व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, चतुर्थोऽध्यायः
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यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके चतुर्थोऽध्यायः — गायत्रीनिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।
चतुर्थोऽध्यायः — गायत्रीनिर्णयः
अध्याय-सार — गायत्रीनिर्णय। ओंकार (अ. २) और व्याहृतियों (अ. ३) के बाद अब गायत्री, जिसे जानकर विप्र ब्रह्मसायुज्य पाता है (४.१)। अध्याय वही क्रम पकड़ता है जो ४.२–३ में गिनाया गया है: ऋषि विश्वामित्र, छन्द गायत्री, देवता सविता, मुख अग्नि, उपनयन और प्राणायाममें विनियोग; शिरस् ‘ओमापो ज्योतिः’, सोलह अक्षरोंका, ऋषि प्रजापति (४.८–१०)। आदिसृष्टिमें स्वयम्भूके मुखसे ओंकारपूर्वा गायत्री निकली; प्रजापतिने तीन वेदोंसे अ-उ-म, भूः-भुवः-स्वः और एक-एक पाद दुहा (४.११–१३)। गायत्री प्रकृति है और ओंकार पुरुष, इन दोनोंके संयोगसे जगत् चलता है; चौबीस अक्षर चौबीस तत्त्व हैं, ओंकार पच्चीसवाँ (४.१७–२०); चौबीसवें अक्षरपर मतभेद है (४.२१–२५)। फिर जपका क्रम, देवीका ध्यान-रूप, आवाहन-विसर्जन, नामोंकी निरुक्तियाँ, और प्रयोजनके अनुसार पाठके भेद (वेदपाठ, जप, प्राणायाम, होम, अभिचार) आते हैं। जपकी संख्याओंके फल और प्रायश्चित्त, चौबीस अक्षरोंके देवता (४.६३–६९) और गायत्रीको न जाननेकी निन्दाके बाद अध्याय सार-परम्परासे समाप्त होता है: उपनिषद् → गायत्री → तीन व्याहृतियाँ → ओंकार, यह ‘त्रिवृत् ब्रह्म’ है (४.७७–७९); तुलापर एक ओर चार वेद और दूसरी ओर गायत्री (४.८०)।
गायत्रीनिर्णयप्रतिज्ञा · गायत्रीज्ञानफलम्
अतः परं प्रवक्ष्यामि गायत्र्या निर्णयं शुभम् ।
यं ज्ञात्वा याति वै विप्रः सायुज्यं ब्रह्मणा सह ॥ ४.१ ॥
इसके आगे मैं गायत्रीका शुभ निर्णय कहूँगा, जिसे जानकर विप्र ब्रह्मके साथ सायुज्यको प्राप्त होता है।
अवतरणिका —
पिछले अध्यायों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने क्रमशः प्रणव (ॐ) और व्याहृतियों के निश्चित स्वरूप का निर्णय किया है। जिस प्रकार अध्याय ३ का आरम्भ व्याहृतियों के निर्णय की प्रतिज्ञा से हुआ था, उसी क्रम को पूर्ण करते हुए अब चतुर्थ अध्याय में वे गायत्री के रहस्योद्घाटन की ओर अग्रसर हैं। यह श्लोक उस महान ज्ञान-यात्रा का प्रवेश द्वार है, जहाँ साधक स्थूल ध्वनि (प्रणव) और मध्यवर्ती सेतु (व्याहृति) को पार कर अब सीधे उस प्रकाश-पुंज (गायत्री) के सम्मुख खड़ा है, जो ब्रह्म-सायुज्य का मार्ग प्रशस्त करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अतः परं अहं गायत्रीयाः शुभं निर्णयं प्रवक्ष्यामि, यम् ज्ञात्वा विप्रः ब्रह्मणा सह सायुज्यं वै याति।
पदार्थ एवं निर्वचन:
• अतः परं: इसके आगे / अब। यह शब्द एक सोपान (सीढ़ी) की ओर संकेत करता है कि प्रणव और व्याहृति का ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात ही गायत्री का निर्णय पूर्णता पाता है।
• निर्णयम्: यहाँ 'निर्णय' का अर्थ केवल फैसला करना नहीं, अपितु 'निश्चित ज्ञान' या 'अंतिम सत्य का उद्घाटन' है। वह ज्ञान जो संशय को समाप्त कर वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित कर दे।
• शुभम्: कल्याणकारी। जो न केवल लौकिक सुख दे, अपितु साधक के चित्त को शुद्ध कर उसे मोक्ष की ओर ले जाए।
• विप्रः: वह जो 'वि' (विशेष) और 'प्र' (प्रकृष्ट) ज्ञान का है। यहाँ विप्र केवल जातिवाचक शब्द नहीं, अपितु उस जिज्ञासु का परिचायक है जिसने ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए स्वयं को समर्पित किया है।
• सायुज्यम्: एकरूपता या तादात्म्य। जब जीव और ब्रह्म के बीच का भेद समाप्त हो जाता है और साधक उसी अनंत चैतन्य में विलीन हो जाता है, उसे सायुज्य कहते हैं।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में अपनी उस प्रतिज्ञा को दोहरा रहे हैं जो एक गुरु अपने शिष्य से करता है—कि अब मैं तुम्हें उस रहस्य से अवगत कराऊँगा जिसे जानकर जीवन की सार्थकता सिद्ध होती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि महर्षि ने 'जप द्वारा' या 'पाठ द्वारा' नहीं, अपितु 'ज्ञात्वा' (जानकर) शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ यह है कि गायत्री केवल शब्दों का समूह या एक मन्त्र मात्र नहीं है, बल्कि वह एक 'ज्ञेय' तत्त्व है। जब तक साधक गायत्री के वास्तविक स्वरूप, उसके देवता और उसके आन्तर अर्थ को नहीं जानता, तब तक जप केवल एक क्रिया है; परन्तु जब वह उसे 'जान' लेता है, तब वही जप सायुज्य का साधन बन जाता है।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि गायत्री-ज्ञान का फल 'ब्रह्म-सायुज्य' है। यह सायुज्य कोई बाहरी मिलन नहीं, बल्कि अपनी ही आत्मा के उस स्वरूप को पहचानना है जो सूर्य की भाँति देदीप्यमान और अक्षर (अविनाशी) है। याज्ञवल्क्य यहाँ संकेत कर रहे हैं कि गायत्री वह कुंजी है जो साधक को द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाती है।
श्रुति-संगति —
गायत्री के इस 'निर्णय' का मूल आधार श्रुति में निहित है, जहाँ इसे केवल एक ऋचा नहीं, अपितु एक दिव्य पद के रूप में देखा गया है।
अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति सर्वमु ह्येष रज उपर्युपरि तपत्येवं हैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १४.८.१५.४ ॥
अब इस (गायत्री) का यही चौथा, "दर्शत" (दर्शनीय) पद है — "परोरजाः" (रजसे परे) — जो यह (सूर्य) तपता है। जो चौथा है वही 'तुरीय' है; 'दर्शत पद' इसलिए कि यह मानो दिखायी देता है; 'परोरजाः' इसलिए कि यह सारे रज (लोकों) के ऊपर-ऊपर तपता है। जो इस (गायत्री) के इस पदको ऐसा जानता है, वह इसी प्रकार श्री और यशसे तपता (दीप्त होता) है।
इस श्रुति-अंश की संगति यहाँ यह है कि जब याज्ञवल्क्य 'शुभ निर्णय' और 'सायुज्य' की बात करते हैं, तो वे उसी तुरीय (चौथे) पद की ओर संकेत कर रहे होते हैं जो रज (भौतिक जगत) से परे है। जो साधक इस 'परोरजाः' (रजसे परे) तत्त्व को जान लेता है, वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, बल्कि स्वयं उस सूर्य के समान तपता है और दीप्त होता है। सायुज्य की अवस्था वही है जहाँ साधक उस तुरीय पद में प्रतिष्ठित होकर श्री और यश (दिव्य तेज) से आलोकित हो जाता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संकल्प' और 'अधिष्ठान' की भूमि है। एक साधक जब प्रणव और व्याहृति के अभ्यास से अपने मन को एकाग्र कर लेता है, तब वह गायत्री के इस निर्णय को सुनने के योग्य होता है। यहाँ अभ्यास केवल जिह्वा का नहीं, अपितु प्रज्ञा का है।
साधक के लिए यहाँ यह रहस्य है कि 'सायुज्य' की प्राप्ति जप की संख्या से अधिक उस 'ज्ञान' पर निर्भर करती है जो जप के दौरान घटित होता है। साधक जब गायत्री के निर्णय को आत्मसात करता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल शरीर और मन से हटाकर उस 'प्रकाश-तत्त्व' में स्थापित करने का प्रयास करता है। यह श्लोक साधक को इस विश्वास में प्रतिष्ठित करता है कि यदि वह पूर्ण निष्ठा और सही ज्ञान (निर्णय) के साथ इस मार्ग पर चलेगा, तो उसका अंततः ब्रह्म के साथ एकाकार होना निश्चित है। यह ज्ञान ही साधक को 'साधन-भूमि' से उठाकर 'साध्य-भूमि' की ओर ले जाता है।
सम्पादकीय टिप्पणी — अवतरणिकामें प्रणवको "स्थूल ध्वनि" कहा गया है — यह ग्रन्थके अपने वचनके विपरीत है: अध्याय २ के आरम्भ (२.१) में सब मन्त्र प्रणवसे निकलते और उसीमें लीन होते हैं, और मनु (२.८३) "एकाक्षरं परं ब्रह्म" कहते हैं। प्रणव → व्याहृति → गायत्री जपका क्रम है, ऊँच-नीचका नहीं।
गायत्र्यार्षादिज्ञानमाहात्म्यम्
आर्षं छन्दश्च दैवत्यं विनियोगश्च ब्राह्मणम् ।
शिरश्चाक्षरदैवत्यमावाहनविसर्जनम् ॥ ४.२ ॥
ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, ब्राह्मण, शिरस्, अक्षरों के देवता, आवाहन और विसर्जन…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिज्ञा की कि वे गायत्री के उस शुभ निर्णय का उद्घाटन करेंगे, जिससे विप्र ब्रह्म में सायुज्य प्राप्त करता है। वर्तमान श्लोक उसी 'निर्णय' की विषय-सूची प्रस्तुत करता है; यहाँ ऋषि उन अनिवार्य अंगों को गिना रहे हैं, जिनके पूर्ण ज्ञान के बिना मन्त्र केवल एक ध्वनि बनकर रह जाता है और उसकी वास्तविक शक्ति जाग्रत नहीं होती।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ब्राह्मणैः ज्ञातव्यम्)— आर्षं (ऋषिः), छन्दः, दैवत्यं (देवता), विनियोगश्च, ब्राह्मणम् (व्याख्यानम्), शिरश्च, अक्षरदैवत्यम्, आवाहनविसर्जनम् (च)।
पदार्थ-निर्वचन:
• आर्षं: मन्त्र के ऋषि। वह द्रष्टा जिसने इस मन्त्र को अपनी समाधि में अनुभव किया और संसार को दिया।
• छन्दः: मन्त्र की लय और वृत्ता। छन्द केवल काव्य-रचना नहीं, अपितु प्राण की वह गति है जो मन्त्र को विशिष्ट आयाम देती है।
• दैवत्यं: मन्त्र के अधिष्ठात्री देवता। वह चेतना जिसकी उपासना हेतु यह मन्त्र प्रयुक्त होता है।
• विनियोगः: मन्त्र का विशिष्ट प्रयोग। यह विधान कि किस संस्कार, कर्म या समय में इस मन्त्र का विनियोग किया जाना चाहिए।
• ब्राह्मणम्: यहाँ 'ब्राह्मण' का अर्थ जाति नहीं, अपितु 'ब्राह्मण-ग्रन्थ' या 'व्याख्यान' है। वह शास्त्र-सम्मत विवेचन जो मन्त्र के स्थूल अर्थ को सूक्ष्म अर्थ से जोड़ता है।
• शिरस्: मन्त्र का शीर्ष भाग। यह मन्त्र का आरम्भिक बिंदु और उसकी सर्वोच्च सत्ता का संकेत है।
• अक्षरदैवत्यम्: प्रत्येक अक्षर में प्रतिष्ठित देवता। मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु अक्षरों के रूप में विद्यमान दिव्य शक्तियों का विन्यास है।
• आवाहन-विसर्जनम्: देवता को बुलाने (आवाहन) और कार्य समाप्ति पर उन्हें ससम्मान विदा करने (विसर्जन) की विधि।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ उन घटकों का विवरण दे रहे हैं जो एक मन्त्र के 'अंग' कहलाते हैं। किसी भी वैदिक मन्त्र का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब साधक उसके ऋषि, छन्द और देवता से परिचित हो। यदि कोई बिना ऋषि के जप करता है, तो वह उस स्रोत से कटा रहता है; बिना छन्द के जप करता है, तो प्राणों की लय सही नहीं बैठती; और बिना देवता के जप करता है, तो उसकी दिशा अनिश्चित रहती है।
यह श्लोक एक निर्देशिका है। ऋषि यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि गायत्री का 'निर्णय' केवल मन्त्र को रटने में नहीं, बल्कि उसके संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को समझने में है। इसमें 'ब्राह्मणम्' और 'अक्षरदैवत्यम्' जैसे शब्दों का समावेश यह दर्शाता है कि याज्ञवल्क्य इस स्मृति में केवल एक विधि नहीं बता रहे, बल्कि गायत्री के उस विराट स्वरूप को खोल रहे हैं जहाँ व्याकरण, ज्योतिष और अध्यात्म का संगम है।
यह वाक्य अधूरा है; इसकी क्रिया 'ज्ञातव्यं' (जानना चाहिए) अगले श्लोक (४.३) में आती है। अतः यह श्लोक और अगला श्लोक मिलकर एक ही पूर्ण वाक्य बनाते हैं, जिसका अर्थ है— "इन सभी अंगों (ऋषि, छन्द... विसर्जन) को ब्राह्मणों द्वारा यत्नपूर्वक जाना जाना चाहिए।"
शास्त्र-साक्ष्य —
सा च किं गोत्रा कत्यक्षरा कति पादा कति कुक्षयः कानि शीर्षाणि । सांख्यायनगोत्रा सा चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री त्रिपादा चतुष्पादा । पुनस्तस्याश्चत्वारः पादाः षट् कुक्षयः पञ्च शीर्षाणि भवन्ति । … ऋग्वेदोऽस्याः प्रथमः पादो भवति । यजुर्वेदो द्वितीयः पादः । सामवेदस्तृतीयः पादः । अथर्ववेदश्चतुर्थः पादः । … व्याकरणोऽस्याः प्रथमः शीर्षो भवति । शिक्षा द्वितीयः । कल्पस्तृतीयः । निरुक्तश्चतुर्थः । ज्योतिषामयनमिति पञ्चमः ॥ ३ ॥
उसका गोत्र क्या है, कितने अक्षर, कितने पाद, कितनी कुक्षियाँ, कितने सिर? वह सांख्यायन गोत्रवाली, चौबीस अक्षरोंवाली गायत्री है — तीन पादोंवाली (और) चार पादोंवाली। उसके चार पाद, छः कुक्षियाँ (छः दिशाएँ) और पाँच सिर हैं। ऋग्वेद उसका पहला पाद है, यजुर्वेद दूसरा, सामवेद तीसरा, अथर्ववेद चौथा। … व्याकरण उसका पहला सिर है, शिक्षा दूसरा, कल्प तीसरा, निरुक्त चौथा, और ज्योतिष पाँचवाँ।
इस उपनिषद् में गायत्री के गोत्र, अक्षर, पाद और विशेषतः उसके 'शीर्ष' (शिरस्) का विस्तृत वर्णन है। जहाँ स्मृति के इस श्लोक में केवल 'शिरस्' और 'अक्षर-दैवत' का उल्लेख कर उन्हें जानने योग्य बताया गया है, वहीं गायत्री-रहस्योपनिषद् उन शीर्षों को व्याकरण, शिक्षा, कल्प, निरुक्त और ज्योतिष से जोड़ता है। यह मेल सिद्ध करता है कि मन्त्र का 'शीर्ष' केवल शब्द नहीं, अपितु संपूर्ण वैदिक विद्याओं का सार है। स्मृति यहाँ संक्षिप्त संकेत दे रही है, जबकि उपनिषद् उसी रहस्य का विस्तार कर रहा है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'सजगता' का अभ्यास है। जब साधक केवल शब्दों को दोहराता है, तो वह केवल वाक्-स्तर पर होता है। किन्तु जब वह ऋषि, छन्द और देवता का स्मरण करता है, तो उसकी चेतना मन्त्र के अर्थ और उसके पीछे की शक्ति से जुड़ जाती है।
ऋषि का स्मरण साधक को 'श्रद्धा' में ले जाता है, छन्द का स्मरण 'प्राण' की लय को व्यवस्थित करता है, और देवता का स्मरण 'चित्त' को लक्ष्य पर केंद्रित करता है। यह प्रक्रिया साधक को स्थूल जप से उठाकर सूक्ष्म उपासना की भूमि पर ले जाती है। यहाँ आवाहन और विसर्जन का आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपनी चेतना को पहले उस दिव्य सत्ता में विलीन करे (आवाहन) और फिर उस अनुभव को अपने भीतर आत्मसात कर पुनः लोक-कर्मों में लौटे (विसर्जन)। इस प्रकार, मन्त्र के इन अंगों का ज्ञान जप को एक यांत्रिक क्रिया से बदलकर एक जीवंत योग-साधना बना देता है।
ध्यानं जपप्रयोगश्च येषु कर्मसु यादृशम् ।
ज्ञातव्यं ब्राह्मणैर्यत्नाद्ब्राह्मण्यं येन वै भवेत् ॥ ४.३ ॥
— ध्यान, और जिन कर्मोंमें जैसा जपका प्रयोग होता है — यह सब ब्राह्मणोंको यत्नसे जानना चाहिए, जिससे ब्राह्मणत्व होता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि ने गायत्री-निर्णय के उन बाहरी अंगों (ऋषि, छन्द, देवता आदि) की सूची दी, जो मन्त्र के बाह्य स्वरूप को पूर्ण करते हैं। वर्तमान श्लोक उस सूची का उपसंहार करता है और यह स्पष्ट करता है कि केवल सूचनात्मक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, अपितु मन्त्र के साथ जुड़े 'ध्यान' और 'प्रयोग' का यत्नपूर्वक अध्ययन ही साधक को वास्तविक ब्राह्मणत्व की ओर ले जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ध्यानं जपप्रयोगश्च (च) येषु कर्मसु यादृशम् (अस्ति), (तद्) ज्ञातव्यं ब्राह्मणैर्यत्नात्, येन (तस्मात्) ब्राह्मण्यं वै भवेत्।
पदार्थ-निर्वचन:
• ध्यानम्: मन्त्र के देवता का मानसिक स्वरूप और उस चेतना में लीन होना। जप यदि शरीर और वाणी का कर्म है, तो ध्यान हृदय और मन का कर्म है।
• जपप्रयोगः: जप की विशिष्ट विधियाँ—जैसे कि वाचिक, उपांशु या मानसिक जप; और किन विशेष समयों या स्थितियों में किसका प्रयोग करना है।
• यादृशम्: जैसा या जिस प्रकार का। यहाँ यह संकेत है कि प्रत्येक मन्त्र के साथ उसके प्रयोग की एक विशिष्ट प्रकृति जुड़ी होती है, जिसे 'यथार्थ' जानना आवश्यक है।
• ज्ञातव्यं यत्नात्: केवल सुनना पर्याप्त नहीं, अपितु 'यत्न' (अभ्यास और जिज्ञासा) से जानना चाहिए।
• ब्राह्मण्यम्: यह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ इसका अर्थ केवल जाति-संकेत नहीं, अपितु उस 'गुण' या 'अवस्था' से है जो एक व्यक्ति को ब्रह्मज्ञानी या ब्राह्मण बनाता है। वह आंतरिक तेज और पात्रता जिससे साधक मन्त्र की शक्ति को धारण करने के योग्य होता है।
भाष्य —
ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि गायत्री मन्त्र का ज्ञान केवल शब्दों के उच्चारण तक सीमित नहीं है। उन्होंने पिछले श्लोक में जो सूची दी (ऋषि, छन्द, देवता आदि), वह मन्त्र का 'शरीर' है; और वर्तमान श्लोक में वर्णित 'ध्यान' तथा 'जप-प्रयोग' उसकी 'प्राण-शक्ति' हैं।
भाव यह है कि ब्राह्मण को यह यत्नपूर्वक जानना चाहिए कि किन कर्मों में जप का प्रयोग किस प्रकार किया जाता है और उस जप के साथ कौन सा ध्यान जुड़ा है। यदि साधक केवल जप करता है और उसका ध्यान (देवता का स्वरूप) लुप्त है, तो वह जप यान्त्रिक हो जाता है। उसी प्रकार, यदि केवल ध्यान है और विधिपूर्वक जप-प्रयोग का अभाव है, तो साधना आधारहीन हो जाती है। इन दोनों का समन्वय ही 'ब्राह्मण्य' को जन्म देता है।
यहाँ 'ब्राह्मण्य' होने का अर्थ है—मन्त्र के योग्य होना। मन्त्र एक अग्नि की भाँति है; जो पात्र (साधक) शुद्ध और संस्कारित होता है, वही उस अग्नि में तपकर कुन्दन बनता है। अतः, विधिपूर्वक जप और गहरे ध्यान का अभ्यास ही वह प्रक्रिया है जो एक विप्र को वास्तविक 'ब्राह्मण' बनाती है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, अपितु अनुभावात्मक होना चाहिए, इसीलिए यहाँ 'यत्नात्' (परिश्रमपूर्वक) शब्द का प्रयोग किया गया है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में जप और ध्यान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास यह है कि वह अपने प्रत्येक जप को 'ध्यान-युक्त' करे।
साधक जब मन्त्र का उच्चारण करता है, तो ध्वनि (जप) उसे स्थूल जगत से खींचकर सूक्ष्म की ओर ले जाती है, और ध्यान उसे उस सूक्ष्मता में स्थिर कर देता है। यदि जप बिना ध्यान के हो, तो मन भटकता रहता है; और यदि ध्यान बिना जप के हो, तो चित्त को एकाग्र करने का साधन नहीं मिलता।
अभ्यास यह है कि साधक पहले मन्त्र के 'प्रयोग' (विधि) को जाने ताकि उसकी क्रिया शुद्ध हो, फिर उस प्रयोग में 'ध्यान' को समाहित करे ताकि उसकी चेतना जाग्रत हो। जब जप और ध्यान एक हो जाते हैं, तब साधक की भूमि बदलती है—वह केवल शब्दों का उच्चारण करने वाले 'पाठक' से ऊपर उठकर मन्त्र के रहस्य को जीने वाला 'योगी' बन जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ वह 'ब्राह्मण्य' का अनुभव करता है, अर्थात अपनी आत्मा का उस विराट ब्रह्म-चेतना (गायत्री) के साथ तादात्म्य स्थापित करता है।
गायत्र्या देवता ऋष्यादि
सविता देवता ह्यस्या मुखमग्निस्तदित्यृचः ।
विश्वामित्रऋषिश्छन्दो गायत्री तु विधीयते ॥ ४.४ ॥
इसकी देवता सविता है, (इसका) मुख अग्नि है, (मन्त्र) "तत्" से आरम्भ होनेवाली ऋचा है; ऋषि विश्वामित्र हैं और छन्द गायत्री कहा जाता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में याज्ञवल्क्य ऋषि ने गायत्री-निर्णय के उन अंगों की सूची दी थी जिन्हें एक ब्राह्मण को यत्नपूर्वक जानना चाहिए ताकि वह वास्तविक 'ब्राह्मणत्व' को प्राप्त कर सके। वर्तमान श्लोक उस सूची के प्रथम और मुख्य अंग—मन्त्र के परिचय (ऋषि, छन्द, देवता)—का उद्घाटन करता है। यह श्लोक केवल सूचना नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति के स्रोत और उसकी प्रज्ज्वलित प्रकृति का बोध कराता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अस्या (गायत्र्याः) देवता हि सविता (अस्ति), तस्याः मुखम् अग्निः (अस्ति), तत् (इत्यारम्भितः) ऋचः (तस्य मन्त्रः), विश्वामित्रः ऋषिः, गायत्री तु छन्दः विधीयते।
पदार्थ-निर्वचन:
• सविता: वह जो प्रेरित करता है (सु-वित्)। सूर्य का वह स्वरूप जो समस्त जगत को जाग्रत कर कर्म की ओर प्रवृत्त करता है। यह केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु चेतना का वह प्रकाश है जो अज्ञान के अंधकार को हटाता है।
• मुखम् अग्निः: यहाँ 'मुख' शब्द के दो अर्थ हैं—एक वह द्वार जिससे मन्त्र का उच्चारण होता है (वाणी), और दूसरा वह माध्यम जिससे मन्त्र की शक्ति क्रियान्वित होती है। अग्नि यहाँ प्रज्वलित तेज और भस्मीकरण की शक्ति का प्रतीक है।
• तत्-इति ऋचः: गायत्री मन्त्र के प्रथम शब्द 'तत्' का संकेत है। यह सर्वनाम उस 'परम तत्त्व' (ब्रह्म) की ओर इंगित करता है, जिसकी वरेण्यता का गान किया जाता है।
• विश्वामित्र ऋषिः: मन्त्र के दृष्टा। 'विश्वस्य मित्रम्'—जो समस्त विश्व के साथ मैत्री भाव रखता हो और जिसने घोर तप से इस विद्या को सिद्ध किया।
• गायत्री छन्दः: २४ अक्षरों वाला वह छंद जो गान योग्य (गै) और बुद्धि को प्रदीप्त करने वाला है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री मन्त्र के बाह्य कलेवर को परिभाषित कर रहे हैं, किंतु उनकी दृष्टि सदैव आन्तर अर्थ की ओर रहती है। वे कहते हैं कि इस विद्या के देवता 'सविता' हैं। सविता वह चैतन्य शक्ति है जो साधक की सुप्त बुद्धि को जाग्रत करती है। जब साधक कहता है कि इसकी देवता सविता है, तो वह वास्तव में अपनी अंतरात्मा के उस सूर्य का आह्वान करता है जो उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए।
ऋषि ने विशेष रूप से कहा है—'मुखमग्निस्तदित्यृचः'। इसका अर्थ यह है कि गायत्री मन्त्र का प्रवेश द्वार या उसका मुख 'अग्नि' है। जब साधक इस मन्त्र का जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा, अपितु अग्नि-तत्व के माध्यम से अपनी समस्त वासनाओं और संचित पापों की आहुति दे रहा है। जिस प्रकार भौतिक अग्नि ईंधन को जलाकर उसे सूक्ष्म धुएँ और ऊष्मा में बदल देती है, उसी प्रकार गायत्री का 'अग्नि-मुख' साधक के स्थूल अहंकार और अविद्या को भस्म कर उसे शुद्ध करता है।
ऋषि विश्वामित्र और गायत्री छन्द का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह विद्या तप और अनुशासन की परिणति है। विश्वामित्र का नाम यहाँ केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, अपितु उस 'तपो-भूमि' के प्रतीक के रूप में है जहाँ पहुँचकर मनुष्य अपनी सीमाओं को लांघकर देवत्व को प्राप्त करता है।
श्रुति-संगति —
इस स्मृति वचन की पुष्टि श्रुति (शतपथ) स्पष्ट रूप से करती है:
तस्या अग्निरेव मुखम् यदि ह वा अपि बह्विवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्संदहत्येवं हैवैवंविद्यद्यपि बह्विव पापं करोति सर्वमेव तत्सम्प्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः सम्भवति ॥ १४.८.१५.१२ ॥
अग्नि ही उसका (गायत्रीका) मुख है। जैसे अग्निमें बहुत-सा (ईंधन) भी डालें तो वह सबको जला देता है, वैसे ही ऐसा जाननेवाला चाहे बहुत-सा पाप भी करे, तो भी उस सबको भक्षण करके वह शुद्ध, पवित्र, अजर और अमृत हो जाता है।
यहाँ श्रुति कहती है कि अग्नि ही गायत्री का मुख है। इस रहस्य का भाव यह है कि जिस प्रकार अग्नि में सब कुछ डालने पर वह सबको भस्म कर देती है, उसी प्रकार जब साधक 'अग्नि-मुख' वाली इस विद्या का आश्रय लेता है, तो उसके द्वारा किए गए अनेक पाप भी उस दिव्य अग्नि में जलकर भस्म हो जाते हैं। श्रुति का यह वचन स्मृति के 'मुखमग्निः' पद को पूर्णता प्रदान करता है और सिद्ध करता है कि गायत्री केवल एक प्रार्थना नहीं, अपितु एक 'शुद्धिकरण की अग्नि' है, जो साधक को अजर और अमृत बनाने की क्षमता रखती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अन्य शास्त्रों में भी गायत्री के इन्हीं अंगों की पुष्टि मिलती है:
अभीष्टदा कोटिजप्ता देवत्वं राजतामियात् । ओंकारं पूर्वमुच्चार्य भूर्भुवः स्वस्तथैव च । गायत्री प्रणवश्चान्ते जपे चैवमुदाहृतम् । विश्वामित्रऋषिश्छन्दो गायत्रं सविता तथा ॥ २१५.१४–१५ ॥
करोड़ बार जपी गयी (गायत्री) अभीष्ट देती है; (साधक) देवत्व या राजत्व पाता है। पहले ओंकार, फिर "भूः भुवः स्वः" का उच्चारण करके, (फिर) गायत्री और अन्तमें प्रणव — जपमें ऐसा कहा गया है। (इसके) ऋषि विश्वामित्र, छन्द गायत्री और देवता सविता हैं।
अग्नि पुराण का यह अंश स्मृति के साथ पूर्णतः मेल खाता है, जहाँ ऋषि विश्वामित्र, छन्द गायत्री और देवता सविता को स्वीकार किया गया है। यहाँ एक सूक्ष्म भेद यह है कि अग्नि पुराण जप की बाहरी विधि (प्रणव और व्याहृति) पर बल देता है, जबकि याज्ञवल्क्य स्मृति मन्त्र के 'मुख' यानी उसकी आंतरिक प्रज्वलन शक्ति (अग्नि) पर ध्यान केंद्रित करती है। दोनों का उद्देश्य एक ही है—साधक को देवत्व की ओर ले जाना।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास अत्यंत गूढ़ है। साधक के लिए 'मुख अग्नि' होने का अर्थ यह है कि जप के समय उसकी चेतना वाणी के उच्चारण स्थल (मुख) पर स्थित हो, जहाँ वह अनुभव करे कि उसके द्वारा उच्चारित प्रत्येक अक्षर एक दिव्य अग्नि-ज्वाला है।
साधक जब 'तत्' शब्द से मन्त्र आरम्भ करता है, तो वह स्वयं को उस 'तत्' (परम तत्व) में विलीन करने का प्रयास करता है। अभ्यास यह है कि जप के दौरान साधक अपनी समस्त मानसिक मलिनताओं, कुंठाओं और पुराने संस्कारों को इस अग्नि-मुख में आहुति की तरह समर्पित कर दे। जैसे-जैसे जप आगे बढ़ता है, साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर का 'सविता' (आंतरिक सूर्य) जाग्रत हो रहा है।
यह अभ्यास साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'ज्ञान-भूमि' की ओर ले जाता है। यहाँ अग्नि केवल जलाने वाली नहीं, बल्कि प्रकाशित करने वाली है। जब वाणी की अग्नि और हृदय की श्रद्धा मिलती है, तब साधक उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ वह स्वयं को विश्वामित्र की भांति समस्त विश्व के साथ एकाकार (मैत्री) महसूस करता है। यह श्लोक साधक को स्थूल मंत्रोच्चार से हटाकर 'अग्नि-तप' की आंतरिक प्रक्रिया में प्रतिष्ठित करता है।
विश्वस्य जगतो मित्रं विश्वामित्रः प्रजापतिः ।
विनियोग उपनये प्राणायामे तथैव च ॥ ४.५ ॥
सारे जगत्का मित्र होनेसे प्रजापति ही विश्वामित्र हैं; इसका विनियोग उपनयन और प्राणायाममें है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि ने गायत्री मन्त्र के बाह्य स्वरूप—उसके देवता (सविता), मुख (अग्नि), ऋचा और छन्द का परिचय दिया था। वर्तमान श्लोक उस श्रृंखला की अगली कड़ी है, जहाँ वे मन्त्र के 'ऋषि' शब्द के गूढ़ अर्थ को खोलते हुए उसके विनियोग (प्रयोग-क्षेत्र) को स्पष्ट कर रहे हैं। यहाँ ऋषि केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: विश्वस्य जगतः मित्रं (अतः) विश्वामित्रः (अस्ति), (सः) प्रजापतिः (अस्ति)। अस्याः विनियोगः उपनये प्राणायामे तथैव च (निदिश्यते)।
पदार्थ-निर्वचन:
• विश्वस्य जगतो मित्रं: समस्त चराचर जगत् के साथ जिसका मैत्री भाव हो। यहाँ 'मैत्री' का अर्थ केवल सामाजिक सम्बन्ध नहीं, अपितु उस अवस्था से है जहाँ साधक और सृष्टि के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है।
• विश्वामित्रः: वह जो विश्व का मित्र है। यह ऋषि का नाम होने के साथ-साथ एक विशेष योग्यता (विशेषण) भी है।
• प्रजापतिः: समस्त प्रजाओं के स्वामी या सृजनकर्ता। यहाँ संकेत है कि जब कोई साधक 'विश्व-मैत्री' की अवस्था को प्राप्त करता है, तो वह वास्तव में प्रजापति रूपी उस विराट चेतना में प्रतिष्ठित हो जाता है।
• विनियोग: मन्त्र का विशिष्ट प्रयोजन या प्रयोग करने की विधि।
• उपनयन: वह संस्कार जिसमें शिष्य को गुरु के समीप लाया जाता है और प्रथम बार गायत्री दी जाती है। यह 'अन्धकार से प्रकाश' की ओर ले जाने वाला द्वार है।
• प्राणायाम: श्वास-प्रश्वास का नियमन। यहाँ गायत्री का विनियोग होने का अर्थ है कि प्राणायाम के समय मन्त्र का मानसिक जप या उसके साथ प्राणों का समन्वय करना।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में 'विश्वामित्र' नाम का एक आध्यात्मिक निर्वचन प्रस्तुत कर रहे हैं। सामान्यतः विश्वामित्र को एक ऐतिहासिक ऋषि माना जाता है, किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य उन्हें 'प्रजापति' के साथ एकाकार कर रहे हैं। भाव यह है कि जो वास्तव में समस्त जगत् का मित्र (विश्व-मित्र) हो गया, वही प्रजापति के स्वरूप को प्राप्त करता है। जब साधक गायत्री की शक्ति से अपने भीतर के 'अहं' को मिटाकर स्वयं को सृष्टि के कण-कण से जोड़ लेता है, तब वह विश्वामित्र कहलाता है। यह अवस्था उस विराट चेतना की है जहाँ 'मैं' और 'पर' का भेद समाप्त हो जाता है।
इसके पश्चात ऋषि इस मन्त्र के विनियोग का निर्देश करते हैं। वे कहते हैं कि गायत्री का प्रयोग 'उपनयन' और 'प्राणायाम' में होता है। उपनयन केवल एक बाह्य संस्कार नहीं, अपितु यह आत्मा का परमात्मा की ओर प्रस्थान है। जहाँ से साधक का वास्तविक आध्यात्मिक जीवन आरम्भ होता है, वहीं गायत्री का बीजारोपण किया जाता है।
किन्तु अधिक गूढ़ बात 'प्राणायाम' में इसके विनियोग की है। प्राणायाम केवल श्वास रोकना नहीं, अपितु प्राण को मन्त्रमय करना है। जब गायत्री के २४ अक्षर प्राणों की गति के साथ लयबद्ध होते हैं, तब वह प्राण साधारण न रहकर 'ब्रह्म-प्राण' बन जाता है। उपनयन जहाँ साधक को मार्ग पर खड़ा करता है, वहीं प्राणायाम में इसका जप उसे उस मार्ग पर अग्रसर कर उस लक्ष्य तक पहुँचाता है जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में किया गया था।
शास्त्र-साक्ष्य —
(29.3) (106) सद्यो ह जातो वृषभः कनीन इति मैत्रावरुणः पुरस्तात्सूक्तानामहरहः शंसति तदेतत्सूक्तं स्वर्ग्यमेतेन वै सूक्तेन देवाः स्वर्गं लोकमजयन्नेतेन ऋषयस्तथैवैतद्यजमाना एतेन सूक्तेन स्वर्गं लोकं जयन्ति तदु वैश्वामित्रं विश्वस्य ह वै मित्रं विश्वामित्र आस विश्वं हास्मै मित्रं भवति य एवं वेद येषां चैवं विद्वानेतन्मैत्रावरुणः पुरस्तात्सूक्तानामहरहः शंसति तदृषभवत्पशुमद्भवति पशूनामवरुद्ध्यै तत्पञ्चर्चम्भवति पञ्चपदा पङ्क्तिः पङ्क्तिर्वा अन्नमन्नाद्यस्यावरुद्ध्या उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येति ब्राह्मणाच्छंसी ब्रह्मण्वत्समृद्धं सूक्तमहरहः शंसति तदेतत्सूक्तं स्वर्ग्यमेतेन वै सूक्तेन देवाः स्वर्गं लोकमजयन्नेतेन ऋषयस्तथैवैतद्यजमाना एतेन सूक्तेन स्वर्गं लोकं जयन्ति तदु वासिष्ठमेतेन वै वसिष्ठ इन्द्रस्य प्रियं धामोपागछत्स परमं लोकमजयदुपेन्द्रस्य प्रियं लोकं गच्छति जयति परमं लोकं य एवं वेद तद्वै षळृचं षड्वा ऋतव ऋतूनामाप्त्यै तदुपरिष्टात्सम्पातानां शंसत्याप्त्वैव तत्स्वर्गं लोकं यजमाना अस्मिँल्लोके प्रतितिष्ठन्त्यभि तष्टेव दीधया मनीषामिति अच्छावाकोऽहरहः शंसत्यभिवत्तत्यै रूपमभि प्रियाणि मर्मृशत्पराणीति यान्येव पराण्यहानि तानि प्रियाणि तान्येव तदभिमर्मृशतो यन्त्यभ्यारभमाणाः परो वा अस्माल्लोकात्स्वर्गो लोकस्तमेव तदभिवदति कवीँरिच्छामि संदृशे सुमेधा इति ये वै ते न ऋषयः पूर्वे प्रेतास्ते वै कवयस्तानेव तदभ्यतिवदति तदु वैश्वमित्रं विश्वस्य ह वै मित्रं विश्वामित्र आस विश्वं हास्मै मित्रम्भवति य एवं वेद तदनिरुक्तं प्राजापात्यं शंसत्यनिरुक्तो वै प्रजापतिः प्रजापतेराप्त्यै सकृदिन्द्रं निराह तेनैन्द्राद्रूपान्न प्रच्यवते तद्वै दशर्चं दशाक्षरा विराळ् अन्नं विराळ् अन्नाद्यस्यावरुद्ध्यै यदेव दशर्चां दश वै प्राणाः प्राणानेव तदाप्नुवन्ति प्राणानात्मन्दधते तदुपरिष्टात्सम्पातानां शंसत्याप्त्वैव तत्स्वर्गं लोकं यजमाना अस्मिँल्लोके प्रतितिष्ठन्ति ॥ ६.२० ॥
"सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः" — मैत्रावरुण प्रतिदिन सूक्तोंसे पहले (यह सूक्त) पढ़ता है; यह सूक्त स्वर्ग देनेवाला है … और वह वैश्वामित्र (विश्वामित्रका देखा) है — विश्वामित्र विश्वका (सारे जगत्का) मित्र था; जो ऐसा जानता है, सारा विश्व उसका मित्र होता है। … (अच्छावाकका "कवीँरिच्छामि" सूक्त) भी वैश्वामित्र है — विश्वामित्र विश्वका मित्र था; जो ऐसा जानता है, विश्व उसका मित्र होता है। (शेष अंश सम्पात-सूक्तोंके शंसनका विधान है।)
ऐतरेय ब्राह्मण स्पष्ट रूप से कहता है— "विश्वस्य ह वै मित्रं विश्वामित्र आस" अर्थात् विश्वामित्र वास्तव में विश्व के मित्र थे। इस ग्रन्थ का यह कथन स्मृति के इस वचन की पुष्टि करता है कि 'विश्वामित्र' केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक अवस्था है। ऐतरेय ब्राह्मण आगे यह भी संकेत देता है कि जो ऐसा जानता है, सारा विश्व उसका मित्र हो जाता है। स्मृतिका यह बात और विस्तार देते हुए कहती है कि यह मैत्री भाव वास्तव में प्रजापति (परमेश्वर) का ही स्वरूप है। अतः यहाँ स्मृति और ब्राह्मण ग्रन्थ दोनों इस बात पर सहमत हैं कि विश्वामित्र का तत्त्व 'विश्व-मैत्री' में निहित है, जो साधक को विराटता की ओर ले जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक महान अभ्यास का द्वार खोलता है। यहाँ 'विश्वामित्र' होने का अर्थ है—अपने हृदय में समस्त सृष्टि के प्रति मैत्री भाव जागृत करना। जब तक साधक के भीतर राग-द्वेष है, वह गायत्री की पूर्ण शक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। जैसे ही वह स्वयं को प्रजापति का अंश मानकर जगत् को अपना मित्र मानने लगता है, उसके भीतर का अवरोध समाप्त हो जाता है।
योगिक अभ्यास की दृष्टि से 'प्राणायाम में विनियोग' का अर्थ अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधक जब प्राणायाम करता है, तो उसे मन्त्र के अक्षरों को प्राणों के प्रवाह के साथ जोड़ना चाहिए। श्वास के आने और जाने के साथ गायत्री के पदों का मानसिक स्पन्दन होना चाहिए। इससे प्राण और मन्त्र एक हो जाते हैं। जब प्राण मन्त्रमय होता है, तब मन स्वतः स्थिर होने लगता है और साधक स्थूल शरीर की सीमाओं से ऊपर उठकर उस 'विश्व-मैत्री' (विराट चेतना) का अनुभव करता है। यह अभ्यास साधक को व्यक्तिगत सीमित पहचान से निकालकर प्रजापति रूपी व्यापक चेतना की भूमि पर ले जाता है।
गायत्री वा इदं सर्वं ब्रह्माण्डं ब्राह्मणानि तु ।
वेदोपनिषच्छाखासु ब्राह्मणानि विधानतः ॥ ४.६ ॥
यह सारा ब्रह्माण्ड गायत्री ही है; (इसके) ब्राह्मण (व्याख्यान-भाग) वेदों, उपनिषदों और शाखाओंमें विधिपूर्वक (कहे गये) हैं —
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में याज्ञवल्क्य ऋषि ने गायत्री के बाह्य स्वरूप—देवता, ऋषि और विनियोग की व्याख्या की थी। अब वे इस मन्त्र को केवल एक 'वाक्य' या 'विधि' के रूप में नहीं, अपितु एक विराट तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। यह श्लोक साधक को मन्त्र के सीमित दायरे से निकालकर उसे ब्रह्माण्डव्यापी चेतना में विलीन करने का द्वार खोलता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: गायत्री वा इदं सर्वं ब्रह्माण्डं (अस्ति), (तस्य) ब्राह्मणानि तु वेदोपनिषच्छाखासु विधानतः (प्रोक्तानि सन्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• गायत्री वा इदं सर्वं ब्रह्माण्डं: यह संपूर्ण चराचर जगत् गायत्री ही है। यहाँ 'ब्रह्माण्ड' शब्द केवल भौतिक आकाश और पृथ्वी का समूह नहीं, अपितु वह समस्त विस्तार है जो ब्रह्म की अभिव्यक्ति है।
• ब्राह्मणानि: सामान्यतः 'ब्राह्मण' वेदों के व्याख्यान-भाग होते हैं, किन्तु यहाँ इसका अर्थ उस 'विस्तार' या 'विवरण' से है जो मन्त्र के गुप्त रहस्यों को खोलता है।
• वेदोपनिषच्छाखासु: वेदों, उपनिषदों और उनकी विभिन्न शाखाओं में। यह संकेत है कि गायत्री का पूर्ण ज्ञान किसी एक स्थान पर नहीं, अपितु संपूर्ण वैदिक साहित्य में बिखरा हुआ है।
• विधानतः: विधिपूर्वक, शास्त्रसम्मत रीति से या व्यवस्थित रूप से।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गम्भीर रहस्य उद्घाटित कर रहे हैं कि "यह सारा ब्रह्माण्ड गायत्री ही है"। प्रथम दृष्टि में यह कथन अतिशयोक्ति प्रतीत हो सकता है, क्योंकि गायत्री एक मन्त्र है और ब्रह्माण्ड एक विराट सृष्टि। किन्तु, जब याज्ञवल्क्य 'गायत्री' कहते हैं, तो उनका तात्पर्य केवल २४ अक्षरों के समूह से नहीं, अपितु उस 'चेतना-शक्ति' से है जिससे इस सृष्टि का सृजन हुआ है।
भाव यह है कि जिस प्रकाश और बुद्धि की प्रार्थना गायत्री मन्त्र में की जाती है, वही प्रकाश और बुद्धि इस समस्त ब्रह्माण्ड के संचालन का मूल आधार है। जो कुछ भी दृश्यमान है, वह उस विराट 'गायत्री-शक्ति' का ही स्थूल रूप है। अतः मन्त्र का जप करना वास्तव में स्वयं को उस ब्रह्माण्डीय लय के साथ जोड़ना है।
आगे ऋषि कहते हैं कि इस गायत्री तत्त्व के 'ब्राह्मण' अर्थात् इसके विस्तृत व्याख्यान और रहस्यों का वर्णन वेदों, उपनिषदों और उनकी शाखाओं में विधिपूर्वक किया गया है। यहाँ याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि मन्त्र केवल रटने की वस्तु नहीं है; उसका एक दार्शनिक आधार और प्रयोगात्मक विस्तार है, जो संपूर्ण श्रुति-परम्परा में व्याप्त है।
यह वाक्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है; यह विचार अगले श्लोक (४.७) तक विस्तृत होता है, जहाँ वे इस पावनता के प्रमाणों की चर्चा करेंगे। यहाँ याज्ञवल्क्य साधक को बता रहे हैं कि जब वह गायत्री का जप करे, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण न करे, बल्कि उस 'ब्रह्माण्ड' का साक्षात्कार करे जो स्वयं गायत्री स्वरूप है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विचार की पुष्टि छान्दोग्य उपनिषद् में मिलती है:
गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच वाग्वै गायत्री वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ ३.१२.१ ॥
जो कुछ भी यह भूत (जगत्) है, वह सब गायत्री ही है। वाणी ही गायत्री है; वाणी ही इस सब भूतका गान करती है और (उसकी) रक्षा करती है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट कहती है कि "जो कुछ भी यह भूत (जगत्) है, वह सब गायत्री ही है।" स्मृति और उपनिषद् यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। उपनिषद् इस रहस्य को और गहराई देते हुए कहते हैं कि 'वाणी' (वाक्) ही गायत्री है। इसका अर्थ यह है कि जिस शब्द-शक्ति से सृष्टि की रचना हुई और जिससे हम संवाद करते हैं, वह मूल रूप से गायत्री ही है। स्मृति में याज्ञवल्क्य इसी श्रुति के बीज को विस्तार दे रहे हैं कि मन्त्र का प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं, अपितु सार्वभौमिक है क्योंकि पूरा ब्रह्माण्ड ही उस मन्त्र का साकार रूप है।
योग-रहस्य —
एक साधक के लिए इस श्लोक का अर्थ अत्यंत व्यावहारिक और अनुभवजन्य है। प्रायः साधक जप करते समय स्वयं को एक सीमित शरीर में बंद महसूस करता है और सामने एक बाहरी जगत् देखता है। किन्तु याज्ञवल्क्य उसे 'ब्रह्माण्ड' की स्थिति में ले जाना चाहते हैं।
अभ्यास यह है कि जब साधक गायत्री का जप करे, तो वह इस भाव को स्थापित करे कि— "मैं जिस मन्त्र का जप कर रहा हूँ, वह केवल मेरे भीतर नहीं, अपितु बाहर व्याप्त प्रत्येक परमाणु, प्रत्येक तारा और प्रत्येक जीव में स्पंदित हो रहा है।"
जब साधक 'गायत्री वा इदं सर्वम्' के भाव में स्थित होता है, तो उसका द्वैत समाप्त होने लगता है। वह अनुभव करता है कि जप करने वाला (जपी), जप की जाने वाली वस्तु (मन्त्र) और जिस जगत् के बीच वह बैठा है, ये तीनों अलग-अलग नहीं हैं। इस स्थिति में जप 'क्रिया' न रहकर 'अवस्था' बन जाता है। साधक मन्त्र से बाहर नहीं निकलता, बल्कि मन्त्र के विस्तार में स्वयं को विलीन कर देता है। यह अभ्यास उसे स्थूल देह की सीमा से उठाकर विराट चेतना की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ही एक महा-मन्त्र के रूप में देखता है।
पुराणधर्मशास्त्राणि गायत्र्याः पावनानि तु ।
कीर्तितानि त्वनेकानि गायत्र्याः पावनानि च ॥ ४.७ ॥
— पुराण और धर्मशास्त्र गायत्रीकी पावनता बतानेवाले हैं; गायत्रीकी पावनताके अनेक (वचन) कहे गये हैं।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के विराट स्वरूप का वर्णन करते हुए इसे संपूर्ण ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार कर दिया। जब किसी मन्त्र को ब्रह्माण्डव्यापी बताया जाता है, तब उसकी महत्ता और पावनता की पुष्टि के लिए प्रमाणों की आवश्यकता होती है। अतः इस श्लोक में वे श्रुति-साक्ष्य के पश्चात स्मृति और पुराणों के साक्ष्यों की ओर संकेत कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: पुराणधर्मशास्त्राणि गायत्र्याः पावनानि (गुणाः/वचनानि) तु कीर्तितानि, (तथा) अनेकानि गायत्र्याः पावनानि (च) (कीर्तितानि सन्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• पुराणधर्मशास्त्राणि: प्राचीन ऋषियों द्वारा रचित पुराण और धर्मशास्त्र। यहाँ 'पुराण' केवल कथाओं के ग्रन्थ नहीं, अपितु वह ज्ञान है जो 'पुराणा' अर्थात् सनातन और आदि है।
• पावनानि: पवित्र करने वाली या पावनता को सिद्ध करने वाली। यह शब्द मन्त्र की उस शक्ति का बोधक है जो साधक के अंतःकरण के मल को धो देती है।
• कीर्तितानि: प्रशंसित, वर्णित या घोषित।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ शास्त्र-परम्परा की एकता और निरंतरता को स्थापित कर रहे हैं। उन्होंने पूर्व में गायत्री के ऋषि, छन्द, देवता और उसके ब्रह्माण्डव्यापी स्वरूप का वर्णन किया, जो कि मुख्य रूप से वैदिक और उपनिषद्-दृष्टि है। अब वे स्पष्ट करते हैं कि केवल श्रुति ही नहीं, अपितु पुराण और धर्मशास्त्र भी एकमत होकर गायत्री की पावनता का गान करते हैं।
भाव यह है कि सत्य जब एक होता है, तो वह विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है। जो रहस्य उपनिषदों में 'गुह्य' (गुप्त) रूप में है, वही पुराणों और स्मृतियों में 'कीर्ति' (प्रसिद्धि) और 'पावनता' के रूप में जन-सामान्य के लिए उपलब्ध है। "अनेकानि पावनानि" कहकर ऋषि यह बता रहे हैं कि गायत्री की पवित्रता केवल एक गुण नहीं है, अपितु उसके अनेक आयाम हैं—वह बुद्धि को शुद्ध करती है, चित्त को निर्मल करती है और आत्मा को प्रकाशमय बनाती है। यहाँ याज्ञवल्क्य साधक को यह विश्वास दिला रहे हैं कि जिस मार्ग पर वे चल रहे हैं, वह संपूर्ण शास्त्र-परम्परा द्वारा प्रमाणित और स्वीकृत है।
योग-रहस्य —
एक योग-अभ्यासी के लिए 'पावनता' का अर्थ केवल बाह्य शुद्धि नहीं, अपितु चित्त की वह अवस्था है जहाँ मन्त्र का बीज अंकुरित हो सके। साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि गायत्री जप एक ऐसी अग्नि है जिसमें संस्कार भस्म होते हैं और शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।
अभ्यास की दृष्टि से साधक को जप के पूर्व और पश्चात अपनी मानसिक स्थिति का अवलोकन करना चाहिए। यदि जप के बाद मन में शांति, स्पष्टता और पवित्रता का अनुभव हो रहा है, तो वह इस 'पावनता' का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा है। यह श्लोक साधक को संकेत देता है कि मन्त्र की शक्ति तभी प्रकट होती है जब वह पावनता के भाव से युक्त होता है। अतः जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, अपितु स्वयं को उस विराट पवित्रता में विलीन करने का प्रयास होना चाहिए।
गायत्रीशिरस्तदृष्यादि च
षोडशाक्षरकं ब्रह्म गायत्र्यास्तच्छिरः स्मृतम् ।
ओमापो ज्योतिरित्येष मन्त्रो यः परिकीर्त्यते ॥ ४.८ ॥
सोलह अक्षरोंवाला ब्रह्म (मन्त्र) गायत्रीका शिरस् कहा गया है — "ओमापो ज्योतिः…" यह जो मन्त्र कहा जाता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में याज्ञवल्क्य ने गायत्री की पावनता के विषय में पुराणों और धर्मशास्त्रों के साक्ष्यों का उल्लेख किया। अब वे गायत्री के उस विशिष्ट अंग की चर्चा कर रहे हैं जिसे 'शिरस्' (मस्तक) कहा जाता है। जिस प्रकार शरीर का संचालन मस्तक से होता है, उसी प्रकार गायत्री साधना में इस शिरस्-मन्त्र का स्थान सर्वोपरि और मार्गदर्शक है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: षोडशाक्षरकं ब्रह्म (मन्त्रं) गायत्र्याः तच्छिरः स्मृतम् । ओमापो ज्योतिः इति एष मन्त्रः यः परिकीर्त्यते (स एव तच्छिरः)।
पदार्थ-निर्वचन:
• षोडशाक्षरकं ब्रह्म: सोलह अक्षरों वाला वह दिव्य मन्त्र जिसे 'ब्रह्म' कहा गया है। यहाँ 'ब्रह्म' शब्द केवल व्यापकता का सूचक नहीं, अपितु उस परम तत्त्व का बोधक है जो साधक को सत्य से जोड़ता है।
• शिरः (शिरस्): शाब्दिक अर्थ 'सिर' या 'मस्तक' है। मन्त्र-शास्त्र में 'शिरस्' वह पूर्व-भाग होता है जो मुख्य ऋचा के आरम्भ में जुड़कर उसे पूर्णता और शक्ति प्रदान करता है। यह मन्त्र का शीर्ष बिंदु है।
• ओमापो ज्योतिः: यह उस सोलह अक्षरों वाले मन्त्र का आरम्भिक अंश (प्रतीक) है। पूरा मन्त्र "ओमापो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्" है।
• परिकीर्त्यते: जिसे शास्त्र सम्मत रूप से कहा जाता है या जिसका उच्चारण किया जाता है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री के उस गुप्त और शक्तिशाली मन्त्र का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसे 'शिरस्' कहा गया है। यह श्लोक पूर्व में (श्लोक ४.२ में) दी गई सूची की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि मुख्य गायत्री ऋचा से पूर्व जिस सोलह अक्षरों वाले ब्रह्म-मन्त्र का जप किया जाता है, वही इस साधना का मस्तक है।
इस मन्त्र के पदों का विश्लेषण करें तो इसमें सृष्टि और चेतना के चार मुख्य सोपान निहित हैं: 'आपः' (जल), 'ज्योतिः' (प्रकाश), 'रसः' (आनन्द) और 'अमृतम्' (अमरत्व)। बाहरी दृष्टि से यह जल और अग्नि की स्तुति प्रतीत होती है, किन्तु आन्तर अर्थ में यह साधक की चेतना के रूपांतरण की प्रक्रिया है।
जब साधक "ओमापो ज्योतिः..." का उच्चारण करता है, तो वह केवल शब्दों का जप नहीं कर रहा, अपितु स्वयं को उस दिव्य प्रवाह में विलीन कर रहा है जहाँ सबसे पहले अंतःकरण की शुद्धि (आपः) होती है, तत्पश्चात ज्ञान का प्रकाश (ज्योतिः) प्रस्फुटित होता है, फिर वह प्रकाश रस या परमानन्द (रसः) में परिवर्तित होता है और अन्ततः साधक उस अविनाशी तत्व 'अमृत' और 'ब्रह्म' में प्रतिष्ठित हो जाता है। इसमें व्याहृतियों (भूर्भुवः स्वः) का समावेश यह दर्शाता है कि यह मन्त्र स्थूल पृथ्वी से सूक्ष्म द्यौलोक तक की यात्रा का मानचित्र है।
यह मन्त्र गायत्री के मुख्य भाग का आधार है; बिना शिरस् के जप के, मन्त्र की पूर्ण शक्ति जाग्रत नहीं होती। इसीलिए इसे 'ब्रह्म' कहा गया है क्योंकि यह साधक को सीधे ब्रह्म-अवस्था की ओर ले जाने वाला द्वार है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक क्रमिक आरोहण का अभ्यास है। योगि इस मन्त्र के माध्यम से अपनी चेतना को निम्नतर स्तरों से उच्चतम स्तर की ओर ले जाता है:
१. आपः (शुद्धि): साधक सर्वप्रथम अपने चित्त और प्राणों की शुद्धि का अनुभव करता है। जैसे जल मल को धो देता है, वैसे ही यह पद मानसिक विकारों का शमन करता है।
२. ज्योतिः (प्रकाश): शुद्धि के पश्चात हृदय में ज्ञान-रूपी सूर्य का उदय होता है। यहाँ साधक 'अन्धकार' से 'प्रकाश' की ओर बढ़ता है।
३. रसः (आनन्द): जब प्रकाश स्थिर होता है, तो वह रस रूप में परिवर्तित हो जाता है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक को आंतरिक तृप्ति और अलौकिक आनन्द का अनुभव होने लगता है।
४. अमृतम् (अमरत्व/अक्षर): अंततः साधक उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ जन्म-मरण और द्वैत का अभाव है। यह 'अमृत' की भूमि है, जिसे याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति में 'अक्षर' कहा है।
अभ्यास करते समय साधक को इन सोलह अक्षरों के कंपन को अपने भीतर महसूस करना चाहिए। यह अभ्यास उसे स्थूल शरीर (भूर्) से सूक्ष्म प्राण (भुवः) और फिर कारण-शरीर या शुद्ध चेतना (स्वः) की ओर ले जाता है। इस प्रकार, 'शिरस्' का जप साधक को उस भूमि तक पहुँचाता है जहाँ वह स्वयं को ब्रह्म के रूप में अनुभव कर सके।
तस्य प्रजापतिश्चर्षिर्यजुश्छन्दो विवर्जि(र्णि)तम् ।
ब्रह्माग्निवायुसूर्याश्च दैवत्यं समुदाहृतम् ॥ ४.९ ॥
उसके ऋषि प्रजापति हैं; वह यजुः है, छन्दसे रहित; ब्रह्मा, अग्नि, वायु और सूर्य उसके देवता कहे गये हैं।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में याज्ञवल्क्य ने गायत्री के 'शिरस्' मन्त्र का स्वरूप और उसके सोलह अक्षरों वाले ब्रह्म-रूप की पहचान कराई। अब इस श्लोक (४.९) में वे उस शिरस्-मन्त्र के आध्यात्मिक ढाँचे अर्थात् उसके ऋषि, छन्द और देवताओं का निर्धारण कर रहे हैं, ताकि साधक इसे केवल शब्दों का समूह न मानकर एक पूर्ण दैवीय यंत्र के रूप में स्थापित कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तस्य (शिरस्-मन्त्रस्य) प्रजापतिः ऋषिः, यजुः छन्दः विवर्जितम्, ब्रह्मा अग्निः वायुः सूर्याश्च दैवत्यं समुदाहृतम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• तस्य: यहाँ 'तस्य' का सम्बन्ध पिछले श्लोक (४.८) में वर्णित 'शिरस्' मन्त्र से है।
• प्रजापतिः ऋषिः: प्रजापति इस मन्त्र के द्रष्टा या ऋषि हैं। प्रजापति वह परम सत्ता है जो समस्त प्रकृतियों और प्राणों की उत्पत्ति और पालन करती है।
• यजुः छन्दो विवर्जितम्: यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत है। यहाँ 'विवर्जितम्' का अर्थ है—छोड़ा हुआ या रहित। सामान्यतः मन्त्र पद्य (छन्द) में होते हैं, किन्तु इस शिरस्-मन्त्र की प्रकृति 'यजुः' (गद्य) जैसी है; इसमें छन्द का बंधन विवर्जित है। यह गद्य-रूप इसे एक आदेशात्मक और प्रत्यक्ष शक्ति प्रदान करता है।
• ब्रह्मा अग्नि वायु सूर्य: ये चार देवता हैं। ब्रह्मा (सृजन/चेतना), अग्नि (तेज/पावनता), वायु (प्राण/गति) और सूर्य (प्रकाश/ज्ञान)।
• दैवत्यं समुदाहृतम्: इन चारों देवताओं के समूह को इस मन्त्र में समाहित (समुदाहृत) किया गया है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ शिरस्-मन्त्र की आंतरिक संरचना खोल रहे हैं। किसी भी मन्त्र की पूर्णता उसके ऋषि, छन्द और देवता के मिलन से होती है। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसके ऋषि प्रजापति हैं, तो भाव यह है कि इस मन्त्र का प्रयोग साधक को उसकी मूल सृष्टि-शक्ति (प्रजापति) से जोड़ता है।
मन्त्र के 'छन्द-विवर्जित' होने का रहस्य यह है कि छन्द मन को लयबद्ध करता है, किन्तु गद्य (यजुः) सीधे संकल्प और क्रिया से जुड़ा होता है। शिरस्-मन्त्र कोई काव्य नहीं, अपितु एक 'ब्रह्म-वाक्य' है जो साधक की चेतना को सीधा प्रहार कर उसे जागृत करता है। यह मन्त्र मुख्य गायत्री ऋचा के लिए भूमि तैयार करता है।
जहाँ तक देवताओं का प्रश्न है, यहाँ ब्रह्मा, अग्नि, वायु और सूर्य का उल्लेख केवल बाहरी देवताओं का नाम नहीं है। ये चारों तत्व ब्रह्माण्ड और शरीर के चार स्तरों के प्रतिनिधि हैं। ब्रह्मा सूक्ष्म चेतना के प्रतीक हैं, अग्नि जठराग्नि और तेज के, वायु प्राण-शक्ति के और सूर्य उस परम प्रकाश के जो हृदय में स्थित है। इन चारों को 'समुदाहृत' करने का अर्थ है कि साधक जब इस मन्त्र का जप करता है, तो वह अपने भीतर की समस्त सृजनात्मक, पावन, गतिशील और प्रकाशमय शक्तियों को एक सूत्र में पिरो लेता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक आरोहण-प्रक्रिया का निर्देश है। जब साधक "ओमापो ज्योति..." इस शिरस्-मन्त्र का जप करता है, तो उसे इन चार देवताओं के माध्यम से अपनी चेतना को ऊपर उठाना होता है:
१. अग्नि: सबसे पहले वह अपने भीतर की जठराग्नि और तपस का अनुभव करे (पृथ्वी तत्त्व/भूः)।
२. वायु: फिर वह उस प्राण-शक्ति का अनुभव करे जो शरीर में गति करती है (अन्तरिक्ष तत्त्व/भुवः)।
३. सूर्य: तत्पश्चात वह हृदय-कमल में स्थित सूर्य के प्रकाश को देखे (द्यौ तत्त्व/स्वः)।
४. ब्रह्मा: अंततः वह उस निराकार ब्रह्म-चेतना में लीन हो जाए जो इन तीनों से परे और सबका आधार है।
इस प्रकार, शिरस् का जप करते हुए साधक 'भूः' से 'भुवः', 'भुवः' से 'स्वः' और 'स्वः' से उस तुरीय अवस्था (ब्रह्मा) की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर के बंधन से मुक्त कर सूक्ष्म चैतन्य की भूमि पर ले जाता है, जिससे वह मुख्य गायत्री ऋचा के गहन रहस्यों को ग्रहण करने के योग्य बन सके।
प्राणस्यायमने चैव विनियोग उदाहृतः ।
गायत्र्याः शिरसा सार्धमेवं श्रुतिनिदर्शनम् ॥ ४.१० ॥
प्राणायाममें गायत्रीके साथ, उसके शिरस् सहित, इसका विनियोग कहा गया है — ऐसा श्रुतिका निदर्शन है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के 'शिरस्' (मन्त्र-शीर्ष) का स्वरूप स्पष्ट किया और उसके ऋषि, छन्द तथा देवताओं का निर्धारण किया। अब इस १०वें श्लोक में वे यह बता रहे हैं कि इस विशिष्ट शिरस्-मन्त्र का व्यावहारिक प्रयोग कहाँ और किस प्रकार करना है, जिससे साधक की साधना केवल शब्दों का उच्चारण न रहकर प्राणों के रूपांतरण की प्रक्रिया बन जाए।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: प्राणायामस्य अयं (विनियोगः) मने च एव विनियोगः उदाहृतः । गायत्र्याः शिरसा सार्धम् एवं श्रुति-निदर्शनम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्राणस्यायमने चैव विनियोगः: यहाँ 'प्राणस्य' का अर्थ प्राणायाम की क्रिया से है। 'मने' शब्द संकेत करता है कि यह विनियोग केवल वाणी का नहीं, अपितु मन का है। अर्थात् इस मन्त्र का मानसिक नियोजन (विनियोग) प्राणायाम के समय किया जाता है।
• उदाहृतः: यहाँ प्रयुक्त या कहा गया है।
• गायत्र्याः शिरसा सार्धम्: 'सार्धम्' का अर्थ है 'साथ में'। भाव यह है कि जब गायत्री मन्त्र का जप हो, तब उसके 'शिरस्' (ओमापो ज्योतिः...) को उससे जोड़कर (संगत करके) प्रयोग किया जाए।
• श्रुति-निदर्शनम्: यह केवल स्मृति का मत नहीं, अपितु श्रुति (वेदों/ब्राह्मणों) में दिए गए प्रमाण का उदाहरण या निदर्शन है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं कि मन्त्र और प्राण का सम्बन्ध अविभाज्य है। सामान्यतः लोग प्राणायाम को केवल श्वास की क्रिया मानते हैं और जप को केवल वाणी का खेल, किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि प्राणायाम के समय गायत्री और उसके शिरस्-मन्त्र का विनियोग होना चाहिए।
इसका अर्थ यह है कि जब साधक प्राणायाम करता है, तो वह केवल वायु का आवागमन नहीं करता, बल्कि उस श्वास की लय में 'शिरस्' मन्त्र और 'गायत्री' को स्थापित करता है। यहाँ 'विनियोग' शब्द महत्वपूर्ण है; विनियोग का अर्थ है—किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किसी शक्ति को नियुक्त करना। जब साधक प्राणायाम में शिरस्-सहित गायत्री का प्रयोग करता है, तो वह अपने प्राणों को उस दिव्य ज्योति (ओमापो ज्योतिः) में विलीन करने का प्रयास करता है।
यह विधि इस प्रकार है: प्राणायाम की प्रक्रिया में व्याहृतियाँ (भूः भुवः स्वः), फिर शिरस् मन्त्र और उसके पश्चात मुख्य गायत्री मन्त्र का एक एकीकृत प्रवाह बनता है। यह क्रम साधक को स्थूल शरीर से उठाकर सूक्ष्म प्राणमय कोष की ओर ले जाता है। याज्ञवल्क्य यहाँ 'श्रुति-निदर्शन' कहकर यह सिद्ध कर रहे हैं कि यह पद्धति वैदिक परम्परा का मूल आधार है, न कि कोई बाद में जोड़ी गई विधि।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अर्थ प्राण और मन्त्र के एकीकरण का अभ्यास है। योग में जब साधक प्राणायाम करता है, तब वह केवल वायु को नहीं रोकता या छोड़ता, अपितु उस रिक्तता और पूर्णता के बीच मन्त्रों को स्थापित करता है।
अभ्यास यह है कि प्राणायाम की प्रत्येक अवस्था—श्वास लेने (पूरक), श्वास रोकने (कुम्भक) और श्वास छोड़ने (रेचक)—के साथ गायत्री और उसके शिरस् का मानसिक जप किया जाए। जब प्राण भीतर खिंचते हैं, तब 'शिरस्' के १६ अक्षर उस प्राण को शुद्ध करते हैं; जब प्राण स्थिर होते हैं, तब गायत्री का तेज साधक के भीतर प्रज्वलित होता है; और जब प्राण बाहर निकलते हैं, तब वह समस्त अशुद्धियों का विसर्जन करते हैं।
इस अभ्यास से साधक की भूमि बदलती है। वह केवल 'क्रिया' की भूमि से उठकर 'विज्ञान' की भूमि पर आता है। यहाँ मन्त्र और प्राण एक लय में आ जाते हैं—जहाँ प्राण मन्त्र बन जाता है और मन्त्र प्राण। इस अवस्था में साधक अनुभव करता है कि उसके हृदय का सूर्य और बाहरी सूर्य एक ही ज्योति के दो रूप हैं। यह अभ्यास मन को एकाग्र कर उसे 'अक्षर' (जो नष्ट न हो) की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है।
गायत्रीमाहात्म्यम्
तपसा सुसमुद्धृत्य आदिसर्गे स्वयंभुवः ।
ओंकारपूर्वा गायत्री निर्जगाम ततो मुखात् ॥ ४.११ ॥
आदिसृष्टिमें तपसे (उसे) भली-भाँति उद्धृत करनेपर, ओंकारसे आरम्भ होनेवाली गायत्री तब स्वयम्भूके मुखसे निकली।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के 'शिरस्' मन्त्र और उसके विनियोग का विवरण दिया। अब वे इस मन्त्र की ऐतिहासिकता और उसकी आध्यात्मिक उत्पत्ति की ओर संकेत कर रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि वह जिस शक्ति का आवाहन कर रहा है, उसका उद्गम कहाँ से हुआ है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: आदिसर्गे स्वयंभुवः तपसा सुसमुद्धृत्य ओंकारपूर्वा गायत्री ततो मुखात् निर्जगाम।
पदार्थ-निर्वचन:
• आदिसर्गे: सृष्टि के आरम्भ में, जब केवल चैतन्य का विस्तार था।
• स्वयंभुवः: वह जो स्वयं से उत्पन्न हुआ है—परब्रह्म या प्रजापति ब्रह्मा।
• तपसा सुसमुद्धृत्य: 'सु' (भली-भाँति) + 'समुद्धृत्य' (उद्धृत करने पर/निकालने पर)। यहाँ तप का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट नहीं, अपितु वह गहन मानसिक एकाग्रता और संकल्प है जिससे शून्य से सृजन होता है।
• ओंकारपूर्वा: ओंकार के बाद आने वाली या वह गायत्री जिसके पूर्व में ओंकार प्रतिष्ठित है। यह मन्त्र के क्रम को दर्शाता है।
• निर्जगाम: प्रगट हुई, बाहर निकली।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री की उत्पत्ति का रहस्य बता रहे हैं। वे कहते हैं कि आदिसृष्टि के समय स्वयम्भू (ब्रह्मा) ने अपनी गहन तपस्या के माध्यम से जिस परम शक्ति को अभिव्यक्त किया, वह 'ओंकार-पूर्वा गायत्री' थी। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि गायत्री कोई साधारण काव्य या शब्दों का समूह नहीं, अपितु तप की अग्नि से प्रस्फुटित एक दैवीय ध्वनि है।
यहाँ "ओंकारपूर्वा" शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि सृष्टि के प्रकटीकरण में सबसे पहले 'ओंकार' (नाद) आया और उसी ओंकार के विस्तार से गायत्री का जन्म हुआ। जब स्वयम्भू ने तप किया, तो वह चेतना पहले बीज-रूप में 'ओंकार' बनी और फिर उस बीज से गायत्री रूपी वृक्ष प्रकट हुआ। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि गायत्री मूलतः ओंकार की ही एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है।
बाहरी दृष्टि से यह कथा सृष्टि-रचना की है, किन्तु आन्तर अर्थ में यह साधक के भीतर घटित होने वाली घटना है। जिस प्रकार स्वयम्भू ने तपसे गायत्री को उद्धृत किया, उसी प्रकार जब मनुष्य अपनी अंतरात्मा में तप (एकाग्रता और अनुशासन) करता है, तब उसके हृदय-आकाश में पहले ओंकार का गुंजन होता है और तत्पश्चात गायत्री की ज्योति प्रदीप्त होती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
गायत्री की इस उत्पत्ति-क्रम की पुष्टि अन्य शास्त्रों में भी मिलती है:
को नाम स्वयंभूः पुरुष इति । तेनाङ्गुलीमथ्यमानात् सलिलमभवत् । सलिलात् फेनमभवत् । फेनाद्बुद्बुदमभवत् । बुद्बुदादण्डमभवत् । अण्डाद्ब्रह्माभवत् । ब्रह्मणो वायुरभवत् । वायोरग्निरभवत् । अग्नेरोङ्कारोऽभवत् । ओंकाराद्व्याहृतिरभवत् । व्याहृत्या गायत्र्यभवत् । गायत्र्याः सावित्र्यभवत् । सावित्र्याः सरस्वत्यभवत् । सरस्वत्याः सर्वे वेदा अभवन् । सर्वेभ्यो वेदेभ्यः सर्वे लोका अभवन् । सर्वेभ्यो लोकेभ्यः सर्वे प्राणिनोऽभवन् ॥ १ ॥
स्वयम्भू पुरुष कौन है? उसके द्वारा (मानो) अँगुलीसे मथे जानेसे जल हुआ; जलसे फेन, फेनसे बुलबुला, बुलबुलेसे अण्ड, अण्डसे ब्रह्मा, ब्रह्मासे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे ओंकार, ओंकारसे व्याहृति, व्याहृतिसे गायत्री, गायत्रीसे सावित्री, सावित्रीसे सरस्वती, सरस्वतीसे सब वेद, सब वेदोंसे सब लोक, और सब लोकोंसे सब प्राणी हुए।
इस उपनिषद् के अनुसार सृष्टि का क्रम अत्यंत सूक्ष्म है—अग्नि से ओंकार, ओंकार से व्याहृति और व्याहृति से गायत्री उत्पन्न हुई। स्मृति का यह श्लोक इसी क्रम को पुष्ट करता है कि गायत्री 'ओंकारपूर्वा' है। जहाँ उपनिषद् में व्याहृति का मध्यस्थ होना बताया गया है, वहीं याज्ञवल्क्य यहाँ मूल बीज (ओंकार) और फल (गायत्री) के सम्बन्ध को प्रधानता दे रहे हैं। यह दर्शाता है कि ओंकार वह आधार है जिस पर गायत्री की पूरी टिकी हुई है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का रहस्य 'अभ्यास' में निहित है। याज्ञवल्क्य संकेत दे रहे हैं कि गायत्री को केवल शब्दों के दोहराव से प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसकी उत्पत्ति ही 'तपसे' हुई है। अतः साधक यदि गायत्री का पूर्ण फल चाहता है, तो उसे अपने भीतर तप (इन्द्रिय-निग्रह और ध्यान) की अग्नि प्रज्वलित करनी होगी।
योगिक दृष्टि से जप का क्रम भी यही होना चाहिए: पहले ओंकार का उच्चारण कर चित्त को शून्य और एकाग्र करना, और फिर उस शांत अवस्था में गायत्री मन्त्र में प्रवेश करना। जब साधक 'ओं' के नाद में स्थित होकर गायत्री का जप करता है, तो वह वास्तव में उसी आदिसर्ग की प्रक्रिया को अपने भीतर दोहरा रहा होता है। यह अभ्यास उसे स्थूल जगत से उठाकर सूक्ष्म बीज-ध्वनि (ओंकार) तक ले जाता है और फिर उस ध्वनि के माध्यम से प्रकाश (गायत्री) का अनुभव कराता है। इस प्रकार साधक 'स्वयम्भू' की उस अवस्था की ओर अग्रसर होता है जहाँ वह स्वयं अपनी चेतना का दृष्टा बन जाता है।
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः ।
वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवःस्वरितीति च ॥ ४.१२ ॥
प्रजापतिने तीनों वेदोंसे अकार, उकार और मकार, तथा "भूः भुवः स्वः" को दुहा।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि आदिसृष्टि के समय तप की अग्नि से 'ओंकार-पूर्वा गायत्री' का प्राकट्य हुआ। अब इस श्लोक में वे उस प्रस्फुटन की सूक्ष्म प्रक्रिया को स्पष्ट कर रहे हैं कि किस प्रकार व्यापक वेदों के सार रूप में अक्षरों और व्याहृतियों का जन्म हुआ, जो आगे चलकर मन्त्रों के आधार बने।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: प्रजापतिः वेदत्रयान् (निरदुहत्) अकारं चाप्युकारं च मकारं च भूर्भुवःस्वरितीति च।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्रजापतिः: यहाँ सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का संकेत है, जो समस्त ज्ञान और विद्याओं के आदि स्रोत हैं।
• वेदत्रयान्: ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद। (अथर्ववेद को प्रायः योगिक या तंत्र-विद्या के रूप में अलग रखा जाता है, यहाँ मूल त्रयी की बात है)।
• निरदुहत्: 'दुहना' का अर्थ होता है दूध निकालना। यहाँ यह एक अत्यंत सूक्ष्म रूपक है। जिस प्रकार गौ के शरीर में दूध समाहित रहता है परंतु उसे दुहने पर वह गाढ़ा और सार रूप में बाहर आता है, वैसे ही वेदों के विशाल ज्ञान-सागर से उनके 'सार-तत्व' को निकालना 'निरदुहन' कहलाता है।
• अकारं उकारं मकारं: प्रणव (ओम्) के तीन घटक अक्षर।
• भूर्भुवःस्वरितीति: ये तीन व्याहृतियाँ हैं, जो क्रमशः पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक का प्रतिनिधित्व करती हैं।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि विज्ञान के उस रहस्य को खोल रहे हैं जहाँ शब्द और अर्थ एक हो जाते हैं। वे कहते हैं कि प्रजापति ने तीनों वेदों से 'अ', 'उ', 'म' तथा 'भूः, भुवः, स्वः' को दुहा।
यहाँ 'दोहन' की क्रिया का गहरा अर्थ है। वेद अनंत हैं, उनके मन्त्र और व्याख्याएँ अपार हैं। किसी भी साधना के लिए उस अनंतता को एक बिंदु पर लाना आवश्यक होता है। प्रजापति ने वेदों के उस विराट ज्ञान को संकुचित कर उन्हें बीज-रूप में परिवर्तित किया।
प्रथम, उन्होंने 'अ', 'उ' और 'म' को निकाला। ये केवल वर्ण नहीं हैं; 'अ' जाग्रत अवस्था और सृष्टि के आरम्भ का, 'उ' स्वप्न और मानसिक विस्तार का, तथा 'म' सुषुप्ति और लय का प्रतीक है। इन तीनों के मिलन से 'ओम्' (प्रणव) निर्मित होता है, जो समस्त वेदों का निचोड़ है।
द्वितीय, उन्होंने 'भूः', 'भुवः' और 'स्वः' को दुहा। ये व्याहृतियाँ साधक के लिए सोपान हैं। जब साधक गायत्री जप करता है, तो वह इन व्याहृतियों के माध्यम से अपनी चेतना को स्थूल शरीर (भूः) से उठाकर प्राणमय कोष (भुवः) और फिर चैतन्य के प्रकाश (स्वः) तक ले जाता है।
अतः यह श्लोक सिद्ध करता है कि प्रणव और व्याहृतियाँ वेदों के बाहर की वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि वे वेदों का ही 'निर्मल सार' हैं। जो इन बीज-अक्षरों को समझ लेता है, वह वास्तव में तीनों वेदों के मर्म को प्राप्त कर लेता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विषय में मनुस्मृति का कथन शब्दशः समान है:
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीति च ॥ २.७६ ॥
प्रजापतिने तीनों वेदोंसे अकार, उकार और मकार को, तथा "भूः, भुवः, स्वः" को दुहकर निकाला।
यहाँ स्मृतिका वचन और मनुस्मृति का वचन एक ही सत्य को दोहराते हैं कि प्रजापति ने वेदों से इन अक्षरों और व्याहृतियों का निष्कर्षण किया।
किन्तु जब हम इसकी तुलना श्रुति (ब्राह्मण) से करते हैं, तो प्रक्रिया के क्रम में सूक्ष्म भेद दिखता है:
प्रजापतिरकामयत प्रजायेय भूयान्स्यामिति स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वेमाँल्लोकानसृजत पृथिवीमन्तरिक्षं दिवं ताँल्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रीणि ज्योतींष्यजायन्ताग्निरेव पृथिव्या अजायत वायुरन्तरिक्षादादित्यो दिवस्तानि ज्योतींष्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त ऋग्वेद एवाग्नेरजायत यजुर्वेदो वायोः सामवेद आदित्यात्तान्वेदानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रीणि शुक्राण्यजायन्त भूरित्येव ऋग्वेदादजायत भुव इति यजुर्वेदात्स्वरिति सामवेदात्। तानि शुक्राण्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वर्णा अजायन्ताकार उकारो मकार इति तानेकधा समभरत्तदेतदोमिति तस्मादोमिति प्रणौत्योमिति वै स्वर्गो लोक ओमित्यसौ योऽसौ तपति। स प्रजापतिर्यज्ञमतनुत तमाहरत्तेनायजत स ऋचैव हौत्रमकरोद्यजुषाऽऽध्वर्यवं साम्नोद्गीथं तदेतत्त्रय्यैव विद्यायै शुक्रं तेन ब्रह्मत्वमकरोत्। स प्रजापतिर्यज्ञं देवेभ्यः संप्रायच्छत्ते देवा यज्ञमतन्वत तमाहरन्त तेनायजन्त त ऋचैव हौत्रमकुर्वन्यजुषाऽऽध्वर्यवं साम्नोद्गीथं यदेवैतत्त्रय्यै विद्यायै शुक्रं तेन ब्रह्मत्वमकुर्वन्। ते देवा अब्रुवन्प्रजापतिं यदि नो यज्ञ ऋक्त आर्तिः स्याद्यदि यजुष्टो यदि सामतो यद्यविज्ञाता सर्वव्यापद्वा का प्रायश्चित्तिरिति स प्रजापतिरब्रवीद्देवान्यदि वो यज्ञ ऋक्त आर्तिर्भवति भूरिति गार्हपत्ये जुहवाथ यदि यजुष्टो भुव इत्याग्नीध्रीयेऽन्वाहार्यपचने वा हविर्यज्ञेषु यदि सामतः स्वरित्याहवनीये यद्यविज्ञाता सर्वव्यापद्वा भूर्भुवः स्वरिति सर्वा अनुद्रुत्याऽऽहवनीय एव जुहवाथेति। एतानि ह वै वेदानामन्तःश्लेषणानि यदेता व्याहृतयस्तद्यथाऽऽत्मनाऽऽत्मानं संदध्याद्यथा पर्वणा पर्व यथा श्लेष्मणा चर्मण्यं वाऽन्यद्वा विश्लिष्टं संश्लेषयेदेवमेवैताभिर्यज्ञस्य विश्लिष्टं संदधाति सैषा सर्वप्रायश्चित्तिर्यदेता व्याहृतयस्तस्मादेषैव यज्ञे प्रायश्चित्तिः कर्तव्या ॥ ५.३२ ॥
प्रजापतिने कामना की — "मैं प्रजा उत्पन्न करूँ, बहुत होऊँ।" उसने तप किया और इन लोकोंको रचा — पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक। उनको तपाया; उनसे तीन ज्योतियाँ उत्पन्न हुईं — पृथिवीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु, द्युलोकसे आदित्य। उनको तपाया; उनसे तीन वेद उत्पन्न हुए — अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद, आदित्यसे सामवेद। उनको तपाया; उनसे तीन शुक्र (सार) उत्पन्न हुए — ऋग्वेदसे "भूः", यजुर्वेदसे "भुवः", सामवेदसे "स्वः"। उनको तपाया; उनसे तीन वर्ण उत्पन्न हुए — अकार, उकार, मकार; उन्हें एक साथ जोड़ा, वह यह "ओम्" है। इसीलिए "ओम्" कहकर प्रणव करता है; "ओम्" ही स्वर्गलोक है, "ओम्" वह (आदित्य) है जो तपता है। … (यज्ञमें ऋक्, यजुः या सामसे त्रुटि हो तो क्रमशः गार्हपत्य, आग्नीध्रीय/अन्वाहार्यपचन और आहवनीयमें "भूः", "भुवः", "स्वः" से आहुति दे; अज्ञात त्रुटिमें "भूर्भुवः स्वः" से।) ये व्याहृतियाँ वेदोंको परस्पर जोड़नेवाली हैं — जैसे अपनेसे अपनेको, जोड़से जोड़को, या लसीले पदार्थसे चमड़ेको जोड़ते हैं, वैसे ही इनसे यज्ञका टूटा हुआ जुड़ता है; यही सब प्रायश्चित्त है।
ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार, प्रजापति ने पहले तप किया, जिससे तीन ज्योतियाँ (अग्नि, वायु, आदित्य) उत्पन्न हुईं; उनसे तीन वेद जन्मे; उन वेदों से 'भूः', 'भुवः' और 'स्वः' (शुक्राणि/सार) निकले और अंत में इन व्याहृतियों के तपाने से 'अ', 'उ', 'म' वर्ण उत्पन्न हुए, जिनसे 'ओम्' बना।
स्मृति में क्रम संक्षिप्त है—वेदों से सीधे अक्षर और व्याहृतियाँ दिखाई गई हैं। श्रुति (ऐतरेय) इस प्रक्रिया को अधिक विस्तृत रूप में दिखाती है कि पहले व्याहृतियाँ आईं, फिर उनसे अक्षरों का जन्म हुआ। यह भेद विरोधाभास नहीं, बल्कि दृष्टि का अंतर है। स्मृति 'फल' पर बल देती है कि ये सब वेदों से आए हैं, जबकि श्रुति 'क्रम' को विस्तार से समझाती है। दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि प्रणव और व्याहृतियाँ वेदों का सार-तत्व हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'दोहन' के अभ्यास का संकेत देता है। योग में 'दोहन' का अर्थ है—शास्त्रों के पढ़ने (स्वाध्याय) से केवल सूचनाएँ एकत्र न करना, बल्कि उनमें से उस 'सार' को निकालना जो अनुभव में उतर सके।
अभ्यास की दृष्टि से साधक जब 'भूः भुवः स्वः' का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में तीनों वेदों की शक्ति को जाग्रत कर रहा होता है।
• अकार का अभ्यास करते समय साधक अपनी चेतना को सृष्टि के आरम्भ और अपने अस्तित्व के मूल बिंदु पर टिकाता है।
• उकार के समय वह उस विस्तार का अनुभव करता है जहाँ मन और प्राण विलीन होते हैं।
• मकार के समय वह पूर्णता और शांति (लय) में स्थित होता है।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि जिस 'ओम्' का वह जप कर रहा है, उसमें ऋग्वेद की ऋचाओं का तेज, यजुर्वेद की क्रियाशक्ति और सामवेद का माधुर्य समाहित है। जब वह व्याहृतियों के साथ गायत्री का जप करता है, तो वह केवल शब्दों को नहीं बोल रहा, बल्कि वेदों के उस 'दुहे हुए सार' का पान कर रहा है, जो उसे स्थूल जगत से उठाकर अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाता है। यह अभ्यास साधक को ज्ञान-भूमि से अनुभव-भूमि की ओर अग्रसर करता है।
त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमदूदुहत् ।
तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः ॥ ४.१३ ॥
परमेष्ठी प्रजापतिने इस सावित्री — "तत्" ऋचा — का एक-एक पाद तीनों वेदोंसे ही दुहा।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि प्रजापति ने तीनों वेदों से प्रणव के तीन अक्षरों (अ, उ, म) और तीन व्याहृतियों का दोहन किया। अब इस श्लोक में वे उस 'दोहन' की प्रक्रिया को पूर्ण करते हुए यह स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल अक्षर ही नहीं, अपितु गायत्री मन्त्र के पाद भी उन्हीं तीनों वेदों के सार रूप में प्रकट हुए हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: परमेष्ठी प्रजापतिः त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः इस्याः सावित्र्याः (तत् इति) ऋचोः पादं पादमदूदुहत्।
पदार्थ-निर्वचन:
• परमेष्ठी प्रजापतिः: वह सर्वोच्च सत्ता जो सृष्टि का संचालन करती है और समस्त विद्याओं का मूल स्रोत है।
• त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः: केवल तीनों वेदों (ऋक्, यजुष्, साम) से ही। यहाँ 'एव' शब्द इस बात पर बल देता है कि गायत्री किसी बाहरी स्रोत से नहीं, बल्कि स्वयं वेद-तत्व के संघनन से बनी है।
• सावित्र्याः ऋचोः: सावित्री ऋचा का। 'सावित्री' वह मन्त्र है जो 'सवितृ' (सूर्य/प्रकाश) से संबंधित है और साधक को जाग्रत करता है। यहाँ संकेत "तत्" शब्द से आरम्भ होने वाली प्रसिद्ध गायत्री ऋचा की ओर है।
• पादं पादम्: एक-एक चरण या हिस्सा। गायत्री के तीन पाद हैं, और यहाँ प्रत्येक पाद का सम्बन्ध एक वेद से बताया गया है।
• अदूदुहत्: दुहा या निकाला। जैसा कि पिछले श्लोक में 'निरदुहत्' का अर्थ 'सार निकालना' था, यहाँ भी इसका भाव वेदों के विशाल ज्ञान को संक्षिप्त कर उसे मन्त्र-रूप में लाना है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से गायत्री की उस सर्वव्यापकता को सिद्ध कर रहे हैं जो इसे समस्त वेदों का निचोड़ बनाती है। वे कहते हैं कि परमेष्ठी प्रजापति ने सावित्री ऋचा (तत् सवितुर्वरेण्यं...) के तीनों पादों को अलग-अलग तीनों वेदों से दुहा है।
भाव यह है कि गायत्री कोई पृथक मन्त्र नहीं है, बल्कि वह त्रयी विद्या का संकुचित और सघन रूप है। जिस प्रकार एक विशाल वृक्ष का सारा पोषण उसके बीज में समाहित होता है, उसी प्रकार ऋग्वेद की ऋचाओं, यजुर्वेद के कर्मकांडों और सामवेद के उपासना-स्वर का सार इन तीन पादों में समाया हुआ है। जब साधक गायत्री का जप करता है, तो वह अनजाने में ही तीनों वेदों की शक्ति का आह्वान कर रहा होता है।
यहाँ 'दोहन' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। दूध को दुहने के बाद जो 'मक्खन' या 'घी' प्राप्त होता है, वह दूध का सबसे शुद्ध और शक्तिशाली अंश होता है। ठीक उसी प्रकार, प्रजापति ने वेदों के विस्तृत ज्ञान से उस तत्व को निकाला जो मनुष्य की बुद्धि को सीधे प्रकाश (सवितृ) की ओर ले जा सके। इस प्रकार गायत्री वेदों का उपसंहार और उनका सार-तत्व बन गई।
श्रुति-संगति —
इस रहस्य की पुष्टि श्रुति में मिलती है:
ऋचो यजूंषि सामानीति अष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १४.८.१५.२ ॥
"ऋचः, यजूंषि, सामानि" — ये आठ अक्षर हैं; और गायत्रीका एक पद आठ अक्षरोंका है — यह (त्रयी) ही इसका वह (दूसरा पद) है। जो इसके इस पदको ऐसा जानता है, वह जितनी यह त्रयी विद्या है, उतना जीतता है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि "ऋचः, यजूंषि, सामानि" (तीनों वेद) मिलकर गायत्री का एक पद बनाते हैं। यह श्रुति-अंश इस स्मृति के वचन की पुष्टि करता है कि गायत्री का प्रत्येक पाद त्रयी विद्या का प्रतिनिधित्व करता है। जो साधक इस रहस्य को जान लेता है कि गायत्री के पादों में संपूर्ण वेदों का वास है, वह उस समस्त ज्ञान को 'जीत' लेता है या प्राप्त कर लेता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विषय पर अन्य स्मृतियों में भी यही मत मिलता है:
त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमदूदुहत् । तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः ॥ २.७७ ॥
परमेष्ठी प्रजापतिने "तत्" से आरम्भ होनेवाली इस सावित्री ऋचाका एक-एक पाद तीनों वेदोंसे ही दुहकर निकाला।
मनुस्मृति में शब्दशः यही वर्णन है कि प्रजापति ने सावित्री ऋचा का एक-एक पाद तीनों वेदों से दुहा। यह इस बात का प्रमाण है कि वैदिक परंपरा में गायत्री को 'वेदों का सार' मानना एक सर्वमान्य सत्य है। स्मृति और श्रुति दोनों यहाँ एकमत हैं कि गायत्री की शक्ति उसके वेदोन्मुखी होने में है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक केवल ऐतिहासिक विवरण नहीं, बल्कि एक गहन अभ्यास पद्धति है। जब योगी गायत्री का जप करता है, तो उसे इस भाव में उतरना चाहिए कि वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा, बल्कि त्रयी विद्या के सार को अपने भीतर उतार रहा है।
अभ्यास यह है कि साधक प्रत्येक पाद के उच्चारण के समय अनुभव करे कि:
१. प्रथम पाद के समय ऋग्वेद की ज्ञान-शक्ति उसके हृदय में प्रवाहित हो रही है।
२. द्वितीय पाद के समय यजुर्वेद की क्रिया-शक्ति और अनुशासन उसकी प्राण-शक्ति को व्यवस्थित कर रहा है।
३. तृतीय पाद के समय सामवेद की आनंदमयी उपासना का स्वर उसके चित्त को प्रकाशित कर रहा है।
इस प्रकार, एक ही मन्त्र के तीन पादों के माध्यम से साधक संपूर्ण वेद-तत्व का अनुभव करता है। यह अभ्यास उसे स्थूल शब्दों से उठाकर सूक्ष्म 'सार' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि समस्त ज्ञान अंततः एक ही प्रकाश—सवितृ—में विलीन हो जाता है।
यथाग्निर्वै देवतानामृतूनां कुसुमाकरः ।
ब्राह्मणो द्विपदानां च गावश्चैव चतुष्पदं(दाम्) ॥ ४.१४ ॥
जैसे देवताओं में अग्नि, ऋतुओं में वसन्त, द्विपद (दो पैरों वाले) में ब्राह्मण और चौपायों में गौ श्रेष्ठ है …
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के उद्भव और उसके वेदों से दोहन की प्रक्रिया का वर्णन किया। अब वे गायत्री की महिमा को स्थापित करने के लिए एक विशेष उपमा-श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसमें सृष्टि के विभिन्न वर्गों के श्रेष्ठतम तत्त्वों का उल्लेख है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यथा देवतानां अग्निः, ऋतुनाम् कुसुमाकरः (वसन्त), द्विपदानां ब्राह्मणः च, चतुष्पदाम् (चतुष्पदेषु) च गावः (श्रेष्ठः)।
पदार्थ-निर्वचन:
• कुसुमाकरः: 'कुसुम' (फूल) और 'आकर' (भण्डार/उत्पत्ति स्थान)। वह ऋतु जिसमें फूल खिलते हैं, अर्थात् वसन्त ऋतु।
• द्विपदानां: दो पैरों वालों में। यहाँ मनुष्य जाति का संकेत है।
• चतुष्पदाम्: चार पैरों वाले प्राणियों में।
• यथा: 'जैसे'। यह शब्द यहाँ एक तुलनात्मक श्रृंखला की आरम्भिका है, जिसका पूर्ण निष्कर्ष आने वाले श्लोकों (विशेषकर 4.15) में स्पष्ट होगा।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री की श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए 'विभूति-शैली' का प्रयोग कर रहे हैं। वे उन तत्त्वों को सम्मुख ला रहे हैं जो अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च, शुद्धतम और सबसे अधिक प्रभावशालि माने जाते हैं।
वे कहते हैं कि जिस प्रकार देवताओं के समूह में अग्नि सर्वोपरि है, क्योंकि वह समस्त यज्ञों का मुख है और प्रकाश का आदि स्रोत है; जिस प्रकार ऋतुओं में वसन्त श्रेष्ठ है, क्योंकि वह प्रकृति के पुनर्जन्म, सौंदर्य और आनंद का प्रतीक है; जिस प्रकार मनुष्यों (द्विपदों) में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, क्योंकि उसका जीवन सत्य और ज्ञान की खोज को समर्पित है; और पशुओं (चौपायों) में गौ श्रेष्ठ है, क्योंकि वह करुणा, पोषण और पवित्रता की मूर्ति है—ठीक उसी प्रकार एक विशिष्ट तत्त्व (गायत्री) अपने वर्ग में श्रेष्ठ है।
यहाँ याज्ञवल्क्य केवल बाहरी श्रेष्ठता की बात नहीं कर रहे हैं, अपितु वे 'सार' की ओर संकेत कर रहे हैं। अग्नि ऊर्जा का सार है, वसन्त जीवन का सार है, ब्राह्मण ज्ञान का सार है और गौ पोषण का सार है। जब साधक इन चारों उपमाओं को देखता है, तो वह वास्तव में सृष्टि के चार भिन्न आयामों—ऊर्जा, समय, बुद्धि और प्रकृति—के शिखर तत्त्वों का दर्शन करता है। यह श्लोक एक सेतु है जो स्थूल जगत की श्रेष्ठता से साधक को सूक्ष्म मन्त्र-शक्ति की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'श्रेष्ठता के दर्शन' का अभ्यास है। योग की दृष्टि से, जब हम किसी वस्तु के सबसे श्रेष्ठ रूप का चिंतन करते हैं, तो हमारा चित्त स्वतः ही निम्न वृत्तियों को छोड़कर उच्चतर अवस्था की ओर अग्रसर होता है।
यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार अग्नि अंधकार को मिटाती है और वसन्त जड़ता को तोड़कर प्रकृति में प्राण फूँकता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ तत्त्वों का स्मरण मन के मल को धोता है। अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर की ऊर्जा को 'अग्नि' की तरह प्रज्वलित करे, अपने हृदय को 'वसन्त' की तरह आनंदित रखे, अपनी बुद्धि को 'ब्राह्मण' की तरह शुद्ध और ज्ञानमय बनाए तथा स्वभाव में 'गौ' जैसी सरलता और करुणा उत्पन्न करे। जब साधक इन चार गुणों (तेज, आनंद, ज्ञान और करुणा) को अपने भीतर समन्वित कर लेता है, तब वह उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ से गायत्री जैसे सर्वोच्च छन्द का अनुभव संभव होता है। यह श्लोक साधक को 'साधारण' से 'श्रेष्ठ' की ओर ले जाने वाली मानसिक तैयारी है।
तेजस्विनां सहस्रांशुरिन्द्रियाणां यथा मनः ।
मेरुः शिखरिणां श्रेष्ठो गायत्री छन्दसां तथा ॥ ४.१५ ॥
— तेजस्वियोंमें सूर्य, इन्द्रियोंमें जैसे मन, और पर्वतोंमें मेरु श्रेष्ठ है, वैसे ही छन्दोंमें गायत्री।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक (४.१४) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अग्नि, वसन्त, ब्राह्मण और गौ के माध्यम से श्रेष्ठता की एक श्रृंखला आरम्भ की थी। वह वाक्य अधूरा था; वर्तमान श्लोक उस तुलनात्मक श्रृंखला को पूर्ण करता है और अंततः गायत्री छन्द की सर्वोच्चता को स्थापित कर इस उपमा-क्रम का निष्कर्ष निकालता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तेजस्विनां सहस्रांशुरिन्द्रियाणां यथा मनः, शिखरिणां मेरुः श्रेष्ठो, (तथा) छन्दसां गायत्री (श्रेष्ठा)।
पदार्थ-निर्वचन:
• तेजस्विनां सहस्रांशुः: 'तेजस्वियों' में 'सहस्रांशु'। सहस्रांशु का शाब्दिक अर्थ है 'हजारों किरणों वाला', जो सूर्य का पर्याय है। यहाँ तेज का अर्थ भौतिक प्रकाश और आध्यात्मिक ओज दोनों है।
• इन्द्रियाणां मनः: इन्द्रियों के समूह में 'मन'। यद्यपि व्याकरणिक दृष्टि से मन को इन्द्रिय नहीं माना जाता, किन्तु कार्य-कौशल और नियंत्रण की दृष्टि से वह समस्त इन्द्रियों का अधिपति है।
• शिखरिणां मेरुः: पर्वतों या शिखरों में 'मेरु' पर्वत। यह केवल भौगोलिक पर्वत नहीं, अपितु ब्रह्माण्ड के अक्ष का प्रतीक है।
• छन्दसां गायत्री: समस्त छन्दों (काव्य-रूपों या मन्त्रों की संरचनाओं) में गायत्री।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ उस तुलना को पूर्ण करते हैं जिसे उन्होंने पिछले श्लोक में आरम्भ किया था। वे कहते हैं कि जिस प्रकार तेजपुंजों में सूर्य सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह समस्त जगत को प्रकाशित करता है और जीवन का आधार है; जिस प्रकार इन्द्रियों के समूह में मन श्रेष्ठ है क्योंकि बिना मन के कोई भी इन्द्रिय सक्रिय नहीं हो सकती—मन ही वह सूत्र है जो बाह्य जगत और अन्तर्मन को जोड़ता है; और जिस प्रकार पर्वतों में मेरु पर्वत सर्वोच्च है, जो स्थिरता और ऊँचाई की पराकाष्ठा है—ठीक उसी प्रकार समस्त वेदमन्त्रों की संरचनाओं (छन्दों) में गायत्री छन्द सर्वश्रेष्ठ है।
यहाँ 'श्रेष्ठ' शब्द का प्रयोग केवल पद या प्रतिष्ठा के लिए नहीं, अपितु 'क्षमता' और 'प्रभाव' के लिए किया गया है। सूर्य जैसे अंधकार को मिटाता है, मन जैसे इन्द्रियों को संचालित करता है, और मेरु जैसे आकाश की ओर संकेत करता है, वैसे ही गायत्री साधक के भीतर अविद्या के अंधकार को मिटाने, बिखरे हुए चित्त को एकाग्र करने और चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने की क्षमता रखती है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु छन्दों की वह 'शिखर-अवस्था' है जहाँ पहुँचकर साधक अपनी उच्चतम स्थिति को प्राप्त करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ १०.३५ ॥
सामोंमें बृहत्साम और छन्दोंमें गायत्री मैं हूँ; महीनोंमें मार्गशीर्ष और ऋतुओंमें वसन्त मैं हूँ।
इस ग्रन्थ में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सामों में बृहत्साम, छन्दों में गायत्री और ऋतुओं में वसन्त वे स्वयं हैं।
स्मृति के इस श्लोक और गीता के इस अंश में अद्भुत साम्य है। जहाँ गीता में ईश्वर अपनी श्रेष्ठता को इन प्रतीकों के माध्यम से बता रहे हैं, वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति में यह बताया गया है कि जो तत्व (गायत्री, सूर्य, मन) सर्वश्रेष्ठ हैं, वे वास्तव में उसी एक परमतत्त्व की विभूतियाँ हैं। दोनों ही स्थान पर 'कुसुमाकर' (वसन्त) और 'गायत्री' को सर्वोच्च श्रेणी में रखा गया है, जो इस बात का प्रमाण है कि वैदिक परंपरा और योग-दर्शन में गायत्री की स्थिति अपरिवर्तनीय रूप से सर्वोपरि है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य 'नियंत्रण' और 'केंद्रन' में है। याज्ञवल्क्य ने यहाँ एक बहुत सूक्ष्म संकेत दिया है— "इन्द्रियाणां यथा मनः"। योग मार्ग में इन्द्रियाँ अश्व के समान हैं और मन उनकी लगाम। जब साधक यह अनुभव करता है कि मन इन्द्रियों का अधिपति है, तब वह इस अभ्यास की ओर बढ़ता है कि 'गायत्री' उस मन की अधिपति है।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए: यदि मैं अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में करना चाहता हूँ, तो मुझे मन को साधना होगा; और यदि मुझे मन को साधना है, तो मुझे उसे गायत्री के प्रकाश में विलीन करना होगा। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार जब साधक गायत्री का जप और ध्यान करता है, तो उसके मन की चंचलता शांत होने लगती है और इन्द्रियाँ स्वतः ही अंतर्मुखी होकर उस 'मेरु' (स्थिरता) को प्राप्त कर लेती हैं।
यह श्लोक साधक को 'इन्द्रिय-भूमि' से उठाकर 'मन-भूमि' पर और फिर 'गायत्री-शक्ति' के माध्यम से 'अक्षर-भूमि' की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि जप के समय मन को एक स्थिर पर्वत (मेरु) की भाँति अडिग रखा जाए और चेतना को सूर्य के समान प्रज्वलित किया जाए।
यथा मधु च पुष्पेभ्यो घृतान्मण्डं रसात् पयः ।
एवं हि सर्ववेदानां गायत्री सारमुच्यते ॥ ४.१६ ॥
जैसे फूलोंसे मधु, घीसे मण्ड (सार) और रससे दूध (सार निकलता है), वैसे ही गायत्री सब वेदोंका सार कही जाती है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री को समस्त छन्दों में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया था। श्रेष्ठता एक गुण है, किन्तु 'सार' होना एक तत्त्व है। वर्तमान श्लोक इस बात को स्पष्ट करता है कि गायत्री केवल श्रेष्ठ नहीं, अपितु वेदों का वह निचोड़ है, जिसमें संपूर्ण वैदिक ज्ञान अपनी सूक्ष्मतम अवस्था में समाहित है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यथा पुष्पेभ्यो मधु च, रसात् पयः, घृतान्मण्डं (तथा), एवं हि सर्ववेदानां गायत्री सारमुच्यते।
पदार्थ-निर्वचन:
• पुष्पेभ्यो मधु: फूलों से निकलने वाला मधुर रस। फूल विस्तार है, मधु उसका सूक्ष्मतम और सबसे मूल्यवान अंश है।
• घृतान्मण्डम्: घी का 'मण्ड'। जब घी को गर्म किया जाता है या रखा जाता है, तो ऊपर का जो स्वच्छ, शुद्ध और गाढ़ा सार उभरता है, उसे मण्ड कहते हैं। यह घी की शुद्धता का उच्चतम बिंदु है।
• रसात् पयः: रस से दूध (पय)। यहाँ रस का अर्थ व्यापक द्रव्यों से है, जिनमें से दूध को जीवनदायी श्रेष्ठ रस माना गया है।
• सर्ववेदानां सारम्: समस्त वेदों का निचोड़ या तत्त्व। 'सार' वह अंश है जिसे निकालने के बाद शेष भाग गौण हो जाता है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि गायत्री और वेदों का सम्बन्ध वैसा ही है जैसा फूल और मधु का। फूल सुंदर होता है, उसकी सुगंध विस्तृत होती है, किन्तु भौंरा केवल मधु की खोज में आता है क्योंकि वही उस फूल का वास्तविक जीवन-तत्त्व है। उसी प्रकार, चारों वेद (ऋक्, यजुष्, साम, अथर्व) ज्ञान के विशाल वन हैं; उनमें हज़ारों मंत्र और अनन्त विधियाँ हैं, किन्तु उन सबका जो आध्यात्मिक निचोड़ है—जो लक्ष्य उन सबको प्राप्त करना है—वह गायत्री में समाहित है।
यहाँ 'घृतान्मण्डम्' की उपमा अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार घी स्वयं शुद्ध है, किन्तु मण्ड उस शुद्धता का भी सार है, वैसे ही वेद सत्य हैं, परन्तु गायत्री उस सत्य का वह प्रदीप्त अंश है जो साधक को सीधे प्रकाश की ओर ले जाता है। रस से दूध का उदाहरण यह दर्शाता है कि जैसे दूध समस्त रसों में श्रेष्ठ और पोषक है, वैसे ही गायत्री छन्द समस्त वैदिक वाक्यों में सबसे अधिक पोषक और चेतना को जाग्रत करने वाला है।
अतः याज्ञवल्क्य का भाव यह है कि गायत्री कोई पृथक मंत्र नहीं है, बल्कि वह वेदों की वह 'आत्मा' है जिसे प्रजापति ने तीनों वेदों से दुहा था (जैसा कि श्लोक ४.१३ में वर्णित है)। जो साधक संपूर्ण वेदों के विस्तृत अध्ययन में असमर्थ है, वह यदि केवल इस सार-रूप गायत्री का आश्रय ले ले, तो उसे वह समस्त फल प्राप्त हो सकता है जो एक वेद-विज्ञानी को मिलता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
यथा विकसिते पुष्पे मधु गृह्णन्ति षट्पदाः । एवं गृहीता सावित्री सर्ववेदे च पाण्डव ॥
(श्रीभगवान् —) पाण्डव! जैसे भौंरे खिले हुए फूलसे मधु ले लेते हैं, वैसे ही सब वेदोंसे (उनका सार) सावित्री ली गयी है।
महाभारत के आश्वमेधिकपर्व में श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं कि जिस प्रकार भौंरे खिले हुए पुष्पों से मधु ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार सावित्री (गायत्री) को समस्त वेदों से उनके सार रूप में ग्रहण किया गया है।
स्मृति और महाभारत का यह मत पूर्णतः एक है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर बल देते हैं कि गायत्री कोई बाहरी रचना नहीं, बल्कि वेदों के भीतर छिपा हुआ वह 'मधु' है जिसे केवल सूक्ष्म दृष्टि वाला साधक ही पहचान सकता है। जहाँ वेद विस्तार हैं, वहाँ गायत्री संकोचन है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का रहस्य 'एकाग्रता' और 'संक्षेपण' में है। योग मार्ग में जब साधक स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है, तो वह विस्तार को छोड़कर सार को पकड़ता है।
१. सार का जप: जो साधक हज़ारों मंत्रों के जाल में उलझकर दिग्भ्रमित हो जाता है, उसके लिए गायत्री एक 'केंद्र' का कार्य करती है। जब साधक इस भाव से गायत्री का जप करता है कि "इसमें समस्त वेदों का सार है", तो उसकी एकाग्रता तीव्र हो जाती है। वह अब केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा, बल्कि संपूर्ण वैदिक चेतना के निचोड़ को अपने भीतर उतार रहा है।
२. अनुभव: जैसे मधु का एक बिंदु पूरे फूल की सुगंध और शक्ति को समेटे रहता है, वैसे ही गायत्री के प्रत्येक अक्षर में वेदों की पूरी शक्ति निहित है। साधक जब इस 'सार-भाव' में स्थित होकर जप करता है, तो वह मानसिक रूप से विस्तार (वेदों के ज्ञान) से संकुचित होकर उस एक बिंदु (गायत्री) पर टिक जाता है। यह स्थिति उसे 'बौद्धिक ज्ञान' से उठाकर 'अनुभवात्मक ज्ञान' की भूमि पर ले जाती है।
३. अभ्यास: साधक को चाहिए कि वह जप के समय स्वयं को उस 'भौंरे' के समान समझे जो वेदों रूपी पुष्पों से गायत्री रूपी मधु निकाल रहा है। यह अभ्यास उसे इस अनुभूति तक ले जाता है कि सत्य विस्तृत नहीं, बल्कि सूक्ष्म और सारगर्भित है। जब वह इस सार को हृदय में स्थापित करता है, तब उसकी चेतना स्थूल जगत से हटकर अक्षर-रूप सूर्य की ओर अग्रसर होती है।
गायत्री प्रकृतिर्ज्ञेया ओंकारः पुरुषः स्मृतः ।
ताभ्यामुभाभ्यां संयोगात् जगत् सर्वं प्रवर्तते ॥ ४.१७ ॥
गायत्री को प्रकृति जानिये और ओंकार को पुरुष जाना गया है, इन दोनों के संयोग से ही सम्पूर्ण जगत् प्रवर्तित होता है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री को समस्त वेदों का 'सार' सिद्ध किया था। जब कोई वस्तु सार कहलाती है, तो वह केवल एक अंश नहीं, अपितु उस वस्तु का मूल आधार बन जाती है। अब ऋषि इस सार के तात्विक स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं कि यह 'सार' वास्तव में क्या है और सृष्टि की उत्पत्ति में इसकी क्या भूमिका है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: गायत्री प्रकृतिर्ज्ञेया, ओंकारः पुरुषः स्मृतः। ताभ्यामुभाभ्यां संयोगात् जगत् सर्वं प्रवर्तते।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्रकृतिर्ज्ञेया: 'प्रकृति' को जाना जाए। यहाँ प्रकृति का अर्थ केवल भौतिक शरीर नहीं, अपितु वह सक्रिय शक्ति है जो रूप और नाम देने में सक्षम है।
• पुरुषः स्मृतः: ओंकार को 'पुरुष' कहा गया है। पुरुष यहाँ वह चेतन तत्व, साक्षी और निर्गुण प्रकाश है, जिसके बिना प्रकृति जड़ है।
• ताभ्यामुभाभ्यां संयोगात्: इन दोनों के आपसी संयोग से। यह शब्द 'संयोग' अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह केवल भौतिक मिलन नहीं, अपितु चेतना (पुरुष) का शक्ति (प्रकृति) में और शक्ति का चेतना में विलीनीकरण है।
• जगत् सर्वं प्रवर्तते: संपूर्ण जगत संचालित या अभिव्यक्त होता है। 'प्रवर्तते' का अर्थ है—गतिमान होना, सृजित होना और जीवन-चक्र को चलाना।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री के उस रहस्य को खोल रहे हैं जो उनकी श्रुति (शुक्ल्यजुर्वेद) के बीजों में निहित है। यहाँ वे सृष्टि-मीमांसा का एक संक्षिप्त सूत्र दे रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति के संयोग से जगत की उत्पत्ति मानी गई है, ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक स्तर पर 'ओंकार' वह पुरुष (चेतन तत्व) है और 'गायत्री' वह प्रकृति (शक्ति तत्व) है।
यहाँ गायत्री को प्रकृति कहना उसे सीमित करना नहीं, अपितु उसकी व्यापकता बताना है। प्रकृति वह है जो विस्तार करती है; गायत्री मंत्र के २४ अक्षर (जैसा कि अगले श्लोकों में स्पष्ट होगा) संपूर्ण सृष्टि के २४ तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अतः गायत्री वह 'महा-शक्ति' है जिसके माध्यम से निराकार ब्रह्म साकार जगत के रूप में प्रकट होता है। दूसरी ओर, ओंकार वह बिंदु है जहाँ समस्त विस्तार शांत हो जाता है—वह शुद्ध चैतन्य या पुरुष है।
जब साधक गायत्री मंत्र का जप करता है और उसमें प्रणव (ओंकार) को जोड़ता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर पुरुष और प्रकृति के उस आदि-संयोग को पुनः जीवित कर रहा होता है जिससे यह ब्रह्मांड बना है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि गायत्री केवल एक प्रार्थना नहीं, अपितु सृष्टि की वह 'ब्लू-प्रिंट' या आधार-शक्ति है जिसके बिना चेतना (पुरुष) स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर सकती और शक्ति (प्रकृति) दिशाहीन रहती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक महान योगिक अभ्यास का द्वार खोलता है। जप के समय जब साधक 'ओम्' और 'गायत्री मंत्र' का संयोग करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा होता, अपितु अपने भीतर पुरुष और प्रकृति का समन्वय कर रहा होता है।
अभ्यास की दृष्टि से:
१. साक्षी भाव (पुरुष): जब साधक ओंकार के नाद में स्थित होता है, तब वह स्वयं को 'पुरुष' यानी दृष्टा या साक्षी के रूप में अनुभव करता है। यह वह अवस्था है जहाँ केवल शुद्ध प्रकाश और शांति है।
२. शक्ति का अनुभव (प्रकृति): जैसे ही जप गायत्री मंत्र के पदों की ओर बढ़ता है, साधक उस चैतन्य प्रकाश को 'शक्ति' के रूप में बहते हुए देखता है। यहाँ गायत्री प्रकृति है—जो मन, प्राण और बुद्धि को प्रकाशित कर उन्हें सक्रिय करती है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि उसका अपना शरीर और मन (प्रकृति) जब ओंकार (पुरुष) से जुड़ता है, तभी जीवन में वास्तविक 'प्रवर्तन' या दिव्यता आती है। वह इस भूमि से उस भूमि की ओर जाता है जहाँ वह स्वयं को केवल एक हाड़-मांस का पुतला नहीं, अपितु पुरुष-प्रकृति के उस शाश्वत मिलन का केंद्र अनुभव करता है। यहाँ जप का अर्थ है—शक्ति (गायत्री) के माध्यम से शिव/पुरुष (ओंकार) में विलीन होना और पुनः उसी पूर्णता के साथ संसार में कार्य करना।
संवत्सरतनुर्ह्येषा अरणीति निगद्यते ।
चतुर्विंशत्यात्मिकैषा तत्त्वन(व)त्यपि सा स्मृता ॥ ४.१८ ॥
…यह संवत्सर-रूप शरीरवाली है और अरणि कही जाती है; यह चौबीस तत्त्वों रूप है तथा तत्त्ववती भी स्मृत है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री को 'प्रकृति' और ओंकार को 'पुरुष' कहकर सृष्टि के मूल संयोग का वर्णन किया था। अब इस श्लोक में वे उस प्रकृति (गायत्री) के स्वरूप को और अधिक सूक्ष्मता से समझा रहे हैं कि वह किस रूप में विद्यमान है और साधक के लिए उसका उपयोग क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एषा हि संवत्सर-तनुः, अरणि इति निगद्यते। एषा चतुर्विंशत्यात्मिका, तत्त्ववती अपि सा स्मृता।
पदार्थ-निर्वचन:
• संवत्सर-तनुः: 'संवत्सर' का अर्थ है वह काल-चक्र जो संपूर्ण समय को अपने भीतर समेटे हुए है। 'तनु' का अर्थ है शरीर। अतः संवत्सर-तनु का अर्थ है—वह जिसकी देह स्वयं समय या काल-प्रवाह है।
• अरणि: अरणि वह लकड़ी होती है जिसे मथकर अग्नि प्रज्वलित की जाती है। यहाँ यह एक प्रतीक है उस साधन का, जिसके द्वारा भीतर की सुप्त ज्योति को जगाया जाता है। 'निगद्यते' का अर्थ है—कहा गया है या परिभाषित किया गया है।
• चतुर्विंशत्यात्मिका: चौबीस तत्वों या अक्षरों से बनी हुई। यहाँ 'आत्मा' शब्द स्वरूप और सार के लिए प्रयुक्त हुआ है।
• तत्त्ववती: तत्त्वों से युक्त। यह शब्द इस बात की पुष्टि करता है कि गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु समस्त सृष्टि के मूलभूत तत्त्वों का संघात है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री के उस रहस्य को खोल रहे हैं जो श्रुति में बीजरूप में है। वे कहते हैं कि यह गायत्री 'संवत्सर-तनु' है। इसका भाव यह है कि समय (काल) की गति और उसकी शक्ति इस मन्त्र में निहित है। जब साधक इस मन्त्र का जप करता है, तो वह काल के प्रभाव से ऊपर उठकर उस शाश्वत पुरुष (ओंकार) की ओर बढ़ता है।
ऋषि आगे कहते हैं कि गायत्री 'अरणि' कही जाती है। बाहरी विधि में अरणि लकड़ी का एक टुकड़ा है जिससे अग्नि उत्पन्न होती है, किन्तु यहाँ इसका आन्तर अर्थ यह है कि जिस प्रकार अरणि को मथने से भौतिक अग्नि प्रकट होती है, उसी प्रकार जब साधक अपनी जिह्वा और प्राण के द्वारा इस मन्त्र का 'मन्थन' (जप) करता है, तब उसके हृदय में ज्ञान की ज्योति प्रदीप्त होती है। गायत्री वह साधन है जो जड़ता को जलाकर चैतन्यता को प्रकट करती है।
इसके पश्चात ऋषि इसकी संरचना पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि यह 'चतुर्विंशत्यात्मिका' और 'तत्त्ववती' है। यहाँ चौबीस की संख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संकेत है कि सृष्टि के चौबीस तत्त्व (जैसे सांख्य दर्शन में वर्णित) इस मन्त्र के अक्षरों में समाहित हैं। जब साधक इन अक्षरों का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में उन समस्त तत्त्वों को शुद्ध कर रहा होता है जिनसे उसका स्थूल और सूक्ष्म शरीर बना है। यह मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त रूप है।
श्रुति-संगति —
इस रहस्य की पुष्टि श्रुति में इस प्रकार मिलती है:
तद्वै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितम् प्राणो वै बलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलं सत्यादोजीय इत्येवम्वेषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता ॥ १४.८.१५.६ ॥
और वह सत्य बलमें प्रतिष्ठित है; प्राण ही बल है — वह प्राणमें प्रतिष्ठित है; इसीलिए कहते हैं, बल सत्यसे अधिक ओजस्वी है। इस प्रकार यह गायत्री अध्यात्म (प्राणमें) प्रतिष्ठित है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि गायत्री 'अध्यात्म' (प्राण) में प्रतिष्ठित है और सत्य तथा बल उसमें स्थित हैं। स्मृति का यह कथन कि गायत्री 'संवत्सर-तनु' और 'तत्त्ववती' है, इसी श्रुति का विस्तार है। यदि गायत्री प्राण में प्रतिष्ठित है, तो वह अनिवार्य रूप से उन सभी तत्त्वों को नियंत्रित करती है जो प्राण के अधीन हैं। संवत्सर (काल) भी प्राण की गति से ही अनुभव होता है; अतः प्राण-प्रतिष्ठित गायत्री ही साधक को समय और तत्त्वों के बंधन से मुक्त कर सत्य तक ले जाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'जप' को एक क्रिया के रूप में देखने का निर्देश देता है। यहाँ जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि 'मन्थन' है।
अभ्यास यह है कि साधक जब गायत्री का जप करे, तो वह अनुभव करे कि उसकी जिह्वा और प्राण अरणि की भांति कार्य कर रहे हैं। जिस प्रकार मन्थन में घर्षण से ऊष्मा पैदा होती है, उसी प्रकार एकाग्र जप से भीतर एक आध्यात्मिक ताप (तप) उत्पन्न होता है। यह ताप साधक को 'तत्त्ववती' अवस्था से ले जाकर उस निराकार पुरुष (ओंकार) में विलीन करता है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि वह स्वयं चौबीस तत्त्वों का पुंज है, और यह मन्त्र उन तत्त्वों को परिष्कृत करने वाली अग्नि है। जब साधक स्वयं को 'अरणि' मानकर जप के मन्थन में उतरता है, तब वह स्थूल शरीर से ऊपर उठकर संवत्सर-तनु (काल-शरीर) और अंततः अक्षर-रूप पुरुष की भूमि तक जाता है।
प्रणवः सर्ववेदानां गायत्री छन्दसामिह ।
अक्षराणि च यान्यस्याः स्मृतान्यङ्गानि तानि तु ॥ ४.१९ ॥
(जैसे) प्रणव सब वेदोंका (प्रधान है, वैसे ही) यहाँ गायत्री छन्दोंकी; इसके जो अक्षर हैं, वे इसके अंग कहे गये हैं।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री को 'प्रकृति' और उसकी देह को 'संवत्सर' तथा 'अरणि' कहकर उसके सृजनात्मक और प्रज्वलित स्वरूप का वर्णन किया था। अब इस श्लोक में वे गायत्री की स्थिति को समस्त वैदिक साहित्य के परिप्रेक्ष्य में रखकर उसकी प्रधानता को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: प्रणवः सर्ववेदानां (प्रधानम्), गायत्री छन्दसामिह (प्रधानम्)। तस्याः यान्यक्षराणि, तानि तु अस्याः स्मृतान्यङ्गानि।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्रणवः: 'ओम्' का वह नाद जो समस्त ब्रह्माण्ड के मूल में है। यहाँ प्रणव को वेदों के 'प्रधान' या 'शिखर' के रूप में संकेतित किया गया है।
• छन्दसामिह: 'छन्दसाम्' (समस्त छन्दों में) + 'इह' (यहाँ/इस समय/इस शास्त्र में)। गायत्री को सभी छंदों का अधिष्ठात्री या प्रधान बताया गया है।
• अक्षराणि च यान्यस्याः: इस मन्त्र के जो भी अक्षर हैं।
• स्मृतान्यङ्गानि: 'स्मृतानि' (कहे गए हैं/स्मृत हैं) + 'अङ्गानि' (शरीर के अवयव या अंग)। यहाँ अक्षरों को केवल ध्वनि नहीं, अपितु गायत्री रूपी शरीर के अंगों के रूप में परिभाषित किया गया है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में एक अत्यंत सूक्ष्म तुलना कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार समस्त वेदों (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व) का सार और उनका उच्चतम शिखर 'प्रणव' (ओंकार) है, ठीक उसी प्रकार समस्त छन्दों के परिवार में 'गायत्री' का स्थान सर्वोच्च है। प्रणव यदि ज्ञान का चरम है, तो गायत्री उस ज्ञान की प्राप्ति का वह छंद-साधन है जो साधक को प्रकाश की ओर ले जाता है।
यहाँ ऋषि एक महत्वपूर्ण सूत्र दे रहे हैं— "अक्षराणि च यान्यस्याः स्मृतान्यङ्गानि"। सामान्यतः हम मन्त्र के अक्षरों को केवल वर्णमाला के भाग मानते हैं, किन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में गायत्री केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक 'जीवंत सत्ता' या 'देवी' है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में हाथ, पैर और नेत्र उसके अंग होते हैं, उसी प्रकार इस मन्त्र के प्रत्येक अक्षर गायत्री के 'अङ्ग' हैं।
यह वचन आगामी विवेचनाओं की नींव है। जब अक्षरों को 'अंग' मान लिया जाता है, तब यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि प्रत्येक अक्षर का अपना एक विशिष्ट प्रभाव, अपना एक देवता और अपना एक स्थान (न्यास) होगा। यदि अक्षर केवल ध्वनि होते तो वे निर्जीव होते, किन्तु 'अङ्ग' होने के कारण उनमें शक्ति निहित है। इसी आधार पर आगे चलकर अक्षरों के देवताओं का वर्णन आएगा, क्योंकि शरीर के अंगों की भाँति मन्त्र के अंग भी विशिष्ट कार्यों (जैसे—बुद्धि का शोधन, प्राण का जागरण) के लिए उत्तरदायी हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-शरीर' के अनुभव का द्वार खोलता है। योग मार्ग में जब साधक जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु वह एक दिव्य शरीर का ध्यान करता है।
अभ्यास यह है कि साधक गायत्री मन्त्र को एक विराट स्वरूप या एक देह के रूप में देखे। जब वह प्रत्येक अक्षर का उच्चारण करे, तो उसे यह अनुभव हो कि वह उस दिव्य शरीर के किसी विशिष्ट 'अंग' को स्पर्श कर रहा है या जाग्रत कर रहा है। जैसे-जैसे साधक अक्षरों को अंग रूप में देखता है, उसकी एकाग्रता ध्वनि से हटकर मन्त्र की आंतरिक शक्ति (शक्ति-रूप शरीर) पर केंद्रित होने लगती है।
यह अभ्यास साधक को 'शब्द-भूमि' से उठाकर 'रूप-भूमि' और फिर 'शक्ति-भूमि' की ओर ले जाता है। यहाँ अक्षर केवल माध्यम नहीं रहते, बल्कि वे स्वयं साधना के उपकरण बन जाते हैं। इस दृष्टि से जप करना ही वास्तव में मन्त्र का अंग-पूजन या अंग-साधना है, जो आगे चलकर न्यास की प्रक्रिया में पूर्णता प्राप्त करता है।
चतुर्विंशति तत्त्वानि ओंकारः पञ्चविंशकः ।
चतुर्विंशाक्षरा देवी त्रिपदाष्टाक्षरं पदम् ॥ ४.२० ॥
चौबीस तत्त्व हैं और ओंकार पच्चीसवाँ है; चौबीस अक्षरों वाली देवी तीन पादों वाली है, जिसका प्रत्येक पाद आठ अक्षर का है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के अक्षरों को देवी के 'अंग' कहकर उन्हें केवल ध्वनि मात्र न मानकर एक सजीव दैवीय देह के रूप में प्रतिष्ठित किया। अब इस श्लोक में वे उस शरीर की सूक्ष्म संरचना का विवरण देते हुए, अक्षर और तत्त्व के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: चतुर्विंशति तत्त्वानि (सन्ति), ओंकारः पञ्चविंशकः (अस्ति)। देवी चतुर्विंशाक्षरा (अस्ति), (तस्याः) पदम् त्रिपदा अष्टाक्षरम् (अस्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• चतुर्विंशति तत्त्वानि: चौबीस तत्त्व। यहाँ तत्त्व का अर्थ उन सूक्ष्म और स्थूल घटकों से है जिनसे सृष्टि और शरीर निर्मित हैं।
• ओंकारः पञ्चविंशकः: ओंकार पच्चीसवाँ है। यह संकेत है कि जब चौबीस तत्त्व पूर्ण होते हैं, तब उनके अधिष्ठाता या उनसे परे स्थित 'पुरुष' (ओंकार) का उदय होता है।
• चतुर्विंशाक्षरा देवी: वह गायत्री देवी जो चौबीस अक्षरों से निर्मित हैं। यहाँ अक्षर और तत्त्व को एक-दूसरे का पर्याय माना गया है।
• त्रिपदा अष्टाक्षरं पदम्: तीन पादों वाली, जिसमें प्रत्येक पाद आठ अक्षरों का है। यह गायत्री मन्त्र के गणितीय विभाजन और उसकी लयबद्ध संरचना को दर्शाता है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि-विज्ञान और मन्त्र-विज्ञान का समन्वय कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जिस प्रकार यह सम्पूर्ण दृश्य जगत चौबीस तत्त्वों के संयोग से बना है, उसी प्रकार गायत्री देवी की देह भी इन चौबीस अक्षरों में निहित है।
भाव यह है कि गायत्री केवल एक प्रार्थना नहीं, अपितु इस ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म प्रतिरूप है। जब ऋषि कहते हैं कि "चौबीस तत्त्व हैं और ओंकार पच्चीसवाँ है", तो वे उस रहस्य को खोल रहे हैं जो श्लोक ४.१७ में संकेतित था— जहाँ गायत्री 'प्रकृति' (तत्त्व-समूह) है, वहीं ओंकार 'पुरुष' (चेतन तत्व) है। प्रकृति के चौबीस तत्त्वों का आधार वह पच्चीसवाँ पुरुष-तत्त्व है; बिना ओंकार के ये चौबीस अक्षर जड़ हैं, और ओंकार के साथ मिलकर वे चैतन्य देवी बन जाते हैं।
मन्त्र की संरचना के विषय में ऋषि बताते हैं कि यह देवी 'त्रिपदा' है। मन्त्र को तीन चरणों (पादों) में विभाजित किया गया है, और प्रत्येक चरण आठ अक्षरों का है। यह विभाजन केवल पाठ की सुविधा के लिए नहीं है, बल्कि यह साधक को एक निश्चित क्रम में ऊपर ले जाने वाली सीढ़ी है। बाहरी दृष्टि से यह गणित है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह स्थूल से सूक्ष्म की ओर गमन का मार्ग है।
शास्त्र-साक्ष्य —
गायत्री के अक्षरों और तत्त्वों के इस सम्बन्ध को अन्य शास्त्रों में भी विस्तार मिला है:
पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशगन्धरसरूपस्पर्शशब्दवाक्पाणिपादपायूपस्थत्वक्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाघ्राणमनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तज्ञानानीति प्रत्यक्षराणां तत्त्वानि प्रतीयन्ते ॥ ६ ॥
पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश; गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; वाक्, हाथ, पैर, पायु, उपस्थ; त्वचा, चक्षु, श्रोत्र, जिह्वा, घ्राण; मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और ज्ञान — ये (चौबीस) प्रत्येक अक्षरके तत्त्व माने जाते हैं।
इस उपनिषद् के अनुसार, गायत्री के प्रत्येक अक्षर का एक विशिष्ट तत्त्व है— जैसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश (पंचमहाभूत); गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द (पंचतन्मात्राएँ); वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ (पंचकर्मेन्द्रियाँ); त्वचा, चक्षु, श्रोत्र, जिह्वा, घ्राण (पंचज्ञानेन्द्रियाँ); और मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त तथा ज्ञान।
स्मृति का यह श्लोक इसी रहस्य का सार है। जहाँ स्मृति केवल संख्या (२४) बताकर संकेत दे रही है, वहीं उपनिषद् उन तत्त्वों की सूची देता है। दोनों का मेल यह है कि साधक जब गायत्री के चौबीस अक्षरों का जप करता है, तो वह वास्तव में अपने शरीर और ब्रह्माण्ड के इन चौबीस घटकों को शुद्ध कर रहा होता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'विभेकी-शून्यता' और 'एकाग्रता' का है। जब साधक गायत्री के तीन पादों (प्रत्येक ८ अक्षर) का जप करता है, तो वह अनुभव करता है कि वह अपने अस्तित्व के विभिन्न स्तरों को पार कर रहा है।
अभ्यास यह है कि जप के समय साधक केवल शब्दों को न दोहराए, बल्कि यह भाव रखे कि प्रत्येक अक्षर एक तत्त्व का प्रतिनिधित्व कर रहा है। जैसे-जैसे वह चौबीस अक्षरों की यात्रा पूरी करता है, वह प्रकृति के समस्त बंधनों (पंचभूतों से लेकर मन और बुद्धि तक) को पार कर जाता है।
इस यात्रा का चरम 'पच्चीसवाँ' तत्व— ओंकार है। योगिक अनुभव यह है कि जब २४ अक्षरों का विसर्जन हो जाता है, तब साधक उस पच्चीसवें बिंदु पर स्थित होता है जहाँ केवल शुद्ध चेतना (पुरुष) शेष रहती है। अतः इस श्लोक का अभ्यास साधक को 'तत्त्व-अवलम्बन' से उठाकर 'परब्रह्म-अवलम्बन' की ओर ले जाता है। वह प्रकृति (देवी) के माध्यम से पुरुष (ओंकार) में लीन होने का अनुभव करता है।
गायत्रीप्रतिष्ठाक्षराणि
गेयकाले सामगानां यकारोऽस्याः प्रजायते ।
चतुर्विंशः स विज्ञेयो अलक्ष्यः शान्तिमस्तु वः (चान्तिमस्तु सः) ॥ ४.२१ ॥
सामगायकोंके गानके समय इसमें (एक) यकार उत्पन्न होता है (वरेणियम्); वह चौबीसवाँ (अक्षर) जानना चाहिए — अलक्ष्य, और वही अन्तिम है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री देवी के शरीर की संरचना को चौबीस तत्त्वों और अक्षरों से जोड़ते हुए ओंकार को पच्चीसवाँ अधिष्ठान बताया। अब इस श्लोक में वे उस चौबीसवें अक्षर की विशिष्टता और उसकी उत्पत्ति के रहस्य को स्पष्ट कर रहे हैं, जो लिखित पाठ के बजाय गान और उच्चारण की सूक्ष्मता में निहित है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सामगानानां गेयकाले (तस्मिन् काले) अस्याः (गायत्रीमन्त्रस्य) यकारः प्रजायते । सः चतुर्विंशः (अक्षरः) विज्ञेयो (अस्ति), (सः) अलक्ष्यः (अस्ति), सः अन्तिमः (अस्ति)। शान्तिमस्तु वः।
पदार्थ-निर्वचन:
• गेयकाले सामगानां: सामगान के समय। यहाँ 'साम' का अर्थ उस विशिष्ट संगीतमय लय और स्वर-प्रक्रिया से है, जिसमें वेदों के मन्त्रों को गाया जाता है।
• यकारोऽस्याः प्रजायते: इसमें 'य' कार उत्पन्न होता है। गायत्री के लिखित पाठ में अक्षर संख्या तेईस प्रतीत होती है, किन्तु गान की प्रक्रिया में एक सूक्ष्म ध्वनि का उदय होता है।
• चतुर्विंशः: चौबीसवाँ। यह उस लुप्त या अदृश्य अक्षर की गणना को पूर्ण करता है।
• अलक्ष्यः: जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे; जो केवल अनुभव या श्रवण द्वारा ही जाना जा सके।
• अन्तिमः: वह अक्षर जो मन्त्र के समापन बिंदु पर स्थित है और सम्पूर्ण ऊर्जा को समेटकर शून्य में विलीन करता है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र के 'लिखित रूप' (लिपि) और 'ध्वनि रूप' (नाद) के बीच के भेद को स्पष्ट कर रहे हैं। सामान्यतः जब हम गायत्री मन्त्र का पाठ करते हैं, तो अक्षरों की गणना तेईस तक पहुँचती है, किन्तु महर्षि कहते हैं कि सामगान की विशिष्ट रीति में एक 'यकार' उत्पन्न होता है।
रहस्य यह है कि गायत्री मन्त्र के पद 'वरेण्यम्' (वरयोग्य) को जब सामगायन की पद्धति से गाया जाता है, तो वह 'वरेणियम्' के रूप में प्रकट होता है। इस गान-प्रक्रिया में जो 'य' ध्वनि उभरती है, वही वास्तव में चौबीसवाँ अक्षर है। यह अक्षर लिपि में अंकित नहीं है, इसलिए इसे 'अलक्ष्य' कहा गया है।
यहाँ महर्षि यह संकेत दे रहे हैं कि सत्य सदैव वह नहीं होता जो स्थूल रूप से दृष्टिगोचर हो; वास्तविक शक्ति उस सूक्ष्म अंतराल में छिपी होती है जिसे केवल योग्य साधक ही अपने कान और हृदय से सुन सकता है। यह चौबीसवाँ अक्षर मन्त्र का 'अन्तिम' बिंदु है, जो साधक को शब्द-जगत से निकालकर उस मौन की ओर ले जाता है जहाँ ओंकार (पच्चीसवाँ तत्त्व) प्रतिष्ठित है। यदि साधक केवल लिखित अक्षरों तक सीमित रहता है, तो वह मन्त्र की पूर्णता और उसकी दैवीय देह के चौबीसवें अंग से वंचित रह जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शब्द' से 'नाद' की ओर संक्रमण का अभ्यास है। जप के समय साधक को केवल शब्दों के उच्चारण पर ध्यान नहीं देना चाहिए, अपितु उन शब्दों के बीच उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म कंपन और ध्वनियों के प्रति सजग होना चाहिए।
अभ्यास यह है कि जब साधक गायत्री मन्त्र के अंतिम चरण 'वरेण्यम्' पर पहुँचे, तो वह उस 'अलक्ष्य' (अदृश्य) ध्वनि को अनुभव करे जो शब्द के समाप्त होने और मौन के आरम्भ होने के बीच घटित होती है। यह अभ्यास साधक को स्थूल वाणी से सूक्ष्म नाद की भूमि पर ले जाता है। जब वह इस अलक्ष्य अक्षर को पकड़ता है, तब उसकी चेतना शब्दों के बंधन से मुक्त होकर उस बिंदु पर स्थित होती है जहाँ मन्त्र अपनी पूर्णता प्राप्त करता है। यह अनुभव साधक को यह सिखाता है कि परम तत्त्व 'अलक्ष्य' ही है—वह दिखता नहीं, किन्तु संपूर्ण अस्तित्व उसी के कारण स्पंदित है।
केचिदिच्छन्ति निष्क्रान्तं यकारान्ते प्रतिष्ठितम् ।
अन्तिमो यो भवेद्वर्णो व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम् ॥ ४.२२ ॥
कुछ (आचार्य) उस (अक्षर) को निकला हुआ, यकारके अन्तमें स्थित मानते हैं — जो अन्तिम वर्ण होता है, अर्धमात्रावाला व्यञ्जन —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सामगान की रीति से उत्पन्न होने वाले 'यकार' को चौबीसवाँ अक्षर बताकर एक मत प्रस्तुत किया। वर्तमान श्लोक में वे उसी चौबीसवें अक्षर के विषय में आचार्यों के एक अन्य सूक्ष्म मत का विवेचन कर रहे हैं, जो ध्वनि के विलोपन और मौन की संधि पर आधारित है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: केचित् (आचार्याः) निष्क्रान्तं यकारान्ते प्रतिष्ठितम् (तद् अक्षरम्) इच्छन्ति । अन्तिमः यो भवेद्वर्णो व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम् (सः एव चतुर्विंशः)।
पदार्थ-निर्वचन:
• केचिदिच्छन्ति: कुछ (आचार्य/विद्वान) ऐसा मानते हैं या इस मत का समर्थन करते हैं। यहाँ 'इच्छन्ति' का अर्थ केवल इच्छा करना नहीं, अपितु किसी सिद्धांत को स्वीकार करना है।
• निष्क्रान्तं: जो बाहर निकला हुआ हो; अर्थात् वह ध्वनि जो पूर्णतः अभिव्यक्त होकर अब विलीन होने की अवस्था में है।
• यकारान्ते प्रतिष्ठितम्: य-अक्षर के अन्त में स्थित।
• अन्तिमो वर्णः: मन्त्र का सबसे अंतिम वर्ण।
• व्यञ्जनं चार्धमात्रिकम्: वह व्यञ्जन जो पूर्ण मात्रा (एक पूरे अक्षर) के रूप में नहीं, बल्कि अर्धमात्रा (आधी ध्वनि) के रूप में विद्यमान है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री के चौबीसवें अक्षर की पहचान के विषय में एक भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हैं। जहाँ पिछला मत 'यकार' की उत्पत्ति पर था, वहीं यह मत उस ध्वनि के 'अन्तिम बिंदु' पर केंद्रित है।
भाव यह है कि कुछ आचार्यों के अनुसार वह चौबीसवाँ अक्षर कोई अलग से सुनाई देने वाला वर्ण नहीं है, बल्कि मन्त्र के अंतिम वर्ण (व्यञ्जन) में निहित वह सूक्ष्म 'अर्धमात्रा' है, जो उच्चारण के समाप्त होते ही शेष रह जाती है। जब हम किसी व्यञ्जन का उच्चारण करते हैं, तो उसकी एक ध्वनि बाहर निकलती है (निष्क्रान्त), किन्तु उस ध्वनि का पूर्णतः शून्य में विलीन होना एक प्रक्रिया है। वह अंतिम क्षण, जहाँ शब्द मौन में बदलता है, वही 'अर्धमात्रिक व्यञ्जन' चौबीसवें अक्षर का वास्तविक स्वरूप है।
यह वाक्य यहाँ समाप्त नहीं होता, अपितु अगले श्लोक (४.२३) तक विस्तृत है, जहाँ इस अर्धमात्रा के स्थान और उसके ब्रह्म-स्वरूप की व्याख्या की गई है। याज्ञवल्क्य जी ने 'केचित्' शब्द का प्रयोग कर यह स्पष्ट किया है कि वे किसी एक मत को थोप नहीं रहे, बल्कि मन्त्र के सूक्ष्म शरीर के विभिन्न आयामों को खोल रहे हैं। एक दृष्टि गान (साम) की है और दूसरी दृष्टि ध्वनि-विज्ञान (ध्वनि के क्षय) की है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'शब्द' से 'मौन' की ओर जाने का अभ्यास है। योग की दृष्टि से, जब हम किसी मन्त्र का जप करते हैं, तो हमारा ध्यान प्रायः शब्दों के स्पष्ट उच्चारण पर होता है। किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य हमें उस 'अर्धमात्रा' पर टिकने का संकेत दे रहे हैं—वह सूक्ष्म बिंदु जहाँ ध्वनि समाप्त हो रही है और मौन आरम्भ हो रहा है।
अभ्यास यह है कि जप के अंतिम अक्षर को झटके से न छोड़ें, बल्कि उसकी उस क्षीण होती हुई गूँज को अनुभव करें जो अर्धमात्रा के रूप में शेष रहती है। वह 'निष्क्रान्त' ध्वनि जब शून्य में विलीन होती है, तब साधक की चेतना शब्द-माया से मुक्त होकर उस बिंदु पर स्थित होती है जहाँ प्रकृति (गायत्री) का अंत और पुरुष (ओंकार/ब्रह्म) का साक्षात्कार सम्भव है। यह अभ्यास साधक को स्थूल वाणी से सूक्ष्म नाद और फिर पूर्ण मौन की भूमि की ओर ले जाता है।
तत्तालुनि निविष्टं तु तुर्याख्यं सोमरूपकम् ।
चतुर्विंशतिसंख्येयमक्षरं ब्रह्म निष्कलम् ॥ ४.२३ ॥
— वह तालुमें स्थित, तुरीय नामवाला, सोमरूप है; चौबीसकी संख्यावाला वह अक्षर निष्कल ब्रह्म है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन आचार्यों के मत का वर्णन किया जो चौबीसवें अक्षर को मन्त्र के अन्तिम वर्ण की उस सूक्ष्म अर्धमात्रा के रूप में देखते हैं, जो ध्वनि के विलोपन के समय शेष रहती है। वर्तमान श्लोक उसी अर्धमात्रिक अक्षर के अधिष्ठान, उसके स्वरूप और उसकी वास्तविक पहचान का उद्घाटन करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तत् (चतुर्विंशतिसंख्येयम् अक्षरम्) तालुनि निविष्टं तुर्य-आख्यं सोम-रूपकम् (अस्ति) । चतुर्विंशति-संख्येयम् अक्षरं ब्रह्म निष्कलम् (एव सः)।
पदार्थ-निर्वचन:
• तत्तालुनि निविष्टम्: वह (चौबीसवाँ अक्षर) तालु में स्थित है। यहाँ 'निविष्ट' का अर्थ केवल भौतिक स्थान नहीं, अपितु ध्वनि का वहाँ विलीन होकर प्रतिष्ठित होना है।
• तुर्याख्यम्: जिसका नाम 'तुर्य' है। 'तुर्य' का शाब्दिक अर्थ है चौथा। यह वह अवस्था या पद है जो तीन सामान्य अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) से परे है अथवा गायत्री के तीन पादों के बाद आने वाला चतुर्थ पद है।
• सोमरूपकम्: सोम रूप वाला। योगिक और वैदिक सन्दर्भ में 'सोम' शीतलता, तृप्ति, अमृतत्व और मानसिक शान्ति का प्रतीक है। जब ध्वनि समाप्त होती है, तो वहाँ एक शीतल शून्यता शेष रहती है, वही सोमरूप है।
• चतुर्विंशतिसंख्येयम्: जिसे संख्या में चौबीसवाँ माना गया है।
• अक्षरं ब्रह्म निष्कलम्: वह अक्षर 'निष्कल' ब्रह्म है। 'निष्कल' का अर्थ है—कण-रहित, जिसमें कोई विभाजन न हो, जो अखंड और अविभाज्य है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस सूक्ष्म बिंदु की व्याख्या कर रहे हैं जहाँ वाणी का साम्राज्य समाप्त होता है और मौन का आरम्भ होता है। पिछले श्लोक में जिस 'अर्धमात्रिक व्यञ्जन' की चर्चा थी, वह वास्तव में ध्वनि का अंतिम अवशेष है। ऋषि कहते हैं कि जब साधक गायत्री के जप के अंत में उस सूक्ष्म ध्वनि को पकड़ता है, तो वह अनुभव करता है कि यह ध्वनि तालु के ऊपरी भाग में विलीन हो रही है।
यह स्थिति 'तुर्य' कहलाती है। यहाँ तुर्य का अर्थ केवल संख्यात्मक चतुर्थ नहीं, अपितु वह अवस्था है जहाँ शब्द (वाक्) अपनी सीमा छोड़कर ब्रह्मत्व में प्रवेश करता है। इसे 'सोमरूप' कहा गया है क्योंकि जहाँ शब्दों का कोलाहल समाप्त होता है, वहाँ एक गहन शीतलता और शान्ति का अनुभव होता है; यह सोम-तत्त्व ही साधक को अमृतत्व की ओर ले जाता है।
रहस्य यह है कि जिसे हम गणना में चौबीसवाँ अक्षर कह रहे हैं, वह वास्तव में कोई 'वर्ण' नहीं है जिसे बोला जा सके, अपितु वह 'अक्षर' (न क्षरति इति—जो नष्ट न हो) है। यह वही निष्कल ब्रह्म है जो समस्त सृष्टि का मूल है। अतः बाहरी विधि में यह मन्त्र का अंतिम अंश दिखता है, किन्तु आन्तर अर्थ में यह साधक का शब्दों से परे उस अखंड चैतन्य में विलीन होना है जिसे 'निष्कल' कहा गया है।
श्रुति-संगति —
इस स्मृति-वचन का मूल आधार शतपथ ब्राह्मण के उसी रहस्य में है जहाँ गायत्री के चतुर्थ पद की चर्चा है:
सैषा गायत्र्येतस्मिंस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद्वै तत्सत्ये प्रतिष्ठिता चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानीं द्वौ विवदमानावेयातामहमद्राक्षमहमश्रौषमिति य एव ब्रूयादहमद्राक्षमिति तस्मा एव श्रद्दध्यात् ॥ १४.८.१५.५ ॥
वह यह गायत्री इस चौथे, दर्शनीय, रजसे परे पदमें प्रतिष्ठित है। और वह (पद) सत्यमें प्रतिष्ठित है — चक्षु ही सत्य है, क्योंकि चक्षु ही सत्य है; इसलिए यदि दो विवाद करते हुए आयें — "मैंने देखा", "मैंने सुना" — तो जो कहे "मैंने देखा", उसीका विश्वास करना चाहिए।
यहाँ श्रुति स्पष्ट कहती है कि गायत्री 'तुरीये दर्शते पदे' (चौथे दर्शनीय पद) में प्रतिष्ठित है। स्मृतिका यह व्याख्या कि चौबीसवाँ अक्षर 'तुर्य' और 'निष्कल ब्रह्म' है, इसी श्रुति का विस्तार है। श्रुति इस तुर्य पद को 'सत्य' से जोड़ती है और कहती है कि इसे केवल देखा (अनुभव किया) जा सकता है, सुना नहीं जा सकता ("अहमद्राक्षम")। याज्ञवल्क्य स्मृति में 'सोमरूप' और 'तालु-निविष्ट' कहना इसी 'दर्शते पदे' (दृश्य/अनुभव योग्य पद) की व्यावहारिक साधना का संकेत है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक जप की एक अत्यंत सूक्ष्म विधि का निर्देश करता है। सामान्यतः साधक मन्त्र के शब्दों के उच्चारण में व्यस्त रहता है, किन्तु योगी का ध्यान उस 'संधि' पर होता है जहाँ शब्द समाप्त हो रहा है।
अभ्यास यह है कि जब गायत्री के अंतिम अक्षर का उच्चारण पूर्ण हो, तो ध्वनि को झटके से न छोड़ें, अपितु उसे तालु में विलीन होते हुए अनुभव करें। उस विलोपन के क्षण में जो एक सूक्ष्म कंपन या मौन की गूँज शेष रहती है, वही 'तुर्य' है। इस बिंदु पर साधक को 'सोमरूप' यानी एक दिव्य शीतलता का अनुभव होगा।
यह अभ्यास साधक को 'शब्द-भूमि' से उठाकर 'अक्षर-भूमि' (मौन की भूमि) में ले जाता है। जब तक ध्वनि है, तब तक द्वैत है; जैसे ही ध्वनि निष्कल ब्रह्म में विलीन होती है, साधक उस अखंड अवस्था का साक्षात्कार करता है। यहाँ जप केवल मन्त्र का पाठ नहीं, बल्कि शब्दों के माध्यम से शब्द-रहित (निष्कल) होने की प्रक्रिया बन जाता है।
तेनैवारभ्यते देवी तेनैवेषा समाप्यते ।
सार्धमात्रिकरूपेण ओंकारान्ते व्यवस्थितम् ॥ ४.२४ ॥
उसीसे देवी (गायत्री) आरम्भ होती है और उसीसे समाप्त होती है; (वह) ओंकारके अन्तमें अर्धमात्राके रूपमें स्थित है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के चौबीसवें अक्षर के स्वरूप को स्पष्ट किया, जो तालु में स्थित 'तुर्य' और 'सोमरूप' निष्कल ब्रह्म है। वर्तमान श्लोक इस रहस्य को पूर्णता प्रदान करता है कि यह सूक्ष्म अक्षर केवल एक संख्या नहीं, अपितु मन्त्र की संपूर्ण संरचना का आदि और अन्त है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: देवी (गायत्री) तेन (तस्मात् अर्धमात्रिक-अक्षरेण) एव आरभ्यते, तेन एव एषा समाप्यते । (सः) सार्धमात्रिकरूपेण ओंकारान्ते व्यवस्थितम् (अस्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• तेनैवारभ्यते देवी: उसी (चौबीसवें तुर्य अक्षर) से देवी गायत्री का आरम्भ होता है। यहाँ 'आरम्भ' केवल वाचिक उच्चारण नहीं, अपितु उस चेतना का उदय है जिससे मन्त्र प्रकट होता है।
• तेनैवेषा समाप्यते: उसी से इसकी समाप्ति होती है। अर्थात् मन्त्र की यात्रा जहाँ से शुरू हुई थी, उसी मूल बिंदु में विलीन हो जाती है।
• सार्धमात्रिकरूपेण: साढ़े-मात्रा के रूप में (स + अर्ध-मात्रा)। यहाँ 'स' का अर्थ पूर्ण मात्रा से है और उसके साथ जुड़ी वह सूक्ष्म अर्धमात्रा, जो ध्वनि और मौन की संधि है।
• ओंकारान्ते व्यवस्थितम्: ओंकार के अन्त में स्थित है। जब प्रणव (ॐ) का उच्चारण पूर्ण होता है, तो अंत में एक गूँज शेष रहती है जो धीरे-धीरे मौन में बदलती है; उसी स्थिति में यह अक्षर प्रतिष्ठित है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र की चक्रीय प्रकृति का उद्घाटन कर रहे हैं। सामान्यतः हम मन्त्र को एक सीधी रेखा की तरह देखते हैं—जहाँ से शब्द शुरू होते हैं और जहाँ समाप्त होते हैं। किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि देवी गायत्री का आरम्भ और अन्त एक ही बिंदु पर है। वह बिंदु है—वह चौबीसवाँ अर्धमात्रिक अक्षर, जिसे पिछले श्लोक में 'निष्कल ब्रह्म' कहा गया।
इसका भाव यह है कि मन्त्र की शक्ति उस मौन से उत्पन्न होती है और अंततः उसी मौन में विलीन हो जाती है। जब साधक जप आरम्भ करता है, तो वह जिस सूक्ष्म चेतना के साथ प्रवेश करता है, मन्त्र का समापन भी उसी स्तर पर होना चाहिए। यदि आरम्भ और अन्त भिन्न हुए, तो साधना खंडित रहती है; किन्तु जब आदि और अन्त एक ही 'तुर्य' अक्षर में मिल जाते हैं, तब जप एक पूर्ण वृत्त बन जाता है, जो साधक को भीतर की ओर मोड़ देता है।
विशेषतः, इस श्लोक में ओंकार के साथ इसके सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है। ओंकार केवल मन्त्र के बाहर का आवरण नहीं है, अपितु गायत्री स्वयं ओंकार की उसी अर्धमात्रा में व्यवस्थित है। जब हम 'ॐ' कहते हैं, तो उसकी अंतिम गूँज (नाद) जो शून्य की ओर जाती है, वही वह स्थान है जहाँ देवी गायत्री प्रतिष्ठित हैं। अतः ओंकार का अन्त ही वास्तव में गायत्री का आरम्भ है और गायत्री का समापन पुनः उसी ओंकार की अर्धमात्रा में होता है। यह विधान मन्त्र को केवल शब्दों का समूह न बनाकर उसे एक जीवंत ऊर्जा-चक्र बना देता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'नाद' और 'मौन' के बीच के सम्बन्ध को पहचानने का है। योगिक दृष्टि से, जप की प्रक्रिया केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु एक यात्रा है—ध्वनि से शून्य की ओर।
साधक जब जप आरम्भ करे, तो वह अनुभव करे कि मन्त्र उस सूक्ष्म अर्धमात्रा (तुर्य) से जन्म ले रहा है। और जब मन्त्र समाप्त हो, तो वह तुरंत मौन में न जाए, बल्कि उस 'सार्धमात्रिक' गूँज को पकड़े जो ओंकार के अन्त में स्थित है। अभ्यास यह है कि जप की प्रत्येक आवृत्ति के अंत में आने वाले उस गहन सन्नाटे को पहचाना जाए, जहाँ शब्द विलीन हो चुके हैं किन्तु चेतना अभी भी जागृत और शीतल (सोमरूप) है।
जब साधक अनुभव करता है कि मन्त्र उसी बिंदु से निकला और उसी बिंदु पर लौट गया, तब वह 'द्वैत' से 'अद्वैत' की भूमि की ओर बढ़ता है। यहाँ अभ्यास यह है कि ध्वनि के विलोपन के समय जो सूक्ष्म कंपन शेष रहता है, उसमें स्वयं को स्थित करना। यही वह स्थिति है जहाँ साधक शब्दों के बंधन से मुक्त होकर उस 'निष्कल ब्रह्म' का अनुभव करता है, जो मन्त्र के आदि और अन्त दोनों में समान रूप से विद्यमान है।
प्रधानः स तु विज्ञेयस्तत्परः पुरुषः स्मृतः ॥ ४.२५ ॥
उसे प्रधान (प्रकृति) जानना चाहिए; उससे परे पुरुष कहा गया है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के चौबीसवें अक्षर के स्वरूप को स्पष्ट किया, जो तालु में स्थित 'तुर्य' और 'सोमरूप' निष्कल ब्रह्म है। उन्होंने यह भी बताया कि वही सूक्ष्म अक्षर मन्त्र का आरम्भ और समापन बिंदु है तथा ओंकार के अन्त में अर्धमात्रा के रूप में प्रतिष्ठित है। वर्तमान श्लोक इस संरचना के अंतिम सत्य को उद्घाटित करता है कि यह संपूर्ण अक्षर-योजना अंततः किस परम तत्त्व की ओर संकेत करती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सः (तुर्य अक्षरः) तु प्रधानः विज्ञेयः, ततपरः पुरुषः स्मृतः।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्रधानः: वह जो मुख्य है, या वह जो मूल प्रकृति है। यहाँ 'प्रधान' शब्द सांख्य और योग की उस दृष्टि से है जहाँ समस्त सृष्टि और ध्वनि-संयोग प्रकृति के अधीन हैं।
• विज्ञेयस्तत्परः: उसे जानना चाहिए (विज्ञेय) और उससे परे (तत्परः) स्थित होना चाहिए।
• पुरुषः स्मृतः: वह पुरुष कहा गया है। यहाँ 'पुरुष' का अर्थ देह नहीं, अपितु वह शुद्ध चैतन्य या साक्षी है जो प्रकृति के समस्त विकारों से पृथक है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पुनः उसी मूल सिद्धांत की पुनरावृत्ति कर रहे हैं जो उन्होंने श्लोक ४.१७ में प्रतिपादित किया था—कि गायत्री प्रकृति है और ओंकार पुरुष। यहाँ वे सूक्ष्मता से यह समझा रहे हैं कि जिस चौबीसवें अक्षर (तुर्य) को हम अब तक खोज रहे थे, वह वास्तव में 'प्रधान' यानी प्रकृति का ही उच्चतम और सूक्ष्मतम शिखर है।
भाव यह है कि ध्वनि, मात्रा, वर्ण और मन्त्र की संपूर्ण संरचना—चाहे वह कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हो जाए—वह अंततः 'माया' या 'प्रकृति' के दायरे में ही आती है। जिस अक्षर को हम निष्कल ब्रह्म कह रहे हैं, वह साधक के लिए एक सोपान (सीढ़ी) है। जब तक साधक अक्षर का आश्रय ले रहा है, वह प्रकृति के सबसे सूक्ष्म रूप (प्रधान) के साथ खेल रहा है। लेकिन सत्य इससे भी परे है। याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि उस सूक्ष्म अक्षर-शक्ति से भी 'पर' (परे) एक तत्व है—वह 'पुरुष' है।
यह रहस्य अत्यंत गहरा है: मन्त्र साधक को ध्वनि से शून्य की ओर ले जाता है, और शून्य से साक्षी की ओर। अक्षर वह द्वार है जहाँ प्रकृति समाप्त होती है और पुरुष का साक्षात्कार आरम्भ होता है। अतः, इस सूक्ष्म अक्षर को प्रधान जानकर अपनी साधना को पूर्ण करना चाहिए, किन्तु रुकना नहीं चाहिए; क्योंकि लक्ष्य उस 'पुरुष' में स्थित होना है जो इस संपूर्ण मन्त्र-योजना का दृष्टा है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के भेद को स्पष्ट करता है। अक्षर (ध्वनि/मात्रा) साधन है, जबकि पुरुष (शुद्ध चैतन्य) साध्य है। अभ्यास की दृष्टि से साधक जब गायत्री के चौबीसवें अक्षर या ओंकार की अर्धमात्रा में स्थित होता है, तो वह प्रकृति के उच्चतम बिंदु पर पहुँच जाता है। यहाँ अनुभव यह होता है कि समस्त जगत और मन्त्र एक सूक्ष्म बिंदु में सिमट गए हैं।
किन्तु योगी इसी स्थिति में सजग रहता है कि "मैं यह ध्वनि नहीं हूँ, मैं यह अक्षर भी नहीं हूँ।" वह स्वयं को उस अक्षर-शक्ति से पृथक कर, उसके पीछे स्थित 'साक्षी' (पुरुष) के रूप में अनुभव करता है। अभ्यास यह है कि मन्त्र की सूक्ष्मता में लीन होने के बाद, उस लीनता के प्रति सजग रहने वाला जो 'द्रष्टा' शेष बचता है, उसी पुरुष-तत्त्व में स्थिर होना। यह स्थिति साधक को अक्षर-योग से ऊपर उठाकर शुद्ध आत्म-साक्षात्कार की भूमि पर ले जाती है।
गायत्रीजपविधिः
ओंकारः पूर्वमुच्चार्यो भूर्भुवःस्वस्ततः परम् ।
गायत्री प्रणवश्चान्ते जपे ह्येवमुदाहृतः ॥ ४.२६ ॥
जपमें पहले ओंकार उच्चारित होता है, उसके बाद भूः भुवः स्वः, (फिर) गायत्री, और अन्तमें प्रणव — ऐसा कहा गया है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के सूक्ष्मतम चौबीसवें अक्षर और प्रकृति-पुरुष के सम्बन्ध को स्पष्ट किया। अब वे इस सैद्धान्तिक विवेचन से आगे बढ़कर साधक के लिए व्यावहारिक 'जप-विधि' का विधान कर रहे हैं, ताकि वह मन्त्र की शक्ति को सही क्रम में अनुभूत कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: जपे ओंकारः पूर्वम् उच्चार्यो भूर्भुवःस्वस्ततः परम्, (ततः) गायत्री (उच्चार्य), प्रणवश्च अन्ते; ह्येवमुदाहृतः।
पदार्थ-निर्वचन:
• पूर्वमुच्चार्यो: सबसे पहले जिसका उच्चारण किया जाना चाहिए। यहाँ 'उच्चार्य' विधिलिङ् रूप में है, जो विधि का संकेत करता है।
• भूर्भुवःस्वस्ततः परम्: उसके (ओंकार के) बाद भूः, भुवः और स्वः (व्याहृतियों) का उच्चारण हो।
• प्रणवश्च अन्ते: और अन्त में पुनः प्रणव (ॐ) का उच्चारण किया जाए।
• ह्येवमुदाहृतः: क्योंकि जप की विधि इसी प्रकार कही गई है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य गायत्री जप के उस क्रम को निर्धारित कर रहे हैं, जो स्थूल जगत से सूक्ष्म चैतन्य की यात्रा और पुनः उसमें विलीन होने का मार्ग है। जप का विधान इस प्रकार है: प्रथम ओंकार → द्वितीय व्याहृतियाँ (भूः भुवः स्वः) → तृतीय गायत्री मन्त्र → चतुर्थ प्रणव।
बाहरी दृष्टि से यह केवल शब्दों का क्रम है, किन्तु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, अतः यहाँ प्रत्येक पद एक सोपान है। प्रथम ओंकार साधक के चित्त को एकाग्र कर उसे शून्य में स्थापित करता है। तत्पश्चात 'भूः भुवः स्वः' के माध्यम से वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर) की सीमाओं को लाँघकर उस क्षेत्र में प्रवेश करता है जहाँ गायत्री मन्त्र प्रतिष्ठित है। जब साधक गायत्री का जप करता है, तब वह सविता (सूर्य/प्रकाश) के तेज से अपनी बुद्धि को प्रदीप्त करता है। अन्त में पुनः प्रणव का उच्चारण उसे वापस उसी परम तत्त्व में विलीन कर देता है जहाँ से यात्रा आरम्भ हुई थी।
यह विधि यह सुनिश्चित करती है कि जप केवल शब्दों की पुनरावृत्ति न बनकर एक पूर्ण चक्र बन जाए। यदि साधक बिना ओंकार और व्याहृति के सीधे मन्त्र में प्रवेश करता है, तो वह मन्त्र के बाहरी आवरण में ही उलझ सकता है; किन्तु प्रणव और व्याहृतियों का कवच उसे मन्त्र के आन्तर रहस्य तक ले जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
जप की इसी विधि की पुष्टि अन्य शास्त्रों में भी मिलती है:
अभीष्टदा कोटिजप्ता देवत्वं राजतामियात् । ओंकारं पूर्वमुच्चार्य भूर्भुवः स्वस्तथैव च । गायत्री प्रणवश्चान्ते जपे चैवमुदाहृतम् । विश्वामित्रऋषिश्छन्दो गायत्रं सविता तथा ॥ २१५.१४–१५ ॥
करोड़ बार जपी गयी (गायत्री) अभीष्ट देती है; (साधक) देवत्व या राजत्व पाता है। पहले ओंकार, फिर "भूः भुवः स्वः" का उच्चारण करके, (फिर) गायत्री और अन्तमें प्रणव — जपमें ऐसा कहा गया है। (इसके) ऋषि विश्वामित्र, छन्द गायत्री और देवता सविता हैं।
अग्नि पुराण का यह अंश शब्दशः याज्ञवल्क्य स्मृति के इस विधान का समर्थन करता है। यहाँ 'ओंकारं पूर्वमुच्चार्य भूर्भुवः स्वस्तथैव च' और 'गायत्री प्रणवश्चान्ते' के माध्यम से वही क्रम बताया गया है जो महर्षि याज्ञवल्क्य ने यहाँ दिया है। अग्नि पुराण जहाँ जप के फल (देवत्व, राजत्व) की बात करता है, वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति इस विधि को मन्त्र के सूक्ष्म अक्षरों और प्रकृति-पुरुष के ज्ञान के साथ जोड़कर उसे एक योगिक प्रक्रिया बना देती है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह जप एक 'वृत्त' है। साधक ओंकार से आरम्भ करता है और प्रणव पर समाप्त होता है। इसका गूढ़ रहस्य यह है कि जिस ब्रह्म से हम निकले हैं, उसी में हमें लौटना है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह आरम्भ के प्रणव और अन्त के प्रणव के बीच के अंतर को अनुभव करे। प्रथम प्रणव 'आवाहन' है—परमात्मा को बुलाना या स्वयं को तैयार करना; जबकि अन्तिम प्रणव 'लय' है—मन्त्र की समस्त ऊर्जा को अपने भीतर समाहित कर लीन हो जाना।
साधक जब 'भूः भुवः स्वः' कहता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को नीचे से ऊपर (पृथ्वी → अन्तरिक्ष → द्यौ) उठा रहा होता है। फिर गायत्री के माध्यम से वह उस प्रकाश का साक्षात्कार करता है और अन्तिम प्रणव के समय वह पूर्णतः मौन होकर उस अक्षर में ठहर जाता है। अभ्यास यह है कि जप के दौरान मन मन्त्र के शब्दों में न भटककर, आरम्भ और अन्त के उन दो केंद्रों (प्रणव) पर टिका रहे, जिससे जप एक अखंड धारा बन जाए।
गायत्रीस्वरूपम्
श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा ।
श्वेतैर्विलेपनैः पुष्पैरलङ्कारैश्च भूषिता ॥ ४.२७ ॥
वह (देवी) श्वेत वर्ण वाली, कौशेय वस्त्र धारण करने वाली तथा श्वेत लेपनों, पुष्पों और आभूषणों से भूषिता बताई गई है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री जप के बाह्य क्रम (ओंकार → व्याहृतियाँ → मन्त्र → प्रणव) का विधान किया। अब वे साधक को उस मानसिक अवस्था और स्वरूप की ओर ले जा रहे हैं, जिसमें इस मन्त्र की शक्ति वास्तव में प्रकट होती है; अतः यहाँ देवी गायत्री के ध्यान-रूप का वर्णन आरम्भ हो रहा है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सावित्री देवी) श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा, कौशेयवसना तथा (समुद्दिष्टा), श्वेतैर्विलेपनैः पुष्पैरलङ्कारैश्च भूषिता (समुद्दिष्टा)।
पदार्थ-निर्वचन:
• श्वेतवर्णा: श्वेत रंग वाली। यहाँ 'श्वेत' केवल रंग नहीं, अपितु सत्त्वगुण और शुद्धता का प्रतीक है।
• समुद्दिष्टा: विशेष रूप से वर्णित या निर्देशित। यह शब्द संकेत करता है कि यह स्वरूप किसी प्रामाणिक परंपरा या आगम से लिया गया है।
• कौशेयवसना: कौशेय (रेशमी) वस्त्र धारण करने वाली। रेशम की कोमलता और चमक सूक्ष्म शरीर की सूक्ष्मता और प्रकाश का बोध कराती है।
• श्वेतैर्विलेपनैः: श्वेत लेपनों से। विलेपन का अर्थ है शरीर पर लगाया जाने वाला चंदन या अन्य पवित्र द्रव्य।
• पुष्पैरलङ्कारैश्च भूषिता: पुष्पों और आभूषणों से सुसज्जित।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य देवी गायत्री के उस स्वरूप का चित्रण कर रहे हैं जिसे जप के समय हृदय में धारण करना चाहिए। यह वाक्य यहाँ समाप्त नहीं होता, अपितु अगले श्लोक (४.२८) तक विस्तृत है, जहाँ उनके स्थान और आसन का वर्णन आता है।
बाहरी विधि की दृष्टि से, साधक को निर्देश दिया गया है कि वह देवी को श्वेत वर्ण, श्वेत वस्त्रों, श्वेत लेपनों और पुष्प-आभूषणों से युक्त देखे। यह एक प्रकार का 'रूप-ध्यान' है। परन्तु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, अतः इस विधिक वर्णन के भीतर एक गहरा आन्तर अर्थ छिपा है।
श्वेत वर्ण सात्त्विकता का परिचायक है। जब साधक मन्त्र जप आरम्भ करता है, तो उसका चित्त रजोगुण (चंचलता) और तमोगुण (जड़ता) से मुक्त होकर 'सत्त्व' में स्थित होना चाहिए। श्वेत वस्त्रों और लेपनों का उल्लेख इस बात का संकेत है कि साधक की आंतरिक शुद्धि पूर्ण होनी चाहिए। जिस प्रकार श्वेत रंग किसी भी अन्य रंग के मिश्रण के बिना शुद्ध होता है, उसी प्रकार गायत्री का यह स्वरूप साधक को उस अवस्था में ले जाता है जहाँ केवल 'शुद्ध चैतन्य' शेष रहता है। पुष्प और आभूषण यहाँ भौतिक विलासिता नहीं, अपितु मन्त्र के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले आनंद और आध्यात्मिक ऐश्वर्य के प्रतीक हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
गायत्री के विभिन्न रूपों का वर्णन अन्य शास्त्रों में भी मिलता है:
पूर्वाह्णकालिका सन्ध्या गायत्री कुमारी रक्ता रक्ताङ्गी रक्तवासिनी … हंसारूढा ब्रह्मदैवत्या ऋग्वेदसहिता आदित्यपथगामिनी भूमण्डलवासिनी । मध्याह्नकालिका सन्ध्या सावित्री युवती श्वेताङ्गी श्वेतवासिनी श्वेतगन्धमाल्यानुलेपनी त्रिशूलडमरुहस्ता वृषभारूढा रुद्रदैवत्या यजुर्वेदसहिता आदित्यपथगामिनी भुवोलोके व्यवस्थिता । सायं सन्ध्या सरस्वती वृद्धा कृष्णाङ्गी कृष्णवासिनी … गरुडारूढा विष्णुदैवत्या सामवेदसहिता आदित्यपथगामिनी स्वर्गलोकव्यवस्थिता ॥ ४ ॥
प्रातःकालकी सन्ध्या गायत्री है — कुमारी, लाल अंगों और लाल वस्त्रोंवाली, हंसपर आरूढ़, ब्रह्मा जिसके देवता, ऋग्वेदसहित, आदित्यके मार्गपर चलनेवाली, भूमण्डलमें रहनेवाली। मध्याह्नकी सन्ध्या सावित्री है — युवती, श्वेत अंगों और श्वेत वस्त्रोंवाली, श्वेत गन्ध-माला-लेपवाली, हाथोंमें त्रिशूल-डमरू, वृषभपर आरूढ़, रुद्र देवता, यजुर्वेदसहित, आदित्यपथगामिनी, भुवर्लोकमें स्थित। सायंकी सन्ध्या सरस्वती है — वृद्धा, कृष्ण अंगों और कृष्ण वस्त्रोंवाली, गरुडपर आरूढ़, विष्णु देवता, सामवेदसहित, आदित्यपथगामिनी, स्वर्गलोकमें स्थित।
यहाँ मध्याह्न काल की सावित्री को 'श्वेताङ्गी श्वेतवासिनी' (श्वेत अंगों और श्वेत वस्त्रों वाली) तथा 'श्वेतगन्धमाल्यानुलेपनी' (श्वेत गन्ध, माला और लेपन वाली) कहा गया है।
स्मृति का यह श्लोक उपनिषद् के इस वर्णन से पूर्णतः मेल खाता है। जहाँ उपनिषद् समय (मध्याह्न) के अनुसार रूप का भेद करता है, वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति में जप की सामान्य विधि के अंतर्गत इसी सात्त्विक 'श्वेत' स्वरूप को प्रधानता दी गई है, क्योंकि गायत्री मन्त्र का मुख्य उद्देश्य ही बुद्धि को प्रकाशमय और शुद्ध करना है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाली प्रक्रिया है। रूप-ध्यान मन को एकाग्र करने का एक सशक्त साधन है।
साधक जब देवी के श्वेत वर्ण और श्वेत वस्त्रों का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'सत्त्व' को जाग्रत कर रहा होता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक जप के समय अपने चित्त को उसी शुभ्र, शान्त और निर्मल भाव से रंग ले। जब मन स्वयं श्वेत (शुद्ध) हो जाता है, तब वह मन्त्र के सूक्ष्म स्पंदनों को ग्रहण करने के योग्य होता है।
यह ध्यान साधक को 'भाव-भूमि' से उठाकर उस स्थिति में ले जाता है जहाँ चित्त की चंचलता समाप्त होती है और वह एक स्थिर, प्रकाशमय बिंदु में केंद्रित होने लगता है। श्वेत वर्ण का यह अनुभव साधक को मानसिक द्वंद्वों से मुक्त कर उसे एक ऐसी शांति प्रदान करता है, जो आगे चलकर 'अक्षर' के अनुभव का आधार बनती है।
आदित्यमण्डलान्तस्था ब्रह्मलोकगताथवा ।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा ॥ ४.२८ ॥
…वह (देवी) आदित्यमण्डल के भीतर स्थित है, अथवा ब्रह्मलोक में स्थित है; अक्षमाला धारण किये हुए, पद्मासन पर विराजमान, शुभ देवी।…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने देवी गायत्री के स्वरूप के वर्ण और अलंकारों का वर्णन किया था। अब इस श्लोक में वे देवी के निवास-स्थान, उनके आसन और उनके द्वारा धारण की गई जपमाला का उल्लेख कर ध्यान-चित्र को पूर्णता प्रदान कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (देवी) आदित्यमण्डलान्तस्था (अस्ति) अथवा ब्रह्मलोकगता (अस्ति), अक्षसूत्रधरा (अस्ति), पद्मासनगता शुभा (अस्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• आदित्यमण्डलान्तस्था: आदित्य (सूर्य) के मण्डल के भीतर स्थित। यहाँ 'मण्डल' उस प्रकाश-घेरे का प्रतीक है जो चेतना की उच्चतम अवस्था को दर्शाता है।
• ब्रह्मलोकगता: ब्रह्मलोक में स्थित। यह स्थान वह परम स्थिति है जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य का वास है।
• अक्षसूत्रधरा: अक्षमाला (जपमाला) धारण करने वाली। 'अक्ष' का अर्थ है अक्षरात्मा; माला धारण करना निरंतर जप और स्मरण की अवस्था का प्रतीक है।
• पद्मासनगता: कमल के आसन पर विराजमान। पद्म शुद्धता, अनासक्ति और हृदय-कमल का संकेत है।
• शुभा: कल्याणमयी या अत्यंत शुभ।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (४.२७) से शुरू हुए देवी के स्वरूप-वर्णन की परिणति है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य देवी के दो निवासों का संकेत देते हैं— 'आदित्यमण्डल' और 'ब्रह्मलोक'।
बाहरी विधि की दृष्टि से, साधक को यह निर्देश दिया जा रहा है कि वह गायत्री देवी को सूर्य के प्रकाश-पुंज में अथवा परम ब्रह्मलोक में स्थित देखे। वे पद्मासन पर विराजमान हैं और उनके हाथ में जपमाला (अक्षसूत्र) है। यह चित्रण साधक को एक स्थिर और शुभ मानसिक छवि प्रदान करता है, जिससे चित्त की चंचलता समाप्त होती है।
किन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है। 'आदित्यमण्डल' केवल आकाश का सूर्य नहीं, अपितु हृदय के भीतर स्थित वह ज्योति-पुरुष है जिसे वे 'विज्ञानमय पुरुष' कहते हैं। जब साधक कहता है कि देवी आदित्यमण्डलान्तस्था हैं, तो इसका भाव यह है कि मन्त्र की शक्ति उसी हृदय-सूर्य के केंद्र में प्रतिष्ठित है। 'ब्रह्मलोक' उस अवस्था का नाम है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है; अतः देवी का वहाँ होना यह दर्शाता है कि गायत्री केवल एक देवता नहीं, बल्कि वह सेतु हैं जो साधक को ब्रह्मलोक तक ले जाती हैं।
अक्षसूत्र (माला) का धारण करना यहाँ सबसे महत्वपूर्ण रहस्य है। सामान्यतः उपासक माला लेकर जप करता है, किन्तु यहाँ देवी स्वयं अक्षसूत्र धारण किए हुए हैं। इसका भाव यह है कि मन्त्र-शक्ति स्वयं में निरंतर चैतन्य और स्पन्दनशील है। वह 'जपमय' है। जब साधक इस स्वरूप का ध्यान करता है, तो वह अपने व्यक्तिगत जप को देवी के उस शाश्वत जप में विलीन कर देता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
देवी गायत्री के इस स्वरूप की पुष्टि अन्य आगमों में भी मिलती है:
भास्वज्जपाप्रसूनाभां कुमारीं परमेश्वरीम् । रक्ताम्बुजासनारूढां रक्तगन्धानुलेपनाम् ॥ रक्तमाल्याम्बरधरां चतुरास्यां चतुर्भुजाम् । द्विनेत्रां स्रुक्स्रुवौ मालां कुण्डिकां चैव बिभ्रतीम् ॥ … ब्रह्मा तु कवचं यस्या गोत्रं सांख्यायनं स्मृतम् । आदित्यमण्डलान्तःस्थां ध्यायेद्देवीं महेश्वरीम् ॥ ११.१६ ॥
(प्रातः) चमकते जपा-पुष्पकी आभावाली, कुमारी, परमेश्वरी, लाल कमलके आसनपर विराजमान, लाल गन्धका लेप किये, लाल माला और वस्त्र धारण किये, चार मुख और चार भुजाओंवाली, दो नेत्रोंवाली, स्रुक्, स्रुवा, माला और कमण्डलु धारण किये (देवीका ध्यान करे)। … जिसका कवच ब्रह्मा हैं, गोत्र सांख्यायन है — उस आदित्यमण्डलके भीतर स्थित महेश्वरी देवीका ध्यान करे।
यहाँ देवीभागवत में भी 'आदित्यमण्डलान्तःस्थां ध्यायेद्देवीं महेश्वरीम्' कहकर उन्हें सूर्य-मण्डल के भीतर स्थित बताया गया है। स्मृतिका यह वचन उसी परंपरा का विस्तार है। जहाँ देवीभागवत में लाल वर्ण और जपा-पुष्पों का वर्णन अधिक है, वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति में 'श्वेत' वर्ण की प्रधानता है। यह भेद केवल दृष्टि का है— एक ओर शक्ति का प्रखर रूप (लाल) है, तो दूसरी ओर ज्ञान और सत्त्व का शुद्ध प्रकाश (श्वेत) है। दोनों ही मार्ग साधक को उसी आदित्य-मण्डल के केंद्र तक ले जाते हैं।
योग-रहस्य —
योगी के लिए यह श्लोक 'साधारणा' से 'विशेष' ध्यान की ओर ले जाने वाला है।
प्रथम सोपान में साधक देवी को बाहरी सूर्य (आदित्य) में देखता है, जिससे उसकी दृष्टि ऊपर की ओर उठती है। द्वितीय सोपान में वह उन्हें हृदय-सूर्य में स्थित पाता है, जहाँ 'पद्मासन' वास्तव में हृदय-कमल का प्रतीक बन जाता है।
सबसे सूक्ष्म अभ्यास 'अक्षसूत्रधरा' के भाव में है। साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि उसके भीतर जो जप चल रहा है, वह उसका अपना प्रयास नहीं, अपितु देवी द्वारा स्वयं संचालित है। जब साधक स्वयं को 'कर्ता' मानकर जप करता है, तो वह केवल एक क्रिया होती है; किन्तु जब वह देखता है कि देवी स्वयं माला धारण किए हुए हैं, तब वह 'साक्षी' भाव में स्थित हो जाता है।
इस अभ्यास से साधक 'क्रिया-भूमि' से उठकर 'अनुभव-भूमि' में प्रवेश करता है। वह अनुभव करता है कि मन्त्र का उच्चारण केवल जिह्वा से नहीं, बल्कि उस आंतरिक प्रकाश (आदित्य) के स्पन्दन से हो रहा है। इस प्रकार वह स्थूल शरीर से हटकर सूक्ष्म ज्योति-स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है और अंततः ब्रह्मलोक की उस शून्य-अवस्था को प्राप्त करता है जहाँ केवल 'शुभ' (शुद्ध चैतन्य) शेष रहता है।
गायत्र्याऽऽवाहनविसर्जने
आवाह्य यजुषा तेन तेजोसीति विधानतः ।
एतद्यजुः पुरा दृष्टं देवैर्दर्शनकाङ्क्षिभिः ॥ ४.२९ ॥
"तेजोऽसि…" इस यजुःसे विधिपूर्वक (देवीका) आवाहन करके — यह यजुः पूर्वकालमें (देवीके) दर्शनके इच्छुक देवताओंने देखा था।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री देवी के स्वरूप, उनके दिव्य वस्त्रों और उनके निवास स्थान का सूक्ष्म वर्णन किया है। अब इस श्लोक में वे उस विधि का निर्देश दे रहे हैं जिसके द्वारा साधक उस ध्यान-प्रतिमा को अपनी चेतना में प्रतिष्ठित करता है, अर्थात् देवी का आवाहन।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (देवीम्) तेन यजुषा विधानतः आवाह्य (जपेत्), एतद्यजुः पुरा दर्शनकाङ्क्षिभिः देवैर् दृष्टम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• आवाह्य: आवाहन करके। आवाहन का अर्थ है— किसी शक्ति को अपनी उपस्थिति में आमंत्रित करना या उसे जागृत करना।
• यजुषा तेन: उस यजुष् (मन्त्र) के द्वारा। यहाँ 'यजुः' शब्द शुक्लयजुर्वेद की उस विशिष्ट ऋचा के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसमें 'तेजोऽसि' पद आता है।
• विधानतः: विधिपूर्वक या शास्त्र-सम्मत रीति से।
• तेजोऽसि: "तू तेज है"। यह मन्त्र का मुख्य बीज-शब्द है, जो प्रकाश और ऊर्जा का आवाहन करता है।
• पुरा दृष्टं: प्राचीन काल में देखा गया (प्राप्त किया गया)। यहाँ 'दृष्ट' शब्द केवल देखने के लिए नहीं, अपितु साक्षात्कार करने या अनुभव करने के अर्थ में है।
• दर्शनकाङ्क्षिभिः देवैः: दर्शन की इच्छा रखने वाले देवताओं द्वारा। यहाँ 'देव' उन उच्च कोटि के ऋषियों और दिव्य सत्ताओं के लिए प्रयुक्त हुआ है जिन्होंने अपनी तपस्या से सत्य का साक्षात्कार किया था।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ जप की पूर्व-तैयारी की एक अनिवार्य कड़ी बता रहे हैं। जब साधक पिछले श्लोकों (४.२७–४.२८) के अनुसार देवी के श्वेत वर्ण और आदित्यमण्डल में उनकी स्थिति का ध्यान कर लेता है, तब उस मानसिक छवि को जीवंत करने के लिए 'तेजोऽसि' यजुष् का प्रयोग किया जाता है।
बाहरी विधि की दृष्टि से यह एक आवाहन मन्त्र है। जिस प्रकार किसी अतिथि को बुलाने के लिए पुकारा जाता है, उसी प्रकार गायत्री देवी को अपनी साधना में उपस्थित करने के लिए इस विशिष्ट यजुर्वेद-मन्त्र का पाठ किया जाता है। याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि यह कोई साधारण रचना नहीं है, बल्कि वह दिव्य ज्ञान है जिसे प्राचीन काल में उन 'देवों' (सिद्ध पुरुषों) ने प्राप्त किया था जो सत्य के दर्शन के अभिलाषी थे।
परन्तु इस विधि का आन्तर अर्थ अत्यंत सूक्ष्म है। आवाहन का अर्थ बाहर से किसी को बुलाना नहीं, अपितु सुप्त चेतना को जाग्रत करना है। जब साधक 'तेजोऽसि' कहता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर की उस ज्योति को पुकार रहा होता है जो सूर्य-स्वरूप आत्मा का प्रतिबिंब है। यजुर्वेद के द्रष्टा होने के नाते याज्ञवल्क्य यहाँ संकेत कर रहे हैं कि यह मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक 'यज्ञ' है— हृदय के भीतर किया जाने वाला प्रकाश-यज्ञ।
श्रुति-संगति —
इस आवाहन मन्त्र का मूल आधार शतपथ ब्राह्मण में मिलता है:
सोऽवेक्षते । तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसीति स एष सत्य एव मन्त्रस्तेजा ह्येतच्छुक्रं ह्येतदमृतं ह्येतत्तत्सत्येनैवैतत्समर्धयति ॥ १.३.१.२७ ॥
वह (घीको) देखता है — "तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि" (तू तेज है, शुक्र (दीप्त) है, अमृत है)। यह सत्य ही मन्त्र है, क्योंकि यह (घी) तेज है, शुक्र है, अमृत है; इस प्रकार वह इसे सत्यसे ही समृद्ध करता है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि "तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि" केवल एक वाक्य नहीं, अपितु 'सत्य' मन्त्र है। स्मृति में याज्ञवल्क्य इसी सत्य-मन्त्र के माध्यम से देवी का आवाहन करने का निर्देश देते हैं। जिस प्रकार शतपथ में इस मन्त्र का प्रयोग घी (हविष्य) की दीप्ति और उसकी अमरता को सिद्ध करने के लिए किया गया है, उसी प्रकार गायत्री-जप में इसका प्रयोग साधक के भीतर 'तेज' और 'अमृतत्व' को जाग्रत करने के लिए किया जाता है। श्रुति इसे 'सत्य' कहती है क्योंकि यह मन्त्र उस परम सत्य (ब्रह्म) की प्रकाशमय प्रकृति का सीधा अनुभव कराता है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में 'तेजोऽसि' का आवाहन एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। साधक जब इस यजुष् का प्रयोग करता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल शरीर से हटाकर 'तेज' (प्रकाश) के स्तर पर ले जाता है।
योगिक अभ्यास में यह स्थिति इस प्रकार है:
१. पहचान: 'तेजोऽसि' कहने का अर्थ है— "हे देवी! आप केवल एक कल्पना नहीं, अपितु शुद्ध प्रकाश-पुंज हैं।" यहाँ साधक अपने भीतर के अंधकार (अविद्या) को प्रकाश से प्रतिस्थापित करता है।
२. साक्षात्कार: जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इसे 'दर्शनकाङ्क्षिभिः देवैः' देखा गया, तो इसका अर्थ है कि यह मन्त्र केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि 'देखने' (अनुभव करने) के लिए है। साधक इस अभ्यास से उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह स्वयं को शरीर न मानकर एक प्रकाश-बिन्दु अनुभव करता है।
३. अवस्था परिवर्तन: आवाहन की इस प्रक्रिया से साधक 'जड़' से 'चेतन' और 'अंधकार' से 'ज्योति' की ओर प्रवृत्त होता है। यह अभ्यास हृदय के भीतर सूर्य के पुरुष का स्मरण करना है, जिससे चित्त एकाग्र होकर जप के लिए तैयार हो जाता है।
संक्षेप में, यह आवाहन वास्तव में स्वयं के भीतर स्थित उस दिव्य ज्योति का जागरण है, जो साधक को निम्न भूमियों से उठाकर उच्च चेतना की भूमि पर प्रतिष्ठित करती है।
तत्रावाह्य जपित्वा तु नमस्कृत्य विसर्जयेत्
प्रणवं भूर्भुवःस्वश्च अङ्गानि हृदयादयः ॥ ४.३० ॥
वहाँ आवाहन करके, जप करके, नमस्कार करके विसर्जन करे। प्रणव, भूः भुवः स्वः, और हृदय आदि अङ्ग —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'तेजोऽसि' यजुष् के माध्यम से देवी के आवाहन की विधि बताई और यह स्पष्ट किया कि यह वही मन्त्र है जिससे देवताओं ने साक्षात्कार प्राप्त किया था। अब इस श्लोक में वे जप की पूर्ण प्रक्रिया (आवाहन से विसर्जन तक) का क्रम निर्धारित कर रहे हैं और उन अंगों का संकेत दे रहे हैं जिनमें इस चेतना को प्रतिष्ठित करना है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तत्र (देवीम्) आवाह्य, जपित्वा तु, नमस्कृत्य विसर्जयेत्। (ततः) प्रणवम्, भूर्भुवःस्वश्च, अङ्गानि हृदयादयः... (इति ध्यातव्याः)।
पदार्थ-निर्वचन:
• आवाह्य, जपित्वा, नमस्कृत्य, विसर्जयेत्: ये चार क्रियाएं साधना के एक पूर्ण चक्र को दर्शाती हैं। आवाहन (आमंत्रित करना), जप (मन्त्र का मानसिक या वाचिक दोहराव), नमस्कार (पूर्ण समर्पण) और विसर्जन (चेतना को पुनः व्यापक स्वरूप में विलीन करना)।
• प्रणवं भूर्भुवःस्वश्च: ओंकार और तीन व्याहृतियाँ। ये केवल शब्द नहीं, अपितु स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाले सोपान हैं।
• अङ्गानि हृदयादयः: हृदय आदि शरीर के अंग। यहाँ 'हृदयादयः' शब्द एक सूची का आरम्भ है, जिसका पूर्ण विवरण आगामी श्लोकों (४.३१) में आता है। यह संकेत है कि मन्त्र की शक्ति को केवल कंठ तक सीमित न रखकर उसे शरीर के विभिन्न अंगों में अनुभव करना है।
भाष्य —
इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी जप का एक व्यवस्थित अनुष्ठान प्रस्तुत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि साधक पहले 'तेजोऽसि' यजुष् से देवी का आवाहन करे, तत्पश्चात निर्धारित विधि से जप करे और अंत में नमस्कार करके उनका विसर्जन करे।
यहाँ 'विसर्जन' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः विसर्जन का अर्थ 'त्यागना' लिया जाता है, किन्तु योगिक दृष्टि से विसर्जन का अर्थ है—साधना के दौरान जो विशिष्ट मानसिक रूप बनाया गया था, उसे अब हटाकर उस विराट चैतन्य में लीन हो जाना। यदि साधक विसर्जन नहीं करता, तो वह केवल एक मानसिक प्रतिमा से बंधा रह जाता है; विसर्जन उसे 'रूप' से 'अरूप' की ओर ले जाता है।
श्लोक का दूसरा वाक्य—"प्रणवं भूर्भुवःस्वश्च अङ्गानि हृदयादयः"—एक नए निर्देश का आरम्भ है जो आगामी श्लोक (४.३१) में पूर्ण होता है। यहाँ ऋषि यह बता रहे हैं कि जप के पश्चात साधक को प्रणव, व्याहृतियों और हृदय आदि अंगों का स्मरण या ध्यान करना चाहिए। यह इस बात का संकेत है कि गायत्री की शक्ति केवल मन्त्र के शब्दों में नहीं, बल्कि शरीर के प्राण-केन्द्रों (अंगों) और ब्रह्माण्डीय ध्वनियों (प्रणव और व्याहृति) के समन्वय में निहित है।
श्रुति-संगति —
गायत्री के उपस्थान और उनके प्रति समर्पण का रहस्य श्रुति में इस प्रकार मिलता है:
तस्या उपस्थानम् गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समर्धीति वा न हैवास्मै स कामः समृध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ १४.८.१५.१० ॥
उस (गायत्री) का उपस्थान (स्तुति-मन्त्र): "हे गायत्री! तुम एकपदी हो, द्विपदी हो, त्रिपदी हो, चतुष्पदी हो; (वस्तुतः) तुम अपद हो, क्योंकि तुम (पैरोंसे) चलती नहीं। तुम्हारे चौथे, दर्शनीय, रजसे परे पदको नमस्कार है।" (फिर) जिससे द्वेष करे उसके लिए — "अमुक (शत्रु) अमुक (वस्तु) को न पाये", अथवा "उसकी वह कामना पूरी न हो" — जिसके लिए (वह) इस प्रकार उपस्थान करता है, उसकी वह कामना निश्चय ही पूरी नहीं होती; अथवा (अपने लिए) "मैंने वह पा लिया" (कहकर उपस्थान करे)।
इस श्रुति-अंश में गायत्री के 'तुरीयाय' (चौथे) पद को नमस्कार करने का विधान है। स्मृति का यह श्लोक जब 'नमस्कृत्य विसर्जयेत्' कहता है, तो वह वास्तव में इसी तुरीय पद के प्रति समर्पण की बात कर रहा है। शतपथ ब्राह्मण स्पष्ट करता है कि जो साधक इस प्रकार उपस्थान (नमस्कार और ध्यान) करता है, उसकी कामना सिद्ध होती है। स्मृति यहाँ उसी श्रुति-विधि को जप के क्रम में पिरोकर उसे एक व्यावहारिक साधना बना रही है।
योग-रहस्य —
योगी के लिए यह श्लोक 'साधना के वृत्त' का विज्ञान है। आवाहन और विसर्जन—ये दो छोर हैं। आवाहन यदि चेतना का 'संकुचन' है, तो विसर्जन उसका 'विस्तार' है। साधक जब देवी का आवाहन करता है, तो वह अपनी बिखरी हुई प्रज्ञा को एक बिंदु पर लाता है; जप के माध्यम से उस बिंदु को प्रदीप्त करता है और नमस्कार के द्वारा अहंकार का विसर्जन करता है।
विशेषतः, 'प्रणव', 'व्याहृति' और 'हृदयादयः अङ्गानि' का उल्लेख यह दर्शाता है कि साधक को अपनी चेतना को केवल मस्तिष्क में नहीं रखना चाहिए। उसे ओंकार की ध्वनि को हृदय और शरीर के अन्य अंगों में प्रतिध्वनित करना चाहिए। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शरीर' से उठाकर 'सूक्ष्म शरीर' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि मन्त्र केवल वाणी का खेल नहीं, बल्कि शरीर के कण-कण में व्याप्त एक स्पंदन है। इस प्रकार साधक रूप-साधना (आवाहन) से आरम्भ कर, शून्य-साधना (विसर्जन) तक पहुँचता है।
त्रिरावर्त्य ततः पश्चादार्षं छन्दश्च दैवतम् ।
विनियोगस्तथा रूपं ध्यातव्यं क्रमशस्तु वै ॥ ४.३१ ॥
— (इनको) तीन बार दोहराकर, उसके बाद ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और रूप — इनका क्रमसे ध्यान करना चाहिए।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के पूर्ण चक्र—आवाहन, जप, नमस्कार और विसर्जन की विधि बताई तथा संकेत दिया कि प्रणव, व्याहृतियों और हृदय आदि अंगों का इसमें विशेष महत्त्व है। वर्तमान श्लोक उसी प्रक्रिया के सूक्ष्म विस्तार को पूर्ण करता है, जहाँ जप से पूर्व और उसके साथ किए जाने वाले मानसिक संकल्पों के क्रम को निर्धारित किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तत्र प्रणवं, भूर्भुवःस्वश्च, अङ्गानि हृदयादयः) त्रिरावर्त्य, ततः पश्चात् अर्षं छन्दश्च दैवतम्, विनियोगस्तथा रूपं ध्यातव्यं क्रमशस्तु वै।
पदार्थ-निर्वचन:
• त्रिरावर्त्य: तीन बार दोहराकर। यहाँ संख्या 'तीन' केवल गिनती नहीं, अपितु स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों स्तरों पर मन्त्र की शक्ति को जाग्रत करने का संकेत है।
• अर्षं (आर्षम्): ऋषि। वह द्रष्टा जिसने इस मन्त्र के रहस्य को साक्षात्कार किया।
• छन्दश्च: छन्द। मन्त्र का लयबद्ध स्वरूप या उसकी गति।
• दैवतम्: देवता। वह लक्ष्य या चेतना जिसके लिए मन्त्र का प्रयोग किया जा रहा है।
• विनियोगस्तथा: विनियोग। मन्त्र के प्रयोग का विशिष्ट प्रयोजन और उसका संकल्प।
• रूपं: देवी का वह स्वरूप जिसका वर्णन पूर्व श्लोकों (४.२७-४.२८) में आया है।
• क्रमशस्तु वै: निश्चित रूप से इसी क्रम में। 'वै' यहाँ निश्चयवाचक अव्यय है, जो यह बताता है कि इस क्रम का उल्लंघन करने से साधना की एकाग्रता भंग होती है।
भाष्य —
इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी जप के उस अनिवार्य मानसिक विन्यास को स्पष्ट कर रहे हैं, जिसे 'पूर्व-तैयारी' कहा जा सकता है। वे कहते हैं कि साधक पहले प्रणव (ॐ), व्याहृतियों (भूः भुवः स्वः) और हृदय आदि अंगों के न्यास या स्मरण को तीन बार दोहराए। यह त्रिविध आवृत्ति साधक की चेतना को बाहरी जगत से हटाकर पूरी तरह आंतरिक यंत्र में स्थापित करने के लिए है।
इसके पश्चात, साधक को 'ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और रूप' का क्रमशः ध्यान करना चाहिए। यहाँ विधिक क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है:
१. ऋषि: पहले उस दृष्टि का स्मरण करना जिसने इस विद्या को देखा।
२. छन्द: फिर उस लय में स्वयं को ढालना।
३. देवता: तत्पश्चात उस लक्ष्य पर चित्त को केंद्रित करना।
४. विनियोग: फिर यह संकल्प करना कि मैं किस प्रयोजन के लिए इस शक्ति का आवाहन कर रहा हूँ।
५. रूप: और अन्त में देवी के उस श्वेत, प्रकाशमय स्वरूप का ध्यान करना जो आदित्यमण्डल में स्थित है।
बाहरी दृष्टि से यह एक कर्मकाण्डीय विधि प्रतीत होती है, किन्तु आन्तर अर्थ यह है कि जब तक साधक को यह ज्ञात नहीं कि वह कौन सा मन्त्र (छन्द), किस लक्ष्य (देवता) के लिए, किसकी परंपरा (ऋषि) से और किस उद्देश्य (विनियोग) से जप रहा है, तब तक मन्त्र केवल शब्दों का समूह रहता है। इन पाँचों के ध्यान से मन्त्र 'शब्द' से 'शक्ति' में परिवर्तित हो जाता है।
योग-रहस्य —
एक योगी के लिए यह श्लोक 'चित्त-एकत्रीकरण' की विधि है। जप आरम्भ करने से पूर्व जब साधक ऋषि, छन्द और देवता का स्मरण करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को निम्नवत व्यवस्थित कर रहा होता है:
• ऋषि का ध्यान: स्वयं के भीतर उस 'द्रष्टा' भाव को जाग्रत करना जो केवल देखता है (साक्षी भाव)।
• छन्द का ध्यान: अपनी श्वास और मन की गति को मन्त्र की लय में लयबद्ध करना।
• देवता का ध्यान: हृदय के भीतर स्थित उस ज्योति-पुरुष या देवी की आभा को अनुभव करना।
• विनियोग का ध्यान: अपनी साधना का लक्ष्य निर्धारित करना, जिससे मन भटकन से बचता है।
• रूप का ध्यान: एक निश्चित मानसिक छवि पर चित्त को स्थिर करना ताकि वह विसरित न हो।
जब साधक इन पाँचों को 'क्रमशः' (एक के बाद एक) अनुभव करता है, तो वह स्थूल शरीर से उठकर सूक्ष्म शरीर और फिर कारण शरीर की भूमि तक पहुँच जाता है। इस प्रकार तैयार किया गया मन जब गायत्री जप में उतरता है, तब वह केवल वाचिक जप न रहकर 'अजपा-जप' की ओर अग्रसर होता है। बिना इस पूर्व-स्मरण के किया गया जप केवल एक यांत्रिक क्रिया है, किन्तु इस विधि से किया गया जप साधक को साक्षात् सिद्धि की ओर ले जाता है।
गायत्रीनामधेयनिर्वचनानि
सर्वावयवसंपूर्णा ध्याता सिद्धिकरी भवेत् ।
षड्जश्च ऋषभश्चैव धैवतश्च तृतीयकः ॥ ४.३२ ॥
सब अवयवोंसे पूर्ण (रूपमें) ध्यान की गयी (देवी) सिद्धि देनेवाली होती है। षड्ज, ऋषभ और तीसरा धैवत —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के पूर्व ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग और देवी के स्वरूप के क्रमिक ध्यान की अनिवार्यता बताई थी। वर्तमान श्लोक इस ध्यान की पूर्णता के फल को स्पष्ट करता है और तत्पश्चात मन्त्र के संगीतमय एवं ध्वन्यात्मक स्वरूप (स्वरों) की ओर संकेत करना आरम्भ करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यदि देवीः) सर्वावयवसंपूर्णा ध्याता (तर्हि सा) सिद्धिकरी भवेत्। षड्जश्च ऋषभश्चैव धैवतश्च तृतीयकः (इति स्वरत्रयम्)।
पदार्थ-निर्वचन:
• सर्वावयवसंपूर्णा: सभी अवयवों से पूर्ण। यहाँ 'अवयव' शब्द के दो अर्थ हैं—प्रथम, देवी का वह स्वरूप जिसका वर्णन पूर्व श्लोकों में आया है (श्वेत वर्ण, कौशेय वस्त्र, अक्षमाला, पद्मासन आदि); द्वितीय, साधना के वे सभी अंग जिनका उल्लेख पिछले श्लोक (४.३१) में हुआ (ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग)।
• ध्याता: जिस देवी का पूर्णतः ध्यान किया गया हो।
• सिद्धिकरी: सिद्धि प्रदान करने वाली। यहाँ 'सिद्धि' का अर्थ केवल चमत्कारिक शक्तियाँ नहीं, अपितु मन्त्र के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार और साधक की चेतना का उस लक्ष्य तक पहुँचना है।
• षड्ज, ऋषभ, धैवत: ये संगीत के सात स्वरों (सप्तक) में से प्रथम, द्वितीय और चौथे स्वर हैं। यहाँ याज्ञवल्क्य जी गायत्री के गायन में प्रयुक्त होने वाले विशिष्ट स्वरों का संकेत दे रहे हैं, जो अगले श्लोकों में 'त्रैस्वर्या' नाम की निरुक्ति का आधार बनेंगे।
भाष्य —
याज्ञवल्क्य योगीश्वर यह स्पष्ट करते हैं कि साधना में 'अपूर्णता' फल में बाधा डालती है। वे कहते हैं कि जब साधक देवी के स्वरूप का ध्यान करता है, तो वह केवल एक धुंधली छवि न हो, अपितु उसके सभी अवयवों—वर्ण, वस्त्र, आसन और आभूषणों—का सूक्ष्म और स्पष्ट दर्शन हो। साथ ही, यदि मन्त्र के अंगों (ऋषि-छन्द-देवता) में से किसी एक की भी उपेक्षा की गई, तो वह ध्यान 'संपूर्ण' नहीं कहलाएगा। जो देवी अपने समस्त अवयवों सहित ध्याता के हृदय में प्रतिष्ठित होती हैं, वही साधक को सिद्धि तक ले जाती हैं।
यहाँ बाहरी विधि यह है कि रूप का पूर्ण विवरण याद किया जाए, किन्तु इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपनी चेतना को विखंडित न होने दे। जब ध्यान के सभी अंग एक सूत्र में बंध जाते हैं, तब चित्त की एकाग्रता चरम पर होती है और वही अवस्था 'सिद्धि' का द्वार खोलती है।
श्लोक का उत्तरार्ध एक नए विषय का आरम्भ है। यहाँ महर्षि ने अचानक तीन स्वरों—षड्ज, ऋषभ और धैवत—का उल्लेख किया है। यह संकेत है कि गायत्री केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक विशिष्ट ध्वनि-विज्ञान है। इन तीन स्वरों का वर्णन यहाँ केवल इसलिए किया गया है ताकि साधक जान सके कि मन्त्र की शक्ति उसके उच्चारण के लय और स्वर में भी निहित है। यह वाक्य अधूरा है और इसका पूर्ण अर्थ अगले श्लोकों (४.३३-४.३५) में प्रकट होगा, जहाँ यह बताया जाएगा कि इन्हीं स्वरों के कारण इसे 'त्रैस्वर्या' कहा जाता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'पूर्णता' के अभ्यास पर बल देता है। साधक अक्सर ध्यान में कुछ अंगों को छोड़ देता है या केवल शब्दों का उच्चारण करता है, जबकि रूप और भाव विस्मृत हो जाते हैं। याज्ञवल्क्य जी सिखा रहे हैं कि अधूरा ध्यान अधूरे फल का कारण बनता है।
साधक को यहाँ 'पूर्ण-प्रतिमा' का अभ्यास करना चाहिए। जब वह देवी के श्वेत वर्ण, पद्मासन और अक्षमाला को पूर्णता में देखता है, तो उसका मन बाहरी जगत से पूरी तरह कटकर एक ही बिंदु पर केंद्रित हो जाता है। यह अवस्था साधक को स्थूल ध्यानावस्था से सूक्ष्म अनुभव की भूमि की ओर ले जाती है।
जहाँ तक स्वरों (षड्ज, ऋषभ, धैवत) का प्रश्न है, योगिक अभ्यास में ध्वनि का कंपन सीधे हृदय और प्राण को प्रभावित करता है। इन विशिष्ट स्वरों का स्मरण साधक को यह अनुभव कराता है कि मन्त्र केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, बल्कि एक नाद-साधना है। यहाँ साधक शब्दों के अर्थ से ऊपर उठकर ध्वनियों के प्रभाव की भूमि में प्रवेश करना आरम्भ करता है।
त्रिभिः स्वरैर्यदा गीता त्रैस्वर्येति ततःस्मृता ।
भूर्लोकश्चान्तरिक्षं च स्वर्लोकश्च तृतीयकः ॥ ४.३३ ॥
…जब इन तीन स्वरों से गायी जाती है, तब वह 'त्रैस्वर्या' कही जाती है; भूर्लोक, अन्तरिक्ष तथा तीसरा स्वर्लोक…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने देवी के पूर्ण स्वरूप के ध्यान से होने वाली सिद्धि का वर्णन किया था और साथ ही षड्ज, ऋषभ एवं धैवत नामक तीन स्वरों का उल्लेख किया था। वर्तमान श्लोक उन स्वरों के आधार पर गायत्री की 'त्रैस्वर्या' नाम की निरुक्ति करता है तथा उसके विस्तार को तीनों लोकों के साथ जोड़ता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (गायत्री मन्त्रः) त्रिभिः स्वरैर्यदा गीता (ततः सा) त्रैस्वर्येति ततः स्मृता। भूर्लोकश्च अन्तरिक्षं च स्वर्लोकश्च तृतीयकः (इति त्रयि)।
पदार्थ-निर्वचन:
• त्रिभिः स्वरैः: तीन स्वरों से। यहाँ पूर्व श्लोक (४.३२) में वर्णित षड्ज, ऋषभ और धैवत स्वरों की बात है।
• गीता: जब गायी जाती है। 'गायन' यहाँ केवल संगीत नहीं, अपितु मन्त्र के उस नाद-रूप का प्रकटीकरण है जो चेतना को जाग्रत करता है।
• त्रैस्वर्या: तीन स्वरों से युक्त होने के कारण 'त्रैस्वर्या'। यह गायत्री के एक विशिष्ट नाम की व्युत्पत्ति है।
• भूर्लोक, अन्तरिक्ष, स्वर्लोक: ये स्थूल जगत के तीन स्तर हैं—पृथ्वी (भूः), मध्य-आकाश (भुवः) और दिव्य लोक (स्वः)। यहाँ 'तृतीयकः' शब्द स्वर्लोक के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो इस त्रय की पूर्णता को दर्शाता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री मन्त्र के ध्वन्यात्मक स्वरूप और उसके ब्रह्माण्डीय विस्तार का रहस्य खोल रहे हैं। वे कहते हैं कि जब इस मन्त्र का उच्चारण षड्ज, ऋषभ और धैवत इन तीन स्वरों के समन्वय से किया जाता है, तब इसे 'त्रैस्वर्या' कहा जाता है।
यहाँ बाहरी विधि यह है कि मन्त्र का गायन विशिष्ट स्वरों में हो, किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। स्वर केवल ध्वनि नहीं हैं, अपितु वे प्राण की विभिन्न गतियों और चेतना के स्तरों के प्रतीक हैं। जब साधक इन तीन स्वरों के माध्यम से मन्त्र को गाता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को तीन भिन्न आयामों में विस्तारित कर रहा होता है।
इसी विस्तार को स्पष्ट करने के लिए याज्ञवल्क्य जी तुरंत 'भूर्लोक', 'अन्तरिक्ष' और 'स्वर्लोक' का उल्लेख करते हैं। भाव यह है कि जिस प्रकार मन्त्र तीन स्वरों (त्रैस्वर्या) से निर्मित है, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण सृष्टि इन तीन लोकों के त्रय में विभाजित है। मन्त्र के स्वर और जगत के लोक परस्पर प्रतिबिम्ब हैं। जब साधक मन्त्र को गाता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु वह भूः (स्थूल), भुवः (सूक्ष्म) और स्वः (कारण/दिव्य) इन तीनों स्तरों की ऊर्जाओं को एक सूत्र में पिरोता है। यह श्लोक संकेत दे रहा है कि गायत्री मन्त्र इस त्रैलोक्य के सार का ध्वनि-रूप है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में, मन्त्र का गायन 'नाद-योग' का एक अंग है। साधक जब इन तीन स्वरों (षड्ज, ऋषभ, धैवत) के साथ जप करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसकी चेतना केवल शरीर तक सीमित नहीं है।
अभ्यास यह है कि साधक जप की लय में स्वयं को इन तीनों लोकों के साथ एकाकार करे। 'भूः' स्वर का अनुभव करते समय वह अपने भौतिक अस्तित्व और पृथ्वी तत्व को साक्षी रखे; 'भुवः' (अन्तरिक्ष) के समय अपनी प्राण-शक्ति और मानसिक विस्तार को अनुभव करे; और 'स्वः' (स्वर्लोक) के समय उस परम प्रकाश और अक्षर-तत्व में विलीन होने का प्रयास करे।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि मन्त्र के तीन स्वर ही वास्तव में तीनों लोकों की कुंजियाँ हैं। वह स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से दिव्य की ओर यात्रा करता है। यहाँ 'त्रैस्वर्या' होना इस बात का प्रतीक है कि साधक ने अपनी चेतना को त्रिविध बंधनों से मुक्त कर, उन्हें एक लय में बाँध लिया है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को केवल एक देह नहीं, अपितु तीनों लोकों में व्याप्त एक चैतन्य सत्ता के रूप में देखने लगता है।
पदैस्त्रिभिर्यदा त्या(व्या)प्ता त्रिपदेति ततः स्मृता ।
सविता देवता यस्मात् सावित्री तेन चोच्यते ॥ ४.३४ ॥
— जब (वह) इन तीन पदों (लोकों) से व्याप्त है, तब त्रिपदा कही जाती है। सविता देवता होनेसे सावित्री कहलाती है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के 'त्रैस्वर्या' नाम की निरुक्ति करते हुए उसके नाद-स्वरूप को तीन स्वरों (षड्ज, ऋषभ, धैवत) और तीन लोकों (भूः, भुवः, स्वः) से जोड़ा था। वर्तमान श्लोक इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए मन्त्र के पदों के आधार पर 'त्रिपदा' और इसके अधिष्ठातृ देवता के आधार पर 'सावित्री' नाम का रहस्य स्पष्ट करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (गायत्री मन्त्रः) यदा त्रिभिः पदैः व्याप्ता ततः त्रिपदेति स्मृता। यस्मात् सविता (मन्त्रस्य) देवता (अस्ति), तेन सावित्री च उच्यते।
पदार्थ-निर्वचन:
• पदैस्त्रिभिः: तीन पदों से। यहाँ 'पद' शब्द के दो अर्थ हैं—प्रथम, मन्त्र के शाब्दिक चरण; द्वितीय, वे तीन लोक (पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यौ) जो इस मन्त्र की शक्ति के विस्तार क्षेत्र हैं।
• व्याप्ता: व्याप्त होना या समाहित होना। जब मन्त्र की चेतना इन तीनों स्तरों को पूरी तरह अपने घेरे में ले लेती है।
• त्रिपदा: 'त्रि' (तीन) + 'पद' (चरण/स्तर)। तीन पदों से युक्त होने के कारण यह 'त्रिपदा' कहलाती है।
• सविता देवता: सविता वह सूर्य-तत्त्व है जो जगत को प्रेरित करता है और जाग्रत करता है। मन्त्र का अधिष्ठातृ देवता सविता होने के कारण इसे 'सावित्री' कहा गया है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री के नामकरण के माध्यम से उसकी व्यापकता और उसके स्रोत की ओर संकेत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब यह मन्त्र तीन पदों द्वारा व्याप्त होता है, तब इसे 'त्रिपदा' कहा जाता है।
यहाँ बाहरी दृष्टि से 'पद' का अर्थ मन्त्र के तीन चरणों से है, किन्तु इसका आन्तर रहस्य यह है कि गायत्री केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक ब्रह्माण्डीय ऊर्जा है जो स्थूल (भूः), सूक्ष्म (भुवः) और कारण (स्वः) तीनों स्तरों को व्याप्त किए हुए है। जब साधक इस मन्त्र का जप करता है, तो वह केवल ध्वनि नहीं करता, अपितु अपनी चेतना को इन तीन पदों—अर्थात् तीन लोकों के विस्तार में ले जाता है।
इसके पश्चात ऋषि कहते हैं कि यह मन्त्र 'सावित्री' कहलाता है क्योंकि इसका देवता 'सविता' है। सविता शब्द 'सु' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'उत्पन्न करना' या 'प्रेरित करना'। सविता वह दिव्य सूर्य है जो न केवल भौतिक जगत को प्रकाश देता है, अपितु साधक की प्रज्ञा (बुद्धि) को भी जाग्रत करता है। अतः सावित्री होने का अर्थ है—उस परम प्रेरणा-शक्ति से जुड़ जाना जो जड़ता को मिटाकर चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाती है।
श्रुति-संगति —
इस मन्त्र के 'त्रिपदा' होने और लोकों के साथ इसके सम्बन्ध की पुष्टि श्रुति में स्पष्ट मिलती है:
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरिति अष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हास्या एतत्स यावदेषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १४.८.१५.१ ॥
"भूमिः, अन्तरिक्षम्, द्यौः" — ये आठ अक्षर हैं; और गायत्रीका एक पद आठ अक्षरोंका है — यह (त्रिलोकी) ही इसका वह (पहला पद) है। जो इसके इस पदको ऐसा जानता है, वह इन लोकोंमें जितना है, उतना जीतता है।
यहाँ शतपथ ब्राह्मण यह रहस्य खोलता है कि "भूमिः, अन्तरिक्षम्, द्यौः" ये तीन लोक स्वयं गायत्री का एक पद हैं। इस प्रकार मन्त्र के शब्द और ब्रह्माण्डीय वास्तविकता एक ही हैं। स्मृति में जिसे 'त्रिपदा' कहा गया है, श्रुति उसे त्रिलोकी की विजय से जोड़ती है। भाव यह है कि जो साधक गायत्री के इन पदों को केवल अक्षर नहीं, अपितु लोकों का स्वरूप जानकर जप करता है, वह समस्त ब्रह्माण्ड की शक्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'विस्तार' और 'केंद्रण' का योग है।
जब साधक व्याहृतियों (भूर्भुवःस्वः) का जप करता है, तो उसे अनुभव करना चाहिए कि उसकी चेतना पृथ्वी (भूः), अन्तरिक्ष (भुवः) और स्वर्ग (स्वः) के विस्तार में फैल रही है। यह 'त्रिपदा' का अनुभव है—जहाँ साधक स्वयं को सीमित शरीर से निकालकर त्रिलोकी-व्याप्त स्वरूप में देखता है।
इसके पश्चात, इस व्यापकता के बीच में वह 'सविता' (दिव्य सूर्य) की उपस्थिति का अनुभव करता है। अभ्यास यह है कि जब चेतना तीनों लोकों में व्याप्त हो जाए, तब उसे पुनः उस एक केंद्र—'सविता'—पर लाना है, जो हृदय-कमल में स्थित ज्योति स्वरूप पुरुष है। इस प्रकार साधक स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अक्षर की ओर बढ़ता है। 'सावित्री' मन्त्र का जप करते समय साधक यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार सूर्य अंधकार को मिटाकर जगत को जाग्रत करता है, वैसे ही यह मन्त्र उसके भीतर के अविद्या-अंधकार को मिटाकर उसे प्रज्ञानघन बना रहा है।
गायनं(न्तं) त्रायते यस्मात् गायत्रीति ततः स्मृतः(ता) ।
श्येनो भूत्वाऽऽहरत् सोमं त्रिदिवात् स्वेन तेजसा ॥ ४.३५ ॥
क्योंकि (यह) गानेवालेकी रक्षा करती है, इसलिए गायत्री कही गयी। (यह) श्येन बनकर अपने तेजसे स्वर्गसे सोम ले आयी —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के 'त्रैस्वर्या', 'त्रिपदा' और 'सावित्री' नामों की निरुक्ति करते हुए उसे तीन स्वरों, तीन लोकों और सविता देवता से जोड़ा था। वर्तमान श्लोक इस नाम-निर्वचन की कड़ी को पूर्ण करता है, जहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि 'गायत्री' शब्द का वास्तविक अर्थ केवल गान नहीं, अपितु रक्षा करना और दिव्य ऊर्जा का अवतरण कराना है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (गायत्री मन्त्रः) यस्मात् गायनम् (गायनं/गायन्तम्) त्रायते, ततः गायत्रीति स्मृतः। (सावित्री/गायत्री) स्वेन तेजसा श्येनो भूत्वा त्रिदिवात् सोमम् अहरत्।
पदार्थ-निर्वचन:
• गायनं(न्तं) त्रायते: यहाँ 'गायन' के दो अर्थ निहित हैं। प्रथम, जो इस मन्त्र का गान करता है (गायन्तम्), उसकी यह रक्षा करती है। द्वितीय, 'गय' शब्द का अर्थ प्राणों से है, अतः प्राणों की रक्षा करने वाली।
• त्रायते: रक्षा करना, त्राण करना या संकट से मुक्त करना।
• श्येनो भूत्वा: श्येन अर्थात् बाज। यहाँ यह एक प्रतीक है—अत्यंत तीव्र गति और ऊर्ध्वगामी चेतना का। साधक जब मन्त्र के तेज से अपनी चेतना को ऊपर उठाता है, तो वह 'श्येन' रूप धारण करता है।
• त्रिदिवात्: तीनों लोकों के ऊपर स्थित सर्वोच्च आकाश या स्वर्ग से।
• सोमम् अहरत्: सोम यहाँ केवल एक वनस्पति नहीं, अपितु वह दिव्य अमृत-तत्त्व है जो आनंद और अमरता का प्रतीक है। अपने तेज (तेजसा) के प्रभाव से उस अमृत को नीचे लाना ही 'सोमाहरण' है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री मन्त्र की रक्षात्मक शक्ति और उसकी ऊर्ध्वगामी प्रकृति का रहस्य उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो इस मन्त्र का गान करता है, यह मन्त्र उसकी रक्षा करता है, इसलिए इसे 'गायत्री' कहा गया। यहाँ 'रक्षा' शब्द केवल बाहरी संकटों से बचाव नहीं, अपितु साधक के प्राणों और उसकी आध्यात्मिक यात्रा की सुरक्षा का संकेत है।
इसके साथ ही ऋषि एक अत्यंत गूढ़ घटना का उल्लेख करते हैं कि यह मन्त्र (या इसकी शक्ति) श्येन पक्षी का रूप धारण कर अपने स्वयं के तेज से स्वर्गलोक से सोम ले आयी। यह प्रसंग दर्शाता है कि गायत्री केवल एक प्रार्थना नहीं, अपितु एक ऐसी 'शक्ति' है जो साधक की चेतना को स्थूल जगत से उठाकर सर्वोच्च शिखर तक ले जाने और वहाँ से अमृत-तत्त्व (सोम) को प्राप्त कर वापस लाने में सक्षम है।
श्रुति-संगति —
इस नाम-निर्वचन और सोमाहरण की घटना का मूल आधार श्रुति में मिलता है:
सा हैषा गयांस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणांस्तत्रेतद्यद्गयांस्तत्रे तस्माद्गायत्री नाम स यामेवामूमन्वाहैषैव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणांस्त्रायते ॥ १४.८.१५.७ ॥
इस (गायत्री) ने गयोंकी रक्षा की। प्राण ही "गय" हैं; इसने प्राणोंकी रक्षा की — क्योंकि इसने गयोंका त्राण किया, इसलिए इसका नाम गायत्री है। (आचार्य) जिस (सावित्री) का (शिष्यको) उपदेश करता है, वह यही है; और जिसे उपदेश करता है, उसके प्राणोंकी यह रक्षा करती है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि 'प्राण ही गय हैं' (प्राणा वै गयाः)। गायत्री ने प्राणों की रक्षा की, इसलिए इसका नाम गायत्री है। स्मृति का "गायनं त्रायते" इसी श्रुति का विस्तार है—जो मन्त्र प्राणों का त्राण करता है, वही वास्तव में गायत्री है।
तेभ्यो गायत्री सोममच्छापतत् । तस्या आहरन्त्यै गन्धर्वो विश्वावसुः पर्यमुष्णात्ते देवा अविदुः प्रच्युतो वै परस्तात्सोमोऽथ नो नागच्छति गन्धर्वा वै पर्यमोषिषुरिति ॥ ३.२.४.२ ॥
उनके लिए गायत्री सोमकी ओर उड़ी। जब वह (सोम) ला रही थी, तब विश्वावसु गन्धर्वने उसे छीन लिया। देवोंने जाना — "सोम उधर (स्वर्ग) से तो छूट गया, पर हमारे पास नहीं आता; गन्धर्वोंने उसे छीन लिया है।"
सोमाहरण की कथा यहाँ वर्णित है कि गायत्री सोम की ओर उड़ी और उसे प्राप्त किया। स्मृति का "श्येनो भूत्वा" इसी घटना का संकेत है, जो यह सिद्ध करता है कि गायत्री मन्त्र वह वाहन है जो साधक को अमृत-प्राप्ति के योग्य बनाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अन्य शास्त्रों में भी इस नाम-निर्वचन की पुष्टि मिलती है:
एवं सन्ध्याविधिं कृत्वा गायत्रीं च जपेत्स्मरेत् । गायञ्छिष्यान् यतस्त्रायेद्भार्यां प्राणांस्तथैव च ॥ ततः स्मृतेयं गायत्री सावित्रीयं ततो यतः । प्रकाशनात्सा सवितुर्वाग्रूपत्वात्सरस्वती ॥ २१६.१–२ ॥
(अग्निदेव —) इस प्रकार सन्ध्याका विधान करके गायत्रीका जप और स्मरण करे। क्योंकि यह गान करनेवालेके शिष्यों, पत्नी और प्राणोंकी रक्षा करती है (पाठान्तर: "कायान्" — शरीरोंकी), इसलिए गायत्री कहलाती है; सवितासे प्रकट होनेके कारण सावित्री, और वाणीरूपा होनेसे सरस्वती।
अग्नि पुराण के अनुसार, यह मन्त्र गान करने वाले के शिष्यों, पत्नी और प्राणों की रक्षा करता है, इसीलिए इसे गायत्री कहा गया। यहाँ स्मृति और पुराण दोनों एकमत हैं कि 'त्रायते' (रक्षा करना) ही इस नाम का मुख्य आधार है। साथ ही, सविता से प्रकट होने के कारण इसे सावित्री और वाणी-रूप होने के कारण सरस्वती कहा गया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ दो स्तरों पर अभ्यास और अनुभव निहित हैं:
प्रथम—'प्राण-रक्षा' का अनुभव। जब साधक गायत्री का जप करता है, तो मन्त्र की ध्वनि तरंगें उसके प्राणों को स्थिर करती हैं। 'त्रायते' का अर्थ है कि वह साधक को मानसिक विक्षेपों और प्राणिक असंतुलन से बचाकर उसे एक सुरक्षित आंतरिक स्थिति में ले जाता है।
द्वितीय—'सोमाहरण' का अभ्यास। योग में 'श्येन' बनना अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी करना है। जिस प्रकार श्येन तीव्र गति से आकाश की ऊँचाइयों को छूता है, उसी प्रकार गायत्री मन्त्र का तेज साधक के भीतर सोई हुई चेतना को जाग्रत कर उसे ऊपर उठाता है। जब साधक इस मन्त्र के प्रभाव से अपनी उच्चतम अवस्था (त्रिदिव) में पहुँचता है, तो वह वहाँ से 'सोम' यानी उस परम आनंद और शांति का अनुभव करता है, जो सामान्यतः भौतिक जगत में दुर्लभ है।
अतः यह श्लोक साधक को विश्वास दिलाता है कि गायत्री केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक दिव्य यंत्र है जो उसे सुरक्षा प्रदान करते हुए अमृत-तत्त्व की प्राप्ति कराता है।
प्रयोजनभेदेन गायत्रीपठनभेदाः
छन्दसां पोषणात् तस्मात् गायत्री वा ततः स्मृता ।
वेदेषु पठ्यते चान्या जप्यकालेऽन्यथा पुनः ॥ ४.३६ ॥
— छन्दोंका पोषण करनेसे भी (वह) गायत्री कही गयी है। वेदोंमें (वह) एक प्रकारसे पढ़ी जाती है, और जपके समय फिर दूसरे प्रकारसे —
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के नामों की निरुक्ति करते हुए उसे तीन स्वरों, तीन लोकों और सविता देवता से जोड़ा था तथा उसकी रक्षात्मक शक्ति का वर्णन किया था। वर्तमान श्लोक इस चर्चा को नाम-निर्वचन से आगे बढ़ाकर उसके प्रयोग की ओर ले जाता है, जहाँ वे मन्त्र के पोषणपरक स्वभाव और विभिन्न प्रयोजनों के अनुसार उसके पाठ-भेदों की भूमिका बाँधते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (गायत्री मन्त्रः) छन्दसां पोषणात् तस्मात् गायत्री वा ततः स्मृता। (सः एव गायत्री) वेदेषु पठ्यते च अन्या, जप्यकाले अन्यथा पुनः (पठ्यते)।
पदार्थ-निर्वचन:
• छन्दसां पोषणात्: छन्दों का पोषण करने के कारण। यहाँ 'पोषण' का अर्थ केवल बढ़ाना नहीं, अपितु उन्हें आधार प्रदान करना और उनमें प्राण फूँकना है। गायत्री को समस्त छन्दों की जननी माना गया है; वह अन्य सभी छंदों को शक्ति और स्थिरता देती है।
• स्मृता: कही गई है या प्रसिद्ध है।
• वेदेषु पठ्यते च अन्या: वेदों के पाठ (सामूहिक वाचन या स्वाध्याय) में यह एक विशिष्ट रीति से पढ़ी जाती है, जो कि 'अन्या' अर्थात् भिन्न है।
• जप्यकाले अन्यथा पुनः: जप के समय (जब साधक एकांत में मन्त्र का मानसिक या उपशुप्ते अभ्यास करता है) इसकी विधि फिर से 'अन्यथा' अर्थात् अलग होती है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री की उस व्यापकता को स्पष्ट कर रहे हैं जिससे वह समस्त वैदिक छंदों का पोषण करती है। जिस प्रकार एक माता अपनी सन्तानों का पोषण करती है, उसी प्रकार गायत्री मन्त्र अन्य सभी छन्दों के लिए आधार-शक्ति है। यदि कोई साधक केवल किसी विशिष्ट छंद का अभ्यास करता है, तो उसकी सिद्धि तभी संभव है जब उसके मूल में गायत्री का पोषण हो।
परन्तु, यहाँ महर्षि एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक भेद की ओर संकेत कर रहे हैं—'प्रयोजन-भेद'। वे कहते हैं कि मन्त्र एक ही है, किन्तु जिस उद्देश्य के लिए उसका प्रयोग किया जा रहा है, उस उद्देश्य के अनुसार उसकी 'पठन-विधि' बदल जाती है।
प्रथम स्थिति 'वेद-पाठ' की है। जब गायत्री का पाठ वेदों के क्रम में या सामूहिक स्वाध्याय के रूप में होता है, तब वह शास्त्रोक्त विधि से पढ़ी जाती है। यहाँ मुख्य बल मन्त्र की शुद्धता और उसके वाचन पर होता है।
द्वितीय स्थिति 'जप' की है। जप एक व्यक्तिगत साधना है, जिसका लक्ष्य अंतर्मुखी होना और इष्ट का साक्षात्कार करना है। अतः जप के समय इसकी विधि बदल जाती है; इसमें प्रणव (ओंकार) और व्याहृतियों का समावेश होता है ताकि साधक स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर प्रवेश कर सके।
यह भेद यह स्पष्ट करता है कि मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक जीवंत ऊर्जा है। जिस प्रकार औषधि का प्रयोग रोग के अनुसार बदलता है, उसी प्रकार गायत्री का पाठ प्रयोजन के अनुसार बदलता है। याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को सचेत कर रहे हैं कि विधि का ज्ञान होना अनिवार्य है, क्योंकि गलत विधि से मन्त्र का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
श्रुति-संगति —
इस पाठ-भेद की महत्ता श्रुति में भी स्पष्ट दिखाई देती है:
तां हैके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वागनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति न तथा कुर्याद्गायत्रीमेवानुब्रूयाद्यदि ह वा अपि बह्विव प्रतिगृह्णाति न हैव तद्गायत्र्या एकं चन पदं प्रति ॥ १४.८.१५.८ ॥
कुछ लोग अनुष्टुप् छन्दकी सावित्री (शिष्यको) बताते हैं, यह सोचकर कि "अनुष्टुप् वाणी है, हम (शिष्यमें) वाणीका उपदेश करते हैं"। ऐसा न करे; गायत्री (छन्दकी सावित्री) ही बताये। (गायत्रीको जाननेवाला) चाहे बहुत-सा भी (दान) ग्रहण कर ले, वह गायत्रीके एक पदके बराबर भी नहीं होता।
यहाँ शतपथ ब्राह्मण यह चेतावनी देता है कि कुछ लोग अनुष्टुप् छन्द को सावित्री (गायत्री) मानकर उसका उपदेश करते हैं, जो कि त्रुटिपूर्ण है। श्रुति दृढ़ता से कहती है कि गायत्री का ही विधान करना चाहिए क्योंकि गायत्री के एक पद का मूल्य समस्त भौतिक दान से ऊपर है। याज्ञवल्क्य की स्मृति इसी श्रुति-परम्परा का विस्तार करती है—वे केवल यह नहीं कह रहे कि गायत्री पढ़ो, बल्कि यह बता रहे हैं कि उसे 'कैसे' पढ़ना है। यदि कोई साधक अनुष्टुप् और गायत्री के भेद को नहीं जानता, तो वह उस दिव्य निधि से वंचित रह जाता है जिसे श्रुति सर्वोपरि मानती है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साधना के स्तर' का बोध कराता है। एक ही मन्त्र के भिन्न पाठ-भेद वास्तव में चेतना की विभिन्न अवस्थाओं के प्रतीक हैं:
१. वेद-पाठ (बाह्य स्तर): यह वाक्-स्तर की साधना है, जहाँ मन्त्र का उच्चारण शुद्ध होता है। यहाँ साधक 'अक्षर' से जुड़ता है।
२. जप (आन्तर स्तर): जब साधक जप करता है, तो वह शब्द से परे उसके 'बीज' और 'स्पंदन' में उतरता है। यहाँ प्रणव और व्याहृतियों का प्रयोग उसे बाह्य जगत से काटकर हृदय के भीतर स्थित सूर्य (आत्मा) की ओर मोड़ देता है।
साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि जब वह वेद-पाठ करता है, तो वह ज्ञान का अर्जन कर रहा है; किन्तु जब वह जप करता है, तो वह उस ज्ञान को अपने प्राणों में उतार रहा है। पोषण का अर्थ यहाँ 'प्राण-शक्ति का संचार' है। जो साधक गायत्री के इन भेदों को जानकर अभ्यास करता है, उसकी चेतना केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह मन्त्र के माध्यम से स्वयं के भीतर स्थित 'सविता' (जागृत सूर्य) का अनुभव करने लगता है। यह श्लोक साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह समझता है कि साधन (विधि) और साध्य (फल) के बीच एक गहरा सम्बन्ध है।
प्राणायामे तथा ध्याने होमकालेषु चान्यथा ।
निग्रहे चापि शत्रूणामन्यथा परिपठ्यते ॥ ४.३७ ॥
...प्राणायाम में तथा ध्यान में और होम के समय दूसरी प्रकार से, तथा शत्रुओं के निग्रह (दमन) में भी दूसरी प्रकार से परिपठित की जाती है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि गायत्री का पाठ वेदों के सामान्य वाचन और व्यक्तिगत जप के समय भिन्न-भिन्न होता है। वर्तमान श्लोक उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए उन अन्य विशिष्ट प्रयोजनों की सूची प्रस्तुत करता है, जहाँ मन्त्र के प्रयोग की रीति बदल जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (गायत्री मन्त्रः) प्राणायामे तथा ध्याने होमकालेषु च अन्यथा (पठ्यते), निग्रहे चापि शत्रूणामन्यथा परिपठ्यते।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्राणायाम, ध्यान, होमकाल: ये तीन भिन्न अवस्थाएँ हैं—प्राण का नियमन, चित्त का एकाग्रिकरण और अग्नि में आहुति का कर्म। इन तीनों के समय मन्त्र के साथ जुड़ने वाले अवयव (जैसे प्रणव, व्याहृति या शिरस्) बदल जाते हैं।
• अन्यथा: दूसरी प्रकार से। यहाँ 'अन्यथा' शब्द यह संकेत देता है कि मूल मन्त्र के पद स्थिर हैं, किन्तु उसके आरम्भ, अन्त और सहायक अंगों का विन्यास प्रयोजन के अनुसार परिवर्तित होता है।
• निग्रहे चापि शत्रूणामन्यथा: शत्रुओं के दमन या निग्रह के समय भी इसका पाठ एक भिन्न रीति से किया जाता है। यहाँ 'परिपठ्यते' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है—पूर्णता के साथ या एक विशिष्ट चक्र में पढ़ना।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक जीवंत शक्ति है जिसकी अभिव्यक्ति साधक के 'भाव' और 'प्रयोजन' पर निर्भर करती है। जब साधक का लक्ष्य भिन्न होता है, तो उसकी मानसिक तरंगें और प्राणिक ऊर्जा का प्रवाह भी भिन्न दिशा में होता है; अतः मन्त्र की बाहरी संरचना (जैसे व्याहृतियों का संयोजन) को उस प्रयोजन के अनुकूल करना आवश्यक हो जाता है।
यहाँ ऋषि केवल चार मुख्य प्रयोगों की चर्चा कर रहे हैं:
१. प्राणायाम: जहाँ मन्त्र प्राणवायु के नियंत्रण और विस्तार से जुड़ा होता है।
२. ध्यान: जहाँ मन्त्र चित्त को एक बिंदु पर स्थिर करने का साधन बनता है।
३. होम: जहाँ मन्त्र अग्नि के माध्यम से देवताओं तक आहुति पहुँचाने का माध्यम है।
४. शत्रु-निग्रह: जहाँ मन्त्र की शक्ति का प्रयोग बाधाओं के निवारण और रक्षा हेतु किया जाता है।
यह श्लोक अपने आप में एक सूची मात्र है। यह आने वाले श्लोकों (४.३८–४१) के लिए भूमिका तैयार करता है, जिनमें याज्ञवल्क्य विस्तार से बताएंगे कि प्राणायाम में 'शिरस्' का प्रयोग कैसे करना है, होम में 'स्वाहा' का अंत कैसे करना है और जप में व्याहृतियों का क्रम क्या होगा। यह स्पष्ट है कि मन्त्र की शक्ति उसके सही विन्यास में निहित है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि 'कर्म' बदलने पर 'रूप' बदलता है। योगिक दृष्टि से देखें तो जब साधक प्राणायाम करता है, तब उसका केंद्र प्राण है; जब ध्यान करता है, तब केंद्र मन है; और जब होम करता है, तब केंद्र अग्नि (तेजस) है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि एक ही मन्त्र अलग-अलग मानसिक अवस्थाओं में अलग-अलग प्रभाव डालता है। यदि वह केवल शब्दों का पाठ करे तो वह 'वेदपाठ' है, किन्तु यदि वह प्रयोजन के अनुसार अंगों (प्रणव, व्याहृति) को जोड़कर अभ्यास करे, तो वह उस विशिष्ट ऊर्जा-क्षेत्र में प्रवेश करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपनी वर्तमान मानसिक स्थिति और लक्ष्य को पहचानकर ही मन्त्र का चयन और विन्यास करे, ताकि मन्त्र की शक्ति व्यर्थ न जाए और वह सटीक फल प्रदान करे।
ओंकारं व्याहृतीस्तिस्रः प्रथमं संप्रयोजयेत् ।
ओंकाराद्या त्रिरावर्त्या वेदस्यारम्भणे तथा ॥ ४.३८ ॥
पहले ओंकार और तीन व्याहृतियोंका प्रयोग करे; और वेद(पाठ) के आरम्भमें (गायत्री) ओंकारसे आरम्भ करके तीन बार दोहरानी चाहिए।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इस रहस्य को उद्घाटित किया कि प्रयोजन के अनुसार गायत्री के पाठ की रीति बदल जाती है—चाहे वह सामान्य वेद-पाठ हो, जप हो अथवा निग्रह कर्म। वर्तमान श्लोक इसी क्रम में प्रथम विधि का निरूपण करता है कि वेद के अध्ययन और वाचन के आरम्भ में मन्त्र का विन्यास कैसा होना चाहिए।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधकः) ओंकारं व्याहृतीस्तिस्रः प्रथमं संप्रयोजयेत्। तथा वेदस्यारम्भणे ओंकाराद्या त्रिरावर्त्या (गायत्रीं प्रयोजयेत्)।
पदार्थ-निर्वचन:
• ओंकारं व्याहृतीस्तिस्रः: यहाँ 'ओंकार' प्रणव है और 'व्याहृतयस्तिस्रः' वे तीन शब्द हैं— भूः, भुवः, स्वः।
• प्रथमं संप्रयोजयेत्: आरम्भ में प्रयोग करना चाहिए। यह विधि मन्त्र के मुख्य पदों से पूर्व उसकी आधार-भूमि तैयार करने की प्रक्रिया है।
• वेदस्यारम्भणे: जब साधक वेदों का स्वाध्याय या पाठ आरम्भ करता है, उस समय।
• ओंकाराद्या त्रिरावर्त्या: ओंकार से आरम्भ करके तीन बार दोहराते हुए (त्रिरावृत्ति)। यहाँ 'त्रिरावर्त्या' शब्द यह संकेत देता है कि मन्त्र की एक आवृत्ति पर्याप्त नहीं है, अपितु तीन बार का दोहराव आवश्यक है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ वेद-अध्ययन की उस मर्यादा को बता रहे हैं जो ज्ञान के ग्रहण से पूर्व चित्त को शुद्ध और एकाग्र करने के लिए अनिवार्य है। वे कहते हैं कि किसी भी वैदिक पाठ के आरम्भ में सबसे पहले प्रणव (ओंकार) और तीनों व्याहृतियों का प्रयोग करना चाहिए।
बाहरी दृष्टि से यह एक विधि है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। प्रणव वह बीज है जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड समाहित है, और भूः, भुवः, स्वः वे तीन आयाम हैं जिनमें यह सृष्टि व्याप्त है। जब साधक वेद-पाठ से पूर्व इनका उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में अपने स्थूल शरीर (भूः), प्राणिक ऊर्जा (भुवः) और चैतन्य स्वरूप (स्वः) को उस एक 'अक्षर' (ओंकार) में विलीन कर रहा होता है। इस प्रकार मन्त्र के मुख्य पदों तक पहुँचने से पूर्व साधक अपनी चेतना को भूतल से उठाकर शून्य की ओर ले जाता है।
विशेष रूप से, वेदारम्भ के समय गायत्री को ओंकार सहित तीन बार दोहराने का विधान है। यह त्रिरावृत्ति केवल संख्या नहीं है; यह संकल्प, प्राण और मन की त्रिविध शुद्धि का प्रतीक है। वेद ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली होता है; यदि साधक बिना तैयारी के उसमें प्रवेश करता है, तो वह केवल शब्दों का संग्रह रह जाता है। अतः तीन बार गायत्री का पाठ करके वह अपनी बुद्धि को उस 'सविता' (प्रकाश-पुंज) से जोड़ता है, जिससे वेदों के गूढ़ अर्थों को समझने की पात्रता प्राप्त होती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा । स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं परस्ताच्च विशीर्यति ॥ २.७४ ॥
वेद(पाठ) के आरम्भ और अन्तमें सदा प्रणव लगाये; जिसके आरम्भमें ओंकार न हो वह बह जाता है, और जिसके अन्तमें न हो वह बिखर जाता है।
मनुस्मृति में भी इसी सिद्धांत का समर्थन किया गया है कि वेद के आरम्भ और अन्त में प्रणव अनिवार्य है, अन्यथा ज्ञान बिखर जाता है या बह जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य की यह स्मृति मनुस्मृति के इस विधान को विस्तार देती है; जहाँ मनु ने केवल प्रणव की अनिवार्यता बताई, वहीं याज्ञवल्क्य ने व्याहृतियों के संयोजन और त्रिरावृत्ति की विशिष्ट विधि बताकर उसे एक पूर्ण साधना पद्धति में परिवर्तित कर दिया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्वाध्याय' का प्रवेश-द्वार है। योग में स्वाध्याय केवल पढ़ना नहीं, बल्कि स्वयं का अध्ययन करना है। वेद ग्रहण करने से पूर्व गायत्री का यह प्रयोग बुद्धिमत्ता (धी) को प्रेरित करने की प्रार्थना है।
अभ्यास यह है कि जब साधक वेदों के सम्मुख बैठता है, तो वह पहले प्रणव के माध्यम से अपने भीतर के मौन को जाग्रत करता है और व्याहृतियों के द्वारा अपनी चेतना को पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग के स्तरों पर संतुलित करता है। तीन बार मन्त्र का दोहराव उसे 'अविद्या' के अंधकार से निकालकर 'विद्या' के प्रकाश में प्रतिष्ठित करता है। यह अभ्यास साधक को इस भूमि से उस भूमि तक ले जाता है जहाँ वह केवल एक पाठक नहीं रहता, बल्कि वेदों के मर्म को अनुभव करने वाला 'द्रष्टा' बन जाता है। यहाँ ओंकार का प्रयोग चित्त की चंचलता को रोककर उसे अक्षर-रूप में स्थिर करने का साधन है।
प्रणवाद्या तु विज्ञेया जप्ये व्याहृतिभिः सह ।
ताभिस्तु सप्तभिः सार्धं सप्तोंकारसमन्विताम् ॥ ४.३९ ॥
जपमें (गायत्री) प्रणवसे आरम्भ होनेवाली, व्याहृतियों सहित जाननी चाहिए। उन सात (व्याहृतियों) के साथ, सात ओंकारोंसे युक्त —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेद-पाठ के आरम्भ की विधि बताई थी कि वहाँ ओंकार और तीन व्याहृतियों का प्रयोग कर मन्त्र को तीन बार दोहराना चाहिए। अब वर्तमान श्लोक में वे जप और प्राणायाम के विशिष्ट प्रयोजनों के लिए गायत्री के विन्यास के भेद को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधकः) जप्ये (गायत्रीं) प्रणवाद्या तु व्याहृतिभिः सह विज्ञेया। (तथा प्राणायामे) ताभिस्तु सप्तभिः सार्धं सप्तोंकारसमन्विताम् (विज्ञेया)।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्रणवाद्या: 'प्रणव' (ओंकार) से आरम्भ होने वाली। यहाँ 'आद्य' शब्द यह दर्शाता है कि जप की प्रक्रिया का प्रथम बिंदु प्रणव होना चाहिए, क्योंकि बिना बीज के फल की प्राप्ति संभव नहीं।
• व्याहृतिभिः सह: व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) के साथ। जप में मन्त्र के मुख्य भाग से पूर्व इन शब्दों का प्रयोग चित्त को स्थूल जगत से सूक्ष्म की ओर मोड़ने के लिए किया जाता है।
• विज्ञेया: जाना जाना चाहिए या इस रीति से प्रयोग करना चाहिए। यह केवल सूचना नहीं, अपितु एक विधि-विधान (विधिलिङ्) है।
• ताभिस्तु सप्तभिः सार्धं: यहाँ 'ताभिः' शब्द पिछले व्याहृतियों की ओर संकेत करता है, किन्तु संख्या 'सप्तभिः' (सात) होने से यह स्पष्ट होता है कि प्राणायाम के समय केवल तीन नहीं, अपितु सातों व्याहृतियों का प्रयोग करना है।
• सप्तोंकारसमन्विताम्: सात ओंकारों से युक्त। अर्थात् प्रत्येक व्याहृति से पूर्व एक ओंकार का विन्यास होगा।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र के प्रयोग में 'प्रयोजन-भेद' को स्थापित कर रहे हैं। वे बताते हैं कि जब साधक केवल जप (एकाग्रता और शुद्धि) के लिए गायत्री का आश्रय लेता है, तब उसे प्रणव से आरम्भ करके तीन व्याहृतियों सहित उसका पाठ करना चाहिए। यह विधि साधक को इस भौतिक देह (भूः), प्राणमय कोष (भुवः) और मानसिक प्रकाश (स्वः) के स्तर पर संतुलित कर मन्त्र की शक्ति में प्रवेश कराती है।
किन्तु, जब यही प्रक्रिया प्राणायाम के स्तर पर पहुँचती है, तो उसकी व्यापकता बढ़ जाती है। यहाँ महर्षि कहते हैं कि प्राणायाम में गायत्री का प्रयोग सात व्याहृतियों और सात ओंकारों के साथ होना चाहिए। यह वाक्य पूर्णतः श्लोक ४.४० के आरम्भिक शब्दों 'शिरसा सहितां' के साथ जुड़कर पूरा होता है, जहाँ यह बताया गया है कि इस विन्यास के साथ शिरस् (मन्त्र का शीर्ष भाग) का प्रयोग प्राणायाम में करना है।
बाहरी दृष्टि से यह केवल संख्या का खेल प्रतीत हो सकता है, किन्तु रहस्य यह है कि जप एक आंतरिक संचय है, जबकि प्राणायाम प्राणों का विस्तार और आरोहण है। सात व्याहृतियाँ—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्—सृष्टि के सात आयामों या लोकों का प्रतिनिधित्व करती हैं। जब साधक प्रत्येक व्याहृति से पूर्व ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में प्रत्येक लोक की सीमा को लांघकर उच्चतर चेतना में प्रवेश करने का प्रयास करता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'आरोहण' का विज्ञान है। जप की विधि में तीन व्याहृतियों का प्रयोग साधक को वर्तमान अस्तित्व (पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग) में स्थिर करता है। किन्तु प्राणायाम में सात व्याहृतियों और सात ओंकारों का अभ्यास उसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक सीढ़ी प्रदान करता है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक प्राणायाम करता है, तो वह केवल श्वास का नियंत्रण नहीं कर रहा होता, अपितु प्रत्येक ओंकार के साथ अपनी चेतना को ऊपर उठाता है। 'भूः' से आरम्भ कर 'सत्यम्' तक पहुँचते हुए साधक अनुभव करता है कि वह भौतिक जगत से उठकर सत्य-लोक (परम तत्व) की ओर अग्रसर हो रहा है। सात ओंकारों का प्रयोग यहाँ प्राणों के सात स्तरों को जाग्रत करने और उन्हें एक सूत्र में पिरोने का साधन है। इस अभ्यास से साधक अपनी चेतना को निम्न भूमियों से उठाकर उच्चतम भूमि तक ले जाता है, जिससे मन्त्र की शक्ति केवल वाणी तक सीमित न रहकर उसके संपूर्ण प्राण-तत्व में व्याप्त हो जाती है।
शिरसा सहितां देवीं प्राणायामे प्रयोजयेत् ।
प्रणवव्याहृतिभिः सार्धं स्वाहान्तां होमकर्मणि ॥ ४.४० ॥
— और शिरस् सहित देवीका प्राणायाममें प्रयोग करे; होम-कर्ममें प्रणव और व्याहृतियों सहित, अन्तमें "स्वाहा" वाली (गायत्रीका)।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप की विशिष्ट विधि बताते हुए प्रणव और सात व्याहृतियों के विन्यास का निर्देश किया था। वर्तमान श्लोक में वे इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए प्राणायाम और होम-कर्म के लिए गायत्री के प्रयोग के भेदों को स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक प्रयोजन के अनुसार मन्त्र की शक्ति का उचित विनियोग कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधकः) शिरसा सहितां देवीं प्राणायामे प्रयोजयेत्। (तथा) प्रणव-व्याहृतिभिः सार्धं स्वाहान्तां (गायत्रीं) होमकर्मणि (प्रयोजयेत्)।
पदार्थ-निर्वचन:
• शिरसा सहितां: 'शिरस्' का अर्थ है मन्त्र का मस्तक या उसका आरम्भिक भाग। गायत्री के संदर्भ में शिरस् उस गुप्त या विशिष्ट अंश को कहते हैं जो मन्त्र की पूर्णता करता है। यहाँ 'सहिताम्' शब्द यह दर्शाता है कि प्राणायाम में मन्त्र को उसके पूर्ण स्वरूप (मस्तक सहित) में लेना अनिवार्य है।
• देवीं: गायत्री मन्त्र के लिए यहाँ 'देवी' शब्द का प्रयोग हुआ है। यह संकेत है कि मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक जीवन्त चेतना और शक्ति है।
• प्राणायामे प्रयोजयेत्: प्राणायाम में इसका प्रयोग करना चाहिए। 'प्रयोजयेत्' विधिलिङ् है, जो इस क्रिया की अनिवार्यता को प्रकट करता है।
• स्वाहान्ताम्: वह मन्त्र जिसका अन्त 'स्वाहा' शब्द से होता हो। होम-कर्म में मन्त्र के अन्त में 'स्वाहा' जोड़ना उसे आहुति के योग्य बनाता है, जिससे मन्त्र की शक्ति अग्नि के माध्यम से देवता तक पहुँचती है।
• होमकर्मणि: अग्नि-होत्र या हवन की क्रिया में।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को बाहरी विधि और आन्तर रहस्य के बीच का सेतु बता रहे हैं। वे दो भिन्न कर्मों—प्राणायाम और होम—के लिए मन्त्र के अलग-अलग विन्यास का विधान कर रहे हैं।
प्रथम निर्देश प्राणायाम के विषय में है। महर्षि कहते हैं कि जब साधक प्राणायाम करे, तब उसे गायत्री देवी का प्रयोग 'शिरस्' (मस्तक) सहित करना चाहिए। बाहरी दृष्टि से यह मन्त्र के पूर्ण पाठ की विधि है, किन्तु आन्तरिक रूप से शिरस् वह बिंदु है जहाँ प्राण और मन का मिलन होता है। प्राणायाम केवल श्वास का व्यायाम नहीं, अपितु मन्त्र के माध्यम से प्राण को उसके मूल स्रोत तक ले जाने की प्रक्रिया है। जब मन्त्र 'शिरस्' सहित होता है, तब वह पूर्णता को प्राप्त करता है; जैसे शरीर बिना सिर के अधूरा है, वैसे ही प्राणायाम में बिना शिरस् के मन्त्र अपनी पूर्ण शक्ति प्रदान नहीं करता।
द्वितीय निर्देश होम-कर्म का है। यहाँ वे कहते हैं कि अग्निहोत्र के समय गायत्री का प्रयोग प्रणव और व्याहृतियों के साथ हो, तथा उसका समापन 'स्वाहा' से हो। बाहरी विधि में यह आहुति देने का तरीका है, किन्तु इसका रहस्य यह है कि जब साधक 'स्वाहा' कहता है, तो वह अपने अहंकार और सीमित व्यक्तित्व की आहुति उस दिव्य अग्नि में दे देता है। प्रणव (ओंकार) बीज है, व्याहृतियाँ (भूः भुवः स्वः) मार्ग हैं, और स्वाहा उस यात्रा का समर्पण है। होम-कर्म यहाँ केवल कुंड की अग्नि नहीं, अपितु जठराग्नि और प्राण-अग्नि का शोधन भी है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक अत्यंत सूक्ष्म अभ्यास का निर्देश देता है। विशेषतः प्राणायाम के समय, जैसा कि पिछले श्लोक (४.३९) में सात ओंकारों और सात व्याहृतियों की बात कही गई थी, यहाँ उसे 'शिरस्' सहित जोड़ने को कहा गया है।
योगिक दृष्टि से इसका अभ्यास इस प्रकार है: एक ही श्वास-चक्र के भीतर—सात बार प्रणव का नाद, सात व्याहृतियों का विन्यास, फिर गायत्री मन्त्र और अंत में उसका शिरस्। यह एक पूर्ण आध्यात्मिक चक्र है। जब साधक एक श्वास में इस पूरी श्रृंखला को संपन्न करता है, तो वह स्थूल शरीर से उठकर सूक्ष्म स्तर पर प्रविष्ट होता है। सात ओंकार और सात व्याहृतियाँ चित्त की सात परतों को भेदती हैं और 'शिरस्' का स्पर्श उसे उस उच्चतम बिंदु पर ले जाता है जहाँ मन्त्र मौन हो जाता है और केवल अनुभव शेष रहता है।
होम-कर्म के संदर्भ में, साधक जब 'स्वाहा' का उच्चारण करता है, तो वह अपने भीतर की समस्त अशुद्धियों को गायत्री की अग्नि में भस्म करने का अभ्यास करता है। इस प्रकार, याज्ञवल्क्य जी हमें बता रहे हैं कि बाहरी कर्म (होम) और आंतरिक साधना (प्राणायाम) दोनों का लक्ष्य एक ही है—साधक का पूर्ण रूपांतरण। जो साधक इस विधि से अभ्यास करता है, वह केवल मन्त्र नहीं जपता, बल्कि अपनी चेतना को अक्षर-रूप में परिवर्तित करने की दिशा में अग्रसर होता है।
गायत्रीज्ञानमाहात्म्यम्
प्रतिलोमा प्रयोक्तव्या फट्कारान्ताऽऽभिचारिके ।
एवं यस्तु विजानाति गायत्रीं ब्राह्मणस्तु सः ॥ ४.४१ ॥
अभिचारिक कर्म में "फट्" अन्त वाली, प्रतिलोम क्रम से प्रयोग करनी चाहिए; और जो इस प्रकार गायत्री को जानता है, वह ब्राह्मण है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेद-पाठ, जप, प्राणायाम और होम-कर्म के लिए गायत्री मन्त्र के विशिष्ट विन्यास का निर्देश किया। वर्तमान श्लोक इस क्रम की अंतिम कड़ी है, जहाँ वे अभिचार कर्म के प्रयोग को स्पष्ट कर इस संपूर्ण प्रकरण का उपसंहार करते हुए 'ब्राह्मण' की वास्तविक परिभाषा प्रतिपादित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधकः) अभिचारिके (गायत्रीं) प्रतिलोमा (क्रमम्) प्रयोक्तव्या फट्कारान्ताऽऽभिचारिके। एवं यस्तु गायत्रीं विजानाति, सः ब्राह्मणस्तु।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्रतिलोमा: 'अनुलोम' का विपरीत। यहाँ मन्त्र के अक्षरों या पदों के क्रम को उलटकर प्रयोग करने की विधि है।
• फट्कारान्ता: जिसका अन्त 'फट्' शब्द से होता हो। तंत्र और अभिचार शास्त्र में 'फट्' शब्द का प्रयोग शक्ति के तीव्र प्रक्षेप और बाधा-निवारण के लिए किया जाता है।
• अभिचारिके: अभिचार कर्म में। यह वह क्रिया है जहाँ मन्त्र की शक्ति का प्रयोग किसी विशिष्ट उद्देश्य (जैसे शत्रु निग्रह या रक्षा) के लिए किया जाता है।
• एवं यस्तु विजानाति: जो इस प्रकार (उपर्युक्त सभी प्रयोग-भेदों को) जानता है। यहाँ 'विजानाति' शब्द केवल सूचना प्राप्त करने के लिए नहीं, अपितु मन्त्र के सूक्ष्म रहस्यों और उनके विनियोग के ज्ञान के लिए प्रयुक्त हुआ है।
• ब्राह्मणस्तु सः: वह वास्तव में ब्राह्मण है। यहाँ ब्राह्मणत्व जाति से नहीं, अपितु गायत्री के पूर्ण और यथार्थ ज्ञान (विद्या) से सिद्ध होता है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में मन्त्र-प्रयोग की उस सीमा को स्पर्श कर रहे हैं जहाँ शक्ति का विनियोग तीव्र और आक्रामक होता है। वे निर्देश करते हैं कि जब गायत्री का प्रयोग अभिचार कर्म में किया जाए, तो वह 'प्रतिलोम' (उलटे क्रम) में और अन्त में 'फट्' के साथ होना चाहिए।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि मन्त्र की शक्ति उसके विन्यास में निहित होती है। जिस प्रकार अनुलोम जप सात्त्विक शांति और आत्म-उत्थान के लिए होता है, उसी प्रकार प्रतिलोम प्रयोग उसकी ऊर्जा को बाहर की ओर प्रेषित करने के लिए किया जाता है। महर्षि यहाँ विधि तो बता रहे हैं, किन्तु साधक का संकेत केवल ज्ञान की पूर्णता की ओर कर रहे हैं।
श्लोक का दूसरा भाग अत्यंत गम्भीर है— "एवं यस्तु विजानाति गायत्रीं ब्राह्मणस्तु सः"। यह कथन इस पूरे अध्याय का उपसंहार है। याज्ञवल्क्य जी यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति गायत्री के इन सभी भेदों—वेद-पाठ, जप, प्राणायाम, होम और अभिचार—के सूक्ष्म अंतर और उनके सही विनियोग को जानता है, वही वास्तव में 'ब्राह्मण' कहलाने का अधिकारी है। यह ब्राह्मणत्व का वह लक्षण है जो अध्याय के आरम्भ (श्लोक ४.३) से जुड़ा हुआ है। यहाँ ब्राह्मण होने का अर्थ केवल जन्म-कुल नहीं, अपितु मन्त्र-विद्या का पूर्ण अधिष्ठान है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक चेतावनी और एक सिद्धि-बोध दोनों है। योग में 'प्रतिलोम' क्रियाएँ प्रायः प्राण के विपरीत प्रवाह या तीव्र प्रहार से जुड़ी होती हैं, किन्तु एक योगी के लिए मन्त्र का सात्त्विक प्रयोग ही सर्वोपरि है। यहाँ प्रतिलोम और फट्कारान्ता का उल्लेख इसलिए किया गया है ताकि साधक को यह ज्ञात रहे कि मन्त्र की शक्ति बहुआयामी है; वह जहाँ सृजन कर सकती है, वहीं विनियोग बदलने पर विसर्जन भी कर सकती है।
साधक के लिए इस श्लोक का मुख्य अभ्यास 'विवेक' है। उसे यह अनुभव करना चाहिए कि मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक जीवित ऊर्जा है जिसे बिना पूर्ण ज्ञान और गुरु-निर्देश के नहीं छेड़ना चाहिए।
यहाँ 'ब्राह्मणत्व' का योगिक अर्थ है— 'ब्रह्म' को जानने वाला। जो साधक गायत्री के बाहरी विन्यास (विधि) से लेकर उसके आन्तर रहस्य (ज्ञान) तक को पूर्णतः आत्मसात कर लेता है, वह अपनी चेतना को निम्न स्तर से उठाकर उस उच्च भूमि पर ले जाता है जहाँ वह मन्त्र की शक्ति का स्वामी बन जाता है। इस प्रकार, यह ज्ञान साधक को केवल एक विधि-विशेष नहीं सिखाता, अपितु उसे 'विद्या' के माध्यम से पात्रता प्रदान करता है, जिससे वह जन्म-जात पहचान से ऊपर उठकर वास्तविक 'ब्रह्म-ज्ञानी' या ब्राह्मण बनता है।
अन्यथा शूद्रधर्मा स्याद्वेदानामपि पारगः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ज्ञातव्या ब्राह्मणेन सा ॥ ४.४२ ॥
अन्यथा वेदों का पारगामी होकर भी शूद्रधर्म वाला होगा; इसलिए ब्राह्मण को सब प्रयत्न से उसे जानना चाहिए।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री मन्त्र के विभिन्न विनियोगों—वेद-पाठ, जप, प्राणायाम, होम और अभिचार—का विस्तृत विवरण दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो इन सूक्ष्म भेदों को जानता है, वही वास्तव में ब्राह्मण है। वर्तमान श्लोक इसी कथन का तार्किक विस्तार है, जहाँ वे इस ज्ञान की अनिवार्यता और इसके अभाव में होने वाली आध्यात्मिक हानि को प्रतिपादित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) वेदानामपि पारगः (परन्तु एवं प्रकारेन गायत्रीं न विजानाति चेत्), अन्यथा शूद्रधर्मा स्यात्। तस्मात् सा (गायत्री-विद्या) ब्राह्मणेन सर्वप्रयत्नेन ज्ञातव्या।
पदार्थ-निर्वचन:
• अन्यथा: यदि ऐसा न हो; अर्थात् यदि उपर्युक्त वर्णित गायत्री के विनियोग-भेदों का ज्ञान न हो।
• वेदानामपि पारगः: वेदों के सम्पूर्ण ज्ञान में निपुण, समस्त वेदों का अध्ययन करने वाला।
• शूद्रधर्मा स्यात्: शूद्र-धर्म वाला होगा। यहाँ 'शूद्रधर्मा' शब्द उस ब्राह्मण की स्थिति के लिए प्रयुक्त हुआ है जो केवल स्थूल ज्ञान (सूचना) रखता है, किन्तु मन्त्र की जीवंत शक्ति और उसके प्रयोग-विधान से अनभिज्ञ है। वह वैदिक कर्मों के वास्तविक फल और अधिकार से च्युत हो जाता है।
• सर्वप्रयत्नेन: समस्त प्रयासों से; इसमें केवल बौद्धिक प्रयत्न नहीं, अपितु साधना, गुरु-आज्ञा का पालन और निरंतर अभ्यास सम्मिलित है।
• ज्ञातव्या: जानना चाहिए (विधि लिङ्)। यह एक अनिवार्य विधान है कि ब्राह्मणत्व की पूर्णता के लिए इस ज्ञान को प्राप्त करना आवश्यक है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत कठोर किन्तु सत्य चेतावनी दे रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति चारों वेदों का प्रकाण्ड विद्वान हो, समस्त शास्त्रों का ज्ञाता हो, किन्तु उसे गायत्री मन्त्र के उन सूक्ष्म प्रयोगों (जैसे प्रणव-व्याहृति सहित जप, शिरस् सहित प्राणायाम आदि) का ज्ञान न हो, तो उसका वह पाण्डित्य निष्फल है। ऐसा व्यक्ति वेदपारग होते हुए भी 'शूद्रधर्मा' कहलाता है।
यहाँ महर्षि की दृष्टि अत्यंत स्पष्ट है—वेद केवल शब्दों का संग्रह नहीं हैं, अपितु वे एक जीवित शक्ति-धारा हैं। जब कोई ब्राह्मण केवल शब्दों को पढ़ता है किन्तु उस मन्त्र के बीज (गायत्री) के विनियोग और उसके आंतरिक रहस्यों से अनभिज्ञ रहता है, तो वह ज्ञान केवल 'सूचना' मात्र रह जाता है। वह व्यक्ति कर्मकाण्ड की बाहरी क्रियाएँ तो कर सकता है, परन्तु उन क्रियाओं के पीछे छिपे योगिक और आध्यात्मिक प्रभाव को प्राप्त नहीं कर पाता। अतः, मन्त्र-शक्ति के प्रयोग-विधान से वंचित होना उस ब्राह्मण की अपनी महान हानि है; वह अपने ही अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाता है और उसकी स्थिति उस व्यक्ति जैसी हो जाती है जिसे वेदों के रहस्यों का कोई अधिकार न हो।
इसीलिए याज्ञवल्क्य निर्देश देते हैं कि एक ब्राह्मण को सर्वप्रयत्न से इस विद्या को जानना चाहिए। गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु वह समस्त वैदिक ज्ञान की कुंजी है। यदि कुंजी ही लुप्त हो, तो ज्ञान के विशाल खजाने का द्वार नहीं खुल सकता। अतः ब्राह्मणत्व की वास्तविक कसौटी जाति या केवल शास्त्र-पठन नहीं, अपितु गायत्री के यथार्थ स्वरूप और उसके विनियोग का अनुभवजन्य ज्ञान है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'सूचना' और 'अनुभव' के बीच के भेद को स्पष्ट करता है। वेद का पाण्डित्य यदि केवल मस्तिष्क तक सीमित है (बौद्धिक ज्ञान), तो वह योग की दृष्टि से अधूरा है। बिना गायत्री के अनुभव के, वेदों का अध्ययन केवल एक मानसिक व्यायाम बनकर रह जाता है, क्योंकि मन्त्र की जीवंत शक्ति ही शब्दों को अनुभव में परिवर्तित करती है।
साधक के लिए यहाँ मुख्य अभ्यास यह है कि वह किसी भी शास्त्र-अध्ययन या पाठ से पूर्व मन्त्र के जप और उसके विनियोग को प्राथमिकता दे। जब तक साधक गायत्री के माध्यम से अपनी बुद्धि को प्रदीप्त नहीं करता, तब तक वेदों के गूढ़ अर्थ हृदय में नहीं उतरते। यहाँ 'शूद्रधर्मा' होने का योगिक संकेत उस ब्राह्मण की अपनी स्थिति पर है, जो वेद-पारग होते हुए भी मन्त्र-शक्ति के प्रयोग-विधान से वंचित रहकर अपने ही अधिकार और फल से च्युत हो गया है। वह ज्ञान के शिखर पर खड़े होकर भी उस कुंजी (गायत्री) के अभाव में भीतर प्रवेश नहीं कर पाता, जिससे उसकी समस्त बौद्धिक उपलब्धि निष्फल हो जाती है।
अतः साधक को चाहिए कि वह पहले गायत्री के विनियोगों को आत्मसात करे, ताकि उसका अध्ययन केवल सूचना न रहकर 'साक्षात्कार' बन जाए। यह श्लोक साधक को स्थूल पाण्डित्य के अहंकार से हटाकर सूक्ष्म अनुभव की भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ ज्ञान केवल पढ़ा नहीं जाता, अपितु जिया जाता है।
व्याहृत्योंकारसहिता सशिराश्च यथार्थतः ।
सशिराश्चैव गायत्री यैर्विप्रैरवधारिता ॥ ४.४३ ॥
व्याहृतियों और ओंकार सहित, और यथार्थरूपसे शिरस् सहित — जिन विप्रोंने शिरस् सहित गायत्रीको (हृदयमें) धारण किया है —
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के प्रयोग-भेदों (अनुलोम, प्रतिलोम, फट्कारान्त) का वर्णन करते हुए यह चेताया कि इन सूक्ष्म भेदों के ज्ञान के बिना वेदों का पाण्डित्य भी निष्फल है। अब यहाँ से वे उन साधकों की स्थिति और उनके सौभाग्य का वर्णन कर रहे हैं, जिन्होंने मन्त्र को उसकी पूर्णता में आत्मसात् किया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: व्याहृत्योंकारसहिता (गायत्रीः) सशिराश्च यथार्थतः । सशिराश्चैव गायत्री (या) यैर्विप्रैरवधारिता (ते...) [वाक्य श्लोक ४.४४ में पूर्ण होता है]।
पदार्थ-निर्वचन:
• व्याहृत्योंकारसहिता: वह गायत्री जो तीन महाव्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) और प्रणव (ओंकार) के साथ संयुक्त है।
• सशिराश्च यथार्थतः: 'शिरस्' का अर्थ है मन्त्र का मस्तक या शीर्ष-भाग। यथार्थतः का अर्थ है—जैसा वह श्रुति में बीजरूप में है, ठीक उसी शुद्ध और वास्तविक रूप में शिरस् सहित।
• अवधारिता: यह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। 'जप' केवल वाणी का चलना है, किन्तु 'अवधारित' करने का अर्थ है—मन्त्र को हृदय में स्थिर करना, उसे धारण करना। जिस प्रकार एक पात्र जल को थामे रहता है, उसी प्रकार साधक जब मन्त्र के अर्थ और शक्ति को अपने भीतर टिका लेता है, तब वह 'अवधारित' कहलाता है।
• विप्र: यहाँ विप्र केवल जन्मजात ब्राह्मण नहीं, अपितु वह 'विप्र' है जिसने विशेष ज्ञान (वि-प्र) द्वारा स्वयं को शुद्ध किया है और मन्त्र की शक्ति को अनुभव किया है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री के उस पूर्ण स्वरूप की बात कर रहे हैं जो केवल तीन पदों का समूह नहीं, अपितु एक संपूर्ण आध्यात्मिक यंत्र है। वे कहते हैं कि जिन विप्रों ने गायत्री को ओंकार, व्याहृतियों और शिरस् (मन्त्र-शीर्ष) सहित यथार्थ रूप से धारण किया है—उनका वर्णन अगले श्लोक में आएगा।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि मन्त्र के साथ प्रणव और व्याहृति का जुड़ना केवल एक परंपरा नहीं, अपितु एक सोपान है। जब साधक 'भूः भुवः स्वः' कहता है, तो वह स्थूल पृथ्वी से सूक्ष्म आकाश की ओर प्रस्थान करता है; जब वह 'ओंकार' का आश्रय लेता है, तो वह अक्षर-ब्रह्म में प्रवेश करता है। और जब वह इसे 'सशिरास्' (शिरस् सहित) जप करता है, तब वह मन्त्र के उस उच्चतम शिखर को स्पर्श करता है जहाँ से ज्ञान का सूर्य उदय होता है।
महर्षि यहाँ 'यथार्थतः' शब्द पर बल दे रहे हैं। इसका भाव यह है कि मन्त्र में अपनी ओर से कोई परिवर्तन या त्रुटि न हो। जिस प्रकार बीज शुद्ध होगा तभी वृक्ष फलित होगा, उसी प्रकार यदि गायत्री का स्वरूप यथार्थ (शुद्ध) है, तो ही वह साधक को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करने में समर्थ होगा। विप्रों द्वारा 'अवधारित' करने का अर्थ यह है कि उन्होंने मन्त्र को केवल जीभ पर नहीं, अपितु अपने प्राण और हृदय में प्रतिष्ठित कर लिया है।
योग-रहस्य —
एक योग-अभ्यासी के लिए इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'धारणा' से जुड़ा है। साधारण जप में मन भटकता रहता है, किन्तु 'अवधारिता' वह अवस्था है जहाँ मन्त्र और मंत्र-साधक एक हो जाते हैं।
साधक जब व्याहृतियों और ओंकार सहित गायत्री का अभ्यास करता है, तो वह वास्तव में अपने चित्त को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जा रहा होता है। शिरस् (मस्तक) सहित गायत्री का अर्थ है—उस ऊर्जा को मन्त्र के माध्यम से ऊपर की ओर उठाना। यहाँ 'शिरस्' केवल शब्द नहीं, अपितु उस बिंदु का संकेत है जहाँ साधक की चेतना मन्त्र के उच्चतम प्रभाव में स्थित होती है।
अभ्यास यह है कि साधक मन्त्र को केवल शब्दों के रूप में न पढ़े, बल्कि उसे अपने भीतर एक जीवित सत्ता के रूप में 'धारण' करे। जब मन्त्र अवधारित होता है, तब वह जप से ऊपर उठकर 'ध्यान' बन जाता है। इस अवस्था में साधक अनुभव करता है कि गायत्री की ज्योति उसके हृदय और मस्तक (शिरस्) को प्रकाशित कर रही है। यह वह भूमि है जहाँ से साधक जन्म-बन्धनों के विसर्जन की ओर अग्रसर होता है, क्योंकि अब वह केवल शब्दों का नहीं, अपितु उस 'अक्षर' का उपासक बन चुका है जो अविनाशी है।
ते जन्मबन्धनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति वै ।
षोडशाक्षरकं ब्रह्म गायत्री सशिरास्तथा ॥ ४.४४ ॥
— वे जन्मके बन्धनसे मुक्त होकर परब्रह्ममें प्रवेश करते हैं। सोलह अक्षरोंवाला ब्रह्म (शिरस्-मन्त्र) और शिरस् सहित गायत्री —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन विप्रों की चर्चा आरम्भ की जिन्होंने गायत्री को उसके यथार्थ रूप में—अर्थात् प्रणव, व्याहृतियों और शिरस् के साथ हृदय में अवधारित किया है। वर्तमान श्लोक उसी वाक्य का समापन करते हुए इस पूर्ण धारणा के परम फल और मन्त्र के एक विशिष्ट स्वरूप (षोडशाक्षर) का परिचय देता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (व्याहृत्योंकारसहिता सशिराश्च यथार्थतः सशिराश्चैव गायत्री यैर्विप्रैरवधारिता) ते जन्मबन्धनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति वै । षोडशाक्षरकं ब्रह्म (तत्) गायत्री सशिरास्तथा (अस्ति/विज्ञेया) [वाक्य श्लोक ४.४५ में पूर्ण होता है]।
पदार्थ-निर्वचन:
• जन्मबन्धनिर्मुक्ताः: जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) के बन्धन से पूरी तरह छूट चुके। 'निर्मुक्ति' का अर्थ केवल देह त्याग नहीं, अपितु उस अविद्या का नाश है जो पुनर्जन्म का कारण बनती है।
• परं ब्रह्म विशन्ति वै: परब्रह्म में प्रवेश करते हैं। यहाँ 'विशन्ति' (प्रवेश करना) शब्द यह संकेत देता है कि साधक अपनी पृथक सत्ता को विलीन कर उस अनंत चैतन्य में एक हो जाता है। 'वै' निश्चयवाचक अव्यय है, जो इस फल की सत्यता की पुष्टि करता है।
• षोडशाक्षरकं ब्रह्म: सोलह अक्षरों वाला ब्रह्म। यहाँ 'ब्रह्म' शब्द मन्त्र के लिए प्रयुक्त हुआ है, क्योंकि मन्त्र स्वयं उस परब्रह्म का नाद-स्वरूप है। यह १६ अक्षरों वाली संरचना 'शिरस्' (मस्तक) भाग को इंगित करती है।
• गायत्री सशिरास्तथा: शिरस् सहित गायत्री। यहाँ याज्ञवल्क्य स्पष्ट कर रहे हैं कि जब मूल मन्त्र के साथ उसका शीर्ष-भाग जुड़ता है, तब वह पूर्णता प्राप्त करता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में साधना की पराकाष्ठा और उसके प्रतिफल को उद्घाटित कर रहे हैं। पिछले श्लोक (४.४३) से शुरू हुआ वाक्य यहाँ पूर्ण होता है कि जिन साधकों ने गायत्री के पूर्ण स्वरूप (प्रणव, व्याहृति और शिरस्) को केवल रटा नहीं, बल्कि 'अवधारित' किया—अर्थात् उसे अपने अस्तित्व में उतार लिया—वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परब्रह्म में लीन हो जाते हैं।
यहाँ यह रहस्य समझना आवश्यक है कि मन्त्र का जप यदि केवल शब्दों का दोहराव है, तो वह पुण्य दे सकता है; किन्तु जब मन्त्र 'अवधारित' होता है, तब वह साधक को बन्धनमुक्त करता है। जन्म-बन्धन का मूल कारण अविद्या और वासनाएँ हैं। जब साधक शिरस् सहित गायत्री के प्रकाश में स्थित होता है, तो वह उस 'तुरीय' अवस्था को प्राप्त करता है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल परब्रह्म शेष रहता है।
श्लोक के दूसरे भाग में ऋषि एक नवीन रहस्य की ओर संकेत करते हैं—"षोडशाक्षरकं ब्रह्म"। वे बताते हैं कि गायत्री का एक स्वरूप सोलह अक्षरों वाला है, जिसे 'शिरस्' कहा गया है। यह १६ अक्षरों का समूह मन्त्र का वह मस्तक है जो उसे साधारण जप से उठाकर योगिक साधना के स्तर पर ले जाता है। याज्ञवल्क्य यहाँ संकेत दे रहे हैं कि गायत्री केवल तीन पदों (२४ अक्षरों) तक सीमित नहीं है, अपितु उसका एक 'शिरस्' स्वरूप भी है जो ब्रह्म-स्वरूप है। यह वाक्य अधूरा है और इसका विस्तार अगले श्लोक में मिलता है कि इस षोडशाक्षर ब्रह्म को जब आवर्तित किया जाता है, तब वह किस प्रकार के फल देता है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में मन्त्र का अभ्यास केवल 'वाक्' (वाणी) का व्यायाम नहीं, अपितु 'धारणा' का अभ्यास है। साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि जब वह गायत्री को शिरस् सहित धारण करता है, तो वह स्थूल देह और मन के स्तर से ऊपर उठकर उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ मन्त्र और मंत्र-देवता एक हो जाते हैं।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि 'जन्मबन्धन' कोई बाहरी जंजीर नहीं, बल्कि चित्त की वह स्थिति है जो स्वयं को शरीर मानती है। जब षोडशाक्षर ब्रह्म का प्रकाश हृदय में प्रस्फुटित होता है, तो साधक अपनी वास्तविक पहचान (अहं ब्रह्मास्मि) को पुनः प्राप्त करता है। अभ्यास की दृष्टि से यह श्लोक साधक को प्रेरित करता है कि वह जप को केवल फल-प्राप्ति या पुण्य के लिए न करे, अपितु 'मुक्ति' और 'ब्रह्म-प्रवेश' के लक्ष्य से करे। जब लक्ष्य परब्रह्म का प्रवेश होता है, तभी मन्त्र की पूर्ण शक्ति जाग्रत होती है और वह साधक को जन्मों के बन्धन से मुक्त करने में समर्थ होता है।
शताक्षरा गायत्री
सकृदावर्तयेद्यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
सोंकारं चतुरावर्त्या विज्ञेया सा शताक्षरा ॥ ४.४५ ॥
जो उसे एक बार भी आवर्तित करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है; ओंकार सहित चार बार आवर्तित करने से वह शताक्षरा जाननी चाहिए।
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के यथार्थ स्वरूप—प्रणव, व्याहृति और शिरस् सहित—की महिमा बताई और घोषणा की कि इसे धारण करने वाले विप्र जन्म-बन्धनों से मुक्त होकर परब्रह्म में प्रवेश करते हैं। वर्तमान श्लोक इसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए मन्त्र की एक विशेष आवृत्ति के फल और 'शताक्षरा' नामक विशिष्ट स्वरूप का परिचय देता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यस्तु (गायत्रीं) सकृदावर्तयेत्, स सर्वपापैः प्रमुच्यते । ओंकारं चतुरावर्त्या (विज्ञेया) सा शताक्षरा (अस्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• सकृदावर्तयेद्यस्तु: जो इसे केवल एक बार आवर्तित करता है। 'आवर्तन' का अर्थ यहाँ केवल शब्दों को दोहराना नहीं, अपितु मन्त्र के नाद में स्वयं को विलीन कर उसे हृदय में घुमाना है।
• सर्वपापैः प्रमुच्यते: समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। यहाँ 'पाप' का अर्थ केवल नैतिक त्रुटियाँ नहीं, अपितु वे संस्कार और अविद्या-परतें हैं जो आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से अलग करती हैं।
• ओंकारं चतुरावर्त्या: ओंकार (प्रणव) के साथ चार बार आवर्तित करने पर। संख्या 'चार' यहाँ निश्चित है; यह मन्त्र की एक पूर्णता का संकेत है।
• शताक्षरा: सौ अक्षरों वाली। जब गायत्री को प्रणव और विशिष्ट विधि से चार बार आवर्तित किया जाता है, तब वह 'शताक्षरा' कहलाती है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र की शक्ति और उसकी संख्यात्मक पूर्णता के रहस्य को खोल रहे हैं। प्रथम चरण में वे कहते हैं कि यदि कोई साधक पूर्ण श्रद्धा और विधि से इस मन्त्र को एक बार भी आवर्तित करता है, तो वह सर्वपापमुक्त हो जाता है। यह संकेत है कि मन्त्र का प्रभाव केवल यांत्रिक पुनरावृत्ति पर नहीं, अपितु उस एक 'एकत्व' के अनुभव पर है। जब साधक मन्त्र के अर्थ और नाद में पूरी तरह डूबकर उसे एक बार भी हृदय में उतारता है, तो वह शोधन प्रक्रिया इतनी तीव्र होती है कि समस्त संचित पाप भस्म हो जाते हैं।
द्वितीय चरण में ऋषि एक विशिष्ट योगिक संरचना का वर्णन करते हैं—'शताक्षरा गायत्री'। जब इस मन्त्र को ओंकार (प्रणव) के साथ जोड़कर चार बार आवर्तित किया जाता है, तब वह 'शताक्षरा' कहलाता है। यहाँ याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि मन्त्र की शक्ति उसकी संरचना और आवृत्ति के संयोग में निहित है। प्रणव वह बीज है जो मन्त्र को अनंत तक ले जाता है, और जब इसे चार आवृत्तियों में पिरोया जाता है, तो यह एक ऐसी पूर्णता (शताक्षर) को प्राप्त करता है जो साधक के लिए परम कल्याणकारी है।
यह विधान दर्शाता है कि बाहरी विधि (चार बार जप) वास्तव में आंतरिक रूपांतरण की एक सीढ़ी है। जिस प्रकार अग्नि में तपने से स्वर्ण शुद्ध होता है, उसी प्रकार मन्त्र के आवर्तन से चित्त की शुद्धि होती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'संख्या' और 'भाव' के समन्वय का अभ्यास कराता है।
प्रथम, "एक बार आवर्तित करने से सर्वपापमुक्ति" का रहस्य यह है कि योग में 'एक' संख्या का अर्थ है—एकाग्रता। जब साधक मन्त्र को केवल शब्दों की तरह नहीं, बल्कि एक जीवित स्पंदन की तरह अनुभव करता है, तब वह 'एक आवृत्ति' ही पर्याप्त होती है। यहाँ अभ्यास यह है कि जप करते समय मन और मन्त्र के बीच का भेद समाप्त हो जाए; जब 'जपने वाला', 'जप' और 'जिसका जप किया जा रहा है'—तीनों एक हो जाएँ, तब पापों (अविद्या) का नाश होता है।
द्वितीय, 'शताक्षरा' रूप का अभ्यास साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। ओंकार के साथ चार आवृत्तियों का जप करते समय साधक अनुभव करता है कि मन्त्र केवल वाणी का विषय नहीं है, अपितु वह हृदय और प्राण में एक चक्र की भाँति घूम रहा है। यह 'आवर्तन' मन को बाहर की दुनिया से समेटकर अंतर्मुखी करता है।
साधक इस अभ्यास से इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ उसे मन्त्र के अक्षरों की संख्या नहीं, बल्कि उस नाद की अनंतता का अनुभव होने लगता है। प्रणव (ॐ) के साथ जब वह चार बार इस मन्त्र को घुमाता है, तो वह अपनी चेतना को विस्तारित कर उस 'शताक्षर' या पूर्णता में स्थित करता है, जहाँ से वह परब्रह्म की ओर अग्रसर होता है।
गायत्रीजपफलम्
शताक्षरा(रां) समावर्त्य चतुर्वेदफलं लभेत् ।
ओंकारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः ॥ ४.४६ ॥
शताक्षराको (एक बार) दोहराकर (साधक) चारों वेदोंका फल पाता है। ओंकारसे आरम्भ होनेवाली तीन अविनाशी महाव्याहृतियाँ —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'शताक्षरा' के स्वरूप का परिचय देते हुए बताया कि प्रणव सहित चार बार आवर्तन करने से साधक समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। वर्तमान श्लोक इसी शताक्षरा के फल की व्यापकता को प्रकट करता है और मन्त्र-साधना के उस आधारभूत त्रय (प्रणव, व्याहृति, गायत्री) की ओर संकेत करता है, जो साधक को स्थूल जगत से उठाकर अक्षर तक ले जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यस्तु) शताक्षरा(ं) समावर्त्य चतुर्वेदफलं लभेत् । ओंकारपूर्विकाः तिस्रो महाव्याहृतयः अव्ययाः (अस्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• शताक्षरा समावर्त्य: 'शताक्षरा' (प्रणव सहित चार बार आवर्तित गायत्री) को पूर्णतः दोहराकर या उसमें लीन होकर। यहाँ 'समावर्त्य' का अर्थ केवल संख्यात्मक गिनती नहीं, अपितु मन्त्र की ऊर्जा को स्वयं में समेटना है।
• चतुर्वेदफलं लभेत्: चारों वेदों के फल को प्राप्त होता है। वेदों का फल केवल सूचना या ज्ञान नहीं, अपितु वह 'ऋत' (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) और 'सत्य' का अनुभव है जिसके लिए चारों वेद अलग-अलग मार्गों से संकेत करते हैं।
• ओंकारपूर्विकाः: जिनके पूर्व में ओंकार (प्रणव) स्थित है। यह क्रम अनिवार्य है क्योंकि प्रणव वह बीज है जिससे व्याहृतियों का अंकुरण होता है।
• तिस्रो महाव्याहृतयः: तीन महाव्याहृतियाँ— भूः, भुवः और स्वः। ये केवल शब्द नहीं, अपितु अस्तित्व के तीन स्तर (पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ) हैं।
• अव्ययाः: अविनाशी या जिनका क्षय नहीं होता। व्याकरण में 'अव्यय' वह है जिसका रूप नहीं बदलता; आध्यात्मिक दृष्टि से वे तत्व जो काल और परिस्थिति से परे नित्य रहते हैं।
भाष्य —
ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र-साधना के चरम फल की घोषणा कर रहे हैं। प्रथम पंक्ति में वे कहते हैं कि जब साधक 'शताक्षरा' रूप गायत्री का आवर्तन करता है, तो वह चतुर्वेदफल को प्राप्त होता है। भाव यह है कि चारों वेदों का सार—जो ज्ञान, कर्म, उपासना और योग का समुच्चय है—वह इस विशिष्ट जप-विधि में संकलित हो जाता है। जिस प्रकार समुद्र की एक बूँद में संपूर्ण सागर के गुण होते हैं, उसी प्रकार शताक्षरा गायत्री का पूर्ण अनुभव साधक को उन समस्त सिद्धियों और बोध से युक्त कर देता है जो चारों वेदों के गहन अध्ययन और अनुष्ठान से प्राप्त होते हैं।
द्वितीय पंक्ति में महर्षि उस 'त्रिक' की नींव रख रहे हैं जिसे आगे के श्लोकों में विस्तार दिया जाएगा। वे कहते हैं कि ओंकार से आरम्भ होने वाली तीन महाव्याहृतियाँ 'अव्यय' हैं। यहाँ याज्ञवल्क्य यह रहस्य खोल रहे हैं कि साधना का आरम्भ हमेशा सूक्ष्म से स्थूल की ओर नहीं, अपितु अक्षर (ॐ) से होकर व्याहृतियों के माध्यम से मन्त्र तक जाना चाहिए। ये तीन व्याहृतियाँ—भूः, भुवः और स्वः—साधक के लिए केवल उच्चारण के शब्द नहीं, बल्कि वे ब्रह्माण्ड के तीन मुख्य आयाम हैं। इन्हें 'अव्यय' इसलिए कहा गया है क्योंकि ये तीनों लोकों का नित्य आधार हैं; शरीर नष्ट हो सकता है, मन बदल सकता है, किंतु इन तीनों तत्त्वों की सत्ता शाश्वत है।
यह वाक्य यहाँ अधूरा है और अगले श्लोकों (४.४७-४८) में पूरा होता है, जहाँ यह बताया गया है कि इन अव्यय व्याहृतियों और त्रिपदा गायत्री का निरंतर अध्ययन साधक को 'वायुभूत' और 'खमूर्तिमान्' बनाकर परब्रह्म तक ले जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओङ्कारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः । त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः । स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ २.८१–८२ ॥
ओंकारसे आरम्भ होनेवाली तीन अविनाशी महाव्याहृतियाँ और त्रिपदा सावित्री — इन्हें ब्रह्म (वेद) का मुख जानना चाहिए। जो इनका प्रतिदिन, बिना आलस्यके, तीन वर्ष तक अध्ययन (जप) करता है, वह वायुरूप, आकाश-शरीरवाला होकर परब्रह्मको प्राप्त होता है।
मनुस्मृति में भी ठीक यही क्रम और शब्द मिलते हैं: "ओङ्कारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः । त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥"
यह साम्य सिद्ध करता है कि महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिपादित यह विधि केवल एक स्मृति का मत नहीं, अपितु संपूर्ण वैदिक-स्मृति परम्परा का सर्वमान्य सिद्धांत है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि प्रणव → व्याहृति → गायत्री का क्रम ही वह राजमार्ग है जो साधक को 'ब्रह्म के मुख' (परम सत्य) तक पहुँचाता है। दोनों ग्रन्थों में इन व्याहृतियों को 'अव्यय' कहकर उनकी नित्यता और स्थिरता पर बल दिया गया है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में यह श्लोक साधक को 'स्थिरता' और 'नित्यता' के अनुभव से जोड़ता है। जब साधक 'अव्ययाः' शब्द का चिंतन करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि वह उन तत्त्वों के साथ एकाकार हो रहा है जो काल के प्रवाह में नष्ट नहीं होते।
अभ्यास की दृष्टि से, शताक्षरा का आवर्तन साधक को मानसिक विखराव से हटाकर एक केंद्र पर लाता है। जब साधक ओंकार के साथ तीन महाव्याहृतियों का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में अपने चैतन्य को पृथ्वी (भूः), अन्तरिक्ष (भुवः) और द्यौ (स्वः) के स्तरों पर विस्तारित कर रहा होता है। 'अव्यय' का अनुभव करने का अर्थ है—साधना के समय मन की चंचलता को समाप्त कर उसे उस स्थिति में लाना जहाँ कोई परिवर्तन न हो, क्योंकि जो परिवर्तित होता है वह 'व्यय' है और जो अपरिवर्तित रहता है वही 'अव्यय' है।
यह अभ्यास साधक को इस भूमि से उस भूमि तक ले जाता है जहाँ वह स्वयं को केवल एक सीमित शरीर (स्थूल) न मानकर, एक व्यापक चेतना (सूक्ष्म और कारण) के रूप में अनुभव करने लगता है। चतुर्वेदफल की प्राप्ति का योगिक अर्थ यह है कि साधक अब बाहरी ज्ञान के संकलन से ऊपर उठकर उस 'एकत्व' के बोध में स्थित हो गया है, जो समस्त वेदों का अंतिम लक्ष्य है। यहाँ साधक अक्षर (ॐ) के बीज से आरम्भ कर व्याहृतियों के माध्यम से स्वयं को ब्रह्माण्ड के नित्य आधारों में प्रतिष्ठित करना सीखता है।
त्रिपदा चैव गायत्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ।
योऽधीतेऽहन्यहन्येतां त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः ॥ ४.४७ ॥
… और त्रिपदा गायत्री को ब्रह्म का मुख जानना चाहिए; जो प्रतिदिन बिना आलस्य के तीन वर्ष तक इसका अध्ययन करता है — …
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव और तीन महाव्याहृतियों के अविनाशी स्वरूप का वर्णन किया है। अब वे इन तीनों (प्रणव, व्याहृति और गायत्री) के समुच्चय को एक पूर्ण इकाई के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे साधक की चेतना का विस्तार ब्रह्म तक होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: त्रिपदा चैव गायत्री ब्रह्मणः मुखम् इति विज्ञेयम् । यः (साधकः) तन्द्रितः (नूनं न), अहन्-अहनि एताम् (गायत्रीं) त्रीणि वर्षाणि अधीते।
पदार्थ-निर्वचन:
• त्रिपदा गायत्री: तीन पदों वाला गायत्री मन्त्र। यहाँ 'त्रिपदा' केवल शब्दों की संख्या नहीं, अपितु चेतना के तीन स्तरों का संकेत है।
• ब्रह्मणः मुखम्: ब्रह्म का मुख। जिस प्रकार मुख से वाणी प्रकट होती है और मुख शरीर का प्रवेश द्वार एवं अभिव्यक्ति का केंद्र है, उसी प्रकार गायत्री वह द्वार है जिससे साधक परब्रह्म में प्रवेश करता है और ब्रह्म की वाणी को अनुभव करता है।
• विज्ञेयम्: जानना चाहिए या अनुभव करना चाहिए। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु 'अनुभव-जन्य' ज्ञान है।
• अहन्यहनि (अहन्-अहनि): प्रतिदिन। यहाँ निरंतरता का विधान है; एक भी दिन का अंतराल साधना की लय को भंग करता है।
• त्रीणि वर्षाणि: तीन वर्ष तक। यह समय-सीमा साधक के संस्कार परिवर्तन और चित्त की शुद्धि के लिए निर्धारित की गई है।
• अतन्द्रितः: बिना आलस्य के, सजग होकर। तन्द्रा केवल नींद नहीं, अपितु वह मानसिक जड़ता है जहाँ साधक मन्त्र तो जपता है परन्तु उसका ध्यान कहीं और होता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री मन्त्र की सर्वोच्च स्थिति को उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि त्रिपदा गायत्री को 'ब्रह्म का मुख' समझना चाहिए। रहस्य यह है कि ब्रह्म निःशब्द, निराकार और अगोचर है; वह स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए जिस प्रथम ध्वनि या द्वार का उपयोग करता है, वही गायत्री है। जैसे मुख के बिना वाणी प्रकट नहीं हो सकती, वैसे ही इस मन्त्र के बिना साधक उस परम तत्व की अनुभूति तक नहीं पहुँच सकता। यह मन्त्र ब्रह्म की वह 'वाणी' है जो जीव को पुनः शिव (ब्रह्म) बनाने की क्षमता रखती है।
यहाँ ऋषि एक विशिष्ट साधना-विधि का विधान कर रहे हैं: प्रतिदिन, बिना आलस्य के, तीन वर्ष तक इसका अध्ययन करना। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ 'अध्ययन' शब्द का प्रयोग हुआ है। अध्ययन केवल शब्दों को पढ़ना नहीं, अपितु मन्त्र के अर्थ में डूबना और उसके कंपन को अपने भीतर उतारना है।
तीन वर्ष की यह अवधि एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। प्रथम वर्ष में साधक के बाहरी संस्कार छँटते हैं, द्वितीय वर्ष में आंतरिक शुद्धि होती है और तृतीय वर्ष में वह स्थिति आती है जहाँ मन्त्र साधक के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। 'अतन्द्रितः' शब्द यहाँ सबसे महत्वपूर्ण है; यह संकेत करता है कि जप केवल होंठों से नहीं, अपितु पूर्ण सजगता के साथ होना चाहिए। यदि जप में तन्द्रा (आलस्य या भटकाव) है, तो वह केवल शब्दों का दोहराव है, साधना नहीं।
यह श्लोक एक सेतु है; यह साधक को तैयारी की अवस्था से उठाकर उस फल की ओर ले जा रहा है जिसका वर्णन अगले श्लोक (४.४८) में 'वायुभूत' और 'खमूर्तिमान्' होने के रूप में किया गया है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से साधक को 'निरन्तरता' का अभ्यास करा रहे हैं। योग की दृष्टि से, जब कोई मन्त्र तीन वर्ष तक बिना रुके, सजगतापूर्वक जपा जाता है, तो वह 'संस्कार' बन जाता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसका मन अब बाहरी विषयों पर नहीं, अपितु गायत्री के प्रकाशमय स्वरूप पर केंद्रित होने लगा है। 'ब्रह्म का मुख' होने का अर्थ है—अपनी चेतना को मन्त्र के माध्यम से उस बिंदु पर ले जाना जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय एक हो जाते हैं।
अभ्यास की दृष्टि से साधक को यहाँ 'अतन्द्रित' रहने का प्रयास करना चाहिए। इसका अर्थ है कि जप के समय प्राणों में जड़ता न आए, बल्कि वे उर्ध्वगामी हों। जब तीन वर्ष तक यह लय बनी रहती है, तब साधक स्थूल शरीर की सीमाओं को पार कर सूक्ष्म शरीर के स्तर पर स्थित होने लगता है। वह संख्या की गिनती से ऊपर उठकर मन्त्र की 'अवस्था' में प्रवेश करता है। यहाँ साधना केवल फल प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रकृति को ब्रह्म-मुख (ब्रह्ममय) बनाने के लिए है।
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ।
एतदक्षरमेतां च जपन् व्याहृतिपूर्विकाम् ॥ ४.४८ ॥
— वह वायुरूप होकर, आकाश-शरीरवाला होकर परब्रह्मको प्राप्त होता है। इस अक्षर (ॐ) और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (गायत्री) का जप करता हुआ —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने निरंतर तीन वर्ष तक बिना आलस्य के गायत्री के अध्ययन का विधान बताया था। वर्तमान श्लोक उसी साधना की परिणति और उसके चरम फल का वर्णन करता है, जहाँ साधक अपनी भौतिक सीमाओं को लाँघकर सूक्ष्मता के उच्चतम स्तर को प्राप्त करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यः त्रीणि वर्षाणि अतन्द्रितः अधीते) स (साधकः) वायुभूतः खमूर्तिमान् परं ब्रह्म परमभ्येति । एतदक्षरम् (ॐ) एवं एताम् व्याहृतिपूर्विकाम् (गायत्रीं) जपन् (परब्रह्मभ्येति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• वायुभूतः: वायु के समान सूक्ष्म। यहाँ वायु का अर्थ भौतिक पवन नहीं, अपितु वह अवस्था है जहाँ देह का स्थूलपन समाप्त हो जाता है और चेतना इतनी हल्की एवं व्यापक हो जाती है कि उसमें कोई अवरोध नहीं रहता।
• खमूर्तिमान्: 'ख' का अर्थ है आकाश (शून्य)। खमूर्तिमान् वह है जिसका शरीर या स्वरूप आकाश जैसा हो गया हो। यह पूर्ण विस्तार और निराकारता की स्थिति है।
• परं ब्रह्म परमभ्येति: परब्रह्म को प्राप्त होता है। यहाँ 'परम' शब्द दो बार आया है—एक ब्रह्म के लिए और एक प्राप्ति (गंतव्य) के लिए, जो यह दर्शाता है कि यह साधारण स्वर्ग-प्राप्ति नहीं, अपितु उच्चतम तत्व में विलीन होना है।
• एतदक्षरम्: इस अक्षर को। यहाँ 'अक्षर' का संकेत प्रणव (ॐ) की ओर है, जो अविनाशी है।
• व्याहृतिपूर्विकाम्: जिसकी पूर्व व्याहृतियाँ हों। अर्थात् वह गायत्री जप जिसमें पहले ओंकार और फिर महाव्याहृतियों का उच्चारण किया गया हो।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ कर्म (जप) स्वयं में ज्ञान बन जाता है। जो साधक तीन वर्षों तक निरंतरता के साथ इस विद्या में लीन रहता है, उसकी चेतना का रूपांतरण होने लगता है। वह 'वायुभूत' और 'खमूर्तिमान्' हो जाता है। इसका भाव यह है कि जैसे वायु सर्वव्यापी है और आकाश अनंत एवं रिक्त है, वैसे ही साधक का 'अहंकार' और 'देह-भाव' गल जाता है। जब तक मनुष्य स्वयं को हाड़-मांस के शरीर में सीमित मानता है, वह परब्रह्म से दूर रहता है; किन्तु जब जप की अग्नि उसके स्थूल संस्कारों को जला देती है, तब वह सूक्ष्म प्राण (वायु) और फिर शुद्ध चेतना (आकाश) के स्वरूप में स्थित होकर उस परम तत्व में प्रवेश करता है।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत है—"एतदक्षरमेतां च जपन् व्याहृतिपूर्विकाम्"। याज्ञवल्क्य स्पष्ट कर रहे हैं कि यह सिद्धि केवल मन्त्र के शब्दों के दोहराव से नहीं, अपितु एक पूर्ण पद्धति से आती है। वह पद्धति है: प्रणव (ॐ) → महाव्याहृति → गायत्री।
रहस्य यह है कि प्रणव साधक को शून्य में ले जाता है, व्याहृतियाँ उसे ब्रह्माण्ड के विभिन्न स्तरों (भूः भुवः स्वः) से परिचित कराकर विस्तारित करती हैं, और अंततः गायत्री का त्रिपदा मन्त्र उसे उस 'ब्रह्म के मुख' यानी परम प्रकाश में विलीन कर देता है। यह वाक्य पिछले श्लोक से शुरू होकर अगले श्लोकों तक विस्तृत है; यहाँ क्रिया 'परमभ्येति' (प्राप्त होता है) है, जो इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम फल है।
योग-रहस्य —
योगी के लिए 'वायुभूत' और 'खमूर्तिमान्' होना कोई जादुई शक्ति नहीं, अपितु अनुभव की एक स्थिति है। अभ्यास के दौरान साधक जब ओंकार और व्याहृतियों के साथ गायत्री का जप करता है, तो वह धीरे-धीरे यह अनुभव करना शुरू करता है कि उसका अस्तित्व शरीर की सीमाओं में बंद नहीं है।
साधक को इस श्लोक से यह अभ्यास करना है कि जप के समय वह स्वयं को 'भारी' न महसूस करे। जैसे-जैसे मन्त्र की आवृत्ति बढ़ती है, मन का बिखराव रुकता है और एक प्रकार का 'हल्कापन' अनुभव होता है। यही 'वायुभूत' होने का आरम्भिक लक्षण है। जब साधक यह अनुभव करता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि एक चैतन्य प्रकाश है जो आकाश की भाँति सर्वव्यापी है, तब वह 'खमूर्तिमान्' की भूमि पर होता है।
इस अभ्यास में साधक स्थूल देह के भाव को त्यागकर सूक्ष्म प्राण और फिर शुद्ध अक्षर (ॐ) में स्थित होता है। यह यात्रा संकुचितता से विस्तार की ओर है—अक्षर से व्याहृति और व्याहृति से गायत्री। इस क्रम का पालन करने वाला साधक ही उस स्थिति तक पहुँचता है जहाँ 'मैं' का विलोप हो जाता है और केवल 'परब्रह्म' शेष रहता है।
सन्ध्ययोरुभयोर्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ।
सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत् त्रिकं द्विजः ॥ ४.४९ ॥
— विप्र दोनों सन्ध्याओंमें वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है। द्विज (गाँवके) बाहर इस त्रिक (ॐ, व्याहृति, गायत्री) का हजार बार अभ्यास करके —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार और व्याहृति-पूर्विका गायत्री जप के माध्यम से साधक की वायुभूत और खमूर्तिमान होने की उच्चतम अवस्था का वर्णन किया था। अब वर्तमान श्लोक में वे इस साधना के व्यावहारिक विधान, उसकी समय-सीमा और अभ्यास की संख्या के साथ उससे प्राप्त होने वाले पुण्य एवं शुद्धि के मार्ग को प्रशस्त कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: विप्रो सन्ध्ययोरुभयोः (एतदक्षरमेतां च जपन् व्याहृतिपूर्विकाम्) वेदपुण्येन युज्यते । द्विजः बहिः एतत् त्रिकं सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य (विमुच्यते)।
पदार्थ-निर्वचन:
• सन्ध्ययोरुभयोः: दोनों संध्याओं में। यहाँ सन्ध्या का अर्थ केवल समय नहीं, अपितु वह संधि-काल है जहाँ दिन और रात्रि मिलते हैं; योगिक दृष्टि से यह जाग्रत और सुषुप्ति के मध्य की वह अवस्था है जहाँ मन स्थिर होता है।
• वेदपुण्येन: वेदों के अध्ययन और उनके मन्त्रों के जप से प्राप्त होने वाले पुण्य से। यहाँ 'पुण्य' केवल परलोक का फल नहीं, अपितु चेतना का वह शोधन है जो साधक को पात्रता प्रदान करता है।
• युज्यते: युक्त होता है। इसका अर्थ है उस पुण्य के साथ एकाकार होना या उसे आत्मसात करना।
• बहिः: बाहर। इसके दो अर्थ हैं—प्रथम, ग्राम या बस्ती के शोर-शराबे से दूर किसी शांत स्थान पर; द्वितीय, स्थूल देह के बाहरी आवरणों को छोड़कर अंतर्मुखी होकर।
• त्रिकं: तीन का समूह। यहाँ त्रिक का तात्पर्य है—प्रणव (ॐ), महाव्याहृति और गायत्री मन्त्र। इन तीनों का समुच्चय ही पूर्ण साधना-विधि है।
• सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य: एक हजार बार अभ्यास करके। संख्या यहाँ निश्चित है; यह मानसिक एकाग्रता को गहन करने की एक प्रक्रिया है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में जप के दो स्तर बता रहे हैं—नियमित अनुष्ठान और विशेष शोधन अभ्यास।
प्रथम स्तर पर, जो विप्र दोनों संध्याओं (प्रातः और सायं) में ओंकार, व्याहृति और गायत्री का विधिपूर्वक जप करता है, वह 'वेदपुण्य' से युक्त होता है। यह वेदपुण्य वास्तव में उस दिव्य कंपन की प्राप्ति है जो वेदों के मन्त्रों में निहित है। जब साधक नियमित रूप से इन मन्त्रों का आश्रय लेता है, तो उसके भीतर एक आध्यात्मिक संचय होने लगता है, जो उसे साधारण मनुष्य से ऊपर उठाकर विप्रत्व (प्रकाशमयता) की ओर ले जाता है।
द्वितीय स्तर पर, ऋषि एक विशेष साधना का निर्देश देते हैं—'बहिः सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य'। यहाँ द्विज को बस्ती या ग्राम के बाहर जाकर इस 'त्रिक' (ॐ-व्याहृति-गायत्री) का एक हजार बार अभ्यास करने का विधान दिया गया है। यह विधान केवल संख्या की पूर्ति नहीं, अपितु चित्त की शुद्धि का एक गहन प्रयोग है। जब साधक बाहरी शोर से दूर होता है, तब वह अपने भीतर के शोर को सुनने और उसे शांत करने में सक्षम होता है। सहस्र (एक हजार) बार जप करने से मन्त्र की शक्ति साधक के अवचेतन मन में गहरे तक उतर जाती है, जिससे वह मानसिक संस्कारों के भारी बोझ से मुक्त होने लगता है। यह अभ्यास एक प्रकार का 'महा-शोधन' है, जिसका फल अगले श्लोकों में विस्तृत रूप से बताया गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ २.७८ ॥
इस अक्षर (ॐ) का और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (सावित्री) का दोनों सन्ध्याओंमें जप करनेवाला वेदवेत्ता विप्र वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है।
मनुस्मृति में भी यही विधान शब्दशः वर्णित है कि जो ब्राह्मण दोनों संध्याओं में व्याहृति-पूर्विका सावित्री और अक्षर (ॐ) का जप करता है, वह वेदपुण्य को प्राप्त होता है। यह इस तथ्य की पुष्टि करता है कि याज्ञवल्क्य स्मृति और मनुस्मृति दोनों एक ही वैदिक परंपरा के मन्त्र-विज्ञान को पुष्ट कर रहे हैं। जहाँ मनु इसे एक सामाजिक और धार्मिक मर्यादा के रूप में देखते हैं, वहीं योगीश्वर याज्ञवल्क्य इसे चेतना के रूपांतरण की सीढ़ी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य 'बहिः' (बाहर) शब्द में छिपा है। योग मार्ग में दो प्रकार के एकान्त अनिवार्य हैं। पहला 'बाहरी एकान्त', जहाँ साधक भौतिक जगत के कोलाहल से दूर किसी शांत वन या नदी तट पर जाता है ताकि उसकी इंद्रियाँ बाहरी विषयों से विचलित न हों। दूसरा 'आन्तरिक एकान्त', जहाँ वह अपनी देह और मन के आवरणों से बाहर निकलकर स्वयं के केंद्र में स्थित होता है।
जब साधक इस त्रिक (ॐ, व्याहृति, गायत्री) का सहस्र बार अभ्यास करता है, तो वह वास्तव में स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा करता है।
१. ओंकार से वह शून्य और पूर्ण के मिलन बिंदु पर आता है।
२. व्याहृति से वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ (भूः भुवः स्वः) के स्तरों को पार कर ऊपर उठता है।
३. गायत्री के माध्यम से वह अपनी बुद्धि को उस परम ज्योति (सूर्य/परमात्मा) में विलीन करने का प्रयास करता है।
एक हजार बार की यह आवृत्ति मन को 'एक- (एकाग्र) बनाती है। योगिक दृष्टि से, जब एक ही मन्त्र हज़ारों बार दोहराया जाता है, तो वह केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि एक नाद बन जाता है जो साधक के हृदय और मस्तिष्क के मध्य के अवरोधों को तोड़ देता है। इस अभ्यास से साधक 'साधारण मनुष्य' की भूमि से उठकर 'शुद्ध विप्र' की भूमि पर प्रतिष्ठित होता है, जहाँ उसका चित्त दर्पण की भाँति स्वच्छ हो जाता है।
महतोऽप्येनसो मासात् त्वचेवाहिर्विमुच्यते ।
सप्तावृत्त्या पुनेद्देहं दशभिः प्राप्यते दिवम् ॥ ४.५० ॥
— एक महीनेमें बड़े पापसे भी (वैसे) छूट जाता है, जैसे साँप केंचुलसे। सात आवृत्तियोंसे देहको पवित्र करता है, दससे स्वर्ग पाता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने त्रिक (प्रणव, व्याहृति और गायत्री) के सहस्र जप की विधि बताई थी। वर्तमान श्लोक उसी साधना के समय-फल और संख्या-विशेष से होने वाली शुद्धि का विवरण देता है, जहाँ साधक के पापों के क्षय और देह की पवित्रता की चर्चा की गई है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (द्विजः बहिः एतत् त्रिकं सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य) महतोऽप्येनसो मासात् त्वचेवाहिर्विमुच्यते । सप्तावृत्त्या देहं पुनेद्, दशभिः दिवम् प्राप्यते।
पदार्थ-निर्वचन:
• महतोऽप्येनसो: बड़े पापों से भी। यहाँ 'एनुस' का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु वे संस्कार और मानसिक अवरोध हैं जो आत्मा के प्रकाश को ढक लेते हैं।
• मासात्: एक मास (महीने) की अवधि में। यह समय-सीमा उस तीव्रता को दर्शाती है जो सहस्र जप के निरंतर अभ्यास से उत्पन्न होती है।
• त्वचेवाहिर्विमुच्यते: जैसे त्वचा (केंचुल) से बाहर निकल जाता है। 'त्वच' यहाँ बाहरी आवरण का प्रतीक है; जिस प्रकार सर्प अपनी पुरानी त्वचा त्याग कर नवीन रूप पाता है, वैसे ही साधक पुराने संस्कारों को त्यागता है।
• सप्तावृत्त्या: सात बार आवर्तित करने से। संख्या यहाँ निश्चित है—सात आवृत्तियाँ।
• पुनेद्देहं: देह को पवित्र करता है। 'पुनः' का अर्थ शोधन करना है; शरीर के सूक्ष्म स्तर पर स्थित मल का विनाश।
• दशभिः: दस बार जप करने से।
• प्राप्यते दिवम्: स्वर्ग (दिव्य लोक या दिव्य अवस्था) को प्राप्त होता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि जब एक द्विज शांत स्थान पर रहकर प्रणव, व्याहृति और गायत्री के त्रिक का सहस्र बार अभ्यास करता है, तो उसका प्रभाव इतना प्रगाढ़ होता है कि वह एक मास के भीतर ही अपने घोरतम पापों से मुक्त हो जाता है। यहाँ 'पाप' को सर्प की केंचुल के समान बताया गया है। जिस प्रकार केंचुल सर्प का हिस्सा होते हुए भी उसके लिए बोझ बन जाती है और अंततः वह उसे उतार फेंकता है, उसी प्रकार जप की अग्नि जब प्रज्वलित होती है, तो संचित पाप रूपी आवरण स्वतः ही छूटकर गिर जाते हैं। यह मुक्ति केवल मानसिक नहीं, अपितु अस्तित्वगत शोधन है।
आगे ऋषि जप की संख्या के अनुसार प्राप्त होने वाले विशिष्ट फलों का क्रम बताते हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई साधक इस त्रिक को सात बार (सप्तावृत्त्या) जपता है, तो उसकी देह पवित्र हो जाती है। यहाँ 'देह' का अर्थ केवल स्थूल शरीर नहीं, अपितु वह प्राणमय कोष है जिसमें वासनाएँ और अशुद्धियाँ लिपटी होती हैं। सात की संख्या यहाँ पूर्णता का संकेत है, जो साधक के भौतिक और सूक्ष्म शरीर के बीच के संतुलन को शुद्ध करती है।
तत्पश्चात, दस बार (दशभिः) जप करने से 'दिव' अर्थात स्वर्ग की प्राप्ति बताई गई है। विधिक रूप से यह स्वर्ग एक लोक हो सकता है, किन्तु याज्ञवल्क्य जैसे योगीश्वर की दृष्टि में 'दिव' वह उच्च चेतना है जहाँ साधक का मन सूर्य के समान प्रकाशमान और आनंदमय हो जाता है। यह क्रम दर्शाता है कि जप की संख्या जितनी बढ़ती है, शुद्धि स्थूल (देह) से सूक्ष्म (दिव्य अवस्था) की ओर बढ़ती जाती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्त्रिकं द्विजः । महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाहिर्विमुच्यते ॥ २.७९ ॥
द्विज (गाँवसे) बाहर इस त्रिक (ॐ, व्याहृति, सावित्री) का हज़ार बार अभ्यास करके एक महीनेमें बड़े पापसे भी वैसे छूट जाता है जैसे साँप केंचुलसे।
मनुस्मृति में भी इसी विधान का उल्लेख मिलता है कि द्विज द्वारा बाहर त्रिक का सहस्र जप करने से वह एक मास में बड़े पापों से वैसे ही मुक्त हो जाता है जैसे सर्प केंचुल से। यहाँ स्मृति और मनुस्मृति पूर्णतः एकमत हैं, जो यह सिद्ध करता है कि यह विधि ऋषि-परम्परा में सर्वमान्य रही है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर बल देते हैं कि जप की तीव्रता और संख्या जब एक निश्चित सीमा (सहस्र) तक पहुँचती है, तो वह संस्कार-परिवर्तन का सामर्थ्य रखती है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से 'पाप' आत्मा का गुण नहीं, अपितु उस पर चढ़ी हुई धूल या आवरण है। केंचुल की उपमा अत्यंत गूढ़ है; यह संकेत करती है कि पाप साधक के व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक बाहरी परत मात्र हैं। जैसे सर्प को अपनी त्वचा छोड़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वैसे ही जप के माध्यम से उत्पन्न मानसिक ताप (तपस) उन पुराने संस्कारों को ढीला करता है और अंततः साधक उनसे विलग हो जाता है।
साधक यहाँ इस अनुभव से गुजरता है कि वह 'मैं पाप हूँ' से 'मुझ पर पाप का आवरण है' की भूमि पर आता है। सात आवृत्तियों का अभ्यास देह के शोधन का मार्ग है, जहाँ साधक अपनी प्राण-शक्ति को संतुलित करता है। दस आवृत्तियाँ उसे उस मानसिक स्थिति में ले जाती हैं जिसे 'दिव्य' कहा गया है—जहाँ मन बाहरी विषयों से हटकर प्रकाशमय स्वरूप में स्थित होने लगता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल मलिनता से उठाकर सूक्ष्म ज्योति की ओर ले जाने वाली एक सोपान-विधि है।
विंशावृत्त्या तु सा देवी नयते हीश्वरालयम् ।
अष्टोत्तरशतं जप्त्वा तरते जन्मसागरम् ॥ ४.५१ ॥
किन्तु बीस आवर्तनों से वह देवी ईश्वर के घर (परमधाम) ले जाती है। एक सौ आठ बार जप करके जन्मसागर से तर जाता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सात और दस आवृत्तियों के माध्यम से देह की शुद्धि और स्वर्ग प्राप्ति का विधान बताया था। वर्तमान श्लोक उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए जप की उच्चतर संख्याओं के उस फल का वर्णन करता है, जहाँ साधक केवल लोक-शुद्धि तक सीमित नहीं रहता, अपितु परमधाम और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तु विंशावृत्त्या सा देवी हीश्वरालयम् नयते । अष्टोत्तरशतं जप्त्वा (साधकः) जन्मसागरम् तरते ।
पदार्थ-निर्वचन:
• विंशावृत्त्या: बीस बार आवर्तित करने से। यहाँ संख्या निश्चित है—बीस आवृत्तियाँ।
• सा देवी: वह गायत्री देवी। यहाँ 'देवी' शब्द मन्त्र की शक्ति और उसकी चेतना को संबोधित करता है, जो साधक का हाथ पकड़कर उसे ऊपर ले जाती है।
• हीश्वरालयम्: ईश्वर के घर (परमधाम) में। यह केवल एक स्थान नहीं, अपितु वह अवस्था है जहाँ आत्मा अपने मूल स्वरूप 'ईश्वर' में प्रतिष्ठित हो जाती है।
• अष्टोत्तरशतं: एक सौ आठ बार (१०८)। यह संख्या पूर्णता का प्रतीक है।
• जन्मसागरम्: जन्म और मृत्यु के निरंतर प्रवाह वाले संसार-सागर को।
• तरते: पार हो जाता है; इस चक्र से मुक्त होकर तटस्थ हो जाता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ जप की संख्या और उससे प्राप्त होने वाली आध्यात्मिक उन्नति के सोपानों को स्पष्ट कर रहे हैं। जब साधक बीस बार गायत्री का जप करता है, तब वह 'देवी' (गायत्री की शक्ति) द्वारा ईश्वर के धाम की ओर निर्देशित किया जाता है। यहाँ ध्यान देने योग्य रहस्य यह है कि सात और दस आवृत्तियों में जहाँ देह-शुद्धि और स्वर्ग (दिव्य लोकों) की बात थी, वहीं बीसवीं आवृत्ति पर साधक का संबंध सीधे 'ईश्वरालय' से जुड़ जाता है। इसका भाव यह है कि जैसे-जैसे जप की संख्या और एकाग्रता बढ़ती है, साधक की चेतना स्थूल शरीर से हटकर सूक्ष्म धामों की ओर प्रस्थान करती है।
इसके पश्चात, जब जप की संख्या एक सौ आठ (१०८) तक पहुँचती है, तब वह अवस्था आती है जिसे 'जन्मसागर' को पार करना कहा गया है। जन्म-मृत्यु का चक्र एक ऐसे सागर के समान है जिसकी लहरें मनुष्य को निरंतर विभिन्न योनियों में बहा ले जाती हैं। १०८ बार का जप इस प्रवाह को रोकने वाली नौका बन जाता है। यह संख्या केवल गणितीय गणना नहीं है, अपितु यह उस गहन संस्कार-शोधन की प्रक्रिया है जो साधक को संसार के आकर्षणों से पूरी तरह मुक्त कर देती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विषय में अग्निपुराण का मत याज्ञवल्क्य स्मृति के पूर्णतः अनुकूल है:
सप्तावर्ता पापहरा दशभिः प्रापयेद्दिवम् । विंशावर्ता तु सा देवी नयते हीश्वरालयम् ॥ अष्टोत्तरशतं जप्त्वा तीर्णः संसारसागरात् । रुद्रकूष्माण्डजप्येभ्यो गायत्री तु विशिष्यते ॥ २१५.६–७ ॥
सात आवृत्तियोंमें (गायत्री) पाप हरती है, दससे स्वर्ग पहुँचाती है, और बीस आवृत्तियोंमें वह देवी ईश्वरके धाम ले जाती है। एक सौ आठ बार जप करके (साधक) संसार-सागरसे पार हो जाता है। रुद्र और कूष्माण्ड मन्त्रोंके जपसे भी गायत्री श्रेष्ठ है।
अग्निपुराण में भी ठीक इसी क्रम का उल्लेख मिलता है—सात आवृत्तियों से पाप-निवारण, दस से स्वर्ग, बीस से ईश्वरालय और एक सौ आठ से संसार-सागर से मुक्ति। यह समानता सिद्ध करती है कि गायत्री जप की यह संख्या-विधि किसी एक काल की नहीं, अपितु एक प्राचीन और स्थिर वैदिक परंपरा है। यहाँ दोनों ग्रंथों का मेल इस बात में है कि गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि एक सोपान-क्रम है, जहाँ प्रत्येक संख्या साधक को एक उच्चतर चेतना के स्तर पर स्थापित करती है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में ये संख्याएँ—सात, दस, बीस और एक सौ आठ—बाहरी गणना मात्र नहीं हैं, बल्कि ये 'एकाग्रता की सीढ़ियाँ' हैं। साधक जब जप आरम्भ करता है, तो प्रारंभ में मन विचलित रहता है; अतः कम संख्या (७ या १०) में केवल देह और चित्त की ऊपरी शुद्धि होती है।
जैसे-जैसे वह बीस और फिर एक सौ आठ की संख्या की ओर बढ़ता है, उसका मन बाहरी जगत से हटकर भीतर की ओर मुड़ने लगता है। योगिक अभ्यास में 'संख्या' का अर्थ है—साधना की तीव्रता। जब साधक १०८ बार जप करता है, तो वह केवल शब्दों को नहीं दोहरा रहा होता, बल्कि वह अपनी चेतना को पूर्णतः मन्त्र के अर्थ और उसके प्रकाश में विलीन कर रहा होता है।
बीस आवृत्तियों का अभ्यास साधक को 'ईश्वरालय' (हृदय के भीतर स्थित ईश्वर-तत्व) की अनुभूति कराता है, और १०८ का पूर्ण जप उसे जन्म-मृत्यु के द्वंद्व से ऊपर उठाकर 'अक्षर' या 'परब्रह्म' की स्थिति में ले जाता है। साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह संख्या को बोझ न बनाए, बल्कि प्रत्येक आवृत्ति के साथ अपनी जागरूकता को बढ़ाए, जिससे वह स्थूल देह से सूक्ष्म शरीर और फिर शुद्ध आत्मा की भूमि तक पहुँच सके।
तीर्णो भूयो न पश्येत जन्ममृत्युं सुदारुणम्
गायत्रीं जपते यस्तु सोमवद्भासते तु सः ॥ ४.५२ ॥
पार होने के बाद वह फिर से अत्यंत कठिन जन्म और मृत्यु को नहीं देखता। जो गायत्री का जप करता है, वह सोम (चंद्रमा) के समान चमकता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने एक सौ आठ बार जप के माध्यम से जन्म-सागर को पार करने का विधान बताया था। वर्तमान श्लोक उसी मुक्ति-अवस्था की गहराई और साधक के व्यक्तित्व में आने वाले दिव्य परिवर्तन (तेजस) का वर्णन करता है, जो इस साधना का प्रत्यक्ष फल है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यस्तु गायत्रीं जपते तु सः सोमवद्भासते । (वह) सुदारुणं जन्ममृत्युं भूयो न पश्येत, (क्योंकि वह) तीर्णो (होता है)।
पदार्थ-निर्वचन:
• तीर्णो: पार हो गया। यहाँ 'तीरण' का अर्थ केवल मृत्यु के बाद कहीं जाना नहीं, अपितु संसार के द्वंद्वों और वासनाओं के बंधन से ऊपर उठकर मुक्त हो जाना है।
• भूयो न पश्येत: पुनः नहीं देखता। यह पुनर्जन्म के चक्र की समाप्ति का संकेत है।
• जन्ममृत्युं सुदारुणम्: जन्म और मृत्यु जो अत्यंत कठिन (दारुण) हैं। 'सुदारुण' शब्द इस सत्य को उद्घाटित करता है कि देह-धारण और देह-त्याग की प्रक्रिया आत्मा के लिए कितनी कष्टदायक होती है।
• सोमवद्भासते: सोम (चंद्रमा) के समान चमकता है। यहाँ 'भास' केवल शारीरिक कांति नहीं, अपितु ओज और तेज की वह अवस्था है जो आंतरिक शांति से उपजती है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री जप के दो स्तरों पर फल बता रहे हैं—एक पारलौकिक (मुक्ति) और दूसरा इहलौकिक (दिव्य आभा)।
प्रथम रहस्य यह है कि जो साधक निरंतर गायत्री का जप करता है, वह 'तीर्ण' हो जाता है। जब साधक इस मन्त्र की शक्ति से उस परम तत्व में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो उसके लिए जन्म और मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है। जिसे हम 'सुदारुण' (अत्यंत कठिन) कहते हैं, वह यह संस्कार-बंधन है जो आत्मा को बार-बार शरीर धारण करने पर विवश करता है। गायत्री के जप से जब बुद्धि शुद्ध होती है और साधक उस 'तुरीयं पदम्' (चौथे अक्षर/परम तत्व) को प्राप्त कर लेता है, तब वह पुन: इस कष्टदायक चक्र में नहीं गिरता।
द्वितीय रहस्य 'सोमवत् भासते' शब्द में छिपा है। गायत्री सूर्य की शक्ति का मन्त्र है, किन्तु इसका फल साधक को 'सोम' के समान बनाता है। यह एक गहरा योगिक विरोधाभास है—साधना सूर्य (तेज) की होती है, परन्तु परिणाम सोम (शीतलता और शांति) के रूप में आता है। जिस प्रकार सूर्य की प्रखरता को चंद्रमा परावर्तित कर उसे शीतल चाँदनी में बदल देता है, उसी प्रकार गायत्री का जप करने वाला साधक ज्ञान की प्रखर अग्नि में तपकर भी स्वभाव से अत्यंत शांत, सौम्य और प्रकाशवान हो जाता है। उसकी आभा में एक ऐसी दीप्ति आती है जो दूसरों को जलाती नहीं, अपितु शीतलता प्रदान करती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
जप की संख्या और उसकी महत्ता के विषय में अन्य शास्त्रों में भी स्पष्ट विधान मिलता है:
सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां शतावराम् । सावित्रीं जप कौन्तेय सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥
कौन्तेय! सब पापोंका नाश करनेवाली सावित्री देवीका जप करो — (प्रतिदिन) हज़ार उत्तम, सौ मध्यम, और (कम-से-कम) सौसे नीचे (दस) अधम है।
इस अंश में महाभारत का यह मत है कि सावित्री देवी का जप पापों का नाश करने वाला है, जिसमें एक हजार बार जप को 'परम' (उत्तम), सौ बार को 'मध्यम' और उससे कम को 'अवर' कहा गया है।
स्मृति और महाभारत की इस संगति से यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि अल्प जप से भी लाभ है, किन्तु 'तीर्णो' होने की अवस्था और 'सोमवत्' चमकने की पूर्णता उच्चतर संख्या और निरंतर अभ्यास (अभ्यास-परम्परा) से ही संभव है। जहाँ महाभारत संख्या का वर्गीकरण कर रहा है, वहीं याज्ञवल्क्य जी उस संख्या के पीछे छिपे आध्यात्मिक रूपांतरण को उद्घाटित कर रहे हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'तेज' और 'शांति' के संतुलन का अभ्यास है।
जब साधक गायत्री का जप करता है, तो वह अपनी बुद्धि को उस परम प्रकाश (सूर्य) की ओर ले जाता है। किन्तु जैसे-जैसे जप गहरा होता है, वह बाहरी सूर्य से हटकर भीतर के 'हृदय-सूर्य' में प्रतिष्ठित होता है। जब यह प्रकाश स्थिर हो जाता है, तब साधक के स्वभाव में 'सोमत्व' का उदय होता है।
योगिक अनुभव यह है कि जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गई, उसके चेहरे पर एक विशेष प्रकार की शांति और चमक प्रकट होने लगती है। यह वह 'सोम-भास' है जो क्रोध, मोह और भय के नष्ट होने पर स्वतः उत्पन्न होता है। साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसकी साधना उसे केवल मोक्ष की ओर ही नहीं ले जा रही, अपितु वर्तमान जीवन में ही उसे एक दिव्य व्यक्तित्व प्रदान कर रही है। वह जन्म-मृत्यु के 'दारुण' भय से मुक्त होकर, वर्तमान क्षण में चंद्रमा की भाँति स्थिर और शीतल हो जाता है।
पादार्धं पादमर्धं वा समस्तामृचमेव वा ।
सर्वेषां भवपापानां संकरे समुपस्थिते ॥ ४.५३ ॥
आधा पाद, (एक) पाद, आधी (ऋचा) अथवा पूरी ऋचा ही — सब सांसारिक पापोंका संकर (मिश्रण) उपस्थित होनेपर —
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री जप की विशिष्ट संख्याओं (७, १०, २०, १०८) और उनके द्वारा प्राप्त होने वाले फल—जैसे देह-शुद्धि, स्वर्गप्राप्ति और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति—का वर्णन किया है। अब यहाँ ऋषि इस बात का उद्घाटन कर रहे हैं कि मन्त्र की शक्ति केवल निर्धारित संख्या या पूर्णता में ही नहीं, अपितु उसके सूक्ष्म अंशों में भी विद्यमान है, विशेषकर तब जब साधक घोर संकट या पापसंकर की स्थिति में हो।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यदि) सर्वेषां भवपापानां संकरे समुपस्थिते, (तदा) पादार्धं पादमर्धं वा समस्तामृचमेव वा (जप्यते)।
पदार्थ-निर्वचन:
• पादार्धं: एक पाद का आधा हिस्सा। गायत्री ऋचा के चार पाद (चरण) होते हैं, यहाँ उस एक चरण के भी आधे भाग की बात है।
• पादमर्धं: एक पूर्ण पाद या आधा पाद। (यहाँ 'अर्ध' शब्द का प्रयोग सूक्ष्मता दिखाने के लिए है)।
• समस्तामृचमेव वा: अथवा पूरी ऋचा (सम्पूर्ण मन्त्र)।
• भवपापानां: सांसारिक पापों का। 'भव' का अर्थ है संसार; अतः वे पाप जो इस भौतिक जगत के मोह और अविद्या के कारण उत्पन्न हुए हैं।
• संकरे समुपस्थिते: संकर उपस्थित होने पर। 'संकर' का अर्थ है मिश्रण या जटिलता। जब अनेक प्रकार के पाप, मानसिक द्वन्द्व और प्रतिकूल परिस्थितियाँ एक साथ घेर लें, तब ऐसी विषम स्थिति को 'पाप-संकर' कहा गया है।
भाष्य —
यह श्लोक अपने आप में पूर्ण वाक्य नहीं है, अपितु इसका अर्थ अगले श्लोक (४.५४) के साथ जुड़कर पूरा होता है, जहाँ शोधन और शुद्धि की बात कही गई है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र की 'अविभाज्य शक्ति' का रहस्य खोल रहे हैं।
सामान्यतः विधान यह है कि जप पूर्ण मन्त्र का और निर्धारित संख्या में होना चाहिए, किन्तु ऋषि कहते हैं कि जब मनुष्य 'भवपाप-संकर' में फँसा हो—अर्थात जब उसके ऊपर पापों का ऐसा बोझ हो या वह ऐसी परिस्थिति में हो जहाँ पूर्ण विधि-विधान संभव न हो—तब इस महामन्त्र का एक छोटा सा अंश भी रक्षा कवच बन जाता है।
यहाँ 'पादार्ध', 'पाद' और 'अर्ध-ऋचा' का उल्लेख यह बताने के लिए है कि गायत्री की शक्ति उसके प्रत्येक अक्षर और प्रत्येक ध्वनि में व्याप्त है। जैसे अग्नि का एक छोटा सा तिनका भी अंधकार को मिटा देता है, वैसे ही इस ऋचा का आधा पाद भी साधक के अंतःकरण में स्थित अविद्या के अंधकार को नष्ट करने की क्षमता रखता है।
विधिक दृष्टि से इसका अर्थ यह है कि संकट की घड़ी में यदि कोई साधक पूर्ण मन्त्र जपने में असमर्थ हो या व्याकुलता के कारण केवल कुछ शब्दों का ही उच्चारण कर पाए, तो भी वह निष्फल नहीं जाता। परन्तु योगिक दृष्टि से इसका रहस्य और गहरा है। गायत्री केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक 'ध्वनि-प्रवाह' है। जब साधक इस मन्त्र के किसी भी अंश को पूर्ण श्रद्धा और तीव्रता से जपता है, तो वह उसी विराट चेतना (सविता) से जुड़ जाता है, क्योंकि बीज में ही सम्पूर्ण वृक्ष निहित होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विषय की पुष्टि अन्य शास्त्रों में भी मिलती है:
न गायत्र्याः परं जप्यं न व्याहृतिसमं हुतम् । गायत्र्याः पादमप्यर्धमृगर्धमृचमेव वा ॥ २१५.८ ॥
गायत्रीसे बढ़कर कोई जप नहीं, व्याहृतियोंके समान कोई होम नहीं। गायत्रीका एक पाद, आधा (पाद), आधी ऋचा, अथवा पूरी ऋचा ही — (जपनेसे फल देती है)।
अग्निपुराण स्पष्ट कहता है कि गायत्री से बढ़कर कोई जप नहीं है और इसके एक पाद, आधे पाद या आधी ऋचा का जप भी फलदायी होता है। यह स्मृति के इस वचन से पूर्णतः मेल खाता है कि मन्त्र की शक्ति उसकी मात्रा पर नहीं, अपितु उसके तत्त्व पर टिकी है। जहाँ स्मृतिका यह कथन 'पाप-संकर' (संकटकालीन शुद्धि) के प्रसंग में आता है, वहीं अग्निपुराण इसे सामान्य जप-महिमा के रूप में प्रस्तुत करता है। दोनों का निष्कर्ष एक ही है—गायत्री का सूक्ष्म अंश भी प्रभावशून्य नहीं है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'आपात-कालीन साधना' का संकेत देता है। योग मार्ग में जब साधक अपनी साधना के चरम पर होता है, तब वह जानता है कि मन्त्र केवल वाणी का खेल नहीं, अपितु एक स्पंदन है।
जब साधक 'भवपाप-संकर' की स्थिति में होता है—अर्थात जब मन विचलित हो, प्राण अस्थिर हों और बाहरी परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों—तब लंबी साधना या पूर्ण जप संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में मन्त्र का छोटा सा अंश भी एक 'मानसिक लंगर' का कार्य करता है। साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि वह उस परमात्मा की कृपा से कभी अलग नहीं है; यदि वह पूरी ऋचा नहीं जपे तो भी केवल एक पाद का स्मरण उसे पुनः केंद्र में ला सकता है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब भी मन अत्यंत अशांत हो या पाप-बोध के कारण हृदय भारी हो, तब साधक को चाहिए कि वह मन्त्र के जिस अंश पर उसकी पकड़ सबसे मजबूत है, उसी को तीव्रता से जपे। यह अभ्यास साधक को 'भय' की भूमि से 'विश्वास' की भूमि पर ले जाता है। यहाँ रहस्य यह है कि मन्त्र का छोटा अंश भी उस 'अक्षर' (ॐ) की शक्ति से जुड़ा है, और वह अक्षर ही संपूर्ण ब्रह्मांड का सार है। अतः एक छोटे से अंश का जप भी साधक के भीतर उसी विराट सूर्य-पुरुष को जाग्रत करने में समर्थ है।
दशसाहस्रिकोऽभ्यासो गायत्र्याः शोधनं परम् ।
रुद्रकूष्माण्डजप्यैश्च जप्यैः सौरार्णकैस्तथा ॥ ४.५४ ॥
— गायत्रीका दस हजार (जप) का अभ्यास परम शोधन है; रुद्र, कूष्माण्ड और सौर(?) मन्त्रोंके जपोंसे —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह बताया कि जब साधक पापों के जटिल संकर (मिश्रण) से घिरा हो, तब मन्त्र के सूक्ष्म अंश का जप भी प्रभावकारी होता है। अब यहाँ ऋषि उस शोधन की पराकाष्ठा और उसकी तुलना अन्य शक्तिशाली मन्त्रों से करते हुए, गायत्री की सर्वोच्चता को प्रतिपादित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तदा) गायत्र्याः दशसाहस्रिकोऽभ्यासो परम् शोधनम् (अस्ति); रुद्र-कूष्माण्डजप्यैश्च (मन्त्रैः) तथा सौरार्णकैः (मन्त्रैः) जप्यैः (अपि शोधनं भवति, किन्तु गायत्री श्रेष्ठ है)।
पदार्थ-निर्वचन:
• दशसाहस्रिकोऽभ्यासो: दस हजार बार का अभ्यास। यहाँ संख्या निश्चित है—दस सहस्र।
• शोधनं परम्: परम शोधन। 'शोधन' का अर्थ केवल पापों का नाश नहीं, अपितु चित्त की वह शुद्धि है जिससे आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकाशित हो सके।
• रुद्र-कूष्माण्डजप्यैः: रुद्र और कूष्माण्ड मन्त्रों के जप द्वारा। ये मन्त्र अपनी उग्रता और शोधन शक्ति के लिए जाने जाते हैं।
• सौरार्णकैः: सौर या आरण्यक मन्त्रों के जपों से। (यह पद संदिग्ध है, किन्तु इसका संकेत सूर्य की ऊर्जा और वनों में किए जाने वाले गहन मन्त्र-साधनाओं की ओर है)।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (४.५३) का उपसंहार और फल है। पिछले श्लोक में प्रश्न यह था कि जब पापों का संकर उपस्थित हो, तब क्या जप करें? यहाँ उत्तर मिलता है कि यदि साधक गायत्री का दस हजार बार अभ्यास करता है, तो वह 'परम शोधन' को प्राप्त होता है।
यहाँ 'परम शोधन' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधारण शुद्धि केवल कर्मों के फल से मुक्ति है, किन्तु 'परम शोधन' वह अवस्था है जहाँ साधक का अंतःकरण दर्पण की भाँति स्वच्छ हो जाता है। जब चित्त के मल (राग-द्वेष) पूरी तरह धुल जाते हैं, तब उसमें उस 'सविता' (सूर्य/परमात्मा) का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देने लगता है।
ऋषि आगे अन्य शक्तिशाली मन्त्रों—रुद्र, कूष्माण्ड और सौरार्णक जपों—का उल्लेख करते हैं। वे यह संकेत दे रहे हैं कि शास्त्र में कई ऐसे मन्त्र हैं जो उग्र शोधन या तीव्र शुद्धि के लिए प्रयुक्त होते हैं, किन्तु गायत्री का दस सहस्र जप उन समस्त शोधन-विधियों में श्रेष्ठ है। यहाँ अन्य मन्त्रों की शक्ति को कम नहीं आँका गया है, अपितु यह बताया गया है कि गायत्री वह 'महा-शोधक' है जो साधक को केवल पापमुक्त ही नहीं करता, बल्कि उसे दिव्य प्रकाश (सोमवद्भासते) की ओर ले जाता है।
यह वाक्य अगले श्लोक (४.५५) में जाकर पूर्ण होता है, जहाँ स्पष्ट किया जाएगा कि इन समस्त जपों की तुलना में गायत्री 'विशिष्यते' अर्थात् विशिष्ट और श्रेष्ठ है।
योग-रहस्य —
योगी के लिए 'दश सहस्र जप' केवल एक संख्या नहीं, अपितु एक अनुशासन (तप) है। जब साधक दस हजार बार एक ही मन्त्र का अभ्यास करता है, तो वह मन्त्र उसकी चेतना में गहरे तक उतर जाता है और अंततः संस्कार बन जाता है।
योगिक दृष्टि से 'शोधन' का अर्थ है—चित्त की वृत्तियों का शांत होना। जिस प्रकार अग्नि सोने को तपाकर उसकी अशुद्धियाँ दूर करती है, उसी प्रकार गायत्री का निरंतर अभ्यास साधक के भीतर के अंधकार (अविद्या) को जला देता है। यहाँ साधक प्रायश्चित्त को केवल पश्चाताप के रूप में नहीं, बल्कि एक 'मानसिक शोधन प्रक्रिया' के रूप में देखता है।
अभ्यास की यह भूमि वह है जहाँ साधक स्थूल पापों से ऊपर उठकर सूक्ष्म अशुद्धियों का विसर्जन करता है। दस हजार की संख्या मन को एकाग्र करने और उसे मन्त्र के अधीन करने का साधन है। जब मन मन्त्र में लीन होता है, तब वह बाहरी संसार के 'संकर' (द्वन्द्वों) से मुक्त होकर उस परम ज्योतिमय पुरुष में प्रतिष्ठित होने लगता है। यह अभ्यास साधक को संकीर्णता से व्यापकता की ओर ले जाता है।
सम्पादकीय टिप्पणी — ‘सौरार्णक’ पाठ संदिग्ध है। भाष्यमें दिया अर्थ ‘सौर या आरण्यक मन्त्र’ (और ४.५५ की अवतरणिकामें ‘सौर-आरण्यक’) अनुमान है, संस्करण या किसी मूल ग्रन्थसे पुष्ट नहीं; श्लोकका निश्चित कथन केवल इतना है कि इन जपोंसे भी गायत्री विशेष है (४.५५)।
ऋषिभैर्विरजाजाप्यैर्गायत्री च विशिष्यते ।
ब्रह्महत्यां सुरापानं सुवर्णस्तेयमेव वा ॥ ४.५५ ॥
— (और) ऋषभ (?) तथा विरजा मन्त्रोंके जपसे भी गायत्री श्रेष्ठ है। ब्रह्महत्या, सुरापान अथवा सुवर्णकी चोरी —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने दस सहस्र गायत्री जप के माध्यम से होने वाले 'परम शोधन' का वर्णन किया और रुद्र एवं सौर-आरण्यक मन्त्रों की शोधन शक्ति का उल्लेख किया। वर्तमान श्लोक उसी तुलना को आगे बढ़ाते हुए गायत्री की सर्वोच्चता सिद्ध करता है और उन महापापों का संकेत देता है, जिनके निवारण हेतु यह जप एक अचूक औषधि के समान कार्य करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तथा) ऋषभ-विरजा-जाप्यैः (मन्त्रैः) अपि गायत्री च विशिष्यते । (सा एषा गायत्री) ब्रह्महत्याम्, सुरापानम्, सुवर्णस्तेयमेव वा (पुनाति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• ऋषभ-विरजा-जाप्यैः: यहाँ 'ऋषभ' और 'विरजा' विशिष्ट मन्त्रों के संकेत हैं। विरजा मन्त्र वह है जो साधक को 'रज' (सांसारिक आसक्ति और मल) से मुक्त कर दे। ऋषभ का पाठ संदिग्ध है, किन्तु यह संभवतः किसी विशिष्ट ऋषिवच्य या शक्ति-मन्त्र की ओर संकेत करता है।
• विशिष्यते: श्रेष्ठ है, विशिष्ट है। इसका अर्थ है कि अन्य मन्त्रों की तुलना में गायत्री का प्रभाव अधिक व्यापक और तीव्र है।
• ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्णस्तेय: ये तीनों 'महापातक' श्रेणी के पाप हैं। ब्रह्महत्या (ब्राह्मण या ज्ञान-स्वरूप पुरुष की हत्या), सुरापान (मदहोश करने वाले पदार्थों का सेवन जिससे विवेक नष्ट हो) और सुवर्णस्तेय (सोने की चोरी)।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य गायत्री मन्त्र की तुलना अन्य उच्च कोटि के मन्त्रों से कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ऋषभ और विरजा जैसे शक्तिशाली जपों की अपेक्षा भी गायत्री श्रेष्ठ है। यहाँ अन्य मन्त्रों की निंदा नहीं, अपितु गायत्री की उस 'सर्वोपरिता' का वर्णन है जो उसे समस्त वैदिक मन्त्रों की जननी और सार बनाती है।
वाक्य यहाँ समाप्त नहीं होता, अपितु अगले श्लोक (४.५६) तक विस्तृत है। इस श्लोक के उत्तरार्ध में उन पापों की सूची आरम्भ हुई है जिन्हें गायत्री जप द्वारा धोया जा सकता है। ब्रह्महत्या, सुरापान और स्वर्ण-चोरी—ये तीन ऐसे अपराध हैं जिनके लिए शास्त्रों में अत्यंत कठिन प्रायश्चित बताए गए हैं। किन्तु याज्ञवल्क्य जी यहाँ यह रहस्य खोल रहे हैं कि यदि साधक पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ गायत्री का आश्रय लेता है, तो वह इन घोर पापों के प्रभाव से भी मुक्त हो सकता है।
बाहरी दृष्टि से ये तीन अपराध सामाजिक और नैतिक मर्यादाओं का उल्लंघन हैं, किन्तु आन्तरिक या योगिक दृष्टि से इनका अर्थ अत्यंत गहरा है:
१. ब्रह्महत्या: अपने भीतर स्थित 'ब्रह्म-तत्त्व' या विवेक की हत्या करना; स्वयं के वास्तविक स्वरूप को विस्मृत कर अज्ञान में जीना।
२. सुरापान: प्रमाद और मोह का सेवन करना, जिससे चित्त की एकाग्रता नष्ट हो जाए और साधक माया के मद में डूब जाए।
३. सुवर्णस्तेय: 'सुवर्ण' यहाँ केवल धातु नहीं, अपितु उस आंतरिक तेज या ओज का प्रतीक है जो साधना से प्राप्त होता है। दूसरे के तेज का लोभ करना या अपनी पात्रता के बिना आध्यात्मिक शक्ति को हथियाने का प्रयास करना ही 'सुवर्ण-स्तेय' है।
अतः गायत्री जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि एक ऐसी अग्नि है जो इन गहरे संस्कारों और पापों को भस्म करने की क्षमता रखती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'श्रद्धा' और 'शोधन' के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। योग मार्ग में जब साधक अपनी अशुद्धियों (क्लेशों) को देखता है, तो वह अक्सर निराशा में डूब जाता है कि अब उसकी शुद्धि संभव नहीं। यहाँ याज्ञवल्क्य जी उसे आश्वासन दे रहे हैं कि गायत्री की शक्ति इतनी प्रबल है कि वह महापापकों का भी उद्धार कर सकती है।
अभ्यास यह है कि साधक जप की शक्ति में अटूट विश्वास रखे, किन्तु इस विश्वास का अर्थ पाप को 'हल्का' मानना नहीं होना चाहिए। योगिक शोधन तब होता है जब साधक अपने अपराधों के प्रति पश्चाताप (प्रायश्चित) की अग्नि में जलता है और फिर गायत्री के प्रकाश का आश्रय लेता है। यह जप साधक को उस मानसिक भूमि से ऊपर उठाता है जहाँ वह स्वयं को 'पापी' या 'पतित' मानकर रुक जाता है, और उसे पुनः 'शुद्धि-भूमि' की ओर ले जाता है। यहाँ अभ्यास केवल मन्त्र जपना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अंधकार (महापाप) को स्वीकार कर उसे सूर्य-स्वरूप गायत्री के प्रकाश में विलीन करना है।
गुरुदारागमं चैव जप्येनैव पुनाति सा ।
यत्र यत्र च संकीर्णमात्मानं मन्यते द्विजः ॥ ४.५६ ॥
… और गुरुपत्नीगमन को भी वह केवल जप से ही पवित्र कर देती है। जहाँ-जहाँ द्विज अपनेको संकीर्ण मानता है —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री की तुलना अन्य शक्तिशाली मन्त्रों से करते हुए उसकी सर्वोच्चता सिद्ध की और ब्रह्महत्या, सुरापान एवं सुवर्ण-स्तेय जैसे महापातकों के निवारण हेतु इस जप की शक्ति का संकेत दिया। वर्तमान श्लोक उसी सूची को पूर्ण करता है और साधक की उस मानसिक अवस्था का वर्णन करता है जहाँ वह स्वयं को दूषित अनुभव करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सा गायत्री) गुरुदारागमं चैव (पुनाति), जप्येनैव पुनाति सा । यत्र यत्र च संकीर्णमात्मानं मन्यते द्विजः (तत्र तत्र तिलैर्होमो... इति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• गुरुदारागमम्: गुरु की पत्नी के सान्निध्य में जाना या उनके साथ अनुचित सम्बन्ध रखना। यह स्मृतियों में चौथे महापातक के रूप में गिना गया है।
• जप्येनैव पुनाति सा: 'पुनाति' का अर्थ है पवित्र करना या शोधित करना। यहाँ 'एव' का प्रयोग बल देने के लिए किया गया है कि केवल जप की शक्ति ही इस घोर दोष को मिटाने में सक्षम है।
• संकीर्णम्: संकीर्ण का शाब्दिक अर्थ 'मिश्रित' या 'गिरे हुए' से है। यहाँ इसका भाव है—दूषित, अपवित्र या पाप-मल से लिप्त। जब साधक का अंतःकरण किसी अपराध बोध के कारण स्वयं को मलिन अनुभव करता है।
• मन्यते: मानता है या अनुभव करता है। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु हृदय की वह ग्लानि है जो साधक को संकुचित कर देती है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि गायत्री जप की शोधन-शक्ति इतनी प्रचंड है कि वह गुरुपत्नी-गमन जैसे अत्यंत गंभीर पाप का भी निवारण कर सकती है। पिछले श्लोक (४.५५) में वर्णित तीन महापातकों के साथ जब इस चौथे दोष को जोड़ा जाता है, तब 'चारों महापातकों' की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि याज्ञवल्क्य केवल एक विधि नहीं बता रहे, अपितु गायत्री के उस स्वरूप को प्रकट कर रहे हैं जो समस्त मानसिक और आध्यात्मिक अवरोधों को भस्म करने वाली अग्नि है। जब साधक से कोई ऐसा अपराध होता है जिससे उसकी पात्रता नष्ट हो जाती है, तब वह 'संकीर्ण' (दूषित) हो जाता है। यह संकीर्णता केवल बाहरी पाप नहीं, अपितु एक मानसिक संकुचन है जो साधक और परमात्मा के बीच दीवार बन जाता है। ऋषि कहते हैं कि जहाँ-जहाँ द्विज (द्विजत्व अर्थात् जिसका दूसरा जन्म हुआ हो, जो ज्ञान मार्ग पर हो) स्वयं को इस मलिनता में पाता है, वहाँ उसे तत्काल शोधन की आवश्यकता होती है।
वाक्य यहाँ समाप्त नहीं होता; 'यत्र यत्र' (जहाँ-जहाँ) के उत्तर में 'तत्र तत्र' (वहाँ-वहाँ) का विधान अगले श्लोक (४.५७) में आता है, जहाँ तिल-होम और उपवास की विधि बताई गई है।
श्रुति-संगति —
गायत्री की इस भस्मीकरण शक्ति का मूल आधार श्रुति में मिलता है:
तस्या अग्निरेव मुखम् यदि ह वा अपि बह्विवाग्नावभ्यादधति सर्वमेव तत्संदहत्येवं हैवैवंविद्यद्यपि बह्विव पापं करोति सर्वमेव तत्सम्प्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः सम्भवति ॥ १४.८.१५.१२ ॥
अग्नि ही उसका (गायत्रीका) मुख है। जैसे अग्निमें बहुत-सा (ईंधन) भी डालें तो वह सबको जला देता है, वैसे ही ऐसा जाननेवाला चाहे बहुत-सा पाप भी करे, तो भी उस सबको भक्षण करके वह शुद्ध, पवित्र, अजर और अमृत हो जाता है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि गायत्री का मुख 'अग्नि' है। जिस प्रकार अग्नि में डाला गया कोई भी ईंधन, चाहे वह कितना ही अधिक क्यों न हो, पूर्णतः भस्म हो जाता है, उसी प्रकार गायत्री के ज्ञान और जप से युक्त पुरुष यदि बहुत पाप भी कर बैठता है, तो वह अग्नि-तुल्य शक्ति उन समस्त पापों को 'सम्प्साय' (भक्षण) कर उसे पुनः शुद्ध, पवित्र और अमृत स्वरूप बना देती है। स्मृति का यह वचन इसी श्रुति-रहस्य का विस्तार है कि गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक अग्नि है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विषय में अन्य शास्त्रों की सहमति भी दृष्टिगोचर होती है:
ब्रह्महत्या सुरापानं सुवर्णस्तेयमेव च । गुरुदारागमश्चैव जप्येनैव पुनाति सा ॥ पापे कृते तिलैर्होमो गायत्री जप ईरितः । जप्त्वा सहस्रं गायत्र्या उपवासी स पापहा ॥ २१५.९–१० ॥
ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्णकी चोरी और गुरुपत्नी-गमन — (इन पापोंसे भी) वह (गायत्री) केवल जपसे पवित्र कर देती है। पाप होनेपर तिलोंसे होम और गायत्रीका जप कहा गया है; उपवास करके गायत्रीका हज़ार जप करनेवाला पापका नाश करता है।
अग्निपुराण का यह अंश शब्दशः याज्ञवल्क्य स्मृति के इस वचन की पुष्टि करता है कि ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण-स्तेय और गुरुदारागम—इन चारों महापातों से गायत्री जप ही पवित्र करता है। यहाँ दोनों ग्रन्थों में मेल यह है कि जब पाप की तीव्रता अत्यधिक हो, तब केवल साधारण जप पर्याप्त नहीं होता, अपितु उसके साथ तिल-होम और उपवास (वायुभक्षण) जैसी कठोर तपस्या को जोड़ना पड़ता है ताकि शोधन पूर्ण हो सके।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से 'पाप' का अर्थ केवल सामाजिक अपराध नहीं, अपितु वह 'चित्त-मल' है जो प्राणों के प्रवाह को बाधित करता है और साधक की चेतना को संकुचित (संकीर्ण) कर देता है। जब साधक स्वयं को 'संकीर्ण' मानता है, तो वह वास्तव में अपनी उस अवस्था का अनुभव कर रहा होता है जहाँ उसका मन ग्लानि और अपराध-बोध से भरा होता है। यह ग्लानि एक मानसिक अवरोध है जो ध्यान के मार्ग को रोकती है।
साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह अपने पश्चात्ताप को निष्क्रिय शोक में न बदले, बल्कि उसे 'जप' की अग्नि में परिवर्तित कर दे। गायत्री जप के समय जब साधक अपनी समस्त मलिनता को मन्त्र की ध्वनि और उसके प्रकाश (सूर्य-तत्त्व) को समर्पित करता है, तो वह जप एक शोधन-प्रक्रिया बन जाता है। जैसे अग्नि अशुद्धियों को जलाकर स्वर्ण को शुद्ध करती है, वैसे ही गायत्री का निरंतर अभ्यास साधक के हृदय से संकीर्णता को मिटाकर उसे पुनः 'विस्तृत' और 'प्रकाशमय' बनाता है। यह प्रक्रिया साधक को ग्लानि की निम्न भूमि से उठाकर पुनः पात्रता की भूमि पर प्रतिष्ठित करती है।
तत्र तत्र तिलैर्होमो गायत्र्या जपनं तथा ।
वायुभक्षो दिवा तिष्ठेत् रात्रिं नीत्वाप्सु सूर्यदृक् ॥ ४.५७ ॥
… वहाँ-वहाँ तिलों से होम और गायत्री का जप करे। दिन में वायु पीकर (उपवास करके) खड़ा रहे, रात्रि जल में बिताकर, सूर्य को देखता हुआ …
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह बताया कि जब भी कोई द्विज अपने अंतःकरण को पाप-मल से दूषित या संकीर्ण अनुभव करता है, तब उसे शोधन की आवश्यकता होती है। वर्तमान श्लोक उसी मानसिक ग्लानि और आत्मिक मलिनता को दूर करने के लिए विशिष्ट प्रायश्चित्त विधियों का विधान करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तत्र तत्र) तिलैर्होमो (कुर्यात्), गायत्र्या जपनं तथा (कुर्यात्)। दिवा वायुभक्षो तिष्ठेत्, रात्रिं (च) नीत्वाप्सु (तिष्ठेत्), सूर्यदृक् (तिष्ठेत्)।
पदार्थ-निर्वचन:
• तिलैर्होमो: तिलों की आहुति देना। तिल अग्निहोत्र में शुद्धि के प्रतीक माने जाते हैं, जो सूक्ष्म शरीर के मैल को भस्म करने की क्षमता रखते हैं।
• वायुभक्षो: 'वायु का भक्षण करना'। इसका शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ है—पूर्ण उपवास। जब अन्न का त्याग कर केवल प्राणवायु पर टिका रहा जाता है, तब उसे वायु-भक्षण कहते हैं।
• नीत्वाप्सु: जल में रहकर या जल के भीतर समय व्यतीत करना। यहाँ 'नीत्वा' का अर्थ जल की शरण में जाना और वहाँ ठहरना है।
• सूर्यदृक्: सूर्य का दर्शन करते हुए। यह केवल दृष्टि का विषय नहीं, अपितु सूर्य की किरणों के माध्यम से शरीर और मन के शोधन का संकेत है।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (४.५६) के उस वाक्य "यत्र यत्र च संकीर्णमात्मानं मन्यते द्विजः" (जहाँ-जहाँ द्विज स्वयं को दूषित मानता है) का उत्तर और समाधान है। जब साधक अपनी चेतना में किसी दोष का अनुभव करता है, तब केवल मानसिक जप पर्याप्त नहीं होता, अपितु देह और इंद्रियों के स्तर पर भी शोधन आवश्यक हो जाता है।
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ तीन स्तरों पर शुद्धि की विधि बताते हैं:
प्रथम—अग्नि द्वारा: तिलों से होम करना। अग्नि रूपांतरण की शक्ति है। तिल जब अग्नि में समर्पित होते हैं, तो वे साधक के संचित पाप-संस्कारों को भस्म करने का माध्यम बनते हैं। इसके साथ गायत्री जप का निर्देश है, क्योंकि मन्त्र और होम मिलकर स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तरों पर शोधन करते हैं।
द्वितीय—प्राण और देह द्वारा: "दिवा वायुभक्षो तिष्ठेत्" अर्थात् दिन में उपवास रखकर स्थिर रहना। अन्न के त्याग से शरीर की जड़ता समाप्त होती है और चेतना हल्की होती है। जब साधक केवल वायु का भक्षण करता है, तो उसका ध्यान बाहरी भोजन से हटकर आंतरिक प्राण-शक्ति की ओर मुड़ता है।
तृतीय—तत्वों द्वारा: "रात्रिं नीत्वाप्सु सूर्यदृक्"। रात्रि के समय जल में रहना (स्नान या जल-समाधि जैसी स्थिति) मन की चंचलता और ताप को शांत करता है, क्योंकि जल शीतलता और शुद्धि का प्रतीक है। वहीं 'सूर्यदृक्' के माध्यम से साधक अपने भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को सूर्य के तेज से मिटाने का प्रयास करता है।
यह संपूर्ण प्रक्रिया एक चक्र है—अग्नि (होम), वायु (उपवास), जल (रात्रि-निवास) और तेज (सूर्य-दर्शन)। इन चारों तत्वों के संयोग से वह 'संकीर्णता' समाप्त होती है, जिसका उल्लेख पिछले श्लोक में था। यह विधि ४.५८ में वर्णित जप-संख्याओं के साथ मिलकर पूर्ण होती है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को एक ऐसी अवस्था में ले जा रहे हैं जहाँ देह, प्राण और दृष्टि—तीनों का एक साथ शोधन हो।
साधक के लिए 'वायुभक्षण' (उपवास) केवल पेट खाली रखना नहीं है, बल्कि यह शरीर की ऊर्जा को ऊपर उठाने का अभ्यास है। जब अन्न का भारीपन समाप्त होता है, तब मन स्वाभाविक रूप से गायत्री के सूक्ष्म स्पंदनों को ग्रहण करने योग्य बनता है। जल में रात्रि व्यतीत करना चित्त की गहन शांति और अंतर्मुखता का अभ्यास है; जल जैसा स्वभाव अपनाकर साधक अपने अहंकार को विसर्जित करता है।
अंततः 'सूर्य-दर्शन' इस पूरी प्रक्रिया का शिखर है। सूर्य इस सृष्टि का प्रत्यक्ष अधिष्ठाता है और हृदय के भीतर स्थित 'हृदय-सूर्य' का प्रतीक है। जब साधक उपवास और जल-शुद्धि के बाद सूर्य को देखता है, तो उसकी दृष्टि केवल भौतिक सूर्य पर नहीं, बल्कि उस प्रकाश पर होती है जो उसे गायत्री मन्त्र (जो स्वयं सौर-शक्ति है) के माध्यम से प्राप्त हुआ है।
इस प्रकार यह अभ्यास साधक को 'संकीर्ण' (संकुचित/दूषित) भूमि से उठाकर 'विस्तृत' और 'शुद्ध' भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ वह पुनः अपनी मूल ब्रह्म-प्रकृति में स्थित हो सके।
सम्पादकीय टिप्पणी — पदार्थमें ‘तिल अग्निहोत्रमें शुद्धिके प्रतीक’ कहा गया है — अग्निहोत्रकी आहुति दूध (पय) से होती है, तिलसे नहीं; श्लोक केवल ‘तिलैर्होमः’ कहता है, यानी प्रायश्चित्तका तिल-होम।
जप्त्वा सहस्रं गायत्र्याः शुध्येद् ब्रह्मवधादृते ।
शतेन गायत्र्याः स्नायात् शतमन्तर्जले जपेत् ॥ ४.५८ ॥
… गायत्री का सहस्र जप करके ब्रह्महत्या के सिवा (अन्य पापों से) शुद्ध हो जाए। सौ गायत्री मन्त्रों से स्नान करे और सौ बार अन्तर्जल में जप करे …
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संकीर्ण आत्मा (दूषित अंतःकरण) की शुद्धि के लिए तिल-होम, उपवास और जल-निवास जैसी कठिन शारीरिक तपस्याओं का विधान किया। वर्तमान श्लोक उसी शोधन-प्रक्रिया को मन्त्र-शक्ति से जोड़ते हुए गायत्री जप की विशिष्ट संख्याओं और उनके प्रभाव का वर्णन करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (द्विजः) गायत्र्याः सहस्रं जप्त्वा ब्रह्मवधादृते (अन्यपापेभ्यः) शुध्येत्। शतेन गायत्र्याः स्नायात्, (तथा) शतमन्तर्जले जपेत्।
पदार्थ-निर्वचन:
• सहस्रं जप्त्वा: एक हजार बार जप करने से। यहाँ संख्या का विशेष महत्त्व है; सहस्र जप मन की एक अवस्था को निर्मित करता है जहाँ चित्त पूरी तरह मन्त्रमय हो जाता है।
• ब्रह्मवधादृते: 'ऋते' का अर्थ है—के बिना या छोड़कर। ब्रह्मवध (ब्राह्मण की हत्या) के पाप को छोड़कर। यह स्पष्ट संकेत है कि ब्रह्महत्या जैसा महापातक केवल सहस्र जप से नहीं धुलता, उसके लिए और अधिक गहन विधान (जैसा आगे लक्ष-जप में आएगा) आवश्यक है।
• शतेन स्नायात्: सौ गायत्री मन्त्रों के साथ स्नान करना। इसका अर्थ है—स्नान के समय या जल का उपयोग करते समय सौ बार मन्त्र का उच्चारण करना, जिससे जल अभिमन्त्रित होकर शोधक बन जाए।
• अन्तर्जले जपेत्: जल के भीतर (निमज्जित होकर) जप करना।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री मन्त्र की उस सामर्थ्य को प्रकट कर रहे हैं जो साधक के सूक्ष्म शरीर पर जमे पाप-मल को हटाने में सक्षम है। वे यहाँ शुद्धि के तीन स्तर बताते हैं:
प्रथम— सहस्र जप द्वारा मानसिक शुद्धि: जब कोई साधक एक हजार बार गायत्री का जप करता है, तो उसकी चेतना में मन्त्र की एक ऐसी धारा प्रवाहित होती है जो अधिकांश पापों का क्षय कर देती है। किन्तु ऋषि यहाँ एक मर्यादा रेखा खींचते हैं—'ब्रह्मवधादृते'। ब्रह्महत्या को वेदों में सबसे घोर अपराध माना गया है क्योंकि यह ज्ञान-परम्परा के जीवित प्रतीक की हत्या है। अतः याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि सहस्र जप सामान्य पापों और मध्यम दोषों से तो मुक्त करता है, किन्तु महापातक (ब्रह्मवध) के लिए यह पर्याप्त नहीं है। यहाँ विधि और फल का भेद स्पष्ट रखा गया है।
द्वितीय— शतेन स्नायात् (अभिमन्त्रित स्नान): बाहरी शरीर की शुद्धि हेतु जल आवश्यक है, किन्तु केवल जल शरीर को स्वच्छ करता है, आत्मा को नहीं। जब साधक सौ गायत्री मन्त्रों के साथ स्नान करता है, तो वह जल 'सावित्री-जल' बन जाता है। यह क्रिया स्थूल देह और सूक्ष्म देह के मध्य के सेतु को शुद्ध करती है।
तृतीय— अन्तर्जले जप: जल के भीतर रहकर सौ बार जप करने का विधान अत्यंत गूढ़ है। जब शरीर जल में होता है, तब बाहरी जगत के शोर से विच्छेद हो जाता है और इंद्रियाँ अंतर्मुखी होने लगती हैं। यह क्रिया केवल शारीरिक स्नान नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति द्वारा चित्त के गहनतम स्तरों की सफाई है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से साधक को 'बाहरी' से 'भीतरी' ले जा रहे हैं।
जल के भीतर जप करने का योगिक रहस्य यह है कि जब शरीर जल में निमज्जित होता है, तो स्वाभाविक रूप से श्वास की गति धीमी होती है और कुम्भक (श्वास-रोक) जैसी स्थिति उत्पन्न होती है। इस अवस्था में मन अधिक एकाग्र होता है और मन्त्र सीधे हृदय के आकाश में गूँजता है। साधक को यहाँ यह अनुभव करना है कि जैसे जल शरीर के मैल को धोता है, वैसे ही गायत्री का प्रकाश उसके अंतःकरण के अंधकार को धो रहा है।
यहाँ 'स्नान' केवल जल से नहीं, अपितु 'प्रकाश' (सविता) से स्नान है। सौ बार जप करके स्नान करने का अर्थ है—अपने अस्तित्व के प्रत्येक रोम-छिद्र में उस दिव्य ज्योति को स्थापित करना। साधक इस अभ्यास से अपनी चेतना को 'जड़' से 'चैतन्य' की ओर ले जाता है और अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, अपितु प्रकाशपुंज है।
संध्योपासनमाहात्म्यम्
अपः शतेन पीत्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
सायं प्रातस्तु यः संध्यां सऋक्षां सेवते द्विजः ॥ ४.५९ ॥
… सौ (गायत्री से अभिमन्त्रित) जल पीकर वह सर्वपापों से मुक्त हो जाता है। जो द्विज सायं और प्रातः नक्षत्रों सहित संध्या का सेवन करता है …
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्महत्या के अतिरिक्त अन्य पापों की शुद्धि हेतु सहस्र जप, सौ बार अभिमन्त्रित स्नान और जल के भीतर जप का विधान बताया था। वर्तमान श्लोक उसी शोधन-प्रक्रिया को पूर्ण करता हुआ जल के सेवन (पान) की महिमा बताता है और फिर साधक को संध्यावंदन के नियमित समय और उसकी विधि की ओर ले जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधकः) अपः शतेन (गायत्र्याः) पीत्वा तु सर्वपापेभ्यः प्रमुच्यते। (तथा) सायं प्रातस्तु यः द्विजः सऋक्षां संध्यां सेवते (तस्य... ४.६०)।
पदार्थ-निर्वचन:
• अपः शतेन पीत्वा: सौ गायत्री मंत्रों द्वारा अभिमन्त्रित जल का पान करना। यहाँ 'शतेन' संख्या निश्चित है, जो मंत्र की शक्ति को जल में संचित करने की एक विशिष्ट मात्रा है।
• सर्वपापेभ्यः प्रमुच्यते: समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। यहाँ मुक्ति का अर्थ केवल कर्मफल का विनाश नहीं, अपितु अंतःकरण का वह शोधन है जिससे साधक पुनः साधना के योग्य बनता है।
• सायं प्रातस्तु: सायंकाल और प्रातःकाल। ये दो समय सूर्य की गति के संधि-बिन्दु हैं।
• सऋक्षां सेवते: 'ऋक्ष' का अर्थ है नक्षत्र (तारे)। सऋक्षां का तात्पर्य है—उन समयों में संध्या करना जब आकाश में नक्षत्र दिखाई दे रहे हों। यह समय सूर्योदय से ठीक पूर्व और सूर्यास्त के ठीक पश्चात का वह सूक्ष्म अंतराल है जहाँ प्रकाश और अंधकार मिलते हैं।
• द्विजः: वह जिसने द्वितीय जन्म (उपनयन/दीक्षा) प्राप्त किया हो, अर्थात् जो अब केवल शरीर नहीं, अपितु एक 'साधक' है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ जल की शुद्धि और उसके प्रभाव का रहस्य खोल रहे हैं। पूर्व श्लोक में उन्होंने जल के भीतर जप (अन्तर्जले जपेत्) और स्नान की बात कही थी; अब वे उस अभिमन्त्रित जल के 'आन्तर' उपयोग यानी पान का विधान करते हैं। जब साधक सौ बार गायत्री का जप कर जल को अभिमन्त्रित करता है, तो वह जल केवल प्यास बुझाने वाला पदार्थ नहीं रहता, अपितु 'अमृत' और 'औषधि' बन जाता है। इस मंत्र-युक्त जल का सेवन करने से शरीर के भीतर स्थित सूक्ष्म दोष और पाप रूपी मल धुल जाते हैं। यह क्रिया बाह्य शुद्धि (स्नान) के बाद आन्तर शुद्धि (पान) की पूर्णता है।
इसके पश्चात, ऋषि एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम की ओर संकेत करते हैं—संध्यावंदन का समय। वे कहते हैं कि जो द्विज सायं और प्रातः 'सऋक्षां' संध्या का सेवन करता है। यहाँ 'सऋक्षां' शब्द का गहरा अर्थ है। नक्षत्रों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि सूर्य क्षितिज के नीचे है, किन्तु उसकी आभा अभी भी वातावरण में व्याप्त है। यह वह समय है जब प्रकृति स्वयं मौन होती है और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह सबसे तीव्र होता है। जो साधक इस विशिष्ट काल-खंड में संध्या करता है, वह समय की लय के साथ एकाकार हो जाता है।
यह वाक्य यहाँ समाप्त नहीं होता; 'सेवते' क्रिया के बाद उसका फल अगले श्लोकों (४.६०-४.६२) में विस्तार से बताया गया है कि ऐसा करने वाला ब्राह्मण किस प्रकार पवित्र होता है और किन घोर पापों से मुक्त होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
गोघ्नः पितृघ्नो मातृघ्नो ब्रह्महा गुरुतल्पगः । ब्रह्मघ्नः स्वर्णहारी च सुरापो लक्षजप्यतः ॥ शुध्यते वाऽथ वा स्नात्वा शतमन्तर्जले जपेत् । अपः शतेन पीत्वा तु गायत्र्याः पापहा भवेत् ॥ शतं जप्ता तु गायत्री पापोपशमनी स्मृता । सहस्रं जप्ता सा देवी उपपातकनाशिनी ॥ २१५.११–१३ ॥
गोहत्यारा, पितृहत्यारा, मातृहत्यारा, ब्रह्महत्यारा, गुरुपत्नीगामी, सोना चुरानेवाला और सुरापी — (गायत्रीके) एक लाख जपसे शुद्ध होता है; अथवा स्नान करके सौ बार जलके भीतर जप करे, और गायत्रीसे (अभिमन्त्रित) सौ (अञ्जलि) जल पीकर पापरहित हो जाता है। सौ बार जपी गयी गायत्री पापको शान्त करती है, हज़ार बार जपी गयी वह देवी उपपातकोंका नाश करती है।
अग्नि पुराण के इस अंश में भी ठीक यही क्रम मिलता है—'अपः शतेन पीत्वा तु गायत्र्याः पापहा भवेत्'। यहाँ स्मृति और पुराण दोनों एक स्वर में कहते हैं कि सौ बार गायत्री द्वारा अभिमन्त्रित जल का पान पापों का नाश करने वाला है। अग्निपुराण जहाँ 'उपपातकनाशिनी' (हजार जप) और 'पापोपशमनी' (सौ जप) के बीच भेद करता है, वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति इस प्रक्रिया को संध्या की नियमितता और नक्षत्र-काल (सऋक्षां) से जोड़कर उसे एक योगिक अनुशासन का रूप देती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाला है। सबसे पहले अभिमन्त्रित जल का पान—यह शरीर के भौतिक स्तर पर शोधन है। जब मंत्रयुक्त जल भीतर जाता है, तो वह केवल रक्त और मांस को नहीं, अपितु प्राणों को भी पवित्र करता है।
विशेषता 'सऋक्षां' (नक्षत्रों सहित संध्या) में छिपी है। योग में संधि-काल का अत्यधिक महत्त्व है। दिन और रात के मिलन बिंदु पर मन की चंचलता न्यूनतम होती है और एकाग्रता उच्चतम। जब आकाश में तारे दिखने लगें, तब साधक का चित्त बाहरी जगत से हटकर भीतर की ओर मुड़ने के लिए सबसे अधिक तैयार होता है। यह वह क्षण है जहाँ 'अहं' (व्यक्तिगत पहचान) और 'अहर्' (ब्रह्मांडीय समय) का मिलन होता है। जो साधक इस समय में गायत्री का जप करता है, वह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं कर रहा, बल्कि अपनी चेतना को सूर्य के उस सूक्ष्म रूप से जोड़ रहा है जो अंधकार में भी प्रकाशमान है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल-मन' की भूमि से उठाकर 'सूक्ष्म-चित्त' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।
जपन् वै पावनीं देवीं सावित्रीं लोकमातरम् ।
स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो धूतकिल्बिषः ॥ ४.६० ॥
… लोकमाता पावनी देवी सावित्री का जप करता हुआ, वह ब्राह्मण उस देवी से पवित्र होकर निष्पाप हो जाता है …
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्यावंदन के नियमित समय और नक्षत्रों की उपस्थिति (सऋक्षां) के महत्त्व को रेखांकित किया था। वर्तमान श्लोक उसी निरंतरता में सावित्री मंत्र की उस शक्ति का उद्घाटन करता है, जो साधक को केवल कर्मकांडीय शुद्धि ही नहीं, अपितु एक मातृत्व-भाव से युक्त दैवीय कृपा द्वारा पूर्णतः निष्पाप करती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यः द्विजः सायं प्रातस्तु सऋक्षां संध्यां सेवते,) (सः) लोकमातरम् पावनीं देवीं सावित्रीं जपन् वै, तया देव्या पावितो ब्राह्मणः धूतकिल्बिषः (भवति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• पावनीं देवीं सावित्रीं: 'पावनी' वह है जो पवित्र करती है। यहाँ सावित्री केवल एक मंत्र नहीं, अपितु 'देवी' रूप में प्रतिष्ठित हैं। सावित्री का अर्थ है—वह जो सूर्य (सविता) की शक्ति का स्वरूप है और साधक को प्रकाश की ओर ले जाती है।
• लोकमातरम्: समस्त लोकों की माता। जिस प्रकार माता अपने बालक के समस्त दोषों को क्षमा कर उसे पोषण देती है, उसी प्रकार यह मंत्र साधक के अंतःकरण का पोषण कर उसे शुद्ध करता है।
• धूतकिल्बिषः: 'धूत' का अर्थ है धोया हुआ या पूरी तरह से साफ किया हुआ; 'किल्बिष' का अर्थ है पाप या मानसिक मल। अर्थात् वह ब्राह्मण जिसके भीतर का मैल पूरी तरह धुल चुका है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ मंत्र के यांत्रिक जप और उसके जीवंत अनुभव के बीच के भेद को स्पष्ट कर रहे हैं। जब साधक सायं और प्रातः की संधि-वेला में सावित्री का जप करता है, तब वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा होता, अपितु उस 'पावनी देवी' के सान्निध्य में होता है जो समस्त लोकों की माता हैं।
यहाँ 'लोकमाता' शब्द अत्यंत गूढ़ है। यह संकेत देता है कि गायत्री मंत्र साधक के लिए एक सुरक्षा-कवच और वात्सल्यमयी शक्ति बन जाती है। जब कोई ब्राह्मण इस भाव से जप करता है, तो वह देवी की कृपा से 'धूतकिल्बिष' हो जाता है। यहाँ शुद्धि का अर्थ केवल बाहरी पापों का निवारण नहीं, अपितु चित्त की वह निर्मलता है जिससे साधक के भीतर का अंधकार मिट जाता है और वह पुनः ब्रह्म-साधना के योग्य बनता है। यह प्रक्रिया एक निरंतर शोधन है, जहाँ संध्यावंदन के माध्यम से साधक अपने दिन और रात के संचित विकारों को धो डालता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
संध्यावंदन की इस शुद्धि-प्रक्रिया की पुष्टि अन्य शास्त्रों में भी मिलती है:
पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ २.१०२ ॥
प्रातःसन्ध्यामें खड़े होकर (सावित्रीका) जप करनेवाला रातके पापको दूर करता है, और सायंसन्ध्यामें बैठकर (जप करनेवाला) दिनमें किये मलको नष्ट करता है।
मनुस्मृति स्पष्ट करती है कि संध्या का जप केवल एक नियम नहीं, अपितु समय-बद्ध शोधन है। प्रातःकाल का जप रात्रि के संचित विकारों को नष्ट करता है और सायंकाल का जप दिनभर की मानसिक अशुद्धियों (मल) का क्षय करता है। स्मृति यह बताती है कि मनुष्य निरंतर पापों का संचय करता है; अतः संध्यावंदन एक ऐसी 'दिव्य स्नान' प्रक्रिया है जो साधक को प्रतिदिन पवित्र करती रहती है।
संध्यामुपासते ये वै नित्यमेव द्विजोत्तमाः । ते यान्ति नरशार्दूल ब्रह्मलोकं न संशयः ॥
नरश्रेष्ठ! जो श्रेष्ठ द्विज नित्य ही सन्ध्याकी उपासना करते हैं, वे ब्रह्मलोकको जाते हैं — इसमें संशय नहीं।
महाभारत इस नियमितता के अंतिम फल की घोषणा करता है। जो द्विज नित्य ही सन्ध्या की उपासना करते हैं, वे ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं। यहाँ 'ब्रह्मलोक' केवल एक स्थान नहीं, अपितु वह चेतना-अवस्था है जहाँ साधक अपनी सीमित पहचान से मुक्त होकर विराट में विलीन हो जाता है। याज्ञवल्क्य स्मृति और ये शास्त्र एकमत हैं कि संध्या का नियमित अनुष्ठान ही जीव को पाश से मुक्त कर परम पद की ओर ले जाता है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से साधक को 'भक्ति' और 'शक्ति' के समन्वय का मार्ग दिखा रहे हैं। योगिक दृष्टि से, जब साधक सावित्री को 'लोकमाता' के रूप में अनुभव करता है, तो वह केवल एक मन्त्र-साधक नहीं रहता, अपितु एक 'पुत्र' बन जाता है। माँ की शरण में जाने पर बालक को अपनी योग्यताओं या त्रुटियों का भय नहीं रहता; वह पूर्णतः समर्पित हो जाता है।
अभ्यास यह है कि जप के समय साधक स्वयं को उस दैवीय वात्सल्य में विसर्जित कर दे। जब 'पावनी देवी' का भाव जाग्रत होता है, तब मन्त्र की शक्ति केवल वाणी तक सीमित न रहकर हृदय में उतरती है। यह अनुभव साधक को 'अहंकार' (मैं जप कर रहा हूँ) से हटाकर 'कृपा' (देवी मुझे पवित्र कर रही हैं) की भूमि पर ले जाता है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जैसे जल मैल को धो देता है, वैसे ही सावित्री का प्रकाश उसके अंतःकरण के गहरे अंधकार और पापों को भस्म कर रहा है। यह 'धूतकिल्बिष' होने की अवस्था वह भूमि है जहाँ से साधक सूक्ष्म जगत की यात्रा प्रारंभ करता है और स्वयं को उस विराट चेतना (सूर्य-पुरुष) के साथ एकाकार करने के योग्य पाता है।
न सीदेत् प्रतिगृह्णानः पृथिवीं च ससागराम् ।
गोघ्नः पितृघ्नो मातृघ्नो भ्रूणहा गुरुतल्पगः ॥ ४.६१ ॥
— समुद्र सहित पृथ्वीका दान लेता हुआ भी (वह) दोषी नहीं होता। गोहत्यारा, पितृहत्यारा, मातृहत्यारा, भ्रूणहत्यारा, गुरुपत्नीगामी —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सावित्री मंत्र को 'लोकमाता' और 'पावनी देवी' कहकर उसकी उस शक्ति का वर्णन किया, जो साधक के समस्त मानसिक मल (किल्बिष) को धो देती है। वर्तमान श्लोक इसी शुद्धि की पराकाष्ठा और गायत्री-शक्ति के प्रभाव से प्राप्त होने वाले उस आध्यात्मिक कवच का वर्णन करता है, जो साधक को संसार के सबसे भारी दोषों और प्रतिग्रह के परिणामों से सुरक्षित रखता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यः द्विजः सायं प्रातस्तु सावित्रीं जपन् पावितो भवति,) (सः) पृथिवीं च ससागराम् प्रतिगृह्णानः न सीदेत् । (अथवा सः) गोघ्नः, पितृघ्नो, मातृघ्नो, भ्रूणहा, गुरुतल्पगः (अपि शुध्यति/न सीदेत्)।
पदार्थ-निर्वचन:
• प्रतिगृह्णानः न सीदेत्: 'प्रतिग्रह' का अर्थ है दान या उपहार लेना। सामान्यतः शास्त्र कहते हैं कि ब्राह्मण को अनुचित प्रतिग्रह नहीं करना चाहिए, अन्यथा वह आध्यात्मिक रूप से गिरता है ('सीदेत्' अर्थात् डूबना या पतन होना)। यहाँ 'न सीदेत्' का अर्थ है कि गायत्री की शक्ति उसे उस पतन से बचा लेती है।
• पृथिवीं च ससागराम्: समुद्र सहित पूरी पृथ्वी। यह एक अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि यदि कोई साधक समस्त भौतिक जगत के स्वामित्व को भी प्रतिग्रह में ले ले, तो भी वह गायत्री-शक्ति के कारण विचलित या पतित नहीं होता।
• गोघ्नः, पितृघ्नो, मातृघ्नो, भ्रूणहा, गुरुतल्पगः: ये वे घोर पाप हैं जो सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अक्षम्य माने जाते हैं—गोहत्यारा, पिता की हत्या करने वाला, माता की हत्या करने वाला, गर्भस्थ शिशु की हत्या करने वाला और गुरु की पत्नी के साथ संबंध रखने वाला।
भाष्य —
यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत साहसी और रहस्यमय बात कह रहे हैं। वे बता रहे हैं कि जो ब्राह्मण नियमित रूप से सावित्री मंत्र का जप कर 'पावित' हो चुका है, उसकी चेतना इतनी उन्नत और शुद्ध हो जाती है कि वह संसार के सबसे भारी भौतिक भार (प्रतिग्रह) से भी अप्रभावित रहता है।
साधारणतः प्रतिग्रह चित्त में आसक्ति उत्पन्न करता है और साधक को नीचे गिराता है, किन्तु गायत्री का जापक उस प्रकाश-पुंज में स्थित होता है जहाँ वस्तुएँ उसके भीतर प्रवेश नहीं करतीं। 'समुद्र सहित पृथ्वी' का दान लेना इस बात का प्रतीक है कि वह भौतिक जगत के चरम वैभव या स्वामित्व को प्राप्त करके भी उसमें डूबता नहीं है; उसकी आंतरिक ज्योति उसे ऊपर उठाए रखती है।
इसके पश्चात, ऋषि उन पापों की सूची देते हैं जिन्हें सामान्यतः घोर माना गया है—जैसे पितृहत्या और मातृहत्या। यहाँ भाव यह है कि गायत्री मंत्र की अग्नि इतनी तीव्र है कि वह केवल छोटे दोषों को ही नहीं, अपितु इन जड़ पापों के संस्कारों को भी भस्म करने की क्षमता रखती है। यह विधि कर्मकाण्डीय शुद्धि से अधिक 'संस्कार-शुद्धि' की बात है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सावित्री मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक ऐसी आध्यात्मिक अग्नि है जिसमें स्वयं का अहंकार और अतीत के घोरतम पाप भी भस्म हो सकते हैं।
श्रुति-संगति —
इस रहस्य की पुष्टि श्रुति में मिलती है:
स य इमांस्त्रींलोकान् पूर्णान्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतत्प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतद्द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केन चनाप्यं कुत उ एतावत्प्रतिगृह्णीयात् ॥ १४.८.१५.९ ॥
जो (गायत्रीका जानकार) इन तीनों भरे हुए लोकोंको दानमें ग्रहण कर ले, (वह दान) इस (गायत्री) के इस पहले पदको ही पाता (चुकाता) है; जितनी यह त्रयी विद्या है, उतना जो ग्रहण कर ले, वह इसके दूसरे पदको पाता है; जितने ये प्राणी हैं, उतना जो ग्रहण कर ले, वह इसके तीसरे पदको पाता है; और इसका जो यह चौथा, दर्शत, रजसे परे पद है — जो यह (सूर्य) तपता है — वह तो किसीसे भी प्राप्य नहीं; कोई इतना (दान) ग्रहण ही कैसे करेगा?
यहाँ शतपथ ब्राह्मण यह स्पष्ट करता है कि गायत्री मंत्र का एक पद इतना महान और प्रकाशमय है कि यदि कोई व्यक्ति तीनों भरे हुए लोकों को भी दान में ग्रहण कर ले, तो वह केवल इस मंत्र के प्रथम पद की कीमत के बराबर ही होगा। अर्थात्, भौतिक जगत का समस्त वैभव (प्रतिग्रह) गायत्री के एक अक्षर के सामने तुच्छ है। अतः जो साधक इस मंत्र के प्रभाव में है, उसे पृथ्वी और समुद्र जैसा विशाल प्रतिग्रह लेने पर भी पतन (सीदन) का भय नहीं रहता, क्योंकि उसकी उपलब्धि उस 'तुरीय पद' की ओर है जो रज से परे और अप्राप्य है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से 'प्रतिग्रह' केवल धन या वस्तु लेना नहीं है, अपितु बाहरी जगत के प्रभावों को अपने भीतर समाहित करना है। जब हम संसार से कुछ लेते हैं, तो उसके साथ उससे जुड़ी वासनाएँ और मानसिक भार भी हमारे चित्त में प्रवेश करते हैं, जिससे साधक का मन भारी होकर नीचे की ओर (पतन की ओर) गिरता है।
साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि गायत्री का निरंतर अभ्यास उसे 'अनासक्त' बना देता है। जब वह सूर्य-पुरुष के प्रकाश में स्थित होता है, तब उसके भीतर एक ऐसा शून्य या रिक्त स्थान निर्मित हो जाता है जहाँ बाहरी वस्तुएँ तो आती हैं, किन्तु उनका 'भार' (दोष) चित्त को नहीं डुबो पाता।
यहाँ घोर पापों (गोघ्न आदि) का उल्लेख साधक को यह बोध कराने के लिए है कि जब वह मंत्र के वास्तविक स्वरूप में उतरता है, तो उसके भीतर की 'अविद्या' नष्ट होती है। योगिक अभ्यास में, जब जापक मन्त्र के प्रकाश को हृदय में अनुभव करता है, तब वह उन गहरे संस्कारों से मुक्त होने लगता है जो उसे जन्म-जन्मांतर से जकड़े हुए थे। यह श्लोक साधक को भय से मुक्त कर, उस असीम क्षमा और शुद्धि की भूमि पर ले जाता है जहाँ केवल 'अक्षर' का शासन है।
गायत्र्यक्षरदेवताः
ब्रह्महा हेमहारी च यस्तु विप्रः सुरां पिबेत् ।
गायत्र्याः शतसाहस्रे जपे भवति वै शुचिः ॥ ४.६२ ॥
— ब्रह्महत्यारा, सोनेका चोर, और जो विप्र सुरा पीता है — (ये भी) गायत्रीके एक लाख जपसे शुद्ध हो जाते हैं।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन घोर पापों की सूची दी थी, जिनमें गोहत्या और गुरुतल्पगमन जैसे अक्षम्य अपराध सम्मिलित थे। वर्तमान श्लोक उस सूची को पूर्ण करता है और यह उद्घोष करता है कि गायत्री-शक्ति का प्रभाव इतना व्यापक है कि वह सबसे गहरे अंधकार में गिरे हुए जीव को भी पुनः प्रकाश की ओर ला सकता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ब्रह्महा, हेमहारी च (तथा) यः सुराम् पिबति विप्रः (ते अपि) गायत्र्याः शतसाहस्रे जपे वै शुचिः भवति।
पदार्थ-निर्वचन:
• ब्रह्महा: ब्रह्महत्यारा। वह जिसने ब्राह्मण की हत्या की हो। यह पाप समस्त महापातों में सबसे भारी माना गया है।
• हेमहारी: सोने का चोर। केवल धन की चोरी नहीं, अपितु 'हेम' (स्वर्ण) का चुराना उस समय के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुशासन का घोर उल्लंघन था।
• सुरां पिबेत् विप्रः: वह विप्र जो सुरा (मदिरा) का सेवन करता है। ब्राह्मण के लिए मदिरा-पान न केवल मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि यह उसकी बुद्धि और विवेक को नष्ट करने वाला कृत्य है।
• शतसाहस्रे जपे: एक लाख (१,००,०००) बार जप करने से। यहाँ संख्या निश्चित है; 'सहस्र' (एक हजार) और 'शतसाहस्र' (एक लाख) के बीच का अंतर साधना की तीव्रता को दर्शाता है।
• शुचिः भवति: पवित्र हो जाता है। इसका अर्थ केवल बाह्य शुद्धि नहीं, अपितु उस पाप से उत्पन्न मानसिक बोझ और आध्यात्मिक अवरोधों का समाप्त होना है।
भाष्य —
यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य गायत्री-मंत्र की उस चरम सामर्थ्य को प्रकट कर रहे हैं, जो मृत्युंजय और सर्व-पाप-नाशिनी है। श्लोक ४.६१ में वर्णित पापों के साथ यहाँ ब्रह्महत्या, स्वर्ण-चौर्य और विप्र द्वारा मदिरा-पान जैसे दोषों को जोड़ा गया है।
यहाँ एक सूक्ष्म भेद पर ध्यान देना अनिवार्य है। पिछले श्लोक (४.५८) में कहा गया था कि सहस्र (एक हजार) जप से ब्रह्महत्या के सिवा अन्य पापों से शुद्धि होती है—अर्थात् सहस्र जप ब्रह्महत्या जैसे महापाप को मिटाने के लिए पर्याप्त नहीं था। किन्तु वर्तमान श्लोक ४.६२ में याज्ञवल्क्य घोषणा करते हैं कि यदि वही जप 'शतसाहस्र' (एक लाख) तक विस्तृत हो जाए, तो वह ब्रह्महत्यारा और सोने का चोर तक भी शुद्ध हो जाता है।
यह विधान यह स्पष्ट करता है कि गायत्री केवल एक मंत्र नहीं, अपितु एक अग्नि-तप है। जिस प्रकार मंद अग्नि से कच्चा भोजन नहीं पकता और अत्यंत तीव्र अग्नि से जल सकता है, उसी प्रकार सूक्ष्म दोषों के लिए अल्प जप पर्याप्त है, किन्तु जब पाप 'महापातक' की श्रेणी में आ जाते हैं, तो उन्हें जलाने के लिए साधना की तीव्रता (संख्या) बढ़ानी पड़ती है। एक लाख का जप साधक के अंतःकरण में उस तपिश को उत्पन्न करता है जो जन्म-जन्मांतर के संचित पापों के मैल को भस्म कर देती है।
यह विधान विप्र के लिए विशेष चेतावनी और आशा दोनों है। मदिरा-पान से नष्ट हुई बुद्धि और चोरी से गिरा हुआ चरित्र, जब एक लाख बार सावित्री की शरण में जाता है, तो वह पुनः अपनी 'ब्रह्मत्व' की स्थिति को प्राप्त करता है। यह इस सत्य का प्रमाण है कि गायत्री-शक्ति जीव के मूल स्वभाव (शुद्धता) को पुनः जाग्रत करने में सक्षम है, चाहे उसने कितने ही घोर अपराध किए हों।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से, पाप केवल सामाजिक अपराध नहीं हैं, अपितु वे 'चित्त-वृत्तियाँ' और 'संस्कार' हैं जो आत्मा के प्रकाश को ढँक देते हैं। ब्रह्महत्या या मदिरा-पान जैसे कृत्य चित्त पर अत्यंत गहरे और गाढ़े अवरोध (मल) उत्पन्न करते हैं।
साधक के लिए यहाँ रहस्य यह है कि जितना बड़ा दोष होगा, उतनी ही लंबी और कठोर साधना की आवश्यकता होगी। एक लाख का जप केवल संख्या की गिनती नहीं है, अपितु यह 'तप' का अनुशासन है। जब साधक एक लाख बार गायत्री का जप करता है, तो वह अनजाने में ही अपनी एकाग्रता को उस स्तर पर ले जाता है जहाँ मन पूरी तरह से सावित्री-शक्ति में विलीन हो जाता है।
यह अभ्यास साधक को 'प्रायश्चित्त' की भावना से उठाकर 'रूपांतरण' की भूमि पर ले जाता है। जो व्यक्ति महापातक करता है, वह आत्म-ग्लानि और अवसाद के गहरे गर्त में होता है। जब वह इस अनुशासन का पालन करता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी निम्न भूमियों से ऊपर उठता है। यह प्रक्रिया उसे ग्लानि से मुक्ति, फिर शुद्धि और अंततः उस प्रकाशमय अवस्था तक ले जाती है जहाँ पाप का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। साधक यहाँ अनुभव करता है कि गायत्री की अग्नि में जलकर उसका पुराना 'पापी व्यक्तित्व' भस्म हो गया है और एक नवीन, शुद्ध चैतन्य का उदय हुआ है।
अक्षराणि च दैवत्यं संप्रवक्ष्याम्यतःपरम् ।
आग्नेयं प्रथमं ज्ञेयं वायव्यं च द्वितीयकम् ॥ ४.६३ ॥
… इसके आगे मैं अक्षरों और उनके देवताओं को कहूँगा: पहला 'आग्नेय' जानना चाहिए और दूसरा 'वायव्य' …
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री-मंत्र की उस अपार शुद्धि-शक्ति का वर्णन किया, जो ब्रह्महत्या जैसे घोर पापों से भी साधक को मुक्त कर सकती है। अब यहाँ से विषय परिवर्तित होकर मंत्र के सूक्ष्म शरीर यानी उसके 'अक्षर-देवताओं' की ओर मुड़ता है, जहाँ मंत्र केवल ध्वनि नहीं, बल्कि दिव्य शक्तियों का अधिष्ठान बन जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अतः परम् अहं अक्षराणि च दैवत्यं संप्रवक्ष्यामि; (तत्र) प्रथमं आग्नेयं ज्ञेयं वायव्यं च द्वितीयकम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• अतः परम्: इसके आगे या अब से। यह शब्द संकेत करता है कि यहाँ से एक नए प्रकरण का आरम्भ हो रहा है।
• अक्षराणि च दैवत्यं: अक्षरों के देवता (दैवत्य)। गायत्री मंत्र के प्रत्येक अक्षर में एक विशिष्ट दैवीय शक्ति प्रतिष्ठित है, जिसे 'अक्षर-देवता' कहा जाता है।
• संप्रवक्ष्यामि: मैं विस्तार से कहूँगा या व्याख्या करूँगा। यह वक्ता (याज्ञवल्क्य) का संकल्प है।
• आग्नेयं प्रथमं ज्ञेयं: पहला अक्षर 'आग्नेय' (अग्नि के देवता से संबंधित) जानना चाहिए। यहाँ 'ज्ञानेय' शब्द केवल सूचना नहीं, अपितु उस शक्ति के साक्षात्कार की ओर संकेत है।
• वायव्यं च द्वितीयकम्: और दूसरा अक्षर 'वायव्य' (वायु के देवता से संबंधित) है।
भाष्य —
यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य गायत्री-साधना के एक अत्यंत गोपनीय पक्ष को खोल रहे हैं। अब तक उन्होंने मंत्र की महिमा, जप की संख्या और शुद्धि के फल बताए, किंतु अब वे साधक को मंत्र के 'अंग-प्रत्यंग' से परिचित करा रहे हैं। यह श्लोक उस लंबी सूची का आरम्भ है जो श्लोक ४.६९ तक चलती है।
ऋषि स्पष्ट करते हैं कि गायत्री के चौबीस अक्षर केवल वर्णमाला के शब्द नहीं हैं, अपितु वे ब्रह्मांडीय शक्तियों के बीज हैं। जब साधक प्रथम अक्षर का उच्चारण करता है, तब वह 'आग्नेय' शक्ति को जाग्रत करता है। अग्नि ज्ञान, तेज और रूपांतरण का प्रतीक है; अतः जप का आरम्भ ही साधक के भीतर अज्ञान के अंधकार को जलाने वाली अग्नि से होता है। तत्पश्चात, द्वितीय अक्षर 'वायव्य' है। वायु प्राण और गति का अधिष्ठान है। प्रथम अक्षर की अग्नि जब प्रज्वलित होती है, तो उसे वायु (प्राण) का सहारा मिलता है, जिससे वह साधना की ऊंचाइयों तक पहुँच सके।
यह क्रम दर्शाता है कि मंत्र का जप एक व्यवस्थित आध्यात्मिक यात्रा है, जहाँ प्रत्येक अक्षर साधक को एक विशेष दैवीय ऊर्जा से जोड़ता है। यह विधि बाहरी जप को आंतरिक यज्ञ में परिवर्तित कर देती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
गायत्री के अक्षर-देवताओं के विषय में विभिन्न परम्पराओं में भिन्न सूचियाँ मिलती हैं। उदाहरणस्वरूप:
आग्नेयं प्रथमं प्रोक्तं प्राजापत्यं द्वितीयकम् । तृतीयं च तथा सौम्यमीशानं च चतुर्थकम् ॥ सावित्रं पञ्चमं प्रोक्तं षष्ठमादित्यदैवतम् । बार्हस्पत्यं सप्तमं तु मैत्रावरुणमष्टमम् ॥ नवमं भगदैवत्यं दशमं चार्यमेश्वरम् । गणेशमेकादशकं त्वाष्ट्रं द्वादशकं स्मृतम् ॥ पौष्णं त्रयोदशं प्रोक्तमैन्द्राग्नं च चतुर्दशम् । वायव्यं पञ्चदशकं वामदैव्यं च षोडशम् ॥ मैत्रावरुणिदैवत्यं प्रोक्तं सप्तदशाक्षरम् । अष्टादशं वैश्वदेवमूनविंशं तु मातृकम् ॥ वैष्णवं विंशतितमं वसुदैवतमीरितम् । एकविंशतिसंख्याकं द्वाविंशं रुद्रदैवतम् ॥ त्रयोविंशं च कौबेरमाश्विनं तत्त्वसंख्यकम् ॥ १२.१ ॥
(गायत्रीके चौबीस अक्षरोंके देवता —) पहला अग्नि, दूसरा प्रजापति, तीसरा सोम, चौथा ईशान, पाँचवाँ सविता, छठा आदित्य, सातवाँ बृहस्पति, आठवाँ मित्रावरुण, नवाँ भग, दसवाँ अर्यमा, ग्यारहवाँ गणेश, बारहवाँ त्वष्टा, तेरहवाँ पूषा, चौदहवाँ इन्द्राग्नी, पन्द्रहवाँ वायु, सोलहवाँ वामदेव, सत्रहवाँ मैत्रावरुणि, अठारहवाँ विश्वेदेव, उन्नीसवाँ मातृका, बीसवाँ विष्णु, इक्कीसवाँ वसु, बाईसवाँ रुद्र, तेईसवाँ कुबेर, और चौबीसवाँ (तत्त्व-संख्यावाला) अश्विनौ। (बृहद्योगियाज्ञवल्क्यकी सूची इससे भिन्न है — दोनों परम्पराएँ हैं।)
देवीभागवत की इस सूची में प्रथम देवता 'अग्नि' ही हैं, किंतु द्वितीय स्थान पर 'प्रजापति' का उल्लेख है, जबकि याज्ञवल्क्य स्मृति में द्वितीय अक्षर 'वायव्य' (वायु) बताया गया है। यह भेद दर्शाता है कि मंत्र-साधना की विभिन्न शाखाएँ और कुल-परम्पराएँ रही हैं। जहाँ एक परम्परा सृजन (प्रजापति) को प्रधानता देती है, वहीं याज्ञवल्क्य की यह योगिक दृष्टि प्राण-शक्ति (वायु) के प्रवाह को प्राथमिकता देती है। दोनों ही दृष्टियाँ सत्य हैं, क्योंकि वे मंत्र के भिन्न आयामों को उद्घाटित करती हैं।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह अभ्यास 'अक्षर-ध्यान' कहलाता है। साधारण जप में साधक केवल पूरे मंत्र का उच्चारण करता है, किंतु इस गुप्त विधि में वह प्रत्येक अक्षर पर ठहरकर उस अक्षर के अधिष्ठित देवता का क्षणिक स्मरण करता है।
साधक जब प्रथम अक्षर पर 'आग्नेय' शक्ति का अनुभव करता है, तो उसके भीतर ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित होती है। जैसे ही वह द्वितीय अक्षर पर आता है, वह 'वायव्य' शक्ति के माध्यम से अपने प्राणों को विस्तारित करता है। इस प्रकार जप करते हुए साधक यह अनुभव करता है कि मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड (समस्त देवताओं) का एक संघटित रूप है।
जब साधक अक्षर-अक्षर में देवताओं को देखता है, तो वह सूक्ष्म रूप से पूरे विश्व को अपने भीतर समाहित कर लेता है। इस अभ्यास से साधक की चेतना स्थूल ध्वनि से उठकर दैवीय स्पंदनों में प्रवेश करती है, जिससे मंत्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है और साधक अक्षर-अक्षर के साथ उच्चतर भूमियों की ओर अग्रसर होता है।
तृतीयं सूर्यदैवत्यं चतुर्थं वैद्युतं स्मृतम् ।
पञ्चमं यमदैवत्यं वारुणं षष्ठमुच्यते ॥ ४.६४ ॥
तृतीय सूर्यदैवत्य है, चौथा वैद्युत स्मृत है, पाँचवाँ यमदैवत्य है और छठा वारुण कहा जाता है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के प्रथम दो अक्षरों के देवताओं—अग्नि और वायु—का परिचय दिया था। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए इस श्लोक में तीसरे से छठे अक्षर तक के अधिष्ठान देवों का वर्णन किया गया है, जिससे मंत्र की दैवीय संरचना स्पष्ट होती जा रही है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तृतीयं सूर्यदैवत्यं, चतुर्थं वैद्युतं स्मृतम्, पञ्चमं यमदैवत्यं, (तथा) षष्ठमुच्यते वारुणम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• तृतीयं सूर्यदैवत्यं: तीसरा अक्षर सूर्य के देवता से संबंधित है। यहाँ 'सूर्य' केवल भौतिक प्रकाश नहीं, अपितु चैतन्य का प्रतीक है।
• चतुर्थं वैद्युतं: चौथा अक्षर विद्युत (बिजली/ऊर्जा) के अधिष्ठान वाला है। यह तीव्र गति और प्रदीप्ति का सूचक है।
• पञ्चमं यमदैवत्यं: पाँचवाँ अक्षर यम के देवता से संबंधित है। यहाँ यम का अर्थ केवल मृत्यु नहीं, अपितु 'नियम' (संयम) और अनुशासन है।
• षष्ठमुच्यते वारुणम्: छठा अक्षर वरुण के देवता का कहा गया है। वरुण जल के अधिष्ठाता होने के साथ-साथ ऋत (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) के रक्षक भी हैं।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ मंत्र के अक्षरों को देवताओं की एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह सूची केवल सूचनात्मक नहीं है, अपितु जप की एक सूक्ष्म विधि का संकेत है। जब साधक गायत्री के चौबीस अक्षरों का उच्चारण करता है, तो वह वास्तव में उन शक्तियों का आह्वान करता है जो इस सृष्टि का संचालन कर रही हैं।
तीसरे अक्षर में 'सूर्य' की उपस्थिति साधक के भीतर ज्ञान के प्रकाश को जाग्रत करती है। चौथे अक्षर में 'विद्युत' जैसी तीव्र ऊर्जा का समावेश है, जो जड़ता को तोड़कर चेतना को ऊपर उठाती है। पाँचवें अक्षर में 'यम' का अधिष्ठान यह सुनिश्चित करता है कि साधक की साधना अनुशासित हो और वह अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखे। अंततः छठे अक्षर में 'वरुण' का वास है, जो साधक के भीतर शुद्धि और ब्रह्मांडीय नियमों (ऋत) के साथ तादात्म्य स्थापित करता है।
यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि विभिन्न तंत्रों या बाद की स्मृतियों (जैसे देवीभागवत या अन्य गायत्री-रहस्यों) में अक्षर-देवताओं की सूचियाँ भिन्न हो सकती हैं। कुछ परम्पराओं में देवताओं का क्रम अलग होता है, किंतु यहाँ हम याज्ञवल्क्य ऋषि की विशिष्ट दृष्टि का अनुसरण कर रहे हैं। विभिन्न सूचियों का यह भेद इस बात का प्रमाण है कि एक ही मंत्र को अलग-अलग योगिक स्तरों और पद्धतियों से देखा गया है; इनमें से कोई गलत नहीं है, बल्कि वे साधना के भिन्न सोपानों को दर्शाती हैं।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'अक्षर-ध्यान' है। सामान्यतः साधक पूरे मंत्र को एक इकाई मानकर जप करता है, किंतु यहाँ याज्ञवल्क्य उसे सूक्ष्म स्तर पर ले जा रहे हैं।
साधक जब जप करे, तो प्रत्येक अक्षर के उच्चारण के समय उस अक्षर में प्रतिष्ठित देवता का क्षणिक स्मरण करे—तीसरे पर सूर्य, चौथे पर विद्युत, पाँचवें पर यम और छठे पर वरुण। इस अभ्यास से मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं रहता, बल्कि देवताओं का एक जीवंत समूह बन जाता है।
साधक अनुभव करता है कि वह अक्षर-अक्षर के माध्यम से पूरे विश्व की शक्तियों को अपने भीतर उतार रहा है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल ध्वनि' से उठाकर 'सूक्ष्म स्पंदन' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ प्रत्येक वर्ण एक विशिष्ट दैवीय ऊर्जा का द्वार बन जाता है। इस प्रकार जप करते हुए साधक स्वयं को ब्रह्मांड के साथ एकाकार अनुभव करने लगता है।
सम्पादकीय टिप्पणी — भाष्यमें देवीभागवतको ‘बाद की स्मृतियों’ में गिना गया है — देवीभागवत पुराण है, स्मृति नहीं; और दोनों सूचियोंमें कौन पहले की है, यह किसी ग्रन्थसे स्थापित नहीं। दोनोंको भिन्न परम्पराएँ मानना ही पर्याप्त है (देखें ४.६३ का शास्त्र-साक्ष्य)।
बार्हस्पत्यं सप्तमं च पार्जन्यमष्टमं विदुः ।
ऐन्द्रं तु नवमं ज्ञेयं गांधर्वं दशमं स्मृतम् ॥ ४.६५ ॥
सातवाँ बार्हस्पत्य (बृहस्पतिका) और आठवाँ पार्जन्य (पर्जन्यका) जानते हैं; नवाँ ऐन्द्र जानना चाहिए और दसवाँ गान्धर्व कहा गया है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के तीसरे से छठे अक्षर तक के अधिष्ठान देवों—सूर्य, विद्युत, यम और वरुण—का परिचय दिया था। इसी दिव्य श्रृंखला को निरंतर रखते हुए, वर्तमान श्लोक में सातवें से दसवें अक्षर के देवताओं का विवेचन किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: बार्हस्पत्यं सप्तमं च, पार्जन्यमष्टमं विदुः, ऐन्द्रं तु नवमं ज्ञेयं, गांधर्वं दशमं स्मृतम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• बार्हस्पत्यं सप्तमं: सातवाँ अक्षर बृहस्पति (गुरु) के देवता से संबंधित है। यह ज्ञान और विवेक का अधिष्ठान है।
• पार्जन्यमष्टमं: आठवाँ अक्षर पार्जन्य (वृष्टि/बादल) के अधिष्ठान वाला है। यह पोषण और वृद्घि का प्रतीक है।
• ऐन्द्रं नवमं: नवाँ अक्षर इंद्र के देवता से संबंधित है। यह शक्ति, नेतृत्व और इन्द्रिय-जय का सूचक है।
• गांधर्वं दशमं: दसवाँ अक्षर गान्धर्व (संगीत/कला) के अधिष्ठान वाला है। यह नाद-ब्रह्म और लय का प्रतीक है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री मंत्र के अक्षरों को केवल वर्णमाला के अंश नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय शक्तियों के सोपानों के रूप में दिखा रहे हैं। जब साधक जप की प्रक्रिया में आगे बढ़ता है, तो वह क्रमशः इन दिव्य तत्वों के संपर्क में आता है।
सातवें अक्षर में 'बृहस्पति' का अधिष्ठान यह संकेत देता है कि मंत्र का प्रभाव अब केवल बाहरी शुद्धि तक सीमित नहीं, अपितु साधक के भीतर आध्यात्मिक विवेक और बोध को जाग्रत करने लगता है। आठवें अक्षर में 'पार्जन्य' की उपस्थिति उस वृष्टि के समान है जो ज्ञान रूपी बीज को हृदय में अंकुरित करने के लिए आवश्यक पोषण प्रदान करती है।
नौवें अक्षर में 'इंद्र' का अधिष्ठान साधक को वह आंतरिक बल और तेज देता है, जिससे वह अपनी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर सके। अंततः दसवें अक्षर में 'गान्धर्व' देवता का स्मरण नाद की उस सूक्ष्मता की ओर ले जाता है, जहाँ मंत्र शब्द से ऊपर उठकर एक दिव्य लय बन जाता है। इस प्रकार सातवें से दसवें अक्षर तक की यात्रा विवेक, पोषण, शक्ति और लय के मिलन की यात्रा है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि गायत्री के अक्षरों और उनके देवताओं की यह सूची विभिन्न परम्पराओं में भिन्न हो सकती है; जैसे कुछ अन्य तंत्रों या रहस्य-ग्रन्थों में अलग क्रम मिलता है। किन्तु यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी विशिष्ट दृष्टि से इन शक्तियों का विन्यास कर रहे हैं, जो उनकी श्रुति-परम्परा के अनुकूल है।
योग-रहस्य —
योगी के लिए यह श्लोक 'अक्षर-ध्यान' की एक प्रविधि है। जप के समय साधक केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु प्रत्येक अक्षर पर उसके अधिष्ठान देवता का क्षणिक स्मरण करता है। जब सातवें अक्षर पर बृहस्पति, आठवें पर पार्जन्य, नौवें पर इंद्र और दसवें पर गान्धर्व का ध्यान आता है, तब मंत्र एक शब्द-समूह न रहकर 'देवताओं का समूह' बन जाता है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि संपूर्ण विश्व की शक्तियाँ—ज्ञान, वृष्टि, तेज और लय—मंत्र के इन छोटे-छोटे अक्षरों में ही संकुचित रूप से विद्यमान हैं। अक्षर-अक्षर पर देवताओं को देखने से साधक की चेतना स्थूल शब्द से हटकर सूक्ष्म चैतन्य में प्रवेश करती है। वह अनुभव करता है कि जैसे-जैसे वह मंत्र में आगे बढ़ रहा है, वह वास्तव में संपूर्ण ब्रह्मांड का जप कर रहा है और स्वयं उस विराट सत्ता में विलीन हो रहा है।
पौष्णमेकादशं ज्ञेयं द्वादशं मैत्रवारुणम् ।
त्वाष्ट्रं त्रयोदशं ज्ञेयं वासवं च चतुर्दशम् ॥ ४.६६ ॥
ग्यारहवाँ पौष्ण जानने योग्य है, बारहवाँ मैत्रवारुण, तेरहवाँ त्वाष्ट्र जानने योग्य है और चौदहवाँ वासव है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के सातवें से दसवें अक्षर तक के अधिष्ठान देवों—बृहस्पति, पार्जन्य, इंद्र और गान्धर्व—का परिचय दिया था। इसी दिव्य अनुक्रम को आगे बढ़ाते हुए, वर्तमान श्लोक में ग्यारहवें से चौदहवें अक्षर के देवताओं का विवेचन किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: पौष्णं एकादशं ज्ञेयं, द्वादशं मैत्रवारुणम्, त्वाष्ट्रं त्रयोदशं ज्ञेयं, वासवं च चतुर्दशम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• पौष्णं एकादशं: ग्यारहवाँ अक्षर 'पौष्ण' (पुषण् देवता) के अधिष्ठान वाला है। पुषण् पोषण और मार्ग-दर्शन के देवता हैं।
• द्वादशं मैत्रवारुणम्: बारहवाँ अक्षर 'मैत्रवारुण' है। यहाँ मित्र और वरुण की संयुक्त शक्ति का संकेत है, जो मैत्री और नियमन (ऋत) का प्रतीक है।
• त्वाष्ट्रं त्रयोदशं: तेरहवाँ अक्षर 'त्वाष्ट्र' (त्वष्टा देवता) के अधिष्ठान वाला है। त्वष्टा सृजन और रूप देने वाले शिल्पी देवता हैं।
• वासवं चतुर्दशम्: चौदहवाँ अक्षर 'वासव' (इंद्र का एक नाम, वासुदेव या वसुओं के स्वामी) के अधिष्ठान वाला है। यह ऐश्वर्य और तेज का सूचक है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री मंत्र के अक्षरों के माध्यम से साधक को ब्रह्मांडीय शक्तियों के सूक्ष्म विन्यास से परिचित करा रहे हैं। इस स्मृति में मन्त्र केवल ध्वनि नहीं, अपितु देवताओं का एक सजीव समूह है।
ग्यारहवें अक्षर में 'पुषण्' का अधिष्ठान यह दर्शाता है कि मंत्र की शक्ति अब साधक के भीतर आध्यात्मिक पोषण का कार्य कर रही है और उसे सही मार्ग की ओर अग्रसर कर रही है। बारहवें अक्षर में 'मैत्रवारुण' की उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है; मित्र और वरुण का संयोग इस बात का संकेत है कि साधक के भीतर आंतरिक मैत्री (स्वयं से प्रेम) और ब्रह्मांडीय नियमों (ऋत) के प्रति अनुशासन एक साथ स्थापित हो रहे हैं।
तेरहवें अक्षर में 'त्वष्टा' का अधिष्ठान यह बताता है कि मंत्र की अग्नि अब साधक के व्यक्तित्व और चित्त को नया रूप दे रही है, जैसे कोई शिल्पी मिट्टी को गढ़कर मूर्ति बनाता है; यहाँ अहंकार का विसर्जन कर दिव्य स्वरूप का सृजन होता है। चौदहवें अक्षर में 'वासव' का आगमन उस तेज और प्रभुत्व को प्रकट करता है जो एक योगी को आंतरिक जगत में स्थिरता और ऐश्वर्य प्रदान करता है।
विभिन्न परम्पराओं (जैसे देवीभागवत या अन्य गायत्री-रहस्य ग्रन्थों) में इन अक्षरों के देवताओं की सूचियाँ भिन्न हो सकती हैं। परन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य ऋषि अपनी विशिष्ट दृष्टि से उन शक्तियों को क्रमबद्ध कर रहे हैं जो शुक्लयजुर्वेद की श्रुति-परम्परा के अनुकूल हैं। यह भेद विरोधाभास नहीं, अपितु साधना के विभिन्न मार्गों का संकेत है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'अक्षर-चिन्तन' है। जब साधक गायत्री का जप करता है, तो वह केवल शब्दों को नहीं दोहराता, बल्कि प्रत्येक अक्षर के उच्चारण के समय उस अक्षर के अधिष्ठान देवता का क्षणिक स्मरण करता है।
जब ग्यारहवें अक्षर पर आता है, तो पुषण् का स्मरण कर स्वयं के आध्यात्मिक पोषण का अनुभव करता है; बारहवें पर मित्र-वरुण को याद कर अपने भीतर शांति और नियम का बोध करता है। इस प्रकार जप की प्रक्रिया में मन्त्र एक 'देव-समूह' बन जाता है। साधक जब अक्षर-अक्षर इन देवताओं को देखता है, तो उसे यह अनुभव होता है कि संपूर्ण विश्व और उसकी समस्त शक्तियाँ इस छोटे से मन्त्र के अक्षरों में समाहित हैं। वह स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म देवता की ओर और फिर देवता से उस एक 'अक्षर' (ब्रह्म) की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास साधक को विखंडित चेतना से समग्र चेतना की ओर ले जाता है।
सम्पादकीय टिप्पणी — भाष्यमें ‘वासव’ को वासुदेव कहा गया है — वासव इन्द्र हैं (वसुओंके स्वामी), वासुदेव नहीं। साथ ही इस देवता-सूचीको ‘शुक्लयजुर्वेदीय श्रुति-परम्परा’ से जोड़ना किसी ग्रन्थसे पुष्ट नहीं; श्लोक केवल अक्षरोंके देवता गिनाता है।
मारुतं पञ्चदशकं सौम्यं षोडशकं स्मृतम् ।
सप्तदशं त्वाङ्गिरसं वैश्वदेवमतःपरम् ॥ ४.६७ ॥
पन्द्रहवाँ मारुत है और सोलहवाँ सौम्य स्मृत है, सत्रहवाँ आङ्गिरस है तथा उसके बाद अठारहवाँ वैश्वदेव है...
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ग्यारहवें से चौदहवें अक्षर के अधिष्ठान देवों—पौष्ण, मैत्रवारुण, त्वाष्ट्र और वासव—का परिचय दिया था। उसी क्रम को निरंतर रखते हुए, वर्तमान श्लोक में पन्द्रहवें से अठारहवें अक्षर के देवताओं का विवेचन किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: मारुतं पञ्चदशकं, सौम्यं षोडशकं स्मृतम्, सप्तदशं त्वाङ्गिरसं, वैश्वदेवमतःपरम् (अर्थात् अष्टादशं वैश्वदेवम्)।
पदार्थ-निर्वचन:
• मारुतं पञ्चदशकं: पन्द्रहवाँ अक्षर 'मारुत' के अधिष्ठान वाला है। मारुत वायु की गति और प्राणशक्ति के प्रतीक हैं।
• सौम्यं षोडशकं: सोलहवाँ अक्षर 'सौम्य' (सोम/चन्द्र) के अधिष्ठान वाला है। सोम मन की शांति, रस और अमृतत्व का प्रतीक है।
• त्वाङ्गिरसं सप्तदशं: सत्रहवाँ अक्षर 'आङ्गिरस' है। यह अग्नि-पुत्रों या आङ्गिरस ऋषियों की तपोशक्ति का संकेत है, जो रूपांतरण की शक्ति रखते हैं।
• वैश्वदेवमतःपरम्: इसके बाद, अर्थात् अठारहवाँ अक्षर 'वैश्वदेव' है। वैश्वदेव वह शक्ति है जिसमें समस्त देव समूह (विश्व-देव) समाहित होते हैं।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री के अक्षरों के माध्यम से साधक को सूक्ष्म जगत की उन शक्तियों से जोड़ रहे हैं, जो जप के समय सक्रिय होती हैं। यहाँ प्रत्येक अक्षर केवल एक ध्वनि मात्र नहीं है, अपितु एक विशिष्ट दैवीय ऊर्जा का केंद्र है।
पन्द्रहवें अक्षर में 'मारुत' का अधिष्ठान यह संकेत देता है कि मंत्र की शक्ति अब साधक के भीतर प्राणों को तीव्र कर रही है, जिससे जड़ता का नाश होता है। सोलहवें अक्षर में 'सौम्य' (सोम) का आगमन अत्यंत महत्वपूर्ण है; जहाँ मारुत की तीव्रता थी, वहाँ सोम की शीतलता और शांति आती है। यह मन के उद्वेग को शांत कर उसे अमृतमय बनाने की प्रक्रिया है। सत्रहवाँ अक्षर 'आङ्गिरस' तपो-अग्नि का प्रतीक है, जो साधक के अहंकार और अशुद्धियों को जलाकर उन्हें शुद्ध चैतन्य में बदलने का कार्य करता है। अंततः अठारहवें अक्षर में 'वैश्वदेव' का उल्लेख है; यह वह बिंदु है जहाँ व्यक्तिगत शक्तियाँ समाप्त होकर समग्रता में विलीन होने लगती हैं। यहाँ साधक अनुभव करता है कि मंत्र के भीतर केवल पृथक देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण देवकुल एक साथ उपस्थित है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस विधि से साधक को 'अक्षर-चिन्तन' का अभ्यास करा रहे हैं। जप की सामान्य विधि में मनुष्य केवल शब्दों का उच्चारण करता है, किन्तु यहाँ निर्देश है कि प्रत्येक अक्षर के उच्चारण के समय उस विशेष देवता का क्षणिक स्मरण किया जाए।
जब साधक पन्द्रहवें अक्षर पर मारुत को, सोलहवें पर सोम को, सत्रहवें पर आङ्गिरस और अठारहवें पर वैश्वदेव को स्थित देखता है, तब मन्त्र उसके लिए केवल शब्दों की माला नहीं रहता, अपितु देवताओं का एक सजीव समूह बन जाता है। इस अभ्यास से साधक के भीतर यह बोध जाग्रत होता है कि पूरा ब्रह्मांड (विश्व) इस गायत्री मंत्र के अक्षरों में ही सिमटा हुआ है। वह अक्षर-अक्षर पूरे विश्व को जप में देखने लगता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल ध्वनि' से उठाकर 'सूक्ष्म स्पंदन' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को और संपूर्ण सृष्टि को एक ही दिव्य प्रकाशमय विन्यास का अंग अनुभव करता है।
यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि विभिन्न आगमों या अन्य परम्पराओं (जैसे देवीभागवत या कुछ गायत्री-रहस्य ग्रन्थों) में अक्षर-देवताओं की सूचियाँ भिन्न हो सकती हैं। परन्तु याज्ञवल्क्य ऋषि यहाँ शुक्लयजुर्वेद की उस विशिष्ट दृष्टि को प्रस्तुत कर रहे हैं, जहाँ मंत्र का आंतरिक विन्यास सूर्य और प्राण के रहस्य से जुड़ा है। अन्य परम्पराओं के मत अपने स्थान पर मान्य हैं, किन्तु यह स्मृति इस विशेष अनुक्रम के माध्यम से विष्णु-सायुज्य की ओर ले जाने वाला मार्ग प्रशस्त करती है।
सम्पादकीय टिप्पणी — ‘त्वाङ्गिरस’ को देवताका नाम माना गया है — पदच्छेद तु + आङ्गिरसम् है, देवता आङ्गिरस हैं। शुक्लयजुर्वेद-परम्पराका दावा ४.६६ की टिप्पणी देखें।
आश्विनं चैकोनविंशं प्राजापत्यं तु विंशकम् ।
सर्वदेवमयं ज्ञेयमेकविंशकमक्षरम् ॥ ४.६८ ॥
उन्नीसवाँ आश्विन और बीसवाँ प्राजापत्य है; एकविंशति (इक्कीसवाँ) अक्षर सर्वदेवमय जानने योग्य है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने पन्द्रहवें से अठारहवें अक्षर के अधिष्ठान देवों—मारुत, सौम्य, त्वाङ्गिरस और वैश्वदेव—का परिचय दिया था। उसी क्रम को निरंतर रखते हुए, वर्तमान श्लोक में उन्नीसवें से इक्कीसवें अक्षर के देवताओं का विवेचन किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: आश्विनं चैकोनविंशं, प्राजापत्यं तु विंशकम्, एकविंशकमक्षरं सर्वदेवमयं ज्ञेयम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• आश्विनं चैकोनविंशं: उन्नीसवाँ (एकूनविंश) अक्षर 'आश्विन' के अधिष्ठान वाला है। आश्विन यहाँ अश्विनीकुमारों या उस तेज का संकेत है जो आरोग्य और पुनर्जीवन प्रदान करता है।
• प्राजापत्यं तु विंशकम्: बीसवाँ (विंशक) अक्षर 'प्राजापत्य' है। प्राजापत्य वह शक्ति है जो प्रजापति (सृष्टि के अधिष्ठाता) से संबंधित है, जो विस्तार और सृजन का प्रतीक है।
• एकविंशकमक्षरं सर्वदेवमयं ज्ञेयम्: इक्कीसवाँ अक्षर 'सर्वदेवमय' है; इसे ऐसा जानना चाहिए कि इसमें समस्त देवताओं का वास है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य गायत्री के अक्षरों की इस श्रृंखला के माध्यम से साधक को स्थूल ध्वनि से उठाकर सूक्ष्म दैवीय शक्तियों के केंद्र तक ले जा रहे हैं। यहाँ प्रत्येक अक्षर एक द्वार है, जिसके पीछे एक विशिष्ट देवता प्रतिष्ठित है।
उन्नीसवें अक्षर में 'आश्विन' का अधिष्ठान यह दर्शाता है कि मंत्र जप के प्रभाव से साधक की चेतना में वह ओज और आरोग्य जागृत होता है, जो अश्विनीकुमारों की विशेषता है। यह मानसिक और प्राणिक स्तर पर नवीनीकरण की अवस्था है। बीसवें अक्षर में 'प्राजापत्य' का आगमन सृजन की शक्ति को इंगित करता है। यहाँ साधक अनुभव करता है कि मंत्र केवल शब्द नहीं, अपितु एक जीवंत सृष्टि है जो उसके भीतर प्रस्फुटित हो रही है।
इक्कीसवाँ अक्षर अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे याज्ञवल्क्य 'सर्वदेवमय' कहते हैं। अब तक साधक अलग-अलग देवताओं (आग्नेय, वायव्य आदि) का स्मरण कर रहा था, किन्तु इक्कीसवें अक्षर पर पहुँचते ही वह विविधता समाप्त हो जाती है और वह एक ऐसे बिंदु पर आता है जहाँ समस्त देव-शक्तियाँ एकाकार हो जाती हैं। यह इस बात का संकेत है कि मंत्र की यात्रा अब पृथक शक्तियों से हटकर उनके मूल स्रोत की ओर बढ़ रही है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'अक्षर-चिन्तन' है। जब साधक गायत्री का जप करता है, तो उसे केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करना चाहिए, अपितु प्रत्येक अक्षर के समय उस विशिष्ट देवता का क्षणिक स्मरण करना चाहिए।
जब वह उन्नीसवें अक्षर पर हो, तो आरोग्य और तेज (आश्विन) का अनुभव करे; बीसवें पर सृष्टि की व्यापकता (प्राजापत्य) को महसूस करे; और इक्कीसवें अक्षर पर पहुँचते ही यह अनुभव करे कि संपूर्ण ब्रह्मांड के समस्त देवता इस एक ध्वनि में सिमट आए हैं। इस अभ्यास से मंत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि देवताओं का एक जीवंत समूह बन जाता है। साधक अक्षर-अक्षर पूरे विश्व को अपने जप में देखता है, जिससे उसकी चेतना संकुचित 'मैं' से निकलकर 'सर्वदेवमय' व्यापकता की ओर बढ़ती है।
यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि विभिन्न परम्पराओं (जैसे देवीभागवत या अन्य गायत्री-रहस्य ग्रन्थों) में अक्षर-देवताओं की सूचियाँ भिन्न हो सकती हैं। वह भिन्नता दृष्टि की है; यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य ने शुक्लयजुर्वेद और अपनी योग-दृष्टि के अनुसार यह क्रम निर्धारित किया है, जो साधक को एक निश्चित सोपान से ऊपर ले जाता है।
सम्पादकीय टिप्पणी — ‘त्वाङ्गिरस’ का पदच्छेद तु + आङ्गिरसम् है (४.६७ की टिप्पणी देखें); इस सूचीका शुक्लयजुर्वेदीय श्रुति-परम्परासे सम्बन्ध किसी ग्रन्थसे स्थापित नहीं।
रौद्रं द्वाविंशकं प्रोक्तं त्रयोविंशं तु ब्राह्मणम् ।
वैष्णवं तु चतुर्विंशमेता अक्षरदेवताः ॥ ४.६९ ॥
बाईसवाँ रौद्र कहा गया है, तेईसवाँ ब्राह्मण और चौबीसवाँ वैष्णव— ये सब अक्षरदेवताएँ हैं।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन्नीसवें से इक्कीसवें अक्षर के अधिष्ठान देवों—आश्विन, प्राजापत्य और सर्वदेवमय—का परिचय दिया था। इसी क्रम को पूर्ण करते हुए वर्तमान श्लोक में अंतिम तीन अक्षरों के देवताओं का विवरण दिया गया है, जिससे गायत्री के चौबीस अक्षरों की दैवीय श्रृंखला पूर्ण होती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: द्वाविंशकं रौद्रं प्रोक्तम्, त्रयोविंशं तु ब्राह्मणम्, चतुर्विंशं वैष्णवम्; एताः अक्षरदेवताः (सन्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• द्वाविंशकं रौद्रं: बाईसवाँ अक्षर 'रौद्र' (रुद्र) के अधिष्ठान वाला है। रुद्र यहाँ संहारक नहीं, अपितु अविद्या का नाश करने वाले और साधक के भीतर के अवरोधों को तोड़ने वाले तेज के प्रतीक हैं।
• त्रयोविंशं तु ब्राह्मणम्: तेईसवाँ अक्षर 'ब्राह्मण' (ब्रह्मा) के अधिष्ठान वाला है। यह सृजनात्मक चेतना और ज्ञान के विस्तार का सूचक है।
• चतुर्विंशं वैष्णवम्: चौबीसवाँ और अंतिम अक्षर 'वैष्णव' (विष्णु) के अधिष्ठान वाला है। विष्णु यहाँ सर्वव्यापकता, पोषण और परम लक्ष्य (सायुज्य) के प्रतीक हैं।
भाष्य —
याज्ञवल्क्य ऋषि इस श्लोक के माध्यम से गायत्री मंत्र के अक्षरों की उस दैवीय यात्रा को पूर्ण कर रहे हैं, जो प्रथम अक्षर से आरम्भ होकर चौबीसवें पर समाप्त होती है। यह सूची केवल नामों का संग्रह नहीं, अपितु चेतना के आरोहण का एक मानचित्र है।
बाईसवें अक्षर में 'रौद्र' का आगमन यह संकेत देता है कि जब साधक मंत्र के गहन जप में उतरता है, तब उसके भीतर की जड़ता और अहंकार का रुद्र-शक्ति द्वारा विखंडन होता है। इसके पश्चात तेईसवें अक्षर में 'ब्राह्म' शक्ति जागृत होती है, जो शुद्ध ज्ञान और चैतन्य का विस्तार करती है। अंततः चौबीसवाँ अक्षर 'वैष्णव' है। यहाँ साधक उस विष्णुतत्व में प्रतिष्ठित होता है जो संपूर्ण सृष्टि को धारण करता है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सूची का समापन 'वैष्णव' अक्षर पर हो रहा है, क्योंकि यही कारण है कि अगले श्लोक (४.७०) में याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इन देवताओं के चिन्तन से साधक 'विष्णुसायुज्यतां व्रजेत्' अर्थात् विष्णु के साथ एकत्व को प्राप्त होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
गायत्री के अक्षरों के देवताओं के विषय में विभिन्न परम्पराओं में भिन्न सूचियाँ मिलती हैं, जैसा कि यहाँ देखा जा सकता है:
प्रथममाग्नेयं द्वितीयं प्राजापत्यं तृतीयं सौम्यं चतुर्थमीशानं पञ्चममादित्यं षष्ठं गार्हपत्यं सप्तमं मैत्रमष्टमं भगदैवतं नवममार्यमणं दशमं सावित्रमेकादशं त्वाष्ट्रं द्वादशं पौष्णं त्रयोदशमैन्द्राग्नं चतुर्दशं वायव्यं पञ्चदशं वामदेवं षोडशं मैत्रावरुणं सप्तदशं भ्रातृव्यमष्टादशं वैष्णवमेकोनविंशं वामनं विंशं वैश्वदेवमेकविंशं रौद्रं द्वाविंशं कौबेरं त्रयोविंशमाश्विनं चतुर्विंशं ब्राह्ममिति प्रत्यक्षरदैवतानि ॥ ५ ॥
(अक्षरोंके देवता —) पहला अग्नि, दूसरा प्रजापति, तीसरा सोम, चौथा ईशान, पाँचवाँ आदित्य, छठा गार्हपत्य, सातवाँ मित्र, आठवाँ भग, नवाँ अर्यमा, दसवाँ सविता, ग्यारहवाँ त्वष्टा, बारहवाँ पूषा, तेरहवाँ इन्द्राग्नी, चौदहवाँ वायु, पन्द्रहवाँ वामदेव, सोलहवाँ मित्रावरुण, सत्रहवाँ भ्रातृव्य, अठारहवाँ विष्णु, उन्नीसवाँ वामन, बीसवाँ विश्वेदेव, इक्कीसवाँ रुद्र, बाईसवाँ कुबेर, तेईसवाँ अश्विनौ, चौबीसवाँ ब्रह्मा — ये प्रत्येक अक्षरके देवता हैं।
उपर्युक्त गायत्री-रहस्योपनिषद् की सूची और याज्ञवल्क्य स्मृति की इस सूची में स्पष्ट भेद है। जहाँ स्मृति में बाईसवाँ अक्षर 'रौद्र' है, वहीं उपनिषद में इक्कीसवाँ 'रौद्र' और बाईसवाँ 'कौबेर' बताया गया है। स्मृति में चौबीसवाँ अक्षर 'वैष्णव' है, जबकि उक्त उपनिषद में वह 'ब्राह्म' है।
यह भेद यह दर्शाता है कि मंत्र के आंतरिक रहस्यों को देखने की विभिन्न ऋषियों की अलग-अलग दृष्टियाँ रही हैं। कोई भी सूची गलत नहीं है; अपितु ये भिन्न साधना-परम्पराओं (कुल) के संकेत हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति की यह विशिष्ट व्यवस्था साधक को अंततः विष्णुसायुज्य की ओर ले जाने के लिए निर्मित है, जबकि अन्य सूचियाँ अन्य गंतव्यों या अनुभवों पर बल देती हैं।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'अक्षर-देवता चिन्तन' कहलाता है। साधक जब गायत्री का जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु प्रत्येक अक्षर के उच्चारण के समय उस अक्षर में प्रतिष्ठित देवता का क्षणिक स्मरण करता है।
जब साधक बाईसवें अक्षर पर आता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके भीतर की अशुद्धियाँ भस्म हो रही हैं (रौद्र); तेईसवें पर वह स्वयं को ज्ञान-स्वरूप पाता है (ब्राह्म); और चौबीसवें पर पहुँचते ही वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं को लांघकर सर्वव्यापकता में विलीन हो जाता है (वैष्णव)। इस प्रकार, जप के दौरान अक्षर-अक्षर पूरे विश्व और समस्त दैवीय शक्तियों का अनुभव होता है। साधक मंत्र को एक शब्द-समूह नहीं, बल्कि देवताओं के एक जीवंत समूह के रूप में देखता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल ध्वनि से उठाकर सूक्ष्म चैतन्य की उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को संपूर्ण ब्रह्मांड (वाङ्मय) के साथ एकाकार पाता है।
अक्षरदेवताचिन्तनफलम्
जप्यकालेषु संचिन्त्य विष्णुसायुज्यतां व्रजेत् ।
एतस्यां ज्ञातमात्रायां वाङ्मयं विदितं भवेत् ॥ ४.७० ॥
(इन्हें) जपके समय चिन्तन करके (साधक) विष्णुसायुज्य पाता है। इस (गायत्री) के जानते ही सारा वाङ्मय जाना हुआ हो जाता है —
अवतरणिका —
पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के चौबीस अक्षरों के अधिष्ठान देवों का क्रमिक विवरण दिया, जो रौद्र, ब्राह्मण और वैष्णव देवताओं पर समाप्त हुआ। वर्तमान श्लोक इस अक्षर-श्रृंखला के प्रयोजन को स्पष्ट करता है कि इन दैवीय शक्तियों का जपकाल में चिन्तन साधक को किस परम लक्ष्य तक ले जाता है और इस ज्ञान की व्यापकता क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (अक्षरदेवताः) जप्यकालेषु संचिन्त्य विष्णुसायुज्यतां व्रजेत् । एतस्यां (गायत्र्याम्) ज्ञातमात्रायां वाङ्मयं विदितं भवेत्।
पदार्थ-निर्वचन:
• जप्यकालेषु: जब गायत्री मंत्र का जप किया जा रहा हो, उस समय में।
• संचिन्त्य: केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु उन अक्षरों के अधिष्ठान देवताओं का निरंतर ध्यान या मनन करते हुए।
• विष्णुसायुज्यतां व्रजेत्: विष्णु (सर्वव्यापक परमात्मा) के साथ सायुज्य-मुक्ति को प्राप्त होता है। 'सायुज्य' का अर्थ है—अद्वैत भाव से लीन हो जाना, जहाँ साधक और साध्य का भेद समाप्त हो जाए।
• एतस्यां ज्ञातमात्रायां: इस गायत्री मंत्र के (रहस्य को) जानते ही। यहाँ 'ज्ञात' शब्द केवल रटने से नहीं, अपितु उसके आन्तर अर्थ और अक्षर-देवताओं के बोध से है।
• वाङ्मयं विदितं भवेत्: समस्त वाङ्मय (संपूर्ण वैदिक साहित्य, ज्ञान और वाणी की शक्ति) जाना हुआ हो जाता है।
भाष्य —
याज्ञवल्क्य योगीश्वर यहाँ जप की एक सूक्ष्म विधि बता रहे हैं। सामान्यतः जप केवल वाचिक या मानसिक होता है, किन्तु 'संचिन्त्य' शब्द यह संकेत देता है कि साधक जब गायत्री के चौबीस अक्षरों का उच्चारण करे, तब उसका चित्त उन अक्षरों के अधिष्ठान देवताओं में प्रतिष्ठित रहे। यह प्रक्रिया स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाने वाली है।
जब साधक प्रथम अक्षर से आरम्भ कर चौबीसवें 'वैष्णव' अक्षर तक पहुँचता है, तो वह वास्तव में अनेकता से एकता की यात्रा करता है। चौबीस देवता अलग-अलग शक्तियों के प्रतीक हैं, किन्तु अंतिम लक्ष्य 'विष्णुसायुज्य' है। विष्णु यहाँ केवल एक नाम नहीं, अपितु उस सर्वव्यापक चेतना का नाम है जिसमें समस्त अक्षर और समस्त देवता विलीन हो जाते हैं। भाव यह है कि जब साधक अंतिम अक्षर पर ठहरकर उस व्यापकता का अनुभव करता है, तब वह स्वयं उस विराट पुरुष में लीन हो जाता है।
श्लोक का द्वितीय अंश एक महान रहस्य उद्घाटित करता है—"एतस्यां ज्ञातमात्रायां वाङ्मयं विदितं भवेत्"। इसका अर्थ यह है कि गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु समस्त वेदों का सार (बीज) है। जिस प्रकार बीज में संपूर्ण वृक्ष निहित होता है, उसी प्रकार इस मंत्र के चौबीस अक्षरों और उनके रहस्यों में सम्पूर्ण वाङ्मय समाहित है। जो साधक इन अक्षर-देवताओं के माध्यम से गायत्री के मर्म को जान लेता है, उसे पुनः अन्य शास्त्रों के विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता नहीं रहती; वह वाणी की उस मूल शक्ति को प्राप्त कर लेता है जिससे समस्त ज्ञान प्रस्फुटित होता है। यह वाक्य अगले श्लोक (४.७१) में विस्तार पाता है, जहाँ बताया गया है कि इससे संपूर्ण विश्व की उपासना हो जाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अनेकता से एकता' के अभ्यास का निर्देश है। योगिक अभ्यास में जब साधक चौबीस अक्षर-देवताओं का चिन्तन करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को विभिन्न सूक्ष्म स्तरों पर ले जा रहा होता है। प्रत्येक अक्षर एक सोपान है।
अभ्यास यह है कि जप के समय मन केवल शब्दों की आवृत्ति न करे, बल्कि प्रत्येक अक्षर के साथ जुड़े दैवीय तेज का अनुभव करे। जब साधक अंतिम 'वैष्णव' अक्षर पर आता है, तो उसे अपनी समस्त चेतना को उस बिंदु पर केंद्रित कर देना चाहिए जहाँ वह व्यापकता (विष्णु) में विलीन हो जाए। यह अभ्यास साधक को 'सायुज्य' की भूमि तक ले जाता है—जहाँ वह स्वयं को सीमित इकाई न मानकर सर्वव्यापी अनुभव करता है।
यहाँ 'वाङ्मय' का ज्ञान होने का योगिक अर्थ यह है कि जब साधक मन्त्र के बीजाक्षर और उनके देवताओं में स्थित होता है, तो उसकी बुद्धि 'अक्षर' (जो नष्ट नहीं होता) से जुड़ जाती है। इस अवस्था में वह शब्दों के पार जाकर उस मौन को प्राप्त करता है जहाँ समस्त वेदों का ज्ञान स्वतः प्रकाशित हो जाता है। यह अभ्यास साधक को वैयक्तिक जप से उठाकर वैश्विक चेतना की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।
गायत्र्यज्ञाननिन्दा
उपासितं भवेत् सर्वं विश्वं भुवनसप्तकम् ।
अज्ञात्वा चैव गायत्रीं ब्राह्मण्यात् परिहीयते ॥ ४.७१ ॥
— (और) सात भुवनोंवाले सारे विश्वकी उपासना हो जाती है। गायत्रीको न जानकर (मनुष्य) ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि गायत्री के अक्षर-देवताओं का चिन्तन साधक को विष्णुसायुज्य तक ले जाता है और इस ज्ञान से समस्त वाङ्मय का बोध हो जाता है। वर्तमान श्लोक इसी ज्ञान की व्यापकता और उसके अभाव में होने वाली आध्यात्मिक हानि को स्पष्ट करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (एतस्यां ज्ञातमात्रायां) उपासितं भवेत् सर्वं विश्वं भुवनसप्तकम् । अज्ञात्वा चैव गायत्रीं ब्राह्मण्यात् परिहीयते।
पदार्थ-निर्वचन:
• उपासितं भवेत्: उपासना हो जाती है; अर्थात् उस एक तत्व के माध्यम से समस्त की पूजा या साक्षात्कार संपन्न हो जाता है।
• सर्वं विश्वं भुवनसप्तकम्: सात भुवनों वाला सम्पूर्ण विश्व। यहाँ 'भुवनसप्तक' का अर्थ मानक सात लोकों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्) से है।
• अज्ञात्वा चैव गायत्रीं: और यदि इस गायत्री के रहस्य को न जाना जाए तो। यहाँ 'अज्ञान' केवल मंत्र के शब्दों को न जानना नहीं, अपितु उसकी शक्ति और उसके आन्तर अर्थ से विमुख रहना है।
• ब्राह्मण्यात् परिहीयते: ब्राह्मणत्व से गिर जाता है या विमुख हो जाता है। 'ब्राह्मण्य' का अर्थ यहाँ जातिगत पहचान नहीं, अपितु उस दिव्य चेतना और पात्रता से है जो एक साधक को ब्रह्म के समीप ले जाती है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री की अमोघ शक्ति का वर्णन कर रहे हैं। वाक्य का आरम्भ पिछले श्लोक (४.७०) के अंतिम चरण 'एतस्यां ज्ञातमात्रायां' से होता है, जिसका अर्थ है कि जब साधक गायत्री के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तब उसे प्रत्येक देवता या प्रत्येक लोक के लिए पृथक-पृथक उपासना करने की आवश्यकता नहीं रहती।
भाव यह है कि गायत्री वह बीज है जिसमें संपूर्ण सृष्टि का सार निहित है। जिस प्रकार एक बीज में पूरा वृक्ष और उसके फल-पुष्प रूप में होते हैं, उसी प्रकार इस मन्त्र के चौबीस अक्षरों और उनके देवताओं के बोध से साधक जब जप करता है, तो उसकी वह एक उपासना सात भुवनों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) के समस्त अधिष्ठातृ देवों की उपासना बन जाती है। यह 'एकमेवाद्वितीयम्' का व्यावहारिक प्रयोग है—एक ही केंद्र (गायत्री) के माध्यम से संपूर्ण परिधि (विश्व) की वंदना हो जाना।
किन्तु, इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति इस विद्या से वंचित रहता है या इसे जानकर भी उपेक्षित करता है, तो वह 'ब्राह्मण्यात् परिहीयते'। यहाँ ब्राह्मणत्व का अर्थ है—ब्रह्म को जानने की क्षमता। जो व्यक्ति उस प्रकाश-पुंज (गायत्री) से दूर है, वह अपनी उस उच्चतम आध्यात्मिक पात्रता को खो देता है। यह पतन किसी बाहरी सामाजिक स्तर का नहीं, अपितु आंतरिक चेतना के स्तर का है। जब साधक उस मन्त्र को भूल जाता है जो उसे 'अक्षर' से जोड़ता था, तो वह पुनः स्थूल जगत के मोह और अज्ञान में गिर जाता है। यह चेतावनी साधक को सचेत करने के लिए है कि गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु ब्राह्मणत्व (ब्रह्म-बोध) की रक्षा करने वाला कवच है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ 'एककी उपासना में सबकी' उपासना का गुप्त सूत्र दे रहे हैं। साधक जब इस श्लोक के अनुसार अभ्यास करता है, तो वह अपनी दृष्टि को संकुचित नहीं रखता। जप के समय वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु यह अनुभव करता है कि उसके हृदय में प्रज्वलित गायत्री-ज्वाला सात भुवनों के प्रकाश को अपने भीतर समेटे हुए है।
साधक इस अवस्था में पहुँचता है जहाँ उसे यह बोध होता है कि जिस 'सविता' (सूर्य) की वह उपासना कर रहा है, वही सूर्य समस्त लोकों का प्राण है। जब साधक गायत्री के माध्यम से स्वयं को विश्व-चेतना से जोड़ता है, तो उसकी व्यक्तिगत पूजा 'विश्व-पूजा' में परिवर्तित हो जाती है। यहाँ अभ्यास यह है कि जप के दौरान मन को सात भुवनों के विस्तार में ले जाकर पुनः उस एक बिंदु (अक्षर) पर लाना।
जहाँ तक 'ब्राह्मण्यात् परिहीयते' का प्रश्न है, योग की दृष्टि से इसका अर्थ है—साधना की लय टूटना। यदि साधक गायत्री के रहस्य (बीज और अक्षर) को विस्मृत कर केवल यांत्रिक जप करता है, तो वह उस उच्च भूमि से गिरकर पुनः निम्न मानसिक स्तर पर आ जाता है। अतः इस श्लोक का योगिक संदेश यह है कि निरंतर सजगता के साथ मन्त्र के आन्तर अर्थ में स्थित रहना ही वास्तविक ब्राह्मणत्व की रक्षा करना है।
अपवादेन संयुक्तो भवेच्छ्रुतिनिदर्शनात् ।
येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि ॥ ४.७२ ॥
और श्रुति के निदर्शन के अनुसार अपवाद से युक्त होता है; जिन द्विजों को यथाविधि "सावित्री" का उपदेश नहीं किया गया है —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि गायत्री के ज्ञान के अभाव में साधक अपने 'ब्राह्मणत्व' अर्थात् ब्रह्म-साक्षात्कार की पात्रता से गिर जाता है। वर्तमान श्लोक इसी पतन की गंभीरता को श्रुति के प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करता है और उन द्विजों की स्थिति का वर्णन करता है जो विधिपूर्वक दीक्षा से वंचित रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) श्रुतिनिदर्शनात् अपवादेन संयुक्तो भवेत् । येषां द्विजानां सावित्री यथाविधि न अनूच्येत (ते...)
पदार्थ-निर्वचन:
• अपवादेन संयुक्तो भवेत्: निन्दा या तिरस्कार से युक्त हो जाता है। यहाँ 'अपवाद' का अर्थ केवल सामाजिक आलोचना नहीं, अपितु उस आध्यात्मिक मर्यादा के उल्लंघन का परिणाम है जो एक विप्र की पहचान है।
• श्रुतिनिदर्शनात्: श्रुति (वेदों) में दिए गए उदाहरणों या प्रमाणों के अनुसार। ऋषि यह संकेत दे रहे हैं कि यह निन्दा या पतन केवल स्मृति का मत नहीं, अपितु श्रुति-सम्मत सत्य है।
• द्विजानां: द्विजों का। यहाँ 'द्विज' वह है जिसका उपनयन संस्कार हुआ हो और जो ज्ञान के द्वितीय जन्म के योग्य हो।
• सावित्री नानूच्येत (न अनूच्येत): सावित्री (गायत्री मन्त्र) का उपदेश नहीं दिया गया। 'अन्वाच्य' धातु का अर्थ है—विधिपूर्वक सुनाना या दीक्षित करना।
• यथाविधि: शास्त्रोक्त विधि के अनुसार। केवल शब्दों का ज्ञान होना दीक्षा नहीं है, अपितु गुरु द्वारा विशिष्ट समय और संकल्प के साथ मन्त्र प्रदान किया जाना 'यथाविधि' है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य गायत्री-ज्ञान की अनिवार्यता पर बल देते हुए उसके अभाव में होने वाले आध्यात्मिक पतन की चेतावनी दे रहे हैं। यह वाक्य पिछले श्लोक (४.७१) के अंतिम चरण 'ब्राह्मण्यात् परिहीयते' का विस्तार है।
ऋषि कहते हैं कि जो व्यक्ति गायत्री के रहस्य और उसकी साधना से विमुख रहता है, वह केवल अपनी पात्रता ही नहीं खोता, अपितु श्रुति के निदर्शनों के अनुसार वह 'अपवाद' अर्थात् निन्दा का पात्र बन जाता है। इसका गहरा अर्थ यह है कि जिस शरीर और बुद्धि को ब्रह्म-विद्या के लिए तैयार किया गया था, यदि उसमें उस विद्या का संचार नहीं होता, तो वह उद्देश्यविहीन हो जाता है।
आगे महर्षि उन द्विजों की स्थिति पर विचार करते हैं जिनका उपनयन तो हुआ, किन्तु उन्हें 'यथाविधि' सावित्री का उपदेश नहीं मिला। यहाँ 'यथाविधि' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मन्त्र केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु एक ऊर्जा-प्रवाह है जो गुरु से शिष्य में स्थानांतरित होता है। यदि किसी द्विज़ को यह मन्त्र विधिपूर्वक प्राप्त नहीं हुआ, तो वह औपचारिक रूप से तो द्विज कहलाएगा, किन्तु वास्तव में वह उस दिव्य ज्योति से वंचित है जो उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है।
यह श्लोक एक प्रश्न खड़ा करता है कि ऐसे व्यक्तियों का क्या किया जाए? इस प्रश्न का उत्तर अगले श्लोक (४.७३) में 'कृच्छ्र' और पुन: उपनयन के माध्यम से दिया गया है। यहाँ याज्ञवल्क्य यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि मन्त्र-दीक्षा केवल एक रस्म नहीं, अपितु साधक के अस्तित्व का रूपांतरण है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः । सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ २.३९ ॥
इस (नियत आयु) के बाद ये तीनों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) समयपर संस्कार न होनेसे सावित्रीसे पतित, व्रात्य और आर्योंसे निन्दित हो जाते हैं।
मनुस्मृति में भी इसी तथ्य की पुष्टि की गई है कि यदि नियत आयु तक संस्कार (विशेषकर सावित्री दीक्षा) संपन्न न हों, तो व्यक्ति 'सावित्रीपतित' और 'व्रात्य' हो जाता है। यह वचन महर्षि याज्ञवल्क्य के इस कथन के साथ पूर्णतः संगत है कि बिना यथाविधि उपदेश के द्विज अपनी गरिमा खो देता है। यहाँ एक ही तत्त्व को दो भिन्न दृष्टिकोणों से देखा गया है: मनुस्मृति जहाँ इसे सामाजिक मर्यादा, आर्य-परम्परा और संस्कार-विहीनता की दृष्टि से 'निन्दित' मानती है, वहीं महर्षि याज्ञवल्क्य इसे श्रुति के निदर्शनों के आधार पर एक गंभीर आध्यात्मिक क्षति के रूप में देखते हैं। एक ओर यह सामाजिक व्यवस्था का प्रश्न है कि व्यक्ति अपनी जातिगत मर्यादाओं का पालन कर रहा है या नहीं, और दूसरी ओर यह आत्मिक विकास का प्रश्न है कि साधक उस दिव्य ज्योति से वंचित है जो उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। दोनों ही दृष्टिकोण इस सत्य को पुष्ट करते हैं कि सावित्री-दीक्षा के बिना ब्राह्मणत्व अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं करता।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'दीक्षा' के रहस्य को उद्घाटित करता है। साधक के लिए केवल मन्त्र का पाठ करना पर्याप्त नहीं है; मन्त्र का 'यथाविधि' प्राप्त होना अनिवार्य है।
इसका गूढ़ अर्थ यह है कि जब गुरु शिष्य को मन्त्र देता है, तो वह केवल शब्द नहीं देता, अपितु अपनी तपस्या का एक अंश उस मन्त्र में आरोपित कर शिष्य के हृदय में स्थापित करता है। बिना इस ऊर्जा-संपर्क के, मन्त्र केवल एक बौद्धिक व्यायाम बनकर रह जाता है और साधक की चेतना उच्च भूमियों की ओर अग्रसर नहीं हो पाती।
जो द्विज सावित्री से वंचित है, वह योगिक दृष्टि से उस बीज के समान है जिसे बोया तो गया (उपनयन), किन्तु उसे जीवनदायी जल (दीक्षा) नहीं मिला। अतः यहाँ 'अपवाद' का अर्थ है—अपनी वास्तविक क्षमता को प्राप्त न कर पाने की त्रासदी। साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि साधना में अनुशासन और विधि का पालन ही उसे साधारण मनुष्य से ऊपर उठाकर एक 'योगीश्वर' या 'विप्र' की श्रेणी में प्रतिष्ठित करता है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी दीक्षा के प्रति कृतज्ञ रहे और मन्त्र के उस बीज-रूप को अपने भीतर जाग्रत करने का प्रयास करे जो गुरु द्वारा प्रदत्त किया गया है।
तांश्चारयित्वा त्रीन् कृच्छ्रान् यथाविध्युपनाययेत् ।
एतया चापि संयुक्तः काले च क्रियया स्वया ॥ ४.७३ ॥
उनसे तीन कृच्छ्र करवाकर यथाविधि उपनयन करना चाहिए; और इस (गायत्री) से युक्त होकर, समय पर अपनी क्रिया से स्वयं —...
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह चेतावनी दी कि गायत्री के ज्ञान के अभाव में विप्र अपने ब्राह्मणत्व से गिर जाता है और श्रुति-साक्ष्य के अनुसार निंदा का पात्र बनता है। वर्तमान श्लोक उस पतन के पश्चात पुनः उत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है, जहाँ प्रायश्चित्त और पुनरारम्भ की विधि बताई गई है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तेषां) त्रीन् कृच्छ्रान् यथाविधि चारयित्वा (ततः) यथाविधि उपनाययेत् । एतया (सावित्रीमन्त्रया) चापि संयुक्तः काले च क्रियया स्वया (गच्छेत्/तिष्ठेत्) —
पदार्थ-निर्वचन:
• त्रीन् कृच्छ्रान् चारयित्वा: तीन 'कृच्छ्र' व्रतों का पालन करवाकर। 'कृच्छ्र' का शाब्दिक अर्थ है—कठिन या कष्टदायक। यह एक विशिष्ट प्रायश्चित्त-व्रत है जो साधक के अहंकार को गलाने और चित्त की शुद्धि के लिए किया जाता है।
• यथाविधि उपनाययेत्: शास्त्रोक्त विधि से पुनः उपनयन संस्कार करना चाहिए। यहाँ 'उपनयन' केवल जनेऊ धारण करना नहीं, अपितु गुरु के समीप ले जाकर पुनः मन्त्र-दीक्षा देना है।
• एतया चापि संयुक्तः: और इस (सावित्री मन्त्र) से युक्त होकर।
• काले च क्रियया स्वया: अपने समय पर अपनी निर्धारित क्रियाओं (जैसे संध्या, जप आदि) द्वारा।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ केवल दोष नहीं बता रहे, अपितु समाधान भी दे रहे हैं। जो विप्र किसी कारणवश सावित्री-उपदेश से वंचित रह गया या ज्ञान होने पर भी उसका पालन नहीं कर सका, वह आध्यात्मिक रूप से 'पतित' माना जाता है। ऐसे साधक के लिए सीधे पुनः दीक्षा देना उचित नहीं है, क्योंकि जिसके भीतर पूर्व की अशुद्धि या आलस्य शेष है, वह मन्त्र की शक्ति को ग्रहण नहीं कर पाएगा। अतः सर्वप्रथम 'तीन कृच्छ्र' व्रतों का विधान है। ये व्रत शरीर और मन को तपाकर उसे पात्रता प्रदान करते हैं ताकि वह पुनः ब्रह्म-विद्या के योग्य हो सके। इसके पश्चात यथाविधि उपनयन द्वारा उसे पुनः दीक्षित किया जाना चाहिए।
यहाँ एक महत्वपूर्ण पाठ-भेद विचारणीय है। वर्तमान श्लोक में 'एतया चापि संयुक्तः' (इससे युक्त होकर) शब्द आया है, किन्तु मनुस्मृति (२.८०) के समान पाठों में 'एतयर्चा विसंयुक्तः' (इससे वियुक्त होकर) मिलता है। यदि हम मनु के पाठ को देखें, तो भाव यह स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति इस महान मन्त्र से वियुक्त रहता है, वह साधुओं और श्रेष्ठ जनों के बीच निंदित होता है। याज्ञवल्क्य जी यहाँ उसी विमुखता के निवारण का मार्ग बता रहे हैं—कि प्रायश्चित्त के बाद जब वह 'संयुक्त' (जुड़ा हुआ) हो जाए, तब वह अपनी नियत क्रियाओं को समय पर संपन्न करे।
अतः यह श्लोक एक सेतु है: जो अज्ञान या प्रमाद से गिरा, वह कृच्छ्र-व्रतों द्वारा शुद्ध होकर, पुनः उपनयन द्वारा दीक्षित होकर, सावित्री से जुड़कर अपने विप्रत्व को पुनः प्राप्त करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
पुनरुपनयन और मन्त्र-ज्ञान की अनिवार्यता के विषय में ब्राह्मण-परम्परा अत्यंत कठोर है।
इन्द्रः प्रजापतिं अपृच्छत् भगवन्नभिष्टूय पृच्छामीति पृच्छ वत्सेत्यब्रवीत् किं अयं ओंकारः कस्यः पुत्रः किं चैतच्छन्दः किं चैतद्वर्णः किं चैतद्ब्रह्मा ब्रह्म सम्पद्यते तस्माद्वै तद्भद्रं ओंकारं पूर्वं आलेभे स्वरितोदात्त एकाक्षर ओंकार ऋग्वेदे त्रैस्वर्योदात एकाक्षर ओंकारो यजुर्वेदे दीर्घप्लुतोदात्त एकाक्षर ओंकारः सामवेदे ह्रस्वोदात्त एकाक्षर ओंकारोऽथर्ववेदे उदात्तोदात द्विपद अ उ इत्यर्धचतस्रो मात्रा मकारे व्यञ्जनं इत्याहुः या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवत्या रक्ता वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्ब्राह्मं पदम् या सा द्वितीया मात्रा विष्णुदेवत्या कृष्णा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्वैष्णवं पदम् या सा तृतीया मात्रैशानदेवत्या कपिला वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पदम् या सार्धचतुर्थी मात्रा सर्वदेवत्या व्यक्तीभूता खं विचरति शुद्धस्फटिकसन्निभा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेत्पदं अनामकम् ओंकारस्य चोत्पत्तिः विप्रो यो न जानाति तत्पुनरुपनयनम् तस्माद्ब्राह्माणवचनं आदर्तव्यं यथा लातव्यो गोत्रो ब्रह्मणः पुत्रः गायत्रं च्छन्दः शुक्लो वर्णः पुंसो वत्सः रुद्रो देवता ओंकारो वेदानां ॥ १.२५ ॥
इन्द्रने प्रजापतिसे पूछा — "भगवन्, स्तुति करके पूछता हूँ" — "पूछो, वत्स।" — "यह ओंकार क्या है? किसका पुत्र है? इसका छन्द क्या, वर्ण क्या? यह ब्रह्म कैसे होता है?" … ऋग्वेदमें ओंकार स्वरित-उदात्त एकाक्षर है, यजुर्वेदमें त्रैस्वर्य-उदात्त, सामवेदमें दीर्घ-प्लुत-उदात्त, अथर्ववेदमें ह्रस्व-उदात्त। "अ" और "उ" — (ये) साढ़े तीन मात्राएँ, और मकारमें व्यञ्जन — ऐसा कहते हैं। जो पहली मात्रा है, उसकी देवता ब्रह्मा है, वर्ण लाल — जो उसका नित्य ध्यान करता है वह ब्राह्म पदको जाता है। दूसरी मात्राकी देवता विष्णु, वर्ण कृष्ण — उसका ध्यान करनेवाला वैष्णव पदको जाता है। तीसरी मात्राकी देवता ईशान, वर्ण कपिल — उसका ध्यान करनेवाला ऐशान पदको जाता है। जो आधी चौथी मात्रा है, वह सब देवतावाली है, व्यक्त होकर आकाशमें विचरती है, वर्णमें शुद्ध स्फटिकके समान — उसका नित्य ध्यान करनेवाला नामरहित पदको जाता है। जो विप्र ओंकारकी उत्पत्ति नहीं जानता, उसका फिरसे उपनयन (होना चाहिए); इसलिए ब्राह्मण-वचनका आदर करना चाहिए … ओंकार वेदोंका (मुख्य) है।
गोपथ ब्राह्मण का यह अंश स्पष्ट करता है कि यदि कोई विप्र 'ओंकार' की उत्पत्ति (अर्थात् उसके मूल रहस्य) को नहीं जानता, तो उसका पुनरुपनयन आवश्यक है। स्मृति और गोपथ ब्राह्मण यहाँ एक ही बिंदु पर मिलते हैं—कि केवल जन्म से ब्राह्मण होना पर्याप्त नहीं है; मन्त्र-दीक्षा और उसकी आंतरिक समझ (उत्पत्ति) अनिवार्य है। यदि इसमें त्रुटि हो, तो उपनयन संस्कार की पुनरावृत्ति का विधान है। यह सिद्ध करता है कि वैदिक परंपरा में 'पात्रता' को स्थिर नहीं माना गया, उसे निरंतर अभ्यास और शुद्धि से अर्जित करना पड़ता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साधना के दूसरे अवसर' का संकेत है। साधक के जीवन में ऐसा समय आता है जब वह अपनी साधना की लय खो देता है या गुरु-उपदेश को विस्मृत कर देता है। ऐसी स्थिति में मन में ग्लानि और अवसाद उत्पन्न होता है, जो उसे और नीचे गिराता है।
यहाँ 'कृच्छ्र' का आन्तर अर्थ 'तप' है। जब साधक अपनी त्रुटियों को स्वीकार कर स्वयं को अनुशासन (व्रतों) की अग्नि में तपाता है, तो उसका चित्त शुद्ध होता है। यह शुद्धि ही उसे पुनः दीक्षा के योग्य बनाती है। योग में इसे 'पुनः संकल्प' की अवस्था कहते हैं।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि पतन अंतिम नहीं है। प्रायश्चित्त का अर्थ केवल दंड नहीं, बल्कि उस मानसिक अवरोध को हटाना है जिसने उसे मन्त्र की शक्ति से दूर किया था। जब वह पुनः सावित्री से 'संयुक्त' होता है और अपनी क्रियाओं (संध्या-जप) को समय पर करता है, तो वह स्थूल शरीर के अनुशासन से सूक्ष्म प्राणों के अनुशासन की ओर बढ़ता है। यह प्रक्रिया साधक को 'अपात्र' भूमि से उठाकर पुनः 'साधक' भूमि पर प्रतिष्ठित करती है।
विप्रक्षत्रियविड्योनिर्गृह्णाणां पतिसाधुषु ॥
(?)
ओंकारो व्याहृतीः सप्त सावित्री प्राणसंयमः ॥ ४.७४ ॥
(?) विप्र, क्षत्रिय और वैश्य योनिवालोंमें … (पाठ अस्पष्ट)। ओंकार, सात व्याहृतियाँ, सावित्री, प्राणायाम —
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन द्विजों के लिए प्रायश्चित्त और पुनः उपनयन की विधि बताई, जो सावित्री-उपदेश से वंचित रह गए थे। वर्तमान श्लोक उस विस्मृति या त्याग के दुष्परिणामों को रेखांकित करता है और उन अनिवार्य अंगों की सूची देता है, जिनके बिना एक द्विज का आध्यात्मिक जीवन अपूर्ण है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: विप्र-क्षत्रिय-विड्योनिः ... (?) ... पतिसाधुषु (निन्दितः) । ओंकारः व्याहृतीः सप्त सावित्री प्राणसंयमः (च) ... —
पदार्थ-निर्वचन:
• विप्रक्षत्रियविड्योनिः: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य योनियों में जन्म लेने वाले (द्विज)।
• पतिसाधुषु: श्रेष्ठ पुरुषों या साधुओं के बीच।
• ओंकारः: प्रणव, जो समस्त वेदों का बीज और अक्षर-तत्त्व है।
• व्याहृतीः सप्त: सात व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः और उनके संबंधित स्वरूप), जो स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाने वाले सोपान हैं।
• सावित्री: गायत्री मन्त्र, जो बुद्धि को प्रेरित करने वाली सर्वोच्च ऋचा है।
• प्राणसंयमः: प्राणायाम, अर्थात प्राणों का नियमन और नियंत्रण।
भाष्य —
इस श्लोक की प्रथम पंक्ति का पाठ कुछ अस्पष्ट है, किंतु इसका भाव अत्यंत गंभीर है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जो व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य योनि में जन्म लेकर भी अपने कुल और धर्म के अनिवार्य अनुष्ठानों से विमुख रहता है, वह श्रेष्ठ पुरुषों और साधुओं के समाज में निन्दा का पात्र बनता है। यह निन्दा व्यक्ति के व्यक्तित्व की नहीं, अपितु उसके उस 'अधिकार' के त्याग की है, जो उसे जन्म और संस्कार से प्राप्त हुआ था।
श्लोक की दूसरी पंक्ति में ऋषि उन चार आधार-स्तम्भों का उल्लेख कर रहे हैं, जो किसी भी साधक की दैनिक साधना की अनिवार्य नींव हैं: ओंकार, सात व्याहृतियाँ, सावित्री और प्राणसंयम। यह केवल शब्दों की सूची नहीं है, बल्कि एक पूर्ण साधना-क्रम है। ओंकार से चेतना का विस्तार होता है, व्याहृतियों से सात लोकों (भुवनों) के साथ सामंजस्य स्थापित होता है, सावित्री से बुद्धि का दिव्यीकरण होता है और प्राणसंयम से मन स्थिर होता है।
यह वाक्य अगले श्लोक (४.७५) तक विस्तृत है, जहाँ 'संध्या' का उल्लेख है। अतः पूर्ण अर्थ यह है कि— ओंकार, सात व्याहृतियाँ, सावित्री, प्राणायाम और संध्या; इन पाँचों का त्याग करने वाला द्विज अपने आध्यात्मिक गौरव को खो देता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतयर्चा विसंयुक्तः काले च क्रियया स्वया । ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां याति साधुषु ॥ २.८० ॥
इस ऋचा (सावित्री) से, और समयपर अपनी (सन्ध्या आदि) क्रियासे रहित ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कुलमें जन्मा (मनुष्य) सज्जनोंमें निन्दाको प्राप्त होता है।
मनुस्मृति का यह अंश वर्तमान श्लोक के अस्पष्ट पाठ की पुष्टि करता है। मनु कहते हैं कि जो व्यक्ति सावित्री और अपनी नित्य क्रियाओं (संध्या आदि) से विसंयुक्त हो जाता है, वह ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य योनि में होने पर भी साधुओं में निन्दित होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ इस बात पर सहमत हैं कि मन्त्र और क्रिया का त्याग केवल एक व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, अपितु एक सामाजिक और आध्यात्मिक पतन है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक के लिए 'दैनिक अनुष्ठान की समय-सारणी' के समान है। एक योगी के लिए ये पाँचों अंग— ओंकार, व्याहृति, सावित्री, प्राणसंयम और संध्या— एक सीढ़ी की तरह हैं:
१. ओंकार: शून्य से अस्तित्व की ओर प्रस्थान।
२. व्याहृतियाँ: स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर के सात स्तरों (लोकों) का जागरण।
३. सावित्री: प्रज्ञा का उदय और दिव्य प्रकाश का अनुभव।
४. प्राणसंयम: प्राणों को स्थिर कर मन को अंतर्मुखी करना।
५. संध्या: समय की संधि में स्वयं को परमात्मा से जोड़ना।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि इनमें से किसी एक की भी उपेक्षा करने पर साधना की कड़ी टूट जाती है। यह क्रम साधक को 'बाहरी विधि' से 'आन्तरिक अनुभव' की ओर ले जाता है। जो इन पाँचों का नियमित अभ्यास करता है, वह केवल एक विप्र या क्षत्रिय नहीं रहता, अपितु एक 'योगी' के रूप में प्रतिष्ठित होता है।
सम्पादकीय टिप्पणी — योग-रहस्य: व्याहृतियोंको ‘सूक्ष्म शरीरके सात स्तर (लोक)’ कहा — श्लोकमें नहीं; तीन recompose के बाद स्वीकार, लोक-अर्थ बना रहा।
संध्या न वन्दिता येन ब्राह्मण्यं तस्य वै कुतः ॥ ४.७५ ॥
— और संध्या — इनकी वन्दना जिसने नहीं की, उसका ब्राह्मणत्व कहाँ?
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन अनिवार्य साधना-अंगों की सूची दी थी, जिनके बिना द्विजजन साधुओं के बीच निंदा के पात्र होते हैं। वर्तमान श्लोक उसी सूची को पूर्ण करते हुए संध्या-वन्दना की अनिवार्यता को प्रतिपादित करता है और ब्राह्मणत्व की वास्तविक कसौटी निर्धारित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (ओंकारः व्याहृतयः सप्त सावित्री प्राणसंयमः) संध्या च न वन्दिता येन (तस्य) ब्राह्मण्यं तस्य वै कुतः?
पदार्थ-निर्वचन:
• संध्या न वन्दिता: जिसकी संध्या-वन्दना नहीं की गई (अर्थात् जिसने संध्या का अभ्यास नहीं किया)।
• ब्राह्मण्यं: ब्राह्मणत्व; केवल जन्मगत स्थिति नहीं, अपितु वह आध्यात्मिक गुण और पात्रता जो ब्रह्म-ज्ञान की ओर ले जाए।
• तस्य वै कुतः: उसका (वह गुण) कहाँ से होगा? यहाँ 'कुतः' प्रश्नवाचक शब्द है, जो निषेध को दर्शाता है कि ऐसा व्यक्ति ब्राह्मणत्व से शून्य है।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (४.७४) के अधूरे वाक्य को पूर्ण करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ओंकार, सात व्याहृतियाँ, सावित्री मन्त्र, प्राणायाम और संध्या—ये पाँचों एक ही माला के मनके हैं। इनमें से किसी एक का भी अभाव साधना की श्रृंखला को तोड़ देता है। विशेषतः संध्या-वन्दना के विषय में ऋषि का स्वर अत्यंत कठोर है। वे प्रश्न करते हैं कि जिसने संध्या की वन्दना नहीं की, उसका ब्राह्मणत्व कहाँ?
यहाँ 'ब्राह्मणत्व' का अर्थ केवल जाति या कुल से नहीं है, अपितु उस 'ब्रह्म-भाव' से है जो साधक को संसार से ऊपर उठाकर अक्षर-ब्रह्म में प्रतिष्ठित करता है। संध्या केवल एक बाह्य क्रिया नहीं, अपितु समय और चेतना का मिलन है। जो व्यक्ति दिन के संधि-कालों में अपनी चेतना को उस परम ज्योति (सूर्य) के साथ नहीं जोड़ता, वह आध्यात्मिक रूप से मृत समान है। ऐसा व्यक्ति केवल नाममात्र का ब्राह्मण रह जाता है, उसके भीतर का 'विप्रत्व' (विशेष ज्ञान) लुप्त हो जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
संध्या के त्याग को शास्त्रों में अत्यंत गंभीर अपराध माना गया है।
न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद्द्विजकर्मणः ॥ २.१०३ ॥
जो प्रातःसन्ध्यामें खड़ा नहीं होता और सायंसन्ध्याकी उपासना नहीं करता, उसे शूद्रकी भाँति सब द्विज-कर्मोंसे बाहर कर देना चाहिए।
मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि जो प्रातः और सायं की उपासना नहीं करता, वह शूद्र के समान द्विज-कर्मों से बहिष्कृत होने योग्य है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों का मत एक है—संध्या का त्याग करना केवल एक विधि का त्याग नहीं, अपितु अपनी आध्यात्मिक पहचान और अधिकारों का त्याग करना है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक यह रहस्य खोलता है कि 'ब्राह्मणत्व' कोई एक बार प्राप्त किया गया संस्कार नहीं है, जिसे जीवनभर के लिए सुरक्षित मान लिया जाए। यह एक जीवंत अवस्था है, जिसे दैनिक उपासना (संध्या) के द्वारा निरंतर पोषित करना पड़ता है।
साधक के लिए संध्या का अर्थ है—अपनी बिखरी हुई वृत्तियों को समेटकर उन्हें सूर्य-पुरुष (हृदय-ज्योति) में विलीन करना। जिस प्रकार सूर्य के उदय और अस्त होने पर प्रकृति में परिवर्तन आता है, उसी प्रकार संध्या-वन्दना के समय साधक अपने स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर और फिर अक्षर की ओर गमन करता है। जो इस दैनिक अभ्यास से विमुख है, वह अपनी चेतना के स्तर को ऊपर नहीं उठा सकता; वह केवल स्थूल जगत में ही भटकता रहता है। अतः संध्या का अभ्यास ही वह सेतु है जो साधक को 'जन्मजात ब्राह्मण' से 'तत्वतः ब्राह्मण' (ब्रह्मज्ञानी) की भूमि पर ले जाता है।
सावित्रीं यो न जानाति वृथा तस्य परिश्रमः ॥
गायत्रीमात्रसंतुष्टो वरं विप्रः सुयन्त्रितः ॥ ४.७६ ॥
जो सावित्री को नहीं जानता, उसका परिश्रम व्यर्थ है; केवल गायत्री से ही संतुष्ट और सुयन्त्रित विप्र श्रेष्ठ है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार, व्याहृति, सावित्री, प्राणायाम और संध्या को ब्राह्मणत्व की अनिवार्य कसौटी बताया था। वर्तमान श्लोक इसी विचार का उपसंहार करता है, जहाँ वे मन्त्र-ज्ञान और संयम के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए यह बताते हैं कि बिना सावित्री के समस्त आध्यात्मिक पुरुषार्थ निष्फल है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यः सावित्रीं न जानाति तस्य परिश्रमः वृथा (अस्ति)। (परन्तु) यः विप्रः सुयन्त्रितः (अस्ति) (तस्मात्) गायत्रीमात्रेण सन्तुष्टः (सः) वरम्।
पदार्थ-निर्वचन:
• सावित्रीं न जानाति: यहाँ 'जानने' का अर्थ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु मन्त्र के स्वरूप, उसके देवता और उसकी शक्ति का अनुभव करना है।
• वृथा परिश्रमः: व्यर्थ का प्रयास। जब लक्ष्य (ब्रह्म-प्राप्ति) का मार्ग (सावित्री) ही ज्ञात न हो, तो अन्य सभी कर्म केवल शारीरिक श्रम मात्र रह जाते हैं।
• सुयन्त्रितः: जिसने अपनी इन्द्रियों, मन और प्राणों को यन्त्रवत (अनुशासित) कर लिया है। 'यन्त्र' वह साधन है जो बिखरी हुई ऊर्जा को एक दिशा में केंद्रित करता है; अतः सुयन्त्रित वह है जिसकी चेतना विचलित नहीं होती।
• गायत्रीमात्रसन्तुष्टो: जो केवल गायत्री के जप और उसके साक्षात्कार में ही पूर्णता का अनुभव करता है और अन्य बाहरी आडम्बरों या अधिक ज्ञान के अहंकार में नहीं भटकता।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में एक अत्यंत गंभीर सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो साधक सावित्री (गायत्री) के रहस्य को नहीं जानता, उसका समस्त परिश्रम व्यर्थ है। यहाँ 'परिश्रम' का संकेत उन समस्त कर्मकाण्डों, वेदों के केवल शाब्दिक पाठ और बाहरी अनुष्ठानों की ओर है, जो बिना मन्त्र-शक्ति के किए जाते हैं। जिस प्रकार बिना बीज के केवल भूमि जोतने से फसल नहीं उगती, उसी प्रकार बिना सावित्री के केवल कर्मों के परिश्रम से आत्म-साक्षात्कार संभव नहीं है। सावित्री वह बीज है जो साधक की बुद्धि को प्रदीप्त कर उसे अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाता है।
किन्तु, ऋषि यहाँ एक और सूक्ष्म भेद बताते हैं। वे कहते हैं कि वह विप्र श्रेष्ठ है जो 'सुयन्त्रित' है और केवल गायत्री से ही संतुष्ट है। इसका भाव यह है कि यदि किसी व्यक्ति के पास चारों वेदों का ज्ञान हो, परन्तु वह असंयमी हो—अर्थात् उसकी इन्द्रियाँ अनियंत्रित हों और मन चंचल हो—तो वह ज्ञान उसके लिए बोझ मात्र है। इसके विपरीत, यदि कोई विप्र केवल गायत्री मन्त्र का आश्रय लेकर अपने जीवन को संयमित कर ले, तो वह उस महापंडित से कहीं अधिक श्रेष्ठ है जो ज्ञान तो बहुत रखता है पर आचरण में असंयमी है।
यहाँ 'सन्तुष्टि' का अर्थ आलस्य नहीं, अपितु 'एकाग्रता' है। जब साधक यह अनुभव कर लेता है कि गायत्री के भीतर ही समस्त वेदों का सार और संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति निहित है, तब वह अन्यत्र भटकना छोड़ देता है। यही वह स्थिति है जहाँ कर्म, ज्ञान और योग का मिलन होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस मत की पुष्टि मनुस्मृति में भी मिलती है:
सावित्रीमात्रसारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः । नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥ २.११८ ॥
केवल सावित्री (के ज्ञान) को सार माननेवाला भी, भली-भाँति संयमी विप्र श्रेष्ठ है; पर तीनों वेद जाननेवाला भी असंयमी, सब कुछ खानेवाला, सब कुछ बेचनेवाला (श्रेष्ठ) नहीं।
मनुस्मृति का यह कथन बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक के साथ पूर्णतः मेल खाता है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर बल देते हैं कि 'संयम' (सुयन्त्रित होना) ज्ञान से अधिक मूल्यवान है। जहाँ मनुस्मृति में 'सावित्रीमात्रसार' (केवल सावित्री को सार मानने वाले) की श्रेष्ठता बताई गई है, वहीं याज्ञवल्क्य ऋषि इसे 'सन्तुष्टि' और 'सुयन्त्रित' होने के साथ जोड़कर योगिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं। दोनों का निष्कर्ष एक ही है—असंयमी विद्वान की तुलना में संयमी मन्त्र-साधक श्रेष्ठ है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' और 'साध्य' के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। साधक के लिए यह चेतावनी है कि वह केवल सूचनाओं के संग्रह (परिश्रम) को साधना न समझे। योग का अर्थ ही है—संयम।
यहाँ 'सुयन्त्रित' होने का अभ्यास यह है कि साधक अपनी बिखरी हुई मानसिक वृत्तियों को गायत्री के एक बिंदु पर केंद्रित करे। जब साधक 'गायत्रीमात्रसन्तुष्ट' होता है, तो वह वास्तव में 'एक (एकाग्रता) की स्थिति में पहुँच जाता है। वह अनुभव करता है कि मन्त्र के अक्षर केवल ध्वनि नहीं, बल्कि प्राणिक स्पंदन हैं।
साधक के लिए अभ्यास यह है: बहुत अधिक ग्रंथों के अध्ययन के अहंकार से बेहतर है कि मन्त्र के एक छोटे से अंश का गहरा अनुभव किया जाए और साथ में इन्द्रिय-संयम रखा जाए। यह श्लोक साधक को 'बहुज्ञ' (बहुत जानने वाले) से 'विज्ञ' (अनुभवी) बनने की ओर ले जाता है। संयम वह पात्र है, और गायत्री वह अमृत है; यदि पात्र (संयम) टूटा हुआ होगा, तो अमृत (ज्ञान) टिक नहीं पाएगा। अतः सुयन्त्रित होना ही वास्तविक योग है।
गायत्रीमाहात्म्यम्
नायन्त्रितश्चतुर्वेदः सर्वाशी सर्वविक्रयी ।
सारभूतास्तु वेदानां गुह्योपनिषदः स्मृताः ॥ ४.७७ ॥
न कि असंयमी चारों वेदों का ज्ञाता, जो सब कुछ खाता और सब कुछ बेचता है; गुह्य उपनिषदें वेदों का सार कही गयी हैं।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि केवल गायत्री के ज्ञान और आत्म-संयम से संतुष्ट विप्र ही वास्तव में श्रेष्ठ है। वर्तमान श्लोक उसी विचार को विस्तार देते हुए यह बताते हैं कि केवल शास्त्र-ज्ञान (चतुर्वेदी होना) पर्याप्त नहीं है, यदि वह संयम से रहित हो; और साथ ही वे वेदों के उस सूक्ष्म मार्ग का संकेत देते हैं जो साधक को विस्तार से सार की ओर ले जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः वरं विप्रः) यः नायन्त्रितः (अस्ति), (न तु) यः चतुर्वेदः (ज्ञाता) (अस्ति) (परन्तु) सर्वाशी सर्वविक्रयी (अस्ति)। वेदानां तु गुह्योपनिषदः सारभूताः स्मृताः।
पदार्थ-निर्वचन:
• नायन्त्रितः: जिसका अपने मन, प्राण और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं है। यहाँ 'यन्त्र' का अर्थ है अनुशासन। जो अनुशासित नहीं, वह ज्ञान के बोझ से दबा हुआ है, उसे वह ज्ञान रूपांतरित नहीं करता।
• चतुर्वेदः: चारों वेदों (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व) का ज्ञाता। यहाँ यह शब्द केवल विद्वत्ता का प्रतीक है, जो यदि संयमहीन हो तो अहंकार का कारण बनती है।
• सर्वाशी: 'सर्व' + 'आशी' (खाने वाला)। वह जो समस्त भोगों का लोभी है, जिसकी कामनाएँ अनंत हैं और जो केवल भौतिक उपभोग के लिए शास्त्रों का उपयोग करता है।
• सर्वविक्रयी: वह जो अपने ज्ञान को केवल जीविका या सांसारिक लाभ के लिए बेचता है। आध्यात्मिक सत्य का व्यापार करने वाला व्यक्ति उस सत्य से दूर हो जाता है।
• गुह्योपनिषदः: 'गुह्य' अर्थात गुप्त या रहस्यमय। उपनिषद वे ज्ञान हैं जो गुरु द्वारा केवल योग्य शिष्य को दिए जाते हैं क्योंकि वे स्थूल कर्मकाण्ड से ऊपर उठकर आत्मा के स्वरूप की चर्चा करते हैं।
• सारभूताः: वेदों का वह निचोड़ या तत्त्व, जहाँ समस्त विधियाँ समाप्त होकर एक बिंदु पर केंद्रित हो जाती हैं।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ज्ञान और आचरण के बीच के गहन भेद को रेखांकित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वह व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं है जिसने चारों वेदों का केवल शाब्दिक ज्ञान प्राप्त कर लिया हो, यदि वह 'असंयमी' है। एक ऐसा विद्वान जो 'सर्वाशी' है—अर्थात् जिसकी क्षुधा केवल भौतिक सुखों और इन्द्रिय-तृप्ति तक सीमित है—और जो 'सर्वविक्रयी' है—अर्थात् जो अपने ज्ञान का उपयोग केवल धनार्जन या सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए करता है—वह वास्तव में वेदों के मर्म से अनभिज्ञ है।
यहाँ याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि शास्त्र केवल सूचना नहीं, अपितु रूपांतरण का साधन हैं। यदि वेदों का अध्ययन साधक को संयम (यन्त्र) की ओर नहीं ले जाता, तो वह अध्ययन केवल बौद्धिक व्यायाम है, आध्यात्मिक प्रगति नहीं।
इसके पश्चात, ऋषि वेदों के पदानुक्रम को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि वेदों का सार 'गुह्य उपनिषद' हैं। वेद विशाल हैं, उनमें अनेक विधियाँ, अनुष्ठान और सामाजिक नियम हैं। किंतु उन समस्त विधियों का अंतिम लक्ष्य क्या है? वह लक्ष्य उपनिषदों में निहित है। जिस प्रकार एक वृक्ष की अनेक शाखाएँ और पत्ते होते हैं, किंतु उसका पोषण करने वाला 'सार' उसके बीज या मूल में होता है, वैसे ही वेदों का प्रयोजन उपनिषदों के ज्ञान में समाहित है। यह यात्रा विस्तार से सूक्ष्म की ओर है—जहाँ साधक पहले व्यापक कर्मों को समझता है और फिर उन कर्मों के पीछे छिपे 'रहस्य' (गुह्य) को पहचानता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तस्मात् तु सर्ववेदानां सावित्री प्राण उच्यते । निर्जीवा हीतरे वेदा विना सावित्रिया नृप ॥ … सावित्रीमात्रसारोऽपि वरो विप्रः सुयन्त्रितः । नायन्त्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥
इसलिए सावित्री सब वेदोंका प्राण कही जाती है; राजन्! सावित्रीके बिना दूसरे वेद निर्जीव हैं। … केवल सावित्रीको सार जाननेवाला भी संयमी विप्र श्रेष्ठ है; पर चारों वेद जाननेवाला भी असंयमी, सब कुछ खानेवाला, सब कुछ बेचनेवाला (श्रेष्ठ) नहीं।
महाभारत के आश्वमेधिकपर्व में भी यही भाव व्यक्त किया गया है कि केवल सावित्री के सार को जानने वाला संयमी विप्र श्रेष्ठ है, न कि वह चतुर्वेदी जो असंयमी और लोभी है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और महाभारत के इस अंश में पूर्ण सहमति है कि 'संयम' ही वह कसौटी है जिससे ज्ञान की सार्थकता मापी जाती है। बिना संयम के चतुर्वेदी होना वैसा ही है जैसे बिना प्राण के शरीर का होना।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'विस्तार से सार' की यात्रा का सूत्र है। साधक का अभ्यास यहाँ 'छंटनी' का है।
प्रथम चरण में साधक वेदों के व्यापक ज्ञान (चतुर्वेद) में होता है, जहाँ वह बाहरी नियमों और विधियों का पालन करता है। किंतु यदि वह केवल यहीं रुक गया और अपनी इन्द्रियों का दास (सर्वाशी) बना रहा, तो वह योग-भूमि में प्रवेश नहीं कर पाता।
द्वितीय चरण में वह 'उपनिषद' की भूमि पर आता है। यहाँ अभ्यास 'गुह्य' की खोज का है। साधक बाहरी कर्मों से हटकर अपने भीतर के साक्षी भाव और आत्मा के स्वरूप का चिंतन करना आरम्भ करता है। यह 'सार' की खोज है।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि ज्ञान का संचय नहीं, बल्कि ज्ञान का शोधन आवश्यक है। वह अपनी चेतना को चारों दिशाओं (चतुर्वेद) में बिखेरने के बजाय उसे एक बिंदु पर केंद्रित करना सीखता है। यह यात्रा उसे 'विस्तार' (वेदों) से 'सार' (उपनिषदों) की ओर ले जाती है, जो आगामी श्लोकों में और सूक्ष्म होकर गायत्री और अंततः ओंकार तक पहुँचेगी।
ताभ्यः सारं तु गायत्री गायत्र्या व्याहृतित्रयम् ।
व्याहृतिभ्यस्तथोंकारस्त्रिवृद्ब्रह्म स उच्यते ॥ ४.७८ ॥
…उन उपनिषदों का सार तो गायत्री है, गायत्री का तीन व्याहृति है, व्याहृतियों का ओंकार है और वह त्रिवृद्ब्रह्म कहलाता है…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वेदों के उस सार की ओर संकेत किया था जिसे 'गुह्य उपनिषद' कहा गया है। वर्तमान श्लोक उसी ज्ञान-परम्परा के सूक्ष्मता की ओर ले जाने वाले सोपानों का वर्णन करता है, जहाँ वेदों के विस्तार से उपनिषदों की ओर, और उपनिषदों से एक बीज-अक्षर की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तेषां) गुह्योपनिषदां सारं तु गायत्री (अस्ति), (तस्याः) गायत्र्याः (सारं) व्याहृतित्रयम् (अस्ति), व्याहृतिभ्यः (तथा) ओंकारः (सारः अस्ति)। (तद्) त्रिवृद्ब्रह्म स उच्यते।
पदार्थ-निर्वचन:
• सारं: वह तत्त्व जो सबसे सूक्ष्म हो और जिसमें संपूर्ण विस्तार समाहित हो। जैसे दूध का सार घी है, वैसे ही ज्ञान का सार वह बिंदु है जहाँ शब्द समाप्त होते हैं और अनुभव आरम्भ होता है।
• व्याहृतित्रयम्: तीन व्याहृतियाँ—'भूः', 'भुवः' और 'स्वः'। ये केवल उच्चारण नहीं, अपितु अस्तित्व के तीन स्तरों (पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक) के प्रतिनिधि हैं।
• ओंकारः: प्रणव 'ॐ'। यह समस्त ध्वनियों का मूल और ब्रह्म का नाद-रूप है।
• त्रिवृद्ब्रह्म: वह ब्रह्म जो तीन स्तरों या तीन वृत्तियों (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) के पार है, अथवा वह जो इन तीनों के समन्वय से पूर्णता को प्राप्त है। यहाँ 'त्रिवृद्' शब्द उस पूर्णता का सूचक है जिसमें त्रयी विद्या और त्रिविध व्याहृति समाहित होकर एकत्व में विलीन हो जाती हैं।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ज्ञान के 'अधोमुखी' (विस्तार से सूक्ष्म की ओर) क्रम को समझा रहे हैं। वे बताते हैं कि ज्ञान की यात्रा स्थूल से सूक्ष्म की ओर होती है। वेदों का विशाल विस्तार है, उस विस्तार का निचोड़ उपनिषदों में है। उपनिषदों का मर्म, जो समस्त ज्ञान का केंद्र है, वह 'गायत्री' है। गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु उस प्रकाश का नाम है जो बुद्धि को उन्मीलित करता है।
परन्तु साधक यहीं नहीं रुकता। जब गायत्री के मन्त्र-रूप का और अधिक सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है, तो उसका सार 'तीन व्याहृतियों' (भूः, भुवः, स्वः) में मिलता है। ये व्याहृतियाँ साधक को स्थूल जगत से उठाकर सूक्ष्म जगत और फिर कारण-जगत की ओर ले जाती हैं। और जब इन तीन व्याहृतियों का भी सार निकाला जाता है, तो केवल 'ओंकार' शेष रहता है।
अतः यह क्रम है: वेद → उपनिषद → गायत्री → व्याहृतियाँ → ओंकार।
यह ओंकार ही 'त्रिवृद्ब्रह्म' कहलाता है। भाव यह है कि जब साधक इस अंतिम बिंदु (ओंकार) पर पहुँचता है, तब वह उस ब्रह्म को प्राप्त होता है जिसमें तीनों लोकों और तीनों अवस्थाओं का लय हो गया है। यह स्मृति हमें बताती है कि साधना का लक्ष्य शब्दों का संग्रह करना नहीं, बल्कि शब्दों के माध्यम से उस 'शब्द-शून्य' या 'नाद-ब्रह्म' में प्रवेश करना है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् ॥ २.२३.३ ॥
प्रजापतिने लोकोंको तपाया; तपाये हुए उनसे त्रयी विद्या (तीनों वेद) बह निकली। उसे तपाया; तपायी हुई उससे ये अक्षर बह निकले — "भूः, भुवः, स्वः"। उन्हें तपाया; तपाये हुए उनसे ओंकार बह निकला।
छान्दोग्य उपनिषद् का यह अंश इस स्मृति के कथन की पूर्ण पुष्टि करता है। वहाँ बताया गया है कि प्रजापति ने लोकों को तपाया जिससे 'त्रयी विद्या' (वेद) निकली, त्रयी को तपाया जिससे 'भूः, भुवः, स्वः' निकले और अंततः उन्हें तपाने से 'ओंकार' प्रकट हुआ। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और छान्दोग्य उपनिषद् दोनों एक ही सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं—कि सत्य की खोज 'तप' (तपाने या परिष्कृत करने) की प्रक्रिया है। जैसे स्वर्ण को तपाकर अशुद्धियाँ दूर की जाती हैं, वैसे ही ज्ञान को तपाकर (अनुभव में उतारकर) जब उसका सार निकाला जाता है, तो अंत में केवल ओंकार शेष रहता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अवरोहण' की विधि है। सामान्यतः मनुष्य स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाता है, किन्तु योगिक अभ्यास में इसे 'लय' कहा जाता है।
साधक पहले गायत्री के जप से अपनी बुद्धि को शुद्ध करता है। फिर वह गायत्री के विस्तार को छोड़कर केवल व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) के नाद में स्थित होता है। यहाँ वह अपने अस्तित्व को पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग के बोध से ऊपर उठाता है। अंततः, वह व्याहृतियों के नाद को भी विलीन कर केवल 'ओंकार' के स्पंदन में ठहर जाता है।
यह अभ्यास साधक को 'विस्तार' से 'बिंदु' की ओर ले जाता है। जब साधक ओंकार में स्थित होता है, तो वह 'त्रिवृद्ब्रह्म' की स्थिति का अनुभव करता है—जहाँ अब न कोई मन्त्र है, न कोई व्याहृति, न कोई शब्द; केवल एक अनंत चैतन्य का अनुभव है। यह यात्रा 'वाचक' (शब्द) से 'वाच्य' (अर्थ) और फिर 'वाच्य' से 'अवाच्य' (अनिर्वचनीय ब्रह्म) की ओर जाने की प्रक्रिया है। इस अभ्यास से साधक की चेतना स्थूल जगत के बंधनों को तोड़कर अक्षर-ब्रह्म में लीन होने लगती है।
त्रिवृद्ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ।
मधुवत् संभृतं ह्येतद्विप्रासो विष्णुना स्वयम् ॥ ४.७९ ॥
तीन रूपोंवाले (त्रिवृत्) ब्रह्ममें पारंगत (साधक) परब्रह्मको प्राप्त होता है। हे विप्रो! स्वयं विष्णुने इसे मधुकी तरह संचित किया है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ज्ञान के सोपानों का वर्णन करते हुए वेदों से उपनिषदों, उपनिषदों से गायत्री, गायत्री से व्याहृतियों और अंततः व्याहृतियों से ओंकार तक की यात्रा बताई। इस प्रक्रिया में उन्होंने इस सूक्ष्मतम बिंदु को 'त्रिवृद्ब्रह्म' की संज्ञा दी। वर्तमान श्लोक इसी त्रिवृद्ब्रह्म की सिद्धि और उसके दिव्य संचय के रहस्य को उद्घाटित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (यः) त्रिवृद्ब्रह्मणि निष्णातः (सः) परं ब्रह्माधिगच्छति। हे विप्र! ह्येतत् (ब्रह्मज्ञानं) विष्णुना स्वयम् मधुवत् संभृतम् (अस्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• त्रिवृद्ब्रह्मणि: यहाँ 'त्रिवृद्' का अर्थ है वह ब्रह्म जिसमें तीन वृत्तियाँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) या तीन स्तर (भूः, भुवः, स्वः) समाहित होकर एक हो गए हैं। यह वह अवस्था है जहाँ साधक द्वैत से ऊपर उठकर अद्वैत की सीमा में प्रवेश करता है।
• निष्णातः: केवल जानने वाला नहीं, अपितु वह जो उस ज्ञान में पूरी तरह डूब चुका हो, जिसका उस सत्य के साथ तादात्म्य हो गया हो।
• परं ब्रह्म: वह सर्वोच्च तत्त्व जो शब्दों, संकल्पों और वृत्तियों से परे है; वह शुद्ध चैतन्य जो त्रिवृद्ब्रह्म के माध्यम से अनुभूत होता है।
• मधुवत्: मधु (शहद) वह सार है जो हज़ारों फूलों के रस से मिलकर एक रूप हो जाता है। यहाँ 'मधुवत्' का अर्थ है—अत्यंत मधुर, सारभूत और अत्यंत सूक्ष्म रूप में संचित।
• संभृतम्: संचित किया हुआ या सुरक्षित रखा हुआ। यह संकेत है कि यह ज्ञान लुप्त नहीं हुआ, अपितु विष्णु (परमात्मा) ने इसे एक गुप्त और मधुर बीज रूप में सुरक्षित रखा है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि 'त्रिवृद्ब्रह्म' कोई केवल दार्शनिक संज्ञा नहीं, अपितु एक साधना-भूमि है। जब साधक ओंकार के उस स्वरूप में निष्णात हो जाता है जहाँ उसे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक (भूः, भुवः, स्वः) के भेद समाप्त हो जाते हैं और वह केवल एक अखंड नाद का अनुभव करता है, तब वह 'परब्रह्म' को प्राप्त होता है। यहाँ 'प्राप्ति' का अर्थ कहीं जाना नहीं, अपितु यह अनुभव करना है कि वह स्वयं वही परब्रह्म है।
श्लोक का दूसरा भाग एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोलता है। ऋषि कहते हैं कि यह ज्ञान 'मधुवत् संभृत' है। जिस प्रकार मधुमक्खी अनेक फूलों से रस लेकर उसे एक मधुर शहद में बदल देती है, उसी प्रकार स्वयं भगवान विष्णु (जो यहाँ सर्वव्यापी चेतना और ब्रह्माण्ड के पालक रूप में हैं) ने वेदों के अनंत विस्तार, उपनिषदों के गहन रहस्यों और गायत्री की शक्ति को संकुचित कर 'ओंकार' और 'त्रिवृद्ब्रह्म' के रूप में संचित कर दिया है।
यह ज्ञान 'मधु' के समान है क्योंकि यह केवल उन्हीं को प्राप्त होता है जो पात्रता रखते हैं और इसका अनुभव अत्यंत आनंदमय होता है। विष्णु द्वारा इसे 'स्वयं' संचित करने का भाव यह है कि यह विद्या किसी मानवीय रचना का परिणाम नहीं, अपितु ईश्वरीय कृपा और नैसर्गिक व्यवस्था है। यह वाक्य अगले श्लोक (४.८०) की उस तुलना की भूमिका बाँधता है, जहाँ गायत्री की तुलना चारों वेदों से की गई है—अर्थात् जिस प्रकार एक बूंद शहद में पूरे जंगल के फूलों का सार होता है, उसी प्रकार एक गायत्री में चारों वेदों का सार है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'एकत्रीकरण' का अभ्यास है। योग का अर्थ ही है—विस्तार से सूक्ष्म की ओर मुड़ना। साधक जब बाहरी जगत के हज़ारों विषयों (फूलों) में भटकना छोड़कर, अपने भीतर के ओंकार-नाद में स्थित होता है, तब वह उस 'मधु' का स्वाद चखता है।
यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने जप और ध्यान में यह भाव रखे कि वह केवल एक अक्षर का उच्चारण नहीं कर रहा, अपितु समस्त वेदों के रस को एक बिंदु में संकुचित कर रहा है। जब मन त्रिवृद्ब्रह्म (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के समन्वय) में निष्णात होता है, तब वह 'तुरीय' अवस्था की ओर बढ़ता है, जिसे यहाँ 'परब्रह्म' कहा गया है। यह साधना साधक को स्थूल देह से उठाकर सूक्ष्म प्राण और फिर अक्षर-रूपी परब्रह्म तक ले जाती है। इस अवस्था में साधक अनुभव करता है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड का सार उसके अपने हृदय के भीतर एक मधुर बिंदु की तरह स्थित है।
गायत्रीं चैव वेदांश्च तुलया समतोलयत् ।
एकतश्चतुरो वेदान् गायत्रीमेकतः समा(म्) ॥ ४.८० ॥
…गायत्री तथा वेदों को तराजू के समान तुलकर समतुल्य किया—एक ओर चारों वेद और एक ओर गायत्री, दोनों बराबर हुए…
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ज्ञान के सोपानों का वर्णन करते हुए वेदों से उपनिषदों, उपनिषदों से गायत्री, गायत्री से व्याहृतियों और अंततः व्याहृतियों से ओंकार तक की यात्रा बताई। इस प्रक्रिया में उन्होंने इस सूक्ष्मतम बिंदु को 'त्रिवृद्ब्रह्म' की संज्ञा दी और बताया कि स्वयं विष्णु ने इस ज्ञान को मधु की भाँति संचित किया है। वर्तमान श्लोक उसी सार-तत्व की व्यापकता और उसकी महिमा को एक अद्भुत उपमान के माध्यम से सिद्ध करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (कश्चित्) गायत्रीं चैव वेदान् च तुलया समतोलयत्। एकत: चतुरो वेदान् (अतुलयत्), एकत: गायत्रीम् (अतुलयत्), (तौ) समा (अभवताम्)।
पदार्थ-निर्वचन:
• तुलया: तुला (तराजू) के माध्यम से मापना या तुलना करना। यहाँ यह केवल भौतिक तौल नहीं, अपितु 'गुण-दोष' और 'फल-सामर्थ्य' का आध्यात्मिक विश्लेषण है।
• समतोलयत्: समान रूप से तौलना। जब दो वस्तुएँ तुला के दोनों पलड़ों में बराबर होती हैं, तो उसे 'समतोलन' कहते हैं।
• एकत: चतुरो वेदान्: एक पलड़े में चारों वेदों (ऋक्, यजुष्, साम और अथर्व) का संपूर्ण ज्ञान और उनकी शक्ति।
• एकत: गायत्रीम्: दूसरे पलड़े में केवल एक मन्त्र—सावित्री (गायत्री)।
• समा (म्): समान। यहाँ 'समा' शब्द यह दर्शाता है कि गायत्री का एक मन्त्र चारों वेदों के समस्त ज्ञान के तुल्य पाया गया।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री की उस अगाध महिमा का वर्णन कर रहे हैं, जिसे सामान्यतः केवल एक मन्त्र मान लिया जाता है। वे एक प्रतीकात्मक घटना का वर्णन करते हैं कि जब गायत्री और चारों वेदों को तुला पर रखा गया, तो दोनों पलड़े समान पाए गए।
इसका भाव यह है कि चारों वेदों में जो भी ज्ञान, विधि, मन्त्र और फल बिखरे हुए हैं, उन सबका निचोड़, सार और बीज 'गायत्री' में समाहित है। यदि वेद एक विस्तृत वन हैं, तो गायत्री उस वन का वह बीज है जिसमें संपूर्ण वन की क्षमता निहित है। यह स्मृति यहाँ 'समानता' (समा) की बात कर रही है, जिसका अर्थ है कि गायत्री का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाला साधक वास्तव में चारों वेदों के सार-तत्व को प्राप्त कर लेता है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि वेदों और गायत्री में कोई विरोध नहीं है, अपितु यह 'विस्तार' और 'संक्षेप' का सम्बन्ध है। जिस प्रकार एक छोटा सा बीज पूरे वृक्ष के समान होता है, उसी प्रकार यह त्रिपद मन्त्र संपूर्ण वैदिक वाङ्मय के तुल्य है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इसी विषय का वर्णन महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में मिलता है:
सावित्रीं चैव वेदांश्च तुलयातोलयन् पुरा । सदेवर्षिगणाश्चैव सर्वे ब्रह्मपुरःसराः । चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन् गरीयसी ॥
पूर्वकालमें ब्रह्माको आगे करके देवों और ऋषियोंने सावित्री और वेदोंको तराजूपर तौला; राजन्! वह (सावित्री) चारों वेदोंसे भी भारी निकली।
यहाँ एक सूक्ष्म भेद दृष्टिगोचर होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति कहती है कि गायत्री और वेद 'समान' (समा) हुए, जबकि महाभारत का यह अंश कहता है कि सावित्री वेदों से 'गरीयसी' (भारी) निकली।
इस भेद का रहस्य यह है कि जब हम 'ज्ञान' और 'शास्त्र' की दृष्टि से देखते हैं, तो गायत्री वेदों का सार है, अतः वह उनके 'समान' है। किन्तु जब हम 'साधना', 'तप' और 'सिद्धि' की दृष्टि से देखते हैं, तो एक मन्त्र की एकाग्रता और उसका प्रभाव संपूर्ण वेदों के पाठांतर से अधिक तीव्र और भारी होता है। स्मृति यहाँ 'तत्व-साम्य' को दिखा रही है और महाभारत 'साधना-सामर्थ्य' की श्रेष्ठता को। दोनों ही दृष्टिकोण से गायत्री की सर्वोच्चता सिद्ध होती है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विस्तार' से 'बिंदु' की ओर ले जाने का निर्देश है। एक साधक के लिए चारों वेदों का अध्ययन और उनमें निहित हज़ारों मन्त्रों का अभ्यास अत्यंत समयसाध्य और कठिन है। याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को वह 'शॉर्टकट' या सीधा मार्ग दिखा रहे हैं जहाँ एक मन्त्र की पूर्ण एकाग्रता पूरे वेद के फल के बराबर है।
साधक जब गायत्री के एक-एक अक्षर में डूबता है, तो वह वास्तव में वेदों के उस 'अक्षर-ब्रह्म' को स्पर्श करता है जिससे चारों वेद उत्पन्न हुए हैं। अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को वेदों के बाहरी विस्तार (कर्मकाण्ड और अनेकता) से हटाकर गायत्री के आंतरिक केंद्र (एकत्व) पर स्थिर करे। जब गायत्री का जप केवल शब्दों का दोहराव न रहकर एक 'अनुभव' बन जाता है, तब साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर संपूर्ण वेद जागृत हो गए हैं। यह 'समतोलन' वास्तव में मन का वह संतुलन है जहाँ ज्ञान (वेद) और साधना (गायत्री) एक बिंदु पर मिल जाते हैं।
एषा हि त्रिपदा देवी सर्वब्रह्ममयी शुभा ।
तपसा महता दृष्टा विश्वामित्रेण धीमता ॥ ४.८१ ॥
यह त्रिपद वाली देवी सब ब्रह्ममयी और शुभा है, जिसे बुद्धिमान विश्वामित्र ने महान तप से देखा था।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री की महिमा को वेदों के समकक्ष सिद्ध करते हुए बताया कि एक ओर चारों वेद और दूसरी ओर केवल गायत्री होने पर भी तुला के दोनों पलड़े समान रहे। अब इस श्लोक में वे उस देवी के स्वरूप और उनके साक्षात्कार की विधि का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एषा हि त्रिपदा देवी सर्वब्रह्ममयी शुभा (अस्ति), (एषा) तपसा महता धीमता विश्वामित्रेण दृष्टा (अस्ति)।
पदार्थ-निर्वचन:
• त्रिपदा: तीन पदों वाली। यहाँ 'पद' का अर्थ केवल शब्दों की संख्या नहीं, अपितु चेतना के तीन स्तरों (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) या तीन लोकों के अधिष्ठात्री स्वरूप से है।
• देवी: दिव्य शक्ति। मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक जीवित चैतन्य सत्ता है।
• सर्वब्रह्ममयी: संपूर्ण ब्रह्म में व्याप्त और स्वयं ब्रह्म स्वरूप। जो समस्त वेदों और उपनिषदों के सार को अपने भीतर समेटे हुए है।
• शुभा: कल्याणकारी। जो साधक के अंतःकरण को शुद्ध कर उसे मोक्ष की ओर ले जाए।
• तपसा महता: घोर तपस्या के द्वारा। यहाँ तप का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट नहीं, अपितु चित्त की वह एकाग्रता और प्रज्वलित इच्छा है जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाए।
• दृष्टा: देखा गया। यह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; मन्त्रों का 'दर्शन' होता है, उनका 'निर्माण' नहीं।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यह सावित्री मन्त्र वास्तव में एक 'देवी' है—अर्थात् एक जीवंत दिव्य शक्ति। इसे 'त्रिपदा' कहा गया है क्योंकि यह तीन पदों के माध्यम से साधक को उस एक अखंड ब्रह्म से जोड़ती है। यह 'सर्वब्रह्ममयी' है, जिसका अर्थ है कि ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी सत्य, चित्त और आनंद है, वह सब इस मन्त्र के भीतर बीज रूप में विद्यमान है।
यहाँ याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गूढ़ रहस्य की ओर संकेत कर रहे हैं कि विश्वामित्र ने इस मन्त्र को 'दृष्टा' अर्थात् 'देखा' था। सामान्यतः लोग समझते हैं कि ऋषियों ने मन्त्रों की रचना की, किन्तु वैदिक परम्परा में मन्त्र 'अपौरुषेय' हैं। ऋषि मन्त्रों के रचयिता नहीं, अपितु 'द्रष्टा' हैं। जिस प्रकार सूर्य पहले से विद्यमान है और हम उसे केवल देखते हैं, उसी प्रकार सत्य-मन्त्र पहले से चैतन्य रूप में विद्यमान थे; विश्वामित्र ने अपनी 'धी' (बुद्धि) और 'महता तपसा' (भीषण तप) के माध्यम से अपनी चेतना को इतना सूक्ष्म कर लिया कि वे इस दिव्य ध्वनि के दर्शन कर सके।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि गायत्री का ज्ञान केवल शब्दों को रटने से नहीं, अपितु उस पात्रता को विकसित करने से आता है जिससे मन्त्र का 'दर्शन' हो सके। जब साधक अपनी बुद्धि को शुद्ध करता है, तब वह मन्त्र को केवल कान से सुनता नहीं, अपितु हृदय की आँखों से 'देखता' है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-साक्षात्कार' की प्रक्रिया को समझाता है। साधक के लिए यहाँ दो मुख्य बिंदु हैं: 'तप' और 'दर्शन'।
साधक जब इस श्लोक का अभ्यास करता है, तो वह यह अनुभव करता है कि मन्त्र केवल एक बाहरी ध्वनि नहीं, बल्कि एक आंतरिक शक्ति (देवी) है। 'तपसा महता' का योगिक अर्थ है—प्राणों का निग्रह और मन की स्थिरता। जब साधक अपनी इंद्रियों को समेटकर अंतर्मुखी होता है, तब उसके भीतर एक 'तप' या ऊष्मा उत्पन्न होती है। यही तप उसकी बुद्धि (धी) को इतना प्रदीप्त कर देता है कि वह मन्त्र के शाब्दिक अर्थ से ऊपर उठकर उसके 'प्रकाश' को देखने लगता है।
यह अवस्था उस भूमि की है जहाँ साधक 'श्रवण' (सुनने) से 'दर्शन' (देखने) की ओर बढ़ता है। मन्त्र का दर्शन होने का अर्थ है—मन्त्र की शक्ति का साधक के अस्तित्व में विलीन हो जाना। जब साधक गायत्री को 'सर्वब्रह्ममयी' अनुभव करता है, तो वह अपनी सीमित पहचान को छोड़कर उस विराट ब्रह्ममयता में स्थित होने लगता है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को केवल जप की विधि से हटाकर 'मन्त्र-योग' की उस ऊँचाई पर ले जाता है जहाँ मन्त्र और मंत्र-साधक एक हो जाते हैं।
गायत्रीजपफलम्
संवत्सरं वा षण्मासान् यो जपेद्विधिवद्द्विजः ।
सोऽचिरात्सर्वकामांश्च प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥ ४.८२ ॥
जो द्विज विधिपूर्वक एक वर्ष या छः मास तक जप करता है, वह बिना विलंब के सब कामनाओं को प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
अवतरणिका —
पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के उस दिव्य स्वरूप का वर्णन किया जिसे बुद्धिमान विश्वामित्र ने महान तप से देखा था। अब इस श्लोक में वे इस मन्त्र के अनुष्ठान की एक निश्चित समय-सीमा और उससे प्राप्त होने वाले फल का विधान कर रहे हैं, जो इस अध्याय का उपसंहार है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यो द्विजः विधिवद् संवत्सरं वा षण्मासान् जपेत्, सः अचिरात् सर्वकामांश्च प्राप्नुयात्, नात्र संशयः।
पदार्थ-निर्वचन:
• संवत्सरं वा षण्मासान्: एक वर्ष या छः मास। यहाँ संख्या का विशेष महत्व है; यह अनुष्ठान की न्यूनतम और पूर्णता की अवधि को दर्शाता है।
• विधिवद्: विधि के अनुसार। इसका अर्थ है—नियत समय (संध्याकाल), शुद्धता, सही उच्चारण, प्राणायाम और ध्यान के साथ किया गया जप।
• द्विजः: यहाँ द्विज का अर्थ केवल जन्म से नहीं, अपितु उस साधक से है जिसने उपनयन संस्कार के माध्यम से ज्ञान के मार्ग में प्रवेश किया है और जिसका अंतःकरण मन्त्र ग्रहण करने योग्य है।
• अचिरात्: बिना विलंब के, शीघ्र ही।
• सर्वकामांश्च: समस्त कामनाओं को। इसमें लौकिक सुख और पारलौकिक शांति दोनों सम्मिलित हैं।
• नात्र संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं है। यह ऋषि का पूर्ण विश्वास है, जो उनके स्वयं के अनुभव और मन्त्र की शक्ति पर आधारित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य गायत्री जप के फल का विधान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई द्विज विधिपूर्वक एक वर्ष या छः मास तक इस मन्त्र का जप करता है, तो वह शीघ्र ही अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।
यहाँ 'विधिवद्' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मन्त्र केवल शब्दों का दोहराव नहीं है; जब इसे शुक्लयजुर्वेद की मर्यादा, संध्या-वंदन के अनुशासन और आंतरिक शुद्धि के साथ जोड़ा जाता है, तभी वह 'विधि' बनती है। एक वर्ष और छः मास की यह समय-सीमा साधक के चित्त को एक निश्चित लय में लाने के लिए है। जैसे किसी बीज को वृक्ष बनने में एक निश्चित समय लगता है, वैसे ही मन्त्र के बीजरूप प्रभाव को जाग्रत करने के लिए यह अवधि निर्धारित की गई है।
'सर्वकामांश्च प्राप्नुयात्' के माध्यम से ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि गायत्री केवल वैराग्य का मन्त्र नहीं है, अपितु यह जीवन के हर स्तर पर पूर्णता देने वाला है। साधक की जो भी सात्विक कामनाएँ हैं—चाहे वह आरोग्य हो, विद्या हो, समृद्धि हो या शांति—वे इस अनुष्ठान से सिद्ध होती हैं। इसमें संशय न होने का कारण यह है कि गायत्री 'सर्वब्रह्ममयी' है, और जब साधक उस ब्रह्म-शक्ति से जुड़ जाता है, तो समस्त सृष्टि की शक्तियाँ उसके अनुकूल हो जाती हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
गायत्री की महिमा और उसके पाठ के फल के विषय में अन्य शास्त्रों में भी इसी प्रकार के प्रमाण मिलते हैं।
य इदं गायत्रीरहस्यमधीते दिवसकृतं पापं नाशयति । प्रातर्मध्याह्नयोः षण्मासकृतानि पापानि नाशयति । सायं प्रातरधीयानो जन्मकृतं पापं नाशयति । … सर्वान्वेदानधीतो भवति । सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति ॥ ८ ॥
जो इस गायत्री-रहस्यका अध्ययन करता है, वह दिनमें किये पापका नाश करता है; प्रातः और मध्याह्नमें (पढ़नेवाला) छः महीनोंके पापोंका; सायं और प्रातः पढ़नेवाला जन्मभरके पापका नाश करता है। … वह मानो सब वेद पढ़ चुका, सब तीर्थोंमें स्नान कर चुका होता है।
इस उपनिषद में बताया गया है कि गायत्री-रहस्य का अध्ययन करने वाला साधक दिन के पापों का नाश करता है, प्रातः और मध्याह्न के पाठ से छः महीनों के पाप नष्ट होते हैं और सायं एवं प्रातः के निरंतर पाठ से जन्म-जन्म के पाप मिट जाते हैं। वह मानो समस्त वेदों का ज्ञाता और सभी तीर्थों में स्नान करने वाला हो जाता है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गायत्री-रहस्योपनिषद् में अद्भुत मेल है। जहाँ स्मृति 'छः मास' के जप से 'सर्वकामनाओं की प्राप्ति' की बात करती है, वहीं उपनिषद् 'छः मास' के पाठ से 'पापों के नाश' का वर्णन करता है। वास्तव में, पापों का नाश होना ही समस्त कामनाओं की पूर्ति का प्रथम सोपान है, क्योंकि जब अंतःकरण के अवरोध (पाप/मल) हट जाते हैं, तब साधक को वह सब प्राप्त होता है जिसकी वह अभिलाषा करता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संकल्प' और 'निरंतरता' के अभ्यास का निर्देश देता है। साधक के लिए यह केवल मन्त्र-जप नहीं, अपितु एक निश्चित समय-सीमा का 'व्रत' है।
१. नियत अवधि का अभ्यास: योग में किसी भी संस्कार को स्थायी बनाने के लिए निरंतरता आवश्यक है। एक वर्ष या छः मास का संकल्प साधक के मन को भटकने से रोकता है और उसे एक लक्ष्य पर केंद्रित करता है। यह अभ्यास साधक को 'अस्थिर' भूमि से उठाकर 'स्थित' भूमि की ओर ले जाता है।
२. कामनाओं का रूपांतरण: बाहरी दृष्टि से यह 'सर्वकामनाओं की प्राप्ति' है, किंतु आंतरिक रहस्य यह है कि जब साधक विधिपूर्वक जप करता है, तो उसकी कामनाओं का स्वरूप बदलने लगता है। प्रारंभ में वह लौकिक वस्तुओं की कामना करता है, किंतु जैसे-जैसे जप गहरा होता है, उसकी कामनाएँ सूक्ष्म होती जाती हैं और अंततः वह केवल उस 'परब्रह्म' की कामना करने लगता है। इस प्रकार, कामनाओं की पूर्ति वास्तव में कामनाओं के शमन और उनके परमात्मा में विलीन होने की प्रक्रिया है।
३. विधि का आंतरिक अर्थ: यहाँ 'विधि' का अर्थ है—प्राण और मन्त्र का समन्वय। जब साधक अपनी श्वास की गति को मन्त्र के पदों के साथ जोड़ता है, तो वह स्थूल शरीर से ऊपर उठकर सूक्ष्म शरीर के प्रकाश में प्रवेश करता है। यही वह अवस्था है जहाँ 'अचिरात्' (शीघ्र) फल की प्राप्ति होती है, क्योंकि वह अब प्रकृति के अधीन नहीं, अपितु मन्त्र-शक्ति के अधीन कार्य कर रहा होता है।