श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, सप्तमोऽध्यायः

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यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके सप्तमोऽध्यायः — स्नानतर्पणसंध्योपासनजपादिविधिनिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।

सप्तमोऽध्यायः — स्नानतर्पणसंध्योपासनजपादिविधिनिर्णयः

अध्याय-सार — स्नान, तर्पण, संध्योपासन और जपकी विधि — ग्रन्थका दूसरा सबसे बड़ा अध्याय (१९० श्लोक), पूरी तरह कर्मका। ऋषियोंके प्रश्नपर याज्ञवल्क्य स्नानकी सामग्री और विधि बताते हैं: मिट्टी, गोमय और वारुण स्नान, दर्भसे मार्जन, जलके भीतर (अन्तर्जल) जप, और जलमें विष्णुका स्मरण — ‘नारायण’ पदकी निरुक्ति और वैष्णवी गायत्री सहित। फिर वस्त्र-विधि, देव-ऋषि-पितृ तर्पण (हाथके पाँच तीर्थ, तिल), आदित्योपस्थान, जपयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ, देवार्चन, सावित्रीको हवि और अर्कदर्शन। इसके बाद अनेक नियम हैं: पराये जलाशयमें स्नान, पात्र, स्नान-तर्पणका फल, जपमें वर्जित बातें, जपके तीन प्रकार, अक्षमाला, जपके स्थान और आहार, जपके बीच बोलने या अशुचि देखनेका प्रायश्चित्त। ७.१६१ पर स्नानविधि पूरी होती है; फिर असमर्थके लिए मन्त्र-स्नान आदि सात स्नान, अघमर्षण सूक्तका ऋषि आदि और उसकी महिमा, और संध्योपासनमें आचमन तथा मार्जनके मन्त्र आते हैं। अध्याय एक संक्रमणसे समाप्त होता है: इस प्रकार मार्जनसे बाहरी शुद्धि करके, अब भीतरी शुद्धिके लिए प्राणायाम करे (७.१९०)।

ऋषिप्रश्नः

श्लोक ७.१

स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्यत्त्वयोक्तं पुराऽनघ ।

तदाचक्ष्व विशेषेण स्नानस्य तु विधिं प्रभो ॥ ७.१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५२

हे निष्पाप! आपने पहले जलदेवताके मन्त्रोंसे जो स्नान कहा था, हे प्रभो! उस स्नानकी विधि विशेषरूपसे बताइये।

अवतरणिका —

पिछले अध्याय में ऋषियों ने संध्या-उपासना के मन्त्रों और उनके प्रयोगों का ज्ञान प्राप्त किया। अब वे शरीर और चित्त की बाह्य एवं आंतरिक शुद्धि के लिए स्नान की विधि जानना चाहते हैं, जिसकी संक्षिप्त चर्चा महर्षि याज्ञवल्क्य ने पूर्व में (६.२९) की थी।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: हे अनघ! पुरा त्वया यत् स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्युक्तं उक्तं, तदाचक्ष्व प्रभो; स्नानस्य तु विधिं विशेषेण (आचक्ष्व)।

पदार्थ:

• अब्दैवतैः मन्त्रैः — 'अब्द' का अर्थ है जल और 'देवता' का अर्थ है अधिष्ठात्री देव। अतः जल के देवताओं (जैसे वरुण, आपः) को समर्पित मन्त्रों द्वारा।

• अनघ — निष्पाप, दोषरहित। यहाँ ऋषियों द्वारा याज्ञवल्क्य जी के लिए प्रयुक्त संबोधन है, जो उनकी शुद्धता और सिद्धता को दर्शाता है।

• पुरा — पूर्व में। यह संकेत है कि इस विषय पर पहले संक्षिप्त चर्चा हो चुकी है।

• आचक्ष्व — कहिये, बताइये या वर्णन कीजिये।

• विशेषेण — विस्तारपूर्वक, सूक्ष्म विवरण सहित।

भाष्य —

प्रस्तुत श्लोक में ऋषियों द्वारा महर्षि याज्ञवल्क्य से किया गया प्रश्न है। यह प्रश्न केवल एक बाह्य क्रिया की जिज्ञासा नहीं है, अपितु उस विधि की खोज है जो साधक को 'शुद्धि' के योग्य बनाए।

ऋषि कहते हैं कि हे निष्पाप प्रभो! आपने पूर्व में जलदेवताओं के मन्त्रों से युक्त स्नान का उल्लेख किया था। अब आप उस स्नान की विधि को विशेष रूप से बताइये। यहाँ 'विशेषेण' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्य स्नान केवल शरीर की मैल हटाने के लिए होता है, किन्तु जब स्नान 'अब्द-देवताओं' के मन्त्रों से जुड़ता है, तो वह 'विधि' बन जाता है। विधि वह होती है जो एक निश्चित उद्देश्य (जैसे पाप-क्षय या चित्त-शुद्धि) के लिए की जाए।

ऋषियों की यह जिज्ञासा दर्शाती है कि वे जानते हैं कि मन्त्र और जल का संयोग केवल भौतिक स्वच्छता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक संस्कार है। जब जल में मन्त्रों की शक्ति विलीन होती है, तो वह जल केवल शरीर को नहीं, बल्कि सूक्ष्म शरीर के मल (मानसिक क्लेशों) को भी धोने की क्षमता रखता है। अतः वे उस मन्त्र-युक्त स्नान की पूर्ण प्रक्रिया जानना चाहते हैं ताकि वे बाह्य शुद्धि के माध्यम से आंतरिक शुद्धि की ओर बढ़ सकें।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साधना की तैयारी' का प्रतीक है। किसी भी उच्च साधना (जैसे ध्यान या प्राणायाम) से पूर्व 'शौच' (शुद्धि) अनिवार्य है। यहाँ ऋषियों का प्रश्न यह संकेत देता है कि साधक जब तक बाह्य जगत और स्थूल शरीर के साथ अपने सम्बन्धों को मन्त्रों के माध्यम से पवित्र नहीं करता, तब तक वह भीतर की गहराई में उतरने के लिए तैयार नहीं होता।

साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह अपनी हर भौतिक क्रिया को 'विधि' में बदले। जब स्नान केवल एक आदत न रहकर एक 'मन्त्र-युक्त विधि' बन जाता है, तब वह क्रिया 'कर्म' से 'योग' की ओर अग्रसर होती है। यह प्रश्न उस भूमि का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ साधक अपनी अविद्या और अशुद्धियों को स्वीकार कर, उनसे मुक्ति पाने के लिए गुरु से सही मार्ग (विधि) की याचना करता है। यह 'जिज्ञासा' ही वह प्रथम सोपान है जो साधक को बाह्य कर्मकाण्ड से उठाकर उसके आन्तर अर्थ की ओर ले जाती है।

याज्ञवल्क्यस्य स्नाननिरूपणप्रतिज्ञा

श्लोक ७.२

तांस्तु प्रोवाच प्रीतात्मा याज्ञवल्क्यो महामुनिः ।

श्रृणुध्वं वक्ष्यते स्नानं सर्वपापहरं शुभम् ॥ ७.२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५२

तब प्रसन्नचित्त महामुनि याज्ञवल्क्यने उनसे कहा — सुनो, मैं सब पापोंको हरनेवाला शुभ स्नान कहूँगा।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में ऋषियों ने महर्षि याज्ञवल्क्य से जल-देवताओं के मन्त्रों से युक्त स्नान की विशेष विधि जानने की जिज्ञासा प्रकट की। अब उस प्रश्न के उत्तर में योगीश्वर याज्ञवल्क्य स्नान के प्रयोजन और उसके प्रभाव की घोषणा कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ततः प्रीतात्मा महामुनिः याज्ञवल्क्यः तांस्तु (ऋषीन्) प्रोवाच — (हे ऋषियो!) श्रृणुध्वं, (अहं) सर्वपापहरं शुभं स्नानं वक्ष्यते।

पदार्थ:

• प्रीतात्मा — प्रसन्न चित्त। यहाँ 'प्रीति' केवल मानसिक सुख नहीं, अपितु साधकों की पात्रता और जिज्ञासा को देखकर उत्पन्न हुआ वह योगिक संतोष है, जो गुरु को शिष्य के प्रति वात्सल्य से भर देता है।

• प्रोवाच — कहा। यह क्रिया ऋषियों के प्रश्न और याज्ञवल्क्य के उत्तर के बीच की सेतु है।

• श्रृणुध्वं — सुनो। यह केवल श्रवण का आदेश नहीं, अपितु 'श्रुति' (सुने हुए ज्ञान) के प्रति सजग होने का आह्वान है।

• सर्वपापहरं — समस्त पापों का हरण करने वाला। 'पाप' यहाँ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु वे मानसिक और शारीरिक मलिनताएँ (क्लेश) हैं जो आत्मा के प्रकाश को ढँक लेती हैं।

• शुभम् — कल्याणकारी। वह क्रिया जो साधक को मंगलमय अवस्था की ओर ले जाए।

• वक्ष्यते — कहूँगा या वर्णन करूँगा।

भाष्य —

प्रस्तुत श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ऋषियों के प्रश्न का प्रत्युत्तर देना आरम्भ कर रहे हैं। श्लोक का आरम्भ 'प्रीतात्मा' शब्द से होता है, जो यह संकेत देता है कि जब शिष्य पूर्ण समर्पण और शुद्ध जिज्ञासा के साथ प्रश्न करता है, तब गुरु का हृदय प्रसन्न होता है। योगिक दृष्टि से, गुरु की प्रसन्नता ही शिष्य के लिए प्रथम 'शुद्धि' है, क्योंकि गुरु की कृपा से ही ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।

याज्ञवल्क्य जी कहते हैं— "श्रृणुध्वं" (सुनो)। वैदिक परम्परा में 'श्रवण' ज्ञान की प्रथम सोपान है। जब वे स्नान की विधि बताने से पूर्व उसे 'सर्वपापहरं' और 'शुभम्' कहते हैं, तो वे स्नान को केवल देह की शुद्धि तक सीमित नहीं रखते, अपितु उसे एक आध्यात्मिक संस्कार के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

यहाँ 'पाप' का अर्थ उन संस्कारों से है जो चित्त में जड़ता पैदा करते हैं। जिस प्रकार जल शरीर की बाहरी गंदगी को धोता है, उसी प्रकार विधिपूर्वक किया गया स्नान, मन्त्रों के प्रभाव से, सूक्ष्म शरीर के उन अवरोधों को हटाता है जिन्हें 'पाप' कहा गया है। यह स्नान 'शुभ' है क्योंकि यह साधक को उस मानसिक स्थिति में लाता है जहाँ वह आगे के कठिन योग-अभ्यासों और मन्त्र-जप के लिए तैयार हो सके।

यह वचन एक प्रतिज्ञा है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि आगे जो विधि बताई जाएगी, वह केवल जल में डुबकी लगाना नहीं है, अपितु एक ऐसी प्रक्रिया है जो साधक के संपूर्ण अस्तित्व (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर) का शोधन करेगी।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का रहस्य यह है कि किसी भी बाह्य क्रिया (जैसे स्नान) का फल तभी प्राप्त होता है जब वह 'प्रीति' (प्रसन्नता) और 'श्रवण' (सजगता) के साथ की जाए।

यहाँ 'सर्वपापहरं' का योगिक अर्थ है— चित्त की वृत्तियों का निरोध और मानसिक मल का क्षय। साधक जब यह अनुभव करता है कि यह स्नान केवल त्वचा को नहीं, अपितु उसके अंतःकरण को धो रहा है, तब वह 'शुभ' अवस्था को प्राप्त होता है। यह श्लोक साधक को यह विश्वास दिलाता है कि बाह्य शुद्धि, आंतरिक शुद्धि की पहली सीढ़ी है। जब शरीर पवित्र होता है, तब प्राण स्थिर होते हैं, और जब प्राण स्थिर होते हैं, तब मन एकाग्र होता है। अतः, यह स्नान साधक को 'स्थूल भूमि' से 'सूक्ष्म भूमि' की ओर ले जाने का प्रथम साधन है।

स्नानविधिसामग्री

श्लोक ७.३

मृद्गोमयतिलान् दर्भान् पुष्पाणि सुरभीणि च ।

आहरेत् स्नानकाले तु स्नानार्थी प्रयतः शुचिः ॥ ७.३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५२

स्नानका इच्छुक, संयत और पवित्र (द्विज) स्नानके समय मिट्टी, गोबर, तिल, कुश और सुगन्धित फूल ले आये।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान को 'सर्वपापहरं' और 'शुभम्' कहकर उसकी महिमा बताई। अब वे उस शुभ फल की प्राप्ति के लिए स्नान की पूर्व-तैयारी और आवश्यक सामग्रियों का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: स्नानार्थी प्रयतः शुचिः स्नानकाले तु मृद्-गोमय-तिलान् दर्भान् पुष्पाणि सुरभीणि च आहरेत्।

पदार्थ:

• स्नानार्थी — स्नान की इच्छा रखने वाला। यहाँ 'अर्थी' केवल चाहने वाला नहीं, अपितु वह साधक है जो बाह्य शुद्धि के माध्यम से आंतरिक शुद्धि का लक्ष्य रखता है।

• प्रयतः — संयत, प्रयत्नशील या एकाग्र। वह व्यक्ति जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में किया है और जो पूर्ण सजगता के साथ क्रिया में संलग्न है।

• शुचिः — पवित्र। शरीर, मन और वाणी से शुद्ध।

• स्नानकाले — स्नान के समय।

• मृद् — मिट्टी।

• गोमय — गाय का गोबर।

• तिलान् — तिल।

• दर्भान् — कुश (एक विशेष पवित्र घास)।

• पुष्पाणि सुरभीणि — सुगंधित पुष्प।

• आहरेत् — ले आए या एकत्रित करे। यहाँ 'आहरेत्' विधिलिङ् लकार है, जो एक आवश्यक विधान को दर्शाता है।

भाष्य —

प्रस्तुत श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान की बाह्य विधि के प्रथम चरण—सामग्री संकलन का वर्णन कर रहे हैं। स्नान केवल जल का शरीर पर प्रपातन नहीं है, अपितु यह एक संस्कार है। इसीलिए ऋषि कहते हैं कि स्नानार्थी 'प्रयतः' और 'शुचिः' होकर सामग्री लाए। इसका अर्थ यह है कि स्नान की क्रिया जल में प्रवेश करने से नहीं, अपितु स्नान के संकल्प और उसकी तैयारी से ही आरम्भ हो जाती है। यदि साधक अशांत मन से या अपवित्र भाव से सामग्री जुटाता है, तो वह केवल शरीर धोता है, संस्कार नहीं करता।

सामग्रियों का चयन अत्यंत विशिष्ट है: मिट्टी, गोबर, तिल, कुश और सुगंधित पुष्प। ये सभी वस्तुएं प्रकृति के उन तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो यज्ञीय पवित्रता से जुड़े हैं। मिट्टी और गोबर का प्रयोग शरीर के विभिन्न अंगों के प्रक्षालन के लिए किया जाता है, तिल और कुश का प्रयोग तर्पण और संकल्प की शुद्धि के लिए होता है, और सुगंधित पुष्प मन को प्रसन्न कर उसे उच्चतर भावों की ओर ले जाते हैं।

यहाँ 'आहरेत्' शब्द यह संकेत देता है कि इन सामग्रियों को पहले ही एकत्रित कर लेना चाहिए, ताकि स्नान के समय मन विचलित न हो और साधक पूरी तरह से जल-तत्व और मन्त्रों के साथ एकाकार हो सके। यह विधि बाह्य रूप से एक कर्मकाण्डीय प्रक्रिया प्रतीत होती है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ साधक को 'तैयारी' के भाव में स्थित करना है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म-योग' और 'चित्त-शुद्धि' का सूक्ष्म अभ्यास है। साधक जब 'प्रयतः' (संयत) होकर सामग्री एकत्रित करता है, तो वह अपने बिखरे हुए मन को एक केंद्र पर लाना आरम्भ करता है। सामग्री जुटाने की यह प्रक्रिया वास्तव में चित्त को बाहरी संसार से हटाकर आगामी साधना (स्नान) की ओर मोड़ने का एक सेतु है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि कोई भी आध्यात्मिक क्रिया आकस्मिक नहीं होती; उसके लिए 'तैयारी' अनिवार्य है। जिस प्रकार मिट्टी, गोबर और कुश शरीर की शुद्धि के साधन हैं, उसी प्रकार 'प्रयत्न' और 'शुचिता' मन की शुद्धि के साधन हैं। जब साधक सजगतापूर्वक इन वस्तुओं को चुनता और लाता है, तो वह अनजाने में ही अपनी इन्द्रियों को वर्तमान क्षण में स्थित कर रहा होता है। यह अभ्यास उसे 'स्थूल' (सामग्री) से 'सूक्ष्म' (भाव) की ओर ले जाता है। इस प्रकार, स्नान की तैयारी ही वास्तव में चित्त की तैयारी बन जाती है, जिससे साधक बाह्य शुद्धि से आंतरिक शुद्धि की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

स्नानविधिः

श्लोक ७.४

गत्वोदकान्तं विधिवत् स्थापयेत् तत् पृथक् क्षितौ ।

त्रिधा कृत्वा मृदं तां तु गोमयं च विचक्षणः ॥ ७.४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५२

जलके किनारे जाकर विधिपूर्वक उन्हें भूमिपर अलग-अलग रखे; बुद्धिमान् (द्विज) उस मिट्टी और गोबरके तीन-तीन भाग करके —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में स्नान के लिए आवश्यक पाँच सामग्रियों—मिट्टी, गोबर, तिल, कुश और सुगन्धित फूलों के संकलन का निर्देश दिया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उन सामग्रियों के नियोजन और उनके विभाजन की सूक्ष्म विधि बता रहे हैं, ताकि बाह्य क्रिया में एक निश्चित अनुशासन और व्यवस्था बनी रहे।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (स्नानार्थी) गत्वोदकान्तं विधिवत् तत् पृथक् क्षितौ स्थापयेत्। विचक्षणः तां मृदं तु गोमयं च त्रिधा कृत्वा (स्थापयेत्)।

पदार्थ:

• गत्वोदकान्तं — जल के समीप जाकर। 'उदक' (जल) और 'अन्त' (किनारा)। यहाँ जल के किनारे जाना केवल भौतिक गमन नहीं, बल्कि चेतना का उस तत्त्व के समीप पहुँचना है जो प्रक्षालन और शुद्धि का आधार है।

• विधिवत् — शास्त्रसम्मत रीति से। बिना किसी उतावलेपन के, सजगता और मर्यादा के साथ।

• पृथक् क्षितौ स्थापयेत् — भूमि पर अलग-अलग स्थापित करे। सामग्रियों को आपस में मिलाना नहीं है, बल्कि प्रत्येक के विशिष्ट गुण को बनाए रखने के लिए उन्हें पृथक रखना है।

• विचक्षणः — बुद्धिमान, विवेकशील या कुशल। वह साधक जो क्रिया के पीछे के मर्म को जानता है और जिसे पता है कि किस वस्तु का प्रयोग कहाँ और कैसे करना है।

• त्रिधा कृत्वा — तीन भागों में विभाजित करके। यह संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु शरीर के तीन स्तरों (ऊर्ध्व, मध्य और अधोभाग) के संकेत स्वरूप है।

• मृदं गोमयं च — मिट्टी और गोबर को।

भाष्य —

प्रस्तुत श्लोक में स्नान की क्रिया से पूर्व सामग्रियों के नियोजन की विधि बताई गई है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि साधक जल के तट पर पहुँचकर अपनी एकत्रित की हुई सामग्रियों को भूमि पर अलग-अलग स्थापित करे। यहाँ 'पृथक्' शब्द महत्वपूर्ण है; यह संकेत देता है कि जब तक क्रिया का समय न आए, तब तक तत्वों का मिश्रण न हो। यह साधक के मन में स्पष्टता और व्यवस्था का भाव जाग्रत करता है।

इसके पश्चात, एक 'विचक्षण' या विवेकशील साधक मिट्टी और गोबर के तीन-तीन ढेर या भाग बनाए। यह विभाजन शरीर की त्रिविध संरचना के अनुरूप है। जैसा कि अगले श्लोक में स्पष्ट होगा, शरीर के अंगों को तीन श्रेणियों—उत्तम (सिर और ऊपरी भाग), मध्यम (नाभि से ऊपर का मध्य भाग) और अधम (नाभि से नीचे का भाग)—में बाँटा गया है। अतः, मिट्टी और गोबर के ये तीन भाग शरीर के इन्हीं तीन स्तरों की शुद्धि के लिए नियत किए गए हैं।

बाहरी दृष्टि से यह केवल मिट्टी और गोबर का ढेर है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह पृथ्वी तत्त्व का विन्यास है। गोबर सात्विकता का और मिट्टी स्थिरता का प्रतीक है। जब साधक इन्हें तीन भागों में विभाजित करता है, तो वह अनजाने में ही अपने शरीर के स्थूल ढाँचे को तीन खंडों में विभाजित कर उसे शुद्धि के लिए तैयार कर रहा होता है। यह विधि दर्शाती है कि वैदिक स्नान केवल शरीर को भिगोना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित अनुष्ठान है जहाँ प्रत्येक सामग्री और उसकी मात्रा का एक निश्चित उद्देश्य है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'सजगता' और 'विभाजन' का अभ्यास है। जल के किनारे जाकर सामग्रियों को अलग-अलग रखना इस बात का प्रतीक है कि साधक अपने भीतर के विभिन्न प्रवृत्तियों और संस्कारों को पहचानकर उन्हें अलग-अलग (पृथक्) देख रहा है।

मिट्टी और गोबर के तीन भाग करना इस बात का संकेत है कि साधक अपनी चेतना को शरीर के तीन स्तरों—स्थूल, सूक्ष्म और कारण (या शारीरिक, प्राणिक और मानसिक)—में विभाजित कर उनकी शुद्धि का संकल्प ले रहा है। 'विचक्षण' होने का अर्थ है—साधना में सूक्ष्म दृष्टि रखना। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार वह बाह्य रूप से मिट्टी और गोबर को तीन भागों में बाँट रहा है, उसी प्रकार उसे अपने भीतर के विकारों को भी श्रेणियों में बाँटकर, एक-एक कर उनका प्रक्षालन करना है। यह क्रिया साधक को 'अव्यवस्थित' अवस्था से 'व्यवस्थित' अवस्था की ओर ले जाती है, जो ध्यान की पूर्व-शर्त है।

श्लोक ७.५

उत्तमाधममध्यानामङ्गानां क्षालनं च तैः ।

भागैः पृथक् पृथक् कुर्यात् क्षालने मृदसंकरः ॥ ७.५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५३

— उन भागोंसे उत्तम, मध्यम और अधम अंगोंका अलग-अलग प्रक्षालन करे; प्रक्षालनमें मिट्टीका मिश्रण न हो।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में बुद्धिमान साधक को मिट्टी और गोबर के तीन-तीन भाग करने का निर्देश दिया गया था। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन विभाजित भागों के प्रयोग की विधि और प्रक्षालन के समय बरती जाने वाली सावधानी का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (स्नानार्थी) तैः (त्रिभिः) भागैः उत्तम-अधम-मध्यम-नाम्नाम् अङ्गानां क्षालनं च पृथक् पृथक् कुर्यात्। क्षालने मृदसंकरः (न स्यात्)।

पदार्थ:

• तैः भागैः — उन (तीन) भागों से। यहाँ 'तैः' शब्द पिछले श्लोक के 'त्रिधा' (तीन भागों) की ओर संकेत करता है।

• उत्तम-अधम-मध्यम-नाम्नाम् अङ्गानाम् — उत्तम, अधम और मध्यम नाम वाले अंगों का। शरीर के विभाजन को यहाँ तीन श्रेणियों में बाँटा गया है।

• पृथक् पृथक् कुर्यात् — अलग-अलग (प्रक्षालन) करे। प्रत्येक श्रेणी के अंगों के लिए अलग भाग की सामग्री का प्रयोग हो।

• क्षालने — धोते समय या प्रक्षालन की क्रिया में।

• मृदसंकरः (न स्यात्) — मिट्टी का मिश्रण न हो। यहाँ 'संकर' का अर्थ है—एक भाग की मिट्टी का दूसरे भाग की मिट्टी के साथ मिलना, या विशेषतः अधम अंगों की मिट्टी का उत्तम अंगों के साथ मिल जाना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में बाह्य शुद्धि के अंतर्गत 'क्रम' और 'पृथकता' के सिद्धांत को स्थापित किया गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य निर्देश देते हैं कि शरीर के प्रक्षालन के लिए जो मिट्टी और गोबर के तीन भाग किए गए थे, उनका प्रयोग अंगों की श्रेणी के अनुसार अलग-अलग करना चाहिए।

यहाँ अंगों का विभाजन इस प्रकार समझा जा सकता है: संभवतः 'उत्तम' अंग शिर (मस्तक) को, 'मध्यम' अंग नाभि से ऊपर के अंगों को और 'अधम' अंग कटि, उरु (जाँघ), जंघा और चरणों को सूचित करते हैं। विधि यह है कि अधम अंगों को धोने के लिए प्रयुक्त मिट्टी का अंश, मध्यम या उत्तम अंगों के प्रक्षालन में प्रयुक्त न हो।

श्लोक का अंतिम पद 'क्षालने मृदसंकरः' एक निषेध है। इसका भाव यह है कि प्रक्षालन के समय सामग्रियों का आपस में मिश्रण नहीं होना चाहिए। यदि अधम अंगों की मिट्टी उत्तम अंगों पर लग जाए, तो वह शुद्धि के स्थान पर अशुद्धि का कारण बन जाएगी। अतः प्रत्येक श्रेणी के लिए निर्धारित सामग्री का उपयोग पृथक रूप से करना अनिवार्य है। यह केवल एक भौतिक स्वच्छता का नियम नहीं है, बल्कि यह साधक को क्रिया के प्रति सजग और अनुशासित रखने का एक साधन है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शौच' (शुद्धि) के सूक्ष्म अनुशासन का बोध कराता है। योग मार्ग में केवल परिणाम महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उस परिणाम तक पहुँचने की 'प्रक्रिया' और 'क्रम' का अत्यधिक महत्व है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि शरीर के विभिन्न स्तरों की ऊर्जा और शुद्धि की आवश्यकता भिन्न-भिन्न होती है। नीचे के अंगों (अधम) में स्थूल मल और पृथ्वी तत्त्व की प्रधानता होती है, जबकि ऊपर के अंगों (उत्तम) में सूक्ष्मता और आकाश तत्त्व की प्रधानता होती है। जब साधक अधम अंगों के लिए प्रयुक्त सामग्री को उत्तम अंगों से पृथक रखता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना में 'स्थूल' और 'सूक्ष्म' के भेद को स्थापित कर रहा होता है।

अभ्यास की दृष्टि से यह 'विवेक' का अभ्यास है। जिस प्रकार साधक अपने मन के विकारों को अलग-अलग पहचानकर उनका निवारण करता है, वैसे ही शरीर की शुद्धि में भी वह इस पृथकता का पालन करता है। यह अनुशासन साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह अपनी प्रत्येक क्रिया के प्रति पूर्णतः जागरूक हो जाता है। वह सीखता है कि शुद्धि केवल जल से नहीं, बल्कि 'विधि' और 'क्रम' के पालन से सिद्ध होती है। इस प्रकार, बाह्य प्रक्षालन के माध्यम से वह अपने भीतर के मल को श्रेणीबद्ध तरीके से हटाने का मानसिक संस्कार विकसित करता है।

श्लोक ७.६

प्रभूते विद्यमाने तु उदके सुमनोहरे ।

नाल्पोदके द्विजः स्नायान्नदींश्चो(चो)त्सृज्य कृत्रिमे ॥ ७.६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५३

सुन्दर, प्रचुर जल रहनेपर द्विज थोड़े जलमें स्नान न करे, और नदियोंको छोड़कर कृत्रिम (जलाशय) में (स्नान न करे)।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में अंगों के प्रक्षालन के लिए मिट्टी और गोबर के तीन-तीन भागों के प्रयोग की विधि बताई गई थी। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान के लिए उपयुक्त जल की मात्रा और जल-स्रोत की प्रकृति के विषय में निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: प्रभूते सुमनोहरे उदके विद्यमाने तु, द्विजः अल्पोदके (न) स्नायात्, (तथा) कृत्रिमे (सरः) उत्सृज्य नदीन् स्नायात्।

पदार्थ:

• प्रभूते — प्रचुर मात्रा में, पर्याप्त।

• सुमनोहरे — मन को हरने वाले, स्वच्छ, निर्मल और सुंदर।

• उदके विद्यमाने — जल के उपस्थित होने पर।

• अल्पोदके — थोड़े जल में। यहाँ 'अल्प' का अर्थ केवल मात्रा से नहीं, बल्कि उस जल से है जो स्थिर और गंदा हो चुका हो।

• द्विजः — यहाँ द्विज का अर्थ केवल जन्म से नहीं, अपितु उस साधक से है जिसने ज्ञान के द्वारा द्वितीय जन्म प्राप्त किया है और जो शुद्धि के सूक्ष्म नियमों का ज्ञाता है।

• न स्नायात् — स्नान न करे। यह एक निषेध है जो प्रचुर जल की उपलब्धता की स्थिति में लागू होता है।

• नदीन् उत्सृज्य — नदियों को त्यागकर या छोड़कर।

• कृत्रिमे (सरः) — कृत्रिम जलाशयों में (जैसे मानव-निर्मित गड्ढे या छोटे टैंक)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में स्नान के लिए जल की 'गुणवत्ता' और 'प्रवाह' के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि कहीं स्वच्छ, सुंदर और प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध हो, तो साधक को थोड़े जल में स्नान करने से बचना चाहिए।

बाह्य दृष्टि से यह निर्देश स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़ा प्रतीत होता है, क्योंकि प्रचुर जल शरीर की गंदगी को पूरी तरह बहा ले जाता है, जबकि अल्प जल में गंदगी शरीर पर ही घूमती रहती है। किंतु इसका आन्तर अर्थ अधिक गहरा है। जल केवल शरीर को धोने का साधन नहीं, बल्कि वह एक तत्व है जो चेतना को प्रभावित करता है। 'सुमनोहर' जल वह है जो अपनी निर्मलता से मन को प्रसन्न करे और चित्त को शांत करे। जब साधक प्रचुर और स्वच्छ जल में उतरता है, तो वह प्रकृति के विशाल स्वरूप के साथ एकाकार होता है, जिससे उसकी मानसिक जड़ता टूटती है।

आगे ऋषि कहते हैं कि नदियों को छोड़कर कृत्रिम जलाशयों में स्नान न करें। नदी 'प्रवाह' का प्रतीक है। बहता हुआ जल जीवंत होता है, उसमें गति होती है और वह निरंतर नवीनीकृत होता रहता है। इसके विपरीत, कृत्रिम जलाशय या स्थिर जल 'जड़ता' का प्रतीक हैं। योगिक दृष्टि से, स्नान का उद्देश्य केवल त्वचा की शुद्धि नहीं, बल्कि शरीर के भीतर के अवरोधों को हटाना है। नदी का प्रवाह साधक के भीतर के मानसिक और प्राणिक अवरोधों को ढीला करने में सहायक होता है। इसीलिए, जहाँ विकल्प हो, वहाँ प्राकृतिक और प्रवाहमय जल (नदी) को ही प्राथमिकता दी गई है।

शास्त्र-साक्ष्य —

स्नान के उपयुक्त स्थानों के विषय में अन्य शास्त्रों में भी निर्देश मिलते हैं:

मनुस्मृति

नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु च । स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च ॥ ४.२०३ ॥

नदियोंमें, देवखातों (प्राकृतिक कुण्डों) में, तालाबोंमें, सरोवरोंमें, गड्ढों और झरनोंमें नित्य स्नान करे।

मनुस्मृति ४.२०३मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 289

मनुस्मृति में नदियों, देवखातों, तालाबों, सरोवरों और झरनों में नित्य स्नान का विधान है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों ही प्राकृतिक जल-स्रोतों को प्रधानता देते हैं। जहाँ मनुस्मृति विभिन्न प्राकृतिक स्रोतों की सूची देती है, वहीं याज्ञवल्क्य यहाँ विशेष रूप से 'प्रवाह' (नदी) और 'प्रचुरता' पर बल देते हैं, ताकि साधक केवल क्रिया न करे, बल्कि जल के जीवंत तत्त्व का अनुभव भी करे।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'प्रवाह' और 'विस्तार' का अभ्यास है। अल्प जल में स्नान करना 'संकोच' का प्रतीक है, जबकि प्रचुर जल में स्नान करना 'विस्तार' का। जब साधक प्रचुर और सुंदर जल में उतरता है, तो वह अपने सीमित 'अहम्' को उस विशाल जलराशि में विलीन करने का अनुभव करता है।

नदी के प्रवाह में स्नान करने का योगिक रहस्य यह है कि जिस प्रकार नदी निरंतर बहते हुए स्वयं को शुद्ध करती रहती है और अंततः सागर में मिल जाती है, उसी प्रकार साधक का चित्त भी जड़ता (कृत्रिम जलाशय) को त्यागकर चैतन्य के प्रवाह (नदी) में बहना सीखे। यहाँ 'सुमनोहर जल' का अर्थ हृदय की उस निर्मलता से है, जो साधक को अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाती है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि शुद्धि केवल बाहरी लेप से नहीं, बल्कि प्रकृति के जीवंत प्रवाह के साथ लय होने से आती है।

श्लोक ७.७

मृद्भिरद्भिश्च चरणौ प्रक्षाल्याचम्य वै शुचिः ।

उरुं हीति ऋचा तोयमुपस्थाय प्रदक्षिणम् ॥ ७.७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५३

पवित्र (द्विज) मिट्टी और जलसे पैर धोकर, आचमन करके, "उरुं हि राजा…" ऋचासे जलका उपस्थान (स्तुति) करके प्रदक्षिणा करे;

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान की आवश्यक सामग्री के संकलन और जल की प्रचुरता एवं शुद्धता के महत्व को समझाया है। अब इस श्लोक से वे स्नान की वास्तविक क्रिया का आरम्भ कर रहे हैं, जहाँ बाह्य शुद्धि के साथ-साथ जल के प्रति श्रद्धा और उसके दैवीय स्वरूप के प्रति समर्पण का विधान है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: शुचिः (द्विजः), मृद्भिरद्भिश्च चरणौ प्रक्षाल्य, आचम्य, 'उरुं हि' इति ऋचा तोयमुपस्थाय, (ततः) प्रदक्षिणम् (कुर्यात्)।

पदार्थ:

• मृद्भिरद्भिश्च: मिट्टी और जल के द्वारा।

• चरणौ प्रक्षाल्य: दोनों पैरों को धोकर।

• आचम्य: आचमन करके (हस्त-मुख शुद्धि और आंतरिक पवित्रता के लिए जल का सेवन)।

• शुचिः: पवित्र होकर। यहाँ शुचिता केवल शरीर की नहीं, अपितु मन की एकाग्रता और संकल्प की शुद्धि है।

• उरुं हि: ऋग्वेद की उस ऋचा का प्रतीक शब्द जिससे जल की स्तुति की जाती है।

• तोयमुपस्थाय: जल के समीप जाकर या जल का उपस्थान करके (जल को देवता मानकर उसके सम्मुख उपस्थित होना)।

• प्रदक्षिणम्: प्रदक्षिणा करना (जल के स्रोत या जलाशय की परिक्रमा करना)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक स्नान की उस प्रारंभिक अवस्था का वर्णन करता है जहाँ साधक स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर प्रस्थान करता है। स्नान केवल शरीर की गंदगी हटाना नहीं, बल्कि एक संस्कार है।

सबसे पहले 'मृद्भिरद्भिश्च चरणौ प्रक्षाल्य' का निर्देश है। जल में प्रवेश करने से पूर्व पैरों को मिट्टी और जल से धोना यह दर्शाता है कि साधक अपनी भौतिक यात्रा (पैर जो पृथ्वी पर चलते हैं) की धूल को वहीं त्याग कर पवित्रता के क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है। इसके पश्चात 'आचमन' की विधि है। आचमन का अर्थ केवल जल पीना नहीं, बल्कि अपनी वाणी और प्राण को शुद्ध करना है ताकि आगे के मन्त्रों का प्रभाव पूर्ण हो।

इसके बाद महर्षि 'उरुं हि' प्रतीक वाली ऋचा से जल का उपस्थान करने का निर्देश देते हैं। यहाँ 'उपस्थान' का अर्थ केवल जल के पास खड़े होना नहीं है, बल्कि जल के भीतर व्याप्त चेतना को जागृत करना है। जब साधक इस ऋचा का पाठ करता है, तो वह जल को एक जड़ पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि एक चेतन देवता के रूप में देखता है।

अंत में 'प्रदक्षिणम्' का विधान है। प्रदक्षिणा का अर्थ है—केंद्र को केंद्र मानकर उसके चारों ओर घूमना। यहाँ जल का स्रोत केंद्र है। यह क्रिया साधक के अहंकार को विसर्जित करती है और उसे यह बोध कराती है कि प्रकृति की ये शक्तियाँ ही उसकी शुद्धि का आधार हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'बाह्य क्रिया' को 'आन्तरिक साधना' में बदलने की प्रक्रिया है। साधक यहाँ 'वस्तु' से 'देवता' की ओर बढ़ता है।

१. पैर धोना और आचमन: यह शरीर के निचले स्तर (अधम अंग) से ऊपर की ओर उठने का प्रतीक है। यह चित्त को यह संकेत देता है कि अब वह सांसारिक प्रवृत्तियों को छोड़कर शुद्धि के मार्ग पर है।

२. जल का उपस्थान: योगिक अभ्यास में जल 'प्राण' का एक रूप है। जब साधक 'उरुं हि' ऋचा का प्रयोग करता है, तो वह अपने भीतर के जल-तत्व (रस) को जाग्रत करता है। जल की स्तुति वास्तव में उस ईश्वरीय ऊर्जा की स्तुति है जो शरीर के भीतर रसों के रूप में प्रवाहित होती है।

३. प्रदक्षिणा का अनुभव: प्रदक्षिणा करते समय साधक का मन जल के केंद्र में स्थित होता है। यह अभ्यास उसे 'स्थिरता' की भूमि पर ले जाता है। जैसे प्रदक्षिणा में शरीर घूमता है पर दृष्टि केंद्र पर रहती है, वैसे ही जीवन के झंझावातों के बीच साधक का मन उस 'अक्षर' या 'परमात्मा' पर केंद्रित रहे, इसका यह एक भौतिक अभ्यास है।

इस प्रकार, जल में उतरने से पहले की यह तैयारी साधक को मानसिक रूप से तैयार करती है कि वह अब केवल शरीर नहीं धो रहा, बल्कि अपनी चेतना का अभिषेक करने जा रहा है।

श्लोक ७.८

आवर्तयेत्तदुदकं ये ते शतमिति ह्यृचा ।

सुमित्रिया इत्यञ्जलिमुद्धरेद्दैवतं स्मरन् ॥ ७.८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५३

"ये ते शतम्…" ऋचासे उस जलको घुमाये (आवर्तन करे); "सुमित्रिया (न आप ओषधयः सन्तु)" — इससे देवताका स्मरण करते हुए अञ्जलि (जल) ऊपर उठाये।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जल के समीप जाकर, उसकी स्तुति कर प्रदक्षिणा करने की विधि बताई है। अब इस श्लोक में जल के साथ साधक के तादात्म्य और उस जल को दैवीय ऊर्जा से अभिमंत्रित करने की क्रिया का वर्णन है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (स्नानार्थी) 'ये ते शतम्' इति ह्यृचा तदुदकं आवर्तयेत्; (ततः) दैवतं स्मरन् 'सुमित्रिया' इति (ऋचायाः मन्त्रेण) अञ्जलिमुद्धरेत्।

पदार्थ:

• आवर्तयेत्: घुमाना या चक्राकार गति देना। यहाँ जल को अञ्जलि में लेकर या जल के भीतर हाथ घुमाकर उसे जाग्रत करने की क्रिया है।

• ये ते शतम्: ऋग्वेद की उस ऋचा का प्रतीक शब्द, जिससे जल की शक्तियों का आह्वान किया जाता है।

• सुमित्रिया: 'न आप ओषधयः सन्तु' आदि मन्त्र का प्रतीक शब्द। 'सुमित्र' का अर्थ है—जो मित्रवत हो, कल्याणकारी हो।

• अञ्जलिमुद्धरेत्: अञ्जलि (दोनों हाथों से भरे हुए जल) को ऊपर उठाना।

• दैवतं स्मरन्: जल के अधिष्ठाता देवता (वरुण या आपः) का स्मरण करते हुए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक जल को केवल एक भौतिक द्रव्य से बदलकर उसे 'तीर्थ' या 'औषधि' बनाने की प्रक्रिया है।

प्रथम निर्देश है— 'आवर्तयेत्तदुदकं ये ते शतमिति ह्यृचा'। जब साधक 'ये ते शतम्' ऋचा का जप करते हुए जल को घुमाता है, तो वह जल के भीतर निहित सुप्त शक्तियों को जाग्रत करता है। 'आवर्तन' का अर्थ है—प्रवाह को एक केंद्र पर लाना। जिस प्रकार मन्त्र की ध्वनि जल के अणुओं में स्पंदन पैदा करती है, उसी प्रकार आवर्तन उस स्पंदन को एक दिशा प्रदान करता है। यह क्रिया जल को शुद्ध करने के साथ-साथ उसे साधक की संकल्प-शक्ति से जोड़ देती है।

तत्पश्चात, 'सुमित्रिया इत्यञ्जलिमुद्धरेद्दैवतं स्मरन्' का विधान है। 'सुमित्रिया' प्रतीक वाले मन्त्र का भाव है कि यह जल हमारे लिए मित्रवत, आरोग्यदायी और औषधीय हो। जब साधक देवता का स्मरण करते हुए अञ्जलि को ऊपर उठाता है, तो वह जल को पृथ्वी के तल (स्थूल) से उठाकर आकाश की दिशा (सूक्ष्म) की ओर ले जाता है। यह ऊपर उठाना इस बात का प्रतीक है कि अब यह जल केवल शरीर धोने के लिए नहीं, बल्कि अंतःकरण के शोधन के लिए प्रयुक्त होगा। देवता का स्मरण जल में दैवीय चेतना का संचार करता है, जिससे वह जल 'पवित्रेण' (पवित्र करने वाला) बन जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह क्रिया 'बाह्य जल' का 'आन्तर जल' (सोम) में रूपांतरण है। 'आवर्तन' का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि सृष्टि की समस्त ऊर्जाएँ एक केंद्र की ओर घूम रही हैं। जिस प्रकार जल को घुमाया जाता है, उसी प्रकार साधक अपने बिखरे हुए मन और प्राणों को समेटकर एक केंद्र पर लाने का अभ्यास करता है।

अञ्जलि को ऊपर उठाना 'ऊर्ध्वगति' का प्रतीक है। साधक जब जल को ऊपर उठाता है, तो वह अपनी चेतना को भी निम्न वृत्तियों से ऊपर उठाकर उच्चतर देवत्व की ओर ले जाता है। यहाँ 'सुमित्र' का स्मरण करना वास्तव में अपने भीतर के उस मित्र (आत्मा) को जाग्रत करना है, जो सदैव कल्याणकारी है। इस अभ्यास से साधक की भूमि 'स्थूल शुद्धि' से 'भाव शुद्धि' की ओर बढ़ती है, जहाँ वह जल के माध्यम से अपनी आंतरिक अशुद्धियों को विसर्जित करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होता है।

विविधगात्रक्षालनम्

श्लोक ७.९

दुर्मित्रिया इति द्वि(द्वे)ष्यं ध्यायंश्चापः प्रसेचयेत् ।

मृद्भिरद्भिश्च गात्राणि क्रमशस्त्ववनेजयेत् ॥ ७.९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५४

"दुर्मित्रियाः (तस्मै सन्तु…)" — इससे शत्रुका ध्यान करते हुए जल (नीचे) छिड़के; फिर मिट्टी और जलसे क्रमशः अंगोंको धोये।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साधक ने 'सुमित्रिया' ऋचा के द्वारा जल को ऊपर उठाकर देवताओं का स्मरण किया और जल की कल्याणकारी शक्ति को आत्मसात किया। अब इस श्लोक में जल के माध्यम से आंतरिक और बाह्य अशुद्धियों के विसर्जन तथा शरीर के भौतिक एवं सूक्ष्म प्रक्षालन की विधि बताई गई है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (स्नानार्थी) 'दुर्मित्रिया' इति (ऋचायाः मन्त्रेण) द्विष्यं ध्यायंस् च आपः प्रसेचयेत्; (ततः) मृद्भिः अद्भिश्च गात्राणि क्रमशः तु अवनेजयेत्।

पदार्थ:

• दुर्मित्रिया: 'न आपो दुर्मित्राः सन्तु' आदि मन्त्र का प्रतीक शब्द। यहाँ 'दुर्मित्र' का अर्थ है—जो मित्र न हो, अर्थात् प्रतिकूल, शत्रुवत या अहितकारी।

• द्विष्यं ध्यायंस्: 'द्विष्य' का अर्थ है वह जिसे त्यागना है, जिससे घृणा है या जो शत्रु भाव है। यहाँ इसका तात्पर्य साधक के भीतर स्थित द्वेष, विकार और पाप-पुंज से है।

• प्रसेचयेत्: जल को नीचे की ओर छिड़कना या बहाना। यह विसर्जन की क्रिया है।

• मृद्भिः अद्भिश्च: मिट्टी और जल के द्वारा।

• गात्राणि: शरीर के अंग।

• क्रमशस्त्ववनेजयेत्: क्रमशः (एक निश्चित क्रम में) धोना या प्रक्षालित करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक स्नान को केवल देह की स्वच्छता तक सीमित न रखकर उसे 'मनो-शारीरिक शोधन' की प्रक्रिया बनाता है।

प्रथम निर्देश है— 'दुर्मित्रिया इति द्विष्यं ध्यायंश्चापः प्रसेचयेत्'। यहाँ 'दुर्मित्रिया' मन्त्र का प्रयोग जल को नीचे की ओर छिड़कते हुए किया जाता है। यह क्रिया अत्यंत गूढ़ है। जब साधक 'द्विष्यं ध्यायंस्' अर्थात् अपने भीतर के द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध और उन सभी प्रवृत्तियों का ध्यान करता है जो उसकी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक (शत्रु) हैं, और उसी समय जल को नीचे की ओर प्रवाहित करता है, तो वह प्रतीकात्मक और मानसिक रूप से उन विकारों को अपने शरीर और चित्त से अलग कर जल में विसर्जित कर देता है। यह क्रिया 'त्याग' का अभ्यास है। जिस प्रकार जल ऊपर से नीचे गिरता है, उसी प्रकार साधक अपने अहंकार और मलिनता को नीचे गिराकर स्वयं को हल्का करता है। यहाँ 'दुर्मित्र' किसी बाहरी व्यक्ति के प्रति अभिचार या शत्रुता नहीं है, अपितु अपने ही भीतर के 'अमित्र' (अविद्या और विकार) का निष्कासन है।

तत्पश्चात निर्देश है— 'मृद्भिरद्भिश्च गात्राणि क्रमशस्त्ववनेजयेत्'। जब साधक ने मानसिक मलिनता को जल के साथ विसर्जित कर दिया, तब वह मिट्टी (मृद्) और जल (अद्भिः) के मिश्रण से अंगों का प्रक्षालन करता है। मिट्टी पृथ्वी तत्त्व का प्रतीक है और जल आपः तत्त्व का। इन दोनों के संयोग से शरीर के स्थूल दोष दूर होते हैं। 'क्रमशः' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह संकेत देता है कि अंगों के प्रक्षालन का एक निश्चित क्रम है, जिससे शरीर की ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होता है। इस क्रम का विवरण अगले श्लोकों में दिया गया है। मिट्टी का लेप और जल का प्रवाह मिलकर शरीर को केवल स्वच्छ नहीं करते, बल्कि उसे आगामी मन्त्र-साधना और जप के लिए एक पवित्र पात्र के रूप में तैयार करते हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' के प्रथम चरण का वर्णन करता है। साधक यहाँ 'विमुक्ति' का सूक्ष्म अभ्यास करता है। 'द्वेष्य' का ध्यान करना वास्तव में अपनी कमियों और विकारों के प्रति सजग होना है। जब तक साधक यह नहीं देखेगा कि उसके भीतर क्या 'अमित्र' है, वह उसे विसर्जित नहीं कर पाएगा।

जल को नीचे छिड़कने की क्रिया 'अपान' की दिशा में है, जो विसर्जन का मार्ग है। साधक अनुभव करता है कि उसके हृदय और मन का सारा बोझ, सारी नकारात्मकता जल के साथ बहकर पृथ्वी में समा रही है। यह मानसिक स्तर पर एक 'कैथार्सिस' (भाव-विरेचन) है।

मिट्टी और जल से अंगों को क्रमशः धोना, स्थूल शरीर को प्रकृति के तत्त्वों से जोड़ना है। मिट्टी (पृथ्वी) स्थिरता देती है और जल (आपः) तरलता और शुद्धि। जब साधक क्रमबद्ध तरीके से अंगों को धोता है, तो वह अपनी चेतना को पैर के अंगूठे से लेकर शिर तक ले जाने की तैयारी करता है। यह अभ्यास साधक को 'अशुद्धि' की भूमि से 'पवित्रता' की भूमि की ओर ले जाता है, जिससे उसका मन एकाग्र होता है और वह आंतरिक जप के लिए तैयार होता है।

श्लोक ७.१०

एकया च शिरः क्षाल्यं द्वाभ्यां नाभेस्तथोपरि ।

कटिबस्त्यूरुजङ्घे च चरणौ च त्रिभिस्त्रिभिः ॥ ७.१० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५४

एक (अंजलि) से शिरः का क्षालन करे, दो (अंजलि) से नाभि से ऊपर, तीन-तीन (अंजलि) से कटि, उरु, जङ्घा और चरणों का क्षालन करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साधक ने 'दुर्मित्रिया' ऋचा के द्वारा अपने भीतर के द्वेष और विकारों का जल में विसर्जन किया और अंगों के क्रमशः प्रक्षालन का संकल्प लिया। अब इस श्लोक में उस प्रक्षालन की सूक्ष्म संख्या और अंगों के क्रम का निर्धारण किया गया है, ताकि शुद्धि केवल बाह्य न रहकर एक व्यवस्थित साधना बन जाए।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: एकया (अञ्जलिना) च शिरः क्षाल्यं, द्वाभ्यां (अञ्जलिभ्याम्) नाभेस्तथोपरि (क्षाल्यम्), (तथा) कटि-बस्ति-उरु-जङ्घे च चरणौ च त्रिभिः त्रिभिः (क्षाल्यन्ते)।

पदार्थ:

• एकया: एक अञ्जलि जल से। यहाँ 'एक' संख्या एकाग्रता और शिरोभाग की सूक्ष्मता का प्रतीक है।

• शिरः क्षाल्यं: सिर का प्रक्षालन करना।

• द्वाभ्यां: दो अञ्जलि जल से।

• नाभेस्तथोपरि: नाभि से ऊपर के अंगों का।

• कटिबस्त्यूरुजङ्घे च चरणौ च: कटि (कमर), बस्ति (गुदा/मूत्राशय क्षेत्र), उरु (जाँघ), जङ्घा (पिंडली) और चरण (पैर)।

• त्रिभिस्त्रिभिः: प्रत्येक अंग के लिए तीन-तीन अञ्जलि जल का प्रयोग।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में अंगों के प्रक्षालन के लिए जल की जो मात्रा निर्धारित की गई है, वह केवल स्वच्छता की रीति नहीं, अपितु शरीर के विभिन्न केंद्रों की शुद्धि का एक गणितीय विज्ञान है।

ऋषि याज्ञवल्क्य निर्देश देते हैं कि सर्वप्रथम 'एकया च शिरः क्षाल्यं'—सिर के लिए एक अञ्जलि जल पर्याप्त है। सिर शरीर का उच्चतम बिंदु है, जहाँ चेतना का वास है। यहाँ जल की अल्प मात्रा यह संकेत करती है कि शिरोभाग की शुद्धि के लिए केवल एक शुद्ध संकल्प और एक स्पर्श पर्याप्त है, क्योंकि यहाँ सूक्ष्मता प्रधान है।

तदुपरांत 'द्वाभ्यां नाभेस्तथोपरि'—नाभि से ऊपर के अंगों (वक्ष, स्कंध, भुजाओं) के लिए दो अञ्जलि जल का विधान है। नाभि शरीर का मध्य बिंदु है। नाभि से ऊपर का क्षेत्र प्राण और मन के संचालन का केंद्र है। यहाँ दो अञ्जलि जल का प्रयोग इस क्षेत्र की व्यापकता और हृदय-मंडल की शुद्धि का प्रतीक है, जहाँ साधक अपनी आंतरिक वृत्तियों को निर्मल करता है।

अन्तिम चरण में 'कटिबस्त्यूरुजङ्घे च चरणौ च त्रिभिस्त्रिभिः'—कटि से लेकर चरणों तक के प्रत्येक अंग के लिए तीन-तीन अञ्जलि जल का निर्देश है। शरीर का यह निचला भाग स्थूलता और पृथ्वी तत्त्व का प्रधान क्षेत्र है। यहाँ मल, विकार और जड़ता अधिक होती है, इसलिए यहाँ प्रक्षालन की तीव्रता और मात्रा अधिक (तीन-तीन बार) रखी गई है। यह विधि दर्शाती है कि जैसे-जैसे हम ऊपर से नीचे की ओर बढ़ते हैं, स्थूलता बढ़ती है और उसे शुद्ध करने के लिए अधिक साधन की आवश्यकता होती है।

यह क्रम वास्तव में 'ऊर्ध्वगमन' की तैयारी है। जब साधक अपने शरीर के सबसे निचले और स्थूलतम अंगों को तीन-तीन बार धोकर पूर्णतः शुद्ध कर लेता है, तब वह अपनी चेतना को नीचे से ऊपर की ओर ले जाने के योग्य होता है। यह बाह्य स्नान वास्तव में आंतरिक शुद्धि का एक सोपान है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर जाने की प्रक्रिया है। साधक जब एक, दो और तीन की संख्या में जल अर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपने शरीर के विभिन्न स्तरों पर स्थित जड़ता को धो रहा होता है।

१. तीन (त्रिभिः): यह पृथ्वी, जल और अग्नि के स्थूल प्रभाव को मिटाने का अभ्यास है। पैरों और जंघाओं का तीन बार प्रक्षालन साधक को भौतिक आसक्तियों और पृथ्वी के भारीपन से मुक्त करता है।

२. दो (द्वाभ्यां): यह प्राण और मन के द्वंद्व को शांत करने का अभ्यास है। नाभि से ऊपर का प्रक्षालन हृदय के भावों को शुद्ध करता है।

३. एक (एकया): यह अद्वैत और एकाग्रता का अभ्यास है। सिर का प्रक्षालन साधक को उस एक 'अक्षर' या 'बिन्दु' की ओर ले जाता है जहाँ समस्त चेतना विलीन हो जाती है।

साधक इस अभ्यास से अनुभव करता है कि शरीर केवल मांस-मज्जा नहीं, बल्कि विभिन्न ऊर्जा-स्तरों का समूह है। वह इस विधि से अपने भौतिक शरीर को एक पवित्र वेदी में परिवर्तित करता है, ताकि आगामी जप और ध्यान के समय शरीर बाधा न बने, अपितु सहायक सिद्ध हो।

जलनमस्कारः

श्लोक ७.११

प्रक्षाल्य हस्तौ चाचम्य नमस्कृत्य जलं ततः ।

यत्किंचिदिति मन्त्रेण नमस्येत् प्रयताञ्जलिः ॥ ७.११ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५४

हाथ धोकर, आचमन करके, फिर जलको नमस्कार करके, अञ्जलि बाँधे हुए "यत्किंचेदं (वरुण दैव्ये जने)…" मन्त्रसे नमस्कार करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में अंगों के प्रक्षालन की संख्या और क्रम का निर्धारण किया गया था, जिससे साधक ने शरीर के स्थूल अंगों की शुद्धि पूर्ण कर ली। अब इस श्लोक में जल के प्रति कृतज्ञता और उसके दैवीय स्वरूप के प्रति समर्पण की विधि बताई गई है, ताकि स्नान केवल देह-मार्जन न रहकर एक आध्यात्मिक संवाद बन जाए।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) हस्तौ प्रक्षाल्य, (ततः) आचम्य, जलं नमस्कृत्य, ततः प्रयताञ्जलिः 'यत्किंचिद्' इति मन्त्रेण (जलं) नमस्येत्।

पदार्थ:

• प्रक्षाल्य हस्तौ: हाथों को धोकर। यह क्रिया बाह्य शुद्धि के साथ-साथ कर्म-इन्द्रियों के पवित्रीकरण का संकेत है।

• आचम्य: आचमन करके। आचमन से अंतःकरण की शुद्धि और प्राण का संतुलन होता है।

• नमस्कृत्य जलं: जल को नमस्कार करके। यहाँ जल को केवल पदार्थ नहीं, अपितु चेतना के रूप में स्वीकार किया गया है।

• प्रयताञ्जलिः: पूरी तरह एकाग्र होकर या शुद्ध भाव से अञ्जलि बाँधकर। 'प्रयतः' शब्द यहाँ सावधानी, संयम और श्रद्धा के सम्मिश्रण को दर्शाता है।

• यत्किंचिदिति मन्त्रेण: 'यत्किंचिदं (वरुण दैव्ये जने)...' इस मन्त्र के द्वारा। यह वरुण देवता (जल के अधिपति) को समर्पित मन्त्र है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह प्रक्रिया केवल शरीर को स्वच्छ करने की विधि नहीं है, अपितु यह प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने का एक योग है। अंगों के प्रक्षालन के पश्चात ऋषि याज्ञवल्क्य 'हस्तौ प्रक्षाल्य' और 'आचम्य' की पुनरावृत्ति इसलिए करते हैं, क्योंकि जब साधक जल के साथ गहन संपर्क करता है, तो वह पुनः अपनी चेतना को स्थिर कर उस परम तत्त्व के सम्मुख उपस्थित होना चाहता है।

यहाँ 'जलं नमस्कृत्य' का निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है। जल जीवन का आधार है और वैदिक दृष्टि में यह वरुण देव का स्वरूप है। जब साधक जल को नमस्कार करता है, तो वह वास्तव में उस व्यापक चेतना को नमन करता है जो संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। जल की तरलता और उसकी निर्मलता साधक को यह स्मरण कराती है कि जिस प्रकार जल सब कुछ धो देता है, उसी प्रकार परमात्मा की कृपा साधक के अंतःकरण के मल को धो देती है।

तदुपरांत, 'प्रयताञ्जलिः' होकर 'यत्किंचिदिति मन्त्रेण' नमन करने का विधान है। यह मन्त्र वरुण देव की स्तुति है, जिसमें जल के माध्यम से समस्त पापों के प्रक्षालन और दैवीय कृपा की प्रार्थना की जाती है। अञ्जलि बाँधना पूर्ण समर्पण का प्रतीक है—दोनों हाथों का मिलन मन के बिखराव को रोककर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करने का सूचक है। जब साधक इस मन्त्र का जप करते हुए जल को नमन करता है, तो वह अपने अहंकार को जल की तरलता में विसर्जित कर देता है और स्वयं को उस विराट जल-तत्त्व (चेतना) के अधीन कर देता है।

यह विधि यह स्पष्ट करती है कि स्नान का उद्देश्य केवल त्वचा की शुद्धि नहीं, अपितु जल के माध्यम से अपने भीतर के 'वरुण' (संयम और नियम के देवता) को जाग्रत करना है। बाह्य जल का स्पर्श जब आन्तर श्रद्धा से मिलता है, तब वह स्नान एक यज्ञ बन जाता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'बाह्य क्रिया' से 'आन्तर भाव' की ओर संक्रमण का बिंदु है। हाथ धोना और आचमन करना मन को वर्तमान क्षण में लाना है। 'प्रयताञ्जलि' की अवस्था में साधक अपने हृदय को खोलता है और जल के माध्यम से अपनी चेतना को प्रवाहित करता है।

अभ्यास यह है कि जब साधक 'यत्किंचिद्' मन्त्र का उच्चारण करे, तो वह अनुभव करे कि जल केवल शरीर को नहीं धो रहा, अपितु उसके सूक्ष्म शरीर के संचित संस्कारों को भी धोकर उसे निर्मल कर रहा है। यहाँ जल 'अक्षर' की तरलता का प्रतीक है। अञ्जलि बाँधकर नमन करने से साधक की वृत्ति बाहर से हटकर अपने केंद्र (हृदय) की ओर मुड़ती है, जिससे वह स्नान के बाद होने वाले ध्यान और प्राणायाम के लिए पूर्णतः तैयार हो जाता है। यह क्रिया साधक को 'स्थूल शुद्धि' की भूमि से 'भाव शुद्धि' की भूमि पर ले जाती है।

स्नानसमये तीर्थविशेषध्याननिर्णयः

श्लोक ७.१२

यत्र स्थाने च यत्तीर्थं नदी पुण्यतमा च या ।

तां ध्यायन् मनसाऽऽवाह्य अन्यत्रेष्टं विचिन्तयेत् ॥ ७.१२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५४

उस स्थानमें जो तीर्थ और जो परम पवित्र नदी हो, उसका ध्यान करते हुए मनसे आवाहन करे; दूसरी जगह (स्नान हो तो) अपने अभीष्ट (तीर्थ) का चिन्तन करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साधक ने 'यत्किंचिद्' मन्त्र के द्वारा जल-तत्त्व और वरुण देवता के सम्मुख अपनी श्रद्धा अर्पित कर समर्पण का भाव जाग्रत किया। अब इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य स्नान की उस मानसिक विधि का निर्देश दे रहे हैं, जिससे भौतिक जल, आध्यात्मिक तीर्थ में परिवर्तित हो जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) यत् स्थाने च (अस्ति) या पुण्यतमा नदी च यत्तीर्थं (अस्ति), तां (नदीं) ध्यायन् मनसाऽऽवाह्य, (यदि) अन्यत्र (स्नानं कुर्यात्) तर्हि इष्टं (तीर्थं) विचिन्तयेत्।

पदार्थ:

• यत्र स्थाने च: जिस स्थान पर (साधक उपस्थित है)।

• पुण्यतमा नदी च यत्तीर्थं: जो परम पवित्र नदी और जो तीर्थ वहाँ विद्यमान है।

• ध्यायन मनसाऽऽवाह्य: मन से उनका ध्यान करते हुए और उन्हें (अपने भीतर या उस जल में) आवाहन करते हुए।

• अन्यत्रेष्टं विचिन्तयेत्: यदि किसी अन्य स्थान (जहाँ कोई प्रसिद्ध तीर्थ न हो) पर स्नान करना पड़े, तो अपने इष्ट या अभीष्ट तीर्थ का चिन्तन करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह विधि स्पष्ट करती है कि शुद्धि केवल जल के स्पर्श से नहीं, अपितु 'भाव' और 'संकेत' से होती है। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को बाह्य जल से ऊपर उठाकर मानसिक जल (चित्त-शुद्धि) की ओर ले जा रहे हैं।

विधि यह है कि यदि साधक किसी ऐसे स्थान पर है जहाँ वास्तव में कोई पवित्र नदी या तीर्थ है, तो वह केवल उस जल में न उतरे, अपितु पहले उस नदी और तीर्थ के दैवीय स्वरूप का 'ध्यान' करे। 'आवाहन' का अर्थ है—उस तीर्थ की चेतना को अपने वर्तमान अनुभव में बुलाना। जब साधक मन से आवाहन करता है, तब वह जल केवल नहीं रहता, अपितु वह उस तीर्थ की समस्त आध्यात्मिक ऊर्जा का संवाहक बन जाता है।

किन्तु, यदि साधक किसी ऐसे स्थान पर है जहाँ कोई प्रसिद्ध तीर्थ या पुण्य-नदी उपलब्ध नहीं है (अन्यत्र), तब भी उसकी साधना बाधित नहीं होती। यहाँ 'इष्टं विचिन्तयेत्' का निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि साधक अपने मन में उस तीर्थ का स्मरण करे जिसे वह अपना इष्ट मानता है (जैसे गंगा, यमुना या कोई अन्य सिद्ध पीठ)। इस मानसिक चिन्तन से वह साधारण जल भी उसी पुण्य-नदी के समान फल देने वाला हो जाता है। यह विधान सिद्ध करता है कि तीर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं, अपितु एक 'चेतना' है, जिसे श्रद्धा के द्वारा कहीं भी प्रतिष्ठित किया जा सकता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मानसिक संकल्प' और 'भाव-शुद्धि' का अभ्यास है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी जगत की वस्तुएँ (जल, नदी, तीर्थ) केवल माध्यम हैं; वास्तविक परिवर्तन मन के भीतर घटित होता है।

जब साधक 'मनसाऽऽवाह्य' (मन से आवाहन) करता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल जल से हटाकर सूक्ष्म तत्त्व पर केंद्रित करता है। यह अभ्यास साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि पवित्रता बाहर नहीं, भीतर है। यदि मन पवित्र है और संकल्प दृढ़ है, तो वह किसी भी साधारण जलाशय को 'पुण्यतमा नदी' में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है।

साधक इस अभ्यास से 'भाव-शक्ति' के प्रयोग को सीखता है। वह यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार मन से तीर्थ को बुलाया जा सकता है, उसी प्रकार ध्यान के माध्यम से अंतःकरण के भीतर स्थित 'अक्षर' और 'सूर्य-पुरुष' का आवाहन किया जा सकता है। यह क्रिया साधक को स्थूल शरीर की सीमाओं से मुक्त कर उसे मानसिक धरातल पर प्रतिष्ठित करती है, जहाँ वह स्थान और समय के बंधन से परे अपने इष्ट के साथ एकाकार हो सकता है।

श्लोक ७.१३

गङ्गादिपुण्यतीर्थानि कृत्रिमादिषु संस्मरेत् ।

उदुत्यमिति प्रविशेज्जलं तु प्राङ्मुखं शुचिः ॥ ७.१३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५४

कृत्रिम आदि (जलाशयों) में गङ्गा आदि पुण्य तीर्थोंका स्मरण करे; और पवित्र होकर, पूर्वकी ओर मुँह करके "उदु त्यम्…" मन्त्रसे जलमें प्रवेश करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साधक ने जिस स्थान पर स्नान कर रहा है, वहाँ के स्थानीय तीर्थ या अपनी अभीष्ट पवित्र नदी का मानसिक आवाहन किया। अब इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस स्थिति का समाधान दे रहे हैं जहाँ जल प्राकृतिक न होकर कृत्रिम हो, और साथ ही जल में प्रवेश की दिशा तथा मन्त्र का निर्देश कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) कृत्रिमादिषु (जलाशयेषु) गङ्गादि-पुण्यतीर्थानि संस्मरेत्; (ततः) शुचिः प्राङ्मुखं 'उदु त्यम्' इति (मन्त्रेण) जले प्रविशेत्।

पदार्थ:

• कृत्रिमादिषु: कृत्रिम आदि जलाशयों में (जैसे कुआँ, तालाब, बावड़ी या मानव-निर्मित कुंड)।

• गङ्गादिपुण्यतीर्थानि संस्मरेत्: गङ्गा आदि पुण्य तीर्थों का स्मरण करे।

• शुचिः: पवित्र होकर (यहाँ शुद्धि का अर्थ केवल बाह्य स्वच्छता नहीं, अपितु पूर्वोक्त आचमन और मानसिक आवाहन से प्राप्त पवित्रता है)।

• प्राङ्मुखं: पूर्व दिशा की ओर मुख करके।

• उदु त्यम् इति प्रविशेत्: 'उदु त्यम्...' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए जल में प्रवेश करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह विधि दर्शाती है कि साधक के लिए जल की भौतिकता से अधिक उसका 'गुण' और 'संकेत' महत्वपूर्ण है। जब साधक किसी कृत्रिम जलाशय (कृत्रिमादिषु) में स्नान करता है, तो वहाँ वह प्राकृतिक प्रवाह या वह दैवीय ऊर्जा नहीं होती जो गङ्गा जैसी पुण्य नदियों में होती है। अतः ऋषि निर्देश देते हैं कि ऐसे समय में 'संस्मरण' का आश्रय लिया जाए। स्मरण का अर्थ है—चेतना के स्तर पर गङ्गा आदि तीर्थों की पवित्रता को उस कृत्रिम जल में आरोपित कर देना। जब साधक गङ्गा का स्मरण करता है, तो उसकी श्रद्धा उस साधारण जल को भी 'गङ्गाजल' के समान प्रभाव वाला बना देती है।

इसके पश्चात, जल में प्रवेश की विधि दी गई है। साधक 'शुचिः' होकर, अर्थात् मानसिक और शारीरिक शुद्धि के बाद, 'प्राङ्मुखं' (पूर्व की ओर मुख करके) प्रवेश करे। पूर्व दिशा सूर्य की दिशा है, जो जाग्रति, प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है। सूर्य की ओर मुख करके जल में उतरना इस बात का संकेत है कि साधक अंधकार (अविद्या) से प्रकाश (विद्या) की ओर अग्रसर हो रहा है।

प्रवेश के समय 'उदु त्यम्...' मन्त्र का प्रयोग किया गया है। यह मन्त्र जल के देवता और उसकी उत्थान शक्ति का आह्वान है। जल में प्रवेश करना केवल शरीर को भिगोना नहीं, बल्कि एक संस्कार है। मन्त्र के साथ प्रवेश करने से जल के भीतर की सूक्ष्म ऊर्जाएँ साधक के शरीर के साथ सामंजस्य स्थापित करती हैं, जिससे स्नान केवल त्वचा की सफाई न रहकर प्राणों का शोधन बन जाता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'संकेत-साधना' का उदाहरण है। कृत्रिम जलाशय में पुण्य तीर्थों का स्मरण करना यह सिखाता है कि साधक अपनी इच्छाशक्ति और ध्यान के माध्यम से किसी भी साधारण वस्तु को आध्यात्मिक उपकरण में बदल सकता है।

यहाँ 'पूर्वमुख' होना सूर्य-साधना से जुड़ा है। जिस प्रकार सूर्य बाह्य जगत को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार पूर्व की ओर मुख कर जल में उतरना अंतःकरण के सूर्य को जाग्रत करने का अभ्यास है। 'उदु त्यम्' मन्त्र का उच्चारण करते हुए जल में उतरना साधक को इस अनुभव की ओर ले जाता है कि वह भौतिक जल में नहीं, अपितु चेतना के प्रवाह में उतर रहा है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' (कृत्रिम जलाशय) से 'सूक्ष्म' (पुण्य तीर्थों का स्मरण) और फिर 'अक्षर' (मन्त्र की ध्वनि) की ओर ले जाता है, जिससे स्नान की क्रिया एक ध्यान-प्रक्रिया में परिवर्तित हो जाती है।

मृदा गात्रालम्भनम्

श्लोक ७.१४

येन देवाः पवित्रेति कुर्यादालम्भनं त्रिभिः ।

महाव्याहृतिभिः पश्चादाचम्य प्रयतोऽपि सन् ॥ ७.१४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५५

"येन देवाः पवित्रेण…" (मन्त्र) से, फिर तीनों महाव्याहृतियोंसे (अंगोंका) स्पर्श करे; उसके बाद संयत होते हुए भी आचमन करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साधक 'उदु त्यम्' मन्त्र के साथ पूर्वमुख होकर पवित्र जल में प्रवेश कर चुका है। अब इस श्लोक में जल में प्रवेश के उपरान्त, शरीर को दैवीय ऊर्जा से अभिमंत्रित करने के लिए मन्त्रों द्वारा अंगों के स्पर्श (आलम्भन) और आंतरिक संयम की विधि बताई गई है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) 'येन देवाः पवित्रेण' इति (मन्त्रेण), (ततः) त्रिभिः महाव्याहृतिभिः (गात्राणां) आलम्भनं कुर्यात्; (ततः) प्रयतोऽपि सन् आचम्य (पुनः) (स्नानं कुर्यात्)।

पदार्थ:

• येन देवाः पवित्रेण: यह एक ऋचा का आरम्भिक अंश है, जिसका अर्थ है— "जिस (जल) से देव पवित्र हुए..."। यह जल की पवित्रता को देवत्व से जोड़ने वाला मन्त्र है।

• आलम्भनम्: स्पर्श करना या आधार लेना। यहाँ इसका अर्थ मन्त्रों के प्रभाव को शरीर के अंगों पर आरोपित करने के लिए उन्हें स्पर्श करना है।

• त्रिभिः महाव्याहृतिभिः: तीन महाव्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) के द्वारा।

• प्रयतोऽपि सन्: 'प्रयतः' का अर्थ है संयमित, प्रयत्नशील या एकाग्र। 'अपि' यहाँ यह दर्शाता है कि बाहरी क्रियाओं के बीच भी आंतरिक सजगता और संयम बना रहे।

• आचम्य: आचमन करके (जल का सेवन कर शुद्धि करना)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान केवल शरीर की मैल धोना नहीं, अपितु शरीर को एक 'यज्ञ-वेदी' बनाने की प्रक्रिया है। जल में प्रवेश करने के बाद साधक सबसे पहले 'येन देवाः पवित्रेण...' ऋचा का पाठ करता है। इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस जल ने देवताओं को पवित्र किया, वही जल अब मेरे इस भौतिक शरीर को भी दैवीय गुणों से ओत-प्रोत करे। यह मन्त्र जल की भौतिकता को आध्यात्मिक शक्ति में बदल देता है।

इसके पश्चात, साधक तीनों महाव्याहृतियों— 'भूः', 'भुवः' और 'स्वः' का उच्चारण करते हुए अपने अंगों का स्पर्श (आलम्भन) करता है। महाव्याहृतियाँ केवल शब्द नहीं, अपितु अस्तित्व के तीन स्तर हैं। 'भूः' पृथ्वी और स्थूल शरीर का, 'भुवः' अन्तरिक्ष और प्राणिक शरीर का, तथा 'स्वः' द्यौ और सूक्ष्म चेतना का प्रतीक है। जब साधक इन तीनों का उच्चारण करते हुए शरीर को स्पर्श करता है, तो वह अपने स्थूल, प्राणिक और सूक्ष्म शरीरों को एक सूत्र में पिरोकर पवित्र करता है।

इस पूरी प्रक्रिया के अंत में 'प्रयतोऽपि सन् आचम्य' का निर्देश है। यहाँ 'प्रयतः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि अंगों के स्पर्श और मन्त्रोच्चार के समय साधक की चेतना विचलित न हो, बल्कि वह पूर्णतः संयमित और एकाग्र रहे। बाहरी तौर पर वह जल में है और अंगों को छू रहा है, किन्तु भीतर से वह अपनी इन्द्रियों को समेटकर केंद्र की ओर अग्रसर है। इस संयम की स्थिति में किया गया आचमन केवल मुख की शुद्धि नहीं, अपितु प्राणों का परिष्कार है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर जाने की एक सीढ़ी है। 'आलम्भन' का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि उसका शरीर जड़ नहीं, अपितु मन्त्रों की शक्ति से स्पंदित होने वाला एक चैतन्य माध्यम है।

साधक जब महाव्याहृतियों से अंगों का स्पर्श करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को पृथ्वी (भूः) से उठाकर अन्तरिक्ष (भुवः) और फिर स्वर्ग/परम पद (स्वः) की ओर ले जाने का अभ्यास करता है। यह 'प्रयत्न' (संयम) साधक को बाह्य स्नान से हटाकर 'अन्तस्नान' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि शरीर के भीतर भी एक पवित्र जल-धारा (अमृत या प्राण-शक्ति) प्रवाहित हो रही है। यहाँ 'आचमन' का योगिक अर्थ है— अपनी चेतना को हृदय के केंद्र में स्थापित करना, जिससे साधक की आंतरिक शुद्धि सुनिश्चित होती है।

श्लोक ७.१५

आलभेद्वै मृदाङ्गानि इदं विष्णुरिति त्र्यृचा ।

भास्कराभिमुखो मज्जेदापो अस्मानिति त्र्यृचा ॥ ७.१५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५५

"इदं विष्णुर्वि चक्रमे…" — इन तीन ऋचाओंसे मिट्टीसे अंगोंका लेपन करे; और सूर्यकी ओर मुँह करके "आपो अस्मान्…" — इन तीन ऋचाओंसे (जलमें) डुबकी लगाये।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साधक ने 'येन देवाः पवित्रेण' ऋचा और महाव्याहृतियों के द्वारा अंगों का स्पर्श कर शरीर को दैवीय ऊर्जा से अभिमंत्रित किया और आचमन द्वारा आंतरिक शुद्धि की। अब इस श्लोक में शरीर को पृथ्वी-तत्त्व (मृत्तिका) से जोड़ने और सूर्य-ऊर्जा के साथ एकाकार होने की विधि बताई गई है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) 'इदं विष्णुरिति' (त्रयः ऋचाः) — एतैः त्र्यृचाभिः मृदाङ्गानि आलभेत; (ततः) भास्कराभिमुखः 'आपो अस्मानिति' (त्रयः ऋचाः) — एतैः त्र्यृचाभिः (जले) मज्जेत्।

पदार्थ:

• आलभेद्वै मृदाङ्गानि: 'आलभ्' धातु का अर्थ है स्पर्श करना या लेपन करना। मृत्तिका (मिट्टी) के द्वारा अंगों का स्पर्श या लेपन करना।

• इदं विष्णुरिति त्र्यृचा: यह 'इदं विष्णुर्वि चक्रमे...' से आरम्भ होने वाली तीन ऋचाओं का संकेत है। यहाँ विष्णु का अर्थ केवल एक देवता नहीं, अपितु वह 'व्यापकता' है जो समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।

• भास्कराभिमुखो: भास्कर (सूर्य) की ओर मुख करके।

• मज्जेत्: जल में पूरी तरह डूबना या डुबकी लगाना।

• आपो अस्मानिति त्र्यृचा: यह 'आपो अस्मान् नुन्चन्तु...' आदि तीन ऋचाओं का संकेत है, जो जल की शुद्धिकरण शक्ति का आह्वान करती हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह प्रक्रिया स्थूल शरीर को ब्रह्माण्ड के तत्त्वों के साथ लयबद्ध करने की एक विधि है। महाव्याहृतियों के स्पर्श के बाद अब साधक 'इदं विष्णुर्वि चक्रमे...' आदि तीन ऋचाओं का पाठ करते हुए अपने अंगों पर मृत्तिका (मिट्टी) का लेपन करता है।

यहाँ मृत्तिका का लेपन केवल एक बाह्य क्रिया नहीं है। मिट्टी पृथ्वी तत्त्व का प्रतीक है। 'विष्णु' शब्द का अर्थ है— 'विशते इति विष्णुः' अर्थात् जो सर्वत्र व्याप्त है। जब साधक इन ऋचाओं के साथ मिट्टी का लेप करता है, तो वह अपने शरीर को उस व्यापक विष्णु-तत्त्व (ब्रह्मांडीय चेतना) के साथ जोड़ता है। यह क्रिया साधक के भीतर के अहंकार को मिटाकर उसे पृथ्वी के समान विनम्र और स्थिर बनाती है। मिट्टी का लेप शरीर की भौतिकता को स्वीकार करना और उसे दैवीय व्यापकता में विलीन करने का साधन है।

इसके पश्चात, साधक सूर्य (भास्कर) की ओर मुख करता है। सूर्य ज्ञान, प्रकाश और प्राण का स्रोत है। सूर्यमुख होकर 'आपो अस्मान्...' आदि तीन ऋचाओं के साथ जल में डुबकी लगाना (मज्जन) एक महान रहस्य है। जल शरीर की अशुद्धि धोता है, किंतु सूर्य की ओर मुख होने से वह जल 'तेजस' में परिवर्तित हो जाता है। जब साधक जल में डूबता है, तो वह केवल जल में नहीं, अपितु सूर्य की किरणों और जल की शीतलता के संगम में प्रवेश करता है। यह क्रिया साधक के भीतर के ताप और शीतलता का संतुलन करती है, जिससे चित्त स्थिर होता है।

योग-रहस्य —

योगी के लिए यह श्लोक 'पृथ्वी' और 'सूर्य' (अग्नि) के संतुलन का अभ्यास है। मृत्तिका लेपन द्वारा साधक अपनी 'स्थिरता' का अभ्यास करता है, जिससे मन का भटकाव रुकता है और वह अपनी जड़ (मूल) से जुड़ता है।

सूर्यमुख होकर डुबकी लगाना 'प्राण' के जागरण का अभ्यास है। सूर्य बाहरी हृदय है और जल आंतरिक शुद्धि। जब साधक सूर्य की ओर देखते हुए जल में विलीन होता है, तो वह अपने बाहरी व्यक्तित्व (अहंकार) को जल में डुबोकर, भीतर के सूर्य (आत्मा) को जाग्रत करता है। इस अभ्यास से साधक 'स्थूल' (मिट्टी) से 'सूक्ष्म' (जल) और फिर 'तेजस' (सूर्य) की ओर अग्रसर होता है। यह प्रक्रिया उसे भौतिक शरीर की सीमाओं से निकालकर उस व्यापक चेतना की ओर ले जाती है, जहाँ वह स्वयं को विष्णु की भाँति सर्वव्यापी अनुभव करने लगता है।

गोमयस्नानम्

श्लोक ७.१६

ततो निघृष्य गात्राणि निमज्योन्मज्य वै शनैः ।

गोमयेन तु यः स्नायादापादतलमस्तकम् ॥ ७.१६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५५

फिर अंगोंको मलकर, धीरे-धीरे डुबकी लगाकर और उठकर — जो गोबरसे पैरके तलवेसे मस्तकतक स्नान करता है —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साधक ने मृत्तिका-लेपन द्वारा पृथ्वी-तत्त्व से संबंध स्थापित किया और सूर्य की ओर मुख कर जल में डुबकी लगाकर अपनी चेतना को सौर-ऊर्जा से जोड़ा। अब इस श्लोक में शरीर की सूक्ष्म शुद्धि और पृथ्वी की उर्वरता एवं पवित्रता को आत्मसात करने के लिए 'गोमय-स्नान' की विधि बताई गई है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) ततः (हस्तेन) गात्राणि निघृष्य, शनैः निमज्योन्मज्य, (ततः) यः आपादतलमस्तकं गोमयेन तु स्नायात्।

पदार्थ:

• निघृष्य: 'नि-घ्रु' धातु से, जिसका अर्थ है मलना या रगड़ना। यहाँ जल में डुबकी लगाने से पूर्व शरीर के अंगों को हाथों से मलने की क्रिया है।

• निमज्योन्मज्य: 'निमज्' (डूबना) और 'उमज्' (ऊपर उठना)। अर्थात् डुबकी लगाना और पुनः बाहर निकलना।

• शनैः: धीरे-धीरे। यह क्रिया की गति को दर्शाता है, जो योगिक स्थिरता (स्थिरता) का संकेत है।

• गोमयेन: गोमय (गाय के गोबर) के मिश्रण युक्त जल से। वैदिक परम्परा में गोमय को अत्यंत पवित्र और शोधक माना गया है।

• आपादतलमस्तकम्: 'आ-पाद-तल-मस्तकम्' अर्थात् पैर के तलवों से लेकर सिर के ऊपरी भाग (मस्तक) तक।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह विधि केवल शारीरिक स्वच्छता नहीं, अपितु शरीर के स्थूल और सूक्ष्म स्तरों का शोधन है। श्लोक के प्रथम चरण में 'गात्राणि निघृष्य' कहा गया है—अर्थात् जल में डुबकी लगाने से पूर्व साधक अपने अंगों को मलकर जाग्रत करे। यह क्रिया शरीर के रोम-छिद्रों को खोलती है और रक्त-संचार को तीव्र करती है, जिससे शरीर जल के गुणों को ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाता है।

तत्पश्चात 'शनैः निमज्योन्मज्य' की विधि है। डुबकी लगाना और उठना—यह जीवन और मृत्यु, या प्रलय और सृष्टि के चक्र का प्रतीक है। 'शनैः' (धीरे-धीरे) शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है; योग में जब क्रियाएँ धीमी और सजग होती हैं, तभी वे 'साधना' बनती हैं। तीव्र डुबकी केवल शरीर को भिगोती है, किन्तु धीरे-धीरे डुबकी लगाना मन को शांत करता है और साधक को अपनी श्वास और जल के स्पर्श के प्रति सचेत करता है।

इसके उपरान्त 'गोमय-स्नान' का विधान है। पैर के तलवों से मस्तक तक गोमय युक्त जल का प्रयोग करना एक विशेष शोधन प्रक्रिया है। गोमय पृथ्वी की उर्वरता और गौ-तत्त्व की पवित्रता का संगम है। यह शरीर के बाहरी मैल के साथ-साथ उन सूक्ष्म अशुद्धियों को भी दूर करता है जो पृथ्वी-तत्त्व के असंतुलन से उत्पन्न होती हैं। जब साधक आपादतलमस्तकं (पैर से सिर तक) इस स्नान को करता है, तो वह स्वयं को प्रकृति के मूल स्वरूप में विलीन कर देता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'समर्पण' और 'शुद्धिकरण' है। अंगों को मलना (निघृष्य) वास्तव में शरीर के प्रति सजगता का अभ्यास है। धीरे-धीरे डुबकी लगाना (निमज्) अंतर्मुखी होने की प्रक्रिया है—जैसे साधक अपनी चेतना को बाहरी जगत से समेटकर अपने भीतर उतारता है। पुनः ऊपर उठना (उमज्) उस आंतरिक शांति के साथ पुनः संसार में प्रतिष्ठित होना है।

गोमय-स्नान का योगिक अर्थ है—अहंकार का विसर्जन। गोबर, जो पृथ्वी का सबसे विनम्र और उपजाऊ रूप है, उसका लेपन करना यह दर्शाता है कि साधक स्वयं को प्रकृति के सम्मुख पूरी तरह समर्पित कर रहा है। यह अभ्यास साधक को 'भूमि' (स्थिरता) से 'मस्तक' (उच्च चेतना) तक एक सूत्र में पिरोता है। इस क्रिया से साधक अपने शरीर के स्थूल दोषों का क्षय कर एक ऐसी पवित्रता प्राप्त करता है, जो उसे आगामी मन्त्र-साधना और ध्यान के लिए तैयार करती है।

श्लोक ७.१७

स स्नातः सर्वतीर्थेषु पूतः संवत्सरं भवेत् ।

आचम्य गोमयेनातो मानस्तोक्या समालभेत् ॥ ७.१७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५५

— वह सब तीर्थोंमें स्नान किया हुआ, एक वर्षतक पवित्र होता है। (गोबरसे स्नानके) बाद आचमन करके "मा नस्तोके…" ऋचासे (अंगोंका) स्पर्श करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में साधक ने अंगों को मलकर और धीरे-धीरे डुबकी लगाकर शरीर को जल के साथ एकाकार किया तथा पैर के तलवों से मस्तक तक गोमय-स्नान की विधि का आरम्भ किया। वर्तमान श्लोक में इस विशिष्ट स्नान के आध्यात्मिक फल और उसके उपरांत की जाने वाली मन्त्र-विधि का वर्णन है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यः गोमयेन स्नायात्) स (साधकः) सर्वतीर्थेषु स्नातः, पूतः संवत्सरं भवेत्। अतः (ततः) गोमयेन (स्नात्वा) आचम्य, 'मा नस्तोके...' (इत्यृचाया) मानस्तोक्या समालभेत्।

पदार्थ:

• सर्वतीर्थेषु स्नातः: समस्त तीर्थों में स्नान करने के समान फल प्राप्त करने वाला।

• पूतः: पवित्र, शुद्ध। यहाँ 'पूत' का अर्थ केवल बाह्य शुद्धि नहीं, अपितु संस्कारों की शुद्धि से है।

• संवत्सरं भवेत्: एक वर्ष तक (उस पवित्रता की स्थिति में) बना रहता है।

• आचम्य: आचमन करके। जल के आचमन से अंतःकरण की शुद्धि और इंद्रियों का संयम होता है।

• मा नस्तोके...: यह ऋचा का प्रतीक है। यह ऋचा सुरक्षा, सौभाग्य और दोष-निवारण के लिए प्रयुक्त होती है।

• समालभेत्: स्पर्श करे या प्राप्त करे। यहाँ मन्त्र के प्रभाव को शरीर के अंगों पर स्थापित करने की क्रिया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में गोमय-स्नान की महिमा का वर्णन करते हुए ऋषि कहते हैं कि जो साधक इस विधि से स्नान करता है, वह 'सर्वतीर्थेषु स्नातः' हो जाता है। भाव यह है कि तीर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं हैं, अपितु वे चेतना की उच्च अवस्थाएँ हैं। गोमय पृथ्वी की उर्वरता और गौ-तत्त्व की सात्त्विकता का प्रतीक है। जब साधक इस पवित्र द्रव्य से अपने संपूर्ण शरीर को स्पर्श करता है, तो वह समस्त तीर्थों के पुण्य-प्रभाव को अपने भीतर आत्मसात कर लेता है।

'संवत्सरं भवेत्' का रहस्य यह है कि यह पवित्रता क्षणिक नहीं है। एक वर्ष की अवधि यहाँ समय की गणना मात्र नहीं, अपितु एक पूर्ण चक्र का संकेत है। जिस प्रकार सूर्य एक वर्ष में अपनी पूरी राशि-यात्रा पूर्ण करता है, उसी प्रकार गोमय-स्नान से प्राप्त शुद्धि साधक के सूक्ष्म शरीर में एक स्थायी संस्कार के रूप में अंकित हो जाती है, जो उसे दीर्घकाल तक मानसिक और आध्यात्मिक रूप से संरक्षित रखती है।

स्नान के पश्चात 'आचम्य' की विधि अनिवार्य है। स्नान शरीर की शुद्धि है, किंतु आचमन मन और वाणी की शुद्धि है। इसके उपरांत 'मा नस्तोके...' ऋचा का प्रयोग बताया गया है। यह ऋचा साधक के चारों ओर एक सुरक्षा-कवच निर्मित करती है। जब साधक इस मन्त्र के साथ अपने अंगों का स्पर्श करता है, तो वह केवल शरीर को नहीं छू रहा होता, अपितु मन्त्र की शक्ति को अपने प्राणों में विलीन कर रहा होता है ताकि बाहरी नकारात्मक प्रभाव उसकी साधना में विघ्न न डाल सकें।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह क्रिया 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर गमन है। गोमय-स्नान पृथ्वी-तत्त्व का उच्चतम शोधन है, जो साधक को स्थिरता प्रदान करता है। जब साधक 'संवत्सरं' की पवित्रता का अनुभव करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'काल' को स्थिर करने का अभ्यास करता है।

आचमन और 'मा नस्तोके...' ऋचा का स्पर्श एक प्रकार की 'न्यास' क्रिया है। इसमें साधक मन्त्र के अक्षरों को अपने शरीर के विभिन्न अंगों में प्रतिष्ठित करता है। इस अभ्यास से साधक की चेतना शरीर की सीमाओं से ऊपर उठकर मन्त्र की ध्वनि में स्थित होने लगती है। यह उसे उस भूमि पर ले जाता है जहाँ शरीर केवल एक यंत्र बन जाता है और आत्मा उसकी शुद्धता का अनुभव करती है। यहाँ अभ्यास यह है कि स्नान की बाह्य क्रिया को आंतरिक शुद्धि के संकल्प के साथ जोड़कर, पूरे वर्ष के लिए अपनी चेतना को पवित्रता के स्तर पर स्थिर रखा जाए।

वारुणं स्नानम्

श्लोक ७.१८

ततोऽभिषिञ्चेन्मन्त्रैस्तु वारुणैश्च यथाक्रमम् ।

इमं मे वरुणेत्यृग्भ्यां त्वन्नः सत्वन्न इत्यपि ॥ ७.१८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५५

फिर वरुणके मन्त्रोंसे क्रमानुसार अभिषेक करे — "इमं मे वरुण…" (आदि) दो ऋचाओंसे, "त्वं नो अग्ने…" और "स त्वं नो अग्ने…" से भी,

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में गोमय-स्नान की महिमा और उसके पश्चात 'मा नस्तोके...' ऋचा के प्रयोग से अंगों के स्पर्श की विधि बताई गई। अब साधक जल की भौतिक शुद्धि से आगे बढ़कर जल के अधिष्ठातृ देवता वरुण के मन्त्रों द्वारा अपने अस्तित्व का अभिषेक करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ततः (साधकः) वारुणैः मन्त्रैः यथाक्रमम् अभिषिञ्चेत्। (तेषु मन्त्रेषु) 'इमं मे वरुण...' (इत्यृग्भ्याम्) द्वयोः ऋचाभ्याम्, 'त्वं नः सत्वन्न...' (इत्यपि) ऋचाभ्याम् (अभिषिञ्चेत्)।

पदार्थ:

• ततः: उसके बाद (गोमय-स्नान और आचमन के पश्चात)।

• अभिषिञ्चेत्: अभिषेक करे। जल को मन्त्रमय करके शरीर पर ढालना 'अभिषेचन' है।

• वारुणैः मन्त्रैः: वरुण देवता से सम्बन्धित ऋचाओं से। वरुण जल के स्वामी हैं और ऋत (ब्रह्माण्डीय नियम) के रक्षक हैं।

• यथाक्रमम्: निर्धारित क्रम के अनुसार। मन्त्रों का एक निश्चित क्रम होता है जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।

• इमं मे वरुण...: यह ऋग्वेद की उन ऋचाओं का प्रतीक है जिनमें वरुण से पाश (बन्धनों) से मुक्ति और शुद्धि की प्रार्थना की गई है।

• त्वं नः सत्वन्न...: यह ऋचा वरुण के सात्त्विक स्वरूप और उनकी शक्ति के आह्वान का प्रतीक है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह विधि केवल शरीर की स्वच्छता नहीं, अपितु एक पूर्ण 'शुद्धिकरण यज्ञ' है। गोमय-स्नान के बाद जब साधक वरुण के मन्त्रों से अभिषेक करता है, तो वह जल को केवल एक द्रव्य नहीं, अपितु एक दैवीय शक्ति में परिवर्तित कर देता है।

यहाँ 'अभिषेचन' का अर्थ है—मन्त्रों के माध्यम से जल की चेतना को जाग्रत करना और उस जाग्रत चेतना को अपने शरीर पर प्रवाहित करना। वरुण देव जल के अधिष्ठातृ होने के साथ-साथ 'ऋत' के संरक्षक हैं। जब साधक 'इमं मे वरुण...' आदि ऋचाओं का प्रयोग करता है, तो वह वरुण से प्रार्थना करता है कि उसके जीवन के समस्त मानसिक और आध्यात्मिक पाश (बन्धनों) को काट दिया जाए।

बाहरी विधि यह है कि साधक जल लेकर इन मन्त्रों का जप करे और स्वयं पर जल डाले। परन्तु इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपने भीतर के 'अन्तर-जल' (रस और प्राण) को वरुण-तत्त्व से जोड़ रहा है। जिस प्रकार वरुण जल के माध्यम से सृष्टि का पोषण करते हैं, उसी प्रकार इन मन्त्रों के प्रभाव से साधक के भीतर का प्राण शुद्ध होता है और वह अपने मूल स्वभाव (ऋत) में प्रतिष्ठित होने लगता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह क्रिया 'शुद्धि' से 'संस्कार' की ओर संक्रमण है। साधक यहाँ जल के माध्यम से अपने मन के विकारों को धोने का अभ्यास करता है। 'इमं मे वरुण...' मन्त्र का अभ्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि उसके मोह, अहंकार और अविद्या के जो पाश उसे जकड़े हुए हैं, वे वरुण की कृपा से छिन्न हो रहे हैं।

यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शरीर' की शुद्धि से उठाकर 'प्राण-शरीर' की शुद्धि तक ले जाता है। जब वह क्रमवार मन्त्रों का प्रयोग करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को जल के तरल गुण (प्रवाह और शीतलता) के साथ एकाकार कर रहा होता है, जिससे चित्त शांत होता है और वह आगामी ध्यान या जप के लिए तैयार हो जाता है। यह अभिषेक साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को प्रकृति के नियमों (ऋत) के साथ लयबद्ध पाता है।

श्लोक ७.१९

इदमापउदुत्तममित्येतन्मुञ्चन्त्ववभृथेति च ।

अभिषिञ्च्य तयाऽऽत्मानं निमज्याचम्य वै पुनः ॥ ७.१९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५५

"इदमापः (प्रवहत)…", "उदुत्तमं (वरुण पाशम्)…", "मुञ्चन्तु (मा शपथ्यात्)…" और "अवभृथ…" — इनसे अपना अभिषेक करके, डुबकी लगाकर फिर आचमन करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में वरुण देवता के सात्त्विक स्वरूप और पाश-मुक्ति की प्रार्थना वाली ऋचाओं से अभिषेक का आरम्भ हुआ था। वर्तमान श्लोक उसी वारुण-अभिषेक की मन्त्र-श्रृंखला को पूर्ण करते हुए, जल में निमज्जन और पुनः आचमन की विधि का निर्देश देता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) 'इदमापः...', 'उदुत्तमं...', 'मुञ्चन्तु...' तथा 'अवभृथ...' (इत्यदि मन्त्रैः) अभिषिञ्च्य, तया (जलेन) आत्मानं (अभिषिञ्चेत्), (ततः) निमज्य, आचम्य वै पुनः (कुर्यात्)।

पदार्थ:

• इदमापउदुत्तममित्येतन्: यहाँ चार मन्त्रों के आरम्भिक शब्दों का संकेत है— 'इदमापः' (जल की पवित्रता), 'उदुत्तमम्' (वरुण के पाश से मुक्ति), 'मुञ्चन्तु' (शपथ और बन्धन से विमुक्ति), और 'अवभृथ' (शुद्धिकरण)।

• मुञ्चन्: मुक्त करना या छोड़ना। यहाँ मन्त्रों के माध्यम से स्वयं को बन्धनों से मुक्त करने का भाव है।

• अभिषिञ्च्य: अभिषेक करके। मन्त्रमय जल को शरीर पर प्रवाहित करना।

• तयाऽऽत्मानं: उस (मन्त्रमय) जल से अपनी आत्मा (यहाँ शरीर और अंतःकरण के सम्मिलित स्वरूप) का अभिषेक करना।

• निमज्या: डुबकी लगाकर (जल में पूरी तरह डूबकर)।

• आचम्य वै पुनः: फिर से आचमन करके (आन्तर शुद्धि के लिए)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह प्रक्रिया केवल बाह्य शरीर के प्रक्षालन तक सीमित नहीं है, अपितु यह एक सूक्ष्म 'पाश-मोचन' अनुष्ठान है। वरुण देव केवल जल के अधिष्ठातृ नहीं हैं, अपितु वे 'ऋत' (ब्रह्माण्डीय नियम) के रक्षक और 'पाश' (बन्धनों) के स्वामी भी हैं।

यहाँ जिन चार मन्त्र-प्रतीकों का उल्लेख है, वे साधक की चेतना को अलग-अलग स्तरों पर शुद्ध करते हैं। 'इदमापः' से जल की दैवीय शक्ति का आवाहन होता है। 'उदुत्तमम्' और 'मुञ्चन्तु' मन्त्रों का मुख्य उद्देश्य वरुण के उन पाशों को खोलना है, जो अविद्या, प्रमाद और पाप कर्मों के कारण साधक की आत्मा को जकड़े हुए हैं। 'अवभृथ' मन्त्र उस शुद्धि को स्थायी करता है।

जब साधक इन मन्त्रों से अपना अभिषेक करता है, तो वह जल केवल त्वचा को नहीं धोता, बल्कि मन्त्रों की ध्वनि और जल की तरलता मिलकर चित्त के गहरे मैल को ढीला करती हैं। अभिषेक के पश्चात 'निमज्जन' (डुबकी) का अर्थ है—पूर्ण समर्पण। जब साधक जल में डूबता है, तो वह प्रतीकात्मक रूप से अपने अहंकार और पुराने संस्कारों को जल में विसर्जित कर देता है। अंत में 'पुनः आचमन' यह सुनिश्चित करता है कि बाह्य शुद्धि के बाद आन्तरिक शुद्धि (मुख और हृदय का प्रक्षालण) भी पूर्ण हो, ताकि साधक अगले चरण के लिए तैयार हो सके।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'पाश-मुक्ति' के अभ्यास का है। वरुण का पाश वास्तव में हमारे वे मानसिक बन्धन हैं जो हमें सत्य से दूर रखते हैं। साधक जब 'उदुत्तमं वरुण पाशम्' (वरुण के पाश को ऊपर उठाओ/खोल दो) के भाव से अभिषेक करता है, तो वह अपने भीतर के अवरोधों को हटाने का अभ्यास करता है।

यहाँ 'अभिषेचन' का अर्थ है—ऊपर से नीचे की ओर चेतना का प्रवाह। जब मन्त्रमय जल सिर से पैरों तक गिरता है, तो साधक अनुभव करता है कि दैवीय कृपा उसके समस्त अस्तित्व को भिगो रही है। 'निमज्जन' की क्रिया साधक को 'लय' की भूमि पर ले जाती है, जहाँ वह स्वयं को जल-तत्त्व (जो कि चेतना का ही एक रूप है) में विलीन कर देता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर के बोध से हटाकर सूक्ष्म शरीर की शुद्धि की ओर ले जाता है। डुबकी लगाकर जब साधक पुनः ऊपर आता है, तो वह एक नवीन जन्म (पुनर्जन्म) का अनुभव करता है, जहाँ वह बन्धनों से मुक्त और हल्का महसूस करता है। यह प्रक्रिया साधक को 'शुद्धि' से 'मुक्ति' की ओर ले जाने वाली एक सीढ़ी है।

दर्भैर्मार्जनम्

श्लोक ७.२०

दर्भैश्च पावयेन्मन्त्रैरब्लिङ्गैः पावनैः शुभैः ।

आपोहिष्ठेति तिसृभिरिदमापो हविष्मतीः ॥ ७.२० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५६

और कुशोंसे, जलदेवताके पवित्र और शुभ मन्त्रोंसे (अपनेको) पवित्र करे — "आपो हि ष्ठा…" इन तीन ऋचाओंसे, "इदमापो हविष्मतीः…" (से),

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में वरुण देवता के मन्त्रों द्वारा अभिषेक, निमज्जन और आचमन की विधि बताई गई थी, जिससे साधक बाह्य और सूक्ष्म बन्धनों से मुक्त होता है। अब इस क्रम में जल की शुद्धि के साथ-साथ शरीर और अंतःकरण की पूर्णता के लिए 'दर्भ' (कुश) के प्रयोग और विशिष्ट पावन ऋचाओं के माध्यम से मार्जन की विधि का निर्देश दिया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) शुभैः पावनैः अब्लिङ्गैः मन्त्रैः दर्भैः (आत्मानं) पावयेत्; (तदर्थं) 'आपो हि ष्ठा...' (इत्यदि) तिसृभिः (ऋचाभिः), 'इदमापो हविष्मतीः...' (इत्यदि ऋचाभिः) (पावनं कुर्यात्)।

पदार्थ:

• दर्भैः: कुश (एक पवित्र घास) के द्वारा। यज्ञीय क्रियाओं में कुश का प्रयोग शुद्धि और स्थिरता के लिए किया जाता है।

• पावयेन्: पवित्र करे। यहाँ 'पावन' करने का अर्थ केवल गंदगी हटाना नहीं, अपितु मन्त्र और द्रव्य के संयोग से चेतना को शुद्ध करना है।

• अब्लिङ्गैः: 'अब्लिङ्ग' का अर्थ है— जो बिंगल (दोष या विकार) रहित हो, या जिसमें कोई त्रुटि न हो। यहाँ ऐसे मन्त्रों का संकेत है जो पूर्णतः शुद्ध, दोषरहित और सात्त्विक प्रभाव वाले हों।

• शुभैः: मंगलकारी। जो साधक के भीतर सात्त्विक वृत्तियों का उदय करें।

• आपो हि ष्ठा...: यह ऋग्वेद की प्रसिद्ध ऋचा का आरम्भिक अंश है, जिसमें जल की प्रार्थना की गई है कि वह साधक को पापों और दोषों से मुक्त कर शुद्ध करे।

• इदमापो हविष्मतीः...: इस मन्त्र-प्रतीक का अर्थ है— वह जल जो 'हविष्मती' (हवि या आहुति के समान पवित्र और अर्पण योग्य) है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह विधि केवल जल-क्रिया नहीं, अपितु एक 'मार्जन' अनुष्ठान है। जल के अभिषेक के बाद अब 'दर्भ' (कुश) का प्रयोग बताया गया है। वैदिक परम्परा में कुश को केवल एक घास नहीं, अपितु एक पवित्र माध्यम माना गया है जो मन्त्रों की शक्ति को शरीर के सूक्ष्म अंगों तक पहुँचाने में सहायक होता है।

यहाँ 'अब्लिङ्ग' मन्त्रों का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। याज्ञवल्क्य ऋषि संकेत दे रहे हैं कि मन्त्र का प्रभाव तभी होता है जब वह 'अब्लिङ्ग' हो— अर्थात जिसका उच्चारण शुद्ध हो, जिसका भाव निष्कपट हो और जिसमें कोई मानसिक विकार न हो। जब शुभ और दोषरहित मन्त्र कुश के माध्यम से शरीर पर स्पर्श करते हैं, तो वह 'मार्जन' (शुद्धिकरण) की प्रक्रिया बन जाती है।

'आपो हि ष्ठा...' इन तीन ऋचाओं का प्रयोग साधक को यह अनुभव कराता है कि जल केवल भौतिक पदार्थ नहीं, अपितु एक दैवीय शक्ति है जो आंतरिक मलिनता को धो देने में सक्षम है। इसी प्रकार 'इदमापो हविष्मतीः...' ऋचा के माध्यम से साधक स्वयं को और अपने स्नान के जल को 'हवि' (यज्ञ की आहुति) के समान पवित्र बनाता है। इसका भाव यह है कि स्नान करने वाला साधक स्वयं एक आहुति बन जाए, ताकि उसका अहंकार और अविद्या अग्नि में भस्म हो सके और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहे।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'बाह्य शुद्धि' से 'आन्तर शुद्धि' की ओर संक्रमण का मार्ग है। कुश का स्पर्श और मन्त्रों का नाद जब शरीर पर होता है, तो साधक का चित्त बाह्य जगत से हटकर अपने शरीर के प्रति सजग होता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार जल और कुश शरीर की अशुद्धि मिटाते हैं, उसी प्रकार 'शुभ' और 'अब्लिङ्ग' (दोषरहित) विचार मन की अशुद्धि मिटाते हैं। 'हविष्मती' जल का भाव साधक को 'त्याग' की भूमि पर ले जाता है— जहाँ वह अपने शरीर और प्राणों को ईश्वर के चरणों में समर्पित (आहुत) करने का अभ्यास करता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर के मोह से मुक्त कर उसे सूक्ष्मता की ओर ले जाता है, जिससे आगे आने वाले प्राणायाम और ध्यान के लिए अंतःकरण पूरी तरह तैयार हो जाता है।

श्लोक ७.२१

देवीराप इति द्वाभ्यामापो देवा इति त्र्यृचा ।

द्रुपदादिव इत्यृचा शन्नोदेवीरपां रसम् ॥ ७.२१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५६

"देवीरापः…" इन दो ऋचाओंसे, "आपो देवाः…" इन तीन ऋचाओंसे, "द्रुपदादिव…" ऋचासे, "शं नो देवीः…" और "अपां रसम्…" (से),

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में कुश (दर्भ) के प्रयोग से मार्जन का आरम्भ करते हुए 'आपो हि ष्ठा' और 'इदमापो हविष्मतीः' जैसी पावन ऋचाओं का निर्देश दिया गया था। इसी मार्जन-प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करने के लिए अब अन्य विशिष्ट ऋचाओं के संख्यात्मक प्रयोग और उनके क्रम का विधान बताया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) 'देवीरापः...' (इत्यदि) द्वाभ्याम् (ऋचाभिः), 'आपो देवाः...' (इत्यदि) त्र्यृचाभिः, 'द्रुपदादिव...' (इत्यृचाभिः), 'शं नो देवीः...' (इत्यृचाभिः) और 'अपां रसम्...' (इत्यृचाभिः) (पावनं कुर्यात्)।

पदार्थ:

• देवीरापः...: ऋग्वेद की वह ऋचा जिसमें जल को 'देवी' (दिव्य शक्ति) कहकर संबोधित किया गया है। यहाँ दो ऋचाओं के प्रयोग का निर्देश है।

• आपो देवाः...: जल के दिव्य स्वरूप को 'देव' के रूप में पूजने वाली तीन ऋचाएँ।

• द्रुपदादिव...: यह ऋचा जल की उस शक्ति का आवाहन करती है जो साधक के अंतःकरण के अवरोधों को दूर करे।

• शं नो देवीः...: 'शं' का अर्थ है कल्याण। वह ऋचा जो जल की देवियों से साधक के लिए मंगल और शांति की प्रार्थना करती है।

• अपां रसम्...: 'रस' का अर्थ है सार या तत्व। जल के भीतर निहित उस दिव्य रस (चेतना) का आवाहन करने वाली ऋचा।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह विधि केवल बाह्य देह की शुद्धि नहीं, अपितु मन्त्रों के माध्यम से जल को 'औषधि' और 'दिव्य ऊर्जा' में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। पिछले श्लोक में दर्भ (कुश) के प्रयोग का आरम्भ हुआ था; यहाँ उन ऋचाओं का विवरण है जिनसे उस कुश के माध्यम से जल का छिड़काव (मार्जन) किया जाना है।

ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्रों की संख्या पर विशेष बल दे रहे हैं। 'देवीरापः' की दो ऋचाएँ, 'आपो देवाः' की तीन ऋचाएँ—यह संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति को जाग्रत करने का एक गणित है। जब साधक इन विशिष्ट ऋचाओं का जप करते हुए कुश से अपने अंगों का मार्जन करता है, तो जल केवल त्वचा को नहीं धोता, अपितु मन्त्रों के स्पन्दन से सूक्ष्म शरीर के दोषों का क्षालन करता है।

'देवीरापः' और 'आपो देवाः' के माध्यम से जल के स्त्री और पुरुष (शक्ति और शिव) दोनों स्वरूपों का आवाहन किया गया है। 'द्रुपदादिव' ऋचा का प्रयोग उन सूक्ष्म अशुद्धियों को हटाने के लिए है जो गहरे स्तर पर जमी होती हैं। अंत में 'शं नो देवीः' और 'अपां रसम्' का प्रयोग यह सुनिश्चित करता है कि शुद्धि के पश्चात साधक का अंतःकरण केवल रिक्त न रहे, अपितु वह दिव्य शांति (शं) और जीवन के सार (रस) से परिपूर्ण हो जाए। यह विधि बाह्य स्नान को एक आंतरिक अभिषेक में बदल देती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' की एक उच्च अवस्था का संकेत है। साधक जब कुश के माध्यम से जल का मार्जन करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'अक्षर' (अविनाशी तत्व) को जाग्रत करने का प्रयास कर रहा होता है।

यहाँ 'रस' का अर्थ केवल जल का स्वाद नहीं, अपितु वह 'आनंद-रस' है जो हृदय की गहराई में स्थित है। साधक जब 'अपां रसम्' का अभ्यास करता है, तो वह अपनी चेतना को बाह्य जल से हटाकर अंतःकरण के उस अमृत-रस की ओर ले जाता है जो शांति का स्रोत है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शुद्धि' (शरीर) से 'सूक्ष्म शुद्धि' (प्राण और मन) की ओर ले जाता है। इस मार्जन से साधक का मन एकाग्र होता है और वह उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह स्वयं को जल की भाँति निर्मल और पारदर्शी अनुभव करने लगता है, जिससे आगामी ध्यान और प्राणायाम की साधना सुगम हो जाती है।

श्लोक ७.२२

आपो देवीति नवभिः पावमानीभिरेव च ।

पुनन्तु मायि(पि)तर इति पावमानीः प्रयोजयेत् ॥ ७.२२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५६

"आपो देवीः…" इन नौ (ऋचाओं) से और पावमानी ऋचाओंसे; "पुनन्तु मा पितरः…" इन पावमानी ऋचाओंका प्रयोग करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में दर्भ (कुश) द्वारा मार्जन के लिए 'देवीरापः', 'आपो देवाः' और 'अपां रसम्' जैसी ऋचाओं के प्रयोग का विधान बताया गया था। मार्जन की इस श्रृंखला को पूर्णता देते हुए अब उन विशिष्ट ऋचाओं का निर्देश है जो जल की शुद्धिकरण शक्ति को चरम पर ले जाती हैं और साधक के पूर्वजों तथा अंतःकरण के दोषों का शोधन करती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) 'आपो देवीः...' (इत्यदि) नवभिः (ऋचाभिः) और पावमानीभिः एव च (ऋचाभिः), तथा 'पुनन्तु मा पितरः...' (इत्यदि) पावमानीः (ऋचाः) प्रयोजयेत्।

पदार्थ:

• आपो देवीति नवभिः: 'आपो देवीः' से आरम्भ होने वाली नौ ऋचाएँ। ये ऋचाएँ जल की दिव्य शक्तियों को जागृत करती हैं।

• पावमानीभिः: 'पावमान' का अर्थ है—जो निरंतर शुद्ध हो रहा है या जो शुद्ध करने वाला है। ये ऋचाएँ ऋग्वेद के उन सूक्तों से हैं जो जल के प्रवाह और उसकी शोधन क्षमता को समर्पित हैं।

• पुनन्तु मा पितरः: 'पुनन्तु' का अर्थ है—पवित्र करें या शोधित करें। 'मा' का अर्थ है—मुझे। 'पितरः' का अर्थ है—पितर (पूर्वज)। यह ऋचा प्रार्थना करती है कि जल की वह शक्ति, जो पितरों की शुद्धि करती है, वह मुझे भी पवित्र करे।

• प्रयोजयेत्: प्रयोग करे या जप करते हुए मार्जन करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान और मार्जन की यह प्रक्रिया केवल शरीर की स्वच्छता नहीं, अपितु एक सूक्ष्म 'संस्कार' है। पिछले श्लोक में जिन ऋचाओं का उल्लेख था, वे जल के दैवीय स्वरूप को प्रतिष्ठित कर रही थीं; यहाँ याज्ञवल्क्य ऋषि 'पावमान' ऋचाओं के प्रयोग का निर्देश दे रहे हैं।

'पावमान' शब्द का गहरा अर्थ है—वह जो निरंतर गतिमान रहकर मलिनता को दूर करता है। जिस प्रकार नदी का प्रवाह स्थिर जल की तुलना में अधिक शुद्ध होता है, उसी प्रकार पावमानी ऋचाओं का जप साधक के भीतर जमे हुए मानसिक संस्कारों के अवरोधों को प्रवाहित कर उन्हें दूर करता है। यहाँ 'नौ ऋचाओं' का विधान है। संख्या नौ पूर्णता का प्रतीक है, जो शरीर के नौ द्वारों (नवनवद्वारे) की शुद्धि का संकेत देती है।

विशेषतः 'पुनन्तु मा पितरः' ऋचा का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ 'पितरः' शब्द के दो अर्थ हैं। बाह्य रूप से यह उन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और उनकी शुद्धि का भाव है जिनसे हमें यह शरीर मिला है। परन्तु आन्तरिक रूप से, 'पितरः' वे मूल बीज-संस्कार हैं जो पीढ़ियों से हमारे चित्त में संचित हैं। जब साधक जल और मन्त्र के संयोग से स्वयं को मार्जित करता है, तो वह केवल वर्तमान शरीर को नहीं, अपितु अपने वंशानुगत संस्कारों को भी शोधित करता है।

अतः यह विधि जल के माध्यम से एक ऐसी ऊर्जा का सृजन करती है जो स्थूल देह से आरम्भ होकर सूक्ष्म शरीर और अंततः संस्कार-देह तक पहुँचती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से, यह श्लोक 'शोधन' की प्रक्रिया है। साधक जब 'पावमान' ऋचाओं का प्रयोग करता है, तो वह अपने भीतर 'प्राण' के प्रवाह को सक्रिय करता है। जिस प्रकार जल की धारा अशुद्धियों को बहा ले जाती है, उसी प्रकार इन मन्त्रों का नाद और जल का स्पर्श साधक के हृदय में स्थित 'मल' (आलस्य, प्रमाद और मोह) को धो देता है।

साधक यहाँ इस अनुभव की भूमि पर जाता है जहाँ वह स्वयं को केवल एक भौतिक शरीर नहीं, अपितु एक 'प्रवाह' के रूप में देखता है। 'पुनन्तु मा पितरः' का अभ्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर की जड़ता (तमो गुण) समाप्त हो रही है और वह चैतन्य की उस धारा में विलीन हो रहा है जो निरंतर शुद्ध और निर्मल है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शुद्धि' से 'सूक्ष्म शुद्धि' की ओर ले जाता है, जिससे चित्त एकाग्र होता है और वह अगले चरण (समाहित होकर पवित्र होने) के लिए तैयार होता है।

श्लोक ७.२३

चित्पतिर्मेति च शनैः पाव्यात्मानं समाहितः ।

हिरण्यवर्णा इति च पावमान्यस्तथाऽपराः ॥ ७.२३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५६

"चित्पतिर्मा (पुनातु)…" से धीरे-धीरे, समाहित होकर अपनेको पवित्र करे; और "हिरण्यवर्णाः…" तथा दूसरी पावमानी (ऋचाओं) से भी।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में 'पुनन्तु मा पितरः' आदि पावमानी ऋचाओं के प्रयोग का निर्देश दिया गया था, जिसका उद्देश्य पितृ-ऋण की शुद्धि और वंशानुगत संस्कारों का शोधन था। अब इस मार्जन प्रक्रिया के मानसिक और सूक्ष्म पक्ष को स्पष्ट करते हुए ऋषि उन विशिष्ट ऋचाओं और उस मानसिक अवस्था का वर्णन कर रहे हैं, जिससे जल की शुद्धि केवल बाह्य न रहकर अंतःकरण के प्रकाश में परिवर्तित हो जाए।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) 'चित्पतिर्मा...' (इत्यदि ऋचायाः) शनैः (जपन्), समाहितः (भूत्वा), पाव्यात्मानं (पावयेत्), तथा 'हिरण्यवर्णाः...' (इत्यदि) च पावमान्यस्तथाऽपराः (ऋचः) (प्रयोजयेत्)।

पदार्थ:

• चित्पतिर्मा: यह ऋचा के आरम्भिक शब्द हैं। यहाँ 'चित्' का सम्बन्ध चेतना से और 'पति' का सम्बन्ध स्वामी या अधिष्ठाता से है। यह मन्त्र चित्त की शुद्धि और उसे परमात्मा के अधीन करने का संकेत है।

• शनैः: धीरे-धीरे। यह केवल जप की गति नहीं, अपितु प्राणों की लय और मन के ठहराव का निर्देश है।

• पाव्यात्मानं: 'पाव' (पवित्र करना) + 'आत्मानं' (स्वयं को)। यहाँ आत्मा से तात्पर्य केवल देह नहीं, अपितु सूक्ष्म शरीर और चित्त है।

• समाहितः: एकाग्र होकर या स्वयं में लीन होकर। योग की भाषा में यह 'संयम' की अवस्था है जहाँ साधक बाहरी जगत से हटकर अंतर्मुखी हो जाता है।

• हिरण्यवर्णाः: 'हिरण्य' का अर्थ है स्वर्ण। स्वर्ण वर्ण प्रकाश, शुद्धता और अमरत्व का प्रतीक है। यह उन पावमानी ऋचाओं का संकेत है जो साधक के भीतर दिव्य ज्योति का आवाहन करती हैं।

• अपराः: अन्य पावमानी ऋचाएँ।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह विधि केवल जल-क्रिया नहीं, अपितु एक 'मन्त्र-स्नान' है। जब साधक 'चित्पतिर्मा...' आदि ऋचाओं का प्रयोग करता है, तो वह जल की भौतिक शक्ति को मन्त्र की शक्ति से जोड़ देता है।

ऋषि यहाँ 'शनैः' (धीरे-धीरे) शब्द पर विशेष बल दे रहे हैं। जब मार्जन धीरे-धीरे किया जाता है, तब साधक का मन चंचल नहीं रहता, बल्कि जल के स्पर्श और मन्त्र के नाद के साथ एक लयबद्धता स्थापित करता है। यह 'शनैः' की गति ही साधक को 'समाहित' होने की स्थिति में ले जाती है। समाहित होने का अर्थ है—यह अनुभव करना कि जिस जल से मैं शरीर धो रहा हूँ, वही जल मेरे भीतर की चेतना का स्वरूप है।

इसके पश्चात 'हिरण्यवर्णाः' ऋचाओं का निर्देश है। स्वर्ण वर्ण सूर्य का वर्ण है और सूर्य समस्त जगत का प्राण है। जब साधक इन ऋचाओं का जप करते हुए कुश से मार्जन करता है, तो वह अपने भीतर के अंधकार (तमस) को धोकर स्वर्ण के समान प्रकाशमय (सत्व) होने का प्रयास करता है। यह प्रक्रिया बाह्य मल को हटाने से आरम्भ होकर, अंततः सूक्ष्म मलों (राग-द्वेष) के शोधन तक जाती है। 'अपराः' शब्द यह दर्शाता है कि पावमानी ऋचाओं की यह श्रृंखला व्यापक है और साधक अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार इनका प्रयोग कर सकता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' से 'समाधि' की ओर ले जाने वाली एक कड़ी है। साधक यहाँ तीन स्तरों पर अभ्यास करता है:

१. नाद और लय: 'शनैः' जप करने से श्वास की गति धीमी होती है, जिससे मन शांत होता है।

२. एकाग्रता: 'समाहितः' होने का अभ्यास साधक को स्थूल देह के बोध से ऊपर उठाकर सूक्ष्म शरीर के बोध में लाता है। वह अनुभव करता है कि मन्त्र की शक्ति जल के माध्यम से उसके रोम-रोम में प्रवेश कर रही है।

३. प्रकाश का अनुभव: 'हिरण्यवर्णाः' ऋचाओं का अभ्यास करते समय साधक अपने हृदय में स्वर्ण जैसी ज्योति का ध्यान करता है। यह अभ्यास उसे 'तमस' (अज्ञान) से 'ज्योति' (ज्ञान) की ओर ले जाता है।

इस प्रकार, यह मार्जन केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि चित्त का वह संस्कार है जो साधक को बाह्य कर्मकाण्ड से हटाकर आन्तरिक योग-साधना की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।

श्लोक ७.२४

तरत्समाः शुद्धवत्यः पवित्राणि च शक्तितः ।

वारुणीश्च ऋचः सूक्तं शक्तितश्च प्रयोजयेत् ॥ ७.२४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५६

"तरत्समन्दी…", शुद्धवती (ऋचाएँ), पवित्र (सूक्त) — यथाशक्ति; और वारुणी ऋचाओं तथा सूक्तका भी यथाशक्ति प्रयोग करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में 'हिरण्यवर्णाः' आदि पावमानी ऋचाओं के माध्यम से साधक को अंतःकरण में दिव्य ज्योति का आवाहन करने और स्वयं को पवित्र करने का निर्देश दिया गया था। अब ऋषि उन अन्य विशिष्ट ऋचाओं और सूक्तों का उल्लेख कर रहे हैं, जो स्नान और मार्जन की इस प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करते हैं, ताकि बाह्य शुद्धि और आंतरिक शुद्धि का समन्वय हो सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) 'तरत्समाः' (इत्यदि ऋचः), शुद्धवत्यः (ऋचः), पवित्राणि (सूक्तानि) च शक्तितः (प्रयोजयेत्), तथा वारुणीश्च ऋचः (तथा) सूक्तं शक्तितश्च (प्रयोजयेत्)।

पदार्थ:

• तरत्समाः: यह उन ऋचाओं का संकेत है जो 'तरत्' (पार लगाने वाले या प्रवाहमान) भाव वाली हैं। यह साधक को संसार के भव-सागर से पार उतारने वाली और चेतना को प्रवाहमान करने वाली ऋचाएँ हैं।

• शुद्धवत्यः: 'शुद्ध' + 'वत्यः'। वे ऋचाएँ जिनमें शुद्धता का गुण विद्यमान है या जो शुद्धता प्रदान करने वाली हैं। यह केवल शब्दों की शुद्धि नहीं, अपितु साधक के भावों की निर्मलता का निर्देश है।

• पवित्राणि (सूक्त): 'पवित्र' शब्द का मूल 'पु' (शुद्ध करना) है। यहाँ सूक्तों का अर्थ है वे मन्त्र-समूह जो चित्त के विकारों को धोकर उसे पवित्र कर देते हैं।

• वारुणीश्च ऋचः: वरुण देव से सम्बन्धित ऋचाएँ। वरुण केवल जल के देवता नहीं, अपितु ऋत (ब्रह्मांडीय नियम) के रक्षक और पाश (बंधन) को खोलने वाले देवता हैं।

• शक्तितः: अपनी शक्ति, सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार। यह इस स्मृति का एक महत्वपूर्ण निर्देश है कि साधना में जबरदस्ती नहीं, अपितु क्रमिक विकास आवश्यक है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह विधि वास्तव में एक 'मन्त्र-स्नान' है, जहाँ जल केवल एक माध्यम है और वास्तविक शोधन मन्त्रों की ध्वनि और उनके अर्थ से होता है। इस श्लोक में ऋषि ने 'तरत्समाः', 'शुद्धवत्यः' और 'पवित्राणि' सूक्तों के प्रयोग का निर्देश दिया है।

इन मन्त्रों का बाह्य प्रयोजन शरीर की शुद्धि है, किन्तु इनका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। 'तरत्समाः' ऋचाएँ साधक के भीतर उस प्रवाह को जाग्रत करती हैं जो उसे जड़ता से चेतनता की ओर ले जाता है। 'शुद्धवत्यः' और 'पवित्राणि' सूक्तों का जप करते समय साधक यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार जल त्वचा की अशुद्धि को हटाता है, उसी प्रकार ये मन्त्र उसके सूक्ष्म शरीर से काम, क्रोध और मोह के लेप को धो रहे हैं।

विशेष रूप से 'वारुणी ऋचाओं' का उल्लेख यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। वरुण देव 'पाश' (बंधन) के अधिपति हैं। जब साधक वारुणी ऋचाओं का प्रयोग करता है, तो वह प्रार्थना करता है कि उसके जीवन के समस्त मानसिक और कर्मजन्य बंधन कट जाएँ। यह स्नान केवल शरीर को स्वच्छ करना नहीं, अपितु वरुण के माध्यम से अपनी चेतना के बंधनों को मुक्त करना है।

ऋषि ने यहाँ दो बार 'शक्तितः' शब्द का प्रयोग किया है। यह संकेत देता है कि ऋचाओं और सूक्तों की यह सूची विस्तृत है, किन्तु साधक के लिए यह अनिवार्य बाध्यता नहीं है कि वह सबको रटे या जपे। साधना में 'अति' के स्थान पर 'योग्यता' को महत्व दिया गया है। जो साधक जितना समर्थ है, वह उतने ही मन्त्रों का प्रयोग करे, क्योंकि मन्त्रों का प्रभाव उनकी संख्या से अधिक उनके प्रति श्रद्धा और एकाग्रता पर निर्भर करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि-क्रिया' और 'मन्त्र-योग' का संगम है। साधक यहाँ 'शक्तितः' (अपनी शक्ति के अनुसार) अभ्यास करता है। इसका अर्थ है कि वह अपनी वर्तमान मानसिक और प्राणिक स्थिति को पहचानकर मन्त्रों का चयन करे।

जब साधक 'तरत्समाः' और 'शुद्धवत्यः' ऋचाओं का प्रयोग करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा होता, अपितु वह अपने भीतर के 'अक्षर' (अविनाशी तत्व) का स्मरण कर रहा होता है। वारुणी ऋचाओं का अभ्यास करते समय साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर का 'पाश' (अज्ञान का बंधन) ढीला हो रहा है।

यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शुद्धि' (शरीर) से 'सूक्ष्म शुद्धि' (प्राण और मन) की ओर ले जाता है। जो साधक इन सूक्तों के साथ स्नान करता है, वह जल के भौतिक स्पर्श को मन्त्रों की ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है। यहाँ 'शक्तितः' का योगिक अर्थ यह है कि साधक अपनी क्षमता के अनुसार मन्त्रों की गहराई में उतरे—प्रथम स्तर पर केवल जप, द्वितीय स्तर पर अर्थ का चिंतन, और तृतीय स्तर पर मन्त्र के स्वरूप में विलीन होना। इस प्रकार वह धीरे-धीरे निम्न भूमि से उच्चतर चेतना की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ७.२५

जलमध्यास्थितो विप्रः शुद्धभावो हरिं स्मरेत् ।

ओंकारेण व्याहृतिभिर्गायत्र्या च समाहितः ॥ ७.२५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५६

जलके बीचमें खड़ा विप्र शुद्ध भावसे हरिका स्मरण करे; ओंकार, व्याहृतियों और गायत्रीसे समाहित होकर —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में विभिन्न पावमानी, शुद्धवती और वारुणी ऋचाओं के प्रयोग से बाह्य और आंतरिक शुद्धि की विधि बताई गई थी। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ साधक समस्त ऋचाओं के प्रभाव से पवित्र होकर, जल के मध्य स्थित होकर अपनी चेतना को एकाग्र करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: विप्रः जलमध्यास्थितः शुद्धभावः हरिं स्मरेत्, (तथा) ओंकारेण व्याहृतिभिः गायत्री च समाहितः (स्मरेत्)।

पदार्थ:

• जलमध्यास्थितो: जल के मध्य में स्थित। यहाँ जल केवल बाह्य नदी या सरोवर नहीं, अपितु चेतना के प्रवाह का प्रतीक है।

• विप्रः: विप्र का शाब्दिक अर्थ है 'विविध ज्ञान रखने वाला' या 'ब्रह्मज्ञानी'। यहाँ वह साधक है जो अपनी बुद्धि को परमात्मा में विलीन करने की योग्यता रखता है।

• शुद्धभावो: जिसका भाव शुद्ध है। केवल शरीर का जल से धुलना स्नान नहीं है, अपितु 'भाव' की शुद्धि ही वास्तविक स्नान है।

• हरिम्: 'हरि' वह है जो 'हरति' (हर लेता है)। वह परमात्मा जो साधक के समस्त पापों, अज्ञान और मानसिक विकारों को हर ले।

• समाहितः: पूर्णतः एकाग्र, जिसमें चित्त की बिखरी हुई वृत्तियाँ एक बिंदु पर सिमट गई हों।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान की यह प्रक्रिया केवल शरीर की शुद्धि तक सीमित नहीं है, अपितु यह एक सूक्ष्म योग-साधना है। जब साधक जल के मध्य में खड़ा होता है, तो वह प्रकृति के एक तत्व (जल) के साथ एकाकार होता है। इस समय निर्देश है कि वह 'शुद्ध भाव' से हरि का स्मरण करे। यहाँ 'हरि' का स्मरण यह संकेत देता है कि बाह्य जल शरीर की मलिनता धोता है, किन्तु केवल हरि-स्मरण ही अंतःकरण के सूक्ष्म मैल को धो सकता है।

इस श्लोक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्रम दिया गया है— ओंकार, व्याहृति और गायत्री। यह क्रम स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने की सीढ़ी है। साधक पहले 'ओंकार' (प्रणव) से अपनी चेतना को ब्रह्मांडीय ध्वनि से जोड़ता है, फिर 'व्याहृतियों' (भूः, भुवः, स्वः) के माध्यम से पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक की ऊर्जाओं को संतुलित करता है, और अंत में 'गायत्री' के माध्यम से अपनी बुद्धि को उस परम प्रकाश (सविता) की ओर उन्मुख करता है।

जब साधक इन तीनों के साथ 'समाहित' होता है, तब वह केवल जल में खड़ा एक मनुष्य नहीं रह जाता, अपितु वह स्वयं एक 'यज्ञ-वेदी' बन जाता है। यहाँ जल का मध्य भाग हृदय-आकाश का प्रतीक है, जहाँ हरि (परमात्मा) प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार, बाहरी स्नान आंतरिक अभिषेक में परिवर्तित हो जाता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'केंद्रन' का अभ्यास है। मन्त्रों की एक लंबी सूची के बाद, यह श्लोक साधक को पुनः केंद्र पर लाता है।

अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक जल में खड़ा हो, तो वह अनुभव करे कि जल की शीतलता उसके शरीर को नहीं, अपितु उसके क्रोध और वासनाओं को शांत कर रही है। ओंकार का जप करते समय वह स्वयं को उस अनंत ध्वनि में विलीन करे; व्याहृतियों के समय वह अनुभव करे कि उसका अस्तित्व तीनों लोकों में व्याप्त है; और गायत्री के समय वह अपनी बुद्धि को सूर्य के समान तेजस्वी और निर्मल बनाए।

यह अवस्था 'सावधानी' से 'समाधि' की ओर ले जाने वाली है। जल के बीच खड़ा होना स्थिरता का प्रतीक है, और हरि का स्मरण उस स्थिरता में चैतन्यता का संचार करना है। साधक यहाँ 'भाव-शुद्धि' का अभ्यास करता है, जहाँ वह यह अनुभव करता है कि जैसे जल सब कुछ धो देता है, वैसे ही हरि का नाम उसके अस्तित्व के हर स्तर से अविद्या को धो रहा है। यह अभ्यास साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'भाव-भूमि' पर प्रतिष्ठित करता है।

श्लोक ७.२६

आदावन्ते च कुर्वीत अभिषेके यथाक्रमम् ।

अपां मध्यं स्थितस्यैवं मार्जनं तु विधीयते ॥ ७.२६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५७

— अभिषेकमें (इन्हें) क्रमसे आदि और अन्तमें करे। जलके बीच खड़े (द्विज) के लिए इस प्रकार मार्जनका विधान है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में जल के मध्य स्थित विप्र के लिए शुद्ध भाव से हरि-स्मरण तथा ओंकार, व्याहृति और गायत्री में समाहित होने का विधान बताया गया है। अब इस समाहित अवस्था में उन मन्त्रों के प्रयोग का समय और मार्जन की विशिष्ट विधि का निर्देश दिया जा रहा है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (विप्रः) अभिषेके (तानि) यथाक्रमम् आदावन्ते च कुर्वीत। अपां मध्यं स्थितस्य एवम् मार्जनं तु विधीयते।

पदार्थ और निर्वचन:

• अभिषेके: अभिषेक के समय। यहाँ अभिषेक का अर्थ केवल जल डालना नहीं, अपितु मन्त्रों के प्रभाव से स्वयं को और जल को संस्कारित करना है।

• यथाक्रमम्: जिस क्रम में मन्त्र दिए गए हैं, उसी अनुक्रम में।

• आदावन्ते: आदि और अन्त में। 'आद' का अर्थ आरम्भ और 'अन्त' का अर्थ समापन।

• कुर्वीत: करना चाहिए (विधिलिङ्)। यह एक आवश्यक विधान है।

• अपां मध्यं स्थितस्य: जल के मध्य में स्थित व्यक्ति के लिए।

• मार्जनम्: मार्जन का शाब्दिक अर्थ है 'धोना' या 'साफ करना'। योगिक दृष्टि से यह चित्त के विकारों को मन्त्र-शक्ति से झटक देने की प्रक्रिया है।

• विधीयते: विधान किया गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक मन्त्र-साधना के अनुशासन और उसकी समय-सीमा को निर्धारित करता है। पिछले श्लोक (७.२५) में जिन तीन स्तंभों—ओंकार, व्याहृति और गायत्री—का उल्लेख हुआ, उन्हें यहाँ 'तानि' (उनको) के भाव से प्रयोग करने का निर्देश है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अभिषेक की प्रक्रिया के आरम्भ में और उसके समापन पर इन मन्त्रों का क्रमबद्ध प्रयोग अनिवार्य है।

इसका कारण यह है कि कोई भी आध्यात्मिक क्रिया यदि बिना आरम्भिक संस्कार (आदि) के शुरू हो, तो वह दिशाहीन होती है, और यदि बिना उपसंहार (अन्त) के समाप्त हो, तो उसकी ऊर्जा संचित नहीं हो पाती। आरम्भ में ओंकार, व्याहृति और गायत्री का जप साधक को बाह्य जगत से हटाकर आंतरिक केंद्र पर लाता है, और अन्त में इनका जप उस प्राप्त पवित्रता को साधक के भीतर स्थिर कर देता है।

श्लोक का दूसरा भाग जल के मध्य खड़े साधक के लिए 'मार्जन' का विधान करता है। सामान्यतः मार्जन शुद्धि के लिए किया जाता है, किन्तु जब साधक जल के बीच खड़ा होता है, तो वह प्रकृति के जल-तत्व में पूरी तरह विलीन होता है। इस अवस्था में मार्जन केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि 'अपां मध्य' (जल के मध्य) स्थित होकर अपनी चेतना को मन्त्रों के माध्यम से झटकना है, ताकि सूक्ष्म मल भी छूट जाए। यह विधि संकेत करती है कि जब साधक भौतिक जल में होता है, तब उसे मानसिक जल (भावनाओं और संस्कारों) का भी मार्जन करना चाहिए।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'क्रम' और 'सीमा' का अभ्यास है। योग में 'क्रम' का अत्यधिक महत्त्व है; जिस प्रकार शरीर की शुद्धि के बाद ही प्राण और फिर मन की शुद्धि होती है, वैसे ही अभिषेक के आदि और अन्त में मन्त्रों का प्रयोग साधक को एक सुरक्षित घेरे में रखता है।

यहाँ 'मार्जन' का योगिक अभ्यास यह है कि साधक जल के स्पर्श और मन्त्र के नाद के बीच एक सेतु बनाए। जब वह जल के मध्य खड़ा होकर इन मन्त्रों का प्रयोग करता है, तो वह अनुभव करता है कि ओंकार उसकी स्थिरता है, व्याहृतियाँ उसकी प्राण-शक्ति हैं और गायत्री उसकी प्रज्ञा है। आदि और अन्त में इन तीनों का समन्वय उसे इस योग्य बनाता है कि वह जल से बाहर निकलने के बाद भी उस 'शुद्ध भाव' को अपने साथ रखे। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शुद्धि' से 'सूक्ष्म शुद्धि' की भूमि पर ले जाता है।

अन्तर्जले जपः

श्लोक ७.२७

अन्तर्जले जपेन्मग्नस्त्रिः कृत्वस्त्वघमर्षणम् ।

द्रुपदां वा त्रिरभ्यस्येदायं गौरिति वा जपेत् ॥ ७.२७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५७

जलके भीतर डूबकर तीन बार अघमर्षण (सूक्त) जपे; अथवा "द्रुपदादिव…" को तीन बार दोहराये, अथवा "आयं गौः…" जपे;

अवतरणिका — पिछले श्लोक में जल के मध्य स्थित विप्र के लिए ओंकार, व्याहृति और गायत्री के माध्यम से समाहित होने तथा अभिषेक के आदि एवं अन्त में उनके प्रयोग का विधान बताया गया। अब इस समाहित अवस्था में, जब साधक जल के भीतर प्रवेश करता है, तब वहाँ किए जाने वाले विशिष्ट मन्त्र-जप की विधि का निर्देश दिया जा रहा है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (विप्रः) अन्तर्जले मग्नः (स्थितः) अघमर्षणम् (सूक्तं) त्रिः कृत्वा जपेत्, अथवा द्रुपदां (सूक्तं) त्रिः अभ्यस्येत्, अथवा 'आयं गौः' इति (सूक्तं) जपेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अन्तर्जले: जल के भीतर। यहाँ 'अन्तर्' शब्द केवल भौतिक गहराई नहीं, अपितु बाहरी जगत से विलग होकर अपने भीतर उतरने का संकेत है।

• मग्नः: डूबा हुआ। जल में पूरी तरह निमज्जित होना।

• त्रिः कृत्वा: तीन बार करके। यहाँ संख्या 'तीन' का अर्थ तीन बार की पुनरावृत्ति है, जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर की शुद्धि का प्रतीक है।

• अघमर्षणम्: 'अघ' (पाप/मल) का 'मर्षण' (मिटाना/रगड़कर साफ करना)। यह एक विशिष्ट सूक्त है जो चित्त के गहरे संस्कारों को धोता है।

• द्रुपदां: द्रुपद सूक्त। यह ऋग्वेद का वह सूक्त है जो पवित्रता और दैवीय शक्ति के आह्वान से संबंधित है।

• आयं गौः: 'आयं गौः' से आरम्भ होने वाला सूक्त। यहाँ 'गौ' का अर्थ केवल गाय नहीं, अपितु प्रकाश, पृथ्वी और ज्ञान की वह धारा है जो साधक को पवित्र करती है।

• अभ्यस्येत्: अभ्यास करे या दोहराए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक स्नान की क्रिया को एक गहन योगिक प्रक्रिया में परिवर्तित कर देता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'अन्तर्जले' जप का विधान कर रहे हैं। सामान्य स्नान में जल शरीर के ऊपर गिरता है, किन्तु यहाँ 'मग्न' होने का निर्देश है—अर्थात् साधक को जल में पूरी तरह डूबना है।

जब साधक जल के भीतर डूबता है, तो वह एक ऐसी स्थिति में होता है जहाँ बाहरी ध्वनियाँ क्षीण हो जाती हैं और वह केवल अपनी आंतरिक ध्वनि और मन्त्र के साथ रह जाता है। इस अवस्था में तीन विकल्पों का सुझाव दिया गया है: प्रथम, अघमर्षण सूक्त का तीन बार जप; द्वितीय, द्रुपद सूक्त का तीन बार अभ्यास; और तृतीय, 'आयं गौः' सूक्त का जप।

इन तीनों सूक्तों का उद्देश्य एक ही है—पवित्रता। अघमर्षण सूक्त का प्रयोग तब किया जाता है जब साधक अपने भीतर के गहरे दोषों और मानसिक मलिनता को पूर्णतः मिटाना चाहता है। द्रुपद और 'आयं गौः' सूक्तों का प्रयोग उस दैवीय प्रकाश और शुद्धि को प्राप्त करने के लिए है जो साधक को उसके वास्तविक स्वरूप की याद दिलाए। यहाँ 'तीन' की संख्या का महत्व यह है कि यह जप केवल वाणी से नहीं, अपितु प्राण और मन के स्तर पर तीन बार घटित होना चाहिए, ताकि शुद्धि पूर्ण हो।

शास्त्र-साक्ष्य —

अघमर्षण सूक्त की महिमा के विषय में मनुस्मृति में कहा गया है:

मनुस्मृति

यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः । तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ ११.२६१ ॥

जैसे यज्ञोंका राजा अश्वमेध सब पापोंको दूर करता है, वैसे ही अघमर्षण सूक्त सब पापोंको दूर करता है।

मनुस्मृति ११.२६१मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 581

यह साक्ष्य स्पष्ट करता है कि अघमर्षण सूक्त की शक्ति उतनी ही प्रबल है जितना कि अश्वमेध यज्ञ। जहाँ अश्वमेध बाह्य कर्मकाण्ड का शिखर है, वहीं अघमर्षण सूक्त आंतरिक शुद्धि का शिखर है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस सूक्त को 'अन्तर्जले' (जल के भीतर) रखकर इसे और अधिक प्रभावी बना देती है, क्योंकि जल तत्त्व और मन्त्र की शक्ति मिलकर पापों का क्षय तीव्र कर देते हैं।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से 'अन्तर्जले मग्न' होकर जप करना 'कुम्भक' और 'प्रत्याहार' का एक अद्भुत समन्वय है। जब साधक जल में डूबता है, तो वह स्वाभाविक रूप से श्वास को रोककर (कुम्भक) और अपनी इंद्रियों को बाहरी जगत से समेटकर (प्रत्याहार) भीतर की ओर मुड़ता है।

इस क्षण में बाहरी संसार का कोलाहल समाप्त हो जाता है और केवल मन्त्र की गूँज शेष रहती है। यह 'अन्तर्जल' वास्तव में साधक के अपने हृदय-आकाश का प्रतीक है। जिस प्रकार जल शरीर की गंदगी धोता है, उसी प्रकार जल के भीतर किया गया मन्त्र-जप प्राणों के स्तर पर जमा 'मल' (अविद्या और वासनाओं) को धो देता है।

साधक यहाँ इस अनुभव से गुजरता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि वह मन्त्र ही है। जब वह तीन बार अघमर्षण या अन्य सूक्तों का जप करता है, तो वह स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर और फिर कारण शरीर की गहराई में उतरता है। यह अभ्यास साधक को 'बाहरी शुद्धि' से 'आन्तरिक शुद्धि' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि वास्तविक पवित्रता जल में नहीं, अपितु जल के भीतर स्थित उस मन्त्र-शक्ति में है जो उसे अक्षर (ब्रह्म) से जोड़ती है।

श्लोक ७.२८

हंसः शुचिषदिति च त्रिरावर्त्य जपेदथ ।

अन्यानि चैव सूक्तानि स्मार्तदृष्टान्यनुस्मरेत् ॥ ७.२८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५७

अथवा "हंसः शुचिषत्…" को तीन बार दोहराकर जपे; और स्मृतियोंमें देखे गये अन्य सूक्तोंका भी स्मरण करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में जल के भीतर निमज्जित होकर अघमर्षण, द्रुपद और 'आयं गौः' सूक्तों के जप का विधान बताया गया। इसी क्रम में, जल के भीतर की साधना को पूर्णता देने के लिए एक और विशिष्ट मन्त्र और स्मृतियों के आधार पर अन्य सूक्तों के स्मरण का निर्देश यहाँ दिया जा रहा है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (विप्रः) 'हंसः शुचिषत्' इति (सूक्तं) च त्रिरावर्त्य जपेत्, अथ अन्यानि च एव सूक्तानि स्मार्तदृष्टानि अनुस्मरेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• हंसः शुचिषत्: यह उस ऋचा का प्रतीक है जो 'हंस' (परमात्मा/सूर्य) की शुद्धता और सर्वव्यापकता का वर्णन करती है। 'शुचिषत्' का अर्थ है—अत्यंत पवित्र या शुद्ध।

• त्रिरावर्त्य: तीन बार दोहराकर। यहाँ 'आवर्तन' का अर्थ केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति को तीन स्तरों (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) पर उतारना है।

• अथ: अथवा। यह विकल्प देता है कि यदि पूर्वोक्त सूक्तों के स्थान पर या उनके साथ कुछ और करना हो।

• स्मार्तदृष्टानि: स्मृतियों (शास्त्रों) में देखे गए या वर्णित।

• अनुस्मरेत्: स्मरण करे। यहाँ 'जप' (वाचिक या उपांशु) के स्थान पर 'स्मरण' (मानसिक) शब्द का प्रयोग है, जो साधना की सूक्ष्मता को दर्शाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान की बाह्य क्रिया को आंतरिक रूपांतरण की प्रक्रिया बना रहे हैं। श्लोक का प्रथम भाग 'हंसः शुचिषत्' मन्त्र के तीन बार जप का विधान करता है। जल के भीतर जब साधक निमज्जित होता है, तब वह केवल शरीर को नहीं धोता, अपितु अपनी चेतना को उस 'हंस' रूपी शुद्ध आत्मा में विलीन करने का प्रयास करता है। 'हंस' यहाँ प्रतीक है उस ज्योति का जो जल, पृथ्वी और आकाश—तीनों में व्याप्त है। तीन बार दोहराने का रहस्य यह है कि साधक पहले अपने स्थूल शरीर के दोषों को, फिर सूक्ष्म मन के विकारों को और अंततः कारण शरीर के बीज-संस्कारों को इस पवित्र ध्वनि से धो डाले।

श्लोक का द्वितीय भाग 'अन्यानि चैव सूक्तानि स्मार्तदृष्टान्यनुस्मरेत्' अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ 'जप' से 'स्मरण' की ओर संक्रमण है। जब साधक जल के भीतर मग्न होता है, तब वह बाहरी जगत से पूरी तरह कट जाता है। इस एकांत और निमज्जित अवस्था में, उसने शास्त्रों और स्मृतियों में जिन पवित्र सूक्तों का अध्ययन किया है, उन्हें केवल शब्दों के रूप में नहीं, बल्कि उनके 'भाव' के रूप में हृदय में स्मरण करना चाहिए। यह स्मरण क्रिया साधक को यह अनुभव कराती है कि वह केवल जल में नहीं, बल्कि समस्त वेदों के ज्ञान और पवित्रता के सागर में डूबा हुआ है।

शास्त्र-साक्ष्य —

कठ उपनिषद्

हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २.२.२ ॥

वह हंस (सूर्य) है जो शुद्ध (आकाश) में रहता है, वसु जो अन्तरिक्षमें, होता जो वेदीपर, अतिथि जो घरमें; मनुष्योंमें, श्रेष्ठोंमें, ऋतमें, व्योममें रहता; जलमें, पृथ्वीमें, यज्ञमें, पर्वतोंमें उत्पन्न — वह ऋत है, महान् है।

कठ उपनिषद् २.२.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 73

यह मन्त्र कठोपनिषद् में आत्मा और सूर्य की सर्वव्यापकता को उद्घाटित करता है। वहाँ बताया गया है कि वह 'हंस' (परमात्मा) शुद्ध आकाश में भी है, अन्तरिक्ष में भी, वेदी पर भी और मनुष्यों के बीच भी; वह जल, पृथ्वी और पर्वतों में भी व्याप्त है।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में इस मन्त्र का प्रयोग स्नान के समय इसलिए किया गया है क्योंकि जल स्वयं विष्णु और आत्मा का आयतन माना गया है। जब साधक 'हंसः शुचिषत्' का जप करता है, तो वह इस सत्य को अनुभव करता है कि जिस जल में वह डूबा है, वही शुद्ध आत्मा सर्वत्र व्याप्त है। उपनिषद् जहाँ इस सत्य का 'विवरण' देता है, वहीं यह स्मृति उस सत्य को 'साधना' (अभ्यास) में बदल देती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'बाह्य स्नान' को 'अन्तर-स्नान' में परिवर्तित करने की विधि है। 'हंस' शब्द का प्रयोग यहाँ प्राण के उस स्वरूप के लिए है जो निरंतर 'सो-हं' (वह मैं हूँ) की ध्वनि करता है। जल के भीतर निमज्जित होकर जब साधक इस मन्त्र को तीन बार दोहराता है, तो वह अपने प्राणों को हृदय-कमल की शुद्धता में स्थित करने का अभ्यास करता है।

साधक यहाँ 'जप' (ध्वनि) से 'स्मरण' (भाव) की भूमि की ओर जाता है। 'अनुस्मरेत्' का अर्थ है—मन्त्र के अर्थ को अपने अस्तित्व में महसूस करना। जब वह स्मृतियों में पढ़े गए सूक्तों का स्मरण करता है, तो वह मानसिक रूप से उन दिव्य शक्तियों का आह्वान करता है। यह अभ्यास साधक को इस अनुभव तक ले जाता है कि शुद्धि केवल जल से नहीं, बल्कि 'शुद्ध-भाव' और 'दिव्य-स्मरण' से होती है। इस प्रकार साधक स्थूल जल की शीतलता से ऊपर उठकर, ज्ञान की अग्नि और आत्मा की ज्योति (हंस) में स्थित हो जाता है।

श्लोक ७.२९

सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं त्रिर्जपेदथ ।

आवर्तयेद्वा प्रणवं स्मरेद्वा विष्णुमव्ययम् ॥ ७.२९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५७

या व्याहृतियों और प्रणव सहित गायत्रीका तीन बार जप करे; या प्रणवको दोहराये, या अविनाशी विष्णुका स्मरण करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में जल के भीतर निमज्जित होकर अघमर्षण, द्रुपद, 'आयं गौः' और 'हंसः शुचिषत्' जैसे सूक्तों के जप तथा स्मृतियों में वर्णित अन्य सूक्तों के स्मरण का विधान बताया गया। अब इस क्रम में, साधक के लिए और अधिक सूक्ष्म एवं संक्षिप्त विकल्पों का निर्देश दिया जा रहा है, ताकि वह अपनी सामर्थ्य और स्थिति के अनुसार जल-साधना को पूर्ण कर सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (विप्रः) सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं त्रिर्जपेदथ, (अथवा) प्रणवं आवर्तयेद्वा, (अथवा) अव्ययम् विष्णुं स्मरेद्वा।

पदार्थ और निर्वचन:

• सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं: वह गायत्री मन्त्र जो व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) और प्रणव (ॐ) के साथ जुड़ा हुआ है। यहाँ 'स' उपसर्ग 'सहित' का अर्थ देता है।

• त्रिर्जपेत्: तीन बार जप करे। तीन की संख्या यहाँ त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) के परिष्कार और तीन लोकों के शुद्धिकरण का संकेत है।

• आवर्तयेद्वा: अथवा दोहराए। 'आवर्तन' का अर्थ है मन्त्र को बार-बार घुमाना या उसकी पुनरावृत्ति करना, जिससे चित्त मन्त्र के केंद्र में स्थिर हो जाए।

• अव्ययम् विष्णुम्: अविनाशी विष्णु। 'अव्यय' वह है जिसका कभी क्षय न हो, जो समय और स्थान से परे है। विष्णु यहाँ केवल एक देवता नहीं, अपितु वह सर्वव्यापक चेतना है जो कण-कण में 'विष्णु' (विशते—प्रवेश करता है) है।

• स्मरेद्वा: अथवा स्मरण करे। यह जप से अधिक सूक्ष्म अवस्था है, जहाँ शब्द विलीन हो जाते हैं और केवल भाव शेष रहता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान की बाह्य क्रिया को आंतरिक रूपांतरण की प्रक्रिया बना रहे हैं। श्लोक 7.29 में जल के भीतर जप के लिए तीन विकल्प दिए गए हैं, जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक सोपान-श्रेणी हैं।

प्रथम विकल्प है—'सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं त्रिर्जपेत्'। जब साधक जल में निमज्जित होता है, तब वह प्रणव और व्याहृतियों के साथ गायत्री का जप करता है। व्याहृतियाँ उसे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ (स्थूल, सूक्ष्म और कारण) के स्तरों से जोड़ती हैं, और गायत्री उसकी बुद्धि को उस परम ज्योति की ओर प्रेरित करती है। जल के भीतर यह जप करने से शरीर की बाह्य शुद्धि के साथ-साथ बुद्धि का आंतरिक प्रकाश जाग्रत होता है।

द्वितीय विकल्प है—'आवर्तयेद्वा प्रणवं'। यदि साधक गायत्री के विस्तृत जप में असमर्थ हो या अधिक सूक्ष्मता चाहता हो, तो वह केवल 'ॐ' (प्रणव) का आवर्तन करे। प्रणव समस्त मन्त्रों का बीज है। जल के भीतर प्रणव का आवर्तन करना वैसा ही है जैसे समुद्र की लहरों के बीच उस मौन गहराई को खोजना जहाँ केवल नाद शेष रहता है।

तृतीय विकल्प है—'स्मरेद्वा विष्णुमव्ययम्'। यह सबसे सूक्ष्म अवस्था है। यहाँ न मन्त्र है, न शब्द, केवल 'अव्यय विष्णु' का स्मरण है। अविनाशी विष्णु का स्मरण करने का अर्थ है—अपनी उस सत्ता को पहचानना जो जल की तरह सर्वव्यापी है और जो कभी नष्ट नहीं होती। यह स्मरण साधक को सीधे उस स्थिति में ले जाता है जहाँ वह स्वयं को उस अविनाशी पुरुष के साथ एकाकार अनुभव करता है।

इस प्रकार, याज्ञवल्क्य ऋषि यहाँ साधक को उसकी योग्यता और समय के अनुसार मार्ग दे रहे हैं। जो विस्तार (सूक्त) में नहीं जा सकता, वह मन्त्र (गायत्री) का आश्रय ले; जो मन्त्र में नहीं ठहर सकता, वह बीज (प्रणव) को पकड़े; और जो बीज से भी ऊपर उठ चुका है, वह केवल अविनाशी के स्मरण में लीन हो जाए।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ २.७८ ॥

इस अक्षर (ॐ) का और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (सावित्री) का दोनों सन्ध्याओंमें जप करनेवाला वेदवेत्ता विप्र वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है।

मनुस्मृति २.७८मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 177

मनुस्मृति में भी प्रणव और व्याहृतिपूर्वक सावित्री (गायत्री) के जप की महिमा बताई गई है, जिससे वेदवेत्ता विप्र वेद-पुण्य से युक्त होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विधान को केवल संध्या तक सीमित न रखकर स्नान के समय 'अन्तर्जले' (जल के भीतर) ले आती है, जिससे बाह्य शुद्धि और आंतरिक पुण्य का संगम हो जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विकल्पों के माध्यम से सूक्ष्मता' का अभ्यास है। साधक यहाँ तीन भूमियों का अनुभव करता है:

१. मन्त्र-भूमि (गायत्री): यहाँ साधक शब्द और अर्थ के माध्यम से अपनी बुद्धि को शुद्ध करता है। यह अभ्यास उसे सजगता की स्थिति में लाता है।

२. नाद-भूमि (प्रणव): जब साधक केवल प्रणव का आवर्तन करता है, तो वह शब्दों के पार जाकर ध्वनि (नाद) में स्थित होता है। यहाँ मन की चंचलता समाप्त होने लगती है और साधक केवल स्पंदन का अनुभव करता है।

३. भाव-भूमि (विष्णु-स्मरण): यह उच्चतम अवस्था है। यहाँ ध्वनि भी विलीन हो जाती है और केवल 'अव्यय' (अविनाशी) का बोध शेष रहता है। यह स्मरण वास्तव में 'साक्षी भाव' है, जहाँ साधक स्वयं को उस अविनाशी चेतना के रूप में देखता है।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जैसे जल शरीर की अशुद्धि धोता है, वैसे ही गायत्री बुद्धि की, प्रणव मन की और विष्णु-स्मरण अहंकार की अशुद्धि को धोकर उसे 'अक्षर' की ओर ले जाता है।

अप्सु विष्णुस्मरणोपपत्तिः

श्लोक ७.३०

विष्णोरायतनं ह्यापः स एवाप्य(प्यो) निरुच्यते ।

तस्यैव सूनवस्त्वेतास्तस्मात्तं ह्यप्सु संस्मरेत् ॥ ७.३० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५७

जल विष्णुका निवास है, (इसलिए) वह आप्य (जलमें रहनेवाला) कहा जाता है; ये (जल) उसीकी सन्तान हैं, इसलिए जलमें उसीका स्मरण करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में जल के भीतर निमज्जित होकर गायत्री जप, प्रणव के आवर्तन अथवा अविनाशी विष्णु के स्मरण का विकल्प दिया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जल में विष्णु का स्मरण करना केवल एक विधि नहीं, अपितु जल के वास्तविक स्वरूप और उसके अधिष्ठाता के साथ तादात्म्य स्थापित करने का एक तार्किक और आध्यात्मिक आधार है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: आपः हि विष्णोः आयतनम्, (अतः) सः एव आप्यः निरुच्यते। एताः (आपः) तस्यैव सूनवः, तस्मात् तं हि आप्सु संस्मरेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• विष्णोरायतनं: विष्णु का निवास स्थान। 'आयतन' वह आधार या स्थान है जहाँ किसी शक्ति का वास होता है या जहाँ उसकी अभिव्यक्ति होती है।

• आप्यः: जल में रहने वाला। 'आप्य' शब्द 'आप' (जल) धातु से बना है, जिसका अर्थ है जो जल का आश्रय ले या जल में प्रतिष्ठित हो।

• निरुच्यते: कहा जाता है या निरुक्त किया जाता है। यह शब्द संकेत करता है कि यहाँ नाम के पीछे का आध्यात्मिक कारण बताया जा रहा है।

• सूनवः: संतानें। यहाँ 'सूनु' शब्द का प्रयोग भौतिक जन्म के लिए नहीं, अपितु 'उत्पत्ति' और 'अभिव्यक्ति' के लिए हुआ है। जिस प्रकार संतान अपने पिता के गुणों को वहन करती है, वैसे ही जल विष्णु की व्यापकता और शीतलता को वहन करता है।

• संस्मरेत्: स्मरण करे। 'सम्' उपसर्ग के साथ 'स्मरण' का अर्थ है—पूर्णता के साथ, गहराई से और एकाग्रचित्त होकर याद करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य बाह्य स्नान को 'देव-स्नान' में परिवर्तित कर रहे हैं। इस श्लोक का मुख्य उद्देश्य साधक के भीतर यह बोध जगाना है कि वह जिस जल में शरीर को शुद्ध कर रहा है, वह जल मात्र एक भौतिक द्रव्य नहीं, अपितु साक्षात् विष्णु का स्वरूप और उनका निवास है।

जब ऋषि कहते हैं कि "जल विष्णु का आयतन है", तो वे यह संकेत दे रहे हैं कि विष्णु की सर्वव्यापकता (विशते इति विष्णुः) जल के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करती है। जल की विशेषता है—प्रवाह, पारदर्शिता और जीवन देना। ये तीनों गुण उस अविनाशी पुरुष के हैं जो समस्त सृष्टि का पोषण करता है। इसीलिए विष्णु को 'आप्य' कहा गया है; अर्थात् वह जो जल के सूक्ष्मतम कण-कण में व्याप्त है।

आगे यह रहस्य खोला गया है कि जल विष्णु की 'सूनवः' यानी संतान है। इसका भाव यह है कि सृष्टि के आदि-क्रम में जब परमात्मा ने स्वयं को अभिव्यक्त किया, तो जल प्रथम तत्व के रूप में प्रकट हुआ। अतः जल में विष्णु का स्मरण करना वैसा ही है जैसे किसी के घर में जाकर उस घर के स्वामी को याद करना। जब साधक जल में उतरता है, तो वह वास्तव में विष्णु के आयतन में प्रवेश करता है। इस बोध के साथ किया गया स्नान केवल त्वचा की शुद्धि नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा के निवास में विलीनीकरण बन जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १.१० ॥

जल 'नार' कहलाता है, क्योंकि जल नर (परमात्मा) की सन्तान है; वह (जल) इसका पहला अयन (निवास) था, इसलिए वह 'नारायण' कहलाया।

मनुस्मृति १.१०मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 143

इस अंश में मनुस्मृति स्पष्ट करती है कि जल को 'नार' कहा गया है क्योंकि वह नर (परमात्मा) की संतान है और यही जल नारायण का प्रथम अयन (निवास) था। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। दोनों ही ग्रन्थ जल को विष्णु की संतान और उनका निवास बताकर यह सिद्ध करते हैं कि जल में स्नान करते समय विष्णु का स्मरण करना सबसे स्वाभाविक और फलदायी क्रिया है। जहाँ मनुस्मृति इसे एक परिभाषा के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे साधना की विधि (संस्मरेत्) से जोड़कर साधक के लिए अनुभव का विषय बना देते हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'बाह्य क्रिया' को 'आन्तर साधना' में बदलने की कुंजी है। साधारण व्यक्ति जल में उतरता है तो वह केवल शरीर की गंदगी धोता है, किंतु योगी जब इस बोध के साथ जल में उतरता है कि "यह जल विष्णु का घर है", तो उसका स्नान 'उपसाना' (निकट बैठना) बन जाता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार जल शरीर के रोम-रोम में प्रवेश कर उसे स्वच्छ करता है, उसी प्रकार विष्णु का स्मरण उसके चित्त के सूक्ष्मतम स्तरों तक प्रवेश कर मानसिक मलिनता को धो देता है। जल में उतरना यहाँ एक प्रतीक है—स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर उतरने का। जब साधक जल के बीच खड़ा होकर विष्णु का स्मरण करता है, तो वह अपनी चेतना को 'आप्य' (जल-तत्व) से ऊपर उठाकर 'विष्णु' (परम-तत्व) में स्थित करता है। यह अभ्यास साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह पदार्थ (जल) और अधिष्ठाता (विष्णु) के बीच के भेद को मिटाकर केवल एक ही व्यापक चेतना का अनुभव करता है।

नारायणपदनिरुक्तिः

श्लोक ७.३१

नरादापः प्रसूता वै तेन नारा इति स्मृताः ।

ता एवास्यायनं ह्यापस्तस्मान्नारायणः स्मृतः ॥ ७.३१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५७

जल नर (परमात्मा) से उत्पन्न हुआ, इसलिए 'नार' कहलाता है; वह जल ही इसका अयन (निवास) है, इसलिए (वह) नारायण कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में जल को विष्णु का आयतन और उनकी संतान बताकर जल में उनके स्मरण का निर्देश दिया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य 'नारायण' शब्द की निरुक्ति के माध्यम से यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जल और परमात्मा का सम्बन्ध केवल निवास का नहीं, अपितु उत्पत्ति का है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: नरात् आपः प्रसूताः, (अतः) ताः वै तेन 'नार' इति स्मृताः। ताः (आपः) एव अस्य अयनम्, अतः तस्मात् (सः) 'नारायणः' स्मृतः।

पदार्थ और निर्वचन:

• नरात्: यहाँ 'नर' शब्द का अर्थ भौतिक मनुष्य नहीं, अपितु वह आदि-पुरुष या परमात्मा है जो समस्त सृष्टि का मूल कारण है।

• प्रसूताः: उत्पन्न हुए। यह शब्द संकेत करता है कि जल परमात्मा की इच्छा और शक्ति से प्रकट हुआ है।

• नार: जल के लिए प्रयुक्त विशेषण। जो नर (परमात्मा) से उत्पन्न हुआ, वह 'नार' है।

• अयनम्: निवास, आश्रय या वह स्थान जहाँ कोई विश्राम करता है या प्रतिष्ठित होता है।

• नारायणः: वह जिसका अयन 'नार' (जल) है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ नाम-निरुक्ति के माध्यम से साधक को पदार्थ के पार उसके अधिष्ठाता से जोड़ रहे हैं। श्लोक का भाव यह है कि आदि-पुरुष (नर) से जल की उत्पत्ति हुई, इसलिए जल को 'नार' कहा गया। चूँकि वही जल उस परमात्मा का प्रथम निवास या अयन बना, इसलिए उस पुरुष का नाम 'नारायण' पड़ा।

यहाँ याज्ञवल्क्य जी यह रहस्य खोल रहे हैं कि सृष्टि की रचना में जल की भूमिका केवल एक भौतिक तत्व की नहीं है, बल्कि वह परमात्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है। जब साधक स्नान के समय यह विचार करता है कि यह जल 'नार' है और इसका स्वामी 'नारायण' है, तब उसकी बाह्य क्रिया एक आंतरिक साधना में बदल जाती है। जल में निमज्जित होना केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि उस मूल पुरुष के अयन में प्रवेश करने के समान हो जाता है। यह निरुक्ति साधक के मन में जल के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करती है, जिससे जल की शीतलता और तरलता नारायण की कृपा और व्यापकता के रूप में अनुभव होने लगती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १.१० ॥

जल 'नार' कहलाता है, क्योंकि जल नर (परमात्मा) की सन्तान है; वह (जल) इसका पहला अयन (निवास) था, इसलिए वह 'नारायण' कहलाया।

मनुस्मृति १.१०मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 143

यह निरुक्ति मनुस्मृति के इस वचन से पूर्णतः मेल खाती है, जहाँ कहा गया है कि जल 'नार' कहलाता है क्योंकि वह नर (परमात्मा) की संतान है और वही उसका प्रथम अयन था, अतः वह 'नारायण' कहलाया। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ एक ही सत्य को प्रतिपादित करते हैं कि नारायण और जल का सम्बन्ध अविभाज्य है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'स्नान' को 'ध्यान' में परिवर्तित करने की विधि है। सामान्य मनुष्य जल को केवल शरीर की गंदगी धोने का साधन मानता है, किन्तु योगी इस निरुक्ति के माध्यम से जल को 'नारायण-मय' देखता है।

साधक जब जल में खड़ा होता है, तो वह इस भाव का अभ्यास करता है कि वह जिस जल को स्पर्श कर रहा है, वह स्वयं नारायण का स्वरूप और उनका निवास है। इस बोध से साधक की चेतना स्थूल जल से हटकर सूक्ष्म नारायण में स्थित होने लगती है। यहाँ अभ्यास यह है कि जल के स्पर्श के साथ ही मन में यह विचार आए— "यह जल नारायण का अयन है, और मैं उस अयन में स्थित होकर स्वयं को नारायण के चरणों में समर्पित कर रहा हूँ।" इस प्रकार, जल का भौतिक स्पर्श 'स्पर्श-ध्यान' बन जाता है और साधक बाह्य शुद्धि से आंतरिक शुद्धि की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

विष्णुध्यानप्रशंसा

श्लोक ७.३२

यं(यो)हि व्रतानां वेदानां यमस्य नियमस्य च ।

भोक्तारं यज्ञतपासां ध्यायिनां ध्येयमेव च ॥ ७.३२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५८

जो व्रतों, वेदों, यम और नियमका, यज्ञ और तपका भोक्ता है, और ध्यान करनेवालोंका ध्येय है —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'नारायण' शब्द की निरुक्ति करते हुए जल को परमात्मा का अयन बताया था। अब वे उस नारायण के स्वरूप और उनकी सर्वव्यापकता का वर्णन कर रहे हैं, ताकि साधक जल में केवल एक देवता का नहीं, अपितु समस्त साधनाओं के चरम लक्ष्य का स्मरण करे।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (सः नारायणः) यः व्रतानां, वेदानां, यमस्य, नियमस्य च (भोक्ता अस्ति), (यः) यज्ञतपासां भोक्तारं (अस्ति), (तस्यैव) ध्यायिनां ध्येयमेव च (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• व्रतानां: व्रतों का। यहाँ व्रत का अर्थ केवल उपवास नहीं, अपितु किसी एक लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण और संकल्प है।

• वेदानां: वेदों का। वेदों का अर्थ यहाँ केवल ग्रन्थ नहीं, अपितु उस 'ऋत' (ब्रह्मांडीय नियम) और ज्ञान का है जिससे सृष्टि संचालित है।

• यमस्य नियमस्य: यम और नियम का। योगशास्त्र के वे पाँच यम (अहिंसा आदि) और पाँच नियम (शौच आदि) जो साधक के व्यक्तित्व को शुद्ध करते हैं।

• भोक्तारं: भोक्ता। वह जो फल का उपभोग करता है या जिसमें समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं। यहाँ 'भोक्ता' का अर्थ उपभोग करने वाला नहीं, अपितु वह 'अधिष्ठान' है जहाँ हर क्रिया का गंतव्य है।

• यज्ञतपासां: यज्ञ और तप का। बाहरी अग्निहोत्र और आंतरिक तप (तपस) दोनों का।

• ध्येयमेव: एकमात्र ध्येय। वह लक्ष्य जिस पर चित्त एकाग्र होता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य नारायण के उस स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं, जो समस्त धार्मिक और आध्यात्मिक क्रियाओं का केंद्र है। श्लोक का भाव यह है कि जो पुरुष व्रतों, वेदों, यम, नियम, यज्ञ और तप का भोक्ता है और जो ध्यान करने वालों का एकमात्र ध्येय है, वही नारायण है।

यहाँ 'भोक्ता' शब्द अत्यंत गूढ़ है। सामान्यतः भोक्ता वह होता है जो फल की इच्छा से कर्म करता है, किंतु यहाँ नारायण 'भोक्ता' हैं क्योंकि संसार की कोई भी शुभ क्रिया—चाहे वह वेद-मंत्र का जप हो, यम-नियम का पालन हो या कठिन तप—बिना उस परमात्मा की शक्ति के संभव नहीं है और अंततः उन्हीं में विलीन होती है। जब साधक कहता है कि नारायण वेदों के भोक्ता हैं, तो उसका अर्थ है कि वेदों का वास्तविक अर्थ और उनका फल वही हैं। जब वह उन्हें यम-नियमों का भोक्ता मानता है, तो वह यह अनुभव करता है कि उसकी शुद्धि वास्तव में नारायण की ही कृपा है।

यह श्लोक साधक को एक महान सत्य की ओर ले जाता है कि साधन (वेद, यज्ञ, तप) और साध्य (ध्येय) अलग-अलग नहीं हैं। जो साधन के रूप में 'यज्ञ' है, वही फल के रूप में 'नारायण' है। स्नान के समय जब साधक जल में इस नारायण का ध्यान करता है, तो वह अपनी समस्त बाहरी क्रियाओं को उनके चरणों में समर्पित कर देता है, जिससे कर्म का अहंकार समाप्त हो जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ ५.२९ ॥

मुझे यज्ञ और तपका भोक्ता, सब लोकोंका महेश्वर और सब प्राणियोंका सुहृद् जानकर (मनुष्य) शान्ति पाता है।

भगवद्गीता ५.२९गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 166

इस श्लोक की संगति भगवद्गीता के इस वचन से पूर्णतः स्पष्ट होती है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को 'यज्ञतपसां भोक्ता' और 'सर्वलोकमहेश्वर' कहते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों एक ही सत्य को पुष्ट करते हैं कि समस्त तप और यज्ञ का अंतिम गंतव्य वह एक परमात्मा ही है। स्मृति यहाँ इस भाव को स्नान की विधि से जोड़कर उसे दैनिक जीवन की क्रिया में उतार रही है, जबकि गीता इसे ज्ञान के मार्ग पर शांति प्राप्त करने का साधन बताती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साधन' से 'साध्य' की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। साधक जब यम, नियम, तप और यज्ञ करता है, तो वह एक 'प्रयास' की स्थिति में होता है। किंतु जब वह यह अनुभव करता है कि इन सबका भोक्ता नारायण है, तब वह 'प्रयास' से 'समर्पण' की स्थिति में पहुँच जाता है।

अभ्यास की दृष्टि से साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसके भीतर जो भी अनुशासन (यम-नियम) है, वह वास्तव में नारायण की ही अभिव्यक्ति है। स्नान के समय जल में डुबकी लगाते हुए जब वह 'ध्येय' का स्मरण करता है, तो उसका चित्त बाहरी जगत से हटकर अपने अंतर्निहित नारायण में लीन होने लगता है। यह अभ्यास साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'ध्यान-भूमि' में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ 'भोक्ता' होने का अर्थ है—समस्त प्राण-ऊर्जा का उस एक केंद्र में विलीन हो जाना। साधक यह अनुभव करता है कि उसका तप, उसका जप और उसका संयम सब उस एक अक्षर-पुरुष की ही लहरें हैं।

श्लोक ७.३३

ध्यायेन्नारायणं देवं नित्यं स्नानादिकर्मसु ।

प्रायश्चित्त्यपि सर्वस्माद्दुष्कृतान् मुच्यते पुमान् ॥ ७.३३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५८

— उस नारायण देवका स्नान आदि कर्मोंमें नित्य ध्यान करे; (इससे) प्रायश्चित्ती (पापी) मनुष्य भी सब दुष्कर्मोंसे छूट जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने नारायण के स्वरूप को समस्त व्रतों, वेदों और तप का भोक्ता तथा ध्याताओं का परम ध्येय बताया था। अब वे इस ध्येय के नित्य अभ्यास की विधि और उसके द्वारा प्राप्त होने वाले उस महान फल का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को उसके समस्त संचित दोषों से मुक्त कर देता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: पुमान् स्नानादि-कर्मसु नित्यं नारायणं देवं ध्यायेत्; (ततः) प्रायश्चित्त्यपि (सा) पुमान् सर्वस्माद् दुष्कृतान् मुच्यते।

पदार्थ और निर्वचन:

• स्नानादिकर्मसु: स्नान आदि कर्मों में। यहाँ 'आदि' शब्द का विस्तार पूर्व में बताए गए तर्पण, मार्जन और जप तक है।

• नित्यं: निरंतर या प्रतिदिन। यह केवल समय की पुनरावृत्ति नहीं, अपितु चित्त की उस अवस्था का संकेत है जहाँ क्रिया और ध्यान एक हो जाएँ।

• नारायणं देवं: नारायण देव का। यहाँ 'देव' का अर्थ है 'द्योतयति इति देवः'—जो प्रकाशमान है और जो दिव्य ज्ञान का स्रोत है।

• प्रायश्चित्त्यपि: प्रायश्चित्त करने वाला भी। वह मनुष्य जो अपने पापों या त्रुटियों के बोध से व्याकुल होकर प्रायश्चित्त के मार्ग पर है।

• दुष्कृतान्: दुष्कर्मों से। यहाँ 'दुष्कृत' का अर्थ केवल सामाजिक अपराध नहीं, अपितु वे मानसिक संस्कार और अविद्या जनित त्रुटियाँ हैं जो साधक की उन्नति में बाधक हैं।

• मुच्यते: मुक्त हो जाता है। यह केवल कर्मों का क्षय नहीं, अपितु बंधन से मुक्ति (मोक्ष) की दिशा में एक कदम है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य बाह्य शुद्धि (स्नान) को आंतरिक शुद्धि (ध्यान) से जोड़ रहे हैं। वे निर्देश देते हैं कि जब साधक स्नान आदि के कर्म करे, तब उसका चित्त केवल जल की भौतिक धारा में न रहे, अपितु उस नारायण देव के ध्यान में स्थित रहे।

यहाँ 'नित्यं' शब्द का गहरा रहस्य है। जब स्नान जैसी दैनिक क्रिया 'नित्य ध्यान' में बदल जाती है, तब वह क्रिया केवल एक शारीरिक शुद्धि न रहकर एक 'योग' बन जाती है। जल का स्पर्श शरीर को शुद्ध करता है, किन्तु नारायण का ध्यान अंतःकरण को पवित्र करता है।

श्लोक का दूसरा भाग एक अत्यंत गंभीर सत्य उद्घाटित करता है कि इस ध्यान के प्रभाव से 'प्रायश्चित्त्यपि' (प्रायश्चित्त करने वाला भी) मनुष्य दुष्कर्मों से मुक्त हो जाता है। सामान्यतः प्रायश्चित्त एक कठिन प्रक्रिया है, जिसमें तप, दान और उपवास जैसी विधाएँ होती हैं। किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य यह बता रहे हैं कि यदि साधक पूर्ण शरणागति और एकाग्रता के साथ नारायण का ध्यान करता है, तो वह ध्यान स्वयं में एक महा-प्रायश्चित्त बन जाता है।

इसका कारण यह है कि नारायण केवल एक देवता नहीं, अपितु वह 'अक्षर' और 'परम पुरुष' हैं जिनमें समस्त सृष्टि विलीन होती है। जब साधक का चित्त उस अनंत प्रकाश (देव) में लीन होता है, तो उसके भीतर के छोटे-छोटे 'दुष्कृत' (अंधकारमय संस्कार) उस सूर्य के समान तेज में जलकर भस्म हो जाते हैं। अतः, यह विधि केवल बाह्य शुद्धि की नहीं, अपितु आत्मा के परिष्कार की विधि है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म' को 'समाधि' में बदलने का अभ्यास है। साधारण मनुष्य स्नान करता है और ध्यान अलग से करता है, किन्तु योगी के लिए स्नान ही ध्यान है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार जल शरीर की मैल को धो देता है, उसी प्रकार नारायण का स्मरण हृदय के भीतर जमी हुई अविद्या और पाप की परतों को धो रहा है। अभ्यास यह है कि जल के स्पर्श के साथ-साथ हृदय में नारायण के स्वरूप का प्रकाश अनुभव किया जाए। जब साधक यह अनुभव करता है कि वह स्वयं उस नारायण के अयन (जल) में स्थित है और नारायण उसके भीतर स्थित हैं, तब वह 'साधक' से 'सिद्ध' की भूमि की ओर बढ़ता है। यहाँ 'मुच्यते' का अर्थ है—संस्कारों के बंधन से मुक्ति, जिससे चित्त निर्मल होकर उच्चतर ध्यान के लिए तैयार हो जाता है।

श्लोक ७.३४

प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् ।

स्मरणादेव तद्विष्णोः संपूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥ ७.३४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५८

प्रमादसे कर्म करनेवालोंका यज्ञोंमें जो (अंश) छूट जाता है, वह विष्णुके स्मरणसे ही पूर्ण हो जाता है — ऐसी श्रुति है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने नारायण के ध्यान की महिमा बताते हुए कहा था कि स्नान आदि कर्मों में उनका नित्य स्मरण करने से प्रायश्चित्त करने वाला मनुष्य भी अपने समस्त दुष्कर्मों से मुक्त हो जाता है। अब वे इस सत्य को और अधिक विस्तार देते हुए समझा रहे हैं कि केवल पापों का क्षय ही नहीं, अपितु कर्मों में होने वाली त्रुटियों की पूर्ति भी नारायण के स्मरण से संभव है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यत् (अंशं) प्रमादात् कुर्वतां कर्म (णां) अध्वरेषु प्रच्यवेता, (तद्) विष्णोः स्मरणादेव संपूर्णं स्यात् इति श्रुतिः।

पदार्थ और निर्वचन:

• प्रमादात्: प्रमादवश या असावधानी से। योग की दृष्टि में प्रमाद वह अवस्था है जहाँ चित्त वर्तमान क्षण में उपस्थित नहीं रहता, जिससे क्रिया और चेतना के बीच विच्छेद हो जाता है।

• कुर्वतां कर्म: कर्म करने वालों का। यहाँ 'कर्म' से तात्पर्य उन वैदिक विधियों, स्नान और तर्पण से है जिनका वर्णन इस अध्याय में किया गया है।

• प्रच्यवेता: छूट गया हो या विचलित हो गया हो। 'च्युति' का अर्थ है गिरना या अलग होना। जब कर्म का फल उसकी विधि से अलग हो जाता है, तो उसे 'प्रच्युत' कहा जाता है।

• अध्वरेषु: यज्ञों में। 'अध्वर' का शाब्दिक अर्थ है 'अ-ध्वर'—जिसमें कोई बाधा न हो। यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, अपितु प्रत्येक वह पवित्र क्रिया है जो परमात्मा को समर्पित है।

• स्मरणादेव: केवल स्मरण मात्र से। 'एव' शब्द यहाँ बल दे रहा है कि जब विधि विफल हो जाए, तब केवल 'भाव' और 'स्मरण' ही एकमात्र साधन बचते हैं।

• संपूर्णं स्यात्: पूर्ण हो जाता है। अधूरा कर्म पूर्णता को प्राप्त करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी एक अत्यंत सूक्ष्म और करुणामय सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य स्वभाववश प्रमादग्रस्त है। जब कोई साधक या गृहस्थ श्रद्धापूर्वक यज्ञ या स्नान आदि कर्म करता है, तब भी कभी-कभी मानसिक व्याकुलता, अज्ञान या असावधानी के कारण विधि का कोई अंश छूट जाता है—जैसे किसी मन्त्र का उच्चारण त्रुटिपूर्ण हो जाना, किसी अंग का विस्मरण होना या समय का चुक जाना। ऐसी स्थिति में वह कर्म 'प्रच्युत' हो जाता है, अर्थात उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

यहाँ ऋषि यह रहस्य खोलते हैं कि जहाँ बाह्य विधि समाप्त होती है, वहाँ से आंतरिक भाव का साम्राज्य आरम्भ होता है। यदि कर्म के दौरान या उसके पश्चात साधक यह अनुभव करे कि उससे त्रुटि हुई है और वह पूर्ण समर्पण के साथ अविनाशी विष्णु का स्मरण करे, तो वह 'स्मरण' उस रिक्त स्थान को भर देता है।

भाव यह है कि विष्णु केवल एक देवता नहीं, अपितु वह 'पूर्णत्व' का स्वरूप हैं। जब साधक उस पूर्णता (विष्णु) का स्मरण करता है, तो उसकी अपनी अपूर्णता उस पूर्णता में विलीन हो जाती है। जिस प्रकार एक छोटे से छिद्र वाले पात्र को यदि महासागर में डुबो दिया जाए, तो वह पूर्णतः भर जाता है, वैसे ही प्रमाद से रिक्त हुए कर्म को विष्णु-स्मरण का महासागर पूर्ण कर देता है। यह वचन केवल कर्मकाण्डीय त्रुटि की बात नहीं करता, अपितु यह संकेत देता है कि ईश्वर की कृपा विधि के कठोर नियमों से ऊपर है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विधि' और 'भाव' के समन्वय का सूत्र है। योग के मार्ग पर चलते हुए साधक अक्सर इस ग्लानि में डूब जाता है कि उसने अभ्यास में त्रुटि कर दी या ध्यान के समय मन भटक गया। यह ग्लानि स्वयं में एक नया अवरोध बन जाती है।

यहाँ याज्ञवल्क्य जी सिखाते हैं कि 'स्मरण' स्वयं में एक उच्चतर साधना है। जब विधि विफल हो, तब भाव को जाग्रत करना चाहिए। साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि वह अपनी त्रुटियों पर शोक करने के बजाय, अपनी चेतना को तुरंत 'विष्णु' (परम चेतना) में केंद्रित करे।

यह अवस्था साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'भक्ति-भूमि' और फिर 'ज्ञान-भूमि' की ओर ले जाती है। वह अनुभव करता है कि बाह्य क्रियाएँ केवल माध्यम हैं, वास्तविक लक्ष्य तो उस चेतना में स्थित होना है जो स्वयं पूर्ण है। जब साधक यह जान लेता है कि विष्णु का स्मरण ही समस्त त्रुटियों का निवारण है, तब उसका अभ्यास भयमुक्त हो जाता है। वह विधि के बंधन में बँधने के बजाय, विधि के माध्यम से उस 'पूर्ण' की ओर बढ़ता है। यहाँ 'स्मरण' का अर्थ केवल नाम जपना नहीं, बल्कि अपनी लघुता को उस विराट पुरुष में विलीन कर देना है।

वैष्णवी गायत्री

श्लोक ७.३५

तद्विष्णोरिति मन्त्रेण मज्जेदप्सु पुनः पुनः ।

गायत्री वैष्णवी ह्येषा विष्णोः संस्मरणाय वै ॥ ७.३५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५८

"तद्विष्णोः (परमं पदम्)…" मन्त्रसे जलमें बार-बार डुबकी लगाये; यह वैष्णवी गायत्री विष्णुके स्मरणके लिए ही है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया था कि प्रमादवश कर्मों में जो त्रुटि रह जाती है, वह नारायण के स्मरण मात्र से पूर्ण हो जाती है। अब वे उस विशिष्ट मन्त्र और विधि का निर्देश दे रहे हैं, जिसके माध्यम से नारायण का वह स्मरण साकार और फलदायी बनता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: तद्विष्णोः (परमं पदम्...) इति मन्त्रेण अप्सु पुनः पुनः मज्जेत्। ह्येष गायत्री वैष्णवी विष्णोः संस्मरणाय वै (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• तद्विष्णोः इति मन्त्रेण: 'तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः' इस मन्त्र के द्वारा। यह ऋग्वेद (१.२२.२०) का मन्त्र है, जिसे वैष्णवी गायत्री कहा जाता है।

• मज्जेदप्सु: जल में डुबकी लगाए। 'मज्जन' का अर्थ है पूरी तरह जल में विलीन हो जाना।

• पुनः पुनः: बार-बार। यह संख्या नहीं, अपितु निरंतरता और लय का संकेत है।

• वैष्णवी ह्येषा: क्योंकि यह गायत्री वैष्णवी है। यहाँ 'गायत्री' शब्द केवल छन्द के लिए नहीं, अपितु उस शक्ति के लिए प्रयुक्त है जो साधक की बुद्धि को प्रेरित करती है।

• संस्मरणाय: पुनः स्मरण करने के लिए। 'सम्' उपसर्ग यहाँ स्मरण की गहराई और पूर्णता को दर्शाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान की क्रिया को केवल शरीर की शुद्धि से उठाकर उसे 'परम पद' की प्राप्ति के साधन में परिवर्तित कर रहे हैं। वे निर्देश देते हैं कि साधक 'तद्विष्णोः परमं पदम्' मन्त्र का जप करते हुए जल में बार-बार डुबकी लगाए।

यहाँ 'मज्जन' (डुबकी लगाने) की विधि का आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है। बाहरी रूप से साधक जल में डूबता है, किन्तु आन्तरिक रूप से वह अपने अहंकार और सीमित व्यक्तित्व को परमात्मा के विराट स्वरूप में विलीन करने का अभ्यास करता है। जब शरीर जल के भीतर होता है, तब बाह्य जगत के सारे शोर थम जाते हैं; उस निस्तब्धता में जब 'तद्विष्णोः' का मन्त्र गूँजता है, तो वह सीधे हृदय के आकाश में प्रतिध्वनित होता है।

ऋषि कहते हैं कि यह 'वैष्णवी गायत्री' है। जिस प्रकार मुख्य गायत्री मन्त्र सूर्य (सविता) के माध्यम से बुद्धि को प्रेरित करता है, उसी प्रकार यह वैष्णवी गायत्री साधक को उस 'परम पद' का दर्शन कराती है, जहाँ विष्णु (सर्वव्यापी पुरुष) प्रतिष्ठित हैं। जल को विष्णु का आयतन माना गया है, अतः जल में डुबकी लगाना साक्षात् विष्णु के हृदय में प्रवेश करने के समान है। यह क्रिया केवल एक शारीरिक विधी नहीं, अपितु एक मानसिक विसर्जन है, जिससे साधक अपनी त्रुटियों को धोकर उस पूर्णता (संपूर्णता) को प्राप्त करता है, जिसका उल्लेख पिछले श्लोक में किया गया था।

शास्त्र-साक्ष्य —

कठ उपनिषद्

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ १.३.९ ॥

जिस मनुष्यका सारथि विवेक है और मनरूपी लगाम वशमें है, वह मार्गके पार पहुँचता है — वह विष्णुका परम पद है।

कठ उपनिषद् १.३.९उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 69

कठोपनिषद् में कहा गया है कि जिस मनुष्य का सारथि विवेक है और जिसने मन रूपी लगाम को वश में कर लिया है, वही इस संसार-मार्ग के पार पहुँचकर 'तद्विष्णोः परमं पदम्' (विष्णु के परम पद) को प्राप्त करता है।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और कठोपनिषद् का यहाँ अद्भुत मेल है। जहाँ कठोपनिषद् 'परम पद' को साधना के अंतिम लक्ष्य (मार्ग के अन्त) के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं यह स्मृति उस लक्ष्य को दैनिक स्नान की सरल क्रिया से जोड़ देती है। स्मृति यह बताती है कि यदि साधक प्रत्येक डुबकी के साथ उस परम पद का स्मरण करे, तो उसकी साधारण दिनचर्या भी एक उच्च योग-साधना बन जाती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह अभ्यास 'लय' और 'विलेपन' का है। साधक जब जल में डुबकी लगाता है, तो वह क्षणिक रूप से संसार से कट जाता है। यह 'प्रत्याहार' की एक सहज अवस्था है।

१. अभ्यास: डुबकी लगाते समय मन्त्र का मानसिक जप करना और जल से बाहर आते समय उस 'परम पद' के अनुभव को हृदय में स्थिर करना।

२. अनुभव: हर डुबकी के साथ साधक यह अनुभव करता है कि वह स्थूल शरीर से सूक्ष्म चेतना की ओर जा रहा है। जल यहाँ केवल माध्यम है, वास्तविक डुबकी तो 'अहं' की 'चित्त-सागर' में है।

३. भूमि: यह अभ्यास साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'भक्ति-भूमि' और अंततः 'ज्ञान-भूमि' की ओर ले जाता है, जहाँ वह यह जान लेता है कि जिस विष्णु का वह जल में स्मरण कर रहा है, वह वास्तव में उसके अपने ही हृदय का अन्तर्यामी पुरुष है।

इस प्रकार, बार-बार डुबकी लगाना वास्तव में बार-बार स्वयं को परमात्मा में विलीन करने और फिर एक नवीन, शुद्ध चेतना के साथ उभरने का योगिक अभ्यास है।

स्नानकाले निषिद्धानि

श्लोक ७.३६

पादेन पाणिना वापि यष्ट्या वस्त्रेण वोदकम् ।

न हन्यान्नैव रुन्धीत न च प्रक्षोभयेद्द्विजः ॥ ७.३६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५८

पैर, हाथ, लाठी या वस्त्रसे जलको न पीटे, न रोके और न द्विज (उसे) मथे (क्षुब्ध करे)।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जल को नारायण का आयतन बताते हुए 'वैष्णवी गायत्री' के मन्त्र से मज्जन की विधि बताई थी। अब वे स्नान के समय जल के प्रति किए जाने वाले आचरण और वर्जित क्रियाओं का निर्देश दे रहे हैं, ताकि साधक की शुद्धि केवल शारीरिक न रहकर मानसिक और आध्यात्मिक भी हो।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: द्विजः वोदकम् पादेन पाणिना वापि यष्ट्या वस्त्रेण (वा) न हन्यात्, न एव रुन्धीत, न च प्रक्षोभयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• वोदकम्: जल। यहाँ जल केवल एक पदार्थ नहीं, अपितु दिव्य तत्त्व का प्रतीक है।

• पादेन पाणिना वापि यष्ट्या वस्त्रेण: पैर से, हाथ से, अथवा लाठी या वस्त्र के द्वारा। ये वे साधन हैं जिनसे जल के प्रवाह में बाधा डाली जा सकती है या उसे प्रहार किया जा सकता है।

• न हन्यात्: न मारे, न पीटे। 'हन' धातु यहाँ प्रहार करने या जल की स्वाभाविक शांति को भंग करने के अर्थ में है।

• न रुन्धीत: न रोके। जल की धारा को बाधित करना या उसे अवरुद्ध करना निषिद्ध है।

• न प्रक्षोभयेत्: न मथे, न क्षुब्ध करे। जल की स्थिरता को नष्ट कर उसे अशांत करना 'प्रक्षोभ' है।

• द्विजः: वह जो दोबारा जन्मा हो। यहाँ द्विज का अर्थ केवल जाति से नहीं, अपितु उस साधक से है जिसने उपनयन के बाद ज्ञान-मार्ग में दूसरा जन्म लिया है और जो अब सूक्ष्म संवेदनाओं के प्रति सजग है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान के समय जल के साथ किए जाने वाले व्यवहार की मर्यादा निर्धारित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि एक द्विज (साधक) को जल को पैर, हाथ, लाठी या वस्त्र से पीटना नहीं चाहिए, उसके प्रवाह को रोकना नहीं चाहिए और न ही उसे अनावश्यक रूप से मथकर क्षुब्ध करना चाहिए।

बाहरी दृष्टि से यह निर्देश जल के प्रति सम्मान और प्रकृति के साथ सामंजस्य का है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। पूर्व श्लोकों में यह स्थापित किया गया कि जल 'नारायण' का आयतन है। जब साधक जल को नारायण का स्वरूप मानकर उसमें प्रवेश करता है, तब जल के प्रति किया गया कोई भी हिंसक या उग्र व्यवहार वास्तव में उस परमात्मा के प्रति अनादर है। जल की शांति, नारायण की शांति का प्रतिबिंब है। यदि साधक जल को प्रहार करता है या उसे मथकर अशांत करता है, तो वह अपने भीतर की शांति को भी भंग कर रहा होता है।

'रुन्धीत' (रोकना) शब्द यहाँ विशेष महत्वपूर्ण है। जल का स्वभाव है—निरन्तर बहना और मुक्त होना। इसी प्रकार चेतना का स्वभाव है—मुक्ति की ओर अग्रसर होना। जो साधक जल के प्रवाह को रोकता है, वह अनजाने में ही अपने भीतर के प्रवाह को अवरुद्ध करने की प्रवृत्ति को पुष्ट करता है। अतः स्नान की यह विधि साधक को 'अहिंसा' और 'प्रवाह' के साथ एकरूप होना सिखाती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'स्थिरता' और 'अहिंसा' के अभ्यास की ओर ले जाता है। जल यहाँ केवल बाहरी जल नहीं, अपितु शरीर के भीतर स्थित 'सोम' और 'प्राण' का प्रतीक है।

साधक जब जल में उतरता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि वह अपनी चेतना को परमात्मा के विराट स्वरूप में विलीन कर रहा है। यदि वह जल को पैर या हाथ से पीटता है (हन्यात्), तो वह अपनी ही सूक्ष्म ऊर्जाओं के साथ उग्रता का व्यवहार कर रहा है। योग का लक्ष्य 'क्षोभ' (अशांति) को समाप्त करना है, न कि उसे उत्पन्न करना। 'न प्रक्षोभयेत्' का अभ्यास साधक को यह सिखाता है कि वह अपने मन के सरोवर को भी मथकर अशांत न करे, बल्कि उसे शांत और दर्पण जैसा बनाए रखे।

इस अभ्यास से साधक 'उग्र' भूमि से 'सौम्य' भूमि की ओर जाता है। वह यह अनुभव करता है कि समस्त सृष्टि में, यहाँ तक कि जल की एक बूँद में भी, वही नारायण प्रतिष्ठित हैं। जब वह जल के प्रति पूर्ण अहिंसा का भाव रखता है, तब उसके हृदय में करुणा का उदय होता है। यह अभ्यास उसे उस स्थिति में ले जाता है जहाँ वह बाहरी जगत की हलचल के बीच भी अपने भीतर की शांति (अक्षर) को अक्षुण्ण रख पाता है। जल की तरलता और शांति का अनुभव वास्तव में आत्मा की तरलता और शांति का अनुभव बन जाता है।

श्लोक ७.३७

न कुर्यात् कस्यचित् पीडां मनोवाक्कायकर्मभिः ।

आचरन्नाऽभिषेकं च कर्माण्यन्यानि नाचरेत् ॥ ७.३७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५९

मन, वाणी, शरीर और कर्मसे किसीको पीड़ा न दे; अभिषेक करते हुए दूसरे कर्म न करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जल के भौतिक स्वरूप के प्रति हिंसा और अशांति का निषेध किया था। अब वे इस अनुशासन को विस्तार देते हुए साधक के मानसिक और सामाजिक आचरण की मर्यादा बता रहे हैं, ताकि स्नान की बाह्य शुद्धि, आंतरिक पवित्रता में परिवर्तित हो सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (स्नातेन द्विजः) मनोवाक्कायकर्मभिः कस्यचित् पीडां न कुर्यात्। अभिषेकं च आचरन् अन्यानि कर्मणि न आचरेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• मनोवाक्कायकर्मभिः: मन, वाणी और शरीर के कर्मों से। यहाँ 'कर्म' का अर्थ केवल क्रिया नहीं, अपितु संकल्प, शब्द और शारीरिक चेष्टाओं के सम्मिलित प्रभाव से है।

• कस्यचित् पीडां: किसी को भी पीड़ा। यहाँ 'किसी' में केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु जल में रहने वाले सूक्ष्म जीव, जलीय प्राणी और प्रकृति के अन्य तत्त्व भी सम्मिलित हैं।

• न कुर्यात्: न करे। यह विधिलिङ् निषेध है, जो साधक के लिए अनिवार्य मर्यादा है।

• आचरन्नाऽभिषेकं: अभिषेक का आचरण करते हुए। 'अभिषेक' का अर्थ यहाँ केवल जल डालना नहीं, अपितु जल के माध्यम से स्वयं का और अपने भीतर के देवता का संस्कार करना है।

• कर्माण्यन्यानि नाचरेत्: अन्य कर्म न करे। एक समय में एक ही साधना पर पूर्ण ध्यान केंद्रित करने का निर्देश है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य स्नान की प्रक्रिया को एक 'यज्ञ' के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। वे निर्देश देते हैं कि स्नान के समय साधक मन, वाणी और शरीर—इन तीनों स्तरों पर किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाए।

बाहरी दृष्टि से यह एक नैतिक निर्देश प्रतीत होता है, किंतु इसका गहरा अर्थ यह है कि जब साधक जल में उतरता है, तो वह प्रकृति के साथ एकाकार होने का प्रयास करता है। यदि उसके मन में क्रोध, ईर्ष्या या किसी के प्रति द्वेष है (मनो-पीडा), यदि वह कठोर शब्दों का प्रयोग करता है (वाक्-पीडा), या यदि वह जल के जीवों को अनावश्यक कष्ट देता है (कायिक-पीडा), तो उसकी चेतना विखंडित हो जाती है। ऐसी अशांत अवस्था में किया गया स्नान केवल शरीर की मैल धो सकता है, चित्त के मैल को नहीं।

श्लोक का दूसरा भाग—'अभिषेक करते हुए दूसरे कर्म न करे'—साधना की एकाग्रता का सूत्र है। अभिषेक का अर्थ है—शुद्ध जल की धारा द्वारा स्वयं के अस्तित्व को पवित्र करना। जब साधक अभिषेक की क्रिया में होता है, तब उसका संपूर्ण ध्यान केवल उस जल, उस मन्त्र और उस अनुभूति पर होना चाहिए। यदि वह इस बीच किसी अन्य सांसारिक विचार में खो जाता है या कोई अन्य भौतिक कार्य करता है, तो वह 'अभिषेक' मात्र एक 'नहाने' की क्रिया बन कर रह जाता है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि साधना में 'एक समय में एक ही कर्म' का सिद्धांत सर्वोपरि है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'एकतत्व' की स्थिति में ले जाने का अभ्यास है। स्नान के समय मन, वाणी और शरीर का सामंजस्य होना अनिवार्य है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसकी चेतना केवल उसके शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जल और उसके आसपास के समस्त जीवों से जुड़ी है। 'किसी को पीड़ा न देना' वास्तव में अपनी चेतना का विस्तार करना है, जिससे 'अहं' मिटकर 'सर्वम्' का भाव जागे। जब साधक मन से किसी के प्रति द्वेष का त्याग करता है, तब उसके हृदय का अवरोध खुलता है और वह जल के साथ सहजता से जुड़ पाता है।

'अन्य कर्म न करने' का अभ्यास साधक को वर्तमान क्षण में स्थिर करता है। यह अभ्यास उसे 'भ्रम' से हटाकर 'स्मृति' और 'ध्यान' की भूमि पर ले जाता है। जब अभिषेक के दौरान कोई अन्य विचार या कर्म हस्तक्षेप नहीं करता, तब साधक की एकाग्रता इतनी प्रगाढ़ हो जाती है कि वह जल की प्रत्येक बूँद में उस नारायण या उस अक्षर का अनुभव करने लगता है, जिसका स्मरण पिछले श्लोकों में बताया गया था। यह अभ्यास साधक को विखराव से हटाकर केंद्र की ओर ले जाता है, जिससे वह स्थूल शुद्धि से सूक्ष्म शुद्धि की ओर अग्रसर होता है।

धौतवस्त्रपरिधानम्

श्लोक ७.३८

स्नात्वैवं वाससी धौते अक्लिष्टे परिधाय च ।

प्रक्षाल्योरू मृदाद्भिश्च हस्तौ प्रक्षालयेत्ततः ॥ ७.३८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५९

इस प्रकार स्नान करके, धुले हुए, बिना फटे दो वस्त्र पहनकर, मिट्टी और जलसे जाँघें धोकर, फिर हाथ धोये।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जल के प्रति हिंसा के निषेध और अभिषेक के समय एकाग्रता की मर्यादा बताई थी। अब वे स्नान के उपरांत शरीर की शुद्धि और परिधान के अनुशासन का निर्देश दे रहे हैं, ताकि साधक बाह्य स्वच्छता से आंतरिक स्थिरता की ओर अग्रसर हो सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) स्नात्वा एवम्, धौते अक्लिष्टे वाससी परिधाय च, मृदा-अद्भिश्च ऊरू प्रक्षालयेत्, ततः हस्तौ प्रक्षालयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• स्नात्वैवं: इस प्रकार (पूर्वोक्त विधि से) स्नान करके। यहाँ 'एवम्' शब्द पूर्व के नारायण-ध्यान और जल-मर्यादा के पालन की ओर संकेत करता है।

• वाससी धौते अक्लिष्टे: धुले हुए और बिना फटे (अक्लिष्टे) वस्त्र। 'अक्लिष्ट' का अर्थ है जिसमें कोई छेद या विदीर्णता न हो; यह पूर्णता और अखंडता का प्रतीक है।

• परिधाय च: पहनकर।

• प्रक्षाल्योरू: जाँघों (ऊरू) को धोए।

• मृदा-अद्भिश्च: मिट्टी और जल से। मिट्टी यहाँ केवल सफाई का साधन नहीं, अपितु पृथ्वी-तत्त्व के स्पर्श का विधान है।

• हस्तौ प्रक्षालयेत्ततः: उसके पश्चात दोनों हाथों को धोए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान के उपरांत की उस विधि का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को पुनः भौतिक जगत में प्रवेश करने से पूर्व एक विशेष 'संस्कार' से गुजारती है।

बाहरी विधि यह है कि स्नान के पश्चात साधक ऐसे वस्त्र धारण करे जो स्वच्छ (धौते) हों और जिनमें कोई छेद या फटा हुआ अंश (अक्लिष्टे) न हो। वस्त्रों की अखंडता साधक के संकल्प की अखंडता का प्रतीक है। फटे वस्त्रों का निषेध इसलिए है क्योंकि वे चित्त में विखंडन और अभाव का भाव उत्पन्न करते हैं, जबकि पूर्ण वस्त्र साधक को एक 'पूर्ण इकाई' के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

इसके पश्चात, जाँघों को मिट्टी और जल से धोने का निर्देश है। विधिक रूप से यह स्नान के बाद शरीर के निचले अंगों की अंतिम शुद्धि है। किंतु इसका आन्तर अर्थ गहरा है। जाँघें शरीर के उस भाग का प्रतिनिधित्व करती हैं जो हमें पृथ्वी पर टिकाए रखता है और गति प्रदान करता है। मिट्टी (मृत्तिका) पृथ्वी का स्वरूप है। मिट्टी और जल के संयोग से जाँघों का प्रक्षालन करना वास्तव में अपने आधार (पृथ्वी-तत्त्व) के प्रति कृतज्ञता और स्वयं को पुनः प्रकृति के साथ लयबद्ध करने की क्रिया है।

अंत में हाथों को धोने का विधान है। हाथ कर्म के साधन हैं। जाँघों (आधार) की शुद्धि के बाद हाथों (साधन) की शुद्धि यह सुनिश्चित करती है कि अब साधक जो भी कर्म करेगा, वह शुद्ध आधार और शुद्ध साधन के संयोग से होगा। यह क्रम—वस्त्र (आवरण), ऊरू (आधार) और हस्त (कर्म)—साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक तैयारी है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' और 'संयम' के अभ्यास का विस्तार है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि साधना केवल जल में डुबकी लगाना नहीं, बल्कि स्नान के बाद के आचरण में भी सजग रहना है।

मिट्टी और जल से अंगों को धोना 'तत्व-शुद्धि' का अभ्यास है। जब साधक मिट्टी को स्पर्श करता है, तो वह अपने भीतर के जड़त्व (स्थूलता) को पहचानकर उसे जल (तरलता/चेतना) से प्रक्षालित करता है। यह अभ्यास साधक को 'भूमि' (स्थिरता) से 'हस्त' (क्रिया) तक एक लय में लाता है।

बिना फटे वस्त्र पहनना मन के 'अक्लिष्ट' होने का अभ्यास है। जिस प्रकार फटे वस्त्र शरीर को पूरी तरह नहीं ढँकते, उसी प्रकार विखंडित मन आत्मा को पूरी तरह नहीं ढँक पाता। साधक इस विधि के माध्यम से अपने व्यक्तित्व में अखंडता का अनुभव करता है। यह प्रक्रिया उसे उस भूमि पर ले जाती है जहाँ शरीर केवल एक यंत्र नहीं, बल्कि एक पवित्र मंदिर बन जाता है, जिससे वह आगामी तर्पण और जप की उच्चतर भूमियों में प्रवेश कर सके।

धौतवस्त्रानुकल्पाः

श्लोक ७.३९

अभावे धौतवस्त्रस्य शाणक्षौमाविकानि च ।

कुतपं योगपट्टं वा द्विवासा येन वै भवेत् ॥ ७.३९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५९

धुले वस्त्रके अभावमें सन, रेशम या ऊनके वस्त्र, कम्बल (कुतप) या योगपट्ट — जिससे (वह) दो वस्त्रोंवाला हो जाये।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में स्नान के पश्चात धुले हुए और बिना फटे वस्त्र धारण करने तथा अंगों की शुद्धि का विधान बताया गया था। यहाँ ऋषि याज्ञवल्क्य उन विशेष परिस्थितियों का समाधान दे रहे हैं जहाँ साधक के पास सूती धुले वस्त्र उपलब्ध न हों, ताकि शुद्धि की प्रक्रिया में कोई बाधा न आए।

अन्वय और पदार्थ —

धौतवस्त्रस्य अभावे शाण-क्षौम-आविकानि च, कुतपं योगपट्टं वा (परिधेत), येन वै (साधकः) द्विवासा भवेत्।

पदार्थ:

• धौतवस्त्रस्य अभावे: धुले हुए (सूती) वस्त्रों के अभाव में।

• शाण: सन से बना वस्त्र।

• क्षौम: रेशम का वस्त्र।

• आविकानि: ऊन के वस्त्र।

• कुतप: कम्बल या मोटा ऊनी वस्त्र।

• योगपट्टं: योग-साधना में प्रयुक्त होने वाला पट्टा या वस्त्र का टुकड़ा।

• द्विवासा: दो वस्त्रों वाला। वैदिक परंपरा में शरीर के ऊपरी और निचले भाग को ढंकने वाले दो वस्त्रों का समूह 'द्विवासा' कहलाता है।

• येन वै भवेत्: जिससे वह (साधक) हो जाए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य केवल कठोर नियमों का विधान नहीं करते, अपितु साधक की परिस्थिति के अनुसार विकल्प भी प्रदान करते हैं। पिछले श्लोक में 'धौतवस्त्र' (धुले वस्त्र) की बात कही गई थी, जो सामान्यतः सूती वस्त्रों के लिए प्रयुक्त होता है। किंतु यदि साधक के पास ऐसे वस्त्र न हों, तो वह सन (शाण), रेशम (क्षौम) या ऊन (आविकानि) के वस्त्रों का उपयोग कर सकता है। यहाँ 'कुतप' (कम्बल) और 'योगपट्ट' का उल्लेख यह दर्शाता है कि साधना की निरंतरता वस्त्रों की विलासिता से अधिक महत्वपूर्ण है।

यहाँ मुख्य लक्ष्य 'द्विवासा' होना है। 'द्विवासा' होने का अर्थ है कि साधक शरीर के दो प्रमुख भागों को आच्छादित करे। बाहरी विधि के अनुसार यह लज्जा और मर्यादा का पालन है, किंतु इसका आन्तर अर्थ साधक के 'आवरण' से है। जिस प्रकार वस्त्र शरीर की रक्षा और मर्यादा करता है, उसी प्रकार साधक अपनी चेतना के चारों ओर एक अनुशासन का आवरण बनाता है ताकि बाहरी जगत के विक्षेप उसकी आंतरिक एकाग्रता को भंग न कर सकें।

यदि साधक के पास पूर्ण वस्त्र नहीं हैं, तब भी वह योगपट्ट या किसी अन्य उपलब्ध शुद्ध वस्त्र के माध्यम से इस मर्यादा को पूर्ण कर सकता है। यह निर्देश स्पष्ट करता है कि साधन (वस्त्र) साध्य (शुद्धि और जप) के मार्ग में बाधा नहीं बनना चाहिए। याज्ञवल्क्य जी यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि शुद्धि केवल जल और सूत में नहीं, बल्कि उस भाव में है जिसके साथ साधक स्वयं को साधना के लिए तैयार करता है। जब साधक उपलब्ध साधनों से ही स्वयं को मर्यादित और शुद्ध कर लेता है, तब वह बाहरी अभावों से ऊपर उठकर आंतरिक पूर्णता की ओर अग्रसर होता है।

योग-रहस्य —

योगी के लिए वस्त्र का अर्थ केवल शरीर को ढंकना नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा को संचित करना है। सूती वस्त्रों को श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि वे सौम्य होते हैं, किंतु अभाव में अन्य वस्त्रों का उपयोग यह सिखाता है कि साधक को 'वस्तु-आसक्ति' से मुक्त होना चाहिए।

योगपट्ट का उल्लेख यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। योगपट्ट संभवतः वह वस्त्र है जिसे योगी अपनी साधना के दौरान शरीर को स्थिर रखने या विशिष्ट आसनों में सहायता के लिए उपयोग करते हैं। जब साधक 'द्विवासा' होने का प्रयास करता है, तो वह वास्तव में अपने व्यक्तित्व के दो पक्षों—स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर—के बीच एक सामंजस्य स्थापित करता है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि बाहरी शुद्धि (धौतवस्त्र) केवल एक आरम्भ है। यदि बाहरी साधन उपलब्ध न हों, तो संकल्प की दृढ़ता और उपलब्ध संसाधनों का शुद्ध भाव से प्रयोग करना ही वास्तविक योग है। यह स्थिति साधक को 'साधन-निर्भरता' से निकालकर 'साधना-निर्भरता' की ओर ले जाती है, जहाँ वह भौतिक अभावों के ऊपर उठकर अपनी आंतरिक शुद्धि पर ध्यान केंद्रित करता है।

तर्पणात् पूर्वं वस्त्रनिष्पीडननिषेधः

श्लोक ७.४०

यावद्देवान् ऋषींश्चैव पितॄंश्चापि न तर्पयेत् ।

तावन्नपीडयेद्वस्त्रं येन स्नातो न चोदके ॥ ७.४० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ५९

जबतक देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण न कर ले, तबतक वह वस्त्र न निचोड़े जिसे पहनकर स्नान किया हो, और न जलमें (निचोड़े)।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक के लिए विभिन्न प्रकार के वस्त्रों के विकल्प दिए गए थे ताकि वह 'द्विवासा' होकर शुद्धि की प्रक्रिया को पूर्ण कर सके। अब महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान के पश्चात और तर्पण से पूर्व वस्त्रों के साथ किए जाने वाले एक विशेष निषेध का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यावत् (साधकः) देवान् ऋषींश्चैव पितॄंश्चापि न तर्पयेत्, तावत् (सः) वस्त्रं न अपीडयेत् येन स्नातो न च (वस्त्रं) उदके (अपीडयेत्)।

पदार्थ:

• यावत्... तावत्: जब तक... तब तक। यह समय की एक निश्चित सीमा को दर्शाता है।

• तर्पयेत्: तृप्त करना या अर्पण करना। यहाँ जल द्वारा देवताओं, ऋषियों और पितरों को दी जाने वाली आहुति (तर्पण) का बोध है।

• न अपीडयेत्: न निचोड़े। 'पीडन' का अर्थ है दबाव डालना या निचोड़ना।

• येन स्नातो: जिससे (वस्त्र से) स्नान किया गया हो।

• उदके: जल में। यहाँ अर्थ है कि जल के भीतर रहते हुए भी वस्त्र को निचोड़कर जल को विस्थापित न किया जाए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में स्नान केवल शरीर की बाहरी स्वच्छता नहीं, अपितु एक सूक्ष्म संस्कार है। इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत सूक्ष्म विधि का निर्देश दे रहे हैं कि स्नान के पश्चात जब साधक तर्पण के लिए तैयार होता है, तब उसे अपने स्नान-वस्त्रों को निचोड़ना नहीं चाहिए। यह निषेध दो स्थितियों के लिए है: प्रथम, स्नान के बाद बाहर आकर वस्त्रों को निचोड़ना, और द्वितीय, स्नान के समय जल के भीतर ही वस्त्रों को निचोड़ना।

यह नियम तब तक प्रभावी है जब तक कि देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण पूर्ण न हो जाए। तर्पण का अर्थ है—अपनी श्रद्धा और जल के माध्यम से उन सूक्ष्म शक्तियों को तृप्त करना जिन्होंने हमें यह जीवन और ज्ञान दिया है। जब साधक स्नान करता है, तो उसके वस्त्र जल को सोख लेते हैं। यह जल केवल भौतिक जल नहीं, अपितु स्नान के मन्त्रों और संकल्प से अभिमन्त्रित 'तीर्थ' बन जाता है। यदि साधक इस जल को निचोड़कर व्यर्थ बहा देता है, तो वह उस सूक्ष्म ऊर्जा का अपमान करता है जो तर्पण के समय पितरों और देवताओं के लिए आवश्यक होती है।

बाहरी विधि यह है कि तर्पण पूर्ण होने तक वस्त्र गीले ही रहें और उन्हें निचोड़ा न जाए। इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपनी साधना के 'रस' (अनुभव) को समय से पूर्व बाहर न निकाले। जिस प्रकार निचोड़ने से वस्त्र का जल समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार जल्दबाजी और उतावलेपन से साधना का सूक्ष्म रस नष्ट हो जाता है। तर्पण वह प्रक्रिया है जहाँ साधक अपनी कृतज्ञता को अभिव्यक्त करता है; अतः उस भाव की पूर्णता तक संयम बनाए रखना अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'संयम' और 'धारण' का अभ्यास है। स्नान के पश्चात शरीर में एक विशेष शीतलता और स्निग्धता आती है। वस्त्रों को न निचोड़ने का अभ्यास साधक को यह सिखाता है कि वह अपनी आंतरिक ऊर्जा और शांति को बिना कारण विसरित न करे।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि सूक्ष्म जगत (देव, ऋषि, पितर) उसकी छोटी से छोटी क्रिया से प्रभावित होते हैं। जब वह वस्त्रों को निचोड़ने के आवेग को रोकता है, तो वह वास्तव में अपनी इंद्रियों के 'वेग' को नियंत्रित करना सीखता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' (वस्त्र और जल) से 'सूक्ष्म' (तर्पण और कृतज्ञता) की भूमि पर ले जाता है। यहाँ साधक यह समझता है कि साधना में केवल 'करना' महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि क्या 'नहीं करना' है, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह निषेध उसे मानसिक स्थिरता और सूक्ष्म संवेदनाओं के प्रति सजग बनाता है।

श्लोक ७.४१

निष्पीडयति यः पूर्वं स्नानवस्त्रं तु तर्पणात् ।

निराशाः पितरस्तस्य यान्ति देवाः सहर्षिभिः ॥ ७.४१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६०

जो तर्पणसे पहले स्नानका वस्त्र निचोड़ता है, उसके पितर निराश होकर चले जाते हैं, और देवता ऋषियों सहित (चले जाते हैं)।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण होने तक स्नान-वस्त्रों को निचोड़ने का निषेध किया था। वर्तमान श्लोक में वे इस निषेध के पीछे के आध्यात्मिक कारण और इस नियम के उल्लंघन से होने वाले सूक्ष्म परिणामों का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यः (साधकः) तर्पणात् पूर्वं स्नानवस्त्रं निष्पीडयति, तस्य पितरः निराशः (भूत्वा) यान्ति, (तथा) देवाः सह ऋषिभिः (यान्ति)।

पदार्थ:

• निष्पीडयति: जोर से दबाकर जल निकालना या निचोड़ना।

• तर्पणात् पूर्वं: तर्पण की क्रिया से पहले।

• निराशाः: आशाशून्य, अतृप्त या निराश होकर।

• यान्ति: चले जाना या विमुख हो जाना।

• सह ऋषिभिः: ऋषियों के साथ।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी शुद्धि की विधियाँ वास्तव में सूक्ष्म जगत के साथ हमारे संबंधों को व्यवस्थित करने का साधन हैं। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य स्पष्ट कर रहे हैं कि तर्पण से पूर्व वस्त्रों को निचोड़ना केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, अपितु एक ऐसा कृत्य है जो पितरों और देवताओं की सूक्ष्म उपस्थिति को बाधित करता है।

तर्पण का अर्थ है 'तृप्त करना'। जब साधक स्नान करके तर्पण के लिए खड़ा होता है, तो वह स्वयं को एक पात्र के रूप में प्रस्तुत करता है ताकि वह देवताओं, ऋषियों और पितरों को जल अर्पित कर सके। स्नान के बाद वस्त्रों में जो जल शेष रहता है, वह उस समय साधक के आभामंडल का हिस्सा होता है। यदि साधक उस जल को निचोड़कर बाहर निकाल देता है, तो वह अनजाने में उस 'तृप्ति' के भाव को नष्ट कर देता है जिसे तर्पण के माध्यम से अर्पित किया जाना था।

भाव यह है कि पितर और देवता अत्यंत सूक्ष्म और संवेदनशील होते हैं। वे साधक की श्रद्धा और उसकी सूक्ष्म अवस्था से जुड़े होते हैं। वस्त्रों को निचोड़ने की क्रिया में एक प्रकार की 'हिंसा' या 'अधीरता' निहित है, जो उस शांति और समर्पण के भाव को भंग कर देती है जो तर्पण के लिए अनिवार्य है। जब साधक इस मर्यादा का उल्लंघन करता है, तो पितर निराश हो जाते हैं क्योंकि उन्हें वह सूक्ष्म समर्पण प्राप्त नहीं होता जिसकी वे प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी कारण देवता भी ऋषियों सहित विमुख हो जाते हैं, क्योंकि जहाँ मर्यादा और सूक्ष्म अनुशासन का अभाव होता है, वहाँ दैवीय शक्तियों का वास नहीं रहता।

यह निर्देश हमें सिखाता है कि योगिक जीवन में कोई भी क्रिया 'छोटी' नहीं होती। एक साधारण वस्त्र निचोड़ने की क्रिया भी यदि समय और स्थान के विरुद्ध हो, तो वह हमारे सूक्ष्म संबंधों को प्रभावित कर सकती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से, यह श्लोक साधक को 'संयम' और 'सूक्ष्मता' का अभ्यास कराता है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसकी बाहरी क्रियाओं का सीधा प्रभाव उसके सूक्ष्म परिवेश पर पड़ता है।

अभ्यास की दृष्टि से, तर्पण से पूर्व वस्त्रों को न निचोड़ना वास्तव में 'प्राणों की स्थिरता' का अभ्यास है। निचोड़ने की क्रिया में एक प्रकार का संकुचन और दबाव होता है, जबकि तर्पण का भाव 'विस्तार' और 'दान' का है। साधक जब वस्त्रों के जल को वैसा ही रहने देता है, तो वह अपने भीतर 'अपरिग्रह' और 'स्वीकार्यता' के भाव को पुष्ट करता है। वह सीखता है कि कैसे अपनी शारीरिक अवस्था को बिना किसी उद्वेग के, शांत भाव से तर्पण की उच्चतर मानसिक भूमि तक ले जाना है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर की आदतों से ऊपर उठाकर सूक्ष्म जगत की संवेदनाओं के प्रति जागरूक बनाता है।

श्लोक ७.४२

न क्लिन्नवासाः स्थलगो जपादीन्याचरेद्बुधः ।

वस्त्रनिष्पीडनं प्रेताः परिचार्य पिबन्ति हि ॥ ७.४२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६०

बुद्धिमान् भूमिपर गीले वस्त्र पहने जप आदि न करे; (क्योंकि) वस्त्रके निचोड़े जलको प्रेत (उसके) पास आकर पीते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में तर्पण से पूर्व वस्त्र निचोड़ने पर पितरों और देवताओं के विमुख होने का उल्लेख था। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य इस निषेध को और अधिक स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि गीले वस्त्रों में जप आदि करने का दोष क्या है और निचोड़े गए जल का सूक्ष्म जगत में क्या प्रभाव पड़ता है।

अन्वय और पदार्थ —

बुधः (साधकः) न क्लिन्नवासाः स्थलगो जपादीन्याचरेत् । वस्त्रनिष्पीडनं (तोयं) प्रेताः परिचार्य पिबन्ति हि ।

पदार्थ:

• बुधः: बुद्धिमान्, विवेकशील साधक। यहाँ 'बुध' का अर्थ केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु वह है जो सूक्ष्म जगत के नियमों से परिचित है।

• क्लिन्नवासाः: गीले वस्त्र पहने हुए (क्लिन्न = गीला, वास = वस्त्र)।

• स्थलगो: भूमि पर स्थित होकर।

• जपादीन्याचरेत्: जप आदि (ध्यान, उपासना) का आचरण करे। 'न' के साथ मिलकर यह निषेध बन जाता है।

• वस्त्रनिष्पीडनं: वस्त्रों को निचोड़कर निकाला गया जल।

• परिचार्य: पास आकर, सेवा भाव से या खोजकर।

• पिबन्ति: पीते हैं या ग्रहण करते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी शुद्धि की विधियाँ केवल शरीर की स्वच्छता नहीं, अपितु सूक्ष्म ऊर्जाओं के प्रबंधन की कला हैं। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य निर्देश दे रहे हैं कि विवेकशील साधक को गीले वस्त्र पहनकर भूमि पर बैठकर जप या अन्य आध्यात्मिक साधना नहीं करनी चाहिए।

इस नियम के पीछे दो मुख्य कारण हैं। प्रथम, शारीरिक और मानसिक स्थिरता। गीले वस्त्र शरीर के तापमान को प्रभावित करते हैं और शीतलता या चिपचिपाहट के कारण मन का ध्यान बाहरी संवेदनाओं में अधिक रहता है, जिससे 'एकग्रता' में बाधा आती है। जप के लिए शरीर का संतुलित और स्थिर होना आवश्यक है।

द्वितीय और अधिक गूढ़ कारण सूक्ष्म जगत से संबंधित है। जब साधक स्नान के बाद वस्त्रों को निचोड़ता है, तो वह जल केवल भौतिक जल नहीं रहता, बल्कि उसमें साधक की शारीरिक ऊर्जा और स्नान के समय के संकल्पों का अंश होता है। स्मृति कहती है कि इस निचोड़े हुए जल को प्रेत (अतृप्त सूक्ष्म आत्माएँ) पास आकर ग्रहण करते हैं।

रहस्य यह है कि निचोड़ा हुआ जल 'उच्छिष्ट' (शेष) की श्रेणी में आता है। जब साधक तर्पण से पूर्व वस्त्र निचोड़ता है, तो वह जल पितरों या देवताओं को विधिपूर्वक अर्पित करने के बजाय अनजाने में उन निम्न स्तर की सूक्ष्म शक्तियों (प्रेतों) को उपलब्ध करा देता है जो केवल अवशेषों पर जीवित रहती हैं। यदि साधक गीले वस्त्र पहनकर भूमि पर बैठता है, तो वह जल धीरे-धीरे भूमि में रिसता है, जिससे वह अनजाने में उन अतृप्त शक्तियों को अपने निकट आकर्षित करता है। जप और ध्यान के समय साधक का आभामंडल विस्तृत होता है; ऐसी स्थिति में निम्न स्तर की ऊर्जाओं का निकट आना साधना में व्यवधान उत्पन्न कर सकता है और साधक की मानसिक शांति को प्रभावित कर सकता है।

अतः बुद्धिमान साधक पहले तर्पण द्वारा पितरों और देवताओं को तृप्त करता है, उसके पश्चात ही वस्त्रों का निपटान करता है ताकि साधना के समय उसकी ऊर्जा केवल उच्च केंद्रों की ओर प्रवाहित हो, न कि निम्न शक्तियों के आकर्षण में व्यय हो।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ऊर्जा के संरक्षण' और 'शुद्धि' का अभ्यास है। योग में 'बुद्धि' का अर्थ है—यह जानना कि हमारी हर क्रिया का प्रभाव केवल स्थूल जगत पर नहीं, बल्कि सूक्ष्म जगत पर भी पड़ता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधना (जप आदि) के समय साधक स्वयं को पूरी तरह से 'शुद्ध' और 'अप्रतिबंधित' रखे। गीले वस्त्रों का त्याग और निचोड़े जल का उचित प्रबंधन इस बात का प्रतीक है कि साधक अपनी ऊर्जा को व्यर्थ के रिसाव से बचा रहा है। जब साधक भूमि पर बैठकर जप करता है, तो वह पृथ्वी तत्व के साथ जुड़ता है। यदि वस्त्र गीले हों, तो वह जुड़ाव बाधित होता है और ध्यान का प्रवाह ऊपर की ओर जाने के बजाय बाहरी संवेदनाओं और निम्न सूक्ष्म आकर्षणों में उलझ जाता है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि बाहरी अनुशासन ही आंतरिक स्थिरता की नींव है।

श्लोक ७.४३

व्रतादृते नार्द्रवासा नैकवासाः समाचरेत्

न जीर्णेन न नीलेन परिक्लिष्टेन वा जपेत् ॥ ७.४३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६०

व्रतके सिवा गीले वस्त्रमें या एक वस्त्रमें (कर्म) न करे; और न पुराने, नीले या मैले वस्त्रसे जप करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में गीले वस्त्रों में भूमि पर जप करने के निषेध और निचोड़े गए जल के प्रेत-ग्रहणा का वर्णन था। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन विशेष परिस्थितियों और वस्त्रों के प्रकारों का निर्देश दे रहे हैं, जिनमें साधना वर्जित है, ताकि साधक की ऊर्जा का क्षय न हो।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) व्रतादृते नार्द्रवासा नैकवासाः समाचरेत् । न जीर्णेन न नीलेन परिक्लिष्टेन वा जपेत् ।

पदार्थ:

• व्रतादृते: व्रत के अतिरिक्त (व्रत = संकल्पबद्ध विशेष साधना या नियम)। यहाँ 'व्रत' का अर्थ है वह स्थिति जहाँ साधक ने किसी विशेष उद्देश्य के लिए शरीर की सुख-सुविधाओं का त्याग करने का संकल्प लिया हो।

• नार्द्रवासा: गीले वस्त्रों में नहीं (आर्द्र = गीला, वास = वस्त्र)।

• नैकवासाः: एक वस्त्र में नहीं। 'द्विवासा' (दो वस्त्रों) की अनिवार्यता यहाँ स्पष्ट होती है, जो शरीर और परिवेश के बीच एक संतुलन का प्रतीक है।

• समाचरेत्: आचरण करे या साधना करे। 'न' के साथ मिलकर यह निषेध है।

• जीर्णेन: पुराने या फटे-पुराने वस्त्रों से।

• नीलेन: नीले रंग के वस्त्रों से।

• परिक्लिष्टेन: मैले, गंदे या कष्टदायक वस्त्रों से।

• जपेत्: जप करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी शुद्धि का उद्देश्य केवल देह की स्वच्छता नहीं, अपितु मन की उस अवस्था को निर्मित करना है जहाँ वह सूक्ष्म स्पंदनों को ग्रहण कर सके। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य साधना के समय वस्त्रों की मर्यादा और उनकी स्थिति पर बल दे रहे हैं।

प्रथम निर्देश है कि व्रत के अतिरिक्त गीले या एक वस्त्र में साधना न करें। सामान्यतः गीले वस्त्र शरीर की उष्णता को सोख लेते हैं, जिससे शरीर में शिथिलता आती है और प्राण का प्रवाह बाधित होता है। जहाँ तक 'एक वस्त्र' का प्रश्न है, वैदिक परंपरा में 'द्विवासा' (ऊपर और नीचे दो वस्त्र) का विधान है। यह द्वैत केवल लज्जा के लिए नहीं, अपितु शरीर के ऊपरी और निचले केंद्रों के बीच एक संतुलन बनाने के लिए है। किंतु यदि साधक ने किसी विशेष 'व्रत' का संकल्प लिया है—जैसे तपस्या, मौन या कठिन साधना—तब वह इन भौतिक सीमाओं से ऊपर उठ जाता है, क्योंकि तब उसकी शक्ति का आधार वस्त्र नहीं, अपितु उसका 'संकल्प' होता है।

द्वितीय निर्देश जप के समय वस्त्रों के रंग और स्थिति के विषय में है। पुराने (जीर्ण), नीले (नील) या मैले (परिक्लिष्ट) वस्त्रों में जप का निषेध है। पुराने वस्त्र अपनी ऊर्जा खो चुके होते हैं और उनमें पूर्व के संस्कारों की छाप होती है। मैले वस्त्र मानसिक अशुद्धि का प्रतीक हैं, जो साधक के भीतर 'अहं' या 'असावधानी' का भाव जाग्रत करते हैं।

नीले वस्त्रों के निषेध का रहस्य सूक्ष्म है। नीला रंग विस्तार और गहराई का प्रतीक है, किंतु जप के समय साधक को 'केंद्रित' होना होता है। नीले रंग की प्रकृति मन को बाहर की ओर या अवसाद की ओर ले जाने वाली हो सकती है, जो एकाग्रता में बाधक है। जप के लिए ऐसे वस्त्रों का चयन करना चाहिए जो सात्विक हों और मन को अंतर्मुखी करने में सहायक हों।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से वस्त्र केवल शरीर का आवरण नहीं, अपितु एक 'ऊर्जा-कवच' हैं। जब साधक जप करता है, तो उसके भीतर एक सूक्ष्म ऊष्मा (तपस) उत्पन्न होती है। गीले या मैले वस्त्र इस ऊष्मा के प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करते हैं, जिससे साधक का मन शरीर की असहजता में उलझ जाता है।

साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि वह अपनी बाहरी स्थिति को अपनी आंतरिक स्थिति के अनुरूप बनाए। 'एक वस्त्र' का त्याग और 'शुद्ध वस्त्रों' का चयन उसे इस बोध की ओर ले जाता है कि साधना के लिए 'उपयुक्तता' आवश्यक है। जब साधक स्वच्छ और संतुलित वस्त्र धारण करता है, तो वह स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर संक्रमण के लिए तैयार होता है। यह अभ्यास उसे 'असावधानी' की भूमि से 'जागरूकता' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ शरीर की हर सूक्ष्म संवेदना उसकी साधना का सहायक बनती है, बाधक नहीं।

वस्त्रनिष्पीडनं स्थले कर्तव्यम्

श्लोक ७.४४

वस्त्रनिष्पीडनं तोयं स्नातस्योच्छिष्टभागिनः ।

भागधेयं श्रुतिः प्राह तस्मान्निष्पीडयेत् स्थले ॥ ७.४४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६०

श्रुतिने वस्त्रसे निचोड़े जलको स्नान करनेवालेके उच्छिष्टके भागियोंका भाग कहा है; इसलिए (वस्त्र) भूमिपर निचोड़े।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में व्रत के अतिरिक्त गीले, एकल या मैले वस्त्रों में जप करने का निषेध किया गया था। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य वस्त्रों को निचोड़ने की विधि और उसके आध्यात्मिक कारण का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

स्नातस्य उच्छिष्टभागिनः भागधेयं तोयं वस्त्रनिष्पीडनं श्रुतिः प्राह । तस्मात् (वस्त्रं) स्थले निष्पीडयेत् ।

पदार्थ:

• स्नातस्य: स्नान करने वाले का।

• उच्छिष्टभागिनः: उच्छिष्ट (शेष) भाग प्राप्त करने वालों का। यहाँ 'उच्छिष्ट' का अर्थ केवल भोजन का बचा हुआ अंश नहीं, अपितु वह सूक्ष्म अंश है जो मुख्य प्रयोग के बाद शेष रह जाता है। उच्छिष्टभागी वे सूक्ष्म जीव, प्रेत या निम्नतर शक्तियाँ हैं जो साधक के अवशेषों से पोषण पाती हैं।

• भागधेयं: भाग के रूप में दिया जाने वाला या नियत हिस्सा।

• तोयं वस्त्रनिष्पीडनं: वस्त्रों को निचोड़ने से निकलने वाला जल।

• श्रुतिः प्राह: श्रुति ने कहा है।

• तस्मात्: इसलिए।

• स्थले निष्पीडयेत्: भूमि पर निचोड़े।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी क्रियाओं के पीछे सूक्ष्म जगत के नियमों का विवरण दिया गया है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य इस रहस्य को खोल रहे हैं कि स्नान के पश्चात वस्त्रों को निचोड़ने की क्रिया केवल जल हटाने के लिए नहीं, अपितु एक प्रकार के 'दान' या 'त्याग' के रूप में है।

श्रुति के अनुसार, स्नान के बाद वस्त्रों में जो जल शेष रह जाता है, वह केवल भौतिक जल नहीं है; वह स्नायी के शरीर और ऊर्जा के संपर्क में आने के कारण 'उच्छिष्ट' (अवशेष) बन चुका है। इस जल को निचोड़कर बाहर निकालना उन सूक्ष्म शक्तियों (उच्छिष्टभागिनों) को उनका नियत भाग देने के समान है, जो साधक के परिवेश में विद्यमान रहती हैं।

यहाँ एक महत्वपूर्ण निर्देश है—वस्त्रों को जल के भीतर निचोड़ने का निषेध है। यदि साधक जल के स्रोत (नदी, तालाब या पात्र) के भीतर ही वस्त्र निचोड़ता है, तो वह शुद्ध जल को दूषित करता है और उस पवित्र स्रोत में अपने शरीर के अवशेषों को मिला देता है, जो मर्यादा के विरुद्ध है। इसलिए, वस्त्रों को जल से बाहर निकालकर 'स्थले' अर्थात् भूमि पर निचोड़ने का विधान है। भूमि पर जल गिराने का अर्थ है कि वह अंश पृथ्वी को समर्पित कर दिया गया, जिससे निम्नतर शक्तियाँ अपनी तृप्ति कर सकें और साधक की साधना में बाधा न डालें।

यह विधान दर्शाता है कि योगी अपनी हर क्रिया में समस्त सृष्टि के प्रति करुणा और उत्तरदायित्व का भाव रखता है। वह अपनी शुद्धि के साथ-साथ दूसरों (चाहे वे सूक्ष्म जगत के ही क्यों न हों) के पोषण का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से, शरीर से निकलने वाला हर द्रव्य (पसीना, अश्रु, या स्नान का जल) साधक की ऊर्जा के सूक्ष्म अंशों को लेकर बहता है। जब साधक स्नान करता है, तो वह अपनी बाहरी और आंतरिक अशुद्धियों को जल के माध्यम से विसर्जित करता है। वस्त्रों में रुका हुआ जल उन अवशेषों को धारण किए रहता है।

यदि यह जल शरीर से चिपका रहे (गीले वस्त्र), तो वह साधक की ऊर्जा को नीचे की ओर खींचता है, जिससे जप और ध्यान में मन का उद्वेग होता है। वस्त्रों को भूमि पर निचोड़ना एक प्रकार का 'विसर्जन' है। साधक अनुभव करता है कि वह अपने अहंकार और शरीर के समस्त अवशेषों को पृथ्वी को सौंप रहा है। जब वह इस 'उच्छिष्ट' भाग का त्याग कर देता है, तब वह पूर्णतः रिक्त और हल्का होकर जप की उच्च भूमि की ओर अग्रसर होता है। यह क्रिया साधक को 'त्याग' के भाव में स्थित करती है, जो कि योग की अनिवार्य शर्त है।

वस्त्रनिष्पीडने केषांचिन्मतम्

श्लोक ७.४५

पूर्वं निष्पीडनं केचित् प्राग्देवपितृतर्पणात् ।

स्नानवस्त्रस्य नेच्छन्ति तस्मात् पूर्वं न पीडयेत् ॥ ७.४५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६१

कुछ (आचार्य) देवता और पितरोंके तर्पणसे पहले स्नानके वस्त्रको निचोड़ना नहीं चाहते; इसलिए (तर्पणसे) पहले न निचोड़े।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया था कि स्नान के बाद वस्त्रों को निचोड़कर निकलने वाला जल उच्छिष्टभागियों का भाग है, अतः उसे भूमि पर निचोड़ना चाहिए। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य इस क्रिया के समय (काल) की सूक्ष्मता और आचार्यों के मत का समन्वय कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

केचित् प्राग्देवपितृतर्पणात् स्नानवस्त्रस्य निष्पीडनं पूर्वं न इच्छन्ति । तस्मात् पूर्वं (तर्पणात् पूर्वं) न पीडयेत् ।

पदार्थ:

• केचित्: कुछ (आचार्य या विद्वान)।

• प्राग्देवपितृतर्पणात्: देवताओं और पितरों के तर्पण से पहले। 'प्राक्' शब्द पूर्व समय का बोध कराता है।

• स्नानवस्त्रस्य निष्पीडनं: स्नान के पश्चात वस्त्रों को निचोड़ना।

• न इच्छन्ति: इच्छा नहीं करते अर्थात् इसका निषेध करते हैं।

• तस्मात्: इसलिए।

• पूर्वं न पीडयेत्: (तर्पण से) पहले न निचोड़े।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी विधि और आन्तरिक शुद्धि का अद्भुत समन्वय है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत सूक्ष्म मर्यादा का संकेत दे रहे हैं। पूर्व श्लोक में वस्त्र निचोड़ने का विधान बताया गया था, किंतु यहाँ उस क्रिया के 'समय' पर विचार किया गया है।

तर्पण वह क्रिया है जिसमें साधक अपनी श्रद्धा और जल के माध्यम से देवताओं, ऋषियों और पितरों को तृप्त करता है। यह एक उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा का आदान-प्रदान है। कुछ आचार्यों का मत है कि जब साधक तर्पण के लिए तत्पर हो, तब उसके वस्त्रों में वह जल अभी भी विद्यमान रहना चाहिए जिसने उसे स्नान के समय पवित्र किया है। यदि तर्पण से पूर्व ही वस्त्र निचोड़ दिए जाएँ, तो वह जल 'उच्छिष्ट' होकर निम्नतर शक्तियों (प्रेतों आदि) के लिए समर्पित हो जाता है।

भाव यह है कि तर्पण के समय साधक का शरीर और वस्त्र उस दिव्य ऊर्जा के पात्र होने चाहिए। यदि वह पूर्व में ही निचोड़कर स्वयं को 'उच्छिष्ट-मुक्ति' की क्रिया में लगा देता है, तो तर्पण की पवित्रता और उसकी तीव्रता में न्यूनता आ सकती है। अतः, जब तक देवताओं और पितरों को उनका जल अर्पित न कर दिया जाए, तब तक वस्त्रों को निचोड़ने की क्रिया वर्जित है। यह निर्देश साधक को सिखाता है कि उच्च लक्ष्यों (देव-पितृ तर्पण) की सिद्धि के बाद ही निम्नतर दायित्वों (उच्छिष्टभागियों का भाग) का निपटारा करना चाहिए।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से, स्नान के पश्चात शरीर और वस्त्रों में जो आर्द्रता रहती है, वह एक प्रकार की 'संस्कार-शक्ति' है। तर्पण के समय यह आर्द्रता साधक के भीतर एक विशेष तरलता और ग्रहणशीलता उत्पन्न करती है, जो दिव्य शक्तियों के आह्वान में सहायक होती है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि ऊर्जा का प्रवाह एक क्रम में होता है। पहले 'ऊर्ध्वगामी' ऊर्जा (देव-तर्पण), फिर 'अधोगामी' या 'स्थूल' ऊर्जा (पितृ-तर्पण) और अंत में 'बाह्य' या 'अवशेष' ऊर्जा का विसर्जन (वस्त्र निष्पीडन)। यदि साधक क्रम उलट देता है, तो वह अपनी सूक्ष्म ऊर्जा को समय से पूर्व ही विसर्जित कर देता है। अतः अभ्यास यह है कि अपनी आंतरिक और बाहरी शुद्धि को तर्पण की पूर्णता तक सुरक्षित रखा जाए, ताकि दिव्य तरंगों का प्रवाह निर्बाध रूप से हृदय और मन में उतर सके।

अपसव्येन वस्त्रपीडनम्

श्लोक ७.४६

अन्नप्रकरवत्तस्य अपसव्येन पीडयेत् ।

पीडयित्वा ततः पश्चाज्जपं कुर्यात् सुविस्तरम् ॥ ७.४६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६१

अन्न बिखेरनेकी भाँति, उसे (वस्त्रको) अपसव्य (जनेऊ दाहिने कंधेपर) होकर निचोड़े; निचोड़नेके बाद विस्तारपूर्वक जप करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में तर्पण से पूर्व वस्त्र निचोड़ने का निषेध किया गया था ताकि पवित्र जल उच्छिष्ट न हो जाए। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य यह बता रहे हैं कि तर्पण की क्रिया पूर्ण होने के पश्चात, उस जल का विसर्जन किस रीति से किया जाए और उसके बाद जप की अवस्था क्या हो।

अन्वय और पदार्थ —

तस्य (स्नानवस्त्रस्य) अन्नप्रकरवत् अपसव्येन पीडयेत् । पीडयित्वा ततः पश्चात् सुविस्तरम् जपं कुर्यात् ।

पदार्थ:

• तस्य: उसके (स्नान-वस्त्र के)।

• अन्नप्रकरवत्: अन्न बिखेरने की रीति के समान। जिस प्रकार अन्न को किसी एक स्थान पर एकत्र न करके चारों ओर बिखेर दिया जाता है, उसी प्रकार जल को भी एक जगह एकत्र न कर बिखेरते हुए निचोड़ना।

• अपसव्येन: अपसव्य होकर। जब जनेऊ दाहिने कंधे पर हो (यजमान की स्थिति)। यह स्थिति पितृ-कर्म और विसर्जन के समय की होती है।

• पीडयेत्: निचोड़े।

• पीडयित्वा ततः पश्चात्: निचोड़ने के बाद, उसके पश्चात।

• सुविस्तरम् जपं कुर्यात्: विस्तारपूर्वक (दीर्घ समय तक या पूर्ण एकाग्रता से) जप करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी क्रिया का उद्देश्य सदैव आन्तरिक शुद्धि और ऊर्जा का सही प्रबंधन होता है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य वस्त्र निचोड़ने की एक विशिष्ट विधि बता रहे हैं।

जब साधक देवताओं और पितरों के तर्पण की क्रिया पूर्ण कर लेता है, तब उसके वस्त्रों में बचा हुआ जल अब 'उच्छिष्ट' की श्रेणी में आता है, क्योंकि वह तर्पण की प्रक्रिया से गुजर चुका है। इस जल को एक स्थान पर एकत्र करके निचोड़ना वर्जित है, क्योंकि एक स्थान पर एकत्र जल 'संचय' का प्रतीक है और वह निम्नतर शक्तियों को आकर्षित करता है। इसलिए ऋषि कहते हैं—'अन्नप्रकरवत्'। जिस प्रकार अन्न को बिखेरकर दिया जाता है ताकि वह सर्वव्यापी सूक्ष्म जीवों और भूतों की तृप्ति कर सके, उसी प्रकार वस्त्र को भी इस भाव से निचोड़ें कि जल भूमि पर बिखर जाए।

यहाँ 'अपसव्य' होने का विधान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैदिक परंपरा में 'सव्य' (जनेऊ बाएँ कंधे पर) देव-कर्म और उत्कर्ष का प्रतीक है, जबकि 'अपसव्य' (जनेऊ दाहिने कंधे पर) विसर्जन, पितृ-कर्म और त्याग का प्रतीक है। चूंकि वस्त्र निचोड़कर जल का विसर्जन करना एक प्रकार का त्याग और निम्नतर शक्तियों को तृप्त करना है, इसलिए यह क्रिया अपसव्य होकर ही की जानी चाहिए।

वस्त्र निचोड़ने के बाद, जब शरीर उस अतिरिक्त जल के भार से मुक्त हो जाता है और विसर्जन की क्रिया पूर्ण हो जाती है, तब साधक 'सुविस्तरम्' जप करता है। यहाँ 'सुविस्तरम्' का अर्थ केवल समय की लंबाई नहीं, बल्कि जप की गहराई और विस्तार है। जब बाहरी शुद्धि (स्नान) और ऋण-मुक्ति (तर्पण) और विसर्जन (वस्त्र-पीडन) पूर्ण हो जाते हैं, तब चित्त पूरी तरह रिक्त और शुद्ध होता है। इसी रिक्तता में किया गया जप सीधे हृदय तक उतरता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'त्याग' और 'एकाग्रता' के क्रम को समझाता है। योग में जब तक साधक अपने भीतर के 'मल' या अनावश्यक संस्कारों का विसर्जन नहीं करता, तब तक वह उच्च अवस्था के ध्यान में नहीं उतर सकता।

वस्त्र निचोड़ना यहाँ एक प्रतीक है—अपने भीतर के बचे हुए अवशेषों (उच्छिष्ट संस्कारों) को अपसव्य भाव (त्याग भाव) से बाहर निकालने का। जिस प्रकार गीले वस्त्र का भारीपन जप में बाधा डालता है, उसी प्रकार मानसिक भारीपन और आसक्ति साधक को विचलित करती है। जब साधक 'अपसव्य' होकर सब कुछ विसर्जित कर देता है, तब वह हल्का हो जाता है। इसी हल्केपन की स्थिति में 'सुविस्तरम्' जप का अभ्यास किया जाता है। यह वह भूमि है जहाँ जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं रहता, बल्कि एक विस्तार बन जाता है, जो साधक को स्थूल शरीर से हटाकर सूक्ष्म चैतन्य की ओर ले जाता है।

वस्त्रपीडनोत्तरं जपः

श्लोक ७.४७

उदके चोदकस्थस्तु स्थलस्थः स्थलके शुचिः ।

पादौ स्थाप्योभयत्रैव आचम्योभयतः शुचिः ॥ ७.४७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६१

जलमें हो तो जलमें खड़ा होकर, भूमिपर हो तो भूमिपर (आचमन करे); पवित्र (द्विज) दोनों पैर एक ही स्थानपर रखकर आचमन करे, (तभी) दोनों ओरसे शुद्ध होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में तर्पण के पश्चात वस्त्रों को अपसव्य होकर निचोड़ने और उसके बाद विस्तारपूर्वक जप करने की विधि बताई गई। अब महर्षि याज्ञवल्क्य आचमन की उस स्थिति का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ साधक की शारीरिक स्थिति (जल या थल) और उसके पैरों के संतुलन का शुद्धि से सम्बन्ध है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) उदके (सति) च उदकस्थः, स्थलके (सति) स्थलस्थः शुचिः (भवेत्) । उभयत्रैव पादौ स्थाप्य आचम्योभयतः शुचिः (भवेत्) ।

पदार्थ:

• उदके च उदकस्थः: जल में होने पर जल में ही स्थित रहे। अर्थात् यदि स्नान या तर्पण के समय साधक जल के भीतर है, तो आचमन के लिए बाहर न निकले।

• स्थलस्थः स्थलके: भूमि (थल) पर होने पर भूमि पर ही स्थित रहे।

• शुचिः: पवित्र। यहाँ शुद्धि का अर्थ केवल शारीरिक स्वच्छता नहीं, बल्कि क्रिया की निरंतरता और मानसिक एकाग्रता का बना रहना है।

• पादौ स्थाप्य: दोनों पैरों को (एक ही स्थान पर) स्थिर रखकर।

• उभयत्रैव: दोनों ही स्थितियों में (जल और थल दोनों में)।

• आचम्योभयतः शुचिः: दोनों ओर से शुद्ध होकर आचमन करे। 'उभयतः' का अर्थ है—बाहरी शरीर की शुद्धि और आन्तरिक प्राण-शक्ति का संतुलन।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी विधि के पीछे सदैव एक सूक्ष्म विज्ञान कार्य करता है। इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य आचमन के समय 'स्थिरता' और 'स्थान' के महत्त्व को रेखांकित कर रहे हैं।

सामान्यतः साधक क्रिया के बीच में स्थान परिवर्तन करता है, जिससे उसकी एकाग्रता भंग होती है और शरीर की ऊर्जा बिखर जाती है। ऋषि का निर्देश है कि यदि आप जल में हैं, तो वहीं रहकर आचमन करें और यदि भूमि पर हैं, तो वहीं रहें। यह निर्देश 'अविच्छिन्नता' के सिद्धांत पर आधारित है। जब साधक जल से बाहर आता है या भूमि पर अनावश्यक चलता है, तो वह अपनी उस सूक्ष्म ऊर्जा-मण्डल को विखंडित करता है जिसे उसने स्नान और तर्पण के माध्यम से निर्मित किया है।

विशेष रूप से 'पादौ स्थाप्य' (दोनों पैर एक ही स्थान पर रखकर) का निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है। आचमन केवल जल पीने की क्रिया नहीं है, बल्कि यह शरीर के भीतर प्राणों के प्रवाह को व्यवस्थित करने की एक विधि है। जब दोनों पैर एक ही स्थान पर स्थिर होते हैं, तब शरीर का गुरुत्व केंद्र संतुलित रहता है और ऊर्जा का क्षय नहीं होता। यदि पैर हिलते हैं या एक पैर आगे-पीछे होता है, तो शरीर में एक प्रकार का द्वैत उत्पन्न होता है, जो जप और ध्यान की पूर्व-तैयारी में बाधक है।

'उभयतः शुचिः' का गहरा अर्थ यह है कि जब साधक अपनी स्थिति में स्थिर होकर आचमन करता है, तब वह केवल जल से शरीर को शुद्ध नहीं करता, बल्कि अपनी स्थिरता से मन को भी शुद्ध करता है। यह बाहरी शुद्धि (जल) और आन्तरिक शुद्धि (स्थिरता) का संगम है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थिरता' का अभ्यास है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि शुद्धि केवल जल के स्पर्श से नहीं, बल्कि 'अचल' होने से आती है।

जब साधक दोनों पैरों को एक ही स्थान पर स्थिर रखकर आचमन करता है, तो वह वास्तव में अपने प्राणों को संकुचित कर हृदय और मस्तिष्क की ओर ऊपर उठाने का प्रयास करता है। पैरों की स्थिरता मन की स्थिरता का प्रतिबिंब है। यह अभ्यास साधक को 'चंचल' अवस्था से 'स्थिर' अवस्था की ओर ले जाता है। जो साधक अपने पैरों को स्थिर नहीं रख पाता, उसका मन जप के समय भी भटकता है। अतः, एक ही स्थान पर पैर रखकर आचमन करना, आगामी जप-साधना के लिए शरीर और मन को एक बिंदु पर केंद्रित करने का प्रथम सोपान है।

उदके तर्पणम्

श्लोक ७.४८

यत्राशुचिस्थलं वा स्यादुदके देवताः पितॄन् ।

तर्पयेत्तु यथाकाममप्सु सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ७.४८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६१

जहाँ भूमि अशुद्ध हो, वहाँ जलमें (खड़ा होकर) देवताओं और पितरोंका इच्छानुसार तर्पण करे; (क्योंकि) जलमें सब कुछ प्रतिष्ठित है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में आचमन के समय पैरों की स्थिरता और स्थान की शुद्धि का निर्देश दिया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस विशेष परिस्थिति का समाधान बता रहे हैं जहाँ साधक को बाहरी भूमि अशुद्ध मिले और तर्पण की विधि संपन्न करनी हो।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) यत्र अशुचिः स्थलम् वा स्यात्, (तत्र) उदके (स्थितः) देवताः पितॄन् तर्पयेत् तु यथाकामम्; (यतः) अप्सु सर्वं प्रतिष्ठितम्।

पदार्थ:

• यत्राशुचिस्थलं वा स्यात्: जहाँ भूमि अशुद्ध हो। 'अशुचि' का अर्थ है वह स्थान जो शारीरिक गंदगी, सूतक या किसी अन्य कारण से पवित्र न हो।

• उदके: जल में। यहाँ इसका अर्थ है जल के भीतर खड़े होकर या जल के प्रवाह में रहकर।

• देवताः पितॄन्: देवताओं और पितरों को। तर्पण की प्रक्रिया में पहले देवों का और फिर पितरों का स्मरण कर जल अर्पित किया जाता है।

• यथाकामम्: इच्छानुसार या शास्त्रोक्त विधि के अनुसार।

• अप्सु सर्वं प्रतिष्ठितम्: जल में सब कुछ प्रतिष्ठित है। 'अप्सु' (जल में) 'सर्वं' (समस्त दैवीय और पितृ शक्तियाँ) 'प्रतिष्ठितम्' (विराजमान/स्थित) हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी शुद्धि के नियमों का उद्देश्य साधक को उस मानसिक अवस्था में लाना है जहाँ वह सूक्ष्म शक्तियों से जुड़ सके। तर्पण एक अत्यंत संवेदनशील क्रिया है, जिसमें जल के माध्यम से पूर्वजों और देवताओं तक श्रद्धा पहुँचाई जाती है। सामान्य नियम यह है कि तर्पण शुचि भूमि पर खड़े होकर किया जाए, किन्तु यदि साधक ऐसी परिस्थिति में हो जहाँ भूमि अशुद्ध है, तो ऋषि एक विकल्प देते हैं—जल में रहकर तर्पण करना।

यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य एक महान रहस्य उद्घाटित करते हैं कि "जल में सब कुछ प्रतिष्ठित है"। इसका अर्थ यह है कि जल केवल एक भौतिक द्रव्य नहीं है, बल्कि वह 'चेतना का संवाहक' है। जल की प्रकृति सर्वव्यापी और ग्रहणशील है; वह अपने भीतर समस्त तत्वों और देवतत्वों को धारण करने की क्षमता रखता है। जब भूमि अशुद्ध होती है, तो वह पृथ्वी तत्व की अशुद्धि होती है, किन्तु जल (अप्सु) अपनी शुद्धता और प्रवाह के कारण उस अशुद्धि से ऊपर रहता है। अतः जल के भीतर खड़े होकर किया गया तर्पण न केवल मान्य है, अपितु वह सीधे उन शक्तियों तक पहुँचता है जो जल-तत्त्व में प्रतिष्ठित हैं।

विधिक रूप से यह निर्देश है कि यदि स्थल अशुद्ध हो, तो साधक जल में प्रवेश करे और वहीं से देवताओं तथा पितरों का तर्पण संपन्न करे। यहाँ 'यथाकामम्' शब्द का अर्थ यह नहीं है कि विधि को मनमाने ढंग से बदल दिया जाए, बल्कि यह है कि उपलब्ध संसाधनों और परिस्थिति के अनुसार, श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त तर्पण पूर्ण किया जाए।

योग-रहस्य —

योगी के लिए 'जल' केवल बाहरी नदी या सरोवर नहीं है, अपितु शरीर के भीतर बहने वाला 'सोम-रस' और प्राणों का प्रवाह है। इस श्लोक का आन्तर अर्थ यह है कि जब बाहरी जगत (स्थूल भूमि) अशुद्ध या विक्षुब्ध हो, तब साधक को अपने भीतर के जल-तत्त्व (अमृत या शांति) में उतर जाना चाहिए।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि परमात्मा और पितृ-तत्व (परम्परागत ज्ञान) केवल बाहर किसी विशेष स्थान पर नहीं, बल्कि चेतना के प्रवाह में प्रतिष्ठित हैं। जिस प्रकार जल में सब प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार हृदय के भीतर स्थित 'हृदयाकाश' के जलमय स्वरूप में समस्त देवतत्व विद्यमान हैं। अभ्यास यह है कि बाहरी अशुद्धियों से विचलित हुए बिना, साधक अपनी अंतःधारा में स्थित होकर अर्पण और समर्पण का भाव जगाए। यह स्थिति साधक को स्थूल जगत की सीमाओं से मुक्त कर उसे सूक्ष्म जगत की व्यापकता की ओर ले जाती है, जहाँ केवल 'शुद्ध चेतना' का प्रवाह शेष रहता है।

आचमननिमित्तानि

श्लोक ७.४९

आचान्तः पुनराचामेन्मन्त्रवत् स्नानभोजने ।

द्रुपदां वा त्रिरावर्त्य तथा चैवाघमर्षणम् ॥ ७.४९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६१

स्नान और भोजनमें आचमन कर चुका भी मन्त्रपूर्वक फिर आचमन करे — "द्रुपदादिव…" को तीन बार दोहराकर, अथवा अघमर्षणसे —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में अशुद्ध भूमि की स्थिति में जल में रहकर तर्पण करने की अनुमति दी गई थी। अब महर्षि याज्ञवल्क्य साधक को उस सूक्ष्म शुद्धि की ओर ले जा रहे हैं, जो केवल शारीरिक स्नान से पूर्ण नहीं होती, अपितु मन्त्रों के माध्यम से चेतना के स्तर पर की जाती है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) स्नान-भोजने आचान्तः (अपि) पुनर-आचामेन्-मन्त्रवत्; द्रुपदां वा त्रिरावर्त्य तथा च एव अघमर्षणम् (जपेत्)।

पदार्थ:

• आचान्तः: जो आचमन कर चुका है। यहाँ 'क्त' प्रत्यय यह दर्शाता है कि बाहरी विधि के अनुसार आचमन की क्रिया संपन्न हो चुकी है।

• पुनराचामेन्-मन्त्रवत्: मन्त्रों के साथ पुनः आचमन करे। 'मन्त्रवत्' का अर्थ है मन्त्रों की विधि के अनुसार।

• स्नान-भोजने: स्नान के समय और भोजन के समय।

• द्रुपदां: द्रुपद मन्त्रों को। ये वे मन्त्र हैं जो शरीर और मन के दोषों को दूर कर साधक को 'द्रु' (प्रवाह) और 'पद' (स्थिरता) के संतुलन में लाते हैं।

• त्रिरावर्त्य: तीन बार दोहराकर। संख्या तीन यहाँ त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) के शोधन का संकेत है।

• अघमर्षणम्: 'अघ' (पाप/दोष) का 'मर्षण' (मिटाना/रगड़कर साफ करना)। यह एक विशिष्ट मन्त्र है जो अंतःकरण की मलिनता को धोता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी शुद्धि और आंतरिक शुद्धि के बीच एक सेतु बनाया गया है। सामान्यतः स्नान और भोजन से पूर्व आचमन करना एक विहित क्रिया है, जिसे साधक संपन्न कर चुका होता है। किन्तु महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'पुनराचमन' का निर्देश देते हैं। यह निर्देश यह स्पष्ट करता है कि स्थूल जल से शरीर की शुद्धि तो हो जाती है, परन्तु मन्त्रों के बिना 'चित्त' की शुद्धि नहीं होती।

यहाँ दो विकल्प दिए गए हैं: पहला, 'द्रुपद' मन्त्रों का तीन बार जप करते हुए आचमन करना, और दूसरा, 'अघमर्षण' मन्त्र का प्रयोग करना। जब साधक स्नान करता है, तो वह केवल त्वचा को नहीं धोता, अपितु वह अपने अस्तित्व के विभिन्न स्तरों को शुद्ध करने का प्रयास करता है। भोजन के समय पुनः आचमन का निर्देश इसलिए है क्योंकि भोजन केवल शरीर का पोषण नहीं, बल्कि प्राण का संचय है; अतः अन्न ग्रहण करने से पूर्व मन का पूर्णतः शुद्ध और एकाग्र होना अनिवार्य है।

'अघमर्षण' का अर्थ है—दोषों का मर्दन करना। जिस प्रकार वस्त्र पर लगे कठिन दाग को रगड़कर साफ किया जाता है, उसी प्रकार मन्त्रों के कंपन से हृदय की गहराई में जमी वासनाओं और अशुद्धियों को हटाया जाता है। यह विधि विधिको मिटाती नहीं, बल्कि उसे अर्थ प्रदान करती है। बाहरी आचमन यदि हाथ से जल गिराना है, तो मन्त्रपूर्वक पुनराचमन उस जल को 'अमृत' में बदल देता है, जो साधक के भीतर के अशुद्धियों को धो देता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर संक्रमण का अभ्यास है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि केवल क्रिया पर्याप्त नहीं है, अपितु उस क्रिया के साथ मन्त्र का होना आवश्यक है।

द्रुपद मन्त्रों को तीन बार दोहराना साधक को उसकी मानसिक भूमियों के शोधन में सहायता करता है। प्रथम बार में स्थूल शरीर, द्वितीय बार में प्राण और तृतीय बार में मन की शुद्धि होती है। अघमर्षण का अभ्यास साधक को 'साक्षी' भाव में लाता है, जहाँ वह अपने दोषों को देख पाता है और उन्हें मन्त्र की अग्नि में भस्म करता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह केवल एक 'स्नातक' नहीं, अपितु एक 'शुद्ध चैतन्य' के रूप में भोजन या जप के लिए तत्पर होता है। यहाँ जल केवल एक माध्यम है, वास्तविक शोधन मन्त्र के नाद और साधक के संकल्प से हो रहा है।

श्लोक ७.५०

गायत्रीं वा त्रिरावर्त्य महाव्याहृतिभिस्तथा ।

सोपांशु प्रणवेनापि आपः पीता अघापहाः ॥ ७.५० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६१

— अथवा गायत्रीको तीन बार दोहराकर, अथवा महाव्याहृतियोंसे, अथवा उपांशु प्रणवसे — (इस प्रकार) पिया गया जल पापोंको दूर करता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में स्नान और भोजन के समय मन्त्रपूर्वक पुनः आचमन करने का निर्देश दिया गया था, जिसमें द्रुपद और अघमर्षण मन्त्रों का विकल्प बताया गया। वर्तमान श्लोक उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए आचमन के अन्य और अधिक सूक्ष्म विकल्पों को प्रस्तुत करता है, जो साधक को स्थूल शुद्धि से सूक्ष्म शुद्धिकरण की ओर ले जाते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(अथवा साधकः) गायत्रीं वा त्रिरावर्त्य, महाव्याहृतिभिस्तथा (वा), सोपांशु प्रणवेनापि (वा) — (एतादृशः) आपः पीता अघापहाः (भवन्ति)।

पदार्थ:

• गायत्रीं त्रिरावर्त्य: गायत्री मन्त्र को तीन बार दोहराकर। यहाँ 'त्रिरावर्त्य' का अर्थ है मन्त्र के पूर्ण चक्र को तीन बार संपन्न करना, जो पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ (तीन लोकों) के शोधन का प्रतीक है।

• महाव्याहृतिभिस्तथा: महाव्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) के साथ। व्याहृति वे शब्द हैं जो मन्त्र के द्वार खोलते हैं और चेतना को स्थूल से सूक्ष्म स्तर पर ले जाते हैं।

• सोपांशु प्रणवेनापि: उपांशु प्रणव के साथ। 'उपांशु' का अर्थ है वह जप जिसमें होंठ न हिलें, केवल जिह्वा और मन के भीतर ध्वनि गूँजे। 'प्रणव' (ओंकार) वह बीज है जिसमें समस्त वेद समाहित हैं।

• आपः पीता: पिया गया जल।

• अघापहाः: 'अघ' (पाप, दोष, अविद्या) का 'पहा' (नाश करने वाला)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में आचमन केवल जल पीने की क्रिया नहीं, अपितु जल को 'औषधि' और 'मन्त्र-शक्ति' में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। पिछले श्लोक में बताए गए द्रुपद और अघमर्षण मन्त्रों के अतिरिक्त, महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ तीन और विकल्प दे रहे हैं, जो साधक की पात्रता और उसकी साधना की गहराई के अनुसार हैं।

प्रथम विकल्प है—गायत्री का तीन बार जप। गायत्री इस सृष्टि का प्राण-मन्त्र है। जब साधक गायत्री के साथ जल ग्रहण करता है, तो वह जल केवल प्यास नहीं बुझाता, अपितु बुद्धि को प्रदीप्त करने वाला 'अमृत' बन जाता है।

द्वितीय विकल्प है—महाव्याहृतियों का प्रयोग। भूः, भुवः, स्वः केवल शब्द नहीं, अपितु अस्तित्व के तीन स्तर हैं। इन व्याहृतियों से अभिमन्त्रित जल जब शरीर में प्रवेश करता है, तो वह शरीर (भूः), प्राण (भुवः) और मन (स्वः) तीनों स्तरों पर शुद्धि करता है।

तृतीय और सबसे सूक्ष्म विकल्प है—उपांशु प्रणव। यहाँ 'उपांशु' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब प्रणव (ओंकार) को बिना होंठ हिलाए, केवल अंतःकरण में गुंजित करते हुए जल पिया जाता है, तो वह जल साधक की सूक्ष्म नाड़ियों और हृदय के भीतर तक शोधन करता है।

श्लोक का अंतिम निष्कर्ष है—'अघापहाः'। इसका भाव यह है कि मन्त्र-युक्त जल जब शरीर के भीतर जाता है, तो वह केवल भौतिक गंदगी नहीं, अपितु 'अघ' अर्थात् उन संस्कारों और दोषों को धो देता है जो आत्मा के प्रकाश को ढँक लेते हैं। यह जल अब साधारण जल नहीं, अपितु मन्त्र-मय ऊर्जा बन चुका है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'आन्तर स्नान' की विधि है। बाहरी स्नान त्वचा की शुद्धि करता है, किन्तु मन्त्रपूर्वक किया गया आचमन 'भीतरी स्नान' है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि मन्त्र की ध्वनि जब जल के साथ मिलकर शरीर के भीतर उतरती है, तो वह जल के माध्यम से पूरे शरीर के कोशों में प्रसारित हो जाती है।

साधक जब उपांशु प्रणव का अभ्यास करता है, तो वह अपनी चेतना को बाहरी जगत से हटाकर अंतर्मुखी करता है। जल का सेवन यहाँ केवल एक निमित्त है; वास्तविक क्रिया मन्त्र के द्वारा प्राणों का शोधन करना है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' (जल) से 'सूक्ष्म' (ध्वनि) और 'सूक्ष्म' से 'अक्षर' (प्रणव) की ओर ले जाता है।

इस क्रिया से साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर का अविद्या-अन्धकार (अघ) मन्त्र-ज्योति से धुल रहा है। यह अभ्यास उसे उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह शरीर और मन्त्र के भेद को मिटाकर स्वयं को 'अक्षर' रूप में देखने का प्रयास करता है। यहाँ जल पीना एक योगिक क्रिया बन जाती है, जिससे अंतःकरण की मलिनता समाप्त होती है और साधक अगले चरण—प्राणसंयम और सूर्योपस्थान—के लिए तैयार होता है।

आदित्योपस्थानम्

श्लोक ७.५१

आचम्य पाव्य चात्मानं निरायाम्य (त्रिरायम्य) शनैरसून् ।

अथोपतिष्ठेदादित्यमूर्ध्वं पुष्पान्वितं जलम् ॥ ७.५१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६१

आचमन करके, अपनेको पवित्र करके, धीरे-धीरे प्राणोंका (तीन बार) संयम करके, फिर फूलों सहित जल ऊपर (अर्पित) करके सूर्यका उपस्थान करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में स्नान और भोजन के समय मन्त्रपूर्वक पुनः आचमन करने की विधियों का वर्णन था, जिससे जल 'अघापहा' (पापों का नाश करने वाला) बन जाता है। अब साधक उस आंतरिक और बाह्य शुद्धि के पश्चात सूर्य के सम्मुख उपस्थित होने की तैयारी करता है, जहाँ स्थूल जल का अर्पण सूक्ष्म ज्योति के मिलन का माध्यम बनता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) आचम्य, पाव्य च आत्मानं, निरायाम्य (अथवा त्रिरायम्य) शनैः असुन्, अथ आदित्यमूर्ध्वं पुष्पान्वितं जलं (प्रक्षिप्य) उपतिष्ठेत्।

पदार्थ:

• आचम्य: आचमन करके। यहाँ आचमन केवल जल पीना नहीं, अपितु पिछले श्लोकों में वर्णित मन्त्रों द्वारा जल को संस्कारित कर शरीर के भीतर उतारना है।

• पाव्य च आत्मानं: अपने आप को पवित्र करके। 'पाव्य' का अर्थ है वह शुद्धि जो केवल जल से नहीं, अपितु मन्त्र और संकल्प से आती है।

• निरायाम्य (त्रिरायम्य): प्राणों का संयम करके (तीन बार)। 'निरायाम्य' का अर्थ है श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करना। कोष्ठक में 'त्रिरायम्य' यह स्पष्ट करता है कि यह प्रक्रिया तीन बार की जानी चाहिए।

• शनैः असुन्: धीरे-धीरे प्राणों को। 'असु' का अर्थ है प्राण। 'शनैः' शब्द संकेत देता है कि यह संयम झटके से नहीं, अपितु अत्यंत सहजता और सूक्ष्मता से होना चाहिए।

• अथोपतिष्ठेदादित्यमूर्ध्वं: फिर सूर्य के सम्मुख ऊपर की ओर (दृष्टि या अर्पण के साथ) उपस्थित हो। 'उपस्थान' का अर्थ है किसी देवता के सम्मुख पूर्ण पात्रता और श्रद्धा के साथ खड़े होना।

• पुष्पान्वितं जलम्: फूलों से युक्त जल। पुष्प हृदय की प्रफुल्लता और भक्ति का प्रतीक हैं, और जल जीवन की तरलता का।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में सूर्योपस्थान केवल एक बाह्य कर्मकांड नहीं है, अपितु यह 'पिण्ड' (शरीर) का 'ब्रह्माण्ड' (सूर्य) के साथ तादात्म्य स्थापित करने की एक योगिक प्रक्रिया है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक निश्चित क्रम बता रहे हैं: पहले आचमन, फिर आत्म-पवित्रीकरण, फिर प्राण-संयम और अंत में अर्पण।

प्रथम चरण 'आचमन' और 'पावन' है। जब साधक मन्त्रयुक्त जल पीता है, तो वह जल केवल कंठ से नीचे नहीं जाता, अपितु उसके भीतर की अशुद्धियों को धोता है। यह 'पाव्य' अवस्था है, जहाँ शरीर एक मंदिर के समान शुद्ध हो जाता है।

द्वितीय चरण 'निरायाम्य' है। यहाँ याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगिक निर्देश दे रहे हैं—'शनैः असुन्'। सूर्य की ऊर्जा प्रचंड है; यदि साधक अस्थिर मन और उच्छृंखल प्राणों के साथ उसके सम्मुख जाएगा, तो वह उस ऊर्जा को आत्मसात नहीं कर पाएगा। इसलिए, तीन बार धीरे-धीरे प्राणों का संयम करने का विधान है। यह तीन बार का संयम पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ के प्राणों को एक सूत्र में पिरोने जैसा है, जिससे साधक की चेतना स्थिर हो जाती है।

तृतीय चरण 'पुष्पान्वित जल' का अर्पण है। जब साधक ऊर्ध्व दिशा में जल अर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपनी सीमित चेतना को अनंत सूर्य-प्रकाश में विलीन करने का प्रयास करता है। जल का ऊपर जाना, नीचे की जड़ता से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है। पुष्पों का साथ होना यह दर्शाता है कि यह अर्पण केवल कर्तव्य नहीं, अपितु प्रेम और समर्पण है।

इस प्रकार, आचमन से शुद्धि, प्राणायाम से स्थिरता और अर्पण से समर्पण—इन तीनों के मिलन से 'सूर्योपस्थान' पूर्ण होता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'ऊर्ध्वगमन' है। 'आचमन' के द्वारा साधक अपनी आंतरिक जठराग्नि और प्राण को जाग्रत करता है। 'त्रिरायम्य' (तीन बार प्राण संयम) का अभ्यास साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाता है। जब श्वास अत्यंत धीमी (शनैः) हो जाती है, तब मन की चंचलता समाप्त होती है और हृदय में स्थित 'अन्तरिक सूर्य' (हृदय-ज्योति) जाग्रत होने लगता है।

यहाँ 'ऊर्ध्वं' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग में ऊर्ध्वगमन का अर्थ है प्राणों का नीचे की वासनाओं से उठकर ऊपर की ओर बढ़ना। जब साधक जल अर्पित करते हुए सूर्य की ओर देखता है, तो वह बाह्य सूर्य के माध्यम से अपने भीतर के उस 'अक्षर' को खोजने का प्रयास करता है, जो सूर्य को भी प्रकाशित करता है। इस अभ्यास से साधक 'भय' और 'जड़ता' की भूमि से उठकर 'प्रकाश' और 'चेतना' की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

जपयज्ञः

श्लोक ७.५२

प्रक्षिप्योद्वयमुदुत्यं चित्रं तच्चक्षुरित्यपि ।

हंसःशुचिषदेतानि शुभानि पावनानि च ॥ ७.५२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६१

(जल) अर्पित करके "उद्वयं (तमसस्परि)…", "उदु त्यम्…", "चित्रं (देवानाम्)…", "तच्चक्षुः…" और "हंसः शुचिषत्…" — ये शुभ और पावन (मन्त्र) —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक ने आचमन, आत्म-पावन और प्राण-संयम के माध्यम से स्वयं को तैयार किया और पुष्प-जल अर्पित कर सूर्योपस्थान की स्थिति ग्रहण की। अब इस श्लोक में उन विशिष्ट मन्त्रों का संकेत दिया गया है, जिनका जप जल अर्पण के समय करना है, ताकि बाह्य अर्पण आंतरिक ज्योति-जाग्रति में परिवर्तित हो सके।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) उद्वयं, उदुत्यं, चित्रं, तच्चक्षुः इति अपि, हंसः शुचिषत् — एतानि (मन्त्राणि) प्रक्षिप्य (अर्पितं कुरुयात्); (एतानि) शुभानि पावनानि च (सन्ति)।

पदार्थ:

• प्रक्षिप्य: जल अर्पित करते हुए। यहाँ 'प्रक्षिप्' धातु का अर्थ केवल जल गिराना नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति को जल के माध्यम से सूर्य (परमात्मा) की ओर प्रक्षेपित करना है।

• उद्वयं, उदुत्यं, चित्रं, तच्चक्षुः, हंसः शुचिषत्: ये पाँचों मन्त्रों के आरम्भिक शब्द (प्रतीक) हैं। ये मन्त्र सूर्य की विभिन्न अवस्थाओं और उसकी प्रकाशमय प्रकृति का वर्णन करते हैं।

• शुभानि पावनानि: ये मन्त्र केवल शुभ (कल्याणकारी) ही नहीं, अपितु पावन (शुद्ध करने वाले) भी हैं। 'पावन' वह है जो साधक के भीतर के मल (अविद्या) को धो डाले।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में सूर्योपस्थान की यह विधि केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, अपितु एक सूक्ष्म योग-प्रक्रिया है। जब साधक जल अर्पित करता है, तब वह वास्तव में अपनी जड़ता और अहंकार को सूर्य की अग्नि में होम कर रहा होता है। इस प्रक्रिया में पाँच मन्त्रों का उल्लेख है, जो साधक की चेतना को निम्न से उच्च की ओर ले जाते हैं:

१. 'उद्वयं' (तमसस्परि): यह मन्त्र अंधकार से ऊपर उठने का संकेत है। जैसे सूर्य तमस को चीरकर उदय होता है, वैसे ही साधक अपनी अविद्या के अंधकार से ऊपर उठता है।

२. 'उदु त्यम्': यह उत्थान का प्रतीक है। यह साधक को भौतिकता से ऊपर उठाकर सूक्ष्म जगत की ओर प्रेरित करता है।

३. 'चित्रं' (देवानाम्): सूर्य का स्वरूप 'चित्र' है, अर्थात् वह अनंत रंगों और गुणों का स्रोत है। यहाँ साधक ईश्वर की विविधता और उसकी विराटता का अनुभव करता है।

४. 'तच्चक्षुः': सूर्य को जगत की आँख (चक्षु) कहा गया है। इस मन्त्र के साथ साधक अपनी बाह्य दृष्टि को आंतरिक दृष्टि (दिव्य-चक्षु) में बदलने का प्रयास करता है।

५. 'हंसः शुचिषत्': हंस पवित्रता और विवेक का प्रतीक है। यह मन्त्र साधक को उस स्थिति में लाता है जहाँ वह 'नीर-क्षीर' विवेक की भाँति सत्य और असत्य का भेद कर सके और पूर्णतः शुद्ध (शुचि) हो जाए।

ये मन्त्र 'शुभ' और 'पावन' इसलिए हैं क्योंकि ये साधक के चित्त को सूर्य के समान प्रदीप्त कर देते हैं। जब जल की बूँदें सूर्य की ओर बढ़ती हैं, तब मन्त्रों के प्रभाव से साधक का मन भी अपनी मूल स्थिति (सूर्य-पुरुष) की ओर अग्रसर होता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'अर्घ्य-दान' के माध्यम से 'चित्त-दान' का अभ्यास है। साधक जब 'उद्वयं' और 'उदु त्यम्' जैसे मन्त्रों का जप करता है, तो वह अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है। 'तच्चक्षुः' का अभ्यास करते समय वह अपनी दृष्टि को सूर्य के केंद्र में स्थिर करता है, जिससे उसकी एकाग्रता बढ़ती है। 'हंसः शुचिषत्' के माध्यम से वह स्वयं को उस शुद्ध हंस (जीवात्मा) के रूप में अनुभव करता है जो अब माया के बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा के प्रकाश में विलीन होने को तत्पर है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर के बोध से हटाकर सूक्ष्म ज्योति-स्वरूप की ओर ले जाता है।

श्लोक ७.५३

एतज्जपेदूर्ध्वबाहुः सूर्यमीक्षन् समाहितः ।

गायत्र्या तु यथाशक्ति चोपस्थाय दिवाकरम् ॥ ७.५३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६२

— भुजाएँ ऊपर उठाये, सूर्यको देखता हुआ, समाहित होकर जपे; और यथाशक्ति गायत्रीसे सूर्यका उपस्थान करके —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में सूर्योपस्थान के लिए प्रयुक्त होने वाले पावन मन्त्रों का उल्लेख किया गया था। अब इस श्लोक में उन मन्त्रों के जप के समय साधक की शारीरिक स्थिति, मानसिक अवस्था और दृष्टि के केंद्र का निर्धारण किया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) उर्ध्वबाहुः, सूर्यम् ईक्षन्, समाहितः (एतज्जपेत्); दिवाकरम् उपस्थाय तु गायत्रीया यथाशक्ति (जपेत्)।

पदार्थ:

• उर्ध्वबाहुः: भुजाएँ ऊपर उठाई हुई। यह केवल एक शारीरिक मुद्रा नहीं, अपितु चेतना के आरोहण का संकेत है।

• सूर्यमीक्षन्: सूर्य को देखते हुए। यहाँ 'ईक्षण' का अर्थ केवल आँखों से देखना नहीं, अपितु दृष्टि को सूर्य के प्रकाश में विलीन करना है।

• समाहितः: एकाग्रचित्त होकर। जब मन बाहरी जगत से हटकर केवल एक ही लक्ष्य (सूर्य/परमात्मा) में स्थित हो जाए, वह समाहित अवस्था है।

• यथाशक्ति: अपनी सामर्थ्य के अनुसार। यहाँ सामर्थ्य का अर्थ शारीरिक बल नहीं, अपितु साधक की आध्यात्मिक परिपक्वता और उसकी एकाग्रता की क्षमता है।

• उपस्थाय: समीप खड़े होकर या उपस्थित होकर। सूर्य के सम्मुख उपस्थित होना वास्तव में स्वयं के अहंकार का विसर्जन कर उस विराट ज्योति के समक्ष समर्पण करना है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यह निर्देश दिया गया है कि पूर्व में वर्णित शुभ मन्त्रों का जप करते समय साधक की स्थिति 'उर्ध्वबाहु' होनी चाहिए। जब भुजाएँ ऊपर उठती हैं, तो शरीर में प्राण का प्रवाह ऊपर की ओर गति करता है। यह मुद्रा साधक को भौतिकता के बंधन से मुक्त कर उच्चतर चेतना की ओर ले जाती है।

यहाँ 'सूर्यमीक्षन्' और 'समाहितः' शब्दों का साथ आना अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः सूर्य को देखना आँखों के लिए कष्टकारी हो सकता है, किंतु यहाँ 'समाहित' होने का निर्देश है। इसका भाव यह है कि साधक सूर्य के भौतिक गोले को नहीं, अपितु उस ज्योति-पुंज को देखे जो उसके भीतर भी विद्यमान है। जब बाह्य सूर्य और आंतरिक सूर्य (हृदय-ज्योति) एक हो जाते हैं, तब दृष्टि 'समाहित' हो जाती है।

इसके पश्चात, दिवाकर (सूर्य) का उपस्थान करते हुए गायत्री मन्त्र के जप का विधान है। गायत्री मन्त्र इस पूरी प्रक्रिया का शिखर है। 'यथाशक्ति' शब्द यहाँ संकेत देता है कि गायत्री का जप केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि उस 'भर्ग' (तेज) का अनुभव करना है। जो साधक जितना अधिक समाहित हो सकता है, वह उतना ही गहरा गायत्री का अनुभव करता है। यह प्रक्रिया बाह्य अर्घ्य देने से आरम्भ होकर, मन्त्रों के माध्यम से आंतरिक प्रकाश की प्राप्ति तक विस्तृत होती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक शरीर को ही 'यज्ञ-वेदी' और 'अर्घ्य' बनाने की विधि है। जब साधक उर्ध्वबाहु होकर सूर्य की ओर देखता है, तो वह स्वयं को एक सेतु के रूप में स्थापित करता है, जो पृथ्वी (स्थूल) को सूर्य (सूक्ष्म/परमात्मा) से जोड़ता है।

१. शारीरिक अभ्यास: भुजाओं को ऊपर उठाने से वक्षस्थल खुलता है और प्राण का संचार ऊर्ध्वगामी होता है। यह मुद्रा साधक को सजग और जाग्रत करती है।

२. दृष्टि अभ्यास (त्राटक): सूर्य की ओर देखते हुए समाहित होना एक प्रकार का दिव्य त्राटक है। इसमें साधक अपनी दृष्टि को सूर्य के प्रकाश में विलीन कर देता है, जिससे मन की चंचलता समाप्त होती है और चित्त एकनिष्ठ हो जाता है।

३. अनुभव: इस स्थिति में साधक अनुभव करता है कि वह केवल सूर्य को नहीं देख रहा, बल्कि सूर्य के प्रकाश के माध्यम से वह स्वयं भी प्रकाशित हो रहा है।

४. भूमि परिवर्तन: साधक यहाँ 'क्रिया-भूमि' (जल अर्पण) से 'ध्यान-भूमि' (समाहित होकर जप) की ओर प्रस्थान करता है। गायत्री के जप के साथ वह 'अक्षर-भूमि' की ओर बढ़ता है, जहाँ केवल प्रकाश और चैतन्य शेष रहता है।

श्लोक ७.५४

विभ्राडित्यनुवाकेन सूक्तेन पुरुषस्य तु ।

शिवसंकल्पेन तथा मण्डलब्राह्मणेन तु ॥ ७.५४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६२

— "विभ्राड्…" अनुवाकसे, पुरुषसूक्तसे, शिवसंकल्प (सूक्त) से, और मण्डलब्राह्मणसे —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में सूर्योपस्थान की शारीरिक मुद्रा और गायत्री जप की सामर्थ्यानुसार विधि बताई गई थी। अब इस श्लोक में उन विशिष्ट सूक्तों और अनुवाकों का विवरण दिया गया है, जिनसे सूर्य-साधना पूर्ण होती है और साधक विराट पुरुष के साथ एकाकार होता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) विभ्राड्-इत्यनुवाकेन, पुरुषस्य सूक्तेन, शिवसंकल्पेन तथा मण्डलब्राह्मणेन (तु जपेत्)।

पदार्थ:

• विभ्राड्-इत्यनुवाकः: 'विभ्राड्' शब्द से आरम्भ होने वाला अनुवाक। यह सूर्य की किरणों के विस्तार और चेतना के प्रस्फुटन का सूचक है।

• पुरुषस्य सूक्तम्: पुरुषसूक्त। वह ऋचाएँ जो उस एक विराट पुरुष का वर्णन करती हैं जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड व्याप्त है।

• शिवसंकल्पः: शिवसंकल्प सूक्त। वह मन्त्र-समूह जो चित्त को कल्याणकारी संकल्पों (शिव) में स्थित करता है।

• मण्डलब्राह्मणम्: मण्डलब्राह्मण। सूर्य के मण्डल और उसकी व्यापकता का बोध कराने वाला ब्राह्मण-अंश।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में सूर्योपस्थान के क्रम में अब उन उच्चतर मन्त्रों का निर्देश है, जो साधक को केवल व्यक्तिगत प्रार्थना से उठाकर वैश्विक चेतना में विलीन कर देते हैं। यह श्लोक पिछले श्लोक (७.५३) के क्रिया-भाग का विस्तार है; अर्थात् 'यथाशक्ति' जो जप करना है, उसमें इन सूक्तों का समावेश है।

सर्वप्रथम 'विभ्राड्' अनुवाक का उल्लेख है। जब साधक उर्ध्वबाहु होकर सूर्य को देखता है, तब वह केवल बाहरी सूर्य को नहीं, अपितु अपने भीतर के उस तेज को जाग्रत करता है जो 'विभ्राड्' (विस्तारित) होकर संपूर्ण अस्तित्व को आलोकित करता है। इसके पश्चात 'पुरुषसूक्त' का जप है। पुरुषसूक्त का रहस्य यह है कि साधक यह अनुभव करे कि जिस सूर्य को वह बाहर देख रहा है, वही विराट पुरुष उसके भीतर भी स्थित है। यह बाह्य सूर्य और आंतरिक सूर्य के बीच की दूरी को समाप्त करने की विधि है।

तदुपरांत 'शिवसंकल्प' का निर्देश है। योगिक दृष्टि से, जब साधक सूर्य की ज्योति में समाहित होता है, तब उसके मन के सारे विकार भस्म हो जाते हैं। उस रिक्तता में 'शिवसंकल्प' का बीजारोपण किया जाता है, जिससे साधक का संकल्प लोक-कल्याणकारी और शुद्ध हो जाता है। अंत में 'मण्डलब्राह्मण' का जप है, जो साधक को यह बोध कराता है कि वह स्वयं उस सूर्य-मण्डल का एक अंश है और उसका विस्तार अनंत है।

यह क्रम अत्यंत वैज्ञानिक है: पहले विस्तार (विभ्राड्), फिर विराटता का बोध (पुरुषसूक्त), फिर मानसिक शुद्धि (शिवसंकल्प) और अंत में पूर्णता का अनुभव (मण्डलब्राह्मण)।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की यात्रा है। पुरुषसूक्त के जप के समय साधक अपनी देह-चेतना को विराट पुरुष की देह में विलीन करता है। शिवसंकल्प का अभ्यास उसे 'संकल्प-सिद्धि' की ओर ले जाता है, जहाँ मन की चंचलता समाप्त होकर एक बिंदु पर स्थिर हो जाती है। मण्डलब्राह्मण का जप करते समय साधक अनुभव करता है कि उसकी चेतना अब शरीर की सीमाओं में नहीं, अपितु सूर्य के समान एक व्यापक मण्डल में फैल गई है। यह अभ्यास साधक को 'अहं' से 'विराट' की भूमि पर ले जाता है।

श्लोक ७.५५

दिवाकीर्त्यैस्तथान्यैश्च सौरैर्मन्त्रैश्च शक्तितः ।

जपयज्ञोऽपि कर्तव्यः सर्ववेदप्रणीतकैः ॥ ७.५५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६२

— दिनमें कीर्तनीय (सूर्यके) तथा अन्य सौर मन्त्रोंसे यथाशक्ति (उपस्थान करे)। सब वेदोंके मन्त्रोंसे जपयज्ञ भी करना चाहिए —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में सूर्योपस्थान के लिए विशिष्ट सूक्तों और अनुवाकों का निर्देश दिया गया था, जो साधक को विराट पुरुष के साथ एकाकार करते हैं। अब इस श्लोक में सूर्य-साधना के विस्तार और 'जपयज्ञ' के व्यापक स्वरूप का वर्णन है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) दिवा कीर्त्यैः तथा अन्यैः सौरमन्त्रैः च शक्तितः (उपस्थानं कुर्यात्)। सर्ववेदप्रणीतकैः (मन्त्रैः) जपयज्ञोऽपि कर्तव्यः।

पदार्थ:

• दिवा कीर्त्यैः: दिन के समय गाए जाने वाले स्तुति-मन्त्रों (कीर्तनों) से।

• सौरमन्त्रैः: सूर्य के स्वरूप, तेज और शक्ति को समर्पित विशिष्ट मन्त्रों से।

• शक्तितः: अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार।

• सर्ववेदप्रणीतकैः: चारों वेदों (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व) द्वारा प्रणीत या उनमें रचित मन्त्रों से।

• जपयज्ञः: जप को ही 'यज्ञ' के रूप में करना। यहाँ जप केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं, अपितु एक आहुति है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ सूर्योपस्थान की विधि को पूर्णता प्रदान की जा रही है। पिछले श्लोकों में 'उद्वयम्', 'पुरुषसूक्त' आदि विशिष्ट मन्त्रों का उल्लेख था, किन्तु यहाँ ऋषि याज्ञवल्क्य साधक को व्यापकता प्रदान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि दिन के समय सूर्य की स्तुति के लिए जो भी कीर्तनीय मन्त्र और सौरमन्त्र उपलब्ध हैं, साधक अपनी शक्ति और समय के अनुसार उनका प्रयोग करे।

यहाँ 'शक्तितः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग मार्ग में जबरदस्ती या अति-प्रयास के स्थान पर अपनी वर्तमान क्षमता के अनुसार साधना का विस्तार करने का निर्देश है। बाहरी रूप से यह सूर्य की स्तुति है, किन्तु आन्तरिक रूप से यह साधक के भीतर स्थित 'सूर्य-पुरुष' (आत्मा) का आवाहन है।

इस श्लोक का दूसरा भाग एक महान सिद्धान्त प्रस्तुत करता है— 'जपयज्ञ'। सामान्यतः यज्ञ का अर्थ अग्नि में आहुति देना होता है, किन्तु यहाँ जप को ही यज्ञ कहा गया है। जब मन्त्र का जप एकाग्रता, श्रद्धा और प्राण-संयम के साथ किया जाता है, तब वह शब्द-ब्रह्म की आहुति बन जाता है। 'सर्ववेदप्रणीतकैः' कहकर याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट करते हैं कि सत्य एक है और चारों वेदों के मन्त्र उसी एकपरम तत्त्व की ओर ले जाते हैं। अतः साधक केवल एक वेद तक सीमित न रहकर, वेदों के उस सार का जप करे जो उसकी चेतना को उन्नत करे। यह विधान बाहरी कर्मकाण्ड से ऊपर उठकर मन्त्र-शक्ति के माध्यम से चित्त की शुद्धि का मार्ग है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'शब्द' से 'अर्थ' और 'अर्थ' से 'साधक' (स्वयं) की ओर यात्रा है।

१. सौरमन्त्रों का अभ्यास: जब साधक सौरमन्त्रों का जप करता है, तो वह अपने हृदय-कमल में स्थित सूर्य-तेज का ध्यान करता है। बाहरी सूर्य की किरणों और भीतर के तेज का समन्वय ही वास्तविक उपस्थान है।

२. जपयज्ञ का अनुभव: साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसका प्रत्येक मन्त्र एक आहुति है। जैसे अग्नि में आहुति देने से पदार्थ भस्म होकर सूक्ष्म हो जाता है, वैसे ही जपयज्ञ में साधक के 'अहंकार' और 'विकार' मन्त्र की अग्नि में भस्म होते जाते हैं।

३. भूमि परिवर्तन: यह अभ्यास साधक को 'क्रिया-भूमि' (बाहरी पूजा) से उठाकर 'ज्ञान-भूमि' (मन्त्र-साधना) की ओर ले जाता है। जब वह सर्ववेदप्रणीत मन्त्रों का आश्रय लेता है, तो उसकी दृष्टि संकुचित न रहकर सार्वभौमिक हो जाती है, जिससे वह स्वयं को संपूर्ण ब्रह्मांड (विराट) के साथ संयुक्त अनुभव करने लगता है।

श्लोक ७.५६

पवित्रैर्विविधैश्चान्यैर्गुह्योपनिषदा तथा ।

अध्यात्मविद्या विविधा जप्तव्या जपसिद्धये ॥ ७.५६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६२

— विविध पवित्र मन्त्रोंसे, और गुह्य उपनिषद्‌से; जपकी सिद्धिके लिए विविध अध्यात्मविद्याका जप करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में सूर्योपस्थान के लिए सौरमन्त्रों और सर्ववेद-प्रणीत जपयज्ञ का निर्देश दिया गया था। अब इस श्लोक में उस जपयज्ञ की गहराई और उसकी सिद्धि के लिए प्रयुक्त होने वाले सूक्ष्म साधनों—गुह्य उपनिषदों और अध्यात्मविद्याओं—का वर्णन है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) पवित्रैः विविधैः च अन्यैः (मन्त्रैः), तथा गुह्योपनिषदा, विविधा अध्यात्मविद्या (अपि) जप्तव्या (अस्ति), जपसिद्धये।

पदार्थ:

• पवित्रैः विविधैः च अन्यैः: अन्य विविध पवित्र मन्त्रों से। यहाँ 'पवित्र' का अर्थ केवल शब्दों की शुद्धि नहीं, अपितु वे मन्त्र हैं जो चित्त को निर्मल कर उसे उच्चतर अवस्था में ले जाने की क्षमता रखते हैं।

• गुह्योपनिषदा: गुह्य उपनिषदों के द्वारा। 'गुह्य' का अर्थ है वह रहस्य जो केवल योग्य शिष्य को गुरु द्वारा दिया जाता है और जिसे बाहरी जगत से गुप्त रखा जाता है। उपनिषद् का शाब्दिक अर्थ है—पास बैठना (उप-नि-षद), अर्थात् गुरु के समीप बैठकर प्राप्त किया गया ब्रह्म-ज्ञान।

• अध्यात्मविद्या विविधा: आत्मा के स्वरूप, उसकी स्थिति और परमात्मा के साथ उसके सम्बन्ध का बोध कराने वाली विभिन्न विद्याएँ।

• जपसिद्धये: जप की सिद्धि के लिए। यहाँ सिद्धि का अर्थ केवल चमत्कार नहीं, अपितु मन्त्र का 'सिद्ध' हो जाना है, अर्थात् जब मन्त्र शब्द से ऊपर उठकर साधक के अनुभव और प्राण में विलीन हो जाए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ जप की प्रक्रिया को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जा रहे हैं। पिछले श्लोकों में सूर्योपस्थान और सौरमन्त्रों की विधि बताई गई, जो कि बाहरी क्रिया और उपासना का भाग है। किन्तु इस श्लोक में वे 'गुह्य उपनिषदों' और 'अध्यात्मविद्याओं' का उल्लेख कर रहे हैं।

इसका भाव यह है कि केवल मन्त्रों की संख्या पूरी करना जप नहीं है, अपितु उन मन्त्रों के पीछे छिपे 'अर्थ' और 'तत्त्व' का साक्षात्कार करना ही वास्तविक जप है। जब साधक पवित्र मन्त्रों के साथ-साथ उपनिषदों के रहस्यों का चिंतन करता है, तब उसका जप केवल एक यांत्रिक क्रिया न रहकर एक 'विद्या' बन जाता है।

यहाँ 'गुह्य उपनिषद्' का संकेत किसी एक विशिष्ट ग्रन्थ की ओर मात्र नहीं है, अपितु उन सभी गोपनीय उपदेशों की ओर है जो श्रुति के बीज-रूप में विद्यमान हैं। जब साधक इन रहस्यों को अपने जप में सम्मिलित करता है, तब वह 'जपसिद्धि' की ओर बढ़ता है। जप की सिद्धि तब होती है जब जप करने वाला, जप की जाने वाली वस्तु (मन्त्र) और जिसका जप किया जा रहा है (इष्ट/ब्रह्म), तीनों एक हो जाएँ।

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जपयज्ञ में कर्म (मन्त्र जप) और ज्ञान (उपनिषद्/अध्यात्मविद्या) का समन्वय अनिवार्य है। बिना ज्ञान के जप अंधा है और बिना जप के ज्ञान निराधार है। अतः जप की पूर्णता के लिए अध्यात्मविद्या का आश्रय लेना चाहिए।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म' और 'ज्ञान' की संधि-स्थली है। साधक जब सूर्योपस्थान और सौरमन्त्रों का अभ्यास करता है, तो वह बाहरी जगत के तेज से जुड़ता है। किन्तु जब वह 'गुह्य उपनिषदों' और 'अध्यात्मविद्या' का जप करता है, तो वह अपने भीतर के 'अन्तर्यामी सूर्य' की खोज करता है।

साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह मन्त्र के शब्दों के साथ-साथ उसके आन्तरिक अर्थ (भाव) का ध्यान करे। उदाहरण के लिए, यदि वह किसी मन्त्र का जप कर रहा है, तो साथ ही यह विचार करे कि यह मन्त्र उसके हृदय-आकाश में किस प्रकाश को जाग्रत कर रहा है।

जप की सिद्धि की तीन भूमियाँ यहाँ संकेतित हैं:

१. वैखरी: पवित्र मन्त्रों का स्पष्ट उच्चारण।

२. मध्यमा/पश्यन्ती: गुह्य उपनिषदों के रहस्यों का मानसिक चिंतन।

३. परा: अध्यात्मविद्या के माध्यम से अक्षर-ब्रह्म में विलीन हो जाना।

इस प्रकार, साधक बाहरी विधि (स्नान, तर्पण, सूर्योपस्थान) से आरम्भ कर, मन्त्रों के माध्यम से सूक्ष्म होता है और अंततः अध्यात्मविद्या के जप से उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ 'जप' समाप्त हो जाता है और केवल 'साक्षी' शेष रहता है। यही जप की वास्तविक सिद्धि है।

ब्रह्मयज्ञः

श्लोक ७.५७

प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्योपविश्य च ।

दर्भेषु दर्भपाणिः स्यात् प्राङ्मुखस्तु कृताञ्जलिः ॥ ७.५७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६२

प्रदक्षिणा करके, नमस्कार करके, कुशोंपर बैठकर, हाथमें कुश लिये, पूर्वकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े हुए —

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में सूर्योपस्थान के लिए सौरमन्त्रों, जपयज्ञ और गुह्य अध्यात्मविद्याओं के अभ्यास का निर्देश दिया गया था। अब साधक उस आंतरिक जप और उपासना के उपरान्त, ब्रह्मयज्ञ अर्थात् स्वाध्याय के लिए स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से कैसे प्रतिष्ठित करे, उसकी विधि का वर्णन आरम्भ हो रहा है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) प्रदक्षिणं समावृत्य, नमस्कृत्य, उपविश्य च, दर्भेषु दर्भपाणिः स्यात्, प्राङ्मुखस्तु कृताञ्जलिः।

पदार्थ:

• प्रदक्षिणं समावृत्य: प्रदक्षिणा पूर्ण करके। 'समावृत्य' का अर्थ है पूर्णता के साथ घेरना। यहाँ यह उस केंद्र के चारों ओर घूमने की क्रिया है जिसे साधक ने अपनी उपासना का केंद्र बनाया है।

• नमस्कृत्य: नमस्कार करके। यह अहंकार का विसर्जन और शरणागति का भाव है।

• उपविश्य च: और बैठकर। यह स्थिरता का संकेत है, क्योंकि बिना स्थिरता के स्वाध्याय संभव नहीं।

• दर्भेषु: कुशों (दर्भ) पर। कुश का आसन केवल परंपरा नहीं, अपितु ऊर्जा के संरक्षण का साधन है।

• दर्भपाणिः: हाथ में कुश लिए हुए। कुश का हाथ में होना पवित्रता और संकल्प की दृढ़ता का प्रतीक है।

• प्राङ्मुखः: पूर्व की ओर मुख करके। पूर्व दिशा सूर्य की दिशा है, जो ज्ञान और जाग्रति का प्रतीक है।

• कृताञ्जलिः: हाथ जोड़े हुए। यह हृदय के दोनों पक्षों के मिलन और एकाग्रता की स्थिति है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ बाहरी क्रियाओं के माध्यम से आंतरिक अनुशासन की स्थापना कर रहे हैं। जप और सूर्योपस्थान के बाद साधक अब 'ब्रह्मयज्ञ' (स्वाध्याय) की तैयारी कर रहा है। ब्रह्मयज्ञ का अर्थ केवल वेदों को पढ़ना नहीं, अपितु उस ब्रह्म के साथ तादात्म्य स्थापित करना है जो वेदों के रूप में अभिव्यक्त है।

सबसे पहले 'प्रदक्षिणा' का निर्देश है। बाहरी रूप से यह मंदिर या वेदी की प्रदक्षिणा हो सकती है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ है—अपने जीवन के केंद्र (परमात्मा) को पहचानकर उसके चारों ओर अपने चित्त को घुमाना, ताकि संसार की परिधि से हटकर केंद्र की ओर दृष्टि जाए। तत्पश्चात् 'नमस्कार' है, जो यह दर्शाता है कि साधक अब अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को त्यागकर ज्ञान के सम्मुख नतमस्तक है।

इसके बाद 'कुशों पर बैठना' और 'हाथ में कुश लेना' बताया गया है। कुश (दर्भ) विद्युत-चालक की भांति कार्य करता है; यह साधक की देह से पृथ्वी में होने वाले ऊर्जा के क्षरण को रोकता है और उसे ऊपर की ओर प्रवाहित करता है। जब साधक 'पूर्वमुख' होकर 'कृताञ्जलि' स्थिति में बैठता है, तो वह स्वयं को ब्रह्मांडीय प्रकाश (सूर्य) के साथ जोड़ लेता है। हाथ जोड़ना केवल एक मुद्रा नहीं, अपितु द्वैत का अंत कर अद्वैत में स्थित होने का प्रयास है। यह पूरी तैयारी इस लिए है ताकि जब वह अगले श्लोकों में वर्णित 'स्वाध्याय' आरम्भ करे, तो उसका मन विचलित न हो और वह शब्दों के पार छिपे अर्थ (ब्रह्म) को ग्रहण कर सके।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'स्थिरता' और 'संरेखण' का अभ्यास है। प्रदक्षिणा से वह अपने परिवेश को पवित्र करता है, नमस्कार से अहंकार को शून्य करता है और कुश के आसन से अपनी प्राण-ऊर्जा को सुरक्षित करता है। पूर्व की ओर मुख करना इस बात का प्रतीक है कि साधक अब 'अंधकार से प्रकाश की ओर' (तमसो मा ज्योतिर्गमय) बढ़ने के लिए तत्पर है। हाथ जोड़कर बैठना हृदय के केंद्र में एकाग्रता लाने का साधन है, जिससे स्वाध्याय के समय मन्त्र केवल कंठ से न निकलें, अपितु हृदय की गहराई से गूँजें। यह अवस्था साधक को 'क्रिया' से 'ज्ञान' की भूमि पर ले जाने वाली सेतु है।

श्लोक ७.५८

स्वाध्यायं च यथाशक्ति ब्रह्मयज्ञार्थमाचरेत् ।

आदावारभ्य वेदं तु स्नात्वोपर्युपरि क्रमात् ॥ ७.५८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६३

— ब्रह्मयज्ञके लिए यथाशक्ति स्वाध्याय करे। स्नान करके वेदको आरम्भसे शुरू करके क्रमसे आगे-आगे —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में स्वाध्याय के आरम्भ से पूर्व की शारीरिक और मानसिक तैयारी—प्रदक्षिणा, नमस्कार, कुश-आसन और पूर्वमुखी अंजलि मुद्रा का विधान बताया गया है। अब साधक उस स्थिर अवस्था में पहुँचकर ब्रह्मयज्ञ के मुख्य अंग 'स्वाध्याय' का क्रियान्वयन करता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) ब्रह्मयज्ञार्थं यथाशक्ति स्वाध्यायं च आचरेत्। स्नात्वा, वेदं तु आदावारभ्य क्रमात् (अधीतेत्)।

पदार्थ:

• ब्रह्मयज्ञार्थम्: ब्रह्मयज्ञ के उद्देश्य से। यहाँ ब्रह्मयज्ञ का अर्थ केवल वेदों का पाठ नहीं, अपितु उस परम ब्रह्म की अर्चना है जो वाणी के रूप में अभिव्यक्त है।

• यथाशक्ति: अपनी शक्ति, सामर्थ्य और पात्रता के अनुसार। यह शब्द संकेत देता है कि साधना में जबरदस्ती नहीं, अपितु क्रमिक विकास आवश्यक है।

• स्वाध्यायं च आचरेत्: स्वाध्याय का आचरण करे। 'स्वाध्याय' का शाब्दिक अर्थ है—स्वयं का अध्ययन या शास्त्र का अध्ययन।

• स्नात्वा: स्नान करके। यह बाह्य शुद्धि के साथ-साथ अंतःकरण की निर्मलता का प्रतीक है।

• आदावारभ्य: आरम्भ से शुरू करके। 'आद' का अर्थ है मूल या आदि।

• क्रमात्: क्रम के अनुसार। बिना किसी छलांग के, एक-एक पद को आत्मसात करते हुए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य ऋषि यहाँ 'स्वाध्याय' को 'ब्रह्मयज्ञ' के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। सामान्यतः यज्ञ का अर्थ अग्नि में आहुति देना होता है, किंतु योगीश्वर याज्ञवल्क्य के लिए वाणी द्वारा वेदों का अनुशीलन ही सर्वोच्च यज्ञ है।

श्लोक का निर्देश है कि साधक यथाशक्ति स्वाध्याय करे। 'यथाशक्ति' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह साधक की वर्तमान मानसिक और शारीरिक स्थिति का सम्मान करता है। कोई पूर्ण वेद का ज्ञाता हो सकता है, तो कोई केवल कुछ मन्त्रों का; किंतु जो भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार सत्य के मार्ग पर अग्रसर है, वह ब्रह्मयज्ञ का भागी है।

स्नान के पश्चात वेद को आरम्भ से क्रमपूर्वक पढ़ने का विधान है। बाह्य स्नान शरीर को शुद्ध करता है, किंतु जब साधक वेद के प्रथम अक्षर से अध्ययन आरम्भ करता है, तो वह 'शब्द-स्नान' करता है। वेद का क्रम केवल पाठ का क्रम नहीं है, अपितु यह चेतना के आरोहण का क्रम है। आरम्भ से क्रमवार पढ़ना यह सुनिश्चित करता है कि साधक की बुद्धि में कोई रिक्तता न रहे और वह आधारभूत सत्य से उच्चतम रहस्य की ओर व्यवस्थित रूप से बढ़े।

श्रुति-संगति —

इस स्मृति का यह विधान सीधे तौर पर शतपथ ब्राह्मण की इस घोषणा पर टिका है:

शतपथ ब्राह्मण

अथ ब्रह्मयज्ञः स्वाध्यायो वै ब्रह्मयज्ञस्तस्य वा एतस्य ब्रह्मयज्ञस्य वागेव जुहूर्मन उपभृच्चक्षुर्ध्रुवा मेधा स्रुवः सत्यमवभृथः स्वर्गो लोक उदयनं यावन्तं ह वा इमां पृथिवीं वित्तेन पूर्णां ददंलोकं जयति त्रिस्तावन्तं जयति भूयांसं चाक्षय्यं य एवं विद्वानहरहः स्वाध्यायमधीते तस्मात्स्वाह्यायोऽध्येतव्यः ॥ ११.५.६.३ ॥

अब ब्रह्मयज्ञ: स्वाध्याय ही ब्रह्मयज्ञ है। उस इस ब्रह्मयज्ञकी वाणी ही जुहू (आहुति-पात्र) है, मन उपभृत्, चक्षु ध्रुवा, मेधा स्रुव, सत्य अवभृथ (समापन-स्नान), और स्वर्गलोक उदयन (यज्ञकी पूर्णाहुति)। धनसे भरी इस पूरी पृथ्वीका दान करके मनुष्य जितना लोक जीतता है, उसका तीन गुना, और उससे भी अधिक, अक्षय लोक वह जीतता है जो ऐसा जानकर प्रतिदिन स्वाध्याय करता है। इसलिए स्वाध्याय करना चाहिए।

शतपथ ब्राह्मण ११.५.६.३माध्यन्दिन पाठ · thevyasa.in

श्रुति स्पष्ट कहती है कि "स्वाध्याय ही ब्रह्मयज्ञ है"। यहाँ यज्ञ की पूरी सामग्री को शरीर और चेतना के भीतर ही रूपांतरित कर दिया गया है। जहाँ भौतिक यज्ञ में सामग्री बाहर से लाई जाती है, वहीं ब्रह्मयज्ञ में 'वाणी' ही जुहू (आहुति-पात्र) है और 'मन' उपभृत् (वह पात्र जिससे आहुति दी जाती है) है। जब साधक क्रम से वेद पढ़ता है, तो वह वास्तव में अपनी वाणी और मन को ब्रह्म-अग्नि में समर्पित कर रहा होता है। यह स्मृति इसी श्रुति-रहस्य का व्यावहारिक विस्तार है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से स्वाध्याय केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं, अपितु एक गहन आंतरिक प्रक्रिया है। जब साधक 'यथाशक्ति' स्वाध्याय करता है, तो वह अपनी वाणी (वाक्) को शुद्ध करता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि वाणी को 'जुहू' (आहुति-पात्र) बनाया जाए। इसका अर्थ है कि मन्त्रों का उच्चारण करते समय साधक यह अनुभव करे कि प्रत्येक शब्द उसके अहंकार और अविद्या की आहुति है। जब वह 'क्रमात्' (क्रम से) पढ़ता है, तो उसकी एकाग्रता एक बिंदु पर केंद्रित होती जाती है।

साधक इस अभ्यास से 'वाक्-सिद्धि' की ओर बढ़ता है। वाणी जब शुद्ध होती है, तो मन (उपभृत्) स्थिर होता है और चक्षु (दृष्टि) ध्रुव यानी अटल हो जाती है। इस प्रक्रिया में साधक स्थूल शब्दों से सूक्ष्म अर्थों की ओर और सूक्ष्म अर्थों से उस 'अक्षर' (अविनाशी) की ओर जाता है, जिसकी चर्चा याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति में की है। यह अभ्यास साधक को कर्म-भूमि से ज्ञान-भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि वह स्वयं ही वह वेद है और स्वयं ही वह ब्रह्म है जिसकी वह उपासना कर रहा है।

श्लोक ७.५९

यदधीतेऽन्वहं शक्त्या स स्वाध्याय इति स्मृतः ।

आकेशादानखाग्राच्च परं संतप्यते तपः ॥ ७.५९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६३

— जो प्रतिदिन यथाशक्ति पढ़ता है, वह स्वाध्याय कहा गया है; (वह) केशोंसे लेकर नखोंके अग्रभागतक परम तप तपता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ब्रह्मयज्ञ के निमित्त स्नान के पश्चात वेद के आरम्भ से क्रमबद्ध अध्ययन का विधान बताया गया है। वर्तमान श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य स्वाध्याय की परिभाषा स्पष्ट करते हुए उसके तपोमय स्वरूप और शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यत् (साधकः) अन्वहं शक्त्या अधीते, स स्वाध्याय इति स्मृतः। (सः) आकेशात्-अनखाग्रात् च परं तपः संतप्यते।

पदार्थ:

• अन्वहम्: प्रतिदिन, बिना किसी अंतराल के। यह निरंतरता ही साधना को संस्कार में बदलती है।

• शक्त्या: अपनी सामर्थ्य के अनुसार। यहाँ शक्ति का अर्थ केवल शारीरिक क्षमता नहीं, अपितु मानसिक ग्रहणशीलता और समय की उपलब्धता भी है।

• अधीते: पढ़ता है या अध्ययन करता है। 'धी' धातु का अर्थ है बुद्धि का प्रयोग कर अर्थ को आत्मसात करना।

• स्वाध्याय: 'स्व' (अपना/परमात्मा का) और 'अध्ययन'। शास्त्रों का पाठ करना स्वाध्याय है, किंतु उन शास्त्रों के माध्यम से स्वयं को जानना वास्तविक स्वाध्याय है।

• स्मृतः: कहा गया है या याद किया गया है।

• आकेशादानखाग्रात्: केशों (सिर के बालों) से लेकर नखों के अग्रभाग (नाखूनों के सिरों) तक। यह संपूर्ण देह की परिधि को दर्शाता है।

• परं संतप्यते तपः: परम तप का अनुभव करता है या तपता है। 'तप' का अर्थ है तपना, शुद्ध होना या घर्षण से चमकना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य ऋषि स्वाध्याय को केवल एक बौद्धिक व्यायाम या शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु एक गहन तपस्या के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। श्लोक का प्रथम चरण कहता है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन अपनी शक्ति के अनुसार अध्ययन करता है, वही वास्तव में 'स्वाध्याय' है। यहाँ 'अन्वहम्' (प्रतिदिन) शब्द इस बात पर बल देता है कि ज्ञान का अर्जन आकस्मिक नहीं, बल्कि निरंतर होना चाहिए। जिस प्रकार अन्न के बिना शरीर क्षीण होता है, उसी प्रकार स्वाध्याय के बिना बुद्धि और चैतन्य की ज्योति मंद पड़ जाती है।

'यथाशक्ति' या 'शक्त्या' का निर्देश यह स्पष्ट करता है कि स्वाध्याय में प्रतिस्पर्धा नहीं, अपितु पात्रता का विकास मुख्य है। एक साधक अपनी वर्तमान स्थिति से आरम्भ करे और धीरे-धीरे सूक्ष्मता की ओर बढ़े।

श्लोक का दूसरा चरण अत्यंत रहस्यमय और गहरा है: "आकेशादानखाग्राच्च परं संतप्यते तपः"। सामान्यतः तप का अर्थ कठिन शारीरिक कष्ट या वन में जाकर तपस्या करना समझा जाता है, किंतु यहाँ ऋषि कह रहे हैं कि नियमित स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति अपने शरीर के रोम-रोम से, सिर के बालों से लेकर पैर के नाखूनों तक, परम तप तपता है।

इसका भाव यह है कि जब कोई साधक पवित्र मन्त्रों का उच्चारण करता है और उनके अर्थ का मनन करता है, तो वह ध्वनि-कंपन केवल मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहता, अपितु संपूर्ण शरीर की कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। मन्त्रों की अग्नि अविद्या के मैल को जलाती है, जिससे साधक का संपूर्ण भौतिक शरीर भी संस्कारित और शुद्ध होने लगता है। यह वह 'तप' है जो बिना अग्नि के, केवल ज्ञान और ध्वनि के माध्यम से देह को स्वर्ण जैसा शुद्ध बना देता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

आ हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः । यः स्रग्व्यपि द्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम् ॥ २.१६७ ॥

जो द्विज माला पहने हुए भी (सुखमें भी) प्रतिदिन यथाशक्ति स्वाध्याय करता है, वह नखोंके अग्रतक परम तप तपता है।

मनुस्मृति २.१६७मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 192

मनुस्मृति में भी इसी सत्य की पुष्टि की गई है कि जो द्विज प्रतिदिन यथाशक्ति स्वाध्याय करता है, वह नखों के अग्रतक परम तप तपता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ इस बात पर सहमत हैं कि स्वाध्याय केवल एक मानसिक क्रिया नहीं, अपितु एक 'शारीरिक रूपांतरण' की प्रक्रिया है। जहाँ मनुस्मृति इसे एक नियम के रूप में देखती है, वहीं याज्ञवल्क्य ऋषि इसे योग की दृष्टि से एक आंतरिक शोधन प्रक्रिया के रूप में स्थापित कर रहे हैं।

योग-रहस्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में स्वाध्याय 'वाक्-योग' है। जब साधक मन्त्रों का पाठ करता है, तो वह केवल शब्दों को नहीं पढ़ रहा होता, बल्कि उन बीजरूप ध्वनियों के माध्यम से अपने भीतर के सोए हुए चैतन्य को जगा रहा होता है।

साधक के लिए इसका अभ्यास इस प्रकार है:

१. ध्वनि का विस्तार: जब साधक 'अन्वहम्' (प्रतिदिन) अभ्यास करता है, तो मन्त्रों की शक्ति उसके शरीर में एक लयबद्धता पैदा करती है।

२. देह का शोधन: 'आकेशादानखाग्रात्' का अर्थ है कि स्वाध्याय का प्रभाव केवल बुद्धि तक सीमित न रहे। साधक अनुभव करे कि मन्त्र की शक्ति उसके मस्तक (केश) से शुरू होकर शरीर के अंतिम छोर (नख) तक प्रवाहित हो रही है। यह एक प्रकार का मानसिक न्यास है, जहाँ ज्ञान की अग्नि संपूर्ण शरीर को पवित्र करती है।

३. तप का अनुभव: यहाँ तप का अर्थ कष्ट नहीं, बल्कि 'ताप' है—वह ऊष्मा जो अज्ञान को जलाती है। साधक जब एकाग्र होकर पढ़ता है, तो उसके भीतर एक आध्यात्मिक ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो उसे आलस्य और प्रमाद से मुक्त कर उच्चतर भूमि की ओर ले जाती है।

अतः, इस श्लोक का योगिक सार यह है कि स्वाध्याय के माध्यम से बुद्धि का विकास, मन की स्थिरता और शरीर की शुद्धि—तीनों एक साथ घटित होते हैं। यह बौद्धिक अध्ययन से ऊपर उठकर 'देह-संस्कार' की प्रक्रिया है।

श्लोक ७.६०

यस्तु सम्यक् द्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम्

ऋचं यजुर्वा साम वा गाथां ह्याममथापि वा ॥ ७.६० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६३

जो द्विज प्रतिदिन यथाशक्ति भली-भाँति स्वाध्याय करता है — ऋचा, यजुः, साम, गाथा अथवा (और कुछ) भी —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में स्वाध्याय की परिभाषा देते हुए ऋषि ने इसे 'परम तप' कहा था, जो साधक के रोम-रोम को शुद्ध करता है। वर्तमान श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि इस स्वाध्याय के विस्तार और उसके स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं कि एक द्विज के लिए अध्ययन के विषय क्या होने चाहिए।

अन्वय और पदार्थ —

यस्तु द्विजः अन्वहम् शक्तितो सम्यक् स्वाध्यायं अधीते — (तस्य) ऋचं यजुर्वा साम वा गाथां वा अमथापि (अन्यत्) वा (अधीते)।

पदार्थ:

• यस्तु: जो कोई भी।

• सम्यक्: भली-भाँति, पूर्ण एकाग्रता और शुद्ध उच्चारण के साथ। केवल शब्दों को पढ़ लेना सम्यक् अध्ययन नहीं है, अपितु उनके अर्थ और भाव को हृदयंगम करना सम्यक् है।

• द्विजोऽधीते: द्विज (दूसरा जन्म लेने वाला) अध्ययन करता है। यहाँ द्विज वह है जिसने उपनयन संस्कार के माध्यम से ज्ञान के मार्ग पर प्रवेश किया है और जिसका जन्म अब केवल शारीरिक नहीं, अपितु आध्यात्मिक है।

• शक्तितोऽन्वहम्: अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रतिदिन। निरंतरता (अन्वहम्) अनुशासन पैदा करती है और सामर्थ्य (शक्तितो) साधक को अतिरेक या हताशा से बचाती है।

• ऋचं यजुर्वा साम वा: ऋग्वेद की ऋचाएँ, यजुर्वेद के यजुः (यज्ञ-मन्त्र) और सामवेद के साम (गायन)। यह तीनों वेदों के ज्ञान का समुच्चय है।

• गाथां: गाथाएँ, जो वेदों के सार या उपनिषदों के संक्षिप्त और गेय रूप होते हैं।

• अमथापि वा: अथवा इसके अतिरिक्त अन्य (जैसे उपनिषद्, स्मृति या योग-ग्रन्थ)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषि याज्ञवल्क्य स्वाध्याय को 'ब्रह्मयज्ञ' के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। यह श्लोक पिछले श्लोक (७.५९) के भाव को विस्तार दे रहा है, जहाँ स्वाध्याय को तप कहा गया था। यहाँ ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि इस तप की सामग्री क्या है।

ऋषि कहते हैं कि जो द्विज प्रतिदिन अपनी शक्ति के अनुसार ऋचा, यजुः, साम या गाथाओं का सम्यक् अध्ययन करता है, वह वास्तव में ब्रह्मयज्ञ कर रहा है। यहाँ 'सम्यक्' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सम्यक् अध्ययन का अर्थ है—शब्द, अर्थ और प्रयोजन का समन्वय। जब साधक मन्त्र का उच्चारण करता है, तो वह केवल ध्वनि नहीं निकालता, बल्कि उस मन्त्र के पीछे छिपे देवता और तत्त्व का आह्वान करता है।

ऋचाएँ ज्ञान का प्रतीक हैं, यजुः कर्म का और साम उपासना (आनंद) का। इन तीनों का अध्ययन साधक के व्यक्तित्व में ज्ञान, क्रिया और भक्ति का संतुलन स्थापित करता है। 'गाथा' और 'अमथापि' शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि स्वाध्याय की परिधि केवल चार वेदों तक सीमित नहीं है, अपितु सत्य की खोज में सहायक हर वह शब्द स्वाध्याय है जो साधक को अक्षर (ब्रह्म) की ओर ले जाए।

यह वाक्य पिछले श्लोक से शुरू होकर यहाँ तक आता है कि जो व्यक्ति इस प्रकार का अध्ययन करता है, वह नखों के अग्र तक तपता है। अतः यह श्लोक स्वाध्याय की विधि और उसके विषयों का निर्धारण करता है, ताकि साधक यह जान सके कि उसे अपनी बुद्धि और वाणी का निवेश कहाँ करना है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

आ हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः । यः स्रग्व्यपि द्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम् ॥ २.१६७ ॥

जो द्विज माला पहने हुए भी (सुखमें भी) प्रतिदिन यथाशक्ति स्वाध्याय करता है, वह नखोंके अग्रतक परम तप तपता है।

मनुस्मृति २.१६७मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 192

मनुस्मृति में भी ठीक इसी विधान का उल्लेख है कि जो द्विज प्रतिदिन यथाशक्ति स्वाध्याय करता है, वह नखों के अग्र तक परम तप तपता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः सहमत हैं कि स्वाध्याय केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक शारीरिक और मानसिक शोधन प्रक्रिया है। जहाँ मनुस्मृति इसे एक सामान्य नियम के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं याज्ञवल्क्य ऋषि इसे 'ब्रह्मयज्ञ' और 'योग' की कड़ी में जोड़कर इसके आन्तर अर्थ को उद्घाटित कर रहे हैं।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से स्वाध्याय का अर्थ है—'श्रुति' (सुनी हुई विद्या) को 'अनुभव' में बदलना। जब साधक ऋचा, यजुः या साम का जप करता है, तो वह वास्तव में अपनी वाणी के माध्यम से अपने भीतर के सूक्ष्म तंतुओं को झंकृत कर रहा होता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह प्रतिदिन एक निश्चित समय और स्थान पर बैठकर, अपनी सामर्थ्य के अनुसार मन्त्रों का पाठ करे। 'सम्यक्' अध्ययन का योगिक अर्थ है—मन्त्र के अक्षर को जिह्वा पर, उसके अर्थ को मन में और उसके प्रभाव को हृदय में अनुभव करना।

जब साधक 'ऋचा' पढ़ता है, तो वह अपनी प्रज्ञा को जाग्रत करता है; जब 'यजुः' का अभ्यास करता है, तो वह अपने प्राणों को अनुशासित करता है; और जब 'साम' का गायन करता है, तो वह अपने हृदय को ब्रह्माण्डीय लय से जोड़ता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर के मोह से निकालकर सूक्ष्म शरीर की शुद्धि की ओर ले जाता है। प्रतिदिन का यह अभ्यास मन के विक्षेपों को शांत करता है और साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ शब्द शांत हो जाते हैं और केवल 'अक्षर' शेष रहता है। यह स्वाध्याय ही वह सेतु है जो साधक को कर्मकाण्ड से उठाकर ज्ञान और अंततः समाधि की ओर अग्रसर करता है।

देवर्ष्यादितर्पणम्

श्लोक ७.६१

ततः संतर्पयेद्देवानृषीन् पितृगणांस्तथा ।

संवत्सरं सावयवं देवीरप्सरसस्तथा ॥ ७.६१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६३

फिर देवताओं, ऋषियों और पितृगणोंका तर्पण करे; अंगों सहित संवत्सरका, देवियोंका और अप्सराओंका भी।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में स्वाध्याय को 'ब्रह्मयज्ञ' के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए ऋषि ने उसे शरीर के रोम-रोम को तपाने वाला तप बताया था। अब स्वाध्याय के पश्चात, बाहरी और आन्तरिक शुद्धि के क्रम में, याज्ञवल्क्य ऋषि 'तर्पण' की विधि का आरम्भ कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

ततः देवान्, ऋषीन्, पितृगणांस्तथा (तर्पयेत्) । सावयवं संवत्सरं, देवीरप्सरसस्तथा (तर्पयेत्)।

पदार्थ:

• ततः: उसके बाद। अर्थात् स्वाध्याय और ब्रह्मयज्ञ की समाप्ति के पश्चात।

• संतर्पयेद्: तर्पण करे। 'तृप्' धातु से बना यह शब्द तृप्ति प्रदान करने के अर्थ में है। जल द्वारा दी जाने वाली यह आहुति केवल भौतिक जल नहीं, अपितु कृतज्ञता और समर्पण का भाव है।

• देवानृषीन् पितृगणांस्तथा: देवताओं, ऋषियों और पितृगणों का। यहाँ देव (दिव्य शक्तियाँ), ऋषि (ज्ञान के स्रोत) और पितर (वंशानुगत और आध्यात्मिक पूर्वज) सृष्टिकी तीन मुख्य धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

• संवत्सरं सावयवं: अंगों सहित संवत्सर का। संवत्सर का अर्थ है 'वर्ष' या 'समय का चक्र'। 'सावयव' का अर्थ है उसके अंगों (महीनों, नक्षत्रों, ऋतुओं) सहित। समय स्वयं एक देवता है, जिसका तर्पण समय के प्रति सजगता है।

• देवीरप्सरसस्तथा: देवियों और अप्सराओं का। यहाँ देवियाँ शक्ति का और अप्सराएँ सूक्ष्म आनंद तथा कलाओं का प्रतीक हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषि याज्ञवल्क्य तर्पण को केवल एक कर्मकाण्डीय क्रिया के रूप में नहीं, अपितु समस्त अस्तित्व के प्रति एक 'समर्पण-यज्ञ' के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। तर्पण का शाब्दिक अर्थ है—तृप्त करना। जब साधक जल अर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को उन सूक्ष्म शक्तियों से जोड़ता है जिन्होंने इस सृष्टि का सृजन और संचालन किया है।

इस श्लोक में तर्पण की एक विस्तृत श्रृंखला का आरम्भ होता है। सबसे पहले देवताओं का नाम आता है, जो ब्रह्माण्ड की नियामक शक्तियों के प्रतीक हैं। तत्पश्चात ऋषियों का तर्पण है, क्योंकि ज्ञान के बिना किसी भी क्रिया की पूर्णता संभव नहीं; ऋषि उस प्रकाश के वाहक हैं जो साधक को अंधकार से बाहर लाता है। पितृगणों का तर्पण उस ऋण को चुकाने की प्रक्रिया है जो हमारा अपने पूर्वजों और उस बीज-चेतना के प्रति है जिससे हमारा अस्तित्व संभव हुआ।

विशेष रूप से 'सावयव संवत्सर' का तर्पण अत्यंत गूढ़ है। संवत्सर केवल कैलेंडर का वर्ष नहीं है, अपितु वह काल-चक्र है जिसमें जीव बद्ध है। उसके 'अंगों' (सावयव) का तर्पण करने का अर्थ है—समय की प्रत्येक इकाई (क्षण, मुहूर्त, दिन, मास) को परमात्मा के प्रति समर्पित करना। जब साधक समय का तर्पण करता है, तब वह काल के बंधन से मुक्त होकर 'अकाल' (कालातीत) की ओर बढ़ता है। देवियों और अप्सराओं का तर्पण सृष्टि की उस रचनात्मक ऊर्जा और सौंदर्य के प्रति कृतज्ञता है, जो जीवन को रसपूर्ण बनाती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से तर्पण का अर्थ है—अपने भीतर की समस्त वृत्तियों और प्रवृत्तियों को शांत कर उन्हें उच्चतर चेतना में विलीन कर देना। जल यहाँ केवल माध्यम है, वास्तव में साधक अपनी 'अहंकार-वृत्ति' का तर्पण कर रहा है।

साधक इस श्लोक के माध्यम से 'सर्व-समर्पण' का अभ्यास करता है। जब वह देवताओं, ऋषियों और पितरों का स्मरण कर जल देता है, तो वह अनुभव करता है कि वह अकेला नहीं है, अपितु एक अनंत आध्यात्मिक श्रृंखला का हिस्सा है। यह अभ्यास साधक को 'व्यष्टि' (व्यक्तिगत) से 'समष्टि' (ब्रह्माण्ड) की ओर ले जाता है।

अगले श्लोकों में दी गई सूची वास्तव में सृष्टिकी पूरी सीढ़ी है—ब्रह्मा से लेकर वनस्पति और भूतग्राम तक। इस पूरी श्रृंखला का तर्पण करने का योगिक अर्थ यह है कि साधक अपने भीतर के सूक्ष्म से स्थूल तक के सभी तत्वों को शुद्ध कर रहा है। वह यह अनुभव करता है कि जो चैतन्य देवताओं में है, वही ऋषियों में, पितरों में, समय के चक्र में और यहाँ तक कि तुच्छ समझे जाने वाले जीवों में भी व्याप्त है। इस प्रकार, तर्पण का यह अभ्यास साधक को 'द्वैत' से 'अद्वैत' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह समस्त अस्तित्व को स्वयं का ही विस्तार देखने लगता है।

श्लोक ७.६२

ब्रह्माणं तर्पयेत् पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम् ।

तथा देवानुगान् नागान् सागरानपि पर्वतान् ॥ ७.६२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६३

पहले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और प्रजापतिका तर्पण करे; फिर देवताओंके अनुचरों, नागों, समुद्रों और पर्वतोंका भी;

अवतरणिका — पिछले श्लोक में तर्पण के व्यापक फलक को प्रस्तुत करते हुए ऋषि ने देवताओं, ऋषियों, पितरों और समय-चक्र (संवत्सर) की तृप्ति का उल्लेख किया था। अब इस श्लोक में उन विशिष्ट दिव्य सत्ताओं और प्रकृति के विराट स्वरूपों का नाम निर्दिष्ट किया जा रहा है, जिनसे तर्पण का आरम्भ होना चाहिए।

अन्वय और पदार्थ —

पूर्वं ब्रह्माणं, विष्णुं, रुद्रं, प्रजापतिं तर्पयेत् । तथा देवानुगान्, नागान्, सागरानपि, पर्वतान् (तर्पयेत्)।

पदार्थ:

• पूर्वं: सबसे पहले। यह क्रमबद्धता दर्शाती है कि साधक को अपनी चेतना का विस्तार सूक्ष्म से स्थूल की ओर या सर्वोच्च से नीचे की ओर ले जाना है।

• ब्रह्माणं, विष्णुं, रुद्रं, प्रजापतिम्: ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन), रुद्र (लय) और प्रजापति (प्रजनन/उत्पत्ति)। ये चारों सृष्टि के चार मुख्य आधार-स्तम्भ हैं।

• तथा: उसी प्रकार।

• देवानुगान्: देवताओं के अनुचर या उनके अधीन कार्य करने वाली दिव्य शक्तियाँ।

• नागान्: नागों का। यहाँ नाग केवल सर्प नहीं, अपितु पाताल लोक के अधिपति और पृथ्वी की गुप्त शक्तियों के प्रतीक हैं।

• सागरानपि: समुद्रों का भी। जल के विराट भंडार और चेतना के गहरे सागर का प्रतिनिधित्व।

• पर्वतान्: पर्वतों का। स्थिरता, ऊँचाई और पृथ्वी के आधार का प्रतीक।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य ऋषि तर्पण की इस विधि के माध्यम से साधक को 'विराट पुरुष' के दर्शन करा रहे हैं। तर्पण का अर्थ केवल जल देना नहीं, अपितु उस तत्व के साथ एकाकार होकर उसे तृप्त करना है।

सबसे पहले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और प्रजापति का तर्पण करने का विधान है। यह क्रम सृष्टि की संपूर्ण प्रक्रिया का आदर है। ब्रह्मा सृजन के संकल्प हैं, विष्णु उस संकल्प के विस्तार और पोषण हैं, रुद्र उसके विसर्जन और परिवर्तन हैं, और प्रजापति वह शक्ति हैं जो इस चक्र को निरंतर चलाती हैं। जब साधक इन चारों का तर्पण करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के सृजन, पालन और लय के गुणों को संतुलित कर रहा होता है।

तत्पश्चात, ऋषि देवानुगों, नागों, सागरों और पर्वतों के तर्पण का निर्देश देते हैं। यहाँ एक गहरा रहस्य है—साधक केवल आकाशगामी देवताओं को ही नहीं, अपितु पाताल (नाग), जल (सागर) और पृथ्वी (पर्वत) के अधिष्ठाताओं को भी तृप्त कर रहा है। यह इस बात का संकेत है कि ईश्वर केवल ऊँचे स्वर्ग में नहीं, अपितु पृथ्वी की गहराई और प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है। जब हम पर्वतों और समुद्रों का तर्पण करते हैं, तो हम प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि हमारा शरीर इन्हीं पंचमहाभूतों से निर्मित है।

यह विधि साधक को 'अहंकार' से मुक्त कर 'विराट' में विलीन करने की प्रक्रिया है। बाहरी रूप से यह जल की आहुति है, किन्तु आन्तरिक रूप से यह साधक के हृदय में समस्त चराचर जगत के प्रति करुणा और समर्पण का भाव जगाने का साधन है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विराट-ध्यान' का अभ्यास है। साधक जब ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का स्मरण कर तर्पण करता है, तो वह अपनी चेतना को उच्चतम शिखर पर ले जाता है। फिर जब वह नागों, सागरों और पर्वतों का तर्पण करता है, तो वह अपनी चेतना को पृथ्वी के सबसे गहरे और स्थिर केंद्रों तक ले जाता है।

अभ्यास यह है कि साधक जल अर्पित करते समय यह अनुभव करे कि वह केवल जल नहीं दे रहा, बल्कि अपनी चेतना के माध्यम से इन समस्त शक्तियों को अपने भीतर एकीकृत कर रहा है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' (पर्वत, सागर) से 'सूक्ष्म' (देवता) और अंततः 'अक्षर' की ओर ले जाने वाली एक कड़ी है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि जो विराट बाहर है, वही सूक्ष्म रूप में उसके हृदय में स्थित है। इस प्रकार तर्पण के माध्यम से साधक अपनी व्यक्तिगत पहचान को मिटाकर संपूर्ण ब्रह्माण्ड के साथ तादात्म्य स्थापित करता है।

श्लोक ७.६३

सरितः सरसीश्चैव यक्षान् रक्षांसि मानुषान् ।

पिशाचांश्च सुपर्णांश्च भूतान्यथ पशूंस्तथा ॥ ७.६३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६४

नदियों, सरोवरों, यक्षों, राक्षसों, मनुष्यों, पिशाचों, सुपर्णों (गरुडों), भूतों और पशुओंका;

अवतरणिका — पिछले श्लोक में सृष्टि के आधार-स्तम्भों और विराट प्रकृति के स्थूल स्वरूपों—पर्वतों और सागरों के तर्पण का विधान था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य तर्पण के दायरे को और विस्तृत करते हुए उन सभी सूक्ष्म और स्थूल प्राणियों का उल्लेख कर रहे हैं, जो इस चराचर जगत में व्याप्त हैं।

अन्वय और पदार्थ —

सरितः, सरसीश्चैव, यक्षान्, रक्षांसि, मानुषान्, पिशाचांश्च, सुपर्णांश्च, भूतान्यथ, पशूंस्तथा (तर्पयेत्)।

पदार्थ:

• सरितः, सरसीश्चैव: नदियों और सरोवरों का। यहाँ सरिता (प्रवाह) और सरस (स्थिरता) दोनों प्रकार के जल-तत्वों का संकेत है।

• यक्षान्, रक्षांसि: यक्षों और राक्षसों का। यक्ष पृथ्वी के गुप्त निधियों के रक्षक हैं और राक्षस उन प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं जो ऊर्जा का उपभोग करती हैं।

• मानुषान्: मनुष्यों का।

• पिशाचांश्च: पिशाचों का। वे सूक्ष्म शरीर जो अतृप्त वासनाओं के कारण भटकते हैं।

• सुपर्णांश्च: सुपर्णों का। सुपर्ण का शाब्दिक अर्थ है 'सुन्दर पंखों वाला' (जैसे गरुड़), जो उच्च चेतना और तीव्र गति का प्रतीक है।

• भूतान्यथ: भूतों का। 'भूत' का अर्थ है जो 'भाता' है, अर्थात् अस्तित्व में है; यहाँ समस्त सूक्ष्म प्राणियों का बोध है।

• पशूंस्तथा: पशुओं का।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में तर्पण की यह सूची केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, अपितु साधक की चेतना के विस्तार की एक प्रक्रिया है। याज्ञवल्क्य ऋषि यहाँ 'सर्वभूतहिते' का मार्ग दिखा रहे हैं। तर्पण का मूल अर्थ है—'तृप्त करना'। जब साधक जल अर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपनी करुणा और चेतना को उन सभी दिशाओं और आयामों में भेज रहा होता है जहाँ जीवन किसी न किसी रूप में विद्यमान है।

नदियों और सरोवरों का तर्पण करना यह स्वीकार करना है कि हमारा जीवन जल-तत्व के ऋण से बना है। यक्ष, राक्षस, मनुष्य, पिशाच और भूत—ये केवल अलग-अलग प्रजातियाँ नहीं हैं, अपितु चेतना के विभिन्न स्तर और मानसिक अवस्थाएँ हैं। राक्षस तामसिकता का, मनुष्य रजस-सत्व के मिश्रण का और यक्ष सूक्ष्म दिव्यता का प्रतिनिधित्व करते हैं। पिशाच और भूत उन ऊर्जाओं के प्रतीक हैं जो अपनी पूर्णता खो चुकी हैं और तृप्ति की प्रतीक्षा कर रही हैं।

सुपर्णों का उल्लेख यहाँ विशेष है, क्योंकि वे आकाश-तत्व और उच्च उड़ान (उर्ध्वगमन) के प्रतीक हैं। पशुओं का तर्पण प्रकृति के उस सहज और सरल स्वरूप के प्रति कृतज्ञता है, जो केवल अस्तित्व के आनंद में जीता है। इस प्रकार, ब्रह्मा-विष्णु से शुरू होकर पशुओं तक पहुँचने वाला यह क्रम यह दर्शाता है कि परमात्मा केवल सर्वोच्च शिखर पर नहीं, अपितु सृष्टि के अंतिम और निम्नतम जीव में भी प्रतिष्ठित है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'समत्व' का अभ्यास है। साधक जब इन भिन्न-भिन्न और परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों (जैसे यक्ष और राक्षस, मनुष्य और पिशाच) का तर्पण करता है, तो उसके भीतर यह अनुभव जागृत होता है कि समस्त जगत एक ही विराट पुरुष का विस्तार है।

साधक इस अभ्यास से अपनी संकीर्ण पहचान (अहंकार) को तोड़कर 'विराट-भाव' में प्रवेश करता है। वह अनुभव करता है कि उसके भीतर भी ये सभी प्रवृत्तियाँ—पशुता, राक्षसी क्रोध, मानवीय मोह और दिव्य शांति—उपस्थित हैं। जब वह बाहरी जगत के इन रूपों को जल से तृप्त करता है, तो वास्तव में वह अपने भीतर की उन अतृप्त वृत्तियों को शांत कर रहा होता है। यह अभ्यास साधक को 'करुणा-भूमि' पर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को समस्त चराचर जगत का संबंधी अनुभव करने लगता है। यह स्थूल तर्पण वास्तव में अंतःकरण की शुद्धि का साधन है, जिससे मन निष्काम और निर्मल होता है।

श्लोक ७.६४

वनस्पतीनोषधींश्च भूतग्रामं चतुर्विधम् ।

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ॥ ७.६४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६४

वनस्पतियों, ओषधियों और चार प्रकारके प्राणिसमूहका; (फिर) मरीचि, अत्रि, अङ्गिरस्, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु,

अवतरणिका — पिछले श्लोक में नदियों, सरोवरों और पशु-मानव आदि समस्त जीव-समुदायों के तर्पण का विधान था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इस तर्पण-सूची को वनस्पति जगत और फिर सृष्टि के आदि-ऋषियों की ओर ले जा रहे हैं, ताकि साधक की कृतज्ञता संपूर्ण चराचर जगत और ज्ञान-परम्परा के मूल तक पहुँच सके।

अन्वय और पदार्थ —

(तर्पयेत्) वनस्पतीनोषधींश्च, भूतग्रामं चतुर्विधम्, मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ, पुलस्त्यं, पुलहं, क्रतुम् (च)।

पदार्थ:

• वनस्पतीनोषधींश्च: वनस्पतियों और ओषधियों का। वनस्पति वे हैं जो केवल वृद्धि करते हैं, और ओषधि वे हैं जिनमें औषधीय गुण (रोगनिवारक शक्ति) होती है।

• भूतग्रामं चतुर्विधम्: चार प्रकार के प्राणियों के समूह का। यहाँ 'भूत' का अर्थ है वह सब जो अस्तित्व में है, और 'ग्राम' का अर्थ है उनका सामूहिक वर्ग।

• मरीचि, अत्रि, अङ्गिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु: ये ब्रह्मा के मानस पुत्र और सृष्टि के आदि-ऋषि हैं, जो ज्ञान और तप के माध्यम से जगत का संचालन करते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में तर्पण की यह प्रक्रिया साधक को 'अहं' के संकुचित घेरे से निकालकर 'विराट' की ओर ले जाती है। यहाँ वनस्पतियों और ओषधियों का तर्पण यह दर्शाता है कि मनुष्य का जीवन केवल अन्य मनुष्यों पर नहीं, बल्कि उस मूक वनस्पति जगत पर टिका है जो उसे प्राणवायु और पोषण देता है। यह क्रिया प्रकृति के प्रति समर्पण और कृतज्ञता का भाव जाग्रत करती है।

इसके पश्चात 'चतुर्विध भूतग्राम' का उल्लेख है। यह संकेत है कि चेतना केवल मनुष्य या देवों में ही नहीं, बल्कि सृष्टि के चारों मूल श्रेणियों में व्याप्त है। जब साधक इन चारों श्रेणियों को जल अर्पित करता है, तो वह वास्तव में इस सत्य को स्वीकार करता है कि एक ही परमात्मा अलग-अलग आवरणों में इन सभी रूपों में अभिव्यक्त है।

तर्पण की इस कड़ी में अब ऋषि उन महान ऋषियों का नाम लेते हैं जिन्होंने इस सृष्टि के मानसिक और आध्यात्मिक ढांचे का निर्माण किया। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु—ये केवल नाम नहीं, बल्कि विशिष्ट दैवीय शक्तियों और ज्ञान-धाराओं के प्रतीक हैं। इनका तर्पण करने का अर्थ है—अपने भीतर उस ज्ञान-अंश को जाग्रत करना जो इन ऋषियों के माध्यम से संसार में आया। यह तर्पण जल से अधिक 'स्मरण' और 'श्रद्धा' का विषय है, जिससे साधक स्वयं को उस महान ऋषि-परम्परा से जोड़ता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विस्तार' का अभ्यास है। साधक जब वनस्पतियों और चतुर्विध भूतग्राम का तर्पण करता है, तो वह अपने हृदय के भाव को शरीर की सीमाओं से बाहर निकालकर संपूर्ण प्रकृति में फैलाता है। यह अभ्यास साधक को 'करुणा' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है, जहाँ वह स्वयं को जगत से पृथक नहीं, अपितु उसका एक अंग अनुभव करता है।

जब वह मरीचि और अत्रि जैसे आदि-ऋषियों का स्मरण कर उन्हें तर्पित करता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल जगत से उठाकर 'सूक्ष्म ज्ञान-तत्व' की ओर ले जाता है। यह अभ्यास साधक को इस अनुभव की ओर बढ़ाता है कि जिस परमात्मा ने इन ऋषियों को उत्पन्न किया, वही उसके भीतर भी साक्षी रूप में स्थित है। इस प्रकार, यह तर्पण उसे 'प्राणी-मात्र' के प्रति प्रेम और 'ऋषि-तत्त्व' के प्रति श्रद्धा के समन्वय से आत्म-विस्तार की ओर ले जाता है।

श्लोक ७.६५

प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ।

सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः ॥ ७.६५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६४

प्रचेतस्, वसिष्ठ, भृगु और नारद (का)। सनक, सनन्दन और तीसरे सनातन,

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ब्रह्मा के मानस पुत्रों में मरीचि, अत्रि, अङ्गिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु के तर्पण का निर्देश था। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए ऋषि याज्ञवल्क्य अब उन ऋषियों और दिव्य सत्ताओं का नाम ले रहे हैं, जिन्होंने ज्ञान की इस धारा को पृथ्वी और लोकत्रय में प्रवाहित किया।

अन्वय और पदार्थ —

(तर्पयेत्) प्रचेतसं, वसिष्ठं, च भृगुं, नारदमेव च। सनकश्च, सनन्दश्च, तृतीयश्च सनातनः (तर्पयेत्)।

पदार्थ:

• प्रचेतस्: प्रचेतस् का अर्थ है 'चेतन' या 'जागृत'। ये ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं, जो चेतना के उच्चतम स्तर के प्रतीक हैं।

• वसिष्ठ: 'वसिष्ठ' का अर्थ है 'श्रेष्ठ' या 'सबसे स्थिर'। ये मन के नियंत्रण और स्थिरता के अधिष्ठाता हैं।

• भृगु: भृगु का अर्थ है 'तेज' या 'ऊर्जा'। ये तप और ज्ञान की प्रखरता के प्रतीक हैं।

• नारद: नारद 'देवऋषि' हैं, जो ज्ञान के संचार और भक्ति के सेतु माने जाते हैं। 'नारद' शब्द का एक अर्थ 'नारा' (स्तुति) और 'द' (देने वाला) भी है।

• सनक, सनन्दन, सनातन: ये ब्रह्मा के तीन पुत्र हैं जो 'सनकादि' समूह के अंतर्गत आते हैं। ये 'नित्य' (सनातन) और 'आनंदमय' (सनन्दन) अवस्था के प्रतीक हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में तर्पण की यह सूची केवल नामों की गणना नहीं है, अपितु यह चेतना के विभिन्न सोपानों का स्मरण है। जब साधक प्रचेतस् का तर्पण करता है, तो वह अपने भीतर की 'जागृत चेतना' को पुकारता है। वसिष्ठ का तर्पण उसे मानसिक स्थिरता की ओर ले जाता है, और भृगु का तर्पण उसके भीतर के ज्ञान-तेज को प्रदीप्त करता है। नारद का स्मरण साधक को इस बोध में लाता है कि ज्ञान केवल संचय के लिए नहीं, अपितु लोक-कल्याण के लिए प्रवाहित करने हेतु है।

इसके पश्चात सनक, सनन्दन और सनातन का उल्लेख है। ये तीनों ऋषि 'नित्य ब्रह्म-भाव' में स्थित हैं। इनका तर्पण करते समय साधक यह अनुभव करता है कि वह उस अवस्था की ओर बढ़ रहा है जहाँ समय (काल) का प्रभाव समाप्त हो जाता है और केवल 'सनातन' सत्य शेष रहता है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह वाक्य श्लोक ७.६४ से आरम्भ होकर ७.६६ तक विस्तृत है। श्लोक ७.६४ में छह ऋषियों का नाम था, ७.६५ में ये सात नाम हैं और ७.६६ में कपिल, आसुरि, वोढु तथा पञ्चशिख का नाम आएगा। इस प्रकार कुल चौदह ऋषियों का समूह बनता है, जिन्हें आगे 'ब्रह्मसुता' और 'मनुष्य' के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह तर्पण 'गुरु-तत्व' के प्रति समर्पण है। साधक जब इन ऋषियों का नाम लेकर जल अर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपने हृदय में स्थित उन दिव्य गुणों का आह्वान कर रहा होता है।

प्रचेतस् से 'जागृति', वसिष्ठ से 'स्थिरता', भृगु से 'तप', नारद से 'प्रवाह' और सनकादि से 'नित्यता' का अभ्यास होता है। साधक इस अभ्यास से 'साधारण मनुष्य' की भूमि से उठकर 'ऋषि-भूमि' की ओर अग्रसर होता है। वह अनुभव करता है कि ये ऋषि बाहर कहीं स्थित नहीं हैं, बल्कि उसकी अपनी चेतना के वे उच्चतम शिखर हैं जिन्हें प्राप्त करना है। जल का अर्पण यहाँ 'अहंकार के विसर्जन' का प्रतीक है—जैसे जल बहकर मिल जाता है, वैसे ही साधक का व्यक्तित्व इन ऋषियों के दिव्य गुणों में विलीन होने का प्रयास करता है।

श्लोक ७.६६

कपिलश्चासुरिश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा ।

एते ब्रह्मसुताः सप्त मनुष्याः परिकीर्तिताः ॥ ७.६६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६४

कपिल, आसुरि, वोढु और पञ्चशिख — ये सात ब्रह्माके पुत्र 'मनुष्य' (ऋषि) कहे गये हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में सनक, सनन्दन और सनातन जैसे नित्य ऋषियों के तर्पण का उल्लेख था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य उन विशिष्ट ऋषियों के नाम पूर्ण कर रहे हैं, जिन्हें ब्रह्मा के पुत्र होने के साथ-साथ 'मनुष्य' श्रेणी के ऋषियों में प्रतिष्ठित किया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

कपिलः च, आसुरिः च एव, वोढुः, पञ्चशिखः तथा (तर्पयेत्)। एते ब्रह्मसुताः सप्त मनुष्याः परिकीर्तिताः (सन्ति)।

पदार्थ:

• कपिल: 'कपिल' का शाब्दिक अर्थ है 'सुनहरा' या 'भूरा'। ये ज्ञान के उस स्वरूप के प्रतीक हैं जो प्रकृति और पुरुष के भेद को स्पष्ट करता है।

• आसुरि: यह नाम उस ऊर्जा का संकेत है जो भौतिकता और दिव्यता के संधि-स्थल पर स्थित है।

• वोढु: 'वोढु' का अर्थ है 'जानने वाला' या 'बोध कराने वाला'। यह बोध की उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ साधक सत्य को प्रत्यक्ष अनुभव करता है।

• पञ्चशिख: 'पञ्चशिख' का अर्थ है 'पाँच शिखों वाला'। यह पाँचों प्राणों या पाँचों ज्ञानेंद्रियों के पूर्ण संयम और उनके शिखर (उच्चतम अवस्था) पर पहुँचने का प्रतीक है।

• ब्रह्मसुताः: ब्रह्मा के पुत्र। यहाँ पुत्र का अर्थ केवल शारीरिक जन्म नहीं, अपितु ब्रह्मा (परम चेतना) से उत्पन्न मानस-पुत्र या ज्ञान-पुत्र है।

• सप्त मनुष्याः: सात मनुष्य। यहाँ 'मनुष्य' शब्द का प्रयोग उन ऋषियों के लिए हुआ है जिन्होंने मानवीय देह में रहकर या मानवीय मर्यादाओं के भीतर रहकर योग और ज्ञान का आचरण किया।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में तर्पण की यह प्रक्रिया वास्तव में अपने भीतर के दिव्य गुणों का आह्वान है। श्लोक में कपिल, आसुरि, वोढु और पञ्चशिख के नामों के साथ पिछले श्लोकों के ऋषियों को मिलाकर कुल 'सात मनुष्य' (सप्त मनुष्याः) बताए गए हैं।

जब साधक कपिल का तर्पण करता है, तो वह अपने भीतर के उस विवेक को जाग्रत करता है जो सत्य और असत्य का निर्णय कर सके। आसुरि का स्मरण उसे यह बोध कराता है कि शरीर की भौतिकता को त्यागकर ही दिव्यता प्राप्त होती है। वोढु का तर्पण साधक को 'बोध' की स्थिति में ले जाता है, और पञ्चशिख का स्मरण उसे अपनी इंद्रियों और प्राणों के शिखर पर पहुँचने की प्रेरणा देता है।

यहाँ 'मनुष्य' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। ब्रह्मसुता होने के बाद भी उन्हें 'मनुष्य' कहना यह दर्शाता है कि उच्चतम आध्यात्मिक उपलब्धियाँ भी मानवीय धरातल पर, साधना और तप के माध्यम से ही प्राप्त की जाती हैं। यह स्मृति हमें बताती है कि जो ज्ञान श्रुति में बीजरूप में है, उसे इन ऋषियों ने अपने जीवन और आचरण से विस्तार दिया। तर्पण के माध्यम से साधक स्वयं को उसी ऋषि-परम्परा से जोड़ता है, जिससे उसकी अपनी चेतना का विस्तार होता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'मानवीयता से देवत्व' की ओर ले जाने का मार्ग है। तर्पण का बाहरी विधान जल अर्पित करना है, किंतु इसका आन्तर अभ्यास 'समर्पण' है।

साधक जब इन सात ऋषियों का स्मरण करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर की सात मानसिक वृत्तियों को शुद्ध कर रहा होता है। वह अनुभव करता है कि वह केवल एक हाड़-मांस का शरीर नहीं, अपितु 'ब्रह्मसुता' है—अर्थात उसकी मूल प्रकृति ब्रह्म है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को 'वोढु' (बोध) और 'पञ्चशिख' (इंद्रिय-शिखर) की अवस्था तक ले जाए। इस अभ्यास से साधक 'साधारण मनुष्य' की भूमि से उठकर 'ऋषि' की भूमि में प्रवेश करता है, जहाँ ज्ञान केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभव बन जाता है।

श्लोक ७.६७

ब्रह्माद्यानुपवीती तु देवतीर्थेन तर्पयेत् ।

निवीती कायतीर्थेन मनुष्यान् सनकादिकान् ॥ ७.६७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६४

ब्रह्मा आदि (देवताओं) का उपवीती (जनेऊ बायें कंधेपर) होकर देवतीर्थ (अँगुलियोंके अग्रभाग) से तर्पण करे; और सनक आदि मनुष्य (ऋषियों) का निवीती (जनेऊ मालाकी भाँति) होकर कायतीर्थ (कनिष्ठिकाके मूल) से।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ब्रह्मा के उन सात मानस-पुत्रों का उल्लेख किया गया जिन्हें 'मनुष्य' ऋषि कहा गया है। अब ऋषि याज्ञवल्क्य उन विभिन्न श्रेणियों के देवों और ऋषियों के तर्पण के लिए विशिष्ट शारीरिक मुद्राओं (यज्ञोपवीत की स्थिति) और जल-पात के स्थानों (तीर्थों) का निर्धारण कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

ब्रह्माद्यान् तु उपवीती (भूत्वा) देवतीर्थेन तर्पयेत् । मनुष्यान् सनकादिकान् निवीती (भूत्वा) कायतीर्थेन (तर्पयेत्)।

पदार्थ:

• ब्रह्माद्यान्: ब्रह्मा आदि देवताओं को। इसमें विष्णु, रुद्र, प्रजापति और अन्य दिव्य शक्तियाँ सम्मिलित हैं।

• उपवीती: उपवीत (यज्ञोपवीत) की वह स्थिति जिसमें जनेऊ बाएँ कंधे पर और दाहिनी भुजा के नीचे होता है। यह 'उत्कर्ष' और 'दिव्यता' की मुद्रा है।

• देवतीर्थेन: देवतीर्थ वह स्थान है जहाँ से जल गिरता है। यह हाथ की तीन मध्यमाओं के अग्रभाग (अँगुलियों के पोरों) का संगम स्थल है।

• निवीती: जब यज्ञोपवीत को गले में माला की भाँति लपेटा जाता है, उसे 'निवीती' कहते हैं। यह 'विनय' और 'सांसारिक मर्यादा' की मुद्रा है।

• कायतीर्थेन: कायतीर्थ वह स्थान है जहाँ से जल गिराया जाता है; यह कनिष्ठिका (छोटी अँगुली) के मूल भाग का क्षेत्र है।

• मनुष्यान् सनकादिकान्: सनक आदि उन ऋषियों को, जिन्हें पूर्व में 'मनुष्य' श्रेणी में रखा गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में तर्पण केवल जल अर्पण की क्रिया नहीं, अपितु एक सूक्ष्म विज्ञान है। यहाँ साधक को दो भिन्न अवस्थाओं में तर्पण करने का निर्देश दिया गया है।

प्रथम, ब्रह्मा आदि उच्च देवताओं के लिए 'उपवीती' होकर 'देवतीर्थ' का प्रयोग करना है। उपवीत की स्थिति साधक के भीतर उस आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है जो उसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। देवतीर्थ (अँगुलियों के अग्रभाग) का प्रयोग यह दर्शाता है कि दिव्य शक्तियों को अर्पण सूक्ष्म और एकाग्र होना चाहिए। यह क्रिया साधक को यह अनुभव कराती है कि वह अपनी चेतना के उच्चतम शिखर से उस परम सत्ता को तृप्त कर रहा है।

द्वितीय, सनक आदि ऋषियों के लिए, जिन्हें 'मनुष्य' कहा गया है, 'निवीती' और 'कायतीर्थ' का विधान है। निवीती की मुद्रा उस विनम्रता और स्थिरता का प्रतीक है जो एक गुरु या ऋषि के प्रति होनी चाहिए। कायतीर्थ (कनिष्ठिका का मूल) शरीर के आधार और स्थिरता से जुड़ा है। यहाँ 'मनुष्य' शब्द का अर्थ उन दिव्य आत्माओं से है जिन्होंने मानवीय मर्यादाओं और अनुशासन के माध्यम से सिद्धि प्राप्त की। अतः उनका तर्पण उस आधारभूत ऊर्जा के माध्यम से किया जाता है जो साधक को पृथ्वी और अनुशासन से जोड़ती है।

इस प्रकार, याज्ञवल्क्य ऋषि यह स्पष्ट करते हैं कि अर्पण की विधि अर्पण किए जाने वाले के स्वरूप के अनुरूप होनी चाहिए—दिव्य के लिए दिव्य मुद्रा और मानवीय/ऋषि स्वरूप के लिए विनयी मुद्रा।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'ऊर्ध्वगामी' और 'अधोगामी' ऊर्जा के संतुलन का अभ्यास है। 'उपवीती' और 'देवतीर्थ' का अभ्यास साधक को अपनी चेतना को ऊपर उठाने का अनुभव कराता है, जिससे वह अपने भीतर के 'ब्रह्मा' (सृजनात्मक शक्ति) को जाग्रत करता है। वहीं 'निवीती' और 'कायतीर्थ' का अभ्यास उसे अपनी जड़ों से जोड़ता है, जिससे वह ऋषियों जैसी स्थिरता और धैर्य प्राप्त करता है।

साधक जब इन दो भिन्न मुद्राओं में जल अर्पण करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'दिव्य' और 'मानवीय' तत्त्वों का सामंजस्य कर रहा होता है। वह अनुभव करता है कि वह एक ही समय में उच्च आकाश (देव) और सुदृढ़ पृथ्वी (मनुष्य) दोनों का संगम है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' से 'विनय' की ओर और 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाली एक आंतरिक यात्रा है।

श्लोक ७.६८

अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु ।

तृप्यतामिति सेक्तव्यं नाम्ना तु प्रणवादिना ॥ ७.६८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६४

दाहिने हाथसे, बायाँ हाथ उसे छूते हुए, प्रणवसे आरम्भ करके (देवताका) नाम लेकर "तृप्यताम्" कहकर (जल) सींचे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए 'उपवीती' और सनकादि ऋषियों के लिए 'निवीती' की शारीरिक मुद्राओं तथा उनके तर्पण हेतु विशिष्ट तीर्थों का निर्देश दिया गया था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य तर्पण की उस सूक्ष्म क्रियाविधि का वर्णन कर रहे हैं, जिसमें हाथों की स्थिति, मन्त्रों का क्रम और जल-अर्पण के समय बोले जाने वाले शब्दों का निर्धारण है।

अन्वय और पदार्थ —

(तर्पणः) अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना, दक्षिणेन तु (पाणिना) नाम्ना तु प्रणवादिना 'तृप्यताम्' इति सेक्तव्यं।

पदार्थ:

• अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना: 'अन्वारब्ध' का अर्थ है सहारा देना या स्पर्श करना। सव्य (बायाँ) हाथ दाहिने हाथ को स्पर्श करता हुआ या उसे आधार देता हुआ रहे।

• दक्षिणेन तु: जल अर्पण करने का मुख्य साधन दाहिना हाथ है।

• नाम्ना तु प्रणवादिना: तर्पण के समय केवल नाम पर्याप्त नहीं है; उसका आरम्भ 'प्रणव' (ॐ) से होना चाहिए। अतः 'प्रणव + देवता का नाम' इस क्रम का पालन करना है।

• तृप्यताम्: यह क्रियावाचक शब्द है, जिसका अर्थ है— 'आप तृप्त हों' या 'आपकी तृप्ति हो'। यह समर्पण का भाव है।

• सेक्तव्यं: सींचना या जल अर्पण करना। यहाँ 'सेचन' क्रिया जल के सूक्ष्म प्रवाह को सूचित करती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में तर्पण की यह विधि केवल एक बाह्य कर्मकाण्ड नहीं, अपितु शरीर और चेतना के संतुलन की एक प्रक्रिया है। यहाँ दाहिने हाथ से जल सींचने और बाएँ हाथ से उसे स्पर्श करने का निर्देश है। दाहिना हाथ 'क्रिया' और 'शक्ति' का प्रतीक है, जबकि बायाँ हाथ 'संवेदना' और 'समर्थन' का। जब बायाँ हाथ दाहिने हाथ को स्पर्श करता है, तो साधक के भीतर द्वैत समाप्त होकर एक एकाग्रता उत्पन्न होती है। यह स्पर्श इस बात का प्रतीक है कि क्रिया (दाहिना हाथ) केवल अहंकार से नहीं, अपितु पूर्ण सजगता और आंतरिक संतुलन (बायाँ हाथ) के साथ संपन्न हो रही है।

मन्त्र के प्रयोग में 'प्रणवादिना' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋषि याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि किसी भी देवता या ऋषि का नाम लेने से पूर्व 'ॐ' का उच्चारण अनिवार्य है। प्रणव वह बीज है जिससे समस्त नाम उत्पन्न होते हैं। बिना प्रणव के नाम केवल एक संबोधन है, किन्तु प्रणव के साथ वह नाम उस देवता के मूल स्वरूप (अक्षर) से जुड़ जाता है। अतः साधक पहले 'ॐ' के द्वारा उस विराट चेतना में प्रवेश करता है और फिर विशिष्ट नाम लेकर उस चेतना को एक रूप प्रदान करता है।

अंत में 'तृप्यताम्' शब्द का प्रयोग किया गया है। तर्पण का अर्थ ही है— 'तृप्त करना'। जब साधक जल सींचते हुए 'तृप्यताम्' कहता है, तो वह वास्तव में अपनी आंतरिक प्यास और कामनाओं का विसर्जन कर रहा होता है। वह यह अनुभव करता है कि ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियाँ पूर्ण हैं और वह केवल उस पूर्णता में अपनी आहुति दे रहा है। यह क्रिया साधक को 'दाता' के भाव में प्रतिष्ठित करती है, जो कि योग की उच्च अवस्था है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'समन्वय' का अभ्यास है। दाहिने और बाएँ हाथ का परस्पर स्पर्श शरीर के दो विपरीत ध्रुवों के मिलन का प्रतीक है, जिससे प्राणों का प्रवाह संतुलित होता है। साधक जब 'प्रणव' से आरम्भ कर 'तृप्यताम्' पर समाप्त करता है, तो वह अपनी चेतना को 'अक्षर' (ॐ) से 'विशिष्ट रूप' (नाम) और फिर 'पूर्णता' (तृप्ति) की ओर ले जाता है।

अभ्यास की दृष्टि से, जल का गिरना मन के विकारों के क्षय का प्रतीक है। जैसे-जैसे जल की धारा नीचे गिरती है, साधक का अहंकार और आसक्ति भी वैसे ही विसर्जित होती जाती है। इस प्रक्रिया में साधक 'तृप्ति' के उस भाव को अनुभव करता है जहाँ उसे यह बोध होता है कि वह स्वयं भी उसी विराट सत्ता का अंश है जिसे वह तृप्त कर रहा है। यह अभ्यास साधक को कर्म के बंधन से मुक्त कर उसे 'निष्काम कर्म' की भूमि की ओर ले जाता है।

श्लोक ७.६९

आवाह्य पूर्ववन्मन्त्रैरास्तीर्य च कुशान् शुचीन् ।

प्रागग्रेषु सुरान् सर्वान् दक्षिणाग्रेषु वै पितॄन् ॥ ७.६९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६५

पहलेकी तरह मन्त्रोंसे आवाहन करके और पवित्र कुश बिछाकर — पूर्वकी ओर अग्रभागवाले (कुशों) पर सब देवताओंका, और दक्षिणकी ओर अग्रभागवाले (कुशों) पर पितरोंका —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में देवताओं और ऋषियों के तर्पण हेतु शारीरिक मुद्राओं तथा जल-अर्पण की सूक्ष्म विधि का निर्देश दिया गया था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य तर्पण की उस आधार-भूमि का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ कुशों के विन्यास द्वारा देव और पितृ दोनों के लिए अलग-अलग ऊर्जा-क्षेत्र निर्मित किए जाते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

आवाह्य पूर्ववन्मन्त्रैः, शुचीन् कुशान् आस्तीर्य च, प्रागग्रेषु सुरान् सर्वान्, दक्षिणाग्रेषु वै पितॄन् (तर्पयेत्)।

पदार्थ:

• आवाह्य पूर्ववन्मन्त्रैः: 'आवाह्य' का अर्थ है आवाहन करना, अर्थात् सूक्ष्म रूप में उनकी उपस्थिति का आह्वान करना। 'पूर्ववन्मन्त्रैः' का तात्पर्य है कि जिस प्रकार पूर्व में (देव-तर्पण के समय) मन्त्रों का प्रयोग किया गया, उन्हीं के अनुरूप आवाहन हो।

• शुचीन् कुशान् आस्तीर्य: 'शुचि' अर्थात् पवित्र। 'कुश' एक विशेष पवित्र घास है जो ऊर्जा का संवाहक मानी जाती है। 'आस्तीर्य' का अर्थ है बिछाना या आधार तैयार करना।

• प्रागग्रेषु: 'प्राक्' (पूर्व) + 'अग्र' (अग्रभाग)। उन कुशों पर जिनका अग्रभाग पूर्व दिशा की ओर है।

• सुरान् सर्वान्: समस्त देवताओं का।

• दक्षिणाग्रेषु: उन कुशों पर जिनका अग्रभाग दक्षिण दिशा की ओर है।

• पितॄन्: पितरों का।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में तर्पण की यह विधि केवल जल का अर्पण नहीं, अपितु दिशाओं और प्रतीकों के माध्यम से चेतना के विभिन्न स्तरों से जुड़ने का विज्ञान है। यहाँ दो महत्वपूर्ण निर्देश हैं: आवाहन और कुशों का विन्यास।

प्रथम, 'आवाह्य' शब्द यह स्पष्ट करता है कि तर्पण केवल एक यांत्रिक क्रिया नहीं है; जब तक मन्त्रों द्वारा संबंधित देव या पितृ का आवाहन नहीं किया जाता, तब तक जल केवल भौतिक जल रहता है। आवाहन उसे 'सोम' या 'अमृत' में बदल देता है जो सूक्ष्म जगत के जीवों तक पहुँचता है।

द्वितीय, कुशों का विन्यास दिशाओं के मनोविज्ञान पर आधारित है। पूर्व दिशा सूर्य की दिशा है, जो प्रकाश, ज्ञान और देवत्व का प्रतीक है। इसलिए, पूर्व की ओर अग्रभाग वाले कुशों पर देवताओं का स्थान निर्धारित है। इसके विपरीत, दक्षिण दिशा पितरों की दिशा मानी गई है, जो विसर्जन और पूर्वजों के लोक का प्रतीक है। अतः दक्षिण की ओर अग्रभाग वाले कुशों का प्रयोग पितृ-तर्पण के लिए किया गया है।

यहाँ 'शुचिन्' (पवित्र) शब्द पर ध्यान देना आवश्यक है। पवित्रता केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि साधक के मन की वह स्थिति है जिसमें वह स्वयं को एक माध्यम बना लेता है। कुश यहाँ एक 'एंटीना' या ऊर्जा-पट्टिका की भाँति कार्य करते हैं, जो साधक की संकल्प-शक्ति और जल की तरलता को सूक्ष्म तरंगों में बदलकर संबंधित लोक तक पहुँचाते हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'दिशा-बोध' और 'ऊर्जा-केंद्रण' का अभ्यास है। योग में दिशाएँ केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आंतरिक अवस्थाएँ हैं। पूर्व दिशा 'उदय' और 'जाग्रति' का प्रतीक है, जो साधक को उसकी उच्चतर दैवीय प्रवृत्तियों (सुरान्) से जोड़ती है। दक्षिण दिशा 'विश्राम' और 'मूल' का प्रतीक है, जो साधक को उसके कुल, परंपरा और पूर्वजों (पितॄन्) के प्रति कृतज्ञता से जोड़ती है।

कुशों को बिछाना वास्तव में अपने भीतर एक 'यज्ञ-वेदी' तैयार करने जैसा है। जब साधक पूर्व और दक्षिण के बीच इस संतुलन को स्थापित करता है, तो वह अपने जीवन के दो महान ऋणों—देव ऋण और पितृ ऋण—के प्रति सजग होता है। यह अभ्यास साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह अनुभव करता है कि वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक अनंत परंपरा की कड़ी है। यहाँ 'आवाहन' का आंतरिक अर्थ है—अपने भीतर सोई हुई उन दैवीय और पैतृक शक्तियों को जगाना, जो उसे जीवन-पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

श्लोक ७.७०

नासनस्तु (आसीनस्तु) स्वधाकारैर्गोत्रेण तु समाहितः ।

दक्षिणे पितृतीर्थेन पितॄणां तृप्तिमावहन् ॥ ७.७० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६५

— (और) बैठकर, स्वधाकारोंसे और गोत्र (के उच्चारण) से, समाहित होकर, दक्षिणकी ओर पितृतीर्थसे पितरोंको तृप्ति पहुँचाते हुए (तर्पण करे)।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पितृ-तर्पण के लिए कुशों के विन्यास और दिशा-निर्धारण का विधान बताया गया था। अब इस श्लोक में तर्पण की शारीरिक स्थिति, मानसिक अवस्था और जल अर्पण के विशिष्ट माध्यम का वर्णन है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तर्पयितुं) आसीनः, स्वधाकारैः (मन्त्रैः) गोत्रेण च समाहितः, दक्षिणे पितृतीर्थेन पितॄणां तृप्तिम् आहन् (तर्पयेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• आसीनः: बैठकर। देवताओं के तर्पण में प्रायः खड़े होने या विशिष्ट मुद्राओं का विधान होता है, किन्तु पितरों के लिए 'आसीन' अवस्था का निर्देश है। यह विनय और समर्पण का भाव है।

• स्वधाकारैः: स्वधा-रूप मन्त्रों से। 'स्वधा' वह शक्ति है जिसके माध्यम से पितरों को अन्न और जल प्राप्त होता है। यह देवताओं के 'स्वाहा' के समान है।

• गोत्रेण: गोत्र के उच्चारण से। गोत्र केवल कुल की पहचान नहीं, अपितु उस मूल ऋषि की ऊर्जा-धारा है जिससे साधक का अस्तित्व जुड़ा है।

• समाहितः: एकाग्र होकर या चित्त को स्थिर करके। बिना मानसिक एकाग्रता के किया गया तर्पण केवल एक भौतिक क्रिया है; 'समाहित' होने से वह आध्यात्मिक सेतु बन जाता है।

• पितृतीर्थेन: पितृ-तीर्थ से। हाथ की वह विशिष्ट स्थिति या अँगुलियों का वह स्थान जिससे जल गिराया जाता है, उसे 'तीर्थ' कहा गया है। पितरों के लिए यह तीर्थ देवताओं के तीर्थ से भिन्न होता है।

• तृप्तिम् आहन्: तृप्ति प्रदान करें। 'आहन्' का अर्थ यहाँ लाना या पहुँचाना है—अर्थात् अपनी श्रद्धा और जल के माध्यम से पितरों की अतृप्ति को शान्त करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ पितृ-तर्पण की आंतरिक और बाह्य विधि का समन्वय कर रहे हैं। पितृ-तर्पण केवल पूर्वजों को जल देना नहीं है, अपितु अपने मूल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।

यहाँ 'आसीन' (बैठने) का निर्देश है क्योंकि पितृ-तर्पण में साधक को अपनी जड़ों की ओर लौटना होता है। बैठने की अवस्था शरीर के निचले केंद्रों को स्थिर करती है और विनम्रता का संचार करती है। 'स्वधा' का प्रयोग यह दर्शाता है कि पितृ-लोक की अपनी एक विशिष्ट ऊर्जा-प्रणाली है। जिस प्रकार अग्निहोत्र में 'स्वाहा' के द्वारा आहुति देवताओं तक पहुँचती है, उसी प्रकार 'स्वधा' के द्वारा अर्पण पितरों तक पहुँचता है।

'गोत्र' का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब साधक अपने गोत्र का उच्चारण करता है, तो वह केवल नाम नहीं लेता, बल्कि उस सूक्ष्म बीज-चेतना को जाग्रत करता है जिससे उसकी पूरी वंश-परम्परा प्रवाहित हुई है। यह क्रिया साधक को उसके व्यक्तिगत अहंकार से ऊपर उठाकर एक विराट कुल-चेतना में विलीन करती है।

'समाहित' शब्द यहाँ विधि का प्राण है। तर्पण के समय यदि मन भटक रहा हो, तो जल केवल भूमि पर गिरता है; किन्तु यदि साधक समाहित है, तो वह जल 'सोम' में परिवर्तित हो जाता है, जो सूक्ष्म रूप से पितरों की तृप्ति करता है। 'पितृतीर्थ' का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि शरीर के विभिन्न अंगों में भिन्न-भिन्न ऊर्जा-द्वार हैं। जिस तीर्थ से जल गिरता है, उसी के अनुसार वह ऊर्जा संबंधित लोक (देव, ऋषि या पितृ) तक पहुँचती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मूल' के साथ तादात्म्य स्थापित करने का अभ्यास है। साधक जब 'समाहित' होकर दक्षिण की ओर मुख करता है, तो वह अपने जीवन के उस प्रवाह को देखता है जो समय के साथ पीछे (अतीत में) गया है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक जल अर्पित करते समय यह अनुभव करे कि वह अपने पूर्वजों के ऋणों से मुक्त हो रहा है और उनके पुण्य-गुणों को अपने भीतर आत्मसात कर रहा है। 'स्वधा' का मानसिक जप करते हुए जब जल पितृतीर्थ से गिरता है, तो साधक के हृदय में कृतज्ञता का भाव जागता है। यह भाव उसे 'अहं' (मैं) से 'वयं' (हम/कुल) की ओर ले जाता है। यह अभ्यास साधक को मानसिक रूप से स्थिर करता है और उसे इस बोध की ओर ले जाता है कि वह एक अखंड चेतना की कड़ी है, जिससे उसके पूर्वज और आने वाली संतति जुड़ी है। यह समाधि की वह प्रारंभिक भूमि है जहाँ साधक अपने अस्तित्व के विस्तार का अनुभव करता है।

श्लोक ७.७१

सव्यं जानु ततोऽन्वाच्य पाणिभ्यां दक्षिणामुखः ।

तल्लिङ्गैस्तर्पयेन्मन्त्रैः सर्वान् पितृगणांस्तथा ॥ ७.७१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६५

फिर बायाँ घुटना (भूमिपर) टेककर, दक्षिणकी ओर मुँह करके, दोनों हाथोंसे, उन (पितरों) के लिङ्गवाले (उन्हें सूचित करनेवाले) मन्त्रोंसे सब पितृगणोंका तर्पण करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पितृ-तर्पण के लिए बैठने की स्थिति, स्वधा-मन्त्रों के प्रयोग और गोत्र-समाधि का विधान बताया गया था। अब इस श्लोक में तर्पण के समय शरीर की विशिष्ट मुद्रा, दिशा और मन्त्रों के प्रयोग की विधि का विस्तार किया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तर्पयितुं) सव्यं जानु (भूमिपर) ततः अनवाच्य पाणिभ्यां, दक्षिणामुखः, तल्लिङ्गैः मन्त्रैः सर्वान् पितृगणान् तथा तर्पयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• सव्यं जानु: बायाँ घुटना। 'सव्य' का अर्थ है बायाँ। यहाँ घुटने को भूमि पर टिकाने का निर्देश है।

• अनवाच्य पाणिभ्यां: दोनों हाथों के द्वारा। यहाँ 'अनवाच्य' का भाव है कि जल अर्पण की क्रिया में दोनों हाथों का समन्वय आवश्यक है—एक हाथ से जल ग्रहण करना और दूसरे (पितृ-तीर्थ) से उसे सींचना।

• दक्षिणामुखः: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके। दक्षिण दिशा पितरों की दिशा मानी गई है, जो वैतरण और यमलोक का मार्ग है।

• तल्लिङ्गैः मन्त्रैः: उनके लिङ्गों (लक्षणों/नामों) वाले मन्त्रों से। 'लिङ्ग' का अर्थ यहाँ शारीरिक अंग नहीं, अपितु 'चिह्न' या 'संकेत' है। पितरों के विशिष्ट नाम, गोत्र और उनकी पहचान कराने वाले मन्त्रों को 'लिङ्ग-मन्त्र' कहा गया है।

• सर्वान् पितृगणान्: समस्त पितृ-समूहों का। इसमें केवल प्रत्यक्ष पूर्वज नहीं, अपितु कुल के समस्त ज्ञात-अज्ञात पितृगण सम्मिलित हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य पितृ-तर्पण की इस विधि के माध्यम से साधक को एक विशेष शारीरिक और मानसिक विन्यास में ला रहे हैं। बायाँ घुटना टेककर बैठना (सव्य-जानु) केवल एक शारीरिक मुद्रा नहीं, अपितु यह पूर्ण समर्पण और विनय का प्रतीक है। जब साधक एक घुटना भूमि पर रखता है, तो वह पृथ्वी-तत्त्व के साथ अपना गहरा संबंध स्थापित करता है, जो पितरों का निवास स्थान है।

दक्षिणमुख होना इस सत्य का स्वीकार है कि जीवन का एक प्रवाह मृत्यु की ओर है। दक्षिण दिशा का मुख करना साधक को अपनी नश्वरता और अपने मूल के प्रति कृतज्ञता का बोध कराता है। दोनों हाथों का प्रयोग यह दर्शाता है कि तर्पण की यह क्रिया केवल एक हाथ का यांत्रिक कार्य नहीं, अपितु संपूर्ण व्यक्तित्व का अर्पण है।

'तल्लिङ्गैः मन्त्रैः' का रहस्य अत्यंत गहरा है। मन्त्रों में जब पितरों के 'लिङ्ग' या उनके विशिष्ट लक्षणों का उच्चारण होता है, तो वह ध्वनि-तरंगें सूक्ष्म लोक में उन विशिष्ट आत्माओं को जाग्रत करती हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी विशिष्ट नाम के पुकारने पर व्यक्ति सचेत हो जाता है। यहाँ मन्त्र केवल शब्द नहीं, अपितु पितरों तक पहुँचने वाले 'संकेत' हैं। इस प्रकार, बाह्य रूप से जल का अर्पण हो रहा है, किन्तु आन्तरिक रूप से ध्वनि और श्रद्धा के माध्यम से साधक अपने पूर्वजों की चेतना से जुड़ रहा है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विनय' और 'स्मृति' के अभ्यास का है। बायाँ घुटना टेकना शरीर में एक विशिष्ट संतुलन पैदा करता है, जिससे मन अंतर्मुखी होता है। दक्षिणमुख होकर पितरों का ध्यान करना साधक को अपने 'बीज' की ओर ले जाता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह अकेला नहीं है, अपितु उसके पीछे अनगिनत पूर्वजों की ऊर्जा-धारा प्रवाहित हो रही है। जब वह 'लिङ्ग-मन्त्रों' का जप करते हुए दोनों हाथों से जल अर्पण करता है, तो वह अपने भीतर के अहंकार को विसर्जित कर 'कुल-चेतना' में विलीन होने का अभ्यास करता है। यह अभ्यास साधक को 'अहं' (मैं) से 'वयं' (हम/कुल) की भूमि पर ले जाता है, जो कि सामाजिक और आध्यात्मिक विस्तार की पहली सीढ़ी है। यहाँ जल केवल माध्यम है, वास्तव में साधक अपनी प्राण-ऊर्जा को पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता के रूप में प्रवाहित कर रहा है।

श्लोक ७.७२

मातामहांश्च सततं श्रद्धया तर्पयेद्बुधः ।

प्राचीनावीत्युदकं च प्रसिञ्चेद्वै तिलान्वितम् ॥ ७.७२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६५

बुद्धिमान् (द्विज) श्रद्धासे सदा मातामहों (नानाओं) का भी तर्पण करे; और प्राचीनावीती (जनेऊ दाहिने कंधेपर) होकर तिल मिला जल सींचे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पितृगणों के तर्पण के लिए दक्षिणमुखी होकर बैठने और उनके विशिष्ट लिङ्ग-मन्त्रों के प्रयोग का विधान बताया गया था। अब इस श्लोक में मातामहों (नानाओं) के तर्पण की विशिष्ट विधि और जनेऊ की स्थिति का निर्देश दिया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: बुधः मातामहान् च सततं श्रद्धया तर्पयेत्, (तर्पयितुं) प्राचीनावीतिः (भूत्वा) तिलान्वितम् उदकं च प्रसिञ्चेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• बुधः: बुद्धिमान्। यहाँ 'बुध' का अर्थ केवल बौद्धिक क्षमता नहीं, अपितु वह द्विज है जो शास्त्र-विधि और उसके आन्तर रहस्य को जानता है।

• मातामहः: माता के पिता (नाना)। पितृ-तर्पण में पितृ-पक्ष के साथ मातृ-पक्ष के पूर्वजों का स्मरण अनिवार्य है।

• श्रद्धया: श्रद्धापूर्वक। 'श्रद्धा' वह मानसिक स्थिति है जहाँ संशय का अभाव होता है और कर्ता का पूर्ण विश्वास अर्पण की वस्तु और प्राप्तकर्ता के सम्बन्ध में होता है।

• प्राचीनावीतिः: प्राचीनावीती की स्थिति में। जब जनेऊ (यज्ञोपवीत) दाहिने कंधे पर रखा जाता है, तो उसे 'प्राचीनावीती' कहते हैं। यह स्थिति विशेषतः पितृ-कर्मों और कुछ विशिष्ट तर्पणों के लिए निर्धारित है।

• तिलान्वितम्: तिल युक्त। जल में काले तिल मिलाकर अर्पण करना पितृ-तर्पण की अनिवार्य शर्त है।

• प्रसिञ्चेत्: सींचे या अर्पण करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ इस बात पर बल दे रहे हैं कि तर्पण केवल पिता के कुल तक सीमित नहीं है, अपितु माता के कुल (मातामहों) के प्रति भी समान कर्तव्य है। एक 'बुध' अर्थात् विवेकशील साधक जानता है कि उसकी देह और प्राणों का आधा अंश मातृ-कुल से आया है, अतः उनकी तृप्ति के बिना साधक की अपनी आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है।

यहाँ 'श्रद्धा' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिना श्रद्धा के किया गया तर्पण केवल एक यांत्रिक क्रिया है, जो केवल शरीर को संतुष्ट करती है, आत्मा को नहीं। श्रद्धा वह सेतु है जो अर्पण करने वाले और पितरों के बीच सम्बन्ध स्थापित करती है।

विधि के स्तर पर 'प्राचीनावीती' का निर्देश दिया गया है। सामान्यतः देव-तर्पण में उपवीती (बायाँ कंधा) होता है, किन्तु पितृ-तर्पण के इस विशिष्ट चरण में दाहिने कंधे पर जनेऊ रखना यह संकेत देता है कि अब साधक अपनी चेतना को 'वैकुण्ठ' या 'स्वर्ग' (ऊर्ध्व) से हटाकर 'पितृलोक' (अधोगामी या दक्षिण) की ओर मोड़ रहा है। यह दिशा-परिवर्तन और मुद्रा-परिवर्तन साधक के मानसिक भाव को बदल देता है।

तिल युक्त जल का प्रयोग पितृ-तर्पण का प्राण है। तिल को पितरों का प्रिय और अक्षय माना गया है। जल जहाँ शीतलता और शुद्धि का प्रतीक है, वहीं तिल उस स्थिरता और बीज-रूप का प्रतीक है जो पूर्वजों के ऋण को चुकाने का माध्यम बनता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ऋण-मुक्ति' का अभ्यास है। साधक जब मातामहों का तर्पण करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के उस सूक्ष्म बीज को तृप्त कर रहा होता है जो उसे मातृ-कुल से प्राप्त हुआ है।

प्राचीनावीती की स्थिति में शरीर का दाहिना पक्ष (सूर्य पक्ष) सक्रिय होता है, जो संकल्प और क्रिया का प्रतीक है। तिल युक्त जल का अर्पण करना 'त्याग' का अभ्यास है। साधक जब श्रद्धा से जल सींचता है, तो वह अपने अहंकार को विसर्जित कर यह अनुभव करता है कि वह एक अनंत वंश-परम्परा की एक छोटी सी कड़ी है। यह भाव साधक को 'अहं' से 'वयम्' (हम) की ओर ले जाता है और अंततः उसे उस शून्य में विलीन करता है जहाँ न कोई पिता है, न माता, केवल शुद्ध चेतना है। इस प्रकार, बाहरी तर्पण के माध्यम से साधक अपने हृदय में कृतज्ञता का भाव जाग्रत करता है, जो उसे उच्चतर आध्यात्मिक भूमियों की ओर ले जाने वाला आवश्यक संस्कार है।

श्लोक ७.७३

यद्युद्धृतं निषिञ्चेत्तु तिलान् संमिश्रयेज्जले ।

अतोऽन्यथा तु सव्येन तिला ग्राह्या विचक्षणैः ॥ ७.७३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६५

यदि (पात्रमें) निकाला हुआ (जल) सींचे तो तिल जलमें मिला दे; अन्यथा बुद्धिमान् बायें हाथसे तिल लें।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में मातामहों के तर्पण के लिए प्राचीनावीती की स्थिति और तिल-युक्त जल के अर्पण का निर्देश दिया गया था। वर्तमान श्लोक उसी विधि के व्यावहारिक पक्ष को स्पष्ट करता है कि तिल जल में किस प्रकार सम्मिलित किए जाएँ।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यदि उद्धृतं (उदकं) निषिञ्चेत् तु, (तदा) तिलान् (तस्मिन्) जले संमिश्रयेत्; अतोऽन्यथा तु विचक्षणैः (तिलाः) सव्येन ग्राह्याः।

पदार्थ और निर्वचन:

• उद्धृतं: निकाला हुआ। यहाँ उस जल की बात है जिसे पहले ही पात्र (कमंडलु या कलश) से निकाल लिया गया है।

• निषिञ्चेत्: सींचे या अर्पण करे।

• संमिश्रयेत्: मिला दे या मिश्रित करे।

• अतोऽन्यथा: इसके विपरीत या अन्य स्थिति में। अर्थात् जब जल पात्र में ही हो और उसे सीधे सींचा जा रहा हो।

• सव्येन: बाएँ हाथ से।

• ग्राह्याः: ग्रहण किए जाएँ।

• विचक्षणैः: बुद्धिमानों या कुशल साधकों द्वारा। जो विधि के सूक्ष्म भेदों को जानते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य तर्पण की क्रिया में जल और तिल के संयोग की दो स्थितियाँ बता रहे हैं। तर्पण का मुख्य उद्देश्य पितरों की तृप्ति है, और तिल इस क्रिया में 'तृप्ति' के वाहक माने जाते हैं।

प्रथम स्थिति यह है कि यदि साधक ने जल को पात्र से निकालकर किसी अन्य पात्र में रख लिया है या वह जल पहले से ही अलग किया हुआ है, तो उस जल में तिल मिलाकर उसे सींचना चाहिए। यहाँ 'संमिश्रण' का अर्थ है कि तिल और जल एकरूप हो जाएँ, जिससे अर्पण की वस्तु पूर्णता प्राप्त करे।

द्वितीय स्थिति 'अतोऽन्यथा' (अन्यथा) है। जब जल पात्र में ही हो और साधक सीधे पात्र से जल सींच रहा हो, तब तिल जल में पहले से मिश्रित नहीं होते। ऐसी स्थिति में 'विचक्षण' अर्थात् विवेकशील साधक तिल को अपने बाएँ हाथ (सव्येन) से ग्रहण करता है और दाहिने हाथ से जल सींचते समय उन्हें अर्पित करता है।

यहाँ बाएँ हाथ का प्रयोग एक महत्वपूर्ण संकेत है। वैदिक विधि में दाहिना हाथ 'दान' और 'अर्पण' का मुख्य साधन है, जबकि बायाँ हाथ उस साधन को 'सहयोग' प्रदान करता है। जब तिल अलग से ग्रहण किए जाते हैं, तो बायाँ हाथ उन्हें संभालकर दाहिने हाथ की क्रिया में सम्मिलित करता है, जिससे अर्पण की धारा बाधित न हो।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से, जल 'चेतना' का प्रतीक है और तिल 'बीज' (संस्कारों) के प्रतीक हैं। तर्पण की यह क्रिया वास्तव में साधक के भीतर के पूर्वजों (पूर्व जन्मों के संस्कारों और ऋणों) का शोधन है।

जब साधक जल में तिल मिलाता है, तो वह अपने सूक्ष्म संस्कारों को चेतना के प्रवाह में विलीन कर उन्हें समर्पित कर रहा होता है। बाएँ हाथ से तिल ग्रहण करना और दाहिने हाथ से जल सींचना, शरीर की दो विपरीत प्रवृत्तियों के समन्वय का संकेत है। बायाँ हाथ यहाँ 'ग्रहण' और 'संभालने' का कार्य करता है, जबकि दाहिना हाथ 'विसर्जन' और 'अर्पण' का। जब बायाँ हाथ बीज रूपी संस्कारों को उठाता है और दाहिना हाथ उन्हें जल के माध्यम से प्रवाहित करता है, तो साधक के भीतर एक संतुलन निर्मित होता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह केवल बाहरी जल नहीं सींच रहा, अपितु अपने हृदय के भीतर स्थित 'पितृ-तत्त्व' (मूल प्रवृत्तियों) को श्रद्धा के जल से तृप्त कर रहा है, जिससे वह मानसिक बोझ से मुक्त होकर उच्चतर भूमियों की ओर अग्रसर हो सके।

श्लोक ७.७४

दक्षिणे पितृतीर्थेन जलं सिञ्चेद्यथाविधि ।

दक्षिणेनैव गृह्णीयात् पितृतीर्थसमीपतः ॥ ७.७४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६५

दाहिने (हाथ) के पितृतीर्थसे विधिपूर्वक जल सींचे; और दाहिने (हाथ) से ही पितृतीर्थके पास (तिल) ग्रहण करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में तिल ग्रहण करने की सामान्य विधि और जल के साथ उनके सम्मिश्रण के भेदों का वर्णन था। वर्तमान श्लोक अब उस विशिष्ट शारीरिक मुद्रा और हाथ के उस बिंदु (तीर्थ) को निर्धारित करता है, जहाँ से पितरों को जल अर्पित किया जाना चाहिए।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) यथाविधि जलं दक्षिणे पितृतीर्थेन सिञ्चेत्; (तथा) पितृतीर्थसमीपतः (तिलाः) दक्षिणेनैव गृह्णीयात्।

पदार्थ और निर्वचन:

• दक्षिणे पितृतीर्थेन: दाहिने हाथ के उस विशिष्ट स्थान (तीर्थ) से, जो पितरों के अर्पण के लिए नियत है। 'तीर्थ' का अर्थ है वह स्थान जहाँ से सूक्ष्म ऊर्जा का प्रवाह होता है।

• सिञ्चेत्: सींचे या जल अर्पित करे।

• यथाविधि: शास्त्रसम्मत विधि के अनुसार।

• गृह्णीयात्: ग्रहण करे या उठाए। यहाँ तिल को उठाने की क्रिया का निर्देश है।

• पितृतीर्थसमीपतः: पितृतीर्थ के निकट से।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य तर्पण की क्रिया को केवल एक भौतिक कर्म नहीं, बल्कि एक ऊर्जा-विनिमय की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। यहाँ निर्देश है कि जल का विसर्जन दाहिने हाथ के 'पितृतीर्थ' से किया जाए।

सामान्यतः देवताओं के लिए जल अर्पण करते समय हाथ की अन्य उंगलियों या तीर्थों का प्रयोग होता है, किंतु पितरों के निमित्त एक विशिष्ट बिंदु निर्धारित है। 'पितृतीर्थ' वह स्थान है जो पूर्वजों की सूक्ष्म चेतना से जुड़ा होता है। जब साधक विधिपूर्वक जल सींचता है, तो वह केवल जल नहीं, बल्कि अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता को उस विशिष्ट तीर्थ के माध्यम से पितृ-लोक की ओर प्रवाहित करता है।

श्लोक का दूसरा भाग एक महत्वपूर्ण निर्देश देता है: "दक्षिणेनैव गृह्णीयात् पितृतीर्थसमीपतः"। पिछले श्लोक (७.७३) में कहा गया था कि यदि जल पात्र में हो, तो तिल 'सव्येन' (बाएँ हाथ से) ग्रहण किए जाएँ। किंतु यहाँ एक विशेष स्थिति का संकेत है—जब तिल पितृतीर्थ के समीप रखे हों या उस विशिष्ट क्रिया के प्रवाह में हों, तब उन्हें दाहिने हाथ से ही ग्रहण करना चाहिए। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि क्रिया की सूक्ष्मता है। जब साधक का दाहिना हाथ अर्पण की मुद्रा में होता है, तब उसी हाथ के तीर्थ के समीप से तिल ग्रहण करना ऊर्जा के प्रवाह को अखंड रखता है।

यह विधि दर्शाती है कि तर्पण में हाथ की स्थिति और उंगलियों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि शरीर के विभिन्न बिंदु अलग-अलग दैवीय और पितृ शक्तियों के संवाहक होते हैं।

योग-रहस्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस विधि के माध्यम से साधक को 'शरीर-चेतना' के प्रति सजग कर रहे हैं। योग की दृष्टि से हाथ की उंगलियाँ और हथेली के विशिष्ट बिंदु केवल मांस-मज्जा नहीं, बल्कि प्राणिक केंद्रों के द्वार हैं।

साधक जब 'पितृतीर्थ' से जल सींचता है, तो वह अपने भीतर के उस भाव को जाग्रत करता है जो उसे अपनी जड़ों से जोड़ता है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' से मुक्त कर 'ऋण-मुक्ति' की भूमि पर ले जाता है। दाहिने हाथ का प्रयोग यहाँ सक्रियता और संकल्प का प्रतीक है। जब साधक पितृतीर्थ के समीप से तिल ग्रहण कर जल अर्पित करता है, तो वह अपने हृदय की करुणा और पूर्वजों के प्रति समर्पण को एक भौतिक क्रिया में रूपांतरित करता है। यह अभ्यास साधक को इस अनुभव की ओर ले जाता है कि वह अकेला नहीं है, बल्कि एक अनंत पितृ-श्रृंखला का हिस्सा है। इस प्रकार, बाहरी तर्पण धीरे-धीरे आंतरिक कृतज्ञता के ध्यान में बदल जाता है।

विप्रकरे पञ्च तीर्थानि

श्लोक ७.७५

पञ्च तीर्थानि विप्रस्य करे तिष्ठन्ति दक्षिणे ।

ब्राह्मं दैवं तथा पैत्रं प्राजापत्यं तु सौमिकम् ॥ ७.७५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६६

विप्रके दाहिने हाथमें पाँच तीर्थ रहते हैं — ब्राह्म, दैव, पैत्र, प्राजापत्य और सौम्य।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पितृ-तर्पण के लिए दाहिने हाथ के 'पितृतीर्थ' के प्रयोग और तिल ग्रहण करने की विधि बताई गई थी। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस संपूर्ण तंत्र को स्पष्ट कर रहे हैं, जिसके अंतर्गत दाहिना हाथ केवल एक भौतिक अंग नहीं, अपितु पाँच दिव्य तीर्थों का केंद्र है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: विप्रस्य दक्षिणे करे पञ्च तीर्थानि तिष्ठन्ति — ब्राह्मं, दैवं, तथा पैत्रं, प्राजापत्यं तु, सौमिकम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• विप्रस्य: यहाँ 'विप्र' शब्द केवल जातिवाचक नहीं, अपितु 'विप्र' (वि + प्र) अर्थात् जो विशेष ज्ञान से प्रबुद्ध है, ऐसा साधक।

• दक्षिणे करे: दाहिने हाथ में। वैदिक परंपरा में दाहिना हाथ 'दक्षिण' (कुशल/शुभ) माना गया है, जो क्रियात्मक शक्ति का प्रतीक है।

• तीर्थानि: तीर्थ का शाब्दिक अर्थ है 'तितीर्षा' या पार उतरने का स्थान। यहाँ तीर्थ का अर्थ हाथ के वे विशिष्ट बिंदु हैं, जो सूक्ष्म ऊर्जा के प्रवाह के द्वार हैं।

• ब्राह्म, दैव, पैत्र, प्राजापत्य, सौम्य: ये पाँचों तीर्थों के नाम हैं, जो क्रमशः ब्रह्मा (परमात्मा/ऋषि), देव, पितृ, प्रजापति और सोम (चंद्रमा/मन) की शक्तियों से संबद्ध हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से यह रहस्य खोल रहे हैं कि शरीर का प्रत्येक अंग ब्रह्मांडीय शक्तियों का प्रतिबिंब है। विप्र के दाहिने हाथ में पाँच तीर्थों का होना यह दर्शाता है कि साधक का शरीर ही वह वेदी है जहाँ से वह समस्त लोकों के साथ संबंध स्थापित कर सकता है।

यहाँ 'तीर्थ' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। जिस प्रकार नदी का तीर्थ हमें भौतिक रूप से पार उतारता है, उसी प्रकार हाथ के ये सूक्ष्म बिंदु साधक की चेतना को स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाते हैं। जब साधक किसी विशिष्ट तीर्थ से जल अर्पण करता है, तो वह जल केवल एक द्रव्य नहीं रह जाता, बल्कि उस तीर्थ की विशिष्ट ऊर्जा से अभिमंत्रित होकर अपने गंतव्य (देव, पितृ या ऋषि) तक पहुँचता है।

इन पाँच तीर्थों का क्रम सृष्टि के पदानुक्रम को दर्शाता है:

१. ब्राह्म तीर्थ: यह उच्चतम चेतना और ऋषियों के ज्ञान का केंद्र है।

२. दैव तीर्थ: यह दिव्य शक्तियों और देवताओं के अर्पण का मार्ग है।

३. पैत्र तीर्थ: यह पूर्वजों और पितृ-तत्व के प्रति कृतज्ञता का द्वार है।

४. प्राजापत्य तीर्थ: यह सृष्टि के सृजक और प्रजापतियों के निमित्त है।

५. सौम्य तीर्थ: यह सोम (चंद्रमा) और मन की शांति का केंद्र है।

इस विधि का बाहरी अर्थ यह है कि अलग-अलग अर्पण के लिए हाथ के अलग-अलग हिस्सों का प्रयोग करें, किंतु इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपनी चेतना को उस विशिष्ट बिंदु पर केंद्रित करे। जल का मार्ग बदलने से वास्तव में पाने वाला (पात्र) बदल जाता है, क्योंकि प्रत्येक तीर्थ एक विशिष्ट 'आवृत्ति' का प्रतिनिधित्व करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म में सूक्ष्म सजगता' का अभ्यास है। एक साधारण व्यक्ति के लिए हाथ केवल जल गिराने का साधन है, किंतु एक योगी के लिए हाथ 'तीर्थ' है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके हाथ में दिव्य तीर्थ स्थित हैं, तो उसकी क्रिया 'कर्म' से उठकर 'यज्ञ' बन जाती है।

साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि कैसे शरीर के भौतिक अंगों को आध्यात्मिक उपकरणों में बदला जाए। जब वह 'पैत्र तीर्थ' से जल सींचता है, तो उसका मन केवल जल के प्रवाह पर नहीं, बल्कि उस बिंदु की संवेदना पर केंद्रित होता है। यह एकाग्रता उसे स्थूल देह से ऊपर उठाकर सूक्ष्म शरीर के बोध की ओर ले जाती है।

यह अभ्यास साधक को इस भूमि पर लाता है जहाँ वह समझता है कि बाहरी जगत के तीर्थों (नदियों, पर्वतों) की यात्रा से पूर्व, अपने शरीर के भीतर के तीर्थों को जाग्रत करना आवश्यक है। हाथ के इन पाँच बिंदुओं पर ध्यान देना वास्तव में प्राण-शक्ति को दिशा देने का अभ्यास है। जिस बिंदु से जल गिरता है, वहीं से साधक की आंतरिक ऊर्जा का प्रवाह भी उस विशिष्ट लोक की ओर प्रवाहित होता है। यह 'अंग-चेतना' का विकास है, जहाँ शरीर का प्रत्येक रोम और बिंदु ईश्वरीय विधान से जुड़ जाता है।

श्लोक ७.७६

अङ्गुष्ठमूले ब्राह्मं तु दैवं ह्यङ्गुलमूर्धनि ।

प्राजापत्यं तु मूले स्यात् मध्ये सौम्यं प्रतिष्ठितम् ॥ ७.७६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६६

अँगूठेके मूलमें ब्राह्म (तीर्थ), अँगुलियोंके अग्रभागमें दैव, (कनिष्ठिकाके) मूलमें प्राजापत्य, और (हथेलीके) बीचमें सौम्य प्रतिष्ठित है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में विप्र के दाहिने हाथ में स्थित पाँच दिव्य तीर्थों के नामों का उल्लेख किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उन तीर्थों की शारीरिक स्थिति और उनके सटीक स्थान का निर्धारण कर रहे हैं, ताकि तर्पण की क्रिया केवल एक शारीरिक चेष्टा न रहकर एक सूक्ष्म ऊर्जा-संक्रमण बन सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ब्राह्मं तु अङ्गुष्ठमूले, दैवं ह्यङ्गुलमूर्धनि, प्राजापत्यं तु मूले स्यात्, सौम्यं मध्ये प्रतिष्ठितम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अङ्गुष्ठमूले: अँगूठे के मूल भाग में (जहाँ अँगूठा हथेली से जुड़ता है)।

• अङ्गुलमूर्धनि: अँगुलियों के अग्रभाग (शीर्ष) पर। यहाँ 'अङ्गुल' शब्द समस्त अँगुलियों के लिए प्रयुक्त है, क्योंकि दैव-शक्ति का विस्तार ज्ञान और स्पर्श के अग्रिम छोर तक होता है।

• मूले (प्राजापत्यं तु मूले): यहाँ 'मूल' शब्द कनिष्ठिका (सबसे छोटी अँगुलि) के मूल भाग के लिए आया है।

• मध्ये: हथेली के मध्य भाग में।

• प्रतिष्ठितम्: स्थित या स्थापित। 'प्रतिष्ठा' शब्द यह संकेत देता है कि ये स्थान केवल शारीरिक बिंदु नहीं, अपितु विशिष्ट शक्तियों के अधिष्ठान हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य तर्पण की विधि के माध्यम से शरीर के 'सूक्ष्म-मानचित्र' को उद्घाटित कर रहे हैं। जब साधक जल सींचता है, तो वह केवल जल नहीं गिरा रहा होता, अपितु हाथ के इन विशिष्ट तीर्थों के माध्यम से अपनी चेतना को संबंधित लोकों की शक्तियों से जोड़ रहा होता है।

प्रथम, ब्राह्म तीर्थ अँगूठे के मूल में है। अँगूठा संकल्प और इच्छाशक्ति का प्रतीक है। ब्रह्मा का अर्थ है—सृजन और ज्ञान। अतः जहाँ संकल्प का मूल है, वहीं ब्राह्म तीर्थ है, जो साधक को ऋषियों और परम ज्ञान से जोड़ता है।

द्वितीय, दैव तीर्थ अँगुलियों के अग्रभाग (मूर्धनि) पर है। हमारी अँगुलियों के अग्रभाग ही वह स्थान हैं जहाँ से हम संसार का अनुभव करते हैं और कर्म करते हैं। देवताओं का संबंध इंद्रियों और बाहरी जगत के संचालन से है, इसलिए दैव तीर्थ का स्थान अँगुलियों के अग्रभाग पर है।

तृतीय, प्राजापत्य तीर्थ कनिष्ठिका के मूल में है। प्रजापति सृष्टि के पालनकर्ता और वंश-उत्पत्ति के अधिष्ठाता हैं। कनिष्ठिका का मूल भाग स्थिरता और आधार का प्रतीक है, जो वंश और परंपरा के पोषण की शक्ति को दर्शाता है।

चतुर्थ, सौम्य तीर्थ हथेली के मध्य में प्रतिष्ठित है। हथेली का मध्य भाग हृदय की निकटता और ग्रहणशीलता का केंद्र है। 'सौम्य' का संबंध सोम (चंद्रमा) से है, जो मन, शांति और अमृतत्व का प्रतीक है। हथेली के केंद्र में सौम्य तीर्थ का होना यह दर्शाता है कि समस्त क्रियाओं के बीच में मन की शांति और संतोष का वास होना चाहिए।

इस प्रकार, यह विधि बाहरी रूप से तर्पण की है, किंतु आन्तरिक रूप से यह शरीर के विभिन्न केंद्रों को ब्रह्माण्ड के पाँच प्रमुख आयामों—ब्रह्मा, देव, पितृ, प्रजापति और सोम—के साथ एकाकार करने की प्रक्रिया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्मं तीर्थं प्रचक्षते । कायमङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः ॥ २.५९ ॥

अँगूठेके मूलके नीचे ब्राह्म तीर्थ कहते हैं; (कनिष्ठिका-) अँगुलीके मूलमें काय (प्राजापत्य), अँगुलियोंके अग्रमें दैव, और उन दोनों (अँगूठे-तर्जनी) के नीचे पित्र्य।

मनुस्मृति २.५९मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 213

मनुस्मृति में हाथ के तीर्थों का वर्णन है, जहाँ अँगूठे के मूल को ब्राह्म, अँगुलियों के अग्र को दैव और कनिष्ठिका के मूल को काय (प्राजापत्य) तीर्थ कहा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति के इस विवरण में पूर्ण सहमति है। अंतर केवल इतना है कि मनुस्मृति में चार मुख्य तीर्थों का उल्लेख है, जबकि महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'सौम्य तीर्थ' को जोड़कर इसे पाँच तीर्थों की पूर्णता प्रदान करते हैं। यह वृद्धि यह दर्शाती है कि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में 'मन' (सोम) की स्थिति को विशेष महत्व दिया गया है, क्योंकि बिना मानसिक शांति और सोम-तत्व के कोई भी योगिक क्रिया पूर्ण नहीं होती।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'न्यास' और 'ऊर्जा-प्रवाह' का अभ्यास है। योग की दृष्टि से, जब साधक इन तीर्थों को स्पर्श करता है या वहाँ से जल सींचता है, तो वह अपने शरीर के स्थूल अंगों को सूक्ष्म शक्तियों के प्रतीकों में बदल देता है।

अँगूठे के मूल (ब्राह्म) पर ध्यान केंद्रित करने से साधक में 'विवेक' जाग्रत होता है। अँगुलियों के अग्र (दैव) पर ध्यान देने से 'कर्म-कुशलता' आती है। कनिष्ठिका के मूल (प्राजापत्य) का अनुभव उसे अपनी 'जड़ों और पूर्वजों' से जोड़ता है, और हथेली के मध्य (सौम्य) का अभ्यास मन को 'अमृतमय' और शांत बनाता है।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि उसका दाहिना हाथ केवल भौतिक वस्तु पकड़ने का साधन नहीं, अपितु एक 'दिव्य यंत्र' है। इस अभ्यास के माध्यम से वह 'स्थूल देह' की भूमि से उठकर 'सूक्ष्म शरीर' की भूमि पर प्रविष्टि करता है, जहाँ शरीर का प्रत्येक बिंदु एक ब्रह्माण्डीय द्वार (तीर्थ) बन जाता है।

तिलानुकल्पाः

श्लोक ७.७७

अङ्गुष्ठस्य प्रदेशिन्या मध्ये पित्र्यं प्रकीर्तितम् ।

तिलानामप्यभावे तु सुवर्णं रजतान्वितम् ॥ ७.७७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६६

अँगूठे और तर्जनीके बीच पैत्र (तीर्थ) कहा गया है। तिलोंके अभावमें चाँदी सहित सोना (जलमें डाले) —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने दाहिने हाथ के चार तीर्थों—ब्राह्म, दैव, प्राजापत्य और सौम्य—के स्थानों का निर्धारण किया था। अब इस श्लोक में वे पाँचवें तीर्थ 'पैत्र' के स्थान को स्पष्ट कर रहे हैं और तर्पण के अनिवार्य द्रव्य 'तिल' के अभाव में उसके विकल्प का विधान बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: पित्र्यं (तीर्थं) अङ्गुष्ठस्य प्रदेशिन्याः मध्ये प्रकीर्तितम् । तिलानाम् अपि अभावे तु सुवर्णं रजतान्वितम् (निषिञ्चेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अङ्गुष्ठस्य प्रदेशिन्याः मध्ये: अँगूठे (अङ्गुष्ठ) और तर्जनी (प्रदेशिका) के मध्य के स्थान में।

• पित्र्यं प्रकीर्तितम्: 'पैत्र' या 'पितृ-तीर्थ' कहा गया है।

• तिलानाम् अपि अभावे: तिलों के भी अभाव में (जब तर्पण हेतु तिल उपलब्ध न हों)।

• सुवर्णं रजतान्वितम्: सोना (सुवर्ण) और चाँदी (रजता) के साथ (अर्थात् जल में इन दोनों धातुओं का अंश मिलाकर या उन्हें डालकर)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी केवल बाह्य कर्मकांड का निर्देश नहीं कर रहे, अपितु शरीर के माध्यम से ब्रह्मांडीय शक्तियों के संचार का मार्ग बता रहे हैं। हाथ के पाँच तीर्थ वास्तव में पाँच अलग-अलग आयामों के द्वार हैं।

यहाँ पैत्र तीर्थ का स्थान अँगूठे और तर्जनी के मध्य बताया गया है। अँगूठा संकल्प का और तर्जनी निर्देश या क्रिया का प्रतीक है। इन दोनों के मध्य का स्थान वह संधि है जहाँ संकल्प क्रिया में परिवर्तित होता है। पितर हमारे मूल हैं, हमारी परंपरा और पूर्वजों के संचित संस्कार हमारे भीतर प्रवाहित हैं। अतः जब साधक इस विशिष्ट तीर्थ से जल सींचता है, तो वह अपनी मूल ऊर्जा को पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता के रूप में अर्पित करता है। यह क्रिया साधक को अपने वंशानुगत बंधनों से मुक्त कर उन्हें तृप्त करने और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने का साधन है।

श्लोक का दूसरा भाग तर्पण के द्रव्य पर है। तर्पण में तिल का प्रयोग अनिवार्य माना गया है क्योंकि तिल को 'अक्षय' और 'संस्कार-वाहक' माना जाता है। किंतु, यदि किसी कारणवश तिल उपलब्ध न हों, तो महर्षि विकल्प देते हैं कि जल में सोना और चाँदी मिलाकर सींचा जाए। यहाँ सोना (सुवर्ण) सूर्य का और चाँदी (रजता) चन्द्रमा का प्रतीक है। पितृ-तर्पण वास्तव में सौर और चंद्र ऊर्जाओं के संतुलन का खेल है, क्योंकि पितर इन्हीं दोनों ज्योतियों के प्रभाव में रहते हैं। जब भौतिक द्रव्य (तिल) नहीं होते, तब साधक इन धातुओं के माध्यम से सूर्य-चन्द्र की सूक्ष्म ऊर्जाओं को जल में आवेशित कर पितरों को समर्पित करता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्मं तीर्थं प्रचक्षते । कायमङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः ॥ २.५९ ॥

अँगूठेके मूलके नीचे ब्राह्म तीर्थ कहते हैं; (कनिष्ठिका-) अँगुलीके मूलमें काय (प्राजापत्य), अँगुलियोंके अग्रमें दैव, और उन दोनों (अँगूठे-तर्जनी) के नीचे पित्र्य।

मनुस्मृति २.५९मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 213

मनुस्मृति में भी हाथ के तीर्थों का वर्णन मिलता है, जहाँ कहा गया है कि अँगूठे और तर्जनी के नीचे (तयोरधः) पित्र्य तीर्थ स्थित है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः सहमत हैं। दोनों ही ग्रन्थ इस बात की पुष्टि करते हैं कि शरीर के विशिष्ट बिंदु विशिष्ट दैवीय शक्तियों के अधिष्ठान हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ऊर्जा-मार्ग' के अभ्यास का संकेत है। साधक जब अँगूठे और तर्जनी के मध्य के बिंदु (पैत्र तीर्थ) पर ध्यान केंद्रित कर जल सींचता है, तो वह अपने हृदय की करुणा को हाथ के माध्यम से प्रवाहित करता है।

तिल का अभाव होने पर सोना और चाँदी का प्रयोग करना यह सिखाता है कि साधना में 'भाव' और 'तत्व' प्रधान होते हैं। सोना 'तेज' है और चाँदी 'शीतलता'। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि वह अपने भीतर की उष्णता (क्रोध, अहंकार) को शीतलता (शांति, संतोष) में बदलकर अपने पूर्वजों और अपने मूल स्वभाव को तृप्त कर रहा है। यह अभ्यास साधक को 'अहं' (मैं कर्ता हूँ) से हटाकर 'ऋण' (मैं कृतज्ञ हूँ) की भूमि पर ले जाता है, जो कि उच्चतर आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है।

श्लोक ७.७८

तदभावे निषिञ्चेत्तु दर्भैर्मन्त्रेण वाग्यतः ।

कव्यवाडनलः सोमो यमश्चैवार्यमा तथा ॥ ७.७८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६६

— उसके (भी) अभावमें, मौन रहकर मन्त्रसे कुशोंद्वारा (जल) सींचे। कव्यवाहन अग्नि, सोम, यम और अर्यमा,

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने तर्पण के लिए तिलों के अभाव में स्वर्ण और रजत के प्रयोग का विकल्प बताया था। वर्तमान श्लोक में वे उस स्थिति का समाधान दे रहे हैं जब साधक के पास तिल, सोना और चाँदी—तीनों ही उपलब्ध न हों, तथा साथ ही दिव्य पितरों के नाम का उल्लेख आरम्भ कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (सुवर्ण-रजतानाम्) तदभावे तु (साधकः) मन्त्रेण वाग्यतः दर्भैः (जलं) निषिञ्चेत् । कव्यवाड्-अनलः, सोमः, यमः च, अर्यमा तथा (पितरः सन्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• तदभावे: तिलों, स्वर्ण और रजत के अभाव में।

• वाग्यतः: मौन रहकर; वाणी का बाह्य प्रयोग न करते हुए (अन्तर्मुखी होकर)।

• दर्भैः: कुश (दूर्वा) के तिनकों द्वारा।

• निषिञ्चेत्: जल सींचे या अर्पण करे।

• कव्यवाड्-अनलः: 'कव्यवाड्' वह अग्नि है जो सोम-यज्ञ के समय कव्य (सोम रस) को ले जाती है। यहाँ यह दिव्य पितरों के प्रतिनिधि के रूप में अग्नि का स्वरूप है।

• सोमः, यमः, अर्यमा: ये तीनों दिव्य पितर हैं, जो ब्रह्मांडीय व्यवस्था, मृत्यु और पितृ-लोक के अधिष्ठाता हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी साधक को हर परिस्थिति में साधना के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देते हैं। तर्पण का मूल उद्देश्य पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और उनके ऋण से मुक्ति है। जब भौतिक द्रव्य (तिल, स्वर्ण, रजत) उपलब्ध न हों, तब साधक 'मौन' और 'कुश' का आश्रय लेता है।

यहाँ 'वाग्यतः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब बाह्य द्रव्य नहीं होते, तब साधक की अपनी 'इच्छाशक्ति' और 'मौन' ही सबसे शक्तिशाली द्रव्य बन जाते हैं। मौन रहने का अर्थ केवल चुप रहना नहीं, अपितु वाणी की ऊर्जा को बाहर व्यर्थ न करके उसे मन्त्र के साथ भीतर की ओर मोड़ देना है। कुश (दर्भ) यहाँ केवल एक घास नहीं, अपितु वह माध्यम है जो सूक्ष्म ऊर्जाओं को ग्रहण और प्रसारित करने की क्षमता रखता है। अतः जब साधक मौन रहकर कुशों के माध्यम से जल सींचता है, तो वह भौतिकता से ऊपर उठकर विशुद्ध चेतना के स्तर पर पितरों से जुड़ता है।

श्लोक के उत्तरार्ध में महर्षि उन दिव्य पितरों का नाम लेना आरम्भ करते हैं, जो समस्त मानव जाति के आदि-पितर हैं। कव्यवाड्-अनल वह अग्नि है जो स्थूल और सूक्ष्म के बीच सेतु है। सोम मन और अमृतत्व के अधिष्ठाता हैं, यम धर्म और अनुशासन के, तथा अर्यमा संबंधों और सामाजिक व्यवस्था के स्वामी हैं। यह सूची संकेत करती है कि तर्पण केवल अपने कुल के मृत पूर्वजों को जल देना नहीं है, अपितु उन सार्वभौमिक शक्तियों को याद करना है जिनसे हमारा अस्तित्व निर्मित हुआ है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'द्रव्य-साधना' से 'भाव-साधना' की ओर संक्रमण है। जब साधक के पास बाहरी साधन नहीं होते, तब वह अपनी आंतरिक रिक्तता (मौन) को ही साधन बना लेता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि श्रद्धा और मन्त्र की शक्ति किसी भी भौतिक वस्तु से श्रेष्ठ है। 'वाग्यतः' (मौन) का अभ्यास साधक को वाक्-शक्ति के संचय की ओर ले जाता है। जब वह कुशों द्वारा जल सींचता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर की सूक्ष्म नाड़ियों के माध्यम से कृतज्ञता का प्रवाह ऊपर की ओर भेज रहा होता है। कव्यवाड्-अनल, सोम, यम और अर्यमा के नाम का स्मरण करते समय साधक अपने व्यक्तित्व के उन गुणों—तेज (अग्नि), शांति (सोम), संयम (यम) और उदारता (अर्यमा)—को जाग्रत करता है, जो उसे पूर्वजों की दिव्य विरासत से जोड़ते हैं। यह अभ्यास साधक को स्थूल देह के मोह से निकालकर उसे 'दिव्य पितृ-तत्व' यानी वैश्विक चेतना की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।

तर्पणदेवताः

श्लोक ७.७९

अग्निष्वात्तान् सोमपाश्च तथा बर्हिषदः पितॄन् ।

यदिस्याज्जीवत्पितृक एतान् दिव्यान् पितॄंस्तथा ॥ ७.७९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६६

अग्निष्वात्त, सोमप और बर्हिषद् पितर — जिसका पिता जीवित हो, (वह) इन दिव्य पितरोंका (तर्पण करे),

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने दिव्य पितरों की सूची आरम्भ करते हुए कव्यवाड्-अग्नि, सोम, यम और अर्यमा का उल्लेख किया था। वर्तमान श्लोक में वे इस दिव्य सूची को पूर्ण कर रहे हैं और साथ ही उस विशेष स्थिति का निर्देश दे रहे हैं जब साधक के पिता जीवित हों।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: अग्निष्वात्तान्, सोमपाश्च, तथा बर्हिषदः (इति) पितरः (सन्ति)। यदि (साधकः) जीवत्पितृकः स्यात्, (तर्हि सः) एतान् दिव्यान् पितॄन् (तर्पयेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अग्निष्वात्तान्: 'अग्नि' और 'श्वत्त' (श्वेत/प्रकाशित) के संयोग से बना शब्द। वे पितर जो अग्नि के समान तेजस्वी हैं और जिन्होंने प्रकाशमय स्वरूप धारण किया है।

• सोमपाश्च: सोम रस का पान करने वाले। यहाँ सोम केवल औषधि नहीं, अपितु वह चंद्र-तत्व है जो मन और शांति का प्रतीक है।

• बर्हिषदः: 'बर्हिष्' (कुश का आसन) पर प्रतिष्ठित। यज्ञ के समय जिस आसन पर देवता और पितृ विराजते हैं, उससे सम्बन्धित पितर।

• जीवत्पितृकः: जिसका पिता जीवित हो (जीवत् + पितृक)।

• दिव्यान् पितॄन्: वे पितर जो देह-बद्ध नहीं हैं, अपितु सूक्ष्म और प्रकाशमय स्वरूप में ब्रह्मांडीय शक्तियों के रूप में स्थित हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी पितृ-तर्पण को केवल एक पारिवारिक कर्मकांड नहीं, अपितु एक ब्रह्मांडीय सम्बन्ध के पुनरुद्धार के रूप में देखते हैं। पिछले श्लोक में वर्णित चार दिव्य पितरों के साथ अब तीन और नाम जुड़ते हैं—अग्निष्वात्त, सोमप और बर्हिषद्। ये नाम वास्तव में पितरों की उन अवस्थाओं या श्रेणियों के प्रतीक हैं, जहाँ वे भौतिक शरीर का त्याग कर दिव्य गुणों (तेज, शांति और यज्ञ-स्थिरता) को प्राप्त कर चुके हैं।

यहाँ एक महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उठता है कि यदि किसी व्यक्ति के पिता जीवित हैं, तो वह पितृ-तर्पण कैसे करे? शास्त्रानुसार, जीवित पिता की उपस्थिति में मृत पूर्वजों का तर्पण करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि पिता स्वयं पितृ-तत्व के जीवित प्रतिनिधि हैं। अतः याज्ञवल्क्य जी निर्देश देते हैं कि ऐसा व्यक्ति केवल 'दिव्य पितरों' का तर्पण करे।

दिव्य पितर वे हैं जो किसी विशेष कुल के नहीं, अपितु संपूर्ण मानवता के आदि-पितर हैं। वे प्रकृति के उन सूक्ष्म तत्वों के अधिष्ठाता हैं जो हमें जीवन देते हैं। जब साधक इन दिव्य पितरों को जल अर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के उस 'आदि-स्रोत' के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है जिससे समस्त सृष्टि का उद्भव हुआ है। यह विधि यह सुनिश्चित करती है कि श्रद्धा का प्रवाह न रुके, चाहे पारिवारिक स्थिति कैसी भी हो।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'कुल' से ऊपर उठकर 'ब्रह्मांड' से जुड़ने का अभ्यास कराता है।

साधक जब अग्निष्वात्त, सोमप और बर्हिषद् का स्मरण करता है, तो वह अपने भीतर तीन वृत्तियों का शोधन करता है:

१. अग्निष्वात्त: अपने भीतर के ज्ञान-प्रकाश (तेज) को जाग्रत करना।

२. सोमप: मन की चंचलता को शांत कर उसे सोम-तत्व (आनंद) में लीन करना।

३. बर्हिषद्: अपने चित्त को एक स्थिर आसन (स्थिरता) प्रदान करना।

'जीवत्पितृक' होने की स्थिति में दिव्य पितरों का तर्पण करना यह संकेत देता है कि साधक अब केवल रक्त-सम्बन्धों के मोह में नहीं, अपितु चेतना के व्यापक सम्बन्धों में प्रवेश कर रहा है। यहाँ जल का अर्पण वास्तव में अपनी सूक्ष्म ऊर्जा को उन उच्च केंद्रों की ओर प्रवाहित करना है, जहाँ से जीवन की धारा आती है। यह अभ्यास साधक को 'संकीर्णता' से 'विस्तार' की भूमि की ओर ले जाता है।

श्लोक ७.८०

तेभ्यो वापि पिता दद्यात् कामतस्तांस्तु तर्पयेत् ।

एतांश्च वक्ष्यमाणांश्च प्रमीतपितृको द्विजः ॥ ७.८० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६७

— अथवा पिता जिन्हें देता हो उन्हें, (या) इच्छानुसार उनका तर्पण करे। जिसका पिता मर चुका हो, वह द्विज इनका और आगे कहे जानेवालोंका (तर्पण करे) —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'जीवत्पितृक' (जिनके पिता जीवित हैं) साधक के लिए दिव्य पितरों के तर्पण का निर्देश दिया था। वर्तमान श्लोक में वे तर्पण की परिधि का विस्तार करते हुए व्यक्तिगत इच्छा और 'प्रमीतपितृक' (जिनके पिता देह त्याग चुके हैं) साधक के विशेष विधान को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तर्पयेत्) तेभ्यो वापि (यन्) पिता दद्यात् (तेभ्यः), कामतस्तंस्तर्पयेत्। एतान् च (दिव्यान् पितॄन्) वक्ष्यमाणांश्च (वसून् रुद्रान् आदित्यान् च) प्रमीतपितृकः द्विजः (तर्पयेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• तेभ्यो वापि पिता दद्यात्: यहाँ 'तेभ्यः' शब्द उन पितरों या पूर्वजों के लिए है जिन्हें साधक के पिता स्वयं तर्पण या दान देते रहे हों। अर्थात् पिता द्वारा पूजित पूर्वज।

• कामतः: इच्छा के अनुसार। यह साधक की श्रद्धा और उसके पारिवारिक कुल-परम्परा के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

• प्रमीतपितृकः: 'प्रमीत' का अर्थ है जो प्रेषित हो गया हो या मृत्यु को प्राप्त हो चुका हो। वह द्विज जिसके पिता का देहावसान हो चुका है।

• वक्ष्यमाणांश्च: जो आगे कहे जाने वाले हैं (अर्थात् अगले श्लोक में आने वाले वसु, रुद्र और आदित्य)।

• द्विजः: वह जो संस्कार द्वारा दूसरा जन्म पा चुका है; यहाँ वह साधक जो वैदिक विधि और योग-साधना के योग्य है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी तर्पण की विधि को केवल एक यांत्रिक क्रिया नहीं, अपितु एक 'ऋण-मुक्ति' की प्रक्रिया मानते हैं। इस श्लोक के प्रथम चरण में वे एक सूक्ष्म संकेत देते हैं कि यदि साधक के पिता जीवित हैं, तो वह उन पितरों का तर्पण करे जिन्हें उसके पिता पूजते आए हैं। यह 'पिता-अनुकरण' की विधि है, जहाँ पुत्र अपने पिता की श्रद्धा को आगे बढ़ाता है। 'कामतः' शब्द यहाँ यह स्पष्ट करता है कि तर्पण में यांत्रिक बाध्यता से अधिक 'भाव' और 'इच्छा' का महत्त्व है। जब साधक अपनी इच्छा से पूर्वजों को स्मरण करता है, तभी वह जल उनके सूक्ष्म शरीर तक पहुँचता है।

श्लोक के द्वितीय भाग में 'प्रमीतपितृक' की स्थिति का वर्णन है। जब पिता का भौतिक शरीर नहीं रहता, तब पुत्र स्वयं कुल का मुख्य तर्पणकर्ता बन जाता है। ऐसे साधक के लिए दायित्व बढ़ जाता है। उसे न केवल अब तक बताए गए दिव्य पितरों (कव्यवाड्, अग्नि, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, सोमप, बर्हिषद्) का तर्पण करना है, बल्कि उन ब्रह्मांडीय शक्तियों का भी तर्पण करना है जिनका उल्लेख अगले श्लोकों में आने वाला है।

यहाँ 'दिव्य पितर' और 'मानुष पितर' के बीच का सेतु यह है कि दिव्य पितर वे मूल ऊर्जाएँ हैं जिनसे समस्त मनुष्य-पितरों की उत्पत्ति हुई है। प्रमीतपितृक द्विज जब इन दिव्य शक्तियों का तर्पण करता है, तो वह वास्तव में अपने कुल के समस्त पूर्वजों को उस परम ज्योति में विलीन करने का मार्ग प्रशस्त करता है। यह विधि केवल जल अर्पण नहीं, अपितु सूक्ष्म जगत के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का एक साधन है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार-शुद्धि' और 'वंश-शुद्धि' का अभ्यास है। साधक जब तर्पण करता है, तो वह केवल बाहरी जल नहीं देता, अपितु अपने भीतर के 'कृतज्ञता भाव' को जाग्रत करता है।

१. इच्छा का अभ्यास (कामतः): योग में 'संकल्प' की बड़ी शक्ति है। 'कामतः' तर्पण का अर्थ है कि साधक अपनी चेतना को पूर्वजों के प्रति प्रेम और कृतज्ञता से भरे संकल्प में स्थिर करे। जब संकल्प शुद्ध होता है, तब साधक की ऊर्जा सूक्ष्म स्तर पर पितरों तक पहुँचती है।

२. प्रमीतपितृक की अवस्था: जिसका पिता नहीं रहा, वह साधक अब स्वयं 'अधिष्ठाता' है। योगिक स्तर पर इसका अर्थ है कि अब वह अपनी आध्यात्मिक यात्रा में स्वयं उत्तरदायी है। वह अब केवल परंपरा का अनुयायी नहीं, बल्कि परंपरा का वाहक है।

३. दिव्य और मानवीय का समन्वय: दिव्य पितरों का तर्पण करना साधक को इस अनुभव की ओर ले जाता है कि उसके पूर्वज केवल हाड़-मांस के शरीर नहीं थे, बल्कि वे उन्हीं दिव्य तत्वों (अग्नि, सोम, वायु) के अंश थे। इस अभ्यास से साधक की दृष्टि 'स्थूल' (मानुष पितृ) से 'सूक्ष्म' (दिव्य पितृ) की ओर बढ़ती है, जिससे वह धीरे-धीरे देह-अभिमान से मुक्त होकर उस 'अक्षर' की ओर अग्रसर होता है जिसे याज्ञवल्क्य जी ने अपनी श्रुति में उद्घाटित किया है।

श्लोक ७.८१

वसून् रुद्रांस्तथादित्यान् नमस्कारस्वधान्वितान् ।

एते सर्वस्य पितर एष्वायत्ताश्च मानुषाः ॥ ७.८१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६७

— नमस्कार और स्वधाके साथ वसुओं, रुद्रों और आदित्योंका; ये सबके पितर हैं, और मनुष्य इन्हींके अधीन हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'प्रमीतपितृक' द्विज के लिए उन दिव्य पितरों के तर्पण का निर्देश दिया था जो पूर्व में कहे गए थे। अब इस श्लोक में वे उन व्यापक पितृ-शक्तियों का परिचय दे रहे हैं जो केवल एक कुल के नहीं, अपितु समस्त मानवता के मूल पुरुष हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तर्पयेत्) स्वधान्वितान् वसून्, रुद्रांस्तथा आदित्यान् नमस्कार(पूर्वकं तर्पयेत्)। एते सर्वस्य पितरः (सन्ति), मानुषाः एषाम् एव यत्ताः (अधीनः सन्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• स्वधान्वितान्: 'स्वधा' वह शक्ति है जिसके द्वारा पितरों को तृप्ति प्राप्त होती है। यह देवताओं के 'स्वाहा' के विपरीत पितृ-लोक की वह ऊर्जा है जो पूर्वजों तक पहुँचती है। 'स्वधान्वित' का अर्थ है—स्वधा के संकल्प और अर्पण से युक्त।

• वसु, रुद्र, आदित्य: ये केवल देवताओं के समूह नहीं हैं, अपितु सृष्टि की तीन मूलभूत प्रवृत्तियाँ हैं। वसु (स्थिरता और पोषण), रुद्र (परिवर्तन और संहार), और आदित्य (प्रकाश और चेतना)।

• सर्वस्य पितरः: यहाँ 'सर्वस्य' शब्द व्यापक है। ये केवल एक परिवार के नहीं, अपितु संपूर्ण मानव जाति के आदि-पितर हैं।

• यत्ताश्च मानुषाः: 'यत्ताः' का अर्थ है—इनसे उत्पन्न या इनके अधीन। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और प्राणिक संरचना इन्हीं तीन शक्तियों के अधीन है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य तर्पण की इस विधि के माध्यम से साधक को उसके सूक्ष्म मूल से जोड़ रहे हैं। यहाँ वे निर्देश देते हैं कि वसुओं, रुद्रों और आदित्यों का तर्पण 'नमस्कार' और 'स्वधा' के साथ किया जाए। नमस्कार समर्पण का प्रतीक है और स्वधा उस माध्यम का, जिससे सूक्ष्म जगत में ऊर्जा का संचार होता है।

जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि "ये सबके पितर हैं", तो वे पितृत्व की परिभाषा को रक्त-संबंधों से ऊपर उठाकर 'तत्व-संबंध' तक ले जाते हैं। बाहरी विधि में यह तर्पण जल और तिल से होता है, किंतु इसका आन्तर अर्थ यह है कि मनुष्य अपने भीतर की उन तीन प्रवृत्तियों को पहचानकर उन्हें संतुलित करे जिनसे वह निर्मित है। वसु रूपी स्थिरता, रुद्र रूपी तीव्रता और आदित्य रूपी प्रज्ञा—इन तीनों का सामंजस्य ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है।

यह विधान स्पष्ट करता है कि मनुष्य केवल अपने माता-पिता की संतान नहीं है, अपितु वह ब्रह्माण्डीय शक्तियों का वंशज है। जब साधक इन आदि-पितरों का तर्पण करता है, तो वह वास्तव में अपनी उन मूल प्रवृत्तियों का शुद्धिकरण करता है जो उसे संसार के बंधनों में जकड़े हुए हैं। मनुष्य का इन शक्तियों के 'अधीन' होना यह दर्शाता है कि जब तक साधक इन तत्वों के रहस्य को नहीं जानता, वह प्रकृति के अधीन रहता है; किंतु तर्पण और नमस्कार के माध्यम से वह इन शक्तियों के साथ एकाकार होकर बंधन से मुक्ति की ओर बढ़ता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

वसून्वदन्ति तु पितॄन्रुद्रांश्चैव पितामहान् । प्रपितामहांस्तथादित्याञ्छ्रुतिरेषा सनातनी ॥ ३.२८४ ॥

पितरोंको वसु, पितामहोंको रुद्र और प्रपितामहोंको आदित्य कहते हैं — यह सनातन श्रुति है।

मनुस्मृति ३.२८४मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 515

मनुस्मृति में भी इसी सनातन श्रुति का उल्लेख है कि पितरों को वसु, पितामहों को रुद्र और प्रपितामहों को आदित्य कहा जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार को और विस्तार देती है। जहाँ मनुस्मृति इन्हें पीढ़ियों के क्रम (पितर-पितामह-प्रपितामह) में देखती है, वहीं याज्ञवल्क्य इन्हें 'सर्वस्य पितरः' कहकर संपूर्ण मानवता के मूल आधार के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। यह दृष्टि कर्मकाण्ड को योग की व्यापकता प्रदान करती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कुल-चेतना' से 'विश्व-चेतना' में प्रवेश का द्वार है। योगिक अभ्यास में साधक जब वसु, रुद्र और आदित्य का ध्यान करते हुए तर्पण करता है, तो वह अपने भीतर के तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—का अर्पण करता है।

वसुओं का तर्पण करते समय साधक अपने भीतर की 'स्थिरता' और 'संतोष' का अनुभव करता है। रुद्रों के तर्पण में वह अपने भीतर के 'क्रोध', 'अहंकार' और 'विकारों' को विसर्जित कर शुद्ध होता है। आदित्यों के तर्पण में वह अपनी 'चेतना' को सूर्य के समान प्रज्वलित कर ज्ञान की प्राप्ति करता है।

यह अभ्यास साधक को इस बोध तक ले जाता है कि उसके पूर्वज केवल देहधारी मनुष्य नहीं थे, बल्कि वे उन्हीं दिव्य शक्तियों के अंश थे। इस प्रकार, तर्पण की यह क्रिया केवल मृत पूर्वजों को जल देना नहीं, बल्कि अपने भीतर की सुप्त दिव्य शक्तियों को जाग्रत करना और उन्हें नमस्कार कर उनके साथ लय होना है। साधक इस अभ्यास से व्यक्तिगत पहचान को छोड़कर उस विराट पितृत्व में विलीन होने की भूमि की ओर बढ़ता है।

श्लोक ७.८२

आचार्यांश्च पितॄंश्चैव पितृप्रभृतिनामतः ।

मन्त्रैश्च देयमुदकं पितॄणां प्रीतिवर्धनम् ॥ ७.८२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६७

आचार्योंका, और पितरोंका पिता आदि (के) नामोंसे (तर्पण करे); पितरोंकी प्रीति बढ़ानेवाला जल मन्त्रोंके साथ देना चाहिए —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वसु, रुद्र और आदित्यों जैसे आदि-पितरों के तर्पण का निर्देश दिया था, जो समस्त मानवता के मूल पुरुष हैं। अब इस श्लोक में वे तर्पण की विधि को व्यापक करते हुए व्यक्तिगत संबंधों और गुरु-परम्परा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विधान बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) आचार्यान् च पितॄंश्चैव पितृ-प्रभृति-नामतः (तर्पयेत्)। मन्त्रैः च (देयम्) उदकं पितॄणां प्रीति-वर्धनम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• आचार्यान्: वे गुरुजन जिन्होंने ज्ञान का दान दिया। तर्पण की सूची में आचार्यों को पितरों से पूर्व रखना यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक जन्म देने वाला गुरु, शारीरिक जन्म देने वाले पिता से भी श्रेष्ठ और पूजनीय है।

• पितृ-प्रभृति-नामतः: 'प्रभृति' का अर्थ है 'आदि' या 'क्रम से'। यहाँ पितरों का तर्पण उनके विशिष्ट नामों (जैसे पिता, पितामह आदि) के उच्चारण के साथ करने का निर्देश है। नाम का उच्चारण उस विशिष्ट चेतना का आह्वान करना है।

• प्रीति-वर्धनम्: 'प्रीति' का अर्थ केवल सुख नहीं, अपितु संतुष्टि और तृप्ति है। 'वर्धनम्' का अर्थ है उसे बढ़ाना। तर्पण का उद्देश्य पितरों की अतृप्ति को शांत कर उन्हें संतुष्ट करना है, जिससे साधक के मार्ग के अवरोध दूर हों।

• मन्त्रैः च देयमुदकम्: जल केवल भौतिक द्रव्य नहीं, अपितु मन्त्रों के संयोग से वह 'सोम' या 'प्राण-शक्ति' बन जाता है, जो सूक्ष्म जगत के पितरों तक पहुँच सकता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ तर्पण की एक ऐसी विधि बता रहे हैं जो साधक को उसके सामाजिक और आध्यात्मिक ऋणों (ऋण-त्रय) से मुक्त करती है। वे कहते हैं कि साधक सर्वप्रथम अपने आचार्यों का और तत्पश्चात पिता आदि के नामों से पितरों का तर्पण करे।

यहाँ 'नाम' का विशेष महत्त्व है। जब हम किसी का नाम लेकर जल अर्पित करते हैं, तो हम अपनी चेतना को उस विशिष्ट पूर्वज या गुरु की चेतना से जोड़ते हैं। यह केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, अपितु एक मानसिक सेतु का निर्माण है। आचार्यों का तर्पण यह स्मरण दिलाता है कि हमारी बुद्धि और विवेक उन्हीं की कृपा से जाग्रत हुए हैं, और पितरों का तर्पण यह स्वीकारोक्ति है कि हमारा शरीर और वंश उन्हीं की ऊर्जा का विस्तार है।

मन्त्रों के साथ जल देने का विधान इसलिए है क्योंकि मन्त्र ध्वनि-विज्ञान है। बिना मन्त्र के जल केवल भौतिक प्यास बुझा सकता है, किन्तु मन्त्रयुक्त जल सूक्ष्म शरीर की प्यास बुझाता है। यह जल पितरों की 'प्रीति' बढ़ाता है, अर्थात् उनके प्रति हमारे प्रेम और सम्मान को सूक्ष्म जगत में पहुँचाता है, जिससे वे तृप्त होकर साधक को आशीर्वाद देते हैं।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'कृतज्ञता' के अभ्यास का सूत्र है। साधक जब आचार्यों और पितरों का नाम लेकर जल अर्पित करता है, तो वह अपने भीतर के 'अहंकार' को विसर्जित करता है। वह अनुभव करता है कि वह स्वयं में अकेला नहीं है, अपितु उसके पीछे ज्ञान की एक लंबी गुरु-परम्परा और प्राणों की एक गहरी पितृ-धारा प्रवाहित हो रही है।

साधक इस अभ्यास से अपनी चेतना को 'स्व' से हटाकर 'कुल' और 'परम्परा' तक विस्तृत करता है। जब वह 'प्रीति-वर्धनम्' का संकल्प करता है, तो उसके हृदय में करुणा और प्रेम का भाव जाग्रत होता है। यह भाव उसे संकीर्णता से निकालकर व्यापकता की ओर ले जाता है। मन्त्रों का जप करते हुए जल देना वास्तव में अपनी प्राण-शक्ति को उन सूक्ष्म शक्तियों के प्रति समर्पित करना है, जिससे साधक का अंतःकरण शुद्ध होता है और वह उच्चतर साधना के लिए तैयार होता है।

मन्त्रजपः

श्लोक ७.८३

उदीरतामङ्गिरस आयं रिवरयूर्जमित्यपि ।

पितृभ्यश्चापि ये चेह मधुवाता इति त्र्यृचम् ॥ ७.८३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६७

"उदीरताम्…", "अङ्गिरसः…", "आयन्तु नः…", "ऊर्जं वहन्तीः…", "पितृभ्यः…", "ये चेह…" और "मधु वाताः…" — इन तीन ऋचाओं (से)।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में आचार्यों और पितरों के नाम से तर्पण करने की विधि का निर्देश दिया गया था। अब यहाँ उन विशिष्ट मन्त्रों (ऋचाओं) का उल्लेख है, जिनके द्वारा तर्पण की यह क्रिया सम्पन्न की जाती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तर्पयितुं) उदीरताम्, अङ्गिरसः, आयन्तु नः, ऊर्जं वहन्तीः, पितृभ्यः च अपि ये चेह, मधुवाताः इति (त्रयः) ऋचम् (पठेत)।

पदार्थ और निर्वचन:

• उदीरताम्... अङ्गिरसः... आयन्तु नः... ऊर्जं वहन्तीः... पितृभ्यः... ये चेह... मधुवाताः: ये सभी पितृ-तर्पण के लिए प्रयुक्त होने वाले विशिष्ट वैदिक मन्त्रों के आरम्भिक पद या प्रतीक हैं। ये मन्त्र पितरों के आवाहन, उनकी तृप्ति और उनके कल्याण के लिए बोले जाते हैं।

• त्र्यृचम्: तीन ऋचाएँ। यहाँ श्लोक में पदों की संख्या अधिक दिखती है, किन्तु वे तीन मुख्य ऋचाओं के समूह या उनके मुख्य अंशों का संकेत हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य उन मन्त्रों का संकेत दे रहे हैं जो जल-तर्पण की भौतिक क्रिया को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करते हैं। जैसा कि पिछले श्लोक (७.८२) में कहा गया कि जल 'मन्त्रैः च देयम्' (मन्त्रों के साथ दिया जाना चाहिए), यहाँ उन्हीं मन्त्रों का विवरण है।

तर्पण का अर्थ है 'तृप्त करना'। जल केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं है, अपितु जब इसे ऋचाओं के साथ अर्पित किया जाता है, तो यह 'सोम' के समान हो जाता है, जो सूक्ष्म शरीर वाले पितरों को पोषण प्रदान करता है। यहाँ दिए गए मन्त्र-प्रतीक पितृ-तर्पण की तीन अवस्थाओं को दर्शाते हैं:

१. आवाहन: 'उदीरताम्' और 'आयन्तु नः' जैसे पद पितरों को उनके लोक से बुलाने और उन्हें उपस्थित करने के लिए हैं।

२. ऊर्जा-प्रदान: 'ऊर्जं वहन्तीः' का भाव है कि यह जल पितरों के लिए ओज और शक्ति लेकर आए।

३. शांति और माधुर्य: 'मधु वाताः' का अर्थ है कि पितरों का वातावरण मधुर और सुखद हो, जिससे वे संतुष्ट होकर साधक को आशीर्वाद दें।

यह विधि केवल मृत पूर्वजों के लिए नहीं है, अपितु यह एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सेतु है। जब साधक इन ऋचाओं का जप करता है, तो वह अपने भीतर के उस 'ऋण' भाव को शुद्ध करता है जो उसे अपने पूर्वजों से मिला है। यह क्रिया साधक को कृतज्ञता के भाव में प्रतिष्ठित करती है, जो कि उच्च योग-साधना के लिए अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से, तर्पण केवल बाहरी क्रिया नहीं, अपितु 'स्मरण' का अभ्यास है। जब साधक 'उदीरताम्' (उठो/जागो) कहता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर सोई हुई उन पूर्वजों की प्रवृत्तियों और संस्कारों को जाग्रत कर उन्हें प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले जाने का प्रयास करता है।

साधक यहाँ 'अहं' के विसर्जन का अभ्यास करता है। वह अनुभव करता है कि वह केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक लंबी वंश-परम्परा की कड़ी है। मन्त्रों का यह जप मन को एकाग्र करता है और हृदय में करुणा का संचार करता है। जब साधक 'मधु वाताः' का जप करता है, तो वह अपने अंतःकरण के विक्षेपों को शांत कर एक 'मधुर' और स्थिर मानसिक स्थिति प्राप्त करता है। यह अभ्यास साधक को 'स्व' से 'सर्व' की ओर ले जाता है, जिससे उसकी चेतना का विस्तार होता है और वह पितृ-ऋण से मुक्त होकर उच्चतर आध्यात्मिक भूमियों की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ७.८४

पितॄन् ध्यायन् प्रसिञ्चेद्वै जपन् मन्त्रान् यथाक्रमम् ।

तृप्यध्वमिति च त्रिर्वै दद्याच्च सलिलाञ्जलिम् ॥ ७.८४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६७

पितरोंका ध्यान करते हुए, मन्त्रोंको क्रमसे जपते हुए (जल) सींचे; और "तृप्यध्वम्" कहकर तीन बार जलकी अञ्जलि दे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पितृ-तर्पण के लिए प्रयुक्त होने वाली तीन मुख्य ऋचाओं के प्रतीकों का निर्देश दिया गया था। अब इस श्लोक में उन मन्त्रों के जप के साथ जल अर्पण करने की विधि और तृप्ति के संकल्प का वर्णन है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) मन्त्रान् यथाक्रमम् जपन् पितॄन् ध्यायन् (जलम्) प्रसिञ्चेत्, (ततः) 'तृप्यध्वम्' इति च त्रिर्वै सलिलाञ्जलिम् दद्यात्।

पदार्थ और निर्वचन:

• प्रसिञ्चेत्: सींचना या जल अर्पण करना। यहाँ जल का अर्पण केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, अपितु मन्त्र-शक्ति द्वारा उसे पितृ-लोक तक पहुँचाने की प्रक्रिया है।

• यथाक्रमम्: जिस क्रम में मन्त्र दिए गए हैं, उसी क्रम में उनका जप करना। वैदिक विधि में क्रम का विशेष महत्त्व है क्योंकि वह चेतना के आरोहण का मार्ग निर्धारित करता है।

• तृप्यध्वम्: यह एक कामना-वाक्य या संकल्प है— "आप तृप्त हों"। यह शब्द पितरों के प्रति कृतज्ञता और उनके संतोष की प्रार्थना है।

• सलिलाञ्जलिम्: जल से भरी हुई अञ्जलि (दोनों हथेलियों को मिलाकर बनाया गया पात्र)। अञ्जलि समर्पण और विनय का प्रतीक है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य तर्पण की क्रिया को पूर्णता प्रदान कर रहे हैं। केवल मन्त्र बोलना या केवल जल देना पर्याप्त नहीं है; यहाँ 'ध्यान', 'जप' और 'क्रिया' (सींचना) का त्रिसंयोग बताया गया है।

प्रथम चरण है— ध्यान। 'पितॄन् ध्यायन्' का अर्थ है कि साधक अपने पूर्वजों के स्वरूप और उनके प्रति अपने सम्बन्ध का मानसिक स्मरण करे। जब तक चित्त में पितरों के प्रति श्रद्धा और उनका मानसिक प्रतिबिम्ब नहीं उभरता, तब तक बाहरी क्रिया केवल एक यांत्रिक कर्म रह जाती है। ध्यान जल को 'संस्कारित' करता है।

द्वितीय चरण है— मन्त्र-जप और अर्पण। मन्त्रों को 'यथाक्रमम्' जपते हुए जल सींचने का निर्देश है। मन्त्र ध्वनि है और जल द्रव्य है। जब ध्वनि और द्रव्य का मिलन होता है, तो वह 'अमृत' का रूप ले लेता है। पिछले श्लोक में बताए गए आवाहन और ऊर्जा-प्रदान के मन्त्रों का क्रमबद्ध जप साधक के भीतर एक सूक्ष्म सेतु का निर्माण करता है, जिससे अर्पित जल पितृ-तत्व तक पहुँचता है।

तृतीय चरण है— तृप्ति का संकल्प। 'तृप्यध्वम्' शब्द का तीन बार उच्चारण करते हुए तीन अञ्जलि जल देना इस क्रिया का उपसंहार है। संख्या 'तीन' यहाँ पूर्णता का संकेत है। यह संकल्प साधक के अहंकार को मिटाकर उसे यह बोध कराता है कि वह जो कुछ भी है, अपने पूर्वजों की देह, संस्कार और ज्ञान के कारण है। 'तृप्यध्वम्' कहना वास्तव में अपनी जड़ों को सींचना है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'कृतज्ञता' के अभ्यास का मार्ग है। साधक जब पितरों का ध्यान करता है, तो वह अपने 'बीज-संस्कारों' के सम्मुख उपस्थित होता है।

यहाँ 'जल' केवल भौतिक जल नहीं, अपितु साधक के भीतर प्रवाहित होने वाले 'भाव-रस' का प्रतीक है। जब साधक मन्त्रों के क्रम से जप करता है, तो उसकी चेतना स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ती है। 'तृप्यध्वम्' का तीन बार जप करना मन, प्राण और बुद्धि के स्तर पर पितृ-ऋण से मुक्ति और उनके प्रति समर्पण का अनुभव है।

साधक इस अभ्यास से 'अहं' (मैं करता हूँ) से 'वयम्' (हम सब एक ही श्रृंखला का हिस्सा हैं) की भूमि की ओर जाता है। यह अभ्यास साधक के हृदय में करुणा और विनम्रता उत्पन्न करता है, जो उच्चतर ध्यान की अनिवार्य पूर्व-शर्त है। जब पूर्वज तृप्त होते हैं, तो साधक का मानसिक अवरोध समाप्त होता है और वह बिना किसी आंतरिक द्वन्द्व के अपनी आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ पाता है।

पितृतर्पणविधिः

श्लोक ७.८५

नमो व इति जप्त्वा वै ततो मातामहान् सखीन् ।

तर्पयेदानृशंसार्थं धर्मं परममास्थितः ॥ ७.८५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६८

"नमो वः (पितरः)…" जपकर, फिर परम धर्ममें स्थित होकर, सहृदयताके लिए मातामहों और मित्रोंका तर्पण करे;

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पितरों के ध्यान, मन्त्र-क्रम और 'तृप्यध्वम्' संकल्प के साथ जल अर्पण की विधि बताई गई थी। अब इस श्लोक में तर्पण के विस्तार और उसके पीछे निहित मानवीय एवं आध्यात्मिक भाव का वर्णन है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) 'नमो वः' इति जप्त्वा वै ततः धर्मं परमम् आश्रितः अनृशंसार्थं मातामहान् सखीन् (च) तर्पयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• नमो वः: यह मन्त्र का प्रतीक है। 'नमः' का अर्थ है नमन या समर्पण, और 'वः' (तुम्हें) संबोधन है। यह पितरों के प्रति पूर्ण शरणागति और सम्मान का सूचक है।

• धर्मं परममास्थितः: 'परम धर्म' में स्थित होकर। यहाँ धर्म केवल सामाजिक नियम नहीं, अपितु वह ऋत है जो जीव को उसके मूल से जोड़ता है।

• अनृशंसार्थं (आनृशंस्यार्थम्): 'नृशंसता' का अर्थ है क्रूरता या कठोरता। 'अनृशंस्य' का अर्थ है सहृदयता, दया और करुणा। अतः 'अनृशंसार्थं' का अर्थ है— हृदय की कठोरता को मिटाकर करुणा भाव जाग्रत करने के लिए।

• मातामहान् सखीन्: मातामह (नाना) और सखा (मित्र)। तर्पण की परिधि यहाँ केवल रक्त-सम्बन्धों तक सीमित नहीं रहती, अपितु स्नेह और मित्रता के सम्बन्धों तक विस्तृत हो जाती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य तर्पण की क्रिया को एक संकीर्ण कर्मकाण्ड से उठाकर उसे एक व्यापक आध्यात्मिक साधना में परिवर्तित कर रहे हैं।

साधक जब 'नमो वः' का जप करता है, तो वह अपने अहंकार का विसर्जन कर पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। यहाँ 'नमो वः' केवल शब्द नहीं, बल्कि एक सेतु है जो वर्तमान जीव को उसके अतीत (पितरों) से जोड़ता है।

ऋषि यहाँ एक विशेष शर्त जोड़ते हैं— 'धर्मं परममास्थितः'। तर्पण तभी फलदायी होता है जब साधक 'परम धर्म' में स्थित हो। परम धर्म का अर्थ है वह स्थिति जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, अपितु एक अनंत वंश-परम्परा की कड़ी है। जब साधक स्वयं को इस विराट प्रवाह का हिस्सा मानता है, तब उसका तर्पण केवल एक मृत व्यक्ति को जल देना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को सींचना बन जाता है।

इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है— 'अनृशंसार्थं'। सामान्यतः तर्पण केवल उन पितरों के लिए किया जाता है जिनसे हमारा सीधा रक्त-सम्बन्ध हो। किन्तु याज्ञवल्क्य यहाँ मातामहों और सखाओं (मित्रों) के तर्पण का निर्देश देते हैं। यह निर्देश यह सिद्ध करता है कि तर्पण का उद्देश्य केवल 'ऋण उतारना' नहीं, बल्कि 'हृदय का विस्तार' करना है। जब साधक उन लोगों के लिए भी जल अर्पण करता है जिनके प्रति उसका सम्बन्ध केवल स्नेह या मित्रता का था, तब उसके भीतर की संकीर्णता समाप्त होती है और 'आनृशंस्य' अर्थात् सहृदयता का उदय होता है। यह करुणा का वह स्तर है जहाँ व्यक्ति समस्त मानवता और समस्त पूर्वजों को अपना समझने लगता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्तव्य' से 'करुणा' की ओर संक्रमण का मार्ग है। साधक जब केवल अपने पिता या दादा का तर्पण करता है, तो वह 'स्व' और 'पर' के भेद में होता है। किन्तु जब वह सखाओं और मातामहों तक इस सेवा को विस्तृत करता है, तो वह 'अद्वैत' की भूमि की ओर बढ़ता है।

साधक यहाँ इस बात का अभ्यास करता है कि उसकी चेतना केवल अपने छोटे से परिवार तक सीमित न रहे। 'आनृशंस्य' का अभ्यास वास्तव में हृदय-कमल का खिलना है। जब हृदय में करुणा का संचार होता है, तब मन की चंचलता शांत होती है और साधक उस मानसिक स्थिति में पहुँचता है जहाँ वह समस्त जगत के दुखों और अभावों को अपना अनुभव करने लगता है।

यह अभ्यास साधक को 'अहं' (मैं और मेरा) से निकालकर 'वयम' (हम सब) की स्थिति में ले जाता है। यह मानसिक विस्तार ही वह आधार है जिस पर आगे चलकर ध्यान और समाधि की नींव रखी जाती है। यहाँ जल का अर्पण वास्तव में हृदय के भीतर की कठोरता को पिघलाकर उसे प्रेममय बनाने की एक योगिक प्रक्रिया है।

श्लोक ७.८६

मातृर्मातृष्वसॄः श्वश्रूर्मातुलानि(नीं) पितृष्वसॄः ।

दुहितॄं(तॄ)श्च स्वसॄं(सॄ)श्चैव ज्ञात्यृत्विक्छिष्यबान्धवान् ॥ ७.८६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६८

माताओं, मौसियों, सासों, मामियों, बुआओं, पुत्रियों, बहनों, जातिवालों, ऋत्विजों, शिष्यों और बन्धुओंका —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में मातामहों और मित्रों के तर्पण का उल्लेख करते हुए ऋषि ने 'अनृशंस्य' अर्थात् करुणा भाव पर बल दिया था। वर्तमान श्लोक उसी तर्पण-सूची का विस्तार है, जिसमें पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्धों की व्यापकता को समाहित किया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) मातृन्, मातृष्वसृः, श्वश्रून्, मातुलानि(नीं), पितृष्वसृः, दुहितॄं(तॄ)श्च, स्वसॄं(सॄ)श्च एव (तर्पयेत्); (तथा) ज्ञात्यृत्विक्-छिष्य-बान्धवान् (च तर्पयेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• मातृन्: माताओं का।

• मातृष्वसृः: माता की बहन (मौसी) का।

• श्वश्रून्: सास का।

• मातुलानि(नीं): मामा और मामी का।

• पितृष्वसृः: पिता की बहन (बुआ) का।

• दुहितॄं(तॄ)श्च: पुत्रियों का।

• स्वसॄं(सॄ)श्च: बहनों का।

• ज्ञात्यृत्विक्छिष्यबान्धवान्: यहाँ 'ज्ञात' शब्द का अर्थ है— जिन्हें जाना जाता है या जिनसे सम्बन्ध है। इसमें ऋत्विक् (यज्ञ कराने वाले पुरोहित), शिष्य और बन्धु (कुल के लोग) सम्मिलित हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य तर्पण की परिधि को केवल पितृ-वंश (पिता के पक्ष) तक सीमित न रखकर उसे संपूर्ण पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्धों तक विस्तृत कर रहे हैं।

सामान्यतः तर्पण में पितरों के नाम लिए जाते हैं, किन्तु यहाँ माताओं, मौसियों, सासों, मामियों, बुआओं, पुत्रियों और बहनों का उल्लेख यह दर्शाता है कि श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव स्त्री-पुरुष के भेद से परे है। यह विधान इस सत्य को उद्घाटित करता है कि जीव के आध्यात्मिक उत्थान में केवल पिता का ही नहीं, अपितु उन समस्त शक्तियों का योगदान होता है जिन्होंने उसे पोषण, स्नेह और संस्कार दिए।

विशेष रूप से 'श्वश्रून्' (सास) और 'मातुलानि' (मामा-मामी) का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि तर्पण केवल रक्त-सम्बन्धों का नहीं, अपितु उन सम्बन्धों का भी है जो विवाह या सामाजिक मर्यादाओं से निर्मित हुए हैं। जब साधक अपनी पुत्रियों और बहनों का तर्पण करता है, तो वह इस भाव को पुष्ट करता है कि आत्मा का सम्बन्ध केवल ऊपर (पूर्वजों) की ओर नहीं, अपितु अपनी शाखाओं (संतानों) की ओर भी है।

श्लोक के अंत में 'ऋत्विक्', 'शिष्य' और 'बान्धु' का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋत्विक् वह है जिसने हमें वेदों और मन्त्रों का ज्ञान कराया; शिष्य वह है जिसने हमारी विद्या को आगे बढ़ाया; और बन्धु वे हैं जो जीवन के संघर्षों में सहचर रहे। यह तर्पण-विधि अब एक व्यक्तिगत क्रिया से बढ़कर 'विश्व-तर्पण' की ओर अग्रसर हो रही है, जहाँ साधक स्वयं को संपूर्ण समाज और ज्ञान-परम्परा का ऋणी मानकर जल अर्पित करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'अहं' के विसर्जन का अभ्यास है। साधक जब इतने विस्तृत सम्बन्धों का स्मरण कर उन्हें जल अर्पित करता है, तो उसका चित्त 'मैं और मेरा' की संकीर्णता से निकलकर 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' के भाव की ओर बढ़ता है।

बाहरी रूप से यह जल का अर्पण है, किन्तु आन्तरिक रूप से यह हृदय के भीतर स्थित 'स्नेह-तन्तुओं' का शोधन है। प्रत्येक सम्बन्ध का स्मरण करते समय साधक उस व्यक्ति के प्रति समस्त द्वेष, क्रोध और मोह को जल के साथ प्रवाहित कर देता है। जब वह ऋत्विजों और शिष्यों का स्मरण करता है, तो वह 'गुरु-शिष्य' सम्बन्ध के उस सूक्ष्म सूत्र को जाग्रत करता है जो केवल देह तक सीमित नहीं, अपितु चेतना के स्तर पर जुड़ा है। यह अभ्यास साधक को 'वैराग्य' की उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह सम्बन्धों में रहते हुए भी उनसे ऊपर उठकर उन्हें केवल चैतन्य रूप में देखता है।

श्लोक ७.८७

नामतस्तु स्वधाकारैस्तर्पयेदनुपूर्वशः ।

सवर्णेभ्यो जलं देयं नासवर्णे कथंचन ॥ ७.८७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६८

— नाम लेकर स्वधाकारसे क्रमशः तर्पण करे; सवर्णोंको (ही) जल देना चाहिए, असवर्णको किसी प्रकार नहीं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में तर्पण के लिए उन समस्त सम्बन्धों की सूची दी गई थी, जिनमें माता, बहन, शिष्य और बन्धु आदि सम्मिलित थे। वर्तमान श्लोक उस सूची के आधार पर तर्पण की वास्तविक क्रिया, मन्त्र-विधि और पात्रता का निर्धारण करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) नामतः तु स्वधा-कारैः (पितॄन्) अनुपूर्वशः तर्पयेत्। सवर्णेभ्यः जलं देयं, नासवर्णे कथंचन (देयं)।

पदार्थ और निर्वचन:

• नामतः: नाम लेकर। तर्पण में केवल सम्बन्ध नहीं, अपितु व्यक्ति का नाम लेना उसे विशिष्ट करता है।

• स्वधा-कारैः: 'स्वधा' शब्द का प्रयोग करते हुए। स्वधा वह शक्ति है जो पितरों को तृप्त करती है; यह देवताओं के 'स्वाहा' के समान पितृ-लोक का अर्पण-शब्द है।

• अनुपूर्वशः: क्रमशः। मर्यादा और ज्येष्ठता के क्रम में।

• सवर्णेभ्यः: समान वर्ण या समान कुल/श्रुति-परम्परा वाले व्यक्तियों को।

• नासवर्णे कथंचन: असवर्णों को किसी भी स्थिति में (तर्पण का जल) नहीं देना चाहिए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य तर्पण की व्यावहारिक विधि का निर्देश कर रहे हैं। तर्पण का अर्थ है— 'तृप्त करना'। जब साधक पूर्वजों का नाम लेकर जल अर्पित करता है, तो वह केवल जल नहीं दे रहा होता, अपितु अपनी स्मृति और श्रद्धा के माध्यम से उस पूर्वज के साथ एक सूक्ष्म सम्बन्ध स्थापित कर रहा होता है।

यहाँ 'नामतः' शब्द का विशेष महत्त्व है। नाम व्यक्ति की विशिष्ट पहचान है। जब साधक नाम लेता है, तो उसकी चेतना उस विशिष्ट पूर्वज की ओर केंद्रित होती है, जिससे तर्पण का फल सीधे उस आत्मा को प्राप्त होता है। 'स्वधा' शब्द का प्रयोग इस क्रिया को केवल भौतिक जल-अर्पण से उठाकर एक यज्ञीय स्वरूप प्रदान करता है। जिस प्रकार अग्निहोत्र में 'स्वाहा' के बिना आहुति पूर्ण नहीं होती, उसी प्रकार पितृ-यज्ञ में 'स्वधा' के बिना जल का अर्पण केवल स्नान के समान है, तर्पण नहीं।

'अनुपूर्वशः' का विधान मर्यादा का प्रतीक है। जो ज्येष्ठ है, जो मूल है, उसे पहले अर्पण करना यह दर्शाता है कि साधक अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञ है।

जहाँ तक 'सवर्णेभ्यः' और 'नासवर्णे' का प्रश्न है, यहाँ वर्ण का अर्थ केवल सामाजिक जाति नहीं, अपितु 'समान श्रुति' और 'समान संस्कार' से है। तर्पण एक सूक्ष्म ऊर्जा का आदान-प्रदान है। जिस प्रकार एक विशिष्ट आवृत्ति का मन्त्र केवल उसी के अनुकूल पात्र पर प्रभाव करता है, उसी प्रकार तर्पण का जल उन्हीं को दिया जाता है जो उसी कुल-परम्परा और संस्कार-धारा (सवर्ण) से जुड़े हों। असवर्णों को जल न देने का विधान इस सूक्ष्म ऊर्जा-सामंजस्य को बनाए रखने के लिए है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से तर्पण 'स्मृति-शुद्धि' का अभ्यास है। जब साधक नाम लेकर और क्रमशः जल अर्पित करता है, तो वह अपने भीतर के 'ऋण-भाव' को समाप्त कर रहा होता है। योगिक अभ्यास में इसे 'चित्त-शुद्धि' कहते हैं।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, अपितु एक लंबी वंश-परम्परा की कड़ी है। 'स्वधा' का जप करते समय साधक अपने हृदय में उस तृप्ति का भाव जगाता है, जो वह अपने पूर्वजों को देना चाहता है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' से मुक्त कर 'कृतज्ञता' की भूमि पर ले जाता है। जब तक पूर्वजों के प्रति ऋण का भाव बना रहता है, तब तक चित्त में सूक्ष्म विक्षेप रहते हैं; तर्पण के माध्यम से इन विक्षेपों का शमन होता है और साधक उच्चतर ध्यान के लिए तैयार होता है।

तर्पणाकरणे निन्दा

श्लोक ७.८८

पूर्वजांश्च पितॄंस्तर्प्य ततोऽन्येषां प्रदीयते ।

नास्तिक्यभावाद्यश्चापि न तर्पयति वै पितॄन् ॥ ७.८८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६८

पूर्वजों और पितरोंका तर्पण करके फिर दूसरोंको (जल) दिया जाता है। जो नास्तिकभावसे पितरोंका तर्पण नहीं करता —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में तर्पण के लिए उन समस्त सम्बन्धों की सूची दी गई थी और सवर्णता की पात्रता बताई गई थी। वर्तमान श्लोक तर्पण के क्रम का निर्धारण करता है और उन लोगों के प्रति चेतावनी देता है जो पितृ-ऋण के प्रति उदासीन हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) पूर्वजांश्च पितॄंस्तर्प्य, ततः अन्येषां (जलं) प्रदीयते। नास्तिक्य-भावात् (अथवा नास्तिक्य-भावाद्यः) च अपि यः न तर्पयति वै पितॄन् (तस्य पितरः...)

पदार्थ और निर्वचन:

• पूर्वजांश्च पितॄन्: पूर्वजों और पितरों को। यहाँ 'पूर्वज' शब्द उन पूर्वजों के लिए है जो कुल की परंपरा में पहले आए, और 'पितृ' शब्द व्यापक पितृ-तत्व के लिए है।

• ततः अन्येषां: उसके पश्चात अन्य सम्बन्धियों या पात्रों को।

• नास्तिक्य-भावात्: नास्तिकता के भाव से। यहाँ नास्तिकता का अर्थ केवल ईश्वर का निषेध नहीं, अपितु अपनी श्रुति-परम्परा, कुल-धर्म और पितृ-ऋण के प्रति श्रद्धा का अभाव है।

• न तर्पयति: तृप्त नहीं करता। जल का अर्पण न करना केवल क्रिया का अभाव नहीं, अपितु कृतज्ञता का अभाव है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य तर्पण के अनुशासन और उसके मनोवैज्ञानिक आधार को स्पष्ट कर रहे हैं। तर्पण की विधि में 'क्रम' का अत्यधिक महत्त्व है। पहले उन पूर्वजों और पितरों का तर्पण किया जाता है जिन्होंने हमें यह देह, यह कुल और यह ज्ञान-परम्परा प्रदान की। जब मूल स्रोत (पितर) तृप्त होते हैं, तभी साधक की चेतना अन्य सम्बन्धों के तर्पण के लिए विस्तारित होती है। यह क्रम दर्शाता है कि जीवन में कृतज्ञता का प्रवाह पहले मूल की ओर होना चाहिए, फिर शाखाओं की ओर।

श्लोक का दूसरा भाग एक गंभीर चेतावनी है। जो व्यक्ति 'नास्तिक्य-भाव' से पितरों का तर्पण नहीं करता, वह केवल एक धार्मिक क्रिया का त्याग नहीं कर रहा, अपितु वह अपने अस्तित्व के आधार को नकार रहा है। याज्ञवल्क्य यहाँ 'भाव' शब्द पर बल दे रहे हैं। यदि जल दिया भी जाए, परन्तु हृदय में नास्तिकता (अश्रद्धा) हो, तो वह तर्पण नहीं कहलाता। नास्तिकता का अर्थ है— यह मानना कि मेरा सम्बन्ध केवल इस भौतिक देह से है और मेरे पूर्वजों का मेरे वर्तमान जीवन या आध्यात्मिक उन्नति से कोई सम्बन्ध नहीं है।

यह स्मृति यहाँ यह संकेत दे रही है कि जो साधक अपने पितृ-ऋण को नहीं पहचानता, वह अपनी जड़ों से कट जाता है। ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए आवश्यक 'संस्कार-शक्ति' से वंचित रह जाता है, क्योंकि पितरों का आशीर्वाद ही साधक के लिए आंतरिक अवरोधों को दूर करने वाला बल बनता है। यह वाक्य अगले श्लोक (७.८९) से जुड़ा है, जहाँ यह बताया गया है कि तर्पण न करने पर पितर किस अवस्था में रहते हैं और साधक के शरीर से क्या ग्रहण करते हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से तर्पण केवल जल का अर्पण नहीं, अपितु 'स्मृति-योग' है। जब साधक पितरों का ध्यान कर उन्हें जल देता है, तो वह अपनी चेतना को अतीत की उन कड़ियों से जोड़ता है जिनसे वह निर्मित हुआ है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' से मुक्त कर 'विनय' की भूमि पर ले जाता है।

नास्तिकता का भाव योग में 'विस्मृति' है— अपनी मूल प्रकृति और ऋणों को भूल जाना। जो साधक पितरों के प्रति कृतज्ञ नहीं है, उसका चित्त अशांत रहता है क्योंकि उसके अवचेतन में पितृ-ऋण का बोझ बना रहता है। तर्पण के माध्यम से साधक अपने भीतर के 'पितृ-तत्व' (परम्परागत ज्ञान और संस्कार) को तृप्त करता है। जब यह आंतरिक तृप्ति होती है, तभी साधक सूक्ष्म शरीर की शुद्धि कर उच्च भूमियों की ओर अग्रसर हो पाता है। यहाँ जल 'श्रद्धा' का प्रतीक है; जैसे जल प्यास बुझाता है, वैसे ही श्रद्धा पितरों की अतृप्ति को शांत करती है और साधक के मार्ग को प्रशस्त करती है।

स्नानतर्पणश्राद्धप्रशंसा

श्लोक ७.८९

पिबन्ति देहनिःस्रावं पितरोऽस्य जलार्थिनः ।

तस्मात् स्नानं प्रशंसन्ति श्रद्धयाऽश्रद्धयापि वा ॥ ७.८९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६८

— उसके पितर जलके प्यासे होकर उसके शरीरसे टपकता (जल) पीते हैं; इसलिए श्रद्धासे हो या बिना श्रद्धाके, (विद्वान्) स्नानकी प्रशंसा करते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में नास्तिकता के भाव से पितरों का तर्पण न करने वाले व्यक्ति की स्थिति का संकेत दिया गया था। वर्तमान श्लोक उसी विस्मृति और उपेक्षा का परिणाम बताता है और स्नान की अनिवार्यता को पितृ-तर्पण के सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तस्य) जलार्थिनः पितरः अस्य देहनिःस्रावं पिबन्ति। तस्मात् (विद्वांसः) श्रद्धयाऽश्रद्धयापि वा स्नानं प्रशंसन्ति।

पदार्थ और निर्वचन:

• जलार्थिनः: जल की इच्छा रखने वाले। यहाँ पितरों की वह अवस्था वर्णित है जहाँ वे तृप्ति के लिए साधक के अर्पण की प्रतीक्षा करते हैं।

• देहनिःस्रावं: देह से निःसृत (टपकने वाले या स्रावित) जल को। 'निःस्राव' का अर्थ है वह जल जो शरीर के अंगों से रिसकर या टपककर गिरता है।

• श्रद्धयाऽश्रद्धयापि वा: श्रद्धा के साथ या श्रद्धा के अभाव में भी। यह वाक्यांश संकेत करता है कि कुछ लाभ केवल 'विधि' (क्रिया) के पालन से भी प्राप्त होते हैं, भले ही उसमें मानसिक भाव (श्रद्धा) की कमी हो।

• प्रशंसन्ति: स्तुति करते हैं या श्रेष्ठ बताते हैं। यहाँ विद्वान ऋषियों और शास्त्रकारों द्वारा स्नान की महत्ता को प्रतिपादित किया गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गूढ़ और मनोवैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। जो व्यक्ति नास्तिकता या उदासीनता के कारण अपने पितरों का विधिवत तर्पण नहीं करता, उसके पितर अतृप्त रहते हैं। अतृप्त पितर जल के अभिलाषी (जलार्थिनः) होते हैं। जब ऐसा व्यक्ति स्नान करता है, तब उसके शरीर से टपकने वाला जल—जो कि स्नान की एक स्वाभाविक क्रिया है—उन अतृप्त पितरों के लिए तृप्ति का साधन बन जाता है।

यहाँ यह रहस्य है कि पितृ-तत्व केवल बाहरी अर्पण (अञ्जलि) से ही नहीं, अपितु साधक के शरीर से जुड़े जल-तत्व से भी सम्बन्धित है। शरीर के रोम-छिद्रों से रिसने वाला जल जब पृथ्वी पर गिरता है, तो वह सूक्ष्म रूप से उन पितरों तक पहुँचता है जो अपने वंशज के सान्निध्य में रहते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि पितृ-ऋण इतना गहरा है कि वह क्रिया के अभाव में भी साधक के शरीर के माध्यम से अपनी तृप्ति का मार्ग खोज लेता है।

इसी कारण विद्वान इस बात पर बल देते हैं कि स्नान केवल शारीरिक शुद्धि का साधन नहीं है, अपितु यह एक अनिवार्य 'पितृ-सेवा' भी है। श्लोक में "श्रद्धयाऽश्रद्धयापि वा" (श्रद्धा से या बिना श्रद्धा के भी) कहना यह दर्शाता है कि स्नान की क्रिया का भौतिक प्रभाव इतना प्रबल है कि वह बिना किसी विशेष मानसिक संकल्प के भी पितरों को अल्प तृप्ति प्रदान कर देता है। किंतु, यह केवल न्यूनतम लाभ है; पूर्ण फल तो श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण से ही मिलता है। यहाँ स्नान की प्रशंसा इसलिए की गई है क्योंकि यह उस व्यक्ति के लिए भी 'अंतिम सहारा' है जो तर्पण की विधि को भूल चुका है या उससे विमुख है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'देह-चेतना' और 'कुल-चेतना' के सम्बन्ध का बोध कराता है। शरीर केवल मांस-मज्जा का पुंज नहीं है, अपितु यह पूर्वजों के संस्कारों और तत्वों का संचय है। जब साधक स्नान करता है, तो वह केवल त्वचा को नहीं धोता, बल्कि अपने भीतर के उन सूक्ष्म तंतुओं को भी सक्रिय करता है जो उसे अपने पूर्वजों (मूल) से जोड़ते हैं।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसकी देह से निःसृत होने वाला जल वास्तव में उसके भीतर के 'अमृत' या 'प्राण-रस' का स्थूल रूप है। जो साधक इस भाव से स्नान करता है कि उसका शरीर पितरों की धरोहर है, उसका स्नान एक 'यज्ञ' बन जाता है। अभ्यास यह है कि स्नान करते समय यह बोध रहे कि शरीर के प्रत्येक छिद्र से बहता जल केवल मल का निष्कासन नहीं, अपितु पितृ-तत्वों का पोषण और उनके प्रति कृतज्ञता का प्रवाह है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' (मैं स्नान कर रहा हूँ) से हटाकर 'समर्पण' (मेरी देह से यह जल पितरों की तृप्ति के लिए है) की भूमि पर ले जाता है।

श्लोक ७.९०

विदित्वैव सदा स्नायात् विधिनानेन नित्यशः ।

कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा ॥ ७.९० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६९

यह जानकर सदा इस विधिसे नित्य स्नान करे; प्रतिदिन अन्न आदिसे अथवा जलसे श्राद्ध करे —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह रहस्य खुला कि जो पितरों का तर्पण नहीं करता, उसके शरीर से टपकता जल ही अतृप्त पितरों की तृप्ति का माध्यम बनता है। इसी बोध के आधार पर वर्तमान श्लोक स्नान और श्राद्ध की नित्य अनिवार्यता का विधान करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) विदित्वैव सदा विधिना स्नायात् नित्यशः। अनेन (विधिना) कुर्यादहरहः श्राद्धम् अन्नादि-येनोदकेन वा।

पदार्थ और निर्वचन:

• विदित्वैव: जानकर ही। यहाँ 'विदित' शब्द उस ज्ञान की ओर संकेत है जो पिछले श्लोक में दिया गया—कि स्नान मात्र से भी पितरों का पोषण होता है।

• विधिना: शास्त्रोक्त विधि से। केवल जल का शरीर पर गिरना पर्याप्त नहीं, अपितु जिस विधि से स्नान और तर्पण का समन्वय है, वह अपेक्षित है।

• नित्यशः / अहरहः: प्रतिदिन। यह शब्द क्रिया की निरंतरता और अनुशासन को दर्शाते हैं, जो योग साधना की पहली शर्त है।

• अन्नाद्येनोदकेन वा: अन्न आदि से अथवा जल से। 'अन्नादि' में दूध, फल, मूल आदि सम्मिलित हैं, जबकि 'उदक' (जल) न्यूनतम और अनिवार्य अर्पण है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य बाह्य शुद्धि (स्नान) और पितृ-ऋण से मुक्ति (श्राद्ध) को एक ही सूत्र में पिरो रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने बताया कि स्नान के समय शरीर से गिरने वाला जल भी पितरों को तृप्त करता है। अब वे कहते हैं कि इस रहस्य को 'जानकर' (विदित्वैव) साधक को नित्य स्नान करना चाहिए। यहाँ 'जानकर' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; क्योंकि अज्ञानवश किया गया स्नान केवल शरीर की शुद्धि है, किंतु इस बोध के साथ किया गया स्नान कि "मेरा यह स्नान मेरे पूर्वजों की तृप्ति का निमित्त बन रहा है", वह स्नान 'यज्ञ' बन जाता है।

विधिपूर्वक नित्य स्नान का निर्देश केवल त्वचा की स्वच्छता के लिए नहीं, अपितु उस सूक्ष्म संबंध को जीवित रखने के लिए है जो जीव का अपने मूल (पितरों) से होता है। जब साधक विधिपूर्वक स्नान करता है, तो वह अपने अस्तित्व के उस प्रवाह को पहचानता है जो उसे पूर्वजों से प्राप्त हुआ है।

इसके साथ ही, ऋषि प्रतिदिन श्राद्ध करने का विधान करते हैं। श्राद्ध का अर्थ है 'श्रद्धा' से किया गया अर्पण। यह अर्पण अन्न के रूप में हो या केवल जल के रूप में, उसका उद्देश्य पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। अन्न स्थूल शरीर का पोषण करता है और जल प्राण का। जब साधक प्रतिदिन अन्न या जल का अर्पण करता है, तो वह अपने भीतर के 'अहं' को विसर्जित कर यह स्वीकार करता है कि वह जो कुछ भी है, अपने पूर्वजों की कृपा और उनके द्वारा दिए गए संस्कारों का परिणाम है। यह क्रिया साधक को विनम्र बनाती है और उसे उस मानसिक स्थिति में लाती है जहाँ से योग की उच्च अवस्थाएँ संभव होती हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा । पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन् ॥ ३.८२ ॥

पितरोंको प्रीति पहुँचाते हुए प्रतिदिन अन्न आदिसे, जलसे, अथवा दूध, मूल और फलोंसे श्राद्ध करे।

मनुस्मृति ३.८२मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 393

मनुस्मृति में भी यही विधान है कि पितरों की प्रीति के लिए प्रतिदिन अन्न, जल, दूध, मूल या फलों से श्राद्ध करना चाहिए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः सहमत हैं कि पितृ-तर्पण कोई आकस्मिक क्रिया नहीं, अपितु एक 'नित्य कर्म' है। अंतर केवल इतना है कि याज्ञवल्क्य इसे स्नान की विधि और उसके सूक्ष्म प्रभाव (देहनिःस्राव) से जोड़कर इसे और अधिक सुगम और अनिवार्य बना देते हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'कृतज्ञता' और 'समर्पण' के अभ्यास का है। साधक जब यह अनुभव करता है कि उसके शरीर से टपकने वाला जल भी किसी की तृप्ति का कारण बन सकता है, तो वह स्वयं को ब्रह्मांडीय संबंधों के जाल में देखता है।

यहाँ 'नित्य स्नान' का आन्तर अर्थ है—चित्त का निरंतर शोधन। जिस प्रकार जल शरीर की मलिनता धोता है, उसी प्रकार पितरों के प्रति श्रद्धा और अर्पण का भाव हृदय की मलिनता (अहंकार) को धोता है। प्रतिदिन अन्न या जल का अर्पण करना वास्तव में अपनी प्राण-शक्ति का एक अंश उन सूक्ष्म शक्तियों को समर्पित करना है जिनसे हम उत्पन्न हुए हैं। जब साधक अपने मूल के प्रति कृतज्ञ होता है, तब उसके भीतर का अवरोध समाप्त होता है और वह सहजता से सूक्ष्म शरीर के स्तर पर ऊपर की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास साधक को 'स्व' से निकालकर 'सर्व' की ओर ले जाने वाली पहली सीढ़ी है।

श्लोक ७.९१

तृप्त्यर्थं वै पितॄणां तु आत्मनः श्रेय इच्छता

यदेव तर्पयेदद्भिः पितॄन् स्नात्वा द्विजोत्तमः ॥ ७.९१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६९

— पितरोंकी तृप्तिके लिए और अपने कल्याणकी इच्छासे। श्रेष्ठ द्विज स्नान करके जो जलसे पितरोंका तर्पण करता है —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने नित्य स्नान और अन्न या जल से श्राद्ध करने की अनिवार्यता बताई। वर्तमान श्लोक उसी विधान के उद्देश्य और उसके फल को स्पष्ट करते हुए तर्पण की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: द्विजोत्तमः पितॄणां तु तृप्त्यर्थं वै आत्मनः श्रेय इच्छता स्नात्वा यदेव पितॄन् तर्पयेदद्भिः।

पदार्थ और निर्वचन:

• तृप्त्यर्थं: तृप्ति के लिए। यहाँ तृप्ति केवल भौतिक भूख-प्यास का मिटना नहीं, अपितु पितरों की सूक्ष्म चेतना का संतुष्ट होना है।

• श्रेय: परम कल्याण या आध्यात्मिक उन्नति। 'अभ्युदय' भौतिक उन्नति है, किंतु 'श्रेय' वह है जो साधक को बंधनमुक्त कर उच्चतर भूमियों की ओर ले जाए।

• द्विजोत्तमः: श्रेष्ठ द्विज। वह जो केवल जन्म से नहीं, अपितु ज्ञान, संस्कार और योग-साधना से 'द्विजों' में उत्तम हो चुका है।

• तर्पयेदद्भिः: जल आदि से तृप्त करे। 'तर्पण' का अर्थ है—तृप्त करना। जल यहाँ केवल द्रव्य नहीं, अपितु श्रद्धा और प्राण का वाहक है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक बाह्य क्रिया (तर्पण) और आन्तरिक लक्ष्य (श्रेय) के बीच के सेतु को स्पष्ट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि पितरों का तर्पण केवल एक सामाजिक या पारिवारिक कर्तव्य नहीं है, अपितु यह साधक की अपनी आध्यात्मिक उन्नति (श्रेय) का साधन है।

श्लोक का भाव यह है कि जो श्रेष्ठ द्विज अपने पूर्वजों की तृप्ति की कामना करता है और साथ ही स्वयं के परम कल्याण की इच्छा रखता है, उसे स्नान के पश्चात जल से तर्पण करना चाहिए। यहाँ 'स्नात्वा' (स्नान करके) शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्नान केवल त्वचा की शुद्धि नहीं है, अपितु यह साधक को उस मानसिक और शारीरिक स्थिति में लाता है जहाँ वह सूक्ष्म जगत के पितरों के साथ तादात्म्य स्थापित कर सके। जब साधक पवित्र होकर जल अर्पित करता है, तो वह जल केवल भौतिक रूप में नहीं गिरता, अपितु उसमें साधक के संकल्प और श्रद्धा का संचार होता है।

रहस्य यह है कि पितृ और पुत्र एक ही बीज (वंश) के दो छोर हैं। जब पुत्र तर्पण करता है, तो वह अपने मूल को सींचता है। यदि मूल तृप्त होगा, तो उस वृक्ष के फल स्वरूप साधक का जीवन और उसकी साधना स्वतः ही पुष्ट होगी। अतः पितरों की तृप्ति और साधक का श्रेय परस्पर विरोधी नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। जो व्यक्ति अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ नहीं है, उसकी चेतना में 'अहंकार' का अवरोध रहता है, जो उसे 'श्रेय' की प्राप्ति से रोकता है। तर्पण इस अहंकार को मिटाकर साधक को विनम्र बनाता है, जिससे उसकी योग-यात्रा सुगम हो जाती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'कृतज्ञता' के अभ्यास का सूत्र है। साधक जब स्नान के बाद जल अर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के उस प्रवाह को जागृत कर रहा होता है जो उसे उसके मूल स्रोत से जोड़ता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह केवल एक पृथक इकाई नहीं है, अपितु एक अनंत परंपरा की कड़ी है। 'जल' यहाँ प्राण के प्रवाह का प्रतीक है। जिस प्रकार जल ऊपर से नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार तर्पण के समय साधक अपनी चेतना को स्थूल शरीर से हटाकर सूक्ष्म पूर्वजों की ओर प्रवाहित करता है। यह अभ्यास साधक को 'अहं' (मैं करता हूँ) की भूमि से उठाकर 'ऋण' (मैं कृतज्ञ हूँ) की भूमि पर ले जाता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसकी वर्तमान स्थिति उसके पूर्वजों के तप और पुण्यों का परिणाम है, तब उसके हृदय में करुणा और समर्पण का भाव जाग्रत होता है। यही वह मानसिक भूमि है जहाँ से साधक उच्चतर आध्यात्मिक अवस्थाओं की ओर अग्रसर होता है। अतः यहाँ तर्पण, चित्त की शुद्धि का एक सशक्त मनोवैज्ञानिक और योगिक साधन है।

श्लोक ७.९२

तेनैव सर्वमाप्नोति पितृयज्ञक्रियाफलम् ।

निष्पीड्य स्नानवस्त्रं तु आचम्य प्रयतः शुचिः ॥ ७.९२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६९

— उसीसे वह पितृयज्ञ-क्रियाका सारा फल पा लेता है। (फिर) स्नानका वस्त्र निचोड़कर, आचमन करके, संयत और पवित्र होकर —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि स्नान के पश्चात किया गया जल-तर्पण पितरों की तृप्ति और साधक के अपने कल्याण (श्रेय) का साधन है। वर्तमान श्लोक इसी तर्पण-विधि के फल की पूर्णता और उसके पश्चात की शुद्धि-प्रक्रिया का निर्देश करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (स्नात्वा तर्पयिता) तेनैव पितृयज्ञक्रियाफलम् सर्वम् आप्नोति। तु स्नानवस्त्रं निष्पीड्य, आचम्य, प्रयतः शुचिः (ततः अर्चनं कुर्यात्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• तेनैव: उसी (स्नान के पश्चात जल-तर्पण की क्रिया) से। यहाँ 'एव' निश्चयवाचक है, जो यह दर्शाता है कि जल-तर्पण ही पितृयज्ञ का सार है।

• पितृयज्ञक्रियाफलम्: पितरों के निमित्त किए गए यज्ञ-कर्म का फल। यज्ञ यहाँ केवल अग्निहोत्र नहीं, अपितु श्रद्धापूर्वक किया गया अर्पण है।

• निष्पीड्य: निचोड़कर। स्नान के वस्त्र को निचोड़ना बाह्य शुद्धि और जल के अपव्यय को रोकने का संकेत है।

• आचम्य: आचमन करके। जल का सेवन कर मुख और अंतःकरण को शुद्ध करना।

• प्रयतः: प्रयत्नशील या संयत। वह साधक जिसने अपनी इंद्रियों और मन को साधना के लिए एकाग्र किया हो।

• शुचिः: पवित्र। बाह्य रूप से स्नान-युक्त और आंतरिक रूप से दोषरहित।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जो द्विज स्नान के उपरांत विधिपूर्वक जल-तर्पण करता है, वह उसी सरल क्रिया से समस्त 'पितृयज्ञ-क्रियाफल' को प्राप्त कर लेता है। यहाँ एक गहरा रहस्य है—पितृयज्ञ के लिए विस्तृत श्राद्ध-कर्म, अन्न-दान और जटिल अनुष्ठान बताए गए हैं, किंतु याज्ञवल्क्य उन्हें 'नित्य-कर्म' के परिप्रेक्ष्य में सरल कर देते हैं। उनका भाव यह है कि यदि स्नान के पश्चात श्रद्धा और विधि से जल अर्पित किया जाए, तो वह क्रिया भी उसी फल को प्रदान करती है जो महान श्राद्ध-कर्मों से मिलता है। यह साधक के लिए सुगम मार्ग है, जहाँ 'श्रद्धा' द्रव्य से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

श्लोक का दूसरा भाग क्रिया के अगले चरण की ओर ले जाता है। तर्पण के पश्चात साधक को 'स्नानवस्त्र' को निचोड़ना चाहिए। यह केवल वस्त्र सुखाने की क्रिया नहीं है, अपितु यह इस बात का प्रतीक है कि अब स्नान और तर्पण का समय समाप्त हुआ और अब साधक अन्य देव-पूजन या जप के लिए तत्पर है। इसके बाद 'आचमन' का विधान है। आचमन शरीर के भीतर के सूक्ष्म स्रोतों को जाग्रत करता है और वाणी को पवित्र करता है, ताकि आगामी मन्त्र-जप में कोई विघ्न न आए।

यहाँ 'प्रयतः शुचिः' शब्दों का प्रयोग अत्यंत गंभीर है। 'शुचिः' वह है जिसने स्नान किया, किंतु 'प्रयतः' वह है जिसने मन को संयत किया। केवल जल से शरीर धो लेना शुद्धि नहीं है; जब तक साधक 'प्रयत्न' (संयम) के द्वारा अपने चित्त को स्थिर नहीं करता, तब तक वह पूर्णतः शुचि नहीं कहलाता। अतः, तर्पण के बाद आचमन कर, मन को एकाग्र कर और पवित्र भाव धारण कर ही साधक अगले चरण (देव-अर्चन) में प्रवेश करे।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'नित्य-कर्म' को 'साधना' में बदलने की कला सिखाता है। पंच महायज्ञों में पितृयज्ञ एक अनिवार्य अंग है। साधक के लिए प्रतिदिन का जल-तर्पण केवल पूर्वजों को जल देना नहीं, अपितु अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता का भाव जगाना है। जब साधक कृतज्ञ होता है, तो उसके हृदय में 'अहंकार' का विसर्जन होता है और 'विनय' का उदय होता है। यही विनय उसे उच्चतर भूमियों की ओर ले जाता है।

यहाँ 'स्नानवस्त्र निचोड़ने' और 'आचमन' करने का योगिक अर्थ यह है कि साधक अपनी बाह्य क्रियाओं (कर्म) को पूर्ण कर अब अंतर्मुखी होने की तैयारी कर रहा है। 'प्रयतः' होने का अर्थ है—प्राणों को स्थिर करना। तर्पण के बाद जब साधक आचमन करता है, तो वह अपने भीतर के 'अमृत' का स्मरण करता है। यह अवस्था साधक को 'स्थूल शुद्धि' (स्नान) से 'सूक्ष्म शुद्धि' (आचमन और संयम) की ओर ले जाती है। इस प्रकार, वह केवल एक कर्मकाण्डीय क्रिया नहीं कर रहा, बल्कि अपने चित्त को उस अवस्था में ला रहा है जहाँ वह देवताओं के अर्चन (जैसा कि अगले श्लोक 7.93 में वर्णित है) के योग्य बन सके। यह क्रिया साधक को 'कर्म-भूमि' से 'भक्ति-भूमि' और तत्पश्चात 'ज्ञान-भूमि' की ओर अग्रसर करती है।

सुरार्चनाविधिः

श्लोक ७.९३

सुराणामर्चनं कुर्याद्ब्रह्मादीनाममत्सरः ।

ब्राह्मवैष्णवरौद्रैश्च सावित्रैर्मैत्रवारुणैः ॥ ७.९३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६९

— ईर्ष्यारहित होकर ब्रह्मा आदि देवताओंका अर्चन करे — ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सविता और मित्र-वरुणके मन्त्रोंसे —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में स्नान के पश्चात वस्त्र निचोड़ने और आचमन के माध्यम से बाह्य एवं आंतरिक शुद्धि की विधि बताई गई। अब साधक उस शुद्धि के साथ देव-अर्चन की ओर अग्रसर होता है, जहाँ वह अपने व्यक्तिगत अहंकार और संकीर्णता का त्याग कर विराट सत्ता के विभिन्न रूपों का पूजन करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (स्नात्वा आचम्य शुचिः) ब्रह्मादीनां सुराणां अर्चनं अमत्सरः कुर्यात्; (तदर्चनं) ब्राह्म-वैष्णव-रौद्रैः, सावित्रैः, मैत्र-वारुणैः (मन्त्रैः कुर्यात्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• सुराणाम्: देवताओं का। 'सुर' वह है जो प्रकाशमय है और जो सत्त्व-गुण का अधिष्ठाता है।

• अमत्सरः: ईर्ष्यारहित होकर। 'मत्सर' का अर्थ है जलन या यह भाव कि मेरा इष्ट दूसरे से श्रेष्ठ है। 'अमत्सर' वह स्थिति है जहाँ साधक समस्त देवतत्वों को एक ही ब्रह्म के विभिन्न स्वरूप मानता है।

• ब्रह्मादीनाम्: ब्रह्मा आदि देवताओं का। यहाँ ब्रह्मा सृजन, विष्णु पालन और रुद्र संहार के प्रतीक हैं।

• ब्राह्म-वैष्णव-रौद्रैः: ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के विशिष्ट मन्त्रों से।

• सावित्रैः: सविता (सूर्य) के मन्त्रों से।

• मैत्र-वारुणैः: मित्र और वरुण के मन्त्रों से। मित्र दिन के प्रकाश और वरुण रात्रि के रहस्य एवं जल के अधिपति हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य देव-अर्चन की एक ऐसी पद्धति बता रहे हैं जो साधक को संकीर्णता से मुक्त कर व्यापकता की ओर ले जाती है। स्नान और आचमन के बाद जब साधक पवित्र होता है, तब उसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सविता, मित्र और वरुण जैसे प्रमुख देवताओं का अर्चन करना चाहिए।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण निर्देश है—'अमत्सरः' अर्थात् ईर्ष्यारहित होकर। सामान्यतः मनुष्य किसी एक देवता या सम्प्रदाय के प्रति आसक्त होकर अन्य देवों के प्रति उपेक्षा या ईर्ष्या का भाव रखता है। याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, और उनकी दृष्टि में समस्त देवता उस एक ही 'अक्षर' (ब्रह्म) के विभिन्न कार्य-रूप हैं। यदि साधक केवल एक देवता को पूजता है और अन्य को तिरस्कृत करता है, तो वह वास्तव में उस एक ब्रह्म के ही किसी अंग का तिरस्कार कर रहा है। इसलिए, अर्चन की पहली शर्त 'अमत्सर' है—यह भाव कि सभी देव एक हैं और सभी पूजनीय हैं।

विधि यह है कि इन देवताओं के विशिष्ट मन्त्रों (ब्राह्म, वैष्णव, रौद्र, सावित्र, मैत्र और वारुण) का प्रयोग किया जाए। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, अपितु उन विशिष्ट शक्तियों के साथ तादात्म्य स्थापित करना है। ब्रह्मा के मन्त्र से सृजनात्मकता, विष्णु के मन्त्र से स्थिरता और रुद्र के मन्त्र से विसर्जन की शक्ति का आवाहन किया जाता है। सविता, मित्र और वरुण के मन्त्रों के माध्यम से साधक सूर्य के विभिन्न आयामों—प्रकाश, मैत्री और नियम—को अपने भीतर जागृत करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'अमत्सर' का अभ्यास 'समत्व' की भूमि का विकास है। साधक जब यह अनुभव करता है कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र अलग-अलग सत्ताएँ नहीं, बल्कि एक ही चेतना के तीन गुण (सत्त्व, रज, तम) और तीन कार्य (सृजन, पालन, संहार) हैं, तब उसकी चित्त-वृत्ति स्थिर होने लगती है।

यहाँ 'अमत्सर' का अर्थ सम्प्रदाय की ईर्ष्या का त्याग है। योग मार्ग में जब साधक विभिन्न देव-मन्त्रों का अभ्यास करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर की विभिन्न प्रवृत्तियों को शुद्ध कर रहा होता है। ब्रह्मादि देवताओं का अर्चन वास्तव में हृदय के भीतर स्थित उन दिव्य शक्तियों का जागरण है, जो साधक को स्थूल जगत से उठाकर सूक्ष्म जगत की ओर ले जाती हैं। यह अभ्यास साधक को 'भेद-भाव' की निम्न भूमि से उठाकर 'एकत्व' की उच्च भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। जब ईर्ष्या मिटती है, तब हृदय विस्तृत होता है और उसी विस्तृत हृदय में उस 'अदृश्य द्रष्टा' का साक्षात्कार संभव होता है।

श्लोक ७.९४

तल्लिङ्गैरर्चयेन्मन्त्रैः सर्वान् देवान् समाहितः ।

ध्यात्वा प्रणवपूर्वं तु दैवतं तु समाहितः ॥ ७.९४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६९

— उन-उन (देवताओं) के लिङ्गवाले मन्त्रोंसे सब देवताओंका समाहित होकर अर्चन करे; प्रणवपूर्वक देवताका ध्यान करके, समाहित होकर —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सविता, मित्र और वरुण जैसे प्रमुख देवतत्वों के मन्त्रों द्वारा ईर्ष्यारहित होकर अर्चन करने का विधान बताया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उन मन्त्रों के स्वरूप और अर्चन के समय साधक की मानसिक अवस्था (समाधि) का रहस्य खोल रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: समाहितः सर्वान् देवान् तल्लिङ्गैरर्चयेन्मन्त्रैः। (ततः) प्रणवपूर्वं तु दैवतं ध्यात्वा समाहितः (अर्चयेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• तल्लिङ्गैः: उन-उन (देवताओं) के लिङ्गवाले। यहाँ 'लिङ्ग' का अर्थ शारीरिक अंग नहीं, अपितु 'चिह्न' या 'लक्षण' है। जिस मन्त्र में जिस देवता का विशिष्ट लक्षण या बीज-शब्द निहित हो, वह उस देवता का 'लिङ्ग-मन्त्र' है।

• समाहितः: एकाग्रचित्त होकर। योग की भाषा में 'समाहित' वह अवस्था है जहाँ चित्त बाहरी विषयों से हटकर केवल इष्ट के स्वरूप में लीन हो जाता है।

• प्रणवपूर्वं: प्रणव (ॐ) के साथ या प्रणव के पूर्व। किसी भी मन्त्र के आरम्भ में प्रणव का प्रयोग उसे जाग्रत करता है और साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।

• ध्यात्वा: ध्यान करके। केवल मन्त्र का उच्चारण या पुष्प अर्पण पर्याप्त नहीं है, अपितु देवता के स्वरूप का मानसिक दर्शन (ध्यान) अनिवार्य है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य बाहरी पूजा को आंतरिक योग से जोड़ रहे हैं। वे कहते हैं कि जब साधक ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि का अर्चन करे, तो वह 'तल्लिङ्ग' मन्त्रों का प्रयोग करे। इसका अर्थ यह है कि जिस देवता की पूजा की जा रही है, उसी के विशिष्ट लक्षण वाले मन्त्र का चयन हो। यह विधि साधक को यह बोध कराती है कि यद्यपि ब्रह्म एक है, किन्तु उसकी विभूतियाँ अनेक हैं और प्रत्येक विभूति का अपना एक विशिष्ट 'ध्वनि-चिह्न' (लिङ्ग) है।

यहाँ 'समाहितः' शब्द दो बार आया है, जो इस क्रिया की गम्भीरता को दर्शाता है। प्रथम 'समाहित' मन्त्रोच्चार के समय की एकाग्रता है, और द्वितीय 'समाहित' ध्यान के समय की स्थिरता। याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि बिना समाधि के किया गया अर्चन केवल एक यांत्रिक क्रिया है। जब साधक समाहित होता है, तब मन्त्र केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि उस देवता की साक्षात् उपस्थिति बन जाता है।

विधि यह है कि सर्वप्रथम 'प्रणव' (ॐ) का उच्चारण किया जाए। प्रणव समस्त देवताओं का मूल है; यह वह बीज है जिससे सभी देव-मन्त्र प्रस्फुटित होते हैं। प्रणव के द्वारा जब चित्त शुद्ध और विस्तृत हो जाता है, तब विशिष्ट देवता का ध्यान किया जाए और फिर मन्त्रों द्वारा अर्चन किया जाए। यह क्रम—प्रणव → ध्यान → मन्त्र → अर्चन—साधक को शून्य से साकार की ओर और पुनः साकार से निराकार की ओर ले जाने वाली प्रक्रिया है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मंत्र-योग' और 'ध्यान-योग' का संगम है। यहाँ 'तल्लिङ्ग' मन्त्रों का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि उसके भीतर ही उन समस्त देवताओं के बीज विद्यमान हैं।

अभ्यास की विधि यह है:

१. प्रणव-स्थिति: सबसे पहले ॐ का उच्चारण कर स्वयं को ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन करना।

२. देव-ध्यान: जिस देवता का अर्चन करना है, उनके स्वरूप को हृदय-आकाश में प्रतिष्ठित करना।

३. मन्त्र-समाधि: मन्त्र के उच्चारण के साथ उस ध्वनि को अपने भीतर गूंजते हुए अनुभव करना, जिससे साधक 'समाहित' हो जाए।

इस अभ्यास से साधक 'साकार' (देवता) के माध्यम से 'निराकार' (ब्रह्म) की भूमि की ओर बढ़ता है। जब वह सभी देवताओं का इसी प्रकार समाहित होकर अर्चन करता है, तो उसे यह अनुभव होता है कि ये सभी विभिन्न लिङ्ग (चिह्न) वास्तव में एक ही परम-तत्व के विभिन्न प्रतिबिम्ब हैं। यह अभ्यास साधक को द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है।

श्लोक ७.९५

नमस्कारेण पुष्पाणि विन्यसेच्च पृथक् पृथक् ।

आवाहनादिकं कर्म यन्न प्रोक्तं मया त्विह ॥ ७.९५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६९

— नमस्कारके साथ अलग-अलग फूल रखे। आवाहन आदि जो कर्म मैंने यहाँ नहीं कहे —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में मन्त्रों के चयन, प्रणव के प्रयोग और समाहित चित्त से देवता के ध्यान की विधि बताई गई। अब महर्षि याज्ञवल्क्य अर्चन की भौतिक क्रिया और पूजा-पद्धति के संक्षिप्त स्वरूप का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) नमस्कारेण पृथक् पृथक् पुष्पाणि विन्यसेत्। आवाहनादिकं कर्म यत् न मया त्विह प्रोक्तम् (तत् सर्वं प्रणवेनैव कर्तव्यम्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• नमस्कारेण: प्रणाम के साथ। यहाँ नमस्कार केवल शरीर का झुकना नहीं, अपितु अहंकार का विसर्जन है।

• पृथक् पृथक्: अलग-अलग। प्रत्येक देवता के लिए भिन्न पुष्पों का अर्पण, उनकी विशिष्ट शक्तियों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।

• विन्यसेत्: रखे या अर्पित करे। 'विन्यास' का अर्थ है सचेत होकर उचित स्थान पर स्थापित करना।

• आवाहनादिकं कर्म: आवाहन (देवता को बुलाना), आसन, पाद्य, अर्घ्य आदि पूजा के प्रारंभिक चरण।

• न प्रोक्तं मया त्विह: जो मैंने यहाँ (इस स्मृति में) नहीं कहा है। ऋषि यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि वे कर्मकाण्ड की लंबी सूची के स्थान पर योगिक सार को प्राथमिकता दे रहे हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य पूजा की बाहरी विधि और उसके आंतरिक संक्षिप्तिकरण का समन्वय कर रहे हैं। वे निर्देश देते हैं कि ध्यान और मन्त्र के पश्चात, साधक विनम्रतापूर्वक नमस्कार करते हुए प्रत्येक देवता के लिए पृथक-पृथक पुष्प अर्पित करे। पुष्प यहाँ केवल वनस्पति नहीं, अपितु साधक के हृदय के प्रस्फुटित भावों का प्रतीक हैं। जब साधक 'पृथक् पृथक्' पुष्प रखता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर की भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रहा होता है।

श्लोक के दूसरे भाग में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत है। ऋषि कहते हैं कि आवाहन, अर्घ्य, पाद्य आदि जो विस्तृत कर्म उन्होंने यहाँ नहीं बताए हैं, वे लुप्त नहीं हैं, अपितु उन्हें एक विशेष रीति से करने का निर्देश अगले श्लोकों में आने वाला है। सामान्यतः कर्मकाण्ड में आवाहन के लिए लंबे मन्त्र और जटिल विधियाँ होती हैं, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य का दृष्टिकोण यह है कि जब साधक 'समाहित' (एकाग्र) होता है, तो उसे बाहरी आडंबरों की आवश्यकता नहीं रहती। वे यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि जो विस्तार उन्होंने नहीं लिखा, वह वास्तव में 'प्रणव' के एक लघु प्रयोग में समाहित हो चुका है। यह स्मृति हमें स्थूल कर्म से सूक्ष्म योग की ओर ले जाने का मार्ग दिखाती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'समर्पण' का अभ्यास है। नमस्कार की क्रिया शरीर के माध्यम से मन को झुकने की प्रक्रिया है। जब साधक अलग-अलग पुष्प अर्पित करता है, तो वह अपनी चेतना को खंडित नहीं करता, अपितु यह अनुभव करता है कि सृष्टि की समस्त विविधता (पुष्प) एक ही मूल स्रोत (देवता) से निकली है और उसी में विलीन हो रही है।

आवाहनादिक कर्मों का उल्लेख न करना यह दर्शाता है कि योग मार्ग में 'आवाहन' बाहर से किसी को बुलाना नहीं, अपितु अपने भीतर सोई हुई दिव्य शक्ति को जाग्रत करना है। साधक यहाँ इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह समझ जाता है कि मन्त्र और भाव ही वास्तविक अर्चन हैं; भौतिक सामग्री केवल मन को एकाग्र करने का एक साधन मात्र है।

श्लोक ७.९६

तत् सर्वं प्रणवेनैव कर्तव्यं चक्रपाणिनः ॥ ७.९६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ६९

— वह सब चक्रपाणि (विष्णु) का (पूजन) प्रणवसे ही करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने पूजा की भौतिक क्रिया और आवाहन आदि कर्मों के विस्तृत विवरण को इस स्मृति में न देने की बात कही थी। अब वे उस विस्तृत विधि के विकल्प के रूप में एक अत्यंत संक्षिप्त और शक्तिशाली योगिक मार्ग का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (आवाहनादिकं कर्म यन्न प्रोक्तं मया त्विह) तत् सर्वं चक्रपाणिनः प्रणवेनैव कर्तव्यम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• तत् सर्वं: वह सब। यहाँ 'सर्वं' शब्द आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य और उपचारों की उस पूरी श्रृंखला को सूचित करता है, जिसका उल्लेख पिछले श्लोक (७.९५) में नहीं किया गया।

• प्रणवेनैव: केवल प्रणव (ॐ) से ही। 'एव' अवधरणार्थक है, जो यह दर्शाता है कि प्रणव मात्र से ही समस्त विधियों का पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है।

• कर्तव्यम्: किया जाना चाहिए। यह विधिलिङ् है, जो साधक के लिए एक श्रेष्ठ विकल्प प्रस्तुत करता है।

• चक्रपाणिनः: चक्रपाणि (विष्णु) के लिए। यहाँ चक्रपाणि केवल एक देवता नहीं, अपितु संपूर्ण सृष्टि के संचालन करने वाले उस परम पुरुष के प्रतीक हैं, जिनमें समस्त देवता प्रतिष्ठित हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य कर्मकाण्ड की जटिलता को योग की सरलता में विलीन कर रहे हैं। उन्होंने पिछले श्लोक में स्पष्ट किया कि उन्होंने आवाहन आदि विस्तृत कर्मों का वर्णन यहाँ नहीं किया है। अब वे उसका समाधान देते हुए कहते हैं कि उन समस्त बाह्य क्रियाओं के स्थान पर केवल 'प्रणव' (ॐ) का आश्रय लेकर चक्रपाणि का पूजन करना पर्याप्त है।

यहाँ 'चक्रपाणि' का संबोधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। चक्र समय का प्रतीक है और पाणि (हाथ) उस समय और सृष्टि के नियंत्रण का। जब साधक चक्रपाणि का पूजन करता है, तो वह वास्तव में उस विराट सत्ता का पूजन करता है जो समय और काल से परे है। ऋषि यह समझाना चाहते हैं कि यदि साधक के पास विस्तृत पूजन सामग्री या समय का अभाव हो, अथवा वह सूक्ष्म साधना की ओर अग्रसर हो, तो वह 'ॐ' के उच्चारण मात्र से समस्त पूजन-विधि को पूर्ण कर सकता है।

भाव यह है कि प्रणव (ॐ) केवल एक ध्वनि नहीं, अपितु समस्त मन्त्रों, देवताओं और विधियों का बीजरूप है। जिस प्रकार एक बीज में संपूर्ण वृक्ष निहित होता है, उसी प्रकार प्रणव में आवाहन, अर्घ्य, धूप, दीप और नैवेद्य—सभी अंतर्निहित हैं। जब साधक एकाग्रचित्त होकर 'ॐ' का उच्चारण करता है, तो वह अनजाने में ही उस परम पुरुष का आवाहन कर लेता है और उसे अपने हृदय-सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर देता है। यह विधि बाह्य कर्मकाण्ड को मिटाती नहीं, अपितु उसे उसके उच्चतम और सूक्ष्मतम स्तर पर ले जाती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विधि' से 'सिद्धि' की ओर ले जाने वाला है। योगिक अभ्यास में इसे 'मानसिक पूजन' या 'बीज-साधना' कहा जाता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाह्य उपकरणों (फूल, जल, धूप) की आवश्यकता तब तक है जब तक चित्त स्थूल है। जैसे-जैसे साधक की भूमि सूक्ष्म होती जाती है, वह पाता है कि उसके भीतर का 'ॐ' ही सबसे बड़ा अर्पण है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपनी आँखें बंद कर, हृदय में चक्रपाणि का ध्यान करे और प्रत्येक मानसिक उपचार (जैसे आवाहन, अर्घ्य) के स्थान पर केवल 'ॐ' का मानसिक जप करे।

इस अभ्यास से साधक 'कर्म-भूमि' से उठकर 'भाव-भूमि' में प्रवेश करता है। वह अनुभव करता है कि प्रणव की एक ध्वनि में ही संपूर्ण ब्रह्माण्ड की ऊर्जा समाहित है। जब वह 'ॐ' कहता है, तो वह स्वयं को और अपने संपूर्ण अस्तित्व को उस चक्रपाणि (परमात्मा) में विलीन कर देता है। यह अभ्यास साधक को यह बोध कराता है कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए बाहरी आडंबरों से अधिक, आंतरिक एकाग्रता और बीज-मन्त्र का सामर्थ्य आवश्यक है। इस प्रकार, प्रणव यहाँ एक सेतु बन जाता है जो साधक को स्थूल पूजन से उठाकर अक्षर-ब्रह्म की स्थिति तक ले जाता है।

श्लोक ७.९७

दद्यात् पुरुषसूक्तेन यः पुष्पाण्यप एव वा ।

अर्चितं स्याज्जगदिदं तेन सर्वं चराचरम् ॥ ७.९७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७०

जो पुरुषसूक्तसे फूल या जल ही अर्पित करता है, उसने इस सारे चराचर जगत्‌की पूजा कर ली।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने यह स्पष्ट किया था कि विस्तृत पूजा-विधियों के स्थान पर केवल प्रणव के आश्रय से चक्रपाणि का पूजन पर्याप्त है। अब वे एक और अत्यंत संक्षिप्त किन्तु सर्वसमावेशी विधि बता रहे हैं, जिससे साधक एक ही क्रिया में समस्त चराचर जगत के प्रति अपनी कृतज्ञता और अर्चन प्रकट कर सकता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यः पुरुषसूक्तेन पुष्पाणि अप एव वा दद्यात्, तेन इदं सर्वं चराचरं जगत् अर्चितं स्यात्।

पदार्थ और निर्वचन:

• पुरुषसूक्तेन: पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा। यहाँ 'पुरुषसूक्त' उस वैदिक ऋचा-समूह का संकेत है जो उस एक विराट पुरुष का वर्णन करता है, जिसमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड व्याप्त है।

• पुष्पाणि अप एव वा: फूल अथवा जल ही। 'अप' का अर्थ जल है। 'एव वा' यह दर्शाता है कि यदि फूल उपलब्ध न हों, तो केवल जल का अर्पण भी उतना ही फलदायी है।

• दद्यात्: अर्पित करे। यह विधिलिङ् है, जो एक सरल किन्तु श्रेष्ठ विकल्प का निर्देश देता है।

• जगदिदं सर्वं चराचरम्: यह सारा चराचर जगत्। 'चराचर' में चर (गतिशील/प्राणी) और अचर (स्थिर/जड़) दोनों सम्मिलित हैं।

• अर्चितं स्यात्: पूजा हो जाती है। यहाँ 'स्यात्' संभावना नहीं, अपितु परिणाम की निश्चितता को दर्शाता है कि इस एक क्रिया से संपूर्ण जगत की पूजा पूर्ण हो गई।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि कर्म और ज्ञान के समन्वय का अद्भुत सूत्र दे रहे हैं। बाहरी दृष्टि से यह श्लोक केवल एक संक्षिप्त पूजन विधि है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई साधक पुरुषसूक्त के मन्त्रों का पाठ करते हुए पुष्प या जल अर्पित करता है, तो उसे समस्त देवताओं और चराचर जगत की पूजा का फल प्राप्त हो जाता है।

परन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। पुरुषसूक्त उस 'एक' का वर्णन है जो अनेकता के पीछे छिपा है। जब साधक पुरुषसूक्त के मन्त्रों का उच्चारण करता है, तो वह केवल शब्दों का जप नहीं कर रहा होता, अपितु वह अपनी चेतना को उस विराट पुरुष में विलीन कर रहा होता है जिसमें सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, आकाश और समस्त जीव समाहित हैं।

यहाँ 'फूल' और 'जल' केवल भौतिक वस्तुएँ नहीं हैं। फूल हृदय के खिलने और समर्पण का प्रतीक है, और जल शुद्धि तथा प्रवाह का। जब यह समर्पण उस 'पुरुष' को किया जाता है जो स्वयं संपूर्ण जगत है, तो वह अर्पण किसी एक व्यक्ति या मूर्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह संपूर्ण अस्तित्व तक फैल जाता है। भाव यह है कि जब हम उस मूल स्रोत को जल या पुष्प देते हैं, तो उसकी समस्त शाखाओं (सृष्टि के कण-कण) तक वह अर्चन स्वतः पहुँच जाता है। इस प्रकार, एक लघु क्रिया के माध्यम से साधक 'सर्व-देवता' और 'सर्व-भूत' के साथ एकाकार हो जाता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'एकत्व' की भूमि पर ले जाता है। सामान्यतः पूजा में साधक एक-एक देवता का अलग-अलग स्मरण करता है, जिससे मन में अनेकता का भाव बना रहता है। परन्तु पुरुषसूक्त का अभ्यास साधक को इस अनुभव की ओर ले जाता है कि जिसे वह बाहर खोज रहा है, वह विराट पुरुष उसके भीतर भी है और बाहर भी।

साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह अपने हृदय के पुष्प (भक्ति) और अपने प्राणों के जल (शुद्धता) को उस विराट पुरुष को समर्पित कर दे। जब वह यह अनुभव करता है कि "सब कुछ उसी का है और वह सब में है", तब उसकी पूजा केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक ध्यान बन जाती है। इस अभ्यास से साधक 'विभक्त' चेतना से 'अविभक्त' चेतना की ओर बढ़ता है। वह यह अनुभव करता है कि संपूर्ण चराचर जगत वास्तव में उसी एक पुरुष का विस्तार है। अतः, उस एक को अर्पण करना, वास्तव में सबको अर्पण करना है। यह अभ्यास साधक को अहंकार के विसर्जन और सार्वभौमिक प्रेम की स्थिति में प्रतिष्ठित करता है।

श्लोक ७.९८

विष्णुर्ब्रह्मा च रुद्रश्च विष्णुर्देवो दिवाकरः ।

तस्मात् पूज्यतमं नान्यमहं मन्ये जनार्दनात् ॥ ७.९८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७०

विष्णु ही ब्रह्मा और रुद्र हैं, विष्णु ही दिवाकर (सूर्य) देव हैं; इसलिए मैं जनार्दनसे बढ़कर दूसरे किसीको पूजनीय नहीं मानता।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने पुरुषसूक्त के माध्यम से विराट पुरुष के पूजन को समस्त चराचर जगत के अर्चन के समान बताया था। अब वे उस विराट पुरुष के स्वरूप और विभिन्न देव-रूपों की एकता का रहस्य खोल रहे हैं, ताकि साधक के मन में किसी भी देवता के प्रति द्वैत या ईर्ष्या न रहे।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: विष्णुः ब्रह्मा च रुद्रः च (त एव) विष्णुः, देवो दिवाकरः (त एव)। तस्मात् जनार्दनात् अन्यं पूज्यतमं अहं न मन्ये।

पदार्थ और निर्वचन:

• विष्णुर्ब्रह्मा च रुद्रश्च: विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र। यहाँ तीनों मुख्य शक्तियों—सृजन, पालन और संहार—के अधिष्ठातृ देवों का उल्लेख है।

• विष्णुर्देवो दिवाकरः: विष्णु ही दिवाकर (सूर्य) देव हैं। दिवाकर का अर्थ है 'दिन करने वाला', जो अविद्या के अन्धकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।

• तस्मात्: इसलिए। यह शब्द पूर्वोक्त एकता के आधार पर निष्कर्ष की ओर ले जाता है।

• पूज्यतमं: सबसे अधिक पूजनीय। 'तम' प्रत्यय श्रेष्ठता और पूर्णता को दर्शाता है।

• नान्यमहं मन्ये: मैं दूसरे किसी को नहीं मानता। 'न' (निषेध) + 'अन्यम्' (दूसरा) + 'अहं' (मैं) + 'मन्ये' (मानता हूँ/अनुभव करता हूँ)।

• जनार्दनात्: जनार्दन से। 'जन' (प्राणी) + 'अर्दना' (दुखों का नाश करने वाला)। वह जो समस्त जीवों के बंधनों और दुखों का निवारण करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि उस परम सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं जिसे वे अपनी श्रुति में 'अक्षर' और 'विज्ञानमय पुरुष' के रूप में देखते हैं। बाहरी दृष्टि से यह श्लोक एक विशिष्ट देवता की श्रेष्ठता का कथन लग सकता है, किन्तु वास्तव में यह 'एकमेवाद्वितीयम्' के सिद्धांत का विस्तार है।

ऋषि कहते हैं कि जिसे हम ब्रह्मा (सृजन), रुद्र (लय) और दिवाकर (प्रकाश) के रूप में अलग-अलग देखते हैं, वे वास्तव में एक ही विष्णु-तत्त्व के विभिन्न आयाम हैं। विष्णु का अर्थ है 'विशृण्वते'—जो सर्वव्यापी है, जो हर कण में व्याप्त है। जब वही सर्वव्यापी तत्त्व सृष्टि का विस्तार करता है, तब वह ब्रह्मा है; जब वह संहार और परिवर्तन करता है, तब वह रुद्र है; और जब वह प्रत्यक्ष प्रकाश बनकर जगत को जाग्रत करता है, तब वह दिवाकर (सूर्य) है।

यहाँ 'अहं मन्ये' (मैं मानता हूँ) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह किसी शास्त्र का थोपा हुआ नियम नहीं, अपितु एक योगीश्वर का अपना अनुभव है। याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उनकी दृष्टि में जनार्दन (दुखहर्ता विष्णु) ही वह केंद्र बिंदु हैं, जहाँ पहुँचकर समस्त देव-रूप विलीन हो जाते हैं। इसलिए, जब साधक जनार्दन का पूजन करता है, तो वह अनजाने में ही ब्रह्मा, रुद्र और सूर्य का पूजन कर लेता है। यह दृष्टि साधक को संकीर्णता से मुक्त कर उसे उस व्यापकता में ले जाती है जहाँ पूजा केवल एक आकृति की नहीं, बल्कि उस एक ही तत्त्व के अनंत रूपों की होती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'एकाग्रता' और 'समत्व' का अभ्यास है। श्लोक ७.९३ में महर्षि ने 'अमत्सर' (ईर्ष्यारहित) अर्चन की बात कही थी। ईर्ष्या तब होती है जब हम भिन्नता देखते हैं। यह श्लोक उस भिन्नता को मिटाकर 'एकता' का अनुभव कराता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसके भीतर का जो प्रकाश (सूर्य), जो संकल्प-शक्ति (ब्रह्मा) और जो विसर्जन-शक्ति (रुद्र) है, वे सब एक ही चेतना के खेल हैं। जब साधक जनार्दन के रूप में उस परम पुरुष का ध्यान करता है, तो वह अपने भीतर के समस्त विरोधाभासों को समाप्त कर देता है। वह इस भूमि पर आता है जहाँ उसे यह बोध होता है कि जिस सूर्य को वह बाहर देख रहा है, वही सूर्य उसके हृदय-आकाश में 'विज्ञानमय पुरुष' के रूप में प्रतिष्ठित है।

इस अभ्यास से साधक 'बहु' से 'एक' की ओर बढ़ता है। वह समझ जाता है कि पूजा की विविधता केवल साधन है, साध्य तो वह एक ही जनार्दन है जो समस्त प्राणियों को संसार के दुखों से मुक्त करता है। यह श्लोक साधक को उस स्थिति में ले जाता है जहाँ वह किसी भी देव-रूप को देखकर उसी एक परम तत्त्व का स्मरण करने लगता है।

सावित्र्यै हविर्दानम्

श्लोक ७.९९

विष्णुं वा भास्करं वापि सर्वदैव समर्चयेत् ।

सावित्र्यै च हविर्दद्यात् यथाशक्ति समाहितः ॥ ७.९९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७०

विष्णुका अथवा सूर्यका सदा ही अर्चन करे; और समाहित होकर यथाशक्ति सावित्रीको हवि दे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने यह स्पष्ट किया था कि ब्रह्मा, रुद्र और दिवाकर सभी वास्तव में जनार्दन रूपी एक ही परम पुरुष के विभिन्न स्वरूप हैं। अब वे इस ज्ञान के आधार पर साधक के लिए दैनिक अर्चन की विधि और सावित्री उपासना के व्यावहारिक पक्ष को प्रस्तुत कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) विष्णुं वा भास्करं वापि सर्वदैव समर्चयेत्; (तथा) समाहितः यथाशक्ति सावित्र्यै च हविर्दद्यात्।

पदार्थ और निर्वचन:

• विष्णुं वा भास्करं वापि: विष्णु का अथवा भास्कर (सूर्य) का। यहाँ 'वा' और 'वापि' विकल्प दे रहे हैं, जो यह दर्शाते हैं कि दोनों एक ही तत्त्व के दो रूप हैं—एक आंतरिक व्यापकता (विष्णु) और दूसरा बाह्य प्रकाश (भास्कर)।

• सर्वदैव: सदा, प्रतिदिन या सर्वदा। यह निरंतरता का सूचक है।

• समर्चयेत्: अर्चन करे। 'अर्चन' का अर्थ केवल फूल चढ़ाना नहीं, बल्कि उस देवता के गुण और स्वरूप का चित्त में आवाहन करना है।

• सावित्र्यै: सावित्री को। यहाँ सावित्री का अर्थ गायत्री मन्त्र की अधिष्ठात्री शक्ति या उस दिव्य प्रकाश से है जो साधक को सत्य की ओर ले जाता है।

• हविर्दद्यात्: हवि दे। हवि का अर्थ भौतिक आहुति भी है और योगिक दृष्टि से अपने अहंकार और वृत्तियों का समर्पण भी।

• यथाशक्ति: अपनी शक्ति के अनुसार। यह निर्देश देता है कि साधना में प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामर्थ्यानुसार निष्ठा प्रधान होनी चाहिए।

• समाहितः: एकाग्र होकर, चित्त को स्थिर करके। यह शब्द इस पूरी क्रिया को केवल कर्मकाण्ड से उठाकर 'योग' की श्रेणी में ले आता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य बाहरी पूजा और आंतरिक योग का समन्वय कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने जनार्दन की सर्वोपरिता सिद्ध की थी, अतः यहाँ वे कहते हैं कि साधक विष्णु या भास्कर का अर्चन करे। विष्णु वह व्यापक चेतना हैं जो कण-कण में व्याप्त हैं, और भास्कर वह प्रदीप्त सूर्य हैं जो जगत को प्रकाशित करते हैं। चूंकि विष्णु ही दिवाकर हैं, अतः इन दोनों का अर्चन वास्तव में एक ही परम पुरुष का अर्चन है। 'सर्वदैव' शब्द यह संकेत देता है कि यह अर्चन किसी विशेष उत्सव के लिए नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का हिस्सा होना चाहिए।

इसके पश्चात महर्षि 'सावित्र्यै हविर्दद्यात्' के माध्यम से गायत्री उपासना का निर्देश देते हैं। सावित्री वह विद्या है जो साधक के बुद्धि-प्रकाश को जाग्रत करती है। यहाँ 'हवि' देने का विधान है। बाहरी विधि में यह अग्निहोत्र या जल-अर्पण हो सकता है, किन्तु इस स्मृति के योगिक परिप्रेक्ष्य में, हवि का अर्थ है—साधक की अपनी सीमित बुद्धि और वासनाओं को उस अनंत प्रकाश (सावित्री) में होम कर देना।

सबसे महत्वपूर्ण शब्द है 'समाहितः'। बिना समाहित हुए किया गया अर्चन केवल एक शारीरिक क्रिया है, किन्तु समाहित होकर किया गया अर्चन 'योग' बन जाता है। जब साधक अपनी समस्त वृत्तियों को समेटकर, केवल इष्ट के स्वरूप में लीन होकर अर्चन करता है, तब वह बाहरी देवता से जुड़कर अपने भीतर के देवता का साक्षात्कार करता है। 'यथाशक्ति' का निर्देश यह बताता है कि साधन की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण साधक का भाव और उसकी एकाग्रता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'भक्ति' से 'योग' की ओर संक्रमण का मार्ग है। यहाँ विष्णु और भास्कर का अर्चन करना वास्तव में अपने भीतर के 'विज्ञानमय पुरुष' का स्मरण करना है।

अभ्यास की दृष्टि से साधक को चाहिए कि वह अर्चन के समय अपने चित्त को 'समाहित' करे। समाहित होने का अर्थ है—बाहरी जगत के विषयों से मन को हटाकर उसे हृदय के उस केंद्र पर लाना जहाँ सूर्य रूपी आत्मा का प्रकाश विद्यमान है। जब वह 'सावित्र्यै हवि' देता है, तो वह वास्तव में अपनी अल्प-बुद्धि को उस दिव्य प्रज्ञा में विलीन कर रहा होता है। यह अभ्यास साधक को 'सात्विक भूमि' से ऊपर उठाकर 'प्रकाशमय भूमि' की ओर ले जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि पूजक, पूजन और पूज्य—तीनों एक ही प्रकाश के स्वरूप हैं।

अर्कदर्शनम्

श्लोक ७.१००

ततोऽवलोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यृचा ।

स याति ब्रह्मसदनं स्नात्वेक्षेद्योऽनया रविम् ॥ ७.१०० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७०

फिर "हंसः शुचिषत्…" ऋचासे सूर्यको देखे; जो स्नान करके इस (ऋचा) से सूर्यको देखता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि ने जनार्दन की सर्वोपरिता बताते हुए विष्णु और भास्कर के अर्चन तथा सावित्री को हवि देने का विधान बताया था। अब वे अर्चन के पश्चात सूर्य-दर्शन की उस विशिष्ट विधि का निर्देश दे रहे हैं, जो साधक को भौतिक जगत से उठाकर ब्रह्मलोक की ओर ले जाती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (ततः साधकः) 'हंसः शुचिषत्' इति ऋचा (सह) अर्कं अवलोकयेत्। यः स्नात्वा अनया (ऋचाया) रविम् इक्षेत्, स (साधकः) ब्रह्मसदनं याति।

पदार्थ और निर्वचन:

• ततः: उसके बाद। यहाँ 'ततः' शब्द पूर्वोक्त अर्चन और सावित्री हवि के पश्चात की क्रमबद्धता को दर्शाता है।

• अवलोकयेत्/इक्षेत्: देखे या दर्शन करे। यहाँ 'देखना' केवल चक्षु-क्रिया नहीं, अपितु मन्त्र के साथ एकाग्रचित्त होकर उस स्वरूप का साक्षात्कार करना है।

• अर्कं/रविम्: सूर्य को। अर्क और रवि यहाँ केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु प्रकाशमान चेतना के प्रतीक हैं।

• हंसः शुचिषत्: यह ऋग्वेद की एक ऋचा का प्रतीक है। 'हंस' वह है जो शुद्ध है, जो विवेकपूर्ण है और जो जल (माया) में रहकर भी उससे अछूता रहता है। 'शुचिषत्' का अर्थ है अत्यंत पवित्र या शुद्ध।

• ब्रह्मसदनं: ब्रह्म का निवास स्थान। यह मोक्ष की वह अवस्था है जहाँ साधक अपनी सीमित पहचान छोड़कर विराट ब्रह्म में विलीन हो जाता है।

• स्नात्वा: स्नान करके। यहाँ बाह्य जल-स्नान के साथ-साथ मन्त्रों द्वारा की गई आंतरिक शुद्धि का भी संकेत है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्य-दर्शन को एक आध्यात्मिक यात्रा के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। विधि यह है कि साधक पहले स्नान करे और फिर 'हंसः शुचिषत्' ऋचा का पाठ करते हुए सूर्य की ओर दृष्टि करे।

यहाँ 'देखना' एक साधना है। जब साधक मन्त्र के साथ सूर्य को देखता है, तो वह केवल एक खगोलीय पिंड को नहीं देख रहा होता, बल्कि वह उस 'हंस' रूपी शुद्ध चेतना का दर्शन करता है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित कर रही है। ऋचा का प्रभाव साधक की दृष्टि को भौतिकता से हटाकर सूक्ष्मता की ओर मोड़ देता है।

ऋषि स्पष्ट कहते हैं कि जो स्नान के पश्चात इस मन्त्र के साथ सूर्य का दर्शन करता है, वह 'ब्रह्मसदन' को प्राप्त होता है। इसका रहस्य यह है कि सूर्य इस दृश्य जगत में उस अदृष्ट परमात्मा का सबसे प्रत्यक्ष प्रतीक है। जब शुद्ध शरीर और शुद्ध मन्त्र के माध्यम से सूर्य का दर्शन होता है, तब साधक के भीतर का सूर्य (आत्मा) और बाहर का सूर्य (परमात्मा) एक हो जाते हैं। यह मिलन ही ब्रह्मसदन की प्राप्ति है। यहाँ स्नान केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि चित्त का वह परिष्कार है जो साधक को ब्रह्मलोक के योग्य बनाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

सूर्य के इस 'हंस' स्वरूप की व्यापकता कठोपनिषद् में स्पष्ट मिलती है:

कठ उपनिषद्

हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २.२.२ ॥

वह हंस (सूर्य) है जो शुद्ध (आकाश) में रहता है, वसु जो अन्तरिक्षमें, होता जो वेदीपर, अतिथि जो घरमें; मनुष्योंमें, श्रेष्ठोंमें, ऋतमें, व्योममें रहता; जलमें, पृथ्वीमें, यज्ञमें, पर्वतोंमें उत्पन्न — वह ऋत है, महान् है।

कठ उपनिषद् २.२.२उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 73

यहाँ यह स्पष्ट है कि वह 'हंस' केवल आकाश में नहीं, बल्कि वसु, होता, अतिथि, मनुष्यों, श्रेष्ठों, व्योम, जल, पृथ्वी और पर्वतों—अर्थात् चराचर जगत के कण-कण में व्याप्त है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में जब साधक 'हंसः शुचिषत्' मन्त्र से सूर्य को देखता है, तो वह वास्तव में उसी सर्वव्यापी ऋत (सत्य) का दर्शन करता है जिसकी चर्चा कठोपनिषद् में है। स्मृति यहाँ उस व्यापक सत्य को 'सूर्य' के केंद्र बिंदु पर लाकर साधक के लिए सुलभ बना देती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'त्राटक' और 'साक्षी-भाव' का समन्वय है। साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह सूर्य की ज्योति को केवल आँखों से न देखे, बल्कि उसे अपने हृदय की ज्योति के साथ जोड़ दे।

जब साधक 'हंसः शुचिषत्' का जप करता है, तो वह स्वयं को उस 'हंस' (शुद्ध आत्मा) के रूप में अनुभव करता है। सूर्य का दर्शन यहाँ 'बाह्य-दृष्टि' का 'आंतरिक-दृष्टि' में रूपांतरण है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जो प्रकाश बाहर सूर्य के रूप में है, वही प्रकाश भीतर आत्मा के रूप में विद्यमान है।

यह अभ्यास साधक को 'सांसारिक दृष्टि' (जहाँ केवल वस्तुएं दिखती हैं) से उठाकर 'दिव्य दृष्टि' (जहाँ केवल ब्रह्म दिखता है) की ओर ले जाता है। स्नान से शरीर शुद्ध हुआ, मन्त्र से वाणी शुद्ध हुई और सूर्य-दर्शन से दृष्टि शुद्ध हुई। जब ये तीनों शुद्धियाँ एक साथ मिलती हैं, तब साधक की चेतना भौतिक धरातल को छोड़कर 'ब्रह्मसदन' की ओर प्रस्थान करती है। यह स्थिति साधक को स्थूल जगत के मोह से मुक्त कर उसे अक्षर-ब्रह्म के समीप ले जाने वाली एक सीढ़ी है।

दिवाकरोपस्थानम्

श्लोक ७.१०१

अदृश्रमस्येति मन्त्रैरुपस्थाय दिवाकरम् ।

संवर्चसेति पाणिभ्यां तोयेनाविमृजेन्मुखम् ॥ ७.१०१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७०

"अदृश्रमस्य (केतवः)…" मन्त्रोंसे सूर्यका उपस्थान करके, "सं वर्चसा…" (मन्त्र) से दोनों हाथोंसे जल लेकर मुँह पोंछे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में 'हंसः शुचिषत्' ऋचा के माध्यम से सूर्य-दर्शन और ब्रह्मसदन की प्राप्ति का रहस्य बताया गया। अब साधक दर्शन के पश्चात सूर्य के सम्मुख उपस्थित होने (उपस्थान) और अपनी इंद्रियों, विशेषकर मुख की शुद्धि की विधि का पालन करता है।

अन्वय और पदार्थ —

'अदृश्रमस्य (केतवः)' इति मन्त्रैः दिवाकरम् उपस्थाय, 'सं वर्चसा' इति (मन्त्रेण) तोयेन पाणिभ्यां मुखम् अविमृजेत्।

पदार्थ-निर्वाचन:

• अदृश्रमस्य (केतवः): यह सूर्योपस्थान के मन्त्र का आरम्भिक पद है। 'अदृश्रम' का अर्थ है जो श्रम रहित है, जो अमोघ है। 'केतवः' का अर्थ है ध्वज या प्रकाश-पुंज। यह मन्त्र साधक को सूर्य की दिव्य आभा के सम्मुख स्थिर करने का साधन है।

• उपस्थाय: सम्मुख उपस्थित होना। केवल शरीर से खड़ा होना नहीं, अपितु चित्त को आराध्य में लीन कर स्थिर होना।

• सं वर्चसा: यह मुख-मार्जन के मन्त्र का प्रतीक है। 'वर्चस' का अर्थ है तेज, ओज या आभा। 'सं' उपसर्ग यहाँ पूर्णता और सामंजस्य का बोध कराता है।

• अविमृजेत्: पोंछना या शुद्ध करना। जल के माध्यम से बाहरी मल और मन्त्र के माध्यम से आन्तरिक अशुद्धि का निवारण करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक सूर्य-साधना के उस चरण को दर्शाता है जहाँ साधक दर्शन के बाद 'उपस्थान' की क्रिया करता है। उपस्थान का अर्थ है—साधना के उस बिंदु पर पहुँचना जहाँ साधक और साध्य के बीच की दूरी न्यूनतम हो जाए। 'अदृश्रमस्य केतवः' जैसे मन्त्रों का प्रयोग करते हुए जब साधक दिवाकर के सम्मुख खड़ा होता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के आलस्य और जड़ता (श्रम) को त्यागकर उस दिव्य प्रकाश-पुंज (केतु) के साथ एकाकार होने का प्रयास करता है।

इसके पश्चात 'सं वर्चसा' मन्त्र के साथ दोनों हाथों से जल लेकर मुख को पोंछने की विधि दी गई है। यह केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है। मुख वह द्वार है जिससे वाक् (वाणी) प्रकट होती है और प्राण का आवागमन होता है। जल का स्पर्श शरीर की शुद्धि है, किंतु 'वर्चसा' शब्द का प्रयोग यह संकेत देता है कि साधक अपने मुख-मंडल पर सूर्य के तेज का आवाहन कर रहा है। वह चाहता है कि उसकी वाणी सत्यमय हो और उसका व्यक्तित्व ओजस्वी बने।

यहाँ दोनों हाथों (पाणिभ्यां) का प्रयोग पूर्णता और संतुलन का प्रतीक है। जिस प्रकार सूर्य जगत में संतुलन बनाए रखता है, उसी प्रकार साधक दोनों हाथों के समन्वय से अपने मुख की शुद्धि करता है। यह क्रिया इस बात का बाह्य संकेत है कि साधक अब अपनी समस्त इंद्रियों और चेतना को एक सूत्र में पिरोकर उस परम प्रकाश की ओर अग्रसर है। इस प्रकार बाह्य मार्जन के साथ-साथ आन्तरिक शुद्धि का समन्वय होता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'स्थिरता' और 'तेज' के अभ्यास का है। 'उपस्थान' का योगिक अर्थ है—चित्त का एकाग्र होकर सूर्य (परम पुरुष) में स्थित हो जाना। जब साधक 'अदृश्रम' भाव में आता है, तो वह मानसिक द्वंद्वों से मुक्त होकर सहज हो जाता है।

मुख-मार्जन का अभ्यास करते समय साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि वह केवल जल नहीं लगा रहा, अपितु सूर्य की किरणों के रूप में 'वर्चस' (दिव्य ऊर्जा) को अपने चेहरे और वाणी में आत्मसात कर रहा है। यह अभ्यास साधक को 'सात्त्विक भूमि' से 'राजसिक ओज' की ओर ले जाता है, जिससे उसकी संकल्प शक्ति प्रबल होती है। इस क्रिया से साधक का मुख-मंडल प्रकाशमय होता है और वह आगामी जप और ध्यान के लिए पूर्णतः शुद्ध और चैतन्य हो जाता है।

दिग्देवतानमस्कारः · ब्रह्मादिभ्यो जलदानपूर्वकं नमस्क्रिया

श्लोक ७.१०२

स्वयंभूरित्युपस्थाय सूर्यस्येति प्रदक्षिणा ।

समावृत्य नमस्कुर्याद्दिशो दिग्देवता अपि ।

ब्रह्मणेऽग्नये पृथिव्यै औषधिभ्यस्तथैव च ॥ ७.१०२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७०

"स्वयम्भूः…" से उपस्थान करके, "सूर्यस्य (आवृतम्)…" से प्रदक्षिणा करके दिशाओं और दिग्देवताओंको नमस्कार करे; ब्रह्मा, अग्नि, पृथिवी, ओषधियों,

अवतरणिका — पिछले श्लोक में 'अदृश्रमस्य' मन्त्र से सूर्योपस्थान और 'सं वर्चसा' मन्त्र द्वारा मुख-मार्जन की विधि बताई गई। अब साधक अपनी बाहरी शुद्धि के पश्चात सूर्य के दिव्य स्वरूप की प्रदक्षिणा कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और उसमें व्याप्त दिव्य शक्तियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है।

अन्वय और पदार्थ —

'स्वयम्भूः' इति (मन्त्रेण) उपस्थाय, 'सूर्यस्य (आवृतम्)' इति (मन्त्रेण) प्रदक्षिणां कुर्यात्, (ततः) दिशाः दिग्देवताः अपि (नमस्कुर्यात्)। (तथा) ब्रह्मणे, अग्नये, पृथिव्यै, औषधिभ्यः तथैव च (नमस्कुर्यात्)।

पदार्थ-निर्वाचन:

• स्वयम्भूः: यह उपस्थान मन्त्र का प्रतीक शब्द है। 'स्वयम्भू' का अर्थ है जो स्वयं से उत्पन्न है, जो किसी अन्य कारण का आश्रित नहीं है। यह उस परम सत्ता का बोध कराता है जो सृष्टि का मूल कारण है।

• सूर्यस्य (आवृतम्): यह प्रदक्षिणा मन्त्र का संकेत है। 'आवृतम्' का अर्थ है चारों ओर से घिरा हुआ या आवृत्त। सूर्य के चारों ओर घूमना वास्तव में उस केंद्र के चारों ओर जीवन को व्यवस्थित करना है।

• प्रदक्षिणा: आराध्य के चारों ओर दाहिने हाथ की ओर से घूमना। यह इस भाव का प्रतीक है कि ईश्वर ही हमारे जीवन का केंद्र है और समस्त गतिविधियाँ उसी के इर्द-गिर्द घूमती हैं।

• दिशो दिग्देवता अपि: दसों दिशाएँ और उनमें प्रतिष्ठित अधिष्ठातृ देवता।

• ब्रह्मणे, अग्नये, पृथिव्यै, औषधिभ्यः: सृष्टि के चार आधार—ब्रह्मा (सृजन), अग्नि (ऊर्जा/रूपांतरण), पृथ्वी (आधार/धैर्य) और औषधियाँ (आरोग्य/पोषण)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को स्थूल क्रिया से सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाता है। मुख-मार्जन के बाद साधक पुनः 'स्वयम्भूः' मन्त्र से उपस्थान करता है। यहाँ 'स्वयम्भू' का स्मरण साधक को यह अनुभव कराता है कि जिस सूर्य को वह बाहर देख रहा है, वही आत्म-प्रकाशक सत्ता उसके भीतर भी विद्यमान है। यह उपस्थान केवल शारीरिक उपस्थिति नहीं, बल्कि अपनी सीमित पहचान को उस 'स्वयंभू' सत्ता में विलीन करने का प्रयास है।

तत्पश्चात 'सूर्यस्य' प्रतीक वाले मन्त्र से प्रदक्षिणा की विधि है। प्रदक्षिणा का बाहरी अर्थ सूर्य के चारों ओर घूमना है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ है—अपने चित्त की चंचलता को रोककर उसे एक केंद्र (सूर्य/आत्मा) पर स्थिर करना। जब साधक सूर्य को केंद्र मानकर प्रदक्षिणा करता है, तो वह वास्तव में यह स्वीकार करता है कि सम्पूर्ण चराचर जगत उसी एक प्रकाश-पुंज का विस्तार है।

इसके बाद साधक दिशाओं और दिग्देवताओं को नमस्कार करता है। यह क्रिया साधक के व्यक्तित्व का विस्तार करती है। वह केवल एक शरीर नहीं रहता, बल्कि अपनी चेतना को दसों दिशाओं में फैलाकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के साथ एकाकार होता है। ब्रह्मा, अग्नि, पृथ्वी और औषधियों को दिया गया नमस्कार इस सत्य का बोध है कि हमारा अस्तित्व इन तत्वों के सहयोग से है। ब्रह्मा सृजन शक्ति हैं, अग्नि वह तेज है जिससे विचार प्रदीप्त होते हैं, पृथ्वी वह स्थिरता है जिस पर जीवन टिका है, और औषधियाँ वह प्रकृति-शक्ति हैं जो शरीर और मन का पोषण करती हैं। इस प्रकार, यह विधि साधक को 'अहं' (मैं) से निकालकर 'सर्वम्' (सब कुछ) के भाव में प्रतिष्ठित करती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'केंद्रण' और 'विस्तार' का अभ्यास है। प्रदक्षिणा 'केंद्रण' है—जहाँ साधक अपनी बिखरी हुई ऊर्जा को सूर्य रूपी केंद्र पर लाकर एकाग्र करता है। दिशाओं और तत्वों (ब्रह्मा, अग्नि आदि) का नमस्कार 'विस्तार' है—जहाँ वह उसी एकाग्र ऊर्जा को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रसारित करता है।

साधक यहाँ इस अनुभव से गुजरता है कि जो प्रकाश सूर्य में है, वही तेज अग्नि में है, वही स्थिरता पृथ्वी में है और वही चेतना ब्रह्मा में है। प्रदक्षिणा के समय जब साधक का शरीर घूमता है, तब उसका मन उस केंद्र बिंदु पर स्थिर होने का अभ्यास करता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल देह' की सीमा से निकालकर 'विराट स्वरूप' के अनुभव की ओर ले जाता है, जिससे वह अपनी व्यक्तिगत पहचान को विराट सत्ता में विलीन करने की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ७.१०३

वाचि(चे च) वाचस्पतये विष्णवे महते तथा ॥

एताभ्यो देवताभ्यश्च नमस्कारादि वै जलम् ॥ ७.१०३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७०

वाणी, वाचस्पति और महान् विष्णुको — इन देवताओंको नमस्कार आदिके साथ जल —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक ने दिशाओं, दिग्देवताओं, ब्रह्मा, अग्नि, पृथ्वी और औषधियों को जल अर्पित कर उनका अभिवादन किया। अब इस क्रम को पूर्ण करते हुए वह सृष्टि की अभिव्यक्ति के मूल आधार—वाणी और उसके अधिष्ठाता तथा सर्वव्यापी परमात्मा को अर्घ्य समर्पित करता है।

अन्वय और पदार्थ —

(नमस्कुर्यात्) वाचि, वाचस्पतये, विष्णवे महते तथा (नमस्कुर्यात्)। एताभ्यो देवताभ्यः च नमस्कारादि वै जलम् (दद्यात्)।

पदार्थ-निर्वाचन:

• वाचि: 'वाच्' (वाणी) के लिए। यहाँ वाणी केवल बोलने का साधन नहीं, अपितु वह शक्ति है जिससे सृष्टि का प्रकटीकरण हुआ।

• वाचस्पतये: वाणी के स्वामी (वाचस्पति) के लिए। वह चेतना जो वाणी को नियंत्रित करती है और उसे अर्थ प्रदान करती है।

• विष्णवे महते: 'महान् विष्णु' के लिए। 'महते' शब्द यहाँ विष्णु के उस विराट स्वरूप को दर्शाता है जो समस्त चराचर जगत में व्याप्त है और सबको धारण किए हुए है।

• नमस्कारादि वै जलम्: नमस्कार और अन्य श्रद्धा-पूर्ण क्रियाओं के साथ जल का अर्पण। यहाँ जल केवल भौतिक द्रव्य नहीं, अपितु समर्पण और शुद्धि का प्रतीक है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि साधक को उन सूक्ष्म शक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना सिखा रहे हैं, जिनके बिना ज्ञान और मोक्ष संभव नहीं है। पिछले श्लोक में स्थूल तत्वों (पृथ्वी, अग्नि आदि) की पूजा हुई, अब यह क्रम सूक्ष्म की ओर बढ़ रहा है।

सबसे पहले 'वाक्' (वाणी) को जल दिया जाता है। वेद कहते हैं कि वाणी ही ब्रह्म है। साधक जब वाणी को नमस्कार करता है, तो वह वास्तव में उस शक्ति को प्रणाम करता है जिसके माध्यम से वह मन्त्रों का जप करता है। उसके पश्चात 'वाचस्पति' का अर्चन है। वाणी यदि शरीर है, तो वाचस्पति उसकी आत्मा हैं। वाणी का सही उपयोग, उसका संयम और उसकी पवित्रता वाचस्पति की कृपा से ही संभव है।

अंत में 'विष्णवे महते' अर्थात् महान् विष्णु को जल समर्पित किया जाता है। यहाँ विष्णु का अर्थ उस सर्वव्यापी पुरुष से है जो 'महान्' है—अर्थात् जिसकी कोई सीमा नहीं है। यह वही जनार्दन हैं जिन्हें पिछले श्लोकों (७.९८-९९) में पूज्यतम बताया गया। इस प्रकार, यह जल-अर्पण एक क्रम है: पहले अभिव्यक्ति (वाक्), फिर नियंत्रण (वाचस्पति) और अंत में पूर्णता (विष्णु)।

बाहरी विधि में यह केवल जल देना है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपनी वाणी को पवित्र कर उसे ईश्वरीय इच्छा के अधीन कर रहा है। जब वह 'नमस्कारादि जलम्' कहता है, तो वह अपने अहंकार को जल की भाँति प्रवाहित कर परमात्मा के चरणों में विसर्जित कर देता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्-शुद्धि' और 'समर्पण' का अभ्यास है। साधक जब वाक् और वाचस्पति का ध्यान करता है, तो वह अपनी जिह्वा और मन के बीच के सम्बन्ध को जाग्रत करता है। अभ्यास यह है कि जप के समय वाणी केवल शब्द न बोले, अपितु वह वाचस्पति (चेतना) के नियंत्रण में रहे।

'महान् विष्णु' का ध्यान साधक को अपनी सीमित देह-चेतना से उठाकर 'विराट' चेतना में प्रतिष्ठित करता है। जल का अर्पण यहाँ 'अहंकार के विसर्जन' का प्रतीक है। साधक अनुभव करता है कि उसकी वाणी, उसका ज्ञान और उसका अस्तित्व उसी महान् विष्णु का अंश है। इस अभ्यास से साधक 'स्थूल-पूजा' की भूमि से उठकर 'सूक्ष्म-साक्षात्कार' की भूमि की ओर अग्रसर होता है, जहाँ वह स्वयं को उस विराट पुरुष में विलीन करने का प्रयास करता है।

श्लोक ७.१०४

दत्वा नमस्येत् क्रमशस्त्वन्ते वै सर्वकर्मणाम् ।

नमोऽद्भ्यो नमोऽपांपतये वरुणाय नमो नमः ॥ ७.१०४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७०

— देकर, सब कर्मोंके अन्तमें क्रमसे नमस्कार करे: "जलको नमस्कार, जलोंके स्वामी वरुणको नमस्कार, नमस्कार" —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक ने वाणी, वाचस्पति और महान् विष्णु को जल अर्पित कर अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। अब इस जल-दान की प्रक्रिया को पूर्ण करते हुए, वह समस्त जलीय तत्त्वों और उनके अधिष्ठाता के प्रति समर्पण भाव प्रकट करता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) क्रमशस्त्वन्ते वै सर्वकर्मणाम् (जलम्) दत्वा नमस्येत् — नमोऽद्भ्यः, नमोऽपांपतये, वरुणाय नमो नमः।

पदार्थ-निर्वाचन:

• क्रमशस्त्वन्ते वै सर्वकर्मणाम्: समस्त कर्मों (यहाँ स्नान और अर्चन के विभिन्न चरणों) के अंत में, एक निश्चित क्रम के अनुसार।

• दत्वा नमस्येत्: (जल) अर्पित करने के पश्चात नमस्कार करे। यहाँ 'दत्वा' क्रिया जल-दान की है और 'नमस्येत्' मानसिक एवं शारीरिक समर्पण की।

• नमोऽद्भ्यः: 'अप्' (जल) के लिए नमस्कार। यहाँ 'अप्' बहुवचन में है, जो जल के विभिन्न रूपों (नदी, समुद्र, ओस, शरीर के भीतर का रस) का संकेत है।

• नमोऽपांपतये: जलों के स्वामी (अपपति) को नमस्कार।

• वरुणाय नमो नमः: वरुण देव को बार-बार नमस्कार। 'नमो नमः' की पुनरावृत्ति गहन श्रद्धा और पूर्ण समर्पण को दर्शाती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि बाहरी शुद्धि के कर्मों को एक आध्यात्मिक पूर्णता प्रदान कर रहे हैं। जब साधक दिशाओं, दिग्देवताओं और विराट पुरुष का अर्चन कर लेता है, तब वह अंत में उस माध्यम को प्रणाम करता है जिसके बिना यह समस्त शुद्धि संभव नहीं थी—अर्थात जल।

यहाँ 'सर्वकर्मणाम्' शब्द का अर्थ केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं, अपितु उस पूरी प्रक्रिया से है जो 'हंसः शुचिषत्' ऋचा से आरम्भ होकर अब तक चली आई। जल केवल एक भौतिक द्रव्य नहीं है, बल्कि यह चेतना का वह तरल रूप है जो मल को धोता है और प्राण को पुष्ट करता है। जब साधक कहता है "नमोऽद्भ्यः", तब वह केवल बाहरी जल को नहीं, अपितु अपने शरीर के भीतर प्रवाहित होने वाले रस और प्राण-जल को भी नमन करता है।

तदुपरांत, वह 'अपपति' और 'वरुण' को नमस्कार करता है। वरुण केवल समुद्र के देवता नहीं हैं, अपितु वे 'ऋत' (ब्रह्मांडीय नियम) के रक्षक हैं। जल का स्वामी होने के कारण वे साधक की आंतरिक और बाहरी शुद्धि के नियामक हैं। जल देना (दत्वा) एक त्याग है, और नमस्कार करना (नमस्येत्) एक स्वीकार है। जब साधक जल अर्पित कर वरुण को नमन करता है, तो वह वास्तव में अपने अहंकार को उस विराट जल-तत्त्व में विसर्जित कर रहा होता है, ताकि वह पूर्णतः निर्मल होकर अगले चरण (निरञ्जन ध्यान) में प्रवेश कर सके।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'त्याग' और 'विश्रांति' का अभ्यास है। साधक ने अब तक अनेक देवताओं का आवाहन और अर्चन किया, जिसमें एक सक्रियता थी। अब 'सर्वकर्मणाम्' के अंत में यह नमस्कार उसे स्थिरता की ओर ले जाता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि शरीर का स्थूल जल (स्नान का जल) और सूक्ष्म जल (हृदय का रस) एक ही वरुण-तत्त्व के अधीन हैं। 'नमो नमः' का जप करते हुए वह अपने मन को जल की भाँति शांत और पारदर्शी बनाने का अभ्यास करता है। यह अभ्यास साधक को 'क्रिया' से 'भाव' की ओर ले जाता है। जब वह जल को समर्पित कर वरुण को नमन करता है, तो वह अपनी चेतना को बाहरी जगत से समेटकर अंतर्मुखी होने की तैयारी करता है। यह स्थिति उसे उस 'निरञ्जन' (अलिप्त) अवस्था के लिए तैयार करती है, जिसका उल्लेख अगले श्लोक में आने वाला है। यहाँ साधक 'साधन' (जल और मन्त्र) को उनके मूल स्रोत (वरुण/परमात्मा) में विलीन कर स्वयं को शून्य करने का प्रयास करता है।

श्लोक ७.१०५

इत्युक्त्वापो नमस्कृत्यावनौ देवांश्च नामतः ।

इदमापः प्रवहता(त) धाम्नो धाम्नस्तथैव च ॥ ७.१०५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७१

यह कहकर जलको और (फिर) भूमिपर देवताओंको नाम लेकर नमस्कार करे; "इदमापः प्रवहत…" और "धाम्नो धाम्नः…" (मन्त्रोंसे) —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक ने जल के अधिष्ठाता वरुण देव और समस्त जलीय तत्त्वों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। अब वह इस समर्पण को मन्त्रों के माध्यम से क्रियान्वित करते हुए जल और पृथ्वी के सूक्ष्म सम्बन्धों को जाग्रत करता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) इत्युक्त्वा आपो नमस्कृत्य अवनौ देवांश्च नामतः (नमस्कुर्यात्) । (ततः) "इदमापः प्रवहता (प्रवहतु)" (इति) "धाम्नो धाम्नस्तथैव च" (इति मन्त्रौ जपेत्) ।

पदार्थ-निर्वाचन:

• इत्युक्त्वा: 'इति' का अर्थ है पूर्वोक्त वचनों (नमोऽद्भ्यः...) के बाद। अर्थात् जब वरुण देव और जल को नमस्कार करने के शब्द पूर्ण हो जाएँ।

• आपो नमस्कृत्य: जल को प्रणाम करके। यहाँ जल केवल द्रव्य नहीं, अपितु 'आपः' (बहुवचन) के रूप में समस्त जीवन-रस का प्रतीक है।

• अवनौ देवांश्च नामतः: 'अवनौ' का अर्थ है दोनों भूमियों (पृथ्वी और पाताल/अधोलोक) में स्थित देवताओं को। 'नामतः' का अर्थ है उनके विशिष्ट नामों का स्मरण करते हुए।

• इदमापः प्रवहता: यह इस मन्त्र का आरम्भिक अंश है। इसका शाब्दिक अर्थ है— "हे जल! तुम इसे प्रवाहित करो (ले जाओ)।" यह मन्त्र जल के माध्यम से अशुद्धियों के विसर्जन का संकेत है।

• धाम्नो धाम्नः: यह दूसरे मन्त्र का प्रतीक है। 'धामन्' का अर्थ है प्रकाश, निवास या शरीर। इसका भाव है— "एक प्रकाश-पुंज से दूसरे प्रकाश-पुंज तक" या "एक शरीर से दूसरे शरीर (दिव्य देह) तक" का संक्रमण।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य बाहरी स्नान की विधि को 'ब्रह्म-स्नान' में परिवर्तित कर रहे हैं। जब साधक वरुण देव को नमस्कार कर लेता है, तब वह जल और पृथ्वी (अवनौ) के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखता है। यहाँ 'अवनौ' शब्द महत्वपूर्ण है; यह संकेत देता है कि शुद्धि केवल त्वचा की नहीं, अपितु उस आधार की भी होनी चाहिए जिस पर हम खड़े हैं और जो हमारे भीतर गहरे स्तरों (पाताल/अचेतन) में व्याप्त है।

इसके पश्चात दो विशिष्ट मन्त्रों का विधान है। प्रथम मन्त्र 'इदमापः प्रवहता' का प्रयोग जल को यह आदेश या प्रार्थना देने के लिए किया जाता है कि वह साधक के समस्त मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक मल को अपने साथ बहा ले जाए। यह केवल शरीर के मैल का विसर्जन नहीं, अपितु 'पाप' और 'तमस' का विसर्जन है।

द्वितीय मन्त्र 'धाम्नो धाम्नः' का रहस्य अत्यंत गहरा है। 'धामन्' का अर्थ ज्योति या शरीर दोनों होता है। बाहरी दृष्टि से यह जल के प्रवाह को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने का मन्त्र है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह साधक की चेतना को स्थूल शरीर (एक धाम) से सूक्ष्म शरीर (दूसरे धाम) की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। जब साधक जल के स्पर्श और मन्त्र के नाद को मिलाता है, तब वह अनुभव करता है कि उसकी चेतना भौतिक सीमाओं को छोड़कर दिव्य ज्योति में विलीन हो रही है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'विसर्जन' और 'संक्रमण' का अभ्यास है। साधक जब 'इदमापः प्रवहता' का जप करता है, तो वह अपने भीतर के समस्त अवरोधों और अशुद्धियों को जल-तत्त्व में विसर्जित करने का मानसिक संकल्प करता है। यह 'त्याग' की वह भूमि है जहाँ साधक स्वयं को रिक्त करता है।

'धाम्नो धाम्नः' का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि वह केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं, अपितु एक 'धाम' (प्रकाश-पुंज) है। वह अपनी चेतना को शरीर के एक केंद्र से दूसरे केंद्र की ओर प्रवाहित करना सीखता है। इस अभ्यास से साधक स्थूल शुद्धि से सूक्ष्म शुद्धि की ओर बढ़ता है, जहाँ जल केवल शरीर को नहीं, बल्कि हृदय के दर्पण को स्वच्छ करता है ताकि उसमें सूर्य (परमात्मा) का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई दे सके।

तीर्थविमोचनमन्त्रः

श्लोक ७.१०६

एवं संपूज्य देवेशं क्षणं ध्यात्वा निरञ्जनम् ।

विमोचनार्थं तीर्थस्य आप्यायस्वेति वै जपेत् ॥ ७.१०६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७१

— इस प्रकार देवेश्वरकी पूजा करके, क्षणभर निरञ्जनका ध्यान करके, तीर्थको विदा करनेके लिए "आप्यायस्व…" जपे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक ने जल और पृथ्वी के देवताओं को मन्त्रों द्वारा अर्चन कर अपनी शुद्धि का संकल्प लिया। अब वह इस बाह्य क्रिया के समापन और आंतरिक स्थिरता के मिलन की ओर बढ़ता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) एवं देवेशं संपूज्य, क्षणं निरञ्जनं ध्यात्वा, तीर्थस्य विमोचनार्थं "आप्यायस्वेति" (इति मन्त्रं) वै जपेत् ।

पदार्थ-निर्वाचन:

• एवं संपूज्य देवेशं: इस प्रकार देवेश्वर (देवताओं के ईश्वर, अर्थात् परमात्मा या सूर्य-पुरुष) की पूजा समाप्त करके।

• क्षणं ध्यात्वा निरञ्जनम्: एक क्षण के लिए 'निरञ्जन' का ध्यान करके। 'निरञ्जन' वह है जो रंजित न हो—अर्थात् जो गुणों, राग-द्वेष और माया के रंगों से मुक्त, शुद्ध चैतन्य स्वरूप है।

• विमोचनार्थं तीर्थस्य: 'तीर्थ' का अर्थ यहाँ वह पवित्र जल है जिसमें स्नान किया गया। 'विमोचन' का अर्थ है मुक्त करना या विदा करना। जब साधक जल का उपयोग अपनी शुद्धि के लिए करता है, तो वह जल के साथ एक आध्यात्मिक सम्बन्ध बनाता है; स्नान के अंत में उस सम्बन्ध को ससम्मान विसर्जित करना ही 'तीर्थ-विमोचन' है।

• आप्यायस्वेति: यह मन्त्र का प्रतीक शब्द है। 'आप्यायस्व' का शाब्दिक अर्थ है— "तुम पूर्ण हो जाओ" या "तुम तृप्त हो जाओ"। यह जल-देवता को तृप्ति प्रदान करने और उनसे विदा लेने का मन्त्र है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य बाह्य कर्म और आंतरिक योग की संधि कराते हैं। अब तक साधक ने जल, वरुण, सूर्य और विभिन्न दिग्देवताओं की पूजा की, जो कि 'सगुण' और 'विधिक' प्रक्रिया थी। परन्तु इस पूरी प्रक्रिया का लक्ष्य केवल शरीर की शुद्धि नहीं, अपितु उस परम तत्त्व की प्राप्ति है जो इन समस्त देवताओं का आधार है।

अतः याज्ञवल्क्य निर्देश देते हैं कि समस्त पूजा के उपरान्त साधक 'निरञ्जन' का ध्यान करे। यह 'क्षण' का ध्यान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वह क्षण है जहाँ कर्म (पूजा) समाप्त होता है और ज्ञान (ध्यान) आरम्भ होता है। यहाँ देवेश्वर की पूजा के बाद निरञ्जन का ध्यान यह दर्शाता है कि साधक अब साकार से निराकार की ओर, और दृश्य से अदृश्य की ओर मुड़ रहा है।

इसके पश्चात 'आप्यायस्वेति' मन्त्र का जप किया जाता है। बाह्य दृष्टि से यह जल को विदा करने की विधि है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह 'तृप्ति' का भाव है। जब साधक स्वयं भीतर से पूर्ण (तृप्त) होता है, तभी वह बाह्य जगत के तत्त्वों को पूर्णता के साथ विसर्जित कर सकता है। यह मन्त्र इस बात का प्रतीक है कि साधक ने जल से जो ऊर्जा और शुद्धि ग्रहण की, वह अब उसे पूर्णता के साथ लौटा रहा है, ताकि प्रकृति का चक्र बना रहे।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म' से 'समाधि' की ओर एक लघु छलांग है। पूरी स्नान-विधि एक विस्तृत और लम्बी प्रक्रिया थी—उपस्थान, प्रदक्षिणा, नमस्कार और मन्त्र जप। यह सब 'चित्त-वृत्ति' को एकाग्र करने की तैयारी थी। अंत में जो "क्षणं ध्यात्वा निरञ्जनम्" कहा गया है, वह इस पूरी साधना का सार है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह लम्बी विधिक क्रियाओं के बीच में या उनके अंत में एक क्षण के लिए पूर्णतः शून्य और रंगहीन (निरञ्जन) हो जाए। यह 'क्षण' ही वह बिंदु है जहाँ साधक अनुभव करता है कि पूजा करने वाला, जिसकी पूजा की गई और जिस माध्यम (जल) से पूजा हुई—ये तीनों वास्तव में एक ही निरञ्जन चैतन्य के विभिन्न रूप हैं।

यह अभ्यास साधक को 'क्रिया-भूमि' से 'अनुभव-भूमि' में ले जाता है। यदि साधक बिना निरञ्जन के ध्यान के केवल मन्त्र जपता है, तो वह केवल एक कर्मकाण्डी है; परन्तु जो उस एक क्षण में स्वयं को निरञ्जन में लीन कर लेता है, वह योगी बन जाता है। यहाँ 'विमोचन' केवल तीर्थ का नहीं, अपितु साधक का स्वयं के अहंकार और बाह्य आसक्तियों से विमोचन है। वह इस अनुभव के साथ जल से बाहर निकलता है कि वह अब केवल शरीर नहीं, अपितु वह निरञ्जन तत्व है जो शुद्ध और तृप्त है।

अर्घ्यनिवेदनम्, तीर्थदेशप्रक्षालनम्, गृहगमनादि च

श्लोक ७.१०७

देवा गातुविद इति कृत्वा जप्यनिवेदनम् ।

प्रक्षाल्य तीर्थदेशं तु गत्वा स्वं कर्म आचरेत् ॥ ७.१०७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७१

"देवा गातुविदः…" से जपका निवेदन करके, तीर्थस्थानको धोकर, (घर) जाकर अपना कर्म करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक ने निरञ्जन का ध्यान कर 'आप्यायस्व' मन्त्र से तीर्थ-विमोचन किया, जिससे जल के साथ उसका आध्यात्मिक सम्बन्ध ससम्मान विसर्जित हुआ। अब वह इस पूरी स्नान-प्रक्रिया के अंतिम चरण में प्रवेश कर, अपनी साधना को कर्म की ओर मोड़ता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) "देवा गातुविदः" (इति मन्त्रं) कृत्वा, (मन्त्रस्य) जप्य-निवेदनं (कुर्यात्) । तीर्थदेशं तु प्रक्षाल्य, (गृहम) गत्वा स्वं कर्म आचरेत् ।

पदार्थ-निर्वाचन:

• देवा गातुविद इति कृत्वा: 'देवा गातुविदः' वह मन्त्र-प्रतीक है जिसका अर्थ है— "देवता मार्ग को जानने वाले हैं"। इस मन्त्र का उच्चारण कर साधक स्वीकार करता है कि वह स्वयं अज्ञानी है और देवताओं की कृपा से ही उसे सही मार्ग (साधना का पथ) प्राप्त होगा।

• जप्यनिवेदनम्: जप का निवेदन। यहाँ 'जप्य' का अर्थ है वह मन्त्र जो जप के योग्य है। निवेदन का अर्थ है कि साधक ने जो जप या मानसिक संकल्प स्नान के समय किया, उसका फल स्वयं के अहंकार के लिए नहीं, अपितु इष्टदेवों को समर्पित कर दे।

• प्रक्षाल्य तीर्थदेशं: तीर्थस्थान (स्नान के स्थान) को धोकर। यह बाह्य शुद्धि की मर्यादा है कि जहाँ पवित्र क्रिया संपन्न हुई, वह स्थान पुनः स्वच्छ किया जाए।

• गत्वा स्वं कर्म आचरेत्: (अपने गृह या आश्रम) जाकर अपने नियत कर्मों का आचरण करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान की संपूर्ण विधि का उपसंहार कर रहे हैं। यहाँ 'देवा गातुविदः' मन्त्र का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक समर्पण है। जब साधक कहता है कि "देवता मार्ग-विद (मार्ग जानने वाले) हैं", तब वह अपने 'अहम्' का विसर्जन करता है। योग का प्रथम सोपान ही यह है कि साधक यह अनुभव करे कि वह अब तक अंधकार में था और अब वह उस ज्योति (सूर्य-पुरुष) के मार्गदर्शन में है जो मार्ग का ज्ञाता है।

इसके पश्चात 'जप्य-निवेदन' की विधि आती है। सामान्यतः मनुष्य जप इसलिए करता है ताकि उसे कोई फल प्राप्त हो। परन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य योगीश्वर यह रहस्य खोल रहे हैं कि वास्तविक शुद्धि 'फल की इच्छा' के त्याग में है। स्नान के समय जो आंतरिक जप हुआ, उसका फल देवताओं को निवेदित करने का अर्थ है— अपनी साधना को 'अहंकार-मुक्त' करना। जब साधक फल का त्याग कर देता है, तभी वह वास्तव में 'शुद्ध' होता है।

अंत में, तीर्थस्थान को धोकर अपने कर्म की ओर प्रवृत्त होना यह दर्शाता है कि योग केवल एकांत या जल-क्रीड़ा नहीं है, अपितु योग का अर्थ है— शुद्ध होकर अपने कर्तव्य (स्वधर्म) में स्थित होना। बाह्य जल से शरीर धुला, मन्त्रों से चित्त धुला और निवेदन से अहंकार धुला; अब यह शुद्ध व्यक्तित्व संसार के कर्मों को करने के लिए तैयार है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'साधना के फल के विसर्जन' में है। योग मार्ग पर चलते हुए साधक अक्सर अपनी उपलब्धियों (अनुभूतियों) को पकड़ लेता है, जो एक नया सूक्ष्म बंधन बन जाता है। 'निवेदन' का अभ्यास साधक को इस बंधन से मुक्त करता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक जब भी कोई जप या ध्यान करे, तो उसके अंत में यह भाव लाए कि "यह क्रिया मेरी नहीं, उस परमात्मा की थी और इसका फल भी उसी को समर्पित है।" जब जप का फल अपने पास नहीं रखा जाता, तब वह फल 'देवताओं' (अर्थात् उच्च चेतना) में विलीन हो जाता है और साधक को 'अनासक्ति' की भूमि प्राप्त होती है।

तीर्थस्थान को धोना इस बात का प्रतीक है कि साधक अपनी साधना के स्थान (हृदय-कमल) को किसी भी प्रकार के मानसिक अवशेषों या स्मृतियों से मुक्त रखे, ताकि वह हर बार एक नवीन और शुद्ध चेतना के साथ अपने कर्मों में उतर सके। इस प्रकार साधक 'साधना' से 'कर्म' की भूमि पर इस प्रकार आता है कि उसका कर्म अब साधारण क्रिया नहीं, अपितु एक 'यज्ञ' बन जाता है।

स्नानविधेरावृत्तौ

श्लोक ७.१०८

उपस्थानादिर्यस्तासां मन्त्रवान् कीर्तितो विधिः ।

निवेदनान्तं तत् स्नानमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः ॥ ७.१०८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७१

उपस्थान आदि जो उन (जलों) की मन्त्रवाली विधि कही गयी, निवेदनतकका (वह सब) स्नान है — ऐसा ब्रह्मवादी कहते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में साधक ने देवताओं के अर्चन, निरञ्जन के ध्यान और 'आप्यायस्व' मन्त्र से तीर्थ-विमोचन की क्रिया संपन्न की। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस पूरी प्रक्रिया को एक परिभाषा दे रहे हैं कि वास्तव में 'स्नान' का विस्तार कहाँ तक है।

अन्वय और पदार्थ —

उपस्थानादिः यः तासां मन्त्रवान् विधिः कीर्तितः, (तस्य) निवेदनान्तं तत् स्नानम् इति आहुरब्रह्मवादिनः ।

पदार्थ-निर्वाचन:

• उपस्थानादिः: उपस्थान आदि। 'उपस्थान' का अर्थ है देवता के समीप स्थित होना या उनकी उपस्थिति में स्वयं को समर्पित करना। यहाँ यह स्नान की प्रक्रिया के आरम्भिक मन्त्रों और मानसिक स्थापना का संकेत है।

• तासां मन्त्रवान् विधिः: उन (जलों/देवताओं) की मन्त्रों से युक्त विधि। यहाँ 'तासां' शब्द जल के विभिन्न स्वरूपों और उनमें प्रतिष्ठित देवताओं के लिए प्रयुक्त है।

• निवेदनान्तं: निवेदन के अन्त तक। 'निवेदन' वह अंतिम क्रिया है जहाँ साधक अपनी साधना का फल ईश्वर को समर्पित कर विदा लेता है।

• ब्रह्मवादिनः: ब्रह्म को जानने वाले या ब्रह्म-विद्या के ज्ञाता। यहाँ इसका अर्थ उन ऋषियों से है जो बाह्य कर्मों के भीतर छिपे ब्रह्म-तत्त्व को देखते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'स्नान' शब्द की एक व्यापक और आध्यात्मिक परिभाषा प्रस्तुत कर रहे हैं। सामान्य दृष्टि में स्नान का अर्थ केवल शरीर पर जल डालना या जल में डुबकी लगाना होता है, किन्तु ब्रह्मवादियों की दृष्टि में यह एक संपूर्ण 'यज्ञ' है।

ऋषि स्पष्ट करते हैं कि उपस्थान (देवता के सम्मुख उपस्थित होना) से आरम्भ होकर, विभिन्न मन्त्रों के माध्यम से जल और देवताओं के अर्चन की जो विधि बताई गई है, और अंत में जो निवेदन किया गया है—यह संपूर्ण क्रम ही 'स्नान' कहलाता है। यह वाक्य पिछले कई श्लोकों (7.100 से 7.107) में वर्णित समस्त क्रियाओं को एक सूत्र में पिरोकर उसे 'स्नान' की संज्ञा देता है।

यहाँ 'ब्रह्मवादी' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। ब्रह्मवादी वह है जो स्थूल क्रिया में सूक्ष्म सत्य को खोजता है। उसके लिए जल केवल शरीर की शुद्धि का साधन नहीं, बल्कि चित्त की शुद्धि का माध्यम है। जब साधक मन्त्रों के साथ उपस्थान करता है, तब वह अपने भौतिक अस्तित्व को दैवीय चेतना के साथ जोड़ता है। जब वह निवेदन करता है, तब वह अपने 'कर्ता-भाव' को त्यागकर फल को परमात्मा को सौंप देता है। अतः, केवल जल का स्पर्श शरीर को स्वच्छ कर सकता है, किन्तु यह मन्त्र-बद्ध विधि आत्मा को स्वच्छ करती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'क्रिया' से 'संस्कार' की ओर ले जाता है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि कोई भी बाह्य क्रिया तब तक पूर्ण नहीं होती, जब तक वह एक निश्चित मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन (विधि) में न बंधी हो।

इस श्लोक से साधक का अभ्यास यह है कि वह स्नान को एक यांत्रिक क्रिया न मानकर उसे 'साधना' के रूप में देखे। उपस्थान से निवेदन तक की यह यात्रा वास्तव में 'अहं' से 'ब्रह्म' की यात्रा है:

१. उपस्थान: यह सजगता का आरम्भ है, जहाँ साधक अपने इष्ट के प्रति जागरूक होता है।

२. मन्त्र-विधि: यह मन के बिखराव को रोककर उसे एक बिंदु (एकाग्रता) पर लाने का अभ्यास है।

३. निवेदन: यह पूर्ण समर्पण (ईश्वरार्पण) की भूमि है।

साधक जब इस विधि का पालन करता है, तो वह केवल त्वचा की शुद्धि नहीं करता, बल्कि अपने प्राणों और मन के मलों का विसर्जन करता है। वह इस अनुभव से गुजरता है कि जिस प्रकार जल शरीर की गंदगी धोता है, उसी प्रकार यह मन्त्र-युक्त विधि उसके अंतःकरण के विकारों को धोकर उसे 'शुचि' (पवित्र) बनाती है। इस प्रकार वह स्थूल शुद्धि की भूमि से सूक्ष्म शुद्धि की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

परकीयजलाशयस्नाने कृत्यविशेषः

श्लोक ७.१०९

परकीयनिपानेषु यदि स्नायात् कदाचन ।

सप्त पिण्डान् समुद्धृत्य ततः स्नानं समाचरेत् ॥ ७.१०९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७१

यदि कभी परकीय (दूसरे के) जलाशय में स्नान करना हो, तो सात पिण्डों को निकालकर उसके बाद स्नान का आचरण करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान की उस व्यापक परिभाषा को स्पष्ट किया, जिसमें उपस्थान से लेकर निवेदन तक की समस्त मन्त्र-विधि सम्मिलित है। अब वे एक विशेष परिस्थिति का समाधान दे रहे हैं कि जब साधक अपने निजी या प्राकृतिक जलाशय के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा निर्मित जलाशय का उपयोग करे, तब शुद्धि का विधान क्या हो।

अन्वय और पदार्थ —

यदि कदाचन परकीय-निपानेषु स्नायात्, (तर्हि) सप्त पिण्डान् समुद्धृत्य ततः स्नानं समाचरेत् ।

पदार्थ-निर्वाचन:

• परकीय-निपानेषु: परकीय (दूसरे के) निपानेषु (जलाशयों में)। 'निपान' वह स्थान है जहाँ जल को संचित किया गया हो, जैसे तालाब, बावड़ी या कुण्ड।

• कदाचन: कभी। यह शब्द दर्शाता है कि पराये जलाशय में स्नान करना प्राथमिक विकल्प नहीं है, अपितु आवश्यकतावश किया जाने वाला कार्य है।

• सप्त पिण्डान्: सात पिण्डों को। यहाँ पिण्ड का अर्थ मिट्टी के छोटे गोलों से है। संख्या 'सात' का विशेष महत्व है, जो सप्त-द्वीप या सप्त-ऋषियों के प्रतीक स्वरूप सृष्टि के सात स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

• समुद्धृत्य: निकालकर। जल के तल से मिट्टी के पिण्डों को बाहर निकालना।

• समाचरेत्: आचरण करे या संपन्न करे। यह विधिलिङ् है, जो एक आवश्यक निर्देश देता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक व्यावहारिक और सूक्ष्म शोधन विधि का निर्देश दे रहे हैं। वैदिक परंपरा में जल केवल भौतिक द्रव्य नहीं, अपितु चेतना का संवाहक है। जब कोई व्यक्ति जलाशय का निर्माण करता है, तो उस स्थान की ऊर्जा और उस व्यक्ति के कर्मों का प्रभाव उस जल और उसकी तलहटी (मिट्टी) में समाहित हो जाता है। यदि वह जलाशय किसी अशुद्ध भावना या दोषपूर्ण कर्म से निर्मित हुआ हो, तो उसमें स्नान करने वाले साधक के सूक्ष्म शरीर पर उन दोषों का प्रभाव पड़ सकता है।

ऋषि कहते हैं कि यदि किसी कारणवश साधक को पराये जलाशय (परकीय-निपान) में स्नान करना पड़े, तो उसे सीधे जल में प्रवेश नहीं करना चाहिए। पहले उसे जल के तल से मिट्टी के सात पिण्ड निकालकर बाहर रखने चाहिए। यह क्रिया केवल एक भौतिक औपचारिकता नहीं है, अपितु एक 'शुद्धिकरण-संस्कार' है। मिट्टी के सात पिण्डों को बाहर निकालने का अर्थ है—उस स्थान के संचित दोषों, मलिनताओं और परकीय कर्म-बंधनों को प्रतीकात्मक रूप से विसर्जित करना, ताकि साधक एक निष्पक्ष और शुद्ध जल-तत्व के संपर्क में आ सके।

यहाँ 'सात' की संख्या का रहस्य यह है कि जिस प्रकार शरीर के सात कोश या सृष्टि के सात तल होते हैं, उसी प्रकार सात पिण्डों का निष्कासन साधक के भीतर के सात स्तरों की शुद्धि का संकेत है। जब साधक इन पिण्डों को बाहर निकाल देता है, तब वह उस जलाशय के साथ अपने कर्म-संबंध को विच्छेद कर देता है और केवल जल की दैवीय शक्ति (वरुण तत्त्व) से जुड़ता है। इसके पश्चात ही स्नान का आचरण करना श्रेयस्कर है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

परकीयनिपानेषु न स्नायाद्धि कदाचन । निपानकर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥ ४.२०१ ॥

दूसरेके (बनवाये) जलाशयोंमें कभी स्नान न करे; (वहाँ) स्नान करके (मनुष्य) जलाशय बनानेवालेके पापके अंशसे लिप्त होता है।

मनुस्मृति ४.२०१मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 622

मनुस्मृति में इस विषय पर अधिक कठोर दृष्टिकोण मिलता है, जहाँ परकीय जलाशयों में स्नान का निषेध किया गया है क्योंकि वहाँ स्नान करने वाला जलाशय-निर्माता के पाप-अंश से लिप्त हो जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों का लक्ष्य साधक की सूक्ष्म शुद्धि को सुरक्षित रखना है। जहाँ मनुस्मृति निषेध के माध्यम से सुरक्षा बताती है, वहीं महर्षि याज्ञवल्क्य 'सप्त-पिण्ड' निकालने की विधि बताकर एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करते हैं जिससे अपरिहार्य परिस्थिति में भी साधक अपनी शुद्धि बनाए रख सके। यह विधि निषेध को समाधान में बदल देती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह क्रिया 'संस्कार-शोधन' का अभ्यास है। साधक जब पराये जलाशय में प्रवेश करता है, तो वह अनजाने में दूसरों के मानसिक संस्कारों के संपर्क में आता है। सात पिण्डों को निकालना इस बात का अभ्यास है कि साधक अपने परिवेश की नकारात्मकता या परकीय प्रभाव को अपने भीतर आत्मसात न करे, बल्कि उसे तटस्थ होकर बाहर निकाल दे।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी जगत की मलिनता को हटाकर ही आन्तरिक शुद्धि संभव है। यह क्रिया उसे 'अनासक्ति' की भूमि पर ले जाती है—जहाँ वह संसार के संसाधनों का उपयोग तो करता है, किन्तु उनके साथ आने वाले कर्म-दोषों से स्वयं को मुक्त रखना जानता है। यह अभ्यास साधक को मानसिक रूप से सजग करता है कि वह केवल जल (तत्व) का आश्रय ले, न कि उस स्थान के साथ जुड़े किसी व्यक्ति के अहंकार या दोष का।

श्लोक ७.११०

अनुद्धृत्य तु यः स्नायात् परकीयजलाशये ।

वृथा भवति तत् स्नानं कर्तुः पापेन लिप्यते ॥ ७.११० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७१

किन्तु जो परकीय जलाशय में (पिण्डों को) बिना निकालकर स्नान करता है, ऐसा स्नान करने वाले के लिए व्यर्थ होता है और वह पाप से लिप्त होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने परकीय जलाशय में स्नान के समय सात पिण्डों को निकालने की विधि बताई थी। वर्तमान श्लोक में वे उसी विधि के उल्लंघन का परिणाम बताते हुए इस क्रिया की अनिवार्यता को सिद्ध कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

किन्तु यः परकीयजलाशये अनुद्धृत्य (पिण्डान्) स्नायात्, तत् स्नानं वृथा भवति, (तथा) (सः) कर्तुः पापेन लिप्यते ।

पदार्थ-निर्वाचन:

• अनुद्धृत्य: बिना निकाले। 'उद्धृत्य' (निकालकर) के साथ 'अन्' निषेधवाचक उपसर्ग है, जो विधि के अभाव को दर्शाता है।

• परकीयजलाशये: दूसरे के स्वामित्व वाले जलाशय में।

• वृथा: व्यर्थ, निष्फल। यहाँ फल का अर्थ केवल भौतिक शुद्धि नहीं, अपितु आध्यात्मिक शुद्धि और मन्त्रों के प्रभाव से है।

• कर्तुः: बनाने वाले का। यहाँ 'कर्तु' शब्द जलाशय के निर्माणकर्ता (निपानकर्तु) के लिए प्रयुक्त हुआ है।

• पापेन लिप्यते: पाप से लिप्त हो जाता है। 'लिप्त' होने का अर्थ है—अदृश्य संस्कारों का संक्रमण होना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य चेतावनी दे रहे हैं कि यदि कोई साधक पराये जलाशय में स्नान करते समय पूर्व-निर्धारित 'सप्त पिण्ड' निकालने की विधि का पालन नहीं करता, तो वह स्नान आध्यात्मिक दृष्टि से निष्फल हो जाता है।

यहाँ रहस्य यह है कि जल केवल एक तरल पदार्थ नहीं है, वह सूक्ष्म स्पंदनों और संस्कारों को धारण करने वाला माध्यम है। जब कोई व्यक्ति जलाशय का निर्माण करता है, तो उसके संकल्प, उसकी मानसिक अवस्था और उसके द्वारा किए गए कर्मों के संस्कार उस जलाशय की मिट्टी और जल में गहरे अंकित हो जाते हैं। यदि निर्माणकर्ता के कर्म अशुद्ध रहे हों, तो वह जलाशय एक प्रकार के 'कर्म-संचय' का केंद्र बन जाता है।

जब साधक बिना पिण्ड निकाले उस जल में प्रवेश करता है, तो वह अनजाने में उस निर्माणकर्ता के नकारात्मक संस्कारों (पाप) के संपर्क में आता है। 'लिप्त' होने का भाव यह है कि जैसे गीले वस्त्र पर धूल चिपक जाती है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर पर पराये अशुद्ध संस्कार आरोपित हो जाते हैं। अतः, वह स्नान शरीर को तो धो सकता है, किन्तु अंतःकरण की शुद्धि नहीं कर पाता, इसलिए उसे 'वृथा' कहा गया है। सात पिण्डों को बाहर निकालना वास्तव में उस स्थान के कर्म-बंधनों को विच्छेद करने और जल को साधक के लिए तटस्थ बनाने की एक प्रतीकात्मक और तांत्रिक प्रक्रिया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

परकीयनिपानेषु न स्नायाद्धि कदाचन । निपानकर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥ ४.२०१ ॥

दूसरेके (बनवाये) जलाशयोंमें कभी स्नान न करे; (वहाँ) स्नान करके (मनुष्य) जलाशय बनानेवालेके पापके अंशसे लिप्त होता है।

मनुस्मृति ४.२०१मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 622

मनुस्मृति में इस विषय पर अधिक कठोर निषेध मिलता है कि परकीय जलाशयों में कदापि स्नान नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से मनुष्य जलाशय बनाने वाले के पाप-अंश से लिप्त हो जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति का भाव एक ही है—परकीय जलाशय के संस्कारों का संक्रमण। भेद केवल इतना है कि जहाँ मनुस्मृति पूर्ण निषेध की ओर संकेत करती है, वहीं महर्षि याज्ञवल्क्य 'सप्त पिण्ड' निकालने की एक शोधन-विधि बताकर उस निषेध का समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे बताते हैं कि यदि विधिपूर्वक शोधन किया जाए, तो परकीय जलाशय का उपयोग भी संभव है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार-संक्रमण' के सिद्धांत को समझाता है। साधक के लिए बाहरी वातावरण की ऊर्जा का प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म और गहरा होता है। जिस प्रकार योग में 'संगत' (कुसंग और सत्संग) का महत्व है, उसी प्रकार भौतिक तत्वों (जल, वायु, मिट्टी) के साथ हमारा संपर्क भी हमारे चित्त की वृत्तियों को प्रभावित करता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि शुद्धि केवल जल के स्पर्श से नहीं, अपितु 'संस्कारों के विलोपन' से होती है। बिना विधि के स्नान करना केवल शरीर की क्रिया है, किन्तु विधिपूर्वक (पिण्ड निकालकर) स्नान करना एक 'शोधन-अभ्यास' है। यह अभ्यास साधक को सचेत करता है कि वह अपने परिवेश के प्रति सजग रहे और किसी भी बाहरी ऊर्जा को अपने अंतःकरण में प्रवेश देने से पूर्व उसे शुद्ध या तटस्थ करना आवश्यक है। यह क्रिया साधक को स्थूल जगत के बंधनों से मुक्त होकर सूक्ष्म शुद्धि की ओर ले जाती है।

सोपानत्कस्यापि शुचित्वम्

श्लोक ७.१११

स्रवन्त्यादिष्वथाचम्य सोपानत्को ह्यसंस्पृशन् ।

आगतः सोदपात्रस्तु यत्नेन शुचिरेव सः ॥ ७.१११ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७१

बहती (नदी) आदिमें आचमन करके, जूते पहने (भूमि आदिको) न छूता हुआ, जलपात्र लिये आया हुआ (द्विज) यत्नसे शुद्ध ही है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने परकीय जलाशय में स्नान की विशेष विधि और उसके उल्लंघन के दोष का वर्णन किया था। अब वे इस बात का निर्णय कर रहे हैं कि स्नान के पश्चात जलाशय से घर तक की यात्रा के दौरान शुद्धि को कैसे अक्षुण्ण रखा जाए।

अन्वय और पदार्थ —

स्रवन्त्यादिषु आचम्य, सोपानत् (भूमिम्) असंपृशन्, सोदपात्रः आगतः, (ततः) को ह्यसंस्पृशन् (अशुद्धं) आगतः, सः यत्नेन शुचिरेव सः।

पदार्थ-निर्वाचन:

• स्रवन्त्यादिषु: बहती हुई नदी आदि जलाशयों में। 'स्रवन्ती' वह जल है जो गतिमान है; गतिशीलता शुद्धि का लक्षण है।

• आचम्य: आचमन करके। जल का सेवन कर अंतःकरण और मुख की शुद्धि करना।

• सोपानत्: यहाँ 'सोपान' का अर्थ सीढ़ियों या उस मार्ग से है जो जलाशय और गृह के बीच है। 'सोपानत् असंपृशन्' का भाव है—भूमि या अशुद्ध स्थानों को स्पर्श न करते हुए (जूते पहनकर या सावधानी से)।

• सोदपात्रः: जलपात्र के सहित। वह पात्र जिसमें पवित्र जल संचित है।

• असंस्पृशन्: स्पर्श न करते हुए। यहाँ संदर्भ अशुद्ध वस्तुओं या व्यक्तियों के स्पर्श से बचने का है।

• यत्नेन: यत्नपूर्वक, सजगता के साथ।

• शुचिरेव: पूर्णतः शुद्ध ही है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान के उपरांत 'शुद्धि-रक्षण' की विधि बता रहे हैं। बाहरी स्नान के बाद जब साधक जलाशय से अपने निवास स्थान की ओर लौटता है, तो उस अंतराल में शुद्धि के नष्ट होने की प्रबल संभावना रहती है। इसलिए वे यहाँ तीन प्रमुख शर्तों का उल्लेख कर रहे हैं:

प्रथम, 'स्रवन्त्यादिषु आचम्य'—स्नान के अंत में बहते जल से आचमन करना अनिवार्य है। बहता जल चैतन्य और जीवंत होता है, वह शरीर के शेष मलिन संस्कारों को बहा ले जाता है। आचमन के द्वारा साधक उस पवित्रता को अपने भीतर उतारता है।

द्वितीय, 'सोपानत् असंपृशन्'—जलाशय से निकलते समय भूमि या अशुद्ध स्थानों के सीधे स्पर्श से बचना चाहिए। जूते पहनना यहाँ केवल एक भौतिक क्रिया नहीं, अपितु एक 'सीमा' का निर्धारण है। यह इस बात का प्रतीक है कि साधक ने जिस दिव्य शुद्धि को स्नान से प्राप्त किया है, वह उसे सांसारिक मलिनता (भूमि के स्थूल दोषों) से अलग रखना चाहता है।

तृतीय, 'सोदपात्रः'—हाथ में जलपात्र लेकर आना। यह पात्र केवल जल ले जाने का साधन नहीं है, बल्कि यह उस 'संस्कारित जल' का वाहक है जिसका उपयोग घर पहुँचकर प्रोक्षण और अन्य नित्य कर्मों में किया जाना है।

यदि कोई द्विज या साधक इन नियमों का पालन करते हुए, मार्ग में किसी अशुद्ध वस्तु या व्यक्ति का स्पर्श किए बिना (असंस्पृशन्) घर लौटता है, तो वह 'यत्नेन' अर्थात् सजगता के कारण शुद्ध बना रहता है। यहाँ 'यत्न' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; शुद्धि केवल जल से नहीं, अपितु उस शुद्धि को बनाए रखने के 'संकल्प' और 'जागरूकता' से बनी रहती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साधना के संरक्षण' का सूत्र है। स्नान 'शुद्धि' का प्रतीक है, और घर की ओर लौटना 'संसार की ओर वापसी' का। साधक अक्सर गहन ध्यान या साधना (स्नान) के बाद जब अपनी सामान्य दिनचर्या में लौटता है, तो बाहरी विक्षेपों के कारण अपनी मानसिक शांति और ऊर्जा खो देता है।

यहाँ 'सोपानत् असंपृशन्' होने का आन्तर अर्थ है—सांसारिक वृत्तियों और अशुद्ध विचारों के स्पर्श से बचना। जिस प्रकार साधक भौतिक भूमि को स्पर्श न करने का यत्न करता है, उसी प्रकार उसे अपने मन के स्तर पर 'अशुद्ध संस्कारों' के स्पर्श से बचना चाहिए। जलपात्र का साथ होना इस बात का संकेत है कि साधक ने अपनी साधना का 'सार' (अमृत) अपने भीतर संचित कर लिया है और अब वह उसे अपने जीवन के अन्य क्षेत्रों (गृह/कर्म) में वितरित करने जा रहा है।

यह अभ्यास साधक को 'सजगता' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह क्रिया करते हुए भी अपनी आंतरिक पवित्रता के प्रति सजग रहता है।

अभ्युक्षणे ग्राह्यवर्ज्यजलस्वरूपम्

श्लोक ७.११२

तेनोदकेन द्रव्याणि प्रोक्ष्याचम्य पुनर्गृहे ।

ततः कर्माणि कुर्वीत नित्यं वै यानि कानि चित् ॥ ७.११२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७२

उस जलसे घरमें द्रव्योंको प्रोक्षित करके, फिर आचमन करके, उसके बाद जो भी नित्य कर्म हों, उन्हें करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह बताया कि जलाशय से घर लौटते समय यदि साधक सावधानीपूर्वक, भूमि का स्पर्श न करते हुए और पवित्र जलपात्र के साथ आता है, तो वह शुद्ध ही रहता है। अब वे उस संचित पवित्र जल के उपयोग और उसके पश्चात नित्य कर्मों के आरम्भ की विधि का निर्णय कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

तेन उदकेन द्रव्याणि प्रोक्ष्य, आचम्य, पुनर्गृहे, ततः नित्यं वै यानि कानि चित् कर्माणि, तानि कुर्वीत।

पदार्थ-निर्वाचन:

• तेन उदकेन: उस जल से। यहाँ 'उस जल' का तात्पर्य पिछले श्लोक (७.१११) में वर्णित 'सोदपात्र' (पात्र में संचित) पवित्र जल से है, जिसे बहते जलाशय से लेकर आया गया है।

• द्रव्याणि प्रोक्ष्य: द्रव्यों का प्रोक्षण करके। प्रोक्षण का अर्थ है जल का छिड़काव करना। 'द्रव्य' यहाँ उन वस्तुओं, पूजन-सामग्रियों और उस स्थान को कहा गया है जहाँ बैठकर साधना की जानी है।

• आचम्य: आचमन करके। जल का सेवन कर स्वयं की आंतरिक शुद्धि करना।

• पुनर्गृहे: पुनः घर में (प्रवेश कर)।

• नित्यं वै यानि कानि चित् कर्माणि: जो भी नित्य कर्म हों। इसमें संध्यावंदन, अग्निहोत्र, जप और अन्य दैनिक आध्यात्मिक अभ्यास सम्मिलित हैं।

• कुर्वीत: करे या आचरण करे। यह विधिलिङ् लकार है, जो एक अनिवार्य अनुशासन का संकेत देता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य बाहरी शुद्धि (स्नान) और आंतरिक साधना (नित्य कर्म) के बीच की सेतु-विधि बता रहे हैं। स्नान के पश्चात जब साधक पवित्र जल लेकर घर लौटता है, तो वह जल केवल भौतिक जल नहीं, बल्कि जलाशय की चैतन्य शक्ति का संचित रूप होता है।

प्रथम चरण 'द्रव्याणि प्रोक्ष्य' है। घर में प्रवेश कर साधक सबसे पहले अपने पूजन-स्थान, आसन और पूजन-सामग्रियों पर उस पवित्र जल का छिड़काव करता है। इसका भाव यह है कि जिस प्रकार शरीर को स्नान से शुद्ध किया गया, उसी प्रकार जिस वातावरण और जिन उपकरणों के माध्यम से ईश्वर या अक्षर का साक्षात्कार होना है, उन्हें भी शुद्ध किया जाए। यह बाह्य शुद्धि का विस्तार है, ताकि साधक और साध्य के बीच कोई भी मलिनता शेष न रहे।

द्वितीय चरण 'आचम्य' है। प्रोक्षण के बाद साधक स्वयं आचमन करता है। यह क्रिया इस बात का संकेत है कि बाहरी शुद्धि (स्नान) और वातावरण की शुद्धि (प्रोक्षण) के बाद अब साधक अपनी चेतना को भीतर की ओर मोड़ रहा है। आचमन मुख और अंतःकरण की शुद्धि है, जो साधक को 'वाक्-शुद्धि' प्रदान करता है ताकि वह मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण कर सके।

इन दोनों क्रियाओं के पूर्ण होने पर 'ततः कर्माणि कुर्वीत'—अर्थात् तब वह अपने नित्य कर्मों में प्रवृत्त हो। यहाँ 'नित्य कर्म' केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि वह अनुशासन है जो साधक को प्रतिदिन स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाता है। याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि बिना प्रोक्षण और आचमन के, सीधे नित्य कर्मों में लगना अपूर्णता है; क्योंकि साधना के लिए 'शुद्ध देह' के साथ-साथ 'शुद्ध परिवेश' और 'शुद्ध अंतःकरण' का होना अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'बाह्य शुद्धि' से 'आंतरिक जागरण' की ओर संक्रमण का अभ्यास है। साधक जब जलाशय से जल लेकर आता है, तो वह वास्तव में अपनी सजगता को संचित कर लाता है।

घर में द्रव्यों का प्रोक्षण करना इस बात का अभ्यास है कि साधक अपने चारों ओर के वातावरण को अपनी चेतना से आलोकित करे। योगिक भाव यह है कि साधक जिस स्थान पर बैठता है, उस स्थान को अपनी संकल्प-शक्ति और पवित्र जल के माध्यम से एक 'ऊर्जा-क्षेत्र' में बदल दे।

इसके पश्चात आचमन करना, प्राणों को स्थिर करने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। यह साधक को इस भूमि से ऊपर उठाकर उस मानसिक अवस्था में लाता है जहाँ वह नित्य कर्मों (जप, ध्यान, उपासना) के लिए तैयार होता है। यह क्रिया साधक को 'बाह्य जगत' (जलाशय और मार्ग) से हटाकर 'साधना जगत' (गृह और आसन) में प्रतिष्ठित करती है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को 'स्थूल शुद्धि' से 'सूक्ष्म तैयारी' की भूमि पर ले जाता है, जिससे उसके नित्य कर्म केवल क्रिया न रहकर 'योग' बन जाते हैं।

श्लोक ७.११३

पात्रादिरहितं तोयमुद्धृतं सव्यपाणिना ।

न तेनाभ्युक्षणं कुर्याद्वस्त्रनिष्पीडनेन च ॥ ७.११३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७२

बिना पात्रके बायें हाथसे निकाला गया जल — उससे और वस्त्र निचोड़े जलसे अभ्युक्षण (छिड़काव) न करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने घर में प्रवेश कर पवित्र जल से प्रोक्षण करने और तत्पश्चात नित्य कर्मों के आरम्भ की विधि बताई। अब वे उस प्रोक्षण या अभ्युक्षण के लिए प्रयुक्त होने वाले जल की शुद्धता और उसकी मर्यादा का निर्णय कर रहे हैं कि किस प्रकार का जल अभ्युक्षण के योग्य नहीं है।

अन्वय और पदार्थ —

पात्रादिरहितं तोयम्, यत् सव्यपाणिना उद्धृतम्, तेन न अभ्युक्षणं कुर्यात्; वस्त्रनिष्पीडनेन (निस्पीडितं तोयम्) च (न अभ्युक्षणं कुर्यात्)।

पदार्थ-निर्वाचन:

• पात्रादिरहितं तोयम्: बिना पात्र आदि के जल। यहाँ 'पात्र' का अर्थ है वह पात्र जो जल की पवित्रता को सुरक्षित रखे।

• सव्यपाणिना: बायें हाथ से। 'सव्य' का अर्थ है बायाँ।

• उद्धृतं: निकाला गया या भरा गया।

• अभ्युक्षणं: जल का छिड़काव करना। प्रोक्षण के समान ही, किन्तु यहाँ शरीर या वस्त्रों पर पवित्रता के लिए जल छिड़कने की क्रिया है।

• कुर्यात्: करे। 'न' के साथ होने के कारण यह निषेध है—अर्थात् न करे।

• वस्त्रनिष्पीडनेन: वस्त्रों को निचोड़ने से। 'निष्पीडन' का अर्थ है दबाकर जल निकालना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य अभ्युक्षण के लिए प्रयुक्त जल की 'पात्रता' का निर्धारण कर रहे हैं। अभ्युक्षण एक ऐसी क्रिया है जिसका उद्देश्य अशुद्धि का निवारण और चैतन्य का आवाहन करना है, अतः इसमें प्रयुक्त जल का संचय और उसकी प्रकृति अत्यंत शुद्ध होनी चाहिए।

यहाँ दो प्रकार के जल के प्रयोग का निषेध किया गया है:

प्रथम, 'पात्रादिरहितं तोयमुद्धृतं सव्यपाणिना'। जो जल बिना किसी पात्र के केवल बायें हाथ की अंजुलि में भरकर निकाला गया हो, उससे अभ्युक्षण नहीं करना चाहिए। वैदिक परंपरा में दायाँ हाथ (सव्य का विपरीत) शुभ और क्रियात्मक माना गया है, जबकि बायाँ हाथ अपशौच और अन्य लौकिक कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है। जब जल को पात्र में लिया जाता है, तो वह पात्र उस जल की ऊर्जा को सीमित और संरक्षित रखता है। बिना पात्र के, विशेषकर बायें हाथ से लिया गया जल, वह सूक्ष्म पवित्रता धारण नहीं कर पाता जो अभ्युक्षण जैसी संस्कारात्मक क्रिया के लिए आवश्यक है।

द्वितीय, 'वस्त्रनिष्पीडनेन च'। वस्त्रों को निचोड़कर प्राप्त किए गए जल का प्रयोग अभ्युक्षण के लिए वर्जित है। वस्त्रों में पसीना, धूल और शरीर के अन्य मल संचित होते हैं। जब वस्त्र निचोड़े जाते हैं, तो वह जल केवल भौतिक रूप से गंदा नहीं होता, अपितु वह 'उच्छिष्ट' और 'अशुद्ध' श्रेणी में आता है। ऐसा जल शरीर या पूजन-सामग्री पर छिड़कने से शुद्धि के स्थान पर अशुद्धि का प्रसार होता है।

इस निषेध का भाव यह है कि साधक जिस जल से अपनी बाहरी और आंतरिक शुद्धि का संकल्प करता है, वह जल 'अविच्छिन्न' और 'असंस्पृष्ट' होना चाहिए।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'पात्र' केवल मिट्टी या धातु का बर्तन नहीं है, अपितु वह 'संयम' का प्रतीक है। जिस प्रकार बिना पात्र के जल बिखर जाता है, उसी प्रकार बिना संयम (पात्र) के साधक की प्राण-शक्ति बिखर जाती है। बायाँ हाथ यहाँ 'वाम-मार्ग' या उन प्रवृत्तियों का संकेत है जो साधक को भौतिकता की ओर खींचती हैं।

साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि साधना में प्रयुक्त होने वाला प्रत्येक साधन—चाहे वह जल हो, मन्त्र हो या श्वास—पूर्णतः शुद्ध और मर्यादित होना चाहिए। वस्त्र निचोड़कर जल निकालना 'संस्कारहीन' क्रिया है। योगिक अभ्यास में साधक यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार अशुद्ध जल से शरीर शुद्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार मलिन मन और अनियंत्रित इंद्रियों के सहारे 'अक्षर' की प्राप्ति संभव नहीं है। यह निषेध साधक को स्थूल शुद्धि से सूक्ष्म शुद्धि की ओर ले जाता है, जहाँ वह अपने भीतर के 'पात्र' (हृदय) को शुद्ध कर उसमें चैतन्य जल को संचित करना सीखता है।

पात्रलक्षणम्

श्लोक ७.११४

सौवर्णं राजतं ताम्रं मुख्यं पात्रं प्रकीर्तितम् ।

तदलाभे मृदं पात्रं स्रवते यन्न धारितम् ॥ ७.११४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७२

सोने, चाँदी और ताँबेका पात्र मुख्य कहा गया है; उनके न मिलनेपर मिट्टीका पात्र, जो (जल) धारण करे, टपके नहीं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि बिना पात्र के बायें हाथ से लिए गए जल या वस्त्रों को निचोड़कर प्राप्त जल से अभ्युक्षण नहीं करना चाहिए। अब वे उस 'पात्र' के स्वरूप और उसकी धातु का निर्णय कर रहे हैं, जो जल की पवित्रता और उसकी शक्ति को धारण करने में समर्थ हो।

अन्वय और पदार्थ —

सौवर्णं, राजतं, ताम्रं (च) मुख्यं पात्रं प्रकीर्तितम्। तदलाभे मृदं पात्रं (कुर्यात्), यत् न स्रवते, (यत्) धारितम्।

पदार्थ-निर्वाचन:

• सौवर्णं: सोने (स्वर्ण) से निर्मित।

• राजतं: चाँदी से निर्मित।

• ताम्रं: ताँबे से निर्मित।

• मुख्यं पात्रं: श्रेष्ठ या प्रधान पात्र। 'मुख्य' वह है जो मन्त्रों की शक्ति और जल की शुद्धि को अक्षुण्ण रखे।

• प्रकीर्तितम्: कहा गया है या प्रतिष्ठित है।

• तदलाभे: उनके (स्वर्ण, रजत, ताम्र) न मिलने पर या अभाव में।

• मृदं पात्रं: मिट्टी का पात्र।

• स्रवते यन्न: जो रिसता न हो, अर्थात् जिससे जल टपके नहीं।

• धारितम्: जो जल को धारण करने में सक्षम हो।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य जल-संग्रह के लिए उपयुक्त धातुओं का क्रम निर्धारित कर रहे हैं। जल केवल एक भौतिक द्रव्य नहीं, अपितु वह चैतन्य का वाहक है, विशेषकर जब उसका प्रयोग प्रोक्षण, तर्पण या जप के समय किया जाता है। पात्र का चुनाव इस आधार पर किया जाता है कि वह जल के सूक्ष्म गुणों को नष्ट न करे, बल्कि उन्हें संवर्धित करे।

यहाँ तीन धातुओं को 'मुख्य' कहा गया है: स्वर्ण, रजत और ताम्र। स्वर्ण सूर्य का प्रतीक है, जो शुद्धता और तेज का चरम है; रजत चन्द्रमा का प्रतीक है, जो शीतलता और मन की शुद्धि का परिचायक है; और ताम्र अग्नि और पृथ्वी के संतुलन का प्रतीक है, जो जल के दोषों का शमन करता है। इन तीनों धातुओं में यह विशेषता है कि ये जल की 'सात्त्विकता' को बनाए रखती हैं और मन्त्रों के प्रभाव को संचित करने की क्षमता रखती हैं।

किन्तु, ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ केवल संपन्नता की बात नहीं कर रहे, अपितु साधना की सुलभता का मार्ग भी खोल रहे हैं। वे कहते हैं—'तदलाभे मृदं पात्रं'। यदि साधक के पास स्वर्ण, रजत या ताम्र का पात्र उपलब्ध न हो, तो मिट्टी (मृत्तिका) का पात्र प्रयोग किया जा सकता है। मिट्टी पृथ्वी तत्त्व का साक्षात् स्वरूप है, जो सबको धारण करती है।

मिट्टी के पात्र के विषय में एक अनिवार्य शर्त रखी गई है: 'स्रवते यन्न धारितम्'। पात्र ऐसा होना चाहिए जो जल को पूर्णतः धारण करे और जिससे रिसाव न हो। रिसाव केवल जल की हानि नहीं है, अपितु वह उस ऊर्जा और संकल्प का क्षय है जो साधक ने जल में आरोपित किया है। जिस प्रकार एक विचलित मन से ध्यान सिद्ध नहीं होता, उसी प्रकार एक रिसने वाले पात्र से की गई शुद्धि अधूरी रहती है। अतः पात्र का 'अखंड' और 'धारणीय' होना अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से पात्र का अर्थ है—'अधिष्ठान'। जिस प्रकार जल के लिए स्वर्ण या ताम्र पात्र श्रेष्ठ है, उसी प्रकार चेतना के संचय के लिए 'स्थिर बुद्धि' श्रेष्ठ है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी पात्र की शुद्धता और उसकी अखंडता वास्तव में उसके भीतर के 'हृदय-पात्र' का प्रतिबिंब है। स्वर्ण, रजत और ताम्र—ये तीन धातुएँ साधक के भीतर के तेज, शांति और तप का प्रतीक हैं। जब साधक मिट्टी के पात्र का प्रयोग करता है, तो वह अपनी साधना को पृथ्वी (विनम्रता और स्थिरता) के साथ जोड़ता है।

'स्रवते यन्न' (जो टपके नहीं) का गूढ़ अभ्यास यह है कि साधक अपनी प्राण-शक्ति और एकाग्रता को बाहर न बहने दे। जिस प्रकार रिसने वाले पात्र में जल नहीं ठहरता, उसी प्रकार जिस साधक के इन्द्रिय-द्वार खुले होते हैं, उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा क्षय हो जाती है। इस श्लोक के माध्यम से साधक अपने चित्त को एक 'अखंड पात्र' बनाने का अभ्यास करता है, ताकि वह ब्रह्म-ज्ञान रूपी जल को बिना किसी रिसाव के अपने भीतर धारण कर सके।

स्नानतर्पणफलम्

श्लोक ७.११५

स्नात्वैवं सर्वभूतानि तर्पयेद्योऽन्वहं द्विजः ।

स गच्छति परं स्थानं तेजोमूर्तिरनामयम् ॥ ७.११५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७२

जो द्विज इस प्रकार स्नान करके प्रतिदिन सब भूतोंका तर्पण करता है, वह तेजोमूर्ति होकर निर्दोष परम स्थानको जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जल-संग्रह के लिए उपयुक्त पात्रों का निर्णय किया था, ताकि शुद्ध जल के माध्यम से प्रोक्षण और अन्य क्रियाएँ संपन्न की जा सकें। अब वे स्नान और पात्र-शुद्धि के उपरांत उस जल के सर्वोच्च प्रयोग 'तर्पण' का विधान बता रहे हैं, जो साधक को भौतिक शुद्धि से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक उत्कर्ष की ओर ले जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

स्नात्वैवं द्विजः अन्वहं सर्वभूतानि तर्पयेत्, (तर्पयति) यः, स अनमयः तेजोमूर्तिः (भूत्वा) परं स्थानं गच्छति।

पदार्थ-निर्वाचन:

• स्नात्वैवं: इस प्रकार (पूर्व-निर्दिष्ट विधि से) स्नान करके।

• सर्वभूतानि: समस्त प्राणियों को। यहाँ 'भूत' शब्द केवल मृत पूर्वजों के लिए नहीं, अपितु चराचर जगत के समस्त सूक्ष्म और स्थूल जीवों के लिए प्रयुक्त है।

• तर्पयेत्: तृप्त करे। तर्पण का अर्थ है—किसी की प्यास बुझाना या उसकी कामना को शांत करना।

• अन्वहं: प्रतिदिन। यह निरंतरता का सूचक है, जो अभ्यास (साधना) की अनिवार्य शर्त है।

• द्विजः: वह जो दूसरी बार जन्मा हो। बाह्यतः यह उपनयन संस्कार प्राप्त व्यक्ति है, परन्तु आन्तरिक दृष्टि से वह है जिसने ज्ञान के द्वारा अविद्या का नाश कर 'द्वितीय जन्म' प्राप्त किया है।

• परं स्थानं: वह सर्वोच्च अवस्था या लोक, जो इंद्रिय-भोगों और जन्म-मृत्यु के चक्र से परे है।

• तेजोमूर्तिः: जिसका स्वरूप ही 'तेज' (प्रकाश/ऊर्जा) हो गया हो।

• अनामयम्: रोगमुक्त, दोषरहित या निर्दोष।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य स्नान की प्रक्रिया को केवल शरीर की शुद्धि तक सीमित न रखकर उसे 'सर्वभूत-तर्पण' से जोड़ रहे हैं। स्नान के उपरांत जब साधक जल के माध्यम से समस्त भूतों का तर्पण करता है, तो वह वास्तव में अपनी व्यक्तिगत पहचान (अहंकार) का विसर्जन कर समस्त सृष्टि के साथ एकाकार होने का अभ्यास करता है।

तर्पण का बाह्य अर्थ जल देना है, परन्तु इसका गूढ़ अर्थ है—सृष्टि के प्रत्येक कण के प्रति करुणा और कृतज्ञता का भाव रखना। जब एक द्विज प्रतिदिन यह भाव करता है कि "मेरे माध्यम से इस जगत के समस्त जीव तृप्त हों", तब उसके भीतर का संकुचित 'स्व' विस्तृत होकर 'विश्व' बन जाता है। यह क्रिया केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, अपितु चित्त का विस्तार है।

ऋषि कहते हैं कि ऐसा करने वाला 'तेजोमूर्ति' हो जाता है। जब साधक दूसरों की तृप्ति में अपनी तृप्ति देखता है, तो उसके भीतर का तामस और राजस गुण क्षीण होने लगते हैं और सत्त्व गुण 'तेज' के रूप में प्रस्फुटित होता है। यह तेज वही है जो सूर्य का स्वरूप है और जो हृदय के भीतर स्थित है। 'अनामय' होने का अर्थ है—मानसिक विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) से पूर्णतः मुक्त हो जाना। ऐसा साधक जब 'परं स्थान' को प्राप्त होता है, तो वह किसी भौगोलिक स्वर्ग की बात नहीं है, अपितु वह चेतना की वह उच्चतम अवस्था है जहाँ वह स्वयं को उस अक्षर-ब्रह्म में विलीन पाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'अहंकार-विसर्जन' और 'करुणा-योग' का अभ्यास है। साधक जब 'सर्वभूत-तर्पण' करता है, तो वह अपने भीतर के 'दाता' भाव को जाग्रत करता है। योग में जब तक 'मैं' और 'मेरा' का भाव रहता है, तब तक साधक स्थूल भूमि पर रहता है। जैसे ही वह समस्त भूतों को स्वयं का विस्तार मानकर उन्हें तृप्त करने का संकल्प लेता है, वह सूक्ष्म भूमि की ओर अग्रसर होता है।

अभ्यास यह है कि स्नान के समय जल को केवल शरीर धोने का साधन न मानकर, उसे चैतन्य का वाहक माना जाए। जल अर्पित करते समय यह अनुभव किया जाए कि यह जल केवल पात्र से नहीं, अपितु हृदय के प्रेम और करुणा से निकल रहा है। इस अभ्यास से साधक का चित्त 'तेजोमय' होने लगता है, जिससे उसकी एकाग्रता बढ़ती है और वह निर्दोष (अनामय) अवस्था में प्रतिष्ठित होकर उस परम तत्व का अनुभव करने योग्य बनता है। यह क्रिया साधक को 'स्व' से 'सर्व' की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है।

श्लोक ७.११६

स्नानमूलाः क्रियाः सर्वाः श्रुतिस्मृत्युदिता नृणाम् ।

तस्मात् स्नानं निषेवेत श्रीपुष्ट्यारोग्यवर्धनम् ॥ ७.११६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७२

श्रुति और स्मृतिमें कहे गये मनुष्योंके सब कर्मोंका मूल स्नान है; इसलिए लक्ष्मी, पुष्टि और आरोग्य बढ़ानेवाले स्नानका सेवन करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान के उपरांत सर्वभूत-तर्पण की महिमा बताई, जिससे साधक तेजोमूर्ति होकर परम स्थान को प्राप्त करता है। अब वे इस पूरी प्रक्रिया के आधारभूत स्तंभ 'स्नान' की सर्वोपरिता और उसकी व्यापकता का प्रतिपादन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

नृणां श्रुति-स्मृत्युदिताः सर्वाः क्रियाः स्नानमूलाः (सन्ति)। तस्मात् श्री-पुष्टि-आरोग्य-वर्धनम् स्नानं निषेवेत।

पदार्थ-निर्वाचन:

• श्रुति-स्मृत्युदिताः: श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्मशास्त्र) में उद्घोषित या बताए गए।

• क्रियाः: यहाँ क्रिया का अर्थ केवल शारीरिक गतिविधि नहीं, अपितु समस्त धार्मिक, आध्यात्मिक और योगिक अनुष्ठान (जैसे जप, होम, ध्यान, तप) हैं।

• स्नानमूलाः: जिनका मूल (आधार/जड़) स्नान है। जिस प्रकार जड़ के बिना वृक्ष का अस्तित्व नहीं, उसी प्रकार स्नान के बिना किसी भी क्रिया की पूर्णता और शुद्धि संभव नहीं है।

• निषेवेत: सेवन करे। यहाँ सेवन का अर्थ केवल जल में डुबकी लगाना नहीं, बल्कि स्नान को एक साधना के रूप में अंगीकार करना है।

• श्री-पुष्टि-आरोग्यवर्धनम्: श्री (ऐश्वर्य/दिव्य तेज), पुष्टि (शारीरिक और मानसिक बल) तथा आरोग्य (रोगमुक्ति) को बढ़ाने वाला।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गंभीर सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं कि समस्त वैदिक और शास्त्रीय कर्मों का मूल 'स्नान' है। जब वे कहते हैं कि "सर्वाः क्रियाः स्नानमूलाः", तो उनका संकेत केवल बाह्य शुद्धि की ओर नहीं है, अपितु उस पात्रता की ओर है जो किसी भी उच्चतर साधना के लिए अनिवार्य है।

बाह्य दृष्टि से, स्नान शरीर की अशुद्धि को दूर करता है, जिससे साधक का मन प्रसन्न होता है और वह एकाग्रता की स्थिति में आ पाता है। बिना स्नान के किया गया जप या होम निष्फल माना जाता है क्योंकि मलिन शरीर और चंचल मन के साथ ब्रह्म-विद्या का साक्षात्कार संभव नहीं है।

किन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में स्नान का एक आन्तरिक और रहस्यमय अर्थ भी है। जल केवल एक द्रव्य नहीं, अपितु चेतना का वह रूप है जो विलेय होने की क्षमता रखता है। जब साधक जल में प्रवेश करता है, तो वह प्रतीकात्मक रूप से अपने अहंकार और पुराने संस्कारों को जल में विसर्जित करता है। 'श्री' का अर्थ यहाँ केवल धन नहीं, अपितु वह 'दिव्य आभा' है जो शुद्धि के बाद प्रकट होती है। 'पुष्टि' का अर्थ केवल शरीर का भारीपन नहीं, अपितु प्राणशक्ति का संवर्धन है, और 'आरोग्य' का अर्थ है—चित्त का विकारों से मुक्त होना।

अतः, ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यदि कोई साधक उच्च कोटि के आध्यात्मिक फल चाहता है, तो उसे स्नान को केवल एक दैनिक दिनचर्या न मानकर, उसे अपनी साधना का प्रथम सोपान (मूल) मानना चाहिए।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' की अनिवार्यता को दर्शाता है। साधक के लिए स्नान का अर्थ है—स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर संक्रमण।

अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक जल के स्पर्श का अनुभव करता है, तो वह अपनी चेतना को त्वचा के स्पर्श से हटाकर जल की शीतलता और प्रवाह में लीन करता है। यह 'प्राण' को शांत करने की पहली प्रक्रिया है। जल का शरीर पर गिरना, मन के विकारों के क्षालन (धुलने) का प्रतीक है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि जब तक बाह्य आवरण (शरीर) शुद्ध और आरोग्य नहीं होगा, तब तक आन्तरिक ज्योति (सूर्य) का प्रकाश हृदय में नहीं उतर सकता। अतः स्नान यहाँ 'चित्त-शुद्धि' का भौतिक साधन है, जो साधक को 'तमस' (जड़ता) से निकालकर 'सत्व' (प्रकाश) की भूमि पर ले जाता है। यह क्रिया साधक को इस योग्य बनाती है कि वह आगे आने वाले कठिन योगिक अभ्यासों और मन्त्र-साधनाओं को धारण कर सके।

श्लोक ७.११७

प्रातरुत्थाय यो विप्रः संध्यास्नायी सदा भवेत् ।

सप्तजन्मकृतं पापं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥ ७.११७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७२

जो विप्र प्रातः उठकर सदा संध्याके समय स्नान करता है, वह सात जन्मोंमें किये पापको तीन वर्षोंमें दूर कर देता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान को समस्त श्रुति-स्मृति कर्मों का मूल बताते हुए उसे श्री, पुष्टि और आरोग्य का वर्धक कहा। अब इस श्लोक में वे स्नान के उस विशिष्ट समय और निरंतरता का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक के संचित पापों का क्षय कर उसे तीव्र गति से शुद्ध करता है।

अन्वय और पदार्थ —

यो विप्रः प्रातरुत्थाय सदा संध्यास्नायी (भवेत्), (सः) सप्तजन्मकृतं पापं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. प्रातरुत्थाय: प्रातः उठकर। यहाँ 'प्रातः' केवल समय नहीं, अपितु वह ब्रह्ममुहूर्त है जब प्रकृति और पुरुष के बीच का पर्दा सबसे पतला होता है।

२. संध्यास्नायी: संध्या के समय स्नान करने वाला। 'संध्या' दो कालों के मिलन का समय है। यहाँ स्नान का अर्थ है स्वयं को उस संधि-काल की पवित्रता में विलीन कर देना।

३. सप्तजन्मकृतं पापं: सात जन्मों में किया गया पाप। 'सप्त' संख्या यहाँ पूर्णता और चक्र का संकेत है, जो मनुष्य के दीर्घकालीन संस्कारों और प्रारब्ध के संचय को दर्शाती है।

४. व्यपोहति: दूर कर देता है, धो डालता है या मिटा देता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ विप्र (साधक) के लिए एक अत्यंत प्रभावशाली शुद्धि-विधि बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जो विप्र प्रातः काल उठकर निरंतर संध्या के समय स्नान करता है, वह सात जन्मों के संचित पापों को मात्र तीन वर्षों में नष्ट कर देता है।

यहाँ 'विप्र' शब्द केवल जातिवाचक नहीं, अपितु 'विप्र' वह है जो विशेष ज्ञान (विप्रता) की ओर अग्रसर है, जिसने स्वयं को ब्रह्म-साधना के लिए समर्पित किया है। ऐसे साधक के लिए स्नान केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि एक 'संस्कार' बन जाता है।

इस श्लोक में दो महत्वपूर्ण समय-सीमाएँ दी गई हैं—'सात जन्म' और 'तीन वर्ष'। सात जन्मों का पाप वह गहरा संस्कार-जाल है जो साधक को जन्म-जन्मांतर से जकड़े हुए है। तीन वर्ष की अवधि यह दर्शाती है कि जब बाह्य विधि (स्नान) और आंतरिक संकल्प (संध्या-साधना) का मेल होता है, तो शुद्धि की गति तीव्र हो जाती है। यह 'तीन वर्ष' का समय वास्तव में उस अवधि का संकेत है जिसमें साधक का अनुशासन उसके अवचेतन मन (चित्त) की परतों को भेदकर उसे निर्मल कर देता है।

बाहरी दृष्टि से यह जल से शरीर धोने की विधि है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ 'प्राण-स्नान' है। जब साधक संध्या के संधि-काल में जल के संपर्क में आता है, तो वह जल केवल त्वचा को नहीं धोता, अपितु सूर्य की प्रथम किरणों और जल के तत्त्व के संयोग से उसके भीतर के जड़त्व (तमस) का क्षय होता है। यह स्नान साधक को उस मानसिक अवस्था में लाता है जहाँ वह आगामी जप और ध्यान के लिए पूर्णतः पात्र बन जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार-शोधन' की प्रक्रिया है। साधक जब 'सदा' (निरंतर) इस अभ्यास को करता है, तो वह 'अभ्यास-योग' की भूमि पर पहुँचता है।

यहाँ 'प्रातः उत्थाय' का अर्थ है—तंद्रा और निद्रा के आलस्य से जागना। 'संध्यास्नायी' होने का अर्थ है—अपने प्राणों को उस संधि-बिन्दु पर लाना जहाँ स्थूल शरीर और सूक्ष्म मन का मिलन होता है। सात जन्मों के पाप वास्तव में वे 'वृत्तियाँ' हैं जो चित्त में गहरे दबे हुए हैं। जब साधक नियमपूर्वक स्नान कर संध्या-साधना करता है, तो जल का स्पर्श और समय की पवित्रता मिलकर उन सुप्त वृत्तियों को जाग्रत कर उन्हें विसर्जित कर देती हैं।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि अनुशासन (नियम) की शक्ति प्रारब्ध के भारी बोझ को भी हल्का कर सकती है। यह अभ्यास उसे 'तमस' से 'रजस' और फिर 'सत्त्व' की भूमि की ओर ले जाता है, जिससे उसके भीतर का सूर्य (आत्मा) प्रकाशित होने लगता है।

श्लोक ७.११८

उषस्युषसि यत् स्नानं संध्यास्वनुदिते रवौ ।

प्राजापत्येन तत्तुल्यं महापातकनाशनम् ॥ ७.११८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७२

प्रतिदिन उषःकालमें, संध्याओंमें सूर्यके उगनेसे पहले जो स्नान है, वह प्राजापत्य (व्रत) के तुल्य है, महापातकोंका नाशक है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या-स्नान की निरंतरता से सात जन्मों के संचित पापों के क्षय का विधान बताया। अब इस श्लोक में वे स्नान के उस विशिष्ट समय की सूक्ष्मता और उसकी आध्यात्मिक शक्ति का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को एक महान व्रत के समान फल प्रदान करती है।

अन्वय और पदार्थ —

उषस्युषसि यत् स्नानं, संध्यास्वनुदिते रवौ, (तत्) प्राजापत्येन (व्रतेन) तुल्यं, महापातकनाशनम् ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. उषस्युषसि: उषःकाल में। 'उषः' वह समय है जब रात्रि का अंधकार छँट रहा होता है और प्रकाश का उदय होने वाला होता है। यह जागरण और चेतना के उदय का समय है।

२. संध्यास्वनुदिते रवौ: सूर्य के उदय होने से पूर्व संध्या के समय। 'रवौ' शब्द यहाँ सूर्य के लिए प्रयुक्त है, जो प्रकाश और ज्ञान का उद्घोष करता है। 'अनुदिते' का अर्थ है उदय से ठीक पहले की वह स्थिति जब आकाश लालिमा से भर जाता है।

३. प्राजापत्येन तुल्यं: प्राजापत्य (व्रत) के समान। 'प्राजापत्य' वह व्रत या तप है जो प्रजापति (सृष्टि के अधिष्ठाता) के अनुशासन में किया जाता है, जो अत्यंत कठिन, शुद्ध और उच्च कोटि का होता है।

४. महापातकनाशनम्: महापातकों का नाश करने वाला। वे घोर पाप जो साधक की आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधा बनते हैं, यह स्नान उन्हें क्षीण कर देता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान के समय की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि प्रतिदिन उषःकाल में, सूर्य के उदय होने से पूर्व संध्या के समय किया गया स्नान 'प्राजापत्य' व्रत के समान फलदायी और महापातकों का नाश करने वाला होता है।

यहाँ 'उषःकाल' और 'सूर्योदय से पूर्व' के समय पर विशेष बल दिया गया है। बाहरी दृष्टि से यह समय शरीर की शुद्धि और दिनचर्या के आरम्भ का है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह वह संधि-क्षण है जब प्रकृति शांत होती है और साधक का मन सबसे अधिक एकाग्र और ग्रहणशील होता है। जब सूर्य अभी उदित नहीं हुआ है, तब साधक अपनी चेतना को उस 'अदृश्य सूर्य' (आत्मा) की ओर मोड़ने का प्रयास करता है।

ऋषि कहते हैं कि ऐसा स्नान 'प्राजापत्य' के तुल्य है। प्राजापत्य व्रत का अर्थ है—सृष्टि के मूल नियम के साथ एकरूप होना। जिस प्रकार प्रजापति सृष्टि का सृजन करते हैं, उसी प्रकार उषःकाल का स्नान साधक के भीतर एक 'नूतन सृजन' करता है। वह पुराने संस्कारों, मलिनताओं और मानसिक बोझ को धोकर साधक को एक नवीन, शुद्ध और पवित्र व्यक्तित्व प्रदान करता है।

महापातकनाशक होने का रहस्य यह है कि जब मनुष्य इस पवित्र समय में जल के स्पर्श से स्वयं को शुद्ध करता है, तो वह केवल त्वचा की शुद्धि नहीं करता, अपितु अपने अवचेतन में गहरे बैठे उन तामसिक संस्कारों को भी विसर्जित करता है जो 'महापातक' के रूप में उसकी आत्मा को ढँके हुए थे। यह जल का स्पर्श, समय की पवित्रता और संकल्प का संगम है, जो साधक के प्रारब्ध की कठोरता को पिघला देता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से उषःकाल का स्नान 'चित्त-शुद्धि' का एक सशक्त साधन है। साधक जब सूर्योदय से पूर्व शीतल जल के संपर्क में आता है, तो उसके शरीर की जड़ता समाप्त होती है और प्राणों में एक नई स्फूर्ति का संचार होता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक स्नान करते समय यह अनुभव करे कि जल केवल शरीर को नहीं, अपितु उसके हृदय और मन के (मल) को भी धो रहा है। सूर्य के उदय होने से पूर्व का यह समय 'संधि' है; इस संधि में स्नान करना साधक को स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर ले जाने का अभ्यास है। जब वह जल में उतरता है, तो वह स्वयं को प्रकृति के विराट तत्व में विलीन करता है। यह अभ्यास साधक को 'तमो-गुण' से निकालकर 'सत्त्व-गुण' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है, जिससे वह आगामी जप और ध्यान के लिए पूर्णतः तैयार हो जाता है। महापातक का नाश वास्तव में उन मानसिक अवरोधों का नाश है जो साधक को उसकी वास्तविक स्वरूप-स्थिति से दूर रखते हैं।

सरितां स्नानफलदाने विशेषः

श्लोक ७.११९

त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः ।

समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः ॥ ७.११९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७३

जो नदियाँ समुद्रमें नहीं जातीं, वे तीन रातका फल देती हैं; समुद्रमें जानेवाली पखवाड़ेका, और नदियोंका स्वामी (समुद्र) महीनेका।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान की अनिवार्यता और उषःकाल में स्नान करने से प्राप्त होने वाले प्राजापत्य-तुल्य फल का वर्णन किया। अब वे स्नान के उस स्थान की विशिष्टता बता रहे हैं, जहाँ जल की गति और उसका गंतव्य साधक के पुण्य-फल की मात्रा को निर्धारित करता है।

अन्वय और पदार्थ —

याः काश्चिद् (नद्यो) असमुद्रगाः (सन्ति), (ताः) त्रिरात्रफलदा (भवन्ति) । समुद्रगाः (नद्यो) पक्षस्य (फलदाः), सरितां पतिः (समुद्रः) मासस्य (फलदा भवति) ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. असमुद्रगाः: जो नदियाँ समुद्र तक नहीं पहुँचतीं (जैसे वे जो बीच में ही लुप्त हो जाती हैं या छोटी झील/सरोवर में मिल जाती हैं)।

२. त्रिरात्रफलदा: तीन रातों (तीन दिनों) के तप या स्नान के फल को देने वाली।

३. समुद्रगाः: वे नदियाँ जो निरंतर प्रवाहित होकर अंततः समुद्र में विलीन हो जाती हैं।

४. पक्षस्य: पखवाड़े (१५ दिन) के फल के समान।

५. सरितां पतिः: नदियों का स्वामी अर्थात् 'समुद्र'।

६. मासस्य: एक मास (३० दिन) के स्नान के फल के समान।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य जल की पवित्रता और उसकी गतिशीलता के बीच के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि स्नान का फल केवल जल की उपस्थिति पर नहीं, बल्कि उस जल के 'प्रवाह' और उसके 'लक्ष्य' पर निर्भर करता है।

जो नदियाँ समुद्र तक नहीं पहुँचतीं, वे तीन रातों का फल देती हैं। यहाँ 'तीन रात' का संकेत उस अल्पकालिक शुद्धि से है जो केवल शरीर के बाहरी मैल को हटाती है। समुद्रगामिनी नदियाँ, जो अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर निरंतर बहती हैं, पखवाड़े (१५ दिन) का फल प्रदान करती हैं। अंततः, नदियों का स्वामी समुद्र, जो समस्त जलधाराओं का संगम स्थल है, एक मास के स्नान का फल देता है।

यहाँ बाहरी विधि यह है कि साधक को यथासंभव ऐसी नदियों में स्नान करना चाहिए जो समुद्र में मिलती हों, और सर्वश्रेष्ठ फल के लिए समुद्र-स्नान करना चाहिए। किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। जल यहाँ 'चित्त' और 'प्राण' का प्रतीक है। जो साधक की चेतना (नदी) केवल छोटे-छोटे विषयों या अल्पकालिक लक्ष्यों (असमुद्रगाः) में उलझी रहती है, उसकी शुद्धि सीमित होती है। जो चेतना निरंतर प्रवाहित होकर परमात्मा रूपी समुद्र की ओर अग्रसर है, वह तीव्र गति से पापों का क्षय करती है। समुद्र 'पूर्णता' का प्रतीक है; जहाँ पहुँचकर नदी अपना पृथक अस्तित्व खोकर पूर्ण हो जाती है, वैसे ही जब साधक का मन व्यक्तिगत अहंकार को छोड़कर उस विराट चेतना (समुद्र) में विलीन होता है, तब उसे पूर्ण शुद्धि और मास-तुल्य महान फल की प्राप्ति होती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रवाह' और 'विलय' का अभ्यास है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसकी साधना की गति क्या है।

१. अल्प-प्रवाह: जब साधक केवल शारीरिक शुद्धि या मानसिक शांति के छोटे लक्ष्यों में रहता है, तो वह 'असमुद्रगा' नदी के समान है।

२. निरन्तर-प्रवाह: जब साधक का अभ्यास एकनिष्ठ होकर केवल लक्ष्य (ईश्वर/अक्षर) की ओर बहता है, तो वह 'समुद्रगा' नदी की भाँति तीव्र प्रगति करता है।

३. पूर्ण-विलय: समुद्र में स्नान का अर्थ है—साधना की वह पराकाष्ठा जहाँ 'मैं' का विलोप हो जाता है और केवल 'वह' शेष रहता है।

साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि उसकी भक्ति और जप का प्रवाह छोटा न हो, बल्कि वह समुद्र की भाँति व्यापक और गहरा हो। जिस प्रकार नदी समुद्र में मिलकर अपनी सारी अशुद्धियाँ और सीमितताएँ त्याग देती है, उसी प्रकार साधक अपने प्राणों और मन को विराट पुरुष (सूर्य-पुरुष) के विराट स्वरूप में विलीन करने का अभ्यास करता है। यह यात्रा 'अंश' से 'पूर्ण' की ओर जाने की यात्रा है।

स्नानजप्यदानभुक्तिविशेषनिन्दा

श्लोक ७.१२०

वृथा उष्णोदकस्नानं वृथा जप्यमवैदिकम् ।

वृथा त्वश्रोत्रिये दानं वृथा भुक्तमसाक्षिकम् ॥ ७.१२० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७३

गरम जलका स्नान व्यर्थ है, अवैदिक जप व्यर्थ है, श्रोत्रियसे भिन्नको दिया दान व्यर्थ है, और साक्षीके बिना (देवताको अर्पित किये बिना) खाया भोजन व्यर्थ है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान की अनिवार्यता और विभिन्न जलाशयों से प्राप्त होने वाले पुण्य-फल की मात्रा का विवेचन किया। अब वे उन क्रियाओं का निषेध कर रहे हैं जो बाहरी रूप से तो कर्म प्रतीत होती हैं, किन्तु शास्त्र-सम्मत विधि और चेतना के अभाव में फलहीन रहती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

उष्णोदकस्नानं वृथा (अस्ति), अवैदिकं जप्यं वृथा (अस्ति) । अश्रोत्रिये दानं वृथा (अस्ति), असाक्षिकं भुक्तं वृथा (अस्ति) ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. उष्णोदकस्नानं: उष्ण जल (गरम पानी) से किया गया स्नान।

२. अवैदिकं जप्यं: वह जप जो वैदिक विधि, मन्त्र-शुद्धि या श्रुति-प्रामाणिकता से रहित हो।

३. अश्रोत्रिये दानं: श्रोत्रिय (वेदों का ज्ञाता और आचरण करने वाला) के अतिरिक्त किसी अन्य को दिया गया दान।

४. असाक्षिकं भुक्तं: बिना साक्षी के खाया गया भोजन। यहाँ 'साक्षी' का अर्थ केवल मनुष्य नहीं, अपितु देवता (अग्नि/सूर्य) है, जिन्हें भोजन अर्पित कर उन्हें साक्षी मानकर ग्रहण किया जाता है।

५. वृथा: निष्फल, व्यर्थ या फलहीन।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'विधि' और 'फल' के अविभाज्य सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। वे चार ऐसी स्थितियों का वर्णन कर रहे हैं जहाँ क्रिया तो हो रही है, किन्तु वह 'यज्ञ' नहीं बन पा रही, इसलिए वह वृथा है।

प्रथम, उष्णोदकस्नानं वृथा। सामान्यतः गरम जल का प्रयोग सुख के लिए किया जाता है, किन्तु आध्यात्मिक शुद्धि के लिए प्राकृतिक जल (नदी, सरोवर या वर्षा जल) श्रेष्ठ है, क्योंकि उसमें प्रकृति की जीवंत शक्ति और प्रवाह होता है। गरम जल शरीर की त्वचा को तो साफ कर सकता है, किन्तु वह सूक्ष्म नाड़ियों की शुद्धि और प्राणों के स्नानाचार्य (शुद्धिकरण) में सक्षम नहीं है। जब तक स्नान का उद्देश्य केवल शारीरिक सुख है, वह 'स्नान' है; जब वह शुद्धि और तप का साधन बनता है, तब वह 'वैदिक स्नान' कहलाता है।

द्वितीय, अवैदिकं जप्यं वृथा। जप केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं है। वह श्रुति के बीजों (मन्त्रों) का जागरण है। जो जप वैदिक विधि, सही उच्चारण, लय और मन्त्र के वास्तविक अर्थ (देवता) के ज्ञान के बिना किया जाता है, वह केवल मानसिक व्यायाम है, आध्यात्मिक साधना नहीं। मन्त्र एक यंत्र है; यदि यंत्र त्रुटिपूर्ण है, तो वह वांछित परिणाम नहीं दे सकता।

तृतीय, अश्रोत्रिये दानं वृथा। दान की सार्थकता इस बात में नहीं है कि क्या दिया गया, बल्कि इस बात में है कि किसे दिया गया। श्रोत्रिय वह है जो वेदों के ज्ञान को अपने जीवन में उतार चुका है। उसे दिया गया दान उस ज्ञान-परम्परा का पोषण करता है। जब दान किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जो ज्ञान का मूल्य नहीं जानता, तो वह केवल भौतिक लेन-देन बनकर रह जाता है, जिससे साधक के चित्त का शोधन नहीं होता।

चतुर्थ, असाक्षिकं भुक्तं वृथा। भोजन करना एक जैविक क्रिया है, किन्तु उसे 'प्रसाद' बनाना एक योगिक क्रिया है। 'साक्षी' का अर्थ है— उस चेतना को स्मरण करना जिसने इस अन्न को उत्पन्न किया। अग्निहोत्र या सूर्य-अर्पण के बिना खाया गया भोजन केवल जठराग्नि की तृप्ति करता है, किन्तु वह प्राण-शक्ति में परिवर्तित नहीं होता। जब हम देवता को साक्षी मानकर अर्पण करते हैं, तब हम यह स्वीकार करते हैं कि यह अन्न हमारा नहीं, अपितु ईश्वरीय कृपा है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'जागरूकता' का अभ्यास है। महर्षि याज्ञवल्क्य संकेत दे रहे हैं कि बिना 'चेतना' और 'विधि' के कोई भी कर्म केवल शरीर की क्रिया है, आत्मा की नहीं।

१. स्नान का योगिक अर्थ है— मन और प्राणों का शोधन। गरम जल केवल स्थूल शरीर को छूता है, किन्तु प्राकृतिक जल और मन्त्रों का संयोग सूक्ष्म शरीर को स्पर्श करता है।

२. जप का रहस्य है— ध्वनि से शून्य की ओर जाना। अवैदिक जप में केवल ध्वनि है, मन्त्र की शक्ति नहीं। साधक को शब्दों से ऊपर उठकर मन्त्र के 'बीज' में स्थित होना चाहिए।

३. दान का योगिक अर्थ है— 'ममता' का त्याग। जब दान श्रोत्रिय को दिया जाता है, तो वह अहंकार के विसर्जन का साधन बनता है।

४. भोजन का रहस्य है— 'अन्न' को 'प्राण' बनाना। साक्षी के साथ भोजन करने का अर्थ है— भोजन करते समय अपनी चेतना को सूर्य या अग्नि (जठराग्नि) में स्थित करना।

इस प्रकार, यह श्लोक साधक को 'जड़ क्रिया' से 'चेतन साधना' की ओर ले जाता है। वह सिखाता है कि जीवन की हर साधारण क्रिया (स्नान, जप, दान, भोजन) यदि शास्त्र-सम्मत और सजगतापूर्वक की जाए, तो वह स्वयं में एक महायज्ञ बन जाती है।

स्नानमाहात्म्यम्

श्लोक ७.१२१

अस्नात्वा नाचरेत् कर्म जपहोमादि किंचन ।

लालास्वेदसमाकीर्णः शयनादुत्थितः पुमान् ॥ ७.१२१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७३

बिना स्नान किये जप, होम आदि कोई कर्म न करे; बिस्तरसे उठा पुरुष लार और पसीनेसे भरा होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन क्रियाओं को 'वृथा' बताया जो शास्त्र-सम्मत विधि और पात्रता के बिना की जाती हैं। अब वे इस बात पर बल दे रहे हैं कि किसी भी वैदिक कर्म के आरम्भ से पूर्व शरीर की बाह्य शुद्धि अनिवार्य है, क्योंकि अशुद्ध शरीर में स्थित मन और प्राण साधना के योग्य नहीं होते।

अन्वय और पदार्थ —

शयनादुत्थितः पुमान् लालास्वेदसमाकीर्णः (अस्ति), (तस्मात्) अस्नात्वा नाचरेत् कर्म जपहोमादि किंचन ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. शयनादुत्थितः: शय्या (बिस्तर) से उठा हुआ।

२. पुमान्: पुरुष (यहाँ साधक के अर्थ में)।

३. लालास्वेदसमाकीर्णः: लार (लाला) और पसीने (स्वेद) से मिला हुआ या लिपटा हुआ।

४. अस्नात्वा: स्नान किए बिना।

५. नाचरेत्: आचरण न करे, न करे।

६. जपहोमादि: जप, होम आदि के समान अन्य वैदिक कर्म।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ कर्म की भौतिक और सूक्ष्म पात्रता की बात कर रहे हैं। वे स्पष्ट निषेध करते हैं कि जब तक शरीर बाह्य रूप से शुद्ध न हो जाए, तब तक जप और होम जैसे उच्च कोटि के आध्यात्मिक कर्मों का आरम्भ नहीं करना चाहिए।

इसका कारण वे शारीरिक स्तर पर देते हुए कहते हैं कि शय्या से उठा हुआ पुरुष 'लालास्वेदसमाकीर्णः' होता है। निद्रा के समय शरीर की चेतना शिथिल होती है, जिससे शरीर के छिद्रों से मल, लार और पसीना निरंतर स्रावित होते रहते हैं। यह केवल त्वचा की गंदगी नहीं है, अपितु यह शरीर की उस जड़ता का प्रतीक है जो निद्रा के कारण उत्पन्न हुई है। जब तक यह भौतिक मल शरीर पर लगा रहता है, तब तक शरीर में 'तमस' की प्रधानता रहती है।

जप और होम जैसी क्रियाएँ 'सत्व' गुण का विस्तार हैं। यदि शरीर अशुद्ध है, तो वह अशुद्धि मन के सूक्ष्म स्तर पर भी प्रभाव डालती है। अशुद्ध शरीर में किया गया जप केवल शब्दों का उच्चारण बनकर रह जाता है, वह 'मंत्र' नहीं बन पाता, क्योंकि मंत्र के लिए शरीर का एक पवित्र पात्र होना आवश्यक है। होम में अग्नि का आवाहन किया जाता है, और अग्नि शुद्धता की अधिष्ठात्री है; अतः अशुद्ध शरीर से अग्नि-होत्र करना शास्त्र-विरुद्ध और दोषपूर्ण है।

यहाँ 'नाचरेत्' शब्द एक विधि-निषेध है। यह केवल स्वच्छता का निर्देश नहीं है, बल्कि यह साधक को सचेत करने की प्रक्रिया है कि वह अपनी भौतिक अवस्था से जागृत होकर सूक्ष्म अवस्था की ओर बढ़े।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से, निद्रा के बाद शरीर में प्राणों का प्रवाह मंद और भारी होता है। लार और पसीना शरीर के भीतर के विषाक्त तत्त्वों (मल) का बाह्य प्रकटीकरण हैं। जब साधक स्नान करता है, तो जल का स्पर्श केवल त्वचा को नहीं धोता, बल्कि वह शरीर की सुप्त ऊर्जा को जाग्रत करता है और जड़ता (तमस) को समाप्त कर सजगता (सत्व) का संचार करता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह स्नान को केवल एक शारीरिक क्रिया न मानकर 'शुद्धिकरण के संस्कार' के रूप में देखे। जब वह जल से शरीर को धोता है, तो भाव यह हो कि वह अपने भीतर के आलस्य और अशुद्धियों को धो रहा है, ताकि उसका हृदय और मन जप एवं होम के लिए एक स्वच्छ दर्पण बन सकें। बिना स्नान के जप करने से मन विचलित रहता है और एकाग्रता नहीं आती, क्योंकि शरीर की भारीपन की अनुभूति चित्त को नीचे की ओर खींचती है। अतः स्नान के माध्यम से साधक अपनी भूमि को 'तमस' से 'रजस' और फिर 'सत्व' की ओर ले जाता है, जिससे वह उच्चतर साधना के योग्य बनता है।

श्लोक ७.१२२

क्लिद्यन्ति हि प्रसुप्तस्य इन्द्रियाणि स्रवन्ति च ।

अङ्गानि समतां गच्छन्त्युत्तमान्यधमैः सह ॥ ७.१२२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७३

सोये हुए (मनुष्य) की इन्द्रियाँ गीली होती और टपकती हैं; उत्तम अंग अधम अंगोंके साथ समान (अशुद्ध) हो जाते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादन किया कि शय्या से उठा हुआ पुरुष लार और पसीने से मलिन होता है, अतः स्नान के बिना जप-होम आदि कर्म वर्जित हैं। वर्तमान श्लोक में वे इसी निषेध का वैज्ञानिक और सूक्ष्म कारण स्पष्ट कर रहे हैं कि निद्रावस्था में शरीर और इन्द्रियों की क्या स्थिति होती है।

अन्वय और पदार्थ —

प्रसुप्तस्य इन्द्रियाणि हि क्लिद्यन्ति स्रवन्ति च । अङ्गानि उत्तमानि अधमैः सह समतां गच्छन्ति ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. प्रसुप्तस्य: सोए हुए व्यक्ति का (निद्रावस्था में स्थित)।

२. क्लिद्यन्ति: गीले होते हैं, आर्द्र होते हैं।

३. स्रवन्ति: टपकते हैं, स्रावित होते हैं (जैसे लार, पसीना या अन्य शारीरिक स्राव)।

४. उत्तमानि अङ्गानि: श्रेष्ठ अंग (यहाँ मुख, नेत्र, मस्तिष्क आदि ऊपरी और सूक्ष्म अंगों का संकेत है)।

५. अधमैः सह: अधम अंगों के साथ (यहाँ पैरों और शरीर के निचले अंगों का संकेत है)।

६. समतां गच्छन्ति: समान हो जाते हैं (अर्थात् शुद्ध-अशुद्ध का भेद समाप्त हो जाता है)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ शरीर की उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जिसे 'तमस' की पराकाष्ठा कहा जा सकता है। निद्रा में जब चेतना अंतर्मुखी होती है, तब शरीर की बाह्य रक्षा-प्रणाली और नियंत्रण शिथिल हो जाता है। ऋषि कहते हैं कि सोए हुए मनुष्य की इन्द्रियाँ 'क्लिद्यन्ति' और 'स्रवन्ति' होती हैं।

इसका स्थूल अर्थ यह है कि निद्रा के समय मुख से लार का गिरना, त्वचा से पसीने का स्राव होना और नेत्रों का आर्द्र होना स्वाभाविक है। किन्तु इसका आन्तर अर्थ अधिक गहरा है। इन्द्रियाँ जब जागृत होती हैं, तो वे अपने विषयों पर नियंत्रण रखती हैं, परन्तु निद्रा में वे 'गीली' हो जाती हैं, जिसका अर्थ है कि वे अपनी सजगता खोकर जड़ता (तमो-गुण) में डूब जाती हैं। स्राव का होना इस बात का प्रतीक है कि शरीर के भीतर का विरेचन अनियंत्रित हो गया है।

श्लोक का दूसरा चरण अत्यंत महत्वपूर्ण है— 'अङ्गानि समतां गच्छन्ति उत्तमान्यधमैः सह'। शरीर में एक स्वाभाविक सोपान होता है। शिर और मुख को 'उत्तम' माना गया है क्योंकि यहाँ ज्ञान, वाणी और प्राण का मुख्य केंद्र है, जबकि पैरों को 'अधम' माना गया है क्योंकि वे पृथ्वी के संपर्क में रहते हैं और मल-त्याग की दिशा में होते हैं। जागृत अवस्था में यह भेद बना रहता है; हम पैरों को मुख के समीप नहीं लाते। परन्तु निद्रा में शरीर शिथिल होकर किसी भी मुद्रा में गिर जाता है। पैर सिर के पास हो सकते हैं, या शरीर के निचले अंगों की अशुद्धि ऊपरी अंगों को स्पर्श कर सकती है।

जब 'उत्तम' और 'अधम' अंग समान हो जाते हैं, तो शरीर की वह मर्यादा समाप्त हो जाती है जो उसे साधना के योग्य बनाती है। यह 'समता' आध्यात्मिक समता नहीं, बल्कि 'अशुद्धता की समता' है। जब तक स्नान द्वारा इस भौतिक और सूक्ष्म जड़ता को धोया नहीं जाता, तब तक शरीर में वह पवित्रता नहीं आती जो उच्च मन्त्रों के स्पन्दन को झेल सके।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'तमो-गुण' के प्रभाव को समझने का सूत्र है। निद्रा वास्तव में एक अल्प-मृत्यु है, जहाँ प्राण और मन की गति मंद हो जाती है। 'इन्द्रियों का गीला होना' इस बात का संकेत है कि साधक की सजगता लुप्त हो गई है।

अभ्यास की दृष्टि से साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि निद्रा के बाद शरीर केवल त्वचा से गंदा नहीं होता, बल्कि उसकी ऊर्जा का स्तर गिर चुका होता है। 'उत्तम अंगों का अधमों के समान होना' यह दर्शाता है कि चेतना का ऊर्ध्वगमन रुक गया है और वह पुनः जड़ता में गिर गई है। अतः प्रातःकाल का स्नान केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि इस 'अधम' अवस्था से पुनः 'उत्तम' अवस्था में लौटने का संकल्प है। स्नान के जल के स्पर्श से जब इन्द्रियाँ पुनः जागृत होती हैं, तब साधक तमस को त्यागकर सत्व की ओर बढ़ता है, जिससे उसका मन जप और ध्यान के लिए तैयार होता है।

श्लोक ७.१२३

अत्यन्तमलिनः कायो नवच्छिद्रसमन्वितः ।

स्रवत्येव दिवारात्रौ प्रातःस्नानं विशोधनम् ॥ ७.१२३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७४

नौ छिद्रोंवाला यह शरीर अत्यन्त मलिन है, दिन-रात टपकता ही रहता है; प्रातःस्नान (उसका) शोधन है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने निद्रावस्था में इन्द्रियों के आर्द्र होने और श्रेष्ठ अंगों के अधम अंगों के समान अशुद्ध होने का वर्णन किया। इसी क्रम में वर्तमान श्लोक में वे शरीर की मूल संरचना और उसकी स्वाभाविक मलिनता का उल्लेख कर प्रातःस्नान की अनिवार्यता सिद्ध कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

कायो नवच्छिद्रसमन्वितः अत्यन्तमलिनः । दिवारात्रौ स्रवत्येव, प्रातःस्नानं (तस्य) विशोधनम् ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. नवच्छिद्रसमन्वितः: नौ छिद्रों से युक्त (शरीर)। ये नौ द्वार हैं— दो नेत्र, दो श्रोत्र (कान), दो नासिका-छिद्र, मुख, गुदा और मूत्रमार्ग।

२. अत्यन्तमलिनः: अत्यंत गंदा या अशुद्ध। यहाँ मलिनता केवल बाहरी धूल नहीं, अपितु शरीर के भीतर से निकलने वाले स्राव और मानसिक संस्कारों की अशुद्धि भी है।

३. स्रवत्येव: निरंतर टपकता या स्रावित होता रहता है।

४. दिवारात्रौ: दिन और रात, अर्थात् चौबीसों घंटे।

५. विशोधनम्: शुद्ध करने वाला, शोधन करने वाला।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ शरीर की उस भौतिक और सूक्ष्म वास्तविकता को उद्घाटित कर रहे हैं, जिसे साधारण मनुष्य विस्मृत कर देता है। वे कहते हैं कि यह शरीर 'नवच्छिद्रसमन्वितः' है, अर्थात् नौ द्वारों वाला एक पुर (नगर) है। ऋषि का संकेत है कि यह शरीर केवल मांस-मज्जा का पुंज नहीं, बल्कि एक ऐसा यंत्र है जिसके नौ द्वार निरंतर बाह्य जगत और आंतरिक जगत के बीच विनिमय कर रहे हैं।

जब वे कहते हैं कि शरीर 'अत्यन्तमलिनः' है और 'दिवारात्रौ स्रवत्येव' (दिन-रात टपकता रहता है), तो इसका अर्थ केवल पसीने या लार से नहीं है। शरीर के नौ छिद्रों से निरंतर कुछ न कुछ स्रावित होता रहता है— नेत्रों से अश्रु, नासिका से श्लेष्मा, मुख से लार, और निचले द्वारों से मल-मूत्र। यह निरंतर स्राव इस बात का प्रमाण है कि शरीर क्षयशील और अशुद्धता का केंद्र है।

बाहरी दृष्टि से यह मलिनता त्वचा की गंदगी है, जिसे जल से धोया जाता है। किन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में यह 'स्रवण' प्राणों के क्षय और इन्द्रियों के विषयों में विसर्जन का भी प्रतीक है। जो शरीर निरंतर टपक रहा है, वह अपनी ऊर्जा (ओज) को बाहर बहा रहा है। अतः 'प्रातःस्नानं विशोधनम्'—प्रातःकाल का स्नान केवल त्वचा की सफाई नहीं, बल्कि शरीर की उस जड़ता और मलिनता को तोड़कर उसे पुनः चैतन्य करने की प्रक्रिया है। यह स्नान साधक को उस 'तमस' से बाहर निकालता है जो निद्रा के समय शरीर पर हावी हो गया था।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ ५.१३ ॥

वशी देहधारी मनसे सब कर्मोंको त्यागकर नौ द्वारोंवाले (शरीररूपी) पुरमें सुखसे रहता है — न करता है, न कराता है।

भगवद्गीता ५.१३गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 154

यहाँ श्रीमद्भगवद्गीता में शरीर को 'नवद्वारे पुरे' (नौ द्वारों वाला नगर) कहा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों ही शरीर की इस संरचना को स्वीकार करते हैं। जहाँ गीता इस 'पुर' के भीतर रहने वाले देही को वशीभूत होकर सुखपूर्वक रहने का निर्देश देती है, वहीं यह स्मृति उस 'पुर' की अशुचिता को दिखाकर साधक को सचेत करती है। स्मृति का दृष्टिकोण यह है कि जब तक यह 'पुर' (शरीर) मलिन है, तब तक इसके भीतर रहने वाला देही पूर्णतः शुद्ध और एकाग्र नहीं हो सकता। अतः बाहरी शुद्धि (स्नान) को आंतरिक शुद्धि (योग) की पहली सीढ़ी माना गया है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'वैराग्य' और 'जागरूकता' का है। साधक जब यह अनुभव करता है कि उसका शरीर 'अत्यन्तमलिनः' है और निरंतर स्रावित हो रहा है, तब उसके भीतर 'देहासक्ति' (शरीर के प्रति मोह) ढीली होने लगती है। यह बोध कि "मैं इस टपकते हुए, मलिन शरीर के समान नहीं हूँ", साधक को शरीर से ऊपर उठकर 'द्रष्टा' बनने की ओर ले जाता है।

साधक प्रातःकाल स्नान करते समय केवल जल का स्पर्श नहीं करता, बल्कि यह अनुभव करता है कि वह अपने शरीर के नौ द्वारों से होने वाले अनावश्यक रिसाव (ऊर्जा के क्षय) को रोक रहा है और स्वयं को शोधित कर रहा है। यह स्नान एक 'संस्कार' बन जाता है, जहाँ जल शरीर की मलिनता को धोता है और संकल्प मन की मलिनता को। इस प्रकार साधक स्थूल शरीर की शुद्धि से सूक्ष्म शरीर की शुद्धि की ओर अग्रसर होता है, जिससे वह आगामी जप और ध्यान के लिए एक निर्मल पात्र बन सके।

श्लोक ७.१२४

तस्मात् प्रातः प्रशंसन्ति स्नानमेव हि नित्यशः ।

कालमालम्ब्य कर्तव्यं मध्यमे सवने तथा ॥ ७.१२४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७४

इसलिए (विद्वान्) प्रातःकाल नित्य स्नानकी ही प्रशंसा करते हैं; और समय देखकर मध्याह्न सवनमें भी (स्नान) करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर की स्वाभाविक मलिनता और नौ छिद्रों से होने वाले निरंतर स्राव का वर्णन करते हुए प्रातःस्नान को उसका शोधन बताया। इसी तार्किक क्रम को पूर्ण करते हुए, वर्तमान श्लोक में वे स्नान के समय और उसकी नित्यता के विधान को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

तस्मात् (विद्वांसः) प्रातः स्नानमेव नित्यशः प्रशंसन्ति; कालम् आलम्ब्य (स्नानं) कर्तव्यं मध्यमे सवने तथा ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. तस्मात्: इसलिए। यह शब्द पिछले श्लोक (७.१२३) के कारण को आधार बना रहा है—चूँकि शरीर निरंतर स्रावित और मलिन होता रहता है, इसलिए स्नान अनिवार्य है।

२. नित्यशः: प्रतिदिन, बिना किसी त्रुटि के। यह केवल एक क्रिया नहीं, अपितु एक अनुशासन है।

३. कालम् आलम्ब्य: समय का आश्रय लेकर या समय के अनुसार। यहाँ 'आलम्ब्य' का अर्थ है कि स्नान केवल जल डालना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय समय के साथ अपने शरीर का सामंजस्य बिठाना है।

४. मध्यमे सवने: मध्याह्न के सवन (अग्निहोत्र/संध्या) के समय। सवन का अर्थ है आहुति देना या अर्पण करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य शरीर की शुद्धि को केवल बाह्य स्वच्छता नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक तैयारी के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं कि विद्वान पुरुष प्रातःकाल के स्नान की प्रशंसा करते हैं। यहाँ 'प्रशंसा' शब्द का प्रयोग यह संकेत देता है कि प्रातःस्नान केवल एक सामाजिक रीति नहीं, बल्कि एक ऐसा साधन है जो साधक की चेतना को जाग्रत करता है।

प्रातःकाल का समय वह संधि-काल है जब रात्रि का अंधकार (तमस) और दिन का प्रकाश (सत्व) मिलते हैं। इस समय स्नान करने से शरीर की जड़ता टूटती है और मन आगामी दिन के धर्म-कर्मों के लिए तत्पर होता है। ऋषि ने 'नित्यशः' शब्द पर बल दिया है, क्योंकि योगिक मार्ग में निरंतरता (अभ्यास) ही सिद्धि का आधार है। यदि स्नान में अनियमितता हो, तो शरीर के साथ-साथ मन की शुद्धि में भी व्यवधान आता है।

इसके साथ ही, महर्षि 'मध्यमे सवने' अर्थात् मध्याह्न के समय भी स्नान का निर्देश देते हैं। वैदिक परंपरा में तीन सवन (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल) होते हैं। मध्याह्न का समय सूर्य की उच्चतम स्थिति का होता है, जिसे 'मध्यम सवन' कहा गया है। इस समय सूर्य की प्रखरता शरीर और मन में उष्णता बढ़ाती है। समय का आश्रय लेकर (कालमालम्ब्य) किया गया यह स्नान साधक को पुनः केंद्रित करता है और मध्याह्न की तपिश से उत्पन्न होने वाले मानसिक विचलितपन को शांत कर उसे पुनः साधना में लीन करने में सहायक होता है।

अतः यहाँ स्नान की दो अवस्थाएँ बताई गई हैं: एक जो दिन का आरम्भ करती है (प्रातःस्नान) और दूसरी जो दिन के मध्य में ऊर्जा का संतुलन करती है (मध्याह्न स्नान)।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'काया-शुद्धि' और 'काल-शुद्धि' का समन्वय है। योग में शरीर को 'देवालय' माना गया है। जिस प्रकार मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश से पूर्व बाह्य प्रांगण की शुद्धि आवश्यक है, उसी प्रकार अंतर्यामी पुरुष के ध्यान के लिए शरीर का शोधन अनिवार्य है।

प्रातःकाल का स्नान साधक के लिए 'प्राण-जाग्रति' का अभ्यास है। जब शीतल जल शरीर के स्पर्श करता है, तो वह सुप्त इंद्रियों को झंकृत कर देता है, जिससे साधक 'तमस' से 'रजस' और फिर 'सत्व' की ओर बढ़ता है। मध्याह्न का स्नान 'ऊर्जा-संतुलन' का अभ्यास है। सूर्य जब शिखर पर होता है, तब शरीर में पित्त और उष्णता बढ़ती है, जो क्रोध या व्याकुलता का कारण बन सकती है। इस समय स्नान करना साधक को पुनः शांत भाव में लाता है, जिससे वह मध्याह्न की साधना को बिना किसी मानसिक अवरोध के पूर्ण कर सके।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि उसका शरीर प्रकृति के चक्र (सूर्य की गति) से अलग नहीं है। जब वह समय के अनुसार स्नान करता है, तो वह अपनी व्यक्तिगत चेतना को ब्रह्मांडीय लय में मिला देता है, जिससे उसकी साधना अधिक प्रभावी हो जाती है।

श्लोक ७.१२५

सवनत्रयं तु यः कुर्यात् स्नानमेव हि नित्यशः ।

स गच्छति परं स्थानं ब्रह्मणः सदनं द्विजः ॥ ७.१२५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७४

जो द्विज नित्य तीनों सवनोंमें स्नान ही करता है, वह परम स्थान ब्रह्मलोकको जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रातःकाल के साथ-साथ मध्याह्न सवन के समय स्नान करने का विधान बताया। अब वर्तमान श्लोक में वे स्नान की पूर्णता और उसकी नित्यता का फल बताते हुए इसे मोक्ष के मार्ग से जोड़ रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यः द्विजः नित्यशः सवनत्रयं तु स्नानमेव कुर्यात्, स ब्रह्मणः सदनं परं स्थानं गच्छति ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. सवनत्रयं: तीनों सवन। वैदिक परंपरा में दिन के तीन समय (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल) अग्निहोत्र की आहुतियां दी जाती हैं, जिन्हें 'सवन' कहते हैं। यहाँ स्नान को सवन के साथ जोड़कर उसे एक 'यज्ञ' का रूप दिया गया है।

२. नित्यशः: प्रतिदिन, बिना किसी त्रुटि के। यह निरंतरता ही अभ्यास को सिद्धि में बदलती है।

३. द्विजः: वह जो दूसरी बार जन्मा हो। शाब्दिक अर्थ ब्राह्मण है, किन्तु योगिक अर्थ में वह है जिसने संस्कार और ज्ञान के द्वारा अपनी जड़ता को त्यागकर आध्यात्मिक पुनर्जन्म लिया है।

४. परं स्थानं / ब्रह्मणः सदनं: ब्रह्मलोक या वह सर्वोच्च अवस्था जहाँ आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है। यह केवल मृत्यु के बाद का स्थान नहीं, अपितु जीवन में प्राप्त होने वाली 'ब्रह्म-स्थिति' भी है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान को केवल शरीर की शुद्धि नहीं, अपितु एक 'जलाभिषेक' और 'यज्ञ' के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो द्विज नित्य तीनों सवनों (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल) में स्नान करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।

यहाँ 'सवनत्रयं' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः सवन का अर्थ अग्नि में आहुति देना होता है, किन्तु यहाँ स्नान को सवन कहा गया है। इसका भाव यह है कि जब साधक पवित्र भाव से जल के स्पर्श से अपने शरीर और मन को शुद्ध करता है, तो वह स्नान स्वयं एक आहुति बन जाता है। जिस प्रकार अग्निहोत्र में आहुति देकर साधक देवताओं को तृप्त करता है, उसी प्रकार तीनों समय का स्नान शरीर के भीतर स्थित 'अग्नि' (जठराग्नि और प्राण-अग्नि) को संतुलित करता है और बाहरी मलिनता के साथ-साथ आंतरिक संस्कारों के मैल को धोता है।

यह विधान केवल बाह्य विधि नहीं है। यदि कोई व्यक्ति केवल शरीर धोता है किन्तु मन में द्वेष और अहंकार रखता है, तो वह 'द्विज' नहीं कहलाता। यहाँ 'द्विज' शब्द यह संकेत देता है कि यह फल उसी को मिलेगा जिसने अपनी बुद्धि को संस्कारित किया है। नित्य स्नान का अर्थ है—चेतना को निरंतर जाग्रत रखना। जब साधक दिन के तीनों संधि-कालों में स्वयं को जल से शुद्ध करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'अक्षर' (अविनाशी तत्व) का स्मरण कर रहा होता है। इस अनुशासन से उसकी इंद्रियाँ वश में होती हैं और वह स्थूल शरीर के मोह से मुक्त होकर 'परं स्थान' अर्थात ब्रह्मसदन की ओर अग्रसर होता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' और 'अनुशासन' के सिद्धांत पर आधारित है। साधक के लिए तीनों सवनों का स्नान तीन स्तरों की शुद्धि है:

१. प्रातः स्नान: यह 'तमस' का नाश कर 'सत्व' की स्थापना है, जिससे दिन का आरम्भ प्रफुल्लित मन से होता है।

२. मध्याह्न स्नान: यह दिन के मध्य में उत्पन्न होने वाले मानसिक तनाव और शरीर की उष्णता (पित्त) को शांत कर पुनः एकाग्रता लाने का साधन है।

३. सायंकाल स्नान: यह दिन भर के कर्मों और बाहरी जगत के प्रभावों (संस्कारों) को धोकर अंतर्मुखी होने की तैयारी है।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि शरीर केवल हाड़-मांस का पुंज नहीं, बल्कि एक मंदिर है। जब वह नित्य तीन बार इस मंदिर का अभिषेक करता है, तो उसकी चेतना 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर बढ़ती है। यह अभ्यास उसे 'भूमिका' से 'सिद्धि' की ओर ले जाता है, जहाँ शरीर की शुद्धि मन की शुद्धि बनती है और मन की शुद्धि अंततः आत्मा के साक्षात्कार (ब्रह्मसदन) का मार्ग प्रशस्त करती है।

स्नानहोमजपाद्याचरणावश्यकता

श्लोक ७.१२६

मनःप्रसादजननं रूपसौभाग्यवर्धनम् ।

शोकदुःस्वप्नहृत् स्नानमोजःप्रह्लादनं तथा ॥ ७.१२६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७४

स्नान मनको प्रसन्न करता है, रूप और सौभाग्य बढ़ाता है, शोक और दुःस्वप्नको हरता है, ओजको आनन्दित करता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर की मलिनता का वर्णन करते हुए प्रातःकालीन स्नान की अनिवार्यता बताई और तीनों सवनों में स्नान करने वाले द्विज की ब्रह्म-स्थिति का संकेत दिया। अब वर्तमान श्लोक में वे स्नान के उन मनोवैज्ञानिक और शारीरिक लाभों का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को उच्चतर साधना के लिए तैयार करते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

स्नानं मनःप्रसादजननं, रूप-सौभाग्यवर्धनम्, शोक-दुःस्वप्नहृत्, तथा ओजःप्रह्लादनं (च अस्ति) ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. मनःप्रसादजननं: मन के 'प्रसाद' को उत्पन्न करने वाला। 'प्रसाद' का अर्थ केवल प्रसन्नता नहीं, अपितु चित्त की वह निर्मलता और स्थिरता है जहाँ विचार शांत हो जाते हैं और अंतःकरण दर्पण की भाँति स्वच्छ हो जाता है।

२. रूप-सौभाग्यवर्धनम्: बाह्य कान्ति (रूप) और जीवन के शुभ संयोगों (सौभाग्य) को बढ़ाने वाला।

३. शोक-दुःस्वप्नहृत्: शोक (मानसिक क्लेश) और दुःस्वप्न (अचेतन मन के भय और विकार) को हरने वाला। 'हृत्' का अर्थ है—जड़ से मिटा देने वाला।

४. ओजःप्रह्लादनं: ओज को प्रह्लादित करने वाला। 'ओज' वह सूक्ष्म तेज है जो शरीर के सार तत्व और मानसिक शक्ति के मिलन से उत्पन्न होता है। 'प्रह्लादन' का अर्थ है—आनन्दित करना या उसे जागृत कर प्रसारित करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान को केवल एक बाह्य शुद्धि क्रिया नहीं, अपितु एक 'मानसिक औषधि' और 'ऊर्जा-संचरण' की विधि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जल का स्पर्श केवल त्वचा की गंदगी नहीं हटाता, अपितु वह अंतःकरण के स्तर पर गहरा प्रभाव डालता है।

प्रथम लाभ 'मनःप्रसाद' है। जब जल शरीर के मर्मों और त्वचा के छिद्रों को स्पर्श करता है, तो वह जड़ता को तोड़ता है और मन को एक विशेष प्रकार की प्रसन्नता और स्थिरता प्रदान करता है। योगिक दृष्टि से, जब तक मन 'प्रसन्न' (निर्मल) नहीं होता, तब तक ध्यान में एकाग्रता संभव नहीं है। अतः स्नान यहाँ ध्यान की पूर्व-तैयारी है।

द्वितीय लाभ 'रूप और सौभाग्य' का वर्धन है। यहाँ 'रूप' का अर्थ केवल शारीरिक सुंदरता नहीं, अपितु वह 'तेज' है जो शुद्ध शरीर और शांत मन से स्वतः प्रकट होता है। सौभाग्य का अर्थ है—साधना के अनुकूल वातावरण और मानसिक स्थिति का प्राप्त होना।

तृतीय लाभ 'शोक और दुःस्वप्न' का निवारण है। शोक मन की वह अवस्था है जहाँ चेतना संकुचित हो जाती है, और दुःस्वप्न अवचेतन में दबे हुए विकारों का प्रकटीकरण हैं। जल की शीतलता और प्रवाह इन मानसिक अवरोधों को धो देते हैं, जिससे साधक का चित्त हल्का होता है और वह विषाद से मुक्त होकर वर्तमान क्षण में स्थित हो पाता है।

अन्त में, स्नान 'ओज' को प्रह्लादित करता है। ओज वह जीवनी शक्ति है जो साधक के चेहरे पर आभा और वाणी में ओज उत्पन्न करती है। जब शरीर शुद्ध होता है, तो प्राण का प्रवाह सुगम हो जाता है, जिससे ओज का विस्तार होता है और साधक स्वयं को ऊर्जावान और आनन्दित अनुभव करता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की यात्रा का सूत्र है। स्नान का बाह्य अभ्यास वास्तव में 'चित्त-शुद्धि' का अभ्यास है।

१. मनःप्रसाद का अभ्यास: साधक जब स्नान करे, तो वह केवल शरीर को न धोए, बल्कि यह अनुभव करे कि जल के साथ उसके मन के सारे विकार, क्रोध और मोह बह रहे हैं। यह 'मनःप्रसाद' की अवस्था उसे 'सात्विक भूमि' पर ले जाती है, जहाँ से वह जप और ध्यान की ओर अग्रसर हो सकता है।

२. ओज का अनुभव: ओज का प्रह्लादन वास्तव में प्राणशक्ति का जागरण है। जब शरीर की जड़ता समाप्त होती है, तो प्राण ऊपर की ओर गति करते हैं। साधक इस स्नान के माध्यम से अपने भीतर के 'सूर्य' (तेज) को जागृत करता है।

३. शोक-निवारण: दुःस्वप्न और शोक मानसिक 'मल' हैं। स्नान के समय जल के प्रवाह को मानसिक प्रवाह मानकर साधक अपने अवचेतन की गंदगी को विसर्जित करता है, जिससे वह 'भय-मुक्त' होकर समाधि की ओर बढ़ सकता है।

संक्षेप में, यह श्लोक बताता है कि बाह्य स्नान यदि सजगता के साथ किया जाए, तो वह आंतरिक स्नान बन जाता है, जो साधक को मानसिक क्लेशों से मुक्त कर ओजपूर्ण और प्रसन्न चित्त बनाता है।

स्नानदानजपध्यानादिफलम्

श्लोक ७.१२७

स्नानहोमजपातिथ्यं नाचरेच्छक्तिमांस्तु यः ।

वृथा हि जीवितं तस्य परलोकात् स हीयते ॥ ७.१२७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७४

जो समर्थ होते हुए भी स्नान, होम, जप और अतिथि-सत्कार नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ है; वह परलोकसे वञ्चित हो जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान के शारीरिक और मानसिक लाभों का वर्णन करते हुए इसे ओज और सौभाग्य वर्धक बताया। अब वे इस शुद्धि को व्यापक आधार देते हुए इसे अन्य अनिवार्य वैदिक कर्तव्यों के साथ जोड़कर, उनकी उपेक्षा करने के दुष्परिणामों को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

शक्तिमान् यः (तु) स्नान-होम-जप-अतिथ्यं न आचरेत्, तस्य जीवितं वृथा हि (अस्ति), स ही परलोकात् हीयते ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. शक्तिमान्: यहाँ 'शक्ति' का अर्थ केवल शारीरिक बल नहीं, अपितु साधन-सामग्री की उपलब्धता, मानसिक स्वास्थ्य और शास्त्र-बोध से युक्त होना है। जो इन चारों क्रियाओं को करने में सक्षम है, वह 'शक्तिमान्' है।

२. अतिथ्यं: अतिथि का सत्कार। योगिक दृष्टि से यह 'पर' में 'स्व' को देखने और अहंकार के विसर्जन का अभ्यास है।

३. वृथा: व्यर्थ या निष्फल। जिसका कोई आध्यात्मिक उद्देश्य या परिणाम न निकले।

४. परलोकात् हीयते: परलोक से वञ्चित होना। यहाँ 'परलोक' का अर्थ केवल मृत्यु के बाद का स्थान नहीं, अपितु 'पर' यानी उच्चतर चेतना की अवस्था से दूर हो जाना है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक गंभीर चेतावनी दे रहे हैं। वे स्नान, होम, जप और अतिथि-सत्कार—इन चार क्रियाओं को एक सूत्र में पिरो रहे हैं। यह सूत्र है—'शुद्धि और समर्पण'।

स्नान शरीर की शुद्धि है, होम (अग्निहोत्र) प्राणों और पर्यावरण की शुद्धि है, जप मन की शुद्धि है और अतिथि-सत्कार हृदय (भावों) की शुद्धि है। जब कोई व्यक्ति 'शक्तिमान्' होते हुए भी इन क्रियाओं का त्याग करता है, तो वह वास्तव में अपनी शुद्धि के द्वार बंद कर लेता है।

ऋषि कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति का जीवन 'वृथा' है। जीवन वृथा तब होता है जब वह केवल जैविक अस्तित्व बनकर रह जाए और आध्यात्मिक विकास की दिशा में एक पग भी न बढ़े। जो व्यक्ति अपनी क्षमताओं का उपयोग स्वयं को और समाज को परिष्कृत करने में नहीं करता, वह जीवन के वास्तविक प्रयोजन से चूक जाता है।

'परलोकात् हीयते' का गहरा रहस्य यह है कि जो व्यक्ति अपनी देह, प्राण, मन और हृदय को शुद्ध नहीं करता, वह उस सूक्ष्म यंत्र (शरीर) को तैयार नहीं कर पाता जो उच्चतर लोकों या उच्चतर चेतना के स्पंदनों को ग्रहण कर सके। अशुद्ध दर्पण में सूर्य का प्रतिबिंब नहीं दिखता; वैसे ही अशुद्ध अंतःकरण वाला व्यक्ति उस 'पर' तत्व या परमात्मा का अनुभव करने में असमर्थ रहता है। वह संसार के स्थूल बंधनों में ही फँसा रह जाता है और चेतना के उत्थान से वञ्चित हो जाता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'साधना की निरंतरता' और 'समग्रता' का पाठ है। योग केवल आसन या प्राणायाम नहीं, अपितु जीवन की समग्र शुद्धि है।

१. स्नान से साधक अपनी बाह्य त्वचा और मर्मों को जागृत करता है।

२. होम के माध्यम से वह अपने भीतर के क्रोध, लोभ और मोह को ज्ञान की अग्नि में आहुत करना सीखता है।

३. जप से वह मन के बिखराव को रोककर उसे एक बिंदु (एकाग्रता) पर लाता है।

४. अतिथि-सत्कार से वह 'स्व' के संकुचित घेरे को तोड़कर विस्तार का अनुभव करता है।

यदि इनमें से एक भी अंग छूट जाए, तो साधना अधूरी रहती है। जो साधक इन चारों का समन्वय करता है, वह स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म शरीर से अक्षर (ब्रह्म) की ओर अग्रसर होता है। इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक स्वयं से पूछे—"क्या मैं अपनी पूर्ण शक्ति का उपयोग अपनी आंतरिक और बाह्य शुद्धि के लिए कर रहा हूँ?" यदि वह समर्थ होकर भी आलस्यवश इन क्रियाओं को छोड़ता है, तो वह अपनी ही चेतना के विकास का मार्ग अवरुद्ध कर रहा है।

श्लोक ७.१२८

स्नानं दानं जपो ध्यानं पितृदेवार्चनं तथा ।

पावनानि मनुष्याणां दुष्कृतस्येह कर्मणः ॥ ७.१२८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७४

स्नान, दान, जप, ध्यान और पितरों-देवताओंका अर्चन — ये मनुष्योंके यहाँके दुष्कर्मोंको पवित्र करनेवाले हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान की शारीरिक और मानसिक महिमा बताते हुए इसे ओज-वर्धन और सौभाग्य-कारक सिद्ध किया। अब वे इस शुद्धि-प्रक्रिया को व्यापक आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए उन पाँच अनिवार्य क्रियाओं का उल्लेख कर रहे हैं, जो मनुष्य के संचित पापों का क्षय कर उसे पावन करती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

स्नानं, दानं, जपो, ध्यानं, पितृ-देव-अर्चनं तथा (एतानि) मनुष्याणां इह दुष्कृतस्य कर्मणः पावनानि (भवन्ति) ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. पावनानि: पवित्र करने वाले। 'पावन' वह है जो मल (अशुद्धि) को हटाकर मूल स्वरूप को प्रकट करे।

२. दुष्कृतस्य कर्मणः: दुष्कर्मों के। यहाँ दुष्कर्म का अर्थ केवल नैतिक पाप नहीं, अपितु वे संस्कार और मानसिक अवरोध हैं जो आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से अलग करते हैं।

३. इह: यहाँ, इस लोक में। यह संकेत है कि इन क्रियाओं का फल केवल परलोक में नहीं, अपितु इसी जीवन में मानसिक शांति और चित्त-शुद्धि के रूप में प्राप्त होता है।

४. पितृ-देवार्चनम्: पितरों और देवताओं की पूजा। पितृ-अर्चन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता (ऋण-मुक्ति) है और देवार्चन ईश्वरीय गुणों के प्रति समर्पण।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन पाँच साधनों का विधान कर रहे हैं, जो मनुष्य के जीवन में व्याप्त अशुद्धियों का निवारण करते हैं। ऋषि कहते हैं कि स्नान, दान, जप, ध्यान और पितृ-देवार्चन—ये पाँचों क्रियाएँ मनुष्यों के इस लोक में किए गए दुष्कर्मों को पावन करने वाली हैं।

यहाँ 'पावन' करने का अर्थ केवल पापों का मिटना नहीं, अपितु चित्त का परिष्कार है। याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, अतः वे इन बाहरी क्रियाओं के पीछे छिपे आन्तरिक शोधन को देख रहे हैं।

प्रथम 'स्नान' शरीर और इंद्रियों की शुद्धि करता है। द्वितीय 'दान' के माध्यम से साधक अपने 'ममता' और 'मोह' के बंधन को काटता है, जिससे हृदय उदार होता है। तृतीय 'जप' वाणी और मन के बिखराव को रोककर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करता है। चतुर्थ 'ध्यान' उस एकाग्रता को गहरे मौन में ले जाकर आत्मा के साक्षात्कार का मार्ग खोलता है। और पाँचवाँ 'पितृ-देवार्चन' साधक को उसके मूल और लक्ष्य से जोड़ता है।

जब ये पाँचों क्रियाएँ समन्वित रूप से की जाती हैं, तब मनुष्य के भीतर जमा 'दुष्कृत' यानी नकारात्मक संस्कार जलकर भस्म हो जाते हैं। यह प्रक्रिया एक पूर्ण चक्र है—स्नान से स्थूल शरीर, दान से अहंकार, जप से मन, ध्यान से बुद्धि और अर्चन से भाव शुद्ध होते हैं। इस प्रकार मनुष्य पूर्णतः पावन होकर उच्चतर चेतना के लिए तैयार होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-शुद्धि' का एक संपूर्ण मार्गचित्र है। योग में जब तक चित्त मलिन रहता है, तब तक ध्यान स्थिर नहीं होता। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'पावन' करने की एक क्रमिक विधि दी है।

साधक पहले स्नान द्वारा शरीर को शिथिल और शुद्ध करता है, फिर दान द्वारा आसक्ति का त्याग करता है। जब शरीर और आसक्ति शांत होते हैं, तब 'जप' के माध्यम से मन की चंचलता समाप्त होती है। यह जप ही 'ध्यान' की आधारशिला बनता है। अंत में, अर्चन के माध्यम से वह अपनी व्यक्तिगत चेतना को विराट चेतना (देवत्व) में विलीन कर देता है।

इस अभ्यास से साधक 'कर्म-भूमि' से उठकर 'ज्ञान-भूमि' की ओर अग्रसर होता है। वह अनुभव करता है कि उसके दुष्कर्म वास्तव में अज्ञानता के कारण हुए थे, और इन पाँचों क्रियाओं के अभ्यास से वह अज्ञान का पर्दा हट रहा है। यह श्लोक साधक को यह सिखाता है कि बाहरी विधि और आन्तरिक योग अलग-अलग नहीं हैं; बाहरी विधि ही आन्तरिक योग का द्वार है।

जपयज्ञविधिनिरूपणप्रतिज्ञा · जपयज्ञप्रशंसा

श्लोक ७.१२९

जपस्येह विधिं वक्ष्ये यथा कार्यं विधानतः ।

ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।

सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ७.१२९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७४

अब मैं यहाँ जपकी विधि कहूँगा, जैसे विधानपूर्वक करनी चाहिए। जो चार पाकयज्ञ विधियज्ञ सहित हैं, वे सब जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्नान की शारीरिक और मानसिक महिमा बताते हुए इसे ओज-वर्धन और सौभाग्य-कारक सिद्ध किया। उन्होंने स्नान, दान, जप, ध्यान और अर्चन को मनुष्य के दुष्कर्मों का परिहार करने वाला बताया। अब वे इन पावन क्रियाओं में से 'जप' की विशिष्टता और उसकी विधि के विवेचन की ओर अग्रसर हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(अहं) इह जपस्य विधिं विधानतः यथा कार्यं वक्ष्ये । ये चत्वारो पाकयज्ञाः विधियज्ञसमन्विताः (सन्ति), ते सर्वे जपयज्ञस्य षोडशीं कलां नार्हन्ति ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. विधिं विधानतः: 'विधि' वह प्रक्रिया है जिससे लक्ष्य की प्राप्ति हो, और 'विधान' वह शास्त्र-सम्मत नियम है जो उस प्रक्रिया को त्रुटिहीन बनाता है। यहाँ याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, अपितु एक शास्त्र-सम्मत अनुशासन है।

२. पाकयज्ञाः: वे यज्ञ जिनमें अन्न पकाकर (हवि के रूप में) देवताओं को अर्पित किया जाता है। ये स्थूल यज्ञ हैं जिनमें सामग्री, अग्नि और बाहरी कर्मकांड की प्रधानता होती है।

३. विधियज्ञसमन्विताः: उन पाकयज्ञों के साथ जो अन्य अनिवार्य विधियाँ (जैसे संकल्प, आवाहन, मन्त्रोपचार) जुड़ी होती हैं, उन सबको मिलाकर भी।

४. कलां नार्हन्ति षोडशीम्: 'कला' का अर्थ है सूक्ष्म अंश। १६ कलाओं को एक पूर्ण इकाई माना जाता है। यहाँ 'सोलहवीं कला' का अर्थ है—एक पूर्ण इकाई का १६वाँ हिस्सा। अर्थात्, समस्त पाकयज्ञ मिलकर भी जपयज्ञ के १६वें हिस्से के समान नहीं हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य जप की महिमा को स्थापित करते हुए उसकी विधि के वर्णन का आरम्भ कर रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि अब मैं यहाँ जप की वह विधि बताऊंगा जिसे विधानपूर्वक (शास्त्रानुसार) करना चाहिए।

इस श्लोक का मुख्य उद्देश्य साधक को 'कर्म' से 'मन्त्र' की ओर, और 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाना है। याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गंभीर तुलना कर रहे हैं। वे कहते हैं कि चार प्रकार के पाकयज्ञ, जो अपनी पूर्ण विधि और सामग्री के साथ संपन्न किए जाते हैं, वे सब मिलकर भी जपयज्ञ की सोलहवीं कला के बराबर नहीं हैं।

इसका भाव यह है कि बाहरी यज्ञों में सामग्री (हवि), अग्नि और बाहरी क्रियाओं की आवश्यकता होती है, जिनमें त्रुटि की संभावना अधिक रहती है और जो भौतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इसके विपरीत, 'जपयज्ञ' एक ऐसा आंतरिक यज्ञ है जिसमें साधक की वाणी, मन और प्राण ही हवि बन जाते हैं। जब मन्त्र का जप विधिपूर्वक किया जाता है, तो वह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं रह जाता, बल्कि एक 'यज्ञ' बन जाता है—'जपयज्ञ'। इस यज्ञ की अग्नि साधक के हृदय में प्रज्वलित होती है, जो मानसिक विकारों और संचित संस्कारों को भस्म करती है। अतः, सामग्री प्रधान यज्ञों की तुलना में मन्त्र-प्रधान जपयज्ञ अनंत गुना अधिक प्रभावशाली और सूक्ष्म है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः । सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २.८६ ॥

जो चार पाकयज्ञ विधियज्ञ सहित हैं, वे सब जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं।

मनुस्मृति २.८६मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 178

मनुस्मृति में भी ठीक इसी कथन की पुष्टि की गई है कि चार पाकयज्ञ विधियज्ञ सहित होने पर भी जपयज्ञ की सोलहवीं कला के तुल्य नहीं हैं। यह दर्शाता है कि वैदिक परंपरा में जप को कर्मकांड के शिखर पर रखा गया है। जहाँ मनुस्मृति इसे एक विधि के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसे योग की दृष्टि से 'यज्ञ' के रूप में परिभाषित कर रही है, जहाँ साधक स्वयं ही यज्ञ-वेदी और स्वयं ही आहुति बन जाता है।

योग-रहस्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में जप केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि ध्वनि के माध्यम से चेतना का रूपांतरण है। एक साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास यह है कि वह अपनी साधना को 'क्रिया' से उठाकर 'यज्ञ' के स्तर पर ले जाए।

बाहरी यज्ञों में ऊर्जा बाहर की ओर (देवताओं की ओर) प्रवाहित होती है, किंतु जपयज्ञ में ऊर्जा का प्रवाह भीतर की ओर होता है। जब साधक 'विधानतः' (विधिपूर्वक) जप करता है, तो वह अपनी बिखरी हुई मानसिक वृत्तियों को समेटकर एक बिंदु पर केंद्रित करता है। यहाँ 'सोलहवीं कला' का संकेत यह है कि जप की सूक्ष्मता इतनी अधिक है कि वह स्थूल कर्मों की समस्त सामर्थ्य को तुच्छ कर देती है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसे किसी बाहरी सामग्री की आवश्यकता नहीं है; उसका अपना मन ही यज्ञ-कुण्ड है और मन्त्र उस कुण्ड में डाली जाने वाली शुद्ध आहुति है। यह अभ्यास साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'साधना-भूमि' में प्रतिष्ठित करता है, जहाँ वह यह जान जाता है कि वाणी का संयमित और एकाग्र प्रयोग ही सबसे बड़ा तप और सबसे श्रेष्ठ यज्ञ है।

श्लोक ७.१३०

जप्येनैव हि संसिध्येत् ब्राह्मणो नात्र संशयः ।

कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ ७.१३० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७५

ब्राह्मण जपसे ही सिद्धि पाता है, इसमें संशय नहीं; वह दूसरा (कर्म) करे या न करे, (सबका) मित्र ब्राह्मण कहलाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जपयज्ञ की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए बताया कि समस्त पाकयज्ञ और विधियज्ञ मिलकर भी जप की सोलहवीं कला के तुल्य नहीं हैं। अब वे इस श्रेष्ठता के कारण को स्पष्ट करते हुए यह बताते हैं कि जप किस प्रकार साधक को सिद्धि तक ले जाता है और उसके व्यक्तित्व में क्या परिवर्तन लाता है।

अन्वय और पदार्थ —

ब्राह्मणो हि जप्येनैव संसिध्येत्, नात्र संशयः । (सः) अन्यन्न कुर्यात् वा न कुर्यात्, (तथापि) मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. जप्येनैव: 'जप्य' वह मन्त्र है जो जप के योग्य हो। 'एव' का प्रयोग यहाँ अनन्यता दिखाने के लिए है, अर्थात् केवल जप के माध्यम से ही।

२. संसिध्येत्: 'सिद्धि' का अर्थ केवल चमत्कारिक शक्ति नहीं, अपितु मन्त्र के देवता के साथ एकरूपता और चित्त की पूर्ण स्थिरता है।

३. नात्र संशयः: यह ऋषि का दृढ़ निश्चय है कि जप के बिना आध्यात्मिक पूर्णता संभव नहीं है।

४. अन्यन्न वा कुर्यान्: 'अन्य' का अर्थ है अन्य बाहरी कर्म, जैसे विस्तृत अनुष्ठान, जटिल यज्ञ या केवल शास्त्र-विद्वत्ता।

५. मैत्रो ब्राह्मण: 'मैत्र' का अर्थ है सबका मित्र, जो सबके प्रति मैत्री-भाव रखे। यहाँ ब्राह्मण का अर्थ केवल जन्मजात जाति नहीं, अपितु उस 'ब्रह्म-ज्ञानी' या साधक से है जो ब्रह्म की खोज में रत है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य जप की उस शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं जो साधक को 'सिद्धि' तक पहुँचाती है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि ब्राह्मण (साधक) की वास्तविक सिद्धि केवल जप से ही संभव है। यहाँ 'सिद्धि' का अर्थ है—मन्त्र के बीज-रूप शक्ति का जाग्रत होना और उस शक्ति का साधक के प्राणों में विलीन हो जाना। जब मन्त्र केवल वाणी का शब्द न रहकर हृदय की धड़कन बन जाता है, तब वह सिद्धि कहलाता है।

ऋषि एक अत्यंत गंभीर बात कहते हैं कि साधक अन्य बाहरी कर्म करे या न करे, यदि वह जप में स्थित है, तो वह 'मैत्र' ब्राह्मण कहलाता है। इसका गहरा अर्थ यह है कि बाहरी कर्मकांडों का पालन कभी-कभी अहंकार या सामाजिक प्रतिष्ठा का कारण बन जाता है, जिससे व्यक्ति में भेद-भाव उत्पन्न हो सकता है। किंतु जप एक आन्तरिक प्रक्रिया है। जो साधक निरंतर जप में लीन रहता है, उसका चित्त शांत और निर्मल हो जाता है। ऐसा साधक समस्त चराचर जगत के प्रति करुणा और मैत्री का भाव रखने लगता है। वह किसी के प्रति द्वेष नहीं करता, क्योंकि उसे अपने भीतर ही उस ब्रह्म का अनुभव होने लगता है जो सबमें व्याप्त है। अतः जप केवल मन्त्र की पुनरावृत्ति नहीं, अपितु व्यक्तित्व का परिष्कार है जो साधक को 'मैत्र' बना देता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

जप्येनैव तु संसिध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ २.८७ ॥

ब्राह्मण जपसे ही सिद्धि पाता है, इसमें संशय नहीं; दूसरा (कर्म) करे या न करे — (सबका) मित्र (मैत्र) ब्राह्मण कहलाता है।

मनुस्मृति २.८७मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 232

मनुस्मृति में भी ठीक यही वचन कहा गया है कि ब्राह्मण जप से ही सिद्धि पाता है और जप के प्रभाव से वह 'मैत्र' कहलाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति के इस पूर्ण मेल से यह सिद्ध होता है कि वैदिक परम्परा में जप को केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि सिद्धि का एकमात्र और अनिवार्य साधन माना गया है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि बाहरी कर्मों की तुलना में आन्तरिक जप का प्रभाव व्यक्तित्व को अधिक उदार और मैत्रीपूर्ण बनाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'अहिंसक यज्ञ' का बोध कराता है। बाहरी यज्ञों में हवि दी जाती है, सामग्री का उपयोग होता है, किंतु जपयज्ञ में केवल 'प्राण' और 'मन' की आहुति होती है। यह एक ऐसा यज्ञ है जिसमें किसी जीव को कष्ट नहीं दिया जाता, इसलिए जपी स्वभाव से ही अहिंसक और 'मैत्र' हो जाता है।

साधक जब इस श्लोक के अनुसार अभ्यास करता है, तो वह 'कर्म' की भूमि से 'सिद्धि' की भूमि की ओर बढ़ता है। यहाँ 'मैत्र' होने का एक सूक्ष्म अर्थ यह भी संभव है कि साधक का सम्बन्ध 'मित्र' देवता (सूर्य के एक रूप) से प्रगाढ़ हो जाता है। चूँकि याज्ञवल्क्य सूर्यमण्डल के पुरुष के ज्ञाता हैं, अतः यहाँ 'मैत्र' का भाव सूर्य के उस प्रकाशमय स्वरूप से जुड़ना भी हो सकता है जो संपूर्ण जगत को समान रूप से आलोकित करता है। साधक जब जप के माध्यम से अपने हृदय के सूर्य को जाग्रत करता है, तो उसका अहंकार नष्ट हो जाता है और वह संपूर्ण सृष्टि के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। यह अवस्था साधक को द्वंद्वों से मुक्त कर उसे एक स्थिर और शांत मानसिक धरातल पर प्रतिष्ठित करती है।

जपकाले वर्ज्यानि

श्लोक ७.१३१

न च क्रमन्न विहसन्न पार्श्वमवलोकयन् ।

ना(नो)पाश्रितो न जल्पंश्च न प्रावृत्य शिरस्तथा ॥ ७.१३१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७५

न चलते हुए, न हँसते हुए, न बगलमें देखते हुए, न (किसी चीजका) सहारा लिये, न बात करते हुए, और न सिर ढँककर —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप की अनन्यता और उसकी सिद्धि-शक्ति का वर्णन किया। जब किसी साधन की महिमा इतनी अधिक हो, तो उसकी विधि में सूक्ष्मता और अनुशासन का होना अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि त्रुटिपूर्ण विधि फल को क्षीण कर देती है। इसी क्रम में अब ऋषि उन शारीरिक और मानसिक अवस्थाओं का निषेध कर रहे हैं, जो जप के समय ऊर्जा के क्षरण का कारण बनती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(जपेत्) न च क्रमन्, न विहसन्, न पार्श्वमवलोकयन्, न उपाश्रितः, न जल्पन्, न च शिरः प्रावृत्य (जपेत्)।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. क्रमन्: चलते हुए। यहाँ गति का अर्थ केवल शारीरिक चलना नहीं, अपितु चित्त की चंचलता भी है।

२. विहसन्: हँसते हुए। हँसना मन के प्रफुल्लन की एक बाहरी अभिव्यक्ति है, जो एकाग्रता को भंग करती है।

३. पार्श्वमवलोकयन्: बगल में या पार्श्व में देखते हुए। दृष्टि का भटकना मन के भटकने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

४. उपाश्रितः: किसी वस्तु का सहारा लेकर या टिककर। शरीर का किसी बाहरी अवलंबन पर निर्भर होना आलस्य और शिथिलता का संकेत है।

५. जल्पन्: व्यर्थ की बातें करना या बड़बड़ाना। मन्त्र के साथ अन्य शब्दों का मिश्रण जप की पवित्रता को नष्ट करता है।

६. शिरः प्रावृत्य: सिर को ढँककर। सिर को ढंकना यहाँ संकुचित चेतना या बाहरी दुनिया से पूर्ण विच्छेद के अहंकार का प्रतीक हो सकता है, अथवा यह मर्यादा के विरुद्ध माना गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जप के समय वर्जित शारीरिक मुद्राओं और मानसिक प्रवृत्तियों का वर्णन कर रहे हैं। जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति को अपने भीतर उतारने की एक योगिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में शरीर, प्राण और मन का एक विशेष अनुशासन आवश्यक है।

ऋषि कहते हैं कि जप करते समय 'चलना' वर्जित है। जब शरीर चलता है, तो प्राणों का प्रवाह अस्थिर हो जाता है और मन बाहरी दृश्यों में उलझ जाता है। जप का उद्देश्य 'स्थिरता' है, जबकि चलना 'गति' है। इसी प्रकार, 'हँसना' वर्जित है क्योंकि हँसते समय श्वास की लय टूट जाती है। जप के लिए श्वास का एक लयबद्ध प्रवाह आवश्यक है; अट्टहास या मंद हास्य दोनों ही उस लय को खंडित करते हैं।

'पार्श्वमवलोकयन्' अर्थात् बगल में देखना। यह दृष्टि की चंचलता है। मन्त्र साधना में दृष्टि का एक बिंदु पर स्थिर होना या नेत्रों का कोमलता से बंद होना आवश्यक है। यदि दृष्टि इधर-उधर भटकती है, तो मन्त्र की शक्ति बाहर की ओर प्रवाहित होने लगती है और साधक अंतर्मुखी नहीं हो पाता।

'उपाश्रितः' का निषेध अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी दीवार या वस्तु का सहारा लेकर बैठना शरीर में जड़ता और मन में प्रमाद (आलस्य) उत्पन्न करता है। योगिक जप के लिए रीढ़ की हड्डी का सीधा होना अनिवार्य है ताकि प्राण ऊर्जा बिना किसी अवरोध के ऊपर की ओर बढ़ सके। सहारा लेने से शरीर झुक जाता है और प्राणों का प्रवाह अवरुद्ध होता है।

'जल्पन्' अर्थात् अन्य बातें करना। जप का अर्थ है—मन्त्र में लीन होना। यदि साधक जप के साथ-साथ अन्य बातों में लगा है, तो वह मन्त्र का उपयोग केवल एक यांत्रिक क्रिया के रूप में कर रहा है, साधना के रूप में नहीं। अंत में, 'सिर ढँककर' जप करने का निषेध है। यह इस बात का संकेत है कि साधक को प्रकृति और परमात्मा के समक्ष खुला और समर्पित होना चाहिए।

यह संपूर्ण श्लोक हमें यह सिखाता है कि जप की बाहरी विधि वास्तव में आंतरिक शुद्धि का ही विस्तार है। बाहरी अनुशासन ही आंतरिक एकाग्रता का द्वार खोलता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रत्याहार' के अभ्यास का एक व्यावहारिक रूप है। प्रत्याहार का अर्थ है—इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना।

१. चलना और देखना (दृष्टि और स्पर्श): जब साधक न चलने और न बगल में देखने का अभ्यास करता है, तो वह अपनी बाहरी इंद्रियों के विस्तार को सीमित कर रहा होता है। यह अभ्यास उसे 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाता है।

२. हँसना और बोलना (वाक् और मन): हँसने और बोलने का निषेध वास्तव में 'वाक्-शक्ति' को संचित करने का अभ्यास है। जब शब्द बाहर नहीं निकलते, तो वे ऊर्जा बनकर हृदय में संचित होते हैं।

३. सहारा लेना (प्राण और शरीर): बिना सहारे के सीधे बैठना साधक को 'सजगता' की भूमि पर ले जाता है। सहारा लेना 'तमस' है, जबकि सीधा बैठना 'सत्व' का लक्षण है।

इस श्लोक का योगिक अभ्यास यह है कि साधक अपने शरीर को एक मंदिर की भाँति स्थिर करे। जब शरीर स्थिर होता है, तब प्राण स्थिर होते हैं, और जब प्राण स्थिर होते हैं, तब मन मन्त्र के अक्षर में विलीन हो जाता है। यह वर्जनाएँ साधक को 'विखराव' से 'एकत्रीकरण' की ओर ले जाती हैं। यहाँ साधक अपनी चेतना को बाहरी जगत से समेटकर अपने केंद्र की ओर मोड़ना सीखता है।

श्लोक ७.१३२

न पदा पदमाक्रम्य न चैव हि तथा करे(रौ) ।

न चासमाहितमना न च संश्रावयन् जपेत् ॥ ७.१३२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७५

— न पैरसे पैर दबाकर, न वैसे ही हाथोंसे; न असमाहित मनसे, और न (दूसरोंको) सुनाते हुए जप करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के समय बाहरी चंचलता, जैसे चलना, हँसना या इधर-उधर देखना वर्जित बताया। अब इस श्लोक में वे शरीर की उन विशिष्ट मुद्राओं और मानसिक अवस्थाओं का निषेध कर रहे हैं, जो साधक की एकाग्रता को भंग करती हैं और मन्त्र की ऊर्जा को क्षीण करती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(जपेत्) न पदा पदमाक्रम्य, न चैव हि तथा करे(रौ), न च असमाहितमना, न च संश्रावयन् (जपेत्)।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. पदा पदमाक्रम्य: एक पैर से दूसरे पैर को दबाकर या पैर पर पैर रखकर। यह मुद्रा शरीर में एक प्रकार का अवरोध और मानसिक शिथिलता उत्पन्न करती है।

२. तथा करे(रौ): हाथों से वैसे ही (अर्थात् हाथों की उँगलियों को आपस में गूँथकर या एक हाथ से दूसरे हाथ को दबाकर)। यहाँ 'तथा' शब्द पैरों की मुद्रा के समान ही हाथों की अनुचित स्थिति का संकेत देता है।

३. असमाहितमना: जिस मन का संहित (एकत्र) न होना हो; यानी विचलित या भटका हुआ मन।

४. संश्रावयन्: दूसरों को सुनाते हुए। मन्त्र का प्रभाव तब होता है जब वह साधक के भीतर गूँजता है, न कि जब वह बाहरी श्रोताओं के लिए प्रदर्शन बन जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जप के समय शारीरिक स्थिरता और मानसिक एकाग्रता के सूक्ष्म नियमों को स्पष्ट कर रहे हैं। जप एक आंतरिक यज्ञ है, और जिस प्रकार यज्ञवेदी का स्थिर होना आवश्यक है, उसी प्रकार जप के समय शरीर का स्थिर और संतुलित होना अनिवार्य है।

ऋषि कहते हैं कि जप करते समय 'पैर पर पैर रखकर' या 'एक पैर से दूसरे पैर को दबाकर' नहीं बैठना चाहिए। योगिक दृष्टि से, जब हम शरीर के अंगों को एक-दूसरे पर दबाते हैं, तो प्राणों का प्रवाह बाधित होता है और शरीर में एक प्रकार का आलस्य या जड़ता आने लगती है। जप का उद्देश्य चेतना का उत्थान है, जबकि ऐसी मुद्राएँ चेतना को नीचे की ओर खींचती हैं। इसी प्रकार, हाथों से भी ऐसी कोई क्रिया नहीं करनी चाहिए जिससे शरीर में तनाव या अवरोध पैदा हो। हाथों की स्थिति सहज और खुली होनी चाहिए ताकि प्राण-शक्ति का संचार अबाध रहे।

इसके पश्चात, ऋषि सबसे महत्वपूर्ण निषेध करते हैं—'असमाहित मन'। मन्त्र केवल शब्द नहीं, अपितु ध्वनि-रूप ब्रह्म है। यदि मन बाहर भटक रहा है, तो मन्त्र केवल जीभ का व्यायाम बनकर रह जाएगा, वह हृदय तक नहीं पहुँचेगा। बिना समाहित मन के किया गया जप निष्फल होता है क्योंकि मन्त्र की शक्ति मन की एकाग्रता के माध्यम से ही जाग्रत होती है।

अंत में, 'संश्रावयन्' अर्थात् दूसरों को सुनाते हुए जप करने का निषेध है। मन्त्र की शक्ति उसकी गोपनीयता में निहित है। जब साधक जप को दूसरों को सुनाने के लिए करता है, तो उसके भीतर 'अहंकार' का उदय होता है कि "मैं जप कर रहा हूँ"। यह प्रदर्शन मन्त्र की सूक्ष्म ऊर्जा को बाहर बिखेर देता है। मन्त्र जब भीतर गूँजता है, तब वह साधक के अंतःकरण को शुद्ध करता है; जब वह बाहर सुनाया जाता है, तो वह केवल एक ध्वनि बन जाता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ संदेश यह है कि शरीर की हर मुद्रा का सीधा प्रभाव मन पर पड़ता है। जब शरीर में कोई अवरोध (जैसे पैर पर पैर रखना) होता है, तो मन में भी सूक्ष्म अवरोध उत्पन्न होते हैं। इस श्लोक का अभ्यास साधक को 'स्थिरता' की ओर ले जाता है।

यहाँ 'पैर' और 'हाथ' के निषेध का अर्थ है—बाहरी अवलंबनों और शारीरिक सुख-सुविधाओं का त्याग। जब साधक शरीर को सहज और स्थिर रखता है, तब वह 'असमाहित' अवस्था से 'समाहित' अवस्था की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर से सूक्ष्म मन की ओर ले जाने की प्रक्रिया है।

साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि जप के समय उसका शरीर एक मंदिर की भाँति स्थिर हो और मन उस मंदिर के गर्भगृह में स्थित ज्योति की भाँति एकाग्र। दूसरों को न सुनाने का अभ्यास साधक को 'अंतर्मुखता' का अनुभव कराता है। इस प्रकार, शारीरिक स्थिरता → मानसिक एकाग्रता → आंतरिक मौन; यही इस श्लोक का योगिक मार्ग है।

अनन्तफलदानि

श्लोक ७.१३३

प्रच्छन्नानि च दानानि ज्ञानं च निरहङ्कृतम् ।

जप्यानि च सुगुप्तानि तेषां फलमनन्तकम् ॥ ७.१३३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७५

गुप्त दान, अहंकाररहित ज्ञान और भली-भाँति गुप्त रखे गये जप — इनका फल अनन्त है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के समय शरीर की अशुद्ध मुद्राओं और मानसिक विचलितता का निषेध किया है। अब इस श्लोक में वे साधक को उन तीन विशिष्ट गुप्त क्रियाओं की ओर ले जा रहे हैं, जो बाह्य कर्मकांड से ऊपर उठकर साधक को 'अनन्त फल' यानी पूर्णता की ओर अग्रसर करती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

प्रच्छन्नानि च दानानि, ज्ञानं च निरहङ्कृतम्, जप्यानि च सुगुप्तानि; तेषां फलम् अनन्तकम्।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. प्रच्छन्नानि दानानि: वह दान जो पूरी तरह गुप्त हो। 'प्रच्छन्न' का अर्थ है ढका हुआ या छिपा हुआ। यहाँ दान का अर्थ केवल धन देना नहीं, अपितु अपने सामर्थ्य का दूसरों के कल्याण हेतु इस प्रकार अर्पण करना है कि दाता और दानग्राही के बीच का अहंकार समाप्त हो जाए।

२. ज्ञानं निरहङ्कृतम्: वह ज्ञान जिसमें 'अहं' (मैं) का अभाव हो। जब ज्ञान साधक के भीतर 'मैं जानता हूँ' के भाव को मिटाकर केवल 'सत्य' को शेष कर देता है, तब वह निरहङ्कृत ज्ञान कहलाता है।

३. जप्यानि सुगुप्तानि: वह जप जो भली-भाँति गुप्त रखा गया हो। 'सुगुप्त' का अर्थ है—न केवल दूसरों से छिपा हुआ, बल्कि स्वयं के मन में भी प्रदर्शन की इच्छा से मुक्त।

४. फलमनन्तकम्: जिसका फल अनन्त हो। यहाँ 'अनन्त' का अर्थ सांसारिक सुखों की अधिकता नहीं, बल्कि उस स्थिति से है जहाँ फल की कामना समाप्त हो जाती है और साधक स्वयं उस अनंत ब्रह्म में लीन हो जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य कर्म, ज्ञान और उपासना के उच्चतम स्तर का उद्घाटन कर रहे हैं। वे बताते हैं कि किसी भी शुभ कर्म की शक्ति उसकी 'गुप्तता' और 'निरहंकारता' में निहित होती है।

प्रथम, 'प्रच्छन्न दान' की महिमा यह है कि जब दान गुप्त होता है, तब वह 'पुण्य' कमाने का साधन नहीं रहता, बल्कि 'त्याग' का अभ्यास बन जाता है। यदि दान प्रकट हो, तो वह सामाजिक प्रतिष्ठा या प्रशंसा की भूख को तृप्त करता है, जिससे अहंकार बढ़ता है। किंतु गुप्त दान साधक के भीतर के 'अहं' को गला देता है।

द्वितीय, 'निरहङ्कृत ज्ञान' की बात अत्यंत गूढ़ है। ज्ञान जब तक 'मेरा' है, वह बंधन है; जब वह 'अहंकाररहित' हो जाता है, तब वह मुक्ति बन जाता है। याज्ञवल्क्य यहाँ उस स्थिति की ओर संकेत कर रहे हैं जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि ज्ञान उसके भीतर नहीं, बल्कि वह स्वयं उस ज्ञान का एक अंश है, तब वह ज्ञान उसे अनंत की ओर ले जाता है।

तृतीय, 'सुगुप्त जप' का विधान है। जप का उद्देश्य मन्त्र की शक्ति को जाग्रत करना है। जब जप प्रकट होता है, तो ऊर्जा बाहर की ओर प्रवाहित होती है और नष्ट हो जाती है। किंतु जब जप गुप्त होता है, तो मन्त्र की ध्वनि और कंपन साधक के भीतर ही संचित होते हैं, जिससे आंतरिक रूपांतरण तीव्र होता है।

इन तीनों—गुप्त दान, निरहंकार ज्ञान और गुप्त जप—में एक ही सूत्र है: 'अहंकार का विसर्जन'। जहाँ 'मैं' नहीं रहता, वहीं 'अनन्त' का प्रवेश होता है। इसीलिए इन क्रियाओं का फल अनन्त बताया गया है, क्योंकि ये साधक को सीमित व्यक्तित्व से मुक्त कर असीम चैतन्य में विलीन कर देती हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अहंकार-शमन' का व्यावहारिक अभ्यास है। योग में सबसे बड़ी बाधा 'अहं' है। जब साधक जप करता है और उसे यह बोध होता है कि वह जप कर रहा है, तो यह 'कर्ता-भाव' एक सूक्ष्म अवरोध बन जाता है।

'सुगुप्त जप' का अभ्यास करते समय साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि मन्त्र उसके भीतर स्वयं गूँज रहा है, वह उसे 'कर' नहीं रहा। इसी प्रकार, ज्ञान को निरहङ्कृत करने का अर्थ है—अपने बोध को अहंकार की वेदी पर होम कर देना।

साधक इस अभ्यास से 'साक्षी भाव' की भूमि की ओर बढ़ता है। वह देखता है कि जब वह दान देता है, तो देने वाला वह नहीं, बल्कि प्रकृति ही प्रकृति को दे रही है। जब वह जप करता है, तो वह केवल एक माध्यम है। इस गुप्तता और निरहंकारता के अभ्यास से साधक की मानसिक ऊर्जा का क्षय रुक जाता है और वह ऊर्जा 'ओज' और 'तेज' में परिवर्तित होकर उसे समाधि की ओर ले जाती है। यहाँ गुप्तता का अर्थ संकीर्णता नहीं, बल्कि ऊर्जा का संरक्षण है, जो साधक को स्थूल जगत के प्रभाव से बचाकर सूक्ष्म जगत के आनंद में प्रतिष्ठित करता है।

जपत्रैविध्यम्

श्लोक ७.१३४

मानसः शान्तिकजप उपांशुः पौष्टिकः स्मृतः ।

सशब्दश्चाभिचारश्च जपस्तु त्रिविधः स्मृतः ॥ ७.१३४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७६

मानस जप शान्तिक (शान्ति देनेवाला), उपांशु पौष्टिक (पुष्टि देनेवाला), और सशब्द (वाचिक) आभिचारिक कहा गया है — (इस प्रकार) जप तीन प्रकारका है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गुप्त दान, निरहंकार ज्ञान और सुगुप्त जप के 'अनन्त फल' का वर्णन किया है। उसी गुप्तता के क्रम को आगे बढ़ाते हुए, अब वे जप की तीन विशिष्ट श्रेणियों का वर्गीकरण कर रहे हैं, ताकि साधक अपनी अवस्था और प्रयोजन के अनुसार उचित विधि का चयन कर सके।

अन्वय और पदार्थ —

मानसः जपः शान्तिकः, उपांशुः (जपः) पौष्टिकः स्मृतः, सशब्दः च आभिचारिकः (जपः) च; जपस्तु त्रिविधः स्मृतः।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. मानस जप: वह जप जो केवल मन के भीतर घटित होता है। इसमें न जिह्वा हिलती है, न होंठ और न ही कोई ध्वनि उत्पन्न होती है। यह चेतना के सबसे सूक्ष्म स्तर का जप है।

२. शान्तिक: शांति प्रदान करने वाला। यहाँ 'शांति' का अर्थ केवल मानसिक स्थिरता नहीं, अपितु वह अवस्था है जहाँ वृत्तियों का निरोध हो जाता है और साधक अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है।

३. उपांशु जप: वह जप जिसमें जिह्वा और होंठ हिलते हैं, किंतु ध्वनि इतनी धीमी होती है कि केवल स्वयं जप करने वाला ही उसे सुन सके या वह भी न सुने। यह 'उपांशु' (पास या धीमी) ध्वनि का जप है।

४. पौष्टिक: पुष्टि देने वाला। 'पुष्टि' का अर्थ यहाँ भौतिक बल नहीं, अपितु प्राणिक शक्ति और मानसिक संकल्प की दृढ़ता है। यह जप साधक के आंतरिक बल (इच्छाशक्ति) को पुष्ट करता है।

५. सशब्द जप: वह जप जो स्पष्ट वाणी और ध्वनि के साथ किया जाता है, जिसे अन्य लोग भी सुन सकें। इसे 'वाचिक जप' भी कहते हैं।

६. आभिचारिक: आभिचार से संबंधित। यहाँ 'आभिचारिक' का अर्थ है वह जप जिसका प्रयोग किसी विशिष्ट बाह्य प्रयोजन, प्रभाव या किसी विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य जप की सूक्ष्मता के आधार पर उसे तीन श्रेणियों में विभाजित कर रहे हैं। यह विभाजन केवल ध्वनि का नहीं, बल्कि साधक की चेतना के स्तर का विभाजन है।

प्रथम, मानस जप को 'शान्तिक' कहा गया है। जब मन्त्र ध्वनि के बंधन से मुक्त होकर केवल विचार और संकल्प में परिवर्तित हो जाता है, तब वह मन के गहरे स्तरों में उतरता है। चूँकि इसमें बाह्य इंद्रियों का कोई हस्तक्षेप नहीं होता, इसलिए यह मन के विक्षेपों को शांत कर साधक को अंतर्मुखी बनाता है। यह जप की वह अवस्था है जहाँ मन्त्र और मंत्र-साधक के बीच का भेद मिटने लगता है, जिससे परम शांति की अनुभूति होती है।

द्वितीय, उपांशु जप को 'पौष्टिक' कहा गया है। इसमें जिह्वा का सूक्ष्म संचालन होता है, जिससे मन्त्र की शक्ति प्राणों के साथ जुड़ती है। यह जप साधक के भीतर एक प्रकार की ऊर्जा का संचय करता है। जिस प्रकार अन्न शरीर की पुष्टि करता है, उसी प्रकार उपांशु जप साधक के आध्यात्मिक व्यक्तित्व और संकल्प शक्ति की पुष्टि करता है। यह मानस जप की ओर बढ़ने की पहली सीढ़ी है।

तृतीय, सशब्द जप को 'आभिचारिक' कहा गया है। जब मन्त्र को शब्द और ध्वनि के रूप में व्यक्त किया जाता है, तो वह वायुमंडल में कंपन उत्पन्न करता है। इस कंपन का प्रभाव बाह्य जगत और अन्य प्राणियों पर पड़ता है। इसीलिए, जब किसी विशेष कार्य की सिद्धि या बाह्य प्रभाव के लिए जप किया जाता है, तो सशब्द विधि का प्रयोग होता है।

अतः, जप की यह त्रिविधता साधक को स्थूल (सशब्द) से सूक्ष्म (मानस) की ओर ले जाने वाली एक सोपान-श्रेणी है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः । उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ॥ २.८५ ॥

विधियज्ञसे जपयज्ञ दस गुना श्रेष्ठ है; उपांशु (जप) सौ गुना, और मानस हजार गुना कहा गया है।

मनुस्मृति २.८५मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 231

मनुस्मृति में भी जप की इसी श्रेणीबद्ध श्रेष्ठता का वर्णन मिलता है, जहाँ विधियज्ञ की तुलना में जपयज्ञ को दस गुना, उपांशु को सौ गुना और मानस जप को हजार गुना अधिक फलदायी बताया गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि जैसे-जैसे जप की ध्वनि कम होती है और उसकी सूक्ष्मता बढ़ती है, उसका आध्यात्मिक प्रभाव और फल उतना ही अधिक बढ़ जाता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि से शून्य' होने की यात्रा है।

१. सशब्द जप का अभ्यास तब किया जाता है जब मन अत्यंत चंचल हो; ध्वनि के माध्यम से मन को मन्त्र पर टिकाया जाता है।

२. उपांशु जप में साधक ध्वनि को भीतर की ओर मोड़ना शुरू करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि ध्वनि बाहरी जगत के लिए लुप्त हो जाए और केवल अंतःकरण में गूँजे। यह प्राणों के संयम का अभ्यास है।

३. मानस जप उच्चतम भूमि है। यहाँ साधक मन्त्र के 'अक्षर' को ध्वनि के रूप में नहीं, बल्कि एक 'प्रकाश' या 'स्पंदन' के रूप में अनुभव करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि मन्त्र का जप करना न पड़े, बल्कि मन्त्र स्वयं घटित होने लगे।

साधक जब सशब्द से उपांशु और उपांशु से मानस की ओर बढ़ता है, तो वह वास्तव में स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर और फिर कारण शरीर की ओर अपनी चेतना को स्थानांतरित कर रहा होता है।

श्लोक ७.१३५

तिष्ठंश्चेद्वीक्ष्यमाणोऽर्कमासीनः प्राङ्मुखो जपेत् ।

प्रागग्रेषु कुशेष्वेवमासीनश्चासने शुभे ।

नात्युच्छ्रिते नातिनीचे दर्भपाणिः सुसंयतः ॥ ७.१३५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७६

खड़ा हो तो सूर्यको देखता हुआ, बैठा हो तो पूर्वकी ओर मुँह करके जपे — पूर्वकी ओर अग्रभागवाले कुशोंपर, शुभ आसनपर, जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, हाथमें कुश लिये, भली-भाँति संयत होकर।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के तीन प्रकारों—मानस, उपांशु और सशब्द—का वर्गीकरण करते हुए उनकी विशिष्ट फलश्रुतियाँ बताई हैं। अब वे इस जप की सफलता के लिए आवश्यक बाह्य और आंतरिक अनुशासन, विशेषकर आसन और दिशा के विधान का निर्देश कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) तिष्ठन् च यदि (जपेत्) तर्हि अर्कम् ईक्ष्यमाणः (जपेत्), आसीनः (तु) प्राङ्मुखः जपेत्। प्रागग्रेषु कुशेषु एवम् आसीनः च आसने शुभे, (यत्) न अत्युच्छ्रितं न अतिनीचम्, दर्भपाणिः सुसंयतः (जपेत्)।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. अर्कम् ईक्ष्यमाणः: सूर्य को देखते हुए। यहाँ 'अर्क' सूर्य का वह रूप है जो प्रकाश और चैतन्य का प्रतीक है।

२. प्राङ्मुखः: पूर्व दिशा की ओर मुख करके। पूर्व दिशा ज्ञान और उदय की दिशा है।

३. प्रागग्रेषु कुशेषु: उन कुशों पर जिनका अग्रभाग (नोक) पूर्व की ओर हो। कुश घास को पवित्र और ऊर्जा-संचायक माना गया है।

४. आसने शुभे: ऐसे आसन पर जो पवित्र हो और साधक की मानसिक स्थिति के अनुकूल हो।

५. नात्युच्छ्रिते नातिनीचे: जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा। यह संतुलन का प्रतीक है।

६. दर्भपाणिः: हाथ में दर्भ (कुश) धारण किए हुए। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक कवच और एकाग्रता का साधन है।

७. सुसंयतः: पूर्णतः संयमित। इसमें केवल शरीर की स्थिरता नहीं, अपितु प्राण और मन का संयम भी सम्मिलित है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य जप के लिए शारीरिक स्थिति और परिवेश के अनुशासन का वर्णन कर रहे हैं। वे दो स्थितियों का विधान करते हैं: प्रथम, यदि साधक खड़ा होकर जप कर रहा है, तो उसे सूर्य (अर्क) की ओर देखते हुए जप करना चाहिए। सूर्य यहाँ केवल भौतिक पिंड नहीं, अपितु जगत की आत्मा और चैतन्य का केंद्र है। सूर्य का दर्शन साधक के भीतर के आलस्य और अज्ञान के अंधकार को मिटाकर उसे जाग्रत करता है।

द्वितीय स्थिति में, यदि साधक बैठा है, तो उसका मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। पूर्व दिशा का चयन इसलिए है क्योंकि यह दिशा 'उदय' और 'आरम्भ' की है। जब साधक पूर्व की ओर मुख करता है, तो वह अपने भीतर के आध्यात्मिक उदय का आह्वान करता है। बैठने के लिए 'शुभ आसन' का निर्देश है, जो न तो अत्यधिक ऊँचा हो और न ही अत्यधिक नीचा। बहुत ऊँचा आसन अहंकार को जन्म दे सकता है और बहुत नीचा आसन आलस्य या हीनता का प्रतीक हो सकता है। अतः मध्यस्थता या संतुलन ही योग का मूल है।

आसन के लिए 'प्रागग्रेषु कुशेषु' का निर्देश है, अर्थात ऐसे कुश जिनका अग्रभाग पूर्व की ओर हो। कुश का प्रयोग केवल परंपरा नहीं, अपितु ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करने की एक विधि है। हाथ में कुश (दर्भपाणिः) धारण करना इस बात का संकेत है कि साधक ने अपनी इंद्रियों और बाह्य जगत के प्रभावों को सीमित कर लिया है। अंत में 'सुसंयतः' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह स्पष्ट करता है कि बाहरी विधि (आसन, दिशा, कुश) केवल एक माध्यम है, वास्तविक सिद्धि 'संयम' से ही प्राप्त होती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

आसन के संतुलन और उसकी पवित्रता के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता में भी यही निर्देश मिलता है:

श्रीमद्भगवद्गीता

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ६.११ ॥

पवित्र स्थानमें, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा, (नीचेसे) कुश, मृगचर्म और वस्त्र बिछाया हुआ अपना स्थिर आसन स्थापित करके —

श्रीमद्भगवद्गीता ६.११गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 178

"शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥"

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का मत एक ही है—आसन 'नात्युच्छ्रितं नातिनीचम्' (न बहुत ऊँचा, न बहुत नीचा) होना चाहिए। जहाँ गीता में 'लाजिन' (मृगचर्म) और 'वस्त्र' का उल्लेख है, वहीं यह स्मृति 'कुश' की विशिष्टता और उसकी दिशा (पूर्वाग्र) पर अधिक बल देती है, जो शुक्लयजुर्वेद की यज्ञ-परम्परा का प्रभाव है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि स्थिर और संतुलित आसन ही उच्चतर ध्यान और जप का आधार बनता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'स्थिरता' और 'संरेखण' का अभ्यास है। जब साधक खड़ा होकर सूर्य को देखता है, तो वह अपनी दृष्टि को एक बिंदु पर केंद्रित कर रहा होता है, जिससे मन की चंचलता समाप्त होती है। यह 'त्राटक' के समान एक अभ्यास है जो चित्त को एकाग्र करता है।

बैठने की स्थिति में पूर्वमुख होना और संतुलित आसन का चयन करना, साधक के शरीर में प्राण-ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करता है। 'नात्युच्छ्रितं नातिनीचम्' का रहस्य यह है कि जब शरीर भौतिक रूप से संतुलित होता है, तभी मानसिक संतुलन संभव है। हाथ में कुश धारण करना एक प्रकार की 'मुद्रा' है, जो साधक को यह बोध कराती है कि वह अब सांसारिक क्रियाओं से हटकर जप-यज्ञ में प्रविष्ट हो चुका है।

साधक यहाँ 'बाह्य संयम' से 'आन्तर संयम' की ओर बढ़ता है। 'सुसंयतः' होने का अर्थ है—प्राणों का स्थिर होना और मन का मन्त्र में लीन होना। इस अभ्यास से साधक स्थूल शरीर की चेतना से ऊपर उठकर सूक्ष्म चेतना की भूमि पर जाता है, जहाँ जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि एक आंतरिक स्पंदन बन जाता है।

श्लोक ७.१३६

विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः ।

उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ॥ ७.१३६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७६

विधियज्ञसे जपयज्ञ दस गुना श्रेष्ठ है; उपांशु (जप) सौ गुना, और मानस हजार गुना कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के लिए आवश्यक बाह्य अनुशासन, जैसे दिशा, आसन और शारीरिक संयम का निर्देश दिया है। अब वे जप की श्रेष्ठता का तुलनात्मक विवरण देते हुए यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जप की सूक्ष्मता जैसे-जैसे बढ़ती है, उसका फल और प्रभाव भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकस्य) विधियज्ञात् जपयज्ञः दशभिर्गुणैः विशिष्टः (अस्ति), उपांशुः (जपः) शतगुणः स्यात्, (तथा) मानसः (जपः) साहस्रः स्मृतः।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. विधियज्ञः: वे यज्ञ जो शास्त्रों में वर्णित विधि, सामग्री, मंत्र और अनुष्ठान के साथ बाह्य रूप से संपन्न किए जाते हैं।

२. जपयज्ञः: मंत्र का बार-बार उच्चारण कर किया गया यज्ञ। इसे 'यज्ञ' इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें मंत्र की अग्नि द्वारा चित्त की अशुद्धियों की आहुति दी जाती है।

३. विशिष्टो दशभिर्गुणैः: दस गुणों (गुना) से श्रेष्ठ या विशिष्ट। यहाँ 'गुण' का अर्थ विशेषता नहीं, अपितु परिमाण है।

४. उपांशुः: वह जप जिसमें होंठ हिलते हैं, किंतु ध्वनि केवल साधक को सुनाई देती है या बिल्कुल नहीं सुनाई देती।

५. मानसः: वह जप जो केवल मन के भीतर चलता है, जिसमें जिह्वा और होंठ पूर्णतः स्थिर रहते हैं।

६. साहस्रः: एक हजार गुना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य जप की शक्ति और उसकी श्रेणियों के फल का विवेचन कर रहे हैं। वे सबसे पहले 'विधियज्ञ' और 'जपयज्ञ' की तुलना करते हैं। विधियज्ञ में बाह्य सामग्री, समिधा, घी और अन्य उपकरणों की आवश्यकता होती है, जो स्थूल जगत के साधन हैं। इसके विपरीत, जपयज्ञ में केवल 'शब्द' और 'श्रद्धा' की आवश्यकता होती है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जपयज्ञ विधियज्ञ से दस गुना श्रेष्ठ है क्योंकि यह साधक को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाता है। जहाँ बाह्य यज्ञ समाज और प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाता है, वहीं जपयज्ञ साधक के अंतःकरण को सीधे परमात्मा से जोड़ता है।

इसके पश्चात, वे जप के ही तीन स्तरों—सशब्द (वाचिक), उपांशु और मानस—के फल का क्रम बताते हैं। यद्यपि यहाँ सशब्द का नाम स्पष्ट नहीं है, किंतु 'विधियज्ञ' और 'उपांशु' के बीच का अंतर यह संकेत देता है कि जो जप ध्वनि सहित (सशब्द) होता है, वह आधारभूत है। उपांशु जप, जिसमें ध्वनि का विलोप होने लगता है और एकाग्रता बढ़ती है, वह सौ गुना अधिक फलदायी है। अंततः, मानस जप को 'साहस्र' अर्थात् एक हजार गुना श्रेष्ठ बताया गया है।

इसका रहस्य यह है कि ध्वनि जितनी कम होगी, मन की एकाग्रता उतनी ही अधिक होगी। जब शब्द होंठों से हटकर केवल मन में गूँजता है, तब वह 'वाक्' से ऊपर उठकर 'चित्त' में स्थित हो जाता है। यह क्रम स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने की यात्रा है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः । उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ॥ २.८५ ॥

विधियज्ञसे जपयज्ञ दस गुना श्रेष्ठ है; उपांशु (जप) सौ गुना, और मानस हजार गुना कहा गया है।

मनुस्मृति २.८५मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 231

इस श्लोक का साम्य मनुस्मृति के इस कथन से पूर्णतः मेल खाता है। यहाँ दोनों स्मृतियाँ इस बात पर सहमत हैं कि जप की सूक्ष्मता ही उसकी शक्ति का स्रोत है। मनुस्मृति और बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति दोनों ही इस बात को पुष्ट करते हैं कि बाह्य कर्मों की तुलना में आंतरिक साधना (जप) अधिक प्रभावशाली है और मानस जप उसकी पराकाष्ठा है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'सूक्ष्मता के सिद्धांत' का प्रतिपादन करता है। साधक के लिए अभ्यास का क्रम इस प्रकार होना चाहिए: पहले सशब्द जप से वाणी को अनुशासित करना, फिर उपांशु जप से प्राण और मन को जोड़ना, और अंततः मानस जप के माध्यम से मन को मंत्र में विलीन कर देना।

साधक अनुभव करता है कि जैसे-जैसे वह वाणी के बंधन से मुक्त होता है, मंत्र की ऊर्जा बाहर बिखरने के बजाय भीतर संचित होने लगती है। सशब्द जप में ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा ध्वनि के रूप में बाहर निकल जाता है, उपांशु में वह संकुचित होती है, और मानस जप में वह पूरी तरह से अंतर्मुखी हो जाती है। जब मंत्र केवल मन में गूँजता है, तब वह 'अक्षर' रूप में हृदय के आकाश में प्रतिष्ठित होने लगता है। यह अभ्यास साधक को 'वाचिक' भूमि से 'मानसिक' भूमि और अंततः 'तुरीय' अवस्था की ओर ले जाता है, जहाँ जप और जपने वाला एक हो जाते हैं।

अक्षमाला तत्फलं च

श्लोक ७.१३७

स्फाटिकेन्द्राक्षरुद्राक्षपुत्रजीवसमुद्भवैः ।

अक्षमाला तु कर्तव्या प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तरा ॥ ७.१३७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७६

स्फटिक, इन्द्राक्ष, रुद्राक्ष और पुत्रजीव (के दानों) से अक्षमाला बनानी चाहिए; (इनमें) उत्तरोत्तर (बादवाली) अधिक प्रशस्त है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप की सूक्ष्मता और उसके फल की तुलना करते हुए मानस जप की सर्वोच्चता सिद्ध की है। अब वे जप की उस बाह्य सामग्री का निर्देश कर रहे हैं, जो मन को एकाग्र करने और जप की संख्या का लेखा रखने में सहायक होती है, अर्थात् अक्षमाला का चयन।

अन्वय और पदार्थ —

स्फाटिकेन्द्राक्षरुद्राक्षपुत्रजीवसमुद्भवैः अक्षमाला तु कर्तव्या, (यतः) प्रशस्ता हि उत्तरोत्तरा।

पदार्थ-निर्वाचन:

१. स्फाटिक (स्फटिक): एक पारदर्शी, श्वेत और शीतल मणि। यह चंद्रमा और सोम तत्त्व का प्रतीक है।

२. इन्द्राक्ष: इन्द्र के नेत्र के समान तेजस्वी बीज या मणि। इसे अक्सर विशेष प्रकार के स्फटिक या पारदर्शी दानों के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

३. रुद्राक्ष: 'रुद्र' (शिव) की 'अक्ष' (आँसू या नेत्र)। यह अग्नि और ताप तत्त्व का प्रतीक है, जो साधक के भीतर तप और वैराग्य जाग्रत करता है।

४. पुत्रजीव: एक विशेष प्रकार का बीज या वनस्पति-उत्पन्न दाना, जिसे जीवन और वृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

५. समुद्भवैः: इनसे उत्पन्न या निर्मित।

६. कर्तव्या: बनाना चाहिए या प्रयोग करना चाहिए।

७. प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तरा: क्योंकि इनमें बाद वाला (पुत्रजीव) पूर्व वाले (स्फटिक) की तुलना में अधिक श्रेष्ठ और प्रशस्त है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य जप के लिए प्रयुक्त होने वाली अक्षमाला (माला) के पदार्थों का विधान कर रहे हैं। यद्यपि जप एक आंतरिक प्रक्रिया है, किंतु स्थूल शरीर में रहते हुए मन की चंचलता को रोकने के लिए एक भौतिक आधार की आवश्यकता होती है। अक्षमाला केवल संख्या गिनने का यंत्र नहीं है, अपितु वह मन्त्र की शक्ति को संचित करने वाला एक पात्र है।

ऋषि यहाँ चार पदार्थों का उल्लेख करते हैं: स्फटिक, इन्द्राक्ष, रुद्राक्ष और पुत्रजीव। याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि इनमें 'उत्तरोत्तरा' अर्थात् क्रम के अनुसार बाद वाला अधिक प्रशस्त है। इस क्रम का रहस्य साधक की आध्यात्मिक यात्रा में निहित है। स्फटिक शीतलता और मानसिक शांति देता है, इन्द्राक्ष तेज प्रदान करता है, रुद्राक्ष तप और वैराग्य की अग्नि प्रज्वलित करता है, और पुत्रजीव जीवन की पूर्णता और बीज-शक्ति का प्रतीक है।

बाहरी विधि यह है कि साधक अपनी रुचि और इष्ट देवता के अनुसार इनमें से किसी भी माला का चयन करे, किंतु जैसे-जैसे साधक की साधना गहन होती है, उसे अधिक प्रभावशाली और 'प्रशस्त' सामग्री की ओर बढ़ना चाहिए। यहाँ 'प्रशस्त' होने का अर्थ केवल भौतिक मूल्य नहीं, अपितु मन्त्र की ऊर्जा को धारण करने की क्षमता और साधक के चित्त पर उसका प्रभाव है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से अक्षमाला का प्रयोग 'चित्त-वृत्ति' को एक केंद्र पर लाने का साधन है। जब साधक की उँगलियाँ एक-एक दाने को स्पर्श करती हैं, तो वह स्पर्श-संवेदना मन को वर्तमान क्षण में बाँध देती है, जिससे मन मन्त्र के अक्षर में विलीन हो पाता है।

यहाँ स्फटिक से पुत्रजीव की ओर बढ़ना, साधक की यात्रा को दर्शाता है—प्रारम्भिक शांति (स्फटिक) से लेकर, अंततः उस बीज-शक्ति (पुत्रजीव) तक पहुँचना, जहाँ मन्त्र का पूर्ण बीजरूप अनुभव होता है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जैसे माला के सभी दाने एक ही सूत्र में पिरोए होते हैं, वैसे ही उसके जीवन की समस्त बिखरी हुई वृत्तियाँ एक ही 'ईश्वरीय सूत्र' (मन्त्र) में बंधकर एकरूप हो रही हैं। यह अभ्यास साधक को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जाता है।

श्लोक ७.१३८

कोट्या स्यात्तु भवेद्वृद्धिरनन्ता चात्र संज्ञया ।

जपस्य क्रियमाणस्य तस्माच्छ्रेष्ठा परा परा ॥ ७.१३८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७६

(पहलीसे) करोड़ गुनी और (अन्तिमसे) अनन्त वृद्धि होती है — जपमें; इसलिए आगे-आगेवाली श्रेष्ठ है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने जप के लिए प्रयुक्त होने वाली अक्षमाला के लिए स्फटिक, इन्द्राक्ष, रुद्राक्ष और पुत्रजीव के क्रम को बताया और यह स्पष्ट किया कि इस क्रम में बाद वाला पदार्थ पूर्व वाले से अधिक प्रशस्त है। वर्तमान श्लोक में वे इसी श्रेष्ठता के आधार पर प्राप्त होने वाले फल की मात्रा और उसकी तीव्रता का रहस्य खोल रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

जपस्य क्रियमाणस्य (तस्मिन्) कोट्या स्यात् तु भवेद्वृद्धिः, अनन्ता च अत्र संज्ञया (वृद्धिः) भवेत्; तस्मात् (एतेषु मालासु) परा परा श्रेष्ठा (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• क्रियमाणस्य: जब जप किया जा रहा हो (वर्तमान काल की क्रिया)।

• कोट्या: करोड़ गुना (दस मिलियन)। यहाँ यह संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु फल की तीव्रता और वेग का सूचक है।

• वृद्धिः: फल में वृद्धि या मन्त्र की शक्ति का विस्तार।

• अनन्ता: जिसकी कोई सीमा न हो; जो परिमाण से परे हो।

• संज्ञया: संज्ञा या नामकरण के अनुसार; शास्त्र में जिस रूप में इसे परिभाषित किया गया है।

• परा परा: जो बाद में है, वह पूर्व वाले से अधिक श्रेष्ठ है (पुत्रजीव > रुद्राक्ष > इन्द्राक्ष > स्फटिक)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ अक्षमाला के पदार्थों और जप के फल के बीच के सूक्ष्म सम्बन्ध को दर्शाया गया है। साधक जब मन्त्र का जप करता है, तो वह केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं करता, अपितु मन्त्र की शक्ति को अपने भीतर संचित करता है। इस संचयन की गति और गुणवत्ता उस साधन (माला) पर निर्भर करती है जिसे वह स्पर्श कर रहा है।

ऋषि कहते हैं कि यदि साधक स्फटिक से रुद्राक्ष और रुद्राक्ष से पुत्रजीव की ओर बढ़ता है, तो जप के फल में 'कोटि' (करोड़) गुनी वृद्धि होती है। यहाँ 'कोटि' शब्द का भाव यह है कि जैसे-जैसे साधन अधिक तपोमय और सूक्ष्म होता जाता है, मन्त्र की शक्ति का प्रस्फुटन तीव्र होता जाता है। स्फटिक जहाँ शीतलता और मानसिक शांति देता है, वहीं रुद्राक्ष और पुत्रजीव जैसे बीज तप और प्राण-शक्ति के संवाहक हैं, जो जप के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं।

श्लोक का अगला अंश 'अनन्ता च अत्र संज्ञया' अत्यंत गूढ़ है। इसका भाव यह है कि जब साधक उच्चतम श्रेणी की माला (पुत्रजीव) का प्रयोग करता है और पूर्ण एकाग्रता से जप करता है, तब वह फल 'अनन्त' संज्ञा को प्राप्त होता है। 'अनन्त' का अर्थ है वह स्थिति जहाँ फल की गणना समाप्त हो जाती है और साधक मन्त्र के साथ एकरूप हो जाता है। यहाँ वृद्धि केवल बाहरी लाभों में नहीं, अपितु मन्त्र की आंतरिक शक्ति के जागरण में होती है।

अतः निष्कर्ष यह है कि 'परा परा श्रेष्ठा'—अर्थात इस क्रम में जो पदार्थ जितना बाद में आता है, वह उतना ही अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि वह साधक को स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अनन्त की ओर ले जाने में अधिक सहायक है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से अक्षमाला केवल गणना का यंत्र नहीं, अपितु मन को बांधने वाली एक 'सूक्ष्म डोर' है। जब साधक की उँगलियाँ माला के मनकों को स्पर्श करती हैं, तो वह स्पर्श मन को बाहरी जगत से हटाकर मन्त्र की ध्वनि और उसके अर्थ पर केंद्रित करता है।

इस श्लोक का अभ्यास साधक को यह सिखाता है कि साधना में 'साधन' का चुनाव महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे साधक की भूमि उन्नत होती है, उसे अधिक तपोमय साधनों की आवश्यकता होती है। 'करोड़ गुनी वृद्धि' का अनुभव तब होता है जब मन्त्र की शक्ति प्राण के साथ जुड़ती है, और 'अनन्त वृद्धि' तब होती है जब जप केवल होंठों या मन का खेल न रहकर हृदय की स्पन्दन बन जाता है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि भौतिक साधन (माला) जब मन्त्र और श्रद्धा के साथ मिलते हैं, तो वे चेतना के स्तर को तीव्रता से ऊपर उठाते हैं।

अक्षमालानुकल्पाः

श्लोक ७.१३९

अभावादक्षमालायाः कुशग्रन्थ्याऽथ पाणिना ।

जप एव हि कर्तव्य एकाग्रमनसा तथा ॥ ७.१३९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७७

अक्षमालाके अभावमें कुशकी गाँठोंसे अथवा हाथ (की पोरों) से एकाग्र मनसे जप ही करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में ऋषि याज्ञवल्क्य ने जप के लिए स्फटिक, इन्द्राक्ष, रुद्राक्ष और पुत्रजीव की मालाओं की श्रेष्ठता और उनके फल की तीव्रता का वर्णन किया है। वर्तमान श्लोक में वे उस स्थिति का समाधान दे रहे हैं जहाँ साधक के पास इन विशिष्ट मालाओं का अभाव हो, ताकि साधन में कोई बाधा न आए।

अन्वय और पदार्थ —

अक्षमालायाः अभावादथ कुशग्रन्थ्या (अथवा) पाणिना, तथा एकाग्रमनसा जप एव हि कर्तव्यम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अभावादक्षमालायाः: अक्षमाला के अभाव में; जब स्फटिक, रुद्राक्ष आदि उपलब्ध न हों।

• कुशग्रन्थ्या: कुश (दर्भ) की गाँठों से। कुश यज्ञीय पवित्र घास है, जिसकी गाँठों को गिनकर जप किया जाता है।

• पाणिना: हाथ से; यहाँ इसका अर्थ हाथ की उँगलियों के पोरों का उपयोग करना है।

• एकाग्रमनसा: एकनिष्ठ चित्त से; जहाँ मन मन्त्र के अक्षर और उसके अर्थ में पूरी तरह लीन हो।

• जप एव हि कर्तव्यम्: जप ही करना चाहिए। 'एव' और 'हि' यहाँ इस बात पर बल दे रहे हैं कि साधन (माला) की अनुपलब्धता जप के त्याग का कारण नहीं बननी चाहिए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ साधक के लिए 'साधन' और 'साध्य' के भेद को स्पष्ट किया गया है। अक्षमाला एक बाह्य साधन है, जिसका उद्देश्य मन्त्र की संख्या का हिसाब रखना और मन को एक केंद्र पर टिकाए रखना है। किंतु, जप का वास्तविक साध्य 'मन्त्र-सिद्धि' और 'चित्त की एकाग्रता' है।

ऋषि याज्ञवल्क्य यह समझा रहे हैं कि यदि किसी कारणवश स्फटिक या रुद्राक्ष जैसी श्रेष्ठ मालाएँ उपलब्ध न हों, तो साधक को जप का परित्याग नहीं करना चाहिए। ऐसे में वह 'कुश' की गाँठों का प्रयोग कर सकता है। कुश को वैदिक परम्परा में अत्यंत पवित्र और यज्ञीय माना गया है; यह शुद्धता का प्रतीक है। यदि कुश भी उपलब्ध न हो, तो स्वयं के हाथ की उँगलियों का उपयोग किया जा सकता है।

यहाँ 'पाणिना' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। हाथ का स्पर्श जब मन्त्र के उच्चारण के साथ जुड़ता है, तो वह शरीर के भीतर एक सूक्ष्म लय उत्पन्न करता है। किंतु ऋषि यहाँ एक अनिवार्य शर्त जोड़ते हैं— 'एकाग्रमनसा'। वे यह संकेत दे रहे हैं कि माला चाहे स्फटिक की हो, कुश की हो या केवल उँगलियों का सहारा हो, यदि मन एकाग्र नहीं है, तो उस साधन का कोई मूल्य नहीं है। वास्तव में, माला केवल एक सहायक है, जबकि एकाग्रता ही वह कुंजी है जो मन्त्र के गुप्त रहस्यों को खोलती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साधन-निर्भरता' से मुक्त कर 'साधना-केंद्रित' बनाता है। माला एक 'आलम्बन' है, जो शुरुआती साधक के लिए मन को भटकने से रोकने का एक यंत्र है। किंतु जैसे-जैसे साधक की भूमि ऊँची होती है, वह समझ जाता है कि वास्तविक माला उसके भीतर का 'प्राण' और 'चित्त' है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी वस्तुओं की श्रेष्ठता (जैसे पुत्रजीव या रुद्राक्ष) फल की तीव्रता को बढ़ा सकती है, परंतु जप की मूल शक्ति 'एकाग्रता' में निहित है। जब साधक हाथ की पोरों पर जप करता है, तो वह अपनी ही देह को साधन बना लेता है। यह अभ्यास उसे इस बोध की ओर ले जाता है कि ईश्वर और मन्त्र की शक्ति किसी बाहरी वस्तु में नहीं, बल्कि उसके अपने चैतन्य और एकाग्र मन में विद्यमान है। इस प्रकार, साधक बाह्य उपकरणों के मोह से ऊपर उठकर अंतर्मुखी होने की दिशा में अग्रसर होता है।

जपावधिः

श्लोक ७.१४०

ध्यायेच्च मनसा मन्त्रं जिह्वोष्ठौ न विचालयेत् ।

न कम्पयेच्छिरोग्रीवं दन्तान्नैव प्रकाशयेत् ॥ ७.१४० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७७

मन से मन्त्र का ध्यान करना चाहिए, जिह्वा और ओष्ठ (होठों) को नहीं हिलाना चाहिए, शिरोग्रीव (सिर और गर्दन) को नहीं कंपित करना चाहिए और दाँतों को भी प्रकट नहीं करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि अक्षमाला के अभाव में भी कुश की गाँठों या उँगलियों के माध्यम से एकाग्र मन से जप करना चाहिए। अब इस श्लोक में वे मानस जप की उस सूक्ष्म देह-स्थिति और मानसिक एकाग्रता का वर्णन कर रहे हैं, जिससे जप की शक्ति क्षय न हो और साधक उच्चतम सिद्धि को प्राप्त करे।

अन्वय और पदार्थ —

मनसा मन्त्रं ध्यायेत्, जिह्वोष्ठौ न विचालयेत्, शिरोग्रीवं न कम्पयेत्, दन्तान्नैव प्रकाशयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• मनसा मन्त्रं ध्यायेत्: मन से मन्त्र का ध्यान करना चाहिए। यहाँ 'ध्यान' का अर्थ केवल स्मरण नहीं, अपितु मन्त्र के अक्षरों के स्वरूप और उनके स्पंदन में लीन होना है।

• जिह्वोष्ठौ न विचालयेत्: जिह्वा (जीभ) और ओष्ठ (होठों) को नहीं हिलाना चाहिए। यह मानस जप की अनिवार्य शर्त है, जहाँ ध्वनि केवल हृदय के भीतर गूँजती है।

• न कम्पयेच्छिरोग्रीवं: शिर (सिर) और ग्रीवा (गर्दन) को नहीं कंपित करना चाहिए। स्थिरता का अर्थ है—शारीरिक जड़ता नहीं, अपितु एक संतुलित और अचल स्थिति।

• दन्तान्नैव प्रकाशयेत्: दाँतों को प्रकट नहीं करना चाहिए। इसका अर्थ है कि मुख पूरी तरह बंद रहे और चेहरे पर कोई अनावश्यक भाव या खिंचाव न हो।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ मानस जप की भौतिक और मानसिक मर्यादा का सूक्ष्म विवेचन है। पिछले श्लोक (७.१३६) में यह बताया गया था कि मानस जप, उपांशु और वैखरी की तुलना में हजार गुना अधिक फलदायी है। वर्तमान श्लोक उस 'हजार गुने फल' को प्राप्त करने की विधि बता रहा है।

ऋषि याज्ञवल्क्य का निर्देश है कि मन्त्र का ध्यान 'मनसा' (मन से) हो। जब साधक मन्त्र को केवल वाणी से नहीं, बल्कि मन की गहराई में उतारता है, तब वह मन्त्र 'शब्द' से 'स्पंदन' में बदल जाता है। यदि जप के समय जिह्वा या ओष्ठ हिलते हैं, तो वह मानस जप न रहकर 'उपांशु' (धीमा स्वर) बन जाता है। जब तक भौतिक अंगों में हलचल रहती है, ऊर्जा का एक अंश बाह्य जगत की ओर प्रवाहित होता रहता है। पूर्णतः स्थिर जिह्वा और ओष्ठ इस बात का संकेत हैं कि साधक ने अपनी समस्त इंद्रियों को भीतर की ओर मोड़ लिया है।

इसी प्रकार, सिर और गर्दन की स्थिरता का निर्देश इसलिए है क्योंकि शरीर की सूक्ष्म हलचल मन की चंचलता का प्रतिबिंब होती है। यदि ग्रीवा काँपती है, तो इसका अर्थ है कि चित्त अभी पूर्णतः एकाग्र नहीं हुआ है। दाँतों को प्रकट न करने का निर्देश यह सुनिश्चित करता है कि साधक का मुख बंद रहे, जिससे प्राणवायु का क्षय न हो और वह भीतर ही भीतर संचित होकर मन्त्र के साथ एकाकार हो सके। यह स्थिति एक ऐसी गहन शांति की है जहाँ साधक बाहर से एक पत्थर की प्रतिमा के समान स्थिर दिखता है, किंतु भीतर एक प्रचंड मन्त्र-अग्नि प्रज्वलित होती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मानस जप की इस शारीरिक स्थिरता का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलता है:

श्रीमद्भगवद्गीता

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ ६.१३ ॥

शरीर, सिर और गर्दनको सीधा और अचल धारण करके, स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता हुआ, दिशाओंको न देखता हुआ —

श्रीमद्भगवद्गीता ६.१३गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 179

'समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥'

(अर्थ: शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और अचल धारण करके, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखता हुआ, दिशाओं को न देखता हुआ—)

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का मत एक ही है—अध्यात्मिक साधना में देह की स्थिरता, मन की स्थिरता की पूर्व-शर्त है। जहाँ गीता ध्यान की सामान्य स्थिति बता रही है, वहीं यह स्मृति विशेष रूप से 'मानस जप' के दौरान शरीर के उन अंगों (जिह्वा, ओष्ठ, दंत) की स्थिरता पर बल दे रही है, जो वाणी और प्राण के केंद्र हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'स्थिरता' से 'लय' की ओर ले जाता है। जब साधक जिह्वा और ओष्ठों को स्थिर करता है, तो वह वास्तव में अपनी 'वाक्-शक्ति' को आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तित कर रहा होता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह मन्त्र के प्रत्येक अक्षर को मन की आँखों से देखे और अनुभव करे। जब शरीर (विशेषकर शिरोग्रीव) पूरी तरह अचल हो जाता है, तब प्राणों का प्रवाह बाहरी दिशाओं में भटकना बंद कर देता है। यह स्थिति साधक को उस भूमि पर ले जाती है जहाँ 'अहं' और 'मन्त्र' के बीच का भेद मिटने लगता है। दाँतों का न दिखना और मुख का बंद रहना इस बात का प्रतीक है कि साधक ने अपनी बाहरी इंद्रियों के द्वार बंद कर लिए हैं और अब वह केवल 'अक्षर' (जो कभी नष्ट नहीं होता) के साथ संवाद कर रहा है। यह अभ्यास साधक को स्थूल देह के बोध से ऊपर उठाकर सूक्ष्म चेतना के स्तर पर प्रतिष्ठित करता है।

श्लोक ७.१४१

यक्षराक्षसभूतानि सिद्धविद्याधरोरगाः ।

हरन्ति प्रसभं यस्मात्तस्माद्गुप्तं समाचरेत् ॥ ७.१४१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७७

क्योंकि यक्ष, राक्षस, भूत, सिद्ध, विद्याधर और सर्प आदि (मन्त्र को) बलपूर्वक हर लेते हैं, इसलिए जप गुप्त रूप से करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मानस जप की शारीरिक मर्यादा का वर्णन करते हुए जिह्वा, ओष्ठ और शिरोग्रीवा की स्थिरता का निर्देश दिया। अब इस श्लोक में वे जप की उस 'गोपनीयता' का रहस्य बता रहे हैं, जो साधक की अर्जित शक्ति को सुरक्षित रखती है।

अन्वय और पदार्थ —

यक्ष-राक्षस-भूत-सिद्ध-विद्याधर-उरगाः प्रसभं यस्मात् हरन्ति, तस्मात् गुप्तं समाचरेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• यक्ष-राक्षस-भूत-सिद्ध-विद्याधर-उरगाः: यहाँ सूक्ष्म जगत के विभिन्न प्राणियों का उल्लेख है। यक्ष, राक्षस, भूत, सिद्ध, विद्याधर और उरगाः (सर्प/नाग) वे शक्तियाँ हैं जो स्थूल जगत और सूक्ष्म जगत के मध्य विचरण करती हैं।

• प्रसभं: बलपूर्वक, जबरदस्ती या बिना अनुमति के।

• हरन्ति: हर लेते हैं, चुरा लेते हैं या क्षय कर देते हैं। यहाँ 'हरने' का अर्थ मन्त्र के शब्दों को चुराना नहीं, अपितु जप से उत्पन्न होने वाले 'तेज' और 'संस्कार' को सोख लेना है।

• तस्मात् गुप्तं समाचरेत्: इसलिए (जप का) आचरण गुप्त रूप से करना चाहिए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ जप की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा का विधान कर रहे हैं। जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं है, अपितु यह एक सूक्ष्म ऊर्जा का संचय है। जब साधक मन्त्र का जप करता है, तो उसके भीतर एक विशेष प्रकार का 'तेज' या 'सिद्ध-शक्ति' उत्पन्न होती है।

ऋषि का संकेत है कि सूक्ष्म जगत में ऐसी अनेक शक्तियाँ (यक्ष, राक्षस, सिद्ध आदि) विद्यमान हैं, जो इस ऊर्जा के प्रति आकर्षित होती हैं। यदि जप प्रकट हो, वैखरी रूप में हो या साधक अपनी सिद्धि का प्रदर्शन करे, तो ये सूक्ष्म प्राणी उस ऊर्जा को 'प्रसभं' अर्थात् बलपूर्वक हर लेते हैं। जिस प्रकार एक दीपक की लौ को तेज वायु बुझा सकती है, उसी प्रकार प्रकट जप की ऊर्जा इन बाहरी प्रभावों से क्षीण हो सकती है।

अतः यहाँ 'गुप्त' रहने का निर्देश केवल सामाजिक गोपनीयता नहीं है, अपितु यह एक आध्यात्मिक सुरक्षा-कवच है। जब जप गुप्त होता है—विशेषकर मानस रूप में—तो वह साधक के हृदय और मन के भीतर ही संचित रहता है, जहाँ बाहरी सूक्ष्म शक्तियाँ उसका अतिक्रमण नहीं कर पातीं। यह गुप्तता मन्त्र की शक्ति को भीतर ही भीतर परिपक्व करती है, जिससे वह अंततः साधक को अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जा सके।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ऊर्जा के संरक्षण' का सिद्धांत है। साधक जब मन्त्र का अभ्यास करता है, तो वह अपने प्राणों को एक बिंदु पर केंद्रित करता है। यदि वह जप के दौरान विचलित होता है या अपनी साधना का प्रदर्शन करता है, तो उसकी एकाग्रता भंग होती है और संचित ऊर्जा बिखर जाती है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह अपने जप को 'हृदय-गुहा' में सुरक्षित रखे। गुप्त जप का अर्थ है—न वाणी से ध्वनि निकले, न मन से यह भाव आए कि "मैं जप कर रहा हूँ"। जब जप पूरी तरह गुप्त और निस्पृह हो जाता है, तब वह बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त होकर साधक को स्थूल भूमि से सूक्ष्म भूमि की ओर ले जाता है। यहाँ गुप्तता ही सिद्धि का आधार है।

जपस्थलानि

श्लोक ७.१४२

जलान्ते वाग्न्यगारे वा जपेद्देवालये तथा ।

पुण्यतीर्थे गवां गोष्ठे सिद्धक्षेत्रेऽथवा गृहे ॥ ७.१४२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७७

जलके किनारे, अग्निशालामें, देवालयमें, पुण्य तीर्थमें, गोशालामें, सिद्धक्षेत्रमें अथवा घरमें जप करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप की गोपनीयता का निर्देश दिया ताकि सूक्ष्म शक्तियाँ साधक के तप और तेज को हर न सकें। अब इस श्लोक में वे उन विशिष्ट स्थानों का वर्णन कर रहे हैं जहाँ जप करने से उसकी प्रभावकारिता और फल में वृद्धि होती है।

अन्वय और पदार्थ —

जलान्ते वा वाग्न्यगारे वा जपेत्, देवालये तथा, पुण्यतीर्थे, गवां गोष्ठे, सिद्धक्षेत्रे अथवा गृहे।

पदार्थ और निर्वचन:

• जलान्ते: जल के अंत में, अर्थात् जल के तट पर (नदी, सरोवर या समुद्र का किनारा)।

• वाग्न्यगारे: 'वा' (अथवा) 'अग्न्यगारे' (अग्नि-शाला या रसोईघर)। यहाँ 'वा' का प्रयोग विकल्प के लिए है।

• देवालये: देवालय में, जहाँ देवता की मूर्ति या प्रतीक प्रतिष्ठित हो।

• पुण्यतीर्थे: उन पवित्र स्थानों पर जहाँ पूर्व ऋषियों या सिद्धों के तप का प्रभाव शेष हो।

• गवां गोष्ठे: गौशाला में, जहाँ गौवंश का निवास हो।

• सिद्धक्षेत्रे: वह स्थान जहाँ किसी सिद्ध पुरुष ने तपस्या की हो या जो स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिक ऊर्जा से युक्त हो।

• गृहे: अपने घर में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ जप के लिए उपयुक्त 'क्षेत्रों' का विधान कर रहे हैं। जप एक मानसिक और प्राणिक क्रिया है, किंतु वह जिस वातावरण में संपन्न होती है, उस वातावरण के सूक्ष्म गुण साधक के अनुभव को प्रभावित करते हैं। महर्षि ने यहाँ सात स्थानों का उल्लेख किया है, जो स्थूल होते हुए भी अपने भीतर एक विशेष ऊर्जा को समेटे हुए हैं।

प्रथम, 'जलान्त' अर्थात् जल का तट। जल चंचलता और प्रवाह का प्रतीक है, किंतु उसका तट स्थिरता और प्रवाह का मिलन बिंदु है। जल की शीतलता मन के ताप को शांत करती है, जिससे एकाग्रता सुगम होती है। द्वितीय, 'अग्न्यगार' या रसोईघर। यह आश्चर्यजनक लग सकता है कि रसोईघर जप का स्थान है, किंतु अग्नि पवित्रता और रूपांतरण की अधिष्ठात्री है। जहाँ अन्न पकता है, वहाँ जीवन की ऊर्जा का सृजन होता है; अतः अग्नि के सान्निध्य में किया गया जप साधक के भीतर के अशुद्धियों को भस्म करने की क्षमता रखता है।

तृतीय, 'देवालय' और 'पुण्यतीर्थ'। ये स्थान सामूहिक श्रद्धा और दीर्घकालीन उपासना से अभिमंत्रित होते हैं। यहाँ का वातावरण साधक को स्वतः ही उच्चतर चेतना की ओर ले जाता है। चतुर्थ, 'गवां गोष्ठ' अर्थात् गौशाला। गौवंश में समस्त देवताओं का वास माना गया है और उनकी उपस्थिति में सात्विकता की प्रधानता होती है। जहाँ सात्विकता अधिक होती है, वहाँ मन्त्र का बीज शीघ्र अंकुरित होता है।

पंचम, 'सिद्धक्षेत्र'। यह वह भूमि है जहाँ 'सिद्धता' का संस्कार पहले से मौजूद है। जैसे एक जलता हुआ दीपक दूसरे दीपक को शीघ्र प्रज्वलित कर देता है, वैसे ही सिद्धक्षेत्र की ऊर्जा साधक की साधना की गति को तीव्र कर देती है। अंत में, 'गृह' का उल्लेख है। घर वह स्थान है जहाँ साधक अपनी निजी निजता और सुरक्षा में रहकर अभ्यास कर सकता है।

इन स्थानों का क्रम केवल भौगोलिक नहीं, अपितु चेतना के स्तरों का संकेत है। बाहरी तीर्थों से शुरू होकर यह यात्रा अंततः अपने ही घर (आन्तरिक गृह) तक आती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से, ये सात स्थान साधक के भीतर के सात केंद्रों या अवस्थाओं के प्रतीक हैं। बाहरी जल-तट मन की तरलता को रोकने का अभ्यास है। अग्न्यगार भीतर की जठराग्नि और ज्ञानग्नि को प्रज्वलित करने का संकेत है। देवालय और तीर्थ हृदय के उस केंद्र को दर्शाते हैं जहाँ ईश्वरीय सत्ता का अनुभव होता है। गौशाला सात्विक भावों के पोषण का प्रतीक है और सिद्धक्षेत्र उस अवस्था का है जहाँ साधक की वृत्तियाँ स्थिर होने लगती हैं।

साधक जब इन स्थानों पर जप करता है, तो वह वास्तव में बाहरी वातावरण की ऊर्जा को अपने भीतर के सूक्ष्म केंद्रों के साथ लयबद्ध कर रहा होता है। घर में जप करना यह सिखाता है कि अंततः समस्त तीर्थ और सिद्धक्षेत्र साधक के अपने भीतर ही स्थित हैं। इस अभ्यास से साधक 'बाह्य-साधना' से 'आन्तरिक-साधना' की भूमि की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ७.१४३

गृहे ह्येकगुणं प्रोक्तं नद्यां तु द्विगुणं स्मृतम् ।

गवां गोष्ठे दशगुणमग्न्यगारे दशाधिकम् ।

सिद्धक्षेत्रेषु तीर्थेषु देवतायाश्च संनिधौ ।

सहस्रं शतकोटीनामनन्तं विष्णुसंनिधौ ॥ ७.१४३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७७

घरमें (जप) एक गुना कहा गया है, नदीमें दो गुना, गोशालामें दस गुना, अग्निशालामें उससे भी अधिक; सिद्धक्षेत्रों, तीर्थों और देवताके सान्निध्यमें हजार और सौ करोड़ गुना, और विष्णुके सान्निध्यमें अनन्त।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के लिए सात उपयुक्त स्थानों का निर्देश दिया था। अब इस श्लोक में वे उन स्थानों के अनुसार जप के फल की मात्रा और उनकी प्रभावकारिता का क्रम स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

गृहे ह्येकगुणं प्रोक्तं, नद्यां तु द्विगुणं स्मृतम्। गवां गोष्ठे दशगुणम्, अग्न्यगारे दशाधिकम्। सिद्धक्षेत्रेषु, तीर्थेषु, देवतायाः संनिधौ (सहस्रं), शतकोटीम्, अनन्तं विष्णुसंनिधौ।

पदार्थ और निर्वचन:

• गृहे ह्येकगुणं: घर में एक गुना (फल)। यहाँ 'हि' निश्चयवाचक अव्यय है, जो यह बताता है कि घर जप का आधारभूत स्थान है।

• नद्यां तु द्विगुणं: नदी के तट पर दो गुना। 'तु' यहाँ तुलना का बोध करा रहा है।

• गवां गोष्ठे दशगुणम्: गौशाला में दस गुना।

• अग्न्यगारे दशाधिकम्: अग्निशाला (रसोईघर) में दस गुना से भी अधिक।

• सिद्धक्षेत्रेषु, तीर्थेषु, देवतायाः संनिधौ: सिद्धों के तपस्थलों, पवित्र तीर्थों और देवता की उपस्थिति (सान्निध्य) में।

• सहस्रं, शतकोटीम्, अनन्तं: क्रमशः हजार गुना, सौ करोड़ गुना और अनंत (असीम) फल।

• विष्णुसंनिधौ: भगवान विष्णु के सान्निध्य में।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य जप के फल की गणना कर रहे हैं। यह गणना केवल गणितीय नहीं है, अपितु यह उस स्थान की सूक्ष्म ऊर्जा और साधक के मन की एकाग्रता के मध्य के सम्बन्ध को दर्शाती है।

साधक जब अपने 'गृह' में जप करता है, तो उसे एक गुण फल मिलता है। गृह वह स्थान है जहाँ साधक का मोह, आसक्ति और पारिवारिक प्रपंच सबसे अधिक होते हैं, अतः यहाँ मन को एकाग्र करने में अधिक श्रम लगता है। नदी के तट पर प्रकृति की शीतलता और जल का प्रवाह मन के विकारों को धोता है, जिससे एकाग्रता सुगम होती है और फल 'द्विगुण' हो जाता है।

गौशाला (गवां गोष्ठे) को ऋषि ने अत्यंत प्रभावशाली माना है। गौवंश में समस्त देवताओं का वास माना गया है, और उनकी सात्त्विक उपस्थिति साधक के भीतर सहज ही करुणा और शांति जाग्रत करती है, जिससे फल दस गुना बढ़ जाता है। अग्न्यगार (रसोईघर) में अग्नि की उपस्थिति होती है। अग्नि पवित्रता और रूपांतरण का प्रतीक है। जहाँ अन्न पकता है, वहाँ जीवन की ऊर्जा का संचार होता है; अतः यहाँ जप का फल गौशाला से भी अधिक (दशाधिकम्) होता है।

जब साधक 'सिद्धक्षेत्रों' और 'तीर्थों' में जाता है, तो वह उन स्थानों पर पहुँचता है जहाँ सदियों से ऋषियों और सिद्धों ने अपनी तपस्या से वातावरण को संस्कारित किया है। ऐसे स्थानों पर साधक को स्वयं प्रयास कम करना पड़ता है; वातावरण ही उसे अंतर्मुखी कर देता है। देवता के सान्निध्य में यह प्रभाव हजार गुना और सौ करोड़ गुना तक बढ़ जाता है क्योंकि वहाँ दैवीय चेतना का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है।

अंत में, 'विष्णुसंनिध्य' में फल 'अनन्त' बताया गया है। विष्णु यहाँ केवल एक मूर्ति या व्यक्ति नहीं, अपितु उस सर्वव्यापी 'विष्णु' (विशाल रूपी परमात्मा) का प्रतीक हैं जो कण-कण में व्याप्त हैं। जब साधक इस बोध के साथ जप करता है कि वह उस परम पुरुष के सान्निध्य में है, तब वह सीमित फल की गणना से ऊपर उठकर अनन्त सिद्धि को प्राप्त होता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'वातावरण के प्रभाव' और 'चित्त की एकाग्रता' के विज्ञान को समझाता है। साधक के लिए स्थान केवल एक भौतिक पता नहीं, बल्कि एक 'ऊर्जा-क्षेत्र' है।

जिस स्थान पर पूर्व में गहन साधना हुई हो (सिद्धक्षेत्र), वहाँ सूक्ष्म तरंगें पहले से ही विद्यमान होती हैं। जब साधक वहाँ बैठकर मन्त्र का उच्चारण करता है, तो उसका मन उन तरंगों के साथ शीघ्रता से लय हो जाता है। इसे 'संस्कार-संयोग' कहते हैं। घर में जप करते समय साधक को अपने मन के विरुद्ध लड़ना पड़ता है, जबकि तीर्थ या विष्णु-सन्निध्य में वातावरण ही साधक को ऊपर की ओर खींचता है।

साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि वह अपनी मानसिक स्थिति के अनुसार स्थान का चुनाव करे। यदि मन बहुत चंचल है, तो वह नदी तट या गौशाला जैसे सात्त्विक स्थानों का आश्रय ले। जैसे-जैसे साधक की भूमि ऊँची होती है, वह 'विष्णुसंनिधि' के रहस्य को समझता है कि वास्तव में उसका अपना हृदय ही वह परम विष्णु-सन्निधि है। बाहरी तीर्थों से यात्रा आरम्भ होती है, किंतु अंततः साधक अपने भीतर के उस अनन्त क्षेत्र में प्रतिष्ठित होता है जहाँ जप का फल सीमित नहीं, अपितु अनन्त हो जाता है। यह यात्रा स्थूल (गृह) से सूक्ष्म (विष्णु) की ओर जाने की यात्रा है।

जपे भक्ष्याणि

श्लोक ७.१४४

शाकयावकभैक्ष्याणि पयोमूलफलानि च ।

बिसशृङ्गाटशालूक(कं) हविष्यान्नानि यानि तु ।

दधि सर्पिस्तथा ह्यापः प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तरम् ॥ ७.१४४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७८

शाक, जौका दलिया, भिक्षान्न, दूध, मूल, फल, कमलनाल, सिंघाड़ा, शालूक (कमलकन्द) — जो हविष्य अन्न हैं; और दही, घी तथा जल — (ये) उत्तरोत्तर प्रशस्त हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के लिए उपयुक्त स्थानों और उनके अनुसार मिलने वाले फल की गणना बताई थी। अब इस श्लोक में वे जप की आंतरिक सिद्धि के लिए आवश्यक 'आहार-शुद्धि' का निर्देश दे रहे हैं, क्योंकि अन्न का प्रभाव सीधे मन और प्राण पर पड़ता है।

अन्वय और पदार्थ —

शाकयावकभैक्ष्याणि, पयो, मूलफलानि च, बिसशृङ्गाटशालूकं (इमानि) हविष्यान्नानि यानि तु; दधि, सर्पिस्तथा ह्यापः प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तरम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• शाकयावकभैक्ष्याणि: शाक (हरी पत्तेदार सब्जियाँ), यावक (जौ का दलिया या जौ से बना हल्का भोजन) और भैक्ष्य (भिक्षा में प्राप्त अन्न)।

• पयोमूलफलानि च: पय (दूध), मूल (जड़ वाली सब्जियाँ/कंद) और फल।

• बिसशृङ्गाटशालूकं: बिस (कमलनाल), शृङ्गाट (सिंघाड़ा) और शालूक (कमल कन्द)।

• हविष्यान्नानि: हविष्य अन्न। वह अन्न जो पवित्र हो, सात्विक हो और जिसे अग्निहोत्र या देव-यज्ञ में अर्पित किया जा सके।

• दधि, सर्पिस्तथा ह्यापः: दही, घी और जल।

• प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तरम्: उत्तरोत्तर (क्रमशः) अधिक प्रशस्त या श्रेष्ठ हैं। यहाँ 'उत्तरोत्तर' शब्द यह संकेत देता है कि सूची में जो नाम बाद में आ रहे हैं, वे जप-साधना के लिए पूर्ववर्ती नामों की तुलना में अधिक उपयुक्त हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य जप की बाहरी विधि (स्थान, माला) के बाद अब साधक के शरीर और मन की शुद्धि के लिए आहार का विधान कर रहे हैं। जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति को प्राणों में उतारने की प्रक्रिया है। यदि अन्न तामसिक या भारी होगा, तो प्राणों में जड़ता आएगी और मन विचलित होगा। इसलिए यहाँ 'हविष्य अन्न' का निर्देश दिया गया है।

ऋषि सबसे पहले शाक, जौ का दलिया और भिक्षा-अन्न का उल्लेख करते हैं। जौ (याव) को वेदों में अत्यंत पवित्र और हल्का माना गया है, जो शरीर में उत्तेजना नहीं पैदा करता। भिक्षा-अन्न का महत्त्व उसकी सात्विकता और अहंकार के विसर्जन में है। तत्पश्चात दूध, मूल और फलों का उल्लेख है, जो प्राणशक्ति को बढ़ाते हैं। विशेष रूप से जल-पुष्पों के कंदों (कमलनाल, सिंघाड़ा, शालूक) का निर्देश दिया गया है, क्योंकि ये शीतल होते हैं और साधक के भीतर की तपन (राजस गुण) को शांत करते हैं।

श्लोक के अंतिम भाग में दही, घी और जल को 'उत्तरोत्तर प्रशस्त' कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि यद्यपि पूर्वोक्त सभी अन्न उचित हैं, किन्तु शुद्ध जल, शुद्ध घृत (घी) और दही—जो कि दूध के परिष्कृत रूप हैं—जप की गहराई के लिए सबसे श्रेष्ठ हैं। जल मन को निर्मल करता है, घी बुद्धि को ओजस्वी बनाता है और दही स्थिरता प्रदान करता है। यह क्रम स्थूल अन्न से सूक्ष्म और सात्विक रस की ओर ले जाने वाला है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मितहार' और 'सात्विक आहार' के सिद्धांत पर आधारित है। जप एक मानसिक तपस्या है, और तपस्या के लिए शरीर का हल्का होना अनिवार्य है। भारी या गरिष्ठ भोजन से 'तमो गुण' बढ़ता है, जिससे निद्रा और आलस्य आता है, जो जप के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

साधक जब 'युक्ताहार' (संतुलित आहार) का पालन करता है, तो उसका प्राण सूक्ष्म होने लगता है। यहाँ वर्णित अन्नों का क्रम साधक को भौतिकता से सूक्ष्मता की ओर ले जाता है। शाक और मूल जहाँ शरीर का पोषण करते हैं, वहीं दूध और घी ओज और तेज का निर्माण करते हैं। जल का अंत में आना यह दर्शाता है कि जप की उच्चतम अवस्था में साधक केवल जल और वायु पर आश्रित होकर अपनी चेतना को अक्षर में विलीन कर सकता है।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जैसा अन्न, वैसा मन। जब वह हविष्य अन्न ग्रहण करता है, तो उसका हृदय एक यज्ञशाला बन जाता है, जहाँ मन्त्र की अग्नि बिना किसी बाधा के प्रज्वलित हो सकती है। यह आहार-विधि साधक को 'स्थूल भूमि' (शरीर) से 'सूक्ष्म भूमि' (प्राण) की ओर ले जाने का साधन है।

श्लोक ७.१४५

चरवो ह्युपवासश्च भैक्ष्यं नक्तमयाचितम् ।

एतान्येव व्रतान्याहुः शस्तानि जपकर्मणि ॥ ७.१४५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७८

चरु, उपवास, भिक्षान्न, नक्त (केवल रातमें भोजन) और अयाचित (बिना माँगे मिला) — इन्हें ही जपकर्ममें प्रशस्त व्रत कहते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जप के लिए सात्विक और हविष्य अन्नों की सूची दी थी, जिससे शरीर और प्राणों की शुद्धि होती है। अब इस श्लोक में वे आहार की मात्रा और उसे ग्रहण करने के संयमित तरीकों (व्रतों) का निर्देश दे रहे हैं, ताकि जप की शक्ति और एकाग्रता उच्चतम स्तर पर पहुँच सके।

अन्वय और पदार्थ —

चरवो ह्युपवासश्च, भैक्ष्यं, नक्तं, अयाचितम्; एतान्येव व्रतान्याहुः, जपकर्मणि शस्तानि।

पदार्थ और निर्वचन:

• चरु: चरु एक विशेष प्रकार का हविष्य अन्न है, जो जौ, दूध, घी और जल के सम्मिश्रण से बनाया जाता है। यह यज्ञीय अन्न है, जो शरीर में सात्विकता और ओज बढ़ाता है।

• उपवास: 'उप' (निकट) + 'वास' (रहना)। केवल ईश्वर के निकट रहना ही उपवास है। व्यावहारिक अर्थ में यह अल्पाहार या निराहार रहकर इंद्रियों को संयमित करना है।

• भैक्ष्य: भिक्षा में प्राप्त अन्न। यह साधक के अहंकार का नाश करता है और उसे सर्वसमर्पण की स्थिति में लाता है।

• नक्त: 'नक्त' का अर्थ है रात्रि में भोजन करना। यह एक विशिष्ट व्रत है जहाँ साधक दिनभर जप और साधना में लीन रहता है और केवल रात्रि में अल्पाहार लेता है।

• अयाचित: वह अन्न जो माँगा न गया हो, अपितु प्रेम और श्रद्धा से स्वेच्छा से प्राप्त हुआ हो। यह अन्न मानसिक शांति और संतोष प्रदान करता है।

• शस्तानि: प्रशस्त, श्रेष्ठ या अनुशंसित।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ केवल भोजन की सूची नहीं दे रहे, बल्कि 'व्रत' की अवधारणा समझा रहे हैं। जप एक आंतरिक यज्ञ है, और जिस प्रकार बाहरी यज्ञ में आहुति की शुद्धि आवश्यक है, उसी प्रकार जप-यज्ञ में शरीर रूपी वेदी की शुद्धि के लिए आहार का संयम अनिवार्य है।

यहाँ पाँच प्रकार के व्रतों का उल्लेख है। 'चरु' का सेवन साधक को यज्ञीय चेतना से जोड़ता है। 'उपवास' से शरीर हल्का होता है और प्राणों का प्रवाह ऊपर की ओर बढ़ता है। 'भैक्ष्य' और 'अयाचित' अन्न का सेवन साधक के 'मैं' (अहंकार) को समाप्त करता है; जब साधक यह अनुभव करता है कि वह केवल प्रकृति के प्रसाद पर निर्भर है, तब उसका मन मन्त्र के प्रति अधिक ग्रहणशील हो जाता है। 'नक्त' भोजन का विधान उन साधकों के लिए है जो दिन के समय सूर्य की ऊर्जा के साथ एकाकार होकर गहन जप करना चाहते हैं, ताकि भोजन के कारण आने वाली निद्रा और आलस्य साधना में बाधक न बने।

इन व्रतों का उद्देश्य केवल शरीर को भूखा रखना नहीं, बल्कि मन को मन्त्र के अधीन करना है। जब जठराग्नि शांत और संतुलित होती है, तभी मन्त्र की अग्नि प्रज्वलित होती है। इसलिए इन व्रतों को जपकर्म में 'शस्तानि' अर्थात् श्रेष्ठ कहा गया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ ६.१७ ॥

जिसका आहार-विहार, कर्मोंमें चेष्टा, और सोना-जागना युक्त (संयमित) है, उसका योग दुःखोंका नाश करता है।

भगवद्गीता ६.१७गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 182

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिसका आहार और विहार 'युक्त' (संयमित) है, उसी का योग दुःखों का नाश करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी 'युक्त आहार' के व्यावहारिक और आध्यात्मिक स्वरूप को प्रकट करती है। जहाँ गीता संयम का सिद्धांत देती है, वहीं यह स्मृति चरु, उपवास और भैक्ष्य जैसे विशिष्ट साधनों द्वारा उस संयम को सिद्ध करने की विधि बताती है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—मन को चंचल अवस्था से हटाकर स्थिर करना ताकि वह मन्त्र या परमात्मा में लीन हो सके।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से, अन्न केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि वह सूक्ष्म रूप से 'चित्त' का निर्माण करता है। भारी और तामसिक भोजन से मन में जड़ता आती है, जिससे मन्त्र का प्रभाव केवल कंठ तक सीमित रह जाता है।

साधक जब उपवास, नक्त या अयाचित अन्न का अभ्यास करता है, तो वह अपनी प्राण-शक्ति को पाचन क्रिया (जठराग्नि) से हटाकर ध्यान की अग्नि में परिवर्तित करता है। चरु और हविष्य अन्न का सेवन करने से हृदय में सात्विक भाव जागृत होते हैं, जिससे मन्त्र का उच्चारण केवल ध्वनि नहीं रह जाता, बल्कि वह एक स्पंदन बन जाता है जो हृदय के गहरे स्तरों को स्पर्श करता है। इस अभ्यास से साधक 'स्थूल शरीर' की सीमाओं को पार कर 'सूक्ष्म शरीर' की शुद्धि की ओर बढ़ता है, जिससे वह जप के दौरान गहन एकाग्रता और अंततः मन्त्र-सिद्धि का अनुभव करता है।

श्लोक ७.१४६

जपकाले न भाषेत व्रतहोमादिकेषु च ।

एतेष्वेवावसक्तं तु यद्यागच्छेद्द्विजोत्तमः ।

अभिवाद्य ततो विप्रं योगक्षेमं च कीर्तयेत् ॥ ७.१४६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७८

जपके समय और व्रत-होम आदिमें न बोले; यदि इनमें लगे रहते (समय) कोई श्रेष्ठ द्विज आ जाये, तो उस विप्रको प्रणाम करके योगक्षेम (कुशल) पूछे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जपकर्म के लिए प्रशस्त व्रतों का निर्देश दिया था, जो साधक के शरीर और मन को सूक्ष्म बनाते हैं। अब इस श्लोक में वे साधना के समय 'मौन' की अनिवार्यता और उस मौन के व्यावहारिक प्रयोग के विषय में बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

जपकाले न भाषेत, व्रत-होम-आदिकेषु च। एतेषु एव अवसक्तं तु, यदि आगच्छेद् द्विजोत्तमः, अभिवाद्य ततो विप्रं, योगक्षेमं च कीर्तयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• जपकाले: जप के समय। यहाँ 'काल' केवल समय नहीं, अपितु वह अवस्था है जब साधक मन्त्र की शक्ति में लीन होता है।

• न भाषेत: न बोले। यह निषेध केवल वाणी के उच्चारण के लिए नहीं, अपितु मानसिक प्रलाप के लिए भी है।

• अवसक्तं: लीन होना, तल्लीन होना या एकाग्र होना। जब साधक बाहरी जगत से कटकर आंतरिक मन्त्र-ध्वनि में स्थित हो।

• द्विजोत्तमः: श्रेष्ठ द्विज। वह ब्राह्मण जो केवल जन्म से नहीं, अपितु ज्ञान, तप और आचरण से श्रेष्ठ हो।

• योगक्षेमं: 'योग' का अर्थ है जो प्राप्त नहीं है उसे प्राप्त करना और 'क्षेम' का अर्थ है जो प्राप्त हो चुका है उसकी रक्षा करना। व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ 'कुशल-मंगल' पूछना है।

• कीर्तयेत्: कहे या पूछे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधना के समय 'मौन' के अनुशासन को स्थापित कर रहे हैं। जप, व्रत और होम—ये तीनों ही क्रियाएँ साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती हैं। जप में ध्वनि का आंतरिक होना, व्रत में इंद्रियों का संयम और होम में आहुति के माध्यम से समर्पण होता है। इन तीनों अवस्थाओं में 'वाक्' (वाणी) का बाह्य प्रयोग ऊर्जा का क्षय करता है। जब साधक मन्त्र के बीज में स्थित होता है, तब वाणी का प्रकटीकरण उस सूक्ष्म धारा को भंग कर देता है, इसलिए निर्देश है—'न भाषेत' अर्थात् न बोले।

किन्तु, ऋषि यहाँ केवल कठोर निषेध नहीं कर रहे, अपितु 'धर्म' और 'साधना' के बीच संतुलन सिखा रहे हैं। यदि साधक अपनी साधना (जप या होम) में लीन है और उस समय कोई 'द्विजोत्तम' (श्रेष्ठ ज्ञानमार्गी ब्राह्मण) वहाँ आ जाए, तो मौन का पालन करना अहंकार या अनादर नहीं होना चाहिए। शास्त्र कहता है कि ज्ञान और तप का सम्मान साधना का ही हिस्सा है। अतः ऐसे समय में साधक को संक्षिप्त रूप में उस विप्र का अभिवादन करना चाहिए और उनके 'योगक्षेम' (कुशल) के विषय में पूछना चाहिए।

यहाँ रहस्य यह है कि श्रेष्ठ ज्ञानी का सान्निध्य स्वयं में एक प्रेरणा है। एक लघु संवाद, यदि वह श्रद्धापूर्वक और संक्षिप्त हो, तो वह साधना में बाधा नहीं बनता, बल्कि साधक के हृदय में विनय भाव जागृत करता है। यह निर्देश दर्शाता है कि योग केवल एकांत की क्रिया नहीं है, बल्कि वह समाज में रहते हुए भी श्रेष्ठों के प्रति सम्मान और विनम्रता को बनाए रखने की कला है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्-संयम' का अभ्यास है। जप के समय जब साधक मन्त्र के साथ एकरूप होता है, तब उसकी प्राण-ऊर्जा ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। बाह्य बोलना उस ऊर्जा को पुनः नीचे की ओर (बाहर की ओर) धकेल देता है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, बल्कि ऊर्जा का संचय है।

जब वह श्रेष्ठ द्विज का अभिवादन करता है, तो वह अपने 'अहं' का विसर्जन करता है। योगिक अभ्यास यह है कि संवाद के दौरान भी मन मन्त्र की लय से पूरी तरह अलग न हो; वह केवल आवश्यक शब्दों का प्रयोग करे और पुनः तुरंत अपनी आंतरिक अवस्था में लौट आए। यह अभ्यास साधक को 'स्थितप्रज्ञ' बनाता है, जहाँ वह बाहरी जगत के संपर्क में आने पर भी अपनी आंतरिक शांति और एकाग्रता को खोता नहीं है।

श्लोक ७.१४७

स्त्रीशूद्रपतितांश्चैव पाषण्डिनं रजस्वलाम् ।

जपकाले न भाषेत व्रतहोमादिकेषु च ॥ ७.१४७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७८

जप, व्रत, होम आदिके समय स्त्री, शूद्र, पतित, पाखण्डी और रजस्वलासे न बोले।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह बताया था कि जप और होम जैसी गहन साधना के समय यदि कोई श्रेष्ठ द्विज आ जाए, तो शिष्टाचारवश उनसे कुशल पूछने में दोष नहीं है। अब इस श्लोक में वे उन परिस्थितियों और व्यक्तियों का निर्देश कर रहे हैं, जिनके सम्मुख मौन का पालन अनिवार्य है।

अन्वय और पदार्थ —

पदार्थ और निर्वचन:

• जपकाले: जप के समय।

• व्रत-होम-आदिकेषु च: व्रत और होम आदि के समय भी।

• पाषण्डिनं: पाखण्डी या वे जो सत्य के मार्ग से विमुख होकर मिथ्या मतों का पोषण करते हैं।

• रजस्वलाम्: रजस्वला स्त्री।

• न भाषेत: न बोले; वाणी का प्रयोग न करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधना की शुचिता और ऊर्जा के संरक्षण का नियम बता रहे हैं। जप, व्रत और होम—ये तीनों ही क्रियाएँ साधक को स्थूल जगत से हटाकर सूक्ष्म चैतन्य की ओर ले जाने वाले साधन हैं। इस प्रक्रिया में साधक के भीतर एक विशेष प्रकार की 'तपस' या ऊष्मीय ऊर्जा उत्पन्न होती है।

यहाँ 'न भाषेत' का अर्थ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि उस मानसिक एकाग्रता का भंग होना भी है जो इन व्यक्तियों के साथ संवाद करने से संभव है। साधना के समय साधक का मन मन्त्र के बीज में स्थित होता है; जब वह ऐसे व्यक्तियों से बात करता है जिनके पास उस विशिष्ट साधना का अधिकार नहीं है या जो मर्यादा से विमुख हैं, तो साधक की वह सूक्ष्म ऊर्जा बिखर जाती है।

यह नियम 'साधना की मर्यादा' और 'ऊर्जा के विनिमय' पर आधारित है। जप और होम जैसी क्रियाओं में एक विशेष मानसिक और आध्यात्मिक वातावरण निर्मित होता है, जिसे 'साधना-मंडल' कहा जा सकता है। इस मंडल की पवित्रता बनाए रखना साधक का धर्म है। जिस प्रकार एक जलता हुआ दीपक यदि तीव्र वायु के संपर्क में आए तो बुझ जाता है, उसी प्रकार जप के समय उत्पन्न होने वाली मानसिक ज्योति बाहरी विचलित करने वाले संवादों से क्षीण हो जाती है। अतः साधना की पूर्णता और मन्त्र-सिद्धि के लिए इन विशेष स्थितियों में मौन का पालन अनिवार्य बताया गया है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्-संयम' का अभ्यास है। साधक जब जप करता है, तो वह अपनी वाणी को बाहर से समेटकर भीतर की ओर मोड़ देता है। इस अवस्था में वह 'मौन' के एक ऐसे खोल में होता है जहाँ बाहरी जगत की तरंगें उसे प्रभावित न करें।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि संवाद केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि दो प्रवृत्तियों का मिलन है। यदि साधक उच्चतर चेतना (मन्त्र) में स्थित है और वह किसी ऐसी प्रवृत्ति के साथ संवाद करता है जो तामसिक या राजसिक है, तो उसकी अपनी मानसिक स्थिति विचलित हो जाती है। इस श्लोक के माध्यम से साधक यह अभ्यास करता है कि साधना के समय उसकी प्राथमिकता केवल 'अक्षर' (मन्त्र) और 'परमात्मा' हों। वह अपनी ऊर्जा को बाहर बहने से रोककर उसे हृदय के भीतर केंद्रित करना सीखता है। यह अभ्यास उसे 'बाह्य-मौन' से 'आन्तरिक-मौन' की भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ व्यक्ति संसार के बीच रहकर भी भीतर से पूर्णतः मौन और स्थिर रहता है।

जपकालसंभाषणे निष्कृतिः

श्लोक ७.१४८

यदि वाग्यमलोपः स्याज्जपादिषु कथञ्चन ।

व्याहरेद्वैष्णवं मन्त्रं स्मरेद्वा विष्णुमव्ययम् ॥ ७.१४८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७८

यदि जप आदिमें किसी प्रकार मौन भंग हो जाये, तो वैष्णव मन्त्र बोले, अथवा अविनाशी विष्णुका स्मरण करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने निर्देश दिया था कि जप और होम जैसी साधना के समय किन व्यक्तियों के साथ संवाद वर्जित है। अब इस श्लोक में वे उस स्थिति का समाधान बता रहे हैं जहाँ अनजाने में या किसी विवशता के कारण साधक का वह अनिवार्य मौन भंग हो जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यदि जप-आदिषु कथञ्चन वाग्यमलोपः स्यात्, (तदा) वैष्णवं मन्त्रं व्याहरेत्, वा अव्ययम् विष्णुं स्मरेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• वाग्यमलोपः: 'वाक्' (वाणी) + 'मौन' + 'उप' (न्यूनता/लोप)। यहाँ इसका अर्थ है—मौन का टूट जाना या वाणी का अनपेक्षित रूप से प्रगट हो जाना।

• जपादिषु: जप, व्रत और होम आदि साधनाओं में।

• कथञ्चन: किसी भी प्रकार से; चाहे वह अनजाने में हो, विवशता में हो या किसी अन्य कारण से।

• व्याहरेत्: उच्चारण करे; बोले।

• वैष्णवं मन्त्रं: विष्णु से सम्बन्धित कोई भी मन्त्र (जैसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' या अन्य)।

• अव्ययम् विष्णुं: अविनाशी विष्णु। 'अव्यय' वह है जिसका कभी क्षय नहीं होता, जो समय और स्थान से परे नित्य है।

• स्मरेत्: स्मरण करे; मन में उनकी उपस्थिति का अनुभव करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक की मानवीय सीमाओं और साधना के बीच के संतुलन को समझा रहे हैं। जप, व्रत और होम जैसी क्रियाओं में 'मौन' केवल वाणी का अभाव नहीं है, बल्कि वह एक 'संस्कार' है जो साधक की आंतरिक ऊर्जा को बाहर बहने से रोकता है। जब साधक मन्त्र के बीज में लीन होता है, तो वह एक सूक्ष्म कवच निर्मित करता है। यदि किसी कारणवश 'वाग्यमलोपः' हो जाए, अर्थात वह मौन टूट जाए, तो वह कवच खंडित हो जाता है और साधना की वह संचित ऊर्जा बिखरने लगती है।

ऋषि कहते हैं कि यदि ऐसा घटे, तो विचलित होने के बजाय तुरंत 'वैष्णव मन्त्र' का उच्चारण करना चाहिए। यहाँ 'वैष्णव मन्त्र' का विधान इसलिए है क्योंकि विष्णु 'स्थितिरक्षक' हैं। वे समस्त सृष्टि के संतुलन और मर्यादा के अधिष्ठाता हैं। जब साधना की मर्यादा टूटती है, तो विष्णु के मन्त्र का उच्चारण उस बिखरी हुई ऊर्जा को पुनः एकत्रित करने और मन को पुनः स्थिर करने का कार्य करता है।

यदि मन्त्र का उच्चारण संभव न हो, तो 'अव्यय विष्णु' का स्मरण करने का निर्देश है। 'अव्यय' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधक जब यह अनुभव करता है कि वह उस अविनाशी तत्त्व का अंश है, तो वह अपनी उस त्रुटि (मौन भंग) से ऊपर उठ जाता है। यह स्मरण साधक को पुनः उसी अवस्था में ले आता है जहाँ से उसने जप आरम्भ किया था। यह विधि वास्तव में 'दोष-निवारण' की एक प्रक्रिया है, ताकि साधक ग्लानि या मानसिक विक्षेप में न फँसे, क्योंकि साधना में ग्लानि भी एक बाधा है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'चूक के बाद पुनः संधान' का अभ्यास है। साधना के मार्ग पर साधक से त्रुटि होना स्वाभाविक है। योग का उद्देश्य त्रुटिहीन होना नहीं, बल्कि त्रुटि होने पर पुनः केंद्र की ओर लौटने की क्षमता विकसित करना है।

यहाँ 'वैष्णव मन्त्र' और 'विष्णु-स्मरण' एक मानसिक सेतु का कार्य करते हैं। जब मौन टूटता है, तो मन बाहरी जगत की ओर खिंच जाता है। विष्णु का स्मरण साधक को पुनः 'अव्यय' यानी अविनाशी चैतन्य से जोड़ता है। यह अभ्यास साधक को सिखाता है कि यदि एकाग्रता भंग हो जाए, तो किसी उच्च नाम या मन्त्र के सहारे तुरंत मन को वापस खींचकर अंतर्मुखी कैसे किया जाए।

यह इस ग्रन्थ के पूर्ववर्ती सूत्र (७.३४) की उसी पद्धति का विस्तार है, जहाँ मन्त्र-चूक होने पर पुनः स्मरण का विधान था। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि साधना केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि निरंतर सजगता का नाम है। जब वह 'अव्यय' का स्मरण करता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल वाणी के स्तर से उठाकर पुनः उस सूक्ष्म स्तर पर ले जाता है जहाँ जप का वास्तविक फल मिलता है। इस प्रकार साधक 'विचलित अवस्था' से 'स्थितप्रज्ञ अवस्था' की ओर पुनः अग्रसर होता है।

जपकालेऽशुचिदर्शने

श्लोक ७.१४९

तूष्णीमासीत तु जपंश्चाण्डालपतितादिकान् ।

दृष्ट्वा तीर्थमुपस्पृश्य भाष्य स्नात्वा पुनर्जपन् ॥ ७.१४९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७९

जप करते हुए चाण्डाल, पतित आदिको देखकर चुप रहे; (उनसे) बोलना पड़े तो जलका स्पर्श करके, स्नान करके फिर जप करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मौन भंग होने पर विष्णु-स्मरण का उपाय बताया था। अब इस श्लोक में वे उस विशिष्ट परिस्थिति का वर्णन कर रहे हैं जहाँ साधक के सम्मुख ऐसे व्यक्ति आ जाएँ जिनकी उपस्थिति या संवाद से साधना की शुद्धि प्रभावित होने की आशंका हो।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (जपकाले) चाण्डाल-पतितादिकान् दृष्ट्वा तूष्णीमासीत; (यदि तेभ्यः) भाष्य (भाषेत), (तदा) तीर्थमुपस्पृश्य स्नात्वा पुनर्जपन् (आसीत)।

पदार्थ और निर्वचन:

• तूष्णीमासीत: 'तूष्णीम्' (मौन रहकर) + 'आसीत' (बैठा रहे/स्थित रहे)। यहाँ केवल चुप रहने का नहीं, बल्कि अपनी चेतना को स्थिर रखने का निर्देश है।

• चाण्डाल-पतितादिकान्: चाण्डाल, पतित (धर्म से गिरे हुए) और उनके समान अन्य अशुचि व्यक्तियों को।

• भाष्य: यहाँ 'भाष्य' क्रिया के रूप में प्रयुक्त है, जिसका अर्थ है—बोलना पड़े या संवाद करना पड़े।

• तीर्थमुपस्पृश्य: 'तीर्थम्' (पवित्र जल या जल-स्रोत) + 'उपस्पृश्य' (स्पर्श करके)।

• स्नात्वा: स्नान करके; शरीर और मन का जल से शोधन करके।

• पुनर्जपन्: पुनः जप की अवस्था में लौटकर।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य जप की सूक्ष्मता और उसकी सुरक्षा के विषय में बता रहे हैं। जप एक आंतरिक अग्निहोत्र है, जिसमें मन्त्र की शक्ति साधक के भीतर संचित होती है। जब साधक जप में लीन होता है, तब उसकी मानसिक ऊर्जा एक विशेष तरंग में होती है। चाण्डाल या पतित जैसे व्यक्तियों का दर्शन या उनसे संवाद, साधक की उस मानसिक एकाग्रता और सूक्ष्म शुद्धि में व्यवधान उत्पन्न करता है।

ऋषि निर्देश देते हैं कि यदि जप के समय ऐसे व्यक्तियों का दर्शन हो, तो साधक को 'तूष्णीम्' रहना चाहिए। इसका भाव यह है कि साधक अपनी दृष्टि और मन को बाहरी जगत से हटाकर पुनः मन्त्र के बीज में विलीन कर ले, ताकि बाहरी प्रभाव उसकी आंतरिक लय को न तोड़ सके।

परन्तु, यदि किसी अनिवार्य कारणवश उनसे बोलना पड़े, तो केवल मौन टूटना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस संवाद से उत्पन्न 'मानसिक अशुद्धि' का निवारण भी आवश्यक है। इसलिए महर्षि ने दो सोपान बताए हैं: प्रथम 'तीर्थ-स्पर्श' और द्वितीय 'स्नान'। जल केवल भौतिक मैल नहीं धोता, अपितु वह चेतना को शीतल कर उसे पुनः शून्य की स्थिति में लाता है। जल का स्पर्श और स्नान साधक के उस आभा-मंडल को पुनः शुद्ध करता है जो बाहरी संवाद के कारण विचलित हुआ था। इसके पश्चात ही पुनः जप आरम्भ करना चाहिए, ताकि साधना की निरंतरता और उसकी पवित्रता बनी रहे।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-शुद्धि' और 'ऊर्जा-संरक्षण' का अभ्यास है। जप के समय साधक सूक्ष्म जगत में प्रवेश करता है। जब वह किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आता है जिसकी चेतना तामसिक या विचलित है, तो साधक की सूक्ष्म ऊर्जा में 'लीकेज' या क्षय होने की संभावना रहती है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी जगत के प्रभाव उसके भीतर की शांति को कैसे स्पर्श करते हैं। 'तूष्णीम्' रहने का अभ्यास उसे बाहरी विक्षेपों के प्रति अभेद्य बनाता है। यदि संवाद अनिवार्य हो जाए, तो जल का स्पर्श और स्नान वास्तव में 'प्राणिक शोधन' की प्रक्रिया है। जल तत्व का उपयोग करके साधक अपने मन के दर्पण पर पड़ी बाहरी धूल को साफ करता है और पुनः उस भूमि पर आता है जहाँ से मन्त्र का आरोहण संभव हो। यह अभ्यास साधक को सिखाता है कि साधना के दौरान अपनी आंतरिक पवित्रता को बाहरी परिस्थितियों से कैसे सुरक्षित रखा जाए।

श्लोक ७.१५०

आचम्य प्रयतो भूत्वा जपेदशुचिदर्शने ।

सौरान् मन्त्रान् यथोत्साहं पावमानीश्च शक्तितः ॥ ७.१५० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७९

अशुद्धको देखनेपर आचमन करके, संयत होकर, यथाउत्साह सौर मन्त्रोंका और यथाशक्ति पावमानी (ऋचाओं) का जप करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चाण्डाल या पतित व्यक्तियों के दर्शन होने पर मौन रहने और यदि संवाद अनिवार्य हो, तो स्नान के पश्चात पुनः जप आरम्भ करने की विधि बताई थी। वर्तमान श्लोक में वे उस स्थिति का समाधान दे रहे हैं जहाँ स्नान संभव न हो या केवल दर्शन मात्र से उत्पन्न मानसिक अशुद्धि को दूर कर जप की निरंतरता को बनाए रखना हो।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (जपकाले) अशुचि-दर्शने आचम्य प्रयतो भूत्वा सौरान् मन्त्रान् यथोत्साहं पावमानीश्च शक्तितः जपेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अशुचि-दर्शने: अशुद्ध व्यक्ति या वस्तु के दर्शन होने पर। यहाँ 'अशुचि' केवल शारीरिक अपवित्रता नहीं, अपितु वह मानसिक तरंग है जो साधक की एकाग्रता को विचलित करती है।

• आचम्य: आचमन करके। जल के तीन घूँटों का सेवन, जो शरीर और वाणी की शुद्धि का लघु-साधन है।

• प्रयतो भूत्वा: 'प्रयतः' (संयत, प्रयत्नशील, शुद्ध) + 'भूत्वा' (होकर)। इसका अर्थ है—मन को पुनः केन्द्रित कर, इंद्रियों को वश में कर और संकल्प को दृढ़ कर।

• सौरान् मन्त्रान्: सूर्य के मन्त्रों को। सौर मन्त्र वे हैं जो सूर्य के तेज, प्रकाश और चैतन्य से सम्बन्धित हैं।

• यथोत्साहं: जैसा उत्साह हो, उस सीमा तक। यहाँ उत्साह का अर्थ मानसिक तत्परता और ऊर्जा के स्तर से है।

• पावमानीश्च: पावमानी ऋचाओं को। ये ऋचाएँ शोधन (पावन करना) करने वाली होती हैं, जो अग्नि और सूर्य के तेज का आवाहन करती हैं।

• शक्तितः: अपनी शक्ति के अनुसार। यहाँ शक्ति का अर्थ साधक की आध्यात्मिक क्षमता और मन्त्र-साधना के स्तर से है।

• जपेत्: जप करना चाहिए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य जप की प्रक्रिया को एक सूक्ष्म यज्ञ के रूप में देखते हैं। जप के समय साधक की चेतना एक विशेष लय में होती है। जब कोई 'अशुचि' (अपवित्र या निम्न चेतना वाला) व्यक्ति दृष्टि-गोचर होता है, तो उसकी तामसिक या राजसिक तरंगें साधक के सूक्ष्म मंडल को प्रभावित करती हैं। इससे जप की वह लय टूट जाती है और मन में एक प्रकार का 'मल' या अवरोध उत्पन्न हो जाता है।

ऐसी स्थिति में ऋषि पूर्ण स्नान के स्थान पर 'आचमन' का निर्देश देते हैं। आचमन केवल जल का सेवन नहीं है, अपितु यह एक संकेत है कि साधक अपनी बाहरी चेतना को पुनः शुद्ध कर रहा है। 'प्रयतो भूत्वा' का निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है; इसका अर्थ है कि केवल जल डालने से शुद्धि नहीं होगी, अपितु साधक को सचेत होकर अपने मन को पुनः उस बिंदु पर लाना होगा जहाँ वह जप के समय था।

इसके पश्चात, ऋषि 'सौर मन्त्रों' और 'पावमानी' ऋचाओं के जप का विधान करते हैं। सूर्य समस्त जगत की आत्मा है और उसकी किरणों में शोधन की शक्ति है। सौर मन्त्रों का जप करने से साधक के भीतर सूर्य का तेज जाग्रत होता है, जो अशुचि-दर्शन से उत्पन्न मानसिक धुंधलके को मिटा देता है। 'यथोत्साहं' और 'शक्तितः' शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि साधक अपनी वर्तमान मानसिक स्थिति के अनुसार मन्त्रों की संख्या या तीव्रता निर्धारित करे, ताकि जबरदस्ती के प्रयास से एकाग्रता और अधिक न भंग हो।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-शुद्धि' और 'ऊर्जा-पुनर्प्राप्ति' का अभ्यास है। जब साधक किसी अशुचि वस्तु या व्यक्ति को देखता है, तो उसकी दृष्टि के माध्यम से एक सूक्ष्म ऊर्जा का विनिमय होता है, जिससे उसकी साधना की 'धार' कुंद हो जाती है।

साधक यहाँ तीन सोपानों का अभ्यास करता है:

१. आचमन (शारीरिक-मानसिक संकेत): जल के स्पर्श और सेवन से इंद्रियों को वर्तमान क्षण में लाना।

२. प्रयत्न (संकल्प): 'प्रयतो भूत्वा' के माध्यम से बिखरी हुई मानसिक ऊर्जा को पुनः संकुचित कर केन्द्रित करना।

३. सौर-पावमानी जप (तेज का आवाहन): सूर्य के मन्त्रों के माध्यम से अपने भीतर के 'हृदय-सूर्य' को प्रकाशित करना। जिस प्रकार बाहरी सूर्य अंधकार को मिटाता है, उसी प्रकार सौर मन्त्रों का जप आंतरिक अशुद्धि को जलाकर भस्म कर देता है।

इस अभ्यास से साधक यह अनुभव करता है कि बाहरी जगत की कोई भी अशुद्धि उसे स्थायी रूप से दूषित नहीं कर सकती, यदि उसके पास अपने भीतर के प्रकाश (सौर-शक्ति) को जाग्रत करने की विधि है। वह इस स्थिति से यह सीखता है कि साधना के मार्ग में आने वाले व्यवधानों को कैसे 'पावन' करके अपनी प्रगति का हिस्सा बनाया जाए।

रौद्रपित्र्यादिमन्त्रजपे विशेषः

श्लोक ७.१५१

रौद्रपित्र्यासुरान् मन्त्रान् राक्षसानाभिचारिकान् ।

व्याहृत्यालभ्य चात्मानमपः स्पृष्ट्वान्यदाचरेत् ॥ ७.१५१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७९

रुद्र, पितर, असुर और राक्षसोंके तथा आभिचारिक मन्त्र बोलकर, अपनेको स्पर्श करके और जलका स्पर्श करके (ही) दूसरा (कर्म) करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अशुचि के दर्शन होने पर सौर मन्त्रों और पावमानी ऋचाओं के जप द्वारा शुद्धि का विधान बताया था। अब वे उन विशिष्ट मन्त्रों के प्रयोग के पश्चात की शुद्धि का निर्देश दे रहे हैं, जिनकी प्रकृति उग्र या तामसिक होती है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यदा) रौद्र-पित्र्य-आसुरान् मन्त्रान् (वा) राक्षसान्-आभिचारिकान् (मन्त्रान् व्याहृत्य), (तदा) व्याहृत्यालभ्य चात्मानम् अपः स्पृष्ट्वा अन्यदाचरेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• रौद्र-पित्र्य-आसुरान् मन्त्रान्: रुद्र (संहार शक्ति), पितरों (पूर्वजों) और असुरों से सम्बन्धित मन्त्र। ये मन्त्र विशिष्ट प्रयोजनों के लिए होते हैं और इनकी ऊर्जा अत्यंत तीव्र और भारी होती है।

• राक्षसान्-आभिचारिकान्: राक्षसों से सम्बन्धित या आभिचारिक (मारण, मोहन, वशीकरण आदि) मन्त्र। आभिचार वह क्रिया है जिसमें मन्त्र के माध्यम से किसी बाहरी परिस्थिति या व्यक्ति को प्रभावित किया जाता है।

• व्याहृत्य: बोलकर या उच्चारित करके। यहाँ 'व्याहृति' का अर्थ मन्त्र के पूर्ण उच्चारण से है।

• व्याहृत्यालभ्य चात्मानम्: स्वयं को स्पर्श करके। 'आत्मानम्' का अर्थ यहाँ देह के अंगों का स्पर्श है, ताकि मन्त्र की उग्र ऊर्जा शरीर के भीतर ही संतुलित हो जाए।

• अपः स्पृष्ट्वा: जल का स्पर्श करके। जल शीतलता और शोधन का प्रतीक है, जो उग्र ऊर्जा को शांत करता है।

• अन्यदाचरेत्: उसके पश्चात ही दूसरा (सात्विक या दैवीय) कर्म करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक को सचेत कर रहे हैं कि मन्त्र केवल शब्द नहीं, अपितु ऊर्जा के पुंज हैं। रुद्र, पितृ, असुर, राक्षस और आभिचारिक मन्त्रों की प्रकृति 'उग्र' होती है। जब कोई साधक इन मन्त्रों का उच्चारण करता है, तो उसके सूक्ष्म शरीर और वाणी-मंडल में एक विशिष्ट प्रकार का आवेश उत्पन्न होता है। यदि इसी आवेश की स्थिति में वह किसी सात्विक जप, संध्या या अन्य दैवीय कर्म में प्रविष्ट होता है, तो दोनों ऊर्जाओं के टकराव से कर्म की सिद्धि नहीं होती और साधक के चित्त में विक्षेप उत्पन्न हो सकता है।

अतः विधि यह है कि ऐसे मन्त्रों के उच्चारण के पश्चात सर्वप्रथम 'आत्म-स्पर्श' किया जाए और फिर 'जल-स्पर्श' किया जाए। आत्म-स्पर्श का भाव यह है कि मन्त्र की उग्रता को शरीर के भौतिक स्तर पर उतारकर उसे स्थिर किया जाए, और जल-स्पर्श द्वारा उस ताप को शांत किया जाए। यह प्रक्रिया एक प्रकार के 'विसर्जन' के समान है, जिससे साधक पुनः उस तटस्थ अवस्था में आ सके जहाँ से वह अन्य सात्विक कर्मों को आरम्भ कर सके।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से, रौद्र या आभिचारिक मन्त्रों का अभ्यास साधक के भीतर 'तपस' और 'क्रोध' के समान उग्र ऊर्जा को जाग्रत करता है। यह ऊर्जा यदि सही समय पर विसर्जित न की जाए, तो यह साधक के मानसिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी क्रिया (जल स्पर्श) वास्तव में आंतरिक शोधन का माध्यम है। आत्म-स्पर्श के समय साधक अपनी चेतना को उग्र मन्त्र के प्रभाव से हटाकर पुनः अपने शरीर और प्राणों में केन्द्रित करता है। जल का स्पर्श मन की चंचलता और उग्रता को शांत कर उसे 'शून्य' या 'शांत' भूमि पर लाता है। इस अभ्यास से साधक यह सीखता है कि उच्च ऊर्जा के प्रयोग के बाद पुनः सामान्य अवस्था में आना अनिवार्य है, तभी वह उच्चतर आध्यात्मिक भूमियों की ओर अग्रसर हो सकता है।

श्लोक ७.१५२

एतान् व्याहृत्य रौद्रादीनस्पृष्ट्वाऽऽशु जलं द्विजः ।

ऊर्ध्वं यत् कुरुते कर्म तद्भवत्ययथायथम् ॥ ७.१५२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७९

द्विज इन रौद्र आदि (मन्त्रों) को बोलकर, तुरन्त जलका स्पर्श किये बिना जो आगेका कर्म करता है, वह ठीक नहीं होता।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उग्र प्रकृति वाले मन्त्रों के उच्चारण के पश्चात स्वयं के अंगों और जल के स्पर्श द्वारा शुद्धि का विधान बताया था। वर्तमान श्लोक में वे उसी विधि के उल्लंघन से होने वाले दोष और उसके परिणामस्वरूप कर्म की विफलता का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: द्विजः एतान् रौद्रादीन (मन्त्रान्) व्याहृत्य, (यदि) जलं न स्पृष्ट्वा, ऊर्ध्वं यत् कर्म कुरुते, तद् अयथायथम् भवति।

पदार्थ और निर्वचन:

• एतान् रौद्रादीन: इन रुद्र, पितृ, असुर, राक्षस और आभिचारिक मन्त्रों को। यहाँ 'रौद्रादीन' शब्द पिछले श्लोक (७.१५१) में वर्णित समस्त उग्र मन्त्रों के समूह का संकेत है।

• व्याहृत्य: उच्चारित करके। मन्त्र का उच्चारण उसकी शक्ति को जाग्रत करता है।

• जलं न स्पृष्ट्वा: जल का स्पर्श न करके। जल यहाँ केवल भौतिक द्रव्य नहीं, अपितु शीतलता और शोधन का साधन है।

• ऊर्ध्वं यत् कुरुते कर्म: उसके पश्चात जो भी कर्म (पूजा, जप, होम या अन्य सात्विक क्रिया) करता है।

• अयथायथम्: जैसा होना चाहिए वैसा नहीं; अनुचित, दोषपूर्ण या निष्फल। जब कर्म अपनी स्वाभाविक रीति और शुद्धता से विमुख हो जाता है, तब वह 'अयथावत्' कहलाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र-शक्ति के सूक्ष्म विज्ञान को उद्घाटित कर रहे हैं। मन्त्रों की प्रकृति उनके देवता और प्रयोजन के अनुसार भिन्न होती है। रुद्र, पितृ, असुर और आभिचारिक मन्त्रों की ऊर्जा 'उग्र' और 'तीव्र' होती है। जब एक द्विज (साधक) इन मन्त्रों का उच्चारण करता है, तो उसके प्राण और देह में एक विशेष प्रकार का ताप और भारीपन उत्पन्न होता है। यदि इस उग्र ऊर्जा को जल के स्पर्श द्वारा शांत नहीं किया गया, तो वह ऊर्जा साधक के आभामंडल और चित्त पर चिपकी रहती है।

ऐसे दूषित या उग्र अवस्था में यदि साधक किसी सात्विक कर्म (जैसे विष्णु-जप या संध्या) में प्रवृत्त होता है, तो वह कर्म 'अयथायथम्' हो जाता है। इसका भाव यह है कि उग्र मन्त्रों का अवशेष सात्विक कर्म की सूक्ष्मता को नष्ट कर देता है, जिससे कर्म का अपेक्षित फल प्राप्त नहीं होता या वह कर्म दोषपूर्ण हो जाता है। जैसे अग्नि से जलने के बाद बिना शीतल किए किसी को स्पर्श करने पर ताप पहुँचता है, वैसे ही उग्र मन्त्रों के बाद बिना जल-स्पर्श के किया गया कर्म साधक के लिए और उसके इष्ट के लिए अनुचित हो जाता है। अतः जल का स्पर्श यहाँ केवल बाह्य शुद्धि नहीं, अपितु ऊर्जा का रूपांतरण है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से, मन्त्रों का उच्चारण नाड़ियों और प्राणों में एक विशेष कंपन उत्पन्न करता है। रौद्र और आभिचारिक मन्त्रों का कंपन तीव्र और संकुचित होता है, जो साधक के भीतर 'ताप' बढ़ाता है। जल का स्पर्श इस ताप को शांत कर प्राणों को पुनः संतुलित करता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह यह अनुभव करे कि प्रत्येक मन्त्र के बाद उसकी मानसिक और प्राणिक स्थिति बदल जाती है। उग्र मन्त्रों के प्रयोग के बाद जब वह जल को स्पर्श करता है, तो उसे उस शीतलता को केवल त्वचा पर नहीं, बल्कि अपने हृदय और प्राणों में उतरते हुए अनुभव करना चाहिए। यदि वह इस संतुलन को प्राप्त किए बिना उच्चतर भूमियों के सात्विक अभ्यासों में जाता है, तो उसकी एकाग्रता भंग होती है और चित्त में उद्वेग बना रहता है, जिससे साधना की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। अतः यह श्लोक साधक को 'ऊर्जा-शुद्धि' के महत्त्व का बोध कराता है।

स्नानानर्हा आपः

श्लोक ७.१५३

स्पर्शनाद्भिर्दूषिताभिरुद्धृताभिश्च मानवः ।

स्नानमाचरन्नुष्णाभिर्न विशुद्ध्यति कर्हिचित् ॥ ७.१५३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ७९

स्पर्शसे दूषित, (बर्तनमें) निकाले हुए और गरम जलसे स्नान करनेवाला मनुष्य कभी शुद्ध नहीं होता।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उग्र मन्त्रों के प्रयोग के पश्चात जल-स्पर्श द्वारा शुद्धि की अनिवार्यता बताई थी। अब वे स्नान के लिए प्रयुक्त होने वाले जल की पात्रता और उसकी शुद्धता के विषय में निर्देश दे रहे हैं कि किस प्रकार का जल शोधन में सहायक नहीं होता।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: मानवः स्पर्शनाद्भिः दूषिताभिः, उद्धृताभिः च, उष्ण-जल-अभिः स्नानं आचरन् न विशुद्ध्यति कर्हिचित्।

पदार्थ और निर्वचन:

• स्पर्शनाद्भिः दूषिताभिः: स्पर्श द्वारा दूषित जल से। यहाँ 'दूषित' का अर्थ केवल भौतिक गंदगी नहीं, अपितु अशुचि व्यक्ति या वर्जित वस्तुओं के स्पर्श से जल की सूक्ष्म ऊर्जा का क्षय होना है।

• उद्धृताभिः: पात्र या बर्तन में निकाले हुए जल से। जो जल अपनी प्राकृतिक धारा (प्रवाह) से अलग कर किसी पात्र में संचित कर लिया गया हो।

• उष्ण-जल-अभिः: गरम जल से। अग्नि द्वारा तापित जल।

• न विशुद्ध्यति कर्हिचित्: कभी शुद्ध नहीं होता। 'कर्हिचित्' शब्द यहाँ निषेध की पूर्णता को दर्शाता है, जिससे स्पष्ट होता है कि शोधन के लिए जल की विशिष्ट अवस्था अनिवार्य है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य स्नान को केवल देह की स्वच्छता नहीं, अपितु एक संस्कार मानते हैं। इस श्लोक में वे तीन प्रकार के जल का निषेध कर रहे हैं, जो साधक की शुद्धि में बाधक होते हैं।

प्रथम, 'स्पर्श-दूषित' जल। जल की प्रकृति ग्रहणशील होती है; वह अपने स्पर्श में आने वाली वस्तुओं और व्यक्तियों के गुणों को आत्मसात कर लेता है। यदि जल किसी अशुचि व्यक्ति या तामसिक वस्तु के स्पर्श से दूषित हो गया है, तो वह अपनी शोधन-शक्ति खो देता है। ऐसा जल देह पर डालने से भौतिक गंदगी तो हट सकती है, किन्तु सूक्ष्म स्तर पर वह अशुद्धि को और बढ़ा देता है।

द्वितीय, 'उद्धृत' जल। वह जल जो नदी, सरोवर या झरने की प्राकृतिक धारा में प्रवाहित है, उसमें 'गति' और 'प्राण' होता है। प्रवाहित जल निरंतर नवीनीकृत होता रहता है और उसमें चैतन्य शक्ति होती है। जब जल को किसी पात्र में निकाल लिया जाता है, तो उसकी वह स्वाभाविक गति रुक जाती है और वह 'जड़' होने लगता है। याज्ञवल्क्य के अनुसार, शोधन के लिए जल का 'जीवंत' (प्रवाहित) होना आवश्यक है, क्योंकि जड़ जल केवल शरीर को धोता है, आत्मा और प्राणों का शोधन नहीं करता।

तृतीय, 'उष्ण' जल। अग्नि का गुण ताप और प्रज्वलन है, जबकि जल का गुण शीतलता और शांति है। जब जल को अत्यधिक गरम किया जाता है, तो उसकी स्वाभाविक शीतलता नष्ट हो जाती है। स्नान का उद्देश्य शरीर और मन के ताप (क्रोध, उत्तेजना, व्याकुलता) को शांत करना है। गरम जल शरीर के छिद्रों को खोलकर बाहर से तो सफाई कर सकता है, किन्तु वह उस आंतरिक शांति और सात्विक स्थिरता को प्रदान नहीं कर सकता जो शीतल, प्राकृतिक जल से प्राप्त होती है।

अतः, जो मनुष्य इन तीन दोषों वाले जल से स्नान करता है, वह कभी भी उस 'विशुद्धि' को प्राप्त नहीं कर सकता जिसकी अपेक्षा जप, होम और ध्यान जैसे उच्च कर्मों के लिए की जाती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से स्नान का अर्थ है—चित्त की वृत्तियों का प्रक्षालन। साधक जब प्राकृतिक, शीतल और प्रवाहित जल से स्नान करता है, तो वह जल के 'प्राण' के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है।

यहाँ 'उष्ण जल' का निषेध साधक की मानसिक अवस्था की ओर संकेत करता है। उत्तेजित मन, कामनाओं का ताप और क्रोध की अग्नि में जलकर जो चित्त हो चुका है, वह केवल बाहरी क्रियाओं से शुद्ध नहीं होता। उसी प्रकार, जिस प्रकार गरम जल शोधन की पात्रता खो देता है, वैसे ही उत्तेजित और अशांत मन ज्ञान को ग्रहण करने की पात्रता खो देता है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि शुद्धि के लिए 'प्राकृतिकता' और 'शीतलता' अनिवार्य है। पात्र में निकाला हुआ जल 'सीमितता' का प्रतीक है, जबकि प्रवाहित जल 'अनंत' और 'मुक्त' होने का। साधक जब बहते जल में स्नान करता है, तो वह अपनी सीमित पहचान (अहंकार) को उस अनंत प्रवाह में विलीन करने का अभ्यास करता है। यह अभ्यास उसे स्थूल देह की शुद्धि से सूक्ष्म प्राणों की शुद्धि की ओर ले जाता है।

श्लोक ७.१५४

अग्राह्यास्त्वग्रिमा ह्यापो नद्याः प्रथमवेगगाः ।

प्रक्षोभिताश्च केनापि याश्च तीर्थादिनिःसृताः ॥ ७.१५४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८०

नदीका अगला, पहले वेगसे बहता हुआ जल, किसीके द्वारा मथा (गँदला किया) गया, और जो तीर्थ आदिसे (बहकर) निकला हो — (वह) ग्रहण करने योग्य नहीं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने पात्र-बद्ध और उष्ण जल की अयोग्यता बताकर स्नान के लिए जल की जीवंतता पर बल दिया था। इसी क्रम में अब वे नदी के उस जल के विषय में बता रहे हैं जो अपनी प्राकृतिक गति और शुद्धता के कारण स्नान के योग्य नहीं रह जाता।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: नद्याः अग्रिमाः आपः, प्रथम-वेग-गाः, केनापि प्रक्षोभिताः (आपिः) च, याश्च तीर्थादि-निःसृताः (ताः आपः) अग्राह्याः।

पदार्थ और निर्वचन:

• अग्राह्याः: ग्रहण करने योग्य नहीं। यहाँ 'ग्रहण' का अर्थ है—साधना की शुद्धि के लिए उपयोग में लाना।

• अग्रिमाः / प्रथमवेगगाः: नदी का वह अग्रिम जल जो सबसे पहले वेग से बहकर आता है। यह वह जल है जो मार्ग की समस्त धूल, मल और अशुद्धियों को अपने साथ बहाकर लाता है।

• प्रक्षोभिताः: 'क्षोभ' का अर्थ है—हिलना या मथना। किसी व्यक्ति या वस्तु द्वारा गँदला किया गया जल, जिसमें स्थिरता समाप्त हो गई हो।

• तीर्थादिनिःसृताः: जो जल तीर्थों, घाटों या अन्य पवित्र स्थानों से होकर (बहकर) बाहर निकल चुका हो। यहाँ 'निःसृत' का अर्थ है—वह जल जो पहले ही अन्य लोगों के स्नान या क्रियाओं से उपयोगित होकर अपनी सात्त्विकता खो चुका है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक जल की भौतिक शुद्धता के साथ-साथ उसकी 'ऊर्जा-शुद्धता' का विवेचन करता है। ऋषि याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि नदी का प्रत्येक जल स्नान के लिए उपयुक्त नहीं होता।

१. अग्रिम वेग का निषेध: नदी का जो जल सबसे पहले वेग से आता है, वह 'अग्रिम' कहलाता है। वह जल मार्ग की समस्त अशुद्धियों, मृत पत्तियों और तट की गंदगी को समेटकर आगे बढ़ता है। वह जल 'शोधक' नहीं, अपितु 'संग्राहक' होता है। साधक को उस जल की प्रतीक्षा करनी चाहिए जो प्रवाह के स्थिर होने पर आता है, क्योंकि वही जल शरीर और मन के दोषों को धोने की क्षमता रखता है।

२. प्रक्षोभित जल का निषेध: जल की एक प्रमुख विशेषता उसकी 'निर्मलता' और 'स्थिरता' है। जब जल को किसी के द्वारा मथा या क्षोभित किया जाता है, तो उसकी अंतर्निहित शांति भंग हो जाती है और तलहटी की अशुद्धियाँ ऊपर आ जाती हैं। ऐसा जल चित्त की चंचलता का प्रतीक बन जाता है, जिससे स्नान करने पर साधक के भीतर शांति के स्थान पर विक्षेप उत्पन्न होता है।

३. तीर्थ-निःसृत जल का निषेध: तीर्थों के पास जल का संचय होता है, जहाँ अनेक लोग स्नान और तर्पण करते हैं। वह जल जो इन स्थानों से होकर बह चुका है, वह दूसरों के शारीरिक और मानसिक संस्कारों (दोषों) से युक्त हो जाता है। योगिक दृष्टि से, जल केवल जल नहीं है, वह एक माध्यम है। जो जल पहले ही 'उपयोगित' हो चुका है, वह साधक की अपनी शुद्धि के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं रखता।

अतः, स्नान के लिए वह जल श्रेष्ठ है जो स्वच्छ हो, स्थिर हो और जिसका प्रवाह प्राकृतिक रूप से शुद्ध हो।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक केवल बाहरी जल की शुद्धि नहीं, अपितु 'चित्त-शुद्धि' का संकेत है।

नदी का 'प्रथम वेग' उस तीव्र आवेग और चंचलता का प्रतीक है जो साधना के आरम्भ में मन में उठती है। जैसे प्रथम वेग का जल अशुद्ध होता है, वैसे ही मन के प्रथम आवेगों (अति-उत्साह या तीव्र कामनाओं) में लिया गया निर्णय या किया गया अभ्यास शुद्ध नहीं होता। साधक को उस 'स्थिर जल' की भाँति होना चाहिए जो वेग के शांत होने पर प्रकट होता है।

'प्रक्षोभित जल' उस मन का प्रतीक है जो बाहरी विषयों के कारण मथा गया है। जब तक मन में विक्षेप (क्षोभ) है, तब तक वह ज्ञान-रूप जल को ग्रहण नहीं कर सकता। अतः स्नान की यह विधि साधक को यह सिखाती है कि साधना के लिए 'स्थिरता' और 'निर्मलता' अनिवार्य है।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार वह दूषित जल से शरीर की शुद्धि नहीं कर सकता, उसी प्रकार विक्षुब्ध और आवेगपूर्ण मन से वह अपनी अंतरात्मा की शुद्धि नहीं कर सकता। वह 'अग्राह्य' अवस्था से 'ग्राह्य' (स्थिर और शुद्ध) अवस्था की ओर बढ़ता है।

स्नानमाहात्म्यम्

श्लोक ७.१५५

अगम्यागमनात् स्तेयात् पापेभ्यश्च प्रतिग्रहात् ।

रहस्याचरितात् पापात् मुच्यते स्नानमाचरन् ॥ ७.१५५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८०

अगम्यागमन, चोरी, पापियोंसे दान लेने और गुप्त रूपसे किये पापसे (मनुष्य) स्नान करता हुआ मुक्त हो जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने स्नान के लिए जल की भौतिक और ऊर्जात्मक शुद्धता की शर्तें बताई थीं। अब वे स्नान के उस प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं जो केवल शरीर की शुद्धि तक सीमित नहीं है, अपितु साधक के संचित पापों और मानसिक संस्कारों का क्षय करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: स्नानम् आचरन् (मानुष्यः) अगम्यागमनात्, स्तेयात्, पापेभ्यः प्रतिग्रहात्, रहस्याचरितात् पापात् मुच्यते।

पदार्थ और निर्वचन:

• अगम्यागमन: 'अगम्य' अर्थात् जहाँ जाने का अधिकार न हो या जहाँ जाना वर्जित हो, वहाँ जाना। इसमें मर्यादा का उल्लंघन और अनधिकृत प्रवेश दोनों सम्मिलित हैं।

• स्तेय: चोरी। केवल भौतिक वस्तु का हरण ही नहीं, अपितु दूसरे के श्रेय या अधिकार का मानसिक रूप से लोभ करना भी स्तेय है।

• पापेभ्यः प्रतिग्रहः: 'प्रतिग्रह' का अर्थ है ग्रहण करना। पापियों या अधर्म से अर्जित धन/वस्तुओं को स्वीकार करना।

• रहस्याचरितात् पापात्: 'रहस्य' अर्थात् गुप्त। ऐसा पाप जो लोक-लाज के भय से या छिपकर किया गया हो। यह मानसिक स्तर पर अधिक गहरा घाव करता है क्योंकि यह द्वैत (दिखावा और वास्तविकता) को जन्म देता है।

• मुच्यते: मुक्त हो जाता है। यहाँ मुक्ति का अर्थ केवल पाप का मिटना नहीं, अपितु उस पाप से उत्पन्न मानसिक क्लेश और बंधन से छूट जाना है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक स्नान को केवल एक शारीरिक क्रिया से उठाकर एक 'शोधन-संस्कार' के रूप में प्रतिष्ठित करता है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जब स्नान विधिपूर्वक, श्रद्धा और पवित्रता के साथ किया जाता है, तो वह जल केवल त्वचा के मैल को नहीं, अपितु चित्त के उन मैलों को भी धो देता है जो चार विशिष्ट प्रकार के पापों से उत्पन्न हुए हैं।

१. अगम्यागमन से मुक्ति: मर्यादा का उल्लंघन व्यक्ति के भीतर अहंकार और उच्छृंखलता उत्पन्न करता है। जब साधक पवित्र जल में उतरता है, तो वह अपनी सीमाओं को पहचानता है और प्रकृति के विराट स्वरूप के सम्मुख समर्पित होता है, जिससे मर्यादा-भंग का दोष नष्ट होता है।

२. स्तेय से मुक्ति: चोरी या लोभ मन में 'अतृप्ति' और 'असुरत्व' का बीज बोता है। स्नान की क्रिया, विशेषकर जब वह समर्पण भाव से हो, साधक को यह अनुभव कराती है कि सब कुछ ईश्वर का है। यह 'ममत्व' (मेरापन) को समाप्त कर संतोष का संचार करता है।

३. पाप-प्रतिग्रह से मुक्ति: अधर्मी व्यक्ति से कुछ ग्रहण करना साधक की पात्रता को दूषित करता है। जल का स्वभाव है—सब कुछ अपने भीतर समाहित कर शुद्ध करना। स्नान के समय जब साधक जल से संपर्क करता है, तो वह बाहरी दूषित प्रभावों और अनैतिक संबंधों के संस्कारों का विसर्जन कर देता है।

४. गुप्त पापों से मुक्ति: गुप्त पाप मनुष्य के अवचेतन में 'ग्लानि' के रूप में जमा रहते हैं, जो साधना में सबसे बड़ी बाधा हैं। जब साधक जल में डुबकी लगाता है, तो वह प्रतीकात्मक रूप से अपने समस्त रहस्यों और पापों को जल को सौंप देता है। यह एक प्रकार का 'आत्म-स्वीकार' और 'प्रायश्चित्त' है।

यहाँ 'स्नान आचरन्' शब्द महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि केवल जल में शरीर डुबोना पर्याप्त नहीं है, अपितु स्नान के 'आचरण' (विधि, मंत्र और भाव) के साथ उसे करना अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-शुद्धि' की प्रक्रिया है। साधक के लिए स्नान केवल जल-क्रिया नहीं, अपितु 'भाव-विसर्जन' है।

अभ्यास यह है कि स्नान करते समय साधक अपने भीतर इन चार दोषों (अगम्यागमन, चोरी, पाप-प्रतिग्रह और गुप्त पाप) का स्मरण करे और यह अनुभव करे कि जल के साथ-साथ ये संस्कार भी उसके शरीर और मन से बहकर जा रहे हैं। जब जल शरीर को स्पर्श करता है, तो साधक उसे 'अक्षर' (अविनाशी) की शक्ति मानकर अपने भीतर की मलिनता को विसर्जित करता है। यह अभ्यास साधक को 'तामस' और 'राजस' वृत्तियों से निकालकर 'सत्व' भूमि की ओर ले जाता है, जिससे आगे की ध्यान-साधना सुगम हो जाती है।

श्लोक ७.१५६

प्रवर्तुमसमर्थश्चेत् जुहोतियजतिक्रियाः ।

स्नानध्यानजपैर्होमैरात्मानं शोधयेद्बुधः ॥ ७.१५६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८०

यदि (कोई) हवन और यज्ञकी क्रियाएँ करनेमें असमर्थ हो, तो बुद्धिमान् स्नान, ध्यान, जप और होमोंसे अपनेको शुद्ध करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में स्नान के माध्यम से गुप्त पापों और मर्यादा-उल्लंघन के दोषों से मुक्ति का वर्णन किया गया था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य उन साधकों के लिए विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं जो संसाधनों के अभाव या शारीरिक-मानसिक असमर्थता के कारण विस्तृत यज्ञ-कर्म नहीं कर पाते।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यदि मनुष्यः) प्रवर्तुमसमर्थः चेत् (यज्ञ-क्रियासु), (तदा) बुधः स्नान-ध्यान-जपैः होमैः रात्मानं शोधयेत्, (तथा) जुहोति यजति क्रियाः।

पदार्थ और निर्वचन:

• प्रवर्तुमसमर्थः: 'प्रवर्तुम्' का अर्थ है किसी क्रिया में प्रवृत्त होना या उसे पूर्ण करना। यहाँ असमर्थता का अर्थ केवल धन या सामग्री का अभाव नहीं, अपितु समय, स्वास्थ्य या उचित मार्गदर्शन की कमी भी हो सकती है।

• जुहोति यजति क्रियाः: यह वाक्यांश इस श्लोक का मुख्य उद्देश्य है। इसका भाव यह है कि जब कोई व्यक्ति स्नान, ध्यान, जप और लघु-होमों के द्वारा स्वयं को शुद्ध करता है, तो वह वास्तव में यज्ञ और हवन की क्रियाओं को ही संपन्न कर रहा होता है।

• बुधः: वह व्यक्ति जो जाग्रत है, विवेकशील है और जानता है कि बाहरी क्रिया का लक्ष्य आंतरिक शुद्धि है।

• शोधयेत्: शोधन करना। केवल सफाई नहीं, बल्कि तत्त्व की शुद्धि करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक कर्म और ज्ञान के बीच एक सेतु का कार्य करता है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि 'यज्ञ' केवल वेदी पर आहुति देना नहीं है, अपितु वह एक 'शोधन-प्रक्रिया' है। यदि कोई साधक विस्तृत यज्ञ-अनुष्ठानों, जटिल विधियों या भारी सामग्री वाले हवन करने में असमर्थ है, तो वह निराश न हो। उसके लिए 'बुद्धि' (विवेक) का मार्ग खुला है।

ऋषि कहते हैं कि एक बुद्धिमान व्यक्ति (बुधः) चार सरल साधनों से अपनी आत्मा का शोधन कर सकता है: स्नान, ध्यान, जप और होम। यहाँ 'होम' का अर्थ केवल अग्नि-कुण्ड नहीं, अपितु लघु-हवन या मानसिक आहुति भी है। जब साधक इन चार क्रियाओं को पूर्ण श्रद्धा से करता है, तो वह 'जुहोति यजति'—अर्थात् वह वास्तव में यज्ञ कर रहा है।

इसकी गहराई यह है कि बाहरी यज्ञ का उद्देश्य भी वही है जो इन चार क्रियाओं का है—अशुद्धियों का विनाश और चेतना का उत्थान। यदि साधन उपलब्ध नहीं हैं, तो साधक अपनी आंतरिक अग्नि (जठराग्नि और प्राण-अग्नि) में अपने दोषों की आहुति दे सकता है। यह श्लोक यह स्थापित करता है कि विधि से अधिक महत्वपूर्ण 'भाव' और 'शुद्धि' है। जो व्यक्ति अपनी आत्मा को शोधित कर लेता है, वह समस्त यज्ञ-क्रियाओं के फल का अधिकारी बन जाता है क्योंकि यज्ञ का वास्तविक स्वरूप 'आत्म-शुद्धि' ही है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर जाने की यात्रा है। विस्तृत यज्ञ 'स्थूल' कर्म है, जबकि स्नान, जप और ध्यान 'सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाले सोपान हैं।

साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह अपनी असमर्थता को बाधा न बनने दे, बल्कि उसे सूक्ष्म साधना की प्रेरणा बनाए।

१. स्नान से वह स्थूल शरीर और बाहरी वृत्तियों को शांत करता है।

२. जप से वह मन की चंचलता को एक बिंदु पर केंद्रित करता है।

३. ध्यान से वह उस बिंदु को हृदय के भीतर स्थित सूर्य (पुरुष) से जोड़ता है।

४. होम के माध्यम से वह अपने अहंकार और वासनाओं को ज्ञान की अग्नि में भस्म करता है।

जब साधक इन चारों का समन्वय करता है, तो वह 'बुध' की भूमि पर पहुँचता है, जहाँ उसे अनुभव होता है कि उसका अपना अस्तित्व ही एक निरंतर चलने वाला यज्ञ है। वह बाहरी वेदी के बंधन से मुक्त होकर 'अंतर्याग' (आंतरिक यज्ञ) में प्रतिष्ठित हो जाता है।

श्लोक ७.१५७

यदैव कुरुते स्नानं विशुद्धेनान्तरात्मना ।

तेनैव सर्वमाप्नोति विधिं यज्ञक्रियाफलम् ॥ ७.१५७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८०

जब भी (कोई) विशुद्ध अन्तरात्मासे स्नान करता है, उसीसे वह विधिपूर्वक यज्ञ-क्रियाका सारा फल पा लेता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह बताया गया कि जो साधक विस्तृत यज्ञ-अनुष्ठानों में असमर्थ है, वह स्नान, ध्यान, जप और होम के द्वारा स्वयं का शोधन करे। अब ऋषि याज्ञवल्क्य उस शोधन की पराकाष्ठा और उसके फल का रहस्य खोल रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (मनुष्यः) यदैव विशुद्धेनान्तरात्मना स्नानं कुरुते, (तदा) तेनैव (स्नानेन) विधिं यज्ञक्रियाफलम् सर्वम् आप्नोति।

पदार्थ और निर्वचन:

• यदैव: 'यदा' (जब) और 'एव' (ही)। यहाँ 'एव' इस बात पर बल देता है कि जैसे ही अन्तरात्मा की शुद्धि और स्नान का संयोग होता है, फल तत्काल सुनिश्चित हो जाता है।

• विशुद्धेनान्तरात्मना: यह इस श्लोक का कुंजी-पद है। 'विशुद्ध' का अर्थ है वह अवस्था जहाँ कोई विकार, द्वन्द्व या मल शेष न हो। 'अन्तरात्मा' का अर्थ है हृदय के भीतर स्थित वह चैतन्य स्वरूप, जो केवल शरीर या मन नहीं है।

• विधिं यज्ञक्रियाफलम्: 'विधि' का अर्थ है शास्त्रसम्मत मर्यादा और नियम। 'यज्ञक्रियाफल' वह आध्यात्मिक उन्नति, तेज और पुण्य है जो एक पूर्णतः विधिपूर्वक संपन्न किए गए महायज्ञ से प्राप्त होता है।

• सर्वमाप्नोति: पूर्णता की प्राप्ति। यहाँ 'सर्व' शब्द यह दर्शाता है कि आंतरिक शुद्धि से प्राप्त फल, बाहरी कर्मकांड के फल से न्यून नहीं, बल्कि उसके समान या उससे श्रेष्ठ है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक कर्मकांड के स्थूल स्तर को उठाकर उसे योग के सूक्ष्म स्तर पर प्रतिष्ठित करता है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह उद्घोष कर रहे हैं कि बाहरी जल का स्पर्श केवल शरीर की शुद्धि करता है, किन्तु उस स्नान को 'यज्ञ' में परिवर्तित करने वाला तत्त्व 'विशुद्ध अन्तरात्मा' है।

सामान्यतः लोग स्नान को केवल देह की स्वच्छता मानते हैं, परन्तु योगी के लिए स्नान एक संस्कार है। जब साधक जल में उतरता है और उसी समय उसका चित्त पूर्णतः शुद्ध, निष्काम और परमात्मा में लीन होता है, तब वह जल केवल जल नहीं रह जाता, वह सोमरस बन जाता है। ऋषि का भाव यह है कि यदि अन्तरात्मा शुद्ध है, तो एक लोटा जल से किया गया स्नान भी उस फल को दे सकता है जो हज़ारों अश्वमेध या राजसूय यज्ञों से प्राप्त होता है।

यहाँ 'विधि' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः विधि का अर्थ बाहरी नियमों (जैसे दिशा, समय, मन्त्र) से लिया जाता है, परन्तु यहाँ 'विशुद्ध अन्तरात्मा' ही सबसे बड़ी विधि है। जब साधक के भीतर सत्य, संतोष और पवित्रता की स्थापना हो जाती है, तो उसकी प्रत्येक क्रिया 'विधिपूर्वक' हो जाती है। इस प्रकार, आंतरिक शुद्धि बाहरी कर्मकांड की जटिलताओं का विकल्प बन जाती है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि यज्ञ का वास्तविक उद्देश्य 'शोधन' है; यदि शोधन भीतर ही भीतर घटित हो गया, तो बाहरी आहुतियों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'भाव-शुद्धि' का अभ्यास है। योग में इसे 'मानस-शुद्धि' कहा जाता है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जल केवल एक माध्यम है, वास्तविक शोधक तो उसके भीतर का चैतन्य है।

अभ्यास यह है कि स्नान के समय साधक केवल शरीर को न धोए, बल्कि यह अनुभव करे कि वह अपने भीतर के समस्त मानसिक विकारों—काम, क्रोध, लोभ और मोह—को जल के साथ प्रवाहित कर रहा है। जब वह 'विशुद्धेनान्तरात्मना' स्नान करता है, तो वह अपने हृदय-कमल को पूर्णतः खिला देता है। इस अवस्था में वह अनुभव करता है कि उसका शरीर ही वेदी है, उसकी श्वासें ही मन्त्र हैं और उसकी शुद्धि ही सबसे बड़ी आहुति है।

साधक इस अभ्यास से 'कर्म-भूमि' से 'भाव-भूमि' की ओर जाता है। वह समझ जाता है कि ईश्वर बाहरी क्रियाओं का भूखा नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता का अभिलाषी है। जब स्नान के क्षण में मन पूरी तरह स्थिर और निर्मल होता है, तब साधक का हृदय सूर्य के समान देदीप्यमान हो उठता है, और यही वह स्थिति है जहाँ उसे यज्ञ-क्रिया का संपूर्ण फल प्राप्त होता है।

वर्णभेदेन स्नानविधौ विशेषः

श्लोक ७.१५८

ब्रह्मक्षत्रविशां चैव मन्त्रवत् स्नानमिष्यते ।

तूष्णीमेव तु शूद्रस्य सनमस्कारकं स्मृतम् ॥ ७.१५८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८०

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके लिए मन्त्रपूर्वक स्नान अभीष्ट है; शूद्रके लिए मौन रहकर, नमस्कार सहित (स्नान) कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने यह रहस्योद्घाटित किया कि जब स्नान विशुद्ध अन्तरात्मा के साथ किया जाता है, तब वह बाह्य क्रिया मात्र न रहकर यज्ञ के समान फलदायी हो जाती है। अब इस शोधन-प्रक्रिया में वर्णों के अनुसार मन्त्र और भाव के विनियोग का विधान बताया जा रहा है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ब्रह्म-क्षत्र-विशां (त्रिणां वर्णानां) चैव मन्त्रवत् स्नानम् इष्यते; तूष्णीमेव तु शूद्रस्य स-नमस्कारकम् स्मृतम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• ब्रह्मक्षत्रविशां: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों वर्णों का समूह।

• मन्त्रवत्: मन्त्रों के साथ, या मन्त्रों के प्रभाव के समान। यहाँ 'वत्' प्रत्यय यह संकेत देता है कि स्नान केवल जल का अर्पण नहीं, अपितु मन्त्रों द्वारा जल को चैतन्य कर उस दिव्य ऊर्जा में स्वयं को विसर्जित करना है।

• इष्यते: अभीष्ट है, वांछनीय है या शास्त्रसम्मत है।

• तूष्णीम्: मौन रहकर। 'तूष्णीं' का अर्थ केवल वाणी का रुकना नहीं, अपितु चित्त की स्थिरता और आंतरिक शांति है।

• स-नमस्कारकम्: नमस्कार के साथ। यहाँ नमस्कार का अर्थ है उस परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण, जो जल के रूप में और हृदय के भीतर स्थित है।

• स्मृतम्: ऋषियों द्वारा याद किया गया है या स्मृति-परम्परा में प्रतिष्ठित है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक सामाजिक व्यवस्था के साथ-साथ साधना के सोपानों को भी स्पष्ट करता है। याज्ञवल्क्य यहाँ स्नान की विधि में वर्ण-भेद का विधान कर रहे हैं, जिसे बाहरी दृष्टि से सामाजिक नियम माना जा सकता है, किन्तु योगीश्वर की दृष्टि में यह 'अधिकार' और 'साधन' का भेद है।

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए 'मन्त्रवत् स्नान' का विधान है। मन्त्र वह ध्वनि-शक्ति है जो जड़ जल को चेतन बना देती है। जब साधक मन्त्रों का जप करते हुए स्नान करता है, तो वह जल केवल त्वचा की शुद्धि नहीं करता, अपितु मन्त्रों के स्पन्दन से शरीर के सूक्ष्म तन्तुओं और प्राणों का शोधन करता है। यह मन्त्र-स्नान वास्तव में उस श्रुति-बीज का विस्तार है जहाँ जल को 'देवता' और 'शुद्धिकर्ता' माना गया है।

शूद्र के लिए 'तूष्णीं' (मौन) और 'स-नमस्कार' स्नान का विधान है। यहाँ मौन का अर्थ मन्त्रों के अभाव से नहीं, अपितु 'मौन' को ही साधना बना देने से है। जब मन्त्रों का अधिकार या ज्ञान उपलब्ध न हो, तब 'मौन' सबसे बड़ा मन्त्र बन जाता है। नमस्कार का अर्थ है—अहंकार का विसर्जन। जब कोई साधक बिना किसी मन्त्र के, पूर्ण मौन रहकर और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण (नमस्कार) के भाव से जल में उतरता है, तो वह समर्पण ही उसके लिए मन्त्र का कार्य करता है।

भाव यह है कि शुद्धि के मार्ग भिन्न हो सकते हैं, किन्तु लक्ष्य एक ही है—चित्त की निर्मलता। जहाँ एक ओर मन्त्रों के माध्यम से 'वाक्-शक्ति' का प्रयोग कर शुद्धि की जा रही है, वहीं दूसरी ओर मौन और नमस्कार के माध्यम से 'भाव-शक्ति' द्वारा वही शुद्धि प्राप्त की जा रही है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्' और 'मौन' के संतुलन का अभ्यास है। मन्त्रवत् स्नान करने वाला साधक अपनी वाणी को ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से जोड़ता है, जिससे उसका मन एकाग्र होता है। वहीं, तूष्णीं (मौन) स्नान करने वाला साधक अपनी ऊर्जा को बाहर बहने से रोकता है और उसे भीतर की ओर मोड़ता है।

साधक के लिए यहाँ दो अभ्यास निकलते हैं:

१. मन्त्र-साधना: जल के स्पर्श के साथ मन्त्र का समन्वय करना, जिससे शरीर के भौतिक और सूक्ष्म स्तरों का शोधन हो।

२. मौन-साधना: वाणी को शांत कर केवल 'समर्पण' के भाव में स्थित होना। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं और केवल अनुभव शेष रहता है।

अतः, चाहे मन्त्रों का सहारा लिया जाए या मौन का, यदि स्नान में 'नमस्कार' (समर्पण) और 'विशुद्ध अन्तरात्मा' का भाव है, तो वह साधक को स्थूल शरीर की शुद्धि से उठाकर सूक्ष्म चैतन्य की ओर ले जाता है।

सर्वेषां धर्मसाधनम् · यमनियममाहात्म्यम्

श्लोक ७.१५९

अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।

दमः शमार्जवं दानं सर्वेषां धर्मसाधनम् ।

गृहीत्वा यमधनुर्वै नियमज्याततं दृढम् ।

संदधीत दमशरं स्वर्गलक्ष्ये प्रयत्नतः ॥ ७.१५९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८१

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, दम, शम, आर्जव और दान — (ये) सबके धर्मके साधन हैं। यमरूपी धनुष लेकर, नियमरूपी प्रत्यञ्चा दृढ़तासे चढ़ाकर, दमरूपी बाण स्वर्गरूपी लक्ष्यपर यत्नपूर्वक साधे।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में याज्ञवल्क्य ने स्नान की बाह्य शुद्धि और वर्णों के अनुसार मन्त्रों के विनियोग का वर्णन किया। अब वे स्पष्ट करते हैं कि केवल जल और मन्त्रों से शरीर की शुद्धि पर्याप्त नहीं है; वास्तविक शुद्धि और परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चरित्र की शुद्धि अनिवार्य है, जो सभी मनुष्यों के लिए समान है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: अहिंसा, सत्यम्, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, दमः, शमः, आर्जवम्, दानम् (एतानि) सर्वेषां धर्मसाधनम् (सन्ति)। यमम् (रूपकं) धनुः इव गृहीत्वा, नियमम् (रूपकं) दृढम् ज्याततम् (प्रत्यञ्चा इव) ज्याततम् (चढ़ाकर), दमम् (रूपकं) शरम् (बाणम्) स्वर्ग-लक्ष्ये प्रयत्नतः संदधीत।

पदार्थ और निर्वचन:

• अहिंसा: मन, वाणी और शरीर से किसी भी प्राणी को कष्ट न देना।

• सत्य: यथार्थ का बोलना और यथार्थ में स्थित रहना।

• अस्तेय: चोरी न करना; जो अपना नहीं है, उसकी इच्छा न करना।

• शौच: बाह्य स्वच्छता के साथ-साथ अन्तःकरण की शुद्धि।

• इन्द्रियनिग्रहः: इन्द्रियों को विषयों से हटाकर उनके अधिष्ठाता में लीन करना।

• दमः: मन का निग्रह; विशेषकर बाहरी विषयों के प्रति मन की चंचलता को रोकना।

• शमः: आंतरिक शांति; चित्त की वह अवस्था जहाँ द्वन्द्व समाप्त हो जाएँ।

• आर्जवम्: सरलता; मन, वचन और कर्म में एकरूपता (यथार्थता)।

• दानम्: त्याग की वृत्ति; केवल द्रव्य का नहीं, अपितु ज्ञान और करुणा का वितरण।

• ज्याततम्: प्रत्यञ्चा (धनुष की डोरी) को खींचकर चढ़ाना।

• संदधीत: लक्ष्य की ओर छोड़ना या साधित करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधना के उस धरातल को स्पर्श करता है जहाँ वर्ण, जाति और बाह्य विधियाँ गौण हो जाती हैं। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ नौ गुणों का वर्णन कर रहे हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, दम, शम, आर्जव और दान। इन गुणों के लिए उन्होंने शब्द प्रयुक्त किया है—'सर्वेषां धर्मसाधनम्'। इसका भाव यह है कि चाहे कोई ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो या शूद्र, यदि उसे धर्म (परम सत्य) का साधन करना है, तो ये नैतिक मूल्य अनिवार्य हैं। पिछले श्लोकों में स्नान की विधि में जो वर्ण-भेद था, वह 'अधिकार' और 'विधि' का था, किन्तु यहाँ 'साधन' की बात है, जो सार्वभौमिक है।

यहाँ याज्ञवल्क्य एक अत्यंत सूक्ष्म और ओजस्वी रूपक का प्रयोग करते हैं। वे साधना को एक युद्ध या लक्ष्य-वेध की भाँति देखते हैं। वे कहते हैं कि 'यम' (संयम) रूपी धनुष को हाथ में लें। धनुष केवल एक ढाँचा है, उसकी शक्ति उसकी प्रत्यञ्चा (डोरी) में होती है। इसलिए, 'नियम' (अनुशासन) रूपी प्रत्यञ्चा को उस धनुष पर दृढ़ता से चढ़ाएँ। यदि नियम ढीला होगा, तो धनुष का कोई मूल्य नहीं रहेगा। जब धनुष (यम) और प्रत्यञ्चा (नियम) तैयार हो जाएँ, तब 'दम' (मन का निग्रह) रूपी बाण को 'स्वर्ग' (परम पद या मोक्ष) रूपी लक्ष्य की ओर पूरी प्रयत्नपूर्वकता से छोड़ें।

यहाँ 'स्वर्ग' का अर्थ केवल भौतिक स्वर्ग नहीं, अपितु वह उच्चतम अवस्था है जहाँ साधक अपनी सीमित पहचान से मुक्त होकर अक्षर-ब्रह्म में लीन हो जाता है। यह श्लोक यह सिद्ध करता है कि बिना चरित्र की शुद्धि के, कोई भी मन्त्र, स्नान या होम साधक को लक्ष्य तक नहीं ले जा सकता।

शास्त्र-साक्ष्य —

योगसूत्र

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ २.३० ॥

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — ये यम हैं।

योगसूत्र २.३०पातञ्जल योगदर्शन — व्यासभाष्य (theVyasa) · पृष्ठ 81

यहाँ पातञ्जल योगसूत्र में यम के पाँच अंगों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) का उल्लेख है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में भी अहिंसा, सत्य और अस्तेय को प्रमुखता दी गई है, जो यह दर्शाता है कि स्मृति और योगदर्शन एक ही मूल परंपरा के दो आयाम हैं—एक सामाजिक-नैतिक मर्यादा का विस्तार है, दूसरा मानसिक एकाग्रता का।

मुण्डक उपनिषद्

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ २.२.४ ॥

प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। सावधान होकर (उसे) बेधना चाहिए, और बाणकी भाँति (लक्ष्यमें) तन्मय हो जाना चाहिए।

मुण्डक उपनिषद् २.२.४उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 104

मुण्डक उपनिषद् में एक समान रूपक आता है जहाँ प्रणव (ॐ) धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है। याज्ञवल्क्य इसी उपनिषद्-रूपक को व्यावहारिक साधना में उतारते हैं। जहाँ मुण्डक में 'प्रणव' (मन्त्र) धनुष है, यहाँ 'यम' (आचरण) धनुष है। इसका रहस्य यह है कि मन्त्र का प्रभाव तभी होता है जब साधक का आचरण (यम-नियम) शुद्ध हो। बिना यम के प्रणव-धनुष से बाण नहीं छूट सकता।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'यम' और 'नियम' के व्यावहारिक प्रयोग का सूत्र है। योगी के लिए 'यम' केवल सामाजिक नियम नहीं, बल्कि ऊर्जा के रिसाव को रोकने की प्रक्रिया है। जब साधक अहिंसा, सत्य और अस्तेय का पालन करता है, तो उसका मानसिक संघर्ष समाप्त होता है और ऊर्जा संचित होने लगती है।

अभ्यास की विधि यह है:

१. यम-धनुष: सर्वप्रथम अपने व्यवहार में अहिंसा और सत्य को स्थापित करें ताकि चित्त में कोई ग्लानि न रहे।

२. नियम-ज्या: फिर अनुशासन (नियम) को दृढ़ता से अपनाएँ। जैसे प्रत्यञ्चा जितनी दृढ़ होगी, बाण उतना ही दूर जाएगा, वैसे ही नियम जितना कठोर होगा, साधना उतनी ही तीव्र होगी।

३. दम-शर: अंत में, मन के निग्रह (दम) को एक बिंदु पर केंद्रित कर उसे लक्ष्य की ओर प्रक्षेपित करें।

यह प्रक्रिया साधक को 'स्थूल' (बाह्य स्नान) से 'सूक्ष्म' (मानसिक शुद्धि) और फिर 'कारण' (परम लक्ष्य) की ओर ले जाती है। जो साधक इन नौ साधनों को सिद्ध कर लेता है, वह वर्णों की सीमाओं से ऊपर उठकर 'मानव' से 'योगी' की भूमि पर प्रविष्ट होता है।

श्लोक ७.१६०

यस्येदमायुधं नास्ति स्वर्गसाधनमुत्तमम् ।

अपि जन्मसहस्रेण न साधयति तत् परम् ॥ ७.१६० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८१

जिसके पास यह स्वर्गका उत्तम साधनरूप आयुध नहीं है, वह हजार जन्मोंमें भी उस परम (लक्ष्य) को सिद्ध नहीं करता।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यम और नियम के रूपक द्वारा एक आध्यात्मिक धनुष-बाण की रचना बताई थी, जिसमें अहिंसा, सत्य और दम जैसे गुण आयुध के अंग हैं। वर्तमान श्लोक उसी रूपक का उपसंहार करते हुए यह स्पष्ट करता है कि इन नैतिक और मानसिक गुणों के बिना केवल बाह्य क्रियाएँ लक्ष्य प्राप्ति में सहायक नहीं होतीं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यस्य इदम् आयुधं नास्ति, (सः) उत्तमं स्वर्गसाधनम्, अपि जन्मसहस्रेण तत् परम् न साधयति।

पदार्थ और निर्वचन:

• यस्य: जिसके पास (यहाँ साधक के संदर्भ में है)।

• इदम् आयुधम्: यह आयुध; अर्थात् पिछले श्लोक (७.१५९) में वर्णित यम-नियम-दम का समुच्चय।

• स्वर्गसाधनम्: स्वर्ग की प्राप्ति का साधन। यहाँ 'स्वर्ग' का अर्थ केवल भौतिक सुखों का लोक नहीं, अपितु उच्च चेतना की वह स्थिति है जहाँ जीव अपनी सीमितता से मुक्त होता है।

• उत्तमम्: सर्वश्रेष्ठ; क्योंकि यह साधन किसी बाहरी वस्तु पर नहीं, अपितु स्वयं के चरित्र और चित्त की शुद्धि पर आधारित है।

• जन्मसहस्रेण: हजार जन्मों तक (अत्यधिक समय के सूचक के रूप में)।

• तत् परम्: उस परम लक्ष्य को; यहाँ 'परम्' शब्द उस परमपद या मोक्ष का संकेत है, जो समस्त कामनाओं के पार है।

• न साधयति: सिद्ध नहीं करता या प्राप्त नहीं करता।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को एक कठोर सत्य से अवगत कराता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि आध्यात्मिक यात्रा में 'विधि' से अधिक 'योग्यता' का महत्त्व है। पिछले श्लोक में उन्होंने जिस धनुष (यम), प्रत्यञ्चा (नियम) और बाण (दम) की बात की थी, वह वास्तव में साधक का 'आंतरिक अनुशासन' है।

भाव यह है कि यदि कोई व्यक्ति केवल बाह्य स्नान करता है, मन्त्रों का जप करता है या तीर्थों की यात्रा करता है, किन्तु उसके भीतर अहिंसा, सत्य और इन्द्रिय-निग्रह जैसे गुणों का अभाव है, तो वह साधन अधूरा है। जिस प्रकार बिना धनुष और बाण के कोई भी योद्धा युद्ध नहीं जीत सकता, उसी प्रकार बिना चरित्र-शुद्धि के कोई भी साधक संसार रूपी माया के बंधन को नहीं काट सकता।

'जन्मसहस्रेण' शब्द का प्रयोग यहाँ यह बताने के लिए किया गया है कि केवल समय बीतने या बार-बार जन्म लेने से मुक्ति नहीं मिलती। मुक्ति समय की परिमाण से नहीं, बल्कि साधना की गुणवत्ता से मिलती है। यदि साधक के पास वह 'उत्तम आयुध' (नैतिक बल और मानसिक स्थिरता) नहीं है, तो वह युगों-युगों तक साधना के मार्ग पर भटकता रहेगा, किन्तु उस 'परम' लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएगा। यह श्लोक कर्मकाण्ड और योग के बीच की कड़ी है; यह बताता है कि बाह्य कर्म (स्नान, तर्पण) तभी सार्थक होते हैं जब वे आंतरिक गुणों (यम-नियम) के आधार पर किए जाएँ।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन-पत्ति' के महत्त्व को रेखांकित करता है। साधक के लिए यम और नियम केवल सामाजिक मर्यादाएँ नहीं, बल्कि चित्त की वह तैयारी हैं जिसके बिना ध्यान की उच्च भूमियाँ प्राप्त नहीं होतीं।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि 'दम' (मन का निग्रह) वह बाण है जो सीधे लक्ष्य (परमपद) पर प्रहार करता है। यदि मन चंचल है और चरित्र में दोष हैं, तो मन्त्रों की शक्ति भी निष्फल हो जाती है। अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के 'आयुध' को जाँचे—क्या उसका सत्य दृढ़ है? क्या उसकी अहिंसा स्थिर है? जब साधक इन गुणों को अपने स्वभाव में उतार लेता है, तब वह 'असमर्थ' से 'समर्थ' की भूमि पर जाता है। यह श्लोक सिखाता है कि वास्तविक शुद्धि जल से नहीं, अपितु गुणों के संस्कार से होती है। जब अंतःकरण शुद्ध होता है, तभी वह 'परम' लक्ष्य साधक के लिए दृश्यमान होता है।

स्नानविधिनिरूपणोपसंहारः

श्लोक ७.१६१

एष वोऽभिहितः कृत्स्नः स्नानस्य परमो विधिः ।

गुणाश्च तस्याऽऽचरतो दोषाश्चैवानिषेवणात् ॥ ७.१६१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८१

तुमसे स्नानकी यह सम्पूर्ण परम विधि कही गयी, और उसका आचरण करनेवालेके गुण तथा न करनेवालेके दोष भी।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बाह्य स्नान की मर्यादाओं के साथ-साथ यम-नियम रूपी आंतरिक आयुधों की अनिवार्यता को प्रतिपादित किया था। वर्तमान श्लोक स्नान-विधि के इस विस्तृत विवेचन का उपसंहार है, जहाँ ऋषि साधक को संपूर्ण निर्देश देकर इस प्रकरण को पूर्ण करते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: एषः स्नानस्य परमो विधिः कृत्स्नः वोऽभिहितः, तस्य आचरतः गुणाः च अनिषेवणात् दोषाः च एव (अभिहिताः)।

पदार्थ और निर्वचन:

• एषः: यह (यहाँ पूर्व में कही गई समस्त चर्चा का संकेत है)।

• वोऽभिहितः: तुम सबको कही गई (अभिहित = स्पष्ट रूप से बताई गई)।

• कृत्स्नः: सम्पूर्ण; जिसमें बाह्य शुद्धि, मानसिक शुद्धि और नैतिक अनुशासन—तीनों का समावेश है।

• स्नानस्य परमो विधिः: स्नान की परम विधि; 'परम' शब्द यहाँ यह दर्शाता है कि यह केवल शरीर धोने की क्रिया नहीं, अपितु आत्मा को शुद्ध करने का उच्चतम मार्ग है।

• आचरतः गुणाः: आचरण करने वाले के गुण; जो विधिपूर्वक स्नान और यम-नियम का पालन करता है, उसमें उत्पन्न होने वाले सात्विक लक्षण।

• अनिषेवणात् दोषाः: अनिषेवण (न करने या उपेक्षा करने) से उत्पन्न दोष; जो केवल बाह्य क्रिया करता है या विधि का त्याग करता है, उसकी चेतना में आने वाली जड़ता।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक 'पूर्णविराम' की भाँति है, जो साधक को यह बोध कराता है कि अब उसे स्नान के विषय में वह सब ज्ञात हो चुका है जो उसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'परम विधि' शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। उनके लिए स्नान केवल जल का शरीर से स्पर्श नहीं है, अपितु यह एक समग्र प्रक्रिया है।

इस 'परम विधि' का विस्तार पिछले श्लोकों में इस प्रकार था: प्रथम—जल की शुद्धता और चयन (नदी का वेग, उष्ण जल का निषेध), द्वितीय—मानसिक स्थिति (विशुद्ध अन्तरात्मा), तृतीय—सामाजिक और नैतिक मर्यादाएँ (अशुचि-दर्शन पर शुद्धि), और चतुर्थ—चरित्र की शुद्धि (यम-नियम)। जब ये चारों स्तर मिलते हैं, तब वह 'स्नान' बनता है।

भाव यह है कि ऋषि ने केवल 'क्या करना है' (विधि) ही नहीं बताया, बल्कि 'क्यों करना है' और 'न करने पर क्या होगा' (गुण और दोष) का भी विश्लेषण किया है। जो साधक इस विधि का पालन करता है, वह केवल भौतिक रूप से स्वच्छ नहीं होता, अपितु उसके भीतर 'गुण' रूपी सात्विकता का उदय होता है। इसके विपरीत, जो इस विधि की उपेक्षा करता है या केवल यांत्रिक रूप से जल छिड़कता है, वह 'दोष' रूपी अविद्या और तामसिकता से घिरा रहता है।

यह श्लोक यह भी संकेत देता है कि बाह्य कर्म (स्नान) और आंतरिक धर्म (यम-नियम) अलग-अलग नहीं हैं। यदि स्नान की विधि में यम-नियम का अभाव है, तो वह विधि 'कृत्स्न' (सम्पूर्ण) नहीं रह जाती। अतः, इस उपसंहार के माध्यम से ऋषि साधक को कर्म और ज्ञान के समन्वय की ओर ले जा रहे हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'पूर्णता' के अनुभव का सूत्र है। योग में किसी भी क्रिया का अभ्यास तब तक सफल नहीं होता जब तक वह 'विधि' और 'भाव' के समन्वय से न किया जाए।

यहाँ स्नान का योगिक अभ्यास यह है कि साधक जब शरीर को जल से धोता है, तो वह यह अनुभव करे कि वह केवल त्वचा की गंदगी नहीं, अपितु चित्त के मल (काम, क्रोध, लोभ) को भी धो रहा है। 'परम विधि' का अर्थ है—स्थूल से सूक्ष्म की ओर गमन। जब साधक इस विधि को आत्मसात करता है, तो वह 'भूमि' के स्तर पर परिवर्तन अनुभव करता है: वह केवल 'शौच' (बाह्य शुद्धि) की भूमि से उठकर 'शुद्धि' (आंतरिक पवित्रता) की भूमि पर प्रतिष्ठित होता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह स्नान के समय यह चिंतन करे कि जिस प्रकार जल शरीर को निर्मल करता है, उसी प्रकार यम-नियम का पालन उसके सूक्ष्म शरीर को निर्मल कर रहा है। इस श्लोक का रहस्य यह है कि 'विधि' का पालन करना अनुशासन है, और उस विधि के पीछे के 'गुणों' को जीना योग है। जब विधि और गुण एक हो जाते हैं, तब स्नान एक 'यज्ञ' बन जाता है, जैसा कि पिछले श्लोकों में संकेत दिया गया था।

सप्त स्नानानि

श्लोक ७.१६२

असामर्थ्याच्छरीरस्य कालशक्त्यव्यपेक्षया ।

मन्त्रस्नानादिकान् सप्त केचिदिच्छन्ति सूरयः ॥ ७.१६२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८१

शरीरकी असमर्थतासे, अथवा काल और शक्तिकी अपेक्षासे, कुछ विद्वान् मन्त्रस्नान आदि सात (स्नान) मानते हैं —

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बाह्य स्नान की मर्यादाओं और यम-नियम रूपी आंतरिक आयुधों की अनिवार्यता को प्रतिपादित कर स्नान की 'परम विधि' का उपसंहार किया था। अब ऋषि उन विशेष परिस्थितियों का समाधान कर रहे हैं जहाँ साधक पूर्ण विधि से बाह्य स्नान करने में असमर्थ हो।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: शरीरस्य असामर्थ्यात्, काल-शक्ति-अव्यपेक्षया, केचिद् सूरयः मन्त्रस्नानादिकान् सप्त (स्नानानि) इच्छन्ति।

पदार्थ और निर्वचन:

• असामर्थ्याच्छरीरस्य: शरीर की असमर्थता से; जैसे गंभीर रोग, अत्यधिक वृद्धावस्था, या ऐसी शारीरिक स्थिति जहाँ जल का स्पर्श वर्जित या हानिकारक हो।

• कालशक्त्यव्यपेक्षया: काल और शक्ति की अपेक्षा से; 'काल' का अर्थ यहाँ केवल समय नहीं, अपितु ऋतु (जैसे कड़ाके की ठंड) या विशेष समय का अभाव है। 'शक्ति' का अर्थ है शारीरिक या मानसिक ऊर्जा की न्यूनता, अथवा जल के उपलब्ध न होने जैसी परिस्थिति।

• सूरयः: विद्वान या मनीषी; यहाँ उन ऋषियों का संकेत है जिन्होंने सूक्ष्म साधना के माध्यम से बाह्य क्रियाओं के आंतरिक विकल्पों को खोजा है।

• मन्त्रस्नानादिकान् सप्त: मन्त्रस्नान आदि सात प्रकार के स्नान; यहाँ 'आदिकान्' शब्द यह संकेत देता है कि मन्त्रस्नान प्रथम और प्रमुख है, जिसके बाद अन्य छह विकल्पों का विवरण आएगा।

• इच्छन्ति: मानते हैं या स्वीकार करते हैं; यहाँ 'इच्छा' का अर्थ व्यक्तिगत अभिलाषा नहीं, अपितु शास्त्र-सम्मत मान्यता या विधान है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक करुणा और योगिक व्यवहार का संगम है। महर्षि याज्ञवल्क्य जानते हैं कि साधना का मार्ग केवल स्वस्थ और अनुकूल परिस्थितियों वाले लोगों के लिए नहीं, अपितु हर उस जिज्ञासु के लिए है जो सत्य की खोज में है। यहाँ वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यदि शरीर जल-स्नान के योग्य न हो, या समय और परिस्थिति प्रतिकूल हो, तो भी शुद्धि का मार्ग बंद नहीं होता।

बाह्य स्नान (अवगाहन) का मुख्य उद्देश्य शरीर की अशुद्धि को दूर कर मन को एकाग्र करना और चेतना को जागृत करना है। जब बाह्य जल उपलब्ध न हो या शरीर उसे सहन न कर सके, तब 'मन्त्रस्नान' और अन्य विकल्प उसी उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। यह विधान सिद्ध करता है कि शुद्धि का मूल 'भाव' और 'संकल्प' में है, न कि केवल जल की भौतिक धारा में।

ऋषि यहाँ 'सूरयः' (विद्वानों) का उल्लेख कर रहे हैं, क्योंकि ये सात स्नान केवल कर्मकाण्डीय विकल्प नहीं हैं, बल्कि सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि जब स्थूल साधन (जल) अनुपलब्ध होता है, तब सूक्ष्म साधन (मन्त्र, तत्व, चिन्तन) उसी फल की प्राप्ति कराते हैं। यह श्लोक एक सेतु है जो साधक को भौतिक निर्भरता से मुक्त कर उसे मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि की ओर ले जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन की अनुकूलता' का सिद्धांत सिखाता है। साधक के लिए संदेश यह है कि उसकी साधना शरीर की सीमाओं की दासी नहीं होनी चाहिए। जब शरीर असमर्थ हो, तब साधक अपनी चेतना को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर मोड़ता है।

यहाँ 'असामर्थ्य' केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक जड़ता भी हो सकती है। ऐसे में मन्त्रस्नान का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि शुद्धता बाहर से भीतर नहीं आती, बल्कि भीतर से बाहर की ओर प्रवाहित होती है। यह अभ्यास साधक को 'अवस्था-परिवर्तन' की भूमि पर ले जाता है—जहाँ वह भौतिक जल के अभाव में भी अपने भीतर के 'अमृत-तत्व' या 'प्राण-जल' का अनुभव करना सीखता है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक यह समझता है कि मन्त्र की ध्वनि और तत्व का ध्यान शरीर के रोम-रोम को उसी प्रकार शुद्ध कर सकता है, जैसे गंगाजल करता है।

श्लोक ७.१६३

मान्त्रं भौमं तथाऽऽग्नेयं वायव्यं दिव्यमेव च ।

वारुणं मानसं चैव सप्त स्नानान्यनुक्रमात् ॥ ७.१६३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८१

— मान्त्र, भौम, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और मानस — क्रमसे ये सात स्नान हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन विशेष परिस्थितियों का उल्लेख किया जहाँ शरीर की असमर्थता या काल-शक्ति के अभाव में साधक पूर्ण बाह्य स्नान नहीं कर पाता। इसी विकल्प के समाधान स्वरूप, अब ऋषि उन सात प्रकार के स्नानों का नाम निर्दिष्ट कर रहे हैं जो बाह्य जल-स्नान के तुल्य फल प्रदान करने वाले हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: मान्त्रं, भौमं, तथा अग्नेयं, वायव्यं, दिव्यमेव च, वारुणं, मानसं च एव — (एतानि) सप्त स्नानानि अनुक्रमात् (सन्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• मान्त्रं: मन्त्रों के प्रभाव से होने वाला स्नान; जहाँ जल की न्यूनता हो, वहाँ मन्त्र की शक्ति जल के गुण को जागृत करती है।

• भौमं: पृथ्वी तत्त्व से सम्बद्ध स्नान; मृदा (मिट्टी) के लेप या स्पर्श से होने वाली शुद्धि।

• आग्नेयं: अग्नि तत्त्व से सम्बद्ध स्नान; भस्म या अग्नि की उष्णता के प्रभाव से होने वाली शुद्धि।

• वायव्यं: वायु तत्त्व से सम्बद्ध स्नान; गोरज (गायों की धूलि) या वायु के वेग से होने वाली शुद्धि।

• दिव्यम्: दिव्य या आकाशीय तत्त्व से सम्बद्ध स्नान; विशेष प्राकृतिक संयोग (जैसे धूप में वर्षा) से होने वाली शुद्धि।

• वारुणं: जल तत्त्व का पूर्ण प्रयोग; अवगाहन या जल में पूरी तरह डुबकी लगाना।

• मानसं: मन के स्तर पर होने वाली शुद्धि; विष्णु-चिन्तन या आत्म-साक्षात्कार द्वारा किया गया स्नान।

• अनुक्रमात्: क्रमशः; यहाँ स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने का एक क्रम संकेतित है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि शुद्धि केवल जल के भौतिक स्पर्श का नाम नहीं है, अपितु यह एक चेतना का विस्तार है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सात स्नानों की एक ऐसी श्रृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं जो सृष्टि के पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को मन्त्र और मन के साथ जोड़ती है।

सामान्यतः स्नान का अर्थ शरीर की बाह्य अशुद्धि को दूर करना है, किन्तु योगी के लिए स्नान का अर्थ है—अपने अस्तित्व के प्रत्येक स्तर को शुद्ध करना। जब साधक जल-स्नान में असमर्थ होता है, तब वह अन्य तत्त्वों का आश्रय लेता है। 'मान्त्र' स्नान मन्त्र की ध्वनि-शक्ति से सूक्ष्म शरीर को धोता है; 'भौम' पृथ्वी की स्थिरता और सोखने की शक्ति से मल का निष्कासन करता है; 'आग्नेय' भस्म के माध्यम से अहंकार और वासनाओं को जलाकर भस्म करता है; 'वायव्य' वायु की गतिशीलता से जड़ता को दूर करता है; 'दिव्य' स्नान प्रकृति के विराट स्वरूप के साथ एकाकार होने का अनुभव है; 'वारुण' जल के प्रवाह में स्वयं को विसर्जित करना है; और अंततः 'मानस' स्नान वह पराकाष्ठा है जहाँ साधक मन के दर्पण को शुद्ध कर उसमें परमात्मा (विष्णु) का दर्शन करता है।

यह सात स्नानों का क्रम केवल विकल्प नहीं, बल्कि एक सोपान है। यह स्थूल शरीर की शुद्धि से आरम्भ होकर अंततः मन की शुद्धि पर समाप्त होता है। यह विधान सिद्ध करता है कि ईश्वर या शुद्धि किसी एक साधन (केवल जल) तक सीमित नहीं है, अपितु संपूर्ण प्रकृति ही शुद्धि का माध्यम है, यदि उसे मन्त्र और श्रद्धा के साथ जोड़ा जाए।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'तत्त्व-शुद्धि' का अभ्यास है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसका शरीर और मन उन्हीं तत्त्वों से बना है जिनसे यह ब्रह्माण्ड बना है। जब वह इन सात स्नानों का अभ्यास करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के पंच-महाभूतों का शोधन कर रहा होता है।

अभ्यास की दृष्टि से साधक इसे इस प्रकार देखता है:

१. मान्त्र स्नान: ध्वनि और कंपन द्वारा चित्त की शुद्धि।

२. भौम स्नान: पृथ्वी तत्त्व के माध्यम से स्थिरता और का अनुभव।

३. आग्नेय स्नान: तप और तेज द्वारा आंतरिक अशुद्धियों का दहन।

४. वायव्य स्नान: प्राण-वायु के माध्यम से हल्कापन और गतिशीलता का अनुभव।

५. दिव्य स्नान: आकाश तत्त्व की व्यापकता और विराटता का अनुभव।

६. वारुण स्नान: प्रवाह और समर्पण का भाव।

७. मानस स्नान: समस्त इंद्रियों को समेटकर हृदय-कमल में स्थित परमात्मा का चिन्तन।

साधक इस अभ्यास से 'स्थूल भूमि' (शरीर) से 'सूक्ष्म भूमि' (प्राण और मन) की ओर बढ़ता है। यह यात्रा जल (बाहरी माध्यम) से आरम्भ होकर अंततः मन (आंतरिक माध्यम) पर समाप्त होती है। यहाँ 'मानस स्नान' सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि यह अन्य सभी स्नानों के फल को अपने भीतर समेटे हुए है। योगी अनुभव करता है कि यदि मन शुद्ध है, तो वह सदैव स्नान की अवस्था में है; वह 'आत्म-तीर्थ' में स्थित है जहाँ कोई बाह्य मल उसे स्पर्श नहीं कर सकता।

श्लोक ७.१६४

आपोहिष्ठेति वै मान्त्रं मृदालम्भश्च पार्थिवम् ।

आग्नेयं भस्मना स्नानं वायव्यं गोरजः स्मृतम् ॥ ७.१६४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८२

"आपो हि ष्ठा…" (से मार्जन) मान्त्र (स्नान) है, मिट्टीका लेप पार्थिव (भौम), भस्मसे स्नान आग्नेय, और गायोंकी धूलि वायव्य कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर की असमर्थता या काल-शक्ति के अभाव में सात स्नानों के विकल्पों का नाम निर्दिष्ट किया था। वर्तमान श्लोक में ऋषि उन पहले चार स्नानों—मान्त्र, भौम, आग्नेय और वायव्य—की विशिष्ट विधि और उनके तत्त्व-आधार को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: 'आपो हि ष्ठा' इति (मन्त्रेण स्नानं) वै मान्त्रम्, मृदालम्भः च पार्थिवम्, भस्मना स्नानं आग्नेयम्, गोरजः वायव्यं स्मृतम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• आपो हि ष्ठा: यह ऋग्वेद के प्रसिद्ध 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र का आरम्भिक अंश है। यहाँ इस मन्त्र के पाठ या इसके द्वारा अभिमन्त्रित जल के प्रयोग से होने वाले स्नान को 'मान्त्र स्नान' कहा गया है।

• मृदालम्भः: मृदा (मिट्टी) का शरीर पर लेप करना या मिट्टी के स्पर्श से शुद्धि करना।

• पार्थिवम्: पृथ्वी तत्त्व से सम्बद्ध। यहाँ मृदा का लेप पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है।

• भस्मना: अग्नि द्वारा दग्ध पदार्थों की राख (भस्म) के प्रयोग से।

• आग्नेयम्: अग्नि तत्त्व से सम्बद्ध। भस्म अग्नि का अवशेष है, अतः यह अग्नि तत्त्व की शुद्धि है।

• गोरजः: 'गो' (गाय) और 'रज' (धूलि)। गायों के चलने से उड़ने वाली धूलि।

• वायव्यं: वायु तत्त्व से सम्बद्ध। धूलि वायु के माध्यम से शरीर पर पहुँचती है और वायु के वेग से ही यह शुद्धि संभव होती है, अतः यह वायव्य स्नान है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को यह समझाता है कि जब बाह्य जल-स्नान संभव न हो, तब सृष्टि के मूल तत्त्वों (पंचमहाभूतों) के माध्यम से भी शुद्धि प्राप्त की जा सकती है। याज्ञवल्क्य यहाँ केवल कर्मकाण्डीय विकल्प नहीं दे रहे, अपितु शरीर और प्रकृति के गहरे सम्बन्ध को खोल रहे हैं।

प्रथम 'मान्त्र स्नान' है। यहाँ 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र का संकेत है। जब जल की भौतिक उपलब्धता कम हो, तब मन्त्र की शक्ति जल के सूक्ष्म तत्त्व को जागृत कर देती है। मन्त्र केवल शब्द नहीं, अपितु वह ध्वनि-तरंग है जो शरीर के भीतर के जल (रस) को शुद्ध करती है।

द्वितीय 'पार्थिव स्नान' है, जिसमें मृदा (मिट्टी) का लेप किया जाता है। पृथ्वी तत्त्व स्थिरता और सोखने की शक्ति का प्रतीक है। मिट्टी का लेप शरीर के स्थूल दोषों और अशुद्धियों को सोख लेता है, जिससे साधक का शरीर पृथ्वी के साथ एकाकार होकर स्थिर होता है।

तृतीय 'आग्नेय स्नान' है, जो भस्म के माध्यम से होता है। अग्नि तत्त्व का स्वभाव है—दहन और परिवर्तन। भस्म उस अग्नि का साक्ष्य है जिसने सब कुछ जलाकर भस्म कर दिया। भस्म का लेप करने से साधक के भीतर के काम, क्रोध और मोह जैसे मानसिक विकारों का प्रतीकात्मक दहन होता है और शरीर की सूक्ष्म शुद्धि होती है।

चतुर्थ 'वायव्य स्नान' है, जिसमें गोरज (गायों की धूलि) का प्रयोग होता है। वायु तत्त्व गति और प्राण का प्रतीक है। गाय को पवित्र माना गया है और उसकी धूलि वायु के माध्यम से जब शरीर को स्पर्श करती है, तो वह प्राणवायु के प्रवाह को शुद्ध करती है।

इस प्रकार, याज्ञवल्क्य यह दिखा रहे हैं कि शुद्धि केवल जल तक सीमित नहीं है, अपितु मन्त्र (नाद), पृथ्वी, अग्नि और वायु—इन सबके माध्यम से चेतना को शुद्ध किया जा सकता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'तत्त्व-शुद्धि' के अभ्यास में ले जाता है। यहाँ शुद्धि केवल बाह्य शरीर की स्वच्छता नहीं, अपितु शरीर के भीतर व्याप्त पंचमहाभूतों का संतुलन और उनका परिष्कार है।

जब साधक 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र का जप या प्रयोग करता है, तो वह अपने भीतर के सूक्ष्म जल-तत्त्व (रस) को जागृत कर उसे शुद्ध करता है, जिससे चित्त की चंचलता शांत होती है। मृदा लेप के समय वह अपनी चेतना को पृथ्वी तत्त्व की स्थिरता में प्रतिष्ठित करता है, जिससे मन का भटकाव रुकता है और साधक में धैर्य का उदय होता है। भस्म का प्रयोग करते समय वह अपनी आंतरिक ज्ञान-अग्नि को प्रदीप्त करता है; जैसे अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही यह अभ्यास साधक के भीतर के काम, क्रोध और मोह जैसे विकारों का दहन कर उसे वैराग्य की भूमि पर ले जाता है। गोरज के स्पर्श में वह वायु तत्त्व के माध्यम से अपने प्राणों के प्रवाह को शुद्ध और हल्का करता है।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि संपूर्ण प्रकृति ही शुद्धि का साधन है। वह स्थूल शरीर की सीमाओं से ऊपर उठकर यह अनुभव करता है कि वह स्वयं इन तत्त्वों का पुंज है। जब शरीर के ये भौतिक तत्त्व—पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु—मन्त्र और संकल्प के द्वारा शुद्ध होते हैं, तब साधक की चेतना स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर बढ़ती है और अंततः उस 'अक्षर' (अविनाशी तत्त्व) के साक्षात्कार के योग्य बनती है।

श्लोक ७.१६५

यत्तु सातपवर्षेण स्नानं तद्दिव्यमुच्यते ।

वारुणं चावगाहस्तु मानसं विष्णुचिन्तनम् ॥ ७.१६५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८२

धूप रहते वर्षामें जो स्नान है, वह दिव्य कहलाता है; (जलमें) डुबकी वारुण है, और विष्णुका चिन्तन मानस (स्नान) है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सात स्नानों के क्रम में प्रथम चार—मान्त्र, भौम, आग्नेय और वायव्य—की व्याख्या की थी। वर्तमान श्लोक में वे शेष तीन स्नानों (दिव्य, वारुण और मानस) की विधि और उनके स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यत् तु सातपवर्षेण स्नानं तत् दिव्यम् उच्यते, अवगाहः च वारुणम्, विष्णुचिन्तनम् (च) मानसं (स्नानम्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• सातपवर्षेण: 'सातप' (सूर्य की तपिश/धूप) और 'वर्ष' (वर्षा)। जब आकाश में सूर्य की धूप और वर्षा एक साथ विद्यमान हो, ऐसी स्थिति को 'सातपवर्ष' कहते हैं।

• दिव्यम्: दिव्य स्नान। यहाँ 'दिव्य' का अर्थ आकाश-तत्त्व से सम्बद्ध है, जहाँ अग्नि (सूर्य) और जल (वर्षा) का मिलन हो रहा हो।

• अवगाहः: जल में पूरी तरह डुबकी लगाना। शरीर का पूर्णतः जलमग्न होना 'अवगाहन' कहलाता है।

• वारुणम्: वरुण देव के तत्त्व (जल) से सम्बद्ध।

• विष्णुचिन्तनम्: भगवान विष्णु का ध्यान या उनका स्मरण। यहाँ विष्णु केवल एक देवता नहीं, अपितु 'विष्णु' शब्द के अर्थ 'विशाल' या 'सर्वव्यापी' उस चेतना का चिन्तन है जो समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।

• मानसं: मन के स्तर पर किया गया स्नान। यह भौतिक जल के बिना, केवल विचार और भाव की शुद्धि है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी ने शरीर की असमर्थता या प्रतिकूल काल के लिए जो सात स्नानों का विकल्प दिया है, वे वास्तव में स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक यात्रा हैं।

प्रथम, 'दिव्य स्नान' वह है जो धूप और वर्षा के संयोग में होता है। प्रकृति में जब सूर्य (अग्नि) और वर्षा (जल) एक साथ हों, तो वह स्थिति एक प्राकृतिक यज्ञ के समान हो जाती है। यह स्नान 'दिव्य' इसलिए है क्योंकि इसमें साधक एक साथ दो विपरीत तत्त्वों के संतुलन का अनुभव करता है। यह बाहरी प्रकृति के माध्यम से भीतर के द्वंद्वों को शांत करने की एक विधि है।

द्वितीय, 'वारुण स्नान' वह है जिसे 'अवगाहन' कहा गया है। जल में पूरी तरह डूबना केवल शरीर की शुद्धि नहीं है, अपितु यह स्वयं को पूर्णतः समर्पित करने का प्रतीक है। जैसे जल में डूबकर शरीर के सभी छिद्र शुद्ध होते हैं, वैसे ही अवगाहन के समय साधक अपनी समस्त अहंकार-वृत्तियों को जल में विसर्जित कर देता है।

तृतीय और अंतिम है 'मानस स्नान', जो विष्णु-चिन्तन के माध्यम से होता है। यह सात स्नानों की श्रृंखला का शिखर है। जब बाह्य जल, मिट्टी, भस्म या धूप-वर्षा उपलब्ध न हो, तब साधक अपने भीतर के 'विष्णु' (सर्वव्यापक आत्मा) का चिन्तन करता है। यह स्नान सबसे सूक्ष्म है क्योंकि यह मन के मैल—काम, क्रोध, लोभ और मोह—को धोने की प्रक्रिया है। यहाँ 'विष्णु-चिन्तन' का अर्थ है यह अनुभव करना कि मैं उसी अनंत चेतना का अंश हूँ, और उस बोध मात्र से अंतःकरण शुद्ध हो जाता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'बाह्य शुद्धि' से 'आंतरिक शुद्धि' की ओर ले जाता है। दिव्य और वारुण स्नान जहाँ प्रकृति और शरीर के स्तर पर कार्य करते हैं, वहीं मानस स्नान सीधे चित्त के स्तर पर कार्य करता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह धीरे-धीरे अपनी निर्भरता भौतिक संसाधनों (जैसे नदी या वर्षा) से हटाकर अपने भीतर के ध्यान पर ले आए। विष्णु-चिन्तन का अभ्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार जल शरीर की अशुद्धि हटाता है, उसी प्रकार 'विष्णु' (परम पुरुष) का स्मरण मन के विकारों को धो देता है।

यह मानस स्नान सबसे श्रेष्ठ और सूक्ष्म है क्योंकि यह किसी देश या काल की सीमा में नहीं बँधा है। एक योगी के लिए विष्णु-चिन्तन ही वह 'अक्षर-स्नान' है, जो उसे भौतिक शरीर की सीमाओं से ऊपर उठाकर शुद्ध चैतन्य की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। इस अभ्यास से साधक 'स्थूल' (शरीर) से 'सूक्ष्म' (मन) और फिर 'कारण' (आत्मा) की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ७.१६६

शस्तं स्नानं यथोद्दिष्टं मन्त्रस्नानक्रमेण तु ।

कालदोषादसामर्थ्यात् सर्वं तुल्यफलं स्मृतम् ॥ ७.१६६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८२

जैसा कहा गया (वैसा जलमें) स्नान प्रशस्त है; पर कालदोष या असमर्थताके कारण मन्त्रस्नान आदिके क्रमसे सबका फल समान कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर की असमर्थता या प्रतिकूल समय के लिए सात वैकल्पिक स्नानों (मान्त्र, भौम, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और मानस) का निरूपण किया था। वर्तमान श्लोक में वे इन विकल्पों की तुलना मूल जल-स्नान से करते हुए उनके फल की स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यथोद्दिष्टं स्नानं शस्तम्, तु मन्त्रस्नानक्रमेण (स्नानं) कालदोषादसामर्थ्यात् सर्वं तुल्यफलं स्मृतम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• यथोद्दिष्टं: जैसा कि निर्देश दिया गया है, अर्थात् शास्त्रोक्त विधि से नदी, सरोवर या शुद्ध जल में किया गया वास्तविक स्नान।

• शस्तम्: श्रेष्ठ, प्रशस्त या उत्तम।

• मन्त्रस्नानक्रमेण: मन्त्रस्नान आदि के उस क्रम से, जिसका वर्णन पिछले श्लोकों (७.१६३-१६५) में किया गया है।

• कालदोषात्: समय की प्रतिकूलता के कारण (जैसे अत्यधिक शीत, वर्षा या ऐसी स्थिति जहाँ जल उपलब्ध न हो)।

• असामर्थ्यात्: शारीरिक दुर्बलता, रोग या अन्य किसी विवशता के कारण।

• तुल्यफलं: समान फल देने वाला। यहाँ फल का अर्थ केवल बाह्य शुद्धि नहीं, अपितु वह मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि है जो स्नान का उद्देश्य है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में ऋषि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण समन्वय स्थापित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि साधक समर्थ है और समय अनुकूल है, तो 'यथोद्दिष्ट' स्नान—अर्थात् जल में डूबकर किया गया शास्त्रोक्त स्नान—ही सबसे श्रेष्ठ (शस्तम्) है। जल का स्पर्श शरीर की स्थूल अशुद्धियों को धोता है और मन को शीतलता प्रदान करता है, जिससे साधक आगे की साधना के लिए तैयार होता है।

किंतु, योगीश्वर याज्ञवल्क्य जानते हैं कि साधना केवल शरीर और परिस्थिति की दासी नहीं होनी चाहिए। यदि कोई साधक रोगग्रस्त है या ऐसा समय है जब जल में उतरना प्राणघातक या असंभव हो, तब 'मन्त्रस्नान' आदि के सात विकल्प सामने आते हैं। यहाँ रहस्य यह है कि जब बाहरी जल उपलब्ध न हो, तब मन्त्र, भस्म, मिट्टी या केवल विष्णु-चिन्तन (मानस स्नान) के माध्यम से जो शुद्धि की जाती है, वह फल में मूल स्नान के 'तुल्य' मानी गई है।

इसका अर्थ यह है कि शुद्धि का मूल उद्देश्य 'भाव' और 'संकेत' है। जिस प्रकार जल शरीर को शुद्ध करता है, उसी प्रकार मन्त्र मन को, भस्म अहंकार को और विष्णु-चिन्तन बुद्धि को शुद्ध करता है। जब साधक पूर्ण श्रद्धा और विधि से इन विकल्पों का आश्रय लेता है, तो उसकी अंतरात्मा में वही स्पंदन उत्पन्न होता है जो एक पवित्र नदी में स्नान करने से होता है। अतः, असमर्थता की स्थिति में ये सात स्नान केवल 'विकल्प' नहीं, बल्कि 'समान फल' देने वाले साधन हैं।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साधन' और 'साध्य' के भेद से ऊपर उठाता है। जल-स्नान एक स्थूल साधन है, जबकि मन्त्र और मानस स्नान सूक्ष्म साधन हैं। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि शुद्धि केवल त्वचा का प्रक्षालन नहीं, अपितु चेतना का परिमार्जन है।

जब साधक कालदोष या असमर्थता में मन्त्रस्नान या मानस-स्नान करता है, तो वह अपनी चेतना को बाह्य जगत (जल) से हटाकर आंतरिक जगत (मन्त्र/चिन्तन) की ओर मोड़ता है। यह अभ्यास उसे इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह समझ पाता है कि 'शुद्धि' एक आंतरिक अवस्था है। जो साधक जल के बिना भी स्वयं को शुद्ध अनुभव करने की क्षमता विकसित कर लेता है, वह धीरे-धीरे स्थूल अवलंबनों से मुक्त होकर केवल 'अक्षर' और 'भाव' के सहारे अपनी साधना को निरंतर रखने में सक्षम हो जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, साधना का क्रम टूटना नहीं चाहिए; विकल्प का चयन कर लक्ष्य (शुद्धि) की प्राप्ति जारी रखनी चाहिए।

श्लोक ७.१६७

मानसं प्रणवस्नानं केचिदिच्छन्ति सूरयः ।

आत्मतीर्थप्रशंसायां व्यासेन पठितं यतः ॥ ७.१६७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८२

कुछ विद्वान् प्रणवसे (किये) मानस स्नानको मानते हैं, क्योंकि आत्मतीर्थकी प्रशंसामें व्यासने (ऐसा) पढ़ा है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर की असमर्थता या प्रतिकूल समय के लिए सात वैकल्पिक स्नानों का निरूपण किया था, जिनमें अंतिम 'मानस स्नान' के रूप में विष्णु-चिन्तन को बताया गया। वर्तमान श्लोक में वे मानस स्नान की एक और सूक्ष्म और उच्चतर विधि का संकेत दे रहे हैं, जो केवल चिन्तन तक सीमित नहीं अपितु नाद-योग से जुड़ी है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: केचिद सूरयः मानसं प्रणवस्नानं इच्छन्ति, यतः व्यासेन आत्मतीर्थप्रशंसायां (एतत्) पठितं।

पदार्थ और निर्वचन:

• सूरयः: विद्वान्, मनीषी या वे साधक जो सूक्ष्म ज्ञान के ज्ञाता हैं।

• मानसं प्रणवस्नानं: प्रणव (ॐ) के माध्यम से किया गया वह स्नान जो मन के स्तर पर घटित होता है। यहाँ 'स्नान' का अर्थ जल से नहीं, अपितु चेतना के शोधन से है।

• इच्छन्ति: यहाँ 'इच्छन्ति' का अर्थ केवल इच्छा करना नहीं, अपितु उसे स्वीकार करना, मान्य करना या उसके अभ्यास का समर्थन करना है।

• आत्मतीर्थप्रशंसायाम्: 'आत्मतीर्थ' वह अवस्था है जहाँ साधक स्वयं के भीतर स्थित शुद्ध चैतन्य रूपी तीर्थ का अनुभव करता है। उसकी प्रशंसा या महिमा के वर्णन में।

• व्यासेन पठितं: महर्षि व्यास ने इसे पढ़ाया या प्रतिपादित किया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं। पिछले श्लोक (७.१६५) में मानस स्नान का अर्थ 'विष्णु-चिन्तन' बताया गया था, जो कि एक साकार या गुणात्मक चिन्तन है। किंतु यहाँ वे 'प्रणवस्नान' की बात कर रहे हैं, जो निराकार और नाद-प्रधान है।

कुछ मनीषी और योग-विज्ञानी यह मानते हैं कि 'ॐ' (प्रणव) का जप और उसमें लीन होना ही वास्तविक मानस स्नान है। जल शरीर की बाहरी त्वचा और स्थूल मल को धोता है, किंतु प्रणव का नाद मन के सूक्ष्म संस्कारों, वासनाओं और मानसिक अशुद्धियों को धोता है। जब साधक प्रणव के 'अ', 'उ', 'म' और उसके बाद आने वाले अनहद नाद (अक्षर) में डूबता है, तो वह वास्तव में चेतना के उस स्तर पर स्नान करता है जहाँ कोई मैल शेष नहीं रहता।

ऋषि याज्ञवल्क्य इस मत की पुष्टि के लिए महर्षि व्यास का प्रमाण देते हैं। वे कहते हैं कि व्यास ने 'आत्मतीर्थ' की महिमा बताते हुए इस विधि को पढ़ाया है। आत्मतीर्थ वह स्थिति है जहाँ साधक को यह अनुभव होता है कि तीर्थ बाहर नदियों या सागरों में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। जब बाहरी जल उपलब्ध न हो, या शरीर अत्यंत अशक्त हो, तब यह 'प्रणवस्नान' केवल विकल्प नहीं, अपितु श्रेष्ठतम साधन बन जाता है क्योंकि यह सीधे आत्मा के स्तर पर शुद्धि करता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर यात्रा है। बाहरी स्नान शरीर को शुद्ध करता है, विष्णु-चिन्तन मन को एकाग्र करता है, और प्रणवस्नान आत्मा को प्रकाशित करता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक प्रणव (ॐ) को केवल एक शब्द न मानकर उसे एक 'दिव्य जल' की भाँति अनुभव करे। जैसे जल में डुबकी लगाने से शरीर जलमय हो जाता है, वैसे ही प्रणव के जप और उसके नाद में डूबने से साधक का संपूर्ण अस्तित्व 'ओम्-मय' हो जाता है। यह 'प्रणव में डुबकी' लगाना ही मानस स्नान है।

साधक जब इस अभ्यास को करता है, तो वह 'बाह्य तीर्थ' (नदी, सरोवर) से 'आन्तर तीर्थ' (हृदय-आकाश) की ओर बढ़ता है। वह अनुभव करता है कि आत्मा ही परम तीर्थ है और प्रणव उस तीर्थ तक पहुँचने का मार्ग और स्वयं वह पवित्र जल है। इस अभ्यास से साधक अपनी चेतना को भौतिकता से उठाकर अक्षर-ब्रह्म की भूमि तक ले जाता है, जहाँ पहुँचकर वह समस्त मानसिक क्लेशों से मुक्त होकर परम शुद्धि का अनुभव करता है।

अशक्तस्यार्थे स्नानानुकल्पः

श्लोक ७.१६८

योऽसौ विस्तरशः प्रोक्तः स्नानस्य विधिरुत्तमः ।

अशक्तस्तु न कुर्याद्वै तत्रायं विधिरुच्यते ॥ ७.१६८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८३

स्नानकी जो उत्तम विधि विस्तारसे कही गयी, उसे जो असमर्थ हो वह न करे; उसके लिए यह विधि कही जाती है —

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर की असमर्थता या प्रतिकूल समय के लिए सात वैकल्पिक स्नानों का निरूपण किया था, जिसमें मानस स्नान के अंतर्गत विष्णु-चिन्तन और प्रणव-जप की महिमा बताई गई। अब इस श्लोक के माध्यम से वे विस्तृत विधि और संक्षिप्त विकल्प के मध्य की विभाजक रेखा खींच रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: स्नानस्य यो उत्तमः विधिः विस्तरशः प्रोक्तः (तम्) अशक्तः न कुर्यात्, (किन्तु) तत्रायं विधिः उच्यते।

पदार्थ और निर्वचन:

• विस्तरशः: विस्तारपूर्वक, जिसमें मन्त्र, मुद्रा, जल की विशिष्टता और समय का पूर्ण अनुपालन हो।

• उत्तमः विधिः: वह आदर्श विधि जो पूर्ण शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य वाले साधक के लिए निर्धारित है।

• अशक्तः: वह जो शारीरिक व्याधि, वृद्धत्व, अत्यधिक प्रतिकूल जलवायु या अन्य अनिवार्य बाधाओं के कारण विस्तृत विधि का पालन करने में असमर्थ हो।

• न कुर्यात्: न करे। यहाँ 'न' निषेध नहीं, अपितु करुणा और विवेक है; क्योंकि सामर्थ्य के विरुद्ध किया गया कर्म तनाव पैदा करता है, शुद्धि नहीं।

• तत्रायं विधिः उच्यते: वहाँ (उस स्थिति में) यह (संक्षिप्त/वैकल्पिक) विधि कही जाती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक और योगिक सूत्र दे रहे हैं। उन्होंने पूर्व में स्नान की जो 'उत्तम विधि' बताई—जिसमें नदी का अग्र-वेग, विशिष्ट मन्त्रों का उच्चारण, समय का सटीक पालन और शरीर का पूर्ण अवगाहन सम्मिलित था—वह एक आदर्श स्थिति है। किंतु, योग का लक्ष्य केवल बाह्य क्रियाओं का अनुकरण नहीं, अपितु चेतना की शुद्धि है।

ऋषि कहते हैं कि जो साधक 'अशक्त' है, उसे उस विस्तृत विधि के पीछे भागकर स्वयं को कष्ट न देना चाहिए। शास्त्र का यह दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि विधि साधन है, साध्य नहीं। यदि शरीर रोगी है या परिस्थिति प्रतिकूल है, तो बाह्य जल में डुबकी लगाने का प्रयास शरीर को और अधिक रुग्ण कर सकता है, जिससे साधना में बाधा आएगी। अतः, याज्ञवल्क्य यहाँ 'विधि-परिवर्तन' का विधान कर रहे हैं।

यहाँ 'अशक्त' शब्द केवल शारीरिक दुर्बलता के लिए नहीं, अपितु उस मानसिक स्थिति के लिए भी है जहाँ साधक बाह्य कर्मकाण्ड के बोझ तले दबकर अपने अंतःकरण की शांति खो देता है। जब बाह्य साधन उपलब्ध न हों, तब 'अन्तःकरण' ही साधन बन जाता है। इसीलिए, विस्तृत विधि के स्थान पर वे अब उन सूक्ष्म विकल्पों की चर्चा करने जा रहे हैं, जो बाह्य रूप से छोटे दिखते हैं, किंतु आंतरिक प्रभाव में उतने ही शक्तिशाली हैं। यह श्लोक एक सेतु है, जो हमें स्थूल स्नान (जल-स्नान) से सूक्ष्म स्नान (मन्त्र और मानस स्नान) की ओर ले जाता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधना के लचीलेपन' और 'विवेक' का अभ्यास है। योग में 'अति' वर्जित है। यदि कोई साधक अपनी शारीरिक सीमा को भूलकर कठोर विधि का पालन करता है, तो वह 'अभ्यास' नहीं, बल्कि 'अहंकार' या 'भय' बन जाता है।

यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि शुद्धि का मूल 'भाव' और 'संकल्प' में है, केवल जल की मात्रा में नहीं। जब वह विस्तृत विधि का त्याग कर संक्षिप्त विधि को अपनाता है, तो वह 'बाह्य-निर्भरता' से 'आंतरिक-निर्भरता' की ओर बढ़ता है। यह संक्रमण उसे इस बोध की ओर ले जाता है कि जिस शुद्धता के लिए वह नदी की खोज कर रहा था, वही शुद्धता उसके भीतर के मन्त्र और संकल्प में निहित है। यह अभ्यास साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह समझता है कि 'अक्षर' (प्रणव) और 'भाव' ही वास्तविक शोधक हैं।

श्लोक ७.१६९

स्नानमन्तर्जले चैव मार्जनाचमने तथा ।

जलाभिमन्त्रणं चैव तीर्थस्य परिकल्पनम् ॥ ७.१६९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८३

— अन्तर्जलमें स्नान, मार्जन और आचमन, जलका अभिमन्त्रण और तीर्थकी कल्पना —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि जो साधक विस्तृत स्नान-विधि के पालन में असमर्थ है, उसे विवश होकर त्रुटिपूर्ण क्रिया न कर विकल्प का आश्रय लेना चाहिए। इसी क्रम में अब वे उन संक्षिप्त विधियों का (गणना) कर रहे हैं, जो बाह्य जल की अनुपलब्धता या शारीरिक अशक्तता में भी शुद्धि प्रदान करती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: स्नानम् (भवति) अन्तर्जले चैव, (तथा) मार्जनाचमने तथा, (तथा) जलाभिमन्त्रणं चैव, (तथा) तीर्थस्य परिकल्पनम्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अन्तर्जले: यहाँ 'अन्तर्जला' के दो अर्थ हैं। प्रथम, वह जल जो पात्र के भीतर हो (जैसे लोटा या कलश), जिससे पूर्ण अवगाहन संभव न हो। द्वितीय, योगिक दृष्टि से शरीर के भीतर स्थित जल-तत्त्व (रस, रक्त, लसीका)।

• मार्जन: जल की सूक्ष्म बूँदें छिड़क कर शरीर को शुद्ध करना। यह क्रिया बाह्य शुद्धि के साथ-साथ मन के विकारों को 'मार्जित' करने का प्रतीक है।

• आचमन: जल के लघु अंश का सेवन। यह केवल मुख की शुद्धि नहीं, अपितु अंतःकरण की शुद्धि का संकल्प है।

• जलाभिमन्त्रण: जल में मन्त्र की शक्ति का आरोपण करना। जब जल पर्याप्त न हो, तब मन्त्र द्वारा जल के गुण परिवर्तित कर उसे 'दिव्य' बना दिया जाता है।

• तीर्थस्य परिकल्पनम्: 'कल्पना' का अर्थ यहाँ केवल कल्पना करना नहीं, बल्कि 'मानसिक प्रतिस्थापन' है। किसी पवित्र तीर्थ के गुणों और उसकी ऊर्जा का मानसिक रूप से आवाहन कर स्वयं को उसमें स्थित मानना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य बाह्य कर्मकाण्ड और आंतरिक योग के बीच एक सेतु बना रहे हैं। जब साधक नदी या सरोवर में डुबकी लगाने (अवगाहन) में असमर्थ होता है, तब वह 'अन्तर्जला' का आश्रय लेता है। यह निर्देश यह दर्शाता है कि शुद्धि का मूल आधार 'जल की मात्रा' नहीं, अपितु 'शुद्धि का भाव' और 'मन्त्र की शक्ति' है।

प्रथम विकल्प 'अन्तर्जले स्नान' है। यदि पूर्ण शरीर को जल में नहीं डुबोया जा सकता, तो पात्र के जल से अंगों का प्रक्षालन करना ही स्नान माना जाता है। इसके साथ 'मार्जन' और 'आचमन' की विधि है। मार्जन में जल की बूँदें शरीर पर छिड़कना इस बात का संकेत है कि सूक्ष्म दोषों को हटाने के लिए सूक्ष्म जल पर्याप्त है। आचमन के द्वारा साधक अपनी इंद्रियों और वाणी को पवित्र करता है।

तदुपरांत, ऋषि 'जलाभिमन्त्रण' की बात करते हैं। यह एक अत्यंत गूढ़ रहस्य है। मन्त्र ध्वनि की तरंगें हैं, और जल उन तरंगों को ग्रहण करने वाला माध्यम है। जब साधक जल को अभिमन्त्रित करता है, तो वह भौतिक जल 'सोम' या 'अमृत' में परिवर्तित हो जाता है। यहाँ जल केवल एक निमित्त है, वास्तविक शुद्धि मन्त्र के माध्यम से घटित होने वाले कंपन से होती है।

अन्त में 'तीर्थस्य परिकल्पनम्' का विधान है। यह मानसिक योग की पराकाष्ठा है। तीर्थ वह स्थान है जहाँ दैवीय ऊर्जा का संकेंद्रण होता है। यदि शरीर तीर्थ तक नहीं जा सकता, तो साधक अपनी चेतना को उस तीर्थ की ऊर्जा के साथ जोड़ लेता है। यह 'मानसिक स्नान' की वह अवस्था है जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह गंगा या किसी पवित्र सरिता के प्रवाह में स्थित है। यह क्रिया सिद्ध करती है कि संकल्प की शक्ति भौतिक उपस्थिति से अधिक प्रभावी हो सकती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर जाने की यात्रा है। यहाँ पाँचों विधियाँ साधक को अलग-अलग भूमियों का अनुभव कराती हैं:

१. अन्तर्जला और मार्जन: यह शरीर के स्थूल स्तर पर शुद्धि का अभ्यास है। साधक अनुभव करता है कि जल के स्पर्श से उसकी त्वचा और प्राण-स्तर की अशुद्धियाँ दूर हो रही हैं।

२. आचमन: यह मन और वाणी के स्तर पर शुद्धि है। जल का सेवन करते समय साधक अपने भीतर के 'अहं' का विसर्जन करता है।

३. जलाभिमन्त्रण: यहाँ साधक 'नाद' और 'स्पंदन' का अभ्यास करता है। वह देखता है कि कैसे एक मन्त्र भौतिक पदार्थ (जल) के गुण बदल देता है। यह अभ्यास उसे यह बोध कराता है कि उसकी चेतना भी मन्त्रों के द्वारा रूपांतरित हो सकती है।

४. तीर्थ-कल्पना: यह शुद्ध 'चित्त-वृत्ति' का अभ्यास है। साधक अपने मन को एक बिंदु (तीर्थ) पर केंद्रित करता है और उस ऊर्जा को अपने भीतर आत्मसात करता है। यह एकाग्रता की वह भूमि है जहाँ बाह्य जगत लुप्त हो जाता है और केवल 'शुद्धि का अनुभव' शेष रहता है।

इस प्रकार, महर्षि याज्ञवल्क्य साधक को यह सिखा रहे हैं कि यदि बाह्य साधन (नदी, सरोवर) उपलब्ध न हों, तो अपने भीतर के जल-तत्त्व, मन्त्र-शक्ति और संकल्प-बल से भी वही पूर्णता प्राप्त की जा सकती है जो एक विस्तृत स्नान से मिलती है। यह अभ्यास साधक को 'साधन-निर्भरता' से मुक्त कर 'साधना-निर्भर' बनाता है।

श्लोक ७.१७०

अघमर्षणसूक्तेन त्रिरावृत्तेन नित्यशः ।

अन्यांश्च वारुणान् मन्त्रान् कामतः संप्रयोजयेत् ॥ ७.१७० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८३

— प्रतिदिन तीन बार दोहराये अघमर्षण सूक्तसे; और अन्य वारुण मन्त्रोंका भी इच्छानुसार प्रयोग करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अशक्त साधक के लिए अन्तर्जलास्नान, मार्जन, आचमन और तीर्थ-कल्पना जैसी संक्षिप्त विधियों का निर्देश दिया। अब वे इस संक्षिप्त शुद्धि-प्रक्रिया को मन्त्र-शक्ति से पूर्ण करने के लिए विशिष्ट सूक्त और वारुण मन्त्रों के प्रयोग का विधान बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: नित्यशः अघमर्षणसूक्तेन त्रिरावृत्तेन (शुद्धिः भवति), (तथा) कामतः अन्यान् वारुणान् मन्त्रान् संप्रयोजयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• अघमर्षणसूक्त: वह वैदिक सूक्त जिसका उद्देश्य 'अघ' (पाप/मल) का 'मर्षण' (रगड़कर साफ करना या मिटाना) है। यह जल के दिव्य स्वरूप का आवाहन करने वाला सूक्त है।

• त्रिरावृत्तेन: तीन बार दोहराने से। यहाँ 'तीन' की संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरों की शुद्धि का संकेत है।

• नित्यशः: प्रतिदिन। यह अभ्यास की निरंतरता को दर्शाता है ताकि चित्त में शुद्धि का संस्कार गहरा हो सके।

• वारुणान् मन्त्रान्: वरुण देव से सम्बन्धित मन्त्र। वरुण जल के अधिष्ठाता देवता हैं और योगिक दृष्टि से वे 'ऋत' (ब्रह्मांडीय नियम) के रक्षक हैं।

• कामतः: इच्छानुसार या अपनी योग्यता और आवश्यकता के अनुसार।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जब बाह्य जल की प्रचुरता न हो, तब 'मन्त्र' ही जल का कार्य करता है। मन्त्र ध्वनि का वह सूक्ष्म रूप है जो जड़ पदार्थ (जल) को चेतन और दिव्य बना देता है।

यहाँ 'अघमर्षण सूक्त' के नित्य तीन बार पाठ का विधान है। बाह्य रूप से यह पाठ पापों के क्षय के लिए है, किन्तु आन्तरिक रूप से यह 'मर्षण' की प्रक्रिया है। जिस प्रकार वस्त्र को रगड़कर साफ किया जाता है, उसी प्रकार मन्त्र की ध्वनि तरंगें अंतःकरण पर जमे हुए संस्कारों के मैल को रगड़कर हटा देती हैं। तीन बार दोहराने का अर्थ है कि साधक अपनी शारीरिक अशुद्धि, मानसिक विक्षेप और सूक्ष्म वासनाओं का शोधन करे।

इसके साथ ही, ऋषि अन्य 'वारुण मन्त्रों' के प्रयोग की छूट देते हैं। वरुण केवल जल के देवता नहीं हैं, वे मन की गहराई और चेतना के विस्तार के भी प्रतीक हैं। 'कामतः' शब्द यहाँ साधक की विवेक-शक्ति को जाग्रत करता है कि वह अपनी वर्तमान मानसिक अवस्था और देश-काल के अनुसार उचित मन्त्र का चयन करे। यह विधि दर्शाती है कि शुद्धि केवल जल के स्पर्श से नहीं, अपितु मन्त्र के माध्यम से उत्पन्न होने वाली 'स्पन्दन-शक्ति' से होती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'ध्वनि-स्नान' का अभ्यास है। जब शरीर अशक्त हो या जल उपलब्ध न हो, तब साधक अघमर्षण सूक्त के अक्षरों के उच्चारण में लीन होकर यह अनुभव करता है कि मन्त्र की प्रत्येक ध्वनि जल की एक शीतल धारा के समान उसके हृदय और मस्तिष्क को धो रही है।

तीन बार पाठ का योगिक अभ्यास इस प्रकार है: प्रथम बार में बाह्य शरीर की शुद्धि का भाव, द्वितीय बार में प्राणों की शुद्धि और तृतीय बार में बुद्धी तथा अहंकार की शुद्धि। वारुण मन्त्रों का प्रयोग साधक को 'ऋत' के साथ जोड़ता है, जिससे उसका मन वरुण के समान गंभीर और निर्मल हो जाता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल कर्मकाण्ड से उठाकर मन्त्र-योग की उस भूमि पर ले जाता है जहाँ 'शब्द' ही 'साधन' बन जाता है।

श्लोक ७.१७१

यथाकालं यथादेशं ज्ञात्वा ज्ञात्वा विचक्षणः ।

स्नानाचरणमित्येतत् समुद्दिष्टं महात्मभिः ।

वारुणानथवा मन्त्रान् कामतः संप्रयोजयेत् ॥ ७.१७१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८३

बुद्धिमान् देश और कालको अच्छी तरह जानकर (करे) — महात्माओंने स्नानका आचरण ऐसा बताया है; अथवा इच्छानुसार वारुण मन्त्रोंका प्रयोग करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अशक्त साधक के लिए अन्तर्जलास्नान, मार्जन, आचमन और अघमर्षण सूक्त जैसे विकल्पों का विधान बताया। अब इस श्लोक में वे इन समस्त विधियों के प्रयोग के लिए 'विवेक' और 'विविधता' के महत्त्व को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: विचक्षणः यथाकालम् यथादेशं ज्ञात्वा ज्ञात्वा, (तथा) महात्मभिः स्नानाचरणमित्येतत् समुद्दिष्टं (तद् आचरेत्); अथवा कामतः वारुणान् मन्त्रान् संप्रयोजयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• विचक्षणः: वह जो विवेकशील हो, जिसे उचित और अनुचित का सूक्ष्म भेद ज्ञात हो। यहाँ केवल विधि का पालन करने वाला नहीं, अपितु परिस्थिति के अनुसार उसे ढालने वाला बुद्धिमान साधक है।

• यथाकालम् यथादेशं: काल (समय) और देश (स्थान) के अनुसार। काल में ऋतु, समय और मानसिक अवस्था आती है; देश में भौगोलिक स्थिति और उपलब्ध संसाधनों की उपलब्धता।

• समुद्दिष्टं: निर्देश किया गया या लक्ष्य दिखाया गया।

• महात्मभिः: उन महान आत्माओं द्वारा जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया है और जो केवल विधि के बाहरी खोल को नहीं, अपितु उसके मर्म को जानते हैं।

• वारुणान् मन्त्रान्: वरुण देव से सम्बन्धित मन्त्र। वरुण जल के अधिष्ठाता हैं और ऋत (ब्रह्मांडीय नियम) के रक्षक हैं।

• संप्रयोजयेत्: प्रयोग करे या नियोजित करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित कर रहे हैं—'विवेक आधारित साधना'। उन्होंने पूर्व के श्लोकों में स्नान की विस्तृत और संक्षिप्त दोनों विधियाँ बताईं, किन्तु यहाँ वे चेतावनी दे रहे हैं कि इन विधियों का पालन यांत्रिक न होकर 'विचक्षण' भाव से होना चाहिए।

साधना में 'देश' और 'काल' का ज्ञान अनिवार्य है। यदि कोई साधक ऐसी परिस्थिति में है जहाँ जल उपलब्ध नहीं है, या स्वास्थ्य ऐसा है कि वह शीतल जल में नहीं उतर सकता, या वह किसी ऐसी यात्रा पर है जहाँ केवल मानस-स्नान ही संभव है, तो वहाँ वह अपनी बुद्धि और विवेक से उचित विकल्प का चुनाव करे। महात्माओं ने स्नानाचरण का जो मार्ग दिखाया है, वह केवल शरीर को भिगोने के लिए नहीं, अपितु अंतःकरण की शुद्धि के लिए है। अतः यदि बाहरी जल नहीं है, तो मन्त्र-जल, मानस-जल या केवल वरुण-मन्त्रों का आश्रय लेना ही 'स्नानाचरण' माना जाएगा।

यहाँ 'वारुण मन्त्रों' के 'कामतः' (इच्छानुसार) प्रयोग की अनुमति दी गई है। इसका अर्थ यह है कि साधक अपनी मानसिक स्थिति और अपनी आवश्यकता के अनुसार विभिन्न वारुण मन्त्रों का चयन कर सकता है। किसी को शांति के लिए, किसी को पाप-निवारण के लिए, तो किसी को केवल शुद्धि के लिए मन्त्रों की आवश्यकता होती है। यह लचीलापन दर्शाता है कि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में विधि से अधिक 'फल' (शुद्धि) और 'साधक की क्षमता' को महत्त्व दिया गया है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'विधि-बद्धता' से उठाकर 'विवेक-बद्धता' की ओर ले जाता है। यहाँ 'देश' और 'काल' का आन्तर अर्थ है—साधक की वर्तमान 'भूमि' और उसकी 'मानसिक अवस्था'।

एक साधक जब 'विचक्षण' होता है, तो वह समझ जाता है कि बाहरी स्नान शरीर के मैल को धोता है, किन्तु मन्त्र-स्नान मन के विकारों को धोता है। 'वारुण मन्त्रों' का प्रयोग वास्तव में शरीर के भीतर स्थित 'अमृत-तत्व' या 'सोम' को जाग्रत करने का अभ्यास है। जब साधक अपनी इच्छा (कामतः) और विवेक से इन मन्त्रों का प्रयोग करता है, तो वह केवल एक क्रिया नहीं कर रहा होता, बल्कि वह अपने भीतर के जल-तत्त्व (प्राणिक तरलता) को शुद्ध कर रहा होता है।

यह अभ्यास साधक को इस अनुभव की ओर ले जाता है कि शुद्धि किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह मन्त्र-शक्ति और विवेक के द्वारा स्वयं के भीतर ही घटित होने वाली एक आंतरिक प्रक्रिया है। यहाँ साधक 'कर्म-भूमि' से 'ज्ञान-भूमि' की ओर बढ़ता है, जहाँ वह जानता है कि मन्त्र ही वह सूक्ष्म जल है जो हृदय के दर्पण को स्वच्छ करता है।

अघमर्षणसूक्तार्षादि

श्लोक ७.१७२

अघमर्षणसूक्तस्य ऋषिश्चैवाघमर्षणः ।

अनुष्टुप् च भवेच्छन्दो भाववृत्तं च दैवतम् ॥ ७.१७२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८४

अघमर्षण सूक्तके ऋषि अघमर्षण हैं, छन्द अनुष्टुप् है, और देवता भाववृत्त है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अशक्त साधक के लिए अन्तर्जलास्नान, मार्जन, आचमन और अघमर्षण सूक्त जैसे विकल्पों का विधान बताया। अब इस श्लोक में वे अघमर्षण सूक्त के विनियोग का निर्देश दे रहे हैं, ताकि साधक मन्त्र की शक्ति को सही दिशा में प्रवाहित कर सके।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: अघमर्षणसूक्तस्य ऋषिश्च अघमर्षणः, अनुष्टुप् च भवेत् छन्दः, भाववृत्तं च दैवतम् (भवेत्)।

पदार्थ और निर्वचन:

• अघमर्षणसूक्तस्य: 'अघ' अर्थात् पाप या अशुद्धि, और 'मर्षण' अर्थात् रगड़कर साफ करना या मिटाना। वह सूक्त जो अन्तःकरण और शरीर की समस्त मलिनताओं का मर्षण कर दे।

• ऋषि अघमर्षणः: मन्त्र के द्रष्टा। यहाँ ऋषि का नाम ही 'अघमर्षण' है, जो यह संकेत देता है कि इस सूक्त का एकमात्र लक्ष्य अशुद्धियों का विनाश है।

• अनुष्टुप्: छन्द का नाम। यह छन्द संतुलन और स्थिरता का प्रतीक है, जो साधक के चित्त को एकाग्र करने में सहायक होता है।

• भाववृत्तं दैवतम्: यहाँ 'भाववृत्त' को देवता माना गया है। 'भाव' का अर्थ है सृष्टि का मूल संकल्प या मानसिक अवस्था, और 'वृत्त' का अर्थ है वह चक्र या क्रम जिसमें यह भाव परिणत होता है। अतः वह शक्ति जो सृष्टि के उत्पत्ति-स्थिति-लय के भाव-क्रम को संचालित करती है, यहाँ आराध्य देवता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य अघमर्षण सूक्त के 'विनियोग' का विधान कर रहे हैं। किसी भी वैदिक मन्त्र के प्रयोग से पूर्व उसका विनियोग करना अनिवार्य होता है, क्योंकि विनियोग ही वह सेतु है जो मन्त्र की शक्ति को विशिष्ट उद्देश्य (जैसे शुद्धि, आरोग्य या मोक्ष) से जोड़ता है। बिना विनियोग के मन्त्र केवल शब्दों का समूह रहता है, किन्तु विनियोग के साथ वह एक 'अस्त्र' बन जाता है।

यहाँ ऋषि, छन्द और देवता का निर्देश केवल कर्मकाण्डीय औपचारिकता नहीं है, अपितु यह साधक को मन्त्र के सूक्ष्म स्तर से जोड़ने की प्रक्रिया है। ऋषि 'अघमर्षण' का स्मरण करते समय साधक अपने भीतर उस चेतना को जागृत करता है जो पापों को मिटाने में सक्षम है। अनुष्टुप् छन्द के माध्यम से वह अपनी श्वास और वाणी में एक लयबद्धता लाता है।

सबसे महत्वपूर्ण है 'भाववृत्त' का देवता होना। सामान्यतः देवताओं के नाम विशिष्ट होते हैं (जैसे अग्नि, वरुण, इंद्र), किन्तु यहाँ 'भाववृत्त' शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि इस सूक्त का संबंध किसी बाहरी व्यक्ति-रूप देवता से अधिक, सृष्टि के उस 'भाव' से है जिससे समस्त ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ और जिसमें वह लय हो जाता है। यह सूक्त साधक को उस मूल भाव-धारा से जोड़ता है, जहाँ पहुँचकर व्यक्तिगत अशुद्धियाँ (अघ) स्वतः समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि वहाँ केवल शुद्ध चैतन्य का प्रवाह होता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विनियोग' के अभ्यास का है। विनियोग का अर्थ है—अपनी समस्त मानसिक ऊर्जा को एक निश्चित लक्ष्य की ओर मोड़ना। साधक जब 'ऋषि अघमर्षण' का ध्यान करता है, तो वह अपने भीतर 'शुद्धिकर्ता' भाव को स्थापित करता है।

इस अभ्यास में साधक यह अनुभव करता है कि अशुद्धि (पाप) कोई बाहरी वस्तु नहीं, अपितु चित्त पर जमी एक परत है। 'भाववृत्त' के ध्यान से वह इस सत्य को समझता है कि जैसे सृष्टि का एक चक्र (वृत्त) है, वैसे ही उसके जीवन की अशुद्धियाँ भी एक चक्र का हिस्सा हैं, जिन्हें उचित मन्त्र-शक्ति और भाव से मिटाया जा सकता है।

साधक यहाँ 'स्थूल शुद्धि' (स्नान) से 'सूक्ष्म शुद्धि' (विनियोग) की ओर बढ़ता है। वह अपनी चेतना को अनुष्टुप् छन्द की लय में लाकर मन के विक्षेपों को शांत करता है और अंततः उस 'भाव' में स्थित होता है जहाँ वह स्वयं को ब्रह्माण्ड के मूल सृजन-क्रम का हिस्सा अनुभव करता है। यह अभ्यास साधक को 'कर्म-भूमि' से 'भाव-भूमि' की ओर ले जाता है, जहाँ क्रिया से अधिक 'भाव' की प्रधानता होती है।

श्लोक ७.१७३

अश्वमेधावभृथके विनियोगस्तु कल्पितः ।

सर्वपापापनोदार्थं स्मृतिकारैरुदाहृतम् ॥ ७.१७३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८४

अश्वमेधके अवभृथमें (इसका) विनियोग कल्पित है; स्मृतिकारोंने सब पापोंको दूर करनेके लिए (इसे) कहा है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में अघमर्षण सूक्त के विनियोग के लिए ऋषि, छन्द और देवता का परिचय दिया गया। वर्तमान श्लोक में इस सूक्त के प्रयोग के विशिष्ट प्रसंग और उसके प्रयोजन को स्पष्ट किया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

अश्वमेधावभृथके विनियोगस्तु कल्पितः । सर्वपापापनोदार्थं स्मृतिकारैरुदाहृतम् ॥

पदार्थ:

• अश्वमेधावभृथके: अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ (स्नान) के समय। 'अवभृथ' वह पवित्र स्नान है जो किसी महान यज्ञ की समाप्ति पर साधक की शुद्धि और फल की प्राप्ति के लिए किया जाता है।

• विनियोगस्तु कल्पितः: (इस सूक्त का) विनियोग कल्पित है, अर्थात् निर्धारित किया गया है।

• सर्वपापापनोदार्थं: समस्त पापों के अपनोधन (दूर करने या नष्ट करने) के उद्देश्य से। 'अपनोद' का अर्थ है—पूरी तरह से हटा देना।

• स्मृतिकारैरुदाहृतम्: स्मृतिकारों (धर्मशास्त्रों के ऋषियों) द्वारा कहा गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ अघमर्षण सूक्त के प्रयोग की महिमा और उसके शास्त्रीय आधार को बताया गया है। ऋषि याज्ञवल्क्य संकेत कर रहे हैं कि इस सूक्त का विनियोग मूलतः 'अश्वमेध' जैसे महान यज्ञ के 'अवभृथ' स्नान के लिए कल्पित है। अश्वमेध केवल एक भौतिक यज्ञ नहीं, अपितु यह संपूर्ण अहंकार और सीमित व्यक्तित्व के विसर्जन का प्रतीक है। जिस प्रकार अश्वमेध के बाद अवभृथ स्नान साधक को पुनः शुद्ध कर उसे नए चैतन्य स्तर पर प्रतिष्ठित करता है, उसी प्रकार अघमर्षण सूक्त का प्रयोग साधक के अंतःकरण पर जमी अविद्या और पापों की परत को धो डालता है।

स्मृतिकार इस सूक्त का उल्लेख 'सर्वपापापनोदार्थं' अर्थात् सभी प्रकार के पापों के नाश के लिए करते हैं। यहाँ 'पाप' का अर्थ केवल नैतिक त्रुटियाँ नहीं, अपितु वे मानसिक संस्कार और क्लेश हैं जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप (सूर्य-पुरुष) को ढँक लेते हैं। जब साधक इस सूक्त का विनियोग करता है, तो वह स्वयं को उस महान यज्ञ की पूर्णाहुति के समान समर्पित कर देता है, जिससे उसके संचित दोषों का क्षय होता है। यह विधान दर्शाता है कि जो फल एक अत्यंत कठिन और विस्तृत अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान से मिलता है, वही शुद्धि अघमर्षण सूक्त के मन्त्र-बल से प्राप्त की जा सकती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से, यह श्लोक 'संस्कार-शोधन' की प्रक्रिया है। साधक जब इस सूक्त का अभ्यास करता है, तो वह अपने भीतर एक 'मानसिक अवभृथ' का अनुभव करता है। जिस प्रकार बाहरी स्नान शरीर की अशुद्धि मिटाता है, यह सूक्त हृदय के दर्पण पर जमी धूल को हटाता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह इस सूक्त को पढ़ते समय यह अनुभव करे कि मन्त्र की ध्वनि एक दिव्य जलधारा के समान उसके चित्त के गहरे स्तरों में उतर रही है। 'सर्वपाप-अपनोद' का अर्थ है—मन के विकारों का विसर्जन। जब साधक स्वयं को 'अश्वमेध' के संकल्प में लाता है, तो वह अपने छोटे 'अहम्' की आहुति देता है। इस समर्पण के बाद जब वह अघमर्षण का जप करता है, तो वह शून्य की उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। यह अभ्यास साधक को 'मलिनता' की भूमि से उठाकर 'निर्मलता' की भूमि पर ले जाता है, जिससे ध्यान का मार्ग प्रशस्त होता है।

श्लोक ७.१७४

ननु भूताण्डपिण्डस्य स्थित्युत्पत्तिलयं तथा ।

सूक्तेऽस्मिन् व्याहृतं सर्वमेतन्मन्त्रार्थमस्य वै ॥ ७.१७४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८४

इस सूक्तमें प्राणियों और ब्रह्माण्डरूपी पिण्डकी स्थिति, उत्पत्ति और लय — यह सब कहा गया है; यही इसके मन्त्रोंका अर्थ है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में अघमर्षण सूक्त के विनियोग का संबंध अश्वमेध के अवभृथ स्नान और सर्वपाप-निवारण से बताया गया। वर्तमान श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य इस सूक्त की आंतरिक गहराई और उसके मन्त्रों के वास्तविक अर्थ का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

ननु भूताण्डपिण्डस्य स्थित्युत्पत्तिलयं तथा च । अस्मिन् सूक्ते सर्वं व्याहृतम्, एतन्मन्त्रार्थमस्य वै ॥

पदार्थ:

• ननु: वास्तव में, निश्चय ही।

• भूताण्डपिण्डस्य: 'भूत' (प्राणी/तत्व) और 'अण्ड' (ब्रह्माण्ड) रूपी पिण्ड का। यहाँ 'पिण्ड' शब्द शरीर और ब्रह्माण्ड दोनों के लिए प्रयुक्त है, क्योंकि जो ब्रह्माण्ड में है, वही पिण्ड (शरीर) में है।

• स्थित्युत्पत्तिलयं: स्थिति (पालन/धरण), उत्पत्ति (सृजन) और लय (विलीन होना/प्रलय)।

• सूक्तेऽस्मिन् व्याहृतं सर्वम्: इस सूक्त में यह सब कहा गया है (व्याहृत है)।

• एतन्मन्त्रार्थमस्य वै: वास्तव में यही इस सूक्त के मन्त्रों का वास्तविक अर्थ है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ अघमर्षण सूक्त का केवल विधिक पक्ष नहीं, अपितु उसका दार्शनिक और ब्रह्माण्डीय रहस्य प्रकट किया गया है। सामान्यतः साधक अघमर्षण सूक्त का प्रयोग केवल बाहरी अशुद्धि या पापों के शमन के लिए करता है, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि इस सूक्त के मन्त्रों का गम्भीर अर्थ 'सृष्टि-प्रक्रिया' के बोध में है।

'भूताण्डपिण्ड' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संकेत करता है कि जो विराट ब्रह्माण्ड (अण्ड) है, वही सूक्ष्म रूप में मनुष्य के शरीर (पिण्ड) में निहित है। इस सूक्त में केवल जल की शुद्धि की बात नहीं है, अपितु उस आदि-जल और चैतन्य की चर्चा है जिससे समस्त प्राणियों की 'उत्पत्ति' हुई, जिसमें उनकी 'स्थिति' है और जिसमें अंततः उनकी 'लय' होनी है।

जब ऋषि कहते हैं कि "यही इसके मन्त्रों का अर्थ है", तो उनका भाव यह है कि मन्त्र केवल शब्द-ध्वनि नहीं, अपितु उस सत्य के संकेत हैं जो सृष्टि के आदि, मध्य और अंत को जोड़ते हैं। जब साधक इस बोध के साथ अघमर्षण सूक्त का पाठ करता है, तो वह केवल पाप नहीं धोता, बल्कि वह स्वयं को उस विराट चक्र (उत्पत्ति-स्थिति-लय) का हिस्सा अनुभव करता है। यह बोध ही उसे सीमित 'अहं' से मुक्त कर उस व्यापक तत्त्व में विलीन करने की क्षमता रखता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'पाप-नाश' की स्थूल अवस्था से उठाकर 'लय-बोध' की सूक्ष्म अवस्था में ले जाता है। पाप वास्तव में क्या है? अपनी मूल प्रकृति को भूलकर स्वयं को शरीर और अहंकार के साथ जोड़ लेना ही मूल पाप (अविद्या) है।

अघमर्षण सूक्त पापों का नाश इसलिए करता है क्योंकि यह साधक को 'लय' का स्मरण कराता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि जिस तत्त्व से इस भूताण्ड-पिण्ड की उत्पत्ति हुई, उसी में सब कुछ विलीन (लय) हो जाना है, तब उसके भीतर के संचित संस्कार और मानसिक कलुष स्वतः समाप्त होने लगते हैं।

साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अभ्यास करता है कि वह अपने शरीर (पिण्ड) को ब्रह्माण्ड (अण्ड) के साथ एकाकार करे। वह अनुभव करता है कि उसके भीतर भी वही उत्पत्ति, स्थिति और लय की प्रक्रिया चल रही है। जब वह स्वयं को 'लय' के भाव में स्थित करता है, तो वह उस भूमि पर पहुँच जाता है जहाँ न कोई कर्ता रहता है और न कोई पाप। यह अभ्यास साधक को विसर्जन की उस अवस्था में ले जाता है जहाँ वह केवल उस 'अक्षर' का अनुभव करता है, जो सृष्टि के उत्पन्न होने से पहले था और लय के बाद भी शेष रहता है।

अघमर्षणसूक्तमाहात्म्यम्

श्लोक ७.१७५

हुत्वा लोकानपोमांस्त्रींस्त्रिः पठेदघमर्षणम् ।

यथाश्वमेधावभृथमेवं तन्मनुरब्रवीत् ॥ ७.१७५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८४

तीन लोकों और जलका हवन करके (?) तीन बार अघमर्षण पढ़े — जैसे अश्वमेधका अवभृथ, वैसा ही यह (फल देता) है — ऐसा मनुने कहा।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में अघमर्षण सूक्त के मन्त्रों का वास्तविक अर्थ ब्रह्माण्ड और पिण्ड की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय के बोध में बताया गया। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इस सूक्त के प्रयोग की विधि और उसके फल की तुलना एक महान यज्ञ से कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

लोकान् आपः च हुत्वा, अघमर्षणम् त्रिः पठेद । यथा अश्वमेधावभृथम्, एवं तत् मनुरब्रवीत् ॥

पदार्थ:

• हुत्वा: यहाँ 'हुत्वा' का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, अपितु 'अर्पण करना' या 'समर्पित करना' है।

• लोकान् आपः च: लोकों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) और आपः (जल तत्त्व) को।

• त्रिः पठेद: तीन बार पाठ करे।

• यथा अश्वमेधावभृथम्: जैसे अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान (यज्ञ के अंत में होने वाला पवित्र स्नान) का फल होता है।

• एवं तत् मनुरब्रवीत्: वैसा ही यह (फल देने वाला) है, ऐसा मनु ने कहा है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ अघमर्षण सूक्त के पाठ की एक विशेष विधि और उसकी महिमा का वर्णन है। श्लोक का प्रथम चरण "हुत्वा लोकानपोमांस्त्रीं" (लोकान् आपः च हुत्वा) एक गूढ़ संकेत है। सामान्यतः हवन अग्नि में किया जाता है, किन्तु यहाँ 'लोकों' और 'जल' के हवन की बात है। इसका भाव यह है कि साधक अपने भीतर के समस्त लोकों (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और अपने प्राणों के जल-तत्त्व को उस परमात्मा में विलीन कर दे, या उन्हें आहुति के रूप में समर्पित कर दे। जब साधक अपनी समस्त अस्मिता और भौतिकता को समर्पित कर देता है, तब वह 'अघमर्षण' (पापों का मर्षण करने वाला) सूक्त का पाठ करता है।

इस सूक्त का तीन बार पाठ करने का विधान है। यह 'तीन' संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) और तीन शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) की शुद्धि का प्रतीक है।

ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ इस लघु क्रिया की तुलना 'अश्वमेध के अवभृथ' से कर रहे हैं। अश्वमेध यज्ञ समस्त यज्ञों में श्रेष्ठ है और उसका 'अवभृथ' वह अंतिम स्नान है जो यज्ञ के संपूर्ण फल को साधक के शरीर और आत्मा में प्रतिष्ठित करता है और उसे समस्त पापों से मुक्त कर देता है। यहाँ रहस्य यह है कि जो शुद्धि और फल एक विशाल और कठिन अश्वमेध यज्ञ के अवभृथ स्नान से मिलता है, वही फल एक समर्पित साधक को अघमर्षण सूक्त के तीन बार पाठ से प्राप्त हो जाता है। इस विधान की प्रमाणिकता के लिए यहाँ मनु के वचन का उल्लेख किया गया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः । तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ ११.२६१ ॥

जैसे यज्ञोंका राजा अश्वमेध सब पापोंको दूर करता है, वैसे ही अघमर्षण सूक्त सब पापोंको दूर करता है।

मनुस्मृति ११.२६१मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 581

मनुस्मृति में भी अघमर्षण सूक्त की महिमा को अश्वमेध यज्ञ के समान बताया गया है। स्मृति कहती है कि जैसे यज्ञों का राजा अश्वमेध सब पापों को दूर करता है, वैसे ही अघमर्षण सूक्त सर्वपाप-प्रणोदन है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों का यहाँ पूर्ण मेल है; दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि मन्त्र की शक्ति और उसके सही विनियोग से वह फल प्राप्त किया जा सकता है जो अन्यथा कठिन कर्मकाण्डों से मिलता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'समर्पण' और 'शुद्धि' का अभ्यास है। "हुत्वा लोकानपः" का योगिक अर्थ है—अपने भीतर के समस्त अनुभवों (लोकों) और भावनाओं के प्रवाह (जल) को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना। जब साधक स्वयं को शून्य कर लेता है, तब अघमर्षण सूक्त का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु एक आंतरिक प्रक्षालन बन जाता है।

साधक इस अभ्यास से 'अश्वमेध' जैसी मानसिक शक्ति और पवित्रता का अनुभव करता है। जिस प्रकार अश्वमेध में अश्व (इन्द्रियों का प्रतीक) का समर्पण होता है, वैसे ही यहाँ साधक अपने अहंकार और पापों का समर्पण कर 'अवभृथ' जैसी परम शांति और शुद्धि की भूमि पर पहुँचता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल पापों से ऊपर उठाकर सूक्ष्म चेतना की शुद्धि की ओर ले जाता है।

श्लोक ७.१७६

अहं तु परमेत्युक्तस्त्रिरह्नो ह्युपपन्नयः ।

(?)

मुच्यते पातकैः सर्वैर्जप्त्वा त्रिरघमर्षणम् ॥ ७.१७६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८४

(?) "अहं तु परम…" — (पाठ अस्पष्ट); तीन बार अघमर्षणका जप करके (मनुष्य) सब पातकोंसे छूट जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में मनु के कथन के माध्यम से अघमर्षण सूक्त के पाठ की विधि और उसकी तुलना अश्वमेध के अवभृथ स्नान से की गई थी। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इस सूक्त के जप से प्राप्त होने वाले अंतिम फल और पाप-मुक्ति के रहस्य को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(अहं तु परमेत्युक्तस्त्रिरह्नो ह्युपपन्नयः) [पाठ अस्पष्ट] । त्रिरघमर्षणम् जप्त्वा, सर्वैः पातकैः मुच्यते ॥

पदार्थ:

• त्रिरघमर्षणम्: तीन बार अघमर्षण सूक्त का पाठ या जप।

• जप्त्वा: जप करने से; यहाँ जप का अर्थ है मन्त्र के शब्दों के साथ एकाग्रतापूर्वक उनका मानसिक या वाचिक दोहराव।

• सर्वैः पातकैः: समस्त पापों से; पातक वे गहरे संस्कार या दोष हैं जो आत्मा के स्वाभाविक प्रकाश को ढक लेते हैं।

• मुच्यते: मुक्त हो जाता है; बंधन का क्षय हो जाना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक का पूर्वार्ध (अहं तु परमेत्युक्त...) पाठ की अस्पष्टता के कारण अर्थगत रूप से बाधित है, अतः यहाँ केवल उत्तरार्ध के स्पष्ट विधान पर विचार किया जाएगा।

ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ अघमर्षण सूक्त के जप का फल बता रहे हैं। 'अघमर्षण' शब्द का अर्थ है— 'अघ' (पाप) का 'मर्षण' (मलना या रगड़कर साफ करना)। जिस प्रकार किसी मैली वस्तु को रगड़कर स्वच्छ किया जाता है, उसी प्रकार यह सूक्त साधक के चित्त पर जमी हुई मलिनता को दूर करता है। यहाँ 'तीन बार' जप करने का विधान है। यह संख्या केवल गणना नहीं है, अपितु यह तीन स्तरों की शुद्धि का संकेत है: प्रथम जप से स्थूल शरीर के कर्म-दोष, द्वितीय जप से सूक्ष्म शरीर के मानसिक संस्कार और तृतीय जप से कारण शरीर के बीज-पाप नष्ट होते हैं।

जब साधक इस सूक्त का जप करता है, तब वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु उस 'भाववृत्त' देवता (जैसा कि श्लोक ७.१७२ में बताया गया) से जुड़ता है। 'पातक' केवल बाहरी अपराध नहीं हैं, अपितु वे अविद्या के कारण उत्पन्न हुए वे भ्रामक विचार हैं जिन्होंने आत्मा को शरीर और मन के साथ एक कर दिया है। तीन बार अघमर्षण का जप करने से साधक इन सभी बंधनों से 'मुच्यते' अर्थात् मुक्त हो जाता है। यह मुक्ति केवल परलोक की नहीं, अपितु इसी जीवन में चित्त की वह निर्मलता है जहाँ साधक स्वयं को पापों के बोझ से मुक्त अनुभव करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-शुद्धि' के अभ्यास का है। साधक जब अघमर्षण सूक्त का जप करता है, तो वह अपने भीतर के 'अघ' (अंधकार या मलिनता) को पहचानता है। जप की प्रक्रिया में जब वह तीन बार इस सूक्त को दोहराता है, तो वह वास्तव में अपने प्राणों को स्थिर कर रहा होता है।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह प्रत्येक शब्द के उच्चारण के साथ यह अनुभव करे कि उसके हृदय के दर्पण पर जमी हुई धूल हट रही है। यह अभ्यास उसे 'सात्विक भूमि' से ऊपर उठाकर उस अवस्था की ओर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को केवल एक दृष्टा के रूप में देखता है। जब समस्त पातक (संस्कार) मिट जाते हैं, तब हृदय में वह 'सूर्य-पुरुष' प्रकाशित होता है जिसकी चर्चा इस स्मृति के आगामी अध्यायों में है। अतः यह जप बाहरी विधि होते हुए भी आन्तरिक रूप से 'संस्कार-क्षय' की एक गहन योगिक प्रक्रिया है।

श्लोक ७.१७७

यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापप्रणोदनः ।

तथाऽघमर्षणं सूक्तं सर्वपापप्रणोदनम् ॥ ७.१७७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८४

जैसे यज्ञोंका राजा अश्वमेध सब पापोंको दूर करनेवाला है, वैसे ही अघमर्षण सूक्त सब पापोंको दूर करनेवाला है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में अघमर्षण सूक्त के विनियोग, उसके ब्रह्माण्ड-उत्पत्ति के रहस्य और मनु के कथनों के माध्यम से उसके फल का वर्णन किया गया था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इस सूक्त की सामर्थ्य को एक महानतम यज्ञ के समकक्ष रखकर उसकी महिमा को पूर्णता प्रदान कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यथा सर्वपापप्रणोदनः क्रतुराट् अश्वमेधः (अस्ति), तथा सर्वपापप्रणोदनम् अघमर्षणं सूक्तं (अस्ति) ॥

पदार्थ:

• यथा... तथा: जिस प्रकार... उसी प्रकार (तुलना)।

• क्रतुराट्: यज्ञों का राजा; 'क्रतु' का अर्थ है यज्ञ और 'राट्' का अर्थ है राजा या श्रेष्ठ। अश्वमेध यज्ञ को समस्त यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

• सर्वपापप्रणोदनः: समस्त पापों को दूर करने वाला; 'प्रणोदन' का अर्थ है दूर भगाना या निष्कासित करना।

• अघमर्षणं सूक्तं: अघमर्षण सूक्त; 'अघ' (पाप) का 'मर्षण' (मलकर शुद्ध करना) करने वाला मन्त्र-समुच्चय।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण साम्य स्थापित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ को 'क्रतुराट्' यानी यज्ञों का अधिपति माना गया है और वह अपनी प्रचंड अग्नि और विधान से साधक के समस्त संचित पापों का दहन कर उन्हें दूर कर देता है, ठीक वैसा ही प्रभाव 'अघमर्षण सूक्त' के पाठ का होता है।

यहाँ बाहरी कर्म और मन्त्र-शक्ति के बीच का सेतु दिख रहा है। अश्वमेध एक विशाल बाह्य यज्ञ है, जिसमें अत्यधिक साधन, समय और सामग्री की आवश्यकता होती है। किंतु याज्ञवल्क्य यह रहस्य खोल रहे हैं कि जो फल उस विराट यज्ञ से प्राप्त होता है, वही फल इस सूक्त के जप और उसके आन्तर अर्थ के अनुभव से संभव है। यह स्मृति यहाँ यह संकेत दे रही है कि मन्त्र केवल शब्द नहीं, अपितु संकुचित बीज-रूप में वही शक्ति है जो एक विस्तृत यज्ञ में विस्तारित होती है।

'सर्वपापप्रणोदन' शब्द यहाँ विशेष है। पाप केवल नैतिक त्रुटि नहीं, अपितु वे 'मल' हैं जो आत्मा के स्वाभाविक प्रकाश को ढक लेते हैं। अश्वमेध यज्ञ जहाँ बाह्य आहुतियों से शुद्धि करता है, वहीं अघमर्षण सूक्त ध्वनि और भाव की आहुति से चित्त की गहराई में स्थित दोषों को 'मर्षण' (रगड़कर साफ) करता है। यह विधान उस साधक के लिए वरदान है जो बाह्य यज्ञों के सामर्थ्य या साधन से रहित है, किंतु मन्त्र-साधना के माध्यम से उसी परम शुद्धि को प्राप्त करना चाहता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः । तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ ११.२६१ ॥

जैसे यज्ञोंका राजा अश्वमेध सब पापोंको दूर करता है, वैसे ही अघमर्षण सूक्त सब पापोंको दूर करता है।

मनुस्मृति ११.२६१मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 581

मनुस्मृति में भी यही विधान मिलता है कि जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ समस्त पापों का अपन (नाश) करता है, उसी प्रकार अघमर्षण सूक्त का पाठ भी वही फल प्रदान करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वैदिक परम्परा में सूक्तों की शक्ति को यज्ञों के समकक्ष माना गया है, क्योंकि मन्त्र वास्तव में यज्ञ का ही सूक्ष्म रूप है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार-शोधन' की प्रक्रिया को दर्शाता है। अश्वमेध यज्ञ एक स्थूल क्रिया है, जबकि अघमर्षण सूक्त का जप एक सूक्ष्म क्रिया है। साधक जब इस सूक्त का अभ्यास करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, बल्कि अपने भीतर एक 'मानसिक यज्ञ' प्रज्वलित करता है।

यहाँ 'मर्षण' का योगिक अर्थ है— सजगता के साथ अपने दोषों को देखना और मन्त्र की शक्ति से उन्हें रगड़कर मिटा देना। जिस प्रकार अश्वमेध में अश्व की दौड़ सीमाओं का विस्तार करती है, उसी प्रकार इस सूक्त का जप साधक की चेतना का विस्तार करता है, जिससे पाप (अविद्या के संस्कार) टिक नहीं पाते और दूर हो जाते हैं। साधक इस अभ्यास से 'कर्म-भूमि' से उठकर 'शुद्धि-भूमि' की ओर अग्रसर होता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि मन्त्र की ध्वनि ही उसकी आंतरिक अग्नि है जो समस्त मलिनता को भस्म कर रही है।

पुनश्च सूक्तार्षादि

श्लोक ७.१७८

सिंधुद्वीपो भवेदार्षं गायत्री च्छन्द एव हि ।

आपस्तु दैवतं प्रोक्तं विनियोगस्तु मार्जने ॥ ७.१७८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८५

("आपो हि ष्ठा…" के) ऋषि सिन्धुद्वीप हैं, छन्द गायत्री, देवता आपः (जल) कहे गये हैं, और विनियोग मार्जनमें है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में अघमर्षण सूक्त के विनियोग और उसकी महिमा का वर्णन करते हुए उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पाप-निवारक बताया गया था। अब ऋषि याज्ञवल्क्य मार्जन की विधि में प्रयुक्त होने वाले एक अन्य अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र 'आपो हि ष्ठा' के शास्त्रीय परिचय और उसके विनियोग का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(आपो हि ष्ठा मन्त्रस्य) सिंधुद्वीपः भवेद् ऋषिः, गायत्री च्छन्दः एव हि (अस्ति), आपः तु दैवतं प्रोक्तम्, विनियोगः तु मार्जने (अस्ति) ॥

पदार्थ:

• सिन्धुद्वीपः: मन्त्र के ऋषि। सिन्धुद्वीप वह स्थान या व्यक्तित्व है जहाँ इस मन्त्र का साक्षात्कार हुआ या जिसने इसे प्रतिष्ठित किया।

• गायत्री: छन्द का नाम। यहाँ यह केवल मात्राओं की गणना नहीं, अपितु उस तेज का प्रतीक है जो साधक की बुद्धि को प्रेरित करता है।

• आपः: देवता। जल यहाँ केवल भौतिक द्रव नहीं, अपितु शुद्धि और जीवन का आदि-तत्त्व है।

• विनियोगः मार्जने: विनियोग का अर्थ है मन्त्र का विशिष्ट प्रयोग। 'मार्जन' का अर्थ है शरीर या मन को मन्त्रयुक्त जल से पोंछकर या छिड़ककर शुद्ध करना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र के विनियोग का विवरण दे रहे हैं। किसी भी मन्त्र की पूर्ण शक्ति तब जाग्रत होती है जब साधक उसके ऋषि, छन्द और देवता के साथ एकाकार होता है।

यहाँ ऋषि 'सिन्धुद्वीप' हैं। सिन्धु (नदी/सागर) और द्वीप (स्थिरता) का यह संयोग संकेत करता है कि यह मन्त्र प्रवाह और स्थिरता दोनों का समन्वय है। छन्द 'गायत्री' है, जो कि वेदों का मुख है और सर्वोच्च प्रकाश का प्रतीक है। देवता 'आपः' (जल) हैं। जल की प्रकृति है—सबको अपने भीतर समाहित कर लेना और मलिनता को धो डालना। जब साधक इस मन्त्र का प्रयोग 'मार्जन' के लिए करता है, तो वह केवल बाहरी त्वचा को नहीं धोता, अपितु जल के माध्यम से उस दैवीय शक्ति का आवाहन करता है जो अंतःकरण की कलुषता को धोकर उसे निर्मल कर देती है।

यहाँ विधिको मिटाये बिना उसका आन्तर अर्थ यह है कि 'मार्जन' क्रिया वास्तव में मन के विकारों को हटाने की प्रक्रिया है। जिस प्रकार जल शरीर के मैल को हटाता है, उसी प्रकार गायत्री छन्द की शक्ति से अभिमन्त्रित जल जब शरीर पर स्पर्श करता है, तो वह सूक्ष्म स्तर पर चित्त के संस्कारों का मार्जन करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'शुद्धि' की उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता है। साधक जब 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र का अभ्यास करता है, तो वह जल के देवता (आपः) का ध्यान अपने भीतर करता है। योग में जल का अर्थ है—हृदय की तरलता और करुणा।

साधक इस मन्त्र के माध्यम से अपने भीतर के 'अक्षर' रूपी जल का अनुभव करता है। गायत्री छन्द का प्रयोग उसे बुद्धि के स्तर पर जाग्रत करता है, जिससे वह यह अनुभव करता है कि उसकी आत्मा स्वयं उस शुद्ध जल के समान है जिसमें कोई विकार नहीं। मार्जन का अभ्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि मन्त्र की ध्वनि और जल का स्पर्श उसके भीतर के तामसिक गुणों को धो रहा है, जिससे वह ध्यान की उच्च भूमि के लिए तैयार हो सके। यह अभ्यास साधक को 'बाह्य शुद्धि' से 'आन्तर शुद्धि' की ओर ले जाने वाली एक आवश्यक कड़ी है।

श्लोक ७.१७९

सर्वत्र मार्जनं कर्म अब्लिङ्गानामुदाहृतम् ।

कोकिलो राजपुत्रश्च द्रुपदामार्षमुच्यते ॥ ७.१७९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८५

अब्लिङ्ग (जलदेवताके) मन्त्रोंका कर्म सर्वत्र मार्जन कहा गया है। "द्रुपदादिव…" के ऋषि कोकिल राजपुत्र कहे जाते हैं —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र के ऋषि, छन्द और देवता का परिचय देते हुए उसके विनियोग को 'मार्जन' बताया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य मार्जन की इस व्यापकता को स्पष्ट करते हुए एक अन्य विशिष्ट मन्त्र 'द्रुपदा' के ऋषि का परिचय दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अब्लिङ्गानाम् मन्त्रणां कर्म सर्वत्र मार्जनं (इति) उदाहृतम् । द्रुपदा (मन्त्रस्य) ऋषिः कोकिलः राजपुत्रः (इति) उच्यते ॥

पदार्थ:

• अब्लिङ्ग: 'अब्लिङ्ग' शब्द यहाँ उन मन्त्रों के लिए प्रयुक्त हुआ है जो किसी विशिष्ट 'लिङ्ग' (चिह्न या सीमित सीमा) में बँधे नहीं हैं, अपितु सर्वव्यापी शुद्धि के लिए हैं। जल-देवता के वे मन्त्र जो शरीर और मन की समग्र कलुषता को धोने की क्षमता रखते हैं, उन्हें यहाँ अब्लिङ्ग कहा गया है।

• मार्जनं कर्म: मार्जन का अर्थ है मन्त्रयुक्त जल का छिड़काव करना या शरीर को पोंछना। यह केवल भौतिक स्वच्छता नहीं, अपितु सूक्ष्म शरीर के मैल को हटाने की क्रिया है।

• कोकिलः राजपुत्रः: 'द्रुपदा' मन्त्र के ऋषि। कोकिल राजपुत्र वह दृष्टा हैं जिन्होंने इस ऋचा के मन्त्र-शक्ति को आत्मसात किया।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्रों के प्रयोग की एक महत्वपूर्ण पद्धति का उद्घाटन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जल-देवता के जिन मन्त्रों को 'अब्लिङ्ग' कहा गया है, उनका मुख्य कर्म 'मार्जन' है।

यहाँ 'अब्लिङ्ग' शब्द का रहस्य अत्यंत गहरा है। सामान्यतः किसी मन्त्र का प्रयोग किसी विशेष रोग, दोष या विशिष्ट कामना के लिए होता है (जो उसका 'लिङ्ग' या चिह्न है), किन्तु अब्लिङ्ग मन्त्र वे हैं जो 'सर्वत्र' प्रभावी हैं। चाहे वह शारीरिक अशुद्धि हो, मानसिक व्याकुलता हो या सूक्ष्म पाप, इन मन्त्रों का प्रयोग मार्जन के रूप में करने से साधक पूर्णतः निर्मल हो जाता है। मार्जन की यह क्रिया बाहरी रूप से जल के छिड़काव जैसी दिखती है, किन्तु इसका वास्तविक अर्थ है—चेतना के स्तर पर उस जल-तत्त्व का आवाहन करना जो अविद्या के मैल को धो देता है।

इसी क्रम में, ऋषि याज्ञवल्क्य 'द्रुपदा' नामक मन्त्र का परिचय देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि इस मन्त्र के ऋषि 'कोकिल राजपुत्र' हैं। जब साधक मन्त्र का जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु उस ऋषि की चेतना (कोकिल राजपुत्र) के साथ जुड़ता है जिसने उस मन्त्र को सिद्ध किया था। यह जुड़ाव साधक को उस मन्त्र की पूर्ण शक्ति प्राप्त करने में सहायता करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से 'मार्जन' का अर्थ है—चित्त की शुद्धि। जिस प्रकार जल शरीर के मैल को हटाता है, उसी प्रकार अब्लिङ्ग मन्त्रों का अभ्यास मन के विकारों (राग-द्वेष) का मार्जन करता है। साधक जब इन मन्त्रों का प्रयोग करता है, तो वह अपनी चेतना को 'अब्लिङ्ग' अवस्था में ले जाने का प्रयास करता है, जहाँ वह किसी एक सीमित पहचान या बंधन (लिङ्ग) में नहीं बँधा रहता।

कोकिल राजपुत्र जैसे ऋषियों का स्मरण साधक को यह अनुभव कराता है कि मन्त्र-सिद्धि केवल व्याकरण का ज्ञान नहीं, अपितु एक जीवंत अनुभव है। साधक इस अभ्यास से 'स्थूल शुद्धि' (स्नान) से 'सूक्ष्म शुद्धि' (मार्जन) की ओर बढ़ता है, ताकि वह आगामी प्राणायाम और ध्यान की भूमियों के लिए स्वयं को तैयार कर सके। यह श्लोक साधक को यह सिखाता है कि बाहरी क्रिया (मार्जन) वास्तव में आंतरिक निर्मलता का ही एक प्रतिबिम्ब है।

श्लोक ७.१८०

अनुष्टुभं भवेच्छन्द आपश्चैव तु दैवतम् ।

सौत्रामण्यवभृथके स्नाने तद्विनियोजनम् ॥ ७.१८० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८५

— छन्द अनुष्टुप् है और देवता आपः ही; सौत्रामणीके अवभृथ-स्नानमें उसका विनियोग है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में 'द्रुपदा' मन्त्र के ऋषि के रूप में कोकिल राजपुत्र का उल्लेख किया गया था। इसी क्रम में महर्षि याज्ञवल्क्य अब उस मन्त्र के छन्द, देवता और उसके विशिष्ट विनियोग का विवरण दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(तस्य द्रुपदा मन्त्रस्य) छन्दः अनुष्टुभं भवेत्, आपः च एव तु दैवतम् । सौत्रामण्यवभृथके स्नाने तस्य विनियोजनम् (अस्ति) ॥

पदार्थ:

• अनुष्टुभं: यह एक प्रसिद्ध छन्द है जिसमें प्रत्येक चरण में आठ अक्षर होते हैं। यह स्थिरता और संतुलन का प्रतीक है।

• आपः: जल-तत्त्व। यहाँ देवता के रूप में 'आपः' का अर्थ केवल भौतिक जल नहीं, अपितु वह चैतन्य जल है जो समस्त सृष्टि का मूल है और शोधन की शक्ति रखता है।

• सौत्रामण्यवभृथके स्नाने: 'सौत्रामणी' एक विशिष्ट प्रकार का अवभृथ (शुद्धिकरण स्नान) है। अवभृथ का अर्थ है—वह स्नान जो किसी बड़े यज्ञ या अनुष्ठान के अंत में कलुषता को मिटाने के लिए किया जाता है।

• विनियोजनम्: मन्त्र का वह विशिष्ट उद्देश्य या स्थान जहाँ उसका प्रयोग शास्त्रसम्मत फल प्रदान करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'द्रुपदा' मन्त्र की तकनीकी और आध्यात्मिक संरचना को स्पष्ट कर रहे हैं। वे बताते हैं कि इस मन्त्र का छन्द 'अनुष्टुप्' है और इसके अधिष्ठात्री देवता 'आपः' (जल) हैं।

यहाँ 'अनुष्टुप्' छन्द का प्रयोग महत्वपूर्ण है, क्योंकि अनुष्टुप् छन्द को ऋत (सत्य) और धर्म का वाहक माना जाता है। जब साधक इस छन्द में मन्त्र का उच्चारण करता है, तो उसकी वाणी में एक विशेष लय उत्पन्न होती है जो शरीर के भीतर के जलीय तत्त्व (रस और रक्त) को संतुलित करती है। देवता के रूप में 'आपः' का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह मन्त्र जल की उस शक्ति को जाग्रत करता है जो केवल बाहरी त्वचा को नहीं, अपितु अंतःकरण के गहरे मैल को भी धोने में सक्षम है।

इस मन्त्र का विनियोग 'सौत्रामणी अवभृथ' स्नान में बताया गया है। अवभृथ स्नान का मूल उद्देश्य 'अव-भृथ' अर्थात् दोषों का निवारण करना है। सौत्रामणी अवभृथ विशेष रूप से उन सूक्ष्म दोषों को दूर करने के लिए है जो अनजाने में या प्रारब्ध के कारण साधक के सूक्ष्म शरीर पर चिपके रहते हैं। याज्ञवल्क्य यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि जिस प्रकार एक महान यज्ञ के बाद अवभृथ स्नान से साधक पुनः शुद्ध होकर अपनी मूल स्थिति में आता है, उसी प्रकार इस मन्त्र के विनियोग से साधक अपनी चेतना की अशुद्धियों को धोकर पुनः पवित्रता प्राप्त करता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'तत्व-शुद्धि' का अभ्यास है। साधक जब अनुष्टुप् छन्द की लय में 'आपः' देवता का आवाहन करता है, तो वह अपने भीतर के 'अन्तर-जल' को जाग्रत करता है।

अभ्यास यह है कि स्नान के समय जब जल शरीर को स्पर्श करे, तब साधक यह अनुभव करे कि यह जल केवल भौतिक द्रव नहीं, बल्कि साक्षात् 'आपः' देवता हैं जो उसके शरीर के प्रत्येक रोम-कूप और मन के प्रत्येक विचार से कलुषता को बहा ले जा रहे हैं। अनुष्टुप् छन्द की स्थिरता मन को एकाग्र करती है और जल-तत्त्व का ध्यान हृदय में शीतलता और शांति उत्पन्न करता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शुद्धि' से 'सूक्ष्म शुद्धि' की ओर ले जाता है, जिससे वह उच्चतर ध्यान की भूमियों के लिए तैयार होता है।

अघमर्षणसूक्तमाहात्म्यम्

श्लोक ७.१८१

द्रुपदा नाम सावित्री यजुर्वेदे प्रतिष्ठिता ।

अन्तर्जले त्रिरावर्त्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ७.१८१ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८५

"द्रुपदा" नामकी सावित्री यजुर्वेदमें प्रतिष्ठित है; अन्तर्जलमें (उसे) तीन बार दोहराकर (मनुष्य) ब्रह्महत्या (के पाप) को दूर करता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में 'द्रुपदा' मन्त्र के छन्द, देवता और सौत्रामणी-अवभृथ स्नान में उसके विनियोग का वर्णन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस मन्त्र की शास्त्रीय प्रतिष्ठा और उसकी विलक्षण शोधन-शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

द्रुपदा नाम (एक ऋचा) सावित्री यजुर्वेदे प्रतिष्ठिता (अस्ति) । (सः) अन्तर्जले त्रिरावर्त्य ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥

पदार्थ:

• द्रुपदा नाम सावित्री: यह एक विशिष्ट ऋचा है जिसे 'द्रुपदा' कहा गया है। इसे 'सावित्री' इसलिए कहा गया है क्योंकि यह सविता (सूर्य/प्रेरक शक्ति) के तेज से युक्त है और साधक की सुप्त चेतना को जाग्रत कर उसे शुद्ध करने की क्षमता रखती है।

• यजुर्वेदे प्रतिष्ठिता: यह मन्त्र शुक्लयजुर्वेद की परंपरा में स्थापित है। 'प्रतिष्ठिता' शब्द यह दर्शाता है कि यह केवल एक पाठ नहीं, अपितु एक सिद्ध शक्ति है जिसका आधार वेदमूलक प्रमाण है।

• अन्तर्जले: इसका बाह्य अर्थ है—वह जल जो पात्र के भीतर हो या शरीर के भीतर का जल (रस)। योगिक दृष्टि से 'अन्तर्जल' का अर्थ हृदय-आकाश में स्थित वह चैतन्य रस है, जो प्राणों का आधार है।

• त्रिरावर्त्य: तीन बार दोहराकर। संख्या 'तीन' यहाँ केवल गिनती नहीं, अपितु त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) के शोधन का संकेत है।

• ब्रह्महत्यां व्यपोहति: ब्रह्महत्या सबसे घोर पाप माना गया है। 'व्यपोहति' का अर्थ है—पूर्णतः मिटा देना या दूर कर देना। यहाँ ब्रह्महत्या का अर्थ केवल किसी ब्राह्मण की हिंसा नहीं, अपितु अपनी ही अंतरात्मा (ब्रह्म) की उपेक्षा करना या उसे अविद्या के अंधकार में मार देना भी है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य 'द्रुपदा' मन्त्र की उस शक्ति का वर्णन कर रहे हैं जो घोरतम कलुषता को भी नष्ट करने में समर्थ है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह मन्त्र यजुर्वेद की परंपरा में प्रतिष्ठित है। चूँकि याज्ञवल्क्य स्वयं शुक्लयजुर्वेद के द्रष्टा हैं, अतः वे यहाँ उस रहस्य को खोल रहे हैं जो श्रुति में बीजरूप में विद्यमान है।

इस मन्त्र का प्रयोग 'अन्तर्जले' करने का विधान है। बाह्य विधि में साधक जल लेकर उसे अभिमन्त्रित करता है, किंतु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है। 'अन्तर्जल' वह प्राण-शक्ति है जो हमारे शरीर के भीतर प्रवाहित है। जब इस मन्त्र को तीन बार दोहराया जाता है, तो वह ध्वनि-तरंगें शरीर के भीतर के जलीय तत्त्व (रस) को स्पंदित करती हैं, जिससे चित्त की गहराई में जमा हुआ पाप-मल धुल जाता है।

यहाँ 'ब्रह्महत्या' के पाप के निवारण की बात कही गई है। शास्त्रानुसार ब्रह्महत्या का दोष अत्यंत कठिन होता है, जिसे केवल विशिष्ट प्रायश्चित या दिव्य मन्त्रों से ही मिटाया जा सकता है। महर्षि याज्ञवल्क्य संकेत दे रहे हैं कि इस सावित्री मन्त्र में वह तेज है जो साधक के सूक्ष्म शरीर पर लगे हुए सबसे गहरे संस्कारों (पाप) को भी भस्म कर देता है। यह मन्त्र साधक को उस मानसिक जड़ता से मुक्त करता है जो उसे अपनी वास्तविक ब्रह्म-स्वरूपता को पहचानने से रोकती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' के उच्चतम स्तर का अभ्यास है। यहाँ 'अन्तर्जल' का अर्थ हृदय के भीतर स्थित वह शून्य या आकाश है जहाँ प्राण प्रतिष्ठित है। जब साधक 'द्रुपदा' मन्त्र का तीन बार जप करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के तीन स्तरों—स्थूल, सूक्ष्म और कारण—की शुद्धि करता है।

ब्रह्महत्या का योगिक अर्थ है—'ब्रह्म' (चेतना) का 'हत्या' (विस्मृति या दमन)। जब मनुष्य अविद्या के कारण अपनी आत्मा को भूलकर इंद्रिय-विषयों में लिप्त होता है, तो वह अपनी ही चेतना की हत्या करता है। इस मन्त्र का अभ्यास साधक को उस विस्मृति से जगाता है। तीन बार दोहराने का अभ्यास मन को एकाग्र करता है और उसे 'सावित्री' (प्रकाशमय) अवस्था में ले जाता है, जिससे साधक अज्ञान की भूमि से उठकर आत्म-बोध की भूमि की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास केवल पाप-मुक्ति नहीं, अपितु चेतना का पुनरुत्थान है।

श्लोक ७.१८२

आपः पुण्याः समादाय त्रिः पठेद्द्रुपदामृचम् ।

तत्तोयं मूर्ध्नि विन्यस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ७.१८२ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८५

पवित्र जल लेकर "द्रुपदादिव…" ऋचा तीन बार पढ़े; वह जल सिरपर डालकर (मनुष्य) सब पापोंसे छूट जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में 'द्रुपदा' मन्त्र के यजुर्वेदीय आधार और ब्रह्महत्या जैसे घोर पाप के शमन में उसकी क्षमता का वर्णन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस मन्त्र के प्रयोग की व्यावहारिक विधि और उसके द्वारा प्राप्त होने वाली सर्वपाप-मुक्ति के फल को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

पुण्याः आपः समादाय द्रुपदामृचम् त्रिः पठेत् । तत् तोयं मूर्ध्नि विन्यस्य (मनुष्यः) सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

पदार्थ:

• पुण्याः आपः: पवित्र जल। बाह्यतः वह जल जो मन्त्रित हो या किसी तीर्थ का हो; आन्तरतः वह शुचि भाव या चैतन्य-प्रवाह जो साधक के भीतर प्रवाहित है।

• समादाय: ग्रहण करके। यहाँ जल को केवल हाथ में लेना नहीं, अपितु मन्त्र की शक्ति को जल में संचित करना (समाहित करना) अभिप्रेत है।

• द्रुपदामृचम्: 'द्रुपदा' नाम की ऋचा को।

• त्रिः पठेत्: तीन बार पढ़े। संख्या 'तीन' यहाँ पुनः त्रिगुणों के शोधन और तीन कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) के पापों के क्षय का संकेत है।

• मूर्ध्नि विन्यस्य: मस्तक (सिर) पर डालकर। मस्तक शरीर का उच्चतम बिंदु है, जहाँ चेतना का केंद्र होता है।

• सर्वपापैः प्रमुच्यते: समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। 'प्रमुच्यते' का अर्थ है—पूरी तरह छूट जाना, जैसे बंधन से मुक्ति मिलती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य जल और मन्त्र के संयोग से होने वाले शोधन की विधि बता रहे हैं। विधि यह है कि साधक पहले पवित्र जल ग्रहण करे और फिर उस जल की उपस्थिति में 'द्रुपदा' ऋचा का तीन बार पाठ करे। जब मन्त्र की ध्वनि तरंगें जल के अणुओं से टकराती हैं, तो वह जल केवल भौतिक द्रव्य नहीं रहता, अपितु एक 'औषधि' या 'दिव्य द्रव' में परिवर्तित हो जाता है।

इस मन्त्रित जल को मस्तक पर डालने की आज्ञा दी गई है। मस्तक वह स्थान है जहाँ बुद्धि और अहंकार का वास होता है। जब यह पवित्र जल मस्तक को स्पर्श करता है, तो यह केवल त्वचा की शुद्धि नहीं करता, अपितु उस मानसिक मल (पाप) को धो देता है जिसने साधक की प्रज्ञा को ढँक रखा था।

यहाँ 'सर्वपाप' शब्द अत्यंत व्यापक है। पाप केवल वे कर्म नहीं हैं जो शास्त्र-निषेध हैं, अपितु 'पाप' वह है जो साधक को उसके वास्तविक स्वरूप (ब्रह्म) से अलग करता है। अविद्या, मोह और आसक्ति ही मूल पाप हैं। द्रुपदा ऋचा का यह प्रयोग साधक के चित्त पर जमी हुई उन परतों को हटा देता है, जिससे वह 'प्रमुच्यते' अर्थात् मुक्त हो जाता है। यह विधि दर्शाती है कि याज्ञवल्क्य के लिए बाह्य क्रियाएँ (स्नान, मार्जन) केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आन्तरिक शुद्धि के सोपान हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' के अभ्यास का है। योग में 'मूर्ध्न्य' स्थान को चेतना के उत्कर्ष का केंद्र माना गया है। जब साधक पवित्र जल लेकर तीन बार मन्त्र का जप करता है, तो वह अपने प्राणों को मन्त्र की लय में लाता है। जल का मस्तक पर विन्यस्त होना इस बात का प्रतीक है कि ऊपर से उतरती हुई ईश्वरीय कृपा (अमृत) साधक के अहंकार को गलाकर उसे निर्मल कर रही है।

यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शुद्धि' से 'सूक्ष्म शुद्धि' की ओर ले जाता है। तीन बार पाठ करने से मन, प्राण और बुद्धि तीनों स्तरों पर शोधन होता है। इस क्रिया से साधक उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह स्वयं को पापों के बोझ से मुक्त अनुभव करता है और उसकी चेतना उस हल्कापन का अनुभव करती है, जो ध्यान की अगली अवस्थाओं के लिए अनिवार्य है। यह क्रिया वास्तव में बाह्य जल के माध्यम से आन्तरिक 'अक्षर-स्नान' की तैयारी है।

संध्योपासनविधिः

श्लोक ७.१८३

एवं ज्ञात्वा तु मन्त्राणां विनियोगं द्विजोत्तमाः ।

संध्यां यद्वदुपासीत तथा सर्वं निबोधत ॥ ७.१८३ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८६

हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार मन्त्रोंका विनियोग जानकर (द्विज) जैसे संध्याकी उपासना करे, वह सब सुनो।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अघमर्षण और द्रुपदा जैसे विशिष्ट मन्त्रों के विनियोग तथा उनके द्वारा होने वाले पाप-शोधन की विधि बताई। अब वे इन समस्त मन्त्र-विनियोगों को आधार बनाकर संध्या-उपासना के व्यावहारिक क्रम की ओर संकेत कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

द्विजोत्तमाः मन्त्राणां विनियोगं एवं ज्ञात्वा तु, संध्यां यद्वदुपासीत, तत् सर्वं निबोधत ॥

पदार्थ:

• द्विजोत्तमाः: श्रेष्ठ द्विज। यहाँ 'द्विज' केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं, अपितु वह साधक है जिसका दूसरा जन्म (उपनयन/दीक्षा) हो चुका है और जो ज्ञान-अग्नि में तपकर पुनः जन्मा है। 'उत्तम' वे हैं जिन्होंने मन्त्रों के बाह्य और आन्तर अर्थों का समन्वय कर लिया है।

• मन्त्राणां विनियोगं: मन्त्रों के प्रयोग के विधान को। विनियोग का अर्थ है—मन्त्र का वह विशिष्ट उद्देश्य, ऋषि, छन्द और देवता जिससे मन्त्र की सुप्त शक्ति जागृत होती है।

• एवं ज्ञात्वा: इस प्रकार जानकर। यहाँ 'जानने' का अर्थ केवल बौद्धिक सूचना नहीं, अपितु अनुभवजन्य बोध है।

• संध्यां यद्वदुपासीत: जिस प्रकार संध्या की उपासना करे। 'उपासना' का शाब्दिक अर्थ है—उप (समीप) + आसन (बैठना)। अर्थात् उस परम तत्त्व के समीप बैठना।

• तत् सर्वं निबोधत: वह सब जानो/सुनो। 'निबोधत' क्रिया यहाँ आदेशात्मक है, जो शिष्य को एकाग्र होकर सुनने का निर्देश देती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक महत्वपूर्ण संधि-बिन्दु पर खड़े हैं। अब तक उन्होंने मन्त्रों के विनियोग, उनके ऋषियों और देवताओं का विवरण दिया, जो कि साधना की 'तैयारी' थी। अब वे उस तैयारी को 'क्रिया' (उपासना) में बदलने का निर्देश दे रहे हैं।

ऋषि कहते हैं कि हे श्रेष्ठ साधकों! जब तुम यह जान लेते हो कि किस मन्त्र का क्या विनियोग है, तब तुम मन्त्रों के साथ केवल शब्दों का खेल नहीं खेलते, बल्कि उस मन्त्र के देवता और ऋषि के साथ एकाकार हो जाते हो। जब विनियोग ज्ञात होता है, तब मन्त्र 'जीवित' हो उठता है। इसी बोध के साथ जब द्विज संध्या की उपासना करता है, तब वह केवल एक कर्मकाण्डीय क्रिया नहीं रह जाती, अपितु वह स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर यात्रा बन जाती है।

यहाँ 'संध्या' शब्द का गहरा अर्थ है। संध्या वह संधि-काल है जहाँ दिन और रात्रि मिलते हैं। योगिक दृष्टि से यह वह अवस्था है जहाँ जाग्रत और सुषुप्ति के बीच का सेतु बनता है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि मन्त्रों का विनियोग जानना इसलिए आवश्यक है ताकि उपासना के समय मन विचलित न हो और साधक सीधे उस लक्ष्य (देवता) पर प्रहार कर सके। यह श्लोक एक घोषणा है कि अब हम उस पूर्ण विधि को समझेंगे जिससे बाह्य शुद्धि (स्नान-मार्जन) और आन्तर शुद्धि (जप-ध्यान) का संगम होता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्सावित्रीमार्कदर्शनात् । पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ २.१०१ ॥

प्रातःसंध्यामें सूर्यके दर्शनतक खड़े होकर सावित्री जपे; सायंसंध्यामें नक्षत्र भलीभाँति दिखनेतक बैठकर (जपे)।

मनुस्मृति २.१०१मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 181

मनुस्मृति में प्रातः और सायं संध्या के समय सावित्री जप की शारीरिक स्थिति (खड़े होना या बैठना) का विधान है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ केवल शारीरिक स्थिति तक सीमित नहीं है, अपितु 'विनियोग' के ज्ञान को प्राथमिकता देती है। मनु का विधान 'विधि' पर बल देता है, जबकि याज्ञवल्क्य का यह श्लोक 'बोध' पर बल देता है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—साधक को अनुशासन में रखकर उसे उच्च चेतना की ओर ले जाना।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'तैयारी' और 'अभ्यास' के बीच की कड़ी है। योग में इसे 'पूर्वांग' और 'मुख्य अंग' का मिलन कहा जा सकता है। मन्त्रों का विनियोग जानना 'पूर्वांग' है, और संध्या-उपासना 'मुख्य अंग' है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बिना विनियोग के जप केवल 'वाचा' (वाणी) का व्यायाम है, किंतु विनियोग के साथ वह 'मानस' (मन) और 'प्राण' का योग बन जाता है। जब साधक यह जानता है कि वह किस ऋषि के माध्यम से, किस छन्द की लय में और किस देवता की शक्ति से जुड़ रहा है, तो उसका चित्त एकाग्र हो जाता है।

इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक अपनी उपासना से पूर्व मन्त्र के विनियोग का स्मरण करे। इससे उसकी चेतना 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर बढ़ती है। वह इस भूमि से उस भूमि की ओर जाता है जहाँ कर्म और ज्ञान अलग-अलग नहीं रहते, बल्कि 'उपासना' के रूप में एक हो जाते हैं। यह श्लोक साधक को सचेत करता है कि संध्या का अर्थ केवल समय का पालन नहीं, अपितु चेतना का संधान है।

तत्राचमनम्

श्लोक ७.१८४

ऐशान्यभिमुखो भूत्वा शुचिः प्रयतमानसः ।

आचान्तः पुनराचामेदृतमित्यभिमन्त्र्य च ॥ ७.१८४ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८६

ईशान (उत्तर-पूर्व) की ओर मुँह करके, पवित्र और संयत मनवाला होकर, आचमन कर चुका भी "ऋतं च (सत्यं च)…" से अभिमन्त्रित करके फिर आचमन करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्रों के विनियोग का ज्ञान देकर साधक को संध्या-उपासना के लिए तैयार किया। अब वे उपासना के प्रथम व्यावहारिक चरण—शुद्धिकरण और आचमन की विशिष्ट विधि का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

शुचिः प्रयतमानसः भूत्वा, ऐशान्यभिमुखो भूत्वा, आचान्तः (च), 'ऋतं च' इत्यभिमन्त्र्य च पुनराचामेत् ॥

पदार्थ:

• ऐशान्यभिमुखो: ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) की ओर मुख करके। ईशान वह दिशा है जहाँ उत्तर (शिव/कैलास) और पूर्व (सूर्य/प्रकाश) का मिलन होता है; यह ज्ञान और मोक्ष की दिशा मानी जाती है।

• शुचिः: पवित्र। यहाँ शुद्धि केवल शरीर की बाह्य स्वच्छता नहीं, अपितु मन्त्रों के प्रभाव से उत्पन्न वह आंतरिक निर्मलता है जो साधक को पात्रता प्रदान करती है।

• प्रयतमानसः: संयमित मन वाला। 'प्रयत' का अर्थ है—वह मन जो भटकन से मुक्त हो, जो संकल्प और विकल्प के द्वंद्व को छोड़कर केवल इष्ट (परमात्मा) में स्थित हो।

• आचान्तः: आचमन कर चुका। आचमन का अर्थ है जल का सेवन कर शरीर और वाणी की शुद्धि करना।

• 'ऋतं च' इत्यभिमन्त्र्य: 'ऋतं च सत्यं च...' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके। यहाँ 'ऋत' का अर्थ है वह शाश्वत ब्रह्मांडीय नियम जिससे संपूर्ण सृष्टि संचालित है।

• पुनराचामेत्: पुनः आचमन करे। यह द्वितीय आचमन प्रथम आचमन की भौतिक शुद्धि को आध्यात्मिक शुद्धि में बदलने की प्रक्रिया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य संध्या-उपासना के आरम्भिक अनुशासन को स्पष्ट कर रहे हैं। उपासना केवल मन्त्रों का उच्चारण नहीं, अपितु एक संपूर्ण 'अवस्था' का निर्माण है। इसीलिए ऋषि सबसे पहले दिशा, शुद्धि और मन की स्थिति का निर्देश देते हैं।

साधक को 'ईशान' की ओर मुख करना है। योगिक दृष्टि से ईशान दिशा वह बिंदु है जहाँ साधक की चेतना भौतिक जगत (पूर्व) से ऊपर उठकर शिवत्व या शून्य (उत्तर) की ओर उन्मुख होती है। जब साधक 'शुचिः' और 'प्रयतमानसः' होता है, तब वह केवल एक शरीर नहीं रहता, अपितु एक 'यन्त्र' बन जाता है जिसमें मन्त्रों की शक्ति प्रवाहित हो सके।

यहाँ एक विशेष विधान है—'पुनराचमन'। साधक पहले सामान्य आचमन कर चुका है, जो शरीर की शुद्धि के लिए था। किन्तु अब वह 'ऋतं च...' मन्त्र का आश्रय लेकर पुनः आचमन करता है। यह द्वितीय आचमन 'ऋत' (सत्य और नियम) के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करने की क्रिया है। 'ऋतं च सत्यं च' का भाव यह है कि साधक अपनी वाणी और प्राण को उस परम सत्य के साथ जोड़ रहा है, जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। यह क्रिया संकेत करती है कि बाह्य शुद्धि के बाद अब वह अपनी आंतरिक चेतना को 'ऋत' के अनुरूप ढाल रहा है, ताकि आगे की उपासना में कोई अवरोध न रहे।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'चित्त-शुद्धि' का अभ्यास है। ईशानमुख होना केवल शरीर को मोड़ना नहीं, अपितु अपनी दृष्टि को ऊर्ध्वगामी बनाना है। 'प्रयतमानस' होने का अर्थ है—प्राणों को स्थिर कर मन को हृदय-कमल में लाना।

जब साधक 'ऋतं च...' मन्त्र के साथ पुनः आचमन करता है, तो वह अनुभव करता है कि वह जल केवल प्यास बुझाने या मुख धोने के लिए नहीं, अपितु उसके भीतर के 'अहंकार' को धोने वाला अमृत है। वह इस भाव का अभ्यास करता है कि जैसे जल शरीर की अशुद्धि धोता है, वैसे ही 'ऋत' (ब्रह्मांडीय सत्य) उसकी बुद्धि के भ्रमों को धो रहा है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शुद्धि' से 'सूक्ष्म शुद्धि' की भूमि पर ले जाता है, जिससे वह अगले चरण में प्रणव और सावित्री के गहरे रहस्यों को ग्रहण करने के योग्य बनता है।

श्लोक ७.१८५

आन्तरं शुध्यति ह्येवमन्नपानमलीकृतम् ।

त्रिरावर्त्य तु सावित्रीं प्रणवं व्याहृतीस्तथा ॥ ७.१८५ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८६

इस प्रकार झूठे (दूषित) अन्न-पानसे (हुई) भीतरी अशुद्धि शुद्ध होती है। (फिर) सावित्री, प्रणव और व्याहृतियोंको तीन बार दोहराकर —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ईशानमुख होकर 'ऋतं च' मन्त्र से पुनराचमन की विधि बताई। अब वे इस विशिष्ट आचमन के प्रयोजन और उसके पश्चात की मन्त्र-विधि का निर्देश कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

एवम् (पुनराचमनेन) अलिक़ृतम् अन्नपानम्, ह्येवम आन्तरं शुध्यति । (ततः) सावित्रीं, प्रणवं, व्याहृतीस्तथा त्रिरावर्त्य (कुर्यात्) ॥

पदार्थ:

• अलिक़ृतम्: दूषित या झूठा। यहाँ 'अलिक़ृत' का अर्थ केवल भौतिक अशुद्धि नहीं, अपितु वह अन्न-पान है जो बिना मन्त्र या बिना सजगता के ग्रहण किया गया हो, जिससे चित्त में तामसिकता या जड़ता आती है।

• अन्नपानम्: भोजन और जल। योगिक दृष्टि से अन्न केवल शरीर का पोषण नहीं करता, अपितु वह 'चित्त' का निर्माण करता है।

• आन्तरं शुध्यति: भीतरी शुद्धि होती है। यहाँ 'आन्तर' का अर्थ है—कंठ, हृदय और नाभि के मध्य का वह सूक्ष्म क्षेत्र जहाँ प्राण और मन का वास है।

• सावित्रीं: गायत्री मन्त्र। यह प्रकाश का मन्त्र है, जो बुद्धि को प्रेरित करता है।

• प्रणवं: ओंकार। यह अक्षर ब्रह्म है, जो समस्त ध्वनियों का मूल है।

• व्याहृतीस्तथा: भूः, भुवः, स्वः। ये तीनों लोक और तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) के प्रतीक हैं।

• त्रिरावर्त्य: तीन बार दोहराकर। संख्या तीन यहाँ त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) के शोधन और तीन कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) के संतुलन का संकेत है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि बाहरी शुद्धि और भीतरी शुद्धि के मध्य के सेतु को स्पष्ट कर रहे हैं। पूर्व श्लोक में 'ऋतं च' मन्त्र से पुनराचमन का विधान था। ऋषि कहते हैं कि इस प्रकार के अभिमन्त्रित जल के सेवन से 'अलिक़ृत' अन्न-पान से हुई आंतरिक अशुद्धि का नाश होता है।

यहाँ एक गहरा रहस्य है। हम जो अन्न ग्रहण करते हैं, वह केवल जठराग्नि में नहीं जलता, अपितु उसका सूक्ष्म अंश हमारे सूक्ष्म शरीर और चित्त में भी जाता है। यदि अन्न अशुद्ध हो या उसे बिना सजगता के ग्रहण किया गया हो, तो वह हृदय और प्राणों में एक प्रकार का अवरोध (मल) उत्पन्न करता है। यह 'आन्तर अशुद्धि' साधक की एकाग्रता में बाधा डालती है। जब साधक 'ऋतं च' (सत्य और ऋत) के भाव से अभिमन्त्रित जल पीता है, तो वह जल केवल गले से नीचे नहीं उतरता, अपितु वह मन्त्र की शक्ति से 'अमृत' बन जाता है, जो भीतर की तामसिकता को धोकर चित्त को निर्मल करता है।

भीतरी शुद्धि के पश्चात, ऋषि अब साधक को उच्चतर कंपन की ओर ले जाते हैं। वे निर्देश देते हैं कि अब सावित्री (गायत्री), प्रणव (ओंकार) और व्याहृतियों का तीन-तीन बार जप किया जाए। यह क्रम अत्यंत वैज्ञानिक है। पहले 'सावित्री' से बुद्धि का प्रकाश होता है, फिर 'प्रणव' से वह प्रकाश एकाग्र होकर ब्रह्म-अक्षर में लीन होता है, और 'व्याहृतियों' के माध्यम से वह चेतना भूः, भुवः और स्वः के विस्तृत आयामों में प्रतिष्ठित होती है। यह प्रक्रिया साधक को स्थूल शरीर से उठाकर सूक्ष्म और फिर कारण शरीर की ओर ले जाती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'शुद्धि' से 'प्रकाश' की यात्रा है।

'आन्तरं शुध्यति' का योगिक अनुभव यह है कि मन्त्रपूत जल जब कंठ से उतरता है, तो साधक उसे केवल जल न मानकर 'शुद्धि-शक्ति' के रूप में अनुभव करे। वह अनुभव करे कि यह जल हृदय-आकाश में स्थित समस्त मलिनता को धो रहा है। जब आंतरिक मार्ग शुद्ध होता है, तभी मन्त्रों का वास्तविक प्रभाव प्रकट होता है।

इसके बाद जब साधक तीन बार सावित्री, प्रणव और व्याहृति का जप करता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को तीन स्तरों पर परिष्कृत कर रहा होता है:

१. सावित्री जप: इससे मानसिक स्तर पर 'सत्व' की वृद्धि होती है और बुद्धि प्रखर होती है।

२. प्रणव जप: ओंकार के माध्यम से साधक अपने मन को शून्य में ले जाता है, जहाँ केवल 'अक्षर' शेष रहता है।

३. व्याहृति जप: भूः, भुवः, स्वः के उच्चारण से साधक अपनी प्राण-शक्ति को पृथ्वी (स्थूल), अंतरिक्ष (सूक्ष्म) और द्युलोक (कारण) के साथ लयबद्ध करता है।

इस प्रकार, यह श्लोक साधक को 'अलिक़ृत' (तामसिक/दूषित) अवस्था से निकालकर 'सावित्री' (प्रकाशमय) और 'प्रणव' (ब्रह्ममय) अवस्था की ओर ले जाता है। यह अभ्यास साधक को भौतिक शरीर की सीमाओं से मुक्त कर उसे उस भूमि पर प्रतिष्ठित करता है जहाँ से ध्यान और समाधि का मार्ग प्रशस्त होता है।

मार्जनमन्त्राः

श्लोक ७.१८६

मार्जनं च तथा कृत्वा आपोहिष्ठेति मार्जयेत् ।

सार्धामृचं तु प्रक्षिप्य ऊर्ध्वं सार्धामधः क्षिपेत् ॥ ७.१८६ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८६

— और उसी प्रकार मार्जन करके, "आपो हि ष्ठा…" से मार्जन करे — डेढ़ ऋचा (पढ़कर जल) ऊपर छिड़के, और डेढ़ (पढ़कर) नीचे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सावित्री, प्रणव और व्याहृतियों के त्रिवर जप का निर्देश किया। अब वे संध्या-उपासना के क्रम में जल के माध्यम से शरीर और चित्त के शोधन की विशिष्ट विधि 'मार्जन' का वर्णन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(ततः) मार्जनं च तथा कृत्वा, 'आपो हि ष्ठा' (इति मन्त्रेण) मार्जयेत् । सार्धामृचं तु (जलम्) प्रक्षिप्य, ऊर्ध्वं सार्धामधः (जलम्) क्षिपेत् ॥

पदार्थ:

• मार्जनं: जल छिड़ककर शुद्ध करने की क्रिया। यह केवल शरीर की धूल हटाना नहीं, अपितु मन्त्रशक्ति से सूक्ष्म अशुद्धियों का विसर्जन है।

• आपो हि ष्ठा: यह ऋग्वेद के प्रसिद्ध 'आपः' सूक्त की प्रथम ऋचा का प्रतीक है। यह जल के दिव्य स्वरूप का आवाहन है, जो पापों का शमन करता है।

• सार्धामृचं: 'सार्धा' का अर्थ है 'डेढ़' (एक और आधा)। यहाँ 'सार्धामृचं' का अर्थ है—एक पूरी ऋचा और अगली ऋचा का आधा भाग पढ़ने तक जल का प्रयोग करना।

• प्रक्षिप्य/क्षिपेत्: छिड़कना या विसर्जित करना।

• ऊर्ध्वं/अधः: ऊपर की ओर और नीचे की ओर।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य मार्जन की एक अत्यंत सूक्ष्म और गणितीय विधि बता रहे हैं। जब साधक सावित्री और प्रणव के जप से अपनी बुद्धि और प्राण को जाग्रत कर लेता है, तब वह 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र के माध्यम से जल को अभिमन्त्रित करता है।

यहाँ 'मार्जन' की विधि केवल जल छिड़कना नहीं है, अपितु मन्त्र की ध्वनि और जल के स्पर्श का एक संगम है। ऋषि निर्देश देते हैं कि साधक डेढ़ ऋचा (सार्धामृचं) के पाठ के साथ जल को ऊपर की ओर छिड़के और पुनः डेढ़ ऋचा के पाठ के साथ जल को नीचे की ओर छिड़के।

बाहरी दृष्टि से यह शरीर के ऊपरी और निचले अंगों की शुद्धि है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। ऊपर की ओर जल छिड़कना 'ऊर्ध्वगमन' का प्रतीक है—अर्थात चेतना को निम्न वृत्तियों से उठाकर उच्चतर अवस्था की ओर ले जाना। नीचे की ओर जल छिड़कना 'विसर्जन' का प्रतीक है—अर्थात संचित मानसिक मल और कलुष को पृथ्वी में विसर्जित कर देना। डेढ़ ऋचा की यह संख्या मन्त्र के प्रभाव को पूर्णता प्रदान करती है, जहाँ एक पूर्ण ऋचा स्थिरता देती है और आधा अंश गतिशीलता या प्रवाह का संकेत है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह क्रिया 'प्राण-शुद्धि' का अभ्यास है। 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र जल के भीतर छिपे उस दिव्य तत्व को जाग्रत करता है जो शोधक है। जब साधक जल को ऊपर की ओर छिड़कता है, तो वह अपने भीतर के 'सूर्य' (आत्मा) की ओर उन्मुख होता है, जिससे उसकी चेतना का विस्तार होता है। जब वह जल नीचे छिड़कता है, तो वह अपने भीतर के 'पाश' और 'तामस' को विसर्जित करता है।

यह अभ्यास साधक को इस अनुभव की ओर ले जाता है कि शुद्धि केवल बाहरी जल से नहीं, अपितु मन्त्र के माध्यम से जल में प्रवाहित 'अक्षर' की शक्ति से होती है। इस विधि से साधक अपनी देह को एक पवित्र वेदी में परिवर्तित करता है, जिससे वह अगले चरण की गहन आंतरिक साधना (प्राणायाम और ध्यान) के लिए तैयार हो सके।

श्लोक ७.१८७

अधोभागविसृष्टाभिः कलुषं याति संक्षयम् ।

सर्वतीर्थाभिषेकश्च ऊर्ध्वं संमार्जनाद्भवेत् ॥ ७.१८७ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८६

नीचेकी ओर छोड़े (जल) से पाप नष्ट होता है, और ऊपरकी ओर मार्जनसे सब तीर्थोंका अभिषेक होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र के साथ जल को ऊपर और नीचे छिड़कने की विधि बताई थी। वर्तमान श्लोक में वे इस विशिष्ट विन्यास के पीछे निहित आध्यात्मिक फल और उसके आन्तर अर्थ को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(जलम्) अधोभागविसृष्टाभिः (मन्त्र-जलैः) कलुषं याति संक्षयम् । ऊर्ध्वं संमार्जनात् (च) सर्वतीर्थाभिषेकश्च भवेत् ॥

पदार्थ:

• अधोभागविसृष्टाभिः: नीचे के भाग (पादों या शरीर के निचले अंगों) की ओर छोड़े गए या छिड़के गए जल से।

• कलुषं: पाप, मल, मानसिक अशुद्धि या तामसिक वृत्तियाँ।

• संक्षयम्: पूरी तरह नष्ट होना, क्षय होना।

• ऊर्ध्वं संमार्जनात्: ऊपर की ओर (मस्तक की ओर) मार्जन करने से।

• सर्वतीर्थाभिषेकः: समस्त तीर्थों के पवित्र जल से अभिषेक होने के समान फल की प्राप्ति।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य मार्जन की क्रिया के द्वैत प्रभाव को समझा रहे हैं। जल जब मन्त्रयुक्त होकर शरीर के निचले भाग की ओर विसर्जित होता है, तब वह 'कलुष' का संक्षय करता है। यहाँ 'कलुष' केवल बाह्य मैल नहीं है, अपितु वे संस्कार हैं जो साधक को नीचे की ओर, अर्थात् जड़ता और मोह की ओर खींचते हैं। जल का नीचे की ओर गिरना, अशुद्धियों के विसर्जन का प्रतीक है। जिस प्रकार पृथ्वी पर गिरने वाला जल सब कुछ बहा ले जाता है, उसी प्रकार अधोमुखी मार्जन साधक के भीतर के तामसिक मल को धोकर बाहर निकाल देता है।

इसके विपरीत, जब वही अभिमन्त्रित जल ऊपर की ओर छिड़का जाता है, तो वह 'सर्वतीर्थाभिषेक' का फल देता है। तीर्थ का अर्थ केवल वह भौगोलिक स्थान नहीं जहाँ पवित्र नदियाँ हों, अपितु तीर्थ वह है जो 'तर्थन' (पार करना) कराए। ऊपर की ओर जल का प्रक्षेप साधक की चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है। मस्तक और शिर के ऊपर जल का स्पर्श इस बात का संकेत है कि अब साधक का अंतःकरण समस्त तीर्थों की पवित्रता से ओत-प्रोत हो गया है।

बाहरी विधि में यह केवल जल का छिड़काव है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपनी निम्न वृत्तियों का त्याग कर दिव्य गुणों का अभिषेक कर रहा है। नीचे की ओर क्रिया 'त्याग' है और ऊपर की ओर क्रिया 'ग्रहण' है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'विसर्जन' और 'आरोहण' के सिद्धांत को दर्शाता है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि शुद्धि की प्रक्रिया दो चरणों में पूर्ण होती है: प्रथम—नकारात्मकता का विसर्जन और द्वितीय—सकारात्मकता का आवाहन।

जब साधक जल को नीचे की ओर छोड़ता है, तो वह मानसिक रूप से अपने समस्त पापों, ग्लानियों और मानसिक बोझ को पृथ्वी में विसर्जित करने का अभ्यास करता है। यह 'अपकर्ष' की क्रिया है, जिससे चित्त हल्का होता है। इसके पश्चात, जब वह जल को ऊपर की ओर छिड़कता है, तो वह उस रिक्त स्थान को तीर्थों की पवित्रता और दैवीय ऊर्जा से भरने का अनुभव करता है। यह 'उत्कर्ष' की क्रिया है।

साधक इस अभ्यास से यह सीखता है कि बिना कलुष के संक्षय (खाली हुए बिना), तीर्थाभिषेक (दिव्य ऊर्जा का प्रवेश) संभव नहीं है। पहले नीचे की ओर मल का विसर्जन, फिर ऊपर की ओर अमृत का अभिषेक—यही योगिक शोधन का मार्ग है। इस प्रकार साधक अपनी चेतना को नीचे के अंधकार से ऊपर के प्रकाश की ओर ले जाने का शारीरिक और मानसिक अभ्यास करता है।

श्लोक ७.१८८

अघमर्षणसूक्तेन मार्जनं कारयेत्ततः ।

शन्न आपश्च द्रुपदां कामतः संप्रयोजयेत् ॥ ७.१८८ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८६

फिर अघमर्षण सूक्तसे मार्जन करे; और "शं नो देवीः…" तथा "द्रुपदादिव…" का इच्छानुसार प्रयोग करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'आपो हि ष्ठा' मन्त्र के साथ जल को ऊपर और नीचे छिड़कने की विधि और उसके फल का वर्णन किया था। अब वे मार्जन की प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करते हुए अन्य विशिष्ट सूक्तों के प्रयोग का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अघमर्षणसूक्तेन मार्जनं कारयेत्, ततः शन्न आपश्च द्रुपदां (मन्त्रौ) कामतः संप्रयोजयेत् ॥

पदार्थ:

• अघमर्षणसूक्तेन: अघमर्षण सूक्त के द्वारा (यह सूक्त पापों के क्षय और शुद्धि के लिए प्रयुक्त होता है)।

• मार्जनं कारयेत्: मार्जन (जल छिड़कने की क्रिया) करना चाहिए।

• ततः: उसके पश्चात।

• शन्न आपश्च: 'शं नो देवीः' आदि ऋचाओं वाले मन्त्र (जो शांति और कल्याण के लिए हैं)।

• द्रुपदां: द्रुपदा सावित्री मन्त्र।

• कामतः: इच्छानुसार या आवश्यकतानुसार।

• संप्रयोजयेत्: प्रयोग करना चाहिए या सम्मिलित करना चाहिए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य मार्जन की विधि में सूक्तों के क्रमिक प्रयोग का विधान बता रहे हैं। 'आपो हि ष्ठा' के पश्चात अब 'अघमर्षण सूक्त' से मार्जन करने का निर्देश है। अघमर्षण का शाब्दिक अर्थ है—पापों का मर्षण करना, अर्थात् उन्हें रगड़कर या धोकर पूरी तरह मिटा देना। यह सूक्त केवल बाह्य शरीर की शुद्धि नहीं करता, अपितु साधक के सूक्ष्म शरीर पर चिपके हुए उन संस्कारों को हटाता है जो उसे साधना के मार्ग में बाधित करते हैं।

इसके उपरान्त महर्षि 'शं नो देवीः' और 'द्रुपदा' मन्त्रों के प्रयोग को 'कामतः' यानी इच्छानुसार बताया है। यहाँ 'इच्छानुसार' का अर्थ यह नहीं है कि साधक अपनी मनमानी करे, अपितु इसका रहस्य यह है कि साधक अपनी वर्तमान मानसिक और आध्यात्मिक अवस्था के अनुसार इनका चयन करे। यदि साधक के भीतर अशांति, भय या व्याकुलता अधिक है, तो वह 'शं नो देवीः' (शांति सूक्त) का प्रयोग करे, क्योंकि यह मन्त्र दैवीय शक्तियों से कल्याण और शांति की प्रार्थना करता है। यदि साधक को अनुभव हो कि उसके भीतर गहरे पाप या ब्रह्म-हत्या जैसे गंभीर दोषों का प्रभाव है, तो वह 'द्रुपदा' मन्त्र का प्रयोग करे, जो अपनी तीव्रता से गहनतम अशुद्धियों का विनाश करने में सक्षम है।

इस प्रकार, याज्ञवल्क्य यहाँ एक क्रम बना रहे हैं: पहले सामान्य शुद्धि ('आपो हि ष्ठा'), फिर गहन संस्कार-क्षय (अघमर्षण), और अंत में विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार शांति या विशेष शुद्धि (शं नो देवीः और द्रुपदा)। यह पूरी प्रक्रिया साधक को उस अवस्था में लाने के लिए है जहाँ वह बाहरी जगत के प्रभाव से मुक्त होकर अपने भीतर की ज्योति की ओर मुड़ सके।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह मार्जन 'चित्त-शुद्धि' का एक बाह्य साधन है। साधक जब अघमर्षण सूक्त का जप करते हुए जल छिड़कता है, तो वह वास्तव में अपने मन के 'मल' (राग, द्वेष, मोह) को विसर्जित करने का अभ्यास करता है। 'शं नो देवीः' का प्रयोग मन को शांत कर उसे एकाग्रता की भूमि पर लाता है, जबकि 'द्रुपदा' का प्रयोग अंतःकरण के अवरोधों को तोड़ने का कार्य करता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर की शुद्धि से सूक्ष्म शरीर की शुद्धि की ओर ले जाता है, ताकि वह अगले चरण में 'प्राणायाम' जैसी आंतरिक साधना के लिए पूर्णतः तैयार हो सके।

श्लोक ७.१८९

ओंकारपूर्वा गायत्री अब्लिङ्गान्यघमर्षणम् ।

ज्ञातव्यं ब्रह्म चैतद्वै पुरा दृष्टं स्वयंभुवा ॥ ७.१८९ ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८६

ओंकारसे आरम्भ होनेवाली गायत्री, अप्-लिङ्ग मन्त्र और अघमर्षण — यह ब्रह्म (वेद) जानना चाहिए, जिसे पूर्वकालमें स्वयम्भूने देखा था।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मार्जन के लिए प्रयुक्त होने वाले विभिन्न सूक्तों और मन्त्रों की विधि बताई थी। अब वे इन मन्त्रों के आध्यात्मिक महत्त्व और उनकी उत्पत्ति के रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं, जिससे साधक केवल क्रिया न करे, अपितु उस शक्ति को अनुभव करे जिससे यह विधि निकली है।

अन्वय और पदार्थ —

ओंकारपूर्वा गायत्री, अब्लिङ्गानि, अघमर्षणम् (इति) ज्ञातव्यं ब्रह्म च, एतत् वै पुरा दृष्टं स्वयंभुवा ॥

पदार्थ:

• ओंकारपूर्वा गायत्री: ओंकार (प्रणव) से आरम्भ होने वाली गायत्री ऋचा।

• अब्लिङ्गानि: 'अप्-लिङ्ग' मन्त्र (जल के स्वरूप और उसकी शक्ति को प्रकट करने वाले मन्त्र)।

• अघमर्षणम्: अघमर्षण सूक्त (पापों का क्षय करने वाला)।

• ज्ञातव्यं ब्रह्म च: और यह जानना चाहिए कि यह 'ब्रह्म' है (यहाँ ब्रह्म का अर्थ पवित्र ज्ञान, वेद और उस परम तत्त्व से है जो इन मन्त्रों का आधार है)।

• एतत् वै पुरा दृष्टं स्वयंभुवा: वास्तव में इसे पूर्वकाल में स्वयंभु (स्वयं प्रकट होने वाले परमात्मा/ब्रह्म) ने देखा था।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधक को बाहरी कर्मकाण्ड से ऊपर उठाकर उसके मन्त्र-तत्व के साक्षात्कार की ओर ले जा रहे हैं। वे कहते हैं कि ओंकार से प्रारंभ होने वाली गायत्री, अब्लिङ्ग मन्त्र और अघमर्षण सूक्त—ये केवल शब्दों का समूह या जल छिड़कने की विधि नहीं हैं, अपितु ये साक्षात् 'ब्रह्म' हैं।

यहाँ 'ब्रह्म' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। जब ऋषि कहते हैं कि "यह ब्रह्म है", तो उनका संकेत है कि ये मन्त्र उस परब्रह्म की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। जिस प्रकार सूर्य से किरणें निकलती हैं, उसी प्रकार उस अक्षर-ब्रह्म से ये मन्त्र निकले हैं। गायत्री साधक की बुद्धि को प्रेरित करती है, अब्लिङ्ग मन्त्र जल के माध्यम से शुद्धि का मार्ग दिखाते हैं और अघमर्षण सूक्त अंतःकरण के मल को धोता है।

श्लोक का दूसरा भाग—"पुरा दृष्टं स्वयंभुवा"—एक महान रहस्य खोलता है। 'स्वयंभु' वह है जो किसी अन्य से उत्पन्न नहीं हुआ, जो स्वयं-प्रकाशित है। ऋषियों का मत है कि ये मन्त्र मनुष्य ने नहीं बनाए, बल्कि स्वयंभु परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में जिस दिव्य दृष्टि से सत्य को देखा था, उसी 'दृष्टि' का शब्द-रूप ये मन्त्र हैं। अतः जब साधक इन मन्त्रों का जप या प्रयोग करता है, तो वह वास्तव में उस आदि-दृष्टि से जुड़ता है।

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि बाहरी शुद्धि (मार्जन) और आंतरिक ज्ञान (ब्रह्म-ज्ञान) अलग-अलग नहीं हैं। जब साधक यह जानकर मार्जन करता है कि वह ब्रह्म का ही प्रयोग कर रहा है, तब उसकी क्रिया 'कर्म' से उठकर 'योग' बन जाती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'क्रिया' से 'ज्ञान' की भूमि पर ले जाता है। एक सामान्य व्यक्ति केवल जल छिड़ककर शरीर शुद्ध करता है, किन्तु एक योगी इन मन्त्रों के माध्यम से 'ब्रह्म-स्पर्श' का अनुभव करता है।

साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि ओंकार (प्रणव) वह बीज है जिससे गायत्री और अन्य सूक्त प्रस्फुटित होते हैं। जब वह ओंकार-पूर्वा गायत्री का जप करता है, तो वह अपने भीतर के उस 'स्वयंभु' प्रकाश को जाग्रत करने का प्रयास करता है जिसे परमात्मा ने आदि-काल में देखा था।

यहाँ अभ्यास यह है कि मार्जन के समय साधक यह अनुभव करे कि जल केवल भौतिक पदार्थ नहीं, अपितु 'अब्लिङ्ग' स्वरूप ब्रह्म है। जब वह अघमर्षण सूक्त का प्रयोग करता है, तो वह केवल त्वचा की शुद्धि नहीं, अपितु हृदय के दर्पण पर जमी अविद्या की धूल को हटा रहा है। इस प्रकार, वह बाह्य शुद्धि के माध्यम से उस आंतरिक शुद्धता की ओर बढ़ता है, जो उसे अगले अध्याय के 'प्राणायाम' और 'ध्यान' के लिए तैयार करती है। यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि मन्त्रों का वास्तविक फल तब मिलता है जब उन्हें 'ब्रह्म' के रूप में जाना जाए।

प्राणायामोपदेशः

श्लोक ७.१९०

एवं संमार्जनं कृत्वा बाह्यशुद्ध्यर्थमात्मनः ।

अथाभ्यन्तरशुद्ध्यर्थं प्राणायामान् समाचरेत् ॥ ७.१९० ॥

सप्तमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८७

इस प्रकार अपनी बाहरी शुद्धिके लिए संमार्जन करके, फिर भीतरी शुद्धिके लिए प्राणायाम करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मार्जन के लिए प्रयुक्त होने वाले विभिन्न सूक्तों, मन्त्रों की विधि और उनके ब्रह्म-स्वरूप होने के रहस्य को समझाया था। अब वे इस पूरी बाहरी शुद्धि प्रक्रिया का उपसंहार करते हुए साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जा रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

एवं संमार्जनं कृत्वा बाह्यशुद्ध्यर्थं आत्मनः, अथ अभ्यन्तरशुद्ध्यर्थं प्राणायामान् समाचरेत् ॥

पदार्थ:

• एवं संमार्जनं कृत्वा: इस प्रकार (पूर्वोक्त मन्त्रों और जल के प्रयोग से) संमार्जन (शुद्धिकरण) करके।

• बाह्यशुद्ध्यर्थं आत्मनः: अपने आप की बाहरी शुद्धि के लिए।

• अथ: अब (एक कार्य की समाप्ति और दूसरे के आरम्भ का सूचक)।

• अभ्यन्तरशुद्ध्यर्थं: भीतरी (आन्तरिक) शुद्धि के लिए।

• प्राणायामान् समाचरेत्: प्राणायाम का अभ्यास/आचरण करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधक के लिए एक महत्वपूर्ण विभाजक रेखा खींच रहे हैं। यहाँ 'एवं' शब्द उन सभी पूर्ववर्ती क्रियाओं—अघमर्षण, द्रुपदा और आपो-हिष्ठा मार्जन—को समेट लेता है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि जल, मन्त्र और विधि के माध्यम से जो कुछ भी अब तक किया गया, वह 'बाह्यशुद्धि' के निमित्त था।

बाहरी शुद्धि का अर्थ केवल त्वचा या शरीर की स्वच्छता नहीं है, अपितु उन सूक्ष्म अशुद्धियों का निवारण है जो अन्न-पान और बाहरी वातावरण के संपर्क से शरीर और मन के स्थूल स्तर पर जमा हो जाती हैं। जब साधक मन्त्रों द्वारा जल को अभिमन्त्रित कर अपने ऊपर छिड़कता है, तो वह वास्तव में अपने स्थूल शरीर के आवरण को पवित्र कर रहा होता है ताकि वह सूक्ष्म साधना के योग्य हो सके।

किन्तु, केवल बाह्य शुद्धि पर्याप्त नहीं है। 'अथ' शब्द यहाँ एक महान संक्रमण का संकेत है। यह शब्द बताता है कि अब साधक उस सीमा पर पहुँच गया है जहाँ बाहरी कर्म समाप्त होते हैं और वास्तविक योग आरम्भ होता है। बाह्य शुद्धि एक तैयारी थी, अब 'अभ्यन्तरशुद्धि' का समय है। आन्तरिक शुद्धि का अर्थ है—प्राणों का शुद्ध होना, मन के विक्षेपों का शांत होना और हृदय के दर्पण से मल का हटना। इस भीतरी शुद्धि के लिए ऋषि 'प्राणायाम' का विधान करते हैं।

यहाँ यह रहस्य समझना आवश्यक है कि बाह्य शुद्धि और आन्तरिक शुद्धि अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही यात्रा के दो सोपान हैं। जिस प्रकार जल बाहरी गंदगी को धोता है, उसी प्रकार प्राण का नियमन (प्राणायाम) भीतर की अशुद्धियों को जलाकर भस्म कर देता है। बाह्य शुद्धि साधक को 'बाहर' से तैयार करती है, और प्राणायाम उसे 'भीतर' से रूपांतरित करता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक द्वार की भाँति है। अब तक साधक जल और मन्त्रों के माध्यम से अपनी देह को एक मंदिर की तरह स्वच्छ कर रहा था। अब वह मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर रहा है।

योगिक दृष्टि से, जल और प्राण का गहरा सम्बन्ध है। जल की तरलता और शीतलता साधक के शरीर को शिथिल और ग्रहणशील बनाती है, जिससे प्राणों का प्रवाह सुगम हो जाता है। जब बाह्य संमार्जन से शरीर की जड़ता और मल समाप्त हो जाता है, तब प्राणों को अपनी सूक्ष्म गति प्राप्त होती है। यदि शरीर अशुद्ध और भारी हो, तो प्राणायाम का अभ्यास कठिन और कष्टकारी हो सकता है; अतः बाह्य शुद्धि वास्तव में प्राणायाम के लिए मार्ग प्रशस्त करती है।

साधक यहाँ 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की भूमि में प्रवेश करता है। बाह्य शुद्धि 'कर्म' की भूमि है, जबकि प्राणायाम 'साधना' की भूमि है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि जिस पवित्रता को वह बाहर जल से खोज रहा था, वही पवित्रता अब उसे अपने भीतर प्राणों के नियमन से प्राप्त करनी है। इस श्लोक के माध्यम से साधक यह सीखता है कि योग केवल मानसिक एकाग्रता नहीं, अपितु शरीर और प्राण की क्रमिक शुद्धि की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। अब वह बाह्य जगत के अवलंबन को छोड़कर अपने ही भीतर के प्राण-तत्व में लीन होने की तैयारी करता है।

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-10-04।

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