श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, पञ्चमोऽध्यायः

12 मूल पद्य

यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके पञ्चमोऽध्यायः — ओंकारगायत्रीन्यासः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।

पञ्चमोऽध्यायः — ओंकारगायत्रीन्यासः

अध्याय-सार — ओंकार-गायत्री-न्यास — बारह श्लोकोंका छोटा अध्याय, जिसमें पिछले तीन अध्यायोंके मन्त्र शरीरमें स्थापित किये जाते हैं; न्यास करनेमात्रसे ब्राह्मण ब्रह्मरूप हो जाता है (५.१)। प्रणवके अकारका नाभिमें (सत्त्व), उकारका हृदयमें (रज), मकारका मूर्धामें (तम) न्यास करके ब्रह्मरूप आत्माका ध्यान करे (५.२–३)। सात व्याहृतियाँ पैरोंसे भौंहोंके बीचतक रखी जाती हैं — भूः पैरोंमें, सत्यम् भ्रूमध्यमें; उसके ऊपर हिरण्मय परम कोशमें निष्कल ब्रह्म, ‘ज्योतियोंकी ज्योति’, ध्येय है (५.५–७)। फिर गायत्रीके चौबीस अक्षर पैरके अँगूठेसे सिरतक चौबीस स्थानोंमें, और दूसरे प्रकारसे भी, रखे जाते हैं। जो द्विज यह चतुर्विध न्यास एक बार भी करता है, वह सब पापोंसे छूटकर ब्रह्मसायुज्य पाता है।

न्यासनिरूपणप्रतिज्ञा

श्लोक ५.१

न्यासं तु संप्रवक्ष्यामि ओंकारादि यथायथम् ।

येन विन्यस्तमात्रेण ब्रह्मीभवति ब्राह्मणः ॥ ५.१ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४५

मैं ओंकार आदि का यथाविधि न्यास कहूँगा, जिससे केवल विन्यस्त करने मात्र से ही ब्राह्मण ब्रह्मरूप हो जाता है।

अवतरणिका —

पिछले खण्डों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार और व्याहृतियों के स्वरूप तथा गायत्री के रहस्य को स्पष्ट किया है। अब वे इन मन्त्रों के केवल श्रवण या जप तक सीमित न रहकर, उन्हें शरीर में प्रतिष्ठित करने की विधि, अर्थात् 'न्यास' का विवेचन आरम्भ कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (अहं) ओंकारादि (मन्त्राणां) न्यासं तु यथायथम् संप्रवक्ष्यामि, येन (मन्त्रेण) मात्रेण विन्यस्तम् ब्राह्मणः ब्रह्मी भवति।

पदार्थ और निर्वचन:

• न्यासः — 'न्यस्त' धातु से। मन्त्र के अक्षर या उसके अर्थ को शरीर के किसी निश्चित अंग में मानसिक या शारीरिक स्पर्श के साथ स्थापित करना। यह केवल स्पर्श नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति को देह के उस हिस्से में 'संक्रमित' करने की प्रक्रिया है।

• ओंकारादि — ओंकार (अ-उ-म), व्याहृतियाँ और गायत्री मन्त्र। यहाँ 'आदि' शब्द यह संकेत देता है कि न्यास की श्रृंखला ओंकार से आरम्भ होकर अन्य मन्त्रों तक जाएगी।

• यथायथम् — यथाविधि या उचित क्रम में। योग में क्रम का विशेष महत्त्व है, क्योंकि ऊर्जा का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर या एक निश्चित विन्यास में होता है।

• विन्यस्तमात्रेण — केवल विन्यस्त करने से ही। यहाँ 'मात्रेण' शब्द की विलक्षणता है; यह संकेत करता है कि यदि न्यास पूर्ण चेतना और श्रद्धा से किया जाए, तो वह क्रिया स्वयं में फलदायी है।

• ब्रह्मी — ब्रह्मरूप। यहाँ 'ब्रह्मी' का अर्थ केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि शरीर, प्राण और मन का ब्रह्ममय हो जाना है।

• ब्राह्मणः — वह जो ब्रह्म को जानता है या ब्रह्म की खोज में लगा है।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में न्यास की महिमा की प्रतिज्ञा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मैं अब ओंकार आदि मन्त्रों के न्यास का वर्णन करूँगा। बाहरी दृष्टि से न्यास एक विधि है जिसमें मन्त्रों को शरीर के अंगों पर रखा जाता है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है।

जब साधक किसी मन्त्र के अक्षर को शरीर के अंग में स्थापित करता है, तो वह वास्तव में अपने स्थूल शरीर को 'मन्त्र-मय' बना रहा होता है। सामान्यतः मनुष्य का शरीर कामनाओं, विकारों और प्रमाद से भरा होता है। न्यास की प्रक्रिया के द्वारा साधक अपने शरीर के प्रत्येक अंग को पवित्र अक्षर की शक्ति से ओढ़ लेता है। जब मन्त्र शरीर के अंगों में विन्यस्त हो जाता है, तब शरीर केवल हाड़-मांस का पुंज नहीं रहता, बल्कि वह साक्षात् मन्त्र का विग्रह बन जाता है।

"विन्यस्तमात्रेण ब्रह्मीभवति ब्राह्मणः" — इस कथन का रहस्य यह है कि जब मन्त्र शरीर में प्रतिष्ठित होता है, तो मन स्वतः ही उस मन्त्र के अर्थ में लीन हो जाता है। अब साधक को मन्त्र खोजने के लिए बाहर या केवल मस्तिष्क में नहीं जाना पड़ता, बल्कि उसका पूरा अस्तित्व ही मन्त्र बन जाता है। जब देह मन्त्रमय होती है, तो वह 'ब्रह्मी' हो जाती है, अर्थात् वह उस अवस्था को प्राप्त कर लेती है जहाँ देह और ब्रह्म के बीच का भेद मिटने लगता है। यह स्मृति यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि कर्म (न्यास) और ज्ञान (ब्रह्मभाव) अलग-अलग नहीं हैं; सही विधि से किया गया कर्म ही ज्ञान का द्वार खोलता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से न्यास एक अत्यंत प्रभावशाली अभ्यास है। योग में सबसे बड़ी चुनौती है—मन का भटकना। जब साधक केवल जप करता है, तो मन अक्सर विषय-विकारों में चला जाता है। किन्तु न्यास के अभ्यास में मन्त्र को शरीर के अंग से जोड़ा जाता है, जिससे ध्यान को एक 'आधार' मिल जाता है।

इस श्लोक से साधक यह अनुभव करता है कि उसका शरीर ही मंदिर है और मन्त्र उसके देवता। जब वह ओंकार या गायत्री के अक्षरों को अपने अंगों में स्थापित करता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल शरीर से हटाकर सूक्ष्म अक्षरों पर केंद्रित करता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाता है।

यहाँ 'ब्रह्मी' होने का अर्थ है—चित्त की वह अवस्था जहाँ साधक स्वयं को शरीर न मानकर, उस अक्षर-शक्ति का विस्तार मानने लगता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ शरीर की सीमाएँ समाप्त होने लगती हैं और वह स्वयं को विराट ब्रह्म के साथ एकाकार अनुभव करने लगता है। यह केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि शरीर का 'दिव्यकरण' है।

प्रणवाक्षरन्यासः

श्लोक ५.२

अकारं विन्यसेन्नाभ्यां सत्त्वरूपं निरञ्जनम् ।

उकारं हृदये तद्वद्राजसं तद्गुणं स्मृतम् ॥ ५.२ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४५

नाभिमें सत्त्वरूप, निरञ्जन अकारका न्यास करे; वैसे ही हृदयमें उकारका — जो राजस, उस (रजो)गुणवाला कहा गया है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने न्यास की महिमा बताते हुए यह प्रतिज्ञा की कि इस विधि से ब्राह्मण ब्रह्मरूप हो जाता है। अब वे इस प्रक्रिया के प्रथम चरण, अर्थात् प्रणव (ओंकार) के अक्षरों को शरीर के विशिष्ट केंद्रों में प्रतिष्ठित करने की विधि का विवरण दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) अकारं सत्त्वरूपं निरञ्जनं नाभ्यां विन्यसेत्, (तथैव) उकारं हृदये (विन्यसेत्), तद् (उकारः) राजसं तद्गुणं स्मृतम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अकारं — ओंकार की प्रथम मात्रा 'अ'। यह सृष्टि का आरम्भ और जाग्रत अवस्था का प्रतीक है।

• विन्यसेत् — न्यास करे। यहाँ 'विधिलिङ्' का प्रयोग है, जो यह दर्शाता है कि यह एक अनिवार्य साधना-विधि है।

• नाभ्यां — नाभि-प्रदेश में। शरीर का वह केंद्र जहाँ से प्राणों का उद्वर्तन आरम्भ होता है।

• सत्त्वरूपं — सत्त्वगुण से युक्त। सत्त्व का अर्थ है प्रकाश, पवित्रता और साम्यावस्था।

• निरञ्जनम् — रंजित न होना। 'अञ्जन' का अर्थ है कालिख या मल। निरञ्जन वह है जो किसी भी गुण या दोष से लिप्त नहीं है, पूर्णतः शुद्ध है।

• उकारं — ओंकार की द्वितीय मात्रा 'उ'। यह स्वप्न अवस्था और विस्तार का प्रतीक है।

• हृदये — हृदय-कमल या हृदय-आकाश में।

• राजसं — रजोगुण से युक्त। रजस क्रियाशीलता, गति और इच्छा का प्रतीक है।

• तद्गुणं स्मृतम् — उस गुण (रजोगुण) वाला कहा गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्रणव के प्रथम दो अक्षरों के विन्यास और उनके गुण-स्वरूप का रहस्य खोल रहे हैं।

वे निर्देश देते हैं कि साधक सर्वप्रथम 'अकार' का न्यास अपनी नाभि में करे। यहाँ 'अकार' को 'सत्त्वरूप' और 'निरञ्जन' कहा गया है। भाव यह है कि नाभि वह स्थान है जहाँ से जीवन की शक्ति प्रस्फुटित होती है; अतः वहाँ उस शुद्ध, निर्मल और प्रकाशमय तत्त्व को प्रतिष्ठित करना है जो किसी भी प्रकार के मानसिक या शारीरिक मल (अञ्जन) से मुक्त है। जब साधक अकार को नाभि में स्थापित करता है, तो वह अपने अस्तित्व के मूल में उस पवित्रता को जगाता है जो उसे स्थूलता से ऊपर उठाती है।

तत्पश्चात, 'उकार' का न्यास हृदय में करने का विधान है। उकार को 'राजस' कहा गया है। हृदय भावनाओं, इच्छाओं और स्पंदनों का केंद्र है। रजोगुण का अर्थ यहाँ केवल सांसारिक आसक्ति नहीं, अपितु वह 'दिव्य ऊर्जा' और 'गति' है जो साधक को नाभि (मूल) से ऊपर उठाकर चेतना के विस्तार की ओर ले जाती है। हृदय में उकार का न्यास करने का अर्थ है—अपनी प्राण-शक्ति को सक्रिय करना ताकि वह ऊपर की ओर प्रवाहित हो सके।

यह विन्यास केवल शब्दों का खेल नहीं, अपितु शरीर के भीतर एक आध्यात्मिक मानचित्र तैयार करना है। नाभि में स्थिरता और पवित्रता (सत्त्व) और हृदय में गति और ऊर्जा (रजस) का संतुलन ही साधक को तृतीय अक्षर 'मकार' की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

माण्डूक्य उपनिषद्

जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राप्तेरादिमत्त्वाद्वाप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥

जाग्रत्-स्थानवाला वैश्वानर अकार है — पहली मात्रा, व्याप्ति या आदि होनेके कारण; जो ऐसा जानता है, वह सब कामनाएँ पाता है और आदि (प्रथम) होता है।

माण्डूक्य उपनिषद् ९उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 115

यहाँ माण्डूक्य उपनिषद् अकार को 'वैश्वानर' और 'जाग्रत्-स्थान' बताता है, जो अपनी व्याप्ति के कारण सर्व-कामनाओं को प्राप्त करने वाला है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस श्रुति-तथ्य को साधना में उतारते हुए अकार को नाभि में प्रतिष्ठित करती है। जहाँ उपनिषद् अकार के 'व्यापक' होने की बात करता है, वहीं यह स्मृति उस व्यापकता को 'निरञ्जन सत्त्व' के रूप में शरीर के केंद्र (नाभि) में केंद्रित करने की विधि बताती है। इस प्रकार, श्रुति का सैद्धान्तिक ज्ञान यहाँ व्यावहारिक योग-विधि में परिवर्तित हो गया है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ऊर्ध्वगमन' का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य की चेतना नीचे की ओर गिरती है, किंतु न्यास के माध्यम से उसे नीचे से ऊपर की ओर उठाया जाता है।

अभ्यास यह है कि जब साधक ओंकार का उच्चारण करे, तो 'अ' के समय उसका पूरा ध्यान नाभि-केंद्र पर हो। वह अनुभव करे कि नाभि में एक शुद्ध, श्वेत और निरञ्जन प्रकाश पुंज स्थित है। यह अभ्यास साधक को 'स्थिरता' की भूमि पर लाता है। इसके बाद, जब उच्चारण 'उ' पर पहुँचे, तो ध्यान को नाभि से ऊपर उठाकर हृदय-प्रदेश में ले जाए। यहाँ वह अनुभव करे कि एक गतिशील, तेजस्वी ऊर्जा प्रवाहित हो रही है।

यह क्रम साधक को भौतिक शरीर (नाभि) से सूक्ष्म शरीर (हृदय) की ओर ले जाता है। नाभि में सत्त्व का अनुभव उसे शुद्ध करता है और हृदय में रजस का अनुभव उसे ऊपर की ओर धकेलने वाली शक्ति प्रदान करता है। इस प्रकार साधक अपनी चेतना को शरीर के निचले केंद्रों से ऊपर उठाकर उस अवस्था की ओर बढ़ता है जहाँ वह अंततः 'मकार' के माध्यम से पूर्णता को प्राप्त करेगा।

श्लोक ५.३

मकारं मूर्ध्नि विन्यस्य तमोमात्रं तृतीयकम् ।

ब्रह्मरूपं तदात्मानं ध्यायेद्विगतकल्मषम् ॥ ५.३ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४५

मस्तक पर तृतीय (तीसरा) अक्षर जो तमोमात्र है, मकार का न्यास करके, उस पाप-रहित ब्रह्मरूप आत्मा का ध्यान करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव की प्रथम दो मात्राओं—'अ' और 'उ' का क्रमशः नाभि और हृदय में विन्यास बताया। अब इस श्लोक में वे प्रणव की तृतीय मात्रा के विन्यास और उसके पश्चात होने वाले ध्यान की विधि का प्रतिपादन कर रहे हैं, जिससे साधक स्थूल शरीर से ऊपर उठकर ब्रह्मरूप आत्मा में स्थित हो सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) मकारं तमोमात्रं तृतीयकम् मूर्ध्नि विन्यस्य, तदा (ततः) विगतकल्मषम् ब्रह्मरूपं आत्मानं ध्यायेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• मकारं — ओंकार की तृतीय मात्रा 'म'। यह लय, समापन और सुषुप्ति अवस्था का प्रतीक है।

• मूर्ध्नि — मस्तक या सिर के ऊपरी भाग में। यह शरीर का उच्चतम बिंदु है, जहाँ चेतना का विसर्जन होता है।

• तमोमात्रं — केवल तमोगुण से युक्त। यहाँ 'तम' का अर्थ अंधकार नहीं, अपितु 'लय' और 'प्रच्छन्नता' है, जहाँ समस्त प्रपंच विलीन हो जाते हैं।

• तृतीयकम् — तीसरी मात्रा।

• विन्यस्य — न्यास करके (करके)। यह पूर्वकालिक क्रिया है; पहले न्यास होगा, फिर ध्यान।

• तदा — तब या उसके पश्चात।

• विगतकल्मषम् — कल्मष (पाप, मल, अशुद्धि) से रहित। वह अवस्था जहाँ कोई भी मानसिक या शारीरिक विकार शेष न रहे।

• ब्रह्मरूपं — जिसका स्वरूप ही ब्रह्म हो।

• आत्मानं — अपनी उस वास्तविक सत्ता को, जो देह-मन से भिन्न है।

• ध्यायेत् — ध्यान करे। यहाँ पुनः 'विधिलिङ्' का प्रयोग है, जो न्यास के बाद ध्यान की अनिवार्यता को दर्शाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्रणव-न्यास की प्रक्रिया को पूर्ण करते हुए उसके परम लक्ष्य की ओर संकेत कर रहे हैं।

वे निर्देश देते हैं कि साधक 'मकार' का न्यास अपने मस्तक (मूर्धा) में करे। मकार को 'तमोमात्र' कहा गया है। सामान्य दृष्टि में तमोगुण को जड़ता या अंधकार माना जाता है, किंतु योगिक रहस्य में 'तम' वह अवस्था है जहाँ समस्त बाहरी जगत और आंतरिक विचार विलीन हो जाते हैं। जिस प्रकार रात्रि में सब कुछ शांत होकर एक बिंदु में सिमट जाता है, वैसे ही मकार का न्यास साधक की चेतना को बाहरी विस्तार से समेटकर उच्चतम बिंदु पर स्थिर कर देता है।

जब साधक नाभि में 'अ' (सत्त्व), हृदय में 'उ' (रजस) और मूर्धा में 'म' (तमस) का विन्यास कर लेता है, तब उसका संपूर्ण शरीर इन तीन गुणों के संतुलन और सामंजस्य से युक्त हो जाता है। यह केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि शरीर के भीतर संपूर्ण सृष्टि के चक्र (उत्पत्ति-स्थिति-लय) को प्रतिष्ठित करना है।

न्यास की इस प्रक्रिया के पूर्ण होते ही, याज्ञवल्क्य कहते हैं कि साधक 'विगतकल्मषम् ब्रह्मरूपं आत्मानं ध्यायेत्'—अर्थात् अब वह उस आत्मा का ध्यान करे जो समस्त पापों और अशुद्धियों से मुक्त है और जिसका स्वरूप साक्षात् ब्रह्म है। यहाँ 'विगतकल्मष' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यास का उद्देश्य ही यह है कि शरीर के विभिन्न केंद्रों में अक्षरों को स्थापित कर साधक के भीतर के मल (कल्मष) को धो दिया जाए, ताकि वह शुद्ध दर्पण की भाँति अपने ब्रह्मस्वरूप को देख सके।

अतः यह श्लोक स्पष्ट करता है कि न्यास 'साधन' है और ब्रह्म-ध्यान 'साध्य' है। अक्षरों का विन्यास केवल इसलिए किया जाता है ताकि चित्त एकाग्र हो और वह उस निराकार, निर्गुण ब्रह्म में लीन हो सके जो शरीर के भीतर ही प्रतिष्ठित है।

शास्त्र-साक्ष्य —

प्रश्न उपनिषद्

यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः ॥ ५.५ ॥

पर जो इसी तीन मात्राओंवाले 'ॐ' अक्षरसे परम पुरुषका ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यमें सम्पन्न (एक) होता है।

प्रश्न उपनिषद् ५.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 93

प्रश्न उपनिषद् में कहा गया है कि जो व्यक्ति इन तीन मात्राओं वाले 'ॐ' अक्षर से परम पुरुष का ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्य में सम्पन्न हो जाता है।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी उपनिषदीय सत्य को व्यावहारिक विधि में बदल रही है। जहाँ प्रश्न उपनिषद् 'त्रिमात्र' ओंकार से ध्यान की बात करता है, वहीं यह स्मृति बताती है कि उस ध्यान की पूर्व-तैयारी 'न्यास' है। जब तक शरीर के केंद्रों में अ-उ-म का विन्यास नहीं होता, तब तक साधक का चित्त उस 'परम पुरुष' या 'ब्रह्मरूप आत्मा' को पकड़ने में सक्षम नहीं होता। स्मृति यहाँ क्रिया (न्यास) और ज्ञान (ध्यान) का सुंदर समन्वय कर रही है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' और 'सूक्ष्म' से 'अक्षर' की ओर ले जाने वाली यात्रा है।

अभ्यास की विधि यह है कि साधक जब मस्तक में 'मकार' का न्यास करता है, तो वह अपनी समस्त इंद्रियों और विचारों को ऊपर की ओर खींचता है। नाभि (अ) से आरम्भ हुई यात्रा हृदय (उ) से होते हुए मूर्धा (म) तक पहुँचती है। यह उर्ध्वगमन की प्रक्रिया है।

जब तीनों मात्राएँ—अ, उ, म—अपने निर्धारित स्थानों पर प्रतिष्ठित हो जाती हैं, तब साधक अनुभव करता है कि उसका शरीर अब केवल मांस और अस्थियों का पुंज नहीं, बल्कि साक्षात् 'प्रणव-मय' हो गया है। इस अवस्था में 'तमोमात्र' मकार का अर्थ है—संसार के प्रति पूर्ण विस्मृति। जब संसार विस्मृत हो जाता है, तभी 'विगतकल्मष' (पापरहित) अवस्था प्रकट होती है।

साधक यहाँ 'साधन-भूमि' से 'साध्य-भूमि' में प्रवेश करता है। न्यास के माध्यम से उसने शरीर को मंदिर बना लिया, और अब वह उस मंदिर के भीतर विराजमान 'ब्रह्मरूप आत्मा' का ध्यान करता है। यह अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि आत्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि इसी शरीर के उच्चतम शिखर और गहनतम गहराई में व्याप्त है। यहाँ ध्यान का अर्थ केवल कल्पना करना नहीं, बल्कि उस ब्रह्मरूपता में स्वयं को विलीन कर देना है।

व्याहृतिन्यासः

श्लोक ५.४

कुर्याद्व्याहृतिभिर्न्यासं वक्ष्यमाणक्रमेण तु ।

पूर्वमेव तु याः प्रोक्ता भूराद्यास्ते समासतः ॥ ५.४ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४५

आगे कहे जाने वाले क्रम से व्याहृतियों से न्यास करे — जो भूः आदि पहले ही कही जा चुकी हैं, वे संक्षेप में (ये हैं)...

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव के तीन अक्षरों—अ, उ, म—का नाभि, हृदय और मूर्धा में विन्यास बताकर साधक को ब्रह्मरूप आत्मा के ध्यान में प्रतिष्ठित किया। अब इस श्लोक से वे न्यास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए व्याहृतियों के विन्यास का विधान आरम्भ कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) वक्ष्यमाणक्रमेण तु व्याहृतिभिः न्यासं कुर्यात्। पूर्वमेव तु याः प्रोक्ताः भूराद्यास्ते समासतः (वदामि)।

पदार्थ और निर्वचन:

• कुर्यात् — करे। यह विधिलिङ् है, जो साधक के लिए एक अनिवार्य साधना-विधि का निर्देश करता है।

• व्याहृतिभिः — व्याहृतियों के द्वारा। व्याहृति का शाब्दिक अर्थ है 'प्रकट करना' या 'उच्चारण करना'। योगिक दृष्टि से ये वे ध्वनियाँ हैं जो चेतना को स्थूल से सूक्ष्म लोकों में ले जाती हैं।

• न्यासम् — न्यास। किसी मन्त्र या अक्षर को शरीर के अंगों में स्थापित करना ताकि शरीर ही मन्त्रमय हो जाए।

• वक्ष्यमाणक्रमेण — आगे कहे जाने वाले क्रम से। 'वक्ष्यमाण' का अर्थ है जो आगे बोला जाएगा।

• पूर्वमेव तु याः प्रोक्ताः — जो पहले ही कहे जा चुके हैं। यहाँ संकेत इस ग्रन्थ के तीसरे अध्याय की ओर है, जहाँ व्याहृतियों की निरुक्ति और उनके अर्थ विस्तार से दिए गए थे।

• भूराद्याः — 'भूः' आदि। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्।

• समासतः — संक्षेप में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक को शरीर के स्थूल अंगों को ब्रह्माण्ड के लोकों से जोड़ने की विधि बता रहे हैं।

ऋषि निर्देश देते हैं कि साधक अब व्याहृतियों का न्यास करे। यह न्यास एक निश्चित क्रम में होना चाहिए, जिसे वे अगले श्लोकों में स्पष्ट करेंगे। यहाँ 'वक्ष्यमाणक्रमेण' शब्द यह संकेत देता है कि न्यास की दिशा और स्थान यादृच्छिक नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सोपान है, जो शरीर के निचले भाग से आरम्भ होकर ऊपर की ओर बढ़ता है।

महर्षि यहाँ एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ देते हैं कि जिन व्याहृतियों (भूः आदि) का उल्लेख तीसरे अध्याय में विस्तार से किया गया था, उन्हें यहाँ पुनः विस्तार से समझाने के स्थान पर 'समासतः' अर्थात् संक्षेप में लिया जा रहा है। इसका भाव यह है कि साधक पहले से ही यह जानता हो कि 'भूः' पृथ्वी का, 'भुवः' अन्तरिक्ष का और 'स्वः' स्वर्ग का प्रतीक है। अब उन प्रतीकों को केवल बौद्धिक ज्ञान तक सीमित न रखकर, उन्हें शरीर के अंगों में 'विन्यस्त' करना है।

बाहरी दृष्टि से यह केवल अंगों को स्पर्श कर मन्त्र बोलने की विधि है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह शरीर के भौतिक तत्त्वों का लोकोत्तर तत्त्वों में रूपांतरण है। जब साधक 'भूः' का न्यास करता है, तो वह अपने शरीर के उस भाग को पृथ्वी तत्त्व की शुद्धता और स्थिरता से जोड़ता है। इस प्रकार, यह विधि साधक को यह अनुभव कराती है कि उसका शरीर केवल मांस और अस्थि का पुंज नहीं, अपितु समस्त ब्रह्माण्ड (सप्तलोक) का लघु रूप है।

शास्त्र-साक्ष्य —

तैत्तिरीय उपनिषद्

भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ लोकः । मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते ॥ १.५.२ ॥

'भूः' यह लोक है, 'भुवः' अन्तरिक्ष, 'सुवः' वह (द्यु-) लोक, 'महः' आदित्य; आदित्यसे ही सब लोक महिमा पाते (बढ़ते) हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद् १.५.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 149

तैत्तिरीय उपनिषद् में व्याहृतियों का सीधा सम्बन्ध लोकों से जोड़ा गया है—'भूः' यह लोक (पृथ्वी) है, 'भुवः' अन्तरिक्ष और 'सुवः' वह द्यु-लोक है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी उपनिषदीय सत्य को 'न्यास' के माध्यम से क्रियात्मक बनाती है। जहाँ उपनिषद् यह बताता है कि व्याहृति क्या है, वहीं यह स्मृति बताती है कि उस व्याहृति को शरीर में कहाँ स्थापित करना है। इस प्रकार, ज्ञान (उपनिषद्) और साधन (स्मृति) का यहाँ पूर्ण समन्वय है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का रहस्य 'सूक्ष्मीकरण' में है। योगिक अभ्यास में जब हम किसी अक्षर को शरीर के किसी अंग में स्थापित करते हैं, तो उस अंग की चेतना उस अक्षर के गुण में विलीन होने लगती है।

यहाँ 'समासतः' शब्द का एक गहरा अर्थ यह भी है कि साधक अब विस्तार (विग्रह) से हटकर संक्षेप (एकत्व) की ओर बढ़ रहा है। पूर्व में उसने व्याहृतियों के अर्थों को समझा (विस्तार), अब वह उन्हें अपने अस्तित्व में समेट रहा है (समास)। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शरीर' से 'सूक्ष्म शरीर' की ओर ले जाने की पहली सीढ़ी है। जब साधक आगे बताए गए क्रम से न्यास करेगा, तो वह अनुभव करेगा कि उसकी चेतना पैरों से उठकर क्रमशः ऊपर की ओर बढ़ रही है, जो अंततः उसे उस 'हिरण्मय कोश' तक ले जाएगी जहाँ केवल शुद्ध ज्योति शेष रहती है।

श्लोक ५.५

भूर्लोकं पादयोर्मध्ये भुवर्लोकं तु जानुनोः ।

स्वर्लोकं कटिदेशे तु नाभिदेशे महस्तथा ॥ ५.५ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४५

भूर्लोकका दोनों पैरोंके बीच, भुवर्लोकका घुटनोंमें, स्वर्लोकका कटि-प्रदेशमें, और महर्लोकका नाभि-प्रदेशमें (न्यास करे);

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने व्याहृतियों के न्यास का विधान आरम्भ करते हुए संकेत दिया कि जो व्याहृतियाँ पूर्व में (तृतीय अध्याय में) समझाई जा चुकी हैं, अब उनका क्रमवार विन्यास करना है। इसी क्रम के प्रथम चरण के रूप में प्रस्तुत श्लोक में वे शरीर के निचले अंगों को निम्न लोकों से जोड़ रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) भूर्लोकं पादयोर्मध्ये, भुवर्लोकं तु जानुनोः, स्वर्लोकं कटिदेशे तु, (तथा) नाभिदेशे महस्तथा (विन्यसेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• भूर्लोकं पादयोर्मध्ये — भूर्लोक का दोनों पैरों के मध्य (न्यास करे)। 'मध्य' शब्द यहाँ पैरों के बीच के आधारभूत क्षेत्र को सूचित करता है, जहाँ से शरीर का संतुलन और गमन आरम्भ होता है।

• भुवर्लोकं तु जानुनोः — भुवर्लोक का घुटनों में। 'जानु' वह संधि है जो शरीर को मोड़ने और ऊपर उठाने की शक्ति देती है।

• स्वर्लोकं कटिदेशे — स्वर्लोक का कटि-प्रदेश (कमर) में। कटि वह केंद्र है जहाँ शरीर का ऊपरी और निचला भाग जुड़ता है।

• नाभिदेशे महस्तथा — और इसी प्रकार महर्लोक का नाभि-प्रदेश में। नाभि शरीर का केंद्रबिन्दु और प्राणों का मूल स्थान है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक को स्थूल शरीर के अंगों को ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों के साथ एकाकार करने की विधि बता रहे हैं। यहाँ 'न्यास' का अर्थ केवल स्पर्श करना नहीं, अपितु उस अंग में उस लोक की चेतना और शक्ति को स्थापित करना है।

ऋषि निर्देश देते हैं कि साधक सर्वप्रथम 'भूः' व्याहृति का न्यास दोनों पैरों के मध्य करे। भूर्लोक पृथ्वी का प्रतीक है, जो धैर्य और आधार का लोक है। शरीर में पैर ही वह आधार हैं जो हमें पृथ्वी से जोड़ते हैं, अतः यहाँ भूर्लोक का विन्यास शरीर को स्थिरता प्रदान करता है। तत्पश्चात 'भुवः' का न्यास घुटनों में करना है। भुवर्लोक अन्तरिक्ष का लोक है, जहाँ गति और विस्तार है। घुटने शरीर की गतिशीलता के मुख्य केंद्र हैं, अतः यहाँ भुवर्लोक की स्थापना साधक की चेतना को पृथ्वी (स्थिरता) से उठाकर अन्तरिक्ष (गति) की ओर ले जाती है।

इसके बाद 'स्वः' का न्यास कटि-प्रदेश में बताया गया है। स्वर्लोक प्रकाश और आनंद का लोक है। कटि-प्रदेश वह संधि है जो शरीर के भौतिक आधार (पैर) और सूक्ष्म केंद्र (हृदय/मस्तिष्क) के बीच सेतु का कार्य करती है। यहाँ स्वर्लोक का विन्यास साधक के भीतर एक दिव्य संतुलन और उल्लास उत्पन्न करता है। अंत में 'महः' व्याहृति का न्यास नाभि-प्रदेश में करना है। महर्लोक वह स्थान है जहाँ महान तप और मानसिक शक्तियाँ वास करती हैं। नाभि शरीर का मध्य-बिन्दु है, जहाँ से प्राणों का संचार होता है। यहाँ महर्लोक की स्थापना का अर्थ है—साधक की प्राण-शक्ति का विस्तार करना और उसे उच्च मानसिक आयामों से जोड़ना।

यह विधि दर्शाती है कि साधक का शरीर केवल हाड़-मांस का पुंज नहीं, अपितु एक सूक्ष्म ब्रह्माण्ड है। जब वह नीचे से ऊपर की ओर इन व्याहृतियों का न्यास करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को पृथ्वी से महर्लोक तक आरोहण करा रहा होता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे' के सिद्धांत का व्यावहारिक अभ्यास है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि उसका शरीर ही सात लोकों का प्रतिबिंब है। पैरों से लेकर नाभि तक का यह आरोहण वास्तव में जड़ता से चैतन्यता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है।

साधक जब 'भूः' से 'महः' तक का न्यास करता है, तो वह अपनी चेतना को भौतिक धरातल (पैर) से उठाकर, गति (घुटने) और आनंद (कटि) से होते हुए, प्राण-केंद्र (नाभि) तक पहुँचाता है। यह अभ्यास साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि वह स्वयं ही ब्रह्माण्ड है (पुरुषसंमित)। इस प्रक्रिया में साधक का मन बाहरी जगत के लोकों की खोज छोड़कर, अपने ही शरीर के भीतर उन लोकों की अनुभूति करने लगता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल भूमि से सूक्ष्म भूमि की ओर ले जाने वाली पहली सीढ़ी है, जिससे शरीर मन्त्रमय और देवालय के समान पवित्र हो जाता है।

श्लोक ५.६

जनलोकं कण्ठदेशे मुखबिम्बे तपस्तथा ।

भ्रुवोर्ललाटसंधौ तु सत्यलोकं प्रतिष्ठितम् ।

हिरण्मये परे कोशे ध्येयः परमनिष्कलः ॥ ५.६ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४५

जनलोकका कण्ठ-प्रदेशमें, तपोलोकका मुखमण्डलमें, और सत्यलोकका भौंहोंके बीच ललाटकी सन्धिमें प्रतिष्ठित (न्यास करे)। सुवर्णमय परम कोशमें परम निष्कल (ब्रह्म) ध्यान करने योग्य है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने व्याहृति-न्यास के प्रथम चार चरणों का वर्णन करते हुए भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक और महर्लोक को क्रमशः पैरों, घुटनों, कटि और नाभि में प्रतिष्ठित करने का विधान बताया था। वर्तमान श्लोक में इस आरोहण क्रम को पूर्ण करते हुए वे शेष तीन व्याहृतियों के विन्यास और उसके उपरान्त ध्येय के परम स्वरूप का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) जनलोकं कण्ठदेशे, (तपोलोकं) मुखबिम्बे तपस्तथा (विन्यसेत्), भ्रुवोर्ललाटसंधौ तु सत्यलोकं प्रतिष्ठितम् (विन्यसेत्)। (ततः) हिरण्मये परे कोशे (स्थितं) परमनिष्कलं (ब्रह्म) ध्येयः (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• जनलोकं कण्ठदेशे — जनलोक का कण्ठ-प्रदेश में न्यास करे। 'जन' का अर्थ है जहाँ प्राणों का स्पन्दन और अभिव्यक्ति (वाक्) सक्रिय होती है।

• मुखबिम्बे तपस्तथा — तथा तपोलोक का मुखमण्डल (मुख-बिम्ब) में। 'तपः' का अर्थ है वह अग्नि या ताप जो शुद्धि और रूपांतरण करता है; मुख वह स्थान है जहाँ अग्नि-तत्व प्रधान है।

• भ्रुवोर्ललाटसंधौ तु सत्यलोकं — और भौंहों तथा ललाट के मिलन-स्थान (संधि) में सत्यलोक को प्रतिष्ठित करे। यह वह बिंदु है जहाँ द्वैत समाप्त होता है और सत्य का साक्षात्कार आरम्भ होता है।

• हिरण्मये परे कोशे — सुवर्णमय परम कोश में। 'हिरण्मय' का अर्थ केवल स्वर्ण नहीं, अपितु वह प्रकाशमय, शुद्ध और देदीप्यमान आवरण है जो आत्मा को ढके हुए है।

• परमनिष्कलः — जो पूर्णतः कलारहित है। 'कला' का अर्थ है अंश, गुण या विकार। निष्कल वह है जो गुणों के त्रिविध बंधन से मुक्त, अखंड और अविभाज्य है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में न्यास की प्रक्रिया अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचती है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को शरीर के ऊपरी अंगों के माध्यम से सूक्ष्म लोकों की चेतना में ले जा रहे हैं।

प्रथम निर्देश है कि 'जनः' व्याहृति का न्यास कण्ठ में किया जाए। कण्ठ वह स्थान है जहाँ से वाणी प्रस्फुटित होती है और जहाँ प्राण का प्रवाह नियंत्रित होता है। जनलोक वह क्षेत्र है जहाँ जीव अपनी चेतना के विस्तार का अनुभव करता है। इसके उपरान्त 'तपः' का न्यास मुख-बिम्ब में करने का विधान है। मुख वह द्वार है जहाँ से ज्ञान का आदान-प्रदान और अग्नि-होत्र (भोजन और मंत्र) का अर्पण होता है। तपोलोक की अग्नि साधक के भीतर के अशुद्धियों को जलाकर उसे कुन्दन बनाती है।

अन्ततः, 'सत्यम्' व्याहृति का न्यास भ्रूमध्य और ललाट की संधि में करने का निर्देश है। यह शरीर का वह उच्चतम बिंदु है जहाँ बाहरी जगत का विस्मरण और आन्तरिक सत्य का उदय होता है। यहाँ तक का न्यास स्थूल शरीर को ब्रह्माण्ड के सात लोकों (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्) के साथ पूर्णतः एकाकार कर देता है।

श्लोक का उत्तरार्ध इस पूरी प्रक्रिया के लक्ष्य को स्पष्ट करता है। जब सात व्याहृतियों का न्यास पूर्ण हो जाता है, तब साधक की दृष्टि इन सभी लोकों के पार 'हिरण्मय परम कोश' की ओर मुड़ती है। यह कोश वह दिव्य प्रकाशपुंज है जिसमें 'परम निष्कल' ब्रह्म स्थित है। यहाँ 'निष्कल' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; इसका अर्थ है कि अब साधक किसी गुण, किसी लोक या किसी विशेष शक्ति का ध्यान नहीं करेगा, अपितु उस अखंड चैतन्य का ध्यान करेगा जिसमें कोई भेद नहीं है। यह विन्यास की प्रक्रिया साधक को 'सगुण' से 'निर्गुण' की ओर ले जाने वाली एक सोपान-श्रेणी है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस श्लोक का उत्तरार्ध मुण्डक उपनिषद् के एक प्रसिद्ध मंत्र का सार है:

मुण्डक उपनिषद्

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ २.२.९ ॥

सुवर्णमय परम कोशमें निर्मल, कलारहित ब्रह्म (स्थित) है; वह शुभ्र है, ज्योतियोंकी ज्योति है — जिसे आत्मवेत्ता जानते हैं।

मुण्डक उपनिषद् २.२.९उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 105

यह उपनिषद् स्पष्ट करता है कि वह ब्रह्म 'विरज' (रंगहीन/गुणारहित) और 'निष्कल' है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ मुण्डक के उसी दर्शन को साधना-विधि (न्यास) से जोड़ रही है। जहाँ उपनिषद् उस सत्य का वर्णन करता है, वहीं यह स्मृति उस सत्य तक पहुँचने के लिए शरीर के अंगों को माध्यम बनाने का मार्ग दिखाती है। दोनों का मेल यह है कि अंतिम लक्ष्य 'ज्योतिषां ज्योति' (ज्योतियों की ज्योति) ही है, जो समस्त लोकों और व्याहृतियों से परे है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'आरोहण' और 'विलय' का अभ्यास है। साधक जब पैरों से आरम्भ कर भ्रूमध्य (सत्यलोक) तक पहुँचता है, तो वह अपनी चेतना को पृथ्वी-तत्व से ऊपर उठाकर आकाश और सत्य के स्तर पर ले आता है।

अभ्यास यह है कि जब साधक 'सत्यलोक' का न्यास भ्रूमध्य में करे, तो वह अनुभव करे कि समस्त बाहरी जगत और उसके सात लोक अब उसके भीतर सिमट गए हैं। उसके उपरान्त, ध्यान को भ्रूमध्य से भी ऊपर 'हिरण्मय कोश' में स्थिर करना है। यहाँ रहस्य यह है कि सत्यलोक तक तो 'लोक' (क्षेत्र) हैं, परन्तु उसके ऊपर कोई लोक नहीं, केवल 'ब्रह्म' है।

साधक इस अभ्यास से 'साकार' से 'निराकार' की भूमि में प्रवेश करता है। वह पहले अंगों के माध्यम से व्याहृतियों को स्थापित करता है (साधन), और फिर उन सबको विलीन कर 'परम निष्कल' में टिक जाता है (साध्य)। यह अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि शरीर केवल मांस-मज्जा का पुंज नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का लघु-रूप है, और इस शरीर के भीतर ही वह परम ज्योति विद्यमान है।

श्लोक ५.७

तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ।

गायत्रीं विन्यसेत् पश्चाच्छरीरे चात्मनो बुधः ॥ ५.७ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४५

वह शुभ्र (ब्रह्म) ज्योतियोंकी ज्योति है, जिसे आत्मवेत्ता जानते हैं। उसके पश्चात् बुद्धिमान् अपने शरीरमें गायत्रीका न्यास करे —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने व्याहृति-न्यास के आरोहण क्रम को पूर्ण करते हुए जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक को क्रमशः कण्ठ, मुख और ललाट-संधि में प्रतिष्ठित करने का विधान बताया था। साथ ही, उस विन्यास के उपरान्त 'हिरण्मय परम कोश' में स्थित 'परम निष्कल' ब्रह्म के ध्यान का निर्देश दिया था। वर्तमान श्लोक उसी ध्येय के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए साधक को अगले चरण—गायत्री-न्यास की ओर अग्रसर करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तत् ब्रह्म) शुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिः (अस्ति), तद् (ब्रह्म) यदात्मविदो विदुः। (ततः) बुधः पश्चात् (स्व)शरीरे गायत्रीं विन्यसेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• तच्छुभ्रं — वह शुभ्र है। 'शुभ्र' का अर्थ केवल श्वेत रंग नहीं, अपितु वह परम पवित्रता और निर्मलता है जिसमें कोई भी मल या विकार शेष नहीं रहा। यह वह प्रकाश है जो स्वयं प्रकाशित है और जिसमें कोई छाया नहीं।

• ज्योतिषां ज्योतिः — ज्योतियों की ज्योति। सूर्य, चन्द्र और अग्नि जैसी समस्त भौतिक और आध्यात्मिक ज्योतियाँ उसी एक परम ज्योति के प्रतिबिंब हैं; वह उन सबका मूल स्रोत है।

• आत्मविदो विदुः — जिसे आत्मवेत्ता (आत्मा को जानने वाले) जानते हैं। यह संकेत है कि यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, अपितु अनुभवजन्य है; जो स्वयं को जान लेता है, वही इस ज्योति को पहचान पाता है।

• बुधः — बुद्धिमान् या प्रबुद्ध साधक। यहाँ 'बुध' वह है जिसने पूर्व के न्यासों (प्रणव और व्याहृति) के माध्यम से अपनी चेतना को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाकर स्थिर कर लिया है।

• विन्यसेत् — विन्यास करे। विन्यास का अर्थ है—किसी मन्त्र या शक्ति को शरीर के विशिष्ट अंगों में प्रतिष्ठित करना ताकि शरीर स्वयं मन्त्रमय हो जाए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम लक्ष्य का वर्णन कर रहे हैं जिसे साधक ने पिछले श्लोक में 'परम निष्कल' के रूप में देखा था। वह ब्रह्म 'शुभ्र' है। इस शुभ्रता का रहस्य ग्रन्थ के द्वितीय अध्याय (२.५) में भी मिलता है, जहाँ ओंकार के वर्ण को श्वेत बताया गया है। श्वेत वर्ण समस्त वर्णों का समुच्चय है और शुद्धता का प्रतीक है। जब साधक व्याहृतियों के न्यास द्वारा अपने शरीर के निचले स्तरों (पादों) से ऊपर उठकर ललाट-संधि तक पहुँचता है, तब वह उस 'ज्योतिषां ज्योति' का अनुभव करता है। यह वह प्रकाश है जो केवल आँखों से नहीं, अपितु प्रज्ञा से देखा जाता है।

यहाँ एक सूक्ष्म विधि का संकेत है: पहले प्रणव-न्यास, फिर व्याहृति-न्यास और अब गायत्री-न्यास। यह क्रम स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने वाली सीढ़ी है। व्याहृति-न्यास ने शरीर के विभिन्न लोकों (भूः से सत्य तक) को शुद्ध किया, जिससे शरीर एक 'यज्ञवेदी' बन गया। अब इस शुद्ध शरीर में 'गायत्री' का विन्यास करना है। गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु वह शक्ति है जो बुद्धि को प्रेरित करती है। अतः 'बुधः' (बुद्धिमान्) ही इस विन्यास को करने का अधिकारी है, क्योंकि जो अपनी बुद्धि को उस शुभ्र ज्योति में विलीन कर चुका है, वही गायत्री के २४ अक्षरों को अपने शरीर के २४ अंगों में सही रीति से प्रतिष्ठित कर सकता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस श्लोक का प्रथम चरण सीधे मुण्डक उपनिषद् के शब्दों से मेल खाता है:

मुण्डक उपनिषद्

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ २.२.९ ॥

सुवर्णमय परम कोशमें निर्मल, कलारहित ब्रह्म (स्थित) है; वह शुभ्र है, ज्योतियोंकी ज्योति है — जिसे आत्मवेत्ता जानते हैं।

मुण्डक उपनिषद् २.२.९उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 105

मुण्डक उपनिषद् स्पष्ट करता है कि हिरण्मय कोश में जो ब्रह्म है, वह 'शुभ्र' और 'ज्योतिषां ज्योति' है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ उपनिषद् के उस ज्ञान को एक क्रियात्मक विधि (न्यास) से जोड़ रही है। जहाँ उपनिषद् केवल ज्ञान देता है, वहीं यह स्मृति उस ज्ञान को शरीर में उतारने का साधन (न्यास) बताती है।

इसी प्रकार, ज्योतियों की ज्योति होने का भाव भगवद्गीता में भी मिलता है:

भगवद्गीता

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १३.१७ ॥

वह ज्योतियोंकी भी ज्योति है, अन्धकारसे परे कहा जाता है; वही ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानसे प्राप्य है — सबके हृदयमें स्थित।

भगवद्गीता १३.१७गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 329

गीता कहती है कि वह ज्योति 'तमसः परम्' (अन्धकार से परे) है और 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्' (सबके हृदय में स्थित) है। स्मृति का 'शुभ्र' और गीता का 'तमसः परम्' एक ही तत्त्व के दो पहलू हैं—एक उसकी निर्मलता को दर्शाता है और दूसरा उसके प्रकाशमय स्वरूप को जो अविद्या के अन्धकार को नष्ट करता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थिरता' और 'संक्रमण' का बिंदु है। पिछले श्लोकों में साधक ने शरीर के अंगों में लोकों का विन्यास किया, जिससे उसकी चेतना ऊपर की ओर उठी। अब जब वह 'ज्योतिषां ज्योति' का ध्यान करता है, तो वह एक क्षण के लिए पूर्णतः शांत और रिक्त (निष्कल) हो जाता है।

अभ्यास की विधि यह है कि साधक पहले अपनी चेतना को ललाट-संधि से ऊपर उस शुभ्र प्रकाश में स्थित करे। जब वह अनुभव करे कि वह स्वयं उस ज्योतिमय प्रकाश का अंश है, तब वह उस अवस्था में गायत्री के अक्षरों का विन्यास आरम्भ करे। यदि साधक बिना इस 'शुभ्र ज्योति' के अनुभव के केवल यांत्रिक रूप से गायत्री-न्यास करेगा, तो वह केवल एक शारीरिक क्रिया होगी। किन्तु जब वह 'बुध' (प्रबुद्ध) होकर, उस परम प्रकाश के बोध के साथ विन्यास करता है, तो गायत्री के २४ अक्षर उसके शरीर के २४ केंद्रों में प्राण-शक्ति के रूप में जागृत होते हैं। यह अभ्यास साधक को 'साधन' (न्यास) से 'साध्य' (परब्रह्म) की ओर ले जाने वाली प्रक्रिया है।

गायत्रीन्यासः

श्लोक ५.८

चतुर्विंशतिस्थानेषु पादो(द)मूर्धान्तमस्तकम् ।

पादाङ्गुष्ठे तथा गुल्फे जङ्घयोर्जानुनोस्तथा ॥ ५.८ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४५

— पैरसे लेकर सिरकी चोटीतक चौबीस स्थानोंमें: पैरके अँगूठेमें, टखनेमें, पिंडलियोंमें, घुटनोंमें,

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने साधक को 'ज्योतिषां ज्योतिः' के ध्यान के पश्चात गायत्री-न्यास के लिए प्रेरित किया था। अब वर्तमान श्लोक से उस विन्यास की व्यावहारिक विधि का आरम्भ होता है, जिसमें शरीर के विभिन्न अंगों को गायत्री के अक्षरों से मन्त्रमय बनाने का विधान है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (बुधः) पादो(द)मूर्धान्तमस्तकम् चतुर्विंशतिस्थानेषु (गायत्रीं) विन्यसेत्। (तथा) पादाङ्गुष्ठे, तथा गुल्फे, जङ्घयोः, जानुनोस्तथा (विन्यसेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• पादो(द)मूर्धान्तमस्तकम् — पाद (पैर) से लेकर मूर्धा (सिर की चोटी) तक। यहाँ 'पाद' आधार है और 'मूर्धा' शिखर। यह आरोहण क्रम है, जो पृथ्वी तत्व से आकाश तत्व की ओर जाने का संकेत है।

• चतुर्विंशतिस्थानेषु — चौबीस स्थानों में। गायत्री मन्त्र के कुल चौबीस अक्षर हैं (यदि हम व्याकरणिक विच्छेद और उच्चारण के आधार पर गणना करें)। शरीर के चौबीस अंगों का चयन इसलिए किया गया है ताकि मन्त्र का एक-एक अक्षर शरीर के एक-एक विशिष्ट केंद्र में प्रतिष्ठित हो सके।

• पादाङ्गुष्ठे — पैर के अँगूठे में। यह शरीर का निम्नतम बिंदु है, जहाँ से चेतना का उत्थान आरम्भ होता है।

• गुल्फे — टखने में।

• जङ्घयोः — पिंडलियों में।

• जानुनोः — घुटनों में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य गायत्री के अक्षरों को शरीर में प्रतिष्ठित करने की विधि बता रहे हैं। यह केवल एक बाहरी क्रिया नहीं है, अपितु शरीर के स्थूल ढाँचे को सूक्ष्म मन्त्र-शक्ति में परिवर्तित करने की एक योगिक प्रक्रिया है।

यहाँ 'विन्यास' का अर्थ है—मन्त्र के अक्षर को उस अंग के साथ एकाकार कर देना। जब साधक पैर के अँगूठे से आरम्भ करके ऊपर की ओर बढ़ता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को पृथ्वी (पैर) से उठाकर आकाश (मूर्धा) की ओर ले जा रहा होता है। यह विधि दर्शाती है कि शरीर मन्त्र का ही विस्तार है।

वाक्य की संरचना पिछले श्लोक (5.7) से जुड़ी है, जहाँ 'विन्यसेत्' (विन्यास करे) क्रिया का निर्देश था। वर्तमान श्लोक उस क्रिया के 'स्थानों' का विवरण दे रहा है। यहाँ पैरों के अँगूठे, टखने, पिंडली और घुटनों का उल्लेख है। यह क्रम यह सुनिश्चित करता है कि शरीर का कोई भी भाग मन्त्र-शक्ति से वंचित न रहे। बाहरी दृष्टि से यह अंगों का स्पर्श है, किन्तु आन्तर दृष्टि से यह शरीर के प्रत्येक मर्म और कोशिका को गायत्री के प्रकाश से आलोकित करने का साधन है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'कायाकल्प' और 'मन्त्र-मय शरीर' के निर्माण का अभ्यास है। साधक जब गायत्री के चौबीस अक्षरों को चौबीस स्थानों में प्रतिष्ठित करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसका शरीर अब केवल मांस और अस्थि का पुंज नहीं, बल्कि साक्षात् मन्त्र का स्वरूप हो गया है।

अभ्यास की विधि यह है कि साधक प्रत्येक अक्षर का उच्चारण करते हुए उसे संबंधित अंग में मानसिक रूप से स्थापित करे। जैसे-जैसे अक्षर पैर के अँगूठे से ऊपर की ओर बढ़ते हैं, साधक की चेतना भी निम्न भूमियों (स्थूल प्रवृत्तियों) को छोड़कर उच्च भूमियों (सूक्ष्म प्रवृत्तियों) की ओर आरोहण करती है। यह 'अक्षर-आरोहण' साधक को जड़ता से चेतनता की ओर ले जाता है।

यहाँ पैर का अँगूठा आधार है, जो स्थिरता का प्रतीक है, और मूर्धा लक्ष्य है, जो मोक्ष और परब्रह्म का प्रतीक है। इस अभ्यास से साधक यह अनुभव करता है कि जिस ब्रह्म को वह बाहर खोज रहा था, वह अक्षर-रूप में उसके अपने ही शरीर के अंगों में व्याप्त है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शरीर' से 'विज्ञानमय शरीर' की ओर ले जाने वाली एक सीढ़ी है।

श्लोक ५.९

ऊरुभ्यां गुह्यवृषणे कटौ नाभ्यां तथैव च ॥

जठरे स्तने च हृदये कण्ठे वक्त्रे च तालुनि ॥ ५.९ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४६

जाँघों में, गुह्य और वृषण में, कटि में तथा नाभि में भी उसी प्रकार; जठर में, स्तनों में, हृदय में, कण्ठ में, मुख में तथा तालु में...

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री-न्यास के आरोहण क्रम का आरम्भ करते हुए पैर के अँगूठे से घुटनों तक के अंगों का उल्लेख किया था। वर्तमान श्लोक में इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए शरीर के मध्य भाग से लेकर मुख के ऊपरी हिस्से तक के उन स्थानों का विवरण दिया गया है, जहाँ मन्त्र के अक्षरों को प्रतिष्ठित करना है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (गायत्रीं) ऊरुभ्यां, गुह्यवृषणे, कटौ, नाभ्यां तथैव च (विन्यसेत्)। (तथा) जठरे, स्तने च, हृदये, कण्ठे, वक्त्रे च, तालुनि (विन्यसेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• ऊरुभ्यां — दोनों जाँघों में।

• गुह्यवृषणे — गुप्त अंगों और वृषणों में।

• कटौ — कमर या कटि प्रदेश में।

• नाभ्यां — दोनों नाभि-केंद्रों में (यहाँ 'नाभ्यां' द्विवचन है, जो बाह्य नाभि और अन्तरिक प्राण-नाभि या नाभि-मंडल के संकेत स्वरूप है)।

• तथैव च — उसी प्रकार (अर्थात् पूर्ववत मन्त्र के अक्षरों का न्यास करते हुए)।

• जठरे — जठराग्नि के स्थान या उदर प्रदेश में।

• स्तने च — दोनों स्तनों में।

• हृदये — हृदय-कमल या हृदय-आकाश में।

• कण्ठे — कंठ प्रदेश में।

• वक्त्रे — मुख के विवर या मुख-मंडल में।

• तालुनि — तालु में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में गायत्री के अक्षरों के विन्यास की वह कड़ी है, जो साधक की चेतना को अधोगामी केंद्रों से ऊपर उठाकर हृदय और मुख की ओर ले जाती है। यह प्रक्रिया शरीर के भौतिक अंगों को मन्त्र के अक्षरों के माध्यम से 'दिव्यमय' करने की विधि है।

यहाँ ऊरु (जाँघों) से आरम्भ होकर तालु तक की यात्रा वास्तव में प्राणों के ऊर्ध्वगमन की यात्रा है। जब साधक 'गुह्यवृषण' और 'कटि' में मन्त्र के अक्षरों को प्रतिष्ठित करता है, तो वह अपनी काम-शक्ति और भौतिक आसक्तियों को मन्त्र की अग्नि में आहूत करता है। 'नाभि' और 'जठर' में न्यास करने से प्राण और अग्नि का संतुलन होता है, जिससे साधक का शरीर तपमय होने लगता है।

जैसे-जैसे न्यास 'स्तन' और 'हृदय' की ओर बढ़ता है, साधना स्थूल से सूक्ष्म की ओर मुड़ती है। हृदय में मन्त्र का अक्षर प्रतिष्ठित करना वास्तव में उस 'हृदयाकाश' को जाग्रत करना है, जहाँ आत्मा का वास है। अंततः 'कण्ठ', 'मुख' और 'तालु' में न्यास करने से साधक की वाणी मन्त्रमय हो जाती है। यह विधि यह सुनिश्चित करती है कि साधक केवल जिह्वा से मन्त्र न बोले, अपितु उसका संपूर्ण अस्तित्व—उसकी देह, उसकी प्राण-शक्ति और उसकी वाणी—गायत्री के अक्षरों में विलीन हो जाए।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक शरीर के 'मन्त्र-कवच' का निर्माण है। जब साधक इन अंगों पर मन्त्र के अक्षरों का न्यास करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसका शरीर अब केवल मांस और अस्थियों का पुंज नहीं, बल्कि एक जीवित मन्त्र है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब 'नाभि' से 'हृदय' और फिर 'तालु' तक अक्षरों को ले जाता है, तो वह अपनी चेतना को नीचे से ऊपर की ओर खींचता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल भूमि' से 'सूक्ष्म भूमि' की ओर ले जाता है। हृदय में न्यास के समय साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि मन्त्र का अक्षर उसके हृदय के भीतर सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा है। तालु में न्यास का अर्थ है—ध्वनि का उच्चतम बिंदु, जहाँ मन्त्र का नाद और साधक का चित्त एक हो जाते हैं। इस प्रकार, यह न्यास साधक को उस अवस्था में लाता है जहाँ वह स्वयं 'अक्षर' (अविनाशी) के साथ एकाकार होने की तैयारी करता है।

श्लोक ५.१०

श्रोत्रे चक्षुर्भ्रुवोर्मध्ये ललाटे पूर्वके मुखे ।

याम्यपश्चिमके चैव उत्तरे च यथाक्रमम् ॥ ५.१० ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४६

कानों में, आँखों में, भौंहों के मध्य में, ललाट में, मुख के पूर्व भाग में, दक्षिण में, पश्चिम में तथा उत्तर में यथाक्रम से...

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री-न्यास के आरोहण क्रम को जाँघों से आरम्भ कर तालु तक पहुँचाया था। वर्तमान श्लोक में इस विन्यास की प्रक्रिया को मुख-मंडल और शिरोभाग के सूक्ष्म केंद्रों तक ले जाया गया है, जहाँ मन्त्र के अक्षरों को प्रतिष्ठित कर साधक अपनी इंद्रियों और चेतना को मन्त्रमय करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (गायत्रीं) श्रोत्रे, चक्षुर्भ्रुवोर्मध्ये, ललाटे, पूर्वके मुखे, याम्य-पश्चिमके चैव, उत्तरे च (विन्यसेत्) यथाक्रमम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• श्रोत्रे — दोनों कानों में।

• चक्षुर्भ्रुवोर्मध्ये — आँखों में और भौंहों के मध्य (भ्रूमध्य) में।

• ललाटे — ललाट (माथे) के प्रदेश में।

• पूर्वके मुखे — मुख के पूर्व भाग में।

• याम्य-पश्चिमके — याम्य (दक्षिण) और पश्चिम भाग में।

• उत्तरे च — उत्तर भाग में।

• यथाक्रमम् — जिस क्रम में मन्त्र के अक्षर आते हैं, उसी क्रम में एक-एक कर प्रतिष्ठित करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में गायत्री के चौबीस अक्षरों के विन्यास का वह चरण है, जहाँ साधक की चेतना अब शरीर के सबसे ऊपरी और संवेदनशील केंद्रों—इंद्रिय-द्वारों—पर केंद्रित होती है। यहाँ कानों, आँखों और ललाट में अक्षरों का न्यास करना केवल एक बाह्य क्रिया नहीं है, अपितु यह साधक की श्रवण, दर्शन और प्रज्ञा शक्तियों का मन्त्र-शुद्धिकरण है।

जब साधक 'श्रोत्रे' (कानों) में अक्षरों का न्यास करता है, तो वह बाह्य शोर से हटकर 'अक्षर-ध्वनि' को सुनने की पात्रता विकसित करता है। 'चक्षु' और 'भ्रूमध्य' का न्यास दृष्टि को स्थूल जगत से हटाकर अन्तरिक ज्योति की ओर मोड़ता है। ललाट का न्यास बुद्धि के उस केंद्र को जागृत करता है जहाँ मन्त्र का बीज प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक के उत्तरार्ध में मुख के चार भागों—पूर्व, दक्षिण (याम्य), पश्चिम और उत्तर—में अक्षरों के विन्यास का निर्देश है। यहाँ 'मुख' शब्द का अर्थ केवल बाहरी मुख-विवर नहीं, अपितु सम्भवतः शिरोभाग या मुख-मंडल के चारों दिशाओं में स्थित ऊर्जा-बिन्दुओं से है। दिशाओं का यह उल्लेख यह दर्शाता है कि मन्त्र की शक्ति केवल एक बिंदु पर नहीं, अपितु साधक के चारों ओर एक सुरक्षा-कवच और चेतना-मंडल के रूप में प्रतिष्ठित हो रही है। 'यथाक्रमम्' शब्द यह स्पष्ट करता है कि गायत्री के अक्षरों का जो क्रम है, उसे बिना किसी त्रुटि के इन अंगों में स्थापित करना अनिवार्य है, क्योंकि मन्त्र की शक्ति उसके अक्षरों के विन्यास और क्रम में ही निहित होती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'इंद्रिय-संयम' और 'चेतना के केंद्रीकरण' का अभ्यास है। यहाँ साधक निम्नलिखित अनुभव और अभ्यास करता है:

१. श्रवण-शुद्धि: कानों में न्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि अब वह केवल मन्त्र की नाद-ध्वनि को ग्रहण करेगा।

२. दृष्टि-परिवर्तन: आँखों और भ्रूमध्य में न्यास के समय साधक बाह्य जगत का दर्शन छोड़कर अन्तरिक प्रकाश (सूर्य) की ओर उन्मुख होता है।

३. प्रज्ञा-जागृति: ललाट में न्यास करने से मन की चंचलता समाप्त होती है और एकाग्रता बढ़ती है।

४. दिक्-विस्तार: मुख के चारों दिशाओं (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर) में अक्षरों को प्रतिष्ठित कर साधक अपनी चेतना को सीमित शरीर से निकालकर सर्वव्यापी बनाने का अभ्यास करता है।

यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ उसका शरीर केवल हाड़-मांस का पुंज नहीं, बल्कि एक जीवित मन्त्र-यन्त्र बन जाता है। जब इंद्रिय-द्वार मन्त्रमय हो जाते हैं, तब साधक के भीतर से बाहर और बाहर से भीतर जाने वाली समस्त वृत्तियाँ मन्त्र के नियंत्रण में आ जाती हैं।

प्रकारान्तरेण गायत्रीन्यासः

श्लोक ५.११

अन्तिमं मूर्ध्नि विन्यस्य परब्रह्म स उच्यते ।

गुह्ये चक्षुषि वक्त्रे च समीके (?) हृदये तथा ॥ ५.११ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४६

अन्तिम (अक्षर) का मूर्धामें न्यास करके — वह परब्रह्म कहलाता है। (फिर शिरस्-मन्त्रका) गुह्यमें, आँखमें, मुखमें, समीके (?), और हृदयमें —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री के अक्षरों को कानों, आँखों, ललाट और मुख के चारों दिशाओं में प्रतिष्ठित कर साधक की इंद्रिय-चेतना को मन्त्रमय किया था। वर्तमान श्लोक इस आरोहण का चरमोत्कर्ष है, जहाँ मन्त्र का अंतिम अक्षर मूर्धा में विलीन होता है और तत्पश्चात एक नवीन न्यास-प्रक्रिया का संकेत मिलता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (गायत्रीमन्त्रस्य) अन्तिमं (अक्षरं) मूर्ध्नि विन्यस्य (सः) परब्रह्म उच्यते। (ततः शिरस्-मन्त्रं) गुह्ये, चक्षुषि, वक्त्रे च, समीके, हृदये तथा (विन्यसेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अन्तिमं मूर्ध्नि विन्यस्य — गायत्री के चौबीसवें (अंतिम) अक्षर का मूर्धा (सिर के उच्चतम बिंदु) पर न्यास करके।

• परब्रह्म स उच्यते — वह (अवस्था या वह अक्षर) परब्रह्म कहलाता है।

• गुह्ये, चक्षुषि, वक्त्रे, समीके, हृदये — गुह्य स्थान में, आँखों में, मुख में, समीके (पाठ अनिश्चित) और हृदय में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में गायत्री-न्यास की पूर्णाहुति और एक नए विन्यास का आरम्भ है। गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों का विन्यास पैर के अँगूठे से आरम्भ होकर जब मूर्धा तक पहुँचता है, तो वह केवल एक संख्यात्मक पूर्णता नहीं, अपितु चेतना का पूर्ण उत्थान है।

जब साधक चौबीसवें अक्षर को मूर्धा में प्रतिष्ठित करता है, तो यहाँ 'परब्रह्म' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाव यह है कि जब मन्त्र का अंतिम अक्षर अपने उच्चतम स्थान पर स्थित होता है, तब साधक की व्यक्तिगत चेतना मन्त्र की शक्ति में विलीन होकर उस 'परब्रह्म' स्वरूप का अनुभव करती है, जो समस्त अक्षरों का आधार है। यहाँ अक्षर केवल ध्वनि नहीं रहता, अपितु वह उस निराकार ब्रह्म का साकार प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार, गायत्री का न्यास साधक को स्थूल शरीर से उठाकर उस बिंदु पर ले आता है जहाँ वह स्वयं को ब्रह्म के साथ एकाकार पाता है।

श्लोक का उत्तरार्ध एक नवीन न्यास की ओर संकेत करता है। यहाँ 'शिरस्-मन्त्र' (शिरो-न्यास या शिरो-मन्त्र) के विन्यास की बात सम्भवतः की जा रही है। इस प्रक्रिया में मन्त्र के अंगों को पुनः गुह्य, चक्षु, वक्त्र, समीके और हृदय जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों पर प्रतिष्ठित किया जाता है। यह दोहराव यह दर्शाता है कि एक बार जब साधक मूर्धा में परब्रह्म का अनुभव कर लेता है, तो वह उस उच्च चेतना को पुनः शरीर के अन्य केंद्रों में उतारता है, ताकि सम्पूर्ण अस्तित्व उस दिव्य प्रकाश से आलोकित हो सके।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'समाप्ति' और 'विस्तार' का समन्वय है। चौबीसवाँ अक्षर मूर्धा में प्रतिष्ठित करना साधक के लिए 'लय' का अभ्यास है। जिस प्रकार नदी समुद्र में मिलकर अपना नाम और रूप खो देती है, उसी प्रकार जब गायत्री का अंतिम अक्षर मूर्धा में स्थित होता है, तो साधक की समस्त वृत्तियाँ शांत होकर 'परब्रह्म' में लय हो जाती हैं। यह वह भूमि है जहाँ साधक मन्त्र के शब्दों से ऊपर उठकर मन्त्र के 'अर्थ' और अंततः 'मन्त्र-स्वरुप' ब्रह्म में स्थित होता है।

इसके पश्चात, गुह्य से हृदय तक का जो न्यास बताया गया है, वह 'अवनति' नहीं अपितु 'प्रसार' है। मूर्धा में प्राप्त उस परब्रह्म-अनुभव को जब साधक हृदय और अन्य अंगों में प्रतिष्ठित करता है, तो वह अपने भौतिक शरीर को ही देवालय बना लेता है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जिस ब्रह्म को उसने मूर्धा के उच्चतम बिंदु पर पाया, वही ब्रह्म उसके हृदय में, उसकी वाणी में और उसके अस्तित्व के सबसे गुप्त (गुह्य) अंगों में भी व्याप्त है। यह अभ्यास साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि ब्रह्म कहीं बाहर या केवल ऊपर नहीं, अपितु सर्वत्र और सर्व-अंग में स्थित है।

न्यासचतुष्टयमाहात्म्यम्

श्लोक ५.१२

पद्भ्यां नाभ्यां ललाटे तु नवमं मूर्ध्नि विन्यसेत् ।

इदं न्यासचतुष्कं तु सकृन्न्यस्यति यो द्विजः ॥ ५.१२ ॥

पञ्चमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४६

— दोनों पैरोंमें, नाभिमें, ललाटमें, और नवाँ मूर्धामें न्यास करे। जो द्विज इस चतुर्विध न्यासका एक बार भी न्यास करता है —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री-न्यास की पूर्णता और शिरस्-मन्त्र के न्यास का आरम्भ किया था। वर्तमान श्लोक इस मन्त्र-विन्यास के अंतिम केंद्रों को निर्धारित करते हुए संपूर्ण न्यास-चतुष्टय की समग्रता को एक सूत्र में बांधता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (शिरस्-मन्त्रस्य) पद्भ्यां, नाभ्यां, ललाटे तु, नवमं मूर्ध्नि विन्यसेत्। इदं न्यासचतुष्कं तु सकृन्न्यस्यति यो द्विजः (सः सर्वपापेभ्यः मुक्तः ब्रह्मसायुज्यं गच्छति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• पद्भ्यां, नाभ्यां, ललाटे — दोनों पैरों में, दोनों नाभि-स्थानों (या नाभि के केंद्र) में और ललाट में।

• नवमं मूर्ध्नि विन्यसेत् — नौवें (अंतिम) अक्षर या बिंदु का न्यास मूर्धा (सिर के उच्चतम शिखर) पर करे।

• न्यासचतुष्कं — चार प्रकार के न्यासों का समूह: (१) ओंकार-न्यास, (२) व्याहृति-न्यास, (३) गायत्री-न्यास और (४) शिरस्-मन्त्र-न्यास।

• सकृन्न्यस्यति — एक बार भी न्यास करता है।

• द्विजः — वह साधक जिसने उपनयन संस्कार के माध्यम से आध्यात्मिक पुनर्जन्म लिया है और जो मन्त्र-दीक्षा का अधिकारी है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में शिरस्-मन्त्र के न्यास की विधि पूर्ण हो रही है और संपूर्ण अध्याय का सार प्रकट हो रहा है। पिछले श्लोक में जो न्यास गुह्य, चक्षु, मुख और हृदय में आरम्भ हुआ था, वह अब पैरों, नाभि और ललाट से होते हुए नौवें स्थान अर्थात् मूर्धा पर समाप्त होता है। यहाँ 'नवमं' शब्द यह संकेत देता है कि शिरस्-मन्त्र के नौ विशिष्ट केंद्रों पर चेतना को प्रतिष्ठित करना है।

जब साधक इन नौ स्थानों पर मन्त्र के अंशों को स्थापित करता है, तो वह अपने शरीर को एक मंदिर और स्वयं को उस मन्त्र का साक्षात् स्वरूप बना लेता है। पैरों से आरम्भ होकर मूर्धा तक जाने वाली यह प्रक्रिया स्थूल शरीर के प्रति आसक्ति को समाप्त कर चेतना को ऊपर की ओर ले जाने वाली एक सोपान-विधि है।

इसके पश्चात महर्षि याज्ञवल्क्य 'न्यासचतुष्क' शब्द का प्रयोग करते हैं। यह इस ग्रन्थ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है। यहाँ चतुर्विध न्यास का अर्थ है—प्रणव (ओंकार), व्याहृति, गायत्री और शिरस्-मन्त्र का विन्यास। यह कोई यांत्रिक क्रिया नहीं, अपितु एक क्रमिक आरोहण है। पहले ओंकार से बीज-शक्ति जाग्रत होती है, व्याहृतियों से ब्रह्माण्ड के स्तरों (भूः, भुवः, स्वः आदि) का समन्वय होता है, गायत्री से दिव्य बुद्धि का प्रकाश फैलता है और अंततः शिरस्-मन्त्र से साधक अपनी व्यक्तिगत पहचान को विराट पुरुष के साथ एकाकार कर लेता है।

महर्षि कहते हैं कि जो 'द्विज' इस चतुर्विध न्यास को 'एक बार' (सकृत्) भी पूर्ण निष्ठा से करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मसायुज्य (ब्रह्म में विलीन होना) को प्राप्त करता है। यहाँ 'एक बार' का अर्थ केवल संख्या नहीं, अपितु उस एक क्षण की पूर्णता है जहाँ साधक और मन्त्र के बीच का भेद मिट जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शरीर-मन्त्रमयता' का अभ्यास है। साधक यहाँ चार अलग-अलग न्यासों के माध्यम से एक ही ऊर्ध्व-यात्रा को चार बार दोहराता है। यह दोहराव इसलिए है ताकि चेतना की परतें धीरे-धीरे खुलें।

प्रथम न्यास (ओंकार) में साधक केवल बीज-ध्वनि को अनुभव करता है। द्वितीय (व्याहृति) में वह अपने अस्तित्व को पृथ्वी से आकाश तक विस्तारित करता है। तृतीय (गायत्री) में वह अपनी प्रज्ञा को चौबीस केंद्रों में विभाजित कर संपूर्ण शरीर को प्रकाशमय करता है। चतुर्थ (शिरस्-मन्त्र) में वह उस प्रकाश को नौ केंद्रों के माध्यम से पुनः संकुचित कर मूर्धा के एक बिंदु पर केंद्रित कर देता है।

साधक जब पैरों से मूर्धा तक इस यात्रा को पूर्ण करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसका शरीर अब केवल मांस-मज्जा का पुंज नहीं, बल्कि अक्षरों और ध्वनियों का एक जीवंत विन्यास है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' की भूमि से उठाकर 'अक्षर' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को मन्त्र के रूप में देखता है। मूर्धा में अंतिम न्यास का अर्थ है—चेतना का पूर्ण विलय, जहाँ अब कोई क्रिया शेष नहीं रहती, केवल शून्य और पूर्ण का अनुभव शेष रहता है।

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-10-04।

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