्वनि समाप्त हो जाती है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। 'ऋजु' होने का अर्थ है—सीधे ब्रह्म में स्थित हो जाना। यहाँ अब कोई माध्यम नहीं रहता, कोई क्रम नहीं रहता, केवल एक अखंड सत्य का अनुभव होता है। जिस प्रकार एक घुमावदार सड़क अंततः एक खुले मैदान में समाप्त होती है, उसी प्रकार प्रणव की वक्र यात्रा पञ्चम पद के मौन में विलीन होकर ऋजु हो जाती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इन्द्रः प्रजापतिं अपृच्छत् भगवन्नभिष्टूय पृच्छामीति पृच्छ वत्सेत्यब्रवीत् किं अयं ओंकारः कस्यः पुत्रः किं चैतच्छन्दः किं चैतद्वर्णः किं चैतद्ब्रह्मा ब्रह्म सम्पद्यते तस्माद्वै तद्भद्रं ओंकारं पूर्वं आलेभे स्वरितोदात्त एकाक्षर ओंकार ऋग्वेदे त्रैस्वर्योदात एकाक्षर ओंकारो यजुर्वेदे दीर्घप्लुतोदात्त एकाक्षर ओंकारः सामवेदे ह्रस्वोदात्त एकाक्षर ओंकारोऽथर्ववेदे उदात्तोदात द्विपद अ उ इत्यर्धचतस्रो मात्रा मकारे व्यञ्जनं इत्याहुः या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवत्या रक्ता वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्ब्राह्मं पदम् या सा द्वितीया मात्रा विष्णुदेवत्या कृष्णा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्वैष्णवं पदम् या सा तृतीया मात्रैशानदेवत्या कपिला वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पदम् या सार्धचतुर्थी मात्रा सर्वदेवत्या व्यक्तीभूता खं विचरति शुद्धस्फटिकसन्निभा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेत्पदं अनामकम् ओंकारस्य चोत्पत्तिः विप्रो यो न जानाति तत्पुनरुपनयनम् तस्माद्ब्राह्माणवचनं आदर्तव्यं यथा लातव्यो गोत्रो ब्रह्मणः पुत्रः गायत्रं च्छन्दः शुक्लो वर्णः पुंसो वत्सः रुद्रो देवता ओंकारो वेदानां ॥ १.२५ ॥
इन्द्रने प्रजापतिसे पूछा — "भगवन्, स्तुति करके पूछता हूँ" — "पूछो, वत्स।" — "यह ओंकार क्या है? किसका पुत्र है? इसका छन्द क्या, वर्ण क्या? यह ब्रह्म कैसे होता है?" … ऋग्वेदमें ओंकार स्वरित-उदात्त एकाक्षर है, यजुर्वेदमें त्रैस्वर्य-उदात्त, सामवेदमें दीर्घ-प्लुत-उदात्त, अथर्ववेदमें ह्रस्व-उदात्त। "अ" और "उ" — (ये) साढ़े तीन मात्राएँ, और मकारमें व्यञ्जन — ऐसा कहते हैं। जो पहली मात्रा है, उसकी देवता ब्रह्मा है, वर्ण लाल — जो उसका नित्य ध्यान करता है वह ब्राह्म पदको जाता है। दूसरी मात्राकी देवता विष्णु, वर्ण कृष्ण — उसका ध्यान करनेवाला वैष्णव पदको जाता है। तीसरी मात्राकी देवता ईशान, वर्ण कपिल — उसका ध्यान करनेवाला ऐशान पदको जाता है। जो आधी चौथी मात्रा है, वह सब देवतावाली है, व्यक्त होकर आकाशमें विचरती है, वर्णमें शुद्ध स्फटिकके समान — उसका नित्य ध्यान करनेवाला नामरहित पदको जाता है। जो विप्र ओंकारकी उत्पत्ति नहीं जानता, उसका फिरसे उपनयन (होना चाहिए); इसलिए ब्राह्मण-वचनका आदर करना चाहिए … ओंकार वेदोंका (मुख्य) है।
गोपथ ब्राह्मण में ओंकार की मात्राओं का विस्तृत वर्णन है, जहाँ 'अ', 'उ' और 'म' के साथ 'अर्धचतस्रो मात्रा' (आधी चौथी मात्रा) का उल्लेख है। गोपथ ब्राह्मण के अनुसार यह अर्धमात्रा 'सर्वदेवत्या' है और जो इसका ध्यान करता है, वह 'पदं अनामकम्' (नामरहित पद) को प्राप्त करता है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-तत्व का विस्तार कर रही है। गोपथ ब्राह्मण जिस 'अनामक पद' की बात करता है, वही याज्ञवल्क्य का 'पञ्चम पद' है। जहाँ गोपथ ब्राह्मण मात्राओं के देवत्व और वर्णों का वर्णन कर साधक को उस पद की ओर ले जाता है, वहीं यह स्मृति स्पष्ट करती है कि उन चार मात्राओं का पार करना ही 'वक्र' से 'ऋजु' होने की प्रक्रिया है। गोपथ ब्राह्मण की 'अर्धमात्रा' यहाँ चतुरक्षर ओंकार का अंतिम छोर है, जिसके पार वह अमात्र स्थिति है जहाँ साधक सीधा (ऋजु) ब्रह्म में स्थित हो जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि' से 'शून्य' की ओर जाने का मानचित्र है।
अभ्यास के समय साधक अनुभव करता है कि 'अ', 'उ', 'म' और अर्धमात्रा का उच्चारण एक मानसिक और प्राणिक यात्रा है। यह यात्रा 'वक्र' है क्योंकि इसमें मन को एक निश्चित क्रम में बांधना पड़ता है। साधक पहले जाग्रत अवस्था (अ), फिर स्वप्न (उ), फिर सुषुप्ति (म) और फिर तुरीय की झलक (अर्धमात्रा) का अनुभव करता है। यह क्रमबद्धता ही 'वक्रता' है।
परन्तु, जब साधक इस चौथे पद (अर्धमात्रा) के पार उस मौन में ठहर जाता है जहाँ कोई नाद शेष नहीं रहता, तब वह 'पञ्चम पद' में प्रवेश करता है। यह पञ्चम पद 'अमात्र ओंकार' है। यहाँ साधक की चेतना अब किसी अक्षर या ध्वनि के सहारे नहीं चलती, बल्कि वह सीधे (ऋजु) उस परम तत्व में स्थित हो जाती है।
योगिक अभ्यास यह है कि चतुरक्षर ओंकार का जप करते हुए, अंतिम गूँज के बाद आने वाले उस गहन मौन को पकड़ना। वह मौन ही 'ऋजुत्व' है। साधक जब इस बिंदु पर पहुँचता है, तो वह 'साधन' से 'साध्य' में बदल जाता है; वह अब ओंकार का जप नहीं करता, बल्कि वह स्वयं ओंकार (ब्रह्म) हो जाता है। इस प्रकार साधक क्रमबद्ध अभ्यास (वक्र) से अद्वैत अनुभूति (ऋजु) की भूमि तक पहुँचता है।
ब्रह्मणस्त्रिविधो निर्देशः
ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २.९ ॥
"ओं तत् सत्" — इस प्रकार का निर्देश ब्रह्म के विषय में तीन प्रकार का स्मृत है; उस (निर्देश) से पूर्वकाल में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ विहित किए गए हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव की उस यात्रा का वर्णन किया जहाँ साधक चतुरक्षर की वक्रता को पार कर पाँचवें पद की ऋजुता यानी अमात्र स्थिति को प्राप्त होता है। अब इस नौवें श्लोक में वे उस परम सत्य के त्रिविध निर्देश का उद्घाटन कर रहे हैं, जो समस्त सृष्टि और धर्म का आधार है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओं तत् सत् इति निर्देशः ब्रह्मणः त्रिविधः स्मृतः । पुरा तेन (निर्देशेन) ब्राह्मणाः, वेदाः च यज्ञाः च विहिताः ।
पदार्थ:
• निर्देशो: संकेत, नाम या परिभाषा। यहाँ ब्रह्म के उस स्वरूप को इंगित करने वाले शब्द।
• त्रिविधः: तीन प्रकार का। ओं, तत् और सत्—ये तीन शब्द ब्रह्म के तीन आयामों को दर्शाते हैं।
• स्मृतः: याद किया गया है, शास्त्र-प्रमाणित है या परंपरा में स्वीकृत है।
• विहिताः: रचे गए, निर्मित किए गए या स्थापित किए गए।
• पुरा: प्राचीन काल में, अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में जब आदि-शक्ति का प्रकटीकरण हुआ।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ब्रह्म के उस त्रिविध नाम का वर्णन कर रहे हैं जिसे 'ॐ तत् सत्' कहा जाता है। यह केवल तीन शब्दों का समूह नहीं, अपितु उस एक अखंड ब्रह्म के तीन कार्यात्मक निर्देश हैं।
ऋषि कहते हैं कि ब्रह्म का निर्देश तीन प्रकार से स्मृत है। प्रथम 'ओं' है, जो ब्रह्म का बीज रूप है और समस्त ध्वनियों का उद्गम है। द्वितीय 'तत्' है, जो उस परब्रह्म की उस स्थिति का संकेत है जो इस दृश्य जगत से परे, निर्गुण और निराकार है। तृतीय 'सत्' है, जो ब्रह्म के उस स्वरूप को दर्शाता है जो वास्तव में अस्तित्ववान है, शाश्वत है और जिसमें संपूर्ण सृष्टि विलीन होती है।
इन तीन निर्देशों का महत्व यह है कि इन्हीं के माध्यम से 'पुरा' अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ विहित किए गए। यहाँ 'ब्राह्मण' का अर्थ केवल जाति से नहीं, अपितु उन ऋषियों और ज्ञानियों से है जो ब्रह्म के स्वरूप को जानते हैं। 'वेद' उन ईश्वरीय ज्ञान-पुंजों का नाम है जो इसी 'ॐ तत् सत्' के कंपन से उत्पन्न हुए, और 'यज्ञ' वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव पुनः उसी ब्रह्म में विलीन होने का प्रयास करता है।
भाव यह है कि यदि 'ॐ तत् सत्' का यह त्रिविध निर्देश न होता, तो न ज्ञान (वेद) का मार्ग होता, न साधक (ब्राह्मण) का अस्तित्व होता और न ही साधना (यज्ञ) की विधि होती। यह निर्देश ही वह सेतु है जो स्थूल जगत को सूक्ष्म ब्रह्म से जोड़ता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ १७.२३ ॥
'ॐ तत् सत्' — यह ब्रह्मका तीन प्रकारका निर्देश (नाम) कहा गया है; उसीसे पूर्वकालमें ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गये।
यह श्लोक पूर्णतः भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के तेईसवें श्लोक के समान है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्म के इसी त्रिविध निर्देश की चर्चा की है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता का यहाँ पूर्ण मेल है, जो यह सिद्ध करता है कि याज्ञवल्क्य की यह स्मृति उसी शाश्वत वैदिक ज्ञान की धारा का विस्तार है जो गीता के माध्यम से प्रकट हुई। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर बल देते हैं कि समस्त धार्मिक और आध्यात्मिक क्रियाएँ इसी 'ॐ तत् सत्' के अधिष्ठान पर टिकी हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से 'ॐ तत् सत्' का अभ्यास केवल शब्दों का जप नहीं, अपितु चेतना के तीन स्तरों का आरोहण है:
१. ओं (आरम्भ): जब साधक 'ओं' का अभ्यास करता है, तो वह अपनी चेतना को बाहरी जगत से हटाकर भीतर की ओर मोड़ता है। यह सृजन का बीज है। यहाँ साधक अपनी प्राण-शक्ति को एकत्रित कर उसे एक बिंदु पर लाने का प्रयास करता है।
२. तत् (निष्काम भाव): 'तत्' का अर्थ है 'वह'। जब साधक 'तत्' के भाव में स्थित होता है, तो वह 'मैं' (अहंकार) को त्यागकर उस विराट पुरुष में स्थित होता है। यह निष्काम भाव की स्थिति है, जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह कर्ता नहीं है, बल्कि वह 'वह' (परब्रह्म) ही है। यह योग की वह भूमि है जहाँ वैराग्य और समर्पण घटित होता है।
३. सत् (सद्भाव): 'सत्' का अर्थ है परम सत्य या शुद्ध अस्तित्व। यहाँ साधक अनुभव करता है कि केवल वही सत्य है, शेष सब माया है। यह पूर्णता की स्थिति है।
इस प्रकार, साधक 'ओं' से आरम्भ करता है, 'तत्' के माध्यम से अहंकार का विसर्जन करता है और 'सत्' में स्थित होकर अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करता है। यह क्रम साधक को स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अक्षर की ओर ले जाता है।
प्रणवस्य कर्मारम्भकत्वम्
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २.१० ॥
इसलिए ब्रह्मवादियोंकी शास्त्रविहित यज्ञ, दान और तपकी क्रियाएँ सदा "ॐ" कहकर ही आरम्भ होती हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'ॐ तत् सत्' के रूप में ब्रह्म के त्रिविध निर्देश का वर्णन किया और बताया कि इसी आधार पर ब्राह्मण, वेद और यज्ञों की स्थापना हुई। अब इस दसवें श्लोक में वे इस सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यावहारिक साधना और कर्म के स्तर पर उतार रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तस्मात् ब्रह्मवादिनाम् विधानोक्ताः यज्ञ-दान-तपः-क्रियाः सततं 'ओम्' इति उदाहृत्य प्रवर्तन्ते ।
पदार्थ:
• तस्मात्: इसलिए (पिछले श्लोक में वर्णित 'ॐ तत् सत्' के निर्देश के कारण)।
• ब्रह्मवादिनाम्: उन साधकों का जो ब्रह्म को ही एकमात्र सत्य मानते हैं और उसकी उपासना करते हैं।
• विधानोक्ताः: शास्त्रों या विधि द्वारा निर्देशित (शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार)।
• यज्ञ-दान-तपः-क्रियाः: यज्ञ (समर्पण), दान (त्याग) और तप (संयम) की क्रियाएँ।
• उदाहृत्य: उच्चारण करके या स्मरण करके।
• प्रवर्तन्ते: आरम्भ होते हैं या संचालित होते हैं।
• सततं: निरंतर, सदैव।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जब ब्रह्म का निर्देश 'ॐ' के रूप में प्रतिष्ठित है, तो जीवन की समस्त शुभ क्रियाएँ इसी बीज-मन्त्र से अनुप्राणित होनी चाहिए।
ऋषि कहते हैं कि जो 'ब्रह्मवादी' हैं—अर्थात् जिनका लक्ष्य केवल परब्रह्म की प्राप्ति है—उनकी समस्त शास्त्रविहित क्रियाएँ 'ॐ' के उच्चारण से आरम्भ होती हैं। यहाँ तीन मुख्य क्रियाओं का उल्लेख है: यज्ञ, दान और तप।
बाहरी दृष्टि से यज्ञ का अर्थ अग्निहोत्र या अनुष्ठान है, दान का अर्थ द्रव्य का त्याग है और तप का अर्थ शरीर और इंद्रियों का अनुशासन है। किन्तु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, अतः वे इन क्रियाओं के आन्तर अर्थ की ओर भी संकेत कर रहे हैं। उनके लिए 'यज्ञ' का अर्थ है—अपने अहंकार की आहुति देना; 'दान' का अर्थ है—चित्त के विकारों का त्याग करना; और 'तप' का अर्थ है—चित्त को एकाग्र कर आत्म-साक्षात्कार के लिए तपना।
इन तीनों क्रियाओं से पूर्व 'ॐ' का उच्चारण यह सुनिश्चित करता है कि यह कर्म केवल भौतिक फल की प्राप्ति के लिए नहीं, अपितु ब्रह्म-अर्पण है। जब साधक 'ॐ' कहता है, तो वह अपनी सीमित पहचान (अहंकार) को छोड़कर उस विराट सत्ता से जुड़ जाता है। बिना 'ॐ' के किया गया कर्म केवल एक यांत्रिक क्रिया है, किन्तु 'ॐ' के साथ वह 'योग' बन जाता है। इसीलिए ब्रह्मवादियों के लिए यह विधान अनिवार्य और सतत है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ १७.२४ ॥
इसलिए ब्रह्मवादियोंकी शास्त्रोक्त यज्ञ, दान और तपकी क्रियाएँ सदा 'ॐ' कहकर आरम्भ होती हैं।
यह श्लोक भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के चौबीसवें श्लोक के समान है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने यही निर्देश दिया है कि ब्रह्मवादियों की शास्त्रोक्त क्रियाएँ 'ॐ' से आरम्भ होती हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता का यह मेल यह सिद्ध करता है कि कर्म और ज्ञान अलग-अलग नहीं हैं। कर्म जब 'ॐ' (ब्रह्म) के साथ जुड़ता है, तो वह ज्ञान-मार्ग का ही एक साधन बन जाता है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि 'ॐ' वह सेतु है जो स्थूल क्रिया को सूक्ष्म ब्रह्म से जोड़ता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म-योग' का बीज है। सामान्यतः मनुष्य दान देते समय 'दाता' होने के अभिमान में रहता है, तप करते समय 'तपस्वी' होने के अहंकार में और यज्ञ करते समय 'कर्ता' होने के भाव में रहता है। यह 'मैं' भाव ही साधना में सबसे बड़ी बाधा है।
जब साधक किसी भी क्रिया से पूर्व 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में यह अनुभव करता है कि कर्ता वह स्वयं नहीं, बल्कि उसके भीतर स्थित वह 'अक्षर-ब्रह्म' है।
१. दान के समय 'ॐ': यह भाव जागृत होता है कि मैं कुछ दे नहीं रहा, बल्कि ब्रह्म ही ब्रह्म को दे रहा है। यहाँ 'त्याग' का अनुभव होता है।
२. तप के समय 'ॐ': यह अनुभव होता है कि यह शरीर और प्राण उसी परमात्मा के हैं, अतः इस तप की अग्नि में केवल अविद्या जल रही है। यहाँ 'शुद्धि' का अनुभव होता है।
३. यज्ञ के समय 'ॐ': यह बोध होता है कि संपूर्ण जीवन ही एक महायज्ञ है और 'ॐ' उसकी मुख्य आहुति है। यहाँ 'समर्पण' का अनुभव होता है।
इस अभ्यास से साधक 'कर्ता' की भूमि से उठकर 'निमित्त' की भूमि पर जाता है। वह अपनी हर क्रिया को 'प्रणव' में विलीन कर देता है, जिससे कर्म के बंधन नहीं बनते और क्रिया स्वयं एक ध्यान बन जाती है।
पाशुपतसाङ्ख्यमतम्
उद्गीथाक्षरमेद्ब्रह्मविदो ब्रह्मणो योगम् ।
पाशुपताश्च वदन्ति हि साङ्ख्याश्चाध्यात्मतत्त्वज्ञाः ॥ २.११ ॥
उद्गीथाक्षर (ॐ) को ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म का योग कहते, और पाशुपत तथा अध्यात्मतत्त्व के ज्ञाता साङ्ख्य भी यही कहते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह बताया कि ब्रह्मवादियों की समस्त शास्त्रविहित क्रियाएँ 'ॐ' के उच्चारण से आरम्भ होती हैं। अब इस ग्यारहवें श्लोक में वे इस बात को सिद्ध कर रहे हैं कि प्रणव का यह प्रयोग केवल एक परंपरा नहीं, अपितु विभिन्न दर्शनों और ज्ञान-मार्गों के अनुसार ब्रह्म और जीव के मिलन का वास्तविक 'योग' है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ब्रह्मविदो उद्गीथाक्षरम् ब्रह्मणो योगम् (वदन्ति), पाशुपताश्च साङ्ख्याश्च अध्यात्मतत्त्वज्ञाः हि (तदेव) वदन्ति ।
पदार्थ:
• उद्गीथाक्षरम्: वह अक्षर जिसे 'उद्गीथ' कहा जाता है (अर्थात् ओंकार)। उद्गीथ का अर्थ है वह नाद जो ऊपर की ओर ले जाए या जो सर्वोच्च हो।
• ब्रह्मविदो: ब्रह्म को जानने वाले, ऋषियों या आत्मज्ञानी पुरुष।
• ब्रह्मणो योगम्: ब्रह्म के साथ संयोग या मिलन। यहाँ 'योग' का अर्थ केवल शारीरिक आसन नहीं, अपितु साधक का उस परम तत्त्व में विलीन हो जाना है।
• पाशुपताश्च: पाशुपत संप्रदाय के साधक (जो शिव-तत्त्व की उपासना करते हैं)।
• साङ्ख्याश्च अध्यात्मतत्त्वज्ञाः: सांख्य दर्शन के अनुयायी, जो अध्यात्म के सूक्ष्म तत्त्वों और प्रकृति-पुरुष के विवेक का ज्ञान रखते हैं।
• वदन्ति: कहते हैं या उद्घोषित करते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी एक अत्यंत महत्वपूर्ण समन्वय प्रस्तुत कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि 'ॐ' केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु वह सेतु है जो जीव को ब्रह्म से जोड़ता है।
ऋषि कहते हैं कि जो 'ब्रह्मविद्' हैं—अर्थात् जिन्होंने अनुभव किया है कि यह संपूर्ण जगत उस एक चेतना का विस्तार है—वे इस उद्गीथ-अक्षर (ॐ) को 'ब्रह्मणो योगम्' कहते हैं। भाव यह है कि जब साधक पूर्ण श्रद्धा और विधि से ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में ब्रह्म के साथ योग कर रहा होता है। यहाँ 'योग' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है; यह उस अवस्था का संकेत है जहाँ जप करने वाला (जपक), जप की जाने वाली वस्तु (जप्य) और जप का फल (ब्रह्म) तीनों एक हो जाते हैं।
इस सत्य की पुष्टि के लिए याज्ञवल्क्य जी विभिन्न विचारधाराओं का प्रमाण देते हैं। वे कहते हैं कि पाशुपत (जो शिव के उपासक हैं) और सांख्य (जो प्रकृति-पुरुष के विवेकज्ञ हैं) भी इसी मत का समर्थन करते हैं। यद्यपि इन संप्रदायों की साधना पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, किन्तु उनके गंतव्य का बिंदु एक ही है—वह है 'अक्षर ब्रह्म'। सांख्य के लिए जो 'पुरुष' का शुद्ध स्वरूप है और पाशुपतों के लिए जो 'पशुपति' का निराकार रूप है, वही इस ओंकार में निहित है।
इस प्रकार, याज्ञवल्क्य जी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सत्य एक ही है, केवल उसे देखने वाले की दृष्टि भिन्न है। चाहे वह ज्ञानमार्गी ब्रह्मविद् हो, भक्तिमार्गी पाशुपत हो या विवेकमार्गी सांख्य, सभी इस बात पर सहमत हैं कि ओंकार ही वह साधन है जो साधक को उसकी मूल स्थिति (ब्रह्म) में वापस ले जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १.१.१ ॥
'ॐ' इस अक्षरकी उद्गीथरूपसे उपासना करे; क्योंकि 'ॐ' कहकर ही (उद्गाता) गाता है। उसीकी यह व्याख्या (आगे) है।
छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि 'ॐ' इस अक्षर की उद्गीथ रूप से उपासना करनी चाहिए। स्मृति का यह श्लोक उपनिषद् के इसी निर्देश का विस्तार है। जहाँ उपनिषद् 'उपासना' की आज्ञा देता है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति उसे 'योग' कहती है। उपासना एक प्रक्रिया है और योग उसकी पूर्णता। उपनिषद् में उद्गीथ को ब्रह्म का प्रतीक माना गया है, और यहाँ याज्ञवल्क्य जी उसे ब्रह्म के साथ साधक के वास्तविक संयोग का साधन सिद्ध कर रहे हैं।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'एकत्व' के अनुभव की ओर ले जाता है। साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह ओंकार के उच्चारण को केवल कंठ की क्रिया न माने, बल्कि उसे 'ब्रह्मणो योगम्' के रूप में अनुभव करे।
जब साधक 'अ', 'उ' और 'म' की मात्राओं का जप करता है, तो वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है। इस श्लोक का गुप्त रहस्य यह है कि सब मार्गों का मिलन-बिन्दु एक ही अक्षर है। साधक जब इस भाव में स्थित होता है कि "यह ओंकार ही मेरा और ब्रह्म का मिलन है", तब वह द्वैत की भूमि से अद्वैत की भूमि की ओर प्रस्थान करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि जप के समय मन को उस 'अक्षर' में विलीन कर दिया जाए, जिससे साधक स्वयं को एक नाद के रूप में अनुभव करने लगे। यही वह स्थिति है जहाँ पाशुपत, सांख्य और ब्रह्मवेत्ता—तीनों की साधना एक ही बिंदु पर आकर समाप्त होती है।
प्रणवमात्रात्रयनामधेयानि
मात्रास्तिस्रो व्यक्ताऽव्यक्ता तथा परा सूक्ष्मा ।
अध्यात्मामधिभूतामथाधिदैवीं विजानीयात् ॥ २.१२ ॥
तीन मात्राएँ हैं, व्यक्त, अव्यक्त तथा परा सूक्ष्म; इन्हें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव के रूप में जाने। ...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि प्रणव केवल एक शब्द नहीं, अपितु ब्रह्मवेत्ताओं, पाशुपतों और सांख्ययोगियों के लिए ब्रह्म के साथ संयोग का वास्तविक 'योग' है। अब इस बारहवें श्लोक में वे इस योग के आंतरिक स्वरूप को खोलते हुए प्रणव की तीन मात्राओं के सूक्ष्म भेद और उनके व्यापक विस्तार का निर्देश कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: मात्राः तिस्रः (सन्ति) — व्यक्ता, अव्यक्ता तथा परा सूक्ष्मा । (ताः) अध्यात्माम्, अधिभूताम्, अथ अधिदैवीं (इति) विजानीयात् ।
पदार्थ:
• मात्राः तिस्रः: ओंकार के तीन घटक या नाद-अंश। यहाँ संख्या तीन केवल गिनती नहीं, अपितु सृष्टि और चेतना के तीन स्तरों का संकेत है।
• व्यक्ता: जो प्रकट है, जिसे इंद्रियों या वाणी के माध्यम से अनुभव किया जा सके।
• अव्यक्ता: जो प्रकट नहीं है, जो वाणी के परे है किन्तु चेतना में विद्यमान है।
• परा सूक्ष्मा: जो अत्यंत सूक्ष्म है, जो समस्त अभिव्यक्तियों का मूल कारण है और जिसे केवल गहन समाधि में ही जाना जा सकता है।
• अध्यात्म: वह जो आत्मा या व्यक्तिगत चेतना से सम्बन्धित है।
• अधिभूत: वह जो भौतिक जगत, प्रकृति और जड़ पदार्थों से सम्बन्धित है।
• अधिदैव: वह जो दिव्य शक्तियों, देवताओं और ब्रह्माण्डीय नियमों से सम्बन्धित है।
• विजानीयात्: जानना चाहिए या अनुभव करना चाहिए (विधिलिङ्)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी प्रणव के उस त्रिविध स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है। वे कहते हैं कि ओंकार की तीन मात्राएँ हैं—व्यक्त, अव्यक्त और परा सूक्ष्म।
प्रथम 'व्यक्त' मात्रा वह है जो हमारे उच्चारण में आती है, जिसे कान सुनते हैं और मन पकड़ता है। यह स्थूल जगत का द्वार है। द्वितीय 'अव्यक्त' मात्रा वह मौन है जो उच्चारण के बाद शेष रहता है, जहाँ शब्द समाप्त होता है और केवल स्पंदन बचता है। तृतीय 'परा सूक्ष्म' वह अवस्था है जहाँ नाद भी विलीन हो जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। यह 'परा' वह बिंदु है जहाँ साधक अक्षर-ब्रह्म में स्थित हो जाता है।
ऋषि आगे निर्देश देते हैं कि इन तीन अवस्थाओं को केवल दार्शनिक रूप से न जानकर, उन्हें 'अध्यात्म', 'अधिभूत' और 'अधिदैव' के रूप में जानना चाहिए। इसका रहस्य यह है कि यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड तीन स्तरों पर कार्य करता है। एक स्तर हमारा अपना अंतःकरण (अध्यात्म) है, दूसरा वह दृश्यमान जगत (अधिभूत) है जिसमें हम रहते हैं, और तीसरा वह अदृश्य दिव्य शासन (अधिदैव) है जो इस जगत को संचालित करता है।
जब साधक प्रणव का अभ्यास करता है, तो वह केवल एक मन्त्र का जप नहीं करता, अपितु वह अपनी चेतना को इन तीनों स्तरों पर विस्तारित करता है। वह अनुभव करता है कि जो नाद उसके हृदय में गूँज रहा है (अध्यात्म), वही नाद संपूर्ण सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है (अधिभूत) और वही नाद देवताओं की दिव्य शक्ति का आधार है (अधिदैव)। इस प्रकार, प्रणव का अभ्यास साधक को व्यक्ति से प्रकृति और प्रकृति से परमात्मा की ओर ले जाता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'त्रिविध दृष्टि' का अभ्यास कराता है। साधक जब ओंकार का जप करता है, तो उसे केवल ध्वनि पर नहीं रुकना है, बल्कि उसे इन तीन भूमियों का अनुभव करना है:
१. अध्यात्म-स्तर: साधक अनुभव करे कि ओंकार की मात्रा उसके भीतर के प्राण और मन में कैसे स्पंदित हो रही है। यह उसकी अपनी आंतरिक शुद्धि और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है।
२. अधिभूत-स्तर: साधक अपनी चेतना को शरीर से बाहर निकालकर यह अनुभव करे कि यह संपूर्ण भौतिक जगत उसी एक नाद का विस्तार है। यहाँ वह 'अहं' से मुक्त होकर 'सर्वम्' (सब कुछ) होने का अनुभव करता है।
३. अधिदैव-स्तर: अंत में साधक उस परा-सूक्ष्म नाद में स्थित होकर उस दिव्य प्रकाश और ईश्वरीय सत्ता का अनुभव करता है जो इस जगत का नियंता है।
साधक इस अभ्यास से 'व्यक्त' (स्थूल) से 'अव्यक्त' (सूक्ष्म) और फिर 'परा' (कारण) की ओर बढ़ता है। यह यात्रा उसे सीमित व्यक्तित्व से निकालकर अनंत ब्रह्म की स्थिति में प्रतिष्ठित करती है। यहाँ अभ्यास यह है कि प्रत्येक मात्रा के साथ अपनी चेतना को क्रमशः सूक्ष्मतर स्तरों पर ले जाया जाए, जिससे साधक की दृष्टि केवल भौतिक न रहकर आध्यात्मिक और दैवीय हो जाए।
प्रणवमाहात्म्यम्
सिद्धान्तानां तु सर्वेषां वेदवेदान्तयोस्तथा ।
अन्येषामपि शास्त्राणां निष्ठाकारमुच्यते ॥ २.१३ ॥
सब सिद्धान्तों का, वेद और वेदान्त का तथा अन्य शास्त्रों का भी (यह ओंकार) निष्ठा का आधार कहा जाता है। ...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव की तीन मात्राओं—व्यक्त, अव्यक्त और परा सूक्ष्म—का परिचय देते हुए उन्हें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव के स्तरों से जोड़ा था। अब इस तेरहवें श्लोक में वे यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि यह त्रिविध स्वरूप केवल एक पद्धति नहीं, अपितु समस्त ज्ञान-परम्पराओं का अंतिम गंतव्य और आधार है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सिद्धान्तानां तु सर्वेषां, वेद-वेदान्तयोः तथा, अन्येषामपि शास्त्राणां (एषः ओंकारः) निष्ठाकारम् उच्यते ।
पदार्थ:
• सिद्धान्तानां सर्वेषां: समस्त मतों, दर्शनों और स्थापित सिद्धांतों का। यहाँ 'सिद्धान्त' का अर्थ है वह निष्कर्ष जो तर्क और अनुभव से सिद्ध हो चुका हो।
• वेद-वेदान्तयोः: श्रुति (वेद) और उसके सार-तत्व (वेदान्त) दोनों का।
• अन्येषामपि शास्त्राणां: अन्य पूरक शास्त्रों, आगमों और विद्याओं का भी।
• निष्ठाकारम्: निष्ठा का आधार, अंतिम आश्रय या वह बिंदु जहाँ पहुँचकर सारी खोज समाप्त हो जाती है। 'निष्ठा' का अर्थ है वह स्थिति जहाँ साधक स्थिर हो जाता है और सत्य का साक्षात्कार करता है।
• उच्यते: कहा जाता है या घोषित किया गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी एक अत्यंत गंभीर सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि संसार में अनेक सिद्धान्त हैं, वेदों की अनेक शाखाएँ हैं और वेदान्त के विभिन्न दृष्टिकोण हैं। यहाँ तक कि अन्य शास्त्र भी अपनी-अपनी विधि से सत्य की व्याख्या करते हैं। किन्तु, इन समस्त मार्गों का 'निष्ठा-स्थल' केवल ओंकार ही है।
भाव यह है कि ज्ञान की यात्रा में ऊपर की शाखाएँ भिन्न हो सकती हैं—कोई कर्म को प्रधान मानता है, कोई ज्ञान को, कोई भक्ति को—किन्तु जैसे-जैसे साधक सूक्ष्म की ओर बढ़ता है, वह पाता है कि समस्त शास्त्रों की जड़ एक ही है। वह जड़ है 'प्रणव'। वेद जहाँ से आरम्भ होते हैं, वहीं अंततः प्रणव में विलीन हो जाते हैं। वेदान्त जिसे 'एकमेवाद्वितीयम्' कहता है, वाणी में उसी की अभिव्यक्ति 'ॐ' है।
जब याज्ञवल्क्य जी इसे 'निष्ठाकार' कहते हैं, तो उनका संकेत उस स्थिति की ओर है जहाँ तर्क समाप्त हो जाता है और केवल अनुभव शेष रहता है। शास्त्रों की विधाएँ, नियम और विधि केवल साधन हैं; साध्य तो वह अक्षर-ब्रह्म है जिसे प्रणव के रूप में जपा और अनुभव किया जाता है। अतः, यह स्मृति स्पष्ट करती है कि ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु समस्त वैदिक और अवैदिक ज्ञान का वह केंद्र-बिंदु है जहाँ पहुँचकर साधक की जिज्ञासा शांत हो जाती है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विविधता से एकता' की ओर ले जाने वाला सूत्र है। साधक जब अपनी साधना के आरम्भिक स्तर पर होता है, तो वह विभिन्न शास्त्रों, मतों और विधियों के द्वन्द्व में उलझा रहता है। वह पूछता है कि कौन सा मार्ग सत्य है? यह श्लोक उसे बताता है कि मतभेद केवल ऊपरी सतह पर हैं; गहराई में सबकी नींव एक ही है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जिस 'अक्षर' की खोज वह वेदों में कर रहा है, वही अक्षर उसके भीतर नाद के रूप में गूँज रहा है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी समस्त बौद्धिक खोजों और शास्त्र-ज्ञान को 'निष्ठा' के रूप में ओंकार में विसर्जित कर दे। जब वह ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं करता, अपितु समस्त शास्त्रों के सार को अपने हृदय में उतारता है।
यह स्थिति साधक को 'विवेक-भूमि' से 'अनुभव-भूमि' की ओर ले जाती है। यहाँ वह समझ जाता है कि शास्त्रों का पढ़ना (स्वाध्याय) तब तक पूर्ण नहीं होता, जब तक कि वह उस पढ़ी हुई बात को प्रणव के नाद में लय न कर दे। इस प्रकार, ओंकार का अभ्यास उसे उस बिंदु पर स्थिर करता है जहाँ वह स्वयं को समस्त शास्त्रों का निचोड़ और ब्रह्म का अंश अनुभव करने लगता है।
प्रणवाद्याः स्मृता वेदाः प्रणवे पर्युपस्थिताः ।
वाङ्मयं प्रणवः सर्वं तस्मात् प्रणवमभ्यसेत् ॥ २.१४ ॥
जिनके आदि में प्रणव है, ऐसे वेद स्मृत हुए हैं और वे प्रणव में ही स्थित हैं; सारा वाङ्मय प्रणव है, इसलिए प्रणव का अभ्यास करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि समस्त सिद्धान्तों, वेदों और वेदान्तों की निष्ठा का अंतिम आधार ओंकार ही है। अब इस चौदहवें श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस आधार की व्यापकता को समझाते हुए प्रणव और वेदों के अविभाज्य सम्बन्ध को प्रतिपादित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: वेदाः प्रणवाद्याः स्मृताः, (वेदाः) प्रणवे पर्युपस्थिताः । सर्वं वाङ्मयं प्रणवः, तस्मात् (साधकः) प्रणवम् अभ्यसेत् ।
पदार्थ:
• प्रणवाद्याः: जिनके आदि (आरम्भ) में प्रणव है। 'प्रणव' का अर्थ है वह नाद जो समस्त ध्वनियों का मूल है और जो साधक को पार ले जाता है।
• स्मृताः: याद किए गए हैं, शास्त्र-सम्मत हैं या परंपरा में स्वीकृत हैं।
• पर्युपस्थिताः: पूरी तरह स्थित हैं, विलीन हैं या उन्हीं में प्रतिष्ठित हैं। यहाँ 'उपस्थिताः' के साथ 'परि' उपसर्ग यह दर्शाता है कि वेद केवल प्रणव से शुरू नहीं होते, अपितु वे अंततः उसी में समाहित भी हैं।
• वाङ्मयं: वाणी से निर्मित समस्त ज्ञान, समस्त मन्त्र, शब्द और अर्थ का समुच्चय।
• अभ्यसेत्: अभ्यास करे। यह विधिलिङ् लकार है, जो एक आवश्यक साधना का निर्देश देता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य वेदों के स्वरूप और प्रणव के सम्बन्ध का रहस्य खोल रहे हैं। वे कहते हैं कि वेद 'प्रणवाद्याः' हैं। इसका अर्थ यह है कि किसी भी वैदिक मन्त्र का वास्तविक बीज ओंकार ही है। बाहरी रूप से मन्त्रों के अक्षर भिन्न हो सकते हैं, किन्तु उनकी आंतरिक शक्ति और स्पंदन प्रणव ही है।
रहस्य यह है कि वेद केवल प्रणव से आरम्भ नहीं होते, अपितु वे 'प्रणवे पर्युपस्थिताः' हैं—अर्थात् वे प्रणव में ही स्थित हैं। जिस प्रकार अनेक नदियाँ अंततः सागर में मिलकर अपना पृथक अस्तित्व खो देती हैं और सागर ही रह जाता है, उसी प्रकार वेदों की समस्त ऋचाएँ, यजुः और साम अंततः ओंकार के महानाद में विलीन हो जाते हैं।
जब ऋषि कहते हैं कि "सारा वाङ्मय प्रणव है", तो उनका अभिप्राय यह है कि वाणी की जो भी अभिव्यक्ति है—चाहे वह स्थूल शब्द हो, सूक्ष्म विचार हो या गहन मन्त्र—उसका मूल स्रोत ओंकार ही है। यदि ओंकार न होता, तो वाणी का प्राकट्य संभव न था। अतः समस्त ज्ञान, समस्त मन्त्र और समस्त शब्द-शक्ति ओंकार के ही विभिन्न विस्तार हैं।
यही कारण है कि याज्ञवल्क्य जी अंत में निर्देश देते हैं—'तस्मात् प्रणवमभ्यसेत्'। जब समस्त वेदों का सार, उनकी शक्ति और उनका गंतव्य केवल प्रणव ही है, तो अलग-अलग मन्त्रों के विस्तार में भटकने के बजाय उस एक मूल बीज का अभ्यास करना ही सर्वोपरि है। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि एक साधना-विधि है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् ॥ २.२३.३ ॥
प्रजापतिने लोकोंको तपाया; तपाये हुए उनसे त्रयी विद्या (तीनों वेद) बह निकली। उसे तपाया; तपायी हुई उससे ये अक्षर बह निकले — "भूः, भुवः, स्वः"। उन्हें तपाया; तपाये हुए उनसे ओंकार बह निकला।
इस उपनिषद् अंश में स्पष्ट किया गया है कि प्रजापति के तप से पहले त्रयी विद्या (वेद) प्रकट हुई, फिर व्याहृतियाँ (भूः भुवः स्वः) और अंततः सबसे सूक्ष्म और अंतिम रूप में ओंकार प्रकट हुआ। यह क्रम दर्शाता है कि ओंकार वेदों का केवल आरम्भ नहीं, बल्कि उनका परिष्कृत और उच्चतम सार है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी सत्य को पुष्ट करती है कि समस्त वाङ्मय ओंकार में ही स्थित है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का मुख्य शब्द 'अभ्यसेत्' (अभ्यास करे) है। यहाँ अभ्यास का अर्थ केवल मन्त्र का उच्चारण करना नहीं है, बल्कि 'वाङ्मय' को 'प्रणव' में विलीन करने की प्रक्रिया है।
साधक जब इस श्लोक के अनुसार अभ्यास करता है, तो वह पहले स्थूल वाणी (वाङ्मय) से आरम्भ करता है, फिर धीरे-धीरे शब्दों के अर्थ को छोड़कर केवल नाद पर स्थिर होता है। वह अनुभव करता है कि जिस मन्त्र का वह जप कर रहा है, वह मन्त्र वास्तव में ओंकार का ही एक रूप है। इस अभ्यास से साधक 'विविधता' (अनेक मन्त्रों) से 'एकता' (एक ओंकार) की ओर बढ़ता है।
यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ उसे यह बोध होता है कि बाहरी जगत की समस्त ध्वनियाँ और आंतरिक मन के विचार, वास्तव में उसी एक अक्षर के स्पंदन हैं। जब साधक प्रणव का निरंतर अभ्यास करता है, तो उसकी वाणी शुद्ध होती है, मन एकाग्र होता है और वह उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ मन्त्र और मन्त्र-साधक के बीच का भेद समाप्त हो जाता है। यह 'वाङ्मय' से 'ब्रह्ममय' होने की यात्रा है।
प्रणवपर्यायाः
ओंकारः प्रणवस्तारस्त्र्यक्षरस्त्रिगुणः स्मृतः ।
उद्गीथश्च तथादित्यो हंसो नारायणो विभुः ॥ २.१५ ॥
ओंकार, प्रणव, तार, त्र्यक्षर, त्रिगुण, उद्गीथ तथा आदित्य, हंस, नारायण और विभु—ये सब (ओंकार के नाम) स्मृत हुए हैं। ...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि समस्त वाङ्मय प्रणव में ही स्थित है, इसलिए साधक को इसका निरंतर अभ्यास करना चाहिए। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस एक ही परम तत्त्व के विभिन्न नामों का परिचय दे रहे हैं, ताकि साधक उसकी व्यापकता और विविध आयामों को समझ सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओंकारः, प्रणवः, तारः, त्र्यक्षरः, त्रिगुणः (एव) स्मृतः । उद्गीथः च तथा (ओंकारः), आदित्यः, हंसः, नारायणः, विभुः (च स्मृताः) ।
पदार्थ:
• ओंकारः: 'ॐ' इति कारः। वह ध्वनि जो समस्त सृष्टि का मूल कारण है।
• प्रणवः: 'प्र' (प्रकृष्ट) + 'नु' (नमन/स्तुति)। वह श्रेष्ठ ध्वनि जिससे ईश्वर की स्तुति होती है और जो साधक को ऊपर उठाती है।
• तारः: तारण करने वाला। वह ध्वनि जो जन्म-मृत्यु के चक्र से पार उतार दे।
• त्र्यक्षरः: तीन अक्षरों (अ, उ, म) वाला।
• त्रिगुणः: तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) का समन्वित स्वरूप।
• उद्गीथः: 'उद्' (ऊपर) + 'गीथ' (गान)। वह उच्चतम गान जो प्राण के माध्यम से गाया जाता है।
• आदित्यः: सूर्य के समान प्रकाशमान और जगत को चैतन्य करने वाला।
• हंसः: वह जो विवेकपूर्ण है; जो शुद्ध और श्वेत है (परमात्मा का स्वरूप)।
• नारायणः: 'नार' (जल/मनुष्य) + 'अयन' (निवास)। समस्त जीवों के भीतर निवास करने वाला परम पुरुष।
• विभुः: सर्वव्यापी, जो किसी सीमा में बँधा नहीं है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ओंकार के उन पर्यायों का वर्णन कर रहे हैं, जो शास्त्रों में प्रचलित हैं। यहाँ केवल शब्दों की सूची नहीं है, अपितु एक ही सत्य को देखने के विभिन्न दृष्टिकोण हैं। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ओंकार 'प्रणव' है, तो वे उसकी स्तुति और उत्थान की शक्ति की ओर संकेत करते हैं। जब वे उसे 'तार' कहते हैं, तो वे उसकी मोक्षदायिनी शक्ति को रेखांकित करते हैं।
'त्र्यक्षर' और 'त्रिगुण' शब्दों के माध्यम से वे यह संकेत दे रहे हैं कि यह ध्वनि केवल एक अक्षर नहीं, अपितु त्रिपुटी (अ-उ-म) का योग है, जिसमें सृष्टि के तीनों गुण और तीनों अवस्थाएँ समाहित हैं। 'उद्गीथ' शब्द का प्रयोग विशेष रूप से सामवेद और यज्ञीय परंपरा की ओर संकेत करता है, जहाँ ओंकार को उच्चतम नाद माना गया है।
इसके पश्चात, महर्षि इसे 'आदित्य', 'हंस', 'नारायण' और 'विभु' के नाम से पुकारते हैं। यहाँ वे ओंकार को केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि एक जीवित पुरुष और सर्वव्यापी चेतना के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। आदित्य का अर्थ है वह प्रकाश जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है; हंस वह विवेक है जो नीर-क्षीर विवेक की भाँति सत्य और असत्य को अलग करता है; नारायण वह आधार है जिसमें संपूर्ण चराचर जगत स्थित है; और विभु वह विस्तार है जहाँ पहुँचकर साधक की लघुता समाप्त हो जाती है।
यह स्मृति यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि जिस ओंकार का जप हम करते हैं, वह वास्तव में उसी परमेश्वर का नाम है जो सूर्य के रूप में बाहर है और आत्मा के रूप में भीतर।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक के लिए 'नाम-संकेतों' के द्वार खोलता है। एक साधक जब अपनी साधना के विभिन्न सोपानों पर होता है, तो वह ओंकार के अलग-अलग रूपों का अनुभव करता है।
आरम्भ में, जब साधक केवल ध्वनि का अभ्यास करता है, तब उसके लिए यह 'त्र्यक्षर' और 'प्रणव' है। जब वह इस ध्वनि के माध्यम से अपने चित्त के विकारों को पार करने लगता है, तब वह इसे 'तार' के रूप में अनुभव करता है। जब उसकी साधना में प्राण का जागरण होता है और वह नाद-ब्रह्म को सुनता है, तब यह 'उद्गीथ' बन जाता है।
जैसे-जैसे साधक की भूमि ऊँची होती है, वह ओंकार को केवल ध्वनि नहीं, बल्कि प्रकाश (आदित्य), शुद्ध विवेक (हंस) और अंततः सर्वव्यापी चेतना (विभु) के रूप में अनुभव करने लगता है। इस प्रकार, ये दस नाम साधक की चेतना के दस अलग-अलग स्तरों या द्वारों की तरह हैं। साधक प्रत्येक नाम के भाव में प्रवेश करके अपनी अनुभूति को सूक्ष्म से सूक्ष्मतर की ओर ले जाता है। अभ्यास यह है कि जप के समय केवल शब्द का उच्चारण न हो, बल्कि उस नाम के पीछे छिपे हुए अर्थ (जैसे—'मैं उस विभु का स्मरण कर रहा हूँ जो सर्वव्यापी है') का अनुभव हृदय में जागृत हो।
सूर्यस्यान्तर्गतं सूक्ष्मं विष्णुं दिव्यं निरञ्जनम् ।
पर्यायैश्च तथा चान्यैः शास्त्रेभ्यः संप्रगीयते ॥ २.१६ ॥
सूर्य के अन्तर्गत सूक्ष्म, दिव्य और निरञ्जन विष्णु (के रूप में भी इसे) तथा अन्य पर्यायों से भी शास्त्रों में गाया जाता है। ...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के उन नामों का परिचय दिया जो उसकी व्यापकता और स्वरूप को दर्शाते हैं। अब इस श्लोक में वे ओंकार के उस स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं जो स्थूल सूर्य के भीतर स्थित सूक्ष्म चैतन्य पुरुष है, जिससे साधक की दृष्टि बाहरी जगत से हटकर अंतर्जगत की ओर मुड़ती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) सूर्यस्य अन्तर्गतं सूक्ष्मं दिव्यं निरञ्जनं विष्णुं (इति च), तथा च अन्यैः पर्यायैः शास्त्रेभ्यः संप्रगीयते ।
पदार्थ:
• सूर्यस्य अन्तर्गतं: सूर्य के भीतर स्थित। यहाँ 'सूर्य' के दो अर्थ हैं—बाह्य आकाश का भौतिक सूर्य और हृदय-आकाश का आंतरिक सूर्य।
• सूक्ष्मं: जो इन्द्रियों और स्थूल बुद्धि से परे है; जो केवल प्रज्ञा से अनुभूत होता है।
• दिव्यं: प्रकाशमय, अलौकिक और देह-बंधनों से मुक्त।
• निरञ्जनम्: 'अञ्जन' (मैल या दोष) से रहित। जो माया, आसक्ति और अविद्या के दोषों से सर्वथा मुक्त है।
• विष्णुं: सर्वव्यापी। वह जो कण-कण में व्याप्त है और जो संपूर्ण जगत का आधार है।
• पर्यायैः: समान अर्थ वाले अन्य नामों से।
• संप्रगीयते: शास्त्र-परम्परा में गाया जाता है या प्रतिष्ठित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ओंकार के उस रहस्य को खोल रहे हैं जिसे वे 'सूर्य के भीतर का विष्णु' कहते हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने ओंकार को 'आदित्य' कहा था, यहाँ वे स्पष्ट कर रहे हैं कि वह आदित्य केवल एक नाम नहीं, अपितु एक स्थिति है।
जब वे कहते हैं कि ओंकार 'सूर्य के अन्तर्गत सूक्ष्म, दिव्य और निरञ्जन विष्णु' है, तो वे साधक को एक महान सत्य की ओर ले जा रहे हैं—कि जिस प्रकाश को हम बाहर सूर्य में देखते हैं, वही प्रकाश सूक्ष्म रूप में हमारे भीतर भी विद्यमान है। शास्त्रों में विष्णु का अर्थ केवल एक विशिष्ट देवता नहीं, अपितु वह 'विष्णु-तत्त्व' है जो सर्वव्यापी है। ओंकार वही सर्वव्यापी विष्णु है जो सूक्ष्म रूप में सूर्य-मण्डल (हृदय-कमल) के भीतर स्थित है।
यहाँ 'निरञ्जन' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। संसार की हर वस्तु किसी न किसी गुण या दोष (अञ्जन) से लिपटी है, किन्तु ओंकार का जो स्वरूप सूर्य के भीतर स्थित है, वह समस्त द्वंद्वों और अशुद्धियों से परे है। इस प्रकार, ओंकार को विष्णु कहना यह दर्शाता है कि यह ध्वनि केवल एक अक्षर नहीं, बल्कि उस परम पुरुष का नाद-स्वरूप है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड का पालन करता है। शास्त्रों में इसे अन्य अनेक पर्यायों से गाया गया है, क्योंकि एक ही अनंत तत्त्व को अलग-अलग अवस्थाओं में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ १.६.६ ॥
और जो यह आदित्यके भीतर सुवर्णमय पुरुष दिखायी देता है — सुनहरी दाढ़ी, सुनहरे केश, नखोंके सिरेतक सब-का-सब सुवर्ण ही।
यह छान्दोग्य उपनिषद् का अंश इस स्मृति के वचन की पुष्टि करता है। जहाँ उपनिषद् आदित्य के भीतर 'हिरण्मय पुरुष' (सुवर्णमय पुरुष) के दर्शन कराता है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति उस हिरण्मय पुरुष को 'सूक्ष्म, दिव्य और निरञ्जन विष्णु' के रूप में परिभाषित करती है। दोनों ही शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि सूर्य केवल एक भौतिक पिंड नहीं, बल्कि उस परम चैतन्य का निवास स्थान है। स्मृति यहाँ उस दर्शन को 'ओंकार' के साथ जोड़कर उसे साधना का आधार बना देती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'बाह्य' से 'आन्तर' की यात्रा का सूत्र है। योगिक अभ्यास में साधक पहले बाहरी सूर्य के प्रकाश का ध्यान करता है, फिर धीरे-धीरे अपनी चेतना को हृदय-आकाश (आन्तरिक सूर्य) में ले जाता है।
जब साधक ओंकार का जप करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं कर रहा, बल्कि वह उस 'सूक्ष्म विष्णु' को पुकार रहा है जो उसके अपने हृदय-सूर्य में स्थित है। इस अभ्यास से साधक की दृष्टि 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर बढ़ती है।
अभ्यास की विधि यह है कि ओंकार के उच्चारण के समय मन को सूर्य के प्रकाशमय स्वरूप में स्थिर किया जाए और यह भाव रखा जाए कि यह प्रकाश मेरे भीतर के विष्णु-तत्त्व का ही विस्तार है। इस अनुभव से साधक 'अविद्या के अंधकार' से निकलकर 'दिव्य प्रकाश' की भूमि में प्रवेश करता है। यहाँ ओंकार वह सेतु है जो साधक को भौतिक सूर्य से जोड़कर अंततः उसे उस निरञ्जन विष्णु (परमात्मा) में लीन कर देता है।
ओंकारसञ्ज्ञं त्रिगुणं त्र्यक्षरं च त्रिदैवतम् ।
त्रिब्रह्म त्रिरवस्थानं त्रैकाल्यं त्रिप्रतिष्ठितम् ॥ २.१७ ॥
ओंकार नाम वाला त्रिगुण, त्र्यक्षर और त्रिदैवत है; वह त्रिब्रह्म, तीन स्थानोंवाला, त्रैकाल्य और तीन में प्रतिष्ठित है। ...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ओंकार के उन पर्यायों का वर्णन था जो उसकी सर्वव्यापकता और दिव्य स्वरूप को दर्शाते हैं। अब महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस 'त्रिक' स्वरूप का परिचय दे रहे हैं, जिसके माध्यम से साधक सृष्टि की त्रिविध संरचना को समझकर उस एक मूल तत्त्व में लीन हो सकता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) ओंकारसञ्ज्ञः त्रिगुणः, त्र्यक्षरं च, त्रिदैवतं (च), त्रिब्रह्म (च), त्रिरवस्थानं, त्रैकाल्यं (च), त्रिप्रतिष्ठितं (च अस्ति) ।
पदार्थ:
• ओंकारसञ्ज्ञः: ओंकार नाम वाला। यहाँ 'सञ्ज्ञ' केवल नाम नहीं, अपितु उस तत्त्व की पहचान है।
• त्रिगुणः: तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) का समुच्चय या उनसे परे।
• त्र्यक्षरं: तीन अक्षरों (अ, उ, म) से निर्मित।
• त्रिदैवतम्: तीन देवों (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र) के रूप में प्रतिष्ठित।
• त्रिब्रह्म: तीन वेदों (ऋक्, यजुः, साम) का सार या मूल।
• त्रिरवस्थानं: तीन स्थानों (भूमि, अन्तरिक्ष, द्यौ) में व्याप्त।
• त्रैकाल्यं: तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) का अधिपति या उनसे अतीत।
• त्रिप्रतिष्ठितम्: तीन आधारों या श्रेणियों में प्रतिष्ठित।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ओंकार के 'त्रिक' स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं। यह श्लोक एक सूचकांक की भाँति है, जो आने वाले श्लोकों (२.१९ से २.२५) में विस्तार से समझाए जाने वाले रहस्यों की नींव रखता है।
यहाँ ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड और मानवीय अनुभव 'तीन' की संख्या में बँटा हुआ प्रतीत होता है—चाहे वह प्रकृति के गुण हों, भाषा के अक्षर हों, देवताओं का त्रय हो या समय का चक्र। किंतु, यह 'तीन' कोई विभाजन नहीं, अपितु एक ही ओंकार के तीन आयाम हैं। जब वे ओंकार को 'त्रिगुण', 'त्र्यक्षर' और 'त्रिदैवत' कहते हैं, तो वे साधक को यह संकेत दे रहे हैं कि जिसे हम विविधता समझ रहे हैं, वह वास्तव में एक ही अखंड सत्ता का विवर्तन है।
'त्रिब्रह्म' कहने का भाव यह है कि वेद चाहे कोई भी हो, उसकी अंतिम परिणति प्रणव में ही होती है। 'त्रिरवस्थान' और 'त्रैकाल्य' के माध्यम से वे यह बता रहे हैं कि ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि वह स्थान और काल का स्वामी है। जो 'त्रिप्रतिष्ठित' है, वह इन तीनों श्रेणियों में रहकर भी उनसे अलिप्त है।
यह श्लोक हमें विधि से यह समझाता है कि साधना की यात्रा स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है। पहले साधक तीन गुणों को देखता है, फिर तीन अक्षरों का जप करता है, फिर तीन देवों का ध्यान करता है, और अंततः उस एक 'अमात्र' ओंकार में स्थित हो जाता है जो इन तीनों के योग का फल है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ॥ १ ॥
'ॐ' यह अक्षर ही यह सब है। उसकी व्याख्या: जो हुआ, जो है, जो होगा — सब ओंकार ही है; और जो तीनों कालोंसे परे है, वह भी ओंकार ही है।
यह माण्डूक्य उपनिषद् का कथन कि 'जो हुआ, जो है, जो होगा—सब ओंकार ही है' और जो इन तीनों कालों से परे है वह भी ओंकार है, इस स्मृति के 'त्रैकाल्य' शब्द की पूर्ण पुष्टि करता है। स्मृति यहाँ ओंकार को केवल कालों का समूह नहीं, अपितु उनका अधिष्ठान मानती है। जहाँ उपनिषद् इसे दार्शनिक व्याख्या देता है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसे साधक के अभ्यास के लिए एक श्रेणीबद्ध मार्ग के रूप में प्रस्तुत करती है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'एकत्व' की प्राप्ति का सूत्र है। साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह अपने जीवन में जहाँ भी 'तीन' का अनुभव करे—जैसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति; या सत्त्व, रज और तम—वहाँ वह यह अनुभव करे कि ये तीनों पृथक नहीं हैं, बल्कि एक ही ओंकार की अभिव्यक्तियाँ हैं।
साधक जब 'त्र्यक्षर' (अ-उ-म) का जप करता है, तो वह वास्तव में इन तीनों गुणों और अवस्थाओं को समेटकर एक बिंदु पर लाने का प्रयास करता है। यहाँ रहस्य यह है कि 'तीन' का ज्ञान केवल इसलिए दिया गया है ताकि साधक उन तीनों को पार कर सके। जब तक साधक त्रिगुणों के बंधन में है, वह संसार में है; जैसे ही वह इन तीनों को 'ओंकार' के रूप में पहचान लेता है, वह त्रिगुणों से ऊपर उठकर 'गुणातीत' होने की भूमि की ओर अग्रसर होता है। इस श्लोक का अभ्यास साधक को इस बोध तक ले जाता है कि समस्त त्रिविध जगत वास्तव में एक ही चैतन्य का विस्तार है।
त्रिप्रज्ञं च त्रिधामं च त्रिरवस्थं त्रिलिङ्गकम् ।
त्रिधातुकं समुद्दिष्टं सर्वगं परमेश्वरम् ॥ २.१८ ॥
(वह) त्रिप्रज्ञ, त्रिधाम, तीन अवस्थाओंवाला, तीन लिङ्गोंवाला और त्रिधातुक कहा गया है — सर्वव्यापी परमेश्वर।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ओंकार के त्रिक स्वरूप की प्रथम श्रेणी (त्रिगुण, त्र्यक्षर, त्रिदैवत आदि) का परिचय दिया गया था। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य अब उन सूक्ष्म पर्यायों को उद्घाटित कर रहे हैं, जो ओंकार को केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु संपूर्ण अस्तित्व के अधिपति 'परमेश्वर' के रूप में सिद्ध करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः ओंकारः) त्रिप्रज्ञं च, त्रिधामं च, त्रिरवस्थं (च), त्रिलिङ्गकम् (च), त्रिधातुकं (च) समुद्दिष्टं (अस्ति) — (सः एव) सर्वगं परमेश्वरम् ।
पदार्थ:
• त्रिप्रज्ञं: तीन प्रकार की प्रज्ञा (चेतना) का आधार।
• त्रिधामं: तीन लोकों या आश्रयों (धामों) में व्याप्त।
• त्रिरवस्थं: तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) का मूल।
• त्रिलिङ्गकम्: तीन लिङ्गों (प्रकट लक्षणों या श्रेणियों) वाला।
• त्रिधातुकं: तीन धातुओं (अस्थि-मज्जा आदि स्थूल धातु या सत्त्व-रज-तम सूक्ष्म धातु) का आधार।
• समुद्दिष्टं: स्पष्ट रूप से कहा गया या निर्देश किया गया।
• सर्वगं: सर्वव्यापी; जो सबमें व्याप्त है और सब कुछ जिसमें व्याप्त है।
• परमेश्वरम्: वह सर्वोच्च सत्ता जो समस्त प्रज्ञओं, धामों और अवस्थाओं का नियंत्रण करती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार के उन स्वरूपों की सूची दे रहे हैं, जो साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाते हैं। यह श्लोक पिछले श्लोक (२.१७) का ही विस्तार है, जहाँ 'त्रिक' की चर्चा आरम्भ हुई थी। यहाँ 'समुद्दिष्टं' शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि ये परिभाषाएँ केवल कल्पना नहीं, अपितु शास्त्र-प्रमाणित निर्देश हैं।
ऋषि कहते हैं कि वह ओंकार 'त्रिप्रज्ञ' है। प्रज्ञा का अर्थ है बोध। जब साधक ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह तीन स्तरों के बोध से गुजरता है—बाह्य जगत का बोध, अन्तरिक मानसिक बोध और अंततः वह बोध जहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिट जाता है। इसी प्रकार 'त्रिधाम' होने का अर्थ है कि वह ओंकार केवल आकाश में नहीं, अपितु पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ—इन तीनों धामों का सार है।
'त्रिरवस्थ' और 'त्रिलिङ्ग' के माध्यम से याज्ञवल्क्य जी यह संकेत दे रहे हैं कि मनुष्य की जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाएँ वास्तव में ओंकार की ही तीन मात्राओं के प्रतिबिंब हैं। 'त्रिधातुक' होने का अर्थ है कि वह शरीर के स्थूल तत्वों से लेकर सूक्ष्म प्राण-तत्त्वों तक, सबमें व्याप्त है।
श्लोक का समापन 'सर्वगं परमेश्वरम्' शब्दों से होता है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ऊपर गिनाए गए सभी 'त्रिक' (तीन-तीन के समूह) वास्तव में उस एक 'परमेश्वर' के ही विभिन्न आयाम हैं। ओंकार वह सेतु है जो साधक को 'तीन' के द्वैत से निकालकर 'एक' की अद्वैत स्थिति में प्रतिष्ठित करता है। यह श्लोक एक संकेत-सूची है; इन पदों का विस्तृत विवरण आने वाले श्लोकों (२.१९ से २.२५) में दिया जाएगा।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक के लिए एक 'मानचित्र' की भाँति है। साधक जब ओंकार का जप या ध्यान करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं कर रहा होता, बल्कि वह अपनी चेतना को इन पाँच श्रेणियों में विस्तारित करता है:
१. प्रज्ञा का विस्तार: अपनी बुद्धि को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाना।
२. धाम का अनुभव: स्वयं को केवल शरीर तक सीमित न मानकर, संपूर्ण ब्रह्मांड (त्रिधाम) के साथ एकाकार करना।
३. अवस्थाओं का साक्षी होना: जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं के बीच उस एक अविचल तत्व (ओंकार) को खोजना।
४. लिङ्गों का बोध: प्रकृति के प्रकट लक्षणों को पहचानकर उनके मूल कारण तक पहुँचना।
५. धातुओं का शोधन: शरीर की भौतिकता (धातु) से ऊपर उठकर चैतन्य स्वरूप होना।
साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि वह जिस 'परमेश्वर' को बाहर खोज रहा है, वह वास्तव में ओंकार के रूप में उसकी अपनी ही चेतना की तीन परतों (त्रिप्रज्ञ, त्रिरवस्थ आदि) में छिपा हुआ है। यह अभ्यास साधक को 'विविधता' से 'एकत्व' की भूमि की ओर ले जाता है।
प्रणवविविधनामनिरुक्तिः
सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रिगुणस्तेन स स्मृतः ।
अकारश्चाप्युकारश्च मकारश्चाक्षरत्रयम् ॥ २.१९ ॥
सत्त्व, रजस् और तमस्—इन तीनों गुणों से वह त्रिगुण कहा गया है; अकार, उकार और मकार—ये तीन अक्षर हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ओंकार के उन व्यापक स्वरूपों का वर्णन था जो उसे 'सर्वग परमेश्वर' सिद्ध करते हैं। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस 'त्रिक' (तीन के समूह) के सूक्ष्म विश्लेषण की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि ओंकार के 'त्रिगुण' और 'त्र्यक्षर' होने का वास्तविक अर्थ क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः ओंकारः) सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रिगुणः (अस्ति), तेन (त्रिगुणेन) सः स्मृतः । अकारश्चापि उकारश्च मकारश्च (च) अक्षरत्रयम् (अस्ति) ।
पदार्थ:
• सत्त्वं रजस्तमश्चैव: सत्त्व, रजस् और तमस्—प्रकृति के तीन मूल गुण।
• त्रिगुणः: इन तीनों गुणों का समुच्चय या इन तीनों गुणों का अधिष्ठान।
• तेन स स्मृतः: उन (तीनों गुणों) के कारण ही वह (ओंकार) 'त्रिगुण' के नाम से जाना गया है।
• अकारः, उकारः, मकारः: प्रणव की तीन ध्वनियाँ या मात्राएँ।
• अक्षरत्रयम्: तीन अक्षरों का समूह।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार के दो प्रमुख आयामों—'गुण' और 'अक्षर'—के मध्य सम्बन्ध स्थापित कर रहे हैं। यह श्लोक पिछले श्लोकों (२.१५ और २.१७) में प्रयुक्त 'त्रिगुण' और 'त्र्यक्षर' शब्दों की व्याख्या है।
ऋषि कहते हैं कि ओंकार 'त्रिगुण' है। यहाँ त्रिगुण का अर्थ केवल तीन गुणों का होना नहीं, अपितु प्रकृति के तीन मूलभूत प्रवृत्तियों—सत्त्व (प्रकाश, सुख, ज्ञान), रजस् (क्रिया, वेग, राग) और तमस् (जड़ता, अंधकार, निद्रा)—का मूल स्रोत होना है। यह रहस्य है कि जो परमात्मा निर्गुण है, वही जब इस सृष्टि के रूप में अभिव्यक्त होता है, तो वह इन तीन गुणों के माध्यम से कार्य करता है। चूँकि ओंकार संपूर्ण ब्रह्मांड का बीज है, इसलिए इसमें ये तीनों गुण अंतर्निहित हैं। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में इन तीनों गुणों के स्वामी को पुकारता है, जिससे उसके अपने भीतर के गुण संतुलित होने लगते हैं।
तत्पश्चात, ऋषि ओंकार के स्थूल स्वरूप 'अक्षरत्रय' का निर्देश करते हैं। ओंकार केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु तीन अक्षरों—'अ', 'उ' और 'म'—का योग है। यह 'अक्षरत्रय' केवल व्याकरणिक वर्ण नहीं हैं, बल्कि वे सृष्टि के विकास और लय के प्रतीक हैं। 'अ' से आरम्भ, 'उ' से विस्तार और 'म' में विलीनीकरण। इस प्रकार, बाहरी ध्वनि (अक्षर) और आन्तरिक तत्त्व (गुण) एक ही सत्य के दो पहलू हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीति च ॥ २.७६ ॥
प्रजापतिने तीनों वेदोंसे अकार, उकार और मकार को, तथा "भूः, भुवः, स्वः" को दुहकर निकाला।
मनुस्मृति में कहा गया है कि प्रजापति ने तीनों वेदों से अकार, उकार और मकार तथा 'भूः, भुवः, स्वः' को दुहकर निकाला। यह बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक की पुष्टि करता है कि ओंकार के ये तीन अक्षर कोई आकस्मिक ध्वनि नहीं, अपितु वेदों के सार से निकले हुए दिव्य बीज हैं। जहाँ मनुस्मृति इनके उद्गम (प्रजापति और वेद) पर बल देती है, वहीं यह स्मृति इनके स्वरूप (गुण और अक्षर) के विश्लेषण पर बल देती है, ताकि साधक इन्हें अनुभव कर सके।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'गुण-अतीत' होने की यात्रा का मार्ग दिखाता है। साधक जब 'अ' का उच्चारण करता है, तो वह सत्त्व गुण के प्रकाश को जाग्रत करता है; 'उ' के समय रजस् की सक्रियता का अनुभव करता है और 'म' के समय तमस् के विलीनीकरण या गहन शांति का अनुभव करता है।
अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि उसके भीतर के सत्त्व, रज और तम—ये तीनों पृथक नहीं हैं, बल्कि ओंकार रूपी एक ही सत्ता के विभिन्न आयाम हैं। जब वह इन तीनों अक्षरों का लयबद्ध जप करता है, तो वह गुणों के स्रोत (त्रिगुण) को पुकारता है। इस अभ्यास से साधक की चेतना गुणों के द्वंद्व से ऊपर उठकर उस 'अमात्र' स्थिति की ओर बढ़ती है, जहाँ गुण केवल उपकरण रह जाते हैं और साधक स्वयं शुद्ध चैतन्य में स्थित हो जाता है। यह अभ्यास साधक को प्रकृति के बंधन से मुक्त कर पुरुष (परमात्मा) के समीप ले जाने वाला है।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रिदैवत्य उदाहृतः ।
अग्निवायुरविभ्यश्च त्रिमात्र इति संज्ञितः ॥ २.२० ॥
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—इन तीनों से "त्रिदैवत" कहा गया है; अग्नि, वायु और रवि से वह "त्रिमात्र" नाम से संज्ञित है।…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'त्रिगुण' (सत्त्व, रज, तम) और 'त्र्यक्षर' (अ, उ, म) स्वरूप को स्पष्ट किया था। अब वे ओंकार के उन नामों की व्याख्या कर रहे हैं जो उसे स्थूल जगत के देवताओं और तत्वों से जोड़ते हैं, ताकि साधक बाहरी जगत के देवताओं को अपने भीतर की ध्वनियों में स्थित कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः ओंकारः) ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च (इति) त्रिदैवत्य (इति) उदाहृतः । अग्निवायुरविभ्यश्च (इति) त्रिमात्र इति संज्ञितः ।
पदार्थ:
• ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च: सृष्टि, स्थिति और लय के अधिष्ठाता—ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र।
• त्रिदैवत्य: तीन देवताओं का समूह; यहाँ ओंकार के उन तीन आयामों का संकेत है जो इन तीन मुख्य देवताओं के रूप में अभिव्यक्त होते हैं।
• उदाहृतः: कहा गया है या उल्लेख किया गया है।
• अग्निवायुरविभ्यश्च: अग्नि, वायु और रवि (विभ्यति अर्थात् जो दीप्तिमान है, सूर्य)।
• त्रिमात्र: तीन मात्राओं वाला; यहाँ मात्रा का अर्थ केवल ध्वनि की इकाई नहीं, अपितु वह 'माप' या 'तत्व' है जिससे सृष्टि का विस्तार हुआ है।
• संज्ञितः: नाम दिया गया है या संज्ञा दी गई है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ओंकार के 'त्रिदैवत' और 'त्रिमात्र' होने के रहस्य को खोल रहे हैं। यह श्लोक पिछले श्लोकों (२.१७ और २.१८) में आए शब्दों की विस्तृत व्याख्या है।
प्रथम चरण में ऋषि कहते हैं कि ओंकार 'त्रिदैवत' है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—ये केवल तीन पृथक देवता नहीं हैं, अपितु एक ही ब्रह्म की तीन क्रियाएँ हैं: सृजन, पालन और संहार। जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह अनजाने में ही इन तीनों दैवीय शक्तियों को जाग्रत करता है। 'अ' में सृजन (ब्रह्मा), 'उ' में पोषण (विष्णु) और 'म' में लय (रुद्र) की शक्ति निहित है। इस प्रकार, ओंकार का जप वास्तव में संपूर्ण ब्रह्मांडीय शासन के साथ एकाकार होना है।
द्वितीय चरण में ओंकार को 'त्रिमात्र' कहा गया है, जिसके आधार अग्नि, वायु और रवि (सूर्य) हैं। यहाँ 'मात्रा' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः मात्रा ध्वनि की अवधि होती है, किन्तु योगिक दृष्टि से मात्रा वह 'तत्व' है जो चेतना को एक स्तर से दूसरे स्तर पर ले जाता है। अग्नि, वायु और रवि—ये तीनों प्रकाश और ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं। अग्नि पृथ्वी का प्रकाश है, वायु अन्तरिक्ष की गति है और रवि द्युलोक का तेज है। ओंकार की तीन मात्राओं के माध्यम से साधक अपनी चेतना को पृथ्वी (अग्नि) से उठाकर अन्तरिक्ष (वायु) और फिर द्युलोक (रवि) तक ले जाता है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं, अपितु चेतना का ऊर्ध्वगमन है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषां तप्यमानानां रसान्प्रावृहदग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ ४.१७.१ ॥
प्रजापतिने लोकोंको तपाया; तपते हुए उनके रस निकाले — पृथिवीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु, द्युलोकसे आदित्य।
इस छान्दोग्य उपनिषद् के अंश में प्रजापति द्वारा लोकों को तपाकर उनके रस निकालने की बात कही गई है—पृथ्वी से अग्नि, अन्तरिक्ष से वायु और द्युलोक से आदित्य। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी वैदिक सत्य का विस्तार है। जहाँ उपनिषद् यह बता रहा है कि इन तत्वों का उद्भव कैसे हुआ, वहीं यह स्मृति बता रही है कि इन तत्वों (अग्नि-वायु-रवि) को ओंकार की 'मात्राओं' के रूप में कैसे साधा जाए। उपनिषद् का 'रस' यहाँ स्मृति की 'मात्रा' बन गया है, जो साधक के लिए साधना का साधन है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'ध्वनि-तत्व-देवता' के समन्वय का अभ्यास है। जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं बोल रहा, बल्कि वह अपने भीतर के तत्वों को क्रमबद्ध कर रहा है।
अभ्यास की विधि यह है कि 'अ' का उच्चारण करते समय साधक उसे 'अग्नि' के तेज और ब्रह्मा की सृजन शक्ति से जोड़े; 'उ' के समय उसे 'वायु' की गति और विष्णु के पालन-भाव से जोड़े; और 'म' के समय उसे 'रवि' (सूर्य) के प्रकाश और रुद्र की लय-शक्ति से जोड़े।
इस अभ्यास से साधक अनुभव करता है कि वह स्थूल पृथ्वी (अग्नि) से उठकर सूक्ष्म अन्तरिक्ष (वायु) और फिर परम ज्योति (रवि/सूर्य) की ओर बढ़ रहा है। यह 'त्रिमात्र' साधना साधक को जाग्रत अवस्था से स्वप्न और फिर सुषुप्ति की गहराई तक ले जाती है, जहाँ वह अंततः उन तीनों देवताओं (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र) के मूल स्रोत—परब्रह्म—में विलीन होने की तैयारी करता है। इस प्रकार, वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा करता है।
ऋग्यजुश्च तथा साम त्रिब्रह्म इति संज्ञितः ।
भूर्भुवः स्वस्त्र्यवस्थानं हृत्कण्ठं तालुकेति च ॥ २.२१ ॥
…ऋक्, यजुः और साम—इन तीनों से "त्रिब्रह्म" नाम से संज्ञित है; भूः, भुवः और स्वः—ये तीन अवस्थाएँ हैं, तथा हृदय, कण्ठ और तालु भी (तीन अवस्थाएँ) हैं।…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'त्रिदैवत' और 'त्रिमात्र' स्वरूप की व्याख्या करते हुए उसे ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र तथा अग्नि-वायु-रवि से जोड़ा था। अब वे ओंकार के 'त्रिब्रह्म' और 'त्र्यवस्थान' होने के रहस्य को स्पष्ट कर रहे हैं, जिससे यह ज्ञात हो कि वेद, लोक और शरीर—तीनों एक ही चेतना के विभिन्न स्तर हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः ओंकारः) ऋग्यजुश्च तथा साम (इति) त्रिब्रह्म इति संज्ञितः । भूः भुवः स्वः (इति) त्र्यवस्थानं (अस्ति), (तथा) हृत् कण्ठं तालुकेति च (त्र्यवस्थानं अस्ति) ।
पदार्थ:
• ऋग्यजुश्च तथा साम: ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद।
• त्रिब्रह्म: तीन वेदों का समूह; यहाँ 'ब्रह्म' का अर्थ केवल ग्रंथ नहीं, अपितु वह दिव्य ज्ञान (विद्या) है जो ओंकार के माध्यम से अभिव्यक्त होता है।
• संज्ञितः: नाम दिया गया है।
• भूर्भुवः स्वः: पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक के प्रतीक व्याहृतियाँ।
• त्र्यवस्थानं: तीन अवस्थाएँ या तीन स्थान।
• हृत् कण्ठं तालुकेति: हृदय, कण्ठ और तालु—शरीर के वे तीन मुख्य स्थान जहाँ से ओंकार की तीन मात्राओं का उद्भव और गमन होता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप को प्रकट कर रहे हैं जो ज्ञान (वेद), ब्रह्मांड (लोक) और शरीर (अंग) को एक सूत्र में पिरोता है।
प्रथम चरण में ऋषि कहते हैं कि ओंकार 'त्रिब्रह्म' है। ऋक्, यजुः और साम—ये केवल तीन अलग-अलग वेद नहीं हैं, अपितु एक ही परम सत्य के तीन आयाम हैं। ऋक् ज्ञान का, यजुः कर्म का और साम उपासना का प्रतिनिधित्व करता है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में त्रयी विद्या के सार का अनुभव करता है। भाव यह है कि संपूर्ण वैदिक ज्ञान अंततः उसी एक प्रणव में सिमटा हुआ है; इसलिए ओंकार का ज्ञान ही तीनों वेदों का ज्ञान है।
द्वितीय चरण में ओंकार को 'त्र्यवस्थान' कहा गया है। इसके दो अर्थ दिए गए हैं—एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। स्थूल अर्थ में 'भूः, भुवः, स्वः' तीन लोक हैं। पृथ्वी (भूः), अन्तरिक्ष (भुवः) और स्वर्ग (स्वः) के ये प्रतीक वास्तव में चेतना के विस्तार के तीन स्तर हैं।
परंतु, याज्ञवल्क्य यहाँ केवल बाहरी भूगोल की बात नहीं कर रहे। वे तुरंत इसे शरीर के भीतर ले आते हैं: 'हृत्, कण्ठं, तालुकेति'। यहाँ रहस्य यह है कि जो ब्रह्मांड में तीन लोक हैं, वही साधक के शरीर में तीन स्थानों के रूप में विद्यमान हैं। ओंकार की पहली मात्रा 'अ' हृदय से उठती है (भूः), दूसरी मात्रा 'उ' कण्ठ में गूँजती है (भुवः) और तीसरी मात्रा 'म' तालु और ओष्ठों तक पहुँचकर लय होती है (स्वः)। इस प्रकार, जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह अपने शरीर के भीतर ही संपूर्ण ब्रह्मांड की यात्रा करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २.२३.२ ॥
प्रजापतिने लोकोंको तपाया; तपे हुए उनसे त्रयी विद्या बह निकली; उसे तपाया, तो तपी हुई उससे ये अक्षर बह निकले — भूः, भुवः, स्वः।
इस अंश में छान्दोग्य उपनिषद् स्पष्ट करता है कि प्रजापति के तप से पहले त्रयी विद्या (ऋक्, यजुः, साम) प्रकट हुई और फिर उस त्रयी से 'भूः, भुवः, स्वः' अक्षर निकले। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी क्रम को पुष्ट करती है। जहाँ उपनिषद् सृष्टि के अवतरण क्रम (तप → त्रयी → व्याहृतियाँ) को बताता है, वहीं यह स्मृति साधक के आरोहण क्रम को दिखाती है कि कैसे वह शरीर के अंगों (हृदय-कण्ठ-तालु) के माध्यम से व्याहृतियों और अंततः त्रयी विद्या के मूल 'ओंकार' तक पहुँच सकता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि-योग' का आधार है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक ओंकार का उच्चारण करते समय अपना ध्यान केवल शब्दों पर न रखे, बल्कि ध्वनि के गमन के मार्ग का अनुभव करे।
जब वह 'अ' का उच्चारण करे, तो अनुभव करे कि ध्वनि हृदय के गहरे आकाश से उठ रही है—यह उसकी 'भूः' अवस्था है, जहाँ वह अपने अस्तित्व की नींव को पहचानता है। जब ध्वनि 'उ' में परिवर्तित होकर कण्ठ तक आए, तो वह अनुभव करे कि वह अन्तरिक्ष (भुवः) में विस्तार कर रहा है, जहाँ मन और प्राण का मिलन होता है। अंततः जब ध्वनि 'म' के रूप में तालु और ओष्ठों पर स्थित होकर शांत हो, तो वह उसे 'स्वः' (द्युलोक) के समान प्रकाशमय अनुभव करे।
इस अभ्यास से साधक यह अनुभव करता है कि उसका शरीर ही एक छोटा ब्रह्मांड है। हृदय, कण्ठ और तालु केवल शारीरिक अंग नहीं, बल्कि चेतना के तीन द्वार हैं। इस प्रकार वह स्थूल शरीर से सूक्ष्म प्राण और फिर सूक्ष्म प्राण से अक्षर-ब्रह्म की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास उसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं से ऊपर उठाकर उस तुरीय अवस्था की ओर ले जाता है, जिसका संकेत अगले श्लोकों में मिलेगा।
तुर्ये प्राणे तथाऽऽदित्ये त्रिषु चैव प्रतिष्ठितम् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च त्रैकाल्यं तेन चोच्यते ॥ २.२२ ॥
तुरीय, प्राण और आदित्य—इन तीनों में प्रतिष्ठित होने के कारण वह "त्रिप्रतिष्ठित" है; भूत, वर्तमान और भविष्य—इन तीनों कालों से वह "त्रैकाल्य" कहा जाता है।…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'त्रिब्रह्म' और 'त्र्यवस्थान' स्वरूप की व्याख्या करते हुए उसे वेदों, लोकों और शरीर के अंगों से जोड़ा था। अब वे ओंकार के 'त्रिप्रतिष्ठित' और 'त्रैकाल्य' होने के रहस्य को स्पष्ट कर रहे हैं, जिससे साधक यह जान सके कि यह अक्षर केवल ध्वनि नहीं, अपितु समस्त काल और चेतना का आधार है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः ओंकारः) तुर्ये प्राणे तथाऽऽदित्ये (इति) त्रिषु चैव प्रतिष्ठितम् (अस्ति) । भूतं भव्यं भविष्यं च (इति) त्रैकाल्यं (अस्ति), तेन (ओंकारेण) च उच्यते ।
पदार्थ:
• तुर्ये: वह चौथी अवस्था या चेतना, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे है।
• प्राणे: यहाँ प्राण का अर्थ केवल श्वास नहीं, अपितु वह प्राण-शक्ति है जो संपूर्ण शरीर और ब्रह्मांड को संचालित करती है।
• आदित्ये: सूर्य, जो बाह्य जगत का प्रकाशक है और अंतःकरण में 'हृदय-सूर्य' के रूप में स्थित है।
• प्रतिष्ठितम्: स्थित होना या आधार होना।
• भूतं: जो बीत चुका है (अतीत)।
• भव्यं: जो वर्तमान में घटित हो रहा है (वर्तमान)।
• भविष्यं: जो आने वाला है (भविष्य)।
• त्रैकाल्यं: तीनों कालों का समूह या तीनों कालों में व्याप्त।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ओंकार के उस विराट स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जहाँ वह समय और चेतना की सीमाओं को लाँघ जाता है।
प्रथम चरण में ऋषि कहते हैं कि ओंकार 'त्रिप्रतिष्ठित' है, अर्थात् वह तीन महान शक्तियों में प्रतिष्ठित है—तुरीय, प्राण और आदित्य। यहाँ 'प्रतिष्ठित' होने का अर्थ है कि ओंकार इन तीनों का मूल आधार है और इन्हीं के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। तुरीय वह शुद्ध चेतना है जहाँ साधक का विलय होता है; प्राण वह सेतु है जो स्थूल शरीर को सूक्ष्म चेतना से जोड़ता है; और आदित्य वह प्रकाश है जो अविद्या के अन्धकार को मिटाता है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं बोलता, बल्कि अपनी चेतना को प्राण और आदित्य के प्रकाश के माध्यम से तुरीय अवस्था की ओर ले जाता है।
द्वितीय चरण में ओंकार को 'त्रैकाल्य' कहा गया है। वह भूतं (अतीत), भव्यं (वर्तमान) और भविष्यं (आने वाला काल)—तीनों में व्याप्त है। समय की यह त्रिविध धारा वास्तव में एक ही अखंड चेतना का विस्तार है। ओंकार वह बिंदु है जहाँ समय ठहर जाता है। वह केवल समय के भीतर नहीं है, बल्कि समय स्वयं उस ओंकार की एक लहर है। जो साधक इस सत्य को जान लेता है, उसके लिए काल का भय समाप्त हो जाता है, क्योंकि वह स्वयं को उस 'त्रैकाल्य' अक्षर में स्थित अनुभव करने लगता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ॥ १ ॥
'ॐ' यह अक्षर ही यह सब है। उसकी व्याख्या: जो हुआ, जो है, जो होगा — सब ओंकार ही है; और जो तीनों कालोंसे परे है, वह भी ओंकार ही है।
इस उपनिषद् का यह कथन कि 'जो हुआ, जो है, जो होगा — सब ओंकार ही है', बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के 'त्रैकाल्य' शब्द की पूर्ण पुष्टि करता है। स्मृति और माण्डूक्य उपनिषद् दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि संपूर्ण अस्तित्व का पर्याय है। जहाँ उपनिषद् इसे दार्शनिक रूप से व्याख्यायित करता है, वहीं यह स्मृति इसे 'त्रिप्रतिष्ठित' कहकर साधक के लिए अनुभवगम्य बनाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक समय और चेतना के एकीकरण का अभ्यास है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह 'अ-उ-म' की मात्राओं के माध्यम से जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को पार कर 'तुरीय' में प्रवेश करने का प्रयास करता है।
अभ्यास का रहस्य यह है कि जप के क्षण में, जब 'ॐ' की ध्वनि गूँजती है, तो वह वर्तमान (भव्यं) है; उस ध्वनि का आधार साधक के पूर्व संस्कार और ज्ञान (भूतं) हैं; और उस ध्वनि का लक्ष्य मोक्ष या समाधि (भविष्यं) है। इस प्रकार, एक ही जप के क्षण में भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों एक बिंदु पर सिमट आते हैं। साधक अनुभव करता है कि वह काल के प्रवाह में बहने वाला कोई जीव नहीं, बल्कि वह 'त्रैकाल्य' अक्षर है जिसमें सारा समय समाहित है। इस भूमि पर पहुँचकर साधक समय की सीमाओं से मुक्त होकर 'अमात्र' या कालतीत अवस्था की ओर अग्रसर होता है।
अन्तःप्रज्ञो बहिःप्रज्ञो घनप्रज्ञ उदाहृतः ।
गार्हपत्यो दक्षिणाग्निराहवनीयस्त्रिधामकम् ॥ २.२३ ॥
अन्तःप्रज्ञ, बहिःप्रज्ञ और घनप्रज्ञ—इन तीनों से "त्रिप्रज्ञ" कहा गया है; गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय—ये तीन धाम हैं।…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'त्रिप्रतिष्ठित' और 'त्रैकाल्य' स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसे तुरीय, प्राण, आदित्य और तीनों कालों के साथ जोड़ा था। इसी क्रम में, अब वे ओंकार के 'त्रिप्रज्ञ' और 'त्रिधाम' होने के रहस्य को खोल रहे हैं, ताकि साधक चेतना के विभिन्न स्तरों और यज्ञीय अग्नियों के आन्तर अर्थ को समझ सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः ओंकारः) अन्तःप्रज्ञः, बहिःप्रज्ञः, घनप्रज्ञः (इति) उदाहृतः (अस्ति) । (सः एव) गार्हपत्यः, दक्षिणाग्निः, आहवनीयः (इति) त्रिधामकम् (अस्ति) ।
पदार्थ:
• अन्तःप्रज्ञ: वह प्रज्ञा (चेतना) जो अंतर्मुखी है, जो केवल आंतरिक जगत और सूक्ष्म वृत्तियों का अनुभव करती है।
• बहिःप्रज्ञ: वह प्रज्ञा जो बहिर्मुखी है, जो इन्द्रियों के माध्यम से बाह्य जगत के विषयों का अनुभव करती है।
• घनप्रज्ञ: वह प्रज्ञा जो घनीभूत है; जहाँ द्वैत समाप्त हो गया है और चेतना अपने शुद्ध, एकीभूत और आनन्दमय स्वरूप में स्थित है।
• गार्हपत्य: घरेलू अग्नि, जो गृहस्थी और पोषण का आधार है।
• दक्षिणाग्नि: वह अग्नि जो देवताओं को दक्षिणा या आहुति देने के लिए प्रयुक्त होती है।
• आहवनीय: वह अग्नि जिसमें देवताओं का आह्वान कर उन्हें आहुति दी जाती है।
• त्रिधामकम्: तीन धामों (निवासों या अग्नियों) वाला।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जो प्रज्ञा और यज्ञीय अग्नि दोनों में व्याप्त है।
प्रथम चरण में ऋषि ओंकार को 'त्रिप्रज्ञ' बताते हुए उसके तीन रूपों का उल्लेख करते हैं—अन्तःप्रज्ञ, बहिःप्रज्ञ और घनप्रज्ञ। यहाँ प्रज्ञा का अर्थ केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु वह चैतन्य है जो अनुभव करता है। जब यह चैतन्य इन्द्रियों के माध्यम से बाहर की ओर प्रवाहित होता है, तो वह 'बहिःप्रज्ञ' है। जब यही चैतन्य इन्द्रियों को समेटकर अंतःकरण में विलीन होता है, तो वह 'अन्तःप्रज्ञ' है। परन्तु जब यह चैतन्य न बाहर की ओर जाता है और न केवल भीतर सिमटता है, अपितु स्वयं में ही पूर्ण होकर एकीभूत हो जाता है, तब वह 'घनप्रज्ञ' कहलाता है। ओंकार इन तीनों प्रज्ञाओं का मूल बीज है; वह वह ध्वनि है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की प्रज्ञाओं को एक सूत्र में पिरोती है।
द्वितीय चरण में, ऋषि ओंकार को 'त्रिधामक' कहते हुए उसे तीन अग्नियों—गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय से जोड़ते हैं। बाहरी विधि में ये तीन अलग-अलग अग्निकुण्ड हैं, जिनमें यज्ञ किया जाता है। किन्तु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, अतः यहाँ वे विधिको मिटाए बिना उसका आन्तर अर्थ भी दे रहे हैं। यज्ञीय अग्नि वास्तव में 'तप' और 'तेज' का प्रतीक है। गार्हपत्य अग्नि शरीर रूपी घर की वह अग्नि है जो प्राणों का पोषण करती है; दक्षिणाग्नि वह त्याग है जो साधक अपने अहंकार और वृत्तियों को समर्पित करता है; और आहवनीय अग्नि वह उच्च चेतना है जिसके द्वारा साधक परमात्मा (देवता) का आह्वान करता है। ओंकार वह परम अग्नि है जिसमें ये तीनों धाम समाहित हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥
जहाँ सोया हुआ न कोई कामना करता है, न कोई स्वप्न देखता है — वह सुषुप्ति है। सुषुप्ति जिसका स्थान है, एकीभूत, प्रज्ञानघन, आनन्दमय, आनन्दका भोक्ता, चेतना ही जिसका मुख है — वह प्राज्ञ तीसरा पाद है।
इस उपनिषद् में प्रज्ञानघन और आनन्दमय स्वरूप का वर्णन है, जो यहाँ 'घनप्रज्ञ' के रूप में आया है। माण्डूक्य उपनिषद् चेतना के इन स्तरों को ओंकार की मात्राओं से जोड़ता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ उसी रहस्य को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत कर रही है कि ओंकार केवल एक अक्षर नहीं, अपितु प्रज्ञा की वह यात्रा है जो बहिर्मुखता से शुरू होकर घनभूत एकता (एकत्व) तक पहुँचती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक चेतना के रूपांतरण का मार्ग है। अभ्यास की दृष्टि से साधक पहले अपनी 'बहिःप्रज्ञ' (बाहरी बिखराव) को पहचानता है, फिर उसे 'अन्तःप्रज्ञ' (अंतर्मुखी एकाग्रता) में बदलता है। जब यह अंतर्मुखता इतनी गहरी हो जाती है कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है, तब साधक 'घनप्रज्ञ' की स्थिति का अनुभव करता है।
यही वह भूमि है जहाँ ओंकार का जप केवल ध्वनि नहीं रहता, बल्कि एक अनुभव बन जाता है। साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर की 'गार्हपत्य' (प्राण-शक्ति), 'दक्षिणाग्नि' (समर्पण) और 'आहवनीय' (दिव्य प्रकाश) तीनों एक ही ओंकार-अक्षर में विलीन हो रहे हैं। इस अभ्यास से साधक स्थूल प्रज्ञा से सूक्ष्म प्रज्ञा की ओर और अंततः घनभूत प्रज्ञा (शुद्ध चैतन्य) की ओर अग्रसर होता है।
शान्तो घोरस्तथा मूढस्त्रिरवस्थ इति स्मृतः ।
स्त्री पुं नपुंसकं चेति त्रिलिङ्ग इति स स्मृतः ॥ २.२४ ॥
…शान्त, घोर और मूढ—इन तीनों से "त्रिअवस्था" स्मृत है; स्त्री, पुरुष और नपुंसक—इन तीनों से वह "त्रिलिङ्ग" स्मृत है।…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'त्रिप्रज्ञ' और 'त्रिधाम' स्वरूप का विवेचन किया था, जिससे चेतना के अंतर्मुखी, बहिर्मुखी और एकीभूत होने के साथ-साथ यज्ञीय अग्नियों के साथ उसका सम्बन्ध स्पष्ट हुआ। अब इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए ऋषि ओंकार के उन स्वरूपों का उद्घाटन कर रहे हैं जो प्रवृत्तियों (अवस्थाओं) और प्रकृति के मूल विभाजनों (लिङ्गों) में व्याप्त हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः ओंकारः) शान्तः, घोरः, तथा मूढः (इति) त्रिरवस्थ इति स्मृतः । (सः एव) स्त्री, पुं (पुमन्), नपुंसकं चेति त्रिलिङ्ग इति स स्मृतः ।
पदार्थ:
• शान्त: वह अवस्था जहाँ चंचलता का अभाव है, जो स्थिर, सौम्य और प्रकाशमय है।
• घोर: वह अवस्था जो तीव्र, उग्र, क्रियाशील और विक्षुब्ध है।
• मूढ: वह अवस्था जो जड़, अंधकारमय, आलस्यपूर्ण और अज्ञान से ढकी है।
• त्रिरवस्थ: तीन मानसिक या प्रवृत्तिक अवस्थाओं वाला।
• स्त्री: प्रकृति का वह पक्ष जो ग्रहणशीलता, कोमलता और सृजन की शक्ति का प्रतीक है।
• पुं (पुमन्): प्रकृति का वह पक्ष जो प्रक्षेपण, कठोरता और क्रियान्वयन का प्रतीक है।
• नपुंसक: वह तटस्थ अवस्था जहाँ स्त्री और पुरुष के गुण विलीन हो जाते हैं; जो द्वैत से परे है।
• त्रिलिङ्ग: तीन लिङ्गों (प्रकृतियों/चिह्नों) वाला।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस व्यापक स्वरूप को समझा रहे हैं जो मनुष्य की मानसिक प्रवृत्तियों और प्रकृति के मूलभूत भेदों में निहित है।
प्रथम चरण में ऋषि ओंकार को 'त्रिरवस्थ' कहते हुए तीन मानसिक स्थितियों का वर्णन करते हैं—शान्त, घोर और मूढ। यहाँ 'अवस्था' का अर्थ केवल जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति नहीं, अपितु मन के वे गुण-प्रधान रूप हैं जो हमारे अनुभव को निर्धारित करते हैं। जब ओंकार की शक्ति सत्त्वगुण के प्रभाव में होती है, तब वह 'शान्त' कहलाती है—जहाँ साधक को शांति और स्पष्टता का अनुभव होता है। जब वही शक्ति रजोगुण के प्रभाव में आती है, तो वह 'घोर' हो जाती है—जहाँ तीव्रता, कामना और संघर्ष का उदय होता है। और जब वह तमोगुण के प्रभाव में होती है, तो 'मूढ' कहलाती है—जहाँ मोह, निद्रा और जड़ता व्याप्त होती है। इस प्रकार, ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु वह चेतना है जो इन तीनों अवस्थाओं के रूप में हमारे भीतर स्पन्दित हो रही है।
द्वितीय चरण में याज्ञवल्क्य ओंकार को 'त्रिलिङ्ग' बताते हैं—स्त्री, पुरुष और नपुंसक। यहाँ 'लिङ्ग' शब्द का अर्थ केवल शारीरिक भेद नहीं, अपितु 'चिह्न' या 'प्रवृत्ति' है। सृष्टि का सम्पूर्ण विस्तार इन तीन प्रवृत्तियों के खेल से हुआ है। 'स्त्री' वह शक्ति है जो संचय करती है और पोषण देती है; 'पुरुष' वह शक्ति है जो बीज डालती है और विस्तार करती है; और 'नपुंसक' वह बिंदु है जहाँ ये दोनों परस्पर विलीन होकर एक हो जाते हैं। ओंकार इन तीनों का मूल है। वह सृजन की शक्ति (स्त्री), संरक्षण की शक्ति (पुरुष) और लय की शक्ति (नपुंसक) का समुच्चय है।
इस प्रकार, याज्ञवल्क्य यह सिद्ध कर रहे हैं कि संसार में जो कुछ भी त्रिविध है—चाहे वह मन की अवस्था हो या प्रकृति का भेद—वह वास्तव में ओंकार के ही विभिन्न आयाम हैं। जो साधक ओंकार के इस त्रिविध स्वरूप को पहचान लेता है, वह अपनी प्रवृत्तियों के बंधन से मुक्त होकर उस एकत्व को प्राप्त करता है जो इन तीनों से परे है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को अपनी मानसिक वृत्तियों के निरीक्षण का अभ्यास कराता है। साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसका मन कभी 'शान्त' (सत्त्व), कभी 'घोर' (रजस) और कभी 'मूढ' (तमस) होता है। अभ्यास यह है कि वह इन तीनों अवस्थाओं को ओंकार के ही रूप मानकर उनमें तटस्थ हो जाए। जब वह देखता है कि "मैं न शान्त हूँ, न घोर, न मूढ, अपितु मैं वह ओंकार हूँ जिसमें ये तीनों स्थित हैं", तब वह गुणों के पार जाने लगता है।
इसी प्रकार, 'त्रिलिङ्ग' का अभ्यास साधक को आंतरिक संतुलन की ओर ले जाता है। साधक अपने भीतर की ग्रहणशीलता (स्त्री-तत्व) और क्रियाशीलता (पुरुष-तत्व) का सामंजस्य स्थापित करता है और अंततः उस 'नपुंसक' या तटस्थ अवस्था में स्थित होता है, जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है। यह अभ्यास साधक को 'अवस्था' और 'लिङ्ग' के सीमित दायरे से निकालकर उस अमात्र ओंकार की ओर ले जाता है, जहाँ न कोई गुण है और न कोई भेद।
वातः पित्तं तथा श्लेष्मा त्रिधातुः समुदाहृतः ।
त्रिप्रकारं विदित्वा तु ओंकारं मुच्यते द्विजः ॥ २.२५ ॥
वात, पित्त और श्लेष्मा — इनसे (वह) त्रिधातु कहा गया है। इस त्रिविध (स्वरूपवाले) ओंकारको जानकर द्विज मुक्त हो जाता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में ओंकार के त्रिदैवत, त्रिब्रह्म, त्रिप्रज्ञ और त्रिलिङ्ग जैसे विविध त्रिक-स्वरूपों का विवेचन किया गया। यह श्लोक उस श्रृंखला की अंतिम कड़ी है, जहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य प्रणव के स्थूल शरीर और जैविक आधार (धातुओं) के साथ सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
वातः, पित्तं तथा श्लेष्मा (एतैः) त्रिधातुः समुदाहृतः। (ततः) त्रिप्रकारं (इदं) विदित्वा तु ओंकारं (विज्ञाय), द्विजः मुच्यते।
पदार्थ:
• वात, पित्त, श्लेष्मा: शरीर के तीन मुख्य दोष या जैविक तत्व। वात (गति और वायु), पित्त (ऊष्मा और अग्नि), श्लेष्मा (स्थिरता और जल-पृथ्वी)।
• त्रिधातुः: तीन धातुओं का समूह। यहाँ 'धातु' का अर्थ केवल रक्त-मांस नहीं, अपितु वे आधारभूत तत्व हैं जो शरीर की संरचना और संचालन करते हैं।
• समुदाहृतः: एक साथ एकत्रित या समाहित। अर्थात् ओंकार में ये तीनों तत्व समाहित हैं।
• त्रिप्रकारं: यहाँ इसका अर्थ ओंकार के उन सभी त्रिविध स्वरूपों से है, जिनका वर्णन पिछले श्लोकों (२.२० से २.२५) में किया गया है।
• द्विजः: वह जो दूसरी बार जन्मा हो। आध्यात्मिक अर्थ में, वह साधक जिसने संस्कार और ज्ञान के द्वारा अपने अज्ञान रूपी जन्म को समाप्त कर सत्य में पुनर्जन्म लिया है।
• मुच्यते: मुक्त हो जाता है; बंधन से छूट जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यह सिद्ध कर रहे हैं कि ओंकार केवल एक मन्त्र या ध्वनि नहीं है, अपितु वह संपूर्ण अस्तित्व का सार है। इस श्लोक में वे ओंकार के 'त्रिधातु' स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं।
जब वे कहते हैं कि वात, पित्त और श्लेष्मा से 'त्रिधातु' कहा गया है, तो उनका संकेत यह है कि मनुष्य का भौतिक शरीर भी उसी प्रणव का विस्तार है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में वायु, अग्नि और जल-पृथ्वी के तत्व व्याप्त हैं, उसी प्रकार शरीर में वात (वायु), पित्त (अग्नि) और श्लेष्मा (जल-पृथ्वी) के रूप में वे विद्यमान हैं। ओंकार की तीन मात्राएँ (अ, उ, म) इन्हीं भौतिक और सूक्ष्म तत्वों के साथ एकाकार हैं।
यहाँ 'त्रिप्रकारं विदित्वा' का अर्थ अत्यंत व्यापक है। इसका तात्पर्य केवल वात-पित्त-श्लेष्मा को जानना नहीं है, अपितु पिछले श्लोकों में बताए गए सभी त्रिकों—त्रिदैवत, त्रिब्रह्म, त्रिप्रज्ञ, त्रिलिङ्ग और त्रिधातु—के समन्वय को समझना है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसका स्थूल शरीर (त्रिधातु), उसकी मानसिक अवस्थाएँ (त्रिप्रज्ञ), उसके दैवीय आधार (त्रिदैवत) और उसकी वाणी (त्रिब्रह्म) सब एक ही ओंकार के विभिन्न आयाम हैं, तब वह द्वैत से मुक्त हो जाता है।
यह मुक्ति केवल मृत्यु के पश्चात की मोक्ष-अवस्था नहीं है, अपितु यह बोध है कि "मैं और यह संपूर्ण जगत उसी एक अक्षर (ओंकार) के स्वरूप हैं।" जब द्विज (साधक) इस त्रिविधता को एकत्व में देख लेता है, तब वह प्रकृति के बंधनों से ऊपर उठकर अपनी वास्तविक स्थिति को प्राप्त करता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'शरीर' से 'अक्षर' की ओर ले जाने का मार्ग है। प्रायः साधक शरीर को साधना में बाधा मानता है, किन्तु याज्ञवल्क्य यहाँ शरीर को ही उपासना का क्षेत्र बना रहे हैं।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह अपने भीतर के वात (चंचलता/गति), पित्त (तीक्ष्णता/तप) और श्लेष्मा (जड़ता/शांति) को केवल शारीरिक दोष न मानकर, उन्हें ओंकार की तीन मात्राओं के प्रतिबिंब के रूप में देखे। जब वह ओंकार का जप करता है, तो वह केवल ध्वनि का उच्चारण नहीं कर रहा होता, अपितु वह अपने शरीर की धातुओं, अपनी प्रवृत्तियों और अपने प्राणों को उस एक बीज-अक्षर में विलीन कर रहा होता है।
यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाता है। पहले वह शरीर की त्रिधातु को पहचानता है, फिर उसे मानसिक अवस्थाओं (त्रिप्रज्ञ) से जोड़ता है और अंततः उसे उस अमात्र ओंकार में लीन कर देता है। इस प्रकार, शरीर का रूपांतरण ही मुक्ति का मार्ग बन जाता है। साधक अनुभव करता है कि उसका भौतिक अस्तित्व भी उसी दिव्य ध्वनि का स्पंदन है, और इसी बोध से वह बंधनमुक्त होकर अपनी शुद्ध चेतना में स्थित हो जाता है।
प्रणवमात्रास्वरूपम्
एकैका तु भवेन्मात्रा त्रिगुणा सा तु वै पुनः ।
तासां सर्वं वाङ्मयं यदोतं प्रोतं व्यवस्थितम् ॥ २.२६ ॥
एक-एक मात्रा फिर त्रिगुणा होती है; उनमें सारा वाङ्मय ओतप्रोत होकर व्यवस्थित है।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में ओंकार के विविध त्रिक-स्वरूपों (त्रिब्रह्म, त्रिप्रज्ञ, त्रिधातु आदि) का वर्णन कर यह बताया गया कि इन त्रिविध स्वरूपों को जानकर द्विज मुक्त हो जाता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस मुक्ति के मार्ग का सूक्ष्म विश्लेषण कर रहे हैं कि ओंकार की प्रत्येक मात्रा अपने आप में कैसे पूर्ण है और संपूर्ण सृष्टि का बीज कैसे है।
अन्वय और पदार्थ —
एकैका तु (मात्राः) भवेन्मात्रा त्रिगुणा सा तु वै पुनः । तासां सर्वं वाङ्मयं यदोतं प्रोतं व्यवस्थितम् ॥
पदार्थ:
• एकैका: एक-एक (यहाँ ओंकार की अ, उ, म तीनों मात्राओं का अलग-अलग बोध है)।
• भवेन्मात्रा: मात्राएँ होती हैं।
• त्रिगुणा: तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) से युक्त।
• सा तु वै पुनः: वह (ओंकार का स्वरूप) फिर से (विस्तृत रूप में)।
• तासां: उन मात्राओं में।
• सर्वं वाङ्मयं: संपूर्ण वाक्-जगत, समस्त मन्त्र, शब्द और अभिव्यक्तियाँ।
• यदोतं प्रोतं व्यवस्थितम्: जो ओता-प्रोता है, बुना हुआ है और सुव्यवस्थित रूप से स्थित है। 'ओत-प्रोत' शब्द वस्त्र की बुनाई के समान सूक्ष्म अंतर्सम्बन्ध को दर्शाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के 'मात्रा-विज्ञान' का अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं। पिछले श्लोकों में उन्होंने ओंकार को समग्र रूप से 'त्रि' (तीन) के साथ जोड़ा था, किन्तु अब वे कह रहे हैं कि यह 'त्रि' केवल बाहरी विभाजन नहीं है, अपितु ओंकार की प्रत्येक एक-एक मात्रा (अ, उ और म) अपने आप में 'त्रिगुणा' है।
भाव यह है कि जिस प्रकार संपूर्ण प्रकृति तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के मेल से बनी है, उसी प्रकार प्रणव की प्रत्येक मात्रा में ये तीनों गुण विद्यमान हैं। यह एक अद्भुत विरोधाभास जैसा प्रतीत होता है कि जो स्वयं त्रिगुणों का आधार है, उसकी प्रत्येक मात्रा भी त्रिगुणा है। इसका रहस्य यह है कि ओंकार 'बीज' है और बीज में वह संपूर्ण वृक्ष समाहित होता है जो बाद में विस्तृत होकर प्रकट होता है।
आगे ऋषि कहते हैं कि इन मात्राओं में 'सर्वं वाङ्मयं' ओतप्रोत है। 'वाङ्मय' का अर्थ केवल बोली जाने वाली भाषा नहीं, अपितु वह समस्त शक्ति है जिसके द्वारा ब्रह्म स्वयं को अभिव्यक्त करता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और समस्त उपनिषदों के मन्त्र, जो भी शब्द इस ब्रह्माण्ड में उच्चारित हुए या होने वाले हैं, वे सब इन तीन मात्राओं के भीतर ही व्यवस्थित हैं। जिस प्रकार एक धागे में अनेक मोती पिरोए होते हैं या एक वस्त्र में ताना-बाना (ओत-प्रोत) बुना होता है, वैसे ही समस्त ज्ञान और शब्द-ब्रह्म इन मात्राओं में गुँथे हुए हैं।
यह वचन इस बात का प्रमाण है कि यदि साधक ओंकार की एक मात्रा के रहस्य को भी पूर्णतः जान ले, तो वह समस्त वेदों के ज्ञान को जान लेने के समान है, क्योंकि मूल बीज में ही संपूर्ण विस्तार छिपा होता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'बीज-साधना' का आधार है। सामान्यतः हम मानते हैं कि 'अ' से जाग्रत, 'उ' से स्वप्न और 'म' से सुषुप्ति की ओर जाते हैं, किन्तु यहाँ योग-रहस्य यह है कि प्रत्येक मात्रा अपने आप में एक संपूर्ण संसार है।
अभ्यास की दृष्टि से साधक जब 'अ' का उच्चारण करता है, तो वह केवल एक ध्वनि नहीं निकालता, अपितु वह उस 'अ' के भीतर स्थित सत्त्व, रज और तम के संतुलन को अनुभव करता है। वह देखता है कि इस एक मात्रा में ही संपूर्ण वाङ्मय (शब्द-ब्रह्म) समाहित है। जब साधक इस भाव से अभ्यास करता है कि "इस एक मात्रा में ही समस्त मन्त्रों का सार है", तो उसकी एकाग्रता सूक्ष्म होती जाती है।
यह स्थिति साधक को 'विस्तार' से 'संकुचन' की ओर ले जाती है। जब वह अनुभव करता है कि अनंत मन्त्र और अनंत गुण केवल एक मात्रा में सिमटे हुए हैं, तब वह 'बहु' से 'एक' की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल जगत की विविधता से हटाकर सूक्ष्म बीज-तत्त्व में प्रतिष्ठित करता है, जिससे वह धीरे-धीरे अमात्र (गुणातीत) अवस्था की ओर अग्रसर होता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति केवल एक कंपन का विस्तार है।
प्रथमा तस्य अकारो वाक् सत्त्वं भूर्हुताशनो विष्णुः ।
स्थूला जाग्रद्वृत्तिर्विज्ञेया योगतत्त्वज्ञैः ॥ २.२७ ॥
…उसकी प्रथमा मात्रा अकार है जो वाक्, सत्त्व और भूः है तथा अग्नि और विष्णु है; योगतत्त्वज्ञों द्वारा यह स्थूल जाग्रद्वृत्ति वाली जानी जाती है।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि प्रणव की प्रत्येक मात्रा अपने आप में त्रिगुणा है और संपूर्ण वाङ्मय जगत उन्हीं में ओत-प्रोत है। अब वे इस सूक्ष्म ताने-बाने को खोलते हुए ओंकार की प्रथम मात्रा 'अ' के स्वरूप, उसके अधिष्ठातृ देवताओं और उसकी चेतना-अवस्था का विश्लेषण कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
तस्य प्रथमा (मात्रा) अकारः (अस्ति), (यः) वाक्, सत्त्वं, भूः, हुताशनः, विष्णुः (च अस्ति) । (तस्य) स्थूला जाग्रद्वृत्तिः योगतत्त्वज्ञैः विज्ञेया (अस्ति) ॥
पदार्थ:
• तस्य: उस (ओंकार की)।
• प्रथमा अकारः: पहली मात्रा 'अ' है।
• वाक्: वाणी, अभिव्यक्ति, शब्द-शक्ति।
• सत्त्वं: सत्त्वगुण, प्रकाश, पवित्रता और साम्य।
• भूः: पृथ्वी तत्त्व, भौतिक आधार, प्रथम व्याहृति।
• हुताशनः: अग्नि (हुताशन = जिसे आहुति दी जाती है और जो भक्षण करता है)।
• विष्णुः: सर्वव्यापकता, पालनकर्ता, वह जो सर्वत्र व्याप्त है।
• स्थूला जाग्रद्वृत्तिः: स्थूल शरीर की जाग्रत अवस्था की वृत्ति (चेतना)।
• योगतत्त्वज्ञैः विज्ञेया: योग के वास्तविक तत्त्व को जानने वालों द्वारा जाना जाना चाहिए।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी यहाँ 'अकार' को केवल एक वर्ण नहीं, अपितु सृष्टि के आदि-बीज और जाग्रत चेतना के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
प्रथम मात्रा 'अ' का स्वरूप पाँच स्तरों पर वर्णित है:
१. वाक्: 'अ' वह आदि-नाद है जिससे समस्त वाणी का प्रादुर्भाव होता है। यह अभिव्यक्ति का प्रथम सोपान है।
२. सत्त्व: यह सत्त्वगुण का प्रतीक है, क्योंकि जाग्रत अवस्था में वस्तुएँ अपने स्पष्ट और प्रकाशमय रूप में दिखती हैं।
३. भूः: यह पृथ्वी तत्त्व और 'भूः' व्याहृति का प्रतिनिधित्व करता है, जो समस्त स्थूल जगत का आधार है।
४. हुताशन (अग्नि): अग्नि रूपांतरण की शक्ति है। जिस प्रकार अग्नि भौतिक जगत में प्रथम क्रिया है, उसी प्रकार 'अ' चेतना की प्रथम क्रिया है।
५. विष्णुः: यहाँ विष्णु का अर्थ उस 'व्यापकता' से है जो संपूर्ण भौतिक जगत में व्याप्त है। 'अ' की ध्वनि कंठ के मूल से निकलकर संपूर्ण मुख-मंडल में व्याप्त होती है, जो विष्णु की सर्वव्यापकता का प्रतीक है।
महर्षि कहते हैं कि यह 'अकार' स्थूल जाग्रत वृत्ति है। साधारण मनुष्य के लिए यह केवल एक वर्ण है, किन्तु 'योगतत्त्वज्ञों' (जो योग के सूक्ष्म विज्ञान को जानते हैं) के लिए यह वह द्वार है जहाँ से वे जाग्रत अवस्था की सीमाओं को पहचानकर उससे ऊपर उठने का प्रयास करते हैं। यह वह भूमि है जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि जो कुछ भी स्थूल, दृश्य और वाणी-गम्य है, वह सब इस 'अ' मात्रा के भीतर ही समाहित है।
शास्त्र-साक्ष्य —
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राप्तेरादिमत्त्वाद्वाप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥
जाग्रत्-स्थानवाला वैश्वानर अकार है — पहली मात्रा, व्याप्ति या आदि होनेके कारण; जो ऐसा जानता है, वह सब कामनाएँ पाता है और आदि (प्रथम) होता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में भी अकार को जाग्रत अवस्था और वैश्वानर (विश्वरूप) से जोड़ा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार की पुष्टि करती है और उसमें अग्नि (हुताशन) तथा विष्णु के स्वरूप को जोड़कर उसे वैदिक कर्मकाण्ड और योग-साधना के समन्वय से प्रस्तुत करती है। जहाँ उपनिषद् जाग्रत अवस्था के ज्ञान पर बल देता है, वहीं यह स्मृति उसे 'वाक्' और 'सत्त्व' के साथ जोड़कर साधक को उसकी सूक्ष्म प्रकृति समझाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब योगी 'ॐ' का उच्चारण प्रारंभ करता है और 'अ' की ध्वनि निकालता है, तब उसे केवल वर्ण का उच्चारण नहीं करना है, अपितु एक विशेष योगिक अनुभव करना है।
अभ्यास यह है कि 'अ' का उच्चारण करते समय साधक अपनी संपूर्ण जाग्रत चेतना, अपनी वाणी और इस भौतिक पृथ्वी (भूः) के अस्तित्व को उसी ध्वनि में समेट ले। वह अनुभव करे कि यह संपूर्ण स्थूल जगत, जो उसे बाहर दिखाई दे रहा है, वास्तव में इस प्रथम मात्रा का ही विस्तार है।
जब साधक 'अ' में स्थित होता है, तो वह अपनी 'जाग्रत वृत्ति' को साक्षी भाव से देखता है। वह समझता है कि वह शरीर नहीं, अपितु वह चेतना है जो इस स्थूल शरीर और संसार को देख रही है। इस प्रकार, 'अ' का अभ्यास साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली पहली सीढ़ी है। यहाँ वह 'सत्त्व' की स्थापना करता है, जिससे मन शुद्ध होता है और वह अगली मात्रा 'उ' (सूक्ष्म जगत) में प्रवेश करने के योग्य बनता है।
ब्रह्मान्तरिक्षसंज्ञो मनोरजः सोमसंज्ञक उकारः ।
मात्रा स्वप्नविकल्पा (वि)सृष्टिसंज्ञा द्वितीया तु ॥ २.२८ ॥
…उसकी द्वितीया मात्रा उकार है जो ब्रह्मा, अन्तरिक्ष संज्ञा वाली, मनोरज और सोम संज्ञा वाली है; वह स्वप्नविकल्पों वाली सृष्टि संज्ञा वाली है।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में 'अकार' के माध्यम से जाग्रत अवस्था, स्थूल शरीर और पृथ्वी तत्त्व के सम्बन्ध को समझाया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य प्रणव की द्वितीय मात्रा 'उकार' के स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जो साधक को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
(तस्य) द्वितीया (मात्रा) उकारः (अस्ति), (यः) ब्रह्मा, अन्तरिक्ष-संज्ञः, मनोरजः, सोम-संज्ञकः (च अस्ति) । (तस्य) मात्रा स्वप्न-विकल्पा (अस्ति), (तस्य) विसृष्टिसंज्ञा (अस्ति) ॥
पदार्थ:
• ब्रह्मा: सृजन शक्ति, विस्तार का अधिष्ठाता।
• अन्तरिक्ष-संज्ञः: आकाश और पृथ्वी के मध्य का स्थान; सूक्ष्म लोक।
• मनोरजः: मन और रजोगुण का सम्मिश्रण (मनः + रजः)।
• सोम-संज्ञकः: चन्द्रमा, शीतलता, रस और मानसिक तृप्ति का प्रतीक।
• स्वप्न-विकल्पा: स्वप्न की अवस्था में होने वाले विभिन्न विकल्प, कल्पनाएँ और मानसिक चित्र।
• विसृष्टिसंज्ञा: 'विसृष्टि' का अर्थ है विस्तार या प्रक्षेपण। यहाँ इसका तात्पर्य उस मानसिक सृष्टि से है जो स्वप्न में निर्मित होती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी उकार के माध्यम से चेतना के उस स्तर का वर्णन कर रहे हैं जहाँ साधक भौतिक शरीर की सीमाओं को पार कर मानसिक जगत में प्रवेश करता है।
उकार के स्वरूप को पाँच आयामों से समझा जा सकता है:
१. ब्रह्मा: उकार 'ब्रह्मा' है क्योंकि यहाँ से सूक्ष्म सृजन आरम्भ होता है। जाग्रत अवस्था में हम निर्मित वस्तु को देखते हैं, किन्तु स्वप्न में हम स्वयं निर्माता बन जाते हैं। यह सृजन की मानसिक शक्ति है।
२. अन्तरिक्ष: जिस प्रकार अन्तरिक्ष पृथ्वी (अकार) और द्यौ (मकार) के मध्य की संधि है, उसी प्रकार उकार जाग्रत और सुषुप्ति के मध्य की अवस्था है। यह स्थूल और कारण के बीच का सूक्ष्म सेतु है।
३. मनोरजः: उकार का सम्बन्ध 'मन' और 'रजोगुण' से है। रजोगुण गति और चंचलता का गुण है, और मन निरंतर एक विचार से दूसरे विचार पर कूदता रहता है। अतः उकार उस मानसिक चंचलता का बीज है।
४. सोम: सोम चन्द्रमा का प्रतीक है, जो मन का अधिष्ठाता देवता है। यह रस और आनंद का सूचक है, जो केवल मानसिक स्तर पर अनुभव किया जाता है।
५. स्वप्न-विकल्प और विसृष्टि: उकार की वृत्ति 'स्वप्न' है। यहाँ 'विकल्प' शब्द महत्वपूर्ण है; विकल्प का अर्थ है—जो वास्तव में नहीं है, फिर भी प्रतीत हो रहा है। स्वप्न में मन अपनी ही स्मृतियों से एक नया संसार 'विसृजित' (प्रक्षेपित) करता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक अपनी मानसिक प्रवृत्तियों और वासनाओं के प्रतिबिंब देखता है।
अतः उकार वह अवस्था है जहाँ चेतना स्थूल शरीर के बंधन से मुक्त होकर सूक्ष्म शरीर (मन) के माध्यम से विचरण करती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥
स्वप्न-स्थानवाला तैजस उकार है — दूसरी मात्रा, उत्कर्ष या दोनोंके बीच होनेके कारण; जो ऐसा जानता है, उसकी ज्ञान-परम्परा बढ़ती है, वह सबके प्रति सम होता है, और उसके कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता।
यह उपनिषद् उकार को 'तैजस' कहता है और उसे स्वप्न-स्थान बताता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और माण्डूक्य उपनिषद् यहाँ पूर्णतः एकमत हैं कि उकार का सम्बन्ध स्वप्न-अवस्था से है। स्मृति इसे 'विसृष्टिसंज्ञा' कहकर यह स्पष्ट करती है कि स्वप्न केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि मन द्वारा किया गया एक प्रक्षेपण है। दोनों ही ग्रन्थ उकार को 'द्वितीया मात्रा' मानकर इसे जाग्रत (अ) और सुषुप्ति (म) के मध्य की कड़ी सिद्ध करते हैं।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से उकार का अभ्यास साधक को 'मन' के स्वरूप का साक्षात्कार कराता है। जब साधक 'अ' से 'उ' की ओर बढ़ता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल इंद्रियों से हटाकर अंतर्मुखी करता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार स्वप्न में वह स्वयं को और जगत को सत्य मानता है, उसी प्रकार जाग्रत अवस्था भी एक वृहत्तर स्वप्न मात्र है। उकार का ध्यान करते समय साधक अपने भीतर की 'रजस' (चंचलता) को देखता है और उसे 'सोम' (शीतलता/शांति) में बदलने का प्रयास करता है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक प्रणव का उच्चारण करते हुए 'उ' की मात्रा पर ठहरता है, तो वह अपनी मानसिक कल्पनाओं (विकल्पों) का साक्षी बनता है। वह यह जान जाता है कि मन केवल एक यंत्र है जो स्मृतियों के आधार पर संसार रचता है। इस भूमि पर पहुँचकर साधक 'मन' के ऊपर उठने की तैयारी करता है, ताकि वह अगली मात्रा 'मकार' के माध्यम से उस महानिद्रा (सुषुप्ति) में लीन हो सके जहाँ समस्त विकल्प शांत हो जाते हैं।
रौद्री मकारसंज्ञा प्राणाख्या तामसी तृतीया तु ।
संहरति जगत् समस्तं (सर्वं) सौषुम्णाख्या महानिद्रा ॥ २.२९ ॥
…तीसरी तामसी प्राणाख्या रौद्री मकारसंज्ञा है; वह समस्त जगत् का संहार करती है, सुषुम्णाख्या महानिद्रा है।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में उकार के माध्यम से सूक्ष्म जगत, रजोगुण और स्वप्न-अवस्था के विस्तार (विसृष्टि) का वर्णन किया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य प्रणव की तृतीय मात्रा 'मकार' के स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं, जहाँ विस्तार का अंत होता है और चेतना अपने मूल में विलीन होने की तैयारी करती है।
अन्वय और पदार्थ —
(तस्य) तृतीया (मात्रा) तामसी (अस्ति), (यः) प्राणाख्या (अस्ति), रौद्री मकार-संज्ञा (अस्ति) । (सः) समस्तं जगत् संहरति, (सः) सौषुम्णाख्या महानिद्रा (अस्ति) ॥
पदार्थ:
• तामसी: तमोगुण से युक्त; यहाँ तम का अर्थ अंधकार नहीं, अपितु 'आवरण' है, जो जाग्रत और स्वप्न के प्रपंचों को ढँक देता है।
• प्राणाख्या: जिसे 'प्राण' कहा गया है। यहाँ प्राण का अर्थ केवल श्वास नहीं, अपितु वह मूल जीवनी-शक्ति है जो अंततः स्वयं में विलीन होती है।
• रौद्री: रुद्र का स्वरूप; रुद्र वह है जो संहार करता है या जो 'रुदन' (पीड़ा) से मुक्त कर लय में ले जाता है।
• मकार-संज्ञा: प्रणव की वह अंतिम मात्रा जिसका उच्चारण ओष्ठों के बंद होने से पूर्ण होता है।
• संहरति: समेटना या लय करना।
यहाँ यह उस मार्ग का संकेत है जहाँ प्राण अंतर्मुखी होकर स्थिर हो जाता है।
• महानिद्रा: सुषुप्ति अवस्था; वह गहरी निद्रा जहाँ न कोई इच्छा शेष रहती है और न ही कोई विकल्प।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी मकार के माध्यम से चेतना की उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ साधक समस्त बाह्य और मानसिक प्रपंचों का त्याग कर लय की स्थिति में पहुँचता है।
मकार के स्वरूप को इन चार आयामों से समझा जा सकता है:
१. तामसी और रौद्री: अकार 'सत्त्व' (प्रकाश) था, उकार 'रज' (गति) था, और मकार 'तम' है। यहाँ तम का अर्थ अंधकार नहीं, अपितु वह 'आवरण' है जो जाग्रत और स्वप्न के प्रपंचों को ढँक देता है। इसे 'रौद्री' इसलिए कहा गया है क्योंकि रुद्र की शक्ति संहार की है। जिस प्रकार रुद्र जगत का संहार कर उसे पुनः शिवत्व में मिला देते हैं, उसी प्रकार मकार की मात्रा जाग्रत और स्वप्न के समस्त अनुभवों का संहार कर साधक को परम शांति की ओर ले जाती है।
२. प्राणाख्या: मकार को 'प्राण' कहा गया है क्योंकि जब वाणी का उच्चारण समाप्त होता है, तब केवल प्राण शेष रहता है। यह वह स्थिति है जहाँ शब्द (वाक्) मौन हो जाता है और केवल शुद्ध प्राण-शक्ति का अनुभव होता है। यह प्राण ही वह सेतु है जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।
३. जगत्-संहार: "संहरति जगत् समस्तं" का भाव यह है कि जब साधक 'म' का उच्चारण करता है, तो उसके ओष्ठ बंद हो जाते हैं। यह भौतिक रूप से बाहरी जगत के द्वार बंद करने का प्रतीक है। यहाँ समस्त दृश्य-अदृश्य जगत अपनी मूल स्थिति में सिमट जाता है; जैसे बीज में पूरा वृक्ष समाहित हो जाता है, वैसे ही मकार में समस्त सृष्टि लय हो जाती है।
४. सौषुम्णा और महानिद्रा: इस अवस्था को 'महानिद्रा' या सुषुप्ति कहा गया है। यह वह निद्रा नहीं है जिसमें आलस्य हो, अपितु वह स्थिति है जहाँ साधक द्वैत से मुक्त होता है और कोई विकल्प शेष नहीं रहता। इसे 'सौषुम्णाख्या' कहा गया है क्योंकि यह उस मार्ग का संकेत है जहाँ प्राण बाहर की नाड़ियों को छोड़कर अंतर्मुखी होकर स्थिर हो जाता है। जब प्राण इस मार्ग में स्थित होता है, तभी यह गहन शांति और लय संभव है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥
सुषुप्ति-स्थानवाला प्राज्ञ मकार है — तीसरी मात्रा, माप या लय होनेके कारण; जो ऐसा जानता है, वह इस सबको माप लेता है और (सबका) लय-स्थान होता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में मकार को 'सुषुप्तस्थान' और 'प्राज्ञ' कहा गया है। वहाँ इसे 'मित' (माप) और 'अपीति' (लय) के कारण तीसरी मात्रा माना गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात की पुष्टि करती है कि मकार ही वह स्थान है जहाँ समस्त प्रपञ्च 'अपीति' या लय हो जाते हैं। उपनिषद् जहाँ इसे 'प्राज्ञ' (ज्ञानयुक्त निद्रा) कहता है, वहीं यह स्मृति इसे 'रौद्री' और 'तामसी' कहकर उसके संहारक और आवरणकारी गुण को स्पष्ट करती है, जो साधक को अमात्र अवस्था के लिए तैयार करता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए मकार का अभ्यास 'लय' का अभ्यास है। जब साधक 'अ' और 'उ' के विस्तार से गुजरकर 'म' पर आता है, तो वह अनुभव करता है कि समस्त सृष्टि उसके भीतर सिमट रही है।
योगिक दृष्टि से इसका अभ्यास इस प्रकार है:
'म' के उच्चारण में ओष्ठों का बंद होना यह संकेत है कि अब बाहर की ओर कोई दृष्टि नहीं रखनी है। साधक अपने प्राणों को अंतर्मुखी करता है। जैसे ही ओष्ठ बंद होते हैं, ध्वनि भीतर गूँजती है और वह गूँज साधक को 'सौषुम्णा' के अनुभव में ले जाती है, जहाँ प्राण स्थिर हो जाता है।
यह अभ्यास साधक को 'स्वप्न-विकल्पों' (उकार) से निकालकर 'महानिद्रा' (सुषुप्ति) की उस भूमि पर लाता है जहाँ केवल शुद्ध अस्तित्व शेष रहता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह न तो शरीर है, न मन, बल्कि वह वह 'प्राण' है जो अब अक्षर (अमात्र) में विलीन होने को तत्पर है। यह अवस्था जाग्रत और स्वप्न के बीच के सेतु को तोड़कर साधक को पूर्ण शांति की ओर ले जाती है।
आद्या परतरा सूक्ष्मा शान्ता गान्धर्वनिरवयवा ।
अनभिलक्ष्या सौम्या मकारसंज्ञा विज्ञानाकाशसंबद्धा ॥ २.३० ॥
…उससे परतर, सूक्ष्म, शान्त, गान्धर्व रूप, निरवयव, अनभिलक्ष्य और सौम्य वाली मकारसंज्ञा विज्ञान आकाश से सम्बद्ध है।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में मकार के उस स्वरूप का वर्णन किया गया जो तामसी है, संहारक है और महानिद्रा (सुषुुप्ति) से सम्बद्ध है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य मकार के भीतर छिपे उस और भी सूक्ष्म तत्त्व की ओर संकेत कर रहे हैं, जो स्थूल लय से परे, चेतना की उस उच्च अवस्था का द्वार है जिसे 'अर्धमात्रा' कहा जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
(सा) आद्या (अस्ति), परतरा (अस्ति), सूक्ष्मा (अस्ति), शान्ता (अस्ति), गान्धर्वनिरवयवा (अस्ति), अनभिलक्ष्या (अस्ति), सौम्या (अस्ति), (सा) मकार-संज्ञा (अस्ति), (सा) विज्ञानाकाश-संबद्धा (अस्ति) ॥
पदार्थ:
• आद्या: आदि रूप; वह मूल बिंदु जहाँ से ध्वनि का उदय होता है और जहाँ अंततः सब विलीन होता है।
• परतरा: उससे भी परे; यहाँ 'उससे' का अर्थ पिछली तीन मात्राओं (अ, उ, म) से है। यह मात्रा भौतिक और मानसिक सीमाओं से ऊपर है।
• गान्धर्वनिरवयवा: 'गान्धर्व' का अर्थ यहाँ उस सूक्ष्म नाद से है जो केवल श्रुति-साधकों को सुनाई देता है (अनहद नाद); 'निरवयव' का अर्थ है जिसका कोई आकार, अंग या भौतिक ढाँचा न हो।
• अनभिलक्ष्या: जिसे बुद्धि या इंद्रियों द्वारा लक्षित न किया जा सके; जो केवल अनुभव का विषय है।
• सौम्या: अत्यंत कोमल, शांत और आनंदमय; रुद्र के 'रौद्र' रूप के विपरीत यह मकार का 'सौम्य' पक्ष है।
• मकार-संज्ञा: यहाँ पुनः 'मकार' शब्द का प्रयोग हुआ है, किंतु प्रसंगानुसार यह उस मकार की 'गूँज' या 'अर्धमात्रा' का संकेत है जो ओष्ठों के बंद होने के बाद भीतर प्रतिध्वनित होती है।
• विज्ञानाकाश-संबद्धा: विज्ञान-आकाश से सम्बद्ध; वह आकाश जो हृदय के भीतर स्थित है और जहाँ शुद्ध विज्ञान निवास करता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी यहाँ प्रणव के उस रहस्य को खोल रहे हैं जो सामान्य जप से परे, योगिक अनुभव का विषय है। पिछले श्लोक में मकार को 'तामसी' और 'रौद्री' कहा गया था, क्योंकि वह जाग्रत और स्वप्न के प्रपंचों का संहार करता है। किंतु उसी मकार के भीतर एक और सूक्ष्म स्तर है, जिसे यहाँ 'आद्या' और 'सौम्या' कहा गया है।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि प्रणव केवल तीन अक्षरों का समूह नहीं है, बल्कि एक यात्रा है। जब साधक 'म' का उच्चारण कर ओष्ठों को बंद करता है, तो ध्वनि बाहर रुक जाती है, किंतु उसके भीतर एक सूक्ष्म कंपन शेष रह जाता है। यही वह 'परतरा' और 'सूक्ष्मा' अवस्था है। यह अवस्था 'गान्धर्वनिरवयव' है, अर्थात् यह भौतिक ध्वनि नहीं, बल्कि एक दिव्य नाद है जिसका कोई आकार नहीं है।
इस अवस्था को 'अनभिलक्ष्या' इसलिए कहा गया है क्योंकि यहाँ पहुँचकर 'लक्षण' समाप्त हो जाते हैं। जब तक हम 'अ' या 'उ' में हैं, हम गुणों (सत्त्व, रज) और अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न) को पहचान सकते हैं, किंतु इस अर्धमात्रा में पहुँचते ही साधक केवल 'होने' के बोध में स्थित हो जाता है। यह 'सौम्य' है क्योंकि यहाँ संहार की पीड़ा नहीं, बल्कि विलीन होने का परम आनंद है।
महर्षि इसे 'विज्ञानाकाश-संबद्धा' कहते हैं। हृदय के भीतर जो सूक्ष्म आकाश है, जहाँ आत्मा का प्रकाश (विज्ञान) स्थित है, यह अर्धमात्रा साधक को सीधे उसी केंद्र से जोड़ देती है। यह वह संधि-स्थल है जहाँ से साधक स्थूल जगत को छोड़कर अमात्र (मात्रारहित) ब्रह्म की ओर प्रस्थान करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'नाद-योग' और 'लय-योग' का सार है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो 'अ' और 'उ' के बाद जब वह 'म' पर आता है और ओष्ठ बंद करता है, तब उसे केवल मौन नहीं, बल्कि एक गूँज का अनुभव होता है।
अभ्यास यह है कि साधक उस गूँज के पीछे छिपे 'मौन' को पकड़े। वह गूँज ही 'गान्धर्व' नाद है। जैसे-जैसे मन इस सूक्ष्म कंपन में लीन होता है, वह 'निरवयव' होने लगता है—अर्थात् मन के विचार और शरीर का बोध मिटने लगता है। यह अनुभव साधक को सुषुप्ति (महानिद्रा) से ऊपर उठाकर 'तुरीय' अवस्था की ओर ले जाता है।
यहाँ साधक का मन 'विज्ञान-आकाश' को छूता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह न शरीर है, न मन, न प्राण, बल्कि वह शुद्ध चैतन्य है। इस अभ्यास से साधक की चेतना स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अति-सूक्ष्म (अर्धमात्रा) की ओर बढ़ती है, जिससे वह अंततः अमात्र ब्रह्म में लीन होने के योग्य बनता है।
प्रपञ्चो ब्रह्मणश्चोक्तः सार्धमात्रात्रयं बुधैः ।
अउमिति तिस्रो मात्रा मकारश्चार्धमात्रकः ॥ २.३१ ॥
…बुधों ने साढ़े तीन मात्राओं के साथ ब्रह्म का प्रपञ्च कहा है; 'अ', 'उ' और 'म' ये तीन मात्राएँ हैं तथा मकार अर्धमात्रक है।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मकार के उस सूक्ष्म और सौम्य स्वरूप का उद्घाटन किया जो विज्ञान-आकाश से सम्बद्ध है। अब वे इस संपूर्ण संरचना को एक सूत्र में पिरोते हुए यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ब्रह्म का यह ध्वनि-रूप विस्तार वास्तव में कितनी मात्राओं से मिलकर बना है और इसे 'प्रपञ्च' क्यों कहा गया है।
अन्वय और पदार्थ —
बुधैः सार्धमात्रात्रयं ब्रह्मणः प्रपञ्चः चोक्तः । अ, उ, म इति तिस्रः मात्राः, (तथा) मकारः अर्धमात्रकः ॥
पदार्थ:
• बुधैः: ज्ञानियों, ऋषियों और योग-सिद्धों द्वारा।
• सार्धमात्रात्रयं: तीन मात्राओं के साथ आधी और मात्रा (अर्थात् साढ़े तीन मात्राएँ)।
• ब्रह्मणः प्रपञ्चः: ब्रह्म का प्रपञ्च; यहाँ 'प्रपञ्च' का अर्थ भौतिक जगत का भ्रम नहीं, अपितु उस एकत्व (अमात्र) का ध्वनि और चेतना के स्तर पर हुआ 'विस्तार' या 'फैलाव' है।
• अ, उ, म: प्रणव के तीन मुख्य अक्षर/ध्वनियाँ।
• मकारः अर्धमात्रकः: यहाँ 'मकार' शब्द का प्रयोग उस अनुनासिक गूँज (नाद) के लिए हुआ है जो ओष्ठों के बंद होने के बाद भी भीतर बनी रहती है, जिसे 'अर्धमात्रा' कहा गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी यहाँ प्रणव के गणितीय और आध्यात्मिक स्वरूप का समन्वय कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ज्ञानियों (बुधों) ने ब्रह्म के प्रपञ्च को साढ़े तीन मात्राओं के रूप में परिभाषित किया है।
साधारणतः 'प्रपञ्च' शब्द का प्रयोग संसार के लिए होता है, किंतु यहाँ यह ब्रह्म के उस स्वरूप के लिए प्रयुक्त है जो स्वयं को अभिव्यक्त करता है। जिस प्रकार एक बीज में संपूर्ण वृक्ष छिपा होता है, उसी प्रकार 'अमात्र' ब्रह्म जब ध्वनि के रूप में प्रकट होता है, तो वह साढ़े तीन मात्राओं के विस्तार के रूप में आता है। यह विस्तार ही 'प्रपञ्च' है।
इस प्रपञ्च के प्रथम तीन अंग 'अ', 'उ' और 'म' हैं। जैसा कि पिछले श्लोकों (२.२७–२.२९) में बताया गया, 'अ' जाग्रत अवस्था और स्थूल जगत का, 'उ' स्वप्न और सूक्ष्म जगत का, और 'म' सुषुप्ति तथा संहार का प्रतीक है। ये तीन मात्राएँ उस त्रिविध सत्ता (सत्त्व, रज, तम) का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनसे यह दृश्य और अदृश्य जगत निर्मित है।
किंतु, केवल इन तीन मात्राओं से ब्रह्म का प्रपञ्च पूर्ण नहीं होता। इन तीनों के पश्चात एक 'अर्धमात्रा' है। यह वह संधि-बिंदु है जहाँ ध्वनि समाप्त होती है और मौन आरम्भ होता है। यह मकार की वह सूक्ष्म प्रतिध्वनि है जो साधक को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर और अंततः अमात्र (बिंदु) की ओर ले जाती है। इस प्रकार, अ-उ-म (तीन पूर्ण मात्राएँ) और वह सूक्ष्म गूँज (अर्धमात्रा) मिलकर ब्रह्म के उस ध्वनि-रूप विस्तार को पूर्ण करते हैं जिसे हम 'ॐ' कहते हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस मत की पुष्टि गोपथ ब्राह्मण में भी मिलती है:
इन्द्रः प्रजापतिं अपृच्छत् भगवन्नभिष्टूय पृच्छामीति पृच्छ वत्सेत्यब्रवीत् किं अयं ओंकारः कस्यः पुत्रः किं चैतच्छन्दः किं चैतद्वर्णः किं चैतद्ब्रह्मा ब्रह्म सम्पद्यते तस्माद्वै तद्भद्रं ओंकारं पूर्वं आलेभे स्वरितोदात्त एकाक्षर ओंकार ऋग्वेदे त्रैस्वर्योदात एकाक्षर ओंकारो यजुर्वेदे दीर्घप्लुतोदात्त एकाक्षर ओंकारः सामवेदे ह्रस्वोदात्त एकाक्षर ओंकारोऽथर्ववेदे उदात्तोदात द्विपद अ उ इत्यर्धचतस्रो मात्रा मकारे व्यञ्जनं इत्याहुः या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवत्या रक्ता वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्ब्राह्मं पदम् या सा द्वितीया मात्रा विष्णुदेवत्या कृष्णा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्वैष्णवं पदम् या सा तृतीया मात्रैशानदेवत्या कपिला वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पदम् या सार्धचतुर्थी मात्रा सर्वदेवत्या व्यक्तीभूता खं विचरति शुद्धस्फटिकसन्निभा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेत्पदं अनामकम् ओंकारस्य चोत्पत्तिः विप्रो यो न जानाति तत्पुनरुपनयनम् तस्माद्ब्राह्माणवचनं आदर्तव्यं यथा लातव्यो गोत्रो ब्रह्मणः पुत्रः गायत्रं च्छन्दः शुक्लो वर्णः पुंसो वत्सः रुद्रो देवता ओंकारो वेदानां ॥ १.२५ ॥
इन्द्रने प्रजापतिसे पूछा — "भगवन्, स्तुति करके पूछता हूँ" — "पूछो, वत्स।" — "यह ओंकार क्या है? किसका पुत्र है? इसका छन्द क्या, वर्ण क्या? यह ब्रह्म कैसे होता है?" … ऋग्वेदमें ओंकार स्वरित-उदात्त एकाक्षर है, यजुर्वेदमें त्रैस्वर्य-उदात्त, सामवेदमें दीर्घ-प्लुत-उदात्त, अथर्ववेदमें ह्रस्व-उदात्त। "अ" और "उ" — (ये) साढ़े तीन मात्राएँ, और मकारमें व्यञ्जन — ऐसा कहते हैं। जो पहली मात्रा है, उसकी देवता ब्रह्मा है, वर्ण लाल — जो उसका नित्य ध्यान करता है वह ब्राह्म पदको जाता है। दूसरी मात्राकी देवता विष्णु, वर्ण कृष्ण — उसका ध्यान करनेवाला वैष्णव पदको जाता है। तीसरी मात्राकी देवता ईशान, वर्ण कपिल — उसका ध्यान करनेवाला ऐशान पदको जाता है। जो आधी चौथी मात्रा है, वह सब देवतावाली है, व्यक्त होकर आकाशमें विचरती है, वर्णमें शुद्ध स्फटिकके समान — उसका नित्य ध्यान करनेवाला नामरहित पदको जाता है। जो विप्र ओंकारकी उत्पत्ति नहीं जानता, उसका फिरसे उपनयन (होना चाहिए); इसलिए ब्राह्मण-वचनका आदर करना चाहिए … ओंकार वेदोंका (मुख्य) है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि "अ और उ — (ये) साढ़े तीन मात्राएँ, और मकार में व्यञ्जन — ऐसा कहते हैं।" गोपथ ब्राह्मण में इस अर्ध-चतुर्थी मात्रा को 'सर्वदेवत्या' (सभी देवताओं का स्वरूप) और 'शुद्ध स्फटिक के समान' बताया गया है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गोपथ ब्राह्मण दोनों इस बात पर सहमत हैं कि प्रणव केवल तीन अक्षरों का समूह नहीं है, बल्कि उसमें एक चौथी 'आधी' मात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जहाँ तीन मात्राएँ विशिष्ट देवतओं और गुणों (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र) से जुड़ी हैं, वहीं यह अर्धमात्रा उस 'नामरहित पद' (अनाम पद) की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विस्तार' से 'संकुचन' की प्रक्रिया सिखाता है। साधक जब 'अ' का उच्चारण करता है, तो वह अपनी चेतना को जाग्रत अवस्था में स्थित करता है; 'उ' के साथ वह सूक्ष्म मानसिक स्तर पर जाता है, और 'म' के साथ वह अपनी चेतना को भीतर की ओर समेटता है (लय करता है)।
परंतु, वास्तविक योग तब आरम्भ होता है जब वह 'अर्धमात्रा' का अनुभव करता है। यह अर्धमात्रा वह 'नाद' है जो ओष्ठों के बंद होने के बाद भी मस्तिष्क के ऊपरी भाग (मूर्धा) में गूँजता रहता है। साधक के लिए यह अभ्यास इस प्रकार है:
१. अ-उ-म: यह स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा है।
२. अर्धमात्रा: यह वह द्वार है जहाँ साधक 'वाच्य' (बोले जाने वाले शब्द) से 'वाचक' (शब्द के अर्थ/ब्रह्म) की ओर मुड़ता है।
जब साधक इस साढ़े तीन मात्राओं के प्रपञ्च को समझ लेता है, तब वह जान पाता है कि उसकी चेतना कैसे जाग्रत → स्वप्न → सुषुप्ति से होते हुए 'तुरीय' (अर्धमात्रा) की ओर बढ़ती है। इस अभ्यास से साधक 'प्रपञ्च' (विस्तार) के भीतर रहते हुए भी 'अमात्र' (एकत्व) की खोज करना सीखता है। यह श्लोक साधक को इस भूमि पर लाता है जहाँ वह ध्वनि के माध्यम से ध्वनि-रहित (निःशब्द) ब्रह्म की तैयारी करता है।
तिस्रो मात्रा लयं यान्ति अर्धमात्रे न संशयः ।
अर्धमात्रात्वमात्रे तु लयं याति निरामये ॥ २.३२ ॥
तीनों मात्राएँ अर्धमात्रामें लय होती हैं, इसमें संशय नहीं; और अर्धमात्रा निर्मल अमात्र (मात्रारहित) में लय होती है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के प्रपञ्च को साढ़े तीन मात्राओं के रूप में स्पष्ट किया, जिसमें 'अ', 'उ' और 'म' तीन पूर्ण मात्राएँ हैं और एक सूक्ष्म मकार अर्धमात्रा है। अब वे इस विस्तार के संकोच की प्रक्रिया, अर्थात् लय के क्रम का वर्णन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
तिस्रः मात्राः अर्धमात्रे लयं यान्ति, (तत्र) न संशयः । अर्धमात्रा तु निरामये अमात्रे लयं याति ॥
पदार्थ:
• तिस्रः मात्राः: अ, उ और म — ये तीनों स्थूल और सूक्ष्म ध्वनियाँ।
• अर्धमात्रे: उस सूक्ष्म नाद या गूँज में जो मकार के अंत में शेष रहती है।
• लयं यान्ति: विलीन हो जाते हैं; अपनी मूल अवस्था में लौट जाते हैं।
• न संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं है; यह एक निश्चित योगिक सत्य है।
• निरामये: रोगरहित, दोषरहित, या पूर्णतः शुद्ध अवस्था। यहाँ 'निरामय' का अर्थ है वह अवस्था जहाँ द्वैत, विकार और वृत्तियों का अभाव है।
• अमात्रे: मात्रा-रहित; वह शून्य या पूर्णता जहाँ ध्वनि का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्रणव की साधना के 'लय-क्रम' का रहस्य खोल रहे हैं। उन्होंने पिछले श्लोकों में बताया कि ब्रह्म का विस्तार (प्रपञ्च) साढ़े तीन मात्राओं में हुआ है। अब वे बता रहे हैं कि साधक को इस विस्तार से वापस केंद्र की ओर कैसे लौटना है।
वे कहते हैं कि 'अ', 'उ' और 'म' की तीन मात्राएँ—जो क्रमशः जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं और वाक्, मन तथा प्राण के अधिष्ठाता हैं—वे अंततः उस 'अर्धमात्रा' में विलीन हो जाती हैं। यहाँ 'लय' का अर्थ केवल ध्वनि का रुकना नहीं, अपितु चेतना का सूक्ष्म होना है। जब साधक 'अ' से 'उ' और 'उ' से 'म' की यात्रा करता है, तो वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है। अंत में, जब 'म' की ध्वनि समाप्त होती है, तो एक ऐसी सूक्ष्म गूँज शेष रहती है जो सुनाई नहीं देती, केवल अनुभव होती है; यही अर्धमात्रा है। यह अर्धमात्रा उन तीनों मात्राओं का सार है, इसलिए तीनों इसमें लय हो जाती हैं।
इसके पश्चात, यह अर्धमात्रा भी 'निरामय अमात्र' में विलीन हो जाती है। 'अमात्र' वह स्थिति है जहाँ ध्वनि का कोई आधार नहीं रहता, जहाँ नाद भी शांत हो जाता है। इसे 'निरामय' इसलिए कहा गया है क्योंकि यहाँ पहुँचकर साधक समस्त मानसिक विकारों, शारीरिक व्याधियों और अविद्या के रोगों से मुक्त हो जाता है। यह वह बिंदु है जहाँ 'प्रपञ्च' (विस्तार) का 'उपशम' (शांत होना) हो जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रारहित चौथा है — व्यवहारसे परे, प्रपञ्चका उपशम, शिव, अद्वैत। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है; जो ऐसा जानता है, वह आत्मासे आत्मामें प्रवेश करता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में कहा गया है कि चौथा पद 'अमात्र' है, जो व्यवहार से परे और प्रपञ्च का उपशम है। वह शिव और अद्वैत है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक माण्डूक्य के इसी सिद्धांत का क्रियात्मक विस्तार है। जहाँ उपनिषद् अमात्र को 'प्रपञ्चोपशम' कहता है, वहीं यह स्मृति उस उपशम तक पहुँचने की विधि बताती है—पहले तीन मात्राओं का अर्धमात्रा में लय, और फिर अर्धमात्रा का अमात्र में लय। स्मृति यहाँ यह स्पष्ट करती है कि अमात्र तक पहुँचने के लिए अर्धमात्रा का सेतु अनिवार्य है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक जप की दिशा और अनुभव का मानचित्र है। प्रणव जप केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि चेतना का प्रत्याहार है।
इसका अभ्यास इस क्रम में होता है:
१. वाचन (बोलना): 'अ', 'उ', 'म' का उच्चारण करते समय साधक स्थूल जगत और प्राणिक ऊर्जा को जाग्रत करता है।
२. नाद (गूँज): जब मकार की ध्वनि समाप्त होती है और केवल एक सूक्ष्म कंपन शेष रहता है, तब साधक 'अर्धमात्रा' के अनुभव में स्थित होता है। यह वह भूमि है जहाँ मन शांत होने लगता है और अंतर्मुखता गहन होती है।
३. मौन (अमात्र): अंत में, जब वह सूक्ष्म गूँज भी शून्य में विलीन हो जाती है, तब साधक 'अमात्र' की स्थिति में पहुँचता है। यह पूर्ण मौन है, किंतु यह शून्यता नहीं, बल्कि पूर्णता है।
साधक इस अभ्यास से 'सगुण' से 'निर्गुण' की ओर जाता है। तीन मात्राओं का लय होना अर्थात् जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) का विलीन होना है। अर्धमात्रा का अमात्र में लय होना अर्थात् तुरीय अवस्था का साक्षात्कार करना है। इस प्रकार साधक ध्वनि के माध्यम से उस 'अक्षर' (अविनाशी) को प्राप्त करता है, जो याज्ञवल्क्य की श्रुति का मूल लक्ष्य है।
अकारे पीड्यमाने तु उकारं प्रतिपद्यते ।
उकारे पीड्यमाने तु मकारं प्रतिपद्यते ॥ २.३३ ॥
अकार के दबाए जाने पर उकार को प्राप्त होता है और उकार के दबाए जाने पर मकार को प्राप्त होता है।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के लय-क्रम को स्पष्ट किया कि कैसे तीन मात्राएँ अर्धमात्रा में और अर्धमात्रा अमात्र में विलीन होती हैं। अब इस श्लोक में वे उस विलीनीकरण की व्यावहारिक प्रक्रिया, अर्थात् एक मात्रा से दूसरी मात्रा में प्रवेश करने की विधि का वर्णन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अकारे पीड्यमाने तु उकारं प्रतिपद्यते । उकारे पीड्यमाने तु मकारं प्रतिपद्यते ॥
पदार्थ:
• अकारे पीड्यमाने: जब 'अ' कार की ध्वनि को दबाया जाता है या उसे पूर्ण कर संकुचित किया जाता है।
• तु: तो, परंतु (यहाँ यह एक अवस्था से दूसरी अवस्था में संक्रमण का सूचक है)।
• उकारं प्रतिपद्यते: तब साधक 'उ' कार की ध्वनि और उसकी अवस्था को प्राप्त होता है।
• उकारे पीड्यमाने: जब 'उ' कार की ध्वनि को दबाया जाता है या संकुचित किया जाता है।
• मकारं प्रतिपद्यते: तब 'म' कार की ध्वनि और उसकी अवस्था को प्राप्त होता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्रणव के उच्चारण और उसके पीछे छिपे योगिक संकोच के रहस्य को समझा रहे हैं। यहाँ 'पीड्यमाने' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्य भाषा में 'पीडन' का अर्थ कष्ट देना होता है, किंतु योग और मन्त्र-शास्त्र में इसका अर्थ है—ध्वनि को दबाकर उसे सूक्ष्म करना या एक मात्रा को पूर्ण कर उसकी ऊर्जा को अगली सूक्ष्म अवस्था में धकेलना।
ऋषि कहते हैं कि जब साधक 'अ' कार का उच्चारण करता है, तो वह स्थूल जगत और जाग्रत अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। जब इस 'अ' कार को 'पीडित' किया जाता है, अर्थात् उसकी बाहरी ध्वनि को धीरे-धीरे संकुचित कर भीतर की ओर मोड़ा जाता है, तब वह स्वतः 'उ' कार में परिवर्तित हो जाता है। यह केवल ध्वनि का परिवर्तन नहीं है, अपितु चेतना का स्थूल (अकार/वाक्) से सूक्ष्म (उकार/मन) की ओर प्रस्थान है।
इसी प्रकार, जब 'उ' कार की ध्वनि को दबाया जाता है, तो साधक 'म' कार को प्राप्त होता है। यहाँ 'उ' (स्वप्न/मन) का लय होकर 'म' (सुषुप्ति/प्राण) में प्रवेश होना दर्शाया गया है। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि प्रणव का जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि एक क्रमिक आरोहण है, जहाँ प्रत्येक मात्रा पिछली मात्रा के विलीनीकरण से उत्पन्न होती है। यह एक ऐसी सीढ़ी है जिसमें साधक स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अर्थ 'ध्वनि के भीतर सरकना' है। योग-अभ्यास में जब हम ओंकार का जप करते हैं, तो 'अ' से 'उ' और 'उ' से 'म' तक जाने की प्रक्रिया में मन को बाहर से भीतर की ओर खींचना होता है।
'पीड्यमाने' का योगिक अनुभव यह है कि साधक अपनी चेतना को बाहरी जगत (अकार) से समेटकर, उसे मानसिक धरातल (उकार) पर लाता है और फिर उसे प्राणिक गहराई (मकार) में विलीन कर देता है। यह अभ्यास साधक को जाग्रत भूमि से स्वप्न भूमि और फिर सुषुप्ति भूमि की ओर ले जाता है। यहाँ 'दबाने' का अर्थ किसी शारीरिक बन्ध से नहीं, बल्कि ध्वनि के दबाव और एकाग्रता से है। जब 'अ' की गूँज को भीतर दबाया जाता है, तो वह 'उ' बन जाती है; जब 'उ' की गूँज को और अधिक सूक्ष्म किया जाता है, तो वह 'म' की गंभीर नाद-ध्वनि में बदल जाती है। इस प्रकार साधक अपनी चेतना को संकुचित करते हुए उस बिंदु की ओर बढ़ता है जहाँ समस्त प्रपञ्च लय हो जाता है।
मकारे पीड्यमाने तु अर्धमात्रा तदा भवेत् ।
जिह्वायां पीड्यमानायां निरालम्बं तदा भवेत् ॥ २.३४ ॥
…मकार के दबाए जाने पर तब अर्धमात्रा होती है; जिह्वा के दबाए जाने पर तब निरालम्ब अवस्था होती है।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि किस प्रकार 'अ' से 'उ' और 'उ' से 'म' की यात्रा ध्वनि के संकोच (पीडन) से संभव होती है। अब इस श्लोक में वे इस प्रक्रिया के अंतिम दो चरणों का रहस्य खोल रहे हैं, जहाँ ध्वनि सूक्ष्म होकर अर्धमात्रा बनती है और अंततः सहारा-रहित (निरालम्ब) होकर शून्य में विलीन हो जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
मकारे पीड्यमाने तु अर्धमात्रा तदा भवेत् । जिह्वायां पीड्यमानायां निरालम्बं तदा भवेत् ॥
पदार्थ:
• मकारे पीड्यमाने: जब 'म' कार की ध्वनि को दबाया जाता है या संकुचित किया जाता है।
• तु: तब।
• अर्धमात्रा तदा भवेत्: तब वह (अवस्था) अर्धमात्रा बन जाती है।
• जिह्वायां पीड्यमानायां: जब जिह्वा (जीभ) को दबाया जाता है, अर्थात् उसे पूरी तरह स्थिर कर दिया जाता है।
• निरालम्बं तदा भवेत्: तब वह अवस्था निरालम्ब (बिना किसी आधार या सहारे की) हो जाती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि प्रणव के उच्चारण की उस पराकाष्ठा का वर्णन कर रहे हैं जहाँ शब्द का अस्तित्व समाप्त होने लगता है। पिछले श्लोक में हमने देखा कि 'अ' और 'उ' के पीडन से हम 'म' तक पहुँचे। यहाँ ऋषि कहते हैं कि जब इस 'म' कार की ध्वनि को भी पीडित किया जाता है—अर्थात् जब होंठों के बीच गूँज रही उस ध्वनि को और अधिक सूक्ष्म और संकुचित किया जाता है—तब वह 'अर्धमात्रा' में परिवर्तित हो जाती है।
यह अर्धमात्रा वह संधि-स्थल है जहाँ स्थूल ध्वनि समाप्त होती है और सूक्ष्म स्पंदन आरम्भ होता है। 'म' कार जहाँ सुषुप्ति और संहार का प्रतीक है, वहीं उसका पीडन साधक को उस बिंदु पर ले जाता है जहाँ प्रपञ्च का पूर्ण लय हो चुका है, किंतु अभी पूर्ण शून्य (अमात्र) की प्राप्ति शेष है।
इसके पश्चात ऋषि एक अत्यंत गूढ़ शारीरिक और योगिक क्रिया का संकेत देते हैं: 'जिह्वायां पीड्यमानायां'। यहाँ जिह्वा का पीडन उसके भौतिक दबाव से अधिक उसके 'स्थिर' होने का संकेत है। जब जिह्वा तालु या मुख के भीतर पूरी तरह स्थिर हो जाती है और किसी भी अक्षर के उच्चारण के लिए विचलित नहीं होती, तब ध्वनि का भौतिक आधार (आलम्बन) समाप्त हो जाता है।
जब जिह्वा स्थिर होती है, तब शब्द का सहारा चला जाता है। इसी अवस्था को ऋषि 'निरालम्ब' कह रहे हैं। निरालम्ब वह स्थिति है जहाँ न कोई ध्वनि है, न कोई विचार और न ही कोई भौतिक सहारा। यह वह बिंदु है जहाँ साधक 'अमात्र' या 'तुरीय' अवस्था में प्रवेश करता है। यहाँ 'पीडन' का अर्थ है—इन्द्रियों और अंगों की ऐसी स्थिरता कि वे अब बाह्य जगत के लिए नहीं, बल्कि अन्तर्यामी पुरुष के साक्षात्कार के लिए समर्पित हो जाएँ।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक ध्वनि-योग से शून्य-योग की ओर ले जाने वाला सेतु है।
१. मकार का पीडन: जब साधक 'म' का उच्चारण करते हुए उसे भीतर की ओर खींचता है, तो वह अनुभव करता है कि उसकी चेतना संकुचित होकर एक बिंदु में सिमट रही है। यह अभ्यास साधक को 'साक्षी' भाव की ओर ले जाता है, जहाँ वह देखता है कि ध्वनि अब शब्द नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म कंपन मात्र रह गई है। यह 'अर्धमात्रा' की भूमि है।
२. जिह्वा का स्थिर होना: योग में जिह्वा का स्थिर होना (जैसे खेचरी मुद्रा या जिह्वा-न्यास में होता है) वाणी के प्रवह को रोकने का साधन है। जब जिह्वा स्थिर होती है, तो 'वाक्' का बाहरी मार्ग बंद हो जाता है और ऊर्जा का प्रवाह ऊपर की ओर मुड़ जाता है।
३. निरालम्ब अवस्था: जब शब्द का सहारा (आलम्ब) छिन जाता है, तब मन विचलित होने के बजाय उस निशब्दता में लीन होने लगता है। यह 'निरालम्ब' अवस्था ही वह भूमि है जहाँ साधक अनुभव करता है कि वह न शरीर है, न प्राण है और न ही मन; वह केवल वह 'अक्षर' है जो अविनाशी है।
इस अभ्यास से साधक 'सगुण' (ध्वनि युक्त) से 'निर्गुण' (ध्वनि रहित) की ओर बढ़ता है। यह यात्रा जाग्रत → स्वप्न → सुषुप्ति से होते हुए 'तुरीय' (अमात्र) की ओर जाने की व्यावहारिक विधि है। यहाँ जिह्वा का रुकना केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि संसार के समस्त आलम्बनों का त्याग है।
एकमात्रं द्विमात्रं च त्रिमात्रं कृत्स्नमेव च ।
ह्रस्वदीर्घप्लुतं शान्तं शान्तेन मनसोद्धरेत् ॥ २.३५ ॥
एकमात्र, द्विमात्र, त्रिमात्र और पूर्ण ही; ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और शान्त को शान्त मन से ऊपर उठाये...
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के उच्चारण की उस पराकाष्ठा का वर्णन किया जहाँ ध्वनि का आधार (अलंभन) समाप्त हो जाता है और साधक निरालम्ब अवस्था को प्राप्त होता है। अब इस श्लोक में वे ओंकार के विभिन्न विन्यासों और उनकी गतियों का वर्णन करते हुए यह बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया का चरम लक्ष्य 'शान्त' अवस्था को प्राप्त करना है।
अन्वय और पदार्थ —
एकमात्रं, द्विमात्रं च, त्रिमात्रं (ओंकारः), कृत्स्नमेव च (भवति) । ह्रस्वं, दीर्घं, प्लुतं, शान्तं (च), शान्तेन मनसा (तस्य) उध्ररेत् ॥
पदार्थ:
• एकमात्रं, द्विमात्रं, त्रिमात्रं: एक मात्रा वाला, दो मात्राओं वाला और तीन मात्राओं वाला ओंकार।
• कृत्स्नमेव च: और पूर्ण (समग्र) ओंकार भी।
• ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत: उच्चारण की तीन गतियाँ—कम समय (ह्रस्व), मध्यम समय (दीर्घ) और अधिक समय (प्लुत)।
• शान्त: वह अवस्था जो ध्वनि से परे है, जहाँ स्पंदन स्थिर हो जाता है।
• शान्तेन मनसोद्धरेत्: शान्त मन के द्वारा उस (शान्त अवस्था) को ऊपर उठाना चाहिए या उसमें प्रवेश करना चाहिए।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्रणव के प्रयोग की विविधता और उसकी सूक्ष्मता का विवेचन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि साधक अपनी आवश्यकता और साधना की भूमि के अनुसार ओंकार का प्रयोग एकमात्र, द्विमात्र या त्रिमात्र रूप में करता है। यहाँ 'मात्रा' केवल समय की इकाई नहीं, अपितु चेतना के स्तर हैं। एकमात्र ओंकार केवल 'अ' (जाग्रत) का बोध है, द्विमात्र 'अ-उ' (जाग्रत-स्वप्न) का, और त्रिमात्र 'अ-उ-म' (जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति) का। जब ये तीनों मात्राएँ अपने पूर्ण विस्तार और लय के साथ एक साथ अनुभव होती हैं, तब वह 'कृत्स्न' अर्थात् पूर्ण ओंकार कहलाता है।
इसके पश्चात ऋषि उच्चारण की तीन गतियों का उल्लेख करते हैं—ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत। यह व्याकरणिक विधि मात्र नहीं है, अपितु प्राण के विस्तार की विधि है। ह्रस्व उच्चारण में प्राण का संकोच होता है, दीर्घ में उसका विस्तार और प्लुत में उसका पूर्ण प्रवाह। यह गतियाँ साधक को स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म ध्वनि की ओर ले जाती हैं।
किंतु, इन सबके उपरान्त एक चौथी अवस्था है—'शान्त'। यह वह बिंदु है जहाँ ध्वनि का कंपन पूरी तरह समाप्त हो जाता है और केवल मौन शेष रहता है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि इस 'शान्त' ओंकार को वाणी के उच्चारण से प्राप्त नहीं किया जा सकता। वाणी केवल ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत तक ले जा सकती है। 'शान्त' को केवल 'शान्तेन मनसा' अर्थात् शान्त मन से ही 'उद्धरेत्'—अर्थात् ऊपर उठाया जा सकता है या उस शून्य में विलीन हुआ जा सकता है। भाव यह है कि जब मन की चंचलता समाप्त हो जाती है, तब वह मौन ओंकार स्वतः प्रकट होता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक ध्वनि-योग से मौन-योग की ओर संक्रमण का मार्ग है। अभ्यास की दृष्टि से साधक पहले ओंकार को ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत रूप में जपता है, जिससे उसके भीतर के प्राण और मन की तरंगें लय होने लगती हैं।
यहाँ रहस्य यह है कि 'शान्त' ओंकार कोई शब्द नहीं, बल्कि एक अनुभूति है। जब साधक 'म' कार के बाद आने वाले उस अंतराल में ठहरता है, जहाँ ध्वनि समाप्त हो चुकी है किंतु शांति अभी पूर्णतः व्याप्त नहीं हुई, तब वह 'शान्त मन' का प्रयोग करता है। वह मन को ध्वनि के सहारे नहीं, बल्कि ध्वनि के अभाव के सहारे ऊपर उठाता है।
यह अभ्यास साधक को 'वाच्य' (जो कहा जा सके) से 'अवाच्य' (जो कहा न जा सके) की ओर ले जाता है। जब साधक शान्त मन से उस मौन को 'उठाता' है, तब वह मात्रों के बंधन से मुक्त होकर अमात्र अवस्था में स्थित हो जाता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक केवल ओंकार को सुनता नहीं, बल्कि स्वयं ओंकार हो जाता है।
समाहितमना भूत्वा तत्त्वध्यानपरायणः ।
ओंकारं यस्त्वभिध्यायेदध्यात्मैक इति स्मृतः ॥ २.३६ ॥
समाहित मनवाला होकर तत्त्वध्यान में तत्पर, जो ओंकार का ध्यान करता है, वह अध्यात्ममें एकनिष्ठ कहा गया है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के उच्चारण की विभिन्न गतियों और अंततः 'शान्त' अवस्था में मन को उठाने की विधि बताई। अब इस श्लोक में वे उस मानसिक स्थिति और ध्यान की प्रविधि का वर्णन कर रहे हैं, जिससे ओंकार का जप मात्र एक ध्वनि न रहकर साधक को अध्यात्म की पराकाष्ठा तक ले जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
समाहितमना भूत्वा तत्त्वध्यानपरायणः, यस्त्व ओंकारं अभिध्यायेत्, (सः) अध्यात्मैक इति स्मृतः ॥
पदार्थ:
• समाहितमना: वह मन जो अपनी समस्त वृत्तियों को समेटकर एक केंद्र पर स्थित हो गया हो।
• तत्त्वध्यानपरायणः: जो केवल बाहरी रूप या ध्वनि का नहीं, अपितु उस तत्व (ब्रह्म/अक्षर) का ध्यान करने में तत्पर है जिसमें सब लीन है।
• अभिध्यायेत्: गहनता से ध्यान करना या उस सत्य का साक्षात्कार करने का प्रयास करना।
• अध्यात्मैक: 'अध्यात्म' (आत्मा में स्थित) और 'एक' (एकनिष्ठ)। वह जिसकी चेतना अब द्वैत से मुक्त होकर केवल अपनी आत्मा में एक हो गई है।
• स्मृतः: शास्त्र-प्रमाणित या मान्यता प्राप्त।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ओंकार-साधना के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्ष को उद्घाटित कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि ओंकार का ध्यान केवल होंठों से शब्द का उच्चारण करना नहीं है, बल्कि यह 'समाहित मन' की एक प्रक्रिया है।
जब साधक 'समाहितमना' होता है, तब उसका मन बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो जाता है। यहाँ 'समाहित' होने का अर्थ है—मन का वह स्तर जहाँ वह छिन्न-भिन्न नहीं है, बल्कि एक बिंदु पर केंद्रित है। इसके पश्चात साधक 'तत्त्वध्यानपरायण' होता है। तत्त्वध्यान का अर्थ है—ध्वनि के पीछे छिपे उस मौन और उस अक्षर का ध्यान करना, जो समस्त सृष्टि का बीज है। यदि साधक केवल 'अ-उ-म' की ध्वनियों में उलझा रहे, तो वह केवल वाक्-शक्ति का अभ्यास कर रहा है; परंतु जब वह इन मात्राओं के माध्यम से उस 'तत्व' की ओर बढ़ता है जो इन मात्राओं का आधार है, तब वह वास्तव में ओंकार का 'अभिध्यान' करता है।
जो साधक इस विधि से ओंकार में लीन होता है, उसे 'अध्यात्मैक' कहा गया है। इसका रहस्य यह है कि ओंकार स्वयं आत्मा का नाद है। जब साधक ओंकार का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में अपनी ही आत्मा के स्वरूप को पहचानता है। यहाँ 'अध्यात्मैक' होने का अर्थ है—साधक की चेतना का उस बिंदु पर पहुँच जाना जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है और केवल एक ही सत्ता शेष रहती है। यह अवस्था उस साधक की है जिसने स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अमात्र (अक्षर) की यात्रा पूर्ण कर ली है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओंकार के माध्यम से परम पुरुष के साक्षात्कार की यह बात अन्य उपनिषदों में भी प्रमाणित है:
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः ॥ ५.५ ॥
पर जो इसी तीन मात्राओंवाले 'ॐ' अक्षरसे परम पुरुषका ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यमें सम्पन्न (एक) होता है।
यह ग्रन्थ स्पष्ट करता है कि जब साधक तीन मात्राओं वाले ओंकार से परम पुरुष का ध्यान करता है, तो वह सूर्य के तेज में संपन्न हो जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और प्रश्न उपनिषद् यहाँ एक ही सत्य को कह रहे हैं—कि ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु उस परम पुरुष (आत्मा) तक पहुँचने का साधन है। जहाँ स्मृति 'अध्यात्मैक' होने की बात करती है, वहीं प्रश्न उपनिषद् उसे 'तेजसि सूर्ये सम्पन्नः' कहकर उस अवस्था की ज्योतिर्मयता का वर्णन करता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'जप' से 'ध्यान' की ओर संक्रमण का सूत्र है। साधक के लिए यहाँ दो स्तरों का अभ्यास है:
प्रथम, मन का समाहित होना: बिखरा हुआ मन केवल ध्वनि जपता है, वह ओंकार नहीं जपता। जब तक मन में विचार चल रहे हैं, तब तक ओंकार केवल एक शब्द है। साधक को अभ्यास करना चाहिए कि जैसे-जैसे ओंकार की ध्वनि गूँजे, मन की अन्य सभी वृत्तियाँ उस ध्वनि में विलीन होती जाएँ।
द्वितीय, तत्त्व-निरूपण: साधक को यह अनुभव करना है कि 'अ' से 'उ' और 'उ' से 'म' की यात्रा वास्तव में जाग्रत से स्वप्न और स्वप्न से सुषुप्ति की ओर जाना है। जब वह मकार के बाद आने वाले उस मौन (अर्धमात्रा) में स्थित होता है, तब वह 'तत्त्वध्यान' में होता है।
इस अभ्यास से साधक 'साधक' से 'सिद्ध' की भूमि की ओर बढ़ता है। वह इस अनुभव को प्राप्त करता है कि ओंकार बाहर कहीं नहीं, बल्कि उसके अपने हृदय का स्पंदन है। जब वह इस एकनिष्ठता (अध्यात्मैक) को प्राप्त करता है, तब उसकी चेतना का विस्तार संपूर्ण ब्रह्माण्ड में हो जाता है, क्योंकि उसने उस एक अक्षर को पकड़ लिया है जिसमें संपूर्ण जगत समाहित है।
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति
तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति ।
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ २.३७ ॥
सब वेद जिस पद का प्रतिपादन करते हैं, सब तप जिसे बताते हैं, जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, वह पद मैं तुम्हें संक्षेप में कहता हूँ — "ॐ" इति।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के उच्चारण की गतियों और 'शान्त' अवस्था में मन को उठाने की विधि बताकर साधक को 'अध्यात्मैक' होने का मार्ग दिखाया। अब इस श्लोक में वे उस लक्ष्य की व्यापकता को सिद्ध करने के लिए श्रुति के प्रमाण को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो कि ओंकार कोई साधारण मन्त्र नहीं, अपितु समस्त वैदिक साधनाओं का चरम बिंदु है।
अन्वय और पदार्थ —
सर्वे वेदा यत् पदम् आमनन्ति, तपांसि सर्वाणि च यत् वदन्ति, (यस्य) इच्छन्तः ब्रह्मचर्यं चरन्ति, तत् पदं ते सङ्ग्रहेण ब्रवीमि — "ॐ" इति ॥
पदार्थ:
• आमनन्ति: बार-बार कहना, प्रतिपादन करना या लक्ष्य मानना।
• तपांसि: तपस्या, तप के विभिन्न प्रकार और उनके द्वारा प्राप्त होने वाली आंतरिक अग्नि।
• इच्छन्तः: यहाँ 'इच्छा' का अर्थ कामना नहीं, अपितु उस परम लक्ष्य की तीव्र जिज्ञासा और उसे पाने का संकल्प है।
• ब्रह्मचर्यं चरन्ति: केवल शारीरिक संयम नहीं, अपितु चेतना को 'ब्रह्म' की ओर ले जाने वाला आचरण।
• सङ्ग्रहेण: संक्षेप में, सार रूप में। जब विस्तार बहुत अधिक हो, तब उस पूरे विस्तार को एक बिंदु में समेट देना 'संग्रह' है।
• ब्रवीमि: मैं कहता हूँ (यहाँ वक्ता महर्षि याज्ञवल्क्य हैं, जो श्रुति के वचन को दोहरा रहे हैं)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ने कठोपनिषद् के उस महान सत्य को उद्धृत किया है, जहाँ यमराज नचिकेता को जीवन और मृत्यु के पार के रहस्य का बोध कराते हैं। इस श्लोक का मूल भाव यह है कि संसार में जितने भी आध्यात्मिक मार्ग हैं—चाहे वे वेदों के कर्मकाण्ड हों, तप की कठिन साधनाएँ हों या ब्रह्मचर्य का अनुशासन—उन सबका गंतव्य एक ही है।
ऋषि कहते हैं कि 'सर्वे वेदा यत्पदम् आमनन्ति'—अर्थात चारों वेदों का अंतिम लक्ष्य, उनके समस्त मन्त्रों का निचोड़ और उनके द्वारा संकेतित वह परम पद क्या है? वह है 'ॐ'। वेद केवल शब्दों का समूह नहीं हैं, वे उस एक अक्षर की ओर ले जाने वाली सीढ़ियाँ हैं। इसी प्रकार, 'तपांसि सर्वाणि'—सभी प्रकार के तप, चाहे वे शारीरिक हों, मानसिक हों या प्राणिक, अंततः साधक को उसी मौन और अक्षर की स्थिति में पहुँचाने के लिए हैं।
यहाँ 'ब्रह्मचर्य' का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधक जब ब्रह्मचर्य का पालन करता है, तो वह केवल इंद्रिय-निग्रह नहीं कर रहा होता, बल्कि वह उस 'पद' की इच्छा करता है जहाँ वह स्वयं ब्रह्ममय हो जाए। यह इच्छा ही उसे अनुशासन में बाँधती है। याज्ञवल्क्य जी स्पष्ट करते हैं कि इन सभी विस्तृत मार्गों का सार (सङ्ग्रहेण) केवल एक शब्द में समाहित है—"ॐ"। यह इस बात का प्रमाण है कि ओंकार वह कुंजी है जो वेदों, तप और संयम के बंद द्वारों को एक साथ खोल देती है। बाहरी विधि (वेद, तप, ब्रह्मचर्य) जब भीतर की ओर मुड़ती है, तो वह 'ॐ' के रूप में प्रकट होती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १.२.१५ ॥
सब वेद जिस पदका बार-बार वर्णन करते हैं, सब तप जिसे कहते हैं, जिसकी इच्छासे (साधक) ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं — वह पद मैं तुम्हें संक्षेपमें कहता हूँ: वह 'ओम्' है।
कठोपनिषद् का यह अंश स्पष्ट करता है कि 'ओम्' वह पद है जिसकी प्राप्ति के लिए समस्त वैदिक अनुशासन रचे गए हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस श्रुति-वचन को यहाँ इसलिए लाती है ताकि साधक को यह विश्वास हो सके कि वह जिस ओंकार का अभ्यास कर रहा है, वह किसी एक संप्रदाय या विधि का हिस्सा नहीं, बल्कि समस्त ऋषियों और वेदों का साझा लक्ष्य है। जहाँ उपनिषद् इसे एक 'पद' (गंतव्य) के रूप में देखते हैं, वहीं यह स्मृति इसे एक 'साधन' और 'लक्ष्य' दोनों के रूप में स्थापित करती है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'लक्ष्य-निश्चय' का श्लोक है। साधक अक्सर इस भ्रम में रहता है कि उसे अलग-अलग साधनाएँ करनी होंगी—कभी तप, कभी स्वाध्याय, कभी संयम। याज्ञवल्क्य जी यहाँ उस बिखराव को समाप्त कर रहे हैं।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह अपनी समस्त साधनाओं (जप, प्राणायाम, तप) को 'ॐ' के केंद्र में ले आए। जब वह 'ॐ' का उच्चारण या ध्यान करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि इस एक ध्वनि में वेदों का ज्ञान, तप की अग्नि और ब्रह्मचर्य की शक्ति—तीनों एक साथ समाहित हैं।
यह श्लोक साधक को 'विविधता' से 'एकत्व' की ओर ले जाता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि "सब कुछ इसी एक पद में है", तब उसकी चेतना का बिखराव रुक जाता है और वह 'एकनिष्ठ' होने की भूमि पर पहुँचता है। यहाँ 'ॐ' केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि वह 'बिंदु' है जहाँ पहुँचकर सारी बाहरी क्रियाएँ (तप, कर्म) समाप्त हो जाती हैं और केवल शुद्ध अस्तित्व शेष रहता है।
एतदेवाक्षरं ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम् ।
एतदेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ २.३८ ॥
"ॐ" इति यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही परम है; इस अक्षर को जानकर जो व्यक्ति जिसकी इच्छा करता है, उसे वह प्राप्त होता है...
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि समस्त वेदों का लक्ष्य और तप का सार केवल 'ॐ' है। अब इस श्लोक में वे उस 'ॐ' की सामर्थ्य और उसकी सत्ता के स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं, जिससे साधक को यह बोध हो कि यह अक्षर केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु समस्त सिद्धियों और मोक्ष का एकमात्र द्वार है।
अन्वय और पदार्थ —
एतद् एव अक्षरं ब्रह्म, एतद् एव अक्षरं परम्। यः एतद् अक्षरं ज्ञात्वा यदिच्छति, तस्य तत् (भवति)।
पदार्थ:
• एतद् एव: यही, केवल यही (यहाँ 'एव' शब्द निश्चयवाचक है, जो यह बताता है कि ब्रह्म का कोई अन्य सरल और सुलभ स्वरूप इस अक्षर से भिन्न नहीं है)।
• अक्षरं: जिसका क्षरण न हो, जो अविनाशी हो। योग की दृष्टि से वह ध्वनि जो वाणी के परे स्थित है।
• ब्रह्म: वह अनंत सत्ता जो इस जगत का कारण और आधार है।
• परम्: श्रेष्ठतम, सर्वोच्च, या वह जो इस भौतिक जगत के पार है।
• ज्ञात्वा: जानकर। यहाँ 'ज्ञान' केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, अपितु अनुभवजन्य साक्षात्कार है।
• यदिच्छति: जिसकी इच्छा करता है। यहाँ इच्छा का अर्थ सांसारिक लोभ नहीं, अपितु साधक की वह संकल्प-शक्ति है जो अक्षर-ब्रह्म के साथ एकाकार होने से उत्पन्न होती है।
• तस्य तत्: उसे वह प्राप्त होता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस रहस्य को खोल रहे हैं जो उनकी श्रुति में बीजरूप में विद्यमान है। वे कहते हैं कि यह 'ॐ' ही साक्षात् ब्रह्म है। जब हम कहते हैं कि "यही अक्षर ब्रह्म है", तो इसका अर्थ है कि ब्रह्म, जो कि निराकार और अनिर्वचनीय है, उसने साधकों के लिए स्वयं को इस ध्वनि के रूप में उपलब्ध कराया है। जैसे जल की एक बूँद में संपूर्ण सागर का गुण होता है, वैसे ही इस एक अक्षर में संपूर्ण वेदों और संपूर्ण ब्रह्मांड का तत्व समाहित है।
यहाँ 'अक्षर' शब्द के दो अर्थ हैं। पहला—वह ध्वनि जो कभी नष्ट नहीं होती। दूसरा—वह अवस्था जहाँ पहुँचकर वाणी ठहर जाती है। याज्ञवल्क्य जी इसे 'परम्' कहकर यह संकेत दे रहे हैं कि ओंकार की यात्रा स्थूल से सूक्ष्म की ओर है। जब साधक 'अ', 'उ' और 'म' की मात्राओं को पार कर उस मौन (अर्धमात्रा) में स्थित होता है, तब वह 'परब्रह्म' का अनुभव करता है।
श्लोक का दूसरा भाग—"इसे जानकर जो जिसकी इच्छा करता है, उसे वह प्राप्त होता है"—अत्यंत गूढ़ है। इसका भाव यह है कि जब साधक ओंकार के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तब उसकी व्यक्तिगत इच्छाएँ 'ब्रह्म-इच्छा' में विलीन हो जाती हैं। ऐसी अवस्था में साधक की संकल्प-शक्ति सीधे ब्रह्म की शक्ति से जुड़ जाती है। यदि वह मोक्ष चाहता है, तो उसे मोक्ष मिलता है; यदि वह लोक-कल्याण चाहता है, तो वह सिद्ध होता है। वास्तव में, अक्षर-ज्ञान के बाद साधक स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है, और ब्रह्म के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १.२.१६ ॥
यही अक्षर ब्रह्म है, यही अक्षर परम है; इसी अक्षरको जानकर जो जिसकी इच्छा करता है, उसे वह मिलता है।
कठोपनिषद् का यह अंश स्पष्ट करता है कि ओंकार ही वह 'पर' अक्षर है जिसे जानकर समस्त कामनाओं की पूर्ति संभव है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस उपनिषद् के वचन को केवल एक दार्शनिक सत्य के रूप में नहीं, अपितु एक योगिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है। जहाँ उपनिषद् इसे 'ब्रह्म' कहता है, वहीं यह स्मृति इसे 'साधन' और 'फल' दोनों के रूप में स्थापित करती है—अर्थात् ओंकार का जप साधन है और ओंकार का साक्षात्कार ही फल है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'इच्छा-शक्ति' और 'ज्ञान-शक्ति' के समन्वय का सूत्र है। योग के अभ्यास में साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं कर रहा होता, बल्कि वह अपनी चेतना को 'अक्षर' (अविनाशी) में विस्थापित कर रहा होता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक पहले ओंकार के स्थूल रूप (ध्वनि) को पकड़े, फिर उसके सूक्ष्म रूप (अनुनाद) में उतरे और अंततः उस 'अमात्र' अवस्था में ठहर जाए जहाँ केवल शून्य और पूर्ण का अनुभव हो। जब साधक इस 'अक्षर-ब्रह्म' में स्थित हो जाता है, तब उसकी चित्त-वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं। इस शांत चित्त में जो संकल्प उठता है, वह 'ब्रह्म-संकल्प' बन जाता है।
यह श्लोक साधक को 'साधक' से 'सिद्ध' की भूमि पर ले जाता है। यहाँ 'जानने' का अर्थ है—ओंकार की ध्वनि को अपने हृदय के भीतर गूँजते हुए अनुभव करना और यह देखना कि मेरा अस्तित्व और यह ध्वनि एक ही हैं। जब 'मैं' और 'ॐ' का भेद मिट जाता है, तब साधक उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ उसकी इच्छा और ब्रह्म की इच्छा एक हो जाती है, और इसी कारण उसे वह सब प्राप्त होता है जिसकी वह अभिलाषा करता है।
प्रणवेन प्रयाणस्य फलम्
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ २.३९ ॥
सब इंद्रियों को संयमित करके और मन को हृदय में रोककर, अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित होकर...
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार को 'अक्षर-ब्रह्म' और समस्त इच्छाओं की सिद्धि का मूल आधार बताया। अब वे उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जिसमें इस अक्षर-ब्रह्म का साक्षात्कार संभव है; अर्थात् वह विशिष्ट योगिक स्थिति, जिसमें साधक अपनी चेतना को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
सर्व-द्वाराणि संयम्य, मनो हृदि निरुध्य च, आत्मनः प्राणं मूर्ध्न्या आधाय, योगधारणाम् आस्थितः।
पदार्थ:
• सर्वद्वाराणि संयम्य: समस्त इन्द्रिय-द्वारों को संयमित करके। यहाँ 'द्वार' का अर्थ केवल आँख, कान आदि नहीं, अपितु वे मार्ग हैं जिनसे चेतना बाहर की ओर बहती है।
• मनो हृदि निरुध्य: मन को हृदय में रोककर। 'निरुध्य' का अर्थ है—बाहरी विषयों से खींचकर भीतर की ओर स्थिर करना।
• मूर्ध्न्या आधाय: प्राण को मस्तक (शिर) में स्थापित करके। 'आधाय' का अर्थ है—एक निश्चित स्थान पर केंद्रित करना।
• योगधारणाम् आस्थितः: योग-धारणा में स्थित होकर। यहाँ 'धारणा' का अर्थ है—चित्त का एक बिंदु पर टिका रहना, जहाँ से समाधि का आरम्भ होता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक वास्तव में एक पूर्ण साधना-प्रक्रिया का सूत्र है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस विधि को बता रहे हैं जिससे साधक 'अक्षर' की प्राप्ति करता है। यह श्लोक अपने आप में पूर्ण वाक्य नहीं है, अपितु यह एक 'अवस्था' का वर्णन है, जिसकी परिणति अगले श्लोक (२.४०) की क्रिया 'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्' (ओंकार का उच्चारण करते हुए) में होती है।
यहाँ तीन सोपानों वाली एक आंतरिक यात्रा बताई गई है:
प्रथम सोपान 'इन्द्रिय-संयम' है। जब तक चेतना बाहरी द्वारों से बाहर की ओर प्रवाहित होती रहती है, तब तक वह बिखरती रहती है। द्वारों को संयमित करने का अर्थ है—प्रत्याहार। जब बाहरी जगत का शोर शांत होता है, तभी भीतर की ध्वनि सुनाई देती है।
द्वितीय सोपान 'मन का हृदय में निरुद्ध होना' है। मन स्वभाव से चंचल है और सर्वत्र भ्रमण करता है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मन को हृदय में रोकें। हृदय वह स्थान है जहाँ 'अन्तर्यामी' का वास है, जहाँ सूक्ष्म चेतना का केंद्र है। जब मन हृदय में स्थिर होता है, तब वह भाव-प्रधान और एकाग्र हो जाता है।
तृतीय सोपान 'प्राण का मूर्धा-स्थापन' है। हृदय में स्थिर मन के बाद, साधक अपने प्राण को ऊपर की ओर, मस्तक में ले जाता है। प्राण वह सेतु है जो मन और शरीर को जोड़ता है। प्राण का मूर्धा में स्थित होना इस बात का संकेत है कि अब साधक स्थूल शरीर की सीमाओं को पार कर उस बिंदु पर पहुँच गया है जहाँ 'अक्षर' का अनुभव संभव है।
जब इन्द्रियाँ शांत हों, मन हृदय में स्थित हो और प्राण मस्तक में प्रतिष्ठित हो, तब साधक 'योगधारणाम्' में स्थित होता है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक न शरीर है, न मन, अपितु केवल एक शुद्ध सजगता है। इसी स्थिति में जब ओंकार का उच्चारण किया जाता है, तब वह केवल कंठ की ध्वनि नहीं रहती, अपितु पूरे अस्तित्व का स्पंदन बन जाती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ ८.१२ ॥
सब (इन्द्रिय-) द्वारोंको संयमित कर, मनको हृदयमें रोककर, अपने प्राणको मूर्धामें स्थापित करके योगधारणामें स्थित होकर —
यह श्लोक पूर्णतः भगवद्गीता के आठवें अध्याय के १२वें श्लोक के अनुरूप है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने देह त्याग के समय इसी विधि का निर्देश दिया है ताकि जीव परम गति को प्राप्त कर सके। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस ज्ञान को केवल मृत्यु-समय की विधि नहीं, अपितु जीवित रहते हुए 'अक्षर-ब्रह्म' के साक्षात्कार की योगिक पद्धति के रूप में प्रस्तुत करती है। दोनों ग्रन्थों में इस बात पर सहमति है कि बिना इन्द्रिय-संयम और प्राण-नियंत्रण के, उच्चतर चेतना का अनुभव संभव नहीं है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास एक 'ऊर्ध्वगामी यात्रा' है। इसका क्रम अत्यंत सूक्ष्म है:
१. बाह्य-संयम: सर्वप्रथम साधक अपनी आँखों, कानों और त्वचा के स्पर्श को भीतर की ओर मोड़ता है। यह 'बाहर से भीतर' की ओर पहला कदम है।
२. हृदय-स्थिरता: इसके बाद वह मन को हृदय-आकाश में स्थापित करता है। यहाँ साधक अनुभव करता है कि वह केवल शरीर नहीं, अपितु एक दृष्टा है।
३. प्राण-उत्थान: अंत में, वह अपने प्राण को मस्तक के उच्चतम बिंदु पर केंद्रित करता है। यह प्राण का उर्ध्वगमन है, जिससे चेतना का विस्तार होता है।
इस अभ्यास से साधक 'जाग्रत' और 'स्वप्न' की भूमियों को पार कर उस 'तुरीय' अवस्था की ओर बढ़ता है, जहाँ ओंकार का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। जब प्राण मूर्धा में स्थित होता है और मन हृदय में, तब साधक एक ऐसी धुरी पर स्थित हो जाता है जहाँ वह 'अक्षर' के साथ एकाकार होने के लिए तैयार होता है। यह स्थिति 'योगधारणा' है—वह बिंदु जहाँ साधक का व्यक्तिगत अहंकार समाप्त होता है और ब्रह्म-चेतना का आरम्भ होता है।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् ॥ २.४० ॥
"ॐ" इस एकाक्षर ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ जो देह छोड़कर जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस विशिष्ट योगिक अवस्था का वर्णन किया जिसमें इन्द्रिय-संयम, हृदय में मन का निरोध और मस्तक में प्राणों का आवाहन होता है। अब वे इस अवस्था की परिणति और उसके अंतिम फल को स्पष्ट कर रहे हैं कि ऐसी स्थिति में ओंकार का उच्चारण और ईश्वर का स्मरण किस लक्ष्य तक ले जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्, मामनुस्मरन्, यः देहं त्यजन् प्रयाति, स परमां गतिं याति।
पदार्थ:
• ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म: 'ॐ' रूपी उस एक अक्षर वाले ब्रह्म को। यहाँ 'एकाक्षर' का अर्थ केवल एक वर्ण नहीं, अपितु वह एक तत्त्व है जिसमें समस्त अक्षर और समस्त ब्रह्माण्ड विलीन हैं।
• व्याहरन्: उच्चारण करता हुआ। यह केवल कंठ से निकलने वाली ध्वनि नहीं, अपितु चेतना का उस ध्वनि में लय होना है।
• मामनुस्मरन्: मेरा स्मरण करता हुआ। यहाँ 'माम्' शब्द उस परमेश्वर/ईश्वर के लिए है, जो याज्ञवल्क्य के अनुसार अंतर्यामी और विज्ञानघन पुरुष है।
• प्रयाति त्यजन् देहं: देह का त्याग करते हुए जो प्रस्थान करता है।
• परमां गतिम्: परम गति को। वह स्थिति जहाँ पुनरावृत्ति (जन्म-मरण) समाप्त हो जाती है और केवल 'अक्षर' शेष रहता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक पिछले श्लोक (२.३९) के साथ मिलकर एक पूर्ण वाक्य बनाता है। पिछले श्लोक में जो 'अवस्था' (इन्द्रिय-संयम, हृदय-निरोध, मूर्ध्न-प्राण) बताई गई थी, यह श्लोक उसकी 'क्रिया' और 'फल' है।
जब साधक योगधारणा में स्थित होकर अपने प्राणों को मस्तक में स्थापित कर लेता है, तब वह केवल शरीर में नहीं रहता, अपितु वह उस संधि-स्थल पर पहुँच जाता है जहाँ स्थूल देह और सूक्ष्म आत्मा का अलगाव संभव है। ऐसी स्थिति में 'ॐ' का उच्चारण करना वास्तव में अपनी व्यक्तिगत चेतना को ब्रह्माण्डीय चेतना (अक्षर-ब्रह्म) में विलीन करना है।
यहाँ 'व्याहरन्' (उच्चारण) और 'अनुस्मरन्' (स्मरण) दो अलग क्रियाएँ नहीं, अपितु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ओंकार का उच्चारण 'वाचक' है और ईश्वर का स्मरण 'वाच्य' है। जब साधक ओंकार को उच्चारित करता है, तो वह वास्तव में उसी ईश्वर को स्मरण कर रहा होता है, क्योंकि ओंकार ही ईश्वर का नाद-स्वरूप है।
यह श्लोक मृत्यु के समय की विधि जैसा प्रतीत होता है, किन्तु योगिश्वर याज्ञवल्क्य इसे जीवन की साधना के रूप में दे रहे हैं। जो व्यक्ति जीवन भर अभ्यास से अपने प्राणों को ऊपर उठाने और मन को हृदय में स्थिर करने का कौशल सीख लेता है, उसके लिए देहत्याग एक भय नहीं, अपितु 'परम गति' की ओर एक सचेतन प्रस्थान बन जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ ८.१३ ॥
— 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ जो देह छोड़कर जाता है, वह परम गतिको पाता है।
यह श्लोक पूर्णतः भगवद्गीता के आठवें अध्याय के तेरहवें श्लोक के समान है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इस रहस्य को उद्घाटित किया है कि अंतकाल में जो व्यक्ति एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण और ईश्वर का स्मरण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ गीता के उस उपदेश की पुष्टि करती है और उसे योगिक प्रक्रिया (प्राणों का मस्तक में गमन) के साथ जोड़कर एक व्यावहारिक विधि प्रदान करती है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि देहत्याग के समय चेतना का केंद्र जिस तत्त्व पर होता है, वही उसकी अगली गति निर्धारित करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का रहस्य 'मृत्यु के क्षण का वर्तमान में अभ्यास' करना है। सामान्य मनुष्य मृत्यु के समय विचलित होता है क्योंकि उसने कभी 'छोड़ने' का अभ्यास नहीं किया। योगिश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सिखा रहे हैं कि हर जप, हर प्राणायाम और हर ध्यान वास्तव में एक 'लघु मृत्यु' है।
जब साधक 'ॐ' का जप करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि वह अपनी सीमित पहचान (अहंकार और देह) को त्याग रहा है और उस 'एकाक्षर ब्रह्म' में विलीन हो रहा है। 'त्याजन' का अर्थ केवल देह छोड़ना नहीं, अपितु देह-अभिमान को छोड़ना है।
अभ्यास यह है कि जब भी साधक ओंकार का उच्चारण करे, वह मन को हृदय में स्थिर रखे और अनुभव करे कि उसकी चेतना प्राणों के साथ ऊपर की ओर उठ रही है। यह अभ्यास उसे उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह देह के प्रति आसक्ति से मुक्त होकर 'परम गति' (अक्षर-स्थिति) का अनुभव जीवन रहते ही करने लगता है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को 'स्थितप्रज्ञ' से 'मुक्त' की भूमि की ओर ले जाने वाला सेतु है।
प्रणवमाहात्म्यम्
आद्यं यदक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।
स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ २.४१ ॥
जो आद्य अक्षर ब्रह्म है, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है, वह दूसरा त्रिविध वेद गुह्य है; जो इसे जानता है, वह वेदवित् है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने देहत्याग के समय ओंकार के उच्चारण और ईश्वर-स्मरण से प्राप्त होने वाली परम गति का वर्णन किया। अब वे इस 'एकाक्षर ब्रह्म' की प्राचीनता और उसकी व्यापकता को सिद्ध करते हुए यह बता रहे हैं कि यह केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु समस्त वेदों का सार और एक गुप्त वेद स्वयं है।
अन्वय और पदार्थ —
यद् आद्यं अक्षरं ब्रह्म (अस्ति), त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता, (तद्) स गुह्यः अन्यः त्रिवृद्वेदः (अस्ति); यः एनं वेद, स वेदवित्।
पदार्थ:
• आद्यं अक्षरं ब्रह्म: वह आदि अक्षर जो स्वयं ब्रह्म है। 'आद्य' का अर्थ है जो समय और स्थान से परे प्रथम है; जिससे सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ और जिसमें अंततः विलीन होना है।
• त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता: जिसमें त्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) प्रतिष्ठित है। यहाँ 'प्रतिष्ठिता' का अर्थ है कि वेदों का आधार, उनका बीज और उनकी शक्ति इसी ओंकार में निहित है।
• गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो: वह दूसरा गुह्य (गुप्त) त्रिवृद्वेद है। 'त्रिवृद्वेद' का अर्थ है वह ज्ञान जो तीनों वेदों के सार को अपने भीतर समेटे हुए है, किन्तु वह साधारण वेदों की भाँति प्रकट नहीं, अपितु 'गुह्य' (रहस्यमय) है।
• वेदवित्: वेदों का वास्तविक ज्ञाता। जो केवल शब्दों का ज्ञाता नहीं, अपितु उस अक्षर का अनुभव करता है जिसमें वेद प्रतिष्ठित हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्रणव की उस स्थिति को उद्घाटित करता है जहाँ वह केवल एक ध्वनि न रहकर 'वेद' का रूप ले लेता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ओंकार और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। जिस प्रकार एक बीज में संपूर्ण वृक्ष की संभावना और संरचना छिपी होती है, उसी प्रकार ओंकार रूपी आदि-अक्षर में ऋक, यजु और साम—इन तीनों वेदों का ज्ञान और उनकी शक्ति प्रतिष्ठित है।
यहाँ 'अन्य त्रिवृद्वेद' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः हम वेदों को उनके लिखित स्वरूप और मन्त्रों के माध्यम से जानते हैं, जो बाह्य और व्याख्यात्मक हैं। किन्तु ओंकार वह 'दूसरा वेद' है जो अनुभवजन्य है। यह वह गुप्त विद्या है जो शब्दों के पार, ध्वनि के मूल में स्थित है। जो साधक ओंकार के माध्यम से उस परम तत्त्व में प्रवेश करता है, वह वास्तव में तीनों वेदों के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। इसलिए, केवल वेदों का पाठ करने वाला 'पण्डित' हो सकता है, किन्तु जो इस आदि-अक्षर को जान लेता है, वही वास्तविक 'वेदवित्' है, क्योंकि उसने वेदों के फल (ब्रह्म-साक्षात्कार) को प्राप्त कर लिया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन्प्रतिष्ठिता । स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ॥ ११.२६५ ॥
जो आदि तीन-अक्षरी ब्रह्म (ओंकार) है, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है, वह गुह्य दूसरा त्रिवृत् वेद है; जो उसे जानता है, वही वेदवित् है।
मनुस्मृति में भी लगभग समान शब्दों में कहा गया है कि जो आदि तीन-अक्षरी ब्रह्म है, जिसमें त्रयी प्रतिष्ठित है, वह गुह्य दूसरा त्रिवृत् वेद है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि प्रणव केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु एक संपूर्ण 'गुह्य वेद' है। भेद केवल इतना है कि मनुस्मृति इसे 'त्र्यक्षर' (तीन अक्षरों वाला) कहकर उसकी संरचना पर बल देती है, जबकि याज्ञवल्क्य इसे 'आद्य अक्षर' कहकर उसकी आदि-सत्ता और ब्रह्म-स्वरूपता को प्रधानता देते हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शब्द-ब्रह्म' के अभ्यास का मार्ग प्रशस्त करता है। योगिक अभ्यास में जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं कर रहा होता, अपितु वह उन तीनों वेदों की ऊर्जा को जाग्रत कर रहा होता है जो इस अक्षर में प्रतिष्ठित हैं।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक यह अनुभव करे कि ओंकार का 'अ' ऋग्वेद (ज्ञान), 'उ' यजुर्वेद (कर्म) और 'म' सामवेद (भक्ति/आनन्द) का प्रतिनिधित्व करता है। जब वह इन तीनों मात्राओं को एक साथ लय करता है, तो वह वास्तव में त्रयी-वेद के समन्वय को अपने भीतर अनुभव करता है। यह अभ्यास साधक को 'वाच्य' (शब्द) से 'वाचक' (अर्थ) की ओर और अंततः 'अक्षर' (अविनाशी) की ओर ले जाता है। जो साधक इस गुह्य वेद (ओंकार) को अपने हृदय में स्थापित कर लेता है, उसकी बुद्धि 'वेदवित्' की भूमि पर पहुँच जाती है, जहाँ उसे किसी बाहरी शास्त्र के प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह स्वयं उस मूल बीज का अनुभव कर रहा होता है जिससे समस्त शास्त्र उत्पन्न हुए हैं।
यथा वै शङ्कुना पर्णं संवृता एव सर्वतः ।
एवं सर्वास्तु वै वाचः संतीर्णाः प्रणवेन तु ॥ २.४२ ॥
जैसे (पत्तेकी) नससे सारा पत्ता सब ओरसे गुँथा रहता है, वैसे ही सारी वाणी प्रणवसे व्याप्त है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव को 'गुह्य त्रिवृद्वेद' कहकर उसकी प्राचीनता और वेदों के साथ उसके तादात्म्य को सिद्ध किया। अब वे एक सुंदर उपमा के माध्यम से यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यह 'आद्य अक्षर' केवल वेदों का आधार ही नहीं, अपितु समस्त वाणी के अस्तित्व में किस प्रकार व्याप्त है।
अन्वय और पदार्थ —
यथा वै शङ्कुना पर्णं संवृता एव सर्वतः, एवं सर्वास्तु वै वाचः संतीर्णाः प्रणवेन तु।
पदार्थ:
• शङ्कुना: शङ्कु का अर्थ है 'नस' या 'शिरा'। जिस प्रकार एक पत्ते के मध्य में मुख्य शिरा होती है और उससे छोटी-छोटी नसें निकलकर पूरे पत्ते में फैल जाती हैं।
• पर्णं संवृता: पत्ता पूरी तरह से घिरा हुआ या गुँथा हुआ। यहाँ 'संवृता' का अर्थ है कि नस केवल पत्ते के बीच में नहीं है, बल्कि वह पत्ते के प्रत्येक कण को जीवन और संरचना प्रदान करती है।
• सर्वास्तु वै वाचः: समस्त वाणी। इसमें केवल वेदों के मन्त्र ही नहीं, अपितु संसार की समस्त ध्वनियाँ, शब्द और भाषाएँ सम्मिलित हैं।
• संतीर्णाः: व्याप्त, गुँथे हुए या ओढ़े हुए। इसका अर्थ है कि प्रणव वह सूत्र है जिसमें सारी वाणी पिरोई हुई है।
• प्रणवेन: ओंकार के द्वारा।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक शब्द-ब्रह्म के सूक्ष्म स्वरूप को उद्घाटित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक भौतिक उपमा (पत्ते की नस) के माध्यम से एक परम आध्यात्मिक सत्य को समझा रहे हैं।
जैसे एक पत्ते को देखें, तो उसकी मध्य शिरा (शङ्कु) से ही पोषण और शक्ति पूरे पत्ते के अंतिम छोर तक पहुँचती है। यदि वह शिरा न हो, तो पत्ता न तो आकार ले पाएगा और न ही जीवित रह पाएगा। वह शिरा पत्ते के भीतर अदृश्य होकर भी उसकी संपूर्णता को धारण किए हुए है। ठीक उसी प्रकार, इस सृष्टि की समस्त 'वाणी' (वाचः) प्रणव रूपी मुख्य शिरा से गुँथी हुई है।
भाव यह है कि संसार में हम जो भी शब्द बोलते हैं या सुनते हैं, वे वास्तव में ओंकार के ही विवर्त या विस्तार हैं। ओंकार वह मूल ध्वनि है, जिससे अन्य सभी ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाती हैं। जिस प्रकार पत्ते की नसें पत्ते के हर हिस्से को एक-दूसरे से जोड़ती हैं, वैसे ही प्रणव समस्त मन्त्रों, शब्दों और अर्थों को एक सूत्र में बाँधकर उन्हें 'ब्रह्म' से जोड़ता है। यदि वाणी से प्रणव को निकाल दिया जाए, तो शब्द केवल शून्य ध्वनि रह जाएँगे, उनमें वह दैवीय शक्ति और चैतन्य नहीं रहेगा जो उन्हें 'मन्त्र' बनाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् ॥ २.२३.३ ॥
प्रजापतिने लोकोंको तपाया; तपाये हुए उनसे त्रयी विद्या (तीनों वेद) बह निकली। उसे तपाया; तपायी हुई उससे ये अक्षर बह निकले — "भूः, भुवः, स्वः"। उन्हें तपाया; तपाये हुए उनसे ओंकार बह निकला।
इस श्रुति-अंश में बताया गया है कि प्रजापति के तप से पहले त्रयी विद्या (वेद) प्रकट हुए, फिर व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः) और अंत में सबसे सूक्ष्म और सार रूप में 'ओंकार' प्रकट हुआ।
स्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति की परिणति है। श्रुति जहाँ ओंकार के 'प्रादुर्भाव' (उत्पत्ति) का क्रम बताती है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति उसकी 'व्यापकता' को सिद्ध करती है। श्रुति कहती है कि ओंकार अंत में प्रकट हुआ (सबसे सूक्ष्म रूप में), और स्मृति कहती है कि वह सबसे अंत में प्रकट होकर भी सबसे मूल (शङ्कु) है, क्योंकि उसी के भीतर सारी पूर्ववर्ती वाणी समाहित है। यह ठीक वैसा ही है जैसे वृक्ष के बीज में पूरा वृक्ष समाहित होता है; बीज अंत में आता है, पर वह ही मूल है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'शब्द-योग' का द्वार खोलता है। सामान्यतः मनुष्य शब्दों को केवल बाहरी अर्थों (वाच्य) के लिए प्रयोग करता है, किन्तु योगी शब्दों के भीतर छिपे 'वाचक' (प्रणव) को खोजता है।
इसका अभ्यास यह है कि साधक जब भी किसी मन्त्र का जप करे या किसी से संवाद करे, तो वह यह अनुभव करे कि जिस शब्द को वह उच्चारित कर रहा है, उसकी 'नस' (शङ्कु) वास्तव में ओंकार ही है। वह शब्द केवल एक बाहरी आवरण है, जबकि उसके भीतर प्रवाहित होने वाली प्राण-शक्ति ओंकार है।
जब साधक बोलते समय भी अपने अंतःकरण में ओंकार का स्मरण रखता है, तो उसकी समस्त वाणी 'मन्त्रमय' हो जाती है। वह इस भूमि पर पहुँच जाता है जहाँ उसे यह अनुभव होता है कि संसार की हर ध्वनि वास्तव में ईश्वर की ही पुकार है। इस अभ्यास से साधक स्थूल वाणी (वैखरी) से सूक्ष्म वाणी (पश्यंती) की ओर बढ़ता है, जहाँ वह शब्दों के पार उस 'अक्षर' को अनुभव करता है जो समस्त वाणी को गुँथकर रखता है।
प्रणवस्येश्वरवाचकत्वम्
क्लेशकर्मविपाकैश्च वासनाभिस्तथैव च ।
अपरामृष्टमेवाह पुरुषं हीश्वरं श्रुतिः ॥ २.४३ ॥
क्लेश, कर्म, विपाक और वैसी ही वासनाओं से अछूते ही पुरुष को ही श्रुति ईश्वर कहती है ...
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव को समस्त वाणी का आधार और उसे व्याप्त करने वाली मुख्य शिरा के समान बताया। जब वाणी के इस मूल आधार (प्रणव) की बात आती है, तब प्रश्न उठता है कि वह 'अक्षर' वास्तव में किसे संकेत करता है? वह कौन सा सत्ता-स्वरूप है जो वाणी का मूल है? इसी जिज्ञासा के समाधान हेतु अब ऋषि उस 'पुरुष' के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जिसे श्रुति 'ईश्वर' कहती है।
अन्वय और पदार्थ —
क्लेश-कर्म-विपाकैः च वासनाभिस्तथैव च, अपरामृष्टमेवाह पुरुषं हीश्वरं श्रुतिः (कथयति)।
पदार्थ:
• क्लेश: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। वे मानसिक विकार जो चित्त को मलिन करते हैं और बंधन का कारण बनते हैं।
• कर्म: कुशल (पुण्य) और अकुशल (पाप) क्रियाएँ। वे सभी संकल्प और कार्य जो फल की इच्छा से किए जाते हैं।
• विपाक: कर्मों का पका हुआ फल। जैसे बीज से फल निकलता है, वैसे ही कर्मों के संचय से जो प्रारब्ध या परिस्थिति निर्मित होती है, वह विपाक है।
• वासना: कर्मों और विपाकों के फलस्वरूप चित्त में गहरे अंकित हुए संस्कार। वे सूक्ष्म इच्छाएँ जो पुनः कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं।
• अपरामृष्टम्: जिसे छुआ न गया हो; जो पूरी तरह अछूता, अप्रभावित और मुक्त हो।
• पुरुषं हीश्वरं: उस विशेष पुरुष को ही ईश्वर। यहाँ 'पुरुष' का अर्थ देह नहीं, अपितु शुद्ध चेतना है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ईश्वर की परिभाषा को कर्मकाण्ड के स्तर से उठाकर योग और ज्ञान के स्तर पर प्रतिष्ठित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि ईश्वर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो संसार के किसी कोने में बैठा शासन कर रहा है, अपितु ईश्वर वह 'अवस्था' या 'तत्त्व' है जो समस्त मानवीय बंधनों से सर्वथा मुक्त है।
साधारण मनुष्य क्लेशों से घिरा है, कर्मों के जाल में बँधा है, उनके विपाक (फल) को भोग रहा है और वासनाओं के वशीभूत होकर पुनः जन्म-मृत्यु के चक्र में घूम रहा है। किंतु श्रुति जिस ईश्वर की बात करती है, वह इस संपूर्ण चक्र से 'अपरामृष्ट' है—अर्थात् उसे इन चारों में से किसी ने भी स्पर्श नहीं किया। वह न तो अविद्या के अंधकार में है, न कर्मों के ऋण में, न विपाक के दुख-सुख में और न ही वासनाओं के खिंचाव में।
यहाँ 'पुरुष' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। याज्ञवल्क्य जी के लिए पुरुष वह शुद्ध दृष्टा है जो विज्ञानघन है। जब यह शुद्ध पुरुष समस्त क्लेशों और वासनाओं से रहित होकर अपनी पूर्णता में स्थित होता है, तब उसे ही 'ईश्वर' कहा जाता है। इस प्रकार, ईश्वर वह उच्चतम आदर्श है जहाँ पहुँचकर साधक स्वयं को पाता है। यह श्लोक यह भी संकेत करता है कि प्रणव (ॐ) का जप वास्तव में इसी 'अछूते पुरुष' की ओर लौटने की यात्रा है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस श्लोक का भावपात पूर्णतः योगदर्शन के ईश्वर-लक्षण से मेल खाता है:
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ (भाष्य —) अविद्यादयः क्लेशाः । कुशलाकुशलानि कर्माणि । तत्फलं विपाकः । तदनुगुणा वासना आशयाः ॥ १.२४ ॥
क्लेश, कर्म, विपाक और आशयसे जो अछूता है, वह विशेष पुरुष ईश्वर है। (भाष्य —) अविद्या आदि क्लेश हैं; पुण्य-पाप कर्म हैं; उनका फल विपाक है; उनके अनुरूप वासनाएँ आशय हैं।
यहाँ महर्षि पतंजलि भी ईश्वर को 'क्लेश-कर्म-विपाक-आशय' (वासना) से अप्रभावित एक 'विशेष पुरुष' मानते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और योगसूत्र दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ईश्वर की विशेषता उसकी 'शक्ति' में नहीं, अपितु उसकी 'मुक्तता' में है। जहाँ साधारण जीव वासनाओं का दास है, वहीं ईश्वर वासनाओं से मुक्त पुरुष है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक केवल एक परिभाषा नहीं, अपितु एक 'लक्ष्य' है। योग साधना में साधक जब प्रणव का अभ्यास करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के उस 'पुरुष' को खोज रहा होता है जो इन क्लेशों और वासनाओं से अछूता है।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसके भीतर एक ऐसा अंश है जिसे न कर्मों ने छुआ, न दुखों ने और न ही वासनाओं ने। वह 'अपरामृष्ट पुरुष' उसके भीतर ही बीज रूप में विद्यमान है। अभ्यास यह है कि बाहरी जगत के क्लेशों और विपाकों को देखते हुए भी, मन को उस 'अछूते' भाव में स्थिर करना। जब साधक प्रणव के माध्यम से अपने चित्त की वृत्तियों को शांत करता है, तब वह धीरे-धीरे उस भूमि की ओर बढ़ता है जहाँ वह स्वयं को 'ईश्वर' के समान मुक्त अनुभव करने लगता है। यह श्लोक साधक को 'अहंकार' (जो क्लेशों से बँधा है) से हटाकर 'साक्षी' (जो अपरामृष्ट है) की भूमि पर ले जाता है।
वाच्यो यज्ञेश्वरः प्रोक्तो वाचकः प्रणवः स्मृतः ।
वाचकेन तु विज्ञातो वाच्य एव प्रसीदति ॥ २.४४ ॥
यज्ञेश्वर वाच्य कहा गया है और प्रणव (उसका) वाचक; वाचकसे जाना गया वाच्य ही प्रसन्न होता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ईश्वर के उस स्वरूप का वर्णन किया जो क्लेशों, कर्मों और वासनाओं से सर्वथा अछूता है। अब प्रश्न यह उठता है कि उस 'अपरामृष्ट' और अदृश्य पुरुष तक साधक की पहुँच कैसे हो? उस निराकार सत्ता को पुकारा कैसे जाए? इसी जिज्ञासा के समाधान हेतु ऋषि यहाँ 'वाच्य' और 'वाचक' के सूक्ष्म सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
यज्ञेश्वरः वाच्यो प्रोक्तः, प्रणवः वाचकः स्मृतः । वाचकेन तु विज्ञातो वाच्यः एव प्रसीदति ।
पदार्थ:
• वाच्य: जिसका वर्णन किया जाए; जिसे वाणी द्वारा संकेतित किया जाए। यहाँ 'वाच्य' वह परम सत्ता (ईश्वर) है जो शब्दों की सीमा से परे है, किन्तु जिसे संकेत के माध्यम से जाना जाता है।
• यज्ञेश्वरः: यज्ञों के ईश्वर। बाहरी यज्ञों के अधिष्ठाता ही आन्तरिक योग-यज्ञ के भी स्वामी हैं। वह परम पुरुष जो समस्त सृष्टि रूपी महायज्ञ का कारण है।
• वाचक: संकेत करने वाला; नाम। वह शब्द जो अपने अर्थ की ओर इंगित करता है।
• प्रणवः: ओंकार। वह आदि-अक्षर जो समस्त ध्वनियों का मूल है।
• प्रसीदति: प्रसन्न होता है। योगिक अर्थ में इसका तात्पर्य है—साधक के हृदय में उस सत्ता का प्रकट होना या उस सत्ता के साथ साधक का एकाकार हो जाना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक नाम और नामी (संकेत और संकेतित) के गहन सम्बन्ध को उद्घाटित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वह परम पुरुष, जिसे हम 'यज्ञेश्वर' कहते हैं, वह 'वाच्य' है। वाच्य वह होता है जो स्वयं को शब्दों में नहीं बाँध सकता, क्योंकि वह अवाच्य (अशब्द) है। परन्तु, उस अवाच्य सत्ता को जानने के लिए एक सेतु की आवश्यकता होती है, और वह सेतु है 'वाचक'।
यहाँ 'प्रणव' (ॐ) को वह वाचक माना गया है। जिस प्रकार एक संकेत-चिह्न हमें किसी गंतव्य की ओर ले जाता है, उसी प्रकार प्रणव का उच्चारण और ध्यान साधक को उस यज्ञेश्वर की ओर ले जाता है। प्रणव केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि वह उस परम पुरुष का 'नाम' है। जब साधक 'वाचक' (प्रणव) के माध्यम से 'वाच्य' (ईश्वर) को पहचान लेता है, तब वह 'वाच्य' ही प्रसन्न होता है।
यहाँ 'प्रसन्न होने' का अर्थ किसी बाहरी देवता की कृपा प्राप्त करना नहीं है, अपितु यह एक आन्तरिक योगिक घटना है। जब वाचक (ॐ) का अभ्यास इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि वह स्वयं विलीन हो जाए और केवल वाच्य (ईश्वर) शेष रहे, तब साधक के भीतर उस परम पुरुष का उदय होता है। यही वास्तविक प्रसन्नता है—साधक का अपने वास्तविक स्वरूप (ईश्वर) में प्रतिष्ठित हो जाना।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस वाच्य-वाचक सम्बन्ध की पुष्टि पातञ्जल योगसूत्र में भी मिलती है:
तस्य वाचकः प्रणवः ॥ १.२७ ॥
उस (ईश्वर) का वाचक (नाम) प्रणव (ओंकार) है।
यहाँ भी स्पष्ट कहा गया है कि ईश्वर का वाचक प्रणव है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात को और विस्तार देते हुए 'यज्ञेश्वर' शब्द का प्रयोग करती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रणव का जप केवल एक मानसिक क्रिया नहीं, बल्कि एक 'यज्ञ' है, जिसमें शब्द की आहुति देकर उस शब्द के अर्थ (परब्रह्म) को प्राप्त किया जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'नाम-नामी' के अभ्यास का सूत्र है। योग का एक गुप्त रहस्य यह है कि नाम और नामी में कोई भेद नहीं होता; नाम ही नामी का द्वार है। यदि नाम (वाचक) का उच्चारण और ध्यान शुद्ध और सटीक हो, तो नामी (वाच्य) का प्रकट होना निश्चित है।
साधक जब 'ॐ' का जप करता है, तो वह केवल एक ध्वनि नहीं निकाल रहा होता, बल्कि वह उस 'वाचक' को पकड़ रहा होता है जो उसे सीधे 'वाच्य' से जोड़ता है। अभ्यास यह है कि जप के समय मन इस भाव में रहे कि "मैं इस नाम के माध्यम से उस नामी को पुकार रहा हूँ।" जब वाचक (प्रणव) की ध्वनि हृदय में गूँजती है और धीरे-धीरे शांत होती है, तब उस शून्यता में जो शेष रहता है, वही 'वाच्य' है।
साधक इस अभ्यास से 'शब्द-ब्रह्म' से 'पर-ब्रह्म' की ओर बढ़ता है। पहले वह प्रणव के रूप (वाचक) को जानता है, फिर उसके अर्थ (वाच्य) को अनुभव करता है, और अंततः वह स्वयं उस वाच्य में लीन हो जाता है। यह यात्रा स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म चेतना की ओर की यात्रा है।
प्रणवोपासनाफलम्
तदर्थं प्रणवं जप्यं ध्यातव्यं सततं बुधैः ।
ईश्वरः पुरुषाख्यस्तु तेनोपास्तुः(स्तः) प्रसीदति ॥ २.४५ ॥
इसलिए बुद्धिमानों द्वारा प्रणव का निरंतर जप और ध्यान किया जाना चाहिए; पुरुष नाम वाला ईश्वर उससे उपासित होकर प्रसन्न होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि परम पुरुष 'वाच्य' है और प्रणव उसका 'वाचक' संकेत है। जब वाचक के माध्यम से वाच्य को जाना जाता है, तब वह परम तत्त्व साधक के लिए प्रकट होता है। इसी बोध के आधार पर अब ऋषि इस ज्ञान को व्यावहारिक साधना में परिवर्तित करते हुए जप और ध्यान की विधि बता रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
तदर्थं प्रणवं जप्यं ध्यातव्यं सततं बुधैः ।
ईश्वरः पुरुषाख्यस्तु तेनोपास्तुः(स्तः) प्रसीदति ॥
अन्वय: तदर्थं बुधैः प्रणवं सततं जप्यं ध्यातव्यं (च)। पुरुषाख्यः ईश्वरः तेन (प्रणवेन) उपासितः (सत्त्वः) प्रसीदति।
पदार्थ और निर्वचन:
• तदर्थं: उस उद्देश्य के लिए। यहाँ 'तदर्थं' का अर्थ है—पिछले श्लोक में वर्णित उस 'वाच्य' (यज्ञेश्वर) को जानने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए।
• जप्यं: जप करने योग्य। मन्त्र का बार-बार उच्चारण करना ताकि चित्त उस ध्वनि में लय हो जाए।
• ध्यातव्यं: ध्यान करने योग्य। ध्वनि से आगे बढ़कर उस ध्वनि के अर्थ और उसके अधिष्ठान (परब्रह्म) में स्थित होना।
• सततं: निरंतर। बिना किसी व्यवधान के, श्वास-श्वास में उस चेतना का प्रवाह।
• बुधैः: बुद्धिमानों द्वारा। यहाँ 'बुध' वे हैं जो केवल शब्दों के अर्थ नहीं जानते, अपितु शब्दों के पीछे छिपे सत्य (वाच्य) को पहचानने की क्षमता रखते हैं।
• पुरुषाख्यस्तु: पुरुष नाम वाला। 'पुरुष' वह शुद्ध चैतन्य है जो प्रकृति के गुणों से परे है और समस्त सृष्टि का साक्षी है।
• उपासितः: उपासना किया हुआ। उपासना का अर्थ है—'उप' (निकट) + 'आस' (बैठना)। उस तत्त्व के निकट स्थित होना।
• प्रसीदति: प्रसन्न होना। इसका योगिक अर्थ है—साधक के भीतर उस ईश्वर-तत्त्व का पूर्णतः अभिव्यक्त होना और साधक का उस आनंद में लीन हो जाना।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधन और साध्य के सेतु का निर्माण कर रहे हैं। उन्होंने पूर्व में सिद्ध किया कि प्रणव (ॐ) वह कुंजी है जिससे उस परम पुरुष का द्वार खुलता है। अब वे कहते हैं कि उस परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए 'बुध' पुरुषों को दो क्रियाएँ करनी चाहिए: जप और ध्यान।
जप स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली प्रक्रिया है। जब साधक 'ॐ' का जप करता है, तो वह अपनी बिखरी हुई मानसिक वृत्तियों को एक ध्वनि पर केंद्रित करता है। परन्तु केवल यांत्रिक जप पर्याप्त नहीं है, इसलिए ऋषि 'ध्यातव्यं' शब्द जोड़ते हैं। जप यदि शरीर और वाणी का अनुशासन है, तो ध्यान मन और हृदय का। जप से जो एकाग्रता उत्पन्न होती है, उसी एकाग्रता को जब 'अर्थ' (परब्रह्म) में स्थिर किया जाता है, तब वह ध्यान बन जाता है।
ऋषि यहाँ 'पुरुष' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ अर्थ में कर रहे हैं। यह पुरुष वह नहीं है जो देह और नाम से जाना जाता है, अपितु वह 'पुरुष' है जो समस्त वेदों का सार है और जो स्वयं को जानने योग्य है। जब साधक प्रणव के माध्यम से उस पुरुष की उपासना करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के ही उस दिव्य पुरुष को जाग्रत करता है। 'प्रसीदति' का अर्थ केवल ईश्वर की प्रसन्नता नहीं, अपितु साधक की चेतना का उस ईश्वर-तत्त्व के साथ एकरूप हो जाना है। जैसे जल में घुली चीनी अलग नहीं रहती, वैसे ही जब प्रणव की उपासना पूर्ण होती है, तब उपासक और उपास्य का भेद समाप्त हो जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तस्य वाचकः प्रणवः ॥ १.२७ ॥
उस (ईश्वर) का वाचक (नाम) प्रणव (ओंकार) है।
पातञ्जल योगसूत्र में भी ईश्वर के स्वरूप और उनकी प्राप्ति के साधन के रूप में प्रणव को स्वीकार किया गया है। वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि "तस्य वाचकः प्रणवः" अर्थात् उस ईश्वर का नाम या संकेत प्रणव है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार को और विस्तार देते हुए इसे 'निरंतर जप' और 'ध्यान' से जोड़ती है। जहाँ योगसूत्र ईश्वर के नाम को केवल एक वाचक के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं यह स्मृति उस वाचक के माध्यम से 'वाच्य' (ईश्वर) तक पहुँचने की पूरी प्रक्रिया—जप, ध्यान और प्रसन्नता (साक्षात्कार)—को स्पष्ट करती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' के सिद्धांत का व्यावहारिक प्रयोग है। यहाँ जप और ध्यान को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ लाने का निर्देश है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक जब 'ॐ' का उच्चारण करे, तो केवल ध्वनि न सुने, अपितु उस ध्वनि के साथ उस 'पुरुष' (परम चैतन्य) का अनुभव करे। जप से प्राण स्थिर होते हैं और ध्यान से मन। जब प्राण और मन दोनों प्रणव में विलीन होते हैं, तब साधक 'बुध' की स्थिति में आता है।
साधक इस अभ्यास से 'वाचक' (शब्द) से 'वाच्य' (अर्थ/ब्रह्म) की ओर यात्रा करता है। निरंतरता (सततं) का अर्थ है कि यह अभ्यास केवल आसन पर बैठकर न हो, बल्कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओं में प्रणव की गूँज बनी रहे। जब साधक इस स्थिति में पहुँचता है, तो वह अनुभव करता है कि जिस ईश्वर को वह बाहर खोज रहा था, वह वास्तव में प्रणव रूपी ध्वनि के माध्यम से उसके अपने ही हृदय में 'प्रसन्न' या प्रकट हो रहा है। यह अभ्यास साधक को स्थूल जगत के मोह से उठाकर सूक्ष्म चैतन्य की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।
यथा हि गौर्वत्सकृतं निशम्य
हुङ्कृत्यवत्साभिमुखी प्रयाति ।
ब्रह्मापि तद्वत् प्रणवोपहूतं
वक्तारमागच्छति आशु वक्त्रे ॥ २.४६ ॥
जैसे गाय बछड़ेकी पुकार सुनकर हुंकार करती हुई बछड़ेकी ओर दौड़ती है, वैसे ही प्रणवसे पुकारा गया ब्रह्म भी शीघ्र वक्ताके मुखमें आ जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि बुद्धिमानों द्वारा प्रणव के निरंतर जप और ध्यान से पुरुष-नाम ईश्वर प्रसन्न होते हैं। अब ऋषि एक अत्यंत सरल और मार्मिक दृष्टान्त के माध्यम से यह समझा रहे हैं कि वह 'प्रसन्नता' या ईश्वर की प्राप्ति वास्तव में कैसी होती है और प्रणव की पुकार का प्रभाव कितना त्वरित होता है।
अन्वय और पदार्थ —
यथा हि गौर्वत्सकृतं निशम्य
हुङ्कृत्यवत्साभिमुखी प्रयाति ।
ब्रह्मापि तद्वत् प्रणवोपहूतं
वक्तारमागच्छति आशु वक्त्रे ॥
अन्वय: यथा हि गौः वत्सकृतं (पुकारं) निशम्य, हुङ्कृत्य वत्स-अभिमुखी प्रयाति, तद्वत् ब्रह्मापि प्रणवेन उपहूतं वक्तारम् (वाचकम्) आशु वक्त्रे आगच्छति।
पदार्थ और निर्वचन:
• वत्सकृतं निशम्य: बछड़े द्वारा किए गए (नाद/पुकार को) सुनकर। यहाँ 'वत्स' उस जीव का प्रतीक है जो अपनी मूल प्रकृति से अलग होकर विस्मृति में है।
• हुङ्कृत्य: हुंकार करके। यह एक सहज, स्वाभाविक और प्रेमपूर्ण प्रत्युत्तर है, जो केवल सम्बन्ध होने पर ही निकलता है।
• वत्साभिमुखी: बछड़े की ओर मुख करके। यह पूर्ण समर्पण और एकाग्रता का सूचक है।
• प्रणवोपहूतं: प्रणव द्वारा पुकारा गया। 'उपहूत' का अर्थ है—विशेष संकेत या पुकार से बुलाया हुआ।
• वक्तारम्: वक्ता को। यहाँ वक्ता वह साधक है जो प्रणव का उच्चारण कर रहा है।
• आशु वक्त्रे: शीघ्र ही मुख में। इसका अर्थ केवल भौतिक मुख नहीं, अपितु वक्ता की वाणी, चेतना और हृदय-आकाश में उस ब्रह्म-तत्त्व का प्रकटीकरण है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सुंदर उपमा देते हैं। एक गाय और उसके बछड़े का सम्बन्ध केवल पोषण का नहीं, अपितु गहरे नैसर्गिक अनुराग का होता है। जब बछड़ा पुकारता है, तो गाय को किसी तर्क, विधि या लंबी प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं होती; वह केवल उस पुकार को सुनकर 'हुंकार' करती है और तुरंत बछड़े की ओर दौड़ पड़ती है।
इसी प्रकार, यह संपूर्ण जगत उस परब्रह्म की संतान है। हम सभी उस विराट पुरुष के 'वत्स' (बछड़े) के समान हैं, जो माया के वश होकर स्वयं को अपनी माता (मूल स्रोत) से अलग मान बैठे हैं। प्रणव (ॐ) वह आदि-पुकार है, वह नैसर्गिक नाद है जो जीव के भीतर सोया हुआ है। जब साधक निष्कपट भाव से प्रणव का जप करता है, तो वह वास्तव में ईश्वर को कोई बाहरी याचना नहीं कर रहा होता, अपितु अपने मूल स्रोत को पुकार रहा होता है।
ब्रह्म के लिए यह पुकार कोई बाहरी ध्वनि नहीं, अपितु अपने ही अंश की पुकार है। जिस प्रकार गाय बछड़े की पुकार सुनकर व्याकुल हो उठती है, उसी प्रकार जब 'वाचक' (साधक) प्रणव के माध्यम से 'वाच्य' (ब्रह्म) को पुकारता है, तो वह परब्रह्म 'आशु' अर्थात् शीघ्र ही साधक के 'वक्त्रे' (मुख/चेतना) में प्रकट हो जाता है। यहाँ 'मुख में आने' का अर्थ है—साधक की वाणी में सत्य का उतरना, उसके विचारों में ब्रह्म का प्रतिबिम्ब होना और उसकी चेतना का उस अक्षर-ब्रह्म में विलीन हो जाना। यह मिलन त्वरित है क्योंकि पुकारने वाला और पुकारा जाने वाला वास्तव में एक ही तत्त्व के दो छोर हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गहरा अभ्यास 'सम्बन्ध-बोध' है। प्रायः साधक जप को एक 'प्रार्थना' या 'याचना' मान लेता है, जहाँ वह ईश्वर से कुछ माँगता है। किन्तु याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि प्रणव-जप याचना नहीं, अपितु 'पुकार' है। यह एक ऐसा सम्बन्ध है जो पहले से विद्यमान है, बस उसे जाग्रत करना है।
योगिक दृष्टि से, जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह अपने भीतर के उस 'वत्स-भाव' (बालकवत सरलता और विरक्ति) को जाग्रत करता है। जैसे बछड़ा केवल अपनी माता को जानता है, वैसे ही साधक जब संसार के समस्त द्वन्द्वों को छोड़कर केवल 'ॐ' में स्थित होता है, तब वह 'वत्साभिमुखी' हो जाता है।
अभ्यास यह है कि जप के समय यह अनुभव किया जाए कि मैं उस परम तत्त्व का अंश हूँ और मेरी यह पुकार (ॐ) उस विराट चेतना को मेरी ओर आकर्षित कर रही है। जब यह भाव प्रगाढ़ होता है, तब अनुभव होता है कि ब्रह्म कहीं दूर आकाश में नहीं, अपितु उसी क्षण साधक की वाणी और हृदय में 'आशु' (शीघ्र) प्रकट हो गया है। यह अवस्था साधक को 'अहंकार' से हटाकर 'अनुरक्ति' (प्रेम) की भूमि पर ले जाती है, जहाँ साधना बोझ नहीं, बल्कि एक मिलन बन जाती है।
शब्दपरब्रह्मणोर्भेदः
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ २.४७ ॥
दो ब्रह्म जानने योग्य हैं — शब्दब्रह्म, और जो परब्रह्म है; शब्दब्रह्ममें पारंगत (साधक) परब्रह्मको प्राप्त होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव की पुकार और ब्रह्म की त्वरित प्रतिक्रिया को गाय और बछड़े के मार्मिक दृष्टान्त से समझाया था। अब ऋषि उस पुकार और उस प्राप्ति के बीच के सूक्ष्म सोपान को स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि वाणी के माध्यम से उस अवाच्य ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
अन्वय: शब्दब्रह्म परं च यत् (तौ) द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये; (यः) शब्दब्रह्मणि निष्णातः (सः) परं ब्रह्माधिगच्छति।
पदार्थ और निर्वचन:
• द्वे ब्रह्मणी: दो ब्रह्म। यहाँ 'ब्रह्मणी' शब्द का प्रयोग उन दो अवस्थाओं या स्वरूपों के लिए हुआ है जिनके माध्यम से सत्य का साक्षात्कार होता है।
• वेदितव्ये: जानने योग्य हैं। यह विधिलिङ् का प्रयोग है, जो संकेत करता है कि यह ज्ञान केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभव का विषय है।
• शब्दब्रह्म: वह ब्रह्म जो नाद, ध्वनि या शब्द के रूप में अभिव्यक्त है। यह अभिव्यक्त ब्रह्म है।
• परं (ब्रह्म): वह जो शब्द से भी परे है, जो अनिर्वचनीय और अवाच्य है। यह अव्यक्त ब्रह्म है।
• निष्णातः: पूर्णतः पारंगत, निपुण या लीन। केवल ऊपरी ज्ञान नहीं, अपितु उस शब्द-तत्त्व में पूरी तरह डूब जाना।
• अधिगच्छति: प्राप्त होता है। यहाँ 'अधिगमन' का अर्थ भौतिक प्राप्ति नहीं, अपितु चेतना का उस स्तर तक उठ जाना है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित कर रहे हैं कि साधक के लिए 'शब्द' केवल संवाद का साधन नहीं, अपितु परब्रह्म तक पहुँचने की सीढ़ी है। वे कहते हैं कि दो ब्रह्म जानने योग्य हैं—एक 'शब्दब्रह्म' और दूसरा 'परब्रह्म'।
रहस्य यह है कि परब्रह्म अवाच्य है, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। किंतु, वह परब्रह्म स्वयं को शब्द के रूप में अभिव्यक्त करता है ताकि जीव उसे पा सके। यह अभिव्यक्त रूप ही 'शब्दब्रह्म' है। प्रणव (ॐ) इसी शब्दब्रह्म का बीज और उच्चतम स्वरूप है। साधक सीधे उस शून्य या अवाच्य परब्रह्म में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी चेतना अभी स्थूल और सूक्ष्म के बंधनों में है। इसलिए, उसे पहले शब्दब्रह्म का आश्रय लेना पड़ता है।
ऋषि स्पष्ट करते हैं कि जो साधक शब्दब्रह्म में 'निष्णातः' हो जाता है—अर्थात जो प्रणव के नाद, उसकी मात्राओं और उसके कंपन में पूरी तरह लीन हो जाता है—वही अंततः उस शब्दब्रह्म के पार जाकर 'परब्रह्म' को प्राप्त करता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी भवन में प्रवेश करने के लिए द्वार का उपयोग किया जाता है; द्वार (शब्दब्रह्म) भवन (परब्रह्म) नहीं है, किंतु द्वार के बिना भवन में प्रवेश संभव नहीं है। अतः शब्दब्रह्म का अभ्यास परब्रह्म की प्राप्ति का अनिवार्य साधन है।
शास्त्र-साक्ष्य —
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ २३२.३० ॥
दो ब्रह्म जाननेयोग्य हैं — शब्दब्रह्म और जो पर (ब्रह्म) है; शब्दब्रह्ममें निष्णात (साधक) परब्रह्मको पाता है।
यह श्लोक महाभारत के शान्तिपर्व में शब्दशः विद्यमान है। यह इस तथ्य की पुष्टि करता है कि वैदिक परंपरा में शब्द और अर्थ, या अभिव्यक्त और अव्यक्त ब्रह्म का यह संबंध सर्वमान्य है। महाभारत और यह स्मृति दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि शब्दब्रह्म की निपुणता ही परब्रह्म के साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'क्रम' का बोध कराता है। योग में किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सोपानों का पालन करना आवश्यक है। यहाँ साधक के लिए दो भूमियाँ हैं:
१. शब्दब्रह्म की भूमि: यहाँ साधक प्रणव के उच्चारण, उसके नाद और उसके कंपन का अभ्यास करता है। जब वह 'ॐ' का जप करता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं बोल रहा होता, अपितु अपनी चेतना को शब्द की सूक्ष्मता में ले जा रहा होता है। 'निष्णातः' होने का अर्थ है—जब जप करते समय जप करने वाला, जप की क्रिया और जप का विषय (शब्द) तीनों एक हो जाएँ। यह शब्द-समाधि की अवस्था है।
२. परब्रह्म की भूमि: जब शब्दब्रह्म में पूर्णता आती है, तब एक क्षण ऐसा आता है जब शब्द स्वयं शांत हो जाता है। शब्द के क्षीण होने पर जो शेष बचता है, वही 'परब्रह्म' है। साधक पहले शब्द के सहारे ऊपर उठता है और फिर उस सहारे को छोड़कर उस अनंत में विलीन हो जाता है।
अतः साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह पहले शब्दब्रह्म (प्रणव) में अपनी एकाग्रता को पूर्ण करे। जब तक शब्द में पूर्णता नहीं आती, तब तक शब्द से परे जाने का प्रयास केवल मानसिक कल्पना होगा। पहले शब्द में लीन होना, फिर शब्द के विलीन होने पर परब्रह्म का अनुभव करना—यही इस श्लोक का योगिक मर्म है।
अन्तःशरीरप्रभवमुदानप्रेरितं च यत् ।
वागुच्चार्यं श्रोत्रवृत्ति शब्दब्रह्म तदुच्यते ॥ २.४८ ॥
जो शरीरके भीतरसे उत्पन्न होता है, उदानसे प्रेरित होता है, वाणीसे उच्चारा जाता है और श्रोत्रका विषय है — वह शब्दब्रह्म कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शब्दब्रह्म और परब्रह्म के भेद को स्पष्ट करते हुए यह बताया कि शब्दब्रह्म में निपुणता प्राप्त करने के बाद ही साधक उस अनिर्वचनीय परब्रह्म तक पहुँच सकता है। अब इस श्लोक में ऋषि 'शब्दब्रह्म' की सूक्ष्म परिभाषा दे रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि जिस शब्द-तत्त्व का अभ्यास उसे करना है, उसका उद्गम, गमन और स्वरूप क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्तःशरीरप्रभवमुदानप्रेरितं च यत् ।
वागुच्चार्यं श्रोत्रवृत्ति शब्दब्रह्म तदुच्यते ॥
अन्वय: यत् अन्तःशरीरप्रभवम्, उदानप्रेरितं च, (तद्) वागुच्चार्यं (तथा) श्रोत्रवृत्ति (अस्ति), तत् शब्दब्रह्म उच्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• अन्तःशरीरप्रभवम्: शरीर के भीतर से उत्पन्न होने वाला। यहाँ 'अन्तःशरीर' का अर्थ केवल भौतिक देह नहीं, अपितु वह सूक्ष्म आंतरिक आकाश है जहाँ नाद का जन्म होता है।
• उदानप्रेरितम्: उदान प्राण द्वारा प्रेरित। उदान वह प्राण है जो ऊपर की ओर गति करता है और वाणी के उच्चारण में मुख्य भूमिका निभाता है।
• वागुच्चार्यम्: वाणी द्वारा उच्चारित। जब आंतरिक स्पंदन मुख के माध्यम से ध्वनि बन जाता है।
• श्रोत्रवृत्ति: श्रोत्र (कान) की वृत्ति या विषय। वह ध्वनि जो कानों द्वारा सुनी जा सके और जिससे श्रवण-इन्द्रिय सक्रिय हो।
• शब्दब्रह्म: वह ब्रह्म जो ध्वनि के रूप में अभिव्यक्त है। इसे 'वैखरी' नाद की श्रेणी में रखा जा सकता है।
• तदुच्यते: वह कहा जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य शब्दब्रह्म की भौतिक और सूक्ष्म प्रक्रिया का विश्लेषण कर रहे हैं। ऋषि यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि जिसे हम साधारण 'ध्वनि' समझते हैं, वह वास्तव में ब्रह्म का ही एक विवर्त या विस्तार है, बशर्ते उसे साधना की दृष्टि से देखा जाए।
ऋषि कहते हैं कि शब्दब्रह्म वह है जिसका जन्म 'अन्तःशरीर' में होता है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी शब्द बाहर से नहीं आता, वह पहले हृदय के भीतर एक सूक्ष्म स्पंदन के रूप में जन्म लेता है। यह आंतरिक ध्वनि जब ऊपर की ओर उठती है, तब उसे 'उदान' प्राण का सहारा मिलता है। उदान प्राण ही वह शक्ति है जो आंतरिक संकल्प को भौतिक ध्वनि में बदलने के लिए धक्का देती है। यदि उदान का सहयोग न हो, तो आंतरिक विचार केवल विचार ही रहेंगे, वे शब्द नहीं बन पाएंगे।
इसके पश्चात, यह उदान-प्रेरित ऊर्जा जब मुख और जिह्वा के संपर्क में आती है, तब वह 'वागुच्चार्य' होती है—अर्थात वाणी के माध्यम से प्रकट होती है। अंततः, जब यह ध्वनि वायु में तरंगित होकर श्रोत्र (कान) तक पहुँचती है और श्रोत्र उसकी वृत्ति (सक्रियता) का कारण बनता है, तब उसे 'शब्दब्रह्म' कहा जाता है।
यहाँ रहस्य यह है कि याज्ञवल्क्य केवल व्याकरण या शरीर-विज्ञान नहीं बता रहे, बल्कि वे साधक को यह दिखा रहे हैं कि शब्द का एक पूरा चक्र है: उत्पत्ति (भीतर) → प्रेरणा (उदान) → अभिव्यक्ति (वाणी) → ग्रहण (श्रोत्र)। जब साधक इस पूरी प्रक्रिया के प्रति सजग होकर जप करता है, तब वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, बल्कि ब्रह्म के प्रकटीकरण की पूरी यात्रा का अनुभव करता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'नाद-साधना' की प्रारंभिक भूमि पर ले जाता है। साधक जब प्रणव (ॐ) का जप करता है, तो उसे इस श्लोक के अनुसार निम्नलिखित क्रम का अभ्यास करना चाहिए:
१. उद्गम का अनुभव: साधक यह अनुभव करे कि जप का बीज शरीर के भीतर, हृदय-आकाश में उत्पन्न हो रहा है। वह ध्वनि को बाहर खोजने के बजाय भीतर उठते हुए देखे।
२. प्राण-शक्ति का बोध: वह अनुभव करे कि उदान प्राण उस ध्वनि को नीचे से ऊपर की ओर धकेल रहा है। यहाँ साधक को यह बोध होता है कि शब्द और प्राण अभिन्न हैं; बिना प्राण के शब्द मृत है।
३. अभिव्यक्ति की सजगता: जब शब्द मुख से निकलता है, तब साधक केवल ध्वनि न निकाले, बल्कि उस ऊर्जा के प्रवाह को महसूस करे जो भीतर से बाहर की ओर आ रही है।
४. श्रोत्र-वृत्ति का अभ्यास: यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है। साधक अपने ही उच्चारित शब्द को स्वयं के कानों से सुने। जब वह अपने ही जप को सुनता है, तो उसकी चेतना बाहर से मुड़कर पुनः भीतर की ओर आने लगती है।
इस अभ्यास से साधक 'स्थूल शब्द' से 'सूक्ष्म शब्द' की ओर बढ़ता है। जब वह इस चक्र को समझ लेता है, तब वह धीरे-धीरे बाहरी उच्चारण (वैखरी) को छोड़कर आंतरिक ध्वनि (मध्यमा और पश्यंती) की ओर अग्रसर होता है, जो उसे अगले श्लोकों में बताए गए 'अक्षर' और 'परब्रह्म' की ओर ले जाता है। यह अभ्यास साधक को देह-बोध से उठाकर शब्द-बोध और फिर शून्य-बोध की ओर ले जाने वाली पहली सीढ़ी है।
शब्दब्रह्मात् परं ब्रह्म तस्मिन् क्षीणे यदक्षरम् ।
तदक्षरं सदा ध्यायेद्यदीच्छेद्योगमात्मनः ॥ २.४९ ॥
शब्दब्रह्म से परे परं ब्रह्म है, उसके क्षीण होने पर जो अक्षर है; जो अपने लिए योग चाहे, वह उस अक्षर का सदा ध्यान करे...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शब्दब्रह्म की परिभाषा देते हुए उसे उदान-प्रेरित और श्रोत्र-वृत्ति (श्रव्य) बताया था। अब इस श्लोक में ऋषि शब्दब्रह्म की सीमा निर्धारित कर रहे हैं और साधक को उस बिंदु की ओर ले जा रहे हैं जहाँ ध्वनि समाप्त होती है और वास्तविक 'अक्षर' का उदय होता है।
अन्वय और पदार्थ —
शब्दब्रह्मात् परं ब्रह्म तस्मिन् क्षीणे यदक्षरम् ।
तदक्षरं सदा ध्यायेद्यदीच्छेद्योगमात्मनः ॥
अन्वय: शब्दब्रह्मात् परं ब्रह्म (अस्ति), तस्मिन् (शब्दब्रह्मणः) क्षीणे यत् अक्षरम् (अस्ति), तत् अक्षरं यः (साधकः) आत्मनः योगम् इच्छेत्, (सः) तदक्षरं सदा ध्यायेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• शब्दब्रह्मात् परं ब्रह्म: शब्दब्रह्म से परे जो परब्रह्म है। यहाँ 'परं' का अर्थ केवल स्थान से नहीं, अपितु सूक्ष्मता और श्रेष्ठता से है। जो ध्वनि के अधीन नहीं है, वह 'पर' है।
• तस्मिन् क्षीणे: उसके (शब्दब्रह्म के) क्षीण होने पर। 'क्षीण' का अर्थ यहाँ नष्ट होना नहीं, अपितु विलीन होना या शांत होना है। जब शब्द अपनी अभिव्यक्ति समाप्त कर मूल में लौट जाता है।
• यदक्षरम्: जो अक्षर है। 'अक्षर' का शाब्दिक अर्थ है— जिसका क्षय न हो (अ + क्षर)। वह ध्वनि जो शब्द के शांत होने के बाद भी शेष रहती है।
• सदा ध्यायेत्: निरंतर ध्यान करे।
• यदीच्छेद्योगमात्मनः: यदि वह अपनी आत्मा का योग (परमात्मा से मिलन) चाहता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य योगीश्वर शब्द और शून्य के बीच की उस संधि का रहस्य खोल रहे हैं, जिसे योगमार्ग में 'अमात्र' की स्थिति कहा जाता है।
ऋषि कहते हैं कि शब्दब्रह्म (ध्वनि-रूप ब्रह्म) साधना की पहली सीढ़ी है, किंतु वह अंतिम लक्ष्य नहीं है। शब्दब्रह्म वह है जो उदान द्वारा उच्चारित होता है और कानों से सुना जाता है, अतः वह अभी भी 'माया' या 'प्रपञ्च' के दायरे में है क्योंकि उसमें द्वैत (बोलने वाला और सुनने वाला) विद्यमान है। इस शब्दब्रह्म से परे एक 'परब्रह्म' है, जो मौन है, अनिर्वचनीय है और शब्दों की पहुँच से बाहर है।
साधक के लिए प्रश्न यह है कि उस मौन परब्रह्म को पकड़े कैसे? यहाँ ऋषि एक अत्यंत सूक्ष्म विधि बताते हैं— "तस्मिन् क्षीणे यदक्षरम्"। जब शब्दब्रह्म (ध्वनि) क्षीण हो जाता है, तब भी एक ऐसी सत्ता शेष रहती है जो शब्द नहीं है, पर शब्द का आधार है। जैसे लहरें शांत होने पर भी सागर शेष रहता है, वैसे ही जब उच्चारित ओंकार की ध्वनि शांत होती है, तब जो 'अनहद' या 'अक्षर' शेष रहता है, वही परब्रह्म का द्वार है।
यह 'अक्षर' वह बिंदु है जहाँ शब्द समाप्त होता है और शुद्ध चैतन्य आरम्भ होता है। जो साधक अपनी आत्मा का योग चाहता है, उसे बाहरी ध्वनि के जप से आगे बढ़कर उस 'शेष अक्षर' का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान केवल मानसिक नहीं, अपितु अनुभवजन्य है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रारहित चौथा है — व्यवहारसे परे, प्रपञ्चका उपशम, शिव, अद्वैत। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है; जो ऐसा जानता है, वह आत्मासे आत्मामें प्रवेश करता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में इसी रहस्य को 'तुरीया' अवस्था के रूप में समझाया गया है, जहाँ मात्रारहित (अमात्र) स्थिति का वर्णन है। उपनिषद् कहता है कि वह चौथा पद व्यवहार से परे और प्रपञ्च का उपशम है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उसी 'अमात्र' स्थिति की ओर संकेत करता है। जहाँ स्मृति कहती है "शब्दब्रह्म के क्षीण होने पर जो अक्षर है", उपनिषद् उसे "प्रपञ्चोपशमः" (जहाँ प्रपञ्च शांत हो गया हो) कहता है। दोनों का मेल इस बात में है कि परब्रह्म की प्राप्ति के लिए शब्द (मात्र) का विसर्जन अनिवार्य है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'वैखरी' से 'पश्यंती' और फिर 'परा' की ओर जाने की यात्रा है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह पहले ध्वनि को सुनता है (शब्दब्रह्म)। धीरे-धीरे वह ध्वनि सूक्ष्म होती जाती है। एक समय ऐसा आता है जब उच्चारण समाप्त हो जाता है, लेकिन मन के भीतर एक गूँज या एक गहरा मौन बना रहता है। वह मौन रिक्तता नहीं है, बल्कि एक 'पूर्णता' है। यही वह 'अक्षर' है।
साधक जब इस अक्षर का ध्यान करता है, तो वह 'साकार' से 'निराकार' की भूमि में प्रवेश करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि ध्वनि के शांत होने के बाद जो 'अवशेष' बचता है, उसी में चित्त को स्थिर करना। जब साधक शब्द के क्षय और अक्षर के उदय के बीच के इस अंतराल को पकड़ लेता है, तब वह देह-बुद्धि से ऊपर उठकर आत्म-योग की स्थिति में पहुँच जाता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल ध्वनि के बंधन से मुक्त कर उसे उस अक्षर-ब्रह्म में प्रतिष्ठित करता है, जो अविनाशी है।
पञ्चलक्षणः प्रणवः
अकारश्चाप्युकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
मात्रास्तद्विनियोगश्च प्रणवः पञ्चलक्षणः ॥ २.५० ॥
अकार, उकार, मकार, बिन्दु और मात्राएँ, तथा उनका विनियोग — इस प्रकार प्रणव पाँच लक्षणोंवाला है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शब्दब्रह्म के क्षीण होने पर शेष रहने वाले 'अक्षर' के ध्यान का निर्देश दिया था। अब ऋषि उस अक्षर की व्यावहारिक और सूक्ष्म संरचना को स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक केवल कल्पना में नहीं, अपितु एक निश्चित विधि और लक्षणों के साथ प्रणव का अभ्यास कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अकारश्चाप्युकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
मात्रास्तद्विनियोगश्च प्रणवः पञ्चलक्षणः ॥
अन्वय: अकारः, उकारः, मकारः, बिन्दुः एव च, मात्राः, तद्-विनियोगः च (एताः) प्रणवः पञ्चलक्षणः (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• अकार, उकार, मकार: ये प्रणव के तीन मुख्य स्वर-अंश हैं। व्याकरणिक दृष्टि से ये वर्ण हैं, किंतु योगिक दृष्टि से ये सृष्टि के आदि, मध्य और अंत के प्रतीक हैं।
• बिन्दु: वह सूक्ष्म बिंदु जो 'म' के उच्चारण के बाद शेष रहता है; वह ध्वनि का वह केंद्र है जहाँ शब्द अपनी सूक्ष्मता में सिमटकर मौन हो जाता है।
• मात्रा: प्रणव के ऊपर अंकित अर्धचन्द्र रूपी चिह्न, जो उस अनंत विस्तार का संकेत है जो वर्णों की सीमा से परे है।
• विनियोग: इन पाँचों अंगों का विशिष्ट उद्देश्य, प्रयोग और उनके आपसी समन्वय की विधि। 'विनियोग' का अर्थ है— किसी मन्त्र या अक्षर को उसके विशिष्ट फल की प्राप्ति के लिए सही रीति से लगाना।
• पञ्चलक्षणः: पाँच लक्षणों से युक्त। यहाँ संख्या 'पाँच' केवल गिनती नहीं, बल्कि प्रणव की पूर्णता के पाँच अनिवार्य सोपान हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्रणव (ॐ) के उस विग्रह को प्रस्तुत कर रहे हैं, जो स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म शून्य की ओर ले जाने वाला मानचित्र है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि प्रणव केवल एक शब्द नहीं, बल्कि पाँच लक्षणों का एक समुच्चय है।
प्रथम तीन लक्षण— अ, उ और म— वाणी के विस्तार हैं। 'अ' कंठ से निकलता है, 'उ' जिह्वा के मध्य से और 'म' ओष्ठों के बंद होने पर पूर्ण होता है। यह यात्रा बाहर से भीतर की ओर है। जब साधक 'अ' से 'उ' और 'उ' से 'म' की ओर बढ़ता है, तो वह वास्तव में अपने अस्तित्व के विस्तार को समेटकर केंद्र की ओर ला रहा होता है।
चौथा लक्षण 'बिन्दु' है। जब 'म' का उच्चारण समाप्त होता है, तब एक क्षण के लिए एक ऐसी सूक्ष्म ध्वनि शेष रहती है जो सुनाई नहीं देती, केवल अनुभव होती है। यही वह बिंदु है जहाँ शब्दब्रह्म समाप्त होता है और परब्रह्म की उपस्थिति का आभास शुरू होता है। यह बिन्दु समस्त ब्रह्माण्ड का बीज है।
पाँचवाँ लक्षण 'मात्रा' है। मात्रा वह बिंदु-परत्व है, वह मौन है जो बिन्दु के बाद आता है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक वर्णों और ध्वनियों के बंधन से मुक्त होकर उस 'अक्षर' में स्थित हो जाता है जिसका उल्लेख पिछले श्लोक में किया गया था।
अंत में ऋषि 'विनियोग' शब्द जोड़कर यह समझाते हैं कि केवल इन पाँचों अंगों को जान लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इनका सही क्रम में प्रयोग करना अनिवार्य है। विनियोग ही वह सेतु है जो एक साधारण उच्चारण को 'योग' में बदल देता है। यदि विनियोग सही न हो, तो यह केवल वाक्-जाल है; यदि विनियोग सही हो, तो यह साक्षात् ब्रह्म-प्राप्ति का साधन है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि-योग' का आधार है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक प्रणव के प्रत्येक अक्षर को केवल शब्द न मानकर एक अनुभव बनाए।
जब वह 'अ' का उच्चारण करे, तो उसे अपने भीतर के व्यापक विस्तार का अनुभव हो। 'उ' के समय वह उस विस्तार को संकुचित कर केंद्र की ओर ले जाए, और 'म' के समय वह समस्त चेतना को हृदय के भीतर बंद कर ले। इसके बाद, वह उस 'बिन्दु' पर ठहर जाए जहाँ ध्वनि शांत हो चुकी है, किंतु जागरूकता अभी भी शेष है। अंत में, वह उस 'मात्रा' (मौन) में विलीन हो जाए, जहाँ न कोई अक्षर है, न कोई ध्वनि, केवल शुद्ध चैतन्य है।
यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' (अ, उ, म) से 'सूक्ष्म' (बिन्दु) और फिर 'कारण' (मात्रा) की भूमि तक ले जाता है। इन पाँच लक्षणों का ज्ञान होने से साधक का उच्चारण पूर्ण होता है, क्योंकि वह जानता है कि उसे कहाँ रुकना है और किस बिंदु पर मौन में प्रवेश करना है। यही वह विधि है जिससे शब्दब्रह्म के माध्यम से परब्रह्म की प्राप्ति संभव होती है।
प्रणवोपासना
ओंकारः प्रणवे योज्यो ब्रह्माणि प्रणवस्तथा ।
आनन्दं तत् परं ब्रह्म तत् प्रविश्यामृती भवेत् ॥ २.५१ ॥
ओंकार को प्रणव में जोड़े और प्रणव को ब्रह्म में जोड़े; वह आनन्द परं ब्रह्म है, उसमें प्रवेश करके अमर हो जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के पाँच लक्षणों (अ, उ, म, बिन्दु और मात्रा) का विवेचन कर उसकी सूक्ष्म संरचना को स्पष्ट किया था। अब ऋषि इस संरचना के प्रयोग द्वारा साधक की उस यात्रा का वर्णन कर रहे हैं, जो उच्चार्य ध्वनि से आरम्भ होकर परब्रह्म के आनन्द में विलीन हो जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
ओंकारः प्रणवे योज्यो ब्रह्माणि प्रणवस्तथा ।
आनन्दं तत् परं ब्रह्म तत् प्रविश्यामृती भवेत् ॥
अन्वय: ओंकारः प्रणवे योज्यः, (तथा) प्रणवः ब्रह्माणि (ब्रह्मणः) योज्यः। तत् परं ब्रह्म आनन्दम् (अस्ति), तस्मिन् प्रविश्य अमृतः भवेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• ओंकारः: यहाँ 'ओंकार' का अर्थ उस उच्चार्य ध्वनि से है जिसे वाणी द्वारा व्यक्त किया जाता है। यह साधना का प्रथम सोपान है।
• प्रणवः: वह सूक्ष्म नाद या प्राणमय अवस्था, जहाँ ध्वनि अपनी स्थूलता त्यागकर आंतरिक स्पन्दन बन जाती है।
• योज्यः: जोड़ने योग्य। यहाँ 'योग' का अर्थ केवल मिलाना नहीं, बल्कि एक अवस्था से दूसरी सूक्ष्म अवस्था में प्रवेश करना है।
• ब्रह्माणि: यहाँ 'ब्रह्माणि' का प्रयोग परब्रह्म के लिए हुआ है। प्रणव जब अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है, तो वह उस निराकार ब्रह्म में विलीन हो जाता है।
• आनन्दम्: वह अवस्था जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल परमानन्द शेष रहता है।
• प्रविश्य: भीतर प्रवेश करके। यह केवल मानसिक कल्पना नहीं, अपितु चेतना का विलीनीकरण है।
• अमृती भवेत्: अमर हो जाना। जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप (अक्षर) को प्राप्त करना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधना की एक क्रमिक सोपान-विधि बता रहे हैं। ऋषि यहाँ 'ओंकार', 'प्रणव' और 'ब्रह्म' के बीच एक सूक्ष्म भेद और उनके परस्पर सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं।
प्रथम चरण है— ओंकार को प्रणव में जोड़ना। जब साधक 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह स्थूल शब्दब्रह्म है। इस उच्चार्य ध्वनि को जब प्राण के साथ जोड़कर आंतरिक किया जाता है, तब वह 'प्रणव' बन जाता है। ओंकार वह द्वार है, और प्रणव वह मार्ग है। जब तक ध्वनि कानों को सुनाई देती है, वह ओंकार है; जब वह केवल अंतःकरण में गूँजने लगती है, तब वह प्रणव हो जाती है।
द्वितीय चरण है— प्रणव को ब्रह्म में जोड़ना। प्रणव (नाद) वह अंतिम सेतु है जो जीव को परब्रह्म से जोड़ता है। जब प्रणव का अभ्यास इतना गहन हो जाता है कि नाद भी शांत हो जाता है और केवल एक मौन उपस्थिति शेष रहती है, तब साधक 'प्रणव' से 'ब्रह्म' में प्रवेश करता है। यह वह स्थिति है जहाँ साधन (प्रणव) साध्य (ब्रह्म) में विलीन हो जाता है।
ऋषि कहते हैं कि वह परब्रह्म वास्तव में 'आनन्द' स्वरूप है। यह आनन्द कोई मानसिक सुख नहीं, अपितु वह पूर्णता है जहाँ पहुँचकर आत्मा अपनी विस्मृति को त्याग देती है। इस आनन्द-स्वरूप ब्रह्म में प्रविष्टि ही वास्तविक 'अमृतत्व' है। अमृत का अर्थ केवल चिरंजीवी होना नहीं, अपितु उस 'अक्षर' (अविनाशी) तत्त्व को प्राप्त कर लेना है, जिसकी चर्चा पिछले श्लोकों में की गई थी।
इस प्रकार, यह श्लोक एक पूर्ण यात्रा का मानचित्र है: उच्चार्य ध्वनि (ओंकार) → प्राणमय नाद (प्रणव) → निराकार चैतन्य (ब्रह्म)।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि-योग' का सार है। यहाँ अभ्यास की तीन भूमियाँ स्पष्ट होती हैं:
१. प्रथम भूमि (ओंकार): यहाँ साधक वाणी और श्रोत्र का उपयोग करता है। वह ॐ के वर्णों का शुद्ध उच्चारण करता है। यह स्थूल शरीर और मन की शुद्धि का स्तर है।
२. द्वितीय भूमि (प्रणव): यहाँ साधक उच्चार्य ध्वनि को छोड़कर 'अनाहत' या आंतरिक नाद में स्थित होता है। वह अनुभव करता है कि ध्वनि अब बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर गूँज रही है। यह प्राणमय शरीर का स्तर है, जहाँ वह स्वयं को नाद के साथ जोड़ता है।
३. तृतीय भूमि (ब्रह्म): यह उच्चतम अवस्था है। यहाँ नाद भी लुप्त हो जाता है और केवल 'शून्य' या 'पूर्ण' का अनुभव होता है। साधक अब केवल दृष्टा नहीं रहता, अपितु उस आनन्दमय ब्रह्म में प्रविश्य (विलीन) हो जाता है।
साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि उसे सीधे ब्रह्म की खोज में भटकने के बजाय, पहले ओंकार (शब्द) और फिर प्रणव (नाद) के सोपानों से गुजरना चाहिए। यह यात्रा स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से शून्य की ओर है। जब वह 'अमृत' होता है, तो वह उस स्थिति को प्राप्त करता है जहाँ न कोई शब्द है, न कोई नाद, केवल शुद्ध आनन्दमय चेतना है।
वेदादौ यः स्वरः प्रोक्तो वेदान्ते यः प्रतिष्ठितः ।
तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः ॥ २.५२ ॥
वेदों के आदि में जो स्वर कहा गया है और वेदान्त में जो प्रतिष्ठित है, उस प्रकृति में लीन हुए (स्वर) से जो परे है, वह महेश्वर है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार, प्रणव और परब्रह्म के क्रमिक योग की विधि बताते हुए साधक को अमरत्व की ओर अग्रसर किया था। अब ऋषि उस 'स्वर' के स्वरूप और उसकी परिणति का विवेचन कर रहे हैं, जो वेदों के आरम्भ से लेकर उनके अंत तक व्याप्त है और अंततः महेश्वर के साक्षात्कार का माध्यम बनता है।
अन्वय और पदार्थ —
वेदादौ यः स्वरः प्रोक्तो वेदान्ते यः प्रतिष्ठितः ।
तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः ॥
अन्वय: यः स्वरः वेदादौ प्रोक्तः, (तथा) यः वेदान्ते प्रतिष्ठितः, तस्य प्रकृतिलीनस्य (स्वरस्य) यः परः (अस्ति), स महेश्वरः (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• वेदादौ: वेदों के आरम्भ में। यहाँ 'वेद' का अर्थ केवल ग्रन्थ नहीं, अपितु उस आदि-ज्ञान और आदि-ध्वनि से है जिससे सृष्टि का प्राकट्य हुआ।
• स्वरः: वह नाद या ध्वनि। यहाँ स्वर का अर्थ उस मूल स्पन्दन से है जो समस्त मन्त्रों का बीज है।
• वेदान्ते: वेदान्त में। इसका अर्थ है वेदों के अंतिम लक्ष्य (ब्रह्म-ज्ञान) में या उपनिषदों की पराकाष्ठा में।
• प्रतिष्ठितः: स्थित या स्थापित। वह स्वर जो अंत में केवल एक बिंदु या मौन के रूप में स्थिर हो जाता है।
• प्रकृतिलीनस्य: प्रकृति में लीन। 'प्रकृति' यहाँ उस मायावी शक्ति और त्रिगुणात्मक जगत का प्रतीक है। जब स्वर अपनी अभिव्यक्ति समाप्त कर पुनः अपने मूल कारण (प्रकृति) में विलीन हो जाता है।
• परः: उससे परे। जो विलीनीकरण की प्रक्रिया से भी ऊपर है; जो लीन होने और प्रकट होने के द्वन्द्व से मुक्त है।
• महेश्वरः: वह परम ईश्वर, जो समस्त स्वरों, नादों और प्रकृति का अधिष्ठाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्वर के माध्यम से निराकार ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि वेदों के आदि में जिस स्वर का उल्लेख है, वह सृष्टि का प्रथम स्पन्दन है—वह 'ॐ' की वह ध्वनि है जिसने शून्य को आकार दिया। यही स्वर जब वेदान्त में प्रतिष्ठित होता है, तो वह केवल ध्वनि नहीं रहता, अपितु 'अक्षर' (अविनाशी) बन जाता है।
यहाँ एक सूक्ष्म रहस्य है: स्वर जब तक अभिव्यक्त है, वह प्रकृति के अधीन है। जब साधक जप और ध्यान के माध्यम से उस स्वर को अंतर्मुखी करता है, तो वह स्वर धीरे-धीरे अपनी स्थूलता त्यागकर सूक्ष्म होता जाता है और अंततः प्रकृति (माया/गुणों) में लीन हो जाता है। जिसे हम 'मौन' या 'निःशब्द' अवस्था कहते हैं, वह वास्तव में स्वर का प्रकृति में लीन होना है।
परन्तु, याज्ञवल्क्य यहाँ एक और उच्चतर सोपान की ओर संकेत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो इस 'प्रकृतिलीन स्वर' से भी परे है, वही वास्तविक 'महेश्वर' है। भाव यह है कि स्वर का प्रकट होना 'सृष्टि' है और स्वर का लीन होना 'प्रलय' है। जो इन दोनों अवस्थाओं—प्रकटीकरण और विलीनीकरण—से सर्वथा परे, साक्षी भाव में स्थित है, वही महेश्वर है। वह ईश्वर केवल ध्वनि का स्वामी नहीं, अपितु उस मौन का भी स्वामी है जिसमें ध्वनि विलीन हुई।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'नाद-योग' और 'मौन' के बीच के सेतु को स्पष्ट करता है। साधक जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह प्रथम चरण में 'वेदादि स्वर' (उच्चार्य ध्वनि) का अनुभव करता है। अभ्यास के गहन होने पर वह स्वर अंतःकरण में गूँजने लगता है और अंततः एक ऐसी स्थिति आती है जहाँ ध्वनि और मौन का भेद मिट जाता है—यही 'प्रकृतिलीन' अवस्था है।
साधक यहाँ इस अनुभव से गुजरता है कि ध्वनि (स्वर) केवल एक माध्यम थी। जब वह माध्यम भी शांत हो जाता है, तब जो शेष बचता है, वह 'पर' (परे) है। योगिक अभ्यास में यह वह भूमि है जहाँ साधक 'शब्द-ब्रह्म' से 'पर-ब्रह्म' की ओर छलांग लगाता है।
अभ्यास यह है कि स्वर को केवल कानों से न सुनकर, उसे हृदय और मस्तिष्क के शून्य में विलीन होते हुए देखना। जब स्वर प्रकृति में लीन हो जाए और केवल एक शुद्ध, निर्विकार चेतना शेष रहे, तब साधक अनुभव करता है कि वह उस महेश्वर में स्थित है जो न उत्पन्न होता है और न ही विलीन होता है। यह श्लोक साधक को 'ध्वनि' से 'अध्वनि' (मौन) और फिर 'मौन' से 'परम-तत्त्व' की ओर ले जाने का निर्देश है।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन ॥ २.५३ ॥
जिससे वाणी मन के साथ अप्राप्य होकर लौट आती है, ब्रह्म के उस आनन्द को जाननेवाला विद्वान् किसी से भी नहीं डरता...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्वर के प्रकृति में लीन होने और उससे परे 'महेश्वर' के स्वरूप का वर्णन किया था। अब ऋषि उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ शब्द और मन दोनों अपनी सीमा पर पहुँचकर शांत हो जाते हैं और साधक उस परम आनन्द का अनुभव करता है।
अन्वय और पदार्थ —
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन ॥
अन्वय: यतः वाचः मनसा सह (तम्) अप्राप्य निवर्तन्ते, (तस्य) ब्रह्मणः आनन्दं यः विद्वान् (अस्ति), स कुतश्चन न बिभेति।
पदार्थ और निर्वचन:
• यतः: जहाँ से। यह उस बिंदु या सीमा का संकेत है जहाँ अभिव्यक्ति समाप्त होती है।
• वाचः: वाणी। यहाँ वाणी केवल उच्चारित शब्द नहीं, अपितु 'वैखरी', 'मध्यमा' और 'पश्यंती'—तीनों स्तरों की अभिव्यक्ति है।
• मनसा सह: मन के साथ। वाणी और मन सहचर हैं; जहाँ तक मन की संकल्पना पहुँचती है, वहीं तक वाणी शब्द गढ़ सकती है।
• अप्राप्य: प्राप्त न कर। जब लक्ष्य (ब्रह्म) वाणी और मन की पहुँच से परे हो।
• निवर्तन्ते: लौट आते हैं। जब साधन (वाणी-मन) अपनी सीमा पा लेते हैं, तो वे पुनः अपने मूल स्रोत की ओर मुड़ जाते हैं।
• ब्रह्मणः आनन्दम्: ब्रह्म का आनन्द। वह सुख जो किसी बाहरी वस्तु का उपभोग नहीं, अपितु स्वयं का स्वरूप है।
• विद्वान्: जानने वाला। वह योगी जिसने केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु अनुभवजन्य साक्षात्कार किया है।
• न बिभेति: भय नहीं करता। भय केवल द्वैत में होता है; अद्वैत के अनुभव में भय का अस्तित्व नहीं रहता।
• कुतश्चन: किसी से भी या कहीं से भी।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परा-अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ साधना शब्द-साधना से ऊपर उठकर मौन-साधना में परिवर्तित हो जाती है।
ऋषि कहते हैं कि एक ऐसी सीमा आती है जहाँ वाणी और मन, दोनों साथ मिलकर प्रयास करते हैं, किंतु उस परम तत्त्व को 'प्राप्त' नहीं कर पाते और अंततः लौट आते हैं। यहाँ 'अप्राप्य' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे वाणी द्वारा परिभाषित किया जा सके या मन द्वारा पकड़ा जा सके। वाणी केवल संकेत दे सकती है, मन केवल कल्पना कर सकता है, किंतु साक्षात्कार इन दोनों के विलीनीकरण के बाद ही संभव है। जब वाणी का शब्द और मन का विचार दोनों शांत हो जाते हैं, तब जो शेष बचता है, वही 'ब्रह्म' है।
जब साधक इस सत्य को जान लेता है कि वह उस 'ब्रह्मानन्द' का स्वरूप है, तब वह निर्भय हो जाता है। भय का मूल कारण 'पर' (दूसरे) का होना है। जब तक मन और वाणी सक्रिय हैं, वे संसार को 'मैं' और 'तू' में विभाजित रखते हैं। किंतु जिस विद्वान् ने उस आनन्द को जान लिया जहाँ वाणी लौट आती है, उसके लिए अब कोई 'दूसरा' शेष नहीं रहा। जहाँ द्वैत का अभाव है, वहाँ भय का कोई आधार नहीं बचता। अतः वह 'कुतश्चन' अर्थात् किसी भी परिस्थिति, किसी भी काल या किसी भी सत्ता से भयमुक्त हो जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति ॥ २.९ ॥
जहाँसे मनके साथ वाणी (उसे) न पाकर लौट आती है — ब्रह्मके उस आनन्दको जाननेवाला कभी भय नहीं करता।
यह श्लोक पूर्णतः तैत्तिरीय उपनिषद् के इस मंत्र के अनुरूप है। उपनिषद् और स्मृति दोनों का मत एक ही है कि ब्रह्म वाणी और मन के अतिक्रमण के बाद प्राप्त होने वाला आनन्द है। उपनिषद् इसे एक सत्य के रूप में उद्घोषित करता है, जबकि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसे प्रणव-साधना के क्रम में एक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती है। यहाँ स्मृति यह स्पष्ट करती है कि यह निर्भयता केवल दार्शनिक ज्ञान से नहीं, बल्कि उस आनन्द के 'विद्वान्' (साक्षी) होने से आती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गहरा योगिक अर्थ है। सामान्यतः जब ध्यान में विचार शांत होने लगते हैं और वाणी मौन हो जाती है, तो साधक को लगता है कि वह कुछ 'खो' रहा है या वह लक्ष्य तक नहीं पहुँच पा रहा। वह घबराकर पुनः मन और वाणी के सहारे लौटने का प्रयास करता है।
परंतु महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ संकेत दे रहे हैं कि वाणी और मन का 'लौट आना' (निवर्तन) हार नहीं, बल्कि विजय है। यह वह बिंदु है जहाँ 'शब्दब्रह्म' समाप्त होता है और 'परब्रह्म' का अनुभव आरम्भ होता है। साधक को इस श्लोक से यह अभ्यास करना है कि वह वाणी के मौन होने पर विचलित न हो, बल्कि उस मौन में छिपे आनन्द को खोजे।
जब साधक प्रणव (ॐ) का जप करता है, तो अंत में 'म' के बाद जो गहरा मौन आता है, वही वह स्थान है जहाँ से वाणी लौट आती है। उस मौन में टिकना ही 'ब्रह्मानन्द' का अनुभव करना है। इस अवस्था में साधक 'भय' से 'अभय' की भूमि में प्रवेश करता है, क्योंकि वह जान जाता है कि वह उस अविनाशी अक्षर का अंश है जिसे न वाणी बाँध सकती है, न मन।
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ २.५४ ॥
प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है; सावधान होकर (उसे) बेधना चाहिए, और बाणकी भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिए।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस अवस्था का वर्णन किया जहाँ वाणी और मन अपनी सीमा पाकर लौट आते हैं और साधक ब्रह्म-आनन्द में स्थित होकर निर्भय हो जाता है। अब ऋषि उस परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक 'साधन-विधि' का संकेत दे रहे हैं कि उस अनिर्वचनीय ब्रह्म तक पहुँचने का मार्ग क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥
अन्वय: प्रणवः धनुः (अस्ति), आत्मा तु शरः (अस्ति), ब्रह्म तत् लक्ष्यम् उच्यते। (तद्ब्रह्मं) अप्रमत्तेन वेद्धव्यम्, (ततः) शरवत् (तस्मिन्) तन्मयः भवेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्रणवः धनुः: प्रणव (ॐ) धनुष है। जिस प्रकार धनुष बाण को वेग और दिशा प्रदान करता है, वैसे ही प्रणव साधक की चेतना को प्रक्षेपित करने का आधार है।
• शरो ह्यात्मा: आत्मा ही बाण है। यहाँ 'आत्मा' का अर्थ जीवात्मा या वह प्राण-शक्ति है जिसे साधक एकाग्र कर लक्ष्य की ओर भेजता है। 'हि' यहाँ निश्चयवाचक है कि बाण और कुछ नहीं, स्वयं साधक की अंतःशक्ति ही है।
• ब्रह्म तल्लक्ष्यम्: ब्रह्म वह लक्ष्य है। वह अंतिम बिंदु जहाँ पहुँचकर समस्त द्वैत समाप्त हो जाता है।
• अप्रमत्तेन: बिना प्रमाद के, पूर्ण सजगता और सावधानी से। प्रमाद का अर्थ है—चित्त का भटकना या आलस्य।
• वेद्धव्यम्: बेधना चाहिए। यह विधिलिङ् है, जो एक अनिवार्य साधना का निर्देश देता है। लक्ष्य को भेदने का अर्थ है—साक्षात्कार करना।
• शरवत् तन्मयः: बाण की भाँति तन्मय। जब बाण लक्ष्य को भेदकर उसमें समा जाता है, तो वह लक्ष्य से अलग नहीं रहता; वह लक्ष्य में ही विलीन हो जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधना की एक अत्यंत सूक्ष्म और गत्यात्मक रूपक-विधि प्रस्तुत कर रहे हैं। यहाँ वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल ज्ञान या केवल मन्त्र पर्याप्त नहीं है, अपितु एक 'प्रक्षेपण' की आवश्यकता है।
ऋषि कहते हैं कि प्रणव वह धनुष है जो साधक के भीतर की बिखरी हुई ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित कर उसे ऊपर की ओर भेजने की सामर्थ्य रखता है। यदि प्रणव धनुष है, तो वह बाण कौन है? वह बाण स्वयं साधक की 'आत्मा' या उसकी एकाग्र प्राण-शक्ति है। जिस प्रकार एक कुशल धनुर्धर बाण को चलाने से पूर्व उसे पूरी शक्ति से खींचता है और फिर एक क्षण के लिए स्थिर होकर लक्ष्य पर दृष्टि टिकाता है, वैसे ही योगी प्रणव के माध्यम से अपनी चेतना को संकुचित कर उसे ब्रह्म-लक्ष्य की ओर प्रक्षेपित करता है।
यहाँ 'अप्रमत्त' होने का विशेष निर्देश है। योग में प्रमाद का अर्थ है—साधना के समय मन का सूक्ष्म स्तर पर भी विचलित होना। यदि धनुष की डोरी ढीली हो या धनुर्धर की दृष्टि लक्ष्य से हट जाए, तो बाण कभी लक्ष्य तक नहीं पहुँचता। अतः, पूर्ण जागरूकता ही वह कुंजी है जिससे यह 'वेध' संभव है।
इस प्रक्रिया का चरम फल 'तन्मयता' है। ऋषि कहते हैं कि बाण की भाँति तन्मय हो जाओ। यह एक अत्यंत गूढ़ संकेत है। जब बाण लक्ष्य को भेदता है, तो वह लक्ष्य के भीतर धँस जाता है। अब बाण अलग नहीं है और लक्ष्य अलग नहीं; बाण लक्ष्य का ही एक अंश बन गया है। इसी प्रकार, जब साधक की आत्मा प्रणव के माध्यम से ब्रह्म में विलीन होती है, तो 'मैं' (साधक) और 'वह' (ब्रह्म) का भेद समाप्त हो जाता है। यह स्थिति ही 'तन्मयता' है—जहाँ साधक स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ २.२.४ ॥
प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। सावधान होकर (उसे) बेधना चाहिए, और बाणकी भाँति (लक्ष्यमें) तन्मय हो जाना चाहिए।
मुण्डक उपनिषद् में भी यही सूत्र दिया गया है कि प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस श्रुति-वचन को केवल एक दार्शनिक सत्य के रूप में नहीं, अपितु एक योगिक अभ्यास के रूप में प्रस्तुत करती है। जहाँ मुण्डक उपनिषद् इस सत्य का उद्घाटन करता है, वहीं यह स्मृति इसे 'अप्रमत्त' होकर अभ्यास करने की विधि बताती है, ताकि साधक केवल ज्ञान न करे, अपितु उस लक्ष्य को 'बेध' सके।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'एकग्रता' और 'विलय' का अभ्यास है। यहाँ अभ्यास की तीन अवस्थाएँ हैं:
१. धनुष का निर्माण (प्रणव): साधक ओंकार के जप और उसके स्वरूप के ध्यान से अपने भीतर एक मानसिक तनाव पैदा करता है, जो उसे जड़ता से उठाकर ऊपर की ओर ले जाता है।
२. बाण का प्रक्षेपण (आत्मा): अपनी समस्त प्राण-शक्ति और चित्त को एक सुई की नोक के समान सूक्ष्म कर उसे लक्ष्य की ओर भेजना। यहाँ 'आत्मा' का अर्थ है—वह शुद्ध चेतना जो अब तक शरीर और मन में बिखरी हुई थी, अब एक बाण की भाँति तीक्ष्ण और केंद्रित है।
३. लक्ष्य में विलीनीकरण (तन्मयता): यह इस साधना की उच्चतम भूमि है। बाण का लक्ष्य में समा जाना 'समाधि' का प्रतीक है। जिस प्रकार बाण लक्ष्य में समाकर अपनी स्वतंत्र सत्ता खो देता है, वैसे ही साधक जब ब्रह्म-लक्ष्य में स्थित होता है, तो उसकी व्यक्तिगत पहचान समाप्त हो जाती है और वह केवल 'ब्रह्म' ही रह जाता है।
साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि साधना में 'प्रमाद' (लापरवाही) सबसे बड़ी बाधा है। सजगता ही वह बल है जो आत्मा-रूपी बाण को अक्षर-ब्रह्म तक पहुँचाता है।
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासादेवं पश्येन्निगूढवत् ॥ २.५५ ॥
अपने देहको अरणि बनाकर और प्रणव को उत्तर अरणि बनाकर, ध्यानरूपी मन्थन के अभ्यास से (उस परमात्मा को) छिपी हुई अग्नि की भाँति देखना चाहिए।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव को धनुष और आत्मा को बाण के रूप में चित्रित करते हुए ब्रह्म-लक्ष्य को भेदने की प्रेरणा दी थी। अब ऋषि उस लक्ष्य-भेदन की सूक्ष्म प्रक्रिया को एक प्राचीन वैदिक दृष्टान्त के माध्यम से समझा रहे हैं कि वास्तव में वह 'भेदन' या 'साक्षात्कार' घटित कैसे होता है।
अन्वय और पदार्थ —
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासादेवं पश्येन्निगूढवत् ॥
अन्वय: (साधकः) स्वदेहम् अरणिं कृत्वा, प्रणवं च उत्तरारणिम् (कृत्वा), ध्यान-निर्मथन-अभ्यासात् एवम् (तद्ब्रह्म) निगूढवत् पश्येत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• स्वदेहमरणिम्: अपनी देह को अरणि बनाकर। 'अरणि' वह काष्ठ (लकड़ी) है जिसका उपयोग प्राचीन काल में अग्नि प्रज्वलित करने के लिए मन्थन में किया जाता था। यहाँ देह का अर्थ केवल स्थूल शरीर नहीं, अपितु वह संपूर्ण प्राण-मय अस्तित्व है जिसे साधना के लिए आधार बनाया गया है।
• प्रणवं च उत्तरारणिम्: और प्रणव (ॐ) को उत्तरारणि (ऊपर की अरणि) बनाकर। मन्थन में दो अरणियाँ होती हैं—एक स्थिर (नीचे की) और दूसरी जो उसके ऊपर घूमती है। यहाँ प्रणव वह गतिशील शक्ति है जो चेतना को ऊपर की ओर ले जाती है।
• ध्याननिर्मथनाभ्यासात्: ध्यान रूपी मन्थन के अभ्यास से। 'निर्मथन' का अर्थ है घर्षण या मन्थन। जब ध्यान की एकाग्रता बार-बार एक ही बिंदु पर केंद्रित होती है, तो वह मानसिक घर्षण उत्पन्न करती है।
• एवम्: इस प्रकार।
• पश्येन्निगूढवत्: छिपी हुई (अग्नि की) भाँति देखना चाहिए। 'निगूढ' का अर्थ है जो गुप्त हो, जो प्रत्यक्ष न हो। जिस प्रकार अग्नि अरणि के भीतर बीज रूप में छिपी रहती है और मन्थन से प्रकट होती है, वैसे ही परमात्मा देह में निगूढ़ है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने साधना के सबसे गूढ़ रहस्य 'अग्नि-होत्र' के आन्तर अर्थ को प्रकट किया है। बाहरी यज्ञ में काष्ठ की दो अरणियों को आपस में रगड़कर अग्नि उत्पन्न की जाती है, किन्तु यहाँ ऋषि उस बाहरी विधि को आन्तरिक योग-साधना में परिवर्तित कर रहे हैं।
साधक को निर्देश है कि वह अपनी देह को 'अधो-अरणि' (नीचे की स्थिर लकड़ी) के समान स्थिर करे। देह को अरणि बनाने का अर्थ है—शरीर के प्रति आसक्ति का त्याग कर उसे केवल एक साधन मात्र समझना और उसे साधना के आसन पर स्थिर करना। जब देह स्थिर होती है, तब उस पर 'प्रणव' रूपी 'उत्तरारणि' का प्रयोग किया जाता है। प्रणव यहाँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह ऊर्ध्वगामी चेतना है जो साधक के भीतर निरंतर घूमती है, मन्थन करती है।
यह मन्थन 'ध्यान' है। जिस प्रकार अरणियों के घर्षण से ताप उत्पन्न होता है और अंततः अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार जब स्थिर देह (प्राण) और गतिशील प्रणव (मन) का निरंतर संयोग होता है, तो साधक के भीतर 'तप' उत्पन्न होता है। यह तप कोई भौतिक ताप नहीं, बल्कि वह प्रखर एकाग्रता है जो अविद्या के आवरण को जला देती है।
ऋषि कहते हैं कि इस अभ्यास से उस परमात्मा को 'निगूढवत्' देखना चाहिए। भाव यह है कि ईश्वर कहीं बाहर से नहीं आता, वह तो इस देह-अरणि के भीतर ही बीज रूप में विद्यमान है। वह केवल 'निगूढ' (छिपा हुआ) है। जिस प्रकार अग्नि अरणि के भीतर होती है परन्तु बिना मन्थन के दिखाई नहीं देती, वैसे ही ब्रह्म आत्मा में स्थित है, परन्तु बिना ध्यान-मन्थन के अनुभव नहीं होता। जब यह आन्तरिक अग्नि प्रज्वलित होती है, तब साधक को उस अलक्षित देवता का साक्षात्कार होता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'जप' और 'ध्यान' के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। यहाँ 'जप' घर्षण है और 'ध्यान' वह मन्थन है जो उस घर्षण को दिशा देता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक अपनी देह को स्थिर कर (स्थिरता = अधो-अरणि) प्रणव का निरंतर जप करे। यह जप जब केवल वाणी से हटकर मन में और फिर मन से हटकर प्राण में उतरता है, तो वह 'निर्मथन' बन जाता है। बार-बार, लगातार, बिना किसी विच्छेद के प्रणव का स्मरण करना ही वह घर्षण है जिससे चेतना का ताप बढ़ता है।
साधक इस अभ्यास से 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर बढ़ता है। पहले वह देह के प्रति सजग होता है (देह-अरणि), फिर वह ध्वनि के प्रति सजग होता है (प्रणव-उत्तरारणि), और अंततः वह उस 'अग्नि' के प्रति सजग हो जाता है जो इन दोनों के संयोग से प्रज्वलित हुई है। यह अग्नि ही 'बोध' या 'ज्ञान' है। इस भूमि पर पहुँचकर साधक अनुभव करता है कि जिसे वह खोज रहा था, वह उसके भीतर ही निगूढ़ था। यह अभ्यास साधक को 'साधन' से 'साध्य' की ओर ले जाता है, जहाँ मन्थन समाप्त हो जाता है और केवल प्रकाश शेष रहता है।
शब्दस्पर्शादिभिश्चैव रसरूपैरलक्षितः ।
देवतायाः परस्यास्तु आलम्बः प्रणवः स्मृतः ॥ २.५६ ॥
शब्द, स्पर्श आदि से और रस तथा रूप से भी जो अलक्षित है, उस परम देवता का आलम्बन प्रणव स्मृत है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने देह और प्रणव को अरणि बनाकर ध्यान-मन्थन से उस निगूढ ब्रह्म को प्रकट करने की विधि बताई थी। अब ऋषि इस बात का कारण स्पष्ट कर रहे हैं कि उस निराकार और अलक्षित परमात्मा के साक्षात्कार के लिए प्रणव की आवश्यकता क्यों है।
अन्वय और पदार्थ —
शब्दस्पर्शादिभिश्चैव रसरूपैरलक्षितः ।
देवतायाः परस्यास्तु आलम्बः प्रणवः स्मृतः ॥
अन्वय: (यः) शब्द-स्पर्श-आदिभिः च एव रस-रूपैः (अपि) अलक्षितः (अस्ति), (तस्य) परस्याः देवतायाः आलम्बः प्रणवः स्मृतः।
पदार्थ और निर्वचन:
• शब्दस्पर्शादिभिः: शब्द और स्पर्श आदि (इन्द्रिय-विषयों) द्वारा। यहाँ 'आदि' शब्द अन्य ज्ञानेंद्रियों (रूप, रस, गंध) की ओर संकेत करता है।
• रसरूपैः: रस और रूप से भी। रस और रूप इन्द्रियों के सबसे प्रबल अनुभव हैं; यहाँ इनका उल्लेख यह बताने के लिए है कि परमात्मा किसी भी भौतिक गुण या आकृति से परे है।
• अलक्षितः: जो लक्षित न हो; जिसे इन्द्रियों द्वारा अनुभव न किया जा सके, जो अदृश्य और अनिर्वचनीय है।
• देवतायाः परस्याः: उस परम देवता (परमात्मा) का। 'परस्याः' शब्द यहाँ श्रेष्ठता और पारलौकिकता दोनों को दर्शाता है।
• आलम्बः: आलम्बन, सहारा या आधार। योगशास्त्र में 'आलम्बन' वह वस्तु या विचार होता है जिस पर मन को टिकाया जाता है ताकि वह चंचल न रहे।
• प्रणवः स्मृतः: प्रणव (ॐ) कहा गया है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम सत्य की प्रकृति और उसे प्राप्त करने के साधन के बीच के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वह परम देवता (ब्रह्म) 'अलक्षित' है। अलक्षित होने का अर्थ यह है कि वह पंच-महाभूतों से निर्मित नहीं है, इसलिए वह शब्द से सुनाई नहीं देता, स्पर्श से छुआ नहीं जा सकता, रस से चखा नहीं जा सकता और रूप से देखा नहीं जा सकता। वह समस्त इन्द्रिय-विषयों से परे, निराकार और निर्गुण है।
साधक के सामने समस्या यह आती है कि जिसका कोई रूप नहीं, कोई गुण नहीं और जो किसी इन्द्रिय द्वारा लक्षित नहीं होता, उसे पकड़ा कैसे जाए? मन स्वभाव से ही किसी न किसी 'आलम्बन' (आधार) की खोज करता है। यदि मन को कोई आधार न मिले, तो वह संसार के विषय-रूपों में भटकता रहता है। ऐसे में, उस अलक्षित परमात्मा का 'आलम्ब' प्रणव (ॐ) को माना गया है।
भाव यह है कि जिस प्रकार एक अंधे व्यक्ति के लिए लाठी (छड़ी) वह साधन बनती है जिससे वह अदृश्य मार्ग को पहचानता है, उसी प्रकार निराकार ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए 'प्रणव' वह आध्यात्मिक लाठी या आलम्बन है। प्रणव स्वयं ब्रह्म का ही एक साकार और श्रुति-रूप है। जब साधक ओंकार का जप या ध्यान करता है, तो वह वास्तव में उस निराकार परमात्मा को एक 'नाम-रूप' में पकड़ लेता है। यह नाम-रूप ही उसे स्थूल जगत से खींचकर सूक्ष्म जगत की ओर और अंततः अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १.२.१७ ॥
यह आलम्बन श्रेष्ठ है, यह आलम्बन परम है; इस आलम्बनको जानकर (साधक) ब्रह्मलोकमें महिमा पाता है।
कठोपनिषद् में कहा गया है कि यह आलम्बन (प्रणव) श्रेष्ठ और परम है, जिसे जानकर साधक ब्रह्मलोक में महिमा पाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उसी उपनिषद्-सत्य की पुष्टि करता है। जहाँ कठोपनिषद् प्रणव को 'श्रेष्ठ आलम्बन' कहकर उसकी महिमा गाता है, वहीं यह स्मृति उसका तार्किक कारण बताती है कि चूंकि परमात्मा अलक्षित है, इसलिए प्रणव जैसा श्रेष्ठ आलम्बन अनिवार्य है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि बिना आलम्बन के निराकार की उपासना अत्यंत कठिन है, अतः प्रणव ही वह सेतु है जो साधक को परमात्मा से जोड़ता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'आलम्बन-ध्यान' की प्रक्रिया को समझाता है। साधक जब अपनी साधना के आरम्भिक सोपानों पर होता है, तब उसका मन पूर्णतः निराकार में स्थित नहीं हो पाता। यदि उसे सीधे 'शून्य' या 'निराकार' का ध्यान करने को कहा जाए, तो मन विचलित होकर पुनः संसार में लौट आता है।
यहाँ अभ्यास यह है कि साधक उस 'अलक्षित' को 'लक्षित' करने के लिए प्रणव का सहारा लेता है। वह ओंकार के नाद (ध्वनि) को अपना आलम्बन बनाता है। पहले वह शब्द-रूप ओंकार को सुनता है, फिर उस शब्द के पीछे छिपे मौन को अनुभव करता है। इस प्रकार वह 'शब्द' (जो लक्षित है) से 'अक्षर' (जो अलक्षित है) की ओर बढ़ता है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि नाम और नामी (जिसका नाम है) में कोई भेद नहीं है। जब वह प्रणव में तन्मय होता है, तो वह धीरे-धीरे इन्द्रिय-विषयों (शब्द, स्पर्श, रस, रूप) से ऊपर उठकर उस भूमि पर पहुँच जाता है जहाँ केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है। यह अभ्यास साधक को 'साकार' से 'निराकार' की ओर ले जाने वाली एक सुरक्षित सीढ़ी है।
कश्चिदाराधनाकामो विष्णोर्भक्त्या करोति वै ।
तदाराधनसिद्ध्यर्थं प्रतिमां व्यञ्जिकां यथा ॥ २.५७ ॥
कोई आराधना का इच्छुक विष्णु की भक्ति से करता है, तो उस आराधना की सिद्धि के लिए प्रतिमा, जैसे — ...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया था कि जो परम देवता इन्द्रिय-विषयों से अलक्षित है, उसका आलम्बन प्रणव है। अब ऋषि इस सूक्ष्म सत्य को साधक के लिए अधिक बोधगम्य बनाने हेतु एक दृष्टान्त का सहारा ले रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
कश्चिदाराधनाकामो विष्णोर्भक्त्या करोति वै ।
तदाराधनसिद्ध्यर्थं प्रतिमां व्यञ्जिकां यथा ॥
अन्वय: कश्चिद् आराधना-कामो विष्णोः भक्त्या (आराधनां) करोति वै, (तस्य) तद्-आराधना-सिद्ध्यर्थं प्रतिमां व्यञ्जिकां (करोति), यथा...
पदार्थ और निर्वचन:
• आराधना-कामो: आराधना की इच्छा रखने वाला। यहाँ 'आराधना' का अर्थ केवल पूजा नहीं, अपितु उस परमात्मा के साथ एकरूप होने की तीव्र उत्कंठा और साधना है।
• विष्णोः: विष्णु की। यहाँ विष्णु का अर्थ केवल एक विशिष्ट देवता नहीं, अपितु 'विष्णु' शब्द के मूल अर्थ 'विश' (व्याप्त होना) से है—वह जो सर्वत्र व्याप्त है, सर्वव्यापक ब्रह्म।
• भक्त्या: भक्ति के द्वारा। भक्ति यहाँ केवल भावुकता नहीं, अपितु उस सर्वव्यापी सत्ता के प्रति पूर्ण समर्पण और अनुराग है।
• तद्-आराधना-सिद्ध्यर्थं: उस आराधना की सिद्धि के लिए। सिद्धि का अर्थ है—साधना का फल प्राप्त करना या साध्य (परमात्मा) तक पहुँचना।
• प्रतिमां: प्रतिमा, मूर्ति या स्वरूप।
• व्यञ्जिकां: व्यञ्जक या प्रकट करने वाला। 'व्यञ्जन' वह होता है जो किसी छिपी हुई वस्तु का संकेत दे या उसे अभिव्यक्त करे। यहाँ प्रतिमा को 'व्यञ्जिका' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि प्रतिमा स्वयं साध्य नहीं है, अपितु साध्य तक ले जाने वाला एक संकेत मात्र है।
• यथा: जैसे (यह शब्द संकेत करता है कि वाक्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है और इसका विस्तार अगले श्लोक में है)।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक और साधना-परक सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। यह वाक्य अगले श्लोक (२.५८) तक विस्तृत है, जहाँ प्रतिमा के निर्माण की विधि बताई गई है।
ऋषि कहते हैं कि यदि कोई साधक सर्वव्यापक विष्णु (परब्रह्म) की आराधना करना चाहता है, तो वह भक्तिपूर्वक उस मार्ग पर अग्रसर होता है। किंतु समस्या यह है कि मन स्वभाव से चंचल है और उसे किसी 'आलम्बन' की आवश्यकता होती है। वह निराकार, अगोचर और सर्वव्यापी ब्रह्म को सीधे नहीं पकड़ सकता, क्योंकि मन केवल 'रूप' और 'सीमा' को पहचानता है। अतः, उस आराधना की सिद्धि के लिए साधक 'प्रतिमा' का आश्रय लेता है।
यहाँ याज्ञवल्क्य जी ने 'प्रतिमा' के साथ 'व्यञ्जिका' शब्द का प्रयोग कर एक गहरा भेद स्पष्ट कर दिया है। वे यह नहीं कह रहे कि प्रतिमा ही विष्णु है, बल्कि वे कह रहे हैं कि प्रतिमा 'व्यञ्जक' है। जिस प्रकार एक संकेत-चिह्न उस स्थान का बोध कराता है जहाँ वह संकेत लगा है, उसी प्रकार प्रतिमा उस निराकार ईश्वर की उपस्थिति का बोध कराने वाला एक माध्यम है। यह स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक सीढ़ी है।
बाहरी दृष्टि से यह मूर्ति-पूजा की विधि प्रतीत होती है, किंतु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं; उनकी दृष्टि में यह 'रूप' से 'अरूप' की यात्रा है। जब साधक प्रतिमा में विष्णु का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के उस व्यापक तत्त्व को एक केंद्र पर लाने का प्रयास कर रहा होता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साकार' से 'निराकार' की ओर संक्रमण की प्रक्रिया है। साधक जब अपनी साधना के आरम्भिक चरण में होता है, तो उसका मन अत्यंत बिखरा हुआ होता है। ऐसे में 'व्यञ्जिका' (प्रतिमा या प्रतीक) मन को एक बिंदु पर एकाग्र करने का साधन बनती है।
यहाँ 'प्रतिमा' का आन्तर अर्थ 'संकल्प' है। जिस प्रकार बाहरी प्रतिमा एक निश्चित रूप देती है, उसी प्रकार साधक अपने हृदय में परमात्मा का एक निश्चित मानसिक स्वरूप स्थापित करता है। यह मानसिक प्रतिमा ही वह 'व्यञ्जक' है जो उसे उस निराकार ब्रह्म की ओर ले जाती है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जो सर्वव्यापक है, वह इसी सीमित रूप में भी विद्यमान है। जब वह इस 'व्यञ्जक' के माध्यम से भक्ति करता है, तो धीरे-धीरे उसका चित्त शुद्ध होता है और वह इस बोध तक पहुँचता है कि जिस विष्णु को वह प्रतिमा में देख रहा था, वही उसके भीतर और बाहर सर्वत्र व्याप्त है। इस प्रकार, प्रतिमा केवल एक साधन है, साध्य नहीं। साधक 'रूप' के माध्यम से 'रूपरहित' (निराकार) की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास उसे 'साकार-भूमि' से 'निराकार-भूमि' की ओर ले जाने वाला सेतु है।
धातुदार्वादिपाषाणैः कृत्वा भावं निवेशयेत् ।
भक्त्या श्रद्धादराभ्यां च तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥ २.५८ ॥
धातु, लकड़ी आदि या पत्थर से बनाकर (उसमें) भाव स्थापित करे; भक्ति, श्रद्धा और आदर से उस पर विष्णु प्रसन्न होते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया था कि जो परम देवता इन्द्रिय-विषयों से अलक्षित है, उसका आलम्बन प्रणव है। उसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए ऋषि अब यह समझा रहे हैं कि जिस प्रकार एक साधक अदृष्ट परमात्मा को प्राप्त करने के लिए प्रतिमा का सहारा लेता है, उसी प्रकार प्रणव भी उस अलक्षित ब्रह्म का दृश्य-रूप या आलम्बन है।
अन्वय और पदार्थ —
धातुदार्वादिपाषाणैः कृत्वा भावं निवेशयेत् ।
भक्त्या श्रद्धादराभ्यां च तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥
अन्वय: (प्रतिमां) धातु-दार्वादि-पाषाणैः (निर्मित्वा) कृत्वा, (तस्यां) भावं निवेशयेत्; भक्त्या, श्रद्धा-आदराभ्यां च (पूजनेन) तस्य (प्रतिमायां) विष्णुः प्रसीदति।
पदार्थ और निर्वचन:
• धातु-दार्वादि-पाषाणैः: धातु (सोना, चाँदी, ताँबा), दार्वादि (कुशा या अन्य पवित्र लकड़ियाँ) और पाषाण (पत्थर) आदि के द्वारा। ये स्थूल पदार्थों के प्रतीक हैं।
• कृत्वा: बनाकर या निर्मित करके।
• भावं निवेशयेत्: भाव को निवेश करे। 'निवेश' का अर्थ है स्थापित करना या भीतर उतारना। यहाँ केवल मूर्ति बनाना पर्याप्त नहीं है, अपितु उस जड़ पदार्थ में अपने चेतन भाव को प्रतिष्ठित करना अनिवार्य है।
• भक्त्या श्रद्धा-आदराभ्यां च: भक्ति, श्रद्धा और आदर के द्वारा। ये तीन मानसिक अवस्थाएँ हैं जो स्थूल पदार्थ को दिव्य बनाती हैं।
• तस्य विष्णुः प्रसीदति: उस (प्रतिमा) में विष्णु प्रसन्न होते हैं। यहाँ 'तस्य' शब्द प्रतिमा की ओर संकेत करता है, जिसका अर्थ है कि परमात्मा उस माध्यम में स्वयं को उपलब्ध करा देते हैं जिसे साधक ने अपने भाव से चुना है।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (२.५७) के 'यथा' (जैसे) शब्द का विस्तार है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब कोई साधक सर्वव्यापक विष्णु (ब्रह्म) की आराधना करना चाहता है, तो उसकी बुद्धि को एक केंद्र की आवश्यकता होती है। चूंकि परमात्मा 'अलक्षित' (इन्द्रियों से परे) हैं, इसलिए साधक धातु, काष्ठ या पत्थर की प्रतिमा निर्मित करता है।
परन्तु, ऋषि यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद स्पष्ट करते हैं—वे कहते हैं 'भावं निवेशयेत्'। इसका अर्थ यह है कि पत्थर या धातु अपने आप में ईश्वर नहीं है, वह केवल एक जड़ माध्यम है। जब साधक अपनी प्रगाढ़ भावना, अटूट श्रद्धा और गहरे आदर को उस प्रतिमा में 'निवेश' करता है, तब वह जड़ प्रतिमा उसके लिए 'जीवंत' हो जाती है। वास्तव में, वह प्रतिमा केवल एक दर्पण बन जाती है जिसमें साधक अपने ही भीतर के ईश्वर का प्रतिबिंब देखता है। जब भक्ति और श्रद्धा पूर्ण होती है, तब विष्णु (जो सर्वव्यापी हैं) उस विशिष्ट बिंदु (प्रतिमा) पर साधक के लिए प्रकट हो जाते हैं और प्रसन्न होते हैं।
यह विधि बाहरी तौर पर मूर्ति-पूजा प्रतीत होती है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ 'आलम्बन' की प्रक्रिया है। जैसे एक बीज के भीतर वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही एक स्थिर भाव के भीतर परमात्मा का साक्षात्कार छिपा होता है। यहाँ प्रतिमा वह 'बीज' है और श्रद्धा वह 'जल' है जिससे परमात्मा का अनुभव अंकुरित होता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साकार' से 'निराकार' की ओर जाने वाली यात्रा का प्रथम सोपान है। साधक के लिए सबसे कठिन कार्य है—चित्त को एक बिंदु पर स्थिर करना। जब चित्त चंचल होता है, तब वह किसी अदृष्ट सत्ता का ध्यान नहीं कर सकता। अतः वह एक बाहरी प्रतिमा को 'आलम्बन' बनाता है।
साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह अपनी समस्त मानसिक ऊर्जा (भाव) को एक बाहरी केंद्र पर केंद्रित करे। जब वह प्रतिमा में 'भाव निवेश' करता है, तो वास्तव में वह अपने मन के बिखरे हुए अंशों को समेटकर एक जगह ला रहा होता है। यही 'भाव' आगे चलकर 'एकाग्रता' बनता है।
इस प्रक्रिया का रहस्य यह है कि जिस प्रकार प्रतिमा में भाव निवेश करने से वह जीवित हो उठती है, उसी प्रकार जब साधक 'ओंकार' (प्रणव) का जप करता है, तो वह 'ओं' शब्द को अपनी मानसिक प्रतिमा बना लेता है। जिस प्रकार पत्थर की मूर्ति में विष्णु प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार प्रणव रूपी मानसिक प्रतिमा में जब श्रद्धा और आदर निवेश किया जाता है, तो वही अलक्षित ब्रह्म 'अक्षर' रूप में साधक के हृदय में प्रतिष्ठित हो जाता है।
अतः, प्रतिमा का पूजन वास्तव में 'भाव' का शोधन है। साधक इस अभ्यास से इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह समझ जाता है कि जो शक्ति प्रतिमा में थी, वह वास्तव में उसके अपने 'भाव' में थी, और वह भाव स्वयं परमात्मा का ही अंश है। इस प्रकार वह स्थूल प्रतिमा से सूक्ष्म ध्वनि (ओंकार) और फिर ध्वनि से शून्य (ब्रह्म) की ओर अग्रसर होता है।
आर्यः प्रपूजितो यत्र प्रत्यक्षे च फलप्रदः ।
ओंकारेण तथा ह्यात्मा उपास्तः स प्रसीदति ॥ २.५९ ॥
जैसे वहाँ भलीभाँति पूजित आर्य प्रत्यक्ष रूप में फल देने वाले हैं, वैसे ही ओंकार से उपासित आत्मा प्रसन्न होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया था कि जिस प्रकार एक भक्त विष्णु की आराधना के लिए धातु, दार्वा या पाषाण की प्रतिमा बनाकर उसमें अपने भावों को निवेश करता है, तब वह जड़ प्रतिमा भी साक्षात् परमात्मा की उपस्थिति का माध्यम बन जाती है और विष्णु प्रसन्न होते हैं। अब इस दृष्टान्त के माध्यम से ऋषि उस मुख्य विषय पर लौट रहे हैं जिसके लिए यह उदाहरण दिया गया था—अर्थात् प्रणव (ओंकार) की उपासना।
अन्वय और पदार्थ —
आर्यः प्रपूजितो यत्र प्रत्यक्षे च फलप्रदः ।
ओंकारेण तथा ह्यात्मा उपास्तः स प्रसीदति ॥
अन्वय: यत्र (प्रतिमारूपे) आर्यः प्रपूजितः (अस्ति), (तत्र सः) प्रत्यक्षे च फलप्रदः (भवति); तथा (एवम्) ओंकारेण उपास्तः आत्मा स (आत्मा) प्रसीदति।
पदार्थ और निर्वचन:
• आर्यः: यहाँ 'आर्य' शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ पुरुष, पूज्य देव या उस परम तत्व के लिए हुआ है जिसे साधक अपनी श्रद्धा से प्रतिमा में प्रतिष्ठित करता है।
• प्रपूजितो: भलीभाँति पूजित। जहाँ केवल कर्मकांड नहीं, अपितु पूर्ण समर्पण और श्रद्धा से पूजन किया गया हो।
• प्रत्यक्षे च फलप्रदः: प्रत्यक्ष रूप में फल देने वाला। जब भाव प्रगाढ़ होता है, तब साधक को प्रतिमा में ही देव की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है और उसकी प्रार्थनाएँ सिद्ध होती हैं।
• ओंकारेण: ओंकार (प्रणव) के माध्यम से। यहाँ ओंकार वह साधन है जो प्रतिमा के समान ही आलम्बन का कार्य करता है।
• उपास्तः: जिसकी उपासना की गई हो। 'उपासना' का अर्थ है समीप बैठना (उप-असन), अर्थात् उस तत्व में लीन हो जाना।
• आत्मा: यहाँ आत्मा से तात्पर्य उस सर्वव्यापी परमात्मा या शुद्ध चैतन्य से है, जो प्रत्येक जीव के भीतर स्थित है।
• प्रसीदति: प्रसन्न होता है। प्रसन्न होने का अर्थ है—साधक और इष्ट के बीच के भेद का मिट जाना और कृपा का अवतरण होना।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में 'यथा' (जैसे) के बाद 'तथा' (वैसे ही) का प्रयोग कर स्थूल उपासना और सूक्ष्म उपासना के बीच का सेतु निर्मित कर रहे हैं। पिछले दो श्लोकों (२.५७-२.५८) में उन्होंने प्रतिमा-पूजा का उदाहरण केवल इसलिए दिया ताकि साधारण साधक यह समझ सके कि एक 'आलम्बन' की आवश्यकता क्यों होती है।
ऋषि कहते हैं कि जिस प्रकार एक भक्त पत्थर या धातु की मूर्ति में अपने भावों को निवेश कर उसे 'आर्य' (श्रेष्ठ देव) मानकर पूजता है और वह प्रतिमा उसके लिए प्रत्यक्ष फल देने वाली बन जाती है, ठीक उसी प्रकार ओंकार की उपासना भी है। अंतर केवल इतना है कि प्रतिमा 'दृश्य-आलम्बन' है, जबकि ओंकार 'श्रव्य-आलम्बन' है।
जब साधक ओंकार का जप या ध्यान करता है, तो वह वास्तव में उस निराकार, अलक्षित और अगोचर आत्मा (परमात्मा) को एक ध्वनि-रूप प्रदान कर रहा होता है। जिस प्रकार प्रतिमा में विष्णु प्रसीदते हैं, उसी प्रकार जब ओंकार के माध्यम से आत्मा की उपासना की जाती है, तब वह अंतर्यामी परमात्मा प्रसन्न होता है। यहाँ 'प्रसन्नता' का अर्थ केवल किसी बाहरी वरदान की प्राप्ति नहीं है, अपितु साधक की चेतना का उस शुद्ध चैतन्य के साथ एकाकार हो जाना है।
यह स्मृति यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि ओंकार कोई साधारण शब्द नहीं है, बल्कि वह उस परम तत्व की 'ध्वनि-प्रतिमा' है। जैसे मूर्ति को देखकर मन स्थिर होता है, वैसे ही ओंकार की ध्वनि सुनकर मन बाहरी जगत से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाने की विधि बताता है। साधक के लिए निराकार ब्रह्म का ध्यान करना अत्यंत कठिन है, क्योंकि मन को किसी न किसी आधार (आलम्बन) की आवश्यकता होती है।
यहाँ ओंकार को 'ध्वनि-प्रतिमा' के रूप में स्वीकार करना चाहिए। जिस प्रकार एक कलाकार पत्थर को तराशकर उसमें देवत्व देखता है, उसी प्रकार योगी ओंकार की मात्राओं (अ, उ, म) के माध्यम से अपने भीतर स्थित आत्मा के स्वरूप को तराशता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक जब ओंकार का उच्चारण करे, तो वह इसे केवल एक मन्त्र न माने, बल्कि यह अनुभव करे कि यह ध्वनि ही साक्षात् परमात्मा का स्वरूप है। जब ध्वनि का कंपन हृदय और मस्तिष्क में गूँजता है, तब साधक उस 'ध्वनि-प्रतिमा' में अपनी चेतना को निवेश करता है। जैसे-जैसे एकाग्रता बढ़ती है, ध्वनि लुप्त होने लगती है और केवल वह 'आत्मा' शेष रह जाती है जो उस ध्वनि के पीछे छिपा था।
यह अभ्यास साधक को 'साकार' (प्रतिमा) की आवश्यकता से ऊपर उठाकर 'अक्षर' (ओंकार) की भूमि पर लाता है, जहाँ से वह अंततः 'अमात्र' (निराकार) अवस्था की ओर प्रवृत्त होता है। इस प्रकार, ओंकार के माध्यम से आत्मा की उपासना करना, वास्तव में स्वयं के भीतर स्थित उस परम पुरुष को जाग्रत करना है।
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २.६० ॥
यह आलम्बन श्रेष्ठ है, यह आलम्बन परम है; इस आलम्बनको जानकर (साधक) ब्रह्मभावके योग्य हो जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया था कि जिस प्रकार एक भक्त अपनी श्रद्धा से प्रतिमा में देवत्व का अनुभव कर फल प्राप्त करता है, उसी प्रकार ओंकार के माध्यम से उपासित आत्मा प्रसन्न होते हैं। अब ऋषि इस सत्य को और अधिक प्रगाढ़ करते हुए प्रणव की उस 'आलम्बन' शक्ति का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को स्थूल जगत से उठाकर ब्रह्मभाव तक ले जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
अन्वय: एतत् आलम्बनं श्रेष्ठम् (अस्ति), एतत् आलम्बनं परम् (अस्ति); एतत् आलम्बनं ज्ञात्वा (साधकः) ब्रह्मभूयाय कल्पते।
पदार्थ और निर्वचन:
• एतत्: यह। यहाँ 'एतत्' सर्वनाम का संकेत पिछले श्लोकों में वर्णित 'ओंकार' या 'प्रणव' की ओर है।
• आलम्बनं: वह आधार या सहारा जिसके सहारे मन को एकाग्र किया जा सके। जिस प्रकार एक पर्वतारोही को ऊपर चढ़ने के लिए किसी अवलंब या सहारे की आवश्यकता होती है, वैसे ही निराकार और अलक्षित ब्रह्म की प्राप्ति के लिए मन को जिस सूक्ष्म आधार की आवश्यकता होती है, उसे 'आलम्बन' कहते हैं।
• श्रेष्ठम्: सर्वोत्तम। जो अन्य सभी साधनों की तुलना में अधिक प्रभावशाली और त्वरित फल देने वाला हो।
• परम्: सर्वोच्च या अंतिम। वह आलम्बन जो केवल साधन मात्र न रहकर स्वयं साध्य (परमात्मा) के समान हो जाए।
• ज्ञात्वा: जानकर। यहाँ 'जानने' का अर्थ केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान (साक्षात्कार) है।
• ब्रह्मभूयाय: ब्रह्मभाव के लिए; ब्रह्म होने के लिए। 'भूयाय' में होने की अवस्था का बोध है, अर्थात् जीव का ब्रह्म में विलीन हो जाना।
• कल्पते: योग्य हो जाता है या समर्थ होता है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं कि परमात्मा 'अलक्षित' है—वह इंद्रियों के विषय नहीं है, न ही उसे रूप, रस, गंध या स्पर्श से पकड़ा जा सकता है। चूँकि मानव मन स्वभावतः किसी न किसी आधार को पकड़ने का अभ्यस्त है, इसलिए उसे एक ऐसे 'आलम्बन' की आवश्यकता होती है जो उसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जा सके। वह श्रेष्ठतम आलम्बन 'प्रणव' (ओंकार) है।
ऋषि कहते हैं कि यह आलम्बन 'श्रेष्ठ' है क्योंकि यह समस्त मन्त्रों का बीज है और 'परम' है क्योंकि यह स्वयं उस परब्रह्म का वाचक है। जब साधक ओंकार को केवल एक शब्द न मानकर, उसे उस परम तत्व का प्रतिबिंब मानकर उसमें लीन होता है, तब वह आलम्बन उसे ऊपर की ओर खींचता है।
इस श्लोक का गहरा भाव यह है कि साधना के आरम्भ में हमें एक सहारे की आवश्यकता होती है, किन्तु जब वह आलम्बन 'परम' (ओंकार) होता है, तो वह साधक को केवल किसी लोक तक नहीं पहुँचाता, अपितु उसे 'ब्रह्मभूयाय' अर्थात् स्वयं ब्रह्म होने के योग्य बना देता है। यहाँ 'योग्य होने' का अर्थ है—अविद्या का नाश होना और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेना। यह प्रक्रिया उसी प्रकार है जैसे एक बीज जब मिट्टी (आलम्बन) के सहारे अंकुरित होता है, तो अंततः वह मिट्टी को छोड़कर एक विशाल वृक्ष बन जाता है; वैसे ही प्रणव का आलम्बन साधक को ब्रह्मत्व की पूर्णता तक पहुँचाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १.२.१७ ॥
यह आलम्बन श्रेष्ठ है, यह आलम्बन परम है; इस आलम्बनको जानकर (साधक) ब्रह्मलोकमें महिमा पाता है।
कठ उपनिषद् में भी इसी सत्य का उद्घोष है कि यह आलम्बन श्रेष्ठ और परम है, और इसे जानकर साधक ब्रह्मलोक में महिमा पाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ कठ उपनिषद् के भाव को और अधिक विस्तार देती है। जहाँ उपनिषद् 'ब्रह्मलोक में महिमा' की बात करता है, वहीं यह स्मृति 'ब्रह्मभूयाय' अर्थात् स्वयं ब्रह्म होने की बात करती है। यह सूक्ष्म भेद दर्शाता है कि याज्ञवल्क्य यहाँ केवल लोक-प्राप्ति की नहीं, अपितु पूर्ण आत्म-साक्षात्कार और जीव-ब्रह्म की एकता की बात कर रहे हैं।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'एकाग्रता' और 'आलम्बन' के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है। साधक का मन चंचल है; वह बिना किसी आधार के स्थिर नहीं रह सकता। यदि साधक बिना किसी आलम्बन के शून्य में ध्यान लगाने का प्रयास करेगा, तो मन पुनः संसार के विषयों में भटक जाएगा।
अतः साधक के लिए निर्देश है: एक आलम्बन चुनो और उसी पर टिको। जब वह आलम्बन 'ओंकार' होता है, तो वह मन के लिए एक 'चुम्बक' का कार्य करता है। साधक जब 'ओम्' का जप या ध्यान करता है, तो वह अपनी समस्त मानसिक ऊर्जा को एक बिंदु पर केंद्रित कर देता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक पहले ओंकार के शब्द-रूप को पकड़े (वाचिक), फिर उसके अर्थ और ध्वनि के कंपन में स्थित हो (मानसिक), और अंततः उस ध्वनि के पीछे छिपे मौन में लीन हो जाए। जैसे-जैसे साधक इस आलम्बन में गहरा उतरता है, आलम्बन और साधक के बीच का भेद मिटने लगता है। यही वह स्थिति है जहाँ वह 'ब्रह्मभूयाय कल्पते'—अर्थात् वह उस अवस्था के लिए तैयार हो जाता है जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। यह अभ्यास साधक को 'सावधानी' की भूमि से 'समता' की भूमि तक और अंततः 'निर्वाण' की भूमि तक ले जाता है।
अदृष्टविग्रहो देवो भावग्राह्यो मनोमयः ।
तस्योंकारः स्मृतो नाम तेनाहूतः प्रसीदति ।
तस्मादोमिति पूर्वं तु कृत्वा युञ्जीत तत्परः ॥ २.६१ ॥
अदृष्ट विग्रह वाले, भाव द्वारा ग्रहण किए जाने वाले और मनोमय देव हैं; उनका नाम ओंकार स्मृत है, उस ओंकार से आहूत होने पर वे प्रसन्न होते हैं; इसलिए पहले "ओम्" इति करके तत्पर होकर (ध्यान में) जुड़ना चाहिए।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव को वह श्रेष्ठ आलम्बन बताया जिससे साधक ब्रह्मभाव के योग्य होता है। अब ऋषि इस आलम्बन के स्वरूप और उस 'देव' के रहस्य को खोल रहे हैं, जिन्हें ओंकार के माध्यम से पुकारा जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अदृष्टविग्रहो देवो भावग्राह्यो मनोमयः ।
तस्योंकारः स्मृतो नाम तेनाहूतः प्रसीदति ।
तस्मादोमिति पूर्वं तु कृत्वा युञ्जीत तत्परः ॥
अन्वय: देवः अदृष्टविग्रहः, भावग्राह्यः, मनोमयः (अस्ति)। तस्य नाम ओंकारः स्मृतः, तेन (ओंकारेण) आहूतः (सः देवः) प्रसीदति। तस्मात् पूर्वं 'ओमिति' कृत्वा तत्परः (भूत्वा) युञ्जीत।
पदार्थ और निर्वचन:
• अदृष्टविग्रहः: जिसका विग्रह (शरीर या आकार) इन्द्रियों द्वारा न देखा जा सके। 'विग्रह' का अर्थ है विशिष्ट आकार। यहाँ यह संकेत है कि वह परमात्मा स्थूल शरीर या सीमित रूप में बँधा हुआ नहीं है।
• भावग्राह्यः: जिसे केवल 'भाव' (श्रद्धा, प्रेम, गहन अनुभूति) के द्वारा ही ग्रहण किया जा सके। जहाँ इन्द्रियाँ हार जाती हैं, वहाँ भाव कार्य करता है।
• मनोमयः: मन के समान सूक्ष्म या मन के माध्यम से जानने योग्य। इसका एक अर्थ यह भी है कि वह देव मन के अधिष्ठान में स्थित है, अतः मन की एकाग्रता से ही प्रकट होता है।
• आहूतः: पुकारा गया। यहाँ 'आह्वान' का अर्थ केवल शब्द का उच्चारण नहीं, अपितु चेतना का उस परम सत्ता की ओर उन्मुख होना है।
• प्रसीदति: प्रसन्न होते हैं। देव की प्रसन्नता का अर्थ है—साधक के भीतर उस देवत्व के गुणों का उदय होना और साधना का सिद्ध होना।
• युञ्जीत: योग करे या जुड़ जाए। 'युज्' धातु का अर्थ है जोड़ना। यहाँ साधक का अपनी आत्मा से या परमात्मा से जुड़ने का विधान है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस परम सत्ता के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जिसे हम 'देव' कह रहे हैं। यह देव कोई बाहरी व्यक्ति या आकाश में स्थित कोई सत्ता नहीं, अपितु वह 'अदृष्टविग्रह' है। जिस प्रकार आकाश को देखा नहीं जा सकता, किंतु वह सर्वव्यापी है, वैसे ही यह देव सर्वव्यापी है, किंतु इन्द्रिय-बोध से परे है।
ऋषि कहते हैं कि यह देव 'भावग्राह्य' और 'मनोमय' है। इसका गहरा रहस्य यह है कि परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग तर्क या भौतिक प्रमाण नहीं, बल्कि 'भाव' है। जब साधक के हृदय में तीव्र उत्कंठा और श्रद्धा जागती है, तब वह अदृष्ट विग्रह भी अनुभव में आता है। चूँकि वह देव मनोमय है, इसलिए मन की सूक्ष्मता के बिना उसे पाना असंभव है।
अब प्रश्न उठता है कि उस अदृष्ट और निराकार देव को पुकारें कैसे? यहाँ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति स्पष्ट करती है कि उस अनंत का नाम 'ओंकार' है। ओंकार केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु उस परम पुरुष का बीज-मंत्र और संज्ञा है। जब साधक 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में उस अदृष्ट विग्रह को संबोधित करता है। 'तेनाहूतः प्रसीदति'—अर्थात् जब ओंकार के माध्यम से पुकारा जाता है, तो वह देव प्रसन्न होते हैं। यहाँ 'प्रसन्नता' का अर्थ यह है कि साधक का चित्त शुद्ध हो जाता है और वह उस दिव्य ऊर्जा के साथ एकाकार होने लगता है।
अतः ऋषि निर्देश देते हैं कि किसी भी योग-साधना या ध्यान के आरम्भ में पहले 'ओमिति' (ॐ का उच्चारण) करना चाहिए। यह केवल एक औपचारिक आरम्भ नहीं है, बल्कि स्वयं को उस परम सत्ता के साथ जोड़ने की तैयारी है। जब साधक 'ॐ' कहकर 'तत्पर' (पूर्णतः समर्पित और एकाग्र) होता है, तभी वह वास्तविक योग (युञ्जीत) में प्रवेश कर पाता है। यह स्मृति हमें सिखाती है कि शब्द जब भाव में परिवर्तित होता है, तभी वह साधना का साधन बनता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तस्य वाचकः प्रणवः ॥ १.२७ ॥
उस (ईश्वर) का वाचक (नाम) प्रणव (ओंकार) है।
पातञ्जल योगसूत्र में ईश्वर की परिभाषा देते हुए व्यासभाष्य में कहा गया है कि उस ईश्वर का वाचक (नाम) प्रणव है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और योगसूत्र यहाँ पूर्णतः सहमत हैं। दोनों ही ग्रन्थ यह मानते हैं कि निराकार ईश्वर को जिस माध्यम से पुकारा जा सकता है या जिसकी सहायता से उसे जाना जा सकता है, वह 'प्रणव' (ओंकार) ही है। स्मृति यहाँ इस बात को और विस्तार देती है कि यह पुकार 'भाव' पर आधारित होनी चाहिए, अन्यथा शब्द केवल शब्द रह जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि 'देव का शरीर भाव है'। यदि साधक बिना भाव के केवल कंठ से 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह केवल एक ध्वनि है। किंतु जब वह यह अनुभव करता है कि वह अदृष्ट विग्रह उसके भीतर ही स्थित है और 'ॐ' उस विग्रह की कुंजी है, तब वह 'भावग्राह्य' साधना बन जाती है।
अभ्यास की विधि यह है: पहले 'ॐ' का उच्चारण करें और इस भाव को स्थापित करें कि मैं उस मनोमय देव को पुकार रहा हूँ जो मेरे ही हृदय में अदृष्ट रूप में स्थित है। जब 'ॐ' की ध्वनि अंततः शांत हो जाए और केवल एक मौन शेष रहे, तब उस मौन में 'तत्पर' होकर जुड़ना ही वास्तविक योग है। इस अभ्यास से साधक स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म भाव की ओर और सूक्ष्म भाव से उस अदृष्ट विग्रह (परब्रह्म) की ओर अग्रसर होता है।
ब्रह्मविदोऽनेकविधाः सततं येन प्रवर्तन्ते ।
गूढव्रतस्य हि सदा विशुद्धबुद्धेः स(सु)गूढचित्तस्य ।
प्रणवध्यानपरस्य च स(सु)गूढतपसो भयं नास्ति ॥ २.६२ ॥
जिस (प्रणव) के द्वारा अनेक प्रकार के ब्रह्मवेत्ता सदा प्रवृत्त होते हैं, वह गूढव्रत वाले, सदा विशुद्ध बुद्धि वाले, सुगूढ चित्त वाले और प्रणवध्यान में तत्पर सुगूढ तपस्वी को किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अदृष्टविग्रह देव के नाम रूप में ओंकार का परिचय दिया और निर्देश दिया कि साधक पहले 'ओम्' का उच्चारण कर तत्परता से योग में जुड़ना चाहिए। अब ऋषि बता रहे हैं कि इस प्रणव-साधना का व्यावहारिक प्रभाव साधक के व्यक्तित्व और उसकी मानसिक स्थिति पर क्या पड़ता है।
अन्वय और पदार्थ —
ब्रह्मविदोऽनेकविधाः सततं येन प्रवर्तन्ते ।
गूढव्रतस्य हि सदा विशुद्धबुद्धेः स(सु)गूढचित्तस्य ।
प्रणवध्यानपरस्य च स(सु)गूढतपसो भयं नास्ति ॥
अन्वय: ब्रह्मविदः अनेकविधाः (सन्ति), येन (ओंकारेण) ते सततं प्रवर्तन्ते। हि (अतः) गूढव्रतस्य, सदा विशुद्धबुद्धेः, सुगूढचित्तस्य, प्रणवध्यानपरस्य च, सुगूढतपसः (अस्य साधकस्य) भयं नास्ति।
पदार्थ और निर्वचन:
• ब्रह्मविदोऽनेकविधाः: ब्रह्म को जानने वाले अनेक प्रकार के होते हैं। यहाँ 'अनेकविधा' शब्द संकेत करता है कि ब्रह्मज्ञान की प्राप्तियाँ और मार्ग भिन्न हो सकते हैं—कोई ज्ञानमार्गी है, कोई भक्त, कोई योगी, किंतु सबका लक्ष्य एक ही है।
• प्रवर्तन्ते: प्रवृत्त होते हैं या अपनी साधना में लगे रहते हैं। यहाँ 'प्रवर्तन' का अर्थ है—परम लक्ष्य की ओर निरंतर अग्रसर रहना।
• गूढव्रतस्य: जिसकी 'व्रत' (संकल्प या साधना) गुप्त हो। 'गूढ' का अर्थ है जो बाहर से न दिखे, जो अंतर्मुखी हो।
• विशुद्धबुद्धेः: जिसकी बुद्धि मलिनताओं (काम, क्रोध, मोह) से मुक्त होकर निर्मल हो चुकी हो।
• सुगूढचित्तस्य: जिसका चित्त अत्यंत स्थिर और अंतःस्थ हो। 'सुगूढ' शब्द चित्त की उस गहराई को दर्शाता है जहाँ बाहरी जगत का कोलाहल प्रवेश नहीं कर पाता।
• प्रणवध्यानपरस्य: जिसका एकमात्र आश्रय या लक्ष्य प्रणव का ध्यान हो। 'पर' का अर्थ है—सर्वोपरि या एकमात्र।
• सुगूढतपसो: जिसकी तपस्या गहन और गुप्त हो। तप का अर्थ यहाँ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इंद्रियों का निग्रह और आंतरिक ताप (तपस) द्वारा अविद्या को जलाना है।
• भयं नास्ति: भय का अभाव। यहाँ भय का अर्थ केवल मृत्यु या भौतिक हानि नहीं, अपितु संसार के द्वंद्वों, संशयों और पुनर्जन्म के चक्र का भय है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में प्रणव की उस शक्ति का वर्णन कर रहे हैं जो साधक को अभय प्रदान करती है। वे कहते हैं कि ब्रह्मवेत्ता अनेक प्रकार के होते हैं—कोई उन्हें निराकार में देखता है, कोई सगुण में, कोई ज्योतिर्मय रूप में; किंतु ये सभी जिस एक साधन के द्वारा अपनी साधना में निरंतर प्रवृत्त रहते हैं, वह 'ओंकार' ही है। प्रणव वह सेतु है जो भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों के साधकों को एक ही परम तत्व से जोड़ता है।
ऋषि यहाँ एक विशेष प्रकार के साधक का चित्रण कर रहे हैं, जिसके लिए 'गूढ' शब्द का प्रयोग तीन बार (गूढव्रत, सुगूढचित्त, सुगूढतपस) किया गया है। इसका गहरा रहस्य यह है कि वास्तविक योग-साधना प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। जो साधक अपनी साधना को गुप्त रखता है, उसकी ऊर्जा बाहर बिखरने के बजाय भीतर संचित होती है। जब व्रत, चित्त और तप—तीनों 'गूढ' हो जाते हैं, तब साधक की बुद्धि 'विशुद्ध' हो जाती है।
विशुद्ध बुद्धि वह है जो अब केवल सत्य को देखती है। जब साधक प्रणव-ध्यान में पूरी तरह लीन (पर) हो जाता है, तब वह उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ 'भय' का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। भय तब तक रहता है जब तक 'मैं' और 'तू' का भेद रहता है। प्रणव के माध्यम से जब साधक अपनी लघुता को त्यागकर उस विराट अक्षर में स्थित हो जाता है, तब वह स्वयं अभय हो जाता है। यह अभयता किसी बाहरी सुरक्षा से नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक पूर्णता के अनुभव से आती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'गोपनीयता' और 'एकाग्रता' के अभ्यास का निर्देश है। योग में 'गूढ' रहने का अर्थ है—अपनी अनुभूतियों का ढिंढोरा न पीटना। जब साधक अपनी साधना को गुप्त रखता है, तो उसका अहंकार (जो प्रशंसा से बढ़ता है) शांत होता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक अपनी वृत्तियों को बाहर की ओर प्रवाहित करने के बजाय, उन्हें प्रणव के माध्यम से भीतर की ओर मोड़े। 'सुगूढ चित्त' का अनुभव तब होता है जब मन बाहरी विषयों से हटकर केवल ओंकार की ध्वनि और उसके मौन में स्थित हो जाता है।
इस श्लोक में साधक की तीन भूमियों का संकेत है:
१. व्रत की भूमि: जहाँ संकल्प लिया जाता है (गूढव्रत)।
२. चित्त की भूमि: जहाँ एकाग्रता और स्थिरता आती है (सुगूढचित्त)।
३. तप की भूमि: जहाँ आंतरिक ताप से अविद्या का नाश होता है (सुगूढतपस)।
जब ये तीनों स्थितियाँ प्रणव-ध्यान के साथ मिलती हैं, तब साधक 'विशुद्ध बुद्धि' की अवस्था को प्राप्त करता है। यह वह भूमि है जहाँ से साधक भयमुक्त होकर परम शांति में प्रवेश करता है। यहाँ अभ्यास केवल शब्द का जप नहीं, बल्कि शब्द से शून्य की ओर जाने की यात्रा है।
प्रणवप्राणायामसत्यसावित्रीमाहात्म्यम्
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः ।
सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात् सत्यं विशिष्यते ॥ २.६३ ॥
एकाक्षर (ॐ) परम ब्रह्म है, प्राणायाम परम तप है; सावित्री (गायत्री) से बढ़कर कुछ नहीं, और मौनसे सत्य श्रेष्ठ है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव-ध्यान में लीन साधक की निर्भयता और उसकी विशुद्ध बुद्धि का वर्णन किया। अब इस श्लोक में ऋषि साधना के उन चार सर्वोच्च स्तंभों का निर्धारण कर रहे हैं, जो साधक को स्थूल जगत से उठाकर अक्षर-ब्रह्म तक ले जाते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः ।
सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात् सत्यं विशिष्यते ॥
अन्वय: एकाक्षरं (ओंकारः) परं ब्रह्म (अस्ति), प्राणायामः परं तपः (अस्ति)। सावित्र्याः तु परं नास्ति, मौनात् सत्यं विशिष्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• एकाक्षरं: वह एक अक्षर 'ओम्'। यह केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु समस्त ध्वनियों का बीज और समस्त मन्त्रों का मूल है।
• परं ब्रह्म: वह ब्रह्म जो 'पर' है, अर्थात् जो इंद्रियों, मन और बुद्धि के पार है।
• प्राणायामः: प्राण का आयाम (विस्तार या नियमन)। यहाँ प्राणायाम केवल श्वास की क्रिया नहीं, अपितु प्राण को उसकी मूल सत्ता में विलीन करने की प्रक्रिया है।
• परं तपः: तप का अर्थ है 'तपना' या शुद्ध होना। प्राणायाम को 'परम तप' इसलिए कहा गया क्योंकि यह शरीर और मन की अशुद्धियों को जलाकर साधक को सूक्ष्म बनाता है।
• सावित्र्याः: सावित्री मन्त्र (गायत्री)। यह सूर्य-तत्त्व का मन्त्र है, जो बुद्धि को प्रेरित करता है।
• परं नास्ति: इससे श्रेष्ठ या इससे परे कुछ नहीं है। यह मन्त्रों की श्रेणी में सर्वोच्च शिखर है।
• मौनात् सत्यं विशिष्यते: 'विशिष्यते' का अर्थ है श्रेष्ठ होना या अलग दिखना। मौन की अवस्था में जब वाणी शांत होती है, तब जो 'सत्य' प्रकट होता है, वह समस्त शब्दों से श्रेष्ठ होता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधना के चार अनिवार्य अंगों का समुच्चय प्रस्तुत कर रहे हैं: ओंकार, प्राणायाम, सावित्री और सत्य। यह श्लोक केवल सूक्तियों का संग्रह नहीं है, अपितु एक क्रमिक सोपान है।
प्रथम, 'एकाक्षरं परं ब्रह्म' कहकर ऋषि स्पष्ट करते हैं कि ओंकार ही वह द्वार है जिससे साधक ब्रह्म में प्रवेश करता है। जब साधक 'ओम्' का आश्रय लेता है, तो वह नाम-रूप के जगत से ऊपर उठकर उस निराकार सत्ता से जुड़ता है जो समस्त सृष्टि का आधार है।
द्वितीय, 'प्राणायामः परं तपः'। ब्रह्म का ज्ञान केवल बौद्धिक चर्चा से नहीं, अपितु शरीर और प्राण की शुद्धि से संभव है। प्राणायाम वह अग्नि है जो साधक के भीतर के आलस्य, प्रमाद और मानसिक विक्षेपों को भस्म करती है। जब प्राण स्थिर होता है, तभी मन स्थिर होता है और स्थिर मन ही ब्रह्म को ग्रहण करने में समर्थ होता है।
तृतीय, 'सावित्र्यास्तु परं नास्ति'। सावित्री मन्त्र बुद्धि का प्रकाश है। यदि प्राणायाम शरीर और प्राण को शुद्ध करता है, तो सावित्री बुद्धि को दिव्य बनाती है। यह साधक को अविद्या के अंधकार से निकालकर 'सत्य' के आलोक में लाता है।
चतुर्थ, 'मौनात् सत्यं विशिष्यते'। यह इस श्लोक का उपसंहार है। मन्त्रों का जप और प्राणायाम का अभ्यास अंततः साधक को उस बिंदु पर ले जाता है जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं। मौन वह भूमि है जहाँ सत्य का साक्षात्कार होता है। जब वाणी का बाहरी शोर और मन का आंतरिक कोलाहल शांत हो जाता है, तब जो शेष रहता है, वही 'सत्य' है। अतः मौन के माध्यम से प्राप्त सत्य, शब्दों द्वारा व्यक्त सत्य से कहीं अधिक श्रेष्ठ और वास्तविक है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामाः परं तपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ २.८३ ॥
एकाक्षर (ॐ) परम ब्रह्म है, प्राणायाम परम तप हैं; सावित्रीसे बढ़कर (कोई मन्त्र) नहीं है, और मौनसे सत्य श्रेष्ठ है।
यह श्लोक मनुस्मृति के वचन के साथ पूर्णतः मेल खाता है। मनुस्मृति में भी इन्हीं चार साधनों—एकाक्षर, प्राणायाम, सावित्री और मौन-सत्य—को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति की यह समानता दर्शाती है कि वैदिक परंपरा में योग और स्मृति का लक्ष्य एक ही है: साधक को स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अक्षर की ओर ले जाना।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक के लिए एक पूर्ण 'साधना-चक्र' है। साधक यहाँ चार स्तरों पर अभ्यास करता है:
१. नाद-साधना (ओंकार): साधक 'ओम्' के उच्चारण और उसके नाद में लीन होकर अपनी चेतना को एकाग्र करता है। यह उसे 'परब्रह्म' के साथ एकाकार होने का अनुभव कराता है।
२. प्राण-साधना (प्राणायाम): साधक श्वास के नियमन द्वारा अपने भीतर की ऊर्जा को जाग्रत करता है। यह 'तप' उसे शारीरिक और मानसिक व्याधियों से मुक्त कर उच्च भूमियों की ओर ले जाता है।
३. मंत्र-साधना (सावित्री): साधक गायत्री के माध्यम से अपनी बुद्धि को शुद्ध करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि बुद्धि केवल सांसारिक लाभ के लिए नहीं, अपितु दिव्य ज्ञान के लिए प्रदीप्त हो।
४. मौन-साधना (सत्य): यह अंतिम अवस्था है। साधक जप और प्राणायाम के बाद पूर्ण मौन में स्थित होता है। इस मौन में वह अनुभव करता है कि सत्य शब्दों में नहीं, अपितु शब्दों के अभाव में विद्यमान है।
साधक इस क्रम में आगे बढ़ता है: ओंकार से एकाग्रता → प्राणायाम से शुद्धि → सावित्री से प्रकाश → मौन से सत्य का साक्षात्कार। इस प्रकार वह 'साधारण मनुष्य' से 'मुनि' की भूमि की ओर अग्रसर होता है।
प्रणवव्याहृतिगायत्र्युपासनाफलम्
प्रणवे नित्ययुक्तस्य व्याहृतीषु च सप्तसु ।
त्रिपदायां च गायत्र्यां न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २.६४ ॥
…प्रणव में नित्य लगे हुए को सप्त व्याहृतियों में और त्रिपदा गायत्री में कहीं भी भय नहीं रहता।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने एकाक्षर ब्रह्म, प्राणायाम, सावित्री और मौन के माध्यम से सत्य की प्राप्ति का सूत्र दिया। अब इस श्लोक में वे उन विशिष्ट मंत्र-साधनों के साथ 'नित्य' संबंध स्थापित करने से प्राप्त होने वाले परम फल—'अभय' का वर्णन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
प्रणवे नित्ययुक्तस्य व्याहृतीषु च सप्तसु ।
त्रिपदायां च गायत्र्यां न भयं विद्यते क्वचित् ॥
अन्वय: (यः) प्रणवे (तथा) सप्तसु व्याहृतीषु च (तथा) त्रिपदायां च गायत्र्यां नित्ययुक्तः (अस्ति), तस्य क्वचित् भयं न विद्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्रणवे: ओंकार में। वह आदि-ध्वनि जो समस्त सृष्टि का बीज है।
• नित्ययुक्तस्य: जो निरंतर जुड़ा हुआ है। 'नित्य' का अर्थ केवल समय की निरंतरता नहीं, अपितु चित्त की वह अवस्था है जहाँ साधक का ध्यान बाहरी विषयों से हटकर केवल उस तत्त्व में स्थिर हो गया हो।
• व्याहृतीषु सप्तसु: सात व्याहृतियों में। सामान्यतः तीन व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः) प्रसिद्ध हैं, किंतु यहाँ 'सप्त' (सात) का उल्लेख है। ये सात व्याहृतियाँ स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाले सात सोपान हैं, जो ब्रह्माण्ड और पिंड के सात स्तरों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
• त्रिपदायां गायत्र्यां: तीन पदों वाली गायत्री में। गायत्री के तीन चरण (पद) तीन लोकों, तीन कालों और तीन गुणों के अधिष्ठाता सूर्य-तत्त्व के प्रतीक हैं।
• न भयं विद्यते क्वचित्: कहीं भी भय विद्यमान नहीं रहता। यहाँ 'भय' का अर्थ केवल मृत्यु या संकट का डर नहीं, अपितु अविद्या, द्वैत और संसार के आवागमन का भय है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में साधना के तीन मुख्य स्तंभों—प्रणव, सप्त-व्याहृति और त्रिपदा-गायत्री—के साथ साधक के अटूट संबंध की बात कर रहे हैं। यह स्मृति यहाँ स्पष्ट करती है कि जब साधक इन तीनों के साथ 'नित्ययुक्त' होता है, तब वह 'अभय' की स्थिति को प्राप्त करता है।
प्रथम साधन 'प्रणव' है। प्रणव वह सेतु है जो व्यक्त को अव्यक्त से जोड़ता है। जब साधक ओंकार में स्थित होता है, तो वह अपनी लघुता को छोड़कर उस विराट सत्ता में विलीन हो जाता है। जिसके लिए 'ओम्' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि स्वयं का स्वरूप बन गया हो, उसे संसार की किसी भी वस्तु से भय नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्वयं ही सब कुछ हो गया है।
द्वितीय साधन 'सप्त व्याहृतियाँ' हैं। व्याहृतियाँ वे शब्द हैं जो ब्रह्म को 'व्याहृत' (व्यक्त) करते हैं। सात व्याहृतियों का अभ्यास साधक को पृथ्वी से लेकर परम आकाश तक की यात्रा कराता है। यह बाहरी रूप से मंत्रोच्चार है, किंतु आन्तरिक रूप से यह चेतना का विस्तार है। जब साधक इन सात स्तरों के रहस्य को जान लेता है, तो वह प्रकृति के किसी भी प्रभाव से विचलित नहीं होता।
तृतीय साधन 'त्रिपदा गायत्री' है। गायत्री बुद्धि को प्रेरित करने वाला मंत्र है। त्रिपदा का अर्थ है—तीन चरणों वाला। यह साधक की बुद्धि को शुद्ध कर उसे सूर्य के समान प्रकाशमान बना देता है। जिस साधक की बुद्धि सावित्री-शक्ति से आलोकित है, उसके जीवन से अज्ञान का अंधकार मिट जाता है और अंधकार के अभाव में भय स्वतः समाप्त हो जाता है।
इन तीनों का समन्वय ही पूर्णता है। प्रणव आधार है, व्याहृतियाँ मार्ग हैं और गायत्री वह प्रकाश है जो गंतव्य तक पहुँचाता है। इन तीनों में नित्य लीन रहने वाला साधक उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ 'मैं' और 'मेरा' का बोध समाप्त हो जाता है। जहाँ कोई 'दूसरा' नहीं बचता, वहाँ भय का अस्तित्व ही नहीं रह सकता।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'नित्य अभ्यास' और उसके फल 'निर्भयता' का संबंध स्थापित करता है। साधक के लिए यहाँ अभ्यास की एक निश्चित क्रमबद्धता है:
१. प्रणव-अभ्यास: साधक ओंकार के नाद और उसकी शांति (अमात्र) में स्थित होकर अपने मन को एकाग्र करता है। यह अभ्यास उसे 'स्थिरता' प्रदान करता है।
२. व्याहृति-अभ्यास: सात व्याहृतियों के माध्यम से साधक अपनी चेतना को विभिन्न स्तरों पर ले जाता है। यह अभ्यास उसे 'विस्तार' प्रदान करता है।
३. गायत्री-अभ्यास: त्रिपदा गायत्री के चिंतन से वह अपनी बुद्धि को उस परम ज्योति (सूर्य) में विलीन करता है। यह अभ्यास उसे 'प्रकाश' प्रदान करता है।
जब स्थिरता, विस्तार और प्रकाश एक साथ मिलते हैं, तब साधक 'भयमुक्त' भूमि पर प्रतिष्ठित होता है। यह निर्भयता किसी बाहरी शक्ति के कारण नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक पूर्णता के अनुभव से आती है। साधक अनुभव करता है कि वह न तो शरीर है, न मन, बल्कि वह वही अक्षर-ब्रह्म है जो अविनाशी है। इस अनुभव के साथ वह संसार के द्वंद्वों से ऊपर उठकर परम शांति में स्थित हो जाता है।
आद्यास्तु व्याहृतीस्तिस्रो गायत्रींस्वशिरोय(यु)ताम् ।
ओंकारं विन्दते यस्तु स मुनिर्नेतरो जनः ॥ २.६५ ॥
जो आदिकी तीन व्याहृतियों, अपने शिरस् सहित गायत्री और ओंकारको जानता है, वही मुनि है — दूसरा कोई नहीं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि ने प्रणव, सप्त-व्याहृतियों और त्रिपदा गायत्री के नित्य अभ्यास से प्राप्त होने वाले 'अभय' के फल का वर्णन किया है। अब इस श्लोक में वे 'मुनि' की वास्तविक परिभाषा देते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि केवल बाहरी मौन या तप मुनित्व का प्रमाण नहीं, अपितु मन्त्रों के मर्म का ज्ञान ही वास्तविक मुनित्व है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यः (साधकः) आद्याः तिस्रः व्याहृतयः, स्व-शिरोयुताम् गायत्रीम्, (तथा) ओंकारम् विन्दते, स (एव) मुनिः, नेतरः जनः (मुनिः अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• आद्यास्तु व्याहृतीस्तिस्रो: वे आदि की तीन व्याहृतियाँ—भूः, भुवः, स्वः। 'आद्य' शब्द यहाँ उनके प्राथमिक होने के साथ-साथ सृष्टि के मूल आधार होने का संकेत है।
• गायत्रीं स्वशिरोयुताम्: अपने 'शिरस्' (शीर्ष) सहित गायत्री। यहाँ 'शिरस्' का अर्थ है वह मन्त्र-अंश या वह प्रणव-व्याहृति समूह जो गायत्री के आरम्भ में लगाया जाता है। जिस प्रकार शरीर के बिना शिर का अस्तित्व नहीं और शिर के बिना शरीर पूर्ण नहीं, वैसे ही शिरस् (ओंकार और व्याहृति) के बिना गायत्री का पूर्ण प्रभाव प्रकट नहीं होता।
• विन्दते: जानता है। यहाँ 'जानने' का अर्थ केवल शब्दों का उच्चारण या अर्थ समझना नहीं है, अपितु 'विन्दना' का अर्थ है—अनुभव करना, मन्त्र के भीतर स्थित तत्त्व को प्राप्त करना।
• मुनिः: वह जो मन्त्रों के रहस्य को जानकर मन को स्थिर कर चुका है।
• नेतरो जनः: दूसरा कोई व्यक्ति (केवल बाहरी क्रिया करने वाला या केवल मौन रहने वाला) मुनि नहीं है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को 'मुनि' होने की योग्यता बताता है। सामान्य दृष्टि में मुनि वह है जो मौन रहता है, किंतु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मुनि की एक सूक्ष्म और आध्यात्मिक परिभाषा दे रहे हैं। उनके अनुसार, मुनि वह है जिसने मन्त्रों के त्रय-संगम—व्याहृति, गायत्री और ओंकार—को पूर्णतः जान लिया है।
ऋषि कहते हैं कि जो साधक आदि की तीन व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) के रहस्य को जानता है, जो गायत्री को उसके 'शिरस्' (प्रणव और व्याहृति) के साथ पूर्ण रूप में आत्मसात करता है और जो ओंकार के अक्षर-रूप में स्थित होता है, वही वास्तव में मुनि है।
यहाँ 'शिरोयुताम्' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। गायत्री मन्त्र स्वयं में एक शक्ति है, किंतु जब वह अपने शिरस् (ॐ भूः भुवः स्वः) के साथ जुड़ती है, तब वह स्थूल जगत (भूः), अन्तरिक्ष (भुवः) और दिव्य लोक (स्वः) को पार कर उस परम अक्षर (ॐ) में विलीन होने का मार्ग प्रशस्त करती है। बिना शिरस् के गायत्री केवल एक प्रार्थना हो सकती है, किंतु शिरस् सहित गायत्री एक 'अस्त्र' और 'सोपान' बन जाती है।
इस श्लोक का गहरा संकेत यह है कि केवल मौन रहना मुनि होना नहीं है। यदि मन भीतर से अशांत है और मन्त्रों के प्रकाश से अविद्या का नाश नहीं हुआ, तो वह मौन केवल एक शारीरिक क्रिया है। वास्तविक मुनि वह है जिसका मौन 'मन्त्र-जनित' है—अर्थात जिसने ओंकार और गायत्री के माध्यम से अपने चित्त को उस बिंदु पर स्थिर कर लिया है जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं और केवल अनुभव शेष रहता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ २.७८ ॥
इस अक्षर (ॐ) का और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (सावित्री) का दोनों सन्ध्याओंमें जप करनेवाला वेदवेत्ता विप्र वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है।
मनुस्मृति में भी इसी क्रम की महत्ता बताई गई है कि जो ओंकार और व्याहृतिपूर्वक सावित्री का जप करता है, वह वेद-पुण्य से युक्त होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात को एक कदम आगे ले जाकर कहती है कि यह केवल 'पुण्य' की प्राप्ति नहीं, अपितु 'मुनित्व' की प्राप्ति है। जहाँ मनुस्मृति जप के फल (पुण्य) की बात करती है, वहीं यह स्मृति मन्त्र के ज्ञान से साधक के स्वरूप के परिवर्तन (मुनि बनना) की बात करती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-योग' का सार है। यहाँ अभ्यास की तीन सीढ़ियाँ दी गई हैं:
१. व्याहृति अभ्यास: भूः, भुवः, स्वः के माध्यम से साधक अपने स्थूल शरीर, प्राण और मन के स्तरों को शुद्ध करता है।
२. शिरस्-सहित गायत्री अभ्यास: जब साधक गायत्री को उसके शिरस् के साथ जपता है, तो वह अपनी बुद्धि को उस 'परोरजाः' (परम प्रकाश) की ओर मोड़ता है। यह अभ्यास साधक को 'सावित्री' की शक्ति से जोड़कर उसकी चेतना का विस्तार करता है।
३. ओंकार विन्दना: अंत में, जब साधक ओंकार को 'विन्दते' (जानता/अनुभव करता है), तो वह शब्दों के पार अक्षर में स्थित हो जाता है।
योगिक अनुभव यह है कि जब ये तीनों—व्याहृति, गायत्री और ओंकार—साधक के भीतर एक लय में आ जाते हैं, तब उसके भीतर एक ऐसा मौन घटित होता है जिसे 'मुनि-भाव' कहते हैं। यह वह स्थिति है जहाँ साधक को अब किसी बाहरी मन्त्र की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह स्वयं मन्त्र बन जाता है। इस श्लोक से साधक यह सीखता है कि उसकी साधना का लक्ष्य केवल जप की संख्या पूरी करना नहीं, बल्कि मन्त्र के मर्म को 'जानना' और उसमें 'लीन' होना है। यही वह भूमि है जहाँ से साधक 'जन' (साधारण मनुष्य) से 'मुनि' (ऋषि) की श्रेणी में प्रविष्ट होता है।
प्रणवे सिद्धान्तिनां मतभेदाः
एक एव हि विज्ञेयः प्रणवो योगसाधनम् ।
गृहीतः सप्तसिद्धान्तैरन्यैश्च ब्रह्मवादिभिः ॥ २.६६ ॥
योगका साधन एक प्रणव ही जानने योग्य है, जिसे सात सिद्धान्तों (सम्प्रदायों) ने और अन्य ब्रह्मवादियोंने ग्रहण किया है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि ने मन्त्रों के मर्म को अनुभव करने वाले को ही वास्तविक 'मुनि' सिद्ध किया है। अब वे मुनित्व की उस आधारशिला की चर्चा कर रहे हैं, जिस पर समस्त योग-साधना टिकी है—अर्थात् प्रणव।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एकः एव हि प्रणवः योगसाधनम् (रूपेण) विज्ञेयः, (यः) सप्तसिद्धान्तैः अन्यैश्च ब्रह्मवादिभिः गृहीतः (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• एक एव हि विज्ञेयः: केवल एक ही जानने योग्य है। यहाँ 'एक' शब्द केवल संख्या नहीं, अपितु 'एकत्व' का बोध है। यह संकेत है कि चाहे साधन की कितनी भी विविधता दिखे, मूल तत्त्व एक ही है।
• प्रणवो योगसाधनम्: प्रणव (ॐ) जो योग का साधन है। 'प्रणव' का अर्थ है वह ध्वनि जो प्राण को नवीनीकृत करे या वह जो ब्रह्म का नाम हो। इसे 'योगसाधन' कहना यह दर्शाता है कि यह केवल जप का विषय नहीं, बल्कि चित्त को समाधि तक ले जाने वाला उपकरण है।
• गृहीतः: ग्रहण किया गया। इसका अर्थ है कि इन सिद्धान्तों ने इसे केवल स्वीकार नहीं किया, बल्कि अपनी साधना के केंद्र में प्रतिष्ठित किया है।
• सप्तसिद्धान्तैः: सात प्रमुख सम्प्रदायों या मतों द्वारा। (इनके नाम अगले श्लोकों में स्पष्ट किए गए हैं)।
• ब्रह्मवादिभिः: वे सभी जो ब्रह्म को ही अंतिम सत्य मानते हैं। यह शब्द उन सभी साधकों और ऋषियों के लिए प्रयुक्त है जो किसी विशेष सम्प्रदाय से न जुड़कर भी केवल ब्रह्म-साक्षात्कार को लक्ष्य मानते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधना के मार्ग में आने वाले भ्रम को दूर करता है। जब साधक योग के मार्ग पर अग्रसर होता है, तो उसे अनेक मत, अनेक पद्धतियाँ और अनेक गुरु मिलते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि सत्य तक पहुँचने का निश्चित साधन क्या है? याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मार्ग अनेक हो सकते हैं, किंतु योग का मूल साधन 'एक' ही है—प्रणव।
यहाँ 'विज्ञेयः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि साधक को यह 'जानना' चाहिए कि समस्त योग-साधनाओं का निचोड़ ओंकार ही है। बाहरी रूप से भिन्न दिखने वाले सिद्धान्त वास्तव में एक ही सत्य के विभिन्न आयाम हैं। ऋषि कहते हैं कि सात महान सिद्धान्तों और समस्त ब्रह्मवादियों ने इस एक साधन को ग्रहण किया है। इसका भाव यह है कि जब सत्य एक है, तो उस तक पहुँचने वाला बीज-मन्त्र भी एक ही होगा।
यह श्लोक यह भी स्थापित करता है कि प्रणव किसी एक सम्प्रदाय की बपौती नहीं है, अपितु यह सार्वभौमिक है। चाहे वह सांख्य की दृष्टि हो, योग की हो या पाञ्चरात्र की—सबके केंद्र में वही एक अक्षर प्रतिष्ठित है। यह स्मृति हमें सिखाती है कि मत-भेदों के ऊपर उठकर उस 'एक' साधन पर ध्यान केंद्रित करना ही वास्तविक योग है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥
राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।
महाभारत के शान्तिपर्व में सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत जैसे ज्ञानों का उल्लेख है और उन्हें 'नानामतानि' (विभिन्न नामों वाला) कहा गया है। महाभारत स्पष्ट करता है कि कपिल सांख्य के, हिरण्यगर्भ योग के और अपान्तरतमा वेदों के वक्ता हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस तथ्य को और गहराई देते हुए बताती है कि यद्यपि इन ज्ञानों के नाम और वक्ता भिन्न हैं, किंतु इन सभी ने 'प्रणव' को ही अपना मुख्य साधन माना है। जहाँ महाभारत विभिन्न मतों की पहचान कराता है, वहीं यह स्मृति उन सभी मतों के साझा आधार के रूप में प्रणव को प्रतिष्ठित करती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'एकत्व' के अभ्यास का सूत्र है। योग का अर्थ ही है—जोड़ना। जब साधक देखता है कि सात भिन्न-भिन्न सिद्धान्त एक ही प्रणव पर सहमत हैं, तो उसके भीतर के वैचारिक द्वंद्व समाप्त होने लगते हैं।
अभ्यास की दृष्टि से यहाँ यह संकेत है कि साधक को किसी एक मत के प्रति आग्रह या दूसरे के प्रति विरोध रखने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल उस 'एक' साधन (प्रणव) को पकड़ना है, जिसे सभी ऋषियों ने प्रमाणित किया है। यह श्लोक साधक को 'विविधता' से 'एकता' की ओर ले जाता है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में उन सभी सिद्धान्तों के सार को अपने भीतर समाहित कर रहा होता है। यह अभ्यास उसे उस भूमि पर ले जाता है जहाँ मत-भेद समाप्त हो जाते हैं और केवल 'ब्रह्म-भाव' शेष रहता है।
हिरण्यगर्भैः कपिलैरपान्तरतमैस्तथा ।
सनत्कुमारैर्ब्रह्मिष्ठैस्तथा पाशुपतैरपि ॥ २.६७ ॥
…हिरण्यगर्भों द्वारा, कपिलों द्वारा, अपान्तरतमों द्वारा तथा ब्रह्मनिष्ठ सनत्कुमारों और पाशुपतों द्वारा भी।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि ने यह स्पष्ट किया कि प्रणव ही वह एकमात्र श्रेष्ठ योग-साधन है जिसे समस्त ब्रह्मवादियों ने स्वीकार किया है। अब वे उन विशिष्ट ऋषियों और सिद्धान्तों के नामों का उल्लेख कर रहे हैं जिन्होंने इस एकाक्षर ब्रह्म को अपनी साधना का आधार बनाया।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः प्रणवः) हिरण्यगर्भैः, कपिलैः, अपान्तरतमैः तथा सनत्कुमारैः, ब्रह्मिष्ठैः तथा पाशुपतैरपि (गृहीतः)।
पदार्थ और निर्वचन:
• हिरण्यगर्भैः: हिरण्यगर्भ मत के अनुयायियों द्वारा। हिरण्यगर्भ 'ब्रह्मांड के आदि पुरुष' और योग के पुरातन वक्ता माने जाते हैं।
• कपिलैः: कपिल मुनि के अनुयायियों द्वारा। कपिल सांख्ययोग के प्रणेता हैं, जो प्रकृति और पुरुष के विवेक द्वारा मोक्ष का मार्ग बताते हैं।
• अपान्तरतमैः: अपान्तरतमा मत के अनुयायियों द्वारा। ये वे वेदाचार्य हैं जो वेदों के गूढ़ और अति-सूक्ष्म (अपान्तर) अर्थों के ज्ञाता हैं।
• सनत्कुमारैः: सनत्कुमारों द्वारा। ये ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं, जो नित्य बाल्य स्वरूप में रहकर शुद्ध ज्ञान और ब्रह्म-विद्या का निरूपण करते हैं।
• ब्रह्मिष्ठैः: ब्रह्मनिष्ठों द्वारा। वे साधक जिन्होंने अपनी बुद्धि को पूर्णतः ब्रह्म में स्थिर कर लिया है और जिनके लिए अब कोई अन्य लक्ष्य शेष नहीं रहा।
• पाशुपतैरपि: पाशुपत मत के अनुयायियों द्वारा भी। यह शिव-साधना की वह प्राचीन पद्धति है जहाँ 'पाश' (बंधन) को काटकर 'पशु' (जीव) को 'पति' (परमात्मा) से मिलाया जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक केवल नामों की एक सूची नहीं है, अपितु यह इस सत्य का प्रमाण है कि सत्य की प्राप्ति के मार्ग भिन्न हो सकते हैं, किन्तु उनका गंतव्य और मूल साधन एक ही है। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ यह दिखा रहे हैं कि चाहे वह सांख्य की विवेक-दृष्टि हो, योग की एकाग्रता हो, वेदों का ज्ञान हो या शिव-भक्ति का मार्ग—इन सभी की परिणति 'प्रणव' में ही होती है।
यहाँ 'हिरण्यगर्भ', 'कपिल' और 'अपान्तरतमा' जैसे नाम उन धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्होंने सृष्टि, प्रकृति और वेद के माध्यम से ब्रह्म को खोजा। वहीं 'सनत्कुमार' और 'ब्रह्मिष्ठ' उस अवस्था के प्रतीक हैं जहाँ ज्ञान स्थिर हो चुका है। 'पाशुपत' उस मार्ग को दर्शाते हैं जहाँ समर्पण और तप के माध्यम से बंधन मुक्ति की बात कही गई है।
यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि प्रणव (ॐ) किसी एक संप्रदाय की बपौती नहीं है, बल्कि यह सार्वभौमिक ध्वनि है। जब ऋषि इन विविध मतों का उल्लेख करते हैं, तो वे वास्तव में यह संकेत दे रहे हैं कि जो सत्य हिरण्यगर्भ ने देखा, वही कपिल ने अनुभव किया और वही पाशुपतों ने पाया। यह विविधता केवल बाहरी है; आन्तरिक रूप से यह एक ही 'योगसाधन' की विभिन्न व्याख्याएँ हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥
राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।
महाभारत के शान्तिपर्व में भी इन्हीं ज्ञान-धाराओं का उल्लेख मिलता है, जहाँ सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया है, किन्तु उन्हें मूलतः 'ज्ञान' ही कहा गया है। वहाँ स्पष्ट किया गया है कि सांख्य के वक्ता कपिल हैं, योग के वक्ता हिरण्यगर्भ हैं और अपान्तरतमा वेदाचार्य हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस साक्ष्य की पुष्टि करती है कि ये सभी भिन्न-भिन्न मत वास्तव में प्रणव रूपी एक ही सत्य के विभिन्न आयाम हैं।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'समन्वय' की भूमि पर ले जाता है। साधक जब साधना के आरम्भिक चरणों में होता है, तो वह अक्सर मत-भेदों और संप्रदायों के जाल में उलझ जाता है। यह श्लोक उसे बताता है कि उसे किसी एक मत के प्रति आग्रह या दूसरे के प्रति विरोध रखने की आवश्यकता नहीं है।
अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि जिस 'ॐ' का जप वह कर रहा है, वही ध्वनि कपिल की विवेक-बुद्धि में गूँज रही है और वही हिरण्यगर्भ के योग में व्याप्त है। जब साधक नामों और मतों के पार जाकर केवल 'ध्वनि' (प्रणव) पर टिकता है, तब वह संप्रदाय की सीमा को लाँघकर 'ब्रह्मिष्ठ' की श्रेणी में प्रवेश करता है। यह श्लोक साधक को विविधता में एकता देखने का अभ्यास कराता है, जिससे उसका चित्त विस्तृत होता है और वह संकीर्णता से मुक्त होकर विराट स्वरूप की ओर अग्रसर होता है।
पाञ्चरात्रैः सदोद्युक्तैः सिद्धान्तैरपि सप्तभिः ।
भेदैस्त्रिषष्टिभिर्भिन्नमेकैकं नवधा पुनः ॥ २.६८ ॥
…सदा उद्यत पाञ्चरात्र-मतवालों के इन सात सिद्धान्तों द्वारा भी, वह तिरसठ भेदों में भिन्न है और एक-एक फिर नौ प्रकार का है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में उन सात महान सिद्धान्तों और ऋषियों के नामों का उल्लेख किया गया जिन्होंने प्रणव को योग-साधन के रूप में ग्रहण किया। वर्तमान श्लोक में ऋषि उन सिद्धान्तों की सूची को पूर्ण करते हुए प्रणव की उस अनंत विविधता का संकेत दे रहे हैं, जो उसकी एकता के भीतर ही निहित है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः प्रणवः) पाञ्चरात्रैः (तथा) सदोद्युक्तैः सिद्धान्तैरपि सप्तभिः (गृहीतः), (सः) भेदैः त्रिषष्टिभिः भिन्नम् (अस्ति) एकैकं नवधा पुनः (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• पाञ्चरात्रैः: पाञ्चरात्र मत के अनुयायियों द्वारा। यह वह विद्या है जो सृष्टि के पाँच तत्वों और परमात्मा के पाँच स्वरूपों (विभूति) के माध्यम से मोक्ष का मार्ग दिखाती है।
• सदोद्युक्तैः: सदा उद्यत, निरंतर जागरूक या तत्पर। यहाँ इसका अर्थ उन साधकों से है जो केवल सैद्धान्तिक ज्ञान में नहीं, अपितु निरंतर अभ्यास और साधना में लीन रहते हैं।
• भेदैः त्रिषष्टिभिः: तिरसठ भेदों में। यहाँ 'भेद' का अर्थ विरोधाभास नहीं, अपितु एक ही तत्त्व को देखने के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण या विश्लेषण की विधियाँ हैं।
• एकैकं नवधा पुनः: एक-एक फिर नौ प्रकार का। यह सूक्ष्मता की वह परत है जहाँ प्रत्येक मुख्य भेद के भीतर नौ और उप-विभाजन या अनुभव की अवस्थाएँ प्रकट होती हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक हमें उस महान सत्य से परिचित कराता है कि प्रणव (ॐ) कोई साधारण शब्द नहीं, अपितु एक अनंत महासागर है। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ पाञ्चरात्र मत को जोड़कर सात सिद्धान्तों की श्रृंखला पूर्ण करते हैं। ये सात मत—हिरण्यगर्भ, कपिल, अपान्तरतमा, सनत्कुमार, ब्रह्मनिष्ठ, पाशुपत और पाञ्चरात्र—सत्य के सात अलग-अलग द्वार हैं, किन्तु वे सभी एक ही केंद्र 'ओंकार' पर मिलते हैं।
श्लोक में कहा गया है कि यह प्रणव 'तिरसठ भेदों' में भिन्न है। साधक को यहाँ यह समझना चाहिए कि जब एक ही सत्य को अलग-अलग योग-मार्गों, अलग-अलग मानसिक अवस्थाओं और अलग-अलग मन्त्र-प्रयोगों से देखा जाता है, तो वह अनेक रूपों में प्रतीत होता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक ही सूर्य आकाश में एक है, किन्तु जल की अनेक बूंदों में वह अनेक सूर्यों के रूप में प्रतिबिम्बित होता है। ये ६३ भेद वास्तव में साधक की चेतना के स्तर और उसकी दृष्टि की सूक्ष्मता के भेद हैं।
आगे ऋषि कहते हैं कि 'एक-एक फिर नौ प्रकार का है'। यह संकेत है कि साधना जैसे-जैसे गहन होती है, विश्लेषण और भी सूक्ष्म होता जाता है। जो भेद स्थूल स्तर पर एक प्रतीत होता है, वह सूक्ष्म स्तर पर नौ आयामों में खुलता है। यह विस्तार यह दर्शाता है कि ओंकार की महिमा और उसकी कार्यविधि इतनी व्यापक है कि उसे किसी एक परिभाषा या एक मत में नहीं बांधा जा सकता। वह एक होते हुए भी अनंत है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विविधता में एकता' के अनुभव की ओर ले जाता है। जब साधक ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह प्रारंभ में उसे केवल एक ध्वनि (अक्षर) के रूप में सुनता है। किन्तु जैसे-जैसे उसकी एकाग्रता बढ़ती है, उसे उस एक ध्वनि के भीतर अनेक स्पंदन, अनेक अर्थ और अनेक शक्तियाँ अनुभव होने लगती हैं।
यहाँ ६३ और ९ की संख्याएँ केवल गणितीय गणना नहीं हैं, बल्कि वे साधक की 'अनुभूति की गहराई' को दर्शाती हैं। एक साधक के लिए ओंकार केवल शांति का प्रतीक हो सकता है, दूसरे के लिए वह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का बीज, और तीसरे के लिए वह स्वयं का शुद्ध स्वरूप। ये सभी 'भेद' हैं, किन्तु ये भेद सत्य को विभाजित नहीं करते, बल्कि उसे समृद्ध करते हैं।
साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि उसे किसी एक मत या एक विधि से चिपके रहकर अन्य मार्गों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। वह अनुभव करता है कि चाहे वह पाशुपत मार्ग से चले या पाञ्चरात्र से, अंततः उसे उसी एक एकाक्षर ब्रह्म में विलीन होना है। यह अभ्यास साधक को 'सीमित' से 'असीम' की ओर ले जाता है, जहाँ वह यह जान जाता है कि समस्त मन्त्र, समस्त मत और समस्त योग-विधियाँ वास्तव में ओंकार के ही विभिन्न विस्तार हैं।
हिरण्यगर्भाणां मतम्
त्रिमात्रं चैव त्रिब्रह्म त्र्यक्षरं प्रणवं प्रभुम् ।
हिरण्यगर्भा इच्छन्ति योगसाधननिश्चितम् (...नमुत्तमम्) ॥ २.६९ ॥
हिरण्यगर्भ-मतवाले प्रणव प्रभुको त्रिमात्र, त्रिब्रह्म, त्र्यक्षर और योगका निश्चित साधन मानते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में ऋषि याज्ञवल्क्य ने उन सात महान सिद्धान्तों और ब्रह्मवादियों का उल्लेख किया जिन्होंने प्रणव को योग-साधन के रूप में ग्रहण किया है। अब यहाँ से उन विशिष्ट मतों का विवरण आरम्भ होता है, जिसमें सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ-मत के अनुसार प्रणव के स्वरूप और उसकी साधना-शक्ति का उद्घाटन किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: हिरण्यगर्भा (मतवन्तः) प्रणवं प्रभुम् त्रिमात्रं चैव त्रिब्रह्म त्र्यक्षरं (इति) इच्छन्ति, (यः) योगसाधननिश्चितम् (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• हिरण्यगर्भा: यहाँ 'हिरण्यगर्भा' शब्द उन ऋषियों या उस सम्प्रदाय के लिए प्रयुक्त है जो हिरण्यगर्भ के मत का अनुसरण करते हैं। हिरण्यगर्भ सृष्टि के आदि-पुरुष और योग के प्राचीनतम वक्ता माने जाते हैं।
• त्रिमात्रं: तीन मात्राओं वाला। 'मात्र' का अर्थ है वह सूक्ष्म अंश या आयाम जिसके द्वारा ब्रह्म स्वयं को अभिव्यक्त करता है।
• त्रिब्रह्म: तीन ब्रह्म स्वरूपों का समुच्चय। यहाँ ब्रह्म का अर्थ केवल परमात्मा नहीं, अपितु वह सर्वोच्च सत्ता है जो तीन भिन्न अवस्थाओं या शक्तियों में प्रतिष्ठित है।
• त्र्यक्षरं: तीन अक्षरों वाला (अ, उ, म)।
• प्रभुम्: स्वामी, अधिपति या वह शक्ति जो समस्त सृष्टि को नियंत्रित करती है। प्रणव को 'प्रभु' कहना यह दर्शाता है कि वह केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु साक्षात् ईश्वर का ध्वनि-रूप है।
• योगसाधननिश्चितम्: योग के लिए निश्चित साधन। 'निश्चित' का अर्थ है कि यह वह मार्ग है जिसमें कोई संशय नहीं है; यह सिद्ध और अचूक साधन है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्रणव (ॐ) के उस स्वरूप को उद्घाटित करता है जिसे हिरण्यगर्भ-मत के अनुयायी स्वीकार करते हैं। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि प्रणव केवल एक उपासना का विषय नहीं है, अपितु वह 'प्रभु' है—अर्थात् वह समस्त ब्रह्माण्ड का अधिपति और संचालक है।
हिरण्यगर्भ-मत के अनुसार, इस प्रभु-प्रणव के तीन मुख्य आयाम हैं: वह त्रिमात्र है, त्रिब्रह्म है और त्र्यक्षर है। इन तीनों शब्दों का प्रयोग एक ही सत्य को तीन भिन्न स्तरों पर देखने के लिए किया गया है। 'त्र्यक्षर' उसका स्थूल या वाचिक स्वरूप है (अ, उ, म), 'त्रिमात्र' उसका सूक्ष्म या प्राणिक स्वरूप है, और 'त्रिब्रह्म' उसका कारण या आध्यात्मिक स्वरूप है।
जब ऋषि इसे 'योगसाधननिश्चितम्' कहते हैं, तो उनका भाव यह है कि योग की यात्रा में जब साधक स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है, तब उसे किसी अन्य जटिल विधि की आवश्यकता नहीं रहती; प्रणव का यह त्रिगुण स्वरूप ही उसे पूर्णता तक ले जाने के लिए पर्याप्त और निश्चित है। यह स्मृति यहाँ उस रहस्य को खोल रही है जो शुक्लयजुर्वेद की श्रुति में बीजरूप में है—कि ध्वनि ही ब्रह्म है और उस ध्वनि का विश्लेषण ही योग है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥
राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।
महाभारत के इस अंश में स्पष्ट कहा गया है कि "हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः" अर्थात् योग के वक्ता हिरण्यगर्भ हैं और उनसे प्राचीन कोई अन्य नहीं है। यह साक्ष्य बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक की पुष्टि करता है कि जब प्रणव को 'योगसाधन' कहा जा रहा है, तो उसका आधार वही प्राचीनतम योग-परम्परा है जिसके प्रवर्तक हिरण्यगर्भ थे। स्मृति और महाभारत दोनों यहाँ इस बात पर सहमत हैं कि योग का मूल प्रणव में है और हिरण्यगर्भ उस विद्या के आदि-द्रष्टा हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'त्रि-अवस्था' के समन्वय का है। हिरण्यगर्भ-मत के अनुसार साधक जब प्रणव का जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु तीन स्तरों पर अपनी चेतना को विस्तृत करता है:
१. त्र्यक्षर अभ्यास: सर्वप्रथम साधक 'अ', 'उ' और 'म' के उच्चारण के माध्यम से अपनी वाणी और मन को एकाग्र करता है। यह बाहरी शुद्धि और एकाग्रता की भूमि है।
२. त्रिमात्र अनुभव: इसके पश्चात साधक ध्वनि के पीछे छिपे 'मात्रों' (सूक्ष्म स्पंदनों) को अनुभव करता है। यहाँ अभ्यास केवल कंठ तक सीमित नहीं रहता, अपितु प्राणों के साथ जुड़ जाता है।
३. त्रिब्रह्म साक्षात्कार: अंततः साधक उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ वह स्वयं को और इस ध्वनि को 'ब्रह्म' के रूप में अनुभव करता है। यहाँ वह ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के भेद से ऊपर उठकर 'प्रभु' (परम सत्ता) में विलीन होने का अनुभव करता है।
इस प्रकार, यह श्लोक साधक को वाचिक जप से ऊपर उठाकर अनुभवजन्य योग की ओर ले जाता है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जिस प्रभु की वह बाहर खोज कर रहा था, वह प्रभु 'ॐ' के रूप में उसके भीतर ही त्रिमात्र और त्र्यक्षर रूप में प्रतिष्ठित है।
अग्निर्वायुस्तथादित्यस्तिस्रो मात्राः प्रकीर्तिताः ।
ऋग्यजुश्च तथा साम त्रिब्रह्मेति प्रकीर्तितम् ॥ २.७० ॥
अग्नि, वायु और आदित्य — (ये) तीन मात्राएँ कही गयी हैं; ऋक्, यजुः और साम — (यह) त्रिब्रह्म कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में हिरण्यगर्भ-मत के अनुसार प्रणव को त्रिमात्र, त्रिब्रह्म और त्र्यक्षर कहकर उसे योग का निश्चित साधन बताया गया था। वर्तमान श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य उन तीन मात्राओं और त्रिब्रह्म के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं कि वे कौन से देवता और कौन से वेद हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अग्निः, वायुः तथा आदित्यः (इति) तिस्रो मात्राः प्रकीर्तिताः । ऋग् (वेदः), यजुः च तथा साम (वेदः) त्रिब्रह्म (इति) प्रकीर्तितम् ।
पदार्थ और निर्वचन:
• अग्नि, वायु, आदित्य: ये तीन ब्रह्माण्डीय और देहिक देवता हैं। अग्नि ऊर्जा और रूपांतरण का प्रतीक है, वायु प्राण और गति का, तथा आदित्य प्रकाश और चैतन्य का।
• मात्राः: यहाँ मात्रा का अर्थ केवल ध्वनि की इकाई नहीं, अपितु 'मापन' या 'विस्तार' है। ब्रह्म जब अभिव्यक्त होता है, तो वह इन तीन शक्तियों के रूप में प्रकट होता है।
• ऋग्, यजुः, साम: तीन वेदों के नाम। ऋक् ज्ञान और दर्शन का, यजुः कर्म और विधि का, तथा साम उपासना और आनंद का प्रतिनिधित्व करते हैं।
• त्रिब्रह्म: तीन वेदों का सम्मिलित स्वरूप। यहाँ 'ब्रह्म' शब्द का प्रयोग वेदों के लिए हुआ है क्योंकि वेद ही ब्रह्म के साक्षात् वाक्-स्वरूप हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में हिरण्यगर्भ-मत का सार दिया गया है। ऋषि याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि प्रणव की तीन मात्राएँ केवल व्याकरणिक अक्षर नहीं हैं, अपितु वे तीन विराट शक्तियों के प्रतीक हैं—अग्नि, वायु और आदित्य।
बाहरी दृष्टि से देखें तो अग्नि पृथ्वी की अधिपति है, वायु अन्तरिक्ष की और आदित्य द्युलोक के। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में इन तीनों लोकों की शक्तियों को जाग्रत करता है। परन्तु इसका आन्तर अर्थ और भी सूक्ष्म है। अग्नि यहाँ 'जठराग्नि' और 'ज्ञानग्नि' है, वायु 'प्राण' है और आदित्य 'हृदय-सूर्य' है। इस प्रकार ओंकार का उच्चारण साधक के भीतर की भौतिक, प्राणिक और चैतन्य ऊर्जाओं का एकीकरण करता है।
इसी प्रकार, इन तीन मात्राओं का सम्बन्ध तीन वेदों से है, जिन्हें यहाँ 'त्रिब्रह्म' कहा गया है। ऋक् वेद का सम्बन्ध अग्नि से है, यजुः का वायु से और साम का आदित्य से। यह केवल संयोग नहीं, अपितु एक दिव्य व्यवस्था है। ऋक् (ज्ञान) अग्नि की भाँति प्रकाश फैलाता है, यजुः (कर्म) वायु की भाँति सर्वत्र व्याप्त होकर क्रिया करता है, और साम (भक्ति/आनंद) आदित्य की भाँति हृदय को आलोकित करता है। अतः जब कोई साधक 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह अनजाने में ही ऋक्, यजुः और साम—तीनों वेदों के मर्म को अपने भीतर गुँजाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस मत की पुष्टि छान्दोग्य उपनिषद् में मिलती है:
स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत्तासां तप्यमानानां रसान्प्रावृहदग्नेरृचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ ४.१७.२ ॥
उसने इन तीन देवताओंको तपाया; तपते हुए उनके रस निकाले — अग्निसे ऋचाएँ, वायुसे यजुः, आदित्यसे साम।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि अग्नि से ऋचाएँ (ऋक्), वायु से यजुः और आदित्य से साम रस निकाले गए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी उपनिषद् के रहस्य को स्मृति-रूप में प्रस्तुत कर रही है। जहाँ उपनिषद् इसे देवताओं के तप और रस के रूप में बताता है, वहीं यह स्मृति इसे 'मात्रा' और 'त्रिब्रह्म' कहकर योग-साधना के लिए सुलभ बना देती है। यह सिद्ध करता है कि प्रणव का जप वास्तव में त्रिवेद-विद्या का संक्षिप्त और तीव्रतम प्रयोग है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाली एक सीढ़ी है। साधक जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह तीन स्तरों पर अनुभव करता है:
१. अग्नि-स्तर (प्रथम मात्रा): यहाँ साधक अपनी देह की जड़ता को अग्नि के समान तपाकर शुद्ध करता है। यह ज्ञान की वह अवस्था है जहाँ अविद्या का दहन होता है।
२. वायु-स्तर (द्वितीय मात्रा): यहाँ साधक अपने प्राणों को संतुलित करता है। वायु का अर्थ है प्राण का विस्तार। जब जप के साथ प्राण का लय होता है, तब साधक कर्म-बंधन से मुक्त होकर 'यजुः' की शक्ति को प्राप्त करता है।
३. आदित्य-स्तर (तृतीय मात्रा): यह सर्वोच्च अवस्था है। यहाँ साधक का चित्त हृदय-सूर्य में स्थित होकर पूर्ण प्रकाशमय हो जाता है। यह 'साम' की अवस्था है—परम आनंद और लय।
साधक इस अभ्यास से 'त्रिब्रह्म' की स्थिति में पहुँचता है, जहाँ ज्ञान (ऋक्), कर्म (यजुः) और उपासना (साम) अलग-अलग न रहकर एक ही ओंकार में विलीन हो जाते हैं। यह वह भूमि है जहाँ साधक अपनी व्यक्तिगत चेतना को विराट ब्रह्माण्डीय चेतना (हिरण्यगर्भ) के साथ एकाकार करता है।
अकारश्चाप्युकारश्च मकारश्चाक्षरत्रयम् ।
ओंकारः परमं धाम ओंकारः परमा गतिः ॥ २.७१ ॥
अकार, उकार और मकार — ये तीन अक्षर हैं; ओंकार परम धाम है, ओंकार ही परम गति है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में हिरण्यगर्भ-मत के अनुसार प्रणव की तीन मात्राओं (अग्नि, वायु, आदित्य) और त्रिब्रह्म (ऋक्, यजुः, साम) का विवरण दिया गया था। वर्तमान श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य उन मात्राओं के अक्षर-रूप को स्पष्ट करते हुए ओंकार के परम लक्ष्य और उसकी गंतव्य-स्थिति का उद्घाटन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अकारः च अपि उकारः च मकारः च (इति) अक्षरत्रयम् । ओंकारः परमं धाम (अस्ति), ओंकारः परमा गतिः (अस्ति) ।
पदार्थ और निर्वचन:
• अकार, उकार, मकार: ये प्रणव के तीन घटक अक्षर हैं। 'अ' प्रथम ध्वनि है जो सृष्टि के आरम्भ का प्रतीक है, 'उ' मध्य ध्वनि है जो स्थिति और संरक्षण का प्रतीक है, और 'म' अंतिम ध्वनि है जो लय और पूर्णता का प्रतीक है।
• अक्षरत्रयम्: तीन अक्षरों का समूह। यहाँ 'अक्षर' का अर्थ केवल वर्ण नहीं, अपितु 'अक्षय' (जो नष्ट न हो) भी है।
• परमं धाम: 'धाम' का अर्थ है निवास-स्थान, प्रकाश-पुंज या वह आधार जहाँ चेतना प्रतिष्ठित होती है। 'परम' का अर्थ है जिससे श्रेष्ठ और कुछ नहीं। अतः ओंकार वह सर्वोच्च आश्रय है जहाँ साधक की वृत्ति स्थिर होती है।
• परमा गतिः: 'गति' का अर्थ है गमन, लक्ष्य या मोक्ष। वह अंतिम अवस्था जहाँ पहुँचकर साधक का व्यक्तिगत अस्तित्व ब्रह्म में विलीन हो जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी प्रणव के स्थूल स्वरूप से उसके सूक्ष्म लक्ष्य की ओर ले जा रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने बताया कि अग्नि, वायु और आदित्य ही मात्राएँ हैं; यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि उन शक्तियों के वाक्-प्रतीक 'अ', 'उ' और 'म' हैं।
अकार वह बीज है जिसमें समस्त सृष्टि सुप्त है, उकार वह विस्तार है जिसमें सृष्टि प्रस्फुटित होती है, और मकार वह संकोच है जिसमें सब कुछ पुनः अपने मूल में समाहित हो जाता है। जब ये तीनों अक्षर एक साथ 'ओंकार' के रूप में गूँजते हैं, तब वे केवल ध्वनि नहीं रहते, अपितु उस 'अक्षर' (अविनाशी) तत्व का साक्षात्कार करा देते हैं जो समय और स्थान से परे है।
ऋषि कहते हैं— "ओंकारः परमं धाम ओंकारः परमा गतिः"। यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य है। सामान्यतः 'धाम' वह स्थान है जहाँ हम रहते हैं (निवास) और 'गति' वह स्थान है जहाँ हम जाते हैं (लक्ष्य)। किंतु योगी के लिए ओंकार में ये दोनों एक हो जाते हैं। जब साधक ओंकार को अपना 'धाम' बना लेता है, तो उसे कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं रहती; उसका निवास ही उसकी मुक्ति बन जाता है। जब वह ओंकार को अपनी 'गति' मानता है, तो वह संसार के भटकाव से मुक्त होकर उस परम चैतन्य में विलीन हो जाता है।
यह वचन इस सत्य को उद्घाटित करता है कि साधन (ओंकार) और साध्य (परब्रह्म) में कोई भेद नहीं है। जो ओंकार का आश्रय लेता है, वह उसी क्षण परम गति को प्राप्त कर लेता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अभिधाय' (नाम) से 'अभिप्राय' (तत्व) की ओर ले जाने वाला है। अभ्यास की दृष्टि से साधक यहाँ तीन सोपानों से गुजरता है:
१. अक्षर-अभ्यास: सर्वप्रथम साधक 'अ', 'उ' और 'म' के पृथक उच्चारण और उनके विस्तार का अनुभव करता है। वह देखता है कि कैसे ध्वनि का जन्म होता है, वह कैसे विकसित होती है और कैसे मौन में विलीन होती है।
२. धाम-अनुभव: जब साधक ओंकार के जप में लीन होता है, तो वह अनुभव करता है कि उसका मन अब बाहरी विषयों में नहीं, बल्कि ओंकार की ध्वनि में स्थित है। यह 'परम धाम' का अनुभव है—जहाँ मन को पूर्ण शांति और स्थिरता प्राप्त होती है। यहाँ साधक 'स्थिरता' का अभ्यास करता है।
३. गति-सिद्धि: जप के अंत में जब ध्वनि समाप्त होती है और केवल एक गहरा मौन शेष रहता है, तब साधक उस 'परम गति' का अनुभव करता है। यह वह स्थिति है जहाँ 'मैं' का भाव मिट जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।
इस प्रकार, साधक इस श्लोक के माध्यम से 'ध्वनि' से 'निवास' और 'निवास' से 'मुक्ति' की भूमि तक जाता है। उसके लिए ओंकार अब केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि वह द्वार बन जाता है जिससे वह अपनी सीमित चेतना को असीमित ब्रह्म में परिवर्तित कर देता है।
कापिलमतम्
ओंकारं विन्दते यस्तु तस्य जन्म न विद्यते ।
त्रिप्रज्ञं च त्रिगुणं त्रिकारणमिति कापिलाः ॥ २.७२ ॥
…जो 'ओंकार' को प्राप्त कर लेता है, उसका जन्म नहीं होता; कापिलाः (सांख्य मत वाले) उसे त्रिप्रज्ञ, त्रिगुण और त्रिकारण कहते हैं…
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में हिरण्यगर्भ-मत के अनुसार प्रणव की मात्राओं, त्रिब्रह्म और उसके अक्षर-रूप (अ, उ, म) का वर्णन करते हुए उसे 'परम धाम' और 'परम गति' बताया गया। अब ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार के स्वरूप को समझने के लिए दूसरे महान सिद्धान्त 'कपिल-मत' (सांख्य दृष्टि) की ओर संकेत कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यः (साधकः) ओंकारं विन्दते, तस्य जन्म न विद्यते । कापिलाः (वदन्ति यत्) (ओंकारः) त्रिप्रज्ञं च, त्रिगुणं (च), त्रिकारणम् (इति) (अस्ति) ।
पदार्थ और निर्वचन:
• विन्दते: 'विद्' धातु से, जिसका अर्थ है जानना, प्राप्त करना या अनुभव करना। यहाँ केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु साक्षात्कार का बोध है।
• जन्म न विद्यते: जन्म का अभाव। इसका अर्थ भौतिक मृत्यु के बाद पुनर्जन्म का न होना है, क्योंकि जन्म अविद्या और कर्म के बंधन से होता है।
• कापिलाः: महर्षि कपिल के अनुयायी या सांख्य दर्शन के प्रणेता।
• त्रिप्रज्ञ: तीन प्रकार की प्रज्ञा (चेतना के स्तर) का समुच्चय।
• त्रिगुण: सत्व, रज और तम—प्रकृति के तीन मूलभूत गुण।
• त्रिकारण: सृष्टि के निर्माण के तीन मूल कारण।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी पहले ओंकार की सिद्धि का फल बताते हैं और फिर सांख्य-मत के अनुसार उसकी परिभाषा देते हैं।
प्रथम पंक्ति का भाव यह है कि जो साधक ओंकार के वास्तविक स्वरूप को 'विन्दते' अर्थात् जान लेता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। जन्म का कारण 'अस्मृति' और 'अविद्या' है। जब साधक प्रणव के माध्यम से उस अक्षर-ब्रह्म में स्थित हो जाता है, तो उसकी व्यक्तिगत सीमित पहचान (अहंकार) समाप्त हो जाती है। जहाँ 'मैं' का अभाव है, वहाँ जन्म लेने वाला कोई शेष नहीं रहता; अतः उसका पुनः जन्म नहीं होता।
द्वितीय पंक्ति में याज्ञवल्क्य जी कपिल-मत का उल्लेख करते हैं। सांख्य दर्शन सृष्टि की व्याख्या प्रकृति और पुरुष के माध्यम से करता है। यहाँ ओंकार को 'त्रिप्रज्ञ', 'त्रिगुण' और 'त्रिकारण' कहा गया है। इसका रहस्य यह है कि ओंकार केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु वह संपूर्ण सृष्टि का बीज है।
'त्रिगुण' का अर्थ है कि ओंकार में सत्व, रज और तम तीनों गुणों का समावेश है, किंतु वह स्वयं इन गुणों से ऊपर (निर्गुण) भी है। 'त्रिकारण' के रूप में वह निमित्त, उपादान और कुशल कारण के रूप में कार्य करता है। 'त्रिप्रज्ञ' का अर्थ है कि वह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों प्रज्ञों का आधार है और इन तीनों से परे 'तुरीय' अवस्था का द्वार है। इस प्रकार, सांख्य की दृष्टि में ओंकार वह सेतु है जो व्यक्त और अव्यक्त को जोड़ता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥
राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।
महाभारत के इस अंश में स्पष्ट किया गया है कि सांख्य के वक्ता परमर्षि कपिल हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ इसी परंपरा का समर्थन करती है। जहाँ हिरण्यगर्भ-मत ओंकार को 'योग-साधन' के रूप में देखता है, वहीं कपिल-मत उसे 'सृष्टि-मीमांसा' के रूप में देखता है। दोनों मतों में मेल यह है कि ओंकार ही वह केंद्र है जहाँ पहुँचकर साधक प्रकृति के गुणों और प्रज्ञों के बंधन को काटकर मुक्त हो जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'विवेक' और 'लय' का है।
१. त्रिगुण का अभ्यास: साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके भीतर तम (जड़ता), रज (चंचलता) और सत्व (प्रकाश) विद्यमान हैं। वह इन तीनों गुणों को ओंकार की ध्वनि में विलीन करना सीखता है। जब गुण शांत होते हैं, तब 'त्रिगुण' से 'निर्गुण' की ओर गमन होता है।
२. त्रिप्रज्ञ का अनुभव: जप के दौरान साधक अपनी चेतना को जाग्रत (अकार), स्वप्न/मध्यस्थ (उकार) और सुषुप्ति/लय (मकार) के स्तरों से गुजारते हुए उस शून्य में ले जाता है जहाँ केवल शुद्ध ज्ञान शेष रहता है।
३. जन्म-मुक्ति का अनुभव: यहाँ 'जन्म न विद्यते' का योगिक अर्थ है—वृत्तियों का जन्म न होना। जब साधक ओंकार में स्थित होता है, तो मन में नए विचार या कामनाएँ (वृत्तियाँ) जन्म लेना बंद कर देती हैं। यह 'अज' (अजन्मा) स्थिति ही समाधि की वह भूमि है जहाँ साधक स्वयं को काल और देह से मुक्त अनुभव करता है।
व्यक्तोऽव्यक्तस्तथाज्ञश्च त्रिप्रज्ञ इति स स्मृतः ।
ओंकारस्त्रिगुणं सर्वं व्यञ्जनं निर्गुणं विदुः ॥ २.७३ ॥
व्यक्त, अव्यक्त और ज्ञ (ज्ञाता पुरुष) — इनसे वह त्रिप्रज्ञ कहा गया है; (वे) ओंकारको सब त्रिगुणको प्रकट करनेवाला और (स्वयं) निर्गुण जानते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि कपिल के अनुयायियों (सांख्य मत) के अनुसार ओंकार को 'त्रिप्रज्ञ', 'त्रिगुण' और 'त्रिकारण' बताया गया। वर्तमान श्लोक में याज्ञवल्क्य जी उन्हीं तीन प्रज्ञाओं के स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं और प्रणव के उस रहस्य को खोल रहे हैं जहाँ वह गुणों का व्यंजक होते हुए भी स्वयं निर्गुण है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: व्यक्तः, अव्यक्तः तथा ज्ञः (इति) त्रिप्रज्ञ इति सः (ओंकारः) स्मृतः । (साधकाः) ओंकारं सर्वं त्रिगुणं व्यञ्जनं (च), (परन्तु तं) निर्गुणं विदुः ।
पदार्थ और निर्वचन:
• व्यक्त: जो प्रकट है। सांख्य दृष्टि में वह सृष्टि जो पंचमहाभूतों और इंद्रियों के रूप में अभिव्यक्त है।
• अव्यक्त: जो अप्रकट है। वह मूल प्रकृति, जहाँ गुण साम्यावस्था में होते हैं और सृष्टि के बीज रूप में विद्यमान रहते हैं।
• ज्ञ: ज्ञाता पुरुष। वह शुद्ध चेतना जो दृष्टा है, जो न व्यक्त है और न अव्यक्त, अपितु इन दोनों का साक्षी है।
• त्रिप्रज्ञ: इन तीनों (व्यक्त, अव्यक्त और ज्ञ) के ज्ञान या चेतना के स्तरों का समुच्चय।
• त्रिगुणं सर्वं व्यञ्जनं: सत्व, रज और तम—इन तीनों गुणों को प्रकट करने वाला या अभिव्यक्त करने वाला।
• निर्गुणं विदुः: उसे (ओंकार को) गुणों से रहित (निर्गुण) जानते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी सांख्य दर्शन के माध्यम से प्रणव के त्रिआयामी स्वरूप को समझा रहे हैं। कपिल-मत के अनुसार, जब हम ओंकार को 'त्रिप्रज्ञ' कहते हैं, तो उसका अर्थ है कि प्रणव में पूरी सृष्टि की चेतना समाहित है।
प्रथम पंक्ति का भाव यह है कि ओंकार वह सेतु है जो 'व्यक्त' (जगत), 'अव्यक्त' (प्रकृति) और 'ज्ञ' (शुद्ध पुरुष) को एक सूत्र में पिरोता है। 'व्यक्त' वह है जिसे हम इंद्रियों से अनुभव करते हैं; 'अव्यक्त' वह कारण है जिससे यह व्यक्त जगत उत्पन्न हुआ; और 'ज्ञ' वह चैतन्य है जिसके प्रकाश में ये दोनों प्रकाशित होते हैं। साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं करता, अपितु वह व्यक्त से अव्यक्त की ओर और अव्यक्त से ज्ञ (साक्षी) की ओर यात्रा करता है।
दूसरी पंक्ति एक अत्यंत गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करती है। यहाँ कहा गया है कि ओंकार 'त्रिगुणं सर्वं व्यञ्जनं' है। इसका अर्थ है कि ओंकार सत्व, रज और तम—इन तीनों गुणों का व्यंजक है। जिस प्रकार एक दर्पण स्वयं रंगहीन होता है परंतु उसमें संसार के समस्त रंग प्रतिबिंबित होते हैं, उसी प्रकार ओंकार वह माध्यम है जिसके द्वारा प्रकृति के तीनों गुण अभिव्यक्त होते हैं। ओंकार के 'अ', 'उ' और 'म' में ही इन गुणों का खेल छिपा है।
परन्तु, इसी श्लोक के अंत में याज्ञवल्क्य जी स्पष्ट करते हैं कि 'निर्गुणं विदुः'—अर्थात् जो वास्तव में जानते हैं, वे ओंकार को निर्गुण ही पाते हैं। रहस्य यह है कि ओंकार गुणों को प्रकट तो करता है, किन्तु वह स्वयं उन गुणों के अधीन नहीं है। वह गुणों का स्वामी है, उनका कारण है, परन्तु स्वयं उनसे परे (अतीता) है। यह ठीक वैसा ही है जैसे सूर्य का प्रकाश सब कुछ प्रकाशित करता है, परन्तु सूर्य स्वयं उस प्रकाश के गुणों से अलग एक स्वतंत्र सत्ता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'साक्षी-भाव' का अभ्यास है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह तीन चरणों का अनुभव करता है:
१. व्यक्त का अनुभव: जप के आरम्भ में वह अपनी देह, श्वास और बाहरी ध्वनियों (व्यक्त) के प्रति सजग होता है।
२. अव्यक्त का अनुभव: जैसे-जैसे जप गहरा होता है, वह बाहरी जगत से हटकर उस शून्य या बीज-अवस्था (अव्यक्त) में प्रवेश करता है जहाँ विचार शांत होने लगते हैं।
३. ज्ञ का अनुभव: अंततः वह उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ वह केवल 'जानने वाला' (ज्ञ) रह जाता है।
अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि जिस प्रकार ओंकार गुणों को प्रकट करता है पर स्वयं निर्गुण है, उसी प्रकार मैं (साधक) इस शरीर और मन के गुणों (सत्व, रज, तम) को देख तो रहा हूँ, पर मैं स्वयं इन गुणों से भिन्न, निर्गुण और शुद्ध चैतन्य हूँ। इस प्रकार साधक 'गुण-माया' से ऊपर उठकर 'अक्षर-ब्रह्म' की भूमि की ओर अग्रसर होता है। वह समझ जाता है कि ओंकार केवल ध्वनि नहीं, बल्कि गुणों के पार ले जाने वाली वह शक्ति है जो उसे 'ज्ञ' (साक्षी पुरुष) में प्रतिष्ठित कर देती है।
अपान्तरतममतम्
त्रिमुखं च त्रिदैवत्यं त्रिप्रयोजनमेव च ।
अपान्तरतमैश्चैव ओंकारस्तु प्रकीर्तितः ॥ २.७४ ॥
…अपान्तरतममतवालों द्वारा 'ओंकार' को त्रिमुख, त्रिदैवत और त्रिप्रयोजन ही कहा गया है…
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में हिरण्यगर्भ और कपिल ऋषियों के मतों के अनुसार प्रणव के त्रिमात्र, त्रिब्रह्म और त्रिप्रज्ञ स्वरूप का विवेचन किया गया। अब याज्ञवल्क्य जी 'अपान्तरतमा' मत के अनुसार ओंकार की व्याख्या आरम्भ कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओंकारः अपान्तरतमैः (मतवद्भिः) च त्रिमुखं, त्रिदैवत्यं, त्रिप्रयोजनम् एव च प्रकीर्तितः ।
पदार्थ और निर्वचन:
• अपान्तरतमैः: 'अपान्तरतमा' एक विशिष्ट मत या परंपरा का नाम है। इसका शाब्दिक अर्थ है—जो सबसे अधिक भीतर (अन्तर) स्थित है। यह मत बाहरी कर्मों की अपेक्षा आन्तरिक सूक्ष्मता और वेदमूलक ज्ञान पर बल देता है।
• त्रिमुखं: तीन मुखों वाला। यहाँ 'मुख' का अर्थ केवल शारीरिक अंग नहीं, अपितु अभिव्यक्ति के तीन मार्गों या स्वरूपों से है।
• त्रिदैवत्यं: तीन देवताओं से सम्बद्ध या तीन देवताओं का स्वरूप।
• त्रिप्रयोजनम्: तीन मुख्य उद्देश्यों या लक्ष्यों की पूर्ति करने वाला।
• प्रकीर्तितः: प्रसिद्ध किया गया है या कहा गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ओंकार के उस स्वरूप को प्रस्तुत कर रहे हैं जिसे 'अपान्तरतमा' मत के अनुयायी स्वीकार करते हैं। यह मत साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक विशेष दृष्टि है।
यहाँ ओंकार को 'त्रिमुख', 'त्रिदैवत' और 'त्रिप्रयोजन' कहा गया है। इसका भाव यह है कि प्रणव केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु वह संपूर्ण अस्तित्व का सार है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक अक्षर का उच्चारण नहीं करता, बल्कि उन तीन शक्तियों (मुख), तीन दिव्य स्वरूपों (दैवत) और तीन जीवन-लक्ष्यों (प्रयोजन) को अपने भीतर जागृत करता है, जो इस सृष्टि के संचालन और मोक्ष के आधार हैं।
यह श्लोक एक सूत्र की भाँति है। ऋषि ने यहाँ केवल शीर्षकों का उल्लेख किया है—त्रिमुख, त्रिदैवत और त्रिप्रयोजन। इन तीनों के विस्तृत अर्थ, उनके वास्तविक नाम और उनकी योगिक व्याख्या अगले दो श्लोकों (२.७५ और २.७६) में विस्तार से दी गई है। वर्तमान श्लोक का उद्देश्य साधक के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न करना है कि ओंकार किस प्रकार इन तीनों श्रेणियों को अपने भीतर समेटे हुए है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥
राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।
महाभारत के शान्तिपर्व में स्पष्ट किया गया है कि सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत जैसे विभिन्न ज्ञान वास्तव में एक ही सत्य के अलग-अलग नाम हैं। वहाँ विशेष रूप से उल्लेख है कि 'अपान्तरतमा' वेदाचार्य कहे जाते हैं।
इस साक्ष्य से यह स्पष्ट होता है कि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में जिस 'अपान्तरतमा' मत का वर्णन है, वह पूर्णतः वेदमूलक है। जहाँ कपिल मत (सांख्य) प्रकृति और पुरुष के विश्लेषण पर बल देता है, वहीं अपान्तरतमा मत वेदों के उस रहस्य को खोलता है जहाँ ओंकार के माध्यम से देवताओं और मानवीय प्रयोजनों का समन्वय होता है। स्मृति और महाभारत दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ये भिन्न-भिन्न मत वास्तव में एक ही परम सत्य तक पहुँचने के अलग-अलग मार्ग हैं।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'समन्वय' की भूमि पर लाता है। साधक जब तक ओंकार को केवल एक मंत्र मानता है, वह केवल 'वाचिक' स्तर पर रहता है। किन्तु जब वह उसे 'त्रिमुख', 'त्रिदैवत' और 'त्रिप्रयोजन' के रूप में देखना आरम्भ करता है, तब वह 'मानस' और 'विज्ञान' की भूमि की ओर बढ़ता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसके भीतर की चेतना (ओंकार) ही वह शक्ति है जो सृष्टि के सृजन, पालन और संहार (त्रिमुख) को नियंत्रित करती है; वही शक्ति तीन दिव्य ऊर्जाओं (त्रिदैवत) के रूप में स्थित है; और वही शक्ति उसके जीवन के तीन मूलभूत लक्ष्यों (त्रिप्रयोजन) को सिद्ध करने में सक्षम है। अभ्यास यह है कि जप के समय साधक यह भाव रखे कि ओंकार का प्रत्येक कंपन उसे इन तीन आयामों के सामंजस्य की ओर ले जा रहा है। यह श्लोक साधक को तैयारी कराता है कि वह अब ओंकार के उन विशिष्ट स्वरूपों का ध्यान करे जो अगले श्लोकों में प्रकट होंगे।
गार्हपत्यो दाक्षिणाग्निराहवनीयस्तृतीयकः ।
त्रिमुखः स तु विज्ञेयो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ २.७५ ॥
…गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और तीसरा आहवनीय अग्नि; उसे त्रिमुख जानना चाहिए, वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में अपान्तरतमा मत के अनुसार ओंकार को त्रिमुख, त्रिदैवत और त्रिप्रयोजन कहकर उसकी संक्षिप्त परिभाषा दी गई थी। वर्तमान श्लोक में याज्ञवल्क्य जी उन 'तीन मुखों' का विस्तार करते हुए उन्हें वैदिक अग्नियों और फिर त्रिदेवों के स्वरूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) गार्हपत्यः, दाक्षिणाग्निः, आहवनीयः (इति) तृतीयकः (अस्ति) । सः तु त्रिमुखः विज्ञेयः (यत्) ब्रह्म, विष्णु, महेश्वराः (सन्ति) ।
पदार्थ और निर्वचन:
• गार्हपत्य, दाक्षिणाग्नि, आहवनीय: ये वैदिक यज्ञ की तीन मुख्य अग्नियाँ हैं। गार्हपत्य गृहस्थ की अग्नि है, दाक्षिणाग्नि दक्षिण दिशा की (देवताओं को समर्पित), और आहवनीय वह अग्नि है जिसमें आहुतियाँ दी जाती हैं।
• तृतीयकः: तीन का समूह या तीन प्रकार का। यहाँ ओंकार के त्रिमात्र (अ, उ, म) को इन तीन अग्नियों के साथ जोड़ा गया है।
• त्रिमुखः: तीन मुखों वाला। 'मुख' का अर्थ है वह द्वार जिससे शक्ति प्रकट होती है।
• विज्ञेयः: विशेष ज्ञान द्वारा जाना जाने वाला (केवल बौद्धिक सूचना नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान)।
• ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वराः: सृष्टि के तीन मुख्य अधिष्ठाता—सृजन, पालन और संहार के अधिपति।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ओंकार के 'त्रिमुख' स्वरूप का रहस्य खोल रहे हैं। उन्होंने पहले इसे तीन अग्नियों—गार्हपत्य, दाक्षिणाग्नि और आहवनीय—से जोड़ा है। बाहरी दृष्टि से ये तीन अलग-अलग अग्निकुण्ड हैं जिनमें यज्ञ किया जाता है, किन्तु याज्ञवल्क्य जी की दृष्टि में ये ओंकार के ही तीन मुख हैं।
यहाँ रहस्य यह है कि जिस प्रकार यज्ञ में इन तीन अग्नियों के बिना आहुति पूर्ण नहीं होती, उसी प्रकार ओंकार के तीन मात्राओं (अ, उ, म) के बिना ब्रह्म-साधना पूर्ण नहीं होती। गार्हपत्य अग्नि 'अ' का प्रतीक है जो आधार है, दाक्षिणाग्नि 'उ' का प्रतीक है जो विस्तार और समर्पण है, और आहवनीय 'म' का प्रतीक है जहाँ सब कुछ विलीन होकर परमात्मा को प्राप्त होता है।
आगे ऋषि कहते हैं कि इन तीन अग्नियों के रूप में जो ओंकार है, उसे वास्तव में 'त्रिमुख' जानना चाहिए, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं। यहाँ अग्नि और देवता का भेद मिट जाता है। ब्रह्मा सृजन की अग्नि हैं, विष्णु पालन की और महेश्वर लय की। इस प्रकार, जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर उस त्रिशक्ति को जागृत करता है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन कर रही है। यह विधान स्पष्ट करता है कि बाहरी कर्मकाण्ड (अग्निहोत्र) वास्तव में आन्तरिक योग-साधना का ही स्थूल रूप है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म' को 'योग' में बदलने की विधि है। सामान्यतः अग्निहोत्र बाहर किया जाता है, किन्तु योगी इस श्लोक के माध्यम से 'अग्नि-योग' का अभ्यास करता है।
साधक जब ओंकार का जप करता है, तब वह अनुभव करता है कि उसका शरीर ही 'गार्हपत्य' (आधार), उसका प्राण 'दाक्षिणाग्नि' (गति) और उसका मन 'आहवनीय' (समर्पण) है। वह अपनी समस्त वृत्तियों को ओंकार की अग्नि में आहुत कर देता है। इस अभ्यास से साधक 'स्थूल अग्नि' से ऊपर उठकर 'दिव्य ज्योति' की भूमि में प्रवेश करता है।
यहाँ 'त्रिमुख' का अनुभव यह है कि साधक अपनी चेतना को तीन स्तरों पर ले जाता है: पहले सृजन (ब्रह्मा) की शक्ति से स्वयं को शुद्ध करता है, फिर पालन (विष्णु) की शक्ति से स्थिर होता है, और अंत में लय (महेश्वर) की शक्ति से अहंकार का विसर्जन कर 'अमात्र' ओंकार में लीन हो जाता है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को क्रिया-योग से ज्ञान-योग की ओर ले जाने वाला सेतु है, जहाँ हवन केवल सामग्री का नहीं, अपितु स्वयं के अस्तित्व का ओंकार में विसर्जन है।
एतत् त्रिदैवतं ज्ञेयं धर्मश्चैवार्थ एव च ।
कामेन सहितौ ह्येतौ त्रयं प्रोक्तं प्रयोजनम् ॥ २.७६ ॥
…यह त्रिदैवत जानना चाहिए; धर्म और अर्थ तथा काम सहित ये तीनों प्रयोजन कहे गए हैं…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में अपान्तरतमा मत के अनुसार ओंकार के त्रिमुख, त्रिदैवत और त्रिप्रयोजन स्वरूप का उल्लेख किया गया था, जिसमें 'त्रिमुख' का अर्थ वैदिक अग्नियों और त्रिदेवों से स्पष्ट किया गया। वर्तमान श्लोक उसी श्रृंखला को पूर्ण करते हुए 'त्रिदैवत' और 'त्रिप्रयोजन' के रहस्य को खोल रहा है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) एतत् त्रिदैवतं ज्ञेयम्, (तथा) धर्मः च एव अर्थ एव च (ज्ञेयम्) । ह्येतौ (धर्म-अर्थौ) कामेन सहितौ, (तस्मात्) त्रयं प्रोक्तं प्रयोजनम् ।
पदार्थ और निर्वचन:
• त्रिदैवतं: तीन देवताओं का समूह। यहाँ यह संकेत है कि ओंकार के तीन मात्र (अ, उ, म) केवल ध्वनियाँ नहीं, अपितु तीन दैवीय शक्तियों के अधिष्ठान हैं।
• धर्म, अर्थ, काम: ये जीवन के तीन मुख्य पुरुषार्थ हैं। धर्म (नैतिक और आध्यात्मिक नियम), अर्थ (साधन और समृद्धि), और काम (इच्छा और आनंद)।
• सहितौ: साथ में या सम्मिलित। यहाँ यह दर्शाया गया है कि धर्म और अर्थ जब काम (इच्छाशक्ति) के साथ मिलते हैं, तब वे जीवन के प्रयोजन बनते हैं।
• प्रयोजनम्: वह लक्ष्य जिसके लिए क्रिया की जाती है। ओंकार को 'त्रिप्रयोजन' कहना यह सिद्ध करता है कि समस्त मानवीय और दैवीय क्रियाओं का मूल बीज प्रणव में ही निहित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं जो साधक के व्यावहारिक जीवन और उसके लक्ष्य से जुड़ा है। पिछले श्लोक में उन्होंने ओंकार को 'त्रिमुख' कहकर उसे अग्नि और त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर) से जोड़ा था; अब वे उसे 'त्रिदैवत' और 'त्रिप्रयोजन' कह रहे हैं।
भाव यह है कि ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु संपूर्ण अस्तित्व का मानचित्र है। जब याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि "यह त्रिदैवत जानना चाहिए", तो उनका संकेत है कि ओंकार के तीन मात्र—अ, उ और म—सृष्टि के तीन मूलभूत कार्यों (उत्पत्ति, स्थिति और लय) के अधिष्ठाता देवताओं के प्रतीक हैं। जिस प्रकार बाहरी यज्ञ में तीन अग्नियाँ अनिवार्य हैं, उसी प्रकार जीवन के आंतरिक यज्ञ में इन तीन दैवीय शक्तियों का संतुलन आवश्यक है।
इसके पश्चात, ऋषि इस सूक्ष्म सत्य को स्थूल जीवन के लक्ष्यों से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि धर्म, अर्थ और काम—ये तीनों प्रयोजन ओंकार के ही विस्तार हैं। सामान्यतः लोग धर्म, अर्थ और काम को अलग-अलग मानते हैं, किन्तु योगी की दृष्टि में ये तीनों ओंकार के तीन मात्रों की ही अभिव्यक्ति हैं। 'अ' से धर्म (अस्तित्व का आधार), 'उ' से अर्थ (विकास और पोषण), और 'म' से काम (पूर्णता और लय) का संकेत मिलता है।
यहाँ "कामेन सहितौ" वाक्यांश अत्यंत महत्वपूर्ण है। रहस्य यह है कि बिना 'काम' (इच्छाशक्ति या संकल्प) के न तो धर्म की स्थापना संभव है और न ही अर्थ का अर्जन। जब धर्म और अर्थ, काम के साथ संतुलित रूप से मिलते हैं, तब वे जीवन के सार्थक प्रयोजन बन जाते हैं। इस प्रकार, ओंकार का जप करते हुए साधक वास्तव में अपने जीवन के इन तीनों पुरुषार्थों को शुद्ध कर उन्हें परमात्मा में विलीन करने का अभ्यास करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'संसार' और 'कैवल्य' के बीच की कड़ी है। योगी जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह केवल ध्वनि का जप नहीं करता, बल्कि अपने भीतर के 'त्रिप्रयोजन' को व्यवस्थित करता है।
अभ्यास यह है कि साधक अनुभव करे कि उसका धर्म (कर्तव्य), उसका अर्थ (साधन) और उसकी कामनाएँ (काम)—ये तीनों पृथक नहीं हैं, बल्कि ओंकार के तीन मात्रों की तरह एक ही सत्ता के विभिन्न रूप हैं। जब साधक 'अ', 'उ' और 'म' के माध्यम से इन तीनों को संतुलित कर लेता है, तब वह इस द्वंद्व से मुक्त हो जाता है कि उसे संसार चुनना है या अध्यात्म।
यहाँ एक गूढ़ संकेत यह भी है कि यदि ओंकार 'त्रिप्रयोजन' (धर्म-अर्थ-काम) है, तो संभवतः इससे परे जो 'अमात्र' या 'तुरीय' अवस्था है, वही चतुर्थ पुरुषार्थ 'मोक्ष' है। साधक जब इन तीनों मात्रों के प्रयोजनों को पूर्ण कर लेता है या उनमें स्थित हो जाता है, तब वह स्वाभाविक रूप से उस बिंदु पर पहुँच जाता है जहाँ प्रयोजन समाप्त हो जाते हैं और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को स्थूल पुरुषार्थों से उठाकर सूक्ष्म ब्रह्म-अवस्था की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
भूर्भुवःस्वरिति चैव चतुर्विंशाक्षरा तथा ।
गायत्री चतुरो वेदा ओंकारः सर्वमेव तु ॥ २.७७ ॥
…'भूः भुवः स्वः' इति तथा चौबीस अक्षरों वाली गायत्री और चारों वेद — यह सब ओंकार ही है…
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में अपान्तरतम मत के अनुसार ओंकार के त्रिमुख, त्रिदैवत और त्रिप्रयोजन स्वरूप का विवेचन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार की व्यापकता को सिद्ध करते हुए उसे केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु समस्त वैदिक वाङ्मय और मन्त्र-शक्ति का मूल स्रोत बता रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: भूर्भुवः स्वरिति (व्याहृतयः) च एव, (तथा) चतुर्विंशाक्षरा (गायत्री) तथा (च), चतुरो वेदा (च), सर्वमेव तु ओंकारः (अस्ति) ।
पदार्थ और निर्वचन:
• भूर्भुवः स्वः: ये तीन व्याहृतियाँ हैं। 'भूः' पृथ्वी (अस्तित्व), 'भुवः' अन्तरिक्ष (विस्तार) और 'स्वः' द्युलोक (आनन्द/प्रकाश) के प्रतीक हैं।
• चतुर्विंशाक्षरा: चौबीस अक्षरों वाली गायत्री। यह ऋग्वेद की वह ऋचा है जिसे समस्त वेदों का सार माना गया है।
• चतुरो वेदा: ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद। यहाँ वेदों का अर्थ केवल ग्रन्थों से नहीं, अपितु उस ज्ञान-धारा से है जो सृष्टि के रहस्यों को उद्घाटित करती है।
• सर्वमेव तु ओंकारः: यह सब वास्तव में ओंकार ही है। 'तु' का प्रयोग यहाँ इस रहस्य पर बल देने के लिए है कि जो भिन्न-भिन्न प्रतीत हो रहा है, वह वास्तव में एक ही तत्व का विस्तार है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गूढ़ सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं कि संपूर्ण वैदिक विद्या का बीज 'ओंकार' है। साधक जब बाहरी विधियों में संलग्न होता है, तो उसे व्याहृतियाँ, गायत्री और चारों वेद अलग-अलग प्रतीत होते हैं, किन्तु मन्त्र-विज्ञान की दृष्टि से ये सब प्रणव के ही विभिन्न आयाम हैं।
प्रथम, 'भूः भुवः स्वः' ये तीन व्याहृतियाँ ओंकार की तीन मात्राओं (अ, उ, म) का ही विस्तार हैं। जिस प्रकार 'अ' से सृष्टि का आरम्भ, 'उ' से उसका पोषण और 'म' से उसका लय होता है, उसी प्रकार ये व्याहृतियाँ साधक को स्थूल जगत (भूः) से उठाकर सूक्ष्म जगत (भुवः) और फिर कारण-जगत या प्रकाश-पुंज (स्वः) में प्रतिष्ठित करती हैं।
द्वितीय, चौबीस अक्षरों वाली गायत्री को ओंकार कहना यह दर्शाता है कि गायत्री का जो 'भर्ग' रूप है, वह वास्तव में ओंकार की वह अग्नि है जो अविद्या को भस्म करती है। गायत्री ओंकार का वह विकसित रूप है जो बुद्धि को प्रेरित करता है, जबकि ओंकार वह बीज है जिसमें यह प्रेरणा सुप्त अवस्था में निहित है।
तृतीय, चारों वेदों को ओंकार कहना इस बात का प्रमाण है कि वेदों में जो भी ज्ञान, कर्म या उपासना है, वह अंततः उस एक 'अक्षर' की ओर ही संकेत करती है। ऋग्वेद का ज्ञान, यजुर्वेद की क्रिया, सामवेद का भाव और अथर्ववेद का प्रयोग—ये सब ओंकार के ही चार मार्ग हैं। भाव यह है कि जिस प्रकार एक बीज में संपूर्ण वृक्ष समाहित होता है, उसी प्रकार ओंकार में चारों वेद और समस्त मन्त्र समाहित हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमदूदुहत् । तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः ॥ २.७७ ॥
परमेष्ठी प्रजापतिने "तत्" से आरम्भ होनेवाली इस सावित्री ऋचाका एक-एक पाद तीनों वेदोंसे ही दुहकर निकाला।
मनुस्मृति में उल्लेख है कि प्रजापति ने सावित्री ऋचा (गायत्री) के पादों को तीनों वेदों से दुहकर निकाला। यह इस स्मृति के कथन की पुष्टि करता है कि गायत्री और वेद अलग नहीं हैं। यदि गायत्री वेदों का सार है और यह स्मृति कहती है कि गायत्री ही ओंकार है, तो स्वतः सिद्ध होता है कि चारों वेद और गायत्री, दोनों ही ओंकार के ही प्रकटीकरण हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'एकत्व' के अभ्यास का सूत्र है। सामान्यतः साधक अलग-अलग मन्त्रों का जप करता है, किन्तु इस भूमि पर पहुँचकर वह यह अनुभव करता है कि वह जिस भी मन्त्र का आश्रय ले रहा है, वह वास्तव में ओंकार के ही किसी विस्तार को पुकार रहा है।
अभ्यास यह है कि जब साधक 'भूः भुवः स्वः' का उच्चारण करे, तो वह उसे केवल शब्दों के रूप में न देखे, अपितु उसे ओंकार की मात्राओं के रूप में अनुभव करे। जब वह गायत्री का जप करे, तो वह उस चौबीस अक्षरों के पीछे छिपे उस एक 'अमात्र' ओंकार को खोजे।
यह श्लोक साधक को 'विविधता' से 'एकता' की ओर ले जाता है। यहाँ वह इस अनुभव से गुजरता है कि समस्त मन्त्र-शक्ति एक ही स्रोत से निकल रही है। जब वह यह जान लेता है कि "सब कुछ ओंकार ही है", तब उसकी साधना बिखराव से हटकर केन्द्रित हो जाती है। वह अब बाहरी मन्त्रों के जाल में नहीं उलझता, अपितु उन सभी मन्त्रों को समेटकर उस एक अक्षर (प्रणव) में लीन होने का प्रयास करता है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक 'मन्त्र-साधना' से ऊपर उठकर 'अक्षर-साधना' में प्रवेश करता है।
ऋग्वेदे स्वरितोदात्त एकाक्षर उदाहृतः ।
त्रैस्वर्यं च तथोदात्तो यजुर्वेदे च पठ्यते ॥ २.७८ ॥
ऋग्वेद में स्वरित-उदात्त एकाक्षर कहा गया है; 'त्रैस्वर्यं' तथा उदात्त यजुर्वेद में पढ़ा जाता है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह सिद्ध किया गया कि व्याहृतियाँ, गायत्री और चारों वेद वास्तव में ओंकार के ही विभिन्न रूप हैं। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस व्यापकता को और सूक्ष्म करते हुए यह बता रहे हैं कि वेदों के भिन्न-भिन्न स्वरों में ओंकार की अभिव्यक्ति किस प्रकार हुई है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ऋग्वेदे (ओंकारः) स्वरित-उदात्त एकाक्षर (इति) उदाहृतः । त्रैस्वर्यं च (तथा) उदात्तो (ओंकारः) यजुर्वेदे च पठ्यते ।
पदार्थ और निर्वचन:
• स्वरित-उदात्त: ये वेदों के स्वर हैं। 'उदात्त' वह स्वर है जो ऊँचा और तीव्र होता है, जबकि 'स्वरित' वह है जो उदात्त के बाद आता है और जिसमें स्वर का गिरना या मध्यम होना निहित है।
• एकाक्षर: यहाँ ओंकार को 'एकाक्षर' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह अनेक वर्णों के योग से बना प्रतीत होते हुए भी तत्वतः एक ही अविभाज्य अक्षर है।
• त्रैस्वर्यं: यह शब्द तीन लोकों (भूः, भुवः, स्वः) के स्वामित्व या उनके समन्वय का संकेत है। यजुर्वेद में ओंकार का उच्चारण इन तीनों लोकों की सत्ता को समाहित करने वाले 'त्रैस्वर्य' भाव के साथ किया जाता है।
• पठ्यते: पढ़ा जाता है या उच्चारित किया जाता है। यह केवल वाचन नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति को जाग्रत करने वाली विधि है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषियों को यह समझा रहे हैं कि यद्यपि ओंकार एक ही है, किन्तु विभिन्न वेदों की प्रकृति और उनके प्रयोजनों के अनुसार उसका उच्चारण-स्वर भिन्न है। यह भिन्नता ओंकार के तत्व में नहीं, अपितु उसे अभिव्यक्त करने वाले माध्यम (वेद) के स्वर-विधान में है।
ऋग्वेद, जो कि ज्ञान और ऋचाओं का मूल है, वहाँ ओंकार को 'स्वरित-उदात्त' के रूप में उदाहृत किया गया है। ऋग्वेद की प्रकृति जिज्ञासा और प्रकाश की है, अतः वहाँ स्वर का उतार-चढ़ाव उस चैतन्य की तरंगों को दर्शाता है जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती हैं। उसे 'एकाक्षर' कहना इस बात का प्रमाण है कि समस्त ऋचाओं का सार अंततः उसी एक बिंदु में विलीन हो जाता है।
वहीं, यजुर्वेद, जो कि कर्म और यज्ञ का वेद है, वहाँ ओंकार का पाठ 'उदात्त' स्वर में और 'त्रैस्वर्य' के भाव के साथ किया जाता है। यजुर्वेद का उद्देश्य ब्रह्माण्ड की शक्तियों का नियोजन और यज्ञीय अनुशासन है। 'त्रैस्वर्य' का अर्थ है—तीनों लोकों का सामंजस्य। जब साधक यजुर्वेद के अनुसार उदात्त स्वर में ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह अपने भीतर पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक की शक्तियों को एक सूत्र में पिरोकर उस परम सत्ता को पुकारता है।
यहाँ यह रहस्य है कि स्वर केवल व्याकरणिक नियम नहीं हैं, अपितु वे नाद-योग के साधन हैं। स्वर के बदलने से हृदय और मन पर पड़ने वाला प्रभाव बदल जाता है। ऋग्वेद का स्वरित-उदात्त जहाँ अन्तःप्रज्ञा को जाग्रत करता है, वहीं यजुर्वेद का उदात्त स्वर साधक की इच्छाशक्ति और संकल्प को दृढ़ करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'नाद' और 'स्वर' के अभ्यास का निर्देश देता है। योग का यह सूक्ष्म पक्ष है कि एक ही मन्त्र जब भिन्न-भिन्न स्वरों में उच्चारित होता है, तो वह चेतना के भिन्न-भिन्न स्तरों को स्पर्श करता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि ओंकार कोई बाहरी शब्द नहीं, बल्कि एक आंतरिक कंपन है। ऋग्वेद के स्वर का अभ्यास करते समय वह अपनी चेतना को 'एकाक्षर' की स्थिति में लाने का प्रयास करता है, जहाँ सारी विविधता समाप्त हो जाती है। यजुर्वेद के 'त्रैस्वर्य' और 'उदात्त' स्वर के अभ्यास से वह अपने व्यक्तित्व के तीनों आयामों—स्थूल, सूक्ष्म और कारण—को एक साथ संतुलित करना सीखता है।
इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य यह है कि साधक केवल शब्दों का जप न करे, बल्कि उस स्वर की गहराई को पकड़े। यह श्लोक संकेत देता है कि मन्त्रों का सही प्रभाव तभी प्राप्त होता है जब उनका उच्चारण योग्य स्वर में हो। अतः साधक को निर्देश है कि वह अपनी शाखा और परंपरा के अनुसार, अपने गुरु के मार्गदर्शन में इन स्वरों का सूक्ष्म अंतर समझे और उनका अभ्यास करे, ताकि वह केवल वाक्-स्तर पर नहीं, बल्कि प्राण-स्तर पर ओंकार का अनुभव कर सके।
दीर्घप्लुतः सामवेदे ओंकारस्तु न संशयः ।
संक्षिप्तोदात्तमेवाहुरेकाक्षर उदाहृतः ॥ २.७९ ॥
…सामवेद में ओंकार दीर्घ-प्लुत है, इसमें संशय नहीं; उसे संक्षिप्त-उदात्त ही कहते हैं — इस प्रकार एकाक्षर कहा गया है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋग्वेद और यजुर्वेद के स्वरों में ओंकार की अभिव्यक्ति का वर्णन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य सामवेद के परिप्रेक्ष्य में ओंकार के उच्चारण-विधान और उसकी विशिष्टता को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सामवेदे ओंकारस्तु दीर्घ-प्लुतः (अस्ति), (तस्मिन्) न संशयः । (तम्) संक्षिप्त-उदात्तम् एव (ऋषिः) अहुरेकाक्षर (इति) उदाहृतः ।
पदार्थ और निर्वचन:
• दीर्घ-प्लुतः: 'दीर्घ' का अर्थ है लंबा और 'प्लुत' का अर्थ है अत्यधिक विस्तार वाला। सामवेद गान-प्रधान वेद है, अतः वहाँ ओंकार का उच्चारण विस्तारपूर्वक और लयबद्ध रूप में किया जाता है।
• न संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं है। यह याज्ञवल्क्य का दृढ़ निश्चय है कि सामवेद की प्रकृति ही विस्तार और माधुर्य है, अतः वहाँ ओंकार का स्वरूप भी दीर्घ-प्लुत है।
• संक्षिप्त-उदात्त: 'संक्षिप्त' का अर्थ है सिमटा हुआ या सघन, और 'उदात्त' का अर्थ है ऊँचा स्वर। यहाँ यह संकेत है कि विस्तार के भीतर भी एक ऐसा बिंदु है जहाँ स्वर अपनी पूरी तीव्रता (उदात्तता) के साथ केंद्रित होता है।
• एकाक्षर: ओंकार को पुनः 'एकाक्षर' कहकर यह स्मरण कराया गया है कि चाहे स्वर दीर्घ हो या संक्षिप्त, तत्वतः वह एक ही अविभाज्य सत्ता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य सामवेद में ओंकार के स्वरूप का विवेचन कर रहे हैं। सामवेद का मूल स्वभाव ही संगीत और गान है, जिसका उद्देश्य हृदय के भावों को जाग्रत करना और चेतना को विस्तार देना है। इसीलिए सामवेद में ओंकार का उच्चारण 'दीर्घ-प्लुत' होता है। जब साधक ओंकार को दीर्घ करता है, तो वह केवल ध्वनि को लंबा नहीं कर रहा होता, अपितु अपनी चेतना को ब्रह्मांडीय विस्तार में फैला रहा होता है।
श्लोक का दूसरा भाग एक सूक्ष्म रहस्य खोलता है— "संक्षिप्त-उदात्त"। भाव यह है कि सामवेद के दीर्घ-प्लुत उच्चारण के भीतर भी एक ऐसा क्षण आता है जहाँ वह स्वर अत्यंत सघन (संक्षिप्त) और ऊँचा (उदात्त) हो जाता है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि योगिक सत्य है: विस्तार (दीर्घ) के चरम पर पहुँचकर साधक पुनः उस केंद्र (संक्षिप्त) को प्राप्त करता है जहाँ से सारी सृष्टि निकली है। इस प्रकार ओंकार को 'एकाक्षर' कहा गया है, क्योंकि विस्तार और संक्षेप दोनों एक ही अक्षर के दो छोर हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'ध्वनि के विस्तार और केंद्र' का अभ्यास है। जब साधक सामवेद की रीति से ओंकार का दीर्घ-प्लुत उच्चारण करता है, तो वह अपने भीतर के शून्य का विस्तार करता है। वह अनुभव करता है कि उसकी सत्ता केवल शरीर तक सीमित नहीं, अपितु संपूर्ण आकाश में व्याप्त है।
इसके पश्चात, जब वह उस दीर्घ ध्वनि को 'संक्षिप्त-उदात्त' रूप में अनुभव करता है, तो वह उस अनंत विस्तार को एक बिंदु में समेटकर अपने हृदय के केंद्र में स्थापित करता है। यह अभ्यास साधक को 'विस्तार' से 'केंद्रण' की ओर ले जाता है। दीर्घता से वह जगत को जानता है और संक्षिप्तता से वह उस जगत के स्वामी (अक्षर) को पहचानता है। इस प्रकार वह एकाक्षर ओंकार के माध्यम से स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म सत्ता की ओर अग्रसर होता है।
अकारश्च उकारस्तु प्रविष्टो ह्येकदा यदा ।
अउवर्णसमायोगादोंकारः समपद्यत ॥ २.८० ॥
…अकार और उकार जब एक ही बार प्रविष्ट होते हैं, तब अ और उ वर्णों के समायोग से ओंकार प्राप्त होता है…
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के स्वरों के परिप्रेक्ष्य में ओंकार की अभिव्यक्ति का विवेचन किया। अब वे ओंकार की ध्वनि-संरचना के सूक्ष्म विश्लेषण की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ओंकार का निर्माण किन वर्णों के संयोग से होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अकारः च उकारः च यदा एकदा प्रविष्टौ (भवतः), तदा अ-उ वर्ण-समायोगात् ओंकारः समपद्यत ।
पदार्थ और निर्वचन:
• अकारः च उकारः: ओंकार के प्रथम दो घटक— 'अ' और 'उ'। 'अ' समस्त ध्वनियों का आदि है और 'उ' विस्तार का प्रतीक है।
• प्रविष्टौ: प्रविष्ट होना अर्थात् एक-दूसरे में समाहित होना या विलीन होना। यहाँ यह केवल ध्वनियों का मेल नहीं, अपितु दो अवस्थाओं का एकत्व है।
• एकदा: एक ही समय में या एक ही बार। यह संकेत है कि यह संयोग आकस्मिक नहीं, अपितु एक निश्चित योगिक प्रक्रिया है।
• वर्ण-समायोग: दो वर्णों का ऐसा मिलन जिससे एक नवीन और पूर्ण ध्वनि का जन्म हो।
• समपद्यत: प्राप्त होता है या पूर्ण होता है। 'सम' का अर्थ है संतुलित और पूर्ण।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ओंकार के भौतिक और सूक्ष्म निर्माण की विधि बता रहे हैं। व्याकरणिक दृष्टि से यह सरल है कि 'अ' और 'उ' के मेल से 'ओ' वर्ण बनता है, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ ध्वनि के माध्यम से चेतना के विज्ञान को समझा रहे हैं।
जब वे कहते हैं कि 'अकार और उकार एक साथ प्रविष्ट होते हैं', तो इसका अर्थ है कि साधक की साधना में जब आदि-शक्ति (अ) और विस्तार-शक्ति (उ) का समन्वय होता है, तब 'ओ' की उत्पत्ति होती है। 'अ' वह बीज है जहाँ से सृष्टि आरम्भ होती है और 'उ' वह प्रवाह है जो उस बीज को विकसित करता है। जब ये दोनों परस्पर विलीन होते हैं, तब वह अवस्था 'ओंकार' कहलाती है। यह 'समपद्यत' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; इसका अर्थ है कि ओंकार केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि एक 'समत्व' की अवस्था है—जहाँ आदि और अंत, स्थूल और सूक्ष्म का भेद समाप्त हो जाता है।
यहाँ बाहरी विधि यह है कि साधक 'अ' और 'उ' का उच्चारण इस प्रकार करे कि वे अलग-अलग न सुनाई दें, बल्कि एक-दूसरे में घुले हुए प्रतीत हों। आन्तर अर्थ यह है कि हृदय के भीतर जब जाग्रत अवस्था (अ) और स्वप्न जैसी सूक्ष्म अवस्था (उ) का संतुलन होता है, तब साधक उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ से पूर्णता का अनुभव आरम्भ होता है। यह संयोग ही साधक को द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाने वाला प्रथम सोपान है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'एकात्मकता' के अभ्यास का सूत्र है। योग में द्वैत का अंत ही लक्ष्य है। यहाँ 'अ' और 'उ' दो भिन्न ध्वनियाँ हैं, जो द्वैत का प्रतीक हैं। जब साधक इनका अभ्यास करता है, तो वह अनुभव करता है कि कैसे दो विपरीत या भिन्न प्रवृत्तियाँ एक होकर एक तीसरी, अधिक श्रेष्ठ और पूर्ण सत्ता ('ओ') को जन्म देती हैं।
अभ्यास यह है कि जप के समय साधक 'अ' से आरम्भ कर उसे 'उ' में विलीन करे। यह प्रक्रिया मन को यह सिखाती है कि विविधता में ही एकता छिपी है। जब 'अ' और 'उ' का समायोग होता है, तब साधक की चेतना विखंडित नहीं रहती, बल्कि एक बिंदु पर केंद्रित हो जाती है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह यह अनुभव करता है कि संसार की समस्त विविधताएँ वास्तव में एक ही ब्रह्म-ध्वनि के विभिन्न आयाम हैं। इस प्रकार, वर्णों का यह समायोग वास्तव में साधक के भीतर 'विविधता से एकता' की ओर गमन का योगिक अनुभव है।
अनुस्वारो मकारस्तु ओंकारस्य शिरो यदा ।
प्रकृतिः साधनं कृत्वा व्यञ्जनादौ तु लुप्यते ॥ २.८१ ॥
…अनुस्वार रूप मकार जब ओंकार का शिर है; प्रकृति को साधन बनाकर वह व्यञ्जन आदि में लुप्त हो जाता है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के प्रथम दो घटकों— 'अ' और 'उ' के समायोग से 'ओ' की उत्पत्ति का वर्णन किया। अब वे ओंकार की पूर्णता के लिए उसके तीसरे और अंतिम घटक, 'मकार' के स्वरूप और उसकी कार्यविधि का विवेचन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अनुस्वाररूपः मकारस्तु यदा ओंकारस्य शिरः (भवति), तदा (सः) प्रकृतिम् साधनं कृत्वा व्यञ्जनादौ तु लुप्यते ।
पदार्थ और निर्वचन:
• अनुस्वाररूपः मकारः: मकार जब अनुस्वार के रूप में प्रयुक्त होता है। अनुस्वार वह ध्वनि है जो नासिका के माध्यम से निकलती है और वर्णों के अंत में एक बिंदु के रूप में अंकित होती है।
• शिरः: सिर या शिखर। यहाँ 'शिर' का अर्थ है ओंकार की पूर्णता, उसका उच्चतम बिंदु या समापन।
• प्रकृतिः: मूल स्वभाव या ध्वनि की स्वाभाविक अवस्था। यहाँ प्रकृति का अर्थ उस मूल नाद से है जो मकार के उच्चारण के समय उत्पन्न होता है।
• साधनं कृत्वा: साधन बनाकर। अर्थात् अपनी मूल ध्वनि को एक माध्यम या सोपान के रूप में प्रयोग करना।
• व्यञ्जनादौ: व्यञ्जन वर्णों के आरम्भ में। जब ओंकार के बाद कोई अन्य व्यञ्जन वर्ण आता है।
• लुप्यते: लुप्त हो जाता है या विलीन हो जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ओंकार की ध्वनि-संरचना के अंतिम चरण का रहस्य खोल रहे हैं। 'अ' और 'उ' के संयोग से 'ओ' तो बन गया, किन्तु वह तब तक अपूर्ण है जब तक उसमें 'मकार' का समावेश न हो।
ऋषि कहते हैं कि अनुस्वार रूपी मकार ओंकार का 'शिर' है। जिस प्रकार शरीर का शिर समस्त इंद्रियों और चेतना का केंद्र होता है और शरीर की पूर्णता का बोध कराता है, उसी प्रकार 'मकार' की ध्वनि ओंकार के प्रवाह को समेटकर उसे पूर्णता प्रदान करती है। 'अ' से आरम्भ हुआ प्रवाह 'उ' से विस्तारित हुआ और अब 'म' पर आकर वह स्थिर और संकेंद्रित हो जाता है। यह मकार ही वह बिंदु है जहाँ ध्वनि स्थूलता को त्यागकर सूक्ष्मता में प्रवेश करती है।
यहाँ एक सूक्ष्म व्याकरणिक और योगिक रहस्य यह है कि जब यह मकार अनुस्वार बनता है, तो वह अपनी 'प्रकृति' (अर्थात् 'म' के स्पष्ट उच्चारण की भौतिकता) को एक साधन मात्र बना लेता है। वह स्वयं को इतना सूक्ष्म कर लेता है कि जब उसके पश्चात कोई व्यञ्जन वर्ण आता है, तो मकार की वह स्थूल ध्वनि लुप्त हो जाती है और केवल एक सूक्ष्म अनुनाद शेष रहता है। यह लुप्त होना विनाश नहीं, अपितु विलीनीकरण है—स्थूल ध्वनि का सूक्ष्म नाद में विलीन होना।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक ध्वनि-साधना का एक महत्त्वपूर्ण चरण है। 'अ' और 'उ' का उच्चारण मुख के खुलेपन और विस्तार का प्रतीक है, किन्तु जब साधक 'मकार' (अनुस्वार) पर पहुँचता है, तो उसके होंठ बंद हो जाते हैं।
मुख का बंद होना इस बात का संकेत है कि अब बाह्य जगत से संपर्क टूट गया है और समस्त ध्वनि भीतर की ओर मुड़ गई है। जब ध्वनि बाहर न निकलकर भीतर गूँजती है, तब वह 'शिर' यानी शिखर का अनुभव कराती है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक बाह्य शोर से हटकर अपने अंतःकरण के नाद में स्थित होता है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक ओंकार का जप करता है, तो उसे 'मकार' की ध्वनि को केवल गले तक सीमित न रखकर उसे नासिका और मस्तक (शिर) के ऊपरी भाग में महसूस करना चाहिए। 'प्रकृति को साधन बनाकर लुप्त होने' का अर्थ है कि साधक पहले मकार की स्पष्ट ध्वनि का अनुभव करे और फिर धीरे-धीरे उस ध्वनि को इतना सूक्ष्म कर दे कि वह केवल एक कंपन मात्र रह जाए और अंततः शून्य में विलीन हो जाए। यह अभ्यास साधक को स्थूल मन से सूक्ष्म बुद्धि और फिर अक्षर (अविनाशी) की ओर ले जाता है। यहाँ मकार वह सेतु है जो ध्वनि को मौन में परिवर्तित कर देता है।
नपुंसकस्तथोंकारो वेदानां परिकीर्तितः ।
अपांतरतमो ज्ञेयो वेदसिद्धान्तयोरपि ॥ २.८२ ॥
वेदोंमें ओंकार नपुंसक कहा गया है; वेदों और सिद्धान्तोंमें भी इसे अपान्तरतमाका मत जानना चाहिए।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार की ध्वनि-संरचना का विश्लेषण करते हुए 'अ', 'उ' और 'मकार' के संयोग से प्रणव की पूर्णता को समझाया। अब वे ओंकार के उस स्वरूप की चर्चा कर रहे हैं जो व्याकरणिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से लिंग-भेद से परे है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओंकारः वेदानां नपुंसकः इति परिकीर्तितः । (अतः) वेदसिद्धान्तयोरपि (एतद्) अपान्तरतमो (मतम्) ज्ञेयम् ।
पदार्थ और निर्वचन:
• नपुंसकः: न पुं (पुरुष) न स्त्री। वह जो किसी एक लिंग की सीमाओं में बँधा हुआ नहीं है। व्याकरण में यह तीसरा लिंग है, किन्तु योग में यह 'अलिप्तता' और 'पूर्णता' का प्रतीक है।
• परिकीर्तितः: बार-बार कहा गया है या प्रसिद्ध रूप से घोषित किया गया है।
• वेदसिद्धान्तयोरपि: वेदों (श्रुति) और सिद्धान्तों (ऋषियों के मतों) दोनों में।
• अपांतरतमो ज्ञेयः: इसे अपान्तरतमा का मत जानना चाहिए। यहाँ 'अपांतरतमा' उन ऋषियों या उस दृष्टि का संकेत है जो 'अन्तः' (भीतर) के भी पार (अपांत) जाने का मार्ग दिखाती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ओंकार के तात्विक स्वरूप की घोषणा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वेदों में ओंकार को 'नपुंसक' कहा गया है। साधारणतः हम नपुंसक शब्द को अभाव के रूप में देखते हैं, किन्तु यहाँ इसका अर्थ 'अभाव' नहीं, अपितु 'अति-भाव' है।
स्त्री और पुरुष दो विपरीत ध्रुव हैं—एक सृजन का प्रतीक है, दूसरा बीज का। जब तक साधक इन दो द्वंद्वों (द्वैत) में है, वह अधूरा है। ओंकार वह बिंदु है जहाँ स्त्री और पुरुष, प्रकृति और पुरुष, शिव और शक्ति का विलय हो जाता है। वह नपुंसक है क्योंकि वह इन दोनों के योग से उत्पन्न होकर भी दोनों से परे है। वह वह अवस्था है जहाँ कोई भेद शेष नहीं रहता।
ऋषि आगे कहते हैं कि यह सत्य केवल वेदों में ही नहीं, अपितु समस्त सिद्धान्तों में भी मान्य है, और विशेष रूप से इसे 'अपांतरतमा' का मत जानना चाहिए। अपान्तरतमा वह दृष्टि है जो स्थूल शरीर, सूक्ष्म प्राण और कारण शरीर के भी भीतर जाकर उस 'अक्षर' को खोजती है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह धीरे-धीरे अपने भीतर के स्त्री-पुरुष भावों (इच्छा और ज्ञान के द्वंद्व) को समाप्त कर उस तटस्थ अवस्था में पहुँचता है, जिसे वेदों ने 'नपुंसक' कहा है। यह वह शून्य है जो पूर्ण है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से 'नपुंसक' होने का अर्थ है—'लिङ्ग-अतीत' होना। योग के अभ्यास में जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह केवल एक ध्वनि नहीं करता, बल्कि अपने भीतर के द्वैत को मिटाता है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक 'ओ' की ध्वनि से 'मकार' की ओर बढ़ता है और अंत में मौन में स्थित होता है, तब वह अनुभव करता है कि वह न तो पुरुष है, न स्त्री, न ही कोई देह। वह केवल एक 'साक्षी' है। यह 'नपुंसक' भाव साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह समस्त सांसारिक आसक्तियों और पहचानों से मुक्त हो जाता है।
यह अवस्था 'अलिप्तता' की भूमि है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि ओंकार वह सेतु है जो उसे द्वैत (स्त्री-पुरुष) से अद्वैत (नपुंसक/एकत्व) की ओर ले जाता है। इस अभ्यास से साधक की चेतना संकुचित पहचानों से निकलकर विराट स्वरूप में विलीन होने लगती है।
सनत्कुमारमतम्
त्रिकालं च त्रिलिङ्गं च त्रिसंज्ञं च तथा विदुः ।
सनत्कुमारसिद्धान्ते ओंकारः समुदाहृतः ॥ २.८३ ॥
सनत्कुमारके सिद्धान्तमें ओंकार त्रिकाल, त्रिलिङ्ग और त्रिसंज्ञ कहा गया है — (ज्ञानी) ऐसा जानते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार की ध्वनि-संरचना और उसके व्याकरणिक लिंग-निर्धारण की चर्चा की, जहाँ उसे वेदों में 'नपुंसक' बताया गया। अब वे प्रणव के स्वरूप को समझने के लिए विभिन्न ऋषियों के मतों की श्रृंखला में 'सनत्कुमार-सिद्धान्त' को प्रस्तुत कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सनत्कुमारसिद्धान्ते ओंकारः त्रिकालं च त्रिलिङ्गं च त्रिसंज्ञं च तथा समुदाहृतः (अस्ति), (तथैव) विदुः ।
पदार्थ और निर्वचन:
• सनत्कुमारसिद्धान्ते: महर्षि सनत्कुमार के मत या उनके द्वारा प्रतिपादित ज्ञान-परम्परा के अनुसार। सनत्कुमार 'कुमार' स्वरूप हैं, जो शाश्वत यौवन और अविनाशी ज्ञान के प्रतीक हैं।
• त्रिकालं: तीनों कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) का समुच्चय।
• त्रिलिङ्गं: तीनों लिंगों (स्त्री, पुरुष, नपुंसक) का समावेश।
• त्रिसंज्ञं: तीन संज्ञाओं या नामों से जाना जाने वाला।
• समुदाहृतः: संकलित किया गया है या एक साथ वर्णित किया गया है।
• विदुः: जानते हैं। यह क्रिया उन प्रज्ञावान साधकों और ऋषियों के लिए है जिन्होंने ओंकार के इस रहस्य को अनुभव किया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी सनत्कुमार ऋषि के उस दृष्टिकोण को उजागर कर रहे हैं, जिसमें ओंकार को केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु संपूर्ण अस्तित्व के 'त्रिविध' विस्तार के रूप में देखा गया है।
जब हम कहते हैं कि ओंकार 'त्रिकाल' है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह समय के अधीन है, अपितु यह है कि समय (काल) स्वयं ओंकार की ही एक अभिव्यक्ति है। जो भूत बीत गया, जो वर्तमान में है और जो भविष्य में आने वाला है—इन तीनों का मूल बीज ओंकार है।
इसी प्रकार, 'त्रिलिङ्ग' होने का अर्थ है कि सृष्टि की समस्त सृजनात्मक शक्तियाँ—स्त्री (शक्ति/प्रकृति), पुरुष (चेतना/बीज) और नपुंसक (अलिप्त/तटस्थ)—इस एक अक्षर में समाहित हैं। यह ओंकार ही है जो पुरुषत्व और स्त्रीत्व के द्वंद्व को समाप्त कर उन्हें एक पूर्णता में बाँधता है।
'त्रिसंज्ञ' का अर्थ है कि इस एक अक्षर की तीन अवस्थाएँ या तीन नाम हैं, जो साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाते हैं। सनत्कुमार के सिद्धान्त में ओंकार वह केंद्र है जहाँ काल, लिंग और संज्ञा का भेद समाप्त हो जाता है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ओंकार कोई सीमित शब्द नहीं, बल्कि वह 'समुदाहार' है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड का सार संकलित है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'पूर्णता' के अभ्यास का सूत्र है। सामान्यतः मनुष्य स्वयं को एक काल (वर्तमान), एक लिंग (स्त्री या पुरुष) और एक संज्ञा (नाम/पहचान) तक सीमित मानता है। यह सीमितता ही बंधन है।
जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह धीरे-धीरे इस अनुभव की ओर बढ़ता है कि वह केवल इस शरीर या इस समय के क्षण में सीमित नहीं है।
१. त्रिकाल का अभ्यास: ओंकार के 'अ' 'उ' 'म' के विस्तार में साधक अनुभव करता है कि वह भूत, भविष्य और वर्तमान से परे उस 'अकाल' स्वरूप ब्रह्म का अंश है।
२. त्रिलिङ्ग का अभ्यास: वह अपनी चेतना में स्त्री और पुरुष के मानसिक द्वंद्वों को विसर्जित कर 'नपुंसक' अर्थात् अलिप्त और पूर्ण स्थिति को प्राप्त करता है।
३. त्रिसंज्ञ का अभ्यास: वह अपनी बाहरी पहचान (नाम/संज्ञा) को छोड़कर उस आंतरिक संज्ञा में स्थित होता है जहाँ केवल 'सोऽहम्' शेष रहता है।
इस प्रकार, सनत्कुमार-सिद्धान्त का यह अभ्यास साधक को 'सीमित' से 'असीमित' की भूमि पर ले जाता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि ओंकार के माध्यम से वह संपूर्ण समय, संपूर्ण प्रकृति और संपूर्ण पहचान का स्वामी बन गया है।
भूतं भव्यं भविष्यं च कालत्रयमुदाहृतः ।
स्त्रीपुंनपुंसकश्चैव त्रिलिङ्ग इति स स्मृतः ॥ २.८४ ॥
…भूत, वर्तमान और भविष्य — ये तीन काल कहे गये हैं; तथा स्त्री, पुरुष और नपुंसक — ये तीनों लिङ्ग कहे गये हैं, ऐसा वह स्मृत है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सनत्कुमार-सिद्धान्त के मूल सूत्र को प्रस्तुत किया कि ओंकार त्रिकाल, त्रिलिङ्ग और त्रिसंज्ञ है। वर्तमान श्लोक उसी सूत्र के प्रथम दो अंगों—'त्रिकाल' और 'त्रिलिङ्ग'—का विस्तार कर रहा है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सनत्कुमारसिद्धान्ते) भूतं भव्यं भविष्यं च (एतानि) कालत्रयमुदाहृतः (अस्ति) । स्त्री पुं नपुंसकश्चैव (एतानि) त्रिलिङ्ग इति स (ओंकारः) स्मृतः ।
पदार्थ और निर्वचन:
• भूतं: जो बीत चुका है; अतीत।
• भव्यं: जो वर्तमान में घटित हो रहा है या जो होने वाला है (यहाँ 'भव्य' वर्तमान और निकट भविष्य के संक्रमण को दर्शाता है)।
• भविष्यं: जो आने वाला है; दूरस्थ भविष्य।
• कालत्रयम्: समय के तीन आयाम।
• स्त्री, पुं, नपुंसक: व्याकरणिक और प्रकृतिक तीन लिंग। 'स्त्री' सृजन और प्रकृति का, 'पुं' चेतना और पुरुष का, तथा 'नपुंसक' उस तटस्थ अवस्था का प्रतीक है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
• स्मृतः: याद किया गया है या शास्त्र-सम्मत रूप से वर्णित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी सनत्कुमार ऋषि के मत के माध्यम से ओंकार की सर्वव्यापकता को सिद्ध कर रहे हैं।
प्रथमतः, ओंकार को 'कालत्रय' कहा गया है। सामान्य दृष्टि में काल वह है जो हमें बाँधता है, किन्तु योगी की दृष्टि में काल ओंकार की ही एक लहर है। 'भूत' वह बीज है जो बोया गया, 'भव्य' वह वृक्ष है जो अभी फल दे रहा है, और 'भविष्य' वह बीज है जो पुनः उत्पन्न होगा। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक ध्वनि नहीं करता, अपितु वह उस केंद्र में स्थित होता है जहाँ से समय की तीन धाराएँ निकलती हैं। भाव यह है कि ओंकार समय के भीतर नहीं है, बल्कि समय ओंकार के भीतर विलीन है। जो काल के बंधन से मुक्त होना चाहता है, उसे ओंकार के उस स्वरूप को पहचानना होगा जो इन तीनों का अधिष्ठान है।
द्वितीयतः, ओंकार को 'त्रिलिङ्ग' कहा गया है। यहाँ लिंग का अर्थ केवल शारीरिक या व्याकरणिक भेद नहीं, अपितु सृष्टि की शक्तियों का वर्गीकरण है। 'स्त्री' शक्ति (माया, प्रकृति, सृजन) और 'पुरुष' शक्ति (ज्ञान, चैतन्य, साक्षी) के मिलन से ही जगत का प्रकटीकरण होता है। किन्तु इन दोनों के समन्वय से जो 'नपुंसक' या तटस्थ तत्व उभरता है, वही शुद्ध ब्रह्म है, जो लिंग-भेद से परे है। ओंकार इन तीनों का समुच्चय है क्योंकि इसमें सृजन (स्त्री), संरक्षण (पुरुष) और लय (नपुंसक/शून्य) तीनों निहित हैं। यह स्मृति यहाँ यह संकेत दे रही है कि ओंकार का अभ्यास साधक को द्वैत (स्त्री-पुरुष) से उठाकर अद्वैत (नपुंसक/तटस्थ) की स्थिति में ले जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ॥ १ ॥
'ॐ' यह अक्षर ही यह सब है। उसकी व्याख्या: जो हुआ, जो है, जो होगा — सब ओंकार ही है; और जो तीनों कालोंसे परे है, वह भी ओंकार ही है।
यह माण्डूक्य उपनिषद् का मत इस स्मृति के साथ पूर्णतः मेल खाता है। जहाँ उपनिषद् स्पष्ट कहता है कि जो हुआ, जो है और जो होगा—सब ओंकार ही है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति उसे 'कालत्रय' के रूप में परिभाषित कर साधक के लिए उसे समझने योग्य बना रही है। दोनों ही ग्रन्थों का निष्कर्ष यह है कि ओंकार केवल समय का हिस्सा नहीं, अपितु समय का मूल कारण और उससे परे (त्रिकालातीत) सत्य भी है।
योग-रहस्य —
साधक इस श्लोक के माध्यम से 'काल' और 'प्रकृति' के अतिक्रमण का अभ्यास करता है।
१. काल-अभ्यास: जप के समय जब साधक 'ओ' और 'म्' के बीच के अंतराल में स्थित होता है, तो वह अनुभव करता है कि वह न अतीत की स्मृतियों में है, न भविष्य की चिंताओं में, अपितु वह उस 'अमात्र' बिंदु पर है जहाँ तीनों काल एक हो जाते हैं। यह अभ्यास उसे काल-बद्धता से मुक्त कर 'नित्य' की भूमि पर ले जाता है।
२. लिंग-अभ्यास: साधक अपने भीतर की स्त्री-शक्ति (भाव, संवेदना) और पुरुष-शक्ति (विवेक, संकल्प) के संतुलन का अनुभव करता है। जब ये दोनों शक्तियाँ ओंकार के केंद्र में विलीन होती हैं, तब वह 'नपुंसक' या तटस्थ अवस्था का अनुभव करता है, जिसे योग में 'साक्षी भाव' कहा जाता है। यहाँ साधक पुरुष से ऊपर उठकर और प्रकृति से परे होकर शुद्ध चैतन्य में स्थित होता है।
बहिःसंज्ञो मध्यसंज्ञ अन्तःसंज्ञ इति स्मृतः ।
उद्गीथमक्षरं ह्येतदुद्गीथश्च उपास्यते ॥ २.८५ ॥
…बहिःसंज्ञ, मध्यसंज्ञ और अन्तःसंज्ञ कहा गया है; यह अक्षर ही उद्गीथ है और उद्गीथ के रूप में उपास्य होता है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में सनत्कुमार के सिद्धान्त के अनुसार ओंकार के त्रिकाल और त्रिलिङ्ग स्वरूप का विवेचन किया गया। वर्तमान श्लोक उसी त्रिसंज्ञ (तीन नामों) की व्याख्या करते हुए ओंकार के 'उद्गीथ' स्वरूप और उसकी उपासना के महत्त्व को प्रतिपादित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) बहिःसंज्ञः, मध्यसंज्ञः, अन्तःसंज्ञः इति स्मृतः। ह्येतदक्षरम् उद्गीथम् (अस्ति) और उद्गीथः (रूपेण) उपास्यते।
पदार्थ:
• बहिःसंज्ञ: बाहरी संज्ञा वाला; वह अवस्था या नाम जो बाह्य जगत या स्थूल अनुभव से सम्बद्ध है।
• मध्यसंज्ञ: मध्य संज्ञा वाला; वह जो बाह्य और आन्तर के बीच की सेतु या सूक्ष्म अवस्था है।
• अन्तःसंज्ञ: आन्तर संज्ञा वाला; वह जो गहनतम अंतःकरण, सूक्ष्मतम चैतन्य या कारण-अवस्था का नाम है।
• उद्गीथ: 'उद्' (ऊपर उठना/उच्चारण) + 'गीथ' (गाना)। वह अक्षर जिसे ऊँचे स्वर में गाया जाता है या जो साधक को ऊपर की ओर (उच्चतर चेतना की ओर) ले जाता है। सामगान का मुख्य स्वर।
• उपास्यते: उपासना की जाती है; ध्यान और साधना का विषय बनाया जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सनत्कुमार मत के 'त्रिसंज्ञ' पक्ष को खोल रहे हैं। पिछले श्लोक में काल और लिङ्ग की बात थी, यहाँ उन तीनों आयामों को 'संज्ञा' या 'नाम' के रूप में परिभाषित किया गया है।
प्रथम पंक्ति में ओंकार को बहिःसंज्ञ, मध्यसंज्ञ और अन्तःसंज्ञ कहा गया है। यह विभाजन साधक की चेतना की यात्रा को दर्शाता है। 'बहिःसंज्ञ' वह है जब ओंकार का अनुभव स्थूल जगत के नाद या बाहरी ध्वनि के रूप में होता है। 'मध्यसंज्ञ' वह स्थिति है जहाँ ध्वनि सूक्ष्म होकर मन और प्राण के स्तर पर गूँजती है। 'अन्तःसंज्ञ' वह परम स्थिति है जहाँ नाद लुप्त हो जाता है और केवल वह अक्षर शेष रहता है जो हृदय की गहराइयों में स्थित है। यह त्रिविध संज्ञा वास्तव में एक ही ओंकार के तीन स्तर हैं—स्थूल, सूक्ष्म और कारण।
द्वितीय पंक्ति में एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य उद्घाटित किया गया है: "उद्गीथमक्षरं ह्येतत्"। यहाँ ओंकार को 'उद्गीथ' कहा गया है। वैदिक परम्परा में सामगान के आरम्भ में 'ॐ' का उच्चारण होता है, जिसे उद्गीथ कहते हैं। किन्तु याज्ञवल्क्य यहाँ केवल संगीत की बात नहीं कर रहे, अपितु यह बता रहे हैं कि यह अक्षर ही वह 'उद्गीथ' (ऊर्ध्वगामी स्वर) है जो जीव को नीचे की जड़ता से उठाकर ऊपर अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाता है।
जब ऋषि कहते हैं कि "उद्गीथश्च उपास्यते", तो इसका अर्थ है कि ओंकार की उपासना केवल मन्त्र-जप के रूप में नहीं, बल्कि 'उद्गीथ' के रूप में करनी चाहिए। अर्थात्, इस अक्षर को एक ऐसी सीढ़ी मानना चाहिए जो बाह्य जगत (बहिःसंज्ञ) से होते हुए मध्य अवस्था (मध्यसंज्ञ) को पार कर अंतःकरण के परम शून्य (अन्तःसंज्ञ) में विलीन कर दे।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १.१.१ ॥
'ॐ' इस अक्षरकी उद्गीथरूपसे उपासना करे; क्योंकि 'ॐ' कहकर ही (उद्गाता) गाता है। उसीकी यह व्याख्या (आगे) है।
छान्दोग्य उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि 'ॐ' इस अक्षर की उद्गीथ रूप से उपासना करनी चाहिए क्योंकि उद्गाता इसी के साथ गान आरम्भ करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस उपनिषदीय सत्य की पुष्टि करती है कि ओंकार ही समस्त उपासनाओं का केंद्र है। जहाँ छान्दोग्य उपनिषद् इसे गान और उपासना से जोड़ता है, वहीं यह स्मृति इसे 'बहिः-मध्य-अन्तः' संज्ञाओं के माध्यम से साधक की आंतरिक यात्रा के सोपानों के रूप में प्रस्तुत करती है।
योग-रहस्य —
योगी के लिए यह श्लोक 'नाद-योग' का आधार है। साधक जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह तीन भूमियों से गुजरता है:
१. बहिःसंज्ञ का अभ्यास: जब वह ओंकार को होंठों और जिह्वा से उच्चारित करता है। यहाँ वह स्थूल नाद का अनुभव करता है।
२. मध्यसंज्ञ का अभ्यास: जब उच्चारण सूक्ष्म होता है और ध्वनि का अनुभव कानों के भीतर (अन्तःश्रुति) होने लगता है। यहाँ साधक मन के स्तर पर स्थित होता है।
३. अन्तःसंज्ञ का अभ्यास: जब ध्वनि पूर्णतः शांत हो जाती है और केवल 'अक्षर' की उपस्थिति का अनुभव होता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक स्वयं को उस व्यापक चैतन्य में विलीन पाता है।
'उद्गीथ' के रूप में उपासना का अर्थ है—अपनी चेतना को ऊपर की ओर उठाना। साधक इस अभ्यास से अनुभव करता है कि ओंकार केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक शक्ति है जो उसे बाह्य जगत के कोलाहल से हटाकर हृदय के गहन मौन (अन्तःसंज्ञ) की ओर ले जाती है। यह अभ्यास साधक को स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण-भूमि की ओर अग्रसर करता है।
ब्रह्मिष्ठमतम्
ओमित्युद्गीयते ह्येष भूते भव्ये भविष्यति ।
त्रिस्थानं त्रिपदं चैव त्रिसंज्ञं च प्रकीर्तितम् ॥ २.८६ ॥
"ॐ" — इस रूपमें यह भूत, वर्तमान और भविष्यमें (सामगानमें) ऊँचे स्वरसे गाया जाता है (इसलिए उद्गीथ है); इसे त्रिस्थान, त्रिपद और त्रिसंज्ञ कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में सनत्कुमार सिद्धान्त के अनुसार ओंकार के त्रिकाल, त्रिलिङ्ग और त्रिसंज्ञ स्वरूप का परिचय दिया गया। वर्तमान श्लोक उसी त्रिसंज्ञ और त्रिकाल के स्वरूप को 'उद्गीथ' के माध्यम से स्पष्ट करते हुए ओंकार की व्यापकता को प्रतिपादित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) ओमिति उद्गीयते ह्येष (ओंकारः) भूते, भव्ये, भविष्यति (इति कालत्रये)। (ओंकारः) त्रिस्थानं, त्रिपदं चैव, त्रिसंज्ञं च प्रकीर्तितम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• उद्गीयते: 'उद्' (ऊपर/उच्च) + 'गी' (गाना)। ऊँचे स्वर में गाया जाना; सामगान की वह रीति जिसमें स्वर का आरोहण होता है। योगिक दृष्टि से, वह नाद जो साधक की चेतना को नीचे से ऊपर की ओर ले जाए।
• भूत, भव्य, भविष्यति: भूत (बीता हुआ), भव्य (वर्तमान/होने वाला) और भविष्यति (आने वाला)। काल की तीन अवस्थाएँ।
• त्रिस्थान: तीन स्थानों वाला। यहाँ स्थान का अर्थ केवल भौतिक स्थान नहीं, अपितु चेतना के तीन स्तर या आधार हैं।
• त्रिपद: तीन पदों वाला। 'पद' का अर्थ है चरण या अवस्था।
• त्रिसंज्ञ: तीन संज्ञाओं (नामों) वाला। जैसा कि पिछले श्लोक में 'बहिः, मध्य और अन्तः' संज्ञाओं का उल्लेख आया।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप को उजागर कर रहे हैं जो समय और स्थान की सीमाओं से परे है। यहाँ 'उद्गीथ' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामवेद के गान में जब 'ॐ' का उच्चारण किया जाता है, तो वह केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय स्पंदन का आह्वान होता है।
प्रथम पंक्ति में कहा गया है कि ओंकार 'भूत, भव्य और भविष्य' में उद्गाया जाता है। इसका भाव यह है कि ओंकार काल के अधीन नहीं है, बल्कि काल स्वयं ओंकार में प्रतिष्ठित है। जो बीत गया, जो अभी घटित हो रहा है और जो घटने वाला है—इन तीनों का मूल बीज 'ॐ' ही है। जब साधक इस अक्षर को उद्गाता है, तो वह समय के त्रिविध बंधन को तोड़कर उस 'अकाल' (कालातीत) तत्त्व से जुड़ता है।
द्वितीय पंक्ति में इसे 'त्रिस्थान, त्रिपद और त्रिसंज्ञ' कहा गया है। यह विभाजन साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है। 'त्रिस्थान' का अर्थ है कि यह अक्षर तीन आधारों पर टिका है—स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। 'त्रिपद' का अर्थ है कि इसकी तीन अवस्थाएँ हैं—जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति (जिसका विस्तार अगले श्लोकों में आएगा)। 'त्रिसंज्ञ' का अर्थ है कि इसे तीन नामों से जाना जाता है, जो साधक के अनुभव के स्तर के अनुसार बदलते रहते हैं।
इस प्रकार, यह स्मृति यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि संपूर्ण अस्तित्व का मानचित्र है। जिसे हम बाहर 'गाते' हैं, वह वास्तव में भीतर के मौन का ही उद्घोष है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १.१.१ ॥
'ॐ' इस अक्षरकी उद्गीथरूपसे उपासना करे; क्योंकि 'ॐ' कहकर ही (उद्गाता) गाता है। उसीकी यह व्याख्या (आगे) है।
यह छान्दोग्य उपनिषद् का सूत्र स्पष्ट करता है कि ओंकार की उपासना 'उद्गीथ' रूप में ही की जानी चाहिए क्योंकि संपूर्ण गान का आरम्भ इसी अक्षर से होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह बताती है कि यह उद्गान केवल कंठ से नहीं, बल्कि काल और स्थान (त्रिस्थान, त्रिकाल) के बोध के साथ किया जाना चाहिए। जहाँ उपनिषद् उपासना का निर्देश देता है, वहीं यह स्मृति उस उपासना के आंतरिक विन्यास को खोलती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'नाद-योग' की दिशा में एक कदम है। जब साधक 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह केवल शब्द नहीं बोलता, बल्कि अपने भीतर के 'त्रिस्थान' (तीन केंद्रों) को जाग्रत करता है।
अभ्यास यह है कि साधक जब 'ॐ' का उद्घोष करे, तो वह अनुभव करे कि यह ध्वनि उसके 'भूत' (संचित कर्मों), 'भव्य' (वर्तमान प्रवृत्तियों) और 'भविष्य' (आगामी संस्कारों) को शुद्ध कर रही है। 'उद्गीथ' का योगिक अर्थ है—चेतना का आरोहण। साधक इस ध्वनि के सहारे अपनी चेतना को बाह्य जगत (बहिःसंज्ञ) से हटाकर, मध्य अवस्था (मध्यसंज्ञ) से गुजारते हुए, अंततः उस परम शून्य या अक्षर (अन्तःसंज्ञ) में विलीन करता है। यह अभ्यास साधक को 'त्रिपद' (तीन अवस्थाओं) के पार ले जाकर उस तुरीय अवस्था की ओर अग्रसर करता है, जहाँ समय (काल) का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
ब्रह्मिष्ठानां भवेदेवं गुह्येषूपनिषत्सु च ।
हृत्कण्ठतालुकादीनि स्थानानि समुदाहरेत् ॥ २.८७ ॥
ब्रह्मनिष्ठोंके मतमें और गुह्य उपनिषदोंमें भी ऐसा ही है; हृदय, कण्ठ, तालु आदिको (इसके) स्थान कहे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में सनत्कुमार सिद्धान्त के अनुसार ओंकार के त्रिकाल, त्रिलिङ्ग और त्रिसंज्ञ स्वरूप का वर्णन किया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस चर्चा को और अधिक सूक्ष्मता की ओर ले जाते हुए उन ऋषियों और गुप्त विद्याओं का मत प्रस्तुत कर रहे हैं, जो ओंकार को केवल काल या संज्ञा तक सीमित न मानकर उसे शरीर के भीतर स्थित अनुभव करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ब्रह्मिष्ठानां (मतः) भवेदेवं (अस्ति), गुह्येषु उपनिषत्सु च (एवं मतः)। (ओंकारस्य) हृत्, कण्ठ, तालुका-आदित्वानि स्थानानि समुदाहरेत्।
पदार्थ:
• ब्रह्मिष्ठानां: जो ब्रह्म में स्थिर हैं, अर्थात् जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार कर लिया है, उन ब्रह्मनिष्ठ ऋषियों का मत।
• गुह्येषु उपनिषत्सु: 'गुह्य' का अर्थ है गुप्त या रहस्यमय। वे उपनिषद् जो केवल योग्य शिष्यों को ही दिए जाते हैं (जैसे माण्डूक्य), जिनमें अक्षर के सूक्ष्म भेदों का वर्णन है।
• भवेदेवं: 'भवति' + 'एव' + 'इदम'। ऐसा ही होता है या ऐसा ही मत है।
• हृत्, कण्ठ, तालुका-आदित्वानि: हृदय, कण्ठ और तालु आदि शारीरिक स्थान। यहाँ 'आदि' शब्द संकेत करता है कि ये मुख्य स्थान हैं, पर सूक्ष्म स्तर पर अन्य बिंदु भी सम्मिलित हैं।
• समुदाहरेत्: एकत्रित करना, स्पष्ट करना या संक्षेप में बताना। यहाँ इसका अर्थ है कि इन स्थानों को ओंकार के उच्चारण और अनुभव के आधार के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के बाह्य स्वरूप (ध्वनि) और आन्तर स्वरूप (अनुभव) के बीच की कड़ी जोड़ रहे हैं। पिछले श्लोकों में ओंकार को काल (भूत-भविष्य) और लिङ्गों के परिप्रेक्ष्य में देखा गया, जो कि एक दार्शनिक और सैद्धान्तिक विवेचन था। किंतु यहाँ 'ब्रह्मिष्ठों' और 'गुह्य उपनिषदों' का प्रमाण देकर ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ओंकार केवल विचार का विषय नहीं, अपितु शरीर और चेतना में अनुभव करने योग्य एक जीवन्त सत्ता है।
प्रथम पंक्ति का भाव यह है कि जो साधक ब्रह्म में स्थित हो चुके हैं और जिन्होंने उपनिषदों के गुप्त रहस्यों को आत्मसात किया है, उनके अनुसार ओंकार का स्वरूप वही है जो अभी विवेचित किया जा रहा है—अर्थात् वह त्रिगुणात्मक और त्रिपद है। किंतु इस सत्य को सिद्ध करने के लिए वे उसे शरीर के विशिष्ट स्थानों से जोड़ते हैं।
द्वितीय पंक्ति में ओंकार के उच्चारण और धारणा के तीन मुख्य स्थानों का उल्लेख है: हृदय, कण्ठ और तालु।
बाहरी विधि के अनुसार, जब हम 'ॐ' का उच्चारण करते हैं, तो ध्वनि का उद्गम और कंपन इन तीन केंद्रों से होकर गुजरता है। 'अ' का स्थान हृदय (नाभि-क्षेत्र से ऊपर), 'उ' का स्थान कण्ठ और 'म' (अनुस्वार) का स्थान तालु एवं मस्तक होता है।
परंतु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है। हृदय वह स्थान है जहाँ चेतना का वास है; कण्ठ वह द्वार है जहाँ से प्राण और वाक् का समन्वय होता है; और तालु वह बिंदु है जहाँ ध्वनि सूक्ष्म होकर शून्य में विलीन हो जाती है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि ओंकार का जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं है, बल्कि चेतना को हृदय से उठाकर कण्ठ तक और कण्ठ से ऊपर तालु तक ले जाने की एक प्रक्रिया है। यह स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर गमन का मार्ग है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'नाद-योग' और 'अक्षर-साधना' का आधार है। यहाँ साधक को केवल मंत्र नहीं जपना है, बल्कि ध्वनि के 'स्थान' का अनुभव करना है।
अभ्यास की विधि यह है कि जब साधक 'अ' का उच्चारण करे, तो उसका पूरा ध्यान हृदय-प्रदेश में हो, जहाँ वह अनुभव करे कि संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति वहाँ स्पंदित हो रही है। जब ध्वनि 'उ' में परिवर्तित हो, तो चेतना का आरोहण कण्ठ की ओर हो। और जब 'म' या अनुस्वार का उच्चारण हो, तो वह ध्वनि तालु को स्पर्श करते हुए मस्तक के ऊपरी भाग में विलीन हो जाए।
यह अभ्यास साधक को 'बहिःप्रज्ञ' (बाहरी जगत में खोया हुआ) से 'अन्तःप्रज्ञ' (भीतरी जगत में स्थित) की ओर ले जाता है। हृदय से तालु तक की यह यात्रा वास्तव में नीचे से ऊपर की ओर चेतना का उत्थान है। इस अभ्यास से साधक अनुभव करता है कि ओंकार कोई बाहरी शब्द नहीं, बल्कि उसके अपने ही शरीर के भीतर गूँजने वाला वह आदि-नाद है, जो उसे स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर और अंततः उस 'अमात्र' अवस्था की ओर ले जाता है, जिसका वर्णन आगामी श्लोकों में आएगा। यह अभ्यास साधक को जाग्रत अवस्था से स्वप्न और फिर सुषुप्ति की गहराई में उतरने के लिए तैयार करता है।
जाग्रत् स्वप्नं सुषुप्तं च पदान्येतानि तस्य तु ।
बहिःसंज्ञस्तथान्तश्च घनप्रज्ञः स्वयं विभुः ॥ २.८८ ॥
जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति — ये उसके पद हैं; वह बहिःसंज्ञ, अन्तःसंज्ञ और घनप्रज्ञ है — स्वयं व्यापक।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्मनिष्ठों और गुह्य उपनिषदों के मत का उल्लेख करते हुए ओंकार के उच्चारण स्थानों (हृदय, कण्ठ, तालु) को स्पष्ट किया। अब इस श्लोक में वे उन शारीरिक स्थानों को चेतना की अवस्थाओं से जोड़ते हुए ओंकार के 'त्रिपद' स्वरूप का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तस्य (ओंकारस्य) जाग्रत्, स्वप्नं, सुषुप्तं च पदानि एतानि तु (भवन्ति)। सः बहिःसंज्ञः, तथा अन्तःसंज्ञः, घनप्रज्ञः (च अस्ति), स्वयं विभुः (अस्ति)।
पदार्थ:
• जाग्रत्, स्वप्नं, सुषुप्ति: चेतना की तीन अवस्थाएँ—जाग्रत (जागृत), स्वप्न (सपना) और सुषुप्ति (गहरी नींद)।
• पदानि: यहाँ 'पद' का अर्थ केवल पैर नहीं, बल्कि 'अवस्था' या 'चरण' है। ओंकार के तीन अक्षरों (अ, उ, म) को इन तीन अवस्थाओं का आधार माना गया है।
• बहिःसंज्ञः: जिसकी संज्ञा (ज्ञान/प्रज्ञा) बाहर की ओर उन्मुख हो।
• अन्तःसंज्ञः: जिसकी संज्ञा भीतर की ओर उन्मुख हो।
• घनप्रज्ञः: जिसकी प्रज्ञा 'घन' की भाँति एकीभूत, सघन और अखंड हो; जिसमें कोई द्वैत न रहे।
• विभुः: सर्वव्यापी, व्यापक, जो किसी सीमा में बँधा न हो।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ओंकार के उस रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं जो स्थूल ध्वनि से परे चेतना के स्तर पर घटित होता है। वे कहते हैं कि ओंकार के जो तीन पद हैं, वे वास्तव में साधक की चेतना की तीन अवस्थाएँ—जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति हैं।
जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं करता, बल्कि वह अपनी चेतना को तीन स्तरों पर ले जाता है। प्रथम अवस्था 'जाग्रत' है, जिसमें प्रज्ञा बाहर की ओर प्रवाहित होती है। इसे 'बहिःसंज्ञ' कहा गया है क्योंकि यहाँ ज्ञाता और ज्ञेय (विषय) अलग-अलग होते हैं और इंद्रियाँ बाहरी जगत का अनुभव करती हैं। यह ओंकार का वह स्तर है जहाँ साधक स्थूल जगत में रहकर भी अक्षर का स्मरण करता है।
द्वितीय अवस्था 'स्वप्न' है, जिसे 'अन्तःसंज्ञ' कहा गया है। यहाँ प्रज्ञा बाहर के विषयों को छोड़कर अंतर्मुखी हो जाती है। स्वप्न में इंद्रियाँ शांत होती हैं, किंतु मन सूक्ष्म जगत के विषयों का निर्माण करता है। यह ओंकार के उस सूक्ष्म स्तर का अनुभव है जहाँ साधक बाहरी जगत से विरक्त होकर अपने अंतर्जगत की सूक्ष्म तरंगों का साक्षी होने लगता है।
तृतीय अवस्था 'सुषुप्ति' है, जहाँ प्रज्ञा 'घनप्रज्ञ' हो जाती है। सुषुप्ति में न बाहरी विषय होते हैं, न सूक्ष्म स्वप्न; यहाँ केवल अखंड शांति और आनंद का अनुभव होता है। प्रज्ञा यहाँ 'घन' की भाँति एकरूप हो जाती है—न कोई ज्ञाता बचता है, न कोई ज्ञान, केवल शुद्ध अस्तित्व रह जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ साधक ओंकार के उस बीज-रूप को स्पर्श करता है जो समस्त भेदों से मुक्त है।
अंत में महर्षि कहते हैं—'स्वयं विभुः'। इसका भाव यह है कि ये तीनों अवस्थाएँ अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही व्यापक आत्मा (विभु) के तीन भिन्न प्रतिबिंब हैं। ओंकार वह सेतु है जो साधक को बहिःप्रज्ञ से अन्तःप्रज्ञ और अंततः घनप्रज्ञ की ओर ले जाता है, जिससे वह अनुभव करता है कि वह स्वयं उस सर्वव्यापी विभु का अंश है।
शास्त्र-साक्ष्य —
माण्डूक्य उपनिषद् में इसी रहस्य का विस्तार मिलता है:
जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ ३ ॥
जाग्रत् जिसका स्थान है, जिसकी प्रज्ञा बाहरकी ओर है, सात अङ्ग और उन्नीस मुखवाला, स्थूलका भोक्ता वैश्वानर — पहला पाद।
यहाँ जाग्रत अवस्था को 'बहिःप्रज्ञ' और 'स्थूलभुक्' (स्थूल विषयों का भोग करने वाला) कहा गया है, जो स्मृति के 'बहिःसंज्ञ' से पूर्णतः मेल खाता है।
इसी प्रकार सुषुप्ति की व्याख्या करते हुए कहा गया है:
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥
जहाँ सोया हुआ न कोई कामना करता है, न कोई स्वप्न देखता है — वह सुषुप्ति है। सुषुप्ति जिसका स्थान है, एकीभूत, प्रज्ञानघन, आनन्दमय, आनन्दका भोक्ता, चेतना ही जिसका मुख है — वह प्राज्ञ तीसरा पाद है।
यहाँ सुषुप्ति को 'प्रज्ञानघन' और 'आनन्दभुक्' कहा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'घनप्रज्ञ' शब्द इसी 'प्रज्ञानघन' का संक्षिप्त रूप है, जो यह दर्शाता है कि सुषुप्ति में चेतना किसी एक बिंदु पर केंद्रित न होकर पूर्णतः एकीभूत और आनंदमय हो जाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अवस्था-साधना' का मार्ग है। योगी इस श्लोक के माध्यम से अपने दैनिक अनुभवों को योग में बदलना सीखता है।
१. जाग्रत अभ्यास: जब साधक जाग्रत अवस्था में हो, तब वह 'बहिःसंज्ञ' होते हुए भी ओंकार के माध्यम से यह अनुभव करे कि बाहरी जगत की विविधता वास्तव में उसी एक अक्षर का विस्तार है।
२. स्वप्न अभ्यास: साधक प्रयास करता है कि वह स्वप्न की अवस्था में भी सचेत रहे (स्वप्न-साक्षी)। यहाँ वह 'अन्तःसंज्ञ' होकर यह देखता है कि मन के भीतर उठने वाले विचार भी ओंकार की ही सूक्ष्म तरंगें हैं।
३. सुषुप्ति अभ्यास: योग का उच्चतम लक्ष्य यह है कि साधक सुषुप्ति की उस गहन शांति (घनप्रज्ञ) को केवल नींद में नहीं, बल्कि जागते हुए भी अनुभव करे।
इस प्रकार साधक 'बहिः' से 'अन्तः' और 'अन्तः' से 'घन' की ओर यात्रा करता है। यह यात्रा स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण की ओर जाने की यात्रा है। जब साधक इन तीनों पदों को एक ही 'विभु' (व्यापक सत्ता) के रूप में पहचान लेता है, तब वह त्रिगुणमय प्रकृति से ऊपर उठकर उस अक्षर-ब्रह्म में स्थित हो जाता है, जिसका संकेत याज्ञवल्क्य ने 'स्वयं विभुः' कहकर दिया है।
एतदक्षरमोंकारं भूतं भव्यं भविष्यति ।
त्रिप्रज्ञं त्रिपदं चैव सर्वव्यापि तथोच्यते ॥ २.८९ ॥
यह अक्षर ओंकार भूत, वर्तमान और भविष्य है; वह त्रिप्रज्ञ, त्रिपद और सर्वव्यापी ऐसा कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ओंकार के तीन पदों को जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के रूप में परिभाषित करते हुए उन्हें बहिःसंज्ञ, अन्तःसंज्ञ और घनप्रज्ञ कहा गया। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य इन पदों के समय-विस्तार और उनकी सर्वव्यापकता का उद्घाटन कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ओंकार केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु संपूर्ण अस्तित्व का आधार है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एतत् अक्षरम् ओंकारम् (इति) भूतं, भव्यं, भविष्यति (च अस्ति)। तत् त्रिप्रज्ञं, त्रिपदं च एव (अस्ति), तथा सर्वव्यापि (इति) उच्यते।
पदार्थ:
• एतदक्षरम्: यहाँ 'अक्षर' का अर्थ है जो 'क्षर' (नाशवान) नहीं है। वह अविनाशी तत्व जो ध्वनि के रूप में प्रकट होता है।
• भूतं, भव्यं, भविष्यति: भूत (जो बीत चुका/अतीत), भव्य (जो वर्तमान है/हो रहा है), भविष्यति (जो आने वाला है)। यह काल की त्रयी है।
• त्रिप्रज्ञं: तीन प्रकार की प्रज्ञा (चेतना) वाला। यह प्रज्ञा के तीन स्तरों—बाह्य, आंतरिक और घन (अखंड)—को सूचित करता है।
• त्रिपदं: तीन चरणों या अवस्थाओं वाला। 'पद' यहाँ चेतना के विश्राम-स्थान और विकास के सोपान हैं।
• सर्वव्यापि: जो समस्त चराचर जगत में व्याप्त है; जिसकी सीमा कहीं समाप्त नहीं होती।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ओंकार के उस विराट स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ वह समय और स्थान की सीमाओं को लाँघ जाता है। वे कहते हैं कि यह अक्षर ओंकार ही 'भूत, भव्य और भविष्य' है। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि के आरम्भ में जो बीज रूप में था वह ओंकार था (भूत), जो वर्तमान में इस दृश्य जगत के रूप में स्पंदित है वह ओंकार है (भव्य), और अंततः सब कुछ जिसमें विलीन होगा और जो पुनः प्रकट होगा, वह भी ओंकार ही है (भविष्य)।
यहाँ 'अक्षर' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रुति में अक्षर उसे कहा गया है जिसकी कभी क्षय नहीं होती। जब याज्ञवल्क्य इसे काल-त्रयी से जोड़ते हैं, तो वे यह संकेत दे रहे हैं कि समय का प्रवाह केवल एक आभास है, जबकि ओंकार वह स्थिर धुरी है जिसके चारों ओर समय का चक्र घूमता है।
आगे वे इसे 'त्रिप्रज्ञ' और 'त्रिपद' कहते हैं। 'त्रिपद' होने का अर्थ है कि यह तीन सोपानों में प्रकट होता है—अ, उ और म। लेकिन 'त्रिप्रज्ञ' होने का रहस्य यह है कि यह केवल ध्वनि नहीं, बल्कि चेतना की तीन अवस्थाओं का स्वामी है। जैसा कि पिछले श्लोक में संकेत था, जाग्रत अवस्था में प्रज्ञा बाहर की ओर (बहिःसंज्ञ) है, स्वप्न में भीतर की ओर (अन्तःसंज्ञ) और सुषुप्ति में वह सघन (घनप्रज्ञ) हो जाती है।
अंत में, इसे 'सर्वव्यापि' कहा गया है। यह केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि वह सूक्ष्म स्पंदन है जो परमाणु से लेकर ब्रह्मांड तक व्याप्त है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में उस सर्वव्यापकता के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है। वह अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, बल्कि उस अक्षर का अंश है जो भूत, भविष्य और वर्तमान से परे, सर्वत्र व्याप्त है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोंकार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ॥ १ ॥
'ॐ' यह अक्षर ही यह सब है। उसकी व्याख्या: जो हुआ, जो है, जो होगा — सब ओंकार ही है; और जो तीनों कालोंसे परे है, वह भी ओंकार ही है।
माण्डूक्य उपनिषद् के अनुसार, 'ॐ' यह अक्षर ही यह सब है। जो हुआ, जो है और जो होगा—यह त्रिकाल ओंकार ही है। यहाँ तक कि जो इन तीनों कालों से परे (तुरीय) है, वह भी ओंकार ही है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक माण्डूक्य उपनिषद् के इसी सिद्धांत का विस्तार है। जहाँ उपनिषद् इसे दार्शनिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं यह स्मृति इसे साधक के अनुभव के लिए 'त्रिप्रज्ञ' और 'त्रिपद' के रूप में वर्गीकृत करती है, ताकि योगी अपनी चेतना के स्तर को पहचानकर अक्षर की ओर बढ़ सके।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'काल' के बंधन से मुक्त करने का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य की प्रज्ञा या तो अतीत की स्मृतियों (भूत) में भटकती है या भविष्य की चिंताओं (भविष्य) में। वर्तमान (भव्य) केवल एक क्षणिक सेतु बनकर रह जाता है।
साधक जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह अपनी प्रज्ञा को इन तीनों कालों के समन्वय में लाता है।
१. 'अ' के उच्चारण और अनुभव में वह अपने अस्तित्व के मूल (भूत) को पहचानता है।
२. 'उ' के अनुभव में वह वर्तमान की जीवंतता (भव्य) को महसूस करता है।
३. 'म' के विलीनीकरण में वह भविष्य के पूर्ण विश्राम और लय को अनुभव करता है।
इस अभ्यास से साधक 'त्रिप्रज्ञ' की स्थिति में पहुँचता है—जहाँ वह यह देख पाता है कि उसकी चेतना जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों में एक ही है। जब वह इस त्रिपद स्वरूप को आत्मसात कर लेता है, तब वह 'सर्वव्यापि' भाव का अनुभव करता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक का 'अहं' मिट जाता है और वह स्वयं को उस अक्षर के रूप में अनुभव करता है जो समय और स्थान से मुक्त, अखंड और सर्वव्यापी है। यह अभ्यास साधक को स्थूल प्रज्ञा से सूक्ष्म प्रज्ञा और अंततः घनप्रज्ञ (अखंड चेतना) की ओर ले जाता है।
बहिःप्रज्ञो विभुर्विश्व अन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।
घनप्रज्ञस्तथा प्रोक्त एक एव त्रिधा भवेत् ॥ २.९० ॥
बहिःप्रज्ञ, व्यापक (जीव) "विश्व" है; अन्तःप्रज्ञ "तैजस" है; और (प्राज्ञ) घनप्रज्ञ कहा गया है — एक ही तीन प्रकारका होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ओंकार के तीन पदों को काल-त्रयी (भूत, भव्य, भविष्य) और प्रज्ञा के तीन स्तरों से जोड़कर उसकी सर्वव्यापकता सिद्ध की गई। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन तीन प्रज्ञाओं के विशिष्ट स्वरूपों—विश्व, तैजस और प्राज्ञ—का परिचय दे रहे हैं, जिससे साधक यह जान सके कि उसकी चेतना किन अवस्थाओं में विचरती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: बहिःप्रज्ञः विभुः विश्वः (अस्ति), अन्तःप्रज्ञः तु तैजसः (अस्ति), घनप्रज्ञः तथा प्रोक्तः (अस्ति); (सः) एकः एव त्रिधा भवेत्।
पदार्थ:
• बहिःप्रज्ञः: जिसकी प्रज्ञा (चेतना) बाहर की ओर उन्मुख है; जो इंद्रियों के माध्यम से बाह्य जगत का अनुभव करता है।
• विभुः: सर्वव्यापी, व्यापक। यहाँ इसका अर्थ है कि बाह्य जगत में व्याप्त वह चेतना जो स्वयं को अनेक रूपों में देखता है।
• विश्वः: वह अवस्था जिसमें जीव संपूर्ण जगत को 'विश्व' के रूप में अनुभव करता है। यह जाग्रत अवस्था का संज्ञक है।
• अन्तःप्रज्ञः: जिसकी प्रज्ञा भीतर की ओर मुड़ गई है; जो बाह्य इंद्रियों से हटकर मन के भीतर के प्रतिबिंबों का अनुभव करता है।
• तैजसः: तेज या प्रकाश स्वरूप। स्वप्न अवस्था में इंद्रियाँ भौतिक नहीं रहतीं, अपितु सूक्ष्म प्रकाशमय रूप में कार्य करती हैं, अतः इसे 'तैजस' कहा गया है।
• घनप्रज्ञः: जिसकी प्रज्ञा 'घन' है, अर्थात् अखंड, सघन और एकरूप। जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है। इसे ही 'प्राज्ञ' कहा गया है, जो सुषुप्ति अवस्था का प्रतीक है।
• एक एव त्रिधा भवेत्: वह तत्व एक ही है, किन्तु प्रकटीकरण या अनुभव की दृष्टि से तीन प्रकार का प्रतीत होता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ओंकार के तीन पदों का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जिसे हम तीन अलग-अलग अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) समझते हैं, वे वास्तव में एक ही चेतना के तीन अलग-अलग आयाम हैं।
प्रथम अवस्था 'विश्व' की है। जब साधक की प्रज्ञा बाहर की ओर प्रवाहित होती है, तो वह 'बहिःप्रज्ञ' कहलाता है। इस अवस्था में वह स्वयं को शरीर मानता है और जगत को पृथक। चूँकि यह चेतना समस्त स्थूल जगत में व्याप्त प्रतीत होती है, इसलिए इसे 'विभु' और 'विश्व' कहा गया है। यह ओंकार का वह प्रथम पद है जहाँ अक्षर अपनी स्थूल अभिव्यक्ति में है।
द्वितीय अवस्था 'तैजस' की है। जब चेतना बाह्य जगत से हटकर अंतर्मुखी होती है, तब वह 'अन्तःप्रज्ञ' हो जाती है। यहाँ भौतिक इंद्रियों का अभाव होता है, किन्तु मन की सूक्ष्म इंद्रियाँ सक्रिय रहती हैं। यह स्वप्न की वह स्थिति है जहाँ प्रज्ञा प्रकाशमय (तैजस) होती है और सूक्ष्म अनुभवों का सृजन करती है। यह ओंकार का मध्य पद है।
तृतीय अवस्था 'प्राज्ञ' या 'घनप्रज्ञ' की है। जब प्रज्ञा न बाहर की ओर बहती है और न ही भीतर के प्रतिबिंबों में उलझती है, बल्कि एक अखंड घन की भाँति शांत और एकाग्र हो जाती है, तब वह घनप्रज्ञ कहलाती है। यह सुषुप्ति की वह अवस्था है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल शुद्ध आनंद शेष रहता है। यह ओंकार का अंतिम पद है।
महर्षि यहाँ इस रहस्य को खोल रहे हैं कि ये तीनों अवस्थाएँ भिन्न-भिन्न सत्ताएँ नहीं हैं, अपितु 'एक एव त्रिधा' हैं। जैसे एक ही सूर्य की किरणें जल में पड़ने पर अलग, वायु में अलग और दर्पण में अलग प्रतीत होती हैं, वैसे ही वह एक ही अक्षर (ओंकार) अनुभवकर्ता की प्रज्ञा के स्तर के अनुसार विश्व, तैजस और प्राज्ञ के रूप में भासित होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥
स्वप्न जिसका स्थान है, भीतरकी ओर प्रज्ञावाला, सात अङ्ग और उन्नीस मुखवाला, सूक्ष्म (प्रविविक्त) का भोक्ता तैजस — दूसरा पाद।
माण्डूक्य उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि स्वप्न-स्थान वाला वह अन्तःप्रज्ञ है और सूक्ष्म का भोक्ता 'तैजस' है। यह स्मृति उसी उपनिषदीय ज्ञान का विस्तार कर रही है। जहाँ माण्डूक्य उपनिषद् इन पदों की परिभाषा देता है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इन्हें योग-साधना के सोपानों के रूप में प्रस्तुत करती है, ताकि साधक अपनी प्रज्ञा के स्तर को पहचानकर उसे 'घनप्रज्ञ' की ओर ले जा सके।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'साक्षी भाव' का विकास करना है। साधक यह अनुभव करता है कि वह जाग्रत में 'विश्व' है, स्वप्न में 'तैजस' है और गहरी निद्रा में 'प्राज्ञ' है। अभ्यास यह है कि वह इन तीनों अवस्थाओं के बीच उस 'एक' को खोजे जो तीनों में अपरिवर्तित रहता है।
जब साधक जप और ध्यान के माध्यम से अपनी प्रज्ञा को 'बहिःप्रज्ञ' (बाहरी शोर) से हटाकर 'अन्तःप्रज्ञ' (भीतरी सूक्ष्मता) में लाता है, और फिर उस सूक्ष्मता को भी विलीन कर 'घनप्रज्ञ' (अखंड शांति) में स्थित करता है, तब वह प्रज्ञा के स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अक्षर की ओर बढ़ता है। यह यात्रा 'एक' होने की यात्रा है। साधक अनुभव करता है कि अवस्थाएँ बदल रही हैं, किन्तु अनुभव करने वाला वह 'एक' ही है। यही ओंकार का वास्तविक साक्षात्कार है।
दक्षिणाग्निमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।
आकाशे तुर्यदप्राज्ञस्त्रिधा देहे व्यवस्थितः ॥ २.९१ ॥
…विश्व स्वरूप वह दक्षिणाग्निमुख में, तैजस स्वरूप मन के अन्तर्गत और प्राज्ञ स्वरूप आकाश में—इस प्रकार देह में तीन प्रकार से व्यवस्थित है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में चेतना के तीन स्तरों—विश्व, तैजस और प्राज्ञ—का सैद्धांतिक परिचय दिया गया। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य इन तीनों अवस्थाओं के देह में विशिष्ट अधिष्ठान (स्थान) का वर्णन कर रहे हैं, ताकि साधक अपनी चेतना के विस्थापन को शरीर के अंगों और सूक्ष्म केंद्रों के माध्यम से अनुभव कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: विश्वः दक्षिणाग्निमुखे (अस्ति), तैजसः मनस्यन्तः (अस्ति), प्राज्ञः तु आकाशे (अस्ति); (सः) त्रिधा देहे व्यवस्थितः (अस्ति)।
पदार्थ:
• दक्षिणाग्निमुखे: 'दक्षिणाग्नि' यहाँ मुख की अग्नि (जठराग्नि का ऊपरी छोर या वाक्-अग्नि) का संकेत है। मुख वह द्वार है जिससे बाह्य जगत का उपभोग (भोजन, शब्द, गंध) भीतर आता है।
• मनस्यन्तः: मन के अन्तर्गत। यहाँ 'मन' का अर्थ केवल विचार नहीं, बल्कि वह सूक्ष्म इंद्रिय-समूह है जो स्वप्न अवस्था में बाह्य जगत के बिना भी प्रतिबिंबों का निर्माण करता है।
• आकाशे: यहाँ 'आकाश' का अर्थ भौतिक अंतरिक्ष नहीं, अपितु 'हृदयाकाश' है—वह सूक्ष्म शून्य या अंतराल जहाँ आत्मा का प्रतिबिंब सबसे शुद्ध रूप में स्थित होता है।
• तुर्यदप्राज्ञः: पाठ के अनुसार यहाँ 'प्राज्ञ' शब्द मुख्य है। 'तुर्य' का संकेत उस चतुर्थ अवस्था की ओर है जो इन तीनों का आधार है, किन्तु यहाँ 'प्राज्ञ' (सुषुप्ति का अधिष्ठाता) के स्थान की चर्चा है।
• त्रिधा देहे व्यवस्थितः: वह एक ही चेतना देह के तीन भिन्न स्तरों पर प्रतिष्ठित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य यह रहस्य खोल रहे हैं कि ओंकार के तीन पद केवल दार्शनिक अवधारणाएँ नहीं हैं, बल्कि वे देह के भीतर विशिष्ट स्थानों पर अनुभव किए जा सकते हैं।
प्रथम अवस्था 'विश्व' है। यह जाग्रत अवस्था है, जिसका संबंध स्थूल शरीर और बाह्य जगत से है। इसका अधिष्ठान 'दक्षिणाग्निमुख' है। मुख वह केंद्र है जहाँ से जीव जगत का स्वाद लेता है और वाणी के माध्यम से व्यक्त होता है। जब चेतना मुख और इंद्रियों के द्वार पर स्थित होती है, तब वह 'विश्व' कहलाती है, क्योंकि वह स्वयं को अनेक रूपों वाले संसार में विभाजित देखती है।
द्वितीय अवस्था 'तैजस' है। यह स्वप्न अवस्था है। जब चेतना बाह्य इंद्रियों के द्वार (मुख आदि) को छोड़कर भीतर की ओर मुड़ती है, तो वह 'मनस्यन्तः' अर्थात् मन के भीतर स्थित हो जाती है। यहाँ वह भौतिक अग्नि के बजाय सूक्ष्म प्रकाश (तेज) के सहारे अनुभव करती है। इसीलिए इस अवस्था का नाम 'तैजस' है। यहाँ भोक्ता और भोज्य दोनों सूक्ष्म होते हैं।
तृतीय अवस्था 'प्राज्ञ' है। यह सुषुप्ति (गहरी निद्रा) की अवस्था है। यहाँ चेतना मन के सूक्ष्म प्रतिबिंबों को भी छोड़कर 'आकाश' में स्थित हो जाती है। यह आकाश 'हृदयाकाश' है—वह शून्य जहाँ न कोई विचार है, न कोई इच्छा, न कोई स्वप्न। यहाँ जीव अखंड आनंद और घन-प्रज्ञा में लीन रहता है।
अतः, वह एक ही पुरुष या चेतना देह में तीन रूपों में व्यवस्थित है: बाह्य द्वार (मुख) पर विश्व के रूप में, सूक्ष्म यंत्र (मन) में तैजस के रूप में और सूक्ष्म अंतराल (हृदयाकाश) में प्राज्ञ के रूप में।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक चेतना के 'प्रत्याहार' और 'अंतर्मुखता' का व्यावहारिक मानचित्र है।
१. विश्व-अभ्यास: जब साधक अपनी चेतना को मुख और इंद्रियों के द्वार पर स्थिर कर देखता है कि वह कैसे बाह्य जगत से जुड़ा है, तब वह 'विश्व' रूपी स्थूल चेतना का साक्षी बनता है।
२. तैजस-अभ्यास: जब साधक प्राणों के माध्यम से चेतना को मुख से हटाकर मन के भीतर (अंतःप्रज्ञ) ले जाता है, तब वह सूक्ष्म जगत और मानसिक वृत्तियों का अनुभव करता है। यह अवस्था स्वप्न और ध्यान के बीच की संधि है।
३. प्राज्ञ-अभ्यास: जब साधक मन के वृत्तियों को भी शांत कर अपनी चेतना को हृदयाकाश के शून्य में विलीन करता है, तब वह 'प्राज्ञ' भूमि को प्राप्त होता है। यहाँ वह अनुभव करता है कि वह न शरीर है, न मन, बल्कि वह अखंड चैतन्य है।
साधक इस अभ्यास से 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' और 'सूक्ष्म' से 'कारण' (अक्षर) की ओर बढ़ता है। मुख से मन तक की यात्रा 'प्रत्याहार' है, और मन से हृदयाकाश तक की यात्रा 'ध्यान' और 'समाधि' की ओर ले जाने वाला मार्ग है। इस प्रकार वह देह के तीन स्तरों को पार कर उस तुरीय अवस्था की ओर अग्रसर होता है, जो इन तीनों का आधार है।
स्थूलो वैश्वानरो नित्यं तैजसोन्तः प्रकृतिभुक् ।
आनन्दभुक् तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा भवेत् ॥ २.९२ ॥
वैश्वानर (विश्व) सदा स्थूलका भोक्ता है, तैजस भीतर प्रकृति (सूक्ष्म) का भोक्ता है, और प्राज्ञ आनन्दका भोक्ता — एक ही तीन प्रकारका होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में चेतना के तीन स्तरों—विश्व, तैजस और प्राज्ञ—के देह में विशिष्ट अधिष्ठान (स्थान) का वर्णन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि इन तीनों स्थानों पर प्रतिष्ठित होने के कारण उस एक ही चेतना के 'भोग' (अनुभव) का स्वरूप किस प्रकार भिन्न-भिन्न होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: स्थूलः वैश्वानरः नित्यं (स्थूलस्य) प्रकृतिभुक् (अस्ति), तैजसः (नित्यं) अन्तः प्रकृतिभुक् (अस्ति), तथा प्राज्ञः आनन्दभुक् (अस्ति); (सः) एकः एव त्रिधा भवेत्।
पदार्थ:
• वैश्वानर: जाग्रत अवस्था का वह स्वरूप जो समस्त जगत में व्याप्त है। यहाँ 'वैश्वानर' का अर्थ उस अग्नि के समान प्रदीप्त चेतना से है जो स्थूल इंद्रियों के माध्यम से जगत का अनुभव करती है।
• प्रकृतिभुक्: प्रकृति का भोग करने वाला। यहाँ 'प्रकृति' का अर्थ है स्थूल पदार्थ और इंद्रिय-विषय।
• तैजस: स्वप्न अवस्था का स्वरूप। यह 'तेजस' या सूक्ष्म प्रकाश रूप है, जो बाह्य जगत के अभाव में भी मानसिक प्रतिबिंबों का उपभोग करता है।
• अन्तः प्रकृतिभुक्: भीतर की प्रकृति का भोक्ता। यहाँ 'अन्तः प्रकृति' का अर्थ सूक्ष्म शरीर (मन, बुद्धि, चित्त) और उनके द्वारा रचित सूक्ष्म विषयों से है।
• प्राज्ञ: सुषुप्ति अवस्था का स्वरूप। यह प्रज्ञानघन है, जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
• आनन्दभुक्: आनन्द का भोक्ता। यहाँ भोग का अर्थ किसी वस्तु का उपभोग नहीं, अपितु स्वयं के स्वरूप में स्थित होने का परमानन्द है।
• एक एव त्रिधा भवेत्: वह चेतना एक ही है, किन्तु अनुभव के स्तर के अनुसार तीन प्रकार की प्रतीत होती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य उस एक ही चैतन्य तत्त्व के तीन भिन्न 'भोग-रूपों' का विश्लेषण कर रहे हैं। साधक के लिए यह समझना अनिवार्य है कि वह जिसे 'मैं' कहता है, वह वास्तव में एक ही पुरुष है, जो अपनी दृष्टि के विस्थापन के कारण अलग-अलग अनुभवों में बँटा हुआ प्रतीत होता है।
प्रथम अवस्था में वह 'वैश्वानर' है। जब चेतना का मुख बाह्य जगत की ओर होता है, तब वह स्थूल इंद्रियों के माध्यम से भौतिक प्रकृति का अनुभव करती है। इसे 'स्थूलभुक्' कहा गया है। यहाँ भोग का अर्थ है—रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द का अनुभव। यह अवस्था नित्य है क्योंकि जब तक देह है, बाह्य जगत का यह संपर्क बना रहता है।
द्वितीय अवस्था में वही चेतना 'तैजस' बन जाती है। जब इंद्रियाँ निवृत्त होकर भीतर की ओर मुड़ती हैं (प्रत्याहार की स्थिति), तब वह बाह्य प्रकृति के बजाय 'अन्तः प्रकृति' का भोग करती है। स्वप्न में हम जो कुछ भी देखते या अनुभव करते हैं, वह बाह्य जगत का सूक्ष्म प्रतिबिंब मात्र होता है। अतः तैजस 'प्रविविक्त-भुक्' या सूक्ष्म-भोक्ता है।
तृतीय अवस्था में वह 'प्राज्ञ' कहलाता है। सुषुप्ति में न बाह्य प्रकृति रहती है, न सूक्ष्म प्रतिबिंब। वहाँ केवल शुद्ध चेतना का एकत्व शेष रहता है। यहाँ भोग का स्वरूप 'आनन्द' है। यह वह स्थिति है जहाँ भोक्ता और भोग्य का भेद मिट जाता है और आत्मा स्वयं के स्वरूप में विश्राम करती है।
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह रहस्य खोल रहे हैं कि ये तीनों अवस्थाएँ अलग-अलग सत्ताएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही 'ओंकार' के तीन पद हैं। जैसे एक ही सूर्य की किरणें अलग-अलग माध्यमों (काँच, जल, वायु) से गुजरने पर भिन्न प्रतीत होती हैं, वैसे ही एक ही आत्मा स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के माध्यम से तीन प्रकार के भोगों का अनुभव करती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
माण्डूक्य उपनिषद् में इन तीनों पदों के भोग-स्वरूप का स्पष्ट वर्णन मिलता है:
जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ ३ ॥
जाग्रत् जिसका स्थान है, जिसकी प्रज्ञा बाहरकी ओर है, सात अङ्ग और उन्नीस मुखवाला, स्थूलका भोक्ता वैश्वानर — पहला पाद।
यहाँ वैश्वानर को 'स्थूलभुक्' कहा गया है, जो जाग्रत अवस्था में सात अंगों और उन्नीस मुखों (इंद्रियों) के माध्यम से बाह्य जगत का अनुभव करता है। यह स्मृति के 'स्थूल प्रकृतिभुक्' के साथ पूर्णतः मेल खाता है।
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥
जहाँ सोया हुआ न कोई कामना करता है, न कोई स्वप्न देखता है — वह सुषुप्ति है। सुषुप्ति जिसका स्थान है, एकीभूत, प्रज्ञानघन, आनन्दमय, आनन्दका भोक्ता, चेतना ही जिसका मुख है — वह प्राज्ञ तीसरा पाद है।
यहाँ प्राज्ञ के विषय में कहा गया है कि वह 'आनन्दभुक्' है और 'चेतोमुख' (चेतना ही जिसका मुख है) है। जब वह सुषुप्ति में होता है, तो वह किसी बाहरी कामना या स्वप्न का अनुभव नहीं करता, बल्कि प्रज्ञानघन होकर स्वयं में लीन रहता है।
इस प्रकार, बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और माण्डूक्य उपनिषद् दोनों इस बात पर सहमत हैं कि चेतना के स्तर के अनुसार भोग का स्वरूप बदलता है—स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से आनन्दमय की ओर।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'भोग' के रूपांतरण का अभ्यास है। साधारण मनुष्य केवल 'वैश्वानर' भाव में जीता है, जहाँ वह स्थूल प्रकृति के सुख-दुःख में फँसा रहता है। योगी का अभ्यास यह है कि वह अपनी चेतना को स्थूल से सूक्ष्म (तैजस) और सूक्ष्म से कारण (प्राज्ञ) की ओर ले जाए।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक यह अनुभव करे कि जिस आनंद को वह बाहर स्थूल वस्तुओं में खोज रहा है, वह वास्तव में उसके भीतर 'प्राज्ञ' स्वरूप में सदैव विद्यमान है। जब वह यह जान लेता है कि "मैं स्थूलभुक् नहीं, अपितु आनन्दभुक् हूँ", तब उसकी दृष्टि बदल जाती है।
यह श्लोक साधक को 'भोक्ता' से 'साक्षी' की ओर ले जाता है। जब वह देखता है कि एक ही चेतना तीन अलग-अलग स्तरों पर भोग कर रही है, तो वह स्वयं को इन तीनों अवस्थाओं से ऊपर उठकर देखने लगता है। यह वह भूमि है जहाँ से साधक 'त्रिपद' (तीन पदों) से ऊपर उठकर 'तुरीय' (चतुर्थ अवस्था) की ओर प्रस्थान करता है, जहाँ न प्रकृति का भोग है, न प्रतिबिंबों का, बल्कि केवल शुद्ध अक्षर-ब्रह्म का साक्षात्कार है।
सत्वाश्चैव प्रयत्नेन ब्रह्मा(ह्म)भवति मानवः ।
स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ॥ २.९३ ॥
सत्त्व (शुद्धि) और प्रयत्नसे मनुष्य ब्रह्म होता है। स्थूल (भोग) विश्वको तृप्त करता है, और प्रविविक्त (सूक्ष्म भोग) तैजसको —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में चेतना के तीन स्तरों—विश्व, तैजस और प्राज्ञ—के भोग के स्वरूप (स्थूल, सूक्ष्म और आनन्द) का विवेचन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य यह बता रहे हैं कि एक साधारण मानव इन तीन अवस्थाओं के चक्र से ऊपर उठकर उस परम तत्त्व 'ब्रह्म' में किस प्रकार रूपांतरित होता है और इन अवस्थाओं की तृप्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: मानवः सत्त्वैः च (तथा) प्रयत्नेन ब्रह्मा भवति। स्थूलं (भोज्यं) विश्वं तर्पयते, प्रविविक्तं (भोज्यं) तु तैजसम् (तर्पयते)।
पदार्थ:
• सत्त्वैः: यहाँ 'सत्त्व' का अर्थ केवल गुण नहीं, अपितु 'शुद्धि' और 'सात्त्विक भावों' से है। चित्त की वह निर्मलता जो रज और तम के आवरण को हटा देती है।
• प्रयत्नेन: योगिक पुरुषार्थ। यह केवल शारीरिक श्रम नहीं, अपितु निरंतर सजगता, अभ्यास और वैराग्य का सम्मिलित प्रयास है।
• ब्रह्मा भवति: ब्रह्म हो जाता है। यह अवस्था 'अहं ब्रह्मास्मि' के अनुभव की है, जहाँ भोक्ता और भोज्य का भेद मिट जाता है।
• तर्पयते: तृप्त करना। यहाँ तृप्ति का अर्थ इंद्रिय-सुख नहीं, अपितु उस स्तर की चेतना की भूख का शांत होना है।
• प्रविविक्तं: पृथक, सूक्ष्म या विविक्त। जो स्थूल इंद्रियों की पहुँच से दूर, केवल मन के सूक्ष्म स्तर पर अनुभव हो।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा के लक्ष्य और उसकी प्रक्रिया को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य जन्म से ब्रह्म नहीं होता, अपितु वह 'सत्त्व' और 'प्रयत्न' के माध्यम से ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है।
यहाँ 'सत्त्व' का अर्थ है—चित्त की वह शुद्धि जिससे वह दर्पण के समान स्वच्छ हो जाए। जब तक मन में काम, क्रोध और लोभ के विकार हैं, तब तक वह केवल 'विश्व' (जाग्रत) और 'तैजस' (स्वप्न) के द्वैत में भटकता रहता है। जब साधक सत्त्व-गुण को प्रधान बनाता है, तब उसके भीतर 'प्रयत्न' की क्षमता जागती है। यह प्रयत्न ही वह सेतु है जो उसे स्थूल जगत के मोह से निकालकर सूक्ष्म जगत की ओर और अंततः ब्रह्म की ओर ले जाता है। 'ब्रह्मा भवति' का अर्थ है—अपनी सीमित पहचान (अहंकार) को त्यागकर उस व्यापक चेतना में विलीन हो जाना, जो ओंकार का वास्तविक स्वरूप है।
श्लोक का दूसरा भाग तृप्ति के मनोविज्ञान को समझाता है। चेतना के अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग प्रकार के 'भोज्य' (अनुभव) होते हैं।
'विश्व' वह स्वरूप है जो जाग्रत अवस्था में रहता है। इसकी तृप्ति 'स्थूल' विषयों से होती है। अन्न, जल, स्पर्श और दृश्य जगत के स्थूल अनुभव विश्व-रूप जीव को तृप्त करते हैं। किन्तु यह तृप्ति क्षणिक है क्योंकि स्थूल विषय नाशवान हैं।
इसके विपरीत, 'तैजस' वह स्वरूप है जो स्वप्न अवस्था में सक्रिय होता है। यहाँ स्थूल शरीर और स्थूल विषय नहीं होते, अपितु केवल मन के सूक्ष्म प्रतिबिंब होते हैं। इसलिए तैजस की तृप्ति 'प्रविविक्त' (सूक्ष्म) विषयों से होती है। स्वप्न में हम जो सुख या दुख अनुभव करते हैं, वह प्रविविक्त भोग है। यह स्थूल से अधिक सूक्ष्म है, किन्तु फिर भी यह माया का ही एक रूप है।
महर्षि यह संकेत दे रहे हैं कि जैसे-जैसे साधक की चेतना ऊपर उठती है, उसकी तृप्ति के साधन बदलते जाते हैं—स्थूल से सूक्ष्म की ओर।
शास्त्र-साक्ष्य —
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥
स्वप्न जिसका स्थान है, भीतरकी ओर प्रज्ञावाला, सात अङ्ग और उन्नीस मुखवाला, सूक्ष्म (प्रविविक्त) का भोक्ता तैजस — दूसरा पाद।
माण्डूक्य उपनिषद् में तैजस के विषय में कहा गया है कि वह 'प्रविविक्तभुक्तैजसः' है, अर्थात् सूक्ष्म का भोक्ता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी उपनिषदिक सत्य को पुष्ट करती है कि तैजस का क्षेत्र स्थूल जगत से पृथक (प्रविविक्त) है। जहाँ उपनिषद् केवल अवस्था का वर्णन करता है, वहीं यह स्मृति 'सत्त्व' और 'प्रयत्न' को जोड़कर उस अवस्था से पार जाने का मार्ग भी दिखाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'तृप्ति के सोपानों' का अभ्यास है। साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि उसकी इच्छाएँ किस स्तर की हैं।
१. यदि वह केवल भौतिक सुखों में तृप्ति खोज रहा है, तो वह 'विश्व' स्तर पर है।
२. यदि वह कल्पनाओं, मानसिक सुखों और सूक्ष्म मानसिक आनंद में लिप्त है, तो वह 'तैजस' स्तर पर है।
योग का अभ्यास यहाँ यह है कि साधक 'सत्त्व' (शुद्धि) और 'प्रयत्न' (अभ्यास) के द्वारा अपनी तृप्ति को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाए और अंततः उस 'प्राज्ञ' अवस्था (जिसका वर्णन अगले श्लोक में है) में पहुँचे जहाँ किसी बाहरी भोज्य की आवश्यकता नहीं रहती।
साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि ब्रह्मत्व कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक सचेत प्रयास (प्रयत्न) है। जब वह यह जान लेता है कि स्थूल और सूक्ष्म दोनों भोग अंततः उसे बांधते हैं, तब वह 'अमात्र ओंकार' की उस स्थिति की ओर बढ़ता है जहाँ तृप्ति का अर्थ 'भोग' नहीं, अपितु 'पूर्णता' हो जाता है।
आनन्दश्च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं निबोधत ।
त्रिषु धामसु यद्भोज्यं भोक्ता यस्तु प्रकीर्तितः ॥ २.९४ ॥
…और आनन्द स्वरूप प्राज्ञ को भी (तृप्त करता है), इस प्रकार की त्रिविध तृप्ति को जानो। तीनों धामों में जो भोज्य है और जो भोक्ता कहा गया है —...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि स्थूल भोग 'विश्व' को और सूक्ष्म (प्रविविक्त) भोग 'तैजस' को तृप्त करता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस त्रिविध तृप्ति के चक्र को पूर्ण करते हुए 'प्राज्ञ' की अवस्था और भोक्ता-भोज्य के रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तथा) आनन्दः (च) प्राज्ञं (तर्पयते), (एतानि) त्रिधा तृप्तिं निबोधत। त्रिषु धामसु यत् भोज्यं (अस्ति) और यः भोक्ता प्रकीर्तितः (सः)...
पदार्थ:
• आनन्दः: यहाँ आनन्द केवल एक मानसिक सुख नहीं, अपितु वह 'स्वप्रकाशित' अवस्था है जहाँ चेतना अपनी ही पूर्णता में स्थित होती है। यह सुषुप्ति की वह अवस्था है जहाँ कोई बाहरी विषय नहीं होता, केवल शुद्ध अस्तित्व का सुख होता है।
• प्राज्ञं: वह चेतना जो घनप्रज्ञ है। जो सूक्ष्म प्रवृत्तियों से भी ऊपर उठकर गहन निद्रा या समाधि की स्थिति में स्थित है।
• त्रिधा तृप्तिं: तीन स्तरों की संतुष्टि—स्थूल (विश्व), सूक्ष्म (तैजस) और कारण/आनन्द (प्राज्ञ)।
• निबोधत: जानो या अनुभव करो। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु 'बोध' का निर्देश है।
• त्रिषु धामसु: तीन स्थानों या अवस्थाओं में। यहाँ 'धाम' का अर्थ है चेतना के तीन स्तर—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति।
• भोज्यं: वह विषय जिसे भोगा जाता है।
• भोक्ता: वह जो अनुभव करता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य चेतना के तीन स्तरों की तृप्ति का उपसंहार कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने बताया कि स्थूल जगत विश्व को तृप्त करता है और सूक्ष्म जगत तैजस को; अब वे कहते हैं कि 'आनन्द' रूपी भोज्य 'प्राज्ञ' को तृप्त करता है।
यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य यह है कि जैसे-जैसे साधक ऊपर उठता है, 'भोज्य' (भोगने योग्य वस्तु) बदलती जाती है। जाग्रत अवस्था में हम मिट्टी, पत्थर, अन्न आदि स्थूल वस्तुओं से तृप्ति खोजते हैं। स्वप्न अवस्था में हम सूक्ष्म मानसिक संकल्पों और इच्छाओं से तृप्त होते हैं। किंतु जब साधक 'प्राज्ञ' की अवस्था में पहुँचता है, तो वहाँ न कोई स्थूल वस्तु होती है, न कोई सूक्ष्म संकल्प; वहाँ केवल 'आनन्द' ही भोज्य है और वही भोक्ता भी।
ऋषि कहते हैं—'त्रिधा तृप्तिं निबोधत'। इस त्रिविध तृप्ति को जानना इसलिए आवश्यक है ताकि साधक यह समझ सके कि वह जिस तृप्ति को बाहर खोज रहा है, वह वास्तव में उसकी चेतना के स्तरों का खेल है।
श्लोक का दूसरा भाग एक महान प्रश्न खड़ा करता है: "तीनों धामों में जो भोज्य है और जो भोक्ता कहा गया है..."। यहाँ याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि यद्यपि हमें तीन भोक्ता (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) और तीन भोज्य (स्थूल, सूक्ष्म, आनन्द) दिखाई दे रहे हैं, किंतु वास्तव में ये अलग-अलग नहीं हैं। यह एक ही पुरुष की तीन अवस्थाएँ हैं। जो 'भोज्य' है, वह भी उसी एक पुरुष का विस्तार है और जो 'भोक्ता' है, वह भी वही है। यह विन्यास साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि अंततः भोक्ता और भोज्य का भेद मिट जाना ही वास्तविक मुक्ति है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'साक्षी भाव' का अभ्यास है। साधक अपनी दिनचर्या में यह (निरीक्षण) करे कि जब वह स्थूल जगत में होता है, तो उसकी तृप्ति बाहरी वस्तुओं पर टिकी होती है। जब वह ध्यान में उतरता है और सूक्ष्म संकल्पों का अनुभव करता है, तो वह 'तैजस' की तृप्ति है। और जब वह गहरे मौन या निद्रा जैसी समाधि में होता है, जहाँ केवल एक 'अखंड आनन्द' शेष रहता है, तो वह 'प्राज्ञ' की तृप्ति है।
योगिक दृष्टि से यह अभ्यास साधक को 'भोज्य' से 'भोक्ता' की ओर ले जाता है। साधक अनुभव करता है कि वह केवल वह नहीं है जो भोग रहा है, बल्कि वह वह 'चेतना' है जिसमें ये तीनों धाम (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) घटित हो रहे हैं। जब वह इस त्रिविध तृप्ति को पहचान लेता है, तब वह उस 'तुरीय' अवस्था की ओर बढ़ता है जहाँ न कुछ भोगने योग्य बचता है और न ही कोई भोक्ता—केवल शुद्ध अस्तित्व शेष रहता है।
उभयं विन्दते यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ।
प्रभवः सर्वभूतानां सतामिति विनिश्चयः ॥ २.९५ ॥
…जो इन दोनों को प्राप्त करता है, वह भोगता हुआ भी लिप्त नहीं होता; सब सत् भावों की उत्पत्ति उसी से होती है — यह निश्चय है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने तीन धामों (जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति) में भोज्य और भोक्ता के संबंध को स्पष्ट किया था। अब इस श्लोक में वे उस परम स्थिति का वर्णन कर रहे हैं जहाँ भोक्ता और भोज्य का द्वैत समाप्त हो जाता है और साधक अलिप्तता का अनुभव करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यस्तु उभयं (भोज्यं भोक्तारं च) विन्दते, स (पुरुषः) भुञ्जानो न लिप्यते। सताम् सर्वभूतानां प्रभवः (स एव) इति विनिश्चयः।
पदार्थ:
• उभयं: यहाँ 'उभय' का अर्थ है—भोज्य (भोग का विषय) और भोक्ता (अनुभव करने वाला)। यह द्वैत की वह स्थिति है जहाँ एक 'भोगने वाला' है और दूसरा 'भोग्य' पदार्थ।
• विन्दते: केवल जानना नहीं, अपितु 'प्राप्त करना' या 'साक्षात्कार करना'। जब साधक यह जान लेता है कि भोक्ता और भोज्य दोनों ही एक ही चेतना के विभिन्न विवर्त (प्रकटीकरण) हैं, तब वह इसे 'विन्दते' कहलाता है।
• न लिप्यते: लिप्त न होना। जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी गीला नहीं होता, वैसे ही चेतना विषयों के बीच रहकर भी उनसे प्रभावित नहीं होती।
• प्रभवः: उत्पत्ति का मूल कारण, स्रोत।
• सताम्: सत् भावों का। यहाँ 'सत्' का अर्थ है वह जो वास्तव में अस्तित्ववान है, अविनाशी है।
• विनिश्चयः: यह केवल मत नहीं, अपितु अनुभवजन्य सत्य है जिसे संशय से परे जाना गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस 'साक्षी भाव' का रहस्य खोल रहे हैं जो योग की उच्चतम अवस्था है। पिछले श्लोक में उन्होंने बताया कि तीन धामों में भोज्य और भोक्ता का वर्णन है। यहाँ वे कहते हैं कि जो साधक इन दोनों—भोज्य और भोक्ता—के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, वह 'अलिप्त' हो जाता है।
साधारण मनुष्य के लिए भोग और लिप्तता एक ही हैं; वह जो भोगता है, उसी में बँध जाता है। किंतु योगी के लिए 'विन्दते' (जानना) ही मुक्ति है। जब साधक यह अनुभव करता है कि बाहरी जगत (भोज्य) और उसे अनुभव करने वाला मन/इन्द्रिय (भोक्ता) दोनों ही उस एक ही चैतन्य के प्रतिबिंब हैं, तब वह भोग के बीच रहकर भी उससे अछूता रहता है। वह भुँजता तो है, किंतु वह भोग उसके भीतर संस्कार नहीं बनाता। यह स्थिति 'अलिप्तता' है।
श्लोक का दूसरा भाग एक महान घोषणा है—'प्रभवः सर्वभूतानां सतामिति विनिश्चयः'। यहाँ याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि वह पुरुष जो भोक्ता-भोज्य के द्वैत से ऊपर उठकर साक्षी हो गया है, वही समस्त सत् भावों का मूल कारण (प्रभव) है। इसका रहस्य यह है कि जब हम द्वैत (मैं और मेरा विषय) को पार करते हैं, तब हम उस 'एक' में स्थित होते हैं जिससे यह संपूर्ण सृष्टि उत्पन्न हुई है। अतः, जो स्वयं को अलिप्त साक्षी के रूप में जानता है, वह वास्तव में उस ब्रह्म का अनुभव करता है जो समस्त प्राणियों का उद्गम है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साक्षी-भाव' के अभ्यास का निर्देश है। योग का अर्थ केवल इन्द्रियों का दमन नहीं, अपितु उनके प्रयोग के समय भी 'जानने वाले' की स्थिति में बने रहना है।
साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि जब वह भोजन करता है, चलता है, बोलता है या सोता है, तो वह केवल क्रिया का कर्ता न बने, बल्कि उस क्रिया को देखने वाला 'द्रष्टा' बने। वह अनुभव करता है कि: "शरीर और मन भोग रहे हैं, किंतु मैं वह शुद्ध चेतना हूँ जो इस भोग को देख रही है।"
जब साधक 'भोज्य' (विषय) और 'भोक्ता' (अहंकार) दोनों को एक ही पर्दे पर चलते हुए चित्रों की भाँति देखता है, तब वह 'लिप्त' होना बंद कर देता है। यह अभ्यास उसे 'विश्व' और 'तैजस' की भूमियों से उठाकर 'प्राज्ञ' और अंततः उस 'तुरीय' स्थिति की ओर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को समस्त सत् भावों का प्रभव (स्रोत) अनुभव करता है। यहाँ साधक का रूपांतरण 'भोक्ता' से 'साक्षी' में और 'साक्षी' से 'ब्रह्म' में होता है।
पाशुपतमतम्
प्रणवः सूयते सर्वं वेत्ता यः पुरुषः स्मृतः ।
व्यवस्थानं त्रिभोक्तारं त्रिभोज्यं च तथा परम् ॥ २.९६ ॥
प्रणव से सब उत्पन्न होता है; जो जाननेवाला है वह पुरुष स्मृत है, (वह प्रणव) तीन व्यवस्थानों वाला, तीन भोक्ताओं वाला, तीन भोज्यों वाला और परम है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह निश्चय किया गया था कि जो भोक्ता और भोज्य के स्वरूप को जान लेता है, वह अलिप्त रहता है और वही समस्त सत्भावों का मूल है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस मूल स्रोत—प्रणव—के स्वरूप को पाशुपत मत के आलोक में विस्तृत कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सर्वं प्रणवः सूयते, यः पुरुषः स्मृतः (सः) वेत्ता (अस्ति)। (सः प्रणवः) त्रिभोज्यं च तथा त्रिभोक्तारं (च) व्यवस्थानं परम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• प्रणवः सूयते: 'सूयते' का अर्थ है—उत्पन्न होना या विवर्तित होना। यहाँ प्रणव (ओंकार) को केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु उस आदि-शक्ति के रूप में देखा गया है जिससे संपूर्ण सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ है।
• वेत्ता पुरुषः: 'वेत्ता' वह है जो जानता है। यहाँ पुरुष का अर्थ शरीर नहीं, अपितु वह चेतन तत्व है जो ज्ञाता है। जब प्रणव अपनी पूर्णता में होता है, तो वह 'वेत्ता पुरुष' के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
• व्यवस्थानं: स्थिति या विन्यास। वह परम तत्व जिस प्रकार संसार में स्वयं को व्यवस्थित करता है, उसे व्यवस्थान कहते हैं।
• त्रिभोक्ता और त्रिभोज्य: तीन प्रकार के भोगने वाले (भोक्ता) और तीन प्रकार के भोग के विषय (भोज्य)। यह सृष्टि के त्रिविध आयामों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) का संकेत है।
• परम्: वह जो इन तीनों स्थितियों से परे है; जो सर्वोच्च, अखण्ड और अविनाशी है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य प्रणव के उस स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं जो सृष्टि के निर्माण और उसके संचालन का आधार है। वे कहते हैं कि यह संपूर्ण जगत, चाहे वह जड़ हो या चेतन, वास्तव में प्रणव से ही उत्पन्न हुआ है। प्रणव वह बीज है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड संकुचित अवस्था में विद्यमान है और प्रकटीकरण के समय वही विस्तार लेता है।
यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य है—प्रणव केवल एक मंत्र नहीं है, अपितु वह 'वेत्ता पुरुष' है। इसका भाव यह है कि जिस चेतना ने इस जगत की रचना की, वही चेतना 'ओं' के रूप में अभिव्यक्त होती है। जब हम ओंकार का जप करते हैं, तो हम वास्तव में उस जानने वाले पुरुष (परमात्मा) का ही आह्वान कर रहे होते हैं।
आगे ऋषि इस प्रणव की कार्य-पद्धति बताते हैं कि वह 'त्रिभोज्य' और 'त्रिभोक्ता' के रूप में व्यवस्थित है। इसका अर्थ है कि परमात्मा ने स्वयं को तीन स्तरों पर विभाजित किया है ताकि सृष्टि का खेल चल सके। एक स्तर पर वह भोगने वाला (भोक्ता) है और दूसरे स्तर पर वह भोग का विषय (भोज्य) है। यह द्वैत केवल व्यावहारिक स्तर पर है; वास्तव में वह 'परम्' है—अर्थात इन तीनों स्थितियों (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति या स्थूल, सूक्ष्म, कारण) से ऊपर उठा हुआ एक अखंड तत्व है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है: पहले वह 'प्रणव' है (ध्वनि/बीज), फिर वह 'वेत्ता पुरुष' है (चेतना), फिर वह 'त्रि-व्यवस्थान' है (सृष्टि का संचालन), और अंततः वह 'परम्' है (परम पद)।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'प्रतिलोम' दिशा में होता है। संसार 'प्रणव' से उत्पन्न हुआ (विस्तार), किंतु साधक 'प्रणव' के माध्यम से वापस उस 'परम्' पुरुष में विलीन होता है (संकुचन)।
अभ्यास यह है कि जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल ध्वनि का उच्चारण न करे, बल्कि यह अनुभव करे कि वह 'वेत्ता पुरुष' है। वह स्वयं को उन तीन भोक्ताओं और तीन भोज्यों के द्वैत से ऊपर उठाकर उस 'परम्' स्थिति में स्थित करे। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह जो देख रहा है (भोज्य) और जो देख रहा है (भोक्ता), दोनों ही उसी एक प्रणव के विवर्त हैं। जब यह बोध घटित होता है, तब साधक 'त्रि-व्यवस्थान' की सीमाओं को तोड़कर उस अक्षर-ब्रह्म में स्थित हो जाता है, जहाँ केवल शुद्ध ज्ञान और आनंद शेष रहता है।
एवं पाशुपते विद्यात् सिद्धान्ते प्रणवं विभुम् ।
शान्तं घोरं तथा मूढं त्रिरवस्थानमेव तु ॥ २.९७ ॥
…इस प्रकार पाशुपत सिद्धान्त में विभु प्रणव को जानो; शान्त, घोर तथा मूढ — ये तीन अवस्थान ही हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में प्रणव को संपूर्ण सृष्टि का मूल, ज्ञाता पुरुष तथा त्रिभोक्ता-त्रिभोज्य के व्यवस्थान वाला परम तत्व बताया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य पाशुपत मत के अनुसार उस विभु प्रणव की तीन विशिष्ट अवस्थाओं का वर्णन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एवं पाशुपते (सिद्धान्ते) विभुम् प्रणवं शान्तं, घोरं तथा मूढं (इति) त्रिरवस्थानमेव तु विद्यात्।
पदार्थ:
• पाशुपते: पाशुपत मत या सिद्धान्त में। यह शिव-परम्परा का वह प्राचीन ज्ञान है जो जीव (पाश) और ईश्वर (पशुपति) के सम्बन्ध और मोक्ष की व्याख्या करता है।
• विभुम्: सर्वव्यापी, व्यापक और असीम। जो किसी एक स्थान या सीमा में बँधा नहीं है, अपितु समस्त अस्तित्व में व्याप्त है।
• प्रणवं: ओंकार। यहाँ प्रणव केवल मन्त्र नहीं, अपितु वह परम सत्ता है जो ध्वनि और मौन दोनों का आधार है।
• शान्तं, घोरं, मूढं: ये प्रणव की तीन अवस्थाएँ या अभिव्यक्तियाँ हैं। 'शान्त' वह स्वरूप है जो कल्याणकारी और स्थिर है; 'घोर' वह है जो संहारक, तीव्र और अनुशासनप्रिय है; 'मूढ' वह है जो माया के आवरण में छिपा हुआ या जड़ता का कारण प्रतीत होता है।
• त्रिरवस्थानमेव: केवल तीन ही अवस्थान (स्थितियाँ)। 'अवस्थान' का अर्थ है—ठहराव या स्थिति।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पाशुपत सिद्धान्त के आलोक में प्रणव के विभु स्वरूप का विश्लेषण कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जो प्रणव सर्वव्यापी (विभु) है, वह साधक के अनुभव और सृष्टि के संचालन के स्तर पर तीन भिन्न अवस्थाओं में दृष्टिगोचर होता है: शान्त, घोर और मूढ।
प्रथम 'शान्त' अवस्था वह है जहाँ प्रणव अपनी पूर्ण करुणा और स्थिरता में स्थित है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक को शांति, आनंद और मोक्ष का अनुभव होता है। यह शिव का वह स्वरूप है जो जगत का पालन करता है और साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
द्वितीय 'घोर' अवस्था वह है जहाँ प्रणव अपनी शक्ति और तीव्रता के साथ प्रकट होता है। यह घोरता विनाशक नहीं, अपितु अविद्या का नाश करने वाली है। जिस प्रकार अग्नि अशुद्धियों को जला देती है, उसी प्रकार प्रणव का यह घोर स्वरूप साधक के अहंकार और मानसिक विकारों का दहन करता है। यह अनुशासन और तप की वह अग्नि है जो साधक को शुद्ध करती है।
तृतीय 'मूढ' अवस्था का अर्थ यहाँ अज्ञान नहीं, अपितु वह 'प्रच्छन्न' (छिपा हुआ) स्वरूप है। जब वह विभु तत्व माया के आवरण में स्वयं को सीमित कर लेता है ताकि सृष्टि का खेल चल सके, तब वह 'मूढ' या जड़ता के समान प्रतीत होता है। यह वह अवस्था है जहाँ परमात्मा स्वयं को जीव के रूप में अनुभव करता है या जीव उसे पहचान नहीं पाता।
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि जिसे हम अलग-अलग गुण (शांति, क्रोध या जड़ता) समझते हैं, वे वास्तव में एक ही विभु प्रणव की तीन स्थितियाँ हैं। जो साधक इन तीनों को एक ही तत्व के विभिन्न आयामों के रूप में पहचान लेता है, वह द्वैत से मुक्त हो जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥
राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।
महाभारत के शान्तिपर्व में स्पष्ट कहा गया है कि सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत—ये सभी वास्तव में एक ही ज्ञान के भिन्न-भिन्न नाम हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी समन्वयवादी दृष्टि को अपनाती है। यहाँ पाशुपत मत के माध्यम से प्रणव की व्याख्या करना यह दर्शाता है कि सत्य एक ही है, किन्तु उसे समझने के मार्ग और शब्दावलियाँ भिन्न हो सकती हैं। जहाँ उपनिषद् जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति (विश्व-तैजस-प्राज्ञ) की बात करते हैं, वहीं पाशुपत मत उसी सत्य को शान्त-घोर-मूढ के रूप में देखता है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—विभु तत्व की पहचान।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'भाव-परिवर्तन' का अभ्यास कराता है। साधक जब प्रणव (ओंकार) का जप करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके भीतर के भाव भी इन्हीं तीन अवस्थानों से गुजरते हैं।
जब मन स्थिर और शांत होता है, तब वह 'शान्त प्रणव' का अनुभव करता है; जब संकल्प की तीव्रता और तप का वेग बढ़ता है, तब वह 'घोर प्रणव' की ऊर्जा का अनुभव करता है; और जब वह स्वयं को संसार की सीमाओं में बँधा पाता है, तब वह 'मूढ' अवस्था का साक्षी बनता है।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह इन तीनों अवस्थाओं में भी उस 'विभु' (सर्वव्यापी) तत्व को खोजे। वह यह अनुभव करे कि उसकी शांति, उसका क्रोध और उसकी जड़ता—तीनों ही वास्तव में ओंकार के विवर्त हैं। इस प्रकार वह अपनी मानसिक अवस्थाओं से ऊपर उठकर उस 'परम' में स्थित होता है, जिसका उल्लेख पिछले श्लोक में किया गया था। यह अभ्यास साधक को 'भाव-अलिप्त' बनाता है।
शरीरमापः सोमश्च त्रिभोज्यमिति कीर्तितम् ।
प्राणो ह्यग्निस्तथादित्यस्त्रिभोक्ता इति स स्मृतः ॥ २.९८ ॥
शरीर, आपः (जल) और सोम—ये तीन भोज्य कहे गए हैं; और प्राण, अग्नि तथा आदित्य—ये तीन भोक्ता कहे गए हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में पाशुपत मत के अनुसार प्रणव की तीन अवस्थाओं—शान्त, घोर और मूढ—का उल्लेख किया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि इन अवस्थाओं के भीतर 'भोज्य' (जो भोग का विषय है) और 'भोक्ता' (जो भोग करने वाला है) का क्या स्वरूप है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: शरीरम्, आपः, सोमः (इति) त्रिभोज्यमिति कीर्तितम्। प्राणः, अग्निः तथा आदित्यः (इति) त्रिभोक्ता इति स स्मृतः।
पदार्थ:
• शरीरम्: यहाँ शरीर का अर्थ केवल स्थूल देह नहीं, अपितु वह समस्त भौतिक ढाँचा है जो अन्न और पृथ्वी तत्त्व से निर्मित है।
• आपः: जल तत्त्व। वह तरलता और रस जो जीवन का आधार है।
• सोमः: चन्द्रमा या वह शीतल ऊर्जा जो मन और ओज को पुष्ट करती है।
• त्रिभोज्यम्: तीन भोज्य पदार्थ। 'भोज्य' वह है जिसका उपभोग किया जाए, जो उपभोग के द्वारा क्षय हो या रूपांतरित हो।
• प्राणः: वह जीवनी शक्ति जो शरीर के भीतर स्पन्दन करती है।
• अग्निः: वह जठराग्नि और तेज जो रूपांतरण का कार्य करती है।
• आदित्यः: सूर्य, जो समस्त जगत की ऊर्जा का स्रोत है और परम चेतना का प्रतीक है।
• त्रिभोक्ता: तीन भोक्ता। 'भोक्ता' वह है जो उपभोग करता है, जो ग्रहण करता है और जो ऊर्जा को आत्मसात करता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सृष्टि के एक महान रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं—कि यह संपूर्ण जगत वास्तव में एक विराट यज्ञ है। पाशुपत मत के अनुसार, प्रणव की विभुता जब सृष्टि के रूप में अभिव्यक्त होती है, तो वह 'भोक्ता' और 'भोज्य' के द्वैत में बँट जाती है।
यहाँ तीन भोज्य बताए गए हैं: शरीर, आपः और सोम। शरीर पृथ्वी तत्त्व का प्रतीक है, आपः जल का और सोम आकाश/मन की तरलता का। ये तीनों वह आधार हैं जिन्हें ग्रहण किया जाता है। शरीर अन्न का भोग करता है, जल प्यास का और सोम (अमृत/चंद्र-ऊर्जा) मानसिक तृप्ति का। ये तीनों 'भोज्य' इसलिए हैं क्योंकि ये रूपांतरित होने के लिए उपलब्ध हैं; ये ईंधन की भाँति हैं।
दूसरी ओर, तीन भोक्ता बताए गए हैं: प्राण, अग्नि और आदित्य। प्राण वह सूक्ष्म शक्ति है जो शरीर के कण-कण में व्याप्त है और उसे जीवित रखती है। अग्नि वह ऊष्मा है जो भोज्य पदार्थों को जलाकर ऊर्जा में बदलती है। आदित्य (सूर्य) वह परम भोक्ता है, क्योंकि अंततः समस्त ऊर्जा सूर्य की ओर ही लौटती है और वही सबको प्रकाशित करता है।
भाव यह है कि जो कुछ भी जड़ है या उपभोग्य है, वह 'भोज्य' है और जो कुछ भी चेतन, गतिशील या रूपांतरण करने वाला है, वह 'भोक्ता' है। यह विभाजन केवल बाहरी स्तर पर है; वास्तव में यह एक ही प्रणव की लीला है जहाँ वह स्वयं को भोक्ता और भोज्य दोनों बनाकर इस जगत-यज्ञ को संचालित कर रहा है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'यज्ञ-बोध' का अभ्यास है। योगी जब इस श्लोक का मनन करता है, तो वह अपने भीतर घटित होने वाली जैविक और आध्यात्मिक प्रक्रियाओं को एक यज्ञ के रूप में अनुभव करता है।
१. शरीर-आपः-सोम का अनुभव: साधक देखता है कि उसका स्थूल शरीर (पृथ्वी), उसकी रक्त-रस धाराएँ (जल) और उसका मन (सोम) केवल साधन हैं। ये 'भोज्य' हैं, अर्थात ये नष्ट होने वाले और रूपांतरित होने वाले हैं। वह इनके प्रति आसक्ति छोड़कर इन्हें केवल 'ईंधन' के रूप में देखना शुरू करता है।
२. प्राण-अग्नि-आदित्य का अनुभव: साधक अपना ध्यान अपनी जीवनी शक्ति (प्राण), अपने भीतर की तपिश और संकल्प-शक्ति (अग्नि) तथा अपने हृदय-कमल में स्थित ज्योति (आदित्य) पर केंद्रित करता है। वह अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, बल्कि वह 'भोक्ता' है—वह चैतन्य अग्नि है जो अविद्या रूपी भोज्य को जलाकर ज्ञान रूपी प्रकाश (आदित्य) में परिवर्तित कर रही है।
३. अभ्यास: साधक प्रत्येक श्वास के साथ अनुभव करता है कि वह बाहरी जगत से प्राण (भोज्य) ग्रहण कर रहा है और अपनी आंतरिक अग्नि (भोक्ता) के माध्यम से उसे आत्म-प्रकाश (आदित्य) में बदल रहा है। इस प्रकार, वह स्थूल शरीर की सीमाओं से ऊपर उठकर उस 'परम भोक्ता' की स्थिति में जाता है, जहाँ वह भोगता हुआ भी लिप्त नहीं रहता, जैसा कि पिछले श्लोकों (२.९५) में संकेत दिया गया था। यह अभ्यास साधक को 'भोज्य' (जड़ता) से 'भोक्ता' (चेतना) की ओर ले जाता है।
ओंकारं समभिध्यायेद्हृदि कृत्वा तु धारणाम् ।
ऋषिपुत्रो महातेजा वाग्विशुद्धो महेश्वरः ॥ २.९९ ॥
हृदयमें धारणा करके ओंकारका भली-भाँति ध्यान करे — (ऐसा) ऋषिपुत्र, महातेजस्वी, वाणीसे विशुद्ध महेश्वर (का मत) है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में पाशुपत मत के अनुसार तीन भोज्यों (शरीर, आपः, सोम) और तीन भोक्ताओं (प्राण, अग्नि, आदित्य) का विवरण दिया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस ज्ञान के व्यावहारिक प्रयोग और उसकी साधना विधि को स्पष्ट कर रहे हैं कि इस त्रिविध व्यवस्था को साधक अपने भीतर कैसे प्रतिष्ठित करे।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ऋषिपुत्रः महातेजः वाग्विशुद्धः महेश्वरः (इति), ओंकारं हृदि कृत्वा तु धारणाम् समभिध्यायेद्।
पदार्थ:
• ऋषिपुत्रः: यहाँ 'ऋषिपुत्र' शब्द किसी विशिष्ट व्यक्ति के लिए नहीं, अपितु उस परंपरा के प्रतिनिधि के लिए है जो ऋषियों के ज्ञान को आत्मसात कर उसे सिद्ध कर चुके हैं। यह उस गुरु या आचार्य का संकेत है जिसने श्रुति और स्मृति के समन्वय को जिया है।
• महातेजः: जिसकी तपस्या और योग से शरीर और मन में ओज का प्राकट्य हो गया हो।
• वाग्विशुद्धः: जिसकी वाणी केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु सत्य का प्रतिबिंब बन गई हो। योग में 'वाक्-शुद्धि' का अर्थ है—जब मन और प्राण एक हो जाते हैं, तब वाणी में मन्त्र-शक्ति का वास होता है।
• महेश्वरः: वह जो अपनी इंद्रियों और मन का स्वामी (ईश्वर) बन चुका हो। यहाँ यह शब्द उस सिद्ध योगी के लिए प्रयुक्त है जिसने शिव-तत्व या परम चेतना को प्राप्त कर लिया है।
• हृदि कृत्वा धारणाम्: हृदय में स्थित करना और उसे वहाँ स्थिर रखना। 'धारणा' वह मानसिक क्रिया है जिसमें चित्त को किसी एक बिंदु पर एकाग्र कर दिया जाता है।
• समभिध्यायेद्: सम्यक् रूप से ध्यान करे। 'सम' का अर्थ है—बिना किसी विचलन के, पूर्ण संतुलन के साथ।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पाशुपत मत के सारभूत साधन का निर्देश कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने बताया कि प्रणव के भीतर तीन भोक्ता और तीन भोज्य हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि इस जटिल संरचना को साधक अपने अनुभव में कैसे लाए? इसका उत्तर यह है कि इस संपूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बाहर खोजने के बजाय अपने हृदय में समेट लेना चाहिए।
यहाँ 'हृदय' केवल रक्त का संचार करने वाला अंग नहीं है, अपितु वह 'हृदयाकाश' है, जहाँ आत्मा का निवास है। याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि साधक सर्वप्रथम ओंकार की 'धारणा' करे। धारणा का अर्थ है—ओंकार के स्वरूप को हृदय के केंद्र में स्थापित कर लेना। जब ओंकार हृदय में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब वह केवल एक ध्वनि नहीं रहता, अपितु एक जीवंत सत्ता बन जाता है।
इस विधि का प्रतिपादन 'ऋषिपुत्र' नामक महातेजस्वी और वाक्-शुद्ध महेश्वर ने किया है। यह विशेषण इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह साधना केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं है, बल्कि एक उच्च आध्यात्मिक अनुभव है। जिसकी वाणी शुद्ध होती है, वही ओंकार के वास्तविक कंपन को हृदय में उतार सकता है। जब साधक हृदय में ओंकार को धारण कर उसका 'समभिध्यान' (संतुलित ध्यान) करता है, तब उसके भीतर के तीन भोज्य और तीन भोक्ता एक सूत्र में बंध जाते हैं। शरीर, जल और सोम (भोज्य) जब प्राण, अग्नि और आदित्य (भोक्ता) के साथ एकाकार होते हैं, तब साधक अपनी सीमित देह से ऊपर उठकर उस 'विभु' प्रणव का अनुभव करता है, जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में किया गया था।
यह श्लोक एक सेतु है—एक ओर पाशुपत मत का सैद्धांतिक ज्ञान (भोक्ता-भोज्य) है और दूसरी ओर उसकी प्रयोगात्मक विधि (धारणा-ध्यान)।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'धारणा' से 'ध्यान' की ओर जाने की प्रक्रिया है। योग मार्ग में सबसे पहले वस्तु का चयन होता है, फिर उसे एक स्थान पर टिकाया जाता है (धारणा) और अंततः उसमें लीन हो जाया जाता है (ध्यान)।
यहाँ अभ्यास का क्रम इस प्रकार है:
१. हृदय-केंद्रण: साधक अपना ध्यान बाहरी जगत से हटाकर हृदय के सूक्ष्म केंद्र पर लाता है।
२. ओंकार-धारणा: हृदय में ओंकार (अ-उ-म) के बीज को स्थापित करना। यह अनुभव करना कि मेरा हृदय ही वह स्थान है जहाँ संपूर्ण सृष्टि का बीज—प्रणव—विराजमान है।
३. सम-ध्यान: जब धारणा स्थिर हो जाती है, तब साधक 'समभिध्यान' में प्रवेश करता है। यहाँ 'सम' का अर्थ है कि अब न तो कोई भोक्ता बचा है और न ही कोई भोज्य; केवल ओंकार की एक अखंड धारा प्रवाहित हो रही है।
इस अभ्यास से साधक 'वाग्विशुद्ध' की अवस्था की ओर बढ़ता है। जब हृदय में ओंकार की धारणा गहरी होती है, तो साधक की वाणी में वह ओज उत्पन्न होता है जिससे मन्त्र सिद्ध होने लगते हैं। यह साधना साधक को स्थूल शरीर की सीमाओं से निकालकर उस 'महातेज' की भूमि पर ले जाती है, जहाँ वह स्वयं को 'महेश्वर' (अपने आंतरिक साम्राज्य का स्वामी) अनुभव करने लगता है। यह वह भूमि है जहाँ ज्ञान और कर्म का भेद समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है।
पाञ्चरात्रमतम्
त्रिरात्मा त्रिस्वभावश्च तथा त्रिव्यूह एव च ।
पाञ्चरात्रे स्मृतो ह्येष भगवद्वाचकः स्मृतः ॥ २.१०० ॥
पाञ्चरात्रमें यह (ओंकार) त्रि-आत्मा, त्रि-स्वभाव और त्रि-व्यूह कहा गया है — भगवान्का वाचक कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में पाशुपत मत के अनुसार प्रणव की त्रि-भोज्य और त्रि-भोक्ता व्यवस्था तथा हृदय में उसकी धारणा की विधि बताई गई। अब महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के स्वरूप को समझने के लिए पाञ्चरात्र मत का विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: पाञ्चरात्रे ह्येष (ओंकारः) त्रिआत्मा, त्रिस्वभावश्च तथा त्रिव्यूह एव च स्मृतो; (अयमेव) भगवद्वाचकः स्मृतः।
पदार्थ:
• पाञ्चरात्रे: पाञ्चरात्र मत में। यह एक प्राचीन और प्रतिष्ठित ज्ञान-परम्परा है जो ईश्वर के स्वरूप और उनकी अभिव्यक्तियों का विवेचन करती है।
• त्रिआत्मा: तीन आत्माओं के रूप में। यहाँ 'आत्मा' का अर्थ व्यक्तिगत जीवात्मा नहीं, अपितु परमात्मा की तीन दिव्य शक्तियों या अवस्थाओं से है।
• त्रिस्वभाव: तीन स्वभावों वाला। स्वभाव का अर्थ है वह मूल गुण या प्रकृति जिसके द्वारा परमात्मा अपनी लीला और सृष्टि का संचालन करते हैं।
• त्रिव्यूह: तीन व्यूह (विस्तार) वाला। 'व्यूह' का अर्थ है एक ही तत्त्व का विभिन्न रूपों में प्रसरण होना, ताकि वह सृष्टि के विभिन्न स्तरों पर कार्य कर सके।
• भगवद्वाचकः: भगवान् का वाचक। अर्थात् ओंकार केवल एक ध्वनि या अक्षर नहीं है, अपितु वह साक्षात् 'भगवत्-तत्त्व' का नाम और प्रतीक है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं जो पाञ्चरात्र मत के अनुसार है। पिछले खण्डों में हमने देखा कि कैसे विभिन्न सिद्धान्त ओंकार को अलग-अलग दृष्टियों से देखते हैं; यहाँ पाञ्चरात्र मत यह प्रतिपादित करता है कि ओंकार ही वह सेतु है जो साधक को भगवान् के त्रिगुणात्मक और त्रिगुणतीत स्वरूप से जोड़ता है।
यहाँ 'त्रिआत्मा', 'त्रिस्वभाव' और 'त्रिव्यूह' शब्दों का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि एक ही अविनाशी ओंकार (ब्रह्म) अपनी इच्छा से तीन रूपों में अभिव्यक्त होता है। यह विभाजन वास्तविक नहीं, अपितु बोध के लिए है। जब हम कहते हैं कि ओंकार 'भगवद्वाचक' है, तो इसका अर्थ यह है कि जो कोई भी शुद्ध भाव से ओंकार का जप या ध्यान करता है, वह वास्तव में भगवान् के ही स्वरूप का आवाहन कर रहा होता है।
यह श्लोक एक सूत्र की भाँति है। इसमें केवल संकेत दिए गए हैं कि ओंकार में तीन आत्माएँ, तीन स्वभाव और तीन व्यूह निहित हैं। इन तीनों श्रेणियों का विस्तृत विवरण अगले श्लोकों (२.१०१ और २.१०२) में दिया गया है। यहाँ याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि पाञ्चरात्र मत में ओंकार को केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु साक्षात् ईश्वर का स्वरूप माना गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा । ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते । हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥ अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ॥ ३४९.६४–६६ ॥
राजर्षे, सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत — इन ज्ञानोंको भिन्न-भिन्न मत जानो। सांख्यके वक्ता परमर्षि कपिल कहे जाते हैं; योगके वक्ता हिरण्यगर्भ हैं, उनसे पुराना और कोई नहीं; और अपान्तरतमा वेदाचार्य कहे जाते हैं।
महाभारत के शान्तिपर्व में स्पष्ट कहा गया है कि सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत—ये पाँचों ज्ञान के ही विभिन्न नाम हैं। यह इस बात की पुष्टि करता है कि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में इन विभिन्न मतों का उल्लेख किसी विरोध के लिए नहीं, अपितु सत्य के विभिन्न आयामों को दिखाने के लिए किया गया है। पाञ्चरात्र मत जहाँ ईश्वर के ऐश्वर्य और उनकी दिव्य अभिव्यक्तियों (व्यूह) पर बल देता है, वहीं यह स्मृति उसे ओंकार के योगिक रहस्य से जोड़कर साधक के लिए सुगम बना रही है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'नाम-रूप' के सम्बन्ध को समझने का अभ्यास है। योग में जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक ध्वनि का उच्चारण नहीं कर रहा होता, बल्कि वह उस 'भगवद्-तत्त्व' को अपने भीतर जाग्रत कर रहा होता है जो त्रि-आत्मा, त्रि-स्वभाव और त्रि-व्यूह के रूप में व्याप्त है।
अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि जिस ओंकार को वह उच्चारित कर रहा है, वही उसके भीतर की समस्त शक्तियाँ (बल, वीर्य, तेज) और समस्त गुण (ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति) हैं। यहाँ साधक स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म तत्त्व की ओर बढ़ता है। वह यह अनुभव करता है कि ओंकार का 'अ' उसकी बाहरी दुनिया (व्यूह), 'उ' उसका आंतरिक स्वभाव और 'म' उसकी आत्मा का मूल है। इस प्रकार, ओंकार का जप करते हुए साधक स्वयं को भगवान् के इन तीन दिव्य आयामों में विलीन करने का प्रयास करता है। यह श्लोक साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह मन्त्र और मन्त्र-देवता के भेद को मिटाकर, मन्त्र को ही साक्षात् भगवान् के रूप में देखना आरम्भ करता है।
बलं वीर्यं तथा तेजस्त्रिरात्मा इति संज्ञितः ।
ज्ञानैश्वर्यं तथा शक्तिस्त्रिस्वभाव इति स्मृतः ॥ २.१०१ ॥
बल, वीर्य और तेज—ये तीन आत्मा के नाम हैं; और ज्ञान, ऐश्वर्य तथा शक्ति—ये तीन स्वभाव कहे गए हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में पाञ्चरात्र मत के अनुसार ओंकार को त्रि-आत्मा, त्रि-स्वभाव और त्रि-व्यूह के रूप में भगवान् का वाचक बताया गया। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन त्रि-आत्माओं और त्रि-स्वभावों के विशिष्ट नामों का विवरण दे रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) बलं, वीर्यं तथा तेजः — (एते) त्रिआत्मा इति संज्ञितः । ज्ञानं, ऐश्वर्यं तथा शक्तिः — (एते) त्रिस्वभाव इति स्मृतः।
पदार्थ:
• बल: वह सामर्थ्य जिससे संपूर्ण जगत का आधार बना रहता है; स्थिरता और धारण करने की शक्ति।
• वीर्य: वह ओज या वेग जिससे सृष्टि का विस्तार और सृजन होता है; सक्रियता का तत्त्व।
• तेज: वह प्रकाश या प्रखरता जिससे अविद्या का नाश होता है और ज्ञान का उदय होता है; शुद्ध चैतन्य का आलोक।
• त्रिआत्मा: यहाँ 'आत्मा' का अर्थ परमात्मा की तीन कार्यात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो ओंकार की तीन मात्राओं (अ, उ, म) में प्रतिष्ठित हैं।
• ज्ञान: वह सर्वज्ञता जिससे ईश्वर समस्त सृष्टि के सूक्ष्म से सूक्ष्म कण को जानते हैं।
• ऐश्वर्य: वह प्रभुत्व या स्वामित्व जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड उनके अधीन है।
• शक्ति: वह सामर्थ्य जिससे वे संकल्प मात्र से सृष्टि की रचना, पालन और संहार करते हैं।
• त्रिस्वभाव: परमात्मा के वे मूल गुण जो उनके स्वरूप को प्रकट करते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पाञ्चरात्र मत के उस सूक्ष्म विज्ञान को खोल रहे हैं, जहाँ ओंकार केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु भगवत्-स्वरूप का मानचित्र है। यहाँ ओंकार के माध्यम से भगवान् के 'होने' (अस्तित्व) और 'करने' (क्रिया) के भेद को स्पष्ट किया गया है।
प्रथम पंक्ति में 'बल, वीर्य और तेज' को त्रि-आत्मा कहा गया है। यह भगवान् का वह स्वरूप है जो उनके अस्तित्व की गरिमा को दर्शाता है। 'बल' वह आधार है जिस पर संपूर्ण सृष्टि टिकी है; 'वीर्य' वह प्राण-शक्ति है जो जड़ प्रकृति को चेतन कर उसे गति प्रदान करती है; और 'तेज' वह ज्योति है जो इस जगत को प्रकाशित करती है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल अक्षर का उच्चारण नहीं करता, अपितु अपने भीतर उस दैवीय बल, वीर्य और तेज का आह्वान करता है।
द्वितीय पंक्ति में 'ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति' को त्रि-स्वभाव कहा गया है। यदि बल-वीर्य-तेज परमात्मा के 'होने' का प्रमाण हैं, तो ज्ञान-ऐश्वर्य-शक्ति उनके 'कार्य' करने का स्वभाव है। ज्ञान के बिना ऐश्वर्य अंधा है और शक्ति के बिना ज्ञान निष्प्रभावी। इन तीनों का समुच्चय ही 'भगवत्-तत्त्व' है।
रहस्य यह है कि ओंकार की प्रत्येक मात्रा इन गुणों को समाहित किए हुए है। 'अ' में बल और ज्ञान का वास है, 'उ' में वीर्य और ऐश्वर्य का, तथा 'म' में तेज और शक्ति का। इस प्रकार, ओंकार का जप करते हुए साधक वास्तव में इन छह दैवीय गुणों के साथ एकाकार होने का प्रयास करता है। बाहरी विधि में यह केवल एक मत का विवरण प्रतीत होता है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह साधक को अपनी सीमित मानवीय क्षमताओं से उठाकर ईश्वरीय सामर्थ्य की ओर ले जाने वाली प्रक्रिया है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'गुण-संक्रमण' का अभ्यास कराता है। सामान्यतः मनुष्य का बल, वीर्य और तेज क्षीण होने वाला और सीमित होता है। जब साधक ओंकार के इस पाञ्चरात्र स्वरूप का ध्यान करता है, तो वह अपने स्थूल बल को 'दैवीय बल' में, अपने सीमित ओज को 'ईश्वरीय वीर्य' में और अपनी क्षुद्र बुद्धि को 'परम तेज' में विलीन करने का अभ्यास करता है।
साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि उसके भीतर जो भी ज्ञान, ऐश्वर्य या शक्ति है, वह वास्तव में उसी ओंकार-स्वरूप परमात्मा का अंश है। अभ्यास यह है कि जप के समय 'बल-वीर्य-तेज' का चिंतन करते हुए स्वयं के अस्तित्व को स्थिर करना, और 'ज्ञान-ऐश्वर्य-शक्ति' का चिंतन करते हुए अपने अहंकार को भगवान् के चरणों में समर्पित करना। इस प्रकार साधक अपनी सीमित 'स्व' की भूमि से उठकर 'विराट' की भूमि की ओर अग्रसर होता है, जहाँ वह स्वयं को केवल एक शरीर नहीं, अपितु ओंकार में निहित इन छह दिव्य गुणों का प्रतिबिंब अनुभव करने लगता है।
सङ्कर्षणोऽथ प्रद्युम्नो(म्नः) अनिरुद्धस्तथैव च ।
त्रिव्यूह इति निर्दिष्ट ओंकारो विष्णुरव्ययः ॥ २.१०२ ॥
सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस प्रकार अविनाशी विष्णु रूपी ओंकार को त्रिव्यूह के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में पाञ्चरात्र मत के अनुसार ओंकार के त्रि-आत्मा (बल, वीर्य, तेज) और त्रि-स्वभाव (ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति) का विवेचन किया गया। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के 'त्रि-व्यूह' रूप का उद्घाटन करते हुए उसे अविनाशी विष्णु के साथ एकाकार कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सङ्कर्षणः, अथ प्रद्युम्नः, अनिरुद्धः तथैव च — (एते) त्रिव्यूह इति निर्दिष्टः (अस्ति) । (एषः) ओंकारः विष्णुरव्ययः (अस्ति) ।
पदार्थ:
• सङ्कर्षण: वह शक्ति जो प्रलय काल में समस्त सृष्टि को अपने भीतर खींच लेती है या जो पृथक्करण के माध्यम से विविधता उत्पन्न करती है।
• प्रद्युम्न: वह विस्तार या सृजन-शक्ति जो प्रलय के बाद पुनः जगत का प्रसार करती है।
• अनिरुद्ध: वह अखंड स्वरूप जो किसी भी सीमा या अवरोध से मुक्त है; पूर्णता का वह भाव जिसे रोका नहीं जा सकता।
• त्रिव्यूह: 'व्यूह' का अर्थ है विन्यास या विस्तार। परमात्मा जब स्वयं को तीन कार्यात्मक रूपों में प्रकट करते हैं, तो उसे त्रिव्यूह कहते हैं।
• अव्यय: जिसका कोई क्षय न हो, जो न घटता है न बढ़ता है; जो शाश्वत और अपरिवर्तनीय है।
• विष्णु: सर्वव्यापी पुरुष; वह जो समस्त अंतरिक्ष और हृदय-आकाश में व्याप्त है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पाञ्चरात्र मत के उस रहस्य को उजागर कर रहे हैं जहाँ ओंकार की ध्वनि केवल एक प्रतीक नहीं, अपितु परमात्मा के प्रकटीकरण की प्रक्रिया है। पिछले श्लोकों में हमने देखा कि ओंकार के भीतर बल, वीर्य और तेज जैसी आत्माएँ तथा ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति जैसे स्वभाव निहित हैं। वर्तमान श्लोक में इन आंतरिक शक्तियों के बाह्य विन्यास (व्यूह) का वर्णन है।
सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये तीन नाम परमात्मा के तीन अलग-अलग आयामों को दर्शाते हैं। सङ्कर्षण वह शक्ति है जो संकुचन और संग्रहण का प्रतिनिधित्व करती है; प्रद्युम्न वह है जो विस्तार और सृजन का आधार है; और अनिरुद्ध वह स्थिति है जहाँ विस्तार और संकुचन दोनों शांत हो जाते हैं और केवल अखंड चैतन्य शेष रहता है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में इन तीन व्यूहों की यात्रा करता है—वह अपनी चेतना को संकुचित कर केंद्र की ओर ले जाता है, फिर उसे ब्रह्मांडीय विस्तार में फैलाता है और अंततः उस अवस्था में स्थित होता है जहाँ कोई अवरोध (अनिरुद्ध) नहीं रहता।
महर्षि स्पष्ट करते हैं कि यह 'त्रिव्यूह' और कोई नहीं, अपितु 'विष्णुरव्ययः'—अविनाशी विष्णु ही हैं। यहाँ विष्णु का अर्थ केवल एक देवता से नहीं, अपितु उस 'विष्णु-तत्त्व' से है जो सर्वव्यापी है। ओंकार इस सर्वव्यापकता का बीज है। जिस प्रकार एक बीज में संपूर्ण वृक्ष का विन्यास छिपा होता है, उसी प्रकार 'ओम्' के तीन मात्राओं में सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का यह दिव्य विन्यास निहित है। यह श्लोक सिद्ध करता है कि ओंकार ही वह सेतु है जिसके माध्यम से साधक स्थूल जगत के विस्तार से निकलकर उस अव्यय (अविनाशी) पुरुष में विलीन हो सकता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विस्तार' और 'संकुचन' के संतुलन का अभ्यास कराता है। ओंकार के उच्चारण में जब साधक 'अ' से 'उ' की ओर बढ़ता है, तो वह प्रद्युम्न रूपी विस्तार का अनुभव करता है; जब वह 'म' की ओर मुड़ता है, तो वह सङ्कर्षण रूपी अंतर्मुखता का अनुभव करता है; और जब वह उस मौन (अमात्र) में ठहरता है, तो वह अनिरुद्ध रूपी अखंड आनंद को प्राप्त होता है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि उसका अपना अस्तित्व भी इन्हीं तीन प्रक्रियाओं से बना है—विचारों का उठना (विस्तार), उनका सिमटना (संकुचन) और फिर शून्य में स्थित होना। इस श्लोक का निरंतर मनन साधक को 'व्यय' (नाशवान) से 'अव्यय' (अविनाशी) की ओर ले जाता है। वह अपनी सीमित देह-चेतना से ऊपर उठकर उस विष्णु-स्वरूप ओंकार में प्रतिष्ठित होता है, जहाँ वह स्वयं को सर्वव्यापी और अविनाशी अनुभव करने लगता है।
वायुलिमतम्
भगवद्वाचकः प्रोक्तः प्रकृतेर्वाचकस्तथा ।
व्यक्ताऽव्यक्तो वासुदेवः प्रभवः प्रलयस्तथा ।
वाथुलेरेकमात्रस्तु ओंकारः समुदाहृतः ॥ २.१०३ ॥
(वह) भगवान्का वाचक कहा गया है, और प्रकृतिका वाचक भी; वासुदेव व्यक्त-अव्यक्त, उत्पत्ति और प्रलय हैं। वाथुलिके (मतमें) ओंकार एकमात्र कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में पाञ्चरात्र मत के अनुसार ओंकार के त्रि-व्यूह (सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) का वर्णन करते हुए उसे अविनाशी विष्णु के रूप में निर्दिष्ट किया गया। वर्तमान श्लोक में इस पाञ्चरात्र मत का उपसंहार करते हुए ओंकार के व्यापक स्वरूप और वाथुलि ऋषि के एकमात्र मत का उद्घाटन किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) भगवद्वाचकः प्रोक्तः, (ओंकारः) प्रकृतेर्वाचकस्तथा (अस्ति) । वासुदेवः व्यक्ताऽव्यक्तो (अस्ति), प्रभवः प्रलयस्तथा (अस्ति) । वाथुलेरेकमात्रस्तु ओंकारः समुदाहृतः (अस्ति) ।
पदार्थ:
• भगवद्वाचकः: वह शब्द या ध्वनि जो उस परम पुरुष (भगवान्) का बोध कराए।
• प्रकृतेर्वाचकः: वह ध्वनि जो उस मूल माया या प्रकृति का बोध कराए जिससे जगत का विन्यास होता है।
• वासुदेवः: वह जो सर्वत्र व्याप्त है; 'वसु' (समस्त ऐश्वर्य) का अधिपति। योगिक दृष्टि से वह पुरुष जो हृदय-आकाश में स्थित है।
• व्यक्त-अव्यक्त: 'व्यक्त' वह है जो इन्द्रियों और मन के द्वारा अनुभव योग्य है (सृष्टि); 'अव्यक्त' वह है जो सूक्ष्म है, जो कारण रूप में स्थित है और अनुभव से परे है।
• प्रभव और प्रलय: 'प्रभव' का अर्थ है उत्पत्ति या सृजन की प्रक्रिया; 'प्रलय' का अर्थ है विलीनीकरण या लय।
• वाथुलि: एक प्राचीन ऋषि या मत, जो ओंकार की विविधता के स्थान पर उसकी एकमात्रता (एकत्व) पर बल देते हैं।
• समुदाहृतः: संक्षेप में कहा गया या समग्र रूप से प्रस्तुत किया गया।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पाञ्चरात्र मत के उस गहन रहस्य को पूर्ण कर रहे हैं जहाँ ओंकार को केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु समस्त अस्तित्व का बीज माना गया है।
प्रथम पंक्ति में कहा गया है कि ओंकार 'भगवद्वाचक' और 'प्रकृतेर्वाचक' दोनों है। इसका भाव यह है कि ओंकार की ध्वनि में पुरुष (चेतना) और प्रकृति (शक्ति) दोनों का समावेश है। जिस प्रकार सूर्य और उसकी किरणों को अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार भगवान् और उनकी प्रकृति एक ही ओंकार के दो पहलू हैं। जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं बोलता, अपितु वह उस शक्ति को पुकारता है जो सृष्टि का आधार है और उस चेतना को भी, जो उस आधार का साक्षी है।
द्वितीय पंक्ति में 'वासुदेव' के स्वरूप का वर्णन है। वासुदेव वह परम तत्त्व है जो 'व्यक्त' (सृष्टि) और 'अव्यक्त' (कारण) दोनों है। वह 'प्रभव' है क्योंकि उसी के संकल्प से जगत की उत्पत्ति होती है, और वह 'प्रलय' है क्योंकि अंततः सब कुछ उसी में विलीन हो जाता है। यहाँ याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि ओंकार का 'अ' अक्षर प्रभव (उत्पत्ति), 'उ' अक्षर स्थिति (व्यक्त) और 'म' अक्षर प्रलय (अव्यक्त) का प्रतीक है। इस प्रकार संपूर्ण ब्रह्माण्ड का चक्र ओंकार की तीन मात्राओं में ही सिमटा हुआ है।
श्लोक के अंतिम चरण में 'वाथुलि' मत का उल्लेख है। जहाँ पाञ्चरात्र मत ने ओंकार के त्रि-आत्मा, त्रि-स्वभाव और त्रि-व्यूह जैसे भेदों से उसकी महिमा बताई, वहीं वाथुलि ऋषि का मत अत्यंत सरल और सीधा है— "ओंकार एकमात्र है"। यहाँ विविधता का अंत और एकत्व का आरम्भ होता है। यह संकेत है कि चाहे हम ओंकार को कितने भी भेदों में देखें, अंततः वह एक ही अविभाज्य सत्य है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विविधता से एकता' की ओर जाने का मार्ग है।
१. अभ्यास: साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह पहले उसे 'भगवद्वाचक' (ईश्वर का नाम) मानकर श्रद्धा विकसित करता है, फिर उसे 'प्रकृतेर्वाचक' मानकर अपने भीतर की प्रवृत्तियों और प्रकृति को पहचानता है।
२. अनुभव: जैसे-जैसे अभ्यास गहरा होता है, साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर होने वाला हर विचार (व्यक्त) और हर मौन (अव्यक्त), हर सृजन (प्रभव) और हर विसर्जन (प्रलय) वास्तव में उसी 'वासुदेव' या ओंकार की लहरें हैं।
३. भूमि: यह श्लोक साधक को 'बहुत्व' की भूमि से उठाकर 'एकत्व' (वाथुलि मत) की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि ओंकार कोई बाहरी ध्वनि नहीं, बल्कि उसके अपने हृदय का स्पंदन है, जो उसे व्यक्त जगत से हटाकर अव्यक्त ब्रह्म में लीन करने की क्षमता रखता है।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेणाभिधास्ये ॥ २.१०४ ॥
वेदवेत्ता जिस अक्षरको कहते हैं, वीतराग यति जिसमें प्रवेश करते हैं, जिसकी इच्छासे (लोग) ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, वह पद मैं तुम्हें संक्षेपमें कहूँगा —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में पाञ्चरात्र मत के अनुसार ओंकार के विविध रूपों (भगवान्, प्रकृति, प्रभव और प्रलय) और वाथुलि ऋषि के एकमात्र मत का वर्णन किया गया। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस 'एकमात्र' और 'अक्षर' स्वरूप की महिमा बताते हुए उसे समस्त साधनाओं का लक्ष्य सिद्ध करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यदक्षरं वेदविदो वदन्ति, (तस्मिन्) यद्यतयो वीतरागाः विशन्ति, (यस्य) इच्छन्तो (मनुष्याः) ब्रह्मचर्यं चरन्ति, तत् पदं ते संग्रहेणाभिधास्ये।
पदार्थ:
• अक्षरं: जो क्षर (नाशवान) नहीं है; अविनाशी ध्वनि और अविनाशी तत्त्व।
• वेदविदो: वेदों के वास्तविक ज्ञाता, जिन्होंने केवल शब्दों को नहीं, अपितु मन्त्रों के भीतर छिपे ब्रह्म-तत्त्व को जान लिया है।
• यतयः: यति का अर्थ है 'संन्यस्त' या 'नियमित'। वे साधक जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है।
• वीतरागाः: रागों (आसक्तियों) से मुक्त। यहाँ राग का अर्थ केवल काम-वासना नहीं, अपितु किसी भी द्वैत-भाव के प्रति आसक्ति है।
• विशन्ति: प्रवेश करते हैं। यह केवल मानसिक प्रवेश नहीं, अपितु चेतना का उस अक्षर-तत्त्व में विलीन हो जाना है।
• ब्रह्मचर्यं चरन्ति: यहाँ ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं, अपितु 'ब्रह्म' के मार्ग पर चलना या ब्रह्म-साधना में लीन रहना है।
• संग्रहेणाभिधास्ये: संक्षेप में कहूँगा। जब सत्य अनंत होता है, तो उसे शब्दों में बांधना कठिन होता है, अतः ऋषि उसे 'संग्रह' (संक्षेप) में व्यक्त करते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप की घोषणा कर रहे हैं जो समस्त मतों और भेदों से ऊपर है। यह श्लोक केवल एक कथन नहीं, अपितु उस 'पद' का संकेत है जहाँ पहुँचकर साधक की यात्रा पूर्ण होती है।
ऋषि कहते हैं कि वेदवेत्ता जिस 'अक्षर' की चर्चा करते हैं, वह कोई साधारण वर्ण नहीं है। वेदों के अनुसार अक्षर वह है जो अपरिवर्तनीय है। जब वेदविद् उसे 'वदन्ति' (कहते हैं), तो वे उस ध्वनि के माध्यम से उस परम सत्ता का बोध कराते हैं जो वाणी से परे है।
आगे ऋषि एक महत्वपूर्ण शर्त बताते हैं— 'वीतरागाः'। यति या साधक उसी अक्षर में 'विशन्ति' (प्रवेश) कर पाते हैं, जो रागों से मुक्त हो चुके हैं। इसका रहस्य यह है कि जब तक मन बाहरी विषयों के प्रति राग (आसक्ति) रखता है, उसकी चेतना बाहर की ओर बिखरी रहती है। जिस क्षण राग का क्षय होता है, चेतना भीतर की ओर मुड़ती है और उस अक्षर-ध्वनि के माध्यम से अपने मूल स्रोत में प्रवेश कर जाती है।
तीसरी बात 'ब्रह्मचर्य' की है। लोग ब्रह्मचर्य का पालन क्यों करते हैं? क्योंकि वे उस 'अक्षर' की इच्छा करते हैं। यहाँ ब्रह्मचर्य एक साधन है और अक्षर का अनुभव उसका फल। जो साधक इस अक्षर-पद की अभिलाषा करता है, वही वास्तविक ब्रह्मचर्य का आचरण कर पाता है, क्योंकि उसकी इच्छा अब नश्वर विषयों में नहीं, अपितु अविनाशी पद में है।
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि चाहे वह पाञ्चरात्र मत हो या वाथुलि मत, सबका अंतिम लक्ष्य वही एक 'पद' है। अब वे उस पद को संक्षेप में कहने जा रहे हैं, जो आगामी श्लोकों में 'ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म' के रूप में प्रकट होगा।
शास्त्र-साक्ष्य —
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ८.११ ॥
वेदवेत्ता जिसे अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसमें प्रवेश करते हैं, जिसकी इच्छासे ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं — वह पद मैं तुम्हें संक्षेपमें कहूँगा।
यह श्लोक पूर्णतः भगवद्गीता के आठवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक के अनुरूप है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उसी 'अक्षर' के बारे में बता रहे हैं जिसे वेदविद् जानते हैं और वीतरागी यति जिसमें प्रवेश करते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता की यह अद्भुत संगति दर्शाती है कि याज्ञवल्क्य की योग-दृष्टि और श्रीकृष्ण का ज्ञान-मार्ग एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं। दोनों ही ग्रन्थों में 'अक्षर' को केवल एक शब्द नहीं, अपितु एक 'पद' (अवस्था/स्थान) माना गया है, जिसमें चेतना का विलय होता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है।
१. अभ्यास: साधक को यहाँ 'वीतरागता' का अभ्यास करना है। योगिक दृष्टि से राग का अर्थ है—मन का किसी विशेष विचार या वस्तु से चिपक जाना। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो उसे देखना चाहिए कि क्या उसका मन जप के समय भी किसी राग में बँधा है?
२. अनुभव: 'विशन्ति' (प्रवेश) का अनुभव तब होता है जब जप की ध्वनि और जप करने वाला एक हो जाते हैं। यह वह स्थिति है जहाँ ध्वनि केवल कान से नहीं सुनी जाती, अपितु वह पूरे अस्तित्व में गूँजने लगती है।
३. भूमि: यह श्लोक साधक को 'इच्छा' (ब्रह्मचर्य की इच्छा) से उठाकर 'प्रवेश' (अक्षर में विलीन होना) की भूमि तक ले जाता है।
४. साधना: यहाँ अभ्यास यह है कि ओंकार को केवल एक मन्त्र न मानकर उसे वह 'पद' माना जाए जिसमें प्रवेश करना है। जप के दौरान यह भाव रखना कि "मैं इस अक्षर-ध्वनि के भीतर प्रवेश कर रहा हूँ", साधक को स्थूल जगत से हटाकर सूक्ष्म अक्षर-तत्त्व की ओर ले जाता है।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् ॥ २.१०५ ॥
... "ओम्" इस एक अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए, जो मनुष्य शरीर त्यागकर प्रस्थान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस 'अक्षर' की चर्चा की, जिसे वेदवेत्ता जानते हैं और वीतराग यति जिसमें लीन होते हैं। अब वे उस अक्षर की प्राप्ति का सरल और निर्णायक साधन बताते हुए, साधक को उस अंतिम स्थिति की ओर ले जा रहे हैं जहाँ समस्त दार्शनिक मतों का विसर्जन हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यः देहं त्यजन् प्रयाति, (सः) मामनुस्मरन् ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्, स याति परमां गतिम्।
पदार्थ:
• ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म: 'ओम्' रूपी वह एक अक्षर जो स्वयं ब्रह्म है; यहाँ ओंकार केवल ब्रह्म का प्रतीक नहीं, अपितु साक्षात् ब्रह्म का ध्वनि-रूप है।
• व्याहरन्: उच्चारण करते हुए; यहाँ केवल कंठ से शब्द निकालना नहीं, अपितु उस ध्वनि में चित्त का विलीन होना है।
• मामनुस्मरन्: मेरा स्मरण करते हुए; यहाँ 'मम' (मेरा) शब्द याज्ञवल्क्य ने स्वयं के लिए नहीं, अपितु उस योगीश्वर स्वरूप परमात्मा के लिए प्रयुक्त किया है, जो समस्त जीवों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित है।
• प्रयाति: प्रस्थान करना; शरीर का त्याग कर सूक्ष्म शरीर के साथ आगे बढ़ना।
• परमां गतिम्: वह परम अवस्था जहाँ से पुनरागमन नहीं होता; मोक्ष या अक्षर-पद।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं, जो जीवन की अंतिम परिणति है। पिछले श्लोकों में उन्होंने ओंकार के अनेक भेदों, पाञ्चरात्र और वाथुलि मतों के सूक्ष्म विश्लेषणों को प्रस्तुत किया, किन्तु अब वे उन समस्त मतों के उपसंहार के रूप में एक सरल और अचूक विधि बता रहे हैं।
भाव यह है कि जब साधक देह त्याग के समय 'ओम्' का उच्चारण करता है और उस परमात्मा का स्मरण करता है, तो वह 'परम गति' को प्राप्त होता है। यहाँ 'व्याहरन्' (उच्चारण) और 'अनुस्मरन्' (स्मरण) के बीच एक गहरा सम्बन्ध है। बाहरी तौर पर यह देहत्याग के समय की क्रिया प्रतीत होती है, किन्तु आन्तरिक रूप से यह जीवनभर के अभ्यास का फल है। जो व्यक्ति जीवन भर ओंकार के साथ अपने अस्तित्व को जोड़े रखता है, उसके लिए मृत्यु केवल एक औपचारिक देहत्याग रह जाती है, क्योंकि उसका चित्त पहले ही उस 'एक अक्षर ब्रह्म' में प्रतिष्ठित हो चुका होता है।
यहाँ याज्ञवल्क्य स्वयं को उस परमात्मा के प्रतिनिधि या स्वरूप में रखकर कह रहे हैं—"मेरा स्मरण करते हुए"। यह इस बात का संकेत है कि गुरु और शिष्य के बीच जो तादात्म्य होता है, वही साधक को उस परम पद तक ले जाता है। जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में उस निराकार ब्रह्म को साकार रूप में अनुभव करता है। यह विधि केवल मृत्यु के समय के लिए नहीं, अपितु निरंतर अभ्यास के लिए है, ताकि अंत समय में सहज ही वह स्थिति प्राप्त हो सके।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ ८.१३ ॥
— 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ जो देह छोड़कर जाता है, वह परम गतिको पाता है।
यह श्लोक पूर्णतः भगवद्गीता के इस वचन के अनुरूप है। गीता में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जो पुरुष अंतकाल में एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए उनका स्मरण करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों यहाँ एक ही सत्य की पुष्टि करते हैं कि ओंकार वह सेतु है जो क्षर (नाशवान शरीर) से अक्षर (अविनाशी ब्रह्म) की ओर ले जाता है। दोनों ग्रन्थों में इस बात पर बल दिया गया है कि अंत समय की चेतना ही अगले गंतव्य का निर्धारण करती है, और ओंकार उस चेतना को शुद्ध करने वाला सर्वश्रेष्ठ साधन है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'अन्तिम समय की समाधि' का संकेत है। साधक के लिए इसका अभ्यास यह है कि वह अपने प्रत्येक श्वास और विचार को ओंकार के साथ जोड़ दे। जब साधक 'ओम्' का उच्चारण करता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं बोलता, बल्कि अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को उस एक ध्वनि में समेट लेता है।
यहाँ 'अनुस्मरन्' का अर्थ है—स्मरण की वह अवस्था जहाँ स्मरण करने वाला (स्मर्ता), स्मरण की क्रिया (स्मरण) और जिसका स्मरण किया जा रहा है (स्मर्तव्य), तीनों एक हो जाते हैं। यह अभ्यास साधक को जाग्रत अवस्था से सुषुप्ति और फिर तुरीय अवस्था की ओर ले जाता है। जब साधक इस अभ्यास में निपुण हो जाता है, तो वह देह के भीतर रहते हुए भी 'देह-अतीत' हो जाता है। इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि जो ओंकार को अपना स्वरूप मान लेता है, उसके लिए देहत्याग कोई भय या शोक का विषय नहीं, अपितु एक उत्सव है, क्योंकि वह अपनी सीमित पहचान को छोड़कर उस 'परम गति' यानी अपने वास्तविक स्वरूप में विलीन हो जाता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल देह के बंधन से मुक्त कर उसे अक्षर-ब्रह्म की ध्रुवता प्रदान करता है।
मतभेदोपसंहारः
एवं त्रिषष्टिभेदैस्तु सिद्धान्तेषु प्रगीयते ।
स्थूलभेदेन चोंकारश्चतुःषष्टि(ष्टि)स्तु निष्कलः ॥ २.१०६ ॥
इस प्रकार तिरसठ भेदों से सिद्धान्तों में (ओंकार) गाया जाता है; स्थूल भेद से और चौंसठवाँ निष्कल है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के उच्चारण और परमात्मा के स्मरण द्वारा परम गति की प्राप्ति का मार्ग बताया। अब वे समस्त दार्शनिक मतों और ओंकार के विभिन्न स्वरूपों का एक संख्यात्मक उपसंहार कर रहे हैं, ताकि साधक स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) एवं त्रिषष्टि-भेदैः सिद्धान्तेषु प्रगीयते; (सः) स्थूल-भेदेन च, (परन्तु) ओंकारः चतुःषष्टिः तू निष्कलः (अस्ति)।
पदार्थ:
• त्रिषष्टि-भेदैः: तिरसठ (६३) भेदों से; यहाँ संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु उन समस्त सूक्ष्म अवस्थाओं और व्याख्याओं का योग है जो विभिन्न सिद्धान्तों (माण्डूक्य, पाञ्चरात्र आदि) में बताई गई हैं।
• प्रगीयते: गाया जाता है या वर्णित किया जाता है; 'गायन' यहाँ केवल स्वर-लहरी नहीं, अपितु शास्त्र-प्रमाणों द्वारा उसकी महिमा का गान करना है।
• स्थूल-भेदेन: स्थूल भेद से; वह स्वरूप जो वाणी, मन और बुद्धि के स्तर पर अनुभव किया जा सके, जिसमें मात्राओं का आभास हो।
• चतुःषष्टिः: चौंसठवाँ; वह अंतिम अवस्था जो समस्त भेदों के पार है।
• निष्कलः: कलारहित; 'कला' का अर्थ है अंश, भाग या विशेषता। निष्कल वह है जिसमें कोई द्वैत, कोई भेद या कोई विशेषता शेष न रहे—पूर्णतः एक और अखंड।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के स्वरूप का एक निर्णायक गणित प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने पूर्व के श्लोकों में विभिन्न मतों का वर्णन किया—कहीं तीन पद (जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति), कहीं तीन आत्मा (बल-वीर्य-तेज), कहीं तीन व्यूह (सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध)। जब इन समस्त दार्शनिक विश्लेषणों, मात्राओं और अवस्थाओं को जोड़ा जाता है, तो वे तिरसठ (६३) भेदों के रूप में सामने आते हैं।
भाव यह है कि जब तक हम ओंकार को 'जानने' का प्रयास करते हैं, वह ६३ भेदों में बँटा हुआ प्रतीत होता है। यह 'स्थूल भेद' है, क्योंकि यहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का भेद है; यहाँ शब्द है, अर्थ है और उसे समझने वाला मन है। यह वह मार्ग है जहाँ साधक शास्त्र के माध्यम से ओंकार की विभिन्न परतों को खोलता है।
किन्तु, याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हैं—'चतुःषष्टिः तू निष्कलः'। वह चौंसठवाँ ओंकार वह है जो किसी भेद में नहीं बँटा। यदि ६३ भेद 'साधन' हैं, तो ६४वाँ 'साध्य' है। वह निष्कल ओंकार वह मौन है जो शब्द के विसर्जन के बाद शेष रहता है। वह वह स्थिति है जहाँ ओंकार का उच्चारण समाप्त हो जाता है और केवल ओंकार ही शेष रह जाता है। यह वह बिंदु है जहाँ समस्त मत, समस्त शास्त्र और समस्त विभेद विलीन हो जाते हैं और केवल शुद्ध चैतन्य का अनुभव होता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अभ्यास' से 'अनुभव' की ओर ले जाने वाला है।
६३ भेदों का वर्णन उस साधक के लिए है जो अभी 'वाचिक' और 'मानसिक' जप की भूमि में है। वह ओंकार के विभिन्न गुणों, उसकी मात्राओं और उसके दार्शनिक अर्थों का चिंतन करता है। यह अभ्यास की वह अवस्था है जहाँ मन सूक्ष्म होता जाता है, किन्तु फिर भी वह 'भेद' को जानता है।
किन्तु, योग का चरम लक्ष्य उस ६४वें 'निष्कल' ओंकार में स्थित होना है। अभ्यास यह है कि साधक जब ओंकार का जप करे, तो वह धीरे-धीरे उन ६३ भेदों (शब्द, अर्थ, भाव) को लाँघकर उस शून्य या पूर्णता में प्रवेश करे जहाँ कोई 'कला' (विशेषता) न बचे।
यह यात्रा 'सगुण' से 'निर्गुण' की ओर है। ६३ भेद वह सीढ़ी हैं जो साधक को ऊपर ले जाती हैं, और ६४वाँ निष्कल वह शिखर है जहाँ पहुँचकर सीढ़ी की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। साधक जब इस भूमि पर पहुँचता है, तो वह अनुभव करता है कि वह स्वयं ही वह निष्कल ओंकार है। यहाँ 'अक्षर' का अनुभव केवल ध्वनि के रूप में नहीं, अपितु अपने स्वयं के अस्तित्व के रूप में होता है।
विष्णुस्वरूपम्
विष्णुर्निरञ्जनं शान्तमानन्दं सर्वदेहिनाम् ।
अक्षरं तं विजानीयात् स्थूलं च क्षरसंज्ञितम् ॥ २.१०७ ॥
विष्णु, निरञ्जन, शान्त, सब देहधारियोंका आनन्द — उसे अक्षर जाने, और स्थूलको क्षर नामवाला (जाने)।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के तिरसठ भेदों और चौंसठवें निष्कल स्वरूप का उल्लेख कर साधक को भेद से अभेद की ओर मोड़ा। अब वे उस 'निष्कल' के वास्तविक स्वरूप का परिचय देते हुए उसे विष्णु, अक्षर और आनन्द के रूप में परिभाषित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: विष्णुः निरञ्जनं शान्तम् आनन्दं (च) सर्व-देहिनाम् (अस्ति); तं (विष्णुं) अक्षरं विजानीयात्, (तथा) स्थूलं च क्षर-संज्ञितम् (विजानीयात्)।
पदार्थ:
• विष्णुः: सर्वव्यापी परमात्मा; 'विष्णु' शब्द 'विष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है—व्याप्त होना। जो कण-कण में व्याप्त है और जिसमें समस्त जगत समाहित है।
• निरञ्जनं: रञ्जन-रहित; 'रञ्जन' का अर्थ है आसक्ति, विकार या गुणों का रंग। जो माया के त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) से अछूता है, वह निरञ्जन है।
• शान्तम्: समस्त वृत्तियों के शांत होने की अवस्था; जहाँ द्वंद्व (सुख-दुःख, लाभ-हानि) का अभाव है।
• सर्व-देहिनाम् आनन्दं: समस्त देहधारियों का (अन्तर्निहित) आनन्द; वह परमानन्द जो शरीर के भीतर होते हुए भी शरीर से भिन्न है।
• अक्षरं: अविनाशी; 'अ' (नहीं) + 'क्षर' (नाश होना)। जो समय, स्थान और कारण के प्रभाव से नष्ट नहीं होता।
• क्षर-संज्ञितम्: क्षर नाम वाला; जो परिवर्तनशील है, जिसका क्षय होता है और जो समय के साथ बदलता रहता है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस उच्चतम शिखर का वर्णन कर रहे हैं जिसे उन्होंने पिछले श्लोक में 'निष्कल' कहा था। वे स्पष्ट करते हैं कि वह निष्कल स्वरूप वास्तव में 'विष्णु' है। यहाँ विष्णु का अर्थ किसी विशेष रूप या मूर्ति से नहीं, अपितु उस सर्वव्यापी चेतना से है जो समस्त अस्तित्व का आधार है।
ऋषि कहते हैं कि यह विष्णु 'निरञ्जन' है। जिस प्रकार शुद्ध जल में कोई रंग न होने पर वह पारदर्शी होता है, वैसे ही परमात्मा में कोई विकार या राग-द्वेष नहीं है। वह 'शान्त' है, क्योंकि वह समस्त मानसिक उद्वेगों और संसार की हलचलों से परे एक स्थिर समुद्र की भाँति है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह 'सर्व-देहिनाम् आनन्दम्' है। इसका भाव यह है कि प्रत्येक जीव के भीतर जो सुख की सूक्ष्म प्यास है, वह वास्तव में उसी विष्णु-स्वरूप आनन्द की स्मृति है। देहधारी जीव बाहर सुख खोजता है, किन्तु वह आनन्द उसके भीतर ही विष्णु रूप में प्रतिष्ठित है।
यहाँ महर्षि एक मौलिक विभाजन करते हैं—'अक्षर' और 'क्षर' का। जो अविनाशी, अपरिवर्तनीय और शुद्ध चेतना है, उसे 'अक्षर' कहा गया है। इसके विपरीत, जो कुछ भी स्थूल है, जो इंद्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सकता है, जो जन्म और मृत्यु के चक्र में है, वह 'क्षर' है। यह शरीर क्षर है, यह संसार क्षर है, यहाँ तक कि उच्चारित शब्द भी क्षर है क्योंकि वह उत्पन्न होकर विलीन हो जाता है। इस प्रकार, साधक को यह बोध कराया जा रहा है कि वह अपनी पहचान क्षर (स्थूल देह) से हटाकर अक्षर (विष्णु) में स्थापित करे।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साक्षी भाव' की ओर ले जाता है। साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह दो स्तरों पर अनुभव करता है। पहला स्तर है 'उच्चारित ओंकार'—जो ध्वनि है, जो कान से सुना जाता है और जो समय के साथ समाप्त हो जाता है। यह 'क्षर' है। दूसरा स्तर है वह 'मौन' या 'अक्षर' जो उस ध्वनि के पीछे स्थित है, जो सुनने वाले के भीतर की वह चेतना है जो ध्वनि के आने और जाने का साक्षी है।
साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अभ्यास करता है कि वह स्वयं को स्थूल शरीर (क्षर) न मानकर, अपने भीतर स्थित उस शान्त और निरञ्जन तत्व (अक्षर) के रूप में देखे। जब साधक क्षर और अक्षर के इस भेद को अनुभव करता है, तब वह 'देह-अभिमान' से मुक्त होकर 'आनन्द-अभिमान' (परमानन्द के बोध) की भूमि पर पहुँचता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल जगत के भ्रामक आकर्षणों से हटाकर हृदय के भीतर स्थित उस अविनाशी विष्णु-तत्त्व की ओर मोड़ देता है, जहाँ केवल शान्ति और आनन्द शेष रहता है।
न च स्थूलं न च ह्रस्वं न च दीर्घं न च प्लुतम् ।
न लोहितं न कृष्णं च सर्ववर्णविवर्जितम् ॥ २.१०८ ॥
वह न स्थूल है, न ह्रस्व (लघु) है, न दीर्घ है और न ही प्लुत है; वह न लाल है और न काला है, सब वर्णों से रहित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'अक्षर' और 'क्षर' का भेद स्पष्ट करते हुए विष्णु के निरञ्जन और आनन्दमय स्वरूप का परिचय दिया। अब वे उस अक्षर के स्वरूप को और अधिक सूक्ष्मता से परिभाषित कर रहे हैं, ताकि साधक उसे किसी भौतिक या ध्वनि-आधारित सीमा में न बाँधे।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तद् अक्षरं) न स्थूलं (अस्ति), न च ह्रस्वं (अस्ति), न च दीर्घं (अस्ति), न च प्लुतम् (अस्ति)। (तद्) न लोहितं (अस्ति), न कृष्णं च (अस्ति), (तद्) सर्व-वर्ण-विवर्जितम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• स्थूलं: जो इंद्रियों द्वारा प्रत्यक्ष हो, जिसमें गाढ़ापन या भौतिक विस्तार हो।
• ह्रस्वं: व्याकरण की दृष्टि से वह स्वर जिसका उच्चारण समय सबसे कम हो (लघु)।
• दीर्घं: वह स्वर जिसका उच्चारण समय ह्रस्व से दुगुना हो।
• प्लुतम्: वह स्वर जिसका उच्चारण समय दीर्घ से भी अधिक हो (जैसे पुकारने में)।
• लोहितं: लाल रंग; जो रजोगुण या भौतिक शरीर के रक्त और तेज का प्रतीक है।
• कृष्णं: काला रंग; जो तमोगुण या गहन अंधकार का प्रतीक है।
• सर्ववर्णविवर्जितम्: समस्त रंगों (वर्णों) और ध्वनियों (अक्षरों) से रहित। यहाँ 'वर्ण' शब्द के दो अर्थ हैं—रंग और वर्णमाला के अक्षर।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस 'अक्षर' के स्वरूप का निषेधात्मक वर्णन कर रहे हैं। जब वे कहते हैं कि वह 'न स्थूल' है, तो उनका संकेत है कि यह ब्रह्म किसी भौतिक पिंड या आकार में सीमित नहीं है।
विशेष रूप से, ऋषि यहाँ व्याकरण के तीन काल-मात्राओं—ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत—का निषेध कर रहे हैं। सामान्यतः हम जब 'ओम्' का उच्चारण करते हैं, तो उसमें अ, उ और म की मात्राओं का एक समय-विस्तार होता है। किन्तु याज्ञवल्क्य यहाँ उस 'अमात्र' ओंकार की बात कर रहे हैं जो ध्वनि के उत्पन्न होने से पूर्व की स्थिति है और ध्वनि के विलीन होने के बाद की स्थिरता है। वह अक्षर समय (काल) की सीमाओं से परे है, इसलिए वह न लघु है, न दीर्घ और न ही प्लुत।
इसी प्रकार, 'न लोहितं न कृष्णं' कहकर वे उसे भौतिक गुणों और मानसिक अवस्थाओं से ऊपर उठाते हैं। लाल रंग रजोगुण और सक्रियता का प्रतीक है, काला रंग तमोगुण और जड़ता का। अक्षर इन दोनों के समन्वय या विरोध से मुक्त है। वह 'सर्ववर्णविवर्जितम्' है—अर्थात वह न तो किसी रंग में रंगा है और न ही वह वर्णमाला के किसी अक्षर की सीमा में बँधा है। वह वह शून्य या पूर्ण है जहाँ पहुँचकर समस्त रंग और समस्त ध्वनियाँ विलीन हो जाती हैं।
श्रुति-संगति —
इस श्लोक का मूल आधार शतपथ ब्राह्मण का वह संवाद है जहाँ याज्ञवल्क्य गार्गी को अक्षर का रहस्य समझाते हैं:
स होवाच एतद्वै तदक्षरं गार्गी ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वना काशमसङ्गमस्पर्शमगन्धमरसमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कम प्राणममुखमनामागोत्रमजरममरमभयममृतमरजोऽशब्दमविवृतम संवृतमपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यं न तदश्नोति कं चन न तदश्नोति कश्चन ॥ १४.६.८.८ ॥
(याज्ञवल्क्यने) कहा — गार्गी! उसीको ब्राह्मण "अक्षर" कहते हैं: वह न स्थूल है, न अणु, न ह्रस्व, न दीर्घ; न लाल, न स्नेहयुक्त; न छाया, न अन्धकार; न वायु, न आकाश; असङ्ग; न रस, न गन्ध; बिना नेत्र, बिना कान, बिना वाणी, बिना मन; बिना तेज, बिना प्राण, बिना मुख; न नाम, न गोत्र; अजर, अमर, अभय, अमृत, रजरहित, शब्दरहित; न खुला, न ढका; न उसका पूर्व है, न पर; न भीतर है, न बाहर। वह कुछ भी नहीं खाता, और उसे कोई नहीं खाता।
श्रुति में प्रयुक्त 'अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितम्' के पद इस स्मृति के श्लोक में पूर्णतः प्रतिबिंबित होते हैं। श्रुति जहाँ एक विस्तृत सूची के माध्यम से अक्षर को इंद्रिय-अतीत बताती है, वहीं यह स्मृति उन पदों को चुनकर साधक को यह समझा रही है कि जिस 'ओंकार' का वह जप कर रहा है, उसका अंतिम लक्ष्य उस ध्वनि-रहित, वर्ण-रहित और मात्रा-रहित 'अक्षर' में स्थित होना है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'वाचक' से 'वाच्य' की ओर ले जाने की विधि है। साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह प्रारंभ में स्थूल ध्वनि (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) का अनुभव करता है। यह अभ्यास की प्रथम भूमि है।
परन्तु जैसे-जैसे साधक की एकाग्रता बढ़ती है, वह ध्वनि के भीतर के मौन को सुनने लगता है। इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को ध्वनि के विस्तार (प्लुत) से हटाकर उस बिंदु पर ले जाए जहाँ ध्वनि समाप्त होती है और केवल 'अस्तित्व' शेष रहता है।
जब साधक अनुभव करता है कि उसका इष्ट न तो किसी रंग (लोहित/कृष्ण) में है और न ही किसी समय-सीमा (ह्रस्व/दीर्घ) में, तब वह 'क्षर' (परिवर्तनशील जगत) से ऊपर उठकर 'अक्षर' (अपरिवर्तनशील ब्रह्म) की भूमि में प्रवेश करता है। यह अभ्यास साधक को मानसिक संकल्पों और इंद्रिय-संस्कारों से मुक्त कर उसे उस 'निष्कल' स्थिति में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ न कोई आकार है, न कोई रंग, केवल शुद्ध चैतन्य का प्रकाश है।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च तत्त्वैश्च परिवर्जितम् ।
ध्रुवं च शाश्वतं नित्यमचलं लयवर्जितम् ॥ २.१०९ ॥
वह इन्द्रियों से, इन्द्रियार्थों से और तत्त्वों से रहित है; वह ध्रुव (अटल), शाश्वत, नित्य और अचल है तथा लय से रहित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'अक्षर' के स्वरूप को ध्वनि की काल-मात्राओं (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत) और भौतिक रंगों के निषेध द्वारा समझाया था। अब वे इस निषेध-यात्रा को और गहन करते हुए साधक को इन्द्रियों, विषयों और भौतिक तत्त्वों के पार ले जा रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तद् अक्षरं) इन्द्रियैः, इन्द्रियार्थैः च तत्त्वैः च परिवर्जितम् (अस्ति)। (तद्) ध्रुवं च, शाश्वतं, नित्यम्, अचलम्, लय-वर्जितम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• इन्द्रियैः: ज्ञानेन्द्रियों (श्रवण, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) और कर्मेंद्रियों से।
• इन्द्रियार्थैः: इन्द्रियों के विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) से।
• तत्त्वैः: पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से।
• परिवर्जितम्: सर्वथा रहित, पृथक या उससे परे।
• ध्रुवम्: जो अटल हो, जिसका कभी विस्थापन न हो।
• शाश्वतम्: जो सदैव विद्यमान रहे, जिसका कोई आरम्भ या अन्त न हो।
• नित्यम्: जो काल की सीमाओं से मुक्त, अविनाशी हो।
• अचलम्: जिसमें कोई कंपन या विकार न हो।
• लय-वर्जितम्: जो प्रलय या विलीन होने की प्रक्रिया से मुक्त हो।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस 'अक्षर' (ओंकार के सूक्ष्म स्वरूप) का वर्णन कर रहे हैं, जिसे केवल बुद्धि से नहीं, अपितु अनुभव से जाना जा सकता है। यहाँ ऋषि 'नेति-नेति' (यह नहीं, वह नहीं) की पद्धति का प्रयोग कर रहे हैं।
प्रथम पंक्ति में वे कहते हैं कि वह अक्षर 'इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च तत्त्वैश्च परिवर्जितम्' है। इसका अर्थ यह है कि जिस तत्व को हम कानों से सुन सकें, आँखों से देख सकें या स्पर्श कर सकें, वह 'क्षर' (विनाशी) है। अक्षर वह है जो इन्द्रियों का विषय नहीं है, बल्कि इन्द्रियों का आधार है। यदि वह इन्द्रियार्थों (विषयों) से युक्त होता, तो वह उन विषयों के साथ बदल जाता। यदि वह भौतिक तत्त्वों (पंचमहाभूतों) से बना होता, तो वह उन्हीं के नियमों से बँधा होता। अतः वह अक्षर इन सबसे 'परिवर्जित' है—अर्थात् वह इन सबका मूल तो है, किन्तु इनमें समाहित नहीं है।
द्वितीय पंक्ति में ऋषि उस अक्षर के सकारात्मक गुणों का वर्णन करते हैं। जब वह इन्द्रियों और तत्त्वों के बंधन से मुक्त होता है, तब वह 'ध्रुव' और 'शाश्वत' हो जाता है। भौतिक जगत में सब कुछ परिवर्तनशील है; यहाँ 'नित्य' कुछ भी नहीं है। किन्तु वह अक्षर 'अचल' है। 'लय-वर्जित' होने का अर्थ है कि सृष्टि के निर्माण और प्रलय के चक्र में जहाँ सब कुछ अपने मूल कारण में विलीन (लय) हो जाता है, वह अक्षर उस लय की प्रक्रिया से भी ऊपर है। वह वह साक्षी है जो लय के समय भी बना रहता है और सृष्टि के समय भी।
श्रुति-संगति —
महर्षि याज्ञवल्क्य का यह कथन उनकी अपनी श्रुति के उस संवाद का विस्तार है, जहाँ वे गार्गी को अक्षर के स्वरूप के बारे में बता रहे हैं:
स होवाच एतद्वै तदक्षरं गार्गी ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वना काशमसङ्गमस्पर्शमगन्धमरसमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कम प्राणममुखमनामागोत्रमजरममरमभयममृतमरजोऽशब्दमविवृतम संवृतमपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यं न तदश्नोति कं चन न तदश्नोति कश्चन ॥ १४.६.८.८ ॥
(याज्ञवल्क्यने) कहा — गार्गी! उसीको ब्राह्मण "अक्षर" कहते हैं: वह न स्थूल है, न अणु, न ह्रस्व, न दीर्घ; न लाल, न स्नेहयुक्त; न छाया, न अन्धकार; न वायु, न आकाश; असङ्ग; न रस, न गन्ध; बिना नेत्र, बिना कान, बिना वाणी, बिना मन; बिना तेज, बिना प्राण, बिना मुख; न नाम, न गोत्र; अजर, अमर, अभय, अमृत, रजरहित, शब्दरहित; न खुला, न ढका; न उसका पूर्व है, न पर; न भीतर है, न बाहर। वह कुछ भी नहीं खाता, और उसे कोई नहीं खाता।
श्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि वह अक्षर 'अचक्षुष्कमश्रोत्रम्' (बिना नेत्रों और कानों का) है। स्मृति का 'इन्द्रिय-परिवर्जित' शब्द इसी श्रुति का सार है। जिस प्रकार श्रुति उसे 'अश्रोत्रम्' (कान-रहित) कहती है, उसी प्रकार स्मृति उसे 'इन्द्रियार्थ-रहित' कहती है, क्योंकि जो सुनने वाला (कर्ण) नहीं है, वह शब्द (इन्द्रियार्थ) का विषय भी नहीं हो सकता। श्रुति का 'अमर' और 'अजर' होना ही स्मृति का 'शाश्वत' और 'नित्य' होना है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'निषेध-ध्यान' का एक महान अभ्यास है। योग की दृष्टि से, साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह धीरे-धीरे स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म ध्वनि की ओर बढ़ता है। इस श्लोक का अभ्यास साधक को इस अनुभव की ओर ले जाता है कि:
१. इन्द्रिय-त्याग: साधक अनुभव करता है कि वह केवल शरीर या इन्द्रियाँ नहीं है। वह अपनी चेतना को इन्द्रियों के विषयों (रूप, रस, गन्ध आदि) से हटाकर भीतर की ओर मोड़ता है।
२. तत्त्व-विश्रांति: वह यह अनुभव करता है कि उसका वास्तविक स्वरूप पंचमहाभूतों (मिट्टी, पानी, अग्नि आदि) से परे है। वह देह के भौतिक तत्त्वों में स्थित होते हुए भी उनसे 'परिवर्जित' (अलग) है।
३. अचल स्थिति: जब साधक इन्द्रियों और विषयों के भँवर से बाहर निकलता है, तब वह अपने भीतर एक ऐसी स्थिति का अनुभव करता है जो 'ध्रुव' और 'अचल' है। यह वह बिंदु है जहाँ मन की सारी चंचलता समाप्त हो जाती है और केवल एक स्थिर, नित्य प्रकाश शेष रहता है।
यह अभ्यास साधक को 'क्षर' (परिवर्तनशील जगत) की भूमि से उठाकर 'अक्षर' (अपरिवर्तनशील ब्रह्म) की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह स्वयं वह 'लय-वर्जित' तत्व है, जो संसार के आने-जाने के बीच भी अटल रहता है।
अक्षरं चाजरं चैवमनुत्पन्नमनाशि च ।
सर्वमात्राविनिर्मुक्तमानन्दं ब्रह्म निष्कलम् ॥ २.११० ॥
वह अक्षर और अजर है, उत्पन्न न होने वाला और अविनाशी है; सब मात्राओं से मुक्त, आनन्दस्वरूप ब्रह्म निष्कल है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'अक्षर' के स्वरूप को इन्द्रियों, विषयों और पंचमहाभूतों से पृथक बताते हुए उसे ध्रुव और लय-वर्जित सिद्ध किया था। अब वे इस अक्षर के उस परम स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं जो काल और सृष्टि की उत्पत्ति-विनाश की सीमाओं से सर्वथा परे है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तद् अक्षरं) अक्षरं च, अजरं च एव, (तद्) अनुत्पन्नम्, अनाशि (अविनाशि) च (अस्ति)। (तद्) सर्व-मात्रा-विनिर्मुक्तम्, आनन्दं ब्रह्म निष्कलम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• अक्षरम्: जो क्षर (विनाशी) न हो; अविनाशी और अविभाज्य।
• अजरम्: जिसमें जरा (वृद्धावस्था या क्षय) न हो; जो समय के प्रभाव से अपरिवर्तित रहे।
• अनुत्पन्नम्: जिसकी कोई उत्पत्ति न हुई हो; जो स्वयं-सिद्ध और अनादि हो।
• अनाशि (अविनाशि): जिसका कभी विनाश न हो; जो प्रलय के बाद भी शेष रहे।
• सर्वमात्राविनिर्मुक्तम्: समस्त मात्राओं (ध्वनि की काल-सीमा, गुण, लक्षण और भौतिक मापों) से सर्वथा मुक्त।
• आनन्दम्: वह स्थिति जहाँ द्वैत का अभाव हो और केवल परमानन्द शेष रहे।
• निष्कलम्: जो 'कण' या 'अंश' रहित हो; जिसमें कोई विभाजन न हो, पूर्णतः अभेद।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस सूक्ष्मतम स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं, जो स्थूल ध्वनि से परे 'अमात्र' है। पिछले श्लोकों में उन्होंने बताया कि वह अक्षर इन्द्रियों और तत्त्वों से रहित है, यहाँ वे उसके 'अस्तित्व' की प्रकृति को स्पष्ट कर रहे हैं।
ऋषि कहते हैं कि वह 'अक्षरं चाजरं चैव' है। साधारणतः संसार में जो कुछ भी उत्पन्न होता है, वह क्षर (विनाशी) होता है और समय के साथ उसमें जरा (क्षय) आता है। किन्तु यह अक्षर काल के अधीन नहीं है। वह 'अनुत्पन्नमनाशि' है—अर्थात् उसकी न तो कोई रचना हुई है और न ही उसका कभी लय होगा। वह सदा से है और सदा रहेगा। यह वही रहस्य है जो श्रुति में 'अनादि' और 'अनन्त' के रूप में वर्णित है।
द्वितीय पंक्ति में याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गूढ़ योगिक सत्य प्रकट करते हैं: 'सर्वमात्राविनिर्मुक्तमानन्दं ब्रह्म निष्कलम्'। यहाँ 'मात्रा' शब्द का अर्थ केवल ध्वनि की लघुता या दीर्घता नहीं है, बल्कि संसार के समस्त मापदण्ड हैं। जब साधक ओंकार के जप से ऊपर उठकर उसके शून्य स्वरूप में स्थित होता है, तब वह 'मात्रा-विनिर्मुक्त' हो जाता है। वह अवस्था 'निष्कल' है, क्योंकि वहाँ न कोई ज्ञाता है, न ज्ञान और न ही ज्ञेय—केवल एक अखंड सत्ता है। यही वह 'आनन्द' है जो किसी बाहरी वस्तु से प्राप्त नहीं होता, अपितु स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रारहित चौथा है — व्यवहारसे परे, प्रपञ्चका उपशम, शिव, अद्वैत। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है; जो ऐसा जानता है, वह आत्मासे आत्मामें प्रवेश करता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में कहा गया है कि मात्रारहित चौथा (तुरीय) व्यवहार से परे और प्रपञ्च का उपशम है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'सर्वमात्राविनिर्मुक्त' और 'निष्कल' शब्द इसी 'तुरीय' अवस्था की ओर संकेत करते हैं। जहाँ माण्डूक्य उपनिषद् इसे 'अद्वैत' और 'शिव' कहता है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे 'आनन्द ब्रह्म' के रूप में परिभाषित कर रहे हैं। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि जब ओंकार अपनी मात्राओं से मुक्त होता है, तब वह साक्षात् आत्मा बन जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक महान अनुभव-भूमि का मानचित्र है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह पहले 'अ' (जाग्रत), फिर 'उ' (स्वप्न) और फिर 'म' (सुषुप्ति) की मात्राओं से गुजरता है। किन्तु इस श्लोक का अभ्यास उसे उस 'अमात्र' स्थिति में ले जाता है, जहाँ ध्वनि समाप्त हो जाती है और केवल मौन शेष रहता है।
'सर्वमात्राविनिर्मुक्त' का अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के समस्त संकल्पों, विचारों और समय की अवधारणा (मात्राओं) को विसर्जित कर दे। जब वह अनुभव करता है कि वह न तो शरीर है (जो जराग्रस्त है), न मन है (जो उत्पन्न और विनाशी है), तब वह 'अक्षर' और 'अजर' की भूमि पर पहुँचता है। यह स्थिति 'निष्कल' है—जहाँ साधक स्वयं को एक अखंड ज्योति या शून्य के रूप में पाता है। इस अभ्यास से साधक क्षर-भूमि (परिवर्तनशील संसार) से उठकर अक्षर-भूमि (अपरिवर्तनीय ब्रह्म) में प्रतिष्ठित होता है। यहाँ आनन्द कोई भावना नहीं, बल्कि वह एकमात्र शेष तत्व है जो मात्राओं के मिटने पर स्वतः प्रकट होता है।
अघोषमव्यञ्जनमस्वरं च यत् कव्य(ण्ठ)तालव्यमनासिकं च ।
अरेफजातस्वरमोष्ठवर्जितं तदक्षरं स्वरति स्वयं भवम् ॥ २.१११ ॥
जो घोषरहित, व्यञ्जनरहित, स्वररहित है; कण्ठ और तालुसे रहित, नासिकासे रहित; रेफसे न उत्पन्न स्वरवाला और ओष्ठसे रहित है — वह स्वयम्भू अक्षर (अपने-आप) ध्वनित होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अक्षर के उस स्वरूप का वर्णन किया जो समस्त मात्राओं से मुक्त और निष्कल आनन्दस्वरूप ब्रह्म है। अब वे इस अक्षर की उस सूक्ष्मता को स्पष्ट कर रहे हैं, जहाँ वह भौतिक ध्वनि के समस्त व्याकरणिक और शारीरिक आधारों से परे हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यत् (अक्षरं) अघोषम्, अव्यञ्जनम्, स्वरं च (रहितम्), कण्ठ-तालव्य-अनासिकं च (अस्ति), रेफ-जात-स्वर-मोष्ठ-वर्जितं (अस्ति), तद् अक्षरं स्वयं भवति स्वरति।
पदार्थ:
• अघोषम्: जिसमें 'घोष' (ध्वनि का वह कंपन जो स्वरतन्त्रियों के घर्षण से उत्पन्न होता है) न हो।
• अव्यञ्जनम्: जो व्यञ्जन वर्णों (जैसे क, ख, ग आदि) की भाँति किसी स्वर के सहारे प्रकट न हो; जो स्वतंत्र हो।
• अस्वरम्: जो उन स्वरों (अ, इ, उ आदि) से रहित हो जिन्हें भौतिक मुख से उच्चारित किया जाता है।
• कण्ठ-तालव्य-अनासिकम्: जिसका उच्चारण-स्थान कण्ठ, तालु या नासिका न हो।
• रेफ-जात-स्वर-मोष्ठ-वर्जितम्: जो 'र' (रेफ) की ध्वनि से उत्पन्न न हो और जिसके प्रकटीकरण में ओष्ठों (होंठों) का प्रयोग न हो।
• स्वरति स्वयं भवम्: वह स्वयम्भू अक्षर स्वयं ही ध्वनित होता है; उसे किसी बाहरी प्रयास या शारीरिक क्रिया द्वारा बोलना नहीं पड़ता।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस पारमार्थिक स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जो 'वाक्' की भौतिक सीमाओं से सर्वथा मुक्त है। जब हम ओंकार का जप करते हैं, तो वह कण्ठ, तालु और ओष्ठों के संयोग से एक स्थूल ध्वनि के रूप में प्रकट होता है, किन्तु ऋषि यहाँ उस 'अक्षर' की बात कर रहे हैं जो इस स्थूल ध्वनि का मूल बीज है।
ऋषि कहते हैं कि वह अक्षर 'अघोषम्' और 'अस्वरम्' है। व्याकरण की दृष्टि से किसी भी ध्वनि के लिए वायु का घर्षण और स्वरतन्त्रियों का कंपन आवश्यक है, किन्तु यह अक्षर उस कंपन से परे है। यह 'अव्यञ्जनम्' है, अर्थात् इसे प्रकट करने के लिए किसी अन्य वर्ण या सहारे की आवश्यकता नहीं है; यह स्वयं-सिद्ध है।
आगे ऋषि इसके भौतिक उच्चारण-स्थानों का निषेध करते हैं—'कण्ठतालव्यमनासिकं च' तथा 'मोष्ठवर्जितम्'। सामान्यतः मनुष्य की वाणी कण्ठ, तालु, नासिका और ओष्ठों के विभिन्न संयोजनों से बनती है। किन्तु यह अक्षर इन शारीरिक अंगों का आश्रित नहीं है। यहाँ तक कि 'रेफ' (र की ध्वनि), जो जिह्वा के कंपन से उत्पन्न होती है, वह भी इस अक्षर के स्वरूप में नहीं है।
अंत में ऋषि एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोलते हैं—'तदक्षरं स्वरति स्वयं भवम्'। इसका अर्थ यह है कि जब साधक अपनी चेतना को समस्त भौतिक ध्वनियों और शारीरिक अंगों के बंधन से मुक्त कर लेता है, तब वह अनुभव करता है कि एक ऐसी ध्वनि है जो बिना किसी प्रयास के, बिना किसी मुख के और बिना किसी वायु के घर्षण के, स्वयं ही गूँज रही है। यह वह स्थिति है जहाँ 'बोलने वाला' और 'बोला जाने वाला' एक हो जाते हैं और केवल शुद्ध अस्तित्व की ध्वनि शेष रहती है।
श्रुति-संगति —
स होवाच एतद्वै तदक्षरं गार्गी ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वना काशमसङ्गमस्पर्शमगन्धमरसमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कम प्राणममुखमनामागोत्रमजरममरमभयममृतमरजोऽशब्दमविवृतम संवृतमपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यं न तदश्नोति कं चन न तदश्नोति कश्चन ॥ १४.६.८.८ ॥
(याज्ञवल्क्यने) कहा — गार्गी! उसीको ब्राह्मण "अक्षर" कहते हैं: वह न स्थूल है, न अणु, न ह्रस्व, न दीर्घ; न लाल, न स्नेहयुक्त; न छाया, न अन्धकार; न वायु, न आकाश; असङ्ग; न रस, न गन्ध; बिना नेत्र, बिना कान, बिना वाणी, बिना मन; बिना तेज, बिना प्राण, बिना मुख; न नाम, न गोत्र; अजर, अमर, अभय, अमृत, रजरहित, शब्दरहित; न खुला, न ढका; न उसका पूर्व है, न पर; न भीतर है, न बाहर। वह कुछ भी नहीं खाता, और उसे कोई नहीं खाता।
इस श्रुति-अंश में याज्ञवल्क्य गार्गी को समझाते हुए अक्षर को 'अमुखम्' (बिना मुख वाला) और 'अशब्दम्' (ध्वनिरहित) कहते हैं। स्मृति का यह श्लोक उसी श्रुति का विस्तार है। जहाँ श्रुति संक्षेप में 'अमुखम्' कहकर भौतिक अंगों का निषेध करती है, वहीं यह स्मृति विस्तार से कण्ठ, तालु, नासिका और ओष्ठों का उल्लेख कर यह स्पष्ट करती है कि अक्षर किसी भी शारीरिक उच्चारण-स्थान में सीमित नहीं है। श्रुति का 'अशब्द' यहाँ उस भौतिक शब्द का निषेध है जिसे कान सुनते हैं, जबकि स्मृति का 'स्वरति स्वयं भवम्' उस सूक्ष्म ध्वनि की ओर संकेत है जिसे केवल अंतःकरण से अनुभव किया जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'ध्वनि' से 'मौन' की ओर और 'मौन' से 'स्वयम्-ध्वनि' की ओर ले जाने वाला मार्ग है। योगिक अभ्यास में जब साधक स्थूल जप (वैखरी) से सूक्ष्म जप (मध्यमा और पश्यन्ती) की ओर बढ़ता है, तो वह धीरे-धीरे अनुभव करता है कि ध्वनि का केंद्र कण्ठ से हटकर हृदय और फिर भ्रूमध्य की ओर जा रहा है।
'स्वरति स्वयं भवम्' का अनुभव वह है, जहाँ साधक को ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसके भीतर एक निरंतर नाद गूँज रहा है, जिसे उसने उत्पन्न नहीं किया, बल्कि वह सदा से वहाँ था और अब केवल प्रकट हुआ है। यह अनुभव उस नाद के समान है जो बिना किसी आघात के स्वयं बजता है। साधक जब इस श्लोक के भाव का अभ्यास करता है, तो वह अपने भीतर के मौन में उस 'स्वयम्-ध्वनित' अक्षर को सुनने का प्रयास करता है। वह अपनी चेतना को कण्ठ, तालु और ओष्ठों से हटाकर उस शून्य स्थान में ले जाता है जहाँ कोई शारीरिक क्रिया नहीं है, केवल शुद्ध चैतन्य की गूँज है। यह अभ्यास साधक को स्थूल देह के बोध से मुक्त कर उसे 'अक्षर' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।
ओंकारं विपुलमचिन्त्यमप्रमेयं सूक्ष्माकारं ध्रुवमचलं शिवं पुराणम् ।
तद्विष्णोः पद(पदं) मुखपङ्कजप्रसूतं देहान्तःस्थं मनसि च यत् स्थितिं करोति ॥ २.११२ ॥
विपुल, अचिन्त्य, अप्रमेय, सूक्ष्माकार, ध्रुव, अचल, शिव और पुराण ओंकार, वह विष्णु का पद है जो मुखकमल से उत्पन्न है और देह के भीतर स्थित होकर मन में जो स्थिति करता है ...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अक्षर के उस स्वरूप का वर्णन किया जो समस्त भौतिक उच्चारण-स्थानों (कण्ठ, तालु, ओष्ठ) से रहित और स्वयम्भू है। अब वे इस अक्षर को 'ओंकार' के नाम से संबोधित करते हुए उसकी व्यापकता और उसकी उस स्थिति का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ वह स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म चेतना में परिवर्तित होकर साधक के मन में प्रतिष्ठित होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यः) ओंकारः विपुलः, अचिन्त्यः, अप्रमेयः, सूक्ष्माकारः, ध्रुवः, अचलः, शिवः (च) पुराणम् (अस्ति)। तत् (ओंकारः) मुख-पङ्कज-प्रसूतं विष्णोः पदं (अस्ति), यत् देहान्तःस्थं (भूत्वा) मनसि च स्थितिं करोति।
पदार्थ:
• विपुलः: अत्यंत व्यापक, जिसमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है।
• अचिन्त्यः: जो साधारण बुद्धि या तर्क (चिन्तन) के द्वारा न जाना जा सके; जो केवल अनुभव का विषय है।
• अप्रमेयः: जिसे प्रमाणों (शास्त्र, प्रत्यक्ष, अनुमान) द्वारा मापा या सिद्ध न किया जा सके; जो स्वयं प्रमाण है।
• सूक्ष्माकारः: जिसका आकार इतना सूक्ष्म है कि वह इन्द्रियों की पकड़ में नहीं आता, फिर भी वह सत्ता के रूप में विद्यमान है।
• ध्रुवः और अचलः: जो सदा एक समान रहता है, जिसमें कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता; जो अविनाशी है।
• शिवः: जो परम कल्याणस्वरूप है; जिससे साधक का समस्त दुःख और अविद्या नष्ट हो जाती है।
• पुराणम्: जो सबसे प्राचीन है; समय (काल) की उत्पत्ति से पूर्व भी जो था और अंत के बाद भी जो रहेगा।
• विष्णोः पदम्: विष्णु का स्थान। यहाँ 'विष्णु' का अर्थ उस सर्वव्यापी चेतना से है जो कण-कण में व्याप्त है। 'पद' का अर्थ है वह अवस्था या स्थिति जहाँ पहुँचकर जीव अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है।
• मुखपङ्कजप्रसूतम्: मुख रूपी कमल से उत्पन्न। यहाँ 'मुख' केवल शारीरिक मुख नहीं, अपितु वाणी का वह स्रोत है जहाँ से ओंकार की ध्वनि प्रकट होती है।
• देहान्तःस्थं मनसि च यत् स्थितिं करोति: जो देह के भीतर स्थित होकर मन में अपनी स्थिति बनाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं जो बाह्य ध्वनि से आरम्भ होकर अन्ततः परम पद (विष्णुपद) में विलीन हो जाता है। ऋषि यहाँ ओंकार के आठ विशेषणों द्वारा उसकी महिमा बता रहे हैं। वह 'विपुल' है क्योंकि वह केवल एक शब्द नहीं, अपितु संपूर्ण सृष्टि का सार है। वह 'अचिन्त्य' और 'अप्रमेय' है क्योंकि मन और बुद्धि केवल सीमित वस्तुओं को जान सकते हैं, जबकि ओंकार असीमित है। उसका 'सूक्ष्माकार' होना यह दर्शाता है कि वह भौतिक आकार से रहित होकर भी एक सूक्ष्म स्पंदन के रूप में उपस्थित है। 'ध्रुव', 'अचल', 'शिव' और 'पुराण' होना उसके उस स्वरूप को प्रकट करता है जो काल और परिस्थिति से परे, शाश्वत कल्याण का स्रोत है।
ऋषि एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य खोलते हैं कि यह ओंकार ही 'विष्णोः पदम्' अर्थात् विष्णु का पद है। जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह 'मुखपङ्कजप्रसूत' होता है—अर्थात् वह वाणी के माध्यम से प्रकट होता है। किन्तु यह प्रकटीकरण केवल एक माध्यम है। वास्तविक यात्रा तो तब आरम्भ होती है जब यह ध्वनि मुख से निकलकर 'देहान्तःस्थ' होती है, यानी शरीर के भीतर की सूक्ष्म गहराइयों में उतरती है।
इस प्रक्रिया का चरम तब होता है जब यह ओंकार 'मनसि स्थितिं करोति'—अर्थात् मन में स्थित हो जाता है। साधारणतः मन चंचल होता है और विषयों में भटकता है, किन्तु जब ओंकार की सूक्ष्म ध्वनि मन में स्थिर होती है, तो मन स्वयं उस अक्षर का रूप हो जाता है। यही वह स्थिति है जहाँ साधक को अनुभव होता है कि जिसे वह बाहर खोज रहा था, वह विष्णु-पद उसके अपने ही मन के केंद्र में स्थित है। इस प्रकार, बाहरी जप (मुख) से आंतरिक स्थिरता (मन) तक की यात्रा ही इस श्लोक का मूल मर्म है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि' से 'शून्य' और 'शून्य' से 'पूर्ण' की ओर ले जाने वाला अभ्यास है। योगिक अभ्यास में साधक जब ओंकार का उच्चारण करता है, तो उसे केवल कंठ की ध्वनि पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि यह ध्वनि मुख से उत्पन्न होकर शरीर के भीतर किस प्रकार गूँज रही है।
यहाँ अभ्यास की तीन भूमियाँ संकेतित हैं:
१. वाचिक भूमि (मुखपङ्कजप्रसूत): जहाँ ओंकार एक शब्द के रूप में उच्चारित होता है। यह स्थूल स्तर है।
२. प्राणिक भूमि (देहान्तःस्थ): जहाँ ध्वनि शब्द न रहकर एक सूक्ष्म कंपन बन जाती है और पूरे शरीर के भीतर व्याप्त हो जाती है। यहाँ साधक अनुभव करता है कि ओंकार उसके भीतर की प्राण-शक्ति के साथ एकाकार हो रहा है।
३. मानसिक भूमि (मनसि स्थितिं करोति): यह उच्चतम भूमि है। यहाँ ध्वनि का पूर्णतः विलोप हो जाता है और केवल एक 'अवस्था' शेष रहती है। जब ओंकार मन में स्थित होता है, तो मन की सारी वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं और साधक 'विष्णुपद' का अनुभव करता है।
साधक इस श्लोक के माध्यम से यह सीखता है कि ओंकार का लक्ष्य उसे बोलना नहीं, बल्कि उसमें 'स्थित' होना है। जब ओंकार मन में स्थिर होता है, तब वह 'अचल' और 'ध्रुव' हो जाता है, और साधक का चित्त भी उसी शिवत्व (कल्याण) को प्राप्त कर लेता है। यह अभ्यास साधक को क्षर (परिवर्तनशील) से अक्षर (अपरिवर्तनशील) की ओर ले जाता है।
ओंकारस्य दश नामानि
दश नामानि नैरुक्ता ओंकारस्य प्रचक्षते ।
अन्वर्थकानि तानीह वेदितव्यानि धीमता ॥ २.११३ ॥
ओंकार के दस निरुक्त नाम कहे जाते हैं; वे यहाँ अर्थानुसार बुद्धिमान् को जानने योग्य हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के उस स्वरूप का वर्णन किया जो समस्त भौतिक उच्चारण-स्थानों से रहित, स्वयम्भू और विष्णु का पद है। अब वे इस अक्षर के उन नामों का परिचय दे रहे हैं, जो केवल संबोधन नहीं, अपितु उसके कार्य और स्वरूप के निरुक्त हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओंकारस्य दश नामानि नैरुक्ता प्रचक्षते। तानी अन्वर्थकानि इह धीमता वेदितव्यानि।
पदार्थ:
• नैरुक्ता: निरुक्त से संबंधित। 'निरुक्त' का अर्थ है शब्दों के वास्तविक अर्थ और उनकी व्युत्पत्ति का ज्ञान। यहाँ 'नैरुक्ता' का अर्थ है वे नाम जो केवल परंपरा से नहीं मिले, बल्कि जिनका एक निश्चित अर्थ और कारण है।
• प्रचक्षते: कहे जाते हैं या प्रसिद्ध हैं।
• अन्वर्थकानि: 'अनु' (पीछे/अनुसरण) + 'अर्थक' (अर्थ वाला)। वे नाम जो अपने अर्थ का अनुसरण करते हैं; अर्थात जिन नामों का उच्चारण करते ही उस नाम में छिपे हुए अर्थ का बोध हो जाए।
• धीमता: बुद्धिमानों द्वारा। यहाँ 'धीमता' केवल बौद्धिक ज्ञान रखने वाला नहीं, बल्कि वह साधक है जिसकी बुद्धि योग-साधना से स्थिर और सूक्ष्म हो चुकी है।
• वेदितव्यानि: जानने योग्य हैं। यह 'तव्यत' प्रत्यय विधान और अनिवार्यता को दर्शाता है कि साधक के लिए इन नामों के अर्थ को जानना आवश्यक है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के दस ऐसे नामों का संकेत कर रहे हैं, जो उसके स्वरूप के विभिन्न आयामों को प्रकट करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि ये नाम 'नैरुक्त' हैं। वैदिक परंपरा में निरुक्त का महत्व इसलिए है क्योंकि जब तक साधक को शब्द की व्युत्पत्ति और उसके पीछे छिपे सत्य का ज्ञान नहीं होता, तब तक वह शब्द केवल एक ध्वनि बनकर रह जाता है।
इन नामों को 'अन्वर्थक' कहा गया है। इसका रहस्य यह है कि ओंकार एक ही है, परंतु साधक की चेतना के स्तर के अनुसार वह अलग-अलग रूपों में अनुभव होता है। जब वह शरीर को प्रभावित करता है, तो 'ओंकार' है; जब वह प्राणों को जाग्रत करता है, तो 'प्रणव' है; जब वह साधक को संसार से पार ले जाता है, तो 'तार' है। अतः ये नाम ओंकार के अलग-अलग स्वरूप नहीं, बल्कि एक ही परम-तत्त्व के अलग-अलग 'कार्य' हैं।
ऋषि कहते हैं कि ये 'धीमता' यानी बुद्धिमानों को जानने योग्य हैं। यहाँ बुद्धि का अर्थ तर्क नहीं, बल्कि 'विवेक' है। एक साधारण व्यक्ति ओंकार का जप केवल एक धार्मिक क्रिया के रूप में करता है, किंतु एक योगी जब इन दस नामों के अर्थों को समझकर जप करता है, तो वह ध्वनि के साथ-साथ उस ध्वनि के 'अर्थ' (भाव) में भी प्रवेश करता है। यह ज्ञान ही स्थूल जप को सूक्ष्म ध्यान में परिवर्तित कर देता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-अर्थ' के महत्व को स्थापित करता है। प्रथम अध्याय में ऋषियों ने मन्त्रों की नींव के विषय में प्रश्न किए थे, और यहाँ याज्ञवल्क्य उसका उत्तर दे रहे हैं कि मन्त्र का केवल उच्चारण पर्याप्त नहीं है, अपितु उसके अर्थ का साक्षात्कार अनिवार्य है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह केवल 'ओम्' की ध्वनि न करे, बल्कि उन दस नामों के अर्थों को अपने भीतर अनुभव करे। जब वह 'ओंकार' नाम का स्मरण करे, तो अनुभव करे कि उसकी चेतना ऊपर उठ रही है; जब 'प्रणव' का स्मरण करे, तो अनुभव करे कि उसके प्राण जाग्रत हो रहे हैं।
यह प्रक्रिया साधक को 'शब्द-जाग्रत' अवस्था से 'अर्थ-जाग्रत' अवस्था की ओर ले जाती है। जब नाम और अर्थ एक हो जाते हैं, तब साधक की बुद्धि (धी) उस अक्षर में लीन हो जाती है। इस प्रकार, इन दस नामों का ज्ञान साधक को स्थूल ध्वनि के स्तर से उठाकर उस सूक्ष्म भूमि पर ले जाता है जहाँ वह 'अमात्र' ओंकार के निकट पहुँचता है। यह अभ्यास जप को केवल एक क्रिया न रखकर उसे एक 'अनुभव' बना देता है।
ओंकारं प्रणवं चैव सर्वव्यापिनमेव च ।
अनन्तं च तथा तारं शुक्लं वैद्युतमेव च ॥ २.११४ ॥
(वे नाम हैं) ओंकार, प्रणव, सर्वव्यापी, अनन्त, तार (तारने वाला), शुक्ल और वैद्युत।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के दस निरुक्त नामों की अनिवार्यता बताई और कहा कि बुद्धिमान साधक को इनके अर्थानुसार ज्ञान होना चाहिए। इसी क्रम में वर्तमान श्लोक उन नामों की सूची प्रस्तुत करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओंकारं, प्रणवं, च एव, सर्वव्यापिनम् एव च, अनन्तं च तथा, तारं, शुक्लं, वैद्युतम् एव च (एतानि नामानि सन्ति)।
पदार्थ:
• ओंकार: वह ध्वनि जो शरीर और चेतना को उर्ध्वगामी करती है।
• प्रणव: वह जो समस्त प्राणों और मन्त्रों को प्राणित (सजीव) करता है।
• सर्वव्यापि: जो समस्त चराचर जगत में व्याप्त है; जिससे पृथक कुछ भी नहीं।
• अनन्त: जिसका कोई अंत नहीं; जो काल, देश और सीमा से परे है।
• तार: जो साधक को संसार-सागर से पार उतारता है या निम्न भूमियों से उच्च भूमियों की ओर तारता है।
• शुक्ल: जो शुद्ध है, श्वेत है और साधक के पापों तथा अविद्या के मल को सुखा देता है।
• वैद्युत: जो बिजली के समान तीव्र, प्रकाशमय और भ्रूमध्य में प्रस्फुटित होने वाली ज्योति है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के प्रथम सात नामों का उल्लेख किया है। यह केवल शब्दों की सूची नहीं है, अपितु एक साधक के लिए उस अक्षर की यात्रा का मानचित्र है। जब याज्ञवल्क्य इन नामों को गिनाते हैं, तो वे वास्तव में उस एक ही 'अक्षर' के विभिन्न गुणों को उद्घाटित कर रहे हैं, जिन्हें साधक अपनी साधना की विभिन्न अवस्थाओं में अनुभव करता है।
प्रथम नाम 'ओंकार' और 'प्रणव' उस ध्वनि और शक्ति के सूचक हैं जो स्थूल शरीर को सूक्ष्मता की ओर ले जाते हैं। 'सर्वव्यापिनम्' और 'अनन्तम्' उस अवस्था को दर्शाते हैं जहाँ साधक की दृष्टि संकुचित 'मैं' से निकलकर विराट में विलीन होने लगती है। 'तार' वह सेतु है जो बंधन और मोक्ष के बीच स्थित है। 'शुक्ल' उस आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है जो जप और ध्यान के फलस्वरूप घटित होती है, और 'वैद्युत' उस साक्षात्कार की तीव्र ज्योति है जो साधक के अंतःकरण में बिजली की भाँति कौंधती है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये नाम 'अन्वर्थक' हैं, जैसा कि पिछले श्लोक में बताया गया। इसका अर्थ यह है कि जब साधक 'वैद्युत' शब्द का चिंतन करता है, तो उसे केवल शब्द याद नहीं आता, बल्कि उसके भीतर स्थित वह प्रकाशमय तत्त्व जाग्रत होने लगता है। यह स्मृति-साधना है, जहाँ नाम ही उस स्वरूप का द्वार बन जाता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक के लिए 'नाम-स्मरण' और 'भाव-संस्पर्श' का अभ्यास है। साधक यहाँ केवल शब्दों को नहीं पढ़ता, बल्कि इन सात गुणों को अपने भीतर खोजने का प्रयास करता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक ओंकार का जप करते हुए क्रमशः इन भावों को हृदय में स्थापित करे: पहले यह अनुभव करना कि यह ध्वनि उसे ऊपर उठा रही है (ओंकार), फिर यह कि यह उसके भीतर के प्राणों को जाग्रत कर रही है (प्रणव), तत्पश्चात यह बोध कि यही ध्वनि कण-कण में व्याप्त है (सर्वव्यापी), और अंततः उस तीव्र ज्योति का अनुभव करना जो भ्रूमध्य में स्थित है (वैद्युत)।
यह अभ्यास साधक को स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म प्रकाश की ओर ले जाता है। यहाँ साधक 'क्षर' (परिवर्तनशील) से 'अक्षर' (अपरिवर्तनशील) की ओर संक्रमण करता है। इन नामों का क्रमिक चिंतन साधक की चेतना को विस्तृत करता है, जिससे वह सीमित देह-बोध से मुक्त होकर अनन्त और शुक्ल (शुद्ध) स्वरूप में स्थित होने की भूमि प्राप्त करता है।
हंसं तुर्यं परं ब्रह्म इति नामानि जानत ।
निष्कलस्य तु सर्वज्ञः पर्यायेण हि कीर्तितः ॥ २.११५ ॥
"हंस, तुर्य और परब्रह्म — ये नाम जानो; निष्कल के ही ये पर्याय हैं जिनसे वह सर्वज्ञ कहा गया है।"
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के दस नामों में से प्रथम सात नामों का उल्लेख किया था। वर्तमान श्लोक में उन शेष तीन नामों का वर्णन करते हुए ओंकार के वास्तविक स्वरूप और उसकी सर्वज्ञता को स्पष्ट किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तथा) हंसं, तुर्यं, परं ब्रह्म इति नामानि जानत। सर्वज्ञः (सः) निष्कलस्य तु पर्यायेण हि कीर्तितः।
पदार्थ:
• हंस: वह जो शरीर और मन के बंधनों को भेदकर ऊपर की ओर गमन करता है; वह जो शुद्ध चेतना का वाहक है।
• तुर्य: वह चौथी अवस्था, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे है; वह जो इन तीनों का साक्षी है।
• परब्रह्म: वह सर्वोच्च सत्ता जो समस्त सृष्टि का कारण है और जिससे सब कुछ उत्पन्न होकर अंततः विलीन हो जाता है।
• निष्कल: जो अंश-विभाजन से रहित है; जिसमें कोई भेद, खंड या मात्रा नहीं है।
• सर्वज्ञ: वह जो सब कुछ जानता है, क्योंकि वह स्वयं ही सब कुछ है।
• पर्यायेण: समानार्थी रूप में; एक ही तत्त्व के विभिन्न नाम।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के अंतिम तीन नामों—हंस, तुर्य और परब्रह्म—का बोध कराते हैं। ये नाम केवल संज्ञाएँ नहीं हैं, अपितु साधक की चेतना के उत्कर्ष की तीन उच्चतम अवस्थाएँ हैं।
'हंस' वह शक्ति है जो साधक को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाती है। जिस प्रकार हंस केवल जल और दूध का पृथक्करण करना जानता है, उसी प्रकार ओंकार रूपी हंस साधक के भीतर से अविद्या और विद्या का विवेक जागृत कर उसे ऊपर की ओर उठाता है। 'तुर्य' वह स्थिति है जहाँ साधक जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की तीन अवस्थाओं के पार निकल जाता है। यह वह बिंदु है जहाँ द्वैत समाप्त होता है और केवल शुद्ध साक्षी भाव शेष रहता है। अंततः जब यह तुर्य अवस्था पूर्णता को प्राप्त करती है, तब वह 'परब्रह्म' के रूप में अनुभव होती है—जहाँ न कोई साधक रहता है, न कोई साधन, केवल अनंत पूर्णता शेष रहती है।
ऋषि स्पष्ट करते हैं कि ये सभी नाम वास्तव में 'निष्कल' के ही पर्याय हैं। निष्कल वह है जो मात्राओं, सीमाओं और भेदों से मुक्त है। जब हम ओंकार को 'सर्वज्ञ' कहते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह किसी बाहरी सूचना को जानता है, अपितु रहस्य यह है कि चूँकि वह सर्वव्यापी है और समस्त जगत उसी का विस्तार है, इसलिए वह स्वतः ही सर्वज्ञ है। जो स्वयं ही सब कुछ है, उसके लिए 'जानने' की क्रिया शेष नहीं रहती, वह स्वयं ही ज्ञान स्वरूप है। इस प्रकार, ओंकार के ये दस नाम स्थूल ध्वनि से आरम्भ होकर निष्कल परब्रह्म की स्थिति तक पहुँचने की एक क्रमिक प्रक्रिया हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास चेतना के विलीनीकरण का अभ्यास है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह पहले उसे 'हंस' के रूप में अनुभव करता है—अर्थात् उसकी चेतना उर्ध्वगामी होने लगती है। फिर वह 'तुर्य' की भूमि पर पहुँचता है, जहाँ वह अपने जाग्रत और स्वप्निल जीवन का केवल साक्षी बन जाता है। अंत में, वह उस 'निष्कल' अवस्था में स्थित होता है जहाँ शब्द और अर्थ दोनों विलीन हो जाते हैं और केवल 'परब्रह्म' का अनुभव शेष रहता है। यह अभ्यास साधक को 'ज्ञेय' (जानने योग्य वस्तु) से हटाकर 'सर्वज्ञ' (जानने वाले) में प्रतिष्ठित करता है।
ओंकारनामनिरुक्तयः
उच्चार्यमाणः सर्वत्र आपादतलमस्तकम् ।
उन्नामयेच्छरीरं तु ओंकारस्तेन चोच्यते ॥ २.११६ ॥
"सब ओर उच्चारित होता हुआ यह पैर के तलवे से मस्तक तक शरीर को ऊपर उठाता है, इसलिए ओंकार कहलाता है।"
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के दस नामों की सूची प्रस्तुत की और उनके पर्याय के रूप में 'सर्वज्ञ' और 'निष्कल' शब्दों का बोध कराया। अब वे इन नामों के निरुक्त (व्युत्पत्ति और अर्थ) को एक-एक कर स्पष्ट कर रहे हैं, जिसमें प्रथम नाम 'ओंकार' के शारीरिक और योगिक प्रभाव का वर्णन है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) उच्चार्यमाणः सर्वत्र आपादातलमस्तकम् शरीरं तु उन्नामयेत्, तेन च (सः) ओंकारः इति उच्यते।
पदार्थ:
• उच्चार्यमाणः: जब उसका उच्चारण किया जाता है; नाद के रूप में प्रकट होने पर।
• सर्वत्र: यहाँ इसका अर्थ शरीर के समस्त अंगों में, व्याप्त होकर है।
• आपादातलमस्तकम्: 'आपात्' (से) + 'पादतल' (पैर के तलवे) + 'मस्तकम्' (सिर तक)। अर्थात् पैर के तलवे से लेकर मस्तक तक।
• उन्नामयेत्: ऊपर उठाना; ऊर्ध्वगामी करना; चेतना या प्राण को ऊपर की ओर प्रेरित करना।
• ओंकारः: वह जो शरीर और प्राण को ऊपर उठाता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के प्रथम नाम 'ओंकार' की निरुक्ति कर रहे हैं। वे बताते हैं कि जब साधक इस पवित्र ध्वनि का उच्चारण करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं होता, अपितु एक स्पंदन उत्पन्न होता है जो संपूर्ण शरीर में व्याप्त हो जाता है।
श्लोक का बाहरी अर्थ यह है कि ओंकार का नाद पैर के तलवों से आरम्भ होकर मस्तक तक जाता है और पूरे शरीर को एक ऊर्ध्वगामी ऊर्जा से भर देता है। 'उन्नामयेत्' क्रिया यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल भौतिक उत्थान नहीं, अपितु प्राणिक उत्थान है। जब साधक एकाग्रचित्त होकर ओंकार का जप करता है, तो शरीर की जड़ता समाप्त होती है और एक सूक्ष्म हल्कापन अनुभव होता है, मानो संपूर्ण शरीर ऊपर की ओर खिंचा जा रहा हो।
इसका आन्तर अर्थ यह है कि ओंकार वह शक्ति है जो साधक की चेतना को निम्न स्तर (पैर/पृथ्वी तत्त्व) से उठाकर उच्चतम स्तर (मस्तक/आकाश तत्त्व) की ओर ले जाती है। यह स्थूल से सूक्ष्म की ओर गमन की प्रक्रिया है। शरीर का 'मस्तक' यहाँ केवल शारीरिक सिर नहीं, अपितु उस बिंदु का प्रतीक है जहाँ व्यक्ति का मिलन अक्षर ब्रह्म से होता है। अतः जो नाद साधक को पादतल (अधोगति/जड़ता) से मस्तक (उर्ध्वगति/चेतना) तक ले जाए, वही वास्तव में 'ओंकार' है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'नाद-अनुभव' है। जब साधक शरीर को सीधा (रीढ़ की हड्डी को उर्ध्व) रखकर ओंकार का जप करता है, तो उसे केवल कंठ में ध्वनि नहीं सुननी चाहिए, अपितु यह अनुभव करना चाहिए कि ध्वनि का स्पंदन पैर के तलवों से आरम्भ होकर धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ रहा है।
अभ्यास की विधि यह है कि जप के समय ध्यान को पादतल पर केंद्रित करें और अनुभव करें कि ओंकार की ध्वनि एक प्रकाश-पुंज या ऊर्जा-धारा के रूप में ऊपर की ओर प्रवाहित हो रही है। जैसे-जैसे ध्वनि ऊपर बढ़ती है, साधक अनुभव करता है कि उसका शरीर हल्का हो रहा है और उसकी चेतना मस्तक के उच्चतम बिंदु की ओर अग्रसर है। यह अभ्यास साधक को 'जड़' से 'चेतन' की भूमि पर ले जाता है। यहाँ 'उन्नामयेत्' का अर्थ है—प्राणों का ऊर्ध्वमुखी होना, जिससे मन की चंचलता समाप्त होती है और साधक स्थिरता (ध्रुवता) को प्राप्त करता है।
ऋग्यजुः सामाथर्वाणि देवताश्चाक्षरत्रयम् ।
शरीरं वाङ्मनश्चैव प्राणनात् प्रणवः स्मृतः ॥ २.११७ ॥
ऋक्, यजुः, साम, अथर्व, देवता, तीन अक्षर, शरीर, वाणी और मन — इन (सब) को प्राणित करनेसे (यह) प्रणव कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'ओंकार' नाम की निरुक्ति करते हुए बताया कि यह नाद शरीर की जड़ता को समाप्त कर चेतना को पादतल से मस्तक तक ऊर्ध्वगामी करता है। इसी क्रम में अब वे दूसरे नाम 'प्रणव' का अर्थ स्पष्ट कर रहे हैं कि यह केवल शरीर को ही नहीं, अपितु ज्ञान के समस्त स्रोतों और अंतःकरण को भी प्राणित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ऋग्यजुः सामाथर्वाणि (च), देवताः च, अक्षरत्रयम् (च), शरीरं, वाक्, मनः च एव (एतानि) प्राणनात् प्रणवः स्मृतः।
पदार्थ:
• ऋग्यजुः सामाथर्वाणि: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
• देवताः: मन्त्रों के अधिष्ठाता देव या दिव्य शक्तियाँ।
• अक्षरत्रयम्: 'अ', 'उ' और 'म्'—ओंकार की तीन मात्राएँ।
• शरीरं, वाक्, मनः: स्थूल देह, वाणी (व्यक्त और अव्यक्त) तथा मन (संकल्प-विकल्प करने वाला अंतःकरण)।
• प्राणनात्: प्राणित करने के कारण; जीवन देने के कारण; जाग्रत करने के कारण।
• प्रणवः: वह जो प्राण देता है या प्राणों का मूल है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'प्रणव' शब्द की गहन निरुक्ति कर रहे हैं। 'प्रणव' का शाब्दिक अर्थ है—वह जो प्राण देता है या प्राणित करता है। ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि प्रणव की शक्ति केवल भौतिक शरीर तक सीमित नहीं है, अपितु यह संपूर्ण अस्तित्व और ज्ञान-परम्परा का आधार है।
प्रथम, वेदों का उल्लेख (ऋग्यजुः सामाथर्वाणि) यह दर्शाता है कि चारों वेद, जो ज्ञान के अक्षय भंडार हैं, उनकी वास्तविक शक्ति और स्पंदन प्रणव में ही निहित है। बिना प्रणव के मन्त्र केवल शब्द रहते हैं; प्रणव उन्हें 'प्राणित' कर सिद्ध करता है। इसी प्रकार, देवता भी प्रणव के ही विभिन्न रूप हैं; उनकी शक्ति का स्रोत यही एक अक्षर है।
द्वितीय, 'अक्षरत्रयम्' का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। ओंकार की तीन मात्राएँ (अ, उ, म) जब जाग्रत होती हैं, तब वे साधक की चेतना को प्राणित करती हैं। यह त्रय-अक्षर ही सृष्टि के सृजन, पालन और लय की प्राण-शक्ति है।
तृतीय, बाहरी विधि और आंतरिक अनुभव के समन्वय में ऋषि कहते हैं कि यह शरीर, वाणी और मन को प्राणित करता है। शरीर जब जड़ होता है, वाणी जब मौन या अर्थहीन होती है और मन जब अवसाद या भ्रम में होता है, तब प्रणव का अभ्यास इन तीनों में पुनः चैतन्यता का संचार करता है। शरीर को प्राणिक ऊर्जा, वाणी को ओज और मन को एकाग्रता प्रदान करना ही 'प्राणन' है। अतः, जो इन समस्त स्थूल और सूक्ष्म तत्वों को जीवंत कर दे, वही 'प्रणव' है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रणव' को एक जीवनदाता शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह केवल ध्वनि का उच्चारण नहीं करता, अपितु अपने भीतर के सोए हुए तत्त्वों को जगाता है।
साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर के 'वेद' (अंतर्निहित ज्ञान), उसकी 'वाणी' (अभिव्यक्ति) और उसका 'मन' (विचार) सब इस एक ध्वनि के अधीन हैं। जब साधक प्रणव में स्थित होता है, तो वह पाता है कि उसका शरीर केवल मांस-मज्जा का पुंज नहीं, बल्कि प्राण-ऊर्जा का प्रवाह है।
अभ्यास की भूमि यह है कि साधक पहले शरीर को प्राणित करे (शारीरिक स्वास्थ्य और हल्कापन), फिर वाणी को (मन्त्रों की सिद्धि) और अंत में मन को (स्थितप्रज्ञता)। यह प्रक्रिया साधक को जड़ता से चैतन्यता की ओर ले जाती है। प्रणव यहाँ वह सेतु है जो शरीर, मन और वाणी के बिखराव को समाप्त कर उन्हें एक सूत्र में पिरो देता है, जिससे साधक की पूरी सत्ता 'प्राणित' होकर अक्षर-ब्रह्म की ओर अग्रसर होती है।
शरीरं चैव विश्वं च विद्यास्थानानि सर्वशः ।
व्याप्य संतिष्ठते यस्मात् सर्वव्यापी ततः स्मृतः ॥ २.११८ ॥
क्योंकि जो समस्त शरीर, विश्व और विद्या के सभी स्थानों को व्याप्त करके स्थित रहता है, इसलिए वह सर्वव्यापी स्मृत है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'प्रणव' नाम की निरुक्ति करते हुए बताया कि यह नाद वेदों, देवताओं, अक्षरत्रय और अंतःकरण को प्राणित करने वाला है। अब ऋषि ओंकार के तीसरे नाम 'सर्वव्यापी' का रहस्य खोल रहे हैं कि वह केवल प्राण देने वाला ही नहीं, अपितु समस्त अस्तित्व का आधार और विस्तार भी है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यस्मात् (सः) शरीरं च, विश्वं च, विद्यास्थानानि च सर्वशः व्याप्य संतिष्ठते, ततः सर्वव्यापी (इति) स्मृतः।
पदार्थ:
• शरीरं: यहाँ शरीर का अर्थ केवल स्थूल देह नहीं, अपितु सूक्ष्म और कारण शरीर सहित संपूर्ण 'प्राण-मय' ढांचा है।
• विश्वं: संपूर्ण ब्रह्मांड, जड़-चेतन समस्त सृष्टि।
• विद्यास्थानानि: ज्ञान के वे स्थान जहाँ विद्या प्रतिष्ठित होती है—जैसे श्रुति, स्मृति, मन्त्र, हृदय-आकाश और वे नाड़ियाँ जिनके माध्यम से ज्ञान का प्रवाह होता है।
• सर्वशः: सब ओर से, पूर्णतः, बिना किसी रिक्त स्थान के।
• व्याप्य संतिष्ठते: व्याप्त करके स्थित रहता है। यहाँ 'व्याप्य' विस्तार का सूचक है और 'संतिष्ठते' स्थिरता का।
• सर्वव्यापी: जो सब में व्याप्त हो।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के 'सर्वव्यापी' होने के प्रमाण और उसकी प्रकृति को स्पष्ट कर रहे हैं। इस श्लोक में एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य छिपा है—'व्याप्य संतिष्ठते'। सामान्यतः जो व्याप्त होता है, वह विसरित हो जाता है, और जो स्थित होता है, वह सीमित हो जाता है। किन्तु ओंकार की विशेषता यह है कि वह संपूर्ण जगत में विस्तृत होकर भी अपनी पूर्णता में स्थित है।
ऋषि तीन स्तरों पर इसकी व्याप्ति बताते हैं:
प्रथम, शरीर में उसकी व्याप्ति। यह ओंकार ही है जो देह के कण-कण में स्पंदन के रूप में मौजूद है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसकी देह केवल मांस-मज्जा का पिंड नहीं, अपितु एक दिव्य नाद का विस्तार है।
द्वितीय, विश्व में उसकी व्याप्ति। यह स्थूल जगत जिसे हम देखते हैं, वह उसी अक्षर (ओंकार) का विवर्त या विस्तार है। जैसे मिट्टी से बने घड़े में मिट्टी ही व्याप्त होती है, वैसे ही इस विश्व के प्रत्येक परमाणु में ओंकार की सत्ता व्याप्त है।
तृतीय, विद्यास्थानों में उसकी व्याप्ति। यह सबसे गूढ़ बात है। विद्या (ज्ञान) कहाँ रहती है? वह मन्त्रों में रहती है, वेदों में रहती है और अंततः साधक के हृदय-आकाश में रहती है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इन सभी 'विद्या-स्थानों' का मूल आधार ओंकार है। बिना ओंकार के न तो मन्त्र का अस्तित्व है और न ही उसे ग्रहण करने वाले हृदय की क्षमता। वह ज्ञान के स्रोत और ज्ञान के लक्ष्य, दोनों में व्याप्त है।
अतः, जो शरीर (व्यष्टि), विश्व (समष्टि) और विद्या (ज्ञान) के समस्त केंद्रों को सर्वत्र व्याप्त कर स्थिर रहता है, वही ओंकार 'सर्वव्यापी' कहलाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विस्तार' और 'एकाग्रता' के समन्वय का अभ्यास है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह पहले अपनी चेतना को शरीर के भीतर व्याप्त करता है, फिर उसे विश्व के विस्तार तक ले जाता है और अंततः उसे विद्या-स्थानों (हृदय और मस्तक के ज्ञान-केंद्रों) में स्थित करता है।
यहाँ अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि ओंकार कोई बाहरी शब्द नहीं, बल्कि वह 'तत्व' है जो उसके शरीर, उसके परिवेश और उसके ज्ञान के बीच एक सेतु है। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मैं और यह विश्व दोनों एक ही ओंकार के विस्तार हैं", तब वह सीमित अहंकार से मुक्त होकर 'सर्वव्यापी' भाव की भूमि पर पहुँचता है। यह अभ्यास साधक को संकुचित देह-भाव से निकालकर विराट-भाव की ओर ले जाता है।
अनन्तं नयते स्थानं तस्य चान्तो न लभ्यते ।
ऋषिदेवमनुष्येषु अनन्तस्तेन कीर्तितः ॥ २.११९ ॥
वह अनन्त स्थान को ले जाता है और उसका अन्त नहीं प्राप्त किया जा सकता, इसलिए ऋषियों, देवों और मनुष्यों में वह अनन्त कहलाता है...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'सर्वव्यापी' स्वरूप का वर्णन किया, जो शरीर, विश्व और विद्या के समस्त स्थानों में व्याप्त रहकर भी स्थिर है। अब ऋषि ओंकार के चौथे नाम 'अनन्त' की निरुक्ति कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि यह व्याप्ति केवल विस्तार नहीं, अपितु एक ऐसी यात्रा है जिसका कोई आदि या अंत नहीं है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) अनन्तं स्थानं नयते, तस्य च अन्त: न लभ्यते, अतः ऋषि-देव-मनुष्येषु सः अनन्त: इति कीर्तितः।
पदार्थ:
• अनन्तं स्थानं: वह स्थान जिसका कोई अंत न हो; यहाँ इसका अर्थ उस परम पद या अक्षर-अवस्था से है जहाँ पहुँचकर द्वैत समाप्त हो जाता है।
• नयते: ले जाता है, प्रेरित करता है या मार्ग प्रशस्त करता है।
• चान्तो (अन्तः): सीमा, समाप्ति या अंतिम बिंदु।
• लभ्यते: प्राप्त होता है या अनुभव में आता है।
• कीर्तितः: पुकारा जाता है, कहा गया है या ख्याति प्राप्त है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के 'अनन्त' नाम का रहस्य खोल रहे हैं। पूर्व श्लोक में उन्होंने बताया कि ओंकार 'सर्वव्यापी' है, अर्थात् वह सब जगह है। इस श्लोक में वे बता रहे हैं कि वह केवल व्याप्त ही नहीं है, अपितु वह साधक को उस 'अनन्त स्थान' की ओर ले जाने वाला वाहन भी है।
यहाँ 'नयते' क्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है। ओंकार केवल एक ध्वनि या प्रतीक नहीं है, बल्कि एक शक्ति है जो चेतना को सीमित दायरे से निकालकर असीमित की ओर ले जाती है। जब साधक ओंकार का आश्रय लेता है, तो उसकी चेतना स्थूल शरीर से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण और कारण से उस स्थान की ओर प्रवृत्त होती है जहाँ पहुँचकर 'अंत' शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
ऋषि कहते हैं कि 'तस्य चान्तो न लभ्यते'—उसका अंत प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसका भाव यह है कि ओंकार द्वारा जिस सत्य का अनुभव आरम्भ होता है, वह कोई गंतव्य नहीं है जिसे पाकर यात्रा समाप्त हो जाए, बल्कि वह एक अनंत विस्तार है। जैसे आकाश का कोई अंतिम किनारा नहीं होता, वैसे ही ओंकार के माध्यम से प्राप्त होने वाला आनंद और ज्ञान अनंत है।
यह सत्य ऋषियों, देवों और मनुष्यों—तीनों श्रेणियों में समान रूप से स्वीकार्य है। ऋषि इसे अपनी समाधि में जानते हैं, देव इसे अपने प्रकाशमय स्वरूप में अनुभव करते हैं और मनुष्य इसे साधना के माध्यम से प्राप्त करता है। इसलिए, सर्वसम्मति से इसे 'अनन्त' कहा गया है। यह नाम इस बात का प्रमाण है कि ओंकार वह सेतु है जो परिमित मनुष्य को अपरिमित ब्रह्म से जोड़ता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विस्तार' के अभ्यास का संकेत देता है। जब साधक ओंकार का जप या ध्यान करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं कर रहा होता, अपितु वह अपनी चेतना को संकुचित 'अहं' (मैं) से निकालकर 'अनन्त' में विलीन करने का प्रयास करता है।
अभ्यास यह है कि ओंकार की ध्वनि के साथ अपनी जागरूकता को शरीर की सीमाओं से बाहर ले जाएँ। पहले शरीर, फिर प्राण, फिर मन और अंततः उस शून्य या आकाश में स्थित हों जहाँ कोई सीमा नहीं है। जब साधक अनुभव करता है कि उसका अंत नहीं है और वह उस अनंत स्थान का ही अंश है, तब वह 'अनन्त' की भूमि पर प्रतिष्ठित होता है। यह अभ्यास साधक को सीमित पहचान (नाम, रूप, जाति) से मुक्त कर उसे अक्षर-स्वरूप में ले जाता है।
सर्वदुखसमुत्थानाद्भवग्राहार्णवाकुलात् ।
चिन्तितस्तारयेद्यस्मात्तेन तारो निगद्यते ॥ २.१२० ॥
क्योंकि वह ध्यान किया जाने पर समस्त दुःखों के उद्गम और संसाररूपी मगरमच्छों से भरे समुद्र से तारता है, इसलिए वह तार कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'अनन्त' नाम की निरुक्ति की, जिसमें यह बताया गया कि वह साधक को उस असीम स्थान की ओर ले जाता है जिसका कोई अंत नहीं है। अब ऋषि ओंकार के पाँचवें नाम 'तार' का विवेचन कर रहे हैं, जो इस अनन्त यात्रा के व्यावहारिक फल और दुःखों से मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) सर्व-दुःख-समुत्थानात्, भव-ग्राह-अर्णवाकुलात् (साधकम्) चिन्तितः तारयेत्, यस्मात् तेन 'तारः' इति निगद्यते।
पदार्थ:
• सर्वदुःखसमुत्थानात्: समस्त दुःखों के उद्गम स्थान से। यहाँ 'समुत्थान' का अर्थ है वह मूल कारण जिससे दुःखों की उत्पत्ति होती है।
• भवग्राहार्णवाकुलात्: 'भव' (संसार), 'ग्राह' (पकड़ने वाले मगरमच्छ), 'अर्णव' (समुद्र) और 'आकुल' (व्याकुल या घिरा हुआ)। अर्थात् संसार रूपी ऐसे समुद्र से, जिसमें वासनाओं और कर्मों रूपी मगरमच्छ साधक को जकड़े रहते हैं।
• चिन्तितः: ध्यान किया गया, मनन किया गया या निरंतर स्मरण किया गया।
• तारयेत्: पार उतारता है, मुक्त करता है या उद्धार करता है।
• निगद्यते: कहा जाता है, परिभाषित किया जाता है या नाम दिया गया है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के 'तार' नाम का रहस्य खोल रहे हैं। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि यह जगत केवल भौतिक वस्तुओं का समूह नहीं, अपितु 'भव-सागर' है। इस समुद्र की विशेषता यह है कि यह 'ग्राह-आकुल' है; अर्थात् यहाँ अविद्या, काम, क्रोध और मोह रूपी मगरमच्छ निरंतर साधक की चेतना को जकड़े रहते हैं, जिससे वह ऊपर नहीं उठ पाता और दुःखों के चक्र में फँसा रहता है।
ऋषि कहते हैं कि समस्त दुःखों का एक ही 'समुत्थान' (उद्गम) है—वह है अज्ञान और स्वयं को शरीर मानना। जब तक साधक इस मूल कारण से नहीं मुक्त होता, वह संसार के वेग में बहता रहता है। इस स्थिति में ओंकार एक 'सेतु' या 'नाव' के समान कार्य करता है।
यहाँ 'तार' शब्द की निरुक्ति केवल एक नामकरण नहीं, बल्कि एक आश्वासन है। जो शक्ति साधक को इस भयावह भव-सागर से पार उतारने में समर्थ है, वही वास्तव में 'तार' है। यह तारण केवल बाहरी सहायता से नहीं, अपितु ओंकार के साथ तादात्म्य स्थापित करने से होता है। जब साधक ओंकार के स्वरूप में स्थित होता है, तब वह स्वयं को उन 'ग्राहों' (मगरमच्छों) से पृथक अनुभव करने लगता है और अंततः उनसे मुक्त हो जाता है।
योग-रहस्य —
इस श्लोक का सबसे गूढ़ रहस्य 'चिन्तितः' शब्द में छिपा है। ऋषि ने यहाँ 'जपेत्' (जप) या 'उच्चारयेत्' (उच्चारण) शब्द का प्रयोग नहीं किया, बल्कि 'चिन्तित' शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ यह है कि केवल ओष्ठ-गति या ध्वनि के उच्चारण मात्र से संसार-सागर से पार नहीं उतरा जा सकता।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह ओंकार को केवल एक शब्द न मानकर, उसे एक 'विचार' और 'अनुभव' बना ले। जब ओंकार का चिन्तन (ध्यान) गहरा होता है, तब वह ध्वनि से ऊपर उठकर एक आंतरिक स्पंदन बन जाता है। यह चिन्तन साधक को 'भय' से 'अभय' की ओर ले जाता है।
योगिक दृष्टि से, जब साधक ओंकार का चिन्तन करता है, तो उसका मन बाहरी विषयों (भव-सागर) से हटकर अपने मूल केंद्र की ओर मुड़ता है। जैसे ही मन केंद्र में स्थित होता है, संसार के समस्त दुःखों का उद्गम सूख जाता है। यह प्रक्रिया साधक को उस भूमि पर ले जाती है जहाँ वह अनुभव करता है कि वह न तो शरीर है और न ही वह मन जो दुःखों से व्याकुल है, बल्कि वह वही 'तार' स्वरूप अक्षर है। अतः, ओंकार का चिन्तन ही वह साधन है जो साधक को बंधन से मुक्ति (तारण) की ओर ले जाता है।
वर्णेन च भवेच्छुक्लः शुद्धं च नयते पदम् ।
त्रिविधं शोषयेत् पापं तेन शुक्ल इति स्मृतः ॥ २.१२१ ॥
वर्ण से वह शुक्ल हो जाता है, शुद्ध पद को ले जाता है और तीनों प्रकार के पापों को सुखा देता है, इसलिए वह शुक्ल स्मृत है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'तार' नाम की निरुक्ति की, जिसमें बताया गया कि यह साधक को संसाररूपी दुःखों के समुद्र से पार उतारता है। अब ऋषि ओंकार के छठे नाम 'शुक्ल' का विवेचन कर रहे हैं, जो तारने के बाद साधक की आंतरिक शुद्धि और उसके शुद्ध पद की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) वर्णेन च भवेत् शुक्लः, (सः) शुद्धं च पदं नयते, (सः) त्रिविधं पापं शोषयेत्, तेन (सः) 'शुक्लः' इति स्मृतः।
पदार्थ:
• वर्णेन: वर्ण के द्वारा। यहाँ 'वर्ण' के दो अर्थ हैं—एक वह प्रकाशमय आभा (रंग) जो साधना में प्रकट होती है, और दूसरा 'वर्ण' का अर्थ अक्षर या ध्वनि-रूप है।
• शुक्लः: श्वेत, उज्ज्वल, निर्मल या पवित्र।
• शुद्धं पदम्: वह स्थान या अवस्था जो मलिनता से रहित है; परम पद या शुद्ध चेतना की स्थिति।
• नयते: ले जाता है, पहुँचाता है।
• त्रिविधं पापं: तीन प्रकार के पाप।
• शोषयेत्: सुखा देता है, नष्ट कर देता है या क्षीण कर देता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के 'शुक्ल' नाम का रहस्य खोल रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि ओंकार 'वर्णेन' शुक्ल है। बाह्य दृष्टि से देखें तो शुक्ल वर्ण पवित्रता और प्रकाश का प्रतीक है, किन्तु योगिक दृष्टि से यह वह 'श्वेत प्रकाश' है जो साधक के भीतर जब ओंकार का गुंजन होता है, तब उसकी चेतना में प्रस्फुटित होता है। यह वर्ण केवल रंग नहीं, अपितु अविद्या के अंधकार का विलोपन है।
इस शुक्ल स्वरूप की विशेषता यह है कि वह साधक को 'शुद्ध पद' की ओर नयते अर्थात् ले जाता है। यह शुद्ध पद वह अवस्था है जहाँ चित्त की समस्त वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। जब तक साधक के भीतर संस्कारों की मलिनता है, वह उस पद को नहीं देख सकता; ओंकार अपनी शुक्लता से उस मलिनता को धोकर साधक को उसकी वास्तविक शुद्धता में प्रतिष्ठित करता है।
ऋषि आगे कहते हैं कि यह ओंकार 'त्रिविध पापं शोषयेत्'—तीनों प्रकार के पापों को सुखा देता है। पाप का अर्थ यहाँ केवल सामाजिक अपराध नहीं, अपितु वे मानसिक और शारीरिक अवरोध हैं जो आत्मा को परमात्मा से अलग करते हैं। ये तीन प्रकार के पाप संभवतः मन, वाणी और शरीर के स्तर पर किए गए दोष हैं। जिस प्रकार तीव्र सूर्य की किरणें गीली मिट्टी या जल को सुखा देती हैं, उसी प्रकार ओंकार का प्रकाश मन के विकारों, वाणी के असत्य और शरीर के तामसिक कर्मों के प्रभाव को सुखाकर उन्हें समाप्त कर देता है। इसी कारण ओंकार को 'शुक्ल' कहा गया है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'शुद्धिकरण' की प्रक्रिया है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो उसे केवल ध्वनि पर नहीं, अपितु उस ध्वनि से उत्पन्न होने वाले 'शुक्ल' (श्वेत प्रकाश) के अनुभव पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
अभ्यास की दृष्टि से यह श्लोक साधक को तीन स्तरों पर कार्य करना सिखाता है:
१. शरीर स्तर पर: ओंकार के कंपन से शरीर के स्थूल दोषों और आलस्य का शोष (नष्ट) होना।
२. वाणी स्तर पर: शब्दों की शुद्धि और मौन की गहराई में उतरना।
३. मन स्तर पर: वासनाओं और मानसिक क्लेशों का सूख जाना।
साधक जब अनुभव करता है कि उसके भीतर का अंधकार छँट रहा है और एक उज्ज्वल प्रकाश (शुक्ल वर्ण) व्याप्त हो रहा है, तब वह 'शुद्ध पद' की ओर अग्रसर होता है। यह अनुभव साधक को तामसिक और राजसिक वृत्तियों से उठाकर सात्विक भूमि पर प्रतिष्ठित करता है, जहाँ से वह अक्षर-ब्रह्म की ओर प्रस्थान करता है।
आविष्करोति स यतेर्ज्योतीरूपं भ्रुवो(र)न्तरे ।
विद्योतते तमो भित्त्वा वैद्युतस्तेन कीर्तितः ॥ २.१२२ ॥
वह यति के भ्रू-अंतरे ज्योतिरूप प्रकट करता है और तमस को भेदकर विद्युत् की भाँति चमकता है, इसलिए वह वैद्युत कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'शुक्ल' नाम की निरुक्ति की, जिसमें बताया गया कि यह साधक के पापों को सुखाकर उसे शुद्ध पद की ओर ले जाता है। अब ऋषि ओंकार के सातवें नाम 'वैद्युत' का विवेचन कर रहे हैं, जो शुक्लता के बाद प्रकट होने वाले उस तीव्र प्रकाश का संकेत है जो साधक के अंतर्चक्षु को आलोकित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सः यतेः भ्रुवोऽन्तरे ज्योतिरूपं आविष्करोति, (सः) तमो भित्त्वा विद्युत् (इव) द्योतते, तेन (सः) 'वैद्युतः' इति कीर्तितः।
पदार्थ:
• यतेः: यति का। यहाँ 'यति' वह साधक है जिसने अपनी इंद्रियों और मन का संयम कर लिया है।
• भ्रुवोऽन्तरे: भौंहों के बीच में (भ्रूमध्य में)।
• ज्योतिरूपं: प्रकाश के रूप में, ज्योति के स्वरूप में।
• आविष्करोति: प्रकट करता है, अभिव्यक्त करता है।
• तमो भित्त्वा: तमस (अंधकार) को भेदकर या काटकर।
• विद्योतते: चमकता है, देदीप्यमान होता है।
• वैद्युतः: बिजली के समान तीव्र प्रकाश वाला।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के 'वैद्युत' नाम का रहस्य स्पष्ट कर रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि जब कोई 'यति'—अर्थात् वह साधक जिसने योग-साधना द्वारा अपनी वृत्तियों को संयमित कर लिया है—ओंकार का आश्रय लेता है, तब वह ओंकार उसके 'भ्रुवोऽन्तरे' (भ्रूमध्य में) ज्योतिरूप प्रकट होता है।
यहाँ 'भ्रूमध्य' केवल शरीर का एक स्थान नहीं, अपितु वह बिंदु है जहाँ बाह्य जगत का प्रकाश और आंतरिक जगत का प्रकाश मिलते हैं। जब साधक ओंकार के नाद में लीन होता है, तब उसकी चेतना का संकेंद्रण इस स्थान पर होता है और वहाँ एक दिव्य ज्योति का उदय होता है। यह ज्योति कोई भौतिक प्रकाश नहीं, अपितु ओंकार-ब्रह्म का वह स्वरूप है जो साधक के भीतर जाग्रत होता है।
इस प्रकाश की विशेषता यह है कि यह 'तमो भित्त्वा' कार्य करता है। यहाँ 'तमस' का अर्थ केवल अंधकार नहीं, अपितु अविद्या, मोह और मानसिक जड़ता है। जिस प्रकार घोर अंधकार में बिजली की एक कौंध क्षण भर में सब कुछ स्पष्ट कर देती है, उसी प्रकार यह वैद्युत-ज्योति साधक के भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को भेदकर उसे सत्य का साक्षात्कार कराती है। यह प्रकाश इतना तीव्र और प्रखर होता है कि यह साधक के संशयों को नष्ट कर देता है। इसी तीव्र प्रकाशमय गुण के कारण ओंकार को 'वैद्युत' कहा गया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक ओंकार-ध्यान के एक विशिष्ट अनुभव का वर्णन करता है। जब साधक ओंकार के अक्षरों (अ, उ, म) का मानसिक जप करते हुए अपनी दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर करता है, तब उसे वहाँ एक प्रकाश पुंज का अनुभव होता है। यह अनुभव उस भूमि का संकेत है जहाँ साधक स्थूल जगत से ऊपर उठकर सूक्ष्म जगत में प्रवेश करता है।
अभ्यास यह है कि साधक जप के साथ-साथ अपना ध्यान भ्रूमध्य में लगाए। जब वह इस 'वैद्युत' ज्योति का अनुभव करता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि यह ज्योति वास्तव में उसके अपने ही भीतर स्थित उस परमात्मा का प्रतिबिंब है, जो ओंकार के माध्यम से प्रकट हुआ है। इस ज्योति का उदय होना इस बात का प्रमाण है कि साधक का मन अब बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी हो गया है। यह अनुभव साधक को उस अवस्था तक ले जाता है जहाँ वह स्वयं को केवल शरीर नहीं, अपितु प्रकाशमय चेतना के रूप में देखने लगता है। यह 'वैद्युत' अवस्था साधक को अविद्या के अंधकार से निकालकर ज्ञान के आलोक में प्रतिष्ठित करती है।
हृदि ध्यानं सदा यस्मादादित्योद्गीथमेव च ।
भित्त्वा शरीरं नयति तस्माद्धंस इति स्मृतः ॥ २.१२३ ॥
…क्योंकि उसका सदा हृदय में ध्यान होता है और वह आदित्य तथा उद्गीथ ही है, तथा शरीर को भेदकर ले जाता है, इसलिए वह हंस स्मृत है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ओंकार के 'वैद्युत' स्वरूप का वर्णन था, जहाँ साधक के भ्रूमध्य में ज्योति का उदय होता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के आठवें नाम 'हंस' की निरुक्ति कर रहे हैं, जो इस ज्योति-अनुभव के बाद साधक को शरीर की सीमाओं से ऊपर उठाकर परमपद की ओर ले जाने वाली शक्ति का संकेत है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यस्मात् तस्य हृदि सदा ध्यानं (अस्ति), (सः) आदित्यम् उद्गीथम् एव च (अस्ति), (सः) शरीरं भित्त्वा नयति, तस्मात् (सः) 'हंसः' इति स्मृतः।
पदार्थ:
• हृदि ध्यानं सदा: हृदय में निरंतर ध्यान। यहाँ 'हृदय' केवल भौतिक अंग नहीं, अपितु वह सूक्ष्म आकाश है जहाँ आत्मा का निवास माना गया है।
• आदित्योद्गीथमेव: आदित्य (सूर्य/परमात्मा) और उद्गीथ (ओंकार का गान) ही है।
• भित्त्वा शरीरं: शरीर को भेदकर। यहाँ 'भित्त्वा' का अर्थ शरीर का विनाश नहीं, अपितु शरीर के स्थूल बंधनों और मोह-जाल को काटकर पार करना है।
• नयति: ले जाता है, गमन कराता है।
• हंसः: वह जो मुक्त करता है; वह जो शरीर रूपी सरोवर से ऊपर उठकर परम आकाश में उड़ जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषि ओंकार के 'हंस' नाम का रहस्य खोल रहे हैं। इस श्लोक में ओंकार को केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु एक जीवंत शक्ति के रूप में देखा गया है। ऋषि कहते हैं कि ओंकार 'हंस' इसलिए है क्योंकि उसका निवास और ध्यान सदा 'हृदि' (हृदय में) होता है। जब साधक ओंकार का आश्रय लेता है, तो वह उसकी चेतना को हृदय के उस सूक्ष्म केंद्र पर स्थापित कर देता है जहाँ से संपूर्ण सृष्टि का संचालन होता है।
यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य यह है कि ओंकार 'आदित्य' और 'उद्गीथ' दोनों है। आदित्य वह प्रकाश है जो बाह्य जगत को आलोकित करता है, और उद्गीथ वह नाद है जो आंतरिक जगत को जाग्रत करता है। जब साधक के भीतर यह नाद-प्रकाश एक हो जाता है, तब वह ओंकार उसे 'शरीरं भित्त्वा' (शरीर को भेदकर) ले जाता है। इसका अर्थ यह है कि ओंकार साधक को देह-अभिमान और भौतिक सीमाओं से मुक्त कर देता है। जिस प्रकार हंस जल में रहकर भी उससे अछूता रहता है और अंततः आकाश की ओर उड़ जाता है, उसी प्रकार ओंकार-साधना से युक्त योगी इस संसार में रहते हुए भी उससे ऊपर उठ जाता है और अंततः शरीर के बंधन को भेदकर उस परम पद को प्राप्त करता है जहाँ से पुनरागमन नहीं होता।
अतः ओंकार वह वाहन है जो साधक को स्थूल देह से सूक्ष्म देह और सूक्ष्म से अक्षर-पद की ओर ले जाता है। इसीलिए इसे 'हंस' कहा गया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मुक्ति-मार्ग' का सूत्र है। यहाँ अभ्यास की एक निश्चित दिशा है: पहले हृदय में ओंकार का निरंतर ध्यान (हृदि ध्यानं सदा), फिर उस नाद में सूर्य रूपी प्रकाश का अनुभव (आदित्य-उद्गीथ), और अंततः उस चेतना का विस्तार जो शरीर की सीमाओं को लाँघ जाए।
साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसकी चेतना अब केवल मांस-मज्जा के शरीर तक सीमित नहीं है। वह स्वयं को एक 'हंस' की भाँति अनुभव करता है, जो शरीर रूपी पिंजरे को भेदकर अनंत आकाश में विलीन होने की क्षमता रखता है। यह अभ्यास साधक को 'देह-बुद्धि' से 'आत्मा-बुद्धि' की ओर ले जाता है। यहाँ 'शरीर को भेदना' वास्तव में प्राणों का ऊर्ध्वगमन और चेतना का विस्तार है। साधक इस अवस्था में यह अनुभव करता है कि ओंकार ही वह सेतु है जो उसे इस नश्वर शरीर से निकालकर अविनाशी अक्षर-ब्रह्म में विलीन कर देता है। यह ओंकार ही मुक्तिका का वह वाहन है, जिस पर सवार होकर योगी संसार-सागर को पार करता है।
जाग्रत् स्वप्नं च सुप्तं च तुर्यं चैव चतुर्थकम् ।
ज्ञातस्तु त्रायते यस्मात् तुर्यस्तेन निगद्यते ॥ २.१२४ ॥
जाग्रत्, स्वप्न और सुप्त तथा चौथा तुर्य भी है; क्योंकि जानने पर वह रक्षा करता है, इसलिए वह तुर्य कहा जाता है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ओंकार के 'हंस' स्वरूप का विवेचन था, जो साधक को शरीर के बंधनों को भेदकर ऊपर ले जाने वाली शक्ति है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के नौवें नाम 'तुर्य' की निरुक्ति कर रहे हैं, जो चेतना की उन अवस्थाओं का विश्लेषण है जिनसे होकर साधक परम पद को प्राप्त करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: जाग्रत्, स्वप्नं च, सुप्तं च, (तथा) तुर्यं चैव चतुर्थकम् (अस्ति) । यस्मात् ज्ञातुः (ज्ञातः) त्रायते, तस्मात् सः 'तुर्यः' इति निगद्यते ।
पदार्थ:
• जाग्रत्: वह अवस्था जिसमें इन्द्रियाँ बाह्य जगत के विषयों के साथ संपर्क करती हैं।
• स्वप्न: वह अवस्था जिसमें मन अपने ही संकल्पों और संस्कारों के माध्यम से आंतरिक जगत का अनुभव करता है।
• सुप्त: वह गहरी निद्रा की अवस्था जहाँ विषय और संकल्प दोनों शांत हो जाते हैं, केवल अज्ञान का अंधकार या बीज-रूप आनंद शेष रहता है।
• तुर्यं चतुर्थकम्: चौथा पद। 'तुर्य' शब्द 'त्रय' (तीन) से बना है, जिसका अर्थ है वह जो तीनों अवस्थाओं से परे या उन्हें समाहित करने वाला है।
• ज्ञातुः त्रायते: जानने पर रक्षा करता है। यहाँ 'त्रायते' का अर्थ केवल भौतिक रक्षा नहीं, अपितु संसार के चक्र से मुक्त करना (त्राण) है।
• निगद्यते: कहा जाता है या परिभाषित किया जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार के 'तुर्य' नाम का रहस्य उद्घाटित कर रहे हैं। यहाँ ओंकार को चेतना के चार स्तरों के रूप में देखा गया है। प्रथम तीन अवस्थाएँ—जाग्रत्, स्वप्न और सुप्त—साधारण मनुष्य के अनुभव के दायरे में हैं। जाग्रत में हम स्थूल शरीर से जुड़े होते हैं, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर के संस्कारों में खोए रहते हैं और सुप्त अवस्था में कारण शरीर के गहन अंधकार में विलीन हो जाते हैं।
परन्तु, महर्षि कहते हैं कि इन तीनों के अतिरिक्त एक 'चतुर्थ' अवस्था भी है, जिसे 'तुर्य' कहा गया है। यह तुर्य कोई ऐसी अवस्था नहीं है जो सुप्त अवस्था के बाद आती है, अपितु यह वह शुद्ध चेतना है जो जाग्रत, स्वप्न और सुप्त—तीनों में साक्षी रूप से विद्यमान रहती है। ओंकार का यह तुर्य स्वरूप ही वह सेतु है जो साधक को प्रपञ्च से मुक्त कर परम तत्व में स्थापित करता है।
श्लोक का मुख्य मर्म इस वाक्य में है—'ज्ञातस्तु त्रायते' अर्थात् इसे जानने पर वह रक्षा करता है। जब साधक यह जान लेता है कि वह न तो जागने वाला है, न स्वप्न देखने वाला और न ही सोने वाला, बल्कि वह इन तीनों का साक्षी 'तुर्य' है, तब वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। यही वह 'त्राण' है जिसके कारण ओंकार को 'तुर्य' कहा गया है। यह ज्ञान साधक को भय और शोक से मुक्त कर उसे उस स्थिति में ले जाता है जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रारहित चौथा है — व्यवहारसे परे, प्रपञ्चका उपशम, शिव, अद्वैत। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है; जो ऐसा जानता है, वह आत्मासे आत्मामें प्रवेश करता है।
इस उपनिषद् में तुर्य को 'अमात्र' (मात्रा रहित), 'प्रपञ्चोपशम' (जगत के शोर का शांत होना) और 'अद्वैत' कहा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और माण्डूक्य उपनिषद् यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। दोनों ही इस बात पर बल देते हैं कि तुर्य वह स्थिति है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है और ओंकार स्वयं आत्मा के रूप में संविशित हो जाता है। स्मृति यहाँ 'त्राण' (रक्षा/मुक्ति) पर बल दे रही है, जबकि उपनिषद् उसके 'अद्वैत' और 'शिव' स्वरूप का वर्णन कर रहा है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साक्षी भाव' के अभ्यास की ओर ले जाता है। साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह जाग्रत अवस्था में रहते हुए भी स्वयं को यह स्मरण कराए कि "मैं इस शरीर और इन विचारों का दृष्टा हूँ।" इसी प्रकार स्वप्न और निद्रा के अनुभवों के प्रति भी तटस्थ रहकर वह उस 'चौथे' तत्व को खोजने का प्रयास करता है।
साधक जब इस बोध में स्थित होता है कि वह तीनों अवस्थाओं का आधार है, तब वह 'क्षर' (विनाशशील) से 'अक्षर' (अविनाशी) की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास उसे उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह अनुभव करता है कि ओंकार केवल एक शब्द नहीं, बल्कि उसकी अपनी ही चेतना का वह शुद्धतम रूप है जो कभी सोता नहीं, कभी स्वप्न नहीं देखता और कभी विचलित नहीं होता। यह 'तुर्य' का अनुभव ही साधक को संसार रूपी सागर से तारने वाला वास्तविक साधन है।
वाङ्मयस्य तु सर्वस्य ब्रह्मणस्त्रिविधस्य च ।
मुखमेतत् समुद्दिष्टं शब्दब्रह्ममयं विभु ॥ २.१२५ ॥
यह शब्दब्रह्ममय विभु (सर्वव्यापक), त्रिविध ब्रह्म और समस्त वाङ्मय का मुख समुद्दिष्ट है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में ओंकार के विभिन्न निरुक्त नामों—तार, शुक्ल, वैद्युत, हंस और तुर्य—के माध्यम से उसकी शक्ति और अवस्थाओं का वर्णन किया गया है। अब ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार की उस व्यापकता को स्पष्ट कर रहे हैं, जहाँ वह केवल एक मन्त्र न रहकर समस्त वाणी और ब्रह्म-स्वरूप का द्वार बन जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) त्रिविधस्य ब्रह्मणः च सर्वस्य वाङ्मयस्य च मुखम् एतत् समुद्दिष्टम्, (यतः एषः) विभुः शब्दब्रह्ममयः (अस्ति)।
पदार्थ:
• वाङ्मय: वह समस्त ज्ञान या अभिव्यक्ति जो वाणी (शब्द) के माध्यम से प्रकट होती है। इसमें वेद, शास्त्र और समस्त लोक-व्यवहार की भाषा सम्मिलित है।
• त्रिविध ब्रह्म: ब्रह्म के तीन रूप—परा (अव्यक्त), पश्यन्ती (सूक्ष्म) और वैखरी (स्थूल)। अथवा इसे सृष्टि के तीन स्तरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) के अधिष्ठाता ब्रह्म के रूप में भी देखा जाता है।
• मुखम्: द्वार, प्रवेश-द्वार या वह मुख्य बिंदु जहाँ से किसी वस्तु का आरम्भ होता है। जैसे मुख से वाणी निकलती है, वैसे ही ओंकार से समस्त शब्द-ब्रह्म प्रस्फुटित होता है।
• समुद्दिष्टम्: स्पष्ट रूप से कहा गया, निर्दिष्ट या संकेतित।
• विभु: सर्वव्यापी, जो किसी सीमा में बँधा न हो; जो देश और काल से परे व्याप्त है।
• शब्दब्रह्ममय: वह ओंकार जो स्वयं शब्दरूप ब्रह्म है और जिसमें संपूर्ण ब्रह्मत्व समाहित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं जिसे 'मुख' कहा गया है। यहाँ 'मुख' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। जिस प्रकार शरीर के समस्त प्राण और वाणी मुख के माध्यम से बाहर आते हैं, उसी प्रकार समस्त 'वाङ्मय'—अर्थात् जो कुछ भी शब्द के रूप में अभिव्यक्त हुआ है—उसका मूल स्रोत ओंकार है।
ऋषि कहते हैं कि यह ओंकार 'त्रिविध ब्रह्म' का मुख है। यहाँ त्रिविध ब्रह्म का अर्थ उस चेतना से है जो पहले 'परा' (मौन) रहती है, फिर 'पश्यन्ती' (मानसिक छवि) बनती है और अंततः 'वैखरी' (उच्चारित शब्द) के रूप में प्रकट होती है। ओंकार वह संधि-बिंदु है जहाँ मौन शब्द में बदलता है और शब्द पुनः मौन में विलीन होता है। इसलिए इसे 'शब्दब्रह्ममय विभु' कहा गया है।
यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि ओंकार केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि वह 'विभु' (सर्वव्यापी) सत्ता है जो समस्त मन्त्रों की जननी है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह वास्तव में उस द्वार (मुख) पर खड़ा होता है जहाँ से वह स्थूल वाङ्मय से सूक्ष्म ब्रह्म की ओर प्रस्थान कर सकता है। यह ओंकार ही वह सेतु है जो अभिव्यक्ति (वाङ्मय) को अनिर्वचनीय ब्रह्म से जोड़ता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'ध्वनि से शून्य' की ओर जाने का अभ्यास है। जब साधक ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह सबसे पहले 'वाङ्मय' (शब्द) का अनुभव करता है। किंतु जैसे-जैसे अभ्यास गहरा होता है, वह अनुभव करता है कि यह ध्वनि वास्तव में 'शब्दब्रह्म' है।
यहाँ साधक का अभ्यास यह है कि वह ओंकार को केवल एक मन्त्र न मानकर उसे 'मुख' या द्वार माने। वह अपनी चेतना को शब्द के बाहरी विस्तार से समेटकर उस केंद्र पर लाए जहाँ से शब्द उत्पन्न होते हैं। जब साधक इस 'विभु' स्वरूप का अनुभव करता है, तब वह शब्दों के जाल से मुक्त होकर उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ वाणी मौन हो जाती है और केवल 'ब्रह्म' शेष रहता है। यह अभ्यास साधक को शब्द-माया से निकालकर शब्द-ब्रह्म की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।
परं ब्रह्म नयत्येव परब्रह्म इति स्मृतः ।
एवं नैरुक्तकैर्दृष्टमृषिभिश्च तथा परैः ॥ २.१२६ ॥
…यह परब्रह्म को ही ले जाता है, इसलिए परब्रह्म स्मृत है; इस प्रकार नैरुक्तकारों और अन्य श्रेष्ठ ऋषियों ने भी इसे देखा है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ओंकार को समस्त वाङ्मय और त्रिविध ब्रह्म का 'मुख' या प्रवेश-द्वार बताया गया। अब ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार के दसवें और अंतिम निरुक्त नाम की व्याख्या करते हुए उसे उस परम लक्ष्य से जोड़ रहे हैं, जहाँ पहुँचकर साधक का पूर्ण विलय हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) परं ब्रह्म नयति एव, अतः (सः) परब्रह्म इति स्मृतः। एवं (ओंकारस्य स्वरूपं) नैरुक्तकैः दृष्टम्, ऋषिभिः च तथा परैः (दृष्टम्)।
पदार्थ:
• नयति: ले जाता है, प्रेरित करता है या मार्ग दिखाता है। यहाँ 'नयति' का अर्थ केवल भौतिक गमन नहीं, अपितु चेतना का उत्थान कर उसे लक्ष्य में विलीन करना है।
• परं ब्रह्म: वह सर्वोच्च तत्व जो देश, काल और कारण से परे है। यहाँ 'परब्रह्म' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में है—पहला, वह लक्ष्य जिसे प्राप्त करना है; दूसरा, ओंकार का वह नाम जो उसे उस लक्ष्य तक पहुँचाने के कारण मिला है।
• स्मृतः: याद किया गया है, कहा गया है या शास्त्र-सम्मत मान्यता है।
• नैरुक्तकैः: निरुक्तकारों द्वारा। निरुक्त वह शास्त्र है जो शब्दों की व्युत्पत्ति और उनके वास्तविक अर्थ का विवेचन करता है।
• परैः: श्रेष्ठों द्वारा, या उन ऋषियों द्वारा जो उच्चतर आध्यात्मिक अवस्थाओं (पर-भूमि) में स्थित हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ओंकार के दस नामों की श्रृंखला पूर्ण होती है। ऋषि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ओंकार का अंतिम और सर्वोच्च नाम 'परब्रह्म' है। इसका कारण यह है कि यह साधक को 'परब्रह्म' (परम तत्व) की ओर ले जाता है।
यहाँ एक सूक्ष्म रहस्य है—ओंकार स्वयं वह सेतु है जो क्षर (विनाशी) से अक्षर (अविनाशी) की ओर ले जाता है। जब साधक ओंकार के स्वरूप में स्थित होता है, तो वह केवल एक ध्वनि का जप नहीं कर रहा होता, बल्कि वह उस शक्ति के साथ एकाकार हो रहा होता है जो उसे उसकी अपनी मूल प्रकृति, उस परब्रह्म में विलीन कर देती है। इसीलिए, जो ले जाए वह 'नयति' है, और जो उस परम पद तक ले जाए, वह ओंकार 'परब्रह्म' के नाम से स्मृत है।
श्लोक का दूसरा भाग—"एवं नैरुक्तकैर्दृष्टमृषिभिश्च तथा परैः"—यह स्पष्ट करता है कि यह कोई व्यक्तिगत कल्पना नहीं है, अपितु यह सत्य उन विद्वानों (नैरुक्तकारों) द्वारा प्रमाणित है जिन्होंने शब्द-शक्ति का विश्लेषण किया है, और उन ऋषियों द्वारा अनुभव किया गया है जिन्होंने स्वयं उस परम पद का साक्षात्कार किया है। यहाँ 'पर' शब्द उन ऋषियों के लिए प्रयुक्त हुआ है जो साधना की उच्चतम अवस्था में पहुँच चुके हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि ओंकार का यह मार्ग शास्त्र-प्रमाण (नैरुक्त) और अनुभव-प्रमाण (ऋषि) दोनों से पुष्ट है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के मिलन का बिंदु है। पिछले नौ नामों में ओंकार ने साधक को शरीर से ऊपर उठाया (ओंकार), प्राणित किया (प्रणव), सर्वव्यापकता का बोध कराया (विभु), बंधन से मुक्त किया (तार), अंतःकरण को शुद्ध किया (शुक्ल), भ्रूमध्य में ज्योति जगाई (वैद्युत), शरीर का बंधन भेदकर ऊपर ले गया (हंस) और जाग्रत-स्वप्न-सुप्त से परे तुरीया अवस्था में प्रतिष्ठित किया (तुर्य)।
अब दसवें नाम 'परब्रह्म' के अभ्यास में साधक यह अनुभव करता है कि वह जो 'नयति' (ले जाने वाला) है, वह उससे भिन्न नहीं है। अभ्यास यह है कि जब साधक ओंकार के अंतिम मौन में ठहरता है, तब वह अनुभव करता है कि ले जाने वाला (ओंकार), ले जाने का मार्ग (साधना) और जिसे प्राप्त किया जाना है (परब्रह्म), ये तीनों एक ही हैं।
यह श्लोक साधक को 'साध्य-साधन' के भेद से मुक्त कर उसे पूर्ण लय की भूमि पर ले जाता है। यहाँ अभ्यास केवल शब्द का नहीं, बल्कि उस 'नयन' (ले जाने वाली) शक्ति का है, जो साधक को उसकी सीमित पहचान से निकालकर अनंत में विलीन कर देती है। इस प्रकार ओंकार के दस नामों का यह क्रम एक पूर्ण योग-यात्रा है—स्थूल शरीर से आरम्भ होकर परब्रह्म में समापन तक।
प्रणवमात्रायां बाष्कलमतम् · प्रणवमात्राया रुचकायनमतम्
बाष्कलेरेकमात्रस्तु ओंकारः समुदाहृतः ।
रुचकायन आचार्यो द्विमात्रं चेच्छते सदा ॥ २.१२७ ॥
बाष्कलि के मत में एकमात्र ओंकार कहा गया है; आचार्य रुचकायन सदा द्विमात्र मानते हैं…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ओंकार के दस नामों की व्याख्या पूर्ण हुई, जिसमें उसे 'परब्रह्म' तक ले जाने वाला सेतु सिद्ध किया गया। अब ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार के उस स्वरूप का विवेचन कर रहे हैं जो उसकी 'मात्राओं' (ध्वनि-विस्तार) पर आधारित है, ताकि साधक उच्चारण और उपासना के विभिन्न स्तरों को समझ सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: बाष्कलिना एकमात्रः तु ओंकारः समुदाहृतः। रुचकायन आचार्यो (तु) सदा द्विमात्रं चेच्छते।
पदार्थ:
• बाष्कलि: एक प्राचीन आचार्य और व्याकरण-विज्ञ, जिन्होंने ओंकार के स्वरूप को एकत्व की दृष्टि से देखा।
• एकमात्रः: केवल एक मात्रा वाला। यहाँ 'मात्रा' का अर्थ ध्वनि की वह इकाई है जो एक बार उच्चारित होती है।
• समुदाहृतः: संकलित किया गया है, कहा गया है या प्रतिपादित किया गया है।
• रुचकायन: एक अन्य आचार्य, जिन्होंने ओंकार के विभाजन में द्वैत या दो चरणों की महत्ता बताई।
• चेच्छते: इच्छा करते हैं, मानते हैं या उनका मत है। 'चेच्छते' शब्द यहाँ केवल इच्छा नहीं, अपितु शास्त्र-सम्मत दृढ़ मत को दर्शाता है।
• सदा: निरंतर, सदैव। यह शब्द संकेत करता है कि रुचकायन का यह मत किसी विशेष परिस्थिति के लिए नहीं, अपितु सामान्य नियम के रूप में स्थिर है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ओंकार की मात्राओं के विषय में विभिन्न आचार्यों के मतों का विवरण देना आरम्भ करते हैं। ओंकार केवल एक शब्द नहीं, अपितु एक संपूर्ण ब्रह्मांडीय ध्वनि है, इसलिए अलग-अलग ऋषियों और आचार्यों ने अपनी साधना और अनुभव के अनुसार उसकी मात्राओं का निर्धारण किया है।
प्रथम मत बाष्कलि आचार्य का है, जिनके अनुसार ओंकार 'एकमात्र' है। भाव यह है कि ओंकार एक अखंड ध्वनि है। जब साधक इसे एक मात्रा के रूप में देखता है, तो वह ध्वनि के विभाजन (अ, उ, म) में न जाकर सीधे उस एकत्व में स्थित होता है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है। यह दृष्टि उस अवस्था की है जहाँ साधक केवल 'एक' को देखता है—एक ईश्वर, एक आत्मा, एक ध्वनि।
द्वितीय मत आचार्य रुचकायन का है, जो ओंकार को 'द्विमात्र' (दो मात्राओं वाला) मानते हैं। यहाँ द्विमात्र का अर्थ ध्वनि के दो मुख्य चरणों से है। बाहरी दृष्टि से यह 'अ' और 'उ' या 'उ' और 'म' का मेल हो सकता है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह 'व्युत्पत्ति' और 'लय' का संगम है। रुचकायन का यह मत साधक को यह सिखाता है कि यात्रा हमेशा दो बिंदुओं के बीच होती है—एक वह जहाँ से हम आरम्भ करते हैं (स्थूल) और दूसरा वह जहाँ हम पहुँचते हैं (सूक्ष्म)।
याज्ञवल्क्य यहाँ इन मतों को केवल सूचना के रूप में नहीं दे रहे, अपितु यह दिखा रहे हैं कि सत्य एक ही है, परन्तु उस तक पहुँचने के सोपान (सीढ़ियाँ) अलग-अलग हो सकते हैं। बाष्कलि का मत 'लक्ष्य' की ओर संकेत करता है, जबकि रुचकायन का मत 'प्रक्रिया' की ओर।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से मात्राओं का यह भेद उच्चारण की विधि और चेतना के स्तर का भेद है। साधक जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह विभिन्न भूमियों से गुजरता है:
१. एकमात्र का अभ्यास: यह उन साधकों के लिए है जो अद्वैत भाव में स्थित हैं। वे ओंकार को एक अखंड नाद के रूप में अनुभव करते हैं। यहाँ अभ्यास यह है कि ध्वनि के आरम्भ और अन्त के बीच का भेद मिट जाए और केवल एक निरंतर गूँज शेष रहे। यह एकाग्रता की वह भूमि है जहाँ मन पूरी तरह स्थिर हो जाता है।
२. द्विमात्र का अभ्यास: यह उन साधकों के लिए है जो 'साधन' और 'साध्य' के बीच के सेतु को समझ रहे हैं। यहाँ साधक ध्वनि के उत्थान और पतन का अनुभव करता है। यह अभ्यास प्राण के विस्तार और संकुचन की तरह है। जब साधक दो मात्राओं का अनुभव करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को स्थूल शरीर से उठाकर सूक्ष्म शरीर की ओर ले जा रहा होता है।
ऋषि याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि मात्राओं का यह विभाजन केवल बाहरी उच्चारण के लिए है। वास्तव में, मात्राएँ साधक की चेतना के विस्तार की माप हैं। जैसे-जैसे साधक सूक्ष्म होता जाता है, मात्राओं की संख्या उसके अनुभव में बदलती रहती है। यह अभ्यास साधक को ध्वनि के माध्यम से शून्य की ओर ले जाने की एक क्रमिक विधि है।
प्रणवमात्रायां नारदमतम् · प्रणवमात्रायां मौद्गल्यमतम्
द्विमात्रश्चार्धमात्रस्तु नारदस्य मतेन तु ।
मौद्गल्यस्य त्रिमात्रस्तु ओंकारो नात्र संशयः ॥ २.१२८ ॥
…नारद के मत से द्विमात्र और अर्धमात्र वाला है; मौद्गल्य के मत से त्रिमात्र ओंकार है, इसमें कोई संशय नहीं है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में बाष्कलि और रुचकायन आचार्यों के मतों का उल्लेख हुआ, जहाँ ओंकार को एक और दो मात्राओं में देखा गया। इसी क्रम में अब ऋषि याज्ञवल्क्य नारद और मौद्गल्य ऋषियों के दृष्टिकोण को प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधक ध्वनि के विस्तार और उसके सूक्ष्म विभाजन की विभिन्न श्रेणियों को समझ सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: नारदस्य मतेन (ओंकारः) द्विमात्रः च अर्धमात्रः तु (अस्ति)। मौद्गल्यस्य त्रिमात्रः ओंकारः (अस्ति), नात्र संशयः।
पदार्थ:
• नारदस्य मतेन: देवर्षि नारद के मत या अनुभव के अनुसार। नारद भक्ति और संगीत (नाद) के अधिष्ठाता हैं, अतः उनका मत ध्वनि के सूक्ष्म उतार-चढ़ाव पर आधारित है।
• द्विमात्रश्चार्धमात्रस्तु: दो मात्राएँ और एक अर्धमात्रा। यहाँ 'द्विमात्र' स्थूल ध्वनि के दो चरणों को और 'अर्धमात्र' उस सूक्ष्म गूँज या संधिकाल को दर्शाता है जो ध्वनि के विलोपन और मौन के बीच होता है।
• मौद्गल्यस्य: ऋषि मौद्गल्य के अनुसार।
• त्रिमात्रस्तु: तीन मात्राओं वाला। यह विभाजन सामान्यतः 'अ', 'उ' और 'म्' के रूप में देखा जाता है।
• नात्र संशयः: इसमें कोई संशय नहीं है। यह वाक्यांश यह स्पष्ट करता है कि ये मत परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य को देखने के भिन्न स्तर हैं; जिस स्तर पर जो मत है, वह अपने आप में पूर्ण और सत्य है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ओंकार की मात्राओं के विवेचन को आगे बढ़ाते हुए दो और महत्वपूर्ण मत दिए गए हैं। प्रथम देवर्षि नारद का मत है, जिनके अनुसार ओंकार 'द्विमात्र और अर्धमात्र' है। भाव यह है कि ओंकार का एक भाग उच्चारित ध्वनि (वाङ्मय) है और दूसरा भाग उसकी अनुगूँज है, जबकि वह 'अर्धमात्र' वह सूक्ष्म बिंदु है जहाँ शब्द समाप्त होकर शून्य में विलीन होने लगता है। नारद जी की दृष्टि नाद-योग की है, जहाँ वे ध्वनि के केवल विस्तार को नहीं, बल्कि उसके क्षय होने की प्रक्रिया को भी मात्रा मानते हैं।
द्वितीय मत ऋषि मौद्गल्य का है, जिनके अनुसार ओंकार 'त्रिमात्र' है। यह सबसे प्रचलित मत है, जिसमें ओंकार को तीन अक्षरों या अवस्थाओं में विभाजित किया गया है। यह विभाजन जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की तीन अवस्थाओं का प्रतीक है। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ 'नात्र संशयः' कहकर यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सत्य एक ही है, किंतु साधक की पात्रता और उसकी साधना की विधि के अनुसार वह उसे दो, ढाई या तीन मात्राओं में अनुभव कर सकता है। यह संशय का विषय नहीं, बल्कि अनुभव की विविधता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक ध्वनि के साथ उसके संबंध को गहरा करने का अभ्यास है।
नारद के मत का अभ्यास करने वाला साधक 'अर्धमात्र' पर ध्यान केंद्रित करता है। यह वह क्षण है जब ध्वनि समाप्त होती है और मौन आरम्भ होता है। इस संधि-स्थल पर ठहरने से साधक स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर प्रस्थान करता है। वह अनुभव करता है कि शब्द केवल माध्यम है, वास्तविक लक्ष्य वह 'मौन' है जिसमें शब्द विलीन हो रहे हैं।
मौद्गल्य के त्रिमात्र मत का अभ्यास करने वाला साधक ओंकार के तीन चरणों (अ, उ, म्) के माध्यम से अपने संपूर्ण अस्तित्व को समेटता है। वह पहले अपने स्थूल शरीर (अ), फिर प्राण-शक्ति (उ) और अंततः मन (म्) को ओंकार में विलीन कर देता है। इस अभ्यास से साधक त्रिगुणात्मक प्रकृति (सत्व, रज, तम) से ऊपर उठकर उस एकता की ओर बढ़ता है जहाँ कोई विभाजन नहीं रहता।
यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि मात्राएँ केवल गिनती नहीं हैं, बल्कि चेतना के विस्तार के सोपान हैं। वह द्विमात्र से त्रिमात्र और फिर आगे बढ़ते हुए उस 'अमात्र' की ओर अग्रसर होता है, जिसका वर्णन आने वाले श्लोकों में होगा।
प्रणवमात्रायां वसिष्ठमतम् · प्रणवमात्रायां मनुमतम्
वसिष्ठस्य मतेनैव मात्रा चात्र चतस्रिका (?) ।
त्रिमात्रो मनुना चोक्तस्तथान्यैर्ऋषिसत्तमैः ॥ २.१२९ ॥
वसिष्ठ के मत से ही यहाँ चार मात्राएँ हैं; मनु द्वारा तीन मात्रा वाला कहा गया है और अन्य श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा भी...
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में ओंकार की एक, दो, ढाई और तीन मात्राओं के विभिन्न ऋषियों के मतों का विवेचन किया गया। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए वसिष्ठ और मनु जैसे महान ऋषियों के दृष्टिकोण को प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधक ध्वनि के स्थूल विस्तार से सूक्ष्मता की ओर बढ़ने के विभिन्न सोपानों को समझ सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) वसिष्ठस्य मतेन एव चात्र चतस्रिका (अस्ति)। (ओंकारः) त्रिमात्रः मनुना च उक्तः, तथा अन्यैः ऋषिसत्तमैः (अपि उक्तः)।
पदार्थ:
• वसिष्ठस्य मतेन: ब्रह्मऋषि वसिष्ठ के अनुभव और मत के अनुसार।
• चात्र चतस्रिका: यहाँ 'चतस्रिका' का अर्थ चार मात्राओं वाला है। (पाठ की अनिश्चितता के बावजूद, अगले श्लोक के 'चतुर्मात्र' शब्द से यह स्पष्ट है कि यहाँ चार मात्राओं की बात हो रही है)।
• त्रिमात्रः मनुना च उक्तः: मनु द्वारा तीन मात्राओं वाला कहा गया है। यह विभाजन सामान्यतः 'अ', 'उ' और 'म्' के रूप में देखा जाता है।
• तथान्यैर्ऋषिसत्तमैः: तथा अन्य श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा भी (त्रिमात्र ही कहा गया है)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ओंकार की मात्राओं के विषय में दो प्रमुख धाराओं का उल्लेख है। प्रथम, महर्षि वसिष्ठ का मत है कि ओंकार चार मात्राओं वाला (चतस्रिका) है। यहाँ 'चार' की संख्या केवल गणितीय गिनती नहीं, अपितु ध्वनि के चार अवस्थाओं का संकेत है—ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और शान्त। यह वह दृष्टि है जहाँ साधक ध्वनि के जन्म, उसके विस्तार, उसकी चरम सीमा और अंततः उसके मौन में विलीन होने की पूरी प्रक्रिया को देखता है।
द्वितीय, मनु और अन्य श्रेष्ठ ऋषियों का मत है कि ओंकार 'त्रिमात्र' है। यह मत सबसे अधिक प्रचलित है क्योंकि यह ओंकार के तीन स्पष्ट वर्णों—अ, उ और म—पर आधारित है। यह विभाजन साधक को स्थूल जगत (अ), सूक्ष्म जगत (उ) और कारण जगत (म) के समन्वय का बोध कराता है।
यहाँ यह रहस्य समझना आवश्यक है कि ये मत परस्पर विरोधी नहीं हैं। जब साधक ध्वनि के व्याकरण और उच्चारण की सूक्ष्मता में उतरता है, तब उसे चार मात्राएँ (वसिष्ठ मत) अनुभव होती हैं, और जब वह इसे त्रैगुण्य प्रकृति या तीन लोकों के प्रतीक के रूप में देखता है, तब वह त्रिमात्र (मनु मत) होता है। याज्ञवल्क्य यहाँ विभिन्न ऋषियों के मतों को इसलिए रख रहे हैं ताकि साधक यह जान सके कि ओंकार की यात्रा ध्वनि के विस्तार (मात्राओं) से शुरू होकर अंततः 'अमात्र' (मात्रा-रहित) स्थिति तक जाती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीति च ॥ २.७६ ॥
प्रजापतिने तीनों वेदोंसे अकार, उकार और मकार को, तथा "भूः, भुवः, स्वः" को दुहकर निकाला।
मनुस्मृति में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रजापति ने तीनों वेदों से अकार, उकार और मकार को दुहकर निकाला। यह साक्ष्य इस स्मृति के 'त्रिमात्र' मत की पुष्टि करता है कि ओंकार मूलतः तीन वर्णों (अ-उ-म) का समुच्चय है, जो वेदों के सार से उत्पन्न हुए हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक ध्वनि के 'विस्तार' और 'संकोच' का अभ्यास है।
१. त्रिमात्र अभ्यास: जब साधक 'अ', 'उ' और 'म्' का अलग-अलग और फिर संयुक्त उच्चारण करता है, तो वह अपने भीतर के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को जाग्रत करता है। यह अभ्यास उसे बाहरी जगत से हटाकर अंतर्मुखी करता है।
२. चतुर्मात्र अभ्यास: जब साधक ध्वनि को ह्रस्व (छोटा), दीर्घ (लंबा), प्लुत (अत्यधिक लंबा) और फिर शान्त (मौन) करता है, तो वह ध्वनि के माध्यम से शून्य की यात्रा करता है। 'शान्त' मात्रा का अभ्यास ही वह सेतु है जो उसे शब्दमय ओंकार से अमात्र ओंकार की ओर ले जाता है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि शब्द केवल माध्यम है; वास्तविक लक्ष्य वह 'मौन' है जो ध्वनि के समाप्त होने के बाद शेष रहता है। वह त्रिमात्र की स्थिरता से चतुर्मात्र की सूक्ष्मता की ओर बढ़ता है।
प्रणवमात्रायां पाराशरमतम्
पाराशरैश्चतुर्मात्रस्तथा ह्यध्यात्मचिन्तकैः ।
ह्रस्वं दीर्घं प्लुतं शान्तं चतुर्धा संप्रकीर्तितम् ॥ २.१३० ॥
…पाराशर और अन्य अध्यात्मचिन्तक के मत से चतुर्मात्र है; ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और शान्त—ये चार प्रकार से संप्रकीर्तित कहा गया है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि वसिष्ठ के चतुर्मात्र और मनु तथा अन्य ऋषियों के त्रिमात्र मत का उल्लेख किया गया था। वर्तमान श्लोक उसी क्रम को पूर्ण करते हुए पाराशर और अध्यात्मचिन्तकों के दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि ओंकार की मात्राओं का विवेचन केवल व्याकरण नहीं, अपितु चेतना के विस्तार की एक पद्धति है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) पाराशरैः च अध्यात्मचिन्तकैः च चतुर्मात्रः (अस्ति), तथा हि (सः) ह्रस्वं दीर्घं प्लुतं शान्तं (इति) चतुर्धा संप्रकीर्तितम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• पाराशरैः: महर्षि पाराशर के मत के अनुसार।
• अध्यात्मचिन्तकैः: उन साधकों और ऋषियों के द्वारा, जिन्होंने केवल बाहरी कर्मकाण्ड नहीं, अपितु आत्मा के स्वरूप और उसकी आंतरिक गतियों का चिंतन किया है।
• चतुर्मात्रः: चार मात्राओं वाला।
• ह्रस्वम्: लघु ध्वनि, जो क्षणिक हो।
• दीर्घम्: विस्तृत ध्वनि, जो ह्रस्व से अधिक समय तक रहे।
• प्लुतम्: अति-विस्तारित ध्वनि, जो दीर्घ से भी अधिक समय तक खिंचे।
• शान्तम्: वह मौन या निशब्द अवस्था, जहाँ ध्वनि पूरी तरह विलीन हो जाती है।
• चतुर्धा संप्रकीर्तितम्: इन चार अवस्थाओं के रूप में प्रसिद्ध या वर्णित किया गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन ऋषियों के मत को प्रस्तुत कर रहे हैं जो ओंकार को केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा मानते हैं। महर्षि पाराशर और अध्यात्मचिन्तकों के अनुसार ओंकार 'चतुर्मात्र' है। यहाँ 'चार' की संख्या ध्वनि के भौतिक स्वरूप के बजाय उसकी तीव्रता और समय-सीमा (काल) के आधार पर विभाजित है।
प्रथम मात्रा 'ह्रस्व' है—यह ध्वनि का बीजरूप है, वह बिंदु जहाँ से स्पंदन आरम्भ होता है। द्वितीय मात्रा 'दीर्घ' है—जहाँ वह बीजरूप ध्वनि विस्तार पाती है और अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। तृतीय मात्रा 'प्लुत' है—यह ध्वनि की वह चरम सीमा है जहाँ साधक पूरी तरह उस नाद में डूब जाता है; यह पूर्णता की अवस्था है। चतुर्थ मात्रा 'शान्त' है—यह सबसे महत्वपूर्ण है। जब प्लुत ध्वनि अपनी चरम सीमा पर पहुँचकर अचानक शांत होती है, तब जो शेष बचता है, वह 'शान्त' मात्रा है। यह वह मौन है जो शब्द से पैदा हुआ है, इसलिए यह साधारण मौन नहीं, अपितु 'शब्द-मौन' है।
अध्यात्मचिन्तकों ने इसे चतुर्धा इसलिए कहा क्योंकि वे जानते हैं कि साधक जब तक 'शान्त' मात्रा का अनुभव नहीं करता, तब तक वह केवल शब्द-ब्रह्म के स्तर पर है। 'शान्त' मात्रा ही वह द्वार है जो स्थूल ध्वनि (शब्द) को सूक्ष्म चेतना (अक्षर) से जोड़ता है। इस प्रकार, यह चतुर्मात्र विभाजन साधक को क्रमिक रूप से स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने की एक विधि है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'नाद-साधना' का आधार है। साधक जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह इन चार चरणों से गुजरता है:
१. ह्रस्व: मन का एकाग्र होना और ध्वनि का आरम्भ।
२. दीर्घ: प्राण का विस्तार और ध्वनि के साथ लयबद्ध होना।
३. प्लुत: चेतना का पूरी तरह नाद में विलीन होना, जहाँ ज्ञाता और ज्ञान का भेद मिटने लगता है।
४. शान्त: ध्वनि के समाप्त होने के बाद जो गहरा सन्नाटा अनुभव होता है, उसमें स्थित होना।
साधक इस अभ्यास से 'शब्द' से 'अशब्द' की ओर जाता है। 'शान्त' मात्रा का अनुभव करना ही वास्तव में योग है, क्योंकि यहीं पर वह शब्दमय ओंकार को छोड़कर अमात्र (बिना मात्रा वाले) परब्रह्म की ओर कदम बढ़ाता है। यह अभ्यास साधक को मानसिक चंचलता से मुक्त कर उसे उस शून्य में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।
प्रणवमात्रायां याज्ञवल्क्यमतम्
भवेत् कर्मवशादेवमन्यथा तु त्रिरक्षरम् ।
भगवान् याज्ञवल्क्यस्तु अमात्रं चेच्छते सदा ॥ २.१३१ ॥
…यह कर्म के वश से होता है, अन्यथा तीन अक्षरों वाला है; भगवान् याज्ञवल्क्य तो सदा अमात्र मानते हैं…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि पाराशर और अध्यात्मचिन्तकों के चतुर्मात्र मत का वर्णन था, जिसमें ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और शान्त अवस्थाओं के माध्यम से ध्वनि के विलीनीकरण की प्रक्रिया समझाई गई थी। वर्तमान श्लोक इन समस्त मतों का निष्कर्ष निकालते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य के स्वयं के विशिष्ट और उच्चतम दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारस्य मात्रा-भेदः) कर्मवशादेव भवेत्, अन्यथा (ओंकारः) त्रिरक्षरम् (अस्ति)। भगवान् याज्ञवल्क्यस्तु (ओंकारं) सदा अमात्रं चेच्छते।
पदार्थ:
• कर्मवशादेव: केवल कर्मों के अधीन या क्रियात्मकता के कारण। यहाँ 'कर्म' का अर्थ है—ध्वनि का उच्चारण, वाक्-क्रिया और अभ्यास की वह अवस्था जहाँ साधक शब्द के सहारे ऊपर उठता है।
• मन्यथा: अन्यथा; जब क्रिया समाप्त हो जाए या जब हम मूल तत्त्व की बात करें।
• त्रिरक्षरम्: तीन अक्षरों (अ, उ, म) वाला। यह ओंकार का वह स्वरूप है जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की तीन अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
• अमात्रम्: मात्रा-रहित। जहाँ समय (काल), संख्या और ध्वनि का पूर्ण अभाव हो; जो केवल शुद्ध चैतन्य स्वरूप हो।
• चेच्छते: मानते हैं या इच्छा करते हैं (यहाँ 'चेच्छते' का अर्थ है—दृढ़ मत रखना या स्वीकार करना)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में एक अत्यंत सूक्ष्म भेद स्पष्ट किया गया है। अब तक के श्लोकों में बाष्कलि, रुचकायन, नारद, मनु और पाराशर आदि ऋषियों के विभिन्न मत (एक, दो, ढाई, तीन और चार मात्राएँ) आए। याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि यह समस्त भिन्नता 'कर्मवश' है।
इसका रहस्य यह है कि जब तक साधक 'ध्वनि' के स्तर पर अभ्यास करता है, तब तक वह कर्म के अधीन है। उच्चारण एक क्रिया है, और क्रिया में समय (काल) का निवेश होता है। जब हम ओंकार को उच्चारित करते हैं, तो वह अनिवार्यतः मात्राओं में बँट जाता है—कभी छोटा (ह्रस्व), कभी लंबा (दीर्घ)। यह वह सोपान है जहाँ साधक शब्द के माध्यम से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है। इस स्तर पर ओंकार 'त्रिरक्षर' (अ, उ, म) है, जो सृष्टि के तीन गुणों और चेतना की तीन स्थूल अवस्थाओं का प्रतीक है।
किन्तु, भगवान् याज्ञवल्क्य का मत इससे परे है। वे ओंकार को 'अमात्र' मानते हैं। 'अमात्र' होने का अर्थ है—वह अवस्था जहाँ ध्वनि का अस्तित्व समाप्त हो गया हो, किन्तु उसका अनुभव शेष हो। यह वह बिंदु है जहाँ 'उच्चारण' (कर्म) समाप्त होता है और 'साक्षात्कार' (ज्ञान) आरम्भ होता है। जब साधक शब्द की सीमा को लाँघकर उस मौन में स्थित हो जाता है जहाँ न कोई अक्षर है और न कोई समय, वही वास्तविक ओंकार है। याज्ञवल्क्य जी के लिए ओंकार कोई शब्द नहीं, बल्कि वह 'अक्षर' (अविनाशी) तत्त्व है जो शब्दों से पूर्व है और शब्दों के विलीन होने के बाद भी रहता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रारहित चौथा है — व्यवहारसे परे, प्रपञ्चका उपशम, शिव, अद्वैत। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है; जो ऐसा जानता है, वह आत्मासे आत्मामें प्रवेश करता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में कहा गया है कि चौथा पद 'अमात्र' है, जो व्यवहार से परे और प्रपञ्च का उपशम है। यह अद्वैत स्वरूप है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह मत माण्डूक्य उपनिषद् के इस सत्य से पूर्णतः मेल खाता है। जहाँ उपनिषद् 'तुरीय' अवस्था को अमात्र कहता है, वहीं याज्ञवल्क्य जी उसे साधना के उच्चतम स्तर पर 'अमात्र ओंकार' के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि शब्दमय ओंकार केवल एक साधन (कर्म) है, जबकि अमात्र ओंकार साध्य (परब्रह्म) है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के बीच की विभाजक रेखा है।
अभ्यास के प्रथम सोपान में साधक ओंकार की मात्राओं का विस्तार करता है (जैसे ह्रस्व से प्लुत तक), जिससे उसका चित्त एकाग्र होता है और प्राणों का स्पंदन लयबद्ध होता है। यह 'कर्मवश' की अवस्था है। यहाँ साधक शब्द के सहारे अपनी चेतना को ऊपर उठाता है।
किन्तु, जैसे-जैसे साधक की भूमि ऊँची होती है, वह अनुभव करता है कि मात्राएँ और अक्षर केवल उँगलियाँ हैं जो चंद्रमा की ओर संकेत कर रही हैं। वह अब 'त्रिरक्षर' (अ-उ-म) के भीतर के उस शून्य या मौन को खोजने का प्रयास करता है जहाँ ध्वनि विलीन हो जाती है।
जब साधक उच्चारित ओंकार के अंत में आने वाले उस गहन सन्नाटे में ठहर जाता है, तब वह 'अमात्र' की भूमि पर प्रवेश करता है। यहाँ अभ्यास 'जप' से बदलकर 'समाधि' हो जाता है। साधक अब ओंकार को सुनता नहीं, बल्कि स्वयं ओंकार हो जाता है। यह अवस्था मात्राओं के गणित से परे है; यहाँ केवल शुद्ध अस्तित्व शेष रहता है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को शब्दमय स्थूलता से निकालकर निःशब्द सूक्ष्मता की ओर ले जाने का निर्देश देता है।
यः शब्दमय ओंकार उच्चार्यः स्थूल एव सः ।
अमात्रश्चाप्यनुच्चार्य परोंकारः स उच्यते ॥ २.१३२ ॥
जो शब्दमय, उच्चारित होनेवाला ओंकार है, वह स्थूल ही है; और जो अमात्र तथा अनुच्चार्य है, वह पर (सूक्ष्म) ओंकार कहलाता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया था कि विभिन्न ऋषियों द्वारा बताई गई मात्राएँ 'कर्म' (उच्चारण-क्रिया) के अधीन हैं, जबकि महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार को 'अमात्र' मानते हैं। वर्तमान श्लोक इसी अमात्रता के रहस्य को खोलते हुए शब्दमय और शब्द-अतीत ओंकार के बीच का भेद स्पष्ट करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यः ओंकारः शब्दमयः उच्चार्यः (अस्ति), सः स्थूल एव (अस्ति)। अमात्रः च अपि अनुच्चार्यः (ओंकारः) परोम्कारः स उच्यते।
पदार्थ:
• शब्दमय: ध्वनि से निर्मित, जो वाक्-शक्ति के माध्यम से अभिव्यक्त हो।
• उच्चार्यः: जिसे जिह्वा, तालु और प्राण के संयोग से बोला जा सके।
• स्थूल: यहाँ 'स्थूल' का अर्थ केवल शरीर से नहीं, अपितु 'विस्तार' से है। जो समय, स्थान और ध्वनि की सीमा में बँधा हो, वह स्थूल है।
• अमात्रः: मात्रा-रहित। जहाँ 'अ', 'उ', 'म' का विच्छेद समाप्त हो जाए और केवल एक अखंड सत्ता शेष रहे।
• अनुच्चार्यः: जिसे बोला न जा सके; जो केवल अनुभव का विषय हो।
• परोंकारः: वह ओंकार जो 'पर' (परे/श्रेष्ठ) है। यह शब्द-ब्रह्म से आगे की अवस्था है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार के दो स्तरों का विवेचन कर रहे हैं। प्रथम स्तर है—'शब्दमय ओंकार'। जब हम 'ओम्' का उच्चारण करते हैं, तो वह ध्वनि के रूप में प्रकट होता है। यह ध्वनि कान से सुनी जा सकती है और समय के भीतर घटित होती है। चूंकि इसमें विस्तार है और यह इंद्रिय-बोध (श्रवण) के अधीन है, इसलिए इसे 'स्थूल' कहा गया है। यह स्थूल ओंकार साधक के लिए एक सीढ़ी (सोपान) के समान है, जो उसे बाहरी जगत से आंतरिक जगत की ओर ले जाता है।
द्वितीय स्तर है—'अमात्र ओंकार'। यह वह अवस्था है जहाँ ध्वनि का विलीनीकरण हो जाता है। जब साधक जप के चरम पर पहुँचता है, तब एक ऐसा क्षण आता है जहाँ शब्द समाप्त हो जाता है, किंतु उसकी गूँज (अनुनाद) चैतन्य में बनी रहती है। यह ओंकार 'अनुच्चार्य' है क्योंकि इसे वाणी से नहीं, अपितु केवल आत्म-साक्षात्कार से जाना जा सकता है। इसे ही 'परोंकार' कहा गया है, क्योंकि यह समस्त मात्राओं, अक्षरों और पदों से परे (पर) है।
यहाँ याज्ञवल्क्य जी यह संकेत दे रहे हैं कि स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा अनिवार्य है। बिना शब्दमय ओंकार के अभ्यास के, अनुच्चार्य परोंकार तक पहुँचना कठिन है। स्थूल ओंकार 'साधन' है और अमात्र ओंकार 'साध्य' है।
शास्त्र-साक्ष्य —
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ २३२.३० ॥
दो ब्रह्म जाननेयोग्य हैं — शब्दब्रह्म और जो पर (ब्रह्म) है; शब्दब्रह्ममें निष्णात (साधक) परब्रह्मको पाता है।
महाभारत के इस अंश में स्पष्ट कहा गया है कि दो ब्रह्म जानने योग्य हैं—शब्दब्रह्म और परब्रह्म। जो साधक शब्दब्रह्म (उच्चार्य ओंकार) में निष्णात हो जाता है, वही अंततः परब्रह्म (अमात्र परोंकार) को प्राप्त करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी सिद्धांत को पुष्ट करती है कि शब्दमय ओंकार स्थूल है और अमात्र ओंकार पर है। दोनों में विरोध नहीं, बल्कि एक क्रम है। शब्दब्रह्म वह द्वार है जिससे होकर साधक परब्रह्म के शून्य और पूर्ण स्वरूप में प्रवेश करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'जप' से 'ध्यान' की ओर संक्रमण का सूत्र है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक पहले शब्दमय ओंकार का स्पष्ट उच्चारण करे। इस स्थूल अभ्यास से मन की चंचलता नियंत्रित होती है और चित्त एक बिंदु पर केंद्रित होने लगता है। जैसे-जैसे अभ्यास गहरा होता है, साधक अनुभव करता है कि ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म होती जा रही है। वह 'अ' से 'उ' और 'उ' से 'म' की यात्रा करता है, और अंत में 'म' के विलीनीकरण के बाद जो मौन शेष रहता है, वही 'अमात्र' स्थिति है।
साधक जब इस अनुच्चार्य ओंकार में स्थित होता है, तब वह 'शब्द' के बंधन से मुक्त होकर 'अक्षर' (जो नष्ट न हो) में प्रतिष्ठित हो जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि जप करते समय केवल ध्वनि पर ध्यान न रहे, बल्कि उस ध्वनि के पीछे छिपे उस मौन को पकड़ा जाए जहाँ से ध्वनि उत्पन्न हुई और जहाँ वह विलीन हो रही है। जब साधक उस 'परोंकार' का अनुभव करता है, तब वह स्थूल शरीर और मन की सीमाओं को लाँघकर शुद्ध चैतन्य की भूमि पर कदम रखता है। यही इस अध्याय का मुख्य निर्णय है: जप से आरम्भ करो, किंतु लक्ष्य वह ओंकार है जो बोला नहीं जाता, केवल जिया जाता है।
प्रणवमात्रायां ब्रह्मचिन्तकमतम्
तिस्रः सार्धास्तथा मात्राः स गृह्णाति यथाक्रमम्
परं ब्रह्म तमेवाहुश्चात्मानं ब्रह्मचिन्तकाः ॥ २.१३३ ॥
साढ़े तीन मात्राएँ हैं, उन्हें (साधक) यथाक्रम से ग्रहण करता है; ब्रह्मचिन्तक उसी (अमात्र) को परब्रह्म और आत्मा ही कहते हैं…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शब्दमय ओंकार को 'स्थूल' और अनुच्चार्य ओंकार को 'परोंकार' कहकर साधक के लिए ध्वनि और मौन के भेद को स्पष्ट किया था। वर्तमान श्लोक में वे उन विभिन्न मात्राओं के क्रम और उनके अंतिम गंतव्य का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधकः) तिस्रः सार्धाः मात्राः यथाक्रमम् गृह्णाति; ब्रह्मचिन्तकाः तमेव (अमात्रं) परं ब्रह्म (इत्युच्यन्ते) च आत्मानं (इत्युच्यन्ते)।
पदार्थ:
• तिस्रः सार्धाः मात्राः: तीन और आधा (साढ़े तीन) मात्राएँ। यहाँ 'तीन' मात्राएँ 'अ', 'उ' और 'म' के उच्चारण की अवधि हैं, और 'आधा' (अर्धमात्र) वह मौन है जो उच्चारण के बाद शेष रहता है।
• यथाक्रमम्: उसी क्रम में जिस क्रम में वे प्रकट होती हैं। योग में क्रम का अर्थ है—स्थूल से सूक्ष्म की ओर गमन।
• गृह्णाति: ग्रहण करता है। यहाँ ग्रहण करने का अर्थ केवल सुनना नहीं, अपितु उस ध्वनि के साथ एकाकार होकर उसे अनुभव करना है।
• ब्रह्मचिन्तकाः: वे साधक जो केवल कर्मकाण्ड में नहीं, अपितु ब्रह्म के स्वरूप के चिंतन में लीन हैं।
• परं ब्रह्म / आत्मानं: वह सत्ता जो समस्त सीमाओं से परे है और जो स्वयं का शुद्ध स्वरूप है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य का उद्घाटन कर रहे हैं। पूर्व के श्लोकों में विभिन्न ऋषियों के मतों (एक, दो, तीन, चार मात्राओं) का उल्लेख किया गया था, किंतु यहाँ वे 'साढ़े तीन' मात्राओं की बात करते हैं। यह संख्या केवल गणितीय नहीं, अपितु आध्यात्मिक यात्रा का मानचित्र है।
साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह 'अ', 'उ' और 'म' की तीन मात्राओं से होकर गुजरता है। ये तीन मात्राएँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी अवस्थाओं या स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के प्रतीकों के समान हैं। 'यथाक्रमम्' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है; इसका भाव यह है कि साधक सीधे 'अमात्र' (शून्य/मौन) में नहीं कूद सकता। उसे पहले ध्वनि के विस्तार (अ), फिर उसके संकुचन (उ) और अंततः उसके विलीनीकरण (म) की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यह क्रम ही साधक को स्थूल जगत से खींचकर सूक्ष्मता की ओर ले जाता है।
जब 'म' की ध्वनि समाप्त होती है, तब एक अंतराल आता है—वही 'अर्धमात्र' है। यह वह संधि-काल है जहाँ शब्द समाप्त हो चुका है, किंतु अनुभव अभी शेष है। इसी अर्धमात्र को 'अमात्र' या 'परोंकार' कहा गया है। ब्रह्मचिन्तक, जो केवल ध्वनि के उपासक नहीं हैं, वे जानते हैं कि वास्तविक लक्ष्य 'ओम्' बोलना नहीं, बल्कि उस ध्वनि के विलीन होने के बाद जो 'अखंड मौन' शेष रहता है, उसे प्राप्त करना है। उसी मौन को वे 'परब्रह्म' और 'आत्मा' कहते हैं।
अतः यहाँ विधि यह है कि साधक पहले शब्दमय ओंकार को ग्रहण करे और फिर उस शब्द के पीछे छिपे शब्द-अतीत सत्य (अमात्र) में स्थित हो जाए।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि-योग' और 'मौन-योग' के मिलन का सूत्र है। साधक के लिए ये साढ़े तीन मात्राएँ एक सीढ़ी (सोपान) के समान हैं।
१. प्रथम तीन मात्राएँ (अभ्यास): साधक जब 'अ', 'उ', 'म' का उच्चारण करता है, तो वह अपने चित्त को बाहरी विषयों से हटाकर एक केंद्र पर लाना शुरू करता है। यह 'साधन' की भूमि है।
२. अर्धमात्र (अनुभव): जब ध्वनि समाप्त होती है और साधक उस शून्य में ठहरता है, तो वह 'साध्य' की भूमि में प्रवेश करता है। यहाँ वह अनुभव करता है कि वह केवल शरीर या मन नहीं, बल्कि वह 'द्रष्टा' है जो ध्वनि के आने और जाने को देख रहा है।
३. अमात्र (सिद्धि): जब साधक उस मौन में इतना लीन हो जाता है कि 'मैं' और 'ओंकार' का भेद समाप्त हो जाए, तब वह 'परब्रह्म' की स्थिति को प्राप्त करता है।
साधक को यह अभ्यास करना चाहिए कि वह ध्वनि के अंत में आने वाले उस सूक्ष्म अंतराल (अर्धमात्र) को लंबा करे और उसमें ठहरने का प्रयास करे। यही वह बिंदु है जहाँ से वह स्थूल शरीर के बोध से ऊपर उठकर अपने शुद्ध आत्म-स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है। यहाँ 'ग्रहण' करने का अर्थ है—ध्वनि के माध्यम से मौन की ओर यात्रा करना।
ओंकारोपासनास्वरूपम्
यत् पूर्वं तु समुद्दिष्टमोंकाराग्रे व्यवस्थितम् ।
अक्षरैश्च पदैश्चैव अतीतं पञ्चमं पदम् ॥ २.१३४ ॥
…जो पहले बताया गया, ओंकार के आगे व्यवस्थित है; अक्षरों और पदों से भी परे वह पञ्चम पद है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ब्रह्मचिन्तकों की दृष्टि से साढ़े तीन मात्राओं के क्रम और उस अमात्र अवस्था के परब्रह्म स्वरूप का वर्णन किया गया था। वर्तमान श्लोक उस यात्रा के अंतिम गंतव्य और उस परम स्थिति की घोषणा करता है, जो समस्त ध्वनियों और शब्दों की सीमा को लाँघ चुकी है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यत् (तत्) पूर्वं तु समुद्दिष्टम्, (तत्) ओंकाराग्रे व्यवस्थितम्; (तत्) अक्षरैः च पदैः च एव अतीतं पञ्चमं पदम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• यत् पूर्वं तु समुद्दिष्टम्: जो पहले कहा गया (यहाँ संकेत पूर्व के श्लोकों और विशेषकर इस ग्रन्थ के २.८ के उस प्रसंग की ओर है जहाँ पञ्चम पद का उल्लेख आया था)।
• ओंकाराग्रे व्यवस्थितम्: ओंकार के अग्रभाग में स्थित। 'अग्र' का अर्थ यहाँ केवल स्थान नहीं, अपितु वह बिंदु है जहाँ ध्वनि समाप्त होती है और शुद्ध चेतना आरम्भ होती है।
• अक्षरैश्च पदैश्चैव अतीतं: अक्षरों और पदों से भी परे। 'अक्षर' वह है जिसका क्षय न हो, किंतु यहाँ अक्षर का अर्थ उन वर्णों (अ, उ, म) से है जिनसे मंत्र बनते हैं। 'पद' का अर्थ है शब्द या अर्थ की सीमा। 'अतीत' का अर्थ है—जो इन सबको पार कर चुका हो।
• पञ्चमं पदम्: पाँचवाँ पद। यह वह स्थिति है जो चार मात्राओं (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, शान्त) या साढ़े तीन मात्राओं के बाद आने वाली पूर्ण निःशब्दता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम लक्ष्य का संकेत दे रहे हैं जिसे साधक ओंकार की साधना के माध्यम से प्राप्त करता है। यहाँ 'पञ्चम पद' का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है।
साधक जब ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह सर्वप्रथम 'अ', 'उ' और 'म' की ध्वनियों में प्रवेश करता है। ये तीन पद स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाले सोपान हैं। इसके बाद वह 'अर्धमात्रा' या 'शान्त' पद में पहुँचता है, जहाँ ध्वनि तो समाप्त हो जाती है किंतु उसका प्रभाव (अनुगूँज) बना रहता है। यह चौथा पद है। किंतु याज्ञवल्क्य यहाँ कहते हैं कि एक ऐसा 'पञ्चम पद' भी है, जो इन चारों से भी परे है।
यह पञ्चम पद वह अवस्था है जहाँ न कोई अक्षर शेष रहता है, न कोई पद और न ही कोई ध्वनि। यह वह 'अमात्र' स्थिति है जिसे पिछले श्लोक (२.१३२) में 'परोंकार' कहा गया था। यह पद 'ओंकाराग्रे' यानी ओंकार के अग्रभाग में इसलिए व्यवस्थित है क्योंकि जब तक साधक ओंकार के माध्यम से यात्रा नहीं करता, वह इस पञ्चम पद तक नहीं पहुँच सकता। ओंकार यहाँ एक द्वार की भाँति है; द्वार को पार करने के बाद जो अनंत आकाश मिलता है, वही पञ्चम पद है।
भाव यह है कि शब्द (अक्षर) और अर्थ (पद) मन के उपकरण हैं। जब तक साधक शब्दों में उलझा है, वह द्वैत में है। जब वह अक्षरों और पदों को 'अतीत' कर जाता है, तब वह उस स्थिति में स्थित होता है जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। यह वह बिंदु है जहाँ साधक स्वयं ब्रह्म हो जाता है और ज्ञाता-ज्ञेय का भेद मिट जाता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'ध्वनि' से 'मौन' और 'मौन' से 'शून्य' की ओर ले जाने का निर्देश है। साधक का अभ्यास इस प्रकार होता है:
१. सर्वप्रथम वह 'अ', 'उ', 'म' के उच्चारण और उनके कंपन को अनुभव करता है।
२. फिर वह उस मौन (अर्धमात्रा) में ठहरता है जो उच्चारण के बाद आता है।
३. अंततः वह उस स्थिति का अनुभव करता है जहाँ यह मौन भी विलीन हो जाता है और केवल एक 'अक्षर-रहित' प्रकाश या चेतना शेष रहती है। यही 'पञ्चम पद' है।
साधक इस अभ्यास से 'शब्द-भूमि' से उठकर 'अक्षर-भूमि' में और फिर 'अतीत-भूमि' (पञ्चम पद) में प्रवेश करता है। यहाँ अभ्यास केवल मन्त्र का जप नहीं, अपितु मन्त्र के माध्यम से मन्त्र के ही विसर्जन की प्रक्रिया है। जब साधक अक्षरों और पदों से अतीत हो जाता है, तब वह उस परम व्योम में स्थित होता है जहाँ कोई संकल्प शेष नहीं रहता। यह स्थिति उसे उस सूक्ष्म शरीर के विसर्जन की ओर ले जाती है, जिसका वर्णन अगले श्लोकों (२.१३५-१३७) में आने वाला है।
यं(यत्)प्राप्य विन(नि)वर्तन्ते ओंकारस्य पथि स्थिताः ।
मनसात्र समाधाय शरीरं लिङ्गमानवम् ॥ २.१३५ ॥
ओंकारके मार्गपर स्थित (साधक) जिसे पाकर लौटते नहीं। यहाँ मनसे (ध्यान) समाहित करके, लिङ्ग (सूक्ष्म) शरीरको —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में अक्षरों और पदों से परे उस 'पञ्चम पद' का परिचय दिया गया था, जो ओंकार की साधना का अंतिम लक्ष्य है। वर्तमान श्लोक से महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम पद को प्राप्त करने की प्रयोगात्मक विधि का आरम्भ करते हैं और बताते हैं कि इस मार्ग पर चलने वाले साधक की नियति क्या होती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओंकारस्य पथि स्थिताः (साधकाः) यत् प्राप्य न निवर्तन्ते, (तद्) मनसा अत्र समाधाय, लिङ्गमानवं शरीरं (योजयेत्)।
पदार्थ:
• ओंकारस्य पथि स्थिताः: ओंकार के मार्ग पर स्थित। यहाँ 'पथ' का अर्थ केवल जप की प्रक्रिया नहीं, अपितु स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म मौन की ओर जाने वाली वह क्रमिक यात्रा है जिसे साधक अनुभव करता है।
• यत् प्राप्य निवर्तन्ते (न): जिसे पाकर (साधक) लौटते नहीं। यहाँ 'निवर्तन्ते' का निषेध यह संकेत देता है कि यह उपलब्धि कोई क्षणिक अनुभव नहीं, अपितु एक स्थायी रूपांतरण है। एक बार उस परम तत्व का साक्षात्कार होने पर चेतना पुनः संसार की सीमित वृत्तियों में नहीं गिरती।
• मनसा अत्र समाधाय: मन से यहाँ समाहित करके। 'समाधाय' का अर्थ है एकाग्र करना या एक बिंदु पर स्थिर करना। 'अत्र' (यहाँ) का संकेत उस आंतरिक केंद्र की ओर है जहाँ से सूक्ष्म शरीर का उत्थान आरम्भ होता है।
• शरीरं लिङ्गमानवम्: लिङ्ग-मानव शरीर। 'लिङ्ग' का अर्थ है सूक्ष्म। यह वह शरीर है जो स्थूल भौतिक शरीर के भीतर विद्यमान है और संकल्पों, इच्छाओं तथा चेतना का वाहक है। 'मानव' शब्द यहाँ उस स्वरूप को दर्शाता है जो मानवीय चेतना के सूक्ष्म आयामों से निर्मित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ओंकार-साधना के उस रहस्य को खोल रहे हैं, जहाँ ध्वनि (शब्द) समाप्त होती है और अनुभव (अनुभूति) आरम्भ होता है।
प्रथम पंक्ति में एक महान सत्य की घोषणा है: "जिसे पाकर ओंकार-मार्गी लौटते नहीं।" यह उस 'पञ्चम पद' की महिमा है। जब साधक ओंकार की मात्राओं को पार कर उस अमात्र अवस्था में स्थित हो जाता है, तो वह उस सत्य को पा लेता है जो अपरिवर्तनीय है। जैसे जल की एक बूँद सागर में मिलकर पुनः बूँद नहीं रहती, वैसे ही ओंकार के मार्ग पर चलने वाला साधक जब उस परम तत्व में लीन होता है, तो उसकी वापसी स्थूल जगत के भ्रमों में नहीं होती। यह स्थिति 'अमात्र ओंकार' की वह पूर्णता है, जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है।
द्वितीय पंक्ति में इस परम पद की प्राप्ति की विधि का सूत्र दिया गया है। महर्षि कहते हैं कि इस यात्रा का आरम्भ 'मन' से होता है। मन वह सेतु है जो स्थूल शरीर को सूक्ष्म से जोड़ता है। साधक को सर्वप्रथम अपने मन को उस केंद्र पर 'समाधाय' (स्थिर) करना होता है।
यहाँ 'लिङ्गमानव शरीर' का उल्लेख अत्यंत गूढ़ है। याज्ञवल्क्य स्पष्ट कर रहे हैं कि यह साधना केवल शारीरिक व्यायाम या केवल मानसिक कल्पना नहीं है, बल्कि यह 'सूक्ष्म शरीर' के साथ किया जाने वाला कार्य है। स्थूल शरीर तो केवल एक खोल है; वास्तविक यात्रा उस सूक्ष्म शरीर की होती है जिसमें हमारी चेतना निवास करती है। साधक को अपने भीतर के उस सूक्ष्म स्वरूप (लिङ्ग शरीर) को पहचानना है और उसे मन के माध्यम से एक विशेष दिशा में उन्मुख करना है। यह प्रक्रिया आगामी श्लोकों (२.१३६-१३८) में विस्तार से बताई गई है, जहाँ इस सूक्ष्म शरीर को संकल्पों के साथ हृदय से उठाकर अनंत व्योम में जोड़ने की विधि दी गई है। अतः यह श्लोक उस महान योग-प्रक्रिया की आधारशिला है, जहाँ मन की एकाग्रता के माध्यम से सूक्ष्म शरीर को ऊपर उठाने का संकल्प लिया जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के मिलन का बिंदु है। यहाँ अभ्यास का प्रथम चरण है—मन का समाहित होना। योग में जब तक मन चंचल है, वह सूक्ष्म शरीर को नियंत्रित नहीं कर सकता। इसलिए, सबसे पहले मन को ओंकार की ध्वनि और उसके पीछे छिपे मौन में स्थिर करना होता है।
जब मन स्थिर होता है, तब साधक को अपने 'लिङ्ग शरीर' (सूक्ष्म शरीर) का अनुभव करना होता है। यह अभ्यास साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि वह केवल मांस और अस्थियों का पुंज नहीं है, बल्कि एक सूक्ष्म चेतना है जो इस शरीर के भीतर स्थित है।
साधक यहाँ 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर संक्रमण करता है। मन का समाहित होना 'धारणा' है, और लिङ्ग शरीर का बोध 'ध्यान' की ओर ले जाता है। इस श्लोक का गुप्त अभ्यास यह है कि साधक स्वयं को एक सूक्ष्म स्वरूप के रूप में देखे और उस स्वरूप को ओंकार के मार्ग पर अग्रसर करे। यह वह भूमि है जहाँ से साधक भौतिकता के बंधन को तोड़कर उस 'अमात्र' स्थिति की ओर बढ़ता है, जहाँ से फिर लौटना (संसार में गिरना) संभव नहीं रहता। यह पूर्ण विसर्जन की प्रक्रिया है।
संकल्पं व्यवसायं च अभिमानाख्यसंज्ञकम् ।
चेतनाधिष्ठितं सूक्ष्मं तथा सूक्ष्मैः सहैव तु ॥ २.१३६ ॥
…संकल्प, निश्चय और अभिमान नामवाले, चेतना से अधिष्ठित सूक्ष्म शरीर को सूक्ष्म तत्त्वों सहित (योजयेत्)…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के मार्ग पर चलने वाले साधक की उस अवस्था का वर्णन किया, जहाँ वह 'पञ्चम पद' को प्राप्त कर संसार में निवर्तत नहीं होता। अब इस श्लोक से वे उस सूक्ष्म प्रक्रिया का विवरण दे रहे हैं, जिसके द्वारा साधक अपनी चेतना को स्थूलता से मुक्त कर उस परम पद की ओर ले जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तद्) संकल्पं, व्यवसायं च, अभिमानाख्यसंज्ञकम्, चेतनाधिष्ठितं सूक्ष्मं (शरीरं), तथा सूक्ष्मैः (तत्त्वैः) सहैव तु (योजयेत्)।
पदार्थ:
• संकल्पं: वह मानसिक वृत्ति जो किसी कार्य के करने की इच्छा या कल्पना करती है। योग की दृष्टि से यह मन का वह स्तर है जहाँ विचार बीज रूप में होते हैं।
• व्यवसायं: निश्चय या दृढ़ संकल्प। जब संकल्प परिपक्व होकर एक निश्चित दिशा में अग्रसर होता है, तो वह 'व्यवसाय' कहलाता है। यह बुद्धि का वह गुण है जो लक्ष्य के प्रति एकाग्रता पैदा करता है।
• अभिमानाख्यसंज्ञकम्: अभिमान नामक संज्ञा वाला। यहाँ 'अभिमान' का अर्थ अहंकार या गर्व नहीं, अपितु 'अभिमान' वह बोध है जिससे जीव स्वयं को एक इकाई के रूप में पहचानता है— "मैं यह शरीर हूँ" या "मैं यह साधक हूँ"। यह अस्मिता का बोध है।
• चेतनाधिष्ठितं सूक्ष्मं: चेतना द्वारा अधिष्ठित सूक्ष्म शरीर। वह सूक्ष्म शरीर जो केवल जड़ तत्त्वों से नहीं, अपितु चैतन्य के प्रकाश से प्रकाशित और संचालित है।
• सूक्ष्मैः सहैव: सूक्ष्म तत्त्वों के साथ। इसमें सूक्ष्म वायु, आकाश और अन्य सूक्ष्म ऊर्जाएँ सम्मिलित हैं जो इस सूक्ष्म शरीर का आधार हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य सूक्ष्म शरीर की उस संरचना को उद्घाटित कर रहे हैं, जिसे साधना के माध्यम से ऊपर उठाना है। यह श्लोक पिछले श्लोक (२.१३५) के वाक्य का विस्तार है, जहाँ 'लिङ्गमानव शरीर' का उल्लेख था। यहाँ ऋषि स्पष्ट करते हैं कि वह 'लिङ्ग शरीर' वास्तव में किन तत्त्वों से निर्मित है।
साधक के भीतर जो सूक्ष्म शरीर है, वह तीन मुख्य घटकों से बना है: संकल्प (मन), व्यवसाय (बुद्धि) और अभिमान (अहंकार)। ये तीनों ही चेतना के विभिन्न स्तर हैं। संकल्प विचारों का प्रवाह है, व्यवसाय उन विचारों का निश्चय है, और अभिमान उस निश्चय को धारण करने वाला 'मैं' है। जब तक साधक इन तीनों के जाल में उलझा रहता है, वह स्थूल जगत का बंदी रहता है।
यहाँ 'चेतनाधिष्ठित' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका भाव यह है कि सूक्ष्म शरीर स्वयं प्रकाशमान नहीं है, वह उस शुद्ध चेतना (आत्मा) के कारण ही क्रियाशील है जो उसमें अधिष्ठित है। महर्षि संकेत दे रहे हैं कि साधक को केवल शरीर को नहीं, अपितु उस चेतना को पहचानना है जो संकल्प, व्यवसाय और अभिमान के पीछे छिपी है।
यह वाक्य यहाँ पूर्ण नहीं होता; इसकी क्रिया 'योजयेत्' (जोड़ना/ले जाना) अगले श्लोक (२.१३७) में आती है। अतः इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि साधक अपने संकल्प, निश्चय और अस्मिता के बोध सहित उस चेतना-युक्त सूक्ष्म शरीर को, उसके समस्त सूक्ष्म तत्त्वों के साथ, एक इकाई के रूप में अनुभव करे ताकि उसे हृदय से ऊपर उठाया जा सके।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधना के शरीर' का विश्लेषण है। साधक जब ओंकार की साधना करता है, तो उसे यह अनुभव करना होता है कि वह केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं है, बल्कि एक सूक्ष्म ऊर्जा-पुंज है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक अपनी जागरूकता को संकल्पों (विचारों), व्यवसाय (निश्चय) और अभिमान (स्व-बोध) पर ले जाए। वह देखे कि कैसे उसका मन संकल्प करता है, कैसे उसकी बुद्धि उसे निश्चय में बदलती है और कैसे उसका अहंकार उसे 'कर्ता' मानता है। जब साधक इन तीनों को 'चेतनाधिष्ठित' रूप में देखता है, तब वह इन वृत्तियों से अलग होकर उनका साक्षी बन जाता है।
यह प्रक्रिया साधक को 'स्थूल भूमि' से 'सूक्ष्म भूमि' की ओर ले जाती है। जब तक संकल्प और अभिमान बिखरे हुए हैं, चेतना बंटी हुई है। लेकिन जब इन तीनों को एक साथ (सहैव) अनुभव कर उन्हें ओंकार के केंद्र में लाया जाता है, तब सूक्ष्म शरीर एक बिंदु में सिमट जाता है। यही वह स्थिति है जहाँ से सूक्ष्म शरीर का उत्थान संभव होता है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसका संपूर्ण व्यक्तित्व—उसकी इच्छाएँ, उसका ज्ञान और उसका अस्तित्व—सब उस एक परम चेतना के अधीन हैं।
ओंकारपद्मनालेन हृद उध्दृत्य योजयेत् ।
परमे व्योम्न्यनन्ताख्ये सर्वसङ्कल्पवर्जिते ॥ २.१३७ ॥
…ओंकाररूपी कमलनालके द्वारा हृदयसे ऊपर निकालकर, सब संकल्पों से रहित 'अनन्ता' नामक परम व्योम में जोड़े…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस सूक्ष्म शरीर और उसकी चेतना का वर्णन किया जिसे साधक को साधना है। अब इस श्लोक में वे उस प्रक्रिया का निर्देश दे रहे हैं कि उस चेतना को हृदय के सीमित क्षेत्र से उठाकर किस माध्यम से और कहाँ स्थापित करना है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (लिङ्गमानव शरीरं) ओंकार-पद्म-नालेन हृदः उध्दृत्य, सर्व-सङ्कल्प-वर्जिते परमे व्योम्न्यनन्ताख्ये योजयेत्।
पदार्थ:
• ओंकार-पद्म-नाल: ओंकाररूपी कमल की नाल। यहाँ 'पद्म' हृदय की स्थिति का प्रतीक है और 'नाल' उस सूक्ष्म ऊर्जा-मार्ग का, जो शब्द-ब्रह्म (ओंकार) के माध्यम से ऊपर की ओर जाता है।
• हृदः उध्दृत्य: हृदय से ऊपर उठाकर। हृदय वह स्थान है जहाँ प्राण और मन का वास है; यहाँ से 'उध्दृत्य' का अर्थ है चेतना को स्थूल और मानसिक बंधनों से मुक्त कर ऊपर की ओर ले जाना।
• परमे व्योम्न्यनन्ताख्ये: 'अनन्त' नामक परम व्योम में। व्योम का अर्थ आकाश है, और 'परम व्योम' वह शुद्ध चैतन्य आकाश है जो समस्त सीमाओं से परे है। 'अनन्त' वह अवस्था है जहाँ न आदि है, न अन्त।
• सर्व-सङ्कल्प-वर्जिते: समस्त संकल्पों से रहित। जहाँ कोई विचार, इच्छा या मानसिक निर्माण शेष न रहे।
• योजयेत्: जोड़ना चाहिए या विलीन करना चाहिए।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधना की उस उच्चतम क्रिया को बता रहे हैं, जिसे 'उर्ध्वगमन' कहा जाता है। यह वाक्य पिछले श्लोक (२.१३५-१३६) से शुरू होकर यहाँ पूर्ण होता है, जहाँ साधक अपने सूक्ष्म शरीर (लिङ्गशरीर) को, जिसमें संकल्प, निश्चय और अभिमान निहित हैं, हृदय से उठाकर परम व्योम में जोड़ता है।
यहाँ 'ओंकार-पद्म-नाल' का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। हृदय को कमल माना गया है और ओंकार को वह नाल (तंतु), जो इस कमल को उसके मूल स्रोत से जोड़ती है। जिस प्रकार कमल की नाल जल के भीतर से ऊपर की ओर बढ़ती है, उसी प्रकार साधक ओंकार के नाद और उसकी शक्ति के सहारे अपनी चेतना को हृदय-कमल से ऊपर खींचता है। यह बाहरी क्रिया नहीं, अपितु एक आन्तरिक आरोहण है।
साधक जब ओंकार के साथ एकाकार होता है, तब वह अपनी समस्त मानसिक वृत्तियों—संकल्प, व्यवसाय और अभिमान—को उसी ओंकार-नाल के माध्यम से ऊपर ले जाता है। लक्ष्य है 'अनन्ताख्य परम व्योम'। यह वह शून्य या पूर्ण आकाश है जहाँ पहुँचकर 'मैं' का बोध समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। 'सर्व-सङ्कल्प-वर्जिते' का अर्थ है कि जब तक मन में यह संकल्प है कि "मैं साधना कर रहा हूँ" या "मुझे ब्रह्म प्राप्त करना है", तब तक वह परम व्योम नहीं है। जब यह अंतिम संकल्प भी विलीन हो जाता है, तब साधक वास्तव में उस अनन्त में जुड़ जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ २.२.४ ॥
प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। सावधान होकर (उसे) बेधना चाहिए, और बाणकी भाँति (लक्ष्यमें) तन्मय हो जाना चाहिए।
मुण्डक उपनिषद् में कहा गया है कि प्रणव (ओंकार) धनुष है और आत्मा बाण है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में इसी प्रक्रिया को 'नाल' के रूप में देखा गया है। जहाँ मुण्डक उपनिषद् लक्ष्य को बेधने की बात करता है, वहीं यह स्मृति उस लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग (नाल) और हृदय से चेतना के उत्थान की विधि को स्पष्ट करती है। दोनों ही ग्रन्थों का मत एक है कि ओंकार ही वह साधन है जिसके माध्यम से आत्मा अपने मूल ब्रह्म-स्वरूप में विलीन होती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'लय-योग' की एक सूक्ष्म विधि है। अभ्यास यह है कि साधक हृदय-स्थान पर ध्यान केंद्रित करे और वहाँ ओंकार के नाद का अनुभव करे। जैसे-जैसे ओंकार का जप गहरा होता है, एक सूक्ष्म ऊर्जा-धारा (नाल) का अनुभव होता है जो हृदय से ऊपर की ओर खिंचती है।
साधक को अनुभव करना है कि उसका मन, उसकी बुद्धि और उसका अहंकार—जो अब तक हृदय में सीमित थे—उस ओंकार-नाल के सहारे ऊपर की ओर प्रवाहित हो रहे हैं। जैसे ही यह चेतना हृदय की परिधि को छोड़कर 'परम व्योम' (अनन्त आकाश) में पहुँचती है, वहाँ सारे संकल्प स्वतः गिर जाते हैं। यह अभ्यास साधक को 'साधक' भाव से मुक्त कर 'साध्य' (ब्रह्म) में विलीन करता है। यहाँ हृदय से ऊपर उठने का अर्थ है—स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर और सूक्ष्मता से अक्षर (अविनाशी) की ओर बढ़ना।
तस्मिंस्तावन्निरोद्धव्यं मनश्चोंकारमेव च ।
यावन्निर्मलतां याति एष योग उदाहृतः ॥ २.१३८ ॥
…उस अनन्ता नामक परम व्योम में, वहाँ मन और ओंकार को तब तक रोके रखना चाहिए जब तक कि वह निर्मलता को प्राप्त न कर ले, यह योग कहा गया है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने निर्देश दिया कि साधक अपने संकल्प और अभिमान युक्त सूक्ष्म शरीर को ओंकाररूपी कमलनाल के द्वारा हृदय से उठाकर 'अनन्त' नामक परम व्योम में विलीन करे। वर्तमान श्लोक उसी प्रक्रिया की परिणति और योग की वास्तविक परिभाषा को स्पष्ट करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तस्मिन् (परमे व्योम्न्यनन्ताख्ये) तावत् मनः च ओंकारम् एव च निरोद्धव्यम्, यावत् (तद्) निर्मलतां याति; एष योगः उदाहृतः।
पदार्थ:
• तस्मिन्: उस (परम व्योम/अनन्ताख्ये) में।
• तावत्: तब तक।
• निरोद्धव्यम्: रोके रखना चाहिए या स्थिर करना चाहिए। यहाँ 'निरोध' का अर्थ केवल दबाना नहीं, अपितु एक बिंदु पर स्थिर कर देना है।
• मनः च ओंकारम् एव च: मन और ओंकार दोनों को।
• यावत्: जब तक।
• निर्मलतां याति: निर्मलता को प्राप्त न कर ले। निर्मलता का अर्थ है—विकारों, संकल्पों और द्वैत के मैल का पूरी तरह समाप्त हो जाना।
• एष योगः उदाहृतः: यही योग कहा गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य योग की एक अत्यंत सूक्ष्म और प्रयोगात्मक परिभाषा दे रहे हैं। यह श्लोक पिछले श्लोक (२.१३७) की क्रिया का उपसंहार है। पिछले श्लोक में चेतना को हृदय से उठाकर परम व्योम में 'जोड़ने' (योजयेत्) की बात थी; यहाँ उस जोड़ के बाद की स्थिति का वर्णन है।
ऋषि कहते हैं कि जब साधक अपने सूक्ष्म शरीर और चेतना को उस अनन्त आकाश (परम व्योम) में स्थापित कर दे, तो वहाँ 'मन' और 'ओंकार' दोनों को तब तक स्थिर (निरुद्ध) रखना चाहिए जब तक कि वे पूर्णतः निर्मल न हो जाएँ।
यहाँ एक गहरा रहस्य है—साधक जब ओंकार के साथ ऊपर उठता है, तब वह ओंकार अभी भी एक 'साधन' या 'शब्द' के रूप में उसके साथ होता है और मन एक 'द्रष्टा' के रूप में। जब तक मन में सूक्ष्म संकल्प शेष हैं और ओंकार का उच्चारण (चाहे वह मानसिक ही क्यों न हो) एक ध्वनि के रूप में है, तब तक पूर्ण शुद्धि नहीं हुई है। 'निर्मलता' वह अवस्था है जहाँ मन और ओंकार के बीच का भेद समाप्त हो जाता है। जब मन स्वयं ओंकार हो जाता है और ओंकार उस परम व्योम की निःशब्दता में विलीन हो जाता है, तब वह 'निर्मल' कहलाता है।
महर्षि स्पष्ट करते हैं कि इसी स्थिति को 'योग' कहा गया है। सामान्यतः योग को केवल आसन या प्राणायाम समझा जाता है, किंतु याज्ञवल्क्य के लिए योग वह 'निरोध' है जो मन और शब्द-ब्रह्म को परम चैतन्य के आकाश में विलीन कर उन्हें मल-रहित (निर्मल) कर देता है। यह वह बिंदु है जहाँ साधक 'साधन' से 'साध्य' की ओर बढ़ता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'धारणा' से 'समाधि' की ओर संक्रमण का मार्ग है। अभ्यास यह है कि हृदय से उठी हुई चेतना को जब अनन्त व्योम में स्थापित किया जाए, तो वहाँ मन को विचलित न होने दें।
यहाँ 'निरोध' का अभ्यास दो स्तरों पर होता है:
१. मन का निरोध: बाहरी विषयों और आंतरिक संकल्पों का पूर्ण ठहराव।
२. ओंकार का निरोध: उच्चारित या मानसिक ओंकार का उस 'अमात्र' अवस्था में ठहर जाना, जहाँ ध्वनि समाप्त हो जाती है और केवल उसका प्रभाव (अनुगूँज) शेष रहता है।
जब मन और ओंकार दोनों इस परम शून्य (व्योम) में स्थिर होते हैं, तब साधक अनुभव करता है कि वह स्वयं एक शुद्ध, निर्मल प्रकाश पुंज है। यह 'निर्मलता' ही वह भूमि है जहाँ से साधक उस पञ्चम पद की ओर प्रस्थान करता है, जिसका उल्लेख श्लोक २.१३४ में किया गया था। इस अभ्यास से साधक स्थूल मन की सीमाओं को तोड़कर उस अवस्था में जाता है जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। यही वह योग है जो साधक को 'अहं' से 'ब्रह्म' की ओर ले जाता है।
मनो युञ्ज्यात्तथोंकारे ओंकारं प्रणवे तथा ।
प्रणवं ब्रह्मणि स्थाप्य न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ २.१३९ ॥
…मन को ओंकार में जोड़े, ओंकार को प्रणव में तथा प्रणव को ब्रह्म में स्थापित करके कुछ भी चिन्तन न करे…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन और ओंकार को 'अनन्त' नामक परम व्योम में तब तक रोकने का निर्देश दिया, जब तक वे पूर्ण निर्मलता को प्राप्त न कर लें और इसे ही 'योग' की संज्ञा दी। वर्तमान श्लोक उस निर्मलता के बाद की सूक्ष्मतर अवस्था और लय-क्रम का विवरण देता है, जहाँ साधक शब्द और विचार से परे परम तत्त्व में विलीन होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधकः) मनः तथा ओंकारे युञ्ज्यात्, ओंकारं प्रणवे तथा (युञ्ज्यात्), प्रणवं ब्रह्मणि स्थाप्य न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।
पदार्थ:
• मनो युञ्ज्यात्: मन को जोड़े या एकाग्र करे। 'युज्' धातु का अर्थ है जोड़ना या समाहित करना।
• तथोंकारे: उसी ओंकार में। यहाँ 'तथा' पिछले श्लोक के उस ओंकार की ओर संकेत है जो परम व्योम में स्थित है।
• ओंकारं प्रणवे: ओंकार को प्रणव में। यहाँ ओंकार और प्रणव के बीच एक सूक्ष्म भेद है—ओंकार वह है जो अभी भी ध्वनि या मात्राओं के बोध में है, जबकि प्रणव वह निःशब्द अवस्था है जो केवल अनुभव होती है।
• प्रणवं ब्रह्मणि स्थाप्य: प्रणव को ब्रह्म में स्थापित करके।
• न किञ्चिदपि चिन्तयेत्: फिर किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे। यह पूर्ण शून्य या निर्विचार अवस्था का संकेत है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधना की उस चरम सीमा को दर्शाता है जहाँ साधक 'साधन' को 'साध्य' में विलीन कर देता है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य एक क्रमिक लय-प्रक्रिया बता रहे हैं।
प्रथम सोपान है—मन का ओंकार में लय। मन चंचल है, वह संकल्पों का पुंज है। जब साधक मन को ओंकार (ध्वनि-रूप या मात्रा-रूप) में जोड़ता है, तो मन की चंचलता समाप्त होकर वह एक बिंदु पर केंद्रित हो जाता है। यहाँ मन, ओंकार के अधीन हो जाता है।
द्वितीय सोपान है—ओंकार का प्रणव में लय। ओंकार जब तक उच्चारित या मानसिक रूप से 'अ-उ-म' के बोध में है, तब तक वह एक 'नाम' या 'रूप' है। जब यह ओंकार अपनी समस्त मात्राओं को त्यागकर उस निःशब्द, शुद्ध चेतना में बदल जाता है, तब वह 'प्रणव' कहलाता है। भाव यह है कि शब्द-मय ओंकार का लय अब अमात्र-प्रणव में हो रहा है।
तृतीय सोपान है—प्रणव का ब्रह्म में लय। प्रणव वह सेतु है जो जीव को ब्रह्म से जोड़ता है। जब साधक इस शुद्ध प्रणव को भी ब्रह्म (परम तत्त्व) में स्थापित कर देता है, तब सेतु का कार्य समाप्त हो जाता है और साधक स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है।
अन्तिम अवस्था है—'न किञ्चिदपि चिन्तयेत्'। जब मन, ओंकार और प्रणव तीनों का लय ब्रह्म में हो गया, तब वहाँ चिन्तन करने वाला कोई शेष नहीं रहता। चिन्तन के लिए 'द्वैत' (चिन्तन करने वाला और जिसका चिन्तन किया जाए) की आवश्यकता होती है। जब साधक स्वयं ब्रह्म हो गया, तब चिन्तन का लोप हो जाता है। यह वह अवस्था है जहाँ केवल 'होना' शेष रहता है, 'सोचना' नहीं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'लय-योग' का उच्चतम अभ्यास है। यहाँ तीन स्तरों पर विसर्जन का अनुभव होता है:
१. मन → ओंकार: यह एकाग्रता की भूमि है। यहाँ साधक अपने बिखरे हुए चित्त को ओंकार की ध्वनि में समेटता है।
२. ओंकार → प्रणव: यह ध्यान की भूमि है। यहाँ ध्वनि का बोध समाप्त होता है और केवल एक स्पंदन या शुद्ध ऊर्जा का अनुभव होता है। यह स्थूल से सूक्ष्म की ओर गमन है।
३. प्रणव → ब्रह्म: यह समाधि की भूमि है। यहाँ सूक्ष्म बोध भी विलीन हो जाता है और केवल 'अक्षर' (अविनाशी) शेष रहता है।
अभ्यास यह है कि साधक पहले मन को ओंकार में स्थिर करे, फिर उस ओंकार को निःशब्द प्रणव में बदले और अंततः उस प्रणव को ब्रह्म के महासागर में विसर्जित कर दे। जब 'न किञ्चिदपि चिन्तयेत्' की स्थिति आती है, तब साधक विचार-शून्य होकर उस परम शांति का अनुभव करता है, जहाँ न कोई प्रश्न है, न कोई उत्तर, केवल शुद्ध चैतन्य है। यह वह बिंदु है जहाँ से साधक 'अमात्र ओंकार' के उस रहस्य में प्रवेश करता है जिसका वर्णन महर्षि ने पूर्व में किया है।
प्रणवमाहात्म्यम्
प्रणवो विमलः शुद्धो निःशब्दो व्योमसंज्ञकः ।
तस्मादुत्पद्यते प्राणः पुनस्तत्रैव लीयते ॥ २.१४० ॥
प्रणव निर्मल, शुद्ध, निःशब्द और व्योमसंज्ञक है, उस (प्रणव) से प्राण उत्पन्न होता है और फिर उसी में लीन हो जाता है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन को ओंकार में, ओंकार को प्रणव में और प्रणव को ब्रह्म में स्थापित कर निर्विचार अवस्था में स्थित होने की विधि बताई। वर्तमान श्लोक उस 'निःशब्द प्रणव' के स्वरूप का उद्घाटन करता है और यह स्पष्ट करता है कि जीवन का मूल आधार—प्राण—इसी परम ध्वनि से उत्पन्न होकर अंततः उसी में विलीन होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: प्रणवः विमलः शुद्धः निःशब्दः व्योमसंज्ञकः (अस्ति)। तस्मात् प्राणः उत्पद्यते, पुनः तत्रैव (प्रणवे) लीयते।
पदार्थ:
• प्रणवो विमलः शुद्धो: प्रणव वह है जो विमल (मल-रहित) और शुद्ध (पवित्र/अमिश्रित) है। यहाँ विमल का अर्थ है—किसी भी मानसिक विकार या संकल्प के प्रभाव से रहित।
• निःशब्दो: बिना किसी श्रव्य ध्वनि के। यह वह अवस्था है जहाँ 'ओम्' का उच्चारण समाप्त हो जाता है और केवल उसका 'अनुभव' शेष रहता है।
• व्योमसंज्ञकः: जिसे 'व्योम' (आकाश) की संज्ञा दी गई है। यहाँ व्योम का अर्थ भौतिक आकाश नहीं, अपितु वह अनंत चेतना-आकाश है जिसमें समस्त ब्रह्मांड और विचार समाहित हैं।
• तस्मादुत्पद्यते प्राणः: उस निःशब्द प्रणव से ही प्राण की उत्पत्ति होती है।
• पुनस्तत्रैव लीयते: और पुनः उसी (प्रणव) में वह लीन हो जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को शब्द-जगत से ऊपर उठाकर शून्य और पूर्ण के मिलन बिंदु पर ले जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ प्रणव के उस स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जो मात्राओं और ध्वनियों से परे है।
जब साधक पिछले श्लोकों की विधि से मन और ओंकार को 'अनन्त' व्योम में विलीन कर देता है, तब उसे यह अनुभव होता है कि प्रणव केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु एक 'अवस्था' है। यह अवस्था विमल और शुद्ध है, क्योंकि यहाँ पहुँचकर साधक के सभी संस्कार और वासनाएँ भस्म हो चुकी होती हैं। यह निःशब्द है; जिस प्रकार गहन निद्रा में या समाधि में कोई शब्द नहीं होता, फिर भी बोध बना रहता है, उसी प्रकार यह प्रणव श्रवण-इन्द्रिय से नहीं, अपितु आत्म-इन्द्रिय से सुना जाता है।
इसे व्योमसंज्ञक कहा गया है क्योंकि यह अनंत है, सर्वव्यापी है और इसमें कोई सीमा नहीं है। जिस प्रकार आकाश में सब कुछ स्थित है पर आकाश किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही यह निःशब्द प्रणव समस्त सृष्टि का आधार होते हुए भी निर्लिप्त है।
इस श्लोक का सबसे गहरा रहस्य यह है कि "तस्मादुत्पद्यते प्राणः"—अर्थात प्राण की उत्पत्ति इसी निःशब्द नाद से होती है। यह केवल सृष्टि-उत्पत्ति की बात नहीं है, बल्कि प्रत्येक श्वास की प्रक्रिया का रहस्य है। प्रत्येक प्राण-वायु जब शरीर में प्रवेश करती है, तो वह उसी परम शून्य (प्रणव) से आती है और जब बाहर निकलती है, तो उसी में विलीन हो जाती है। जीवन और मृत्यु, तथा श्वास का आना और जाना, वास्तव में प्रणव से विलग होना और पुनः उसमें समाहित होना ही है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'प्राण-प्रणव' के अभेद का अभ्यास है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने श्वास (प्राण) के आने और जाने के बीच के उस सूक्ष्म अंतराल को पकड़े, जहाँ ध्वनि समाप्त हो जाती है और केवल एक शून्य जैसा अनुभव होता है।
साधक अनुभव करता है कि श्वास केवल वायु का आवागमन नहीं है, बल्कि निःशब्द प्रणव की एक लहर है। जब श्वास भीतर आता है, तो वह उस 'व्योम' से आता है, और जब बाहर जाता है, तो उसी में लीन हो जाता है। इस अभ्यास से साधक 'प्राण' को 'प्रणव' के रूप में देखना शुरू करता है।
यह स्थिति साधक को उस भूमि पर ले जाती है जहाँ वह स्वयं को शरीर या मन नहीं, बल्कि उस निःशब्द व्योम का एक अंश अनुभव करता है। जब श्वास के आने-जाने में प्रणव का दर्शन होने लगता है, तब साधक के भीतर का भय समाप्त हो जाता है, क्योंकि वह जान लेता है कि उसका मूल स्रोत वह अविनाशी, निर्मल और शुद्ध प्रणव है। यह अभ्यास साधक को स्थूल प्राण से उठाकर सूक्ष्म चेतना और अंततः अक्षर-ब्रह्म की ओर अग्रसर करता है।
प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ।
दुःखे भयाभिघातार्थे सर्वथा प्रणवं स्मरेत् ॥ २.१४१ ॥
…प्रणव में नित्ययुक्त रहने वाले को कहीं भी भय विद्यमान नहीं होता, दुःख में और भय के आघात को दूर करने के लिए सब प्रकार से प्रणव का स्मरण करे…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के निःशब्द और व्योम रूप का वर्णन करते हुए यह बताया कि प्राण की उत्पत्ति और लय इसी परम ध्वनि में होती है। वर्तमान श्लोक उस स्थिति के व्यावहारिक फल और संकट काल में प्रणव की उपयोगिता का प्रतिपादन करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं क्वचित् विद्यते। दुःखे (तथा) भयाभिघातार्थे सर्वथा प्रणवं स्मरेत्।
पदार्थ:
• प्रणवे नित्ययुक्तस्य: जो निरंतर प्रणव (ओंकार के निःशब्द स्वरूप) में स्थित है, जिसका चित्त उस परम ध्वनि से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा है।
• न भयं विद्यते क्वचित्: उसे कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में भय का अनुभव नहीं होता। 'क्वचित्' शब्द यहाँ स्थान और समय दोनों की व्यापकता को दर्शाता है।
• दुःखे: शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कष्ट की अवस्था में।
• भयाभिघातार्थे: 'भय' और 'अभिघात' (आघात/प्रहार) के योग से बना शब्द। जब भय का आघात मन पर होता है या बाहरी संकटों का प्रहार होता है, तब उस प्रभाव को दूर करने के लिए।
• सर्वथा प्रणवं स्मरेत्: सब प्रकार से—चाहे वह वैखरी (उच्चारित), मध्यमा (मानसिक) हो या पश्यन्ती (अनुभूत)—प्रणव का स्मरण करे।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को अभयता के मार्ग पर ले जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि प्रणव केवल एक साधना का साधन नहीं, अपितु एक सुरक्षा-कवच है।
जब साधक 'नित्ययुक्त' होता है, तो उसका अर्थ यह नहीं है कि वह केवल जप करता है, अपितु वह उस अवस्था में स्थित हो जाता है जहाँ वह स्वयं को उस 'निःशब्द व्योम' का अंश अनुभव करने लगता है। भय तब उत्पन्न होता है जब 'मैं' (अहंकार) और 'पर' (बाहरी जगत) के बीच द्वैत होता है और साधक स्वयं को असहाय अनुभव करता है। किन्तु जो प्रणव में स्थित है, वह उस अनंत सत्ता में लीन है, और अनंत में भय का कोई स्थान नहीं होता। अतः उसे 'क्वचित्' अर्थात् कहीं भी भय नहीं सताता।
श्लोक का दूसरा भाग उन लोगों के लिए है जो अभी पूर्णतः स्थित नहीं हुए हैं, किन्तु साधना के पथ पर हैं। जीवन में जब दुःख आता है या भय का अचानक आघात (अभिघात) होता है, तब चित्त विचलित होकर बिखरने लगता है। ऐसी स्थिति में 'सर्वथा प्रणवं स्मरेत्' का निर्देश है। यहाँ 'सर्वथा' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका भाव यह है कि यदि उच्चारित जप संभव हो तो वह करें, यदि संभव न हो तो मन में ओंकार की ध्वनि को गूँजते हुए अनुभव करें, और यदि वह भी कठिन हो तो केवल उस 'शून्य' या 'अक्षर' के भाव को पकड़ लें।
दुःख और भय के समय प्रणव का स्मरण करने का अर्थ है—अपनी चेतना को बाहरी प्रहार से हटाकर पुनः उस केंद्र (हृदय-आकाश) की ओर मोड़ना जहाँ प्राण का मूल निवास है। यह स्मरण साधक को पुनः उस स्थिरता की ओर ले जाता है, जहाँ से वह संकट को एक साक्षी की भाँति देख सके।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अभय-मुद्रा' की आंतरिक स्थिति है। योग का लक्ष्य केवल समाधि नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों के बीच भी अविचलित रहना है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक संकट के क्षणों में अपनी पूरी जागरूकता को 'ओं' की ध्वनि या उसके निःशब्द अनुभव पर केंद्रित करे। जब भय का आघात होता है, तो प्राण उच्छ्वास के साथ ऊपर की ओर भागता है और मन अस्थिर होता है। उस समय प्रणव का स्मरण करने से प्राण पुनः अपने मूल स्रोत (प्रणव-व्योम) की ओर खिंचता है।
यह अभ्यास साधक को 'भय-भूमि' से उठाकर 'स्थितप्रज्ञ-भूमि' की ओर ले जाता है। जो साधक इस अभ्यास को निरंतर करता है, उसके लिए प्रणव एक मानसिक आश्रय बन जाता है। वह अनुभव करता है कि बाहरी जगत की कोई भी हलचल उस आंतरिक निःशब्द ध्वनि को विचलित नहीं कर सकती। इस प्रकार, प्रणव का स्मरण केवल एक मानसिक क्रिया नहीं, बल्कि अपनी चेतना को स्थूल जगत से हटाकर सूक्ष्म अक्षर में स्थापित करने का एक त्वरित साधन है।
प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः ।
प्रणवो ह्यादिः सर्गस्य अन्तो मध्यस्तथैव च ॥ २.१४२ ॥
प्रणव ही अपर ब्रह्म है और प्रणव ही पर (ब्रह्म) कहा गया है; प्रणव ही सृष्टिका आदि, मध्य और अन्त है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के निःशब्द और व्योम रूप का वर्णन करते हुए यह बताया कि प्राण की उत्पत्ति और लय इसी परम ध्वनि में होती है और इसमें स्थित पुरुष अभय हो जाता है। अब इस श्लोक में ऋषि प्रणव के उस तात्विक स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जो उसे केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु सम्पूर्ण अस्तित्व का आधार और ब्रह्म का साक्षात् स्वरूप सिद्ध करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म (अस्ति), प्रणवश्च परः स्मृतः। प्रणवो ह्यादिः सर्गस्य, अन्तो मध्यस्तथैव च (अस्ति)।
पदार्थ:
• प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म: 'हि' यहाँ कारणवाचक है। प्रणव ही अपर ब्रह्म है। 'अपर ब्रह्म' वह है जो सृष्टि के रूप में अभिव्यक्त है, जो माया के साथ संयुक्त होकर ईश्वर रूप में जगत का संचालन करता है।
• प्रणवश्च परः स्मृतः: और प्रणव ही 'पर ब्रह्म' कहा गया है। 'पर ब्रह्म' वह निर्गुण, निराकार और निराश्रय तत्त्व है, जो समस्त अभिव्यक्तियों से परे, शुद्ध चैतन्य स्वरूप है।
• आदिः सर्गस्य: सृष्टि (सर्ग) का आरम्भ या मूल कारण।
• अन्तो मध्यस्तथैव च: उसी प्रकार वह सृष्टि का मध्य (धरण करने वाला) और अन्त (लय का स्थान) भी है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्रणव की उस व्यापकता को प्रकट करता है जहाँ वह साधन और साध्य के भेद को मिटा देता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ प्रणव को 'पर' और 'अपर' दोनों ब्रह्मों का समन्वय बता रहे हैं।
जब हम प्रणव को 'अपर ब्रह्म' कहते हैं, तो इसका अर्थ है कि यह वह बीज है जिससे सम्पूर्ण दृश्य जगत उत्पन्न हुआ है। जिस प्रकार एक बीज में वृक्ष की सम्पूर्ण संभावनाएँ छिपी होती हैं, उसी प्रकार ओंकार की मात्राओं (अ, उ, म) में सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार समाहित है। यह वह ईश्वर है जो सगुण है, जो सृष्टि की रचना करता है और उसका पालन करता है।
वहीं, जब ऋषि कहते हैं कि 'प्रणव ही पर ब्रह्म है', तो वे साधक को उस बिंदु पर ले जाते हैं जहाँ ध्वनि भी शांत हो जाती है। यह 'अमात्र' स्थिति है, जहाँ कोई मात्रा नहीं, कोई भेद नहीं, केवल शुद्ध अस्तित्व है। पर ब्रह्म वह है जिसे जाना नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है। प्रणव वह सेतु है जो साधक को 'अपर' (सगुण/व्यक्त) से 'पर' (निर्गुण/अव्यक्त) की ओर ले जाता है।
सृष्टि के सन्दर्भ में प्रणव की भूमिका त्रिकालातीत है। 'आदि' होने का अर्थ है कि प्रथम स्पन्दन ओंकार ही था। 'मध्य' होने का अर्थ है कि यह सम्पूर्ण जगत इसी ध्वनि के कंपन पर टिका हुआ है; यदि यह आधार हट जाए, तो सृष्टि विलीन हो जाए। और 'अन्त' होने का अर्थ है कि प्रलय काल में सब कुछ पुनः इसी शून्य-ध्वनि में लीन हो जाता है। अतः प्रणव केवल एक शब्द नहीं, अपितु वह शाश्वत सत्ता है जो जन्म, जीवन और मृत्यु के चक्र को अपने भीतर समेटे हुए है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ ५.२ ॥
सत्यकाम! यह ओंकार ही पर और अपर ब्रह्म है; इसलिए जाननेवाला इसी आश्रयसे (इन दोनोंमेंसे) किसी एकको प्राप्त होता है।
प्रश्न उपनिषद् में भी यही सत्य उद्घोषित है कि ओंकार ही पर और अपर ब्रह्म है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और प्रश्न उपनिषद् यहाँ पूर्णतः एकमत हैं कि प्रणव वह एकमात्र 'आयतन' या आश्रय है, जिसके माध्यम से साधक अपनी रुचि और पात्रता के अनुसार या तो सगुण ईश्वर (अपर ब्रह्म) को प्राप्त करता है या फिर पूर्णतः निराकार परब्रह्म में विलीन हो जाता है। यह स्मृति इस विचार को और विस्तार देती है कि प्रणव ही सृष्टि का आदि, मध्य और अन्त है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्म केवल सृष्टि से पूर्व या बाद में नहीं, अपितु सृष्टि के हर क्षण में विद्यमान है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'समन्वय' का अभ्यास है। योगिक दृष्टि से, जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह पहले 'अपर ब्रह्म' के स्तर पर होता है—जहाँ ध्वनि है, लय है और एक मानसिक संरचना है। वह अनुभव करता है कि उसका अस्तित्व इस ब्रह्मांडीय ध्वनि का हिस्सा है।
जैसे-जैसे अभ्यास गहरा होता है, वह ध्वनि के पीछे के 'मौन' को पकड़ने लगता है। वह 'पर ब्रह्म' की भूमि में प्रवेश करता है, जहाँ जप समाप्त हो जाता है और केवल 'होना' शेष रहता है। साधक अनुभव करता है कि वह स्वयं ही वह आदि, मध्य और अन्त है। इस स्थिति में वह समय (काल) के बंधन से मुक्त हो जाता है, क्योंकि वह उस तत्त्व में स्थित हो गया है जो सृष्टि के आरम्भ से पहले था और अन्त के बाद भी रहेगा। यह अभ्यास साधक को 'व्युत्थान' (जागृति) की उस अवस्था में ले जाता है जहाँ वह स्वयं को केवल एक शरीर नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्पन्दन अनुभव करता है।
एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा विशन्ति ब्रह्म निष्कलम् ।
अपूर्वोऽनन्तारोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥ २.१४३ ॥
इस प्रकार प्रणव को जानकर वे निष्कल ब्रह्म में प्रवेश करते, वह प्रणव अपूर्व, अनन्तर, अबाह्य, अनपर और अव्यय है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव को सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त के रूप में स्थापित किया। अब इस श्लोक में वे उस परम उपलब्धि का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ प्रणव केवल सृष्टि का कारण न रहकर, साधक के लिए उस 'निष्कल' ब्रह्म में प्रवेश का द्वार बन जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा (ते) निष्कलं ब्रह्म (विशन्ति)। प्रणवः अपूर्वः, अनन्तारः, अबाह्यः, अनपरः, अव्ययः (अस्ति)।
पदार्थ:
• ज्ञात्वा — केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान (साक्षात्कार)।
• निष्कल ब्रह्म — वह ब्रह्म जो 'कल' (अंश, भाग या विकार) से रहित है; अखंड और अविभाज्य।
• अपूर्वः — जिसका कोई पूर्व न हो; जो आदि-रहित है।
• अनन्तारः — जिसका कोई अन्त न हो; जो अनंत है।
• अबाह्यः — जो बाहर नहीं है; जो सर्वत्र भीतर ही व्याप्त है।
• अनपरः — जो 'पर' (दूसरा) नहीं है; जो अद्वैत है।
• अव्ययः — जिसका कभी क्षय न हो; जो अविनाशी और अपरिवर्तनीय है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस अंतिम अवस्था का संकेत दे रहे हैं जहाँ साधन (प्रणव) और साध्य (ब्रह्म) एक हो जाते हैं। वे कहते हैं कि इस प्रकार प्रणव के वास्तविक स्वरूप को जानकर—अर्थात् जब साधक ओंकार की ध्वनि से ऊपर उठकर उसके निःशब्द और अमात्र स्वरूप में स्थित हो जाता है—तब वह 'निष्कल ब्रह्म' में प्रवेश करता है।
'निष्कल' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः हम जगत को कल-युक्त (खंडित) देखते हैं—यहाँ देह, वहाँ मन, वहाँ ईश्वर। किन्तु जब प्रणव का ज्ञान पूर्ण होता है, तब साधक अनुभव करता है कि वह जिसे 'बाहर' खोज रहा था, वह वास्तव में खंड-विखंड से रहित एक अखंड सत्ता है। यह प्रवेश किसी भौगोलिक स्थान में जाना नहीं, अपितु अपनी ही सीमित पहचान को मिटाकर उस विराट अखंडता में विलीन हो जाना है।
इस ब्रह्म के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए ऋषि पाँच विशेषणों का प्रयोग करते हैं:
प्रथम, वह 'अपूर्व' है। इसका अर्थ है कि वह किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुआ, अतः उसका कोई 'पूर्व' नहीं है। वह स्वयं-प्रकाशित है।
द्वितीय, वह 'अनन्तार' है। वह समय और स्थान की सीमाओं से परे है, इसलिए उसका कोई अंत या सीमा नहीं है।
तृतीय, वह 'अबाह्य' है। यह साधक के लिए सबसे बड़ा रहस्य है—ब्रह्म कहीं बाहर आकाश में या किसी अन्य लोक में नहीं है, वह 'अबाह्य' है, अर्थात् वह हृदय के भीतर ही स्थित है।
चतुर्थ, वह 'अनपर' है। 'पर' का अर्थ होता है दूसरा। वह अद्वैत है; उसके अतिरिक्त कोई दूसरी सत्ता नहीं है। जो 'अनपर' है, वही सत्य है।
पंचम, वह 'अव्यय' है। संसार की हर वस्तु व्यय होती है, नष्ट होती है, किन्तु वह प्रणव-स्वरूप ब्रह्म अविनाशी है।
अतः यहाँ प्रणव केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु उस अविनाशी, अद्वैत और अखंड ब्रह्म का ही नाम है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रारहित चौथा है — व्यवहारसे परे, प्रपञ्चका उपशम, शिव, अद्वैत। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है; जो ऐसा जानता है, वह आत्मासे आत्मामें प्रवेश करता है।
माण्डूक्य उपनिषद् में भी इसी तत्व की पुष्टि होती है कि अमात्र चौथी अवस्था (तुरीय) व्यवहार से परे और अद्वैत है। वहाँ कहा गया है कि "ओंकार आत्मा ही है" और जो इसे जानता है, वह आत्मा से आत्मा में प्रवेश करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'निष्कल ब्रह्म में प्रवेश' और माण्डूक्य का 'आत्मा से आत्मा में प्रवेश' एक ही सत्य के दो नाम हैं। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि जब प्रणव अपनी मात्राओं (अ, उ, म) को त्यागकर 'अमात्र' हो जाता है, तभी वह अद्वैत शिव या निष्कल ब्रह्म के रूप में प्रकट होता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' से 'साध्य' की ओर संक्रमण का बिंदु है। अब तक साधक ओंकार का जप कर रहा था, किन्तु अब वह ओंकार के 'होने' में स्थित हो रहा है।
यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने अनुभव में यह देखे कि उसके और ब्रह्म के बीच कोई दूरी नहीं है। 'अबाह्य' का अनुभव उसे बाहर भटकने से रोकता है और 'अनपर' का अनुभव उसे द्वैत (मैं और ईश्वर) के भाव से मुक्त करता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मेरे पहले कुछ नहीं था (अपूर्व), मेरे बाद कुछ नहीं रहेगा (अनन्तार), और मेरे भीतर जो है वही सर्वत्र है (अबाह्य)", तब वह 'निष्कल' की भूमि पर पहुँच जाता है।
यह वह अवस्था है जहाँ 'अक्षर' (ओंकार) स्वयं 'अक्षर' (अविनाशी ब्रह्म) बन जाता है। साधक यहाँ किसी क्रिया को नहीं करता, अपितु वह स्वयं उस अव्यय सत्ता में स्थित हो जाता है। यह 'अद्वय' की वह स्थिति है जहाँ न कोई खोजने वाला है, न कुछ खोजना है—केवल एक अखंड उपस्थिति है।
प्रणवो हीश्वरो देवो हृदि सर्वस्य धिष्ठितः ।
सर्वव्यापिनमोंकारं मत्त्वा धीरो न सीदति ॥ २.१४४ ॥
…प्रणव ही सबके हृदय में स्थित ईश्वर देव है, उस सर्वव्यापि ओंकार को जानकर धीर पुरुष शोक नहीं करता…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के उन स्वरूपों का वर्णन किया जो उसे आदि-अन्त से परे और अविनाशी सिद्ध करते हैं। अब इस श्लोक में वे उस परम सत्य को साधक के व्यक्तिगत अनुभव और उसके हृदय-स्थली से जोड़ रहे हैं, ताकि वह केवल सिद्धांत न रहकर एक जीवंत अनुभूति बन जाए।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: प्रणवः ही ईश्वरः देवः (अस्ति), (यः) सर्वस्य हृदि धिष्ठितः। (तस्मात्) सर्वव्यापिनम् ओंकारं मत्त्वा धीरः न सीदति।
पदार्थ:
• प्रणवः ही ईश्वरः देवः — यहाँ 'ही' (हि) कारणवाचक अव्यय है। प्रणव ही वास्तव में वह ईश्वर है जो शासन करता है और 'देव' है जो प्रकाशमान और देय (दान देने वाला) है।
• हृदि सर्वस्य धिष्ठितः — सबके हृदय में स्थित। यहाँ 'हृदि' केवल भौतिक हृदय नहीं, अपितु वह चेतना-केंद्र है जहाँ आत्मा का वास है।
• सर्वव्यापिनम् — जो समस्त ब्रह्मांड और सूक्ष्म जगत में व्याप्त है; जिसकी व्याप्ति की कोई सीमा नहीं।
• मत्त्वा — मानकर या जानकर। यहाँ 'मत्त्वा' का अर्थ केवल बौद्धिक मान्यता नहीं, अपितु उस सत्य को अपने अस्तित्व में उतार लेना है।
• धीरः — वह साधक जो स्थिर बुद्धि वाला है और जिसने इंद्रियों तथा मन पर नियंत्रण पा लिया है।
• न सीदति — शोक नहीं करता, विचलित नहीं होता या गिरता नहीं है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में एक अत्यंत गूढ़ रहस्य उद्घाटित कर रहे हैं कि जिसे हम 'ईश्वर' कहते हैं, वह कोई दूर स्थित सत्ता नहीं, अपितु वह 'प्रणव' ही है जो प्रत्येक जीव के हृदय में प्रतिष्ठित है। जब वे कहते हैं "प्रणवो हीश्वरो देवो", तो वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ओंकार केवल एक मन्त्र या ध्वनि नहीं है, बल्कि वह उस परम पुरुष का नाम और स्वरूप है।
बाहरी दृष्टि से हम ईश्वर को आकाश में या मंदिरों में खोजते हैं, किन्तु योगी के लिए ईश्वर का अर्थ है—हृदय में गूँजने वाला वह अनाहत नाद, वह शुद्ध चेतना जिसे प्रणव कहा गया है। यह 'हृदय' वह स्थान है जहाँ स्थूल और सूक्ष्म की संधि होती है। जब साधक अपने भीतर ओंकार की उपस्थिति को अनुभव करता है, तब उसे यह बोध होता है कि वह स्वयं उस सर्वव्यापी सत्ता का अंश है।
इस बोध का व्यावहारिक फल यह है कि "धीरः न सीदति"। जो पुरुष इस सत्य को जान लेता है कि सर्वव्यापी ओंकार ही मेरे भीतर स्थित है और मैं उसी का विस्तार हूँ, वह संसार के द्वंद्वों—सुख-दुःख, लाभ-हानि और जन्म-मृत्यु—से विचलित नहीं होता। शोक वहीं उत्पन्न होता है जहाँ 'अलगाव' का भाव हो। किन्तु जब साधक ओंकार को सर्वव्यापी मानकर स्वयं को उसमें विलीन कर देता है, तब शोक के लिए कोई आधार नहीं बचता। वह धीर बन जाता है क्योंकि उसका आधार अब परिवर्तनशील जगत नहीं, अपितु वह अविनाशी प्रणव है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस सत्य की पुष्टि अन्य शास्त्रों में भी मिलती है कि ईश्वर का निवास जीव के हृदय में है।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ १८.६१ ॥
अर्जुन! ईश्वर सब भूतोंके हृदयमें स्थित है, और यन्त्रपर चढ़े हुए-से सब भूतोंको मायासे घुमाता रहता है।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि ईश्वर सब भूतों के हृदय-देश में स्थित है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात को एक कदम आगे ले जाकर यह बताती है कि हृदय में स्थित उस ईश्वर का 'साधना-रूप' ही प्रणव है। जहाँ गीता ईश्वर की स्थिति बताती है, यह स्मृति उस स्थिति को प्राप्त करने का साधन (ओंकार) भी बता देती है।
इसी प्रकार, जब हम ज्ञान और ज्ञेय की बात करते हैं, तब गीता कहती है:
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १३.१७ ॥
वह ज्योतियोंकी भी ज्योति है, अन्धकारसे परे कहा जाता है; वही ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानसे प्राप्य है — सबके हृदयमें स्थित।
जिस प्रकार वह ज्योति सबके हृदय में विष्ठित है, ठीक वैसे ही महर्षि याज्ञवल्क्य ओंकार को सर्वव्यापी और हृदय-स्थित बता रहे हैं। इन दोनों के मेल से यह स्पष्ट होता है कि हृदय में स्थित वह 'ज्योति' ही 'प्रणव' है और वही 'ईश्वर' है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अर्थ एक गहन अभ्यास है। यहाँ 'हृदय' वह केंद्र है जहाँ साधक अपनी चेतना को एकाग्र करता है। अभ्यास यह है कि जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह ध्वनि को बाहर न छोड़कर उसे हृदय की गहराई में ले जाए।
जब ओंकार की ध्वनि हृदय में स्थित होती है, तब साधक अनुभव करता है कि यह ध्वनि केवल कंठ से नहीं निकल रही, बल्कि हृदय के भीतर एक शाश्वत स्पंदन के रूप में पहले से मौजूद है। इसी अवस्था को "हृदि धिष्ठितः" कहते हैं।
साधक इस अभ्यास से 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर बढ़ता है। पहले वह ओंकार को एक शब्द के रूप में सुनता है, फिर उसे एक विचार के रूप में हृदय में स्थापित करता है, और अंततः वह अनुभव करता है कि वह स्वयं ही वह सर्वव्यापी ओंकार है। जब 'मैं' और 'ओंकार' का भेद मिट जाता है, तब साधक 'धीर' की भूमि पर पहुँच जाता है। इस भूमि पर पहुँचकर वह यह देखता है कि संसार की हर वस्तु उसी ओंकार की अभिव्यक्ति है, इसलिए वह किसी भी परिस्थिति में शोक नहीं करता। यह अभ्यास साधक को भय और विषाद से मुक्त कर, उसे उस परम शांति में स्थापित करता है जहाँ केवल 'अक्षर' शेष रहता है।
अमात्रं च त्रिमात्रं च अद्वैतं ब्रह्म तत् परम् ।
स्थूलं चाप्यतिसूक्ष्मं च सर्वतः किमपि स्थितम् ॥ २.१४५ ॥
…वह परब्रह्म अमात्र और त्रिमात्र तथा अद्वैत है, वह स्थूल भी है और अति सूक्ष्म भी है तथा सब ओर कुछ भी स्थित है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव को सबके हृदय में स्थित ईश्वर और सर्वव्यापी सिद्ध करते हुए धीर पुरुष के शोक-निवारण का मार्ग बताया। अब इस श्लोक में वे उस परब्रह्म के स्वरूप की सूक्ष्मता और विस्तार का वर्णन कर रहे हैं, ताकि साधक ओंकार के स्थूल और सूक्ष्म दोनों आयामों को एक ही सत्ता के रूप में देख सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तत् परं ब्रह्म अमात्रं च त्रिमात्रं च अद्वैतं (अस्ति)। तत् स्थूलं च अस्ति, अतिसूक्ष्मं च (अस्ति), (तथा) सर्वतः किमपि स्थितम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• अमात्रं — मात्रा-रहित। वह अवस्था जहाँ 'अ', 'उ', 'म्' की पृथकता समाप्त हो जाती है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। इसे 'अमात्र ओंकार' या 'निःशब्द प्रणव' कहते हैं।
• त्रिमात्रं — तीन मात्राओं वाला। 'अ' (जाग्रत/सृष्टि), 'उ' (स्वप्न/स्थिति) और 'म्' (सुषुप्ति/लय)। यह ब्रह्म का वह स्वरूप है जो अभिव्यक्ति के लिए अभिव्यक्त होता है।
• अद्वैतं — जो दो नहीं है। जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट गया हो; जो पूर्णतः अभेद है।
• स्थूलं — वह जो इंद्रियों द्वारा ग्राह्य है, जो आकार और ध्वनि के रूप में प्रकट है।
• अतिसूक्ष्मं — वह जो इंद्रियों और मन की पहुँच से भी परे है; जो केवल अनुभव (साक्षात्कार) का विषय है।
• सर्वतः किमपि स्थितम् — सब ओर कुछ (अनिर्वचनीय) स्थित है। यहाँ 'किमपि' का अर्थ 'कुछ भी' नहीं, अपितु 'वह अनिर्वचनीय तत्त्व' है जिसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता, फिर भी वह सर्वत्र व्याप्त है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ परब्रह्म के विरोधाभासी प्रतीत होने वाले स्वरूपों का समन्वय कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वह परब्रह्म 'अमात्र' भी है और 'त्रिमात्र' भी। यह विरोधाभास नहीं, अपितु एक ही सत्य के दो स्तर हैं। जब ब्रह्म अपनी पूर्णता में स्थित है, तब वह 'अमात्र' है—अर्थात् वह शून्य और पूर्ण का ऐसा संगम है जहाँ कोई विभाजन नहीं। किंतु जब वही ब्रह्म इस जगत के रूप में प्रकट होता है, तो वह 'त्रिमात्र' हो जाता है। यह त्रिमात्र स्वरूप ही सृष्टि का आधार है, क्योंकि इसी से जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं।
परन्तु, यह अमात्र और त्रिमात्र अलग-अलग सत्ताएँ नहीं हैं, बल्कि 'अद्वैत' हैं। जैसे जल और बर्फ के गुण भिन्न दिखते हैं, पर तत्त्व एक ही है, वैसे ही ओंकार की ध्वनि (त्रिमात्र) और ध्वनि-रहित मौन (अमात्र) एक ही ब्रह्म के दो रूप हैं।
आगे ऋषि कहते हैं कि वह 'स्थूल' भी है और 'अतिसूक्ष्म' भी। स्थूल का अर्थ है वह ओंकार जिसे हम वाणी से उच्चारित करते हैं, जिसे कान सुनते हैं। यह साधक के लिए पहली सीढ़ी है। अतिसूक्ष्म वह है जो हृदय-आकाश में स्पंदित होता है और अंततः उस बिंदु पर पहुँच जाता है जहाँ वह 'अक्षर' हो जाता है।
"सर्वतः किमपि स्थितम्" के माध्यम से याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि वह परब्रह्म केवल शून्य नहीं है, और न ही केवल पदार्थ है। वह एक ऐसी 'अनिर्वचनीय' उपस्थिति है जो दिशाओं, समय और सीमाओं से परे सब ओर स्थित है। वह 'कुछ' (किमपि) ऐसा है जिसे बुद्धि पकड़ नहीं सकती, पर प्राण अनुभव करते हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ ५.२ ॥
सत्यकाम! यह ओंकार ही पर और अपर ब्रह्म है; इसलिए जाननेवाला इसी आश्रयसे (इन दोनोंमेंसे) किसी एकको प्राप्त होता है।
प्रश्न उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि ओंकार ही पर और अपर ब्रह्म है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उसी सत्य का विस्तार करता है। जहाँ प्रश्न उपनिषद् इसे 'पर और अपर' के रूप में देखता है, वहीं यह स्मृति इसे 'अमात्र और त्रिमात्र' तथा 'स्थूल और अतिसूक्ष्म' के रूप में परिभाषित कर साधक को अभ्यास की विधि बता रही है। यह मेल दर्शाता है कि ओंकार वह सेतु है जिसके द्वारा साधक स्थूल (अपर) से सूक्ष्म (पर) की ओर बढ़ता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'द्वैत से अद्वैत' की यात्रा है।
१. स्थूल अभ्यास: साधक पहले ओंकार का उच्चारित जप करता है। यह 'स्थूल' और 'त्रिमात्र' का अभ्यास है। यहाँ वह ध्वनि के माध्यम से अपने मन को एकाग्र करता है।
२. सूक्ष्म अभ्यास: धीरे-धीरे जप मानसिक होता है, फिर केवल एक सूक्ष्म स्पंदन रह जाता है। यहाँ साधक 'अतिसूक्ष्म' की भूमि पर प्रवेश करता है।
३. अमात्र अनुभव: अंततः, जब ध्वनि पूरी तरह विलीन हो जाती है और केवल एक गहरा मौन शेष रहता है, तब साधक 'अमात्र' ओंकार का अनुभव करता है। यह वह स्थिति है जहाँ 'मैं' और 'ओंकार' का भेद मिट जाता है और केवल 'अद्वैत' शेष रहता है।
योगिक दृष्टि से, उच्चार्य (ध्वनि) और अनुच्चार्य (मौन) में कोई विरोध नहीं है। उच्चार्य ओंकार वह द्वार है जो अनुच्चार्य ओंकार की ओर ले जाता है। साधक जब यह अनुभव करता है कि बाहर सुनाई देने वाला ओंकार और भीतर का मौन एक ही है, तब वह 'सर्वतः किमपि स्थितम्' के रहस्य को जान लेता है—अर्थात् वह अनुभव करता है कि वह स्वयं ही वह सर्वव्यापी ब्रह्म है।
ओंकारं विन्दते यस्तु स भवेद्वेदविद्द्विजः ।
यथा पत्रं फलं पुष्पं शङ्कुनैकेन धार्यते ॥ २.१४६ ॥
जो ओंकार को प्राप्त कर लेता है, वह वेदविद् द्विज हो जाता है, जैसे पत्ता, फल और पुष्प एक ही डण्ठल से धारण किए जाते हैं…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के अमात्र, त्रिमात्र, स्थूल और अतिसूक्ष्म स्वरूपों का विवेचन किया। अब वे इस ज्ञान की उपलब्धि से साधक के व्यक्तित्व में आने वाले परिवर्तन और ओंकार की उस धारण-शक्ति का वर्णन कर रहे हैं, जिससे संपूर्ण सृष्टि संचालित है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यः (पुरुषः) ओंकारं विन्दते, स (पुरुषः) वेदविद् द्विजः भवेत् । यथा पत्रं, फलं, पुष्पं शङ्कुनैकेन धार्यते (तथा...)
पदार्थ:
• विन्दते — प्राप्त करता है, अनुभव करता है। यहाँ केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु साक्षात्कार का अर्थ है।
• वेदविद् — वेदों के वास्तविक मर्म को जानने वाला। वह जो केवल शब्दों का ज्ञाता नहीं, अपितु उस सत्य का ज्ञाता है जिसके लिए वेद कहे गए हैं।
• द्विजः — जिसका दूसरा जन्म हुआ हो। शारीरिक जन्म के पश्चात जब साधक ओंकार के माध्यम से आत्म-बोध प्राप्त करता है, तब वह 'द्विज' (पुनर्जन्म प्राप्त) कहलाता है।
• पत्रं, फलं, पुष्पं — पत्ता, फल और पुष्प। ये सृष्टि की विविधता, कर्मों के फल और आध्यात्मिक उपलब्धियों के प्रतीक हैं।
• शङ्कुनैकेन — एक ही डण्ठल (वृक्ष की वह टहनी या डंडी जिससे पत्ता या फल जुड़ा होता है) द्वारा। यहाँ 'शङ्कु' ओंकार का प्रतीक है।
• धार्यते — धारण किया जाता है, टिका हुआ है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में ओंकार की प्राप्ति को 'द्विजत्व' और 'वेद-विद्या' की कसौटी मानते हैं। वे कहते हैं कि जो साधक ओंकार के वास्तविक स्वरूप को विन्दते—अर्थात उसका साक्षात्कार कर लेता है—वह वास्तव में वेदविद् और द्विज हो जाता है।
यहाँ 'द्विज' शब्द का अर्थ केवल जातिगत नहीं, अपितु आध्यात्मिक है। प्रथम जन्म माता-पिता से शरीर रूप में होता है, किन्तु जब साधक ओंकार के माध्यम से अपने भीतर के 'अक्षर' को पहचान लेता है, तब उसका दूसरा जन्म होता है। यह पुनर्जन्म अविद्या के विनाश और विद्या के उदय का क्षण है। चूँकि समस्त वेदों का सार ओंकार ही है, इसलिए जो ओंकार को जान गया, वह समस्त वेदों के मर्म को जान गया (वेदविद्)।
इसके पश्चात ऋषि एक अत्यंत सुंदर उपमा देते हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार एक वृक्ष के पत्तों, फूलों और फलों का अस्तित्व एक ही डण्ठल (शङ्कु) पर टिका होता है; यदि वह डण्ठल टूट जाए, तो पत्ता, पुष्प और फल सब गिर जाएँगे। ठीक उसी प्रकार, यह संपूर्ण दृश्य और अदृश्य जगत, इसकी समस्त विविधताएँ और अभिव्यक्तियाँ केवल ओंकार रूपी एक ही आधार से धारित हैं। (यह वाक्य अगले श्लोक 2.147 में पूर्ण होता है: तथा जगदिदं सर्वमोंकारेणैव धार्यते)।
भाव यह है कि सृष्टि के विविध रूप (पत्र-पुष्प-फल) अलग-अलग प्रतीत होते हैं, किन्तु उनका मूल स्रोत एक ही है। जो साधक इस 'शङ्कु' (ओंकार) को पकड़ लेता है, वह विविधता के भ्रम से मुक्त होकर उस एक आधारभूत सत्ता में स्थित हो जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् ॥ २.२३.३ ॥
प्रजापतिने लोकोंको तपाया; तपाये हुए उनसे त्रयी विद्या (तीनों वेद) बह निकली। उसे तपाया; तपायी हुई उससे ये अक्षर बह निकले — "भूः, भुवः, स्वः"। उन्हें तपाया; तपाये हुए उनसे ओंकार बह निकला।
छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णन है कि प्रजापति ने लोकों को तपाया, जिससे त्रयी विद्या (वेद) प्रकट हुए, फिर उनसे अक्षर (भूः, भुवः, स्वः) और अंततः ओंकार प्रकट हुआ।
इस श्रुति-अंश और बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में अद्भुत संगति है। श्रुति बताती है कि ओंकार वह अंतिम और उच्चतम तत्त्व है जिससे वेद और अक्षर प्रस्फुटित हुए। स्मृति इसी बात को 'शङ्कु' की उपमा से पुष्ट करती है। यदि ओंकार वह 'शङ्कु' (आधार) है, तो वेद, व्याहृतियाँ और यह संपूर्ण जगत उससे निकले हुए 'पत्र, पुष्प और फल' हैं। जिस प्रकार फल के भीतर बीज होता है और बीज से पुनः वृक्ष निकलता है, उसी प्रकार ओंकार में संपूर्ण वेद और संपूर्ण सृष्टि बीज रूप में निहित है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'समर्थन' और 'धारण' के अभ्यास का है।
१. साक्षात्कार का अभ्यास: साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह केवल ध्वनि का उच्चारण नहीं करता, अपितु यह अनुभव करता है कि वह 'वेदविद्' होने की प्रक्रिया में है। वह अपने भीतर उस 'दूसरे जन्म' (द्विजत्व) की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि ओंकार के साथ एकाकार होकर स्वयं को उसी क्षण पुनर्जीवित अनुभव करता है।
२. आधार-दृष्टि (शङ्कु-योग): योगिक अभ्यास में साधक अपने जीवन की समस्त विविधताओं—सुख-दुःख, लाभ-हानि, और संसार के समस्त प्रपंचों को 'पत्र, पुष्प और फल' के समान देखता है। वह यह अनुभव करता है कि ये सब केवल बाहरी आवरण हैं, जिनका आधार केवल ओंकार है।
३. भूमि परिवर्तन: जब साधक केवल मन्त्र जप करता है, तब वह 'पत्र' (बाहरी विधि) पर होता है। जब वह मन्त्र के अर्थ और प्रभाव को अनुभव करता है, तब वह 'पुष्प' (आनंद) की स्थिति में आता है। किन्तु जब वह उस आधार (शङ्कु) को पहचान लेता है जिससे यह सब टिका है, तब वह 'फल' (सिद्धि/मुक्ति) को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार साधक स्थूल जगत के प्रपंचों से हटकर उस एक आधारभूत चैतन्य में स्थित हो जाता है, जहाँ से संपूर्ण सृष्टि का संचालन हो रहा है।
तथा जगदिदं सर्वमोंकारेणैव धार्यते ॥
जप्येन दहते पापं प्राणायामैस्तथा मलम् ॥ २.१४७ ॥
उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् ओंकार द्वारा ही धारण किया जाता है; जप से पाप जल जाते हैं और प्राणायाम से मल (अशुद्धि) नष्ट हो जाते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार की उपमा एक 'शङ्कु' (डण्ठल) से दी थी, जिससे पत्र, फल और पुष्प की भाँति समस्त सृष्टि जुड़ी है। इसी विचार को विस्तार देते हुए अब वे इस ब्रह्माण्डीय सत्य के व्यावहारिक पक्ष को उद्घाटित कर रहे हैं कि यह जगत किस आधार पर टिका है और साधक अपनी शुद्धि के लिए इस शक्ति का प्रयोग कैसे करे।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तथा इदं सर्वं जगत् ओंकारेणैव धार्यते । जप्येन (ओंकारेण) पापं दहते, प्राणायामैस्तथा मलम् (दहते) ।
पदार्थ:
• धार्यते — धारण किया जाता है, सम्भाला जाता है। यहाँ अर्थ है कि ओंकार वह आधार-शक्ति है जिसके बिना सृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं।
• जप्येन — जप द्वारा। यहाँ 'जप्य' विशेषण ओंकार के लिए है, अर्थात् जब ओंकार का जप किया जाता है।
• दहते — जला देते हैं, भस्म कर देते हैं। अग्नि की भाँति नष्ट करना।
• पापं — पाप। योग की दृष्टि से पाप वह मानसिक संस्कार या 'अविद्या' है जो आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से विमुख कर कर्मों के बंधन में बाँधता है।
• प्राणायामैः — प्राणायामों द्वारा। श्वास-प्रश्वास के नियमन और प्रणव के साथ उनके समन्वय की प्रक्रिया।
• मलम् — मल। यह शारीरिक अशुद्धि नहीं, अपितु प्राणिक और मानसिक अवरोध हैं, जो चित्त की निर्मलता में बाधा डालते हैं।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार के दो स्वरूपों को प्रस्तुत कर रहे हैं: एक 'धारिका' रूप में और दूसरा 'शुद्धिका' रूप में।
प्रथम चरण में वे कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् ओंकार द्वारा ही धारण किया गया है। जिस प्रकार पिछले श्लोक में शङ्कु का उदाहरण था, यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि ओंकार केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु वह 'नाद-ब्रह्म' है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड की कंपन का मूल है। स्थूल जगत से लेकर सूक्ष्म जगत तक, सब कुछ उसी एक अक्षर के विस्तार से बना है और उसी के द्वारा टिका हुआ है। यदि यह आधार हट जाए, तो संपूर्ण सृष्टि विलीन हो जाएगी।
द्वितीय चरण में ऋषि साधक के लिए शुद्धि की विधि बताते हैं। वे कहते हैं कि ओंकार का 'जप' पापों को जला देता है। यहाँ 'जप' का अर्थ केवल शब्दों का दोहराव नहीं, अपितु मन को ओंकार की ध्वनि में विलीन करना है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह ध्वनि एक आंतरिक अग्नि का निर्माण करती है, जो संचित पापों (अशुभ संस्कारों) को भस्म कर देती है।
तत्पश्चात वे 'प्राणायाम' का उल्लेख करते हैं, जिससे 'मल' नष्ट होते हैं। यहाँ एक सूक्ष्म भेद है—जप पापों को जलाता है, जबकि प्राणायाम मल को हटाता है। पाप मानसिक और आध्यात्मिक स्तर के दोष हैं, जबकि मल प्राणिक स्तर की अशुद्धियाँ हैं। जब प्रणव के साथ प्राणायाम किया जाता है, तो प्राण शुद्ध होते हैं और चित्त का वह मैल धुल जाता है जो ध्यान में बाधक होता है। इस प्रकार, जप और प्राणायाम मिलकर साधक को पूर्णतः शुद्ध करते हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक शुद्धि के दो स्तरों का विज्ञान है।
प्रथम स्तर 'जप' का है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह 'वाक्-शक्ति' का प्रयोग करता है। यह अभ्यास मन के स्तर पर होता है। पाप यहाँ वे विचार और आसक्तियाँ हैं जो साधक को नीचे खींचती हैं। जप की अग्नि इन मानसिक विकारों को जलाकर साधक को 'पाप-मुक्त' करती है। यह चित्त की वह भूमि है जहाँ साधक अपनी अविद्या का दहन करता है।
द्वितीय स्तर 'प्राणायाम' का है। यहाँ साधक 'प्राण-शक्ति' का प्रयोग करता है। प्राण और मन एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि केवल जप किया जाए और प्राण अशुद्ध रहें, तो साधना में जड़ता बनी रहती है। प्राणायाम के माध्यम से जब ओंकार की ऊर्जा प्राणों में प्रवाहित होती है, तो वह 'मल' (प्राणिक अवरोधों) को हटा देती है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ शरीर और प्राण हल्के हो जाते हैं और चित्त दर्पण की भाँति निर्मल हो जाता है।
अतः साधक के लिए यह क्रम स्पष्ट है: पहले जप से मानसिक संस्कारों (पापों) का दहन, फिर प्राणायाम से प्राणिक अशुद्धियों (मलों) का शोधन। जब पाप और मल दोनों नष्ट हो जाते हैं, तभी साधक अगले चरण—'ध्यान' और 'धारणा'—के लिए तैयार होता है, जिसका वर्णन अगले श्लोक में आएगा।
ध्यानेन जन्म निर्घातं धारणाभिश्च मुच्यते ।
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा ॥ २.१४८ ॥
ध्यानसे जन्म(बन्धन) नष्ट होता है और धारणाओंसे (साधक) मुक्त होता है। वेद(पाठ) के आदि और अन्तमें सदा प्रणव करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के 'धारिका' रूप का वर्णन करते हुए बताया कि जिस प्रकार एक डण्ठल से पत्र और पुष्प टिके होते हैं, वैसे ही यह जगत् प्रणव से धारित है। साथ ही, उन्होंने जप और प्राणायाम के माध्यम से पापों और मलों के विनाश की विधि बताई। अब इस श्लोक में वे साधना की उच्चतर अवस्थाओं—ध्यान और धारणा—के फल का वर्णन करते हुए, इस पूरी प्रक्रिया को वैदिक पाठ और ब्रह्म-विद्या से जोड़ रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ध्यानेन जन्म (निर्घातः भवति), धारणाभिश्च (मुच्यते) । सर्वदा ब्रह्मणः आदौ अन्ते च प्रणवं कुर्यात् ।
पदार्थ:
• ध्यानेन — ध्यान द्वारा। यहाँ ध्यान का अर्थ है—प्रणव के सूक्ष्म स्वरूप में चित्त का निरंतर लय होना।
• जन्म निर्घातं — जन्म का विनाश। यहाँ 'जन्म' का अर्थ केवल शारीरिक जन्म नहीं, अपितु 'पुनर्जन्म' की अनिवार्यता और जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) से है। 'निर्घात' का अर्थ है—जड़ से काट देना।
• धारणाभिश्च — और धारणाओं द्वारा। धारणा वह अवस्था है जहाँ साधक अपनी चेतना को किसी एक बिंदु या अक्षर (यहाँ प्रणव) पर स्थिर कर लेता है।
• मुच्यते — मुक्त हो जाता है। यहाँ मुक्ति का अर्थ है—मानसिक संस्कारों और भौतिक आसक्तियों के बंधन से छूट जाना।
• ब्रह्मणः — यहाँ 'ब्रह्म' के दो अर्थ हैं: प्रथम, वेदों का पाठ (ब्रह्म-पाठ) और द्वितीय, परब्रह्म।
• आदौ अन्ते च — आरम्भ में और अन्त में।
• प्रणवं कुर्यात् — प्रणव (ॐ) का उच्चारण या स्मरण करे।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में साधना के चार सोपानों (जप, प्राणायाम, ध्यान, धारणा) और उनके विशिष्ट फलों का एक पूर्ण समुच्चय प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने बताया कि 'जप' से पाप जलते हैं और 'प्राणायाम' से प्राणिक मल नष्ट होते हैं। अब वे कहते हैं कि जब साधक 'ध्यान' की अवस्था में पहुँचता है, तब उसके 'जन्म' का निर्घात होता है।
भाव यह है कि पाप और मल की शुद्धि के बाद जब चित्त एकाग्र होकर प्रणव के स्वरूप में लीन होता है, तब वह अविद्या के उस मूल कारण को नष्ट कर देता है जो उसे बार-बार जन्म लेने पर विवश करता है। यह जन्म का विनाश वास्तव में 'अहंकार' के जन्म का विनाश है। इसके पश्चात 'धारणा' की अवस्था आती है, जहाँ साधक अपनी चेतना को अक्षर-ब्रह्म में स्थिर कर लेता है। इस स्थिरता से वह उन समस्त सूक्ष्म धारणाओं (मानसिक धारणाओं/संस्कारों) से मुक्त हो जाता है, जिन्होंने उसे संसार के साथ बाँध रखा था।
श्लोक के द्वितीय चरण में ऋषि एक अनिवार्य विधि बताते हैं: "ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा"। इसका बाह्य अर्थ है कि वेदों के पाठ के आरम्भ और अन्त में सदा ओंकार का उच्चारण करना चाहिए। किंतु इसका आन्तर अर्थ यह है कि जीवन की हर क्रिया (जो कि एक प्रकार का पाठ ही है) और ब्रह्म-साधना का आरम्भ और समापन उसी मूल अक्षर 'ॐ' से होना चाहिए। जो आरम्भ प्रणव से होता है, वह शुद्ध होता है, और जो अन्त प्रणव में होता है, वह पूर्ण होता है। बिना प्रणव के किया गया कोई भी कर्म या पाठ अधूरा और विखरा हुआ रहता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा । स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं परस्ताच्च विशीर्यति ॥ २.७४ ॥
वेद(पाठ) के आरम्भ और अन्तमें सदा प्रणव लगाये; जिसके आरम्भमें ओंकार न हो वह बह जाता है, और जिसके अन्तमें न हो वह बिखर जाता है।
मनुस्मृति में भी यही विधान मिलता है कि वेद-पाठ के आरम्भ और अन्त में प्रणव का प्रयोग अनिवार्य है, अन्यथा वह पाठ 'स्रवति' (बह जाता है) और 'विशीर्यते' (बिखर जाता है)। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। यह दर्शाता है कि प्रणव केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु वह 'संयोजक' शक्ति है जो बिखरे हुए ज्ञान को एक सूत्र में पिरोकर उसे फलदायी बनाती है।
योग-रहस्य —
एक योगी के लिए यह श्लोक साधना की क्रमिक उन्नति का मानचित्र है। साधक को यहाँ चार स्तरों के अभ्यास और उनके अनुभवों का बोध होता है:
१. जप (वाचिक/मानसिक): इसका अभ्यास पापों (मानसिक विकारों) के दहन के लिए है।
२. प्राणायाम (प्राण-नियमन): इसका अभ्यास प्राणिक मल (ऊर्जा के अवरोधों) की शुद्धि के लिए है।
३. ध्यान (एकाग्रता): जब साधक प्रणव के नाद में लीन होता है, तब वह जन्म-मृत्यु के चक्र के बीज को नष्ट करता है। यहाँ वह 'अक्षर' का अनुभव करता है।
४. धारणा (स्थिरता): जब वह उस अक्षर में स्थित हो जाता है, तब वह समस्त मानसिक बंधनों से मुक्त होकर 'मुक्त-अवस्था' को प्राप्त करता है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह अपने हर मन्त्र-पाठ, हर श्वास और हर विचार के आदि और अन्त में 'ॐ' को स्थापित करे। जब 'ॐ' आरम्भ बनता है, तो वह संकल्प की शुद्धि करता है; जब 'ॐ' अन्त बनता है, तो वह फल को ब्रह्म में विलीन कर देता है। इस प्रकार साधक स्थूल कर्म से सूक्ष्म योग की ओर और अंततः अक्षर-ब्रह्म की ओर अग्रसर होता है।
स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं परस्ताच्च विशीर्यते ।
प्रोक्षणे पोषणे चैव प्रतिष्ठाने प्रतिग्रहे ॥ २.१४९ ॥
… 'ॐ' कहे बिना किया गया पाठ पहले बह जाता है और बाद में बिखर जाता है; प्रोक्षणमें, पोषणमें, प्रतिष्ठाने और प्रतिग्रहमें…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने साधना के सोपानों—जप, प्राणायाम, ध्यान और धारणा—के फल बताते हुए यह निर्देश दिया था कि ब्रह्म-पाठ के आदि और अन्त में सदा प्रणव का प्रयोग करना चाहिए। वर्तमान श्लोक उसी निर्देश का कारण और उसकी अनिवार्यता को स्पष्ट करता है कि यदि प्रणव का अभाव हो, तो साधना और मन्त्रों का प्रभाव किस प्रकार क्षीण हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यत्) पूर्वं अनोङ्कृतं (तत्) स्रवति, परस्ताच्च विशीर्यते । (तथा) प्रोक्षणे, पोषणे, प्रतिष्ठाने, प्रतिग्रहे (च प्रणवं कुर्यात्) ।
पदार्थ:
• स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं — 'अनोङ्कृतं' अर्थात् जिसमें 'ॐ' (प्रणव) का उच्चारण न किया गया हो। 'पूर्वं स्रवति' — वह आरम्भ में ही बह जाता है। यहाँ 'बह जाने' का अर्थ है—शक्ति का क्षय होना या मन्त्र के प्रभाव का साधक के नियंत्रण से बाहर निकल जाना।
• परस्ताच्च विशीर्यते — 'परस्तात्' अर्थात् अन्त में; 'विशीर्यते' अर्थात् बिखर जाता है। जैसे बिना धागे के मणियाँ बिखर जाती हैं, वैसे ही बिना प्रणव के मन्त्रों का संचित फल छिन्न-भिन्न हो जाता है।
• प्रोक्षणे — प्रोक्षण क्रिया में (शुद्धिकरण के लिए मन्त्रयुक्त जल छिड़कना)।
• पोषणे — पोषण क्रिया में (देवता या यज्ञ-कुण्ड में आहुति देकर उन्हें तृप्त करना)।
• प्रतिष्ठाने — प्रतिष्ठापन में (किसी मन्त्र या देवता को मूर्ति, यंत्र या शरीर में स्थापित करना)।
• प्रतिग्रहे — प्रतिग्रह में (मन्त्र-शक्ति को ग्रहण करना या किसी सिद्धि को आत्मसात करना)।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र-विज्ञान के एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं। वे बताते हैं कि प्रणव केवल एक शब्द नहीं, अपितु वह 'शक्ति का संवाहक' और 'ऊर्जा का बंधन' है। जब कोई साधक वेद-पाठ या किसी मन्त्र का जप करता है, तो वह वास्तव में ध्वनि के माध्यम से एक विशिष्ट ऊर्जा का निर्माण करता है। यदि इस पाठ के आरम्भ में 'ॐ' नहीं है, तो वह ऊर्जा आरम्भ होते ही रिसने लगती है; वह लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही 'स्रवति' अर्थात् बह जाती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी पात्र में छेद हो और जल भरने से पहले ही बाहर निकल जाए।
इसी प्रकार, यदि पाठ के अन्त में प्रणव नहीं है, तो जो ऊर्जा संचित हुई थी, वह एक सूत्र में बंधने के बजाय बिखर जाती है ('विशीर्यते')। प्रणव यहाँ एक 'मुहर' की भाँति कार्य करता है, जो आरम्भ में द्वार खोलता है और अन्त में उस शक्ति को सुरक्षित रूप से बंद कर साधक के भीतर स्थापित कर देता है।
इसके पश्चात ऋषि उन विशिष्ट कर्मों की सूची देते हैं जहाँ प्रणव की उपस्थिति अनिवार्य है। प्रोक्षण में जब हम जल के माध्यम से शुद्धि करते हैं, तो 'ॐ' उस जल को चैतन्य करता है। पोषण में जब हम आहुति देते हैं, तो 'ॐ' उस भौतिक पदार्थ को सूक्ष्म ऊर्जा में बदलकर देवता तक पहुँचाता है। प्रतिष्ठापन में, जब किसी शक्ति को स्थापित करना हो, तो 'ॐ' वह आधार बनता है जिस पर पूरी संरचना टिकी होती है। और प्रतिग्रह में, जब साधक किसी मन्त्र के फल को ग्रहण करता है, तो 'ॐ' उस फल को हृदय में स्थिर करने वाला साधन बनता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा । स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं परस्ताच्च विशीर्यति ॥ २.७४ ॥
वेद(पाठ) के आरम्भ और अन्तमें सदा प्रणव लगाये; जिसके आरम्भमें ओंकार न हो वह बह जाता है, और जिसके अन्तमें न हो वह बिखर जाता है।
मनुस्मृति में भी यही विधान मिलता है कि वेद-पाठ के आरम्भ और अन्त में सदा प्रणव लगाना चाहिए, अन्यथा वह पूर्व में बह जाता है और परन्त बिखर जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति का यहाँ पूर्ण मेल है। यह सिद्ध करता है कि वैदिक परम्परा में प्रणव को केवल एक मंगल-शब्द नहीं, बल्कि मन्त्रों की 'सुरक्षा-कवच' और 'शक्ति-केंद्र' माना गया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ऊर्जा के संरक्षण' का विज्ञान है। योग में जब हम किसी मन्त्र या विचार का अभ्यास करते हैं, तो मन में एक तरंग उत्पन्न होती है। यदि यह तरंग बिना किसी केंद्र के छोड़ी जाए, तो यह मानसिक भटकाव पैदा करती है।
यहाँ 'ॐ' उस केंद्र का नाम है। आरम्भ में 'ॐ' का उच्चारण साधक के चित्त को बाहरी जगत से काटकर भीतर की ओर मोड़ देता है, जिससे ऊर्जा 'बहती' नहीं, बल्कि संकुचित होकर तीव्र होती है। अन्त में 'ॐ' का उच्चारण उस प्राप्त अनुभव को 'अक्षर' (अविनाशी) बना देता है, जिससे वह अनुभव बिखरता नहीं, बल्कि साधक की चेतना में विलीन हो जाता है।
अभ्यास यह है कि साधक किसी भी मन्त्र-साधना या स्वाध्याय के समय प्रणव को केवल एक औपचारिकता न माने, बल्कि उसे एक 'बाँध' की तरह अनुभव करे। आरम्भ का 'ॐ'—प्रवेश द्वार है, और अन्त का 'ॐ'—संग्रहण केंद्र है। जो साधक इस विधि का पालन करता है, उसकी साधना 'स्रवण' (रिसाव) और 'विशीरण' (बिखराव) से मुक्त होकर पूर्णता को प्राप्त करती है।
आश्रावणे वषट्कारे प्रत्याश्रावे जपेऽपि च ।
सामसु ब्रह्ममुख्येषु ऋग्यजुस्तोत्रशस्त्रयोः ॥ २.१५० ॥
…आश्रावण में, वषट्कार में, प्रत्याश्रावण में और जप में भी; सामों के मुख्य ब्रह्मपाठों में तथा ऋक् और यजुर्वेद के स्तोत्र और शस्त्र में…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया था कि प्रणव के बिना मन्त्र-पाठ का फल आरम्भ में ही बह जाता है और अन्त में बिखर जाता है। वर्तमान श्लोक उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए उन विशिष्ट वैदिक क्रियाओं और मन्त्र-प्रयोगों की सूची प्रस्तुत करता है, जहाँ प्रणव की उपस्थिति अनिवार्य है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (प्रणवं कुर्यात्) आश्रावणे, वषट्कारे, प्रत्याश्रावे, जपेऽपि च । सामसु ब्रह्ममुख्येषु (प्रणवं कुर्यात्), ऋग्यजुस्तोत्रशस्त्रयोः (प्रणवं कुर्यात्) ।
पदार्थ:
• आश्रावण — मन्त्रों के उच्चारण के समय उनके स्वर और लय को प्रवाहित करना।
• वषट्कार — आहुति देते समय 'वषट्' शब्द का उच्चारण, जो मन्त्र की शक्ति को अग्नि में समर्पित करने की क्रिया है।
• प्रत्याश्रावण — मन्त्र के प्रभाव को पुनः संचित करना या विपरीत दिशा में प्रवाहित कर संतुलन स्थापित करना।
• जप — मन्त्र का बार-बार मानसिक या वाचिक दोहराव।
• सामसु ब्रह्ममुख्येषु — सामवेद के उन मुख्य मन्त्रों में जिन्हें 'ब्रह्म' कहा जाता है (ब्रह्म-पाठ), जो अत्यंत पवित्र और उच्च स्तर के होते हैं।
• ऋग्यजुस्तोत्रशस्त्रयोः — ऋग्वेद और यजुर्वेद के स्तोत्रों (स्तुतिपरक मन्त्र) और शस्त्रों (वेदों के अंग या मन्त्रों के प्रयोग की विधि/शास्त्र) में।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ यह सिद्ध कर रहे हैं कि सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय और उसकी क्रियात्मकता प्रणव के बिना अधूरी है। यह श्लोक पिछले श्लोक (२.१४९) का ही विस्तार है, जहाँ प्रोक्षण और पोषण जैसी क्रियाओं का उल्लेख था। यहाँ वे यज्ञ के उन सूक्ष्म स्वरों की बात कर रहे हैं जो मन्त्र को केवल शब्द न रखकर उसे 'ऊर्जा' में परिवर्तित करते हैं।
आश्रावण, वषट्कार और प्रत्याश्रावण—ये तीनों क्रियाएँ मन्त्र की गति से सम्बन्धित हैं। आश्रावण में मन्त्र की शक्ति को जगाया जाता है, वषट्कार में उसे लक्ष्य की ओर प्रक्षेपित किया जाता है और प्रत्याश्रावण में उस ऊर्जा का संतुलन किया जाता है। यदि इन तीनों के आदि में ओंकार न हो, तो मन्त्र केवल एक ध्वनि बनकर रह जाता है, वह 'ब्रह्म-शक्ति' नहीं बन पाता। जप के विषय में यह निर्देश है कि जब साधक मन्त्र को बार-बार दोहराता है, तो प्रणव उस जप को एक सूत्र में पिरोकर उसे एकाग्र करता है।
सामवेद के ब्रह्म-पाठों का उल्लेख विशेष है, क्योंकि साम संगीत और लय का विज्ञान है। यहाँ प्रणव वह 'आदि-स्वर' है जिससे समस्त संगीत और लय उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार ऋग्वेद के स्तोत्रों और यजुर्वेद के शस्त्र-प्रयोगों में ओंकार का प्रयोग यह सुनिश्चित करता है कि मन्त्र का प्रभाव विचलित न हो।
भाव यह है कि चाहे वह स्तुति (स्तोत्र) हो या क्रिया (शस्त्र), चाहे वह लयबद्ध गान (साम) हो या एकांत साधना (जप), प्रणव वह सेतु है जो स्थूल वाणी को सूक्ष्म चेतना से जोड़ता है। बिना ओंकार के मन्त्र केवल बाहरी विधि है, ओंकार के साथ वह आंतरिक योग बन जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि जीवन की हर क्रिया—चाहे वह अभिव्यक्ति हो (आश्रावण), समर्पण हो (वषट्कार) या आत्म-संयम हो (प्रत्याश्रावण)—सब ओंकार के अधीन होनी चाहिए।
योगिक अभ्यास में साधक जब किसी मन्त्र का जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, बल्कि 'ॐ' के माध्यम से अपने प्राणों को हृदय और सूर्य (आंतरिक ज्योति) के साथ जोड़ता है। यहाँ 'साम' का अर्थ है—प्राणों का लयबद्ध होना। जब साधक 'ब्रह्ममुख्य' स्थिति में होता है, तब उसका प्रत्येक श्वास एक प्रणव बन जाता है।
ऋक् और यजुः के स्तोत्रों का आंतरिक अर्थ है—हृदय की पुकार और प्राणों का अनुशासन। साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि उसकी वाणी का हर स्वर, उसकी हर मानसिक तरंग यदि ओंकार में विलीन है, तो वह 'अविभक्त' हो जाता है। यह अभ्यास साधक को 'वाक्-शक्ति' से 'चित्त-शक्ति' की ओर ले जाता है, जहाँ मन्त्र का बाहरी शोर समाप्त हो जाता है और केवल ओंकार की गूँज शेष रहती है।
सर्वमन्त्रप्रयोगेषु ओमित्यादौ प्रयुज्यते ।
तेन संपरिपूर्णानि यथोक्तानि भवन्ति च ॥ २.१५१ ॥
सम्पूर्ण मन्त्र-प्रयोगों में 'ओम्' आदि से प्रयुक्त किया जाता है; उससे (मन्त्र) यथा कहे गए परिपूर्ण हो जाते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन विशिष्ट वैदिक क्रियाओं—आश्रावण, वषट्कार और साम-पाठ आदि—का विवरण दिया जहाँ प्रणव का प्रयोग अनिवार्य है। वर्तमान श्लोक उन सभी विशिष्टताओं को एक सामान्य सूत्र में पिरोकर यह घोषित करता है कि किसी भी मन्त्र-प्रयोग की पूर्णता केवल ओंकार से ही संभव है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सर्वमन्त्रप्रयोगेषु ओमित्यादौ प्रयुज्यते, तेन (मन्त्रः) यथोक्तानि संपरिपूर्णानि भवन्ति च ।
पदार्थ:
• सर्वमन्त्रप्रयोगेषु — समस्त मन्त्रों के प्रयोग में (चाहे वे ऋक् हों, यजुस् हों, साम हों या तन्त्रोक्त हों)।
• ओमित्यादौ — 'ओम्' शब्द को आरम्भ में (आदि में)।
• प्रयुज्यते — प्रयुक्त किया जाता है या लगाया जाता है।
• संपरिपूर्णानि — पूर्णतः परिपूर्ण, जिनमें कोई अभाव न रहे।
• यथोक्तानि — जैसा कि शास्त्रों में कहा गया है (यथोक्त), वैसा ही फल और प्रभाव देने वाला।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र-शास्त्र का एक मूलभूत सिद्धान्त प्रतिपादित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि संसार में जितने भी मन्त्र-प्रयोग हैं, उनमें 'ओम्' का आरम्भिक प्रयोग केवल एक परंपरा नहीं, अपितु एक अनिवार्य आवश्यकता है।
यहाँ 'आदौ' (आरम्भ में) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मन्त्र एक बीज है, और ओंकार वह उर्वर भूमि है जिसमें वह बीज बोया जाता है। यदि बीज को भूमि के बिना बोया जाए, तो वह अंकुरित नहीं हो सकता। इसी प्रकार, मन्त्र की शक्ति तब तक प्रसुप्त रहती है जब तक उसे प्रणव के माध्यम से जाग्रत न किया जाए। जब साधक 'ओम्' का उच्चारण करता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल जगत से हटाकर उस 'अक्षर' (अविनाशी) में स्थित करता है, जहाँ से मन्त्र की वास्तविक शक्ति प्रवाहित होती है।
'संपरिपूर्णानि' और 'यथोक्तानि' शब्दों का गहरा रहस्य है। मन्त्रों के उच्चारण में मानवीय त्रुटियाँ संभव हैं—स्वर का उतार-चढ़ाव गलत हो सकता है, उच्चारण में सूक्ष्म दोष रह सकता है या साधक की एकाग्रता भंग हो सकती है। ऐसे में मन्त्र 'अपूर्ण' हो जाता है और उसका अपेक्षित फल (यथोक्त फल) प्राप्त नहीं होता। याज्ञवल्क्य ऋषि यह रहस्य खोल रहे हैं कि प्रणव वह 'पूर्णता' है जो मन्त्र के समस्त अभावों को भर देता है। ओंकार वह महा-ऊर्जा है जो मन्त्र के किसी भी दोष को ढक लेती है और उसे उसकी मूल दैवीय शक्ति से पुनः जोड़ देती है। अतः, प्रणव युक्त मन्त्र ही वास्तव में 'यथोक्त' यानी शास्त्र-सम्मत फल देने वाला होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ १७.२४ ॥
इसलिए ब्रह्मवादियोंकी शास्त्रोक्त यज्ञ, दान और तपकी क्रियाएँ सदा 'ॐ' कहकर आरम्भ होती हैं।
भगवद्गीता में भी यही सत्य उद्घोषित है कि ब्रह्मवादियों की समस्त क्रियाएँ—यज्ञ, दान और तप—सदा 'ॐ' के उच्चारण से आरम्भ होती हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का यहाँ पूर्ण मेल है; दोनों ही इस बात पर बल देते हैं कि किसी भी आध्यात्मिक क्रिया का आरम्भ यदि प्रणव से न हो, तो वह क्रिया केवल भौतिक कर्म रह जाती है, वह 'ब्रह्म-क्रिया' नहीं बन पाती। स्मृति यहाँ मन्त्रों की 'पूर्णता' पर बल दे रही है, जबकि गीता क्रियाओं के 'आरम्भ' और 'ब्रह्मवादी' होने के प्रमाण पर।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'एकाग्रता' और 'संलयन' का है। जब साधक किसी मन्त्र का जप आरम्भ करने से पूर्व 'ओम्' का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में अपने बिखरे हुए मन को एक बिंदु पर केंद्रित कर रहा होता है।
अभ्यास यह है कि 'ओम्' के उच्चारण के समय साधक यह अनुभव करे कि वह अपनी व्यक्तिगत सीमित पहचान को छोड़कर उस विराट अक्षर में विलीन हो रहा है। जब मन इस पूर्णता (संपरिपूर्णता) को प्राप्त कर लेता है, तब उसके बाद बोला गया मन्त्र केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि वह सीधे हृदय के सूर्य और अक्षर-ब्रह्म से जुड़ जाता है। साधक यहाँ 'अपूर्ण' (सांसारिक मन) से 'पूर्ण' (दिव्य चेतना) की भूमि की ओर प्रस्थान करता है। इस प्रकार, प्रणव मन्त्र के लिए एक सेतु का कार्य करता है, जो साधक को स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म स्पंदन की ओर ले जाता है।
सर्वमन्त्राधिराजेन ओंकारेण न संशयः ।
यदूनं चातिरिक्तं च यच्छिद्रं यदयाज्ञिकम् ॥ २.१५२ ॥
सब मन्त्रों के अधिराज ओंकार से — इसमें संशय नहीं — जो कम है, जो अधिक है, जो छिद्र (दोष) है और जो अयाज्ञिक (यज्ञ के अयोग्य) है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि समस्त मन्त्र-प्रयोगों में प्रणव के आरम्भिक प्रयोग से वे मन्त्र शास्त्रोक्त रूप में परिपूर्ण हो जाते हैं। वर्तमान श्लोक उसी पूर्णता के रहस्य को और गहराई से खोलते हुए यह बताते हैं कि ओंकार केवल पूर्णता ही नहीं देता, अपितु मन्त्र-जाप या कर्म में हुई त्रुटियों का निवारण भी करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सर्वमन्त्राधिराजेन ओंकारेण (तद्भवति इति) न संशयः, यदूनं च (तद्भवति), अतिरिक्तं च (तद्भवति), यच्छिद्रं (तद्भवति) यदयाज्ञिकम् (तद्भवति) ।
पदार्थ:
• सर्वमन्त्राधिराज — समस्त मन्त्रों का अधिराज (सम्राट)। जिस प्रकार सम्राट के आदेश से राज्य के समस्त विभाग संचालित होते हैं, वैसे ही ओंकार से समस्त मन्त्र संचालित होते हैं।
• न संशयः — इसमें कोई संदेह नहीं है; यह एक अकाट्य सत्य है।
• ऊनं — न्यून, कम या अधूरा। मन्त्र के किसी अक्षर का छूट जाना या स्वर का त्रुटिपूर्ण होना।
• अतिरिक्तं — अधिक। मन्त्र में अनावश्यक शब्दों का जुड़ जाना या अनधिकृत विस्तार।
• छिद्रं — दोष या रिक्तता। उच्चारण में अंतराल या मन्त्र के प्रभाव में आने वाली बाधा।
• अयाज्ञिकम् — जो यज्ञ के योग्य न हो। वह मन्त्र या कर्म जो विधि-विधान के अभाव में अपनी शक्ति खो चुका हो या अशुद्ध हो गया हो।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार की उस सामर्थ्य का वर्णन कर रहे हैं जिसे 'पूर्णता का तत्त्व' कहा जा सकता है। वे घोषणा करते हैं कि ओंकार समस्त मन्त्रों का अधिराज है। इसका अर्थ यह है कि मन्त्रों की शक्ति मन्त्र के शब्दों में नहीं, बल्कि उस 'अक्षर' में है जिससे वे उत्पन्न हुए हैं। जब साधक ओंकार का प्रयोग करता है, तो वह मन्त्र के स्थूल शब्दों से ऊपर उठकर उस मूल स्रोत से जुड़ जाता है जहाँ कोई त्रुटि संभव नहीं है।
यहाँ ऋषि उन दोषों की चर्चा कर रहे हैं जो प्रायः साधकों से घटित होते हैं। मन्त्र-साधना में 'ऊन' (कमी) और 'अतिरिक्त' (अधिकता) दोनों ही दोष हैं। यदि मन्त्र का एक अक्षर भी छूट जाए, तो उसकी लय टूट जाती है; और यदि कुछ अनावश्यक जुड़ जाए, तो उसका मूल स्वरूप विकृत हो जाता है। 'छिद्र' का अर्थ है वह मानसिक या वाचिक रिक्तता जो मन्त्र के प्रवाह को रोक देती है। वहीं 'अयाज्ञिक' वह अवस्था है जब कर्म या मन्त्र अपनी पवित्रता खो देता है और वह इष्टदेव तक पहुँचने में असमर्थ हो जाता है।
महर्षि कहते हैं कि इन समस्त दोषों का निवारण ओंकार से संभव है। वाक्य यहाँ अधूरा है और इसका समापन अगले श्लोक (२.१५३-१५४) में होता है, जहाँ बताया गया है कि ओंकार के प्रयोग से ये सभी दोष मिट जाते हैं और मन्त्र पुनः 'अनून', 'अनतिरिक्त' और 'पवित्र' हो जाता है। भाव यह है कि ओंकार वह दिव्य सेतु है जो त्रुटिपूर्ण मानवीय प्रयास को ईश्वरीय पूर्णता से जोड़ देता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सैषैकाक्षरर्ग्ब्रह्मणस्तपसोऽग्रे प्रादुर्बभूव ब्रह्मवेदस्याथर्वणं शुक्रम् अत एव मन्त्राः प्रादुर्बभूवुः स तु खलु मन्त्राणां अतपसासुश्रूषानध्यायाध्ययनेन यदूनं च विरिष्टं च यातयामं च करोति तदथर्वणां तेजसा प्रत्याप्याययेत् मन्त्राश्च मां अभिमुखीभवेयुर्गर्भा इव मातरं अभिजिघांसुः पुरस्तादोंकारं प्रयुङ्क्ते एतयैव तदृचा प्रत्याप्यायेत् एषैव यज्ञस्य पुरस्ताद्युज्यते एषा पश्चात् सर्वत एतया यज्ञस्तायते तदप्येतदृचोक्तम् या पुरस्ताद्युज्यत ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्निति तदेतदक्षरं ब्राह्मणो यं कामं इच्छेत्त्रिरात्रोपोषितः प्राङ्मुखो वाग्यतो बर्हिष्युपविश्य सहस्रकृत्व आवर्तयेत् सिध्यन्त्यस्यार्थाः सर्वकर्माणि चेति ब्राह्मणं ॥ १.२२ ॥
यह एकाक्षर ऋक् (ओंकार) ब्रह्मके तपसे सबसे पहले प्रकट हुई — ब्रह्मवेद (अथर्ववेद) का उज्ज्वल सार; इसीसे मन्त्र प्रकट हुए। जो मन्त्रोंका (प्रयोग करनेवाला) तपके अभाव, सेवाके अभाव, अनध्यायमें अध्ययन आदिसे (उनमें) कुछ कम, बिगड़ा और यातयाम (बासी, निःसार) कर देता है, उसे अथर्वणोंके तेजसे फिर भर दे — 'मन्त्र मेरे सम्मुख हों, जैसे गर्भ माताकी ओर' — (इसलिए) आगे ओंकारका प्रयोग करता है; इसी ऋक् (ओंकार) से फिर भरता है। यही यज्ञके आगे जोड़ी जाती है, यही पीछे; इसीसे यज्ञ सब ओर फैलाया जाता है। यह ऋचामें भी कहा है — 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्' (ऋचाएँ परम व्योममें अक्षरमें स्थित हैं)। जो ब्राह्मण जिस कामनाको चाहे, तीन रात उपवास करके, पूर्वमुख, मौन, कुशोंपर बैठकर इस अक्षरको हजार बार आवृत्त करे — उसके अर्थ और सब कर्म सिद्ध होते हैं।
गोपथ ब्राह्मण का यह अंश बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक की पूर्ण पुष्टि करता है। गोपथ ब्राह्मण स्पष्ट कहता है कि जो व्यक्ति तप, सेवा और अध्ययन के अभाव में मन्त्रों को 'ऊन' (कम), 'विरिष्ट' (बिगड़ा हुआ) या 'यातयाम' (बासी/निःसार) कर देता है, वह ओंकार का प्रयोग करके उन्हें पुनः प्राप्त कर सकता है।
स्मृति और ब्राह्मण दोनों का मत एक ही है: ओंकार केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक 'तेज' है। जिस प्रकार अग्नि अशुद्धियों को जलाकर स्वर्ण को शुद्ध कर देती है, उसी प्रकार ओंकार मन्त्रों की त्रुटियों को सोखकर उन्हें पुनः याज्ञिक और प्रभावकारी बना देता है। जहाँ गोपथ ब्राह्मण इसे 'अथर्वणों के तेज' से जोड़ता है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे 'मन्त्राधिराज' के रूप में स्थापित करते हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक अत्यंत ढाढस बँधाने वाला है। योग मार्ग में अक्सर साधक अपनी त्रुटियों—जैसे मन्त्र के गलत उच्चारण या एकाग्रता की कमी—से भयभीत रहता है कि कहीं उसका साधन निष्फल न हो जाए। याज्ञवल्क्य यहाँ यह रहस्य खोलते हैं कि यदि साधक का आश्रय 'ओंकार' है, तो वह अपनी भूलों से ऊपर उठ सकता है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब भी साधक को अनुभव हो कि उसका जप विचलित हुआ है या मन्त्र की लय टूट गई है, तब उसे पुनः गहरे ओंकार में स्थित होना चाहिए। यह अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि पूर्णता बाहर के शब्दों में नहीं, बल्कि भीतर के उस 'अक्षर' में है जो कभी त्रुटिपूर्ण नहीं होता।
साधक यहाँ 'अपूर्णता' (ऊन, छिद्र) से 'पूर्णता' (ओंकार) की ओर यात्रा करता है। वह समझ जाता है कि कर्म का आरम्भ भी ॐ है और उसकी समस्त त्रुटियों का अंत भी ॐ ही है। यह अभ्यास साधक को मानसिक तनाव से मुक्त कर उसे उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह केवल 'शब्द' का नहीं, बल्कि 'ध्वनि' के मूल स्रोत का उपासक बन जाता है।
यदमेध्यमशुद्धं वा यातयामं च यद्भवेत् ।
ओंकारेण प्रयुक्तेन सर्वं चाविफ(क)लं भवेत् ॥ २.१५३ ॥
…जो अपवित्र हो, या जो बासी हो, या जो कुछ भी हो; ओंकार से प्रयुक्त किए जाने पर सब कुछ अविकल हो जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार को समस्त मन्त्रों का अधिराज बताते हुए यह स्पष्ट किया कि मन्त्र में यदि कुछ न्यूनता, अतिशयता या दोष रह जाए, तो प्रणव उसे परिपूर्ण करने की क्षमता रखता है। वर्तमान श्लोक इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए मन्त्रों और कर्मों की शुद्धि तथा उनकी जीवंतता के रहस्य को उद्घाटित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यदमेध्यं वा (भवति), अशुद्धं वा (भवति), यातयामं च यद्भवेत्, (तद्) ओंकारेण प्रयुक्तेन सर्वं च अविकलं भवेत् ।
पदार्थ:
• अमेध्य — जो मेध (यज्ञ) के योग्य न हो; वह कर्म या मन्त्र जो अपनी पवित्रता खो चुका हो और जिससे वांछित फल की प्राप्ति संभव न हो।
• अशुद्ध — जिसमें अशुद्धि हो। यह अशुद्धि बाह्य (शारीरिक) भी हो सकती है और आन्तरिक (मानसिक या स्वर-दोष) भी।
• यातयाम — बासी, पुराना या निःसार। वह मन्त्र जो लंबे समय तक अभ्यास न करने से अपनी ओजस्विता खो चुका हो या वह कर्म जो समय बीत जाने के कारण प्रभावहीन हो गया हो।
• ओंकारेण प्रयुक्तेन — ओंकार के प्रयोग से। जब किसी मन्त्र या कर्म के आरम्भ में प्रणव का आवाहन किया जाता है।
• अविकल — विकल रहित, अखंड, दोषरहित और पूर्ण। 'विकल' का अर्थ है खंडित या विचलित; 'अविकल' वह है जो अपनी मूल शक्ति में पुनः प्रतिष्ठित हो गया हो।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र-शक्ति के पुनरुद्धार का विधान बता रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई मन्त्र 'अमेध्य' (अयोग्य), 'अशुद्ध' या 'यातयाम' (बासी/निःसार) हो गया है, तो भी वह निष्प्रयोजन नहीं होता। जब उस मन्त्र के साथ ओंकार का प्रयोग किया जाता है, तो वह संपूर्णतः 'अविकल' हो जाता है।
यहाँ 'यातयाम' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार अन्न बासी होने पर अपना पोषण-गुण खो देता है, उसी प्रकार मन्त्र भी यदि साधना के अभाव में या गलत प्रयोग से 'बासी' हो जाएँ, तो वे केवल शब्द रह जाते हैं, शक्ति नहीं। याज्ञवल्क्य का संकेत है कि ओंकार वह 'अमृत' है जो मृतप्राय मन्त्रों में पुनः प्राण फूँक देता है।
बाहरी दृष्टि से यह विधि मन्त्र-दोषों के निवारण की है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। 'अशुद्धि' और 'अमेध्यता' वास्तव में साधक के चित्त की अशुद्धि और उसके संकल्प की दुर्बलता है। जब साधक ओंकार का प्रयोग करता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं बोलता, बल्कि वह उस 'अक्षर' (अविनाशी तत्त्व) से जुड़ता है जो स्वयं शुद्ध और पूर्ण है। ओंकार के स्पर्श से मन्त्र की बाहरी त्रुटियाँ तो मिटती ही हैं, साथ ही साधक का वह आंतरिक भाव भी शुद्ध हो जाता है जो उस मन्त्र को 'अमेध्य' बना रहा था। अतः ओंकार यहाँ एक 'शोधक' और 'पुनर्जीवक' की भूमिका में है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सैषैकाक्षरर्ग्ब्रह्मणस्तपसोऽग्रे प्रादुर्बभूव ब्रह्मवेदस्याथर्वणं शुक्रम् अत एव मन्त्राः प्रादुर्बभूवुः स तु खलु मन्त्राणां अतपसासुश्रूषानध्यायाध्ययनेन यदूनं च विरिष्टं च यातयामं च करोति तदथर्वणां तेजसा प्रत्याप्याययेत् मन्त्राश्च मां अभिमुखीभवेयुर्गर्भा इव मातरं अभिजिघांसुः पुरस्तादोंकारं प्रयुङ्क्ते एतयैव तदृचा प्रत्याप्यायेत् एषैव यज्ञस्य पुरस्ताद्युज्यते एषा पश्चात् सर्वत एतया यज्ञस्तायते तदप्येतदृचोक्तम् या पुरस्ताद्युज्यत ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्निति तदेतदक्षरं ब्राह्मणो यं कामं इच्छेत्त्रिरात्रोपोषितः प्राङ्मुखो वाग्यतो बर्हिष्युपविश्य सहस्रकृत्व आवर्तयेत् सिध्यन्त्यस्यार्थाः सर्वकर्माणि चेति ब्राह्मणं ॥ १.२२ ॥
यह एकाक्षर ऋक् (ओंकार) ब्रह्मके तपसे सबसे पहले प्रकट हुई — ब्रह्मवेद (अथर्ववेद) का उज्ज्वल सार; इसीसे मन्त्र प्रकट हुए। जो मन्त्रोंका (प्रयोग करनेवाला) तपके अभाव, सेवाके अभाव, अनध्यायमें अध्ययन आदिसे (उनमें) कुछ कम, बिगड़ा और यातयाम (बासी, निःसार) कर देता है, उसे अथर्वणोंके तेजसे फिर भर दे — 'मन्त्र मेरे सम्मुख हों, जैसे गर्भ माताकी ओर' — (इसलिए) आगे ओंकारका प्रयोग करता है; इसी ऋक् (ओंकार) से फिर भरता है। यही यज्ञके आगे जोड़ी जाती है, यही पीछे; इसीसे यज्ञ सब ओर फैलाया जाता है। यह ऋचामें भी कहा है — 'ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्' (ऋचाएँ परम व्योममें अक्षरमें स्थित हैं)। जो ब्राह्मण जिस कामनाको चाहे, तीन रात उपवास करके, पूर्वमुख, मौन, कुशोंपर बैठकर इस अक्षरको हजार बार आवृत्त करे — उसके अर्थ और सब कर्म सिद्ध होते हैं।
गोपथ ब्राह्मण में स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति तप, सेवा और अध्ययन के अभाव में मन्त्रों को 'ऊन' (कम), 'विरिष्ट' (बिगड़ा हुआ) या 'यातयाम' (बासी) कर देता है, वह ओंकार के प्रयोग से उन्हें पुनः प्राप्त कर सकता है। वहाँ यह उल्लेख है कि ओंकार के प्रयोग से मन्त्र साधक की ओर वैसे ही आकर्षित होते हैं जैसे गर्भ माता की ओर खिंचा चला आता है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गोपथ ब्राह्मण की यह संगति सिद्ध करती है कि प्रणव केवल एक मंगलाचरण नहीं है, अपितु यह मन्त्रों की शक्ति को पुनः जाग्रत करने वाला एक वैज्ञानिक साधन है। जहाँ गोपथ ब्राह्मण इसे 'अथर्वणों के तेज' से जोड़ते हैं, वहीं यह स्मृति इसे ओंकार की अधिराज सत्ता से जोड़कर उसे सर्व-दोष-निवारक बताती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'पुनरुत्थान' का अभ्यास है। योग मार्ग पर चलते हुए कई बार साधक की एकाग्रता भंग होती है, उसकी साधना 'यातयाम' (बासी) हो जाती है या मन की अशुद्धि के कारण उसके मन्त्र निष्फल होने लगते हैं। ऐसे समय में साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि उसकी व्यक्तिगत त्रुटियाँ 'अक्षर' (ओंकार) के सम्मुख तुच्छ हैं।
अभ्यास यह है कि जब भी साधक को लगे कि उसका जप या ध्यान प्रभावहीन हो गया है, वह मन्त्र के शब्दों पर जोर देने के बजाय, आरम्भ में ओंकार के उस नाद में विलीन हो जाए जो समस्त ब्रह्माण्ड का मूल है। यह अभ्यास साधक को 'विकल' (विचलित) अवस्था से 'अविकल' (स्थिर और अखंड) अवस्था में ले जाता है। यहाँ ओंकार एक सेतु है, जो साधक की वर्तमान अशुद्ध स्थिति को उसकी मूल शुद्ध प्रकृति से जोड़ देता है।
अनूनं नातिरिक्तं च अच्छिद्रं याज्ञिकं तथा ।
मेध्यं शुद्धायातयामं पवित्रं मङ्गलं तथा ॥ २.१५४ ॥
…अन्यून, अनतिरिक्त, अच्छिद्र, याज्ञिक, मेध्य, शुद्ध, अयातयाम, पवित्र तथा मंगलमय हो जाता है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि ओंकार के प्रयोग से दोषपूर्ण मन्त्र भी 'अविकल' यानी अखंड और दोषरहित हो जाते हैं। वर्तमान श्लोक उसी परिपूर्णता के स्वरूप का विस्तार करता है, जहाँ वह स्पष्ट करते हैं कि प्रणव के स्पर्श से मन्त्र की स्थिति किस दिव्य अवस्था में परिवर्तित हो जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तद्) अनूनं, न अतिरिक्तं च, अच्छिद्रं, याज्ञिकं तथा, मेध्यं, शुद्धं, अयातयामं, पवित्रं, मङ्गलं तथा (भवति) ।
पदार्थ:
• अनून — जिसमें कोई कमी न हो; जो पूर्ण हो।
• न अतिरिक्त — जो आवश्यकता से अधिक न हो; जिसमें अतिशयता का दोष न हो।
• अच्छिद्र — जिसमें कोई छेद या रिक्तता न हो; जो अखंड हो।
• याज्ञिक — जो यज्ञ के योग्य हो; जिसमें वह ओज हो जो आहुति को लक्ष्य तक पहुँचा सके।
• मेध्य — जो मेध (यज्ञ) के लिए पवित्र और उपयुक्त हो।
• शुद्ध — जो दोषरहित हो; जिसमें स्वर, वर्ण या भाव की कोई अशुद्धि न हो।
• अयातयाम — जो बासी न हो; जो ताज़ा, जीवंत और वर्तमान क्षण में प्रभावी हो।
• पवित्र — जो स्वयं पावन हो और दूसरों को पावन करने की क्षमता रखता हो।
• मङ्गल — जो कल्याणकारी हो; जिससे साधक और जगत का शुभ हो।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक वास्तव में पिछले दो श्लोकों (२.१५२ और २.१५३) में वर्णित दोषों का प्रतिवाद और उनके निवारण का फल है। ऋषि कहते हैं कि जब ओंकार का प्रयोग किया जाता है, तो मन्त्र केवल 'दोषरहित' नहीं होता, अपितु वह अपनी उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर लेता है।
यहाँ 'अनून' और 'न अतिरिक्त' का अर्थ है कि मन्त्र की शक्ति संतुलित हो जाती है। योग में संतुलन ही सिद्धि है। यदि मन्त्र में कोई अक्षर छूट गया (न्यूनता) या कोई अनावश्यक ध्वनि जुड़ गई (अतिशयता), तो वह मन्त्र अपनी दिशा खो देता है। प्रणव उस मन्त्र को उसके मूल स्वरूप में प्रतिष्ठित कर उसे 'अनून' और 'न अतिरिक्त' बना देता है। 'अच्छिद्र' होने का अर्थ है कि मन्त्र की ध्वनि-धारा अब टूटेगी नहीं; वह एक अखंड प्रवाह बन जाती है।
'याज्ञिक' और 'मेध्य' शब्दों के माध्यम से याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि बाहरी यज्ञ की सफलता मन्त्र की शुद्धता पर टिकी है। यदि मन्त्र मेध्य नहीं है, तो वह अग्नि में समर्पित होने पर भी फल नहीं देगा। ओंकार उस मन्त्र में वह 'अग्नि-तत्व' भर देता है जिससे वह यज्ञ के योग्य हो जाता है। 'अयातयाम' का अर्थ है कि मन्त्र अब 'बासी' नहीं रहा। जिस प्रकार पुराना जल अपनी शक्ति खो देता है, वैसे ही बिना प्राण-शक्ति के मन्त्र केवल शब्द रह जाता है। ओंकार उसे 'अयातयाम' कर उसे वर्तमान की जीवंत ऊर्जा से जोड़ देता है। अंततः, वह मन्त्र 'पवित्र' और 'मङ्गल' होकर साधक के लिए मोक्ष और कल्याण का द्वार खोलता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शब्द-योग' और 'प्राण-शुद्धि' का अभ्यास है। जब साधक किसी मन्त्र का जप करता है, तो प्रायः मन की चंचलता के कारण मन्त्र में 'छिद्र' (गैप) आ जाते हैं या एकाग्रता के अभाव में मन्त्र 'यातयाम' (निःसार) हो जाता है। यहाँ ओंकार एक 'सेतु' का कार्य करता है।
साधक जब मन्त्र के आदि में ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में अपनी बिखरी हुई चेतना को एक बिंदु पर केंद्रित कर रहा होता है। ओंकार का वह नाद साधक के भीतर के सभी 'छिद्रों' को भर देता है। अभ्यास यह है कि साधक अनुभव करे कि ओंकार के प्रयोग से उसका मन्त्र केवल होंठों से निकलने वाला शब्द नहीं, बल्कि हृदय की एक अखंड ध्वनि बन गया है।
यह प्रक्रिया साधक को 'अशुद्ध' भूमि से 'शुद्ध' भूमि की ओर ले जाती है। जहाँ मन्त्र केवल एक विधि था, वहाँ वह अब 'मङ्गल' और 'पवित्र' अनुभव बन जाता है। यह अनुभव साधक को यह बोध कराता है कि पूर्णता बाहर से नहीं आती, बल्कि जब हम मूल (ओंकार) से जुड़ते हैं, तो हमारी हर त्रुटि स्वतः परिपूर्ण हो जाती है। इस प्रकार, साधक मन्त्र के माध्यम से स्वयं के व्यक्तित्व को 'अनून' और 'अच्छिद्र' बनाने का अभ्यास करता है।
प्रणवज्ञानफलम्
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वब्रह्ममयं विभुम् ।
पावनं मोक्षदं पुण्यं सर्वदेवमयं विभुम् ॥ २.१५५ ॥
जो सब मंगलों का भी मंगल है, सब ब्रह्ममय और सर्वव्यापक है, पावन करने वाला, मोक्ष देने वाला, पुण्य स्वरूप और सब देवताओं से युक्त सर्वव्यापक है...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि ओंकार के प्रयोग से मन्त्र अपनी समस्त त्रुटियों से मुक्त होकर पवित्र और मङ्गलमय हो जाता है। वर्तमान श्लोक उस मङ्गलमयता के वास्तविक स्वरूप और प्रणव की उस व्यापक सत्ता का उद्घाटन करता है, जो मन्त्र को केवल शुद्ध नहीं करती, अपितु उसे ब्रह्ममय बना देती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः) सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं, सर्वब्रह्ममयं, विभुः, पावनं, मोक्षदं, पुण्यं, सर्वदेवमयं, विभुः (अस्ति) ।
पदार्थ:
• सर्वमङ्गलमाङ्गल्यम् — समस्त मंगलों का भी मंगल; अर्थात् संसार के जितने भी शुभ फल हैं, उन सब का मूल और उच्चतम शिखर।
• सर्वब्रह्ममयम् — जिसमें समस्त ब्रह्म (सगुण और निर्गुण) समाहित है; जो स्वयं ब्रह्म स्वरूप है।
• विभुम् — सर्वव्यापक; जो देश, काल और परिस्थिति की सीमाओं से परे हर जगह व्याप्त है।
• पावनम् — पवित्र करने वाला; जो साधक के चित्त और वाणी के मल को धोकर उसे शुद्ध कर दे।
• मोक्षदम् — मुक्ति प्रदान करने वाला; जो जन्म-मृत्यु के चक्र से विच्छेद करने की क्षमता रखता है।
• पुण्यम् — परम पवित्र; जिसका स्वभाव ही पुण्य है और जो पुण्य का अक्षय स्रोत है।
• सर्वदेवमयम् — समस्त देवताओं के स्वरूपों से युक्त; जहाँ सभी देव-शक्तियाँ एक ही बिंदु में विलीन हो जाती हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्रणव की उस महिमा का गान है, जो उसे केवल एक 'मन्त्र-आरम्भक' (मन्त्र के शुरू में लगाया जाने वाला शब्द) से उठाकर 'परब्रह्म' के रूप में प्रतिष्ठित करता है। पिछले श्लोकों में ऋषि ने बताया कि ओंकार मन्त्रों के दोषों को दूर करता है, किन्तु यहाँ वे उस 'दोष-निवारण' के पीछे की शक्ति का रहस्य खोल रहे हैं।
जब ऋषि कहते हैं कि ओंकार "सर्वमङ्गलमाङ्गल्यम्" है, तो भाव यह है कि संसार में जिसे हम मंगल मानते हैं—सुख, शांति, समृद्धि—वे सब क्षणभंगुर हैं। परन्तु ओंकार वह मंगल है जो इन सब का आधार है और इनसे परे है। यह वह 'महा-मंगल' है जो साधक को केवल भौतिक लाभ नहीं, अपितु आत्मिक आनंद प्रदान करता है।
"सर्वब्रह्ममयम्" और "विभुम्" शब्दों के माध्यम से याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट करते हैं कि ओंकार कोई बाहरी ध्वनि नहीं, बल्कि वह सर्वव्यापक चेतना है जो कण-कण में व्याप्त है। जब साधक 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में उस विभु सत्ता से अपना जुड़ाव स्थापित करता है।
"पावनम्" और "पुण्यम्" का अर्थ यहाँ केवल कर्मकाण्डीय शुद्धि नहीं है, अपितु चित्त की वह अवस्था है जहाँ राग-द्वेष का क्षय हो जाता है। "सर्वदेवमयम्" का रहस्य यह है कि समस्त देवता वास्तव में ब्रह्म के ही विभिन्न रूप हैं; अतः जो ओंकार में प्रतिष्ठित हो गया, उसने सभी देवताओं की शक्तियों को एक साथ प्राप्त कर लिया।
यह श्लोक पिछले श्लोक (२.१५४) के 'मङ्गल' शब्द का विस्तार है। पिछले श्लोक में मन्त्र मङ्गलमय हुआ, और यहाँ उस मङ्गल का स्रोत—प्रणव—स्वयं ब्रह्म और मोक्षस्वरूप सिद्ध हुआ। यह वाक्य अगले श्लोक (२.१५६) तक विस्तृत है, जहाँ इस विभु सत्ता को 'जानने' से होने वाली मुक्ति का वर्णन है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधना के फल' और 'साध्य के स्वरूप' का परिचय देता है। जब साधक ओंकार का जप करता है, तो वह केवल एक शब्द का उच्चारण नहीं कर रहा होता, बल्कि वह अपने भीतर के 'विभु' (सर्वव्यापक) तत्व का आह्वान कर रहा होता है।
अभ्यास की दृष्टि से साधक यहाँ तीन स्तरों का अनुभव करता है:
१. पावनता का अनुभव: जप के आरम्भ में ओंकार 'पावन' बनकर मन के विकारों को धोता है।
२. देवत्व का अनुभव: जैसे-जैसे एकाग्रता बढ़ती है, साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर समस्त देव-शक्तियाँ (सर्वदेवमयम्) जाग्रत हो रही हैं।
३. ब्रह्म-अनुभव: अंततः साधक उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ केवल 'विभु' ब्रह्म शेष रहता है।
यह श्लोक साधक को 'मन्त्र-साधना' से 'ब्रह्म-साधना' की ओर ले जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि ओंकार के उच्चारण के समय केवल ध्वनि पर ध्यान न रहे, बल्कि इस भाव का समावेश हो कि "मैं उस सर्वव्यापक, मोक्षद और ब्रह्ममय सत्ता में विलीन हो रहा हूँ।" यह भाव साधक को स्थूल जगत के मंगलों से उठाकर उस सनातन मंगल की ओर ले जाता है, जो जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करता है।
विदित्वा मुच्यते क्षिप्रं जन्मसंसारबन्धनात् ।
मुक्तो न जायते भूयो ब्रह्मभूतः सनातनः ॥ २.१५६ ॥
...उसको जानकर मनुष्य जन्म-संसार के बंधन से शीघ्र मुक्त हो जाता है; वह सनातन ब्रह्मस्वरूप होकर पुनः जन्म नहीं लेता।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव को सर्वमङ्गलमय, सर्वब्रह्ममय और मोक्षप्रद बताया। वर्तमान श्लोक उस मोक्ष की प्रक्रिया और उसकी अंतिम अवस्था का उद्घाटन करता है कि ओंकार का यह ज्ञान साधक के जीवन में किस प्रकार निर्णायक परिवर्तन लाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः ओंकारः) विदित्वा मुच्यते क्षिप्रं जन्म-संसार-बन्धनात् । मुक्तः न जायते भूयः, (सः) सनातनः ब्रह्मभूतः (भवति) ।
पदार्थ:
• विदित्वा — जानकर; यहाँ 'जानने' का अर्थ केवल बौद्धिक सूचना या शब्दों का ज्ञान नहीं, अपितु 'साक्षात्कार' (अनुभूति) है।
• मुच्यते — मुक्त हो जाता है; बन्धन का विच्छेद हो जाता है।
• क्षिप्रं — शीघ्र; बिना किसी विलम्ब के, क्योंकि यह ज्ञान सीधे मूल कारण पर प्रहार करता है।
• जन्म-संसार-बन्धनात् — जन्म और मृत्यु के पुनरावृत्ति वाले चक्र के बन्धन से।
• न जायते भूयः — पुनः जन्म नहीं लेता; पुनर्जन्म की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
• ब्रह्मभूतः — ब्रह्म के स्वरूप में स्थित; जब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाए और केवल ब्रह्म शेष रहे।
• सनातनः — वह जो समय की सीमाओं से परे है; जिसका न आदि है न अन्त।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्रणव-साधना के चरम फल की घोषणा करता है। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि ओंकार केवल मन्त्रों की त्रुटियों को सुधारने वाला साधन नहीं है, अपितु वह स्वयं साध्य है।
वाक्य की संरचना पिछले श्लोकों से जुड़ी है, जहाँ ओंकार के गुणों का वर्णन था। यहाँ क्रिया 'विदित्वा' (जानकर) यह संकेत देती है कि मुक्ति का आधार 'क्रिया' नहीं, बल्कि 'ज्ञान' है। जब साधक ओंकार के उस स्वरूप को 'जान' लेता है जो अमात्र है, जो शब्द से परे है और जो सर्वव्यापक विभु है, तब वह जन्म-संसार के बन्धन से 'क्षिप्रं' अर्थात् शीघ्र मुक्त हो जाता है। यह शीघ्रता इसलिए है क्योंकि ओंकार वह सेतु है जो स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अक्षर की ओर ले जाता है। जब साधक इस सेतु को पार कर अक्षर में स्थित हो जाता है, तो अविद्या का पर्दा गिर जाता है और बन्धन स्वतः टूट जाता है।
'मुक्तो न जायते भूयः' का भाव यह है कि पुनर्जन्म का कारण 'अतृप्त कामनाएँ' और 'अविद्या' हैं। ओंकार का ज्ञान साधक को पूर्णता (पूर्णत्व) का अनुभव कराता है। जिसे पूर्णता मिल गई, उसे फिर से कुछ पाने के लिए इस संसार में आने की आवश्यकता नहीं रहती। वह 'ब्रह्मभूत' हो जाता है—अर्थात् वह अब शरीर या मन नहीं, बल्कि स्वयं उस सनातन चैतन्य का अनुभव करता है जो सदा से था, है और रहेगा। यह अवस्था 'सनातन' है क्योंकि यह काल के अधीन नहीं है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ज्ञान-योग' और 'लय-योग' का संगम है। यहाँ 'जानना' एक विशिष्ट योगिक अभ्यास है। साधक जब ओंकार का जप करता है, तो वह पहले शब्द (वैखरी) से शुरू करता है, फिर सूक्ष्म ध्वनि (मध्यमा) में जाता है और अंततः उस मौन (पश्यन्ती) में विलीन हो जाता है जहाँ केवल 'अमात्र ओंकार' शेष रहता है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह ओंकार के उच्चारण और उसके बाद आने वाले 'मौन' के बीच के सम्बन्ध को पहचाने। वह मौन ही वह 'ज्ञान' है जिससे मुक्ति मिलती है। जब साधक अनुभव करता है कि वह स्वयं वही ओंकार है, तब वह 'ब्रह्मभूत' होने की भूमि पर पहुँच जाता है। यह यात्रा 'अविद्या' की भूमि से 'विद्या' की भूमि तक की है।
यहाँ मुक्ति का अर्थ शरीर का नष्ट होना नहीं, बल्कि 'अहंकार' का विसर्जन है। जब 'मैं' का भाव ओंकार के विराट स्वरूप में विलीन हो जाता है, तब जन्म-मरण का चक्र रुक जाता है क्योंकि जन्म और मृत्यु केवल 'अहंकार' (जीवात्मा) के लिए होते हैं, 'ब्रह्म' के लिए नहीं। अतः, ओंकार का साक्षात्कार ही वास्तविक मोक्ष है।
ओंकारनिरूपणोपसंहारः
एतत् संक्षेपतः प्रोक्तमोंकारगुणवर्णनम् ।
विस्तरेण न शक्यन्ते वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ २.१५७ ॥
यह ओंकार के गुणों का संक्षेप में कहा गया वर्णन है; जिसे सैकड़ों वर्षों तक विस्तार से कहना भी संभव नहीं है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के साक्षात्कार से होने वाली शीघ्र मुक्ति और सनातन ब्रह्मभाव की प्राप्ति का वर्णन किया। अब वर्तमान श्लोक में वे इस संपूर्ण 'ओंकार-निर्णय' प्रकरण का उपसंहार करते हुए उसकी अगाधता का संकेत दे रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (इदं) ओंकार-गुण-वर्णनम् एतत् संक्षेपतः प्रोक्तम् । (तस्य गुणान्) विस्तरेण वर्ष-शतैरपि वक्तुं न शक्यन्ते ।
पदार्थ:
• संक्षेपतः — संक्षिप्त रूप में; केवल मुख्य सिद्धांतों और अनिवार्य रहस्यों के माध्यम से।
• प्रोक्तम् — कहा गया है; यहाँ 'प्रोक्त' शब्द यह दर्शाता है कि यह ज्ञान परंपरा से प्राप्त और अब शिष्य के सम्मुख प्रस्तुत किया गया है।
• विस्तरेण — विस्तारपूर्वक; जब प्रत्येक सूक्ष्म अनुभव, प्रत्येक अवस्था और प्रत्येक आयाम को अलग-अलग खोला जाए।
• वर्षशतैरपि — सैकड़ों वर्षों तक भी; यहाँ 'शत' (सौ) संख्या केवल गिनती नहीं, बल्कि समय की उस दीर्घता का प्रतीक है जो मानवीय जीवन की सीमाओं से परे है।
• न शक्यन्ते — संभव नहीं है; क्योंकि अनंत का वर्णन परिमित शब्दों में नहीं किया जा सकता।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य की ओर संकेत कर रहे हैं। उन्होंने पिछले श्लोकों में ओंकार को मन्त्रों का अधिराज, दोषों का निवारक, मोक्षप्रद और ब्रह्ममय बताया। किंतु यहाँ वे विनम्रतापूर्वक यह स्वीकार करते हैं कि जो कुछ भी उन्होंने कहा, वह केवल एक 'संक्षेप' था।
भाव यह है कि ओंकार कोई शब्द या ध्वनि मात्र नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण सृष्टि का बीज है। जिस प्रकार एक बीज के भीतर विशाल वटवृक्ष की संपूर्ण संभावनाएँ छिपी होती हैं, उसी प्रकार 'ॐ' के भीतर समस्त वेदों का सार, समस्त देवताओं की शक्ति और संपूर्ण ब्रह्माण्ड का इतिहास समाहित है। जब ऋषि कहते हैं कि "सैकड़ों वर्षों में भी विस्तार संभव नहीं", तो उनका तात्पर्य यह है कि ओंकार के गुणों का वर्णन केवल वाणी (वाक्) से नहीं किया जा सकता। वाणी केवल संकेत दे सकती है, अनुभव नहीं करा सकती।
यह स्मृति यहाँ एक सूक्ष्म भेद स्पष्ट करती है: 'वर्णन' और 'अनुभूति' का भेद। वर्णन शब्दों का खेल है, जो सीमित है; जबकि ओंकार का गुण 'अनंत' है। जो अनंत है, उसे सीमित शब्दों में बांधना असंभव है। अतः याज्ञवल्क्य ने केवल उन सूत्रों को दिया है जो साधक को उस अनंत की ओर ले जाएँ। यह संक्षेप वास्तव में साधक के लिए एक मानचित्र की भाँति है, जिसे लेकर उसे स्वयं की आंतरिक यात्रा पर निकलना है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मौन' की महत्ता को स्थापित करता है। जब ऋषि कहते हैं कि विस्तार संभव नहीं है, तो वे साधक को शब्दों के जाल से निकालकर 'अनुभव' की भूमि पर खड़ा कर देते हैं।
योगिक अभ्यास में इसका अर्थ यह है कि ओंकार का जप करते समय साधक केवल उसके गुणों के बारे में सोचे नहीं, बल्कि उन गुणों को स्वयं में घटित होते देखे। जब साधक 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह केवल एक अक्षर नहीं बोल रहा होता, बल्कि वह उस विराट सत्ता के साथ एकाकार होने का प्रयास कर रहा होता है।
साधक यहाँ इस बात का अनुभव करता है कि ज्ञान की एक सीमा होती है जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं और केवल 'होना' शेष रहता है। यह श्लोक साधक को 'शब्द-ब्रह्म' से 'अक्षर-ब्रह्म' की ओर ले जाता है। अभ्यास यह है कि संक्षेप में दिए गए सूत्रों को आधार बनाकर, अपनी अंतरात्मा में उस विस्तार को खोजा जाए। जो सौ वर्षों के वर्णन में भी नहीं मिल सकता, वह एक क्षण के पूर्ण समर्पण और अमात्र ओंकार के साक्षात्कार में प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार साधक बौद्धिक विमर्श (विस्तार) को छोड़कर प्रत्यक्ष अनुभव (संक्षेप/सार) की भूमि पर प्रतिष्ठित होता है।
योगाचार्येण संचिन्त्य याज्ञवल्क्येन धीमता ।
ओंकारनिर्णयो ह्येष प्रोक्तः शिष्यहितैषिणा ॥
श्लोकानां द्वे शते प्रोक्ते निर्णयः समुदाहृतः ॥ २.१५८ ॥
योगाचार्य, बुद्धिमान्, शिष्योंके हितैषी याज्ञवल्क्यने विचार करके यह ओंकारनिर्णय कहा है। (इसमें) दो सौ श्लोकोंमें निर्णय कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के अनंत गुणों की अगाधता को स्वीकार करते हुए कहा कि इसका पूर्ण वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी संभव नहीं है। अब वर्तमान श्लोक में वे इस संपूर्ण 'ओंकार-निर्णय' प्रकरण का उपसंहार करते हुए इस ज्ञान के प्रदाता और उसके उद्देश्य को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: धीमता योगाचार्येण शिष्यहितैषिणा याज्ञवल्क्येन संचिन्त्य ह्येष ओंकारनिर्णयः प्रोक्तः । (तस्मिन्) प्रोक्ते श्लोकानां द्वे शते, निर्णयः समुदाहृतः ।
पदार्थ:
• योगाचार्येण — योग के आचार्य द्वारा; वह जो केवल योग का ज्ञाता नहीं, अपितु योग के आचरण में सिद्ध है और दूसरों को उस मार्ग पर ले जाने में समर्थ है।
• संचिन्त्य — विचार करके; यहाँ 'चिन्तन' केवल बौद्धिक तर्क नहीं, बल्कि समाधि-अवस्था में प्राप्त प्रत्यक्ष अनुभव और श्रुति के समन्वय का नाम है।
• धीमता — बुद्धिमान्; जिसकी बुद्धि सात्विक है और जो अक्षर-ब्रह्म के स्वरूप को जानने में सक्षम है।
• शिष्यहितैषिणा — शिष्यों के हित की इच्छा रखने वाले; यह गुरु के वात्सल्य और करुणा को दर्शाता है, जिसके बिना ज्ञान का संचार संभव नहीं।
• समुदाहृतः — संकलित या पूर्ण रूप से प्रस्तुत; यहाँ इसका अर्थ है कि ओंकार के विविध आयामों को एक सूत्र में पिरोकर निर्णय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
• द्वे शते — दो सौ; यह संख्या इस प्रकरण की व्यापकता को दर्शाती है (यद्यपि वर्तमान पाठ में श्लोकों की संख्या भिन्न है, किंतु यह मूल विस्तार का संकेत है)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस अंतिम श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्वयं को एक 'योगाचार्य' के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह केवल एक परिचय नहीं, अपितु इस ज्ञान की प्रामाणिकता का प्रमाण है। जब वे कहते हैं कि यह निर्णय 'संचिन्त्य' (विचार करके) कहा गया है, तो इसका रहस्य यह है कि यह ज्ञान केवल शास्त्रों के पठन से नहीं, बल्कि योग की उच्चतम अवस्था में ओंकार के साथ एकाकार होने के अनुभव से निकला है।
यहाँ 'धीमता' शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए है कि ओंकार का रहस्य केवल तर्क से नहीं, बल्कि उस प्रज्ञा (धी) से खुलता है जो योग-साधना से जाग्रत होती है। याज्ञवल्क्य जी ने इस ज्ञान को 'शिष्यहितैषिणा' कहकर साझा किया है। रहस्य यह है कि ब्रह्म-विद्या गुप्त रखी जाती है, किंतु जब गुरु को शिष्य के भीतर पात्रता और उसके कल्याण की तीव्र इच्छा दिखती है, तभी वह 'अक्षर' के द्वार खोलता है।
इस प्रकरण में उन्होंने ओंकार के स्वरूप, उसकी मात्राओं, उसके प्रभाव और उसकी मुक्ति-शक्ति का जो निर्णय दिया है, वह साधक के लिए एक पूर्ण मार्गदर्शिका है। दो सौ श्लोकों का उल्लेख यह बताता है कि ओंकार के सूक्ष्म भेदों को समझाने के लिए एक विस्तृत विमर्श आवश्यक था, ताकि साधक के मन में कोई संशय न रहे। इस प्रकार, यह उपसंहार इस बात की पुष्टि करता है कि यह संपूर्ण अध्याय केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक सिद्ध योगी का अनुभव-सार है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'गुरु-तत्व' और 'समर्पण' के अभ्यास का संकेत है। किसी भी मन्त्र या योग-विधि का फल तब तक नहीं मिलता, जब तक वह किसी 'योगाचार्य' के सान्निध्य में, उनके द्वारा 'संचिन्त्य' (अनुभवसिद्ध) किए गए मार्ग पर चलकर प्राप्त न किया जाए।
यहाँ साधक के लिए यह संदेश है कि ओंकार का जप केवल ध्वनि का उच्चारण नहीं, बल्कि उस 'धी' (बुद्धि) का जागरण है जिससे वह स्वयं को अक्षर-ब्रह्म में विलीन कर सके। जब साधक यह अनुभव करता है कि यह ज्ञान उसके 'हित' के लिए दिया गया है, तो उसके भीतर कृतज्ञता का भाव जाग्रत होता है। यही कृतज्ञता उसे 'शिष्य-भूमि' से उठाकर 'साधक-भूमि' में ले जाती है।
इस अध्याय का समापन यह सिखाता है कि योग-साधना का अंतिम लक्ष्य 'निर्णय' तक पहुँचना है—अर्थात वह अवस्था जहाँ अब कोई प्रश्न शेष न रहे, केवल अनुभव शेष रहे। साधक इस श्लोक के माध्यम से अपनी साधना को गुरु के चरणों में समर्पित कर, ओंकार के उस स्वरूप में स्थित होने का अभ्यास करता है जिसे याज्ञवल्क्य ने अपनी प्रज्ञा से साक्षात्कार किया था।