श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, तृतीयोऽध्यायः

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यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके तृतीयोऽध्यायः — व्याहृतिनिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।

तृतीयोऽध्यायः — व्याहृतिनिर्णयः

अध्याय-सार — व्याहृतिनिर्णय। पूर्वकल्पमें स्वयम्भूने सात व्याहृतियाँ कहीं (३.१) — भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् — और वे ही सात लोक हैं; उनकी संख्या तीन, चार, पाँच या सात माननेके मत भी दिये गये हैं। चौदह प्रकारकी सृष्टिको देखकर (स्वयम्भूने इन्हें) स्वयं ‘व्याहृत’ किया, इसलिए ये व्याहृतियाँ कहलाती हैं (३.७)। इनके स्मरणका फल, ऋषि, छन्द, देवता और प्राणायाममें इनका विनियोग बताकर अध्याय सात लोकोंका वर्णन करता है; फिर ब्रह्माण्डका, जो सातवें पातालसे ऊपरतक है, नीचेका आधा रजतमय और ऊपरका हिरण्मय (३.२४), और उसकी उत्पत्ति और लयका। ब्रह्मलोकमें रहनेवालोंकी मुक्तिका समय बताया गया है; और जो व्याहृतियोंका उच्चारण करते हुए प्राण छोड़ता है, उसका व्यक्त और अव्यक्त क्षणभरमें पुरुषमें लीन हो जाता है (३.३०)।

व्याहृतिनिर्णयप्रतिज्ञा · व्याहृतिसंख्यायां मतभेदः

श्लोक ३.१

अतः परं प्रवक्ष्यामि व्याहृतीनां च निर्णयम् ।

सप्त व्याहृतयः प्रोक्ताः पुराकल्पे स्वयंभुवा ॥ ३.१ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २८

इसके आगे मैं व्याहृतियों का निर्णय कहूँगा। पूर्वकल्प में स्वयम्भू द्वारा सात व्याहृतियाँ कही गई हैं...

अवतरणिका —

पिछले खण्ड में ओंकार के स्वरूप और उसकी महिमा का विवेचन हुआ। अब ऋषि याज्ञवल्क्य उस बीज-अक्षर से प्रस्फुटित होने वाली उन ध्वनियों का निर्णय कर रहे हैं, जो सृष्टि के विस्तार का आधार हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: अतः परं (अतः इसके आगे) अहं व्याहृतीनां च निर्णयम् प्रवक्ष्यामि। पुराकल्पे स्वयंभुवा सप्त व्याहृतयः प्रोक्ताः।

पदार्थ:

• निर्णयम्: यहाँ निर्णय का अर्थ केवल विवाद का निपटारा नहीं, अपितु 'निश्चय' या 'तत्व-बोध' है। वह सत्य जिसे जानकर साधक संशय से मुक्त हो जाए।

• व्याहृतयः: 'वि + आ + हृ' धातु से बना है। जिसका अर्थ है—वह शब्द जिसे स्पष्ट रूप से उच्चारित किया गया हो। जो अव्यक्त (अक्षर) था, उसका व्यक्त रूप 'व्याहृति' है।

• पुराकल्पे: सृष्टि के आदि समय में, जब प्रथम अभिव्यक्ति हुई।

• स्वयंभुवा: स्वयं उत्पन्न होने वाले, अर्थात् प्रजापति या ब्रह्मा द्वारा।

भाष्य —

ऋषि याज्ञवल्क्य इस श्लोक से व्याहृति-निर्णय के प्रकरण का आरम्भ करते हैं। वे कहते हैं कि अब मैं व्याहृतियों के वास्तविक स्वरूप का निश्चय करूँगा। यहाँ 'निर्णय' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाहरी कर्मकाण्ड में व्याहृतियों को केवल मन्त्रों के आरम्भ में बोले जाने वाले शब्दों के रूप में देखा जाता है, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ उनके उस स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं जो सृष्टि के मूल में है।

वे बताते हैं कि पूर्वकल्प में स्वयम्भू (ब्रह्मा) ने सात व्याहृतियों का उच्चारण किया था। इसका अर्थ यह है कि यह ब्रह्माण्ड किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं, अपितु 'ध्वनि' (शब्द-ब्रह्म) का विस्तार है। जब निराकार ब्रह्म ने स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहा, तो सबसे पहले सात दिव्य ध्वनियाँ प्रस्फुटित हुईं। ये सात व्याहृतियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि सात आयाम, सात लोक और सात चेतना-स्तर हैं।

बाहरी दृष्टि से यह विधि है कि जप या संध्या के समय व्याहृतियों का प्रयोग किया जाए, किन्तु आन्तर अर्थ यह है कि साधक जब इन व्याहृतियों का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को उन सात स्तरों पर ले जा रहा होता है जहाँ से सृष्टि का आरम्भ हुआ था। यह प्रक्रिया स्थूल से सूक्ष्म की ओर गमन है।

श्रुति-संगति —

व्याहृतियों के इस प्राकट्य की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में मिलती है:

शतपथ ब्राह्मण

स संवत्सरे व्याजिहीर्षत् स भूरिति व्याहरत्सेयं पृथिव्यभवद्भुव इति तदितमन्तरिक्षमभवत्स्वरिति सासौ द्यौरभवत्तस्मादु संवत्सर एव कुमारो व्याजिहीर्षति संवत्सरे हि प्रजापतिर्व्याहरत् ॥ ११.१.६.३ ॥

संवत्सर (पूरा होने) पर उसने बोलना चाहा। उसने "भूः" कहा — वह यह पृथिवी हुई; "भुवः" कहा — वह यह अन्तरिक्ष हुआ; "स्वः" कहा — वह वह द्युलोक हुआ। इसीलिए बालक संवत्सरमें बोलना चाहता है, क्योंकि प्रजापतिने संवत्सरमें ही (पहले) बोला।

शतपथ ब्राह्मण ११.१.६.३माध्यन्दिन पाठ · thevyasa.in

इस श्रुति-अंश से स्पष्ट है कि प्रजापति ने जब 'भूः', 'भुवः' और 'स्वः' का उच्चारण किया, तो वे क्रमशः पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक के रूप में प्रकट हुए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ 'सप्त' (सात) की संख्या दी गई है, जो इस सत्य को और विस्तार देती है कि अभिव्यक्ति केवल तीन लोकों तक सीमित नहीं थी, अपितु सात स्तरों तक विस्तृत थी। श्रुति जहाँ अभिव्यक्ति की क्रिया (व्याहृत करना) बताती है, वहीं यह स्मृति उन ध्वनियों के संख्यात्मक और योगिक निश्चय की ओर ले जाती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से व्याहृति ब्रह्मा की 'प्रथम वाणी' है। साधक जब इन व्याहृतियों का अभ्यास करता है, तो वह केवल शब्दों का जप नहीं करता, बल्कि सृष्टि के आदि-शब्द को अपने भीतर दोहराता है।

इसका अभ्यास इस प्रकार है: जब साधक 'भूः' से 'सत्यम्' तक की व्याहृतियों का स्मरण करता है, तो वह अपनी चेतना को पृथ्वी-तत्व से उठाकर क्रमशः उच्चतर लोकों की ओर ले जाता है। यह एक प्रकार का 'ध्वनि-योग' है। जिस प्रकार स्वयम्भू ने इन शब्दों से ब्रह्माण्ड की रचना की, उसी प्रकार साधक इन शब्दों के माध्यम से अपने भीतर के ब्रह्माण्ड का पुनर्गठन करता है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसकी वाणी का स्रोत वही दिव्य वाणी है जिसने सृष्टि की रचना की। यहाँ अभ्यास यह है कि प्रत्येक व्याहृति को केवल होंठों से न बोलकर, उसे एक 'स्पंदन' के रूप में अनुभव किया जाए, जिससे साधक की चेतना जड़ता से मुक्त होकर चैतन्य के उच्च स्तरों की ओर अग्रसर होती है।

श्लोक ३.२

तान्येव सप्त च्छन्दांसि लोकाः सप्त प्रकीर्तिताः ।

त्रिधा चतुर्धा विज्ञेया(ः) पंचधा सप्तधा पुनः ॥ ३.२ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २८

वे ही सात छन्द हैं और सात लोक कहे गए हैं; वे तीन, चार, पाँच और पुनः सात प्रकार के जाननी चाहिए।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि पूर्वकल्प में स्वयम्भू द्वारा सात व्याहृतियों का प्रकटीकरण हुआ। अब इस श्लोक में वे उन व्याहृतियों के बहुआयामी स्वरूप और उनकी संख्या के विभिन्न मतों का विश्लेषण कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: तानि एव सप्त च्छन्दांसि (तनि एव सप्त व्याहृतयः) लोकाः सप्त प्रकीर्तिताः। (तानि व्याहृतयः) त्रिधा, चतुर्धा, पंचधा, सप्तधा पुनः विज्ञेयाः।

पदार्थ:

• छन्दांसि: छन्द का शाब्दिक अर्थ है 'अनुकूलन' या 'छानना'। यहाँ व्याहृतियों को छन्द कहा गया है क्योंकि ये चेतना को स्थूल से सूक्ष्म की ओर छानकर ले जाने वाले माध्यम हैं।

• लोकाः: लोक का अर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं, अपितु 'अनुभव की अवस्था' है।

• प्रकीर्तिताः: शास्त्र-प्रमाणों द्वारा घोषित या प्रसिद्ध।

• विज्ञेयाः: 'वि + ज्ञा' धातु। केवल जानना नहीं, अपितु अनुभव द्वारा प्रमाणित करना। यहाँ यह विधिलिङ् में है, जो साधक को इनके भेदों के विवेकपूर्ण ज्ञान का निर्देश देता है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं कि जो सात व्याहृतियाँ ध्वनि-रूप में प्रकट हुईं, वे ही वास्तव में सात छन्द हैं और वे ही सात लोक हैं। इसका भाव यह है कि ध्वनि (व्याहृति), लय (छन्द) और अस्तित्व (लोक) अलग-अलग नहीं हैं। जब एक विशिष्ट ध्वनि का उच्चारण या ध्यान किया जाता है, तो वह एक विशिष्ट लय उत्पन्न करती है, और वही लय साधक को एक विशिष्ट लोक या चेतना-स्तर पर प्रतिष्ठित कर देती है। अतः व्याहृति ही वह कुंजी है जिससे लोकों के द्वार खुलते हैं।

आगे ऋषि कहते हैं कि इन व्याहृतियों को तीन, चार, पाँच और पुनः सात प्रकार से जानना चाहिए। प्रथम दृष्टि में यह संख्या का विरोधाभास लग सकता है, किन्तु रहस्य यह है कि संख्या का यह भेद 'दृष्टि' और 'साधना के स्तर' का भेद है।

१. त्रिधा: सामान्यतः प्रयुक्त 'भूः भुवः स्वः' का समूह, जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का प्रतिनिधित्व करता है।

२. चतुर्धा: यहाँ चार की संख्या का स्पष्ट उल्लेख अगले श्लोकों में नहीं है, किन्तु संभवतः यह उस गुप्त परंपरा की ओर संकेत है जहाँ तीन व्याहृतियों के साथ चौथी व्याहृति 'महः' को जोड़ा जाता है।

३. पंचधा: सामवेद के गायन और विशिष्ट यज्ञीय विधानों में प्रयुक्त पाँच व्याहृतियों का समूह।

४. सप्तधा: प्राणायाम और उच्चतम योग-साधना में प्रयुक्त सातों व्याहृतियों (भूः से सत्यम् तक) का पूर्ण क्रम।

अतः, व्याहृतियों की संख्या स्थिर नहीं है, अपितु साधक जिस सोपान पर है, उसके लिए व्याहृति का विस्तार उतना ही होता जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

तैत्तिरीय उपनिषद्

भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामु ह स्मैतां चतुर्थीम् । माहाचमस्यः प्रवेदयते । मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः ॥ १.५.१ ॥

भूः, भुवः, सुवः — ये तीन व्याहृतियाँ हैं। उनमें इस चौथी (व्याहृति) को माहाचमस्य (ऋषि) बताते थे — 'महः'। वह ब्रह्म है, वह आत्मा है; अन्य देवता (उसके) अङ्ग हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद् १.५.१उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 149

तैत्तिरीय उपनिषद् में भी इसी संख्या-भेद की पुष्टि मिलती है। वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि 'भूः भुवः स्वः' तीन व्याहृतियाँ हैं, किन्तु ऋषि माहाचमस्य ने चौथी व्याहृति 'महः' का बोध कराया, जिसे ब्रह्म और आत्मा कहा गया है। यह इस स्मृति के 'चतुर्धा' (चार प्रकार) के संकेत से पूर्णतः मेल खाता है। यह सिद्ध करता है कि जैसे-जैसे साधक सूक्ष्मता की ओर बढ़ता है, उसे नई व्याहृतियों का उद्घाटन होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'क्रमिक आरोहण' का विज्ञान है। योग में संख्या केवल गिनती नहीं, बल्कि 'भूमिका' है।

जब साधक केवल बाहरी जगत और प्राणों के स्थूल संतुलन में होता है, तब उसके लिए 'त्रिधा' (तीन) व्याहृतियाँ पर्याप्त हैं। किन्तु जैसे ही वह सूक्ष्म शरीर के रहस्यों में प्रवेश करता है, उसे चौथी और पाँचवीं व्याहृति का अनुभव होता है। जब वह पूर्ण योग-सिद्धि और प्राणायाम के माध्यम से अपनी चेतना को 'सत्य' (परम तत्व) तक ले जाना चाहता है, तब वह सातों व्याहृतियों के पूर्ण समूह का अभ्यास करता है।

अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि वह जिस व्याहृति का उच्चारण कर रहा है, वह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक संपूर्ण लोक (अवस्था) है। जितना ऊपर वह चढ़ता है, उतनी ही व्याहृतियाँ उसकी चेतना में सक्रिय होती हैं। यह श्लोक साधक को यह सिखाता है कि साधना में 'संख्या' का अर्थ 'विस्तार' है—जितना अधिक विस्तार, उतनी ही गहरी अनुभूति।

श्लोक ३.३

भूर्भुवःस्वरिति ज्ञेया अव्यस्तास्ताः प्रकीर्तिताः ।

पञ्च व्याहृतयः प्रोक्ताः सामगानां च सामसु ॥ ३.३ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २८

"भूः भुवः स्वः" — इस (तीन) रूपमें (वे) जाननी चाहिए; यह (उनका) अव्यस्त (एक साथ उच्चरित) रूप कहा गया है। सामगायकोंके सामोंमें पाँच व्याहृतियाँ कही गयी हैं —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने व्याहृतियों के त्रिधा, चतुर्धा, पंचधा और सप्तधा होने का संकेत दिया था। वर्तमान श्लोक में वे इस संख्या-भेद के प्रथम दो स्तरों—तीन और पाँच—के प्रयोग और उनके शास्त्रीय आधार को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (ताः व्याहृतयः) भूर्भुवः स्वरिति ज्ञेयाः, (ताः) अव्यस्ताः ताः प्रकीर्तिताः। (तथा) पञ्च व्याहृतयः प्रोक्ताः सामगानां च सामसु।

पदार्थ:

• भूर्भुवः स्वः: ये तीन मूल व्याहृतियाँ हैं। 'भूः' पृथ्वी या अस्तित्व का, 'भुवः' अन्तरिक्ष या प्राण-शक्ति का, और 'स्वः' द्युलोक या आनंद का प्रतीक है।

• ज्ञेयाः: जानने योग्य हैं। यहाँ 'ज्ञेया' शब्द यह संकेत देता है कि यह केवल सूचना नहीं, बल्कि साधना के स्तर पर समझने योग्य सत्य है।

• अव्यस्ताः: 'अव्यस्त' का अर्थ है—जो क्रमबद्ध या अलग-अलग न होकर एक साथ (एक समूह में) उच्चारित हों। जब 'भूः भुवः स्वः' को एक ही श्वास या एक ही इकाई के रूप में लिया जाता है, तो वह 'अव्यस्त' रूप कहलाता है।

• सामगानां सामसु: सामगायक उन ऋचाओं को जब साम-गान (संगीतबद्ध उपासना) में परिवर्तित करते हैं, तब वहाँ प्रयुक्त होने वाली व्याहृतियों की संख्या पाँच बताई गई है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ यह समझा रहे हैं कि व्याहृतियों की संख्या में भिन्नता वास्तव में उनके 'प्रयोग' और 'उद्देश्य' की भिन्नता है।

प्रथम स्तर पर, वे कहते हैं कि व्याहृतियों को 'भूः भुवः स्वः' के रूप में जानना चाहिए। यह इनका 'अव्यस्त' रूप है। साधारणतः हम इन्हें अलग-अलग शब्दों के रूप में देखते हैं, किंतु साधना में जब इन्हें एक साथ उच्चारित किया जाता है, तो ये तीन अलग-अलग लोक नहीं, बल्कि एक अखंड चेतना-प्रवाह बन जाते हैं। यह अव्यस्त रूप साधक को स्थूल (भूः) से सूक्ष्म (भुवः) और फिर कारण (स्वः) की ओर एक ही झटके में ले जाने वाला सेतु है। यह वह संक्षिप्त रूप है जो दैनिक संध्या और जप में प्रयुक्त होता है, ताकि साधक शीघ्रता से अपने मूल स्वरूप में स्थित हो सके।

द्वितीय स्तर पर, ऋषि सामवेद के प्रसंग को लाते हैं। वे कहते हैं कि सामगायक अपने सामों में पाँच व्याहृतियों का प्रयोग करते हैं। यहाँ संख्या तीन से बढ़कर पाँच हो गई है। इसका रहस्य यह है कि साम-गान केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि नाद-योग है। जब ध्वनि को विस्तार दिया जाता है और उसे लयबद्ध किया जाता है, तो चेतना के और अधिक सूक्ष्म स्तर प्रकट होते हैं। तीन व्याहृतियाँ जहाँ आधार प्रदान करती हैं, वहीं अन्य दो व्याहृतियाँ उस चेतना को और ऊपर उठाकर उसे संगीत और लय के माध्यम से परमात्मा के साथ एकाकार करती हैं।

अतः, यहाँ संख्या का भेद गणितीय नहीं, अपितु 'अनुभव' का भेद है। तीन व्याहृतियाँ 'संक्षेप' हैं, पाँच 'विस्तार' हैं और आगे आने वाली सात 'पूर्णता' हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीति च ॥ २.७६ ॥

प्रजापतिने तीनों वेदोंसे अकार, उकार और मकार को, तथा "भूः, भुवः, स्वः" को दुहकर निकाला।

मनुस्मृति २.७६मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 226

मनुस्मृति में उल्लेख है कि प्रजापति ने तीनों वेदों से अ, उ, म और 'भूः भुवः स्वः' को दुहकर निकाला।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति का यहाँ पूर्ण मेल है। जहाँ मनुस्मृति इन्हें प्रजापति द्वारा वेदों से 'दुहकर' (निकाला हुआ) बताती है, वहीं यह स्मृति इन्हें 'अव्यस्त' रूप में जानने का निर्देश देती है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात की पुष्टि करते हैं कि 'भूः भुवः स्वः' केवल शब्द नहीं, अपितु वेदों के सार से निकले हुए बीज-मन्त्र हैं। मनुस्मृति जहाँ इनकी उत्पत्ति बताती है, यह स्मृति इनके प्रयोग और योगिक विनियोग को स्पष्ट करती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'ध्वनि के संकोच और विस्तार' का अभ्यास है।

जब साधक 'भूः भुवः स्वः' का 'अव्यस्त' रूप में जप करता है, तो वह अपने भीतर के तीन स्तरों—स्थूल शरीर, प्राण-मय शरीर और आनंद-मय शरीर—को एक सूत्र में पिरोता है। यह अभ्यास 'एकाग्रता' की भूमि का है, जहाँ साधक बिखरी हुई चेतना को समेटकर एक बिंदु पर लाता है।

वहीं, सामगायक की भाँति पाँच व्याहृतियों का स्मरण करना 'विस्तार' का अभ्यास है। यहाँ साधक अपनी चेतना को केवल एक बिंदु पर सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे नाद और लय के माध्यम से ब्रह्माण्ड में फैलाता है। यह अभ्यास उसे 'विशालता' का अनुभव कराता है।

संक्षेप में, तीन व्याहृतियों का प्रयोग 'आकर्षण' है—सब कुछ भीतर समेटना; और पाँच या सात का प्रयोग 'प्रसारण' है—स्वयं को सर्वत्र व्याप्त देखना। साधक पहले अव्यस्त रूप से स्वयं को केंद्रित करता है और फिर विस्तारित रूप से संपूर्ण लोकों का अनुभव करता है।

श्लोक ३.४

पुरुषं च तथा सत्यं भूर्भुवःस्वस्तथैव च ।

विद्याप्रकरणापाये यजमानस्तु वै सदा ॥ ३.४ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २८

— पुरुष, सत्य, और भूः भुवः स्वः। विद्या-प्रकरणके अभावमें (?) यजमान तो सदा —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में सामगायकों के साम-गान में प्रयुक्त पाँच व्याहृतियों का उल्लेख किया गया था। वर्तमान श्लोक उन पाँचों व्याहृतियों के नामों को स्पष्ट करते हुए, उनके प्रयोग की परिस्थिति और यजमान की स्थिति का संकेत दे रहा है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (ताः पञ्च व्याहृतयः) पुरुषं च तथा सत्यं भूर्भुवः स्वः तथैव च (सन्ति)। विद्याप्रकरणापाये यजमानस्तु वै सदा (किम् करोति/कथं भवति) — (वाक्य ३.५ में पूर्ण होता है)।

पदार्थ:

• पुरुषं च तथा सत्यं: यहाँ पाँच व्याहृतियों में से दो विशिष्ट नामों का उल्लेख है—'पुरुष' और 'सत्य'। 'पुरुष' वह चैतन्य तत्त्व है जो समस्त सृष्टि का आधार है, और 'सत्य' वह अपरिवर्तनीय सत्ता है जिसमें सब विलीन होता है।

• भूर्भुवः स्वः तथैव च: पूर्वोक्त तीन व्याहृतियाँ—भूः, भुवः और स्वः—इनके साथ सम्मिलित हैं। इस प्रकार कुल संख्या पाँच (पुरुष, सत्य, भूः, भुवः, स्वः) होती है।

• विद्याप्रकरणापाये: यह पद व्याकरणिक और अर्थ की दृष्टि से जटिल है। 'विद्या-प्रकरण' का अर्थ है वह विशेष ज्ञान-पद्धति या साधना-क्रम जिसमें व्याहृतियों का सूक्ष्म विनियोग होता है। 'अपाये' का अर्थ है—अभाव में, क्षय होने पर या जब वह विशेष विधि उपलब्ध न हो। भाव यह है कि जब साधक या यजमान उस गहन 'विद्या-प्रकरण' (सूक्ष्म योग-विधि) से अनभिज्ञ हो या उस स्थिति में न हो।

• यजमानस्तु वै सदा: यहाँ 'यजमान' वह है जो यज्ञ या साधना का अनुष्ठान कर रहा है। 'सदा' शब्द उसकी निरंतरता या उसकी स्वाभाविक अवस्था को दर्शाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ व्याहृतियों के उस समूह का वर्णन कर रहे हैं जो साम-गान और विशिष्ट अनुष्ठानों में प्रयुक्त होता है। वे स्पष्ट करते हैं कि पाँच व्याहृतियों के समूह में 'भूः, भुवः, स्वः' के साथ 'पुरुष' और 'सत्य' का समावेश है।

यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म संकेत है। 'पुरुष' और 'सत्य' केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि वे चेतना के उच्चतम शिखर हैं। 'पुरुष' वह दृष्टा है जो सूर्यमण्डल के केंद्र में स्थित है, और 'सत्य' वह अक्षर है जिससे सब उत्पन्न हुआ। जब साधक इन पाँचों का स्मरण करता है, तो वह केवल तीन लोकों (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक) की यात्रा नहीं करता, बल्कि उन लोकों के अधिष्ठाता 'पुरुष' और उनके मूल 'सत्य' तक पहुँचने का प्रयास करता है।

श्लोक का दूसरा भाग—"विद्याप्रकरणापाये यजमानस्तु वै सदा"—एक अधूरे वाक्य की तरह है, जिसकी क्रिया और पूर्णता अगले श्लोक (३.५) में आती है। यहाँ यह संकेत दिया गया है कि जब यजमान उस सूक्ष्म 'विद्या-प्रकरण' (अर्थात् वह उच्च योगिक ज्ञान जिससे व्याहृतियों का आन्तर अर्थ जाना जाता है) के अभाव में होता है, तब भी वह किस प्रकार अपनी साधना को निरंतर रखता है। यह दर्शाता है कि बाहरी विधि (यज्ञ/साम-गान) उन लोगों के लिए है जो अभी सूक्ष्म विद्या के शिखर पर नहीं पहुँचे हैं, किंतु वे भी इन शब्दों के माध्यम से उस परम तत्त्व से जुड़ सकते हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाली एक सीढ़ी है। 'भूः, भुवः, स्वः' का अभ्यास साधक को भौतिक शरीर, प्राण-शक्ति और आनंद-मय स्थिति तक ले जाता है। किंतु जब इसमें 'पुरुष' और 'सत्य' जुड़ते हैं, तो अभ्यास केवल लोकों का नहीं, बल्कि 'सत्ता' का हो जाता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर (भूः) या प्राण (भुवः) या ज्योति (स्वः) नहीं है, बल्कि वह वह 'पुरुष' है जो इन सबमें स्थित है और वह 'सत्य' है जो कभी नष्ट नहीं होता। 'विद्याप्रकरणापाये' का योगिक अर्थ यह है कि जब तक साधक का मन पूर्णतः एकाग्र नहीं होता या जब तक वह उच्चतर समाधि की विद्या में निपुण नहीं होता, तब तक वह इन पाँचों व्याहृतियों के जप और स्मरण के माध्यम से अपनी चेतना को ऊपर उठाने का अभ्यास करता है। यह अभ्यास उसे उस भूमि तक ले जाता है जहाँ वह स्वयं को 'यजमान' (साधना का कर्त्ता) के रूप में अनुभव करते हुए भी धीरे-धीरे उस 'सत्य' में विलीन होने की तैयारी करता है।

श्लोक ३.५

सप्त व्याहृतयः प्रोक्ताः प्राणायामेषु नित्यशः ।

भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यं तथैव च ॥ ३.५ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २८

— प्राणायामोंमें नित्य सात व्याहृतियाँ कही गयी हैं: भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साम-गान की पाँच व्याहृतियों और विद्या-प्रकरण के अभाव में यजमान की स्थिति का संकेत दिया गया था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य उस पूर्ण संख्या की घोषणा कर रहे हैं, जो नित्य प्राणायाम के अभ्यास में अनिवार्य है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: प्राणायामेषु नित्यशः सप्त व्याहृतयः प्रोक्ताः (तथा) भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यं तथैव च (प्रोक्ताः)।

पदार्थ:

• प्राणायामेषु: यहाँ 'प्राणायाम' शब्द केवल श्वास-प्रश्वास की क्रिया नहीं, अपितु प्राण के संयम और उसके माध्यम से चेतना के विस्तार की संपूर्ण प्रक्रिया है। सप्तमी विभक्ति यह दर्शाती है कि यह विधान प्राणायाम के अभ्यास के समय या उसके विषय में है।

• नित्यशः: प्रतिदिन, बिना किसी त्रुटि के। यह संकेत है कि यह अभ्यास किसी विशेष पर्व या अनुष्ठान के लिए नहीं, बल्कि साधक की दैनिक जीवन-पद्धति का अंग है।

• सप्त व्याहृतयः: सात उच्चारणीय बीज-शब्द। 'व्याहृति' का अर्थ है वह शब्द जिसे 'वि-आहृत' किया गया हो, अर्थात् जो अव्यक्त से व्यक्त किया गया हो।

• भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यं: ये सात व्याहृतियाँ हैं।

1. भूः (पृथ्वी/स्थूल शरीर)

2. भुवः (अन्तरिक्ष/प्राण-मय शरीर)

3. स्वः (द्युलोक/मनो-मय शरीर)

4. महः (महस/दिव्य प्रकाश)

5. जनः (जनलोक/परम चेतना का उद्गम)

6. तपः (तपलोक/तपस की अग्नि)

7. सत्यम् (सत्यलोक/अक्षर ब्रह्म)

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य व्याहृतियों की संख्या के विषय में मतभेद को समाप्त करते हुए 'प्राणायाम' के परिप्रेक्ष्य में अंतिम निर्णय दे रहे हैं। जहाँ साम-गान में पाँच और सामान्य जप में तीन व्याहृतियों का उल्लेख आता है, वहीं योग-साधना और प्राणायाम में सातों का होना अनिवार्य है।

यहाँ 'नित्यशः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। योगिक दृष्टि से, साधक जब अपनी प्राण-शक्ति को जाग्रत करता है, तो वह केवल भौतिक शरीर तक सीमित नहीं रहता। वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर प्रस्थान करता है। ये सात व्याहृतियाँ केवल शब्द नहीं, बल्कि चेतना के सात सोपान हैं। जब साधक प्राणायाम के समय इन सातों का स्मरण करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर स्थित सात लोकों की यात्रा करता है।

बाहरी दृष्टि से यह एक विधि है कि प्राणायाम के दौरान इन सात शब्दों का उच्चारण या मानसिक स्मरण किया जाए, किंतु आन्तरिक दृष्टि से यह प्राण को 'भूः' (पृथ्वी तत्त्व) से उठाकर 'सत्यम्' (परम सत्य/अक्षर) तक ले जाने की प्रक्रिया है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि पूर्ण योग-सिद्धि के लिए सात व्याहृतियों का समूह ही पूर्णता का परिचायक है, क्योंकि सृष्टि के सात लोक इन्हीं सात ध्वनियों में निहित हैं।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का रहस्य 'आरोहण' में है। प्राणायाम के अभ्यास में जब श्वास का प्रवाह नियंत्रित होता है, तब साधक इन सात व्याहृतियों का स्मरण करता है। यह स्मरण एक मानसिक मानचित्र की भाँति कार्य करता है:

1. भूः, भुवः, स्वः के स्मरण से साधक अपनी चेतना को स्थूल शरीर, प्राण और मन से ऊपर उठाता है।

2. महः, जनः, तपः के स्मरण से वह दिव्य प्रकाश, सृजन-शक्ति और तप की अग्नि में प्रवेश करता है।

3. सत्यम् के स्मरण पर वह उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ केवल 'सत्य' शेष रहता है, जो कि अक्षर ब्रह्म है।

अभ्यास यह है कि श्वास के साथ इन ध्वनियों को हृदय और प्राण में अनुनादित किया जाए। इससे साधक की चेतना केवल एक लोक में नहीं, बल्कि सातों भुवनों में विचरण करने योग्य बनती है। यह अभ्यास साधक को 'अविद्या' के अंधकार से निकालकर 'सत्य' के प्रकाश की ओर ले जाता है। यहाँ श्वास केवल वायु का आवागमन नहीं, बल्कि सातों लोकों की सीढ़ी बन जाता है, जिससे साधक अपनी वर्तमान भूमि से उठकर उच्चतम भूमि (सत्यलोक) की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ३.६

भूराद्याश्चैव सत्यान्ता महाव्याहृतयस्तु वै ।

लोकाह्येतास्तु सप्तैते उपर्युपरि संस्थिताः ॥ ३.६ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २८

भूः से लेकर सत्यम् तक (ये) महाव्याहृतियाँ हैं; ये सात लोक ही हैं, जो एकके ऊपर एक स्थित हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में प्राणायाम के अभ्यास में प्रयुक्त होने वाली सात व्याहृतियों के नाम—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्—का स्पष्ट उल्लेख किया गया था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इन शब्दों के केवल उच्चारण तक सीमित न रहकर, उनके ब्रह्माण्डीय और आध्यात्मिक विस्तार को उद्घाटित कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: भूराद्याश्चैव सत्यान्ता (एताः) महाव्याहृतयस्तु वै (सन्ति) । एतास्तु सप्तैते लोकाः (इव) उपर्युपरि संस्थिताः (सन्ति)।

पदार्थ:

• भूराद्याः: 'भूः' आदि। यहाँ 'आद्य' शब्द यह संकेत करता है कि क्रम का आरम्भ पृथ्वी-तत्व या स्थूल आधार से होता है।

• सत्यान्ताः: 'सत्यम्' तक। 'अन्त' शब्द यह दर्शाता है कि साधना की पराकाष्ठा सत्यलोक या अक्षर-ब्रह्म में जाकर पूर्ण होती है।

• महाव्याहृतयः: ये केवल साधारण उच्चारण नहीं, अपितु 'महाव्याहृतियाँ' हैं। 'महा' शब्द इनके व्यापक प्रभाव और विराट स्वरूप का परिचायक है; ये शब्द स्वयं में एक सम्पूर्ण लोक की शक्ति समेटे हुए हैं।

• लोकाह्येताः: ये (व्याहृतियाँ) ही लोक हैं। यहाँ 'लोक' का अर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं, अपितु चेतना की वह अवस्था है जहाँ प्रकाश (लोक = प्रकाशमान) व्याप्त है।

• उपर्युपरि संस्थिताः: एक के ऊपर एक स्थित। यह क्रमबद्धता दर्शाती है कि साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर, और नीचे से ऊपर की ओर क्रमिक रूप से बढ़ना होता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य शब्दों और लोकों के अभेद को स्थापित कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि 'भूः' से आरम्भ होकर 'सत्यम्' पर समाप्त होने वाली ये सात महाव्याहृतियाँ केवल मंत्र के आरम्भिक शब्द नहीं हैं, अपितु ये सात लोकों के बीज-रूप हैं।

बाहरी दृष्टि से देखें तो यह सृष्टि की संरचना का वर्णन है, जहाँ पृथ्वी से लेकर सत्यलोक तक सात स्तर हैं। किन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में, जो शुक्लयजुर्वेद के द्रष्टा हैं, बाहरी जगत और आन्तरिक जगत एक ही सत्य के दो प्रतिबिंब हैं। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में सात लोक एक के ऊपर एक स्थित हैं, उसी प्रकार मनुष्य के भीतर चेतना के सात सोपान हैं। जब साधक 'भूः' का उच्चारण करता है, तो वह अपने स्थूल अस्तित्व को जाग्रत करता है; जब वह 'सत्यम्' तक पहुँचता है, तो वह उस परम सत्य में विलीन हो जाता है जो समस्त लोकों का आधार है।

यहाँ 'महाव्याहृति' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधारण व्याहृति केवल नाम है, किन्तु महाव्याहृति वह ध्वनि है जो साधक को उस लोक की आवृत्ति से जोड़ देती है। अतः ये सात शब्द वास्तव में सात सीढ़ियाँ हैं, जो साधक को भौतिकता के अंधकार से निकालकर सत्य के प्रकाश की ओर ले जाती हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

तैत्तिरीय उपनिषद्

भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ लोकः । मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते ॥ १.५.२ ॥

'भूः' यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्ष, 'सुवः' वह (द्यु-) लोक, 'महः' आदित्य; आदित्यसे ही सब लोक महिमा पाते (बढ़ते) हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद् १.५.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 149

तैत्तिरीय उपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि मिलती है कि 'भूः' यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्ष और 'सुवः' द्युलोक है। यह स्मृति उपनिषद् के इस विचार को विस्तार देते हुए सात व्याहृतियों की पूर्ण श्रृंखला (सत्यम् तक) को प्राणायाम से जोड़ती है। जहाँ उपनिषद् इन शब्दों के लोक-स्वरूप को परिभाषित करता है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इन्हें साधना का उपकरण बनाकर साधक को 'उपर्युपरि' यानी क्रमिक आरोहण की विधि बताती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि 'शब्द' और 'लोक' एक ही हैं। योगिक अभ्यास में जब साधक प्राणायाम के समय इन महाव्याहृतियों का स्मरण करता है, तो वह केवल शब्दों का जप नहीं कर रहा होता, अपितु अपनी चेतना का विस्तार कर रहा होता है।

'भूः' का उच्चारण करते समय साधक का अनुभव अपने भौतिक आधार और पृथ्वी-तत्व के साथ जुड़ाव का होता है। जैसे-जैसे वह 'भुवः' और 'स्वः' की ओर बढ़ता है, उसकी चेतना प्राण और मन के सूक्ष्म स्तरों पर आरोहण करती है। 'महः', 'जनः' और 'तपः' के उच्चारण के साथ वह दिव्य प्रकाश और तपस की अग्नि का अनुभव करता है, और अंततः 'सत्यम्' का उच्चारण करते समय वह उस बिंदु पर पहुँच जाता है जहाँ समस्त द्वैत समाप्त हो जाता है।

अभ्यास यह है कि प्रत्येक व्याहृति के साथ साधक यह अनुभव करे कि वह एक लोक से दूसरे लोक में प्रवेश कर रहा है। यह 'उपर्युपरि' गति वास्तव में नीचे से ऊपर की ओर नहीं, बल्कि स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा है। इस प्रकार, सात व्याहृतियों का नित्य स्मरण साधक को सात भुवनों की उपासना में लीन कर देता है, जिससे वह शरीर में रहते हुए भी समस्त लोकों में विचरण करने की क्षमता (कामचार) प्राप्त करता है।

व्याहृतिपदनिरुक्तिः

श्लोक ३.७

चतुर्दशविधं सर्गं दृष्ट्वेदं व्याहृतं स्वयम् ।

सप्त लोका भविष्यन्ति तस्माद्व्याहृतयः स्मृतः(ताः) ॥ ३.७ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २८

चौदह प्रकार की सृष्टि को देखकर स्वयं (प्रजापति ने) यह उच्चारा— "सात लोक होंगे"; इसलिए ये व्याहृतियाँ स्मृत हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में सात महाव्याहृतियों के क्रम और उनके एक के ऊपर एक स्थित लोकों के रूप में होने का वर्णन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इन व्याहृतियों के नामकरण के मूल कारण और उनकी उत्पत्ति के रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (प्रजापतिः) चतुर्दशविधं सर्गं दृष्ट्वा इदं स्वयम् व्याहृतम् । (सः अवदत् यत्) सप्त लोकाः भविष्यन्ति, तस्मात् (एताः) व्याहृतयः स्मृताः।

पदार्थ:

• चतुर्दशविधं सर्गं: चौदह प्रकार की सृष्टि। यहाँ 'सर्ग' का अर्थ है वह प्रकटीकरण जो मूल प्रकृति से भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुआ है।

• दृष्ट्वा: देखकर। यह केवल चक्षु-दृष्टि नहीं, अपितु प्रजापति की वह ज्ञान-दृष्टि है जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि का मानचित्र एक साथ उपस्थित था।

• व्याहृतं: उच्चारित किया या प्रकट किया। 'वि' + 'आ' + 'हृ' धातु से बना यह शब्द केवल बोलने की क्रिया नहीं, बल्कि अव्यक्त को व्यक्त करने का आदेश है।

• स्वयम्: स्वयं ही। यह दर्शाता है कि इन शब्दों का कोई बाहरी स्रोत नहीं है; ये प्रजापति के आत्म-संकल्प से उत्पन्न हुए हैं।

• सप्त लोकाः भविष्यन्ति: सात लोक होंगे। यह एक संकल्प-वाक्य है, जिसने शून्य में सात स्तरों की रचना की।

• स्मृतः: याद किए गए या नाम दिए गए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी व्याहृतियों के नाम के पीछे छिपे सृजन-विज्ञान को समझा रहे हैं। वे बताते हैं कि जब प्रजापति ने चौदह प्रकार की सृष्टि के विस्तार को देखा, तब उन्होंने स्वयं इसका उच्चारण किया कि "सात लोक होंगे"। इसी कारण इन शब्दों को 'व्याहृति' (उच्चारण) कहा गया।

यहाँ 'चौदह प्रकार की सृष्टि' का उल्लेख इस संकेत के लिए है कि जगत की विविधता अपार है, किंतु उस विविधता को व्यवस्थित करने के लिए सात मुख्य स्तरों (लोकों) की आवश्यकता थी। जब प्रजापति ने इन सात स्तरों का संकल्प लेकर उन्हें शब्दों के रूप में उच्चारित किया, तो वे शब्द केवल संज्ञा (नाम) नहीं रहे, बल्कि वे उस लोक की शक्ति और उसकी प्रकृति बन गए।

बाहरी दृष्टि से यह सृष्टि की रचना की कथा है, किंतु आन्तर दृष्टि से यह 'शब्द-ब्रह्म' की शक्ति का वर्णन है। जब तक प्रजापति ने 'व्याहृत' नहीं किया, तब तक सब कुछ अव्यक्त और मौन था। जैसे ही उच्चारण हुआ, मौन भंग हुआ और सृष्टि का विस्तार आरम्भ हुआ। अतः व्याहृतियाँ वास्तव में वे 'ध्वनि-बीज' हैं जिनसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की संरचना हुई है।

श्रुति-संगति —

इस प्रसंग की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में मिलती है, जहाँ प्रजापति के बोलने और लोकों की उत्पत्ति के सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है:

शतपथ ब्राह्मण

स संवत्सरे व्याजिहीर्षत् स भूरिति व्याहरत्सेयं पृथिव्यभवद्भुव इति तदितमन्तरिक्षमभवत्स्वरिति सासौ द्यौरभवत्तस्मादु संवत्सर एव कुमारो व्याजिहीर्षति संवत्सरे हि प्रजापतिर्व्याहरत् ॥ ११.१.६.३ ॥

संवत्सर (पूरा होने) पर उसने बोलना चाहा। उसने "भूः" कहा — वह यह पृथिवी हुई; "भुवः" कहा — वह यह अन्तरिक्ष हुआ; "स्वः" कहा — वह वह द्युलोक हुआ। इसीलिए बालक संवत्सरमें बोलना चाहता है, क्योंकि प्रजापतिने संवत्सरमें ही (पहले) बोला।

शतपथ ब्राह्मण ११.१.६.३माध्यन्दिन पाठ · thevyasa.in

श्रुति स्पष्ट करती है कि प्रजापति के "भूः", "भुवः" और "स्वः" कहने मात्र से पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक की सृष्टि हुई। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-तत्व का विस्तार कर रही है कि ये व्याहृतियाँ केवल मंत्र के आरम्भिक शब्द नहीं हैं, बल्कि वे प्रजापति के वही आदि-उच्चारण हैं जिन्होंने शून्य को सगुण लोकों में परिवर्तित कर दिया।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि 'व्याहृति' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक 'आदेश' है। जिस प्रकार प्रजापति के उच्चारण से सात लोक प्रकट हुए, उसी प्रकार जब योगी प्राणायाम के समय इन व्याहृतियों का स्मरण या उच्चारण करता है, तो वह अपने भीतर उन्हीं सात स्तरों की चेतना को जाग्रत करता है।

यहाँ 'चौदह प्रकार की सृष्टि' का दृष्टा होना साधक की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ वह जगत की समस्त विविधताओं और द्वंद्वों को देख लेता है, और फिर उन सबको सात मुख्य स्तरों (व्याहृतियों) में समेटकर ऊपर की ओर प्रस्थान करता है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब 'भूः' कहता है, तो वह केवल पृथ्वी का नाम नहीं ले रहा, बल्कि अपने भीतर के सबसे स्थूल आधार को जाग्रत कर रहा है। जैसे-जैसे वह 'सत्यम्' की ओर बढ़ता है, वह प्रजापति के उसी सृजन-क्रम को उलट कर वापस मूल स्रोत की ओर लौटता है। इस प्रकार, व्याहृति का अभ्यास साधक को 'सृष्टि' (विस्तार) से 'लय' (संकोच) की ओर ले जाता है, जिससे वह स्थूल देह से ऊपर उठकर अक्षर-ब्रह्म में स्थित होने का अनुभव करता है।

श्लोक ३.८

अव्याहृतमिदं ह्यासीत् सदेवासुरमानुषम् ।

संसत्यं व्याहृतं पूर्वं प्रजापतिरिति श्रुतिः ॥ ३.८ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २८

देव, असुर और मनुष्यों सहित यह (जगत्) पहले अव्याहृत (अप्रकट) था; पहले प्रजापतिने सत्यका उच्चारण किया — ऐसी श्रुति है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में प्रजापति द्वारा चौदह प्रकार की सृष्टि के दर्शन करने और सात लोकों के संकल्प से व्याहृतियों के स्मरण का वर्णन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस आदि-अवस्था का रहस्य बता रहे हैं जब यह सम्पूर्ण दृश्य जगत केवल एक संभावना था और अभी तक शब्द-रूप में प्रकट नहीं हुआ था।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: इदं (जगत्) सदेवासुरमानुषम् ह्यासीत् अव्याहृतम् । प्रजापतिः पूर्वं सत्यं (सहितं) व्याहृतं — इति श्रुतिः।

पदार्थ:

• अव्याहृतम्: जो उच्चारित न किया गया हो। यहाँ इसका अर्थ है 'अव्यक्त' या 'अप्रकट'। जब तक शब्द (वाक्) का प्रकटीकरण नहीं होता, तब तक सृष्टि केवल संकल्प-रूप में रहती है।

• सदेवासुरमानुषम्: देव, असुर और मनुष्य सहित। यहाँ 'सदेव' का अर्थ है कि इन तीनों श्रेणियों के जीव और उनके लोक भी उसी अव्यक्त अवस्था में समाहित थे।

• संसत्यं: सत्य सहित। यहाँ 'संसत्यं' का भाव यह है कि प्रजापति ने जब उच्चारण किया, तो उसमें 'सत्य' (परम तत्त्व) का समावेश था, जिससे वह केवल शब्द न रहकर सृजन-शक्ति बन गया।

• पूर्वं: आदि काल में, सृष्टि के आरम्भ में।

• इति श्रुतिः: ऐसा श्रुति-वचन है। यह संकेत है कि यह विवरण महर्षि की अपनी कल्पना नहीं, अपितु वैदिक ऋषियों द्वारा दृष्ट सत्य है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी सृष्टि की उस 'शून्य' या 'बीज' अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जिसे 'अव्याहृत' कहा गया है। वे कहते हैं कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड—जिसमें देवों का आलोक, असुरों का अंधकार और मनुष्यों का कर्म-क्षेत्र सम्मिलित है—सब कुछ पहले अव्याहृत था।

रहस्य यह है कि शब्द ही सृष्टि का प्रथम कारण है। जब तक प्रजापति (सृष्टि के अधिष्ठाता) ने मौन रहकर केवल देखा, तब तक सब कुछ 'अव्यक्त' था। जैसे ही उन्होंने 'सत्य' सहित व्याहृति (उच्चारण) किया, वह मौन टूट गया और ध्वनि के कंपन से रूप और नाम का प्रकटीकरण हुआ। यहाँ 'सत्य' का उच्चारण सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि सत्य ही वह आधार है जिससे अन्य छह व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः) विस्तारित हुईं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जिसे हम आज स्थूल जगत के रूप में देखते हैं, वह वास्तव में एक 'दिव्य ध्वनि' का विस्तार मात्र है।

श्रुति-संगति —

इस प्रसंग की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में मिलती है:

शतपथ ब्राह्मण

स संवत्सरे व्याजिहीर्षत् स भूरिति व्याहरत्सेयं पृथिव्यभवद्भुव इति तदितमन्तरिक्षमभवत्स्वरिति सासौ द्यौरभवत्तस्मादु संवत्सर एव कुमारो व्याजिहीर्षति संवत्सरे हि प्रजापतिर्व्याहरत् ॥ ११.१.६.३ ॥

संवत्सर (पूरा होने) पर उसने बोलना चाहा। उसने "भूः" कहा — वह यह पृथिवी हुई; "भुवः" कहा — वह यह अन्तरिक्ष हुआ; "स्वः" कहा — वह वह द्युलोक हुआ। इसीलिए बालक संवत्सरमें बोलना चाहता है, क्योंकि प्रजापतिने संवत्सरमें ही (पहले) बोला।

शतपथ ब्राह्मण ११.१.६.३माध्यन्दिन पाठ · thevyasa.in

यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि प्रजापति ने जब "भूः", "भुवः" और "स्वः" का उच्चारण किया, तभी पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक अस्तित्व में आए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति के मर्म को विस्तार दे रही है कि उच्चारण से पूर्व सब कुछ 'अव्याहृत' था और उच्चारण के बाद वह 'सृष्टि' बन गया।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्-शक्ति' और 'मौन' के सम्बन्ध को समझाता है। योग का मार्ग वास्तव में 'व्याहृत' से 'अव्याहृत' की ओर लौटने की यात्रा है।

१. अभ्यास: साधक जब प्राणायाम या जप करता है, तो वह पहले शब्दों (व्याहृतियों) का सहारा लेता है, किन्तु धीरे-धीरे वह उस अवस्था में जाता है जहाँ शब्द विलीन हो जाते हैं और केवल 'सत्य' (मौन) शेष रहता है।

२. अनुभव: इस श्लोक का अभ्यास करते हुए साधक यह अनुभव करता है कि उसका अपना शरीर और मन भी उन्हीं सात व्याहृतियों का विस्तार है। यदि वह अपने भीतर के शोर (मानसिक व्याहृति) को शांत कर दे, तो वह उस 'अव्याहृत' अवस्था का अनुभव कर सकता है जहाँ देव, असुर और मनुष्य जैसे द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं।

३. भूमि: यह श्लोक साधक को 'साकार' से 'निराकार' की ओर ले जाता है। वह समझता है कि वाणी से रूप प्रकट होते हैं, और वाणी के लय होने पर वह मूल 'सत्य' में स्थित हो जाता है। जो कहा नहीं गया, वह प्रकट नहीं; अतः जो पूर्णतः मौन है, वही पूर्णतः व्याप्त है।

श्लोक ३.९

भूर्भुवःस्वस्तथा पूर्वं स्वयमेव स्वयंभुवा ।

व्याहृता ज्ञानदेहेन तेन व्याहृतयः स्मृताः ॥ ३.९ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २९

"भूः", "भुवः", "स्वः" आदि पूर्व में स्वयम्भू ने स्वयं ही उच्चारित किए; ज्ञानमय देह द्वारा उन व्याहृतियों को उच्चारित करने के कारण वे व्याहृतियाँ स्मृत हैं...

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह बताया गया कि सृष्टि के आदि में सब कुछ 'अव्याहृत' अर्थात् अव्यक्त था और प्रजापति ने सर्वप्रथम 'सत्य' का उच्चारण किया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस प्रकटीकरण की प्रक्रिया के सूक्ष्म कारण और उन शब्दों की संज्ञा 'व्याहृति' होने के रहस्य को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: भूर्भुवः स्वः तथा पूर्वं स्वयंभुवा स्वयमेव ज्ञानदेहेन व्याहृताः । तेन (स्वयंभुवा) व्याहृतयः स्मृताः।

पदार्थ:

• स्वयंभुवा: स्वयं उत्पन्न होने वाले, अर्थात् प्रजापति या ब्रह्म। जो किसी अन्य कारण से नहीं, अपितु अपनी इच्छा और सत्ता से प्रकट हुए।

• स्वयमेव: स्वयं ही। यहाँ यह शब्द इस बात पर बल देता है कि इन ध्वनियों का कोई बाहरी स्रोत नहीं था; ये ब्रह्म की अपनी आंतरिक गूँज थीं।

• ज्ञानदेहेन: ज्ञानरूप शरीर द्वारा। यह सबसे महत्वपूर्ण पद है। यहाँ 'देह' भौतिक शरीर नहीं, अपितु 'विज्ञानघन' स्वरूप चेतना है, जहाँ विचार और अस्तित्व एक ही होते हैं।

• व्याहृताः: उच्चारित किए गए। 'वि' + 'आ' + 'हृ' धातु से बना यह शब्द केवल बोलने को नहीं, बल्कि 'बाहर लाना' या 'प्रकट करना' को सूचित करता है।

• स्मृताः: याद किए गए या संज्ञा दी गई।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि "भूः", "भुवः" और "स्वः" जैसी महाव्याहृतियाँ कोई साधारण शब्द या भाषा के अंश नहीं हैं, बल्कि वे आदि-चेतना के स्पंदन हैं। वे कहते हैं कि पूर्वकाल में स्वयंभु (प्रजापति) ने स्वयं ही अपनी 'ज्ञानदेह' से इनका उच्चारण किया।

यहाँ 'ज्ञानदेह' का अर्थ अत्यंत गूढ़ है। सामान्य मनुष्य की देह अन्नमय, प्राणमय या मनमय होती है, जिसमें अज्ञान और विकार होते हैं। किंतु प्रजापति की देह शुद्ध ज्ञान है। जब शुद्ध ज्ञान में संकल्प जागृत होता है, तो वह ध्वनि के रूप में प्रकट होता है। वह ध्वनि ही 'व्याहृति' है। जिस प्रकार एक बीज के भीतर पूरा वृक्ष छिपा होता है, उसी प्रकार इन व्याहृतियों के भीतर सम्पूर्ण लोकों का विस्तार छिपा था।

जब प्रजापति ने ज्ञानदेह से इन शब्दों को उच्चारित किया, तब अव्यक्त सत्ता व्यक्त हुई। इसी कारण इन शब्दों को 'व्याहृतियाँ' कहा गया—अर्थात् वे शब्द जिन्होंने शून्य को आकार दिया और अव्यक्त को व्यक्त किया। यह स्मृति यहाँ यह संकेत दे रही है कि हम जब इन व्याहृतियों का जप करते हैं, तो हम वास्तव में उसी आदि-सृजन की शक्ति को अपने भीतर जाग्रत कर रहे होते हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

छान्दोग्य उपनिषद्

प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २.२३.२ ॥

प्रजापतिने लोकोंको तपाया; तपे हुए उनसे त्रयी विद्या बह निकली; उसे तपाया, तो तपी हुई उससे ये अक्षर बह निकले — भूः, भुवः, स्वः।

छान्दोग्य उपनिषद् २.२३.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 208

छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णन है कि प्रजापति ने लोकों को तपाया, जिससे त्रयी विद्या निकली और उस तपित विद्या से 'भूः, भुवः, स्वः' अक्षर बह निकले।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और छान्दोग्य उपनिषद् की यहाँ पूर्ण संगति है। उपनिषद् 'तप' (ऊर्जा/ताप) की बात करता है और यह स्मृति 'ज्ञानदेह' की। वास्तव में, शुद्ध ज्ञान ही परम तप है। जब ज्ञान की तीव्रता चरम पर पहुँचती है, तो वह ध्वनि (व्याहृति) के रूप में प्रस्फुटित होती है। उपनिषद् जहाँ इस प्रक्रिया के 'ऊर्जा-पक्ष' (तप) को दिखा रहा है, वहीं याज्ञवल्क्य जी इसके 'चेतना-पक्ष' (ज्ञानदेह) को उजागर कर रहे हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का मर्म 'ज्ञानदेह' के अनुभव में है। सामान्यतः साधक व्याहृतियों को केवल होंठों और जीभ से उच्चारित करता है, जो स्थूल क्रिया है। किंतु यहाँ संकेत है कि इनका उद्गम 'ज्ञानदेह' है।

अभ्यास यह है कि साधक जब "भूः भुवः स्वः" का जप करे, तो वह यह अनुभव करे कि यह ध्वनि उसके भौतिक कंठ से नहीं, अपितु उसके भीतर स्थित उस शुद्ध ज्ञान-पिण्ड से निकल रही है जो अविनाशी है। जब जप 'ज्ञानदेह' के स्तर पर होता है, तो साधक केवल शब्द नहीं बोलता, बल्कि वह स्वयं उस ज्ञान-स्वरूप ब्रह्म के साथ एकाकार होने लगता है।

इस अभ्यास से साधक की चेतना 'अन्नमय' और 'प्राणमय' कोशों को पार कर 'विज्ञानमय' कोश (ज्ञानदेह) की ओर अग्रसर होती है। वह अनुभव करता है कि जिस प्रकार प्रजापति ने इन शब्दों से लोकों की सृष्टि की, वैसे ही वह अपने भीतर के ज्ञान-प्रकाश से अपने आंतरिक जगत के अंधकार को मिटाकर नए चैतन्य का सृजन कर रहा है। यह अभ्यास साधक को स्थूल जगत के मोह से निकालकर सूक्ष्म ज्ञान की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।

व्याहृतिस्मरणफलम्

श्लोक ३.१०

एतास्तु व्याहृतीः सप्त यः स्मरेत् प्राणसंयमे ।

उपासितं भवेत्तस्य विश्वं भुवनसप्तकम् ॥ ३.१० ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २९

ये सात व्याहृतियाँ हैं, जो कोई प्राणसंयम में इनका स्मरण करता है, उसने सातों भुवनों वाले विश्व की उपासना कर ली है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि प्रजापति ने अपनी ज्ञानदेह से इन ध्वनियों को उच्चारित कर उन्हें 'व्याहृति' संज्ञा दी। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस ज्ञान को क्रिया में बदलने की विधि बता रहे हैं कि एक साधक इन व्याहृतियों का प्रयोग अपनी साधना में कैसे करे और उसका फल क्या हो।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: एताः सप्त व्याहृतीः यः प्राणसंयमे स्मरेत्, तस्य विश्वं भुवनसप्तकम् उपासितं भवेत्।

पदार्थ:

• एतास्तु: ये (यहाँ 'तु' का प्रयोग पिछले श्लोक के सिद्धांत और वर्तमान श्लोक की विधि के बीच सेतु बनाने के लिए है)।

• प्राणसंयमे: प्राण के संयम में। यहाँ 'संयम' का अर्थ केवल श्वास को रोकना नहीं, अपितु प्राण को एक निश्चित दिशा और लय में बांधना है।

• स्मरेत्: स्मरण करे। यह विधिलिङ् लकार है, जो साधक के लिए एक निर्देश या विधान है।

• विश्वं भुवनसप्तकम्: सात भुवनों वाला संपूर्ण विश्व।

• उपासितं भवेत्: उपासना की हुई मानी जाए। अर्थात् वह फल प्राप्त हो जो सातों लोकों की पृथक-पृथक उपासना से मिलता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी बाहरी कर्मकांड और आंतरिक योग का अद्भुत समन्वय कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो साधक 'प्राणसंयम' की अवस्था में इन सात व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) का स्मरण करता है, उसने वास्तव में सातों भुवनों वाले संपूर्ण विश्व की उपासना कर ली है।

यहाँ 'प्राणसंयम' का अर्थ अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः लोग व्याहृतियों का पाठ केवल शब्दों के रूप में करते हैं, किंतु योगी इन्हें प्राण के साथ जोड़ता है। जब श्वास का प्रवाह नियंत्रित होता है और मन स्थिर होता है, तब इन सात ध्वनियों का स्मरण केवल मानसिक पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि एक 'आरोहण' बन जाता है।

रहस्य यह है कि ये सात व्याहृतियाँ केवल नाम नहीं हैं, बल्कि सात लोकों के बीज-स्वर हैं। जब साधक प्राणसंयम में 'भूः' का स्मरण करता है, तो वह पृथ्वी तत्त्व और उसके स्तर की चेतना को जाग्रत करता है; जब 'भुवः' पर आता है, तो चेतना अन्तरिक्ष की ओर उठती है। इसी क्रम में 'सत्यम्' तक पहुँचते हुए वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर और पृथ्वी से परम पद की ओर अग्रसर होता है।

अतः, सात अलग-अलग लोकों की उपासना करने के लिए सात अलग-अलग विधियों की आवश्यकता नहीं है। यदि प्राण के संयम के साथ इन सात बीजों (व्याहृतियों) को हृदय में स्थापित कर लिया जाए, तो संपूर्ण ब्रह्माण्ड की ऊर्जा और उनका अधिष्ठाता पुरुष साधक के भीतर ही प्रतिष्ठित हो जाता है। यह श्लोक यह सिद्ध करता है कि सूक्ष्म शरीर (प्राण) ही स्थूल ब्रह्माण्ड (विश्व) का दर्पण है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्राणायाम' और 'ध्यान' के बीच की कड़ी है। इसका अभ्यास इस प्रकार है:

प्राणसंयम के समय, विशेषकर कुम्भक (श्वास को रोकने) की अवस्था में, जब मन बाहरी जगत से कटकर भीतर की ओर मुड़ता है, तब साधक इन सात व्याहृतियों का क्रमवार स्मरण करता है।

१. भूः का स्मरण करते समय वह अपनी चेतना को आधारभूत स्तर पर स्थिर करता है।

२. भुवः के साथ वह मानसिक उद्वेगों से ऊपर उठकर अन्तरिक्ष की शून्यता का अनुभव करता है।

३. स्वः के साथ वह दैवीय प्रकाश और आनंद में प्रवेश करता है।

४. महः, जनः, तपः के माध्यम से वह सूक्ष्म लोकों की व्यापकता, सृजन की शक्ति और तप की अग्नि को अनुभव करता है।

५. सत्यम् के स्मरण पर वह उस परम अक्षर में विलीन हो जाता है जहाँ कोई द्वैत नहीं रहता।

यह अभ्यास साधक को 'भूमि-दर-भूमि' ऊपर ले जाता है। वह अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, बल्कि सातों भुवनों का स्वामी है। इस अभ्यास से साधक की चेतना संकुचित दायरे से निकलकर 'विश्व-चेतना' में विस्तारित होती है। यहाँ स्मरण का अर्थ है—उस ध्वनि के साथ अपनी सत्ता को एकाकार कर लेना। इस प्रकार, प्राणसंयम में व्याहृति-स्मरण साधक को भौतिक जगत से उठाकर सत्य-पद तक पहुँचाने वाला एक तीव्र सोपान है।

श्लोक ३.११

सर्वेषु चैव लोकेषु कामचारश्च जायते ।

एषा लोकवती ज्ञेया तनुराद्या प्रजापतेः ॥ ३.११ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २९

— और सब लोकोंमें (उसकी) इच्छानुसार गति होती है। यह (व्याहृति-समूह) प्रजापतिका लोकोंसे युक्त आदि शरीर जानना चाहिए।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह बताया गया कि प्राणसंयम के समय सातों व्याहृतियों का स्मरण करने से साधक सातों भुवनों की उपासना का फल प्राप्त कर लेता है। वर्तमान श्लोक उसी उपासना के फल और उन व्याहृतियों के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तस्य) सर्वेषु च लोकेषु कामचारः च जायते। एषा (व्याहृति-समूहः) प्रजापतेः लोकवती तनुराद्या ज्ञेया।

पदार्थ:

• सर्वेषु लोकेषु: समस्त लोकों में (यहाँ सप्तमी विभक्ति स्थान और व्यापकता को दर्शाती है)।

• कामचारः: इच्छानुसार गति या विचरण। 'काम' का अर्थ यहाँ भौतिक इच्छा नहीं, अपितु चेतना की वह स्वतंत्रता है जहाँ साधक अपनी इच्छा से किसी भी स्तर पर स्थित हो सके।

• जायते: उत्पन्न होता है या सिद्ध होता है।

• लोकवती: लोकों से युक्त।

• तनुराद्या: आदि शरीर (प्रथम शरीर)। 'तनु' का अर्थ शरीर है और 'आद्या' वह मूल ढांचा है जिससे शेष सृष्टि निकली।

• ज्ञेया: जानना चाहिए (यह ज्ञान का निर्देश है)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उपासना के उस चरम फल की चर्चा कर रहे हैं जहाँ साधक की चेतना सीमित नहीं रहती। वे कहते हैं कि जो योगी प्राणसंयम में इन सात व्याहृतियों का स्मरण करता है, उसके लिए 'सर्वेषु लोकेषु कामचारः' सिद्ध होती है। इसका अर्थ यह है कि साधक की चेतना अब केवल भौतिक शरीर या पृथ्वी लोक तक सीमित नहीं रहती, अपितु वह सातों लोकों के सूक्ष्म स्तरों में अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार विचरण करने में समर्थ हो जाता है। यह गति किसी चमत्कार के लिए नहीं, अपितु उस व्यापकता को अनुभव करने के लिए है जो प्रजापति का स्वभाव है।

श्लोक का दूसरा भाग एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोलता है— "एषा लोकवती ज्ञेया तनुराद्या प्रजापतेः"। यहाँ याज्ञवल्क्य जी स्पष्ट करते हैं कि ये सात व्याहृतियाँ केवल मंत्र या शब्द नहीं हैं, बल्कि ये प्रजापति (सृष्टि के अधिपति) के उस 'आदि शरीर' के प्रतीक हैं जिससे संपूर्ण ब्रह्माण्ड निर्मित हुआ है। जिस प्रकार मनुष्य का शरीर पंचभूतों से बना है, उसी प्रकार प्रजापति का आदि शरीर इन सात लोकों (व्याहृतियों) से निर्मित है। जब साधक इन व्याहृतियों का जप या स्मरण करता है, तो वह वास्तव में उस विराट पुरुष के शरीर का ध्यान कर रहा होता है।

बाहरी दृष्टि से यह सात लोकों की यात्रा है, किंतु आंतरिक दृष्टि से यह साधक का अपने ही मूल स्वरूप (आदि शरीर) की ओर लौटना है। जब साधक 'भूः' से 'सत्यम्' तक जाता है, तो वह स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अक्षर की ओर बढ़ता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'विराट-ध्यान' है। जब साधक प्राणसंयम (श्वास के नियंत्रित प्रवाह) के साथ इन सात व्याहृतियों का स्मरण करता है, तो वह अपने लघु शरीर के बोध को त्यागकर स्वयं को प्रजापति के 'लोकवती तनु' (लोकों से युक्त शरीर) के रूप में अनुभव करने का प्रयास करता है।

अभ्यास की विधि यह है कि प्रत्येक व्याहृति के स्मरण के साथ साधक अपनी चेतना को एक स्तर ऊपर ले जाए। 'भूः' के समय पृथ्वी तत्व और आधार का अनुभव, फिर 'भुवः' के साथ अंतरिक्ष और प्राण का विस्तार, और इसी क्रम में 'सत्यम्' तक पहुँचते हुए उस परम स्थिरता को प्राप्त करना।

यहाँ 'कामचार' का योगिक अर्थ है— चेतना की तरलता। साधक जब इस भूमि पर पहुँचता है, तो वह मानसिक रूप से किसी भी लोक के गुण को अपने भीतर उतार सकता है या वहाँ की शांति का अनुभव कर सकता है। यह अभ्यास साधक को 'अहं' (लघु शरीर) से 'सोऽहम्' (विराट शरीर) की ओर ले जाता है। वह अनुभव करता है कि जो सात लोक बाहर व्याप्त हैं, वही सात व्याहृतियों के रूप में उसके भीतर भी स्पंदित हो रहे हैं। इस प्रकार, व्याहृति-जप वास्तव में उस आदि शरीर का ध्यान है, जिससे साधक की चेतना संकुचित होने के बजाय ब्रह्माण्डीय विस्तार प्राप्त कर लेती है।

व्याहृतीनां ऋषिः

श्लोक ३.१२

सप्तान्ता देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः ।

व्याहृतीनां च सर्वासामृषिश्चैव प्रजापतिः ॥ ३.१२ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २९

अमित तेजवाले देवदेव विष्णुका (भी यह शरीर) सात (लोकों) तक फैला है (?); और सब व्याहृतियोंके ऋषि प्रजापति ही हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि सात व्याहृतियों का समूह वास्तव में प्रजापति का लोकों से युक्त आदि शरीर है। वर्तमान श्लोक इस विराट शरीर के विस्तार और इन व्याहृतियों के अधिष्ठाता ऋषि का परिचय देता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: अमिततेजसः देवदेवस्य विष्णोः (तनुः) सप्तान्ता (अस्ति)। व्याहृतीनां च सर्वासामृषिः चैव प्रजापतिः (अस्ति)।

पदार्थ:

• अमिततेजसः: जिसकी आभा या तेज की कोई सीमा न हो (अमित = अ + मित)।

• देवदेवस्य: देवों के भी देव।

• विष्णोः: विष्णु के। यहाँ विष्णु का अर्थ केवल एक देवता नहीं, अपितु 'विष्णु' धातु (विशृ) से बना वह तत्व है जो सर्वत्र व्याप्त है।

• सप्तान्ता: सात (लोकों) तक फैला हुआ या सात अंतों वाला। 'अन्त' का अर्थ यहाँ सीमा या विस्तार की पराकाष्ठा है।

• व्याहृतीनां सर्वासाम्: समस्त व्याहृतियों का।

• ऋषिः: वह द्रष्टा जिसने इस मन्त्र या ध्वनि के रहस्य को देखा या प्रकट किया।

• प्रजापतिः: प्रजा का पालन करने वाला, सृष्टि का आदि कारण।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य व्याहृतियों के स्थूल और सूक्ष्म दोनों पक्षों को एक साथ जोड़ रहे हैं। श्लोक के प्रथम चरण में वे कहते हैं कि अमित तेज वाले देवदेव विष्णु का शरीर सात लोकों तक विस्तृत है। यहाँ 'सप्तान्ता' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। संभवतः इसका भाव यह है कि विष्णु का वह विराट स्वरूप, जो सर्वव्यापी है, उसकी अभिव्यक्ति इन सात लोकों के रूप में हुई है। जिस प्रकार एक ही सूर्य का प्रकाश विभिन्न माध्यमों से अलग-अलग रंगों या तीव्रता में दिखता है, वैसे ही विष्णु का अमित तेज इन सात व्याहृतियों के माध्यम से सात भुवनों में व्याप्त है।

दूसरे चरण में ऋषि यह घोषणा करते हैं कि समस्त व्याहृतियों के ऋषि प्रजापति हैं। शास्त्र में 'ऋषि' केवल वह व्यक्ति नहीं होता जिसने मन्त्र लिखा, अपितु वह 'दृष्टा' होता है जिसने उस ध्वनि के पीछे के सत्य को अनुभव किया। चूँकि इन सात व्याहृतियों का उच्चारण स्वयं प्रजापति ने किया (जैसा कि श्लोक ३.७ और ३.८ में बताया गया), इसलिए वे ही इनके ऋषि हैं। यहाँ प्रजापति और विष्णु के बीच कोई भेद नहीं है; विष्णु व्यापकता का नाम है और प्रजापति उस व्यापकता के सृजनात्मक प्रकटीकरण का।

इस प्रकार, यह श्लोक साधक को यह समझाता है कि जब वह व्याहृतियों का जप या स्मरण करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा, अपितु वह उस अमित तेज वाले विष्णु के विराट शरीर में प्रवेश कर रहा है और प्रजापति की उस द्रष्टा-चेतना से जुड़ रहा है जिसने इस सृष्टि को 'व्याहृत' (प्रकट) किया।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'आर्ष' साधना का आधार है। प्रथम अध्याय में 'आर्ष' (ऋषियों के) प्रयोग की चर्चा आई थी; यहाँ स्पष्ट होता है कि व्याहृति-साधना में साधक स्वयं को प्रजापति के साथ एकाकार करता है।

अभ्यास की दृष्टि से, जब योगी प्राणसंयम में इन सात व्याहृतियों का स्मरण करता है, तो वह अपने भीतर के 'अमित तेज' को जाग्रत करता है। वह अनुभव करता है कि उसका अपना अस्तित्व केवल इस भौतिक देह तक सीमित नहीं है, अपितु वह उस विष्णु की भाँति 'सप्तान्ता' है—अर्थात उसकी चेतना का विस्तार सात लोकों (सूक्ष्म स्तरों) तक है।

साधक यहाँ 'ऋषि' होने का अभ्यास करता है। ऋषि होने का अर्थ है—दृष्टा होना। जब वह व्याहृतियों का उच्चारण करता है, तो वह केवल सुनने वाला नहीं रहता, बल्कि उस ध्वनि का दृष्टा बन जाता है। वह इस अनुभव से गुजरता है कि जिस प्रजापति ने सृष्टि के आरम्भ में इन ध्वनियों को उच्चारित कर शून्य को रूप दिया, वही सृजनात्मक शक्ति अब उसके भीतर प्राणसंयम के माध्यम से सक्रिय हो रही है। यह अभ्यास साधक को सीमित व्यक्तित्व से निकालकर विराट व्यक्तित्व (विष्णु-स्वरूप) की ओर ले जाता है।

व्याहृतीनां छन्दांसि

श्लोक ३.१३

सप्त च्छन्दांसि यान्यासां तानि सम्यक् प्रकीर्तयेत् ।

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च ॥ ३.१३ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. २९

इनके जो सात छन्द हैं, उन्हें ठीक से कहे: 'गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति...'

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में यह बताया गया कि समस्त व्याहृतियों के ऋषि प्रजापति हैं और उनका विस्तार विष्णु के अमित तेज के समान सात लोकों तक है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उन सात व्याहृतियों के साथ जुड़े सात छन्दों का परिचय दे रहे हैं, जो इस ध्वनि-यज्ञ के आधार स्तंभ हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: तानि सप्त च्छन्दांसि यानि आसां, तानि (साधकः) सम्यक् प्रकीर्तयेत्। (तानि छन्दांसि सन्ति) — गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्तिरेव च।

पदार्थ:

• सप्त च्छन्दांसि: सात छन्द। छन्द का शाब्दिक अर्थ है 'बंधन' या 'नियम'। मन्त्रों के अक्षर और लय का वह अनुशासन जो मन को एक निश्चित गति प्रदान करता है।

• यान्यासां: जो (इन व्याहृतियों के साथ) जुड़े हुए हैं या स्थित हैं।

• सम्यक् प्रकीर्तयेत्: ठीक से कहे या उनका उच्चारण/स्मरण करे। यहाँ 'प्रकीर्तन' केवल शब्दों का बोलना नहीं, बल्कि उनके स्वरूप को पहचानना है।

• गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति: ये पाँच छन्दों के नाम हैं। गायत्री (२४ अक्षर), उष्णिक् (२८ अक्षर), अनुष्टुप् (३२ अक्षर), बृहती (३६ अक्षर) और पंक्ति (४० अक्षर) के रूप में इनकी गणना होती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य व्याहृतियों के 'छन्द' पक्ष को उद्घाटित कर रहे हैं। यह श्लोक एक सूची के रूप में आरम्भ होता है, जिसका पूर्ण विवरण अगले श्लोक (३.१४) में समाप्त होगा।

यहाँ 'छन्द' का अर्थ केवल काव्य-शास्त्र की विधा नहीं है। वैदिक परम्परा में छन्द वह 'वाहन' है जिस पर मन्त्र सवार होता है। जिस प्रकार एक ही शब्द को अलग-अलग लय में बोलने से हृदय पर भिन्न प्रभाव पड़ता है, वैसे ही ये सात छन्द सात भिन्न मानसिक और प्राणिक अवस्थाओं के प्रतीक हैं। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इन सात छन्दों को 'सम्यक्' प्रकीर्तित करना चाहिए। 'सम्यक्' शब्द यहाँ संकेत देता है कि साधक को केवल नाम नहीं रटने हैं, बल्कि उस छन्द की लय और उसके द्वारा उत्पन्न होने वाले कंपन का अनुभव करना है।

व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः आदि) यदि बीज हैं, तो ये छन्द उस बीज के विकसित होने की प्रक्रिया हैं। जब साधक इन छन्दों के अनुशासन में व्याहृतियों का जप करता है, तो उसकी चेतना स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ती है। गायत्री से लेकर पंक्ति तक का क्रम वास्तव में चेतना के विस्तार का क्रम है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से छन्द 'प्राण की लय' हैं। साधक जब इन सात छन्दों का अभ्यास करता है, तो वह अपने भीतर के सात स्तरों (लोकों) को संतुलित करता है।

१. लय का अभ्यास: साधक प्रत्येक छन्द के अक्षरों की संख्या और उनकी गति के माध्यम से अपने मन की चंचलता को बांधता है। छन्द का अर्थ ही है 'छन्न' (छानना), अर्थात् मन के विकारों को छानकर केवल शुद्ध चैतन्य को शेष रखना।

२. ध्वनि-योग: गायत्री से पंक्ति तक की यात्रा लघु से दीर्घ की ओर यात्रा है। यह अभ्यास साधक को संकुचित अवस्था से विस्तृत अवस्था में ले जाता है।

३. अनुभव: इस श्लोक का अभ्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि उसकी वाणी केवल शब्द नहीं, बल्कि एक गणितीय और दैवीय संरचना है। जब वह इन छन्दों को 'सम्यक्' प्रकीर्तित करता है, तो उसके भीतर का प्राण-वेग एक निश्चित अनुशासन में बंध जाता है, जिससे चित्त की एकाग्रता बढ़ती है और वह उच्च भूमियों के साक्षात्कार के लिए तैयार होता है।

व्याहृतीनां देवताः

श्लोक ३.१४

त्रिष्टुप् च जगती चैव छन्दांस्येतानि सप्त वै ।

अग्निर्वायुस्तथादित्यो बृहस्पत्याप एव च ॥ ३.१४ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३०

'त्रिष्टुप्' और 'जगती' — ये सात छन्द हैं; अग्नि, वायु तथा आदित्य, बृहस्पति और आपः ही (इनके देवता हैं)...

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सात व्याहृतियों के साथ संबद्ध प्रथम पाँच छन्दों का उल्लेख किया था। इसी क्रम को पूर्ण करते हुए अब वे शेष दो छन्दों और इन सात व्याहृतियों के अधिष्ठात्री देवताओं का विवरण दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: त्रिष्टुप् च जगती चैव (तानि) छन्दांसि, एतानि सप्त वै (भवन्ति)। अग्निः, वायुः, तथा आदित्यः, बृहस्पतिः, आपः एव च (तेषां देवताः)।

पदार्थ:

• त्रिष्टुप् च जगती चैव: त्रिष्टुप् और जगती भी (छन्द हैं)।

• छन्दांसि एतानि सप्त वै: ये सात छन्द वास्तव में हैं।

• अग्निः, वायुः, आदित्यः, बृहस्पतिः, आपः: देवताओं के नाम। यहाँ 'एव' शब्द इन देवताओं की विशिष्टता और उनकी अनिवार्यता को दर्शाता है।

भाष्य —

इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य छन्दों की सूची को पूर्ण करते हुए 'त्रिष्टुप्' और 'जगती' का नाम लेते हैं। इस प्रकार गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् और जगती—ये सात छन्द सात व्याहृतियों के साथ एक-एक करके संबद्ध हैं।

छन्द केवल काव्य-रचना की विधा नहीं, अपितु वे 'छंदित' यानी बंधे हुए प्राण-वेग हैं। जब साधक व्याहृति का उच्चारण करता है, तो वह उस छन्द की लय में बंधता है, जिससे उसकी चेतना का विस्तार उस विशिष्ट लोक की आवृत्ति के साथ एकाकार हो जाता है।

इसके पश्चात ऋषि उन देवताओं का उल्लेख करते हैं जो इन व्याहृतियों और छन्दों के अधिष्ठाता हैं। यहाँ अग्नि, वायु, आदित्य, बृहस्पति और आपः (जल) का नाम लिया गया है। यह सूची आगामी श्लोक (3.15) में इन्द्र और विश्वेदेवों के साथ पूर्ण होगी।

बाहरी विधि में ये देवता प्रकृति के तत्व या स्वर्ग के अधिपति हैं, किंतु आन्तर अर्थ में ये साधक के भीतर की शक्तियाँ हैं। 'अग्नि' वह जठराग्नि और ज्ञानग्नि है जो अविद्या को भस्म करती है; 'वायु' वह प्राण-शक्ति है जो शरीर में गति और चेतना का संचार करती है; 'आदित्य' वह हृदय-सूर्य है जो प्रज्ञा का प्रकाश फैलाता है; 'बृहस्पति' वह बोध या विवेक है जो साधक को सही मार्ग दिखाता है; और 'आपः' वह अंतःकरण की शुद्धि और शांति है जो चित्त को निर्मल करती है।

जब साधक इन देवताओं का स्मरण करते हुए व्याहृतियों का जप करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के इन पंच-तत्वों और दिव्य शक्तियों को जाग्रत कर उन्हें ब्रह्माण्डीय चेतना से जोड़ता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'नाद-योग' और 'तत्व-शुद्धि' का अभ्यास है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक जब व्याहृति का उच्चारण करे, तो वह केवल शब्दों को न बोले, बल्कि उस छन्द की लय को अपने प्राणों में महसूस करे।

जैसे-जैसे वह सात छन्दों और सात देवताओं के क्रम में आगे बढ़ता है, वह स्थूल शरीर (अग्नि, वायु, जल) से सूक्ष्म शरीर (विवेक, प्रज्ञा) और अंततः अक्षर-ब्रह्म की ओर प्रस्थान करता है। यह अभ्यास साधक को 'अविद्या' के अंधकार से निकालकर 'विज्ञान' के प्रकाश की ओर ले जाता है, क्योंकि वह अपने भीतर के देवताओं (शक्तियों) को पहचानकर उन्हें ब्रह्माण्ड के व्यापक स्वरूप में विलीन कर देता है। यह प्रक्रिया साधक को भौतिक धरातल से उठाकर दिव्य धरातल पर प्रतिष्ठित करती है।

व्याहृतीनां विनियोगः

श्लोक ३.१५

इन्द्रश्च विश्वेदेवाश्च देवताः समुदाहृताः ।

अनादिष्टेषु सर्वेषु प्रायश्चित्तेषु सर्वशः ॥ ३.१५ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३०

— इन्द्र और विश्वेदेव — (ये) देवता कहे गये हैं। जिनका विशेष विधान नहीं कहा गया, उन सब प्रायश्चित्तोंमें सब प्रकारसे —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सात व्याहृतियों के छन्दों को पूर्ण करते हुए प्रथम पाँच देवताओं (अग्नि, वायु, आदित्य, बृहस्पति और आपः) का नाम लिया था। वर्तमान श्लोक में वे देवताओं की इस सूची को पूर्ण कर रहे हैं और इन व्याहृतियों के व्यावहारिक विनियोग का विधान बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: इन्द्रः च विश्वेदेवाः च (एताम् सप्त व्याहृतीनां) देवताः समुदाहृताः (सन्ति)। (एते व्याहृतयः) अनादिष्टेषु सर्वेषु प्रायश्चित्तेषु सर्वशः (विनियोजिताः)।

पदार्थ:

• इन्द्रश्च विश्वेदेवाश्च: इन्द्र और विश्वेदेव (समस्त देवता)।

• देवताः समुदाहृताः: देवताओं के रूप में यहाँ एकत्रित या संकलित किए गए हैं।

• अनादिष्टेषु: जहाँ विशेष रूप से निर्देश न दिया गया हो (बिना विशेष विधान के)।

• प्रायश्चित्तेषु सर्वशः: सब प्रकार के प्रायश्चित्तों में सर्वथा।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ देवताओं की सूची को पूर्ण करते हुए 'इन्द्र' और 'विश्वेदेवों' का उल्लेख करते हैं। इस प्रकार सात व्याहृतियों के लिए सात अधिष्ठात्री देवता निर्धारित हुए: अग्नि, वायु, आदित्य, बृहस्पति, आपः, इन्द्र और विश्वेदेव।

यहाँ 'समुदाहृताः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि ये देवता केवल बाहरी आकाश में स्थित अलग-अलग सत्ताएँ नहीं हैं, अपितु सात व्याहृतियों के माध्यम से एक ही ईश्वरीय सत्ता के सात आयामों को यहाँ 'एकत्रित' किया गया है। बाहरी विधि में इन्द्र इंद्रियों के स्वामी हैं और विश्वेदेव समस्त ब्रह्माण्ड के संचालक, किंतु आन्तर अर्थ में इन्द्र 'इंद्रिय-शक्ति' का प्रतीक हैं और विश्वेदेव उस 'सर्वव्यापी चेतना' के प्रतीक हैं जो समस्त सूक्ष्म तत्तवों में व्याप्त है।

इसके पश्चात ऋषि इन व्याहृतियों के विनियोग (प्रयोग) का एक अत्यंत व्यापक नियम बताते हैं। वे कहते हैं कि जिन प्रायश्चित्तों के लिए किसी विशिष्ट मन्त्र या विधि का निर्देश (अनादिष्टेषु) नहीं दिया गया है, उन सभी प्रायश्चित्तों में इन सात व्याहृतियों का प्रयोग 'सर्वशः' अर्थात् सब प्रकार से किया जा सकता है।

प्रायश्चित्त का अर्थ केवल पाप-निवारण नहीं, अपितु 'चित्त का पुनः शुद्धिकरण' है। जब साधक किसी त्रुटि के कारण अपनी लय खो देता है या उसकी चेतना विचलित होती है, तो वह 'प्रायश्चित्त' की अवस्था में होता है। ऐसे समय में सात व्याहृतियों का स्मरण उसे पुनः सात लोकों (चेतना के सात स्तरों) के साथ जोड़ देता है, जिससे उसका मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन पुनः स्थापित हो जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'समन्वय' की भूमि पर ले जाता है। इन्द्र और विश्वेदेवों का स्मरण करना वास्तव में अपनी समस्त इंद्रियों और संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्तियों को एक केंद्र पर लाना है।

साधक जब 'अनादिष्ट' प्रायश्चित्तों में इनका प्रयोग करता है, तो वह वास्तव में यह अनुभव करता है कि जब भी मन किसी दिशाहीनता या ग्लानि में फँसे, तब इन सात व्याहृतियों का जप एक 'सार्वभौमिक औषधि' की तरह कार्य करता है। यह अभ्यास साधक को विखंडित अवस्था से समग्रता की ओर ले जाता है। वह अनुभव करता है कि उसका अपना शरीर और यह संपूर्ण विश्व एक ही लय (छन्द) और एक ही प्रकाश (देवता) से संचालित है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर प्रतिष्ठित करता है जहाँ वह स्वयं को केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु 'विश्व-रूप' के रूप में देखने लगता है।

व्याहृतिप्रोक्तसप्तलोकवर्णनम्

श्लोक ३.१६

प्रणायामप्रयोगे च विनियोग उदाहृतः ।

भवन्ति भूयो भूतानि उपभोगक्षये पुनः ॥ ३.१६ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३०

— और प्राणायामके प्रयोगमें (इनका) विनियोग कहा गया है। उपभोग क्षीण होनेपर भूत (प्राणी) फिर-फिर होते (भवन्ति) हैं — (इसलिए भूः) —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सात व्याहृतियों के देवताओं का उल्लेख करते हुए यह बताया था कि जहाँ विशेष निर्देश न हो, वहाँ इन व्याहृतियों का प्रयोग सभी प्रायश्चित्तों में किया जाता है। अब वे इन व्याहृतियों के एक और महत्वपूर्ण प्रयोग—प्राणायाम—का संकेत देते हुए, सात लोकों के नामों के निरुक्त (व्युत्पत्ति) की श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (एते व्याहृतयः) प्रणायामप्रयोगे च विनियोग उदाहृतः। (तत्र प्रथमः व्याहृतिः भूः अस्ति यतः) उपभोगक्षये पुनः भूतानि भवन्ति।

पदार्थ:

• प्रणायामप्रयोगे च विनियोग उदाहृतः: और प्राणायाम के प्रयोग में (इन व्याहृतियों का) विनियोग कहा गया है।

• उपभोगक्षये: उपभोग (प्रारब्ध या संचित कर्मों के फल का भोग) क्षीण होने पर।

• पुनः भूतानि भवन्ति: प्राणी (भूत) फिर-फिर उत्पन्न होते हैं या होते हैं।

• भूः: प्रथम व्याहृति, जिसका अर्थ 'होना' या 'पृथ्वी' है।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि व्याहृतियाँ केवल मन्त्रों के आरम्भ में बोले जाने वाले शब्द नहीं हैं, अपितु उनका सीधा सम्बन्ध 'प्राणायाम' से है। प्राणायाम का अर्थ है प्राण का आयाम या विस्तार। जब साधक प्राणायाम करता है, तो वह स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर और फिर अक्षर की ओर बढ़ता है। इन सात व्याहृतियों का विनियोग प्राणायाम में इसलिए है क्योंकि ये सात व्याहृतियाँ सात लोकों और सात अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्राणायाम के माध्यम से साधक इन सात स्तरों का अतिक्रमण करता है।

श्लोक के दूसरे भाग में ऋषि 'भूः' व्याहृति का रहस्य खोलते हैं। बाहरी विधि में 'भूः' पृथ्वी लोक है। किंतु यहाँ याज्ञवल्क्य उसकी निरुक्ति 'भवन्ति' (होने) से कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब प्राणी के पूर्व-संचित कर्मों का 'उपभोग' समाप्त हो जाता है, तब वह पुनः जन्म लेता है, फिर से 'होता' है।

यहाँ 'उपभोग' का अर्थ है—इन्द्रिय-विषय का भोग। जब तक जीव के भीतर किसी विशेष लोक या स्थिति के प्रति तृष्णा और कर्म-फल शेष है, वह उसका उपभोग करता है। जैसे ही वह उपभोग क्षीण होता है, प्रकृति उसे पुनः किसी अन्य रूप में 'भू' (उत्पन्न) करती है। अतः जिस लोक में यह निरंतर 'होने' और 'न होने' (जन्म और मृत्यु) का चक्र चलता है, वह 'भूः' है। यह केवल भौतिक पृथ्वी नहीं, अपितु 'भाव-भूमि' है, जहाँ कर्मों के कारण अस्तित्व का निर्माण और विनाश होता रहता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'भूः' वह भूमि है जहाँ साधक का वर्तमान अस्तित्व स्थित है। यह 'कर्मभूमि' है। साधक जब प्राणायाम के अभ्यास में 'भूः' का विनियोग करता है, तो वह अपने स्थूल शरीर और उसकी जड़ता के प्रति सजग होता है।

यहाँ 'उपभोगक्षये' का एक गहरा योगिक अर्थ यह भी है कि जब साधक बाहरी विषयों के उपभोग में अपनी रुचि खो देता है (उपभोग का क्षय), तब उसके भीतर एक नया 'होना' आरम्भ होता है—वह 'साधक' के रूप में पुनः जन्म लेता है।

अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक प्राणायाम के प्रथम चरण में 'भूः' का स्मरण करता है, तो वह अपने प्राण को पृथ्वी तत्त्व की स्थिरता से जोड़ता है। वह अनुभव करता है कि यह शरीर और यह संसार निरंतर परिवर्तनशील है (भवन्ति), और इस परिवर्तनशीलता के बीच वह उस स्थिर तत्त्व की खोज कर रहा है जो इन सात लोकों से परे है। इस प्रकार साधक 'भूः' की अवस्था से ऊपर उठकर सूक्ष्म लोकों की यात्रा का आरम्भ करता है।

श्लोक ३.१७

कल्पान्ते ह्युपभोगाय भुवस्तेन प्रकीर्तितम् ।

शीतोष्णवृष्टितेजांसि जायन्त्येतानि वै ततः ॥ ३.१७ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३०

— कल्पान्तमें उपभोगके लिए (वे वहाँ होते हैं), इसलिए वह भुवः कहलाता है; उसीसे शीत, उष्ण, वर्षा और तेज उत्पन्न होते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रथम व्याहृति 'भूः' की निरुक्ति करते हुए उसे पुनर्जन्म और पृथ्वी लोक से जोड़ा था। अब वे द्वितीय व्याहृति 'भुवः' के स्वरूप और उसके प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (द्वितीयः व्याहृतिः) भुवः (अस्ति), यतः कल्पान्ते ह्युपभोगाय (प्राणिनः तत्र तिष्ठन्ति), तेन (भुवः) प्रकीर्तितम्। ततः वै एतानि शीत-उष्ण-वृष्टि-तेजांसि जायन्ते।

पदार्थ:

• कल्पान्ते: कल्प के अन्त में (प्रलयकाल के समीप)।

• उपभोगाय: कर्मों के फल के उपभोग के लिए।

• प्रकीर्तितम्: कहा गया है या प्रसिद्ध है।

• शीतोष्णवृष्टितेजांसि: शीत (ठण्ड), उष्ण (गर्मी), वृष्टि (वर्षा) और तेज (अग्नि/प्रकाश)।

• जायन्ते: उत्पन्न होते हैं।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'भुवः' व्याहृति का रहस्य खोल रहे हैं। बाहरी विधि और स्थूल दृष्टि में 'भुवः' अन्तरिक्ष लोक है—पृथ्वी और स्वर्ग के मध्य का वह स्थान जहाँ वायु और गन्धर्वों का वास है। किन्तु ऋषि इसकी निरुक्ति 'उपभोग' से करते हैं।

भाव यह है कि कल्प के अन्त में, जब प्रलय की प्रक्रिया आरम्भ होती है, तब जो प्राणी अपने संचित कर्मों के पूर्ण उपभोग के लिए इस लोक में स्थित रहते हैं, उनके कारण ही इसे 'भुवः' कहा गया है। यहाँ 'उपभोग' का अर्थ केवल सुख-दुःख नहीं, अपितु उस प्रारब्ध की परिपक्वता है जो जीव को अगले स्तर पर ले जाने या पुनः नीचे गिराने का निर्धारण करती है।

आगे ऋषि इस लोक की भौतिकता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि 'शीत, उष्ण, वृष्टि और तेज' इसी भुवः लोक से उत्पन्न होते हैं। यह अन्तरिक्ष का वह क्षेत्र है जहाँ मौसमों का चक्र चलता है। बादल, बिजली, वर्षा, सूर्य की तपन और शीतलता—ये सब इसी व्याहृति के अधिष्ठान में घटित होते हैं। अतः 'भुवः' केवल एक स्थान नहीं, अपितु प्रकृति के उन परिवर्तनों का केंद्र है जो जीव के शरीर और मन को प्रभावित करते हैं।

योग-रहस्य —

साधक के लिए 'भुवः' का अर्थ केवल बाहरी अन्तरिक्ष नहीं, अपितु प्राण का वह विस्तार है जहाँ 'ताप' और 'शीत' का अनुभव होता है। योग की दृष्टि से, जब साधक प्राणायाम के माध्यम से अपनी चेतना को पृथ्वी (भूः) के जड़त्व से ऊपर उठाकर अन्तरिक्ष (भुवः) की ओर ले जाता है, तब वह अनुभव करता है कि उसके भीतर भी ऋतुओं जैसा परिवर्तन हो रहा है।

अभ्यास की दृष्टि से, 'भुवः' का जप और ध्यान साधक को मानसिक उद्वेगों (तेज और वृष्टि) से ऊपर उठने में सहायता करता है। जिस प्रकार बाहरी अन्तरिक्ष में वर्षा और धूप का संतुलन जीवन को चलाता है, उसी प्रकार साधक अपने भीतर के प्राण-ताप (उष्ण) और शांति (शीत) का संतुलन करना सीखता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक स्थूल शरीर के मोह को छोड़कर सूक्ष्म शरीर के अनुभवों में प्रवेश करता है। यहाँ वह अनुभव करता है कि जैसे बाहरी मौसम परिवर्तनशील है, वैसे ही उसके विचार और भावनाएँ भी परिवर्तनशील हैं; वह इन परिवर्तनों का साक्षी बनकर 'अक्षर' की ओर बढ़ने का प्रयास करता है।

श्लोक ३.१८

आलयः सुकृतीनां च स्वर्लोकः समुदाहृतः ।

अधरोत्तरेभ्यो लोकेभ्यो महांश्च परिमाणतः ॥ ३.१८ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३०

पुण्यात्माओं का आलय स्वर्लोक कहा गया है; जो नीचे और ऊपर के लोकों से परिमाण में महान् है —...

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'भुवः' व्याहृति की निरुक्ति करते हुए उसे कल्पान्त के उपभोग और अन्तरिक्ष की भौतिक प्रवृत्तियों से जोड़ा था। अब वे तृतीय व्याहृति 'स्वः' के स्वरूप और उसके पश्चात आने वाले 'महः' लोक की विशालता का संकेत दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: सुकृतीनां आलयः च स्वर्लोकः समुदाहृतः। (तथा) अधरोत्तरेभ्यो लोकेभ्यो महांश्च परिमाणतः (अस्ति)।

पदार्थ:

• सुकृतीनां: जिन्होंने शुभ कर्म (सुकृत) किए हैं, उन पुण्यात्माओं का।

• आलयः: निवास स्थान, आश्रय या घर।

• समुदाहृतः: कहा गया है, संकलित है या प्रसिद्ध है।

• अधरोत्तरेभ्यो: अधर (नीचे के—भूः और भुवः) तथा उत्तर (ऊपर के—जनः, तपः, सत्यम्) लोकों से।

• परिमाणतः: आकार, विस्तार या माप की दृष्टि से।

• महांश्च: और 'महः' (लोक) महान् है।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ तृतीय व्याहृति 'स्वः' की निरुक्ति कर रहे हैं। बाहरी विधि और स्थूल दृष्टि में 'स्वः' वह स्वर्गलोक है जहाँ इन्द्र का शासन है और जहाँ भौतिक सुखों की प्रचुरता है। किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य इसे 'सुकृतीनां आलयः' कहकर इसके आन्तर अर्थ को स्पष्ट करते हैं।

भाव यह है कि 'स्वः' केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, अपितु एक मानसिक और आध्यात्मिक अवस्था है। 'सुकृत' का अर्थ केवल बाहरी दान-पुण्य नहीं, अपितु वह चित्त-शुद्धि है जो साधक को तामसिकता और राजसिकता से ऊपर उठाकर सात्विक आनंद में प्रतिष्ठित करती है। जब साधक के भीतर शुभ संस्कारों का उदय होता है, तब उसका हृदय ही 'स्वर्लोक' बन जाता है। अतः यह पुण्यात्माओं का वह आलय है जहाँ वे अपने पुण्य-कर्मों के फलस्वरूप दिव्य सुखों का अनुभव करते हैं।

श्लोक के उत्तरार्ध में ऋषि एक महत्वपूर्ण तुलना कर रहे हैं। वे कहते हैं कि 'अधरोत्तरेभ्यो लोकेभ्यो महांश्च परिमाणतः'। यहाँ वाक्य अधूरा है, जिसका पूर्णत्व अगले श्लोक (३.१९) में 'हृदयं सर्वलोकानां महस्तेन निगद्यते' के साथ होता है।

रहस्य यह है कि 'महः' लोक, नीचे के दो लोकों (भूः, भुवः) और ऊपर के लोकों (जनः, तपः, सत्यम्) की तुलना में परिमाण की दृष्टि से अधिक विशाल है। यह विस्तार केवल भौतिक दूरी का नहीं, अपितु चेतना के विस्तार का है। 'महः' वह क्षेत्र है जो समस्त ब्रह्माण्ड के हृदय के समान है, जिसमें अन्य सभी लोकों का समावेश संभव है। यह उस विराट पुरुष की उस अवस्था का संकेत है जहाँ जीव अपनी सीमित पहचान को छोड़कर 'महान्' (विराट) होने का अनुभव करता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए 'स्वः' का अभ्यास चित्त की सात्विकता का अनुभव करना है। जब साधक प्राणायाम और शुद्धि के माध्यम से अपने भीतर के 'स्व' (स्वः) में स्थित होता है, तब वह अनुभव करता है कि आनंद कहीं बाहर नहीं, बल्कि सुकृतों (शुद्ध संस्कारों) के संचय से भीतर ही प्रकट होता है।

'महः' की विशालता का अभ्यास साधक को 'लघु' (सीमित अहंकार) से 'महान्' (विराट चेतना) की ओर ले जाता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि उसका अपना हृदय ही समस्त लोकों का केंद्र है। परिमाण में महान् होने का अर्थ है—चेतना का इतना विस्तार होना कि उसमें संपूर्ण सृष्टि समाहित हो जाए। इस भूमि पर पहुँचकर साधक स्वयं को केवल एक शरीर न मानकर, समस्त लोकों के आधार रूपी 'महत्' तत्व के रूप में देखने का प्रयास करता है।

श्लोक ३.१९

हृदयं सर्वलोकानां महस्तेन निगद्यते ।

कल्पदाहे प्रलीनास्तु प्राणिनस्तु पुनः पुनः ॥ ३.१९ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३०

सब लोकों का हृदय है, इसलिए 'महः' कहा जाता है; कल्प के दाह में लीन हुए प्राणी फिर-फिर...

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'स्वः' व्याहृति की निरुक्ति करते हुए उसे पुण्यात्माओं का आलय बताया था और 'महः' लोक की परिमाणगत विशालता का संकेत दिया था। अब वे 'महः' के आन्तर अर्थ और कल्प के प्रलयकाल में प्राणियों की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (महः) सर्वलोकानां हृदयं (अस्ति), तेन (सः) निगद्यते। (तथा) कल्पदाहे प्रलीनाः स्तु प्राणिनः (पुनः पुनः जायन्ते)।

पदार्थ:

• सर्वलोकानां हृदयं: समस्त लोकों का हृदय या केन्द्र।

• निगद्यते: कहा जाता है, नाम दिया गया है या वर्णित है।

• कल्पदाहे: कल्प के दाह में, अर्थात् प्रलय के समय जब अग्नि द्वारा ब्रह्माण्ड का विनाश होता है।

• प्रलीनाः: लीन हो चुके, विलीन या समाहित।

• पुनः पुनः: बार-बार, फिर से।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ चतुर्थ व्याहृति 'महः' की निरुक्ति कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने इसे 'परिमाणतः' (आकार में) महान् कहा था, किन्तु यहाँ वे इसके गुणात्मक और आध्यात्मिक स्वरूप को खोल रहे हैं। वे कहते हैं कि 'महः' समस्त लोकों का हृदय है, इसीलिए इसे 'महः' कहा गया है।

यहाँ 'हृदय' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। जिस प्रकार शरीर के समस्त अंगों का संचालन और पोषण हृदय से होता है और वह शरीर का केन्द्र है, उसी प्रकार 'महः' वह केन्द्र-बिन्दु है जिसमें समस्त लोकों का सार निहित है। यह केवल एक लोक नहीं, अपितु वह सत्ता है जो अन्य सभी लोकों को आधार प्रदान करती है। बाहरी दृष्टि में यह एक विशाल लोक है, किन्तु आन्तर दृष्टि में यह वह 'महा-आकाश' है जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि प्रतिबिम्बित होती है।

श्लोक के दूसरे चरण में ऋषि एक गंभीर सत्य की ओर संकेत करते हैं— 'कल्पदाहे प्रलीनास्तु प्राणिनस्तु पुनः पुनः'। यहाँ वाक्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है; इसकी क्रिया 'जायन्ते' (उत्पन्न होते हैं) अगले श्लोक (३.२०) में आती है। भाव यह है कि जब कल्प के अंत में प्रलय की अग्नि (कल्पदाह) प्रज्वलित होती है, तब समस्त दृश्य जगत और उसमें स्थित प्राणी लीन हो जाते हैं। किन्तु यह लीन होना पूर्ण विनाश नहीं है, अपितु एक विश्राम है। वे प्राणी इस 'महः' रूपी बीज-अवस्था में समाहित हो जाते हैं, ताकि अगली सृष्टि के उदय होने पर वे फिर-फिर उत्पन्न हो सकें।

अतः 'महः' वह अक्षय कोष है जहाँ प्रलयकाल में समस्त जीव-तत्त्व सुरक्षित रहते हैं। यह वह बिंदु है जहाँ से सृष्टि का विस्तार होता है और जहाँ अंततः सब विलीन हो जाते हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस विषय में तैत्तिरीय उपनिषद् का मत अत्यंत स्पष्ट है:

तैत्तिरीय उपनिषद्

भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामु ह स्मैतां चतुर्थीम् । माहाचमस्यः प्रवेदयते । मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः ॥ १.५.१ ॥

भूः, भुवः, सुवः — ये तीन व्याहृतियाँ हैं। उनमें इस चौथी (व्याहृति) को माहाचमस्य (ऋषि) बताते थे — 'महः'। वह ब्रह्म है, वह आत्मा है; अन्य देवता (उसके) अङ्ग हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद् १.५.१उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 149

यहाँ 'महः' को साक्षात् 'ब्रह्म' और 'आत्मा' कहा गया है, तथा अन्य देवताओं को उसके अङ्ग बताया गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह कथन कि 'महः सर्वलोकानां हृदयं', इसी उपनिषद् के भाव का विस्तार है। यदि महः आत्मा है, और आत्मा ही सबका केन्द्र है, तो वह स्वाभाविक रूप से समस्त लोकों का हृदय ही होगा।

इसी प्रकार:

तैत्तिरीय उपनिषद्

भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ लोकः । मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते ॥ १.५.२ ॥

'भूः' यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्ष, 'सुवः' वह (द्यु-) लोक, 'महः' आदित्य; आदित्यसे ही सब लोक महिमा पाते (बढ़ते) हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद् १.५.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 149

यहाँ कहा गया है कि 'महः' आदित्य है और आदित्य से ही सब लोक महिमा पाते हैं। स्मृति में 'हृदय' कहने का तात्पर्य इसी आदित्य-तत्त्व (प्रकाश-स्वरूप आत्मा) से है, जो समस्त लोकों को प्रकाशित और संचालित करता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए 'महः' केवल एक बाहरी लोक नहीं, अपितु उसके अपने शरीर का 'हृदयाकाश' है। योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को स्थूल जगत से हटाकर केन्द्र की ओर ले जाता है।

साधक जब प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से अपने चित्त को अंतर्मुख करता है, तब वह अनुभव करता है कि बाहरी ब्रह्माण्ड की विशालता वास्तव में उसके हृदय के भीतर सिमटी हुई है। 'सर्वलोकानां हृदयं' का अभ्यास करते हुए साधक यह अनुभव करता है कि उसके हृदय में स्थित वह चैतन्य-बिन्दु ही वह 'महः' है, जिसमें समस्त सृष्टि का बीज विद्यमान है।

कल्पदाह का आन्तर अर्थ 'अहंकार का दाह' है। जब साधक ज्ञान की अग्नि से अपने पुराने संस्कारों और मिथ्या अहंकार को जला देता है (प्रलीनाः), तब वह उस शून्य-अवस्था में पहुँचता है जहाँ से नवीन आध्यात्मिक जन्म संभव है। इस स्थिति में वह स्वयं को केवल एक सीमित शरीर नहीं, अपितु समस्त लोकों का केन्द्र (हृदय) अनुभव करता है। वह इस भूमि से उस भूमि पर जाता है जहाँ वह 'अंश' से 'पूर्ण' की ओर अग्रसर होता है और अनुभव करता है कि वह स्वयं वही 'महः' है जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड प्रतिष्ठित है।

श्लोक ३.२०

जायन्ते तु पुनः सर्गे जनस्तेन उदाहृतः ।

सनकाद्यास्तपःसिद्धा ये चान्ये ब्रह्मणः सुताः ॥ ३.२० ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

नयी सृष्टि में फिर उत्पन्न होते हैं, इसलिए 'जनः' कहा गया है। सनक आदि तप से सिद्ध और जो ब्रह्मा के अन्य पुत्र हैं —...

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'महः' लोक को समस्त लोकों का हृदय बताया था और यह संकेत दिया था कि कल्प के प्रलयकाल में समस्त प्राणी उसमें लीन हो जाते हैं। अब वे उस लीन अवस्था के पश्चात पुनः प्रकटीकरण की प्रक्रिया और उससे संबंधित 'जनः' तथा 'तपः' व्याहृतियों का विवेचन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (प्रलीनाः प्राणिनः) तु सर्गे पुनः जायन्ते, तेन (सः लोकः) जनः उदाहृतः। सनकाद्याः (तपःसिद्धाः) ये च अन्ये ब्रह्मणः सुताः (तपःलोके तिष्ठन्ति)।

पदार्थ:

• सर्गे: सृष्टि के आरम्भ में, सृजन काल में।

• पुनः जायन्ते: फिर से उत्पन्न होते हैं।

• जनः: उत्पन्न होने वाला या जन्म देने वाला (यहाँ पाँचवें व्याहृति का नाम)।

• उदाहृतः: कहा गया है, नाम दिया गया है।

• सनकाद्याः: सनक आदि ऋषि।

• तपःसिद्धाः: तपस्या के द्वारा सिद्ध हुए।

• ब्रह्मणः सुताः: ब्रह्मा के पुत्र।

भाष्य —

यह श्लोक पिछले श्लोक (३.१९) के अधूरे वाक्य को पूर्ण करता है और अगले श्लोक (३.२१) की भूमिका बनाता है। पिछले श्लोक में कहा गया था कि कल्प के दाह (प्रलय) में प्राणी लीन हो जाते हैं; इस श्लोक के आरम्भ में उसका फल है कि वही लीन प्राणी 'सर्गे' अर्थात् नयी सृष्टि के आरम्भ में पुनः उत्पन्न होते हैं।

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ पाँचवें व्याहृति 'जनः' की निरुक्ति कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस लोक में प्रलय के पश्चात प्राणी पुनः जन्म लेते हैं और प्रकटीकृत होते हैं, उसे 'जनः' कहा गया है। 'जन' धातु का अर्थ ही है— उत्पन्न होना। बाहरी दृष्टि में यह वह लोक है जहाँ से सृष्टि का विस्तार होता है, किन्तु आन्तर दृष्टि में यह वह अवस्था है जहाँ बीज-रूप प्राण पुनः स्पन्दन कर स्वरूप ग्रहण करते हैं। यह व्याहृति उस शक्ति का प्रतीक है जो शून्य से सृष्टि की ओर ले जाती है।

श्लोक के दूसरे चरण में ऋषि छठे व्याहृति 'तपः' की ओर संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि सनक आदि ऋषि, जो तपस्या के द्वारा सिद्ध हो चुके हैं और जो ब्रह्मा के अन्य पुत्र हैं, वे इस लोक (तपः लोक) में स्थित रहते हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि यह वाक्य इस श्लोक में आरम्भ हुआ है, किन्तु इसकी क्रिया 'तिष्ठन्ति' (रहते हैं) अगले श्लोक (३.२१) में आती है।

'तपः' लोक केवल एक स्थान नहीं, अपितु एक विशेष चेतना की स्थिति है। यहाँ 'ब्रह्मणः सुताः' शब्द का प्रयोग केवल शारीरिक पुत्रों के लिए नहीं, अपितु उन प्रज्ञावान् आत्माओं के लिए है जिन्होंने ब्रह्मा-तत्व (परम ज्ञान) को प्राप्त कर लिया है। यह वह भूमि है जहाँ साधक अपनी सिद्धियों के साथ स्थित होता है, किन्तु वह लोक-भोग में आसक्त नहीं होता।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ ८.१९ ॥

पार्थ, वही यह भूत-समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर रात्रिके आनेपर विवश लीन होता है, और दिनके आनेपर फिर उत्पन्न होता है।

भगवद्गीता ८.१९गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 221

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि यह भूत-समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर रात्रि (प्रलय) के आने पर विवश लीन होता है और दिन (सृष्टि) के आने पर फिर प्रभवित होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह कथन कि 'प्रलीनाः प्राणिनः पुनः पुनः जायन्ते' इसी शाश्वत चक्र की पुष्टि करता है। जहाँ गीता इसे 'विवशता' और 'अवश' होने से जोड़ती है, वहीं यह स्मृति इसे व्याहृतियों के माध्यम से एक व्यवस्थित ब्रह्माण्डीय क्रम (जनः लोक) के रूप में प्रस्तुत करती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए 'जनः' और 'तपः' का अभ्यास केवल बाहरी लोकों का चिंतन नहीं, अपितु चेतना का आरोहण है।

'जनः' का अभ्यास वह स्थिति है जब साधक अपने भीतर सोई हुई शक्तियों का पुनः जागरण करता है। जिस प्रकार प्रलय के बाद सृष्टि का जन्म होता है, उसी प्रकार योग-निद्रा या गहन समाधि के बाद जब साधक जागता है, तो वह एक नयी चेतना (नया जन्म) का अनुभव करता है। यह 'जनः' अवस्था है— जहाँ ज्ञान का पुनः प्रस्फुटन होता है।

'तपः' का अभ्यास उस स्थिति का है जहाँ साधक 'अधिकार-निवृत्ति' का अनुभव करता है। तपःसिद्धि का अर्थ है— अपनी इंद्रियों और कामनाओं पर पूर्ण विजय प्राप्त कर उस स्थिरता में स्थित होना, जहाँ केवल प्रकाश और ज्ञान शेष रहता है। साधक जब 'तपः' व्याहृति का विनियोग करता है, तो वह स्वयं को ब्रह्मा के पुत्रों (सिद्ध ऋषियों) की उस मानसिक स्थिति में लाने का प्रयास करता है, जहाँ वह संसार के द्वंद्वों से ऊपर उठकर केवल शुद्ध तप (ऊर्जा) के रूप में स्थित हो जाता है। यह अभ्यास साधक को 'जनः' (उत्पत्ति/संसार) से ऊपर उठाकर 'सत्यम्' (परम सत्य) की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है।

श्लोक ३.२१

अधिकारनिवृत्ताश्च तिष्ठन्त्यस्मिंस्ततस्तपः ।

सत्यं तु सप्तमो लोको ब्रह्मणः सदनं हि तत् ॥ ३.२१ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

अधिकार से निवृत्त होकर इसमें रहते हैं, इसलिए 'तपः' है; सत्य तो सातवाँ लोक है क्योंकि वह ब्रह्मा का सदन है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'जनः' व्याहृति की निरुक्ति करते हुए बताया कि प्रलय के पश्चात पुनः सृजन काल में प्राणी जहाँ उत्पन्न होते हैं, वह जनलोक है। अब वे छठे और सातवें व्याहृतियों— 'तपः' और 'सत्यम्' के स्वरूप और उनके निवासियों का विवेचन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (सनकाद्याः ब्रह्मणः सुताः) अधिकारनिवृत्ताः च अस्मिन् (लोके) तिष्ठन्ति, ततस्तपः (उदाहृतः)। सत्यं तु सप्तमो लोको (अस्ति), हि तत् ब्रह्मणः सदनम्।

पदार्थ:

• अधिकारनिवृत्ताः: अधिकार से निवृत्त हुए। यहाँ 'अधिकार' का अर्थ है— सांसारिक स्वामित्व, भोग का अधिकार या कर्ताभाव। उससे निवृत्त होना अर्थात् त्याग या वैराग्य की पूर्णता।

• तिष्ठन्ति: स्थित रहते हैं।

• ततस्तपः: इसलिए उसे 'तपः' (लोक) कहा गया है।

• सत्यं: सातवाँ व्याहृति और लोक।

• ब्रह्मणः सदनम्: ब्रह्मा का निवास स्थान या परम सत्ता का घर।

भाष्य —

यह श्लोक पिछले श्लोक (३.२०) के अंतिम चरण को पूर्ण करता है और सात व्याहृतियों की श्रृंखला को उसकी पराकाष्ठा तक ले जाता है। पिछले श्लोक में सनक आदि ऋषियों और ब्रह्मा के पुत्रों का उल्लेख था; यहाँ बताया गया है कि वे किस स्थिति में और कहाँ स्थित हैं।

महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो सनकादि ऋषि और ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं, वे 'अधिकारनिवृत्त' हैं। सामान्यतः प्राणी लोकों में अपने कर्मों के फल के 'अधिकार' से बंधा रहता है— उसे स्वर्ग का सुख या नरक का दुख अपने अधिकार से मिलता है। किन्तु ये सिद्ध पुरुष समस्त स्वामित्व, कामनाओं और 'मैं कर्ता हूँ' इस भाव से पूर्णतः निवृत्त हो चुके हैं। जब साधक अपनी सत्ता के प्रति मोह छोड़कर केवल शुद्ध चैतन्य में स्थित होता है, तब वह 'तपः' लोक में प्रतिष्ठित होता है। 'तप' का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट नहीं, अपितु वह अग्नि है जो अविद्या को जलाकर केवल शुद्ध प्रकाश शेष रखती है। अतः जिस लोक में केवल निवृत्त सिद्ध पुरुष तप के रूप में स्थित रहते हैं, उसे 'तपः' व्याहृति कहा गया है।

इसके पश्चात ऋषि सातवें और अंतिम व्याहृति 'सत्यम्' का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि 'सत्यं तु सप्तमो लोको'— सत्य सातवाँ लोक है। यह केवल एक स्थान नहीं, अपितु वह अवस्था है जहाँ पहुँचकर द्वैत समाप्त हो जाता है। इसे 'ब्रह्मणः सदनम्' कहा गया है, क्योंकि यहाँ ब्रह्मा (परम पुरुष) का निवास है। यह वह बिंदु है जहाँ पहुँचकर सृष्टि का विस्तार रुक जाता है और साधक उस मूल स्रोत में मिल जाता है जिससे सात व्याहृतियाँ उत्पन्न हुई थीं। यह लोक समस्त लोकों का शिखर है, क्योंकि यहाँ पहुँचने के बाद पुनः पतन की संभावना नहीं रहती।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'निवृत्ति' और 'सत्य' की चरम अवस्था का बोध कराता है।

'तपः' लोक का अनुभव वह है जब साधक अपनी समस्त मानसिक वृत्तियों और सांसारिक अधिकारों से मुक्त हो जाता है। अभ्यास यह है कि साधक स्वयं से पूछे— "मेरा अधिकार क्या है?" जब वह पाता है कि शरीर, मन और बुद्धि पर उसका कोई वास्तविक स्वामित्व नहीं है, तब वह 'अधिकारनिवृत्त' होने लगता है। यह वह भूमि है जहाँ केवल 'तप' शेष रहता है— अर्थात् वह निरंतर जागरूकता जो साधक को सूक्ष्म से सूक्ष्म की ओर ले जाती है। यहाँ साधक केवल साक्षी भाव में स्थित होता है।

'सत्यम्' लोक का अनुभव वह है जब साधक 'अक्षर' में स्थित हो जाता है। यहाँ 'सत्य' का अर्थ केवल सच बोलना नहीं, अपितु वह 'अपरिवर्तनीय तत्त्व' है जो काल और परिस्थिति से परे है। जब साधक का चित्त पूर्णतः स्थिर होकर उस 'ब्रह्म-सदन' (हृदय के उस गहनतम शून्य या प्रकाश) में प्रवेश करता है, तब वह सातवें व्याहृति के अनुभव में होता है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक स्वयं को ब्रह्मा के स्वरूप में या उसी के सदन में अनुभव करता है।

साधक के लिए यह यात्रा भूः (स्थूल) से सत्यम् (सूक्ष्मतम/अक्षर) तक की यात्रा है। तपः लोक वह संधि-स्थल है जहाँ वह संसार के अधिकारों को त्यागकर सत्य के द्वार पर खड़ा होता है।

श्लोक ३.२२

सर्वेषां चैव देवानां मूर्ध्नि संतिष्ठते सदा ।

ज्ञानकर्मस्वनुष्ठानात्तथा सत्यस्य भाषणात् ॥ ३.२२ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

सब देवताओं के सिर पर सदा स्थित रहता है; ज्ञान-कर्म के अनुष्ठान से और सत्य के भाषण से —...

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'तपः' लोक की व्याख्या की और सातवें व्याहृति 'सत्यम्' का परिचय देते हुए उसे ब्रह्मा का सदन बताया। वर्तमान श्लोक उसी सत्यलोक की सर्वोच्चता और वहाँ पहुँचने के साधनों का निरूपण करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (सत्यं लोको) सर्वेषां च एव देवानां मूर्ध्नि सदा तिष्ठते; (सत्यं लोकं) ज्ञानकर्मस्वनुष्ठानात् तथा सत्यस्य भाषणात् (प्राप्यते)।

पदार्थ:

• मूर्ध्नि: सिर पर या सर्वोच्च स्थान पर। यहाँ 'मूर्ध्न' का अर्थ केवल शारीरिक शिर नहीं, अपितु सत्ता और चेतना के उच्चतम शिखर से है।

• संतिष्ठते: स्थित रहता है।

• ज्ञानकर्मस्वनुष्ठानात्: ज्ञान और कर्म के सम्यक अनुष्ठान से। 'स्वनुष्ठान' का अर्थ है— जैसा शास्त्र-विधि है, ठीक वैसा ही निष्ठापूर्वक पालन करना।

• सत्यस्य भाषणात्: सत्य बोलने से। यहाँ 'भाषण' केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु अस्तित्व और वाणी की एकरूपता है।

भाष्य —

यह श्लोक पिछले श्लोक (३.२१) में वर्णित 'सत्यलोक' के स्वरूप को विस्तार दे रहा है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सत्यलोक की स्थिति और उसकी प्राप्ति के मार्ग को स्पष्ट कर रहे हैं।

वे कहते हैं कि सत्यलोक समस्त देवताओं के 'मूर्ध्नि' अर्थात् उनके मस्तक पर सदा स्थित रहता है। इसका रहस्य यह है कि सत्य (ब्रह्म) ही वह आधार है जिस पर समस्त देवतत्व और ब्रह्मांडीय शक्तियाँ टिकी हैं। जिस प्रकार शरीर में मस्तक सर्वोच्च अंग है और बुद्धि का केंद्र है, उसी प्रकार समस्त सृष्टि के अधिष्ठाता देवताओं के ऊपर भी 'सत्य' की सत्ता है। यह वह बिंदु है जहाँ पहुँचकर समस्त द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।

अब प्रश्न उठता है कि इस सर्वोच्च स्थिति को कैसे प्राप्त किया जाए? याज्ञवल्क्य दो अनिवार्य साधनों का निर्देश देते हैं: 'ज्ञान-कर्म का अनुष्ठान' और 'सत्य का भाषण'।

प्रथम साधन 'ज्ञानकर्मस्वनुष्ठान' है। यहाँ याज्ञवल्क्य अपनी उस दृष्टि को प्रकट कर रहे हैं जहाँ ज्ञान और कर्म परस्पर विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं। केवल शुष्क ज्ञान (तर्क) या केवल अंध-कर्म (अनुष्ठान) साधक को सत्यलोक तक नहीं ले जा सकते। जब कर्म, ज्ञान के प्रकाश में किया जाता है और ज्ञान, कर्म की शुद्धि से सिद्ध होता है, तब वह 'स्वनुष्ठान' कहलाता है। यह वह स्थिति है जहाँ बाहरी यज्ञ, आंतरिक प्राण-यज्ञ में बदल जाता है।

द्वितीय साधन 'सत्यस्य भाषण' है। सत्य बोलना केवल एक नैतिक गुण नहीं, अपितु एक महान योगिक क्रिया है। जब साधक की वाणी, उसका मन और उसका आचरण एक ही सत्य (ब्रह्म) में विलीन हो जाते हैं, तब वह 'सत्यभाषण' कहलाता है। यह वह अवस्था है जहाँ 'वक्त' और 'वचन' का भेद मिट जाता है।

यह वाक्य अगले श्लोक (३.२३) तक विस्तृत है, जहाँ यह बताया गया है कि इन साधनों से सत्यलोक प्राप्त होता है और वहाँ से फिर पतन नहीं होता।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'वाणी' और 'चेतना' के शोधन का अभ्यास है। सत्यलोक का मार्ग 'सत्य' ही है। यहाँ 'सत्यभाषण' का योगिक अर्थ है— अपनी वाणी को अक्षर (ओम्) के साथ एकाकार करना। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर बोलने वाला और बाहर सुनाई देने वाला शब्द, दोनों एक ही चैतन्य हैं, तब वह सत्यभाषण की भूमि पर होता है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक को पहले अपने कर्मों को ज्ञान के प्रकाश में लाना चाहिए (ज्ञान-कर्म अनुष्ठान) और फिर अपनी वाणी को सत्य की अग्नि में तपाना चाहिए। जब वाणी सत्य हो जाती है, तब मन स्थिर होता है और चेतना स्वाभाविक रूप से 'मूर्ध्न' अर्थात् उच्चतम शिखर की ओर उठती है। यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि सत्यलोक कोई भौगोलिक स्थान नहीं, अपितु चेतना की वह सर्वोच्च अवस्था है जहाँ पहुँचकर जीव स्वयं 'सत्य' हो जाता है। यह अभ्यास साधक को कर्म-भूमि से उठाकर ज्ञान-भूमि और अंततः सत्य-भूमि तक ले जाता है।

श्लोक ३.२३

प्राप्यते चोपभोगार्थं प्राप्य न च्यवते पुनः ।

सत्यं तु सप्तमो लोकस्तस्मादूर्ध्वं न विद्यते ॥ ३.२३ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

— उपभोगके लिए (वह) प्राप्त किया जाता है, और पाकर (वहाँसे) फिर गिरता नहीं। सत्य तो सातवाँ लोक है; उससे ऊपर (कोई लोक) नहीं है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सत्यलोक की स्थिति और उसकी प्राप्ति के साधनों—ज्ञान, कर्म और सत्यभाषण—का वर्णन किया था। वर्तमान श्लोक उस प्राप्ति के फल और सत्यलोक की परम सर्वोच्चता को स्पष्ट करते हुए इस खण्ड का उपसंहार करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (सत्यलोकः) उपभोगार्थं प्राप्यते, च (तत्र) प्राप्य पुनः न च्यवते। सत्यं तु सप्तमो लोकः, तस्मादूर्ध्वं न (कोऽपि लोकः) विद्यते।

पदार्थ:

• उपभोगार्थं: आनंद और उपभोग के लिए। यहाँ 'उपभोग' का अर्थ इंद्रिय सुख नहीं, अपितु ब्रह्म के सान्निध्य का वह परमानंद है जिसे 'ब्रह्म-भोग' कहा जाता है।

• न च्यवते: गिरता नहीं है। 'च्युति' का अर्थ है अपने स्थान से खिसक जाना या पतन होना। यहाँ इसका अर्थ है कि एक बार इस स्थिति को प्राप्त करने के बाद साधक पुनः निम्न लोकों में नहीं गिरता।

• सप्तमो लोकः: सातवाँ लोक। यह संख्यात्मक क्रम है जो स्थूल (भूः) से सूक्ष्म (सत्यम्) की ओर यात्रा को दर्शाता है।

• तस्मादूर्ध्वं न विद्यते: उससे ऊपर कुछ भी विद्यमान नहीं है। यह लोकों की श्रेणी का अंतिम शिखर है।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सत्यलोक की उस विशेषता को बता रहे हैं जो उसे अन्य सभी लोकों से भिन्न करती है। वे कहते हैं कि यह लोक 'उपभोग' के लिए प्राप्त किया जाता है। सामान्यतः स्वर्ग आदि लोकों में भी उपभोग होता है, किंतु वहाँ वह पुण्य-संचय पर आधारित होता है; जैसे ही पुण्य क्षीण होता है, जीव वहाँ से गिर जाता है। परंतु सत्यलोक का उपभोग भिन्न है। यह वह अवस्था है जहाँ ज्ञान और कर्म के पूर्ण समन्वय से प्राप्त सत्य का अनुभव होता है।

इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण रहस्य 'न च्यवते' (न गिरना) में छिपा है। अन्य छह लोक—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः और तपः—पुनरावर्ती हैं। वहाँ पहुँचने वाला जीव अपनी वासनाओं या कर्मों के कारण पुनः नीचे की ओर आता है। किंतु सत्यलोक की प्राप्ति के बाद जीव का पतन नहीं होता। यह स्थिरता इसलिए है क्योंकि यहाँ पहुँचने का साधन ही 'सत्य' है, और सत्य कभी परिवर्तित नहीं होता। जब साधक स्वयं सत्यमय हो जाता है, तब वह उस सत्यलोक में प्रतिष्ठित हो जाता है, जहाँ से पुनरावृत्ति का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है।

अंत में, ऋषि घोषणा करते हैं कि 'सत्यं तु सप्तमो लोकः'—सत्य सातवाँ लोक है और इसके ऊपर कोई अन्य लोक नहीं है। यह कथन इस ब्रह्मांडीय संरचना की परिसीमा को निर्धारित करता है। यह सातवाँ सोपान है, जिसके बाद 'लोक' की अवधारणा ही समाप्त हो जाती है। यह वह बिंदु है जहाँ सृष्टि का विस्तार रुक जाता है और केवल पूर्णता शेष रहती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

श्रीमद्भगवद्गीता

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ८.१६ ॥

अर्जुन! ब्रह्मलोकतकके सब लोक पुनरावर्ती हैं (वहाँसे लौटना होता है); पर कौन्तेय! मुझे पाकर पुनर्जन्म नहीं होता।

श्रीमद्भगवद्गीता ८.१६गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 219

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि ब्रह्मलोकतक के सभी लोक पुनरावर्ती हैं, केवल उन्हें (परमात्मा को) पाकर पुनर्जन्म नहीं होता। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक सत्यलोक को 'अच्युत' (न गिरने वाला) बता रहा है, जबकि गीता इसे 'पुनरावर्ती' मानती है। यह विरोध नहीं, अपितु दृष्टि का भेद है। स्मृति यहाँ 'सत्यलोक' को उस उच्चतम स्थिति के रूप में देख रही है जहाँ सत्यभाषण और ज्ञान-कर्म से स्थिरता आती है। इस सूक्ष्म भेद का पूर्ण समाधान और संगति आने वाले श्लोकों (३.२८–२९) में स्पष्ट होगी, जहाँ 'लोक' और 'पुरुष' के अंतर को समझाया जाएगा।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थिरता' का अभ्यास है। योग की यात्रा में साधक विभिन्न भूमियों से गुजरता है। जब तक वह केवल पुण्य या तप के बल पर ऊपर उठता है, वह 'च्युति' (पतन) के भय से मुक्त नहीं होता। किंतु जब वह 'सत्य' के साथ एकरूप होता है, तब वह उस सातवें सोपान पर प्रतिष्ठित हो जाता है जहाँ से गिरना संभव नहीं है।

यहाँ 'सत्य' का अर्थ केवल सच बोलना नहीं, बल्कि अपनी चेतना को उस 'अक्षर' (अविनाशी) में विलीन कर देना है, जिसका वर्णन याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति में किया है। साधक जब इस श्लोक का चिंतन करता है, तो वह अनुभव करता है कि बाहरी लोकों की खोज वास्तव में भीतर के सात स्तरों की यात्रा है। 'सत्यलोक' वह उच्चतम आंतरिक अवस्था है जहाँ मन पूरी तरह शांत और स्थिर हो जाता है।

परंतु, यहाँ एक गूढ़ रहस्य है—ऋषि कह रहे हैं कि 'सत्यलोक' से ऊपर कोई 'लोक' नहीं है। इसका अर्थ यह है कि 'लोक' (जहाँ विषय हों, जहाँ दृश्य हो) की सीमा यहीं समाप्त होती है। इसके पार जो है, वह 'लोक' नहीं, अपितु 'पुरुष' है। साधक इस श्लोक के माध्यम से यह समझता है कि वह सातवें सोपान तक तो पहुँच गया है, किंतु अभी उसे 'लोक' की सीमा को लाँघकर उस परम पुरुष में लीन होना है। यह श्लोक साधक को 'लोक-अवस्था' से 'पुरुष-अवस्था' की ओर ले जाने वाली अंतिम सीढ़ी है।

ब्रह्माण्डस्वरूपम्

श्लोक ३.२४

आसप्तमात्तु पातालादूर्ध्वमेतदुदाहृतम् ।

अधस्ताद्राजतं ह्यण्डमूर्ध्वमर्धं हिरण्मयम् ॥ ३.२४ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

सातवें पातालसे लेकर ऊपरतक यह (ब्रह्माण्ड) कहा गया है; (उसका) नीचेका आधा अण्ड चाँदीका है और ऊपरका आधा सोनेका।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सात लोकों के नामों का निर्वचन करते हुए 'सत्यलोक' की सर्वोच्चता और उसकी स्थिरता का वर्णन किया था। अब वे उन सात लोकों के व्यापक आधार, अर्थात् संपूर्ण ब्रह्माण्ड की भौतिक और सूक्ष्म संरचना का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: एतत् (ब्रह्माण्डम्) तु आसप्तमात् पातालात् ऊर्ध्वम् उदाहृतम्। ह्यण्डम् अधस्तात् रजतं (अस्ति), ऊर्ध्वमर्धं हिरण्मयम् (अस्ति)।

पदार्थ:

• आसप्तमात् पातालात्: सातवें पाताल से। यहाँ 'आ' उपसर्ग विस्तार और सीमा को दर्शाता है, जो यह बताता है कि ब्रह्माण्ड की परिधि नीचे सातवें पाताल तक विस्तृत है।

• ऊर्ध्वम्: ऊपर की ओर।

• उदाहृतम्: कहा गया है या वर्णित है।

• अधस्तात्: नीचे के भाग में।

• रजतं: चाँदी जैसा या रजतमय। यह शीतलता, स्थिरता और भौतिकता का प्रतीक है।

• हिरण्मयम्: सोने जैसा या सुवर्णमय। यह तेज, प्रकाश और दिव्यता का प्रतीक है।

• अण्डम्: अण्डकार रूप। सृष्टि के आरम्भ में जब समस्त तत्व एक बीज रूप में संकुचित थे, तब वह स्वरूप 'अण्ड' कहलाता है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ ब्रह्माण्ड के उस स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जिसे 'ब्रह्मण्ड' कहा जाता है। वे स्पष्ट करते हैं कि इस संपूर्ण रचना की सीमा नीचे सातवें पाताल से आरम्भ होकर ऊपर सत्यलोक तक व्याप्त है। यह केवल भौगोलिक वर्णन नहीं है, अपितु चेतना के विस्तार का मानचित्र है।

वे इस ब्रह्माण्ड को एक 'अण्ड' (अण्डकार रूप) के समान बताते हैं। इस अण्ड की एक विलक्षण विशेषता यह है कि यह दो भिन्न धातुओं या गुणों में विभक्त है—नीचे का आधा भाग रजतमय है और ऊपर का आधा भाग हिरण्मय (स्वर्णमय) है।

यहाँ 'रजत' और 'हिरण्मय' केवल रंगों के नाम नहीं हैं। रजत उस तत्त्व का प्रतीक है जो जड़, शीतल और संकुचित है—अर्थात् वह भाग जहाँ जीव वासनाओं और कर्मों के बंधन में बँधा रहता है। हिरण्मय उस तत्त्व का प्रतीक है जो प्रकाशवान, चैतन्य और ऊर्ध्वगामी है—अर्थात् वह भाग जहाँ ज्ञान और मोक्ष की ज्योति प्रज्वलित है। यह विभाजन यह दर्शाता है कि सृष्टि में एक ओर भौतिकता (रजत) है और दूसरी ओर दिव्यता (हिरण्मय), और साधक को रजतमय स्थूलता से निकलकर हिरण्मय सूक्ष्मता की ओर बढ़ना है।

शास्त्र-साक्ष्य —

ब्रह्माण्ड के इस अण्डकार स्वरूप और उसके दो कपालों का वर्णन उपनिषदों में भी मिलता है।

छान्दोग्य उपनिषद्

आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ ३.१९.१ ॥

"आदित्य ब्रह्म है" — यह उपदेश है; उसकी व्याख्या (यह है): आरम्भमें यह असत् (अव्यक्त) ही था; वह सत् हुआ, (बढ़कर) सम्भूत हुआ; वह अण्ड बन गया; वह एक संवत्सरभर पड़ा रहा; फिर फूटा — उसके दोनों कपाल चाँदी और सोना हुए।

छान्दोग्य उपनिषद् ३.१९.१उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 227

यहाँ यह बताया गया है कि आरम्भ में जब 'अण्ड' प्रकट हुआ और वह फूटा, तो उसके दो कपाल बने—एक रजत और एक सुवर्ण।

छान्दोग्य उपनिषद्

तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं समेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ ३.१९.२ ॥

जो चाँदी (का कपाल) था, वह यह पृथिवी है; जो सोना था, वह द्युलोक; जो जरायु (गर्भकी बाहरी झिल्ली) थी, वे पर्वत हैं; जो उल्ब (भीतरी झिल्ली) था, वह मेघ और कुहरा है; जो धमनियाँ थीं, वे नदियाँ हैं; जो (अण्डके) पेटका जल था, वह समुद्र है।

छान्दोग्य उपनिषद् ३.१९.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 227

यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि वह रजत कपाल 'पृथिवी' (स्थूल जगत) बना और सुवर्ण कपाल 'द्युलोक' (प्रकाशमय जगत) बना।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और छान्दोग्य उपनिषद् एक ही तत्त्व को दो भिन्न दृष्टियों से देखते हैं। उपनिषद् यहाँ सृष्टि-उत्पत्ति के क्रम का वर्णन कर रहा है कि कैसे एक बीज रूपी अण्ड से पृथिवी और द्युलोक का विस्तार हुआ। वहीं, यह स्मृति उस संरचना को एक मानचित्र के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जिससे साधक यह समझ सके कि उसकी चेतना वर्तमान में कहाँ स्थित है और उसे किस दिशा में गमन करना है। उपनिषद् जहाँ 'सृष्टि-विस्तार' की बात करता है, वहीं स्मृति 'साधना-विस्तार' की ओर संकेत करती है। दोनों का मेल इस सत्य में है कि समस्त अस्तित्व का आधार भौतिकता (रजत) है, किन्तु उसका चरम लक्ष्य और शिखर दिव्यता (हिरण्मय) है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अवस्था-परिवर्तन' का संकेत है। सातवें पाताल से सत्यलोक तक की दूरी वास्तव में चेतना के निम्नतम स्तर से उच्चतम स्तर तक की यात्रा है।

साधक जब अपनी साधना आरम्भ करता है, तो वह 'रजतमय' क्षेत्र में होता है—जहाँ मन चंचल है, शरीर भारी है और वृत्तियाँ शीतल (जड़) हैं। यह रजतमय आधा अण्ड हमारी भौतिक देह और मानसिक संस्कारों का प्रतिनिधित्व करता है। अभ्यास के माध्यम से जब साधक अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी करता है, तब वह 'हिरण्मय' क्षेत्र में प्रवेश करता है। हिरण्मय होना अर्थात् स्वयं के भीतर उस सूर्य-तेज का अनुभव करना, जो अज्ञान के अंधकार को मिटा देता है।

इस श्लोक का योगिक अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि वह इस रजतमय स्थूलता (देह-बुद्धि) के खोल को तोड़कर अपने भीतर के हिरण्मय प्रकाश (आत्मा) की ओर बढ़ रहा है। यह 'अण्ड' का फूटना वास्तव में अहंकार का फूटना है, जिसके बाद ही जीव रजत (जड़ता) से मुक्त होकर हिरण्मय (चेतना) में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक ३.२५

प्रधानादेव संभूतं ब्रह्मनीडं हिरण्मयम् ।

भूराद्यैः सप्तभिर्व्याप्तं सत्यान्तैः पुरुषसंमितैः ॥ ३.२५ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

प्रकृतिसे ही उत्पन्न सुवर्णमय ब्रह्मनीड (ब्रह्माका घोंसला — ब्रह्माण्ड), भूः से सत्यम् तक सात (लोकों) से व्याप्त है, जो (विराट्) पुरुषके परिमाणके अनुरूप हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्माण्ड के विस्तार की निचली सीमा (सातवें पाताल) और उसके रजतमय एवं हिरण्मय विभाजन का संकेत दिया। अब इस श्लोक में वे इस संरचना के मूल कारण, उसके स्वरूप और उसके परिमाण का विवेचन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (एतत् ब्रह्मनीडं) प्रधानादेव संभूतं, हिरण्मयम् (अस्ति) । (एतत्) भूराद्यैः सत्यान्तैः सप्तभिः (लोकैः) व्याप्तं, (यत्) पुरुषसंमितैः (अस्ति) ।

पदार्थ और निर्वचन:

• प्रधानादेव: प्रधान से ही। यहाँ 'प्रधान' का अर्थ मूल प्रकृति (माया) है, जो सृष्टि का कारण और जड़ तत्त्व है।

• सम्भूतं: उत्पन्न या निर्मित।

• ब्रह्मनीडं: ब्रह्मा का नीड (घोंसला)। 'नीड' शब्द उस सुरक्षित आवरण को कहते हैं जिसमें बीज सुरक्षित रहता है; यहाँ यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसमें समस्त जीव और लोक स्थित हैं।

• हिरण्मयम्: सुवर्णमय। यह केवल धातु का बोध नहीं, अपितु उस दिव्य प्रकाश और चैतन्य का प्रतीक है जो सृष्टि के ऊपरी भाग को प्रकाशित करता है।

• भूराद्यैः सत्यान्तैः: 'भूः' से आरम्भ होकर 'सत्यम्' पर समाप्त होने वाले।

• सप्तभिर्व्याप्तं: सात (लोकों) द्वारा व्याप्त।

• पुरुषसंमितैः: पुरुष के परिमाण के अनुरूप। 'संमित' का अर्थ है—मापा हुआ या जिसके समान हो। यहाँ 'पुरुष' का अर्थ उस विराट पुरुष से है जो संपूर्ण जगत का आधार है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूप के सेतु को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड, जिसे 'ब्रह्मनीड' कहा गया है, मूलतः 'प्रधान' (प्रकृति) से ही उत्पन्न हुआ है। जिस प्रकार एक बीज के भीतर वृक्ष की पूरी संभावना छिपी होती है, उसी प्रकार इस हिरण्मय अण्ड के भीतर समस्त सृष्टि की संभावनाएँ निहित हैं।

यह ब्रह्मनीड 'हिरण्मय' है, क्योंकि इसका मूल स्वभाव प्रकाशमय है। यह संरचना नीचे 'भूः' (पृथ्वी) से आरम्भ होकर ऊपर 'सत्यम्' (ब्रह्मलोक) तक सात लोकों में विस्तृत है। इन सात लोकों का यह विस्तार यादृच्छिक नहीं है, अपितु यह 'पुरुषसंमित' है। इसका अर्थ यह है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड का परिमाण उस विराट पुरुष के शरीर के माप के अनुसार है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में शिर, बाहु और जंघाएँ होती हैं, उसी प्रकार इस ब्रह्माण्ड के सात लोक उस विराट पुरुष के अंगों के अनुरूप व्यवस्थित हैं।

बाहरी दृष्टि से यह एक विशाल खगोलीय संरचना है, किन्तु आन्तर दृष्टि से यह विराट पुरुष की एक अभिव्यक्ति है। जब याज्ञवल्क्य इसे 'ब्रह्मनीड' कहते हैं, तो वे संकेत देते हैं कि यह केवल पदार्थ का ढेर नहीं, बल्कि ब्रह्मा की चेतना का एक सुरक्षित आश्रय है, जहाँ जीव अपनी यात्रा पूर्ण कर पुनः उसी में लीन होने का प्रयास करता है।

श्रुति-संगति —

ब्रह्माण्ड के इस हिरण्मय स्वरूप की पुष्टि श्रुति में मिलती है:

शतपथ ब्राह्मण

आपो ह वा इदमग्रे सलिलमेवास ता अकामयन्त कथं नु प्रजायेमहीति ता अश्राम्यंस्तास्तपोऽतप्यन्त तासु तपस्तप्यमानासु हिरण्मयमाण्डं सम्बभूवाजातो ह तर्हि संवत्सर आस तदिदं हिरण्मयमाण्डं यावत्संवत्सरस्य वेला तावत्पर्यप्लवत ॥ ११.१.६.१ ॥

आरम्भमें यह (सब) जल ही था, सलिल ही। उन्होंने (जलोंने) कामना की — "हम कैसे उत्पन्न हों (बढ़ें)?" उन्होंने श्रम किया, तप तपा; उनके तप तपते हुए एक सुवर्णमय अण्ड उत्पन्न हुआ। तब संवत्सर उत्पन्न नहीं हुआ था। वह सुवर्णमय अण्ड जितनी संवत्सरकी अवधि है, उतने समय तक (जलोंपर) तैरता रहा।

शतपथ ब्राह्मण ११.१.६.१माध्यन्दिन पाठ · thevyasa.in

यहाँ शतपथ ब्राह्मण स्पष्ट करता है कि आदि-जल के तप से एक 'हिरण्मयमाण्ड' (सुवर्णमय अण्ड) उत्पन्न हुआ, जो संवत्सर की अवधि तक तैरता रहा। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'हिरण्मय ब्रह्मनीड' और श्रुति का 'हिरण्मयमाण्ड' एक ही सत्य के दो नाम हैं। श्रुति जहाँ इसकी उत्पत्ति की प्रक्रिया (तप और जल) बताती है, वहीं यह स्मृति इसके विस्तार और पुरुष-परिमाण (पुरुषसंमित) को स्पष्ट कर उसे योगिक दृष्टि से परिभाषित करती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

हिरण्मय अण्ड में ब्रह्मा की उपस्थिति का वर्णन अन्य शास्त्रों में भी मिलता है:

मनुस्मृति

तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥ १.९ ॥

वह (बीज) सूर्यके समान प्रभावाला सुवर्णमय अण्ड हुआ; उसमें सब लोकोंके पितामह ब्रह्मा स्वयं उत्पन्न हुए।

मनुस्मृति १.९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 142

मनुस्मृति के अनुसार, वह अण्ड सूर्य के समान प्रभावाला था और उसी के भीतर सब लोकों के पितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए। यह स्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ब्रह्माण्ड का मूल स्वरूप 'हिरण्मय' (प्रकाशमय) है और वह एक 'अण्ड' के समान है, जिसमें सृष्टि का सृजक स्थित है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य 'यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे' (जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है) के सूत्र में छिपा है। जब ऋषि कहते हैं कि ब्रह्माण्ड 'पुरुषसंमित' है, तो वे साधक को यह अनुभव कराते हैं कि उसका अपना शरीर भी उसी विराट पुरुष का एक लघु रूप है।

साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अभ्यास करता है कि जिस प्रकार विराट पुरुष के परिमाण में सात लोक व्याप्त हैं, उसी प्रकार उसके अपने शरीर में भी सात स्तर या अवस्थाएँ हैं। 'भूः' से 'सत्यम्' तक की यात्रा वास्तव में स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर और फिर कारण शरीर से अक्षर (ब्रह्म) तक की यात्रा है।

अभ्यास यह है कि साधक अपने शरीर को केवल मांस और अस्थि न मानकर उसे 'ब्रह्मनीड' के रूप में देखे। वह अनुभव करता है कि उसके भीतर का प्रकाश उसी 'हिरण्मय' तत्व का अंश है। जब वह स्वयं को 'पुरुषसंमित' अनुभव करता है, तब उसकी चेतना संकुचित 'अहं' से निकलकर विराट 'पुरुष' में विस्तारित होने लगती है। वह इस बोध से अपनी भूमि को बदलता है—वह स्वयं को एक छोटे शरीर में कैद जीव नहीं, बल्कि उस विराट पुरुष का प्रतिबिंब अनुभव करता है, जिसका विस्तार सत्यलोक तक है।

श्लोक ३.२६

अर्द्धार्द्धं छिद्रितं ह्यण्डं सप्तप्रकृतिलौकिकम् ।

अनन्ताकाशमध्यस्थं जीवभास्करभासितम् ॥ ३.२६ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

(वह) अण्ड आधा-आधा विभक्त है, सात प्रकृतियोंवाले लोकोंसे युक्त, अनन्त आकाशके बीचमें स्थित, जीवरूपी सूर्यसे प्रकाशित।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्माण्ड को 'ब्रह्मनीड' कहकर उसकी प्रकृति और विराट पुरुष के परिमाण के अनुरूप सात लोकों के विस्तार को समझाया। अब इस श्लोक में वे इस ब्रह्माण्ड की स्थिति, उसके विभाजन और उसे प्रकाशित करने वाले मूल तत्त्व का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (एतत्) ह्यण्डं अर्द्धार्द्धं छिद्रितं (अस्ति), (यत्) सप्तप्रकृतिलौकिकम् (अस्ति), (यत्) अनन्ताकाशमध्यस्थं (अस्ति), (यत्) जीवभास्करभासितम् (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अर्द्धार्द्धं छिद्रितं: आधा-आधा विभक्त या दो भागों में विभाजित। 'छिद्रित' का अर्थ यहाँ केवल छेद होना नहीं, अपितु एक अखंड अण्ड का दो अर्द्धों में पृथक होना है, जिससे भीतर के विस्तार के लिए स्थान बना।

• सप्तप्रकृतिलौकिकम्: सात प्रकृतियों वाले लोकों से युक्त। यहाँ 'प्रकृति' का अर्थ उन भिन्न-भिन्न गुणों या अवस्थाओं से है, जिनसे सात लोक (भूः से सत्यम् तक) निर्मित हैं।

• अनन्ताकाशमध्यस्थं: अनन्त आकाश के मध्य में स्थित। यह संकेत है कि व्यक्त ब्रह्माण्ड (सगुण जगत) अव्यक्त और अनन्त शून्य (परब्रह्म रूपी आकाश) के भीतर एक लघु बिंदु के समान स्थित है।

• जीवभास्करभासितम्: जीव रूपी सूर्य द्वारा प्रकाशित। 'भास्कर' वह है जो भानु (प्रकाश) का करण करता है। यहाँ विशेषण 'जीव' है, जिसका अर्थ है कि इस संपूर्ण जगत का प्रकाश बाहरी सूर्य नहीं, अपितु जीव के भीतर का चैतन्य है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ ब्रह्माण्ड के स्थूल शरीर और उसकी चेतना के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यह ब्रह्माण्ड एक 'अण्ड' के समान है, जो दो अर्द्धों में विभक्त है। जैसा कि पिछले श्लोक में बताया गया कि नीचे का आधा रजतमय और ऊपर का आधा हिरण्मय है, यह विभाजन वास्तव में प्रकृति के दो ध्रुवों—प्रवृत्ति और निवृत्ति, या जड़ और चेतन—के बीच का संतुलन है। यह अण्ड सात प्रकृतियों वाले लोकों से व्याप्त है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक लोक की अपनी एक विशिष्ट प्रकृति और गुण-धर्म है, जो जीव की पात्रता के अनुसार उसे अनुभव होते हैं।

इस ब्रह्माण्ड की स्थिति 'अनन्ताकाशमध्यस्थ' बताई गई है। भाव यह है कि जिस प्रकार एक छोटा सा बीज विशाल पृथ्वी के भीतर होता है, वैसे ही यह समस्त व्यक्त सृष्टि उस अनन्त, असीम और निराकार ब्रह्म-आकाश के मध्य स्थित है। यह स्थूल जगत उस सूक्ष्म चेतना का एक छोटा सा प्रतिबिंब मात्र है।

सबसे गूढ़ बात यहाँ 'जीवभास्करभासितम्' शब्द में है। सामान्य दृष्टि में हम मानते हैं कि सूर्य जगत को प्रकाशित करता है, किन्तु याज्ञवल्क्य यहाँ रहस्य खोलते हैं कि वास्तव में यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड 'जीवभास्कर' से प्रकाशित है। जीव ही वह आंतरिक सूर्य है, जिसकी चेतना के कारण ही यह जगत दृश्यमान होता है। यदि जीव रूपी सूर्य का प्रकाश (बोध) न हो, तो यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड अंधकारमय और शून्य होगा। यह उसी आदित्य-तत्त्व का विस्तार है जिसे याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति में 'अन्तर्यामी' कहा है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद्द्विधा ॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ॥ १.१२–१३ ॥

उस अण्डमें वे भगवान् (ब्रह्मा) एक वर्ष रहकर, अपने ही ध्यानसे उस अण्डके दो भाग कर दिये। उन दोनों खण्डोंसे उन्होंने द्युलोक और भूमिको रचा, और बीचमें आकाश, आठों दिशाएँ और जलका शाश्वत स्थान (समुद्र)।

मनुस्मृति १.१२–१३मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 86

मनुस्मृति में भी इसी प्रक्रिया का वर्णन मिलता है कि भगवान् ब्रह्मा ने अपने ध्यान से अण्ड को दो भागों में विभक्त किया और उनसे द्युलोक और भूमि की रचना की। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ इस बात पर सहमत हैं कि सृष्टि का आरम्भ एक अखंड अण्ड के विभाजन से हुआ। भेद यह है कि मनुस्मृति इसे ब्रह्मा की एक क्रिया के रूप में देखती है, जबकि याज्ञवल्क्य इसे योगिक दृष्टि से 'जीवभास्कर' के प्रकाश और चेतना के विस्तार के रूप में समझा रहे हैं।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'बाह्य' से 'आन्तर' की यात्रा का सूत्र है। जब साधक यह अनुभव करता है कि यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड अनन्त आकाश में स्थित एक छोटा सा अण्ड है, तो उसकी दृष्टि जगत की नश्वरता और लघुता की ओर मुड़ती है। वह बाहरी संसार के मोह से मुक्त होकर उस 'अनन्त आकाश' (शून्य/ब्रह्म) की खोज करने लगता है।

अभ्यास की दृष्टि से 'जीवभास्कर' का चिंतन अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधक यह अनुभव करता है कि जिस प्रकाश को वह बाहर सूर्य में खोज रहा है, वही प्रकाश उसके अपने हृदय में 'जीव-सूर्य' के रूप में स्थित है। यह अभ्यास उसे इस बोध तक ले जाता है कि वह केवल इस ब्रह्माण्ड का एक अंश नहीं है, बल्कि वह वह 'प्रकाशक' है जिसके कारण यह पूरा ब्रह्माण्ड प्रकाशित हो रहा है। जब साधक अपनी चेतना को इस आंतरिक भास्कर के साथ जोड़ता है, तब वह स्थूल शरीर और लोकों की सीमाओं को लाँघकर उस अनन्त आकाश में विलीन होने की भूमि प्राप्त करता है। यह अभ्यास उसे 'दृश्य' (जगत) से हटाकर 'द्रष्टा' (जीवभास्कर) की स्थिति में प्रतिष्ठित करता है।

ब्रह्माण्डोत्पत्तिलयौ

श्लोक ३.२७

अजस्य नाभावुद्भूतं यस्मिन् विश्वं प्रतिष्ठितम् ।

महदादि विशेषान्तमव्यक्ते गच्छते लयम् ॥ ३.२७ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

अजन्मा की नाभि से उत्पन्न, जिसमें विश्व प्रतिष्ठित है; महत्‌ से लेकर विशेषों तक सब अव्यक्त में लय हो जाते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्माण्ड के आकार, उसकी संरचना और उसे प्रकाशित करने वाले जीव-चैतन्य का वर्णन किया। अब इस श्लोक में वे इस संपूर्ण व्यक्त जगत के उद्गम-बिन्दु और उसके अंतिम लय-स्थान का रहस्य खोल रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (एतत् ब्रह्माण्डं) अजस्य नाभात् उद्भूतम्, यस्मिन् विश्वं प्रतिष्ठितम्। (तस्य) महदादि-विशेषान्तं (सर्वं) अव्यक्ते गच्छते लयम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अजस्य नाभावुद्भूतं: 'अज' वह है जो जन्मरहित है, अर्थात् वह परम पुरुष जो समय और कारण से परे है। 'नाभि' का अर्थ यहाँ शरीर का अंग नहीं, अपितु 'केंद्र' या 'बीज-स्थान' है। 'उद्भूतं' का अर्थ है—वहाँ से प्रकट होना या ऊपर उठना।

• विश्वं प्रतिष्ठितम्: संपूर्ण जगत (स्थूल और सूक्ष्म) उसी केंद्र में स्थित या आश्रित है।

• महदादि विशेषान्तम्: 'महत्' वह प्रथम बुद्धि या मूल प्रकृति है जिससे सृष्टि का आरम्भ होता है। 'विशेष' वह अंतिम सूक्ष्म अवस्था है जहाँ पदार्थ अपनी पृथकता खोने लगता है। 'विशेषान्तम्' का अर्थ है—महत् से आरम्भ होकर विशेष तक की संपूर्ण श्रृंखला।

• अव्यक्ते गच्छते लयम्: 'अव्यक्त' वह अवस्था है जहाँ कोई रूप, नाम या गुण प्रकट नहीं होता। 'लय' का अर्थ है—विलीन हो जाना या अपने मूल स्वरूप में समा जाना।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि के विकास और विनाश के चक्र को एक सूत्र में बाँध रहे हैं। वे कहते हैं कि यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड उस 'अज' (अजन्मा पुरुष) के केंद्र (नाभि) से प्रकट हुआ है। यहाँ 'नाभि' शब्द का प्रयोग उस बिंदु के लिए किया गया है जहाँ शून्य से सगुण का आरम्भ होता है। जिस प्रकार एक बीज के भीतर संपूर्ण वृक्ष प्रतिष्ठित रहता है, उसी प्रकार उस अजन्मा पुरुष के केंद्र में यह संपूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है। यह केवल एक भौतिक विवरण नहीं है, अपितु यह संकेत है कि जगत ईश्वर से पृथक नहीं, बल्कि उसी का विस्तार है।

सृष्टि का क्रम 'महत्' से आरम्भ होता है, जो सबसे सूक्ष्म और प्रथम अभिव्यक्ति है। महत् से अहंकार, मन और फिर पंचमहाभूतों का विस्तार होता है, जो अंततः 'विशेष' नामक सूक्ष्म अवस्था तक पहुँचता है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि यह संपूर्ण यात्रा—महत् से लेकर विशेष तक—स्थायी नहीं है। समय के चक्र के अंत में, यह समस्त व्यक्त जगत पुनः उसी 'अव्यक्त' में लय हो जाता है।

भाव यह है कि जो अभिव्यक्त हुआ है, उसका अंत अनिवार्य है। जो 'अज' की नाभि से निकला, वह अंततः उसी अव्यक्त शून्य में विलीन हो जाता है। यह लय विनाश नहीं, अपितु विश्राम है; यह उस अवस्था में लौटना है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल एकत्व शेष रहता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

सृष्टि के इस प्रकटीकरण और लय के सिद्धांत की पुष्टि भगवद्गीता में भी मिलती है:

भगवद्गीता

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ ८.१८ ॥

(ब्रह्माके) दिनके आनेपर सब व्यक्तियाँ अव्यक्तसे प्रकट होती हैं, और रात्रिके आनेपर उसी अव्यक्त नामवालेमें लीन हो जाती हैं।

भगवद्गीता ८.१८गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 220

यह ग्रन्थ स्पष्ट करता है कि ब्रह्मा के दिन के आरम्भ में सब कुछ अव्यक्त से प्रकट होता है और रात्रि के आगमन पर पुनः उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का मत एक ही है—कि व्यक्त जगत की उत्पत्ति और लय का केंद्र 'अव्यक्त' ही है। स्मृति यहाँ 'महत्' और 'विशेष' जैसे पारिभाषिक शब्दों के माध्यम से उस प्रक्रिया के सूक्ष्म चरणों को और अधिक स्पष्ट कर रही है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'उत्पत्ति' और 'लय' के अभ्यास का मार्ग है। योग का लक्ष्य केवल बाहरी जगत को जानना नहीं, अपितु उस केंद्र (नाभि) को खोजना है जहाँ से सब उत्पन्न हुआ है।

साधक जब अपनी चेतना को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है, तो वह वास्तव में 'विशेष' से 'महत्' की ओर और फिर 'महत्' से 'अव्यक्त' की ओर यात्रा करता है। अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के विचारों (विशेष) को शांत कर, उन्हें मूल बुद्धि (महत्) में विलीन करे और अंततः उस अव्यक्त शून्य में स्थित हो जाए जहाँ केवल 'अज' (परम पुरुष) का अनुभव होता है।

यह श्लोक साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि जिस प्रकार ब्रह्माण्ड अव्यक्त में लय होता है, उसी प्रकार साधक का अहंकार और उसकी सीमित पहचान भी उस परम अव्यक्त में लय होनी चाहिए। जब साधक अनुभव करता है कि वह स्वयं उस 'अज' की नाभि से निकला एक अंश है और उसका गंतव्य भी वही अव्यक्त है, तब वह जन्म-मृत्यु के भय से मुक्त होकर उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ 'विश्व प्रतिष्ठित' है।

ब्रह्मलोकवर्तिनां मुक्तिसमयः

श्लोक ३.२८

अपुनर्मरणायैव ब्रह्मणः सदने स्थिताः ।

अधिकारं विना चैव ब्रह्मणः सदृशाश्च ते ॥ ३.२८ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

जो ब्रह्माके लोकमें स्थित हैं, वे फिर न मरनेके लिए ही (वहाँ हैं); वे अधिकार (कर्तव्य) के बिना ब्रह्माके समान हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्माण्ड के उद्भव और उसके अव्यक्त में लय होने की प्रक्रिया को स्पष्ट किया। अब वे उस सूक्ष्म स्थिति का वर्णन कर रहे हैं जहाँ जीव, अव्यक्त में पूर्णतः विलीन होने से पूर्व 'ब्रह्मलोक' नामक विश्राम-स्थल पर स्थित होता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (ते जीवाः) अपुनर्मरणाय एव ब्रह्मणः सदने स्थिताः (सन्ति)। ते (अपि) अधिकारं विना एव ब्रह्मणः सदृशाः च (सन्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अपुनर्मरणाय: 'पुनर्मरण' का अर्थ है बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में पड़ना। 'अपुनर्मरणाय' अर्थात् अब पुनः मृत्यु का सामना न करना पड़े, ऐसी स्थिति के लिए।

• ब्रह्मणः सदने: 'सदन' का शाब्दिक अर्थ घर या निवास है। यहाँ इसका तात्पर्य 'ब्रह्मलोक' से है, जो सृष्टि के सर्वोच्च स्तर पर स्थित वह चेतना-मण्डल है जहाँ ब्रह्मा (सृष्टि के अधिष्ठाता) का वास है।

• अधिकारं विना: 'अधिकार' का अर्थ यहाँ शासन करने की शक्ति या सृजन के कर्तव्य से है।

• ब्रह्मणः सदृशाः: ब्रह्मा के समान। अर्थात् चेतना के स्तर पर वे ब्रह्मा जैसी शांति और आनंद का अनुभव करते हैं, यद्यपि वे ब्रह्मा नहीं हैं।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ जीव की उस उच्च अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जिसे 'ब्रह्मलोक' की प्राप्ति कहा जाता है। वे कहते हैं कि जो साधक या जीव अपनी साधना और शुद्धि के बल पर ब्रह्मलोक में स्थित होते हैं, उनका वहाँ निवास 'अपुनर्मरण' के उद्देश्य से होता है। इसका गहरा रहस्य यह है कि जब जीव संसार के समस्त बंधनों को काटकर ऊपर उठता है, तो वह एक ऐसी स्थिति में पहुँचता है जहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। वह अब पुनः पृथ्वी या अन्य निम्न लोकों में नहीं गिरता, अपितु उस परम शांति में स्थित रहता है।

परन्तु, यहाँ एक सूक्ष्म भेद है जिसे ऋषि 'अधिकारं विना' कहकर स्पष्ट करते हैं। ब्रह्मलोक में स्थित जीव आनंद और प्रकाश की दृष्टि से 'ब्रह्मणः सदृशाः' अर्थात् ब्रह्मा के समान ही हो जाता है। उसे वही शांति, वही व्यापकता और वही दिव्य प्रकाश अनुभव होता है जो ब्रह्मा को होता है। किन्तु, वह ब्रह्मा के 'अधिकार' को प्राप्त नहीं होता। अधिकार का अर्थ है—सृष्टि का संचालन करना, संकल्प करना और प्रपंच को रचने की शक्ति। वह जीव वहाँ एक 'साक्षी' और 'उपभोक्ता' के रूप में है, 'कर्ता' के रूप में नहीं।

अतः यह स्थिति पूर्ण मुक्ति (मोक्ष) और संसार के बीच की एक संधि-अवस्था है। वह जीव अब संसार का हिस्सा नहीं रहा, किन्तु अभी वह उस 'परम पुरुष' में पूरी तरह विलीन भी नहीं हुआ है। वह ब्रह्मा के सदन में केवल उस अंतिम क्षण की प्रतीक्षा कर रहा है जब ब्रह्मा का दिन समाप्त होगा और वह पूर्णतः मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करेगा।

शास्त्र-साक्ष्य —

मुण्डक उपनिषद्

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ३.२.६ ॥

वेदान्त-विज्ञानसे जिनका अर्थ सुनिश्चित है, संन्यास-योगसे शुद्धचित्त यति — वे सब ब्रह्मलोकोंमें परान्तकालमें परम अमृत होकर सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं।

मुण्डक उपनिषद् ३.२.६उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 108

मुण्डक उपनिषद् के इस अंश में कहा गया है कि वेदान्त-विज्ञान और संन्यास-योग से शुद्ध हुए यति ब्रह्मलोकों में परान्तकाल में परम अमृत होकर मुक्त हो जाते हैं।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मुण्डक उपनिषद् यहाँ एक ही सत्य को कह रहे हैं। मुण्डक उपनिषद् 'परम अमृत' होने की बात करता है, जबकि यह स्मृति उस अमृतत्व की प्रक्रिया को विस्तार देती है। स्मृति यह स्पष्ट करती है कि ब्रह्मलोक में पहुँचने के बाद भी जीव 'अधिकार-रहित' होता है, वह केवल ब्रह्मा के समान आनंद का अनुभव करता है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात की पुष्टि करते हैं कि ब्रह्मलोक वह स्थान है जहाँ से जीव का पुनरागमन (पुनर्जन्म) समाप्त हो जाता है और वह अंतिम मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रतीक्षा' और 'समर्पण' का अभ्यास है। योग मार्ग में जब साधक उच्च भूमियों को पार करता है, तो वह एक ऐसी अवस्था में आता है जहाँ उसे लगता है कि उसने सब कुछ पा लिया है—वही 'ब्रह्मलोक' की स्थिति है। यहाँ साधक को यह अनुभव होता है कि वह स्वयं ब्रह्म है (ब्रह्मणः सदृशाः), किन्तु यह अनुभव अभी भी एक 'अवस्था' है, 'परम सत्य' नहीं।

साधक के लिए यहाँ यह सीखना आवश्यक है कि 'अनुभव' और 'अधिकार' में अंतर है। आनंद का अनुभव होना एक बात है, और उस आनंद के स्रोत (परम पुरुष) में विलीन हो जाना दूसरी बात। ब्रह्मलोक यहाँ उस मानसिक स्थिति का प्रतीक है जहाँ अहंकार पूरी तरह शांत हो चुका है, किन्तु अभी 'मैं' का सूक्ष्म अंश बचा है जो आनंद का उपभोग कर रहा है।

अभ्यास यह है कि साधक इस स्थिति में आकर भी आसक्त न हो, बल्कि यह समझे कि यह केवल एक विश्राम-स्थल है। वह अपनी चेतना को 'कर्ता' (अधिकार) से हटाकर केवल 'साक्षी' बनाए रखे। इस श्लोक से साधक यह अनुभव करता है कि वह अब मृत्यु के चक्र से ऊपर उठ चुका है, अब उसे केवल उस 'परम पुरुष' में लय होने की प्रतीक्षा करनी है। यह 'अधिकार-शून्यता' ही वास्तव में पूर्ण समर्पण है, जो उसे अगले चरण में परम धाम की ओर ले जाएगी।

श्लोक ३.२९

अव्यक्ते वै दिनस्यान्ते मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह ।

विशन्ति परमं धाम पुरुषं भास्करप्रभम् ॥ ३.२९ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३१

(ब्रह्माके) दिनके अन्तमें अव्यक्तमें वे ब्रह्माके साथ मुक्त होते हैं और सूर्यके समान प्रभावाले परम धाम पुरुषमें प्रवेश करते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्मलोक की उस स्थिति का वर्णन किया जहाँ जीव पुनर्मरण के भय से मुक्त होकर ब्रह्मा के समान आनंद का अनुभव करता है। अब वे इस अवस्था के अंतिम परिणाम और उस परम लक्ष्य की ओर संकेत कर रहे हैं, जहाँ जीव केवल ब्रह्मलोक का निवासी न रहकर पूर्णतः पुरुष में विलीन हो जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (ते जीवाः) दिनस्य अन्ते ब्रह्मणा सह अव्यक्ते वै मुच्यन्ते। (ततः) भास्करप्रभम् परमं धाम पुरुषं विशन्ति।

पदार्थ और निर्वचन:

• दिनस्य अन्ते: यहाँ 'दिन' का अर्थ साधारण २४ घंटे का दिवस नहीं, अपितु 'ब्रह्मा का दिन' (कल्प) है। 'अन्ते' अर्थात् जब ब्रह्मा का यह महान दिवस समाप्त होता है।

• अव्यक्ते: वह स्थिति जहाँ नाम और रूप का अभाव हो जाता है; प्रलय की वह अवस्था जहाँ समस्त व्यक्त सृष्टि पुनः मूल कारण में लय हो जाती है।

• ब्रह्मणा सह: ब्रह्मा के साथ। यहाँ ब्रह्मा सृष्टि के अधिष्ठाता हैं; जब वे स्वयं लय होते हैं, तब उनके आश्रित जीव भी मुक्त होते हैं।

• भास्करप्रभम्: भास्कर (सूर्य) के समान प्रभा वाला। यह सूर्य की भौतिक ज्योति नहीं, अपितु उस आत्म-ज्योति का संकेत है जो सर्वव्यापी और देदीप्यमान है।

• परमं धाम पुरुषम्: वह सर्वोच्च स्थान या अवस्था जो स्वयं 'पुरुष' (शुद्ध चेतना) है। 'धाम' का अर्थ है निवास, किन्तु यहाँ पुरुष स्वयं ही निवास है और स्वयं ही निवासी।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मुक्ति की उस सूक्ष्म और क्रमबद्ध प्रक्रिया को समझा रहे हैं, जिसे 'क्रम-मुक्ति' कहा जाता है। वे बताते हैं कि जो जीव अपनी साधना से ब्रह्मलोक तक पहुँचे हैं, वे वहाँ स्थिर तो हैं, किन्तु वह अंतिम गंतव्य नहीं है। वह एक उच्च विश्राम-स्थल है। वास्तविक और पूर्ण मुक्ति तब घटित होती है जब ब्रह्मा का दिन समाप्त होता है।

जब सृष्टि का चक्र पूर्ण होता है और ब्रह्मा स्वयं अव्यक्त में लय होने की दिशा में बढ़ते हैं, तब ब्रह्मलोक में स्थित वे सभी शुद्ध आत्माएँ, जो अब तक ब्रह्मा के प्रभाव में थीं, उनके साथ ही मुक्त होती हैं। यह 'अव्यक्त' में मुक्ति का अर्थ है—सांसारिक पहचान, अहंकार और सूक्ष्म शरीर के अंतिम अवशेषों का भी विलीन हो जाना।

इसके पश्चात, वे जीव केवल शून्य में नहीं गिरते, अपितु 'भास्करप्रभम् परमं धाम पुरुषम्' में प्रवेश करते हैं। यहाँ 'भास्करप्रभ' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसे सूर्य समस्त जगत को प्रकाशित करता है, वैसे ही वह परम पुरुष अपनी ज्ञान-ज्योति से समस्त अस्तित्व को प्रकाशित करता है। यह प्रवेश वास्तव में 'प्रवेश' नहीं, बल्कि 'एकात्मता' है। जीव अपनी पृथक सत्ता को छोड़कर उस परम प्रकाशमय पुरुष में विलीन हो जाता है, जहाँ से फिर कभी वापसी नहीं होती।

शास्त्र-साक्ष्य —

ब्रह्मलोक में स्थित जीवों की इस अंतिम मुक्ति की पुष्टि मुण्डक उपनिषद् में मिलती है:

मुण्डक उपनिषद्

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ३.२.६ ॥

वेदान्त-विज्ञानसे जिनका अर्थ सुनिश्चित है, संन्यास-योगसे शुद्धचित्त यति — वे सब ब्रह्मलोकोंमें परान्तकालमें परम अमृत होकर सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं।

मुण्डक उपनिषद् ३.२.६उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 108

यहाँ 'परान्तकाले' शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ है—अंतिम समय में। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'दिनस्य अन्ते' और मुण्डक का 'परान्तकाले' एक ही सत्य को दर्शाते हैं। दोनों ही शास्त्र यह मानते हैं कि ब्रह्मलोक एक उच्च अवस्था तो है, किन्तु पूर्ण मोक्ष उस परम पुरुष में विलीन होने से ही प्राप्त होता है।

ब्रह्मा के दिन की विशालता को समझने के लिए भगवद्गीता का यह प्रमाण आवश्यक है:

भगवद्गीता

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ ८.१७ ॥

जो ब्रह्माके दिनको सहस्र युगोंतक और रात्रिको भी सहस्र युगोंतक जानते हैं, वे लोग दिन-रातको (तत्त्वसे) जाननेवाले हैं।

भगवद्गीता ८.१७गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 220

यहाँ स्पष्ट है कि ब्रह्मा का एक दिन सहस्रों युगों के बराबर है। अतः, यह मुक्ति अत्यंत धैर्य और दीर्घकालीन साधना का फल है। स्मृति और गीता दोनों ही समय के इस विराट परिमाण को स्वीकार करते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि साधक की यात्रा स्थूल से सूक्ष्म और फिर सूक्ष्म से विराट की ओर है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का रहस्य 'क्रमिक विसर्जन' का अभ्यास है। योग की दृष्टि से यह श्लोक हमें सिखाता है कि साधना के मार्ग में हम कई पड़ावों (भूमियों) से गुजरते हैं। ब्रह्मलोक एक ऐसी ही उच्च भूमि है जहाँ शांति और आनंद है, किन्तु योगी वहाँ रुकता नहीं है।

साधक जब इस श्लोक का चिंतन करता है, तो वह अपने भीतर के 'सूर्य' (भास्करप्रभ) को पहचानता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक स्वयं को केवल एक शरीर या मन न मानकर, उस 'परम पुरुष' की एक किरण माने। जिस प्रकार ब्रह्मा के दिन के अंत में सब लय हो जाता है, वैसे ही योगी अभ्यास करता है कि उसके भीतर के समस्त 'व्यक्त' (विचार, कामनाएँ, संस्कार) 'अव्यक्त' (मौन और शून्य) में लय हो जाएँ।

जब साधक अपने भीतर के समस्त द्वंद्वों को लय कर देता है, तब वह अनुभव करता है कि वह स्वयं उस भास्करप्रभ पुरुष का ही अंश है। यह अभ्यास उसे 'अहं' से 'सोऽहम्' और अंततः केवल 'पुरुष' (शुद्ध चैतन्य) की स्थिति में ले जाता है। यह श्लोक साधक को यह विश्वास दिलाता है कि उसकी यात्रा का अंत अंधकार में नहीं, अपितु एक अनंत, प्रकाशमय और परम धाम में होना है।

प्रयाणसमये व्याहृतिव्याहरणम्

श्लोक ३.३०

व्याहृतीर्व्याहरंश्चैव प्राणैर्यदि विमुच्यते ।

विलयं याति च व्यक्तमव्यक्तं पुरुषे क्षणात् ॥ ३.३० ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३२

जो व्याहृतियोंका उच्चारण करता हुआ प्राण छोड़ता है, उसका व्यक्त और अव्यक्त क्षणभरमें पुरुषमें लीन हो जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ब्रह्मा के दिन के अंत में ब्रह्मलोक वासियों के परम पुरुष में प्रवेश का वर्णन था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इस महान सत्य को एक व्यावहारिक साधन के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं कि सामान्य साधक प्रयाण काल में किस विधि से उस परम पुरुष को प्राप्त कर सकता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यः साधकः) व्याहृतीन् व्याहरन् चैव प्राणैः यदि विमुच्यते, (तस्य) व्यक्तं अव्यक्तं च क्षणात् पुरुषे विलयं याति।

पदार्थ और निर्वचन:

• व्याहृतीर्व्याहरंश्चैव: व्याहृतियों का उच्चारण करते हुए। 'व्याहृति' का अर्थ है—ब्रह्म का वह विग्रह जो सृष्टि के सात लोकों का प्रतिनिधित्व करता है। 'व्याहरन्' का अर्थ है—उनका स्पष्ट और सचेत उच्चारण करना।

• प्राणैर्यदि विमुच्यते: यदि प्राणों के द्वारा (देह से) मुक्त होता है। यहाँ 'प्राणैः' तृतीया विभक्ति साधन और माध्यम को दर्शाती है; अर्थात् प्राणों के माध्यम से जब देह का त्याग होता है।

• विलयं याति: लीन हो जाता है। विलीन होने का अर्थ है—भेद का समाप्त हो जाना और मूल तत्त्व में मिल जाना।

• व्यक्तमव्यक्तं: व्यक्त (सगुण, नाम-रूप युक्त स्थूल और सूक्ष्म जगत) और अव्यक्त (निराकार, कारण रूप बीज अवस्था)।

• पुरुषे: उस परम चेतना में, जो समस्त लोकों का अधिष्ठान है।

• क्षणात्: क्षण भर में। यह समय की अल्पता नहीं, अपितु उस तीव्र गति का संकेत है जो योगबल और मन्त्रबल से संभव है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ उस रहस्य को खोल रहे हैं जो उनकी श्रुति में बीजरूप में है—कि मन्त्र और ध्वनि केवल बाहरी कर्म नहीं, अपितु चेतना के आरोहण की सीढ़ी हैं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि प्रयाण काल (मृत्यु समय) में चेतना जिस ध्वनि या विचार में स्थित होती है, वह उसी की ओर प्रवृत्त होती है।

जब कोई साधक सात व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) का उच्चारण करते हुए प्राण त्यागता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को सात लोकों के क्रम से ऊपर उठा रहा होता है। व्याहृतियाँ केवल शब्द नहीं हैं, वे ब्रह्माण्ड के सात स्तरों के बीज-स्वर हैं। इनका उच्चारण करते हुए प्राण छोड़ना इस बात का संकेत है कि साधक अपनी सूक्ष्म देह को पृथ्वी (भूः) से उठाकर क्रमशः उच्चतर लोकों की ओर ले जा रहा है और अंततः 'सत्यम्' के पार उस परम पुरुष में विलीन हो रहा है।

यहाँ 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' दोनों के विलीनीकरण की बात कही गई है। व्यक्त का अर्थ है वह शरीर और मन जो इंद्रियों का विषय है, और अव्यक्त का अर्थ है वह संस्कार और कारण-शरीर जो सूक्ष्म रूप में विद्यमान है। सामान्यतः जीव केवल व्यक्त से अव्यक्त में जाता है और पुनः जन्म लेता है, किन्तु जो व्याहृतियों के माध्यम से पुरुष-केंद्रित होता है, उसका व्यक्त और अव्यक्त दोनों का लय हो जाता है, जिससे पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है। यह प्रक्रिया 'क्षण' में घटित होती है क्योंकि व्याहृतियों का ज्ञान साधक को सीधे उस द्वार पर ले जाता है जहाँ पुरुष प्रतिष्ठित है।

शास्त्र-साक्ष्य —

प्रयाण काल में ध्वनि और स्मरण के महत्त्व को अन्य शास्त्रों में भी स्वीकार किया गया है।

भगवद्गीता

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ ८.१३ ॥

— 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ जो देह छोड़कर जाता है, वह परम गतिको पाता है।

भगवद्गीता ८.१३गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 218

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ जो देह त्यागता है, वह परम गति को पाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में व्याहृतियों का उच्चारण इसी 'ॐ' के विस्तार के समान है, क्योंकि व्याहृतियाँ प्रणव के ही विभिन्न आयाम हैं।

भगवद्गीता

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८.१० ॥

जो प्रयाणकालमें अचल मनसे, भक्तिसे युक्त और योगबलसे भ्रुवोंके बीच प्राणको भलीभाँति स्थापित करके (देह छोड़ता है), वह उस दिव्य परम पुरुषको पाता है।

भगवद्गीता ८.१०गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 215

गीता में यह निर्देश है कि प्रयाण काल में मन को अचल कर, योगबल से प्राणों को भ्रुवोर्मध्ये स्थापित कर परम पुरुष को प्राप्त किया जाता है। स्मृति का यह श्लोक उसी योगबल को 'व्याहृति-उच्चारण' के माध्यम से प्राप्त करने की विधि बताता है। जहाँ गीता 'मनसाचलेन' (अचल मन) की बात करती है, वहाँ यह स्मृति 'व्याहरन्' (उच्चारण) के माध्यम से मन को एकाग्र करने का साधन दे रही है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'अन्तकाल' के अभ्यास का निर्देश है। योग की दृष्टि से, जो व्यक्ति जीवन भर व्याहृतियों के आन्तर अर्थ (प्राण, मन और हृदय के स्तर पर) का अभ्यास करता है, उसके लिए मृत्यु केवल एक देह-परिवर्तन नहीं, अपितु 'पुरुष-मिलन' बन जाती है।

साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह केवल शब्दों को न जपे, बल्कि प्रत्येक व्याहृति के साथ अपनी चेतना को ऊपर उठाए। 'भूः' कहते समय पृथ्वी तत्त्व का त्याग, 'भुवः' में प्राणिक विस्तार, और 'सत्यम्' तक पहुँचते-पहुँचते स्वयं को शुद्ध चैतन्य में स्थित करना। जब यह अभ्यास स्वभाव बन जाता है, तब प्रयाण काल में स्वतः ही प्राण व्याहृतियों के मार्ग से होते हुए पुरुष में लीन हो जाते हैं। यह अभ्यास साधक को 'सगुण' (व्यक्त) से 'निराकार' (अव्यक्त) और फिर 'शुद्ध पुरुष' (परब्रह्म) की भूमि तक ले जाता है।

व्याहृतिनिरूपणोपसंहारः

श्लोक ३.३१

एष संक्षेपतश्चोक्तः सप्तव्याहृतिनिर्णयः ।

यं ज्ञात्वा मुच्यते विद्वान् भवग्राहाकुलार्णवात् ॥ ३.३१ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३२

यह सात व्याहृतियोंका निर्णय संक्षेपमें कहा गया, जिसे जानकर विद्वान् संसाररूपी मगरोंसे भरे समुद्रसे मुक्त हो जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में प्रयाण काल में व्याहृतियों के उच्चारण द्वारा व्यक्त और अव्यक्त के पुरुष में लीन होने का रहस्य बताया गया। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इस संपूर्ण प्रकरण का उपसंहार करते हुए इस ज्ञान की महत्ता और फल का प्रतिपादन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: एष सप्तव्याहृतिनिर्णयः संक्षेपतः च उक्तः । यं ज्ञात्वा विद्वान् भवग्राहाकुलार्णवात् मुच्यते।

पदार्थ और निर्वचन:

• एष: यह (यहाँ 'एष' शब्द पिछले ३० श्लोकों के संपूर्ण विवेचन की ओर संकेत करता है)।

• संक्षेपतः: संक्षेप में। यद्यपि सात व्याहृतियों का विस्तार अनंत है, क्योंकि वे सात लोकों और सात चेतना-स्तरों के प्रतीक हैं, किंतु यहाँ साधक के लिए उसका सार प्रस्तुत किया गया है।

• सप्तव्याहृतिनिर्णयः: सात व्याहृतियों का निर्णय। 'निर्णय' का अर्थ यहाँ केवल परिभाषा नहीं, अपितु उनका वास्तविक स्वरूप, विनियोग और लक्ष्य का निर्धारण है।

• विद्वान्: वह जो केवल शास्त्र का ज्ञाता नहीं, अपितु जिसने उस ज्ञान को अनुभव में उतारा है। योग की दृष्टि में विद्वान् वह है जो स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा जानता है।

• भवग्राहाकुलार्णवात्: भव-ग्राह-आकुल-ार्णवात्। यह एक सामासिक पद है—'भव' (संसार), 'ग्राह' (पकड़ने वाले मगर/मोह-माया), 'आकुल' (व्याकुल या ग्रस्त) और 'ार्णव' (समुद्र)। अर्थात् वह संसार-रूपी समुद्र जो मोह और वासना रूपी मगरों से भरा हुआ है और जिसमें जीव व्याकुल है।

• मुच्यते: मुक्त हो जाता है। यह कर्मवाच्य रूप है, जो दर्शाता है कि जब ज्ञान घटित होता है, तब मुक्ति स्वतः सिद्ध होती है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ इस खंड का समापन करते हुए यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सात व्याहृतियों का यह विवेचन केवल व्याकरणिक या कर्मकाण्डीय चर्चा नहीं है, अपितु यह मोक्ष का एक संक्षिप्त मार्ग है। उन्होंने इस पूरे प्रकरण में व्याहृतियों को केवल शब्दों के रूप में नहीं, अपितु ब्रह्माण्ड के सात स्तरों और पुरुष के विभिन्न विग्रहों के रूप में प्रस्तुत किया है।

जब वे कहते हैं कि यह 'संक्षेप' में कहा गया है, तो उनका भाव यह है कि श्रुति में जो विस्तार है, उसे यहाँ साधन-रूप में संक्षिप्त किया गया है ताकि साधक उसे आत्मसात कर सके। यहाँ 'निर्णय' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; इसका अर्थ है कि साधक अब व्याहृतियों के संबंध में भ्रमित नहीं रहेगा। उसे ज्ञात हो गया है कि 'भूः', 'भुवः', 'स्वः' आदि केवल उच्चारण नहीं, अपितु चेतना को पृथ्वी से लेकर सत्यलोक तक ले जाने वाले सोपान हैं।

संसार को 'मगरों से भरे समुद्र' (भवग्राहाकुलार्णव) के रूप में चित्रित करना एक गहरा संकेत है। जिस प्रकार समुद्र में मगर अदृश्य रहकर जीव को खींच लेता है, उसी प्रकार संसार में वासनाएँ और अविद्या जीव को सूक्ष्म रूप से जकड़ लेती हैं। इन 'ग्राहों' (मगरों) से बचने का एकमात्र उपाय है—चेतना का आरोहण। जब विद्वान् इन सात व्याहृतियों के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तो वह समझ जाता है कि उसका मूल निवास इन सात लोकों के पार उस 'परम पुरुष' में है। यह ज्ञान उसे संसार की जकड़न से मुक्त कर देता है क्योंकि वह अब स्वयं को शरीर या लोक नहीं, अपितु वह अक्षर पुरुष मानने लगता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ज्ञान-सिद्धि' और 'मुक्ति' के संबंध को दर्शाता है। योग में केवल क्रिया पर्याप्त नहीं है, उस क्रिया के पीछे का 'निर्णय' (सही बोध) आवश्यक है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जब वह सात व्याहृतियों का अभ्यास करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के सात स्तरों की शुद्धि कर रहा होता है। 'संक्षेप' का योगिक अर्थ है—चित्त का एकाग्र होना। जब बिखरी हुई चेतना संकुचित होकर एक बिंदु पर आती है, तब वह 'संक्षेप' कहलाती है और यही संकुचन विस्तार (मुक्ति) का द्वार खोलता है।

अभ्यास यह है कि साधक केवल शब्दों का जप न करे, बल्कि प्रत्येक व्याहृति के साथ उस लोक और उस पुरुष के भाव में स्थित हो। जब वह 'भूः' से 'सत्यम्' तक की यात्रा को अपने भीतर घटित होते देखता है, तब वह 'विद्वान्' की श्रेणी में आता है। इस स्थिति में वह अनुभव करता है कि संसार के मोह-रूपी मगर उसे स्पर्श नहीं कर सकते, क्योंकि उसकी चेतना अब स्थूल जगत से ऊपर उठकर उस परम पुरुष में प्रतिष्ठित हो चुकी है। यह श्लोक साधक को 'साधन' (व्याहृति जप) से 'साध्य' (मुक्ति) की ओर ले जाने वाला सेतु है।

श्लोक ३.३२

निर्णयो व्याहृतीनां तु श्लोका द्वित्रिंशकस्तथा ॥ ३.३२ ॥

तृतीयोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ३२

व्याहृतियोंका निर्णय (यह है); इसमें बत्तीस श्लोक हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में सात व्याहृतियों के ज्ञान से संसार-सागर से मुक्ति का रहस्य बताया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस संपूर्ण प्रकरण की परिसीमा निर्धारित करते हुए इस खंड का औपचारिक समापन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: व्याहृतीनां तु निर्णयः तथा श्लोका द्वित्रिंशकः (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• निर्णयः: यहाँ 'निर्णय' का अर्थ है—निश्चित निष्कर्ष या स्वरूप का निर्धारण। व्याहृतियों के केवल शब्द नहीं, अपितु उनके लोक-संबंध, प्राण-विनियोग और मोक्ष-फल का अंतिम निर्णय यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

• व्याहृतीनां: व्याहृतियों का। यहाँ सात व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) के समग्र समूह की बात है।

• श्लोका द्वित्रिंशकस्तथा: और इस निर्णय में बत्तीस श्लोक हैं। यह संख्या केवल गणना नहीं, अपितु इस ज्ञान-खंड की पूर्णता का प्रमाण है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस तृतीय अध्याय में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने व्याहृतियों के उस रहस्य को खोला है, जो उनकी श्रुति में बीजरूप में विद्यमान है। इस श्लोक के माध्यम से वे स्पष्ट कर रहे हैं कि व्याहृतियों का यह संपूर्ण विवेचन बत्तीस श्लोकों में पूर्ण हुआ।

बाहरी दृष्टि से यह एक संख्यात्मक विवरण प्रतीत होता है, किंतु आंतरिक दृष्टि से यह साधक के लिए एक 'पूर्णता' का संकेत है। जब कोई साधक इन बत्तीस श्लोकों के सार को आत्मसात करता है, तो वह केवल शब्दों का ज्ञाता नहीं बनता, बल्कि वह सात लोकों और सात चेतना-स्तरों के उस मानचित्र को प्राप्त कर लेता है, जिसके द्वारा जीव स्थूल जगत से सूक्ष्म अक्षर की ओर प्रस्थान करता है।

यह स्मृति यहाँ यह स्थापित करती है कि ज्ञान जब 'निर्णय' (निश्चित निष्कर्ष) का रूप ले लेता है, तभी वह संशय को मिटाकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। व्याहृतियों का यह निर्णय साधक को उस स्थिति में लाता है जहाँ वह जान पाता है कि उसका वास्तविक निवास 'भूः' (पृथ्वी) में नहीं, अपितु 'सत्यम्' (परम पद) में है। इस निर्णय के साथ ही व्याहृति-प्रकरण समाप्त होता है और साधक अब उस परम शक्ति के आवाहन के लिए तैयार है, जिसे अगले अध्याय में 'गायत्री' के रूप में वर्णित किया जाएगा।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का रहस्य 'पूर्णता के बोध' में है। योग मार्ग में जब एक सोपान (अध्याय) पूर्ण होता है, तो साधक को उस ज्ञान को एक 'निर्णय' के रूप में स्थिर करना होता है।

यहाँ बत्तीस श्लोकों का उल्लेख यह दर्शाता है कि व्याहृति-साधना की एक निश्चित सीमा और पद्धति है। साधक ने अब तक सात व्याहृतियों के माध्यम से अपने प्राणों को सात लोकों की यात्रा कराई और अंततः उन्हें पुरुष (परमात्मा) में लीन करने की विधि सीखी। इस अध्याय का समापन यह संकेत देता है कि अब 'व्याहृति' (बाहरी ध्वनि और लोक-बोध) का अभ्यास पूर्ण हुआ; अब साधक की चेतना उस 'बीज' की ओर बढ़ने के लिए तैयार है जो उसे सीधे प्रकाश की ओर ले जाएगा।

अतः, इस श्लोक पर आते-आते साधक की भूमि 'लोक-बोध' से उठकर 'अक्षर-बोध' की ओर अग्रसर होती है। यह अध्याय का उपसंहार है, जो साधक को अगले उच्चतर सोपान—गायत्री साधना—के लिए मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तैयार करता है।

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-10-04।

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