श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, अष्टमोऽध्यायः

56 मूल पद्य

यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके अष्टमोऽध्यायः — प्राणायामप्रत्याहारनिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।

अष्टमोऽध्यायः — प्राणायामप्रत्याहारनिर्णयः

अध्याय-सार — प्राणायाम-प्रत्याहार-निर्णय। याज्ञवल्क्य प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यानको क्रमसे कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं (८.१); ध्यान अगले अध्यायमें आता है। प्राणायामका लक्षण यह है: व्याहृति और प्रणव सहित गायत्रीका, शिरस्‌के साथ, प्राण रोककर तीन बार पाठ (८.२–६) — यही मनुका कहा प्राणायाम है (८.८)। पूरक, कुम्भक और रेचक; बारह, चौबीस और छत्तीस मात्राओंसे कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम (८.९–११); मात्राका माप, अतिमात्रा, और निरोधके समय मन्त्रसे गिनती (८.१२–१८); तीनोंके लक्षण (८.१९–२२)।

पूरकमें नाभिमें विष्णु, कुम्भकमें हृदयमें ब्रह्मा और रेचकमें ललाटमें ईश्वर (शिव) का ध्यान करे (८.२३–२५)। लम्बा माहात्म्य है — जैसे धौंकनेसे धातुओंका मल जलता है, वैसे ही प्राण-निग्रहसे इन्द्रियोंके दोष जलते हैं (८.३०) — और फिर धीरे श्वास छोड़ने तथा बादमें आचमनका नियम। यह स्मृतिका प्राणायाम है; सिद्धान्तमें वह ओंकारसे मात्राके प्रमाणपर होता है (८.४७–४९)।

प्रत्याहार इन्द्रियोंकी वृत्तियोंको मनसे खींच लेना है, जैसे कछुआ अंग समेट लेता है (८.५०–५४); जो मनको बार-बार कामनाओंसे हटाकर एक स्थानमें धारण करता है, वह अमृतत्वके योग्य होता है (८.५५)। ८.५६ ‘स्नान-निर्णय’ का उपसंहार करता है और उसकी श्लोक-संख्या तीन सौ अड़तीस बताता है।

प्राणायामप्रत्याहारध्याननिरूपणप्रतिज्ञा

श्लोक ८.१

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य लक्षणम् ।

प्रत्याहारं तथा ध्यानं यथावदनुपूर्वशः ।

उच्यमानं निबोधध्वं संक्षेपेण द्विजोत्तमाः ॥ ८.१ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८८

इसके बाद मैं प्राणायामका लक्षण, तथा प्रत्याहार और ध्यान, ठीक-ठीक क्रमसे कहूँगा; हे श्रेष्ठ द्विजो! संक्षेपमें कहे जाते (इस विषय) को सुनो।

अवतरणिका —

पिछले अध्यायों में मन्त्रों की नींव, व्याहृतियों के रहस्य और गायत्री के स्वरूप का विवेचन किया गया। अब उन मन्त्रों को प्राण-शक्ति के साथ जोड़कर उन्हें साधना में उतारने का समय है, इसलिए ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ से प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यान की विधि का आरम्भ कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अत ऊर्ध्वं (इसके बाद) द्विजोत्तमाः (हे श्रेष्ठ द्विजों!) उच्यमानं (कहे जाने वाले) प्राणायामस्य लक्षणम् (प्राणायाम के लक्षण को), प्रत्याहारं तथा ध्यानं (तथा प्रत्याहार और ध्यान को) यथावदनुपूर्वशः (ठीक-ठीक क्रम से) संक्षेपेण (संक्षेप में) निबोधध्वं (सुनो/जानो); (अहं) प्रवक्ष्यामि (मैं कहूँगा)।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. लक्षणम्: यहाँ लक्षण का अर्थ केवल परिभाषा नहीं, अपितु वह 'चिह्न' या 'विधि' है जिससे उस अवस्था की पहचान हो और उसे सिद्ध किया जा सके।

२. अनुपूर्वशः: यह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग में क्रम का विशेष महत्त्व है; बिना प्राण के नियमन के प्रत्याहार संभव नहीं और बिना प्रत्याहार के ध्यान संभव नहीं।

३. निबोधध्वं: 'बोध' धातु से है, जिसका अर्थ है केवल सुनना नहीं, बल्कि मन्त्र और क्रिया के सम्बन्ध को गहराई से समझना और अनुभव करना।

४. द्विजोत्तमाः: जो अपनी दूसरी जन्म (विद्या-दीक्षा) के द्वारा श्रेष्ठ बने हैं। यहाँ यह संबोधन उन साधकों के लिए है जो केवल बाह्य कर्मकाण्ड से ऊपर उठकर आन्तरिक योग के लिए तत्पर हैं।

भाष्य —

योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से साधकों को एक महान यात्रा के अगले चरण की ओर ले जा रहे हैं। अब तक जो ज्ञान मन्त्रों के रूप में (बीजरूप में) दिया गया था, अब उसे 'प्राण' के माध्यम से प्रस्फुटित करने की विधि बताई जाएगी।

ऋषि कहते हैं कि अब मैं तुम्हें प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यान का लक्षण बताऊंगा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ 'प्राणायाम' को प्रथम स्थान दिया गया है। याज्ञवल्क्य की दृष्टि में प्राणायाम केवल श्वास को रोकना नहीं है, अपितु मन्त्र और प्राण का ऐसा संयोग है जिससे चित्त स्थिर होता है। जब प्राण स्थिर होता है, तभी 'प्रत्याहार' संभव होता है—अर्थात् इन्द्रियों का बाह्य विषयों से हटकर अन्तर्मुखी होना। और जब इन्द्रियाँ अन्तर्मुखी हो जाती हैं, तब 'ध्यान' की वह अवस्था आती है जहाँ साधक और साध्य का भेद मिटने लगता है।

"संक्षेपेण" शब्द का प्रयोग यहाँ यह संकेत देता है कि योग के ये अनुभव इतने गहरे हैं कि उन्हें शब्दों में पूरी तरह नहीं बांधा जा सकता; अतः ऋषि यहाँ केवल मुख्य सूत्र (लक्षण) दे रहे हैं, जिनका विस्तार साधक को अपने अभ्यास और अनुभव में करना होगा। यह श्लोक एक प्रतिज्ञा है कि अब साधक को स्थूल शरीर की शुद्धि से सूक्ष्म शरीर की शुद्धि और फिर आत्मा के साक्षात्कार की ओर बढ़ना है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'क्रम' का विज्ञान है। योग मार्ग में एक सोपान के बिना दूसरा सोपान नहीं चढ़ा जा सकता।

१. प्राणायाम से प्रत्याहार: जब साधक मन्त्रों के साथ प्राण का नियमन करता है, तो उसकी प्राण-शक्ति संतुलित होती है। इस संतुलन से मन की चंचलता कम होती है, जिससे वह सहज ही 'प्रत्याहार' (इन्द्रिय-निग्रह) की भूमि पर पहुँच जाता है।

२. प्रत्याहार से ध्यान: जब इन्द्रियाँ बाहर भटकना बंद कर देती हैं, तब ऊर्जा का प्रवाह भीतर की ओर मुड़ता है। यही वह स्थिति है जहाँ 'ध्यान' का बीजारोपण होता है।

साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसकी साधना अब केवल 'जप' (वाचिक या मानसिक) तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वह जप अब 'प्राण' के साथ जुड़कर एक शारीरिक और मानसिक रूपांतरण की प्रक्रिया बन जाएगा। यहाँ से साधक 'कर्म-भूमि' से 'योग-भूमि' की ओर प्रस्थान करता है। इस श्लोक का अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर इस क्रम को स्थापित करे—पहले प्राण को लय करना, फिर इन्द्रियों को समेटना और अंततः चेतना को एक बिंदु पर केंद्रित करना।

प्राणायामलक्षणम्

श्लोक ८.२

सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।

त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते ॥ ८.२ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८८

आयतप्राण वाला (व्यक्ति) व्याहृति और प्रणव से युक्त गायत्री का शिरस् (सिर) के साथ तीन बार पाठ करे, वह प्राणायाम कहा जाता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यान के अनुक्रम में विवेचन करने की घोषणा की थी। अब इस श्लोक से वे प्राणायाम के वास्तविक लक्षण और उसकी विधि का उद्घाटन कर रहे हैं, जहाँ मन्त्र और प्राण का अद्वैत स्थापित होता है।

अन्वय और पदार्थ —

सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह (युक्त) आयतप्राणः (वाला व्यक्ति) त्रिः (तीन बार) पठेत् (पढ़े), (तदा) स प्राणायामः उच्यते (वह प्राणायाम कहा जाता है)।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. सव्याहृतिं सप्रणवां: यहाँ 'स' उपसर्ग युक्त शब्द यह बताते हैं कि गायत्री का पाठ अकेला नहीं, अपितु व्याहृतियों और प्रणव (ओंकार) के साथ संयुक्त होना चाहिए। यह मन्त्र के पूर्ण स्वरूप का संकेत है।

२. शिरसा सह: 'शिरस्' का अर्थ यहाँ सिर नहीं, अपितु मन्त्र का 'शिरोभाग' या आरम्भिक मन्त्र है (जिसका विवरण श्लोक ८.५ में 'ओमापो ज्योतिः...' के रूप में दिया गया है)। जैसे शरीर का शिरोभाग सर्वोच्च होता है, वैसे ही यह मन्त्र साधना के शिखर का संकेत है।

३. आयतप्राणः: 'आयत' का अर्थ है विस्तारित या रोके हुए। जब साधक श्वास को भीतर खींचकर उसे स्थिर कर लेता है, तब वह 'आयतप्राण' कहलाता है। यह कुम्भक की वह अवस्था है जहाँ प्राण स्थिर होकर मन्त्र के लिए आधार बनता है।

४. त्रिः: संख्या तीन यहाँ केवल गिनती नहीं, बल्कि त्रिविध अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) या तीन गुणों के परिष्कार का प्रतीक है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम की एक ऐसी विशिष्ट विधि प्रस्तुत करता है जो केवल श्वास-प्रश्वास का व्यायाम नहीं, अपितु 'मन्त्र-प्राण-संयोग' है। सामान्यतः प्राणायाम में श्वास की गिनती की जाती है, किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य जी मन्त्र के पाठ को ही प्राण की अवधि का पैमाना बना रहे हैं।

ऋषि कहते हैं कि जब साधक प्रणव और व्याहृतियों से युक्त गायत्री मन्त्र का, उसके शिरस् मन्त्र के साथ, तीन बार पाठ करता है और इस दौरान उसका प्राण 'आयत' (विस्तारित या निरुद्ध) रहता है, तब वह क्रिया 'प्राणायाम' कहलाती है। यहाँ 'पठेत्' क्रिया का अर्थ केवल वाणी से बोलना नहीं, अपितु प्राण के भीतर मन्त्र का स्पन्दन करना है।

इस विधि में बाहरी क्रिया (मन्त्र पाठ) और आन्तरिक क्रिया (प्राण निरोध) एक साथ घटित होते हैं। व्याहृति साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म की ओर ले जाते हैं, प्रणव उसे अक्षर में विलीन करता है और गायत्री का त्रिपदा स्वरूप उसे उस परम ज्योति से जोड़ता है। जब यह संपूर्ण प्रक्रिया तीन बार दोहराई जाती है, तब प्राण पूरी तरह संयमित होकर चित्त को एकाग्र कर देता है। यह विधि दर्शाती है कि याज्ञवल्क्य के लिए प्राणायाम केवल वायु का नियंत्रण नहीं, बल्कि वायु के माध्यम से मन्त्र की शक्ति को हृदय में उतारना है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

ओङ्कारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः । त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः । स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ २.८१–८२ ॥

ओंकारसे आरम्भ होनेवाली तीन अविनाशी महाव्याहृतियाँ और त्रिपदा सावित्री — इन्हें ब्रह्म (वेद) का मुख जानना चाहिए। जो इनका प्रतिदिन, बिना आलस्यके, तीन वर्ष तक अध्ययन (जप) करता है, वह वायुरूप, आकाश-शरीरवाला होकर परब्रह्मको प्राप्त होता है।

मनुस्मृति २.८१–८२मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 177

मनुस्मृति में भी ओंकारपूर्वक महाव्याहृतियों और त्रिपदा सावित्री के संयोग को 'ब्रह्म का मुख' कहा गया है। मनु के अनुसार जो तीन वर्ष तक निरंतर इनका अध्ययन करता है, वह 'वायुभूत' होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी 'ब्रह्म-मुख' (मन्त्र-समूह) को प्राणायाम की विधि में उतारकर उसे 'वायुभूत' होने का व्यावहारिक साधन बना देती है। जहाँ मनुस्मृति इसके फल (परब्रह्म प्राप्ति) पर बल देती है, वहीं यह स्मृति उसकी सूक्ष्म योगिक विधि (आयतप्राण) को स्पष्ट करती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-मात्रा' के अभ्यास का निर्देश है। यहाँ प्राण रोकने की अवधि किसी बाहरी घड़ी या संख्या से नहीं, बल्कि मन्त्र के जप से मापी जाती है।

अभ्यास यह है कि साधक श्वास को भीतर भरकर (पूरक) उसे स्थिर करे (कुम्भक) और उस स्थिरता के भीतर ही प्रणव, व्याहृति और गायत्री का मानसिक पाठ करे। जब तक मन्त्र का एक आवर्तन पूरा होता है, तब तक प्राण को रोके रखना है। इस प्रकार मन्त्र की लंबाई ही प्राण के निरोध की अवधि निर्धारित करती है।

यह अभ्यास साधक को 'सांसारिक समय' से हटाकर 'मन्त्रिक समय' में ले जाता है। जब प्राण मन्त्र के साथ लयबद्ध होता है, तो मन की चंचलता समाप्त हो जाती है और साधक स्थूल शरीर के बोध से ऊपर उठकर अपने आन्तरिक सूर्य (हृदय-ज्योति) की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ प्राण और अक्षर एक हो जाते हैं।

श्लोक ८.३

गायत्रीं शिरसा सार्धं जपेद्व्याहृतिपूर्विकाम् ।

प्रतिप्रणवसंयुक्तां त्रिरयं प्राणसंयमः ॥ ८.३ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८८

व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली, (प्रत्येक) प्रणवसे युक्त गायत्रीको शिरस् सहित तीन बार जपे — यह प्राणसंयम है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में प्राणायाम के सामान्य लक्षण और 'आयतप्राण' की अवस्था का वर्णन किया गया था। अब इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस मन्त्र-संयोग की सूक्ष्म विधि बता रहे हैं, जिसके द्वारा प्राण का वास्तविक संयम संभव होता है।

अन्वय और पदार्थ —

व्याहृतिपूर्विकाम्, प्रतिप्रणवसंयुक्तां, शिरसा सार्धं गायत्रीं जपेत्, त्रिरयं प्राणसंयमः।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. व्याहृतिपूर्विकाम्: 'पूर्विकाम्' का अर्थ है—जिसके पूर्व में (पहले) स्थित हों। यहाँ गायत्री मन्त्र के पाठ से पूर्व व्याहृतियों के उच्चारण का विधान है। व्याहृति केवल शब्द नहीं, अपितु स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाने वाले द्वार हैं।

२. प्रतिप्रणवसंयुक्तां: 'प्रति' शब्द यहाँ 'प्रत्येक' के अर्थ में है। इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक व्याहृति और मन्त्र के साथ प्रणव (ओंकार) का संयोग होना चाहिए। यह निरंतरता साधक को अक्षरातीत अवस्था से जोड़े रखती है।

३. शिरसा सार्धं: 'सार्धं' का अर्थ है 'सहित'। जैसा कि पिछले श्लोक में 'शिरसा सह' आया था, यहाँ पुनः स्पष्ट किया गया है कि मन्त्र के शिरोभाग (आरम्भिक मन्त्र) के साथ ही यह जप पूर्ण होता है।

४. प्राणसंयमः: श्वास को केवल रोकना 'कुम्भक' है, किन्तु मन्त्र के साथ प्राण को स्थिर करना 'संयम' है। यहाँ जप और प्राण का ऐसा सामंजस्य है कि मन्त्र की ध्वनि ही प्राण को नियंत्रित करती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि याज्ञवल्क्य जी की दृष्टि में प्राणायाम केवल शारीरिक क्रिया नहीं, अपितु एक 'मन्त्र-योग' है। यहाँ 'प्राणसंयम' के लिए एक विशिष्ट क्रम निर्धारित है: सर्वप्रथम व्याहृतियों का उच्चारण, फिर प्रत्येक के साथ प्रणव का मेल, तत्पश्चात गायत्री का जप और अंत में शिरस् का प्रयोग।

इस विधि का रहस्य यह है कि साधक जब व्याहृतियों से आरम्भ करता है, तो वह अपनी चेतना को पृथ्वी (भूः), अन्तरिक्ष (भुवः) और स्वर्ग (स्वः) के स्तरों से ऊपर उठाता है। प्रत्येक व्याहृति के साथ 'प्रणव' का जुड़ना यह सुनिश्चित करता है कि साधक का मन भटककर बाहर न जाए, अपितु ओंकार की शक्ति से भीतर की ओर मुड़े। जब यह क्रम तीन बार दोहराया जाता है, तब वह केवल एक जप नहीं रह जाता, बल्कि प्राणों का पूर्ण निरोध बन जाता है।

यहाँ 'तीन बार' का विधान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह त्रिविध आवर्तन साधक को तीन स्तरों पर शुद्ध करता है—प्रथम बार में स्थूल शरीर और प्राण का संयम, द्वितीय बार में मन और बुद्धि का निग्रह, और तृतीय बार में आत्मा का मन्त्र में विलीन होना। इस प्रकार, यह विधि बाहरी विधि होते हुए भी भीतर के प्राणों को 'अक्षर' (ओंकार) में प्रतिष्ठित करने का साधन है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'ध्वनि-प्राण-एकता' का अभ्यास है। जब साधक व्याहृति और प्रणव का उच्चारण करता है, तो वह श्वास के प्रवाह को मन्त्र की लय में बाँध लेता है।

अभ्यास की भूमि यह है कि साधक पहले श्वास को भीतर खींचकर स्थिर करे और फिर उस स्थिरता के भीतर ही मन्त्र की सूक्ष्म ध्वनि को गूँजने दे। यहाँ 'प्रतिप्रणव' का अर्थ है कि प्रत्येक शब्द के बीच में ओंकार की वह गूँज बनी रहे जो श्वास के रुकने पर भी अंतर्मन में चलती रहती है। इस अभ्यास से साधक 'आयतप्राण' की भूमि से ऊपर उठकर 'संयम' की भूमि पर आता है, जहाँ श्वास और मन्त्र अलग-अलग नहीं रहते, बल्कि एक ही ज्योति के दो रूप बन जाते हैं। यह प्रक्रिया साधक को स्थूल प्राण से सूक्ष्म प्राण की ओर ले जाती है।

प्राणायामे मन्त्राः

श्लोक ८.४

भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यं तथैव च ।

प्रत्योंकारसमायुक्तं तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ ८.४ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८८

भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम् — (प्रत्येक) ओंकार सहित; (फिर) "तत्सवितुर्वरेण्यम्…" —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में प्राणायाम के लिए व्याहृति, प्रणव और शिरस् के संयोग का सामान्य विधान बताया गया था। अब इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन विशिष्ट व्याहृतियों के क्रम और मन्त्र के मुख्य भाग के जुड़ाव की विस्तृत विधि स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यं तथैव च (प्रति-ओङ्कारसमायुक्ताः), (ततः) तत्सवितुर्वरेण्यम् (इति गायत्री मन्त्रः)।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यम्: ये सात व्याहृतियाँ हैं। 'भूः' (पृथ्वी/अस्तित्व), 'भुवः' (अन्तरिक्ष/विभाव), 'स्वः' (द्यौ/स्वर्ग), 'महः' (महान्/विस्तार), 'जनः' (उत्पत्ति/सृष्टि), 'तपः' (तपस/ऊर्जा) और 'सत्यम्' (परम सत्य/अक्षर)। ये सात सोपान साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाते हैं।

२. तथैव च: यहाँ 'तथैव' का अर्थ है—'उसी प्रकार'। अर्थात् जिस प्रकार पहले तीन व्याहृतियों के साथ प्रणव का विधान है, उसी प्रकार शेष चार (महः, जनः, तपः, सत्यम्) के साथ भी वही विधान है।

३. प्रत्योंकारसमायुक्तं: 'प्रति' का अर्थ है प्रत्येक। प्रत्येक व्याहृति के साथ 'ओम्' का संयोग होना अनिवार्य है।

४. तत्सवितुर्वरेण्यम्: यह गायत्री मन्त्र के मुख्य भाग (ऋचा) का आरम्भिक पद है। सात व्याहृतियों के पूर्ण होने के पश्चात साधक इस मुख्य मन्त्र में प्रवेश करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम की मन्त्र-संरचना का रहस्य खोलता है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य केवल तीन नहीं, अपितु सात व्याहृतियों का विधान कर रहे हैं। सामान्य संध्या में तीन व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) का प्रयोग होता है, किन्तु जब यह क्रिया 'प्राणायाम' के रूप में प्राण-संयम के लिए की जाती है, तब सात व्याहृतियों का प्रयोग होता है।

विधि यह है कि साधक सर्वप्रथम 'ओम् भूः', 'ओम् भुवः', 'ओम् स्वः', 'ओम् महः', 'ओम् जनः', 'ओम् तपः' और 'ओम् सत्यम्' का उच्चारण करे। इन सात व्याहृतियों के बाद 'तत्सवितुर्वरेण्यम्...' से आरम्भ होने वाले गायत्री मन्त्र का पाठ किया जाता है।

इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक अपनी चेतना को सात स्तरों पर विस्तारित कर रहा है। भूः से सत्यम् तक की यात्रा वास्तव में पृथ्वी-तत्व से आरम्भ होकर परम सत्य (अक्षर) तक पहुँचने की यात्रा है। जब साधक प्रत्येक व्याहृति को प्रणव (ओम्) से जोड़ता है, तो वह प्रत्येक लोक या अवस्था को उस अविनाशी अक्षर में विलीन कर देता है। सात व्याहृतियों का यह क्रम प्राण को इतना सूक्ष्म बना देता है कि जब वह 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' के प्रकाश (सविता) में प्रवेश करता है, तो वह केवल श्वास नहीं रह जाता, अपितु 'प्रकाश-मय प्राण' बन जाता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि-संयम' का अभ्यास है। यहाँ सात व्याहृतियों का जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि प्राण को सात सोपानों में ऊपर उठाने की प्रक्रिया है।

अभ्यास यह है कि प्रत्येक व्याहृति के साथ प्राण को एक निश्चित बिंदु पर स्थिर किया जाए। 'भूः' पर स्थिरता, 'भुवः' पर विस्तार, 'स्वः' पर उल्लास, 'महः' पर व्यापकता, 'जनः' पर सृजन, 'तपः' पर ताप (ऊर्जा) और 'सत्यम्' पर पूर्ण शांति का अनुभव करना है। जब साधक इन सात अवस्थाओं को ओङ्कार के माध्यम से एकसूत्र में पिरो लेता है, तब वह 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' के माध्यम से अपने भीतर के सूर्य (हृदय-सूर्य) का साक्षात्कार करता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर की सीमाओं से निकालकर सूक्ष्म प्राण-पिण्ड की ओर ले जाता है, जिससे आगे आने वाले कुम्भक (प्राण-रोध) में मन का विचलित होना समाप्त हो जाता है।

श्लोक ८.५

ओमापो ज्योतिरित्येतच्छिरः पश्चात् प्रयोजयेत् ॥ ८.५ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८८

— (फिर) "ओमापो ज्योतिः…" — यह शिरस् बादमें जोड़े।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में प्राणायाम के लिए सात व्याहृतियों और प्रणव के साथ गायत्री मन्त्र के मुख्य भाग के जुड़ाव की विधि बताई गई थी। अब इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मन्त्र-पद्धति के अंतिम अंग 'शिरस्' के प्रयोग का समय और स्थान निर्धारित कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(ततः) ओमापो ज्योतिः इति एतत् शिरः पश्चात् प्रयोजयेत्।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. ओमापो ज्योतिः... : यह मन्त्र के 'शिरस्' (शीर्ष) भाग का आरम्भिक प्रतीक है। जिस प्रकार शरीर में शिरस् (सिर) सर्वोच्च और समापन बिंदु होता है, उसी प्रकार मन्त्र के अंत में आने वाला यह विशेष अंश मन्त्र की ऊर्जा को शिखर तक ले जाता है।

२. शिरः : शाब्दिक अर्थ है 'सिर'। मन्त्र-शास्त्र में 'शिरस्' वह पूरक अंश है जो मुख्य ऋचा के बाद जुड़कर उसे पूर्णता प्रदान करता है। यह मन्त्र का वह उच्चतम बिंदु है जहाँ साधक की चेतना मन्त्र के शब्दों से ऊपर उठकर उसके फल में स्थित होती है।

३. पश्चात् : बाद में या अन्त में। यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि शिरस् का प्रयोग व्याहृतियों और गायत्री मन्त्र के पाठ के उपरान्त करना है।

४. प्रयोजयेत् : प्रयोग करना चाहिए या जोड़ना चाहिए। यह विधिलिङ् लकार है, जो साधक के लिए एक आवश्यक निर्देश (विधान) है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम की मन्त्र-रचना को पूर्ण करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र के 'शिरस्' भाग के प्रयोग का विधान कर रहे हैं। प्राणायाम की इस विशिष्ट विधि में पहले सात व्याहृतियाँ आती हैं, फिर प्रणव और उसके बाद गायत्री मन्त्र का पाठ होता है। इस पूरी प्रक्रिया के अंत में 'ओमापो ज्योतिः...' प्रतीक वाला शिरस् मन्त्र जोड़ा जाता है।

बाहरी विधि के अनुसार, यह मन्त्र का समापन है। किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है। 'शिरस्' का अर्थ है—ऊर्ध्वगमन। जब साधक सात व्याहृतियों के माध्यम से पृथ्वी से सत्य (अक्षर) तक की यात्रा करता है और गायत्री के माध्यम से अपनी बुद्धि को उस प्रकाश (सविता) में विलीन करता है, तब अंत में 'शिरस्' का प्रयोग उस समस्त संचित ऊर्जा को शरीर के उच्चतम केंद्र की ओर ले जाता है।

यह विधान दर्शाता है कि प्राणायाम केवल श्वास का रोकना नहीं है, बल्कि मन्त्रों के माध्यम से चेतना का क्रमिक उत्थान है। व्याहृतियाँ आधार तैयार करती हैं, गायत्री मन्त्र प्रज्वलित करता है और शिरस् उस ज्योति को पूर्णता प्रदान कर साधक को अक्षर-रूपी शिखर पर प्रतिष्ठित करता है। यदि शिरस् को पहले या बीच में प्रयोग किया जाए, तो मन्त्र की वह ऊर्ध्वगामी धारा बाधित होगी; इसीलिए ऋषि कहते हैं—'पश्चात् प्रयोजयेत्' (इसे अन्त में ही जोड़ें)।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'पूर्णता' के अभ्यास का है। योग में जब तक क्रिया का समापन उसके उच्चतम बिंदु (शिरस्) पर न हो, तब तक वह साधना अधूरी रहती है।

साधक जब इस मन्त्र-क्रम का अभ्यास करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसकी चेतना पहले स्थूल (भूः) से सूक्ष्म (सत्यम्) की ओर गई, फिर उस सूक्ष्मता में प्रकाश का उदय हुआ (गायत्री) और अंत में वह प्रकाश उसके मस्तक के उच्चतम बिंदु पर स्थिर हो गया (शिरस्)। यह अभ्यास साधक को 'साधन' से 'साध्य' की ओर ले जाता है। यहाँ 'शिरस्' का प्रयोग करना वास्तव में अपनी व्यक्तिगत बुद्धि को सार्वभौमिक ज्योति में विसर्जित करने का अभ्यास है। इस विधि से प्राणायाम करने वाला योगी केवल प्राणों का निरोध नहीं करता, बल्कि अपनी चेतना को अक्षर-ब्रह्म के साथ एकाकार कर लेता है।

श्लोक ८.६

एष मन्त्रप्रयोगास्त्रिः प्राणायामे निबोधत ।

त्रिरावर्तनयोगात्तु प्राणायामस्तु शब्दितः ॥ ८.६ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८९

प्राणायाममें मन्त्रका यह प्रयोग तीन बार (होता है) — ऐसा जानो; तीन आवर्तनोंके योगसे ही (वह) प्राणायाम कहलाता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के लिए प्रयुक्त होने वाले मन्त्रों के अंगों—सप्त व्याहृति, प्रणव, गायत्री और शिरस्—के क्रम को स्पष्ट किया था। अब इस श्लोक में वे इस संपूर्ण मन्त्र-समुच्चय के प्रयोग की संख्या और 'प्राणायाम' शब्द की वास्तविक परिभाषा निर्धारित कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

प्राणायामे एष मन्त्रप्रयोगः त्रिः (भवेत्), (एतत्) निबोधत। त्रिरावर्तनयोगात् तु प्राणायामः शब्दितः।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. मन्त्रप्रयोगः : मन्त्रों को जपने की वह विशिष्ट विधि जिसमें व्याहृति, प्रणव, गायत्री और शिरस् का एक निश्चित क्रम हो।

२. त्रिः : तीन बार। यह संख्या यहाँ मात्र गिनती नहीं, अपितु एक पूर्ण चक्र की समाप्ति का संकेत है।

३. निबोधत : जानो या अनुभव करो। यह आज्ञावाचक शब्द है, जो साधक को केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु प्रयोग द्वारा बोध प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है।

४. त्रिरावर्तनयोगात् : तीन बार दोहराने के योग (संयोजन) से। 'आवर्तन' का अर्थ है—पुनरावृत्ति। जब एक ही मन्त्र-चक्र तीन बार पूरा होता है, तब वह एक 'योग' या पूर्ण इकाई बनती है।

५. शब्दितः : कहा गया है या नाम दिया गया है। यहाँ इसका अर्थ है कि जिस प्रक्रिया में तीन आवर्तन होते हैं, उसी को शास्त्र में 'प्राणायाम' की संज्ञा दी गई है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम की बाह्य विधि और उसकी परिभाषा के बीच की कड़ी है। महर्षि याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि केवल मन्त्रों का पाठ करना प्राणायाम नहीं है, अपितु उन मन्त्रों का एक निश्चित संख्या में प्रयोग करना अनिवार्य है।

विधि यह है कि सात व्याहृतियों, प्रणव, गायत्री और शिरस् के जिस समूह को पिछले श्लोकों (८.२ से ८.५) में बताया गया है, उस पूरे समूह का प्रयोग तीन बार करना है। जब साधक इस मन्त्र-चक्र को तीन बार दोहराता है, तब वह क्रिया 'प्राणायाम' कहलाती है।

यहाँ 'तीन' की संख्या का गहरा अर्थ है। बाहरी दृष्टि से यह जप की संख्या है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह त्रिविध अवस्थाओं का संतुलन है। प्रथम आवर्तन में साधक अपनी बाहरी चंचलता को मन्त्र में बांधता है, द्वितीय में वह मन्त्र के साथ एकाकार होता है, और तृतीय आवर्तन में वह मन्त्र के प्रभाव से प्राणों के निरोध (संयम) की स्थिति में पहुँचता है। अतः तीन आवर्तनों के योग से ही वह मानसिक और प्राणिक स्थिरता आती है जिसे 'प्राणायाम' कहा गया है।

यह श्लोक यह भी संकेत करता है कि प्राणायाम केवल श्वास का रुकना नहीं है, बल्कि मन्त्र-शक्ति और प्राण-शक्ति का एक साथ लयबद्ध होना है। बिना मन्त्र के केवल श्वास रोकना या बिना श्वास-संयम के केवल मन्त्र जपना, इस विशिष्ट 'प्राणायाम' की श्रेणी में नहीं आता।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'लय' का अभ्यास है। जब साधक तीन बार मन्त्र-चक्र को दोहराता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।

प्रथम आवर्तन में ध्यान 'व्याहृतियों' (शब्दों) पर होता है, द्वितीय में 'गायत्री' (अर्थ और तेज) पर, और तृतीय में 'शिरस्' (शून्य या पूर्णता) पर। यह तीन बार का आवर्तन साधक को 'अस्थिर' भूमि से 'स्थित' भूमि की ओर ले जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि प्रत्येक आवर्तन के साथ प्राण अधिक सूक्ष्म होते जाएँ और मन अधिक एकाग्र। जब तीसरा आवर्तन पूर्ण होता है, तब साधक उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ मन्त्र और प्राण एक हो जाते हैं; यही वह स्थिति है जहाँ से अगले चरणों में 'पूरक, कुम्भक और रेचक' का सूक्ष्म गणित आरम्भ होता है।

प्राणायामभेदाः

श्लोक ८.७

त्रिविधं केचिदिच्छन्ति तथा च नवधा परे ।

मृदुमध्याधिमात्रत्वादेकैकं त्रिविधं भवेत् ॥ ८.७ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८९

कुछ (आचार्य) इसे तीन प्रकारका मानते हैं और दूसरे नौ प्रकारका; मृदु, मध्य और अधिमात्र होनेसे एक-एक (प्रकार) तीन प्रकारका होता है।

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के लिए प्रयुक्त होने वाले मन्त्र-समुच्चय और उसके तीन आवर्तनों (चक्रों) की अनिवार्यता को स्पष्ट किया था। अब इस श्लोक में वे प्राणायाम के भेदों की चर्चा कर रहे हैं, जहाँ वे संख्या और तीव्रता के आधार पर इसके विभिन्न आयामों को उद्घाटित करते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

केचित् (एतद्) त्रिविधं इच्छन्ति, तथा च परे नवधा (इच्छन्ति)। मृदु-मध्य-अधिमात्रत्वात् एकैकं त्रिविधं भवेत्।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. त्रिविधं : तीन प्रकार का। यहाँ 'त्रिविध' का संकेत उन तीन मुख्य अंगों (पूरक, कुम्भक, रेचक) की ओर है, जिन्हें आगे के श्लोकों में विस्तार से बताया गया है, अथवा तीन आवर्तनों की मूल इकाई की ओर है।

२. नवधा : नौ प्रकार का। यह संख्या ३×३ के गणितीय योग से उत्पन्न होती है, जहाँ मूल तीन प्रकारों के भीतर पुनः तीन-तीन तीव्रताएँ समाहित हैं।

३. मृदु : कोमल या मंद। वह अभ्यास जिसमें प्राण का संवेग न्यूनतम हो और सहजता अधिक हो।

४. मध्य : संतुलित। जहाँ प्राण का वेग और नियंत्रण दोनों समान रूप से स्थिर हों।

५. अधिमात्र : तीव्र या उच्च। वह अवस्था जहाँ प्राण का संवेग अधिक हो और निरोध की शक्ति गहन हो।

६. एकैकं त्रिविधं भवेत् : प्रत्येक एक (प्रकार) पुनः तीन प्रकार का हो जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को यह समझाता है कि योग की विधियाँ स्थिर होते हुए भी साधक की क्षमता और संवेग के अनुसार लचीली होती हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ दो मतों का उल्लेख कर रहे हैं—एक जो इसे त्रिविध मानते हैं और दूसरे जो इसे नवविध मानते हैं।

यहाँ 'त्रिविध' का अर्थ उस मूल संरचना से है जिसमें प्राण का ग्रहण, धारण और उत्सर्ग (पूरक, कुम्भक, रेचक) होता है। यह प्राणायाम का ढाँचा है। किन्तु जब इसी ढाँचे को अभ्यास की तीव्रता के साथ जोड़ा जाता है, तब 'नवविध' का विस्तार होता है।

रहस्य यह है कि प्रत्येक मूल अंग (जैसे कुम्भक) तीन स्तरों पर अनुभव किया जा सकता है: मृदु, मध्य और अधिमात्र। इस प्रकार ३ (मूल अंग) × ३ (तीव्रता के स्तर) = ९ प्रकार के प्राणायाम बनते हैं। यह भेद विधि का नहीं, अपितु 'मात्रा' और 'संवेग' का है। जो साधक अभी आरम्भिक अवस्था में है, वह 'मृदु' अभ्यास से प्राणों को संतुलित करता है; जो मध्यम भूमि पर है, वह 'मध्य' अभ्यास से स्थिरता प्राप्त करता है; और जो उच्च कोटि का योगी है, वह 'अधिमात्र' अभ्यास से प्राणों को पूर्णतः वश में कर अक्षर की ओर अग्रसर होता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

योगसूत्र

मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ १.२२ ॥

(तीव्र संवेगवालोंमें भी) मृदु, मध्य और अधिमात्र होनेसे और भी भेद होता है।

योगसूत्र १.२२पातञ्जल योगदर्शन — व्यासभाष्य (theVyasa) · पृष्ठ 22

पातञ्जल योगदर्शन में भी इसी सूक्ष्म भेद का उल्लेख मिलता है, जहाँ कहा गया है कि संवेग के आधार पर मृदु, मध्य और अधिमात्र होने से प्राणायाम में और भी विशेष भेद उत्पन्न होते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और योगसूत्र दोनों इस बात पर सहमत हैं कि प्राणायाम केवल एक यांत्रिक क्रिया नहीं है, बल्कि साधक के आंतरिक संवेग के अनुरूप उसकी तीव्रता को बदलना आवश्यक है। जहाँ सूत्रकार इसे संवेग के विशेष के रूप में देखते हैं, वहीं याज्ञवल्क्य इसे संख्यात्मक भेदों (३ और ९) के माध्यम से स्पष्ट कर रहे हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अति' और 'अल्प' के बीच संतुलन का पाठ है। योग में 'मात्रा' का अत्यंत महत्त्व है। यदि कोई साधक बिना तैयारी के सीधे 'अधिमात्र' (तीव्र) अभ्यास करता है, तो वह प्राणों को विचलित कर सकता है, जबकि केवल 'मृदु' अभ्यास से वह उच्च भूमियों तक नहीं पहुँच पाता।

अभ्यास की दृष्टि से साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि उसके भीतर प्राणों का प्रवाह कैसा है।

१. मृदु अभ्यास: यह मन को शांत करने और शरीर को तैयार करने के लिए है। यहाँ मन्त्रों का उच्चारण और प्राण का संचरण अत्यंत कोमल होता है।

२. मध्य अभ्यास: यह एकाग्रता और नाड़ियों की शुद्धि के लिए है। यहाँ मन्त्र और प्राण का सामंजस्य स्थिर होता है।

३. अधिमात्र अभ्यास: यह समाधि और अक्षर-साक्षात्कार के लिए है। यहाँ प्राण का निरोध इतना गहन होता है कि साधक बाहरी जगत से पूरी तरह कटकर अपने हृदय-सूर्य में प्रतिष्ठित हो जाता है।

इस प्रकार, ३×३ का यह गणित साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाली एक सोपान-श्रेणी है। साधक अपनी वर्तमान भूमि को पहचानकर, मृदु से मध्य और मध्य से अधिमात्र की ओर बढ़ता है, जिससे उसका प्राण संयम पूर्णता को प्राप्त करता है।

मनुप्रोक्तः प्राणायामः

श्लोक ८.८

ओंकारं व्याहृतीः सप्त गायत्री सशिरास्तथा ।

प्राणायामोऽयं मनुना वेदेषु कथितः पुरा ॥ ८.८ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८९

ओंकार, सात व्याहृतियाँ और शिरस् सहित गायत्री — यह प्राणायाम पूर्वकालमें मनुने वेदोंमें कहा था।

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के मन्त्र-विन्यास, उसके तीन आवर्तनों की अनिवार्यता और तीव्रता के आधार पर उसके त्रिविध एवं नवविध भेदों का विवेचन किया था। अब इस श्लोक में वे इस विशिष्ट मन्त्र-युक्त प्राणायाम की प्रमाणिकता सिद्ध करते हुए इसके प्राचीन स्रोत का उल्लेख कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

ओंकारः, सप्त व्याहृतयः, तथा सशिराः गायत्री (एषः) प्राणायामः मनुना पुरा वेदेषु कथितः।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. ओंकारः : प्रणव। वह अक्षर जो समस्त वेदों का सार है और प्राण का बीज है।

२. व्याहृतयः सप्त : सात व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्)। ये ब्रह्माण्ड के सात स्तरों और प्राण के सात आयामों के प्रतीक हैं।

३. सशिराः गायत्री : शिरस् (मन्त्र के शीर्ष भाग 'ओमापो ज्योतिः...') सहित गायत्री मन्त्र। 'शिरस्' का अर्थ है मन्त्र का वह उच्चतम बिंदु जो साधक को सीधे ज्योतिर्मय अवस्था से जोड़ता है।

४. मनुना : आदि-मनु द्वारा। यहाँ मनु केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु उस प्रथम मानव-ऋषि के प्रतीक हैं जिन्होंने वैदिक ज्ञान को व्यवस्थित कर मानव जाति के लिए सुलभ बनाया।

५. वेदेषु कथितः : वेदों में कहा गया। यह इस विधि की 'श्रुति-प्रामाणिकता' को दर्शाता है कि यह केवल किसी व्यक्ति की कल्पना नहीं, अपितु वैदिक ऋषियों का अनुभव है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम की उस विधि का उपसंहार करता है जिसे पिछले पाँच श्लोकों (८.३ से ८.७) में विस्तार से बताया गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि जब हम 'प्राणायाम' शब्द का प्रयोग करते हैं, तो उसका अर्थ केवल श्वास को रोकना (कुम्भक) नहीं है, अपितु एक पूर्ण आध्यात्मिक क्रिया है जिसमें ध्वनि, प्राण और चेतना का समन्वय होता है।

इस विधि में सबसे पहले 'ओंकार' का आवाहन है, जो शून्य से सृजन की ओर ले जाता है। तत्पश्चात 'सप्त व्याहृतियाँ' आती हैं, जो साधक के चित्त को स्थूल पृथ्वी (भूः) से उठाकर परम सत्य (सत्यम्) तक ले जाती हैं। इसके बाद 'शिरस्' सहित गायत्री का जप प्राण को उस सूर्य-ज्योति में विलीन कर देता है। जब यह संपूर्ण प्रक्रिया तीन बार दोहराई जाती है, तब वह 'प्राणायाम' कहलाती है।

याज्ञवल्क्य जी यह कहकर कि "यह मनु ने वेदों में कहा था", साधक को विश्वास दिला रहे हैं कि यह विधि शास्त्र-सम्मत है। बाहरी दृष्टि से यह मन्त्रों का पाठ और श्वास का नियंत्रण है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह 'शब्द-ब्रह्म' के माध्यम से 'प्राण-ब्रह्म' को साधने की प्रक्रिया है। यहाँ मन्त्र केवल शब्द नहीं, बल्कि प्राण के वेग को दिशा देने वाले यंत्र हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः । व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः ॥ ६.७० ॥

ब्राह्मणके विधिपूर्वक किये, व्याहृति और प्रणवसे युक्त तीन प्राणायाम भी परम तप जानने चाहिए।

मनुस्मृति ६.७०मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 341

मनुस्मृति में कहा गया है कि ब्राह्मण द्वारा विधिपूर्वक किए गए, व्याहृति और प्रणव से युक्त तीन प्राणायाम 'परम तप' हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी विचार का विस्तार करती है। जहाँ मनुस्मृति इसे 'परम तप' कहकर इसकी महिमा बताती है, वहीं यह स्मृति उसकी विस्तृत विधि (शिरस् और सप्त व्याहृतियों का क्रम) बताकर उसे साधना के योग्य बनाती है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि बिना प्रणव और व्याहृति के किया गया श्वास-निरोध केवल शारीरिक व्यायाम है, आध्यात्मिक प्राणायाम नहीं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ध्वनि-योग' और 'प्राण-योग' के मिलन का सूत्र है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक केवल श्वास को न रोके, बल्कि प्रत्येक व्याहृति और गायत्री के पद के साथ अपने प्राण को एक विशेष स्तर पर स्थिर करे।

जब साधक 'भूः' कहता है, तो प्राण का अनुभव पृथ्वी-तत्त्व में होता है; जब 'सत्यम्' तक पहुँचता है, तो प्राण सूक्ष्मतम होकर अक्षर में स्थित होने लगता है। 'शिरस्' (ओमापो ज्योतिः...) का प्रयोग साधक को उस ज्योतिर्मय अवस्था में ले जाता है जहाँ वह स्वयं को प्रकाश-पुंज के रूप में अनुभव करता है। इस अभ्यास से साधक 'स्थूल प्राण' से 'सूक्ष्म प्राण' और अंततः 'अक्षर' की भूमि की ओर अग्रसर होता है। यह प्रक्रिया चित्त की चंचलता को समाप्त कर उसे एक-निष्ठा (एकग्रता) की ओर ले जाती है, जिससे वह आगामी अध्याय के 'ध्यान' के लिए पूर्णतः तैयार हो जाता है।

श्लोक ८.९

पूरकः कुम्भकश्चैव रेचकस्तदनन्तरम् ।

प्राणायामस्त्रिधा ज्ञेयः कनीयोमध्यमोत्तमः ॥ ८.९ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८९

पूरक, कुम्भक और उसके बाद रेचक, इस प्रकार प्राणायाम तीन प्रकार का जानना चाहिए— कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम।

अवतरणिका —

पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के मन्त्र-विन्यास और उसकी वैदिक प्रामाणिकता का वर्णन किया था। अब वे प्राणायाम के बाह्य स्वरूप (मन्त्र-जप) से आगे बढ़कर उसकी आंतरिक क्रिया-विधि और समय-मापन के भेदों का विवेचन आरम्भ कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

पूरकः कुम्भकश्चैव रेचकस्तदनन्तरम् (इति) प्राणायामः त्रिधा ज्ञेयः (तथा) कनीयः मध्यमः उत्तमः (च)।

पदार्थ-निरुक्ति:

१. पूरकः : श्वास का भीतर खींचना। यह केवल वायु का भरण नहीं, अपितु प्राण-शक्ति का संग्रहण है।

२. कुम्भकः : भीतर खींची हुई वायु को रोकना। यह वह अवस्था है जहाँ प्राण स्थिर होकर चेतना को एकाग्र करता है।

३. रेचकः : वायु का बाहर निकलना। यह शरीर और मन के मल एवं अशुद्धियों के निष्कासन की प्रक्रिया है।

४. त्रिधा ज्ञेयः : तीन प्रकार से जानना चाहिए। यहाँ 'त्रिधा' शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त है— प्रथम, क्रिया के तीन चरण (पूरक, कुम्भक, रेचक) और द्वितीय, अभ्यास की तीन श्रेणियाँ (कनिष्ठ, मध्यम, उत्तम)।

५. कनीयः, मध्यमः, उत्तमः : समय (मात्रा) के आधार पर प्राणायाम के तीन स्तर। कनीय (न्यूनतम), मध्यम (औसत) और उत्तम (उच्चतम)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम की क्रियात्मक परिभाषा प्रस्तुत करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि प्राणायाम केवल मन्त्रों का पाठ नहीं है, अपितु श्वास की गति का एक निश्चित अनुशासन है।

प्राणायाम की पूर्णता तीन अंगों में है: प्रथम 'पूरक', जिसमें साधक सचेत होकर प्राण को भीतर खींचता है; द्वितीय 'कुम्भक', जिसमें उस प्राण को एक निश्चित अवधि तक रोककर रखा जाता है; और तृतीय 'रेचक', जिसमें उस प्राण को धीरे-धीरे बाहर छोड़ा जाता है। इन तीनों का यह क्रम ही एक 'प्राणायाम' कहलाता है। वाक्य की संरचना देखें तो "पूरकः कुम्भकश्चैव रेचकस्तदनन्तरम्" यह पूरा समूह "प्राणायामः त्रिधा ज्ञेयः" के लिए विशेषण का कार्य कर रहा है। अर्थात्, इन तीन क्रियाओं के योग से ही प्राणायाम का स्वरूप निर्मित होता है।

इसके साथ ही, ऋषि साधक की क्षमता और उसकी आध्यात्मिक भूमि के अनुसार इस अभ्यास को तीन श्रेणियों में विभाजित करते हैं— कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम। यह विभाजन किसी श्रेष्ठता या हीनता का नहीं, अपितु 'मात्रा' (समय) का है। जिस प्रकार एक नौसिखिया साधक कम समय तक श्वास रोक सकता है और एक सिद्ध योगी अधिक समय तक, उसी प्रकार इस अभ्यास को तीन स्तरों पर बांटा गया है। यह निर्देश साधक को अपनी सीमा से बाहर जाकर शरीर को कष्ट देने से बचाने के लिए है, क्योंकि योग में अति-प्रयास के स्थान पर सहज प्रगति का महत्व है।

शास्त्र-साक्ष्य —

प्राणायाम की इस क्रियात्मक प्रक्रिया— प्राण और अपान की गति को रोकने की विधि— का समर्थन अन्य शास्त्रों में भी मिलता है।

भगवद्गीता

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ ४.२९ ॥

कुछ अपानमें प्राणका और प्राणमें अपानका हवन करते हैं; प्राण-अपानकी गति रोककर (वे) प्राणायाममें तत्पर रहते हैं।

भगवद्गीता ४.२९गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 133

यहाँ भगवान श्रीकृष्ण योगियों की विभिन्न पद्धतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि कुछ साधक प्राण को अपान में और अपान को प्राण में हवन करते हैं, तथा प्राण-अपान की गति को रोककर प्राणायाम में तत्पर रहते हैं।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता का यहाँ पूर्ण मेल है। जहाँ गीता 'प्राणापानगती रुद्ध्वा' (गति को रोकने) के सामान्य सिद्धांत की बात करती है, वहीं यह स्मृति उस रोध (कुम्भक) को पूरक और रेचक के साथ जोड़कर एक व्यवस्थित विधि (कनिष्ठ, मध्यम, उत्तम) के रूप में प्रस्तुत करती है। स्मृति यहाँ क्रिया को अधिक सूक्ष्म और मापन योग्य बनाती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर जाने का मार्ग है।

१. पूरक का अभ्यास करते समय साधक केवल वायु नहीं भरता, बल्कि वह बाहरी जगत से अपनी ऊर्जा को समेटकर भीतर की ओर लाता है। यह 'प्रत्याहार' की प्रथम सीढ़ी है।

२. कुम्भक वह बिंदु है जहाँ श्वास रुकती है और मन की चंचलता ठहरती है। जब श्वास स्थिर होती है, तब हृदय में स्थित 'सूर्य' (आंतरिक ज्योति) का अनुभव सुगम हो जाता है। कुम्भक ही वह अवस्था है जहाँ साधक मन्त्र के प्रभाव को अपने भीतर आत्मसात करता है।

३. रेचक के समय साधक अपने अहंकार और मानसिक बोझ को बाहर निकालता है, जिससे वह अगले चक्र के लिए पुनः शुद्ध और रिक्त हो जाता है।

कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम श्रेणियों का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि उसकी प्राण-शक्ति का विस्तार कैसे हो रहा है। कनिष्ठ भूमि पर साधक केवल शारीरिक नियंत्रण सीखता है, मध्यम भूमि पर वह प्राण और मन के सम्बन्ध को समझता है, और उत्तम भूमि पर वह प्राण को 'अक्षर' (अविनाशी) में विलीन करने की क्षमता प्राप्त करता है। साधक को निर्देश है कि वह अपनी वर्तमान क्षमता को पहचानकर ही मात्रा का चयन करे, ताकि प्राण का प्रवाह संतुलित रहे।

श्लोक ८.१०

पूरकः कुम्भको रेच्यः प्राणायामस्त्रिलक्षणः ।

(कन्यसमध्यममुख्या इति त्रयं प्रोच्यते तज्ज्ञैः) ॥ ८.१० ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८९

पूरक, कुम्भक और रेचक, इस प्रकार त्रिलक्षण वाला प्राणायाम... कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम—यह तीन (प्रकार) विद्वानों द्वारा कहे जाते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के तीन स्तरों—कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम—का संकेत दिया था। अब इस श्लोक में वे प्राणायाम के अनिवार्य लक्षणों और उसकी श्रेणियों का पुनरुच्चारण कर रहे हैं, ताकि साधक क्रिया और श्रेणी के भेद को स्पष्ट रूप से समझ सके।

अन्वय और पदार्थ —

पूरकः कुम्भकः रेच्यः (इति) प्राणायामः त्रिलक्षणः । (कन्यसमध्यममुख्या इति त्रयं प्रोच्यते तज्ज्ञैः) ।

पदार्थ:

• पूरकः: श्वास का भीतर खींचना, जिससे प्राण का पूरण हो।

• कुम्भकः: वायु को भीतर रोककर रखना, जैसे कुम्भ (घड़े) में जल स्थिर रहता है।

• रेच्यः (रेचकः): वायु का बाहर निकलना, जिससे शरीर और मन का शोधन हो।

• त्रिलक्षणः: इन तीन क्रियाओं के समुच्चय से पहचाना जाने वाला।

• कन्य (कनिष्ठ), मध्यमो, मुख्य (उत्तम): मात्राओं की संख्या के आधार पर साधक की योग्यता के तीन स्तर।

• तज्ज्ञैः: उन योगियों या ऋषियों द्वारा जो प्राण और मन्त्र के सम्बन्ध को जानते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य योगीश्वर प्राणायाम की परिभाषा को उसके 'लक्षणों' के माध्यम से सिद्ध कर रहे हैं। यहाँ 'त्रिलक्षण' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि यदि इन तीनों में से एक भी क्रिया लुप्त हो जाए, तो वह क्रिया 'प्राणायाम' नहीं कहलाएगी। केवल श्वास लेना और छोड़ना (पूरक और रेचक) स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया है, किन्तु जब इसमें 'कुम्भक' (निरोध) जुड़ जाता है, तब वह योग बन जाता है।

बाहरी विधि यह है कि साधक पहले पूरक द्वारा वायु ग्रहण करे, फिर कुम्भक द्वारा उसे स्थिर करे और अंत में रेचक द्वारा उसे बाहर निकाले। परन्तु इसका आन्तर अर्थ प्राण और चेतना का सम्बन्ध है। पूरक का अर्थ है—बाहरी जगत से प्राण-शक्ति को समेटकर भीतर लाना; कुम्भक का अर्थ है—उस शक्ति को हृदय और मन के केंद्र में स्थिर कर उसे 'अक्षर' या 'ब्रह्म' के साथ एकाकार करना; और रेचक का अर्थ है—चित्त की समस्त अशुद्धियों और मानसिक क्लेशों को बाहर निकाल देना।

श्लोक का दूसरा भाग (जो कोष्ठक में है और सम्भवतः वैकल्पिक पाठ है), पुनः उन तीन श्रेणियों की पुष्टि करता है जिन्हें 'तज्ज्ञ' यानी प्राण-विद्या के विशेषज्ञों ने स्वीकार किया है। कनिष्ठ, मध्यम और मुख्य (उत्तम) का विभाजन साधक की शारीरिक क्षमता और उसकी मानसिक एकाग्रता के अनुसार किया गया है। यह विभाजन इसलिए है क्योंकि प्राण का अति-निरोध यदि बिना तैयारी के किया जाए, तो वह शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। अतः साधक को कनिष्ठ से आरम्भ कर धीरे-धीरे मुख्य (उत्तम) की ओर बढ़ना चाहिए।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थिरता' का अभ्यास है। पूरक और रेचक गमन और अगमन (गति) हैं, जबकि कुम्भक 'ठहराव' है। योग का लक्ष्य गति से ठहरने की ओर जाना है। जब साधक कुम्भक का अभ्यास करता है, तो वह क्षण भर के लिए काल (समय) के प्रवाह से ऊपर उठ जाता है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब पूरक करता है, तो वह अपनी चेतना को ऊपर की ओर ले जाता है; कुम्भक में वह उस चेतना को केंद्र में जमाता है, और रेचक में वह स्वयं को शून्य करता है। इस प्रकार, पूरक-कुम्भक-रेचक का एक चक्र साधक को 'सगुण' (साँस की गति) से 'निर्गुण' (कुम्भक की स्थिरता) की भूमि पर ले जाता है। यह अभ्यास केवल वायु का खेल नहीं, बल्कि प्राण के माध्यम से मन को वश में करने की प्रक्रिया है।

श्लोक ८.११

(द्वादशमात्रः प्रथमो मध्यम उक्तस्तथा तद्द्विगुणः ।

)

(उत्तम उक्तस्त्रिगुणः मात्राभेदाः प्रकीर्तितास्तज्ज्ञैः) ॥ ८.११ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ८९

पहला (कनिष्ठ) बारह मात्राओंका, मध्यम उसका दुगुना (चौबीस मात्राओंका) कहा गया है, और उत्तम तिगुना (छत्तीस मात्राओंका) — जानकारोंने मात्राओंके (ये) भेद कहे हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के तीन स्तरों—कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम—का उल्लेख किया था। अब इस श्लोक में वे इन श्रेणियों के निर्धारण का आधार, अर्थात् 'मात्राओं' की निश्चित संख्या स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

द्वादशमात्रः प्रथमो (कन्यः), मध्यमः तद्द्विगुणः उक्तः तथा, उत्तमः त्रिगुणः उक्तः । मात्राभेदाः तज्ज्ञैः प्रकीर्तिताः ।

पदार्थ:

• द्वादशमात्रः: बारह मात्राओं वाला।

• प्रथमो: यहाँ प्रथम का अर्थ 'कनिष्ठ' (शुरुआती या न्यूनतम) स्तर से है।

• तद्द्विगुणः: उस (बारह) का दुगुना, अर्थात् चौबीस मात्राएँ।

• त्रिगुणः: उस (बारह) का तिगुना, अर्थात् छत्तीस मात्राएँ।

• मात्राभेदाः: समय की इकाई 'मात्रा' के आधार पर किए गए भेद।

• तज्ज्ञैः: उन प्राण-विद्या के विशेषज्ञों या ऋषियों द्वारा।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्राणायाम के अभ्यास की समय-सीमा निर्धारित कर रहे हैं। योग में केवल क्रिया का होना पर्याप्त नहीं है, अपितु उस क्रिया की अवधि का अनुशासन ही साधक को एक भूमि से दूसरी भूमि पर ले जाता है। यहाँ 'मात्रा' समय की वह सूक्ष्म इकाई है, जिसके आधार पर श्वास के ठहराव को मापा जाता है।

ऋषि स्पष्ट करते हैं कि प्राणायाम के तीन स्तर हैं:

१. कनिष्ठ (प्रथमो): यह अभ्यास का आरम्भिक स्तर है, जिसमें बारह मात्राओं का विधान है। यह उन साधकों के लिए है जो अभी प्राण के निरोध के अभ्यस्त नहीं हुए हैं।

२. मध्यम: यह स्तर कनिष्ठ का दुगुना है, अर्थात् चौबीस मात्राओं का। जब साधक का शरीर और मन स्थिर होने लगता है, तब वह इस मध्य स्तर पर आता है।

३. उत्तम: यह उच्चतम स्तर है, जो कनिष्ठ का तिगुना है, अर्थात् छत्तीस मात्राओं का। यह उस सिद्ध साधक की अवस्था है जिसका प्राण पूरी तरह वश में है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि याज्ञवल्क्य ने इन संख्याओं को एक निश्चित क्रम में रखा है। यह केवल गणितीय गणना नहीं है, बल्कि प्राणिक क्षमता के विस्तार का मार्ग है। बाहरी दृष्टि से यह श्वास रोकने की अवधि है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह 'चित्त की स्थिरता' की अवधि है। जैसे-जैसे मात्राएँ बढ़ती हैं, साधक का मन बाहरी जगत से हटकर भीतर की ओर अधिक गहराई से उतरता है। मात्राओं का यह भेद साधक को अपनी वर्तमान क्षमता पहचानने और धीरे-धीरे उसे बढ़ाने का वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'धैर्य' और 'क्रमिकता' का अभ्यास है। योग में अति-उत्साह में आकर सीधे 'उत्तम' (छत्तीस मात्रा) का प्रयास करना शरीर और प्राण के लिए हानिकारक हो सकता है। साधक पहले बारह मात्राओं के कनिष्ठ अभ्यास से अपने प्राणों को अनुशासित करता है।

जब वह बारह मात्राओं में सहज हो जाता है, तब वह चौबीस मात्राओं के मध्यम स्तर पर जाता है, जहाँ प्राण का प्रभाव अधिक गहरा होता है और मन की चंचलता कम होने लगती है। अंततः छत्तीस मात्राओं के उत्तम अभ्यास में वह उस स्थिति को प्राप्त करता है जहाँ श्वास अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है और चेतना का विस्तार होने लगता है। इस प्रकार, मात्राओं का यह आरोहण वास्तव में स्थूल प्राण से सूक्ष्म प्राण की ओर जाने की यात्रा है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि समय का विस्तार उसके भीतर की शांति का विस्तार है।

प्राणायाममात्रास्वरूपम्

श्लोक ८.१२

अङ्गुलिमोक्षत्रितयं जान्वोः परिमार्जनमथापि ।

तत् कालत्रयमपि तज्ज्ञा मात्रासंज्ञां प्रशंसन्ति ॥ ८.१२ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९०

तीन बार चुटकी बजाना, अथवा घुटनोंपर (हाथ) फेरना — उतने समयको जानकार 'मात्रा' नाम देते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के तीन स्तरों—कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम—का उल्लेख करते हुए उनकी मात्रा-संख्या (१२, २४, ३६) बताई थी। अब इस श्लोक में वे उस 'मात्रा' की व्यावहारिक परिभाषा दे रहे हैं कि समय की इस सूक्ष्म इकाई को साधक वास्तव में कैसे मापे।

अन्वय और पदार्थ —

अङ्गुलिमोक्षत्रितयं (वा) जान्वोः परिमार्जनम्, अथापि तत् कालत्रयमपि तज्ज्ञा मात्रासंज्ञां प्रशंसन्ति।

पदार्थ:

• अङ्गुलिमोक्षत्रितयं: अङ्गुलि (उँगली) द्वारा मोक्षण (छोड़ना या चटकाना) की तीन बार की क्रिया। अर्थात् तीन बार चुटकी बजाना।

• जान्वोः परिमार्जनम्: जानु (घुटने) पर हाथ फेरना या स्पर्श करना।

• कालत्रयमपि: इन क्रियाओं में व्यतीत होने वाला वह तीन-गुना समय।

• तज्ज्ञा: प्राण-विद्या के जानकारों या योग-विशेषज्ञों द्वारा।

• मात्रासंज्ञां प्रशंसन्ति: 'मात्रा' नाम से पुकारा जाता है या उसे मात्रा के रूप में स्वीकार किया जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक के सम्मुख एक अत्यंत व्यावहारिक समस्या का समाधान कर रहे हैं। जब साधक पूरक, कुम्भक या रेचक की अवस्था में होता है, तब वह घड़ी या बाहरी यंत्रों से समय नहीं माप सकता, क्योंकि ऐसा करने से उसका ध्यान भंग हो जाएगा और प्राण का निरोध टूट जाएगा। अतः यहाँ समय मापने के लिए शरीर के ही अंगों को आधार बनाया गया है।

ऋषि दो विधियाँ बताते हैं:

प्रथम विधि 'अङ्गुलिमोक्षण' है, जिसमें उँगलियों से तीन बार चुटकी बजाने में जितना समय लगता है, उसे एक 'मात्रा' माना गया है। द्वितीय विधि 'जान्वोः परिमार्जनम्' है, जिसमें घुटने पर हाथ फेरने की क्रिया का समय आधार है।

यहाँ 'कालत्रय' शब्द महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि एक मात्रा केवल एक झटके का नाम नहीं, बल्कि एक निश्चित लयबद्ध गति का नाम है। जब योगी अपनी उँगलियों या हाथ की गति को एक निश्चित लय में ले आता है, तब वह समय उसके लिए स्थिर हो जाता है। यह बाहरी समय नहीं, अपितु 'देह-काल' है।

विधिको यह है कि साधक अभ्यास के आरम्भ में इन शारीरिक संकेतों से अपनी मात्रा का निर्धारण करे, ताकि जब वह १२, २४ या ३६ मात्राओं के कुम्भक में प्रवेश करे, तो उसे अपनी प्रगति का सटीक ज्ञान रहे। यह स्थूल क्रिया वास्तव में साधक को समय के प्रति सजग करने का एक साधन है, ताकि वह धीरे-धीरे समय के बंधन से मुक्त होकर 'अकाल' (समयतीत) अवस्था की ओर बढ़ सके।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-वृत्ति' और 'प्राण-गति' के समन्वय का अभ्यास है। जब साधक अपनी उँगलियों की गति या घुटने के स्पर्श को मात्रा का आधार बनाता है, तो वह वास्तव में अपने मन को एक सूक्ष्म लय में बाँध रहा होता है।

साधक के लिए इसका अभ्यास इस प्रकार है:

१. वह पहले अपनी स्वाभाविक गति से तीन बार चुटकी बजाए या घुटने पर हाथ फेरे और उस समय को अनुभव करे।

२. फिर उसी लय को अपने श्वास के ठहराव (कुम्भक) के साथ जोड़े।

३. जैसे-जैसे अभ्यास गहरा होता है, उँगलियों की यह बाहरी गति आंतरिक स्पंदन में बदल जाती है।

यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' (शारीरिक क्रिया) से 'सूक्ष्म' (समय का अनुभव) की ओर ले जाता है। जब साधक मात्राओं की गिनती में निपुण हो जाता है, तब वह केवल संकल्प मात्र से समय को नियंत्रित करने की क्षमता प्राप्त करता है। इस श्लोक का गुप्त रहस्य यह है कि प्राण का निरोध केवल वायु को रोकना नहीं है, बल्कि समय के प्रवाह को अपनी चेतना में स्थिर करना है।

श्लोक ८.१३

गोदोहमन्नपाको वा इषुक्षेपो ह्यथापि वा ।

घण्टायाः स्तनितं वाऽपि ह्यतिमात्रा उदाहृताः ॥ ८.१३ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९०

गाय दुहने, अन्न पकने, बाण फेंकने अथवा घण्टेकी गूँजके (समय जितनी) — ये अतिमात्राएँ कही गयी हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'मात्रा' को मापने की शारीरिक विधियाँ (चुटकी बजाना और घुटने पर हाथ फेरना) बताई थीं। अब इस श्लोक में वे उन समय-सीमाओं का उल्लेख कर रहे हैं जो सामान्य मात्रा से अधिक हैं और जिन्हें 'अतिमात्रा' की श्रेणी में रखा गया है।

अन्वय और पदार्थ —

गोदोहनम्, अन्नपाकः वा, इषुक्षेपो ह्यथापि वा, घण्टायाः स्तनितं वाऽपि — ह्यतिमात्रा उदाहृताः।

पदार्थ:

• गोदोहनम्: गाय का दूध दुहने की क्रिया।

• अन्नपाकः: अन्न के पकने की प्रक्रिया।

• इषुक्षेपो: धनुष से बाण के छूटने और लक्ष्य तक पहुँचने का समय।

• घण्टायाः स्तनितम्: घण्टे के बजने के बाद उसकी गूँज (ध्वनि) के ठहरने तक का समय।

• अतिमात्रा: सामान्य मात्रा (१२, २४, ३६) से अधिक समय।

• उदाहृताः: यहाँ उदाहरण स्वरूप कहे गए हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'अतिमात्रा' के स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं। प्राणायाम में जब साधक कनिष्ठ, मध्यम या उत्तम मात्राओं का अभ्यास कर लेता है, तब वह स्वाभाविक रूप से समय को और अधिक बढ़ाने का प्रयास करता है। किंतु, समय का यह विस्तार अनियंत्रित नहीं होना चाहिए। इसलिए ऋषि यहाँ कुछ व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से यह संकेत दे रहे हैं कि 'अतिमात्रा' का समय कितना हो सकता है।

यहाँ चार क्रियाओं का उल्लेख है:

१. गोदोहनम्: गाय दुहने में लगने वाला समय। संभवतः यहाँ एक निश्चित लघु अवधि के दुहने की क्रिया का संकेत है।

२. अन्नपाकः: अन्न पकने का समय। यहाँ 'पाक' का अर्थ पूर्ण भोजन बनने से नहीं, अपितु किसी विशेष सूक्ष्म परिवर्तन या उबाल आने के समय से हो सकता है।

३. इषुक्षेपो: बाण के छूटने से लेकर उसके गंतव्य तक पहुँचने के बीच का वह क्षणिक अंतराल।

४. घण्टायाः स्तनितम्: घण्टे की वह गूँज जो प्रहार के बाद धीरे-धीरे शांत होती है।

इन चारों उदाहरणों की विशेषता यह है कि ये सभी 'प्रवाह' और 'अवधि' के उदाहरण हैं। ये स्थिर बिंदु नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया हैं। ऋषि यह समझाना चाहते हैं कि जब कुम्भक या निरोध का समय इन प्राकृतिक क्रियाओं के समय के समान विस्तृत हो जाता है, तब उसे 'अतिमात्रा' कहा जाता है।

यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि ये उदाहरण किसी गणितीय सूत्र के लिए नहीं, बल्कि साधक की सहज अनुभूति के लिए दिए गए हैं। बाण का वेग या घण्टे की गूँज—ये दोनों ही उस सूक्ष्म समय को दर्शाते हैं जहाँ स्थूल समय समाप्त होता है और मानसिक समय आरम्भ होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'सावधानी' का संकेत है। योग में 'अति' का अर्थ सदैव संतुलन का बिगड़ना होता है। जब साधक अपनी क्षमता से अधिक समय तक प्राण को रोके रखता है (कुम्भक करता है), तो वह 'अतिमात्रा' की स्थिति में प्रवेश करता है।

यह श्लोक साधक को यह अनुभव कराता है कि प्राण का निरोध केवल संख्या (१२, २४, ३६) का खेल नहीं है, बल्कि वह एक लय है। जैसे घण्टे की गूँज धीरे-धीरे शून्य में विलीन होती है, वैसे ही प्राणायाम का उद्देश्य भी प्राणों को शून्य या अक्षर में विलीन करना है। यदि साधक बिना तैयारी के अतिमात्रा का प्रयास करता है, तो वह शरीर और मन पर दबाव डालता है। इसीलिए अगले श्लोक में ऋषि इसके दुष्प्रभावों (स्वेद और कम्प) का वर्णन करेंगे। साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह अपनी स्वाभाविक लय को पहचाने और अतिमात्रा की ओर केवल तब बढ़े जब उसका शरीर और प्राण पूरी तरह लचीले और शुद्ध हो चुके हों।

अतिमात्रप्राणायामस्वरूपम्

श्लोक ८.१४

देशकालानुसारेण सेव्यमानः शनैर्यदा ।

स्वेदकम्पादि जनयेदतिमात्रस्तदा भवेत् ॥ ८.१४ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९०

देश और कालके अनुसार धीरे-धीरे अभ्यास किया जाता (प्राणायाम) जब पसीना, कम्पन आदि उत्पन्न करे, तब (वह) अतिमात्र होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'अतिमात्रा' के समय को मापने के लिए व्यावहारिक उदाहरण (जैसे गाय दुहना या बाण छोड़ना) दिए थे। अब इस श्लोक में वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि अतिमात्रा का प्रयोग कब और किस सीमा तक करना चाहिए, तथा शरीर द्वारा दी जाने वाली चेतावनी के लक्षणों को कैसे पहचानें।

अन्वय और पदार्थ —

देशकालानुसारेण शनैः यदा सेव्यमानः (प्राणायामः), तदा स्वेदकम्पादि जनयेत्, (तदा सः) अतिमात्रः भवेत्।

पदार्थ:

• देशकालानुसारेण: देश (स्थान की वायु, जलवायु) और काल (ऋतु, समय) के अनुकूल।

• शनैः: धीरे-धीरे, क्रमिक रूप से।

• सेव्यमानः: अभ्यास में लाया गया या किया गया।

• स्वेदकम्पादि: पसीना (स्वेद), कम्पन (कम्प) आदि शारीरिक प्रतिक्रियाएँ।

• जनयेत्: उत्पन्न करे।

• अतिमात्रः: सामान्य मात्राओं की सीमा से अधिक या शरीर की क्षमता से परे।

• भवेत्: हो जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य प्राणायाम के अभ्यास में 'सावधानी' और 'सीमा' का निर्धारण कर रहे हैं। प्राणायाम केवल श्वास को रोकने की क्रिया नहीं है, अपितु यह शरीर और प्राण के बीच का एक सूक्ष्म संतुलन है।

ऋषि कहते हैं कि प्राणायाम का अभ्यास 'देशकालानुसारेण' होना चाहिए। इसका अर्थ है कि साधक को अपने परिवेश की वायु की शुद्धता, आर्द्रता और ऋतु के प्रभाव को देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, अत्यधिक शीतकाल में या अत्यंत आर्द्र वातावरण में प्राणों का निरोध (कुम्भक) भिन्न प्रभाव डालता है, तुलनात्मक रूप से वसंत या शरद ऋतु में। जो अभ्यास एक स्थान पर सहज है, वह दूसरे स्थान पर कठिन हो सकता है। अतः अभ्यास 'शनैः' अर्थात् धीरे-धीरे और क्रमिक रूप से बढ़ाया जाना चाहिए।

जब साधक अपनी क्षमता से अधिक समय तक प्राणों को रोकने का प्रयास करता है, तब शरीर अपनी सीमा की सूचना देता है। यदि अभ्यास के दौरान शरीर में 'स्वेद' (पसीना) आने लगे या अंगों में 'कम्प' (काँपना) उत्पन्न हो, तो यह इस बात का संकेत है कि अब यह प्राणायाम 'अतिमात्र' हो गया है। यहाँ 'अतिमात्र' का अर्थ केवल समय की अधिकता नहीं, अपितु 'अति' यानी सीमा का उल्लंघन है। जब प्राणों का दबाव शरीर की सहनशक्ति से अधिक हो जाता है, तब स्नायु और मांसपेषियाँ प्रतिक्रिया करती हैं।

यह श्लोक साधक को सचेत करता है कि शरीर में होने वाले ये लक्षण कोई आध्यात्मिक सिद्धि या उपलब्धि नहीं हैं, बल्कि ये शरीर द्वारा दी गई चेतावनी हैं कि साधक ने अपनी वर्तमान क्षमता से अधिक प्रयास कर लिया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

योगसूत्र

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥ २.५० ॥

(वह) बाह्य, आभ्यन्तर और स्तम्भ वृत्तिवाला, देश, काल और संख्यासे परखा हुआ, दीर्घ और सूक्ष्म होता है।

योगसूत्र २.५०पातञ्जल योगदर्शन — व्यासभाष्य (theVyasa) · पृष्ठ 101

पातञ्जल योगदर्शन में प्राणायाम के स्वरूप को समझाते हुए कहा गया है कि वह 'देश, काल और संख्या' से परिदृष्ट (परखा हुआ) होना चाहिए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात की पुष्टि करती है कि यदि देश और काल की उपेक्षा कर केवल संख्या (मात्राओं) को बढ़ाने पर जोर दिया जाए, तो वह शरीर के लिए कष्टकारी हो सकता है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि प्राणायाम एक यांत्रिक क्रिया नहीं, बल्कि एक सजग और परिष्कृत प्रक्रिया है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अति' और 'संयम' के बीच के भेद को समझाता है। योग का अर्थ है संतुलन। जब साधक पूरक, कुम्भक और रेचक का अभ्यास करता है, तो उसका लक्ष्य प्राणों को स्थिर करना होता है, न कि शरीर को तनाव में डालना।

स्वेद और कम्प का आना इस बात का प्रमाण है कि साधक का मन अभी शरीर की सूक्ष्म सीमाओं को नहीं पढ़ पा रहा है और वह केवल 'मात्राओं' की संख्या बढ़ाने के अहंकार या वेग में है। योगिक अभ्यास में जब तक शरीर पूरी तरह शिथिल और प्राण सहज न हों, तब तक कुम्भक का विस्तार नहीं करना चाहिए।

साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह अपने शरीर के प्रति सजग रहे। यदि पसीना या कम्पन महसूस हो, तो वह तुरंत अपनी मात्रा को घटाकर पुनः 'मध्यम' या 'कनिष्ठ' स्तर पर आए और धीरे-धीरे पुनः आगे बढ़े। यह श्लोक साधक को 'बलपूर्वक' अभ्यास से हटाकर 'सहज' अभ्यास की ओर ले जाता है, जिससे वह सुरक्षित रूप से एक भूमि से दूसरी भूमि (स्थूल से सूक्ष्म) की ओर अग्रसर हो सके।

प्राणविरोधकाले मात्रागणनप्रकारः

श्लोक ८.१५

निरोधकाले प्राणस्य मात्राः संकल्पयेत् कथम् ।

तस्मात् स्मृतिप्रतिष्ठं तत् कल्पयित्वा तु योगिभिः ॥ ८.१५ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९०

प्राणके निरोधके समय (साधक) मात्राओंका संकल्प (गिनती) कैसे करे? इसलिए योगियोंने स्मृति (मनमें गिनती) पर आधारित वह (विधि) कल्पित की है —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अतिमात्रा के लक्षणों—पसीना और कम्पन—का वर्णन कर साधक को शरीर की सीमाओं के प्रति सचेत किया था। अब इस श्लोक में वे एक व्यावहारिक समस्या का समाधान कर रहे हैं कि जब प्राणों का निरोध (कुम्भक) हो, तब समय की गणना कैसे की जाए।

अन्वय और पदार्थ —

निरोधकाले प्राणस्य मात्राः कथम् संकल्पयेत्? तस्मात् योगिभिः स्मृतिप्रतिष्ठं तत् कल्पयित्वा तु (अस्ति)।

पदार्थ:

• निरोधकाले: प्राणों को रोकने के समय (कुम्भक की अवस्था में)।

• प्राणस्य मात्राः: प्राणों के समय की इकाइयाँ (१२, २४, ३६ मात्राएँ)।

• संकल्पयेत्: संकल्प करे या गणना (गिनती) करे।

• कथम्: कैसे? (यह एक प्रश्न है)।

• तस्मात्: इसलिए।

• स्मृतिप्रतिष्ठं: स्मृति पर आधारित, अर्थात् मन के भीतर चलने वाली मानसिक गिनती।

• कल्पयित्वा: कल्पित किया या विधि निर्धारित की।

• योगिभिः: योगियों द्वारा।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक की एक सूक्ष्म दुविधा का निवारण कर रहे हैं। पिछले श्लोकों (८.१२-८.१३) में मात्राओं को मापने के लिए बाहरी साधनों का उल्लेख था, जैसे चुटकी बजाना, घुटनों पर हाथ फेरना या घण्टे की ध्वनि। किंतु जब साधक गहरे निरोध (कुम्भक) में प्रवेश करता है, तब बाहरी क्रियाएँ करना न केवल कठिन होता है, बल्कि वे प्राणों के प्रवाह में व्यवधान भी उत्पन्न करती हैं। बाहरी हलचल से मन विचलित हो सकता है, जिससे निरोध की स्थिरता भंग हो जाती है।

अतः ऋषि प्रश्न करते हैं—'निरोधकाले प्राणस्य मात्राः संकल्पयेत् कथम्?' अर्थात् जब प्राण स्थिर हों, तब मात्राओं की गिनती कैसे की जाए?

इस प्रश्न का समाधान देते हुए वे कहते हैं कि योगियों ने 'स्मृतिप्रतिष्ठं' विधि कल्पित की है। यहाँ 'स्मृति' का अर्थ केवल याददाश्त नहीं, अपितु मन की वह सजगता है जो समय के प्रवाह के प्रति जागरूक रहती है। जब साधक बाहरी उपकरणों को त्यागकर अपनी आंतरिक चेतना (स्मृति) में ही गिनती करता है, तो वह बाहरी जगत से कटकर अंतर्मुखी हो जाता है। यह मानसिक गणना वास्तव में एक प्रकार का 'संकेत-जप' या 'मानसिक स्पंदन' है, जो साधक को यह बोध कराता रहता है कि उसने कितनी मात्राओं तक प्राणों को धारण किया है।

यह विधि इसलिए आवश्यक है क्योंकि निरोध के समय यदि साधक गिनती भूल जाए, तो वह या तो समय से पूर्व प्राण छोड़ देगा या फिर अतिमात्रा के कारण शरीर को कष्ट पहुँचाएगा। स्मृति पर आधारित यह गणना साधक को अनुशासन में रखती है और उसे बाहरी शोर से मुक्त कर आंतरिक मौन की ओर ले जाती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर गमन का सूत्र है। बाहरी उपकरणों (चुटकी, घुटने) द्वारा गिनती करना 'स्थूल' अभ्यास है, जबकि मन में गिनती करना 'सूक्ष्म' अभ्यास है।

योगिक अभ्यास में जब साधक स्मृति-आधारित गणना करता है, तो वह वास्तव में अपने मन को एक बिंदु पर केंद्रित करना सीखता है। निरोध के समय मन अक्सर विचलित होता है या शून्य में खो जाता है; ऐसे में 'स्मृति' (गिनती) एक लंगर की भाँति कार्य करती है, जो साधक को वर्तमान क्षण में स्थिर रखती है। यह अभ्यास साधक को 'साक्षी भाव' की ओर ले जाता है, जहाँ वह एक ओर प्राणों को रोके हुए है और दूसरी ओर अपनी स्मृति के माध्यम से उस समय का अवलोकन कर रहा है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को केवल शारीरिक निरोध से उठाकर मानसिक सजगता की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।

श्लोक ८.१६

आदिप्रयत्नं प्रथमं द्वितीयं यत्र चेतसि ।

तृतीयं तु समुद्दिष्टमुद्वयं तमसस्परि ॥ ८.१६ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९०

(?) पहला आदि-प्रयत्न, दूसरा जहाँ (प्राण) चित्तमें (रुके), और तीसरा "उद्वयं तमसस्परि…" कहा गया है —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया था कि निरोध (कुम्भक) के समय बाहरी साधनों के बजाय योगियों ने स्मृति पर आधारित मानसिक गणना की विधि निर्धारित की है। अब इस श्लोक में वे उस मानसिक गणना के लिए प्रयुक्त होने वाले विशिष्ट मानसिक 'प्रयत्नों' या चरणों का विवरण दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

प्रथमं आदिप्रयत्नं, द्वितीयं यत्र चेतसि (रुजते/तिष्ठते), तृतीयं तु 'उद्वयं तमसस्परि' इति समुद्दिष्टम्, (तद्) तमसस्परि (अस्ति)।

पदार्थ:

• आदिप्रयत्नं: आरम्भिक प्रयास या प्रथम मानसिक संकल्प।

• प्रथमं, द्वितीयं, तृतीयं: गिनती के तीन चरण।

• यत्र चेतसि: जहाँ चित्त में (प्राण या विचार स्थिर हो)।

• समुद्दिष्टमुद्वयं तमसस्परि: 'उद्वयं तमसस्परि...' शब्दों वाले मन्त्र का मानसिक स्मरण या उद्दिष्ट करना।

• तमसस्परि: अंधकार (अविद्या या जड़ता) के ऊपर।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य मानसिक गणना (स्मृति-प्रतिष्ठ) की उस सूक्ष्म विधि को समझा रहे हैं, जिससे साधक कुम्भक के समय मात्राओं का सटीक ज्ञान रख सके। जब प्राण निरोध में होते हैं, तब समय का बोध भौतिक नहीं रहता; वह केवल चेतना के स्तर पर होता है। अतः यहाँ 'गिनती' अंकों में नहीं, बल्कि 'प्रयत्नों' या मानसिक अवस्थाओं के माध्यम से की जाती है।

ऋषि कहते हैं कि गणना का पहला चरण 'आदिप्रयत्न' है। यह वह क्षण है जब साधक प्राण को रोकने का संकल्प करता है और अपनी चेतना को बाहरी जगत से हटाकर भीतर की ओर मोड़ता है। यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि प्राण को स्थिर करने का प्रथम सक्रिय प्रयास है।

दूसरा चरण वह है 'यत्र चेतसि'—जहाँ प्राण और चित्त एक बिंदु पर ठहर जाते हैं। जब प्राण का प्रवाह रुकता है, तब वह चित्त में प्रतिष्ठित हो जाता है। इस स्थिरता का अनुभव ही दूसरी मात्रा या दूसरे चरण का संकेत है। यहाँ साधक अनुभव करता है कि प्राण अब विचलित नहीं हैं, बल्कि चेतना में लय हो रहे हैं।

तीसरे चरण के लिए ऋषि एक मन्त्र-प्रतीक का सहारा लेते हैं—'उद्वयं तमसस्परि'। यहाँ 'उद्वयं तमसस्परि' शब्दों वाले मन्त्र का मानसिक जप या स्मरण किया जाता है। यह मन्त्र-स्मरण साधक को उस अवस्था में ले जाता है जो 'तमस' (अंधकार, जड़ता या अविद्या) के ऊपर है। जब साधक इस मन्त्र के भाव में स्थित होता है, तब वह तीसरी मात्रा या तीसरे चरण को पूर्ण करता है।

इस प्रकार, यह विधि केवल समय मापने का यंत्र नहीं है, बल्कि यह प्राण को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने की एक प्रक्रिया है। पहले प्रयत्न से संकल्प जागता है, दूसरे से चित्त स्थिर होता है और तीसरे से साधक तमस (अंधकार) से ऊपर उठकर प्रकाशमय चेतना की ओर अग्रसर होता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'साक्षी-भाव' का अभ्यास है। कुम्भक के समय जब वायु रुकती है, तब मन अक्सर व्याकुल होता है या शून्य हो जाता है। इस श्लोक में दी गई विधि साधक को सिखाती है कि वह शून्य में खोने के बजाय अपनी चेतना को तीन चरणों में विभाजित रखे।

पहला चरण (आदिप्रयत्न) उसे 'इच्छाशक्ति' से जोड़ता है, दूसरा चरण (चेतसि) उसे 'ज्ञानशक्ति' (स्थिरता के अनुभव) से जोड़ता है, और तीसरा चरण (तमसस्परि) उसे 'क्रियाशक्ति' (मन्त्र के माध्यम से उत्थान) से जोड़ता है। इस अभ्यास से साधक केवल मात्राएँ नहीं गिनता, बल्कि वह अपनी चेतना को जड़ता (तमस) से ऊपर उठाकर प्रकाश की ओर ले जाने का अनुभव करता है। यह अभ्यास साधक को 'अस्थिर मन' की भूमि से 'एकाग्र मन' की भूमि तक ले जाता है।

श्लोक ८.१७

पूर्वोक्तस्य तु मन्त्रस्य यथासंख्यं प्रकीर्तयेत् ।

मात्रायोगा यथोक्तास्तु कृता एव भवन्ति च ॥ ८.१७ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९०

— पूर्वोक्त मन्त्रका (जप) संख्याके अनुसार करे; (इससे) यथोक्त मात्राओंके योग (अपने-आप) हो जाते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने कुम्भक के समय मात्राओं की गणना के लिए 'आदिप्रयत्न' और 'उद्वयं तमसस्परि' जैसे मानसिक चरणों का निर्देश दिया था। अब इस श्लोक में वे उस गणना को और अधिक सरल और सुगम बनाने के लिए मन्त्र-जप का आधार बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

तु पूर्वोक्तस्य मन्त्रस्य यथासंख्यं प्रकीर्तयेत् । यथोक्तास्तु मात्रायोगा (तस्मात्) कृता एव भवन्ति च ।

पदार्थ:

• पूर्वोक्तस्य मन्त्रस्य: पूर्व में कहे गए मन्त्र का (यहाँ प्राणायाम के साथ जुड़े सव्याहृति-सप्रणव गायत्री मन्त्र का संकेत है)।

• यथासंख्यं: निर्धारित संख्या के अनुसार।

• प्रकीर्तयेत्: मानसिक रूप से जप करे या उच्चारण करे।

• मात्रायोगा: मात्राओं का योग या समय की गणना।

• यथोक्तास्तु: जैसा कि कहा गया है (जैसा विधान है)।

• कृता एव भवन्ति: स्वतः ही पूर्ण हो जाते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक को एक अत्यंत व्यावहारिक और योगिक सूत्र दे रहे हैं। पिछले श्लोक (८.१६) में उन्होंने मानसिक प्रयत्नों के माध्यम से गिनती करने की विधि बताई थी, किन्तु सूक्ष्म अवस्था में जब प्राण निरोध (कुम्भक) में होते हैं, तब मन कभी-कभी अंकों की गिनती में उलझकर विचलित हो सकता है। यदि साधक केवल १, २, ३ की गिनती पर ध्यान केंद्रित करेगा, तो उसका चित्त 'गणक' बन जाएगा, 'साधक' नहीं।

अतः ऋषि कहते हैं कि पूर्वोक्त मन्त्र का यथासंख्य जप किया जाए। यहाँ 'पूर्वोक्त मन्त्र' से तात्पर्य उस पूर्ण गायत्री मन्त्र से है जिसे इस अध्याय के आरम्भ (८.२) में सव्याहृति और सप्रणव के साथ बताया गया है। जब साधक कुम्भक के समय इस मन्त्र का मानसिक जप करता है, तो मन्त्र के अक्षरों और उनके प्रवाह की एक स्वाभाविक गति होती है। मन्त्र की वह आंतरिक लय ही समय का मापक बन जाती है।

भाव यह है कि मन्त्र का एक पूर्ण पाठ जितनी अवधि लेता है, वह स्वतः ही निर्धारित मात्राओं के योग के बराबर होता है। साधक को अलग से यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि "क्या १२ मात्राएँ पूरी हुईं या २४?"। वह केवल मन्त्र के प्रवाह में लीन रहे; मन्त्र की संख्या पूरी होते ही मात्राओं का विधान स्वतः पूर्ण हो जाता है। यह विधि साधक को गणितीय तनाव से मुक्त कर उसे मन्त्र की शक्ति और प्राण के निरोध के सामंजस्य में स्थापित कर देती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-वृत्ति' के प्रबंधन का रहस्य है। प्राणायाम का लक्ष्य प्राणों का निरोध कर चित्त को स्थिर करना है, न कि उसे गिनती के बोझ से थकाना। जब साधक अंकों में गिनती करता है, तो वह 'तर्क' के स्तर पर रहता है। किन्तु जब वह मन्त्र का जप करता है, तो वह 'श्रद्धा' और 'ध्वनि-विज्ञान' के स्तर पर चला जाता है।

साधक यहाँ इस अनुभव को प्राप्त करता है कि मन्त्र केवल शब्द नहीं, बल्कि समय का एक सूक्ष्म आयाम है। जप के माध्यम से वह अपनी चेतना को 'काल' से ऊपर उठाकर 'अक्षर' की ओर ले जाता है। अभ्यास यह है कि पूरक के बाद जब कुम्भक (निरोध) की स्थिति आए, तब मन में मन्त्र के अक्षरों को एक-एक कर उभरने दें। मन्त्र का एक आवर्तन पूरा होना ही एक निश्चित मात्रा-समूह की समाप्ति है। इससे साधक की एकाग्रता भंग नहीं होती और वह सहजता से कनिष्ठ, मध्यम या उत्तम मात्राओं की भूमि तक पहुँच जाता है। यहाँ जप ही गणना है और गणना ही ध्यान बन जाती है।

श्लोक ८.१८

एतन्मात्राप्रयोगेण प्राणायामत्रयस्य च ।

ग्रहणं धारणोत्सर्गं यथासंख्येन कारयेत् ॥ ८.१८ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९०

इस मात्रा-प्रयोगसे तीनों प्राणायामोंका — ग्रहण (पूरक), धारण (कुम्भक) और उत्सर्ग (रेचक) — संख्याके अनुसार करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया था कि कुम्भक के समय मात्राओं की गणना के लिए मन्त्र का मानसिक जप सबसे सरल और सटीक साधन है, जिससे समय का योग स्वतः पूर्ण हो जाता है। अब इस श्लोक में वे उस गणना पद्धति को प्राणायाम के तीनों अंगों—पूरक, कुम्भक और रेचक—पर लागू करने का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

एतन्मात्राप्रयोगेण प्राणायामत्रयस्य च ग्रहणं धारणोत्सर्गं यथासंख्येन कारयेत् ।

पदार्थ:

• एतन्मात्राप्रयोगेण: इस (पूर्व में वर्णित) मात्राओं के प्रयोग/गणना की विधि से।

• प्राणायामत्रयस्य: प्राणायाम के तीन अंगों का (पूरक, कुम्भक और रेचक)।

• ग्रहणं: श्वास को भीतर खींचना (पूरक)।

• धारणम्: श्वास को भीतर रोककर रखना (कुम्भक)।

• उत्सर्गम्: श्वास को बाहर निकालना (रेचक)।

• यथासंख्येन: निर्धारित संख्या (मात्राओं) के अनुसार।

• कारयेत्: करना चाहिए या संपन्न करना चाहिए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य प्राणायाम की पूर्ण प्रक्रिया को एक गणितीय और मन्त्र-आधारित अनुशासन में बाँध रहे हैं। यहाँ 'प्राणायामत्रय' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः लोग केवल श्वास रोकने (कुम्भक) को ही प्राणायाम मान लेते हैं, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि प्राणायाम एक त्रयी है—जिसमें वायु का ग्रहण (पूरक), उसका ठहराव (कुम्भक) और उसका विसर्जन (रेचक) तीनों सम्मिलित हैं।

ऋषि का निर्देश है कि इन तीनों क्रियाओं को 'एतन्मात्राप्रयोगेण' अर्थात् पूर्व में बताई गई मात्रा-गणना की विधि से ही संपन्न किया जाए। पिछले श्लोकों (८.१३-८.१७) में उन्होंने कनिष्ठ (१२), मध्यम (२४) और उत्तम (३६) मात्राओं का विधान बताया था और यह भी सिखाया था कि इन मात्राओं को मन में कैसे गिना जाए (मन्त्र-जप के माध्यम से)।

यहाँ 'यथासंख्येन' शब्द का गहरा अर्थ है। इसका तात्पर्य है कि यदि साधक ने 'मध्यम' प्राणायाम का संकल्प लिया है, तो वह पूरक में २४ मात्राएँ, कुम्भक में २४ मात्राएँ और रेचक में २४ मात्राएँ ले। जब पूरक, कुम्भक और रेचक की मात्राएँ समान होती हैं, तब प्राण का प्रवाह संतुलित होता है और चित्त में स्थिरता आती है। यदि इनमें असंतुलन हो (जैसे पूरक छोटा और कुम्भक बहुत लंबा), तो शरीर में स्वेद (पसीना) या कम्प (थरथराहट) जैसी अतिमात्रा के लक्षण प्रकट हो सकते हैं, जिसका निषेध ऋषि ने श्लोक ८.१४ में किया है।

अतः यह श्लोक एक सेतु है, जो मात्राओं के सैद्धान्तिक ज्ञान को वास्तविक क्रियान्वयन से जोड़ता है। यह विधि सुनिश्चित करती है कि साधक केवल श्वास नहीं ले रहा, बल्कि एक निश्चित समय-सीमा और मन्त्र-शक्ति के साथ अपने प्राणों को अनुशासित कर रहा है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'लय' और 'संतुलन' का अभ्यास है। जब साधक पूरक, कुम्भक और रेचक को समान मात्राओं में करता है, तो वह अपने भीतर एक 'त्रिभुज' जैसी स्थिरता निर्मित करता है।

१. ग्रहण (पूरक): जब साधक मन्त्र के साथ वायु खींचता है, तो वह केवल वायु नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड की प्राण-शक्ति को अपने भीतर समाहित कर रहा होता है।

२. धारण (कुम्भक): यहाँ वह उस शक्ति को स्थिर कर उसे आंतरिक अग्नि (सूर्य) के साथ एकाकार करता है। मन्त्र का जप यहाँ चित्त को भटकने से रोकता है और समय का बोध कराता है।

३. उत्सर्ग (रेचक): वायु को बाहर निकालते समय वह अपने भीतर के समस्त मल और मानसिक विकारों का विसर्जन करता है।

इस अभ्यास से साधक 'अस्थिर' भूमि से 'स्थिर' भूमि की ओर बढ़ता है। जब श्वास की गति और मन्त्र की गति एक हो जाती है, तब प्राण और मन का द्वैत समाप्त होने लगता है। यह अभ्यास साधक को उस अवस्था के लिए तैयार करता है जहाँ वह वायु के बिना भी ठहर सके, जो कि अगले श्लोकों में वर्णित 'महानिरोध' की ओर ले जाने वाला मार्ग है।

पूरकप्राणायामलक्षणम्

श्लोक ८.१९

बाह्यस्थितं नासपुटेन वायुमाकृष्य तेनैव शनैः समन्तात् ।

नाडीश्च सर्वाः प्रतिपूरयेत्तु स पूरको नाम मरुन्निरोधः ॥ ८.१९ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९०

बाहर स्थित वायुको नासापुटसे खींचकर, उसीसे धीरे-धीरे सब ओरकी सब नाडियोंको भर दे — वह पूरक नामक वायुनिरोध है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के तीनों अंगों—ग्रहण, धारण और उत्सर्ग—को निर्धारित मात्राओं के अनुसार संपन्न करने का निर्देश दिया था। अब इस श्लोक से वे इन तीनों अंगों के लक्षणों का विस्तृत विवेचन आरम्भ कर रहे हैं, जिसमें सर्वप्रथम 'पूरक' की सूक्ष्म विधि और उसके स्वरूप को स्पष्ट किया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

बाह्यस्थितं वायुं नासपुटेन आकृष्य, तेनैव शनैः समन्तात् सर्वाः नाडीश्च प्रतिपूरयेत्; तु स पूरको नाम मरुन्निरोधः।

पदार्थ:

• बाह्यस्थितं वायुम्: बाहर स्थित वायु को।

• नासपुटेन: नासिका के छिद्रों (पुटों) के द्वारा।

• आकृष्य: खींचकर (ग्रहण करके)।

• तेनैव: उसी (खींची हुई) वायु से ही।

• शनैः: धीरे-धीरे, बिना किसी झटके या वेग के।

• समन्तात्: सब ओर, सर्वत्र।

• सर्वाः नाडीश्च: और समस्त नाड़ियों को।

• प्रतिपूरयेत्: पूर्णतः भर दे।

• स पूरको नाम: वह 'पूरक' नाम का है।

• मरुन्निरोधः: वायु का निरोध (यहाँ निरोध का अर्थ केवल रोकना नहीं, अपितु वायु को वश में कर उसे संचालित करना है)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'पूरक' प्राणायाम की परिभाषा और उसकी विधि का वर्णन कर रहे हैं। पूरक का शाब्दिक अर्थ है—'भरना'। यहाँ ऋषि केवल श्वास लेने की शारीरिक क्रिया नहीं बता रहे, बल्कि एक योगिक प्रक्रिया का निर्देश दे रहे हैं।

विधि यह है कि साधक बाहर स्थित वायु को नासिका के पुटों से भीतर की ओर खींचे। यहाँ 'शनैः' (धीरे-धीरे) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; यदि वायु को वेग से खींचा जाए, तो वह केवल फेफड़ों तक सीमित रह जाती है और शरीर में विक्षेप उत्पन्न करती है। किन्तु जब वायु को मंद गति से खींचा जाता है, तब वह 'समन्तात्' अर्थात् शरीर के समस्त अंगों और नाड़ियों में व्याप्त होने लगती है।

ऋषि कहते हैं कि उस खींची हुई वायु से 'सर्वाः नाडीश्च प्रतिपूरयेत्'—अर्थात् शरीर की सभी नाड़ियों को पूर्णतः भर देना चाहिए। सामान्य श्वास केवल प्राणवायु के आदान-प्रदान के लिए होता है, किन्तु योगिक पूरक का उद्देश्य प्राण-शक्ति को शरीर के प्रत्येक सूक्ष्म मार्ग (नाड़ी) में पहुँचाकर उन्हें जाग्रत और शुद्ध करना है। जब वायु इस प्रकार समस्त नाड़ियों में भर जाती है, तब उस अवस्था को 'पूरक' कहा जाता है।

यहाँ 'मरुन्निरोधः' शब्द का प्रयोग किया गया है। सामान्यतः निरोध का अर्थ 'रोकना' होता है, किन्तु यहाँ इसका अर्थ है वायु का अनुशासन। जब वायु अपनी स्वाभाविक अनियंत्रित गति को छोड़कर साधक के संकल्प के अनुसार नाड़ियों में भरने लगती है, तब वह वायु 'निरुद्ध' (वश में) हो जाती है। अतः पूरक केवल वायु का भीतर जाना नहीं, अपितु वायु को वश में कर उसे संपूर्ण शरीर में व्याप्त करना है।

शास्त्र-साक्ष्य —

योगसूत्र

तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥ २.४९ ॥

आसन सिद्ध होनेपर श्वास और प्रश्वासकी गतिका विच्छेद प्राणायाम है।

योगसूत्र २.४९पातञ्जल योगदर्शन — व्यासभाष्य (theVyasa) · पृष्ठ 100

पातञ्जल योगदर्शन में प्राणायाम को 'श्वास-प्रश्वास की गति का विच्छेद' कहा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विच्छेद की प्रक्रिया को और अधिक सूक्ष्म बनाती है। जहाँ योगसूत्र केवल गति के विच्छेद (रोकने) की बात करता है, वहीं याज्ञवल्क्य यहाँ यह दिखा रहे हैं कि विच्छेद से पूर्व 'पूरक' की क्रिया ऐसी होनी चाहिए कि वायु केवल एक स्थान पर न रुके, बल्कि समस्त नाड़ियों को परिपूर्ण करे। यह विच्छेद की तैयारी है—जब नाड़ियाँ पूर्णतः भर जाती हैं, तभी कुम्भक (धारण) संभव और सुरक्षित होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्राण-विस्तार' का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य का श्वास उथला होता है, जो केवल ऊपरी छाती तक सीमित रहता है। इस श्लोक का अभ्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि वायु केवल नासिका से भीतर नहीं जा रही, बल्कि एक प्रकाशमय धारा की तरह शरीर के प्रत्येक सूक्ष्म मार्ग में फैल रही है।

साधक जब 'शनैः' (धीरे-धीरे) वायु खींचता है, तो वह मन के विक्षेपों को शांत करता है और चेतना को स्थूल शरीर से सूक्ष्म नाड़ियों की ओर ले जाता है। 'समन्तात्' शब्द का अनुभव तब होता है जब साधक को महसूस हो कि उसके शरीर का कोई भी कोना वायु और प्राण से रिक्त नहीं है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह शरीर के भौतिक ढांचे से ऊपर उठकर अपने प्राणिक शरीर के प्रति सजग होने लगता है। यह पूरक की वह अवस्था है जो आगामी 'कुम्भक' के लिए आधार तैयार करती है।

कुम्भस्वरूपम्

श्लोक ८.२०

न रेचको नैव च पूरकोऽयं नासाग्रचारी स्थित एव वायुः ।

सुनिश्चितं धार्य यथाक्रमेण कुम्भाख्यमेतत् प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ ८.२० ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९१

न रेचक, न पूरक — (जब) नासाग्रमें विचरनेवाला वायु स्थिर ही रहे; उसे क्रमसे निश्चित रूपसे धारण करना — इसे जानकार कुम्भ (कुम्भक) कहते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पूरक के स्वरूप का वर्णन किया गया, जहाँ बाहरी वायु को खींचकर समस्त नाड़ियों को भरने की विधि बताई गई। अब महर्षि याज्ञवल्क्य प्राणायाम के द्वितीय अंग 'कुम्भक' के लक्षण को स्पष्ट कर रहे हैं, जो पूरक और रेचक के मध्य की वह संधि है जहाँ वायु और मन दोनों स्थिर हो जाते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (यदा) न रेचको (भवेत्), न एव च पूरकोऽयं (भवेत्), (तदा) वायुः नासाग्रचारी स्थित एव (तिष्ठेत्); (तम् वायुं) यथाक्रमेण सुनिश्चितं धार्य, तज्ज्ञाः एतत् कुम्भाख्यं (इति) प्रवदन्ति।

पदार्थ और निर्वचन:

• न रेचको नैव च पूरको: न तो यह वायु को बाहर निकालने की क्रिया (रेचक) है और न ही भीतर खींचने की क्रिया (पूरक)। यह इन दोनों क्रियाओं के अभाव की स्थिति है।

• नासाग्रचारी स्थित एव वायुः: 'नासाग्र' अर्थात नासिका के अग्रभाग पर। 'स्थित' का अर्थ है—अचल, स्थिर। जब वायु न भीतर जाए न बाहर, अपितु नासिका के अग्रभाग पर स्थिर हो जाए।

• यथाक्रमेण: उचित क्रम में। प्राणायाम का क्रम पूरक → कुम्भक → रेचक होता है। बिना पूरक के कुम्भक संभव नहीं है, अतः यह 'क्रम' अनिवार्य है।

• सुनिश्चितं धार्य: पूर्ण निश्चय और सजगता के साथ धारण करना। यहाँ 'सुनिश्चित' शब्द मानसिक एकाग्रता और संकल्प की शक्ति को दर्शाता है।

• कुम्भाख्यम्: 'कुम्भ' का शाब्दिक अर्थ है घड़ा। जिस प्रकार घड़े में जल स्थिर रहता है, उसी प्रकार जब प्राण शरीर में स्थिर हो जाते हैं, उसे कुम्भक कहते हैं।

• तज्ज्ञाः: जो इस विद्या के ज्ञाता (योगीजन) हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य कुम्भक की परिभाषा देते हुए इसे एक 'स्थिरता' के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। कुम्भक केवल श्वास को रोकना नहीं है, अपितु वह अवस्था है जहाँ पूरक की गति समाप्त हो चुकी है और रेचक का आरम्भ अभी नहीं हुआ है।

श्लोक का मुख्य संकेत 'नासाग्रचारी स्थित एव वायुः' है। जब साधक पूरक द्वारा नाड़ियों को पूर्णतः भर लेता है, तब वायु नासिका के अग्रभाग पर आकर ठहर जाती है। यह वह बिंदु है जहाँ प्राण की गति शून्य हो जाती है, किन्तु उसकी शक्ति उच्चतम होती है। यदि वायु भीतर जाती रहती तो वह पूरक होता, और यदि बाहर निकलती तो रेचक। इन दोनों के मध्य का यह 'शून्य-बिंदु' ही कुम्भक है।

महर्षि यहाँ 'यथाक्रमेण' और 'सुनिश्चितं' शब्दों के माध्यम से यह चेतावनी दे रहे हैं कि कुम्भक जबरदस्ती श्वास को रोकने की क्रिया नहीं है। यह एक व्यवस्थित क्रम है। पहले पूरक से नाड़ियों का विस्तार होता है, फिर उस विस्तार को एक निश्चित संकल्प के साथ धारण किया जाता है। यह 'निश्चितता' ही साधक को प्राणिक दबाव से बचाती है और उसे आनंदमय स्थिरता की ओर ले जाती है। तज्ज्ञ योगी जानते हैं कि कुम्भक में ही वह सामर्थ्य है जो प्राण को स्थूल शरीर से हटाकर सूक्ष्म चेतना की ओर मोड़ देता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ ५.२७ ॥

बाहरी विषयोंको बाहर ही छोड़कर, दृष्टिको भौंहोंके बीच (स्थिर) कर, नासिकाके भीतर चलनेवाले प्राण और अपानको सम करके —

भगवद्गीता ५.२७गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 165

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि नासिका के भीतर चलने वाले प्राण और अपान को सम करके बाहरी विषयों का त्याग करना चाहिए। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में कुम्भक का 'नासाग्रचारी' होना उसी 'समता' की पराकाष्ठा है। जहाँ गीता प्राण-अपान के संतुलन की बात करती है, वहीं यह स्मृति उस संतुलन के बाद आने वाली 'स्थिरता' (कुम्भक) का लक्षण बताती है। जब प्राण और अपान पूर्णतः सम और स्थिर हो जाते हैं, तब वायु नासाग्र पर ठहर जाती है, जो समाधि की पूर्व-अवस्था है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से कुम्भक का अर्थ है—श्वास का ठहराव और मन का ठहराव एक साथ। जब तक श्वास चलता है, मन भी चलता है; जैसे ही श्वास स्थिर होता है, मन की चंचलता स्वतः रुक जाती है।

इस श्लोक का अभ्यास करते समय साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि वायु केवल नासिका के अग्रभाग पर नहीं रुकी है, बल्कि वह पूरे शरीर में एक 'घड़े' (कुम्भ) की भाँति व्याप्त होकर स्थिर हो गई है। 'सुनिश्चितं धार्य' का अर्थ है कि साधक अपनी चेतना को उस स्थिर वायु में विलीन कर दे।

यह अभ्यास साधक को 'गति' से 'स्थिरता' की भूमि पर ले जाता है। पूरक में साधक विस्तार का अनुभव करता है, किन्तु कुम्भक में वह उस विस्तार के भीतर 'केंद्रित' होने का अनुभव करता है। यह वह अवस्था है जहाँ प्राण अपनी बाहरी यात्रा समाप्त कर अंतर्मुखी होता है, जिससे हृदय और सूर्य के बीच का संबंध प्रगाढ़ होने लगता है।

रेचकप्राणायामलक्षणम्

श्लोक ८.२१

निष्क्राम्य नासाविवरादशेषं प्राणं बहिः शून्यमिवानिलेन ।

निरुच्छ्वसंस्तिष्ठति चोर्द्ध्व(रुद्ध)वायुः स रेचको नाम महानिरोधः ॥ ८.२१ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९१

नासिकाके छिद्रसे सारे प्राणको बाहर निकालकर, (भीतरको) वायुसे शून्य-सा करके, ऊपर रुके वायुवाला (साधक) बिना श्वास लिये ठहरता है — वह रेचक नामक महानिरोध है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने कुम्भक के लक्षण को स्पष्ट किया, जहाँ वायु नासाग्र पर स्थिर होकर ठहर जाती है। अब इस क्रम में प्राणायाम के तृतीय अंग 'रेचक' के स्वरूप का वर्णन है, जो शरीर और मन के संपूर्ण विसर्जन की प्रक्रिया है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधकः) शेषं प्राणं नासाविवरात् निष्क्राम्य बहिः (कुरुते), (तदा शरीरं) अनिलेन शून्यमिव (भवति); (तथा) उर्द्ध्व(रुद्ध)वायुः निरुच्छ्वसं च तिष्ठति; स (अवस्था) रेचको नाम महानिरोधः (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• निष्क्राम्य: बाहर निकालना। यहाँ प्राण के पूर्ण निष्कासन की क्रिया है।

• नासाविवरात्: नासिका के छिद्रों से।

• शेषं प्राणं: बचा हुआ संपूर्ण प्राण। केवल वायु नहीं, अपितु शरीर के भीतर व्याप्त समस्त प्राण-शक्ति का निष्कासन।

• शून्यमिव: शून्य के समान। जब भीतर वायु का लेश भी न रहे, तब वह अवस्था 'शून्यता' कहलाती है।

• निरुच्छ्वसं: बिना श्वास के। उच्छ्वास (बाहर जाना) और निश्वास (भीतर आना) दोनों का अभाव।

• उर्द्ध्व(रुद्ध)वायुः: यहाँ 'उर्द्ध्व' और 'रुद्ध' का पाठ-भेद है। 'रुद्ध' का अर्थ है रुका हुआ या बाधित। जब बाहर निकालने के बाद भी भीतर की सूक्ष्म वायु एक बिंदु पर रुक जाती है, तब वह स्थिति आती है।

• महानिरोधः: 'निरोध' का अर्थ है रोकना। जब प्राणों का गमन पूरी तरह रुक जाए और साधक केवल चेतना में स्थित रहे, तो इसे 'महानिरोध' कहा गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य रेचक को केवल 'साँस छोड़ने' की भौतिक क्रिया नहीं, अपितु एक गहन आध्यात्मिक विसर्जन के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। रेचक की विधि यह है कि साधक नासिका के छिद्रों से शरीर के भीतर स्थित समस्त प्राण को धीरे-धीरे बाहर निकाल दे। जब शरीर के भीतर वायु का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तब शरीर 'शून्यमिव' यानी शून्य के समान हो जाता है।

यह शून्यता भौतिक रिक्तता नहीं, बल्कि एक मानसिक और प्राणिक अवस्था है। जब शरीर से समस्त वायु बाहर निकल जाती है, तब साधक 'निरुच्छ्वसं' हो जाता है—अर्थात वह श्वास लेने और छोड़ने के द्वंद्व से ऊपर उठ जाता है। इस स्थिति में वायु रुद्ध हो जाती है, वह न भीतर जाती है न बाहर, बल्कि एक बिंदु पर स्थिर हो जाती है। इसी अवस्था को महर्षि ने 'रेचक नामक महानिरोध' कहा है।

यहाँ 'महानिरोध' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। पूरक में प्राणों का विस्तार होता है, कुम्भक में उनका संचय और स्थिरता होती है, किंतु रेचक में उनका पूर्ण विसर्जन होता है। जब साधक स्वयं को शून्य कर लेता है, तभी वह उस 'अक्षर' या 'परमात्मा' के लिए स्थान बना पाता है जो वायु और प्राण से परे है। यह विसर्जन ही साधक को स्थूल शरीर के मोह से मुक्त कर सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक 'शून्यता' के अभ्यास का सूत्र है। रेचक के समय जब साधक संपूर्ण प्राण बाहर निकालता है, तो वह वास्तव में अपने अहंकार और मानसिक संस्कारों का विसर्जन कर रहा होता है।

अभ्यास की दृष्टि से, जब शरीर वायु से शून्य होता है, तब मन की चंचलता स्वतः समाप्त होने लगती है क्योंकि मन प्राण का सहचर है। 'निरुच्छ्वसं' होने पर साधक उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ केवल 'द्रष्टा' शेष रहता है। यह अभ्यास साधक को 'पूर्णता' से 'शून्यता' की ओर ले जाता है, ताकि वह अनुभव कर सके कि वह शरीर या प्राण नहीं, अपितु वह चैतन्य है जो इस शून्यता में भी स्थित है। यह महानिरोध साधक को समाधि की उस अवस्था के निकट लाता है जहाँ श्वास का चलना या न चलना चेतना को प्रभावित नहीं करता।

पूरककुम्भकरेचकलक्षणानि

श्लोक ८.२२

नासिकाकृष्ट उच्छ्वासो ध्मातः पूरक उच्यते

कुम्भको निश्चलश्वासो मुच्यमानस्तु रेचकः ॥ ८.२२ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९१

नासिकासे खींचकर भरा गया श्वास पूरक कहलाता है; निश्चल श्वास कुम्भक है, और छोड़ा जाता (श्वास) रेचक।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों (८.१९–८.२१) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने पूरक, कुम्भक और रेचक की विस्तृत परिभाषा और उनकी सूक्ष्म आंतरिक प्रक्रियाओं का वर्णन किया। अब इस श्लोक में उन तीनों अवस्थाओं के सार को एक सूत्र में पिरोकर उनके संक्षिप्त लक्षण दिए गए हैं, ताकि साधक अभ्यास के समय उनके मूल स्वरूप को विस्मृत न करे।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: नासिकातः कृष्टः उच्छ्वासः पूरकः उच्यते; निश्चलः श्वासः कुम्भकः (अस्ति); मुच्यमानः (श्वासः) तु रेचकः (अस्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• नासिकाकृष्ट: नासिका द्वारा खींचा हुआ। यहाँ 'कृष्ट' क्रिया सक्रियता और संकल्प का प्रतीक है।

• उच्छ्वासः: सामान्यतः उच्छ्वास का अर्थ श्वास का बाहर जाना होता है, किन्तु यहाँ 'नासिकाकृष्ट' विशेषण के साथ इसका प्रयोग 'प्राण के प्रवाह' के लिए हुआ है।

• निश्चलः: जिसमें कोई हलचल न हो। गति का पूर्ण अभाव।

• मुच्यमानः: जो मुक्त किया जा रहा हो; विसर्जित होता हुआ।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के तीन अंगों को अत्यंत सरल शब्दों में परिभाषित किया है। यह श्लोक पूर्व के विस्तृत वर्णन का उपसंहार है, जो साधक को क्रिया के समय केवल तीन मुख्य बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश देता है: खिंचाव (पूरक), स्थिरता (कुम्भक) और विसर्जन (रेचक)।

प्रथम अवस्था 'पूरक' है। जब साधक सजगता के साथ नासिका के माध्यम से वायु को भीतर खींचता है, तो वह केवल भौतिक वायु का संचय नहीं है, अपितु बाहरी जगत की प्राण-शक्ति को अपने भीतर एकीकृत करने की प्रक्रिया है। जब श्वास नासिका से खिंचकर नाडियों में व्याप्त होता है, तब वह 'पूरक' कहलाता है।

द्वितीय अवस्था 'कुम्भक' है। यहाँ श्वास 'निश्चल' हो जाता है। यह वह बिंदु है जहाँ गति समाप्त होती है और स्थिरता का उदय होता है। जब श्वास न भीतर जाता है और न बाहर आता है, बल्कि नासाग्र या हृदय में स्थिर हो जाता है, तब वह कुम्भक है। यह अवस्था साधक को भौतिक शरीर से हटाकर आंतरिक चेतना की ओर मोड़ती है।

तृतीय अवस्था 'रेचक' है। 'मुच्यमानः' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल श्वास छोड़ना नहीं, बल्कि भीतर के समस्त विकारों, अशुद्धियों और अहंकार का विसर्जन है। जब श्वास धीरे-धीरे शरीर को छोड़कर बाहर जाता है, तो साधक शून्य की स्थिति की ओर अग्रसर होता है।

इस प्रकार, पूरक द्वारा ऊर्जा का संचय, कुम्भक द्वारा उस ऊर्जा का स्थिरीकरण और रेचक द्वारा उसका शुद्धिकरण होता है। यह त्रयी साधक को स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की यात्रा कराती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक अभ्यास की 'चेक-लिस्ट' की भाँति है। योगिक अभ्यास में अक्सर साधक गति और स्थिरता के बीच भ्रमित हो जाता है। इस श्लोक के माध्यम से साधक तीन अनुभवों को स्पष्ट करता है:

१. पूरक में 'आकर्षण' का अनुभव: श्वास खींचते समय यह अनुभव करना कि संपूर्ण ब्रह्मांड की प्राण-शक्ति नासिका के माध्यम से भीतर प्रवेश कर रही है।

२. कुम्भक में 'अचलत्व' का अनुभव: श्वास के ठहरते ही मन का भी ठहर जाना। यहाँ साधक 'गति' से 'स्थित' की भूमि पर जाता है।

३. रेचक में 'मुक्ति' का अनुभव: श्वास छोड़ते समय यह भाव रखना कि मैं स्वयं को इस भौतिक शरीर और उसके बंधनों से मुक्त कर रहा हूँ।

यह अभ्यास साधक को श्वास की लय के माध्यम से 'अक्षर' (अविनाशी) की ओर ले जाता है, जहाँ श्वास का आना-जाना समाप्त होकर केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।

पूरकादौ स्थानविशेषध्यानानि

श्लोक ८.२३

नीलोत्पलदलश्यामं नाभिमध्ये प्रतिष्ठितम् ।

चतुर्भुजं महात्मानं पूरकेणैव चिन्तयेत् ॥ ८.२३ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९२

पूरकके साथ ही नाभिके बीच प्रतिष्ठित, नीलकमलकी पंखुड़ीके समान श्याम, चतुर्भुज परमात्मा (विष्णु) का चिन्तन करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों (८.१९–८.२२) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने पूरक, कुम्भक और रेचक की परिभाषा और उनकी भौतिक एवं सूक्ष्म क्रियाओं को स्पष्ट किया। अब इस श्लोक से साधक को केवल वायु-निरोध की क्रिया तक सीमित न रखकर, उसे 'देवता-चिन्तन' से जोड़कर प्राण को चेतना में बदलने की विधि बताई जा रही है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: पूरकेणैव नाभिमध्ये प्रतिष्ठितम्, नीलोत्पलदलश्यामं, चतुर्भुजं महात्मानं चिन्तयेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• पूरकेणैव: केवल पूरक के साथ ही। यहाँ 'एव' का प्रयोग यह बताने के लिए है कि श्वास के भीतर आने की क्रिया और देवता का चिन्तन एक साथ होने चाहिए, अलग-अलग नहीं।

• नाभिमध्ये: नाभि के मध्य स्थान में। यह शरीर का वह केंद्र है जहाँ से प्राण का उद्वर्तन आरम्भ होता है।

• नीलोत्पलदलश्यामं: नीलकमल की पंखुड़ियों के समान श्याम वर्ण वाले। 'नीलोत्पल' (नीला कमल) गहनता, शांति और अनंत आकाश का प्रतीक है।

• चतुर्भुजं: चार भुजाओं वाले। यह सर्वव्यापकता और चारों दिशाओं में प्रभुत्व का संकेत है।

• महात्मानं: महान आत्मा स्वरूप परमात्मा (विष्णु)। यहाँ 'महात्मा' शब्द उस विराट पुरुष के लिए प्रयुक्त है जो समस्त प्राणों का आधार है।

• चिन्तयेत्: चिन्तन करे। यह केवल कल्पना नहीं, अपितु प्राण-शक्ति को उस रूप में स्थापित करने का निर्देश है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ प्राणायाम को केवल एक शारीरिक व्यायाम से उठाकर उसे 'योग' बना रहे हैं। पूरक की क्रिया में जब वायु नासिका से भीतर प्रवेश कर नाडियों को भरती है, तब वह वायु केवल गैस नहीं, बल्कि एक वाहन बन जाती है। इस वाहन पर मन को आरूढ़ कर उसे नाभि के केंद्र में स्थापित करना है।

विधि यह है कि जैसे-जैसे श्वास भीतर खिंचा जा रहा हो, ठीक उसी क्षण साधक अपनी चेतना को नाभि के मध्य में ले जाए और वहाँ नीलकमल के समान श्याम वर्ण, चतुर्भुज परमात्मा विष्णु का दर्शन करे। नाभि वह स्थान है जहाँ प्राण का संचय होता है और जहाँ से जीवन का पोषण आरम्भ होता है। विष्णु 'सर्वव्यापी' हैं और नाभि 'केंद्र' है; अतः केंद्र में सर्वव्यापकता का चिन्तन करने का अर्थ है—अपने सीमित अस्तित्व को विराट पुरुष में विलीन करना।

यहाँ 'श्याम' वर्ण का विशेष महत्त्व है। जिस प्रकार गहरा नीला रंग अनंत आकाश और गहरे समुद्र का होता है, उसी प्रकार यह रंग साधक के भीतर की चंचलता को शांत कर उसे स्थिरता और गंभीरता प्रदान करता है। चतुर्भुज रूप यह दर्शाता है कि साधक का प्राण अब केवल एक दिशा में नहीं, बल्कि संपूर्ण शरीर और ब्रह्मांड के चारों आयामों में व्याप्त हो रहा है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का गूढ़ रहस्य 'प्राण और मन के एकीकरण' में है। सामान्यतः श्वास अलग चलता है और विचार अलग। जब साधक पूरक के साथ विष्णु का चिन्तन करता है, तो वह श्वास (प्राण) और ध्येय (मन) को एक ही सूत्र में बाँध देता है।

अभ्यास यह है कि श्वास का भीतर आना और विष्णु का रूप उभरना—दोनों एक ही गति में हों। जैसे-जैसे वायु नाभि की ओर बढ़े, वैसे-वैसे विष्णु का श्याम स्वरूप स्पष्ट होता जाए। इससे साधक की वह भूमि विकसित होती है जहाँ वह भौतिक वायु को 'दिव्य चेतना' में परिवर्तित करना सीखता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' (वायु) से 'सूक्ष्म' (रूप/चिन्तन) की ओर ले जाता है। जब प्राण नाभि में स्थिर होकर परमात्मा के रूप में प्रतिष्ठित होता है, तब मन की बाहरी दौड़ समाप्त हो जाती है और साधक अंतर्मुखी होने की प्रथम सोपान पर पहुँच जाता है।

श्लोक ८.२४

कुम्भकेन हृदि स्थाने ध्यायेच्च कमलासनम् ।

ब्रह्माणं रक्तगौराङ्गं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥ ८.२४ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९२

कुम्भक के द्वारा हृदय के स्थान में, कमल के आसन पर स्थित, लाल-गोरे अंगों वाले चार मुखों वाले पितामह ब्रह्मा का ध्यान करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पूरक क्रिया के समय नाभि में भगवान विष्णु के चिन्तन की विधि बताई गई। अब ऋषि याज्ञवल्क्य प्राणायाम के द्वितीय चरण 'कुम्भक' के समय होने वाले मानसिक और आध्यात्मिक अनुभव का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(साधक) कुम्भकेन हृदि स्थाने कमलासनम्, रक्तगौराङ्गं, चतुर्वक्त्रं, पितामहं ब्रह्माणां ध्यायेत्।

पदार्थ:

• कुम्भकेन: कुम्भक क्रिया के द्वारा (जब श्वास को भीतर रोककर स्थिर किया जाता है)।

• हृदि स्थाने: हृदय के स्थान में।

• कमलासनम्: कमल के आसन पर विराजमान।

• रक्तगौराङ्गं: जिनके अंग रक्त (लाल) और गौर (सुनहरे/गोरे) वर्ण के मिश्रण से आभासित हैं।

• चतुर्वक्त्रं: चार मुखों वाले।

• पितामहम्: समस्त सृष्टि के पितामह (ब्रह्मा)।

• ध्यायेत्: ध्यान करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य जी प्राण के निरोध को केवल वायु का ठहराव नहीं, अपितु चेतना का उत्थान मानते हैं। श्लोक का निर्देश है कि जब साधक पूरक के बाद वायु को नासाग्र में स्थिर कर 'कुम्भक' की अवस्था में आता है, तब वह अपने चित्त को हृदय के स्थान पर ले जाए। वहाँ वह पितामह ब्रह्मा का ध्यान करे, जो कमल के आसन पर प्रतिष्ठित हैं और जिनके अंग रक्त तथा गौर वर्ण की आभा से युक्त हैं।

यहाँ बाहरी विधि यह है कि श्वास रोके जाने के समय ध्यान हृदय में केंद्रित किया जाए। किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है। हृदय वह स्थान है जहाँ 'अन्तर्हृदय आकाश' स्थित है, जिसे याज्ञवल्क्य जी अपनी श्रुति में चेतना का केंद्र मानते हैं। कुम्भक की अवस्था में जब प्राण स्थिर होता है, तब मन भी स्थिर होने लगता है। उस स्थिरता में जो प्रकाश प्रकट होता है, वह 'रक्त-गौर' वर्ण का है—रक्त वर्ण प्राण की शक्ति (ऊर्जा) का प्रतीक है और गौर वर्ण सात्विक ज्ञान (प्रकाश) का।

पितामह ब्रह्मा का चतुर्मुख रूप यहाँ चारों दिशाओं के ज्ञान और चारों वेदों के समन्वय का प्रतीक है। जब साधक कुम्भक में श्वास को रोकता है, तो वह बाहरी जगत से कटकर अपने भीतर के सृजन-शक्ति (ब्रह्मा) से जुड़ता है। यह अवस्था साधक को उस बिंदु पर ले जाती है जहाँ वह केवल एक शरीर नहीं, बल्कि एक विराट चेतना का अनुभव करता है। इस प्रकार, कुम्भक के माध्यम से साधक अपनी आंतरिक सृष्टि का साक्षात्कार करता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह अभ्यास प्राण और मन के एकीकरण की प्रक्रिया है। पूरक में प्राण नीचे (नाभि) की ओर गया, अब कुम्भक में वह हृदय तक ऊपर उठकर स्थिर हुआ है। साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि जब श्वास रुकता है, तब विचार रुकते हैं और हृदय में एक दिव्य प्रकाश (रक्त-गौर आभा) प्रकट होता है।

अभ्यास यह है कि कुम्भक के समय श्वास के दबाव को हृदय के केंद्र में महसूस किया जाए और वहाँ ब्रह्मा रूपी सृजनात्मक शांति का अनुभव किया जाए। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शरीर' की सीमा से उठाकर 'सूक्ष्म शरीर' के हृदय-केंद्र तक ले जाता है, जिससे चित्त में स्थिरता और प्रज्ञा का उदय होता है।

श्लोक ८.२५

रेचकेनेश्वरं ध्यायेल्ललाटस्थं त्रिलोचनम् ।

शुद्धस्फटिकसंकाशं निर्मलं पापनाशनम् ॥ ८.२५ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९२

रेचकके साथ ललाटमें स्थित, त्रिनेत्र, शुद्ध स्फटिकके समान, निर्मल, पापनाशक ईश्वर (शिव) का ध्यान करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में कुम्भक की अवस्था में हृदय स्थान पर पितामह ब्रह्मा के ध्यान की विधि बताई गई। अब ऋषि याज्ञवल्क्य प्राणायाम के अंतिम चरण 'रेचक' के समय होने वाले मानसिक एकाग्रता और देवता-चिन्तन का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(साधक) रेचकेन ललाटस्थं, त्रिलोचनम्, शुद्धस्फटिकसंकाशं, निर्मलं, पापनाशनम् ईश्वरं ध्यायेत्।

पदार्थ:

• रेचकेन: रेचक क्रिया के द्वारा (जब श्वास को शरीर से बाहर निकाला जाता है)।

• ललाटस्थं: ललाट (भ्रुकुटी के मध्य) में स्थित।

• त्रिलोचनम्: तीन नेत्रों वाले।

• शुद्धस्फटिकसंकाशं: शुद्ध स्फटिक के समान आभा वाले।

• निर्मलं: समस्त मल (अशुद्धियों) से रहित।

• पापनाशनम्: पापों का नाश करने वाले।

• ईश्वरं: ईश्वर (भगवान शिव) का।

• ध्यायेत्: ध्यान करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में प्राणायाम के तीनों चरणों—पूरक, कुम्भक और रेचक—को केवल श्वास की गति नहीं, अपितु चेतना के आरोहण और अवरोहण की एक पूर्ण प्रक्रिया माना गया है। इस श्लोक का निर्देश है कि जब साधक रेचक की अवस्था में हो, अर्थात् जब वह भीतर के समस्त प्राण को नासिका के छिद्रों से बाहर निकालकर शरीर को शून्य कर रहा हो, तब वह अपने चित्त को ललाट के स्थान पर केंद्रित करे। वहाँ वह त्रिनेत्रधारी, शुद्ध स्फटिक के समान उज्ज्वल, निर्मल और पापनाशक ईश्वर का ध्यान करे।

यहाँ बाहरी विधि यह है कि श्वास छोड़ते समय ध्यान ललाट में स्थिर किया जाए। इसका आन्तर अर्थ यह है कि रेचक केवल वायु का निष्कासन नहीं, अपितु मानसिक विकारों और अहंकार का विसर्जन है। जब साधक श्वास के साथ भीतर की जड़ता और मल को बाहर निकालता है, तब चित्त में एक विशेष प्रकार की रिक्तता और हल्कापन आता है। इस रिक्तता में ललाट का स्थान जाग्रत होता है।

'शुद्ध स्फटिक संकाश' का अर्थ है वह परम प्रकाश जो पारदर्शी है, जिसमें कोई अवरोध नहीं है। जिस प्रकार स्फटिक के भीतर से प्रकाश बिना किसी विकार के आरपार जाता है, उसी प्रकार जब साधक का चित्त निर्मल होता है, तब उसे अपने भीतर उस ईश्वर का साक्षात्कार होता है जो 'पापनाशन' है। यहाँ पाप का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु वह 'आवरण' है जो आत्मा और परमात्मा के बीच खड़ा है। रेचक की इस प्रक्रिया में जब साधक श्वास छोड़ता है, तो वह वास्तव में अपने 'अहं' को छोड़ रहा होता है, जिससे ललाट में स्थित वह दिव्य ज्योति प्रकट होती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह अभ्यास 'विसर्जन' और 'शुद्धि' का है। पूरक में ऊर्जा का संचय (नाभि) हुआ, कुम्भक में उसका ठहराव और विस्तार (हृदय) हुआ, और अब रेचक में उस ऊर्जा का परिष्करण (ललाट) हो रहा है। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि जैसे-जैसे वायु बाहर जा रही है, उसके भीतर का अंधकार और मल भी बाहर जा रहा है। ललाट में त्रिनेत्र का ध्यान साधक को 'साक्षी भाव' की ओर ले जाता है, जहाँ वह केवल शरीर नहीं, अपितु एक निर्मल प्रकाशपुंज बन जाता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर की सीमाओं से ऊपर उठाकर उस बिंदु पर ले जाता है जहाँ से आंतरिक दृष्टि (त्रिनेत्र) जाग्रत होती है और चित्त पूरी तरह निर्मल हो जाता है।

प्राणायाममाहात्म्यम्

श्लोक ८.२६

यदा निरोधसंयोगाद्देवतात्रयचिन्तनात् ।

अग्नेर्वायोरपां योगादात्मा शुद्ध्येत वै त्रिभिः ॥ ८.२६ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९२

जब निरोधके योगसे, तीनों देवताओंके चिन्तनसे, और अग्नि, वायु तथा जलके योगसे — इन तीनोंसे आत्मा (अन्तःकरण) शुद्ध होता है —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में रेचक की अवस्था में ललाट स्थित त्रिनेत्र ईश्वर के ध्यान की विधि बताई गई। अब ऋषि याज्ञवल्क्य इस संपूर्ण प्राणायाम प्रक्रिया के संश्लेषण की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ निरोध, देवता-चिन्तन और तत्वों का योग मिलकर साधक के अन्तःकरण की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यदा निरोध-संयोगात्, देवता-त्रय-चिन्तनात्, अग्नेः वायुः अपां योगात्, आत्मा शुद्ध्येत वै त्रिभिः।

पदार्थ:

• यदा: जब।

• निरोध-संयोगात्: निरोध (प्राण के ठहराव और शून्यता) के संयोग से।

• देवता-त्रय-चिन्तनात्: तीनों देवताओं (विष्णु, ब्रह्मा, शिव) के चिन्तन से।

• अग्नेः वायुः अपां योगात्: अग्नि, वायु और जल के योग (संयोजन/संतुलन) से।

• आत्मा: यहाँ आत्मा का अर्थ 'अन्तःकरण' या 'सूक्ष्म शरीर' है।

• शुद्ध्येत वै: निश्चित रूप से शुद्ध हो जाता है।

• त्रिभिः: इन तीनों (निरोध, चिन्तन और तत्व-योग) के द्वारा।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में प्राणायाम केवल श्वास-प्रश्वास का व्यायाम नहीं, अपितु एक समग्र शोधन प्रक्रिया है। इस श्लोक में याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि आत्मा (अन्तःकरण) की शुद्धि किसी एक क्रिया से नहीं, अपितु तीन विशिष्ट आयामों के मिलन से होती है।

प्रथम आयाम है—निरोध का संयोग। यहाँ निरोध का अर्थ केवल श्वास को रोकना नहीं, अपितु उस अवस्था को प्राप्त करना है जहाँ प्राण और मन की चंचलता समाप्त हो जाती है। जब पूरक, कुम्भक और रेचक के माध्यम से प्राण को नियंत्रित कर उसे एक बिंदु पर स्थिर किया जाता है, तब वह 'निरोध' कहलाता है। यह निरोध ही वह आधार है जिस पर ध्यान की (इमारत) खड़ी होती है।

द्वितीय आयाम है—देवता-त्रय का चिन्तन। पिछले तीन श्लोकों (८.२३-८.२५) में हमने देखा कि नाभि में विष्णु, हृदय में ब्रह्मा और ललाट में शिव का ध्यान बताया गया। यह केवल मानसिक कल्पना नहीं है, अपितु चेतना को नीचे (नाभि) से ऊपर (ललाट) की ओर ले जाने की यात्रा है। जब साधक इन तीन केंद्रों पर दैवीय स्वरूपों का चिन्तन करता है, तो उसके भीतर की जड़ता टूटती है और वह स्थूल शरीर से ऊपर उठकर दैवीय गुणों में प्रतिष्ठित होने लगता है।

तृतीय आयाम है—अग्नि, वायु और जल का योग। शरीर पंचमहाभूतों से निर्मित है। प्राणायाम के दौरान जब वायु (प्राण) का निरोध होता है, तो वह शरीर के भीतर एक विशेष ऊष्मा (अग्नि) उत्पन्न करता है, और उस अग्नि के शोधन से अंततः आंतरिक तरलता या अमृत (जल) का उदय होता है। इन तीन तत्वों का संतुलित योग ही शरीर के भौतिक और सूक्ष्म मल को जलाकर भस्म कर देता है।

अतः, जब ये तीनों—निरोध (स्थिरता), चिन्तन (एकाग्रता) और तत्व-योग (शोधन)—एक साथ मिलते हैं, तब साधक का अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध हो जाता है। यह शुद्धि केवल पापों का नाश नहीं, अपितु उस आवरण का हटना है जो आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से अलग रखता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक एक 'शुद्धि-सूत्र' है। योग की दृष्टि से यहाँ 'आत्मा की शुद्धि' का अर्थ है—चित्त का वह स्तर जहाँ विचार शून्य हो जाते हैं और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। साधक जब इस अभ्यास को करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसकी चेतना नाभि (सृष्टि का मूल), हृदय (रक्षण/पालन) और ललाट (लय/संहार) के केंद्रों से गुजरते हुए एक एकीकृत प्रवाह बन गई है।

अभ्यास का रहस्य यह है कि निरोध से 'वायु' स्थिर होती है, चिन्तन से 'मन' स्थिर होता है और तत्व-योग से 'शरीर' स्थिर होता है। जब शरीर, मन और प्राण तीनों एक ही लय में आ जाते हैं, तब साधक 'अशुद्धि' (तमस और रजस) से मुक्त होकर 'सत्व' की भूमि पर प्रतिष्ठित होता है। यह वह अवस्था है जहाँ से वह आगे के ध्यान और समाधि के लिए तैयार होता है।

श्लोक ८.२७

निरोधाज्जायते वायुर्वायोरग्निश्च जायते ।

अग्नेरापोऽभिजायन्ते ततोऽन्तः शुद्ध्यते त्रिभिः ॥ ८.२७ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९२

निरोधसे वायु उत्पन्न होता है, वायुसे अग्नि, और अग्निसे जल उत्पन्न होता है; उन तीनोंसे भीतर (शरीर) शुद्ध होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया था कि निरोध, देवता-त्रय के चिन्तन और तत्वों के योग से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। वर्तमान श्लोक उसी प्रक्रिया का सूक्ष्म विवरण है, जिसमें यह बताया गया है कि निरोध से तत्वों का जागरण किस क्रम में होता है और वह शुद्धि वास्तव में कैसे घटित होती है।

अन्वय और पदार्थ —

निरोधात् वायुः जायते, वायुः अग्निः च जायते, अग्नेः अपः अभिजायन्ते, ततः अन्तः शुद्ध्यते त्रिभिः।

पदार्थ:

• निरोधात्: निरोध से (प्राण के पूर्ण ठहराव और शून्यता की अवस्था से)।

• जायते: उत्पन्न होता है / जाग्रत होता है।

• वायुः: यहाँ वायु का अर्थ प्राण-शक्ति के उस सूक्ष्म वेग से है जो निरोध के समय संचित होता है।

• अग्निः: जठराग्नि और ज्ञान-अग्नि का सम्मिलित रूप।

• अपः: जल तत्त्व, जो यहाँ शीतलता और शोधन का प्रतीक है।

• अभिजायन्ते: पुनः उत्पन्न होते हैं या प्रस्फुटित होते हैं।

• ततः: उसके पश्चात।

• अन्तः: भीतर (हृदय, मन और सूक्ष्म शरीर के भीतर)।

• शुद्ध्यते: शुद्ध होता है।

• त्रिभिः: इन तीनों (वायु, अग्नि और जल) के द्वारा।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में प्राणायाम की विधि के उपरान्त अब उसके आन्तरिक प्रभाव का वर्णन है। याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं कि जब साधक पूरक, कुम्भक और रेचक के बाद 'निरोध' की स्थिति में आता है, तब शरीर के भीतर तत्वों का एक विशेष क्रम सक्रिय होता है।

प्रथम चरण है—निरोधात् जायते वायुः। जब श्वास का पूरी तरह निरोध होता है, तब वह वायु जो बाहर की ओर बह रही थी, भीतर सिमटकर एक तीव्र शक्ति बन जाती है। यह वह 'वायु' है जो जड़ता को तोड़ती है। निरोध का अर्थ केवल श्वास रोकना नहीं, अपितु प्राण को एक बिंदु पर केंद्रित करना है, जिससे सुषुप्त प्राण-शक्ति जाग्रत होकर वेगवती होती है।

द्वितीय चरण है—वायोरग्निश्च जायते। जब यह संचित वायु-शक्ति घर्षण उत्पन्न करती है या एक स्थान पर स्थिर होती है, तब उससे 'अग्नि' का प्राकट्य होता है। यह अग्नि भौतिक ताप नहीं, अपितु वह शोधक अग्नि है जो अन्तःकरण के मल, आलस्य और अविद्या के संस्कारों को जलाती है। जिस प्रकार घर्षण से अग्नि उत्पन्न होती है, उसी प्रकार प्राण के निरोध से उत्पन्न मानसिक वेग ज्ञान-अग्नि को प्रज्वलित करता है।

तृतीय चरण है—अग्नेरापोऽभिजायन्ते। अग्नि के प्रज्वलन के पश्चात, उस ताप को संतुलित करने के लिए भीतर 'अप' (जल तत्त्व) का उदय होता है। यह जल तत्त्व शांति, शीतलता और तरलता का प्रतीक है। अग्नि ने जो अशुद्धियों को जलाया, जल तत्त्व उन्हें धोकर बाहर कर देता है और चित्त को निर्मल कर देता है।

अंत में, याज्ञवल्क्य कहते हैं—ततोऽन्तः शुद्ध्यते त्रिभिः। इन तीन प्रक्रियाओं (वायु का वेग, अग्नि का दहन और जल का प्रक्षालन) के सम्मिलित प्रभाव से साधक का 'अन्तःकरण' शुद्ध होता है। यह शुद्धि केवल शारीरिक नहीं, अपितु सूक्ष्म शरीर की शुद्धि है, जिससे साधक अगले सोपान 'ध्यान' के लिए तैयार होता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

तत्वों के इस क्रम का आधार उपनिषदों की सृष्टि-प्रक्रिया है:

तैत्तिरीय उपनिषद्

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी ॥ २.१ ॥

उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ; आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथ्वी।

तैत्तिरीय उपनिषद् २.१उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 155

तैत्तिरीय उपनिषद् में बताया गया है कि आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि और अग्नि से जल की उत्पत्ति हुई। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य इसी सृष्टि-क्रम को 'प्रति-क्रम' में साधने की विधि बता रहे हैं। जहाँ सृष्टि में विस्तार हुआ, योग में संकुचन और निरोध के द्वारा उन्हीं तत्वों को पुनः जाग्रत कर शुद्धि की जाती है। उपनिषद् जहाँ 'उत्पत्ति' की बात करता है, यह स्मृति 'शोधन' की बात करती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास केवल श्वास रोकने तक सीमित नहीं है। जब साधक निरोध की स्थिति में ठहरता है, तो उसे अनुभव करना चाहिए कि उसके भीतर एक सूक्ष्म ऊर्जा (वायु) संचित हो रही है। जब वह ऊर्जा तीव्र होती है, तब उसे हृदय या मर्म स्थानों पर एक उष्णता (अग्नि) का अनुभव होता है, जो उसके मानसिक विकारों को भस्म कर रही है। इसके पश्चात, वह अनुभव करता है कि वह उष्णता एक असीम शांति और शीतलता (जल) में बदल गई है।

यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाता है। वायु (प्राण) → अग्नि (तेजस) → जल (अमृत/शांति)। इस प्रक्रिया से साधक की भूमि बदलती है; वह केवल क्रिया-काण्ड के स्तर से उठकर 'अनुभूति' के स्तर पर पहुँच जाता है। यह तत्वों का आंतरिक संतुलन ही वह 'शोधन' है, जिसके बाद ही साधक का मन एकाग्र होकर अक्षर (ब्रह्म) में लीन होने की क्षमता प्राप्त करता है।

श्लोक ८.२८

सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश ।

अपि भ्रूणहनं मासात् पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ ८.२८ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९३

व्याहृति और प्रणव सहित सोलह प्राणायाम, प्रतिदिन किये जानेपर, एक महीनेमें भ्रूणहत्यारेको भी पवित्र कर देते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के दौरान देवताओं के चिन्तन और तत्वों के जागरण से होने वाली आंतरिक शुद्धि का रहस्य बताया था। अब वे इस शुद्धि की सामर्थ्य और उसके प्रभाव के माहात्म्य का वर्णन कर रहे हैं कि यह साधना घोरतम पापों के प्रभाव को भी कैसे क्षीण करती है।

अन्वय और पदार्थ —

सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामाः तु षोडश, (यदि) अहरहः कृताः (तर्हि) अपि भ्रूणहनं मासात् पुनन्त्य।

पदार्थ:

• सव्याहृतिप्रणवकाः: व्याहृतियों (भूः, भुवः, स्वः) और प्रणव (ओंकार) के साथ युक्त।

• प्राणायामास्तु षोडश: सोलह प्राणायाम (यहाँ संख्या सोलह बार अभ्यास के दोहराव को सूचित करती है)।

• अपि: यहाँ तक कि / भी।

• भ्रूणहनं: भ्रूण की हत्या करने वाले को (यह एक अत्यंत गंभीर पाप माना गया है)।

• मासात्: एक मास (तीस दिन) के भीतर।

• पुनन्त्य: पवित्र कर देते हैं / शोधित करते हैं।

• अहरहः कृताः: प्रतिदिन किए जाने पर।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में याज्ञवल्क्य प्राणायाम की केवल विधि नहीं, अपितु उसकी शोधन-शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं। यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि प्राणायाम जब केवल श्वास का व्यायाम न रहकर 'सव्याहृतिप्रणवकाः' हो जाता है, तब वह एक महाशक्ति बन जाता है।

व्याहृतियाँ (भूः, भुवः, स्वः) साधक को स्थूल पृथ्वी से सूक्ष्म आकाश की ओर ले जाती हैं और प्रणव (ओंकार) उस यात्रा को अक्षर (परमात्मा) से जोड़ देता है। जब इस मन्त्र-शक्ति के साथ सोलह बार प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है, तो वह शरीर और चित्त के उन गहरे संस्कारों को भी जला देता है जो अत्यंत जड़ और भयानक होते हैं।

श्लोक में 'भ्रूणहनं' (भ्रूणहत्या) का उल्लेख एक प्रतीक और उदाहरण के रूप में है। शास्त्र में इसे घोर पाप माना गया है क्योंकि इसमें एक संभावित जीवन का अंत होता है, जो साधक के सूक्ष्म शरीर पर भारी बोझ और मानसिक क्लेश उत्पन्न करता है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यदि कोई साधक पूर्ण श्रद्धा और विधि से प्रतिदिन सोलह बार यह प्राणायाम करे, तो एक मास के भीतर वह व्यक्ति उस पाप के प्रभाव से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है।

यहाँ 'पुनन्त्य' (पवित्र करना) का अर्थ केवल कर्मकांडीय शुद्धि नहीं है, अपितु चित्त का वह शोधन है जहाँ साधक के भीतर की ग्लानि समाप्त होती है और वह पुनः उस पवित्रता को प्राप्त करता है जो उसके मूल स्वरूप में थी। यह इस बात का प्रमाण है कि प्राण-शक्ति और मन्त्र-शक्ति का संयोग किसी भी मानसिक या आध्यात्मिक अवरोध को हटाने में समर्थ है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश । अपि भ्रूणहनं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ ११.२४९ ॥

व्याहृति और प्रणव सहित सोलह प्राणायाम, प्रतिदिन किये जायँ तो एक मासमें भ्रूणहाको भी पवित्र कर देते हैं।

मनुस्मृति ११.२४९मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 579

यह श्लोक मनुस्मृति के प्रायश्चित्त-प्रसंग से पूर्णतः मेल खाता है। मनु भी इसी विधि और इसी संख्या (सोलह प्राणायाम) को भ्रूणहत्या जैसे घोर पाप के शोधन का साधन बताते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में इसे प्रायश्चित्त के रूप में नहीं, अपितु प्राणायाम के 'माहात्म्य' और उसकी 'शोधन-शक्ति' के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि प्राण का निग्रह और मन्त्रों का जप मिलकर सूक्ष्म शरीर की गहरी अशुद्धियों को मिटाने में सक्षम हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार-शोधन' का अभ्यास है। योग में पाप का अर्थ केवल सामाजिक अपराध नहीं, अपितु वे 'संस्कार' हैं जो चित्त में जड़ता और अंधकार पैदा करते हैं।

जब साधक व्याहृतियों और प्रणव के साथ प्राण को रोकता है, तो वह केवल वायु को नहीं रोक रहा होता, बल्कि अपने मन के बिखराव को रोककर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करता है। सोलह बार का यह दोहराव चित्त की परतों को भेदता है। एक मास का समय वह अवधि है जिसमें शरीर और मन की आदतें (वृत्तियाँ) बदलती हैं।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जिस प्रकार अग्नि सोने की अशुद्धियों को जलाकर उसे शुद्ध कर देती है, उसी प्रकार प्रणव-युक्त प्राणायाम उसके हृदय के गहरे अंधकार और ग्लानि को जलाकर उसे 'विरजा' (रागादि रहित) अवस्था की ओर ले जाता है। यह अभ्यास साधक को अपराध-बोध की निम्न भूमि से उठाकर आत्म-विश्वास और पवित्रता की उच्च भूमि पर प्रतिष्ठित करता है।

श्लोक ८.२९

प्राणायामा ब्राह्मणेन त्रयोऽपि विधिवत् कृताः ।

व्याहृतिप्रणवैः सार्द्धं(र्धं) विज्ञेयं परमं तपः ॥ ८.२९ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९३

ब्राह्मणके विधिपूर्वक किये तीन प्राणायाम भी, व्याहृतियों और प्रणवके साथ, परम तप जानने चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने बताया कि व्याहृति और प्रणव सहित सोलह बार प्राणायाम करने से भ्रूणहत्या जैसे घोर पाप का शोधन एक मास में संभव है। अब वे प्राणायाम की उस लघुतम इकाई के प्रभाव को बता रहे हैं, जो साधक को 'तप' की श्रेणी में प्रतिष्ठित करती है।

अन्वय और पदार्थ —

ब्राह्मणेन व्याहृतिप्रणवैः सार्द्धं त्रयोऽपि प्राणायामा विधिवत् कृताः, (ताः) परमं तपः विज्ञेयं।

पदार्थ:

• ब्राह्मणेन — यहाँ ब्राह्मण का अर्थ केवल जन्मना ब्राह्मण नहीं, अपितु ब्रह्म-ज्ञानी या ब्रह्म-साधक से है।

• व्याहृतिप्रणवैः सार्द्धं — भूः, भुवः, स्वः (व्याहृतियों) और ओंकार (प्रणव) के साथ युक्त।

• त्रयोऽपि — तीन (अर्थात् पूरक, कुम्भक और रेचक की एक पूर्ण क्रिया तीन बार)।

• विधिवत् कृताः — शास्त्रसम्मत विधि (देवता-ध्यान और श्वास-नियंत्रण) के अनुसार किए गए।

• परमं तपः — सर्वोच्च तपस्या।

• विज्ञेयं — जाना जाना चाहिए या अनुभव किया जाना चाहिए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम की सूक्ष्म शक्ति को उद्घाटित करता है। यहाँ 'त्रयोऽपि' शब्द का अर्थ है कि यदि कोई साधक केवल तीन बार विधिपूर्वक प्राणायाम करता है, तो वह भी 'परम तप' के समान फलदायी है। यह इस बात का संकेत है कि योग में मात्रा से अधिक 'विधि' और 'चेतना' का महत्व है।

जब प्राणायाम में व्याहृति और प्रणव जुड़ जाते हैं, तो वह केवल श्वास का नियमन नहीं रहता, अपितु एक मंत्र-यज्ञ बन जाता है। व्याहृति साधक के अस्तित्व को स्थूल (भूः), सूक्ष्म (भुवः) और कारण (स्वः) शरीरों में विस्तारित करती है, और प्रणव उस विस्तार को पुनः उस एक 'अक्षर' में समेट देता है। इस प्रक्रिया में जब श्वास का निरोध होता है, तब मन की चंचलता समाप्त होती है और साधक उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ तप का वास्तविक उदय होता है।

ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि तप केवल शरीर को कष्ट देना या वर्षों तक मौन रहना नहीं है, बल्कि प्राणों को ब्रह्म-शक्ति (प्रणव) के साथ लयबद्ध करना ही वास्तविक तप है। विधिपूर्वक किए गए तीन प्राणायाम भी इसलिए परम तप हैं क्योंकि वे साधक को क्षण भर के लिए ही सही, किन्तु उस 'अक्षर-ब्रह्म' की अनुभूति कराते हैं, जिसे प्राप्त करने के लिए अन्य साधक जीवन भर तपस्या करते हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः । व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः ॥ ६.७० ॥

ब्राह्मणके विधिपूर्वक किये, व्याहृति और प्रणवसे युक्त तीन प्राणायाम भी परम तप जानने चाहिए।

मनुस्मृति ६.७०मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 341

यह श्लोक मनुस्मृति के इस वचन के पूर्णतः समान है, जहाँ प्राणायाम को 'परम तप' कहा गया है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि जब प्राणायाम व्याहृति और प्रणव से युक्त होता है, तब उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।

मनुस्मृति

एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामाः परं तपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ २.८३ ॥

एकाक्षर (ॐ) परम ब्रह्म है, प्राणायाम परम तप हैं; सावित्रीसे बढ़कर (कोई मन्त्र) नहीं है, और मौनसे सत्य श्रेष्ठ है।

मनुस्मृति २.८३मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 178

मनुस्मृति में पुनः कहा गया है कि 'प्राणायामाः परं तपः' अर्थात् प्राणायाम परम तप हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार को विस्तार देते हुए यह बताती है कि यह तप केवल संख्या पर निर्भर नहीं है, बल्कि विधि और मन्त्रों के सही प्रयोग से तीन बार का अभ्यास भी उसी उच्च कोटि के तप के समान है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'साधना की सघनता' का है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक संख्या के पीछे भागने के बजाय, तीन बार के प्राणायाम में ही अपनी पूरी चेतना को व्याहृति और प्रणव में विलीन कर दे।

जब साधक 'भूः' कहता है, तो वह अपने प्राणों को पृथ्वी-तत्व की स्थिरता में अनुभव करे; 'भुवः' पर वायु-तत्व की गतिशीलता और 'स्वः' पर आकाश-तत्व की व्यापकता का अनुभव करे। अंत में 'ओंकार' के साथ जब वह कुम्भक (श्वास रोकना) करता है, तो वह अनुभव करता है कि समस्त ब्रह्मांड उसके भीतर सिमट गया है। यह अनुभव उसे 'साधारण अभ्यास' से उठाकर 'परम तप' की भूमि पर ले जाता है। यहाँ साधक केवल श्वास नहीं रोक रहा, बल्कि वह अपने मन के बिखराव को रोककर उसे एक बिंदु पर केंद्रित कर रहा है।

श्लोक ८.३०

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः ।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ ८.३० ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९३

जैसे धौंकी जाती धातुओंके मल जल जाते हैं, वैसे ही प्राणके निग्रहसे इन्द्रियोंके दोष जल जाते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने विधिपूर्वक किए गए तीन प्राणायामों को 'परम तप' कहकर उनकी महिमा बताई। अब वे इस तप की कार्यविधि और उसके आंतरिक प्रभाव को एक दृष्टान्त के माध्यम से समझा रहे हैं कि प्राण का निग्रह वास्तव में अंतःकरण की शुद्धि कैसे करता है।

अन्वय और पदार्थ —

यथा ध्मायमानानां धातूनां मलाः हि दह्यन्ते, तथेव प्राणस्य निग्रहात् इन्द्रियाणां दोषाः दह्यन्ते।

पदार्थ:

• ध्मायमानानां — धौंकी जाने वाली (अग्नि में तपाकर वायु के दबाव से शुद्ध की जाने वाली)।

• धातूनां — स्वर्ण, रजत या लौह जैसी धातुओं के।

• मलाः — अशुद्धियाँ, खील या विकार।

• दह्यन्ते — जल जाते हैं या भस्म हो जाते हैं।

• प्राणस्य निग्रहात् — प्राण के निग्रह (कुम्भक या निरोध) से।

• इन्द्रियाणां दोषाः — इन्द्रियों के दोष (विषय-आसक्ति, चंचलता और प्रमाद)।

• तथेव — ठीक उसी प्रकार।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम के शोधक गुण का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण करता है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'लोहार' या 'स्वर्णकार' की प्रक्रिया का उदाहरण दिया है। जब किसी धातु को अग्नि में तपाया जाता है और उसे धौंका मारकर तीव्र वायु का दबाव दिया जाता है, तो वह ताप इतना बढ़ जाता है कि धातु के भीतर की समस्त अशुद्धियाँ जलकर अलग हो जाती हैं और धातु शुद्ध, चमकदार और सुघट्य हो जाती है।

इसी प्रकार, जब साधक प्राणायाम के माध्यम से प्राण का निग्रह करता है, तो शरीर और मन के भीतर एक 'योग-अग्नि' प्रज्वलित होती है। यह अग्नि भौतिक नहीं, अपितु प्राणिक ऊर्जा का संकेंद्रण है। इन्द्रियाँ स्वभाव से बाह्य विषयों की ओर प्रवाहित होती हैं, और यही विषय-प्रवाह उनके 'दोष' हैं। जब प्राण को निग्रहित किया जाता है, तो इन्द्रियों का यह बाह्य प्रवाह रुक जाता है और ऊर्जा भीतर की ओर मुड़ती है। इस आंतरिक दबाव और ताप से इन्द्रियों के संस्कार, वासनाएँ और प्रमाद—जो कि मानसिक मल हैं—भस्म होने लगते हैं।

यहाँ 'दह्यन्ते' (जल जाना) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ केवल विनाश नहीं, बल्कि रूपांतरण है। जैसे अग्नि धातु को नष्ट नहीं करती, बल्कि उसे शुद्ध कर उसके वास्तविक स्वरूप को प्रकट करती है, वैसे ही प्राण-निग्रह साधक की इन्द्रियों को नष्ट नहीं करता, बल्कि उन्हें 'दोषमुक्त' कर उन्हें आत्म-साक्षात्कार के योग्य बनाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

इस श्लोक का सीधा संबंध मनुस्मृति से है:

मनुस्मृति

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः । तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ ६.७१ ॥

जैसे धौंकी जाती धातुओंके मल जल जाते हैं, वैसे ही प्राणके निग्रहसे इन्द्रियोंके दोष जल जाते हैं।

मनुस्मृति ६.७१मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 806

यह स्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। दोनों ही प्राणायाम की तुलना धातु-शोधन की प्रक्रिया से करते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि योग की यह विधि प्राचीन ऋषियों के सामूहिक अनुभव का निचोड़ है।

इसी फल की पुष्टि पातञ्जल योगसूत्र में भी मिलती है:

योगसूत्र

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ २.५२ ॥

उससे प्रकाशका आवरण क्षीण होता है।

योगसूत्र २.५२पातञ्जल योगदर्शन — व्यासभाष्य (theVyasa) · पृष्ठ 103

जहाँ महर्षि पतंजलि कहते हैं कि प्राणायाम से 'प्रकाशावरण' क्षीण होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में जिसे 'इन्द्रियों के दोषों का जलना' कहा गया है, योगसूत्र में वही 'आवरण का क्षय' है। जब इन्द्रियों के दोष जल जाते हैं, तभी आत्मा का स्वाभाविक प्रकाश (चित्त-प्रकाशा) प्रकट होता है। दोनों ग्रंथों का निष्कर्ष एक ही है—प्राण का निग्रह अज्ञान और मल का विनाश कर आत्म-प्रकाश का मार्ग प्रशस्त करता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अभ्यास' और 'अनुभव' के सेतु का कार्य करता है। साधक जब पूरक और रेचक के बीच 'कुम्भक' (प्राण-निग्रह) का अभ्यास करता है, तो वह अनुभव करता है कि मन की चंचलता अचानक थम गई है। वह क्षण 'धौंकनी' के समान है, जहाँ प्राण का दबाव बढ़ता है।

अभ्यास की विधि यह है कि साधक जब प्राण को रोके, तब वह केवल श्वास को न रोके, बल्कि अपनी चेतना को इन्द्रियों के दोषों (जैसे काम, क्रोध, मोह) पर केंद्रित करे। वह यह अनुभव करे कि कुम्भक के समय उत्पन्न होने वाला आंतरिक ताप उसके मानसिक विकारों को जला रहा है।

साधक इस अभ्यास से 'भ्रम' की भूमि से 'विवेक' की भूमि की ओर जाता है। जब इन्द्रियों के दोष जल जाते हैं, तब इन्द्रियाँ अब विषयों की दासी नहीं रहतीं, बल्कि वे आत्मा के आदेश का पालन करने वाली यंत्र बन जाती हैं। यह स्थिति 'प्रत्याहार' की पूर्व-तैयारी है, क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ शुद्ध हो चुकी हैं, उसके लिए उन्हें अंतर्मुख करना सरल हो जाता है।

श्लोक ८.३१

अह्ना रात्र्या च यान् जन्तून् हिनस्त्यज्ञानतो यतिः ।

तेषां स्नात्वा विशुद्ध्यर्थं प्राणायामान् षडाचरेत् ॥ ८.३१ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९३

यति दिन और रातमें अनजाने जिन जन्तुओंकी हिंसा करता है, उसकी शुद्धिके लिए स्नान करके छः प्राणायाम करे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम की तुलना धातु-शोधन की प्रक्रिया से करते हुए बताया कि जिस प्रकार धौंकनी की वायु और अग्नि धातुओं के मल जला देती है, वैसे ही प्राण-निग्रह इन्द्रियों के दोषों को भस्म कर देता है। अब वे इस शोधन-शक्ति का प्रयोग एक विशेष परिस्थिति में—अनजाने में हुई हिंसा के परिमार्जन के लिए—बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

यतिः अह्ना रात्र्या च अज्ञानतो यान् जन्तून् हिनस्ति, तेषां विशुद्ध्यर्थं स्नात्वा षड् प्राणायामान् आचरेत्।

पदार्थ:

• यतिः — वह साधक जिसने संसार का त्याग कर योग और संयम का मार्ग चुना है (यहाँ 'यति' शब्द केवल संन्यासी के लिए नहीं, अपितु आत्म-संयम के पथ पर अग्रसर हर साधक के लिए है)।

• अह्ना रात्र्या च — दिन और रात में (अर्थात् २४ घंटे के चक्र में, किसी भी समय)।

• अज्ञानतो — बिना किसी दुर्भावना के, अनजाने में या असावधानीवश।

• हिनस्ति — हिंसा करता है (मारता है या कष्ट देता है)।

• विशुद्ध्यर्थं — पूर्ण शुद्धि के लिए (हिंसा से उत्पन्न सूक्ष्म मानसिक और कार्मिक दोषों के निवारण हेतु)।

• स्नात्वा — स्नान करके (बाहरी जल-स्नान, जो शरीर और मन की प्रथम शुद्धि है)।

• षड् प्राणायामान् — छह बार प्राणायाम (संख्या निश्चित है—छह बार)।

• आचरेत् — अभ्यास करे या पालन करे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक अहिंसा के प्रति एक योगी की अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि को प्रकट करता है। सामान्यतः माना जाता है कि यदि हिंसा जानबूझकर न की गई हो, तो उसका कोई पाप नहीं लगता। किंतु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि हिंसा का प्रभाव केवल 'इच्छा' पर निर्भर नहीं करता, अपितु उस क्रिया से उत्पन्न 'दोष' भी साधक के सूक्ष्म शरीर और प्राण-प्रवाह को प्रभावित करते हैं।

एक यति या साधक का जीवन अत्यंत संवेदनशील होता है। जब वह चलते हुए, बैठते हुए या किसी कार्य में लीन रहते हुए अनजाने में किसी सूक्ष्म जीव की हत्या कर देता है, तो वह क्रिया उसके अंतःकरण में एक सूक्ष्म अवरोध उत्पन्न करती है। यह अवरोध उसे पूर्ण एकाग्रता और समाधि की अवस्था में जाने से रोकता है। इसलिए, इस 'अज्ञानतो' हुई हिंसा के शोधन के लिए दो चरणों वाली विधि बताई गई है: प्रथम 'स्नान' और द्वितीय 'छह प्राणायाम'।

स्नान शरीर की स्थूल अशुद्धि और मन की जड़ता को हटाता है, किंतु प्राणिक स्तर पर हुई हिंसा के दोष को केवल 'प्राण' के द्वारा ही धोया जा सकता है। यहाँ छह प्राणायामों का विधान है। जैसा कि इस स्मृति में प्राणायाम का अर्थ सव्याहृति, सप्रणव और गायत्री के साथ पूरक, कुम्भक और रेचक का अभ्यास है, अतः साधक को छह बार इस संपूर्ण प्रक्रिया को दोहराना है। यह संख्या छह, शरीर के षट्-शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) के दमन और प्राणों के संतुलन का प्रतीक है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

अह्ना रात्र्या च याञ्जन्तून्हिनस्त्यज्ञानतो यतिः । तेषां स्नात्वा विशुद्ध्यर्थं प्राणायामान्षडाचरेत् ॥ ६.६९ ॥

यति दिन और रातमें अनजाने जिन जन्तुओंको मारता है, उनकी (हिंसासे) शुद्धिके लिए स्नान करके छः प्राणायाम करे।

मनुस्मृति ६.६९मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 805

यह श्लोक मनुस्मृति के विधान के साथ पूर्णतः मेल खाता है। मनु ने भी यति के लिए अनजानी हिंसा की शुद्धि हेतु स्नान और छह प्राणायामों का ही निर्देश दिया है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन ऋषियों के बीच इस बात पर पूर्ण सहमति थी कि प्राण-साधना केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन नहीं है, अपितु यह एक 'दिव्य औषधि' और 'शोधक' भी है, जो अनजाने में हुए पापों या दोषों का निवारण करने में सक्षम है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का गूढ़ रहस्य 'अहिंसा की सूक्ष्मता' में है। योग मार्ग में केवल 'हिंसा न करना' पर्याप्त नहीं है, अपितु 'हिंसा-मुक्त' होना आवश्यक है। अनजानी हिंसा से जो सूक्ष्म ग्लानि या दोष उत्पन्न होता है, वह चित्त की वृत्तियों में कंपन पैदा करता है।

जब साधक स्नान के पश्चात छह बार प्राणायाम करता है, तो वह वास्तव में अपने प्राणों को पुनः व्यवस्थित कर रहा होता है। कुम्भक के समय जब प्राण स्थिर होता है, तब वह आंतरिक अग्नि प्रज्वलित होती है, जो उस अनजानी हिंसा से उपजे 'कर्म-बीज' को भस्म कर देती है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि प्राण की शक्ति भौतिक जल से अधिक शोधक है। यह अभ्यास उसे 'सावधानी' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह अपनी हर चेष्टा के प्रति सजग हो जाता है ताकि भविष्य में अनजानी हिंसा की संभावना भी समाप्त हो जाए। इस प्रकार, यह विधि साधक को केवल शुद्धि नहीं देती, अपितु उसे 'अति-सजगता' की अवस्था की ओर अग्रसर करती है।

श्लोक ८.३२

प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषम् ।

प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥ ८.३२ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९३

प्राणायामोंसे दोषोंको जलाये, धारणाओंसे पापको, प्रत्याहारसे (विषयोंके) संसर्गोंको, और ध्यानसे अनीश्वर (आत्माको पराधीन करनेवाले) गुणोंको।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अनजाने में हुई हिंसा के परिमार्जन हेतु छह प्राणायामों की विधि बताई। अब वे प्राणायाम से आगे बढ़कर योग के अन्य अन्तरङ्ग अंगों—धारणा, प्रत्याहार और ध्यान—के विशिष्ट शोधन-फल को स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक जान सके कि किस अवस्था में किस प्रकार की अशुद्धि का नाश होता है।

अन्वय और पदार्थ —

प्राणायामैः दोषान् दहेत्, धारणाभिः किल्बिषम्, प्रत्याहारेण संसर्गान्, ध्यानेन अनीश्वरान् गुणान् (दहेत्)।

पदार्थ:

• प्राणायामैः — पूरक, कुम्भक और रेचक की समन्वित प्रक्रिया से (यहाँ बहुवचन का प्रयोग निरंतर अभ्यास और विभिन्न प्रकार के प्राणायामों के लिए है)।

• दहेत् — जलाये या भस्म करे (अग्नि के समान पूर्ण विनाश करना)।

• दोषान् — शारीरिक, मानसिक और प्राणिक अशुद्धियाँ (जैसे तामसिकता, आलस्य और प्राण का असंतुलन)।

• धारणाभिः — चित्त को किसी एक बिंदु या देवता पर एकाग्र करने की क्रिया से।

• किल्बिषम् — पाप या गहरे संस्कार (वे मानसिक छाप जो बार-बार उन्हीं गलतियों की ओर ले जाती हैं)।

• प्रत्याहारेण — इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ने की क्रिया से।

• संसर्गान् — विषयों के साथ आसक्ति या जुड़ाव (वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति मोह और मानसिक निर्भरता)।

• ध्यानेन — उस एकाग्रता की निरंतरता, जहाँ ध्याता और ध्येय का भेद मिटने लगे।

• अनीश्वरान् गुणान् — वे गुण जो 'अनीश्वर' हैं, अर्थात् जो आत्मा (ईश्वर) के अधीन नहीं हैं, अपितु आत्मा को पराधीन कर देते हैं (जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक योग-साधना की एक वैज्ञानिक सोपान-विधि प्रस्तुत करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि साधक की शुद्धि एक स्तर में नहीं, अपितु क्रमिक चरणों में होती है। जिस प्रकार धातु-शोधन में पहले स्थूल मल हटाया जाता है और फिर सूक्ष्म अशुद्धियों को जलाया जाता है, वैसे ही योग के चार अन्तरङ्ग अंग साधक के व्यक्तित्व की चार अलग-अलग परतों का शोधन करते हैं।

प्रथम चरण प्राणायाम है। प्राणायाम का मुख्य कार्य 'दोषों' का दाह करना है। यहाँ दोषों का अर्थ है—प्राण का अवरुद्ध होना और शरीर में विषाक्त तत्वों का संचय। जब साधक सव्याहृति और सप्रणव गायत्री के साथ प्राण-निग्रह करता है, तो वह 'योगाग्नि' प्रज्वलित होती है, जो शरीर और मन की जड़ता (तामस) को जला देती है।

द्वितीय चरण धारणा है। जब प्राण स्थिर होता है, तब चित्त को एक स्थान पर टिकाया जाता है। धारणा का फल 'किल्बिष' का नाश है। किल्बिष केवल बाहरी पाप नहीं, अपितु वे गहरे संस्कार हैं जो अवचेतन मन में जमे हुए हैं। जब चित्त एक बिंदु पर केंद्रित होता है, तो वह लेजर किरण की भाँति उन पुराने संस्कारों को जला देता है।

तृतीय चरण प्रत्याहार है। धारणा के बाद जब साधक इन्द्रियों को विषयों से खींचता है, तब 'संसर्ग' का अंत होता है। संसर्ग का अर्थ है—बाहरी जगत के साथ वह मानसिक तार जो हमें विचलित करता है। प्रत्याहार से साधक यह अनुभव करता है कि उसकी तृप्ति विषयों में नहीं, अपितु उसके अपने भीतर है।

अंतिम चरण ध्यान है। ध्यान की अग्नि सबसे प्रखर होती है। यह उन 'अनीश्वर गुणों' को जलाती है जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढके हुए हैं। 'अनीश्वर' का अर्थ है—वह जो स्वयं का स्वामी नहीं है, अपितु वासनाओं के अधीन है। ध्यान के माध्यम से साधक उन गुणों को भस्म कर देता है जो उसे अपनी आत्मा से दूर रखते हैं, जिससे वह 'ईश्वर' (अपने वास्तविक स्वरूप) में प्रतिष्ठित हो जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम् । प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ ६.७२ ॥

प्राणायामोंसे दोषोंको जलाये, धारणाओंसे पापको, प्रत्याहारसे (विषयोंके) संसर्गको, और ध्यानसे अनीश्वर (आत्माको ढकनेवाले) गुणोंको।

मनुस्मृति ६.७२मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 806

यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति के छठे अध्याय के ७२वें श्लोक से मेल खाता है। मनुस्मृति और बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति दोनों ही यहाँ एक ही सत्य को प्रतिपादित कर रहे हैं कि योग के अंग केवल मानसिक शांति के साधन नहीं हैं, अपितु वे 'अग्नि' के समान हैं जो साधक के भीतर की अशुद्धियों को जलाकर उसे शुद्ध करते हैं। दोनों ग्रन्थों में प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और ध्यान का यही क्रम और यही फल बताया गया है, जो यह सिद्ध करता है कि यह योग-परम्परा का सर्वमान्य और प्राचीन सिद्धांत है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक 'शुद्धि-मानचित्र' है। अभ्यास के दौरान साधक को यह अनुभव होता है कि:

१. जब वह प्राणायाम करता है, तो शरीर में एक ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो आलस्य और जड़ता (दोषों) को नष्ट करती है।

२. जब वह धारणा का अभ्यास करता है, तो मन की चंचलता रुकती है और पुराने मानसिक बोझ (पाप/संस्कार) हल्के होने लगते हैं।

३. प्रत्याहार के समय वह अनुभव करता है कि बाहरी आकर्षणों की शक्ति क्षीण हो रही है और वह स्वयं में पूर्ण हो रहा है।

४. ध्यान की अवस्था में वह उन सूक्ष्म प्रवृत्तियों (अनीश्वर गुणों) के विसर्जन का अनुभव करता है, जो उसे अब तक 'मैं' और 'मेरा' के बंधन में बाँधे हुए थे।

इस प्रकार साधक स्थूल दोषों से सूक्ष्म गुणों के दाह तक की यात्रा करता है, जिससे वह 'अविद्या' के अंधकार से निकलकर 'विज्ञानघन' स्वरूप की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ८.३३

यथा पर्वतधातूनां दोषान् दहति पावकः ।

एवमन्तर्गतं चैनः प्राणायामेन दह्यते ॥ ८.३३ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९३

जैसे अग्नि पर्वतकी धातुओंके दोषोंको जलाती है, वैसे ही भीतरका पाप प्राणायामसे जल जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और ध्यान के क्रमिक शोधन-फल को स्पष्ट किया था। अब वे प्राणायाम की उस दहन-शक्ति की गहराई को समझाने के लिए एक भौतिक उपमा का सहारा ले रहे हैं, जिससे साधक यह समझ सके कि प्राण का निग्रह केवल वायु का नियंत्रण नहीं, अपितु एक आंतरिक अग्नि का प्रज्वलन है।

अन्वय और पदार्थ —

यथा पावकः पर्वतधातूनां दोषान् दहति, एवम् अन्तर्गतं च (पापम्/मलम्) प्राणायामेन दह्यते।

पदार्थ:

• पावकः — अग्नि। यहाँ इसका अर्थ केवल भौतिक अग्नि नहीं, अपितु 'प्राण-अग्नि' या 'तप' है।

• पर्वतधातूनां — पर्वतों में स्थित खनिजों या धातुओं का।

• दोषान् — अशुद्धियों को। जैसे सोने या लोहे के साथ मिली मिट्टी, गंधक या अन्य अवांछित तत्व जो उसकी शुद्धता और चमक को रोकते हैं।

• दहति — जलाकर नष्ट कर देता है।

• अन्तर्गतं च — जो भीतर स्थित है। यहाँ 'च' का प्रयोग पिछले श्लोकों में वर्णित 'दोषों' और 'किल्बिषों' के संदर्भ में है, जो सूक्ष्म शरीर और चित्त की गहराइयों में अंतर्निहित हैं।

• प्राणायामेन — प्राण के नियमन (पूरक, कुम्भक, रेचक) द्वारा।

• दह्यते — जला दिया जाता है या भस्म हो जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम के 'तप' स्वरूप को उद्घाटित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सटीक उपमा दे रहे हैं। जिस प्रकार पर्वत की गहराइयों में दबी धातुओं में अनेक अशुद्धियाँ (दोष) होती हैं, जिन्हें केवल तीव्र अग्नि में तपाकर ही अलग किया जा सकता है—ताकि धातु अपनी शुद्धतम अवस्था और वास्तविक चमक प्राप्त कर सके—ठीक उसी प्रकार मनुष्य के भीतर भी संस्कारों और पापों की एक गहरी परत जमी होती है।

यह 'अन्तर्गत' पाप केवल बाहरी क्रियाओं का परिणाम नहीं है, अपितु वह प्राणों के प्रवाह में अवरोध के रूप में स्थित है। जब साधक विधिपूर्वक प्राणायाम करता है, तो वह केवल श्वास नहीं ले रहा होता, बल्कि अपने भीतर 'प्राण-अग्नि' को प्रज्वलित कर रहा होता है। यह अग्नि भौतिक नहीं, बल्कि चेतना की वह तीव्रता है जो कुम्भक (प्राणों के ठहराव) के समय उत्पन्न होती है। जब प्राण स्थिर होता है, तब वह ऊष्मा (तप) में परिवर्तित हो जाता है, जो चित्त के गहनतम स्तरों में छिपे हुए तामसिक दोषों और पाप-बीजों को जलाकर भस्म कर देती है।

यहाँ 'दहन' का अर्थ विनाश नहीं, अपितु 'शुद्धीकरण' है। जैसे अग्नि सोने को जलाती नहीं, बल्कि उसे शुद्ध करती है, वैसे ही प्राणायाम साधक के व्यक्तित्व को नष्ट नहीं करता, बल्कि उसे उन दोषों से मुक्त करता है जो उसे उसकी मूल दिव्यता (अक्षर स्वरूप) से अलग कर रहे थे।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः । तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥ ६.७१ ॥

जैसे धौंकी जाती धातुओंके मल जल जाते हैं, वैसे ही प्राणके निग्रहसे इन्द्रियोंके दोष जल जाते हैं।

मनुस्मृति ६.७१मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 806

मनुस्मृति में भी इसी सिद्धांत का समर्थन करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार धौंकनी के द्वारा हवा फूँकने से धातुओं के मल जल जाते हैं, उसी प्रकार प्राण के निग्रह से इन्द्रियों के दोष जल जाते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ एक ही सत्य को प्रतिपादित कर रहे हैं: प्राण का नियंत्रण एक 'धौंकनी' की भांति कार्य करता है जो आंतरिक अग्नि को तीव्र करता है, और यही तीव्रता अशुद्धियों के दहन का एकमात्र साधन है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'तप' के अनुभव का निर्देश है। अभ्यास के दौरान जब साधक कुम्भक की अवस्था में प्राणों को रोकता है, तो उसे शरीर और मन में एक विशेष प्रकार की ऊष्मा या दबाव का अनुभव होता है। यह वह 'पावक' है जिसका उल्लेख यहाँ है।

साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि यह ऊष्मा उसके भीतर के आलस्य, प्रमाद और पुराने मानसिक संस्कारों (दोषों) को जला रही है। जिस प्रकार धातु की अशुद्धि जलने पर वह पारदर्शी या चमकदार हो जाती है, उसी प्रकार प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से साधक का अंतःकरण निर्मल होने लगता है। वह अनुभव करता है कि उसके भीतर का 'भारीपन' (तामसिकता) धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है और वह सूक्ष्मता की ओर बढ़ रहा है। यह अभ्यास उसे 'स्थूल' शरीर के बंधन से निकालकर 'सूक्ष्म' प्राणिक शरीर की शुद्धि की ओर ले जाता है, जिससे आगे चलकर ध्यान की भूमि सुगम हो जाती है।

श्लोक ८.३४

विरजं चतुर्गुणं कृत्वा नियतात्मा जितेन्द्रियः ।

प्राणायामैश्चतुर्भिस्तु मुच्यते ह्युपपातकात् ॥ ८.३४ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९४

विरजा (मन्त्र) को चार बार (जपकर), संयतात्मा और जितेन्द्रिय (साधक) चार प्राणायामोंसे उपपातकसे छूट जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम की तुलना पर्वत की धातुओं को शुद्ध करने वाली अग्नि से की थी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि प्राणायाम चित्त के अंतर्निहित पापों को भस्म करने वाला तप है। अब वे इस शोधन प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करने के लिए मन्त्र-शक्ति और प्राण-शक्ति के समन्वय का विधान बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

नियतात्मा जितेन्द्रियः विरजं चतुर्गुणं कृत्वा, चतुर्भिः प्राणायामैः ह्युपपातकात् मुच्यते।

पदार्थ:

• नियतात्मा — जिसकी आत्मा (चित्त) नियम में बंधी हो; जो संकल्प-विकल्प से मुक्त होकर एकनिष्ठ हो चुका है।

• जितेन्द्रियः — जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है। यहाँ इन्द्रिय-विजय का अर्थ दमन नहीं, अपितु इन्द्रियों के विषयों से हटकर उन्हें अंतर्मुखी करना है।

• विरजं — 'विरजा' मन्त्र। 'रज' का अर्थ है रजोगुण या धूलि (अशुद्धि)। अतः वह मन्त्र जो रजोगुण का नाश कर साधक को विरज (शुद्ध/रजोविहीन) अवस्था में ले जाए।

• चतुर्गुणं कृत्वा — संभवतः चार बार पाठ करने से या उसकी चार गुना शक्ति के प्रयोग से।

• चतुर्भिः प्राणायामैः — चार बार किए गए प्राणायामों द्वारा। यहाँ संख्या 'चार' का विशेष महत्व है, जो संभवतः चार दिशाओं, चार वेदों या चार वायु-स्थितियों के शोधन का संकेत है।

• उपपातकात् — 'उपपातक' वे लघु पाप या दोष होते हैं जो मुख्य महापातक नहीं हैं, किन्तु सूक्ष्म शरीर पर मल के रूप में चिपके रहते हैं और आध्यात्मिक उन्नति में बाधक बनते हैं।

• मुच्यते — मुक्त हो जाता है; छूट जाता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक मन्त्र और प्राण के संयुक्त प्रभाव से होने वाले शोधन का रहस्य खोलता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ केवल एक विधि नहीं बता रहे, अपितु एक अनिवार्य योग्यता भी रख रहे हैं—'नियतात्मा' और 'जितेन्द्रिय'। इसका भाव यह है कि यदि साधक का मन चंचल है और इन्द्रियाँ विषयों में भटक रही हैं, तो केवल मन्त्र का पाठ या प्राण का निग्रह यांत्रिक क्रिया मात्र रह जाएगा। जब साधक का अंतःकरण स्थिर होता है, तभी मन्त्र की ध्वनि और प्राण की शक्ति एक बिंदु पर केंद्रित होकर 'उपपातक' रूपी सूक्ष्म अशुद्धियों को काट पाती हैं।

यहाँ 'विरजा' मन्त्र का चार बार जप और चार प्राणायामों का विधान है। विरजा मन्त्र का उद्देश्य साधक को रजोगुण से ऊपर उठाना है। रजोगुण ही वह कारक है जो मनुष्य को कर्मों के जाल और उपपातक दोषों में फँसाता है। जब विरजा मन्त्र की शक्ति से चित्त निर्मल होता है और साथ में चार प्राणायामों द्वारा प्राणवायु का नियमन किया जाता है, तब शरीर और मन के सूक्ष्म स्तरों पर जमा 'मल' धुल जाता है।

उपपातक वे दोष हैं जो अनजाने में या सूक्ष्म वासनाओं के कारण संचित होते हैं। इन्हें हटाने के लिए केवल बाहरी प्रायश्चित पर्याप्त नहीं होता, अपितु आंतरिक 'योगाग्नि' की आवश्यकता होती है। विरजा मन्त्र उस अग्नि का बीज है और प्राणायाम उस अग्नि को प्रज्वलित करने वाला पवन। इन दोनों के समन्वय से साधक उन बंधनों से मुक्त हो जाता है जो उसे उसकी वास्तविक स्वरूप-प्राप्ति से रोक रहे थे।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-प्राण-संयोग' का अभ्यास है। यहाँ अभ्यास का क्रम यह है कि पहले इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अंतर्मुखी किया जाए (जितेन्द्रिय), फिर मन को एक लक्ष्य पर स्थिर किया जाए (नियतात्मा)। इसके पश्चात विरजा मन्त्र का चार बार जप करते हुए, चार बार प्राणायाम (पूरक, कुम्भक, रेचक) का अभ्यास करना है।

योगिक अनुभव यह होता है कि मन्त्र जप से जो सूक्ष्म स्पंदन उत्पन्न होता है, प्राणायाम उस स्पंदन को पूरे शरीर और हृदय-आकाश में प्रसारित कर देता है। जब यह स्पंदन उपपातक दोषों (मानसिक अवरोधों) से टकराता है, तो वे भस्म हो जाते हैं। साधक इस अभ्यास से 'रजोमय' अवस्था से 'सत्वमय' अवस्था की ओर बढ़ता है। यह प्रक्रिया उसे उस भूमि पर ले जाती है जहाँ चित्त पूरी तरह विरज (शुद्ध) हो जाता है और वह उच्चतर ध्यान की अवस्था के लिए तैयार होता है।

श्लोक ८.३५

मन्त्रैर्होमैर्मार्जनाभ्युक्षणैश्च प्राणायामैर्योगसिद्धिं जयन्ति ।

निर्धूतपापा विरजा विशुद्धा योगाग्निना दग्धबीजा व्रजन्ति ॥ ८.३५ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९४

मन्त्रों, होमों, मार्जन-अभ्युक्षणों और प्राणायामोंसे (साधक) योगसिद्धि पाते हैं; पापरहित, रजोरहित, विशुद्ध होकर, योगाग्निसे (कर्मके) बीज जलाकर (परम पदको) जाते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में विरजा मन्त्र और प्राणायाम के संयोग से उपपातक के क्षय का विधान बताया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस शोधन प्रक्रिया को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए यह स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल प्राणायाम ही नहीं, अपितु वैदिक कर्मकाण्ड के समस्त अंग जब योग के साथ जुड़ते हैं, तब साधक किस परम अवस्था को प्राप्त करता है।

अन्वय और पदार्थ —

मन्त्रैः, होमैः, मार्जनाभ्युक्षणैः च, प्राणायामैः योगसिद्धिं जयन्ति। (ते) निर्धूतपापा विरजा विशुद्धाः, योगाग्निना दग्धबीजाः (परमपदं) व्रजन्ति।

पदार्थ:

• मन्त्रैः — पवित्र ध्वनियों और बीजों के जप द्वारा।

• होमैः — आहुतियों के द्वारा। बाहरी होम अग्नि में दी जाती है, आन्तर होम में प्राण को ज्ञान की अग्नि में समर्पित किया जाता है।

• मार्जनाभ्युक्षणैः — 'मार्जन' का अर्थ है धोना या शुद्ध करना और 'अभ्युक्षण' का अर्थ है पवित्र जल का छिड़काव करना। यह शरीर और चित्त की बाह्य एवं सूक्ष्म शुद्धि की प्रक्रिया है।

• प्राणायामैः — प्राण के नियमन और निग्रह द्वारा।

• योगसिद्धिं जयन्ति — योग की पूर्णता या समाधि की अवस्था को प्राप्त करते हैं।

• निर्धूतपापा — जिनके समस्त पाप (मानसिक और शारीरिक मल) पूरी तरह झड़ चुके हों।

• विरजा — रजोगुण से रहित; जिसमें अब कोई सांसारिक आसक्ति या धूलि शेष न हो।

• विशुद्धाः — जो पूर्णतः निर्मल हो चुके हैं।

• योगाग्निना — योग की प्रज्वलित अग्नि द्वारा। यह वह तप है जो अभ्यास और वैराग्य से उत्पन्न होता है।

• दग्धबीजाः — जिनके कर्मों के बीज जल चुके हैं। संस्कार जब तक बीज रूप में रहते हैं, वे पुनर्जन्म का कारण बनते हैं; उनके जल जाने पर पुनरावृत्ति समाप्त हो जाती है।

• व्रजन्ति — प्रवेश करते हैं या गमन करते हैं (परम पद की ओर)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक की यात्रा के पूर्ण मानचित्र को प्रस्तुत करता है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य यह रहस्य खोल रहे हैं कि मन्त्र, होम, मार्जन, अभ्युक्षण और प्राणायाम—ये अलग-अलग क्रियाएँ नहीं, बल्कि एक ही सोपान के विभिन्न चरण हैं।

सबसे पहले 'मार्जन और अभ्युक्षण' से स्थूल शरीर और त्वचा की शुद्धि होती है, फिर 'मन्त्रों' के जप से वाणी और मन की शुद्धि होती है, 'होम' के द्वारा अंतःकरण की अशुद्धियों की आहुति दी जाती है और अंततः 'प्राणायाम' से प्राण और प्राणमय कोष का शोधन होता है। जब ये पाँचों साधन एक साथ मिलते हैं, तब साधक 'योगसिद्धि' को प्राप्त करता है। यहाँ योगसिद्धि का अर्थ केवल सिद्धियों की प्राप्ति नहीं, अपितु आत्मा का परमात्मा में लय होना है।

श्लोक का दूसरा भाग इस शोधन का चरम फल बताता है। जब साधक 'निर्धूतपाप' और 'विरज' हो जाता है, तब वह 'योगाग्नि' के संपर्क में आता है। यह योगाग्नि वह प्रखर तप है जो केवल बाहरी कर्मों को नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म बीजों को जला देती है जिनसे भविष्य के जन्म और दुःख उत्पन्न होते हैं। 'दग्धबीज' होना ही मोक्ष की वास्तविक अवस्था है। जिस प्रकार बीज जल जाने पर वृक्ष नहीं उगता, उसी प्रकार जब वासना और कर्म के बीज जल जाते हैं, तब पुनर्जन्म का चक्र टूट जाता है और साधक उस परम पद को प्राप्त करता है जहाँ से फिर लौटना नहीं पड़ता।

शास्त्र-साक्ष्य —

श्रीमद्भगवद्गीता

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ४.३७ ॥

अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनको भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मोंको भस्म कर देती है।

श्रीमद्भगवद्गीता ४.३७गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 137

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में वर्णित 'योगाग्नि' और गीता की 'ज्ञानाग्नि' एक ही तत्त्व के दो नाम हैं। स्मृति यहाँ यह जोड़ती है कि यह ज्ञान-अग्नि केवल बौद्धिक विचार से नहीं, अपितु मन्त्र, होम और प्राणायाम जैसे साधनों के समन्वय से प्रज्वलित होती है। कर्म (होम-मार्जन) और ज्ञान (मन्त्र-योग) का यह समुच्चय ही बीज-दहन का कारण बनता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'संस्कार-क्षय' है। योग मार्ग में हम केवल पापों का विलोपन नहीं करते, बल्कि उन 'बीजों' (संस्कारों) को जलाते हैं जो अवचेतन में सोए हुए हैं।

अभ्यास की विधि यह है कि साधक जब मन्त्र जप और प्राणायाम करता है, तो उसके भीतर एक ऊष्मा (तप) उत्पन्न होती है। यह ऊष्मा ही 'योगाग्नि' है। जब यह अग्नि तीव्र होती है, तब वह हृदय और मन के उन सूक्ष्म बीजों को जला देती है जो 'मैं' और 'मेरा' के भाव से जुड़े हैं।

साधक अनुभव करता है कि वह पहले 'विशुद्ध' हुआ (बाहरी मल गया), फिर 'विरज' हुआ (मानसिक रजोगुण गया) और अंत में 'दग्धबीज' हुआ (कारण ही समाप्त हो गया)। इस अवस्था में पहुँचकर साधक किसी बाहरी स्वर्ग की खोज नहीं करता, बल्कि अपने भीतर ही उस परम पद का अनुभव करता है। इस श्लोक का अभ्यास यह सिखाता है कि साधना केवल शांति के लिए नहीं, बल्कि पूर्ण विलोपन (बीज-दहन) के लिए होनी चाहिए।

श्लोक ८.३६

प्राणायामशतं कार्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।

उपपातकजातीनामनादिष्टस्य चैव हि ॥ ८.३६ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९४

सौ प्राणायाम करने चाहिए — (ये) सब पापोंका नाश करते हैं: उपपातक-वर्गके (पापोंका) और जिनका (प्रायश्चित्त) नहीं कहा गया उनका भी।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र, होम और मार्जन के साथ प्राणायाम के समन्वय से कर्म-बीजों के दहन और योगसिद्धि की चर्चा की थी। अब वे प्राणायाम की संख्या और उसकी शोधन-शक्ति का एक विशिष्ट विधान बता रहे हैं, जो साधक को उन पापों से भी मुक्त करने में सक्षम है जिनका प्रायश्चित्त शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं है।

अन्वय और पदार्थ —

(साधक) प्राणायामशतं कार्यं, (यत्) सर्वपापप्रणाशनम्, उपपातकजातीनाम् (प्रणाशनम्) और अनादिष्टस्य चैव हि (प्रणाशनम्)।

पदार्थ:

• प्राणायामशतं कार्यम् — सौ प्राणायाम करने चाहिए। यहाँ 'शत' संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु एक पूर्ण चक्र की पूर्णाहुति का संकेत है।

• सर्वपापप्रणाशनम् — समस्त पापों का समूल नाश करने वाला। 'प्रणाशन' का अर्थ है केवल ढंकना नहीं, बल्कि जड़ से मिटा देना।

• उपपातकजातीनाम् — उपपातक वर्ग के पापों का। उपपातक वे लघु पाप होते हैं जो मुख्य महापातक नहीं हैं, किन्तु चित्त पर मल की भाँति जम जाते हैं और साधक की एकाग्रता में बाधा डालते हैं।

• अनादिष्टस्य — जिसका (प्रायश्चित्त) नहीं कहा गया है। 'आदिष्ट' का अर्थ है शास्त्र द्वारा निर्देशित या आदेशित। जो पाप अनजाने में हुए हों या जिनके लिए विशिष्ट प्रायश्चित्त विधि उपलब्ध न हो, उन्हें 'अनादिष्ट' कहा गया है।

• चैव हि — और निश्चित रूप से।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ प्राणायाम की उस विलक्षण शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं, जो कर्मकाण्ड की जटिल विधियों से परे एक सीधा और प्रभावी मार्ग है। वे कहते हैं कि सौ प्राणायामों का अभ्यास समस्त पापों का नाश करता है। यहाँ 'पाप' का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु वह 'मल' है जो आत्मा के प्रकाश को ढंक लेता है।

स्मृति का यह कथन उन साधकों के लिए अत्यंत कल्याणकारी है जो अपने सूक्ष्म दोषों या अनजाने में हुए अपराधों के कारण ग्लानि से ग्रस्त रहते हैं। प्रायः शास्त्रों में महापातक (जैसे ब्रह्महत्या, चोरी आदि) के लिए कठोर प्रायश्चित्त दिए गए हैं, किन्तु अनेक ऐसे 'उपपातक' या सूक्ष्म मानसिक विकार होते हैं जिनके लिए कोई विशिष्ट विधि 'आदिष्ट' (निर्देशित) नहीं मिलती। ऐसे समय में, जब साधक यह नहीं जानता कि वह किस अपराध का प्रायश्चित्त करे, तब प्राणायाम एक सार्वभौमिक शोधक के रूप में कार्य करता है।

बाहरी दृष्टि से यह सौ बार प्राणों के लय और विस्तार की क्रिया है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह चित्त की उस गहरी सफाई की प्रक्रिया है जहाँ प्राण की अग्नि सूक्ष्म से सूक्ष्म संस्कार को भी जला देती है। जब साधक सौ प्राणायामों के अनुशासन में उतरता है, तो वह केवल वायु का नियंत्रण नहीं करता, अपितु अपने भीतर के उस 'अक्षर' पुरुष को जाग्रत करता है जो समस्त विकारों से परे है। यह विधि बताती है कि जहाँ शब्द (शास्त्र) मौन हो जाते हैं या जहाँ विधि उपलब्ध नहीं होती, वहाँ 'प्राण' स्वयं विधि बन जाता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से, यह श्लोक साधक को 'शोधन-भूमि' से 'शुद्धि-भूमि' की ओर ले जाता है। सौ की संख्या यहाँ एक मानसिक संकल्प और अनुशासन का प्रतीक है। जब साधक सौ बार पूरक, कुम्भक और रेचक के चक्र को पूर्ण करता है, तो उसके भीतर एक ऐसी ऊष्मीय ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो चित्त के उन कोनों तक पहुँचती है जहाँ दबे हुए संस्कार (अनादिष्ट पाप) स्थित होते हैं।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि प्राण का निग्रह केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नहीं, अपितु मानसिक विरेचन के लिए है। अभ्यास यह है कि प्रत्येक प्राणायाम के साथ साधक यह भाव रखे कि उसकी श्वास के साथ अशुद्धियाँ बाहर निकल रही हैं और कुम्भक की स्थिरता में वह उन दोषों को अग्नि में भस्म कर रहा है। यह अभ्यास साधक को उस अवस्था में लाता है जहाँ वह 'पाप-मुक्त' होकर केवल 'साक्षी' भाव में स्थित हो जाता है, जिससे उसके लिए उच्चतर ध्यान और समाधि के द्वार खुल जाते हैं।

श्लोक ८.३७

यदह्ना कुरुते पापं कर्मणा मनसा गिरा ।

त्रिकालसंध्याकरणात् प्राणायामैर्व्यपोहति ॥ ८.३७ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९४

मनुष्य दिनमें कर्म, मन और वाणीसे जो पाप करता है, उसे तीनों कालकी संध्या करनेसे (और) प्राणायामोंसे दूर कर देता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सौ प्राणायामों की उस शोधन-शक्ति का वर्णन किया, जो उन पापों का भी नाश करती है जिनका शास्त्र में कोई विशिष्ट प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है। अब वे इस शोधन-प्रक्रिया को साधक की दैनिक जीवन-चर्या से जोड़ते हुए, संध्या और प्राणायाम के समन्वित प्रभाव को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(मनुष्य) यदह्ना कर्मणा मनसा गिरा पापं कुरुते, (तद्) त्रिकालसंध्याकरणात् (और) प्राणायामैः व्यपोहति।

पदार्थ:

• यदह्ना — जो दिन में (अहन् = दिन)। यहाँ 'दिन' का अर्थ केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय नहीं, अपितु जाग्रत अवस्था है, जिसमें इंद्रियाँ बाह्य जगत के संपर्क में रहती हैं।

• कर्मणा मनसा गिरा — शरीर (कर्म), मन और वाणी द्वारा। ये तीन द्वार हैं जिनसे मनुष्य संसार से जुड़ता है और इन्हीं के माध्यम से पाप या मल का संचय होता है।

• त्रिकालसंध्याकरणात् — तीनों कालों (प्रातः, मध्याह्न और सायं) की संध्या करने से। संध्या केवल समय नहीं, अपितु वह संधि-काल है जहाँ साधक बाह्य जगत से हटकर अंतर्जगत की ओर मुड़ता है।

• प्राणायामैः — प्राणायामों के द्वारा। यहाँ प्राणायाम साधन है।

• व्यपोहति — दूर कर देता है, धो डालता है या मिटा देता है। 'व्यपोह' का अर्थ है किसी वस्तु को हटाकर उसे शुद्ध कर देना, जैसे वस्त्र को धोकर मलमुक्त किया जाता है।

भाष्य —

महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ मनुष्य की स्वाभाविक त्रुटियों और उनके निवारण का मार्ग बता रहे हैं। साधक जब तक पूर्णतः स्थितप्रज्ञ नहीं हो जाता, तब तक जाग्रत अवस्था में उसके मन में विकार, वाणी में कठोरता और कर्मों में अशुद्धि आने की संभावना बनी रहती है। यह 'पाप' वास्तव में चित्त पर जमा हुआ वह सूक्ष्म मल है, जो साधक और उसके इष्ट (अक्षर) के बीच एक पर्दे का कार्य करता है।

ऋषि कहते हैं कि दिनभर में शरीर, मन और वाणी से जो भी अशुद्धियाँ हुई हैं, उन्हें 'त्रिकाल संध्या' और 'प्राणायाम' के संयोग से धोया जा सकता है। यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि संध्या और प्राणायाम को एक साथ रखा गया है। संध्या मन्त्रों और संकल्प की शक्ति है, जबकि प्राणायाम प्राण-शक्ति के निरोध और विस्तार की क्रिया है। जब मन्त्र की शक्ति (संध्या) और प्राण की शक्ति (प्राणायाम) का मिलन होता है, तब वह एक ऐसी 'अग्नि' उत्पन्न करता है जो मानसिक और कार्मिक संस्कारों को भस्म कर देती है।

यह विधान यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर केवल पश्चाताप पर्याप्त नहीं है, अपितु एक निश्चित क्रियात्मक विधि आवश्यक है। जैसे शरीर की शुद्धि के लिए स्नान आवश्यक है, वैसे ही सूक्ष्म शरीर की शुद्धि के लिए त्रिकाल संध्या और प्राणायाम अनिवार्य हैं।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ २.१०२ ॥

प्रातःसन्ध्यामें खड़े होकर (सावित्रीका) जप करनेवाला रातके पापको दूर करता है, और सायंसन्ध्यामें बैठकर (जप करनेवाला) दिनमें किये मलको नष्ट करता है।

मनुस्मृति २.१०२मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 241

मनुस्मृति में भी संध्या के शोधन-गुण का वर्णन मिलता है, जहाँ कहा गया है कि प्रातः संध्या रात के पापों को और सायं संध्या दिन के मलों को नष्ट करती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार को और अधिक विस्तार देती है। जहाँ मनुस्मृति मुख्य रूप से संध्या-जप पर बल देती है, वहीं याज्ञवल्क्य यहाँ 'प्राणायाम' को जोड़कर इसे एक पूर्ण योगिक प्रक्रिया बना देते हैं। यह संकेत है कि केवल मन्त्रों का उच्चारण (जप) पर्याप्त नहीं है, जब तक कि प्राणों को स्थिर न किया जाए; क्योंकि प्राण ही वह वाहन है जो मन्त्र की शक्ति को हृदय के गहराई तक ले जाता है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-शुद्धि' के अभ्यास का सूत्र है। साधक के लिए 'पाप' का अर्थ है—चित्त की वह चंचलता जो उसे केंद्र से दूर ले जाती है।

१. कर्मणा (शरीर) का शोधन प्राणायाम के शारीरिक अनुशासन से होता है।

२. गिरा (वाणी) का शोधन संध्या के मन्त्रों के नाद से होता है।

३. मनसा (मन) का शोधन कुम्भक और निरोध से होता है।

साधक जब त्रिकाल संध्या करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के सूर्य (हृदय-पुरुष) को जाग्रत करता है। प्राणायाम के माध्यम से वह अपनी बिखरी हुई प्राण-शक्ति को समेटकर एक बिंदु पर लाता है। इस प्रक्रिया में, दिन भर के संचित मानसिक तनाव और विकार 'व्यपोह' हो जाते हैं। साधक इस अभ्यास से 'मलिन' अवस्था से 'निर्मल' अवस्था की ओर बढ़ता है, जिससे उसकी एकाग्रता गहरी होती है और वह अगले सोपान—ध्यान—के लिए तैयार होता है।

श्लोक ८.३८

ब्रह्महा च सुरापश्च अगम्यागमने रतः ।

सुवर्णस्तेयि चौरश्च गोघ्नो विस्रम्भघातकः ॥ ८.३८ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९४

ब्रह्महत्यारा, सुरा पीनेवाला, अगम्यागमनमें लगा, सोना चुरानेवाला, चोर, गोहत्यारा, विश्वासघाती,

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि जाग्रत अवस्था में मन, वाणी और शरीर से हुए पापों का निवारण त्रिकाल संध्या और प्राणायाम से संभव है। अब वे उन घोर पापों की सूची दे रहे हैं, जिन्हें सामान्यतः अक्षम्य या अत्यंत कठिन प्रायश्चित्त वाला माना जाता है, ताकि यह सिद्ध हो सके कि प्राणायाम की शोधन-शक्ति कितनी व्यापक है।

अन्वय और पदार्थ —

ब्रह्महा (च), सुरापः (च), अगम्यागमने रतः (च), सुवर्णस्तेयिः (च), चौरः (च), गोघ्नः (च), विस्रम्भघातकः (च)।

पदार्थ:

• ब्रह्महा — ब्रह्महत्यारा। वह जिसने किसी ब्राह्मण या ज्ञान-स्वरूप पुरुष की हत्या की हो।

• सुरापः — मदिरा या नशीले पदार्थों का सेवन करने वाला।

• अगम्यागमने रतः — जो ऐसे स्थानों या संबंधों में प्रवेश करने में लगा हो जहाँ जाना वर्जित है (जैसे परस्त्री-गमन या वर्जित मर्यादाओं का उल्लंघन)।

• सुवर्णस्तेयिः — स्वर्ण की चोरी करने वाला।

• चौरः — सामान्य चोर।

• गोघ्नः — गौ-हत्या करने वाला।

• विस्रम्भघातकः — विश्वासघाती; वह जो किसी के अटूट विश्वास (विस्रम्भ) को तोड़कर उसे चोट पहुँचाता है।

भाष्य —

यह श्लोक अपने आप में पूर्ण वाक्य नहीं है, अपितु पिछले श्लोकों में वर्णित 'सर्वपापप्रणाशन' की व्याख्या कर रहा है और अगले श्लोक (८.३९-८.४०) की क्रिया 'प्राणायामशतं कुर्युः' (सौ प्राणायाम करें) से जुड़ा हुआ है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य उन पापों का उल्लेख कर रहे हैं जो सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत गंभीर माने गए हैं।

जब हम 'ब्रह्महा' या 'गोघ्न' जैसे शब्दों को पढ़ते हैं, तो बाहरी विधि के अनुसार यह हिंसा और मर्यादा-भंग के पाप हैं। किंतु योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में इनका एक आन्तर अर्थ भी है। 'ब्रह्म' केवल व्यक्ति नहीं, अपितु वह बोध है जो सर्वव्यापी है। जब साधक अपने भीतर के ज्ञान-स्वरूप को अज्ञान के वश में मारकर वासनाओं को पुष्ट करता है, तो वह एक प्रकार की 'ब्रह्महत्या' ही है। इसी प्रकार, 'सुराप' का आन्तर अर्थ है—इन्द्रिय-सुख के मद में डूबकर विवेक को खो देना। 'अगम्यागमन' का अर्थ है—चेतना का अपनी स्वाभाविक उच्च अवस्था (अक्षर) को छोड़कर निम्न वृत्तियों (काम, क्रोध) में गिर जाना।

यहाँ इन घोर पापों की सूची इसलिए दी गई है ताकि साधक यह जान सके कि प्राणायाम केवल मानसिक शांति का साधन नहीं, अपितु वह 'योगाग्नि' है जो चित्त के गहरे से गहरे संस्कारों और संचित पापों के बीजों को भस्म करने की क्षमता रखती है। यह स्मृति यहाँ यह संकेत दे रही है कि जहाँ सामान्य प्रायश्चित्त केवल बाहरी दंड या कर्मकांड तक सीमित रहते हैं, वहीं प्राणायाम प्राण-शक्ति के माध्यम से सीधे उस केंद्र पर प्रहार करता है जहाँ पाप का संस्कार जमा होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शोधन' की प्रक्रिया का वर्णन है। योग में पाप का अर्थ है—'मल' या 'क्लेश'। जिस प्रकार धातु के भीतर की अशुद्धियाँ उसे दुर्बल बनाती हैं, वैसे ही ये घोर पाप साधक के प्राण-मार्ग में अवरोध उत्पन्न करते हैं। जब साधक पूरक, कुम्भक और रेचक के माध्यम से प्राण को नियंत्रित करता है, तो वह केवल वायु का व्यायाम नहीं कर रहा होता, अपितु वह अपने भीतर एक ऐसी अग्नि प्रज्वलित करता है जो इन संस्कारों के 'बीजों' को जला देती है।

यह श्लोक साधक को यह विश्वास दिलाता है कि चाहे अतीत कितना भी अंधकारमय रहा हो, यदि वह सूर्योदय के समय पूर्ण निष्ठा से सौ प्राणायामों का अभ्यास करता है, तो वह अपनी चेतना को पुनः शुद्ध कर सकता है। यहाँ अभ्यास का केंद्र 'प्राण' है, क्योंकि प्राण ही वह सेतु है जो स्थूल शरीर को सूक्ष्म आत्मा से जोड़ता है; जब सेतु शुद्ध होता है, तो ऊपर की ओर जाने वाला मार्ग स्वतः खुल जाता है।

श्लोक ८.३९

शरणागतघाती च कूटसाक्षी ह्यकार्यकृत् ।

एवमादिष्वथान्येषु पापेष्वभिरताश्चिरम् ॥ ८.३९ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९४

शरणागतका हत्यारा, झूठा साक्षी, अकार्य करनेवाला — ऐसे और दूसरे पापोंमें लंबे समय तक लगे रहे (लोग भी) —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ब्रह्महत्या, मदिरापान और विश्वासघात जैसे घोर पापों का उल्लेख किया गया था। वर्तमान श्लोक उसी सूची को पूर्ण करता है, जिसमें उन पापों को रखा गया है जो मनुष्य के अंतःकरण को जड़ और मलिन कर देते हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(यह श्लोक भी अपने आप में पूर्ण वाक्य नहीं है; यह श्लोक 8.38 की सूची को आगे बढ़ाता है और इसकी क्रिया अगले श्लोक 8.40 में 'प्राणायामशतं कुर्युः' के रूप में आती है।)

अन्वय: शरणागतघाती च, कूटसाक्षी, ह्यकार्यकृत्, एवम् आदिष्वथान्येषु पापेषु अभिरताः चिरम्... (ते च)

पदार्थ:

• शरणागतघाती: शरण में आए हुए व्यक्ति की हत्या करने वाला।

• कूटसाक्षी: न्यायालय या समाज में झूठी गवाही देने वाला।

• अकार्यकृत्: वह जो शास्त्र-विरुद्ध, अनैतिक या निषिद्ध कर्म (अकार्य) करता है।

• अभिरताः चिरम्: लंबे समय तक उनमें लीन या रत रहने वाले।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ उन पापों का वर्णन है जो केवल सामाजिक अपराध नहीं, अपितु साधक की चेतना के लिए 'विष' के समान हैं। शरणागत की हत्या करना, झूठी गवाही देना और निषिद्ध कर्मों में रत रहना—ये ऐसी क्रियाएँ हैं जो मनुष्य के भीतर 'सत्य' के प्रवाह को अवरुद्ध कर देती हैं।

यहाँ 'चिरम्' (लंबे समय तक) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक पापों में रत रहता है, तो वह पाप उसके स्वभाव (संस्कार) बन जाता है। ऐसे संस्कार अंतःकरण की परतों में गहरे धँस जाते हैं, जिन्हें सामान्य प्रायश्चित या केवल पश्चाताप से निकालना कठिन होता है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि जब पाप 'संस्कार' बन जाए, तब उसे केवल 'प्राण-शक्ति' के तीव्र शोधन से ही मिटाया जा सकता है।

यह श्लोक हमें बताता है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे उसने कितने ही घोर पाप किए हों या वह लंबे समय तक अधर्म में रहा हो, यदि वह सही विधि से प्राणायाम का आश्रय लेता है, तो उसके लिए मुक्ति का द्वार खुला है। यह स्मृतिका पाप की गहराई से अधिक प्राणायाम की शोधन-शक्ति को महान सिद्ध करती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से, पाप का अर्थ है—प्राण का विचलित होना और चित्त का मलिन होना। शरणागत की हत्या या कूटसाक्ष्य जैसे कर्म हृदय में घोर संताप और भय उत्पन्न करते हैं, जिससे प्राणों का स्वाभाविक लय टूट जाता है। जब साधक 'प्राणायाम' का अभ्यास करता है, तो वह केवल वायु को नहीं रोकता, बल्कि अपने भीतर की उस 'योगाग्नि' को प्रज्वलित करता है जो संचित संस्कारों को जला देती है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि प्राण का निरोध और फिर उसका लयबद्ध प्रवाह, मन के उन गहरे अवरोधों को तोड़ देता है जो पापों के कारण बने थे। यह अभ्यास उसे 'पाप-भूमि' से उठाकर 'शुद्धि-भूमि' की ओर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को पापों के बोझ से मुक्त कर हल्का अनुभव करता है।

श्लोक ८.४०

प्राणायामशतं कुर्युः सूर्यस्योदयनं प्रति ।

निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ८.४० ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९४

— सूर्योदयके समय सौ प्राणायाम करें, (तो) निर्मल होकर पुण्यात्मा सज्जनोंकी भाँति स्वर्गको जाते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में उन घोर पापों और संस्कारों की सूची दी गई थी, जो मनुष्य की चेतना को जड़ कर देते हैं। वर्तमान श्लोक उन पापों से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए शोधन का मार्ग और उसके फल का विधान करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (ब्रह्महा च... अभिरताश्चिरम्) ते सूर्यस्योदयनं प्रति प्राणायामशतं कुर्युः, (तदा) सुकृतिनो सन्तः निर्मलाः यथा स्वर्गमायान्ति।

पदार्थ:

• सूर्यस्योदयनं प्रति: सूर्य के उदय होने के समय (अरुणोदय या सूर्योदय काल में)।

• प्राणायामशतं कुर्युः: सौ बार प्राणायाम का अभ्यास करें।

• निर्मलाः: अंतःकरण के मल (राग, द्वेष, मोह) से रहित।

• सुकृतिनो: जिनके पुण्य कर्म प्रधान हो गए हों या जिन्होंने अब श्रेष्ठ कृति (साधना) कर ली हो।

• यथा: उसी प्रकार (जैसे सज्जन जाते हैं)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ यह विधान है कि जो व्यक्ति घोर पापों में लंबे समय तक लिप्त रहा हो, वह यदि सूर्योदय के समय सौ प्राणायाम करे, तो वह निर्मल होकर पुण्यात्माओं की भाँति स्वर्ग को प्राप्त करता है।

यहाँ 'सूर्योदय' का समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। सूर्य केवल बाहरी प्रकाश का स्रोत नहीं है, अपितु वह चेतना का प्रतीक है। जब प्रकृति में अंधकार समाप्त होता है और सूर्य का उदय होता है, तब साधक के भीतर भी अविद्या के अंधकार को मिटाने का सर्वोत्तम समय होता है। इस संधि-काल में प्राणों का नियमन करने से वह प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

'सौ प्राणायाम' की संख्या यहाँ केवल गिनती नहीं, अपितु एक निश्चित अनुशासन और तीव्रता का संकेत है। जब पाप संस्कार गहरे और पुराने (चिरम्) होते हैं, तो उन्हें उखाड़ने के लिए प्राण-शक्ति का तीव्र घर्षण आवश्यक होता है। जैसे अग्नि तपे बिना स्वर्ण शुद्ध नहीं होता, वैसे ही प्राणों के सचेतन नियमन के बिना अंतःकरण का मल नहीं धुलता।

यहाँ 'निर्मलाः' शब्द का प्रयोग किया गया है। पाप केवल एक सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि चित्त पर जमी एक परत (मल) है। प्राणायाम इस परत को हटाकर साधक को उसकी मूल शुद्धता में प्रतिष्ठित कर देता है। जब साधक निर्मल होता है, तो वह 'सुकृति' (पुण्यात्मा) बन जाता है। यहाँ स्वर्ग का अर्थ केवल परलोक की कोई भौतिक जगह नहीं, अपितु वह उच्च मानसिक अवस्था है जहाँ दुःख का अभाव है और आनंद की उपस्थिति है।

यह विधान दर्शाता है कि याज्ञवल्क्य की दृष्टि में प्राण-साधना इतनी शक्तिशाली है कि वह घोरतम पापों के प्रभाव को भी क्षीण कर सकती है और मनुष्य को पुनः सद्मार्ग पर ला सकती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का रहस्य 'प्राण-शुद्धि' और 'सौर-ऊर्जा' के संयोग में है। सूर्योदय के समय जब ब्रह्मांडीय प्राण-शक्ति का प्रवाह तीव्र होता है, तब सौ बार प्राणायाम करने से साधक अपने व्यक्तिगत प्राणों को उस विराट सौर-चेतना से जोड़ता है।

अभ्यास यह है कि सूर्योदय के समय सव्याहृति और सप्रणव गायत्री के साथ प्राणों का नियमन किया जाए। जब प्राण स्थिर होते हैं, तो मन की चंचलता समाप्त होती है और अंतःकरण का शोधन होता है। यह अभ्यास साधक को 'तमस' (पाप और जड़ता) से निकालकर 'सत्व' (निर्मलता और प्रकाश) की भूमि पर ले जाता है। यहाँ सौ प्राणायामों का अभ्यास चित्त की उस एकाग्रता को जन्म देता है, जिससे साधक अपने भीतर के सूर्य (आत्मा) का साक्षात्कार करने के योग्य बनता है।

श्लोक ८.४१

सूर्यस्योदयनं प्राप्य निर्मला गतकिल्बिषाः ।

भवन्ति भास्कराकारा विधूमा इव पावकाः ॥ ८.४१ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९४

सूर्योदय पाकर (वे) निर्मल और निष्पाप होकर सूर्यके समान आकारवाले हो जाते हैं, जैसे धुएँरहित अग्नि।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महापातकियों के लिए सूर्योदय काल में सौ प्राणायामों के द्वारा शोधन और स्वर्ग-प्राप्ति का विधान बताया गया था। वर्तमान श्लोक उस शोधन की अवस्था और साधक के स्वरूप में आने वाले परिवर्तन का सूक्ष्म वर्णन करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (ते) सूर्यस्योदयनं प्राप्य, किल्बिषाः गत (भूत्वा), निर्मलाः (भवन्ति) । (ते) पावकाः विधूमा इव, भास्कराकारा भवन्ति।

पदार्थ:

• सूर्यस्योदयनं प्राप्य: सूर्य के उदय होने के समय को प्राप्त होकर (यहाँ समय और सूर्य की किरणों के स्पर्श दोनों का अर्थ है)।

• गतकिल्बिषाः: किल्बिष (पाप, मानसिक मल, दोष) से मुक्त होकर।

• निर्मलाः: दोषरहित, शुद्ध अंतःकरण वाले।

• भास्कराकारा: सूर्य के समान स्वरूप वाले (तेजस्वी, प्रकाशमय)।

• विधूमा इव पावकाः: जैसे धुएँ से रहित अग्नि हो।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं, जब सौ प्राणायामों का तीव्र अभ्यास करने वाला साधक सूर्योदय के प्रकाश से मिलता है। वे कहते हैं कि ऐसा साधक 'निर्मला' और 'गतकिल्बिषाः' हो जाता है।

यहाँ 'किल्बिष' का अर्थ केवल बाहरी पाप नहीं, अपितु वे मानसिक संस्कार हैं जो आत्मा के प्रकाश को ढँक लेते हैं। प्राणायाम के द्वारा जब प्राणों का निरोध होता है, तब अंतःकरण में एक आंतरिक अग्नि प्रज्वलित होती है। जब यह आंतरिक अग्नि बाहरी सूर्य (भास्कर) के उदय के साथ एकाकार होती है, तब साधक के समस्त पाप-संस्कार भस्म हो जाते हैं।

ऋषि ने इसकी तुलना 'विधूमा पावकाः' से की है—अर्थात् ऐसी अग्नि जिससे धुआँ निकलना बंद हो गया हो। धुआँ किसका प्रतीक है? धुआँ उस अविद्या और मोह का प्रतीक है जो अग्नि (ज्ञान) के होने पर भी उसे ढक कर रखता है। जब तक साधना अपूर्ण है, तब तक ज्ञान की अग्नि में 'संस्कारों का धुआँ' उठता रहता है, जिससे दृष्टि धुंधली रहती है। किंतु जब प्राणायाम की पूर्णता आती है, तब वह अग्नि 'निर्मल' हो जाती है। धुआँ समाप्त होने पर अग्नि का वास्तविक स्वरूप—प्रकाश और ताप—प्रकट होता है।

इसी प्रकार, जब साधक के भीतर से पापों का धुआँ छँट जाता है, तब वह 'भास्कराकारा' हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उसका भौतिक शरीर सूर्य जैसा हो जाए, अपितु उसका तेज, उसकी आभा और उसकी चेतना सूर्य के समान प्रखर और प्रकाशमय हो जाती है। वह स्वयं एक ज्योतिर्मय पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शोधन' से 'तेजस' की यात्रा है। सौ प्राणायामों का अभ्यास प्राणों में एक घर्षण उत्पन्न करता है, जिससे शरीर और मन की अशुद्धियाँ (किल्बिष) जलने लगती हैं। सूर्योदय के समय किया गया यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर से उठाकर सूक्ष्म प्रकाश-मय शरीर की ओर ले जाता है।

अभ्यास यह है कि साधक जब प्राणायाम के बाद सूर्य के उदय को देखता है, तो वह बाहरी सूर्य को अपने भीतर के सूर्य (हृदय-ज्योति) से जोड़े। जैसे-जैसे 'धुआँ' (मानसिक विक्षेप) कम होता है, साधक अनुभव करता है कि उसका स्वरूप अब केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं, बल्कि प्रकाश का एक पुंज है। यह अवस्था साधक को जड़ता से निकालकर उसे 'तेजस' की भूमि पर प्रतिष्ठित करती है, जहाँ वह स्वयं प्रकाशमय होकर सत्य का साक्षात्कार करने में समर्थ होता है।

ध्यानमाहात्म्यम्

श्लोक ८.४२

ध्यानेन सदृशं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् ।

श्वपाकेष्वपि भुञ्जानो ध्यायी नैव तु लिप्यते ॥ ८.४२ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

ध्यानके समान पापकर्मोंका कोई शोधन नहीं है; ध्यान करनेवाला चाण्डालोंके यहाँ भोजन करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महापातकियों के लिए सूर्योदय काल में सौ प्राणायामों के द्वारा शोधन और उनके स्वरूप के सूर्य के समान प्रकाशमय होने का वर्णन किया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य प्राणायाम की उस पराकाष्ठा की चर्चा कर रहे हैं जहाँ साधक 'ध्यान' की स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाता है, जो समस्त शोधनों में सर्वश्रेष्ठ है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: पापकर्मणाम् शोधनं ध्यानेन सदृशं नास्ति । ध्यायी श्वपाकेषु अपि भुञ्जानो नैव तु लिप्यते।

पदार्थ:

• पापकर्मणाम्: पाप कर्मों का (यहाँ पाप का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु चित्त के वे मल और संस्कार हैं जो आत्मा को बंधन में डालते हैं)।

• शोधनं: शुद्ध करने वाला, परिष्कृत करने वाला।

• सदृशं नास्ति: उसके समान कोई दूसरा नहीं है (अर्थात् ध्यान ही सर्वोच्च शोधक है)।

• श्वपाकेषु: चाण्डालों या अशुद्ध माने जाने वाले लोगों के यहाँ।

• भुञ्जानो: भोजन करते हुए (यहाँ भोजन का अर्थ भौतिक आहार और संगति दोनों से है)।

• नैव तु लिप्यते: कदापि लिप्त नहीं होता (संस्कारों का प्रभाव उस पर नहीं पड़ता)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से ध्यान की अपार शक्ति और उसकी शोधक क्षमता का उद्घोष कर रहे हैं। वे कहते हैं कि पाप कर्मों के शोधन के लिए ध्यान के समान कोई अन्य साधन नहीं है।

यहाँ 'शोधन' का अर्थ केवल बाह्य शुद्धि या प्रायश्चित नहीं है, अपितु यह एक आंतरिक रूपांतरण है। पूर्व के श्लोकों में प्राणायाम द्वारा पापों के क्षय की बात कही गई थी, किंतु ध्यान वह स्थिति है जहाँ साधक उस स्रोत में स्थित हो जाता है जहाँ पाप का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। जब साधक का चित्त एकाग्र होकर उस 'अक्षर' या 'परम पुरुष' में लीन हो जाता है, तब उसके अंतःकरण में एक ऐसी दिव्य अग्नि प्रज्वलित होती है जो जन्म-जन्मांतर के संचित संस्कारों को भस्म कर देती है।

ऋषि एक अत्यंत कठोर उदाहरण देते हैं कि ध्यानी पुरुष 'श्वपाकों' (चाण्डालों) के यहाँ भोजन करते हुए भी लिप्त नहीं होता। शास्त्र के अनुसार, अशुद्ध व्यक्ति या स्थान के संपर्क से संस्कार ग्रहण किए जाते हैं, किंतु जो साधक ध्यान में स्थित है, उसका संबंध बाहरी जगत से नहीं, अपितु अपने भीतर के सूर्य (आत्मा) से है। जिस प्रकार अग्नि में पड़ी कोई भी वस्तु अग्नि के ताप से शुद्ध हो जाती है, उसी प्रकार ध्यानी का अंतःकरण इतना प्रदीप्त होता है कि बाहरी कोई भी अशुद्धि उसे स्पर्श नहीं कर पाती। यह कथन वास्तव में ध्यान की महिमा का 'अर्थवाद' है, जो यह सिद्ध करता है कि आंतरिक शुद्धि, बाह्य शुद्धि और सामाजिक मर्यादाओं से कहीं अधिक शक्तिशाली और स्थायी होती है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-शुद्धि' की उच्चतम अवस्था का संकेत है। प्राणायाम जहाँ वायु के निरोध द्वारा मन को स्थिर करता है, वहीं ध्यान उस स्थिरता को 'शून्यता' या 'पूर्णता' में बदल देता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह अब केवल क्रियाओं (कर्मों) का पुंज नहीं है, बल्कि वह 'द्रष्टा' बन गया है। जब वह इस स्थिति में होता है, तब वह 'लिप्त' नहीं होता, क्योंकि लिप्त होने के लिए 'अहंकार' का होना आवश्यक है। ध्यान अहंकार का विसर्जन कर देता है। साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अभ्यास करता है कि उसकी चेतना बाहरी परिस्थितियों, व्यक्तियों या वातावरण से प्रभावित न होकर अपने केंद्र (हृदय-आकाश) में स्थित रहे।

यह वह भूमि है जहाँ साधक 'कर्म' से ऊपर उठकर 'स्थितप्रज्ञ' होने की ओर अग्रसर होता है। यहाँ अभ्यास यह है कि बाह्य जगत के संपर्क में रहते हुए भी भीतर की ज्योति को अखंड रखा जाए, जिससे संसार की कोई भी अशुद्धि साधक के आंतरिक प्रकाश को धूमिल न कर सके।

पूरकादित्रयफलम्

श्लोक ८.४३

पूरके विष्णुसायुज्यं कुम्भके ब्रह्मणोऽन्तिकं ।

रेचकेन तृतीयेन प्राप्नुयादैश्वरं पदम् ॥ ८.४३ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

पूरकसे विष्णुका सायुज्य, कुम्भकसे ब्रह्माका सान्निध्य, और तीसरे रेचकसे ईश्वरका पद पाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ध्यान की सर्वोच्च शोधक क्षमता का वर्णन करते हुए यह बताया गया कि ध्यानस्थ योगी समस्त बाह्य अशुद्धियों और संस्कारों से मुक्त रहता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य प्राणायाम की क्रिया के तीन अंगों—पूरक, कुम्भक और रेचक—के सूक्ष्म आध्यात्मिक फलों का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: पूरकेन विष्णुसायुज्यं, कुम्भकेन ब्रह्मणः अन्तिकं, (तथा) तृतीयेन रेचकेन ईश्वरं पदम् प्राप्नुयात्।

पदार्थ:

• पूरक: श्वास भीतर खींचने की क्रिया (प्राण का अंतर्ग्रहण)।

• विष्णुसायुज्यं: विष्णु के साथ एकत्व या सायुज्य मुक्ति (जहाँ जीव और ईश्वर का भेद मिट जाता है)।

• कुम्भक: श्वास को भीतर रोके रखने की क्रिया।

• ब्रह्मणोऽन्तिकं: ब्रह्मा के सान्निध्य में या उनके निकट (सृष्टि के मूल कारण और ज्ञान के अधिष्ठाता के समीप)।

• रेचक: श्वास को बाहर छोड़ने की क्रिया।

• तृतीयेन: यहाँ 'तृतीयेन' का अर्थ तीसरे चरण (रेचक) से है।

• ईश्वरं पदम्: ईश्वर का पद, वह सर्वोच्च अवस्था जहाँ साधक पूर्ण स्वातंत्र्य और ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।

• प्राप्नुयात्: प्राप्त कर लेता है (विधिलिङ् का प्रयोग, जो अभ्यास से प्राप्त होने वाले फल को दर्शाता है)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य प्राणायाम को केवल शारीरिक व्यायाम या वायु का नियंत्रण नहीं, अपितु एक सोपान मानते हैं जो साधक को क्रमशः उच्चतर आध्यात्मिक स्तरों पर ले जाता है। इस श्लोक में वे पूरक, कुम्भक और रेचक के माध्यम से तीन महान उपलब्धियों का वर्णन कर रहे हैं।

प्रथम चरण 'पूरक' है। जब साधक सचेतन होकर प्राण को भीतर खींचता है, तो वह केवल वायु नहीं, अपितु ब्रह्माण्ड की प्राण-शक्ति को अपने भीतर समाहित करता है। इस क्रिया का फल 'विष्णुसायुज्य' है। विष्णु यहाँ सर्वव्यापी चेतना के प्रतीक हैं। पूरक की स्थिति में जब प्राण का विस्तार होता है, तब साधक की सीमित सत्ता उस सर्वव्यापी विष्णु-तत्व में विलीन होने लगती है। यह 'सायुज्य' वह अवस्था है जहाँ साधक अनुभव करता है कि वह और वह अनंत चेतना एक ही हैं।

द्वितीय चरण 'कुम्भक' है। श्वास को भीतर रोकने पर वायु स्थिर हो जाती है और मन की चंचलता समाप्त होती है। इस स्थिरता में साधक 'ब्रह्मणोऽन्तिकं' अर्थात् ब्रह्मा के सान्निध्य को प्राप्त होता है। ब्रह्मा यहाँ सृजनात्मक ज्ञान और बोध के अधिष्ठाता हैं। कुम्भक की स्थिति में जब प्राण स्थिर होता है, तब साधक उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ से सृष्टि का प्रस्फुटन होता है। यह सान्निध्य साधक को आत्म-ज्ञान और प्रज्ञा के अत्यंत निकट ले आता है।

तृतीय चरण 'रेचक' है। जब साधक धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ता है, तो वह अपने भीतर के समस्त अहंकार, मल और सीमितताओं को विसर्जित कर देता है। इस पूर्ण विसर्जन के साथ वह 'ईश्वरं पदम्' अर्थात् ईश्वर के पद को प्राप्त करता है। यहाँ ईश्वर का पद वह पूर्णता है जहाँ साधक न केवल लीन होता है, न केवल ज्ञान प्राप्त करता है, अपितु वह स्वयं उस परम सत्ता के स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।

इस प्रकार, पूरक द्वारा विस्तार, कुम्भक द्वारा स्थिरता और रेचक द्वारा विसर्जन—इन तीनों की पूर्णता साधक को भौतिकता से उठाकर परम पद तक पहुँचा देती है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए यह श्लोक एक अनुभव-क्रम है। पूरक के समय जब वह विष्णु का ध्यान करता है, तो वह अपने अस्तित्व को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में फैलाता है। कुम्भक में वह उस विस्तार को एक बिंदु पर स्थिर कर ब्रह्मा (परम ज्ञान) के साथ एकाकार होता है। अंत में रेचक के समय वह स्वयं को पूरी तरह शून्य कर देता है, और इसी शून्य में 'ईश्वर' का प्राकट्य होता है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि वह श्वास के साथ केवल वायु नहीं ले रहा, बल्कि दिव्य चेतना को ग्रहण कर रहा है, उसे स्थिर कर रहा है और अंततः स्वयं को उस परमात्मा में विसर्जित कर रहा है। यह प्रक्रिया साधक को स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म से कारण शरीर की ओर ले जाती है, जिससे वह अंततः अक्षर-पद को प्राप्त करता है।

प्राणायामविधिः

श्लोक ८.४४

न प्राणेनाप्यपानेन वेगाद्वायुं समुत्सृजेत् ।

येन सक्तून् करस्थांश्च प्राणा(ण)योगेन चालयेत् ॥ ८.४४ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

न प्राणसे, न अपानसे वायुको (इतने) वेगसे छोड़े कि श्वासका झोंका हाथपर रखे सत्तूको भी उड़ा दे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में पूरक, कुम्भक और रेचक के माध्यम से विष्णु, ब्रह्मा और ईश्वर के पदों की प्राप्ति का वर्णन किया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य रेचक (वायु छोड़ने) की क्रिया के शारीरिक और प्राणिक अनुशासन का निर्देश दे रहे हैं, ताकि साधना में स्थिरता बनी रहे।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधक) न प्राणेन, न अपानेन वायुं वेगाद् समुत्सृजेत्, येन करस्थांश्च सक्तून् प्राणायोगेन चालयेत्।

पदार्थ:

• प्राणेन: प्राण-वायु के द्वारा (ऊर्ध्वगामी वायु)।

• अपानेन: अपान-वायु के द्वारा (अधोगामी वायु)।

• वेगाद्: तीव्र गति से या झटके के साथ।

• समुत्सृजेत्: बाहर छोड़े या विसर्जित करे (निषेधवाचक विधि)।

• करस्थांश्च सक्तून्: हाथ (हथेली) पर रखे हुए सत्तू के कणों को।

• प्राणायोगेन: प्राण के नियमन या श्वास के झोंके से।

• चालयेत्: हिला दे या उड़ा दे।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य प्राणायाम की बाहरी विधि के साथ-साथ उसके सूक्ष्म प्रभाव का समन्वय करते हैं। रेचक की क्रिया में वायु को बाहर छोड़ना केवल एक शारीरिक विसर्जन नहीं है, अपितु यह चित्त के विसर्जन और अहंकार के त्याग की प्रक्रिया है।

यहाँ ऋषि चेतावनी दे रहे हैं कि वायु का विसर्जन न तो प्राण के वेग से हो और न ही अपान के वेग से। सामान्यतः जब साधक कुम्भक के बाद वायु छोड़ता है, तो वह या तो दबाव के साथ (अपान की प्रधानता में) या झटके के साथ (प्राण की व्याकुलता में) वायु बाहर निकालता है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वायु का प्रस्थान इतना मंद, स्थिर और नियंत्रित होना चाहिए कि यदि साधक ने अपनी हथेली पर सत्तू (अत्यंत सूक्ष्म और हल्का चूर्ण) रखा हो, तो श्वास के झोंके से वह सत्तू का एक कण भी न हिले।

सत्तू यहाँ एक 'मानक' के रूप में प्रयुक्त हुआ है। यह इस बात का प्रमाण है कि साधक ने अपनी प्राण-शक्ति पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया है। यदि वायु वेग से निकलती है, तो वह शरीर में कंपन पैदा करती है और मन की एकाग्रता को भंग कर देती है। वेगपूर्ण रेचक से प्राण का क्षय होता है, जबकि मंद और स्थिर रेचक से प्राण का संचय और परिमार्जन होता है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'स्थिरता' का अभ्यास है। जब वायु बिना किसी वेग के बाहर निकलती है, तब हृदय की धड़कन धीमी होती है और मन गहरे शून्य की ओर बढ़ता है।

योगिक दृष्टि से, वेगपूर्ण श्वास 'राजस' गुण का प्रतीक है, जबकि अत्यंत मंद और नियंत्रित श्वास 'सत्व' गुण की परिचायक है। साधक जब वायु को इस सूक्ष्मता से छोड़ता है कि वह सत्तू के कणों को भी न हिला सके, तब वह वास्तव में अपने भीतर के 'विक्षेपों' को शांत कर रहा होता है। यह अभ्यास साधक को 'प्रसार' से 'संकोच' और फिर 'शून्यता' की ओर ले जाता है। यहाँ वायु का नियंत्रण वास्तव में मन का नियंत्रण है; क्योंकि जहाँ वायु स्थिर होती है, वहीं मन स्थिर होता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह शरीर के भौतिक दबाव से मुक्त होकर केवल चैतन्य के प्रवाह का अनुभव करता है।

श्लोक ८.४५

शनैर्नासापुटैर्वायुमुत्सृजेन्न च वेगतः ।

न कम्पयेच्छरीरं तु स योगी परमो मतः ॥ ८.४५ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

नासापुटोंसे वायुको धीरे-धीरे छोड़े, वेगसे नहीं; और शरीरको कँपाये नहीं — वह योगी श्रेष्ठ माना गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में रेचक के समय वायु के वेग पर नियंत्रण का निर्देश देते हुए सत्तू के उदाहरण से उसकी सूक्ष्मता समझाई गई। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस सूक्ष्मता को शारीरिक स्थिरता और नासापुटों के नियमन से जोड़कर 'परम योगी' के लक्षण को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधक) शनैर् नासापुटैर् वायुम् उत्सृजेत्, न च वेगतः। शरीरं तु न कम्पयेत्, स योगी परमो मतः।

पदार्थ:

• शनैर्: धीरे-धीरे, अत्यंत मंद गति से।

• नासापुटैर्: नासिका के दोनों छिद्रों के द्वारा।

• वायुम्: श्वास को।

• उत्सृजेत्: बाहर छोड़े या विसर्जित करे।

• न च वेगतः: और वेग (झटके या तीव्रता) के साथ नहीं।

• न कम्पयेत्: कंपन उत्पन्न न करे, स्थिर रखे।

• शरीरं तु: शरीर को तो।

• स योगी परमो मतः: वह योगी श्रेष्ठ/परम माना गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में प्राणायाम केवल श्वास का व्यायाम नहीं, अपितु प्राणों का अनुशासन है। पिछले श्लोक में वायु के वेग का निषेध किया गया था, यहाँ उस निषेध को क्रियान्वयन में लाने की विधि बताई गई है।

ऋषि निर्देश देते हैं कि वायु का विसर्जन 'शनैर्' अर्थात् अत्यंत मंद गति से होना चाहिए। यहाँ 'नासापुटैर्' शब्द महत्वपूर्ण है। जब वायु को वेग से छोड़ा जाता है, तो नासिका के छिद्रों पर दबाव पड़ता है और श्वास की धारा अस्थिर होती है। लेकिन जब साधक सचेत होकर दोनों नासापुटों से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकालता है, तो वह श्वास की धारा को 'सूक्ष्म' बना लेता है। वेग का अभाव ही सूक्ष्मता का लक्षण है।

आगे महर्षि एक अत्यंत सूक्ष्म शारीरिक संकेत देते हैं— 'न कम्पयेच्छरीरं'। प्रायः जब कोई साधक कुम्भक (श्वास रोकना) के बाद वायु को बलपूर्वक बाहर निकालता है, तो शरीर में एक हल्का कंपन उत्पन्न होता है। यह कंपन इस बात का प्रमाण है कि प्राणों पर नियंत्रण पूर्ण नहीं है और शरीर अभी भी स्थूल जगत के तनाव से जुड़ा है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जिस योगी की रेचक क्रिया इतनी सहज और स्थिर हो कि शरीर का एक भी अंग न काँपे, वही 'परम योगी' है।

यहाँ 'परम' शब्द का अर्थ केवल श्रेष्ठता नहीं, बल्कि वह अवस्था है जहाँ प्राण और मन पूरी तरह एकरूप हो गए हैं। शरीर का न काँपना इस बात का संकेत है कि साधक ने प्राणों को वश में कर लिया है और अब वह स्थूल शरीर के बंधन से ऊपर उठकर सूक्ष्म चैतन्य की ओर अग्रसर है।

शास्त्र-साक्ष्य —

योगसूत्र

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥ २.५० ॥

(वह) बाह्य, आभ्यन्तर और स्तम्भ वृत्तिवाला, देश, काल और संख्यासे परखा हुआ, दीर्घ और सूक्ष्म होता है।

योगसूत्र २.५०पातञ्जल योगदर्शन — व्यासभाष्य (theVyasa) · पृष्ठ 101

इस सूत्र में प्राणायाम के स्वरूप को 'दीर्घ' और 'सूक्ष्म' बताया गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी 'सूक्ष्मता' की व्यावहारिक व्याख्या करता है। जहाँ योगसूत्र प्राणायाम के लक्षणों (देश, काल, संख्या) की बात करता है, वहीं यह स्मृति उस सूक्ष्मता को 'वेग के अभाव' और 'शरीर की स्थिरता' के रूप में परिभाषित करती है। दोनों शास्त्रों का मत एक ही है—प्राणायाम में तीव्रता या बल का प्रयोग नहीं, बल्कि सूक्ष्मता और स्थिरता अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'स्थिरता' और 'सूक्ष्मता' का समन्वय है।

१. अभ्यास: रेचक के समय साधक यह अनुभव करे कि वायु एक महीन धागे की तरह बाहर निकल रही है। यदि नासिका के पास हाथ रखा जाए, तो वायु का स्पर्श लगभग शून्य होना चाहिए।

२. अनुभव: जब वायु वेग से निकलती है, तो मन भी चंचल होता है। जब वायु 'शनैर्' (धीरे) निकलती है, तो मन स्वतः शांत होकर अंतर्मुखी होने लगता है।

३. भूमि: शरीर का न काँपना यह दर्शाता है कि साधक 'स्थूल' भूमि से 'सूक्ष्म' भूमि की ओर जा रहा है। कंपन का अभाव ही वह बिंदु है जहाँ से ध्यान की गहराई शुरू होती है।

४. साधना: इस श्लोक के माध्यम से साधक अपने प्राणों को 'अक्षर' (अविनाशी/स्थिर) बनाने का प्रयास करता है। जैसे अक्षर स्थिर रहता है, वैसे ही प्राणायाम के दौरान शरीर और श्वास की स्थिरता साधक को उस परम पद की ओर ले जाती है जिसका उल्लेख पिछले श्लोकों में किया गया है।

प्राणायामोत्तरमाचमनम् · आचमनपदनिर्वचनम्

श्लोक ८.४६

प्राणस्यायमनं कृत्वा आचमेत् प्रयतोऽपि सन्

आन्तरं स्विद्यते यस्मात्तस्मादाचमनं स्मृतम् ॥ ८.४६ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

प्राणायाम करके, संयत होते हुए भी आचमन करे; क्योंकि भीतर (शरीर) पसीजता है, इसलिए (तब) आचमन कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में प्राणायाम के समय शरीर की स्थिरता और वायु के मंद विसर्जन के महत्त्व को समझाया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य प्राणायाम की समाप्ति के उपरांत की जाने वाली एक आवश्यक शारीरिक और मानसिक शुद्धि क्रिया 'आचमन' का निर्देश दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (साधक) प्राणस्यायमनं कृत्वा, प्रयतोऽपि सन् आचमेत्। यस्मात् आन्तरं स्विद्यते, तस्मात् (एतत्) आचमनं स्मृतम्।

पदार्थ:

• प्राणस्यायमनं कृत्वा: प्राणायाम (प्राण और अपान के नियमन) को पूर्ण करके।

• प्रयतोऽपि सन्: प्रयत्नशील होते हुए भी, अथवा संयमित और सचेत अवस्था में रहते हुए।

• आचमेत्: आचमन करे (जल का सेवन और छिड़काव करे)।

• यस्मात्: क्योंकि।

• आन्तरं: शरीर के भीतर (आंतरिक अंगों और सूक्ष्म शरीर में)।

• स्विद्यते: पसीजता है, स्वेद (पसीना) उत्पन्न होता है।

• तस्मात्: इसलिए।

• आचमनं स्मृतम्: इसे 'आचमन' कहा गया है या यह विधि स्मृति में आई है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में बाहरी कर्म और आंतरिक योग का अद्भुत समन्वय है। यहाँ 'आचमन' केवल एक कर्मकाण्डीय शुद्धि नहीं, अपितु प्राणायाम के बाद उत्पन्न होने वाली शारीरिक स्थिति का वैज्ञानिक समाधान है।

ऋषि कहते हैं कि प्राणायाम की प्रक्रिया को पूर्ण करने के बाद साधक को 'प्रयतोऽपि सन्' अर्थात् अपनी सजगता और संयम को बनाए रखते हुए आचमन करना चाहिए। प्रायः साधक प्राणायाम के बाद शिथिल हो जाते हैं या गहरे शून्य में चले जाते हैं, किंतु यहाँ निर्देश है कि होश और प्रयत्न बना रहे ताकि योगिक ऊर्जा का क्षय न हो।

इस विधि का कारण बताते हुए महर्षि कहते हैं— 'आन्तरं स्विद्यते'। जब साधक पूरक, कुम्भक और रेचक के माध्यम से प्राणों का निरोध करता है, तो शरीर के भीतर एक तीव्र ऊष्मा उत्पन्न होती है। यह ऊष्मा केवल भौतिक नहीं, अपितु प्राणिक घर्षण से उत्पन्न वह ताप है जो शरीर के भीतर के अशुद्धियों को पिघलाता है। इस आंतरिक स्वेद (पसीने) के कारण शरीर के भीतर एक प्रकार की उष्णता और भारीपन महसूस होता है।

जल का गुण शीतल और शोधक है। जब साधक आचमन करता है, तो वह जल न केवल कंठ को तृप्त करता है, अपितु उस आंतरिक ताप को संतुलित कर शरीर को पुनः सामान्य अवस्था में लाता है। यहाँ 'आचमन' शब्द का प्रयोग केवल जल पीने के लिए नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया के लिए हुआ है जो आंतरिक स्वेद को शांत कर साधक को अगली अवस्था (ध्यान) के लिए तैयार करती है। अतः यह क्रिया शरीर के ताप और शीतलता के संतुलन की एक विधि है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'तप' और 'शीतलता' के संतुलन का अभ्यास है। प्राणायाम एक प्रकार का 'अग्नि-तप' है, जिससे शरीर के भीतर सूक्ष्म मल जलकर स्वेद के रूप में प्रकट होते हैं। यदि इस ताप को संतुलित न किया जाए, तो साधक में व्याकुलता या मानसिक उत्तेजना उत्पन्न हो सकती है।

यहाँ 'प्रयतोऽपि सन्' का गुप्त अर्थ यह है कि आचमन करते समय भी साधक अपनी चेतना को बाहर न फैलने दे, बल्कि उसे भीतर ही केंद्रित रखे। वह जल के स्पर्श और उसके शीतल प्रभाव को हृदय और प्राणों में अनुभव करे। इस प्रकार, प्राणायाम से उत्पन्न 'अग्नि' और आचमन से प्राप्त 'सोम' (शीतलता) का मिलन साधक को उस समता की भूमि पर ले जाता है, जहाँ से वह बिना किसी शारीरिक बाधा के अगले सोपान—'ध्यान' में प्रवेश कर सके। यह क्रिया स्थूल शरीर की शुद्धि से सूक्ष्म शरीर के संतुलन की ओर ले जाने वाला सेतु है।

स्मृतिदृष्टं समाप्य सिद्धान्तोक्तप्राणायामनिरूपणप्रतिज्ञा

श्लोक ८.४७

एवं त्रिविधमुद्दिष्टं प्राणायामस्य लक्षणम् ।

स्मृतिदृष्टं भवेदेतत् सिद्धान्ते त्वेतदन्यथा ॥ ८.४७ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

इस प्रकार प्राणायामका त्रिविध लक्षण कहा गया; यह स्मृतियोंमें देखा गया है, सिद्धान्त(शास्त्र) में यह दूसरे प्रकारसे है।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में प्राणायाम के शारीरिक अनुशासन, वायु के मंद विसर्जन और उसके उपरांत आचमन की विधि का वर्णन किया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य अब तक बताई गई विधि और योगशास्त्र के गूढ़ सिद्धांतों के मध्य के सूक्ष्म भेद को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: प्राणायामस्य (एवं) त्रिविधं लक्षणम् उद्दिष्टम्। एतत् स्मृति-दृष्टं भवेत्; सिद्धान्ते तु एतत् अन्यथा (अस्ति)।

पदार्थ:

• त्रिविधं लक्षणम्: तीन प्रकार के लक्षण (यहाँ पूरक, कुम्भक और रेचक की क्रियाओं का समूह)।

• उद्दिष्टं: कहा गया है, निर्देश किया गया है।

• स्मृति-दृष्टं: स्मृतियों में वर्णित या स्मृति-परम्परा के अनुसार देखा गया।

• सिद्धान्ते: सिद्धान्त में (यहाँ 'सिद्धान्त' का अर्थ योगशास्त्र के उन गूढ़ नियमों से है जो केवल अनुभव और सूक्ष्म प्रमाण पर आधारित हैं)।

• अन्यथा: भिन्न प्रकार से, दूसरे ढंग से।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण विभेद कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अब तक प्राणायाम के जिस 'त्रिविध लक्षण' (पूरक, कुम्भक और रेचक) का वर्णन किया गया, वह 'स्मृति-दृष्ट' है। स्मृति का अर्थ है वह परंपरा जो आचार, विधि और बाहरी अनुशासन पर बल देती है। यहाँ प्राणायाम को एक क्रिया के रूप में देखा गया है—वायु को भीतर लेना, रोकना और बाहर निकालना। यह विधि साधक के लिए आरम्भिक सोपान है, जो शरीर को शुद्ध करती है और मन को एकाग्र करती है।

किंतु ऋषि यहाँ एक संकेत देते हैं— 'सिद्धान्ते तु एतदन्यथा'। भाव यह है कि जब साधक स्मृति की बाहरी विधि से ऊपर उठकर 'सिद्धान्त' की भूमि पर पहुँचता है, तब प्राणायाम का स्वरूप बदल जाता है। सिद्धान्त में प्राणायाम केवल वायु का आवागमन नहीं, अपितु चेतना का निरोध है। जहाँ स्मृति 'क्रिया' पर बल देती है, वहीं सिद्धान्त 'अवस्था' और 'मात्रा' पर बल देता है।

यह विरोधाभास नहीं, अपितु विकास क्रम है। जैसे एक बालक पहले अक्षर सीखता है (स्मृति/विधि) और फिर अर्थ का बोध करता है (सिद्धान्त/रहस्य), वैसे ही योगी पहले श्वास के स्थूल नियमन से गुजरता है और फिर उस सूक्ष्म बिंदु पर पहुँचता है जहाँ प्राण और अपान का निरोध स्वतः होने लगता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे केवल एक कर्मकाण्डीय स्मृति के लेखक नहीं हैं, अपितु योग के सिद्धान्तों के ज्ञाता भी हैं, इसलिए वे साधक को विधि से सिद्धान्त की ओर ले जाना चाहते हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक 'संधि-स्थल' है। अब तक साधक ने जिस प्राणायाम का अभ्यास किया, वह शरीर और प्राणों के स्थूल संतुलन के लिए था। वह 'स्मृति-मार्ग' था। अब वह 'सिद्धान्त-मार्ग' की ओर अग्रसर हो रहा है।

इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि योग में एक ही क्रिया के दो स्तर होते हैं। प्रथम स्तर पर प्राणायाम एक शारीरिक व्यायाम या शुद्धि क्रिया है (पूरक-कुम्भक-रेचक)। द्वितीय स्तर पर, जिसे ऋषि 'सिद्धान्त' कह रहे हैं, प्राणायाम 'प्राण-निरोध' बन जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि श्वास केवल नासिका से आने-जाने वाली वायु नहीं है, बल्कि वह 'ओंकार' का स्पंदन है।

जब साधक स्मृति की विधि (त्रिविध लक्षण) को सिद्ध कर लेता है, तब वह सिद्धान्त की उस भूमि पर जाता है जहाँ मात्राओं का सूक्ष्म गणित और प्रणव का चिन्तन मुख्य हो जाता है। यह श्लोक साधक को सचेत करता है कि वह बाहरी विधि में ही न अटक जाए, बल्कि उस 'अन्यथा' यानी उस भिन्न और उच्चतर अवस्था की खोज करे, जहाँ प्राण का लय होना ही वास्तविक प्राणायाम है।

प्राणायामविधिः

श्लोक ८.४८

मात्राप्रमाणयोगेन प्राणापाननिरोधनात् ।

ओंकारेणैव कर्तव्यः प्राणायामो यथोदितः ॥ ८.४८ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

मात्रा के प्रमाण के योग से प्राण और अपान का निरोध करके, जैसा कि ऊपर कहा गया है, ओंकार के द्वारा ही प्राणायाम करना चाहिए …

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के स्थूल स्वरूप (पूरक-कुम्भक-रेचक) को 'स्मृति-दृष्ट' कहकर उसे शरीर-शोधन की विधि बताया। अब वे 'सिद्धान्त' के उस सूक्ष्म पक्ष को उद्घाटित कर रहे हैं, जहाँ प्राणायाम केवल वायु का नियंत्रण नहीं, अपितु नाद और अक्षर का योग बन जाता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: यथोदितः प्राणायामो मात्राप्रमाणयोगेन प्राणापाननिरोधनात् ओंकारेणैव कर्तव्यः।

पदार्थ:

• मात्राप्रमाणयोगेन: 'मात्रा' का अर्थ है समय की सूक्ष्म इकाई या नाद की अवधि। 'प्रमाण' का अर्थ है निश्चित माप। 'योगेन' का अर्थ है उस निश्चित माप के साथ समन्वय स्थापित करना। अर्थात्, श्वास की गति को एक निश्चित गणितीय समय-सीमा (मात्रा) में बाँधना।

• प्राणापाननिरोधनात्: प्राण (ऊपर जाने वाली वायु) और अपान (नीचे जाने वाली वायु) के निरोध से। यहाँ निरोध का अर्थ केवल रोकना नहीं, बल्कि उन्हें एक बिंदु पर स्थिर करना है।

• ओंकारेणैव: केवल ओंकार के द्वारा ही। 'एव' शब्द यहाँ विशेष बल देता है कि बिना प्रणव के यह अभ्यास केवल वायु-क्रीड़ा है, योग नहीं।

• यथोदितः: जैसा कि ऊपर (पूर्व के श्लोकों में) कहा गया है। यहाँ 'उदित' शब्द पूर्व वर्णित पूरक, कुम्भक और रेचक की क्रियाओं की ओर संकेत करता है, जिन्हें अब ओंकार के साथ जोड़ना है।

• कर्तव्यः: किया जाना चाहिए (विधि)।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को स्थूल क्रिया से सूक्ष्म विज्ञान की ओर ले जाता है। पिछले श्लोकों में पूरक, कुम्भक और रेचक की जो विधि बताई गई, वह शरीर के भौतिक ढाँचे को तैयार करने के लिए थी। परन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक 'प्राणायाम' तब घटित होता है जब वायु का निरोध 'मात्रा-प्रमाण' और 'ओंकार' के साथ जुड़ जाता है।

'मात्रा-प्रमाण' का रहस्य यह है कि जब साधक अपनी श्वास को एक निश्चित समय (जैसे ४-१६-८ या अन्य निश्चित मात्राओं) में ढालता है, तो मन की चंचलता स्वतः कम होने लगती है। समय का यह अनुशासन मन को वर्तमान क्षण में स्थिर कर देता है। जब प्राण और अपान का निरोध होता है, तब शरीर के भीतर एक शून्य की स्थिति निर्मित होती है। इसी शून्य में 'ओंकार' का आरोपण करना है।

ऋषि कहते हैं कि प्राणायाम 'ओंकारेणैव' (केवल ओंकार से ही) करना चाहिए। इसका अर्थ है कि श्वास के भीतर जाने, रुकने और बाहर आने के समय केवल 'ॐ' के नाद या उसके मानसिक बीज का चिंतन हो। जब श्वास रुकती है (कुम्भक), तब ओंकार का गुंजन या उसका मानसिक स्पंदन साधक को उस 'अक्षर' से जोड़ता है जो अविनाशी है। इस प्रकार, बाहरी श्वास का निरोध वास्तव में आंतरिक चेतना का विस्तार बन जाता है। यह विधि दर्शाती है कि याज्ञवल्क्य के लिए कर्म (प्राणायाम) और ज्ञान (ओंकार) अलग नहीं हैं; कर्म ही ज्ञान का साधन है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामाः परं तपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ २.८३ ॥

एकाक्षर (ॐ) परम ब्रह्म है, प्राणायाम परम तप हैं; सावित्रीसे बढ़कर (कोई मन्त्र) नहीं है, और मौनसे सत्य श्रेष्ठ है।

मनुस्मृति २.८३मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 178

मनुस्मृति में 'एकाक्षर' (ॐ) को परम ब्रह्म और प्राणायाम को 'परम तप' कहा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस बात की पुष्टि करती है कि जब 'परम तप' (प्राणायाम) और 'परम ब्रह्म' (ओंकार) का संयोग होता है, तभी वह साधना पूर्णता को प्राप्त करती है। मनुस्मृति इन दोनों को एक ही श्लोक में रखकर इनके अंतर्सम्बन्ध का संकेत देती है, जिसे यहाँ याज्ञवल्क्य ने 'ओंकारेणैव' कहकर क्रियात्मक रूप में स्पष्ट कर दिया है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास दो स्तरों पर है। प्रथम स्तर पर, वह अपनी श्वास की गति को एक निश्चित 'मात्रा' (समय) में लाए, जिससे प्राण और अपान का द्वंद्व समाप्त हो और वे एक केंद्र पर स्थिर हों। द्वितीय और सूक्ष्म स्तर पर, वह इस स्थिरता के बीच 'ओंकार' का अनुसंधान करे।

यहाँ अभ्यास यह है कि पूरक के समय 'अ', कुम्भक के समय 'उ' और रेचक के समय 'म' के नाद का अनुभव किया जाए, या संपूर्ण प्रक्रिया में केवल 'ॐ' के अक्षर को हृदय में स्थित रखा जाए। जब साधक मात्रा-प्रमाण से प्राणों को रोकता है, तो वह अपनी ऊर्जा को बाहरी जगत से खींचकर भीतर की ओर मोड़ता है। ओंकार का प्रयोग इस ऊर्जा को दिशा देता है। इस अभ्यास से साधक 'प्राण-भूमि' से ऊपर उठकर 'नाद-भूमि' में प्रवेश करता है, जहाँ श्वास केवल वायु नहीं, बल्कि ब्रह्म का स्पंदन बन जाती है।

श्लोक ८.४९

मात्रायोगप्रमाणेन प्रणवं परिचिन्तयेत् ।

मृदुमध्योत्तमत्वाच्च त्रिविधः सोऽपि कथ्यते ॥ ८.४९ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

मात्रा के प्रमाण के योग से 'प्रणव' का चिन्तन करना चाहिए; मृदु, मध्य और उत्तम होने के कारण ही वह तीन प्रकार का कहा गया है …

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि केवल वायु का निरोध प्राणायाम नहीं है, अपितु ओंकार के साथ समन्वय ही वास्तविक सिद्धान्त है। अब इस श्लोक में वे उस ओंकार-चिन्तन की सूक्ष्म विधि और उसकी तीन अवस्थाओं का विवेचन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: मात्रायोगप्रमाणेन प्रणवं परिचिन्तयेत्। सोऽपि मृदु-मध्य-उत्तमत्वाच्च त्रिविधः कथ्यते।

पदार्थ:

• मात्रायोगप्रमाणेन: 'मात्रा' का अर्थ है समय की सूक्ष्म इकाई। 'योग' का अर्थ है संयोग या समन्वय और 'प्रमाण' का अर्थ है निश्चित माप। अर्थात्, श्वास की अवधि और प्रणव के नाद की अवधि के बीच एक गणितीय संतुलन स्थापित करना।

• प्रणवं परिचिन्तयेत्: 'प्रणव' (ॐ) का 'परिचिन्तन' करना चाहिए। यहाँ 'परि' उपसर्ग का अर्थ है—चारों ओर से घेरकर, पूर्णता में या गहराई से विचार करना। यह केवल उच्चारण नहीं, अपितु नाद में लीन होना है।

• मृदु-मध्य-उत्तमत्वाच्च: मृदु (कोमल/धीमा), मध्य (सामान्य/संतुलित) और उत्तम (तीव्र/गहन) होने के कारण।

• त्रिविधः सोऽपि कथ्यते: वह (प्रणव-चिन्तन) भी तीन प्रकार का कहा गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक प्राणायाम को 'वायु-क्रिया' से उठाकर 'नाद-योग' की श्रेणी में प्रतिष्ठित करता है। याज्ञवल्क्य यहाँ 'मात्रायोगप्रमाण' की बात कर रहे हैं। इसका भाव यह है कि जब साधक पूरक, कुम्भक और रेचक करता है, तो उस समय प्रणव (ॐ) का मानसिक या वाचिक चिन्तन केवल संयोगवश न हो, बल्कि एक निश्चित समय-माप (मात्रा) के अनुसार हो। जैसे एक संगीतकार ताल और मात्रा के अनुशासन में बंधकर स्वर लगाता है, वैसे ही योगी को अपने प्राणों की गति और प्रणव के नाद की अवधि में एकरूपता लानी चाहिए।

यहाँ 'परिचिन्तन' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि साधक केवल 'ॐ' शब्द को न दोहराए, बल्कि उस अक्षर के भीतर छिपे 'अ', 'उ' और 'म' के विस्तार और उनके विलय को अनुभव करे।

आगे ऋषि कहते हैं कि यह प्रणव-चिन्तन तीन श्रेणियों में विभक्त है:

१. मृदु: यह आरम्भिक अवस्था है, जहाँ नाद अत्यंत कोमल और सूक्ष्म होता है। यहाँ साधक केवल प्राणों की लय को समझने का प्रयास करता है।

२. मध्य: यह संतुलन की अवस्था है, जहाँ नाद और प्राण की गति एक समान हो जाती है। यहाँ एकाग्रता बढ़ती है।

३. उत्तम: यह वह अवस्था है जहाँ नाद इतना गहन और तीव्र हो जाता है कि वह साधक के संपूर्ण अस्तित्व को व्याप ले। यहाँ प्राण और प्रणव का पूर्ण विलय हो जाता है और साधक केवल 'अक्षर' (अविनाशी) का अनुभव करता है।

यह त्रिविधता साधक की योग्यता और उसकी चेतना की गहराई के अनुसार है। यह केवल ध्वनि की तीव्रता नहीं, बल्कि अनुभूति की गहराई है।

शास्त्र-साक्ष्य —

प्रणव की मात्राओं और उसके द्वारा परम पुरुष के ध्यान का सम्बन्ध प्रश्न उपनिषद् में भी मिलता है:

प्रश्न उपनिषद्

यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः ॥ ५.५ ॥

पर जो इसी तीन मात्राओंवाले 'ॐ' अक्षरसे परम पुरुषका ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यमें सम्पन्न (एक) होता है।

प्रश्न उपनिषद् ५.५उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 93

यहाँ 'त्रिमात्र' ओंकार का उल्लेख है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'मात्रायोगप्रमाण' इसी श्रुति-तत्व का विस्तार है। जब साधक तीन मात्राओं वाले ओंकार को अपने प्राणों के प्रमाण के साथ जोड़ता है, तब वह सूर्य के समान तेजोमय होता है।

इसी प्रकार, भगवद्गीता में एकाक्षर ब्रह्म के उच्चारण और स्मरण की महिमा बताई गई है:

भगवद्गीता

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ ८.१३ ॥

— 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ जो देह छोड़कर जाता है, वह परम गतिको पाता है।

भगवद्गीता ८.१३गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 218

स्मृति यहाँ 'चिन्तन' शब्द का प्रयोग कर गीता के 'व्याहरन्' (उच्चारण) और 'मनुस्मरन्' (स्मरण) दोनों को समाहित कर लेती है। गीता जहाँ मोक्ष के समय एकाक्षर ब्रह्म के स्मरण की बात करती है, वहीं यह स्मृति उसे जीवित रहते हुए प्राणायाम के माध्यम से सिद्ध करने की विधि बता रही है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास 'नाद-अनुसंधान' है। साधक जब श्वास भरता है (पूरक), तब 'अ' का विस्तार करे; जब श्वास को रोके (कुम्भक), तब 'उ' के मध्यस्थ भाव में रहे; और जब श्वास छोड़े (रेचक), तब 'म' के नाद में विलीन हो जाए।

'मात्रायोग' का अभ्यास करते समय साधक यह अनुभव करता है कि उसका प्राण ही वास्तव में ओंकार है और ओंकार ही उसका प्राण। मृदु से उत्तम की ओर जाना वास्तव में 'स्थूल प्राण' से 'सूक्ष्म प्राण' और फिर 'अक्षर' की ओर जाने की यात्रा है। इस अभ्यास से मन की चंचलता समाप्त होती है और साधक उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह केवल नाद का श्रोता नहीं, अपितु स्वयं नाद बन जाता है। यह अभ्यास उसे प्रत्याहार की अगली भूमि के लिए तैयार करता है, क्योंकि जब मन प्रणव के नाद में स्थिर हो जाता है, तब इन्द्रियों को भीतर खींचना (प्रत्याहार) सहज हो जाता है।

प्रत्याहारनिरूपणप्रतिज्ञा

श्लोक ८.५०

एवं तु त्रिविधं कृत्वा प्राणायामं विधानतः ।

प्रत्याहारं ततः पश्चाच्चिन्तयेत्तन्निबोधत ॥ ८.५० ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९५

… इस प्रकार तीन प्रकार का प्राणायाम विधिपूर्वक करके, उसके पश्चात् प्रत्याहार का चिन्तन करना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम के स्थूल और सूक्ष्म दोनों पक्षों को समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल वायु का निरोध पर्याप्त नहीं है, अपितु मात्रा-प्रमाण के साथ प्रणव का मृदु, मध्य और उत्तम स्तर पर चिन्तन ही वास्तविक सिद्धान्त है। अब इस श्लोक के माध्यम से वे प्राणायाम की पूर्णता और उसके पश्चात आने वाली अगली अवस्था 'प्रत्याहार' की ओर साधक का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: विधानतः एवं तु त्रिविधं प्राणायामं कृत्वा, ततः पश्चात् प्रत्याहारं चिन्तयेत्; तन्निबोधत।

पदार्थ:

• विधानतः: शास्त्रसम्मत विधि के अनुसार। यहाँ 'विधान' का अर्थ केवल बाहरी नियम नहीं, अपितु पूरक-कुम्भक-रेचक और प्रणव-चिन्तन के उस सटीक समन्वय से है, जिसे पिछले श्लोकों में बताया गया है।

• त्रिविधं प्राणायामं: यहाँ 'त्रिविध' के दो अर्थ निहित हैं। प्रथम, प्राणायाम की तीन क्रियाएँ (पूरक, कुम्भक, रेचक) और द्वितीय, प्रणव-चिन्तन की तीन अवस्थाएँ (मृदु, मध्य, उत्तम)। इन दोनों का समुच्चय ही यहाँ 'त्रिविध प्राणायाम' है।

• ततः पश्चात्: उसके बाद। यह शब्द योग-साधना के क्रमिक सोपानों को दर्शाता है।

• प्रत्याहारं चिन्तयेत्: प्रत्याहार का चिन्तन करना चाहिए। 'चिन्तयेत्' विधिलिङ् लकार में है, जो यह संकेत देता है कि प्राणायाम के बाद प्रत्याहार केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक मानसिक संकल्प और सजगता है।

• तन्निबोधत: उसे जानो या सुनो। यह याज्ञवल्क्य का शिष्यों या साधकों को संबोधन है, जो एक नए और महत्वपूर्ण विषय (प्रत्याहार) के आरम्भ की घोषणा करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधना के क्रम में एक सेतु का कार्य कर रहा है। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि योग की यात्रा में अंगों का क्रम अनिवार्य है। जब साधक 'विधानतः' अर्थात् विधिपूर्वक प्राणायाम का अभ्यास कर लेता है, तब उसका शरीर और प्राण स्थिर होने लगते हैं। प्राणों की यह स्थिरता मन की स्थिरता का आधार बनती है।

यहाँ 'त्रिविध प्राणायाम' का उल्लेख करके ऋषि यह समझा रहे हैं कि जब तक प्राणों का प्रवाह (पूरक-रेचक) और उनका ठहराव (कुम्भक), तथा नाद का समन्वय (मृदु-मध्य-उत्तम) सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक चित्त इतना एकाग्र नहीं होता कि वह इन्द्रियों को उनके विषयों से खींच सके। प्राणायाम का उद्देश्य केवल फेफड़ों की क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि प्राणों को वश में करके मन को 'लघु' (हल्का) और 'शुद्ध' करना है।

जब प्राण स्थिर होते हैं, तब साधक की चेतना बाहरी जगत से हटकर भीतर की ओर मुड़ने लगती है। इसी अवस्था को 'ततः पश्चात्' कहकर संकेतित किया गया है। प्राणायाम के बाद प्रत्याहार का चिन्तन करने का अर्थ है—अब अपनी सजगता को वायु की गति से हटाकर इन्द्रियों की वृत्ति पर केंद्रित करना। यह श्लोक एक घोषणा है कि अब साधक उस भूमि पर पहुँच गया है जहाँ वह अपनी इन्द्रियों का स्वामी बन सकता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'संक्रमण' का क्षण है। प्राणायाम तक साधक 'प्राण' के साथ खेल रहा था, अब वह 'इन्द्रिय' और 'मन' के संबंध को समझने की ओर बढ़ रहा है।

अभ्यास की दृष्टि से इसका रहस्य यह है कि प्रत्याहार को प्राणायाम से अलग कोई क्रिया न मानकर, प्राणायाम का ही 'परिणाम' माना जाए। जब कुम्भक और प्रणव-चिन्तन की उच्चतम अवस्था (उत्तम अवस्था) प्राप्त होती है, तब मन स्वतः ही बाहरी विषयों से विरक्त होने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ 'प्राणायाम' समाप्त होता प्रतीत होता है और 'प्रत्याहार' आरम्भ होता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसकी ऊर्जा अब केवल नासिका या श्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक आंतरिक खिंचाव के रूप में विकसित हो रही है, जो उसे बाहरी शोर से हटाकर अंतर्मुखी कर रही है। 'तन्निबोधत' का अर्थ है—अब उस सूक्ष्म कला को समझो जिससे इन्द्रियों को वापस खींचकर आत्मा के केंद्र में स्थापित किया जाता है। यह श्लोक साधक को 'प्राण-भूमि' से 'मन-भूमि' की ओर ले जाने वाला द्वार है।

प्रत्याहारलक्षणम्

श्लोक ८.५१

वायुर्बाह्यो यथा देहे गृहीतस्तत्र (तः स तु) कोष्ठगः ।

शनैः शनैर्निरोद्धव्यः प्रत्याहारः स उच्यते ॥ ८.५१ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९६

जैसे देहमें ग्रहण किया गया बाहरी वायु कोष्ठ (उदर) में जाता है, (वैसे ही इन्द्रियोंको) धीरे-धीरे रोकना चाहिए — वह प्रत्याहार कहलाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणायाम की तीन विधियों और प्रणव-चिन्तन की तीन अवस्थाओं को पूर्ण करने का निर्देश दिया। अब वे साधक को उस अवस्था की ओर ले जा रहे हैं जहाँ प्राणों का निरोध केवल वायु तक सीमित न रहकर इन्द्रियों के निग्रह में परिवर्तित हो जाता है, जिसे 'प्रत्याहार' कहा गया है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: वायुः देहे बाह्यो यथा गृहीतः तत्र कोष्ठगः (भवति), (तथा) शनैः शनैः निरोद्धव्यः; स प्रत्याहारः उच्यते।

पदार्थ:

• वायुर्बाह्यो: बाहर की वायु। यहाँ 'बाह्य' शब्द केवल भौतिक वायु के लिए नहीं, अपितु उन सभी बाहरी प्रभावों के लिए है जो इन्द्रियों के माध्यम से भीतर प्रवेश करते हैं।

• कोष्ठगः: कोष्ठ में जाने वाला। 'कोष्ठ' का अर्थ है उदर या शरीर का मध्य भाग। योगिक दृष्टि से यह वह स्थान है जहाँ प्राण संचित होता है।

• शनैः शनैः: धीरे-धीरे। यह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह संकेत देता है कि प्रत्याहार कोई आकस्मिक झटका या जबरन किया गया दमन नहीं है, बल्कि एक क्रमिक प्रक्रिया है।

• निरोद्धव्यः: रोका जाना चाहिए। यहाँ 'निरोध' का अर्थ विनाश नहीं, अपितु अपनी मूल सत्ता में विलीन करना है।

• प्रत्याहारः: 'प्रति' (लौटाना) और 'आहार' (भोजन या ग्रहण करना)। इन्द्रियों द्वारा बाहरी विषयों के 'आहार' को रोककर उन्हें पुनः भीतर की ओर लौटाना ही प्रत्याहार है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य प्रत्याहार की एक अत्यंत सूक्ष्म और प्राकृतिक उपमा प्रस्तुत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार हम श्वास लेते समय बाहरी वायु को ग्रहण करते हैं और वह वायु स्वाभाविक रूप से हमारे शरीर के कोष्ठ (उदर/मध्य भाग) में समाहित हो जाती है, ठीक उसी प्रकार साधक को अपनी इन्द्रियों की बाहरी गति को रोकना चाहिए।

यहाँ 'वायु' और 'इन्द्रियों' के बीच एक गहरा सम्बन्ध दिखाया गया है। जैसे वायु का भीतर आना जीवन का आधार है, वैसे ही इन्द्रियों का विषयों की ओर जाना जीव का स्वभाव है। किन्तु जिस प्रकार प्राणायाम में हम वायु के प्रवाह को नियंत्रित कर उसे कोष्ठ में स्थिर करते हैं, उसी प्रकार प्रत्याहार में इन्द्रियों के बाहरी प्रवाह को रोककर उन्हें अंतर्मुखी किया जाता है।

ऋषि यहाँ 'शनैः शनैः' (धीरे-धीरे) शब्द पर बल देते हैं। इसका भाव यह है कि इन्द्रियाँ आदतों के कारण विषयों की ओर तीव्र गति से भागती हैं। यदि उन्हें अचानक और बलपूर्वक रोका जाए, तो मन में विद्रोह और विक्षेप उत्पन्न होता है। अतः जैसे वायु धीरे-धीरे कोष्ठ में भरती है, वैसे ही साधक को सजगता के साथ अपनी इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर धीरे-धीरे भीतर की ओर मोड़ना चाहिए। संभवतः यह प्रक्रिया तब और सुगम होती है जब साधक पिछले श्लोकों में वर्णित प्राणायाम की स्थिति में होता है, क्योंकि जब प्राण स्थिर होते हैं, तब इन्द्रियों को रोकना सरल हो जाता है।

इस प्रकार, बाहरी विषयों के प्रति आसक्ति को धीरे-धीरे कम करना और इन्द्रियों की शक्ति को भीतर के 'कोष्ठ' (हृदय या चेतना के केंद्र) में एकत्रित करना ही प्रत्याहार कहलाता है। यह केवल इंद्रिय-दमन नहीं, बल्कि इंद्रिय-परिवर्तन है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'सजगता' का अभ्यास है। जैसे वह अपनी श्वास के आने और जाने के प्रति सजग होता है, वैसे ही उसे इस बात का अनुभव करना चाहिए कि उसकी इन्द्रियाँ किस प्रकार बाहरी विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) को 'आहार' की तरह ग्रहण कर रही हैं।

अभ्यास यह है कि जब इन्द्रियाँ बाहर की ओर भागें, तो साधक उन्हें बलपूर्वक न रोके, बल्कि यह अनुभव करे कि ये इन्द्रियाँ वास्तव में मन का ही विस्तार हैं। जैसे वायु कोष्ठ में समाहित होती है, वैसे ही वह अपनी चेतना को इन्द्रियों से खींचकर अपने भीतर के केंद्र में स्थित करे। यह अभ्यास साधक को 'बहिरमुखी' से 'अंतर्मुखी' बनाता है। जब इन्द्रियाँ विषयों से हटकर भीतर की ओर मुड़ती हैं, तब साधक उस मानसिक स्थिरता को प्राप्त करता है जो अगले सोपान 'ध्यान' के लिए अनिवार्य है। यह स्थिति उस भूमि की है जहाँ साधक विषय-भोग से ऊपर उठकर आत्म-भोग की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक ८.५२

इन्द्रियाणां तु सर्वेषां या वृत्तिस्तु प्रकीर्तिता ।

मनसा प्रतिहर्तव्या प्रत्याहारस्ततः स्मृतः ॥ ८.५२ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९६

इन्द्रियों की जो वृत्ति (गति) प्रसिद्ध है, उसे मन से वापस खींच लेना ही प्रत्याहार कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बाह्य वायु के कोष्ठ में गमन के उदाहरण से यह समझाया कि प्रत्याहार की प्रक्रिया आकस्मिक न होकर 'शनैः शनैः' अर्थात् क्रमिक होनी चाहिए। अब इस श्लोक में वे प्रत्याहार के वास्तविक स्वरूप और उसमें 'मन' की भूमिका को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

इन्द्रियाणां तु सर्वेषां या वृत्तिः तु प्रकीर्तिता, (सा) मनसा प्रतिहर्तव्या; (ततः) प्रत्याहारः ततः स्मृतः।

पदार्थ:

• इन्द्रियाणां सर्वेषां: समस्त इन्द्रियों का (ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ दोनों)।

• वृत्तिः: गति, बहाव, प्रवृत्ति या विषय की ओर दौड़ना।

• प्रकीर्तिता: जो प्रसिद्ध है, जो स्वभावतः घटित होता है।

• मनसा: मन के द्वारा (साधन के रूप में)।

• प्रतिहर्तव्या: वापस खींच लेना चाहिए, लौटा लेना चाहिए।

• प्रत्याहारः ततः स्मृतः: तब उसे 'प्रत्याहार' कहा गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ प्रत्याहार की सूक्ष्म विधि का उद्घाटन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि इन्द्रियों की एक 'वृत्ति' है—अर्थात् उनका स्वभाव है कि वे अपने विषयों की ओर निरंतर प्रवाहित होती रहें। आँख का स्वभाव रूप की ओर, कान का शब्द की ओर और जिह्वा का रस की ओर दौड़ना है। यह जो 'प्रकीर्तिता वृत्ति' है, यह वास्तव में मन के अधीन है, क्योंकि इन्द्रियाँ स्वयं जड़ हैं; मन ही उन्हें विषयों की ओर ले जाता है।

यहाँ याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र देते हैं: "मनसा प्रतिहर्तव्या"। इन्द्रियों को बलपूर्वक दबाना या उन्हें हिंसापूर्वक रोकना प्रत्याहार नहीं है, क्योंकि दमन से विकार और बढ़ते हैं। सही विधि यह है कि जिस 'मन' ने इन्द्रियों को बाहर फैलाया था, उसी 'मन' का उपयोग करके उन्हें वापस खींच लिया जाए। जब मन अपनी वृत्तियों को विषयों से हटाकर स्वयं में या इष्ट के ध्यान में स्थिर करता है, तो इन्द्रियाँ स्वतः ही उसके पीछे-पीछे भीतर की ओर लौट आती हैं।

अतः, प्रत्याहार केवल इन्द्रियों का निग्रह नहीं है, अपितु मन का वह सामर्थ्य है जिसके द्वारा वह इन्द्रियों के प्रवाह की दिशा को 'बाह्य' से 'आन्तर' की ओर मोड़ देता है। जब यह 'प्रतिहर्तन' (वापस खींचना) घटित होता है, तब साधक विषयों के वशीभूत होने के स्थान पर स्वयं का स्वामी बन जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

योगसूत्र

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥ २.५४ ॥

अपने विषयोंसे सम्बन्ध न रहनेपर इन्द्रियोंका मानो चित्तके स्वरूपका अनुकरण करना प्रत्याहार है।

योगसूत्र २.५४पातञ्जल योगदर्शन — व्यासभाष्य (theVyasa) · पृष्ठ 105

पातञ्जल योगसूत्र में प्रत्याहार को 'चित्तस्वरूपानुकार' कहा गया है। इसका अर्थ है कि जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से अलग होती हैं, तो वे चित्त के स्वरूप का अनुकरण करने लगती हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का "मनसा प्रतिहर्तव्या" और योगसूत्र का "चित्तस्वरूपानुकार" एक ही सत्य के दो पहलू हैं—स्मृति यहाँ 'क्रिया' (कैसे खींचें) बता रही है और योगसूत्र 'अवस्था' (खींचने के बाद क्या होता है) बता रहा है।

कठ उपनिषद्

यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ २.३.१०–११ ॥

जब मनके साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ ठहर जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, उसे परम गति कहते हैं। इन्द्रियोंकी उस स्थिर धारणाको ही "योग" मानते हैं; तब (साधक) प्रमादरहित होता है, क्योंकि योग (शुभका) उदय और (अशुभका) लय है।

कठ उपनिषद् २.३.१०–११उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 77

कठोपनिषद् में जब मन के साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ ठहर जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, तो उसे 'परम गति' और 'स्थिरामिन्द्रियधारणा' कहा गया है। यह स्मृति का वह लक्ष्य है जहाँ प्रत्याहार पूर्ण हो जाता है और साधक प्रमाद से मुक्त होकर योग की स्थिति में प्रतिष्ठित होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मन' को एक लगाम की भाँति प्रयोग करने का अभ्यास है। यहाँ इन्द्रियाँ उन शक्तिशाली घोड़ों के समान हैं जो विषयों के घास के मैदान की ओर दौड़ रहे हैं। यदि कोई इन घोड़ों को सीधे रोकने का प्रयास करेगा, तो वे उसे चोट पहुँचा सकते हैं। योगिक रहस्य यह है कि लगाम 'मन' है। जब साधक मन को संकल्प और ध्यान के द्वारा भीतर की ओर खींचता है, तो इन्द्रियाँ (घोड़े) स्वतः ही पीछे लौट आती हैं।

अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि इन्द्रियाँ मन के अधीन हैं। जब भी कोई इन्द्रिय विषय की ओर भागे, तो वह उसे दबाने के बजाय मन को आदेश दे—"लौट आओ"। धीरे-धीरे मन की यह शक्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि वह इन्द्रियों के प्रवाह को पलक झपकते ही भीतर मोड़ देता है। यह अभ्यास साधक को 'विषय-आश्रित' भूमि से उठाकर 'आत्म-आश्रित' भूमि पर ले जाता है, जहाँ से ध्यान की गहराई संभव होती है।

प्रत्याहारविधिः

श्लोक ८.५३

सर्वाङ्गाणि यथा कूर्मो दृष्ट्वा संकोचयेत् क्षणात्

तथेन्द्रियाणीन्द्रियार्थात् तानि प्रत्याहरेद्बुधः ॥ ८.५३ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९६

जैसे कछुआ देखने पर अपने अंगों को क्षण भर में सिकोड़ लेता है, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति इन्द्रियों को इन्द्रियार्थों से प्रत्याहार कर ले।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि इन्द्रियों की विषय-गत वृत्ति को मन के द्वारा ही वापस खींचना प्रत्याहार है। अब वे इस मानसिक प्रक्रिया को एक जीवंत उपमा के माध्यम से समझा रहे हैं ताकि साधक इसकी तीव्रता और पूर्णता को अनुभव कर सके।

अन्वय और पदार्थ —

यथा कूर्मः (दृष्ट्वा) सर्वाङ्गाणि संकोचयेत् क्षणात्, तथैव बुधः इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थात् प्रत्याहरेत्।

पदार्थ:

• यथा कूर्मः: जैसे कछुआ।

• दृष्ट्वा: (किसी संकट या बाहरी उद्दीपन को) देखकर।

• सर्वाङ्गाणि: अपने समस्त अंगों को।

• संकोचयेत्: सिकोड़ लेता है या भीतर समेट लेता है।

• क्षणात्: एक क्षण में, अत्यंत शीघ्रता से।

• तथैव: ठीक उसी प्रकार।

• बुधः: बुद्धिमान व्यक्ति, जाग्रत साधक।

• इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थात्: इन्द्रियों को उनके विषयों (रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श) से।

• प्रत्याहरेत्: वापस खींच ले, समेट ले।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य प्रत्याहार की क्रिया को 'कूर्म' (कछुए) की उपमा से समझा रहे हैं। कछुए की यह विशेषता है कि वह बाहरी वातावरण के प्रति अत्यंत सजग रहता है; जैसे ही उसे किसी संकट का आभास होता है या वह किसी बाहरी वस्तु को देखता है, वह क्षण भर में अपने सिर और अंगों को अपने कठोर कवच के भीतर सुरक्षित समेट लेता है। यहाँ कवच सुरक्षा का प्रतीक है और अंगों का संकोचन 'प्रत्याहार' का।

याज्ञवल्क्य यहाँ 'बुधः' शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। बुध वह है जिसकी बुद्धि जाग्रत है, जो यह जानता है कि इन्द्रियों का बाहर की ओर बहना वास्तव में ऊर्जा का क्षय है। जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेटकर स्वयं को सुरक्षित कर लेता है, उसी प्रकार बुद्धिमान साधक अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अंतर्मुखी कर लेता है।

यहाँ 'क्षणात्' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संकेत करता है कि यद्यपि प्रत्याहार का अभ्यास 'शनैः शनैः' (धीरे-धीरे) आरम्भ होता है (जैसा कि श्लोक ८.५१ में कहा गया), किन्तु उसकी पूर्णता तब आती है जब साधक में यह क्षमता विकसित हो जाए कि वह एक क्षण में ही अपनी चेतना को विषयों से काटकर भीतर की ओर मोड़ सके। यह केवल इन्द्रियों का दमन नहीं, बल्कि उनका 'संकोच' है—अर्थात् उन्हें उनके मूल स्रोत (मन और आत्मा) में वापस ले जाना। जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से विमुख होकर भीतर की ओर मुड़ती हैं, तब साधक का आंतरिक कवच (विवेक) सक्रिय हो जाता है और वह बाहरी विक्षेपों से अप्रभावित रहता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

भगवद्गीता

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २.५८ ॥

जब (साधक) कछुएके अंगोंकी भाँति इन्द्रियोंको इन्द्रियार्थोंसे सब ओरसे समेट लेता है, तब उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है।

भगवद्गीता २.५८गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 66

भगवद्गीता में भी इसी उपमा का प्रयोग किया गया है, जहाँ कहा गया है कि जब साधक कछुए के समान इन्द्रियों को विषयों से समेट लेता है, तब उसकी 'प्रज्ञा प्रतिष्ठित' होती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का यहाँ एक ही मत है—इन्द्रियों का निग्रह केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि प्रज्ञा की प्रतिष्ठा का साधन है। जहाँ गीता इसे 'स्थितप्रज्ञ' के लक्षण के रूप में बताती है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे प्राणायाम के बाद की एक अनिवार्य विधि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'सजगता' का अभ्यास है। कछुआ अंगों को तब समेटता है जब वह 'देखता' है (दृष्ट्वा)। इसी प्रकार साधक को अपनी इन्द्रियों के विषय-गमन के प्रति 'साक्षी' होना चाहिए। जैसे ही मन किसी विषय की ओर भागे, उसी क्षण यह बोध होना कि "यह वृत्ति बाहर जा रही है", और उसे तुरंत भीतर की ओर मोड़ लेना ही 'क्षणात्' प्रत्याहार का अभ्यास है।

योगिक दृष्टि से, इन्द्रियाँ बाहर की ओर फैली हुई किरणें हैं। जब ये किरणें वापस केंद्र की ओर मुड़ती हैं, तो वही ऊर्जा 'ओज' और 'तेज' में परिवर्तित होती है। साधक इस अभ्यास से 'विषय-आसक्ति' की भूमि से उठकर 'आत्म-संकोच' की भूमि पर आता है, जिससे मन एकाग्र होता है और वह अगले सोपान—ध्यान के लिए तैयार हो जाता है।

श्लोक ८.५४

संकल्पोऽध्यवसायश्च अभिमानस्तथैव च ।

तथैव वायवः सूक्ष्मा निरोद्धव्याः प्रयत्नतः ॥ ८.५४ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९६

संकल्प, अध्यवसाय और अभिमान तथा उसी प्रकार वायु रूपी सूक्ष्म (प्राणों) को भी प्रयत्नपूर्वक रोकना चाहिए।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने कछुए की उपमा देकर इन्द्रियों को विषयों से समेटने की तीव्रता को समझाया। अब वे प्रत्याहार की परिधि को केवल स्थूल इन्द्रियों तक सीमित न रखकर, उसे मन की सूक्ष्म वृत्तियों और प्राणों के स्तर तक ले जा रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

संकल्पः, अध्यवसायः च, अभिमानः तथैव च, तथैव वायवः सूक्ष्माः (च) प्रयत्नतः निरोद्धव्याः।

पदार्थ:

• संकल्पः: किसी कार्य को करने का मानसिक निश्चय या भविष्य की योजना।

• अध्यवसायः: संकल्प को सिद्ध करने के लिए किया गया निरंतर मानसिक प्रयास या दृढ़ निश्चय।

• अभिमानः: 'मैं कर्ता हूँ' या 'यह मेरा है'—यह भाव, जिसे अहंकार की सूक्ष्म वृत्ति कहा जाता है।

• तथैव: उसी प्रकार।

• वायवः सूक्ष्माः: वायु रूपी सूक्ष्म शक्तियाँ; यहाँ इसका अर्थ उन सूक्ष्म प्राण-वृत्तियों से है जो मन के साथ मिलकर चंचल होती हैं।

• निरोद्धव्याः: रोके जाने चाहिए, निरुद्ध करने चाहिए (यह विधिलिङ् है, जो अनिवार्य अभ्यास का संकेत है)।

• प्रयत्नतः: निरंतर प्रयास और सजगता के साथ।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ प्रत्याहार की एक अत्यंत गूढ़ और सूक्ष्म विधि बता रहे हैं। सामान्यतः साधक समझता है कि केवल आँखों को बंद कर लेना या कानों को बाहरी शोर से हटा लेना ही प्रत्याहार है, किन्तु याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि असली बाधा इन्द्रियों से अधिक उन मानसिक संस्कारों में है जो इन्द्रियों को बाहर धकेलते हैं।

प्रथम तीन शब्द—संकल्प, अध्यवसाय और अभिमान—मनुष्य की आंतरिक मानसिक गति के तीन सोपान हैं। जब मन किसी विषय की ओर आकर्षित होता है, तो पहले 'संकल्प' उठता है (कि मैं यह करूँ), फिर उस संकल्प को पूरा करने के लिए 'अध्यवसाय' (दृढ़ निश्चय और योजना) जन्म लेता है, और अंततः जब वह कार्य घटित होता है या उसकी इच्छा प्रबल होती है, तो 'अभिमान' (अहंकार) उसे अपने साथ जोड़ लेता है। यदि साधक केवल बाहरी इन्द्रियों को रोक ले, किन्तु भीतर संकल्प और अध्यवसाय को चलता रहने दे, तो वह प्रत्याहार नहीं, केवल दमन होगा। अतः इन तीनों सूक्ष्म मानसिक वृत्तियों को 'प्रयत्नतः' अर्थात सजग प्रयास से रोकना अनिवार्य है।

इसके साथ ही ऋषि 'वायवः सूक्ष्माः' का उल्लेख करते हैं। यहाँ वायु का अर्थ केवल श्वास नहीं, बल्कि वह सूक्ष्म प्राण-शक्ति है जो मन के साथ जुड़ी हुई है। जैसा कि हम जानते हैं कि प्राण और मन एक-दूसरे के पूरक हैं; जब मन चंचल होता है, तो प्राणों की गति भी सूक्ष्म स्तर पर अस्थिर हो जाती है। इन सूक्ष्म वायु-वृत्तियों को रोकना इसलिए आवश्यक है क्योंकि जब तक प्राणों का सूक्ष्म प्रवाह विषयों की ओर बहता रहेगा, मन को स्थिर करना असंभव है।

अतः यह श्लोक स्पष्ट करता है कि प्रत्याहार एक बहुस्तरीय प्रक्रिया है: पहले स्थूल इन्द्रियों का निरोध, फिर संकल्प-अध्यवसाय का निरोध, और अंततः सूक्ष्म प्राणों का निरोध।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रत्याहार' को 'मनोनिग्रह' के उच्चतम स्तर पर ले जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक केवल बाहरी विषयों को न छोड़े, बल्कि अपने भीतर उठने वाले 'विचारों के बीज' (संकल्प) को ही पहचान ले।

अभ्यास की विधि यह है कि जैसे ही मन में कोई विचार आए, साधक उसे 'संकल्प' के रूप में देखे और उसे वहीं रोक दे। यदि वह संकल्प 'अध्यवसाय' (दृढ़ता) बन चुका है, तो उसे साक्षी भाव से देखकर विलीन करे। जब साधक संकल्प, अध्यवसाय और अभिमान के इस त्रिकोण को तोड़ देता है, तब वह 'अभिमान' की उस सूक्ष्म परत को हटा पाता है जो उसे देह और अहंकार से बाँधे रखती है।

यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह केवल शरीर का नहीं, बल्कि अपनी सूक्ष्म मानसिक और प्राणिक प्रवृत्तियों का स्वामी बन जाता है। जब सूक्ष्म वायु और मानसिक वृत्तियाँ निरुद्ध होती हैं, तब ऊर्जा का क्षय रुक जाता है और साधक उस आंतरिक मौन की स्थिति में प्रवेश करता है, जो अगले अध्याय के 'ध्यान' के लिए अनिवार्य आधार है।

प्रत्याहारफलम्

श्लोक ८.५५

अतीतानागतेभ्यश्च कामेभ्यस्तु पुनः पुनः ।

एकत्र धारयेद्यस्तु सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ८.५५ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९६

जो अतीत और अनागत कामनाओंसे (मनको) बार-बार (हटाकर) एक स्थानमें धारण करता है, वह अमृतत्वके योग्य होता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रत्याहार की परिधि को स्थूल इन्द्रियों से आगे बढ़ाकर संकल्प, अध्यवसाय, अभिमान और सूक्ष्म वायु जैसी मानसिक वृत्तियों के निरोध तक विस्तृत किया। अब वे इस संपूर्ण प्रत्याहार प्रक्रिया के चरम लक्ष्य और उसकी सफलता के लक्षण को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अतीतानाम् (च) आगतेभ्यः च कामेभ्यः तु पुनः पुनः (मनः) एकत्र धारयेद्यस्तु, सः अमृतत्वाय कल्पते।

पदार्थ:

• अतीतानाम्: जो बीत चुके हैं; भूतकाल की स्मृतियाँ, कामनाएँ या पश्चाताप।

• आगतेभ्यः: जो आने वाले हैं; भविष्य की योजनाएँ, आशाएँ या आशंकाएँ।

• कामेभ्यः: इच्छाओं या वासनाओं से।

• पुनः पुनः: बार-बार; यह शब्द अभ्यास की निरंतरता और मन की चंचलता दोनों को दर्शाता है।

• एकत्र धारयेत्: एक स्थान पर धारण करना; बिखरे हुए चित्त को समेटकर एक बिंदु या एक लक्ष्य पर स्थिर करना।

• अमृतत्वाय: मृत्युंजय होने के लिए, या जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर अविनाशी तत्त्व (अक्षर) को प्राप्त करने के लिए।

• कल्पते: योग्य होता है या अधिकारी बनता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ प्रत्याहार का उपसंहार करते हुए मन की उस समय-यात्रा का विश्लेषण कर रहे हैं, जो साधक की सबसे बड़ी बाधा है। मन कभी वर्तमान में नहीं रहता; वह या तो 'अतीत' के सुख-दुःख के संस्मरणों में भटकता है या 'अनागत' की कल्पनाओं और कामनाओं में। याज्ञवल्क्य का संकेत है कि कामनाएँ केवल वर्तमान की वस्तु नहीं हैं, बल्कि वे समय के दोनों छोरों पर फैली हुई हैं।

'पुनः पुनः' शब्द यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह स्वीकार करता है कि मन एक बार रोकने से नहीं रुकता। वह बार-बार अतीत की ओर भागेगा और बार-बार भविष्य की ओर। साधक का धर्म यह नहीं है कि वह इस चंचलता से लड़े, बल्कि यह है कि वह जितनी बार मन भटके, उतनी बार उसे 'एकत्र' करे। यह 'एकत्र' करना ही प्रत्याहार की पूर्णता है। जब इन्द्रियों की वृत्तियाँ (जैसा कि श्लोक ८.५२ में कहा गया) और मानसिक संकल्प (श्लोक ८.५४) समेट लिए जाते हैं, तब चित्त की वह बिखरी हुई ऊर्जा एक बिंदु पर केंद्रित हो जाती है।

जब साधक अतीत के बोझ और भविष्य के मोह को त्यागकर मन को एक स्थान पर धारण कर लेता है, तब वह 'अमृतत्व' के योग्य होता है। यहाँ अमृतत्व का अर्थ केवल शारीरिक अमरता नहीं, अपितु उस 'अक्षर' तत्त्व का अनुभव है, जिसके बारे में याज्ञवल्क्य अपनी श्रुति में कहते हैं कि सूर्य और चन्द्र भी उसी के शासन में स्थित हैं। जो समय के बंधन (भूत-भविष्य) से मुक्त होकर एकत्रीकृत हो गया, वह काल से परे उस अविनाशी पुरुष में प्रतिष्ठित हो जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मन की इस चंचलता और उसे बार-बार लौटाने की विधि का समर्थन भगवद्गीता में मिलता है:

भगवद्गीता

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ ६.२६ ॥

चंचल, अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँसे उसे रोककर आत्मामें ही वशमें करे।

भगवद्गीता ६.२६गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 186

यहाँ 'यतो यतो' (जहाँ-जहाँ से) और 'ततस्ततो' (वहाँ-वहाँ से) का प्रयोग बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के 'पुनः पुनः' के समान ही है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि मन को एक झटके में वश में नहीं किया जा सकता, अपितु उसे बार-बार लौटाकर आत्मा में स्थिर करना पड़ता है।

इसी प्रकार, इन्द्रियों को बाहर से हटाकर भीतर मोड़ने की इस प्रक्रिया का लक्ष्य अमृतत्व है, जैसा कि कठोपनिषद् में वर्णित है:

कठ उपनिषद्

पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ २.१.१ ॥

स्वयम्भूने इन्द्रियोंको बाहरकी ओर खुलनेवाला बनाया, इसलिए (मनुष्य) बाहर देखता है, भीतरके आत्माको नहीं; कोई धीर अमृतत्वकी इच्छासे दृष्टि लौटाकर प्रत्यगात्माको देखता है।

कठ उपनिषद् २.१.१उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 71

यहाँ 'आवृत्तचक्षुः' (लौटी हुई दृष्टि) का सीधा सम्बन्ध 'अमृतत्वमिच्छन्' (अमृतत्व की इच्छा करने वाले) से है। स्मृति का 'एकत्र धारयेत्' और उपनिषद् का 'प्रत्यगात्मानमैक्षत' एक ही सत्य के दो पहलू हैं—एक विधि है और दूसरा उसका लक्ष्य।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रत्याहार' से 'धारणा' की ओर जाने वाला सेतु है। जब तक मन अतीत और भविष्य की कामनाओं में बिखरा है, वह 'क्षिप्त' या 'मुड़मुड़ा' है। 'एकत्र धारण' करने का अभ्यास उसे 'एकाग्र' बनाता है।

साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसकी समस्त मानसिक ऊर्जा समय के दो छोरों पर नष्ट हो रही है। अभ्यास यह है कि जैसे ही विचार अतीत की किसी घटना या भविष्य की किसी इच्छा की ओर जाए, बिना किसी द्वेष के, उसे पुनः वर्तमान के केंद्र पर खींच लाया जाए। यह 'खींचना' ही योग है।

जब यह 'एकत्र' होने की प्रक्रिया सहज हो जाती है, तब मन की योग्यता बढ़ती है:

योगसूत्र

धारणासु च योग्यता मनसः ॥ २.५३ ॥

और धारणाओंमें मनकी योग्यता (होती है)।

योगसूत्र २.५३पातञ्जल योगदर्शन — व्यासभाष्य (theVyasa) · पृष्ठ 104

अर्थात्, जब प्रत्याहार के माध्यम से मन कामनाओं से मुक्त होकर एकत्र होता है, तभी वह 'धारणा' (किसी एक वस्तु या मंत्र पर चित्त को टिकाने) के योग्य बनता है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को कामनाओं के विखराव से निकालकर एकाग्रता की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है, जो अंततः उसे अमृतत्व यानी आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।

श्लोकसंख्या स्नाननिर्णयोपसंहारश्च

श्लोक ८.५६

शतत्रयं तु श्लोकानामष्टात्रिंशाधिकं तथा ।

स्नानस्य निर्णयः प्रोक्तः शिष्याणां हितकाम्यया ॥ ८.५६ ॥

अष्टमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ९६

शिष्योंके हितकी इच्छासे तीन सौ अड़तीस श्लोकोंमें स्नानका निर्णय कहा गया।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रत्याहार की परिधि को मानसिक वृत्तियों और सूक्ष्म वायु के निरोध तक विस्तृत करते हुए अमृतत्व की प्राप्ति का मार्ग बताया। अब वे इस संपूर्ण प्रकरण का उपसंहार करते हुए, पूर्व में वर्णित स्नान-विधि की व्यापकता और उसके उद्देश्य को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

शिष्याणां हितकाम्यया (च) शतत्रयं तु श्लोकानाम् अष्टात्रिंशाधिकं तथा, स्नानस्य निर्णयः प्रोक्तः।

पदार्थ:

• शिष्याणां हितकाम्यया: शिष्यों के हित की इच्छा से; यहाँ 'हित' का अर्थ केवल बाह्य शुद्धि नहीं, अपितु साधक की आध्यात्मिक उन्नति और पात्रता का निर्माण है।

• शतत्रयं: तीन सौ (३००)।

• अष्टात्रिंशाधिकं: अड़तीस (३८) अधिक; अर्थात् ३३८।

• श्लोकानाम्: श्लोकों में।

• स्नानस्य निर्णयः: स्नान का निर्णय; यहाँ 'निर्णय' का अर्थ केवल विधि बताना नहीं, बल्कि स्नान के सूक्ष्म रहस्यों, उसके प्रयोजन और उसके पूर्ण विधान का निर्धारण करना है।

• प्रोक्तः: कहा गया है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से एक महत्वपूर्ण संकेत दे रहे हैं। वे बताते हैं कि स्नान के विषय में तीन सौ अड़तीस श्लोकों का विस्तृत विवेचन किया गया है। प्रथम दृष्टि में यह केवल एक संख्यात्मक विवरण प्रतीत होता है, किंतु योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में स्नान केवल शरीर को जल से भिगोना नहीं है।

जब वे कहते हैं कि यह विवरण 'शिष्यों के हित की इच्छा' से दिया गया है, तो इसका भाव यह है कि एक साधक जब योग के उच्च सोपानों—प्राणायाम और प्रत्याहार—की ओर बढ़ता है, तो उसकी बाह्य और आंतरिक शुद्धि का आधार 'स्नान' ही होता है। यदि आधार (शुद्धि) सुदृढ़ न हो, तो उच्च साधनाएँ निष्फल हो जाती हैं। इसलिए, स्नान के सूक्ष्म भेदों, उसके मन्त्रों, उसके समय और उसके आन्तर अर्थों को इतनी विस्तार से समझाया गया ताकि शिष्य किसी भी संशय के बिना अपनी शुद्धि सुनिश्चित कर सके।

यहाँ 'निर्णय' शब्द का प्रयोग अत्यंत सार्थक है। शास्त्र में जब किसी विषय का 'निर्णय' किया जाता है, तो उसका अर्थ होता है कि उस विषय के समस्त पक्षों का विश्लेषण कर उसे अंतिम और प्रमाणिक रूप दे देना। स्नान के ३३८ श्लोक इस बात का प्रमाण हैं कि याज्ञवल्क्य के लिए बाह्य क्रिया (कर्म) और आन्तर साधना (योग) अलग-अलग नहीं हैं। बाह्य स्नान ही आन्तर स्नान की पहली सीढ़ी है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक इस पूरे प्रकरण का उपसंहार है। साधक के लिए इसका रहस्य यह है कि साधना में 'संख्या' और 'विस्तार' का अपना महत्व है। जिस प्रकार स्नान की विस्तृत विधि शरीर को शुद्ध कर उसे प्राण-साधना के योग्य बनाती है, उसी प्रकार सूक्ष्म विवरणों का पालन साधक के मन में अनुशासन और श्रद्धा उत्पन्न करता है।

यह श्लोक साधक को यह अनुभव कराता है कि योग की यात्रा 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर है। स्नान (स्थूल शुद्धि) → प्राणायाम (प्राण शुद्धि) → प्रत्याहार (मन की शुद्धि)। जब महर्षि स्नान के विस्तृत निर्णय की बात करते हैं, तो वे साधक को यह याद दिला रहे हैं कि उसने अपनी यात्रा कहाँ से आरम्भ की थी। अमृतत्व की प्राप्ति (जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया) के लिए जो पात्रता चाहिए, उसकी नींव उन्हीं ३३८ श्लोकों के 'स्नान-निर्णय' में निहित है। अतः साधक इस उपसंहार से यह सीखता है कि किसी भी उच्च अनुभव के लिए आधारभूत शुद्धि की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-10-04।

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