श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, षष्ठोऽध्यायः

31 मूल पद्य

यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके षष्ठोऽध्यायः — संध्यानिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।

षष्ठोऽध्यायः — संध्यानिर्णयः

अध्याय-सार — संध्यानिर्णय। संध्या दिन-रातके पापसे छुड़ाती है (६.१); जो उसे न जाने और न करे, वह जीते-जी शूद्र है और सब द्विज-कर्मसे बाहर करने योग्य है (६.२–३)। माहात्म्य (६.१२ के मन्देह राक्षसोंके प्रसंग सहित) के बाद तीन संध्याएँ बतायी जाती हैं: प्रातः गायत्री (रक्त), मध्याह्न सावित्री (श्वेत) और सायं सरस्वती (कृष्ण) (६.१७–१८), और ‘संध्या’ पदकी निरुक्ति। फिर अध्यायका केन्द्र आता है — ‘अनूदकी’ संध्या, जो जल, लेप और स्नेहके बिना होती है: हृदयाकाशमें, सुषुम्णामें बँधे दीर्घ घण्टानाद-से ईश्वरका मनसे ध्यान (६.२२–२४)। अन्तमें संध्याका काल, आश्रमके अनुसार स्नानकी संख्या, असमर्थके लिए अनुकल्प और स्नान-मार्जनके निमित्त आते हैं; और ऋषि स्नानकी पूरी विधि पूछते हैं (६.३१), जिसका उत्तर अगला अध्याय है।

संध्योपासननिर्णयप्रतिज्ञा

श्लोक ६.१

अतःपरं प्रवक्ष्यामि संध्योपासननिर्णयम् ।

अहोरात्रकृतात् पापात् यामुपास्य विमुच्यते ॥ ६.१ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४७

इसके आगे मैं संध्योपासन का निर्णय कहूँगा, जिसकी उपासना करके मनुष्य अहोरात्र किए हुए पाप से मुक्त हो जाता है।

अवतरणिका —

पिछले अध्यायों में मन्त्रों की नींव, ओंकार, व्याहृतियों और गायत्री के रहस्य का विवेचन किया गया। अब उन बीजों को क्रियान्वित करने के लिए 'संध्या' रूपी कर्म-साधन का निर्णय प्रस्तुत है।

अन्वय और पदार्थ —

अतः परं संध्योपासननिर्णयम् प्रवक्ष्यामि। अहोरात्र-कृतात् पापात् याम् उपास्य विमुच्यते।

पदार्थ:

• अतः परं: इसके आगे (अब तक मन्त्रों का ज्ञान हुआ, अब उनके प्रयोग का समय है)।

• संध्योपासननिर्णयम्: संध्या की उपासना का निश्चित विधान और उसका निर्णायक महत्त्व।

• अहोरात्र-कृतात्: अहोरात्र (दिन और रात) के समय में किए गए।

• पापात्: पाप से (यहाँ पाप का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु चित्त पर जमी वह मलिनता है जो साधक को अक्षर से दूर करती है)।

• उपास्य: उपासना करके (उप + आस = समीप बैठना; मन्त्र और देवता के समीप स्थित होना)।

• विमुच्यते: मुक्त हो जाता है।

भाष्य —

योगीश्वर महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से संध्योपासन की अनिवार्यता और उसकी शुद्धि-शक्ति का उद्घोष कर रहे हैं। यहाँ 'निर्णय' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। निर्णय का अर्थ केवल विधि बताना नहीं, बल्कि यह स्पष्ट करना है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए संध्या का पालन 'वैकल्पिक' नहीं, अपितु 'अनिवार्य' है।

श्लोक का भाव यह है कि साधक दिन और रात के अंतराल में अनजाने में या अज्ञानवश जिन मानसिक, वाचिक और शारीरिक विकारों (पापों) को संचित कर लेता है, वह संध्योपासन के माध्यम से उनसे मुक्त हो जाता है। बाहरी दृष्टि से यह सूर्य के उदय और अस्त होने के समय की जाने वाली पूजा है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह चित्त के शोधन की प्रक्रिया है।

दिन और रात के पापों से मुक्ति का अर्थ है—साधना के मार्ग में आने वाले अवरोधों का निवारण। जब मनुष्य संसार के व्यवहार में संलग्न होता है, तो उसके मन पर कामनाओं और द्वन्द्वों की परतें जम जाती हैं। संध्या वह समय है जब प्रकृति स्वयं परिवर्तन के दौर से गुजरती है; इसी संधि-काल में जब साधक अपनी चेतना को बाहरी जगत से हटाकर अन्तर्मुखी करता है, तो वह उस 'मल' को धो डालता है जो उसे अपने वास्तविक स्वरूप (अक्षर) से अलग करता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

संध्या के द्वारा पाप-निवारण का यह सिद्धांत अन्य स्मृतियों में भी इसी रूप में मिलता है:

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ २.१०२ ॥

प्रातःसन्ध्यामें खड़े होकर (सावित्रीका) जप करनेवाला रातके पापको दूर करता है, और सायंसन्ध्यामें बैठकर (जप करनेवाला) दिनमें किये मलको नष्ट करता है।

मनुस्मृति २.१०२मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 241

मनुस्मृति यहाँ स्पष्ट करती है कि प्रातःकालीन संध्या रात के पापों का और सायंकाल की संध्या दिन के मल का नाश करती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों का यहाँ पूर्ण मेल है। दोनों ही ग्रन्थ संध्या को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक 'शोधन-यज्ञ' मानते हैं। जहाँ मनुस्मृति में खड़े होने (तिष्ठन्) और बैठने (समासीन) की शारीरिक स्थिति का वर्णन है, वहीं यह स्मृति 'उपासना' शब्द पर बल देकर इसके आन्तरिक समर्पण और विज्ञान को प्रधानता देती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'संध्या' केवल समय नहीं, बल्कि 'संधि' का अभ्यास है। दिन और रात का मिलन बिंदु वह क्षण है जहाँ प्रकृति की ऊर्जाएँ संतुलित होती हैं। साधक के लिए यह अभ्यास है—चित्त को धोने का।

जैसे शरीर की शुद्धि के लिए स्नान आवश्यक है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर और मन की शुद्धि के लिए संध्योपासन आवश्यक है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि प्रत्येक सन्धि एक नया आरम्भ है। वह पिछले बारह घंटों के मानसिक बोझ, तनाव और आसक्तियों को संध्या की अग्नि में होम कर देता है ताकि वह पुनः शून्य और शुद्ध होकर अगले चरण में प्रवेश कर सके।

इस अभ्यास से साधक 'अस्थिरता' से 'स्थिरता' की ओर बढ़ता है। जब वह दिन-रात के पापों (विकारों) से मुक्त होता है, तब उसका हृदय उस दर्पण की भाँति स्वच्छ हो जाता है जिसमें सूर्य-पुरुष का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई दे सके। यह अभ्यास साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि मुक्ति कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर क्षण सजग होकर अपनी चेतना को शुद्ध करने में है।

संध्यामाहात्म्यम्

श्लोक ६.२

संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता ।

जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते ॥ ६.२ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४७

जिसके द्वारा संध्या का विज्ञान न किया गया, जिस संध्या की उपासना नहीं की गई, वह जीवित रहते हुए शूद्र हो जाता है और मरने पर श्वान के रूप में जन्म लेता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्योपासन को अहोरात्र के पापों से मुक्ति का साधन बताया। अब इस श्लोक में वे संध्या के प्रति उदासीनता के गंभीर परिणामों का वर्णन कर रहे हैं, ताकि साधक इसकी अनिवार्यता को समझ सके।

अन्वय और पदार्थ —

येन संध्या न विज्ञाता, येनानुपासिता। (सः) जीवमानो भवेच्छूद्रो, मृतः श्वा चाभिजायते।

पदार्थ:

• येन: जिसके द्वारा (यहाँ 'येन' का सम्बन्ध उस व्यक्ति से है जिसने संध्या के रहस्य को नहीं जाना)।

• न विज्ञाता: जिसका विज्ञान नहीं किया गया (विज्ञान = केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान)।

• येनानुपासिता: जिसकी उपासना नहीं की गई (उपासना = विधिपूर्वक नियमित अभ्यास)।

• जीवमानो: जीवित रहते हुए।

• भवेच्छूद्रो: शूद्र हो जाता है (यहाँ 'शूद्र' शब्द का अर्थ उस व्यक्ति के अपने अधिकार और फल से च्युत होना है; जो संध्या-अधिकार पाकर भी उसका त्याग करता है, वह अपने आध्यात्मिक स्तर से गिरकर कर्म-भ्रष्ट हो जाता है)।

• मृतः: मृत्यु के पश्चात।

• श्वा चाभिजायते: श्वान (कुत्ते) के रूप में जन्म लेता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को चेतावनी देता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर केवल इच्छा पर्याप्त नहीं है, अपितु 'विज्ञान' और 'उपासना' का समन्वय अनिवार्य है। महर्षि यहाँ दो स्थितियों का वर्णन कर रहे हैं: प्रथम, जिसने संध्या के रहस्य को नहीं जाना (विज्ञान का अभाव), और द्वितीय, जिसने जानकर भी उसका अभ्यास नहीं किया (उपासना का अभाव)।

जब ऋषि कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति 'जीवित रहते हुए शूद्र' हो जाता है, तो यहाँ 'शूद्र' शब्द का प्रयोग किसी जाति के लिए नहीं, अपितु एक शास्त्रीय उपमा के रूप में किया गया है। इसका अर्थ है—अपने आध्यात्मिक अधिकार और उससे प्राप्त होने वाले फल से पूरी तरह च्युत हो जाना। जो व्यक्ति संध्या-अधिकार पाकर भी उसका त्याग करता है, वह अपनी उस दैवीय क्षमता और पात्रता से गिर जाता है जो उसे इस जन्म में प्राप्त हुई थी। वह अपनी योग्यता को खोकर कर्म-भ्रष्ट हो जाता है, जिससे वह उस उच्चतर चेतना का अनुभव करने में असमर्थ रहता है जिसके लिए वह दीक्षित हुआ था। यह उसकी अपनी आध्यात्मिक हानि है, क्योंकि उसने उस साधन को त्याग दिया जो उसे अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जा सकता था।

मृत्यु के पश्चात 'श्वान' के रूप में जन्म लेने का रहस्य यह है कि श्वान की प्रवृत्ति केवल वासना और आसक्ति की होती है। जो व्यक्ति जीवन भर संध्या के माध्यम से अपने चित्त का शोधन नहीं करता और अपने भीतर के सूर्य (आत्मा) का साक्षात्कार नहीं करता, उसकी वासनाएँ इतनी प्रबल हो जाती हैं कि वह अगले जन्म में उसी निम्नतम चेतना में गिर जाता है, जहाँ केवल इंद्रिय-तृप्ति ही एकमात्र लक्ष्य रह जाता है। इस प्रकार, संध्या का त्याग केवल एक विधि का त्याग नहीं, अपितु अपनी उच्चतम संभावनाओं का त्याग है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ज्ञान' और 'क्रिया' के अनिवार्य समन्वय का सूत्र है। यहाँ 'विज्ञाता' और 'उपासिता' दो भिन्न सोपान हैं, जिनमें से एक की अनुपस्थिति दूसरे को निष्फल कर देती है:

१. विज्ञान: यह केवल सूचना या बौद्धिक समझ नहीं, अपितु अनुभवजन्य बोध है। संध्या का विज्ञान करने का अर्थ है—यह अनुभव करना कि सूर्य का उदय और अस्त होना केवल बाहरी खगोलीय घटना नहीं, अपितु प्राणों का उत्थान और निगमन है। जब साधक यह जान लेता है कि संध्या का मन्त्र उसके हृदय के सूर्य को जाग्रत करने का साधन है और वह स्वयं उस ज्योति का अंश है, तब वह 'विज्ञानी' कहलाता है।

२. उपासना: केवल यह जान लेना कि "संध्या महान है", पर्याप्त नहीं है। जब उस विज्ञान को अनुशासन, नियम और निरंतरता में बदला जाता है, तब वह 'उपासना' बनती है।

साधक के लिए यहाँ यह गंभीर संकेत है कि यदि उसने संध्या की विधि तो सीखी (उपासना की) परन्तु उसका आन्तर अर्थ नहीं समझा (विज्ञान नहीं किया), तो उसकी साधना यांत्रिक है, जिसमें प्राणों का जागरण नहीं होता। और यदि उसने केवल रहस्य पढ़ लिया (विज्ञान किया) परन्तु अभ्यास नहीं किया (उपासना नहीं की), तो वह ज्ञान केवल शुष्क बौद्धिकता और अहंकार बन जाता है।

अतः, जो केवल क्रिया करता है वह 'कर्मकाण्डी' है, जो केवल जानता है वह 'विद्वान' है, किन्तु जो जानकर क्रिया करता है, वही 'योगी' है। इस श्लोक का अभ्यास साधक को इस भूमि पर ले जाता है कि वह अपनी साधना में 'बोध' और 'अभ्यास' को एक कर दे। जो इस समन्वय से च्युत होता है, वह अपने उस दैवीय अधिकार और आध्यात्मिक फल को खो देता है जो उसे दीक्षित होने से प्राप्त हुआ था। यह उसकी अपनी वह हानि है, जिससे वह उच्चतर चेतना के द्वार खोकर पुनः निम्न प्रवृत्तियों के अधीन हो जाता है।

श्लोक ६.३

नोपतिष्ठति यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् ।

स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥ ६.३ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४७

जो प्रातःकालकी संध्यामें (सूर्यका) उपस्थान नहीं करता और जो सायंकालकी संध्याकी उपासना नहीं करता, वह शूद्रकी भाँति द्विजोंके सब कर्मोंसे बहिष्कृत करने योग्य है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या के विज्ञान और उपासना के अभाव में जीव के पतन का वर्णन किया। अब इस श्लोक में वे उस पतन की व्यावहारिक और शास्त्रीय स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं कि संध्या-त्यागी का द्विज-धर्म में क्या स्थान रह जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

यः पूर्वां नोपतिष्ठति, यश्च पश्चिमाम् नोपास्ते, स सर्वस्माद् द्विजकर्मणः शूद्रवद् बहिष्कार्यः।

पदार्थ:

• पूर्वां: प्रातःकालीन संध्या को (पूर्व दिशा में सूर्य के उदय के समय)।

• नोपतिष्ठति: उपस्थान नहीं करता (उपस्थान = सूर्य के सम्मुख उपस्थित होना; योगिक अर्थ में—चेतना का सूर्य-तत्त्व में स्थित होना)।

• पश्चिमाम्: सायंकाल की संध्या को (पश्चिम दिशा में सूर्य के अस्त के समय)।

• नोपास्ते: उपासना नहीं करता (उपासना = उप + आस; समीप बैठना या निरंतर ध्यान करना)।

• शूद्रवद्: शूद्र की भाँति (यहाँ 'शूद्र' का अर्थ उस अवस्था से है जो ज्ञान और संस्कार के अधिकार से वंचित है)।

• बहिष्कार्यः: बाहर करने योग्य या बहिष्कृत (अपने ही धर्म और अधिकारों से विमुख)।

• सर्वस्माद् द्विजकर्मणः: समस्त द्विज-कर्मों से (वे कर्म जो जन्म और संस्कार द्वारा प्राप्त आध्यात्मिक पात्रता के कारण किए जाते हैं)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-साधना की अनिवार्यता को एक कठोर विधि-निषेध के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य दो विशिष्ट क्रियाओं का उल्लेख कर रहे हैं: प्रातःकाल के लिए 'उपस्थान' और सायंकाल के लिए 'उपासना'।

प्रातःकाल जब सूर्य उदित होता है, तब साधक का 'उपस्थान' करना आवश्यक है। बाहरी रूप से यह सूर्य के सम्मुख खड़े होकर अर्घ्य और जप करना है, किन्तु आन्तरिक रूप से यह अपनी सुप्त चेतना को जाग्रत कर उसे उस 'अदित्य' (सूर्य) में स्थापित करना है, जो ज्ञान का प्रतीक है। वहीं, सायंकाल की 'उपासना' का अर्थ है—दिन भर के प्रसरित मन को पुनः समेटकर उस परम तत्त्व के समीप लाना।

जो व्यक्ति इन दोनों संधियों (संधि-काल) का उपयोग नहीं करता, वह 'शूद्रवद् बहिष्कार्य' कहलाता है। यहाँ 'शूद्र' शब्द सामाजिक जाति का सूचक नहीं, अपितु एक 'अवस्था' का सूचक है। द्विज वह है जिसका दूसरा जन्म (संस्कार द्वारा) हुआ हो। यदि कोई व्यक्ति संस्कार पाकर भी संध्या का त्याग करता है, तो वह अपनी उस पात्रता को खो देता है। वह ज्ञान के मार्ग से विमुख होकर केवल स्थूल कर्मों में लिप्त हो जाता है, इसलिए वह अपने ही आध्यात्मिक परिवार और अधिकारों से 'बहिष्कृत' माना जाता है। यह बहिष्कार समाज द्वारा नहीं, अपितु प्रकृति और धर्म के नियम द्वारा स्वतः घटित होता है क्योंकि बिना संध्या के वह आंतरिक शुद्धि संभव नहीं, जिससे द्विज-कर्मों का फल प्राप्त हो सके।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद्द्विजकर्मणः ॥ २.१०३ ॥

जो प्रातःसन्ध्यामें खड़ा नहीं होता और सायंसन्ध्याकी उपासना नहीं करता, उसे शूद्रकी भाँति सब द्विज-कर्मोंसे बाहर कर देना चाहिए।

मनुस्मृति २.१०३मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 241

मनुस्मृति में भी ठीक इसी विधान का उल्लेख मिलता है कि जो प्रातः संध्या में उपस्थित नहीं होता और सायं की उपासना नहीं करता, उसे शूद्र की भाँति सब द्विज-कर्मों से बाहर कर देना चाहिए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वैदिक परम्परा में संध्या केवल एक रीति नहीं, अपितु द्विजत्व (आध्यात्मिक पात्रता) को बनाए रखने की अनिवार्य शर्त है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संधि-काल' की महत्ता और साधना की 'निरन्तरता' का सूत्र है। प्रातः और सायं का समय वह संधि है जब प्रकृति के गुण परिवर्तित होते हैं और मन बाहरी जगत से हटकर भीतर की ओर मुड़ने के लिए सबसे अधिक संवेदनशील होता है।

साधक के लिए 'उपस्थान' का अर्थ है—अपनी चेतना को सूर्य-मण्डल के प्रकाश (ज्ञान-तत्त्व) से जोड़ना। यदि साधक इस समय उपस्थान नहीं करता, तो वह अपनी चेतना को जाग्रत करने के उस दिव्य अवसर को खो देता है जो उसे उच्च भूमियों की ओर ले जा सकता है। इसी प्रकार, सायं की 'उपासना' का अर्थ है—दिन भर के प्रसरित मन और अनुभवों को पुनः समेटकर आत्म-तत्त्व के समीप लाना।

यहाँ 'शूद्रवद् बहिष्कार्य' होने का योगिक अर्थ यह है कि जो साधक इन संधियों का उपयोग नहीं करता, वह अपनी उस 'आध्यात्मिक पात्रता' को स्वयं ही नष्ट कर लेता है, जो उसे द्विज-कर्मों (सूक्ष्म साधनाओं) के योग्य बनाती थी। यह किसी बाहरी दंड की बात नहीं, अपितु एक स्वाभाविक परिणाम है—जैसे बिना ईंधन के अग्नि प्रज्वलित नहीं हो सकती, वैसे ही बिना संध्या-साधना के वह आंतरिक अग्नि जाग्रत नहीं होती जिससे द्विज-कर्मों का फल प्राप्त हो। वह व्यक्ति अपने ही अधिकार और फल से च्युत हो जाता है।

इस श्लोक का अभ्यास साधक को यह बोध कराता है कि योग केवल एकांत का विषय नहीं, अपितु समय के अनुशासन का विषय है। जो साधक प्रातः और सायं अपनी चेतना को सूर्य-तत्त्व (हृदय के सूर्य) से जोड़ता है, वह अपनी पात्रता को सुरक्षित रखते हुए 'आत्म-साक्षात्कार' की ओर बढ़ता है। इसके विपरीत, संध्या की उपेक्षा साधक को उसकी अपनी ही आध्यात्मिक उन्नति और उच्चतर अनुभूतियों से वंचित कर देती है।

श्लोक ६.४

सर्वावस्थोऽपि यो विप्रः संध्योपासनतत्परः ।

ब्राह्मण्याच्च न हीयेत सोऽन्यजन्मगतोऽपि सन् ॥ ६.४ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४७

जो विप्र सब अवस्थाओंमें भी संध्योपासनमें तत्पर रहता है, वह दूसरे जन्ममें जाकर भी ब्राह्मणत्वसे हीन नहीं होता।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या-त्यागी के पतन और उसके द्विज-कर्मों से बहिष्कृत होने की कठोरता का वर्णन किया। अब इस श्लोक में वे संध्या-परायण विप्र की उस अक्षय स्थिति का प्रतिपादन कर रहे हैं, जो उसे जन्म-मृत्यु के चक्र में भी अपनी आध्यात्मिक पहचान और पात्रता बनाए रखने में सहायक होती है।

अन्वय और पदार्थ —

यो विप्रः सर्वावस्थां अपि संध्योपासनतत्परः, स अन्यजन्मगतोऽपि सन् ब्राह्मण्याच्च न हीयेत।

पदार्थ:

• सर्वावस्थां अपि: समस्त अवस्थाओं में भी (यहाँ अवस्थाओं का अर्थ आयु के सोपान—बाल्य, युवा और वृद्धावस्था, तथा जीवन की अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों से है)।

• संध्योपासनतत्परः: संध्या की उपासना में निरंतर लगा हुआ (तत्पर = पूर्ण निष्ठा और सजगता के साथ संलग्न)।

• अन्यजन्मगतोऽपि सन्: दूसरे जन्म में गया हुआ होने पर भी (पुनर्जन्म की स्थिति में)।

• ब्राह्मण्याच्च: ब्राह्मणत्व से (ब्राह्मणत्व यहाँ केवल जाति नहीं, अपितु उस ज्ञान-संस्कार और पात्रता का बोध है जो ब्रह्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है)।

• न हीयेत: हीन नहीं होता या नष्ट नहीं होता (हीयते = कम होना या गिरना)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधना की निरंतरता और उसके संस्कार-फल की अमरता को रेखांकित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि संध्या केवल एक दैनिक क्रिया नहीं, अपितु एक ऐसा संस्कार है जो साधक के सूक्ष्म शरीर में अंकित हो जाता है।

'सर्वावस्था' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधारणतः मनुष्य अपनी अवस्था के अनुसार कर्म बदलता है—बाल्य में खेल, युवावस्था में संग्रह और वृद्धावस्था में विरक्ति। किन्तु जो विप्र अपनी आयु के प्रत्येक चरण में और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में 'संध्योपासन' में तत्पर रहता है, वह अपनी चेतना को सूर्य-तत्त्व (परमात्मा) से जोड़ना नहीं छोड़ता। जब साधक जीवन भर इस अनुशासन में रहता है, तो संध्या उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाती है।

यहाँ 'ब्राह्मणत्व' का अर्थ केवल जन्मजात कुल से नहीं, बल्कि उस 'ब्रह्म-भाव' से है जो संध्या के माध्यम से जागृत होता है। स्मृति का यह वचन संकेत करता है कि आध्यात्मिक पात्रता नष्ट नहीं होती। यदि कोई विप्र इस जीवन में संध्या के प्रति पूर्णतः समर्पित रहा है, तो वह संस्कार उसके साथ अगले जन्म में भी जाता है। वह दूसरे जन्म में किसी ऐसी स्थिति में नहीं गिरता जहाँ वह ज्ञान के मार्ग से वंचित हो जाए। यह विधान दर्शाता है कि श्रद्धा और अभ्यास का बीज कभी नष्ट नहीं होता; वह केवल सुप्त अवस्था में जा सकता है, किन्तु समाप्त नहीं होता।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार' और 'वासना' के सिद्धांत पर आधारित है। संध्या का अभ्यास जब 'तत्परता' (निरन्तरता) के साथ किया जाता है, तो वह केवल एक बाह्य क्रिया न रहकर एक 'योगज संस्कार' बन जाता है।

साधक जब प्रातः, मध्याह्न और सायं—इन संधि-कालों में अपनी चेतना को अक्षर (ओंकार) और गायत्री के माध्यम से केंद्रित करता है, तो उसके हृदय और मन में एक सूक्ष्म ज्योति प्रदीप्त होती है। यह ज्योति ही उसका वास्तविक 'ब्राह्मणत्व' है। योगिक अभ्यास का नियम है कि जो अभ्यास वर्तमान जन्म में पूर्णता की ओर बढ़ता है, वह अगले जन्म में उसी बिंदु से आरम्भ होता है जहाँ वह छूटा था।

इस श्लोक से साधक यह अनुभव करता है कि उसकी साधना व्यर्थ नहीं जा रही है। जब वह सब अवस्थाओं में—चाहे वह रोग में हो, शोक में हो या सुख में—संध्या का आश्रय लेता है, तो वह अपने चित्त को 'अविनाशी' बना रहा होता है। वह अभ्यास करता है कि उसकी चेतना शरीर के परिवर्तन (मृत्यु) से प्रभावित न हो। जिस प्रकार सूर्य अस्त होकर पुनः उदित होता है, उसी प्रकार संध्या-परायण साधक का ज्ञान-संस्कार शरीर बदलने के बाद भी पुनः प्रस्फुटित होता है। यह श्लोक साधक को 'निरन्तरता' की भूमि से 'स्थिरता' की भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ साधना शरीर से ऊपर उठकर आत्मा का स्वभाव बन जाती है।

श्लोक ६.५

ओंकारो व्याहृतीः सप्त गायत्री सशिरास्तथा ।

आपोहिष्ठा ऋचस्तिस्रः सूक्तं चैवाघमर्षणम् ॥ ६.५ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४७

ओंकार, सात व्याहृतियाँ, शिरस् सहित गायत्री, "आपो हि ष्ठा" आदि तीन ऋचाएँ और अघमर्षण सूक्त —

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्योपासन की अनिवार्यता और उसके त्याग से होने वाले पतन का वर्णन किया। अब वे इस उपासना की आंतरिक संरचना को स्पष्ट कर रहे हैं कि वास्तव में 'संध्या' किन तत्वों का समुच्चय है, जिससे साधक की शुद्धि और रक्षा सुनिश्चित होती है।

अन्वय और पदार्थ —

(संध्यायाः अङ्गानि) ओंकारः, व्याहृतयः सप्त, सशिरा गायत्री, तिस्रः आपोहिष्ठा ऋचः, अघमर्षणं च सूक्तम् (इति सन्ध्यानिर्णयः)।

पदार्थ:

• ओंकारः: प्रणव (ॐ), जो समस्त मन्त्रों का बीज और ब्रह्म का प्रतीक है।

• व्याहृतयः सप्त: सात व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः, आदि), जो विभिन्न लोकों और चेतना के स्तरों के द्वार हैं।

• सशिरा गायत्री: 'शिरस्' सहित गायत्री। यहाँ 'शिरस्' का अर्थ प्रणव (ॐ) और व्याहृतियों से है। जब गायत्री मन्त्र के आरम्भ में ओंकार और व्याहृति जोड़े जाते हैं, तब वह 'सशिरा' (मस्तक सहित) कहलाता है।

• आपोहिष्ठा ऋचस्तिस्रः: 'आपो हि ष्ठा' से आरम्भ होने वाली तीन ऋचाएँ, जो जल-तत्व की शुद्धि और दैवीय गुणों के आह्वान के लिए हैं।

• अघमर्षणम्: 'अघ' (पाप) का 'मर्षण' (मिटाना या रगड़कर साफ़ करना) करने वाला सूक्त।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-उपासना के बाह्य स्वरूप और उसके मन्त्र-विन्यास का निर्धारण करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ केवल एक विधि नहीं बता रहे, अपितु एक आध्यात्मिक सीढ़ी का निर्माण कर रहे हैं।

संध्या का आरम्भ 'ओंकार' से होता है, क्योंकि बिना बीज के वृक्ष नहीं उगता। ओंकार वह परम अक्षर है जो साधक को स्थूल जगत से हटाकर सूक्ष्म की ओर ले जाता है। उसके पश्चात 'सात व्याहृतियाँ' आती हैं। ये व्याहृतियाँ केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु चेतना के वे सोपान हैं जो साधक को पृथ्वी (भूः), अन्तरिक्ष (भुवः) और स्वर्ग (स्वः) के पार ले जाकर उस परम सत्ता से जोड़ती हैं।

ततपश्चात 'सशिरा गायत्री' का विधान है। गायत्री मन्त्र को 'शिरस्' (मस्तक) प्रदान करना यह दर्शाता है कि बिना प्रणव और व्याहृति के गायत्री केवल एक प्रार्थना है, किन्तु उनके साथ जुड़कर वह एक पूर्ण 'पुरुष' या 'शरीर' बन जाती है, जिसमें ओंकार मस्तक है और गायत्री हृदय। यह पूर्णता ही साधक की बुद्धि को प्रेरित करने में सक्षम होती है।

इसके उपरान्त 'आपो हि ष्ठा' की तीन ऋचाओं का उल्लेख है। जल केवल शरीर की शुद्धि का साधन नहीं है, अपितु यह प्राणों की तरलता और मन की निर्मलता का प्रतीक है। इन ऋचाओं के द्वारा साधक अपने भीतर के 'आन्तरिक जल' (सोम) को जाग्रत करता है। अंत में 'अघमर्षण सूक्त' का विधान है, जो संचित संस्कारों और मानसिक मलिनता का क्षालन करता है। इस प्रकार ओंकार से शुरू होकर अघमर्षण तक की यह यात्रा साधक को शून्य से पूर्णता की ओर ले जाती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ २.७८ ॥

इस अक्षर (ॐ) का और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (सावित्री) का दोनों सन्ध्याओंमें जप करनेवाला वेदवेत्ता विप्र वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है।

मनुस्मृति २.७८मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 177

मनुस्मृति में भी संध्या के इन्हीं अंगों की पुष्टि की गई है। वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि जो विप्र ओंकार और व्याहृतियों के साथ सावित्री का जप करता है, वह वेद-पुण्य से युक्त होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि संध्या की पूर्णता उसके मन्त्र-विन्यास (ओंकार → व्याहृति → गायत्री) में ही निहित है। भेद केवल इतना है कि यहाँ याज्ञवल्क्य ऋषि ने 'आपो हि ष्ठा' और 'अघमर्षण' को जोड़कर इसे एक पूर्ण योगिक प्रक्रिया बना दिया है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक 'क्रमिक आरोहण' है। पिछले अध्यायों (२ से ५) में जो ओंकार, व्याहृति, गायत्री और न्यास का अलग-अलग विवेचन किया गया था, वह वास्तव में इसी संध्या-साधना की तैयारी थी।

योगिक अभ्यास में साधक जब ओंकार का उच्चारण करता है, तो वह अपनी चेतना को केन्द्रित करता है। सात व्याहृतियों के जप से वह अपनी प्राण-शक्ति को विभिन्न स्तरों पर संतुलित करता है। 'सशिरा गायत्री' का जप करते समय वह अनुभव करता है कि उसका मस्तक (ओंकार) और उसकी बुद्धि (गायत्री) एक हो गए हैं। 'आपो हि ष्ठा' के समय वह अपने भीतर के अमृत-तत्व का अनुभव करता है और अघमर्षण के समय वह अपने चित्त को दर्पण की भाँति स्वच्छ कर लेता है।

यह प्रक्रिया साधक को 'स्थूल' (शरीर) से 'सूक्ष्म' (प्राण), 'सूक्ष्म' से 'कारण' (मन) और अंततः 'अक्षर' (ब्रह्म) की भूमि तक ले जाती है। यहाँ बाहरी मन्त्रों का जप वास्तव में भीतर के सूर्य (आत्मा) को जाग्रत करने का साधन है।

श्लोक ६.६

आदित्यरक्षणार्थं तु सायंप्रातर्दिने दिने ।

सृष्टं स्वयंभुवा पूर्वं ब्राह्मणानां मुखे स्थितम् ॥ ६.६ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४८

— (यह संध्या-कर्म) प्रतिदिन सायं और प्रातः सूर्यकी रक्षाके लिए पूर्वकालमें स्वयम्भूने रचा, (और यह) ब्राह्मणोंके मुखमें स्थित है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या के बाह्य अंगों—ओंकार, व्याहृतियों, गायत्री, ऋचाओं और अघमर्षण सूक्त का विवरण दिया। अब वे इस संपूर्ण समुच्चय के प्रयोजन और उसकी उत्पत्ति के रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं कि यह विधि वास्तव में किसके लिए और क्यों रची गई।

अन्वय और पदार्थ —

(एतत् कर्म) आदित्यरक्षणार्थं तु सायंप्रातर्दिने दिने, पूर्वं स्वयंभुवा सृष्टं, (तद्) ब्राह्मणानां मुखे स्थितम् ।

पदार्थ:

• आदित्यरक्षणार्थं: आदित्य (सूर्य) की रक्षा के लिए। यहाँ 'रक्षण' का अर्थ केवल बाहरी सुरक्षा नहीं, अपितु सूर्य के तेज और उसकी मर्यादा का अक्षुण्ण रहना है।

• सायंप्रातर्दिने दिने: प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल। 'दिने दिने' शब्द निरंतरता और अनुशासन का बोध कराता है।

• स्वयंभुवा: स्वयंभू (ब्रह्मा) द्वारा। जो स्वयं से उत्पन्न हुआ, वह परम चेतना।

• ब्राह्मणानां मुखे स्थितम्: ब्राह्मणों के मुख में स्थित है। यहाँ 'मुख' केवल बोलने वाले अंग का प्रतीक नहीं, अपितु 'वाक्-शक्ति' और 'संस्कार' का केंद्र है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-कर्म के प्रयोजन को 'आदित्यरक्षण' से जोड़ता है। प्रथम दृष्टि में यह विचित्र प्रतीत होता है कि एक मनुष्य का संध्या-कर्म उस विराट सूर्य की रक्षा कैसे कर सकता है, जो समस्त जगत को प्रकाश देता है? किंतु यहाँ 'आदित्य' के दो अर्थ हैं—एक वह बाह्य सूर्य जो आकाश में देदीप्यमान है, और दूसरा वह 'आन्तरिक सूर्य' (हृदय-ज्योति) जो साधक के भीतर स्थित है।

महर्षि याज्ञवल्क्य संकेत दे रहे हैं कि यह विधि स्वयम्भू ने पूर्वकाल में इसलिए रची ताकि सूर्य का तेज लुप्त न हो। बाह्य स्तर पर, संध्या-उपासना से ब्रह्मांडीय ऊर्जा और मानवीय चेतना के बीच एक सेतु बनता है, जिससे सूर्य की किरणों का शुभ प्रभाव पृथ्वी पर बना रहता है। आन्तरिक स्तर पर, साधक जब संध्या करता है, तो वह अपने भीतर के 'आदित्य' (ज्ञान-पुरुष) की रक्षा करता है ताकि अविद्या का अंधकार उसे ढँक न ले।

"ब्राह्मणानां मुखे स्थितम्" का गहरा रहस्य यह है कि यह विद्या केवल शब्दों का रटन नहीं, अपितु एक जीवंत परंपरा है। ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को जानता है। यह संध्या-विद्या उनके मुख में 'स्थित' है, अर्थात यह उनके अस्तित्व, उनके संस्कार और उनकी वाणी का अभिन्न अंग बन चुकी है। यह इस बात का प्रमाण है कि संध्या केवल एक क्रिया नहीं, अपितु एक 'अवस्था' है जिसे साधक अपनी वाणी और प्राण के माध्यम से धारण करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'आदित्यरक्षणार्थम्' का अर्थ है—अपनी चेतना के प्रकाश को सुरक्षित रखना। साधक के लिए सूर्य केवल एक ग्रह नहीं, अपितु 'प्राण' और 'तेज' का प्रतीक है। प्रतिदिन प्रातः और सायं, जब प्रकृति में संधि-काल होता है, तब मन अत्यंत चंचल और अस्थिर होता है। इस समय यदि साधक संध्या के मन्त्रों और विधि में स्थित नहीं होता, तो उसकी मानसिक ऊर्जा (आन्तरिक सूर्य) बिखर जाती है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि वह केवल एक पूजा नहीं कर रहा, अपितु वह उस विराट सौर-ऊर्जा के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर रहा है। 'दिने दिने' का अभ्यास साधक को अनुशासन की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह अपनी इन्द्रियों के बिखराव को रोककर उन्हें एक केंद्र (सूर्य) पर एकाग्र करना सीखता है। जब यह विद्या 'मुख में स्थित' होती है, तो साधक की वाणी में सत्य और तेज का वास हो जाता है, और वह बाह्य जगत के अंधकार से ऊपर उठकर अपने हृदय-सूर्य के प्रकाश में स्थित हो जाता है। आगामी श्लोकों (६.१२-१५) में आने वाली मन्देह राक्षस की कथा इसी 'रक्षण' के स्थूल रूप का संकेत है, किंतु योगी के लिए यह रक्षा 'अविद्या' रूपी राक्षसों से अपने 'विवेक-सूर्य' को बचाने की प्रक्रिया है।

श्लोक ६.७

सातत्यं कर्म विप्राणामहोरात्राघसो(घनो)दनम् ।

पापं तु जायते तस्मादनार्तस्तन्न चोत्सृजेत् ॥ ६.७ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४८

विप्रोंका यह निरन्तर (किया जानेवाला) कर्म दिन-रातके पापोंको दूर करनेवाला है; इसे छोड़नेसे पाप होता है, इसलिए जो पीड़ित (असमर्थ) न हो, वह इसे न छोड़े।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या-कर्म की उत्पत्ति और उसके उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए बताया कि यह विधि स्वयम्भू द्वारा सूर्य की रक्षा के लिए रची गई और ब्राह्मणों के मुख (वाक्-संस्कार) में प्रतिष्ठित की गई। अब वे इस कर्म की अनिवार्यता और उसकी निरंतरता के फल का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(एतत्) विप्राणाम् (एतत्) सातत्यं कर्म, अहोरात्र-अघसो (अघानि) दनम् । तस्मात् (एतत्) पापं तु जायते, (अतः) यः अनार्तस्तन्न च उत्सृजेत् ।

पदार्थ:

• सातत्यं कर्म: निरंतर किया जाने वाला कर्म। यहाँ 'सातत्य' का अर्थ केवल समय की निरंतरता नहीं, अपितु साधना की अविच्छिन्नता है।

• अहोरात्र-अघसो दनम्: दिन और रात के पापों का नाश करने वाला। 'अघ' का अर्थ है वह दोष या मल जो चेतना को ढँक लेता है। 'दनम्' का अर्थ है दहन करना या नष्ट करना।

• अनार्त: जो पीड़ित न हो। 'आर्त' वह है जो शारीरिक व्याधि, घोर मानसिक शोक या ऐसी अपरिहार्य परिस्थिति में हो जहाँ कर्म करना असंभव हो।

• उत्सृजेत्: त्याग दे या छोड़ दे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-उपासना को एक 'दहन-प्रक्रिया' के रूप में प्रस्तुत करता है। महर्षि कहते हैं कि विप्रों के लिए यह कर्म 'सातत्य' (निरन्तरता) का विषय है। जिस प्रकार अग्नि निरंतर प्रज्वलित रहने पर ही अशुद्धियों को जला पाती है, उसी प्रकार संध्या का नियमित अभ्यास साधक के भीतर संचित 'अहोरात्र-अघ' अर्थात् दिन और रात में अनजाने में हुए मानसिक और वाचिक दोषों को भस्म कर देता है।

यहाँ 'पाप' का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु वह 'मल' है जो साधक की अंतर्दृष्टि को धुंधला करता है। दिन की भागदौड़ और रात के निद्रा-मोह में जो संस्कार चित्त पर जम जाते हैं, संध्या-कर्म उन्हें धोकर आत्मा को पुनः निर्मल करता है।

महर्षि एक गंभीर चेतावनी देते हैं कि इस निरंतरता को तोड़ना स्वयं में एक 'पाप' (दोष) का सृजन है। इसका कारण यह है कि जब साधक एक स्थापित लय को तोड़ता है, तो वह पुनः उसी जड़ता और अविद्या की ओर झुक जाता है जहाँ से वह निकल आया था। अतः, जो 'अनार्त' है—अर्थात् जिसे कोई ऐसी विवशता या शारीरिक कष्ट नहीं है जो उसे इस कर्म से रोके—उसे किसी भी परिस्थिति में इस साधना का परित्याग नहीं करना चाहिए। यह निर्देश स्पष्ट करता है कि साधना में अनुशासन ही उसकी शक्ति है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ २.१०२ ॥

प्रातःसन्ध्यामें खड़े होकर (सावित्रीका) जप करनेवाला रातके पापको दूर करता है, और सायंसन्ध्यामें बैठकर (जप करनेवाला) दिनमें किये मलको नष्ट करता है।

मनुस्मृति २.१०२मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 241

मनुस्मृति में भी इसी भाव की पुष्टि की गई है कि प्रातःकालीन संध्या रात्रि के पापों को और सायंकालीन संध्या दिन के मल को नष्ट करती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार को और सूक्ष्म बनाती है; जहाँ मनुस्मृति इसे 'मल' और 'पाप' के विलोपन के रूप में देखती है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे 'सातत्य' (निरंतरता) से जोड़कर एक योगिक अनुशासन का रूप देते हैं। दोनों शास्त्रों का मत एक है कि संध्या केवल एक अनुष्ठान नहीं, अपितु चित्त की शुद्धि का अनिवार्य साधन है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधना-निरंतरता' के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है। साधक के लिए 'अघ' का अर्थ है—चित्त की वह चंचलता और तामसिकता जो उसे अक्षर (ब्रह्म) से दूर ले जाती है।

यहाँ 'अनार्त' शब्द का गहरा रहस्य है। योगमार्ग में 'आर्त' वह है जो वास्तव में विवश है, किंतु आलस्य, प्रमाद या सांसारिक आसक्ति को 'आर्तता' मान लेना साधक की सबसे बड़ी भूल है। महर्षि याज्ञवल्क्य संकेत दे रहे हैं कि शारीरिक रुग्णता या घोर संकट में यदि कर्म संभव न हो, तो वह छूट स्वीकार्य है, किंतु मानसिक शिथिलता के कारण संध्या का त्याग करना साधक को पुनः निम्न भूमि पर ले जाता है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि संध्या-कर्म वास्तव में उसके भीतर के 'आन्तरिक सूर्य' का प्रज्वलन है। जैसे सूर्योदय और सूर्यास्त के समय प्रकृति में संधि होती है, वैसे ही साधक इन दो समयों पर अपने प्राण और मन को स्थिर कर, बाहरी जगत से हटकर अपने हृदय-आकाश की ओर मुड़ता है। यह अभ्यास उसे 'स्थूल' (दिन-रात के कर्म) से 'सूक्ष्म' (अक्षर) की ओर ले जाने वाली एक सेतु-रचना है। जो इस सेतु को निरंतर बनाए रखता है, वह अविद्या के अंधकार से मुक्त होकर ज्योतिर्मयता की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ६.८

अनार्तश्चोत्सृजेद्यस्तु स विप्रः शूद्रसंमितः ।

प्रायश्चित्तीभवेद्विप्रो लोके भवति निन्दितः ॥ ६.८ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४८

जो पीड़ित न होते हुए भी इसे छोड़ता है, वह विप्र शूद्रके समान है; वह विप्र प्रायश्चित्तका भागी होता है और लोकमें निन्दित होता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या-कर्म की निरंतरता पर बल देते हुए इसे दिन-रात के पापों का दहन करने वाला बताया और निर्देश दिया कि जो पीड़ित न हो, उसे इस कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। वर्तमान श्लोक में वे उसी निर्देश के उल्लंघन का परिणाम और उसके आध्यात्मिक व सामाजिक प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यस्तु अनार्तः (एतत्) उत्सृजेत्, स विप्रः शूद्रसंमितः (भवति) । (सः) विप्रो प्रायश्चित्ती-भवेत्, (तथा) लोके निन्दितः भवति ।

पदार्थ:

• अनार्त: जो पीड़ित न हो। यहाँ 'आर्त' का अर्थ शारीरिक व्याधि, घोर संकट या ऐसी विवशता है जिसमें शरीर और मन साधना के योग्य न रहे। अतः 'अनार्त' वह है जो पूर्णतः समर्थ और स्वस्थ है।

• उत्सृजेत्: त्याग दे या छोड़ दे। विधि का विस्मरण या उपेक्षा करना।

• शूद्रसंमितः: शूद्र के समान। यहाँ इसका अर्थ उस अधिकार और फल से च्युत होना है जो एक विप्र के लिए निर्धारित है। विप्र का धर्म ज्ञान और उपासना है; जब वह इसे छोड़ता है, तो वह उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ उपासना का अधिकार नहीं होता, अतः वह विप्र होते हुए भी फल और मर्यादा में शूद्र के समान हो जाता है।

• प्रायश्चित्ती-भवेत्: प्रायश्चित्त का भागी बने। मर्यादा के उल्लंघन से जो दोष लगता है, उसकी शुद्धि के लिए उसे अनिवार्यतः प्रायश्चित्त करना पड़ेगा।

• निन्दितः: निंदा का पात्र। अपने स्वधर्म का परित्याग करने के कारण वह लोक में तिरस्कृत होता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक अनुशासन की कठोरता को रेखांकित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि संध्या केवल एक बाहरी विधि नहीं, अपितु विप्र (जो प्रज्ञावान है) का स्वभाव है। जब कोई साधक 'अनार्त' होते हुए—अर्थात् जब उसके पास समय, स्वास्थ्य और साधन उपलब्ध हों—फिर भी आलस्य, प्रमाद या उपेक्षावश इस साधना को छोड़ देता है, तो वह अपनी उस विशिष्ट चेतना का ह्रास कर लेता है जो उसे 'विप्र' बनाती है।

यहाँ 'शूद्रसंमित' कहने का गहरा रहस्य यह है कि विप्र वह है जो 'वि' (विशेष) 'प्र' (प्रकृष्ट) ज्ञान में स्थित है। जब वह ज्ञान-साधना (संध्या) को छोड़ता है, तो वह उस अवस्था में गिर जाता है जहाँ केवल जड़ कर्म और अज्ञान का वास है। यह पतन सामाजिक नहीं, अपितु चेतना का पतन है।

स्मृति का यह वचन कि वह 'लोके निन्दितः' होगा, इस सत्य को उद्घाटित करता है कि जो व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक मर्यादा का उल्लंघन करता है, उसकी आभा मलिन हो जाती है, जिससे वह स्वाभाविक रूप से दूसरों के लिए और स्वयं के लिए अनादर का पात्र बन जाता है। 'प्रायश्चित्त' की अनिवार्यता यह दर्शाती है कि संध्या का त्याग करने से हृदय में जो 'तमस' या अवरोध उत्पन्न होता है, उसे हटाने के लिए विशेष पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से संध्या एक 'संस्कार-शुद्धि' की प्रक्रिया है। साधक जब निरंतरता (सातत्य) को तोड़ता है, तो उसके भीतर एक 'विच्छेद' उत्पन्न होता है। यह विच्छेद मानसिक बिखराव पैदा करता है, जिससे एकाग्रता का क्षय होता है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि साधना में 'निरंतरता' ही उसकी शक्ति है। जो बिना किसी विवशता के अभ्यास छोड़ता है, वह अपनी 'भूमि' से नीचे गिर जाता है। वह जिस उच्चतर चेतना की अवस्था (विप्रत्व) को प्राप्त कर चुका था, वहाँ से गिरकर पुनः अविद्या की उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ केवल स्थूल जगत का मोह शेष रहता है। अतः साधक के लिए अभ्यास का नियम यह है कि चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, यदि वह 'आर्त' (असमर्थ) नहीं है, तो उसे अपने संकल्प को अक्षुण्ण रखना चाहिए। यह संकल्प ही उसे जड़ता से मुक्त कर अक्षर की ओर ले जाता है।

श्लोक ६.९

यावन्तोऽस्यां पृथिव्यां तु विकर्मस्था द्विजातयः ।

तेषां तु पावनार्थाय संध्या सृष्टा स्वयंभुवा ॥ ६.९ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४८

इस पृथ्वीपर जितने द्विज विकर्म (निषिद्ध कर्म) में स्थित हैं, उनको पवित्र करनेके लिए स्वयम्भूने संध्याकी रचना की।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या-कर्म के त्याग को विप्र के लिए घोर दोषपूर्ण बताया और उसे शूद्र-समान तथा निंदनीय माना। अब वर्तमान श्लोक में वे इस कठोरता के पीछे छिपी करुणा और संध्या की वास्तविक प्रयोजन-शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यावन्तः (ये) द्विजातयः तु अस्मिन् पृथिव्यां विकर्मस्था (सन्ति), तेषाम् पावनार्थाय तु (एषः) संध्या स्वयंभुवा सृष्टा ।

पदार्थ:

• विकर्मस्था: 'विकर्म' अर्थात् वे कर्म जो शास्त्र-विरुद्ध, निषिद्ध या धर्म-विरुद्ध हों। 'विकर्मस्थ' वह व्यक्ति है जो अज्ञानवश या वासनावश ऐसे कर्मों में लिप्त हो गया है जिससे उसकी आंतरिक शुद्धि नष्ट हो गई है।

• द्विजातयः: द्विज। यहाँ इसका अर्थ केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं, अपितु वे सभी हैं जिन्होंने उपनयन संस्कार के माध्यम से ज्ञान-मार्ग में प्रवेश किया और जिन्हें सत्य और ऋत के पालन का दायित्व सौंपा गया।

• पावनार्थाय: पवित्र करने के लिए। 'पावन' का अर्थ केवल बाहरी शुद्धि नहीं, अपितु चित्त के मैल (मल) का क्षय करना है।

• स्वयंभुवा: स्वयं उत्पन्न होने वाले परमात्मा (ब्रह्म) द्वारा।

• सृष्टा: रचना की गई या प्रणीत की गई।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-उपासना के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और करुणामयी पक्ष को उजागर करता है। पिछले श्लोकों में संध्या के त्याग पर जो कठोर चेतावनी दी गई थी, वह साधक को अनुशासन में रखने के लिए थी; किंतु यहाँ ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि संध्या केवल 'शुद्ध' व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि 'अशुद्ध' हो चुके विप्रों के लिए भी एक संजीवनी है।

भाव यह है कि इस पृथ्वी पर ऐसे अनेक द्विज हैं जो किसी कारणवश—चाहे वह मोह हो, क्रोध हो या अज्ञान—'विकर्म' में गिर गए हैं। विकर्म से चित्त में जो तामसिकता और रजस का संचय होता है, वह साधक के और परमात्मा के बीच एक अवरोध बन जाता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या एक बार विकर्म में गिरा हुआ व्यक्ति पुनः अपनी पवित्रता प्राप्त कर सकता है? महर्षि याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं कि इसी उद्देश्य के लिए स्वयंभु (परमात्मा) ने 'संध्या' की रचना की है।

संध्या यहाँ एक 'शोधन-यज्ञ' के रूप में प्रस्तुत है। जिस प्रकार अग्नि सोने की अशुद्धियों को जलाकर उसे कुंदन बना देती है, उसी प्रकार संध्या का नियमित अभ्यास विकर्मस्थ व्यक्ति के अंतःकरण को धोकर उसे पुनः साधना के योग्य बनाता है। यह इस सत्य का उद्घोष है कि आध्यात्मिक पतन अंतिम नहीं है; शुद्धि का द्वार सदैव खुला है। संध्या वह सेतु है जो एक पतित विप्र को पुनः उसकी मूल प्रज्ञा और पवित्रता से जोड़ता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' की प्रक्रिया का वर्णन करता है। साधक के लिए इसका गूढ़ अर्थ यह है कि संध्या केवल एक समय की पूजा नहीं, बल्कि प्रतिदिन उपलब्ध होने वाला एक 'शुद्धिकरण-अवसर' है।

साधक जब विकर्म में होता है, तो उसका मन विखरा हुआ और प्राण अस्थिर होते हैं। संध्या का अभ्यास—जिसमें ओंकार, व्याहृति और गायत्री का समन्वय है—साधक के भीतर एक ऐसी लय पैदा करता है जो मानसिक विकारों को काटती है। यहाँ 'पावन' होने का अर्थ है—चित्त का वह स्तर प्राप्त करना जहाँ से पुनः ध्यान और समाधि की यात्रा संभव हो सके।

अभ्यास की दृष्टि से, जो साधक स्वयं को दोषपूर्ण या पापग्रस्त अनुभव करता है, उसके लिए यह श्लोक आश्वासन है कि वह निराश न हो। वह प्रतिदिन तीन समय संध्या का अभ्यास करके अपने भीतर के 'सूर्य' (आत्म-ज्योति) को जाग्रत करे। जब वह गायत्री के मंत्र और ओंकार के नाद में लीन होता है, तो वह धीरे-धीरे 'विकर्म' की भूमि से उठकर 'धर्म' की भूमि पर आता है। यह अभ्यास उसे इस अनुभव की ओर ले जाता है कि परमात्मा की कृपा (स्वयंभु की रचना) उसके दोषों से कहीं अधिक बड़ी है। इस प्रकार, संध्या साधक को 'मलिनता' से 'निर्मलता' की ओर और 'अंधकार' से 'प्रकाश' की ओर ले जाने वाला दैनिक साधन है।

श्लोक ६.१०

या संध्या सा तु गायत्री त्रिधा भूत्वा प्रतिष्ठिता ।

संध्या ह्युपासिता येन तेन विष्णुरुपासितः ॥ ६.१० ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४८

जो संध्या है, वही गायत्री है, (जो) तीन रूपोंमें होकर प्रतिष्ठित है। जिसने संध्याकी उपासना की, उसने विष्णुकी उपासना कर ली।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि संध्या-कर्म की रचना उन द्विजों के पावन हेतु की गई है जो विकर्म में स्थित हो गए हैं। अब इस श्लोक में वे संध्या के स्वरूप की सूक्ष्मता और उसकी अधिष्ठात्री शक्ति के साथ उसके तादात्म्य को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

या संध्या (अस्ति), सा तु गायत्री त्रिधा भूत्वा प्रतिष्ठिता । येन (सह) संध्या ह्युपासिता, तेन विष्णुरुपासितः ।

पदार्थ:

• त्रिधा भूत्वा: तीन रूपों में होकर। यहाँ 'त्रिधा' संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु संध्या के तीन कालखंडों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) और गायत्री के तीन चरणों (पदों) के परस्पर सम्बन्ध का संकेत है।

• प्रतिष्ठिता: स्थित या प्रतिष्ठित। जो केवल क्रिया नहीं, अपितु एक शाश्वत सत्ता के रूप में स्थापित है।

• उपासिता: उपासना की गई। उपासना का अर्थ है 'उप' (समीप) + 'आस' (बैठना), अर्थात् उस सत्ता के समीप स्थित होकर एकाकार होना।

• विष्णुः: सर्वव्यापक परमात्मा। वह तत्व जो समस्त चराचर में व्याप्त है और जिसे 'विष्णु' कहा गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या और गायत्री के अभेद को सिद्ध करता है। ऋषि कहते हैं कि जिसे हम 'संध्या' (समय और विधि) कहते हैं, वह वास्तव में 'गायत्री' ही है। गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु वह चैतन्य शक्ति है जो तीन रूपों में प्रतिष्ठित है।

भाव यह है कि संध्या के तीन समय—प्रातः, मध्याह्न और सायं—वास्तव में गायत्री के ही तीन स्वरूप हैं। जब साधक इन तीन समयों पर उपासना करता है, तो वह वास्तव में उस एक ही गायत्री-शक्ति के तीन आयामों का अनुभव करता है। बाहरी दृष्टि से यह समय का विभाजन है, किंतु आन्तरिक दृष्टि से यह एक ही प्रकाश-पुंज का तीन अवस्थाओं में दर्शन है।

श्लोक का दूसरा चरण एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोलता है: "जिसने संध्या की उपासना की, उसने विष्णु की उपासना कर ली।" यहाँ विष्णु का अर्थ केवल चतुर्भुज रूपी देवता नहीं, अपितु वह 'विष्णु-तत्त्व' है जो सर्वव्यापी है। संध्या का अर्थ है 'संधि'—दो अवस्थाओं का मिलन। जब साधक दिन और रात्रि के संधि-काल में स्थित होकर स्वयं को उस विराट सत्ता से जोड़ता है, तो वह उस सर्वव्यापक विष्णु-तत्त्व में ही विलीन हो जाता है। अतः संध्या-उपासना कोई यांत्रिक कर्मकांड नहीं, अपितु सर्वव्यापक परमात्मा के साथ एकाकार होने की एक विधि है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'एकत्व' के अनुभव का है। साधक जब प्रातः, मध्याह्न और सायं की तीन संध्याओं का अभ्यास करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि ये तीन अलग-अलग क्रियाएँ नहीं हैं, अपितु एक ही गायत्री-शक्ति के तीन रूप हैं।

योगिक अभ्यास में यह 'त्रिधा' प्रतिष्ठा साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है। प्रातः की संध्या जाग्रत अवस्था का, मध्याह्न की संध्या प्रखर प्रकाश (ज्ञान) का और सायं की संध्या अंतर्मुखी होने का प्रतीक है। जब साधक इन तीनों को एक ही सूत्र (गायत्री) में पिरोता है, तो वह 'विष्णु-भाव' में प्रतिष्ठित होता है। विष्णु का अर्थ है—वह जो सर्वत्र व्याप्त है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जिस प्रकाश को वह सूर्य में देख रहा है, वही प्रकाश उसके हृदय में है और वही सर्वत्र व्याप्त है। इस प्रकार, संध्या-उपासना के माध्यम से साधक अपनी सीमित देह-चेतना से उठकर सर्वव्यापी विष्णु-चेतना की भूमि तक जाता है।

श्लोक ६.११

ह्रासवृद्धी तु सततं दिवसानां यथाक्रमम् ।

संध्या मुहूर्तमात्रं तु ह्रासे वृद्धौ तु सा समा ॥ ६.११ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४८

दिनोंका घटना-बढ़ना तो क्रमसे निरन्तर होता रहता है; पर संध्या मुहूर्तमात्र (की) है — घटने और बढ़नेमें वह समान रहती है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या और गायत्री के अभेद को सिद्ध करते हुए बताया कि संध्या की उपासना वास्तव में सर्वव्यापक विष्णु की उपासना है। अब इस श्लोक में वे संध्या के समय की स्थिरता और उसकी विशिष्टता को स्पष्ट कर रहे हैं कि वह भौतिक समय के उतार-चढ़ाव से किस प्रकार भिन्न है।

अन्वय और पदार्थ —

दिवसानां ह्रासवृद्धी तु यथाक्रमम् सततं (भवति) । संध्या तु मुहूर्तमात्रं (अस्ति), सा ह्रासे वृद्धौ च समा (अस्ति) ।

पदार्थ:

• ह्रासवृद्धी: ह्रास (घटना) और वृद्धी (बढ़ना)। यहाँ दिन और रात्रि की अवधि के कम या अधिक होने का संकेत है।

• यथाक्रमम्: क्रम के अनुसार। ऋतुचक्र के अनुसार दिन और रात का जो स्वाभाविक परिवर्तन होता है।

• मुहूर्तमात्रम्: केवल एक मुहूर्त की अवधि वाला। यहाँ 'मुहूर्त' का अर्थ केवल समय की एक इकाई नहीं, अपितु उस 'संधि-क्षण' से है जो परिवर्तन का बिंदु है।

• समा: समान। जो घटता-बढ़ता नहीं, बल्कि स्थिर रहता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक समय के स्थूल और सूक्ष्म भेदों को स्पष्ट करता है। ऋषि कहते हैं कि भौतिक जगत में दिनों की अवधि निरन्तर बदलती रहती है—उत्तरायण में दिन बढ़ते हैं और दक्षिणायन में घटते हैं। यह प्रकृति का क्रम है, जो परिवर्तनशील है। किंतु 'संध्या' इस परिवर्तन के अधीन नहीं है।

भाव यह है कि संध्या केवल एक समय-खंड नहीं, अपितु वह 'संधि' है जहाँ दिन और रात्रि का मिलन होता है। दिन चाहे चौबीस घंटे का हो या दस घंटे का, वह बिंदु जहाँ प्रकाश और अंधकार एक-दूसरे में विलीन होते हैं, वह सदैव समान रहता है। वह 'मुहूर्तमात्र' है, अर्थात् वह एक सूक्ष्म और निश्चित अंतराल है।

विधिक दृष्टि से इसका अर्थ यह है कि साधक को अपनी उपासना के लिए दिन की लम्बाई या रात्रि के विस्तार पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। संध्या का समय उसकी अपनी एक स्वतंत्र और स्थिर सत्ता है। जब ऋषि कहते हैं कि यह "ह्रासे वृद्धौ तु सा समा" (घटने और बढ़ने में समान है), तो वे संकेत कर रहे हैं कि सत्य और चैतन्य का अनुभव करने वाला साधक समय के बाहरी उतार-चढ़ाव से ऊपर उठकर उस स्थिर बिंदु को प्राप्त करता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्सावित्रीमार्कदर्शनात् । पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ २.१०१ ॥

प्रातःसंध्यामें सूर्यके दर्शनतक खड़े होकर सावित्री जपे; सायंसंध्यामें नक्षत्र भलीभाँति दिखनेतक बैठकर (जपे)।

मनुस्मृति २.१०१मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 181

मनुस्मृति में संध्या की अवधि और उसकी विधि का वर्णन है, जहाँ प्रातः सूर्य के दर्शन तक और सायं नक्षत्रों के दर्शन तक जप का विधान है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात को और सूक्ष्म करती है कि यद्यपि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय ऋतुओं के अनुसार बदलते हैं, किंतु वह 'संधि-क्षण' जिसमें साधक अपनी चेतना को केंद्रित करता है, वह एक समान और स्थिर मुहूर्त है। मनुस्मृति जहाँ बाहरी विधि (खड़े होना या बैठना) पर बल देती है, वहीं यह स्मृति उस समय की आंतरिक स्थिरता और उसकी अपरिवर्तनीयता की ओर संकेत करती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'समय' से 'काल' की ओर ले जाता है। दिन और रात का घटना-बढ़ना 'समय' है, जो परिवर्तनशील और मायावी है। किंतु संध्या वह 'संधि-क्षण' है जो काल के प्रवाह के बीच एक स्थिर बिंदु की भाँति है।

साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि उसकी साधना बाहरी परिस्थितियों या समय के विस्तार पर निर्भर न हो। जैसे संध्या का मुहूर्त समान रहता है, वैसे ही साधक के भीतर का 'अक्षर' (अविनाशी तत्व) समान रहता है, चाहे जीवन में सुखों की वृद्धी हो या दुखों का ह्रास।

अभ्यास यह है कि साधक जब संध्या-उपासना में बैठता है, तो वह स्वयं को दिन-रात के द्वंद्व से हटाकर उस 'समान' और 'स्थिर' मुहूर्त में प्रतिष्ठित करे। यह अभ्यास उसे 'अस्थिर' मन से 'स्थिर' बुद्धि की ओर ले जाता है। वह अनुभव करता है कि बाहरी जगत में सब कुछ घट रहा है या बढ़ रहा है, किंतु उसके हृदय के भीतर एक ऐसा बिंदु है जो सदैव समान, शांत और अपरिवर्तित है। इसी स्थिरता का अनुभव साधक को एक भूमि से उच्चतर भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ वह समय के बंधन से मुक्त होकर शाश्वत वर्तमान में स्थित हो जाता है।

श्लोक ६.१२

त्रिंशत्कोट्यस्तु विख्याता मंदेहा नाम राक्षसाः ।

प्रद्रवन्ति सहस्रांशुमुदयन्तं दिने दिने ॥ ६.१२ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४८

मन्देह नामके तीस करोड़ प्रसिद्ध राक्षस प्रतिदिन उगते हुए सूर्यकी ओर दौड़ते हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या के समय की स्थिरता और उसकी विशिष्टता को स्पष्ट किया था। अब वे संध्या के माहात्म्य को एक पौराणिक प्रसंग के माध्यम से समझा रहे हैं, जिसमें सूर्य की रक्षा और अंधकार की शक्तियों के बीच के संघर्ष का वर्णन है।

अन्वय और पदार्थ —

त्रिंशत्कोट्यस्तु विख्याता मन्देहा नाम राक्षसाः । दिने दिने उदयन्तं सहस्रांशुम् प्रद्रवन्ति ॥

पदार्थ:

• त्रिंशत्कोटिः: तीस करोड़। यह संख्या यहाँ केवल गिनती नहीं, अपितु अंधकार की शक्तियों की व्यापकता और उनकी सघनता का प्रतीक है।

• विख्याताः: प्रसिद्ध। जो अपनी प्रवृत्तियों के कारण सर्वविदित हैं।

• मन्देहा: 'मन्द' (धीमा, धुंधला, जड़) और 'देह' (शरीर) से बना शब्द। ऐसे जीव या प्रवृत्तियाँ जिनका शरीर या स्वभाव तामसिक और जड़ है।

• सहस्रांशुम्: सहस्र (हज़ार) + अंशु (किरणें)। हज़ारों किरणों वाले सूर्य को सहस्रांशु कहा गया है।

• प्रद्रवन्ति: वेग से दौड़ते हैं या आक्रमण करते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक कथा का आरम्भ करता है, जिसमें बताया गया है कि तीस करोड़ मन्देह नाम के प्रसिद्ध राक्षस प्रतिदिन उगते हुए सूर्य की ओर वेग से दौड़ते हैं। बाहरी दृष्टि से यह एक पौराणिक युद्ध का वर्णन प्रतीत होता है, जहाँ दैत्य सूर्य को ग्रसने का प्रयास करते हैं।

किंतु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, अतः यहाँ केवल स्थूल कथा नहीं, अपितु एक गहरा रहस्य छिपा है। 'मन्देह' शब्द का अर्थ है—वह जो 'मन्द' (जड़ता) में स्थित है। यह राक्षस वास्तव में बाहरी जीव नहीं, अपितु साधक के भीतर की वे तामसिक वृत्तियाँ हैं जो ज्ञान के प्रकाश को ढँकना चाहती हैं।

भाव यह है कि जिस प्रकार प्रतिदिन सूर्योदय के समय अंधकार की शक्तियाँ सूर्य को घेरने का प्रयास करती हैं, उसी प्रकार प्रत्येक प्रभात में—जब साधक जागृत होकर अपनी चेतना को ऊपर उठाने का प्रयास करता है—तब उसके भीतर की जड़ता, आलस्य, मोह और अविद्या (तमस) उस प्रकाश को ढँकने के लिए वेग से दौड़ते हैं। 'तीस करोड़' की संख्या यह दर्शाती है कि ये अवरोध अनगिनत और अत्यंत सूक्ष्म हैं, जो मन के हर कोने में व्याप्त हैं।

'सहस्रांशु' सूर्य यहाँ केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु 'हृदय-सूर्य' या 'आत्मा-ज्योति' का प्रतीक है। जब साधक संध्या के माध्यम से अपनी अंतर्दृष्टि जाग्रत करता है, तब उसके भीतर का प्रकाश उदय होता है, और ठीक उसी क्षण उसके संचित संस्कार और तामसिक प्रवृत्तियाँ उस प्रकाश को निगलने का प्रयास करती हैं। यह संघर्ष प्रतिदिन घटित होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'जागरूकता' के अभ्यास का संकेत है। साधक अनुभव करता है कि जैसे ही वह साधना के लिए उठता है, उसके मन में अनेक विचार, आलस्य और मानसिक अवरोध (मन्देह राक्षस) उत्पन्न होते हैं जो उसे प्रकाश (साधना) से दूर ले जाना चाहते हैं।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक इन अवरोधों को 'राक्षस' के रूप में पहचानना सीखे। जब वह यह जान लेता है कि ये प्रवृत्तियाँ केवल 'मन्द' (जड़) हैं और प्रकाश के सामने टिक नहीं सकतीं, तब वह उनसे भयभीत होने के बजाय उन्हें साक्षी भाव से देखता है। यह श्लोक साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह अपने भीतर के अंधकार और प्रकाश के द्वंद्व को पहचानता है। यह पहचान ही उस युद्ध की तैयारी है, जिसका समाधान अगले श्लोकों में संध्या-जप और अभिमन्त्रित जल के रूप में दिया गया है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बिना साधन (संध्या) के, केवल इच्छाशक्ति से इन तीस करोड़ तामसिक प्रवृत्तियों को जीतना कठिन है।

श्लोक ६.१३

अहन्यहनि ते सर्वे सूर्यमिच्छन्ति खादितुम् ।

अथ सूर्यस्य तेषां च युद्धमासीत् सुदारुणम् ॥ ६.१३ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४९

वे सब प्रतिदिन सूर्यको खाना चाहते हैं; तब सूर्य और उनका अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्देह नाम के उन तीस करोड़ राक्षसों का परिचय दिया जो प्रतिदिन उदय होते सूर्य की ओर वेग से आक्रमण करते हैं। वर्तमान श्लोक उसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए उस भीषण संघर्ष का वर्णन करता है, जो प्रकाश और अंधकार के बीच निरंतर चलता रहता है।

अन्वय और पदार्थ —

ते सर्वे अहन्यहनि सूर्यम् खादितुम् इच्छन्ति । अथ सूर्यस्य तेषाम् च सुदारुणम् युद्धम् आसीत् ॥

पदार्थ:

• अहन्यहनि: प्रतिदिन, प्रत्येक दिन। यह निरंतरता का सूचक है।

• खादितुम्: खाना चाहते हैं या ग्रस लेना चाहते हैं। यहाँ 'खादने' का अर्थ केवल भोजन करना नहीं, बल्कि प्रकाश को लील जाना या उसे शून्य कर देना है।

• सुदारुणम्: अत्यंत भयंकर, कठोर या भीषण।

• युद्धम्: संघर्ष या द्वंद्व।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उस पौराणिक युद्ध की तीव्रता को दर्शाता है जहाँ तीस करोड़ मन्देह राक्षस प्रतिदिन सूर्य को ग्रसने का प्रयास करते हैं और उनके बीच एक अत्यंत भयंकर युद्ध होता है।

बाहरी विधि और कथा के स्तर पर यह सूर्य-ग्रहण जैसी घटनाओं या अंधकार की शक्तियों द्वारा प्रकाश को ढकने के प्रयास का संकेत है। किंतु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, इसलिए यहाँ इस युद्ध का आन्तर अर्थ समझना अनिवार्य है। सूर्य केवल आकाश का पिंड नहीं, अपितु वह 'हृदय-सूर्य' है—वह चैतन्य प्रकाश जो आत्मा का स्वरूप है। 'मन्देह' राक्षस वे तामसिक वृत्तियाँ, आलस्य, मोह और अविद्या हैं जो साधक के भीतर के प्रकाश को लील लेना चाहती हैं।

रहस्य यह है कि यह युद्ध किसी एक समय की घटना नहीं है, अपितु 'अहन्यहनि' (प्रतिदिन) होने वाला एक शाश्वत संघर्ष है। प्रत्येक सुबह जब साधक जागता है, तो उसके भीतर का चैतन्य (सूर्य) जाग्रत होने का प्रयास करता है, और ठीक उसी समय उसकी सुप्त वासनाएँ और जड़ प्रवृत्तियाँ (मन्देह) उस प्रकाश को ढँकने के लिए आक्रमण करती हैं। यह युद्ध 'सुदारुण' है क्योंकि यह अस्तित्व की लड़ाई है—यदि अंधकार जीत गया तो जीव अविद्या में डूबेगा, और यदि सूर्य जीता तो साधक ज्ञान की ओर बढ़ेगा।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक उसके भीतर चलने वाले 'द्वंद्व' का चित्रण है। जब साधक संध्या या किसी भी साधना के लिए उठता है, तो उसे अनुभव होता है कि मन की जड़ता उसे खींच रही है। वह 'मन्देह' रूपी तामसिकता है जो सूर्य रूपी विवेक को 'खा जाना' चाहती है।

यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि उसकी आध्यात्मिक यात्रा केवल शांति का मार्ग नहीं, बल्कि एक युद्ध है। यह युद्ध बाहरी शत्रुओं से नहीं, अपितु अपनी ही उन प्रवृत्तियों से है जो प्रकाश के विरुद्ध हैं। इस श्लोक से साधक को यह बोध होता है कि यदि वह अपने भीतर के संघर्ष को नहीं पहचानता, तो वह अविद्या के प्रभाव में रहेगा। यह स्थिति उसे उस भूमि पर ले आती है जहाँ वह यह समझता है कि केवल इच्छाशक्ति से नहीं, अपितु एक विशिष्ट 'विधि' या 'शस्त्र' की आवश्यकता है, जो अगले श्लोकों में 'संध्या-जल' और 'गायत्री' के रूप में प्रकट होगा।

श्लोक ६.१४

ततो देवगणाः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ।

संध्येति (संध्यां तु) समुपासीनाः प्रक्षिपन्ति महज्जलम् ॥ ६.१४ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४९

तब सब देवगण और तपोधन ऋषि संध्याकी उपासना करते हुए (अञ्जलिसे) जल फेंकते हैं —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में सूर्य और मन्देह राक्षसों के बीच के उस भीषण युद्ध का वर्णन था, जहाँ अंधकार की शक्तियाँ प्रकाश को ग्रसने का प्रयास करती हैं। वर्तमान श्लोक उस युद्ध में दैवीय हस्तक्षेप और ऋषियों की भूमिका को स्पष्ट करता है, जो यह दिखाता है कि इस संघर्ष में विजय केवल बाहरी शस्त्रों से नहीं, अपितु संध्या-उपासना के सूक्ष्म विज्ञान से प्राप्त होती है।

अन्वय और पदार्थ —

ततः सर्वे देवगणाः तपोधनाः ऋषयश्च संध्याम् समुपासीनाः महज्जलम् प्रक्षिपन्ति ॥

पदार्थ:

• ततः: तब, उसके पश्चात। यह शब्द उस समय का संकेत है जब सूर्य और राक्षसों का युद्ध अपने चरम पर होता है।

• तपोधनाः: तप की पूँजी वाले। जिनके पास तप के रूप में आंतरिक ऊर्जा और तेज संचित है।

• समुपासीनाः: पूर्ण रूप से उपासना में लीन। यहाँ 'समुपासना' का अर्थ केवल क्रिया नहीं, बल्कि चित्त का पूरी तरह से उस इष्ट (सूर्य/ब्रह्म) में केंद्रित होना है।

• महज्जलम्: बहुत अधिक जल या महान जल। यहाँ 'महत्' शब्द जल की मात्रा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता और शक्ति को भी दर्शाता है।

• प्रक्षिपन्ति: फेंकते हैं या अर्पण करते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उस दैवीय रक्षा-तंत्र का उद्घाटन करता है जो सूर्य (प्रकाश) को राक्षसों (अंधकार) से बचाता है। जब सूर्य और मन्देह राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध होता है, तब समस्त देवगण और तपोधन ऋषि संध्या की उपासना में लीन होकर जल का अर्पण करते हैं।

बाहरी विधि के स्तर पर यह 'अर्घ्य' देने की क्रिया है। संध्या के समय अञ्जलि में जल लेकर सूर्य की ओर समर्पित करना एक सामान्य वैदिक कर्म है। किंतु याज्ञवल्क्य इस कर्म के पीछे छिपे उस महान रहस्य को खोल रहे हैं, जहाँ जल केवल एक पदार्थ नहीं, बल्कि एक माध्यम बन जाता है। जब तपस्वी ऋषि 'समुपासीनाः' होते हैं, अर्थात् जब वे अपनी पूरी चेतना को संध्या के मन्त्रों और प्रणव में विलीन कर देते हैं, तब उनके द्वारा अर्पित जल साधारण जल नहीं रहता। वह तप और मन्त्र की शक्ति से अभिमन्त्रित होकर एक अस्त्र में परिवर्तित हो जाता है।

यहाँ 'महज्जलम्' का अर्थ यह है कि जब साधक का संकल्प दृढ़ होता है और उसकी उपासना पूर्ण होती है, तब उसके द्वारा दिया गया अल्प जल भी 'महत्' (विशाल) प्रभाव वाला हो जाता है। यह जल सूर्य की रक्षा करता है, क्योंकि सूर्य यहाँ केवल भौतिक पिंड नहीं, अपितु वह 'विज्ञानमय पुरुष' है जो हृदय के भीतर स्थित है। जब बाहरी जगत में अंधकार बढ़ता है, तब ऋषियों की यह सामूहिक और व्यक्तिगत संध्या-साधना ब्रह्माण्ड के प्रकाश को अक्षुण्ण रखती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक में 'अर्घ्य' का गूढ़ अभ्यास छिपा है। सूर्य की ओर जल फेंकना वास्तव में 'सेवा' और 'संकल्प' का एक साथ मिलन है।

१. सेवा और समर्पण: जल का अर्पण इस भाव का प्रतीक है कि "हे प्रकाशस्वरूप परमात्मा! मेरा यह जीवन, मेरी यह चेतना आपकी ही है।" जब साधक अहंकार को जल की भाँति प्रवाहित कर देता है, तब उसके भीतर का सूर्य (आत्मा) मन्देह राक्षसों (तामसिक वृत्तियों) से मुक्त हो जाता है।

२. संकल्प की शक्ति: 'प्रक्षिपन्ति' (फेंकना) क्रिया एक तीव्र संकल्प को दर्शाती है। योग में जब साधक अपनी एकाग्रता को एक बिंदु पर केंद्रित कर उसे बाहर की ओर प्रक्षेपित करता है, तो वह मानसिक ऊर्जा एक वज्र के समान शक्तिशाली हो जाती है।

३. तप की पूँजी: श्लोक में 'तपोधनाः' शब्द महत्वपूर्ण है। बिना तप (अनुशासन और संयम) के किया गया अर्घ्य केवल एक शारीरिक क्रिया है। किंतु जिस साधक ने प्राण और मन को वश में किया है, उसके हाथ से निकला जल उसके भीतर के अविद्या-राक्षसों को भस्म करने की क्षमता रखता है।

साधक इस अभ्यास से 'अविद्या' की भूमि से 'विद्या' की भूमि की ओर बढ़ता है। वह अनुभव करता है कि जिस प्रकार ऋषियों का जल सूर्य की रक्षा करता है, उसी प्रकार उसकी नियमित संध्या-साधना उसके हृदय के प्रकाश को बाहरी प्रलोभनों और आंतरिक विकारों से सुरक्षित रखती है।

श्लोक ६.१५

ओंकारब्रह्मसंयुक्तं गायत्र्या चाभिमन्त्रितम् ।

तेन दह्यन्ति ते दैत्या वज्रीभूतेन वारिणा ॥ ६.१५ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४९

— ओंकार (रूप) ब्रह्मसे युक्त और गायत्रीसे अभिमन्त्रित; उस वज्ररूप बने जलसे वे दैत्य जल जाते हैं।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में हमने देखा कि जब मन्देह राक्षस सूर्य को ग्रसने का प्रयास करते हैं, तब देवगण और तपोधन ऋषि संध्या-उपासना के माध्यम से जल का अर्पण करते हैं। वर्तमान श्लोक उस जल की शक्ति और उसके अभिमन्त्रण की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है, जिससे वह साधारण जल न रहकर दैत्यों का विनाश करने वाला अमोघ अस्त्र बन जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

(तत् जलं) ओंकारब्रह्मसंयुक्तं (तथा) गायत्र्या चाभिमन्त्रितम् । तेन वज्रीभूतेन वारिणा ते दैत्या दह्यन्ति ॥

पदार्थ:

• ओंकारब्रह्मसंयुक्तं: ओंकार रूपी ब्रह्म से युक्त। यहाँ 'संयुक्त' शब्द का अर्थ है कि जल में केवल ओंकार का उच्चारण नहीं हुआ, अपितु जल की सत्ता ओंकार के ब्रह्म-तत्त्व में विलीन होकर उससे एक हो गई है।

• गायत्र्या चाभिमन्त्रितम्: गायत्री मन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित। 'अभिमन्त्रण' का अर्थ है मन्त्र की शक्ति को वस्तु में आरोपित करना, जिससे वह वस्तु मन्त्र के गुणधर्मों को ग्रहण कर ले।

• वज्रीभूतेन वारिणा: वज्र रूप हुआ जल। 'वारिणा' (जल) जब 'वज्रीभूत' होता है, तब वह तरल होते हुए भी कठोर प्रहार करने वाला और अग्नि के समान दाहक हो जाता है।

• दह्यन्ति: जल जाते हैं या भस्म हो जाते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक कर्म और मन्त्र के संयोग से उत्पन्न होने वाली अपार शक्ति का वर्णन करता है। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ यह बता रहे हैं कि ऋषियों द्वारा फेंका गया जल साधारण जल नहीं था, अपितु वह 'ब्रह्म-शक्ति' और 'गायत्री-तेज' का मिश्रण था।

इस प्रक्रिया के दो मुख्य सोपान हैं: प्रथम, जल का ओंकारब्रह्म से संयुक्त होना। ओंकार वह बीज है जिसमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है। जब साधक ओंकार का उच्चारण करते हुए जल को स्पर्श करता है या उसे अञ्जलि में धारण करता है, तो जल की जड़ता समाप्त हो जाती है और वह चेतन ब्रह्म की शक्ति से ओत-प्रोत हो जाता है। द्वितीय, उस जल का गायत्री से अभिमन्त्रित होना। गायत्री प्रकाश और बुद्धि का मन्त्र है। जब ओंकार-युक्त जल पर गायत्री का प्रभाव पड़ता है, तो वह जल 'वज्र' के समान शक्तिशाली हो जाता है।

बाहरी दृष्टि से यह दैत्यों का विनाश है, किंतु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है। यहाँ 'मन्देह राक्षस' उन तामसिक वृत्तियों, अविद्या और मानसिक अंधकार के प्रतीक हैं जो मनुष्य के भीतर के 'सूर्य' (आत्मा के प्रकाश) को ढक लेना चाहते हैं। जब साधक ओंकार और गायत्री के संयोग से अपनी चेतना (जल) को शुद्ध करता है, तो वह चेतना 'वज्र' बन जाती है। यह वज्र-चेतना अविद्या के उन घने अंधकारों को भस्म कर देती है जिन्हें साधारण तर्क या बुद्धि नहीं मिटा पाती। अतः, अभिमन्त्रित जल का अर्पण वास्तव में अपनी आंतरिक शुद्धि का वह प्रहार है, जिससे साधक के भीतर का अज्ञान जल जाता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का मुख्य अभ्यास 'अभिमन्त्रण' के भाव को समझना है। योग में अभिमन्त्रण का अर्थ है—किसी भी स्थूल पदार्थ या क्रिया को सूक्ष्म चैतन्य शक्ति से जोड़ देना।

साधक जब संध्या के समय जल लेता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि यह जल केवल शरीर की शुद्धि के लिए नहीं है, बल्कि यह उसकी अपनी 'चित्त-वृत्ति' है। जब वह ओंकार का जप करता है, तो वह अपने चित्त को ब्रह्म-तत्त्व में विलीन करता है (ओंकारब्रह्मसंयुक्तं)। तत्पश्चात, जब वह गायत्री का जप करता है, तो वह उस शून्य हुए चित्त में दिव्य प्रकाश का आवाहन करता है (गायत्र्या चाभिमन्त्रितम्)।

इस अभ्यास से साधक के भीतर एक ऐसी 'वज्र-इच्छाशक्ति' जाग्रत होती है, जो उसे आलस्य, प्रमाद और मोह जैसे दैत्यों से मुक्त करती है। जल का 'वज्र' होना वास्तव में संकल्प का दृढ़ होना है। जो साधक इस भाव से संध्या करता है कि उसका प्रत्येक मन्त्र और प्रत्येक जल-अर्पण उसके आंतरिक अंधकार को भस्म कर रहा है, वह धीरे-धीरे स्थूल जगत के बंधनों से ऊपर उठकर सूक्ष्म प्रकाशमय अवस्था की ओर अग्रसर होता है। यहाँ अभ्यास यह है कि मन्त्र केवल होंठों से न निकले, बल्कि जल के माध्यम से हृदय और प्राण में उतरकर उसे 'वज्रीभूत' कर दे।

श्लोक ६.१६

एतद्विदित्वा यो विप्र उपास्ते संशितव्रतः ।

दीर्घमायुः स विन्देत सर्वपापैश्च मुच्यते ॥ ६.१६ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४९

इस विधि को जानकर जो विप्र दृढ व्रत वाला उपासना करता है, वह दीर्घायु प्राप्त करता है और सब पापों से मुक्त हो जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में मन्देह नामक दैत्यों द्वारा सूर्य को ग्रसने के प्रयास और ऋषियों द्वारा ओंकार-गायत्री युक्त जल के प्रहार से उन दैत्यों के दहन का वर्णन आया है। वर्तमान श्लोक इस दिव्य रहस्य के ज्ञान के उपरांत साधक को प्राप्त होने वाले फल और उसकी पात्रता का विधान करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यो विप्रः एतद् (विधिं/रहस्यं) विदित्वा संशितव्रतः उपास्ते, स दीर्घमायुः विन्देत, (तथा) सर्वपापेभ्यः मुच्यते।

पदार्थ और निर्वचन:

• एतद्विदित्वा: इस रहस्य को जानकर। यहाँ 'एतत्' शब्द केवल कथा के लिए नहीं, अपितु संध्या-जल के वज्र बनने की प्रक्रिया और सूर्य-रक्षण के आध्यात्मिक विज्ञान के लिए प्रयुक्त है।

• विप्र: वह जो 'विप्र' है। विप्र केवल जाति नहीं, अपितु वह है जो विप्र-भाव (ब्रह्म-ज्ञान की जिज्ञासा) में स्थित है और जिसकी बुद्धि शुद्ध है।

• संशितव्रतः: दृढ व्रत वाला। 'संशित' का अर्थ है तीक्ष्ण या प्रखर। ऐसा व्रत जो ढीला न हो, बल्कि संकल्प की अग्नि में तपा हुआ हो।

• उपास्ते: उपासना करता है। उपासना का अर्थ है 'उप' (समीप) + 'आस्' (बैठना)। मन्त्र और देवता के समीप स्थित होना ही उपासना है।

• दीर्घमायुः: लंबी आयु। यहाँ आयु केवल वर्षों की संख्या नहीं, अपितु चैतन्य की वह निरंतरता है जो काल के क्षय से मुक्त हो।

• सर्वपापेभ्यः मुच्यते: समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। पाप यहाँ केवल नैतिक त्रुटि नहीं, अपितु वे 'मन्देह' रूपी मानसिक विकार हैं जो साधक के आंतरिक सूर्य (ज्ञान) को ग्रस लेते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-साधना के फल और उसकी अनिवार्य शर्त को स्पष्ट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ संकेत कर रहे हैं कि केवल यांत्रिक रूप से जल अर्पण करना पर्याप्त नहीं है, अपितु 'विदित्वा' (जानकर) और 'संशितव्रतः' (दृढ़ संकल्प के साथ) करना अनिवार्य है।

जब साधक यह जान लेता है कि उसकी संध्या-उपासना वास्तव में ब्रह्माण्ड के प्रकाश (सूर्य) की रक्षा का एक सूक्ष्म प्रयास है और उसके द्वारा अर्पण किया गया जल ओंकार और गायत्री की शक्ति से वज्र बन जाता है, तब उसकी क्रिया 'कर्म' से उठकर 'योग' बन जाती है। विप्र वह है जो अपनी चेतना को उस वज्र-शक्ति में विलीन कर देता है।

यहाँ 'दीर्घायु' और 'पापमुक्ति' के फल का गहरा अर्थ है। भौतिक शरीर तो नश्वर है, किंतु जो साधक संध्या के माध्यम से अपने भीतर के सूर्य को दैत्यों (अविद्या, आलस्य, काम, क्रोध) से मुक्त रखता है, उसकी 'प्राण-शक्ति' और 'तेज' दीर्घायु हो जाते हैं। वह काल के प्रभाव से ऊपर उठकर उस शाश्वत आयु को प्राप्त करता है जो अक्षर-ब्रह्म का लक्षण है। पापों से मुक्ति का अर्थ है—उन सभी संस्कारों का भस्म होना जो आत्मा के प्रकाश को ढक लेते हैं। जिस प्रकार ऋषियों का अभिमन्त्रित जल दैत्यों को जला देता है, उसी प्रकार संशित-व्रत साधक का ज्ञान उसके आंतरिक अंधकार को जलाकर भस्म कर देता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुवन् । प्रज्ञां यशश्च कीर्तिं च ब्रह्मवर्चसमेव च ॥ ४.९४ ॥

ऋषियोंने दीर्घ (देरतक) संध्या करनेसे दीर्घ आयु, प्रज्ञा, यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज पाया।

मनुस्मृति ४.९४मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 575

मनुस्मृति में भी ऋषियों के इसी अनुभव की पुष्टि की गई है कि उन्होंने दीर्घ संध्या के माध्यम से दीर्घायु, प्रज्ञा और ब्रह्मतेज प्राप्त किया। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ इस बात पर सहमत हैं कि संध्या की अवधि और उसकी एकाग्रता (दीर्घता) का सीधा संबंध साधक की आयु और उसकी आध्यात्मिक क्षमता (ब्रह्मवर्चस) से है। जहाँ मनुस्मृति इसे ऋषियों के अनुभव के रूप में बताती है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे 'विदित्वा' (ज्ञान) और 'संशितव्रतः' (दृढ़ संकल्प) के साथ जोड़ने का विधान देते हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'संकल्प-शक्ति' के अभ्यास का सूत्र है। 'संशितव्रतः' होने का अर्थ है—साधना के समय मन का पूर्णतः एकनिष्ठ होना। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर का सूर्य (हृदय-पुरुष) बाहरी जगत के विकारों द्वारा ग्रसित हो रहा है, तब वह संध्या के मन्त्रों को शस्त्र की भांति प्रयोग करता है।

अभ्यास यह है कि संध्या के समय जब जल अर्पण किया जाए, तो यह भाव रखा जाए कि यह जल केवल भौतिक पदार्थ नहीं, अपितु ओंकार-ब्रह्म से युक्त एक 'तेजस' है। यह भाव ही जल को 'वज्रीभूत' करता है। जो साधक इस भाव के साथ दीर्घ समय तक संध्या में लीन रहता है, उसकी प्राण-शक्ति का क्षय रुक जाता है और वह 'दीर्घायु' का अनुभव करता है। यह आयु शरीर की नहीं, अपितु उस 'अक्षर' की अनुभूति है जो कभी नष्ट नहीं होता। इस प्रकार साधक 'कर्म-भूमि' से उठकर 'ज्ञान-भूमि' की ओर अग्रसर होता है, जहाँ वह स्वयं को पापों (अविद्या के बंधनों) से मुक्त पाता है।

संध्यात्रयवर्णनम्

श्लोक ६.१७

पूर्वा संध्या तु गायत्री सावित्री मध्यमा स्मृता ।

या भवेत् पश्चिमा संध्या सा विज्ञेया सरस्वती ॥ ६.१७ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४९

प्रातःकालकी संध्या गायत्री है, मध्याह्नकी सावित्री कही गयी है, और जो सायंकालकी संध्या है वह सरस्वती जाननी चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में संध्या-जल के वज्र रूप होकर दैत्यों का दहन करने की महिमा और उससे होने वाले पाप-मुक्ति के फल का वर्णन आया है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य संध्या के उन तीन स्वरूपों का परिचय दे रहे हैं, जिनके माध्यम से साधक काल और चेतना के विभिन्न सोपानों पर आरोहण करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: पूर्वा संध्या तु गायत्री, मध्यमा (संध्या) सावित्री स्मृता, या (संध्या) भवेत् पश्चिमा संध्या सा सरस्वती विज्ञेया।

पदार्थ और निर्वचन:

• पूर्वा संध्या: प्रातःकाल की संध्या। 'पूर्वा' यहाँ केवल समय का सूचक नहीं, अपितु उदयकाल का प्रतीक है, जब चेतना अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होती है।

• गायत्री: वह जो इंद्रियों और प्राणों को नियंत्रित कर ऊपर की ओर ले जाए। यह संध्या का वह रूप है जो साधक की बुद्धि को प्रदीप्त करता है।

• मध्यमा: मध्याह्न की संध्या। यह वह समय है जब सूर्य अपने चरम शिखर पर होता है और ताप (तप) अपनी पराकाष्ठा पर होता है।

• सावित्री: सूर्य की वह शक्ति जो सबको जन्म देती है और जाग्रत करती है। यह प्रकाश का पूर्ण प्रकटीकरण है।

• पश्चिमा संध्या: सायंकाल की संध्या। यह वह समय है जब बाहरी जगत का प्रकाश मंद होता है और साधक का ध्यान अंतर्मुखी होने लगता है।

• सरस्वती: वह जो प्रवाहमान है। सरस्वती यहाँ ज्ञान की उस धारा का प्रतीक है जो साधक को बाहरी जगत से खींचकर आंतरिक शांति और मोक्ष की ओर ले जाती है।

• विज्ञेया: विशेष ज्ञान के साथ जानना चाहिए। यह केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-साधना के त्रिविध स्वरूपों का निर्धारण करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ तीन अलग-अलग देवियों की पौराणिक कथाओं का वर्णन नहीं कर रहे, अपितु एक ही परम-तत्व (गायत्री) के तीन अवस्था-रूपों को स्पष्ट कर रहे हैं।

प्रातःकाल की संध्या 'गायत्री' है। यह जागरण की अवस्था है। जिस प्रकार सूर्य उदय होते समय अंधकार को चीरता है, उसी प्रकार गायत्री-संध्या साधक के भीतर अविद्या के अंधकार को समाप्त कर बुद्धि के प्रकाश का उदय करती है। यह साधना की आरम्भिक अवस्था है जहाँ संकल्प और प्रज्ञा का बीजारोपण होता है।

मध्याह्न की संध्या 'सावित्री' है। मध्याह्न वह समय है जब सूर्य का प्रभाव सर्वाधिक तीव्र होता है। सावित्री रूप में यह संध्या साधक के भीतर 'तप' को जाग्रत करती है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक अपनी ऊर्जा को पूर्णतः एकीकृत कर उसे उच्चतम शिखर तक ले जाता है। सावित्री का अर्थ है—वह जो प्रज्वलित करे। यहाँ साधना का उद्देश्य केवल प्रकाश पाना नहीं, बल्कि स्वयं प्रकाशमय हो जाना है।

सायंकाल की संध्या 'सरस्वती' है। यह विश्रांति और अंतर्मुखता का समय है। जब सूर्य अस्त होता है, तब साधक बाहरी क्रियाओं को त्यागकर भीतर की धारा में विलीन होता है। सरस्वती ज्ञान की वह नदी है जो साधक को संसार के कोलाहल से दूर ले जाकर अक्षर-ब्रह्म की शांति में प्रतिष्ठित करती है।

इस प्रकार, यह स्मृति हमें बताती है कि संध्या केवल समय की गणना नहीं है, अपितु चेतना के रूपांतरण की एक प्रक्रिया है: गायत्री से प्रबोधन, सावित्री से प्रदीप्ति और सरस्वती से विलीनीकरण।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'काल-योग' का अभ्यास कराता है। साधक यहाँ तीन मानसिक भूमियों का अनुभव करता है:

१. गायत्री-भूमि (आरम्भ): प्रातःकाल के अभ्यास में साधक अपनी सुप्त चेतना को जाग्रत करता है। वह अपनी बुद्धि को उस 'परम-प्रकाश' के साथ जोड़ता है, जिससे उसके भीतर का आलस्य और जड़ता समाप्त होती है। यह 'उदय' का अनुभव है।

२. सावित्री-भूमि (शिखर): मध्याह्न के अभ्यास में साधक अपनी प्राण-ऊर्जा को सूर्य के समान प्रखर बनाता है। यहाँ वह अनुभव करता है कि वह स्वयं उस प्रकाश का अंश है। यह पूर्ण जाग्रत अवस्था है, जहाँ साधक अपनी समस्त शक्तियों को एक बिंदु पर केंद्रित करता है।

३. सरस्वती-भूमि (लय): सायंकाल के अभ्यास में साधक अपनी समस्त उपलब्धियों और अनुभवों को ज्ञान की धारा में विसर्जित कर देता है। यह 'लय' की अवस्था है। यहाँ साधक बाहरी जगत के प्रति उदासीन होकर अपने हृदय के भीतर बहने वाली अमृत-धारा का अनुभव करता है।

साधक इस अभ्यास से यह सीखता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण—उदय, मध्य और अस्त—परमात्मा से जुड़ने का एक अवसर है। वह समय के प्रवाह में बहने के बजाय, समय के साथ संधि (मिलन) करना सीखता है।

श्लोक ६.१८

रक्ता भवति गायत्री सावित्री श्वेतवर्णिका ।

कृष्णा सरस्वती ज्ञेया संध्यास्तिस्र उदाहृताः ॥ ६.१८ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ४९

गायत्री लाल (वर्णकी) होती है, सावित्री श्वेत वर्णकी, और सरस्वती काली जाननी चाहिए — (इस प्रकार) तीन संध्याएँ कही गयी हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने काल-क्रम के अनुसार तीन संध्याओं—पूर्वा (गायत्री), मध्यमा (सावित्री) और पश्चिमा (सरस्वती)—का निर्धारण किया है। अब इस श्लोक में वे इन तीनों संध्याओं के विशिष्ट वर्णों (रंगों) का उद्घाटन कर रहे हैं, जो साधक के लिए ध्यान के आधार और चेतना के स्तरों के संकेतक हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: गायत्री रक्ता भवति, सावित्री श्वेतवर्णिका (भवति), सरस्वती कृष्णा ज्ञेया; (एवम्) तिस्रः संध्याः उदाहृताः।

पदार्थ और निर्वचन:

• रक्ता: लाल वर्ण की। यह उगते सूर्य की प्रथम रश्मियों का रंग है, जो ऊर्जा और जाग्रति का प्रतीक है।

• श्वेतवर्णिका: सफेद या उज्ज्वल वर्ण वाली। यह मध्याह्न के सूर्य का वह प्रकाश है जिसमें कोई छाया नहीं रहती, जो पूर्ण स्पष्टता और शुद्धि का प्रतीक है।

• कृष्णा: काला या गहरा वर्ण। यह सायं काल के ढलते सूर्य और बढ़ते अंधकार का प्रतीक है, जो अंतर्मुखता और निद्रा-अवस्था से पूर्व की शांति को दर्शाता है।

• ज्ञेया: जाननी चाहिए। यहाँ 'ज्ञेया' शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए है कि यह वर्ण केवल बाहरी दृश्य नहीं, अपितु एक आंतरिक अनुभूति है जिसे साधना के माध्यम से जानना है।

• तिस्रः संध्याः उदाहृताः: तीन संध्याओं का उल्लेख किया गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य संध्या-साधना के तीन रंगों का वर्णन कर रहे हैं। बाहरी दृष्टि से यह वर्णन सूर्य के नैसर्गिक प्रकाश के परिवर्तन का है, किंतु योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में यह साधक की मानसिक अवस्था और ध्यान के स्वरूप का निर्देश है।

प्रातःकाल की गायत्री संध्या 'रक्त' वर्ण की है। जब साधक सूर्योदय के समय उपासना करता है, तब वह उगते सूर्य की लालिमा को अपने भीतर उतारता है। यह लाल रंग रजोगुण का प्रतीक है, जो आलस्य को त्यागकर पुरुषार्थ और जाग्रति की ओर ले जाता है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक अपनी सुप्त चेतना को प्रदीप्त कर बुद्धि के आलोक (गायत्री) की ओर बढ़ता है।

मध्याह्न की सावित्री संध्या 'श्वेत' वर्ण की है। दोपहर के समय सूर्य अपने चरम शिखर पर होता है, जहाँ प्रकाश इतना तीव्र होता है कि वह श्वेत प्रतीत होता है। यह श्वेत वर्ण सत्त्वगुण का प्रतीक है। यहाँ साधक पूर्ण स्पष्टता, पवित्रता और ज्ञान के प्रकाश में स्थित होता है। सावित्री की यह श्वेतता उस परम प्रकाश की ओर संकेत है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।

सायंकाल की सरस्वती संध्या 'कृष्ण' वर्ण की है। सूर्यास्त के समय जब जगत अंधकार की ओर बढ़ता है, तब साधक का ध्यान बाहरी जगत से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है। यह कृष्ण वर्ण तमोगुण का प्रतीक है, किंतु यहाँ यह अविद्या वाला अंधकार नहीं, अपितु वह 'गहन शांति' है जिसमें समस्त बाहरी शोर विलीन हो जाता है। सरस्वती की यह कृष्णता उस शून्य का प्रतीक है, जहाँ पहुँचकर साधक शब्दों से परे मौन के साम्राज्य में प्रवेश करता है।

इस प्रकार, तीन संध्याओं के माध्यम से साधक रज (लाल), सत्त्व (श्वेत) और तम (कृष्ण) के संस्कारों को पार करते हुए उस अवस्था की ओर बढ़ता है जहाँ वह इन तीनों गुणों से ऊपर उठ सके।

योग-रहस्य —

योगिक अभ्यास की दृष्टि से यह श्लोक 'वर्ण-ध्यान' की विधि सिखाता है। साधक जब संध्या उपासना करता है, तो वह केवल मंत्र का जप नहीं करता, अपितु समय के अनुसार अपने भीतर एक विशिष्ट रंग का आभास करता है।

प्रातःकाल में साधक अपने हृदय या भ्रूमध्य में उगते सूर्य की लालिमा का ध्यान करता है। यह अभ्यास प्राण-शक्ति को जाग्रत करता है और साधक को दिन भर के धर्म-कर्म के लिए ऊर्जा प्रदान करता है।

मध्याह्न में वह श्वेत प्रकाश का ध्यान करता है। यह अभ्यास मन की शुद्धि और एकाग्रता के लिए है। जब बाहरी ताप चरम पर होता है, तब भीतर श्वेत प्रकाश का ध्यान साधक को शीतलता और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।

सायंकाल में वह कृष्ण या गहरे नीले वर्ण का ध्यान करता है। यह अभ्यास अंतर्मुखता (प्रत्याहार) का है। जैसे-जैसे बाहरी प्रकाश घटता है, साधक अपने भीतर के अंधकार को प्रकाशित करने का प्रयास करता है, जिससे वह बाहरी जगत के मोह से मुक्त होकर आत्म-तत्व में लीन हो सके।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि काल (समय) और प्रकृति (गुण) निरंतर परिवर्तनशील हैं, किंतु इन तीनों रंगों के पीछे जो 'दृष्टा' है, वह अपरिवर्तनीय है। वह रज से सत्त्व में और सत्त्व से उस गहन शांति (कृष्ण वर्ण) में जाकर अंततः गुणों से अतीत उस 'अक्षर' पुरुष में स्थित होने का अभ्यास करता है।

संध्यापदनिरुक्तिः

श्लोक ६.१९

त्रयाणां चैव देवानां संगमस्तूभयोर्भवेत् ।

मध्यमायां च संध्यायां सर्वदेवसमागमः ॥ ६.१९ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५०

तीनों देवताओं का संगम दोनों (प्रातः और सायंकाल की) संध्याओं में होता है, और मध्यमा संध्या में सब देवताओं का समागम होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने तीन संध्याओं के वर्णों—रक्त, श्वेत और कृष्ण—का निर्देश किया था। अब इस श्लोक में वे संध्या के उस मूल तत्त्व की व्याख्या कर रहे हैं जिसके कारण इसे 'संध्या' कहा जाता है, अर्थात् देवताओं का संगम।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: त्रयाणां देवानां संगमः उभयोः (संध्यायोः) भवेत्, सर्वदेवसमागमः च मध्यमायां संध्यायां (भवेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• त्रयाणां देवानां संगमः: तीन देवताओं का मिलन। यहाँ 'संगम' का अर्थ केवल बाहरी मिलन नहीं, अपितु तीन दिव्य शक्तियों का एक बिंदु पर केंद्रित होना है।

• उभयोः: दोनों में। यहाँ 'उभय' शब्द प्रातः (पूर्वा) और सायं (पश्चिमा) की संध्याओं के लिए प्रयुक्त हुआ है।

• मध्यमायां संध्यायां: मध्याह्न की संध्या में। यह वह समय है जब सूर्य अपने चरम शिखर पर होता है।

• सर्वदेवसमागमः: समस्त देवताओं का एक साथ आना। 'समागम' का अर्थ है पूर्णता, जहाँ कोई भी शक्ति पृथक न रहकर एक एकीकृत ज्योति में विलीन हो जाती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'संध्या' शब्द की निरुक्ति और उसके आध्यात्मिक आधार को स्पष्ट कर रहे हैं। संध्या केवल समय का नाम नहीं है, अपितु यह एक 'संधि' है—दो अवस्थाओं, दो शक्तियों या दो लोकों के मिलन का बिंदु।

ऋषि कहते हैं कि प्रातःकाल और सायंकाल की दोनों संध्याओं में तीन देवताओं का संगम होता है। ये तीन देवता वे मूल शक्तियाँ हैं जो सृष्टि के संचालन, पोषण और लय के लिए उत्तरदायी हैं। जब साधक प्रातःकाल गायत्री उपासना करता है, तब वह अपनी चेतना को उन तीन दिव्य शक्तियों के संगम पर स्थित करता है, जिससे जाग्रत अवस्था में भी दैवीय ऊर्जा का संचार होता है। इसी प्रकार, सायं काल की सरस्वती संध्या में पुनः वही संगम होता है, जो साधक को बाहरी जगत के कोलाहल से हटाकर अंतर्मुखी करता है।

किंतु मध्याह्न की सावित्री संध्या की महिमा भिन्न है। यहाँ 'सर्वदेवसमागमः' कहा गया है। मध्याह्न वह समय है जब सूर्य (जो समस्त देवताओं का अधिष्ठाता है) अपने पूर्ण तेज के साथ आकाश के मध्य में स्थित होता है। इस समय केवल तीन नहीं, अपितु समस्त देवताओं की शक्तियाँ सूर्य-रूप परमात्मा में समाहित हो जाती हैं। यह पूर्णता का क्षण है। जिस प्रकार मध्याह्न में छाया लुप्त हो जाती है, उसी प्रकार सर्वदेवसमागम की इस अवस्था में साधक के भीतर अज्ञान की छाया समाप्त हो जाती है और वह समस्त दैवीय गुणों के एकीकरण का अनुभव करता है।

अतः, पूर्वा और पश्चिमा संध्याएँ 'संगम' (मिलन) की प्रक्रिया हैं, जबकि मध्यमा संध्या 'समागम' (पूर्ण एकीकरण) की स्थिति है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक चेतना के संकुचन और विस्तार का अभ्यास है। प्रातः और सायं की संध्याओं में साधक तीन मुख्य प्राण-शक्तियों या दिव्य गुणों के संतुलन का अभ्यास करता है, जिससे मन स्थिर होता है। यह 'संगम' की अवस्था है, जहाँ साधक अपनी व्यक्तिगत चेतना को दैवीय चेतना से जोड़ता है।

मध्याह्न की साधना में साधक 'सर्वदेवसमागम' का अनुभव करता है। इसका अर्थ है कि वह अपनी समस्त मानसिक वृत्तियों, इंद्रियों और प्राणों को एक केंद्र (सूर्य-पुरुष) में विलीन कर देता है। यह अभ्यास साधक को 'खंडित' अनुभव से 'पूर्ण' अनुभव की ओर ले जाता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि समस्त दैवीय शक्तियाँ उसके भीतर एक ही ज्योति के रूप में विद्यमान हैं, तब वह द्वैत से ऊपर उठकर अद्वैत की भूमि की ओर अग्रसर होता है। यहाँ अभ्यास यह है कि मध्याह्न की तपती धूप में भी आंतरिक शीतलता और पूर्णता का अनुभव किया जाए, क्योंकि वह समय समस्त शक्तियों के एक बिंदु पर केंद्रित होने का है।

श्लोक ६.२०

संधिः सर्वसुराणां च तेन संध्या उदाहृता ।

गरीयसी हि भूतानां तस्मात्यैत्री(त्रैती) तनुर्हि सा ॥ ६.२० ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५०

सब देवताओं की सन्धि होने से वह संध्या कही गई है, क्योंकि वह भूतों के लिए गरीयसी है, इसलिए वह त्रैती तनु वाली है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि प्रातः और सायं की संध्याओं में तीन देवताओं का संगम होता है और मध्याह्न में समस्त देवताओं का समागम होता है। अब इस श्लोक में वे 'संध्या' शब्द की व्युत्पत्ति और उसके भूतों (प्राणियों) के लिए महत्व को प्रतिपादित कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: सर्वसुराणां च संधिः (अस्ति), तेन (सा) संध्या उदाहृता। सा हि भूतानां गरीयसी, तस्मात् सा त्रैती तनुर्हि सा (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• सर्वसुराणां संधिः: समस्त देवताओं का मिलन या संधि। यहाँ 'संधि' का अर्थ है—दो भिन्न अवस्थाओं या शक्तियों का एक बिंदु पर मिलना, जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।

• उदाहृता: कहा गया है या नाम दिया गया है।

• गरीयसी: अधिक गरिमापूर्ण, श्रेष्ठ या भारी। योग की दृष्टि में 'गरीयसी' वह है जो साधक की चेतना को स्थिरता प्रदान करे और उसे निम्न वृत्तियों से ऊपर उठाकर उच्चतर धरातल पर प्रतिष्ठित करे।

• भूतानां: समस्त प्राणियों का। यहाँ 'भूत' शब्द केवल भौतिक शरीर नहीं, अपितु चेतना के उन सभी स्तरों के लिए है जो प्रकृति के अधीन हैं।

• त्रैती तनुः: तीन रूपों वाली या तीन शरीरों/अवस्थाओं वाली। 'तनु' का अर्थ शरीर या सूक्ष्म स्वरूप होता है। 'त्रैती' यहाँ तीन संध्याओं (गायत्री, सावित्री, सरस्वती) के एकीकृत स्वरूप का संकेत है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य 'संध्या' शब्द के वास्तविक अर्थ को खोल रहे हैं। वे बताते हैं कि जिसे हम केवल समय का एक अंतराल समझते हैं, वह वास्तव में 'सर्वसुराणां संधिः' है—अर्थात् समस्त दैवीय शक्तियों का मिलन-बिंदु। जब साधक संध्या उपासना करता है, तो वह केवल एक क्रिया नहीं करता, अपितु स्वयं को उस संधि-स्थल पर स्थित करता है जहाँ सूर्य, चंद्र और अग्नि जैसी समस्त ब्रह्मांडीय शक्तियाँ एक-दूसरे में विलीन होती हैं। इसी संधि के कारण इसे 'संध्या' कहा गया है।

ऋषि आगे कहते हैं कि यह अवस्था समस्त भूतों (प्राणियों) के लिए 'गरीयसी' है। इसका भाव यह है कि संसार के समस्त प्राणी प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) के अधीन हैं और निरंतर विचलित रहते हैं। संध्या की यह संधि उन्हें उस स्थिरता से जोड़ती है जो देवताओं की है। जब साधक इस संधि में प्रवेश करता है, तो उसकी चेतना में एक ऐसी गरिमा और स्थिरता आती है, जिससे वह भौतिक जगत के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है।

अंत में, 'त्रैती तनु' के माध्यम से याज्ञवल्क्य यह रहस्य खोलते हैं कि यह संध्या तीन रूपों वाली है। बाहरी दृष्टि से ये तीन काल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) हैं, किंतु आन्तरिक दृष्टि से यह साधक के तीन शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) की शुद्धि और उनकी संधि का मार्ग है। यह वह बिंदु है जहाँ साधक का व्यक्तिगत अस्तित्व (तनु) दैवीय अस्तित्व के साथ एकाकार होने लगता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए 'संध्या' का अर्थ है—दो अवस्थाओं के बीच का वह शून्य बिंदु जहाँ मन स्थिर हो जाता है। योगिक अभ्यास में यह श्लोक साधक को 'संधि-चेतना' का अनुभव कराता है।

साधक जब संध्या उपासना करता है, तो वह अपने भीतर के 'सर्वसुराणां संधिः' को खोजता है। यह वह अनुभव है जहाँ बाहरी जगत का कोलाहल और आंतरिक वृत्तियों का द्वंद्व शांत होकर एक केंद्र पर मिलते हैं। 'गरीयसी' होने का अनुभव तब होता है जब साधक महसूस करता है कि उसकी चेतना अब केवल स्थूल शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उस विराट गरिमा का हिस्सा है जिसमें समस्त देवता (शक्तियाँ) समाहित हैं। यह भारीपन या गरिमा वास्तव में चेतना का वह घनत्व है जो उसे संसार की चंचलता से मुक्त कर स्थिरता प्रदान करता है।

'त्रैती तनु' का अभ्यास यह है कि साधक अपनी जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं के सूक्ष्म शरीर (तनु) को एक सूत्र में पिरोकर उस 'तुरीय' अवस्था की ओर बढ़े, जिसका संकेत अगले श्लोकों में मिलता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक संध्या के समय केवल मंत्र न जपे, बल्कि स्वयं को एक 'संधि-बिंदु' के रूप में अनुभव करे, जहाँ वह प्रकृति (भूत) के बंधन से ऊपर उठकर पुरुष (देव) की गरिमा को प्राप्त करता है। यह अभ्यास साधक को विखंडित व्यक्तित्व से एकीकृत व्यक्तित्व की ओर ले जाता है।

श्लोक ६.२१

संधिते तु परे सूक्ष्मे निर्गुणे गुणबोधिनी ।

प्रधानपुरुषातीते सा संध्या संधिरुच्यते ॥ ६.२१ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५०

किन्तु जो परे (परमात्मा में) संधि होने पर सूक्ष्म, निर्गुण और गुणों को बोध कराने वाली है, वह संध्या 'संधि' कही जाती है, जो प्रधान और पुरुष से भी अतीत है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या को समस्त देवताओं का संगम और भूतों के लिए गरिमापूर्ण बताते हुए उसके 'त्रैती तनु' (तीन स्वरूपों वाले) होने का संकेत दिया। अब इस श्लोक में वे संध्या के उस उच्चतम और सूक्ष्म स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जो काल और प्रकृति की सीमाओं से परे है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: तु परे सूक्ष्मे निर्गुणे (संधिते), (सा) गुणबोधिनी, प्रधान-पुरुषातीते, सा संध्या 'संधिः' उच्यते।

पदार्थ और निर्वचन:

• परे: जो इस दृश्य जगत, समय और स्थूल शरीर से परे (परमात्मा में) है।

• सूक्ष्मे: वह अवस्था जो इंद्रियों और मन की पकड़ से बाहर है; अत्यंत सूक्ष्म चेतना।

• निर्गुणे: सत्व, रज और तम—इन तीनों गुणों के प्रभाव से रहित।

• गुणबोधिनी: गुणों का बोध कराने वाली। यहाँ इसका अर्थ है कि वह अवस्था, जो स्वयं निर्गुण होते हुए भी साधक को यह बोध कराती है कि प्रकृति के गुण कैसे कार्य करते हैं और उनसे कैसे मुक्त हुआ जा सकता है।

• प्रधान-पुरुषातीते: सांख्य दर्शन के अनुसार 'प्रधान' (मूल प्रकृति) और 'पुरुष' (शुद्ध चेतना) के द्वैत से भी अतीत। जब प्रकृति और पुरुष का भेद मिट जाता है, वह स्थिति 'अतीत' है।

• संधिः: मिलन, योग या एकरूपता। यहाँ 'संधि' केवल समय का मिलन नहीं, अपितु जीवात्मा का परमात्मा से पूर्ण मिलन है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य संध्या के बाह्य और आंतरिक अर्थों के बीच की कड़ी को पूर्ण करते हैं। पिछले श्लोकों में उन्होंने प्रातः, मध्याह्न और सायं की संध्याओं का वर्णन किया, जो काल-चक्र पर आधारित थीं। किन्तु यहाँ वे संध्या के उस 'पर' स्वरूप की चर्चा कर रहे हैं जो कालतीत है।

ऋषि कहते हैं कि जब साधक की चेतना उस 'पर' तत्व में संधि करती है, जो सूक्ष्म है और गुणों के प्रभाव से सर्वथा मुक्त (निर्गुण) है, तब वह अनुभव वास्तविक 'संधि' कहलाता है। यह वह बिंदु है जहाँ साधक को यह बोध होता है कि वह स्वयं इन गुणों का समूह नहीं, अपितु गुणों का साक्षी है—इसीलिए इसे 'गुणबोधिनी' कहा गया है।

इस संध्या की विशेषता यह है कि यह 'प्रधान-पुरुषातीते' है। सामान्यतः साधना में प्रकृति (प्रधान) और आत्मा (पुरुष) के बीच एक संघर्ष या संबंध रहता है। किन्तु जब साधक इस उच्चतम संध्या-अवस्था में पहुँचता है, तो वह प्रकृति के मायाजाल और पुरुष के पृथक होने के भ्रम, दोनों से ऊपर उठ जाता है। यहाँ 'संधि' का अर्थ है—द्वैत का लय होना। यह वह स्थिति है जहाँ उपासक और उपसनीय (ईश्वर) के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। अतः, जिसे हम बाहरी तौर पर सूर्योदय या सूर्यास्त के समय की पूजा समझते हैं, उसका वास्तविक लक्ष्य इस आंतरिक 'संधि' को प्राप्त करना है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'काल-संध्या' से 'चित्त-संध्या' की ओर ले जाता है। बाह्य संध्या एक साधन है, जबकि इस श्लोक में वर्णित 'पर-संधि' साध्य है।

साधक जब नियमित रूप से गायत्री, सावित्री और सरस्वती संध्या का अभ्यास करता है, तो उसकी चेतना स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ती है। इस अभ्यास से वह उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ उसे अनुभव होता है कि आत्मा का परमात्मा से जुड़ना ही वास्तविक संध्या है। यह 'संधि' किसी घड़ी या नक्षत्र पर निर्भर नहीं है, अपितु यह आत्मा की एक अवस्था है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब निर्गुण निराकार में लीन होता है, तब वह 'गुणबोधिनी' शक्ति का अनुभव करता है। वह देखता है कि रज और तम की चंचलता शांत हो गई है और सत्व का प्रकाश उसे उस 'अतीत' अवस्था में ले जा रहा है जहाँ न प्रकृति का बंधन है और न ही पृथकता का बोध। यह वह योगिक अवस्था है जहाँ साधक स्वयं 'अक्षर' (अविनाशी) में प्रतिष्ठित हो जाता है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को कर्म-भूमि से उठाकर ज्ञान-भूमि और अंततः कैवल्य-भूमि की ओर अग्रसर करता है।

अनूदकी संध्या

श्लोक ६.२२

अनूदकी तु या संध्या लेपस्नेहविवर्जिता ।

संधिनी सर्वभूतानां शोधिनी भवनाशिनी ॥ ६.२२ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५०

अनूदकी नामक संध्या लेप और स्नेह से रहित है; वह सभी भूतों की संधि करने वाली, शुद्ध करने वाली और भव (संसार) को नष्ट करने वाली है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या के उस उच्चतम स्वरूप का वर्णन किया जो प्रधान और पुरुष से भी अतीत है। अब वे उस विशिष्ट साधना पद्धति का परिचय दे रहे हैं, जिसमें बाह्य क्रियाओं के स्थान पर आंतरिक चेतना का जागरण प्रधान है, जिसे 'अनूदकी संध्या' कहा गया है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: अनूदकी तु या संध्या, (सा) लेप-स्नेह-विवर्जिता (अस्ति)। (सा) सर्वभूतानां संधिनी, शोधिनी, भवनाशिनी (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अनूदकी: 'उदक' का अर्थ है जल। 'अनूदक' अर्थात् बिना जल के। यहाँ यह उस संध्या का संकेत है जो बाह्य जल-अर्पण (अर्घ्य) के स्थान पर आंतरिक जल (अमृत या प्राण-रस) के प्रवाह से संपन्न होती है।

• लेप-स्नेह-विवर्जिता: 'लेप' का अर्थ है शरीर पर लगाया जाने वाला चंदन, हल्दी या अन्य औषधीय लेप; 'स्नेह' का अर्थ है तेल, घी या सुगंधित द्रव्य। 'विवर्जिता' अर्थात् इनसे रहित। यह संकेत है कि यह साधना स्थूल शरीर के श्रृंगार या भौतिक शुद्धि पर आधारित नहीं है।

• संधिनी: मिलाने वाली। जो जीवात्मा को परमात्मा से, और व्यक्ति को उसके मूल स्वरूप से जोड़ दे।

• शोधिनी: शुद्ध करने वाली। जो केवल बाह्य अशुद्धि नहीं, अपितु चित्त के विकारों, संस्कारों और कर्म-मल का शोधन करे।

• भवनाशिनी: 'भव' अर्थात् संसार-चक्र (जन्म-मृत्यु का आवर्तन)। 'नाशिनी' अर्थात् जिसका नाश करने वाली हो। यह मोक्षदायिनी अवस्था है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य संध्या के उस गुप्त और आंतरिक पक्ष को खोल रहे हैं, जिसे 'अनूदकी संध्या' कहा जाता है। सामान्यतः संध्या उपासना में स्नान, जल-अर्पण, लेप और विभिन्न विहित क्रियाएँ अनिवार्य होती हैं, जो साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने की तैयारी हैं। किन्तु, जब साधक एक निश्चित भूमि पर पहुँच जाता है, तब वह बाह्य उपकरणों के बिना ही उस परम तत्व से जुड़ सकता है।

ऋषि कहते हैं कि अनूदकी संध्या वह है जो 'लेप और स्नेह' से रहित है। इसका भाव यह है कि इस साधना में शरीर की बाहरी साज-सज्जा या भौतिक शुद्धि की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि यहाँ शुद्धि का केंद्र 'शरीर' नहीं, बल्कि 'चेतना' है। जब साधक का ध्यान अंतर्मुखी होता है, तब वह बाह्य जल के स्थान पर अपने भीतर के 'अमृत-जल' का अनुभव करता है।

यह संध्या 'सर्वभूतानां संधिनी' है। इसका रहस्य यह है कि यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, अपितु समस्त भूतों (प्राणियों) के मूल तत्व की संधि है। जब साधक इस अवस्था में होता है, तो वह स्वयं को पृथक न देखकर समस्त अस्तित्व के साथ एकरूप अनुभव करता है। यही वह 'संधि' है जो द्वैत को मिटाकर अद्वैत की स्थापना करती है।

'शोधिनी' होने का अर्थ है कि यह साधना चित्त की उन गहराइयों को साफ करती है जहाँ वासनाएँ और अविद्या जमी होती हैं। जैसे जल शरीर को धोता है, वैसे ही अनूदकी संध्या का ध्यान आत्मा के दर्पण को उज्ज्वल कर देता है। अंततः, जब अविद्या का नाश होता है और आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होती है, तब 'भव' अर्थात् संसार के बंधनों का स्वतः क्षय हो जाता है। इसीलिए इसे 'भवनाशिनी' कहा गया है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक महान परिवर्तन का संकेत है—बाहरी कर्म से आंतरिक योग की ओर गमन। यहाँ 'अनूदकी' शब्द केवल जल के अभाव को नहीं, बल्कि 'जल के पार' जाने को दर्शाता है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब इस श्लोक के भाव को आत्मसात करता है, तो वह यह अनुभव करता है कि वास्तविक शुद्धि बाह्य स्नान में नहीं, बल्कि प्राणों के लय होने में है। लेप और स्नेह का त्याग करना वास्तव में 'माया' और 'मोह' के लेप को हटाने का अभ्यास है।

साधक यहाँ उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह यह जान लेता है कि हृदय के भीतर एक ऐसा अक्षय स्रोत है, जो कभी सूखता नहीं। जब वह बाह्य अर्घ्य के स्थान पर अपनी चेतना को हृदय-आकाश में केंद्रित करता है, तो वह 'संधिनी' अवस्था का अनुभव करता है—जहाँ मन, प्राण और आत्मा एक बिंदु पर मिल जाते हैं। यह अभ्यास साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'ज्ञान-भूमि' और फिर 'समाधि-भूमि' की ओर ले जाता है, जहाँ संसार का भय समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।

श्लोक ६.२३

हृद्याकाशगता सूक्ष्मा आदित्यरश्मिरेखया ।

सोमसूर्याग्निसंस्कृत्या अण्डं भित्त्वा विनिर्गता ॥ ६.२३ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५०

हृदय-आकाश में गमन करने वाली वह सूक्ष्म (संध्या), आदित्य की रश्मि-रेखा द्वारा, सोम, सूर्य और अग्नि के संस्कार से अण्ड को फाड़कर निर्गत हुई है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'अनूदकी संध्या' के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसे बाह्य लेप और स्नेह से रहित, तथा भव-नाश करने वाली बताया। अब वे इस सूक्ष्म संध्या के उद्गम और उसकी आंतरिक गति का रहस्य खोल रहे हैं कि यह चेतना किस मार्ग से और किस संस्कार से जाग्रत होती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (सा अनूदकी संध्या) हृद्याकाशगता (अस्ति), सूक्ष्मा (अस्ति), आदित्यरश्मिरेखया (सम्पन्नः), सोम-सूर्य-अग्नि-संस्कृत्या अण्डं भित्त्वा विनिर्गता (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• हृद्याकाशगता: हृदय के भीतर स्थित उस सूक्ष्म आकाश (दहर-आकाश) में स्थित या वहाँ गमन करने वाली।

• सूक्ष्मा: अत्यंत सूक्ष्म। जो स्थूल इंद्रियों या मन के साधारण संकल्पों से नहीं, अपितु केवल प्रज्ञा से अनुभूत हो।

• आदित्यरश्मिरेखया: आदित्य (सूर्य) की रश्मि-रेखा के द्वारा। यहाँ 'रेखा' उस प्रकाश-मार्ग का संकेत है जो बाहरी सूर्य से आंतरिक सूर्य (हृदय-ज्योति) को जोड़ता है।

• सोम-सूर्य-अग्नि-संस्कृत्या: सोम, सूर्य और अग्नि के संस्कार से। 'संस्कार' का अर्थ है परिष्कृत करना या शुद्ध करना। इन तीनों दैवीय शक्तियों के समन्वय से जो शोधन होता है, वह इस संध्या का आधार है।

• अण्डं भित्त्वा विनिर्गता: अण्ड को भेदकर (फाड़कर) बाहर निकली हुई। 'अण्ड' यहाँ सीमित चेतना के खोल या शरीर-रूप अण्ड का प्रतीक है, जिसे भेदकर आत्मा अपनी सूक्ष्मता में प्रकट होती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य उस आंतरिक प्रक्रिया का वर्णन कर रहे हैं जिसके द्वारा साधक 'अनूदकी संध्या' की अवस्था को प्राप्त करता है। यह संध्या कोई बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि एक आंतरिक घटना है।

ऋषि कहते हैं कि यह संध्या 'हृद्याकाशगता' है। शरीर के भीतर हृदय में एक सूक्ष्म आकाश है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिबिंब है। जब साधक बाह्य जगत से विमुख होकर अंतर्मुखी होता है, तब उसकी चेतना इसी हृदयाकाश में प्रतिष्ठित होती है। यह अवस्था 'सूक्ष्म' है, क्योंकि यहाँ पहुँचने के लिए स्थूल शरीर के भान को छोड़कर प्राणमय और विज्ञानमय कोश में प्रवेश करना पड़ता है।

इस सूक्ष्म अवस्था की प्राप्ति 'आदित्यरश्मिरेखया' से होती है। इसका भाव यह है कि जिस प्रकार बाहरी सूर्य की किरणें अंधकार को मिटाती हैं, उसी प्रकार ज्ञान-रूपी आदित्य की एक सूक्ष्म प्रकाश-रेखा साधक के हृदय में उतरती है। यह रेखा वास्तव में वह सेतु है जो स्थूल सूर्य (बाह्य) और सूक्ष्म सूर्य (हृदय-ज्योति) को जोड़ती है।

इस प्रक्रिया में 'सोम, सूर्य और अग्नि' के संस्कार की भूमिका है। सोम (चंद्रमा) शीतलता और मन का प्रतीक है, सूर्य तेज और आत्मा का, तथा अग्नि रूपांतरण और प्राण का। जब साधक के भीतर इन तीनों शक्तियों का संतुलन और संस्कार होता है, तब उसकी चेतना एक ऐसी शक्ति अर्जित करती है जो 'अण्डं भित्त्वा' अर्थात अण्ड को भेदने में सक्षम होती है। यहाँ 'अण्ड' के दो अर्थ संभव हैं: प्रथम, यह शरीर-अण्ड है, जिसमें जीवात्मा सीमित है; द्वितीय, यह अविद्या का वह आवरण (खोल) है जिसने आत्मा को ढँक रखा है। इस खोल को भेदकर जब चेतना 'विनिर्गता' होती है, तब वह उस परम प्रकाश का अनुभव करती है जिसे अनूदकी संध्या कहा गया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

हृदयाकाश और आदित्य की रश्मियों के इस संबंध की पुष्टि उपनिषदों में मिलती है। छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णन है:

छान्दोग्य उपनिषद्

अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ ८.१.१ ॥

इस ब्रह्मपुर (शरीर) में जो यह छोटा-सा कमल-रूप घर (हृदय) है, उसमें एक छोटा-सा आकाश है; उसके भीतर जो है, उसीको खोजना चाहिए, उसीको जाननेकी इच्छा करनी चाहिए।

छान्दोग्य उपनिषद् ८.१.१उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 292

यहाँ 'दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः' (हृदय के भीतर छोटा आकाश) का उल्लेख है, जिसे स्मृति में 'हृद्याकाशगता' कहा गया है। इसी प्रकार, आदित्य की किरणों के हृदय की नाड़ियों में प्रवेश का रहस्य यहाँ मिलता है:

छान्दोग्य उपनिषद्

तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ ८.६.२ ॥

जैसे एक लम्बा राजमार्ग दोनों गाँवोंको जाता है — इसको भी और उसको भी — वैसे ही आदित्यकी ये किरणें दोनों लोकोंको जाती हैं — इसको भी और उसको भी। वे उस आदित्यसे फैलकर इन (हृदयकी) नाडियोंमें पहुँची हैं, और इन नाडियोंसे फैलकर उस आदित्यमें पहुँची हैं।

छान्दोग्य उपनिषद् ८.६.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 297

श्रुति कहती है कि आदित्य की रश्मियाँ दोनों लोकों को जाती हैं और हृदय की नाड़ियों में सृप्त (स्थित) हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-रहस्य का विस्तार कर रही है कि वही 'आदित्यरश्मिरेखा' साधक को सूक्ष्म संध्या के अनुभव तक ले जाती है। स्मृति यहाँ यह जोड़ती है कि केवल रश्मियों का होना पर्याप्त नहीं, अपितु सोम-सूर्य-अग्नि का 'संस्कार' आवश्यक है, ताकि अविद्या के अण्ड को भेदा जा सके।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अन्तःकरण की शुद्धि' और 'ऊर्ध्वगमन' का सूत्र है। सामान्य संध्या में हम जल से शरीर धोते हैं, किंतु अनूदकी संध्या में 'सोम-सूर्य-अग्नि' के संस्कार से चित्त का शोधन किया जाता है।

अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को बाहरी सूर्य से हटाकर हृदय के केंद्र (हृदयाकाश) में ले जाए। जब वह अनुभव करता है कि बाहरी सूर्य की रश्मि वास्तव में उसके भीतर की ज्योति का ही विस्तार है, तब वह 'आदित्यरश्मिरेखा' पर आरूढ़ होता है। सोम (मन की शांति), सूर्य (आत्मा का तेज) और अग्नि (प्राण की तपिश) जब एक बिंदु पर मिलते हैं, तब एक आंतरिक विस्फोट होता है, जो अविद्या के 'अण्ड' (सीमित अहंकार) को तोड़ देता है।

यह अवस्था साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की भूमि पर ले जाती है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि उस हृदयाकाश में स्थित एक सूक्ष्म प्रकाश-पुंज है। यह अनुभव उसे उस स्थिति के लिए तैयार करता है जहाँ वह अगले श्लोक में वर्णित 'सुषुम्णा' के मार्ग से ईश्वर का ध्यान कर सके।

श्लोक ६.२४

बद्धमेतं सुषुम्णायां दीर्घघण्टानिनादवत् ।

ईश्वरं मनसा ध्यायेदेषा संध्या अनूदकी ॥ ६.२४ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५०

सुषुम्णामें बँधे, लंबे घण्टानादकी भाँति (गूँजते) इस ईश्वरका मनसे ध्यान करे — यह अनूदकी (बिना जलकी) संध्या है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अनूदकी संध्या के उद्गम का रहस्य बताया कि कैसे यह सूक्ष्म चेतना हृदय-आकाश में आदित्य की रश्मि और सोम-सूर्य-अग्नि के संस्कार से अण्ड (सीमित बोध) को भेदकर प्रकट होती है। अब इस श्लोक में वे उस प्रकट हुई चेतना के गमन-मार्ग और उसकी ध्यान-विधि का निरूपण कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तम्) बद्धम् एतम् सुषुम्णायां, दीर्घघण्टानिनादवत् (स्थितम्), ईश्वरं मनसा ध्यायेत्; एषा संध्या अनूदकी (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• बद्धम् एतम्: यहाँ 'बद्ध' का अर्थ बंधन नहीं, अपितु 'प्रतिष्ठित' या 'एकत्रित' होना है। वह सूक्ष्म ज्योति या चेतना जो अब सुषुम्णा में केंद्रित हो गई है।

• सुषुम्णायां: सुषुम्णा नाड़ी में। वह मध्य मार्ग जो हृदय से ऊपर की ओर जाता है।

• दीर्घघण्टानिनादवत्: लंबे घण्टे की गूँज के समान। 'दीर्घ' का अर्थ है वह नाद जो क्षणिक नहीं है, बल्कि निरंतर व्याप्त है। 'घण्टानिनाद' उस अनहद नाद का प्रतीक है जो ध्यान की गहराई में सुनाई देता है।

• ईश्वरं मनसा ध्यायेत्: उस ईश्वर (परम पुरुष/अंतर्यामी) का मन से ध्यान करे। यहाँ 'मनसा' का अर्थ है संकल्प का लय होना, न कि विचार करना।

• अनूदकी: जल-रहित। वह संध्या जिसमें बाह्य जल की आवश्यकता नहीं, क्योंकि साधक आंतरिक अमृत-धारा में स्नान कर रहा है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य अनूदकी संध्या की पराकाष्ठा का वर्णन कर रहे हैं। पिछले श्लोक में जिस सूक्ष्म ज्योति ने 'अण्ड' को भेदा था, वह अब ऊपर की ओर गमन करती है। ऋषि कहते हैं कि वह ज्योति अब सुषुम्णा नाड़ी में 'बद्ध' है, अर्थात वह अब विखरी हुई नहीं है, बल्कि एक सुकेंद्रित धारा के रूप में उर्ध्वगामी है।

यहाँ 'दीर्घघण्टानिनादवत्' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब साधक की चेतना सुषुम्णा में प्रवाहित होती है, तो उसे एक सूक्ष्म ध्वनि का अनुभव होता है। यह ध्वनि किसी बाहरी घण्टे की नहीं, बल्कि उस 'नाद' की है जो संपूर्ण अस्तित्व में गूँज रहा है। जैसे घण्टे का नाद एक बिंदु से शुरू होकर चारों ओर फैल जाता है और फिर एक गहन शांति में विलीन हो जाता है, वैसे ही यह आंतरिक नाद साधक के मन को स्थिर कर उसे ईश्वर के स्वरूप में लीन कर देता है।

यह विधि पूर्णतः मानसिक और प्राणिक है। इसमें न लेप है, न स्नेह और न ही बाह्य जल। इसीलिए इसे 'अनूदकी' कहा गया है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक का मन स्वयं ही मन्त्र बन जाता है और उसकी श्वास स्वयं ही संध्या की आहुति। जब मन इस दीर्घ नाद के साथ लयबद्ध होकर सुषुम्णा में स्थित ईश्वर का ध्यान करता है, तब वह स्थूल जगत की सीमाओं को लाँघकर उस 'संधि' को प्राप्त होता है, जिसका उल्लेख पिछले श्लोकों (६.२०-२१) में किया गया था।

शास्त्र-साक्ष्य —

हृदय से ऊपर की ओर गमन और सुषुम्णा की महत्ता के विषय में उपनिषद् कहते हैं:

कठ उपनिषद्

शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ २.३.१६ ॥

हृदयकी एक सौ एक नाडियाँ हैं; उनमेंसे एक मूर्धाकी ओर निकली है। उससे ऊपर जाता हुआ (मनुष्य) अमृतत्वको पाता है; दूसरी नाडियाँ (प्राणके) निकलनेमें इधर-उधर (के लोकोंमें) ले जानेवाली होती हैं।

कठ उपनिषद् २.३.१६ (= छान्दोग्य ८.६.६)उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 78

यहाँ स्पष्ट है कि हृदय की अनेक नाड़ियों में से केवल एक ही वह मार्ग है जो मूर्धा (ऊपर) की ओर जाता है और अमृतत्व की प्राप्ति कराता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'सुषुम्णायां बद्धम्' इसी अमृत-मार्ग की पुष्टि करता है।

इसी प्रकार, नाड़ियों के संगम और वहाँ 'ॐ' के द्वारा आत्म-ध्यान का निर्देश मिलता है:

मुण्डक उपनिषद्

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः । ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ २.२.६ ॥

जैसे रथकी नाभिमें अरे, वैसे जहाँ (हृदयमें) नाडियाँ मिली हैं, वहाँ वह (आत्मा) अनेक रूपोंमें प्रकट होता भीतर विचरता है। 'ॐ' — ऐसे आत्माका ध्यान करो; अन्धकारसे परे पार जानेके लिए तुम्हारा कल्याण हो।

मुण्डक उपनिषद् २.२.६उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 104

मुण्डक उपनिषद् के अनुसार, जहाँ नाड़ियाँ रथ की नाभि के समान संहता (एकत्रित) होती हैं, वहाँ आत्मा विचरता है। स्मृति में 'दीर्घघण्टानिनादवत्' ईश्वर का ध्यान इसी नाभि-केंद्र से ऊपर उठकर अक्षर-ब्रह्म में लीन होने की प्रक्रिया है। दोनों ही शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि आंतरिक नाद और नाड़ी-शुद्धि ही आत्म-साक्षात्कार का द्वार है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'नाद-योग' और 'लय-योग' का संगम है।

१. अभ्यास: साधक को पहले अपनी चेतना को हृदय-आकाश में लाना है (जैसा पिछले श्लोक में बताया गया), फिर उस ज्योति को सुषुम्णा के मार्ग पर ऊपर की ओर ले जाना है।

२. अनुभव: जब प्राण सुषुम्णा में स्थिर होता है, तब 'दीर्घघण्टानिनाद' जैसा अनुभव होता है। यह नाद साधक को यह संकेत देता है कि वह अब 'अण्ड' (अविद्या के खोल) से मुक्त होकर सूक्ष्म मार्ग पर है।

३. भूमि: यहाँ साधक 'सावित्री' या 'सरस्वती' की स्थूल उपासना से ऊपर उठकर 'ईश्वर-ध्यान' की उस भूमि पर आता है जहाँ केवल मन और नाद शेष रहते हैं।

४. साधना: यह ध्यान बिना किसी बाहरी साधन के केवल 'मनसा' किया जाता है। जब मन इस गूँजते हुए नाद में लीन हो जाता है, तब वह 'अक्षर' (ओंकार) में स्थित ईश्वर का साक्षात्कार करता है। यह अनूदकी संध्या वास्तव में साधक को 'जगत' से 'परमात्मा' की संधि तक ले जाने वाली वह सीढ़ी है, जहाँ बाह्य कर्म समाप्त होते हैं और केवल आंतरिक अनुभव शेष रहता है।

संध्याकालः

श्लोक ६.२५

संधौ संध्यामुपासीत नास्तगे नोद्गते रवौ ।

संध्यात्रयं तु कर्तव्यं द्विजेनात्मविदा सदा ॥ ६.२५ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५०

संधि(काल) में संध्याकी उपासना करे — सूर्यके अस्त हो जाने या उग आनेपर नहीं। आत्मज्ञानी द्विजको सदा तीनों संध्याएँ करनी चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'अनूदकी संध्या' के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसे हृदय-आकाश और सुषुम्णा नाड़ी में स्थित ईश्वर के नादात्मक ध्यान के रूप में परिभाषित किया। अब ऋषि इस आंतरिक साधना के साथ-साथ बाह्य काल-विधान का निर्णय कर रहे हैं कि इस उपासना का सटीक समय क्या होना चाहिए।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधक) रवौ नास्तगे नोद्गते, संधौ संध्यामुपासीत। आत्मविदा द्विजेन तु संध्यात्रयं सदा कर्तव्यम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• रवौ: सूर्य। यहाँ 'रव' शब्द सूर्य के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो प्रकाश और तेज का स्रोत है।

• नास्तगे नोद्गते: 'न अस्तगे' (अस्त होने के बाद नहीं) और 'न उद्गते' (उदित होने के बाद नहीं)। अर्थात् जब सूर्य पूरी तरह छिप चुका हो या पूरी तरह ऊपर आ चुका हो, वह समय संध्या उपासना के लिए उपयुक्त नहीं है।

• संधौ: संधि-काल में। वह समय जब दिन और रात्रि का मिलन होता है, या जब एक अवस्था समाप्त होकर दूसरी का आरम्भ होता है।

• उपासीत: उपासना करे। उपासना का अर्थ है 'उप' (निकट) + 'आस' (बैठना), अर्थात् उस परम तत्त्व के समीप स्थित होना।

• आत्मविदा: वह जो अपनी आत्मा को जानता है; आत्मज्ञानी या योगी।

• द्विजेन: द्विज (दो बार जन्म लेने वाला)। यहाँ द्विज का अर्थ केवल जाति से नहीं, अपितु उस साधक से है जिसने ज्ञान के द्वारा दूसरा जन्म प्राप्त किया है।

• संध्यात्रयं: तीनों संध्याएँ (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल)।

• सदा: निरंतर, बिना किसी व्यवधान के, हर परिस्थिति में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-साधना के 'काल-निर्णय' और 'साधक की पात्रता' के बीच के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद बता रहे हैं। सामान्य विधि के अनुसार, संध्या की उपासना 'संधि' में होनी चाहिए। संधि वह क्षण है जब सूर्य क्षितिज के नीचे जाने वाला होता है या ऊपर आने वाला होता है। जब सूर्य पूरी तरह अस्त (अस्तगे) हो गया या पूरी तरह उदित (उद्गते) हो गया, तब वह 'संधि' समाप्त हो गई। यदि साधक इस समय उपासना करता है, तो वह केवल एक क्रिया बन जाती है, 'संध्या' नहीं।

संध्या का अर्थ ही है—दो अवस्थाओं का मिलन। जब बाह्य प्रकृति में प्रकाश और अंधकार मिलते हैं, तब साधक के भीतर भी जाग्रत और सुषुप्ति के बीच की एक सूक्ष्म संधि निर्मित होती है। इसी क्षण में मन को पकड़ने से वह सहज ही अंतर्मुखी हो जाता है।

किन्तु, श्लोक के दूसरे भाग में ऋषि एक उच्चतर स्तर की बात करते हैं— "आत्मविदा द्विजेन तु संध्यात्रयं सदा कर्तव्यम्"। जो 'आत्मविद्' है, जिसके लिए सूर्य केवल आकाश का एक पिंड नहीं, अपितु हृदय में स्थित 'हृदय-सूर्य' है, उसके लिए संधि का अर्थ बदल जाता है। आत्मज्ञानी के लिए हर क्षण संधि है—क्षण-क्षण परिवर्तन और स्थिरता का मिलन है। इसलिए, वह केवल बाह्य सूर्य के उदय-अस्त पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि वह तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायंकाल) का पालन 'सदा' करता है। यहाँ 'सदा' शब्द यह संकेत देता है कि उसकी उपासना केवल समय की पाबंदी नहीं, बल्कि एक निरंतर सजगता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्सावित्रीमार्कदर्शनात् । पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ २.१०१ ॥

प्रातःसंध्यामें सूर्यके दर्शनतक खड़े होकर सावित्री जपे; सायंसंध्यामें नक्षत्र भलीभाँति दिखनेतक बैठकर (जपे)।

मनुस्मृति २.१०१मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 181

मनुस्मृति में प्रातः संध्या के समय सूर्य के दर्शन तक खड़े रहने और सायं संध्या में नक्षत्रों के दर्शन तक बैठकर जप करने का विधान है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विधान को और सूक्ष्म बनाती है। मनुस्मृति जहाँ बाह्य सूर्य की स्थिति (दर्शन) को आधार मानती है, वहीं याज्ञवल्क्य ऋषि 'संधि' के क्षण पर बल देते हैं। मनुस्मृति की विधि 'विधि-परक' है, जबकि याज्ञवल्क्य की दृष्टि 'योग-परक' है, जहाँ समय का चयन केवल अनुशासन के लिए नहीं, बल्कि चेतना के उस विशेष बिंदु को पकड़ने के लिए है जहाँ साधक का मन सबसे अधिक सूक्ष्म होता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'सजगता' के सूक्ष्म अभ्यास का निर्देश है। 'संधि' का अर्थ है—दो अवस्थाओं के बीच का वह शून्य बिंदु, जहाँ एक स्थिति समाप्त हो रही है और दूसरी अभी आरम्भ नहीं हुई है। जब बाह्य प्रकृति में सूर्य अस्त हो रहा होता है, तब चराचर जगत में एक क्षणिक ठहराव आता है। साधक के लिए यह ठहराव ही वह द्वार है, जिससे वह स्थूल जगत के कोलाहल से हटकर सूक्ष्म जगत के मौन में प्रवेश कर सकता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि यदि वह सूर्य के पूरी तरह अस्त होने का इंतज़ार करेगा, तो वह 'तमस' (अंधकार/जड़ता) के प्रभाव में आ जाएगा, और यदि वह सूर्य के पूरी तरह उदय होने का इंतज़ार करेगा, तो वह 'रजस' (संसार की हलचल/विकार) में खो जाएगा। अतः, न पूर्ण अंधकार, न पूर्ण प्रकाश—बल्कि उस 'संधि' के क्षण को पकड़ना ही योग है। यह अभ्यास मन को उस बिंदु पर लाना है जहाँ वह न अतीत की स्मृतियों में हो और न भविष्य की कामनाओं में, अपितु वर्तमान के उस सूक्ष्म बिंदु पर स्थित हो जहाँ केवल 'होना' शेष है।

'आत्मविद्' साधक के लिए यह अभ्यास और गहरा हो जाता है। वह अनुभव करता है कि उसके भीतर प्राणों का प्रवाह और चेतना की गतियाँ भी निरंतर संधि-काल से गुजरती हैं। जब वह 'संध्यात्रयं सदा' करता है, तो वह वास्तव में समय की सीमाओं को लाँघकर अपने भीतर के उस 'अक्षर' या स्थिर प्रकाश से जुड़ता है जो उदय और अस्त से परे है। वह बाह्य सूर्य की स्थिति को केवल एक संकेत के रूप में प्रयोग करता है, जबकि उसकी वास्तविक उपासना हृदय-सूर्य की निरंतर उपस्थिति में होती है। इस अभ्यास से साधक 'साधारण द्विज' (जो केवल नियमों का पालन करता है) से 'आत्मविद् द्विज' (जो स्वयं के स्वरूप में स्थित है) की भूमि की ओर बढ़ता है।

आश्रमभेदेन स्नानसंख्याभेदः

श्लोक ६.२६

उभे संध्ये तु स्नातव्यं ब्राह्मणैस्तु गृहाश्रितैः ।

तिसृष्वपि च संध्यासु स्नातव्यं ब्रह्मवादिना ॥ ६.२६ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५०

गृहस्थ ब्राह्मणोंको दोनों संध्याओंमें स्नान करना चाहिए; और ब्रह्मवादी (संन्यासी) को तीनों संध्याओंमें स्नान करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या उपासना के सटीक समय (संधि-काल) का निर्धारण किया और यह बताया कि आत्मज्ञानी द्विज के लिए तीनों संध्याओं का पालन निरंतर अनिवार्य है। अब इस उपासना के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी 'स्नान' की बाह्य विधि और साधक के आश्रम के अनुसार उसकी संख्या का निर्णय किया जा रहा है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: गृहाश्रितैः ब्राह्मणैः उभे संध्ये तु स्नातव्यम्। ब्रह्मवादिना तिसृष्वपि च संध्यासु स्नातव्यम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• गृहाश्रितैः: घर में रहने वाले, अर्थात् गृहस्थ आश्रम में स्थित।

• ब्राह्मणैः: यहाँ ब्राह्मण का अर्थ केवल जन्म से नहीं, अपितु उस व्यक्ति से है जो ब्रह्म-विद्या के मार्ग पर अग्रसर है और सात्विक जीवन जीता है।

• उभे संध्ये: दोनों संध्याओं में (प्रातः और सायंकाल)।

• स्नातव्यम्: स्नान करना चाहिए। 'तव्यत्' प्रत्यय यहाँ विधि (कर्तव्य) का बोध करा रहा है।

• ब्रह्मवादिना: वह जो ब्रह्म का वक्ता है, जिसकी वाणी और चेतना ब्रह्म में लीन है। यह संभवतः संन्यासी या वानप्रस्थी साधक के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिसने संसार के बंधनों को न्यूनतम कर लिया है।

• तिसृष्वपि: तीनों (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल) संध्याओं में भी।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक बाह्य शुद्धि (स्नान) और आंतरिक शुद्धि (संध्या) के समन्वय को दर्शाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि साधना की तीव्रता और साधक की अवस्था के अनुसार विधि में परिवर्तन आता है।

गृहस्थ ब्राह्मण के लिए दो समय का स्नान निर्धारित है। गृहस्थ का जीवन कर्तव्यों, परिवार और सामाजिक उत्तरदायित्वों से बँधा होता है। उसके लिए प्रातः और सायंकाल का स्नान केवल शरीर की शुद्धि नहीं, अपितु दिन के आरम्भ और अंत में चित्त को स्थिर करने का एक साधन है। यह उसे भौतिक जगत के प्रपंचों से निकालकर पुनः आध्यात्मिक केंद्र की ओर मोड़ने की प्रक्रिया है।

किन्तु 'ब्रह्मवादी' के लिए यह विधान भिन्न है। ब्रह्मवादी वह है जिसने अपना संपूर्ण जीवन ब्रह्म-साक्षात्कार को समर्पित कर दिया है। उसके लिए स्नान केवल शरीर का प्रक्षालन नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली शुद्धि-प्रक्रिया है। इसीलिए उसे तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल) में स्नान का निर्देश दिया गया है। मध्याह्न की संध्या सूर्य के चरम उत्कर्ष का समय है, जब तेज और ताप सर्वाधिक होते हैं; इस समय स्नान करना साधक के भीतर की अग्नि (तप) को संतुलित करता है और उसे मध्याह्न की उपासना के लिए तैयार करता है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि याज्ञवल्क्य जी विधिको मिटाते नहीं हैं, अपितु उसके पीछे का रहस्य खोलते हैं। बाह्य स्नान जल से होता है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ है—इन्द्रियों का निग्रह और मन का निर्मल होना। गृहस्थ के लिए दो बार का स्नान पर्याप्त है क्योंकि उसकी साधना की गति धीमी होती है, परन्तु ब्रह्मवादी की गति तीव्र है, उसे निरंतर 'शुचि' (पवित्र) रहना पड़ता है ताकि वह ब्रह्म-विद्या के सूक्ष्म स्पंदनों को ग्रहण कर सके।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से स्नान 'शोधन' की प्रक्रिया है। बाह्य जल शरीर के मैल को धोता है, किन्तु जब यह स्नान संध्या-उपासना से जुड़ता है, तो यह 'प्राण-शोधन' बन जाता है।

गृहस्थ साधक जब दोनों संध्याओं में स्नान करता है, तो वह अपनी चेतना को जड़ता (तमस) से सक्रियता (रजस) और फिर शांति (सत्व) की ओर ले जाता है। वहीं ब्रह्मवादी के लिए तीनों समय का स्नान यह सुनिश्चित करता है कि उसकी चेतना में किसी भी क्षण अशुद्धि या आलस्य का प्रवेश न हो। मध्याह्न का स्नान उसे उस 'सूर्य-पुरुष' के साथ एकाकार होने में सहायता करता है, जो चेतना के चरम उत्कर्ष का प्रतीक है।

साधक इस विधि से यह अनुभव करता है कि जैसे जल शरीर को शीतल और स्वच्छ करता है, वैसे ही मन्त्र और ध्यान उसके अंतःकरण को स्वच्छ करते हैं। वह स्थूल शरीर की शुद्धि से सूक्ष्म शरीर की शुद्धि की ओर बढ़ता है, जिससे उसकी एकाग्रता गहरी होती है और वह 'ब्रह्मवादी' की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

अशक्तस्य स्नानानुकल्पः

श्लोक ६.२७

कालदोषादसामर्थ्यान्नशक्नोति यदा ह्यसौ ।

तदाऽऽज्ञातो ऋषिभ्यस्तु मन्त्रैर्दृष्टैस्तु मार्जनम् ॥ ६.२७ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५१

…कालदोष के कारण अथवा असमर्थता के कारण जब वह (स्नान) नहीं कर सके, तब ऋषियों द्वारा देखे गए मन्त्रों से मार्जन की अनुमति है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में गृहस्थों और ब्रह्मवादियों के लिए स्नान की अनिवार्यता और उसकी संख्या का विधान किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उन विशेष परिस्थितियों का समाधान दे रहे हैं जहाँ साधक बाह्य जल-स्नान करने में असमर्थ होता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: कालदोषत: अथवा असमर्थ्यात् यदा ह्यसौ (स्नानं) न शक्नोति, तदा ऋषिभ्य: दृष्टैः मन्त्रैः मार्जनं (कुर्यात्) ।

पदार्थ और निर्वचन:

• कालदोषात्: काल के दोष के कारण। यहाँ 'कालदोष' का अर्थ समय का अभाव, ऋतु-परिवर्तन (अत्यधिक शीत या वर्षा) या किसी विशेष समय की बाध्यता से है, जो स्नान के लिए अनुकूल न हो।

• असमर्थ्यात्: शारीरिक अक्षमता, रोग, या जल के अभाव के कारण स्नान न कर पाने की स्थिति।

• यदा ह्यसौ: जब वह (साधक/उपासक)।

• न शक्नोति: समर्थ न हो या न कर सके।

• ऋषिभ्यः दृष्टैः मन्त्रैः: ऋषियों द्वारा देखे गए (द्रष्टव्य/प्रमाणित) मन्त्रों द्वारा। 'दृष्ट' शब्द यहाँ मन्त्रों की प्रामाणिकता और उनकी शक्ति को दर्शाता है, जो ऋषियों के साक्षात्कार से सिद्ध हुए हैं।

• मार्जनम्: मार्जन का अर्थ है जल की कुछ बूंदों का छिड़काव करना या मन्त्रों के प्रभाव से मानसिक और सूक्ष्म शुद्धि करना। यह बाह्य स्नान का 'अन्ुकल्प' (विकल्प/ है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक के प्रति महर्षि याज्ञवल्क्य की करुणा और योगिक व्यावहारिकता को प्रकट करता है। शास्त्र केवल कठोर नियमों का संग्रह नहीं है, अपितु वह मनुष्य की सीमाओं को समझते हुए उसे लक्ष्य तक पहुँचाने का मार्ग है।

यहाँ 'कालदोष' और 'असमर्थता' दो प्रकार की बाधाओं का उल्लेख है। कालदोष बाहरी परिस्थिति है, जबकि असमर्थता आंतरिक या शारीरिक। जब साधक इन कारणों से जल-स्नान नहीं कर पाता, तो उसकी साधना रुकनी नहीं चाहिए। संध्या उपासना एक अनिवार्य आध्यात्मिक अनुशासन है; यदि जल न मिलने या शरीर के अस्वस्थ होने के कारण बाह्य शुद्धि संभव न हो, तो 'मार्जन' की विधि अपनाई जाती है।

मार्जन केवल जल छिड़कना नहीं है, अपितु यह 'मन्त्र-शक्ति' का प्रयोग है। महर्षि कहते हैं कि ऐसे मन्त्रों का प्रयोग करें जो 'ऋषिभ्यः दृष्टैः' हों—अर्थात् वे मन्त्र जो ऋषियों ने अपनी समाधि और साक्षात्कार में देखे और सिद्ध किए हैं। जब बाह्य जल उपलब्ध न हो, तब मन्त्रों की ध्वनि और उनके अर्थ की तरंगें शरीर के सूक्ष्म तत्त्वों को शुद्ध करती हैं। यह विधि इस सत्य पर आधारित है कि मन्त्र स्वयं में 'शब्द-ब्रह्म' है और उसकी शक्ति भौतिक जल की शुद्धि क्षमता से कहीं अधिक व्यापक और सूक्ष्म है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'नियम' और 'साधन' के बीच के संतुलन को समझाता है। साधक के लिए नियम मनुष्य के कल्याण के लिए हैं, मनुष्य नियम के लिए नहीं। जब स्थूल शरीर (अन्नमय कोष) की शुद्धि जल से संभव न हो, तब साधक को 'प्राणमय' और 'मनोमय' कोष की शुद्धि की ओर मुड़ना चाहिए।

मार्जन का गूढ़ अर्थ है—मन के भीतर स्थित अशुद्धियों का मन्त्रों के माध्यम से परिमार्जन करना। जल शरीर की त्वचा को धोता है, किंतु ऋषि-दृष्ट मन्त्र हृदय की परतों और नाड़ियों में जमी मलिनता को धोते हैं। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि शुद्धि केवल बाह्य क्रिया नहीं, अपितु एक आंतरिक अवस्था है।

जब साधक असमर्थता में मन्त्र-मार्जन करता है, तो वह 'बाह्य अवलंबन' (जल) से हटकर 'आंतरिक अवलंबन' (मन्त्र/नाद) की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास उसे इस बोध की ओर ले जाता है कि वास्तविक स्नान 'चित्त-शुद्धि' है। वह इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह समझ जाता है कि ईश्वर की उपासना के लिए शरीर की शुद्धि आवश्यक तो है, किंतु मन्त्रों के माध्यम से वह शुद्धि सूक्ष्म स्तर पर भी प्राप्त की जा सकती है, जो उसे स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाती है।

श्लोक ६.२८

शन्न आपस्तु द्रुपदा आपोहिष्ठाऽघमर्षणः ।

एतैश्चतुर्भिर्मन्त्रैस्तु मन्त्रस्नानमुदाहृतम् ॥ ६.२८ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५१

"शं नो देवीः", "द्रुपदादिव", "आपो हि ष्ठा" और अघमर्षण — इन चार मन्त्रोंसे (होनेवाला) मन्त्रस्नान कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने कालदोष या शारीरिक असमर्थता की स्थिति में बाह्य स्नान के विकल्प के रूप में ऋषियों द्वारा प्रमाणित मन्त्रों से 'मार्जन' करने की अनुमति दी थी। वर्तमान श्लोक में वे उन विशिष्ट मन्त्रों का नाम निर्दिष्ट कर रहे हैं, जिनके द्वारा यह सूक्ष्म शुद्धि संपन्न की जाती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: शं नो देवीः, द्रुपदा (मन्त्रः), आपो हि ष्ठा (मन्त्रः) और अघमर्षणः (सूक्तः) — एतैः चतुर्भिः मन्त्रैः तु मन्त्रस्नानम् उदाहृतम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• शं नो देवीः: ऋग्वेद के उस सूक्त का संकेत है जिसमें आपों (जल) के कल्याणकारी स्वरूप की प्रार्थना की गई है। यहाँ 'शं' का अर्थ है शांति और मंगल।

• द्रुपदा: यह उन मन्त्रों का संकेत है जो द्रुपद आदि ऋषियों द्वारा दृष्ट या प्रयुक्त हुए, जो शुद्धि और पवित्रीकरण के लिए विशिष्ट हैं।

• आपो हि ष्ठा: यह जल के अधिष्ठातृ देवता की स्तुति वाला मन्त्र है, जो जल के वास्तविक स्वरूप (दिव्य तत्त्व) को जाग्रत करता है।

• अघमर्षणः: 'अघ' का अर्थ है पाप या अशुद्धि और 'मर्षण' का अर्थ है रगड़कर साफ करना या धोना। वह सूक्त जो सूक्ष्म स्तर पर समस्त मलिनताओं का मर्दन कर दे।

• मन्त्रस्नानम्: मन्त्रों के माध्यम से की जाने वाली शुद्धि। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु मन्त्र की ध्वनि-तरंगों द्वारा शरीर और मन के सूक्ष्म कणों का प्रक्षालन है।

• उदाहृतम्: यहाँ 'कहा गया है' या 'प्रतिपादित किया गया है'।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक बाह्य कर्म और आन्तर योग के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। सामान्यतः स्नान का अर्थ शरीर की भौतिक गंदगी को जल से हटाना होता है, किन्तु योगी के लिए स्नान का वास्तविक अर्थ है—चित्त की वृत्तियों और प्राणों में जमी हुई अशुद्धियों का विसर्जन।

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ चार विशिष्ट मन्त्रों/सूक्तों का विधान कर रहे हैं। जब साधक जल के अभाव में या शारीरिक व्याधि के कारण जल-स्नान नहीं कर पाता, तब वह इन मन्त्रों का आश्रय लेता है। यहाँ 'मन्त्रस्नान' का अर्थ यह नहीं है कि मन्त्र जल का विकल्प है, अपितु यह कि मन्त्र उस 'दिव्य जल' को जाग्रत करने का साधन है जो हमारे भीतर ही विद्यमान है।

'शं नो देवीः' और 'आपो हि ष्ठा' जैसे मन्त्र साधक को जल के भौतिक गुण (तरलता और शीतलता) से ऊपर उठाकर उसके आध्यात्मिक गुण (पवित्रीकरण और शांति) से जोड़ते हैं। 'द्रुपदा' और 'अघमर्षण' मन्त्र उस प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं जहाँ साधक अपनी अविद्या और मानसिक विकारों को 'मर्षण' (रगड़कर) बाहर निकाल देता है। यह विधि स्पष्ट करती है कि शुद्धि का मूल आधार 'भाव' और 'ध्वनि' है; जल तो केवल एक माध्यम है। यदि माध्यम उपलब्ध न हो, तो मन्त्र की शक्ति सीधे प्राणों पर प्रहार कर उन्हें शुद्ध कर देती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'भाव-शुद्धि' और 'नाद-शुद्धि' का अभ्यास है। साधक जब इन मन्त्रों का उच्चारण करता है, तो वह केवल शब्द नहीं बोल रहा होता, बल्कि वह अपने भीतर के 'अमृत-जल' को प्रवाहित कर रहा होता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह मन्त्र के अर्थ को अपने हृदय में प्रतिष्ठित करे। जब वह 'शं नो देवीः' का स्मरण करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके भीतर की समस्त नाड़ियाँ शांति और मंगल से भर गई हैं। 'अघमर्षण' के अभ्यास में वह यह अनुभव करता है कि मन्त्र की ध्वनि एक दिव्य प्रक्षालक की भाँति उसके अंतःकरण की परतों पर जमी हुई वासनाओं और संस्कारों को धो रही है।

यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शरीर' की सीमा से निकालकर 'सूक्ष्म शरीर' की शुद्धि की ओर ले जाता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि शुद्धि केवल त्वचा का विषय नहीं, अपितु प्राण और मन का विषय है। यह मन्त्रस्नान साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह यह जान लेता है कि परमात्मा और उसकी शक्तियाँ (जैसे जल-तत्त्व) मन्त्रों के माध्यम से उसके भीतर ही सक्रिय हैं। इस प्रकार, बाह्य जल की अनुपलब्धता साधक के लिए एक अवसर बन जाती है कि वह अपनी अंतरात्मा के भीतर छिपे हुए पवित्र जल का साक्षात्कार कर सके।

श्लोक ६.२९

स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्मार्जनं प्राणसंयमः ।

अघमर्षणसूक्तेन अश्वमेधावभृत्समम् ॥ ६.२९ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५१

जलदेवता के मन्त्रों से स्नान, मार्जन और प्राणसंयम तथा अघमर्षण सूक्त से (स्नान करना) अश्वमेध के अवभृथ-स्नान के समान कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन चार विशिष्ट मन्त्रों का उल्लेख किया था जिनसे असमर्थता की स्थिति में 'मन्त्रस्नान' किया जाता है। वर्तमान श्लोक में वे इस मन्त्रस्नान की पूर्णता के लिए प्राणसंयम की अनिवार्यता बताते हैं और इसकी महिमा को अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान के समकक्ष सिद्ध करते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: अब्-देवताइः मन्त्रैः स्नानम्, मार्जनं, प्राणसंयमः (एव च), अघमर्षण-सूक्तेन (कृतं स्नानं) अश्वमेधा-अवभृत्-समम् (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अब्दैवतैः (अब्-देवताइः): 'अब्' का अर्थ है जल। जल के अधिष्ठातृ देवताओं से संबंधित मन्त्र। यहाँ जल केवल भौतिक द्रव्य नहीं, अपितु चेतना का वह रूप है जो प्रक्षालन (शुद्धि) करता है।

• मार्जनम्: मन्त्रों के साथ जल की सूक्ष्म बूंदों का छिड़काव करना। योगिक दृष्टि से यह मन के विकारों का प्रक्षालन है।

• प्राणसंयमः: श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करना। बिना प्राणसंयम के मन्त्र केवल शब्द रहते हैं; प्राण के संयोग से ही वे 'शक्ति' बनते हैं।

• अघमर्षण-सूक्तेन: 'अघ' (पाप/मल) का 'मर्षण' (रगड़कर साफ करना)। वह सूक्त जो सूक्ष्म शरीर के गहरे मैल को नष्ट कर दे।

• अश्वमेधा-अवभृत्-समम्: अश्वमेध यज्ञ के समापन पर होने वाले 'अवभृथ' स्नान के समान। अवभृथ वह स्नान है जो यज्ञ के समस्त दोषों को धोकर साधक को पूर्णतः शुद्ध और पवित्र कर देता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जब साधक भौतिक जल से स्नान करने में असमर्थ हो, तब वह केवल शब्दों का उच्चारण न करे, अपितु एक समग्र आंतरिक प्रक्रिया को अपनाए। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ तीन अंगों का समुच्चय बता रहे हैं: मन्त्र, मार्जन और प्राणसंयम।

प्रथम अंग 'अब्द-देवता मन्त्र' हैं, जो जल के दिव्य स्वरूप को जाग्रत करते हैं। द्वितीय अंग 'मार्जन' है, जो उस जाग्रत ऊर्जा को शरीर और मन के अंगों पर आरोपित करता है। तृतीय और सबसे महत्वपूर्ण अंग है 'प्राणसंयम'। मन्त्रों की शक्ति प्राण में निहित होती है। जब साधक प्राणों को संयमित कर मन्त्र का जप करता है, तब वह मन्त्र शरीर के भीतर एक आंतरिक जल-धारा (प्राण-प्रवाह) उत्पन्न करता है, जो भौतिक जल से कहीं अधिक प्रभावी होता है।

विशेष रूप से 'अघमर्षण सूक्त' का प्रयोग यहाँ सर्वोच्च शुद्धि का साधन बताया गया है। 'अघ' का अर्थ केवल नैतिक पाप नहीं, अपितु वह 'मल' है जो अविद्या के कारण चित्त पर जम गया है। जैसे भौतिक स्नान त्वचा की शुद्धि करता है, वैसे ही अघमर्षण सूक्त और प्राणसंयम का संयोग चित्त की गहराइयों में जमी मलिनता का मर्दन करता है।

इस प्रक्रिया की तुलना महर्षि ने 'अश्वमेध के अवभृथ स्नान' से की है। अश्वमेध समस्त यज्ञों में श्रेष्ठ है और उसका अवभृथ स्नान साधक को पूर्णतः निष्कलंक कर देता है। भाव यह है कि यदि कोई योगी पूर्ण श्रद्धा, प्राणसंयम और अघमर्षण सूक्त के साथ मन्त्रस्नान करता है, तो उसे वही आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है जो एक महान यज्ञ के उपरांत प्राप्त होती है। यह विधि कर्मकाण्ड को योग में परिवर्तित करने की कला है, जहाँ बाहरी क्रिया का फल आन्तरिक साधना से प्राप्त किया जा रहा है।

शास्त्र-साक्ष्य —

अघमर्षण सूक्त की इस अपार महिमा की पुष्टि मनुस्मृति में भी मिलती है:

मनुस्मृति

यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः । तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ ११.२६१ ॥

जैसे यज्ञोंका राजा अश्वमेध सब पापोंको दूर करता है, वैसे ही अघमर्षण सूक्त सब पापोंको दूर करता है।

मनुस्मृति ११.२६१मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 581

मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ समस्त पापों का नाश करने वाला है, उसी प्रकार अघमर्षण सूक्त भी सर्वपापापनोदन (सभी पापों को दूर करने वाला) है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ मनु के इस मत से पूर्णतः सहमत है, किन्तु वे इसमें 'प्राणसंयम' को जोड़कर इसे एक योगिक आयाम प्रदान करते हैं। मनु जहाँ सूक्त की महिमा बता रहे हैं, वहीं याज्ञवल्क्य उस महिमा को प्राप्त करने की 'विधि' (प्राणसंयम) बता रहे हैं।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'सूक्ष्म शरीर के प्रक्षालन' का अभ्यास है। यहाँ 'स्नान' का अर्थ है—चित्त की वृत्तियों का शांत होना और 'मार्जन' का अर्थ है—प्राणों द्वारा मन के मैल को धोना।

जब साधक अघमर्षण सूक्त का पाठ करते हुए प्राणसंयम (कुम्भक या नियंत्रित श्वास) का अभ्यास करता है, तो मन्त्र की ध्वनि-तरंगें प्राण के माध्यम से हृदय-आकाश में गूँजती हैं। यह गूँज एक आंतरिक घर्षण (मर्षण) पैदा करती है, जिससे संचित संस्कार और मानसिक अशुद्धियाँ नष्ट होने लगती हैं।

साधक इस अभ्यास से 'कर्म-भूमि' से ऊपर उठकर 'शुद्धि-भूमि' में प्रवेश करता है। वह अनुभव करता है कि उसके भीतर एक दिव्य जल-धारा प्रवाहित हो रही है, जो उसे भौतिक शरीर की सीमाओं से मुक्त कर अक्षर-स्वरूप की ओर ले जा रही है। यह अभ्यास साधक को यह बोध कराता है कि वास्तविक शुद्धि जल में नहीं, अपितु मन्त्र और प्राण के योग से उत्पन्न होने वाली चेतना की प्रखरता में है।

स्नानमार्जनानिमित्तानि

श्लोक ६.३०

अप्रायत्ये समुत्पन्ने स्नानमेव तु कारयेत् ।

पूर्वोद्दिष्टैस्तथा मन्त्रैरन्यथा मार्जनं स्मृतम् ॥ ६.३० ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५१

…अशुद्धि उत्पन्न होने पर तो पूर्वोक्त मन्त्रों से स्नान ही करना चाहिए, अन्यथा मार्जन स्मृत है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्रस्नान की महिमा को अश्वमेध के अवभृथ स्नान के समान बताकर यह स्पष्ट किया कि प्राणसंयम और विशिष्ट सूक्तों के संयोग से सूक्ष्म शुद्धि संभव है। वर्तमान श्लोक में वे इस अनुकल्प (विकल्प) की सीमा निर्धारित कर रहे हैं कि वास्तव में जल-स्नान कब अनिवार्य है और मार्जन कब पर्याप्त है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यदा) अशुद्धिः अप्रायत्ये (तदा) समुत्पन्ने स्नानमेव तु कारयेत् । (यदि अशुद्धि न हो तर्हि) पूर्वोद्दिष्टैः तथा मन्त्रैः अन्यथा मार्जनं स्मृतम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अप्रायत्ये: यहाँ 'अप्राप्त' या 'उत्पन्न' होने के अर्थ में है। जब अशुद्धि शरीर या चित्त पर प्रभावी हो जाए।

• स्नानमेव: 'एव' अवधरण का सूचक है। अर्थात् केवल स्नान ही (अन्य कोई विकल्प नहीं)।

• पूर्वोद्दिष्टैः मन्त्रैः: जिन मन्त्रों का उल्लेख पिछले श्लोक (6.28) में किया गया है—'शं नो देवीः', 'द्रुपदादिव', 'आपो हि ष्ठा' और 'अघमर्षण'।

• मार्जनम्: जल की सूक्ष्म बूंदों का मन्त्रपूर्वक छिड़काव करना। यह स्नान की तुलना में एक लघु क्रिया है, जो केवल प्रतीकात्मक शुद्धि या मानसिक ताजगी के लिए की जाती है।

• स्मृतम्: शास्त्र-सम्मत है या याद किया गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक के लिए 'शुद्धि' के दो स्तर निर्धारित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह भेद कर रहे हैं कि 'असमर्थता' और 'अशुद्धि' दो भिन्न स्थितियाँ हैं।

पिछले श्लोकों में उन्होंने बताया कि यदि कालदोष (समय का अभाव) या शारीरिक असमर्थता (रोग, वृद्धत्व या जल का अभाव) हो, तब मन्त्रस्नान और प्राणसंयम पर्याप्त हैं। किन्तु, यदि 'अशुद्धि' (जैसे शारीरिक मलिनता या सूतक-पातक आदि) वास्तव में उत्पन्न हो गई है, तो वहाँ केवल मन्त्रों का आश्रय लेना पर्याप्त नहीं है; वहाँ 'स्नानमेव' अर्थात् भौतिक जल से स्नान करना ही अनिवार्य है।

इसका गहरा रहस्य यह है कि मन्त्र और प्राणसंयम 'अभाव' की पूर्ति करते हैं, किन्तु 'विजातीय मल' (अशुद्धि) को हटाने के लिए प्रक्षालन की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार हृदय के भीतर के सूक्ष्म विकारों को केवल ध्यान और मन्त्रों से धोया जा सकता है, किन्तु स्थूल शरीर की अशुद्धि को स्थूल जल से ही धोना पड़ता है। यहाँ 'स्नान' केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि उस पात्रता को पुनः प्राप्त करना है जिससे साधक उच्चतर योग-साधना में प्रवेश कर सके।

यदि ऐसी कोई स्थूल अशुद्धि नहीं है, और साधक केवल अपनी चेतना को जाग्रत करना चाहता है या संध्या-उपासना से पूर्व स्वयं को मानसिक रूप से तैयार करना चाहता है, तब 'पूर्वोद्दिष्टैः मन्त्रैः' अर्थात् पूर्व में बताए गए मन्त्रों द्वारा 'मार्जन' करना पर्याप्त है। मार्जन वह क्रिया है जो साधक को यह स्मरण कराती है कि वह अब लौकिक जगत से हटकर अलौकिक साधना की ओर बढ़ रहा है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अनुकल्प' (विकल्प) और 'नियम' के बीच का संतुलन सिखाता है। योग में 'शुद्धि' के दो आयाम हैं—बाह्य और आन्तर।

जब साधक वास्तविक अशुद्धि (स्थूल मल) में होता है, तो वह 'तामस' अवस्था में होता है। तामस को हटाने के लिए जल (प्रकृति का तत्व) आवश्यक है। इसलिए, अशुद्धि होने पर स्नान अनिवार्य है, क्योंकि अशुद्ध शरीर में प्राण का प्रवाह अवरुद्ध होता है और मन विचलित रहता है।

किन्तु, जब साधक शुद्ध है और केवल अपनी सूक्ष्म ऊर्जा को संतुलित करना चाहता है, तब वह 'मार्जन' का अभ्यास करता है। मार्जन का योगिक अर्थ है—चित्त की सतह पर जमी धूल को मन्त्रों की सूक्ष्म बूंदों से हटाना। यहाँ साधक पूर्वोक्त मन्त्रों का जप करते हुए यह अनुभव करता है कि मन्त्रों की शक्ति उसके रोम-रोम को पवित्र कर रही है।

यह श्लोक साधक को चेतावनी देता है कि योगिक विकल्पों (मन्त्रस्नान) का प्रयोग 'आलस्य' या 'अशुद्धि को अनदेखा करने' के लिए न किया जाए। वास्तविक शुद्धि के बिना की गई साधना केवल मानसिक कल्पना बनकर रह जाती है। अतः, पहले स्थूल शुद्धि (स्नान), फिर सूक्ष्म शुद्धि (मार्जन) और अंततः प्राणसंयम के माध्यम से अक्षर-शुद्धि की ओर बढ़ना ही सही क्रम है।

ऋषीणां स्नानविषयकः प्रश्नः

श्लोक ६.३१

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं याज्ञवल्क्यस्य धीमतः ।

ऋषयः संयतात्मानः पृच्छन्ति स्नाननिर्णयम् ॥ ६.३१ ॥

षष्ठोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५१

बुद्धिमान याज्ञवल्क्य के इन वचनों को सुनकर, संयत मन वाले ऋषि स्नान का निर्णय पूछते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अशुद्धि की स्थिति में जल-स्नान की अनिवार्यता और अन्य स्थितियों में मन्त्र-मार्जन के विधान को स्पष्ट किया। इसी विमर्श के साथ संध्या-निर्णय का यह प्रकरण पूर्ण होता है और अब जिज्ञासा स्नान की सूक्ष्मता की ओर मुड़ती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: धीमतः याज्ञवल्क्यस्य तु वचनं एतत् श्रुत्वा, संयतात्मानः ऋषयः स्नाननिर्णयम् पृच्छन्ति।

पदार्थ और निर्वचन:

• धीमतः: बुद्धिमान्। यहाँ 'धी' का अर्थ केवल बौद्धिक क्षमता नहीं, अपितु वह प्रज्ञा है जो श्रुति के बीजरूप रहस्यों को स्मृति के रूप में विस्तार देने में सक्षम है।

• संयतात्मानः: जिन्होंने अपनी आत्मा (प्राण और मन) को संयमित कर लिया है। यह शब्द संकेत करता है कि प्रश्न पूछने वाले ऋषि साधारण जिज्ञासु नहीं, अपितु योग-साधना में निपुण हैं।

• स्नाननिर्णयम्: स्नान का निर्णय। 'निर्णय' का अर्थ यहाँ केवल विधि जानना नहीं, बल्कि स्नान के आध्यात्मिक प्रयोजन, उसके आंतरिक और बाहरी भेदों तथा उसके सही समय और प्रभाव का निश्चित ज्ञान प्राप्त करना है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक छठे अध्याय का उपसंहार और सातवें अध्याय की भूमिका है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने अब तक संध्या के समय, उसके प्रकारों (गायत्री, सावित्री, सरस्वती) और अनूदकी संध्या के उस गुप्त रहस्य को खोल दिया है जहाँ बिना जल के, केवल हृदयाकाश में आदित्य की रश्मियों और ईश्वर के ध्यान से शुद्धि प्राप्त की जाती है।

जब ऋषियों ने यह सुना कि मन्त्रों और प्राणसंयम के माध्यम से अश्वमेध के अवभृथ स्नान के समान शुद्धि संभव है, और यह भी जाना कि अशुद्धि होने पर जल-स्नान अनिवार्य है, तब उनके भीतर एक नवीन जिज्ञासा जागी। संयत मन वाले ऋषियों ने अनुभव किया कि यदि मन्त्र और प्राण स्वयं में स्नान बन सकते हैं, तो फिर 'स्नान' की वह वास्तविक परिभाषा क्या है जो देह और चैतन्य दोनों को शुद्ध कर दे?

यहाँ 'संयतात्मानः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो साधक अपनी इंद्रियों और प्राणों को वश में कर चुका है, वही यह समझ सकता है कि स्नान केवल त्वचा की सफाई नहीं, अपितु एक संस्कार है। ऋषियों का यह प्रश्न कि "स्नान का निर्णय क्या है?" वास्तव में यह पूछना है कि स्थूल जल और सूक्ष्म मन्त्रों के बीच का सेतु क्या है, और किस स्थिति में कौन सा स्नान साधक को किस भूमि तक ले जाता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'जिज्ञासा' के उस स्तर को दर्शाता है जहाँ साधक विधि से ऊपर उठकर निर्णय की खोज करता है। ऋषियों का 'संयतात्मा' होना यह सिद्ध करता है कि जब तक मन और प्राण स्थिर नहीं होते, तब तक बाहरी क्रियाओं (जैसे स्नान) का आंतरिक अर्थ समझ में नहीं आता।

साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह अपनी साधना में केवल नियमों का पालन न करे, बल्कि उन नियमों के पीछे छिपे 'निर्णय' या सिद्धांत को समझे। जैसे पिछले श्लोकों में प्राणसंयम को स्नान के समकक्ष रखा गया, वैसे ही अब साधक यह अनुभव करने की तैयारी करता है कि शरीर का जल-स्नान किस प्रकार उसके भीतर के 'अक्षर' और 'सूर्य' को जाग्रत करने का साधन बनता है। यह श्लोक साधक को मानसिक रूप से उस अवस्था में ले जाता है जहाँ वह बाहरी शुद्धि (स्नान) को आंतरिक ज्योति (ज्ञान) से जोड़ने का मार्ग खोजता है।

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-10-04।

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