व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, नवमोऽध्यायः
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यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके नवमोऽध्यायः — अध्यात्मनिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।
नवमोऽध्यायः — अध्यात्मनिर्णयः
अध्याय-सार — अध्यात्मनिर्णय — ग्रन्थका केन्द्र और सबसे बड़ा अध्याय (१९८ श्लोक; अन्तिम श्लोक इसे ‘ध्यान-प्रकरण’ कहता है)। ध्यान वह चौथा (अंग) है, जिसे करके फिर जन्म नहीं होता (९.१–२)। निर्मल हृदयमें स्थित विष्णुमें मन लगाना ही ध्यान और योग है; हृदयमें ओंकारसे लक्षित आत्माको कमलनालसे ऊपर ले जाकर घण्टानाद-से ओंकारकी उपासना करे (९.३–८)। मूर्धाका बिन्दु, जहाँसे वाणी लौट आती है और जो किसी वर्णका नहीं, हृदयाकाशमें अक्षर है (९.९–२०)। उसीका अंश सनातन जीव है — वही विष्णु, वही भर्ग, जो हृदयमें, सूर्यमें और धुएँरहित अग्निमें तपता है (९.२१–२७)। ज्ञान और कर्म दोनों आवश्यक हैं (९.२८–३४), और अष्टांग योग तथा प्रणव, व्याहृति और सावित्री — इन तीनसे आत्माकी उपासना होती है (९.३५–३९)।
फिर सावित्रीका अर्थ आता है (९.४०–६३): ‘तत्’ में ‘यत्’ निहित है; भर्ग वह पुरुष है जो बुद्धिको प्रेरित करता है; ‘भ-र-ग’ की निरुक्ति; सूर्य, सविता, वरेण्य, देव आदि नामोंकी निरुक्तियाँ; और सूर्यमण्डलका पुरुष, जिसके लिए ईश उपनिषद्के ‘हिरण्मयेन पात्रेण’ और ‘योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्’ उद्धृत हैं। हिरण्यगर्भसे जगत्की उत्पत्ति, अदितिके गर्भसे मार्तण्डका जन्म, उसके दो रस जो देव-मनुष्य और नाग-राक्षस सबको पालते हैं, और एक ही देवके अनेक नाम (९.६४–९५)। इडा और सुषुम्णा किरणें हैं; सूर्यके द्वारसे ब्रह्मवेत्ता उस अविनाशी पुरुषतक जाते हैं (९.९६–१०२)। सूर्य वेदमय है, और मण्डलमें तथा अग्निमें वही पुरुष ध्येय है (९.१०३–११५)।
इसके बाद यज्ञ भीतर आता है: ज्ञानपूर्वक अग्निहोत्र (९.११६–१२२), शरीरमें पाँच अग्नियाँ (९.१२३–१२५), हृदयकी वेदी और पाँच मण्डल (९.१२६–१३५), और भोजनको प्राणाग्निहोत्र बनानेकी विधि — अन्न ही परम तत्त्व है, और बिना जाने खाया अन्न राखमें दी गयी आहुति है (९.१३६–१५१)। परमेश्वर काठसे पत्थरतक सबमें है; एक आत्मा पाँच स्थानोंमें है; ‘आदित्य ब्रह्म है’ सब उपनिषदोंकी उपासना है; सूर्य वेदोंके मधुका छत्ता है (९.१५२–१६७)। हृदयकी नाडियोंसे दो मार्ग निकलते हैं — एक सूर्यमण्डलको भेदकर परम गतितक, बाकी संसारमें (९.१६८–१७७)। ध्यानकी महिमाके बाद अन्तमें उसकी विधि है: इन्द्रियोंको बुद्धिमें, बुद्धि आदिको प्रकृतिमें और प्रकृतिको पुरुषमें लीन करना; आसन, पद्मासन, दीर्घ प्रणव, प्राणायाम, और हृदयमें दीपकी तरह अचल आत्मापर धारणा (९.१८२–१९४); फिर योगसिद्धिके लक्षण और अमृतत्व (९.१९५–१९८)।
ध्यानविधिनिरूपणप्रतिज्ञा
ध्यानस्य तु विधिं वक्ष्ये शृण्वन्तु ऋषयः सदा ।
एभ्यस्तु पुनरावृत्तिः कदाचिदिह दृश्यते ॥ ९.१ ॥
अब मैं ध्यानकी विधि कहूँगा; ऋषिगण सावधान होकर सुनें। इन (साधनों) से (भी) यहाँ कभी-कभी पुनर्जन्म देखा जाता है —
अवतरणिका — पिछले अध्याय में प्राणायाम के अंतर्गत सव्याहृति-सप्रणव गायत्री के तीन बार पाठ, प्रत्याहार और ध्यान के लक्षण का निरूपण किया गया। अब इस नौवें अध्याय में महर्षि याज्ञवल्क्य उन लक्षणों से आगे बढ़कर ध्यान की वास्तविक विधि का उद्घाटन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
ऋषयः सदा शृण्वन्तु, (अहं) ध्यानस्य तु विधिं वक्ष्ये। एभ्यः तु कदाचित् इह पुनरावृत्तिः दृश्यते।
पदार्थ:
• विधिं वक्ष्ये: विधि का कथन करूँगा। यहाँ 'विधि' का अर्थ केवल बाहरी प्रक्रिया नहीं, अपितु वह आंतरिक मार्ग है जो साधक को लक्ष्य तक पहुँचाता है।
• शृण्वन्तु ऋषयः सदा: ऋषिगण निरंतर/सावधान होकर सुनें। 'सदा' यहाँ केवल समय का सूचक नहीं, बल्कि एकाग्रता और तत्परता का संकेत है।
• एभ्यः: इन (पूर्व-कथित साधनों) से। इसमें प्राणायाम, प्रत्याहार और पूर्ववर्ती क्रियाएँ सम्मिलित हैं।
• पुनरावृत्तिः: पुनर्जन्म या उसी अवस्था में वापस लौट आना।
• दृश्यते: देखा जाता है या घटित होता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस अध्याय का आरम्भ महर्षि याज्ञवल्क्य एक गंभीर प्रतिज्ञा से करते हैं। वे कहते हैं कि अब वे ध्यान की वह विधि बताएंगे जिससे साधक पूर्णता को प्राप्त करता है। वे ऋषियों को 'सावधान' होकर सुनने का संकेत देते हैं, क्योंकि यहाँ से साधना का वह मोड़ आता है जहाँ केवल क्रिया नहीं, बल्कि 'अवस्था' का परिवर्तन होता है।
श्लोक का दूसरा भाग एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य खोलता है। ऋषि कहते हैं कि पूर्व में बताए गए साधनों (प्राणायाम, प्रत्याहार आदि) से भी कभी-कभी 'पुनरावृत्ति' देखी जाती है। इसका भाव यह है कि प्राणायाम और प्रत्याहार मन और प्राण को शुद्ध करने वाली अनिवार्य सीढ़ियाँ हैं, किन्तु यदि साधक केवल इन्हीं तक सीमित रह जाए और चौथे अंग 'ध्यान' में प्रवेश न करे, तो वह उच्च लोकों या उच्च मानसिक अवस्थाओं को तो प्राप्त कर सकता है, किन्तु पूर्ण मुक्ति (मोक्ष) नहीं। वह पुनः जन्म के चक्र में या उसी मानसिक द्वंद्व में लौट आता है।
यहाँ 'कदाचित्' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। महर्षि यह नहीं कह रहे कि पूर्व साधन व्यर्थ हैं या हीन हैं; अपितु वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे 'साधन' हैं, 'साध्य' नहीं। प्राणायाम प्राण को स्थिर करता है, प्रत्याहार इंद्रियों को भीतर मोड़ता है, परन्तु उस स्थिर प्राण और अंतर्मुख इंद्रियों के साथ 'अक्षर' में लीन होना ही ध्यान है। जब तक यह अंतिम विलय नहीं होता, तब तक सूक्ष्म आसक्ति शेष रह सकती है, जो पुनरावृत्ति का कारण बनती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस स्मृति के वचन की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता में मिलती है:
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ ८.१६ ॥
अर्जुन! ब्रह्मलोकतकके सब लोक पुनरावर्ती हैं (वहाँसे लौटना होता है); पर कौन्तेय! मुझे पाकर पुनर्जन्म नहीं होता।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ब्रह्मलोकतक के सभी लोक पुनरावर्ती हैं। अर्थात्, यदि साधक ने केवल श्रेष्ठ कर्मों या प्रारंभिक योगिक क्रियाओं से उच्च पदों को प्राप्त किया है, तो वहाँ से उसे पुनः लौटना पड़ता है। केवल 'मामुपेत्य'—अर्थात् परमात्मा में लीन होने पर ही पुनर्जन्म नहीं होता। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'ध्यान' वही 'मामुपेत्य' की अवस्था है, जहाँ साधक स्वयं को उस परम पुरुष में विलीन कर देता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक चेतावनी और प्रेरणा दोनों है। अब तक साधक ने प्राणायाम के माध्यम से प्राणों का शोधन किया और प्रत्याहार से चित्त के बिखराव को रोका। यह नींव का कार्य था। परन्तु योग-रहस्य यह है कि केवल प्राण का स्थिर होना मुक्ति नहीं है।
साधक अनुभव करता है कि वह एक ऐसी भूमि पर खड़ा है जहाँ से शिखर दिख रहा है, किन्तु अभी अंतिम छलांग लगाना शेष है। यदि वह केवल प्राणायाम के आनंद या प्रत्याहार की शांति में रुक गया, तो वह 'योग-निद्रा' या 'सांसारिक सुखों के सूक्ष्म रूप' में फंस सकता है, जो कि एक प्रकार की पुनरावृत्ति ही है। इस श्लोक के माध्यम से साधक को यह बोध कराया जा रहा है कि उसे 'विधि' के उस अंतिम सोपान (ध्यान) की ओर बढ़ना है, जहाँ से वापसी का कोई मार्ग न रहे और वह अक्षर-ब्रह्म में स्थित हो जाए।
ध्यानफलम्
ध्यानं कृत्वा चतुर्थं तु न भूयो जन्म चाप्नुयात् ।
ततः सम्यक् प्रवक्ष्यामि प्राणायामचतुर्थकम् ॥ ९.२ ॥
— (पर) चौथे (अंग) ध्यानको करके (मनुष्य) फिर जन्म नहीं पाता। इसलिए मैं भली-भाँति (वह) कहूँगा, जो प्राणायामके बाद चौथा है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि प्राणायाम और प्रत्याहार जैसे साधनों के उपरांत भी साधक के जीवन में पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) की संभावना बनी रहती है। अब इस श्लोक में वे उस अंतिम कुंजी का संकेत दे रहे हैं, जो जन्म-मरण के इस चक्र को पूर्णतः समाप्त कर देती है।
अन्वय और पदार्थ —
(परन्तु) चतुर्थं ध्यानं कृत्वा तु (मनुष्यः) न भूयो जन्म चाप्नुयात्। ततः प्राणायामचतुर्थकम् (तत्) सम्यक् प्रवक्ष्यामि।
पदार्थ:
• चतुर्थं ध्यानं: चौथा अंग, जो कि ध्यान है। यहाँ 'चतुर्थ' शब्द एक क्रम को दर्शाता है। योग की यात्रा में प्राणायाम से आरम्भ होकर ध्यान तक पहुँचने के सोपानों में यह अंतिम और निर्णायक सोपान है।
• न भूयो जन्म चाप्नुयात्: पुनः जन्म प्राप्त नहीं करता। 'भूयः' का अर्थ है दोबारा। यहाँ जन्म न पाने का अर्थ केवल भौतिक शरीर का अभाव नहीं, अपितु उस अविद्या का नाश है जो पुनर्जन्म का कारण बनती है।
• प्राणायामचतुर्थकम्: वह जो प्राणायाम से गिनने पर चौथा है। यह शब्द समूह यह संकेत देता है कि प्राणायाम प्रथम सोपान है, और ध्यान उस श्रृंखला का चौथा शिखर।
• सम्यक् प्रवक्ष्यामि: भली-भाँति या विस्तारपूर्वक कहूँगा। जब साधक की पात्रता सिद्ध हो जाती है, तब ऋषि रहस्य को पूर्णता के साथ खोलते हैं।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ध्यान की उस पराकाष्ठा की घोषणा कर रहे हैं जहाँ साधक की यात्रा पूर्ण होती है। वे कहते हैं कि जब साधक चौथे अंग—'ध्यान'—को सिद्ध कर लेता है, तब वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।
यहाँ 'चतुर्थ' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक विकासक्रम है। यद्यपि विभिन्न योग-परम्पराओं में अंगों की संख्या भिन्न हो सकती है, किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य की दृष्टि में प्राणायाम से आरम्भ होने वाली एक श्रृंखला है। संभवतः यह क्रम प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और फिर ध्यान के रूप में हो। ऋषि यह समझाना चाहते हैं कि बिना प्राणायाम के प्रत्याहार नहीं, बिना प्रत्याहार के धारणा नहीं और बिना धारणा के स्थिर ध्यान संभव नहीं है। जो साधक केवल प्राणायाम या प्रत्याहार तक रुक जाता है, वह चित्त की शुद्धि तो पा लेता है, किन्तु 'अक्षर' में विलीन नहीं होता, इसलिए उसकी पुनरावृत्ति संभव रहती है। परन्तु जब वह चौथे सोपान 'ध्यान' में प्रतिष्ठित होता है, तो वह उस बिंदु पर पहुँच जाता है जहाँ 'अहं' का विसर्जन हो जाता है और केवल 'ब्रह्म' शेष रहता है।
अतः, ऋषि कहते हैं कि अब मैं उस 'प्राणायाम-चतुर्थक' (प्राणायाम से चौथे स्थान पर स्थित ध्यान) की विधि को भली-भाँति समझाऊँगा। यह कथन साधक के भीतर एक तीव्र जिज्ञासा और विश्वास उत्पन्न करता है कि अब वह उस अंतिम द्वार पर खड़ा है जिसके पार केवल शाश्वत मुक्ति है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'क्रम' के महत्व को स्थापित करता है। योग में छलाँग लगाना संभव नहीं है। प्राणायाम से प्राणों का नियमन होता है, प्रत्याहार से इंद्रियाँ अंतर्मुखी होती हैं, और धारणा से चित्त एक बिंदु पर टिकता है। जब यह तीनों आधार तैयार हो जाते हैं, तब 'ध्यान' स्वतः घटित होने लगता है।
इस श्लोक का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि उसकी अब तक की सारी साधना (प्राणायाम आदि) वास्तव में इस चौथे अंग की तैयारी थी। वह समझता है कि यदि उसे जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति चाहिए, तो उसे केवल प्राणों के खेल या इंद्रिय-दमन में नहीं रुकना है, अपितु उस अवस्था तक जाना है जहाँ मन पूरी तरह से विलीन होकर केवल दृष्टा मात्र रह जाए। यह श्लोक साधक को 'साधन' से 'साध्य' की ओर ले जाने वाला सेतु है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपनी वर्तमान स्थिति को पहचाने और धैर्यपूर्वक चौथे सोपान की ओर अग्रसर हो।
ध्यानविधिः
बाह्यस्तु विषयाक्षेपचित्तविक्षेपवर्जितः ।
मानसं विमले शान्ते स्थितं विष्णुं हृदि क्षिपेत् ॥ ९.३ ॥
बाहरके विषयोंके खिंचाव और चित्तके विक्षेपसे रहित होकर, निर्मल और शान्त (हृदय) में स्थित विष्णुमें मनको लगाये।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ध्यान को वह निर्णायक 'चतुर्थ अंग' बताया जो पुनर्जन्म के चक्र को समाप्त कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। अब इस श्लोक में वे उस ध्यान की प्रयोगात्मक विधि का आरम्भ कर रहे हैं कि मन को वास्तव में कहाँ और किस अवस्था में स्थापित करना है।
अन्वय और पदार्थ —
(साधकः) बाह्यस्तु विषयाक्षेप-चित्तविक्षेप-वर्जितः (भूत्वा), मानसं विमले शान्ते (हृदये) स्थितं विष्णुं हृदि क्षिपेत्।
पदार्थ:
• बाह्यस्तु विषयाक्षेप-चित्तविक्षेप-वर्जितः: बाहरी विषयों के खिंचाव (विषयाक्षेप) और चित्त की चंचलता या भटकाव (विक्षेप) से रहित। 'क्षेप' का अर्थ है फेंकना या खिंचाव; जब इंद्रियाँ बाहर की ओर खिंचती हैं, तो उसे विषयाक्षेप कहते हैं।
• मानसं: यहाँ 'मानसं' मन के लिए प्रयुक्त है, जिसे साधक को नियंत्रित कर एक स्थान पर लाना है।
• विमले शान्ते: निर्मल और शान्त। यह विशेषण हृदय की उस अवस्था के लिए है जहाँ मल (अशुद्धि/विकार) और अशांति का अभाव हो।
• स्थितं विष्णुं: स्थित विष्णु में। यहाँ 'विष्णु' का अर्थ किसी अवतार से नहीं, अपितु उस 'सर्वव्यापी' और 'विशाल' चेतना से है जो हृदय के सूक्ष्म केंद्र में सर्वव्यापी रूप से व्याप्त है।
• हृदि क्षिपेत्: हृदय में स्थापित करे या मन को वहाँ विलीन कर दे।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ध्यान की प्रथम अनिवार्य शर्त और उसके लक्ष्य को स्पष्ट कर रहे हैं। ध्यान केवल आँखें मूँद लेना नहीं है, अपितु यह एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है जिसमें दो स्तरों पर शुद्धि आवश्यक है।
प्रथम स्तर है—'बाह्य विषयाक्षेप' का त्याग। मनुष्य का मन स्वभावतः बहिर्मुखी है; वह इंद्रियों के माध्यम से बाहरी जगत के विषयों की ओर फेंका जाता है। जब तक यह बाहरी खिंचाव बना रहता है, तब तक एकाग्रता संभव नहीं है। द्वितीय स्तर है—'चित्तविक्षेप' का निरोध। बाहरी विषयों से हटकर भी मन के भीतर स्मृतियाँ, विचार और कल्पनाएँ उठती रहती हैं, जिसे विक्षेप कहते हैं। जब साधक इन दोनों—बाहरी खिंचाव और आंतरिक भटकाव—से रहित हो जाता है, तब वह उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ ध्यान का बीज अंकुरित हो सके।
इसके पश्चात, ऋषि कहते हैं कि मन को 'विमले शान्ते' हृदय में स्थित 'विष्णु' में क्षेपित (स्थापित) करना चाहिए। यहाँ हृदय केवल मांसल अंग नहीं, बल्कि वह 'हृदयाकाश' है जो चेतना का केंद्र है। जब यह केंद्र निर्मल (विमल) और शान्त हो जाता है, तब वहाँ 'विष्णु' का दर्शन होता है। विष्णु का अर्थ है—वह जो सर्वव्यापी है, जो संपूर्ण अस्तित्व में व्याप्त है। हृदय के भीतर स्थित यह विष्णु ही वह परम पुरुष है, जो साधक के अपने स्वरूप का ही सूक्ष्म रूप है। अतः, मन को बाहर से समेटकर, भीतर की शांति में उस सर्वव्यापी सत्ता में विलीन कर देना ही ध्यान की वास्तविक विधि है।
श्रुति-संगति —
हृदय के भीतर इस 'विष्णु' या सर्वव्यापी पुरुष की उपस्थिति का आधार श्रुति में मिलता है:
मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वैवमयमन्तरात्मन्पुरुषः स एष सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किं च य एवं वेद ॥ १४.८.८.१ ॥
यह पुरुष मनोमय है, प्रकाश ही इसका सत्य (स्वरूप) है। हृदयके भीतर, जैसे धानका दाना या जौ हो, वैसा यह अन्तरात्मामें पुरुष है। वही सबका वशी, सबका ईशान, सबका अधिपति है; जो कुछ भी यह है, उस सबका वह शासन करता है — जो ऐसा जानता है (वह भी वैसा होता है)।
इस श्रुति-अंश में स्पष्ट है कि यह पुरुष 'मनोमय' है और 'प्रकाश' ही इसका सत्य स्वरूप है। जिस प्रकार धान या जौ का दाना छोटा होते हुए भी संपूर्ण अन्न की शक्ति समेटे रहता है, वैसे ही हृदय के भीतर यह अन्तरात्मा-पुरुष स्थित है। यही वह 'विष्णु' है जो सबका वशी और सबका अधिपति है। स्मृति में 'विष्णुं हृदि क्षिपेत्' कहकर याज्ञवल्क्य इसी श्रुति के रहस्य को साधना में बदल रहे हैं—कि जिस पुरुष का शासन संपूर्ण ब्रह्मांड पर है, वह वास्तव में हृदय के भीतर एक सूक्ष्म बिंदु के समान स्थित है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रत्याहार' और 'ध्यान' के बीच की संधि है। योगिक अभ्यास में साधक अनुभव करता है कि उसकी ऊर्जा दो दिशाओं में क्षय हो रही है: एक बाहर की ओर (विषयाक्षेप) और एक भीतर की उथल-पुथल में (विक्षेप)।
अभ्यास यह है कि साधक पहले अपनी इंद्रियों के खिंचाव को पहचाने और उन्हें धीरे-धीरे भीतर की ओर मोड़े। जब बाहरी शोर शांत होता है, तब आंतरिक शोर (विक्षेप) सुनाई देता है। इन दोनों के शांत होने पर हृदय में एक 'शून्यता' या 'निर्मलता' का अनुभव होता है। इसी विमल अवस्था में, साधक अपने मन को एक उपकरण की भाँति प्रयोग कर उसे हृदय के केंद्र में स्थित उस प्रकाश-पुंज (विष्णु) पर टिका देता है।
यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाता है। जब मन हृदय के विष्णु में स्थित होता है, तो वह अब तक के अपने सीमित 'अहं' से ऊपर उठकर उस 'सर्वव्यापी' सत्ता के साथ एकाकार होने लगता है। यह वह भूमि है जहाँ से साधक 'सावित्री' के भर्ग (तेज) का अनुभव करने के लिए तैयार होता है, जिसका वर्णन अगले श्लोकों में आएगा।
तद्ध्यानं तत्तु वै योगो मोक्षमार्गप्रसाधकम् ।
ओं भूर्भुवः स्वर्महर्जनस्तपः सत्यमित्येवं ब्रह्म वैदिकम् ॥ ९.४ ॥
वह ध्यान है, वही योग है, (जो) मोक्षमार्गको सिद्ध करता है। "ॐ भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्" — यह वैदिक ब्रह्म है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ध्यान की प्रथम अवस्था बताई कि कैसे बाह्य विषयों और चित्त के विक्षेपों को त्यागकर मन को हृदय में स्थित सर्वव्यापी विष्णु (चेतना) में विलीन करना है। अब इस श्लोक में वे इस मानसिक स्थापना के स्वरूप को परिभाषित कर रहे हैं और उस 'वैदिक ब्रह्म' का परिचय दे रहे हैं, जो इस ध्यान का आधार और लक्ष्य है।
अन्वय और पदार्थ —
तद्ध्यानं (अस्ति), तत्तु वै योगः (अस्ति), (यत्) मोक्षमार्गप्रसाधकम् (अस्ति)। ओं भूर्भुवः स्वर्महः जनः तपः सत्यम् इति एवम् ब्रह्म वैदिकम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• तद्ध्यानं तत्तु वै योगः: वह (हृदय में विष्णु का चिंतन) ही ध्यान है और वही वास्तव में योग है। यहाँ 'तत्' शब्द पिछले श्लोक की विधि (विष्णु-ध्यान) की ओर संकेत करता है।
• मोक्षमार्गप्रसाधकम्: जो मोक्ष के मार्ग को सिद्ध या प्रशस्त करता है। 'प्रसाधक' का अर्थ है वह साधन जो लक्ष्य की प्राप्ति को सुनिश्चित करे।
• ओं भूर्भुवः स्वर्महः जनः तपः सत्यम्: यह सात व्याहृतियाँ और प्रणव हैं। ॐ (प्रणव) के साथ भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्—ये सात पवित्र शब्द हैं।
• ब्रह्म वैदिकम्: यह 'वैदिक ब्रह्म' है। यहाँ ब्रह्म का अर्थ केवल निराकार तत्व नहीं, अपितु वह वैदिक ध्वनि-शक्ति है जो संपूर्ण सृष्टि का मूल है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ध्यान और योग के मध्य के भेद को मिटा रहे हैं। सामान्यतः लोग योग को शारीरिक आसनों या केवल प्राणायाम तक सीमित मानते हैं, किंतु योगीश्वर याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि जब मन बाहरी विक्षेपों से मुक्त होकर हृदय के केंद्र में स्थित उस सर्वव्यापी चेतना (विष्णु) में स्थिर हो जाता है, तो वही स्थिति 'ध्यान' है और वही 'योग' है। योग का अर्थ ही है 'जुड़ना'—जीवात्मा का परमात्मा से मिलन। जब साधक की बुद्धि और मन एक बिंदु पर स्थिर हो जाते हैं, तब वह मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।
इस ध्यान की प्रक्रिया को केवल मानसिक संकल्प तक सीमित न रखकर, ऋषि इसे 'वैदिक ब्रह्म' से जोड़ते हैं। वे सात व्याहृतियों—'भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्'—और प्रणव 'ॐ' का उल्लेख करते हैं। ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि वे ध्वनियाँ हैं जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती हैं। 'वैदिक ब्रह्म' वह ध्वनि-स्वरूप सत्य है जो वेदों का सार है। इन व्याहृतियों का स्मरण साधक को भौतिक धरातल (भूः) से उठाकर, सूक्ष्म लोकों (भुवः, स्वः) से होते हुए, परम सत्य (सत्यम्) तक ले जाता है। यह क्रम वास्तव में साधक की चेतना के आरोहण का मानचित्र है।
शास्त्र-साक्ष्य —
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ २.३.१०–११ ॥
जब मनके साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ ठहर जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, उसे परम गति कहते हैं। इन्द्रियोंकी उस स्थिर धारणाको ही "योग" मानते हैं; तब (साधक) प्रमादरहित होता है, क्योंकि योग (शुभका) उदय और (अशुभका) लय है।
कठ उपनिषद् में कहा गया है कि जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ ठहर जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, तब उसे 'परम गति' कहा जाता है और इसी स्थिर धारणा को 'योग' माना गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी सत्य की पुष्टि करता है कि जब मन हृदय में स्थित विष्णु में स्थिर हो जाता है (जैसा कि पिछले श्लोक में बताया गया), तो वह स्थिति ही योग है। कठ उपनिषद् जहाँ योग की 'अवस्था' (इन्द्रिय-स्थिरता) पर बल देता है, वहीं यह स्मृति उस अवस्था को प्राप्त करने के लिए 'वैदिक ब्रह्म' (व्याहृतियों) का साधन बताती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक सेतु है। पिछले श्लोक में 'विष्णु' में मन लगाने की बात कही गई, जो कि एक लक्ष्य है। इस श्लोक में उन सात व्याहृतियों का विधान दिया गया है, जो उस लक्ष्य तक पहुँचने की 'सीढ़ी' हैं।
अभ्यास की दृष्टि से साधक इन सात व्याहृतियों और प्रणव का जप या मानसिक न्यास करता है। जब साधक 'ॐ' से आरम्भ कर 'सत्यम्' तक पहुँचता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर की चेतना को स्थूल शरीर से ऊपर उठाकर उस बिंदु तक ले जा रहा होता है जहाँ केवल शुद्ध सत्य शेष रहता है। यह जप मन को एकाग्र करने का वह उपकरण है जिससे 'चित्त-विक्षेप' समाप्त होते हैं।
यहाँ योग का अर्थ है—ध्वनि (व्याहृति) के माध्यम से शून्य (ब्रह्म) में प्रवेश करना। साधक जब इन सात पदों का अनुभव करता है, तो वह अपनी चेतना को सात स्तरों पर परिष्कृत करता है, जिससे वह उस 'मोक्षमार्ग' का अधिकारी बनता है जहाँ पुनर्जन्म की संभावना समाप्त हो जाती है। यह अभ्यास साधक को 'प्रमाता' से 'साक्षी' की भूमि की ओर ले जाता है।
एतदाचार्य वै विप्रः परे धाम्नि नियोजयेत् ।
हृद्याग्निश्चैव वायुश्च जीवश्च समुदाहृतः ॥ ९.५ ॥
विप्र इसका आचरण करके (मनको) परम धाममें लगाये। हृदयमें अग्नि, वायु और जीव कहे गये हैं;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव और सात व्याहृतियों के समुच्चय को 'वैदिक ब्रह्म' के रूप में परिभाषित किया। अब इस श्लोक में वे बताते हैं कि इस वैदिक ब्रह्म के स्वरूप का आचरण कैसे किया जाए और हृदय के भीतर किन तत्त्वों की उपस्थिति में यह साधना संपन्न होती है।
अन्वय और पदार्थ —
विप्रः एतदाचर्य (एतद आचर्य) परे धाम्नि नियोजयेत् । हृद्याग्निश्च एव वायुश्च जीवश्च समुदाहृतः (सन्ति)।
पदार्थ:
• विप्रः: यहाँ विप्र का अर्थ केवल जन्मना ब्राह्मण नहीं, अपितु वह साधक है जो विप्रत्व (विशेष ज्ञान और तप) को प्राप्त कर चुका है।
• एतदाचर्य (एतद आचर्य): यहाँ 'एतदाचार्य' शब्द संभवतः 'एतद आचर्य' है, जिसका अर्थ है— 'इसका आचरण करके'। 'एतत्' शब्द पिछले श्लोक के उस 'वैदिक ब्रह्म' (ॐ और सात व्याहृतियों) की ओर संकेत करता है।
• परे धाम्नि नियोजयेत्: परम धाम (परम पद या शुद्ध चैतन्य अवस्था) में नियोजित करे, अर्थात् मन को वहाँ स्थिर करे।
• हृद्याग्निश्चैव वायुश्च जीवश्च: हृदय में स्थित अग्नि, वायु और जीव।
• समुदाहृतः: यहाँ 'समुदाहृत' का अर्थ है— 'कहे गए हैं' या 'उदाहृत किए गए हैं'। यह उन तीन तत्त्वों का उल्लेख है जो हृदय-क्षेत्र में साधक के अनुभव में आते हैं।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को बाहरी मंत्रोच्चार से हटाकर उसे आन्तरिक अनुभव की ओर ले जा रहे हैं। वे कहते हैं कि विप्र (साधक) केवल शब्दों का जप न करे, बल्कि पिछले श्लोक में बताए गए 'वैदिक ब्रह्म' (ॐ और सात व्याहृतियों) का आचरण करे। आचरण का अर्थ है— उन ध्वनियों को केवल कंठ से नहीं, अपितु हृदय की गहराई में अनुभव करना। जब साधक इन ध्वनियों के माध्यम से अपनी चेतना को सूक्ष्म करता है, तब वह मन को 'परे धाम्नि' अर्थात् उस परम स्थिति में नियोजित कर पाता है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
इसके पश्चात ऋषि हृदय के भीतर की उस संरचना का संकेत देते हैं जहाँ यह संपूर्ण प्रक्रिया घटित होती है। वे कहते हैं कि हृदय में अग्नि, वायु और जीव का उल्लेख किया गया है। यहाँ 'अग्नि' का अर्थ भौतिक अग्नि नहीं, अपितु वह 'वैश्वानर' या 'प्राणाग्नि' है जो तप और ज्ञान का प्रतीक है। 'वायु' वह प्राण-शक्ति है जो मन और शरीर को जोड़े रखती है, और 'जीव' वह व्यक्तिगत चेतना है जो अभी तक स्वयं को शरीर मान रही है।
इन तीनों का उल्लेख इसलिए किया गया है ताकि साधक यह समझ सके कि उसकी वर्तमान स्थिति क्या है। वह अग्नि (तप), वायु (प्राण) और जीव (अहंकार/चेतना) के त्रिकोण में स्थित है। जब वह इस 'वैदिक ब्रह्म' का आचरण करता है, तो वह इन तीनों के पार जाकर उस शुद्ध पुरुष को प्राप्त करता है, जिसका संकेत अगले श्लोकों में 'ओंकार' के माध्यम से दिया गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ ५.२ ॥
सत्यकाम! यह ओंकार ही पर और अपर ब्रह्म है; इसलिए जाननेवाला इसी आश्रयसे (इन दोनोंमेंसे) किसी एकको प्राप्त होता है।
इस अंश में प्रश्न उपनिषद् स्पष्ट करता है कि ओंकार ही 'पर' और 'अपर' ब्रह्म है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी सत्य का व्यावहारिक विस्तार है। यहाँ 'अपर ब्रह्म' वे हृदयस्थ अग्नि, वायु और जीव हैं, जो सृष्टि के उपाधि-रूप हैं, और 'पर ब्रह्म' वह 'परम धाम' है जहाँ साधक को नियोजित होना है। ओंकार वह सेतु (आयतन) है जिसके द्वारा साधक अपर (हृदयस्थ तत्त्वों) से पर (परम धाम) की ओर प्रस्थान करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर संक्रमण का सूत्र है। योगिक अभ्यास में साधक जब हृदय में ध्यान लगाता है, तो उसे तीन स्तरों का अनुभव होता है:
१. अग्नि: हृदय में एक ताप या स्पंदन का अनुभव, जो साधना की तीव्रता (तप) को दर्शाता है।
२. वायु: प्राणों का प्रवाह, जो हृदय के केंद्र में लय होने लगता है।
३. जीव: वह सूक्ष्म बोध जो अब तक 'मैं शरीर हूँ' के भाव में था, अब एक साक्षी की भाँति स्वयं को देखने लगता है।
साधक का अभ्यास यह है कि वह ॐ और सात व्याहृतियों की ध्वनि को इन तीनों (अग्नि, वायु, जीव) के भीतर विलीन करे। जब वह इन ध्वनियों का 'आचरण' करता है, तो उसकी चेतना हृदय के इस सीमित क्षेत्र से ऊपर उठकर 'परम धाम' की ओर खिंचती है। यह अभ्यास साधक को 'जीव' की सीमित पहचान से मुक्त कर उसे 'ब्रह्म' की व्यापकता में ले जाने की प्रक्रिया है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वह केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं, बल्कि प्राण और चेतना का एक सूक्ष्म पुंज है, जो अब अपने मूल स्रोत की ओर लौट रहा है।
एषां ह्यन्तःशरीरस्थं ओंकारेणोपलक्ष्यते ।
ओंकारं पद्मनालेन उद्धृत्योपरि योजयेत् ॥ ९.६ ॥
इनके भीतर, शरीरमें स्थित (आत्मा) ओंकारसे लक्षित होता है। ओंकारको कमलनालके द्वारा (हृदयसे) निकालकर ऊपर जोड़े।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय में अग्नि, वायु और जीव के एक साथ एकत्रित होने का संकेत दिया था। अब इस श्लोक में वे बता रहे हैं कि इन तीनों के सम्मिलित स्वरूप में स्थित उस सूक्ष्म आत्मा को किस साधन से पहचाना जाए और उसे किस मार्ग से परम लक्ष्य तक पहुँचाया जाए।
अन्वय और पदार्थ —
एषां ह्यन्तः शरीरस्थं (आत्मा) ओंकारेण उपलक्ष्यते । ओंकारं पद्मनालेन उद्धृत्य उपरि योजयेत् ।
पदार्थ:
• एषां: इन (हृदय में स्थित अग्नि, वायु और जीव) का।
• अन्तः शरीरस्थं: शरीर के भीतर स्थित। यहाँ 'अन्तः शरीर' का अर्थ केवल भौतिक देह नहीं, अपितु हृदय-आकाश के भीतर का सूक्ष्म क्षेत्र है।
• ओंकारेण उपलक्ष्यते: ओंकार (प्रणव) के द्वारा पहचाना जाता है या लक्षित होता है। 'उपलक्ष्यते' का अर्थ है—किसी संकेत के माध्यम से उस अदृश्य तत्त्व का बोध होना।
• पद्मनालेन: कमलनाल के द्वारा। 'पद्मनाल' वह सूक्ष्म मार्ग है जो हृदय-कमल से ऊपर की ओर जाता है।
• उद्धृत्य: ऊपर उठाकर या निकालकर।
• उपरि योजयेत्: ऊपर (मूर्धा या परम पद में) जोड़ दे।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं। उन्होंने पिछले श्लोक में कहा कि हृदय में अग्नि, वायु और जीव 'समुदाहृत' (एकत्रित) हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि इस त्रिविध मिश्रण में वह शुद्ध आत्मा कहाँ है और उसे कैसे पहचाना जाए? ऋषि कहते हैं कि शरीर के भीतर स्थित वह आत्मा 'ओंकार' के द्वारा उपलक्षित होती है।
भाव यह है कि आत्मा स्वयं निराकार और अदृष्ट है, उसे सीधे पकड़ना कठिन है। अतः ओंकार वह 'लक्षण' या 'संकेत' है, जिसके सहारे साधक अपनी चेतना को आत्मा तक ले जा सकता है। जैसे किसी अदृश्य वस्तु को उसके पद-चिह्नों से पहचाना जाता है, वैसे ही हृदय में स्थित शुद्ध चैतन्य को प्रणव की ध्वनि और उसके कंपन से पहचाना जाता है।
जब साधक ओंकार के माध्यम से उस आंतरिक पुरुष को पहचान लेता है, तब अगला चरण है—उस चेतना का आरोहण। ऋषि निर्देश देते हैं कि इस ओंकार-रूप चेतना को 'पद्मनाल' के द्वारा ऊपर उठाकर (उद्धृत्य) ऊपर जोड़ देना चाहिए। यहाँ 'जोड़ने' का अर्थ है—हृदय में स्थित सूक्ष्म प्राण और मूर्धा में स्थित अक्षर-ब्रह्म का एकीकरण। यह क्रिया बाहरी नहीं, अपितु पूरी तरह आन्तरिक है, जहाँ ध्वनि-साधना के माध्यम से चेतना का केंद्र हृदय से ऊपर की ओर विस्थापित होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ २.२.४ ॥
प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है, ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। सावधान होकर (उसे) बेधना चाहिए, और बाणकी भाँति (लक्ष्यमें) तन्मय हो जाना चाहिए।
यह उपनिषद् इसी प्रक्रिया को एक सुंदर रूपक में समझाता है कि प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उसी रूपक का व्यावहारिक विवरण है। यदि प्रणव धनुष है, तो 'पद्मनाल' वह दिशा है जिसमें बाण (आत्मा) को छोड़ा जाता है। जब साधक ओंकार को हृदय से ऊपर उठाता है, तो वह वास्तव में धनुष की प्रत्यंचा खींचकर बाण को लक्ष्य (ब्रह्म) की ओर प्रक्षेपित कर रहा होता है। स्मृति यहाँ स्पष्ट करती है कि यह 'जोड़ना' (योजयेत्) ही वह स्थिति है जब बाण लक्ष्य में विलीन हो जाता है और साधक तन्मय हो जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक विशिष्ट अभ्यास की विधि है। हृदय में स्थित अग्नि (तेज), वायु (प्राण) और जीव (चित्त) जब ओंकार के जप और ध्यान से एक बिंदु पर स्थिर होते हैं, तब वहाँ एक सूक्ष्म कंपन उत्पन्न होता है। साधक इस कंपन को ही 'ओंकार' के रूप में अनुभव करता है।
अभ्यास यह है कि इस ओंकार-ध्वनि को केवल हृदय में न रखा जाए, बल्कि उसे 'पद्मनाल' के सहारे ऊपर की ओर ले जाया जाए। जैसे कमल की नाल जल से ऊपर उठकर खिलती है, वैसे ही साधक अपनी चेतना को हृदय-कमल से ऊपर उठाकर मूर्धा की ओर प्रवाहित करता है। यह 'उद्धरण' की प्रक्रिया साधक को स्थूल भावों से मुक्त कर सूक्ष्म भावों की ओर ले जाती है।
जब यह चेतना 'उपरि' (ऊपर) जाकर जुड़ती है, तब साधक अनुभव करता है कि हृदय का सूर्य और आकाश का सूर्य एक ही हैं। इस अभ्यास से साधक उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह स्वयं को शरीर नहीं, अपितु एक ध्वनि-तरंग (ओंकार) के रूप में देखता है जो अपने मूल स्रोत (अक्षर) में विलीन हो रही है। यह हृदय-अक्षर और मूर्धा-अक्षर का मिलन ही योग है।
आ(अ)प्राणाच्छून्यभूतं तु चेतोऽङ्गं जीवसंज्ञकम् ।
जप(जाय)ते तु यतस्तस्मात् पुनस्तत्र निवेशयेत् ॥ ९.७ ॥
प्राणसे शून्य (हुआ) चित्त-अंग, जिसका नाम जीव है, जहाँसे उत्पन्न होता है, उसीमें उसे फिर स्थापित करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार के माध्यम से आत्मा को लक्षित करने और उसे पद्मनाल द्वारा ऊपर की ओर ले जाने की विधि बताई थी। अब इस श्लोक में वे उस 'जीव' या 'चित्त' की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं, जिसे ऊपर ले जाया गया है, और यह बता रहे हैं कि इस यात्रा का अंतिम लक्ष्य उसे पुनः उसके मूल उद्गम में स्थापित करना है।
अन्वय और पदार्थ —
आ(अ)प्राणाच्छून्यभूतं तु चेतोऽङ्गं जीवसंज्ञकम् । यतस्तस्मात् (तत्) जप(जाय)ते तु, तत्र पुनस्तत्र निवेशयेत् ।
पदार्थ:
• आ(अ)प्राणाच्छून्यभूतं: प्राण से शून्य हुआ। यहाँ 'आप्राणात्' या 'अप्राणात्' का भाव है—वह अवस्था जहाँ स्थूल प्राणों की हलचल शांत हो गई है और चेतना प्राणों के बंधन से मुक्त होकर सूक्ष्म हो गई है।
• चेतोऽङ्गं: चित्त रूपी अंग। चित्त वह सूक्ष्म यंत्र है जो अनुभव करता है; इसे 'अंग' इसलिए कहा गया क्योंकि यह आत्मा का एक उपकरण मात्र है।
• जीवसंज्ञकम्: जिसे 'जीव' नाम दिया गया है। जब चित्त शरीर और प्राणों के साथ जुड़कर अहंकार का भाव रखता है, तब उसे 'जीव' कहा जाता है।
• यतस्तस्मात् जप(जाय)ते: जहाँ से वह उत्पन्न होता है। यहाँ 'जपते' या 'जायते' का अर्थ है—उद्गम या जन्म। वह मूल स्थान जहाँ से चेतना का प्रस्फुटन हुआ।
• पुनस्तत्र निवेशयेत्: उसे फिर से वहीं स्थापित करे। 'निवेश' का अर्थ है—गहराई में उतारना या पुनः विलीन करना।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधना की एक अत्यंत सूक्ष्म अवस्था का संकेत दे रहे हैं। जब साधक पिछले श्लोक की विधि के अनुसार ओंकार को पद्मनाल से ऊपर ले जाता है, तब एक समय ऐसा आता है जब वह चित्त-अंग स्थूल प्राणों के प्रभाव से शून्य हो जाता है। यह 'प्राण-शून्यता' मृत्यु नहीं, अपितु योगिक समाधि की वह स्थिति है जहाँ श्वास और प्राण की गति इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि वे अनुभव में नहीं आते।
इस अवस्था में वह 'जीव' (चित्त) अपने भौतिक आवरणों से मुक्त होकर हल्का हो जाता है। ऋषि कहते हैं कि यह जीव जहाँ से उत्पन्न हुआ है, उसे पुनः वहीं निवेशित करना चाहिए। भाव यह है कि जीव का मूल उद्गम वह शुद्ध चैतन्य या अक्षर-ब्रह्म है, जिससे वह अलग होकर इस देह और मन के जाल में फँसा था। साधना की यात्रा पहले ऊपर की ओर (उद्धृत्य) जाती है ताकि अशुद्धियों का शोधन हो और चेतना जाग्रत हो, किंतु अंतिम लक्ष्य 'वापसी' है—अपने मूल स्वरूप में विलीन हो जाना।
यह प्रक्रिया एक वृत्त की भाँति है: आत्मा से जीव बना, जीव ने प्राणों को पकड़ा, अब साधक प्राणों को शून्य कर जीव को पुनः उसी मूल आत्मा (उद्गम) में विलीन कर रहा है। यह 'निवेश' ही वास्तविक मोक्ष है, क्योंकि जब तक जीव स्वयं को 'जीव' (एक पृथक इकाई) मानता है, वह बंधन में है; जब वह अपने उद्गम में निवेशित हो जाता है, तब वह केवल 'ब्रह्म' रह जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अध्यात्मं आत्मभैषज्यं आत्मकैवल्यं ओंकारः आत्मानं निरुध्य सङ्गममात्रीं भूतार्थचिन्तां चिन्तयेत् अतिक्रम्य वेदेभ्यः सर्वपरं अध्यात्मफलं प्राप्नोतीत्यर्थः सवितर्कं ज्ञानमयं इत्येतैः प्रश्नैः प्रतिवचनैश्च यथार्थं पदं अनुविचिन्त्य प्रकरणज्ञो हि प्रबलो विषयी स्यात्सर्वस्मिन्वाकोवाक्य इति ब्राह्मणं ॥ १.३० ॥
ओंकार अध्यात्म है, आत्माकी औषधि है, आत्माका कैवल्य है। आत्माको (भीतर) रोककर, (मात्राओंके) संगम-मात्रावाली, भूतार्थ (परमार्थ) की चिन्ताका चिन्तन करे; (ऐसा करनेवाला) वेदोंको भी लाँघकर सबसे परे अध्यात्म-फलको पाता है — यह अर्थ है। इन प्रश्नों और उत्तरोंके द्वारा सवितर्क, ज्ञानमय पदका यथार्थ चिन्तन करके, प्रकरणका ज्ञाता प्रबल (विजयी) होता है, सब वाकोवाक्य (शास्त्रार्थ) में — यह ब्राह्मण है।
गोपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि ओंकार ही अध्यात्म है और आत्मानं निरुध्य (आत्मा को निरुद्ध कर) भूतार्थ का चिन्तन करने से वेदों के भी पार अध्यात्म-फल की प्राप्ति होती है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक गोपथ ब्राह्मण के इस कथन की व्यावहारिक विधि है। जहाँ गोपथ ब्राह्मण 'आत्मा को निरुद्ध करने' की बात करता है, वहीं यह स्मृति स्पष्ट करती है कि निरुद्ध करने का अर्थ है—प्राणों से शून्य होकर चित्त-अंग (जीव) को उसके मूल स्रोत में वापस ले जाना। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि जब तक साधक बाहरी जगत और स्थूल प्राणों के चिंतन को छोड़कर अपने मूल 'अध्यात्म' (आत्मा के भीतर) नहीं उतरता, तब तक वह परम फल को प्राप्त नहीं कर सकता।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रतिगमन' या 'वापसी की यात्रा' का अभ्यास है। सामान्यतः लोग ऊपर उठने (उर्ध्वगमन) को ही लक्ष्य मानते हैं, किंतु महर्षि याज्ञवल्क्य समझा रहे हैं कि ऊँचाई केवल माध्यम है, गंतव्य तो 'मूल' है।
अभ्यास यह है कि जब प्राणायाम और ओंकार के उत्थान से मन शांत और प्राण शून्य होने लगें, तब साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि "मैं यह शरीर नहीं हूँ, मैं यह प्राण नहीं हूँ, मैं वह चेतना हूँ जो इस स्रोत से निकली है और अब उसी में लौट रही हूँ।" यह 'निवेश' का अभ्यास साधक को 'जीव-भूमि' से उठाकर 'शिव-भूमि' या 'ब्रह्म-भूमि' में ले जाता है। यहाँ 'प्राण-शून्यता' का अर्थ है—मन का इतना स्थिर हो जाना कि वह प्राणों की गति का भी साक्षी बन जाए और अंततः उस साक्षी भाव को भी मूल अक्षर में विलीन कर दे। यह ध्यान की वह पराकाष्ठा है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है।
घण्टाशब्दवदोंकारमुपासीत समाहितः ।
पुरुषं निर्मलं शुद्धं पश्यत्यत्र न संशयः ॥ ९.८ ॥
घण्टा के शब्द के समान ओंकार का समाहित होकर उपासना करे। इसमें निर्मल और शुद्ध पुरुष को देखता है, इसमें संशय नहीं है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राण-शून्य हुए चित्त-अंग (जीव) को उसके मूल उद्गम में पुनः स्थापित करने की विधि बताई थी। अब इस श्लोक में वे उस स्थापना के पश्चात की मानसिक अवस्था और ओंकार की उपासना के उस विशिष्ट स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं, जिससे साधक का साक्षात्कार शुद्ध पुरुष से होता है।
अन्वय और पदार्थ —
समाहितः ओंकारमुपासीत घण्टाशब्दवत् । अत्र निर्मलं शुद्धं पुरुषं पश्यति, न संशयः ।
पदार्थ:
• घण्टाशब्दवत्: घण्टे की ध्वनि के समान। यहाँ 'वत्' उपमा है। जिस प्रकार घण्टा बजने पर एक तीव्र ध्वनि होती है और फिर वह ध्वनि धीरे-धीरे गूँजते हुए विस्तार लेती है और अंततः शून्य में विलीन हो जाती है, उसी प्रकार ओंकार का अनुभव करना है।
• ओंकारमुपासीत: ओंकार की उपासना करे। उपासना का अर्थ है—उस तत्त्व में मन को लीन कर देना।
• समाहितः: एकाग्र होकर, या अपनी समस्त चेतना को एक बिंदु पर केंद्रित करके।
• निर्मलं शुद्धं पुरुषं: वह पुरुष जो मल-रहित (निर्मल) और समस्त संस्कारों से परे (शुद्ध) है। यहाँ 'पुरुष' का अर्थ जीवात्मा नहीं, अपितु वह परम चैतन्य है जो दृष्टा है।
• पश्यति: देखता है। यह शारीरिक दृष्टि नहीं, अपितु 'योग-दृष्टि' या अनुभव है।
• न संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं है। यह ऋषि का वह अनुभव है जो प्रमाण सिद्ध है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ओंकार की उपासना का एक अत्यंत व्यावहारिक और सूक्ष्म मार्ग बता रहे हैं। जब साधक पिछले श्लोक की विधि से चित्त को उसके मूल स्थान पर निवेशित कर देता है, तब वह बाहरी जगत और आंतरिक विक्षेपों से मुक्त हो जाता है। ऐसी समाहित अवस्था में उसे ओंकार का उच्चारण या मानसिक जप करना चाहिए, किंतु उसकी पद्धति 'घण्टाशब्द' के समान हो।
घण्टे की ध्वनि की विशेषता यह है कि वह एक क्षणिक प्रहार से उत्पन्न होती है, परंतु उसकी गूँज देर तक बनी रहती है और धीरे-धीरे सूक्ष्म होती जाती है। इसी प्रकार साधक जब 'ओं' का उच्चारण करे, तो वह केवल एक शब्द न रहे, बल्कि उस शब्द की गूँज में वह स्वयं को विलीन कर दे। ध्वनि के स्थूल रूप से सूक्ष्म रूप की ओर जाने की यह यात्रा ही वास्तव में स्थूल शरीर से सूक्ष्म आत्मा की ओर जाने की यात्रा है।
जब ओंकार की यह गूँज अंतःकरण में पूरी तरह व्याप्त हो जाती है और बाहरी शब्द शांत हो जाता है, तब उस निशब्दता के बीच साधक को 'निर्मल और शुद्ध पुरुष' का दर्शन होता है। यह पुरुष वह है जो न तो मन है, न प्राण और न ही अहंकार; वह केवल शुद्ध चैतन्य है। याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि यह अनुभव केवल कल्पना नहीं है, अपितु एक निश्चित विधि का निश्चित फल है, जिसमें कोई संशय नहीं है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओंकार की इसी सर्वव्यापकता और अनुभव की क्षमता का वर्णन गोपथ ब्राह्मण में मिलता है:
ब्रह्म ह वै ब्रह्माणं पुष्करे ससृजे स खलु ब्रह्मा सृष्टश्चिन्तां आपेदे केनाहं एकेनाक्षरेण सर्वांश्च कामान्त्सर्वांश्च लोकान्त्सर्वांश्च देवान्त्सर्वांश्च वेदान्त्सर्वांश्च यज्ञान्त्सर्वांश्च शब्दान्त्सर्वाश्च व्युष्टीः सर्वाणि च भूतानि स्थावरजङ्गमान्यनुभवेयं इति स ब्रह्मचर्यं अचरत् स ओं इत्येतदक्षरं अपश्यद्द्विवर्णं चतुर्मात्रं सर्वव्यापि सर्वविभ्वयातयामब्रह्म ब्राह्मीं व्याहृतिं ब्रह्मदैवताम् तया सर्वांश्च कामान्त्सर्वांश्च लोकान्त्सर्वांश्च देवान्त्सर्वांश्च वेदान्त्सर्वांश्च यज्ञान्त्सर्वांश्च शब्दान्त्सर्वाश्च व्युष्टीः सर्वाणि च भूतानि स्थावरजङ्गमान्यन्वभवत् तस्य प्रथमेन वर्णेनापः स्नेहं चान्वभवत् तस्य द्वितीयेन वर्णेन तेजो ज्योतींष्यन्वभवत् ॥ १.१६ ॥
ब्रह्मने ब्रह्माको (सृष्टिके) पुष्करमें रचा। रचे जानेपर ब्रह्मा चिन्तामें पड़े — "किस एक अक्षरसे मैं सब कामनाओं, सब लोकों, सब देवों, सब वेदों, सब यज्ञों, सब शब्दों, सब उषाओं (व्युष्टि) और स्थावर-जङ्गम सब भूतोंका अनुभव (प्राप्ति) करूँ?" उन्होंने ब्रह्मचर्यका आचरण किया और "ओम्" इस अक्षरको देखा — दो वर्णोंवाला, चार मात्राओंवाला, सर्वव्यापी, सर्वविभु, कभी बासी न होनेवाला ब्रह्म, ब्रह्मदेवतावाली ब्राह्मी व्याहृति। उससे उन्होंने सब कामनाओं … सब भूतोंका अनुभव किया। उसके पहले वर्णसे जल और स्नेहका, दूसरे वर्णसे तेज और ज्योतियोंका अनुभव किया।
यहाँ बताया गया है कि ब्रह्मा ने जब एक अक्षर 'ओम्' को देखा, तो उसी के माध्यम से उन्होंने समस्त कामनाओं, लोकों और भूतों का अनुभव किया। जिस प्रकार ब्रह्मा ने ओंकार के वर्णों के माध्यम से सृष्टि के तत्त्वों को अनुभव किया, उसी प्रकार बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में साधक ओंकार की गूँज के माध्यम से उस 'शुद्ध पुरुष' का अनुभव करता है। ओंकार यहाँ केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु अनुभव का वह द्वार है जिससे सर्वव्यापी ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
इसी प्रकार पातञ्जल योगसूत्र में ईश्वर के स्वरूप को समझने के लिए प्रणव का सहारा लिया गया है:
तस्य वाचकः प्रणवः ॥ १.२७ ॥
उस (ईश्वर) का वाचक (नाम) प्रणव (ओंकार) है।
योगसूत्र कहता है कि प्रणव (ओंकार) ईश्वर का वाचक है। यदि ओंकार वाचक है, तो वह 'शुद्ध पुरुष' वाच्य है। जब साधक वाचक (ध्वनि/गूँज) में पूरी तरह समाहित हो जाता है, तब वह स्वतः ही वाच्य (ईश्वर/पुरुष) के दर्शन कर लेता है। यह स्मृति उस प्रक्रिया को 'घण्टाशब्द' की उपमा से और अधिक स्पष्ट कर देती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'नाद-योग' की एक सूक्ष्म पद्धति है। अभ्यास यह है कि ओंकार का उच्चारण करते समय केवल कंठ की ध्वनि पर ध्यान न रहे, बल्कि उस ध्वनि के बाद आने वाली 'अनुरणन' या गूँज पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
जैसे घण्टे की आवाज़ धीरे-धीरे कम होती हुई अंततः एक सूक्ष्म कंपन में बदल जाती है और फिर मौन हो जाती है, वैसे ही साधक ओंकार की ध्वनि को हृदय से ऊपर ले जाते हुए उसकी गूँज में मन को टिकाए। जब ध्वनि का स्थूल रूप समाप्त हो जाता है, तब जो 'मौन' शेष रहता है, वही 'शुद्ध पुरुष' की उपस्थिति का क्षेत्र है।
साधक इस अभ्यास से 'शब्द-भूमि' से 'अर्थ-भूमि' और अंततः 'अक्षर-भूमि' (जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं) की ओर बढ़ता है। यह समाहित अवस्था उसे उस बिंदु तक ले जाती है जहाँ वह स्वयं को और उस शुद्ध पुरुष को एक ही चैतन्य के रूप में अनुभव करता है।
आत्मस्वरूपं तत्स्थानं च
कुण्डलाक्रान्तसंस्थानं प्रसुप्तोरगसंनिभम् ।
तन्मध्ये संस्थितो ह्यात्मा धामात्मा बिन्दुलक्षणः ॥ ९.९ ॥
कुण्डलसे घिरा (कुण्डली मारे), सोये हुए सर्पके समान (एक) स्थान है; उसके बीचमें आत्मा स्थित है — धामरूप, बिन्दु-लक्षणवाला।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार की समाहित उपासना के माध्यम से निर्मल और शुद्ध पुरुष के साक्षात्कार का मार्ग बताया था। अब इस श्लोक में वे उस साक्षात्कार की पूर्व-अवस्था में साधक के सम्मुख उभरने वाले उस सूक्ष्म आंतरिक 'स्थान' और उसमें स्थित आत्मा के विशिष्ट स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
कुण्डलाक्रान्त-संस्थानं प्रसुप्त-उरग-संनिभम् (एका स्थान अस्ति), तन्-मध्ये ह्यात्मा संस्थितः, (यः) धामात्मा बिन्दु-लक्षणः (अस्ति)।
पदार्थ:
• कुण्डलाक्रान्त-संस्थानं: कुण्डलाकार (घेरे हुए) द्वारा व्याप्त या घिरा हुआ स्थान। यहाँ 'कुण्डलाक्रान्त' का अर्थ है—एक ऐसा विन्यास जो वृत्ताकार या कुण्डलीनुमा है।
• प्रसुप्त-उरग-संनिभम्: सोये हुए सर्प के समान। 'प्रसुप्त' अर्थात् सोया हुआ, 'उरग' अर्थात् सर्प, और 'संनिभम्' अर्थात् सदृश या समान। यह उस स्थान की आकृति और उसकी स्थिरता की उपमा है।
• तन्-मध्ये: उस घेरे के मध्य में।
• संस्थितः: स्थित या प्रतिष्ठित।
• धामात्मा: वह आत्मा जो स्वयं 'धाम' (प्रकाश-पुंज या निवास-स्थान) है।
• बिन्दु-लक्षणः: जिसकी विशेषता या लक्षण एक सूक्ष्म 'बिन्दु' के रूप में होना है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस सूक्ष्म मानसिक या योगिक मानचित्र को प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे साधक गहन ध्यान की अवस्था में अनुभव करता है। जब साधक ओंकार में समाहित होकर शुद्ध पुरुष का दर्शन करने की दिशा में बढ़ता है, तब उसे अपने भीतर एक विशिष्ट विन्यास का आभास होता है।
ऋषि कहते हैं कि वह स्थान 'कुण्डलाक्रान्त' है, अर्थात् वह एक वृत्ताकार घेरे जैसा है। इसकी तुलना 'प्रसुप्त-उरग' अर्थात् सोये हुए सर्प से की गई है। यहाँ सर्प का उल्लेख किसी जीव के रूप में नहीं, अपितु एक 'आकृति' और 'अवस्था' के रूप में है। जिस प्रकार एक सर्प जब सोता है, तो वह स्वयं को गोल घेरे में समेट लेता है और अत्यंत स्थिर हो जाता है, ठीक उसी प्रकार साधक के भीतर चेतना का एक ऐसा घेरा निर्मित होता है जो स्थिर, शांत और संकेंद्रित है। यह उपमा यह दर्शाती है कि यह स्थान वक्र (घुमावदार) है, किंतु वर्तमान में वह प्रसुप्त या शांत अवस्था में है।
इस कुण्डलाकार घेरे के ठीक मध्य में 'आत्मा' संस्थित है। इस आत्मा के दो विशेषण दिए गए हैं—'धामात्मा' और 'बिन्दु-लक्षण'। 'धामात्मा' का अर्थ है कि वह केवल एक सूक्ष्म कण नहीं है, अपितु वह स्वयं प्रकाश का स्रोत (धाम) है। वह ज्योतिर्मय है। वहीं 'बिन्दु-लक्षण' यह बताता है कि वह अनंत प्रकाश होते हुए भी ध्यान की दृष्टि में एक अत्यंत सूक्ष्म, सघन और केंद्रित बिन्दु के रूप में प्रतीत होता है।
यह श्लोक हमें यह संकेत देता है कि आत्मा का स्वरूप विस्तार और संकोच दोनों है—वह बिन्दु रूप में केंद्रित भी है और धाम रूप में प्रकाशमान भी। यह वह अवस्था है जहाँ साधक की दृष्टि बाहरी जगत से हटकर पूरी तरह आंतरिक हो चुकी है और वह उस केंद्र बिंदु की ओर अग्रसर है जहाँ समस्त चेतना विलीन होती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक 'ध्यान-चित्र' प्रदान करता है। योग-अभ्यास की इस भूमि पर साधक को यह अनुभव करना है कि उसके भीतर चेतना का एक घेरा है, जो सोये हुए सर्प की भाँति स्थिर और कुण्डलीनुमा है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी दृष्टि और मन को उस बाहरी घेरे (वक्रता) से हटाकर, उसके ठीक केंद्र में स्थित उस प्रकाशमय 'बिन्दु' पर टिका दे।
यहाँ 'बिन्दु' केवल एक बिंदु नहीं, अपितु वह एकाग्रता की पराकाष्ठा है। जब मन कुण्डलाकार वक्रता को पार कर केंद्र में स्थित बिन्दु में स्थित होता है, तब वह 'धामात्मा' के प्रकाश का अनुभव करता है। यह अभ्यास साधक को वक्रता (संस्कारों और मानसिक घुमावों) से ऋजुता (सरलता) की ओर ले जाने की पहली सीढ़ी है। साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसकी समस्त सत्ता उस एक सूक्ष्म बिन्दु में सिमट गई है, और वही बिन्दु वास्तव में अनंत प्रकाश का द्वार है। यह अवस्था साधक को उस भूमि पर ले जाती है जहाँ वह वर्णों और शब्दों से परे, केवल शुद्ध चैतन्य के प्रकाश में स्थित होता है।
ओंकारस्य वक्रत्वऋजुत्वे
वक्रं तु भवति ह्यादौ ओंकारं चतुरक्षरम् ।
ऋजुत्वं संप्रपद्येत पदं प्राप्य तु पञ्चमम् ॥ ९.१० ॥
प्रारम्भ में तो चतुरक्षर वाला ओंकार वक्र होता है। पञ्चम पद को प्राप्त करके ऋजुत्व (सरलता) प्राप्त कर लेता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस सूक्ष्म आंतरिक स्थान का वर्णन किया जहाँ आत्मा बिन्दु रूप में स्थित है। अब वे उस बिन्दु-स्वरूप आत्मा तक पहुँचने के साधन, अर्थात् 'ओंकार' की आंतरिक गति और उसके रूपांतरण के रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
ओंकारं चतुरक्षरं तु आदौ वक्रं भवति, (किन्तु तत्) पदं पञ्चमं प्राप्य ऋजुत्वं संप्रपद्येत।
पदार्थ:
• वक्रं: टेढ़ा, घुमावदार या प्रत्यक्ष रूप से सरल न होना। यहाँ इसका अर्थ है—वह अवस्था जहाँ चेतना अभी पूर्णतः मुक्त नहीं हुई है और मात्राओं के बंधन में है।
• चतुरक्षरम्: चार अक्षरों या मात्राओं वाला। यहाँ ओंकार के चार अंगों (अ, उ, म और अर्धमात्रा) की ओर संकेत है।
• ऋजुत्वं: सीधापन, सरलता या सहजता। योगिक दृष्टि से यह वह अवस्था है जहाँ साधक और साध्य के बीच का अवरोध समाप्त हो जाता है।
• संप्रपद्येत: प्राप्त कर लेता है या उस अवस्था में स्थित हो जाता है।
• पञ्चमम् पदम्: पाँचवाँ पद। वह स्थिति जो चारों मात्राओं के उपरांत या उनसे परे आती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि ओंकार की साधना के एक अत्यंत गूढ़ रहस्य को समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि जब साधक ओंकार का जप या उपासना आरम्भ करता है, तब वह 'चतुरक्षर' रूप में होता है और उसकी प्रकृति 'वक्र' होती है।
यहाँ 'चतुरक्षर' से तात्पर्य ओंकार की उन चार मात्राओं से है जिनमें स्थूल और सूक्ष्म जगत का समावेश है। सामान्यतः ओंकार में 'अ', 'उ' और 'म' तीन मात्राएँ मानी जाती हैं, परंतु यहाँ ऋषि चौथे अंग (अर्धमात्रा या नाद) को सम्मिलित कर उसे चतुरक्षर कह रहे हैं। 'वक्र' होने का भाव यह है कि जब तक साधक इन चार मात्राओं के भीतर विचरण करता है, उसकी चेतना अभी भी नाम, रूप और ध्वनि के घेरे में होती है। यह मार्ग सीधा नहीं, बल्कि घुमावदार होता है क्योंकि यहाँ साधक को विभिन्न मानसिक अवस्थाओं, संस्कारों और ध्वनि के कंपन से गुजरना पड़ता है। यह वह अवस्था है जहाँ जप और ध्यान के बीच एक सूक्ष्म द्वैत बना रहता है।
परंतु, जैसे ही साधक इन चारों मात्राओं की परिधि को पार कर 'पञ्चम पद' को प्राप्त करता है, ओंकार का वह वक्रत्व समाप्त हो जाता है और वह 'ऋजु' अर्थात् सरल हो जाता है। यह पाँचवाँ पद कोई बाहरी अक्षर नहीं, अपितु वह मौन या वह शून्य है जो चारों मात्राओं के विलीनीकरण के बाद शेष रहता है। जब ध्वनि ध्वनि में विलीन होकर पूर्ण निस्तब्धता में बदल जाती है, तब साधक सीधे उस बिन्दु-स्वरूप आत्मा से जुड़ जाता है। ऋजुत्व का अर्थ है—बिना किसी माध्यम के, बिना किसी वक्रता के, सीधे सत्य का साक्षात्कार करना।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओंकार की मात्राओं और उनके प्रभाव के विषय में गोपथ ब्राह्मण में एक महत्वपूर्ण संवाद मिलता है:
इन्द्रः प्रजापतिं अपृच्छत् भगवन्नभिष्टूय पृच्छामीति पृच्छ वत्सेत्यब्रवीत् किं अयं ओंकारः कस्यः पुत्रः किं चैतच्छन्दः किं चैतद्वर्णः किं चैतद्ब्रह्मा ब्रह्म सम्पद्यते तस्माद्वै तद्भद्रं ओंकारं पूर्वं आलेभे स्वरितोदात्त एकाक्षर ओंकार ऋग्वेदे त्रैस्वर्योदात एकाक्षर ओंकारो यजुर्वेदे दीर्घप्लुतोदात्त एकाक्षर ओंकारः सामवेदे ह्रस्वोदात्त एकाक्षर ओंकारोऽथर्ववेदे उदात्तोदात द्विपद अ उ इत्यर्धचतस्रो मात्रा मकारे व्यञ्जनं इत्याहुः या सा प्रथमा मात्रा ब्रह्मदेवत्या रक्ता वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्ब्राह्मं पदम् या सा द्वितीया मात्रा विष्णुदेवत्या कृष्णा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेद्वैष्णवं पदम् या सा तृतीया मात्रैशानदेवत्या कपिला वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेदैशानं पदम् या सार्धचतुर्थी मात्रा सर्वदेवत्या व्यक्तीभूता खं विचरति शुद्धस्फटिकसन्निभा वर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यं स गच्छेत्पदं अनामकम् ओंकारस्य चोत्पत्तिः विप्रो यो न जानाति तत्पुनरुपनयनम् तस्माद्ब्राह्माणवचनं आदर्तव्यं यथा लातव्यो गोत्रो ब्रह्मणः पुत्रः गायत्रं च्छन्दः शुक्लो वर्णः पुंसो वत्सः रुद्रो देवता ओंकारो वेदानां ॥ १.२५ ॥
इन्द्रने प्रजापतिसे पूछा — "भगवन्, स्तुति करके पूछता हूँ" — "पूछो, वत्स।" — "यह ओंकार क्या है? किसका पुत्र है? इसका छन्द क्या, वर्ण क्या? यह ब्रह्म कैसे होता है?" … ऋग्वेदमें ओंकार स्वरित-उदात्त एकाक्षर है, यजुर्वेदमें त्रैस्वर्य-उदात्त, सामवेदमें दीर्घ-प्लुत-उदात्त, अथर्ववेदमें ह्रस्व-उदात्त। "अ" और "उ" — (ये) साढ़े तीन मात्राएँ, और मकारमें व्यञ्जन — ऐसा कहते हैं। जो पहली मात्रा है, उसकी देवता ब्रह्मा है, वर्ण लाल — जो उसका नित्य ध्यान करता है वह ब्राह्म पदको जाता है। दूसरी मात्राकी देवता विष्णु, वर्ण कृष्ण — उसका ध्यान करनेवाला वैष्णव पदको जाता है। तीसरी मात्राकी देवता ईशान, वर्ण कपिल — उसका ध्यान करनेवाला ऐशान पदको जाता है। जो आधी चौथी मात्रा है, वह सब देवतावाली है, व्यक्त होकर आकाशमें विचरती है, वर्णमें शुद्ध स्फटिकके समान — उसका नित्य ध्यान करनेवाला नामरहित पदको जाता है। जो विप्र ओंकारकी उत्पत्ति नहीं जानता, उसका फिरसे उपनयन (होना चाहिए); इसलिए ब्राह्मण-वचनका आदर करना चाहिए … ओंकार वेदोंका (मुख्य) है।
यहाँ इन्द्र और प्रजापति के संवाद में ओंकार की विभिन्न मात्राओं और उनके देवताओं का वर्णन है। गोपथ ब्राह्मण में पहली तीन मात्राओं (ब्रह्मा, विष्णु, ईशान) के बाद 'सार्ध-चतुर्थी मात्रा' (साढ़े चौथी मात्रा) का उल्लेख है, जिसे 'सर्वदेवत्या' कहा गया है और जो 'शुद्ध स्फटिक' के समान है। यह मात्रा साधक को 'अनामक पद' (नामरहित पद) तक ले जाती है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'पञ्चम पद' इसी 'अनामक पद' की ओर संकेत करता है। गोपथ ब्राह्मण जहाँ चौथी मात्रा को सभी देवताओं का समुच्चय और स्फटिक जैसा शुद्ध बताता है, वहीं यह स्मृति स्पष्ट करती है कि जब साधक इन चारों के पार जाता है, तब वह 'ऋजुत्व' प्राप्त करता है। अर्थात्, चौथी मात्रा तक पहुँचकर शुद्धि होती है, और पाँचवें पद में वह शुद्धि 'सीधे साक्षात्कार' में बदल जाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास अत्यंत व्यावहारिक है। जब साधक ओंकार का जप आरम्भ करता है, तो प्रारम्भ में उसे ध्वनि का अनुभव होता है (अ-उ-म)। यह ध्वनि कभी तीव्र होती है, कभी मंद; मन कभी भटकता है, कभी एकाग्र होता है। यही 'वक्रत्व' है—अर्थात् ध्वनि और मन का वह घुमाव जिसमें साधक उलझा रहता है।
अभ्यास के साथ, साधक ध्वनि से सूक्ष्म नाद की ओर बढ़ता है। जब वह चौथी मात्रा (अक्षर के परे की गूँज) में स्थित होता है, तब वह स्फटिक जैसी निर्मलता का अनुभव करता है। इसके पश्चात एक ऐसी स्थिति आती है जहाँ न ध्वनि रहती है, न नाद, और न ही जप का प्रयास—केवल एक अखंड मौन शेष रहता है। यही 'पञ्चम पद' है।
इस भूमि पर पहुँचकर साधक अनुभव करता है कि अब उसे 'पहुँचना' नहीं है, क्योंकि वह स्वयं ही वह सत्य है। यहाँ वक्रता (प्रयास) समाप्त हो जाती है और ऋजुत्व (सहजता) आरम्भ होता है। साधक अब अक्षरों के माध्यम से नहीं, बल्कि अक्षरत्व (अविनाशी तत्व) के माध्यम से स्वयं को देखता है। यह यात्रा 'ध्वनि' से 'मौन' की ओर और 'प्रयास' से 'सहजता' की ओर जाने की यात्रा है।
मध्यमबिन्दुमाहात्म्यम्
मध्यमस्तु भवेद्बिन्दुर्मूर्धन्येवावतिष्ठते ।
तत्र वाचो निवर्तन्ते सर्वे वर्णास्तथैव च ॥ ९.११ ॥
बिन्दु (उसके) मध्यमें होता है, मूर्धामें ही स्थित रहता है; वहाँ वाणी लौट आती है, और उसी प्रकार सब वर्ण भी।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ओंकार की वक्रता से ऋजुत्व की ओर गति और पञ्चम पद की प्राप्ति का रहस्य बताया। अब वे उस ऋजुता के चरम बिंदु, अर्थात् उस स्थान का बोध करा रहे हैं जहाँ पहुँचकर समस्त ध्वनियाँ और वर्ण विलीन हो जाते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
मध्यमस्तु बिन्दुः भवति, (सः) मूर्धन्येवावतिष्ठते। तत्र सर्वे वाचो निवर्तन्ते, वर्णाः तथैव च (निवर्तन्ते)।
पदार्थ:
• मध्यमस्तु: मध्य में स्थित। यहाँ 'मध्य' का अर्थ केवल शारीरिक केंद्र नहीं, अपितु चेतना के उस केंद्र से है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
• बिन्दुः: एक सूक्ष्म बिंदु के समान। यह आत्मा का वह स्वरूप है जो सघनतम होकर भी अनंत है।
• मूर्धन्येवावतिष्ठते: मूर्धा (शीर्ष) में ही स्थित रहता है। 'अवतिष्ठते' का अर्थ है—स्थिर रहना या प्रतिष्ठित होना।
• वाचो निवर्तन्ते: वाणी लौट आती है। 'निवर्तन' का अर्थ है—अपने मूल स्रोत में वापस मिल जाना या अभिव्यक्ति का रुक जाना।
• वर्णास्तथैव च: वर्ण (अक्षर) भी उसी प्रकार (लौट आते हैं)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य उस परम सूक्ष्म केंद्र का उद्घाटन कर रहे हैं जिसे उन्होंने 'बिन्दु' कहा है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह बिन्दु मूर्धा में स्थित है। यहाँ 'मूर्धा' केवल शारीरिक मस्तिष्क का ऊपरी भाग नहीं है, अपितु वह उच्चतम बिंदु है जहाँ स्थूल शरीर की सीमा समाप्त होती है और सूक्ष्म चेतना का साम्राज्य आरम्भ होता है।
ऋषि कहते हैं कि इस बिन्दु पर पहुँचकर 'वाचो निवर्तन्ते'—अर्थात् वाणी लौट आती है। वाणी का लौटना दो अर्थों में है: प्रथम, जब साधक ओंकार के पञ्चम पद (ऋजुत्व) को प्राप्त करता है, तब शब्द का बाहरी उच्चारण समाप्त हो जाता है। द्वितीय, वाणी जो अब तक विषयों का वर्णन कर रही थी, वह अब अपने मूल कारण में विलीन हो जाती है।
यहाँ 'वर्णों' के लौटने का विशेष उल्लेख है। वर्ण वे इकाइयाँ हैं जिनसे भाषा और विचार निर्मित होते हैं। जब साधक का चित्त इस मूर्धा-बिन्दु में प्रतिष्ठित होता है, तो समस्त वर्ण (अ, इ, उ आदि) अपनी पृथकता खो देते हैं। यह वह स्थिति है जहाँ 'शब्द' अपनी शक्ति खोकर 'मौन' में परिवर्तित हो जाता है। यह मौन शून्यता नहीं, अपितु वह पूर्णता है जिससे समस्त ध्वनियाँ उत्पन्न हुई थीं। अतः, यह बिन्दु वह संगम-स्थल है जहाँ अभिव्यक्ति पुनः अव्यक्त में मिल जाती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
वाणी के इसी निवर्तन का संकेत उपनिषदों में मिलता है:
यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति ॥ २.९ ॥
जहाँसे मनके साथ वाणी (उसे) न पाकर लौट आती है — ब्रह्मके उस आनन्दको जाननेवाला कभी भय नहीं करता।
तैत्तिरीय उपनिषद् स्पष्ट करता है कि एक ऐसी स्थिति है जहाँ मन के साथ वाणी उस परम आनंद को न पाकर लौट आती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस श्रुति-वचन को साधना के धरातल पर उतारती है। जहाँ तैत्तिरीय उपनिषद् इसे 'आनन्द' के परिप्रेक्ष्य में देखता है, वहीं याज्ञवल्क्य ऋषि इसे 'मूर्धा-बिन्दु' के रूप में एक निश्चित स्थान और अनुभव के साथ जोड़ते हैं। स्मृति यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि वाणी का वह निवर्तन किसी अभाव के कारण नहीं, अपितु उस बिन्दु की सघनता और पूर्णता के कारण है, जिसके सम्मुख समस्त वर्ण तुच्छ और अनावश्यक हो जाते हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'जप' से 'मौन' की ओर संक्रमण का मार्ग है। जब साधक ओंकार का अभ्यास करता है, तो वह पहले शब्दों के स्तर पर होता है, फिर नाद के स्तर पर, और अंततः इस मूर्धा-बिन्दु पर पहुँचता है।
अभ्यास यह है कि जप के समय ध्वनि को बाहर न छोड़कर उसे ऊपर की ओर ले जाया जाए, जब तक कि वह मूर्धा के उस बिंदु पर केंद्रित न हो जाए जहाँ उच्चारण की क्रिया स्वतः रुक जाए। जब उच्चारण रुक जाता है और केवल एक 'बिन्दु' का अनुभव शेष रहता है, तब साधक 'वर्णरहित' अवस्था का अनुभव करता है।
यह अनुभव साधक को 'वाचिक' भूमि से उठाकर 'निर्वचनीय' भूमि पर ले जाता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि जिसे वह अब तक 'मैं' या 'शब्द' समझ रहा था, वह वास्तव में उसी एक बिन्दु का विस्तार था। इस बिन्दु पर स्थित होना ही वास्तव में स्वयं में स्थित होना है, क्योंकि यहाँ से वाणी का विसर्जन होता है और आत्मा के शुद्ध स्वरूप का उदय होता है।
तस्मात् सर्वे प्रसूयन्ते वर्णास्तत्र विशन्ति च ।
वर्णात्मा हीनवर्णस्तु सर्ववर्णेषु जीवनम् ॥ ९.१२ ॥
उसीसे सब वर्ण उत्पन्न होते हैं और उसीमें प्रवेश करते हैं; वह वर्णोंका आत्मा (स्वयं) वर्णरहित है, (और) सब वर्णोंमें जीवन है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस मध्यम बिन्दु का बोध कराया जहाँ पहुँचकर समस्त वाणी और वर्ण लौट आते हैं। अब वे इस बिन्दु की उस सृजनात्मक और लयकारी शक्ति का रहस्य खोल रहे हैं, जिससे संपूर्ण ध्वनि-जगत का उद्भव और अंत होता है।
अन्वय और पदार्थ —
तस्मात् (बिन्दुतः) सर्वे वर्णाः प्रसूयन्ते, (तत्रैव) च विशन्ति। (सः) वर्णात्मा (अस्ति), (परन्तु) स्वयं वर्णरहितः (अस्ति), (सः) सर्ववर्णेषु जीवनम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• तस्मात्: उस (मध्यम बिन्दु) से। यहाँ 'तस्मात्' शब्द उस मूर्धा-स्थित बिन्दु की ओर संकेत करता है जिसे पिछले श्लोक में 'वाचो निवर्तन्ते' (वाणी का लौटना) कहा गया।
• प्रसूयन्ते: उत्पन्न होते हैं। यह केवल भौतिक उत्पत्ति नहीं, अपितु उस शून्य से स्पंदन का आरम्भ है जिससे ध्वनि का जन्म होता है।
• विशन्ति: प्रवेश करते हैं या विलीन होते हैं। यह लय की प्रक्रिया है।
• वर्णात्मा: वर्णों का आत्मा। वह मूल तत्त्व जिसके कारण वर्णों का अस्तित्व है।
• हिनावर्णः (वर्णरहित): वह स्वयं किसी भी वर्ण या ध्वनि से सीमित नहीं है। वह 'अक्षर' है, क्योंकि उसमें क्षरण (विनाश) नहीं है और न ही वह किसी ध्वनि-सीमा में बँधा है।
• जीवनम्: प्राण या चेतना। जिस प्रकार शरीर में प्राण के बिना अंगों का कोई मूल्य नहीं, वैसे ही वर्णों में इस बिन्दु-चेतना के बिना कोई अर्थ या शक्ति नहीं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी ध्वनि-विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय कर रहे हैं। वे बताते हैं कि मूर्धा में स्थित वह 'मध्यम बिन्दु' केवल एक शून्य नहीं, अपितु समस्त वर्णमाला का बीज-केंद्र है। 'तस्मात् सर्वे प्रसूयन्ते'—अर्थात् सृष्टि की समस्त ध्वनियाँ, मन्त्र और वाणी इसी एक सूक्ष्म बिंदु के स्पंदन से प्रस्फुटित होती हैं। जब चेतना इस बिन्दु से नीचे की ओर उतरती है, तो वह वर्णों के रूप में अभिव्यक्त होती है, और जब साधक की चेतना ऊपर की ओर लौटती है, तो वह पुनः इसी बिन्दु में 'विशन्ति' अर्थात् विलीन हो जाती है।
ऋषि यहाँ एक अत्यंत गूढ़ सत्य उद्घाटित करते हैं कि वह बिन्दु 'वर्णात्मा' है, किंतु 'वर्णरहित' है। इसका भाव यह है कि जो सबका आधार है, वह स्वयं उस आधार के लक्षणों से मुक्त होता है। जैसे सूर्य प्रकाश का स्रोत है, किंतु वह स्वयं 'प्रकाश' नामक गुण का सीमित बंधक नहीं, बल्कि स्वयं ज्योतिर्मय है; वैसे ही यह बिन्दु समस्त वर्णों का मूल है, परंतु स्वयं किसी एक वर्ण (जैसे अ, इ, उ या म्) में सीमित नहीं है। वह 'निर्वर्ण' है, इसलिए वह 'सर्ववर्णेषु जीवनम्' है। यदि वह स्वयं किसी एक वर्ण में बँधा होता, तो वह अन्य वर्णों का जीवन नहीं हो पाता। वह वर्ण-रहित होने के कारण ही समस्त ध्वनियों में प्राण बनकर व्याप्त है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ओंकार और ध्वनि की इस सृजनात्मक शक्ति का समर्थन गोपथ ब्राह्मण में मिलता है:
तस्य प्रथमया स्वरमात्रया पृथिवीं अग्निं ओषधिवनस्पतीनृग्वेदं भूरिति व्याहृतिं गायत्रं छन्दस्त्रिवृतं स्तोमं प्राचीं दिशं वसन्तं ऋतुं वाचं अध्यात्मं जिह्वां रसं इतीन्द्रियाण्यन्वभवत् ॥ १.१७ ॥
उसकी पहली स्वर-मात्रासे (ब्रह्माने) पृथिवी, अग्नि, ओषधि-वनस्पतियाँ, ऋग्वेद, "भूः" व्याहृति, गायत्र छन्द, त्रिवृत् स्तोम, पूर्व दिशा, वसन्त ऋतु, अध्यात्ममें वाणी, और इन्द्रियोंमें जिह्वा तथा रस — इनका अनुभव किया।
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि ओंकार की प्रथम स्वर-मात्रा से ही पृथ्वी, अग्नि, ऋग्वेद और वाणी (वाचं) का अनुभव हुआ। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति का विस्तार कर रही है। जहाँ गोपथ ब्राह्मण यह बताता है कि ओंकार की मात्राओं से सृष्टि और वेद उत्पन्न हुए, वहीं याज्ञवल्क्य जी उस सूक्ष्म 'बिन्दु' की पहचान करा रहे हैं जो ओंकार के पञ्चम पद (ऋजुत्व) का चरम है। स्मृति यह स्पष्ट करती है कि ऋग्वेद या वाणी की जो उत्पत्ति श्रुति में बताई गई है, उसका वास्तविक केंद्र वह 'मध्यम बिन्दु' ही है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'जप' की प्रक्रिया को बाहरी क्रिया से हटाकर आन्तरिक अनुभव में बदलने का सूत्र है। सामान्यतः साधक वर्णों का उच्चारण करता है (जैसे 'ओ-म्'), परंतु योगी इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि प्रत्येक अक्षर के पीछे एक मौन बिन्दु कार्य कर रहा है।
अभ्यास यह है कि जप करते समय साधक की दृष्टि वर्णों (ध्वनि) पर न रहकर, उस 'ध्वनि-रहित' स्रोत पर टिकी रहे जहाँ से ध्वनि निकल रही है। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मैं जिस वर्ण का जप कर रहा हूँ, वह वास्तव में उसी बिन्दु का विस्तार है", तब वह वर्णों के बंधन से मुक्त होकर 'वर्णात्मा' में स्थित होने लगता है। यह अभ्यास साधक को 'वाक' (वाणी) से 'पारा-वाक' (वाणी से परे) की ओर ले जाता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि वर्ण केवल माध्यम हैं, वास्तविक लक्ष्य वह 'जीवनम्' (चेतना) है जो इन वर्णों के भीतर स्पंदित हो रही है। इस प्रकार साधक वर्ण-साधना से अक्षर-साधना की ओर अग्रसर होता है।
न घोषं नैव चाघोषं दन्तौष्ठ्यं नैव तालुजम् ।
न मूर्धन्यं न चान्तःस्थं न स्वरं व्यञ्जनं न च ॥ ९.१३ ॥
…न वह घोष है, न ही अघोष है; न दन्तौष्ठ्य है, न तालुज है; न मूर्धन्य है और न अन्तःस्थ है; न स्वर है और न व्यञ्जन है…
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस मध्यम बिन्दु को समस्त वर्णों का जीवन और उनका मूल बताया। अब वे उस बिन्दु के 'अक्षरत्व' को सिद्ध करने के लिए उसे उन सभी सीमाओं से मुक्त कर रहे हैं, जिनमें सामान्य ध्वनियाँ बँधी होती हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(सः बिन्दुः) न घोषः, न एव च अघोषः, न दन्तौष्ठ्यम्, न एव तालुजम्। न मूर्धन्यम्, न च अन्तःस्थम्, न स्वरः, न व्यञ्जनम्, न च (अस्ति)।
पदार्थ:
• घोष और अघोष: व्याकरण में जिन वर्णों के उच्चारण में स्वर-तन्त्रियों में कंपन होता है, वे 'घोष' हैं और जिनमें नहीं होता, वे 'अघोष' हैं। यहाँ बिन्दु इन दोनों द्वंद्वों से परे है।
• दन्तौष्ठ्य, तालुज, मूर्धन्य, अन्तःस्थ: ये ध्वनियों के उच्चारण-स्थान हैं। दन्तौष्ठ्य (दाँत और होंठ), तालुज (तालु), मूर्धन्य (मूर्धा) और अन्तःस्थ (कण्ठ और तालु के बीच)। बिन्दु इन भौतिक स्थानों की सीमा में नहीं बँधा है।
• स्वर और व्यञ्जन: स्वर वे हैं जो स्वतंत्र होते हैं, और व्यञ्जन वे जो स्वर के सहारे बोले जाते हैं। बिन्दु न स्वतंत्र ध्वनि है, न किसी पर आश्रित।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी उस 'मध्यम बिन्दु' का वर्णन 'नेति-नेति' (यह नहीं, वह नहीं) की पद्धति से कर रहे हैं। जब साधक अपनी चेतना को मूर्धा के उस बिंदु पर ले जाता है, तो वह पाता है कि जिसे वह अब तक 'ध्वनि' समझ रहा था, वह वास्तव में एक सीमित परिघटना थी।
यहाँ ऋषि स्पष्ट करते हैं कि वह परम बिन्दु न 'घोष' है और न 'अघोष'। घोष और अघोष ध्वनि के दो विपरीत ध्रुव हैं; जो भी इन दोनों में से एक होगा, वह द्वैत में होगा। वह बिन्दु अद्वैत है, इसलिए वह इन दोनों का मूल होते हुए भी दोनों से भिन्न है। इसी प्रकार, वह किसी विशेष उच्चारण-स्थान (दन्त, ओष्ठ, तालु या मूर्धा) तक सीमित नहीं है। यद्यपि वह मूर्धा में स्थित बताया गया है, किन्तु वह 'मूर्धन्य' वर्ण नहीं है, क्योंकि मूर्धन्य वर्ण एक सीमित ध्वनि है, जबकि यह बिन्दु वह अनंत शून्य है जिससे मूर्धन्य सहित समस्त वर्ण प्रस्फुटित होते हैं।
वह न 'स्वर' है और न 'व्यञ्जन'। स्वर और व्यञ्जन मिलकर भाषा का निर्माण करते हैं, किन्तु यह बिन्दु उस भाषा के जन्म से पूर्व की 'मौन-अवस्था' है। यह वह बिंदु है जहाँ शब्द अपनी सार्थकता और आकार खोकर शुद्ध चेतना में विलीन हो जाता है। यह निषेध-मुख वर्णन वास्तव में उस सत्य को उद्घाटित करने के लिए है जिसे सकारात्मक शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता।
श्रुति-संगति —
याज्ञवल्क्य जी की यह पद्धति उनकी अपनी श्रुति-परम्परा का विस्तार है। जब वे गार्गी को अक्षर का बोध कराते हैं, तब वे ठीक इसी प्रकार के निषेधों का प्रयोग करते हैं:
स होवाच एतद्वै तदक्षरं गार्गी ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वना काशमसङ्गमस्पर्शमगन्धमरसमचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कम प्राणममुखमनामागोत्रमजरममरमभयममृतमरजोऽशब्दमविवृतम संवृतमपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यं न तदश्नोति कं चन न तदश्नोति कश्चन ॥ १४.६.८.८ ॥
(याज्ञवल्क्यने) कहा — गार्गी! उसीको ब्राह्मण "अक्षर" कहते हैं: वह न स्थूल है, न अणु, न ह्रस्व, न दीर्घ; न लाल, न स्नेहयुक्त; न छाया, न अन्धकार; न वायु, न आकाश; असङ्ग; न रस, न गन्ध; बिना नेत्र, बिना कान, बिना वाणी, बिना मन; बिना तेज, बिना प्राण, बिना मुख; न नाम, न गोत्र; अजर, अमर, अभय, अमृत, रजरहित, शब्दरहित; न खुला, न ढका; न उसका पूर्व है, न पर; न भीतर है, न बाहर। वह कुछ भी नहीं खाता, और उसे कोई नहीं खाता।
जिस प्रकार श्रुति में अक्षर को 'अस्थूलमनण्वह्रस्वम्' (न स्थूल, न अणु, न ह्रस्व) कहकर भौतिक मापों से मुक्त किया गया है, उसी प्रकार इस स्मृति में उसे 'न घोषं नैव चाघोषं' कहकर ध्वनि-विज्ञान की सीमाओं से मुक्त किया गया है। श्रुति में जो 'अशब्द' (शब्दरहित) था, स्मृति में वही 'न स्वरं व्यञ्जनं' के रूप में प्रकट हुआ है। यह इस बात का प्रमाण है कि बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति वास्तव में उसी श्रुति का व्यावहारिक और योगिक विस्तार है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'विवेक' और 'लय' का अभ्यास है। जब योगी मूर्धा के मध्यम बिन्दु का ध्यान करता है, तो उसके अनुभव में विभिन्न ध्वनियाँ, नाद या मानसिक विचार उठ सकते हैं। यह श्लोक साधक को निर्देश देता है कि जो भी ध्वनि सुनाई दे या अनुभव हो—चाहे वह गंभीर (घोष) हो या सूक्ष्म (अघोष), चाहे वह किसी भी स्थान से उत्पन्न प्रतीत हो—उसे 'यह नहीं' (नेति) कहकर त्याग दे।
यह अभ्यास साधक को 'ध्वनि' से 'ध्वनि-शून्य' की ओर ले जाता है। जब वह समस्त स्वर और व्यञ्जनों का निषेध कर देता है, तब वह उस 'वर्णरहित' अवस्था में स्थित होता है। यह वह भूमि है जहाँ मन की सारी वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं और साधक उस अक्षरत्व का अनुभव करता है जो शब्दों से परे है। यहाँ साधक स्थूल ध्वनि से सूक्ष्म नाद और फिर नाद से उस परम मौन की ओर बढ़ता है, जो वास्तव में पूर्णता है।
न कव्यं(ण्ठ्यं) नैव चोष्माणं न वर्गं न विसर्गिणम् ।
जिह्वामूलमुपध्मानमनुस्वारं न चैव हि ॥ ९.१४ ॥
न कण्ठ्य, न ऊष्म, न वर्ग(व्यञ्जन), न विसर्गवाला; न जिह्वामूलीय, न उपध्मानीय, न अनुस्वार ही —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मध्यम बिन्दु को घोष-अघोष, स्वर-व्यञ्जन और विभिन्न उच्चारण-स्थानों से परे बताकर उसकी अनिर्वचनीयता का संकेत दिया था। वर्तमान श्लोक उसी निषेध-वर्णन की पूर्ति करता है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वह बिन्दु भौतिक वाक्-यंत्र की किसी भी सीमा में नहीं बँधा है।
अन्वय और पदार्थ —
(सः बिन्दुः) न कण्ठ्यम्, न एव च ओष्माणम्, न वर्गम्, न विसर्गिणम्। न जिह्वामूलम्, उपध्मानीयम्, न अनुस्वारं च एव हि (अस्ति)।
पदार्थ:
• कण्ठ्य: जिसका उच्चारण-स्थान कण्ठ हो।
• ओष्माण (ऊष्म): वे वर्ण जिनके उच्चारण में घर्षण से उष्णता उत्पन्न होती है (जैसे श, ष, स, ह)।
• वर्ग: व्यञ्जन वर्णों के पाँच समूह (क-वर्ग, च-वर्ग आदि)।
• विसर्गिण: विसर्ग (ः) युक्त ध्वनि।
• जिह्वामूल: जिह्वा के मूल भाग से निकलने वाली ध्वनि।
• उपध्मानीय: वे ध्वनियाँ जिनमें गालों का फूलना या वायु का दबाव आवश्यक होता है।
• अनुस्वार: वह ध्वनि जो नासिका से निकलती है (ँ)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी उस 'मध्यम बिन्दु' के स्वरूप को पूर्णतः ध्वनिरहित सिद्ध कर रहे हैं। पिछले श्लोक (९.१३) में उन्होंने तालु, दन्त और मूर्धा जैसे स्थानों का निषेध किया था; अब वे कण्ठ, ओष्ठ और नासिका जैसे शेष भौतिक केंद्रों का भी निषेध कर रहे हैं।
ऋषि कहते हैं कि वह बिन्दु 'न कण्ठ्य' है और 'न ओष्माण' है। जब हम किसी वर्ण का उच्चारण करते हैं, तो वायु का घर्षण होता है और एक भौतिक कंपन पैदा होता है, जिसे 'ऊष्म' कहा गया। परंतु वह मध्यम बिन्दु वह अवस्था है जहाँ वायु का घर्षण समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध चेतना शेष रहती है। वह 'न वर्ग' है और 'न विसर्गिण' है, अर्थात वह किसी व्याकरणिक श्रेणी या विसर्ग जैसी विच्छेदक ध्वनि में नहीं बँधा है।
आगे वे कहते हैं कि वह 'न जिह्वामूलीय' है, 'न उपध्मानीय' है और 'न अनुस्वार' है। जिह्वा का हिलना, गालों का फूलना या नासिका का प्रयोग—ये सब स्थूल शरीर के प्रयास हैं। याज्ञवल्क्य जी यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि जिस 'अक्षर' की हम बात कर रहे हैं, वह मुख से बोला जाने वाला शब्द नहीं है, बल्कि वह 'शब्द-बीज' है जो बोलने की क्रिया से पहले विद्यमान रहता है।
यह संपूर्ण निषेध (नेति-नेति) इसलिए है ताकि साधक अपनी दृष्टि को बाहर के वाक्-यंत्र (मुख, जिह्वा, कण्ठ) से हटाकर भीतर की ओर मोड़ सके। जब वह पाता है कि यह बिन्दु किसी भी भौतिक स्थान का नहीं है, तब वह स्वतः ही अगले श्लोक (९.१५) में वर्णित 'हृदयाकाश' की ओर प्रस्थान करता है। यह निषेध वास्तव में उस शून्य की तैयारी है, जिसमें अक्षरत्व का अनुभव होता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'नाद-योग' की एक अत्यंत सूक्ष्म अवस्था का निर्देश है। सामान्यतः जप में साधक कण्ठ, तालु या नासिका में ध्वनि का अनुभव करता है, जिसे 'वाचिक' या 'मानसिक' जप कहते हैं। परंतु यहाँ याज्ञवल्क्य जी साधक को उस भूमि पर ले जा रहे हैं जहाँ ध्वनि का 'रूप' और 'स्थान' दोनों विलीन हो जाते हैं।
अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक मूर्धा के मध्यम बिन्दु पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उसे यह अनुभव करना होता है कि उसकी चेतना अब किसी भौतिक वर्ण या ध्वनि की मोहताज नहीं है। वह अनुभव करता है कि जिसे वह 'ओंकार' कह रहा था, वह अब केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि एक 'बिन्दु' बन गया है।
यह अभ्यास साधक को 'ध्वनि' से 'मौन' की ओर ले जाता है। जब वह यह अनुभव करता है कि यह बिन्दु न कण्ठ्य है, न अनुस्वार है और न ही किसी वर्ग का हिस्सा है, तब उसकी चेतना मुख के सीमित दायरे को तोड़कर 'हृदयाकाश' में विस्तृत हो जाती है। यह वह स्थिति है जहाँ 'वाणी' लौट आती है और केवल 'द्रष्टा' शेष रहता है। साधक यहाँ वर्णों के जीवन (वर्णों का आत्मा) को अनुभव करता है, जो स्वयं वर्णरहित है। इस प्रकार, साधक स्थूल वाक् से सूक्ष्म परा-वाक् की ओर अग्रसर होता है।
हृद्याकाशनिविष्टस्तु सोऽक्षरत्वं निगच्छति ।
अक्षराणि त्रिषष्टिर्वै स्थानयोगाद्भवन्ति हि ॥ ९.१५ ॥
— हृदयाकाशमें स्थित वह अक्षरत्व (अविनाशी अक्षरभाव) को प्राप्त होता है; स्थानोंके योगसे (उच्चरित) अक्षर तो तिरसठ होते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस 'मध्यम बिन्दु' का वर्णन किया जो समस्त वर्णों का मूल होते हुए भी स्वयं वर्णरहित है। उन्होंने भौतिक वाक्-यंत्र के सभी उच्चारण-स्थानों का निषेध कर यह सिद्ध किया कि वह बिन्दु ध्वनियों के विसर्जन का केंद्र है। अब वर्तमान श्लोक में वे इस वर्णरहित अवस्था और उच्चरित वर्णों के मध्य के भेद को स्पष्ट करते हुए साधक को 'अक्षरत्व' की प्राप्ति का मार्ग बता रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(सः साधकः) तु हृद्याकाशे निविष्टः (तिष्ठन्) सोऽक्षरत्वं निगच्छति। अक्षराणि तु त्रिषष्टिः वै स्थान-योगाद् भवन्ति हि।
पदार्थ:
• हृद्याकाशनिविष्टः: हृदय के भीतर स्थित आकाश (चित्त-आकाश या हृदयाकाश) में स्थित होने वाला।
• अक्षरत्वं: यहाँ 'अक्षर' के दो अर्थ हैं— पहला, वर्ण और दूसरा, अविनाशी। 'अक्षरत्व' का अर्थ है उस अविनाशी तत्व में लीन हो जाना या अविनाशी भाव को प्राप्त करना।
• निगच्छति: प्राप्त होता है या प्रवेश करता है।
• त्रिषष्टिः: तिरसठ (६३)।
• स्थानयोगाद्: उच्चारण-स्थानों के संयोग से (अर्थात् जब प्राण वायु किसी विशेष स्थान से टकराकर ध्वनि उत्पन्न करती है)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी 'अक्षर' शब्द के गूढ़ और द्विअर्थी स्वरूप को खोल रहे हैं। वे कहते हैं कि जो साधक अपने चित्त को बाहरी ध्वनियों से हटाकर 'हृद्याकाश' में स्थित करता है, वह 'अक्षरत्व' को प्राप्त होता है। यहाँ 'अक्षरत्व' का अर्थ है उस परम तत्व में स्थित होना जो कभी नष्ट नहीं होता, जो जन्म-मृत्यु और विकार से परे है।
ऋषि एक अत्यंत सूक्ष्म भेद स्पष्ट करते हैं: वे कहते हैं कि 'अक्षराणि त्रिषष्टिर्वै स्थानयोगाद्भवन्ति'—अर्थात् उच्चारण-स्थानों के संयोग से जो अक्षर (वर्ण) बनते हैं, उनकी संख्या तिरसठ है। जब प्राण वायु कण्ठ, तालु, दन्त या ओष्ठ जैसे भौतिक स्थानों से टकराती है, तब 'ध्वनि' उत्पन्न होती है और वह 'अक्षर' (वर्ण) कहलाता है। यह अक्षर 'विनाशी' है क्योंकि यह वायु के घर्षण और भौतिक शरीर के संयोग पर निर्भर है।
परंतु, जब वही साधक इन तिरसठ वर्णों के मूल स्रोत, उस 'मध्यम बिन्दु' में स्थित होकर हृद्याकाश में लीन होता है, तब वह उस 'अक्षर' को प्राप्त करता है जो किसी स्थान के संयोग से नहीं बना, बल्कि जो स्वयं सबका आधार है। वह अक्षर 'अविनाशी' है। अतः, बाहरी वर्णों का ज्ञान केवल साधन है, जबकि आंतरिक अक्षरत्व का अनुभव साध्य है।
शास्त्र-साक्ष्य —
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ १०.२५ ॥
महर्षियोंमें मैं भृगु हूँ, वाणियोंमें एक अक्षर (ओंकार) हूँ, यज्ञोंमें जपयज्ञ हूँ, और स्थावरोंमें हिमालय हूँ।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे वाणियों में 'एक अक्षर' हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक से इसकी पूर्ण संगति है। जहाँ एक ओर भौतिक जगत में तिरसठ अक्षर (वर्ण) बिखरे हुए हैं, वहीं उन सबके मूल में वह 'एक अक्षर' (ओंकार या ब्रह्म) स्थित है। स्मृति यह स्पष्ट करती है कि जब साधक अनेकता (६३ वर्णों) से एकात्मकता (एक अक्षर) की ओर बढ़ता है, तभी वह वास्तव में 'अक्षरत्व' को प्राप्त करता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'जप' से 'ध्यान' की ओर संक्रमण का सूत्र है। साधक जब मन्त्र का जप करता है, तब वह तिरसठ उच्चरित अक्षरों (ध्वनियों) का प्रयोग करता है। यह अभ्यास की प्रथम भूमि है, जहाँ वाणी और प्राण का संयोग होता है। परंतु, जप का वास्तविक लक्ष्य उन अक्षरों को बोलना नहीं, बल्कि उन अक्षरों के पीछे छिपे उस 'मौन' या 'बिन्दु' को खोजना है जहाँ से ध्वनि उत्पन्न हुई थी।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह उच्चरित अक्षर (ध्वनि) से शुरू करे और धीरे-धीरे उसे सूक्ष्म करते हुए हृद्याकाश में ले जाए। जब ध्वनि समाप्त हो जाती है और केवल वह 'अक्षरत्व' (अविनाशी चेतना) शेष रहती है, तब साधक वर्णों के बंधन से मुक्त होकर अक्षर-भूमि में प्रवेश करता है। यह प्रक्रिया 'विनाशी' (ध्वनि) के माध्यम से 'अविनाशी' (ब्रह्म) तक पहुँचने की सीढ़ी है। यहाँ साधक अनुभव करता है कि समस्त ब्रह्मांड की ध्वनियाँ अंततः हृदय के उस शून्य-आकाश में विलीन हो जाती हैं, जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य विद्यमान है।
एतत्तु परमं ध्येयं व्योममध्ये व्यवस्थितम् ।
व्योम्नश्चोपरि मध्यस्थमनन्ताकाशमव्ययम् ॥ ९.१६ ॥
यही परम ध्येय है, व्योमके बीच स्थित — और व्योमके भी ऊपर, बीचमें स्थित, अनन्त, अविनाशी आकाश —
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मध्यम बिन्दु की वर्णरहित स्थिति और हृदयाकाश में स्थित होकर 'अक्षरत्व' प्राप्त करने की प्रक्रिया बताई। अब वे साधक को उस अक्षरत्व के वास्तविक स्वरूप और उसके परम ध्येय की ओर ले जा रहे हैं, जहाँ चेतना किसी सीमित बिंदु से मुक्त होकर अनंत विस्तार को प्राप्त होती है।
अन्वय और पदार्थ —
एतत् तु परमं ध्येयम् (अस्ति), (यत्) व्योम-मध्ये व्यवस्थितम्। (तदपि) व्योम्नः च उपरि मध्यस्थम्, अनन्ताकाशम्, अव्ययम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• परमं ध्येयम्: वह सर्वोच्च लक्ष्य या ध्यान का विषय, जिससे परे और कोई उपलब्धि नहीं।
• व्योम-मध्ये: आकाश के मध्य में। यहाँ 'व्योम' का अर्थ केवल भौतिक अंतरिक्ष नहीं, अपितु चेतना का वह विस्तार है जिसे साधक अनुभव करता है।
• व्यवस्थितम्: पूर्णतः स्थित, सुस्थापित।
• व्योम्नः च उपरि: आकाश के भी ऊपर। यह उस स्थिति का संकेत है जो समस्त ज्ञात और अज्ञात आकाशों (लोकों) से भी परे है।
• मध्यस्थम्: बीच में स्थित। यह विरोधाभास (ऊपर होकर भी मध्य में होना) उस परम तत्व की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।
• अनन्ताकाशम्: जिसका कोई अंत न हो, जो सीमातीत हो।
• अव्ययम्: जिसका कभी क्षय न हो, जो अविनाशी और अपरिवर्तनीय है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य उस 'परम ध्येय' का परिचय दे रहे हैं, जिसकी ओर वे साधक को अग्रसर कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने 'अक्षरत्व' की बात की थी; यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि वह अक्षरत्व वास्तव में क्या है।
ऋषि कहते हैं कि वह परम ध्येय 'व्योम-मध्ये व्यवस्थितम्' है। जब साधक अपनी चेतना को हृदय के आकाश में स्थिर करता है, तो उसे अनुभव होता है कि वह शून्य या आकाश के मध्य में स्थित है। किंतु यह केवल आरम्भ है। साधना की गहराई में वह अनुभव करता है कि जिस आकाश को वह अपना आधार मान रहा था, वह ध्येय तो 'व्योम्नः च उपरि' है—अर्थात् समस्त आकाशों के भी ऊपर है।
यहाँ 'ऊपर' शब्द भौतिक दिशा का सूचक नहीं, बल्कि सूक्ष्मता और श्रेष्ठता का सूचक है। यह उस अवस्था का वर्णन है जहाँ साधक स्थूल आकाश (भौतिक), सूक्ष्म आकाश (मानसिक) और कारण आकाश (बीजरूप) तीनों को पार कर उस 'अनन्ताकाश' में प्रवेश करता है जो 'अव्यय' है। वह मध्यस्थ भी है क्योंकि वह केवल ऊपर नहीं, बल्कि हर परमाणु और हर विस्तार के केंद्र में व्याप्त है। यह स्थिति उस परम शून्य की है जिसमें सब कुछ विलीन हो जाता है, किंतु वह स्वयं अविनाशी रहता है।
श्रुति-संगति —
इस रहस्य की पुष्टि महर्षि याज्ञवल्क्य के उसी संवाद में मिलती है जो उन्होंने गार्गी के साथ किया था:
स होवाच यदूर्ध्वं गार्गी दिवो यदवाक्पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्न्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ १४.६.८.७ ॥
(याज्ञवल्क्यने) कहा — गार्गी! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है, जो इन द्यावापृथिवीके बीचमें है, और जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं — वह सब आकाशमें ही ओत-प्रोत (ताने-बानेकी भाँति बुना) है। (गार्गीने पूछा —) तो आकाश किसमें ओत-प्रोत है?
इस श्रुति-अंश में याज्ञवल्क्य जी स्पष्ट करते हैं कि भूत, वर्तमान और भविष्य—सब कुछ आकाश में ही ओत-प्रोत है। वर्तमान श्लोक इसी का विस्तार है। यदि सब कुछ आकाश में है, तो वह आकाश किसमें है? वह 'व्योम्नः च उपरि' स्थित उस अव्यय अक्षर में है। स्मृति का यह वचन श्रुति के उस प्रश्न का उत्तर देता है कि "आकाश किसमें ओत-प्रोत है?" वह उस परम ध्येय, उस अनन्त और अविनाशी आकाश में ओत-प्रोत है, जो समस्त लोकों का आधार है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'बिन्दु' से 'विस्तार' की ओर जाने की यात्रा है। अब तक का अभ्यास मध्यम बिन्दु और हृदयाकाश की सूक्ष्मता पर था, किंतु यहाँ ध्येय का स्वरूप 'आकाश-सा' हो गया है।
साधक जब इस श्लोक का अभ्यास करता है, तो वह अपने ध्यान को किसी एक बिंदु या आकार (रूप) में सीमित नहीं रखता, बल्कि अपनी चेतना को अनन्त विस्तार में फैलाता है। वह अनुभव करता है कि उसकी आत्मा किसी छोटे से हृदय-कोष्ठ में नहीं, बल्कि एक ऐसे आकाश में स्थित है जिसका न कोई आदि है, न अंत।
अभ्यास यह है कि साधक पहले स्वयं को आकाश के मध्य में स्थित अनुभव करे, फिर उस अनुभव के भी ऊपर एक और विराट आकाश को देखे, और अंततः यह जान ले कि वह 'अव्यय आकाश' ही उसकी अपनी वास्तविक प्रकृति है। यहाँ साधक 'साकार' और 'निराकार' की सीमाओं को तोड़कर 'अनन्त' की भूमि पर प्रतिष्ठित होता है। यह वह स्थिति है जहाँ ध्येय और ध्याता के बीच का भेद मिट जाता है, क्योंकि दोनों ही उस एक अविनाशी आकाश के अंश हैं।
यस्याकाशमयं कोष्ठमनन्तं परमालयम् ।
संयोगश्चेतनोऽस्माकं प्रकाशश्चाग्निसूर्ययोः ॥ ९.१७ ॥
— जिसका कोश आकाशमय, अनन्त, परम आश्रय है; वह हमारी चेतनाका संयोग (आधार) है, और अग्नि तथा सूर्यका प्रकाश है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस परम ध्येय का परिचय दिया जो समस्त आकाशों के मध्य और ऊपर स्थित अविनाशी अनंत आकाश है। अब इस श्लोक में वे उस अनंत आकाश के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसे हमारी चेतना का आधार और ब्रह्मांडीय प्रकाश का स्रोत सिद्ध कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(तस्य) कोष्ठम् आकाशमयं, अनन्तं, परम-आलयम् (अस्ति)। (सः) अस्माकं चेतनो संयोगः (अस्ति), (तथा) अग्नि-सूर्ययोः प्रकाशः (च अस्ति)।
पदार्थ:
• कोष्ठम्: यहाँ 'कोष्ठ' का अर्थ शरीर का कोई अंग नहीं, अपितु वह 'घेरा' या 'आवरण' है जिसमें चेतना स्थित है। यह वह व्यापक क्षेत्र है जिसमें संपूर्ण अस्तित्व समाहित है।
• आकाशमयम्: जो स्वभाव से ही आकाश के समान व्यापक, सूक्ष्म और सर्वव्यापी है।
• परमालयम्: सर्वोच्च आश्रय। वह स्थान जहाँ पहुँचकर आत्मा को पुनः किसी अन्य शरण की आवश्यकता नहीं रहती।
• संयोगः: यहाँ संयोग का अर्थ मिलन नहीं, अपितु 'आधार' या 'जुड़ाव' है। वह तत्व जिससे हमारी चेतना जुड़ी हुई है और जिसके माध्यम से वह अभिव्यक्त होती है।
• चेतनो संयोगः: चेतना का वह जीवंत आधार जो स्वयं चैतन्य है।
• प्रकाशः: वह ज्योति जो केवल दृश्य प्रकाश नहीं, अपितु 'ज्ञान' और 'जागरूकता' है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य उस परम तत्व के विस्तार को समझा रहे हैं जिसे उन्होंने पिछले श्लोक में 'अनन्ताकाश' कहा था। वे कहते हैं कि उस परम ध्येय का 'कोष्ठ' यानी उसका घेरा या विस्तार आकाशमय है। सामान्यतः हम आकाश को शून्य समझते हैं, किन्तु योगी के लिए यह आकाश 'परमालय' है—वह सर्वोच्च आश्रय जहाँ आत्मा का विश्राम है।
ऋषि एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोलते हैं कि वह अनंत आकाश ही 'अस्माकं चेतनो संयोगः' है। इसका भाव यह है कि हमारी व्यक्तिगत चेतना स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं है, बल्कि वह उस विराट चेतना से जुड़ी हुई है। जैसे एक लहर सागर से जुड़ी होती है, वैसे ही हमारी चेतना उस अनंत आकाशमय आधार से जुड़ी है। वह 'संयोग' ही हमें जीवित और जागरूक रखता है।
इसके पश्चात, याज्ञवल्क्य बाहरी जगत के प्रकाश और भीतरी चेतना के प्रकाश के भेद को मिटा देते हैं। वे कहते हैं कि अग्नि और सूर्य का जो प्रकाश हमें बाहर दिखाई देता है, वह वास्तव में उसी एक परम तत्व का विवर्त या प्रकटीकरण है। सूर्य की भौतिक ज्योति और हृदय की आत्म-ज्योति अलग-अलग नहीं हैं; दोनों का स्रोत वही एक अनंत आकाशमय चेतना है। इस प्रकार, बाह्य सूर्य और आंतरिक सूर्य (आत्मा) के बीच की कड़ी को उन्होंने यहाँ स्पष्ट किया है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'विस्तार' के अभ्यास का है। अब तक साधक ने चेतना को मध्यम बिंदु और हृदयाकाश जैसे सूक्ष्म केंद्रों में सीमित किया था, किन्तु यहाँ वह उस सीमा को तोड़कर 'अनंत' में प्रवेश करता है।
अभ्यास यह है कि साधक अपनी व्यक्तिगत चेतना (अहं) को उस अनंत आकाशमय आधार में विलीन करे। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मेरी चेतना का आधार वही है, जो सूर्य और अग्नि का प्रकाश है", तब उसके भीतर 'अद्वैत' का उदय होता है। वह अनुभव करता है कि जो प्रकाश बाहर सूर्य के रूप में जगत् को प्रकाशित कर रहा है, वही प्रकाश उसके भीतर 'चेतना' के रूप में स्थित है।
साधक इस स्थिति में पहुँचता है जहाँ वह अपनी जागरूकता को शरीर की सीमाओं से निकालकर संपूर्ण ब्रह्मांड के आकाश में फैला देता है। यहाँ अभ्यास 'संयोग' का है—अपनी लघु चेतना का उस विराट चेतना के साथ एकरूप होना। जब साधक सूर्य के प्रकाश को देखते हुए उसे अपने ही आंतरिक प्रकाश का विस्तार मानने लगता है, तब वह स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अक्षर की ओर बढ़ता है। यह वह भूमि है जहाँ 'दृष्टा' और 'दृश्य' का भेद समाप्त होने लगता है और केवल 'प्रकाश' शेष रहता है।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ ९.१८ ॥
(गीता १५.१२:) जो तेज सूर्यमें स्थित होकर सारे जगत्को प्रकाशित करता है, जो चन्द्रमामें और जो अग्निमें है, उस तेजको मेरा जानो।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस परम ध्येय के विस्तार को 'अनन्ताकाश' और हमारी चेतना का आधार सिद्ध किया था। अब इस श्लोक में वे उस निराकार आकाश के 'प्रकाशमय' स्वरूप को प्रकट कर रहे हैं, जो स्थूल जगत में सूर्य, चन्द्र और अग्नि के रूप में अभिव्यक्त होता है।
अन्वय और पदार्थ —
यदा आदित्यगतं तेजो अखिलं जगद् भासयते, (तथा) यत् चन्द्रमसि (अस्ति), यत् च अग्नौ (अस्ति) — तत् तेजो मामकम् विद्धि।
पदार्थ:
• आदित्यगतं तेजो: सूर्य में स्थित वह तेज। यहाँ 'गत' का अर्थ केवल स्थित होना नहीं, अपितु वह शक्ति है जो सूर्य के माध्यम से प्रवाहित हो रही है।
• जगद्भासयते: संपूर्ण जगत को प्रकाशित करना। यह केवल भौतिक प्रकाश नहीं, अपितु वह चैतन्य-प्रकाश है जिससे सृष्टि का अस्तित्व बोध होता है।
• चन्द्रमसि: चन्द्रमा में स्थित। चन्द्रमा मन का अधिष्ठाता है, अतः यहाँ शीतलता और मानसिक प्रकाश का संकेत है।
• अग्नौ: अग्नि में स्थित। अग्नि रूपांतरण और जठराग्नि का प्रतीक है।
• मामकम् विद्धि: उसे मेरा (परमात्मा का/परम ध्येय का) जानो। यहाँ 'मामकम्' शब्द उस एकत्व को दर्शाता है जहाँ साधक और ध्येय का भेद मिट जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य उस परम प्रकाश का रहस्य खोल रहे हैं जो पिछले श्लोकों में वर्णित 'अनन्ताकाश' का प्रदीप्त रूप है। वे कहते हैं कि जब हम सूर्य को देखते हैं और उसके तेज से संपूर्ण जगत प्रकाशित होता है, तो वह तेज वास्तव में सूर्य का अपना नहीं है, अपितु उस परम पुरुष का है जो सूर्य में स्थित है। इसी प्रकार, चन्द्रमा की शीतल ज्योति और अग्नि की प्रज्वलित ज्वाला—इन तीनों ही प्रकाश-पुंजों के मूल में एक ही तेज कार्य कर रहा है।
यहाँ ऋषि एक अत्यंत सूक्ष्म भेद स्पष्ट कर रहे हैं। सूर्य, चन्द्र और अग्नि केवल 'यंत्र' या 'माध्यम' हैं; वास्तविक प्रकाशक वह 'अन्तर्यामी' है जो इनमें प्रतिष्ठित है। यह उसी सत्य का विस्तार है जिसे उन्होंने श्रुति में देखा है कि जो आदित्य में रहकर भी आदित्य से भीतर है, वही वास्तव में प्रकाश का स्रोत है। जब साधक इस सत्य को जान लेता है कि बाहरी जगत का समस्त प्रकाश वास्तव में उसके अपने ही भीतर स्थित उस परम तेज का प्रतिबिंब है, तब उसकी दृष्टि 'बाह्य-प्रकाश' से हटकर 'आन्तर-प्रकाश' की ओर मुड़ जाती है।
यह श्लोक हमें स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। सूर्य (बाह्य तेज), चन्द्र (मानसिक तेज) और अग्नि (प्राणिक तेज)—इन तीनों के समन्वय से ही जीवन का संचालन होता है। इन तीनों में एक ही तत्व को देखना ही 'अध्यात्मनिर्णय' है।
श्रुति-संगति —
यो वायौ तिष्ठन् वायोरन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो य आदित्ये तिष्ठन् आदित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य यश्चन्द्रतारके तिष्ठन् चन्द्रतारकादन्तरो यं चन्द्रतारकं न वेद यस्य यो दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्योऽन्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं यो दिशोऽन्तरो यो विद्युति तिष्ठन् विद्युतोऽन्तरो यं विद्युन्न वेद यस्य विद्युच्छरीरं यो य स्तनयित्नौ तिष्ठन् स्तनयित्नोरन्तरो यं स्तनयित्नुर्न वेद यस्य स्तनयित्नुः शरीरं य स्तनयित्नुमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिदेवतमथाधिलोकम् ॥ १४.६.७.१६ ॥
जो वायुमें रहता हुआ वायुसे भीतर है, जिसे वायु नहीं जानता, वायु जिसका शरीर है; जो आदित्यमें रहता हुआ आदित्यसे भीतर है, जिसे आदित्य नहीं जानता, आदित्य जिसका शरीर है; जो चन्द्रमा-तारोंमें रहता हुआ चन्द्रमा-तारोंसे भीतर है, जिसे चन्द्रमा-तारे नहीं जानते; जो दिशाओंमें रहता हुआ दिशाओंसे भीतर है, जिसे दिशाएँ नहीं जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर हैं; जो विद्युत्में रहता हुआ विद्युत्से भीतर है, जिसे विद्युत् नहीं जानती, विद्युत् जिसका शरीर है; जो स्तनयित्नु (मेघ-गर्जन) में रहता हुआ स्तनयित्नुसे भीतर है, जिसे स्तनयित्नु नहीं जानता, स्तनयित्नु जिसका शरीर है, जो भीतर रहकर स्तनयित्नुका नियमन करता है — वह तुम्हारा आत्मा है, अन्तर्यामी, अमृत। यह अधिदैवत (देवताओंकी दृष्टिसे) हुआ; अब अधिलोक (लोकोंकी दृष्टिसे)। [उपलब्ध मूलपाठमें इस कण्डिकाके कुछ वाक्यांश अधूरे हैं।]
इस श्रुति-अंश में स्पष्ट कहा गया है कि वह अन्तर्यामी आदित्य में स्थित होते हुए भी आदित्य से भीतर है और आदित्य उसे नहीं जानता, क्योंकि वह आदित्य का शरीर (आधार) है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति का विस्तार है। श्रुति जहाँ 'अन्तर्यामी' के होने की बात करती है, वहीं यह स्मृति उस अन्तर्यामी के 'तेज' (प्रकाश) को सूर्य, चन्द्र और अग्नि में देखने की विधि बताती है। यह सिद्ध करता है कि जो अधिदैवत रूप में सूर्य का प्रकाश है, वही अधिलोक रूप में परम पुरुष का स्वरूप है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक केवल एक दार्शनिक कथन नहीं, अपितु एक निरंतर अभ्यास (साधना) है। योगी इस श्लोक के माध्यम से 'तेज-सायुज्यता' का अभ्यास करता है।
१. बाह्य अभ्यास: जब साधक सूर्य को देखता है, या दीप प्रज्वलित करता है, या अग्निहोत्र करता है, तब वह केवल भौतिक प्रकाश को नहीं देखता, बल्कि यह अनुभव करता है कि "यह तेज उसी परम पुरुष का है, जो मेरे भीतर भी स्थित है।" दीप जलाते समय भी यह स्मरण करना कि यह ज्योति उस अक्षर-ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है, साधक को स्थूल जगत से ऊपर उठाता है।
२. आन्तर अभ्यास: साधक अपने भीतर स्थित तीन ज्योतियों का अनुभव करता है—हृदय की अग्नि (जठराग्नि/प्राणाग्नि), मन की शीतलता (चन्द्र) और आत्मा का प्रकाश (सूर्य)। जब वह इन तीनों को एक ही 'परम तेज' के रूप में अनुभव करने लगता है, तब वह 'भर्ग' की स्थिति में पहुँचता है।
३. भूमि परिवर्तन: इस अभ्यास से साधक 'दृश्य' (प्रकाश) से 'द्रष्टा' (प्रकाशक) की ओर बढ़ता है। वह इस बोध से कि "सब प्रकाश उसी का है", अपनी व्यक्तिगत चेतना को उस अनंत प्रकाश में विलीन करने का प्रयास करता है। यह अभ्यास उसे उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को सूर्य-चन्द्र-अग्नि के संयोग से परे, केवल शुद्ध चैतन्य-प्रकाश के रूप में अनुभव करता है।
अन्तरेऽस्मिन्निमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत् ।
अग्रं च मूलकं ब्रह्म सर्वेषां चान्तरास्थितम् ॥ ९.१९ ॥
इसीके भीतर ये लोक हैं, यह सारा जगत् इसीके भीतर है; (वह) ब्रह्म (सबका) अग्र और मूल है, और सबके भीतर स्थित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य, चन्द्र और अग्नि के तेज को अपना (परमात्मा का) बताकर साधक को स्थूल प्रकाश से सूक्ष्म प्रकाश की ओर मोड़ा था। अब इस श्लोक में वे उस प्रकाश के आधार, उस 'अनन्ताकाश' की व्यापकता का वर्णन कर रहे हैं, जिसमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड विलीन है।
अन्वय और पदार्थ —
निमे लोकाः अस्मिन् अन्तरे (सन्ति), इदं विश्वं जगत् अन्तर् (अस्ति)। ब्रह्म (तद्) सर्वेषां च अन्तरास्थितम्, (तदेव) अग्रं च मूलकं (च अस्ति)।
पदार्थ:
• अन्तरेऽस्मिन्: इस (परम ध्येय/अनन्ताकाश) के भीतर। 'अस्मिन्' शब्द उस चेतना-आकाश के लिए है जिसका वर्णन पिछले श्लोकों (९.१६-९.१८) में हुआ है।
• निमे लोका: ये लोक। यहाँ 'निमे' शब्द संकेत करता है कि जो लोक हमें बाहर विस्तृत दिखते हैं, वे वास्तव में इसी एक सत्ता के भीतर निहित हैं।
• विश्वमिदं जगत्: यह संपूर्ण चराचर जगत। 'विश्वम्' का अर्थ है वह सब कुछ जो व्याप्त है।
• अग्रं च मूलकं: अग्र (शिर/आरम्भ) और मूलक (जड़/आधार)। वह ब्रह्म ही सृष्टि का प्रस्थान बिंदु (अग्र) है और वही उसका अंतिम आधार (मूल) है।
• अन्तरास्थितम्: सबके भीतर स्थित। यह शब्द 'अन्तर्यामी' भाव को प्रकट करता है, जो बाहर से नहीं, अपितु भीतर से संचालित करता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य उस महान सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं जिसे वेदान्त 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' कहता है। पिछले श्लोकों में उन्होंने जिस 'अनन्ताकाश' और 'तेज' की बात की, वह कोई भौतिक शून्य नहीं, अपितु वह शुद्ध चेतना है जिसमें समस्त अस्तित्व प्रतिबिम्बित है।
ऋषि कहते हैं कि यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड, समस्त लोक और यह दृश्यमान जगत उस एक परम तत्व के भीतर स्थित हैं। सामान्य दृष्टि में हमें लगता है कि हम जगत के भीतर हैं, किंतु योग की दृष्टि से सत्य यह है कि संपूर्ण जगत उस ब्रह्म के भीतर है। वह ब्रह्म केवल जगत का निर्माता नहीं, बल्कि उसका 'अग्र' और 'मूल' भी है। 'अग्र' होने का अर्थ है कि सृष्टि की प्रथम संकल्पना, प्रथम स्पंदन उसी से निकला; और 'मूलक' होने का अर्थ है कि सृष्टि का संपूर्ण पोषण और उसका अंतिम विलय उसी में है।
वह ब्रह्म केवल बाहरी आकाश की तरह व्यापक नहीं है, अपितु वह 'अन्तरास्थित' है—अर्थात् वह प्रत्येक अणु, प्रत्येक जीव और प्रत्येक चेतना के भीतर साक्षी रूप में स्थित है। इस प्रकार, जो बाहर अनन्त आकाश के रूप में है, वही भीतर हृदय-आकाश के रूप में है। बाहरी जगत और आंतरिक जगत के बीच का भेद केवल दृष्टि का है; तत्वतः दोनों एक ही ब्रह्म की अभिव्यक्तियाँ हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ८.१.३ ॥
जितना बड़ा यह (बाहरका) आकाश है, उतना ही यह हृदयके भीतरका आकाश है। द्युलोक और पृथिवी दोनों इसीके भीतर समाये हैं; अग्नि और वायु, सूर्य और चन्द्रमा, विद्युत् और नक्षत्र — और इसका जो कुछ यहाँ है और जो नहीं है, वह सब इसीमें समाया है।
छान्दोग्य उपनिषद् का यह अंश इस स्मृति के वचन की पूर्ण पुष्टि करता है। जहाँ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति कहती है कि "इसीके भीतर ये लोक और यह सारा जगत् है", वहीं छान्दोग्य उपनिषद् स्पष्ट करता है कि जितना विशाल यह बाहरी आकाश है, उतना ही विशाल हृदय के भीतर का आकाश है। द्युलोक, पृथ्वी, अग्नि, वायु, सूर्य और चन्द्रमा—सब इसी आंतरिक आकाश में समाहित हैं। स्मृति और उपनिषद् दोनों इस बात पर सहमत हैं कि हृदय का आकाश कोई भौतिक स्थान नहीं, अपितु वह ब्रह्म-अवस्था है जिसमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतिबिंब विद्यमान है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'विस्तार' के अभ्यास का सूत्र है। प्रायः साधक जब ध्यान करता है, तो वह स्वयं को एक छोटे से शरीर या सीमित हृदय के भीतर अनुभव करता है। यह श्लोक उसे इस सीमितता से मुक्त कर 'अनन्तता' की ओर ले जाता है।
अभ्यास यह है कि साधक जब हृदय-आकाश में ध्यान लगाए, तो वह यह अनुभव करे कि यह हृदय कोई छोटा सा अंग नहीं, अपितु वह विराट आकाश है जिसमें समस्त लोक और नक्षत्र समाए हुए हैं। जब साधक 'अन्तरास्थित' ब्रह्म का अनुभव करता है, तो उसकी चेतना 'पिण्ड' (शरीर) से निकलकर 'ब्रह्माण्ड' में विलीन होने लगती है।
यहाँ 'अग्र' और 'मूल' का ध्यान करने से साधक यह अनुभव करता है कि उसका अपना अस्तित्व भी उसी मूल ब्रह्म से निकला है और अंततः उसी में समाहित होना है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' की संकीर्णता से उठाकर 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है, जहाँ वह स्वयं को जगत से अलग नहीं, अपितु जगत को अपने भीतर स्थित पाता है।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ९.२० ॥
(गीता १५.६:) उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा, न अग्नि; जिसे पाकर (साधक) लौटते नहीं, वह मेरा परम धाम है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया था कि संपूर्ण जगत और समस्त लोक उस एक ब्रह्म के भीतर स्थित हैं, जो सबका मूल और अग्र है। अब इस श्लोक में वे उस परम सत्ता के स्वरूप और उसके 'धाम' की उस विलक्षणता का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ पहुँचकर साधक की यात्रा पूर्ण हो जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
न सूर्यः तद्भासयते, न शशाङ्कः, न पावकः (भासयते)। यद् (तत् स्थानं) गत्वा (साधकाः) न निवर्तन्ते, तद् मम परमं धाम (अस्ति)।
पदार्थ:
• न तद्भासयते: उसे प्रकाशित नहीं करता। 'तद्' शब्द उस परम ध्येय/अनन्ताकाश के लिए है। यहाँ 'भासयते' का अर्थ है बाहरी प्रकाश द्वारा दृश्य होना।
• सूर्यः, शशाङ्कः, पावकः: सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि। ये तीनों स्थूल जगत के प्रकाश के मुख्य स्रोत हैं।
• यद् गत्वा न निवर्तन्ते: जहाँ जाकर (साधक) लौटकर नहीं आते। 'निवर्तन्ते' का अर्थ है पुनः संसार-चक्र या द्वैत की अवस्था में गिरना।
• तद्धाम परमं मम: वह मेरा परम धाम है। 'धाम' का अर्थ केवल स्थान नहीं, अपितु वह प्रकाशमय अवस्था है जहाँ आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य श्रीमद्भगवद्गीता के उस महान वचन को उद्धृत कर रहे हैं, जो साधक को 'प्रकाश्य' (जिस पर प्रकाश पड़े) से 'प्रकाशक' (जो स्वयं प्रकाश है) की ओर ले जाता है।
यहाँ एक सूक्ष्म रहस्य है। पिछले श्लोक (९.१८) में ऋषि ने कहा था कि सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज 'मेरा' (परमात्मा का) है। अब इस श्लोक में वे कहते हैं कि सूर्य, चन्द्र और अग्नि उसे प्रकाशित नहीं कर सकते। इसमें कोई विरोध नहीं है, अपितु यह साधक के लिए एक सोपान है। जब तक साधक स्थूल जगत में है, वह सूर्य के प्रकाश को परमात्मा का प्रतिबिंब मानकर उसकी उपासना करता है। किंतु जब वह योगमार्ग से ऊपर उठकर उस 'परम धाम' में प्रविष्ट होता है, तब उसे ज्ञात होता है कि वह सत्ता किसी बाहरी प्रकाश की आश्रित नहीं है। वह स्वयं 'स्वयं-प्रकाशित' है।
सूर्य, चन्द्र और अग्नि भौतिक जगत के प्रकाशक हैं, किंतु वह परम तत्व वह 'महा-ज्योति' है जिससे ये तीनों उत्पन्न हुए हैं। जो प्रकाशक है, वह स्वयं किसी अन्य प्रकाश से प्रकाशित नहीं हो सकता। वह 'अक्षर' है, वह 'अविनाशी' है।
'यद् गत्वा न निवर्तन्ते' का भाव यह है कि यह वह स्थिति है जहाँ पहुँचकर चेतना का विसर्जन हो जाता है। यह केवल मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं, अपितु जीवनमुक्त योगी की वह अवस्था है जहाँ वह द्वैत के अंधकार से निकलकर उस परम प्रकाश में लीन हो जाता है, जहाँ से फिर अविद्या की ओर लौटना संभव नहीं रहता। यह वह 'परम धाम' है जिसे याज्ञवल्क्य ने पूर्व में 'अनन्ताकाश' और 'हृदयाकाश' के रूप में संकेतित किया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ २.२.१० ॥
वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारे, न ये बिजलियाँ — फिर यह अग्नि कहाँसे? उसीके प्रकाशित होनेसे सब प्रकाशित होता है; उसीकी ज्योतिसे यह सब चमकता है।
मुण्डक उपनिषद् स्पष्ट करता है कि उस परम पद पर न सूर्य चमकता है, न चन्द्रमा और तारे। यहाँ स्मृति और उपनिषद् का पूर्ण मेल है। दोनों ही इस बात पर बल देते हैं कि परमात्मा 'भासक' (प्रकाश देने वाला) है, 'भास्य' (प्रकाश पाने वाला) नहीं। मुण्डक उपनिषद् कहता है कि 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति'—उसी की ज्योति से यह सब चमकता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी सत्य को 'परम धाम' के रूप में प्रस्तुत कर साधक को उस स्थिति के लिए प्रेरित कर रही है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'प्रकाश' के तीन स्तरों का बोध कराता है। प्रथम स्तर है बाहरी प्रकाश (सूर्य, चन्द्र, अग्नि), द्वितीय स्तर है अंतःप्रकाश (हृदय-ज्योति), और तृतीय स्तर है वह 'परम प्रकाश' जो स्वयं प्रकाशक है।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब ध्यान में गहराई से उतरता है, तो वह पहले बाहरी प्रकाश को त्यागता है। फिर वह उस तेज का अनुभव करता है जो सूर्य और अग्नि का मूल है। अंत में, वह उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ उसे किसी भी प्रकार के 'प्रकाश' और 'अंधकार' के भेद का अनुभव नहीं होता, क्योंकि वह स्वयं उस परम ज्योति में स्थित हो जाता है।
यह श्लोक साधक को 'निवृत्ति' की चरम सीमा तक ले जाता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि वह उस धाम का अंश है जहाँ से कोई लौटता नहीं, तो उसकी सारी मानसिक वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं। वह 'प्रकाश्य' होने के मोह से मुक्त होकर 'प्रकाशक' स्वरूप में स्थित हो जाता है। यह अभ्यास उसे स्थूल जगत के अवलंबों से हटाकर उस 'अक्षर' और 'अव्यय' चेतना में प्रतिष्ठित करता है, जो इस संपूर्ण सृष्टि का आधार है।
जीवस्वरूपम्
तस्मादंशं विनिष्क्रान्तं जीवभूतं सनातनम् ।
ब्रह्मणः परमं ब्रह्म ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् ॥ ९.२१ ॥
उसीसे निकला हुआ (उसका) अंश सनातन जीव बना है; वह ब्रह्मासे भी परे परम ब्रह्म है, ज्योतियोंकी उत्तम ज्योति।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस परम धाम की विलक्षणता बताई थी, जहाँ पहुँचकर साधक पुनः संसार में नहीं लौटता। अब इस श्लोक में वे उस परम सत्ता और व्यक्तिगत जीव के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक अपनी लघुता से निकलकर अपनी वास्तविक दिव्यता को पहचान सके।
अन्वय और पदार्थ —
तस्मात् (परमब्रह्मणः) अंशं विनिष्क्रान्तं (तत्) जीवभूतं सनातनम् (अस्ति) । (तत्) ब्रह्मणः परमं ब्रह्म (अस्ति), ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• तस्मादंशं विनिष्क्रान्तं: उससे (परम ब्रह्म से) निकला हुआ अंश। 'विनिष्क्रान्त' का अर्थ है—जो मूल स्रोत से प्रस्फुटित हुआ हो, जैसे सूर्य से किरणें निकलती हैं, पर किरण सूर्य से भिन्न नहीं होती।
• जीवभूतं सनातनम्: जो जीव के रूप में प्रकट हुआ है और जो सनातन है। 'सनातन' का अर्थ है—जिसका न आदि है न अंत, जो समय की सीमाओं से परे है।
• ब्रह्मणः परमं ब्रह्म: वह ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता/ब्रह्म-शक्ति) से भी परे परम ब्रह्म है। यहाँ 'ब्रह्म' शब्द के दो अर्थ हैं—एक वह जो जगत का विस्तार करता है और दूसरा वह जो शुद्ध चैतन्य स्वरूप है।
• ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम्: समस्त ज्योतियों की श्रेष्ठतम ज्योति। यहाँ 'ज्योति' का अर्थ केवल प्रकाश नहीं, अपितु ज्ञान, चेतना और प्राण-शक्ति है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जीव के वास्तविक स्वरूप का उद्घोष कर रहे हैं। पिछले श्लोकों में उन्होंने उस 'परम ध्येय' और 'परम धाम' की चर्चा की थी जो सूर्य और चन्द्रमा के प्रकाश से भी परे है। अब वे उस विराट सत्ता और हमारे भीतर स्थित 'जीव' के सेतु का निर्माण कर रहे हैं।
ऋषि कहते हैं कि यह जीव कोई आकस्मिक संयोग या केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं है, अपितु वह उसी परम ब्रह्म का 'विनिष्क्रान्त अंश' है। जब वे इसे 'सनातन' कहते हैं, तो वे साधक को यह याद दिला रहे हैं कि उसकी मूल प्रकृति अविनाशी है। शरीर और मन की अवस्थाएँ परिवर्तनशील हैं, किन्तु जो तत्व इन सबका साक्षी है, वह सनातन है।
यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य है—"ब्रह्मणः परमं ब्रह्म"। सामान्यतः हम ब्रह्म को एक ही मानते हैं, किन्तु योगिक दृष्टि से, जब वह चैतन्य सृष्टि के विस्तार के लिए 'ब्रह्मा' (सृजक) के रूप में कार्य करता है, तब वह एक विशेष शक्ति-स्वरूप होता है। किन्तु इस श्लोक में याज्ञवल्क्य उस अवस्था की बात कर रहे हैं जो इस सृजन-प्रक्रिया से भी ऊपर, शुद्धतम और निराकार है। वही 'परम ब्रह्म' जब जीव के रूप में हृदय में स्थित होता है, तब वह 'ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम्' कहलाता है।
इसका अर्थ यह है कि जगत की समस्त ज्योतियाँ—चाहे वह भौतिक सूर्य हो, मानसिक प्रज्ञा हो या प्राणों का तेज—सब उसी एक परम ज्योति की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। जिस प्रकार एक ही अग्नि से अनेक दीपक जलते हैं, वैसे ही उस एक परम ज्योति से अनंत जीव प्रस्फुटित हुए हैं।
श्रुति-संगति —
परम सत्ता के इस 'ज्योति' स्वरूप की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में मिलती है:
यस्मादर्वाक्षंवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्ह्योपासतेऽमृतम् ॥ १४.७.२.२० ॥
जिसके नीचे (इस ओर) संवत्सर दिनोंके साथ घूमता है, उसीकी देवता "ज्योतियोंकी ज्योति" के रूपमें, आयु और अमृतके रूपमें उपासना करते हैं।
श्रुति स्पष्ट कहती है कि जिसकी छत्रछाया में यह पूरा संवत्सर (काल-चक्र) घूमता है, उसी की उपासना 'ज्योतिषां ज्योतिः' (ज्योतियों की ज्योति) के रूप में की जाती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उसी श्रुति-वचन का विस्तार है। श्रुति जहाँ इस ज्योति को 'अमृत' और 'आयु' कहती है, वहीं स्मृति इसे 'सनातन जीव' के रूप में हमारे भीतर प्रतिष्ठित करती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
जीव के इस 'अंश' स्वरूप का प्रमाण श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है:
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ १५.७ ॥
जीवलोकमें सनातन जीव मेरा ही अंश है; वही प्रकृतिमें स्थित मन-सहित छः इन्द्रियोंको खींचता है।
गीता में भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि जीवलोक में सनातन जीव उनका ही अंश है। स्मृति और गीता दोनों का मत एक ही है—जीव परमात्मा से पृथक कोई बाहरी वस्तु नहीं, अपितु उसी का विस्तार है। भेद केवल उपाधियों (शरीर, मन, अहंकार) का है, तत्व का नहीं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक केवल एक दार्शनिक कथन नहीं, अपितु एक गहन अभ्यास (साधना) है। योग की दृष्टि से, जब साधक स्वयं को केवल एक सीमित शरीर या मन मानता है, तो वह भय, शोक और बंधन में रहता है। किन्तु जैसे ही वह इस बोध का अभ्यास करता है कि "मैं उसी परम ज्योति का अंश हूँ", उसकी चेतना का विस्तार होने लगता है।
अभ्यास यह है कि ध्यान की अवस्था में, जब साधक अपने भीतर की ज्योति का अनुभव करे, तो वह स्वयं को उस ज्योति से अलग न देखे। वह यह अनुभव करे कि जिस प्रकार किरण सूर्य से अलग नहीं है, उसी प्रकार मेरा अस्तित्व उस परम ब्रह्म से अलग नहीं है। यह 'अंश-बोध' साधक को लघुता (अहंकार) से मुक्त कर विराटता की ओर ले जाता है। जब साधक स्वयं को 'ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम्' के रूप में देखना आरम्भ करता है, तब वह भौतिक अंधकार (अविद्या) से ऊपर उठकर उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ केवल प्रकाश ही प्रकाश है। यह अनुभव साधक को 'जीव' की सीमितता से 'ब्रह्म' की अनंतता की ओर ले जाने वाला पहला सोपान है।
हृदये सर्वभूतानां जीवभूतः स तिष्ठति ।
स एव भगवान् विष्णुर्वेदान्तैरुपगीयते ॥ ९.२२ ॥
वह जीवभूत सब भूतों के हृदय में स्थित है। वे ही भगवान् विष्णु वेदान्तों द्वारा कहे जाते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने जीव को उस परम ब्रह्म का सनातन अंश बताया था, जो समस्त ज्योतियों की श्रेष्ठतम ज्योति है। अब इस श्लोक में वे उस अंश की स्थिति और उसके वास्तविक नाम का उद्घाटन कर रहे हैं, ताकि साधक अपने हृदय में स्थित उस सत्ता को पहचान सके।
अन्वय और पदार्थ —
(सः) जीवभूतः सर्वभूतानां हृदये तिष्ठति । स एव भगवान् विष्णुः वेदान्तैः उपगीयते ॥
पदार्थ:
• जीवभूतः: जो जीव के रूप में प्रकट हुआ है। यहाँ 'जीव' केवल देहधारी प्राणी नहीं, अपितु वह चैतन्य तत्त्व है जो प्राणों का आधार है।
• सर्वभूतानां हृदये: समस्त प्राणियों के हृदय में। यहाँ 'हृदय' केवल मांसल अंग नहीं, अपितु वह 'हृदयाकाश' है जहाँ आत्मा का निवास माना गया है।
• तिष्ठति: स्थित है। यह क्रिया केवल रहने का बोध नहीं कराती, अपितु एक स्थिर, अविनाशी और नियमन करने वाली उपस्थिति को दर्शाती है।
• भगवान् विष्णुः: वह परम पुरुष जो सर्वव्यापी है। 'विष्णु' शब्द 'विष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है—व्याप्त होना। जो कण-कण में व्याप्त है, वही विष्णु है।
• वेदान्तैः: उपनिषदों द्वारा। यहाँ 'वेदान्त' का अर्थ किसी बाद के दार्शनिक मत से नहीं, अपितु वेदों के अंतिम रहस्यमय भाग यानी उपनिषदों से है।
• उपगीयते: स्तुति की जाती है या गाया जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य जीव और ईश्वर के बीच के भेद को मिटा रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने कहा था कि जीव ब्रह्म का अंश है; अब वे स्पष्ट कर रहे हैं कि वह अंश वास्तव में कोई लघु इकाई नहीं, बल्कि वही विराट सत्ता है जो सर्वव्यापी है।
ऋषि कहते हैं कि वह 'जीवभूत' सत्ता सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है। जब हम किसी अन्य प्राणी को देखते हैं, तो हमें वहाँ केवल एक शरीर या एक अलग व्यक्तित्व दिखता है, किंतु योगेश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि यह है कि हर हृदय में वही एक ही चैतन्य प्रकाश जल रहा है। वह सत्ता जो हमारे भीतर 'मैं' के रूप में अनुभव होती है, वही दूसरे के भीतर भी है।
इस सत्ता का नाम वे 'भगवान् विष्णु' बताते हैं। विष्णु का अर्थ है—वह जो सर्वत्र व्याप्त है। जब वही विराट विष्णु किसी विशेष शरीर की सीमाओं में सिमटकर प्रतीत होता है, तब वह 'जीव' कहलाता है। अतः जीव और विष्णु में कोई तात्विक भेद नहीं है; भेद केवल दृष्टि का है। उपनिषदों (वेदान्तों) में जिस विष्णु की महिमा गाई गई है, वह कोई बाहरी देवता नहीं, अपितु प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित वह अन्तर्यामी चैतन्य ही है।
श्रुति-संगति —
इस सत्य की पुष्टि श्रुति में इस प्रकार मिलती है:
यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यु एवाधिभूतमथाध्यात्मम् ॥ १४.६.७.२० ॥
जो सब भूतोंमें रहता हुआ सब भूतोंसे भीतर (भिन्न) है, जिसे सब भूत नहीं जानते, सब भूत जिसका शरीर हैं, जो सब भूतोंके भीतर रहकर उनका नियमन करता है — वही तुम्हारा आत्मा, अन्तर्यामी, अमृत है। यह अधिभूत (कहा); अब अध्यात्म।
यहाँ शतपथ ब्राह्मण स्पष्ट करता है कि वह सत्ता सभी भूतों में रहते हुए भी उनसे भिन्न (अन्तरो) है और उन्हीं के भीतर रहकर उनका नियमन करती है। स्मृति का 'विष्णु' और श्रुति का 'अन्तर्यामी अमृत' एक ही तत्त्व के दो नाम हैं। श्रुति कहती है कि सब भूत उसी का शरीर हैं; इसी आधार पर स्मृति कहती है कि वही विष्णु सब भूतों के हृदय में स्थित है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इसी भाव की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलती है:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ १८.६१ ॥
अर्जुन! ईश्वर सब भूतोंके हृदयमें स्थित है, और यन्त्रपर चढ़े हुए-से सब भूतोंको मायासे घुमाता रहता है।
गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं कि ईश्वर सर्वभूतों के हृदय-देश में स्थित है। स्मृति और गीता दोनों का मत एक है—हृदय वह केंद्र है जहाँ विराट ईश्वर और व्यक्तिगत जीव का मिलन होता है। जहाँ स्मृति उसे 'विष्णु' कहकर उसकी व्यापकता बताती है, वहीं गीता उसे 'माया' के माध्यम से संचालित करने वाला ईश्वर कहती है। दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि हृदय ही वह स्थान है जहाँ परमात्मा का साक्षात्कार संभव है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक महान अभ्यास का द्वार खोलता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके हृदय में स्थित 'जीव' ही वास्तव में 'भगवान् विष्णु' है, तो उसकी दृष्टि बदल जाती है।
१. हृदय-केंद्रितता: साधक अपना ध्यान बाहरी जगत से हटाकर अपने हृदय-आकाश में लाता है। वह अनुभव करता है कि उसके भीतर जो चैतन्य है, वह केवल उसका नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड का व्याप्त तत्त्व है।
२. सर्व-आत्म-भाव: इस बोध से साधक के भीतर 'पर' और 'स्व' का भेद समाप्त होने लगता है। यदि वही विष्णु सब भूतों के हृदय में है, तो दूसरे के प्रति किया गया कोई भी व्यवहार वास्तव में उसी विष्णु की उपासना है। यह श्लोक साधक को करुणा और समत्व की भूमि पर ले जाता है।
३. अवस्था परिवर्तन: साधक 'अहंकार-रूप जीव' की भूमि से उठकर 'विष्णु-रूप चैतन्य' की भूमि में प्रवेश करता है। वह अब स्वयं को शरीर नहीं, बल्कि वह व्यापक ज्योति मानने लगता है जो उपनिषदों में गाई गई है।
अभ्यास यह है कि प्रत्येक प्राणी को देखते समय मन में यह भाव लाया जाए— "हृदये सर्वभूतानां जीवभूतः स तिष्ठति" (इस प्राणी के हृदय में भी वही विष्णु स्थित है)। यह अभ्यास साधक को द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है।
ईश्वरं पुरुषाख्यं तु सत्यधर्माणमव्ययम् ।
भर्गाख्यं विष्णुसंज्ञं तु यं ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥ ९.२३ ॥
पुरुष नामवाले, सत्यधर्मा, अविनाशी ईश्वर — भर्ग नामवाले, विष्णु संज्ञावाले — को जानकर (मनुष्य) अमृत पाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय में स्थित जीवभूत सत्ता को ही 'भगवान् विष्णु' कहकर वेदान्तों के रहस्य से जोड़ा था। अब इस श्लोक में वे उस एक ही परम तत्त्व के विभिन्न नामों और विशेषणों का उद्घाटन कर रहे हैं, ताकि साधक अपनी उपासना में उस सत्ता के स्वरूप को स्पष्टता से पहचान सके।
अन्वय और पदार्थ —
(सः) ईश्वरः पुरुषाख्यः तु सत्यधर्मा अविनाशी (अव्ययः) (अस्ति) । (सः एव) भर्गाख्यः विष्णुसंज्ञः तु (अस्ति), यं ज्ञात्वा अमृतं श्नुते ॥
पदार्थ:
• ईश्वरः: जो समस्त जगत् का स्वामी और नियन्ता है। यहाँ ईश्वर का अर्थ केवल सृष्टिकर्ता नहीं, अपितु वह चेतना है जो हर जीव के भीतर 'द्रष्टा' रूप में स्थित है।
• पुरुषाख्यः: पुरुष नाम वाला। 'पुरुष' वह है जिसमें 'पुर' (नगर/देह) का वास है, अर्थात् जो देह के भीतर रहने वाला शुद्ध चैतन्य है।
• सत्यधर्मा: जिसका धर्म ही सत्य है। यहाँ सत्य का अर्थ केवल वाणी की सच्चाई नहीं, अपितु वह 'अपरिवर्तनीय तत्त्व' है जो काल और परिस्थिति के साथ नहीं बदलता।
• अव्ययम्: अविनाशी। जिसका कभी क्षय नहीं होता, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से परे है।
• भर्गाख्यम्: भर्ग नाम वाला। 'भर्ग' का शाब्दिक अर्थ है—जो पापों और अविद्याओं को भस्म कर दे। यह गायत्री मन्त्र का मुख्य पद है।
• विष्णुसंज्ञम्: विष्णु संज्ञा वाला। जैसा कि पिछले श्लोक में स्पष्ट हुआ, जो सर्वव्यापी (विष्णु) है।
• अमृतमश्नुते: अमृत का अनुभव करता है। यहाँ अमृत का अर्थ केवल मृत्युहीनता नहीं, अपितु उस आनंद की प्राप्ति है जहाँ दुःख और द्वैत का अभाव हो।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम सत्ता के चार प्रमुख नामों—पुरुष, सत्यधर्मा, भर्ग और विष्णु—का उल्लेख कर रहे हैं। साधक के लिए यह समझना अनिवार्य है कि ये अलग-अलग देवता नहीं, अपितु एक ही अविनाशी ईश्वर के विभिन्न आयाम हैं।
ऋषि कहते हैं कि वह ईश्वर 'पुरुष' है। जब साधक अपनी देह को एक नगर (पुर) के रूप में देखता है, तब उसे अनुभव होता है कि इस देह-नगर के भीतर एक ऐसा साक्षी है जो न तो शरीर है, न मन, न प्राण; वह केवल शुद्ध चैतन्य है। यही वह 'पुरुष' है। वह 'सत्यधर्मा' है, क्योंकि संपूर्ण जगत परिवर्तनशील है, केवल वही एक तत्त्व है जो आदि, मध्य और अंत में एक समान रहता है। उसकी यही स्थिरता उसे 'अव्यय' बनाती है।
आगे महर्षि उसे 'भर्ग' और 'विष्णु' कहते हैं। 'विष्णु' उसका सर्वव्यापी स्वरूप है जो हृदय-आकाश से लेकर ब्रह्माण्ड के अंतिम छोर तक व्याप्त है। वहीं 'भर्ग' उसका वह प्रखर तेज है जो साधक के भीतर के अंधकार, मोह और अविद्या को जलाकर भस्म कर देता है। यह 'भर्ग' शब्द सीधे तौर पर गायत्री मन्त्र की उस ज्योति की ओर संकेत करता है, जिसे जानकर साधक का मानसिक जागरण होता है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि इस सत्ता को 'जानने' (ज्ञात्वा) से ही अमृत की प्राप्ति होती है। यहाँ 'जानना' केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं है, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान है। जब साधक यह जान लेता है कि उसके हृदय में स्थित विष्णु ही वह भर्ग-तेज है और वही अविनाशी पुरुष है, तब वह देह-बुद्धि से मुक्त होकर अमृतत्व को प्राप्त करता है। यह ज्ञान ही उसे बंधन से मोक्ष की ओर ले जाता है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'नाम-रूप' से 'तत्त्व' की ओर ले जाने का अभ्यास कराता है। साधक जब गायत्री मन्त्र का जप करता है, तो वह 'भर्ग' पद का उच्चारण करता है। इस श्लोक के माध्यम से महर्षि याज्ञवल्क्य उसे निर्देश दे रहे हैं कि जप के समय 'भर्ग' को केवल एक शब्द न मानें, बल्कि उसे अपने हृदय में स्थित उसी 'विष्णु' और 'अविनाशी पुरुष' के रूप में अनुभव करें।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह अपने भीतर के उस साक्षी (पुरुष) को खोजे, जो सत्य स्वरूप है। जब वह अनुभव करता है कि "मैं यह नाशवान शरीर नहीं, बल्कि वह अव्यय पुरुष हूँ", तब उसकी चेतना स्थूल भूमि से सूक्ष्म भूमि की ओर बढ़ती है। भर्ग का ध्यान साधक के भीतर एक आंतरिक अग्नि प्रज्वलित करता है, जो उसके संशयों को भस्म करती है। इस प्रकार, विष्णु (सर्वव्यापकता) और भर्ग (शुद्धिकरण) का एक साथ अनुभव करना ही वह योग है, जो साधक को अमृत पद तक पहुँचाता है।
हृद्व्योम्नि तपते ह्येष बाह्ये सूर्यस्य चान्तरे ।
अग्नौ ह्यधूमके ह्येष ज्योतिश्चित्रतरङ्गवत् ॥ ९.२४ ॥
यही हृदय-व्योममें तपता है, बाहर सूर्यके भीतर, और धुएँरहित अग्निमें; यह चित्र-विचित्र तरंगोंवाली ज्योति है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस परम सत्ता को 'भर्ग' और 'विष्णु' कहकर उसके विनाशक और सर्वव्यापी स्वरूप का बोध कराया था। अब इस श्लोक में वे उस ज्योतिर्मय सत्ता के तीन मुख्य अधिष्ठानों का वर्णन कर रहे हैं, ताकि साधक स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए उस एक ही ज्योति को भिन्न-भिन्न रूपों में पहचान सके।
अन्वय और पदार्थ —
(सः एव) हृद्व्योम्नि तपते हि एष, (सः एव) बाह्ये सूर्यस्य च अन्तरे (तपते), (सः एव) अग्नौ हि अधूमके हि एष (तपते); (सः) ज्योतिः चित्रतरङ्गवत् (अस्ति) ॥
पदार्थ:
• हृद्व्योम्नि: हृदय रूपी आकाश में। यहाँ 'व्योम' शब्द चेतना के उस विस्तार को दर्शाता है जहाँ आत्मा का निवास है।
• तपते: तपता है या प्रकाशित होता है। 'तप्स' धातु का अर्थ केवल उष्णता नहीं, अपितु वह तेज है जो अविद्या को जलाकर प्रकाश फैलाता है।
• बाह्ये सूर्यस्य चान्तरे: बाहर सूर्य के भीतर। यह संकेत है कि जो भीतर प्रकाश है, वही बाहर सूर्य के रूप में दृश्य है।
• अधूमके: धुएँरहित। वह अग्नि जिसमें भौतिक ईंधन नहीं, अपितु प्राण-शक्ति का ईंधन है, इसलिए वह धुएँरहित (शुद्ध) है।
• चित्रतरङ्गवत्: चित्र-विचित्र तरंगों की भाँति। वह ज्योति स्थिर और जड़ नहीं है, अपितु चैतन्य की लहरों के समान स्पंदित और अनंत रंगों/रूपों वाली है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक महान रहस्य खोल रहे हैं कि जिसे हम अलग-अलग स्थानों पर 'प्रकाश' के रूप में देखते हैं, वह वास्तव में एक ही ज्योति का विवर्त है। वे तीन स्थानों का उल्लेख करते हैं: हृदय-व्योम, सूर्य और अधूम-अग्नि।
प्रथम, 'हृद्व्योम' में वह ज्योति तपती है। यह वह आन्तरिक प्रकाश है जिसे केवल ध्यानस्थ योगी अनुभव करता है। यह प्रकाश शरीर के भौतिक अंगों का नहीं, अपितु हृदय-आकाश (चेतना के केंद्र) का है।
द्वितीय, वही ज्योति 'बाह्य सूर्य' के भीतर है। सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, अपितु उस परम पुरुष का बाह्य स्वरूप है। जो प्रकाश हृदय में 'साक्षी' रूप में है, वही बाहर 'प्रकाशक' रूप में सूर्य बनकर जगत् को आलोकित कर रहा है।
तृतीय, वह 'अधूम अग्नि' में स्थित है। साधारण अग्नि में ईंधन के कारण धुआँ होता है, किन्तु यहाँ 'अधूम' शब्द उस शुद्ध अग्नि का प्रतीक है जो ज्ञान की अग्नि है या वह प्राणाग्नि है जो शरीर के भीतर निरंतर प्रज्वलित रहती है।
यह ज्योति 'चित्रतरङ्गवत्' है। इसका भाव यह है कि परमात्मा का प्रकाश एकरस होने के साथ-साथ अनंत विविधता वाला है। जैसे एक ही श्वेत प्रकाश प्रिज्म से गुजरकर सात रंगों में विभाजित हो जाता है, वैसे ही वह एक ज्योति ही विभिन्न प्रकृतियों और जीवों में अलग-अलग तरंगों (गुणों) के रूप में प्रकट होती है। साधक जब इस एकत्व को जान लेता है, तब उसके लिए भीतर का प्रकाश और बाहर का सूर्य एक ही हो जाते हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस रहस्य की पुष्टि छान्दोग्य उपनिषद् में मिलती है:
अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिः ॥ ३.१३.७ ॥
और जो इस द्युलोकसे परे, विश्वकी पीठपर, सबकी पीठपर, जिनसे ऊँचा कोई नहीं उन उत्तम लोकोंमें ज्योति चमकती है — वह यही है जो इस पुरुषके भीतर ज्योति है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि द्युलोक (स्वर्ग) से परे जो ज्योति सर्वत्र दीप्त है, वही वास्तव में इस पुरुष (जीव/आत्मा) के भीतर की ज्योति है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति का विस्तार कर रही है। जहाँ उपनिषद् केवल 'भीतर और बाहर' के साम्य की बात करता है, वहीं यह स्मृति 'अधूम अग्नि' को जोड़कर साधक के लिए कर्म और उपासना का मार्ग प्रशस्त करती है। यह दर्शाता है कि ज्ञान (हृदय), प्रकाश (सूर्य) और तप (अग्नि) तीनों एक ही तत्त्व के आयाम हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'त्रयि-एकत्व' के अभ्यास का सूत्र है। जब साधक अग्निहोत्र या संध्यावंदन करता है, तब उसे केवल बाहरी क्रिया नहीं करनी चाहिए, अपितु इस रहस्य का स्मरण करना चाहिए कि:
१. मेरे हृदय-आकाश में जो प्रकाश है,
२. वह बाहर सूर्य के रूप में प्रकाशित है,
३. और वह इसी समय मेरी होम-कुण्ड की शुद्ध अग्नि में प्रज्वलित है।
अभ्यास यह है कि साधक अपनी दृष्टि को हृदय से सूर्य की ओर और सूर्य से अग्नि की ओर ले जाए, और अंततः यह अनुभव करे कि ये तीनों एक ही 'चित्र-तरंग' वाली ज्योति के प्रतिबिंब हैं। जब साधक हृदय-ज्योति और सूर्य-ज्योति का एकरूपता से अनुभव करता है, तब वह स्थूल देह की सीमाओं को लाँघकर 'परम व्योम' की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ उसे यह बोध होता है कि उसकी अपनी चेतना ही संपूर्ण ब्रह्माण्ड का आलोक है।
हृद्याकाशे तु यो जीवः साधकैरुपगीयते ।
स एवाऽऽदित्यरूपेण बहिस्तम(नभ)सि राजते ॥ ९.२५ ॥
हृदयाकाशमें जिस जीवका साधक गान करते हैं, वही आदित्यरूपसे बाहर आकाशमें प्रकाशित होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस एक ही ज्योति के तीन अधिष्ठानों—हृदय-व्योम, बाहरी सूर्य और अधूम-अग्नि—का वर्णन कर यह सिद्ध किया कि प्रकाश का स्रोत एक ही है। अब इस श्लोक में वे उस ज्योति के 'जीव' और 'आदित्य' रूप के अभेद को स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक अपनी व्यक्तिगत चेतना को ब्रह्माण्डीय चेतना से जोड़ सके।
अन्वय और पदार्थ —
हृद्याकाशे तु यः जीवः (अस्ति), (तम्) साधकैः उपगीयते; स एव आदित्यरूपेण बहिः नभसि राजते ॥
पदार्थ:
• हृद्याकाशे: हृदय रूपी आकाश में। यहाँ 'आकाश' का अर्थ भौतिक रिक्तता नहीं, अपितु वह चेतना-क्षेत्र है जहाँ आत्मा का प्रतिबिम्ब और वास होता है।
• जीवः: वह चेतन तत्त्व जिसे साधारणतः 'मैं' या व्यक्ति कहा जाता है, किन्तु यहाँ यह उस शुद्ध चैतन्य के लिए प्रयुक्त है जो शरीर के भीतर स्थित है।
• उपगीयते: गान किया जाता है या स्तुति की जाती है। योगिक साधना में 'उपगाना' का अर्थ केवल गीत गाना नहीं, अपितु ध्यान और मंत्र के माध्यम से उस तत्त्व में लीन होना या उसे अनुभव करना है।
• आदित्यरूपेण: सूर्य के रूप में। आदित्य वह है जो 'अदिति' (असीम) से उत्पन्न हुआ है; अर्थात् वह प्रकाश जो असीम चेतना का साकार रूप है।
• बहिः नभसि: बाहर आकाश में।
• राजते: प्रकाशित होता है या चमकता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधक को उस महान सत्य से परिचित करा रहे हैं जिसे 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति का आधार माना जाता है। वे कहते हैं कि हृदय के आकाश में जो 'जीव' रूपी चेतना स्थित है, जिसे साधक अपनी साधना, जप और ध्यान के माध्यम से अनुभव करते हैं और जिसकी स्तुति करते हैं, वह कोई पृथक सत्ता नहीं है। वही आन्तरिक जीव, बाह्य जगत में 'आदित्य' (सूर्य) के रूप में प्रकाशित हो रहा है।
यहाँ 'उपगीयते' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। साधक जब हृदय-कमल में स्थित उस ज्योति का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में अपने ही वास्तविक स्वरूप का गान कर रहा होता है। यह स्मृति यह रहस्य खोल रही है कि जो प्रकाश बाहर सूर्य के रूप में हमें आलोकित कर रहा है, उसका मूल स्रोत हमारे अपने हृदय के भीतर है। बाहर दिखने वाला सूर्य वास्तव में आन्तरिक सूर्य का ही स्थूल विवर्त (प्रतिबिम्ब) है।
अतः, जीव और आदित्य दो भिन्न सत्ताएँ नहीं हैं, अपितु एक ही ज्योति के दो आयाम हैं—एक सूक्ष्म और आन्तरिक (जीव), दूसरा स्थूल और बाह्य (आदित्य)। जब साधक इस अभेद को जान लेता है, तब उसकी दृष्टि संपूर्ण ब्रह्माण्ड में उसी एक प्रकाश को देखने लगती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस अभेद की पुष्टि उपनिषदों में भी मिलती है:
स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एकः ॥ २.८.५ ॥
जो यह (आनन्द-रूप ब्रह्म) पुरुषमें है, और जो वह आदित्यमें है — वह एक ही है।
यह अंश स्पष्ट करता है कि जो आनंद-रूप ब्रह्म पुरुष (जीव) में है और जो आदित्य में है, वह वास्तव में एक ही है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और तैत्तिरीय उपनिषद् दोनों एक ही सत्य की उद्घोषणा कर रहे हैं कि आन्तरिक पुरुष और बाह्य आदित्य में कोई भेद नहीं है। जहाँ स्मृति इसे 'जीव' और 'आदित्य' के रूप में साधक के अनुभव से जोड़ती है, वहीं उपनिषद् इसे 'आनंद-ब्रह्म' के एकत्व के रूप में स्थापित करता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'सूर्य-दर्शन' और 'आत्म-दर्शन' के बीच के सेतु का निर्माण करता है। योगिक अभ्यास में जब साधक सूर्योपस्थान या सूर्य-ध्यान करता है, तो उसका उद्देश्य केवल बाहरी सूर्य को अर्घ्य देना नहीं, अपितु बाहरी सूर्य के प्रकाश के माध्यम से अपने भीतर के 'आदित्य' को जाग्रत करना होता है।
अभ्यास यह है कि साधक जब बाहर सूर्य को देखे, तो यह भाव रखे कि "यह प्रकाश मेरे ही हृदय का विस्तार है।" और जब वह नेत्र बंद कर हृदय-आकाश में ध्यान करे, तो यह अनुभव करे कि "यह आन्तरिक ज्योति ही संपूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करने वाला सूर्य है।" इस अभ्यास से साधक 'व्यष्टि' (व्यक्तिगत जीव) से 'समष्टि' (ब्रह्माण्डीय आदित्य) की ओर बढ़ता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक को यह बोध होता है कि उसकी अपनी चेतना ही वह प्रकाश है जो समस्त सृष्टि का आधार है। इस अनुभूति से साधक के भीतर का अंधकार मिटता है और वह उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ भीतर और बाहर का भेद समाप्त हो जाता है।
तस्य चान्तर्गतं धाम सूक्ष्मं प्राकाश्यमेव च ।
स चात्मा सर्वभूतानां चेतोमात्रस्वरूपकः ॥ ९.२६ ॥
उसके भीतर सूक्ष्म, प्रकाशमय धाम है; और वह सब भूतोंका आत्मा है, चेतनामात्र स्वरूपवाला।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-व्योम की जीव-चेतना और बाहरी आकाश के आदित्य-रूप के अभेद को स्थापित किया। अब इस श्लोक में वे उस चेतना के सूक्ष्म निवास-स्थान (धाम) और उसके वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जिससे साधक को यह बोध हो कि जिसे वह सूक्ष्म मान रहा है, वही वास्तव में सर्वव्यापी चेतना है।
अन्वय और पदार्थ —
तस्य च अन्तर्गतं धाम सूक्ष्मं प्राकाश्यमेव च (अस्ति) । स च आत्मा सर्वभूतानां चेतोमात्रस्वरूपकः (अस्ति) ॥
पदार्थ:
• तस्य: उसके (उस आदित्य या जीव-रूप चेतना के) भीतर।
• अन्तर्गतं धाम: भीतर स्थित निवास-स्थान। यहाँ 'धाम' केवल स्थान नहीं, अपितु वह प्रकाश-पुंज है जहाँ चेतना प्रतिष्ठित रहती है।
• सूक्ष्मं: अति सूक्ष्म, जो स्थूल इंद्रियों और भौतिक दृष्टि से अगोचर है।
• प्राकाश्यमेव: जो स्वयं प्रकाशमय है। वह प्रकाश किसी बाहरी स्रोत से नहीं आता, अपितु वह स्वयं 'स्वयंप्रकाश' है।
• सर्वभूतानां आत्मा: समस्त चराचर जगत के प्राणियों का एक ही साझा आधार, वह मूल आत्मा।
• चेतोमात्रस्वरूपकः: केवल चेतना के स्वरूप वाला। 'मात्र' शब्द यहाँ निषेध करता है कि वह शरीर, मन या प्राण नहीं, अपितु केवल शुद्ध चैतन्य है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य उस सूक्ष्म सत्य को खोल रहे हैं जो श्रुति के बीजरूप रहस्यों का विस्तार है। वे कहते हैं कि उस हृदय-स्थित जीव या बाहरी आदित्य के भीतर एक 'सूक्ष्म धाम' है। यह धाम भौतिक हृदय के भीतर कोई भौतिक कोना नहीं है, अपितु चेतना का वह केंद्र है जहाँ वह अपनी पूर्ण प्रखरता में स्थित है। यह धाम 'सूक्ष्म' है क्योंकि यह पदार्थ की सीमाओं से परे है, और 'प्राकाश्य' है क्योंकि आत्मा का स्वभाव ही प्रकाश है।
ऋषि यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य उद्घाटित करते हैं कि यह आत्मा 'चेतोमात्रस्वरूप' है। साधारणतः जीव स्वयं को शरीर (स्थूल), प्राण (सूक्ष्म) या मन (कारण) समझता है, किन्तु याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि इन सबके साक्षी के रूप में जो केवल 'चेतना' है, वही वास्तविक आत्मा है। यही वह एक आत्मा है जो 'सर्वभूतानां' अर्थात् सभी प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है। जब साधक इस चेतोमात्र स्वरूप का अनुभव करता है, तब वह व्यक्तिगत 'मैं' से ऊपर उठकर सार्वभौमिक 'अहम्' में स्थित हो जाता है।
श्रुति-संगति —
इस सूक्ष्म धाम और प्रकाशमय पुरुष का रहस्य शतपथ ब्राह्मण की शाण्डिल्य-विद्या में स्पष्ट मिलता है:
स आत्मानमुपासीत मनोमयं प्राणशरीरं भारूपमाकाशात्मानं कामरूपिणम् मनोजवसं सत्यसंकल्पं सत्यधृतिं सर्वगन्धं सर्वरसं सर्वा अनु दिशः प्रभूतं सर्वमिदमभ्याप्तमवाक्कमनादरं यथा व्रीहिर्वा यवो वा श्यामाको वा श्यामाकतण्डुलो वैवमयमन्तरात्मन्पुरुषो हिरण्मयो यथा ज्योतिरधूममेवं ज्यायान्दिवो ज्यायानाकाशाज्ज्यायानस्यै पृथिव्यै ज्यायान्त्सर्वेभ्यो भूतेभ्यः स प्राणस्यात्मैष म आत्मैतमित आत्मानं प्रेत्याभिसम्भविष्यामीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्सास्तीति ह स्माह शाण्डिल्य एवमेतदिति ॥ १०.६.३.२ ॥
वह आत्माकी उपासना करे — जो मनोमय है, प्राण जिसका शरीर है, प्रकाश जिसका रूप है, आकाश जिसका स्वरूप है; जो इच्छानुसार रूप धरता है, मनके समान वेगवाला, सत्य-संकल्प, सत्य-धृतिवाला; सब गन्ध, सब रस (जिसके हैं); जो सब दिशाओंमें फैला, इस सबको व्याप्त किये है; वाणीरहित, किसीकी अपेक्षा न रखनेवाला। जैसे धानका दाना, जौ, साँवा या साँवेका चावल हो, वैसा यह अन्तरात्मामें सुवर्णमय पुरुष है — धुएँरहित ज्योतिकी भाँति; (और वही) द्युलोकसे बड़ा, आकाशसे बड़ा, इस पृथिवीसे बड़ा, सब भूतोंसे बड़ा है। वही प्राणका आत्मा है, वही मेरा आत्मा है; यहाँसे जाकर मैं इसी आत्माको प्राप्त होऊँगा — जिसको (ऐसी) निश्चित (श्रद्धा) हो, उसे कोई संशय नहीं रहता — ऐसा शाण्डिल्यने कहा; यह ऐसा ही है।
इस श्रुति-अंश की संगति इस स्मृति-श्लोक से पूर्णतः मेल खाती है। श्रुति कहती है कि अंतरात्मा में वह पुरुष 'व्रीहि' (धान) या 'यव' (जौ) के दाने के समान सूक्ष्म है, किन्तु साथ ही वह 'द्युलोक से बड़ा' और 'आकाश से बड़ा' है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'सूक्ष्मं' शब्द उस दाने जैसी लघुता को दर्शाता है, और 'सर्वभूतानां आत्मा' तथा 'प्राकाश्य' शब्द उस विराटता और हिरण्मय प्रकाश को, जो समस्त ब्रह्मांड को व्याप्त किए हुए है। यह विरोधाभास ही योग का रहस्य है—जो सबसे छोटा (सूक्ष्म) है, वही सबसे बड़ा (विराट) है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'सूक्ष्म-विराट' के समन्वय का अभ्यास है। योगिक दृष्टि से यहाँ साधक को 'लघुता' और 'विराटता' के बीच सेतु बनाना है।
अभ्यास यह है कि साधक अपने हृदय के भीतर उस सूक्ष्म बिंदु (धाम) का ध्यान करे, जो एक बीज के समान छोटा प्रतीत होता है, किन्तु भीतर से अनंत प्रकाश से ओत-प्रोत है। जब साधक इस सूक्ष्म धाम में स्थित 'चेतोमात्र' स्वरूप का अनुभव करता है, तब वह इस सत्य को जीता है कि उसका अपना अस्तित्व केवल यह हाड़-मांस का शरीर नहीं, बल्कि वह शुद्ध चेतना है जो समस्त प्राणियों में समान है।
यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' से 'चित्त' की भूमि पर ले जाता है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि जिस प्रकाश को वह बाहर सूर्य में देखता है, वही प्रकाश उसके हृदय के सूक्ष्म धाम में स्थित है। इस अनुभव से साधक की दृष्टि द्वैत से अद्वैत की ओर मुड़ती है, जहाँ वह स्वयं को केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु सर्वभूतात्मा के रूप में देखता है।
एकधा यो विजानाति ज्ञात्वा चैनमुपासते ।
स परं विद्यते व्योम ब्रह्माणं समुपाश्नुते (?) ॥ ९.२७ ॥
जो (उसे) एक रूपसे जानता है और जानकर उसकी उपासना करता है, वह परम व्योमको पाता है और ब्रह्मको प्राप्त होता है (?)।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-स्थित जीव और बाहरी आदित्य के अभेद को बताते हुए उस चेतना के सूक्ष्म, प्रकाशमय धाम और उसके 'चेतोमात्र' स्वरूप का उद्घाटन किया। अब इस श्लोक में वे उस ज्ञान को साधना में बदलने की विधि बता रहे हैं कि उस एकत्व के बोध के पश्चात उपासना का स्वरूप क्या होना चाहिए।
अन्वय और पदार्थ —
एकधा यः (स) विजानाति, ज्ञात्वा च एनम् (तम्) उपासते (उपासते), स परं विद्यते व्योम (प्राप्नोति), ब्रह्माणं समुपाश्नुते (?) ॥
पदार्थ:
• एकधा: एक रूप से; अभेद भाव से। यहाँ 'एकधा' का अर्थ है कि हृदय का जीव, बाहरी सूर्य का पुरुष और परम ब्रह्म—इन तीनों को भिन्न-भिन्न न मानकर एक ही तत्त्व के विभिन्न आयाम मानना।
• विजानाति: जानता है। यह केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, अपितु 'वि' उपसर्ग के साथ 'ज्ञान' है, जिसका अर्थ है—विवेकपूर्ण साक्षात्कार।
• ज्ञात्वा च एनम् उपासते: जानकर उसकी उपासना करते हैं। पहले ज्ञान (बोध) और फिर उपासना (निरन्तर ध्यान)।
• परं व्योम: परम आकाश; वह अनंत चेतना जिसका वर्णन पिछले श्लोकों (९.१५-९.२०) में किया गया है।
• ब्रह्माणं समुपाश्नुते: ब्रह्म को प्राप्त होता है। (यहाँ 'समुपाश्नुते' शब्द का पाठ संदिग्ध है, सम्भवतः इसका अर्थ 'पूर्ण रूप से प्राप्त करना' या 'साक्षात्कार करना' है)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य उस सेतु का निर्माण कर रहे हैं जो 'ज्ञान' को 'सिद्धि' से जोड़ता है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि केवल यह जान लेना कि "हृदय का जीव ही आदित्य है" पर्याप्त नहीं है, अपितु उस ज्ञान को 'एकधा' (एकरूप) भाव में लाना अनिवार्य है।
यहाँ 'एकधा विजानाति' का गहरा रहस्य यह है कि साधक जब तक हृदय के भीतर के प्रकाश और बाहरी सूर्य के प्रकाश में भेद देखता है, तब तक वह द्वैत में है। जब वह यह जान लेता है कि जो ज्योति बाहर सूर्य-मण्डल में तप रही है, वही ज्योति हृदय-व्योम में तप रही है, तब वह 'एकधा' ज्ञान की स्थिति में आता है।
परन्तु, याज्ञवल्क्य केवल ज्ञान पर नहीं रुकते। वे कहते हैं—'ज्ञात्वा चैनमुपासते'। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत है। ज्ञान एक क्षणिक बोध हो सकता है, किन्तु 'उपासना' उस बोध को संस्कार में बदलने की प्रक्रिया है। उपासना का अर्थ है—उस एकरूप तत्त्व के साथ निरंतर जुड़ा रहना। जब ज्ञान और उपासना का मिलन होता है, तब साधक 'परं व्योम' (परम आकाश) में स्थित हो जाता है। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति की सीमित चेतना का विस्तार होकर वह अनंत ब्रह्मांडीय चेतना (ब्रह्माणं) में विलीन हो जाता है।
दूसरी पंक्ति का पाठ ('ब्रह्माणं समुपाश्नुते') यद्यपि संदिग्ध प्रतीत होता है, किन्तु भाव यह है कि जो एकत्व को जान लेता है, वह उस परम तत्व को पूर्णतः प्राप्त कर लेता है।
श्रुति-संगति —
इस 'एकधा' दर्शन और मन के माध्यम से प्राप्त होने वाले अभेद का प्रमाण श्रुति में मिलता है:
प्राणस्य प्राणम् उत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुः ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यं मनसैवाप्तव्यं नेह नानास्ति किं चन ॥ १४.७.२.२१ ॥
जो प्राणके प्राण, चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र, अन्नके अन्न और मनके मनको जानते हैं, उन्होंने पुरातन, अग्रणी ब्रह्मको निश्चित रूपसे जान लिया। (वह) मनसे ही प्राप्त करने योग्य है; यहाँ नाना (भेद) कुछ भी नहीं है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट कहती है कि जो प्राण के प्राण और मन के मन को जानते हैं, वे उस पुरातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं, क्योंकि "नेह नानास्ति किं चन" अर्थात् वहाँ कोई नानात्व (भेद) नहीं है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति-रहस्य का विस्तार है। जब साधक हृदय और सूर्य के पुरुष को 'एक' देखता है, तब वह वास्तव में उस 'नानात्व' का अंत कर रहा होता है, जिसके बाद ही ब्रह्म की प्राप्ति संभव है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ज्ञान' और 'साधना' के क्रम को निर्धारित करता है। साधक के लिए यहाँ दो सोपान हैं:
१. एकत्व का ज्ञान: सबसे पहले यह अनुभव करना कि मेरा अंतःकरण और यह ब्रह्मांड एक ही ज्योति के प्रतिबिंब हैं। यह 'विवेक' की भूमि है।
२. एकरूप उपासना: ज्ञान होने के बाद उस एक ज्योति में मन को स्थिर करना। यह 'सामाधि' की ओर ले जाने वाला अभ्यास है।
यह क्रम पूर्व में श्लोक ९.१५५ में भी संकेतित था। साधक जब 'एकधा' जानता है, तो वह अपनी चेतना को शरीर की सीमाओं से निकालकर 'परम व्योम' (अनंत आकाश) में स्थापित करता है। अभ्यास यह है कि बाहरी सूर्य को देखते समय हृदय के सूर्य का स्मरण हो, और हृदय के सूर्य में लीन होते समय संपूर्ण ब्रह्मांड की व्यापकता का अनुभव हो। जब यह द्वैत मिट जाता है, तब साधक 'चेतोमात्र' स्वरूप से 'ब्रह्म' स्वरूप की ओर अग्रसर होता है।
ज्ञानकर्मसमुच्चयेन परमपुरुषार्थसिद्धिः
ज्ञानकर्मसमायोगात् परमाप्नोति पूरुषम् ।
पृथग्भावे न सिध्येत उभे तस्मात् समाश्रयेत् ॥ ९.२८ ॥
ज्ञान और कर्म के समायोग से वह परम पुरुष को प्राप्त होता है; दोनों के पृथक् भाव से सिद्धि नहीं होती, इसलिए दोनों का ही आश्रय लेना चाहिए।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-स्थित जीव और बाहरी आदित्य के अभेद को बताते हुए यह स्पष्ट किया कि जो इस एकत्व को जानकर उपासना करता है, वह परम व्योम और ब्रह्म को प्राप्त होता है। अब इस श्लोक में वे उस प्राप्ति के व्यावहारिक साधन—'ज्ञान' और 'कर्म' के अनिवार्य समन्वय—का सूत्र दे रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
ज्ञानकर्मसमायोगात् (सः) परमं पुरुषम् आप्नोति । पृथग्भावे (तयोः) न सिध्येत, तस्मात् उभे (तौ) समाश्रयेत् ॥
पदार्थ:
• ज्ञानकर्मसमायोगात्: ज्ञान और कर्म के सम्मिलित योग से। यहाँ 'ज्ञान' का अर्थ है—विवेक, श्रुति-बोध और आत्म-साक्षात्कार; 'कर्म' का अर्थ है—साधना, उपासना, वैदिक विधि और योगिक अभ्यास। 'समायोग' का अर्थ है—दोनों का ऐसा मिलन जहाँ एक दूसरे का पूरक हो।
• परमाप्नोति पूरुषम्: उस परम पुरुष को प्राप्त होता है। यहाँ 'परम पुरुष' वह शुद्ध चेतना है जिसे पिछले श्लोकों में 'भर्ग' और 'विष्णु' कहा गया।
• पृथग्भावे: पृथक होने की अवस्था में; जब ज्ञान और कर्म अलग-अलग कर दिए जाएँ।
• न सिध्येत: सिद्धि नहीं होती। यहाँ सिद्धि का अर्थ केवल चमत्कार नहीं, अपितु उस परम पुरुष का साक्षात्कार है।
• समाश्रयेत्: आश्रय लेना चाहिए। यह विधिलिङ् लकार है, जो साधक के लिए एक अनिवार्य निर्देश है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित कर रहे हैं कि मोक्ष या परम पुरुष की प्राप्ति के लिए ज्ञान और कर्म का परस्पर विरोध नहीं, बल्कि उनका 'समायोग' आवश्यक है।
अक्सर यह भ्रम होता है कि या तो केवल ज्ञान (विवेक) से मुक्ति संभव है या केवल कर्म (साधना) से। किंतु याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ज्ञान वह प्रकाश है जो मार्ग दिखाता है, और कर्म वह कदम है जो उस मार्ग पर आगे बढ़ाता है। बिना ज्ञान के कर्म 'अंधा' है (अविधिपूर्वक), और बिना कर्म के ज्ञान 'निष्प्राण' या केवल बौद्धिक विलास है।
'पृथग्भावे न सिध्येत' के माध्यम से ऋषि चेतावनी देते हैं कि यदि कोई केवल ज्ञान का दावा करे और साधना (कर्म) को त्याग दे, तो वह आलस्य में गिर जाता है। वहीं, यदि कोई केवल कर्मकांड में लीन रहे और उसके भीतर उस परम पुरुष का ज्ञान न हो, तो वह केवल पुण्य अर्जित कर सकता है, परम पुरुष को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए, 'उभे समाश्रयेत्'—अर्थात साधक को इन दोनों का एक साथ आश्रय लेना चाहिए। यह समन्वय ही वह 'योग' है जो स्थूल शरीर और मन को सूक्ष्म चेतना से जोड़ता है।
श्रुति-संगति —
इस समन्वय की अनिवार्यता को श्रुति भी पुष्ट करती है:
तदेष श्लोको भवति विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः परागताः न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विन इति न हैव तं लोकं दक्षिणाभिर्न तपसानेवंविदश्नुत एवंविदां हैव स लोकः ॥ १०.५.४.१६ ॥
इस विषयमें यह श्लोक है — "विद्यासे (मनुष्य) वहाँ चढ़ते हैं जहाँ कामनाएँ समाप्त हो गयी हैं; वहाँ न दक्षिणाएँ पहुँचती हैं, न विद्यारहित तपस्वी।" उस लोकको न दक्षिणाओंसे, न तपसे, (ऐसा) न जाननेवाला पाता है; वह लोक ऐसा जाननेवालोंका ही है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट कहती है कि "विद्या से (मनुष्य) वहाँ चढ़ते हैं जहाँ कामनाएँ समाप्त हो गयी हैं; वहाँ न दक्षिणाएँ पहुँचती हैं, न विद्यारहित तपस्वी।"
इस श्रुति-अंश का रहस्य यह है कि केवल 'दक्षिणा' (बाहरी कर्मकांड) से उस परम लोक की प्राप्ति नहीं होती, और केवल 'तप' (बिना विद्या के कठिन परिश्रम) से भी सिद्धि नहीं मिलती। 'विद्या' (ज्ञान) अनिवार्य है, क्योंकि वही वह सोपान है जिससे ऊपर चढ़ा जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति के आलोक में ज्ञान को प्रधानता देते हुए भी उसके साथ 'कर्म' (साधना/तप) को जोड़े रखती है, क्योंकि विद्या का आरोहण बिना तप और कर्म के संभव नहीं है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'संतुलन' का अभ्यास कराता है। साधक के जीवन में दो धाराएँ एक साथ बहनी चाहिए: एक 'स्वाध्याय-ध्यान' की (ज्ञान) और दूसरी 'नियम-संयम' की (कर्म)।
साधक जब दिनभर के अपने सांसारिक और आध्यात्मिक कर्मों को 'परम पुरुष' के अर्पण के रूप में करता है, तो वह कर्म बन जाता है। और जब वह एकांत में बैठकर उस पुरुष के स्वरूप का चिंतन करता है, तो वह ज्ञान बन जाता है। अभ्यास यह है कि कर्म करते समय ज्ञान का विस्मरण न हो, और ज्ञान के चिंतन में कर्मों के प्रति उदासीनता न आए।
जब ज्ञान और कर्म का समायोग होता है, तब साधक की 'भूमि' बदलती है। वह केवल एक 'कर्ता' (कर्मयोगी) या केवल एक 'द्रष्टा' (ज्ञानयोगी) न रहकर 'सिद्ध' की ओर बढ़ता है। यह समायोग ही वह अग्नि है जिसमें साधक के संस्कार जलते हैं और वह उस परम पुरुष के साथ एकरूप होने की स्थिति में पहुँचता है।
ज्ञानं प्रधानं न तु कर्महीनं
कर्म प्रधानं न तु बुद्धिहीनम् ॥
तस्माद्द्वयोरेव भवेत सिद्धिर्न ह्येकपक्षो विहगः प्रयाति ॥ ९.२९ ॥
ज्ञान प्रधान है, किन्तु कर्महीन नहीं; कर्म प्रधान है, किन्तु बुद्धिहीन नहीं। इसलिए दोनों का ही होना चाहिए, क्योंकि एक पक्ष से तो पक्षी उड़ नहीं सकता।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि ज्ञान और कर्म के पृथक् भाव से सिद्धि संभव नहीं है, अतः दोनों का आश्रय लेना अनिवार्य है। इसी सिद्धांत को और अधिक गहराई से समझाने के लिए, कि ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं अपितु पूरक हैं, वे इस श्लोक में एक अत्यंत सरल और सटीक दृष्टान्त प्रस्तुत कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
ज्ञानं प्रधानं (अस्ति), न तु कर्महीनं (प्रधानम्) । कर्म प्रधानं (अस्ति), न तु बुद्धिहीनम् (प्रधानम्) ॥ तस्माद् द्वयोरेव भवेत सिद्धिः, न हि एकपक्षो विहगः प्रयाति ॥
पदार्थ:
• ज्ञानं प्रधानं: ज्ञान (विवेक और आत्म-बोध) श्रेष्ठ और मुख्य है।
• न तु कर्महीनं: किन्तु वह ज्ञान तब तक पूर्ण या 'प्रधान' नहीं कहलाता जब तक वह कर्म (साधना और आचरण) से रहित हो।
• कर्म प्रधानं: कर्म (वैदिक विधि, उपासना और योगिक क्रिया) भी मुख्य है।
• न तु बुद्धिहीनम्: किन्तु वह कर्म तब तक प्रधान नहीं होता जब तक वह बुद्धि (विवेक और सही दिशा) से रहित हो।
• द्वयोरेव भवेत सिद्धिः: इन दोनों के सम्मिलित होने पर ही सिद्धि (परम पुरुष की प्राप्ति) होती है।
• न ह्येकपक्षो विहगः प्रयाति: क्योंकि एक ही पंख वाला पक्षी उड़ नहीं सकता। यहाँ 'प्रयाति' का अर्थ गमन करना या लक्ष्य तक पहुँचना है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ज्ञान और कर्म के मध्य जो संतुलन स्थापित कर रहे हैं, वह साधक के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। वे कहते हैं कि ज्ञान प्रधान है, क्योंकि बिना लक्ष्य के ज्ञान के, कर्म केवल यांत्रिक क्रिया बन जाता है। किन्तु, यदि ज्ञान केवल बौद्धिक विमर्श बनकर रह जाए और उसमें 'कर्म' (साधना का अनुशासन और आचरण) न हो, तो वह ज्ञान केवल शुष्क सूचना है, वह साधक को ऊपर नहीं उठा सकता।
ठीक इसी प्रकार, कर्म प्रधान है क्योंकि बिना अभ्यास और क्रिया के ज्ञान केवल कल्पना है। किन्तु यदि कर्म 'बुद्धिहीन' हो—अर्थात बिना विवेक के, बिना यह जाने कि यह क्रिया क्यों की जा रही है और इसका गंतव्य क्या है—तो वह कर्म केवल बंधन का कारण बनता है।
ऋषि यहाँ 'ज्ञान' और 'बुद्धि' शब्दों का प्रयोग सूक्ष्म अंतर के साथ कर रहे हैं। ज्ञान यहाँ उस बोध को कह रहा है जो लक्ष्य को निर्धारित करता है, और बुद्धि उस विवेक को कह रही है जो कर्म को सही दिशा में संचालित करता है। जब ज्ञान, कर्म के माध्यम से अभिव्यक्त होता है और कर्म, बुद्धि के प्रकाश में संपन्न होता है, तभी वह 'सिद्धि' की ओर ले जाता है।
इस सत्य को समझाने के लिए याज्ञवल्क्य जी ने 'विहग' (पक्षी) का सुंदर उदाहरण दिया है। जिस प्रकार पक्षी के दो पंख होते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक यात्रा के दो पंख हैं—एक ज्ञान और दूसरा कर्म। यदि एक पंख बहुत शक्तिशाली हो और दूसरा पूरी तरह अनुपस्थित या कमजोर हो, तो पक्षी केवल गोल-गोल घूम सकता है, वह आकाश की ऊंचाइयों (परम पुरुष) की ओर उड़ान नहीं भर सकता। अतः, ज्ञान और कर्म का समन्वय ही वह एकमात्र मार्ग है जो साधक को इस संसार के बंधन से मुक्त कर अमृत की ओर ले जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥
जो विद्या (उपासना-ज्ञान) और अविद्या (कर्म) — दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह अविद्या (कर्म) से मृत्युको पार करके विद्यासे अमृतको पाता है।
ईश उपनिषद् में भी यही समन्वय मिलता है जहाँ कहा गया है कि जो विद्या (ज्ञान) और अविद्या (कर्म) दोनों को साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करता है और विद्या से अमृत को प्राप्त करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी उपनिषद् वाक्य का व्यावहारिक विस्तार है। जहाँ उपनिषद् इसे 'विद्या-अविद्या' के रूप में प्रस्तुत करता है, वहाँ यह स्मृति इसे 'ज्ञान-कर्म' के समन्वय के रूप में समझाती है। दोनों का मत एक ही है—मृत्यु (सांसारिक बंधन) को पार करने के लिए कर्म की शक्ति चाहिए और अमृत (मोक्ष) को पाने के लिए ज्ञान का प्रकाश।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को अपनी वर्तमान स्थिति का आत्म-निरीक्षण करने का अवसर देता है। साधक को यह देखना चाहिए कि उसकी साधना में कौन सा 'पंख' कमजोर है।
कुछ साधक केवल शास्त्रों के अध्ययन और बौद्धिक विमर्श में लीन रहते हैं; उनके पास 'ज्ञान का पंख' तो है, किन्तु 'कर्म का पंख' (अनुशासन, प्राणायाम, तप और सेवा) अनुपस्थित है। ऐसे साधक केवल विचारों के जाल में उलझे रहते हैं, अनुभव की उड़ान नहीं भर पाते।
दूसरी ओर, कुछ साधक केवल क्रियाओं, मंत्रों और विधियों में डूबे रहते हैं, किन्तु उनके पास उस क्रिया के पीछे के रहस्य का ज्ञान नहीं होता। वे 'कर्म के पंख' से तो फड़फड़ाते हैं, किन्तु 'बुद्धि के पंख' के अभाव में दिशाहीन रहते हैं।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह अपने ज्ञान को कर्म में उतारे और अपने कर्म को ज्ञान से प्रकाशित करे। जब जप (कर्म) के साथ यह बोध (ज्ञान) जुड़ जाता है कि "मैं उस परम पुरुष का अंश हूँ", तब वह जप केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि वह उड़ान बन जाता है। इसी संतुलन को साधकर साधक एक भूमि से दूसरी भूमि की ओर अग्रसर होता है और अंततः उस परम व्योम में विलीन हो जाता है।
गवां सर्पिः शरीरस्थं न करोत्यङ्गपोषणम् ।
निःसृतं कर्मचरितं पुनस्तस्यैव भेषजम् ॥ ९.३० ॥
गायका घी (उसके) शरीरमें रहते हुए (उसके) अंगोंका पोषण नहीं करता; पर (दूधसे) निकालकर, कर्म(संस्कार) से बनाया हुआ (वही घी) उसीकी औषधि बन जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने पक्षी के दो पंखों के उदाहरण से यह सिद्ध किया कि ज्ञान और कर्म का समन्वय अनिवार्य है। अब वे इस सूक्ष्म सत्य को एक भौतिक दृष्टान्त के माध्यम से समझा रहे हैं कि केवल 'होने' और 'प्रकट होने' में क्या भेद है।
अन्वय और पदार्थ —
गवां सर्पिः शरीरस्थं न करोत्यङ्गपोषणम् । निःसृतं कर्मचरितं पुनस्तस्यैव भेषजम् ॥
पदार्थ:
• गवां सर्पिः: गाय का घी।
• शरीरस्थं: शरीर में स्थित (अर्थात् जब घी गाय के शरीर के भीतर ही हो)।
• न करोत्यङ्गपोषणम्: अंगों का पोषण नहीं करता।
• निःसृतं: निकाला हुआ (दूध से पृथक किया हुआ)।
• कर्मचरितं: कर्म-संस्कारित (मथने, तपाने और शोधन की प्रक्रिया से गुज़रा हुआ)।
• पुनस्तस्यैव: फिर उसी का (वही घी)।
• भेषजम्: औषधि (रोगनाशक और स्वास्थ्यवर्धक)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गंभीर रहस्य को सरल भौतिक उदाहरण से उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार गाय के शरीर में घी विद्यमान है, किन्तु जब तक वह घी शरीर के भीतर है, वह गाय के अपने अंगों का पोषण नहीं करता। वह केवल एक अवयव है, एक संभावना है। किन्तु जब वही घी दूध के रूप में 'निःसृत' (बाहर निकाला) होता है और फिर 'कर्मचरित' होता है—अर्थात् मथने, उबलने और तपाने जैसी कठिन प्रक्रियाओं (संस्कारों) से गुज़रता है—तब वह 'भेषज' यानी औषधि बन जाता है।
यहाँ 'कर्मचरित' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। घी का घी होना उसका स्वभाव है, किन्तु उसका औषधि बनना उसका 'संस्कार' है। बिना मथने और तपाने के, दूध में छिपा घी कभी औषधि नहीं बन सकता। इसी प्रकार, मनुष्य के भीतर ईश्वर, चैतन्य और परम पुरुष पहले से ही स्थित हैं, किन्तु वह स्थिति केवल 'शरीरस्थ' होने जैसी है। जब तक साधक अपनी चेतना को साधना के कर्मों से मथता नहीं, तब तक वह आंतरिक ईश्वर केवल एक सुप्त संभावना बना रहता है; वह साधक के दुखों का निवारण नहीं करता और न ही उसे मोक्ष की औषधि प्रदान करता है।
यह श्लोक इस बात का प्रमाण है कि केवल यह जान लेना कि "मैं ब्रह्म हूँ" या "ईश्वर मेरे भीतर है" पर्याप्त नहीं है। यह ज्ञान 'शरीरस्थ घी' की भाँति है। उस ज्ञान को 'भेषज' (अनुभव) बनाने के लिए साधना के कर्मों की अग्नि में तपना आवश्यक है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधना की अनिवार्यता' का बोध कराता है। योग का रहस्य यह है कि जो वस्तु हमारे भीतर है, वह अपने-आप फल नहीं देती; उसे प्रयत्नपूर्वक प्रकट करना होता है।
जिस प्रकार घी को निकालने के लिए दूध को मथना पड़ता है, उसी प्रकार हृदय में स्थित 'परम पुरुष' को अनुभव करने के लिए मन और प्राण को मथना पड़ता है। यहाँ 'मथना' ही योग-अभ्यास है। जब साधक जप, ध्यान और प्राणायाम के माध्यम से अपने चित्त को मथता है, तब उसके भीतर छिपा हुआ वह दिव्य तत्व (घी) ऊपर उठता है।
साधक को यह समझना चाहिए कि वह जिस शांति और आनंद की खोज बाहर कर रहा है, वह उसके भीतर ही 'शरीरस्थ' है, किन्तु वह अभी 'असंस्कारित' है। जब वह ज्ञान (बोध) और कर्म (साधना) का समुच्चय करता है, तब वह आंतरिक सत्ता 'भेषज' बन जाती है, जो उसके जन्म-मृत्यु के रोगों को जड़ से समाप्त कर देती है। यह श्लोक साधक को आलस्य और केवल बौद्धिक ज्ञान के मोह से निकालकर 'अभ्यास' की भूमि पर ले जाता है।
एवं सति शरीरस्थः सर्पिवत्(र्वत्) परमेश्वरः ।
विना चोपासनादेव न करोति हितं नृषु ॥ ९.३१ ॥
ऐसे ही घीकी भाँति शरीरमें स्थित परमेश्वर उपासनाके बिना मनुष्योंका हित नहीं करता।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गाय के घी के दृष्टान्त से यह स्पष्ट किया कि किसी वस्तु का केवल शरीर में स्थित होना पर्याप्त नहीं, अपितु संस्कार और कर्म द्वारा उसका प्रकटीकरण आवश्यक है। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए अब वे इस भौतिक सत्य को आध्यात्मिक धरातल पर प्रतिष्ठित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
एवं सति परमेश्वरः शरीरस्थः सर्पिवत् । विना च उपासनादेव न करोति हितं नृषु ॥
पदार्थ:
• एवं सति: ऐसा होने पर (अर्थात् जैसा घी के उदाहरण में कहा गया, वैसा ही यहाँ भी है)।
• शरीरस्थः: शरीर में स्थित।
• सर्पिवत्: घी की भाँति।
• परमेश्वरः: वह सर्वोच्च चैतन्य, जो हृदय-आकाश में स्थित है।
• विना च उपासनादेव: केवल उपासना के बिना ही।
• न करोति हितं: हित नहीं करता (अर्थात् उसका कल्याणकारी प्रभाव प्रकट नहीं होता)।
• नृषु: मनुष्यों में/के लिए।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस सूक्ष्म भेद को समझा रहे हैं जिसे अक्सर साधक अनदेखा कर देते हैं—'उपस्थिति' और 'उपयोगिता' का भेद। पिछले श्लोक (९.३०) में उन्होंने बताया कि घी गाय के शरीर में होते हुए भी अंगों का पोषण नहीं करता, जब तक वह मथकर बाहर न निकाला जाए। ठीक उसी प्रकार, परमेश्वर—जो कि शुद्ध चैतन्य, भर्ग और पुरुष है—वह प्रत्येक मनुष्य के शरीर में, उसके हृदय-व्योम में सदैव स्थित है। वह अनुपस्थित नहीं है, वह तो 'शरीरस्थ' है। किन्तु, केवल उसकी उपस्थिति मात्र से मनुष्य का आध्यात्मिक उत्थान या वास्तविक हित नहीं होता।
यहाँ 'हित' शब्द का अर्थ केवल भौतिक सुख नहीं, अपितु वह आत्म-साक्षात्कार और मुक्ति है, जो साधक का परम लक्ष्य है। याज्ञवल्क्य जी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ईश्वर की सत्ता सर्वव्यापी और अंतर्यामी है, किन्तु उस सत्ता का अनुभव करना और उसके कल्याणकारी प्रभाव को जीवन में उतारना 'उपासना' पर निर्भर करता है। जिस प्रकार दूध को मथने के 'कर्म' से घी औषधि बनता है, उसी प्रकार अंतःकरण को उपासना के द्वारा मथने से शरीरस्थ ईश्वर 'हितकारी' या 'प्रकट' होते हैं।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि ईश्वर उदासीन नहीं हैं और न ही वे असमर्थ हैं कि वे हित न कर सकें। रहस्य यह है कि ईश्वर 'स्वभाव' हैं और उपासना 'साधन' है। बिना साधन के स्वभाव का अनुभव नहीं होता। यदि कोई कहे कि "ईश्वर तो भीतर ही हैं, फिर उपासना की क्या आवश्यकता?", तो याज्ञवल्क्य जी का यह 'सर्पिवत्' (घी की भाँति) वाला दृष्टान्त उस तर्क का समाधान करता है। जैसे घी का होना सत्य है, किन्तु उसका औषधि बनना एक प्रक्रिया (संस्कार) है, वैसे ही ईश्वर का होना सत्य है, किन्तु उनका अनुभव होना एक साधना है। अतः ज्ञान (यह जानना कि ईश्वर भीतर हैं) और कर्म (उनकी उपासना करना) का समुच्चय ही सिद्धि का मार्ग है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अवस्था' और 'अभ्यास' के सम्बन्ध को खोलता है। साधक अक्सर इस भ्रम में रहता है कि केवल यह जान लेना कि "मैं ब्रह्म हूँ" या "ईश्वर मेरे भीतर है", पर्याप्त है। यह 'केवल ज्ञान' का आलस्य है, जिसकी चर्चा अगले श्लोकों में आएगी।
योगिक अभ्यास की दृष्टि से 'उपासना' यहाँ वह 'मन्थन' है, जो चित्त की वृत्तियों को शांत कर अंतर्यामी पुरुष को उद्घाटित करता है। जिस प्रकार घी निकालने के लिए दूध को उबाला जाता है और मथा जाता है, उसी प्रकार साधक को अपने भीतर तप (तपाने) और ध्यान (मथने) का अभ्यास करना पड़ता है। जब साधक निष्ठापूर्वक उपासना करता है, तब उसके भीतर स्थित वह 'परमेश्वर' केवल एक सैद्धांतिक सत्य न रहकर एक जीवंत अनुभव बन जाता है।
यह श्लोक साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह समझता है कि 'होना' और 'अनुभव करना' दो अलग बातें हैं। शरीरस्थ ईश्वर की उपस्थिति 'बीज' के समान है, और उपासना वह 'जल और खाद' है जिससे वह बीज अंकुरित होकर कल्याण रूपी वृक्ष बनता है। अतः साधक को केवल ज्ञान के अहंकार में नहीं, बल्कि निरंतर उपासना के अभ्यास में लीन रहना चाहिए, ताकि भीतर स्थित वह चैतन्य उसके जीवन का वास्तविक हित (मुक्ति) कर सके।
योगाग्निमाहात्म्यम्
कर्माणि ह्यविनाशीनि बीजवत् प्रभवन्ति च ।
तानि योगाग्निदग्धानि न प्ररोहन्ति वै पुनः ॥ ९.३२ ॥
कर्म अविनाशी होते हैं और बीजकी भाँति (फिर) उगते हैं; (पर) योगाग्निसे जले हुए वे फिर अंकुरित नहीं होते।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि जिस प्रकार घी का शरीर में होना पर्याप्त नहीं, अपितु उसका संस्कार द्वारा प्रकटीकरण आवश्यक है, वैसे ही शरीरस्थ परमेश्वर का हित केवल उपासना से ही संभव है। अब वे उपासना के उस प्रगाढ़ रूप 'योग' की शक्ति का वर्णन कर रहे हैं, जो मनुष्य को कर्मों के अंतहीन चक्र से मुक्त करने में समर्थ है।
अन्वय और पदार्थ —
कर्माणि ह्यविनाशीनि बीजवत् प्रभवन्ति च ।
तानि योगाग्निदग्धानि न प्ररोहन्ति वै पुनः ॥
पदार्थ:
• कर्माणि: क्रियाएँ और उनके संस्कार (फल)।
• हि: क्योंकि/निश्चित रूप से।
• अविनाशीनि: जिनका विनाश साधारण साधनों से नहीं होता; जो सूक्ष्म रूप में बने रहते हैं।
• बीजवत्: बीज की भाँति (सुप्त अवस्था में रहना और अनुकूल समय आने पर अंकुरित होना)।
• प्रभवन्ति च: और पुनः उत्पन्न होते हैं/प्रकट होते हैं।
• तानि: वे (कर्म-बीज)।
• योगाग्नि-दग्धानि: योग रूपी अग्नि से जला दिए गए।
• न प्ररोहन्ति: अंकुरित नहीं होते/पुनः उत्पन्न नहीं होते।
• वै पुनः: वास्तव में फिर कभी नहीं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य कर्म के सूक्ष्म स्वरूप और उसकी अविनाशिता का रहस्य खोल रहे हैं। वे कहते हैं कि कर्म 'अविनाशी' होते हैं। यहाँ अविनाशी का अर्थ यह नहीं है कि क्रिया समाप्त नहीं होती, अपितु यह है कि क्रिया के समाप्त होने के बाद भी उसका 'संस्कार' या 'बीज' चित्त में अंकित रह जाता है।
ऋषि कर्मों की तुलना 'बीज' से करते हैं। बीज की विशेषता यह है कि वह लंबे समय तक सुप्त रह सकता है, किन्तु जैसे ही उसे उचित मिट्टी, जल और ताप मिलता है, वह अंकुरित होकर वृक्ष बन जाता है। ठीक इसी प्रकार, मनुष्य द्वारा किए गए कर्म—चाहे वे शुभ हों या अशुभ—चित्त की गहराइयों में बीज रूप में संचित रहते हैं। जब समय और परिस्थिति अनुकूल होती है, तो ये बीज 'फल' के रूप में प्रस्फुटित होते हैं और जीव को पुनः जन्म-मरण के चक्र में खींच लाते हैं। केवल बाहरी शुद्धि, स्नान या साधारण अनुष्ठानों से ये बीज नष्ट नहीं होते, क्योंकि वे सूक्ष्म शरीर के संस्कार बन चुके होते हैं।
किन्तु, महर्षि यहाँ एक अचूक समाधान देते हैं—'योगाग्नि'। जब साधक ज्ञान और कर्म के समायोग से योग में प्रविष्टि करता है, तब उसके भीतर एक ऐसी आंतरिक अग्नि प्रज्वलित होती है जिसे 'योगाग्नि' कहा गया है। यह अग्नि भौतिक नहीं, अपितु चेतना की वह तीव्रता है जो संस्कारों के मूल को भून देती है। जब कर्म-बीज इस योगाग्नि में दग्ध (जल) जाते हैं, तो उनकी पुनरुत्पत्ति की क्षमता समाप्त हो जाती है। जिस प्रकार जला हुआ बीज फिर कभी अंकुरित नहीं हो सकता, उसी प्रकार योग से भस्म हुए संस्कार जीव को पुनः बंधन में नहीं बांधते।
शास्त्र-साक्ष्य —
कर्म-बीजों के दहन का यही सिद्धांत अन्य शास्त्रों में भी मिलता है। पातञ्जल योगदर्शन के व्यासभाष्य में स्पष्ट कहा गया है:
प्रसङ्ख्यानवतो दग्धक्लेशबीजस्य सम्मुखीभूतेऽप्यालम्बने नासौ पुनरस्ति, दग्धबीजस्य कुतः प्ररोह इति ॥ २.४ ॥
जिसे विवेक-ज्ञान (प्रसंख्यान) प्राप्त है और जिसके क्लेशोंके बीज जल चुके हैं, उसके सामने विषय आ जानेपर भी वह (क्लेश) फिर नहीं उठता — जले हुए बीजका अंकुर कहाँसे?
यहाँ व्यास कहते हैं कि जिस साधक के क्लेश-बीज ज्ञान द्वारा जल चुके हैं, उसके सामने विषय आने पर भी वे पुनः उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि 'दग्धबीजस्य कुतः प्ररोहः' अर्थात् जले हुए बीज का अंकुर कहाँ से संभव है?
इसी भाव को श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने 'ज्ञानाग्नि' के रूप में प्रस्तुत किया है:
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ४.३७ ॥
अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनको भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मोंको भस्म कर देती है।
यहाँ ज्ञान की अग्नि को ईंधन भस्म करने वाला बताया गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति की 'योगाग्नि' और गीता की 'ज्ञानाग्नि' वास्तव में एक ही सत्य के दो आयाम हैं। जहाँ गीता ज्ञान के बोध पर बल देती है, वहीं याज्ञवल्क्य जी उस ज्ञान को 'योग' (अभ्यास और अनुभव) के माध्यम से क्रियान्वित करने की बात करते हैं। ज्ञान जब योग बन जाता है, तब वह अग्नि का रूप ले लेता है जो संस्कारों को भस्म कर देती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'संस्कार-शोधन' की प्रक्रिया का वर्णन है। साधारणतः हम कर्मों के फल से लड़ते हैं, किन्तु योगी कर्म के 'बीज' (संस्कार) पर प्रहार करता है।
योगाग्नि का अर्थ है—गहन ध्यान और एकाग्रता की वह अवस्था जहाँ चित्त पूरी तरह स्थिर हो जाता है और चैतन्य की तीव्रता बढ़ जाती है। जब साधक अपने भीतर स्थित उस 'भर्ग' (दिव्य प्रकाश/अग्नि) से जुड़ता है, तो वह प्रकाश उसके अवचेतन मन में दबे हुए पुराने संस्कारों को आलोकित कर उन्हें जला देता है। अभ्यास यह है कि साधक केवल बाहरी क्रियाओं में न उलझे, बल्कि ध्यान के माध्यम से उन बीजों को पहचाने और उन्हें योग की प्रखरता में विलीन कर दे।
यह प्रक्रिया साधक को 'कर्म-बंधन' से 'कर्म-मुक्ति' की ओर ले जाती है। जब बीज जल जाते हैं, तब साधक उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ वह संसार में रहते हुए भी उससे अप्रभावित रहता है, क्योंकि उसके भीतर अब कोई ऐसा बीज शेष नहीं रहा जो उसे पुनः खींच सके। यह वह भूमि है जहाँ से साधक पूर्ण स्वतंत्रता (कैवल्य) की ओर अग्रसर होता है।
ध्यानाद्यावश्यकता
एतस्मात् कारणाद्ध्यानं धारणां प्राणसंयमम् ।
कुर्याद्यत्नेन योगज्ञः कर्मसंन्यासचिन्तनम् ॥ ९.३३ ॥
इस कारण योगका जानकार यत्नपूर्वक ध्यान, धारणा, प्राणसंयम और कर्मसंन्यासका चिन्तन करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि जिस प्रकार साधारण अग्नि भौतिक वस्तुओं को जलाती है, उसी प्रकार 'योगाग्नि' कर्म-बीजों को भस्म कर देती है ताकि वे पुनः अंकुरित न हो सकें। इसी आधार पर अब वे उन विशिष्ट साधनों का निर्देश कर रहे हैं जिनके द्वारा यह योगाग्नि प्रज्वलित की जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
एतस्मात् कारणात् योगज्ञः यत्नेन ध्यानं, धारणां, प्राणसंयमम्, (तथा) कर्मसंन्यासचिन्तनम् कुर्यात् ।
पदार्थ:
• एतस्मात् कारणात्: इस कारण से (अर्थात् पिछले श्लोक में वर्णित कर्म-बीजों के विनाश की आवश्यकता के कारण)।
• योगज्ञः: योग के वास्तविक रहस्य को जानने वाला साधक।
• यत्नेन: यत्नपूर्वक, निरंतर अभ्यास और सजगता के साथ।
• ध्यानम्: चित्त की एकाग्रता, जहाँ ध्येय वस्तु का निरंतर प्रवाह बना रहे।
• धारणाम्: मन को किसी एक बिंदु या विचार पर स्थिर रखने का प्रयत्न।
• प्राणसंयमम्: प्राणों का नियमन (कुम्भक और नियंत्रण), जिससे मन स्थिर होता है।
• कर्मसंन्यासचिन्तनम्: कर्मों के त्याग का चिंतन। यहाँ 'संन्यास' का अर्थ क्रिया का त्याग नहीं, अपितु कर्मफल और कर्तृत्व-भाव के त्याग का मानसिक चिंतन है।
• कुर्यात्: करे/अभ्यास करे (यह विधिलिङ् लकार है, जो अनिवार्य साधना का संकेत देता है)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधक को उन चार स्तंभों से परिचित करा रहे हैं, जिन पर योग की संपूर्ण (इमारत) टिकी है। ऋषि कहते हैं कि क्योंकि कर्म-बीज अविनाशी होते हैं और केवल योगाग्नि से ही नष्ट होते हैं, इसलिए 'योगज्ञ'—वह व्यक्ति जो जानता है कि आत्मा और परमात्मा का मिलन कैसे संभव है—उसे यत्नपूर्वक चार अभ्यासों में संलग्न होना चाहिए: ध्यान, धारणा, प्राणसंयम और कर्मसंन्यास का चिंतन।
यहाँ 'यत्नेन' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग कोई आकस्मिक घटना नहीं, अपितु एक सचेतन प्रयास है। जब तक साधक अपनी पूरी शक्ति और सजगता नहीं लगाता, तब तक चित्त की वृत्तियाँ शांत नहीं होतीं।
विशेष रूप से 'कर्मसंन्यासचिन्तनम्' के पद पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि हम इसे केवल बाहरी क्रियाओं के त्याग के रूप में देखें, तो यह अगले श्लोक (९.३४) के विरुद्ध होगा, जहाँ ऋषि केवल ज्ञान के नाम पर कर्मों को छोड़ने वाले 'पण्डित' न होने की चेतावनी देते हैं और इसे आलस्य का लक्षण बताते हैं। अतः यहाँ 'कर्मसंन्यास' का रहस्य 'कर्मफलत्याग' (जैसा कि आगे ९.१९८ में स्पष्ट होगा) और 'अहंकार-त्याग' है। यह वह चिंतन है जिसमें साधक यह अनुभव करता है कि "मैं कर्ता नहीं हूँ, यह प्रकृति का खेल है।" जब कर्तृत्व-भाव समाप्त होता है, तब नए कर्म-बीज निर्मित नहीं होते और पुराने बीज योगाग्नि में जल जाते हैं।
इस प्रकार, प्राणसंयम शरीर को स्थिर करता है, धारणा मन को केंद्रित करती है, ध्यान आत्मा को ध्येय से जोड़ता है और कर्मसंन्यास का चिंतन साधक को कर्म-बंधन के सूक्ष्म धागों से मुक्त करता है।
श्रुति-संगति —
तदेतदृचाभ्युक्तम् एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् तस्यैव स्यात्पदवित्तं विद्वित्वा न कर्मणा लिप्यते पापकेनेति तस्मादेवंविच्रान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः श्रद्धावित्तो भूत्वात्मन्येवात्मानम् पश्येत्सर्वमेनं पश्यति सर्वोऽस्यात्मा भवति सर्वस्यात्मा भवति सर्वम् पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तपति नैनं पाप्मा तपति विपापो विजरो विजिघत्सोऽपिपासो ब्राह्मणो भवति य एवं वेद ॥ १४.७.२.२८ ॥
यह बात ऋचासे कही गयी है — "यह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) की नित्य महिमा है, जो न कर्मसे बढ़ती है, न घटती है। उसीके पद (स्वरूप) को जाननेवाला होना चाहिए; उसे जानकर (मनुष्य) पाप-कर्मसे लिप्त नहीं होता।" इसलिए ऐसा जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और श्रद्धा-धनसे युक्त होकर आत्मामें ही आत्माको देखे; वह सबको यही (आत्मा) देखता है, सब इसका आत्मा हो जाता है, वह सबका आत्मा होता है। वह सब पापको पार कर जाता है, पाप इसे पार नहीं करता; वह सब पापको तपाता (जला देता) है, पाप इसे नहीं तपाता। जो ऐसा जानता है वह पापरहित, जरारहित, भूखरहित, प्यासरहित ब्राह्मण होता है।
श्रुति कहती है कि ब्रह्मवेत्ता की महिमा कर्मों से नहीं बढ़ती और वह पाप-कर्मों से लिप्त नहीं होता। वह 'दान्त' और 'उपरत' होकर आत्मा में ही आत्मा को देखता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति-रहस्य का व्यावहारिक साधन है। श्रुति में जिस 'उपरत' (इन्द्रियों से विमुख) और 'दान्त' (मन को वश में करने वाले) की बात कही गई है, उसे प्राप्त करने के लिए महर्षि यहाँ ध्यान, धारणा और प्राणसंयम की विधि बता रहे हैं। जब साधक इन साधनों से 'आत्मान्येवात्मानम्' (आत्मा में आत्मा को) देखता है, तभी वह सब पापों को तपाकर जला देता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम् । प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ ६.७२ ॥
प्राणायामोंसे दोषोंको जलाये, धारणाओंसे पापको, प्रत्याहारसे (विषयोंके) संसर्गको, और ध्यानसे अनीश्वर (आत्माको ढकनेवाले) गुणोंको।
मनुस्मृति में भी इन साधनों की शक्ति का वर्णन मिलता है, जहाँ कहा गया है कि प्राणायाम से दोष, धारणा से पाप (किल्बिष) और ध्यान से अनीश्वर गुणों का दहन होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार को और विस्तार देती है। जहाँ मनुस्मृति इन साधनों को 'दहन' (जलाने) के उपकरण मानती है, वहीं याज्ञवल्क्य इन्हें 'योगाग्नि' के ईंधन के रूप में देखते हैं। दोनों ग्रंथों का मत एक ही है: मानसिक और प्राणिक शुद्धि के बिना कर्म-बीजों का विनाश असंभव है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन-साध्य' के संबंध को स्पष्ट करता है। यहाँ चार साधन हैं और लक्ष्य एक ही है—कर्म-बीजों का पूर्ण दहन।
१. प्राणसंयम: यह प्रथम सोपान है। जब प्राण स्थिर होता है, तब मन की चंचलता कम होती है। साधक यहाँ अनुभव करता है कि प्राण और मन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
२. धारणा: स्थिर मन को जब एक बिंदु पर टिकाया जाता है, तो बिखरी हुई ऊर्जा संकेंद्रित होने लगती है। यह 'बीज' को पकड़ने की प्रक्रिया है।
३. ध्यान: जब धारणा अखंड हो जाती है, तो वह ध्यान बन जाती है। यहाँ साधक और ध्येय के बीच का अंतर मिटने लगता है, जिससे आंतरिक प्रकाश प्रज्वलित होता है।
४. कर्मसंन्यास-चिन्तन: यह बौद्धिक और आध्यात्मिक विरक्ति है। यह साधक को इस बोध की ओर ले जाता है कि वह शरीर या मन नहीं, अपितु वह 'द्रष्टा' है।
इन चारों का सम्मिलित अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह केवल 'कर्ता' नहीं रहता, बल्कि 'साक्षी' बन जाता है। यही वह अवस्था है जहाँ योगाग्नि प्रज्वलित होती है और जन्म-जन्मांतर के संचित संस्कार भस्म हो जाते हैं।
कायक्लेशभयात् कर्मत्यागनिंदा
परिज्ञानाद्भवेन्मुक्तिरेतदालस्यलक्षणम् ।
कायक्लेशभयाच्चैव कर्म नेच्छन्त्यपण्डिताः ॥ ९.३४ ॥
"(केवल) ज्ञानसे मुक्ति होती है" — यह आलस्यका लक्षण है; शरीरके कष्टके भयसे ही मूर्ख कर्म नहीं चाहते।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ध्यान, धारणा और प्राणसंयम के साथ 'कर्मसंन्यास के चिंतन' का निर्देश दिया था। अब वे स्पष्ट कर रहे हैं कि यह संन्यास चिंतन और वास्तविक योग-साधना, केवल बौद्धिक ज्ञान या कर्मों के पलायन से भिन्न कैसे है।
अन्वय और पदार्थ —
परिज्ञानात् मुक्तिः भवेत् — एतदालस्यलक्षणम् । अपण्डिताः कायक्लेशभयात् च एव कर्म न इच्छन्ति ॥
पदार्थ:
• परिज्ञानात्: केवल ज्ञान से (यहाँ 'परिज्ञान' का अर्थ उस सीमित बौद्धिक ज्ञान से है जो अनुभव-सिद्ध नहीं है, केवल सूचना मात्र है)।
• भवेन्मुक्तिः: मुक्ति होती है (यह एक प्रचलित धारणा का उल्लेख है, जिसे ऋषि यहाँ चुनौती दे रहे हैं)।
• एतदालस्यलक्षणम्: यह (ऐसी धारणा रखना) आलस्य का लक्षण है।
• कायक्लेशभयात्: शरीर के कष्ट के भय से (काय = शरीर, क्लेश = कष्ट/पीड़ा, भय = डर)।
• चैव (च + एव): और निश्चित रूप से।
• कर्म न इच्छन्ति: कर्म नहीं चाहते/त्याग देते हैं।
• अपण्डिताः: जो वास्तव में विद्वान नहीं हैं, मूर्ख या अज्ञानी।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस भ्रामक प्रवृत्ति पर प्रहार कर रहे हैं, जहाँ साधक 'ज्ञान' के नाम पर साधना के कठिन परिश्रम से बचना चाहता है। समाज में एक धारणा प्रचलित है कि केवल यह जान लेने से कि "मैं ब्रह्म हूँ" या "संसार मिथ्या है", मुक्ति प्राप्त हो जाएगी। ऋषि स्पष्ट कहते हैं कि यह विचार मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि 'आलस्य' का लक्षण है।
यहाँ 'परिज्ञान' शब्द का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्म है। जब ज्ञान केवल मस्तिष्क में एक विचार बनकर रह जाता है और वह प्राणों में, हृदय में और आचरण में नहीं उतरता, तो वह ज्ञान नहीं, केवल 'सूचना' है। ऐसा ज्ञान साधक को अहंकार तो देता है, किन्तु उसे बंधन से मुक्त नहीं करता। वास्तविक मुक्ति 'ज्ञान' और 'कर्म' (योग) के समुच्चय से आती है, जैसा कि पिछले श्लोकों में पक्षी के दो पंखों के उदाहरण से समझाया गया था।
ऋषि आगे कहते हैं कि जो लोग कर्मों का त्याग करते हैं, उनमें से अधिकांश वास्तव में वैराग्य से नहीं, बल्कि 'कायक्लेशभयात्' अर्थात् शरीर को होने वाले कष्ट के डर से ऐसा करते हैं। योग-साधना में आसन, प्राणायाम और निरंतर सजगता के लिए शारीरिक और मानसिक अनुशासन की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति इस अनुशासन के कष्ट को सहन नहीं कर सकता, वह अपनी इस कायरता को 'ज्ञान' या 'संन्यास' का जामा पहना देता है। ऐसे व्यक्तियों को महर्षि 'अपण्डिताः' (मूर्ख) कहते हैं, क्योंकि वे यह नहीं जानते कि बिना कर्म-संस्कार के ज्ञान का बीज कभी अंकुरित नहीं होता।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विचार की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलती है:
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ १८.८ ॥
जो कर्मको "दुःख है" — ऐसा समझकर शरीरके कष्टके भयसे छोड़ देता है, वह राजस त्याग करके त्यागका फल नहीं पाता।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति कर्म को "दुःख" मानकर और शरीर के कष्ट के भय से उसका त्याग करता है, वह 'राजस' त्याग करता है। ऐसा त्याग मुक्तिदायी नहीं होता क्योंकि इसमें वैराग्य नहीं, बल्कि अरुचि और भय है।
इसी प्रकार, ईशोपनिषद् का यह सूत्र कर्म और जीवन के समन्वय का आधार है:
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥
यहाँ कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीनेकी इच्छा करे। (देहाभिमानी) तुम्हारे लिए इसके सिवा दूसरा मार्ग नहीं है; इस प्रकार (किया हुआ) कर्म मनुष्यको लिप्त नहीं करता।
श्रुति कहती है कि कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करें। यह निर्देश स्पष्ट करता है कि कर्म का त्याग करना समाधान नहीं है, बल्कि ऐसे कर्म करना जो मनुष्य को लिप्त न करें, वास्तविक मार्ग है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि जब तक योगाग्नि में कर्म-बीज नहीं जलते, तब तक केवल बौद्धिक ज्ञान से मुक्ति संभव नहीं है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक कठोर 'आत्मपरीक्षा' का उपकरण है। योग मार्ग पर चलते हुए जब भी साधक को आलस्य आए, या जब वह साधना के कठिन चरणों (जैसे दीर्घ प्राणायाम या कठोर ध्यान) से बचने के लिए यह तर्क दे कि "मैं तो ज्ञान मार्ग का हूँ, मुझे इन क्रियाओं की क्या आवश्यकता", तब उसे इस श्लोक का स्मरण करना चाहिए।
साधक को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए: "क्या मैं वास्तव में कर्मफल के त्याग (संन्यास) की स्थिति में हूँ, या मैं केवल शारीरिक कष्ट और अनुशासन के भय से भाग रहा हूँ?"
योगिक दृष्टि से, शरीर केवल मांस और हड्डी का ढांचा नहीं, बल्कि वह यंत्र है जिसके माध्यम से प्राणों का शोधन होता है। यदि साधक कायक्लेश (शारीरिक अनुशासन) से डरता है, तो वह कभी भी 'प्राणसंयम' की उस अवस्था तक नहीं पहुँच पाएगा जहाँ मन स्थिर होता है। यह श्लोक साधक को 'बौद्धिक संतोष' की नींद से जगाकर उसे वास्तविक 'अभ्यास' की भूमि पर लाता है। मुक्ति का मार्ग केवल यह जानना नहीं है कि लक्ष्य कहाँ है, बल्कि उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए शरीर और मन को तपाना है।
अष्टाङ्गो योगस्तत्फलं च
यमैश्च नियमैश्चैव आसनैः प्राणसंयमैः ।
प्रत्याहारेण ध्यानेन धारणाभिः समाधिना ॥ ९.३५ ॥
यम, नियम, आसन, प्राणसंयम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि के द्वारा...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया था कि केवल बौद्धिक ज्ञान के भरोसे बैठना आलस्य है और साधना के शारीरिक कष्ट से डरना अज्ञानता है। अब वे उस वास्तविक मार्ग का निरूपण कर रहे हैं, जिससे 'परिज्ञान' (सूचना) 'अनुभव' में बदलता है और कर्मबीज वास्तव में भस्म होते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
यमैः, नियमैः, च एव, आसनैः, प्राणसंयमैः, प्रत्याहारेण, ध्यानेन, धारणाभिः, समाधिना (उपास्यात्मा विमुच्यते) ॥
पदार्थ:
• यमैः: यमों के द्वारा (सामाजिक और नैतिक अनुशासन)।
• नियमैः: नियमों के द्वारा (व्यक्तिगत अनुशासन और शुद्धि)।
• आसनैः: आसनों के द्वारा (स्थिरता और शरीर की तैयारी)।
• प्राणसंयमैः: प्राणों के संयम के द्वारा (प्राणायाम)।
• प्रत्याहारेण: प्रत्याहार के द्वारा (इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना)।
• ध्यानेन: ध्यान के द्वारा (एकाग्रता का प्रवाह)।
• धारणाभिः: धारणाओं के द्वारा (चित्त को एक बिंदु पर टिकाना)।
• समाधिना: समाधि के द्वारा (साधक और साध्य का एक हो जाना)।
(नोट: इस श्लोक में क्रिया नहीं है; यह एक साधन-सूची है जिसका फल और क्रिया अगले श्लोक ९.३६ में 'उपास्यात्मा विमुच्यते' के रूप में पूर्ण होती है। अतः यह वाक्य ९.३५ से आरम्भ होकर ९.३६ में समाप्त होता है।)
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य योग के उस अष्टाङ्ग मार्ग को प्रस्तुत कर रहे हैं, जो स्थूल शरीर से सूक्ष्म आत्मा तक की यात्रा है। यहाँ महर्षि यह बता रहे हैं कि मुक्ति कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है।
ऋषि ने यहाँ आठ अंगों का उल्लेख किया है: यम, नियम, आसन, प्राणसंयम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि। बाहरी दृष्टि से यह एक विधि है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह 'अशुद्धि से शुद्धि' और 'विस्तार से संकोच' की यात्रा है। यम और नियम मन और समाज के स्तर पर शुद्धि करते हैं, आसन शरीर को स्थिर करता है, प्राणसंयम प्राणों को लय करता है, और प्रत्याहार उस ऊर्जा को बाहर से खींचकर भीतर मोड़ देता है। इसके पश्चात ध्यान, धारणा और समाधि के माध्यम से साधक उस 'अक्षर' में प्रतिष्ठित होता है।
यहाँ ध्यान का स्थान धारणा से पूर्व आया है। यह छन्द की मर्यादा के कारण है, न कि पद्धति का परिवर्तन। योग की प्रक्रिया में धारणा (एक बिंदु पर टिकाना) पहले आती है और फिर वह अखंड प्रवाह ध्यान बन जाता है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि जब साधक ध्यान की गहराई में उतरता है, तब धारणाएँ स्वतः सिद्ध होने लगती हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥ २.२९ ॥
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — (योगके) आठ अंग हैं।
यह सूत्र अष्टाङ्ग योग के उन्हीं आठ अंगों की सूची देता है जिनका उल्लेख बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में है। दोनों ग्रंथों में अंगों की संख्या और नाम समान हैं, जो यह सिद्ध करता है कि याज्ञवल्क्य की यह स्मृति उसी प्राचीन योग-परम्परा का विस्तार है जिसे बाद में पातञ्जल योगसूत्र ने सूत्रबद्ध किया। यहाँ केवल क्रम का सूक्ष्म भेद है, किन्तु लक्ष्य और साधन एक ही हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक 'सीढ़ी' के समान है। योग-रहस्य यह है कि इन आठों अंगों को अलग-अलग खंडों के रूप में नहीं, बल्कि एक एकीकृत प्रवाह के रूप में अभ्यास करना है। यदि साधक यम-नियम को छोड़कर सीधे ध्यान में बैठता है, तो चित्त की चंचलता और संस्कारों का अवरोध उसे विचलित करेगा। इसी प्रकार, बिना प्राणसंयम के ध्यान केवल मानसिक व्यायाम बनकर रह जाएगा, वह 'योग' नहीं होगा।
अभ्यास की दृष्टि से साधक यहाँ 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर बढ़ता है। यम-नियम 'स्थूल' हैं, आसन-प्राणसंयम 'मध्यस्थ' हैं, और प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधि 'सूक्ष्म' हैं। जब साधक इन आठों का एक साथ समन्वय करता है, तब उसकी चेतना शरीर के घेरे से निकलकर हृदय-आकाश में स्थित उस सूर्य-पुरुष (आत्मा) की ओर अग्रसर होती है। यह अभ्यास साधक को 'अविद्या' के अंधकार से निकालकर 'विज्ञान' की ज्योति की ओर ले जाता है, जहाँ वह केवल यह नहीं जानता कि वह मुक्त है, बल्कि वह मुक्ति का अनुभव करता है।
अष्टाङ्गेन तु योगेन उपास्यात्मा विमुच्यते ।
अणिमादि तथैश्वर्यं प्रत्यक्षं जायते ध्रुवम् ॥ ९.३६ ॥
अष्टाङ्ग योग के द्वारा तो आत्मा की उपासना करके वह मुक्त हो जाता है तथा अणिमादि ऐश्वर्य प्रत्यक्ष रूप से निश्चित ही प्राप्त होता है...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अष्टाङ्ग योग के आठ अंगों की सूची प्रस्तुत की थी। अब इस श्लोक में वे उन अंगों के सामूहिक अभ्यास से प्राप्त होने वाले फल—'मुक्ति' और 'ऐश्वर्य'—का प्रतिपादन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अष्टाङ्गेन तु योगेन आत्मा उपास्या विमुच्यते, (तथा) अणिमादि तथैश्वर्यं प्रत्यक्षं ध्रुवम् जायते ॥
पदार्थ:
• अष्टाङ्गेन योगेन: आठ अंगों वाले योग के द्वारा (यम, नियम, आसन, प्राणसंयम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि)।
• उपास्या: उपासना किए जाने पर (यहाँ 'उपास्य' का अर्थ केवल पूजा नहीं, अपितु 'उप' + 'आस्' अर्थात् समीप बैठना या निरंतर तन्मयता से जुड़ना है)।
• विमुच्यते: मुक्त हो जाता है (बंधनों से छूट जाता है)।
• अणिमादि: अणिमा आदि सिद्धियाँ (अणिमा—अत्यंत सूक्ष्म होना, महिमा—विशाल होना आदि)।
• तथैश्वर्यं: वैसे ही अन्य ऐश्वर्य/सिद्धियाँ।
• प्रत्यक्षं: साक्षात्, अनुभवगम्य।
• ध्रुवम्: निश्चित रूप से, अटल।
• जायते: प्रकट होते हैं या उत्पन्न होते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि पिछले श्लोक (९.३५) में वर्णित आठ अंग केवल बाहरी अनुशासन नहीं, अपितु आत्मा की उपासना के सोपान हैं। जब साधक यम-नियम से चित्त को शुद्ध करता है, आसन और प्राणसंयम से शरीर और प्राण को स्थिर करता है, और प्रत्याहार, ध्यान, धारणा एवं समाधि से चेतना को एकाग्र करता है, तब वह 'आत्मा' के समीप पहुँचता है।
यहाँ 'उपासना' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग की दृष्टि में उपासना का अर्थ है—साधक का साध्य (आत्मा) में विलीन हो जाना। जब अष्टाङ्ग योग के माध्यम से मन के विकार शांत होते हैं और वृत्तियाँ निस्तब्ध होती हैं, तब आत्मा का स्वरूप प्रत्यक्ष होता है और साधक जन्म-मरण के चक्र से 'विमुक्त' हो जाता है।
इसी मार्ग पर चलते हुए साधक को 'अणिमादि ऐश्वर्य' की प्राप्ति होती है। अणिमा (सूक्ष्मता) और महिमा (विस्तार) जैसे ऐश्वर्य केवल चमत्कार नहीं हैं, बल्कि वे इस बात के प्रमाण हैं कि साधक ने प्रकृति के स्थूल बंधनों पर विजय प्राप्त कर ली है। जब साधक अपनी चेतना को सूक्ष्मतम स्तर पर ले जाता है, तो वह स्वयं को अणु के समान सूक्ष्म (अणिमा) और फिर संपूर्ण ब्रह्मांड के समान व्यापक (महिमा) अनुभव करने लगता है। यह ऐश्वर्य 'प्रत्यक्ष' और 'ध्रुव' है, क्योंकि यह किसी बाहरी कृपा से नहीं, बल्कि स्वयं के योग-अभ्यास के तप से अर्जित किया गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ॥ ३.४५ ॥
उस (भूतजय) से अणिमा आदि (सिद्धियों) का प्रकट होना, शरीरकी सम्पत्ति, और उसके धर्मोंका (भूतोंसे) बाधित न होना (होता है)।
पातञ्जल योगसूत्र में भी इसी सत्य की पुष्टि की गई है कि जब साधक भूतजय (प्रकृति के तत्वों पर विजय) प्राप्त करता है, तब अणिमादि सिद्धियों का प्रादुर्भाव होता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और योगसूत्र दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ऐश्वर्य योग-साधना के स्वाभाविक उप-उत्पाद हैं। जहाँ योगसूत्र इसे 'भूतजय' के फल के रूप में देखता है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे अष्टाङ्ग योग के समग्र प्रभाव के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि 'मुक्ति' मुख्य लक्ष्य है और 'ऐश्वर्य' मार्ग का एक पड़ाव। योगिक अभ्यास में जब प्राण और मन एक बिंदु पर स्थिर होते हैं, तो साधक की चेतना भौतिक सीमाओं को लाँघने लगती है। अणिमा का अनुभव तब होता है जब साधक का मन सूक्ष्म होकर हृदय-आकाश में प्रवेश करता है।
साधक को यहाँ यह अनुभव करना है कि ऐश्वर्य (सिद्धियाँ) उसे लुभाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी प्रगति को दर्शाने के लिए आते हैं। यदि साधक इन प्रत्यक्ष सिद्धियों में अटक गया, तो उसकी मुक्ति बाधित हो सकती है। अतः इस श्लोक का अभ्यास करते समय साधक को 'ऐश्वर्य' को एक संकेत मात्र मानना चाहिए और अपनी पूरी शक्ति 'विमुच्यते' (मुक्ति) की ओर लगानी चाहिए। यह यात्रा स्थूल (यम-नियम) से सूक्ष्म (समाधि) की ओर है, जहाँ अंततः साधक स्वयं को उस अक्षर-ब्रह्म में स्थित पाता है, जिसकी चर्चा याज्ञवल्क्य अपनी श्रुति में करते हैं।
आत्मोपासनामाहात्म्यम्
प्रणवव्याहृतिभ्यां च सावित्र्या त्रितयेन च ।
उपास्यं त्रितयं ब्रह्म आत्मा ह्यत्र प्रतिष्ठितः ॥ ९.३७ ॥
प्रणव, व्याहृतियों और सावित्री (गायत्री) — इस त्रयसे त्रिविध ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिए; यहीं आत्मा प्रतिष्ठित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अष्टाङ्ग योग के माध्यम से आत्मा की उपासना और उससे प्राप्त होने वाली मुक्ति एवं सिद्धियों का वर्णन किया। अब वे इस उपासना के व्यावहारिक और मन्त्र-आधारित साधनों का उद्घाटन कर रहे हैं, जिससे साधक सूक्ष्म स्तर पर ब्रह्म से जुड़ सके।
अन्वय और पदार्थ —
प्रणव-व्याहृतिभ्यां च सावित्र्या त्रितयेन च त्रितयं ब्रह्म उपास्यं (अस्ति), आत्मा ह्यत्र प्रतिष्ठितः ॥
पदार्थ:
• प्रणव: ॐकार (परब्रह्म का बीज मन्त्र)।
• व्याहृतिभ्यां: 'भूः', 'भुवः' और 'स्वः'—इन तीनों व्याहृतियों के द्वारा (यहाँ 'भ्यां' द्विवचन का प्रयोग प्रणव और व्याहृति के समूह के लिए है)।
• सावित्री: सावित्री मन्त्र अर्थात् गायत्री मन्त्र।
• त्रितयेन: इन तीनों (प्रणव, व्याहृति, सावित्री) के समूह से।
• त्रितयं ब्रह्म: तीन प्रकार के ब्रह्म (स्थूल, सूक्ष्म और कारण, अथवा पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक के अधिष्ठाता)।
• उपास्यं: उपासना के योग्य।
• प्रतिष्ठितः: स्थित है या विराजमान है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधना के उन तीन मुख्य स्तंभों को प्रस्तुत कर रहे हैं, जो साधक को स्थूल जगत से उठाकर अक्षर-ब्रह्म तक ले जाते हैं। वे कहते हैं कि प्रणव (ॐ), व्याहृतियाँ (भूः भुवः स्वः) और सावित्री (गायत्री मन्त्र)—इन तीनों के समन्वय से 'त्रिविध ब्रह्म' की उपासना करनी चाहिए।
यहाँ 'त्रिविध ब्रह्म' का अर्थ है—सृष्टि के तीन स्तर। प्रथम वह ब्रह्म जो स्थूल जगत (पृथ्वी) का आधार है, द्वितीय वह जो सूक्ष्म जगत (अन्तरिक्ष) का संचालक है, और तृतीय वह जो कारण जगत (द्युलोक/परम प्रकाश) का स्वरूप है। जब साधक इन तीन मन्त्र-रूपों का आश्रय लेता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को तीन स्तरों पर विस्तारित करता है।
रहस्य यह है कि आत्मा कहीं बाहर नहीं, अपितु इसी उपासना-प्रक्रिया में प्रतिष्ठित है। जब साधक प्रणव से आरम्भ कर व्याहृतियों से होते हुए सावित्री के प्रकाश में प्रवेश करता है, तब उसे अनुभव होता है कि जिस ब्रह्म की वह खोज कर रहा था, वह उसके अपने ही स्वरूप में, उसकी अपनी चेतना के केंद्र में प्रतिष्ठित है। यह विधि केवल मन्त्रों का उच्चारण नहीं, अपितु चेतना का आरोहण है।
श्रुति-संगति —
व्याहृतियों के माध्यम से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उनके ब्रह्मत्व का प्रमाण शतपथ ब्राह्मण में मिलता है:
स संवत्सरे व्याजिहीर्षत् स भूरिति व्याहरत्सेयं पृथिव्यभवद्भुव इति तदितमन्तरिक्षमभवत्स्वरिति सासौ द्यौरभवत्तस्मादु संवत्सर एव कुमारो व्याजिहीर्षति संवत्सरे हि प्रजापतिर्व्याहरत् ॥ ११.१.६.३ ॥
संवत्सर (पूरा होने) पर उसने बोलना चाहा। उसने "भूः" कहा — वह यह पृथिवी हुई; "भुवः" कहा — वह यह अन्तरिक्ष हुआ; "स्वः" कहा — वह वह द्युलोक हुआ। इसीलिए बालक संवत्सरमें बोलना चाहता है, क्योंकि प्रजापतिने संवत्सरमें ही (पहले) बोला।
इस श्रुति के अनुसार, प्रजापति के 'भूः', 'भुवः' और 'स्वः' कहने से क्रमशः पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक की उत्पत्ति हुई। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति के रहस्य को साधना में उतारती है। जब साधक इन व्याहृतियों का जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु उन तीन लोकों के अधिष्ठाता ब्रह्म के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है। जिस प्रकार प्रजापति के वचनों से सृष्टि प्रकट हुई, उसी प्रकार साधक के भीतर इन व्याहृतियों के जागरण से उसकी सुप्त चेतना जाग्रत होती है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'जप' और 'ध्यान' के एक निश्चित क्रम को निर्धारित करता है। साधक के लिए यह एक ही उपासना के तीन चरण हैं:
१. प्रणव (ॐ): यह बीज है। इसका अभ्यास साधक को शून्य और पूर्ण के मिलन बिंदु पर लाता है। यह चित्त को एकाग्र कर उसे 'अक्षर' के लिए तैयार करता है।
२. व्याहृति (भूः भुवः स्वः): यह विस्तार है। 'भूः' के द्वारा साधक अपने भौतिक शरीर और पृथ्वी तत्व को शुद्ध करता है; 'भुवः' के द्वारा प्राण और मन (अन्तरिक्ष) को संतुलित करता है; और 'स्वः' के द्वारा अपनी चेतना को दिव्य प्रकाश (द्युलोक) की ओर ले जाता है।
३. सावित्री (तत्सवितुर्वरेण्यं...): यह साक्षात्कार है। सावित्री का अर्थ है—उस परम प्रकाश (सविता) से जुड़ना जो बुद्धि को प्रेरित करता है।
साधक जब इस क्रम में अभ्यास करता है—ॐ → भूः भुवः स्वः → गायत्री—तो वह स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास उसे 'साधारण मनुष्य' की भूमि से उठाकर 'ब्रह्म-साधक' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। यहाँ आत्मा का 'प्रतिष्ठित' होना यह दर्शाता है कि मन्त्रों की यह त्रयी वास्तव में आत्मा तक पहुँचने वाली सीढ़ी है।
विद्या जपश्च चिन्ता च एतद्धि त्रितयं स्मृतम् ।
एतेन त्रितयेनाथ उपास्यात्मा विमुच्यते ॥ ९.३८ ॥
विद्या, जप और चिन्तन — ये तीन कहे गये हैं; इस त्रयसे उपासना करके आत्मा मुक्त हो जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रणव, व्याहृति और सावित्री के माध्यम से त्रिविध ब्रह्म की उपासना का निर्देश दिया। अब वे इस उपासना की प्रक्रिया को तीन क्रियात्मक सोपानों—विद्या, जप और चिन्तन—में विभाजित कर रहे हैं, जिससे साधक की आंतरिक यात्रा पूर्णता को प्राप्त करे।
अन्वय और पदार्थ —
विद्या, जपश्च, चिन्ता च—एतद्धि त्रितयं स्मृतम् । एतेन त्रितयेनाथ उपास्यात्मा विमुच्यते ॥
पदार्थ:
• विद्या: मन्त्र का ज्ञान, उसका व्याकरणिक अर्थ और उसकी शक्ति का बोध।
• जप: मन्त्र का बार-बार उच्चारण, जिससे वह शब्द से ध्वनि और ध्वनि से स्पन्दन बन जाए।
• चिन्ता: मन्त्र के अर्थ में स्थित होना, निरंतर उस तत्त्व का अनुसन्धान करना (चिन्तन)।
• त्रितयं: यह तीनों का समूह।
• स्मृतम्: ऋषियों द्वारा कहा गया है या शास्त्र-सम्मत है।
• उपास्यात्मा: आत्मा की उपासना (यहाँ 'उपास्य' क्रिया है और 'आत्मा' कर्म)।
• विमुच्यते: मुक्त हो जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधना के उस त्रिकोणीय आधार को स्पष्ट कर रहे हैं, जिसके बिना कोई भी मन्त्र केवल शब्दों का समूह मात्र रह जाता है। वे कहते हैं कि मुक्ति के लिए केवल मन्त्र का होना पर्याप्त नहीं है, अपितु उस मन्त्र के साथ तीन क्रियाओं का समन्वय आवश्यक है: विद्या, जप और चिन्ता।
प्रथम 'विद्या' है। विद्या का अर्थ केवल मन्त्र को रट लेना नहीं, अपितु उसकी गहराई को समझना है। मन्त्र के प्रत्येक अक्षर का अर्थ, उसका देवता, उसका छन्द और उसकी आंतरिक शक्ति का ज्ञान 'विद्या' है। जब तक साधक को यह बोध नहीं होता कि वह किस शक्ति का आह्वान कर रहा है, तब तक वह केवल बाहरी क्रिया कर रहा है।
द्वितीय 'जप' है। जब विद्या से मन्त्र का अर्थ स्पष्ट हो जाता है, तब उसे जप के माध्यम से संस्कारित किया जाता है। जप वह साधन है जो मन्त्र को बुद्धि के स्तर से उतारकर प्राण और हृदय के स्तर पर प्रतिष्ठित करता है। निरंतर जप से मन्त्र साधक के चित्त में गहरे उतर जाता है और एक समय ऐसा आता है जब मन्त्र का बाहरी उच्चारण समाप्त हो जाता है और वह भीतर एक निरंतर प्रवाह बन जाता है।
तृतीय 'चिन्ता' है। यहाँ चिन्ता का अर्थ सांसारिक व्याकुलता नहीं, अपितु 'चिन्तन' है। जप से जो स्पन्दन उत्पन्न हुआ, उसे मन्त्र के अर्थ (तत्त्व) पर टिका देना ही चिन्ता है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक मन्त्र के शब्दों से ऊपर उठकर उस 'अर्थ' में लीन हो जाता है जिसका मन्त्र संकेत कर रहा है।
इन तीनों के समुच्चय से जब आत्मा की उपासना होती है, तब साधक स्थूल शरीर और मन के बंधनों से मुक्त हो जाता है। यदि केवल विद्या हो और जप न हो, तो वह केवल शुष्क ज्ञान है; यदि केवल जप हो और विद्या न हो, तो वह अंध-श्रद्धा है; और यदि जप-विद्या हो परन्तु चिन्तन (चिन्ता) न हो, तो वह एकाग्रता के अभाव के कारण फलहीन रहता है। अतः इन तीनों का संगम ही मुक्ति का मार्ग है।
शास्त्र-साक्ष्य —
विज्ञातवाच्यवाचकत्वस्य योगिनः— प्रणवस्य जपः प्रणवाभिधेयस्य चेश्वरस्य भावनम् । तदस्य योगिनः प्रणवं जपतः प्रणवार्थं च भावयतश्चित्तमेकाग्रं सम्पद्यते । तथा चोक्तम्— स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत्। स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्म प्रकाशते ॥ १.२८ ॥
जिस योगीने वाच्य (ईश्वर) और वाचक (प्रणव) का सम्बन्ध जान लिया है, उसके लिए (ईश्वर-प्रणिधान है) — प्रणवका जप और प्रणवके अर्थ ईश्वरकी भावना। प्रणवका जप करते और उसके अर्थकी भावना करते हुए इस योगीका चित्त एकाग्र हो जाता है। जैसा कहा है — स्वाध्यायसे योगमें स्थित हो, योगसे स्वाध्यायका अभ्यास करे; स्वाध्याय और योगकी सम्पत्तिसे परमात्मा प्रकाशित होता है।
इस अंश में महर्षि व्यास स्पष्ट करते हैं कि योगिन के लिए 'वाच्य' (जिसका नाम लिया जा रहा है—ईश्वर) और 'वाचक' (जिसके द्वारा नाम लिया जा रहा है—प्रणव) का सम्बन्ध जानना अनिवार्य है। वे 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' के माध्यम से बताते हैं कि प्रणव का जप और उसके अर्थ (ईश्वर) का भावन एक साथ चलना चाहिए।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और योगसूत्र यहाँ पूर्णतः सहमत हैं। जहाँ व्यास 'जप' और 'अर्थ-भावन' की बात करते हैं, वहीं याज्ञवल्क्य उसे 'जप' और 'चिन्ता' के रूप में परिभाषित कर रहे हैं। दोनों ही दृष्टियाँ इस बात पर बल देती हैं कि मन्त्र का केवल यांत्रिक उच्चारण पर्याप्त नहीं है; जब तक चित्त उस मन्त्र के अर्थ में स्थित नहीं होता, तब तक परमात्मा का प्रकाश नहीं होता।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक पूर्ण दैनिक अभ्यास-क्रम का निर्देश है। एक योगी को प्रतिदिन तीन स्तरों पर कार्य करना होता है:
१. विद्या (पठन और बोध): दिन के आरम्भ में मन्त्र के अर्थ और उसके रहस्य का अध्ययन करना। यह बुद्धि को शुद्ध करता है और दिशा निर्धारित करता है।
२. जप (अभ्यास और स्पन्दन): उस बोध को लेकर मन्त्र का जप करना। यह प्राणों को स्थिर करता है और मन के विक्षेपों को शांत कर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करता है।
३. चिन्ता (ठहराव और अनुभव): जप के उपरान्त मौन में उस मन्त्र के अर्थ पर ठहर जाना। यह वह स्थिति है जहाँ साधक 'मन्त्र' से 'मन्त्र-तत्त्व' में प्रवेश करता है।
यह क्रम साधक को 'बाहर' से 'भीतर' की ओर ले जाता है। विद्या उसे द्वार तक लाती है, जप उसे द्वार के भीतर प्रवेश कराता है, और चिन्ता उसे उस परम पुरुष के साथ एकाकार कर देती है। जब ये तीनों एक साथ घटित होते हैं, तब साधक की चेतना सीमित 'अहं' से मुक्त होकर 'विराट' में विलीन होने लगती है। यही वह विमुक्ति है जिसकी बात यह स्मृति कर रही है।
प्रणवाद्या भवेद्विद्या प्राणायामस्तपः स्मृतम् ।
ध्यानं च धारणा चैव चिन्ता ह्येषा उदाहृता ॥ ९.३९ ॥
प्रणवसे आरम्भ होनेवाली (गायत्री) विद्या है, प्राणायाम तप कहा गया है, और ध्यान तथा धारणा — यह चिन्तन कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने विद्या, जप और चिन्तन के त्रय द्वारा आत्मा की मुक्ति का मार्ग बताया। अब इस श्लोक में वे इन तीन शब्दों (विद्या, जप/तप, चिन्ता) का विस्तृत योगिक स्वरूप स्पष्ट कर रहे हैं कि साधना के व्यावहारिक धरातल पर इनका स्वरूप क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
प्रणवाद्या (विद्याः) भवेद्विद्या, प्राणायामस्तपः स्मृतम् ।
ध्यानं च धारणा चैव चिन्ता ह्येषा उदाहृता ॥
पदार्थ:
• प्रणवाद्या: प्रणव (ॐ) से आरम्भ होने वाली। यहाँ 'विद्या' शब्द का पुनरुक्त प्रयोग बल देने के लिए है कि जो विद्या प्रणव से शुरू होकर सावित्री तक जाती है, वही वास्तविक विद्या है।
• भवेद्विद्या: विद्या कही जानी चाहिए।
• प्राणायामस्तपः: प्राणायाम ही तप है।
• स्मृतम्: शास्त्र-सम्मत है या ऋषियों द्वारा स्मरण किया गया है।
• ध्यानं च धारणा चैव: ध्यान और धारणा दोनों।
• चिन्ता ह्येषा: यह (इन दोनों का समूह) ही 'चिन्ता' है।
• उदाहृता: कहा गया है या परिभाषित किया गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधना के स्थूल और सूक्ष्म अंगों का एक सूत्रबद्ध वर्गीकरण कर रहे हैं। पिछले श्लोक (९.३८) में उन्होंने 'विद्या, जप और चिन्ता' का उल्लेख किया था। इस श्लोक में वे 'जप' के स्थान पर 'प्राणायाम' को 'तप' के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। इसका भाव यह है कि मन्त्र का जप जब प्राणायाम के साथ जुड़ता है, तब वह केवल वाक्-क्रिया न रहकर 'तप' बन जाता है, जो साधक के अंतःकरण की अशुद्धियों को जलाता है।
प्रथम अंग 'विद्या' है। महर्षि कहते हैं कि 'प्रणवाद्या भवेद्विद्या'—अर्थात् वह ज्ञान जो प्रणव (ॐ) से आरम्भ होता है और सावित्री (गायत्री) के रहस्य तक पहुँचता है, वही वास्तविक विद्या है। यहाँ विद्या का अर्थ केवल मन्त्र का पाठ नहीं, अपितु उस मन्त्र के बीजरूप (प्रणव) से लेकर उसके पूर्ण विस्तार (सावित्री) तक के ज्ञान से है। यह वह बौद्धिक और आध्यात्मिक बोध है जो साधक को यह समझाता है कि वह सूक्ष्म अक्षर किस विराट सत्ता का प्रतीक है।
द्वितीय अंग 'तप' है। यहाँ 'प्राणायामस्तपः स्मृतम्' कहकर याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि प्राणायाम ही वास्तविक तप है। तप का अर्थ है—तपना या शुद्ध होना। जिस प्रकार अग्नि सोने की अशुद्धियों को जला देती है, उसी प्रकार प्राणायाम के द्वारा प्राणों का संयम साधक के मानसिक विकारों और शारीरिक जड़ता को समाप्त करता है। मन्त्र-विद्या यदि बीज है, तो प्राणायाम वह ताप है जो उस बीज को अंकुरित कर उसे वृक्ष बनाता है।
तृतीय अंग 'चिन्ता' है। सामान्य भाषा में चिन्ता का अर्थ व्याकुलता होता है, किन्तु योगशास्त्र में 'चिन्ता' का अर्थ है—निरन्तर अनुसन्धान या एकाग्रता। महर्षि स्पष्ट करते हैं कि 'ध्यान' और 'धारणा'—इन दोनों का सम्मिलित रूप ही 'चिन्ता' है। धारणा वह अवस्था है जहाँ चित्त को किसी एक विषय (जैसे मन्त्र या इष्ट) पर टिकाया जाता है, और जब वह टिकाव निर्बाध प्रवाह बन जाता है, तो वह ध्यान कहलाता है। इस निरंतरता को ही यहाँ 'चिन्ता' कहा गया है।
इस प्रकार, विद्या (ज्ञान), तप (प्राणायाम) और चिन्ता (ध्यान-धारणा) का यह त्रय साधक को स्थूल शरीर से सूक्ष्म प्राण और फिर सूक्ष्म प्राण से शुद्ध चेतना की ओर ले जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्राणायाम को तप के रूप में देखने का यह दृष्टिकोण अन्य शास्त्रों में भी मिलता है।
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामाः परं तपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ २.८३ ॥
एकाक्षर (ॐ) परम ब्रह्म है, प्राणायाम परम तप हैं; सावित्रीसे बढ़कर (कोई मन्त्र) नहीं है, और मौनसे सत्य श्रेष्ठ है।
मनुस्मृति में भी 'प्राणायामाः परं तपः' कहकर प्राणायाम को परम तप माना गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों यहाँ इस बात पर सहमत हैं कि केवल बाहरी कष्ट सहना तप नहीं है, अपितु प्राणों का संयम ही वह आंतरिक अग्नि है जो साधक को शुद्ध करती है।
इसी प्रकार, विद्या और प्रणव के सम्बन्ध में:
स्वाध्यायो मोक्षशास्त्राणामध्ययनं प्रणवजपो वा ॥ २.३२ ॥
स्वाध्याय है — मोक्षशास्त्रोंका अध्ययन, अथवा प्रणवका जप।
पातञ्जल योगसूत्र में स्वाध्याय के अंतर्गत 'प्रणवजपो वा' का उल्लेख है। यह इस स्मृति के 'प्रणवाद्या विद्या' के साथ मेल खाता है, जहाँ प्रणव का जप और उसका अध्ययन ही मोक्ष की दिशा में ले जाने वाली विद्या है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक उसकी दैनिक साधना का संपूर्ण ढाँचा प्रस्तुत करता है। एक योगी के लिए साधना के तीन स्तर हैं:
१. विद्या (बौद्धिक स्तर): साधक सबसे पहले प्रणव और सावित्री के अर्थ और शक्ति का बोध करता है। यह 'श्रवण' और 'मनन' की अवस्था है। यहाँ वह मन्त्र के अक्षर-रूप से उसके अर्थ-रूप की ओर बढ़ता है।
२. तप (प्राणिक स्तर): केवल मन्त्र का ज्ञान पर्याप्त नहीं है; उसे प्राणों में उतारना पड़ता है। जब साधक प्राणायाम के माध्यम से श्वास और मन्त्र के स्पन्दन को एक करता है, तब वह 'तप' की भूमि में प्रवेश करता है। यहाँ वह अपने शरीर और प्राणों को मन्त्र की शक्ति के योग्य बनाता है।
३. चिन्ता (मानसिक/चेतन स्तर): जब प्राण स्थिर हो जाते हैं, तब धारणा और ध्यान का आरम्भ होता है। मन्त्र अब शब्द नहीं रहता, वह एक 'चिन्तन' बन जाता है—एक ऐसी निरंतर धारा जिसमें साधक स्वयं को विलीन कर देता है।
साधक इस अभ्यास से 'विद्या' (ज्ञान) से 'तप' (अनुभव) और 'तप' से 'चिन्ता' (समाधि की पूर्व-अवस्था) की ओर अग्रसर होता है। यह यात्रा अक्षर से प्राण तक और प्राण से शुद्ध चैतन्य तक की यात्रा है।
सावित्र्युपासनामहात्म्यम्
सावित्र्याश्चैव माहात्म्यं ज्ञात्वा चैव यथार्थतः ।
तस्यां यदुक्तं चोपास्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ९.४० ॥
सावित्रीका माहात्म्य यथार्थरूपसे जानकर, और उसमें जो कहा गया है उसकी उपासना करके, (मनुष्य) ब्रह्मभावके योग्य होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों (९.३५-३९) में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने साधना के बाह्य और आन्तर उपकरणों का वर्णन किया है। जहाँ एक ओर उन्होंने अष्टाङ्ग योग को मुक्ति का साधन बताया, वहीं दूसरी ओर प्रणव, व्याहृति और सावित्री के त्रय को ब्रह्म-उपासना का आधार सिद्ध किया। अब इस श्लोक (९.४०) में वे स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल मन्त्र का उच्चारण पर्याप्त नहीं है, अपितु उस मन्त्र के 'माहात्म्य' और उसके 'यथार्थ स्वरूप' का ज्ञान ही वह कुंजी है जो साधक को साधारण मनुष्य से 'ब्रह्मभाव' की स्थिति तक ले जाती है। यह श्लोक विधि और फल के बीच की कड़ी है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सावित्र्याः च एव माहात्म्यं यथार्थतः ज्ञात्वा च एव, तस्यां यदुक्तं च उपास्य, (मनुष्यः) ब्रह्मभूयाय कल्पते।
पदार्थ-निर्वाचन:
• सावित्र्याः: सावित्री मन्त्र (गायत्री) के सम्बन्ध में। यहाँ 'सावित्री' केवल एक ऋचा नहीं, अपितु उस सूर्य-शक्ति का प्रतीक है जो चेतना को जाग्रत करती है।
• माहात्म्यम्: इसका अर्थ केवल 'महानता' नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक क्षमता और उसके द्वारा सिद्ध किए जाने वाले प्रयोजन से है।
• यथार्थतः: जैसा वह वास्तव में है। श्रुति के बीजरूप रहस्य को जब उसका पूर्ण विस्तार प्राप्त होता है, तब वह 'यथार्थ' ज्ञान कहलाता है। केवल शब्दों का अर्थ जानना यथार्थ ज्ञान नहीं है, बल्कि मन्त्र के पीछे छिपे तत्त्व को पहचानना यथार्थता है।
• उपास्य: उपासना का शाब्दिक अर्थ है 'उप-असन' अर्थात् ईश्वर के समीप बैठना। यहाँ इसका अर्थ उस मन्त्र में बताए गए देव और शक्ति के साथ तादात्म्य स्थापित करना है।
• ब्रह्मभूयाय कल्पते: ब्रह्मभाव (ब्रह्म होने की स्थिति) के योग्य हो जाता है। 'कल्पते' क्रिया यह दर्शाती है कि साधक अब उस उच्चतर अवस्था को प्राप्त करने की पात्रता पा चुका है।
भाष्य —
ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद स्पष्ट कर रहे हैं। संसार में लाखों लोग सावित्री मन्त्र का जप करते हैं, किन्तु उनमें से बहुत कम 'ब्रह्मभू' होते हैं। इसका कारण यह है कि वे केवल 'जप' करते हैं, जबकि ऋषि 'ज्ञात्वा' (जानकर) और 'उपास्य' (उपासना करके) की बात कर रहे हैं।
बाहरी दृष्टि से यह श्लोक कहता है कि गायत्री मन्त्र की महिमा जानकर उसकी विधिपूर्वक उपासना करने से मोक्ष मिलता है। किन्तु इसकी आन्तर दृष्टि अत्यंत गूढ़ है। सावित्री का यथार्थ माहात्म्य यह है कि वह 'वेदानां माता' (वेदों की माता) है। जिस प्रकार माता शिशु को जन्म देकर उसे संसार से परिचित कराती है, उसी प्रकार सावित्री मन्त्र साधक की सुप्त बुद्धि को जाग्रत कर उसे ब्रह्म-साक्षात्कार के योग्य बनाता है।
यहाँ 'यथार्थतः ज्ञात्वा' का अर्थ है—यह जानना कि यह मन्त्र केवल सूर्य देव की स्तुति नहीं है, बल्कि यह हृदय-आकाश में स्थित उस 'अदृश्य द्रष्टा' का आह्वान है जो समस्त बुद्धियों को प्रेरित करता है। जब साधक इस रहस्य को जान लेता है, तब उसकी उपासना 'कर्म' से बदलकर 'योग' हो जाती है। वह मन्त्र के शब्दों के माध्यम से स्वयं के भीतर के प्रकाश (भर्ग) की खोज करने लगता है।
इस प्रकार, यह श्लोक साधना की उस भूमि का वर्णन करता है जहाँ साधक केवल फल की इच्छा नहीं रखता, बल्कि स्वयं को ब्रह्मरूप में परिवर्तित करने की पात्रता अर्जित करता है। 'ब्रह्मभूयाय कल्पते' का अर्थ है कि अब वह उस स्थिति के लिए परिपक्व हो गया है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है।
श्रुति-संगति —
सावित्री के इस यथार्थ माहात्म्य को जब हम श्रुति के आलोक में देखते हैं, तो उसकी गहराई स्पष्ट होती है। शतपथ ब्राह्मण कहता है कि गायत्री केवल एक छन्द नहीं, बल्कि प्राणों की रक्षा करने वाली शक्ति है:
सा हैषा गयांस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणांस्तत्रेतद्यद्गयांस्तत्रे तस्माद्गायत्री नाम स यामेवामूमन्वाहैषैव सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणांस्त्रायते ॥ १४.८.१५.७ ॥
इस (गायत्री) ने गयोंकी रक्षा की। प्राण ही "गय" हैं; इसने प्राणोंकी रक्षा की — क्योंकि इसने गयोंका त्राण किया, इसलिए इसका नाम गायत्री है। (आचार्य) जिस (सावित्री) का (शिष्यको) उपदेश करता है, वह यही है; और जिसे उपदेश करता है, उसके प्राणोंकी यह रक्षा करती है।
यहाँ 'प्राणों की रक्षा' का अर्थ शारीरिक जीवन बचाना नहीं, अपितु साधक के प्राणों को निम्न वृत्तियों से उठाकर उच्चतर चेतना की ओर ले जाना है। यही सावित्री का वास्तविक माहात्म्य है। इसके अतिरिक्त, जब ऋषि कहते हैं कि इसे 'यथार्थतः' जानना चाहिए, तो इसका संकेत इस रहस्य की ओर है कि गायत्री के पदों में ही ब्रह्माण्ड और प्राणों का विज्ञान निहित है:
प्राणोऽपानो व्यान इति अष्टावक्षराण्यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्रै पदमेतदु हैवास्या एतत्स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १४.८.१५.३ ॥
"प्राणः, अपानः, व्यानः" — ये आठ अक्षर हैं; और गायत्रीका एक पद आठ अक्षरोंका है — यह (प्राण-त्रय) ही इसका वह (तीसरा पद) है। जो इसके इस पदको ऐसा जानता है, वह जितना यह प्राणी-जगत् है, उतना जीतता है।
जो इस एक पद (प्राण-अपान-व्यान) के रहस्य को जानता है, वह समस्त प्राणियों पर विजय प्राप्त करता है। यह 'विजय' वास्तव में स्वयं की प्रवृत्तियों पर विजय और ब्रह्मभाव की प्राप्ति है। साथ ही, सावित्री की श्रेष्ठता इतनी अधिक है कि किसी भी अन्य दान या अनुष्टुप् छन्द के उपदेश से इसकी तुलना नहीं की जा सकती:
तां हैके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वागनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति न तथा कुर्याद्गायत्रीमेवानुब्रूयाद्यदि ह वा अपि बह्विव प्रतिगृह्णाति न हैव तद्गायत्र्या एकं चन पदं प्रति ॥ १४.८.१५.८ ॥
कुछ लोग अनुष्टुप् छन्दकी सावित्री (शिष्यको) बताते हैं, यह सोचकर कि "अनुष्टुप् वाणी है, हम (शिष्यमें) वाणीका उपदेश करते हैं"। ऐसा न करे; गायत्री (छन्दकी सावित्री) ही बताये। (गायत्रीको जाननेवाला) चाहे बहुत-सा भी (दान) ग्रहण कर ले, वह गायत्रीके एक पदके बराबर भी नहीं होता।
यह स्पष्ट है कि सावित्री का माहात्म्य उसकी 'प्रेरक शक्ति' में है, क्योंकि सविता ही समस्त देवताओं और कामनाओं का प्रेरक (प्रसविता) है:
अथ सावित्री । सविता वै देवानां प्रसविता तथो हास्मा एते सवितृप्रसूता एव सर्वे कामाः समृध्यन्ते तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयादिति ॥ २.३.४.३९ ॥
अब सावित्री (ऋचा): सविता ही देवताओंका प्रसविता (प्रेरक) है; इसलिए उस (यजमान) की ये सब कामनाएँ सविताकी प्रेरणासे ही पूरी होती हैं — "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्" (सविता देवके उस वरणीय तेजका हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करे)।
शास्त्र-साक्ष्य —
अन्य शास्त्रों में भी सावित्री को केवल एक मन्त्र नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि का सार माना गया है। छान्दोग्य उपनिषद् इस माहात्म्य की पराकाष्ठा बताता है:
गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच वाग्वै गायत्री वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ ३.१२.१ ॥
जो कुछ भी यह भूत (जगत्) है, वह सब गायत्री ही है। वाणी ही गायत्री है; वाणी ही इस सब भूतका गान करती है और (उसकी) रक्षा करती है।
जब श्रुति कहती है कि "यह सब कुछ भूत गायत्री ही है", तब 'यथार्थतः ज्ञात्वा' का अर्थ यह हो जाता है कि साधक जब संपूर्ण जगत् को सावित्री के रूप में देखने लगता है, तभी वह वास्तव में ब्रह्मभाव की ओर अग्रसर होता है।
इसी प्रकार गोपथ ब्राह्मण इस मन्त्र की उपासना को ब्रह्मविद् बनने की सीढ़ी बताता है:
तं ह स्मैतं एवांविद्वांसो मन्यन्ते विद्मैनं इति याथातथ्यं अविद्वांसः अयं यज्ञो वेदेषु प्रतिष्ठितः वेदा वाचि प्रतिष्ठिताः वाङ्मनसि प्रतिष्ठिता मनः प्राणे प्रतिष्ठितम् प्राणोऽन्ने प्रतिष्ठितः अन्नं भूमौ प्रतिष्ठितम् भूमिरप्सु प्रतिष्ठिता आपो ज्योतिषि प्रतिष्ठिताः ज्योतिर्वायौ प्रतिष्ठितम् वायुराकाशे प्रतिष्ठितः आकाशं ब्रह्मणि प्रतिष्ठितम् ब्रह्म ब्राह्मणे ब्रह्मविदि प्रतिष्ठितम् यो ह वा एवंवित्स ब्रह्मवित् पुण्यां च कीर्तिं लभते सुरभींश्च गन्धान् सोऽपहतपाप्मा अनन्तां श्रियं अश्नुते य एवं वेद यश्चैवंविद्वानेवं एतां वेदानां मातरं सावित्रीं संपदं उपनिषदं उपास्त इति ब्राह्मणं ॥ १.३८ ॥
इस (क्रम) को ऐसा जाननेवाले मानते हैं कि 'हम इसे जानते हैं'; (उनके लिए, जो) यथार्थ नहीं जानते, (क्रम यह है): यह यज्ञ वेदोंमें प्रतिष्ठित है, वेद वाणीमें, वाणी मनमें, मन प्राणमें, प्राण अन्नमें, अन्न भूमिमें, भूमि जलमें, जल ज्योतिमें, ज्योति वायुमें, वायु आकाशमें, आकाश ब्रह्ममें, और ब्रह्म ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणमें प्रतिष्ठित है। जो ऐसा जानता है वही ब्रह्मवित् है; वह पुण्य कीर्ति और सुगन्ध पाता है, पापरहित होकर अनन्त श्री भोगता है — जो ऐसा जानता है, और जो ऐसा जानकर वेदोंकी माता सावित्रीकी इस सम्पद् — इस उपनिषद् (रहस्य) — की उपासना करता है।
यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि यज्ञ से लेकर आकाश तक और आकाश से ब्रह्म तक की जो श्रृंखला है, उसकी कुंजी 'वेदानां माता सावित्री' की उपासना है। स्मृति का यह वचन कि "ब्रह्मभूयाय कल्पते", गोपथ ब्राह्मण के इस कथन से पूर्णतः मेल खाता है कि जो सावित्री की इस उपनिषद् (रहस्य) रूप उपासना करता है, वह ब्रह्मवित् कहलाता है और पापरहित होकर अनन्त श्री प्राप्त करता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साधना' से 'सिद्धि' की ओर ले जाने वाला सेतु है।
१. अभ्यास: साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह सावित्री मन्त्र का जप करते समय केवल शब्दों पर ध्यान न दे, बल्कि उस 'प्रकाश' का अनुभव करे जो उसके भीतर बुद्धिवृत्तियों को प्रेरित कर रहा है। इसे 'भर्ग-ध्यान' कहते हैं।
२. अनुभव: जब साधक 'यथार्थतः' जानता है, तो उसे अनुभव होता है कि बाहरी सूर्य और हृदय के भीतर का सूर्य एक ही चेतना के दो रूप हैं। वह अनुभव करता है कि उसकी बुद्धि (धी) स्वयं की नहीं, अपितु उस विराट चैतन्य की एक किरण है।
३. भूमि परिवर्तन: यह श्लोक साधक को 'साधना-भूमि' से उठाकर 'पात्रता-भूमि' पर ले जाता है। जब तक वह केवल विधि करता है, वह 'साधक' है; किन्तु जब वह माहात्म्य को जानकर उपासना करता है, तब वह 'ब्रह्म-योग्य' हो जाता है। यहाँ वह स्थूल शरीर के बोध से ऊपर उठकर 'विज्ञानमय कोष' में प्रवेश करता है और अंततः 'अक्षर' की स्थिति के लिए तैयार होता है।
संक्षेप में, यह श्लोक चेतावनी देता है कि बिना ज्ञान के उपासना केवल एक क्रिया है, किन्तु ज्ञान के साथ की गई उपासना ही 'योग' है जो ब्रह्मभाव की ओर ले जाती है।
गायत्रीमन्त्रार्थः
तच्छब्देन तु यच्छब्दो बोद्धव्यः सततं बुधैः ।
उदाहृते तु तच्छब्दे यच्छब्द उदितो भवेत् ॥ ९.४१ ॥
"तत्" शब्दसे बुद्धिमान् सदा "यत्" शब्द समझें; "तत्" शब्दके कहे जानेपर "यत्" शब्द (स्वयं) उदित होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.४०) में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि सावित्री मन्त्र के यथार्थ ज्ञान और उसकी उपासना से ही साधक 'ब्रह्मभाव' को प्राप्त कर सकता है। अब यहाँ से वे उस 'यथार्थ ज्ञान' की सूक्ष्म व्याख्या आरम्भ कर रहे हैं। किसी भी मन्त्र का फल उसके शब्दों के केवल उच्चारण में नहीं, अपितु उन शब्दों के परस्पर सम्बन्ध और उनके पीछे छिपे तत्त्व के बोध में होता है। प्रस्तुत श्लोक में याज्ञवल्क्य गायत्री मन्त्र के दो प्रमुख पदों— 'तत्' और 'यत् (यः)' —के व्याकरणिक एवं आध्यात्मिक सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं, जो मन्त्र की पूर्णता का आधार है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: बुधैः तु तच्छब्देन यच्छब्दः सततं बोद्धव्यः । तच्छब्दे उदाहृते तु यच्छब्दः उदितः भवेत्।
पदार्थ-निर्वाचन:
• तच्छब्देन (तत्-शब्द से): गायत्री मन्त्र के प्रथम पद 'तत्' के द्वारा। व्याकरण में 'तत्' एक निश्चयवाचक सर्वनाम है, जो किसी निश्चित वस्तु या पुरुष की ओर संकेत करता है।
• यच्छब्दो बोद्धव्यः (यत्-शब्द समझना चाहिए): यहाँ 'यत्' का अर्थ मन्त्र के अंतिम चरण में आने वाले 'यः' (जो) शब्द से है (धियो यो नः प्रचोदयात्)। बुधों (विवेकशील साधकों) को यह समझना चाहिए कि 'तत्' का सम्बन्ध उस 'यः' से है।
• सततं बुधैः: निरंतर, उन प्रज्ञावान साधकों द्वारा जो मन्त्र के केवल शब्दों में नहीं, अपितु उसके अर्थ-तन्त्र में स्थित हैं।
• उदाहृते तु तच्छब्दे: जब 'तत्' शब्द का उच्चारण किया जाता है या वह श्रवण में आता है।
• यच्छब्द उदितो भवेत्: तब (साधक के अन्तःकरण में) स्वतः ही 'यत्/यः' शब्द जाग्रत हो जाना चाहिए। यहाँ 'उदित' होने का अर्थ केवल वाणी से बोलना नहीं, अपितु चेतना में उस सम्बन्ध का प्रस्फुटित होना है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मन्त्र के भाषाई विन्यास के माध्यम से एक महान रहस्य खोल रहे हैं। गायत्री मन्त्र का आरम्भ होता है 'तत्' (उस) शब्द से— तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो...। परन्तु यह 'तत्' (वह) कौन है? इसका उत्तर मन्त्र के अंत में मिलता है— धियो यो नः प्रचोदयात् (जो हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे)।
बाह्य दृष्टि से यह केवल व्याकरण का नियम है कि सर्वनाम ('तत्') अपने सम्बन्धी ('यः') से जुड़ता है। किन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में यह साधना की एक विधि है। वे कहते हैं कि जब एक प्रज्ञावान साधक 'तत्' शब्द का उच्चारण करता है, तो उसकी बुद्धि केवल एक शब्द नहीं बोल रही होती, अपितु वह उस परम तत्त्व की ओर संकेत कर रही होती है जो बुद्धियों को प्रेरित करने वाला है।
रहस्य यह है कि 'तत्' वह परब्रह्म है जो निर्गुण और अगम्य प्रतीत होता है, जबकि 'यः' (जो) वही ब्रह्म है जब वह 'सविता' रूप में हमारे भीतर की प्रज्ञा को जाग्रत करने वाली शक्ति के रूप में कार्य करता है। अतः जब साधक 'तत्' कहता है, तो उसे तुरंत उस 'शक्ति' (यः) का अनुभव करना चाहिए जो इस समय उसकी बुद्धि को प्रेरित कर रही है। यदि 'तत्' और 'यः' के बीच यह मानसिक सेतु नहीं बना, तो जप केवल शब्दों की पुनरावृत्ति बनकर रह जाएगा; वह उपासना नहीं कहलाएगा।
श्रुति-संगति —
श्रुति में सावित्री मन्त्र को एक अखंड इकाई के रूप में देखा गया है, जहाँ आरम्भ और अन्त एक ही सत्य के दो छोर हैं।
अथ सावित्री । सविता वै देवानां प्रसविता तथो हास्मा एते सवितृप्रसूता एव सर्वे कामाः समृध्यन्ते तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयादिति ॥ २.३.४.३९ ॥
अब सावित्री (ऋचा): सविता ही देवताओंका प्रसविता (प्रेरक) है; इसलिए उस (यजमान) की ये सब कामनाएँ सविताकी प्रेरणासे ही पूरी होती हैं — "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्" (सविता देवके उस वरणीय तेजका हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करे)।
इस अंश में स्पष्ट है कि सविता ही देवताओं का 'प्रसविता' (प्रेरक) है। यहाँ मन्त्र का पूर्ण स्वरूप तत्सवितुर्वरेण्यं... धियो यो नः प्रचोदयात् दिया गया है। यह दर्शाता है कि 'तत्' (वह सविता) और 'यो' (जो प्रेरित करता है) एक ही सत्ता के दो आयाम हैं—एक उसकी व्यापकता ('तत्') और दूसरा उसका कार्य ('यः')।
इसी प्रकार, जब मन्त्र को कर्मकाण्ड में विभाजित किया जाता है, तब भी यह सम्बन्ध बना रहता है:
(शतपथ १४.९.३.११) में प्रथम ग्रास 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' है, और (शतपथ १४.९.३.१३) में अंतिम ग्रास 'धियो यो नः प्रचोदयात्' है। यह विभाजन वास्तव में साधक को यह याद दिलाने के लिए है कि वह अपनी यात्रा 'तत्' (परम लक्ष्य) से आरम्भ करे और उसे 'यः' (प्रेरक शक्ति) के अनुभव पर समाप्त करे। श्रुति का यह विन्यास स्मृतिके इस वचन की पुष्टि करता है कि 'तत्' के साथ 'यत्/यः' का बोध अनिवार्य है।
अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यम् मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः भूः स्वाहा ॥ १४.९.३.११ ॥
तब वह (मन्थका) पहला ग्रास लेता है — "तत्सवितुर्वरेण्यम्", "मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः" (सत्यपरायणके लिए वायु मधु बहाते हैं, नदियाँ मधु बहाती हैं; ओषधियाँ हमारे लिए मधुमयी हों), "भूः स्वाहा"।
धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमामस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भुवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीः सर्वाश्च व्याहृतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य प्रक्षाल्य प्राणी जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशति ॥ १४.९.३.१३ ॥
(तीसरा ग्रास —) "धियो यो नः प्रचोदयात्", "मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः" (वनस्पति हमारे लिए मधुमान् हो, सूर्य मधुमान् हो, गौएँ मधुमयी हों), "स्वः स्वाहा"। फिर वह पूरी सावित्री, सब मधुमती ऋचाएँ और सब व्याहृतियाँ पढ़ता है, और अन्तमें "अहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहा" (मैं ही यह सब हो जाऊँ) कहकर (शेष) पीता है; फिर हाथ धोकर अग्निके पीछे, पूर्वकी ओर सिर करके लेटता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अन्य शास्त्रों में भी गायत्री के इन पदों के गहन अर्थों पर प्रश्न और विवेचन मिलते हैं, जो याज्ञवल्क्य के इस भाष्य को पुष्ट करते हैं।
…तं होपेत्य पप्रच्छ किं स्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किं आहुर्धियो विचक्ष्व यदि ताः प्रवेत्थ प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तस्मा एतत्प्रोवाच वेदांश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य कवयोऽन्नं आहुः कर्माणि धियस् तदु ते प्रब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तं उपसंगृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ १.३२ ॥
(मैत्रेय मौद्गल्यके पास) जाकर पूछने लगे — 'भगवन्, (विद्वान्) "सवितुर्वरेण्यम्" किसे कहते हैं? कवि "भर्गो देवस्य" किसे कहते हैं? "धियः" — जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — उनका विवेचन कीजिए, यदि आप जानते हैं।' उन्होंने उसे यह बताया — 'वेदों और छन्दोंको "सवितुर्वरेण्यम्" कहते हैं; कवि अन्नको "भर्गो देवस्य" कहते हैं; कर्म ही "धियः" हैं, जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — यह मैं तुम्हें बताता हूँ।' तब (मैत्रेयने उनके चरण) पकड़कर पूछा — 'भगवन्, पढ़ाइए: सविता कौन है, सावित्री क्या है?'
गोपथ ब्राह्मण के इस अंश में मैत्रेय मौद्गल्य से यह पूछा गया है कि 'सवितुर्वरेण्यम्' क्या है और 'धियः' (बुद्धियाँ) क्या हैं, जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है। यहाँ प्रश्नकर्ता ने स्वयं 'सवितुर्वरेण्यम्' ('तत्' का विस्तार) और 'प्रचोदयात्' ('यः' का कार्य) को जोड़कर पूछा है। यह सिद्ध करता है कि वैदिक ऋषियों के लिए मन्त्र के प्रथम भाग और अंतिम भाग का सम्बन्ध ही मन्त्र की वास्तविक कुंजी है। स्मृति यहाँ उसी प्राचीन वैदिक परंपरा को दोहरा रही है कि 'तत्' का अर्थ केवल बाहरी सूर्य नहीं, अपितु वह प्रेरक तत्व ('यः') है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'संकेत' और 'अनुभूति' के बीच के सेतु का वर्णन है।
साधक जब 'तत्' शब्द का उच्चारण करता है, तो वह 'वस्तु' की ओर संकेत कर रहा होता है—वह जो मुझसे परे है, वह जो महान है। किन्तु जैसे ही वह 'यत्/यः' को बोधता है, वह उस वस्तु को अपने भीतर 'अनुभव' करने लगता है। 'तत्' से 'यत्' की यात्रा वास्तव में 'बाह्य-ब्रह्म' से 'अन्तः-ब्रह्म' की यात्रा है।
अभ्यास यह है कि जप के समय जब जिह्वा 'तत्' बोले, तब मन में उस विराट सत्ता का दर्शन हो, और जैसे ही वह 'यो नः प्रचोदयात्' पर पहुँचे, साधक अनुभव करे कि वही विराट सत्ता इस क्षण उसके हृदय-आकाश में बुद्धिवृत्तियों को संचालित कर रही है।
यह अभ्यास साधक को 'साक्षी भाव' से 'तादात्म्य भाव' की ओर ले जाता है। जब 'तत्' और 'यत्' का भेद मिट जाता है, तब साधक यह अनुभव करता है कि जो प्रेरित करने वाला ('यः') है, वह वास्तव में वही परम तत्त्व ('तत्') है, और वह स्वयं भी उसी का अंश है। इस प्रकार साधक स्थूल शब्द-जाल से निकलकर प्रज्ञा के उस स्तर पर पहुँचता है जहाँ मन्त्र केवल ध्वनि नहीं, अपितु एक जीवंत स्पंदन बन जाता है।
देवस्य सवितुर्यच्च भर्गमन्तर्गतं विभुम् ।
ब्रह्मवादिन एवाहुर्वरेण्यं तच्च धीमहि ॥ ९.४२ ॥
सविता देवके भीतर स्थित जो व्यापक भर्ग है — ब्रह्मवादी उसीको वरेण्य कहते हैं; उसका हम ध्यान करते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.४१) में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने गायत्री मन्त्र के 'तत्' और 'यत्' शब्दों के व्याकरणिक सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए यह बताया कि साधक की चेतना में 'तत्' (उस परमात्मा) का स्मरण होते ही स्वतः 'यत्' (वह जो प्रेरित करता है) का बोध होना चाहिए। अब प्रस्तुत श्लोक में वे मन्त्र के मध्य भाग— 'सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि' —के रहस्य को खोल रहे हैं, जहाँ वे सविता, भर्ग और वरेण्य के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थूल और सूक्ष्म दोनों स्तरों पर परिभाषित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: देवस्य सवितुः च यत् भर्गम् अन्तर्गतं विभुम् (तत्) ब्रह्मवादिनः एव आहुः; वरेण्यं तच्च धीमहि।
पदार्थ-निर्वाचन:
• देवस्य सवितुः: सविता देव के। यहाँ 'सविता' केवल सूर्य नहीं, अपितु वह प्रेरक शक्ति है जो समस्त प्रकृतियों और बुद्धियों को जाग्रत करती है।
• भर्गम् अन्तर्गतं विभुम्: वह भर्ग (तेज/प्रकाश) जो उनके भीतर अन्तर्निहित है और सर्वव्यापी (विभुम्) है। 'भर्ग' का शाब्दिक अर्थ है वह तेज जो पापों और अविद्या का भक्षण कर शुद्ध करता है।
• ब्रह्मवादिनः एव आहुः: केवल ब्रह्मवादी ही (इस सत्य को) कहते हैं। यहाँ 'ब्रह्मवादी' वे साधक हैं जिन्होंने शब्दों से ऊपर उठकर ब्रह्म के स्वभाव का अनुभव किया है।
• वरेण्यं तच्च धीमहि: और उसी विभु भर्ग को 'वरेण्य' (वरण करने योग्य, श्रेष्ठतम) कहकर हम उसका ध्यान करते हैं। 'धीमहि' धातु 'ध्यै' से है, जिसका अर्थ केवल सोचना नहीं, अपितु एकाग्रचित्त होकर उसमें लीन होना है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री मन्त्र के दूसरे पाद का विग्रह कर रहे हैं। सामान्यतः लोग सविता को आकाश में स्थित सूर्य देव मानते हैं और उनकी स्तुति करते हैं, किन्तु याज्ञवल्क्य इस स्मृति में उस 'आन्तर सूर्य' की ओर संकेत कर रहे हैं।
वे कहते हैं कि सविता देव के भीतर एक 'भर्ग' है। यह भर्ग कोई भौतिक प्रकाश नहीं, अपितु वह दिव्य तेज है जो व्यापक (विभु) है। जब हम 'सवितुर्वरेण्यं भर्गो' कहते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि उस प्रेरक सत्ता (सविता) का जो शुद्धतम स्वरूप है—जो अविद्या को जलाकर भस्म कर देता है—वही भर्ग है। इस रहस्य को केवल 'ब्रह्मवादी' ही जानते हैं क्योंकि एक कर्मकाण्डी के लिए सविता केवल सूर्य है और भर्ग केवल प्रकाश, किन्तु ब्रह्मवादी के लिए यह आत्मा का वह चैतन्य रूप है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।
इस श्लोक में 'वरेण्य' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। वरण करने योग्य वही होता है जो सर्वश्रेष्ठ हो। जब साधक कहता है "तच्च धीमहि" (उसका हम ध्यान करते हैं), तो वह वास्तव में अपनी सीमित बुद्धि को उस व्यापक भर्ग में विलीन करने का संकल्प करता है। यहाँ विधि यह है कि साधक सविता के बाहरी रूप से आरम्भ करे, किन्तु उसकी दृष्टि उस 'अन्तर्गत विभु' (भीतर स्थित सर्वव्यापी) तेज पर स्थिर करे।
श्रुति-संगति —
सविता और उसके भीतर स्थित पुरुष का यह रहस्य श्रुति में स्पष्ट है। शतपथ ब्राह्मण में वर्णन है कि सूर्यमण्डल के भीतर जो हिरण्मय पुरुष है, वही दाहिनी आँख में स्थित पुरुष है:
अथाध्यात्मम् यदेतन्मण्डलं तपति यश्चैष रुक्म इदं तच्छुक्लमक्षन्नथ यदेतदर्चिर्दीप्यते यच्चैतत्पुष्करपर्णमिदं तत्कृष्णमक्षन्नथ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चैष हिरण्मयः पुरुषोऽयमेव स योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः ॥ १०.५.२.१२ ॥
अब अध्यात्म: यह जो मण्डल तपता है और यह जो (अग्निवेदिपर रखा) रुक्म (सोनेका थाल) है, वह यही आँखका श्वेत भाग है; यह जो ज्योति दीप्त होती है और यह जो पुष्करपर्ण (कमलपत्र) है, वह यही आँखका कृष्ण भाग है; और इस मण्डलमें जो पुरुष है और यह जो हिरण्मय पुरुष (अग्निवेदिपर स्थापित) है, वह यही है जो दाहिनी आँखमें पुरुष है।
इस श्रुति-अंश से सिद्ध होता है कि 'भर्गमन्तर्गतम्' का अर्थ वह चैतन्य प्रकाश है जो बाहर सूर्य के रूप में और भीतर नेत्रों एवं हृदय के आलोक के रूप में स्थित है। बाहरी सूर्य और आन्तरिक पुरुष एक ही तत्त्व के दो छोर हैं।
साथ ही, सविता की प्रेरक शक्ति को श्रुति इस प्रकार रेखांकित करती है:
अथ सावित्री । सविता वै देवानां प्रसविता तथो हास्मा एते सवितृप्रसूता एव सर्वे कामाः समृध्यन्ते तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयादिति ॥ २.३.४.३९ ॥
अब सावित्री (ऋचा): सविता ही देवताओंका प्रसविता (प्रेरक) है; इसलिए उस (यजमान) की ये सब कामनाएँ सविताकी प्रेरणासे ही पूरी होती हैं — "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्" (सविता देवके उस वरणीय तेजका हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करे)।
यहाँ सविता को 'प्रसविता' (प्रेरक) कहा गया है। स्मृति का यह श्लोक इसी प्रेरणा-शक्ति के मूल स्रोत— 'विभु भर्ग' —की उपासना का मार्ग प्रशस्त करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अन्य शास्त्रों में इस मन्त्र के पदों की व्याख्या विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से मिलती है। गोपथ ब्राह्मण में 'भर्ग' और 'वरेण्य' का एक विशिष्ट अर्थ प्रस्तुत किया गया है:
…तं होपेत्य पप्रच्छ किं स्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किं आहुर्धियो विचक्ष्व यदि ताः प्रवेत्थ प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तस्मा एतत्प्रोवाच वेदांश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य कवयोऽन्नं आहुः कर्माणि धियस् तदु ते प्रब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तं उपसंगृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ १.३२ ॥
(मैत्रेय मौद्गल्यके पास) जाकर पूछने लगे — 'भगवन्, (विद्वान्) "सवितुर्वरेण्यम्" किसे कहते हैं? कवि "भर्गो देवस्य" किसे कहते हैं? "धियः" — जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — उनका विवेचन कीजिए, यदि आप जानते हैं।' उन्होंने उसे यह बताया — 'वेदों और छन्दोंको "सवितुर्वरेण्यम्" कहते हैं; कवि अन्नको "भर्गो देवस्य" कहते हैं; कर्म ही "धियः" हैं, जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — यह मैं तुम्हें बताता हूँ।' तब (मैत्रेयने उनके चरण) पकड़कर पूछा — 'भगवन्, पढ़ाइए: सविता कौन है, सावित्री क्या है?'
यहाँ भर्ग को 'अन्न' और वरेण्य को 'वेदों-छन्दों' के रूप में देखा गया है। यदि हम इसे याज्ञवल्क्य स्मृति के साथ रखकर देखें, तो पाते हैं कि एक ही तत्त्व को यहाँ दो भिन्न दृष्टिकोणों से देखा जा रहा है। गोपथ ब्राह्मण का यह निरूपण उस आधार की ओर संकेत करता है जहाँ 'अन्न' प्राण का पोषण कर उसे जाग्रत करता है और 'वेद' बुद्धि को दिशा देते हैं—अर्थात् यह वह स्तर है जहाँ साधक भौतिक एवं बौद्धिक संसाधनों के माध्यम से अपनी चेतना को ऊपर उठाता है। वहीं, याज्ञवल्क्य स्मृति में 'ब्रह्मवादी' की दृष्टि दी गई है, जहाँ भर्ग स्वयं वह व्यापक चैतन्य प्रकाश (विभु) है जो समस्त पोषण और ज्ञान का मूल स्रोत है। दोनों व्याख्याएँ परस्पर पूरक हैं; एक साधन-पक्ष को दिखाती है और दूसरी साध्य-पक्ष को।
वहीं, अग्नि पुराण में 'वरेण्य' शब्द की व्याख्या आध्यात्मिक स्तर पर इस प्रकार की गई है:
वृणोतेर्वरणार्थत्वाज्जाग्रत्स्वप्नादिवर्जितम् । नित्यशुद्धबुद्धमेकं सत्यं तद्धीमहीश्वरम् ॥ अहं ब्रह्म परं ज्योतिर्ध्यायेमहि विमुक्तये । तज्ज्योतिर्भगवान् विष्णुर्जगज्जन्मादिकारणम् ॥ २१६.६–७ ॥
"वृ" धातु वरणके अर्थमें है (इसलिए वरेण्य)। जाग्रत्, स्वप्न आदि (अवस्थाओं) से रहित, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, एक, सत्य उस ईश्वरका हम ध्यान करते हैं। "मैं परम ज्योति ब्रह्म हूँ" — (ऐसा) मुक्तिके लिए ध्यान करें। वह ज्योति जगत्के जन्म आदिके कारण भगवान् विष्णु हैं।
अग्नि पुराण के अनुसार 'वरेण्य' वह स्वरूप है जो जाग्रत-स्वप्न आदि अवस्थाओं से रहित, नित्य और शुद्ध है। यह याज्ञवल्क्य के 'विभु भर्ग' के अर्थ से पूर्णतः मेल खाता है, जहाँ ध्यान का लक्ष्य केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु वह 'परम ज्योति ब्रह्म' है जो अवस्थाओं से परे स्थित है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से इस श्लोक में साधक को 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर ले जाने का अभ्यास बताया गया है।
१. सविता (प्रेरक): साधक पहले उस शक्ति का अनुभव करता है जो उसे जाग्रत करती है (जैसे सूर्य शरीर को जाग्रत करता है, वैसे ही गुरु या स्वाध्याय बुद्धि को)।
२. भर्ग (शुद्धिकरण): फिर वह इस तेज के 'अन्तर्गत' होने का अभ्यास करता है। योगिक अभ्यास में यह भर्ग वह अग्नि है जो साधक के भीतर के मल (काम, क्रोध, मोह) को जलाकर उसे शुद्ध करती है। जब साधक 'भर्ग' का ध्यान करता है, तो वह अपने हृदय में एक दिव्य ज्योति का अनुभव करता है।
३. विभु (व्यापकता): जैसे-जैसे अभ्यास गहरा होता है, यह ज्योति केवल हृदय तक सीमित नहीं रहती, अपितु 'विभु' होकर संपूर्ण देह और फिर संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त प्रतीत होने लगती है।
साधक इस श्लोक के माध्यम से 'अहं' की संकुचित सीमा को तोड़कर उस व्यापक प्रकाश (ब्रह्म) में स्थित होता है। 'धीमहि' का अभ्यास यहाँ यह है कि मन को बाहरी विषयों से हटाकर उस आन्तरिक सूर्य के प्रकाश में स्थिर करना, जिससे बुद्धि (धियो) शुद्ध हो और प्रेरित होने के योग्य बने। यह अवस्था साधक को 'साधन-भूमि' से उठाकर 'अनुभव-भूमि' की ओर ले जाती है।
चिन्तयामो वयं भर्गं धियो यो नः प्रचोदयात् ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु बुद्धिवृत्तीः पुनः पुनः ॥ ९.४३ ॥
हम उस भर्गका चिन्तन करते हैं, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें हमारी बुद्धियोंको — बुद्धिकी वृत्तियोंको — बार-बार प्रेरित करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने गायत्री मन्त्र के ‘भर्ग’ तत्त्व को सविता देव के भीतर स्थित व्यापक और वरेण्य रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि साधक का ध्यान उस प्रकाश-पुंज पर होना चाहिए जो अज्ञान को भस्म कर दे। अब इस श्लोक में वे मन्त्र के तृतीय पाद— "धियो यो नः प्रचोदयात्" के वास्तविक प्रयोजन और उसकी व्यापकता को खोल रहे हैं, ताकि साधक यह जान सके कि इस दिव्य तेज का चिन्तन उसके व्यावहारिक जीवन और आध्यात्मिक उत्थान में किस प्रकार सहायक होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: वयं तं भर्गं चिन्तयामो, यः अस्माकं धर्म-अर्थ-काम-मोक्षेषु बुद्धिवृत्तीः पुनः पुनः प्रचोदयात्।
पदार्थ-निर्वाचन:
• चिन्तयामो वयं (हम चिन्तन करते हैं): यहाँ 'चिन्तन' केवल मानसिक विचार नहीं, अपितु वह एकाग्रता है जिसमें चित्त उस तत्त्व में लीन होने का प्रयास करता है। यह जप और विद्या के बाद की वह अवस्था है जहाँ मन्त्र एक अनुभव बन जाता है।
• भर्गं (उस भर्ग का): वह दिव्य प्रकाश जो पापों का नाश करने वाला और प्रज्ञा को जाग्रत करने वाला है (जैसा पिछले श्लोक में वर्णित हुआ)।
• धियो (बुद्धियों को/विचारों को): 'धी' शब्द यहाँ केवल बौद्धिक क्षमता के लिए नहीं, अपितु उस संकल्प-शक्ति के लिए प्रयुक्त है जो मनुष्य को कर्म की ओर ले जाती है।
• यो नः प्रचोदयात् (जो हमारी प्रेरित करे): 'प्रचोदयात्' का अर्थ है— पीछे से धकेलना या आगे बढ़ाना। अर्थात् वह शक्ति जो जड़ता को समाप्त कर चेतना को गति प्रदान करे।
• धर्मार्थकाममोक्षेषु (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में): ये चारों पुरुषार्थ हैं। साधक की प्रार्थना है कि उसकी बुद्धि केवल भौतिक सुखों में न भटके, अपितु इन चारों के समन्वय और उत्कर्ष में प्रेरित हो।
• बुद्धिवृत्तीः पुनः पुनः (बुद्धि की वृत्तियों को बार-बार): 'वृत्ति' का अर्थ है— मन का वह रूप जो किसी विषय के अनुसार बदलता रहता है। 'पुनः पुनः' यह दर्शाता है कि मानवीय बुद्धि चंचल है, वह बार-बार भटकती है; अतः उसे निरंतर दैवीय प्रेरणा की आवश्यकता होती है।
भाष्य —
प्रस्तुत श्लोक में याज्ञवल्क्य जी गायत्री मन्त्र के उस रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं जहाँ साधक अपनी सीमित बुद्धि का समर्पण उस विराट 'भर्ग' (दिव्य प्रकाश) को करता है। बाहरी दृष्टि से यह एक प्रार्थना प्रतीत होती है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह 'बुद्धि-संस्कार' की प्रक्रिया है।
साधक जब "धियो यो नः प्रचोदयात्" का जप या चिन्तन करता है, तो वह वास्तव में अपनी व्यक्तिगत और अहंवादी बुद्धि को ब्रह्माण्डीय बुद्धि के साथ जोड़ने का प्रयास कर रहा होता है। यहाँ 'भर्ग' उस सूर्य-स्वरूप चैतन्य का प्रतीक है जो हृदय-आकाश में स्थित है। जब यह प्रकाश जाग्रत होता है, तो वह साधक की वृत्तियों को परिष्कृत करता है।
विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऋषि ने यहाँ चारों पुरुषार्थों— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उल्लेख किया है। सामान्यतः आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले लोग अर्थ और काम का त्याग करने की बात करते हैं, किन्तु याज्ञवल्क्य जी यहाँ एक पूर्ण जीवन-दर्शन प्रस्तुत कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि बुद्धि 'भर्ग' द्वारा प्रेरित है, तो वह धर्मानुसार अर्थ प्राप्त करेगी और मर्यादित काम का भोग करेगी, जिससे अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होगा। प्रेरणा का अर्थ है— सही समय पर, सही दिशा में, सही निर्णय लेने की क्षमता। जब बुद्धिवृत्तियाँ बार-बार उस दिव्य प्रकाश से स्पर्श होती हैं, तो साधक के भीतर 'विवेक' जाग्रत होता है। यह विवेक ही उसे संसार में रहते हुए भी संसार से मुक्त रखता है।
श्रुति-संगति —
सविता को समस्त देवताओं और कामनाओं का प्रेरक माना गया है। श्रुति कहती है:
अथ सावित्री । सविता वै देवानां प्रसविता तथो हास्मा एते सवितृप्रसूता एव सर्वे कामाः समृध्यन्ते तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयादिति ॥ २.३.४.३९ ॥
अब सावित्री (ऋचा): सविता ही देवताओंका प्रसविता (प्रेरक) है; इसलिए उस (यजमान) की ये सब कामनाएँ सविताकी प्रेरणासे ही पूरी होती हैं — "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्" (सविता देवके उस वरणीय तेजका हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करे)।
इस अंश से स्पष्ट है कि सविता ही 'प्रसविता' (प्रेरक) है और मनुष्य की समस्त कामनाएँ उसी की प्रेरणा से सिद्ध होती हैं। स्मृति में वर्णित "धर्मार्थकाममोक्षेषु" का विस्तार इसी 'सर्वे कामाः समृध्यन्ते' में निहित है।
पुनः, जब हम क्रियात्मक स्तर पर देखते हैं, तो कोई भी शुभ कार्य सविता की प्रेरणा के बिना संभव नहीं:
अथ गृह्णाति । देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् अग्नये जुष्टं गृह्णामीति सविता वै देवानां प्रसविता तत्सवितृप्रसूत एवैतद्गृह्णात्यश्विनोर्बाहुभ्यामित्यश्विनावध्वर्यू पूष्णो हस्ताभ्यामिति पूषा भागदुघोऽशनं पाणिभ्यामुपनिधाता सत्यं देवा अन्तम्मनुष्यास्तत्सत्येनैवैतद्गृह्णाति ॥ १.१.२.१७ ॥
फिर वह (हवि) ग्रहण करता है — "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् अग्नये जुष्टं गृह्णामि" (सविता देवकी प्रेरणामें, अश्विनोंकी बाहुओंसे, पूषाके हाथोंसे, अग्निके लिए प्रिय तुझे ग्रहण करता हूँ)। सविता ही देवताओंका प्रसविता है; इस प्रकार वह सविताकी प्रेरणासे ही ग्रहण करता है। अश्विन (देवताओंके) अध्वर्यु हैं; पूषा भाग बाँटनेवाला है, जो हाथोंसे भोजन रखता है। देवता सत्य हैं, मनुष्य असत्य; इस प्रकार वह सत्यसे ही ग्रहण करता है।
यहाँ 'प्रसवे' शब्द का अर्थ उसी प्रेरणा से है, जो मनुष्य को सत्य और धर्म के मार्ग पर अग्रसर करती है।
अन्ततः, इस प्रेरणा का चरम लक्ष्य केवल सांसारिक सफलता नहीं, अपितु पूर्णता है:
धियो यो नः प्रचोदयात् मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमामस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भुवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमन्वाह सर्वाश्च मधुमतीः सर्वाश्च व्याहृतीरहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य प्रक्षाल्य प्राणी जघनेनाग्निं प्राक्शिराः संविशति ॥ १४.९.३.१३ ॥
(तीसरा ग्रास —) "धियो यो नः प्रचोदयात्", "मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः" (वनस्पति हमारे लिए मधुमान् हो, सूर्य मधुमान् हो, गौएँ मधुमयी हों), "स्वः स्वाहा"। फिर वह पूरी सावित्री, सब मधुमती ऋचाएँ और सब व्याहृतियाँ पढ़ता है, और अन्तमें "अहमेवेदं सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहा" (मैं ही यह सब हो जाऊँ) कहकर (शेष) पीता है; फिर हाथ धोकर अग्निके पीछे, पूर्वकी ओर सिर करके लेटता है।
जब साधक "धियो यो नः प्रचोदयात्" के साथ-साथ "अहमेवेदं सर्वं भूयासं" का अनुभव करता है, तब वह प्रेरणा उसे अपनी लघुता से निकालकर विराटता में विलीन कर देती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
गायत्री के इस तृतीय पाद की महिमा अन्य शास्त्रों में भी अत्यंत सूक्ष्म रूप से वर्णित है। गोपथ ब्राह्मण में इसे एक सोपान के रूप में देखा गया है:
धियो यो नः प्रचोदयादिति सावित्र्यास्तृतीयः पादः दिवा साम समदधात् साम्नादित्यम् आदित्येन रश्मीन् रश्मिभिर्वर्षम् वर्षेणौषधिवनस्पतीन् ओषधिवनस्पतिभिः पशून् पशुभिः कर्म कर्मणा तपस् तपसा सत्यम् सत्येन ब्रह्म ब्रह्मणा ब्राह्मणम् ब्राह्मणेन व्रतम् व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितो भवति अशून्यो भवत्यविछिन्नो भवत्यविछिन्नोऽस्य तन्तुरविछिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद यश्चैवंविद्वानेवं एतं सावित्र्यास्तृतीयं पादं व्याचष्टे ॥ १.३६ ॥
'धियो यो नः प्रचोदयात्' — यह सावित्रीका तीसरा पाद है: इससे द्युलोकसे सामको जोड़ा, सामसे आदित्यको, आदित्यसे रश्मियोंको, रश्मियोंसे वर्षाको, वर्षासे ओषधि-वनस्पतियोंको, ओषधि-वनस्पतियोंसे पशुओंको, पशुओंसे कर्मको, कर्मसे तपको, तपसे सत्यको, सत्यसे ब्रह्मको, ब्रह्मसे ब्राह्मणको, ब्राह्मणसे व्रतको; व्रतसे ही ब्राह्मण संशित, अशून्य, अविच्छिन्न होता है — जो ऐसा जानता है, और जो ऐसा जानकर सावित्रीके तीसरे पादकी व्याख्या करता है।
यहाँ 'धियो यो नः प्रचोदयात्' से आरम्भ होकर प्रेरणा का क्रम साम, आदित्य, रश्मि और अंततः ब्रह्म तक जाता है। स्मृति जहाँ इस प्रेरणा को पुरुषार्थों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) में देखती है, वहीं गोपथ ब्राह्मण इसे तप और सत्य के माध्यम से ब्रह्म प्राप्ति की सीढ़ी बताता है। दोनों में मेल यह है कि प्रेरणा का आरम्भ 'बुद्धि' से होता है और गन्तव्य 'ब्रह्म' है।
मैत्रेय मौद्गल्य के अनुसार:
…तं होपेत्य पप्रच्छ किं स्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किं आहुर्धियो विचक्ष्व यदि ताः प्रवेत्थ प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तस्मा एतत्प्रोवाच वेदांश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य कवयोऽन्नं आहुः कर्माणि धियस् तदु ते प्रब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तं उपसंगृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ १.३२ ॥
(मैत्रेय मौद्गल्यके पास) जाकर पूछने लगे — 'भगवन्, (विद्वान्) "सवितुर्वरेण्यम्" किसे कहते हैं? कवि "भर्गो देवस्य" किसे कहते हैं? "धियः" — जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — उनका विवेचन कीजिए, यदि आप जानते हैं।' उन्होंने उसे यह बताया — 'वेदों और छन्दोंको "सवितुर्वरेण्यम्" कहते हैं; कवि अन्नको "भर्गो देवस्य" कहते हैं; कर्म ही "धियः" हैं, जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — यह मैं तुम्हें बताता हूँ।' तब (मैत्रेयने उनके चरण) पकड़कर पूछा — 'भगवन्, पढ़ाइए: सविता कौन है, सावित्री क्या है?'
"कर्माणि धियः"— अर्थात् कर्म ही वे बुद्धियाँ हैं जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है। यह स्मृति के इस कथन की पुष्टि करता है कि बुद्धिवृत्तियों की प्रेरणा का सीधा सम्बन्ध हमारे पुरुषार्थों (कर्मों) से है।
अग्नि पुराण में भी इसी भाव को दोहराया गया है:
दधातेर्वा धीमहीति मनसा धारयेमहि । नोऽस्माकं यश्च भर्गश्च सर्वेषां प्राणिनां धियः ॥ चोदयात्प्रेरयेद्बुद्धीर्भोक्तॄणां सर्वकर्मसु । दृष्टादृष्टविपाकेषु विष्णुसूर्याग्निरूपवान् ॥ २१६.१२–१३ ॥
अथवा "धा" धातुसे "धीमहि" — (उसे) मनसे धारण करें। "नः" — हम सब प्राणियोंकी; "यः" — जो भर्ग है, वह "धियः" — बुद्धियोंको; "प्रचोदयात्" — कर्मफल भोगनेवालोंकी बुद्धियोंको, दृष्ट-अदृष्ट फलवाले सब कर्मोंमें, विष्णु-सूर्य-अग्नि रूपसे प्रेरित करे।
जहाँ कहा गया है कि वह भर्ग-स्वरूप ईश्वर हमें "दृष्ट-अदृष्ट विपाकेषु" (दिखने वाले और न दिखने वाले फलों) में प्रेरित करे। यह स्मृति के 'पुनः पुनः' शब्द की व्याख्या करता है— कि जीवन के हर उतार-चढ़ाव और हर कर्मफल के समय हमें उस दिव्य प्रेरणा की आवश्यकता होती है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'वृत्ति-निरोध' और 'वृत्ति-परिवर्तन' का विज्ञान है। पतंजलि योगसूत्र में चित्त की वृत्तियों को शांत करने की बात कही गई है, किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य जी उन वृत्तियों को 'दिव्य प्रेरणा' द्वारा रूपांतरित करने का मार्ग बता रहे हैं।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह अपनी प्रत्येक वृत्ति को देखते हुए उसे भर्ग-प्रकाश के सम्मुख प्रस्तुत करे। जब मन में किसी विषय को लेकर कोई वृत्ति उठे, तो साधक अनुभव करे कि उसकी व्यक्तिगत बुद्धि नहीं, अपितु उसके भीतर स्थित 'विराट पुरुष' (भर्ग) उस वृत्ति को संचालित कर रहा है।
यह अभ्यास साधक को 'साक्षी भाव' से 'ईश्वरीय प्रेरणा' की भूमि तक ले जाता है। जब बुद्धिवृत्तियाँ 'पुनः पुनः' दैवीय प्रकाश से छनकर आती हैं, तो साधक के भीतर 'अहंकार-बुद्धि' समाप्त हो जाती है और 'ब्रह्म-बुद्धि' जाग्रत होती है। इस अवस्था में वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को अलग-अलग लक्ष्यों के रूप में नहीं, अपितु एक ही ईश्वरीय प्रवाह के विभिन्न चरणों के रूप में अनुभव करता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक केवल कर्म नहीं करता, बल्कि उसके भीतर 'ईश्वर' कर्म करता है— यही वास्तविक 'प्रचोदना' है।
बुद्धेर्बोधयिता यस्तु चिदात्मा पुरुषो विराट् ।
सवितुस्तद्वरेण्यं तु सत्यधर्माणमीश्वरम् ॥ ९.४४ ॥
जो बुद्धिको बोध देनेवाला चिदात्मा विराट् पुरुष है — सविताका वह वरेण्य, सत्यधर्मा ईश्वर —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने गायत्री मन्त्र के 'भर्ग' तत्त्व को सविता देव के भीतर स्थित व्यापक और वरेण्य रूप में प्रतिष्ठित किया तथा प्रार्थना की कि वह दिव्य प्रकाश हमारी बुद्धियों को चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में प्रेरित करे। अब इस श्लोक में वे उस प्रेरक शक्ति के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं। वे बता रहे हैं कि जिस 'सविता' से हम बुद्धि की प्रेरणा माँगते हैं, वह वास्तव में कौन है और उसका साधक के भीतर क्या स्थान है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: यस्तु बुद्धेर्बोधयिता चिदात्मा पुरुषो विराट् (अस्ति), स सवितायाः तद्वरेण्यं तु सत्यधर्माणम् ईश्वरम् (अस्ति)।
पदार्थ-निर्वाचन:
• बुद्धेर्बोधयिता (बुद्धि को बोध देने वाला): 'बोध' का अर्थ है जागृति या ज्ञान। जो बुद्धि को जड़ता से निकालकर चेतन करे, जो उसे सत्य का साक्षात्कार कराए, वह 'बोधयिता' है।
• चिदात्मा पुरुषो विराट् (चेतन आत्मा विराट् पुरुष): यहाँ 'विराट्' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। शरीर के स्थूल रूप से लेकर ब्रह्माण्ड के व्यापक रूप तक जो चेतना व्याप्त है, वह विराट् है। यह केवल बाहरी आकार नहीं, अपितु वह चेतन-तत्व है जिसमें संपूर्ण सृष्टि समाहित है।
• सवितुस्तद्वरेण्यं (सविता का वह वरेण्य): गायत्री मन्त्र के 'तत् सवितुर्वरेण्यं' शब्दों का यहाँ रहस्य खुल रहा है। सविता का वह रूप जो श्रेष्ठ (वरेण्य) है, वही यह विराट् पुरुष है।
• सत्यधर्माणम् ईश्वरम् (सत्य-धर्म वाला ईश्वर): जिसका धर्म ही सत्य है और जो समस्त प्रकृतियों का अधिपति (ईश्वर) है। यहाँ 'ईश्वर' शब्द किसी बाहरी व्यक्ति के लिए नहीं, अपितु उस सर्वोच्च सत्ता के लिए है जो बुद्धिको संचालित करती है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में गायत्री मन्त्र की शब्दावली को अध्यात्म की गहराई प्रदान कर रहे हैं। जब साधक कहता है "तत् सवितुर्वरेण्यं", तो वह केवल सूर्य-देव की स्तुति नहीं कर रहा, अपितु उस 'विराट् पुरुष' का आह्वान कर रहा है जो उसकी बुद्धि का वास्तविक बोधक है।
यहाँ रहस्य यह है कि हमारी व्यक्तिगत बुद्धि (व्यष्टि) स्वयं में पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है; उसे प्रेरित करने वाली एक विराट् चेतना (समष्टि) है। वह चिदात्मा, जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड के रूप में विस्तृत है, वही 'विराट्' है। जब हम मन्त्र में 'वरेण्यं' शब्द का प्रयोग करते हैं, तो हमारा तात्पर्य उस सत्य-धर्मा ईश्वर से होता है जो हमारे भीतर साक्षी रूप में स्थित है और बाहर सूर्य रूप में प्रकाशमान है।
बाहरी विधि में सविता सूर्य हैं, किन्तु आन्तर अर्थ में सविता वह 'बोधक शक्ति' है जो अज्ञान के अन्धकार को मिटाकर बुद्धि को आलोकित करती है। याज्ञवल्क्य स्पष्ट कर रहे हैं कि जिस ईश्वर को हम वरेण्य कह रहे हैं, वह कोई दूरस्थ सत्ता नहीं, अपितु वही विराट् पुरुष है जो हमारे प्राणों और चेतना का आधार है। यह श्लोक मन्त्र के 'तत्' (उस) शब्द की व्याख्या करता है— वह 'तत्' ही चिदात्मा विराट् पुरुष है।
श्रुति-संगति —
विराट् पुरुष और सूर्य के इस एकत्व को श्रुति स्पष्ट रूप से पुष्ट करती है:
चित्रं देवानामुदगादनीकमिति । असौ वा आदित्य एष पुरुषस्तदेतच्चित्रं देवानामुदेत्यनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेरित्युभयेषां हैतद्देवमनुष्याणां चक्षुराप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षमित्युद्यन्वा एष इमांलोकानापूरयति सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्चेत्येष ह्यस्य सर्वस्यात्मा यच्च जगद्यच्च तिष्ठति ॥ ७.५.२.२७ ॥
"चित्रं देवानामुदगादनीकम्" (देवताओंका अद्भुत मुख उदित हुआ) — वह आदित्य ही यह पुरुष है; वही देवताओंका अद्भुत मुख उदित होता है। "चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः" — यह देवताओं और मनुष्यों, दोनोंका चक्षु है। "आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम्" — उदित होता हुआ यह इन लोकोंको भर देता है। "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" — क्योंकि यही इस सबका आत्मा है, जो चलता है और जो स्थिर है।
यहाँ श्रुति कहती है कि आदित्य ही वह पुरुष है जो देवताओं का अद्भुत मुख है और "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" अर्थात् सूर्य ही जड़ और चेतन समस्त जगत् का आत्मा है। स्मृति का 'विराट् पुरुष' वही है जिसे श्रुति 'जगतः आत्मा' कहती है।
साधक के भीतर इस विराट् की उपस्थिति को बृहदारण्यक (शतपथ) यहाँ दर्शाता है:
कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः पुरुषः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः स समानः सन्नुभौ लोकौ संचरति ध्यायतीव लेलायतीव सधीः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति ॥ १४.७.१.७ ॥
"आत्मा कौन-सा है?" — "यह जो प्राणों (इन्द्रियों) के बीच विज्ञानमय पुरुष है, हृदयके भीतरकी ज्योति। वह (बुद्धिके) समान होकर दोनों लोकोंमें संचार करता है — मानो ध्यान करता है, मानो चलायमान होता है। बुद्धि-सहित वह स्वप्न होकर इस लोकको लाँघ जाता है।"
कि वह विज्ञानमय पुरुष, जो हृदय के भीतर ज्योति रूप में स्थित है, वही वास्तव में आत्मा है। अतः मन्त्र का 'सविता' बाहर सूर्य है और भीतर यह 'हृद्यन्तर्ज्योतिः' (हृदय-ज्योति) विराट् पुरुष है, जो बुद्धिको बोध प्रदान करता है।
विराट् और व्यष्टि के इस सम्बन्ध को अग्निहोत्र के प्रतीक से भी समझा जा सकता है:
अथाध्यात्मम् यदेतन्मण्डलं तपति यश्चैष रुक्म इदं तच्छुक्लमक्षन्नथ यदेतदर्चिर्दीप्यते यच्चैतत्पुष्करपर्णमिदं तत्कृष्णमक्षन्नथ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चैष हिरण्मयः पुरुषोऽयमेव स योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः ॥ १०.५.२.१२ ॥
अब अध्यात्म: यह जो मण्डल तपता है और यह जो (अग्निवेदिपर रखा) रुक्म (सोनेका थाल) है, वह यही आँखका श्वेत भाग है; यह जो ज्योति दीप्त होती है और यह जो पुष्करपर्ण (कमलपत्र) है, वह यही आँखका कृष्ण भाग है; और इस मण्डलमें जो पुरुष है और यह जो हिरण्मय पुरुष (अग्निवेदिपर स्थापित) है, वह यही है जो दाहिनी आँखमें पुरुष है।
जिस प्रकार मण्डल में स्थित हिरण्मय पुरुष दाहिनी आँख का पुरुष है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड का विराट् पुरुष साधक की दृष्टि और बुद्धि का अधिष्ठाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सविता के स्वरूप को लेकर गोपथ ब्राह्मण एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य प्रकट करता है:
मन एव सविता वाक्सावित्री यत्र ह्येव मनस्तद्वाग्यत्र वै वाक्तन्मन इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् अग्निरेव सविता पृथिवी सावित्री यत्र ह्येवाग्निस्तत्पृथिवी यत्र वै पृथिवी तदग्निरिति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् वायुरेव सवितान्तरिक्षं सावित्री यत्र ह्येव वायुस्तदन्तरिक्षं यत्र वा अन्तरिक्षं तद्वायुरिति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री यत्र ह्येवादित्यस्तद्द्यौर्यत्र वै द्यौस्तदादित्य इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् चन्द्रमा एव सविता नक्षत्राणि सावित्री यत्र ह्येव चन्द्रमास्तन्नक्षत्राणि यत्र वै नक्षत्राणि तच्चन्द्रमा इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् अहरेव सविता रात्रिः सावित्री यत्र ह्येवाहस्तद्रात्रिर्यत्र वै रात्रिस्तदहरिति एते द्वे योनी एक मिथुनम् उष्णं एव सविता शीतं सावित्री यत्र ह्येवोष्णं तच्छीतं यत्र वै शीतं तदुष्णं इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् अभ्रं एव सविता वर्षं सावित्री यत्र ह्येवाभ्रं तद्वर्षं यत्र वै वर्षं तदभ्रं इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् विद्युदेव सविता स्तनयित्नुः सावित्री यत्र ह्येव विद्युत्तत्स्तनयित्नुर्यत्र वै स्तनयित्नुस्तद्विद्युदिति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् प्राण एव सवितान्नं सावित्री यत्र ह्येव प्राणस्तदन्नं यत्र वा अन्नं तत्प्राण इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् वेदा एव सविता छन्दांसि सावित्री यत्र ह्येव वेदास्तच्छन्दांसि यत्र वै छन्दांसि तद्वेदा इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् यज्ञ एक सविता दक्षिणाः सावित्री यत्र ह्येव यज्ञस्तद्दक्षिणा यत्र वै दक्षिणास्तद्यज्ञ इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् एतद्ध स्मैतद्विद्वांसं ओपाकारिं आसस्तुर्ब्रह्मचारी ते संस्थित इत्यथैत आसस्तुराचित इव चितो बभूव अथोत्थाय प्राव्राजीदित्येतद्वा अहं वेद नैतासु योनिष्वित एतेभ्यो वा मिथुनेभ्यः संभूतो ब्रह्मचारी मम पुरायुषः प्रेयादिति ॥ १.३३ ॥
मन ही सविता है, वाणी सावित्री — जहाँ मन है वहाँ वाणी, जहाँ वाणी वहाँ मन; ये दो योनियाँ एक मिथुन (जोड़ा) हैं। (इसी प्रकार) अग्नि सविता, पृथ्वी सावित्री; वायु सविता, अन्तरिक्ष सावित्री; आदित्य सविता, द्यौ सावित्री; चन्द्रमा सविता, नक्षत्र सावित्री; दिन सविता, रात्रि सावित्री; उष्ण सविता, शीत सावित्री; मेघ सविता, वर्षा सावित्री; विद्युत् सविता, गर्जन सावित्री; प्राण सविता, अन्न सावित्री; वेद सविता, छन्द सावित्री; यज्ञ सविता, दक्षिणाएँ सावित्री — प्रत्येक जोड़ेमें जहाँ एक है वहाँ दूसरा; ये दो योनियाँ एक मिथुन हैं। (कथा है कि) ऐसे जाननेवाले ओपाकारिसे (लोगोंने) कहा कि तुम्हारा ब्रह्मचारी मर गया; वह (क्षणभर) मानो जड़ हो गया, फिर उठकर चल पड़ा और बोला — 'मैं यह जानता हूँ: इन योनियों, इन मिथुनोंसे उत्पन्न मेरा ब्रह्मचारी आयु पूरी होनेसे पहले नहीं जा सकता।'
यहाँ कहा गया है कि "मन एव सविता" (मन ही सविता है) और "प्राण एव सविता"। यह स्मृति के इस श्लोक की पूर्णतः पुष्टि करता है कि सविता केवल आकाश का सूर्य नहीं, अपितु भीतर का मन और प्राण भी है। जब स्मृति कहती है कि 'चिदात्मा विराट् पुरुष' बुद्धिको बोध देता है, तो गोपथ ब्राह्मण उसे व्यावहारिक रूप में 'मन-सविता' और 'प्राण-सविता' के रूप में दिखाता है। दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि सविता वह प्रेरक शक्ति है जो सूक्ष्म शरीर के माध्यम से चेतना को जाग्रत करती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'व्यष्टि' से 'समष्टि' की ओर ले जाने वाला सोपान है। सामान्यतः साधक गायत्री का जप केवल मानसिक शांति या बौद्धिक प्रखरता के लिए करता है, किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य उसे 'विराट् पुरुष' के ध्यान में ले जा रहे हैं।
अभ्यास यह है कि जब साधक "तत् सवितुर्वरेण्यं" कहे, तो वह अपनी बुद्धि को संकुचित व्यक्तिगत पहचान से निकालकर उस विराट् चेतना में विलीन करे जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। इसका अनुभव तब होता है जब साधक अनुभव करता है कि उसकी बुद्धि केवल उसका अपना छोटा सा हिस्सा नहीं, अपितु उसी महान 'चिदात्मा' का एक अंश है।
योगी यहाँ इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह स्वयं को शरीर न मानकर उस 'विराट् पुरुष' की ज्योति का प्रतिबिंब मानता है। अभ्यास यह है— हृदय के भीतर स्थित उस 'बोधयिता' (ज्ञान देने वाले) प्रकाश का अनुभव करना, जो सूर्य की भाँति देदीप्यमान है। जब साधक इस विराट् रूप का ध्यान करता है, तो उसकी बुद्धि 'सत्यधर्माण' होने लगती है, अर्थात् वह केवल भौतिक लाभ न देखकर सत्य के मार्ग पर चलने लगती है। यह अभ्यास साधक को व्यक्तिगत अहंकार (अहंकार-बुद्धि) से उठाकर ईश्वरीय प्रज्ञा (विराट्-बुद्धि) की भूमि तक ले जाता है।
भर्गपदार्थः
हिरण्यवर्णं पुरुषं ध्यायेम विष्णुसंज्ञकम् ।
भेति भासयते लोकान् रेति रञ्जयते प्रजाः ॥ ९.४५ ॥
— (उस) सुवर्णवर्ण, विष्णु नामवाले पुरुषका हम ध्यान करें। "भ" — (वह) लोकोंको भासित करता है; "र" — प्रजाओंको रञ्जित (प्रसन्न) करता है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने 'भर्ग' तत्त्व को उस विराट् पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित किया जो बुद्धि को बोध देने वाला और सत्यधर्मा ईश्वर है। अब इस श्लोक में वे उस विराट् स्वरूप के विशिष्ट वर्ण, संज्ञा और उसके कार्य-स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जिससे साधक के लिए ध्यान का एक निश्चित आधार (आलम्बन) प्राप्त हो सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (वयं) हिरण्यवर्णं विष्णुसंज्ञकं पुरुषं ध्यायेम । (सः) 'भ' (इत्यर्थे) लोकान् भेति भासयते, 'र' (इत्यर्थे) प्रजाः रेति रञ्जयते।
पदार्थ-निर्वाचन:
• हिरण्यवर्णं (सुवर्ण के रंग वाला): हिरण्य का अर्थ केवल भौतिक सोना नहीं, अपितु वह प्रकाश है जो शुद्ध, देदीप्यमान और अक्षय है। यह उस चैतन्य की आभा है जो अविद्या के अन्धकार को नष्ट करती है।
• विष्णुसंज्ञकम् (विष्णु नाम वाला): 'विष्णु' शब्द 'विष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है—व्याप्त होना। वह पुरुष जो समस्त चराचर जगत में सर्वव्यापी है, वही विष्णु है।
• भ्येति भासयते (भेदता और प्रकाशित करता है): यहाँ 'भ' अक्षर का विश्लेषण है। 'भेति' का अर्थ है—अज्ञान के आवरण को भेदना; 'भासयते' का अर्थ है—प्रकाशित करना।
• रेति रञ्जयते (रंगता या प्रसन्न करता है): यहाँ 'र' अक्षर का विश्लेषण है। 'रञ्जन' का अर्थ है—आनन्दित करना या रस प्रदान करना। जब सत्य का प्रकाश हृदय में उतरता है, तो वह साधक को परमानन्द से भर देता है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ गायत्री मन्त्र के 'भर्ग' शब्द की आंतरिक मीमांसा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस भर्ग का हम ध्यान करते हैं, वह वास्तव में वह सुवर्ण-आभा वाला विराट् पुरुष है जिसे 'विष्णु' कहा गया है। विष्णु होना उसकी व्यापकता का लक्षण है—वह अणु से महान तक व्याप्त है।
यहाँ ऋषि एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य खोल रहे हैं: वे 'भर्ग' शब्द के अक्षरों (वर्णों) के माध्यम से उस सत्ता की कार्यविधि बता रहे हैं।
प्रथम अक्षर 'भ' का अर्थ है—भेदना और प्रकाशित करना। जिस प्रकार सूर्य की किरणें घने बादलों को भेदकर पृथ्वी को आलोकित करती हैं, वैसे ही यह भर्ग-पुरुष साधक के भीतर स्थित अज्ञान, मोह और माया के पर्दों को 'भेदता' है और आत्मा के वास्तविक स्वरूप को 'भासित' करता है। बिना भेदन के प्रकाश संभव नहीं; जब तक बुद्धि की जड़ता नहीं टूटती, तब तक बोध का उदय नहीं होता।
द्वितीय अक्षर 'र' का अर्थ है—रञ्जन या आनन्दित करना। केवल प्रकाश पर्याप्त नहीं है, वह प्रकाश जब हृदय में रस बनकर प्रवाहित होता है, तब वह 'रञ्जयते प्रजाः' अर्थात् जीव को परम संतोष और प्रसन्नता प्रदान करता है। यह वह अवस्था है जहाँ ज्ञान केवल सूचना नहीं रहता, अपितु आनन्द बन जाता है।
इस प्रकार, भर्ग का अर्थ केवल एक शब्द नहीं, अपितु एक प्रक्रिया है—अज्ञान का भेदन → सत्य का प्रकाश → आत्मा का रञ्जन (आनन्द)। यह सुवर्ण-वर्णी पुरुष वह दिव्य तेज है जो साधक को अंधकार से प्रकाश की ओर और प्रकाश से आनन्द की ओर ले जाता है।
श्रुति-संगति —
श्रुति स्पष्ट रूप से इस हिरण्य-पुरुष के स्वरूप और भर्ग के सम्बन्ध को पुष्ट करती है।
(शतपथ १०.५.२.१२) में वर्णन है कि जिस प्रकार अग्निवेदि पर रुक्म (सोने का थाल) और हिरण्मय पुरुष स्थित होता है, वही वास्तव में दाहिनी आँख (सूर्य-नेत्र) में प्रतिष्ठित पुरुष है। याज्ञवल्क्य इसी श्रुति के रहस्य को स्मृति में लाते हुए 'हिरण्यवर्णं पुरुषं' कहते हैं। यह संकेत है कि जिसे हम बाहर सूर्य या स्वर्ण के रूप में देखते हैं, वह वास्तव में हमारी अपनी चेतना का वह उच्चतम शिखर है जो दाहिने नेत्र (ज्ञान-नेत्र) के माध्यम से प्रकाशित होता है।
अथाध्यात्मम् यदेतन्मण्डलं तपति यश्चैष रुक्म इदं तच्छुक्लमक्षन्नथ यदेतदर्चिर्दीप्यते यच्चैतत्पुष्करपर्णमिदं तत्कृष्णमक्षन्नथ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चैष हिरण्मयः पुरुषोऽयमेव स योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः ॥ १०.५.२.१२ ॥
अब अध्यात्म: यह जो मण्डल तपता है और यह जो (अग्निवेदिपर रखा) रुक्म (सोनेका थाल) है, वह यही आँखका श्वेत भाग है; यह जो ज्योति दीप्त होती है और यह जो पुष्करपर्ण (कमलपत्र) है, वह यही आँखका कृष्ण भाग है; और इस मण्डलमें जो पुरुष है और यह जो हिरण्मय पुरुष (अग्निवेदिपर स्थापित) है, वह यही है जो दाहिनी आँखमें पुरुष है।
साथ ही, (शतपथ ५.४.५.१) में कहा गया है—'वीर्यं वै भर्ग एष विष्णुर्यज्ञः'। यहाँ श्रुति ने 'भर्ग' और 'विष्णु' को एक ही संज्ञा दी है। भर्ग वह वीर्य (शक्ति/तेज) है जो सर्वव्यापी विष्णु का स्वरूप है। जब याज्ञवल्क्य इस स्मृति में 'विष्णुसंज्ञकम्' कहते हैं, तो वे इसी श्रुति-परम्परा को विस्तार दे रहे हैं कि भर्ग कोई बाहरी देवता नहीं, अपितु वह व्यापक ईश्वरीय शक्ति है।
वरुणाद्ध वा अभिषिषिचानाद्भर्गोऽपचक्राम । वीर्यं वै भर्ग एष विष्णुर्यज्ञः सोऽस्मादपचक्राम शश्वद्य एषोऽपां रसः सम्भृतो भवति येनैनमेतदभिषिञ्चति सोऽस्य भर्गं निर्जघान ॥ ५.४.५.१ ॥
अभिषेक किये जाते हुए वरुणसे भर्ग निकल गया। भर्ग वीर्य ही है; (और) यह यज्ञ विष्णु है — वह उससे निकल गया। (यजमानका) जिस (जल) से अभिषेक करते हैं, वह जलोंका सँजोया हुआ रस है; उसीने इसके भर्गको (बाहर) धकेल दिया।
शास्त्र-साक्ष्य —
(गोपथ ब्राह्मण, पूर्वभाग १.३२) में गोपथ ब्राह्मण के अनुसार 'कवि अन्न को भर्ग कहते हैं'। यदि हम इसे स्थूल रूप से देखें तो अन्न शरीर का पोषण करता है, किन्तु सूक्ष्म रूप से 'अन्न' वह ऊर्जा है जो प्राण को धारण करती है। स्मृति में 'भ' और 'र' का अर्थ (भेदना और रञ्जित करना) इसी ऊर्जा के परिष्कृत रूप को दर्शाता है—वह तेज जो जड़ता को भेदकर जीवन-रस (रञ्जन) प्रदान करता है।
…तं होपेत्य पप्रच्छ किं स्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किं आहुर्धियो विचक्ष्व यदि ताः प्रवेत्थ प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तस्मा एतत्प्रोवाच वेदांश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य कवयोऽन्नं आहुः कर्माणि धियस् तदु ते प्रब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तं उपसंगृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ १.३२ ॥
(मैत्रेय मौद्गल्यके पास) जाकर पूछने लगे — 'भगवन्, (विद्वान्) "सवितुर्वरेण्यम्" किसे कहते हैं? कवि "भर्गो देवस्य" किसे कहते हैं? "धियः" — जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — उनका विवेचन कीजिए, यदि आप जानते हैं।' उन्होंने उसे यह बताया — 'वेदों और छन्दोंको "सवितुर्वरेण्यम्" कहते हैं; कवि अन्नको "भर्गो देवस्य" कहते हैं; कर्म ही "धियः" हैं, जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — यह मैं तुम्हें बताता हूँ।' तब (मैत्रेयने उनके चरण) पकड़कर पूछा — 'भगवन्, पढ़ाइए: सविता कौन है, सावित्री क्या है?'
(अग्नि पुराण २१६.८–९ (गायत्रीनिर्वाण)) अग्नि पुराण में भी यह उल्लेख है कि अग्नि, सूर्य आदि रूपों वाले 'विष्णु' ही वास्तव में ब्रह्म हैं और सवितु का परम पद विष्णु का ही पद है। यह स्मृति के इस श्लोक से पूर्णतः मेल खाता है कि जिसे हम सविता कहते हैं, उसका वास्तविक स्वरूप वह हिरण्यवर्ण विष्णु पुरुष ही है।
शिवं केचित्पठन्ति स्म शक्तिरूपं पठन्ति च । केचित्सूर्यं केचिदग्निं वेदगा अग्निहोत्रिणः ॥ अग्न्यादिरूपो विष्णुर्हि वेदादौ ब्रह्म गीयते । तत्पदं परमं विष्णोर्देवस्य सवितुः स्मृतम् ॥ २१६.८–९ ॥
कुछ (उस ज्योतिको) शिव कहते हैं, कुछ शक्तिरूप; कुछ सूर्य, और कुछ वेदज्ञ अग्निहोत्री अग्नि। (वस्तुतः) अग्नि आदि रूपोंवाले विष्णु ही वेद आदिमें ब्रह्म कहे जाते हैं; "देवस्य सवितुः" — वह विष्णुका परम पद माना गया है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'ध्यान' की एक विधि है। यहाँ 'ध्यायेम' क्रिया का प्रयोग हुआ है। साधक को चाहिए कि वह अपनी दृष्टि को बाहरी जगत से हटाकर अपने भीतर उस 'हिरण्यवर्ण' (स्वर्ण आभा) का साक्षात्कार करे।
अभ्यास की विधि इस प्रकार है:
१. वर्ण-ध्यान: साधक हृदय के आकाश में या भ्रूमध्य में एक देदीप्यमान सुवर्ण प्रकाश की कल्पना करे। यह प्रकाश केवल रंग नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य की प्रखरता है।
२. विष्णु-भाव (व्यापकता): वह अनुभव करे कि यह प्रकाश केवल एक बिंदु नहीं, बल्कि 'विष्णु' की भाँति उसके पूरे अस्तित्व और संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।
३. भ-र प्रक्रिया का अनुभव:
• जब साधक इस प्रकाश में लीन होता है, तो वह अनुभव करता है कि उसकी मानसिक जड़ता और संशय के पर्दे 'भेदित' (भेति) हो रहे हैं। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक विस्फोट है जहाँ अज्ञान टूटता है।
• इसके तुरंत बाद, वह अनुभव करता है कि उसका रोम-रोम उस दिव्य प्रकाश से 'रञ्जित' (रेति) हो रहा है। यहाँ साधक ज्ञान-भूमि से आनन्द-भूमि की ओर प्रस्थान करता है।
यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर के बोध से उठाकर विराट् पुरुष के बोध तक ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को एक सीमित इकाई न मानकर उस व्यापक हिरण्य-प्रकाश का अंश अनुभव करने लगता है।
गइत्यागच्छतेऽजस्रं भरगा(णा)द्भर्ग उच्यते ।
अग्नीषोमात्मकं बिभ्रद्वैश्वरूपेण कर्मणा ॥ ९.४६ ॥
"ग" — निरन्तर आता-जाता (गति करता) है; (और) भरण करनेसे (भी) भर्ग कहलाता है। (वह) विश्वरूप कर्मसे अग्नि-सोमरूप (जगत्) को धारण करता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ने 'भर्ग' शब्द के प्रथम दो वर्णों 'भ' और 'र' का विश्लेषण करते हुए उसे लोक-प्रकाशक और प्रजा-रञ्जित करने वाले विष्णुस्वरूप विराट् पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित किया। वर्तमान श्लोक में वे 'भर्ग' शब्द के तीसरे वर्ण 'ग' की व्याख्या कर रहे हैं और साथ ही इस शब्द के व्युत्पत्तिपरक अर्थ तथा उसके द्वारा किए जाने वाले विश्व-पालन के रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) 'ग' (इत्यर्थे) अजस्रं (निरन्तर) आगच्छते, (अतः) भरण (पोषण) करनेसे (अपि) भर्ग उच्यते । (सः) अग्नीषोमात्मकं (जगत्) वैश्वरूपेण कर्मणा बिभ्रत् (धारण करता है)।
पदार्थ-निर्वाचन:
• गइत्यागच्छतेऽजस्रं ('ग' निरन्तर आता-जाता है): यहाँ 'भर्ग' के अंतिम अक्षर 'ग' का विश्लेषण है। 'ग' धातु गति का सूचक है। 'अजस्रम्' का अर्थ है—बिना किसी रुकावट के, निरंतर। यह उस चेतना की गति है जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त होकर निरंतर प्रवाहित रहती है।
• भरणसे भर्ग (भरगा(णा)द्भर्ग): यहाँ 'भर्ग' शब्द की व्युत्पत्ति 'भृ' धातु (भरण/पोषण करना) से की गई है। जो समस्त चराचर जगत का पोषण करता है, वह भर्ग है।
• अग्नीषोमात्मकं (अग्नि और सोम के स्वरूप वाला): अग्नि ऊर्जा, ताप और ऊर्ध्वगति का प्रतीक है; सोम शीतलता, तृप्ति और अधोगति का। संपूर्ण ब्रह्माण्ड इन दो विपरीत तत्त्वों (ऊर्जा और पदार्थ/ताप और शीत) के संतुलन से बना है।
• वैश्वरूपेण कर्मणा (विश्व-रूप कर्म द्वारा): वह पुरुष जो स्वयं ही समस्त जगत (विश्व) के रूप में कार्य करता है, उसकी वह व्यापक क्रिया ही 'वैश्वरूप कर्म' है।
• बिभ्रत् (धारण करने वाला): वह इस संपूर्ण अग्नि-सोममय जगत को अपने अस्तित्व में संभाले हुए है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ 'भर्ग' शब्द के पूर्ण वर्ण-विच्छेद और उसके अर्थ-विस्तार को पूर्ण कर रहे हैं। पिछले श्लोक में 'भ' से प्रकाश (भेदना) और 'र' से रञ्जन (आनन्द) का बोध हुआ, अब 'ग' अक्षर द्वारा वे उस 'गति' की ओर संकेत करते हैं जो इस सृष्टि के संचालन का आधार है। यह गति कोई स्थूल विस्थापन नहीं, अपितु वह चैतन्य स्पन्दन है जो निरंतर प्रवाहित होकर जगत को जीवंत रखता है।
रहस्य यह है कि भर्ग केवल एक प्रकाश-पुंज नहीं, बल्कि 'भरण' करने वाला पोषक तत्त्व है। जिस प्रकार शरीर का पोषण अन्न से होता है, उसी प्रकार चेतना का पोषण इस दिव्य भर्ग-तत्त्व से होता है। वह विराट् पुरुष अपनी वैश्वरूप कर्मशक्ति से संपूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण किए हुए है। यहाँ 'अग्नीषोमात्मक' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह दर्शाता है कि सृष्टि के द्वैत—जैसे दिन और रात्रि, ताप और शीत, पुरुष और प्रकृति—वास्तव में उस एक ही भर्ग-तत्त्व के दो आयाम हैं। वह एक ओर अग्नि बनकर प्रज्वलित करता है और दूसरी ओर सोम बनकर तृप्त करता है। इस प्रकार, वह समस्त विरोधाभासों को अपने भीतर समेटकर जगत का संतुलन बनाए रखता है।
श्रुति-संगति —
भर्ग के पोषण और धारण करने वाले स्वरूप की पुष्टि श्रुतियों में स्पष्ट मिलती है:
वरुणाद्ध वा अभिषिषिचानाद्भर्गोऽपचक्राम । वीर्यं वै भर्ग एष विष्णुर्यज्ञः सोऽस्मादपचक्राम शश्वद्य एषोऽपां रसः सम्भृतो भवति येनैनमेतदभिषिञ्चति सोऽस्य भर्गं निर्जघान ॥ ५.४.५.१ ॥
अभिषेक किये जाते हुए वरुणसे भर्ग निकल गया। भर्ग वीर्य ही है; (और) यह यज्ञ विष्णु है — वह उससे निकल गया। (यजमानका) जिस (जल) से अभिषेक करते हैं, वह जलोंका सँजोया हुआ रस है; उसीने इसके भर्गको (बाहर) धकेल दिया।
यहाँ भर्ग को 'वीर्य' (बल/तेज) और 'रस' कहा गया है। रस वही तत्त्व है जो जीवन का पोषण करता है। स्मृति का "भरणाद्भर्गः" (पोषण से भर्ग) इसी श्रुति-अंश का विस्तार है, जहाँ भर्ग वह जीवनी-शक्ति है जो अभिषेक के माध्यम से या प्राण के रूप में शरीर और जगत को पोषित करती है।
जगत के धारण करने के विषय में:
अयं वै लोको भर्गः। अंतरिक्षलोको महः।द्यौर्यशः। येऽन्ये लोकास्तत्सर्वम् ॥ १२.३.४.७ ॥
यह (पृथ्वी-) लोक ही भर्ग है, अन्तरिक्षलोक महः, द्युलोक यश; और जो अन्य लोक हैं, वे "सर्व" हैं।
श्रुति कहती है कि "यह लोक ही भर्ग है"। जब पृथ्वी-लोक स्वयं भर्ग है, तो इसका अर्थ है कि वह आधारभूत तत्त्व जो इस भौतिक जगत को संभाले हुए है, वही भर्ग है।
अग्नि-सोम के संतुलन के विषय में:
अग्निर्वै भर्गः। वायुर्महः। आदित्यो यशः। येऽन्ये देवास्तत्सर्वम् ॥ १२.३.४.८ ॥
अग्नि ही भर्ग है, वायु महः, आदित्य यश; और जो अन्य देवता हैं, वे "सर्व" हैं।
यहाँ "अग्नि ही भर्ग है" कहा गया है। स्मृति का 'अग्नीषोमात्मकं' कहना इस सत्य को पूर्ण करता है कि जहाँ अग्नि (भर्ग) प्रकाश और ताप है, वहीं सोम उसकी पूरक शीतलता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
…तं होपेत्य पप्रच्छ किं स्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किं आहुर्धियो विचक्ष्व यदि ताः प्रवेत्थ प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तस्मा एतत्प्रोवाच वेदांश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य कवयोऽन्नं आहुः कर्माणि धियस् तदु ते प्रब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति तं उपसंगृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ १.३२ ॥
(मैत्रेय मौद्गल्यके पास) जाकर पूछने लगे — 'भगवन्, (विद्वान्) "सवितुर्वरेण्यम्" किसे कहते हैं? कवि "भर्गो देवस्य" किसे कहते हैं? "धियः" — जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — उनका विवेचन कीजिए, यदि आप जानते हैं।' उन्होंने उसे यह बताया — 'वेदों और छन्दोंको "सवितुर्वरेण्यम्" कहते हैं; कवि अन्नको "भर्गो देवस्य" कहते हैं; कर्म ही "धियः" हैं, जिनसे सविता प्रेरित करता हुआ चलता है — यह मैं तुम्हें बताता हूँ।' तब (मैत्रेयने उनके चरण) पकड़कर पूछा — 'भगवन्, पढ़ाइए: सविता कौन है, सावित्री क्या है?'
गोपथ ब्राह्मण में कवियों द्वारा भर्ग को 'अन्न' कहा गया है ("कवयोऽन्नं आहुः भर्गो देवस्य")। यह स्मृति के "भरणाद्भर्गः" (भरण/पोषण से भर्ग) के साथ पूर्णतः मेल खाता है। यहाँ अन्न का अर्थ केवल स्थूल भोजन नहीं, अपितु वह 'ब्रह्म-अन्न' है जो आत्मा को पुष्ट करता है और शरीर को धारण करता है। गोपथ ब्राह्मण जहाँ इसे 'अन्न' कहकर पोषण की ओर संकेत करता है, वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति उसे 'वैश्वरूप कर्म' कहकर उस महान ईश्वरीय क्रिया की ओर ले जाती है जिससे यह संपूर्ण अन्नमय जगत संचालित है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास अत्यंत सूक्ष्म और गहरा है। यहाँ साधक को तीन स्तरों पर अनुभव करना है:
१. वर्ण-अभ्यास (बीज-गति): जब साधक 'भर्ग' शब्द का जप या ध्यान करता है, तो उसे 'ग' अक्षर पर आते ही उस निरंतर प्रवाह (अजस्र गति) का अनुभव करना चाहिए जो उसके भीतर प्राण के रूप में प्रवाहित हो रहा है। यह वह गति है जो चित्त को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है।
२. भरण-अनुभव: साधक यह अनुभव करे कि उसका अस्तित्व किसी बाहरी साधन से नहीं, बल्कि उस आंतरिक 'भर्ग' (दिव्य तेज) द्वारा पोषित हो रहा है। जब वह स्वयं को 'विष्णु' (व्याप्त) स्वरूप में देखता है, तब वह पाता है कि वह केवल पोषित होने वाला जीव नहीं, अपितु उसी विराट् भर्ग का एक अंश है।
३. संतुलन का योग: 'अग्नीषोमात्मकं बिभ्रत्' का अभ्यास करते हुए साधक अपने भीतर के ताप (क्रोध, उत्तेजना, क्रिया) और शीतलता (शांति, संतोष, स्थिरता) के संतुलन को देखता है। वह अनुभव करता है कि उसका हृदय उस केंद्र बिंदु की भाँति है जहाँ अग्नि और सोम का मिलन हो रहा है। इस संतुलन की स्थिति में ही वह 'वैश्वरूप' की अनुभूति करता है—जहाँ वह स्वयं को सीमित शरीर न मानकर पूरे ब्रह्माण्ड को अपने भीतर धारण करने वाला एक विराट् चैतन्य अनुभव करता है। यह अभ्यास साधक को व्यक्ति-भूमि से विराट्-भूमि की ओर ले जाता है।
सूर्यनामधेयनिर्वचनानि
जगदाधानसिद्ध्यर्थं सूर्यात्मा जगतोऽपि च ।
शश्वत्प्रसूयणात् सूर्यः पावनात् पवनः स्मृतः ॥ ९.४७ ॥
जगत्की स्थापनाकी सिद्धिके लिए (वह) जगत्का आत्मा सूर्य है; निरन्तर प्रसव (उत्पन्न) करनेसे सूर्य, और पवित्र करनेसे पवन कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने भर्ग के 'ग' और 'भ' अक्षरों की व्याख्या करते हुए उसे विराट पुरुष और संपूर्ण जगत् का धारणकर्ता बताया। अब वर्तमान श्लोक में वे इस भर्ग (सूर्य) के उस स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं, जो केवल पोषण नहीं करता, अपितु समस्त सृष्टि का मूल कारण और प्राण-तत्त्व है। यहाँ सूर्य के 'आत्मा' होने और उसके 'पवन' रूपी पर्याय का रहस्य समझाया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) जगदाधानसिद्ध्यर्थं जगतोऽपि च सूर्यात्मा (अस्ति) । शश्वत्प्रसूयणात् सूर्यः (उच्यते), पावनात् पवनः स्मृतः।
पदार्थ और निर्वचन:
• जगदाधानसिद्ध्यर्थं: 'जगत्' + 'आधान' + 'सिद्धि' + 'अर्थम्'। जगत् के आधान (स्थापना/आधार) की सिद्धि के लिए। यहाँ 'आधान' का अर्थ है—वह आधार जिस पर संपूर्ण दृश्य जगत टिका हुआ है।
• सूर्यात्मा: सूर्य ही इस जगत् का आत्मा है। 'आत्मा' वह तत्त्व है जिसके बिना शरीर या वस्तु मृत और निष्क्रिय हो जाती है।
• शश्वत्प्रसूयणात्: 'शश्वत' (निरन्तर) + 'प्रसूयणात्' (उत्पन्न करने के कारण)। जो निरंतर समस्त प्राणियों और प्रवृत्तियों को जन्म देता है या उन्हें अभिव्यक्त करता है।
• पावनात् पवनः: 'पावन' (पवित्र करने वाला) होने के कारण वह 'पवन' (वायु) कहा गया है। यहाँ पवन केवल भौतिक वायु नहीं, अपितु वह प्राण-शक्ति है जो शुद्धि करती है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में एक अत्यंत गूढ़ सत्य प्रकट कर रहे हैं कि यह दृश्यमान जगत् स्वतंत्र नहीं है; इसकी स्थापना और सिद्धि के लिए जिस आधार की आवश्यकता है, वह 'सूर्यात्मा' है। सूर्य यहाँ केवल आकाश का एक गोल पिंड नहीं है, अपितु वह चेतना-प्रकाश है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। जैसे शरीर में आत्मा के बिना कोई गति संभव नहीं, वैसे ही इस विराट शरीर (जगत्) में सूर्य-तत्त्व के बिना न प्रकाश है, न जीवन और न ही अस्तित्व।
आगे ऋषि कहते हैं कि इस परम तत्त्व को 'सूर्य' इसलिए कहा गया क्योंकि वह 'शश्वत् प्रसूयणा' है। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि की प्रत्येक कोशिका, प्रत्येक विचार और प्रत्येक जीव इसी सूर्य-शक्ति (सवितृ-शक्ति) के निरंतर प्रसव या प्रकटीकरण का परिणाम है। जो निरंतर सृजन करता है, वही सूर्य है।
अत्यंत सूक्ष्म बात यहाँ 'पवन' शब्द में छिपी है। सामान्यतः हम पवन को वायु समझते हैं, किन्तु याज्ञवल्क्य उसे 'पावनात्' (पवित्र करने के कारण) कह रहे हैं। वह प्रकाश-तत्त्व जब प्राण-शक्ति के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होता है, तो वह अशुद्धियों का नाश कर साधक को पवित्र करता है। अतः सूर्य और पवन एक ही परम तत्त्व के दो रूप हैं—एक जो बाह्य रूप से प्रकाशित कर प्रसव (सृजन) करता है, और दूसरा जो आन्तरिक रूप से प्राण बनकर शुद्धि (पावन) करता है।
श्रुति-संगति —
जगत् के आधार के रूप में सूर्य की स्थिति शतपथ ब्राह्मण में स्पष्ट है:
चित्रं देवानामुदगादनीकमिति । असौ वा आदित्य एष पुरुषस्तदेतच्चित्रं देवानामुदेत्यनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेरित्युभयेषां हैतद्देवमनुष्याणां चक्षुराप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षमित्युद्यन्वा एष इमांलोकानापूरयति सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्चेत्येष ह्यस्य सर्वस्यात्मा यच्च जगद्यच्च तिष्ठति ॥ ७.५.२.२७ ॥
"चित्रं देवानामुदगादनीकम्" (देवताओंका अद्भुत मुख उदित हुआ) — वह आदित्य ही यह पुरुष है; वही देवताओंका अद्भुत मुख उदित होता है। "चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः" — यह देवताओं और मनुष्यों, दोनोंका चक्षु है। "आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम्" — उदित होता हुआ यह इन लोकोंको भर देता है। "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" — क्योंकि यही इस सबका आत्मा है, जो चलता है और जो स्थिर है।
यहाँ श्रुति कहती है— "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" अर्थात् सूर्य ही चलने वाले और स्थिर रहने वाले, दोनों प्रकार के जगत् का आत्मा है। स्मृति का 'सूर्यात्मा' शब्द इसी श्रुति का विस्तार है, जो यह सिद्ध करता है कि सूर्य वह केंद्रीय चेतना है जिसके बिना सृष्टि की 'आधान-सिद्धि' (स्थापना) संभव नहीं थी।
सूर्य के प्रसवकर्ता होने का प्रमाण यहाँ मिलता है:
अथ गृह्णाति । देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् अग्नये जुष्टं गृह्णामीति सविता वै देवानां प्रसविता तत्सवितृप्रसूत एवैतद्गृह्णात्यश्विनोर्बाहुभ्यामित्यश्विनावध्वर्यू पूष्णो हस्ताभ्यामिति पूषा भागदुघोऽशनं पाणिभ्यामुपनिधाता सत्यं देवा अन्तम्मनुष्यास्तत्सत्येनैवैतद्गृह्णाति ॥ १.१.२.१७ ॥
फिर वह (हवि) ग्रहण करता है — "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् अग्नये जुष्टं गृह्णामि" (सविता देवकी प्रेरणामें, अश्विनोंकी बाहुओंसे, पूषाके हाथोंसे, अग्निके लिए प्रिय तुझे ग्रहण करता हूँ)। सविता ही देवताओंका प्रसविता है; इस प्रकार वह सविताकी प्रेरणासे ही ग्रहण करता है। अश्विन (देवताओंके) अध्वर्यु हैं; पूषा भाग बाँटनेवाला है, जो हाथोंसे भोजन रखता है। देवता सत्य हैं, मनुष्य असत्य; इस प्रकार वह सत्यसे ही ग्रहण करता है।
श्रुति कहती है— "सविता वै देवानां प्रसविता"। सविता ही देवताओं को उत्पन्न करने वाला या प्रेरित करने वाला है। स्मृति में 'शश्वत्प्रसूयणात् सूर्यः' कहकर इसी रहस्य को खोला गया है कि सृजन की यह प्रक्रिया निरंतर (शश्वत) चलने वाली है।
सूर्य के पवित्र करने वाले रूप का आधार यहाँ है:
स उत्पुनाति । सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिरिति सविता वै देवानां प्रसविता तत्सवितृप्रसूत एवैतदुत्पुनात्यच्छिद्रेण पवित्रेणेति यो वा अयं पवत एषोऽच्छिद्रं पवित्रमेतेनैतदाह सूर्यस्य रश्मिभिरित्येते वा उत्पवितारो यत्सूर्यस्य रश्मयस्तस्मादाह सूर्यस्य रश्मिभिरिति ॥ १.१.३.६ ॥
वह (जलको) पवित्र करता है — "सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः" (सविताकी प्रेरणामें, छिद्ररहित पवित्रसे, सूर्यकी किरणोंसे तुम्हें पवित्र करता हूँ)। सविता देवताओंका प्रसविता है; (इसलिए) सविताकी प्रेरणासे ही वह पवित्र करता है। "अच्छिद्रेण पवित्रेण" — यह जो (वायु) बहता है, वही छिद्ररहित पवित्र है; इसीको लक्ष्य करके यह कहता है। "सूर्यस्य रश्मिभिः" — सूर्यकी किरणें ही पवित्र करनेवाली हैं; इसलिए कहता है "सूर्यस्य रश्मिभिः"।
श्रुति में "सूर्यस्य रश्मिभिरिति एते वा उत्पवितारो" कहा गया है, अर्थात् सूर्य की किरणें ही पवित्र करने वाली हैं। स्मृति इसी 'उत्पवितार' (शुद्ध करने वाले) गुण के कारण उसे 'पवन' कहती है, क्योंकि प्राण-वायु और सूर्य-किरणें दोनों ही शुद्धि का साधन हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
सविता के प्रसवकर्ता स्वरूप की व्यापकता गोपथ ब्राह्मण में अत्यंत सुंदर ढंग से दिखाई गई है:
मन एव सविता वाक्सावित्री यत्र ह्येव मनस्तद्वाग्यत्र वै वाक्तन्मन इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् अग्निरेव सविता पृथिवी सावित्री यत्र ह्येवाग्निस्तत्पृथिवी यत्र वै पृथिवी तदग्निरिति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् वायुरेव सवितान्तरिक्षं सावित्री यत्र ह्येव वायुस्तदन्तरिक्षं यत्र वा अन्तरिक्षं तद्वायुरिति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री यत्र ह्येवादित्यस्तद्द्यौर्यत्र वै द्यौस्तदादित्य इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् चन्द्रमा एव सविता नक्षत्राणि सावित्री यत्र ह्येव चन्द्रमास्तन्नक्षत्राणि यत्र वै नक्षत्राणि तच्चन्द्रमा इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् अहरेव सविता रात्रिः सावित्री यत्र ह्येवाहस्तद्रात्रिर्यत्र वै रात्रिस्तदहरिति एते द्वे योनी एक मिथुनम् उष्णं एव सविता शीतं सावित्री यत्र ह्येवोष्णं तच्छीतं यत्र वै शीतं तदुष्णं इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् अभ्रं एव सविता वर्षं सावित्री यत्र ह्येवाभ्रं तद्वर्षं यत्र वै वर्षं तदभ्रं इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् विद्युदेव सविता स्तनयित्नुः सावित्री यत्र ह्येव विद्युत्तत्स्तनयित्नुर्यत्र वै स्तनयित्नुस्तद्विद्युदिति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् प्राण एव सवितान्नं सावित्री यत्र ह्येव प्राणस्तदन्नं यत्र वा अन्नं तत्प्राण इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् वेदा एव सविता छन्दांसि सावित्री यत्र ह्येव वेदास्तच्छन्दांसि यत्र वै छन्दांसि तद्वेदा इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् यज्ञ एक सविता दक्षिणाः सावित्री यत्र ह्येव यज्ञस्तद्दक्षिणा यत्र वै दक्षिणास्तद्यज्ञ इति एते द्वे योनी एकं मिथुनम् एतद्ध स्मैतद्विद्वांसं ओपाकारिं आसस्तुर्ब्रह्मचारी ते संस्थित इत्यथैत आसस्तुराचित इव चितो बभूव अथोत्थाय प्राव्राजीदित्येतद्वा अहं वेद नैतासु योनिष्वित एतेभ्यो वा मिथुनेभ्यः संभूतो ब्रह्मचारी मम पुरायुषः प्रेयादिति ॥ १.३३ ॥
मन ही सविता है, वाणी सावित्री — जहाँ मन है वहाँ वाणी, जहाँ वाणी वहाँ मन; ये दो योनियाँ एक मिथुन (जोड़ा) हैं। (इसी प्रकार) अग्नि सविता, पृथ्वी सावित्री; वायु सविता, अन्तरिक्ष सावित्री; आदित्य सविता, द्यौ सावित्री; चन्द्रमा सविता, नक्षत्र सावित्री; दिन सविता, रात्रि सावित्री; उष्ण सविता, शीत सावित्री; मेघ सविता, वर्षा सावित्री; विद्युत् सविता, गर्जन सावित्री; प्राण सविता, अन्न सावित्री; वेद सविता, छन्द सावित्री; यज्ञ सविता, दक्षिणाएँ सावित्री — प्रत्येक जोड़ेमें जहाँ एक है वहाँ दूसरा; ये दो योनियाँ एक मिथुन हैं। (कथा है कि) ऐसे जाननेवाले ओपाकारिसे (लोगोंने) कहा कि तुम्हारा ब्रह्मचारी मर गया; वह (क्षणभर) मानो जड़ हो गया, फिर उठकर चल पड़ा और बोला — 'मैं यह जानता हूँ: इन योनियों, इन मिथुनोंसे उत्पन्न मेरा ब्रह्मचारी आयु पूरी होनेसे पहले नहीं जा सकता।'
गोपथ ब्राह्मण में सविता और सावित्री के बारह मिथुन (जोड़े) बताए गए हैं, जहाँ प्राण-अन्न, मन-वाणी आदि के जोड़ों में 'सविता' पुरुष-अंश या प्रेरक-शक्ति है। यह इस बात का प्रमाण है कि 'प्रसूयणात् सूर्यः' का अर्थ केवल भौतिक जन्म नहीं, अपितु प्रत्येक द्वैत में एक सक्रिय प्रेरक शक्ति का होना है, जो निरंतर प्रसव/अभिव्यक्ति करती रहती है। स्मृति जहाँ इसे संक्षिप्त रूप में 'सूर्य' कहती है, गोपथ ब्राह्मण वहाँ इसके विभिन्न आयामों को खोलता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाला है।
१. प्रथम सोपान (स्थूल): साधक सूर्य को जगत् का पोषणकर्ता मानकर उसके प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित करता है।
२. द्वितीय सोपान (सूक्ष्म): वह अनुभव करता है कि जिस सूर्य ने जगत् को स्थापित किया, वही सूर्य उसके हृदय में 'हृदय-सूर्य' या 'प्राण-सूर्य' के रूप में स्थित है। यहाँ 'पवन' का अभ्यास आरम्भ होता है—साधक प्राणायाम के माध्यम से उस 'पावन' शक्ति को जाग्रत करता है जो नाड़ियों की शुद्धि करती है।
३. तृतीय सोपान (कारण): साधक इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह स्वयं को 'सूर्यात्मा' में लीन पाता है। वह अनुभव करता है कि उसका अपना अस्तित्व भी उसी निरंतर प्रसव (शश्वत्प्रसूयणात्) का एक अंश है।
जब साधक सूर्य-ध्यान और प्राण-शुद्धि (पवन) को एक कर देता है, तब वह इस बोध को प्राप्त करता है कि बाह्य सूर्य और आन्तरिक प्राण एक ही 'अक्षर' के दो रूप हैं। यहाँ से साधक 'विराट' की भूमि से 'ईश्वर' की भूमि की ओर अग्रसर होता है।
आप्यायनात्तु वरुणः श्रेष्ठत्वादिन्द्र एव सः ।
भौमान्तरिक्षं दिव्यं च आ(अ)प आहू रवीन्धनम् ॥ ९.४८ ॥
आप्यायन (तृप्त) करनेसे वही वरुण है, श्रेष्ठ होनेसे इन्द्र; भूमिके, अन्तरिक्षके और दिव्य जलको रविका ईंधन कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के 'आत्मा' और 'पवन' स्वरूप का वर्णन करते हुए उसे जगत् का आधार सिद्ध किया। अब वर्तमान श्लोक में वे सूर्य की उन विभिन्न नाम-परिभाषाओं (पर्याय शब्दों) को खोल रहे हैं, जो उसकी विशिष्ट कार्यात्मक शक्तियों को दर्शाती हैं। यहाँ वरुण, इन्द्र और जल के साथ सूर्य के सम्बन्ध का रहस्य उद्घाटित किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) आप्यायनात् तु वरुणः (अस्ति), श्रेष्ठत्वात् इन्द्र एव सः (अस्ति)। भूमान्तरिक्षं दिव्यं च (एतानि) आपः रविका ईंधनम् (आहूताः) ।
पदार्थ और निर्वचन:
• आप्यायनात्: 'आप्यायन' का अर्थ है तृप्त करना, पोषण करना या पूर्णता की ओर ले जाना। जो समस्त प्राणियों को पोषण देकर उन्हें तृप्त करता है, वह वरुण है।
• श्रेष्ठत्वात्: श्रेष्ठता के कारण। जो समस्त देवों और शक्तियों में सर्वोपरि है, वह इन्द्र है।
• भूमान्तरिक्षं दिव्यं च आपः: यहाँ 'आप' (जल) तीन प्रकार के बताए गए हैं— भू-जल (पृथ्वी का जल), अन्तरिक्ष-जल (मेघ/वर्षा) और दिव्य-जल (आकाश या सूक्ष्म चैतन्य रस)।
• रविका ईंधनम्: रवि (सूर्य) का ईंधन। यहाँ 'ईंधन' शब्द भौतिक लकड़ी के लिए नहीं, अपितु उस कच्चे माल या आधार के लिए है जिसे सूर्य अपनी ताप-शक्ति से परिष्कृत कर ऊर्जा में बदलता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में सूर्य के तीन विशिष्ट स्वरूपों और उसकी पोषण प्रक्रिया का वर्णन कर रहे हैं। प्रथम, जब हम सूर्य को उस शक्ति के रूप में देखते हैं जो सृष्टि की प्यास बुझाती है और उसे तृप्ति प्रदान करती है, तब वह 'वरुण' है। वरुण यहाँ केवल जल के देवता नहीं, अपितु वह नियमबद्धता और पोषण की वह शक्ति है जो जीवन को पूर्णता (आप्यायन) की ओर ले जाती है। द्वितीय, जब वही सूर्य अपनी सर्वोच्च सत्ता, प्रकाश और प्रभुत्व में प्रकट होता है, तो वह 'इन्द्र' कहलाता है। इन्द्र वह शक्ति है जो अज्ञान के अंधकार को जीतती है और चेतना का विस्तार करती है।
इसके पश्चात ऋषि एक अत्यंत गूढ़ रहस्य बताते हैं कि पृथ्वी, अन्तरिक्ष और दिव्य लोकों में जो भी 'जल' (आपः) रूपी पदार्थ विद्यमान है, वह वास्तव में सूर्य का ही ईंधन है। बाहरी दृष्टि से देखें तो जल सूर्य की किरणों द्वारा वाष्पित होकर पुनः वर्षा के रूप में गिरता है—यह एक भौतिक चक्र है। किन्तु आन्तरिक दृष्टि से इसका अर्थ यह है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड का 'रस' (अमृत/प्राण) सूर्य की अग्नि में तपकर ही शुद्ध होता है। जिस प्रकार ईंधन के बिना अग्नि प्रज्वलित नहीं रह सकती, उसी प्रकार इन तीनों लोकों का जल-तत्त्व सूर्य की ऊर्जा का संवहन करता है और उसके द्वारा ही रूपांतरित होकर जीवन को चलाता है।
श्रुति-संगति —
वरुण और भर्ग (सूर्य) के इस सम्बन्ध की पुष्टि श्रुति में मिलती है:
वरुणाद्ध वा अभिषिषिचानाद्भर्गोऽपचक्राम । वीर्यं वै भर्ग एष विष्णुर्यज्ञः सोऽस्मादपचक्राम शश्वद्य एषोऽपां रसः सम्भृतो भवति येनैनमेतदभिषिञ्चति सोऽस्य भर्गं निर्जघान ॥ ५.४.५.१ ॥
अभिषेक किये जाते हुए वरुणसे भर्ग निकल गया। भर्ग वीर्य ही है; (और) यह यज्ञ विष्णु है — वह उससे निकल गया। (यजमानका) जिस (जल) से अभिषेक करते हैं, वह जलोंका सँजोया हुआ रस है; उसीने इसके भर्गको (बाहर) धकेल दिया।
यहाँ वरुण से भर्ग का निकलना और 'अपां रस' (जलों के रस) का उल्लेख है। स्मृति का यह श्लोक इसी रहस्य को विस्तार दे रहा है कि जो जल वरुण के अधिकार में है, वही सूर्य (भर्ग) का ईंधन बनकर उसे दीप्ति प्रदान करता है।
इसी प्रकार जल और सूर्य-अग्नि की एकरूपता यहाँ स्पष्ट है:
आपो वा अर्कः तद्यदपां शर आसीत्तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥ १०.६.५.२ ॥
जल ही अर्क है। जलोंका जो झाग था, वह जमकर पृथ्वी बन गया। उस (पृथ्वी) पर (प्रजापतिने) श्रम किया; उस श्रान्त, तपे हुएका जो तेज और रस निकला, वह अग्नि हुआ।
श्रुति कहती है "आपो वा अर्कः" अर्थात् जल ही अर्क (सूर्य) है। जब यह जल तपता है, तब उससे तेज और रस निकलता है। स्मृति में 'रविका ईंधनम्' कहकर इसी तपन की प्रक्रिया को बताया गया है कि जल सूर्य का वह आधार है जिससे उसकी दीप्ति निरंतर बनी रहती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस जल-चक्र और पोषण की प्रक्रिया को अन्य शास्त्रों में भी देखा जा सकता है:
भर्गो देवस्य धीमहीति सावित्र्या द्वितीयः पादः अन्तरिक्षेण यजुः समदधात् यजुषा वायुम् वायुनाभ्रम् अभ्रेण वर्षम् वर्षेणौषधिवनस्पतीन् ओषधिवनस्पतिभिः पशून् पशुभिः कर्म कर्मणा तपस् तपसा सत्यम् सत्येन ब्रह्म ब्रह्मणा ब्राह्मणम् ब्राह्मणेन व्रतम् व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितो भवति अशून्यो भवत्यविछिन्नो भवत्यविछिन्नोऽस्य तन्तुरविछिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद यश्चैवंविद्वानेवं एतं सावित्र्या द्वितीयं पादं व्याचष्टे ॥ १.३५ ॥
'भर्गो देवस्य धीमहि' — यह सावित्रीका दूसरा पाद है: इससे अन्तरिक्षसे यजुको जोड़ा, यजुसे वायुको, वायुसे मेघको, मेघसे वर्षाको, वर्षासे ओषधि-वनस्पतियोंको, ओषधि-वनस्पतियोंसे पशुओंको, पशुओंसे कर्मको, कर्मसे तपको, तपसे सत्यको, सत्यसे ब्रह्मको, ब्रह्मसे ब्राह्मणको, ब्राह्मणसे व्रतको; व्रतसे ही ब्राह्मण संशित, अशून्य, अविच्छिन्न होता है — जो ऐसा जानता है, और जो ऐसा जानकर सावित्रीके दूसरे पादकी व्याख्या करता है।
गोपथ ब्राह्मण में सावित्री के दूसरे पाद (भर्गो देवस्य धीमहि) से वायु, मेघ और वर्षा का क्रम बताया गया है। यह इस बात का प्रमाण है कि सूर्य की शक्ति ही जल-चक्र को संचालित करती है, जिससे ओषधियाँ और पशु उत्पन्न होते हैं।
इसी प्रकार अग्नि पुराण में इसका स्पष्ट विवरण मिलता है:
महदाद्यं सूयते हि स्वयं ज्योतिर्हरिः प्रभुः । पर्जन्यो वायुरादित्यः शीतोष्णाद्यैश्च पाचयेत् ॥ अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ २१६.१०–११ ॥
स्वयंज्योति प्रभु हरि महत्तत्त्व आदिको उत्पन्न (सूयते) करते हैं (इसलिए सविता); वे ही पर्जन्य, वायु और आदित्य होकर शीत-उष्ण आदिसे (अन्नको) पकाते हैं। अग्निमें विधिपूर्वक दी गयी आहुति आदित्यको पहुँचती है; आदित्यसे वृष्टि, वृष्टिसे अन्न, और उससे प्रजाएँ होती हैं।
यहाँ कहा गया है कि आदित्य (सूर्य) से वृष्टि होती है और वृष्टि से अन्न। स्मृति का यह श्लोक इसी प्रक्रिया के मूल कारण को बता रहा है—कि वह जल जो वृष्टि बनकर गिरता है, वास्तव में सूर्य का ही 'ईंधन' है जिसे उसने अपने मण्डल में परिष्कृत किया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अर्थ अत्यंत सूक्ष्म है। यहाँ 'जल' (आपः) का तात्पर्य भौतिक जल नहीं, अपितु शरीर और मन के भीतर बहने वाले 'रस' और 'भावों' से है।
१. भू-जल: शरीर के स्थूल रस और रक्त।
२. अन्तरिक्ष-जल: प्राण-वायु और मानसिक वृत्तियाँ।
३. दिव्य-जल: हृदय में स्थित वह चैतन्य अमृत जो अभी जाग्रत नहीं हुआ है।
साधक जब अपनी चेतना को सूर्य (भर्ग) में केंद्रित करता है, तो ये तीनों प्रकार के 'जल' उस दिव्य अग्नि के ईंधन बन जाते हैं। अर्थात्, साधक अपने भौतिक सुखों (भू-जल), मानसिक संकल्पों (अन्तरिक्ष-जल) और सूक्ष्म संस्कारों (दिव्य-जल) को सूर्य रूपी ज्ञान-अग्नि में होम कर देता है। जब ये भाव 'ईंधन' बनकर जलते हैं, तब साधक के भीतर 'वरुण' (तृप्ति) और 'इन्द्र' (श्रेष्ठता/विजय) का उदय होता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल देह की सीमाओं से उठाकर सूक्ष्म चैतन्य की भूमि तक ले जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि उसका संपूर्ण अस्तित्व उस एक ही सूर्य-तत्त्व की दीप्ति से प्रकाशित है।
एता गभस्तिभिः पीता दीप्यन्ते रविमण्डले ।
एतैः पर्यायशब्दैस्तु एक एव सदोच्यते ॥ ९.४९ ॥
ये (जल) किरणोंसे पिये जाकर सूर्यमण्डलमें दीप्त होते हैं। इन पर्याय शब्दोंसे एक ही (देव) सदा कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के वरुण और इन्द्र स्वरूपों की व्याख्या करते हुए यह रहस्य खोला कि पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक के जल वास्तव में रवि (सूर्य) के ईंधन हैं। वर्तमान श्लोक इसी प्रक्रिया के परिणाम और उस एकत्व का उद्घाटन करता है, जहाँ अनेक नाम एक ही परम सत्ता के विभिन्न आयाम सिद्ध होते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एता (आपः) गभस्तिभिः पीताः रविमण्डले दीप्यन्ते। एतैः पर्यायशब्दैः तु एक एव (देवः) सदोच्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• एता: यहाँ 'एता' शब्द पिछले श्लोक के 'आपः' (जल) के लिए प्रयुक्त हुआ है।
• गभस्तिभिः पीताः: किरणों द्वारा पिए गए। 'गभस्ति' का अर्थ है सूर्य की किरणें। जल का किरणों द्वारा पिया जाना सौर-चक्र की उस प्रक्रिया का संकेत है जहाँ ताप द्वारा जल का उर्ध्वगमन (वाष्पीकरण) होता है।
• रविमण्डले दीप्यन्ते: सूर्यमण्डल में दीप्त होते हैं। जब जल किरण रूप में ऊपर उठता है, तो वह सूर्य के तेज से मिलकर प्रकाशमय हो जाता है।
• पर्यायशब्दैः: समान अर्थ वाले विभिन्न नाम (जैसे वरुण, इन्द्र, पवन आदि)।
• एक एव सदोच्यते: सदा एक ही (परमतत्व) कहा जाता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि के भौतिक और आध्यात्मिक चक्र की व्याख्या कर रहे हैं। वे बताते हैं कि भू, अन्तरिक्ष और दिव्य जगत के जल जब सूर्य की किरणों द्वारा 'पिए' जाते हैं, तो वे केवल लुप्त नहीं होते, अपितु रविमण्डल में जाकर दीप्तिमान हो जाते हैं। बाहरी दृष्टि से यह जल का वाष्पीकरण है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि से यह जड़ पदार्थ (जल) का तेज (ज्योति) में रूपांतरण है। सूर्य वह महान अग्नि है जो जल रूपी ईंधन को सोखकर उसे पुनः प्रकाश और ऊर्जा में बदल देती है, जिससे सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित रहता है।
इस प्रक्रिया के माध्यम से ऋषि एक महान सत्य की ओर संकेत करते हैं कि जिन्हें हम अलग-अलग देवता—वरुण, इन्द्र, पवन, विष्णु या भर्ग—मानते हैं, वे वास्तव में उस एक ही 'परम पुरुष' या 'सूर्य-आत्मा' के विभिन्न कार्यात्मक नाम (पर्याय शब्द) हैं। जब वह पोषण करता है तो वरुण है, जब श्रेष्ठता दिखाता है तो इन्द्र है, और जब जगत् को प्रकाशित करता है तो रवि है। यह अनेकता केवल शब्दों की है; तत्वतः वह एक ही चेतना है जो भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में अभिव्यक्त हो रही है।
श्रुति-संगति —
जल का सूर्य के तेज में रूपांतरण और फिर अग्नि/ज्योति का प्रादुर्भाव श्रुति में भी वर्णित है:
आपो वा अर्कः तद्यदपां शर आसीत्तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥ १०.६.५.२ ॥
जल ही अर्क है। जलोंका जो झाग था, वह जमकर पृथ्वी बन गया। उस (पृथ्वी) पर (प्रजापतिने) श्रम किया; उस श्रान्त, तपे हुएका जो तेज और रस निकला, वह अग्नि हुआ।
इस अंश से स्पष्ट है कि जल ही अर्क (सूर्य) का मूल आधार है। जिस प्रकार शतपथ कहता है कि जल से पृथ्वी बनी और उस तप्त रस से अग्नि उत्पन्न हुई, ठीक उसी प्रकार याज्ञवल्क्य स्मृति कहती है कि किरणें जल को पीकर उसे सूर्यमण्डल में दीप्त करती हैं। यह जलीय तत्व का तेजमय होना ही सृष्टि की ऊर्जा का मूल स्रोत है।
अनेक रूपों में एक ही भर्ग का वास इस श्रुति से पुष्ट होता है:
अग्निर्वै भर्गः। वायुर्महः। आदित्यो यशः। येऽन्ये देवास्तत्सर्वम् ॥ १२.३.४.८ ॥
अग्नि ही भर्ग है, वायु महः, आदित्य यश; और जो अन्य देवता हैं, वे "सर्व" हैं।
यहाँ अग्नि, वायु और आदित्य को अलग-अलग नाम दिए गए हैं, किन्तु अंत में कहा गया कि "अन्य देवता तत्सर्वम्" अर्थात् वे सब उस एक ही व्यापक सत्ता के अंग हैं। स्मृति का यह वचन कि "इन पर्याय शब्दों से एक ही देव कहा जाता है", इसी श्रुति-रहस्य का विस्तार है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सूर्य की किरणों और जल के इस सम्बन्ध को गोपथ ब्राह्मण में सूक्ष्मता से समझाया गया है:
धियो यो नः प्रचोदयादिति सावित्र्यास्तृतीयः पादः दिवा साम समदधात् साम्नादित्यम् आदित्येन रश्मीन् रश्मिभिर्वर्षम् वर्षेणौषधिवनस्पतीन् ओषधिवनस्पतिभिः पशून् पशुभिः कर्म कर्मणा तपस् तपसा सत्यम् सत्येन ब्रह्म ब्रह्मणा ब्राह्मणम् ब्राह्मणेन व्रतम् व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितो भवति अशून्यो भवत्यविछिन्नो भवत्यविछिन्नोऽस्य तन्तुरविछिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद यश्चैवंविद्वानेवं एतं सावित्र्यास्तृतीयं पादं व्याचष्टे ॥ १.३६ ॥
'धियो यो नः प्रचोदयात्' — यह सावित्रीका तीसरा पाद है: इससे द्युलोकसे सामको जोड़ा, सामसे आदित्यको, आदित्यसे रश्मियोंको, रश्मियोंसे वर्षाको, वर्षासे ओषधि-वनस्पतियोंको, ओषधि-वनस्पतियोंसे पशुओंको, पशुओंसे कर्मको, कर्मसे तपको, तपसे सत्यको, सत्यसे ब्रह्मको, ब्रह्मसे ब्राह्मणको, ब्राह्मणसे व्रतको; व्रतसे ही ब्राह्मण संशित, अशून्य, अविच्छिन्न होता है — जो ऐसा जानता है, और जो ऐसा जानकर सावित्रीके तीसरे पादकी व्याख्या करता है।
गोपथ ब्राह्मण के अनुसार आदित्य अपनी रश्मियों (किरणों) के द्वारा वर्षा का संचालन करता है, जिससे ओषधियाँ और पशु उत्पन्न होते हैं। स्मृति का यह वाक्य "एता गभस्तिभिः पीता" इसी चक्र की प्रथम कड़ी है—पहले किरणें जल को सोखती हैं, फिर वही जल वर्षा बनकर जीवन देता है। शास्त्र-साक्ष्य यह सिद्ध करता है कि सूर्य केवल ताप देने वाला पिंड नहीं, अपितु एक महान नियामक है जो जल और तेज के बीच संतुलन बनाकर सृष्टि का पोषण करता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अर्थ अत्यंत गूढ़ है। यहाँ 'जल' प्रतीक है हमारी अंतःकरण की जड़ता या संचित संस्कारों के 'रस' का, और 'किरणें' प्रतीक हैं प्रज्ञा और विवेक के तेज का।
जब साधक अपनी चेतना को सूर्य (परमात्मा) में केंद्रित करता है, तो उसके भीतर की जड़ वृत्तियाँ (जल) ज्ञान की किरणों द्वारा 'पी' ली जाती हैं—अर्थात् वे भस्म होकर या रूपांतरित होकर शुद्ध प्रकाश में बदल जाती हैं। यह अवस्था वह है जहाँ साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर के अनेक भाव और विचार वास्तव में एक ही चैतन्य सत्ता के विभिन्न रूप हैं।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब सूर्योपस्थान या ध्यान करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि उसका अपना प्राण-जल सूर्य की किरणों में विलीन हो रहा है और वह स्वयं रविमण्डल की दीप्ति का अंश बन रहा है। इस अभ्यास से साधक 'अनेकता' (नामों के जाल) से ऊपर उठकर 'एकत्व' (एक एव सदोच्यते) की भूमि पर प्रतिष्ठित होता है। यह स्थूल शरीर से सूक्ष्म ज्योति-स्वरूप में जाने की प्रक्रिया है।
भ्राजते च यदा भर्गः पुरुषत्वाच्च पूरुषः ।
सर्वात्मा सर्वभावस्तु आत्मा तेन निगद्यते ॥ ९.५० ॥
क्योंकि (वह) दीप्त होता है (इसलिए) भर्ग, पुरमें रहनेसे पुरुष; (और) सबका आत्मा, सब भावोंवाला (होनेसे) वह आत्मा कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि सूर्य के विविध नाम (विष्णु, भर्ग, पवन, वरुण, इन्द्र) वास्तव में एक ही परम तत्त्व की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। वर्तमान श्लोक उसी कड़ी का विस्तार है, जहाँ वे 'भर्ग', 'पुरुष' और 'आत्मा'—इन तीन विशिष्ट संज्ञाओं के पीछे छिपे गूढ़ अर्थों को खोल रहे हैं, ताकि साधक बाहरी सूर्य से आंतरिक पुरुष की ओर अग्रसर हो सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) भ्राजते च यदा (तदा) भर्गः (उच्यते), और पुरुषत्वात् (पुरम् अतिक्रान्तात्/शयात्) पूरुषः (उच्यते)। (सः) सर्वात्मा (अस्ति), सर्वभावस्तु (अस्ति); अतः आत्मा तेन निगद्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• भ्राजते च यदा भर्गः: 'भ्राज्' धातु का अर्थ है चमकना, दीप्त होना या प्रकाशमान होना। जब वह तेज अपनी पूर्ण प्रखरता में प्रकट होता है, तब उसे 'भर्ग' कहा जाता है। यहाँ 'यदा' शब्द यह संकेत देता है कि यह एक अवस्था है—जब प्रकाश की तीव्रता चरम पर होती है।
• पुरुषत्वाच्च पूरुषः: 'पुर' का अर्थ है नगर या शरीर (पिण्ड)। जो इस पुर (शरीर) में स्थित है, वह 'पुरुष' है। यहाँ 'पुरुषत्व' का अर्थ केवल पुरुष-लिंग नहीं, अपितु 'पुर-शयन' (नगर में निवास करने वाला) होने की अवस्था है।
• सर्वात्मा: जो समस्त चराचर जगत का आधार और प्राण है, जो सर्वव्यापी है।
• सर्वभावस्तु: 'भाव' का अर्थ है अस्तित्व या प्रकृति। वह सभी भावों (सत्व, रज, तम तथा समस्त भौतिक-मानसिक वृत्तियों) का मूल स्रोत है, इसलिए 'सर्वभावः'।
• निगद्यते: कहा जाता है, परिभाषित किया जाता है या संज्ञा दी जाती है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सूर्य के नामों को केवल शब्द-कोश की परिभाषा नहीं बना रहे, अपितु उन्हें साधना के सोपान बना रहे हैं।
प्रथमतः, 'भर्ग' संज्ञा। जब हम बाहरी आकाश में सूर्य को देखते हैं, तो वह दीप्तिमान है। किन्तु आंतरिक दृष्टि से 'भर्ग' वह प्रज्ञा-प्रकाश है जो अविद्या के अन्धकार को जलाकर भस्म कर देता है। 'भ्राजते' केवल भौतिक चमक नहीं, अपितु वह चैतन्य की वह अवस्था है जहाँ साधक का मन प्रकाशमय हो जाता है।
द्वितीयतः, 'पुरुष' संज्ञा। यहाँ याज्ञवल्क्य एक महान रहस्य खोल रहे हैं। सूर्य को 'पुरुष' इसलिए कहा गया क्योंकि वह समस्त शरीरों (पुरों) में व्याप्त है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें हर घर और हर वस्तु के भीतर प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार वह परम पुरुष प्रत्येक जीव के शरीर रूपी पुर में आत्मा बनकर स्थित है। बाहरी सूर्य जगत का प्रकाश है, किन्तु आंतरिक पुरुष स्वयं का प्रकाश है।
तृतीयतः, 'आत्मा' संज्ञा। जब हम देखते हैं कि वही तेज (भर्ग) और वही चेतना (पुरुष) समस्त सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है, तब वह 'सर्वात्मा' कहलाता है। वह केवल सूर्य नहीं रहता, अपितु वह 'सर्वभाव' हो जाता है—अर्थात जो कुछ भी अस्तित्व में है, वह उसी का एक रूप है। यहाँ याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जिसे हम बाहर सूर्य कहते हैं, वही भीतर आत्मा है।
श्रुति-संगति —
पुरुष होने के रहस्य पर श्रुति कहती है:
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविषदिति स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किं चनानावृतं नैनेन किं चनासंवृतम् ॥ १४.५.५.१८ ॥
यही वह मधु (-विद्या) है जो आथर्वण दध्यङ्ने अश्विनोंको बतायी। इसे देखते हुए ऋषिने कहा — "उसने दो पैरवाले पुर (शरीर) बनाये, चार पैरवाले पुर बनाये; वह पुरुष पहले पक्षी होकर पुरोंमें प्रविष्ट हुआ।" वह यह पुरुष सब पुरों (शरीरों) में पुरिशय (बसनेवाला) है — (इसीसे पुरुष कहलाता है); ऐसा कुछ नहीं जो उससे ढका न हो, ऐसा कुछ नहीं जिसमें वह व्याप्त न हो।
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि वह पुरुष 'सर्वासु पूर्षु पुरिशयः' है, अर्थात सभी शरीरों में निवास करने वाला है। स्मृति का वचन 'पुरुषत्वाच्च पूरुषः' इसी श्रुति का विस्तार है; जो पुर (शरीर) के भीतर स्थित होकर उसे संचालित करता है, वही वास्तव में पुरुष है।
वहीं, सूर्य को आत्मा कहने के प्रमाण स्वरूप श्रुति उद्घोष करती है:
चित्रं देवानामुदगादनीकमिति । असौ वा आदित्य एष पुरुषस्तदेतच्चित्रं देवानामुदेत्यनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेरित्युभयेषां हैतद्देवमनुष्याणां चक्षुराप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षमित्युद्यन्वा एष इमांलोकानापूरयति सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्चेत्येष ह्यस्य सर्वस्यात्मा यच्च जगद्यच्च तिष्ठति ॥ ७.५.२.२७ ॥
"चित्रं देवानामुदगादनीकम्" (देवताओंका अद्भुत मुख उदित हुआ) — वह आदित्य ही यह पुरुष है; वही देवताओंका अद्भुत मुख उदित होता है। "चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः" — यह देवताओं और मनुष्यों, दोनोंका चक्षु है। "आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम्" — उदित होता हुआ यह इन लोकोंको भर देता है। "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च" — क्योंकि यही इस सबका आत्मा है, जो चलता है और जो स्थिर है।
"सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च"—अर्थात सूर्य ही इस चराचर जगत का आत्मा है। स्मृति का 'सर्वात्मा' शब्द इसी सत्य की पुष्टि करता है कि वह केवल एक ग्रह नहीं, अपितु समस्त अस्तित्व का प्राणतत्त्व है।
शास्त्र-साक्ष्य —
भर्ग की निरुक्ति के विषय में अग्नि पुराण का मत देखें:
ओषध्यादिकं पचति भ्राजृ दीप्तौ तथा भवेत् । भर्गः स्याद्भ्राजत इति बहुलं छन्द ईरितम् ॥ २१६.४ ॥
(वह तेज) ओषधि आदिको पकाता है; और दीप्त्यर्थक "भ्राजृ" धातुसे भी (बनता है) — "जो भ्राजता (चमकता) है, वह भर्ग"; वैदिक प्रयोगमें (धातु-रूप) बहुलतासे होते हैं, ऐसा कहा गया है।
यहाँ 'भ्राजृ' धातु से भर्ग होने की बात कही गई है, जो स्मृति के 'भ्राजते च यदा भर्गः' से पूर्णतः मेल खाता है। शास्त्र यह स्पष्ट करते हैं कि दीप्ति ही भर्ग का मूल है।
वहीं, इस सर्वात्मता के क्रम को गोपथ ब्राह्मण में अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया गया है:
तं ह स्मैतं एवांविद्वांसो मन्यन्ते विद्मैनं इति याथातथ्यं अविद्वांसः अयं यज्ञो वेदेषु प्रतिष्ठितः वेदा वाचि प्रतिष्ठिताः वाङ्मनसि प्रतिष्ठिता मनः प्राणे प्रतिष्ठितम् प्राणोऽन्ने प्रतिष्ठितः अन्नं भूमौ प्रतिष्ठितम् भूमिरप्सु प्रतिष्ठिता आपो ज्योतिषि प्रतिष्ठिताः ज्योतिर्वायौ प्रतिष्ठितम् वायुराकाशे प्रतिष्ठितः आकाशं ब्रह्मणि प्रतिष्ठितम् ब्रह्म ब्राह्मणे ब्रह्मविदि प्रतिष्ठितम् यो ह वा एवंवित्स ब्रह्मवित् पुण्यां च कीर्तिं लभते सुरभींश्च गन्धान् सोऽपहतपाप्मा अनन्तां श्रियं अश्नुते य एवं वेद यश्चैवंविद्वानेवं एतां वेदानां मातरं सावित्रीं संपदं उपनिषदं उपास्त इति ब्राह्मणं ॥ १.३८ ॥
इस (क्रम) को ऐसा जाननेवाले मानते हैं कि 'हम इसे जानते हैं'; (उनके लिए, जो) यथार्थ नहीं जानते, (क्रम यह है): यह यज्ञ वेदोंमें प्रतिष्ठित है, वेद वाणीमें, वाणी मनमें, मन प्राणमें, प्राण अन्नमें, अन्न भूमिमें, भूमि जलमें, जल ज्योतिमें, ज्योति वायुमें, वायु आकाशमें, आकाश ब्रह्ममें, और ब्रह्म ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणमें प्रतिष्ठित है। जो ऐसा जानता है वही ब्रह्मवित् है; वह पुण्य कीर्ति और सुगन्ध पाता है, पापरहित होकर अनन्त श्री भोगता है — जो ऐसा जानता है, और जो ऐसा जानकर वेदोंकी माता सावित्रीकी इस सम्पद् — इस उपनिषद् (रहस्य) — की उपासना करता है।
यहाँ जल से ज्योति और ज्योति से वायु तथा अंततः ब्रह्म तक पहुँचने का क्रम दिया गया है। यह दर्शाता है कि 'सर्वात्मा' होने का अर्थ क्या है—वह एक ऐसी श्रृंखला है जहाँ स्थूल तत्व (जल) सूक्ष्मतम तत्त्व (ब्रह्म/आत्मा) में विलीन हो जाते हैं। स्मृति जब कहती है 'सर्वभावस्तु आत्मा', तो वह इसी ब्रह्माण्डीय सोपान की ओर संकेत करती है।
योग-रहस्य —
योगी के लिए यह श्लोक एक आंतरिक यात्रा का मानचित्र है:
१. भर्ग अवस्था: साधक जब प्राणायाम और त्राटक के माध्यम से अपने भीतर 'तेज' का अनुभव करता है, तब वह 'भर्ग' भूमि में होता है। यहाँ केवल प्रकाश का अनुभव होता है (दीप्ति)।
२. पुरुष अवस्था: जब साधक यह अनुभव करता है कि यह प्रकाश उसके शरीर रूपी पुर (हृदय-आकाश) के भीतर स्थित है और वही उसे चला रहा है, तब वह 'पुरुष' भाव को प्राप्त करता है। यहाँ वह स्वयं को देह से पृथक कर 'साक्षी' (द्रष्टा) के रूप में देखता है।
३. आत्मा अवस्था: उच्चतम भूमि वह है जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर का यह प्रकाश और बाहर सूर्य का प्रकाश एक ही है, और समस्त जगत इसी एक चेतना का विस्तार है। यहाँ वह 'सर्वात्मा' की स्थिति में पहुँचता है।
अतः इस श्लोक का अभ्यास करते हुए योगी 'दीप्ति' (भर्ग) से 'स्थित' (पुरुष) और फिर 'व्याप्त' (आत्मा) होने के अनुभव की ओर बढ़ता है। यह स्थूल सूर्य की उपासना से सूक्ष्म आत्मा के साक्षात्कार तक की यात्रा है।
तत्सवितुर्वरेण्यं च चेतनात्मा महेश्वरः ।
आ(अ)पः संक्षिप्य सवितुस्ततः सर्गः प्रवर्तितः ॥ ९.५१ ॥
सविताका वह वरेण्य (तेज) चेतनात्मा महेश्वर है; सविताने जलोंको समेटकर (उत्पन्न करके) तब सृष्टि प्रवर्तित की।
अवतरणिका — पिछले पाँच श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के विभिन्न नामों (भर्ग, पवन, वरुण, इन्द्र, पुरुष) की व्याख्या करते हुए यह सिद्ध किया कि ये सभी एक ही परम तत्त्व के पर्याय हैं। वर्तमान श्लोक इस श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहाँ वे 'सविता' के स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं और सृष्टि के आरम्भ में जल तथा तेज के सम्बन्ध को उजागर कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तत् (सविता) सवितुः वरेण्यं च चेतनात्मा महेश्वरः (अस्ति)। (सविता) आपः संक्षिप्य सवितुः ततः सर्गः प्रवर्तितः।
पदार्थ और निर्वचन:
• तत्सवितुर्वरेण्यं: 'तत्' शब्द यहाँ उस परम तेज की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख गायत्री मन्त्र में है। 'सविता' का अर्थ है—उत्पन्न करने वाला, प्रेरित करने वाला या सूर्य। 'वरेण्यं' वह है जो श्रेष्ठ है, पूजनीय है और जिसकी कामना की जाती है।
• चेतनात्मा महेश्वरः: 'चेतनात्मा' अर्थात् वह जिसकी आत्मा स्वयं शुद्ध चेतना है; जो केवल चेतन नहीं, अपितु चेतना का स्वरूप है। 'महेश्वरः'—महान ईश्वर, जो समस्त सृष्टि के अधिष्ठाता और नियन्ता हैं।
• आपः संक्षिप्य: 'आपः' का अर्थ जल है। 'संक्षिप्य' (सं + क्षिप्) का अर्थ है—समेटकर, सिकोड़कर या संक्षिप्त करके। यहाँ यह क्रिया सृष्टि की आरम्भिक अवस्था को दर्शाती है जहाँ प्रलयकाल के विस्तृत जल को एक बिंदु में समेटा गया।
• सर्गः प्रवर्तितः: 'सर्ग' अर्थात् सृष्टि या निर्माण; 'प्रवर्तितः' अर्थात् आरम्भ किया गया या गति दी गई।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सविता के उस रूप का वर्णन कर रहे हैं जो केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु वह 'परम चेतना' है जिसने इस जगत को रचने की प्रेरणा दी। वे कहते हैं कि सविता का वह वरेण्य (श्रेष्ठ) तेज वास्तव में 'चेतनात्मा महेश्वर' है। इसका अर्थ यह है कि जिस प्रकाश को हम बाहर देखते हैं, उसका मूल स्रोत वह शुद्ध चैतन्य है जो सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है।
दूसरे चरण में ऋषि सृष्टि-रहस्य को खोलते हैं: "सविता ने जलों को समेटकर तब सृष्टि प्रवर्तित की।" यहाँ 'जल' (आपः) का अर्थ केवल तरल पदार्थ नहीं, अपितु वह आदि-अवस्था या मूल प्रकृति है जो अव्यक्त और विस्तृत थी। जब सविता (परम चेतना) ने उस अव्यक्त जल को संकुचित किया, तब सघनता उत्पन्न हुई और उसी सघनता से सर्ग (सृष्टि) का प्रस्फुटन हुआ। यह क्रिया दर्शाती है कि सृष्टि शून्य से नहीं, अपितु एक सूक्ष्म संकोचन और फिर विस्तार की प्रक्रिया से उत्पन्न हुई है।
बाहरी दृष्टि से यह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की कथा है, किन्तु आन्तर दृष्टि से यह साधक के भीतर घटने वाली प्रक्रिया है। जिस प्रकार सविता ने जल को समेटकर सृष्टि रची, उसी प्रकार जब योगी अपनी बिखरी हुई चेतना (जो जलों की भाँति विस्तृत और चंचल है) को समेटकर एक बिंदु पर केंद्रित करता है, तब उसके भीतर 'बोध' का नया संसार प्रवर्तित होता है।
श्रुति-संगति —
इस श्लोक में वर्णित "जलों को समेटकर सृष्टि के प्रवर्तन" का मूल आधार शतपथ ब्राह्मण में मिलता है:
आपो ह वा इदमग्रे सलिलमेवास ता अकामयन्त कथं नु प्रजायेमहीति ता अश्राम्यंस्तास्तपोऽतप्यन्त तासु तपस्तप्यमानासु हिरण्मयमाण्डं सम्बभूवाजातो ह तर्हि संवत्सर आस तदिदं हिरण्मयमाण्डं यावत्संवत्सरस्य वेला तावत्पर्यप्लवत ॥ ११.१.६.१ ॥
आरम्भमें यह (सब) जल ही था, सलिल ही। उन्होंने (जलोंने) कामना की — "हम कैसे उत्पन्न हों (बढ़ें)?" उन्होंने श्रम किया, तप तपा; उनके तप तपते हुए एक सुवर्णमय अण्ड उत्पन्न हुआ। तब संवत्सर उत्पन्न नहीं हुआ था। वह सुवर्णमय अण्ड जितनी संवत्सरकी अवधि है, उतने समय तक (जलोंपर) तैरता रहा।
श्रुति कहती है कि आरम्भ में केवल जल ही था और उन जलों के तप से हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। स्मृति का यह श्लोक उसी श्रुति-रहस्य का विस्तार करता है। जहाँ श्रुति 'तप' की बात करती है, वहाँ याज्ञवल्क्य उसे 'संक्षिप्य' (समेटने) की क्रिया कहते हैं। तप वास्तव में ऊर्जा का संकोचन और सघनीकरण ही है। जलों का समेटना ही वह तप है जिससे हिरण्मय अण्ड (ब्रह्माण्ड) प्रकट हुआ। अतः यह स्मृति-वचन श्रुति के उस बीज का उपसंहार है कि सृष्टि का मूल आधार जल और उसे गति देने वाला तत्व सविता (चेतनात्मा) है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक में 'संकोचन' और 'विस्तार' का महान अभ्यास छिपा है।
१. चेतनात्मा का अनुभव: साधक जब गायत्री के 'वरेण्यं' शब्द का जप करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि वह केवल एक मन्त्र नहीं पढ़ रहा, अपितु अपने भीतर स्थित उस 'महेश्वर' (परम चेतना) को पुकार रहा है जो उसके अस्तित्व का मूल है।
२. संक्षिप्य अभ्यास: योग में 'संक्षिप्तीकरण' का अर्थ है—इन्द्रियों और मन के बिखराव को समेटना। जिस प्रकार सविता ने आदि-जल को समेटा, उसी प्रकार साधक अपने प्राणों और विचारों के विस्तार (बहिर्मुखता) को समेटकर हृदय-कमल या एक बिंदु पर स्थिर करता है। जब चित्त 'संक्षिप्त' होता है, तभी भीतर सत्य का 'सर्ग' (नया जन्म/बोध) होता है।
३. भूमि परिवर्तन: यह श्लोक साधक को 'स्थूल जल' (भौतिक जगत की चंचलता) से उठाकर 'चेतनात्मा' (शुद्ध चैतन्य) की भूमि तक ले जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक स्वयं को जड़ न मानकर, उस सविता के तेज का अंश माने जो समस्त सृष्टि को प्रवर्तित करने वाला है।
सर्वेषामेव भूतानामापो ज्योतिरिहोच्यते ।
भ्रस्ज पाके भवेद्धातुर्यस्मात् पाचयते ह्यसौ ॥ ९.५२ ॥
यहाँ (मन्त्रमें) सब भूतोंका जल और ज्योति (भर्ग) कहा जाता है; "भ्रस्ज्" धातु पकानेके अर्थमें है, क्योंकि वह (सबको) पकाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के विभिन्न पर्याय नामों की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि सविता, वरुण और इन्द्र आदि वास्तव में एक ही परम तत्त्व के स्वरूप हैं। पूर्व श्लोक (9.51) में उन्होंने बताया कि सविता ने जलों को समेटकर सृष्टि का आरम्भ किया; वर्तमान श्लोक इसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए 'आपः' (जल) और 'भर्ग' (ज्योति) के तादात्म्य तथा 'भर्ग' शब्द की व्युत्पत्ति का रहस्य खोल रहा है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: इह (मन्त्रे) सर्वेषामेव भूतानाम् आपः ज्योतिः इति उच्यते। यस्मात् असौ (ज्योतिः) धातुः पाचयते, तस्मात् भ्रस्ज् (धातुः) पाके भवेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• इहोच्यते: 'इह' का अर्थ है यहाँ; यह संकेत उस मन्त्र (गायत्री) की ओर है जिसकी चर्चा इस अध्याय में निरंतर हो रही है। 'उच्यते' अर्थात् कहा जाता है।
• सर्वेषामेव भूतानाम् आपः ज्योतिः: समस्त जीवित और अजिवित प्राणियों के लिए जल ही वास्तव में वह ज्योति (भर्ग) है। यहाँ 'आपः' और 'ज्योतिः' को एक ही तत्त्व के दो स्वरूपों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
• भ्रस्ज् पाके भवेत्: 'भ्रस्ज्' एक धातु है जिसका अर्थ 'पकाना' या 'तपाना' होता है। यहाँ 'भर्ग' शब्द की व्युत्पत्ति इसी धातु से की गई है।
• धातुर्यस्मात् पाचयते ह्यसौ: क्योंकि वह (ज्योति/सूर्य) समस्त धातुओं को तपता/पकाता है, इसलिए उसे भर्ग कहा गया है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में एक अत्यंत गूढ़ रहस्य उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मन्त्र में जिन 'आपः' (जलों) का वर्णन है और जिसे 'भर्ग' (ज्योति) कहा गया है, वे पृथक नहीं हैं। समस्त भूतों के लिए जल ही ज्योति है। बाहरी दृष्टि से जल शीतल होता है और अग्नि/ज्योति उष्ण, किन्तु सूक्ष्म स्तर पर जल वह माध्यम है जिसमें जीवन की ऊष्मा निहित है।
यहाँ 'भर्ग' शब्द का विश्लेषण करते हुए ऋषि कहते हैं कि यह 'भ्रस्ज्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है—पकाना या परिपक्व करना। जिस प्रकार अग्नि कच्चे अन्न को पकाकर खाद्य बनाती है, उसी प्रकार यह दिव्य ज्योति (सविता) समस्त प्राणियों के भीतर की 'धातुओं' (शारीरिक और मानसिक तत्वों) को तपती है, उन्हें संस्कारित करती है और परिपक्व बनाती है। बिना इस ताप के न तो सृष्टि का विकास संभव है और न ही साधक का आध्यात्मिक रूपांतरण।
अतः यहाँ 'पाचयते' (पकाने) का अर्थ केवल भौतिक दहन नहीं, अपितु वह ईश्वरीय प्रक्रिया है जिसके द्वारा अज्ञान की कच्ची अवस्था समाप्त होती है और ज्ञान का पका हुआ स्वरूप प्रकट होता है। याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि जिस ज्योति को हम बाहर सूर्य में देखते हैं, वही ज्योति समस्त भूतों के भीतर 'जीवन-जल' के रूप में प्रवाहित होकर उन्हें जीवित और विकसित रख रही है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तज्ज्योतिः परमं ब्रह्म भर्गस्तेजो यतः स्मृतम् । भा दीप्ताविति रूपं हि भ्रस्जः पाकेऽथ तत्स्मृतम् ॥ २१६.३ ॥
"तत्" वह ज्योति — परम ब्रह्म है; "भर्ग" तेजको कहते हैं, क्योंकि "भा" धातु दीप्तिके अर्थमें है; अथवा पकानेके अर्थवाली "भ्रस्ज्" धातुसे भी वह (भर्ग) माना गया है।
अग्नि पुराण का यह अंश स्पष्ट करता है कि भर्ग का अर्थ केवल चमकना नहीं, बल्कि वह परम ब्रह्म की ज्योति है। स्मृति और अग्निपुराण दोनों में 'भ्रस्ज्' धातु के माध्यम से 'पाके' (पकाने/तपाने) के अर्थ को प्रधानता दी गई है। जहाँ स्मृतिका यह श्लोक समस्त भूतों के संदर्भ में इस ताप की व्यापकता बताता है, वहीं अग्निपुराण इसे सीधे परम ब्रह्म की ज्योति से जोड़ता है। दोनों का मत एक ही है—भर्ग वह ऊर्जा है जो रूपांतरण करती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'तप' और 'संस्कार' का विज्ञान है। योगिक दृष्टि से, शरीर में स्थित प्राणमय जल जब सविता की इस आंतरिक ज्योति (भर्ग) से तपता है, तब साधक की चेतना परिपक्व होने लगती है।
यहाँ अभ्यास यह है कि साधक स्वयं को उस दिव्य अग्नि के हवाले कर दे जो उसे भीतर से 'पकाती' है। जिस प्रकार कच्ची धातु आग में तपकर कुंदन बनती है, वैसे ही मनुष्य का व्यक्तित्व और उसकी वृत्तियाँ जब इस आंतरिक सूर्य की ऊष्मा के संपर्क में आती हैं, तो वे शुद्ध होती हैं। साधक अनुभव करता है कि उसके हृदय में स्थित ज्योति केवल प्रकाश नहीं दे रही, बल्कि उसके संस्कारों को जलाकर उसे 'वरेण्य' (श्रेष्ठ) बना रही है। यह प्रक्रिया स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर जाने की यात्रा है, जहाँ 'पाचयते' का अर्थ है—अहंकार और अविद्या का भस्म होना और शुद्ध चैतन्य का प्रकट होना।
भ्राजते दीप्यते यस्माज्जगदन्ते हरत्यपि ।
कालाग्निरूपमास्थाय सप्तार्चिः सप्तरश्मिभिः ॥ ९.५३ ॥
क्योंकि वह चमकता है, दीप्त होता है, और जगत्के अन्तमें (सबको) हर लेता है — सात ज्वालाओं और सात किरणोंसे कालाग्निका रूप धारण करके।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के विभिन्न पर्याय नामों की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि सविता, वरुण और इन्द्र आदि एक ही परम तत्त्व हैं। पूर्व श्लोक (9.52) में उन्होंने 'भर्ग' शब्द की व्युत्पत्ति 'भ्रस्ज्' धातु से करते हुए बताया कि वह सबको पकाता है; वर्तमान श्लोक इसी दीप्ति के उस स्वरूप का वर्णन कर रहा है जो सृष्टि के अन्त में संहारक अग्नि के रूप में प्रकट होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) भ्राजते, दीप्यते, यस्मात् (तस्मात्) जगदन्ते (सर्वं) हरत्यपि। (तस्मात् सः) सप्तार्चिः सप्तरश्मिभिः कालाग्निरूपमास्थाय (एवम् उच्यते)।
पदार्थ और निर्वचन:
• भ्राजते, दीप्यते: 'भ्राज्' और 'दीप्' धातुओं का प्रयोग है। भ्राज् का अर्थ है प्रकाश फैलाना और दीप्यते का अर्थ है स्वयं दीप्त होना। यह सूर्य की दो अवस्थाएँ हैं—एक जो बाहर आलोकित करता है, दूसरा जो स्वयं तेजपुंज है।
• जगदन्ते हरत्यपि: 'जगत्' (संसार) के 'अन्ते' (समाप्ति पर) 'हरति' (हरण कर लेना/नष्ट कर देना)। यहाँ सूर्य की संहारक शक्ति का संकेत है।
• कालाग्निरूपमास्थाय: 'कालाग्नि' वह प्रलयंकारी अग्नि है जो समय (काल) के साथ समस्त भौतिक जगत को भस्म कर देती है। 'आस्थाय' का अर्थ है उस रूप को धारण करना या उसमें स्थित होना।
• सप्तार्चिः सप्तरश्मिभिः: 'सप्त' (सात), 'अर्चिः' (ज्वालाएँ) और 'रश्मिभिः' (किरणों द्वारा)। यहाँ संख्या सात का विशेष महत्व है, जो सृष्टि के सात स्तरों या सात तत्वों के संहार की क्षमता को दर्शाता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सूर्य के उस स्वरूप को प्रकट कर रहे हैं जिसे 'संहार-शक्ति' कहा जाता है। वे कहते हैं कि वही सूर्य जो दिन में जगत को प्रकाशित करता है (भ्राजते, दीप्यते), वह काल के अन्त में 'कालाग्नि' बन जाता है। यह विरोधाभास नहीं, अपितु एक ही तत्त्व की दो अवस्थाएँ हैं—एक सृजन और पोषण की, दूसरी लय और संहार की।
बाहरी विधि या स्थूल दृष्टि से देखें तो यह प्रलय का वर्णन है, जहाँ सूर्य अपनी किरणों को अग्नि-ज्वालाओं में बदलकर समस्त दृश्य जगत को हर लेता है। किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गूढ़ है। यहाँ 'जगदन्त' केवल भौतिक संसार का विनाश नहीं, अपितु साधक के भीतर के 'अहंकार' और 'माया' के अन्त का संकेत है। जब सूर्य (ज्ञान-पुंज) अपनी पूर्ण तीव्रता में प्रकट होता है, तो वह साधक के भीतर के समस्त विकारों को भस्म कर देता है।
सात किरणों और सात ज्वालाओं का उल्लेख यह दर्शाता है कि संहार की यह प्रक्रिया पूर्ण है। जिस प्रकार सात स्वर या सात धातुएँ जगत का निर्माण करती हैं, उसी प्रकार ये सात रश्मियाँ उन सभी स्तरों से अविद्या का हरण करती हैं। कालाग्नि वह अग्नि है जो 'काल' (समय) के बंधन को ही जला देती है, जिससे साधक काल-अतीत (अक्षर) में स्थित हो जाता है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से साधक को 'लय' की प्रक्रिया का बोध करा रहे हैं। योग मार्ग में जब साधक अपनी चेतना को सूर्य-तत्त्व में विलीन करता है, तो उसे अनुभव होता है कि उसकी समस्त मानसिक वृत्तियाँ और भौतिक आसक्तियाँ एक प्रज्वलित अग्नि में जल रही हैं।
साधक इस श्लोक से यह अभ्यास करता है कि जिस प्रकार सूर्य जगत के अन्त में सब कुछ हर लेता है, उसी प्रकार वह अपने भीतर की 'अविद्या' को उस दिव्य ज्योति के अर्पण कर दे। यहाँ 'कालाग्नि' का अनुभव वह अवस्था है जहाँ साधक का 'मैं-पन' (अहं) भस्म हो जाता है। यह संहार विनाशकारी नहीं, अपितु मुक्तिदायी है। जब सात किरणों वाली वह अग्नि हृदय में प्रज्वलित होती है, तब साधक स्थूल शरीर और मन की सीमाओं को लाँघकर उस 'भर्ग' या शुद्ध ज्योति में स्थित होता है, जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में किया गया था। यह अवस्था साधक को 'सगुण' दीप्ति से 'निर्गुण' अक्षर की ओर ले जाती है।
भ्राजते स्वेन रूपेण तस्माद्भर्ग इति स्मृतः ।
दीव्यते क्रीडते यस्माद्द्योतते रोचते दिवि ॥ ९.५४ ॥
अपने रूपसे चमकता है, इसलिए भर्ग कहा गया है; क्योंकि स्वर्गमें दीप्त होता है, क्रीडा करता है, प्रकाशित होता है, शोभित होता है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'भर्ग' के उस संहारक स्वरूप का वर्णन किया जो प्रलयकाल में कालाग्नि बनकर समस्त जगत् को हर लेता है। वर्तमान श्लोक (९.५४) उसी 'भर्ग' और उसके बाद 'देव' शब्द की निरुक्ति करता हुआ, ज्योति के उस स्वरूप की व्याख्या कर रहा है जो स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित है और द्युलोक में क्रीडा करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) स्वेन रूपेण भ्राजते, तस्मात् (सः) भर्ग इति स्मृतः। यस्माद् (सः) दिवि दीव्यते, क्रीडते, द्योतते, रोचते—(तस्मात् सः देवः)।
पदार्थ और निर्वचन:
• भ्राजते: 'भ्राज्' धातु से है, जिसका अर्थ है चमकना या प्रज्ज्वलित होना। यह वह प्रकाश है जो स्वयं को और दूसरों को दृश्यमान बनाता है।
• स्वेन रूपेण: अपने ही स्वरूप से। यहाँ 'स्व' शब्द महत्वपूर्ण है; यह संकेत है कि इस ज्योति को प्रकाशित करने के लिए किसी बाहरी स्रोत की आवश्यकता नहीं है, वह 'स्वयंप्रकाश' है।
• भर्ग: चमकने वाला या तेजवान। पूर्व श्लोकों में इसे 'पकाने वाले' और 'हरने वाले' रूप में देखा गया, यहाँ इसे 'रूप-सौंदर्य और दीप्ति' के रूप में देखा जा रहा है।
• दिवि: द्युलोक में अथवा आकाश में (सप्तमी विभक्ति—स्थान)।
• दीव्यते, क्रीडते, द्योतते, रोचते: ये चारों क्रियाएँ 'देव' शब्द की व्युत्पत्ति का आधार हैं। 'दीव्यते' अर्थात् दीप्तिमान होना; 'क्रीडते' अर्थात् विचरना या क्रीड़ा करना (यहाँ क्रीड़ा का अर्थ भौतिक खेल नहीं, अपितु अपनी सत्ता में आनंदपूर्वक स्थित होना है); 'द्योतते' अर्थात् प्रकाशित करना और 'रोचते' अर्थात् शोभायमान होना।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सूर्य के नाम-संकेतों के माध्यम से उस परम तत्त्व के स्वरूप को खोल रहे हैं। वे कहते हैं कि जो ज्योति अपने ही स्वरूप से चमकती है, वह 'भर्ग' है। बाहरी जगत की हर वस्तु प्रकाश के लिए किसी अन्य पर निर्भर है—जैसे पृथ्वी सूर्य पर, और सूर्य अपनी आंतरिक ऊर्जा पर। किन्तु वह मूल पुरुष-ज्योति, जो समस्त ब्रह्मांड का आधार है, वह स्वयं में प्रकाशित है। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि "वह अपने रूप से भ्राजता है", तो वे उस 'अक्षर' की ओर संकेत कर रहे हैं जिसे किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं।
इसके पश्चात ऋषि 'देव' शब्द के रहस्य को उद्घाटित करते हैं। सामान्यतः हम 'देव' को एक व्यक्ति या अधिष्ठाता मानते हैं, किन्तु यहाँ 'देव' एक क्रिया है। जो द्युलोक (दिव्) में स्थित होकर दीप्तिमान है, वहाँ आनंदपूर्वक विचरता है और अपनी आभा से सर्वत्र व्याप्त है, वही देव है। यह वर्णन केवल भौतिक सूर्य का नहीं है, अपितु उस चेतना का है जो आकाश की भाँति व्यापक है।
यहाँ 'क्रीडा' शब्द अत्यंत गूढ़ है। जब पूर्ण चैतन्य अपनी ही माया या सृष्टि के विस्तार में आनंदपूर्वक स्थित होता है, तो उसे 'दिव्य-क्रीड़ा' कहा जाता है। यह वह स्थिति है जहाँ कर्ता और कर्म का भेद मिट जाता है और केवल प्रकाश की क्रीड़ा शेष रहती है। इस प्रकार भर्ग (तेज) और देव (प्रकाशमय विचरन) एक ही तत्त्व के दो आयाम हैं—एक उसकी तीव्रता है और दूसरा उसका विस्तार।
श्रुति-संगति —
देव शब्द की यह निरुक्ति कि वह 'दिव्' (द्युलोक/आकाश) से संबंधित है, शतपथ ब्राह्मण में स्पष्ट मिलती है:
सोऽर्चञ्च्राम्यंश्चचार प्रजाकामः स आत्मन्येव प्रजातिमधत्त स आस्येनैव देवानसृजत ते देवा दिवमभिपद्यासृज्यन्त तद्देवानां देवत्वं यद्दिवमभिपद्यासृज्यन्त तस्मै ससृजानाय दिवेवास तद्वेव देवानां देवत्वं यदस्मै ससृजानाय दिवेवास ॥ ११.१.६.७ ॥
वह प्रजाकी कामनासे (स्तुति-)अर्चन और श्रम करता हुआ चला; उसने अपनेमें ही प्रजननकी शक्ति धारण की। उसने मुखसे ही देवोंको रचा; वे देव द्युलोक (दिव्) को प्राप्त होकर रचे गये — यही देवोंका देवत्व है कि वे दिव्को प्राप्त होकर रचे गये। उस रचनेवालेके लिए (तब) दिन-सा (प्रकाश) हो गया — यह भी देवोंका देवत्व है कि उसके लिए दिन-सा हो गया।
इस श्रुति-अंश में कहा गया है कि जब प्रजापति ने देवों को रचा और वे द्युलोक (दिव्) को प्राप्त हुए, तब वही उनका 'देवत्व' कहलाया। स्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति का विस्तार करता है। श्रुति जहाँ देवत्व के 'प्राप्ति' (स्थान) की बात करती है, वहीं याज्ञवल्क्य उस स्थान में होने वाली क्रियाओं—दीव्यते, क्रीडते, द्योतते—को जोड़कर बताते हैं कि देव केवल वह नहीं जो द्युलोक में पहुँचा, अपितु वह है जो वहाँ अपनी पूर्ण आभा के साथ विचरता और प्रकाशित होता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'स्वयंप्रकाश' की अनुभूति का मार्ग है। योगिक अभ्यास में साधक पहले बाहरी सूर्य (स्थूल) को देखता है, फिर हृदय-आकाश के भीतर स्थित सूर्य (सूक्ष्म) को अनुभव करता है।
जब साधक इस श्लोक के शब्दों 'स्वेन रूपेण भ्राजते' का मनन करता है, तो वह अपनी वृत्ति को बाहरी अवलंबों से हटाकर अपने अंतःकरण की उस ज्योति पर केंद्रित करता है जो किसी बाहरी प्रकाश की मोहताज नहीं है। यह अभ्यास साधक को 'अविद्या' (अंधकार) से 'विद्या' (प्रकाश) की ओर ले जाता है।
यहाँ 'दिवि क्रीडते' का योगिक अर्थ यह है कि जब साधक का मन स्थिर होकर हृदय-आकाश में स्थित होता है, तब उसे एक अपूर्व आनंदानुभूति होती है—यही वह 'क्रीड़ा' है। यह अवस्था उस भूमि की है जहाँ साधक स्वयं को केवल एक शरीर नहीं, बल्कि एक दीप्तिमान चेतना के रूप में अनुभव करता है। इस अभ्यास से साधक स्थूल सूर्य की उपासना से ऊपर उठकर, अपने भीतर के 'भर्ग' (तेज) और 'देव' (प्रकाशमय विस्तार) का साक्षात्कार करता है।
तस्मादेव इति प्रोक्तस्तूयते सर्वदैवतैः ।
सविता सर्वभूतानां सर्वभावान् प्रसूयते ॥ ९.५५ ॥
— इसलिए (वह) "देव" कहा गया है और सब देवता उसकी स्तुति करते हैं। सविता सब भूतोंके सब भावोंको उत्पन्न करता है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'भर्ग' के स्वयंप्रभा स्वरूप और आकाश में उसकी क्रीड़ा का वर्णन किया था। उसी प्रकाशमयता के आधार पर, इस ५५वें श्लोक में ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वह ज्योति केवल एक नाम नहीं, अपितु समस्त देवत्व का मूल है, जो न केवल देवताओं द्वारा पूजनीय है, बल्कि संपूर्ण सृष्टि का आदि-कारण (प्रसविता) भी है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तस्मात् एव (सः) 'देव' इति प्रोक्तः, (तस्य) तूयते सर्वदैवतैः। सविता सर्वभूतानां सर्वभावान् प्रसूयते।
पदार्थ और निर्वचन:
• तस्मादेव: 'तस्मात्' (उस कारण से) + 'एव' (ही)। यहाँ 'कारण' पिछले श्लोक की वह दीप्ति है जो दिवि क्रीड़मान है। जो स्वयं प्रकाशित है, वही 'देव' है।
• तूयते: स्तुति की जाती है या प्रार्थना की जाती है। यह केवल शब्दों का जप नहीं, अपितु उस परम ज्योति के प्रति समस्त चेतनाओं का उन्मुख होना है।
• सर्वदैवतैः: समस्त देवताओं द्वारा। यहाँ देवता वे दिव्य शक्तियाँ हैं जो सृष्टि के विभिन्न विभागों का संचालन करती हैं।
• सविता: सूर्य का वह रूप जो 'उत्पन्न' करता है। 'सवितृ' धातु का अर्थ है—प्रेरित करना, उत्पन्न करना या प्रसव करना।
• सर्वभावान् प्रसूयते: समस्त भावों को प्रसुति (जन्म) देता है। यहाँ 'भाव' केवल भौतिक वस्तुओं को नहीं, अपितु मानसिक वृत्तियों, प्राणिक स्पंदनों और चेतना के स्तरों को भी सूचित करता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में 'देव' शब्द की वास्तविक निरुक्ति कर रहे हैं। सामान्यतः हम देवताओं को अलग-अलग व्यक्तित्वों के रूप में देखते हैं, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य का संकेत है कि जो तत्व स्वयं प्रकाशमान है और जिसके बिना कोई अन्य ज्योति संभव नहीं, वही वास्तव में 'देव' है। जब वे कहते हैं कि "सब देवता उसकी स्तुति करते हैं", तो इसका रहस्य यह है कि सृष्टि की समस्त दिव्य शक्तियाँ (इन्द्रियाँ, मन, प्राण) उसी एक परम सूर्य-तत्त्व से ऊर्जा प्राप्त करती हैं; अतः उनकी सारी क्रियाएँ अंततः उसी एक मूल ज्योति की वंदना और उसकी ओर वापसी का प्रयास हैं।
दूसरे चरण में ऋषि 'सविता' के स्वरूप को उद्घाटित करते हैं। सविता केवल आकाश में उदय होने वाला भौतिक सूर्य नहीं है, अपितु वह 'प्रसविता' है—वह चेतना जो शून्य से सृष्टि को प्रस्फुटित करती है। "सर्वभूतानां सर्वभावान् प्रसूयते" का अर्थ यह है कि चाहे वह स्थूल शरीर हो या सूक्ष्म विचार, जड़ पदार्थ हो या चेतन आत्मा, प्रत्येक 'भाव' (अवस्था) सविता की प्रेरणा और उसकी ऊर्जा से ही प्रकट होता है। जिस प्रकार एक बीज में वृक्ष छिपा होता है और सूर्य की उष्णता उसे प्रस्फुटित करती है, वैसे ही इस ब्रह्मांड के समस्त संभावनाओं के बीज उस सविता-ज्योति द्वारा ही साकार किए जाते हैं।
श्रुति-संगति —
इस प्रसव-शक्ति का प्रमाण श्रुति में मिलता है:
अथ गृह्णाति । देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् अग्नये जुष्टं गृह्णामीति सविता वै देवानां प्रसविता तत्सवितृप्रसूत एवैतद्गृह्णात्यश्विनोर्बाहुभ्यामित्यश्विनावध्वर्यू पूष्णो हस्ताभ्यामिति पूषा भागदुघोऽशनं पाणिभ्यामुपनिधाता सत्यं देवा अन्तम्मनुष्यास्तत्सत्येनैवैतद्गृह्णाति ॥ १.१.२.१७ ॥
फिर वह (हवि) ग्रहण करता है — "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् अग्नये जुष्टं गृह्णामि" (सविता देवकी प्रेरणामें, अश्विनोंकी बाहुओंसे, पूषाके हाथोंसे, अग्निके लिए प्रिय तुझे ग्रहण करता हूँ)। सविता ही देवताओंका प्रसविता है; इस प्रकार वह सविताकी प्रेरणासे ही ग्रहण करता है। अश्विन (देवताओंके) अध्वर्यु हैं; पूषा भाग बाँटनेवाला है, जो हाथोंसे भोजन रखता है। देवता सत्य हैं, मनुष्य असत्य; इस प्रकार वह सत्यसे ही ग्रहण करता है।
यहाँ शतपथ ब्राह्मण स्पष्ट कहता है—"सविता वै देवानां प्रसविता" अर्थात् सविता ही देवताओं को उत्पन्न करने वाला या उन्हें प्रेरित करने वाला है। स्मृति का यह वचन कि "सविता सब भावों को प्रसूयते", वास्तव में इसी श्रुति का विस्तार है। जहाँ श्रुति केवल देवताओं के प्रसव की बात करती है, वहीं याज्ञवल्क्य उसे 'सर्वभूता' और 'सर्वभाव' तक विस्तृत कर देते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भौतिक जगत से लेकर दिव्य लोक तक, सब कुछ उसी एक सविता-शक्ति का विवर्त है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अर्थ अत्यंत गूढ़ है। योगिक दृष्टि से 'सविता' वह आंतरिक सूर्य (हृदय-आकाश की ज्योति) है जो साधक के भीतर सोई हुई शक्तियों को जागृत करता है।
१. अभ्यास: जब साधक गायत्री मन्त्र का जप करता है, तो वह केवल बाहरी सूर्य को नहीं, अपितु अपने भीतर के उस 'सविता' को पुकारता है जो उसकी बुद्धि (धी) को प्रस्फुटित कर सके।
२. अनुभव: यहाँ "सब देवता उसकी स्तुति करते हैं" का अनुभव तब होता है जब साधक की समस्त इन्द्रियाँ (जो कि देवता हैं) बाहरी विषयों से हटकर अंतर्मुखी होकर उस एक आंतरिक प्रकाश में लीन होने लगती हैं। इसे ही 'देवत्व' की प्राप्ति कहा जाता है।
३. भूमि: यह श्लोक साधक को 'साधन-भूमि' से 'अनुभव-भूमि' की ओर ले जाता है। जब साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर उठने वाला प्रत्येक विचार (भाव) और प्रत्येक प्राणिक स्पंदन उसी एक चैतन्य-ज्योति का प्रसव है, तब वह द्वैत से मुक्त होकर स्वयं को उस विराट सविता के साथ एकाकार महसूस करने लगता है। वह समझ जाता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, अपितु उस अनंत प्रकाश की एक छोटी सी किरण है।
सवनात् पावनाच्चैव सविता तेन चोच्यते ।
वरेण्यं वरणीयं च जन्मसंसारभीरुभिः ॥ ९.५६ ॥
— सवन (उत्पन्न करने) और पवित्र करनेसे वह सविता कहलाता है। जन्म-संसारसे डरनेवालोंके लिए (वह) वरेण्य — वरण करने योग्य है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'सविता' के उस स्वरूप का वर्णन किया जो समस्त भूतों और उनके भावों को प्रसूयते अर्थात् उत्पन्न करता है। वर्तमान श्लोक उसी 'सविता' नाम की व्युत्पत्ति (निरुक्ति) करते हुए यह स्पष्ट कर रहा है कि वह परम तत्व केवल सृष्टि का सृजक ही नहीं, अपितु साधक के लिए मोक्ष का द्वार भी है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) सवनात् पावनाच्चैव 'सविता' (इति) तेन च उच्यते। (सः) जन्मसंसारभीरुभिः वरेण्यं वरणीयं च (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सवनात्: 'सवन' का अर्थ है उत्पन्न करना या प्रवृत्त करना। जो जड़ प्रकृति में चेतन प्राणों को प्रवृत्त करता है, वह सवन है।
• पावनात्: 'पावन' अर्थात् पवित्र करने वाला। यहाँ पवित्रता का अर्थ केवल बाह्य शुद्धि नहीं, अपितु अविद्या के मल को जलाकर आत्मा को शुद्ध करना है।
• सविता: इन दोनों गुणों (उत्पन्न करने और पवित्र करने) के कारण वह 'सविता' कहलाता है।
• जनमसंसारभीरुभिः: जो जन्म और मरण के चक्र (संसार) से भयभीत हैं। यहाँ 'भय' का अर्थ केवल डराना नहीं, अपितु संसार की निस्सारता और दुखों का अनुभव कर उससे मुक्त होने की तीव्र उत्कंठा है।
• वरेण्यं: वह पद या तत्व जो श्रेष्ठतम है, जिसे प्राप्त करना परम लक्ष्य है।
• वरणीयं: जिसे वरण किया जाना चाहिए; अर्थात् जिसका चुनाव अन्य सभी सांसारिक सुखों के त्याग कर किया जाए।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'सविता' शब्द के दो मुख्य आयाम खोल रहे हैं—एक सृजनात्मक और दूसरा शुद्धिकरणत्मक।
प्रथमतः, वह 'सवनात्' है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें बीजों को अंकुरित कर वनस्पति उत्पन्न करती हैं, उसी प्रकार यह सविता-तत्व जीव के भीतर सोई हुई चेतना को जाग्रत करता है। यह केवल भौतिक जन्म नहीं, अपितु आध्यात्मिक पुनर्जन्म का कारण है। द्वितीयतः, वह 'पावनात्' है। अग्नि जिस प्रकार स्वर्ण को तपाकर शुद्ध करती है, उसी प्रकार सविता की ज्योति साधक के चित्त के अन्धकार और संस्कारों को जलाकर उसे पवित्र करती है। अतः जो उत्पन्न करता है और जो पवित्र करता है, वही वास्तविक 'सविता' है।
परन्तु, यह ज्ञान केवल दार्शनिक विवेचन नहीं है, अपितु एक साधना-मार्ग है। ऋषि कहते हैं कि वह 'वरेण्य' और 'वरणीयं' है—किन्तु किसके लिए? उन लोगों के लिए जो 'जनमसंसारभीरु' हैं। जो मनुष्य इस देह-बुद्धि में लीन है, उसके लिए यह केवल आकाश का सूर्य है; किन्तु जो इस जन्म-मृत्यु के अंतहीन चक्र की विभीषिका को समझ चुका है और उससे भयभीत (मुक्त होने को व्याकुल) है, उसके लिए यह सविता-तत्व ही एकमात्र शरण है। वह इसे वरण करता है क्योंकि वह जानता है कि संसार के अन्य सभी सुख क्षणभंगुर हैं, केवल इस परम ज्योति का वरण ही उसे शाश्वत शांति दे सकता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
वरेण्यं सर्वतेजोभ्यः श्रेष्ठं वै परमं पदम् । स्वर्गापवर्गकामैर्वा वरणीयं सदैव हि ॥ २१६.५ ॥
"वरेण्य" — सब तेजोंसे श्रेष्ठ परम पद; अथवा स्वर्ग और मोक्षकी कामनावालोंके द्वारा सदा वरण करने योग्य।
अग्नि पुराण में भी 'वरेण्य' शब्द की व्याख्या इसी दृष्टि से की गई है कि यह सब तेजों से श्रेष्ठ परम पद है और स्वर्ग तथा अपवर्ग (मोक्ष) की कामना करने वालों के द्वारा सदा वरण करने योग्य है। यहाँ स्मृति और पुराण का अद्भुत मेल है—स्मृति जहाँ जन्म-संसार के भय को प्रेरणा बता रही है, वहीं अग्नि पुराण उस भय के समाधान रूपी 'परम पद' की ओर संकेत कर रहा है। दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि सविता का यह स्वरूप केवल भौतिक जगत का प्रकाश नहीं, अपितु मोक्ष का साधन है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'भय' को 'अभ्यास' में बदलने की विधि है। योगी जब संसार के दुखों और पुनरावृत्ति (जन्म-मृत्यु) के प्रति सजग होता है, तब उसके भीतर एक 'दिव्य भय' उत्पन्न होता है। यह भय नकारात्मक नहीं, अपितु वह धक्का है जो उसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर धकेलता है।
अभ्यास का केंद्र यहाँ 'सविता' रूपी ज्योति है। साधक जब गायत्री या सूर्य-ध्यान करता है, तो वह केवल एक देवता की पूजा नहीं कर रहा, बल्कि अपने भीतर के उस तत्व को पुकार रहा है जो उसे इस संसार-जाल से बाहर निकाल सके।
• सवन अभ्यास: साधक अनुभव करता है कि उसकी चेतना का जागरण उसी सविता द्वारा हो रहा है।
• पावन अभ्यास: वह अपनी आंतरिक अशुद्धियों को उस सूर्य-ज्योति में होम करता है, जिससे उसका हृदय शुद्ध होता है।
जब साधक 'वरेण्य' भाव में स्थित होता है, तो वह संसार के विषयों का वरण करना छोड़कर केवल उस एक अक्षर (परम ज्योति) का वरण करता है। यह स्थिति उसे 'सांसारिक पुरुष' से 'मुमुक्षु' की भूमि पर ले जाती है, जहाँ अब उसकी एकमात्र अभिलाषा जन्म-मृत्यु के बंधन से पूर्ण मुक्ति है।
आदित्यान्तर्गतं भर्गः सेव्यते वै मुमुक्षुभिः ।
जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य त्रिविधस्य च ॥ ९.५७ ॥
आदित्यके भीतर स्थित भर्गका मुमुक्षु जन्म-मृत्युके नाश और तीनों प्रकारके दुःखके (नाशके) लिए सेवन करते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के 'भर्ग', 'देव' और 'सविता' स्वरूपों की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि जो संसार से भयभीत हैं, उनके लिए वह सविता-तत्व 'वरेण्य' है। अब वर्तमान श्लोक उस 'भर्ग' रूपी तेज के प्रयोजन को स्पष्ट करता है कि मुमुक्षु साधक आदित्य के भीतर स्थित इस तत्व का सेवन क्यों करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तद्) आदित्यान्तर्गतं भर्गः मुमुक्षुभिः जन्म-मृत्यु-विनाशाय दुःखस्य त्रिविधस्य च (विनाशाय) सेव्यते वै।
पदार्थ और निर्वचन:
• आदित्यान्तर्गतं भर्गः: आदित्य के भीतर स्थित 'भर्ग'। यहाँ 'आदित्य' केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु वह प्रकाश-स्वरूप पुरुष है जिसके भीतर 'भर्ग' (दिव्य तेज/अग्नि) निहित है। 'भर्ग' का अर्थ है जो पापों को भूनकर भस्म कर दे और साधक को प्रकाशित करे।
• सेव्यते: सेवन किया जाता है। 'सेवन' के तीन अर्थ हैं— मन्त्र द्वारा जप, ध्यान द्वारा दर्शन और प्राण-साधना द्वारा उस तेज में लीन होना।
• मुमुक्षुभिः: जिन्हें मोक्ष की तीव्र इच्छा है। यहाँ मुमुक्षु वह है जिसने संसार की निस्सारता को जान लिया है।
• जन्ममृत्युविनाशाय: जन्म और मृत्यु के चक्र (पुनर्जन्म) के समूल नाश के लिए।
• दुःखस्य त्रिविधस्य: तीन प्रकार के दुखों का नाश। शास्त्रानुसार दुःख तीन हैं— १. आध्यात्मिक (स्वयं के शरीर और मन से उत्पन्न), २. आधिभौतिक (अन्य जीवों या बाहरी वातावरण से उत्पन्न), ३. आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाओं या दैवीय प्रकोप से उत्पन्न)।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में साधना के लक्ष्य और साधन का समन्वय कर रहे हैं। वे कहते हैं कि आदित्य के भीतर स्थित 'भर्ग' का सेवन मुमुक्षुओं द्वारा किया जाता है।
यहाँ रहस्य यह है कि 'आदित्य' वह विराट पुरुष है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, किंतु उस विराटता के केंद्र में एक 'भर्ग' रूपी अग्नि है। बाहरी दृष्टि से यह सूर्य का तेज है, किंतु आन्तरिक दृष्टि से यह वही 'अक्षर' और 'ज्योति' है जिसका वर्णन श्रुति में मिलता है। मुमुक्षु इस भर्ग का सेवन इसलिए करता है क्योंकि जन्म-मृत्यु का कारण 'अविद्या' और 'संस्कार' हैं। जब साधक आदित्य-भर्ग की उपासना करता है, तो वह तेज उसके हृदय के अन्धकार को जला देता है।
त्रिविध दुखों का नाश यहाँ केवल कष्टों की समाप्ति नहीं, अपितु उन कारणों का विनाश है जो इन दुखों को जन्म देते हैं। आध्यात्मिक दुःख मन के विक्षेप से आता है, आधिभौतिक शरीर के आसक्ति से और आधिदैविक प्रारब्ध से। जब साधक भर्ग-रूप सूर्य में स्थित होकर स्वयं को उस प्रकाशमय पुरुष के साथ एकाकार करता है, तब वह देह-अभिमान से ऊपर उठ जाता है। जिस क्षण 'मैं' (अहं) का विसर्जन होता है, उसी क्षण त्रिविध दुःख स्वतः समाप्त हो जाते हैं क्योंकि दुःख केवल 'अहं' को ही होता है, आत्मा को नहीं।
शास्त्र-साक्ष्य —
स्वर्गाद्यैः क्रीडते देवो योऽहं स पुरुषः प्रभुः । आदित्यान्तर्गतं यच्च भर्गाख्यं वै मुमुक्षुभिः ॥ जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य त्रिविधस्य च । ध्यानेन पुरुषोऽयं च द्रष्टव्यः सूर्यमण्डले ॥ २१६.१५–१६ ॥
स्वर्ग आदि (लोकों) से क्रीडा करता है, इसलिए "देव" है; जो मैं हूँ, वही प्रभु पुरुष है। आदित्यके भीतर स्थित जो "भर्ग" नामका (तेज) है, (उसे) मुमुक्षु जन्म-मृत्युके और त्रिविध दुःखके नाशके लिए (सेवते हैं); और यह पुरुष ध्यानसे सूर्यमण्डलमें देखा जाना चाहिए।
यह ग्रन्थ स्पष्ट करता है कि जो पुरुष आदित्य के भीतर स्थित भर्ग का सेवन करते हैं, वे वास्तव में उस प्रभु पुरुष की प्राप्ति चाहते हैं जो स्वर्ग आदि लोकों में क्रीडा करता है। अग्निपुराण का यह अंश स्मृति के इस श्लोक के साथ पूर्णतः मेल खाता है; दोनों ही यहाँ 'भर्ग' को केवल एक मन्त्र या देवता नहीं, अपितु एक ऐसी शक्ति मानते हैं जो जन्म-मृत्यु और त्रिविध दुखों का समूल नाश करने में समर्थ है। स्मृतिका यह वचन कि भर्ग "सेव्यते" (सेवन किया जाता है), अग्निपुराण के इस निर्देश से पुष्ट होता है कि उसे "ध्यानेन द्रष्टव्यः" (ध्यान द्वारा देखा जाना चाहिए)।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रकाश-योग' का सूत्र है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को स्थूल सूर्य से हटाकर, आदित्य के भीतर स्थित उस सूक्ष्म 'भर्ग' (तेज) पर केंद्रित करे।
अभ्यास की विधि यह है: जब साधक सूर्योदय या सूर्यास्त के समय ध्यान करता है, तो वह केवल बाहरी प्रकाश को नहीं देखता, अपितु इस भाव में रहता है कि उसके हृदय के भीतर भी वही आदित्य-भर्ग प्रदीप्त है। वह अनुभव करता है कि जिस प्रकार सूर्य बाहरी अंधकार को मिटाता है, उसी प्रकार यह आंतरिक भर्ग उसके जन्म-मृत्यु के संस्कारों को भस्म कर रहा है।
साधक यहाँ 'अविद्या' की भूमि से 'विज्ञान' की भूमि की ओर बढ़ता है। जब वह भर्ग का सेवन करता है, तो उसका मन 'चित्त-शुद्धि' के स्तर पर पहुँच जाता है, जहाँ त्रिविध दुःख केवल लहरों की भाँति उठते और गिरते हैं, किंतु साधक स्वयं उस प्रकाशमय पुरुष (आदित्य) में स्थित होकर दृष्टा बना रहता है। यह अभ्यास साधक को शरीर-बोध से हटाकर ज्योति-बोध की ओर ले जाता है।
ध्यानेन पुरुषो यस्तु द्रष्टव्यः सूर्यमण्डले ।
मन्त्रोऽर्थमपि वेदादौ स्थापयत्येवमेव हि ॥ ९.५८ ॥
सूर्यमण्डलमें जिस पुरुषको ध्यानसे देखना चाहिए — वेदके आदिमें मन्त्र भी इसी अर्थको स्थापित करता है —
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के भर्ग, देव और सविता स्वरूपों की व्याख्या करते हुए यह बताया कि मुमुक्षु जन्म-मृत्यु और त्रिविध दुखों के नाश के लिए आदित्य के भीतर स्थित उस भर्ग-तत्व का सेवन करते हैं। वर्तमान श्लोक इस 'सेवन' की विधि को स्पष्ट करता है कि वह सेवन वास्तव में क्या है और वेदों का मूल मन्त्र किस सत्य की स्थापना करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सूर्यमण्डले यस्तु पुरुषो ध्यानेन द्रष्टव्यः (सः), मन्त्रोऽपि वेदादौ एवम् अर्थम् स्थापयति, हि एवमेव (इति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सूर्यमण्डले: यहाँ 'सूर्यमण्डल' के दो अर्थ हैं। स्थूलतः आकाश में स्थित सूर्य का परिधि-क्षेत्र, और सूक्ष्मतः हृदय-आकाश में स्थित वह प्रकाश-पुंज जहाँ प्राण का निवास है।
• पुरुषो ध्यानेन द्रष्टव्यः: वह पुरुष जिसे केवल 'ध्यान' (एकाग्र चित्त) के माध्यम से देखा जा सकता है। यह वह दृष्टा-पुरुष है जो दृश्य सूर्य के पीछे छिपा हुआ है।
• मन्त्रोऽर्थम्: यहाँ 'मन्त्र' शब्द विशेष रूप से गायत्री मन्त्र की ओर संकेत करता है, क्योंकि पूर्व श्लोकों में सविता और वरेण्य की चर्चा हुई है। 'अर्थ' का तात्पर्य उस मन्त्र के गूढ़ रहस्य या उसके लक्ष्य (पुरुष) से है।
• वेदादौ स्थापयति: वेदों के आरम्भ में ही इस सत्य को प्रतिष्ठित किया गया है। यहाँ 'आदि' का अर्थ केवल कालक्रम से नहीं, अपितु प्राथमिकता और मूल-बीज से है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ साधना की उस उच्चतम अवस्था का संकेत दे रहे हैं जहाँ साधक बाहरी सूर्य से हटकर उसके भीतर के 'पुरुष' की खोज करता है। वे कहते हैं कि सूर्यमण्डल में जिस पुरुष को ध्यान द्वारा देखा जाना चाहिए, वही सत्य वेदों के आदि-मन्त्रों में स्थापित किया गया है।
यहाँ रहस्य यह है कि साधारण मनुष्य सूर्य को केवल प्रकाश का स्रोत या एक खगोलीय पिंड मानता है, किन्तु योगी के लिए सूर्य वह द्वार है जिसके भीतर 'पुरुष' (परमात्मा/आत्मा) प्रतिष्ठित है। जब साधक ध्यान करता है, तो वह भौतिक सूर्य की किरणों को पार कर उस हिरण्मय पुरुष तक पहुँचता है जो समस्त जगत का प्रकाशक है।
याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वेदों में दिए गए मन्त्र केवल स्तुति या प्रार्थना नहीं हैं, अपितु वे 'अर्थ' (लक्ष्य) को स्थापित करने वाले साधन हैं। यदि हम गायत्री जैसे मन्त्रों के शब्दों में उलझे रहते हैं, तो हम केवल बाहरी विधि में रहेंगे; परन्तु यदि हम उस 'अर्थ' को पकड़ें जिसे मन्त्र स्थापित कर रहा है, तब हम उस सूर्य-पुरुष का साक्षात्कार कर सकेंगे। अतः वेदों का मूल उद्देश्य ही साधक को उस आंतरिक प्रकाश-पुरुष की ओर ले जाना है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ १.६.६ ॥
और जो यह आदित्यके भीतर सुवर्णमय पुरुष दिखायी देता है — सुनहरी दाढ़ी, सुनहरे केश, नखोंके सिरेतक सब-का-सब सुवर्ण ही।
छान्दोग्य उपनिषद् १.६.६ में वर्णन आता है कि आदित्य के भीतर एक हिरण्मय पुरुष दृश्यमान है, जिसके केश, दाढ़ी और नख तक सुवर्णमय हैं।
स्मृति का यह श्लोक छान्दोग्य के इस वर्णन की पुष्टि करता है। जहाँ छान्दोग्य उस पुरुष के 'रूप' (हिरण्मय) का वर्णन करता है, वहीं याज्ञवल्क्य उसकी 'प्राप्ति की विधि' (ध्यान) और उसके 'शास्त्रीय आधार' (वेदादि मन्त्र) को स्पष्ट करते हैं। स्मृति यह बताती है कि वह हिरण्मय पुरुष केवल एक दार्शनिक कल्पना नहीं है, अपितु ध्यान के माध्यम से द्रष्टव्य सत्य है जिसे वेदों ने आदि से ही स्थापित किया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अर्थ अत्यंत गूढ़ है। यहाँ 'ध्यान' का अर्थ केवल आँखें मूँदकर सोचना नहीं, अपितु चित्त को सूर्य-तत्व में विलीन करना है।
अभ्यास यह है कि साधक जब सूर्य के दर्शन करता है या उसका जप करता है, तो वह अपनी दृष्टि को बाहरी प्रकाश से हटाकर उस 'प्रकाश के स्रोत' (पुरुष) पर केंद्रित करे। इस अभ्यास से साधक की चेतना स्थूल सूर्य (भौतिक) से सूक्ष्म सूर्य (हृदय-ज्योति) की ओर बढ़ती है।
जब मन्त्र का 'अर्थ' हृदय में स्थापित होता है, तब साधक अनुभव करता है कि जिस प्रकाश को वह बाहर खोज रहा था, वह उसके अपने ही भीतर के पुरुष का स्वरूप है। यह अवस्था साधक को 'साधक' से 'द्रष्टा' की भूमि पर ले जाती है। यहाँ अभ्यास केवल मन्त्रोच्चार नहीं, अपितु उस मन्त्र द्वारा संकेतित 'पुरुष' में स्थित होना है। इस प्रकार साधक सूर्य-मण्डल के माध्यम से स्वयं के आत्म-स्वरूप (अक्षर) का अनुभव करता है।
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्याऽपिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ ९.५९ ॥
(ईश १५ / बृहदारण्यक:) सुवर्णमय पात्रसे सत्यका मुख ढका है; हे पूषन्! सत्यधर्मा (मुझ) को दर्शनके लिए उसे हटा दो।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि वेदों के आदि-मन्त्र (गायत्री) का लक्ष्य सूर्यमण्डल में स्थित उस 'पुरुष' को प्रतिष्ठित करना है, जिसे ध्यान से देखा जाना चाहिए। अब वर्तमान श्लोक उस पुरुष की प्राप्ति में आने वाली बाधा और उस बाधा को हटाने की प्रार्थना के रूप में प्रस्तुत है; यह मन्त्र वास्तव में उस 'अवरोध' का रहस्य खोलता है जो साधक और सत्य के बीच खड़ा है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य मुखम् अपिहितम् (अस्ति)। हे पूषन्! सत्यधर्माय (मम) दृष्टये तत्त्वं (तद् पात्रं) अनपावृणु।
पदार्थ और निर्वचन:
• हिरण्मय पात्रेण: 'हिरण्मय' का शाब्दिक अर्थ है सोने जैसा या स्वर्णमय। यहाँ यह केवल धातु का बोध नहीं कराता, बल्कि उस 'प्रकाशमान आवरण' का प्रतीक है जो अत्यंत दीप्तिमान होने के कारण सत्य को ढके हुए है।
• सत्यस्य मुखम् अपिहितम्: 'सत्य' वह परम पुरुष (अक्षर) है जिसकी चर्चा पूर्व श्लोकों में हुई। 'मुख' का अर्थ यहाँ उस द्वार या प्रवेश-बिन्दु से है जहाँ से आत्म-साक्षात्कार संभव है। 'अपिहितम्' का अर्थ है ढका हुआ या अवरुद्ध।
• पूषन्: यह सूर्य का एक नाम है। पूषन् वह है जो पोषण करता है और जो मार्ग का अवरोध हटाकर साधक को गंतव्य तक पहुँचाता है।
• सत्यधर्माय: वह व्यक्ति जिसका धर्म (स्वभाव) सत्य की खोज करना है, या जिसने सत्य-मार्ग को अपना लिया है।
• दृष्टये: दर्शन के लिए। यहाँ 'दर्शन' केवल चर्म-चक्षुओं से देखना नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान (अपरोक्षानुभूति) है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से एक अत्यंत गहन रहस्य उद्घाटित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सत्य का मुख 'हिरण्मय पात्र' से ढका हुआ है। प्रथम दृष्टि में यह एक प्रार्थना प्रतीत होती है, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को उस सूक्ष्म बाधा से परिचित करा रहे हैं जिसे 'स्वर्ण-आवरण' कहा गया है।
बाहरी विधि के अनुसार, यह सूर्य देव (पूषन्) से की गई प्रार्थना है कि वे सत्य के दर्शन कराएं। किन्तु इसका आन्तर अर्थ यह है कि सत्य अत्यंत स्पष्ट और प्रकाशमान है, फिर भी वह हमें दिखाई नहीं देता क्योंकि हम उस 'हिरण्मय पात्र' यानी 'मायावी प्रकाश' या 'अहंकार की दीप्ति' में उलझे हुए हैं। जिस प्रकार अत्यधिक तीव्र प्रकाश आँखों को चौंधिया देता है और वस्तु को ओझल कर देता है, उसी प्रकार संसार की यह चकाचौंध (हिरण्मय पात्र) उस परम सत्य के मुख को ढके हुए है।
यहाँ 'हिरण्मय' शब्द का प्रयोग अत्यंत सार्थक है। स्वर्ण मूल्यवान होता है, आकर्षक होता है; वैसे ही यह भौतिक जगत और इसकी उपलब्धियाँ इतनी आकर्षक हैं कि साधक इन्हीं में लीन रहता है और उसके पीछे छिपे वास्तविक पुरुष (सत्य) को नहीं देख पाता। याज्ञवल्क्य यहाँ संकेत कर रहे हैं कि सत्य कहीं दूर नहीं है, वह यहीं है, बस एक 'पात्र' द्वारा ढका हुआ है। जब साधक स्वयं को 'सत्यधर्मा' (सत्य के प्रति समर्पित) बना लेता है, तब वह पूषन्-तत्व (आंतरिक सूर्य/विवेक) की सहायता से उस आवरण को हटा पाता है।
यह श्लोक वास्तव में एक 'संक्रमण काल' है। पिछले श्लोकों में जिस भर्ग और सविता का वर्णन था, यहाँ यह बताया गया है कि उन तक पहुँचने के लिए पहले इस स्वर्ण-पात्र (माया/अविद्या) का हटना आवश्यक है। जब यह पात्र हटता है, तभी वह पुरुष दृष्टिगोचर होता है जिसका स्मरण अगले श्लोक (९.६०) में बताया गया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'विवेक' और 'अवरोध' के बीच के संघर्ष का प्रतीक है। योग मार्ग पर चलते हुए साधक अनुभव करता है कि सत्य कहीं बाहर नहीं, अपितु उसके भीतर ही है, किन्तु वह एक 'प्रकाशमय आवरण' (हिरण्मय पात्र) से ढका है। यह आवरण और कुछ नहीं, अपितु सूक्ष्म वासनाएँ और मानसिक प्रवृत्तियाँ हैं जो स्वयं को 'ज्ञान' या 'भक्ति' के स्वर्ण-मुखौटों के पीछे छिपा लेती हैं।
साधक यहाँ इस बात का अभ्यास करता है कि वह अपनी दृष्टि को बाहरी चकाचौंध से हटाकर उस केंद्र की ओर ले जाए जहाँ सत्य स्थित है। जब साधक 'सत्यधर्मा' होता है—अर्थात जब उसके विचार, वाणी और कर्म में एकरूपता आती है—तब उसके भीतर का 'पूषन्' (विवेक-सूर्य) जाग्रत होता है। यह अभ्यास साधक को 'साधन-भूमि' से 'अनुभूति-भूमि' की ओर ले जाता है। वह अनुभव करता है कि सत्य ढका हुआ नहीं है, बल्कि उसकी अपनी दृष्टि ही आवरणों से घिरी हुई थी। जैसे ही वह प्रार्थना करता है "नपावृणु" (हटा दो), वह वास्तव में अपने अहंकार के विसर्जन की प्रार्थना कर रहा होता है ताकि उस अक्षर-पुरुष का दर्शन हो सके जो सूर्यमण्डल के केंद्र में स्थित है।
योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम् ।
कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ॥ ९.६० ॥
(ईश १६:) जो वह आदित्यमें पुरुष है, वह मैं हूँ। (गीता ८.९:) जो कवि, पुरातन, शासक, अणुसे भी अणु — (उसका) स्मरण करता है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में सत्य के मुख पर ढके हुए 'हिरण्मय पात्र' (प्रकाशमान आवरण) का उल्लेख था और उस अवरोध को हटाने की प्रार्थना की गई थी। वर्तमान श्लोक उस प्रार्थना के उपरांत प्राप्त होने वाली अनुभूति और उस परम पुरुष के स्वरूप का वर्णन करता है, जहाँ साधक स्वयं को उस आदित्य-पुरुष में विलीन पाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: योऽसौ पुरुषः आदित्ये (अस्ति), सोऽसौ अहम् (अस्मि)। यः कविः, पुराणः, अनुशासिता, अणुरणीयान् (अस्ति), तं (मनुष्यः) अनुस्मरेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्: 'जो वह आदित्य में स्थित पुरुष है, वह मैं ही हूँ।' यहाँ 'आदित्य' केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु उस प्रकाश-पुंज का प्रतीक है जिसमें चेतना प्रतिष्ठित है। यह वाक्य अभेद की चरम अवस्था को दर्शाता है।
• कविम्: कवि का अर्थ केवल कविता रचने वाला नहीं, अपितु वह जो 'त्रिकालज्ञ' है—जो भूत, भविष्य और वर्तमान को एक साथ देखता है। वह सर्वज्ञ है।
• पुराणम्: जो पुरातन है; अर्थात् समय की सीमाओं से परे, अनादि, जिसका कोई आरम्भ नहीं।
• अनुशासितारम्: जो समस्त चराचर जगत का शासन करता है, जिसकी इच्छा से ही सृष्टि का संचालन होता है।
• अणोरणीयांसम्: 'अणु' अत्यंत सूक्ष्म होता है, किन्तु वह पुरुष उस अणु से भी अधिक सूक्ष्म (सूक्ष्मतर) है। यह उसके सर्वव्यापी और अभौतिक होने का प्रमाण है।
• अनुस्मरेत्: उसका स्मरण करे। यहाँ स्मरण केवल मानसिक याद करना नहीं, अपितु निरंतर उस भाव में स्थित रहना है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में साधक को 'अहं ब्रह्मास्मि' की उस स्थिति तक ले जा रहे हैं जहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है। पिछले श्लोक में जिस सत्य के मुख को खोलने की प्रार्थना की गई थी, यह श्लोक उस खुले हुए द्वार के पीछे के दर्शन का वर्णन है।
जब 'हिरण्मय पात्र' हट जाता है, तब साधक अनुभव करता है कि सूर्यमण्डल (प्रकाश-पुंज) के केंद्र में जो पुरुष स्थित है, वह कोई बाहरी देवता नहीं, अपितु उसकी अपनी ही वास्तविक स्वरूप-सत्ता है— "सोऽसावहम्" (वह मैं हूँ)। यह केवल बौद्धिक दावा नहीं, बल्कि एक योगिक अनुभूति है। आदित्य यहाँ 'आत्मा' का प्रतीक है और उसमें स्थित पुरुष 'परमात्मा' का; जब साधक इस अभेद को जान लेता है, तब वह सीमित देह-बुद्धि से मुक्त होकर विराट स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
इसके पश्चात ऋषि उस पुरुष के लक्षणों का वर्णन करते हैं ताकि साधक अपने भीतर उसे खोज सके। वह 'कवि' है क्योंकि वह समस्त सृष्टि के रहस्यों को जानता है; वह 'पुराण' है क्योंकि वह काल का निर्माता है, स्वयं काल के अधीन नहीं; वह 'अनुशासक' है क्योंकि उसकी सत्ता ही ब्रह्माण्ड का नियम है; और वह 'अणोरणीयान्' है क्योंकि उसे भौतिक इंद्रियों से नहीं पकड़ा जा सकता, वह केवल अनुभव का विषय है।
इस श्लोक की संरचना दो भागों में है: प्रथम भाग (अभेद-बोध) और द्वितीय भाग (स्वरूप-स्मरण)। पहले यह बोध कि "मैं वही हूँ", फिर उस स्वरूप के गुणों का स्मरण करना ताकि चित्त उसी सूक्ष्मता को प्राप्त कर सके।
शास्त्र-साक्ष्य —
तत्त्वं सदसि चिद्ब्रह्म विष्णोर्यत्परमं पदम् । देवस्य सवितुर्भर्गो वरेण्यं हि तुरीयकम् ॥ देहादिजाग्रदाब्रह्म अहं ब्रह्मेति धीमहि । योऽसावादित्यपुरुषः सोऽसावहमनन्त ओम् ॥ २१६.१७–१८ ॥
"तत्त्वमसि" (आदि वाक्योंका) सत्-चित् ब्रह्म, जो विष्णुका परम पद है — सविता देवका वही वरेण्य भर्ग (गायत्रीका) चौथा (ब्रह्मरूप) पाद है। देहसे लेकर ब्रह्मतक "मैं ब्रह्म हूँ" — ऐसा ध्यान करें; जो वह आदित्यमें पुरुष है, वही मैं हूँ — अनन्त, ओम्।
अग्निपुराण में भी यही अभेद-ध्यान वर्णित है, जहाँ कहा गया है कि देह से लेकर ब्रह्म तक "मैं ब्रह्म हूँ" ऐसा ध्यान करना चाहिए और स्पष्ट शब्दों में उल्लेख है— "योऽसावादित्यपुरुषः सोऽसावहमनन्त ओम्"।
स्मृति का यह श्लोक अग्निपुराण के इस अंश से पूर्णतः मेल खाता है। दोनों ही ग्रन्थ आदित्य-पुरुष को 'ओम्' (अनन्त) के साथ जोड़ते हैं। स्मृति यहाँ केवल विधि नहीं बता रही, बल्कि उस अवस्था की घोषणा कर रही है जहाँ साधक स्वयं को उस विराट सूर्य-पुरुष में विलीन पाता है। यह दर्शाता है कि वैदिक परंपरा का लक्ष्य केवल पूजा करना नहीं, अपितु उस पूज्य तत्त्व में स्वयं को प्रतिष्ठित करना है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'सोऽहम्' (वह मैं हूँ) के अभ्यास का आधार है। योगिक दृष्टि से, जब साधक सूर्य के प्रकाश या उसके प्रतीक आदित्य पुरुष का ध्यान करता है, तो वह धीरे-धीरे बाहरी सूर्य से हटकर अपने भीतर के 'अन्तर्यामी सूर्य' की ओर मुड़ता है।
अभ्यास यह है कि साधक पहले उस पुरुष को 'कवि', 'पुराण' और 'अणु' के रूप में देखे (साक्षी भाव), और फिर इस बोध को दृढ़ करे कि यह विराटता मेरे अपने स्वरूप की ही है। यहाँ "स्मरण" का अर्थ है—चित्त को सूक्ष्म से भी सूक्ष्म (अणोरणीयान्) करना। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूक्ष्म होकर कण-कण में व्याप्त हैं, वैसे ही साधक अपनी चेतना को इतना सूक्ष्म करता है कि वह स्वयं को शरीर की सीमाओं में नहीं, अपितु संपूर्ण आदित्य-पुरुष के रूप में अनुभव करने लगे। यह अभ्यास साधक को 'व्यष्टि' से 'समष्टि' की भूमि पर ले जाता है।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
भर्गस्तु पुरुषो ह्यात्मा ईश्वराख्यः शुचिस्तथा ॥ ९.६१ ॥
— सबके धारक, अचिन्त्यरूप, सूर्यके समान वर्णवाले, अन्धकारसे परे (उसका)। वह भर्ग ही पुरुष है, आत्मा है, ईश्वर नामवाला और शुचि (पवित्र) है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में साधक ने स्वयं को उस आदित्य-पुरुष के साथ एकाकार करने का उद्घोष किया और उसके 'अणोरणीयांसम्' (सूक्ष्मतम) स्वरूप का स्मरण किया। वर्तमान श्लोक उसी परम पुरुष के गुणों और उसकी वास्तविक पहचान को स्पष्ट करता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि जिसे हम बाहरी सूर्य या ईश्वर मान रहे हैं, वह वास्तव में हमारा अपना ही शुद्ध स्वरूप—भर्ग—है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) सर्वस्य धातारम्, अचिन्त्यरूपम्, आदित्यवर्णम्, तमसः परस्तात् (अस्ति)। भर्गः तु पुरुषः हि आत्मा (अस्ति), ईश्वराख्यः शुचिस्तथा (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सर्वस्य धातारम्: 'धाता' वह है जो धारण करता है। यहाँ अर्थ है—समस्त चराचर जगत को अपने अस्तित्व में थामे हुए। वह केवल सृजन करने वाला नहीं, अपितु निरंतर पोषक और आधार है।
• अचिन्त्यरूपम्: जिसे 'चित्त' या बुद्धि के माध्यम से सोचा न जा सके। जिसकी कोई सीमा, आकार या परिभाषा न हो; जो तर्क और कल्पना से परे है।
• आदित्यवर्णम्: सूर्य के समान प्रकाशमय वर्ण वाला। यहाँ वर्ण का अर्थ त्वचा का रंग नहीं, अपितु वह 'तेजस' है जो अज्ञान के अन्धकार को नष्ट कर देता है।
• तमसः परस्तात्: तमस (अन्धकार/अविद्या) से परे। वह स्थान जहाँ अंधकार की पहुँच ही नहीं है; वह शुद्ध चैतन्य का क्षेत्र है।
• भर्गः: भर्ग का शाब्दिक अर्थ है 'दीप्ति' या 'तेज'। योगिक दृष्टि से, यह वह अग्नि है जो समस्त अशुद्धियों को जलाकर भस्म कर देती है।
• पुरुषः / आत्मा / ईश्वराख्यः: यहाँ एक ही तत्त्व के तीन नाम दिए गए हैं—वह चेतन सत्ता (पुरुष), वह स्वयं का स्वरूप (आत्मा) और वह सर्वशक्तिमान शासक (ईश्वर)।
• शुचिः: पवित्र, निर्मल, जिसमें किसी भी प्रकार का द्वैत या मल (माया) मिश्रित न हो।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस परम तत्त्व के स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं जिसे पिछले श्लोकों में 'आदित्य' और 'पुरुष' कहा गया। वे कहते हैं कि वह सत्ता 'सर्वस्य धातारम्' है—अर्थात् इस संपूर्ण ब्रह्माण्ड का आधार वही है। जिस प्रकार एक बीज में पूरा वृक्ष निहित होता है, उसी प्रकार उस एक पुरुष में समस्त सृष्टि निहित है। उसका स्वरूप 'अचिन्त्य' है, क्योंकि जो सीमित बुद्धि से असीमित को पकड़ने का प्रयास करती है, वह विफल रहती है; उसे केवल अनुभव किया जा सकता है, सोचा नहीं।
वह 'आदित्यवर्ण' है, जिसका अर्थ है कि वह परम प्रकाशमय है। यह प्रकाश बाहरी सूर्य का भौतिक प्रकाश नहीं, अपितु ज्ञान का वह आलोक है जो हृदय के भीतर प्रज्वलित होता है। जब साधक कहता है कि वह 'तमसः परस्तात्' (अन्धकार से परे) है, तो इसका भाव यह है कि जहाँ तक अविद्या और अहंकार का अस्तित्व है, वहाँ तक सत्य ढका रहता है; परन्तु जैसे ही साधक उस सीमा को पार करता है, वह शुद्ध प्रकाश में स्थित हो जाता है।
सबसे महत्वपूर्ण रहस्य इस श्लोक के दूसरे चरण में है: "भर्गस्तु पुरुषो ह्यात्मा ईश्वराख्यः शुचिस्तथा"। यहाँ याज्ञवल्क्य स्पष्ट कर रहे हैं कि जिसे संसार 'ईश्वर' कहकर पुजता है, वह वास्तव में 'भर्ग' (दिव्य तेज) है, और वह भर्ग कोई बाहरी सत्ता नहीं, अपितु साधक की अपनी ही 'आत्मा' है। ईश्वर नाम केवल एक संबोधन है; वास्तविक तत्त्व तो वही शुद्ध, पवित्र और प्रकाशमय आत्मा है। इस प्रकार, यहाँ विधाता (धाता), ईश्वर और आत्मा—इन तीनों का अभेद स्थापित किया गया है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अहं' के रूपांतरण की प्रक्रिया है। जब साधक पिछले श्लोकों के अनुसार "सोऽसावहम्" (वह मैं हूँ) का अभ्यास करता है, तब उसे इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव होता है कि उसका अपना स्वरूप ही वह 'भर्ग' है जो समस्त अशुद्धियों को जला देता है।
यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर उस 'आदित्यवर्ण' (प्रकाशमय वर्ण) का ध्यान करे। यह ध्यान बाहरी सूर्य पर नहीं, अपितु हृदय के आकाश में स्थित उस ज्योति-पुरुष पर है। जब वह अनुभव करता है कि वह 'तमसः परस्तात्' (अन्धकार से परे) है, तब उसका मन बाहरी जगत की चंचलता को छोड़कर अपनी ही शुद्धता (शुचि) में लीन होने लगता है।
साधक इस श्लोक के माध्यम से 'ईश्वर-साधना' से 'आत्मा-साधना' की भूमि पर प्रविष्ट होता है। वह समझ जाता है कि जिसे वह बाहर खोज रहा था, वह उसके भीतर 'धाता' बनकर सबको धारण किए हुए है। यह अनुभव उसे भयमुक्त करता है और उसे इस बोध तक ले जाता है कि वह स्वयं ही उस पवित्र (शुचि) और अचिन्त्य स्वरूप का अंश या स्वयं वही है। अभ्यास का केंद्र यहाँ 'भर्ग' की दीप्ति है—वह आंतरिक अग्नि जो साधक के अहंकार को भस्म कर उसे शुद्ध आत्मा में प्रतिष्ठित करती है।
हिरण्यगर्भो विष्णुश्च शुक्रश्चैव ह्यलिङ्गकः ।
ईशिता सर्वभूतानां कर्मदोषाशयैरपि ॥ ९.६२ ॥
(वही) हिरण्यगर्भ, विष्णु और शुक्र है, (और) अलिङ्ग; (वह) सब भूतोंका शासक है, (पर) कर्म, दोष और आशयोंसे भी —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में उस आदित्य-पुरुष को 'ईश्वर' और 'शुचि' कहा गया। वर्तमान श्लोक उसी परम सत्ता के विभिन्न नाम-संज्ञतियों का उद्घाटन करता है, ताकि साधक यह समझ सके कि जिसे वह अलग-अलग देवताओं या शक्तियों के रूप में देखता है, वे वास्तव में एक ही 'भर्ग' स्वरूप आत्मा की विभिन्द-अवस्थाएँ हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः पुरुषः) हिरण्यगर्भः विष्णुः च शुक्रः च एव ह्यलिङ्गकः (अस्ति)। (सः) सर्वभूतानां ईशितः (अस्ति), कर्म-दोष-आशयैरपि (अस्पृष्टः)।
पदार्थ और निर्वचन:
• हिरण्यगर्भ: हिरण्य (सुवर्ण/तेजस) + गर्भ। वह जो तेजस के अंडे (ब्रह्माण्ड) में स्थित है या जिसने इस प्रकाशमय सृष्टि को गर्भ में धारण किया है। यह सृजन की उच्चतम अवस्था का नाम है।
• विष्णु: 'विष्णु' शब्द 'विष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है—व्याप्त होना। वह जो सर्वव्यापी है, जिसकी सत्ता कण-कण में व्याप्त है।
• शुक्रः: यहाँ शुक्र का अर्थ केवल एक ग्रह या भौतिक पदार्थ नहीं, अपितु 'शुक्ल' (श्वेत/प्रकाशमय) और 'शुचि' (पवित्र) होने का भाव है। यह शुद्ध चैतन्य की दीप्ति है।
• अलिङ्गकः: 'न लिङ्गकः'। जिसके कोई 'लिङ्ग' (लक्षण, चिह्न या भौतिक शरीर) नहीं हैं। जो निर्गुण, निराकार और अनिर्वचनीय है।
• ईशितः: शासक या स्वामी। वह जो समस्त प्रवृत्तियों और भूतों का नियन्तक है।
• कर्म-दोष-आशयैरपि: कर्म (क्रियाएँ), दोष (अशुद्धियाँ) और आशय (संस्कार/वासनाएँ)। 'अपि' यहाँ यह दर्शाता है कि यद्यपि जीव इन तीनों से बँधा है, किन्तु वह पुरुष इनसे सर्वथा मुक्त है।
भाष्य —
याज्ञवल्क्य ऋषि इस श्लोक में उस आदित्य-पुरुष के स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं जो पूर्व के श्लोकों में 'भर्ग' और 'ईश्वर' कहा गया था। वे कहते हैं कि वही एक सत्ता 'हिरण्यगर्भ', 'विष्णु' और 'शुक्र' है। ये तीन नाम वास्तव में एक ही तत्त्व की तीन कार्यात्मक अवस्थाएँ हैं: हिरण्यगर्भ वह है जो सृष्टि का बीज है (सृजन), विष्णु वह है जो सर्वत्र व्याप्त होकर उसे धारण करता है (पालन), और शुक्र वह शुद्ध प्रकाश है जो अज्ञान को नष्ट कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
परन्तु, इन नामों के पीछे का वास्तविक रहस्य 'अलिङ्गक' होना है। संसार में हम किसी भी वस्तु को उसके लक्षणों (लिङ्गों) से पहचानते हैं—जैसे रूप, रंग या गुण। किन्तु वह परम पुरुष 'अलिङ्गक' है; उसका कोई ऐसा बाहरी चिह्न नहीं है जिससे उसे सीमित किया जा सके। वह केवल अनुभव का विषय है।
आगे ऋषि एक अत्यंत गूढ़ बात कहते हैं कि वह 'सर्वभूतानां ईशितः' है। यहाँ 'ईशित' होने का अर्थ केवल शासन करना नहीं, अपितु वह आधार होना है जिसमें समस्त भूत प्रतिष्ठित हैं। सबसे महत्वपूर्ण रहस्य यह है कि वह 'कर्म-दोष-आशयैरपि' अस्पृष्ट है। साधारणतः मनुष्य अपने कर्मों के फल (दोष) और हृदय में संचित संस्कारों (आशय) से बँधा रहता है। किन्तु वह आदित्य-पुरुष, जो हमारे भीतर आत्मा रूप में स्थित है, वह इन सब से परे है। वह साक्षी है; वह कर्म करता नहीं, अपितु कर्मों का आधार मात्र है। इस प्रकार याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि साधक जब स्वयं को इस 'अलिङ्गक' पुरुष के साथ जोड़ता है, तब वह भी अपने कर्म-दोषों और संस्कारों के बंधन से ऊपर उठकर अपनी वास्तविक शुचिता को प्राप्त करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥
वह सर्वत्र व्याप्त है — दीप्तिमान्, अशरीरी, घावरहित, नसोंसे रहित, शुद्ध, पापसे अविद्ध; कवि, मनीषी, सबसे ऊपर, स्वयम्भू — उसने अनादि कालसे यथायोग्य सब पदार्थोंकी रचना की है।
यह श्रुति-अंश इस स्मृति के श्लोक की पूर्ण पुष्टि करता है। जहाँ स्मृति 'शुक्र' और 'अलिङ्गक' (निराकार) होने की बात करती है, वहीं ईश उपनिषद् उसे 'शुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं' कहता है—अर्थात् वह दीप्तिमान है किन्तु शरीररहित (अकाय) है, उसमें न तो कोई घाव है और न ही नसें हैं। स्मृति का 'अलिङ्गक' शब्द श्रुति के 'अकाय' और 'अस्नाविरम्' के समान ही है। दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि वह परम सत्ता भौतिक शरीर की सीमाओं से मुक्त और शुद्ध (अपपविद्ध) है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक महान मानसिक रूपांतरण का सूत्र है। जब साधक सूर्यमण्डल में ध्यान करता है, तो उसे केवल बाहरी प्रकाश नहीं देखना चाहिए, अपितु इस बोध को जाग्रत करना चाहिए कि मेरे भीतर जो चैतन्य है, वह 'अलिङ्गक' है।
अभ्यास यह है कि साधक स्वयं से कहे—"मैं शरीर नहीं हूँ (क्योंकि शरीर का लिङ्ग/चिह्न है), मैं मन नहीं हूँ (क्योंकि मन दोषों और आशयों से भरा है), मैं वह शुद्ध प्रकाश (शुक्र) हूँ जो इन सब से परे है।" जब साधक 'कर्म-दोष-आशय' के प्रभाव को स्वयं से अलग कर देखता है, तब वह 'विष्णु' भाव (सर्वव्यापकता) का अनुभव करता है। यह अभ्यास साधक को 'अविद्या' की भूमि से उठाकर 'विज्ञान' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को एक सीमित व्यक्ति न मानकर उस अनंत आदित्य-पुरुष के रूप में पहचानता है जो सर्वभूतानां ईशितः है। यहाँ 'ईश्वर' होने का अर्थ दूसरों पर राज करना नहीं, अपितु अपनी प्रवृत्तियों और इंद्रियों पर पूर्ण स्वामित्व प्राप्त करना है।
न परामृश्यते यस्माद्विशेषादीश्वरः स्मृतः ।
शोधनाच्छुद्धनाच्चैव अक्लिन्नत्वाच्छुचिः स्मृतः ॥ ९.६३ ॥
— स्पर्श नहीं किया जाता, (इस) विशेषतासे ईश्वर कहा गया है; शोधन करनेसे, शुद्ध होनेसे और अक्लिन्न (निर्लेप) होनेसे शुचि कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.६२) में आदित्य-पुरुष को समस्त भूतों का शासक बताया गया, जो कर्म, दोष और आशयों से ऊपर है। वर्तमान श्लोक उसी वाक्य का उपसंहार करते हुए यह स्पष्ट करता है कि उन सांसारिक बंधनों से 'अछूता' रहना ही वह विशिष्टता है, जिससे उस परम पुरुष को 'ईश्वर' और 'शुचि' कहा जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः पुरुषः) यस्मात् (कर्म-दोष-आशयैः) न परामृश्यते, तस्मात् विशिष्टतायाः कारणेन ईश्वरः स्मृतः । (सः) शोधनात्, शुद्धनात्, च एव अक्लिन्नत्वात् च शुचिः स्मृतः ।
पदार्थ और निर्वचन:
• न परामृश्यते: 'पर' + 'अमृश्यते'। जो स्पर्श नहीं किया जाता। यहाँ स्पर्श का अर्थ भौतिक स्पर्श नहीं, अपितु कर्मों के प्रभाव या संस्कारों के लेप का न लगना है।
• विशेषादीश्वरः: वह विशिष्टता (विशेष) जिसके कारण वह ईश्वर कहलाता है। यहाँ 'विशेष' का अर्थ उस अलौकिक स्थिति से है जो उसे साधारण जीवों से पृथक करती है।
• शोधनात्: शोधन करने की शक्ति से। जो दूसरों के मैल (अविद्या और क्लेश) को दूर कर उन्हें शुद्ध करने में समर्थ हो।
• शुद्धनात्: स्वयं के शुद्ध होने के भाव से। जिसका अपना स्वरूप ही निर्मलता है, जिसमें कोई द्वैत या विकार नहीं।
• अक्लिन्नत्वात्: 'क्लिन्न' का अर्थ है लिप्त होना या चिपकना। अक्लिन्नता वह अवस्था है जहाँ संसार की कोई भी वस्तु, भावना या कर्म उस पर चिपककर उसे मलिन न कर सके।
• शुचिः: पवित्र, निर्मल, दीप्तिमान।
भाष्य —
याज्ञवल्क्य योगीश्वर यहाँ ईश्वर और शुचि शब्दों की दार्शनिक एवं योगिक परिभाषा दे रहे हैं। श्लोक ९.६२ का वाक्य इस श्लोक में आकर पूर्ण होता है—अर्थात वह आदित्य-पुरुष कर्मों, दोषों और आशयों (संस्कारों के संचय) से 'न परामृश्यते', अर्थात् उनसे सर्वथा अछूता रहता है।
ऋषि कहते हैं कि साधारणतः हम जिसे 'ईश्वर' कहते हैं, वह केवल एक पद नहीं, अपितु एक 'विशेष' अवस्था है। वह विशेष यह है कि जिस सत्ता पर कर्मों का प्रभाव न पड़े, जो कर्ता होते हुए भी अकर्ता रहे और जिसके स्वरूप में वासनाओं का कोई लेप न हो, वही वास्तव में ईश्वर है। जब साधक अपनी अंतरात्मा में उस 'अछूतेपन' का अनुभव करता है, तब वह समझ पाता है कि उसकी वास्तविक प्रकृति बंधनमुक्त है।
तत्पश्चात ऋषि 'शुचि' (पवित्रता) के तीन आधार बताते हैं:
प्रथम— शोधन: जो शोधक है। जैसे अग्नि सोने को शुद्ध करती है, वैसे ही यह आदित्य-पुरुष अपनी ज्ञान-दीप्ति से साधक के अंतःकरण का शोधन करता है।
द्वितीय— शुद्धन: जो स्वयं शुद्ध है। जिसका स्वरूप ही प्रकाश है और जिसमें अंधकार (अविद्या) का प्रवेश असंभव है।
तृतीय— अक्लिन्नत्व: जो निर्लेप है। संसार में रहते हुए भी जिस पर संसार की कोई भी वृत्ति चिपकती नहीं, वह शुचि है।
यह व्याख्या स्पष्ट करती है कि ईश्वर केवल बाहर बैठा कोई शासक नहीं, बल्कि वह 'शुचि' तत्त्व है जो शोधन करने की क्षमता रखता है और स्वयं सर्वथा निर्लेप है।
शास्त्र-साक्ष्य —
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ (भाष्य —) अविद्यादयः क्लेशाः । कुशलाकुशलानि कर्माणि । तत्फलं विपाकः । तदनुगुणा वासना आशयाः ॥ १.२४ ॥
क्लेश, कर्म, विपाक और आशयसे जो अछूता है, वह विशेष पुरुष ईश्वर है। (भाष्य —) अविद्या आदि क्लेश हैं; पुण्य-पाप कर्म हैं; उनका फल विपाक है; उनके अनुरूप वासनाएँ आशय हैं।
पातञ्जल योगसूत्र का यह सूत्र स्पष्ट करता है कि ईश्वर वह विशेष पुरुष है जो क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से अपरामृष्ट (अछूता) है। याज्ञवल्क्य स्मृति का यह श्लोक इसी सत्य का विस्तार है। जहाँ योगसूत्र 'अपरामृष्ट' शब्द का प्रयोग कर परिभाषा देता है, वहीं याज्ञवल्क्य ऋषि 'न परामृश्यते' कहकर उसे एक अनुभव और विशेषता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि ईश्वर की सबसे बड़ी पहचान उसका 'अलिप्त' होना है—वह कर्मों के संचय (आशय) से अप्रभावित रहता है, जबकि जीव इन्हीं आशयों के कारण जन्म-मरण के चक्र में बँधा रहता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'ईश्वर-प्रणिधान' का व्यावहारिक आधार है। योग मार्ग में जब साधक जप या ध्यान करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, बल्कि उस 'शुचि' तत्त्व से जुड़ता है जो शोधक है।
अभ्यास की दृष्टि से साधक को तीन स्तरों पर विचार करना चाहिए:
१. शोधन अभ्यास: साधक यह अनुभव करे कि जिस मन्त्र या देवता का वह ध्यान कर रहा है, वह उसके भीतर के मानसिक मैल (मल) को धो रहा है। यहाँ 'शोधन' एक प्रक्रिया है।
२. शुद्धता का अनुभव: जप के दौरान जब मन शांत होता है, तब साधक उस 'शुद्ध' स्वरूप का दर्शन करता है जो स्वयं में पूर्ण है।
३. अक्लिन्नता का अभ्यास: साधक अपनी चेतना को इस भाव में स्थित करे कि "मैं वह हूँ जिस पर संसार की कोई भी परिस्थिति या कर्म-संस्कार चिपक नहीं सकते।"
जब साधक स्वयं को 'न परामृश्यते' (अछूता) अनुभव करने लगता है, तब वह स्थूल जगत के प्रभाव से ऊपर उठकर उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ केवल प्रकाश और शुचिता शेष रहती है। यह अभ्यास उसे कर्म-दोषों के बंधन से मुक्त कर आदित्य-पुरुष की स्थिति में प्रतिष्ठित करता है।
हिरण्यगर्भतो जगदुत्पत्तिक्रमः
हिरण्मयस्य गर्भोऽभूत् हिरण्यस्य च गर्भजः ।
तस्माद्धिरण्यगर्भेति पुराणे विनिगद्यते ॥ ९.६४ ॥
(वह) हिरण्मय (अण्ड) का गर्भ हुआ, और हिरण्यके गर्भसे उत्पन्न हुआ; इसलिए पुराणमें 'हिरण्यगर्भ' कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों (९.५९-९.६३) में आदित्य-पुरुष के स्वरूप, उसकी शुचिता और उसके ईश्वरत्व का विवेचन किया गया। अब ऋषि याज्ञवल्क्य उस परम पुरुष की सृष्टि-परम्परा और उसके नामकरण की ओर प्रवृत्त होते हैं, जहाँ वे 'हिरण्यगर्भ' शब्द के वास्तविक अर्थ और उसकी उत्पत्ति का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः पुरुषः) हिरण्मयस्य गर्भोऽभूत्, (तथा) हिरण्यस्य च गर्भजः (अभवत्) । तस्मात् (तस्य) 'हिरण्यगर्भ' इति (नाम) पुराणे विनिगद्यते ।
पदार्थ और निर्वचन:
• हिरण्मयस्य गर्भोऽभूत्: वह सुवर्णमय अण्ड का गर्भ बना। यहाँ 'हिरण्मय' केवल रंग नहीं, अपितु उस शुद्धतम ज्योति और तेज का प्रतीक है जो सृष्टि के आरम्भ में था।
• हिरण्यस्य च गर्भजः: हिरण्य (स्वर्ण/तेज) के गर्भ से उत्पन्न हुआ। यह पद स्पष्ट करता है कि वह पुरुष न तो किसी भौतिक पदार्थ से जन्मा है और न ही किसी संयोग से, अपितु स्वयं तेज (हिरण्य) का ही परिणाम है।
• हिरण्यगर्भ: 'हिरण्य' अर्थात् स्वर्ण या प्रकाश, और 'गर्भ' अर्थात् वह जो भीतर छिपा हो या जिससे उत्पत्ति होनी हो। वह प्रकाशमय बीज ही हिरण्यगर्भ है।
• पुराणे विनिगद्यते: पुराणों में इस नाम का उल्लेख या वर्णन किया गया है। यहाँ 'पुराण' शब्द प्राचीन ज्ञान-परम्परा और उन ग्रंथों के लिए प्रयुक्त है जिनमें सृष्टि की आदि-कथाएँ संचित हैं।
भाष्य —
याज्ञवल्क्य योगीश्वर यहाँ उस परम पुरुष के 'हिरण्यगर्भ' नाम का व्युत्पत्ति-मूल बता रहे हैं। यह श्लोक एक परिभाषा है, जो यह सिद्ध करती है कि जिस आदित्य-पुरुष को पिछले श्लोकों में 'अचिन्त्यरूप' और 'शुचि' कहा गया, वही सृष्टि के आरम्भ में सुवर्णमय अण्ड (हिरण्मय अण्ड) के रूप में उपस्थित था।
इस श्लोक का भाव यह है कि वह पुरुष दो रूपों में हिरण्यगर्भ है—प्रथम, वह स्वयं उस स्वर्णिम प्रकाश-अण्ड का केंद्र या गर्भ है; और द्वितीय, वह उस तेजपुंज से उत्पन्न हुआ है। यह विरोधाभास नहीं, अपितु एक ही तत्त्व की अवस्थाओं का वर्णन है: वह बीज भी है और उस बीज से प्रस्फुटित होने वाला चैतन्य भी। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि यह नामकरण केवल पौराणिक परंपरा (पुराणे विनिगद्यते) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका आधार वह शाश्वत सत्य है जो श्रुति में बीजरूप में निहित है।
यहाँ 'हिरण्य' शब्द का आन्तर अर्थ 'प्रकाश-स्वरूप चेतना' है। जब यह चेतना संकुचित होकर एक बीज रूप धारण करती है, तो वह 'हिरण्मय अण्ड' कहलाती है और उस बीज के भीतर स्थित चैतन्य 'हिरण्यगर्भ' कहलाता है। आगामी श्लोकों में इसका विस्तार होगा कि कैसे इस एक गर्भ से द्वादश आदित्यों और संपूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई।
श्रुति-संगति —
इस स्मृति-वचन का मूल आधार शतपथ ब्राह्मण की वह कथा है जहाँ प्रजापति के प्राकट्य का वर्णन है:
ततः संवत्सरे पुरुषः समभवत् स प्रजापतिस्तस्मादु संवत्सर एव स्त्री वा गौर्वा वडबा वा विजायते संवत्सरे हि प्रजापतिरजायत स इदं हिरण्मयमाण्डं व्यरुजन्नाह तर्हि का चन प्रतिष्ठास तदेनमिदमेव हिरण्मयमाण्डं यावत्संवत्सरस्य वेलासीत्तावद्बिभ्रत्पर्यप्लवत ॥ ११.१.६.२ ॥
उससे संवत्सर (पूरा होने) पर पुरुष उत्पन्न हुआ — वही प्रजापति है; इसीलिए स्त्री, गाय या घोड़ी संवत्सरमें ही ब्याती है, क्योंकि प्रजापति संवत्सरमें उत्पन्न हुआ। उसने इस सुवर्णमय अण्डको फोड़ा; तब कोई आधार न था, इसलिए वह संवत्सरकी अवधि तक इसी सुवर्णमय अण्डको धारण किये तैरता रहा।
यहाँ श्रुति कहती है कि संवत्सर के साथ पुरुष (प्रजापति) उत्पन्न हुआ और उसने हिरण्मय अण्ड को फोड़ा। स्मृति का यह श्लोक उसी घटना का सार प्रस्तुत करता है। यहाँ हम देखते हैं कि एक ही तत्त्व को दो भिन्न दृष्टियों से देखा गया है। याज्ञवल्क्य स्मृति उसी घटना को सूक्ष्म और नाम-तत्व की दृष्टि से देखती है, जहाँ 'हिरण्यगर्भ' शब्द उस पुरुष की प्रकृति (तेज से उत्पन्न होना) और उसकी चैतन्य स्थिति पर बल देता है। श्रुति का वह तैरता हुआ हिरण्मय अण्ड जहाँ एक ओर सृष्टि के भौतिक आरम्भ का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर वह उस अवस्था का संकेत भी है जब चेतना अभी बीज रूप में संचित थी। इस प्रकार, श्रुति की कथा और स्मृति का निर्वचन परस्पर विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं—एक बाह्य विस्तार को दिखाता है और दूसरा आन्तर तत्त्व को।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक केवल सृष्टि-उत्पत्ति की कथा नहीं, बल्कि अंतःसाधना का सूत्र है। योगिक दृष्टि से 'हिरण्मय अण्ड' साधक के हृदय के भीतर स्थित वह स्वर्णिम केंद्र है, जहाँ चैतन्य बीज रूप में सुषुप्त रहता है।
जब साधक गायत्री मंत्र में 'सवितुः' (प्रकाशमान) का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में अपने हृदय-आकाश में उसी हिरण्यगर्भ का आवाहन कर रहा होता है। अभ्यास यह है कि साधक स्वयं को इस स्थूल शरीर से ऊपर उठाकर उस स्वर्णिम प्रकाश-पुंज में स्थित करे। जिस प्रकार हिरण्यगर्भ ने अण्ड को फोड़कर संपूर्ण जगत की रचना की, उसी प्रकार जब साधक के भीतर ज्ञान का उदय होता है, तो वह अपनी संकीर्ण सीमाओं (अहंकार के अण्ड) को तोड़कर उस विराट आदित्य-पुरुष के साथ एकाकार हो जाता है। यह अवस्था 'बीज' से 'वृक्ष' होने की यात्रा है—अर्थात् सुप्त चेतना से जाग्रत चैतन्य तक पहुँचना।
हैरण्यमण्डं संदीप्तं तपोज्ञानात्तु वै पुरा ।
एकं द्वादशधा गर्भमदितिर्विष्णुमजीजनत् ॥ ९.६५ ॥
पूर्वकालमें तप और ज्ञानसे सुवर्णमय अण्ड प्रज्वलित हुआ; (उस) एक गर्भको अदितिने बारह प्रकारसे — विष्णु (आदित्य) को — उत्पन्न किया।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.६४) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने 'हिरण्यगर्भ' शब्द की व्युत्पत्ति स्पष्ट करते हुए बताया कि वह परम पुरुष सुवर्णमय तेज का बीज है। अब इस श्लोक (९.६५) में वे उस बीज के प्रज्वलित होने की प्रक्रिया और उससे सृष्टि के आदि-स्वरूपों के प्राकट्य का रहस्य खोल रहे हैं, जहाँ एक ही चैतन्य तत्व विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: पुरा तपोज्ञानात् तु वै हैरण्यमण्डं संदीप्तम् (अभवत्) । अदितिः एकं गर्भं द्वादशधा विष्णुम् अजीजनत् ।
पदार्थ और निर्वचन:
• तपोज्ञानात्: 'तपस्' और 'ज्ञान' के संयोग से। यहाँ तप का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट नहीं, अपितु वह आंतरिक ऊष्मा है जो संकल्प को प्रदीप्त करती है, और ज्ञान वह प्रकाश है जो अविद्या के अंधकार को हटाता है।
• हैरण्यमण्डं संदीप्तम्: सुवर्णमय अण्ड प्रज्वलित हुआ। 'मण्ड' या अण्ड उस आदि-बीज का प्रतीक है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड संकुचित अवस्था में निहित था। 'संदीप्त' का अर्थ है—अत्यधिक प्रकाशमान होना।
• अदितिः: शाब्दिक अर्थ है 'अबाधित' या 'अनंत'। यह वह विराट चेतना या प्रकृति है जो विस्तार करने की क्षमता रखती है।
• द्वादशधा: बारह प्रकार से या बारह भागों में। यहाँ संख्या 'बारह' समय (१२ मास) और अंतरिक्ष के चक्र का संकेत है।
• विष्णुम् अजीजनत्: विष्णु को उत्पन्न किया। यहाँ 'विष्णु' शब्द अपने व्यापक अर्थ में है—वह जो सर्वत्र व्याप्त है।
भाष्य —
याज्ञवल्क्य योगीश्वर यहाँ सृष्टि के उस क्षण का वर्णन कर रहे हैं जब निराकार ब्रह्म, सगुण रूप धारण करने की ओर अग्रसर होता है। उनका भाव यह है कि आदि-काल में जब केवल शून्य था, तब 'तप' (संकल्प की शक्ति) और 'ज्ञान' (स्वयं के बोध) के मिलन से एक दिव्य सुवर्णमय अण्ड प्रज्वलित हुआ। यह अण्ड भौतिक पदार्थ नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य का वह संघनित रूप है जिसे 'हिरण्यगर्भ' कहा गया।
इस प्रज्वलित बीज को 'अदिति' (अनंत आकाश या विराट प्रकृति) ने धारण किया और उस एक ही गर्भ को बारह रूपों में अभिव्यक्त किया। ये बारह रूप वास्तव में एक ही विष्णु (सर्वव्यापक तत्व) के विभिन्न आयाम हैं। यह श्लोक इस महान सत्य की ओर संकेत करता है कि जिसे हम अनेक देवता या भिन्न शक्तियाँ मानते हैं, वे वास्तव में एक ही परम तेज का विस्तार हैं।
यहाँ संख्या और स्वरूपों का जो विवरण है, वह अन्य शास्त्रों में भिन्न-भिन्न दृष्टि से आता है। श्रुति और स्मृति के इन भेदों को समझना आवश्यक है:
अष्टौ ह वै पुत्रा अदितेः । यांस्त्वेतद्देवा आदित्या इत्याचक्षते सप्त हैव तेऽविकृतं हाष्टमं जनयां चकार मार्ताण्डं संदेघो हैवास यावानेवोर्ध्वस्तावांस्तिर्यङ् पुरुषसम्मित इत्यु हैक आहुः ॥ ३.१.३.३ ॥
अदितिके आठ पुत्र थे। जिन्हें देव "आदित्य" कहते हैं, वे तो सात ही हैं; आठवेंको उसने अविकृत (बिना आकारका) जन्म दिया — मार्ताण्डको। वह (मांसका) ढेर-सा था, जितना ऊँचा उतना ही चौड़ा; कुछ लोग कहते हैं — पुरुषके नापका।
इस श्रुति-अंश में अदितिके आठ पुत्रों का वर्णन है, जिनमें सात विकृत (आकारयुक्त) हैं और आठवाँ 'मार्ताण्ड' अविकृत या मांसपिण्ड के समान है। यह वृत्तांत सृष्टि के उस आरम्भिक चरण को दर्शाता है जहाँ आकार अभी पूर्णतः विकसित नहीं हुए थे।
वहीं, स्मृतिका यह दृष्टि प्रस्तुत करती है:
धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ॥ एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते । जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः ॥ ६५.१५–१६ ॥
(अदितिके बारह पुत्र — आदित्य:) धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा, और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं — जो सब आदित्योंमें सबसे छोटे होकर भी गुणोंमें सबसे बढ़कर हैं।
महाभारत के अनुसार अदितिके बारह पुत्र (आदित्य) हैं, जिनमें विष्णु सबसे छोटे होते हुए भी गुणों में श्रेष्ठ हैं।
इन दोनों विवरणों का विरोध नहीं, अपितु स्तरों का भेद है। शतपथ की कथा 'अविकृत' से 'विकृत' होने की प्रक्रिया को दिखाती है, जबकि स्मृति और महाभारत उस पूर्णता की बात करते हैं जहाँ बारह आदित्य समय और दिशाओं के अधिष्ठाता बन चुके हैं। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि चाहे संख्या आठ हो या बारह, मूल तत्व 'एक' ही गर्भ है—वह विष्णु स्वरूप परम पुरुष है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'एकसे अनेक' और 'अनेकसे एक' होने के अभ्यास का सूत्र है। जिस प्रकार एक सुवर्णमय अण्ड से बारह आदित्य प्रकट हुए, उसी प्रकार साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर स्थित वह एक ही दिव्य ज्योति (आत्मा) विभिन्न प्राणों, इन्द्रियों और वृत्तियों के रूप में बँटी हुई है।
अभ्यास यह है कि साधक अपनी बिखरी हुई चेतना को, जो बारह मास या विभिन्न दिशाओं की भाँति बाहर की ओर प्रसारित है, पुनः उसी 'एक गर्भ' यानी हृदय-केंद्रित ज्योति में समेटे। जब तप (एकाग्रता) और ज्ञान (विवेक) का संयोग होता है, तब साधक के भीतर भी वह 'हैरण्यमण्ड' प्रज्वलित होता है—अर्थात् उसकी सुषुप्ति और जाग्रत अवस्थाओं के बीच का वह प्रकाश जागृत होता है जो उसे विराट स्वरूप से जोड़ता है। यह प्रक्रिया साधक को विखंडित व्यक्तित्व (अनेक रूप) से एकीकृत व्यक्तित्व (एक विष्णु रूप) की ओर ले जाती है।
सम्पादकीय टिप्पणी — महाभारत इतिहास है, स्मृति नहीं। शतपथ (३.१.३.३) में अदितिके आठ पुत्र और महाभारत (आदिपर्व ६५) में बारह आदित्य — ये दो परम्पराओंकी स्वतन्त्र गणनाएँ हैं; किसी एकको दूसरेकी पूर्व या अधूरी अवस्था मानना ग्रन्थोंमें नहीं कहा गया।
तस्योल्वा(ल्ब)द्धास्थितो मेरुरुदरात् सप्त सिन्धवः ।
पर्वताश्च जरायुत्था नद्यो धमनिसंज्ञिकाः ॥ ९.६६ ॥
उसकी झिल्लीसे मेरु स्थित हुआ, उदरसे सात समुद्र; जरायुसे पर्वत उठे, और धमनियाँ नदियाँ (बनीं)।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.६५) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने उस सुवर्णमय अण्ड के प्रज्वलन और उससे विष्णु (आदित्य) के प्राकट्य का वर्णन किया। वर्तमान श्लोक (९.६६) उसी हिरण्यगर्भ की भौतिक अभिव्यक्ति की कड़ी है, जहाँ यह बताया गया है कि जिस सूक्ष्म बीज से सृष्टि का आरम्भ हुआ, उसके विभिन्न अंगों से इस स्थूल जगत के आधार-स्तम्भ और जल-धाराएँ कैसे निर्मित हुईं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तस्य) उल्बद्धा स्थितो मेरुः, उदरात् सप्त सिन्धवः (अभवन्), जरायुत्था पर्वताश्च (अभवन्), धमनिसंज्ञिकाः नद्यो (अभवन्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• तस्य उल्बद्धा: उसके (हिरण्यगर्भ के) 'उल्ब' से। 'उल्ब' वह भीतरी झिल्ली होती है जो गर्भ को सुरक्षित रखती है। यहाँ यह उस आंतरिक आवरण का प्रतीक है जिससे मेरु का प्राकट्य हुआ।
• मेरुः: ब्रह्माण्ड का केंद्र और अक्ष। यह केवल एक पर्वत नहीं, अपितु वह धुरी है जिस पर संपूर्ण सृष्टि टिकी है।
• उदरात् सप्त सिन्धवः: उदर (पेट) से सात समुद्र उत्पन्न हुए। 'सप्त' संख्या यहाँ पूर्णता और सात दिशाओं (चार दिशाएं, ऊपर, नीचे और केंद्र) का संकेत है।
• जरायुत्था पर्वताः: 'जरायु' (बाहरी झिल्ली) से पर्वत उत्पन्न हुए। जरायु वह तत्व है जो गर्भ को पोषण देता है; अतः पर्वत पृथ्वी के पोषण और स्थिरता के आधार हैं।
• धमनिसंज्ञिकाः नद्यो: वे नदियाँ जिन्हें 'धमनी' नाम दिया गया। यहाँ 'संज्ञिका' शब्द महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है—जिन्हें उस नाम से जाना जाता है या जो उसी स्वरूप के समान हैं।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि-उत्पत्ति के उस रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं जहाँ स्थूल जगत का निर्माण सूक्ष्म शरीर के अंगों से हुआ है। उनका भाव यह है कि यह संपूर्ण दृश्यमान जगत किसी बाहरी सामग्री से नहीं, अपितु उसी एक 'हिरण्यगर्भ' के विस्तार का परिणाम है।
जब वह सुवर्णमय अण्ड प्रस्फुटित हुआ, तब उसकी भीतरी झिल्ली (उल्ब) मेरु पर्वत के रूप में स्थित हुई, जो ब्रह्माण्ड की रीढ़ है। उसके उदर (मध्य भाग) से सात समुद्रों का प्राकट्य हुआ, जो जीवन के मूल जल तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। बाहरी रक्षा-झिल्ली (जरायु) पर्वतों के रूप में परिवर्तित हुई, जिससे पृथ्वी को आकार और स्थिरता मिली। अंततः, जिस प्रकार एक जीव के शरीर में रक्त और प्राण का संचार धमनियों के माध्यम से होता है, उसी प्रकार इस विराट शरीर (ब्रह्माण्ड) में जल का संचार करने वाली नदियाँ 'धमनियाँ' कहलाईं।
यहाँ बाहरी विधि यह दिखती है कि प्रकृति के तत्व कैसे बने, किन्तु इसका आन्तर अर्थ यह है कि साधक जिस संसार को देख रहा है, वह वास्तव में एक विराट पुरुष का शरीर ही है। जिसे हम पर्वत, नदी और समुद्र कहते हैं, वे उस आदि-पुरुष की शारीरिक संरचना के ही स्थूल रूप हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं समेघो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ ३.१९.२ ॥
जो चाँदी (का कपाल) था, वह यह पृथिवी है; जो सोना था, वह द्युलोक; जो जरायु (गर्भकी बाहरी झिल्ली) थी, वे पर्वत हैं; जो उल्ब (भीतरी झिल्ली) था, वह मेघ और कुहरा है; जो धमनियाँ थीं, वे नदियाँ हैं; जो (अण्डके) पेटका जल था, वह समुद्र है।
छान्दोग्य उपनिषद् में भी इसी प्रक्रिया का वर्णन मिलता है: "जो जरायु था, वह पर्वत हैं; जो उल्ब था, वह मेघ और कुहरा है; जो धमनियाँ थीं, वे नदियाँ हैं; जो उदर का जल था, वह समुद्र है।"
स्मृति और श्रुति के इस मिलन में एक सूक्ष्म भेद दृष्टिगोचर होता है। छान्दोग्य उपनिषद् में 'उल्ब' को मेघ और नीहार (कुहरा) बताया गया है, जबकि याज्ञवल्क्य स्मृति में इसे 'मेरु' का आधार माना गया है। यह भेद दृष्टि का है—श्रुति यहाँ उल्ब के 'वायुमय/नमी' वाले गुण को पकड़कर उसे मेघ कह रही है, जबकि याज्ञवल्क्य उसकी 'स्थितिरूप' शक्ति को पकड़कर उसे मेरु (अक्ष) कह रहे हैं। दोनों ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह जगत एक जैविक संरचना की भाँति विकसित हुआ है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'देह और ब्रह्माण्ड की समता' (यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे) में निहित है। योगी जब ध्यान में बैठता है, तो वह स्वयं को केवल एक हाड़-मांस का शरीर नहीं मानता, अपितु अपने शरीर को उसी 'हिरण्मय अण्ड' के रूप में देखता है।
वह अनुभव करता है कि जिस प्रकार बाहर नदियाँ प्रवाहित हो रही हैं, वही धाराएँ उसके भीतर धमनियों के रूप में दौड़ रही हैं। वह अपनी रीढ़ (मेरुदंड) को ब्रह्माण्ड के मेरु पर्वत के समान स्थित देखता है। यह अभ्यास साधक को 'अहं' के संकुचित दायरे से निकालकर विराटता की ओर ले जाता है। जब वह शरीर की धमनियों को जगत की नदियों के रूप में देखना आरम्भ करता है, तब उसकी चेतना स्थूल से सूक्ष्म की ओर गमन करती है। वह इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ उसे ज्ञात होता है कि उसके भीतर जो कुछ भी है, वही बाहर है; और जो बाहर है, वही उसके भीतर है। यह बोध साधक को उस 'अक्षर' तत्व के निकट ले जाता है जिससे यह संपूर्ण विग्रह निर्मित हुआ है।
दिवश्च पृथिवी चैव कपाले द्वे व्यवस्थिते ।
मध्येऽन्तरिक्षमभवत् त्रैलोक्यस्यैष संभवः ॥ ९.६७ ॥
द्यौ और पृथिवी — (अण्डके) दो कपाल (आधे भाग) बनकर स्थित हुए; बीचमें अन्तरिक्ष हुआ — यह त्रिलोकीकी उत्पत्ति है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.६६) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने हिरण्यगर्भ की झिल्ली, उदर और जरायु से मेरु, समुद्रों, पर्वतों और नदियों के प्राकट्य का वर्णन किया। अब वर्तमान श्लोक (९.६७) उस आदि-अण्ड के विग्रह (विभाजन) की व्याख्या करता है, जिससे इस त्रैलोक्य का ढांचा निर्मित हुआ।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: दिवश्च पृथिवी चैव कपाले द्वे व्यवस्थिते, मध्ये अन्तरिक्षमभवत्; त्रैलोक्यस्य एष संभवः।
पदार्थ और निर्वचन:
• दिवश्च पृथिवी च: द्युलोक (आकाश/स्वर्ग) और पृथ्वी। यहाँ 'दिव' प्रकाश और ऊर्ध्वता का प्रतीक है, जबकि 'पृथिवी' स्थिरता और आधार का।
• कपाले द्वे: दो कपाल। 'कपाल' शब्द का अर्थ है खोखला आधा भाग या खोल। जिस प्रकार एक अण्ड के दो अर्ध-भाग होते हैं, उसी प्रकार आदि-अण्ड दो भागों में विभक्त हुआ।
• व्यवस्थिते: स्थित होने पर या व्यवस्थित होने पर। यह क्रिया दर्शाती है कि विभाजन के पश्चात दोनों भाग अपने निश्चित स्थानों पर स्थिर हुए।
• मध्ये अन्तरिक्षमभवत्: बीच में अन्तरिक्ष (मध्यलोक) उत्पन्न हुआ। जब दो कपाल पृथक हुए, तो उनके मध्य जो रिक्त स्थान बचा, वही अन्तरिक्ष कहलाया।
• त्रैलोक्यस्य एष संभवः: त्रिलोकी की यह उत्पत्ति है। 'संभव' का अर्थ है प्राकट्य या जन्म।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि के स्थूल स्वरूप के निर्माण की प्रक्रिया बता रहे हैं। उनका भाव यह है कि जब वह प्रज्वलित हिरण्य-अण्ड विदीर्ण हुआ, तो उसके दो अर्ध-भाग (कपाल) पृथक हो गए। एक कपाल ऊर्ध्वगामी होकर 'द्युलोक' बना और दूसरा अधोगामी होकर 'पृथ्वी' के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इन दोनों के मध्य जो अंतराल निर्मित हुआ, वह 'अन्तरिक्ष' कहलाया। इस प्रकार द्यु, अन्तरिक्ष और पृथ्वी—इन तीनों के मिलन से 'त्रिलोकी' का प्राकट्य हुआ।
यदि हम इसकी विधिक दृष्टि से देखें, तो यह ब्रह्माण्ड के विस्तार की प्रक्रिया है। किन्तु याज्ञवल्क्य केवल बाहरी भूगोल की बात नहीं कर रहे; वे उस बीज-अवस्था (अण्ड) से विस्तार की ओर जाने वाले मार्ग को दिखा रहे हैं। जब एक ही तत्व दो विपरीत ध्रुवों (ऊपर और नीचे) में बँटता है, तब उनके बीच एक संतुलन-क्षेत्र (मध्यलोक) का जन्म होता है। यह विभाजन वास्तव में द्वैत का आरम्भ है, जहाँ एक अखंड चेतना स्वयं को देखने के लिए दृश्य जगत में विभाजित होती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद्द्विधा ॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ॥ १.१२–१३ ॥
उस अण्डमें वे भगवान् (ब्रह्मा) एक वर्ष रहकर, अपने ही ध्यानसे उस अण्डके दो भाग कर दिये। उन दोनों खण्डोंसे उन्होंने द्युलोक और भूमिको रचा, और बीचमें आकाश, आठों दिशाएँ और जलका शाश्वत स्थान (समुद्र)।
यह स्मृति-अंश स्पष्ट करता है कि भगवान ने अपने ध्यान की शक्ति से उस अण्ड को दो भागों (शकलाभ्यां) में विभक्त किया, जिससे द्युलोक और भूलोक का निर्माण हुआ और बीच में व्योम तथा दिशाओं का प्राकट्य हुआ। याज्ञवल्क्य स्मृति और मनुस्मृति यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। दोनों ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह त्रैलोक्य किसी आकस्मिक घटना से नहीं, अपितु एक सुव्यवस्थित विभाजन (कपाल-विभाजन) का परिणाम है। जहाँ मनु इसे 'ध्यान' का फल बताते हैं, वहीं याज्ञवल्क्य इसे हिरण्यगर्भ के विकासक्रम की एक कड़ी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का रहस्य अत्यंत गहरा है। योग मार्ग में जब हम गायत्री मन्त्र का जप करते हैं, तो 'भूः', 'भुवः' और 'स्वः' इन तीन व्याहृतियों का उच्चारण करते हैं। ये केवल शब्द नहीं, बल्कि इसी त्रैलोक्य के प्रतीक हैं—पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक।
साधक जब इस श्लोक के भाव को जप में लाता है, तो वह अनुभव करता है कि जिस प्रकार एक अण्ड से तीन लोक हुए, वैसे ही उसके भीतर स्थित चेतना भी इन्हीं तीन स्तरों पर कार्य करती है। 'भूः' उसका स्थूल शरीर और पृथ्वी-तत्व है; 'भुवः' उसकी प्राण-शक्ति और अन्तरिक्ष है; और 'स्वः' उसका चैतन्य स्वरूप और द्युलोक है।
अभ्यास यह है कि साधक जप के समय इन तीनों व्याहृतियों को अलग-अलग न मानकर, उन्हें उसी एक 'हिरण्य-अण्ड' (एकमात्र ब्रह्म) के तीन भिन्न विस्तार रूप में देखे। वह अनुभव करे कि ऊर्ध्वगामी ज्योति (स्वः) और अधोगामी स्थिरता (भूः) वास्तव में एक ही मूल तत्व के दो कपाल हैं, और वह स्वयं उस मध्यवर्ती अन्तरिक्ष (भुवः) में स्थित होकर इन दोनों के संतुलन का साक्षी है। इस प्रकार साधक स्थूल जगत की उत्पत्ति के वर्णन से उठकर अपने भीतर के ब्रह्माण्ड के विस्तार का अनुभव करता है और अंततः उस एक अण्ड (अखंड ब्रह्म) में विलीन होने की भूमि की ओर अग्रसर होता है।
एते ह्यण्डकपाले द्वे अपां मध्ये निवेशिते ।
एकोऽधस्तात् समभवत् द्वितीयं नन्दनं वनम् ॥ ९.६८ ॥
अण्डके ये दो कपाल जलोंके बीच रखे गये; एक नीचे हुआ, दूसरा नन्दनवन (स्वर्ग)।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.६७) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि आदि-अण्ड के दो कपालों से द्यु और पृथ्वी का निर्माण हुआ तथा उनके मध्य अन्तरिक्ष प्रगट हुआ। वर्तमान श्लोक (९.६८) इस प्रक्रिया के आधार और उन कपालों की अंतिम स्थिति का वर्णन करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एते ह्यण्डकपाले द्वे अपां मध्ये निवेशिते; एकोऽधस्तात् समभवत्, द्वितीयं नन्दनं वनम्।
पदार्थ और निर्वचन:
• एते ह्यण्डकपाले द्वे: ये दोनों अण्ड के कपाल (अर्ध-भाग)। यहाँ 'हि' निश्चयवाचक अव्यय है, जो पूर्वोक्त त्रैलोक्य की उत्पत्ति के कारण को पुष्ट करता है।
• अपां मध्ये निवेशिते: जल के बीच में रखे जाने पर या स्थित होने पर। 'आपः' यहाँ केवल भौतिक जल नहीं, अपितु उस आदिम द्रव्य का संकेत है जिसमें समस्त सृष्टि विलीन थी और जिससे प्रगट हुई।
• एकोऽधस्तात् समभवत्: एक नीचे की ओर स्थित हुआ। यह अधोगामी कपाल स्थूल जगत या पृथ्वी का आधार बना।
• द्वितीयं नन्दनं वनम्: दूसरा (कपाल) नन्दनवन (स्वर्ग) बना। 'नन्दन' का अर्थ है आनन्द देने वाला। यहाँ स्वर्ग का तात्पर्य केवल एक स्थान से नहीं, अपितु उस उच्चतर चेतना के लोक से है जहाँ सुख और प्रकाश की प्रधानता है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि-रचना के सूक्ष्म विवरण को पूर्ण कर रहे हैं। वे बताते हैं कि जब आदि-अण्ड का विग्रह हुआ, तब वे दोनों कपाल 'आपः' (जल) के मध्य स्थित थे। यह जल वह मूल तत्व है जो समस्त सृजन का कारण और पोषक है। इस जलमय आधार में एक कपाल नीचे की ओर स्थिर हुआ, जिसने पृथ्वी और भौतिक जगत के स्थूल ढांचे को जन्म दिया। वहीं दूसरा कपाल ऊर्ध्वगामी होकर 'नन्दनवन' अर्थात आनन्दलोक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
यहाँ यह रहस्य निहित है कि समस्त सृष्टि—चाहे वह अधोगामी भौतिक जगत हो या ऊर्ध्वगामी दिव्य लोक—मूलतः उसी एक आदि-तत्व (अण्ड) का विग्रह है और जलमय आधार (आपः) में ही स्थित है। बाहरी विधि के अनुसार यह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की कथा है, किन्तु आन्तर अर्थ यह है कि चेतना जब प्रसरित होती है, तो वह एक ओर स्थूलता (पृथ्वी) की ओर जाती है और दूसरी ओर सूक्ष्म आनन्द (नन्दनवन) की ओर।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि संपूर्ण अस्तित्व 'आपः' अर्थात् उस प्रवाही चेतना के बीच स्थित है। शरीर और मन का स्थूल ढांचा 'अधस्तात्' (नीचे के कपाल) के समान है, जो जड़ता और भौतिकता का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं साधना की चरम गति इस अधोगामी वृत्ति को उलटकर ऊर्ध्वगामी बनाना है, ताकि साधक उस 'द्वितीय कपाल' अर्थात् नन्दनवन—परमानन्द के लोक—को प्राप्त कर सके।
अभ्यास यह है कि साधक स्वयं को केवल इस भौतिक पृथ्वी (नीचे के कपाल) तक सीमित न मानकर, अपने भीतर स्थित उस आनन्द-तत्व की खोज करे जो ऊर्ध्वगामी है। जिस प्रकार जल के बीच दोनों कपाल स्थित हैं, उसी प्रकार साधक को संसार रूपी जल में रहते हुए भी अपनी चेतना को नीचे से ऊपर की ओर ले जाने का प्रयास करना चाहिए।
मार्तण्डोत्पत्तिस्तन्माहात्म्यं च
तन्मध्याद्यः शिशुर्जातो मार्तण्डः सवितेति सः ।
सर्वाणि चास्य भूतानि ह्युपासन्ते समन्ततः ॥ ९.६९ ॥
उनके बीचसे जो शिशु उत्पन्न हुआ, वह मार्तण्ड — 'सविता' — है; सब भूत चारों ओरसे उसीकी उपासना करते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.६८) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने आदि-अण्ड के दो कपालों की स्थिति का वर्णन किया, जिनमें एक अधोगामी होकर पृथ्वी और दूसरा ऊर्ध्वगामी होकर नन्दनवन बना। अब वर्तमान श्लोक (९.६९) उस अण्ड के मध्य से प्रगट हुए उस मूल तेज-पुंज का परिचय देता है, जो समस्त सृष्टि का प्राण और चेतना है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तन्मध्यात् शिशुः मार्तण्डः जातः; सवितेति सः । सर्वाणि च अस्य भूतानि हि समन्ततः उपासन्ते।
पदार्थ और निर्वचन:
• तन्मध्यात् शिशुः मार्तण्डः जातः: उन (दोनों कपालों के) मध्य से जो शिशु उत्पन्न हुआ, वह 'मार्तण्ड' है। यहाँ 'शिशु' शब्द किसी भौतिक बालक का नहीं, अपितु उस आदि-बीज या प्रथम प्रस्फुटित तेज का प्रतीक है जो अभी अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर है। 'मार्तण्ड' का शाब्दिक अर्थ है— 'मरण्' (मृत्यु/अन्धकार) को नष्ट करने वाला 'अण्ड' से जन्मा।
• सवितेति सः: वह 'सविता' है। सविता वह शक्ति है जो केवल प्रकाश नहीं देती, अपितु समस्त प्रकृतियों को 'सु-वित्' अर्थात अच्छी तरह प्रेरित और संचालित करती है।
• सर्वाणि च अस्य भूतानि हि समन्ततः उपासन्ते: निश्चय ही समस्त भूत (जड़ एवं चेतन) चारों ओर से उसी की उपासना करते हैं। यहाँ 'उपासना' का अर्थ केवल पूजा नहीं, अपितु उस तेज पर आश्रित होना और उसकी ओर उन्मुख रहना है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ सृष्टि के उस केंद्र-बिन्दु को प्रकट कर रहे हैं जिसे हम सूर्य या सविता कहते हैं। जब अण्ड के दो कपाल पृथक हुए और द्यु-पृथ्वी का निर्माण हुआ, तब उन दोनों के मध्य रिक्त स्थान में जो ज्योतिपुंज प्रगट हुआ, वही मार्तण्ड है। यह मार्तण्ड ही वह 'सविता' है जिसकी स्तुति गायत्री मन्त्र में की गई है।
यहाँ रहस्य यह है कि सविता केवल आकाश में स्थित भौतिक सूर्य नहीं है, अपितु वह उस परम पुरुष का साकार रूप है जो समस्त सृष्टि को गति प्रदान करता है। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि "सब भूत उसकी उपासना करते हैं", तो इसका अर्थ यह है कि संसार के प्रत्येक कण में जो जीवन-शक्ति है, वह इसी सविता की किरणों का विस्तार है। पुष्प का खिलना, प्राणों का स्पन्दन और मन का विचार— सब उस एक ही केंद्र से संचालित हैं। अतः समस्त सृष्टि स्वाभाविक रूप से उसी की ओर उन्मुख है।
यह श्लोक हमें बताता है कि सृजन की प्रक्रिया में 'केंद्र' का महत्व सर्वोपरि है। कपाल बाहरी आवरण थे, किन्तु मार्तण्ड वह आंतरिक सत्य था जिसके लिए वह पूरा अण्ड निर्मित हुआ था। इसी कारण सविता को समस्त भूतों का आराध्य और प्रेरक माना गया है।
श्रुति-संगति —
त उ हैत ऊचुः । देवा आदित्या यदस्मानन्वजनिमा तदमुयेव भूद्धन्तेमं विकरवामेति तं विचक्रुर्यथायं पुरुषो विकृतस्तस्य यानि मांसानि संकृत्य संन्यासुस्ततो हस्ती समभवत्तस्मादाहुर्न हस्तिनं प्रतिगृह्णीयात्पुरुषाजानो हि हस्तीति यमु ह तद्विचक्रुः स विवस्वानादित्यस्तस्येमाः प्रजाः ॥ ३.१.३.४ ॥
उन देव-आदित्योंने कहा — "जो हमारे बाद जन्मा है, वह व्यर्थ न जाय; आओ, इसे आकार दें।" उन्होंने उसे वैसा आकार दिया जैसा यह पुरुष आकारवाला है। उसके जो मांस (बचे), उन्हें इकट्ठा करके रख दिया, उससे हाथी हुआ — इसलिए कहते हैं कि हाथीका दान न ले, क्योंकि हाथी पुरुषसे उत्पन्न है। जिसे उन्होंने आकार दिया, वही विवस्वान् आदित्य है; ये प्रजाएँ उसीकी हैं।
इस श्रुति-अंश में बताया गया है कि आदित्यों ने उस पुरुष को आकार दिया, जिससे 'विवस्वान् आदित्य' प्रगट हुए और "ये प्रजाएँ उसी की हैं" (तस्येमाः प्रजाः)। स्मृति का यह श्लोक इसी सत्य का विस्तार करता है कि मार्तण्ड या सविता ही वह मूल पुरुष हैं जिनसे समस्त प्रजा उत्पन्न हुई है और उन्हीं के कारण अस्तित्व में है। जिसे श्रुति 'विवस्वान्' कहती है, स्मृति उसे ही 'मार्तण्ड-सविता' कहकर संबोधित कर रही है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन्त्सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः ॥ ३.१९.३ ॥
और (उस अण्डसे) जो उत्पन्न हुआ, वह यह आदित्य है। उसके जन्म लेते ही जय-जयकारके घोष उठे, और (उसके पीछे-पीछे) सब भूत और सब कामनाएँ उठ खड़ी हुईं।
छान्दोग्य उपनिषद् स्पष्ट कहता है कि जब अण्ड से आदित्य का जन्म हुआ, तब समस्त भूत और कामनाएँ उसके पीछे उठ खड़ी हुईं। स्मृति का यह कथन कि "सर्वाणि भूतानि उपासन्ते" इसी तथ्य की पुष्टि करता है। जहाँ उपनिषद् जन्म के समय भूतों के उन्मुख होने की बात करता है, वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति में उसे एक निरंतर 'उपासना' (आश्रय) के रूप में दिखाते हैं। यह इस सत्य को पुष्ट करता है कि सविता केवल सृष्टि का आदि-कारण नहीं, अपितु वर्तमान में भी समस्त चेतनाओं का एकमात्र आधार है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'सूर्योपस्थान' और 'हृदय-ज्योति' के अभ्यास का मूल है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के केंद्र में मार्तण्ड प्रगट हुए, उसी प्रकार साधक अनुभव करता है कि उसके शरीर रूपी अण्ड के दो कपालों (स्थूल देह और बाह्य मन) के मध्य, हृदय-आकाश में एक ज्योतिपुंज स्थित है।
जब साधक सूर्योदय के समय सूर्योपस्थान का अभ्यास करता है, तो वह केवल बाहरी सूर्य को नहीं देखता, अपितु अपने भीतर के उसी 'शिशु मार्तण्ड' का दर्शन करता है जो अज्ञान के अन्धकार को चीरकर उदित हो रहा है। यह अभ्यास साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। जिस प्रकार समस्त भूत सविता की उपासना करते हैं, वैसे ही साधक अपनी समस्त इंद्रियों और प्राणों को हृदय-केंद्रित कर उस आंतरिक सविता में विलीन करता है। यहाँ 'शिशु' अवस्था का अर्थ है— वह बिंदु जहाँूनि चेतना प्रस्फुटित होती है। साधक इस अभ्यास से 'अहंकार' के कपालों को तोड़कर उस मध्यवर्ती ज्योति (सविता) तक पहुँचता है, जो उसे परम प्रकाश की ओर ले जाती है।
एतस्य ब्रह्मणा न्यस्तं स्तूयते स(सा)र्वलो(लौ)किकम् ।
रौद्र(द्रं) तेजः स्वकीयं च अग्नीषोमौ तथैव च ॥ ९.७० ॥
ब्रह्माने इसमें जो स्थापित किया, उस सर्वलौकिक (तेज) की स्तुति की जाती है — रौद्र तेज, अपना (तेज), और उसी प्रकार अग्नि-सोम —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.६९) में याज्ञवल्क्य ऋषि ने उस आदि-शिशु 'मार्तण्ड' या 'सविता' के प्राकट्य का वर्णन किया, जो समस्त भूतों की उपासना का केंद्र है। वर्तमान श्लोक (९.७०) उस सविता के भीतर निहित तेज के विविध स्वरूपों और उनकी प्रकृति का उद्घाटन करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह एक मात्र प्रकाश-पुंज नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं का समुच्चय है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ब्रह्मणा एतस्य (मार्तण्डे) न्यस्तं सर्वलौकिकम् (तेजः) स्तूयते; (तस्मिन्) रौद्र तेजः, स्वकीयं च, अग्नीषोमौ तथैव च (न्यस्तौ)।
पदार्थ और निर्वचन:
• ब्रह्मणा न्यस्तं सर्वलौकिकम्: ब्रह्मा (परम चेतना/सृष्टिकर्ता) ने इसमें जो 'सर्वलौकिक' तेज स्थापित किया। यहाँ 'सर्वलौकिक' का अर्थ है— वह ऊर्जा जो तीनों लोकों के संचालन के लिए अनिवार्य है और जिसमें समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक जगत की शक्तियाँ समाहित हैं।
• स्तूयते: जिसकी स्तुति की जाती है। यह केवल शब्दों की स्तुति नहीं, अपितु उस तेज के प्रभाव को अनुभव करना और उसे स्वीकार करना है।
• रौद्र तेजः: रुद्र का तेज। यहाँ 'रौद्र' शब्द संहारक अर्थ में नहीं, अपितु उस तीव्र ताप, प्रखरता और परिवर्तनकारी शक्ति के अर्थ में है जो जड़ता को जलाकर चैतन्यता की ओर ले जाती है।
• स्वकीयं च: उसका अपना (ब्रह्मा का) निजी तेज। यह वह शुद्धतम प्रकाश है जो सृष्टि के मूल आधार का स्वरूप है।
• अग्नीषोमौ तथैव च: उसी प्रकार अग्नि और सोम का तेज। 'अग्नि' ताप, ऊर्ध्वगति और प्रदीप्ति का प्रतीक है, जबकि 'सोम' शीतलता, तृप्ति और पोषण का।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में मार्तण्ड (सविता) की उस आंतरिक संरचना को खोल रहे हैं जो सामान्य दृष्टि से केवल एक सूर्य प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में वह समस्त ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं का संगम-स्थल है। यह वाक्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है; इसकी क्रिया और विस्तार अगले श्लोक (९.७१) तक जाता है, जहाँ बताया गया है कि बारहों आदित्यों का तेज इसी एक में निवेशित है।
यहाँ रहस्य यह है कि ब्रह्मा ने सविता को केवल प्रकाश का स्रोत नहीं बनाया, अपितु उसे एक 'ऊर्जा-कोष' के रूप में स्थापित किया। इस कोष में मुख्य रूप से तीन प्रकार के तेज हैं: प्रथम 'रौद्र तेज', जो प्रखर ताप और परिवर्तनकारी शक्ति है; द्वितीय 'स्वकीय तेज', जो उस परम पुरुष की अपनी मूल आत्म-ज्योति है; और तृतीय 'अग्नीषोम'।
अग्नि और सोम का यहाँ साथ आना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसा कि पिछले श्लोकों में संकेत किया गया, अग्नि और सोम ताप और शीतलता के प्रतीक हैं— एक भोक्ता है तो दूसरा भोग्य। सृष्टि का संतुलन तभी संभव है जब उष्णता और शीतलता, विस्तार और संकोच, तथा प्रदीप्ति और शांति एक ही केंद्र में स्थित हों। यदि केवल अग्नि होती तो जगत जल जाता, और केवल सोम होता तो जड़ता छा जाती। याज्ञवल्क्य यह बता रहे हैं कि मार्तण्ड वह बिंदु है जहाँ ये परस्पर विरोधी शक्तियाँ एक-दूसरे को संतुलित करती हैं। अतः जब साधक सविता की स्तुति करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के इन समस्त ऊर्जा-रूपों के सामंजस्य की प्रार्थना करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'एकत्व' के अनुभव का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य ताप (क्रोध, व्याकुलता) को रुद्र और शीतलता (शांति, संतोष) को सोम मानकर उन्हें पृथक देखता है। किन्तु योगी इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि उसके हृदय-आकाश में स्थित वह 'आन्तरिक सूर्य' एक ही है, जिसमें रौद्र ताप भी है और सोमिक शीतलता भी।
अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर उठने वाले तीव्र आवेगों (रौद्र तेज) और गहरी शांति (सोम तेज) को अलग-अलग न मानकर, उन्हें उस एक ही 'ब्रह्म-तेज' के विभिन्न आयाम देखे। जब वह अनुभव करता है कि ताप और शीतलता दोनों एक ही ज्योति के अंग हैं, तब वह द्वंद्व से ऊपर उठकर 'सर्वलौकिक' स्थिति में स्थित होता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह केवल बाहरी सूर्य की नहीं, अपितु अपने भीतर के उस मार्तण्ड की उपासना करता है जो समस्त विरोधाभासों का लय-स्थल है।
द्वादशानां तु यत्तेजस्तदेकस्य निवेशितम् ।
पौरुषं चैव यद्धाम परमं ह्यत्र तिष्ठति ॥ ९.७१ ॥
— बारहों (आदित्यों) का जो तेज है, वह इस एकमें स्थापित है; और जो पुरुषका परम धाम है, वह यहीं स्थित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७०) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने मार्तण्ड के भीतर निहित विविध तेजों—रौद्र, अग्नि और सोम आदि—का वर्णन किया था। वर्तमान श्लोक उस विखंडित ऊर्जाओं के समुच्चय को एक बिंदु पर लाकर खड़ा करता है, जहाँ वह यह स्पष्ट करते हैं कि जो प्रभाव बारहों आदित्यों में विभाजित प्रतीत होता है, उसका मूल केंद्र यही एक मार्तण्ड-पुरुष है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तु द्वादशानां (आदित्यानाम्) यत्तेजः तद् एकस्य (मार्तण्डस्य) निवेशितम्; पौरुषं चैव यद्धाम परमं ह्यत्र तिष्ठति।
पदार्थ और निर्वचन:
• द्वादशानां तु यत्तेजः: बारहों आदित्यों का जो तेज है। यहाँ 'बारह' संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु वर्ष के बारह मास और समय के पूर्ण चक्र का प्रतीक है। आदित्य वह है जो 'आदित्य' (अदिति के पुत्र) होकर सीमाओं से मुक्त है।
• एकस्य निवेशितम्: इस एक (मार्तण्ड/सविता) में स्थापित या निवेशित है। 'निवेश' का अर्थ है—पूर्णतः समाहित होना, जहाँ अब कोई भेद शेष न रहे।
• पौरुषं चैव यद्धाम परमम्: और जो पुरुष का परम धाम है। यहाँ 'पौरुषं' शब्द का अर्थ शारीरिक बल या पौरुष नहीं है, अपितु यह उस 'पुरुष' (परम चेतना/आत्मा) से सम्बन्धित है जिसका उल्लेख पिछले श्लोकों में आदित्य-मण्डल के पुरुष के रूप में हुआ था। 'धाम' का अर्थ है—निवास स्थान, प्रकाश-पुंज या वह स्थिति जहाँ चेतना विश्राम करती है।
• ह्यत्र तिष्ठति: क्योंकि वह यहीं स्थित है। यह 'अत्र' शब्द मार्तण्ड के उस केंद्र की ओर संकेत करता है जो समस्त ब्रह्माण्ड का हृदय है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक महान रहस्य खोल रहे हैं। स्थूल दृष्टि से हम देखते हैं कि आकाश में सूर्य एक है, किन्तु काल-गणना और प्रभाव की दृष्टि से बारह आदित्य (मास) होते हैं। ऋषि कहते हैं कि वह समस्त तेज—जो समय के चक्र को चलाता है और जगत को प्रकाशित करता है—वास्तव में इस एक 'मार्तण्ड' में निवेशित है। यह विखंडन केवल नाम और रूप का है; तत्वतः वह एक ही महा-तेज है।
इस श्लोक का दूसरा भाग अत्यंत गूढ़ है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यहाँ केवल प्रकाश (तेज) नहीं है, अपितु 'पौरुषं धाम' भी है। इसका भाव यह है कि आदित्य-मण्डल केवल भौतिक अग्नि का गोला नहीं, बल्कि वह उस परम पुरुष का निवास स्थान है जो अदृष्ट होकर भी सबको देखता है। जब वे कहते हैं कि "परम धाम यहीं स्थित है", तो वे संकेत कर रहे हैं कि जिस पुरुष को साधक अपने भीतर खोजता है, वही पुरुष ब्रह्माण्ड के केंद्र (सूर्य) में प्रतिष्ठित है।
यह श्लोक वास्तव में उस 'एक' की स्थापना करता है जो अनेकता के पीछे छिपा है। यदि बारहों आदित्यों का तेज एक है और परम पुरुष का धाम भी वहीं है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि सृष्टि का संचालन करने वाली ऊर्जा और उसे संचालित करने वाला चेतन तत्व (पुरुष) एक ही केंद्र पर स्थित हैं। बाहरी विधि में यह सूर्य-उपासना है, किन्तु आन्तर अर्थ में यह 'बहुत्व' से 'एकत्व' की ओर गमन है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'लय' का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य का मन और प्राण विभिन्न दिशाओं में बिखरे रहते हैं (जैसे बारह आदित्य)। साधक जब मार्तण्ड के इस स्वरूप का ध्यान करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके भीतर की समस्त बिखरी हुई ऊर्जाएँ एक केंद्र में समाहित हो सकती हैं।
यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने हृदय के पुरुष और आदित्य-मण्डल के पुरुष को एक ही जाने। जिस प्रकार बाहरी सूर्य संपूर्ण जगत का प्रकाश-स्रोत है, उसी प्रकार हृदय के भीतर स्थित वह 'आन्तरिक सूर्य' (पुरुष) साधक की चेतना का परम धाम है। जब साधक इस भाव में स्थित होता है कि "जो बाहर है, वही भीतर है", तब वह 'बहुत्व' की भूमि से उठकर 'एकत्व' की भूमि पर पहुँचता है। यह अभ्यास साधक को उस स्थिति में ले जाता है जहाँ उसे यह अनुभव होता है कि उसकी व्यक्तिगत सत्ता (अहं) उस विराट पुरुष के धाम में विलीन हो गई है। यहाँ 'पौरुषं धाम' का अनुभव करना ही योग की वह अवस्था है जहाँ साधक स्वयं को सीमित शरीर न मानकर, उस अनंत प्रकाश-पुंज का अंश अनुभव करता है।
अमृतं चैव मृत्युश्च प्राकृतं वैकृतं तथा ।
द्विधा गर्भो भवत्येष हिताय जगतोऽस्य च ॥ ९.७२ ॥
अमृत और मृत्यु, प्राकृत और वैकृत — इस जगत्के हितके लिए यह गर्भ (मार्तण्ड) दो प्रकारका होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७१) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि समस्त द्वादश आदित्यों का तेज और पुरुष का परम धाम इस एक मार्तण्ड-पुरुष में ही निवेशित है। अब वर्तमान श्लोक उस परम तेज के कार्य-स्वरूप की व्याख्या करता है, जहाँ यह बताया गया है कि इसी एक केंद्र से सृष्टि के दो विपरीत ध्रुवों—जीवन और मृत्यु—का प्रादुर्भाव होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अमृतं चैव मृत्युश्च, प्राकृतं वैकृतं तथा (च), इस जगत्के हितके लिए यह गर्भ (मार्तण्ड) द्विधा भवत्येष (होता है)।
पदार्थ और निर्वचन:
• अमृतं चैव मृत्युश्च: 'अमृत' वह है जो अविनाशी है, जिससे पोषण और अमरत्व प्राप्त होता है; 'मृत्यु' वह है जो क्षयकारी है, जो अंत की ओर ले जाता है। यहाँ ये केवल अवस्थाएँ नहीं, अपितु मार्तण्ड के दो भिन्न प्रभाव हैं।
• प्राकृतं वैकृतं तथा: यहाँ 'प्राकृत' का अर्थ सांख्य दर्शन की प्रकृति नहीं, अपितु वह रस या तत्व है जो शुद्ध और स्वाभाविक है। 'वैकृत' वह है जिसमें विकार आ गया है, जो विकृत या दूषित है। आगामी श्लोक ९.७४-७५ स्पष्ट करते हैं कि मेध्य रसों से प्राकृत और अमेध्य रसों से वैकृत जगत् का निर्माण होता है।
• द्विधा गर्भो भवत्येष: यह गर्भ (मार्तण्ड) दो प्रकार का होता है। 'गर्भ' शब्द यहाँ उस बीज-रूप ऊर्जा के लिए प्रयुक्त हुआ है जिससे समस्त सृष्टि का विस्तार हो रहा है।
• हिताय जगतोऽस्य च: इस जगत्के हित के लिए। यह एक अत्यंत गूढ़ कथन है कि मृत्यु और विकार भी 'हित' के लिए हैं, क्योंकि बिना क्षय के नूतन सृजन संभव नहीं है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मार्तण्ड-पुरुष की उस द्वैत-शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं जो सृष्टि के संतुलन को बनाए रखती है। जब वे कहते हैं कि यह गर्भ 'अमृत' और 'मृत्यु' रूप में है, तो उनका संकेत उस एक ही सूर्य-तत्त्व की दो भिन्न किरणों की ओर है। एक किरण वह है जो जीवनदायिनी है, जो औषधियों को शक्ति देती है, अन्न को पकाती है और चेतना को जाग्रत करती है—यह 'अमृत' और 'प्राकृत' पक्ष है। दूसरी किरण वह है जो दाहक है, जो पुराने का क्षय करती है और जिससे विकृत प्रवृत्तियों का पोषण होता है—यह 'मृत्यु' और 'वैकृत' पक्ष है।
रहस्य यह है कि मार्तण्ड केवल प्रकाश का पुंज नहीं, अपितु वह एक महान छननी के समान है। वह ब्रह्माण्ड के रसों को खींचता है। जो रस शुद्ध और मेध्य हैं, वे अमृत बनकर देवों और मनुष्यों का निर्माण करते हैं; किन्तु जो रस अमेध्य और मलिन होते हैं, वे वैकृत रूप लेकर नागों और राक्षसों जैसी योनियों को जन्म देते हैं। याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सृजन और विनाश, शुद्धता और विकार—ये अलग-अलग सत्ताएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही 'सविता' के दो मुख हैं। जगत्के हित के लिए यह द्वैत आवश्यक है, क्योंकि यही द्वंद्व जीव को अंततः उस एक परम धाम की ओर लौटने के लिए प्रेरित करता है जिसका उल्लेख पिछले श्लोक में हुआ था।
शास्त्र-साक्ष्य —
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ ९.१९ ॥
मैं (सूर्य बनकर) तपता हूँ, मैं वर्षाको रोकता और बरसाता हूँ; अर्जुन! अमृत और मृत्यु, सत् और असत् — मैं ही हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता ९.१९ : "तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥"
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं को सूर्य-रूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि वे ही तपते हैं और वही वर्षा का नियमन करते हैं। विशेषतः 'अमृतं चैव मृत्युश्च' कहकर वे उसी सत्य की पुष्टि करते हैं जो याज्ञवल्क्य स्मृति में वर्णित है। जहाँ स्मृति इसे मार्तण्ड के 'गर्भ' (बीज-शक्ति) के रूप में देखती है, वहीं गीता इसे ईश्वर की अपनी इच्छा और क्रिया के रूप में दिखाती है। दोनों का मेल इस बात में है कि जीवन और मृत्यु—ये दोनों एक ही ईश्वरीय तेज के दो छोर हैं। जो तपने वाला सूर्य है, वही अमृत भी है और वही काल (मृत्यु) भी।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक द्वंद्वों के पार जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। योगिक दृष्टि से मार्तण्ड हमारे भीतर की वह जाग्रत चेतना है जो समस्त अनुभवों को प्रकाशित करती है। साधक अनुभव करता है कि उसके जीवन में आने वाले सुख (अमृत) और दुःख (मृत्यु), या शुद्ध विचार (प्राकृत) और विकृत विचार (वैकृत)—ये सब एक ही चैतन्य-सूर्य के प्रभाव हैं।
अभ्यास यह है कि जब साधक जप या ध्यान में स्थित होता है, तो वह केवल 'सुख' या 'अमृत' की कामना नहीं करता, बल्कि उस 'एक सविता' पर टिक जाता है जो इन दोनों का अधिष्ठान है। जिस तेज से पोषण होता है, उसी तेज से अज्ञान का क्षय (मृत्यु) भी होता है। साधक इस बोध में स्थित होकर स्वयं को अमृत और मृत्यु के द्वंद्व से ऊपर उठाकर उस 'परम धाम' में प्रतिष्ठित करता है जहाँ पहुँचकर प्राकृत और वैकृत का भेद समाप्त हो जाता है। वह यह अनुभव करता है कि सविता की एक ही किरण उसे बंधन (वैकृत) से मुक्त कर मोक्ष (अमृत) की ओर ले जा रही है।
वेदाश्चैवात्र चत्वारस्तपन्ते मण्डले स्थिताः ।
ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तु रश्मयस्तस्य शब्दिताः ॥ ९.७३ ॥
यहाँ (सूर्य-)मण्डलमें स्थित होकर चारों वेद तपते हैं; ऋक्, यजुः और साममय (यह) मूर्ति है, और उसकी किरणें (वेदोंके) शब्द कही गयी हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७२) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने मार्तण्ड-गर्भ के प्राकृत और वैकृत द्वैध का वर्णन किया, जो जगत् के हित के लिए आवश्यक है। अब इस श्लोक में वे उस मार्तण्ड-पुरुष की आंतरिक संरचना का रहस्य खोल रहे हैं कि वह केवल भौतिक प्रकाशपुंज नहीं, अपितु साक्षात् वेद-स्वरूप और ज्ञान-मण्डल है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: चत्वारः वेदाश्चैव अत्र (मार्तण्ड-मण्डले) स्थिताः तपन्ते; ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तु (सः), तस्य रश्मयः शब्दिताः (वेदाः)।
पदार्थ और निर्वचन:
• वेदाश्चैवात्र चत्वारस्तपन्ते: यहाँ 'अत्र' का अर्थ मार्तण्ड के तेज-मण्डल से है। 'तपन्ते' क्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है; तपना केवल उष्णता नहीं, अपितु वह आध्यात्मिक ताप (तपस) है जिससे ज्ञान प्रदीप्त होता है और अविद्या का क्षय होता है। चारों वेदों का वहाँ स्थित होकर तपना यह दर्शाता है कि समस्त वैदिक ज्ञान का केंद्र सूर्य-पुरुष ही है।
• मण्डले स्थिताः: मण्डल वह क्षेत्र है जहाँ ऊर्जा अपनी पूर्णता में केन्द्रित होती है। यहाँ वेदों का स्थित होना उनके 'शब्द' रूप से ऊपर उठकर 'तेज' रूप में परिवर्तित होने का संकेत है।
• ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तु: यहाँ याज्ञवल्क्य एक सूक्ष्म भेद कर रहे हैं। यद्यपि चारों वेद तपते हैं, किन्तु मार्तण्ड की 'मूर्ति' (स्वरूप/देह) ऋक्, यजुः और साम के समन्वय से बनी है। यह त्रयी—ज्ञान (ऋक्), कर्म (यजुः) और उपासना (साम)—का एकीकृत स्वरूप ही वह दिव्य पुरुष है।
• रश्मयस्तस्य शब्दिताः: रश्मयि अर्थात् किरणें। 'शब्दिताः' का अर्थ है कि वे किरणें वास्तव में वेदों के शब्दों (मन्त्रों) का ही प्रकाशमान रूप हैं। जो श्रुति में शब्द है, वह सूर्य-मण्डल में प्रकाश (किरण) है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में उस महान रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं जिसे उन्होंने अपनी श्रुति में भी बीजरूप में देखा है। वे बताते हैं कि मार्तण्ड-पुरुष कोई जड़ पिंड नहीं, अपितु साक्षात् ज्ञान का पुंज है। जब वे कहते हैं कि "चारों वेद यहाँ तपते हैं", तो भाव यह है कि समस्त वैदिक ऋचाएँ, विधियाँ और सामगान अपनी मूल ऊर्जा के लिए इसी सूर्य-मण्डल पर आश्रित हैं।
यहाँ 'तप' का अर्थ वह अग्नि है जो अज्ञान को जलाती है। जिस प्रकार भौतिक सूर्य पृथ्वी के अंधकार को मिटाता है, उसी प्रकार यह ज्ञान-सूर्य साधक के भीतर स्थित वेदों की शक्ति से अविद्या का दहन करता है।
विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऋषि ने 'चत्वारः वेद' (चारों वेद) और 'ऋग्यजुःसाममूर्ति' (त्रयी-मूर्ति) का उल्लेख अलग-अलग किया है। इसका रहस्य यह है कि चारों वेद उस मण्डल की व्यापकता में तपते हैं, किन्तु मार्तण्ड की जो साकार मूर्ति है, वह ऋक्, यजुः और साम के योग से निर्मित है। यहाँ अथर्व-अङ्गिरस का उल्लेख नहीं है, क्योंकि जैसा कि आगामी श्लोक (९.७५) में संकेत मिलता है, अथर्वाङ्गिरस की शक्तियाँ वैकृत जगत् या रसों के ग्रहण से संबंधित हैं, जबकि मार्तण्ड की मुख्य मूर्ति शुद्ध सात्विक त्रयी-स्वरूप है।
सबसे गूढ़ बात यह है कि सूर्य की किरणें केवल प्रकाश नहीं, अपितु 'शब्दिताः' हैं—अर्थात् वे मन्त्रों का ही दृश्य रूप हैं। जो शब्द कान से सुना जाता है, वह नेत्रों के लिए किरण बन जाता है। इस प्रकार याज्ञवल्क्य ने शब्द (ध्वनि) और प्रकाश (दृष्टि) के बीच के भेद को मिटा दिया है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'शब्द' और 'प्रकाश' के एकीकरण का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य जप करते समय केवल ध्वनि का अनुभव करता है, किन्तु इस श्लोक का योगिक अर्थ यह है कि जब साधक मन्त्र का जप करे, तो वह उस शब्द को केवल ध्वनि न मानकर एक 'किरण' के रूप में अनुभव करे।
अभ्यास यह है कि जपते हुए साधक अपने भीतर के सूर्य-मण्डल (हृदय-प्रकाश) में स्थित हो और अनुभव करे कि प्रत्येक अक्षर एक प्रकाशपुंज है जो उसके अज्ञान को जला रहा है। यहाँ जप स्वयं वेद-शब्द है; जब शब्द तपता है, तो वह प्रकाश बन जाता है। साधक इस अनुभूति से 'ध्वनि-भूमि' से उठकर 'प्रकाश-भूमि' में प्रवेश करता है।
जब वह अनुभव करता है कि उसकी देह और चेतना ऋक्, यजुः और साम की मूर्ति है, तब वह स्वयं को केवल एक शरीर नहीं, अपितु ज्ञान, कर्म और उपासना का एकीकृत स्वरूप मानने लगता है। यह अभ्यास साधक को उस अवस्था तक ले जाता है जहाँ मन्त्र बोलना और प्रकाश देखना एक ही क्रिया बन जाती है—यही 'शब्दिता रश्मयः' का वास्तविक अनुभव है।
रसानि यानि मेध्यानि रश्मिभिः संप्रकर्षति ।
दिव्याः शिवतमा ह्यापः सौम्यास्ताः संभवन्ति हि ॥ ९.७४ ॥
जो पवित्र रस हैं, उन्हें (वह) किरणोंसे खींचता है; वे दिव्य, परम कल्याणकारी, सौम्य जल बन जाते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७३) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने मार्तण्ड-पुरुष के स्वरूप को वेद-मय सिद्ध किया, जहाँ वेदों का शब्द रूप किरणों में परिवर्तित हो जाता है। अब इस श्लोक में वे उस प्रकाश-पुंज की क्रियात्मक शक्ति का वर्णन कर रहे हैं कि कैसे वह सूर्य-पुरुष भौतिक और सूक्ष्म जगत के रसों का परिष्करण कर उन्हें अमृतमय बनाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः मार्तण्डः) रश्मिभिः यानि मेध्यानि रसानि संप्रकर्षति, ताः (रसाः) दिव्यः शिवतमाः सौम्याः आपः संभवन्ति हि।
पदार्थ और निर्वचन:
• मेध्यानि रसानि: 'मेध्य' का अर्थ है—पवित्र करने योग्य या बुद्धि को प्रदीप्त करने वाले (मेधस)। रस केवल स्वाद नहीं, अपितु वह सूक्ष्म तत्व है जो जीवन का आधार है। यहाँ मेध्य रसों से तात्पर्य उन शुद्ध तत्त्वों से है जो सृष्टि के पोषण के लिए आवश्यक हैं।
• रश्मिभिः संप्रकर्षति: 'संप्रकर्षति' क्रिया का अर्थ है—खींचना या ऊपर उठाना। सूर्य अपनी किरणों के माध्यम से पृथ्वी और अन्य लोकों से सूक्ष्म रसों को ऊपर की ओर खींचता है (जैसे वाष्पीकरण की प्रक्रिया, किन्तु यहाँ उसका आध्यात्मिक पक्ष है)।
• दिव्याः शिवतमाः सौम्याः आपः: 'दिव्य' अर्थात् प्रकाशमय; 'शिवतम' अर्थात् परम कल्याणकारी; 'सौम्य' अर्थात् चन्द्रमा के समान शीतल और शान्त। जब रस सूर्य द्वारा खींचे जाते हैं, तो वे अपनी अशुद्धि त्यागकर 'आपः' (जल) का वह रूप धारण करते हैं जो जीवनदायी है।
• संभवन्ति हि: 'संभवन्ति' का अर्थ है—उत्पन्न होना या परिवर्तित होना। यह प्रक्रिया एक रूपांतरण है, जहाँ स्थूल रस दिव्य जल में बदल जाते हैं।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ मार्तण्ड-पुरुष की उस शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं जिसे हम 'अमृत-वर्षा' का आधार कह सकते हैं। श्लोक का सीधा अर्थ यह है कि सूर्य अपनी किरणों द्वारा पृथ्वी और अन्य स्थानों से पवित्र रसों को खींचता है, जिन्हें वह अपने तेज से परिष्कृत कर पुनः दिव्य, परम कल्याणकारी और सौम्य जल के रूप में संसार को लौटा देता है।
यह प्रक्रिया श्लोक ९.७२ में वर्णित 'प्राकृत' पक्ष का विस्तार है। मार्तण्ड-गर्भ जब प्राकृत होता है, तब वह पोषण करता है। यहाँ यह स्पष्ट हो रहा है कि पोषण की विधि क्या है—सूर्य केवल प्रकाश नहीं देता, अपितु वह एक महान 'शोधक' है। जो रस पृथ्वी में बिखरे हुए हैं, उन्हें सूर्य अपनी किरणों से खींचकर अपने मण्डल में लाता है, वहाँ उनका संस्कार करता है और फिर उन्हें 'शिवतम आपः' बनाकर वर्षा के रूप में या ओस के रूप में पुनः प्रेषित करता है।
रहस्य यह है कि सृष्टि का संपूर्ण जल-चक्र वास्तव में एक आध्यात्मिक शोधन प्रक्रिया है। यदि सूर्य इन रसों को खींचकर परिष्कृत न करे, तो रस जड़ हो जाएँगे। वह इन्हें 'सौम्य' बनाता है; क्योंकि सूर्य स्वयं तेज (अग्नि) है, किन्तु उसका फल 'सोम' (शीतलता और पोषण) के रूप में मिलता है। यही कारण है कि मार्तण्ड-पुरुष को जगत का अन्नदाता कहा गया है।
श्रुति-संगति —
इस प्रक्रिया की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में मिलती है:
तदेष श्लोको भवति अन्ने भात्यपश्रितो रसानां संक्षरेऽमृत इति यदेतन्मण्डलं तपति तदन्नमथ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः सोऽत्ता स एतस्मिन्नन्नेऽपश्रितो भातीत्यधिदेवतम् ॥ १०.५.२.२३ ॥
इस विषयमें श्लोक है — "रसोंके बहनेमें, अमृतमें, अन्नपर आश्रित होकर वह चमकता है।" यह जो मण्डल तपता है, वह अन्न है; और जो इस मण्डलमें पुरुष है, वह उसका भोक्ता है — वह इस अन्नपर आश्रित होकर चमकता है। यह अधिदैवत (कहा)।
यहाँ श्रुति कहती है कि जो मण्डल तपता है वह 'अन्न' है और उसमें स्थित पुरुष उसका 'भोक्ता' है। यह श्लोक ९.७४ के साथ पूर्णतः संगत है; सूर्य-मण्डल जब तपता है, तभी वह रसों को संप्रकर्षित (खींचने) में समर्थ होता है। 'रसानां संक्षरेऽमृत' का अर्थ ही यही है कि रसों के प्रवाह और उनके परिष्करण में ही अमृत की प्राप्ति होती है। मार्तण्ड-पुरुष उस मण्डल के भीतर रहकर रसों का उपभोग और उनका पुनर्वितरण करता है, जिससे जगत जीवित रहता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
यही रहस्य श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों में प्रकट होता है:
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १५.१३ ॥
मैं पृथिवीमें प्रवेश करके अपने ओजसे सब भूतोंको धारण करता हूँ, और रसमय सोम (चन्द्रमा) होकर सब ओषधियोंका पोषण करता हूँ।
यहाँ भगवान कहते हैं कि वे सोम रूप होकर रसात्मक रूप से ओषधियों का पोषण करते हैं। स्मृति (९.७४) और गीता का यह मिलन अद्भुत है—स्मृति बताती है कि सूर्य किरणों से रस खींचता है, और गीता बताती है कि वही शक्ति 'सोम' बनकर उन रसों को पुनः पौधों और भूतों में स्थापित करती है। अतः सूर्य और चन्द्रमा अलग नहीं, अपितु एक ही दिव्य पुरुष की दो क्रियाएँ हैं—एक 'खींचने वाला' (सूर्य) और दूसरा 'पोषण करने वाला' (सोम)।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक केवल खगोलीय घटना नहीं, अपितु आंतरिक रूपांतरण का सूत्र है। मनुष्य जो कुछ भी ग्रहण करता है—चाहे वह अन्न हो, शब्द हों या विचार—वे सब 'रस' हैं। यदि साधक 'मेध्य' (पवित्र) आहार और सात्त्विक विचारों का सेवन करता है, तो उसके भीतर की चेतना (आंतरिक सूर्य) उन रसों को खींचकर उन्हें दिव्य और सौम्य बनाती है।
अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के 'मार्तण्ड' (ज्ञान-सूर्य) को जाग्रत करे। जब आंतरिक सूर्य प्रदीप्त होता है, तो वह मन के विकारों और तामसी रसों को जलाकर उन्हें 'शिवतम आपः' अर्थात् शान्त और आनंदमय अवस्था में परिवर्तित कर देता है। जिस प्रकार सूर्य बाहरी जल को शुद्ध कर वर्षा बनाता है, उसी प्रकार योगी अपने तप से हृदय के भीतर के भावों को परिष्कृत करता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल आहार से सूक्ष्म रस की ओर और फिर रस से अमृत की भूमि की ओर ले जाता है। यहाँ 'सौम्य जल' का अनुभव आंतरिक शांति और संतोष के रूप में होता है।
अक्षत्रेभ्यश्च एतेभ्यो ह्यमेध्याद् गृह्यते रसः ॥
(?)
अथर्वाङ्गिरसेभ्यश्च संभवेदैकृतं जगत् (?) ॥ ९.७५ ॥
(?) और इन (अपवित्र स्थानों) से, अपवित्रसे (भी) रस ग्रहण किया जाता है; (उससे) अथर्वाङ्गिरस (शक्तियों) के द्वारा वैकृत जगत् उत्पन्न होता है (?)।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७४) में याज्ञवल्क्य ऋषि ने मार्तण्ड-पुरुष की उस क्षमता का वर्णन किया जिससे वे पवित्र रसों को खींचकर उन्हें दिव्य और सौम्य जल में परिवर्तित करते हैं। वर्तमान श्लोक इस प्रक्रिया के दूसरे पक्ष को उजागर करता है, जहाँ सूर्य केवल शुद्ध ही नहीं, अपितु अशुद्ध तत्त्वों से भी रस ग्रहण कर जगत के एक विशिष्ट वर्ग का पोषण करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः मार्तण्डः) अक्षत्रेभ्यः च एतेभ्यो ह्यमेध्याद् गृह्यते रसः। अथर्वाङ्गिरसेभ्यश्च संभवेदैकृतं जगत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• अक्षत्रेभ्यः: यह पद संदिग्ध है, किन्तु सम्भवतः इसका अर्थ उन स्थानों से है जो 'क्षेत्र' (पवित्र या उपजाऊ भूमि) नहीं हैं, अर्थात् अपवित्र या बंजर स्थान।
• अमेध्याद् रसः: 'अमेध्य' का अर्थ है—जो पवित्र नहीं है, या जिसे मेधस (बुद्धि/शुद्धता) द्वारा परिष्कृत नहीं किया गया। यहाँ उस रस की बात है जो अशुद्ध और तामसिक है।
• गृह्यते: ग्रहण किया जाता है। यह क्रिया सूर्य-पुरुष की सर्वग्राही शक्ति को दिखाती है।
• अथर्वाङ्गिरसेभ्यः: यह पद भी संदिग्ध है, किन्तु भावतः यह उन शक्तियों या विधियों की ओर संकेत करता है जो 'अथर्व' (स्थिर/गूढ़) और 'अंगिरस' (अग्नि-तप) से सम्बद्ध हैं।
• वैकृतं जगत्: 'वैकृत' का अर्थ है—विकृत या परिवर्तित। श्लोक ९.७२ में वर्णित 'प्राकृत' (शुद्ध/प्राकृतिक) के विपरीत, यह वह जगत है जो क्षय और विकार के अधीन है।
भाष्य —
इस श्लोक का पाठ कुछ संदिग्ध है, किन्तु इसका मूल भाव स्पष्ट है। ऋषि याज्ञवल्क्य यहाँ मार्तण्ड-पुरुष की उस विराटता को दिखा रहे हैं जहाँ वे केवल 'दिव्य' और 'सौम्य' तक सीमित नहीं हैं। जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से पवित्र रसों (मेध्य रसों) को खींचकर देवताओं और मनुष्यों के लिए अमृतमय जल बनाता है, उसी प्रकार वह उन स्थानों और तत्त्वों से भी रस ग्रहण करता है जो 'अमेध्य' अर्थात् अपवित्र या तामसिक हैं।
यहाँ यह रहस्य खुलता है कि सृष्टि का संतुलन केवल शुद्धता से नहीं, अपितु अशुद्धता के रूपांतरण से भी चलता है। सूर्य-पुरुष इन अपवित्र रसों को ग्रहण कर उन्हें एक विशिष्ट रूप देते हैं, जिससे 'वैकृत जगत्' का पोषण होता है। जैसा कि अगले श्लोकों (९.७६ और ९.७८) में स्पष्ट होगा, यह वैकृत रस उन प्राणियों के लिए है जो तामसिक प्रवृत्तियों वाले हैं—जैसे राक्षस, नाग और अन्य निम्न योनियाँ।
यहाँ मार्तण्ड-पुरुष एक महान कीमियागर की भाँति कार्य कर रहे हैं। वे अशुद्धता को पूरी तरह नष्ट नहीं करते, अपितु उसे उस स्तर के अनुकूल परिवर्तित करते हैं जहाँ उसकी आवश्यकता है। यह दर्शाता है कि ईश्वर या सूर्य-तत्त्व समस्त सृष्टि के प्रति समदर्शी हैं; वे शुद्ध को शुद्धता और अशुद्ध को उसके स्वभाव के अनुसार पोषण प्रदान करते हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'अलिप्तता' के अभ्यास में है। सूर्य-पुरुष अपवित्र स्थानों से रस ग्रहण तो करते हैं, किन्तु वे स्वयं अपवित्र नहीं होते। पिछले श्लोकों (९.६३) में उन्हें 'अपरामृष्ट' कहा गया है—अर्थात् जिन्हें कोई स्पर्श नहीं कर सकता।
योगिक दृष्टि से यह 'अनासक्ति' की वह भूमि है जहाँ साधक संसार के बीच रहते हुए, उसके समस्त द्वंद्वों और अशुद्धियों का अनुभव करते हुए भी स्वयं को उनसे अप्रभावित रखता है। जिस प्रकार सूर्य मलिनता को सोखकर उसे प्रकाश में बदल देता है या उचित दिशा में प्रवाहित करता है, वैसे ही योगी अपने भीतर उठने वाले तामसिक विचारों और आवेगों को दबाता नहीं, बल्कि उन्हें अपनी चेतना की अग्नि में तपाकर रूपांतरित कर देता है। वह संसार से रस (अनुभव) तो लेता है, किन्तु उसमें डूबता नहीं; वह अलिप्त रहकर केवल साक्षी भाव से जगत के पोषण और संचालन का अनुभव करता है।
अश्माशनिरवश्याया नागकूष्माण्डराक्षसाः ।
स्तेनास्तेन हि जीवन्ति सौम्येन सुरमानवाः ॥ ९.७६ ॥
पत्थर, वज्र, ओस (से) — नाग, कूष्माण्ड, राक्षस और चोर उस (वैकृत रस) से जीते हैं; और सौम्य (रस) से देवता और मनुष्य।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७५) में याज्ञवल्क्य ऋषि ने यह रहस्य खोला कि मार्तण्ड-पुरुष केवल पवित्र रसों का ही नहीं, अपितु 'अमेध्य' अर्थात् अपवित्र और विकृत स्थानों से भी रस ग्रहण करते हैं, जिससे वैकृत जगत की उत्पत्ति होती है। वर्तमान श्लोक उसी प्रसंग का विस्तार है, जहाँ यह स्पष्ट किया जा रहा है कि उन दो भिन्न प्रकार के रसों—सौम्य और वैकृत—का उपभोग किन-किन प्राणियों द्वारा किया जाता है और उनका जीवन किस पर आश्रित है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (वैकृत रसः) अश्म-शशि-निरवश्यया नाग-कूष्माण्ड-राक्षसाः (च) स्तेनाः (तिष्ठन्ति); तेन स्तेन हि जीवन्ति। (परन्तु) सौम्येन (रसेन) सुर-मानवाः (जीवन्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• अश्म-शशि-निरवश्यया: यहाँ 'अश्म' का अर्थ पत्थर, 'शशि' का अर्थ चन्द्रमा (जो शीतलता और ओस का प्रतीक है) तथा 'निरवश्यया' का अर्थ वज्र या कठोर प्रहार से है। ये वे माध्यम हैं जिनसे वैकृत रस प्रकट होता है या जिनमें वह निहित रहता है।
• नाग-कूष्माण्ड-राक्षसाः: ये तामसिक और निम्न वृत्तियों वाले प्राणों के प्रतीक हैं।
• स्तेन: चोर। यहाँ 'स्तेन' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में है—एक बाहरी चोर और दूसरा वह सूक्ष्म प्रवृत्ति जो दूसरों के तेज या रस को चुराती है।
• सौम्येन: जो सौम्य रस (दिव्य जल/तेज) से सम्बद्ध है, जिसकी चर्चा श्लोक ९.७४ में की गई थी।
• सुर-मानवाः: देवता और मनुष्य; वे जो प्रकाश, सत्य और शुद्धि के मार्ग पर अग्रसर हैं।
भाष्य —
याज्ञवल्क्य ऋषि यहाँ सृष्टि के पोषण के एक अत्यंत गूढ़ नियम को स्पष्ट कर रहे हैं। उन्होंने पूर्व श्लोकों में बताया कि सूर्य-पुरुष दो प्रकार के रस ग्रहण करते हैं—एक 'सौम्य' (पवित्र) और दूसरा 'वैकृत' (विकृत)। इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि जगत के समस्त प्राणी अपनी प्रकृति और अपने कर्मों के अनुसार विशिष्ट रस का उपभोग करते हैं।
वह वैकृत रस, जो अमेध्य स्थानों से लिया गया है, पत्थर (अश्म), ओस (शशि) और कठोर प्रहारों (निरवश्यया) के रूप में अभिव्यक्त होता है। इस खुरदरे और तामसिक रस से नाग, कूष्माण्ड, राक्षस और चोर जैसे प्राणी अपना जीवन चलाते हैं। यहाँ 'चोर' का उल्लेख महत्वपूर्ण है; जो दूसरों के सुख या तेज का अपहरण करता है, वह वास्तव में उसी वैकृत रस पर जीवित रहता है क्योंकि उसका पोषण अधर्म और विकार से होता है।
इसके विपरीत, जो दिव्य, पवित्र और शिवतम जल सूर्य की किरणों द्वारा परिष्कृत किया गया है (जैसा श्लोक ९.७४ में वर्णित है), उस 'सौम्य रस' से देवताओं और मनुष्यों का जीवन चलता है। यहाँ देवता केवल स्वर्ग के निवासी नहीं, अपितु वे मनुष्य हैं जिन्होंने अपनी चेतना को शुद्ध कर लिया है।
इस प्रकार, मार्तण्ड-पुरुष एक ही समय में दो विपरीत धाराओं का पोषण कर रहे हैं। यह उनकी विराटता है कि वे तामसिक जीवों को उनके स्वभाव के अनुकूल वैकृत रस देते हैं और सात्त्विक जीवों को सौम्य रस। यह विधान दर्शाता है कि जीव जिस स्तर की चेतना में स्थित होता है, वह उसी अनुरूप ऊर्जा या 'रस' को ग्रहण करने का अधिकारी बनता है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक के माध्यम से साधक को 'आहार' और 'ऊर्जा' के सूक्ष्म विज्ञान की ओर संकेत कर रहे हैं। योग की दृष्टि से यह श्लोक एक चेतावनी और मार्गनिर्देश दोनों है।
साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि वह जिस रस (ऊर्जा) का सेवन करता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व और उसकी चेतना बनती जाती है। यदि साधक क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और दूसरों के अधिकारों का हनन (स्तेन प्रवृत्ति) करता है, तो वह अनजाने में उस 'वैकृत रस' को आत्मसात कर रहा है, जो उसे तामसिक प्रवृत्तियों (राक्षस, नाग आदि की मानसिक अवस्थाओं) की ओर ले जाता है। ऐसा साधक पत्थर जैसा कठोर और ओस जैसा अस्थिर हो जाता है।
इसके विपरीत, यदि साधक सात्त्विक आहार, सत्य-स्वाध्याय और शुद्ध भावों का अभ्यास करता है, तो वह उस 'सौम्य रस' को प्राप्त करता है जो सूर्य-पुरुष की किरणों द्वारा परिष्कृत है। यह सौम्य रस साधक को मनुष्यता से देवत्व की ओर ले जाता है।
अभ्यास यह है कि साधक अपनी वृत्तियों का निरीक्षण करे—क्या वह वैकृत ऊर्जा से पोषित हो रहा है या सौम्य? जब साधक अपने भीतर के 'अमेध्य' भावों को त्यागकर सूर्य-स्वरूप आत्म-तेज में स्थित होता है, तब वह स्थूल शरीर में रहते हुए भी 'सुर' (देवता) की भूमि पर प्रतिष्ठित हो जाता है। इस प्रकार यह श्लोक साधक को तामसिकता से सात्त्विकता की ओर संक्रमण का मार्ग दिखाता है।
अन्नदः सर्वभूतानां भूर्भुवःस्वर्निवासिनाम् ।
द(वृ)ष्टिप्रकाशे(शा)वश्यायनीहाराशनिमारुतैः ॥ ९.७७ ॥
भूः, भुवः, स्वः में रहनेवाले सब भूतोंका (वह) अन्नदाता है — वर्षा, प्रकाश, ओस, कुहरा, वज्र और वायुके द्वारा।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७६) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि सूर्य-पुरुष द्वारा ग्रहण किए गए सौम्य और वैकृत रसों का वितरण भिन्न-भिन्न प्राणियों में होता है—जहाँ तामसिक प्राणी वैकृत रस से जीवित रहते हैं, वहीं देवता और मनुष्य सौम्य रस के आश्रित हैं। वर्तमान श्लोक इस पूरी प्रक्रिया के मूल कारण यानी मार्तण्ड (सूर्य) की 'अन्नदाता' रूपी भूमिका को प्रतिपादित करता है, जो केवल भौतिक भोजन नहीं, अपितु संपूर्ण चराचर जगत के पोषण का आधार है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) भूर्भुवःस्वर्निवासिनाम् सर्वभूतानां अन्नदः (अस्ति), (यत्) वृष्टि-प्रकाश-श्यायानी-हाराशि-मारुतैः (ददाति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• भूर्भुवःस्वर्निवासिनाम्: भूः (पृथ्वी), भुवः (अंतरिक्ष) और स्वः (द्युलोक)—इन तीनों लोकों में निवास करने वाले समस्त प्राणियों का।
• अन्नदः: अन्न देने वाला। यहाँ 'अन्न' शब्द केवल खाए जाने वाले पदार्थ के लिए नहीं, बल्कि उस सूक्ष्म ऊर्जा और रस (तेज) के लिए है जिससे प्राणों का पोषण होता है।
• वृष्टि: वर्षा। जल का वह रूप जो पृथ्वी पर जीवन का आधार है।
• प्रकाशे (प्रकाश): सूर्य का आलोक, जिसके बिना प्रकाश-संश्लेषण संभव नहीं और चेतना का जागरण नहीं होता।
• श्यायानी (ओस/हिम): 'श्यायानि' का अर्थ यहाँ ओस या शीतलता से है, जो रात्रि के समय पृथ्वी को तृप्त करती है।
• हाराशि (कुहरा/कोहरा): वायुमंडल में व्याप्त वह वाष्प या धुंध, जो जल-चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
• मारुतैः: वायु के द्वारा। प्राणवायु और पवन, जो रसों के संचरण और जीवन के स्पंदन के लिए अनिवार्य हैं।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य इस श्लोक में मार्तण्ड-पुरुष को संपूर्ण ब्रह्मांड का 'अन्नदाता' घोषित कर रहे हैं। यहाँ यह रहस्य खुलता है कि सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि वह विराट पुरुष है जो तीनों लोकों—भूः, भुवः और स्वः—के प्राणियों का भरण-पोषण करता है।
ऋषि बताते हैं कि यह पोषण प्रत्यक्ष रूप से छह माध्यमों से होता है: वर्षा (वृष्टि), प्रकाश, ओस (श्यायानि), कुहरा (हाराशि), वज्र/ऊर्जा और वायु (मारुत)। बाहरी दृष्टि से देखें तो यह एक प्राकृतिक चक्र है—सूर्य की ऊष्मा से सागर का जल वाष्प बनता है, जो बादलों (कुहरे) के रूप में एकत्रित होकर वर्षा करता है, और प्रकाश के माध्यम से वनस्पतियों को जन्म देता है। किंतु इस विधिक्रिया के पीछे मार्तण्ड-पुरुष की वह करुणा और विधान है, जिसे याज्ञवल्क्य 'अन्नदाता' कह रहे हैं।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि सूर्य जिस 'प्रकाश' और 'तेज' का वितरण करता है, वही वास्तव में सूक्ष्म अन्न है। जो रस पिछले श्लोकों (९.७४-९.७६) में वर्णित थे, वे इन्हीं माध्यमों से प्राणियों तक पहुँचते हैं। जब सूर्य रसों को खींचता है और पुनः उन्हें इन छह रूपों में प्रसारित करता है, तब वह समस्त भूतों के लिए 'अन्न' बन जाता है। अतः, इस सृष्टि का कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मार्तण्ड-पुरुष के पोषण से वंचित हो।
शास्त्र-साक्ष्य —
सूर्य की इसी अन्नदाता और रसों को खींचने वाली भूमिका का वर्णन महाभारत में मिलता है:
पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम् । ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा ॥ गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः । दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः ॥ क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः । दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा ॥ … एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम् । पितैष सर्वभूतानां तस्मात् तं शरणं व्रज ॥ ३.५–७ ॥
(धौम्य युधिष्ठिरसे —) पूर्वकालमें रचे गये प्राणी भूखसे बहुत पीड़ित थे; तब पिताकी भाँति सविताने उनपर दया की। उत्तरायणमें जाकर (सूर्य) किरणोंसे तेज और रसोंको खींचता है, और दक्षिणायनमें लौटकर पृथिवीमें प्रवेश करता है। उस (पृथिवी) के खेत बन जानेपर ओषधियोंके स्वामी (चन्द्रमा) ने द्युलोकके तेजको लेकर जलसे ओषधियाँ उत्पन्न कीं। … इस प्रकार प्राणियोंके प्राणोंको धारण करनेवाला अन्न सूर्यमय है; वह सब भूतोंका पिता है, इसलिए उसीकी शरणमें जाओ।
(अंशानुसार: सविता उत्तरायण में किरणों द्वारा रसों को खींचता है और दक्षिणायन में पृथ्वी में प्रवेश कर ओषधियों के माध्यम से अन्न उत्पन्न करता है। अतः भानुमय अन्न ही प्राणधारण का आधार है।)
स्मृति और महाभारत की यह संगति अत्यंत स्पष्ट है। जहाँ स्मृति (९.७७) उन माध्यमों (वर्षा, प्रकाश, वायु आदि) का उल्लेख करती है जिनके द्वारा अन्न वितरित होता है, वहीं महाभारत उस प्रक्रिया के समय (उत्तरायण-दक्षिणायन) और विधि (रसानुद्धृत्य) को विस्तार देता है। दोनों ही ग्रंथ इस बात पर सहमत हैं कि भौतिक अन्न का मूल स्रोत सूर्य का तेज है—'भानुमयं ह्यन्नम्'।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अर्थ अत्यंत गहरा है। योग में 'अन्न' केवल स्थूल भोजन नहीं, बल्कि वह 'प्राण' है जो शरीर और मन को चलाता है। साधक जब यह अनुभव करता है कि उसके भीतर का प्रत्येक स्पंदन, उसकी हर श्वास (मारुत) और उसकी चेतना का प्रकाश (प्रकाशे) वास्तव में मार्तण्ड-पुरुष की ही देन है, तब वह 'अहंकार' से मुक्त होकर 'कृतज्ञता' के भाव में स्थित होता है।
अभ्यास यह है कि साधक जब भी अन्न ग्रहण करे या श्वास ले, तो वह उसे केवल भौतिक वस्तु न मानकर सविता (सूर्य) का प्रसाद माने। इस अभ्यास से भोजन 'प्राणमय' हो जाता है और शरीर में सात्विकता बढ़ती है।
आन्तर अर्थ यह है कि जिस प्रकार सूर्य बिना किसी भेदभाव के तीनों लोकों को प्रकाश और अन्न देता है, उसी प्रकार साधक अपने भीतर के 'अन्तर्यामी सूर्य' (हृदय-ज्योति) का ध्यान करे, जो उसे ज्ञान रूपी अन्न से तृप्त करता है। जब साधक स्थूल अन्न से ऊपर उठकर इस 'प्रकाश-अन्न' का अनुभव करने लगता है, तब वह भौतिक भूख से ऊपर उठकर आध्यात्मिक तृप्ति की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास साधक को 'अभाव' की भावना से निकालकर 'पूर्णता' के भाव में प्रतिष्ठित करता है।
तामसान् यक्षभूतानि नागकूष्माण्डनैर्ऋतान् ।
तदन्नेन बिभर्त्येकोऽमृतवृष्ट्या चराचरान् ॥ ९.७८ ॥
तामस यक्षों, भूतों, नागों, कूष्माण्डों और नैर्ऋतों (राक्षसों) का उस (वैकृत) अन्नसे, और (अन्य) चराचरका अमृतकी वर्षासे — (वह) अकेला भरण करता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७७) में याज्ञवल्क्य ऋषि ने मार्तण्ड के अन्नदाता रूप का वर्णन करते हुए उन भौतिक माध्यमों (वर्षा, प्रकाश, वायु आदि) को बताया जिनसे वह तीनों लोकों का पोषण करता है। वर्तमान श्लोक उसी पोषण-प्रक्रिया के सूक्ष्म भेद को स्पष्ट करता है कि कैसे एक ही स्रोत से भिन्न-भिन्न प्रकृतियों के प्राणियों को उनकी पात्रता और स्वभाव के अनुसार अलग-अलग रस प्राप्त होते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) तामसान् यक्ष-भूत-नाग-कूष्माण्ड-नैर्ऋतान् तदन्नेन (पालयति), चराचरान् (तु) अमृतवृष्ट्या बिभर्त्येव।
पदार्थ और निर्वचन:
• तामसान्: तामस प्रवृत्ति वाले प्राणी। यहाँ 'तामस' का अर्थ है—अंधकार, जड़ता और भारीपन।
• यक्ष-भूत-नाग-कूष्माण्ड-नैर्ऋतान्: ये विभिन्न निम्न-आयामी या पाताल-गामी योनियाँ हैं। 'नैर्ऋत' वे हैं जो दक्षिण दिशा (मृत्यु और पतन की दिशा) के प्रभाव में हैं।
• तदन्नेन: उस अन्न से। यहाँ 'तदन्न' का संकेत पिछले श्लोकों (९.७५-९.७६) में वर्णित 'वैकृत रस' या अपवित्र स्थानों से ग्रहण किए गए रसों की ओर है, जो स्थूल और भारी होते हैं।
• अमृतवृष्ट्या: अमृत की वर्षा से। यहाँ अमृत वह सौम्य तेज है जो जीवन को दीर्घायु, शुद्ध और दिव्य बनाता है।
• चराचरान्: चर (जंगम/चेतन) और अचर (स्थावर/जड़) समस्त प्राणियों को।
• बिभर्त्येव: अकेला भरण करता है। 'बिभर्ति' का अर्थ केवल पेट भरना नहीं, बल्कि अस्तित्व को धारण करना है।
भाष्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ एक महान रहस्य खोल रहे हैं कि सृष्टि का पोषक तत्व एक ही है, किंतु उसका प्रभाव ग्रहण करने वाले के स्वभाव पर निर्भर करता है। श्लोक ९.७२ में जिस 'द्विविध गर्भ' की चर्चा आई थी—जहाँ एक ओर प्रकाश और दूसरी ओर अंधकार का बीज था—उसका उपसंहार यहाँ होता है।
ऋषि कहते हैं कि जो प्राणी अपनी प्रकृति में तामस हैं, जैसे यक्ष, भूत, नाग और नैर्ऋत, उन्हें सूर्य-पुरुष उस 'वैकृत अन्न' के माध्यम से पालता है। यह वह रस है जिसे सूर्य ने अपवित्र या स्थूल स्थानों से खींचकर शुद्ध किया और फिर उन प्राणियों को दिया जिनकी देह और चेतना उसी भारीपन (तामस) की बनी है। विडम्बना यह है कि जो तामस है, वह केवल तामस अन्न से ही जीवित रह सकता है; उसे अमृत का तेज सहन नहीं होगा।
वहीं दूसरी ओर, समस्त चराचर जगत—विशेषकर वे जो सौम्य प्रकृति के हैं—उन्हें सूर्य 'अमृत-वृष्टि' प्रदान करता है। यह अमृत कोई भौतिक पेय नहीं, बल्कि सूर्य की वह दिव्य किरणें और रश्मियाँ हैं जो प्राणों में चैतन्यता, आरोग्य और ओज का संचार करती हैं।
भाव यह है कि मार्तण्ड (सूर्य) निष्पक्ष है। वह एक ही समय में वैकृत अन्न की वर्षा भी कर रहा है और अमृत की वृष्टि भी। पोषण देने वाला 'एक' ही है, किंतु प्राप्त करने वाले अपनी पात्रता के अनुसार या तो तामस रस ग्रहण कर रहे हैं या अमृत रस। यह इस सत्य का उद्घाटन है कि जगत में जो भिन्नता दिखती है, वह पोषक की भिन्नता नहीं, अपितु पोषक को ग्रहण करने वाली प्रवृत्तियों की भिन्नता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अर्थ अत्यंत गूढ़ है। मनुष्य के भीतर भी ये सभी प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं। हमारे भीतर के 'तामस' (आलस्य, मोह, क्रोध) वे यक्ष और भूत हैं जो केवल वैकृत रसों (इंद्रिय सुखों और स्थूल भोजन) से पुष्ट होते हैं। जब तक साधक की चेतना तामस स्तर पर है, वह सूर्य के तेज को भी केवल भौतिक गर्मी या प्रकाश के रूप में देखता है।
अभ्यास यह है कि साधक अपनी आंतरिक 'तामस वृत्तियों' को पहचाने। वह अनुभव करे कि वह अब तक किन वैकृत रसों से अपना पोषण कर रहा था जिससे उसका मन भारी और जड़ हुआ। योग का मार्ग इस तामस भरण से हटकर 'अमृत-वृष्टि' के योग्य बनने का मार्ग है।
जब साधक अपनी प्रज्ञा को सूर्य-पुरुष (मार्तण्ड) में स्थित करता है, तब वह अनुभव करता है कि वही एक तेज जो बाहर सूर्य रूप में है, भीतर 'हृदय-ज्योति' के रूप में विद्यमान है। इस अभ्यास से साधक तामस भूमि से उठकर सौम्य भूमि की ओर अग्रसर होता है। वह समझता है कि यदि वह स्वयं को शुद्ध और हल्का (लघु) कर ले, तो वही एक सूर्य उसे अमृत प्रदान करेगा, जिससे उसकी चेतना का विस्तार चराचर जगत तक हो जाएगा। यहाँ 'अकेला भरण करना' इस बात का संकेत है कि समस्त ब्रह्मांड की ऊर्जा का स्रोत केवल एक ही चैतन्य सत्ता है; शेष सब उसी के विभिन्न रूपों का वितरण है।
विविधानि सूर्यनामधेयानि
एष धाता विधाता च ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः ।
धनदः पावकः कालो वरुणेन्द्रानिलाः शशी ॥ ९.७९ ॥
यही धाता, विधाता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर है; धनद (कुबेर), पावक (अग्नि), काल, वरुण, इन्द्र, वायु और चन्द्रमा है;
अवतरणिका — पिछले श्लोकों (९.७४-९.७९) में याज्ञवल्क्य ऋषि ने सूर्य के उस सामर्थ्य का वर्णन किया जिससे वह समस्त चराचर जगत का पोषण करता है और विभिन्न प्रकृतियों के अनुसार रसों का वितरण करता है। अब यहाँ से एक नई कड़ी आरम्भ होती है, जहाँ वे सूर्य के उन विविध नामों का उल्लेख कर रहे हैं जो वास्तव में एक ही परम तत्व की विभिन्न कार्यात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) एष धाता, विधाता च, ब्रह्मा, विष्णुः, महेश्वरः, धनदः, पावकः, कालो, वरुणेन्द्रानिलाः, शशी (च अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• एष: यह। यहाँ 'एष' शब्द सूर्य (मार्तण्ड) के लिए प्रयुक्त है।
• धाता एवं विधाता: धाता वह है जो धारण करता है, और विधाता वह है जो विधान या नियम करता है। इन दोनों पदों का विस्तृत अर्थ अगले श्लोकों (९.८१-९.८२) में स्पष्ट किया गया है।
• ब्रह्मा, विष्णुः, महेश्वरः: सृष्टि के तीन मुख्य आयाम—उत्पत्ति (सृजन), पालन और संहार। यहाँ ये पौराणिक व्यक्तित्वों के रूप में नहीं, अपितु सूर्य की उन शक्तियों के रूप में हैं जो जन्म, जीवन और मृत्यु का नियमन करती हैं।
• धनदः: कुबेर या धन देने वाला। योगिक दृष्टि से 'धन' केवल स्वर्ण नहीं, अपितु ओज और तेज है।
• पावकः: अग्नि स्वरूप। वह जो शुद्ध करता है (पवित्रीकरण)।
• कालः: समय। सूर्य ही काल का अधिष्ठाता है; वही दिन-रात और ऋतुओं के माध्यम से समय का बोध कराता है।
• वरुणेन्द्रानिलाः, शशी: यह एक सामासिक पद है जिसमें वरुण (जल/आकाश), इन्द्र (शक्ति/वायु) और अनिल (वायु) समाहित हैं। साथ ही 'शशी' (चन्द्रमा) का उल्लेख है।
भाष्य —
यह श्लोक अपने आप में पूर्ण वाक्य नहीं है, अपितु एक लंबी सूची का आरम्भ है जो श्लोक ९.८० में जाकर पूर्ण होती है ("पर्यायनामभिश्चैष एक एव निगद्यते")। याज्ञवल्क्य ऋषि यहाँ सूर्य के उन नामों को उद्घाटित कर रहे हैं जिन्हें सामान्यतः भिन्न देवता माना जाता है, किंतु वास्तव में वे एक ही ज्योति के विभिन्न रूप हैं।
बाहरी दृष्टि से यह केवल देवताओं की सूची प्रतीत होती है, किंतु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। जब ऋषि कहते हैं कि वह 'ब्रह्मा' है, तो भाव यह है कि सूर्य का प्रकाश ही जीवन का बीजरूप है; जब 'विष्णु' कहते हैं, तो वह सर्वव्यापी व्याप्तता है; और जब 'महेश्वर' कहते हैं, तो वह काल के साथ सब कुछ लीन कर लेने वाली अग्नि है। इसी प्रकार वरुण, इन्द्र और अनिल—ये प्रकृति के वे तत्व हैं जो सूर्य की ऊर्जा के बिना निष्प्राण हैं। चन्द्रमा (शशी) का नाम यहाँ इसलिए आया क्योंकि चन्द्रमा स्वयं का प्रकाश नहीं रखता, वह सूर्य का ही प्रतिबिम्ब है; अतः वह भी उसी एक ज्योति का विस्तार है।
ऋषि यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि जिसे हम भिन्न-भिन्न शक्तियों के रूप में देखते हैं, वे वास्तव में उस एक 'अक्षर' और 'ज्योति' के पर्याय मात्र हैं। यह विविधता केवल नाम की है, तत्त्व की नहीं।
शास्त्र-साक्ष्य —
सूर्य के इन पर्याय नामों की पुष्टि अन्य शास्त्रों में भी मिलती है।
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः । गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः ॥ पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम् । सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च ॥ इन्द्रो विवस्वान् दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः ॥ ३.१६–१८ ॥
(सूर्यके एक सौ आठ नामोंका आरम्भ —) सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान्, अज, काल, मृत्यु, धाता, प्रभाकर; पृथिवी, जल, तेज, आकाश, वायु, परम आश्रय; सोम, बृहस्पति, शुक्र, बुध, अंगारक; इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु, शुचि, शौरि, शनैश्चर; ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, स्कन्द, वरुण और यम।
इस अंश में धौम्य ऋषि द्वारा बताए गए सूर्य के १०८ नामों का वर्णन है, जिनमें "ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च... वरुणो यमः" तथा "धाता", "कालो" जैसे नाम स्पष्ट रूप से आते हैं।
स्मृति और महाभारत के इस विवरण में पूर्ण मेल है। दोनों ही स्थान यह सिद्ध करते हैं कि वैदिक परम्परा में सूर्य को केवल एक ग्रह या देवता नहीं, अपितु समस्त ब्रह्माण्डीय शक्तियों का केंद्र माना गया है। जहाँ पौराणिक कथाएँ इन नामों को अलग-अलग व्यक्तित्वों से जोड़ती हैं, वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति इन्हें 'पर्याय' कहकर उस एकत्व की ओर संकेत करती है जिसे योग में 'एक-तत्व' कहा जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का प्रयोजन पौराणिक ज्ञान प्राप्त करना नहीं, अपितु 'नाम' से 'नामी' तक पहुँचना है। योगिक अभ्यास में जब साधक सूर्य का ध्यान करता है, तो वह पाता है कि उसके भीतर की चेतना ही वास्तव में वह धाता और विधाता है जो उसके प्राणों को धारण करती है और जीवन का विधान करती है।
यहाँ अभ्यास यह है: नाम अनेक हों, किंतु ध्यान एक हो। साधक जब 'पावक' का जप करे तो उसे अपने भीतर शुद्धिकरण का अनुभव होना चाहिए; जब 'काल' का स्मरण करे तो उसे नश्वरता का बोध हो; और जब 'ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर' का चिंतन करे तो वह स्वयं को सृष्टि के सृजन, पालन और लय की प्रक्रिया में स्थित पाए।
साधक इस अभ्यास से 'बहुत्व' की भूमि से 'एकत्व' की भूमि की ओर बढ़ता है। वह अनुभव करता है कि जिस सूर्य की किरणें बाहर जगत को प्रकाशित कर रही हैं, वही ज्योति हृदय-आकाश में प्रतिष्ठित है। नामों का यह विस्तार वास्तव में साधक के मन को व्यापक बनाने की एक विधि है, ताकि वह किसी एक सीमित परिभाषा में न बँधकर उस अनंत प्रकाश में विलीन हो सके।
मित्रो धाता भगस्त्वष्टा पूषार्यमांशुरेव च ।
पर्यायनामभिश्चैष एक एव निगद्यते ॥ ९.८० ॥
मित्र, धाता, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा और अंशु भी — इन पर्याय-नामोंसे यह एक ही कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.७९) में याज्ञवल्क्य ऋषि ने सूर्य के उन नामों की सूची आरम्भ की थी जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जैसे महान देव समाहित थे। वह वाक्य अभी अपूर्ण था; वर्तमान श्लोक ९.८० उस सूची को पूर्ण करता है और यह स्पष्ट करता है कि ये समस्त नाम भिन्न-भिन्न देवताओं के नहीं, अपितु एक ही परम तत्व की पर्याय-अभिव्यक्तियाँ हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: मित्रः, धाता, भगः, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, अंशुः एव च (एते) पर्यायनामभिः च एष (सूर्यः/परमात्मा) एक एव निगद्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• मित्रः: वह जो सबका मित्र है; योगिक दृष्टि से वह शक्ति जो साधक के चित्त के साथ मैत्री भाव स्थापित कर उसे अंतर्मुखी करती है।
• धाता: धारण करने वाला। (इसका विस्तृत अर्थ अगले श्लोकों में आएगा, यहाँ यह उस आधार-शक्ति का प्रतीक है)।
• भगः: ऐश्वर्य और सौभाग्य का स्वामी। 'भग' वह तेज है जो साधक के भीतर आध्यात्मिक वैभव को जाग्रत करता है।
• त्वष्टा: रूप देने वाला या शिल्पकार। वह जो प्राणों को शरीर में विन्यास देता है और साधक के संकल्पों को आकार देता है।
• पूषा: पोषण करने वाला। वह जो केवल स्थूल अन्न से नहीं, अपितु ज्ञान-अमृत से आत्मा का पोषण करता है।
• अर्यमाः: नियमन करने वाला या पितृ-देव। वह जो मर्यादा और अनुशासन (धर्म) का अधिष्ठाता है।
• अंशुः: किरणों वाला। यह सूर्य की उस प्रकाश-शक्ति का प्रतीक है जो अज्ञान के अंधकार को छिन्न करता है।
• पर्यायनामभिः: पर्याय नामों से। अर्थात् एक ही वस्तु के विभिन्न कार्यात्मक नाम।
• एक एव निगद्यते: केवल एक ही कहा जाता है। यहाँ 'निगद्यते' क्रिया यह स्पष्ट करती है कि शास्त्र इन सबको एक ही तत्व का विस्तार मानते हैं।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (९.७९) से चले आ रहे वाक्य का उपसंहार है। श्लोक ९.७९ में धाता, विधाता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि नामों का उल्लेख था और यहाँ मित्र, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा और अंशु को जोड़कर यह सूची पूर्ण की गई है। याज्ञवल्क्य ऋषि यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म सत्य उद्घाटित कर रहे हैं कि जिसे हम अलग-अलग देवताओं के रूप में देखते हैं—कोई सृजन करता है (त्वष्टा), कोई पोषण करता है (पूषा), कोई नियमन करता है (अर्यमा)—वे वास्तव में उस एक ही 'सविता' या सूर्य-तत्त्व की विभिन्न क्रियाएँ हैं।
यहाँ 'धाता' शब्द का पुनः आगमन हुआ है, जो यह संकेत देता है कि इस पूरी सूची का केंद्र 'धारण करना' है। जब साधक बाहरी जगत में इन नामों को देखता है, तो उसे अनेक देव दिखाई देते हैं, किन्तु जब वह अपनी दृष्टि अंतःकरण की ओर मोड़ता है, तो पाता है कि उसके भीतर का प्राण ही मित्र भी है, पूषा भी और त्वष्टा भी। यह श्लोक विखंडित उपासना को एकीकृत करने का प्रयास है। यह स्पष्ट करता है कि नाम अनेक हो सकते हैं, परन्तु नामी (जिसका नाम रखा गया है) केवल एक ही है।
श्रुति-संगति —
इस 'अनेक में एक' के रहस्य की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में मिलती है:
तदाहुः यदयमेक एव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥ १४.६.९.१० ॥
कहते हैं — "यह (वायु) तो एक ही बहता है, फिर डेढ़ कैसे?" — "क्योंकि इसमें यह सब ऋद्धि (वृद्धि) को प्राप्त हुआ, इसलिए डेढ़ है।" "एक देव कौन है?" — "प्राण; वह ब्रह्म है, उसे 'त्यत्' (वह) कहते हैं।"
यहाँ श्रुति प्रश्न करती है कि यदि देव एक है, तो वह अनेक कैसे प्रतीत होता है? इसका उत्तर यह है कि जब वह एक ही प्राण/ब्रह्म समस्त जगत में व्याप्त होकर विभिन्न ऋद्धियों और शक्तियों के रूप में प्रकट होता है, तब उसे विविध नामों से पुकारा जाता है। जिस प्रकार वायु एक है परन्तु उसकी गतियाँ भिन्न हैं, उसी प्रकार सूर्य (परमात्मा) एक है, किन्तु उसके कार्य—जैसे पोषण, नियमन और प्रकाश—विभिन्न होने के कारण वह पूषा, अर्यमा और अंशु कहलाता है। स्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति-रहस्य का विस्तार है कि समस्त देव वास्तव में उस एक 'एकदेव' (प्राण/ब्रह्म) की ही पर्याय हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक उपासना की 'एकाग्रता' का सोपान है। साधारण उपासक भिन्न-भिन्न कामनाओं के लिए अलग-अलग देवताओं की शरण में जाता है, जिससे उसकी ऊर्जा बिखर जाती है। याज्ञवल्क्य ऋषि साधक को इस बिखराव से निकालकर 'एकत्व' की भूमि पर लाते हैं।
योगिक अभ्यास यह है कि साधक जब सूर्य का ध्यान करे या इन नामों का जप करे, तो वह यह अनुभव करे कि उसके भीतर जो प्राण-शक्ति स्पंदित हो रही है, वही मित्र के रूप में उसे सहारा दे रही है और वही अंशु के रूप में उसके ज्ञान को प्रकाशित कर रही है। यहाँ अभ्यास 'नाम' से 'नामी' की ओर जाने का है। जब साधक यह जान लेता है कि समस्त दैवीय शक्तियाँ एक ही सूर्य-तत्त्व (परम प्राण) का विस्तार हैं, तब उसकी उपासना बहुमुखी न रहकर एकाग्र हो जाती है। वह अनेक देवताओं के भटकाव से मुक्त होकर उस एक सविता में स्थित हो जाता है, जहाँ पहुँचकर नाम और रूप विलीन हो जाते हैं और केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है।
सूर्यनामधेयनिर्वचनानि
विशनात् सर्वभूतानां विष्णुरित्यभिधीयते ।
पश्यते सर्वभूतानां कर्म एष शुभाऽशुभम् ॥ ९.८१ ॥
सब भूतोंमें प्रवेश करनेसे (वह) विष्णु कहलाता है; यह सब भूतोंके शुभ-अशुभ कर्मको देखता है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.८०) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया था कि मित्र, भग और अर्यमा जैसे अनेक नाम वास्तव में एक ही आदित्य-पुरुष के पर्याय हैं। वर्तमान श्लोक (९.८१) से उन नामों के पीछे छिपे विशिष्ट कर्मों और अर्थों का निर्वचन आरम्भ होता है, जिसमें सर्वप्रथम 'विष्णु' नाम की व्याख्या की गई है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) सर्वभूतानां विशनात् विष्णुरित्यभिधीयते। एष सर्वभूतानां शुभाऽशुभं कर्म पश्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• विशनात्: 'विश' धातु से, जिसका अर्थ है प्रवेश करना, व्याप्त होना या विसरित होना। जो समस्त चराचर जगत के कण-कण में प्रविष्ट है।
• विष्णुरित्यभिधीयते: विष्णु के नाम से पुकारा जाता है। यहाँ 'विष्णु' केवल एक नाम नहीं, अपितु 'व्यापकता' का बोध कराने वाला विशेषण है।
• पश्यते: देखता है। यहाँ 'देखने' का अर्थ केवल चक्षु-दृष्टि नहीं, अपितु 'साक्षी-भाव' है।
• शुभाऽशुभम्: शुभ और अशुभ। कर्मों का वह द्वंद्व जो जीव के संस्कार बनते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस प्रकरण में ऋषि यह स्थापित कर रहे हैं कि जिस सूर्य को हम आकाश में देखते हैं, वही पुरुष हृदय के भीतर 'अन्तर्यामी' रूप में स्थित है। श्लोक का प्रथम चरण कहता है कि वह 'विष्णु' है क्योंकि वह 'विशनात्' है—अर्थात् वह किसी एक स्थान पर सीमित नहीं है, अपितु समस्त भूतों (प्राणियों और तत्वों) में प्रविष्ट है।
बाहरी दृष्टि से देखें तो सूर्य की किरणें सर्वत्र व्याप्त हैं, जिससे सृष्टि का संचालन होता है। किन्तु आन्तरिक दृष्टि से, वह एक ही चैतन्य तत्व है जो प्रत्येक जीव के प्राणों में, मन में और बुद्धि में व्याप्त होकर उसे चेतना प्रदान कर रहा है। जब एक ही तत्व सबमें समाहित होता है, तब वह 'विष्णु' कहलाता है।
श्लोक का द्वितीय चरण इस व्यापकता के फल को बताता है: "पश्यते सर्वभूतानां कर्म एष शुभाऽशुभम्"। जो सबमें प्रविष्ट है, वह अनिवार्य रूप से सबका साक्षी भी है। वह केवल बाहरी क्रियाओं को नहीं देखता, अपितु उन क्रियाओं के पीछे छिपे संकल्पों, वृत्तियों और उनके शुभ-अशुभ परिणामों को भी देखता है। वह दृष्टा है, जो कर्म करता नहीं, अपितु कर्म के होने का प्रकाश देता है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश होने पर ही वस्तुएँ दिखती हैं, उसी प्रकार इस अन्तर्यामी विष्णु के प्रकाश में जीव के कर्म प्रकट होते हैं। यहाँ यह स्पष्ट है कि विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र अलग-अलग सत्ताएँ नहीं, बल्कि उसी एक सूर्य-पुरुष के विभिन्न कार्यात्मक रूप हैं; यहाँ 'विष्णु' रूप में वह 'व्यापक साक्षी' है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का प्रयोग 'साक्षी-भाव' के अभ्यास में है। जब साधक यह अनुभव करता है कि वह जिस ईश्वर की उपासना कर रहा है, वह बाहर कहीं दूर नहीं, अपितु उसके अपने ही भीतर 'विष्णु' रूप में प्रविष्ट है, तब उसकी साधना 'बाहरी पूजा' से 'आन्तरिक जागरूकता' में बदल जाती है।
अभ्यास यह है कि साधक अपने प्रत्येक कर्म को करते समय यह स्मरण करे— "मेरे भीतर वह व्यापक पुरुष स्थित है, जो मेरे हर विचार और हर क्रिया का साक्षी है।" जब साधक स्वयं को उस द्रष्टा के सामने उपस्थित पाता है, तो उसके भीतर स्वाभाविक रूप से 'शुचिता' (पवित्रता) का उदय होता है। वह जान जाता है कि उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
यह बोध साधक को 'कर्म-शुद्धि' की ओर ले जाता है। जब उसे ज्ञात होता है कि उसका हर शुभ और अशुभ कर्म उस अन्तर्यामी द्वारा देखा जा रहा है, तो वह अशुभ कर्मों का त्याग कर शुभता की ओर अग्रसर होता है। योगिक दृष्टि से, यह अभ्यास साधक को 'कर्ता' के अहंकार से मुक्त कर 'द्रष्टा' की भूमि पर ले जाता है। वह अनुभव करता है कि वह स्वयं भी उस व्यापक विष्णु का एक अंश है, और धीरे-धीरे उसका व्यक्तिगत अहंकार उस विराट व्यापकता में विलीन होने लगता है।
छिन्दते पूर्वदेहस्थं विपाकं वै शुभाऽशुभम् ।
तस्माद्धाता विधाता च कीर्त्यते वेदचिन्तकैः ॥ ९.८२ ॥
पूर्व देहमें स्थित शुभ-अशुभ विपाकको काटता है; इसलिए वेदका चिन्तन करनेवाले (उसे) धाता और विधाता कहते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.८१) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने सूर्य-पुरुष के 'विष्णु' नाम का निर्वचन करते हुए बताया कि वह समस्त भूतों में व्याप्त है और उनके शुभ-अशुभ कर्मों का साक्षी है। वर्तमान श्लोक (९.८२) में इसी साक्षी-भाव से आगे बढ़कर, उन कर्मों के फल (विपाक) के निवारण की शक्ति का वर्णन है, जिससे 'धाता' और 'विधाता' नामों का रहस्य खुलता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) पूर्वदेहस्थं शुभाऽशुभं विपाकं छिन्दते; तस्मात् (सः) वेदचिन्तकैः धाता विधाता च कीर्त्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• पूर्वदेहस्थं: पूर्व जन्म के शरीर में संचित। यहाँ 'देह' केवल स्थूल शरीर नहीं, अपितु सूक्ष्म शरीर में स्थित संस्कारों का पुंज है।
• विपाकं: कर्मों का वह फल जो पककर (विपाक) जीव के प्रारब्ध में बदल चुका है। जैसे बीज पककर फल बनता है, वैसे ही कर्म विपाक बनकर जीवन की परिस्थितियों को निर्धारित करते हैं।
• शुभाऽशुभम्: शुभ और अशुभ। कर्मों का वह द्वंद्व जो जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र में बांधे रखता है।
• छिन्दते: काटता है या नष्ट करता है। यहाँ 'छेदन' का अर्थ है—बन्धन का विच्छेद।
• वेदचिन्तकैः: वेदों का केवल पाठ करने वालों से नहीं, अपितु वेदों के मर्म का चिन्तन करने वाले ऋषियों और मनीषियों द्वारा।
• धाता विधाता च: धाता (धारण करने वाला/सृजक) और विधाता (नियमन करने वाला/भाग्य विधाता)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य सूर्य-पुरुष के उस स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं जो जीव को उसके प्रारब्ध के कारागार से मुक्त करने की सामर्थ्य रखता है। श्लोक का प्रथम चरण कहता है—'छिन्दते पूर्वदेहस्थं विपाकं वै शुभाऽशुभम्'। इसका भाव यह है कि जीव अपने पूर्व जन्मों में जो शुभ और अशुभ कर्म करता है, वे संस्कार रूप में उसके सूक्ष्म शरीर (पूर्वदेह) में अंकित हो जाते हैं। जब ये संस्कार परिपक्व होते हैं, तो 'विपाक' बन जाते हैं, जो जीव के वर्तमान जीवन की सुख-दुःख की परिस्थितियों को निर्मित करते हैं। साधारणतः मनुष्य इस विपाक के अधीन होता है, किन्तु जो उस सूर्य-पुरुष (हृदय-आत्मा) की शरण में जाता है, वह पुरुष उसके इन संचित विपाकों को काट देता है।
यहाँ 'काटने' का अर्थ यह नहीं है कि कर्म मिट गए, अपितु यह है कि उन कर्मों का बंधन (बंधन-शक्ति) नष्ट हो गया। जिस प्रकार अग्नि स्वर्ण को तपाकर उसमें से अशुद्धियों को अलग कर देती है, उसी प्रकार हृदय-सूर्य का तेज जब प्रज्वलित होता है, तो पूर्वजन्मों के शुभ-अशुभ विपाक भस्म हो जाते हैं।
इसी कारण, वेदों के मर्म को जानने वाले 'वेदचिन्तक' उसे 'धाता' और 'विधाता' कहते हैं। सामान्यतः धाता और विधाता को केवल सृष्टि की रचना और भाग्य लिखने वाला माना जाता है, किन्तु यहाँ रहस्य यह है कि वह केवल भाग्य लिखता नहीं, अपितु जब साधक तैयार होता है, तो वह उस भाग्य के बंधन को काटकर उसे मुक्त भी करता है। जो जीव के अस्तित्व को धारण करता है वह 'धाता' है, और जो उसके कर्मों के विपाक का न्यायपूर्ण विच्छेद कर उसे नए मार्ग पर विधाता की भाँति निर्देशित करता है, वह 'विधाता' है। यह निर्वचन व्याकरणिक धातु-व्युत्पत्ति पर आधारित न होकर, सूर्य-पुरुष के कार्य (विपाक-छेदन) पर आधारित है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह 'प्रारब्ध' और 'पुरुषार्थ' के संधि-स्थल को दर्शाता है। योग का अंतिम लक्ष्य केवल शांति नहीं, अपितु 'विपाक' का छेदन है। साधक जब अपनी चेतना को बाहरी सूर्य से हटाकर हृदय के भीतर स्थित 'सूर्य-पुरुष' में स्थापित करता है, तब वह वास्तव में उस अग्नि-तत्व का आह्वान करता है जो संस्कारों को जलाने में सक्षम है।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि वह अपने पूर्व-संचित शुभ-अशुभ कर्मों के अधीन विवश नहीं है। जब वह हृदय-आकाश में स्थित उस साक्षी-पुरुष का ध्यान करता है, तो उसकी आंतरिक ज्योति (विज्ञानमय पुरुष) जागृत होती है। यह ज्योति जब प्रखर होती है, तो वह पूर्वदेह के उन सूक्ष्म तंतुओं को काट देती है जो जीव को संसार से बाँधे रखते हैं।
साधक यहाँ 'विपाक-छेदन' का अनुभव करता है—अर्थात् वह मानसिक और शारीरिक क्लेशों से ऊपर उठकर एक ऐसी भूमि पर पहुँचता है जहाँ शुभ-अशुभ का द्वंद्व समाप्त हो जाता है। यह अभ्यास साधक को 'कर्म-बंधन' की भूमि से 'मुक्ति-बोध' की भूमि की ओर ले जाता है। यहाँ उपासना का मुख्य प्रयोजन ही यही है कि उस धाता-विधाता की कृपा से प्रारब्ध का विच्छेद हो और आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित हो सके।
बृहत्वाद् बृंहणत्वाच्च सामऋग्यजुषां तथा ।
त्रयाणां धारणाच्चैव ब्रह्मा तेन निगद्यते ॥ ९.८३ ॥
बड़ा होनेसे, बढ़ानेसे, और साम, ऋक्, यजुः — इन तीनोंको धारण करनेसे (वह) ब्रह्मा कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.८२) में ऋषि याज्ञवल्क्य ने सूर्य-पुरुष के 'धाता' और 'विधाता' नामों का निर्वचन करते हुए बताया कि वह पूर्व-देह के शुभ-अशुभ विपाक को काटने वाला है। वर्तमान श्लोक में इसी क्रम में सूर्य के 'ब्रह्मा' नाम के तीन विशिष्ट हेतुओं का उद्घाटन किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) बृहत्वात्, बृंहणत्वाच्च, साम-ऋग्यजुषां तथा त्रयाणां धारणाच्चैव तेन ब्रह्मा निगद्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• बृहत्वात्: बृहत्त्व के कारण। यहाँ 'बृहत्' का अर्थ केवल आकार में बड़ा होना नहीं, अपितु व्यापकता और अनंतता है। जो सर्वव्यापी है, वह बृहत् है।
• बृंहणत्वाच्च: बढ़ाने के कारण। 'बृंहण' का अर्थ है पोषण करना, विकसित करना और चेतना का विस्तार करना।
• साम-ऋग्यजुषां: साम, ऋक् और यजुः—इन तीनों वेदों के संदर्भ में।
• त्रयाणां धारणाच्चैव: इन तीनों (त्रयी) को धारण करने के कारण। 'धारण' का अर्थ है केवल याद रखना नहीं, अपितु उन्हें अपने भीतर आत्मसात करना और उनके मूल स्रोत के रूप में स्थित होना।
• ब्रह्मा: वह जो व्यापक है, जो विस्तार का कारण है और जो ज्ञान का अक्षय भंडार है।
• निगद्यते: कहा जाता है या संज्ञा दी जाती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि सूर्य-पुरुष को 'ब्रह्मा' सिद्ध कर रहे हैं। यहाँ 'ब्रह्मा' शब्द किसी पौराणिक सृष्टिकर्ता की कथा का संकेत नहीं है, अपितु यह उस परम-चेतना का विशेषण है जो सूर्य के रूप में अभिव्यक्त है। ऋषि ने इस नाम के तीन आधार बताए हैं:
प्रथम हेतु है—'बृहत्वात्'। सूर्य वह प्रकाश-पुरुष है जिसकी व्यापकता की कोई सीमा नहीं। वह केवल आकाश के एक गोलक में सीमित नहीं है, अपितु उसकी किरणें और उसका प्रभाव चराचर जगत के कण-कण में व्याप्त है। जो सर्वत्र है, वही बृहत् है और वही ब्रह्मा है।
द्वितीय हेतु है—'बृंहणत्वात्'। यह सूर्य का पोषक स्वरूप है। जिस प्रकार भौतिक सूर्य वनस्पतियों और प्राणियों को जीवन देकर उन्हें बढ़ाता है, उसी प्रकार अंतः-हृदय का सूर्य-पुरुष साधक की बुद्धि और चेतना का वृद्वि करता है। वह अविद्या के संकुचित दायरे से निकालकर साधक को अनंतता की ओर बढ़ाता है। पोषण और विस्तार का यह गुण ही उसे 'ब्रह्मा' बनाता है।
तृतीय हेतु है—'त्रयाणां धारणाच्चैव'। यहाँ सूर्य को 'त्रयी' (ऋक्, यजुः और साम) का धारक कहा गया है। वेद केवल लिखित शब्द नहीं हैं, अपितु वे उस ईश्वरीय ध्वनि के अंश हैं जो इस सूर्य-पुरुष के भीतर बीज रूप में स्थित हैं। ऋक् (ज्ञान), यजुः (कर्म) और साम (उपासना)—इन तीनों का समन्वय उस एक पुरुष में है। जब तक साधक सूर्य-पुरुष से नहीं जुड़ता, तब तक वेदों का ज्ञान केवल शब्दों का संचय रहता है; परन्तु जब वह उस धारक (ब्रह्मा) को पहचान लेता है, तब वेद उसके भीतर जीवंत हो उठते हैं।
अतः, जो व्यापक है, जो चेतना का विस्तार करता है और जो समस्त वैदिक ज्ञान का मूल आधार है, वही सूर्य-पुरुष 'ब्रह्मा' कहलाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्वाध्याय' और 'चित्त-विस्तार' का एक गहन अभ्यास है। जब साधक वेदों का पाठ करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि वह केवल कागज़ या स्मृति के शब्दों को नहीं पढ़ रहा, अपितु उस 'ब्रह्मा' (सूर्य-पुरुष) की वाणी को सुन रहा है जिसने इन वेदों को धारण किया है।
अभ्यास यह है कि स्वाध्याय के समय वेद-वाणी को उसी सूर्य-पुरुष का रूप मानकर पढ़ा जाए। इससे वाणी केवल कंठ तक सीमित नहीं रहती, अपितु हृदय के सूर्य तक पहुँचती है। जब साधक 'बृहत्त्व' का ध्यान करता है, तो उसका संकुचित 'अहं' विलीन होने लगता है और वह स्वयं को उस अनंत व्यापकता में अनुभव करता है। 'बृंहण' का अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को संकुचित न रखे, बल्कि उसे सूर्य की किरणों की भाँति चारों दिशाओं में फैलाए।
इस प्रकार, ऋक्-यजुः-साम के धारक उस पुरुष का ध्यान करते हुए, साधक ज्ञान, कर्म और उपासना के द्वंद्व से ऊपर उठकर 'ब्रह्म-भूमि' की ओर अग्रसर होता है। यहाँ वेद-पाठ एक साधन बन जाता है और सूर्य-पुरुष का साक्षात् अनुभव उसका फल।
रोदनाद्द्रावणाद्रागाद्रंहणाद्रुद्र उच्यते ।
महानीशश्च भूतानां महेश्वर इति स्मृतः ॥ ९.८४ ॥
रुलानेसे, द्रवित करनेसे, रागसे (और) वेगसे रुद्र कहलाता है; भूतोंका महान् ईश होनेसे महेश्वर कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.८३) में सूर्य-पुरुष के 'ब्रह्मा' नाम का निर्वचन करते हुए ऋषि याज्ञवल्क्य ने उनकी व्यापकता और त्रयी-वेदों को धारण करने की शक्ति का वर्णन किया। इसी क्रम में वर्तमान श्लोक में सूर्य के 'रुद्र' और 'महेश्वर' नामों के पीछे छिपे गूढ़ अर्थों को स्पष्ट किया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) रोदनात्, द्रावणात्, रागात्, रंहणात् रुद्र उच्यते। (सः) भूतानां महानीशः (अस्मात् कारणात्) महेश्वर इति स्मृतः।
पदार्थ और निर्वचन:
• रोदनात्: रुलाने के कारण। यहाँ 'रोदन' केवल शोक का रुदन नहीं, अपितु प्राणों के विच्छेद और विरक्ति की तीव्रता है।
• द्रावणात्: द्रवित करने के कारण। जैसे सूर्य की प्रखरता से वस्तुएं पिघलती हैं, वैसे ही ज्ञान की अग्नि से अविद्या और अहंकार का पिघलना 'द्रवण' है।
• रागात्: राग के कारण। यहाँ राग का अर्थ 'रंजन' (रंगना) और 'आसक्ति' दोनों है। सूर्य जगत को रंगों से भरता है और चेतना को परमात्मा के प्रति आकर्षित करता है।
• रंहणात्: वेग के कारण। 'रंहण' का अर्थ है तीव्रता, गति और प्रहार। सूर्य की किरणों का वेग और प्राणों का तीव्र प्रवाह इसी श्रेणी में आता है।
• रुद्र: वह जो रुलाता है, द्रवित करता है और वेगपूर्वक संचालित करता है।
• महानीशः: महान् ईश (स्वामी)। 'नीश' का अर्थ है अधिपति या स्वामी।
• महेश्वर: भूतों (समस्त चराचर प्राणियों) का महान् ईश्वर।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि सूर्य-पुरुष के उस स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं जिसे सामान्यतः 'रुद्र' कहा जाता है। यहाँ रुद्र को केवल एक संहारक देवता के रूप में नहीं, अपितु चेतना के उस प्रखर रूप में देखा गया है जो साधक के भीतर के जड़त्व को तोड़ता है।
ऋषि ने 'रुद्र' नाम के चार कारण बताए हैं। प्रथम है—'रोदनात्'। जब प्राण देह का त्याग करते हैं, तो वह विछोह रुलाता है, किन्तु योगिक दृष्टि से जब साधक अपनी सीमित पहचान (अहंकार) को छोड़ता है, तब वह विरक्ति का रुदन होता है जो उसे शुद्ध करता है। द्वितीय है—'द्रावणात्'। जिस प्रकार सूर्य की तपिश सब कुछ पिघला देती है, उसी प्रकार यह सूर्य-पुरुष ज्ञान के रूप में साधक के कठोर हृदय और संचित संस्कारों को द्रवित कर देता है। तृतीय है—'रागात्'। सूर्य ही जगत का रंग है; वह चेतना को जाग्रत कर उसे सत्य के प्रति रागयुक्त (आसक्त) करता है। चतुर्थ है—'रंहणात्'। सूर्य की किरणों का वेग और प्राणों की तीव्र गति ही 'रंहण' है, जो अज्ञान के अंधकार को वेगपूर्वक छिन्न-भिन्न कर देती है।
इसके पश्चात ऋषि कहते हैं कि वह 'महेश्वर' है। 'महेश्वर' वह है जो समस्त भूतों (प्राणियों) का महान् स्वामी है। यहाँ 'भूत' का अर्थ केवल जीव नहीं, अपितु पंचमहाभूत भी हैं। जो इन पाँचों तत्वों का अधिपति है और जिनके भीतर वह साक्षी रूप में स्थित है, वही सूर्य-पुरुष महेश्वर है। इस प्रकार, रुद्र और महेश्वर अलग देवता नहीं, अपितु सूर्य-पुरुष के ही वे गुण हैं जो पहले अविद्या का नाश करते हैं (रुद्र) और फिर समस्त सृष्टि का पोषण व शासन करते हैं (महेश्वर)।
श्रुति-संगति —
कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्मान्मर्त्याच्छरीरादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति ॥ १४.६.९.५ ॥
"रुद्र कौन हैं?" — "पुरुषमें ये दस प्राण, और ग्यारहवाँ आत्मा (मन)। जब ये इस मरणशील शरीरसे निकलते हैं, तब (सम्बन्धियोंको) रुलाते हैं; क्योंकि रुलाते (रोदयन्ति) हैं, इसलिए रुद्र हैं।"
श्रुति स्पष्ट करती है कि पुरुष के भीतर दस प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा (मन) जब मरणशील शरीर से निकलते हैं, तब वे रुलाते हैं, इसलिए उन्हें 'रुद्र' कहा गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-तत्व का विस्तार करती है। जहाँ श्रुति देह-त्याग के समय के रोदन की बात करती है, वहीं यह स्मृति उस 'रोदन' को योगिक प्रक्रिया से जोड़ती है—अर्थात् जब प्राणों का लय होता है और वे अपने मूल स्रोत (सूर्य-पुरुष) में विलीन होते हैं, तब वह तीव्रता ही रुद्र का स्वरूप है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक प्राण-संयम का मार्ग प्रशस्त करता है। योग में 'रुद्र' वह शक्ति है जो साधक के भीतर के अवरोधों को वेग (रंहण) से तोड़ती है और उसके हृदय को करुणा से द्रवित (द्रवण) करती है।
साधक जब प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से प्राणों को नियंत्रित करता है, तब वह अनुभव करता है कि प्राणों का अधिपति वही महेश्वर है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के 'रुद्र' रूपी प्रखर ज्ञान को जागृत करे, ताकि वह राग-द्वेष और अविद्या को पिघला सके। जब साधक प्राणों के वेग को समझकर उन्हें स्थिर करता है, तब वह 'रुद्र' से 'महेश्वर' की भूमि पर पहुँचता है—अर्थात् वह केवल प्राणों का अनुभव नहीं करता, बल्कि स्वयं को उन प्राणों का स्वामी (ईश) अनुभव करने लगता है। इस प्रकार, प्राण-संयम ही वास्तव में महेश्वर की उपासना है।
सहस्रकरपन्मूर्तिर्दृश्यते सर्वतो यतः ।
सर्वस्यैवोपरिष्टस्य पूरणात् पुरुषः स्मृतः ॥ ९.८५ ॥
क्योंकि (उसकी) हजारों हाथ-पैरवाली मूर्ति सब ओर दिखायी देती है; सबके ऊपर स्थित (वह) सबको भरनेसे पुरुष कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.८४) में सूर्य-पुरुष के 'रुद्र' और 'महेश्वर' नामों का निर्वचन करते हुए यह स्पष्ट किया गया कि वह चेतना का प्रखर और अधिपति रूप है। इसी क्रम में वर्तमान श्लोक में सूर्य के 'पुरुष' नाम की निरुक्ति की गई है, जो उसकी सर्वव्यापकता और पूर्णता को उद्घाटित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यस्य) सहस्र-कर-पन्-मूर्तिः सर्वतः दृश्यते यतः, (तथा) सर्वस्य एव उपरिष्ठस्य, पूरणात् पुरुषः स्मृतः।
पदार्थ और निर्वचन:
• सहस्र-कर-पन्-मूर्तिः: सहस्र (हजारों), कर (हाथ), पन् (पैर) वाली मूर्ति। यहाँ 'सहस्र' संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु अनन्तता का प्रतीक है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सर्वत्र पहुँचकर कार्य करती हैं, वह उसकी 'कर-पन्' (क्रियाशीलता) है।
• सर्वतः दृश्यते: सब ओर से दिखाई देता है। यह केवल भौतिक दृष्टि नहीं, अपितु ज्ञान-चक्षु से होने वाला साक्षात्कार है।
• उपरिष्ठस्य: सबके ऊपर स्थित। इसका अर्थ केवल स्थान से ऊपर होना नहीं, अपितु श्रेष्ठता और अधिष्ठान होना है।
• पूरणात्: भरने से। जो रिक्तता को समाप्त कर सबको पूर्ण कर दे।
• पुरुषः: वह जो सबको भरता है। यहाँ 'पुरुष' शब्द का व्युत्पत्ति-मूल 'पूरण' को माना गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्य-पुरुष के उस विराट स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं, जो समस्त सृष्टि का आधार है। वे कहते हैं कि उस सूर्य-पुरुष की मूर्ति 'सहस्रकर-पन्' है, अर्थात् उसके अनन्त हाथ और पैर हैं। बाहरी दृष्टि से देखें तो सूर्य की करोड़ों किरणें ही उसके हाथ-पैर हैं, जो पृथ्वी के कण-कण को स्पर्श करती हैं, पोषण करती हैं और संचालित करती हैं। लेकिन आन्तरिक दृष्टि से, यह उस चेतना का विस्तार है जो एक साथ करोड़ों कार्यों को सिद्ध कर रही है।
ऋषि कहते हैं कि यह मूर्ति 'सर्वतः दृश्यते'—सब ओर दिखाई देती है। जब साधक अपनी दृष्टि को बाहरी जगत से हटाकर उस प्रकाश में स्थिर करता है, तो उसे अनुभव होता है कि जिस प्रकाश में वह संसार को देख रहा है, वह प्रकाश स्वयं उस पुरुष की उपस्थिति है। वह केवल एक पिंड नहीं, अपितु एक व्याप्त प्रकाश-पुंज है।
इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष 'पुरुष' शब्द की निरुक्ति है। सामान्यतः पुरुष का अर्थ मनुष्य से लिया जाता है, किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य उसे 'पूरणात्' (भरने से) जोड़ते हैं। वह 'उपरिष्ठ' है, अर्थात् वह समस्त जगत के ऊपर स्थित अधिष्ठाता है, और साथ ही वह सबको 'भरने' वाला है। जिस प्रकार घटाकाश (घड़े के भीतर का आकाश) और महाकाश एक ही हैं, उसी प्रकार यह सूर्य-पुरुष प्रत्येक जीव के हृदय-आकाश को अपनी चेतना से भर देता है। जब वह पूर्णता का अनुभव होता है, तब साधक जान जाता है कि वह 'पुरुष' ही वास्तव में वह पूर्ण तत्व है, जिसने इस चराचर जगत को व्याप्त कर रखा है।
शास्त्र-साक्ष्य —
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३.१३ ॥
उसके हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं; वह लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है।
यह विचार श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय में भी मिलता है, जहाँ कहा गया है कि उस परमात्मा के हाथ-पैर, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं और वह संपूर्ण लोक को व्याप्त करके स्थित है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का मत एक ही है—परमात्मा कोई सीमित शरीर नहीं, अपितु एक सर्वव्यापक शक्ति है। जहाँ भी क्रिया (हाथ-पैर) और दर्शन (आँखें) हो रहा है, वह वास्तव में उसी एक विराट पुरुष की अभिव्यक्ति है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक महान अभ्यास का सूत्र है। योग की दृष्टि से यहाँ 'सर्वत्र एक पुरुष को देखने' का अभ्यास बताया गया है। साधक जब बाहरी जगत में किसी भी व्यक्ति या वस्तु को देखता है, तो वह केवल उसके स्थूल शरीर को न देखकर, उसमें कार्य कर रही उस 'सहस्रकर' शक्ति को अनुभव करे।
अभ्यास यह है कि जहाँ भी हाथ-पैर चलते दिखें, जहाँ भी कोई चेतना सक्रिय दिखे, वहाँ यह भाव लाया जाए कि "यह वही एक पुरुष है जो यहाँ कार्य कर रहा है।" जब साधक इस भाव को दृढ़ कर लेता है, तब उसकी दृष्टि 'भेद' से 'अभेद' की ओर बढ़ती है। वह इस भूमि पर पहुँच जाता है जहाँ उसे संसार की विविधता में भी एक ही पूर्णता (पूरण) दिखाई देती है। यह अभ्यास साधक को 'अहं' के सीमित दायरे से निकालकर 'विराट' के विस्तार में ले जाता है, जिससे हृदय में पूर्णता का अनुभव होता है और वह स्वयं को उस विराट पुरुष का ही एक अंश अनुभव करने लगता है।
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ ९.८६ ॥
अग्निमें भली-भाँति डाली गयी आहुति सूर्यको पहुँचती है; सूर्यसे वर्षा होती है, वर्षासे अन्न, और उससे प्रजा।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में सूर्य-पुरुष के विभिन्न नामों—विष्णु, धाता, ब्रह्मा, रुद्र और पुरुष—का निर्वचन करते हुए उनकी सर्वव्यापकता और पूर्णता को समझाया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस सूर्य-पुरुष की क्रियात्मक शक्ति और सृष्टि के पोषण-चक्र का वर्णन कर रहे हैं, जिसमें यज्ञ की आहुति और भौतिक जगत का अस्तित्व परस्पर गुंथा हुआ है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यक् (गता), आदित्यम् उपतिष्ठते; आदित्यात् वृष्टिः जायते, वृष्टेः अन्नं (जायते), ततः प्रजाः (जायते)।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्रास्ताहुतिः: 'प्र' (प्रकृष्ट/पूर्ण) + 'आ' (समर्पित) + 'हुतिः'। वह आहुति जो पूर्ण श्रद्धा और विधि से समर्पित की गई हो।
• सम्यक्: भली-भाँति, शास्त्रसम्मत रीति से।
• उपतिष्ठते: पहुँचता है या प्रतिष्ठित होता है। यहाँ इसका अर्थ है कि अग्नि में समर्पित द्रव्य अपनी सूक्ष्म ऊर्जा के रूप में सूर्य तक पहुँचता है।
• वृष्टिः: वर्षा। यहाँ वृष्टि केवल जल की वर्षा नहीं, अपितु सूर्य की ताप-शक्ति द्वारा जल-चक्र का संचालित होना है।
• प्रजाः: समस्त जीव-जगत।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सृष्टि के उस महान् 'यज्ञ-चक्र' को उद्घाटित कर रहे हैं, जो स्थूल जगत को जीवित रखता है। वे कहते हैं कि जब अग्नि में विधिपूर्वक आहुति दी जाती है, तो वह आहुति केवल भौतिक अग्नि में नष्ट नहीं होती, अपितु वह सूक्ष्म रूप में आदित्य (सूर्य) तक पहुँचती है। सूर्य उस ऊर्जा को ग्रहण कर उसे ताप और प्रकाश के रूप में वितरित करता है, जिससे जल-चक्र संचालित होता है और वृष्टि (वर्षा) होती है। उस वर्षा से पृथ्वी पर अन्न उत्पन्न होता है और उस अन्न के आश्रय से समस्त प्रजा (जीव-जगत) का पोषण और जन्म होता है।
यहाँ महर्षि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यज्ञ कोई यांत्रिक क्रिया नहीं, अपितु ब्रह्माण्ड की एक जीवन-धारा है। अग्नि पृथ्वी का मुख है और सूर्य आकाश का हृदय; अतः अग्नि में दी गई आहुति वास्तव में सूर्य-पुरुष को दिया गया पोषण है। यह श्लोक दर्शाता है कि मनुष्य का कर्म (यज्ञ) और प्रकृति का पोषण (अन्न-वृष्टि) एक-दूसरे के पूरक हैं। जो व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है, उसके लिए यज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु संपूर्ण सृष्टि के प्रति कृतज्ञता और सेवा का माध्यम बन जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
यह श्लोक शब्दशः मनुस्मृति में भी मिलता है:
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ ३.७६ ॥
अग्निमें विधिपूर्वक डाली गयी आहुति आदित्यको पहुँचती है; आदित्यसे वृष्टि होती है, वृष्टिसे अन्न, और उससे प्रजाएँ।
यहाँ मनुस्मृति और बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति दोनों एक ही सत्य का उद्घोष कर रहे हैं कि आदित्य ही समस्त पोषण का मूल स्रोत है और अग्नि वह सेतु है जो मनुष्य को आदित्य से जोड़ता है।
इसी भाव की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलती है:
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ ३.१४ ॥
प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षासे होता है, वर्षा यज्ञसे होती है, और यज्ञ कर्मसे उत्पन्न होता है।
गीता में इस चक्र को 'कर्म' से जोड़ा गया है। जहाँ स्मृति में 'आहुति' (यज्ञीय द्रव्य) पर बल है, वहीं गीता में 'यज्ञ' को कर्मसमुद्भव बताया गया है। दोनों ग्रंथों का मेल यह है कि बिना यज्ञ-भाव (निःस्वार्थ कर्म और समर्पण) के प्रकृति का संतुलन और प्रजा का पोषण संभव नहीं है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का एक अत्यंत गूढ़ आन्तर अर्थ है। बाहरी यज्ञ में अग्नि, आहुति और सूर्य हैं, किन्तु योगी के भीतर भी यही प्रक्रिया घटित होती है।
साधक के भीतर स्थित 'प्राणाग्नि' (जठराग्नि और प्राण-शक्ति) वह अग्नि है, जिसमें वह अपने अहंकार, वासनाओं और मानसिक विकारों की 'आहुति' देता है। जब यह आन्तरिक आहुति 'सम्यक्' (पूर्ण सजगता और समर्पण से) दी जाती है, तब साधक की चेतना ऊपर उठकर हृदय-आकाश में स्थित 'आदित्य' (सूर्य-पुरुष/आत्म-ज्योति) में प्रतिष्ठित होती है।
जब साधक की चेतना उस आन्तरिक सूर्य में स्थित होती है, तब वहाँ से 'वृष्टि' होती है—अर्थात् ज्ञान और आनंद की वृष्टि। इस ज्ञान-वृष्टि से साधक के भीतर 'अन्न' (अध्यात्मिक पोषण/संतोष) उत्पन्न होता है, जिससे उसके भीतर के सुप्त दैवीय गुणों की 'प्रजा' (विकास) होती है।
अतः योगी इस श्लोक का अभ्यास करते समय यह अनुभव करता है कि उसकी प्रत्येक श्वास और प्रत्येक विचार एक आहुति है। वह स्वयं को एक 'अग्निहोत्री' के रूप में देखता है, जिसका लक्ष्य अपनी क्षुद्र वृत्तियों को जलाकर उस परम सूर्य-पुरुष में विलीन होना है, ताकि वह स्वयं ज्ञान-वृष्टि का माध्यम बन सके और संपूर्ण जगत के कल्याण में सहभागी हो।
सविता श्रियः प्रसविता धनदस्तेन चोच्यते ।
वायुः कर्म च कालो च शुद्धेः कर्तॄणि देहिनाम् ॥ ९.८७ ॥
सविता श्री (सम्पत्ति) का उत्पन्न करनेवाला है, इसलिए धनद कहलाता है। वायु, कर्म और काल — (ये) देहधारियोंकी शुद्धिके कर्ता हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यज्ञ-चक्र के माध्यम से यह दिखाया कि कैसे अग्नि में दी गई आहुति सूर्य तक पहुँचकर वृष्टि, अन्न और प्रजा के रूप में पुनः पृथ्वी पर लौटती है। अब इस श्लोक में वे सूर्य के 'सविता' और 'धनद' रूप का निर्वचन करते हुए, साधक की शुद्धि के उन तीन अनिवार्य कारकों—वायु, कर्म और काल—का संकेत दे रहे हैं, जो आगामी श्लोकों में वर्णित 'पावक' (पवित्र करने वाले) स्वरूप की आधारभूमि तैयार करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सविता श्रियः प्रसविता (अस्ति), (तस्मात्) धनदः तेन च उच्यते। वायुः, कर्म च, कालो च (च), देहिनाम् शुद्धेः कर्तॄणि (सन्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सविता: सूर्य का वह स्वरूप जो जगत को प्रेरित करता है और उत्पन्न करता है। 'सृज्' धातु से निर्मित, जो सृजन का अधिष्ठाता है।
• श्रियः: श्री का। यहाँ 'श्री' का अर्थ केवल भौतिक धन नहीं, अपितु ऐश्वर्य, लक्ष्मी, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक तेज (तेजस) है।
• प्रसविता: प्रसव करने वाला, उत्पन्न करने वाला या प्रफुल्लित करने वाला।
• धनदः: 'धन' (संपत्ति/ऐश्वर्य) + 'द' (देने वाला)।
• शुद्धेः कर्तॄणि: शुद्धि करने वाले या शुद्ध करने के कारक।
• देहिनाम्: देहधारियों का, अर्थात् जो शरीर और प्राण के बंधन में हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्य के पोषणकारी और शोधक स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। प्रथम चरण में वे कहते हैं कि सूर्य 'सविता' है। सविता वह शक्ति है जो बीज को अंकुरित करती है और समस्त चराचर जगत में जीवन का संचार करती है। चूँकि वह समस्त 'श्री' (समृद्धि, स्वास्थ्य और ऐश्वर्य) का प्रसव करता है, इसलिए उसे 'धनद' कहा जाता है। यहाँ 'धन' का अर्थ संकुचित रूप से मुद्रा या स्वर्ण नहीं है, अपितु वह प्राण-शक्ति और ओज है जिसके बिना जीवन संभव नहीं। जिस प्रकार सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अन्न और औषधि का प्रसव करती हैं, उसी प्रकार वह साधक के भीतर ज्ञान और तेज का प्रसव करता है।
श्लोक के द्वितीय चरण में ऋषि एक अत्यंत गंभीर सूत्र देते हैं कि देहधारियों की शुद्धि के तीन मुख्य कर्ता हैं—वायु, कर्म और काल।
प्रथम है 'वायु' (प्राण), जो शरीर के भीतर मल का निष्कासन करती है और प्राणिक ऊर्जा के प्रवाह से नाड़ियों को शुद्ध करती है। द्वितीय है 'कर्म', अर्थात् शास्त्रसम्मत आचरण और सेवा, जो चित्त के संस्कारों और मानसिक मल को धोती है। तृतीय है 'काल' (समय), जो धैर्य और परिपक्वता प्रदान करता है। काल वह महाशोधक है जो समय के साथ पुराने संस्कारों को क्षीण करता है और साधक को पात्रता प्रदान करता है।
यह वर्णन केवल बाहरी शुद्धि का नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि जब वायु (प्राण), कर्म (क्रिया) और काल (समय) का समन्वय होता है, तब देहधारी जीव उस 'पावक' स्वरूप सूर्य के साक्षात्कार के योग्य होता है, जिसका वर्णन अगले श्लोक में आएगा।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' की त्रिआयामी प्रक्रिया का उद्घाटन करता है। योग मार्ग में केवल आसन या प्राणायाम पर्याप्त नहीं है, अपितु शुद्धि तीन स्तरों पर घटित होती है:
१. वायु (प्राणिक शुद्धि): साधक प्राणायाम के माध्यम से अपने भीतर की वायु को नियंत्रित करता है। जब प्राण शुद्ध होता है, तब शरीर के भौतिक और सूक्ष्म अवरोध हटते हैं। यह 'वायु' ही साधक को स्थूल देह से ऊपर उठाकर सूक्ष्म शरीर की ओर ले जाती है।
२. कर्म (संस्कार शुद्धि): केवल प्राणिक अभ्यास से शुद्धि नहीं होती; उसके साथ 'कर्म' का होना अनिवार्य है। यहाँ कर्म का अर्थ है—निष्काम कर्म और धर्मानुसार आचरण। जब साधक अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करता है, तब उसके चित्त की शुद्धि होती है और वह मानसिक विक्षेपों से मुक्त होता है।
३. काल (धैर्य और समय): योग में 'काल' का अर्थ है—अभ्यास की निरंतरता और प्रतीक्षा। कोई भी सिद्धि या शुद्धि क्षणिक नहीं होती; वह काल के प्रवाह में धीरे-धीरे परिपक्व होती है। साधक जब समय के साथ स्वयं को ढालता है, तब वह 'काल-शुद्धि' को प्राप्त करता है।
जब ये तीनों—प्राण, आचरण और समय—एक बिंदु पर मिलते हैं, तब साधक की वह भूमि तैयार होती है जहाँ वह हृदय में स्थित 'सूर्य-पुरुष' के प्रकाश का अनुभव कर सके। यह श्लोक साधक को सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए शारीरिक शुद्धि (वायु), मानसिक शुद्धि (कर्म) और धैर्य (काल) का समुच्चय अनिवार्य है।
पावयेद्रश्मिभिः सर्वं पावकस्तेन चोच्यते ।
सूर्य आत्मा तु जगतः प्राणाख्यो हृदि संस्थितः ॥ ९.८८ ॥
किरणोंसे सबको पवित्र करता है, इसलिए पावक कहलाता है। सूर्य जगत्का आत्मा है, जो प्राण नामसे हृदयमें स्थित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वायु, कर्म और काल को देहधारियों की शुद्धि का कारक बताया। अब इस श्लोक में वे उस परम शुद्धिकर्ता 'पावक' के स्वरूप को प्रकट कर रहे हैं और स्थूल सूर्य का सम्बन्ध साधक के सूक्ष्म हृदय और प्राण से जोड़ रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) रश्मिभिः सर्वं पावयेत्, तस्मात् पावकः तेन च उच्यते। सूर्यः तु जगतः आत्मा (अस्ति), (यः) प्राणाख्यः हृदि संस्थितः (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• पावयेत्: पवित्र करना, शुद्ध करना या शोधित करना। 'पू' धातु से, जिसका अर्थ है शुद्ध करना।
• रश्मिभिः: किरणों के द्वारा। यहाँ रश्मि का अर्थ भौतिक प्रकाश और आध्यात्मिक ज्ञान-किरणें दोनों हैं।
• पावकः: पवित्र करने वाला। सामान्यतः यह अग्नि का नाम है, किन्तु यहाँ सूर्य के लिए प्रयुक्त हुआ है क्योंकि अग्नि का मूल सूर्य ही है।
• जगतः आत्मा: सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आधार, सार या प्रेरक तत्त्व।
• प्राणाख्यः: प्राण नाम से पुकारा जाने वाला।
• हृदि संस्थितः: हृदय में स्थित। यहाँ 'हृदय' केवल मांसपिण्ड नहीं, अपुतु वह आकाश (हृदयाकाश) है जहाँ चेतना का वास है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्य के शोधक और प्राणमय स्वरूप का रहस्य खोल रहे हैं। प्रथम चरण में वे कहते हैं कि सूर्य अपनी किरणों से समस्त जगत को पवित्र करता है, इसलिए वह 'पावक' कहलाता है। सामान्यतः पावक अग्नि को कहा जाता है, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ संकेत कर रहे हैं कि बाह्य अग्नि और आंतरिक सूर्य एक ही तेज के दो रूप हैं। जिस प्रकार अग्नि अशुद्धियों को जलाकर स्वर्ण को शुद्ध करती है, उसी प्रकार सूर्य की रश्मियाँ न केवल भौतिक जगत के कीटाणुओं और अंधकार का नाश करती हैं, अपितु साधक के भीतर के अज्ञान और तामसिक संस्कारों को भी भस्म करती हैं।
द्वितीय चरण में ऋषि एक महान सत्य का उद्घाटन करते हैं— "सूर्य आत्मा तु जगतः"। सूर्य केवल आकाश में स्थित एक खगोलीय पिंड नहीं है, अपितु वह इस संपूर्ण जगत की आत्मा है। आत्मा वह है जिसके बिना शरीर या जगत का अस्तित्व संभव नहीं। जिस प्रकार सूर्य के बिना जगत में जीवन और प्रकाश संभव नहीं, उसी प्रकार इस 'परम सूर्य' के बिना चेतना का अस्तित्व नहीं है।
इस सत्य को साधक के अनुभव तक लाने के लिए ऋषि कहते हैं कि यही जगत-आत्मा हमारे हृदय में 'प्राण' के रूप में स्थित है। यहाँ 'प्राण' का अर्थ केवल श्वसन-प्रक्रिया नहीं, अपितु वह 'प्राण-शक्ति' है जो देह को जीवित रखती है और चेतना को धारण करती है। बाहरी सूर्य जो सबको प्रकाश देता है, वही आंतरिक सूर्य (प्राण) हृदय में स्थित होकर साधक को आत्म-प्रकाश की ओर ले जाता है। इस प्रकार, बाह्य सूर्य और आंतरिक प्राण एक ही तत्त्व के दो छोर हैं—एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म।
शास्त्र-साक्ष्य —
विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ १.८ ॥
(ज्ञानी उसे जानते हैं —) विश्वरूप, किरणोंवाला, सर्वज्ञ, सबका आश्रय, एकमात्र ज्योति, तपनेवाला। हज़ार किरणोंवाला, सैकड़ों रूपोंमें वर्तमान, प्रजाओंका प्राण — यह सूर्य उदित होता है।
इस अंश में सूर्य को 'प्रजानाम् प्राणः' (प्रजाओं का प्राण) कहा गया है। प्रश्न उपनिषद् स्पष्ट करता है कि वह एकमात्र ज्योति, जो सहस्र किरणों वाली है, वास्तव में प्रजाओं का प्राण बनकर उदित होती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी सत्य को और अधिक सूक्ष्म कर उसे 'हृदि संस्थित' (हृदय में स्थित) बताती है। जहाँ उपनिषद् सूर्य को प्रजाओं का प्राण कहता है, वहीं यह स्मृति साधक को उस प्राण को अपने हृदय में अनुभव करने की विधि की ओर प्रेरित करती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'बाह्य' से 'आन्तर' की यात्रा का सूत्र है। योगिक अभ्यास में साधक पहले बाह्य सूर्य की किरणों का अनुभव करता है, फिर उस प्रकाश को अपने भीतर उतारता है।
अभ्यास यह है कि जब साधक हृदय में स्थित 'प्राण' का स्मरण करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के सूर्य का ध्यान कर रहा होता है। यहाँ 'प्राण' का स्मरण करने का अर्थ है—अपनी चेतना को श्वास के माध्यम से हृदय के उस केंद्र पर लाना जहाँ जीवन-शक्ति स्पंदित होती है। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मेरा प्राण ही वह सूर्य है जो संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है", तब वह व्यक्तिगत अहंकार (अहम्) से ऊपर उठकर 'सर्वात्मा' के भाव में स्थित होने लगता है।
यह अभ्यास साधक को 'प्राण-भूमि' से 'आत्मा-भूमि' की ओर ले जाता है। हृदय में स्थित इस प्राण-सूर्य का ध्यान करने से साधक के भीतर का अंधकार (तमस) मिटता है और वह उस 'पावक' स्वरूप की अनुभूति करता है, जो उसे मानसिक और आध्यात्मिक रूप से शुद्ध कर देता है। इस प्रकार, हृदय में प्राण का ध्यान ही वास्तव में सूर्य-साधना है।
सर्वात्मा कथ्यते तज्ज्ञैर्जीवभूतः सनातनः ।
द्वितीयेन तु रूपेण साक्षिवत्तिष्ठते तु सः ॥ ९.८९ ॥
जानकार (उसे) सर्वात्मा, सनातन जीवरूप कहते हैं; और दूसरे रूपसे वह साक्षीकी भाँति स्थित रहता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य को जगत् की आत्मा और हृदय में स्थित 'प्राण' के रूप में प्रतिष्ठित किया। अब इस श्लोक में वे उस प्राण-स्वरूप चेतना के दो आयामों—भोक्ता और दृष्टा—के रहस्य को उद्घाटित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तज्ज्ञैः (सूर्यः/आत्मा) सनातनः जीवभूतः सर्वात्मा कथ्यते। सः तु द्वितीयेन रूपेण साक्षिवत् तिष्ठते।
पदार्थ और निर्वचन:
• तज्ज्ञैः: उन लोगों द्वारा जो इस रहस्य को जानते हैं (तत्वज्ञानी या योगियों द्वारा)।
• सर्वात्मा: समस्त प्राणियों और वस्तुओं में व्याप्त आत्मा; जो सबके भीतर एक ही रूप में विद्यमान है।
• जीवभूतः: जीव के रूप में अभिव्यक्त। यहाँ 'जीव' का अर्थ केवल देहधारी प्राणी नहीं, बल्कि वह चेतना है जो प्राणों के माध्यम से सक्रिय है।
• सनातनः: जो काल की सीमाओं से परे है, जिसका न आदि है न अंत।
• द्वितीयेन रूपेण: दूसरे स्वरूप में। यह द्वैत नहीं, अपितु एक ही तत्त्व की दो कार्य-विधियाँ हैं।
• साक्षिवत्: साक्षी की भाँति। जो केवल देखता है, जिसमें कोई विकार नहीं आता और जो कर्मों से अलिप्त रहता है।
• तिष्ठते: स्थित रहता है या विराजमान रहता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम पुरुष के दो रूपों का वर्णन कर रहे हैं, जिसे उन्होंने पूर्व श्लोकों में सूर्य, पावक और प्राण कहा था। वे कहते हैं कि जो वास्तव में इस विद्या के ज्ञाता (तज्ज्ञ) हैं, वे इस सनातन तत्त्व को 'सर्वात्मा' और 'जीवभूत' कहते हैं।
यहाँ 'जीवभूत' और 'सर्वात्मा' शब्दों का साथ आना अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाव यह है कि वह एक ही सनातन चेतना जब शरीर के भीतर प्राणों के साथ जुड़कर अनुभव करती है, तो वह 'जीव' कहलाती है। वह सर्वात्मा इसलिए है क्योंकि वह किसी एक देह तक सीमित नहीं, अपितु समस्त चराचर जगत में एक ही प्राण-शक्ति के रूप में व्याप्त है। यह वह अवस्था है जहाँ चेतना सक्रिय है, वह अनुभव कर रही है, वह कर्मों के माध्यम से संसार के साथ अंतःक्रिया कर रही है।
किन्तु, महर्षि यहीं नहीं रुकते। वे कहते हैं कि यही तत्त्व 'द्वितीयेन रूपेण' अर्थात् दूसरे रूप में 'साक्षी' बनकर स्थित रहता है। इसका रहस्य यह है कि जब जीव कर्म करता है, सुख-दुःख भोगता है और संसार में लिप्त होता है, तब भी उसके भीतर एक ऐसा केंद्र होता है जो इन सब घटनाओं को केवल देख रहा होता है। वह केंद्र अलिप्त है, निर्विकार है और स्थिर है। वह 'साक्षी' रूप ही वास्तव में वह सूर्य-पुरुष है जो हृदय-आकाश में स्थित होकर संपूर्ण जीवन-लीला का अवलोकन कर रहा है।
अतः, यह स्मृति हमें बताती है कि हम केवल वह 'जीव' नहीं हैं जो दुःखी या सुखी हो रहा है, बल्कि हम वह 'साक्षी' भी हैं जो इस पूरे खेल को देख रहा है। एक ही सत्ता का एक रूप 'भोक्ता' (जीव) है और दूसरा रूप 'द्रष्टा' (साक्षी)।
शास्त्र-साक्ष्य —
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ३.१.१ ॥
साथ रहनेवाले, परस्पर सखा दो पक्षी एक ही वृक्ष (शरीर) पर बैठे हैं; उनमेंसे एक (जीव) स्वादिष्ट फल (कर्मफल) खाता है, दूसरा (ईश्वर) न खाता हुआ केवल देखता (साक्षी रहता) है।
मुण्डक उपनिषद् में इसी रहस्य को दो पक्षियों के रूपक से समझाया गया है: "एक ही वृक्ष पर दो सखा पक्षी बैठे हैं; एक स्वादिष्ट फल खाता है, जबकि दूसरा बिना खाए केवल देखता रहता है।"
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक मुण्डक उपनिषद् के इसी सत्य का विस्तार है। उपनिषद् का 'फल खाने वाला पक्षी' यहाँ का 'जीवभूत' स्वरूप है, जो कर्मफल का भोक्ता है। वहीं 'देखने वाला पक्षी' यहाँ का 'साक्षी' रूप है। स्मृति यह स्पष्ट करती है कि ये दो अलग-अलग सत्ताएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही सनातन आत्मा के दो रूप (द्वितीयेन रूपेण) हैं। जहाँ उपनिषद् इसे रूपक से समझाता है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे योगिक अनुभव और नाम-निरुक्ति के माध्यम से स्थापित कर रहे हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अभ्यास' का मूल मंत्र है। सामान्यतः मनुष्य स्वयं को केवल 'जीव' मानता है—वह सोचता है कि "मैं दुःखी हूँ", "मैं क्रोधित हूँ" या "मैं कर्म कर रहा हूँ"। यह जीव-रूप में स्थित होना है। योग का अभ्यास इस जीव-रूप से ऊपर उठकर अपने 'साक्षी-रूप' को पहचानना है।
साधक जब इस श्लोक का मनन करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके भीतर एक ऐसा 'द्रष्टा' है जो कभी विचलित नहीं होता। अभ्यास यह है कि कर्म करते हुए भी स्वयं को उस 'साक्षी' में स्थित करना। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मैं यह शरीर या मन नहीं, बल्कि वह सनातन साक्षी हूँ जो इन सबको देख रहा है", तब वह भोक्ता से द्रष्टा की भूमि में प्रवेश करता है।
यह अभ्यास साधक को कर्मों के बंधन से मुक्त करता है। वह संसार में रहते हुए भी अलिप्त रहता है, क्योंकि वह जान लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप वह 'साक्षी' है, जो सूर्य के समान प्रकाशमान और सनातन है। इस प्रकार, जीव-रूप से साक्षी-रूप की ओर जाना ही इस श्लोक का योगिक लक्ष्य है।
आदानात् सर्वभूतानामादित्य इति कीर्तितः ।
आर्यः स्वाम्यस्य जगतो ह्यर्यमा तेन चोच्यते ॥ ९.९० ॥
सब भूतोंका (रस) ग्रहण करनेसे आदित्य कहा गया है; जगत्का स्वामी (आर्य) होनेसे अर्यमा कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य को जगत् की आत्मा और हृदय में स्थित 'प्राण' के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए उसके 'साक्षी' स्वरूप का वर्णन किया। अब वे सूर्य के उन विशिष्ट नामों की निरुक्ति कर रहे हैं, जो उसकी कार्य-शक्ति और स्वामित्व को दर्शाते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) सर्वभूतानाम् (रसम्/आयुम्) आदानात् आदित्य इति कीर्तितः। सः ह्यर्यमा (इति) उच्यते, (यतः सः) अस्य जगतः आर्यः (स्वामी) (अस्ति)। तेन (अर्यमया) च उच्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• आदानात्: ग्रहण करने से। 'आदान' का अर्थ है खींचना, लेना या वापस समेटना। यहाँ यह केवल भौतिक ग्रहण नहीं, अपितु प्राणों और आयु के वापस लौटने की प्रक्रिया है।
• सर्वभूतानाम्: समस्त चराचर प्राणियों का।
• आदित्य: वह जो सबको ग्रहण करता है। यहाँ आदित्य शब्द का अर्थ 'अदिति का पुत्र' होने के बजाय 'आदान' क्रिया से सिद्ध किया गया है।
• आर्यः: श्रेष्ठ, कुलीन या स्वामी। जो अपनी श्रेष्ठता और अधिकार के कारण सबका पालन और नियंत्रण करता है।
• स्वाम्यस्य जगतो: इस सम्पूर्ण जगत् का स्वामी होने के कारण।
• अर्यमा: वह जो व्यवस्था का स्वामी है; जो मर्यादा और नियम का अधिष्ठाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्य के दो नामों—'आदित्य' और 'अर्यमा'—के गूढ़ अर्थ खोल रहे हैं। वे सूर्य को केवल एक खगोलीय पिंड के रूप में नहीं, अपितु एक ऐसी विराट चेतना के रूप में देखते हैं जो सृजन और लय (विनाश) दोनों की अधिष्ठाता है।
प्रथम चरण में वे कहते हैं कि सूर्य 'आदित्य' है क्योंकि वह 'आदान' करता है। यहाँ 'आदान' का अर्थ है—सब भूतों के रस, उनकी ऊर्जा और अंततः उनकी आयु को वापस अपने भीतर समेट लेना। जिस प्रकार सूर्य की किरणें दिन भर पृथ्वी से जल और जीवन-शक्ति को खींचती हैं, उसी प्रकार यह विराट चेतना प्रत्येक जीव से उसकी प्राण-शक्ति को वापस खींचकर शून्य में विलीन कर देती है। यह 'आदान' ही प्रकृति का नियम है; जो उत्पन्न हुआ है, उसे अंततः उसी स्रोत में लौट जाना है जिसने उसे उत्पन्न किया।
द्वितीय चरण में वे सूर्य को 'अर्यमा' कहते हैं। 'आर्य' वह है जो श्रेष्ठ है और जिसका अधिकार सर्वोपरि है। चूंकि यह सूर्य-तत्त्व ही इस सम्पूर्ण जगत् का वास्तविक स्वामी (स्वामी अस्य जगतः) है, इसलिए इसे अर्यमा कहा गया है। अर्यमा वह शक्ति है जो जगत् की व्यवस्था को बनाए रखती है, जो मर्यादाओं का निर्धारण करती है और जिसके अनुशासन में संपूर्ण ब्रह्मांड गतिमान है।
इस प्रकार, एक ही तत्त्व जब 'लेने' या 'समेटने' की क्रिया करता है, तब वह 'आदित्य' है, और जब वह 'स्वामी' के रूप में व्यवस्था का संचालन करता है, तब वह 'अर्यमा' है।
श्रुति-संगति —
इस निरुक्ति का आधार श्रुति में स्पष्ट मिलता है:
कतम आदित्या इति द्वादश मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति तद्यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥ १४.६.९.६ ॥
"आदित्य कौन हैं?" — "संवत्सरके बारह मास ही आदित्य हैं, क्योंकि ये इस सबको ग्रहण करते हुए (आददानाः) चलते हैं; क्योंकि ये इस सबको ग्रहण करते हुए चलते हैं, इसलिए आदित्य हैं।"
यहाँ श्रुति कहती है कि संवत्सर के बारह मास ही 'आदित्य' हैं, क्योंकि वे सबको ग्रहण करते हुए (आददानाः) चलते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-बीज का विस्तार करती है। श्रुति में 'आदित्य' को काल (मास) के रूप में देखा गया है, जबकि स्मृति में इसे उस विराट सूर्य-पुरुष के रूप में देखा गया है जो काल के माध्यम से ही सभी भूतों का आदान करता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'वैराग्य' और 'समर्पण' की भूमि का निर्माण करता है।
जब साधक यह अनुभव करता है कि वह जिस देह और प्राणों को अपना समझ रहा है, वे वास्तव में उस 'आदित्य' द्वारा केवल कुछ समय के लिए दिए गए हैं और अंततः वह 'आदान' करने वाला ही उन्हें वापस ले लेगा, तब उसके भीतर गहरे वैराग्य का उदय होता है। यह बोध कि "सब कुछ उसी का है और उसी में लौट जाना है", साधक को आसक्ति से मुक्त करता है।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक ध्यान में यह अनुभव करता है कि उसके हृदय का सूर्य (प्राण) उसी विराट आदित्य का अंश है। जिस प्रकार बाहरी सूर्य जगत के रस को खींचता है, उसी प्रकार आंतरिक सूर्य (अक्षर-प्रकाश) साधक के मन और इंद्रियों के बिखरे हुए संस्कारों को समेटकर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करता है।
'अर्यमा' के रूप में साधक उस आंतरिक स्वामी के प्रति समर्पित होता है। वह यह अनुभव करता है कि वह स्वयं कर्ता नहीं है, अपितु उस 'जगत्-स्वामी' की एक व्यवस्था मात्र है। इस बोध से साधक 'अहंकार' की भूमि से उठकर 'दासत्व' या 'समर्पण' की भूमि पर जाता है, जहाँ वह स्वयं को उस विराट व्यवस्था (अर्यमा) के अधीन कर देता है, जिससे उसके जीवन में अनुशासन और शांति का आगमन होता है।
संरक्षिता च भूतानां सविता तेन स स्मृतः ।
भगसंज्ञा धनस्योक्ता स ददाति ततो भगः ॥ ९.९१ ॥
भूतोंकी रक्षा करनेवाला है, इसलिए (वह) सविता कहा गया है; धनका नाम भग है, (और) वह (धन) देता है, इसलिए भग है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के 'आदित्य' और 'अर्यमा' नामों की निरुक्ति करते हुए उसे जगत् का स्वामी और प्राणों का ग्रहणकर्ता बताया। इसी क्रम में अब वे सूर्य के 'सविता' और 'भग' नामों के माध्यम से उसकी रक्षात्मक और प्रदायक शक्तियों का उद्घाटन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) भूतानां संरक्षिता च (अस्ति), तेन सः सविता (इति) स्मृतः। धनस्य संज्ञा 'भग' (इति) उक्ता, सः (सूर्यः) ततः (धनम्) ददाति, ततो (सः) भगः (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• संरक्षिता: रक्षा करने वाला। यहाँ 'रक्षा' का अर्थ केवल बाहरी सुरक्षा नहीं, अपितु अस्तित्व को बनाए रखने वाला आधार है।
• सविता: वह जो प्रेरित करता है और सुरक्षित रखता है। 'सृज' धातु से इसकी व्युत्पत्ति है, जिसका अर्थ है उत्पन्न करना और संचालित करना।
• भगसंज्ञा: 'भग' शब्द का अर्थ है ऐश्वर्य, लक्ष्मी या वह दिव्य गुण जो पूर्णता का बोध कराए।
• ददाति: प्रदान करता है। यहाँ देना केवल भौतिक वस्तु का दान नहीं, अपितु पात्रता के अनुसार ऊर्जा और चेतना का प्रवाह है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्य के दो और महत्वपूर्ण आयामों—'सविता' और 'भग'—की व्याख्या कर रहे हैं।
प्रथम चरण में वे कहते हैं कि सूर्य 'सविता' है क्योंकि वह समस्त भूतों का 'संरक्षिता' है। यहाँ एक सूक्ष्म समन्वय देखने योग्य है। श्लोक ९.८७ में सविता को 'श्रियः प्रसविता' (श्री को उत्पन्न करने वाला) कहा गया था, और यहाँ उसे 'संरक्षिता' (रक्षा करने वाला) कहा गया है। ये दोनों अर्थ परस्पर विरोधी नहीं, अपितु एक ही प्रक्रिया के दो सोपान हैं। जो शक्ति किसी वस्तु को उत्पन्न करती है (प्रसव), वही शक्ति उसे पोषित कर उसकी रक्षा (संरक्षण) भी करती है। सविता वह चैतन्य शक्ति है जो बीज को वृक्ष बनाती है और फिर उस वृक्ष को जीवन-वायु और प्रकाश से सुरक्षित रखती है। बाहरी दृष्टि से यह सूर्य की किरणें हैं, किन्तु आन्तर दृष्टि से यह वह ईश्वरीय संकल्प है जो हर प्राणी के भीतर 'अस्तित्व' की रक्षा कर रहा है।
द्वितीय चरण में वे 'भग' नाम की निरुक्ति करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि 'भग' का अर्थ है 'धन'। यहाँ धन का अर्थ केवल स्वर्ण या मुद्रा नहीं, अपितु 'ऐश्वर्य' और 'संपदा' है—चाहे वह शारीरिक स्वास्थ्य हो, मानसिक शांति हो या आध्यात्मिक ज्ञान। सूर्य वह परम दाता है जो बिना किसी भेदभाव के समस्त सृष्टि को अपनी ऊर्जा प्रदान करता है। चूँकि वह इस समस्त ऐश्वर्य का स्रोत है और उसे वितरित करता है, इसलिए वह 'भग' कहलाता है।
इस प्रकार, याज्ञवल्क्य जी यह दिखा रहे हैं कि सूर्य केवल एक प्रकाश-पुंज नहीं, अपितु वह 'रक्षक' (सविता) और 'दाता' (भग) के रूप में साधक के जीवन के आधार स्तंभ हैं।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'भय' और 'अभाव' के निवारण का मार्ग दिखाता है। संसार में मनुष्य के दो सबसे बड़े कष्ट हैं—एक यह भय कि वह नष्ट हो जाएगा (असुरक्षा), और दूसरा यह बोध कि उसके पास कुछ नहीं है (अभाव)।
जब साधक सूर्य के 'सविता' रूप का ध्यान करता है, तो वह अपनी सुरक्षा के लिए बाहरी दीवारों या व्यक्तियों पर निर्भर रहना छोड़ देता है। वह अनुभव करता है कि जिस विराट चेतना ने उसे उत्पन्न किया है, वही उसकी रक्षा भी कर रही है। यह अभ्यास साधक को 'अभय' की भूमि पर ले जाता है।
जब वह सूर्य के 'भग' रूप का चिंतन करता है, तो वह अपनी 'अपूर्णता' के भाव से मुक्त होता है। वह समझता है कि समस्त ऐश्वर्य का स्रोत उसके भीतर स्थित उसी सूर्य (हृदय-पुरुष) में है। यहाँ 'धन' का अर्थ 'प्राण-शक्ति' और 'ओज' से है। साधक जब इस भाव में स्थित होता है कि वह उस परम दाता से जुड़ा है, तो उसका मानसिक अभाव समाप्त हो जाता है और वह 'संतोष' और 'पूर्णता' का अनुभव करता है।
अतः इस श्लोक का अभ्यास करते हुए साधक हृदय में स्थित सूर्य का ध्यान करे और यह अनुभव करे कि वह रक्षक और दाता एक ही है। इस अनुभव से वह भयमुक्त और समृद्ध होकर उच्चतर चेतना की ओर अग्रसर होता है।
विश्वेषां कर्मणां कर्ता विश्वकर्मा ततः स्मृतः ।
करैर्भासयते विश्वं भास्करस्तेन चोच्यते ॥ ९.९२ ॥
सब कर्मोंका कर्ता है, इसलिए विश्वकर्मा कहा गया है; किरणोंसे विश्वको भासित करता है, इसलिए भास्कर कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के 'सविता' और 'भग' नामों की निरुक्ति करते हुए उसे भूतों का संरक्षक और ऐश्वर्य का प्रदाता बताया। इसी क्रम में अब वे सूर्य के उन नामों का उद्घाटन कर रहे हैं जो उसकी सृजनात्मक शक्ति और प्रकाशमय स्वरूप को प्रकट करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) विश्वेषां कर्मणां कर्ता (अस्ति), ततः (सः) विश्वकर्मा (इति) स्मृतः। (सः) करैः विश्वं भासयते, तस्मात् सः भास्करः (इति) तेन च उच्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• विश्वेषां कर्मणां कर्ता: समस्त कर्मों का करने वाला। यहाँ 'कर्म' केवल शारीरिक क्रिया नहीं, अपितु सृष्टि के संचालन के लिए आवश्यक समस्त दैविक और प्राकृतिक नियम हैं।
• विश्वकर्मा: 'विश्व' (समस्त जगत्) + 'कर्मा' (कर्ता)। वह जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना और उसका निर्वाह करता है।
• करैः: 'कर' शब्द के यहाँ दो अर्थ हैं—प्रथम, सूर्य की किरणें (रश्मियाँ) और द्वितीय, हाथ (क्रियात्मक शक्ति)।
• भासयते: प्रकाशित करना। यह केवल भौतिक प्रकाश नहीं, अपितु अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाला बोध-प्रकाश है।
• भास्कर: 'भास' (प्रकाश) + 'कर' (करने वाला)। जो प्रकाश का विस्तार करता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्य के दो अत्यंत प्रभावशाली नामों—'विश्वकर्मा' और 'भास्कर'—की निरुक्ति कर रहे हैं।
प्रथम चरण में वे कहते हैं कि वह 'विश्वकर्मा' है क्योंकि वह 'विश्वेषां कर्मणां कर्ता' है। यहाँ याज्ञवल्क्य जी हमें उस परम सत्ता की ओर ले जा रहे हैं जो समस्त सृष्टि की कार्य-कारण श्रृंखला का मूल है। संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है—ग्रहों की गति, ऋतुओं का परिवर्तन, प्राणों का स्पंदन—वह सब उसी एक चेतना के 'कर्म' हैं। यहाँ 'विश्वकर्मा' शब्द का प्रयोग किसी पौराणिक शिल्पकार के रूप में नहीं, अपितु उस विराट पुरुष के रूप में किया गया है जिसकी इच्छा मात्र से सृष्टि का विन्यास होता है। यह उसी श्रुति-तत्व का विस्तार है जहाँ सूर्य को जगत् की आत्मा और संचालक माना गया है।
द्वितीय चरण में वे सूर्य को 'भास्कर' कहते हैं। इसका कारण है कि वह 'करैर्भासयते विश्वं'—अपनी किरणों (कर) द्वारा संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है। बाहरी दृष्टि से यह प्रकाश सूर्य की रश्मियाँ हैं जो अंधकार को मिटाती हैं, किंतु आन्तर दृष्टि से यह 'भास' वह ज्ञान है जो जीव के हृदय में स्थित अविद्या के अंधकार को नष्ट करता है। जिस प्रकार सूर्य के उदय होते ही संसार की वस्तुएँ अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो जाती हैं, उसी प्रकार जब साधक के भीतर 'भास्कर' रूपी आत्म-ज्योति जागृत होती है, तब उसे सत्य और असत्य का भेद स्पष्ट हो जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्तृत्व' के त्याग और 'प्रकाश' के अनुभव का सूत्र है।
जब साधक इस सत्य का अनुभव करता है कि सूर्य ही 'विश्वकर्मा' है और समस्त कर्मों का वास्तविक कर्ता वही है, तब उसके भीतर से 'मैं करता हूँ' (अहंकार) का भाव मिटने लगता है। वह समझ जाता है कि उसके शरीर और मन से जो भी क्रियाएँ हो रही हैं, वे वास्तव में उसी विराट सूर्य-पुरुष की शक्ति का विस्तार हैं। यह बोध साधक को 'कर्ता' भाव से मुक्त कर 'साक्षी' भाव की ओर ले जाता है। जब कर्तृत्व का अभिमान छूटता है, तब मानसिक क्लेश समाप्त हो जाते हैं और साधक शांति की भूमि में प्रवेश करता है।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब सूर्य के प्रकाश का ध्यान करता है, तो वह केवल बाहरी सूर्य को नहीं देखता, अपितु अपने हृदय में स्थित उस 'भास्कर' को पुकारता है जो उसकी बुद्धि को प्रकाशित कर सके। वह अनुभव करता है कि जिस प्रकार सूर्य की किरणें (कर) सर्वव्यापी हैं, उसी प्रकार उस परमात्मा का ज्ञान-प्रकाश उसके रोम-रोम में व्याप्त है। इस अभ्यास से साधक स्थूल जगत के प्रकाश से सूक्ष्म जगत के प्रकाश की ओर और अंततः उस अक्षर-प्रकाश की ओर बढ़ता है जहाँ केवल शुद्ध बोध शेष रहता है।
पुष्णाति हि जगत् सर्वं पूषा तेन निगद्यते ।
अंशुभिर्व्याप्यते विश्वमंशुस्तेन उदाहृतः ॥ ९.९३ ॥
सारे जगत्का पोषण करता है, इसलिए पूषा कहलाता है; अंशुओं (किरणों) से विश्व व्याप्त होता है, इसलिए अंशु कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के 'विश्वकर्मा' और 'भास्कर' नामों की व्याख्या करते हुए उसे समस्त कर्मों का कर्ता और प्रकाश का प्रसारक बताया। इसी क्रम में अब वे सूर्य के उन नामों का उद्घाटन कर रहे हैं जो उसकी पोषक शक्ति और सर्वव्यापकता को प्रकट करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सूर्यः) हि जगत् सर्वं पुष्णति, तस्मात् (सः) पूषा (इति) तेन निगद्यते। (सः) अंशुभिः विश्वम् व्याप्यते, तस्मात् (सः) अंशुः (इति) तेन उदाहृतः।
पदार्थ और निर्वचन:
• पुष्णति: पोषण करना। इसका अर्थ केवल स्थूल अन्न देना नहीं, अपितु जीवन-शक्ति (प्राण) का संचार करना और विकास की क्षमता प्रदान करना है।
• पूषा: 'पुष्' धातु से व्युत्पन्न। वह जो पुष्ट करता है, बढ़ाता है और सबका पालन करता है।
• निगद्यते: कहा जाता है या परिभाषित किया जाता है।
• अंशुभिः: किरणों के द्वारा। 'अंशु' का अर्थ सूक्ष्म प्रकाश-तंतु या किरण है।
• व्याप्यते: व्याप्त होना। वह स्थिति जहाँ कोई रिक्त स्थान न रहे; सर्वत्र उपस्थित होना।
• उदाहृतः: यहाँ 'उदाहृत' का अर्थ है—नाम दिया जाना या पुकारा जाना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्य के दो और नामों—'पूषा' और 'अंशु'—की निरुक्ति कर रहे हैं।
प्रथम चरण में वे कहते हैं कि सूर्य 'पूषा' है क्योंकि वह संपूर्ण जगत् का पोषण करता है। यहाँ पोषण का अर्थ अत्यंत व्यापक है। भौतिक स्तर पर सूर्य की रश्मियाँ वनस्पतियों को जीवन देती हैं, जिनसे अन्न उत्पन्न होता है और समस्त प्राणी पुष्ट होते हैं। किंतु याज्ञवल्क्य जी की दृष्टि केवल स्थूल नहीं है; वे संकेत कर रहे हैं कि जिस प्रकार बाहरी सूर्य जगत को पुष्ट करता है, उसी प्रकार हृदय में स्थित 'प्राण-सूर्य' साधक की चेतना और प्राणशक्ति का पोषण करता है। पोषण का अर्थ है—अभाव को दूर कर पूर्णता की ओर ले जाना।
द्वितीय चरण में वे सूर्य को 'अंशु' कहते हैं। 'अंशुभिर्व्याप्यते विश्वम्'—अर्थात् उसकी किरणें संपूर्ण विश्व को व्याप्त कर लेती हैं। यहाँ 'व्याप्ति' का अर्थ है कि सूर्य का प्रकाश ऐसा है जिसे कोई अवरोध रोक नहीं सकता; वह सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में प्रवेश कर उसे प्रकाशित कर देता है। यह व्याप्ति केवल भौतिक प्रकाश की नहीं, अपितु उस ज्ञान-शक्ति की है जो सर्वत्र व्याप्त है और जिसे 'अक्षर' कहा गया है।
श्रुति-संगति —
पोषण के इस सिद्धांत की पुष्टि श्रुति में इस प्रकार मिलती है:
स नैव व्यभवत् स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमियं वै पूषेयं हीदं सर्वं पुष्यति यदिदं किं च ॥ १४.४.२.२५ ॥
वह (ब्रह्म) फिर भी विभूतिसम्पन्न न हुआ; उसने शूद्र वर्ण — पूषाको रचा। यह (पृथिवी) ही पूषा है, क्योंकि यही यह जो कुछ है, उस सबका पोषण करती है।
यहाँ शतपथ ब्राह्मण में 'पूषा' शब्द का प्रयोग पृथ्वी के लिए किया गया है क्योंकि वह समस्त प्राणियों का पोषण करती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यही नाम सूर्य के लिए प्रयुक्त हुआ है। यहाँ कोई विरोध नहीं है, अपितु यह एक ही तत्त्व के दो रूपों का दर्शन है। पोषण करने वाला गुण (पुष्यति) एक ही है; जब वह गुण स्थूल रूप में अन्न के माध्यम से प्रकट होता है, तब पृथ्वी 'पूषा' है, और जब वही गुण प्रकाश और प्राण-ऊर्जा के रूप में प्रकट होता है, तब सूर्य 'पूषा' है। वास्तव में, पृथ्वी सूर्य की ही शक्ति का विस्तार है, अतः पोषण का मूल स्रोत सूर्य ही है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कृतज्ञता' और 'समर्पण' के अभ्यास का द्वार है। जब साधक सूर्य को 'पूषा' के रूप में अनुभव करता है, तो वह यह बोध करता है कि उसे प्राप्त होने वाला प्रत्येक अन्न-कण और प्रत्येक श्वास उसी परम पुरुष का दान है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' से मुक्त कर 'प्रसाद-भाव' में स्थापित करता है। वह अनुभव करता है कि पोषण करने वाला वह सूर्य बाहर भी है और उसके हृदय में प्राण रूप में भीतर भी।
'अंशु' रूपी व्याप्ति का अभ्यास साधक को 'विस्तार' की भूमि पर ले जाता है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें बिना किसी प्रयास के सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं, उसी प्रकार साधक अपनी चेतना को संकुचित शरीर से निकालकर संपूर्ण ब्रह्माण्ड में विस्तारित करने का प्रयास करता है। वह अनुभव करता है कि उसका अपना स्वरूप भी उसी 'अंशु' (प्रकाश-तंतु) की भाँति सूक्ष्म और सर्वव्यापी है। इस अभ्यास से साधक 'पिण्ड' (शरीर) से 'ब्रह्माण्ड' की ओर अग्रसर होता है और यह अनुभव करता है कि वह स्वयं उस अनंत प्रकाश का एक अंश है।
निमेषादि क्षणः कालस्तस्मादुत्पद्यते यदा(तः) ।
कालकर्ता ततो ज्ञेयः कालाख्यो विष्णुरव्ययः ॥ ९.९४ ॥
निमेष आदि क्षणरूप काल उससे उत्पन्न होता है, इसलिए (उसे) कालका कर्ता जानना चाहिए — अविनाशी विष्णु, जिसका नाम काल है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के 'पूषा' और 'अंशु' नामों की व्याख्या करते हुए उसकी पोषक शक्ति और सर्वव्यापकता को स्पष्ट किया। अब वे सूर्य के उस स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं जो समय के बंधन से परे है, किंतु समस्त समय की उत्पत्ति का मूल कारण है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: निमेषादि क्षणः कालः यतः तस्मात् उत्पद्यते, (ततः) कालकर्ता ततो ज्ञेयः, (सः) कालाख्यो विष्णुरव्ययः।
पदार्थ और निर्वचन:
• निमेषादि: निमेष (पलक झपकने का समय) आदि से आरम्भ होने वाली सूक्ष्म गणना।
• क्षणः: समय की वह लघुतम इकाई जिसे अनुभव किया जा सके।
• यतः (यदातः): जिससे; यहाँ 'यदातः' पाठ संदिग्ध है, अतः इसका अर्थ 'यतः' (कारण/स्रोत) लिया गया है।
• उत्पद्यते: उत्पन्न होता है; प्रकट होता है।
• कालकर्ता: समय का सृजन करने वाला; वह सत्ता जिसके कारण समय का चक्र चलता है।
• कालाख्यो: जिसका नाम 'काल' है।
• विष्णुः: सर्वव्यापी; वह जो सर्वत्र व्याप्त है और जिसे 'विष्णु' कहा गया है।
• अव्ययः: जिसका कभी क्षय न हो; अविनाशी; जो समय के प्रभाव से मुक्त है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य समय (काल) के रहस्य और उसके मूल स्रोत का वर्णन कर रहे हैं।
ऋषि कहते हैं कि निमेष, क्षण और उसके पश्चात आने वाली समस्त काल-गणनाएँ उसी एक सत्ता से उत्पन्न होती हैं। साधारणतः हम काल को एक ऐसी धारा मानते हैं जिसमें हम बह रहे हैं, किंतु याज्ञवल्क्य जी की दृष्टि यहाँ उलट है; वे काल को एक 'उत्पाद' के रूप में देख रहे हैं। समय स्वयं में स्वतंत्र नहीं है, बल्कि वह उस अविनाशी पुरुष का एक विवर्त या प्रभाव है।
अतः वह सत्ता 'कालकर्ता' है। जब वह अविनाशी विष्णु (सर्वव्यापक पुरुष) अपनी शक्ति से जगत् का संचालन करता है, तब समय का आभास होता है। यहाँ 'विष्णु' शब्द का प्रयोग उसकी सर्वव्यापकता के कारण हुआ है—वह जो समय के भीतर भी है और समय के बाहर भी। उसे 'अव्यय' कहा गया है क्योंकि समय सब कुछ नष्ट करता है, किंतु जो समय का कर्ता है, वह स्वयं समय के विनाश (क्षय) से मुक्त है।
यहाँ एक सूक्ष्म भेद है: वह 'कालकर्ता' भी है और उसका नाम 'काल' भी है। इसका रहस्य यह है कि जब वह पुरुष अपनी क्रियाशीलता में होता है, तो वह 'काल' के रूप में अनुभव होता है, किंतु अपनी मूल स्थिति में वह 'अव्यय विष्णु' है। इस प्रकार, बाहरी जगत का समय और हृदय के भीतर का वह अविनाशी साक्षी एक ही तत्त्व के दो रूप हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक समय के प्रति उसकी दृष्टि को बदलने का अभ्यास है। सामान्य मनुष्य समय के प्रवाह में खोया रहता है और क्षणों के व्यय से भयभीत रहता है। किंतु योगी जब इस सत्य का अनुभव करता है कि "निमेषादि क्षणः कालस्तस्मादुत्पद्यते"—अर्थात् समय मेरे भीतर स्थित उस अविनाशी विष्णु से उत्पन्न हो रहा है—तब वह समय का दास नहीं, बल्कि समय का साक्षी बन जाता है।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक प्रत्येक 'निमेष' (पलक झपकने के समय) को केवल एक भौतिक घटना न मानकर, उसे उस अविनाशी सत्ता की अभिव्यक्ति के रूप में देखना शुरू करता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि हर क्षण उसी 'अव्यय' से उत्पन्न हो रहा है, तो समय व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि हर क्षण एक योग-साधना बन जाता है। वह समय की सीमाओं को लाँघकर उस 'विष्णु' भाव में स्थित हो जाता है जहाँ न कुछ खोने का भय है और न कुछ पाने की व्याकुलता। यह अभ्यास साधक को 'काल-बद्ध' अवस्था से 'कालातीत' अवस्था की ओर ले जाता है।
सहस्रच्छिद्रसंकीर्णे आपो रेतोमया घटे ।
हिरण्मयेऽन्तरे तिष्ठन् रविस्तेन निगद्यते ॥ ९.९५ ॥
हजार छिद्रोंसे भरे घटमें वीर्यमय जल (है); (उसके) सुवर्णमय भीतरी भागमें रहता है, इसलिए (वह) रवि कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने समय के अविनाशी स्वामी 'काल-विष्णु' के स्वरूप को स्पष्ट किया। अब वे सूर्य के एक और विशिष्ट नाम 'रवि' की निरुक्ति कर रहे हैं, जिसके माध्यम से वे स्थूल शरीर और उसके भीतर स्थित सूक्ष्म ज्योति के सम्बन्ध को उजागर करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) सहस्रच्छिद्रसंकीर्णे आपो रेतोमया घटे (तिष्ठति), (तस्य) हिरण्मयेऽन्तरे तिष्ठन् रविः, तेन (नាម्ना) निगद्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• सहस्रच्छिद्रसंकीर्णे: हजार छिद्रों से युक्त या घिरे हुए; यहाँ 'सहस्र' संख्या प्रतीकात्मक है, जो अनगिनत सूक्ष्म द्वारों या मार्गों का संकेत करती है।
• आपो रेतोमया घटे: वीर्यमय जल रूपी घट में; 'आपः' जल है, 'रेतस' का अर्थ वीर्य, बीज या जीवन-शक्ति है। ऐसा घट जो जीवन-रस (वीर्य) से परिपूर्ण जल के समान हो।
• हिरण्मयेऽन्तरे: सुवर्णमय (स्वर्ण के समान प्रकाशमान) भीतरी भाग में।
• तिष्ठन्: स्थित होकर; निवास करते हुए।
• रविः: सूर्य का एक नाम; यहाँ उस ज्योति का संकेत है जो घट के भीतर स्थित है।
• निगद्यते: कहा जाता है; संज्ञा दी जाती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'रवि' शब्द की एक अत्यंत गूढ़ और शरीर-विज्ञान सम्बन्धी व्याख्या कर रहे हैं।
ऋषि कहते हैं कि एक ऐसा घट है जो हजार छिद्रों से घिरा हुआ है और जिसमें वीर्यमय जल भरा है; उस घट के सुवर्णमय आंतरिक भाग में जो स्थित रहता है, उसे 'रवि' कहा जाता है। यहाँ 'घट' का अर्थ प्रत्यक्ष मिट्टी का पात्र नहीं, अपितु यह मानव देह का प्रतीक है। शरीर को एक घट माना गया है क्योंकि यह भी मिट्टी (पंचभूतों) से निर्मित है और भीतर प्राण-तत्व को धारण किए हुए है।
'सहस्रच्छिद्र' का भाव यह है कि यह देह अनगिनत सूक्ष्म छिद्रों, रंध्रों और नाड़ियों से व्याप्त है, जिनके माध्यम से प्राण और ऊर्जा का आवागमन होता है। 'आपो रेतोमया' शब्द देह के भीतर स्थित उन रसों और तरल पदार्थों (जैसे रक्त, लसीका और ओज) की ओर संकेत करता है, जिनमें जीवन का बीज (वीर्य/शक्ति) निहित है। यह देह एक ऐसे पात्र के समान है जिसमें जीवन-रस भरा हुआ है।
इस देह-घट के भीतर एक 'हिरण्मय' अर्थात् स्वर्ण के समान प्रकाशमान केंद्र है। यह हिरण्मय अंतरा वह सूक्ष्म स्थान है जहाँ आत्मा या अंतर्यामी पुरुष ज्योति-रूप में स्थित है। चूँकि वह प्रकाशपुंज इस वीर्यमय और छिद्रयुक्त देह के भीतर सूर्य की भाँति प्रकाशित रहता है, इसलिए उसे 'रवि' कहा गया है। यद्यपि 'रवि' शब्द की व्याकरणिक व्युत्पत्ति इस श्लोक में स्पष्ट नहीं की गई है, किंतु भाव यह है कि जो इस देह-पात्र के भीतर प्रकाशमान है, वही रवि है।
इस प्रकार याज्ञवल्क्य जी बाहरी सूर्य और भीतर के सूर्य (आत्मा) के बीच एक सेतु बना रहे हैं। जिस प्रकार बाहरी सूर्य संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार यह आंतरिक रवि (हिरण्मय पुरुष) देह के भीतर स्थित होकर उसे चेतना प्रदान करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'देह-बोध' और 'ज्योति-साधना' का सूत्र है। योगी जब इस श्लोक का अभ्यास करता है, तो वह अपने शरीर को केवल मांस और अस्थियों का ढांचा नहीं, बल्कि एक 'हिरण्मय पात्र' के रूप में अनुभव करता है।
अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को बाहरी जगत से हटाकर देह-घट के भीतर ले जाए। वह अनुभव करे कि यह शरीर अनगिनत सूक्ष्म द्वारों (सहस्र छिद्रों) वाला एक यंत्र है, जिसमें जीवन-रस (रेतस) प्रवाहित हो रहा है। इस प्रवाह के मध्य में, हृदय के गहनतम भाग में, एक स्वर्णमयी ज्योति स्थित है।
जब साधक शरीर को उसी ज्योति का पात्र मानकर उसे पवित्र रखता है, तब उसके भीतर का 'रवि' जाग्रत होने लगता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर (घट) से सूक्ष्म ज्योति (रवि) की ओर ले जाता है। यहाँ शरीर को मिटाया नहीं गया है, बल्कि उसे एक पवित्र मंदिर या पात्र के रूप में स्वीकार किया गया है, ताकि उसके भीतर स्थित हिरण्मय पुरुष का साक्षात्कार हो सके। यह स्थिति साधक को उस भूमि पर ले जाती है जहाँ वह स्वयं को 'प्रकाश-मय' अनुभव करने लगता है।
नाडीविशेषास्तेन ब्रह्मविद्गमनं च
इडासुषुम्णे द्वे नाड्यौ रश्मिसंज्ञे व्यवस्थिते ।
पाचिकाप्यायिके ह्येते अग्नीषोमात्मके स्मृते ॥ ९.९६ ॥
इडा और सुषुम्णा — दो नाडियाँ किरण नामसे स्थित हैं; ये पचानेवाली और तृप्त करनेवाली हैं, अग्नि-सोमरूप कही गयी हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'रवि' के माध्यम से देह रूपी घट के भीतर स्थित सुवर्णमय ज्योति का रहस्य बताया। अब वे उस ज्योति के प्रसार के मार्गों, अर्थात् सूक्ष्म नाड़ियों की चर्चा कर रहे हैं, जो स्थूल शरीर और उस आंतरिक सूर्य को परस्पर जोड़ती हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: इडा-सुषुम्णे (एतौ) द्वे नाड्यौ रश्मि-संज्ञे व्यवस्थिते (सन्तः)। एते (नाड्यौ) पाचिका-अप्यायिके ह्येते अग्नी-सोमात्मके (इति) स्मृते।
पदार्थ और निर्वचन:
• इडा-सुषुम्णे: इडा और सुषुम्णा नामक दो नाड़ियाँ।
• रश्मि-संज्ञे: 'रश्मि' (किरण) नाम से। यहाँ रश्मि का अर्थ केवल प्रकाश की रेखा नहीं, अपितु वह सूक्ष्म ऊर्जा-धारा है जो स्रोत से लक्ष्य की ओर प्रवाहित होती है।
• व्यवस्थिते: स्थित हैं; अपनी निश्चित दिशा और कार्य में प्रतिष्ठित हैं।
• पाचिका: पचाने वाली; जो अग्नि के समान आहार और संस्कारों का पाचन कर उन्हें ऊर्जा में परिवर्तित करती है।
• अप्यायिके: आप्यायन करने वाली; 'आप्यायन' का अर्थ है तृप्त करना, पोषण करना या विस्तार देना। जो सोम के समान शीतलता और पोषण प्रदान करती है।
• अग्नी-सोमात्मके: अग्नि और सोम के स्वरूप वाली।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य शरीर के भीतर की उन सूक्ष्म धाराओं का उद्घाटन कर रहे हैं, जिन्हें वे 'रश्मि' या किरण कहते हैं। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि इडा और सुषुम्णा—ये दो नाड़ियाँ किरण-संज्ञक हैं।
यहाँ 'किरण' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्य और पृथ्वी के बीच एक सेतु का कार्य करती हैं, उसी प्रकार ये नाड़ियाँ हृदय के भीतर स्थित उस 'आंतरिक सूर्य' (आत्मा) और बाह्य शरीर के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान करती हैं। ये केवल शारीरिक नलिकाएँ नहीं हैं, बल्कि चेतना के प्रवाह के मार्ग हैं।
इन दोनों नाड़ियों के कार्यों को ऋषि ने 'पाचिका' और 'अप्यायिके' कहा है। एक नाड़ी 'पाचिका' है, जिसका स्वभाव अग्नि है। यह केवल अन्न का पाचन नहीं करती, बल्कि साधक के कर्मों, वासनाओं और अनुभवों को जलाकर उन्हें शुद्ध ज्ञान-ऊर्जा में बदल देती है। दूसरी नाड़ी 'अप्यायिके' है, जिसका स्वभाव सोम है। यह पोषण करती है, मन को शांति प्रदान करती है और शरीर के सूक्ष्म अंगों को तृप्त करती है।
अग्नि और सोम का यह द्वैत ही जीवन का आधार है। अग्नि बिना सोम के दाहक हो जाती है और सोम बिना अग्नि के जड़। जब ये दोनों 'रश्मियों' के रूप में संतुलित होती हैं, तब साधक का शरीर और मन उस आंतरिक सूर्य की आभा को धारण करने योग्य बनता है।
श्रुति-संगति —
ता वा अस्यैताः हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्न एताभिर्वा एतमास्रवदास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इव भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः ॥ १४.६.११.४ ॥
इसकी ये "हिता" नामकी नाडियाँ हैं — जैसे एक बाल हज़ार भागोंमें चिरा हो (इतनी सूक्ष्म)। इन्हींसे बहता हुआ (अन्नरस) इस (आत्मा) में बहता है; इसलिए यह (तैजस आत्मा) इस शारीर आत्मासे मानो अधिक सूक्ष्म आहारवाला होता है।
श्रुति कहती है कि शरीर में 'हिता' नाम की अत्यंत सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं, जो एक बाल के हजारवें भाग के समान हैं। इन्हीं के माध्यम से सूक्ष्म आहार आत्मा तक पहुँचता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में इन्हीं सूक्ष्म मार्गों को 'रश्मि' कहा गया है। श्रुति जहाँ उनकी सूक्ष्मता (केश-तुल्यता) पर बल देती है, वहीं यह स्मृति उनके गुण (अग्नि-सोम) और कार्य (पाचन-पोषण) को स्पष्ट कर रही है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ ८.६.२ ॥
जैसे एक लम्बा राजमार्ग दोनों गाँवोंको जाता है — इसको भी और उसको भी — वैसे ही आदित्यकी ये किरणें दोनों लोकोंको जाती हैं — इसको भी और उसको भी। वे उस आदित्यसे फैलकर इन (हृदयकी) नाडियोंमें पहुँची हैं, और इन नाडियोंसे फैलकर उस आदित्यमें पहुँची हैं।
छान्दोग्य उपनिषद् में यह रहस्य बताया गया है कि आदित्य की किरणें दोनों लोकों में व्याप्त हैं और वे हृदय की नाड़ियों में सृप्त (विराजित) हैं। यह स्मृति उसी उपनिषदीय सत्य का विस्तार करती है। छान्दोग्य उपनिषद् जहाँ यह बताता है कि सूर्य की किरणें नाड़ियों में प्रवेश करती हैं, वहीं याज्ञवल्क्य यहाँ उन नाड़ियों को स्वयं 'रश्मि-संज्ञक' कहकर यह सिद्ध करते हैं कि नाड़ियाँ और सूर्य की किरणें वास्तव में एक ही ऊर्जा के दो रूप हैं—एक बाह्य और एक आन्तर।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'ऊर्जा-संतुलन' का अभ्यास है। साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि उसके भीतर दो महान धाराएँ प्रवाहित हो रही हैं। एक धारा अग्नि रूपी है जो उसे जाग्रत, ओजस्वी और शुद्ध करती है (पाचिका), और दूसरी धारा सोम रूपी है जो उसे शांत, स्थिर और आनंदित करती है (अप्यायिके)।
अभ्यास यह है कि साधक अपने ध्यान को उन सूक्ष्म किरणों पर केंद्रित करे जो हृदय के सूर्य से निकलकर संपूर्ण देह में व्याप्त हैं। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसकी नाड़ियाँ केवल मांस-मज्जा का हिस्सा नहीं, बल्कि 'आदित्य की रश्मियाँ' हैं, तब वह स्थूल देह के मोह से मुक्त होकर सूक्ष्म शरीर के बोध में जाता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह शरीर को 'प्रकाश का पुंज' अनुभव करने लगता है, जिससे उसकी आंतरिक शुद्धि और पोषण एक साथ घटित होता है।
एतौ तु पार्श्वगौ ज्ञेयौ पन्थानौ ह्यग्निहोत्रिणाम् ।
देवपित्रात्मकौ ह्येतौ शाश्वतौ जगतः समौ ॥ ९.९७ ॥
इन दोनोंको (मध्यके) पार्श्ववर्ती, अग्निहोत्रियोंके दो मार्ग जानना चाहिए; ये देवता और पितरोंवाले, जगत्के लिए समान रूपसे सनातन हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इडा और सुषुम्णा नाड़ियों को अग्नि और सोम के स्वरूप वाला बताकर उन्हें 'रश्मि' (किरण) के रूप में परिभाषित किया। अब वे इन किरणों के विस्तार और उनके द्वारा निर्मित उन मार्गों का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को देह से परे गंतव्य तक ले जाते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एतौ (नाड्यौ) तु पार्श्वगौ ज्ञेयौ (सन्तः), ह्यग्निहोत्रिणाम् पन्थानौ (इति)। एतौ (पन्थानौ) ह्येतौ देव-पित्रात्मकौ, जगतः समौ शाश्वतौ (सन्तः)।
पदार्थ और निर्वचन:
• पार्श्वगौ: पार्श्व में स्थित; जो मध्य मार्ग के दोनों ओर स्थित हैं।
• पन्थानौ: दो मार्ग; यहाँ 'पंथ' केवल चलने का रास्ता नहीं, अपितु चेतना के प्रवाह की दिशा है।
• अग्निहोत्रिणाम्: अग्निहोत्रियों के लिए। यहाँ 'अग्निहोत्री' वह है जो केवल बाहरी हवन नहीं करता, बल्कि अपनी प्राणाग्नि के द्वारा निरंतर आंतरिक यज्ञ (साधना) में लीन रहता है।
• देव-पित्रात्मकौ: देवताओं और पितरों के स्वरूप वाली। 'देव' का अर्थ है प्रकाशमय उच्च अवस्था और 'पितृ' का अर्थ है पूर्वजों की परंपरा या संस्कारमय स्थिति।
• शाश्वतौ: सनातन; जो समय और परिस्थिति से परे सदैव विद्यमान हैं।
• समौ: समान; यहाँ समानता का अर्थ है कि दोनों ही मार्ग अपनी-अपनी प्रकृति में पूर्ण और सत्य हैं, एक को दूसरे से न्यून नहीं मानना चाहिए।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य सूक्ष्म शरीर की संरचना और उससे जुड़े गंतव्यों का रहस्य खोल रहे हैं। वे कहते हैं कि पूर्व में वर्णित इडा और सुषुम्णा (यहाँ सुषुम्णा के पार्श्व विस्तारों या उसके साथ जुड़ी धाराओं के संदर्भ में) दो पार्श्व मार्ग हैं, जिन्हें एक सच्चे अग्निहोत्री को जानना चाहिए।
यहाँ 'अग्निहोत्री' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। याज्ञवल्क्य की दृष्टि में अग्निहोत्र केवल समिधाओं की आहुति नहीं, बल्कि प्राणों का वह अनुशासन है जहाँ साधक अपने भीतर की अग्नि को जाग्रत करता है। ऐसा साधक ही यह देख पाता है कि देह के भीतर चेतना के दो मुख्य पार्श्व मार्ग हैं। एक मार्ग 'देवयान' है, जो प्रकाश, उत्थान और मोक्ष की ओर ले जाता है, और दूसरा 'पितृयान' है, जो संस्कारों, पूर्वजों के ऋण और पुनरागमन की प्रक्रिया से जुड़ा है।
ऋषि यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि ये दोनों मार्ग 'शाश्वत' और 'सम' हैं। सामान्यतः लोग पितृमार्ग को निम्न और देवमार्ग को उच्च मानते हैं, किंतु याज्ञवल्क्य उसे 'सम' कहकर यह स्पष्ट करते हैं कि सृष्टि के संतुलन के लिए दोनों की आवश्यकता है। पितृमार्ग वह आधार है जहाँ से जीव संस्कारों को परिष्कृत करता है, और देवमार्ग वह शिखर है जहाँ वह प्रकाश में विलीन होता है। ये दोनों मार्ग जगत् के लिए सनातन नियम हैं।
श्रुति-संगति —
देवमार्ग की इस यात्रा का विस्तार शतपथ ब्राह्मण में मिलता है:
ते य एवमेतद्विदुः ये चामी अरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्नु आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षण्मासानुदङ्ङादित्य एति मासेभ्यो देवलोकं देवलोकादादित्यमादित्याद्वैद्युतं तान्वैद्युतात्पुरुषो मानस एत्य ब्रह्मलोकान्गमयति ते तेषु ब्रह्मलोकेषु पराः परावतो वसन्ति तेषामिह न पुनरावृत्तिरस्ति ॥ १४.९.१.१८ ॥
वे जो इस (पञ्चाग्नि-विद्या) को ऐसा जानते हैं, और वे जो वनमें श्रद्धा और सत्यकी उपासना करते हैं — वे अर्चि (ज्वाला) को प्राप्त होते हैं; अर्चिसे दिनको, दिनसे शुक्ल पक्षको, शुक्ल पक्षसे उन छः महीनोंको जिनमें सूर्य उत्तरकी ओर चलता है; महीनोंसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको, आदित्यसे विद्युत्को। विद्युत्में स्थित उनके पास एक मानस पुरुष आकर उन्हें ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है; वे उन ब्रह्मलोकोंमें दूर-से-दूरतक बसते हैं। उनकी यहाँ (इस लोकमें) फिर लौटना नहीं होता।
इस श्रुति-अंश में स्पष्ट है कि जो साधक श्रद्धा और सत्य की उपासना करते हैं, वे 'अर्चि' (ज्वाला) के मार्ग पर चलते हैं। यह मार्ग दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के माध्यम से आदित्य और अंततः ब्रह्मलोक तक जाता है। स्मृति का यह श्लोक उसी 'देव-पितृ' मार्ग की संरचना को शरीर की नाड़ियों के संदर्भ में समझा रहा है। श्रुति जहाँ गंतव्य (ब्रह्मलोक) बताती है, वहीं यह स्मृति उस गंतव्य तक पहुँचने वाले 'पंथ' या सूक्ष्म मार्ग का संकेत दे रही है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'मार्ग-बोध' कराता है। साधक जब प्राणायाम और प्रत्याहार के माध्यम से अपनी चेतना को स्थिर करता है, तब वह अनुभव करता है कि उसके भीतर ऊर्जा के दो मुख्य प्रवाह हैं।
एक प्रवाह वह है जो उसे बाहरी जगत के संस्कारों, स्मृतियों और पूर्वजों के ऋण (पितृ-तत्व) की ओर ले जाता है, और दूसरा प्रवाह वह है जो उसे आंतरिक प्रकाश, शून्य और परब्रह्म (देव-तत्व) की ओर खींचता है। योगी इन दोनों पार्श्व मार्गों को पहचानकर यह समझता है कि उसका वर्तमान कर्म और उसकी चेतना की दिशा उसे किस मार्ग पर ले जा रही है।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब इन दोनों सनातन मार्गों के स्वरूप को पहचान लेता है, तब वह इनके साक्षी भाव में स्थित हो जाता है। वह यह अनुभव करता है कि देह के भीतर ही वह संपूर्ण ब्रह्मांडीय यात्रा (देवयान और पितृयान) घटित हो रही है। यह बोध उसे कर्म की यांत्रिक प्रक्रिया से ऊपर उठाकर योग की उस भूमि पर लाता है, जहाँ वह केवल गंतव्य की इच्छा नहीं करता, बल्कि मार्ग के स्वरूप को जानकर स्वयं को उस अनंत प्रकाश में विलीन करने का प्रयास करता है। इस प्रकार, वह देह रूपी यज्ञशाला में स्थित एक सच्चा अग्निहोत्री बन जाता है, जिसके लिए अब केवल वह एक ही मार्ग शेष रहता है जो इन दोनों पार्श्व मार्गों के पार, अक्षर-ब्रह्म की ओर जाता है।
तयोर्मध्ये अमा ह्येषा यत्र संतिष्ठते शशी ।
कलावशिष्टो भूयोऽपि वृद्धिं गच्छति भास्करात् ॥ ९.९८ ॥
उन दोनोंके बीच यह अमा (अमावस्या-कला) है, जहाँ चन्द्रमा स्थित रहता है; कलामात्र शेष रहकर (वह) सूर्यसे फिर वृद्धिको प्राप्त होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इडा और सुषुम्णा को अग्निहोत्रियों के दो पार्श्व मार्गों के रूप में परिभाषित किया, जो देव और पितृ लोकों की ओर ले जाते हैं। अब वे इन दोनों धाराओं के मध्य स्थित उस सूक्ष्म बिंदु या अंतराल का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ चेतना का क्षय और पुनरुत्थान घटित होता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तयोः रश्मिणोः) मध्ये अमा ह्येषा (अस्ति), यत्र शशी संतिष्ठते। (शशी) कलावशिष्टः भूयोऽपि भास्करात् वृद्धिं गच्छति।
पदार्थ और निर्वचन:
• तयोर्मध्ये: उन दोनों (इडा और सुषुम्णा) के बीच में।
• अमा: अमावस्या की स्थिति; वह बिंदु जहाँ चंद्रमा (सोम/मन) पूर्णतः क्षीण हो जाता है। यहाँ 'अमा' केवल एक तिथि नहीं, बल्कि नाड़ियों के मध्य का वह शून्य-स्थान है जहाँ द्वैत समाप्त होता है।
• शशी: चंद्रमा; योगिक दृष्टि से यह मन और सोम तत्त्व का प्रतीक है।
• कलावशिष्टः: केवल एक कला शेष रहकर। यह पूर्ण शून्य नहीं है, बल्कि वह बीज-अवस्था है जिससे पुनः सृष्टि या विस्तार संभव होता है।
• भास्करात्: सूर्य से। यहाँ भास्कर वह आत्म-ज्योति है जो ऊर्जा का अक्षय स्रोत है।
• वृद्धिं गच्छति: वृद्धि को प्राप्त होता है; पुनः प्रकाशित या विस्तारित होता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी नाड़ियों के मध्य के उस रहस्यमय अंतराल की व्याख्या कर रहे हैं जिसे उन्होंने 'अमा' कहा है। जब साधक इडा और सुषुम्णा की दो विपरीत धाराओं (सोम और अग्नि) के प्रवाह को देखता है, तो उनके मध्य एक ऐसा बिंदु आता है जहाँ मन (शशी) अपनी समस्त चंचलता और विस्तार को खोकर न्यूनतम अवस्था में आ जाता है।
ऋषि कहते हैं कि यह 'अमा' वह स्थान है जहाँ चंद्रमा स्थित रहता है। साधारणतः अमावस्या को चंद्रमा अदृश्य माना जाता है, किंतु योगिक रहस्य यह है कि वह लुप्त नहीं होता, अपितु अपनी न्यूनतम 'कला' में सिमट जाता है। यह स्थिति साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जब मन (चंद्रमा) पूरी तरह क्षीण होकर शांत होता है, तभी वह सूर्य (भास्कर/परमात्मा) की ऊर्जा को ग्रहण करने के योग्य होता है। जैसे अमावस्या के बाद चंद्रमा सूर्य के प्रकाश से पुनः अपनी कलाओं की वृद्धि करता है, वैसे ही जब साधक का अहंकार और मानसिक विक्षेप 'अमा' की स्थिति में शून्य हो जाते हैं, तब उसे सूर्य रूपी आत्म-तत्त्व से नई चेतना और शक्ति प्राप्त होती है।
यह प्रक्रिया दर्शाती है कि आध्यात्मिक उन्नति केवल वृद्धि में नहीं, बल्कि पहले 'क्षय' (शून्यता) में है। जब तक मन अपनी पुरानी वृत्तियों से भरा है, वह सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित नहीं कर सकता; उसे पहले 'अमा' होना पड़ता है, फिर वह सूर्य से ऊर्जा लेकर पुनः प्रदीप्त होता है।
श्रुति-संगति —
इस रहस्य की पुष्टि श्रुति भी करती है। शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि अमावस्या की रात्रि को वह सोलहवीं कला के माध्यम से समस्त प्राणियों में प्रविष्ट होता है:
स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदश कला ध्रुवैवास्य षोडशी कला स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते सोऽमावास्यां रात्रिमेतया षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मादेतां रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥ १४.४.३.२२ ॥
वह यह संवत्सर ही सोलह कलाओंवाला प्रजापति है। रात्रियाँ ही इसकी पन्द्रह कलाएँ हैं, और ध्रुवा (स्थिर) इसकी सोलहवीं कला है। वह रात्रियोंसे ही भरता है और घटता है। अमावस्याकी रातको वह इस सोलहवीं कलासे सब प्राणधारियोंमें प्रवेश करके, फिर प्रातःकाल उत्पन्न होता है। इसलिए उस रातको किसी प्राणधारीका प्राण न काटे — गिरगिटका भी नहीं — इसी देवताके सम्मानके लिए।
इसका भाव यह है कि जब चंद्रमा (मन) बाहरी जगत से हटकर न्यूनतम अवस्था में आता है, तब वह वास्तव में समस्त प्राणधारियों के भीतर, उनके मूल तत्त्व में विलीन हो जाता है। यह 'अन्तर्मुखी' होने की प्रक्रिया है। इसी प्रकार, सोम का ओषधियों और जल में प्रवेश करना भी उसकी सूक्ष्मता और आंतरिकता का संकेत है:
शशश्चान्द्रमस इति चन्द्रमा वै सोमो देवानामन्नं तम् पौर्णमास्यामभिषुण्वन्ति सोऽपरपक्षेऽप ओषधीः प्रविशति पशवो वा अप ओषधीरदन्ति तदेनमेतां रात्रीं पशुभ्यः संनयति ॥ ११.१.५.३ ॥
"शश चन्द्रमाका" — (यह) चन्द्रमा ही सोम है, देवोंका अन्न। उसे वे पूर्णिमाको निचोड़ते हैं; वह कृष्ण पक्षमें जलों और ओषधियोंमें प्रवेश करता है। पशु जल और ओषधियोंको खाते हैं; उसे (यजमान) इस (अमावस्याकी) रातको पशुओंसे (दूधके रूपमें) एकत्र करता है।
स्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति-तथ्य को योगिक साधना से जोड़ता है कि 'अमा' वह संधि-स्थल है जहाँ से साधक बाहरी जगत के विस्तार को छोड़कर आंतरिक सूर्य की ओर मुड़ता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'मध्य-स्थिति' का अभ्यास है। इडा (सोम) और सुषुम्णा (अग्नि) के बीच का यह 'अमा' स्थान वह शून्य है जहाँ द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं।
साधक जब प्राणायाम और प्रत्याहार के माध्यम से अपनी चेतना को दोनों नाड़ियों के बीच केंद्रित करता है, तो वह एक ऐसी स्थिति का अनुभव करता है जहाँ मन पूरी तरह शांत (क्षीण) हो जाता है। यह 'मानसिक अमावस्या' है। इस शून्य में ठहरने का अभ्यास ही साधक को उस 'परम धाम' की ओर ले जाता है जिसका वर्णन अगले श्लोकों में है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि उसकी अपनी शक्ति सीमित है, और वास्तविक वृद्धि केवल तब होती है जब वह स्वयं को शून्य कर 'भास्कर' (हृदय-सूर्य) के प्रति समर्पित हो जाता है। यह भूमि 'विश्रांति' की है, जहाँ से साधक सूक्ष्म शरीर के द्वैत से निकलकर एकत्व की ओर बढ़ता है।
तत्र तत् परमं धाम उदधेरिव निःसृतम् ।
यस्मिंल्लवणवद्योगी विशत्येवैकतां गतः ॥ ९.९९ ॥
वहाँ वह परम धाम है, समुद्रसे (अमृत) निकला हो जैसे; जिसमें योगी नमककी भाँति (घुलकर) एकत्वको प्राप्त होकर प्रवेश करता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इडा और सुषुम्णा के मध्य स्थित 'अमा' के उस बिंदु का वर्णन किया जहाँ मन (शशी) क्षीण होकर पुनः सूर्य से वृद्धि प्राप्त करता है। अब ऋषि उस परम स्थिति का उद्घाटन कर रहे हैं जहाँ यह क्षय और वृद्धि का चक्र समाप्त हो जाता है और साधक पूर्णता में विलीन हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तत्र तत् परमं धाम (अस्ति), (यत्) उदधेरिव निःसृतम्। यस्मिन् लवणवद्योगी एकतां गतः विशत्येव।
पदार्थ और निर्वचन:
• तत्र: वहाँ; अर्थात् उस 'अमा' या नाड़ियों के मध्य के उस शून्य-बिंदु में, जहाँ द्वैत का अभाव है।
• परमं धाम: सर्वोच्च आश्रय या परम स्थिति। 'धाम' का अर्थ केवल स्थान नहीं, बल्कि वह प्रकाशमय अवस्था है जहाँ आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित होती है।
• उदधेरिव निःसृतम्: समुद्र से निकला हुआ जैसे। यहाँ 'उदध' (समुद्र) चेतना के अनंत सागर का प्रतीक है और 'निःसृत' का अर्थ है वह जो उस अनंतता से प्रकट हुआ हो, किंतु उससे भिन्न न हो।
• लवणवद्योगी: नमक के समान योगी। 'लवण' (नमक) वह प्रतीक है जो जल में मिलकर अपनी पृथक देह और पहचान खो देता है, किंतु जल के प्रत्येक कण को नमकीन कर देता है।
• एकतां गतः: एकत्व को प्राप्त होकर। जहाँ 'मैं' और 'वह' का भेद समाप्त हो जाए।
• विशत्येव: निश्चित रूप से प्रवेश करता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम लक्ष्य का संकेत दे रहे हैं जिसे योग की भाषा में 'समाधि' या 'कैवल्य' कहा जाता है। ऋषि कहते हैं कि नाड़ियों के मध्य उस शून्य-बिंदु (अमा) में वह 'परम धाम' स्थित है। इस धाम की विशेषता यह है कि यह समुद्र से निकले हुए अमृत या जल की भाँति है। जिस प्रकार समुद्र से निकली लहर समुद्र से अलग नहीं होती, उसी प्रकार यह परम धाम उस अनंत ब्रह्म का ही प्रकटीकरण है।
यहाँ याज्ञवल्क्य जी एक अत्यंत सूक्ष्म और गहन दृष्टान्त देते हैं— 'लवणवद्योगी'। वे कहते हैं कि योगी जब इस परम धाम में प्रवेश करता है, तो वह नमक की भाँति घुल जाता है। साधारणतः हम 'प्रवेश' का अर्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना मानते हैं, जहाँ जाने वाला (कर्ता) और जाने का स्थान (कर्म) दोनों अलग होते हैं। किंतु यहाँ प्रवेश का अर्थ 'विलीन होना' है। जैसे नमक का ढला जब जल में गिरता है, तो वह जल में विलीन होकर अपना पृथक अस्तित्व खो देता है, परंतु जल के गुण को बदल देता है; ठीक वैसे ही योगी जब अपनी पृथकता (अहंकार) को त्यागकर उस परम धाम में प्रवेश करता है, तो वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है। वह अब 'योगी' नहीं रहता, बल्कि 'एकत्व' हो जाता है।
यह स्थिति वियोग की नहीं, बल्कि पूर्ण मिलन की है। जब साधक अपनी समस्त वृत्तियों, संस्कारों और 'मैं' की भावना को उस अनंत चेतना में घोल देता है, तब वह उस परम धाम का अंग बन जाता है।
श्रुति-संगति —
नमक का यह दृष्टान्त महर्षि याज्ञवल्क्य की अपनी श्रुति-परम्परा का मूल है, जिसे उन्होंने मैत्रेयी के संवाद में स्पष्ट किया था:
स यथा सैन्धवखिल्यः उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत नाहास्योद्ग्रहणायेव स्याद्यतोयतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १४.५.४.१२ ॥
जैसे नमकका डला पानीमें डाला जाय तो पानीमें ही घुल जाता है — उसे फिर निकालनेके लिए कुछ नहीं बचता, पर जहाँसे भी (पानी) लो, नमकीन ही है — वैसे ही, अरी (मैत्रेयी)! यह महान् भूत, अनन्त, अपार, विज्ञानघन ही है। इन भूतोंसे उठकर उन्हींके साथ (उसका विशेष रूप) नष्ट हो जाता है; मरनेके बाद (विशेष) संज्ञा नहीं रहती — यह मैं कहता हूँ — ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा।
इस श्रुति-अंश में याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि जैसे नमक का ढला पानी में घुलकर अदृश्य हो जाता है, पर जल के हर अंश में व्याप्त रहता है, वैसे ही यह 'विज्ञानघन' आत्मा समस्त भूतों में व्याप्त है और अंततः उन्हीं में विलीन हो जाती है। स्मृति का यह श्लोक उसी श्रुति-रहस्य का योगिक विस्तार है। जहाँ श्रुति 'विज्ञानघन' होने की बात करती है, वहीं यह स्मृति उस अवस्था को प्राप्त करने की विधि—'एकत्व' और 'घुलने' की प्रक्रिया—को समझाती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अहंकार-विलय' का अभ्यास है। योगिक दृष्टि से, जब प्राण सुषुम्णा के मध्य मार्ग से ऊपर उठता है, तो एक समय ऐसा आता है जब साधक को अपनी देह, मन और बुद्धि की पृथकता अनुभव होनी बंद हो जाती है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि मुक्ति 'प्राप्त' करने की वस्तु नहीं है, बल्कि अपनी 'पृथकता' को मिटाने की प्रक्रिया है। अभ्यास यह है कि ध्यान के समय साधक स्वयं को एक ठोस पिंड (नमक के ढले की तरह) न मानकर, धीरे-धीरे उस अनंत चेतना के सागर में घुलता हुआ अनुभव करे। जैसे-जैसे 'मैं' का भाव गलता है, वैसे-वैसे वह 'एकतां गतः' (एकत्व प्राप्त) होता जाता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक 'साक्षी' से आगे बढ़कर 'साध्य' में ही विलीन हो जाता है। यहाँ प्रवेश का अर्थ है—स्वयं का पूर्ण समर्पण, जहाँ विलीन होने वाला और जिसमें विलीन हुआ जा रहा है, दोनों एक ही तत्व हो जाते हैं।
सा सूर्ये चैव हृदये परे ब्रह्मणि संस्थिता ।
तया गच्छन्ति विद्वांसो ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ ९.१०० ॥
वह (नाडी) सूर्यमें, हृदयमें और परब्रह्ममें स्थित है; उसके द्वारा ब्रह्मवेत्ता विद्वान् ब्रह्मको जाते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस 'परम धाम' का वर्णन किया जहाँ योगी नमक की भाँति घुलकर एकत्व को प्राप्त होता है। अब ऋषि इस एकत्व के उस सूक्ष्म मार्ग या सेतु का उद्घाटन कर रहे हैं जो स्थूल देह से लेकर परब्रह्म तक व्याप्त है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: सा (नाडी/मार्ग) सूर्ये चैव, हृदये, परे ब्रह्मणि (अपि) संस्थिता। तया ब्रह्मविदो जनाः विद्वांसो ब्रह्म गच्छन्ति।
पदार्थ और निर्वचन:
• सा: वह; यहाँ 'सा' सर्वनाम पिछले श्लोकों में वर्णित उस सूक्ष्म मार्ग या नाडी के लिए प्रयुक्त है। यह संभवतः वह मध्य-मार्ग (सुषुम्णा या अमा-बिंदु से निकला प्रकाश-स्तम्भ) है जो साधक को ऊपर ले जाता है।
• सूर्ये, हृदये, परे ब्रह्मणि: सूर्य में, हृदय में और परब्रह्म में। ये तीन भिन्न स्थान नहीं, अपितु एक ही चेतना के तीन स्तर हैं—बाह्य (सौर), आन्तर (हृदय) और सूक्ष्मतम (परब्रह्म)।
• संस्थिता: स्थित है; जो इन तीनों में समान रूप से व्याप्त और अविभाजित है।
• तया: उसके द्वारा; उस मार्ग के माध्यम से।
• ब्रह्मविदो जनाः: ब्रह्म को जानने वाले लोग; वे साधक जिन्होंने अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त कर लिया है।
• गच्छन्ति: जाते हैं; यहाँ 'जाना' भौतिक गमन नहीं, अपितु चेतना का एक स्तर से दूसरे स्तर में विलीन होना है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस रहस्यमय सेतु का वर्णन कर रहे हैं जो साधक की व्यक्तिगत चेतना को सार्वभौमिक ब्रह्म से जोड़ता है। ऋषि कहते हैं कि वह मार्ग (सा) सूर्य में, हृदय में और परब्रह्म में स्थित है।
बाह्य दृष्टि से सूर्य जगत की आत्मा है और प्रकाश का स्रोत है। आन्तर दृष्टि से हृदय वह आकाश है जहाँ आत्मा का वास है। और सूक्ष्मतम दृष्टि से वह परब्रह्म है जो समस्त अस्तित्व का आधार है। याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जो मार्ग हृदय के भीतर है, वही मार्ग सौर-मण्डल के केंद्र तक जाता है और अंततः उसी परब्रह्म में विलीन हो जाता है। यह एक ही ज्योति-पुंज है जिसे अलग-अलग स्तरों पर सूर्य, हृदय-ज्योति और ब्रह्म कहा गया है।
जब साधक इस मार्ग को पहचान लेता है, तब वह 'ब्रह्मवित्' कहलाता है। ऐसे विद्वान् इसी मार्ग के माध्यम से ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यहाँ 'ब्रह्म को जाना' का अर्थ है—अपनी सीमित पहचान को छोड़कर उस अनंत प्रकाश में समाहित हो जाना। यह गमन उसी प्रकार है जैसे नदी समुद्र में मिलकर समुद्र हो जाती है। यह मार्ग केवल उन्हीं के लिए खुलता है जिन्होंने अपनी वृत्तियों को शांत कर लिया है और जो अब केवल उस एक ही प्रकाश-तत्व के प्रति समर्पित हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ ८.२४–२५ ॥
अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायणके छः मास — इस मार्गसे गये हुए ब्रह्मवेत्ता जन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायनके छः मास — इस मार्गसे (गया) योगी चन्द्रमाकी ज्योतिको पाकर लौट आता है।
इस श्लोक की शब्दावली और भाव श्रीमद्भगवद्गीता के इस अंश से पूर्णतः मेल खाते हैं, जहाँ कहा गया है कि ज्योतिर्मय मार्ग से प्रयाण करने वाले ब्रह्मवेत्ता जन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ उस 'मार्ग' की सूक्ष्म शारीरिक और आध्यात्मिक स्थिति को स्पष्ट कर रही है कि वह मार्ग हृदय और सूर्य के माध्यम से परब्रह्म तक जाता है। जहाँ गीता मार्ग के लक्षणों (ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष) की चर्चा करती है, वहीं यह स्मृति उस मार्ग के 'स्थान' (हृदय, सूर्य, ब्रह्म) का बोध कराती है। दोनों ही ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि ब्रह्म की प्राप्ति केवल उन्हीं को होती है जो 'ब्रह्मविद्' हैं, अर्थात् जिन्होंने जीवन में ही उस तत्व का साक्षात्कार कर लिया है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अधिकार' और 'अभ्यास' का समन्वय है। योग का अभ्यास हृदय से आरम्भ होता है। साधक जब अपने हृदय-आकाश में स्थित ज्योति का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में उस मार्ग के प्रथम सोपान पर होता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक अपनी चेतना को हृदय के केंद्र में स्थित करे। जब हृदय की ज्योति प्रदीप्त होती है, तो वह साधक को अनुभव कराती है कि यही ज्योति बाह्य सूर्य में भी विद्यमान है। इस प्रकार 'हृदय-सूर्य' और 'बाह्य-सूर्य' का एकत्व घटित होता है। यह एकत्व ही वह 'मार्ग' (सा) है। जब साधक इस एकत्व को अनुभव करते हुए ऊपर की ओर बढ़ता है, तो वह भौतिक सूर्य की सीमाओं को पार कर उस 'परब्रह्म' में स्थित हो जाता है जहाँ न कोई सूर्य है, न कोई हृदय, केवल शुद्ध चैतन्य है।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि वह जिस ब्रह्म को खोजने निकला है, उसका मार्ग उसके अपने ही हृदय में स्थित है। यह मार्ग उसे स्थूल (देह) से सूक्ष्म (हृदय), सूक्ष्म से कारण (सूर्य/ज्योति) और कारण से अक्षर (परब्रह्म) की ओर ले जाता है। यह यात्रा 'अहं' से 'सोऽहम्' और अंततः केवल 'ब्रह्म' होने की यात्रा है।
श्रद्धायुक्ता ये ह्युपासन्ते अरण्ये
शान्ता विद्वांसो ब्रह्मचर्यं चरन्ति ।
ते सूर्यस्य द्वारेण विरजाः प्रयान्ति
यत्रासौ तिष्ठति पुरुषोऽव्ययात्मा ॥ ९.१०१ ॥
(मुण्डक १.२.११:) जो श्रद्धायुक्त, शान्त विद्वान् वनमें उपासना करते हैं, ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, वे निर्मल होकर सूर्यके द्वारसे वहाँ जाते हैं, जहाँ वह अविनाशी पुरुष स्थित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस सूक्ष्म मार्ग का वर्णन किया जो सूर्य, हृदय और परब्रह्म में समान रूप से स्थित है। अब ऋषि उस मार्ग पर चलने वाले साधक की योग्यताओं और उसके गंतव्य का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसके प्रमाण स्वरूप वे मुण्डक उपनिषद् के महान सत्य को यहाँ उद्धृत करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ये (जनाः) श्रद्धायुक्ताः, शान्ताः, विद्वांसो (च) अरण्ये उपासन्ते, ब्रह्मचर्यं चरन्ति; ते विरजाः सूर्यस्य द्वारेण प्रयान्ति यत्र असौ अव्ययात्मा पुरुषः तिष्ठति।
पदार्थ और निर्वचन:
• श्रद्धायुक्ताः: श्रद्धा से युक्त; यहाँ श्रद्धा का अर्थ केवल विश्वास नहीं, अपितु सत्य के प्रति वह अटूट निष्ठा है जो साधक को लक्ष्य से विचलित नहीं होने देती।
• अरण्ये: वन में; इसका बाह्य अर्थ एकांत स्थान है, किन्तु आन्तर अर्थ 'चित्त के अरण्य' (मन के शोर से मुक्त शून्य अवस्था) में स्थित होना है।
• शान्ताः: शांत; जिन्होंने इन्द्रिय-वृत्तियों और मानसिक विक्षेपों को जीत लिया है।
• विद्वांसो: विद्वान्; वे जो केवल शास्त्र-पण्डित नहीं, अपितु जिन्होंने आत्म-अनुभव द्वारा सत्य को जाना है।
• ब्रह्मचर्यं चरन्ति: ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं; वीर्य और प्राण की रक्षा कर उसे ऊर्ध्वमुखी करना।
• विरजाः: निर्मल या रज रहित; 'रज' का अर्थ यहाँ भौतिक धूल और मानसिक विकार (राग-द्वेष) दोनों हैं। जो इन दोनों से मुक्त हो गया, वह विरज है।
• सूर्यस्य द्वारेण: सूर्य के द्वार से; यह वह प्रकाश-मार्ग है जो हृदय-सूर्य से होकर ब्रह्माण्ड-सूर्य और फिर परब्रह्म तक जाता है।
• अव्ययात्मा पुरुषः: वह अविनाशी पुरुष; जो समय, स्थान और कारण से परे, अपरिवर्तनीय और शाश्वत है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस पात्रता का वर्णन कर रहे हैं जिसके बिना 'सूर्य-द्वार' का मार्ग खुलता नहीं है। यह श्लोक मुण्डक उपनिषद् (१.२.११) का साक्षात् स्वरूप है, जो यह सिद्ध करता है कि पिछले श्लोक (९.१००) में जिस मार्ग को सूर्य और हृदय में स्थित बताया गया, वह केवल उन्हीं के लिए सुलभ है जो विशिष्ट आंतरिक योग्यताओं से संपन्न हैं।
ऋषि चार अनिवार्य योग्यताओं का उल्लेख करते हैं: श्रद्धा, शान्ति, विद्या और ब्रह्मचर्य। श्रद्धा वह बीज है जिससे साधना का वृक्ष उगता है। शान्ति वह भूमि है जहाँ वह वृक्ष स्थिर होता है। विद्या वह प्रकाश है जो मार्ग दिखाता है और ब्रह्मचर्य वह शक्ति (ऊर्जा) है जो साधक को उस मार्ग पर चलने का बल प्रदान करती है। जब साधक 'अरण्ये' अर्थात् एकांत में या अपने भीतर के मौन में इन चारों का समन्वय करता है, तब वह 'विरज' हो जाता है। विरज होने का अर्थ है—साधक के भीतर अब कोई ऐसा अवरोध (रज) नहीं बचा जो उसे उसके मूल स्वरूप से अलग रखे।
जब साधक विरज होकर उस मार्ग पर प्रवृत्त होता है, तब वह 'सूर्य के द्वार' से प्रयाण करता है। यहाँ 'सूर्य का द्वार' वह बिंदु है जहाँ व्यक्तिगत चेतना (हृदय-सूर्य) और सार्वभौमिक चेतना (ब्रह्मांडीय सूर्य) एक हो जाते हैं। यह वह द्वार है जिसे पार कर साधक उस 'अव्यय पुरुष' में स्थित हो जाता है, जहाँ पहुँचकर पुनरावृत्ति का चक्र समाप्त हो जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक एक 'चेकलिस्ट' या योग्यता-सूची है। योगिश्वर याज्ञवल्क्य संकेत दे रहे हैं कि केवल क्रिया (प्राणायाम या ध्यान) पर्याप्त नहीं है, अपितु चार आंतरिक अवस्थाओं का होना अनिवार्य है:
१. श्रद्धा: साधक का अभ्यास तब तक सफल नहीं होता जब तक उसे अपनी आत्मा की पूर्णता पर अटूट विश्वास न हो।
२. शान्ति: चित्त की स्थिरता। यदि मन चंचल है, तो वह सूर्य-द्वार के सूक्ष्म कंपन को नहीं पकड़ पाएगा।
३. विद्या: विवेक का जागरण। यह जानना कि मैं देह नहीं, अपितु वह प्रकाश हूँ जो सूर्य का स्रोत है।
४. ब्रह्मचर्य: प्राण-शक्ति का ऊर्ध्वगमन। जब ऊर्जा नीचे के केंद्रों से ऊपर उठकर हृदय-सूर्य में एकत्रित होती है, तभी वह 'द्वार' खुलता है।
इन चारों के समन्वय से साधक 'विरज' होता है। योगिक अनुभव में विरज होना वह अवस्था है जब साधक के भीतर 'अहंकार' की रज समाप्त हो जाती है और वह केवल एक 'साक्षी' रह जाता है। यही वह स्थिति है जिसमें वह हृदय-सूर्य से निकलकर उस अविनाशी पुरुष (परब्रह्म) में विलीन हो जाता है। यह गमन भौतिक नहीं, अपितु चेतना का विस्तार है—पिण्ड से ब्रह्माण्ड की ओर।
हंसपदनिर्वचनम्
हन्त्यज्ञानं ततो हंस अश्रान्तपरिवर्तनात् ।
एवं पर्यायशब्दैस्तु एक एव निगद्यते ॥ ९.१०२ ॥
अथक परिक्रमणसे अज्ञानको नष्ट करता (हन्ति) है, इसलिए हंस (कहलाता है)। इस प्रकार पर्याय शब्दोंसे एक ही कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मुण्डक उपनिषद् के प्रमाण से उस परम धाम और सूर्य-द्वार के मार्ग का वर्णन किया, जिससे विरज साधक अविनाशी पुरुष को प्राप्त होते हैं। अब ऋषि उस परम पुरुष के 'हंस' रूप की निरुक्ति करते हुए इस नाम-प्रकरण का उपसंहार कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) अश्रान्तपरिवर्तनात् ततो हंस (कथ्यते), (सः) हन्त्यज्ञानं। एवं पर्यायशब्दैः तु एक एव निगद्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• अश्रान्तपरिवर्तनात्: बिना थके (अश्रान्त) निरंतर परिभ्रमण या परिवर्तन करने के कारण। यहाँ 'परिवर्तन' का अर्थ केवल स्थान बदलना नहीं, अपितु चेतना का निरंतर विस्तार और सूक्ष्मता की ओर गमन है।
• हंस: वह जो शुद्ध है और जो अज्ञान का नाश करता है।
• हन्ति: नष्ट करता है या मारता है। यहाँ 'हंस' शब्द की व्युत्पत्ति 'हन्' (मारना/नष्ट करना) धातु से की गई है।
• अज्ञानं: वह अविद्या जो आत्मा और अनात्मा के बीच भेद उत्पन्न करती है।
• पर्यायशब्दैः: समान अर्थ वाले विभिन्न शब्दों से (जैसे पिछले श्लोकों में आदित्य, रवि, भास्कर आदि कहा गया)।
• निगद्यते: कहा जाता है या वर्णित किया जाता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'हंस' शब्द का एक अत्यंत गूढ़ और तात्विक अर्थ प्रकट कर रहे हैं। सामान्यतः हंस को उसकी शुभ्रता या नीर-क्षीर विवेक के लिए जाना जाता है, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ उसकी क्रिया और प्रभाव पर बल दे रहे हैं। वे कहते हैं कि वह परम पुरुष 'हंस' इसलिए है क्योंकि वह 'अज्ञान' का हनन करता है।
यहाँ 'हन्ति' क्रिया महत्वपूर्ण है। अज्ञान कोई भौतिक वस्तु नहीं, अपितु एक आवरण है। जब साधक हृदय-सूर्य में स्थित उस ज्योति-पुरुष का अनुभव करता है, तो वह प्रकाश अज्ञान के अंधकार को वैसे ही नष्ट कर देता जैसे सूर्य के उदय होते ही रात्रि का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
इसके साथ ही, ऋषि 'अश्रान्तपरिवर्तनात्' कहकर एक महान रहस्य खोलते हैं। यह परम पुरुष, जो समस्त ब्रह्माण्ड का आधार है, वह स्थिर होते हुए भी निरंतर गतिशील है। वह सृष्टि के कण-कण में, हृदय के स्पंदन में और सूर्य की किरणों में बिना थके (अश्रान्त) परिभ्रमण कर रहा है। यह परिवर्तन स्थूल जगत का नहीं, अपितु चेतना का वह प्रवाह है जो जीव को पुनः ब्रह्म में विलीन करने के लिए निरंतर कार्यरत रहता है।
श्लोक के अंतिम चरण में—"एवं पर्यायशब्दैस्तु एक एव निगद्यते"—ऋषि इस पूरे नाम-प्रकरण का उपसंहार करते हैं। पिछले कई श्लोकों में उन्होंने उस एक ही तत्व को आदित्य, अर्यमा, सविता, भग, विश्वकर्मा, भास्कर, पूषा, अंशु, काल और रवि जैसे अनेक नामों से पुकारा। अब वे स्पष्ट करते हैं कि ये सभी नाम अलग-अलग देवताओं के नहीं, अपितु उसी एक 'परम पुरुष' के विभिन्न आयाम और गुण हैं। जिस प्रकार एक ही व्यक्ति पिता, पुत्र और भाई हो सकता है, उसी प्रकार वह एक ही आत्म-तत्व साधक की अवस्था और साधना के अनुसार अलग-अलग नामों से प्रकट होता है।
श्रुति-संगति —
इस रहस्य की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में मिलती है:
हंसः शुचिषदिति । असौ वा आदित्यो हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसदिति वायुर्वै वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदित्यग्निर्वै होता वेदिषदतिथिरिति सर्वेषां वा एष भूतानामतिथिर्दुरोणसदिति विषमसदित्येतन्नृषदिति प्राणो वै नृषन्मनुष्या नरस्तद्योऽयं मनुष्येषु प्राणोऽग्निस्तमेतदाह वरसदिति सर्वेषु ह्येष वरेषु सन्न ऋतसदिति सत्यसदित्येतद्व्योमसदिति सर्वेषु ह्येष व्योमसु सन्नोऽब्जा गोजा इत्यब्जाश्च ह्येष गोजाश्चऽर्तजा इति सत्यजा इत्येतदद्रिजा इत्यद्रिजा ह्येष ऋतमिति सत्यमित्येतद्बृहदिति निदधाति बृहद्ध्येष तद्यदेष तदेनमेतत्कृत्वा निदधाति ॥ ६.७.३.११ ॥
"हंसः शुचिषत्" — वह आदित्य ही हंस है, शुचि (द्युलोक) में बैठनेवाला; "वसुरन्तरिक्षसत्" — वायु ही वसु है, अन्तरिक्षमें बैठनेवाला; "होता वेदिषत्" — अग्नि ही होता है, वेदीपर बैठनेवाला; "अतिथिः" — यह सब भूतोंका अतिथि है; "दुरोणसत्" — विषम (स्थान) में बैठनेवाला; "नृषत्" — प्राण ही नृषत् है, मनुष्य नर हैं, अतः मनुष्योंमें जो यह प्राण है, वह अग्नि है — उसे यह कहता है; "वरसत्" — क्योंकि यह सब श्रेष्ठ (स्थानों) में बैठा है; "ऋतसत्" — सत्यमें बैठा; "व्योमसत्" — क्योंकि यह सब व्योमों (आकाशों) में बैठा है; "अब्जाः गोजाः" — यह जलसे और (किरण/वाणी-रूप) गौसे उत्पन्न है; "ऋतजाः" — सत्यसे उत्पन्न; "अद्रिजाः" — पर्वतसे उत्पन्न; "ऋतम्" — सत्य; "बृहत्" — (कहकर) रखता है, क्योंकि यह (आदित्य) बृहत् (महान्) है; उसे वैसा बनाकर रखता है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट कहती है—"असौ वा आदित्यो हंसः शुचिषत्", अर्थात् वह आदित्य ही हंस है जो शुचि (शुद्ध लोक या द्युलोक) में स्थित है। स्मृति और श्रुति दोनों का मेल यहाँ यह है कि 'हंस' केवल एक पक्षी या प्रतीक नहीं, अपितु वह आदित्य-स्वरूप परम पुरुष है जो शुद्धता का अधिष्ठाता है और जो अपनी प्रकाश-शक्ति से अज्ञान का नाश करता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गहरा व्यावहारिक अर्थ है। प्रथम यह कि अज्ञान का नाश केवल बौद्धिक तर्क से नहीं, अपितु उस 'हंस-स्वरूप' ज्योति के साक्षात्कार से होता है। जब साधक का ध्यान हृदय-सूर्य में स्थिर होता है, तब वह अनुभव करता है कि उसके भीतर एक ऐसी शक्ति है जो बिना थके (अश्रान्त) उसे ऊपर की ओर उठा रही है।
द्वितीय रहस्य यह है कि साधना में 'निरंतरता' (अश्रान्तता) ही सफलता की कुंजी है। जिस प्रकार वह परम पुरुष बिना थके परिभ्रमण करता है, उसी प्रकार साधक को भी अपने अभ्यास में अश्रान्त रहना चाहिए।
अंत में, पर्याय शब्दों का बोध साधक को 'नाम-भेद' से ऊपर उठाकर 'तत्व-एकत्व' की ओर ले जाता है। साधक यह अनुभव करता है कि वह चाहे किसी भी नाम से जप करे या किसी भी रूप का ध्यान करे, उसका लक्ष्य वही एक 'अविनाशी पुरुष' है। यह बोध उसे संकीर्णता से मुक्त कर उसे उस 'परम धाम' की ओर ले जाता है जहाँ नमक की भाँति सब कुछ एकत्व में विलीन हो जाता है।
सूर्यस्य वेदमयत्वम्
ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तु बिम्बं यस्य त्रयीमयम् ।
ऋग्भिस्तु तपते प्रातर्मध्याह्ने यजुभिस्तथा ॥ ९.१०३ ॥
जिसका बिम्ब ऋक्-यजुः-साममय, त्रयीमय है — वह प्रातः ऋचाओंसे तपता है, मध्याह्नमें यजुओंसे,
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'हंस' रूपी परम पुरुष की निरुक्ति करते हुए अज्ञान के हनन का रहस्य बताया। अब ऋषि उस परम पुरुष के स्वरूप का विस्तार करते हुए उसे 'वेदमय' सिद्ध कर रहे हैं, जिससे साधक के लिए सूर्य-ध्यान और त्रिकाल सन्ध्या का तात्विक आधार स्पष्ट हो सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तस्य) बिम्बं त्रयीमयम् (अस्ति), (सः) ऋग्यजुःसाममूर्तिः (अस्ति)। (सः) प्रातः ऋग्भिः तपते, तथा मध्याह्ने यजुभिः (तपते)।
पदार्थ और निर्वचन:
• बिम्बं: वह केंद्र या प्रतिबिम्ब जिस पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। यहाँ सूर्य का वह स्वरूप जो केवल भौतिक पिंड नहीं, अपितु चेतना का पुंज है।
• त्रयीमयम्: तीन वेदों (ऋक्, यजुः, साम) से निर्मित या उनमें व्याप्त। 'त्रयी' शब्द यहाँ केवल ग्रन्थों के लिए नहीं, अपितु उन तीन दिव्य शक्तियों के लिए है जो सृष्टि के संचालन और मोक्ष के साधन हैं।
• ऋग्यजुःसाममूर्तिः: जिसकी मूर्ति या स्वरूप ही ऋक्, यजुः और साम मन्त्रों का साकार रूप है।
• तपते: तपता है। यहाँ 'तपन' का अर्थ केवल ऊष्मा देना नहीं, अपितु 'तप' (तेज) का प्रकटीकरण है। मन्त्रों के प्रभाव से जो प्रकाश और ऊर्जा उत्सर्जित होती है, उसे ही यहाँ 'तपना' कहा गया है।
• प्रातः ऋग्भिः: प्रातःकाल में ऋचाओं (ऋक्) के माध्यम से।
• मध्याह्ने यजुभिः: मध्याह्न के समय यजुस (यजुः) के माध्यम से।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सूर्य के उस स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं जो 'वेदमय' है। यह श्लोक एक वृहत्तर वाक्य का आरम्भ है, जो अगले श्लोक (९.१०४) में पूर्ण होता है। ऋषि कहते हैं कि उस परम पुरुष का बिम्ब 'त्रयीमय' है। इसका अर्थ यह है कि जिसे हम आकाश में सूर्य के रूप में देखते हैं और जिसे हृदय में ज्योति-पुरुष के रूप में अनुभव करते हैं, वह वास्तव में वेदों की शक्ति का साकार रूप है।
यहाँ 'बिम्ब' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग में बिम्ब वह आधार होता है जिस पर चित्त को स्थिर किया जाता है। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि बिम्ब त्रयीमय है, तो वे संकेत दे रहे हैं कि सूर्य का ध्यान केवल एक भौतिक पिंड का ध्यान नहीं है, अपितु वेदों के मन्त्र-स्वर और उनके अर्थों का ध्यान है।
ऋषि समय के अनुसार सूर्य की तपन (तेज) के भिन्न-भिन्न स्वरूपों को वेदों से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि प्रातःकाल सूर्य ऋचाओं (ऋक्) से तपता है। ऋक् मन्त्रों का स्वभाव 'स्तुति' और 'उद्घोष' है, जो चेतना को जाग्रत करने वाले होते हैं। जिस प्रकार प्रातःकाल सूर्य की किरणें संसार को जाग्रत करती हैं, उसी प्रकार ऋक् मन्त्र साधक की सुप्त चेतना को जाग्रत कर उसे ज्ञान की ओर प्रवृत्त करते हैं।
तदुपरांत, मध्याह्न में सूर्य यजुस (यजुः) से तपता है। यजुः का स्वभाव 'यज्ञ' और 'कर्म' है। मध्याह्न का समय पूर्ण प्रखरता और क्रियाशीलता का होता है। यहाँ यजुः मन्त्रों की शक्ति सूर्य के ताप में प्रतिबिम्बित होती है, जो अशुद्धियों को भस्म करने वाली और कर्म-फल को परिपक्व करने वाली होती है।
इस प्रकार, बाहरी सूर्य की गतियाँ वास्तव में वेदमय चेतना का प्रकटीकरण हैं। यह स्मृति यहाँ यह स्पष्ट कर रही है कि जो मन्त्र श्रुति में बीजरूप में हैं, वे ही सूर्य के तेज के रूप में दृश्यमान हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'त्रिकाल सन्ध्या' के अभ्यास का आंतरिक आधार प्रस्तुत करता है। सामान्यतः सन्ध्या केवल एक विधि मानी जाती है, किन्तु यहाँ उसका योगिक रहस्य यह है कि साधक अपने भीतर के सूर्य को वेदमय अनुभव करे।
जब साधक प्रातःकाल ऋचाओं का जप करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करता, अपितु अपने हृदय-सूर्य में उस 'ऋक्-तेज' को जाग्रत करता है जो उसे अज्ञान की निद्रा से उठाता है। मध्याह्न में जब वह यजुस का स्मरण करता है, तो वह अपने भीतर की प्राणाग्नि को प्रज्वलित कर समस्त मानसिक मलिनताओं का होम करता है।
साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि उसके भीतर का सूर्य और आकाश का सूर्य एक ही हैं, और दोनों ही वेदों की शक्ति से संचालित हैं। वह इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ उसे यह बोध होता है कि मन्त्र केवल वाणी के शब्द नहीं, अपितु प्रकाश की किरणें हैं। वह 'शब्द-ब्रह्म' से 'ज्योति-ब्रह्म' की ओर गमन करता है। यहाँ अभ्यास यह है कि सूर्य के दर्शन करते समय यह भाव रखा जाए कि यह सूर्य साक्षात ऋक् और यजुः का स्वरूप है, जिससे उसकी चेतना में वेदों का तेज उतरने लगे।
सामभिश्चापराह्णे वै अथर्वाङ्गिरसो निशि ।
ऋचोऽस्य मण्डलं ह्येतत् सामान्यर्चींषि यानि तु ॥ ९.१०४ ॥
अपराह्णमें सामोंसे, और रात्रिमें अथर्वाङ्गिरस (मन्त्रों) से। ऋचाएँ इसका मण्डल हैं, और साम (इसकी) ज्वालाएँ (अर्चियाँ) —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के वेदमय बिम्ब का वर्णन करते हुए बताया कि वह प्रातः ऋचाओं से और मध्याह्न में यजुषों से तपता है। अब ऋषि इस काल-क्रम को पूर्ण करते हुए अपराह्ण और रात्रि के वेदमय स्वरूप तथा सूर्य-मण्डल की आंतरिक संरचना का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (सः) अपराह्णे सामभिः च, वै निशि अथर्वाङ्गिरसैः (तपते)। अस्य मण्डलं हि एतत् ऋचः (सन्ति), (तस्य) यानि तु अर्चींषि (सन्ति), तानि सामान्यचींषि (सन्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सामभिः: सामवेदी मन्त्रों के द्वारा। साम का अर्थ है 'गायन' या 'लय', जो हृदय के भावों को परमात्मा से जोड़ता है।
• अथर्वाङ्गिरसैः: अथर्ववेद के मन्त्रों के द्वारा। यहाँ 'अथर्वाङ्गिरस' शब्द उस ज्ञान का प्रतीक है जो भौतिक और आध्यात्मिक जगत के समन्वय से सुरक्षा और सिद्धि प्रदान करता है।
• निशि: रात्रि में। यहाँ रात्रि केवल समय नहीं, अपितु अंतर्मुखी होने और निद्रा-जाग्रत की संधि का समय है।
• मण्डलं: वह गोलाकार क्षेत्र या प्रभामंडल। योगिक दृष्टि से यह हृदय-आकाश में स्थित सूर्य का वह प्रकाश-पुंज है जिसमें संपूर्ण ब्रह्माण्ड समाहित है।
• अर्चिम्षि/सामान्यर्चींषि: 'अर्चि' का अर्थ है ज्वाला या प्रकाश की किरणें। 'सामान्यर्चींषि' का अर्थ है वे किरणें जो एक ही मूल स्रोत (परमात्मा) से निकलकर सर्वत्र व्याप्त हैं।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (९.१०३) से आरम्भ हुए वाक्य का विस्तार है और इसका पूर्ण अर्थ अगले श्लोक (९.१०५) में जाकर स्पष्ट होता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सूर्य के समय-चक्र और उसके वेदमय स्वरूप का समन्वय कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार प्रातः ऋचाएँ और मध्याह्न यजुसें तपते हैं, उसी प्रकार अपराह्ण के समय सूर्य 'साम' मन्त्रों से तपता है और रात्रि में 'अथर्वाङ्गिरस' मन्त्रों से।
यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि ऋषि ने अथर्ववेद को रात्रि के समय से जोड़ा है। यह संकेत है कि जब बाहरी जगत का प्रकाश लुप्त हो जाता है, तब साधक के भीतर का वह ज्ञान जाग्रत होता है जो स्थूल और सूक्ष्म के बीच सेतु का कार्य करता है। इस प्रकार, चारों वेदों का समय-विभाजन वास्तव में साधक की चेतना के विभिन्न स्तरों का प्रकटीकरण है।
इसके पश्चात, ऋषि सूर्य-मण्डल की सूक्ष्म संरचना बताते हैं। वे कहते हैं कि सूर्य का जो 'मण्डल' (मुख्य गोला) है, वह वास्तव में 'ऋचाओं' का स्वरूप है। ऋचाएँ ज्ञान का वह आधार हैं जो प्रकाश फैलाती हैं। और उस मण्डल से जो 'अर्चियाँ' (ज्वालाएँ या किरणें) निकलती हैं, वे 'साम' मन्त्रों का साकार रूप हैं। जिस प्रकार साम मन्त्रों में लय और प्रवाह होता है, उसी प्रकार सूर्य की किरणें भी एक प्रवाह में निकलकर संपूर्ण सृष्टि को स्पंदित करती हैं।
यहाँ बाहरी सूर्य और आंतरिक सूर्य का भेद मिट जाता है। जो बाहर प्रकाश दे रहा है, वही भीतर ज्ञान के रूप में तप रहा है। यह विधान साधक को यह समझाता है कि वेद केवल ग्रन्थ नहीं हैं, अपितु वे ब्रह्माण्ड की वह ऊर्जा हैं जो सूर्य के रूप में प्रत्यक्ष और हृदय के रूप में सूक्ष्म हैं।
श्रुति-संगति —
यदेतन्मण्डलं तपति तन्महदुक्थं ता ऋचः स ऋचां लोकोऽथ यदेतदर्चिर्दीप्यते तन्महाव्रतं तानि सामानि स साम्नां लोकोऽथ य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषः सोऽग्निस्तानि यजूंषि स यजुषां लोकः ॥ १०.५.२.६ ॥
यह जो मण्डल तपता है, वह महदुक्थ है; वे ऋचाएँ हैं; वह ऋचाओंका लोक है। और यह जो ज्योति (अर्चि) दीप्त होती है, वह महाव्रत है; वे साम हैं; वह सामोंका लोक है। और इस मण्डलमें जो यह पुरुष है, वह अग्नि है; वे यजुः हैं; वह यजुओंका लोक है।
इस श्रुति-अंश में स्पष्ट कहा गया है कि जो मण्डल तपता है वह 'महदुक्थ' (ऋचाएँ) है और जो अर्चि (ज्योति) दीप्त होती है वह 'महाव्रत' (साम) है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति का विस्तार है। श्रुति जहाँ मण्डल को ऋचाओं और अर्चि को सामों से जोड़ती है, वहीं यह स्मृति उसमें 'अथर्वाङ्गिरस' और 'रात्रि' के समय को जोड़कर साधना के चक्र को पूर्ण करती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'दर्शन को स्वाध्याय' बनाना है। सामान्य मनुष्य सूर्य को केवल एक भौतिक पिंड के रूप में देखता है, किन्तु योगी जब सूर्य-मण्डल का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में वेदों के साकार रूप का दर्शन करता है।
अभ्यास यह है कि साधक जब संध्या-वंदन या सूर्य-ध्यान करे, तो वह यह अनुभव करे कि उसके भीतर का सूर्य ऋक्, यजुः, साम और अथर्व के प्रकाश से आलोकित है। जब वह मण्डल का ध्यान करता है, तो वह 'ऋचाओं' (शुद्ध ज्ञान) में स्थित होता है, और जब वह किरणों (अर्चियों) का अनुभव करता है, तो वह 'साम' (दिव्य आनंद और लय) में विलीन होता है।
यह अभ्यास साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ मन्त्र और मन्त्र का अर्थ एक हो जाते हैं। यहाँ 'तपना' केवल ताप सहना नहीं, बल्कि अविद्या के अंधकार को मन्त्र-शक्ति से भस्म करना है। साधक यह अनुभव करता है कि उसका हृदय ही वह सूर्य-मण्डल है, जहाँ वेदों की ऋचाएँ प्रकाश बनकर और साम की किरणें आनंद बनकर प्रवाहित हो रही हैं।
सूर्यमण्डलस्थपुरुषस्वरूपम्
यजुः शुक्ला च गुह्या च तनुः सूक्ष्मा च मण्डले ।
यश्च मण्डलमध्यस्थो यं च वेत्थ हुताशने ॥ ९.१०५ ॥
— यजुः (उस) मण्डलमें शुक्ल, गुह्य और सूक्ष्म शरीर है; और जो मण्डलके बीचमें स्थित है, जिसे तुम अग्निमें (भी) जानते हो —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के वेदमय बिम्ब का वर्णन करते हुए बताया कि सूर्य का मण्डल ऋचाओं से बना है और उसकी ज्वालाएँ सामान्य (एक ही मूल से निकली) हैं। अब ऋषि इस मण्डल की आंतरिक संरचना और उसमें प्रतिष्ठित 'यजुः' रूपी सूक्ष्म शरीर के रहस्य को प्रकट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तस्य) मण्डले यजुः शुक्ला च गुह्या च तनुः सूक्ष्मा च (अस्ति)। यः (पुरुषः) मण्डलमध्यस्थः (अस्ति), (तम्) यं च (त्वं) हुताशने वेत्थ (तस्य ध्यानं कुरु)।
पदार्थ और निर्वचन:
• यजुः: यहाँ 'यजुः' केवल यजुर्वेद के मन्त्र नहीं, अपितु वह 'यज्ञ-तत्व' या 'क्रिया-शक्ति' है जो मण्डल के भीतर व्यवस्थित है। यह वह शक्ति है जो स्थूल को सूक्ष्म में विलीन करती है।
• शुक्ला: श्वेत, निर्मल और प्रकाशमय। योगिक दृष्टि से यह सात्विक ऊर्जा का प्रतीक है जो ज्योतिर्मय है।
• गुह्या: यहाँ 'गुह्य' का अर्थ गोपनीय विधि नहीं, अपितु 'अंतर्निहित' या 'छिपा हुआ' है। वह शरीर जो स्थूल दृष्टि से ओझल है, केवल अंतर्दृष्टि से दृश्य है।
• तनुः सूक्ष्मा: सूक्ष्म शरीर। वह शरीर जो भौतिक पंचभूतों से परे, केवल प्रकाश और चेतना के स्पंदन से बना है।
• मण्डलमध्यस्थो: मण्डल के केंद्र में स्थित। वह बिंदु जहाँ समस्त किरणें विलीन होती हैं और जहाँ से उनका उद्गम होता है।
• हुताशने: अग्नि में। 'हुताशन' वह है जो आहुतियों को भक्षण करता है। यहाँ इसका संकेत बाहरी होम-कुण्ड की अग्नि और भीतर की प्राणाग्नि दोनों से है।
भाष्य —
यह श्लोक एक सेतु है, जो सूर्य के बाहरी वेदमय स्वरूप (श्लोक ९.१०३-१०४) को उसके केंद्र में स्थित 'पुरुष' (श्लोक ९.१०६) से जोड़ता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं कि सूर्य-मण्डल केवल प्रकाश का पुंज नहीं है, अपितु वह एक जीवंत, सूक्ष्म शरीर है।
ऋषि कहते हैं कि इस मण्डल में 'यजुः' रूपी एक शरीर प्रतिष्ठित है। यह शरीर 'शुक्ल' (निर्मल प्रकाशमय), 'गुह्य' (अंतर्निहित) और 'सूक्ष्म' है। इसका अर्थ यह है कि जिस प्रकार यजुर्वेद में यज्ञ की विधियाँ बाहरी क्रियाओं के माध्यम से आंतरिक शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती हैं, उसी प्रकार सूर्य-मण्डल के भीतर एक ऐसी सूक्ष्म क्रियाशील शक्ति है जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन कर रही है। यह 'यजुः-तनु' वह सेतु है जो प्रकाश (ऋक्) और लय (साम) के बीच समन्वय स्थापित करता है।
श्लोक का दूसरा भाग साधक को एक महान सत्य की ओर ले जाता है: "जो मण्डल के मध्य में स्थित है, जिसे तुम अग्नि में भी जानते हो।" यहाँ याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सूर्य और अग्नि अलग-अलग नहीं हैं। जो पुरुष सूर्य-मण्डल के केंद्र में स्थित है, वही पुरुष पृथ्वी पर अग्नि के रूप में विद्यमान है। अग्नि, सूर्य का ही पार्थिव रूप है। अतः, जो साधक बाहरी अग्निहोत्र करता है, यदि वह उस अग्नि के भीतर उसी 'मण्डलमध्यस्थ पुरुष' को देख सके, तो उसकी बाहरी क्रिया एक आंतरिक योग बन जाती है।
यह वाक्य पिछले श्लोकों के क्रम को पूर्ण करते हुए अगले श्लोक (९.१०६) की ओर ले जाता है, जहाँ इस मण्डलमध्यस्थ पुरुष के स्वरूप (हिरण्मय, दीप्तिमान) का ध्यान करने का निर्देश दिया गया है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'बाह्य' से 'आंतर' की यात्रा का सूत्र है। सामान्यतः मनुष्य अग्नि को केवल ताप और प्रकाश का स्रोत मानता है, किन्तु योगी अग्नि में उस 'मण्डलमध्यस्थ पुरुष' का दर्शन करता है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक अग्निहोत्र या किसी भी अग्नि-साधना में लीन होता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि जिस अग्नि में वह आहुति दे रहा है, वह वास्तव में हृदय-आकाश के सूर्य-मण्डल का ही प्रतिबिंब है। वह 'यजुः-तनु' (सूक्ष्म शरीर) का ध्यान करे जो शुक्ल और निर्मल है।
यहाँ साधक 'स्थूल अग्नि' से 'सूक्ष्म सूर्य' और फिर 'हृदय-सूर्य' की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ उसे यह बोध होता है कि ब्रह्माण्ड का केंद्र (सूर्य) और शरीर का केंद्र (हृदय) एक ही पुरुष के द्वारा प्रकाशित हैं। इस प्रकार, अग्नि में पुरुष को देखना, वास्तव में अपने भीतर के उस सूक्ष्म, गुह्य और शुक्ल शरीर को जाग्रत करना है, जो आत्मा का स्वरूप है।
पुरुषं मण्डलान्तस्थं दीप्तिमन्तं हिरण्मयम् ।
ज्वालासहस्रसंकीर्णमग्निरूपं समन्ततः ॥ ९.१०६ ॥
— (उस) मण्डलके भीतर स्थित, दीप्तिमान, सुवर्णमय, हजारों ज्वालाओंसे भरे, सब ओर अग्निरूप पुरुष (का ध्यान करे)।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य-मण्डल के भीतर स्थित 'यजुः' रूपी सूक्ष्म और गुह्य शरीर का संकेत दिया था तथा उस मण्डलमध्यस्थ पुरुष की ओर ध्यान आकर्षित किया था, जिसे साधक बाहरी अग्नि (हुताशन) में भी अनुभव करता है। अब इस श्लोक में उस पुरुष के स्वरूप का प्रत्यक्ष और विस्तृत विवरण दिया गया है, ताकि साधक ध्यान के लिए एक निश्चित बिम्ब ग्रहण कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तस्य) मण्डलान्तस्थं, दीप्तिमन्तं, हिरण्मयम्, ज्वालासहस्रसंकीर्णं, समन्ततः अग्निरूपं (तम्) पुरुषं (ध्यानं कुरु)।
पदार्थ और निर्वचन:
• मण्डलान्तस्थं: मण्डल के भीतर स्थित। यहाँ 'अन्त' का अर्थ केवल सीमा नहीं, अपितु 'आंतरिक हृदय' या केंद्र है।
• दीप्तिमन्तं: अत्यधिक प्रकाशवान। वह प्रकाश जो अंधकार का अभाव नहीं, अपितु स्वयं चैतन्य की प्रदीप्ति है।
• हिरण्मयम्: सुवर्णमय या स्वर्ण के समान। शास्त्र में 'हिरण्य' शब्द शुद्धतम प्रकाश और अविनाशी तत्व का प्रतीक है।
• ज्वालासहस्रसंकीर्णम्: हजारों ज्वालाओं से व्याप्त या घिरा हुआ। 'संकीर्ण' का अर्थ यहाँ मिश्रित या चारों ओर से लिपटा हुआ है। यह ज्वालाएँ मन्त्रों की वह ऊर्जा हैं जो साधक के अज्ञान को भस्म करती हैं।
• समन्ततः अग्निरूपं: सब ओर से अग्नि के स्वरूप वाला। अग्नि यहाँ केवल दाहक नहीं, अपितु रूपांतरण की शक्ति है।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (९.१०५) के अधूरे वाक्य को पूर्ण करता है। पिछले श्लोक में प्रश्न था कि "जो मण्डल के बीच में स्थित है और जिसे तुम अग्नि में जानते हो, वह कौन है?" इस श्लोक में उसका उत्तर और ध्यान-विधि दी गई है। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि उस मण्डल के केंद्र में स्थित वह पुरुष अत्यंत दीप्तिमान और हिरण्मय (स्वर्णमय) है।
यहाँ 'हिरण्मय' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल रंग का वर्णन नहीं है, अपितु उस अवस्था का बोध है जहाँ साधक की चेतना शुद्धतम प्रकाश में परिवर्तित हो जाती है। यह पुरुष 'ज्वालासहस्रसंकीर्ण' है, अर्थात वह हजारों प्रज्वलित ज्वालाओं के बीच स्थित है। ये ज्वालाएँ वास्तव में वे ऋचाएँ और साम-मन्त्र हैं, जिनका वर्णन पिछले श्लोकों (९.१०३-१०४) में किया गया था। जिस प्रकार सूर्य की किरणें बाहर की ओर फैलती हैं, उसी प्रकार यह पुरुष उन समस्त ऊर्जा-धाराओं का केंद्र बिंदु है।
'समन्ततः अग्निरूपं' कहकर ऋषि यह स्पष्ट करते हैं कि उस पुरुष का कोई भौतिक शरीर नहीं है, वह साक्षात् अग्नि-तत्त्व है। बाहरी दृष्टि से यह सूर्य की दाहक अग्नि है, किन्तु आंतरिक दृष्टि से यह 'प्राणाग्नि' है जो हृदय-आकाश में प्रज्वलित है। यह वह अग्नि है जो समस्त संस्कारों को जलाकर जीव को शुद्ध करती है। अतः साधक को निर्देश है कि वह अपनी दृष्टि को बाहरी सूर्य से हटाकर, हृदय के भीतर स्थित उसी दीप्तिमान, स्वर्णमय और अग्निरूप पुरुष पर एकाग्र करे।
योग-रहस्य —
योगिक अभ्यास की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाली एक सोपान-विधि है। साधक का अभ्यास तीन चरणों में घटित होता है:
प्रथम, साधक सूर्य के बाहरी 'मण्डल' का विचार करता है। यह बाहरी जगत और स्थूल शरीर का प्रतीक है।
द्वितीय, वह मण्डल के 'भीतर' (मण्डलान्तस्थ) प्रवेश करता है। यह प्रत्याहार की अवस्था है, जहाँ इंद्रियाँ बाहर से सिमटकर भीतर की ओर मुड़ती हैं।
तृतीय, वह केंद्र में स्थित 'हिरण्मय पुरुष' का दर्शन करता है। यह ध्यान की वह भूमि है जहाँ साधक अनुभव करता है कि उसके हृदय के भीतर भी वही सूर्य स्थित है, जो स्वर्ण के समान शुद्ध और प्रकाशमय है।
साधक जब 'ज्वालासहस्र' का अनुभव करता है, तो वह वास्तव में अपनी प्राण-ऊर्जा के तीव्र स्पंदन का अनुभव कर रहा होता है। यह ज्वालाएँ अज्ञान के आवरणों को जलाती हैं। जब साधक इस पुरुष को 'समन्ततः अग्निरूप' देखता है, तब वह अपनी व्यक्तिगत पहचान (अहंकार) को उस विराट अग्नि में होम कर देता है। इस अभ्यास से साधक 'सात्विक भूमि' से उठकर 'प्रकाश-मय भूमि' की ओर अग्रसर होता है, जहाँ केवल शुद्ध चैतन्य शेष रहता है। यह ध्यान साधक को यह अनुभव कराता है कि जो तेज आकाश के सूर्य में है, वही तेज उसके अपने हृदय-मण्डल के केंद्र में प्रतिष्ठित है।
स सूर्ये ज्योतिरित्युक्तं बहिस्तेजो विनिर्गतम् ।
पुरुषान्तर्गतं सूक्ष्मं शुक्लाच्छुक्लतरं हि तत् ॥ ९.१०७ ॥
"सूर्यो ज्योतिः" — यह (मन्त्र) बाहर निकले तेजको कहता है; पुरुषके भीतर स्थित सूक्ष्म (तेज) शुक्लसे भी शुक्लतर है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में मण्डलमध्यस्थ पुरुष के दीप्तिमान और हिरण्मय स्वरूप का वर्णन किया गया था, जो हजारों ज्वालाओं से घिरा हुआ है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस दीप्ति के दो स्तरों—बाह्य और आंतरिक—के बीच का भेद स्पष्ट कर रहे हैं, ताकि साधक केवल भौतिक प्रकाश में न उलझे, अपितु उसके मूल स्रोत तक पहुँचे।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तस्य) सूर्ये ज्योतिः इति (मन्त्रेण) उक्तं (तेजः), बहिस्तेजो विनिर्गतम् (अस्ति) । (किन्तु) पुरुषान्तर्गतं (तेजः) सूक्ष्मं (अस्ति), (तत्) शुक्लाच्छुक्लतरं हि तत् (अस्ति) ।
पदार्थ और निर्वचन:
• सूर्ये ज्योतिः: यह अग्निहोत्र के मन्त्र का अंश है। यहाँ 'ज्योतिः' का अर्थ वह प्रकाश है जो दृश्यमान है।
• विनिर्गतम्: बाहर निकला हुआ या प्रस्फुटित। जो केंद्र से परिधि की ओर प्रवाहित होकर इंद्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सके।
• पुरुषान्तर्गतं: उस हिरण्मय पुरुष के भीतर स्थित। यह 'अन्तर्गत' शब्द स्थूल शरीर के भीतर नहीं, अपितु चैतन्य पुरुष के सूक्ष्म केंद्र की ओर संकेत करता है।
• सूक्ष्मं: वह जो इंद्रियों की पकड़ से परे है, अत्यंत महीन और गहन।
• शुक्लाच्छुक्लतरं: शुक्ल (सफेद/शुद्ध) से भी अधिक शुक्ल। 'शुक्ल' यहाँ प्रकाश और पवित्रता का प्रतीक है। 'शुक्लतर' का अर्थ है वह परम प्रकाश जो भौतिक श्वेत प्रकाश की तुलना में करोड़ों गुना अधिक प्रदीप्त और निर्मल है।
भाष्य —
यह श्लोक मन्त्र के शाब्दिक अर्थ और उसके योगिक रहस्य के बीच की कड़ी है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'सूर्यो ज्योतिः' मन्त्र की व्याख्या कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब हम मन्त्र में कहते हैं कि "सूर्य ज्योति है", तो सामान्यतः हमारा बोध उस तेज की ओर जाता है जो सूर्य से बाहर निकलकर संपूर्ण जगत को आलोकित कर रहा है। यह 'विनिर्गत' तेज है—वह प्रकाश जो भौतिक नेत्रों से दिखाई देता है और जिससे दिन का बोध होता है।
किन्तु, योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधक को चेतावनी देते हैं कि वह केवल इस बाह्य प्रकाश पर न रुक जाए। वे रहस्य खोलते हैं कि जिस पुरुष (परमात्मा/आत्मा) के कारण यह बाहरी प्रकाश प्रकट हुआ है, उस पुरुष के भीतर एक और 'सूक्ष्म ज्योति' विद्यमान है। यह आंतरिक ज्योति बाह्य प्रकाश का कारण है, इसलिए यह बाह्य शुक्ल प्रकाश से भी अधिक 'शुक्लतर' (अधिक उज्ज्वल और शुद्ध) है।
यहाँ बाहरी तेज और भीतरी तेज में कोई विरोध नहीं है, बल्कि एक ही तत्व की दो अवस्थाएँ हैं। जैसे दीपक की लौ बाहर दिखती है, किन्तु उस लौ को प्रज्वलित रखने वाली ऊर्जा उसके भीतर निहित होती है, वैसे ही सूर्य का बाह्य प्रकाश उस आंतरिक सूक्ष्म पुरुष की दीप्ति का ही विस्तार है। यह स्मृति यहाँ स्पष्ट करती है कि बाहरी विधि (अग्निहोत्र और सूर्य-ध्यान) वास्तव में साधक को उस 'शुक्लतर' सूक्ष्म ज्योति की ओर ले जाने का साधन है।
श्रुति-संगति —
अथ प्रातः । सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहेति तदुभयतो ज्योती रेतो देवतया परिगृह्णात्युभयतःपरिगृहीतं वै रेतः प्रजायते तदुभयत एवैतत्परिगृह्य प्रजनयति तत्प्रजननस्य रूपम् ॥ २.३.१.३३ ॥
फिर प्रातः (आहुति) — "सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (सूर्य ज्योति है, ज्योति सूर्य है)। (सायं और प्रातः दोनों मन्त्रोंसे) वह दोनों ओरसे ज्योतिरूप देवताके द्वारा (आहुतिरूप) रेतको घेर लेता है; दोनों ओरसे घिरा रेत ही प्रजनन करता है; इस प्रकार दोनों ओरसे घेरकर वह (उसे) उत्पन्न करता है — यह प्रजननका रूप है।
शतपथ ब्राह्मण में प्रातःकालीन अग्निहोत्र के मन्त्र "सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" का उल्लेख है। श्रुति यहाँ ज्योति और सूर्य के अभेद को दर्शाती है और इसे 'प्रजनन का रूप' कहती है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-मन्त्र का विस्तार करती है। जहाँ शतपथ में इस ज्योति को आहुति और प्रजनन (सृष्टि) से जोड़ा गया है, वहीं यह स्मृति उसे साधक के आंतरिक अनुभव से जोड़ती है। श्रुति का 'ज्योतिः सूर्यः' यहाँ बाह्य प्रकाश है, और स्मृति का 'शुक्लतरं सूक्ष्मं' उसी ज्योति का वह बीज-रूप है जो हृदय-पुरुष में स्थित है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'दृष्टि-परिवर्तन' का अभ्यास है। जब साधक सूर्योपस्थान या अग्निहोत्र के समय "सूर्यो ज्योतिः" मन्त्र का उच्चारण करता है, तो उसका अभ्यास इस प्रकार होना चाहिए:
१. प्रथम चरण में वह सूर्य के बाह्य प्रकाश (विनिर्गत तेज) का अनुभव करे। यह उसे स्थूल जगत से जोड़ता है।
२. द्वितीय चरण में, वह उस बाह्य प्रकाश को एक बिंदु के रूप में समेटकर अपने भीतर के 'सूक्ष्म पुरुष' में विलीन कर दे।
३. तृतीय चरण में, वह अनुभव करे कि हृदय के भीतर जो प्रकाश है, वह बाहर दिखने वाले सूर्य से कहीं अधिक उज्ज्वल, शीतल और शुद्ध (शुक्लतर) है।
यह अभ्यास साधक को 'बाह्य-अग्नि' से 'प्राणाग्नि' की ओर ले जाता है। जब साधक बाहरी प्रकाश को भीतर के सूक्ष्म प्रकाश में विलीन करता है, तब वह भौतिक दृष्टि से ऊपर उठकर 'ज्ञान-दृष्टि' की भूमि पर प्रवेश करता है। यहाँ 'शुक्लतर' का अनुभव होना इस बात का प्रमाण है कि साधक अब केवल इंद्रिय-बोध से नहीं, अपितु अंतःप्रज्ञा से प्रकाश को देख रहा है।
भूर्भुवः स्वरिति यः सूर्ये ज्योतिरितीति च ।
अग्निहो(हो)त्रतनुर्ह्येष पुरुषाकृतिमण्डले ॥ ९.१०८ ॥
सूर्यमें जो "भूः भुवः स्वः" और "(सूर्यो) ज्योतिः" है — यही पुरुषाकार मण्डलमें अग्निहोत्रका शरीर है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य के बाह्य तेज और पुरुष के भीतर स्थित 'शुक्लतर' सूक्ष्म तेज के अंतर को स्पष्ट किया था। अब वे इस सूक्ष्म तेज का सम्बन्ध उन मन्त्रों और विधियों से जोड़ रहे हैं, जिन्हें साधक बाह्य कर्मों में प्रयोग करता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: भूर्भुवः स्वरिति (यः) (मन्त्रः), (तथा) सूर्ये ज्योतिरिति (यः) (मन्त्रः) च, (तौ) पुरुषाकृतिमण्डले अग्निहोत्रतनुः हि एष (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• भूर्भुवः स्वः: ये तीन व्याहृतियाँ हैं। सामान्यतः इन्हें पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ लोक कहा जाता है, किन्तु यहाँ ये उस पुरुष के स्वरूप के तीन आयामों के संकेत हैं।
• सूर्ये ज्योतिः: यह अग्निहोत्र के मन्त्र का वह अंश है जो सूर्य के प्रकाशरूप स्वभाव को उद्घाटित करता है।
• पुरुषाकृतिमण्डले: उस ज्योतिर्मय मण्डल में जो मनुष्य के स्वरूप (पुरुषाकार) में स्थित है। यह भौतिक शरीर नहीं, अपितु प्रकाश का वह विन्यास है जो चैतन्य पुरुष का प्रतिनिधित्व करता है।
• अग्निहोत्रतनुः: अग्निहोत्र का शरीर। यहाँ 'तनु' का अर्थ भौतिक देह नहीं, अपितु 'स्वरूप' या 'अभिव्यक्ति' है। अग्निहोत्र केवल बाहर की अग्नि में आहुति देना नहीं, अपितु उस पुरुष के स्वरूप में प्राणों का अर्पण है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं। साधक जब संध्या के समय 'भूर्भुवः स्वः' का जप करता है या अग्निहोत्र के समय 'सूर्यो ज्योतिः' का उच्चारण करता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा होता, अपितु वह उस पुरुष के शरीर के विभिन्न अंगों और आयामों का आवाहन कर रहा होता है।
ऋषि कहते हैं कि सूर्य में जो 'भूर्भुवः स्वः' की शक्ति है और जो 'सूर्यो ज्योतिः' का प्रकाश है, वास्तव में वे दोनों अलग-अलग मन्त्र या क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि उसी पुरुषाकार मण्डल के शरीर (तनु) के अभिन्न अंग हैं। इसका भाव यह है कि जिस पुरुष को हम मण्डल के मध्य में देखते हैं, उसकी देह ही वास्तव में 'अग्निहोत्र' है।
बाहरी विधि में अग्निहोत्र एक कर्म है, किन्तु आन्तरिक दृष्टि में अग्निहोत्र वह प्रज्वलित चेतना है जो साधक के भीतर सूर्यरूप पुरुष के रूप में स्थित है। जब साधक व्याहृतियों का जप करता है, तो वह उस पुरुष के विस्तार को पहचानता है, और जब वह 'सूर्यो ज्योतिः' का ध्यान करता है, तो वह उस पुरुष की प्रदीप्ति को अनुभव करता है। इस प्रकार, मन्त्र और मन्त्र का देवता (पुरुष) एक ही शरीर के दो रूप बन जाते हैं—एक शब्द-रूप और दूसरा प्रकाश-रूप।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'एकत्व' का अभ्यास है। प्रायः साधक जप को एक क्रिया, ध्यान को दूसरी क्रिया और अग्निहोत्र को तीसरी क्रिया मानता है। महर्षि याज्ञवल्क्य इस भेद को मिटा रहे हैं।
साधक जब इस श्लोक के भाव में उतरता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके द्वारा उच्चारित 'भूर्भुवः स्वः' और 'सूर्यो ज्योतिः' वास्तव में उसके हृदय-मण्डल में स्थित उसी हिरण्मय पुरुष के अंग हैं। जप करते समय उसे यह बोध होना चाहिए कि शब्द बाहर नहीं जा रहे, बल्कि वे भीतर स्थित उसी 'अग्निहोत्र-तनु' (प्रकाश-देह) को जाग्रत कर रहे हैं।
यहाँ अभ्यास यह है कि जप और ध्यान को एक ही शरीर के दो आयामों के रूप में देखा जाए। जब साधक व्याहृतियों और मन्त्रों को उस पुरुष के शरीर के रूप में देखना आरम्भ करता है, तो उसकी साधना 'कर्म' से ऊपर उठकर 'साक्षात्कार' की भूमि पर पहुँच जाती है। वह अनुभव करता है कि वह स्वयं उस प्रकाश-देह का हिस्सा है और उसका प्रत्येक मन्त्र-उच्चारण उस आंतरिक अग्नि में आहुति के समान है, जो उसे स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर ले जा रहा है।
ओमापो ज्योतिरित्येतद्यजुश्चात्र प्रतिष्ठितम् ।
अष्टपादं शुभं हंस(सं) त्रिमात्रमजमव्ययम् ॥ ९.१०९ ॥
"ओमापो ज्योतिः…" — यह यजुः भी यहाँ प्रतिष्ठित है; (वह) आठ पादोंवाला, शुभ, हंस, त्रिमात्र, अजन्मा, अविनाशी है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि व्याहृतियाँ और 'सूर्यो ज्योतिः' मन्त्र उस पुरुषाकार मण्डल में अग्निहोत्र के स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अब वे इस मण्डल के भीतर स्थित एक और विशिष्ट यजुष्-शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं, जो साधक को सूक्ष्मता से अक्षर की ओर ले जाती है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ओमापो ज्योतिः इति (यः मन्त्रः), एतद् यजुः चात्र प्रतिष्ठितम् । (सः) अष्टपादं, शुभं, हंसं, त्रिमात्रं, अजं, अव्ययम् (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• ओमापो ज्योतिः: यह यजुर्वेद के एक मन्त्र का आरम्भिक अंश है। यहाँ 'अप' का अर्थ केवल जल नहीं, अपितु वह सूक्ष्म रस या तेज है जिससे सृष्टि का पोषण होता है। यह मन्त्र प्रकाश और शुद्धि का प्रतीक है।
• यजुः: यजुर्वेद के मन्त्रों को 'यजुः' कहा जाता है। यहाँ इसका अर्थ उस विशिष्ट मन्त्र-शक्ति से है जो यज्ञीय क्रिया (आहुति) के माध्यम से चेतना को ऊपर उठाती है।
• अष्टपादं: आठ पादों वाला। 'पाद' का अर्थ यहाँ मन्त्र के चरणों से हो सकता है या संभवतः आठ दिशाओं/स्थितियों में व्याप्त होने वाले तेज से। इसका सटीक अर्थ संदिग्ध है, किन्तु यह पूर्णता का संकेत है।
• हंसः: हंस वह है जो नीर-क्षीर विवेक जानता है। योगिक दृष्टि से 'हंस' उस प्राण-शक्ति का नाम है जो हृदय में स्पन्दित होती है और आत्मा का प्रतीक है।
• त्रिमात्रम्: तीन मावरों वाला। यह स्पष्ट रूप से प्रणव (ओम्) के तीन अक्षरों—अ, उ, म—की ओर संकेत है।
• अजम्: अजन्मा। जिसका जन्म न हुआ हो, क्योंकि जो जन्म लेता है वह नष्ट होता है।
• अव्ययम्: अविनाशी। जो व्यय नहीं होता, जिसका क्षय नहीं होता।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह बता रहे हैं कि जिस सूर्यमण्डल और हृदय-ज्योति की चर्चा पिछले श्लोकों में हुई, वहाँ केवल व्याहृतियाँ ही नहीं, अपितु 'ओमापो ज्योतिः' रूपी यजुष्-मन्त्र की शक्ति भी प्रतिष्ठित है। यह मन्त्र साधक के लिए एक सेतु का कार्य करता है, जो उसे स्थूल प्रकाश से सूक्ष्म ज्योति की ओर ले जाता है।
ऋषि इस शक्ति के स्वरूप का वर्णन करते हुए उसे 'अष्टपाद' और 'शुभ' कहते हैं। 'अष्टपाद' का रहस्य संभवतः इस बात में है कि यह ज्योति आठों दिशाओं में व्याप्त है या इसके आठ विशिष्ट आयाम हैं, जो साधक की चेतना को पूर्णता प्रदान करते हैं। इसे 'हंस' कहा गया है क्योंकि यह वही विवेकशील ज्योति है जो साधक को माया के जल से अलग कर सत्य के दूध (अमृत) को पहचानने की शक्ति देती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे 'त्रिमात्र' कहा गया है। इसका भाव यह है कि इस संपूर्ण यजुष्-शक्ति का सार 'ओम्' (अ-उ-म) में समाहित है। जो मन्त्र बाहर से लंबा प्रतीत होता है, उसका वास्तविक केंद्र वह त्रिमात्र प्रणव ही है। यही कारण है कि इसे 'अज' (अजन्मा) और 'अव्यय' (अविनाशी) कहा गया है। जन्म और मृत्यु केवल नाम और रूप के होते हैं; वह ध्वनि-रूप ब्रह्म, जो त्रिमात्र है, वह सदा से है और सदा रहेगा।
अतः, जब साधक इस मन्त्र का प्रयोग करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के उस अविनाशी हंस का आवाहन कर रहा होता है, जो हृदय-आकाश में ज्योतिरूप में स्थित है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'ध्वनि' से 'अक्षर' की ओर जाने की यात्रा है। जब साधक 'ओमापो ज्योतिः' के प्रतीक वाले मन्त्र का जप करता है, तो उसे केवल शब्दों पर नहीं रुकना चाहिए, अपितु उस मन्त्र के भीतर छिपे 'त्रिमात्र' (अ-उ-म) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
अभ्यास की विधि यह है कि मन्त्र के उच्चारण के समय साधक अनुभव करे कि उसकी चेतना उस 'अज' और 'अव्यय' तत्व में विलीन हो रही है। यहाँ 'हंस' का ध्यान करने का अर्थ है—साँसों के आने-जाने (सो-हम्) के बीच उस स्थिर ज्योति को देखना जो न जन्म लेती है और न नष्ट होती है।
साधक इस अभ्यास से 'साकार' (पुरुषाकार मण्डल) से 'निराकार' (त्रिमात्र अक्षर) की भूमि की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास उसे यह अनुभव कराता है कि बाहरी सूर्य की ज्योति और हृदय की ज्योति वास्तव में एक ही 'अव्यय' तत्व की अभिव्यक्तियाँ हैं। त्रिमात्र प्रणव में लीन होना ही उस अजन्मा पुरुष में प्रतिष्ठित होना है।
त्रिरात्मानं तैजसं च सर्वं पश्येत्तमव्ययम् ।
तस्य यद्धृदयावस्थं ज्योतिः सूर्यः स उच्यते ॥ ९.११० ॥
उस अविनाशी, तीन रूपोंवाले, तैजस (आत्मा) को सर्वत्र देखे; उसका जो हृदयमें स्थित ज्योति है, वह सूर्य कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'ओमापो ज्योतिः' मन्त्र के माध्यम से उस अविनाशी हंस-स्वरूप यजुष्-शक्ति का परिचय दिया, जो त्रिमात्र (ओम्) और अजन्मा है। अब वे इस सूक्ष्म ज्योति के विस्तार और उसके सर्वव्यापी स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं, ताकि साधक बाहरी सूर्य और आंतरिक ज्योति के भेद को मिटा सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधक) सर्वं तमव्ययम्, त्रिरात्मानं, तैजसं च (आत्मानं) पश्येत् । तस्य यत् ज्योतिः हृदयावस्थं (अस्ति), स सूर्यः उच्यते ।
पदार्थ और निर्वचन:
• त्रिरात्मानं: तीन रूपों वाला या तीन अवस्थाओं में व्याप्त। यहाँ 'त्रि' का सम्बन्ध संभवतः भूः, भुवः, स्वः के त्रिविध विस्तार से है, जो संपूर्ण अस्तित्व को घेरे हुए है।
• तैजसं: तेज स्वरूप। वह चैतन्य जो प्रकाशमान है और जिसके कारण ही अन्य सभी वस्तुएं दृश्यमान होती हैं।
• अव्ययम्: जिसका कभी क्षय न हो, जो अपरिवर्तनीय और शाश्वत है।
• हृदयावस्थं: हृदय में स्थित। यहाँ हृदय केवल भौतिक अंग नहीं, अपितु वह 'हृदयाकाश' है जहाँ आत्मा का प्रतिबिम्ब या उसकी ज्योति प्रतिष्ठित होती है।
• सूर्यः: वह प्रकाशक तत्व। बाहरी जगत में जो सूर्य है, वही आंतरिक जगत में 'हृदय-ज्योति' के रूप में विद्यमान है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में साधक को एक महान दृष्टि प्रदान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि उस अविनाशी, तीन रूपों वाले और तेजस्वरूप आत्मा को सर्वत्र देखना चाहिए। 'सर्वं पश्येत्' का अर्थ है कि साधक अपनी दृष्टि को केवल शरीर या स्थूल जगत तक सीमित न रखे, बल्कि यह अनुभव करे कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड उसी एक तैजस तत्व का विस्तार है।
यहाँ 'त्रिरात्मा' शब्द अत्यंत गूढ़ है। भाव यह है कि वह एक ही आत्मा पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ (भूः, भुवः, स्वः) के रूप में व्याप्त है, अथवा वह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी विभिन्न अवस्थाओं में भी अपनी अविनाशी सत्ता बनाए रखती है। वह 'तैजस' है क्योंकि वह ज्ञान और प्रकाश का स्रोत है। जब साधक इस सत्य को जान लेता है कि बाहर जो कुछ भी प्रकाशमान है, वह उसी एक अव्यय आत्मा का प्रतिबिम्ब है, तब उसकी दृष्टि 'बाहर' से 'भीतर' की ओर मुड़ती है।
आगे ऋषि रहस्य खोलते हैं कि उस सर्वव्यापी अविनाशी सत्ता की जो ज्योति हमारे हृदय में स्थित है, उसे ही 'सूर्य' कहा जाता है। सामान्यतः मनुष्य सूर्य को आकाश में देखता है, किन्तु योगी के लिए सूर्य वह ज्योति है जो हृदय-गुहा में स्थित है। यह कथन बाहरी सूर्य के अस्तित्व को नकारता नहीं, अपितु यह बताता है कि बाहरी सूर्य वास्तव में आंतरिक सूर्य का ही स्थूल प्रक्षेपण है। हृदय की वह ज्योति ही वास्तव में वह 'भर्ग' है, जो अविद्या के अन्धकार को नष्ट करती है।
अतः इस श्लोक का सार यह है कि जो तेज सूर्यमण्डल में है, वही तेज हृदयमण्डल में है। जब साधक हृदय की ज्योति को सूर्य के रूप में पहचान लेता है, तब वह सूर्योपस्थान और संध्या जैसी बाहरी विधियों को आंतरिक योग-साधना में परिवर्तित कर देता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'दृष्टि-परिवर्तन' का अभ्यास है। इसका अभ्यास इस प्रकार है:
१. सर्वत्र दर्शन: साधक पहले यह अनुभव करे कि उसके सम्मुख जो भी प्रकाश है, वह उस एक ही 'तैजस' आत्मा का रूप है। यह अभ्यास साधक को द्वैत से मुक्त कर एकत्व की भूमि पर ले जाता है।
२. बाह्य से आन्तर की ओर: जब साधक बाहरी सूर्य की दीप्ति को देखता है, तो वह मन ही मन यह संकल्प करे— "यह जो तेज बाहर है, वही तेज मेरे हृदय में भी स्थित है।" इस प्रकार बाहरी सूर्य का ध्यान धीरे-धीरे हृदय की ज्योति में सिमट जाता है।
३. हृदय-सूर्य का अनुभव: साधक अपनी चेतना को हृदय-स्थान पर केंद्रित करे और वहाँ एक सूक्ष्म, प्रकाशमान सूर्य का अनुभव करे। यह सूर्य भौतिक अग्नि नहीं, अपितु 'विज्ञानमय पुरुष' की ज्योति है।
इस अभ्यास से साधक उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ उसे यह बोध होता है कि वह स्वयं उस ज्योति का अंश है। यहाँ साधक 'दृश्य' (बाहरी सूर्य) से 'द्रष्टा' (भीतरी सूर्य/आत्मा) की ओर अग्रसर होता है। यह प्रक्रिया साधक को स्थूल शरीर के बंधन से मुक्त कर उसे सूक्ष्म तैजस शरीर के अनुभव की ओर ले जाती है, जिससे वह अव्यय (अविनाशी) सत्ता में प्रतिष्ठित होने लगता है।
शुक्लं तत् पुरुषं ज्ञेयमलिङ्गं ज्योतिरूपकम् ।
सत्यधर्माण(णं)भर्गं तु ईश्वरं विष्णुसंज्ञकम् ॥ ९.१११ ॥
उस शुक्ल पुरुषको जानना चाहिए — अलिङ्ग, ज्योतिरूप, सत्यधर्मा भर्ग, विष्णु नामवाला ईश्वर।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय में स्थित ज्योति को ही 'सूर्य' कहकर आंतरिक और बाह्य सूर्य के तादात्म्य को स्थापित किया। अब वे उस सूर्य-स्वरूप पुरुष के विशिष्ट गुणों और नामों का उद्घाटन कर रहे हैं, जिससे साधक उस निराकार सत्ता को एक निश्चित स्वरूप (ज्योति) में पहचान सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तत् शुक्लं, अलिङ्गं, ज्योतिरूपकम्, सत्यधर्माणं, भर्गं, विष्णुसंज्ञकम् ईश्वरं पुरुषं ज्ञेयम् (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• शुक्लम्: श्वेत या निर्मल। यहाँ 'शुक्ल' केवल रंग नहीं, अपितु वह परम शुद्धता और सात्विकता है जिसमें कोई मल या विकार नहीं है। यह शुक्लयजुर्वेद के 'शुक्ल' तत्व का भी संकेत है।
• अलिङ्गम्: 'न लिङ्गम्' अर्थात् बिना किसी चिह्न या लक्षण के। जो इंद्रियों के द्वारा पहचाने जाने वाले भौतिक लक्षणों (रूप, गंध, रस, स्पर्श) से परे है।
• ज्योतिरूपकम्: जिसका स्वरूप ही प्रकाश है। वह प्रकाश जो अंधकार का अभाव नहीं, अपितु स्वयं प्रकाशक है।
• सत्यधर्माणम्: जिसका धर्म ही 'सत्य' है। जो अपरिवर्तनीय है और जिसमें 'सत्' (अस्तित्व) और 'चित्' (चेतना) एक ही हैं।
• भर्गम्: भस्म करने वाला या शुद्ध करने वाला तेज। यह गायत्री मन्त्र के 'भर्गो' पद का सीधा विस्तार है, जो साधक के अज्ञान और पापों को भस्म कर उसे शुद्ध करता है।
• विष्णुसंज्ञकम्: 'विष्णु' नाम वाला। 'विष्णु' का अर्थ है— जो सर्वव्यापी है (विशन्ुते), जो कण-कण में व्याप्त है।
• ईश्वरम्: वह जो समस्त प्रकृतियों और जीवों का स्वामी है, जो नियंता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य इस श्लोक में उस परम पुरुष के स्वरूप का ऐसा वर्णन कर रहे हैं जो साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। वे कहते हैं कि उस 'शुक्ल पुरुष' को जानना चाहिए। यहाँ 'शुक्ल' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह उस परम पवित्रता का प्रतीक है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
वह पुरुष 'अलिङ्ग' है। सामान्यतः हम किसी वस्तु को उसके लक्षणों (लिङ्गों) से पहचानते हैं, किन्तु वह ईश्वर लक्षणों के अधीन नहीं है। वह निराकार है, किन्तु निराकार होने का अर्थ 'शून्य' होना नहीं है। इसीलिए ऋषि कहते हैं कि वह 'ज्योतिरूप' है। वह चिह्न-रहित होते हुए भी प्रकाश के रूप में अनुभव होता है। यह एक महान रहस्य है— जो इंद्रियों के लिए अदृश्य (अलिङ्ग) है, वह योगिक दृष्टि के लिए ज्योतिर्मय है।
आगे वे उसे 'सत्यधर्मा' और 'भर्ग' कहते हैं। 'भर्ग' शब्द यहाँ सीधे उस वैदिक अग्नि और गायत्री के तेज से जुड़ा है। जिस प्रकार अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार यह भर्ग-स्वरूप ईश्वर साधक के अहंकार और वासनाओं को भस्म कर उसे शुद्ध करता है। जब साधक इस भर्ग-तेज में स्थित होता है, तब वह 'विष्णु' के स्वरूप को पहचानता है। 'विष्णु' यहाँ केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक अवस्था है— सर्वव्यापकता की अवस्था। जब साधक अनुभव करता है कि वही ज्योति उसके हृदय में है, सूर्य में है और समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है, तब वह उसे 'विष्णु' के रूप में जानता है।
इस प्रकार, यह श्लोक साधक को यह समझाता है कि जिसे हम बाहर ईश्वर या विष्णु के रूप में खोज रहे हैं, वह वास्तव में वही 'शुक्ल-ज्योति' है जो सत्यस्वरूप है और जिसके द्वारा हम शुद्ध होते हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक एक गहन ध्यान-विधि का सूत्र है। योगिक अभ्यास में सबसे बड़ी चुनौती उस सत्ता का ध्यान करना है जिसका कोई भौतिक चिह्न (अलिङ्ग) नहीं है। यदि साधक किसी आकार (मूर्ति या रूप) का ध्यान करता है, तो वह अभी भी स्थूल जगत में है। किन्तु जब वह 'अलिङ्ग' का ध्यान करता है, तो मन भटकने लगता है।
यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य समाधान देते हैं— 'ज्योतिरूपकम्'। साधक को निर्देश है कि वह उस निराकार ईश्वर को 'ज्योति' के रूप में अनुभव करे। ज्योति वह सेतु है जो आकार और निराकार के बीच स्थित है। ज्योति का कोई ठोस आकार नहीं होता, किन्तु वह दृश्यमान होती है। अतः साधक हृदय-आकाश में एक निर्मल, श्वेत (शुक्ल) प्रकाश की कल्पना करता है।
जैसे-जैसे ध्यान गहरा होता है, वह ज्योति 'भर्ग' बन जाती है— अर्थात् वह प्रकाश साधक के भीतर के मानसिक विकारों को भस्म करने लगता है। इस अवस्था में साधक 'सत्यधर्मा' का अनुभव करता है, जहाँ उसे यह बोध होता है कि सत्य ही एकमात्र अस्तित्व है। अंततः, जब वह ज्योति हृदय की सीमा को तोड़कर सर्वत्र व्याप्त प्रतीत होने लगती है, तब साधक 'विष्णु-भाव' (सर्वव्यापकता) की भूमि पर पहुँच जाता है। यह अभ्यास साधक को 'साकार' से 'निरुपाधिक ज्योति' और फिर 'सर्वव्यापी चैतन्य' की ओर ले जाता है।
अग्निस्थपुरुषस्वरूपम्
तस्मिन् प्रतिष्ठितं सर्वं त्रयस्त्रिंशद्गुणं हि तत् ।
अग्निमध्यगतं चैव अग्नौ ज्योतिरुदाहृतम् ॥ ९.११२ ॥
उसमें सब प्रतिष्ठित है; वह तैंतीस गुना (तैंतीस देवोंवाला) है; वह अग्निके मध्यमें भी स्थित है — अग्निमें (वही) ज्योति कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस परम पुरुष के स्वरूप को 'शुक्ल', 'अलिङ्ग', 'भर्ग' और 'विष्णु' के रूप में परिभाषित किया। अब वे इस विराट पुरुष की व्यापकता और उसकी एकता का रहस्य खोल रहे हैं, जिससे साधक यह समझ सके कि समस्त देवत्व और ब्रह्मांडीय शक्तियाँ वास्तव में उसी एक ज्योति का विस्तार हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तस्मिन् (शुक्ल-पुरुषे) सर्वं प्रतिष्ठितं (अस्ति); तत् हि त्रयस्त्रिंशद्गुणं (अस्ति)। तत् (एव) अग्निमध्यगतं च अस्ति, (तथा) अग्नौ ज्योतिः उदाहृतम्।
पदार्थ और निर्वचन:
• तस्मिन् प्रतिष्ठितं सर्वं: 'तस्मिन्' का सम्बन्ध पिछले श्लोक के 'शुक्ल पुरुष' से है। 'प्रतिष्ठित' का अर्थ है आधार होना। सम्पूर्ण चराचर जगत और समस्त दैवीय शक्तियाँ उसी एक चैतन्य ज्योति में स्थित हैं।
• त्रयस्त्रिंशद्गुणं: 'त्रयस्त्रिंशत्' (तैंतीस) और 'गुण' (विशेषता या स्वरूप)। यहाँ इसका अर्थ है कि वह एक पुरुष तैंतीस देवों के गुणों का समाहार है। यह संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतीक है।
• अग्निमध्यगतं: अग्नि के केंद्र में स्थित। यहाँ 'अग्नि' के दो अर्थ हैं— बाह्य वेदी की अग्नि और आंतरिक प्राण-अग्नि। वह ज्योति दोनों के मध्य में समान रूप से प्रतिष्ठित है।
• अग्नौ ज्योतिरुदाहृतम्: अग्नि में जिसे 'ज्योति' कहा गया है, वह वास्तव में वही शुक्ल पुरुष है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस 'एक' और 'अनेक' के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस शुक्ल पुरुष का वर्णन पिछले श्लोक में किया गया, वही समस्त अस्तित्व का आधार है। जब वे कहते हैं कि "वह तैंतीस गुण वाला है", तो वे संकेत दे रहे हैं कि जिसे हम अलग-अलग देवताओं के रूप में देखते हैं, वे वास्तव में उस एक ही परम ज्योति की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ या 'गुण' मात्र हैं।
यह स्मृति यहाँ उस गूढ़ रहस्य को खोल रही है जो याज्ञवल्क्य की श्रुति में बीजरूप में है। जब साधक बाह्य अग्निहोत्र करता है, तो वह केवल भौतिक अग्नि में आहुति नहीं देता, अपितु उस अग्नि के मध्य में स्थित उसी 'परम ज्योति' का साक्षात्कार करता है। अग्नि को 'ज्योति' इसलिए कहा गया है क्योंकि अग्नि का स्वभाव प्रकाश देना है, और उस प्रकाश का मूल स्रोत वही शुक्ल पुरुष है। अतः, बाह्य अग्नि और हृदय की ज्योति में कोई भेद नहीं है; दोनों एक ही सत्ता के दो छोर हैं।
श्रुति-संगति —
इस श्लोक का मूल आधार याज्ञवल्क्य और शाकल्य के बीच का वह संवाद है, जहाँ देवों की संख्या का विश्लेषण किया गया है:
अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य निविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेत्योमिति होवाच ॥ १४.६.९.१ ॥
फिर विदग्ध शाकल्यने उनसे पूछा — "याज्ञवल्क्य! देव कितने हैं?" उन्होंने इसी निविद् (गणना-मन्त्र) से उत्तर दिया — "वैश्वदेव (शस्त्र) की निविद्में जितने कहे गये हैं: तीन और तीन सौ, तीन और तीन हज़ार।" (शाकल्यने कहा —) "ठीक।"
कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिंशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रेति ॥ १४.६.९.२ ॥
"याज्ञवल्क्य! देव कितने ही हैं?" — "तैंतीस।" "ठीक; कितने ही हैं?" — "छः।" "ठीक; कितने ही हैं?" — "तीन।" "ठीक; कितने ही हैं?" — "दो।" "ठीक; कितने ही हैं?" — "डेढ़।" "ठीक; कितने ही हैं?" — "एक।" "ठीक। (तो) वे तीन और तीन सौ, तीन और तीन हज़ार कौन हैं?"
श्रुति में याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि देवों की संख्या ३३०३ या ३३०० हो सकती है, किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर वे तैंतीस हैं, फिर छः, फिर तीन, फिर दो, फिर डेढ़ और अंततः केवल 'एक' हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक उसी श्रुति-प्रक्रिया का उपसंहार है। "त्रयस्त्रिंशद्गुणं" कहकर ऋषि यह बता रहे हैं कि जो तैंतीस देवों के रूप में विस्तृत हैं, वे वास्तव में उसी एक 'शुक्ल पुरुष' के गुण हैं। श्रुति जहाँ गणना (निविद्) के माध्यम से एक की ओर ले जाती है, स्मृति वहाँ सीधे उस 'प्रतिष्ठान' (आधार) की बात करती है जिसमें सब प्रतिष्ठित हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'एकाग्रता' और 'तादात्म्य' का है। योग की दृष्टि से, जब साधक अनेक देवताओं की उपासना करता है, तो वह विविधता में उलझ सकता है। यह श्लोक उसे सिखाता है कि अनेकता (तैंतीस गुण) से एकता (एक पुरुष) की ओर कैसे बढ़ना है।
साधक जब अग्निहोत्र या ध्यान में बैठता है, तो वह पहले अग्नि की लपटों (स्थूल) को देखता है, फिर उस अग्नि के मध्य स्थित ज्योति (सूक्ष्म) का अनुभव करता है, और अंततः उस ज्योति को अपने हृदय के सूर्य (कारण) से जोड़ देता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि ब्रह्मांड की समस्त ऊर्जाएँ, समस्त दैवीय शक्तियाँ उसके अपने ही भीतर स्थित उस एक 'अलिङ्ग पुरुष' के गुण हैं।
यह अवस्था साधक को 'विविधता' की भूमि से उठाकर 'एकत्व' की भूमि पर ले जाती है। वह अनुभव करता है कि जिस ज्योति को वह बाहर अग्नि में खोज रहा था, वह वास्तव में उसके अपने हृदय का ही विस्तार है। इस प्रकार, बाह्य कर्म (अग्निहोत्र) आंतरिक योग (आत्म-साक्षात्कार) में परिवर्तित हो जाता है।
अग्नावग्निः स एवोक्तस्तस्य चैवात्र हूयते ।
अग्निहोत्रे च संप्राप्ते चिन्तयेच्चैकमानसम् ॥ ९.११३ ॥
वही अग्निमें अग्नि कहा गया है, और उसीके लिए यहाँ हवन किया जाता है। अग्निहोत्रका समय आनेपर एकाग्र मनसे (उसका) चिन्तन करे —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि वह शुक्ल पुरुष ही अग्नि के मध्य में स्थित ज्योति है। अब वे इस सत्य को कर्म-कण्ड के साथ जोड़ते हुए यह बता रहे हैं कि बाह्य अग्निहोत्र की वास्तविक परिणति उस आंतरिक ज्योति के साक्षात्कार में ही है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: अग्नावग्निः स एव उक्तः, तस्य च अत्र एव हूयते। अग्निहोत्रे च संप्राप्ते (साधकः) एकमानसम् चिन्तयेत् च।
पदार्थ और निर्वचन:
• अग्नावग्निः स एव: 'अग्नि' शब्द के यहाँ दो अर्थ हैं— प्रथम 'अग्नि' बाह्य वेदी की भौतिक अग्नि है और द्वितीय 'अग्नि' वह परम ज्योतिरूप पुरुष है। भाव यह है कि भौतिक अग्नि के भीतर जो वास्तविक तेज है, वह वही शुक्ल पुरुष है।
• तस्य चैवात्र हूयते: 'तस्य' का सम्बन्ध उसी परम पुरुष से है। 'हूयते' (हवन किया जाता है) का अर्थ है कि आहुतियाँ भौतिक अग्नि में दी जाती प्रतीत होती हैं, किन्तु वास्तव में वे उसी आंतरिक ज्योतिरूप पुरुष को अर्पित की जा रही हैं।
• अग्निहोत्रे च संप्राप्ते: जब अग्निहोत्र का समय (काल) निकट आए।
• एकमानसम् चिन्तयेत्: 'एकमानसम्' का अर्थ है एकाग्र मन वाला। 'चिन्तयेत्' (चिन्तन करे) यहाँ विधिलिङ् है, जो साधक को निर्देश देता है कि वह अपने मन को बिखेरने के बजाय एक बिंदु पर केंद्रित करे।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ कर्म और ज्ञान की संधि करा रहे हैं। वे कहते हैं कि जिसे हम 'अग्नि' समझकर उसमें आहुति देते हैं, वह केवल एक माध्यम है; उस माध्यम के भीतर जो वास्तविक अग्नि (तेज) है, वह वही शुक्ल पुरुष है जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में किया गया। यह एक महान रहस्य है कि बाह्य रूप से जो क्रिया 'अग्निहोत्र' दिखती है, उसका वास्तविक लक्ष्य वह 'अग्नि-पुरुष' ही है।
यहाँ वाक्य पूर्ण नहीं हुआ है; यह निर्देश कि "एकाग्र मन से चिन्तन करे", अगले श्लोकों (९.११४-११५) तक विस्तृत है, जहाँ उस चिन्तन के स्वरूप (धूमरहित अग्नि और अलिङ्ग पुरुष) को स्पष्ट किया गया है।
साधक के लिए यह निर्देश है कि अग्निहोत्र केवल एक यांत्रिक क्रिया या द्रव्य की आहुति नहीं है। जब अग्निहोत्र का समय आए, तब वह केवल हाथ से आहुति न दे, बल्कि अपने मन को 'एक' (एकाग्र) कर ले। जब मन एक होता है, तभी वह बाह्य अग्नि के भीतर छिपे उस आंतरिक पुरुष को देख पाता है। इस प्रकार, अग्निहोत्र का समय वास्तव में ध्यान का समय बन जाता है।
श्रुति-संगति —
सूर्यो ह वा अग्निहोत्रम् । तद्यदेतस्या अग्र आहुतेरुदैत्तस्मात्सूर्योऽग्निहोत्रम् ॥ २.३.१.१ ॥
सूर्य ही अग्निहोत्र है। क्योंकि वह इस आहुतिसे पहले (सबसे आगे) उदित हुआ, इसलिए सूर्य अग्निहोत्र है।
श्रुति कहती है कि सूर्य ही अग्निहोत्र है। याज्ञवल्क्य इस श्रुति के बीज को यहाँ विस्तार दे रहे हैं। यदि सूर्य ही अग्निहोत्र है और हृदय की ज्योति ही सूर्य है (जैसा श्लोक ९.११० में कहा गया), तो इसका अर्थ यह हुआ कि अग्निहोत्र की समस्त प्रक्रिया वास्तव में हृदय-ज्योति के जागरण और उसमें लीन होने की प्रक्रिया है। बाह्य अग्नि केवल उस आंतरिक सूर्य का प्रतिबिम्ब है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म' को 'समाधि' में बदलने की विधि है। सामान्यतः मनुष्य कर्म करते समय मन को बाहरी उपकरणों और विधियों में उलझाए रखता है, किन्तु योगी 'एकमानसम्' होकर कर्म करता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह जो आहुति दे रहा है, वह वास्तव में उसके अपने अहंकार और सीमित वृत्तियों का समर्पण है, जो उस परम ज्योति (अग्नि-पुरुष) में भस्म हो रहे हैं। यहाँ अभ्यास यह है कि अग्निहोत्र के समय बाहरी क्रिया चलते रहने दें, किन्तु चेतना को अग्नि के केंद्र में स्थित उस 'अलिङ्ग' पुरुष पर टिका दें। इस अभ्यास से साधक 'क्रिया-योग' से 'ज्ञान-योग' की भूमि की ओर अग्रसर होता है, जहाँ कर्म केवल एक निमित्त रह जाता है और लक्ष्य केवल वह एक ज्योति बन जाती है।
लेलिह्यमानं संदीप्तं निर्धूमं पावकः(कं) सदा ।
ज्योतिश्चित्रतरं ह्येतत्तद्ब्राह्मं वह्निसंज्ञकम् ॥ ९.११४ ॥
— लपलपाते, प्रज्वलित, सदा धुएँरहित अग्निका; यह (अग्नि) अत्यन्त चित्र-विचित्र ज्योति है — वह ब्राह्म (तेज) है, जिसका नाम वह्नि है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह रहस्य उद्घाटित किया कि बाह्य अग्निहोत्र की आहुतियाँ वास्तव में उस आंतरिक शुक्ल पुरुष को अर्पित की जाती हैं। अब इस श्लोक में वे उस अग्नि के स्वरूप का सूक्ष्म वर्णन कर रहे हैं, जिससे साधक को भौतिक अग्नि और दिव्य ज्योति के बीच के सेतु का बोध हो सके।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: पावकः सदा लेलिह्यमानं संदीप्तं निर्धूमं (अस्ति)। एतत् ह्येतत् चित्रतरं ज्योतिः तद् ब्राह्मं वह्निसंज्ञकम् (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• लेलिह्यमानं: 'लेलिह्य' धातु से बना यह शब्द लपलपाने या जिह्वा की भाँति चंचल गति से ऊपर उठने वाली ज्वालाओं का सूचक है।
• संदीप्तं: जो पूर्णतः प्रज्वलित है, जिसमें तेज की प्रखरता है।
• निर्धूमं: धुएँ से रहित। भौतिक अग्नि में ईंधन के जलने से धुआँ होता है, किन्तु यहाँ 'निर्धूम' शब्द उस शुद्ध तेज की ओर संकेत है जो मलिनता से मुक्त है।
• पावकः: पवित्र करने वाली अग्नि।
• चित्रतरं ज्योतिः: 'चित्र' का अर्थ है विविध रंगों वाली या अद्भुत। ऐसी ज्योति जो साधारण दृष्टि से परे, अलौकिक और विस्मयकारी है।
• ब्राह्मं वह्निसंज्ञकम्: वह तेज जो 'ब्रह्म' स्वरूप है, किन्तु संसार में जिसे 'वह्नि' (अग्नि) के नाम से जाना जाता है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ अग्नि के उस स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जो कर्मकाण्डीय दृष्टि से 'पावक' है और योगिक दृष्टि से 'ब्रह्म' है। वे कहते हैं कि वह अग्नि सदा लपलपाती (लेलिह्यमान), प्रज्वलित और धुएँ से रहित है। यहाँ 'निर्धूम' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्यतः भौतिक अग्नि में धुआँ तब तक रहता है जब तक ईंधन पूर्णतः शुद्ध होकर भस्म न हो जाए। किन्तु जब अग्नि अपनी पूर्ण प्रज्वलित अवस्था में पहुँचती है, तब वह निर्धूम हो जाती है। यह अवस्था उस शुद्ध चेतना की प्रतीक है जहाँ अविद्या का धुआँ समाप्त हो चुका है।
यह ज्योति 'चित्रतर' है, अर्थात यह केवल प्रकाश नहीं, बल्कि एक दिव्य विन्यास है। यह वह 'ब्राह्म तेज' है जिसे हम स्थूल जगत में 'वह्नि' कहते हैं। यहाँ ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जिसे हम केवल दाहक या पाचक अग्नि समझते हैं, वह वास्तव में उस परब्रह्म का ही एक विवर्त है। वह्नि केवल नाम है, वास्तव में वह वही 'अक्षर' और 'शुक्ल पुरुष' है जो हृदय में सूर्य रूप में स्थित है। अतः जब साधक अग्निहोत्र के लिए अग्नि प्रज्वलित करता है, तो उसे उस भौतिक ज्वाला में उस दिव्य, चित्र-विचित्र और शुद्ध ब्राह्म ज्योति का दर्शन करना चाहिए।
शास्त्र-साक्ष्य —
काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ १.२.४ ॥
काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची देवी — ये (अग्निकी) सात लपलपाती जिह्वाएँ हैं।
मुण्डक उपनिषद् में अग्नि की सात लपलपाती जिह्वाओं का वर्णन है: "काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥"
मुण्डक उपनिषद् में अग्नि की सात 'लेलायमाना' (लपलपाती) जिह्वाओं का उल्लेख है, जो यहाँ 'लेलिह्यमानं' शब्द से पूर्णतः मेल खाता है। जहाँ मुण्डक उपनिषद् अग्नि की इन जिह्वाओं के विविध रंगों और गुणों का वर्णन कर उसे एक देवी के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस 'चित्रतर ज्योति' को सीधे 'ब्राह्म' (ब्रह्म स्वरूप) से जोड़ देती है। स्मृति यहाँ यह संकेत देती है कि अग्नि की वे लपलपाती जिह्वाएँ वास्तव में ब्रह्म की ही चेतना का विस्तार हैं, जो साधक की आहुतियों को ग्रहण कर उसे सूक्ष्म जगत की ओर ले जाती हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अर्थ केवल भौतिक अग्नि का अवलोकन नहीं, अपितु चित्त की एक विशेष अवस्था का अनुभव है। 'निर्धूम' अग्नि यहाँ 'विक्षेपरहित चित्त' का दृष्टान्त है। जिस प्रकार धुएँ रहित अग्नि शुद्ध और प्रखर होती है, उसी प्रकार जब साधक का मन कामनाओं और संशयों के धुएँ से मुक्त होता है, तब उसमें 'ब्रह्म-ज्योति' प्रज्वलित होती है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक अग्निहोत्र के समय अग्नि के सम्मुख बैठता है, तो वह अपनी दृष्टि को ज्वालाओं की उस लपलपाती गति (लेलिह्यमान) पर केंद्रित करता है। यह एकाग्रता उसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है। वह अनुभव करता है कि बाहर की यह प्रज्वलित अग्नि वास्तव में उसके भीतर के 'प्राणाग्नि' का ही प्रतिबिंब है। 'चित्रतर ज्योति' का ध्यान करते हुए साधक अपनी चेतना को उस बिंदु पर ले जाता है जहाँ वह्नि का नाम समाप्त हो जाता है और केवल 'ब्राह्म तेज' शेष रहता है। यह अभ्यास साधक को 'साकार' (ज्वाला) से 'निराकार' (ब्रह्म-ज्योति) की भूमि पर ले जाने वाला है।
तदाऽस्य मध्यगं ध्यायेत् पुरुषं चाप्यलिङ्गकम् ।
स सत्यज्योतिर्ब्रह्मा च आदित्यश्च निगद्यते ॥ ९.११५ ॥
तब उसके (अग्नि के) मध्य में स्थित उस अलिङ्गक (बिना लिंग वाले) पुरुष का ध्यान करना चाहिए; वह सत्यज्योति रूपी ब्रह्म और आदित्य कहा जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अग्नि के उस शुद्ध, धुएँरहित और अलौकिक स्वरूप का वर्णन किया जो वास्तव में 'ब्रह्म' है। अब इस श्लोक में वे साधक को उस दिव्य अग्नि के भीतर स्थित उस सूक्ष्म पुरुष के ध्यान की विधि बता रहे हैं, जो बाह्य होम और आंतरिक योग के बीच की मुख्य कड़ी है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: तदा (साधकः) तस्य (अग्नौ) मध्यगं पुरुषं च अपि अलिङ्गकम् ध्यायेत्। स (पुरुषः) सत्यज्योतिः ब्रह्मा च आदित्यः च निगद्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• तदा: उस समय, अर्थात् जब अग्निहोत्र का समय आए और साधक एकाग्र मन से चिन्तन करे (जैसा श्लोक ९.११३ में कहा गया)।
• मध्यगं: अग्नि के मध्य भाग में स्थित। यहाँ 'मध्य' का अर्थ केवल भौतिक केंद्र नहीं, बल्कि वह बिंदु है जहाँ तेज अपनी पराकाष्ठा पर होता है।
• अलिङ्गकम्: लिंगरहित। 'लिंग' का अर्थ है चिह्न, लक्षण या स्त्री-पुरुष का भेद। अलिङ्गक वह है जो गुणों, सीमाओं और द्वैत (स्त्री-पुरुष) से परे है; वह निराकार और शुद्ध चेतना है।
• सत्यज्योतिः: वह ज्योति जो 'सत्य' है, अर्थात् जो अपरिवर्तनीय है और जिसमें कोई भ्रम या माया नहीं है।
• ब्रह्मा: यहाँ 'ब्रह्मा' का अर्थ सृष्टिकर्ता चतुर्मुख देवता नहीं, अपितु वह 'ब्रह्म' तत्त्व है जो सर्वव्यापी और अनंत है (जैसा कि ९.८३ में संकेतित है)।
• आदित्यः: सूर्य के समान प्रकाशमान, जो संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है।
• निगद्यते: कहा जाता है या संज्ञा दी जाती है।
भाष्य —
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ बाह्य अग्निहोत्र को आंतरिक ध्यान में परिवर्तित कर रहे हैं। वे निर्देश देते हैं कि जब साधक अग्नि के सम्मुख बैठे, तब वह केवल प्रज्वलित लकड़ियों या ज्वालाओं को न देखे, अपितु उस अग्नि के मध्य में स्थित उस 'अलिङ्ग पुरुष' का ध्यान करे।
यहाँ 'अलिङ्ग' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। भौतिक जगत में हर वस्तु का कोई न कोई लिंग या लक्षण होता है जिससे उसकी पहचान हो, किन्तु वह पुरुष, जो अग्नि के तेज में प्रतिष्ठित है, वह समस्त लक्षणों से परे है। वह पुरुष ही 'सत्यज्योति' है। सामान्य ज्योति ईंधन के समाप्त होने पर बुझ जाती है, किन्तु यह सत्यज्योति वह चैतन्य है जो कभी नष्ट नहीं होता।
ऋषि स्पष्ट करते हैं कि इसी एक पुरुष को ही विभिन्न अवस्थाओं और दृष्टियों से 'ब्रह्मा' और 'आदित्य' कहा गया है। जब वह पुरुष अपनी व्यापकता में देखा जाता है, तब वह 'ब्रह्मा' है; जब वह प्रकाश और तेज के रूप में प्रकट होता है, तब वह 'आदित्य' है। इस प्रकार, अग्नि के मध्य में स्थित वह पुरुष वास्तव में वही शुक्ल पुरुष है जिसका वर्णन पिछले श्लोकों (९.१११-९.११२) में किया गया था। साधक के लिए यह निर्देश है कि वह बाह्य अग्नि को केवल एक माध्यम माने और अपनी दृष्टि को उस केंद्र (मध्य) पर टिकाए जहाँ दिव्य पुरुष प्रतिष्ठित है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ ४.११.१ ॥
तब (उपकोसलको) गार्हपत्य अग्निने उपदेश दिया — "पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य (मेरे रूप हैं); जो यह आदित्यमें पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।"
छान्दोग्य उपनिषद् के इस अंश में गार्हपत्य अग्नि स्वयं उपकोसल को उपदेश देते हुए कहती है कि जो पुरुष आदित्य में दिखाई देता है, वह मैं (अग्नि) ही हूँ। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी सत्य का विस्तार है। जहाँ उपनिषद् यह सिद्ध करता है कि अग्नि, आदित्य और पुरुष वास्तव में एक ही तत्त्व के विभिन्न नाम हैं, वहीं यह स्मृति उस एकता को 'ध्यान' के माध्यम से अनुभव करने की विधि बताती है। स्मृति कहती है कि अग्नि के मध्य में उस पुरुष का ध्यान करो, क्योंकि वही आदित्य और ब्रह्मा है। इस प्रकार, अग्नि-आदित्य-पुरुष का यह त्रयी-संबंध यहाँ पूर्णतः स्पष्ट होता है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर ले जाने वाला अभ्यास है। साधक के लिए बाहरी अग्नि एक 'आलंबन' है। जब वह अग्नि के मध्य में अलिङ्ग पुरुष का ध्यान करता है, तो उसकी दृष्टि धीरे-धीरे बाह्य ज्वालाओं से हटकर उस बिंदु पर केंद्रित हो जाती है जहाँ कोई आकार नहीं है (अलिङ्ग)।
यह अभ्यास साधक को 'साकार' से 'निराकार' की ओर ले जाता है। अग्नि का मध्य भाग उस शून्य का प्रतीक है जहाँ समस्त द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। जब साधक अनुभव करता है कि अग्नि के मध्य का वह पुरुष ही वास्तव में उसके अपने हृदय का सूर्य है, तब वह बाह्य होम को 'आत्मयज्ञ' में बदल देता है। यहाँ ध्यान का क्रम इस प्रकार है:
१. प्रज्वलित अग्नि का दर्शन (स्थूल) → २. अग्नि के मध्य बिंदु पर एकाग्रता (सूक्ष्म) → ३. अलिङ्ग पुरुष का अनुभव (कारण/निराकार)।
इस अभ्यास से साधक की चित्त-वृत्ति स्थिर होती है और वह इस बोध की भूमि पर पहुँचता है कि जिस सत्यज्योति को वह बाहर खोज रहा है, वह वास्तव में उसके भीतर का ही ब्रह्म-स्वरूप है।
विद्वदग्निहोमविधिः
ब्रह्मभूतं हि संचिन्त्य जुहुयात् सुसमाहितः ।
अवमृज्य ततो हस्तावाद्भिरामणिबन्धनात् ॥ ९.११६ ॥
(उसे) ब्रह्मरूप चिन्तन करके भली-भाँति समाहित होकर हवन करे; उसके बाद कलाईतक हाथोंको जलसे धोकर —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अग्नि के भीतर स्थित उस 'अलिङ्ग' पुरुष के स्वरूप को स्पष्ट किया, जो सत्यज्योति और आदित्य है। अब इस श्लोक में वे उस स्वरूप के ध्यान के पश्चात हवन की मानसिक अवस्था और कर्म के उपरांत की शुद्धि की विधि बता रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (साधकः) ब्रह्मभूतं हि संचिन्त्य सुसमाहितः जुहुयात्। ततो हस्तावाद्भिरामणिबन्धनात् अवमृज्य (जुहुयात्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• ब्रह्मभूतं: ब्रह्म के समान या ब्रह्मरूप। यहाँ इसका अर्थ है उस स्थिति में होना जहाँ साधक स्वयं को और अपने इष्ट को एक ही ब्रह्म तत्त्व के रूप में अनुभव करे।
• संचिन्त्य: चिन्तन करके। केवल विचार करना नहीं, अपितु उस तत्त्व में मन को लीन कर लेना।
• सुसमाहितः: भली-भाँति समाहित होकर। 'सु' उपसर्ग यहाँ पूर्णता का बोध कराता है; वह अवस्था जहाँ चित्त की चंचलता समाप्त हो गई हो और केवल ध्यान का विषय शेष रहे।
• जुहुयात्: हवन करे। यह विधिलिङ् लकार है, जो एक आवश्यक विधान को दर्शाता है।
• अवमृज्य: धोकर या मलकर साफ़ करके।
• हस्तावाद्भिरामणिबन्धनात्: हाथों को कलाई (मणिबन्ध) तक। 'मणिबन्ध' वह स्थान है जहाँ हाथ और कलाई मिलते हैं, जिसे योग में मणिबंध कहा जाता है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य बाह्य कर्म (हवन) को आंतरिक योग (समाधि) के साथ जोड़ रहे हैं। वाक्य की पूर्णता अगले श्लोक (९.११७) में होती है, जहाँ 'दीर्घ प्रणव' और 'यजुष' के प्रयोग से हवन की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
ऋषि कहते हैं कि हवन की क्रिया केवल सामग्री को अग्नि में डालने का नाम नहीं है, अपितु वह 'ब्रह्मभूत' होकर की जाने वाली एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। 'ब्रह्मभूतं संचिन्त्य' का भाव यह है कि आहुति देने वाला, आहुति दी जाने वाली सामग्री और वह अग्नि—तीनों एक ही ब्रह्म के विभिन्न रूप हैं। जब साधक 'सुसमाहित' होता है, तब उसकी दृष्टि बाह्य ज्वाला से हटकर उस 'अलिङ्ग पुरुष' पर टिक जाती है जिसका वर्णन पिछले श्लोक में था। ऐसी समाहित अवस्था में किया गया हवन 'कर्म' न रहकर 'योग' बन जाता है।
हवन के पश्चात 'हस्तावाद्भिरामणिबन्धनात् अवमृज्य' का निर्देश है। बाहरी दृष्टि से यह हाथों की शुद्धि है, क्योंकि हवन के समय हाथों में घी या सामग्री लगती है। किंतु याज्ञवल्क्य योगीश्वर हैं, अतः इसका आन्तर अर्थ भी गहरा है। मणिबन्ध तक हाथ धोना इस बात का प्रतीक है कि कर्म की समाप्ति के बाद साधक को पुनः अपनी चेतना को कर्म के आसक्त भावों से मुक्त कर लेना चाहिए। जिस प्रकार जल हाथों की भौतिक अशुद्धि को धो देता है, उसी प्रकार यह क्रिया साधक को यह स्मरण कराती है कि उसने जो कुछ भी अर्पित किया, वह अहंकार शून्य होकर ब्रह्म को ही अर्पित किया है। अब वह पुनः अपनी स्वाभाविक शुद्ध अवस्था में लौट आया है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'कर्म-योग' का व्यावहारिक सूत्र है। यहाँ अभ्यास का क्रम है: ध्यान → कर्म → शुद्धि।
सामान्यतः मनुष्य पहले कर्म करता है और फिर शांति खोजता है, किंतु याज्ञवल्क्य की विधि विपरीत है। वे कहते हैं कि पहले 'सुसमाहित' हो जाओ, फिर कर्म (हवन) करो। जब कर्म समाधि के भीतर किया जाता है, तो वह कर्म बंधन नहीं बनता, बल्कि मुक्ति का साधन बन जाता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि उसकी आंतरिक 'प्राणाग्नि' ही वह वास्तविक अग्नि है जिसमें वह अपने सीमित अहंकार की आहुति दे रहा है। 'ब्रह्मभूत' होने का अर्थ है—साधक की वह भूमि जहाँ 'मैं' और 'तू' का भेद मिट गया हो। जब वह इस भाव में हवन करता है, तो वह भौतिक अग्नि के माध्यम से अपने हृदय के सूर्य (आदित्य) से जुड़ जाता है। कलाई तक हाथ धोने का अभ्यास साधक को यह सिखाता है कि संसार में रहते हुए और कर्तव्यों का पालन करते हुए भी, भीतर से अनासक्त और निर्मल कैसे रहा जाए। यह क्रिया उसे 'साधन' से 'साध्य' की ओर ले जाने वाली एक मानसिक सेतु है।
दीर्घं प्रणवमुच्चार्य चित्तं तत्र निवेश्य च ।
यजुषा मनसा चैव जुहुयाद्विधिवद् बुधः ॥ ९.११७ ॥
दीर्घ प्रणव (ओंकार) का उच्चारण करके और चित्त को उसमें निवेशित करके; बुद्धिमान पुरुष विधि के अनुसार यजुष से और मन से ही हवन करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्मरूप चिन्तन और सुसमाहित होकर हवन करने तथा कर्म के उपरांत शारीरिक शुद्धि की विधि बताई। अब इस श्लोक में वे हवन की उस सूक्ष्म प्रक्रिया का उद्घाटन कर रहे हैं, जहाँ वाणी, मन और प्राण एक सूत्र में बंधकर आहुति प्रदान करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (बुधः) दीर्घं प्रणवमुच्चार्य चित्तं तत्र निवेश्य च, यजुषा मनसा चैव विधिवद् जुहुयात्।
पदार्थ और निर्वचन:
• दीर्घं प्रणवम्: विस्तृत या लम्बी ध्वनि वाला ओंकार। यहाँ 'दीर्घ' केवल समय की अवधि नहीं, अपितु उस विस्तार का प्रतीक है जो साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।
• उच्चार्य: उच्चारण करके। यह वाणी का साधन है।
• चित्तं तत्र निवेश्य: चित्त को उसमें (प्रणव में) स्थिर या लीन करके। 'निवेश' का अर्थ है पूरी तरह से समाहित हो जाना, जैसे कोई वस्तु किसी पात्र में पूरी तरह समा जाए।
• यजुषा: यजुष् (यजुर्वेद के मन्त्रों) के द्वारा। यजुः का अर्थ है 'यज्ञ' या 'विधि'। यहाँ यह मन्त्र-शक्ति का संकेत है।
• मनसा: मन के द्वारा। यह आंतरिक संकल्प और भाव का साधन है।
• विधिवद्: विधि के अनुसार। वह मर्यादा जो शास्त्र और योग-परम्परा ने निर्धारित की है।
• बुधः: बुद्धिमान या जागृत पुरुष। वह साधक जिसने विवेक प्राप्त कर लिया है और जो बाह्य क्रिया के पीछे के आन्तर अर्थ को जानता है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य हवन की क्रिया को एक पूर्ण योग-साधना में परिवर्तित कर रहे हैं। वाक्य की पूर्णता इसी श्लोक में है, जो पिछले श्लोक (९.११६) में आरम्भ हुई 'जुहुयात्' (हवन करे) की विधि को विस्तार देता है।
ऋषि कहते हैं कि एक जागृत साधक (बुधः) जब अग्निहोत्र करता है, तो वह केवल सामग्री की आहुति नहीं देता, अपितु अपनी पूरी सत्ता को उसमें समर्पित करता है। इसकी प्रक्रिया तीन स्तरों पर घटित होती है:
प्रथम, वाणी के स्तर पर 'दीर्घ प्रणव' का उच्चारण। प्रणव (ॐ) समस्त वेदों का सार है। जब साधक इसका दीर्घ उच्चारण करता है, तो वह अपनी चेतना को बाह्य जगत से समेटकर अन्तर्मुखी करता है। यह ध्वनि एक सेतु का कार्य करती है जो स्थूल शरीर को सूक्ष्म शरीर से जोड़ती है।
द्वितीय, चित्त का निवेश। केवल ध्वनि करना पर्याप्त नहीं है; उस ध्वनि के कंपन में चित्त को 'निवेशित' करना अनिवार्य है। जब चित्त प्रणव में लीन होता है, तब वह द्वैत से मुक्त होकर उस 'अलिङ्ग पुरुष' (जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में था) के साथ एकाकार होने लगता है।
तृतीय, यजुष् और मन का समन्वय। यहाँ याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य खोलते हैं—'यजुषा मनसा चैव'। सामान्यतः लोग या तो केवल मन्त्र पढ़ते हैं या केवल भाव में खो जाते हैं। किन्तु योगी 'यजुः' (मन्त्र की शक्ति) और 'मन' (भाव की तीव्रता) दोनों का एक साथ प्रयोग करता है। यजुः यहाँ उस अनुशासन और विधि का प्रतीक है जो ऊर्जा को सही दिशा देती है, और मन उस श्रद्धा का प्रतीक है जो आहुति को पूर्ण बनाती है।
अतः 'विधिवद्' हवन का अर्थ है—वाणी से प्रणव, चित्त से एकाग्रता, मन्त्र से अनुशासन और मन से समर्पण। जब ये चारों एक साथ मिलते हैं, तब बाह्य अग्नि में दी गई आहुति वास्तव में साधक के अहंकार और कर्मों की आहुति बन जाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्-मनस-प्राण' के एकत्रीकरण का अभ्यास है।
१. दीर्घ प्रणव का अभ्यास: साधक जब 'ॐ' का दीर्घ उच्चारण करता है, तो वह अपनी प्राण-शक्ति को ऊपर की ओर ले जाता है। यह ध्वनि चित्त के बिखराव को रोककर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करती है।
२. चित्त-निवेश: यह 'धारणा' की अवस्था है। प्रणव की ध्वनि को केवल सुनना नहीं, बल्कि उसमें स्वयं को विलीन कर देना ही 'निवेश' है। यहाँ साधक अपनी चेतना को शरीर से हटाकर उस नाद में स्थित करता है।
३. मानस हवन: 'मनसा जुहुयात्' का अर्थ है कि बाह्य अग्नि में सामग्री डालते समय, भीतर के हृदय-कमल में स्थित 'प्राणाग्नि' में अपने विकारों और सीमित पहचान की आहुति देना।
इस अभ्यास से साधक 'कर्म' की भूमि से 'ज्ञान' की भूमि की ओर बढ़ता है। वह अनुभव करता है कि बाहरी अग्नि केवल एक प्रतीक है; वास्तविक अग्नि उसके भीतर का तेज है। जब वाणी (प्रणव), बुद्धि (यजुः) और हृदय (मन) एक साथ मिलते हैं, तब साधक की चेतना स्थूलता को छोड़कर उस 'अक्षर' की ओर प्रस्थान करती है, जहाँ वह स्वयं को उस विराट पुरुष के रूप में देखता है।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ ९.११८ ॥
(गीता ४.२४:) अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्निमें ब्रह्मने (ही) आहुति दी है; ब्रह्मकर्ममें समाधि रखनेवालेको ब्रह्म ही प्राप्त होना है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने दीर्घ प्रणव के उच्चारण और चित्त के निवेश के साथ यजुष एवं मन से हवन करने की विधि बताई। अब इस श्लोक में वे उस हवन की पराकाष्ठा का उद्घाटन कर रहे हैं, जहाँ क्रिया और कर्ता का भेद समाप्त होकर सब कुछ ब्रह्ममय हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मकर्मसमाधिना (तेन) ब्रह्मैव गन्तव्यम्।
पदार्थ और निर्वचन:
• ब्रह्मार्पणम्: अर्पण (देने की क्रिया) ही ब्रह्म है। यहाँ 'अर्पण' का अर्थ केवल सामग्री डालना नहीं, अपितु समर्पण का भाव है।
• ब्रह्महविः: हवि (आहुति की सामग्री) भी ब्रह्म है। जो वस्तु अग्नि में समर्पित की जा रही है, वह स्थूल होते हुए भी अपने मूल स्वरूप में ब्रह्म ही है।
• ब्रह्माग्नौ: ब्रह्म रूपी अग्नि में। यहाँ अग्नि केवल भौतिक पावक नहीं, अपितु वह 'अलिङ्ग पुरुष' या 'सत्यज्योति' है जिसका ध्यान पिछले श्लोकों में बताया गया।
• ब्रह्मणा हुतम्: ब्रह्म द्वारा ही आहुति दी गई है। जब साधक अहंकार शून्य होकर 'ब्रह्मभूत' हो जाता है, तब कर्ता वह व्यक्ति नहीं, अपितु स्वयं ब्रह्म होता है।
• ब्रह्मकर्मसमाधिना: जो ब्रह्म-कर्म में समाधि (तन्मयता) रखता है। वह साधक जिसके लिए कर्म अब बंधन नहीं, बल्कि ब्रह्म की ही एक अभिव्यक्ति है।
• ब्रह्मैव गन्तव्यम्: उसे ब्रह्म की ही प्राप्ति होनी है। 'गन्तव्यम्' यहाँ गमन या उपलब्धि का सूचक है।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य हवन की बाह्य क्रिया को पूर्णतः आध्यात्मिक और योगिक स्वरूप प्रदान कर रहे हैं। यहाँ वाक्य की पूर्णता इसी श्लोक में है, जो पिछले श्लोकों (९.११६-११७) में वर्णित हवन-विधि का दार्शनिक और अनुभवात्मक उपसंहार है।
ऋषि यह रहस्य खोल रहे हैं कि जब साधक दीर्घ प्रणव और यजुष के साथ अग्निहोत्र करता है, तब उसे अपनी दृष्टि को स्थूल से हटाकर सूक्ष्म पर ले जाना चाहिए। साधारणतः हवन में तीन तत्व होते हैं: देने वाला (होता), दी जाने वाली वस्तु (हवि) और ग्रहण करने वाली अग्नि। परंतु योगी की दृष्टि में यह त्रैत समाप्त हो जाता है।
प्रथम, 'ब्रह्मार्पणम्' का भाव यह है कि समर्पण की वह चेतना ही ब्रह्म है। जब साधक यह अनुभव करता है कि मेरा यह समर्पण किसी बाहरी देवता को नहीं, बल्कि अपने ही भीतर के चैतन्य को है, तब अर्पण ब्रह्म बन जाता है। द्वितीय, 'ब्रह्महविः' का अर्थ है कि जो सामग्री (घी, अन्न आदि) अग्नि में डाली जा रही है, वह वास्तव में साधक के संस्कार, वासनाएँ और अहंकार हैं, जिन्हें वह ब्रह्म-अग्नि में भस्म कर रहा है। तृतीय, 'ब्रह्माग्नौ' का अर्थ है कि वह अग्नि वास्तव में हृदय-आकाश में स्थित वह सूर्य-पुरुष है, जो ज्ञान की प्रज्वलित ज्योति है। चतुर्थ, 'ब्रह्मणा हुतम्' का रहस्य यह है कि जब साधक 'अहं कर्ता' के भाव से मुक्त हो जाता है, तब वह स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है, और तब ब्रह्म ही ब्रह्म को ब्रह्म में अर्पित करता है।
अतः यह हवन केवल एक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि एक 'ब्रह्म-यज्ञ' है। जो साधक इस भाव में स्थित होकर कर्म करता है, वह 'ब्रह्मकर्मसमाधि' में होता है। उसके लिए कर्म और ज्ञान अलग-अलग नहीं रहते, बल्कि कर्म ही ज्ञान का साधन बन जाता है। ऐसा साधक जब इस समाधि में स्थित होता है, तो वह उसी तत्व में विलीन हो जाता है जिसका वह चिंतन कर रहा था।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म-योग' और 'ज्ञान-योग' की संधि है। यहाँ अभ्यास यह है कि हवन की प्रत्येक क्रिया को ब्रह्म के रूप में देखा जाए।
साधक जब भौतिक अग्नि के सम्मुख बैठता है, तो वह केवल घी की आहुति नहीं देता, बल्कि अपने मन के विकारों को उस 'अलिङ्ग पुरुष' (ब्रह्म) की अग्नि में समर्पित करता है। वह अनुभव करता है कि:
१. मेरा संकल्प (अर्पण) ब्रह्म है।
२. मेरी अंतःकरण की शुद्धि (हवि) ब्रह्म है।
३. मेरा ज्ञान-तेज (अग्नि) ब्रह्म है।
४. और मैं, जो यह क्रिया कर रहा हूँ (होता), वह भी ब्रह्म ही हूँ।
यह अभ्यास साधक को 'कर्ता' के अहंकार से मुक्त कर 'साक्षी' भाव में प्रतिष्ठित करता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि "ब्रह्म ही ब्रह्म को ब्रह्म में अर्पित कर रहा है", तब वह द्वैत से अद्वैत की भूमि पर पहुँच जाता है। यह 'ब्रह्मकर्मसमाधि' वह अवस्था है जहाँ बाह्य विधि (अग्निहोत्र) और आन्तर साधना (ध्यान) एक हो जाते हैं। इस भूमि पर पहुँचने के बाद साधक के लिए संसार की कोई भी क्रिया बंधनकारी नहीं रहती, क्योंकि वह हर क्रिया में ब्रह्म का ही दर्शन करता है। इसी समाधि के फलस्वरूप वह उस दिव्य पुरुष में प्रवेश करता है, जिसका वर्णन आगामी श्लोकों में है।
ज्योतिषां ज्योतिरित्याहुः सत्यं सत्येषु चैव हि ।
ब्रह्मणः परमं ब्रह्म आदित्यादित्य एव हि ॥ ९.११९ ॥
(उसे) ज्योतियोंकी ज्योति कहते हैं, सत्योंका सत्य; ब्रह्मासे परे परम ब्रह्म, आदित्योंका आदित्य।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्मार्पण और ब्रह्महवि के माध्यम से कर्म को समाधि में बदलने का रहस्य बताया। अब इस श्लोक में वे उस 'अलिङ्ग पुरुष' या 'सत्यज्योति' के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसका ध्यान हवन के समय करना है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: (तम्) ज्योतिषां ज्योतिः इति आहुरि, (तम्) सत्येषु सत्यं च एव हि, (तम्) ब्रह्मणः परमं ब्रह्म (आहुः), (तम्) आदित्यानाम् आदित्यम् एव हि।
पदार्थ और निर्वचन:
• ज्योतिषां ज्योतिः: समस्त ज्योतियों की ज्योति। यहाँ 'ज्योति' का अर्थ केवल प्रकाश नहीं, अपितु ज्ञान, चेतना और प्रदीप्ति है।
• सत्येषु सत्यम्: सत्यों में सत्य (सत्यों का सत्य)। जो सत्य प्रतीत होने वाले समस्त प्रपंचों का भी मूल आधार है।
• ब्रह्मणः परमं ब्रह्म: ब्रह्मा (सृष्टि-कर्ता) से भी परे परम ब्रह्म। यहाँ 'ब्रह्म' शब्द के दो प्रयोग हैं—एक वह जो ब्रह्मांड का विस्तार करता है (ब्रह्मा) और दूसरा वह जो निर्गुण, निराकार और सबका आधार है (परम ब्रह्म)।
• आदित्यानाम् आदित्यम्: आदित्यों का आदित्य। समस्त दैवीय शक्तियों और सौर-तेज के मूल स्रोत।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम तत्त्व की परिभाषा दे रहे हैं जिसे पिछले श्लोकों में 'अलिङ्ग पुरुष' और 'सत्यज्योति' कहा गया। यहाँ वाक्य की पूर्णता इसी श्लोक में है, जो एक दिव्य परिभाषा के रूप में प्रस्तुत है।
जब साधक अग्निहोत्र के समय उस निर्धूम अग्नि के मध्य में स्थित पुरुष का ध्यान करता है, तब उसे यह बोध होना चाहिए कि वह पुरुष कोई साधारण देवता नहीं, अपितु वह 'ज्योतिषां ज्योतिः' है। संसार में अनेक ज्योतियाँ हैं—सूर्य, चन्द्र, अग्नि और बुद्धि की ज्योति। किन्तु इन सबको प्रकाशित करने वाला एक 'महा-प्रकाश' है, जिसके बिना कोई भी ज्योति संभव नहीं है। वही वह परम पुरुष है।
इसी प्रकार, जगत में जिसे हम 'सत्य' मानते हैं—जैसे धर्म, नियम, या भौतिक अस्तित्व—वे सभी सापेक्ष सत्य हैं। इन समस्त सत्यों का आधार जो 'परम सत्य' है, वही 'सत्येषु सत्यम्' है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि सत्य कोई वस्तु नहीं, बल्कि सत्य स्वयं एक चैतन्य सत्ता है।
'ब्रह्मणः परमं ब्रह्म' के माध्यम से ऋषि स्पष्ट करते हैं कि यह साधना केवल सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा की उपासना नहीं है, अपितु उस 'परम ब्रह्म' की प्राप्ति है जो ब्रह्मा से भी परे, अनिर्वचनीय और अखंड है। जिस प्रकार आदित्य (सूर्य) समस्त नक्षत्रों और ग्रहों को आलोकित करता है, उसी प्रकार यह परम पुरुष समस्त आदित्यों और दैवीय शक्तियों का मूल है। अतः वह 'आदित्यों का आदित्य' है।
श्रुति-संगति —
इस रहस्य की पुष्टि श्रुति में इस प्रकार मिलती है:
स यथोर्णवाभिस्तन्तुनोच्चरेत् यथाग्नेः क्षुद्रा विष्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि सर्व एत आत्मानो व्युच्चरन्ति तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ १४.५.१.२३ ॥
जैसे मकड़ी तन्तुसे ऊपर जाती है, जैसे अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मासे सब प्राण, सब लोक, सब देव, सब भूत — ये सब (जीव-)आत्मा निकलते हैं। उसका उपनिषद् (रहस्य-नाम) है "सत्यका सत्य"। प्राण सत्य हैं, और यह उनका सत्य है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि जिस प्रकार अग्नि से चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मा से समस्त प्राण, लोक और देव उत्पन्न होते हैं। इसका रहस्य-नाम 'सत्यस्य सत्यम्' (सत्य का सत्य) है। श्रुति कहती है कि प्राण सत्य हैं, किन्तु यह आत्मा उन प्राणों का भी सत्य है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति-तत्व का विस्तार है; जो 'सत्येषु सत्यम्' है, वही वह परम पुरुष है जिसका ध्यान अग्निहोत्र के समय किया जाना चाहिए।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'दृष्टि के विलोम' का अभ्यास है। सामान्यतः हमारी दृष्टि 'प्रकाशित वस्तु' पर होती है, किन्तु यहाँ अभ्यास यह है कि दृष्टि को 'प्रकाशक' पर ले जाया जाए।
जब साधक अग्नि की ज्वाला को देखता है, तो वह केवल अग्नि को न देखे, बल्कि उस ज्योति को खोजे जिसने अग्नि को प्रकाशित किया है। फिर वह उस ज्योति के पीछे की ज्योति को खोजे। यह 'ज्योतिषां ज्योतिः' का अभ्यास साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाता है।
अभ्यास की विधि यह है कि साधक स्वयं को 'सत्य' (साक्षी) के रूप में स्थित करे और फिर यह अनुभव करे कि यह साक्षी-भाव भी उस 'परम सत्य' का ही प्रतिबिंब है। जब साधक 'सत्येषु सत्यम्' में स्थित होता है, तब वह अपनी व्यक्तिगत पहचान (अहंकार) को उस महा-ज्योति में विलीन कर देता है। यह अभ्यास साधक को 'सापेक्ष सत्य' की भूमि से उठाकर 'निरपेक्ष सत्य' की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है, जहाँ केवल एक ही अखंड प्रकाश शेष रहता है।
तादृशाग्निहोत्रफलम्
एवं यः कुरुते विप्रः अग्निहोत्रमतन्द्रितः ।
शासितं ज्ञानकर्मभ्यामभिसंध्य फलेन च ॥ ९.१२० ॥
इस प्रकार जो विप्र आलस्यरहित होकर ज्ञान और कर्मसे शासित, (और) फलकी अभिसन्धि (कामना) सहित अग्निहोत्र करता है —
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अग्निहोत्र के समय 'अलिङ्ग पुरुष' और 'सत्यज्योति' के ध्यान की विधि बताई तथा ब्रह्मार्पण-ब्रह्महवि के माध्यम से कर्म को समाधि में बदलने का रहस्य उजागर किया। अब इस श्लोक से उस साधना की पूर्णता और उसके फल का वर्णन आरम्भ हो रहा है।
अन्वय और पदार्थ —
अन्वय: एवं (विधम्) अग्निहोत्रम् यः विप्रः अतन्द्रितः कुरुते, (यः) ज्ञानकर्मभ्याम् शासितम् (अस्ति), (यः) फलेन च अभिसंध्य (कुरुते) — (तस्य फलम्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• एवं: इस प्रकार। यहाँ 'एवं' का सम्बन्ध पिछले श्लोकों (९.११५–९.११९) में वर्णित विधि से है—अर्थात् अलिङ्ग पुरुष का ध्यान, ब्रह्मरूप चिन्तन, दीर्घ प्रणव का उच्चारण और मनसा-यजुषा हवन।
• विप्रः: यहाँ विप्र केवल जन्मज जाति नहीं, अपितु वह है जो 'विप्र' (विशेष) चेतना में स्थित है, जो ज्ञान का अन्वेषी है।
• अतन्द्रितः: आलस्यरहित। योग की दृष्टि से 'तन्द्रा' वह मानसिक जड़ता है जो साधक को प्रसुप्त रखती है। अतन्द्रित होने का अर्थ है—पूर्ण सजगता में स्थित होना।
• शासितं ज्ञानकर्मभ्याम्: ज्ञान और कर्म दोनों से शासित। यहाँ 'शासित' का अर्थ है—अनुशासित या मर्यादित। वह साधक जिसने केवल ज्ञान का अहंकार नहीं पाला और न ही केवल कर्मकाण्ड के यांत्रिकपन में स्वयं को खोया, अपितु दोनों के समन्वय से स्वयं को अनुशासित किया है।
• अभिसंध्य फलेन च: फल की अभिसन्धि (कामना/लक्ष्य) सहित। 'अभिसंधि' का अर्थ है किसी लक्ष्य को सामने रखकर उसे प्राप्त करने का प्रयास करना। यहाँ फल का तात्पर्य लौकिक सुखों से नहीं, अपितु उस परम पद या मोक्ष से है जिसकी चर्चा अगले श्लोकों में आएगी।
भाष्य —
इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस आदर्श साधक की पात्रता बता रहे हैं जो अग्निहोत्र के वास्तविक फल को प्राप्त करने का अधिकारी है। यह वाक्य यहाँ समाप्त नहीं होता, अपितु इसका क्रिया-फल अगले श्लोकों (९.१२१–९.१२२) में स्पष्ट होता है कि ऐसा करने वाला विप्र 'दिव्य पुरुष में प्रवेश करता है'।
याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र दे रहे हैं—'ज्ञानकर्मभ्याम् शासितम्'। सामान्यतः ज्ञान और कर्म को परस्पर विरोधी माना जाता है; ज्ञान कहता है कि सब माया है, कर्म कहता है कि विधि अनिवार्य है। किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य के लिए ज्ञान और कर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कर्म बिना ज्ञान के अंधा है और ज्ञान बिना कर्म (साधना) के निराधार है। यहाँ 'शासित' शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि साधक ने ज्ञान को अपनी दृष्टि बनाया है और कर्म को अपना साधन। वह कर्म करता है, किन्तु ज्ञान के प्रकाश में।
'अतन्द्रितः' शब्द यहाँ साधना की तीव्रता को दर्शाता है। जब तक साधक में तन्द्रा (मानसिक निद्रा) है, तब तक वह केवल बाहरी आहुति दे रहा है। जब वह अतन्द्रित होता है, तब वह 'जागृत' होकर अपनी आंतरिक अग्नि में आहुति देता है।
'अभिसंध्य फलेन च' का अर्थ यहाँ संदिग्ध प्रतीत होता है, क्योंकि सामान्यतः योग में फल की इच्छा का त्याग बताया जाता है। किन्तु यहाँ भाव यह है कि साधक ने 'फल' (परम पद/मोक्ष) को अपना लक्ष्य बनाया है। बिना लक्ष्य के दिशाहीन प्रयास केवल क्रियाएँ हैं, साधना नहीं। अतः यहाँ फल की अभिसन्धि का अर्थ है—परम लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित संकल्प।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'समन्वय' का अभ्यास है। योग का अर्थ ही है जोड़ना। यहाँ ज्ञान और कर्म का जोड़ है।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि उसकी बाहरी पूजा या हवन तब तक निष्फल है जब तक वह 'अतन्द्रित' (सजग) नहीं होता। अभ्यास यह है कि जब वह बाहरी अग्नि में आहुति दे, तो साथ ही साथ अपने भीतर के ज्ञान-चक्षु से यह देखे कि वह आहुति वास्तव में उसके अहंकार और अविद्या की आहुति है।
यह स्थिति साधक को 'कर्म-भूमि' से 'ज्ञान-भूमि' की ओर ले जाती है, जहाँ कर्म अब बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति का साधन बन जाता है। जब ज्ञान और कर्म दोनों साधक को 'शासित' (अनुशासित) कर देते हैं, तब वह द्वैत से ऊपर उठकर उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ कर्ता, कर्म और फल—तीनों एक हो जाते हैं। यही वह भूमि है जहाँ से साधक 'दिव्य पुरुष' के साक्षात्कार के लिए तैयार होता है।
स दग्धकिल्बिषो भूत्वा वैश्वानरसमप्रभः ।
विशते पुरुषं दिव्यं शुक्लीभूत्वा ह्यलिङ्गकम् ॥ ९.१२१ ॥
— वह पापोंको जलाकर, वैश्वानर (अग्नि) के समान प्रभावाला होकर, शुक्ल (शुद्ध) होकर अलिङ्ग दिव्य पुरुषमें प्रवेश करता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२०) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस सजग साधक के लक्षणों का वर्णन किया जो ज्ञान और कर्म के अनुशासन में रहकर अग्निहोत्र करता है। वर्तमान श्लोक उसी वाक्य का पूर्णता की ओर ले जाने वाला फल-भाग है, जो यह बताता है कि ऐसी साधना का साधक पर क्या प्रभाव पड़ता है और वह अंततः किस अवस्था को प्राप्त करता है।
अन्वय और पदार्थ —
(सः) दग्धकिल्बिषो भूत्वा, वैश्वानरसमप्रभः, शुक्लो भूत्वा, अलिङ्गं दिव्यं पुरुषं विशते।
पदार्थ और निर्वचन:
• दग्धकिल्बिषो: जिसके किल्बिष (पाप/मल) जल चुके हों। 'किल्बिष' का अर्थ केवल नैतिक पाप नहीं, अपितु वे मानसिक संस्कार और अविद्या के आवरण हैं जो आत्मा के प्रकाश को ढंकते हैं।
• वैश्वानरसमप्रभः: वैश्वानर (विश्व की अग्नि/जठराग्नि/परमात्मा) के समान प्रभा वाला। यहाँ 'प्रभ' का अर्थ है वह तेज जो अज्ञान के अन्धकार को नष्ट कर दे।
• शुक्लीभूत्वा: शुक्ल होकर। 'शुक्ल' का अर्थ है शुद्ध, धवल और सात्विक। यह उस अवस्था का संकेत है जहाँ साधक के चित्त में कोई द्वैत या मल शेष नहीं रहता।
• अलिङ्गकम् (अलिङ्ग): बिना किसी चिह्न या लक्षण के। वह परमात्मा जिसे किसी भौतिक लक्षण, रूप या गुण से नहीं पहचाना जा सकता, वह 'अलिङ्ग' है।
• दिव्यं पुरुषं: उस दिव्य पुरुष (परमात्मा) में।
• विशते: प्रवेश करता है।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (९.१२०) से आरम्भ हुए वाक्य का विस्तार है। पिछले श्लोक में 'यः कुरुते' (जो करता है) कहा गया था, यहाँ उसका फल 'विशते' (प्रवेश करता है) क्रिया द्वारा स्पष्ट किया गया है।
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जब साधक 'ज्ञान और कर्म' के समन्वय से अग्निहोत्र करता है, तो वह केवल एक बाहरी अनुष्ठान नहीं रह जाता, बल्कि एक आंतरिक शोधन प्रक्रिया बन जाता है। 'दग्धकिल्बिष' शब्द यह दर्शाता है कि ज्ञान की अग्नि जब कर्म की आहुति के साथ मिलती है, तो साधक के संचित पाप और मानसिक मल भस्म हो जाते हैं। यह दाह बाहरी अग्नि से नहीं, अपितु उस बोध से होता है कि 'अग्नि' और 'हवि' दोनों ब्रह्म हैं।
साधक जब इस अवस्था में पहुँचता है, तो वह 'वैश्वानरसमप्रभ' हो जाता है। वैश्वानर वह अग्नि है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। जब साधक का अहंकार और मल जल जाता है, तो उसके भीतर वही दिव्य तेज प्रकट होता है जो सूर्य और वैश्वानर का है। यह तेज उसकी अपनी मौलिक आभा है, जो अविद्या के कारण ढकी हुई थी।
इसके पश्चात वह 'शुक्ली' यानी पूर्णतः शुद्ध होकर 'अलिङ्ग दिव्य पुरुष' में प्रवेश करता है। यहाँ 'अलिङ्ग' शब्द अत्यंत गूढ़ है। संसार की हर वस्तु का कोई न कोई 'लिङ्ग' (चिह्न/लक्षण) होता है, जिससे उसे पहचाना जा सके। किंतु वह परम पुरुष, जो शुद्ध चैतन्य है, वह अलिङ्ग है—उसका कोई भौतिक लक्षण नहीं है। साधक जब स्वयं के समस्त लक्षणों (नाम, रूप, जाति, अहंकार) को त्यागकर शुद्ध चैतन्य हो जाता है, तभी वह उस अलिङ्ग पुरुष में विलीन हो पाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस पाप-दाह की प्रक्रिया की पुष्टि छान्दोग्य उपनिषद् में मिलती है:
तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ५.२४.३ ॥
जैसे सींकका घुआ (रुई) अग्निमें डालते ही जल जाता है, वैसे ही उसके सब पाप जल जाते हैं जो इसे इस प्रकार जानकर अग्निहोत्र करता है।
यहाँ श्रुति कहती है कि जिस प्रकार अग्नि में रुई (इषीकातूल) डालते ही क्षण भर में जलकर नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार 'एवं विद्वान्' (ऐसा जानकर) अग्निहोत्र करने वाले के समस्त पाप जल जाते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और छान्दोग्य उपनिषद् दोनों इस बात पर सहमत हैं कि पापों का नाश केवल यांत्रिक कर्म से नहीं, बल्कि 'विद्वान्' होने से, अर्थात् उस आंतरिक रहस्य को जानने से होता है। बिना ज्ञान के किया गया कर्म केवल पुण्य संचय कर सकता है, किंतु 'दग्धकिल्बिष' (पापों का पूर्ण दहन) केवल ज्ञान-युक्त अग्निहोत्र से ही संभव है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शोधन' और 'लय' की प्रक्रिया है। साधक जब दीर्घ प्रणव और ब्रह्म-चिन्तन के साथ हवन करता है, तो वह वास्तव में अपनी वृत्तियों की आहुति दे रहा होता है।
१. पाप-दाह का अभ्यास: साधक अनुभव करता है कि उसके भीतर की नकारात्मकता, वासनाएँ और प्रमाद (तन्द्रा) उस दिव्य अग्नि में जल रहे हैं। यह 'दग्धकिल्बिष' की अवस्था है, जहाँ साधक स्वयं को हल्का और निर्मल अनुभव करता है।
२. तेज का अनुभव: जैसे-जैसे मल नष्ट होते हैं, साधक के भीतर एक आंतरिक प्रकाश का उदय होता है। 'वैश्वानरसमप्रभ' होना वह अवस्था है जहाँ साधक का व्यक्तिगत प्रकाश, सार्वभौमिक प्रकाश में बदल जाता है।
३. अलिङ्ग पुरुष में लय: यह साधना की वह भूमि है जहाँ साधक 'साक्षी' से ऊपर उठकर 'अक्षर' में विलीन होने की ओर बढ़ता है। 'अलिङ्ग' में प्रवेश का अर्थ है—रूप, गुण और नाम के पार जाना। साधक अपनी देह-बुद्धि और मन-बुद्धि के लक्षणों को छोड़कर उस निराकार, लक्षण-रहित चैतन्य में लीन हो जाता है।
अतः इस श्लोक का योगिक सार यह है कि बाहरी अग्निहोत्र वास्तव में आंतरिक शुद्धि का साधन है, जिसका अंतिम लक्ष्य अलिङ्ग पुरुष (परम तत्व) में पूर्ण विलय है।
अणिमाद्यैस्तु संयुक्तस्तेनैव सह मोदते ।
न च्यवते न व्यथते पुनर्वा जायते न च ॥ ९.१२२ ॥
वह अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त होकर उसी के साथ आनंद करता है, न वह विचलित होता है न व्याकुल होता है, और न ही पुनर्जन्म लेता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२१) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि ज्ञान और कर्म के समन्वय से अग्निहोत्र करने वाला साधक पापों का दहन कर अलिङ्ग दिव्य पुरुष में प्रवेश करता है। वर्तमान श्लोक उसी वाक्य की परिणति है, जो उस दिव्य पुरुष में लीन होने के पश्चात साधक की अवस्था और उसके परम फल का वर्णन करता है।
अन्वय और पदार्थ —
(सः) अणिमादि-सिद्धिभिः संयुक्तः, तेनैव (दिव्यपुरुणेन) सह मोदते। न (ततः) च्यवते, न व्यथते, पुनर्वा (न) जायते च।
पदार्थ और निर्वचन:
• अणिमाद्यैः: अणिमा आदि सिद्धियों से। 'अणिमा' सूक्ष्मता का प्रतीक है। यहाँ अणिमा आदि का उल्लेख उन स्वाभाविक सामर्थ्यों के लिए है जो चैतन्य के विस्तार और शुद्धता से स्वतः प्रकट होते हैं।
• संयुक्तः: युक्त होकर। यहाँ 'संयुक्त' का अर्थ केवल प्राप्ति नहीं, अपितु उन शक्तियों का आत्मा के साथ एकाकार हो जाना है।
• तेनैव सह मोदते: उसी (दिव्य पुरुष) के साथ आनंद करता है। 'मोद' का अर्थ है वह परमानंद जो द्वैत के मिटने पर शेष रहता है।
• न च्यवते: विचलित नहीं होता; गिरता नहीं। 'च्युति' का अर्थ है अपनी प्राप्त अवस्था से नीचे गिरना या पुनः अविद्या के वश में होना।
• न व्यथते: व्याकुल नहीं होता। 'व्यथा' मानसिक और शारीरिक क्लेशों का योग है।
• पुनर्वा जायते न च: और पुनः जन्म नहीं लेता। यह जन्म-मरण के चक्र (संसार) से पूर्ण मुक्ति का संकेत है।
भाष्य —
यह श्लोक पिछले श्लोक (९.१२०) से आरम्भ हुए वाक्य का उपसंहार है। उस वाक्य का क्रम इस प्रकार है: "जो विप्र ज्ञान-कर्म से शासित अग्निहोत्र करता है (९.१२०), वह पाप जलाकर दिव्य पुरुष में प्रवेश करता है (९.१२१) और अंततः अणिमादि सिद्धियों से युक्त होकर उसी में आनंदित रहता है तथा पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है (९.१२२)।"
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जहाँ साधक 'अलिङ्ग' पुरुष में विलीन हो चुका है। जब साधक का चित्त शुद्ध होकर उस दिव्य ज्योति में स्थित होता है, तो वह प्रकृति के सीमित बंधनों से ऊपर उठ जाता है। इस अवस्था में 'अणिमा' आदि सिद्धियाँ किसी कामना की पूर्ति के साधन नहीं, अपितु उस दिव्य पुरुष के साथ 'संयुक्त' होने के स्वाभाविक लक्षण हैं। जैसे सूर्य के उदय होने पर प्रकाश का फैलना स्वाभाविक है, वैसे ही आत्मा के शुद्ध होकर परमात्मा में स्थित होने पर उसकी शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं।
साधक अब उस परम पुरुष के साथ 'मोदते' अर्थात् आनंदित होता है। यह आनंद वह 'अहं' का आनंद नहीं है जो संसार में मिलता है, बल्कि यह 'तत्व' का आनंद है। यहाँ 'तेनैव सह' (उसी के साथ) शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है; यह दर्शाता है कि साधक और साध्य के बीच का भेद अब समाप्त हो गया है।
इस अवस्था की स्थिरता को ऋषि 'न च्यवते' और 'न व्यथते' कहकर स्पष्ट करते हैं। संसार की समस्त व्याधियाँ और विचलन मन के अस्थिर होने और वासनाओं के कारण होते हैं। जब साधक उस दिव्य पुरुष में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो उसके लिए न कोई भय बचता है और न कोई दुःख। वह अवस्था 'अच्युत' है, जहाँ से पतन संभव नहीं है। अंततः, यह साधना उसे 'न पुनर्जन्म' की स्थिति तक ले जाती है, जो कि समस्त योगों और स्मृतियों का चरम लक्ष्य है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साध्य' की प्राप्ति के बाद की स्थिति का वर्णन है। साधक जब बाहरी अग्निहोत्र को भीतर के 'प्राणाग्निहोत्र' में बदल देता है और अपनी चेतना को दिव्य पुरुष (हृदय-सूर्य) में निवेशित करता है, तब वह 'शुक्ली' (शुद्ध) हो जाता है।
इस अवस्था में अणिमा आदि सिद्धियों का आना यह दर्शाता है कि साधक ने पदार्थ और ऊर्जा के मूल स्रोत को पा लिया है। योग-साधना में जब चित्त पूरी तरह एकाग्र होकर अक्षर में लीन होता है, तो वह प्रकृति के नियमों से ऊपर उठ जाता है। यहाँ अभ्यास यह है कि साधक सिद्धियों को लक्ष्य न बनाए, अपितु उन्हें उस परम आनंद (मोद) का सह-उत्पाद माने।
साधक के लिए इस श्लोक का अनुभव यह है कि वह अब 'व्यथा' (तनाव/क्लेश) से मुक्त होकर एक ऐसी स्थिरता में है जहाँ कोई विचलन नहीं है। यह 'अच्युत' स्थिति वह भूमि है जहाँ से साधक पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) के बंधन को तोड़कर शाश्वत शांति में स्थित हो जाता है। यह वह बिंदु है जहाँ कर्म, ज्ञान और योग एक ही ज्योति में विलीन हो जाते हैं।
एवंविधं चिन्तयेत्तु आत्मयज्ञे ह्युपस्थिते ।
जीवं वैश्वानरं ध्यायेद्धृदये पद्मसंपुटे ॥ ९.१२३ ॥
आत्मयज्ञका (समय) उपस्थित होनेपर इस प्रकार चिन्तन करे; और हृदयकमलके सम्पुटमें वैश्वानर जीवका ध्यान करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोकों (९.१२०–९.१२२) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बाहरी अग्निहोत्र के आंतरिक रूपांतरण और उसके फल का वर्णन किया है, जहाँ साधक पापों का दहन कर अलिङ्ग दिव्य पुरुष में लीन होकर जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है। अब वर्तमान श्लोक से वह प्रक्रिया स्पष्ट की जा रही है कि यह मुक्तिदायी अवस्था किस 'आत्मयज्ञ' और किस 'ध्यान' के माध्यम से प्राप्त होती है।
अन्वय और पदार्थ —
(साधकः) आत्मयज्ञे ह्युपस्थिते तु एवंविधं चिन्तयेत्, (तथा) हृदये पद्मसंपुटे जीवं वैश्वानरं ध्यायेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• आत्मयज्ञे उपस्थिते: आत्मयज्ञ के उपस्थित होने पर। यहाँ 'उपस्थित' होने का अर्थ है—जब साधक बाहरी कर्मकाण्डों से ऊपर उठकर अंतर्मुखी होकर स्वयं के भीतर यज्ञ करने की स्थिति में आता है।
• एवंविधं चिन्तयेत्: इस प्रकार चिन्तन करे। 'एवंविध' शब्द पिछले श्लोकों में वर्णित उस ब्रह्म-भाव और ज्योति-रूप चिन्तन की ओर संकेत करता है, जहाँ अर्पण, हवि और अग्नि तीनों ब्रह्म हैं।
• हृदये पद्मसंपुटे: हृदय के कमल-सम्पुट में। 'सम्पुट' का अर्थ है वह सुरक्षित आवरण या कोश जिसमें कोई बहुमूल्य वस्तु रखी हो। यहाँ हृदय को एक कमल के समान पवित्र कोश माना गया है, जिसमें आत्मा प्रतिष्ठित है।
• जीवं वैश्वानरं: वैश्वानर जीव का। 'वैश्वानर' वह अग्नि है जो संपूर्ण विश्व में व्याप्त है (विश्व-नर), किंतु यहाँ वह 'जीव' के रूप में हृदय में स्थित है। यह वह प्राण-अग्नि है जो चैतन्य और ऊर्जा का स्रोत है।
• ध्यायेत्: ध्यान करे। यह केवल मानसिक कल्पना नहीं, बल्कि तन्मयतापूर्वक उस ज्योति-स्वरूप पुरुष का अनुभव करना है।
भाष्य —
यह श्लोक एक अत्यंत महत्वपूर्ण संधि-स्थल है, जहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य बाहरी अग्निहोत्र (कुण्ड-यज्ञ) को पूर्णतः आंतरिक 'आत्मयज्ञ' में परिवर्तित कर देते हैं। अब तक की चर्चा में अग्निहोत्र के फल और दिव्य पुरुष में प्रवेश की बात थी; यहाँ उस प्रवेश की 'विधि' बताई जा रही है।
ऋषि कहते हैं कि जब साधक आत्मयज्ञ की स्थिति में आता है—अर्थात् जब वह शरीर, मन और प्राणों को ही यज्ञ की सामग्री मानकर उन्हें परमात्मा में समर्पित करने के लिए तत्पर होता है—तब उसे उसी प्रकार का चिन्तन करना चाहिए जैसा पिछले श्लोकों में बताया गया है। वह चिन्तन है—'ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्' (ब्रह्म-अग्नि में ब्रह्म द्वारा आहुति)।
इस आत्मयज्ञ की मुख्य विधि है—हृदय-कमल के सम्पुट में 'वैश्वानर जीव' का ध्यान। बाहरी यज्ञ में अग्नि कुण्ड के भीतर प्रज्वलित होती है, किंतु आत्मयज्ञ में हृदय वह कुण्ड है और उसमें स्थित वैश्वानर अग्नि वह ज्योति है जो साधक के अज्ञान और पापों को जलाती है। वैश्वानर यहाँ केवल जठराग्नि नहीं, अपितु वह 'विज्ञानमय पुरुष' है जो हृदय के भीतर सूर्य के समान देदीप्यमान है। जब साधक इस वैश्वानर जीव का ध्यान करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के उस दिव्य पुरुष को जाग्रत करता है जो उसे स्थूल शरीर से ऊपर उठाकर अलिङ्ग अवस्था की ओर ले जाता है।
श्रुति-संगति —
इस आंतरिक अग्नि के रहस्य की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में अश्वपति के उपदेश से होती है:
स होवाच मूर्धानमुपदिशन्नेष वा अतिष्ठा वैश्वानर इति चक्षुषी उपदिशन्नुवाचैष वै सुततेजा वैश्वानर इति नासिके उपदिशन्नुवाचैष वै पृथग्वर्त्मा वैश्वानर इति मुख्यमाकाशमुपदिशन्नुवाचैष वै बहुलो वैश्वानर इति मुख्या अप उपदिशन्नुवाचैष वै रयिर्वैश्वानरो इति च्छुबुकमुपदिशन्नुवाचैष वै प्रतिष्ठा वैश्वानर इति स एषोऽग्निर्वैश्वानरो यत्पुरुषः स यो हैतमेवमग्निं वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेदाप पुनर्मृत्युं जयति सर्वमायुरेति न हास्य ब्रुवाणं चन वैश्वानरो हिनस्ति ॥ १०.६.१.११ ॥
उसने सिरकी ओर संकेत करके कहा — "यह 'अतिष्ठा' (सबसे ऊपर स्थित) वैश्वानर है।" आँखोंकी ओर संकेत करके कहा — "यह 'सुततेजा' वैश्वानर है।" नासिकाओंकी ओर संकेत करके — "यह 'पृथग्वर्त्मा' वैश्वानर है।" मुखके आकाशकी ओर — "यह 'बहुल' वैश्वानर है।" मुखके जलकी ओर — "यह 'रयि' वैश्वानर है।" ठोड़ीकी ओर — "यह 'प्रतिष्ठा' वैश्वानर है।" वह यह वैश्वानर अग्नि है जो पुरुष है। जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका, पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है, वह पुनर्मृत्युको जीतता है, पूरी आयु पाता है, और जो उसे बुरा कहता है, उसे भी वैश्वानर नहीं मारता।
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि वैश्वानर अग्नि केवल एक तत्व नहीं, बल्कि 'पुरुष-विध' (पुरुष के आकार वाली) है और 'पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं' (पुरुष के भीतर प्रतिष्ठित) है। स्मृति का 'पद्मसंपुट' और श्रुति का 'पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठित' एक ही सत्य के दो आयाम हैं। जहाँ श्रुति वैश्वानर के विभिन्न स्थानों (मूर्धा, चक्षु, नासिका आदि) का वर्णन कर उसे संपूर्ण शरीर में व्याप्त दिखाती है, वहीं यह स्मृति साधक को ध्यान के लिए 'हृदय' के केंद्र बिंदु पर एकाग्र करती है, क्योंकि हृदय ही वह मुख्य अधिष्ठान है जहाँ से संपूर्ण प्राण-शक्ति का संचालन होता है। जो इस वैश्वानर को भीतर प्रतिष्ठित जानता है, वह पुनर्मृत्यु को जीत लेता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'कर्म-योग' से 'ध्यान-योग' की ओर संक्रमण है।
१. अभ्यास का स्थान: साधक के लिए अब बाहरी वेदी का त्याग कर 'हृदय' को ही वेदी मानना है। 'पद्मसंपुट' का ध्यान उसे यह अनुभव कराता है कि उसका हृदय एक पवित्र और सुरक्षित कोश है, जिसमें परमात्मा की ज्योति सुरक्षित है।
२. ध्यान की प्रक्रिया: यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को हृदय के केंद्र में ले जाए और वहाँ एक ज्योति-स्वरूप 'वैश्वानर पुरुष' की उपस्थिति का अनुभव करे। यह वैश्वानर उसकी अपनी ही वह शुद्ध चेतना है जो अभी अविद्या के कारण 'जीव' प्रतीत हो रही है, किंतु ध्यान से वह 'ब्रह्म' में रूपांतरित हो जाती है।
३. भूमि का परिवर्तन: जब साधक बाहरी अग्निहोत्र (स्थूल कर्म) से आत्मयज्ञ (सूक्ष्म कर्म) की ओर बढ़ता है, तो वह 'साधन-भूमि' से 'साध्य-भूमि' की ओर प्रविष्ट होता है। हृदय में वैश्वानर का ध्यान उसे उस अवस्था में ले जाता है जहाँ वह स्वयं ही हवि, स्वयं ही अग्नि और स्वयं ही होम-कर्ता बन जाता है।
इस प्रकार, यह श्लोक साधक को सिखाता है कि वास्तविक यज्ञ शरीर के भीतर है, और उस यज्ञ की अग्नि 'वैश्वानर' है, जिसका ध्यान ही मोक्ष का द्वार है।
उदरे गार्हपत्योऽग्निः पृष्ठदेशे तु दक्षिणः ।
आस्ये आहवनीयोऽग्निस्त्रिधा ह्येवं निवेशयेत् ॥ ९.१२४ ॥
उदरमें गार्हपत्य अग्नि, पीठमें दक्षिणाग्नि, और मुखमें आहवनीय अग्नि — इस प्रकार तीन रूपोंमें (उसे) स्थापित करे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२३) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने आत्मयज्ञ की स्थिति में हृदय-कमल के भीतर 'वैश्वानर जीव' के ध्यान का निर्देश दिया। अब वर्तमान श्लोक में वे उस वैश्वानर अग्नि के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूप को शरीर के तीन प्रमुख केंद्रों में स्थापित कर, शरीर को ही एक जीवित यज्ञ-वेदी में रूपांतरित करने की विधि बता रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(साधकः) उदरे गार्हपत्योऽग्निः, पृष्ठदेशे तु दक्षिणः, (तथा) आस्ये आहवनीयोऽग्निः — (एवं) त्रिधा ह्येवं निवेशयेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• उदरे गार्हपत्योऽग्निः: उदर (पेट) के स्थान पर गार्हपत्य अग्नि। वैदिक कर्मकाण्ड में गार्हपत्य अग्नि वह है जो गृहस्थ के घर की मुख्य अग्नि होती है, जहाँ हवि का संग्रहण और भोजन की शुद्धि होती है। यहाँ उदर को गार्हपत्य माना गया है क्योंकि शरीर का पोषण और पाचन यहीं संपन्न होता है।
• पृष्ठदेशे तु दक्षिणः: पीठ के प्रदेश में दक्षिणाग्नि। दक्षिण अग्नि वह है जो देवताओं और पितरों के निमित्त दक्षिण दिशा की ओर मुख करके प्रज्वलित की जाती है। यहाँ पीठ (रीढ़ का क्षेत्र) को दक्षिण अग्नि का स्थान बताया गया है।
• आस्ये आहवनीयोऽग्निः: मुख में आहवनीय अग्नि। आहवनीय वह अग्नि है जिसमें देवताओं के लिए आहुति दी जाती है। मुख वह द्वार है जिससे प्राण और अन्न दोनों का ग्रहण होता है, अतः यह आहवनीय है।
• त्रिधा ह्येवं निवेशयेत्: इस प्रकार तीन रूपों में (इन अग्नियों को) स्थापित करे। 'निवेशयेत्' क्रिया यहाँ केवल मानसिक कल्पना नहीं, बल्कि प्राणिक ऊर्जा को उन केंद्रों पर केंद्रित करने का विधान है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक बाहरी यज्ञ-वेदी (वेदि) और आंतरिक शरीर-वेदी के अभेद को प्रकट करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह रहस्य खोल रहे हैं कि जो तीन अग्नियाँ (गार्हपत्य, दक्षिण और आहवनीय) बाहरी यज्ञ में प्रयुक्त होती हैं, वे वास्तव में शरीर के भीतर ही विद्यमान हैं।
साधक जब आत्मयज्ञ में लीन होता है, तब वह अपने शरीर को केवल मांस-मज्जा का पुंज नहीं, बल्कि एक पवित्र वेदी के रूप में देखता है। उदर में गार्हपत्य अग्नि का निवेश करने का अर्थ है—पाचन की अग्नि को केवल भौतिक भोजन पचाने वाला साधन न मानकर, उसे उस दैवीय अग्नि के रूप में अनुभव करना जो जीवन का आधार है। पीठ के प्रदेश में दक्षिणाग्नि का अनुभव करना यह दर्शाता है कि साधक की रीढ़ (पृष्ठ) वह आधार है जो उसे ऊपर की ओर (देवताओं की ओर) ले जाता है। मुख में आहवनीय अग्नि का चिंतन यह बोध कराता है कि मुख से जो भी शब्द या अन्न भीतर जाता है, वह वास्तव में परमात्मा को दी जाने वाली आहुति है।
यहाँ 'निवेश' शब्द महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है—बाहरी कर्मकाण्ड की चेतना को भीतर की ओर मोड़ देना। जब साधक इस प्रकार तीन अग्नियों को शरीर में स्थापित करता है, तब उसका संपूर्ण अस्तित्व एक निरंतर चलने वाले यज्ञ में बदल जाता है। यह विधि बाहरी विधिको मिटाती नहीं, बल्कि उसे पूर्णता प्रदान करती है; अब बाहरी अग्निहोत्र केवल एक प्रतीक रह जाता है और वास्तविक अग्निहोत्र शरीर के भीतर घटने लगता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस आंतरिक अग्नि-व्यवस्था का समर्थन प्रश्न उपनिषद् में भी मिलता है:
प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ४.३ ॥
इस (शरीर-)पुरमें प्राणरूपी अग्नियाँ ही जागती रहती हैं। अपान ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) है; और क्योंकि (आहवनीय) गार्हपत्यसे निकालकर ले जाया जाता है, (अपानसे ऊपर ले जाया जानेवाला) प्राण आहवनीय है।
इस उपनिषद् में शरीर-पुर के भीतर प्राणों को ही अग्नि माना गया है। वहाँ अपान को गार्हपत्य, व्यान को दक्षिणाग्नि (अन्वाहार्यपचन) और प्राण को आहवनीय कहा गया है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और प्रश्न उपनिषद् की ये दोनों दृष्टियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं। जहाँ स्मृति में 'स्थान' (उदर, पीठ, मुख) पर बल दिया गया है, वहीं प्रश्न उपनिषद् में 'प्राण' (अपान, व्यान, प्राण) के स्वरूप पर। वास्तव में, उदर में अपान, पीठ/संपूर्ण शरीर के परिधि में व्यान और मुख/श्वसन तंत्र में प्राण का ही अधिष्ठान है। अतः दोनों शास्त्र एक ही सत्य को कह रहे हैं—यह शरीर ही वह पुर (नगर) है जिसमें दैवीय अग्नियाँ जाग्रत हैं।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'अन्न-योग' और 'प्राण-योग' का मिलन है। साधक के लिए अब भोजन करना केवल क्षुधा शांत करना नहीं, बल्कि 'आहवनीय' (मुख) के माध्यम से 'गार्हपत्य' (उदर) में आहुति देना है। जब साधक इस भाव से अन्न ग्रहण करता है कि "मैं इस अन्न को अपने भीतर की दिव्य अग्नि में समर्पित कर रहा हूँ", तब वह भोजन उसके लिए औषधि और ओज बन जाता है।
साधक का अभ्यास यह है कि वह ध्यान के समय अपनी चेतना को तीन केंद्रों पर ले जाए: पहले मुख (आहवनीय), फिर पीठ (दक्षिण) और अंततः उदर (गार्हपत्य)। इस त्रिकोणीय निवेश से शरीर की जड़ता समाप्त होती है और वह 'अलिङ्ग' पुरुष के साक्षात्कार के योग्य बनता है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर से सूक्ष्म प्राण-शरीर की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह अनुभव करता है कि वह स्वयं एक प्रज्वलित ज्योति है।
शून्योऽग्निः सत्यसंज्ञस्तु मूर्धन्येवाश्रितः सदा ।
यः पञ्चाग्नीनिमान् वेद आहिताग्निः स उच्यते ॥ ९.१२५ ॥
शून्य (आकाशरूप) अग्नि, जिसका नाम सत्य है, सदा मूर्धामें ही स्थित है; जो इन पाँच अग्नियोंको जानता है, वह आहिताग्नि कहलाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२४) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर के तीन केंद्रों—उदर, पीठ और मुख—में गार्हपत्य, दक्षिण और आहवनीय अग्नियों के निवेश का विधान बताया। वर्तमान श्लोक इस आंतरिक अग्नि-मंडल की पूर्णता करते हुए चतुर्थ अग्नि का परिचय देता है और इन समस्त अग्नियों के ज्ञान को 'आहिताग्नि' होने की कसौटी मानता है।
अन्वय और पदार्थ —
शून्योऽग्निः, सत्यसंज्ञः तु मूर्धन्येवाश्रितः सदा। यः इमान् पञ्चाग्नीन् वेद, (सः) आहिताग्निः स उच्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• शून्योऽग्निः: शून्य अग्नि। यहाँ 'शून्य' का अर्थ अभाव नहीं, अपितु 'आकाशरूप' है। वह अग्नि जो स्थूलता से मुक्त होकर सूक्ष्म आकाश के समान व्यापक और निर्मल है।
• सत्यसंज्ञः: जिसका नाम 'सत्य' है। सत्य वह है जो अपरिवर्तनीय और शाश्वत है। यह अग्नि भौतिक दाहक अग्नि नहीं, अपितु वह चैतन्य-ज्योति है जो सत्य स्वरूप है।
• मूर्धन्येवाश्रितः सदा: सदा मूर्धा (सिर के उच्चतम भाग) में ही आश्रित है। यह स्थिति उस उच्चतम बिंदु को संकेत करती है जहाँ साधक की चेतना स्थूल शरीर की सीमाओं को लाँघकर अक्षर में विलीन होती है।
• यः इमान् पञ्चाग्नीन् वेद: जो इन पाँच अग्नियों को जानता है। यहाँ 'वेद' का अर्थ केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान (अनुभूति) है।
• आहिताग्निः स उच्यते: वह 'आहिताग्नि' कहलाता है। 'आहिताग्नि' वह है जिसने अग्नि स्थापित की हो (अग्निहोत्री)। यहाँ संकेत है कि जिसने देह के भीतर इन अग्नियों को पहचान लिया, उसने वास्तव में यज्ञ संपन्न कर लिया।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक आंतरिक यज्ञ की पराकाष्ठा को दर्शाता है। पिछले श्लोक में तीन अग्नियों का वर्णन था, यहाँ चतुर्थ अग्नि 'सत्य' का उल्लेख है जो मूर्धा में स्थित है। यदि हम पिछले श्लोकों के क्रम को देखें, तो श्लोक ९.१२३ में 'हृदय-कमल' में स्थित वैश्वानर जीव का ध्यान बताया गया था। इस प्रकार हृदयस्थ वैश्वानर, उदरस्थ गार्हपत्य, पीठस्थ दक्षिण, मुखस्थ आहवनीय और मूर्धास्थ सत्य—ये मिलकर वह 'पञ्चाग्नि' मंडल बनाते हैं जिसे ऋषि यहाँ जानने का निर्देश दे रहे हैं।
मूर्धा में स्थित 'शून्य अग्नि' का रहस्य यह है कि यह वह ज्योति है जो शरीर के समस्त द्वंद्वों से ऊपर उठकर शून्य (आकाश) के समान प्रशांत है। इसे 'सत्य' इसलिए कहा गया है क्योंकि जब साधक की चेतना इस बिंदु तक पहुँचती है, तब उसे अनुभव होता है कि केवल यही सत्य है, शेष सब माया या परिवर्तनशील है। यह अग्नि वास्तव में वह 'अक्षर' है जिसकी चर्चा याज्ञवल्क्य अपनी श्रुति में करते हैं, जो सूर्य और चन्द्र को भी प्रशासित करती है।
ऋषि यहाँ एक अत्यंत गंभीर सूत्र दे रहे हैं कि जो इन पाँचों अग्नियों को अपने भीतर 'वेद' (अनुभव) करता है, वह 'आहिताग्नि' है। सामान्यतः आहिताग्नि उसे माना जाता है जिसने बाहर कुण्ड बनाकर अग्नि स्थापित की हो और प्रतिदिन आहुति दी हो। किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य का भाव यह है कि बाहरी कुण्ड तो केवल एक प्रतीक है; वास्तविक अग्निहोत्र वह है जहाँ प्राण और चेतना का उत्थान होकर वे शरीर के विभिन्न केंद्रों में प्रज्वलित हों। ऐसा साधक बिना किसी बाहरी क्रिया के भी पूर्णतः अग्निहोत्री है क्योंकि उसका संपूर्ण अस्तित्व ही एक निरंतर प्रज्वलित यज्ञ बन गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद न सह तैरप्याचरन्पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यलोको भवति य एवं वेद ॥ ५.१०.१० ॥
और जो इन पाँच अग्नियोंको इस प्रकार जानता है, वह उन (पतितों) के साथ आचरण करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता; वह शुद्ध, पवित्र और पुण्यलोकवाला होता है — जो ऐसा जानता है।
छान्दोग्य उपनिषद् में भी 'पञ्चाग्नि-विद्या' का वर्णन आता है, जहाँ कहा गया है कि जो इन पाँच अग्नियों को जानता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता और शुद्ध होकर पुण्यलोक को प्राप्त करता है। यद्यपि छान्दोग्य उपनिषद् की पञ्चाग्नि-विद्या मुख्य रूप से जीवात्मा के पुनर्जन्म और गमन के मार्गों (द्युलोक, पर्जन्य आदि) से संबंधित है, किन्तु बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में इन पाँच अग्नियों को शरीर के भीतर स्थित प्राणिक केंद्रों के रूप में देखा गया है। दोनों ग्रंथों का मूल उद्देश्य एक ही है—पाँचों अग्नियों के ज्ञान द्वारा साधक की शुद्धि और उसे दिव्य पुरुष या पुण्यलोक की ओर ले जाना। स्मृति यहाँ उस विद्या को 'योग' के व्यावहारिक अभ्यास में बदल देती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'देह-यज्ञ' की पूर्णता का सूत्र है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को केवल एक स्थान पर न रोककर, उसे शरीर के विभिन्न केंद्रों में प्रवाहित करे। जब वह उदर, पीठ, मुख और हृदय की अग्नियों को संतुलित कर लेता है, तब उसकी चेतना स्वतः मूर्धा की 'सत्य-अग्नि' की ओर अग्रसर होती है।
मूर्धा में स्थित 'शून्य अग्नि' का ध्यान साधक को उस स्थिति में ले जाता है जहाँ विचार शून्य हो जाते हैं और केवल 'सत्य' का प्रकाश शेष रहता है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल' (शरीर) से 'सूक्ष्म' (प्राण) और फिर 'कारण' (शून्य/सत्य) की ओर ले जाता है। जो साधक इस आंतरिक अग्नि-मंडल को जाग्रत कर लेता है, उसके लिए बाहरी कर्मकाण्ड केवल एक सहायक साधन रह जाते हैं; वह स्वयं एक जीवंत वेदी बन जाता है, जिसमें प्रत्येक श्वास एक आहुति है और प्रत्येक विचार एक मन्त्र। वह 'आहिताग्नि' की उस भूमि पर पहुँच जाता है जहाँ वह संसार में रहते हुए भी पापों से अलिप्त और शुद्ध रहता है।
सम्पादकीय टिप्पणी — भाष्यमें मूर्धास्थ ‘शून्य अग्नि’ को ‘वास्तवमें’ वही अक्षर कहा गया है जिसके प्रशासनमें सूर्य-चन्द्र धृत हैं (बृहदारण्यक ३.८.९)। अक्षरका वह वर्णन श्रुतिका है, पर इस अग्निसे उसकी एकता श्लोक या श्रुति नहीं कहती — यह भाष्यकारकी व्याख्या है। श्लोकका निश्चित कथन इतना है: सत्य-नामक शून्य अग्नि मूर्धामें स्थित है, और पाँचों अग्नियोंको जाननेवाला आहिताग्नि है।
योगमार्गेणात्मोपासनम्
केशबर्हि(ः)समाच्छन्नमुरोवेद्यां प्रतिष्ठितम् ।
चेतोत्माधाममात्रं तु निर्भासं चात्मभासकम् ॥ ९.१२६ ॥
केशरूपी कुशोंसे ढकी, वक्षरूपी वेदीपर प्रतिष्ठित, चेतनात्माका धाममात्र, प्रकाशमान और आत्माको भासित करनेवाला (ज्योति) —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२५) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने शरीर की पाँच अग्नियों के ज्ञान से साधक के 'आहिताग्नि' होने की घोषणा की। अब वर्तमान श्लोक में वे इस आंतरिक यज्ञ की वेदी और उस पर प्रतिष्ठित ज्योति के स्वरूप का सूक्ष्म वर्णन कर रहे हैं, जिससे साधक अपनी देह को ही एक जीवंत यज्ञ-शाला के रूप में अनुभव कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
(यः) केशबर्हिः समाच्छन्नम्, (यत्) उरो-वेद्यां प्रतिष्ठितम्, (तत्) चेतोत्मा-धाम-मात्रं तु, (तत्) निर्भासं च, आत्मभासकम् (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• केशबर्हिः समाच्छन्नम्: केशरूपी कुशों (बर्हि) से ढका हुआ। यज्ञ में वेदी को कुशों से ढका जाता है ताकि वह पवित्र रहे और बाहरी अशुद्धियों से मुक्त रहे; यहाँ शरीर के केश उस पवित्र आवरण के प्रतीक हैं।
• उरो-वेद्यां प्रतिष्ठितम्: वक्ष (छाती) रूपी वेदी पर प्रतिष्ठित। 'उर' का अर्थ है हृदय प्रदेश या वक्ष। यहाँ देह का मध्य भाग वह वेदी है जहाँ सर्वोच्च चेतना का आवाहन होता है।
• चेतोत्मा-धाम-मात्रं: चेतनात्मा का केवल धाम (निवास)। यह वह स्थान है जहाँ केवल शुद्ध चेतना का वास है, यहाँ किसी भौतिक वस्तु का अस्तित्व नहीं, केवल 'धाम' या प्रकाश-पुंज है।
• निर्भासं: जो स्वयं किसी अन्य प्रकाश से प्रकाशित नहीं है। वह 'निर्भास' है क्योंकि वह स्वयं प्रकाश का स्रोत है, उसे बाहर से किसी दीपक या सूर्य की आवश्यकता नहीं।
• आत्मभासकम्: जो आत्मा को भासित (प्रकाशित) करने वाला है। वह ज्योति इतनी प्रखर और शुद्ध है कि उसी के प्रकाश में साधक अपनी वास्तविक आत्मा के स्वरूप को देख पाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक बाह्य कर्मकाण्ड और आन्तरिक योग के बीच के सेतु को स्पष्ट करता है। वैदिक परंपरा में यज्ञ के लिए एक वेदी बनाई जाती है, जिसे कुश (बर्हि) से ढका जाता है और उस पर अग्नि प्रतिष्ठित की जाती है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उसी विधान का आन्तरिक रहस्य खोल रहे हैं। वे कहते हैं कि साधक के लिए उसकी अपनी देह ही वह महावेदी है।
यहाँ 'वक्ष' (छाती) को वेदी माना गया है और शरीर के 'केशों' को बर्हि (कुश) के समान। जिस प्रकार कुश वेदी की पवित्रता की रक्षा करते हैं, वैसे ही यह शरीर अपनी सूक्ष्म चेतना को आवरण प्रदान करता है। इस वक्ष-वेदी पर जो प्रतिष्ठित है, वह कोई भौतिक अग्नि नहीं, अपितु 'चेतोत्मा' का धाम है।
इस ज्योति की विशेषता यह है कि यह 'निर्भास' और 'आत्मभासक' है। यह एक महान विरोधाभास जैसा प्रतीत होता है—जो स्वयं निर्भास (बिना किसी बाहरी प्रकाश के) है, वही आत्मा को प्रकाशित कर रहा है। इसका रहस्य यह है कि वह ज्योति स्वयं 'स्वरूप-प्रकाश' है। जैसे सूर्य को देखने के लिए किसी दूसरे दीपक की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही यह आन्तरिक ज्योति स्वयं प्रकाशमान है और इसी के प्रकाश में साधक को अपने 'अहम्' (आत्मा) का साक्षात्कार होता है। यह वाक्य अगले श्लोक (९.१२७) में पूर्ण होता है, जहाँ इस ज्योति को 'सोम-मध्यस्थ अमृत' कहा गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा सन्देहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ ५.१८.२ ॥
इस वैश्वानर आत्माका सिर ही सुतेजा (द्युलोक) है, चक्षु विश्वरूप (सूर्य), प्राण पृथग्वर्त्मा (वायु), शरीरका मध्य बहुल (आकाश), बस्ति ही रयि (जल), पृथिवी ही पैर; छाती ही वेदी है, रोम कुश हैं, हृदय गार्हपत्य अग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) है, और मुख आहवनीय अग्नि है।
इस छान्दोग्य उपनिषद् के अंश में वैश्वानर आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि "उर एव वेदिर्लोमानि बर्हिः" अर्थात् छाती ही वेदी है और रोम (केश) ही कुश हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति-वचन का विस्तार है। जहाँ उपनिषद् इसे एक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं यह स्मृति इसे ध्यान की विधि के रूप में साधक के सम्मुख रखती है। उपनिषद् में 'लोम' (रोम) शब्द का प्रयोग है और यहाँ 'केश' का; यह केवल शब्द-भेद है, भाव एक ही है कि शरीर का बाहरी आवरण ही आंतरिक वेदी का पवित्र पर्दा है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'देह-दृष्टि' को 'देव-दृष्टि' में बदलने का है। सामान्यतः हम शरीर को केवल मांस और हड्डियों का ढांचा मानते हैं, किन्तु यहाँ निर्देश है कि बैठते ही अपनी देह को एक 'यज्ञ-वेदी' के रूप में देखें।
जब साधक यह अनुभव करता है कि उसका वक्ष एक पवित्र वेदी है और उसके केश उस वेदी की पवित्र बर्हि हैं, तब उसकी चेतना स्वतः ही बाहर से सिमटकर भीतर की ओर मुड़ जाती है। इस अभ्यास में साधक हृदय-प्रदेश में एक ऐसी ज्योति की कल्पना करता है जो स्वयं प्रकाशमान है और जिसके प्रकाश में उसका अपना अस्तित्व (आत्मा) स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर के मोह से निकालकर 'धाम-मात्र' (केवल प्रकाश-पुंज) की स्थिति में ले जाता है। यहाँ साधक 'द्रष्टा' और 'दृश्य' के भेद को मिटाकर स्वयं को उस आत्मभासक ज्योति में लीन करने का प्रयास करता है। यह ध्यान की वह भूमि है जहाँ बाहरी जगत का अंधकार मिट जाता है और साधक अपने भीतर के सूर्य का अनुभव करने लगता है।
एतद्धि सोममध्यस्थममृतं ज्योतिरूपकम् ।
हृदिस्थः सर्वभूतानां चेतनः श्रूयते ह्यसौ ॥ ९.१२७ ॥
— यही सोमके बीच स्थित अमृत, ज्योतिरूप है; यह सब भूतोंके हृदयमें स्थित चेतन (आत्मा) सुना जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२६) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-वेदी पर प्रतिष्ठित उस निर्भास ज्योति का वर्णन किया जो स्वयं प्रकाशवान है और आत्मा को प्रकाशित करती है। अब वर्तमान श्लोक में वे उस ज्योति के सूक्ष्म स्थान और उसके सार्वभौमिक स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
एतद्धि सोम-मध्यस्थम्, अमृतं, ज्योतिरूपकम् (अस्ति)। असौ ह्यसौ सर्व-भूतानां हृदि-स्थः चेतनः श्रूयते।
पदार्थ और निर्वचन:
• एतद्धि: यही (वह ज्योति, जिसका वर्णन पिछले श्लोक में हुआ)।
• सोम-मध्यस्थम्: सोम (चन्द्रमा) के मध्य में स्थित। यहाँ 'सोम' केवल आकाश के चन्द्रमा का प्रतीक नहीं, अपितु हृदय के भीतर स्थित उस शीतलता और सौम्यता का प्रतीक है जो मन के विक्षेपों के शांत होने पर प्रकट होती है।
• अमृतं: जो अविनाशी है, जिसका क्षय नहीं होता। योग की दृष्टि से वह अवस्था जहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
• ज्योतिरूपकम्: जिसका स्वरूप ही प्रकाश है। यह प्रकाश भौतिक नहीं, अपितु ज्ञान का प्रकाश है।
• हृदिस्थः: हृदय में स्थित। यह स्थान भौतिक हृदय नहीं, अपितु 'हृदयाकाश' है, जहाँ आत्मा का वास माना गया है।
• सर्व-भूतानां: समस्त जीवित प्राणियों का। यह इस ज्योति की सार्वभौमिकता को दर्शाता है।
• चेतनः: चेतना स्वरूप। वह जो केवल जानता नहीं, बल्कि जिसका स्वरूप ही 'जानना' या 'चेतन होना' है।
• श्रूयते: सुना जाता है। 'श्रुति' का अर्थ है वह ज्ञान जो ऋषियों ने अनुभव किया और परंपरा में सुनाया।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को स्थूल देह से सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाने वाला है। पिछले श्लोक में जिस 'आत्मभासक' ज्योति की चर्चा थी, महर्षि यहाँ बताते हैं कि वह ज्योति 'सोम-मध्यस्थ' है। वैदिक परंपरा में सोम शीतलता, रस और अमृत का प्रतीक है। जब साधक अपनी चेतना को हृदय में केंद्रित करता है, तो उसे वहाँ एक ऐसी ज्योति का अनुभव होता है जो सूर्य की भाँति दाहक नहीं, अपितु चन्द्रमा की भाँति शीतल, शांत और आनंदमय है। यही वह 'अमृत' है, जो साधक को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर अमरता की ओर ले जाता है।
इस श्लोक का दूसरा भाग इस सत्य को और विस्तार देता है कि यह ज्योति केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, अपितु 'सर्व-भूतानां हृदिस्थः' है। अर्थात्, जिस चेतन तत्व का अनुभव योगी अपने हृदय में करता है, वही चेतना समस्त प्राणियों के हृदय में व्याप्त है। यह 'चेतन' ही वह दृष्टा है जो शरीर, मन और बुद्धि के पीछे स्थित है। महर्षि कहते हैं कि यह 'श्रूयते' (सुना जाता है), जिसका अर्थ है कि यह सत्य वेदों की श्रुति में प्रमाणित है।
यहाँ विधिक रूप से साधक को यह निर्देश दिया गया है कि वह अपनी आंतरिक ज्योति को केवल एक व्यक्तिगत प्रकाश न माने, बल्कि उसे उस सार्वभौमिक चेतना के रूप में देखे जो सबमें समान रूप से स्थित है। जब साधक इस भाव में स्थित होता है, तब उसके भीतर से 'पर' और 'स्व' का भेद समाप्त होने लगता है और वह समस्त सृष्टि के साथ एकाकार होने की दिशा में अग्रसर होता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'हृदय-ध्यान' की एक उच्च अवस्था है। योगिक अभ्यास में जब साधक प्राणायाम और प्रत्याहार के बाद हृदय-कमल में ध्यान लगाता है, तो उसे पहले एक सूक्ष्म प्रकाश का आभास होता है। इस श्लोक के अनुसार, उस प्रकाश को 'सोम' (शीतलता) के साथ अनुभव करना चाहिए। यदि ध्यान में ताप या व्याकुलता हो, तो वह अभी पूर्ण नहीं है; जब वह ज्योति सोम के मध्य स्थित होकर शीतल और अमृतमय हो जाए, तब समझना चाहिए कि साधक 'अमृत-ज्योति' के सान्निध्य में है।
यह अभ्यास साधक को 'व्यष्टि' (व्यक्तिगत) से 'समष्टि' (सार्वभौमिक) की ओर ले जाता है। जब साधक अनुभव करता है कि उसके हृदय की यह ज्योति ही दूसरे के हृदय की ज्योति है, तब वह 'करुणा' और 'एकत्व' की भूमि पर पहुँच जाता है। यहाँ अभ्यास केवल एकाग्रता का नहीं, बल्कि उस 'चेतन' स्वरूप में विलीन होने का है। साधक इस अनुभव से यह जान पाता है कि वह शरीर नहीं, अपितु वह अमृतमय ज्योति है जो कभी नष्ट नहीं होती। यह स्थिति साधक को उस भूमि पर ले जाती है जहाँ वह स्वयं को 'सर्व-भूत-हित' और 'सर्व-भूत-एक' अनुभव करने लगता है।
पञ्चमण्डलमध्यस्थो द्रष्टव्यो योगचक्षुषा ।
रविमध्ये स्थितः सोमः सोममध्ये हुताशनः ॥ ९.१२८ ॥
पाँच मण्डलोंके बीच स्थित (उसे) योगदृष्टिसे देखना चाहिए; सूर्यके बीच चन्द्रमा स्थित है, चन्द्रमाके बीच अग्नि,
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२७) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-स्थिर उस अमृतमय ज्योति का वर्णन किया जो समस्त भूतों की चेतना है। अब वर्तमान श्लोक में वे उस ज्योति के सूक्ष्म विन्यास और उसे अनुभव करने के लिए आवश्यक 'दृष्टि' का निर्देश दे रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
योगचक्षुषा पञ्चमण्डलमध्यस्थो (सः) द्रष्टव्यः। रविमध्ये सोमः स्थितः, सोममध्ये हुताशनः (स्थितः)।
पदार्थ और निर्वचन:
• पञ्चमण्डलमध्यस्थो: पाँच मण्डलों (परतों या घेरों) के मध्य में स्थित। यहाँ 'मण्डल' का अर्थ है चेतना के वे पाँच स्तर जिनके भीतर सूक्ष्मतम तत्व छिपा है। इन पाँचों मण्डलों का विवरण आगे श्लोक ९.१३१ में दिया गया है।
• द्रष्टव्यो: देखा जाना चाहिए। यह केवल कल्पना नहीं, अपितु 'साक्षात्कार' का निर्देश है।
• योगचक्षुषा: योग की दृष्टि से। यह वह दृष्टि है जो बाहरी इंद्रियों के निग्रह और अंतर्मुखी होने पर जागृत होती है।
• रविमध्ये सोमः: सूर्य के मध्य चन्द्रमा। यहाँ रवि और सोम भौतिक खगोलीय पिंड नहीं, अपितु भीतर के तेज (ऊर्जा) और शीतलता (शांति) के प्रतीक हैं।
• सोममध्ये हुताशनः: चन्द्रमा के मध्य अग्नि। 'हुताशन' वह अग्नि है जो समस्त संस्कारों और अशुद्धियों को भस्म कर देती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक सूक्ष्म मानचित्रण प्रदान करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि वह परम तत्व, जो हृदय की ज्योति है, वह सीधे उपलब्ध नहीं होता; वह पाँच मण्डलों के आवरणों से ढका हुआ है। इन मण्डलों के केंद्र में स्थित उस 'अक्षर' या 'पुरुष' को देखने के लिए सामान्य दृष्टि पर्याप्त नहीं है, उसके लिए 'योगचक्षु' की आवश्यकता है।
यहाँ रवि, सोम और हुताशन का एक-दूसरे के भीतर स्थित होना यह दर्शाता है कि चेतना की यात्रा एक वृत्ताकार गहराई की यात्रा है। पहले साधक को उस 'रवि' (तेज/ऊर्जा) का अनुभव होता है, फिर उस तेज के भीतर छिपी 'सोम' (शीतलता/आनन्द) की अनुभूति होती है, और उस शांति के केंद्र में 'हुताशन' (तप/अग्नि) प्रज्वलित है। यह क्रम यह संकेत देता है कि परम सत्य तक पहुँचने के लिए ऊर्जा का संतुलन और फिर उस संतुलन के भीतर तप की अग्नि का होना अनिवार्य है।
यह श्लोक एक विधि है—साधक को निर्देश दिया गया है कि वह अपने भीतर इन मण्डलों को एक-दूसरे के भीतर समाहित देखे। यह दृष्टि उसे बाहरी जगत के प्रपंचों से हटाकर हृदय के उस केंद्र की ओर ले जाती है जहाँ सृष्टि का बीज स्थित है। यह क्रम आगे श्लोक ९.१२९ में और विस्तार पाएगा, जहाँ सत्य और अच्युत के मण्डलों का वर्णन है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'अंतर्दृष्टि' का अभ्यास है। 'योगचक्षु' का अर्थ है—बाहरी आँखों को बंद कर, मन को एकाग्र कर, ध्यान की उस अवस्था में पहुँचना जहाँ आंतरिक प्रकाश दिखने लगता है।
साधक को चाहिए कि वह स्वयं को एक केंद्र के रूप में देखे और कल्पना करे कि वह पाँच मण्डलों के भीतर स्थित है। अभ्यास यह है कि वह पहले बाहरी तेज (रवि) को देखे, फिर उस तेज के भीतर शांति के चन्द्रमा (सोम) को अनुभव करे, और अंततः उस शांति के गर्भ में स्थित ज्ञान की अग्नि (हुताशन) में लीन हो जाए। यह एक 'इनवर्ड जर्नी' (अंतर्यात्रा) है। जब साधक एक मण्डल को भेदकर दूसरे में प्रवेश करता है, तो वह स्थूल शरीर (अन्नमय) से सूक्ष्म शरीर (विज्ञानमय) की ओर बढ़ता है। इस अभ्यास से साधक की चेतना संकुचित होकर एक बिंदु पर केंद्रित होती है, जिससे वह 'द्रष्टा' के भाव में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह प्रक्रिया उसे उस भूमि तक ले जाती है जहाँ वह स्वयं को मण्डलों का स्वामी नहीं, अपितु उन मण्डलों के मध्य स्थित उस परम पुरुष का अंश अनुभव करता है।
तेजोमध्ये स्थितः सत्यः सत्यमध्ये स्थितोऽच्युतः ।
अग्निमध्ये रविस्थानं रविमध्ये च चन्द्रमाः ॥ ९.१२९ ॥
तेजके बीच सत्य स्थित है, सत्यके बीच अच्युत; अग्निके बीच सूर्यका स्थान, और सूर्यके बीच चन्द्रमा।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२८) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने योगचक्षु से पाँच मण्डलों के मध्य स्थित उस तत्व को देखने का निर्देश किया और सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि के परस्पर अंतर्निहित होने का संकेत दिया। वर्तमान श्लोक इसी अंतर्निहित ज्योतियों के क्रम को और अधिक सूक्ष्मता से खोलते हुए उस परम लक्ष्य 'अच्युत' तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करता है।
अन्वय और पदार्थ —
तेजोमध्ये सत्यः स्थितः, सत्यमध्ये अच्युतः स्थितः। अग्निमध्ये रविस्थानं (अस्ति), रविमध्ये च चन्द्रमाः (स्थितः)।
पदार्थ और निर्वचन:
• तेजोमध्ये: तेज के मध्य में। यहाँ 'तेज' का अर्थ है वह प्रदीप्त ऊर्जा जो साधक के भीतर जाग्रत होती है।
• सत्यः: सत्य के मध्य। यहाँ 'सत्य' केवल एक गुण नहीं, अपितु उस 'शून्याग्नि' का संज्ञा-नाम है जिसका उल्लेख श्लोक ९.१२५ में आया है। यह वह अवस्था है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
• अच्युतः: वह जो कभी च्युत (विचलित या पतित) न हो। यह उस अविनाशी, स्थिर और परम पुरुष का नाम है, जो समस्त मण्डलों का केंद्र है।
• रविस्थानं: सूर्य का स्थान। रवि यहाँ भीतर के उस तेज का प्रतीक है जो ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
• चन्द्रमाः: चन्द्रमा। यह शीतलता, अमृतत्व और मन की उस शांत अवस्था का प्रतीक है जो प्रकाश को धारण करती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक भीतर की ज्योतियों के एक अद्भुत चक्राकार विन्यास का वर्णन करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह दिखा रहे हैं कि आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया एक सीधी रेखा नहीं, बल्कि परतों को भेदकर केंद्र तक पहुँचने की यात्रा है।
यहाँ एक विशेष क्रम दिया गया है: तेज → सत्य → अच्युत। और साथ ही अग्नि → रवि → चन्द्रमा। प्रथम दृष्टया यह क्रम अलग प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में यह एक ही ज्योति के विभिन्न आयाम हैं। जब साधक अपनी चेतना को अंतर्मुखी करता है, तो उसे सबसे पहले 'तेज' का अनुभव होता है। इस तेज के गहनतम केंद्र में 'सत्य' (शून्याग्नि) स्थित है, और उस सत्य के भी भीतर 'अच्युत' (परमात्मा) प्रतिष्ठित हैं।
इसी प्रकार, जब वह सूक्ष्म दृष्टि से देखता है, तो पाता है कि अग्नि के भीतर सूर्य का स्थान है और सूर्य के भीतर चन्द्रमा। यह विन्यास यह दर्शाता है कि प्रत्येक सूक्ष्म तत्व अपने से अधिक सूक्ष्म तत्व का आवरण है। अग्नि (तप) से रवि (ज्ञान) का उदय होता है और रवि के भीतर चन्द्रमा (शांति और अमृत) निहित है। यह क्रम साधक को यह समझाता है कि बाहरी क्रियाओं से शुरू होकर वह कैसे भीतर की उन ज्योतियों में प्रवेश करता है जहाँ अंततः वह 'अच्युत' में विलीन हो जाता है।
यहाँ ज्योतियों का यह परस्पर गर्भित होना (एक के भीतर एक होना) यह सिद्ध करता है कि सृष्टि का विस्तार बाहर की ओर है, किंतु उसकी वापसी (योग) भीतर की ओर है। जो बाहर सूर्य और चन्द्रमा के रूप में दिखते हैं, वे भीतर चेतना के विभिन्न स्तरों के रूप में विद्यमान हैं।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अंतर्मुखी प्रविष्टि' का अभ्यास है। योग की दृष्टि से इसका अर्थ है—चेतना का निरंतर सूक्ष्म होना। साधक जब ध्यान में गहराई से उतरता है, तो वह पहले अपनी प्राण-ऊर्जा के 'तेज' को अनुभव करता है। अभ्यास यह है कि उस तेज में विलीन न होकर उसके 'मध्य' (केंद्र) को खोजा जाए।
जब वह तेज के केंद्र में पहुँचता है, तो उसे 'सत्य' का अनुभव होता है—वह शून्य अवस्था जहाँ विचार शांत हो जाते हैं। फिर उस सत्य के केंद्र में वह 'अच्युत' का साक्षात्कार करता है, जहाँ पहुँचकर वह स्वयं भी अच्युत (अविनाशी) हो जाता है।
अग्नि, रवि और चन्द्रमा का यह क्रम साधक की मानसिक अवस्थाओं को दर्शाता है:
१. अग्नि: तप और अनुशासन की अवस्था।
२. रवि: विवेक और प्रज्ञा का प्रकाश।
३. चन्द्रमा: पूर्ण शांति और आनंद की अवस्था।
साधक इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, बल्कि ज्योतियों का एक पुंज है। उसका अभ्यास यह है कि वह अपनी दृष्टि को बाहरी जगत से हटाकर पहले अग्नि (तप) में, फिर रवि (ज्ञान) में और अंततः चन्द्रमा (अमृत) के माध्यम से अच्युत तक ले जाए। यह 'भीतर से भीतर' की यात्रा है, जहाँ हर स्तर पिछले स्तर का सार है।
तस्य मध्येंकुसं(?) विद्यात्ततः सृष्टिः प्रजायते ।
सूर्यं भित्त्वा यथा चन्द्रश्चन्द्रमाश्च तथामृतम् ॥ ९.१३० ॥
उसके बीच अंकुश (?) जाने, उससे सृष्टि होती है; जैसे सूर्यको भेदकर चन्द्रमा, वैसे ही चन्द्रमा (को भेदकर) अमृत —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१२९) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने रवि, सोम, अग्नि, सत्य और अच्युत के परस्पर अंतर्निहित मण्डलों का वर्णन किया। वर्तमान श्लोक इन मण्डलों के केंद्र में स्थित उस मूल बिंदु की ओर संकेत करता है, जहाँ से संपूर्ण सृष्टि का प्रस्फुटन होता है और जहाँ साधक को अमृत की प्राप्ति होती है।
अन्वय और पदार्थ —
तस्य मध्येंकुसं(?) विद्यात्, ततः सृष्टिः प्रजायते। सूर्यं भित्त्वा यथा चन्द्रः, चन्द्रमाश्च तथामृतम्।
पदार्थ और निर्वचन:
• तस्य मध्येंकुसं(?): उसके (मण्डलों के) मध्य में 'अंकुश' (या संभवतः अंकुर/बीज) जाना चाहिए/माना जाए। यहाँ 'मध्येंकुसं' पाठ संदिग्ध है, किंतु प्रसंगानुसार यह उस सूक्ष्म बिंदु या बीज-शक्ति का संकेत है जो केंद्र में स्थित है।
• ततः सृष्टिः प्रजायते: उससे सृष्टि उत्पन्न होती है। यह उस मूल कारण की ओर संकेत है जहाँ से प्रपंच का विस्तार होता है।
• सूर्यं भित्त्वा: सूर्य को भेदकर। 'भित्त्वा' का अर्थ है आरपार जाना या भेदकर निकलना।
• यथा चन्द्रः: जैसे चन्द्रमा।
• चन्द्रमाश्च तथामृतम्: और चन्द्रमा को भेदकर वैसे ही अमृत (की प्राप्ति होती है)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक 'भेदन-प्रक्रिया' का रहस्य खोलता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि परमात्मा या अमृत तक पहुँचने का मार्ग बाहरी विस्तार में नहीं, बल्कि भीतर की परतों को भेदकर केंद्र की ओर जाने में है।
श्लोक का प्रथम चरण कहता है कि इन समस्त मण्डलों के मध्य में एक सूक्ष्म बिंदु (संभवतः बीज या अंकुर रूपी शक्ति) स्थित है। यह वह 'बिन्दु' है जहाँ संपूर्ण सृष्टि सिमटी हुई है और जहाँ से इसका प्रकटीकरण होता है। जब साधक अपनी चेतना को इस केंद्र पर एकाग्र करता है, तब वह सृष्टि के मूल कारण से साक्षात्कार करता है।
द्वितीय चरण में एक अत्यंत गूढ़ उपमा दी गई है: "सूर्यं भित्त्वा यथा चन्द्रः"। जिस प्रकार ग्रहण या खगोलीय स्थिति में ऐसा प्रतीत होता है कि एक ज्योति दूसरी ज्योति को भेदकर निकल रही है, या जिस प्रकार सूर्य के तेज के भीतर ही चन्द्रमा की शीतलता निहित है, उसी प्रकार साधक को पहले 'सूर्य' (ज्ञान के प्रदीप्त तेज) को भेदना होता है। यहाँ 'सूर्य' का अर्थ है वह तीव्र प्रज्ञा और तप, जो अज्ञान को जलाती है। जब साधक इस प्रदीप्त तेज को पार करता है, तब उसे 'चन्द्रमा' की प्राप्ति होती है। यहाँ चन्द्रमा मन की वह परम शांत, शीतल और स्थिर अवस्था है, जो द्वंद्वों से मुक्त है।
किंतु यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। महर्षि कहते हैं—"चन्द्रमाश्च तथामृतम्"। चन्द्रमा (शांति और आनंद की अवस्था) को भी भेदकर आगे जाना है। क्योंकि चन्द्रमा अभी भी एक 'अवस्था' है, जबकि 'अमृत' वह शाश्वत तत्व है जो अवस्थाओं से परे है। जब साधक मानसिक शांति और आनंद की इस अंतिम परत को भी भेदकर केंद्र में स्थित उस 'अच्युत' में विलीन हो जाता है, तब वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। यह वाक्य अगले श्लोक (९.१३१) में वर्णित 'शुभ वर्ण' के दर्शन तक निरंतर चलता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'अंतर्मुखी प्रवेध' का है। योग की दृष्टि से यह प्रक्रिया 'भेदन' की है—एक ज्योति से दूसरी ज्योति में प्रवेश करना।
साधक पहले अपने भीतर के 'सूर्य' (प्रदीप्त ज्ञान-शक्ति और तप) का अनुभव करता है। जब वह इस तेज में स्थिर होकर इसे भेदता है, तब वह 'चन्द्र' (शीतल आनंद-शक्ति और मानसिक स्थिरता) की भूमि में प्रवेश करता है। यह वह स्थिति है जहाँ मन पूरी तरह शांत और द्वंद्वरहित हो जाता है। परंतु योगी जानता है कि शांति भी एक पड़ाव है, लक्ष्य नहीं। अतः वह इस मानसिक शांति (चन्द्र) को भी एक द्वार की तरह उपयोग करता है और उसे भेदकर उस 'अमृत' (अक्षर तत्व) में प्रविष्ट होता है।
यह अभ्यास साधक को 'अन्न' से 'आनन्द' की ओर ले जाता है। यहाँ 'भेदने' का अर्थ किसी वस्तु को नष्ट करना नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म स्तर से और अधिक सूक्ष्म स्तर में प्रवेश करना है। साधक अनुभव करता है कि वह परतों के भीतर समाता जा रहा है—तेज से शांति की ओर, और शांति से उस शून्य-अमृत की ओर, जहाँ सृष्टि का बीज स्थित है। यह प्रक्रिया साधक को 'भोग' से 'योग' और 'योग' से 'लय' की भूमि तक ले जाती है।
तन्स्थं (?) च शुभं वर्णं तद्दृष्ट्वाप्यमृती भवेत् ।
अन्नं प्राणो मनश्चैव विज्ञानानन्द एव च ॥ ९.१३१ ॥
— और वहाँ स्थित शुभ वर्ण(रूप) — उसे देखकर भी (मनुष्य) अमर हो जाता है। अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द भी (पाँच मण्डल हैं) —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३०) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मण्डलों के केंद्र में स्थित उस बीज-बिन्दु और भेदन-प्रक्रिया का वर्णन किया, जिससे सृष्टि का प्रस्फुटन होता है और अमृत की प्राप्ति होती है। वर्तमान श्लोक उस केंद्र में स्थित दिव्य स्वरूप के दर्शन और उन पाँच मण्डलों के नाम स्पष्ट करता है, जिन्हें पार कर साधक उस परम पद को प्राप्त करता है।
अन्वय और पदार्थ —
तन्स्थं (?) च शुभं वर्णं तद्दृष्ट्वाप्यमृती भवेत्। अन्नं प्राणो मनश्चैव विज्ञानानन्द एव च।
पदार्थ और निर्वचन:
• तन्स्थं (?) च: वहाँ स्थित और (पाठ संदिग्ध है, संभवतः 'तत्र स्थितं' या 'तन्स्थं'—उस केंद्र में स्थित)।
• शुभं वर्णं: शुभ वर्ण (दिव्य रूप/प्रकाश)। यहाँ 'वर्ण' का अर्थ केवल रंग नहीं, अपितु वह विशिष्ट स्वरूप या आभा है जो शुद्ध चेतना के दर्शन पर प्रकट होती है।
• तद्दृष्ट्वाप्यमृती भवेत्: उसे देखकर भी (साधक) अमर हो जाता है। 'अमृती' का अर्थ है मृत्युंजय या मोक्ष-प्राप्त।
• अन्नं प्राणो मनश्चैव विज्ञानानन्द एव च: अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द (ही वे पाँच मण्डल हैं)। ये पाँचों तत्व यहाँ उन परतों या कोशों के रूप में हैं, जिनसे होकर साधक भीतर की ओर यात्रा करता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधना के उस चरमोत्कर्ष की बात करता है जहाँ साधक 'द्रष्टा' बन जाता है। पिछले श्लोक में जिस 'भेदन' की बात कही गई थी, उसका फल यहाँ प्रकट होता है। जब साधक रवि, सोम, अग्नि, सत्य और अच्युत के मण्डलों को भेदकर उस परम केंद्र में पहुँचता है, तो वहाँ उसे एक 'शुभ वर्ण' के दर्शन होते हैं। यह शुभ वर्ण कोई भौतिक रंग नहीं, बल्कि वह आत्म-प्रकाश है जिसे 'निर्भास' (प्रकाशरहित होते हुए भी सबको प्रकाशित करने वाला) कहा गया है। इस स्वरूप का साक्षात्कार ही अमरता का द्वार है, क्योंकि यहाँ साधक देह-अभिमान से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।
श्लोक के दूसरे चरण में महर्षि याज्ञवल्क्य उन पाँच मण्डलों का नाम देते हैं जो इस दिव्य केंद्र को घेरे हुए हैं: अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द। यह क्रम स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने वाली यात्रा है। सबसे बाहरी परत 'अन्न' की है, फिर 'प्राण' की शक्ति, उसके भीतर 'मन' का संकल्प, फिर 'विज्ञान' का निश्चय और अंत में 'आनन्द' का वह सागर है जिसके पार या जिसके केंद्र में वह परम पुरुष स्थित है।
यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि ये पाँचों मण्डल एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे में अंतर्निहित हैं। जैसे एक मण्डलमध्य में दूसरा स्थित है, वैसे ही अन्नमयता के भीतर प्राणमयता है और आनन्दमयता के भीतर वह शुद्ध चैतन्य है। साधक जब इन पाँचों को पहचान लेता है, तब वह इनके बंधन में नहीं बँधता, बल्कि इन्हें सोपानों की भाँति पार कर जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस मण्डलीय संरचना और क्रम की पुष्टि उपनिषदों में स्पष्ट रूप से मिलती है:
स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति ॥ २.८.५ ॥
जो ऐसा जानता है, वह इस लोकसे जाकर इस अन्नमय आत्माको पार कर जाता है, इस प्राणमय आत्माको, इस मनोमय आत्माको, इस विज्ञानमय आत्माको, और इस आनन्दमय आत्माको (भी) पार कर (ब्रह्मको पा) जाता है।
यह श्रुति स्पष्ट करती है कि जो इस रहस्य को जानता है, वह इस लोक से प्रस्थान कर क्रमशः अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माओं को पार कर ब्रह्म को प्राप्त करता है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और तैत्तिरीय उपनिषद् यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। जहाँ उपनिषद् इन्हें 'आत्मा' (कोश) कहता है, वहीं यह स्मृति इन्हें 'मण्डल' कहती है। मण्डल शब्द यह दर्शाता है कि ये केवल परतें नहीं हैं, बल्कि ऊर्जा के घेरे हैं। स्मृति यहाँ 'शुभ वर्ण' के दर्शन की बात जोड़कर साधक को एक अनुभवजन्य लक्ष्य प्रदान करती है, जिससे ध्यान की प्रक्रिया अधिक सुगम हो जाती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अंतर्मुखी यात्रा' का मानचित्र है। योग का अभ्यास यहाँ 'अन्न' से 'आनन्द' तक की यात्रा है।
१. अन्न-मण्डल: साधक सर्वप्रथम अपने स्थूल शरीर और उसकी प्रकृति के प्रति सजग होता है।
२. प्राण-मण्डल: फिर वह शरीर के भीतर बहने वाली प्राण-शक्ति का अनुभव करता है।
३. मन-मण्डल: प्राणों के स्थिर होने पर वह मन के विचारों और संकल्पों के साक्षी भाव में आता है।
४. विज्ञान-मण्डल: मन के शांत होने पर वह विवेक और ज्ञान की उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ सत्य और असत्य का भेद स्पष्ट हो जाता है।
५. आनन्द-मण्डल: अंततः वह उस अवस्था में प्रवेश करता है जहाँ केवल परमानन्द शेष रहता है।
अभ्यास यह है कि साधक ध्यान के समय स्वयं को इन पाँचों मण्डलों के केंद्र में स्थित उस 'शुभ वर्ण' (दिव्य ज्योति) में विलीन होता हुआ अनुभव करे। जब वह अन्न से आनन्द तक की इन परतों को भेदकर केंद्र में स्थित उस प्रकाश को 'देखता' है, तो वह अनुभव करता है कि वह स्वयं वही प्रकाश है। यही 'अमृती' होने की अवस्था है—जहाँ साधक यह जान लेता है कि वह न शरीर है, न प्राण, न मन, न विज्ञान और न ही केवल आनन्द, बल्कि वह इन सबका आधार वह शुद्ध चैतन्य है।
प्राणो व्यानो ह्यपानश्च समानोदान एव च ।
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमम् ॥ ९.१३२ ॥
प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान भी; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३१) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन पाँच मण्डलों (अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द) का उल्लेख किया, जो साधक के लिए उस परम शुभ वर्ण तक पहुँचने की सीढ़ियाँ हैं। वर्तमान श्लोक इन मण्डलों के भीतर निहित सूक्ष्म ऊर्जाओं और इंद्रिय-विषयों के विस्तार को स्पष्ट करता है, ताकि साधक यह समझ सके कि जिन तत्वों के बीच वह 'छठे' पुरुष को खोज रहा है, वे वास्तव में क्या हैं।
अन्वय और पदार्थ —
प्राणो व्यानो ह्यपानश्च समानोदान एव च। शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमम्।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्राणो व्यानो ह्यपानश्च समानोदान एव च: प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान भी (हैं)। यहाँ 'ह' (हि) का प्रयोग इस बात पर बल देने के लिए है कि पिछले श्लोक में जिस 'प्राण-मण्डल' की चर्चा हुई, उसके भीतर ये पाँचों प्राण-शक्तियाँ समाहित हैं।
• शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमम्: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध। ये पाँचों जगत के वे विषय हैं जिन्हें इंद्रियाँ ग्रहण करती हैं, किंतु यहाँ इन्हें मण्डलों के विस्तार के रूप में देखा गया है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाले उन 'पंचकों' का परिचय कराता है, जो आत्मा के चारों ओर आवरण की भाँति लिपटे हुए हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जब हम 'प्राण-मण्डल' की बात करते हैं, तो उसमें केवल श्वास नहीं, अपितु प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान—इन पाँचों प्राण-शक्तियों का समुच्चय है। ये पाँचों शक्तियाँ शरीर की समस्त जैविक और सूक्ष्म क्रियाओं का संचालन करती हैं।
इसी प्रकार, जब साधक अपने भीतर के मण्डलों का विश्लेषण करता है, तो वह पाता है कि बाहरी जगत के पाँच विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—केवल बाहर नहीं हैं, बल्कि मन और विज्ञान के मण्डलों में सूक्ष्म संस्कारों के रूप में स्थित हैं। यह श्लोक हमें यह समझाता है कि हमारी चेतना इन दस तत्वों (पाँच प्राण और पाँच विषय) के जाल में उलझी हुई है।
यहाँ एक गहरा रहस्य यह है कि प्राण और विषय, दोनों ही 'पंचक' हैं। प्राण शरीर का आधार हैं और विषय मन का आधार। जब तक साधक इन दसों के प्रभाव में है, वह स्वयं को शरीर या मन समझता रहता है। महर्षि यहाँ इन तत्वों की सूची इसलिए दे रहे हैं ताकि साधक इन्हें पहचान सके और इनके 'मध्य' में स्थित उस सत्ता की ओर अग्रसर हो सके, जिसका वर्णन अगले श्लोक (९.१३३) में किया गया है। यह श्लोक एक सूची मात्र नहीं है, बल्कि यह उन सीमाओं का निर्धारण है जिन्हें पार कर 'भोक्ता' का साक्षात्कार होना है।
श्रुति-संगति —
श्रुति इस सत्य की पुष्टि करती है कि ये भिन्न-भिन्न प्रतीत होने वाले प्राण वास्तव में एक ही मूल शक्ति के विस्तार हैं।
यः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमायत्तैषा हि न प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मन्यो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ १४.४.३.१० ॥
जो कुछ भी शब्द है, वह वाणी ही है, क्योंकि यही अन्ततक पहुँची है; पर यह (स्वयं शब्द) नहीं है। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, अन — यह सब प्राण ही है। यह आत्मा इन्हींसे बना है — वाङ्मय, मनोमय, प्राणमय।
इस श्रुति-अंश के अनुसार, प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—ये सब वास्तव में 'प्राण' ही हैं। यह आत्मा ही प्राणमय, मनोमय और वाङ्मय है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-रहस्य का विस्तार करती है कि जिसे हम अलग-अलग प्राण या अलग-अलग विषय (शब्द आदि) समझते हैं, वे वास्तव में उस एक ही चेतना के विभिन्न स्तर या मण्डल हैं।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साक्षी-भाव' की ओर ले जाता है। साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह अपने भीतर प्राणों के प्रवाह (प्राण, व्यान, अपान, समान, उदान) को केवल एक क्रिया के रूप में देखे, न कि स्वयं को उन क्रियाओं के साथ जोड़कर। इसी प्रकार, जब शब्द, स्पर्श, रूप, रस या गन्ध का अनुभव हो, तो साधक यह अनुभव करे कि ये विषय उसके भीतर के मण्डलों में घटित हो रहे हैं, वह इनसे पृथक है।
साधक यहाँ इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह 'प्राण-पंचक' और 'विषय-पंचक' को अपने चारों ओर एक घेरे की तरह देखता है। अभ्यास यह है कि इन दसों के बीच एक 'शून्य' या 'केंद्र' है। जब साधक प्राणों की चंचलता और विषयों के आकर्षण से ऊपर उठता है, तब वह उस 'छठे' तत्व (पुरुष/भोक्ता) की उपस्थिति का अनुभव करने लगता है। यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि वह न तो प्राण है और न ही विषयों का उपभोग करने वाला मन, बल्कि वह इन दोनों पंचकों के मध्य स्थित वह दृष्टा है जो इन सबको देख रहा है।
पञ्चमध्यगतः षष्ठो भुङ्क्ते देहगतान् गुणान् ॥ ९.१३३ ॥
पाँचों के मध्य में स्थित छठा (तत्व) देहगत गुणों का भोग करता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३२) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उन पंचकों का विवरण दिया जो साधक के अनुभव के घेरे में आते हैं—पाँच प्राण और पाँच तन्मात्राएँ। वर्तमान श्लोक इन समस्त आवरणों के केंद्र में स्थित उस सत्ता का संकेत करता है, जो इन सबके साक्षी होते हुए भी इनके माध्यम से अनुभव करती है।
अन्वय और पदार्थ —
पञ्चमध्यगतः षष्ठो भुङ्क्ते देहगतान् गुणान्।
पदार्थ और निर्वचन:
• पञ्चमध्यगतः: पाँचों के मध्य में स्थित। यहाँ 'पञ्च' शब्द पिछले श्लोकों में वर्णित पाँच मण्डलों (अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द), पाँच प्राणों और पाँच तन्मात्राओं के समुच्चय का संकेत है।
• षष्ठो: छठा। वह तत्व जो इन पाँचों के केंद्र में है, किंतु इनसे भिन्न और श्रेष्ठ है।
• भुङ्क्ते: भोग करता है (अनुभव करता है)। यहाँ 'भोग' का अर्थ केवल इंद्रिय-सुख नहीं, अपितु किसी भी गुण का अनुभव करना है।
• देहगतान् गुणान्: देह में स्थित गुणों को। 'गुण' यहाँ केवल सत्व-रज-तम नहीं, अपितु शरीर और इंद्रियों के माध्यम से आने वाले समस्त संवेदनाओं और वृत्तियों का बोध कराते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को उस निर्णायक बिंदु पर लाता है जहाँ वह 'भोक्ता' और 'भोग्य' के भेद को समझता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म रहस्य खोल रहे हैं: शरीर में जो कुछ भी अनुभव हो रहा है—चाहे वह प्राणों की गति हो, मन के विचार हों या इंद्रियों द्वारा ग्रहण किए गए विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध)—उन सबका अनुभव करने वाला कोई और है, जो इन पाँचों के केंद्र में स्थित है।
यह 'छठा' तत्व वह शुद्ध चैतन्य है, जो स्वयं निर्गुण होते हुए भी, देहगत गुणों का अनुभव करता है। भाव यह है कि जैसे एक राजा अपने सेवकों के माध्यम से राज्य का संचालन करता है और उनके द्वारा लाई गई सूचनाओं का अनुभव करता है, वैसे ही यह छठा पुरुष (आत्मा) पाँच प्राणों और पाँच तन्मात्राओं के माध्यम से इस संसार और देह का अनुभव करता है।
यहाँ 'भुङ्क्ते' (भोग करता है) क्रिया का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्य मनुष्य स्वयं को ही 'भोगने वाला' मानकर गुणों में लिप्त हो जाता है, किंतु योगी यह देखता है कि भोग देहगत गुणों का हो रहा है, और वह स्वयं उन पाँचों के मध्य स्थित वह 'छठा' है जो केवल साक्षी है। यह श्लोक साधक को देह-अभिमान से हटाकर 'केंद्र-अभिमान' (आत्मा के केंद्र में स्थित होने के बोध) की ओर ले जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विषय में कठोपनिषद् का यह कथन अत्यंत प्रासंगिक है:
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ १.३.४ ॥
इन्द्रियोंको घोड़े कहते हैं, विषयोंको उनके चरनेके मार्ग; शरीर, इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको मनीषी "भोक्ता" कहते हैं।
(इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥)
अर्थ: इन्द्रियों को घोड़े कहते हैं, विषयों को उनके चरने के मार्ग; शरीर, इन्द्रिय और मन से युक्त आत्मा को मनीषी "भोक्ता" कहते हैं।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और कठोपनिषद् दोनों का मत एक ही है। जहाँ कठोपनिषद् शरीर, इंद्रिय और मन के समुच्चय को 'भोक्ता' के उपकरण के रूप में देखता है, वहीं महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस भोक्ता की स्थिति (पञ्चमध्यगतः) को स्पष्ट कर रहे हैं। दोनों शास्त्र यह बताते हैं कि अनुभव की प्रक्रिया में एक 'भोक्ता' अनिवार्य है, किंतु वह भोक्ता इंद्रियों या मन के भीतर नहीं, बल्कि उनके केंद्र में स्थित है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'साक्षी-भाव' का अभ्यास है। जब साधक ध्यान में होता है, तो वह अपने भीतर उठने वाले विचारों (मन), श्वासों की गति (प्राण) और शरीर की संवेदनाओं (अन्न) को देखता है। वह अनुभव करता है कि ये पाँचों तत्व उसके चारों ओर मण्डलों की भाँति घिरे हुए हैं।
अभ्यास यह है कि साधक स्वयं से पूछे—"इन पाँचों के अनुभव को कौन जान रहा है?" वह जो जान रहा है, वही 'छठा' है। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मैं इन पाँचों में नहीं हूँ, बल्कि इनके मध्य स्थित छठा हूँ", तब वह गुणों के प्रभाव से मुक्त होने लगता है। वह भोगते हुए भी यह जानता है कि भोक्ता वह शुद्ध पुरुष है, देह नहीं। इस प्रकार साधक 'भोक्ता' से 'साक्षी' की भूमि की ओर अग्रसर होता है। यह बोध उसे देहगत गुणों के बंधन से मुक्त कर उस 'अच्युत' तत्व की ओर ले जाता है जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में किया गया है।
पुरुषस्वरूपम्
शब्दादीनां च पञ्चानामुपलब्धिस्तु या स्थिता ।
चेतसा यस्तु गृह्णाति बुद्ध्यवस्थितमीश्वरम् ॥ ९.१३४ ॥
शब्द आदि पाँचोंकी जो उपलब्धि (ज्ञान) स्थित है, (उसे) जो चित्तसे ग्रहण करता है — बुद्धिमें स्थित ईश्वर —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३३) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस 'छठे' तत्व का संकेत दिया जो पाँचों के मध्य स्थित होकर देहगत गुणों का भोग करता है। वर्तमान श्लोक उस भोग या अनुभव की प्रक्रिया को और सूक्ष्मता से समझाते हुए, उस ग्रहणकर्ता की स्थिति और उसके स्थान का बोध कराता है।
अन्वय और पदार्थ —
शब्दादीनां च पञ्चानामुपलब्धिस्तु या स्थिता, चेतसा यस्तु गृह्णाति बुद्ध्यवस्थितमीश्वरम्।
पदार्थ और निर्वचन:
• शब्दादीनां च पञ्चानाम्: शब्द आदि पाँचों की। यहाँ 'शब्दादि' से तात्पर्य पिछले श्लोक (९.१३२) में वर्णित पाँच तन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) से है।
• उपलब्धिस्तु: उपलब्धि या ज्ञान। जब इंद्रियाँ विषय के संपर्क में आती हैं, तो जो बोध उत्पन्न होता है, वह 'उपलब्धि' है।
• या स्थिता: जो स्थित है। यह उपलब्धि चित्त या इंद्रिय-क्षेत्र में स्थित होती है।
• चेतसा: चित्त से। यहाँ चेतसा का अर्थ उस चेतना या मानसिक उपकरण से है जिसके माध्यम से अनुभव को पकड़ा जाता है।
• गृह्णाति: ग्रहण करता है। केवल जानना उपलब्धि है, किंतु उस ज्ञान को 'अपना' अनुभव करना या उसे आत्मसात करना 'ग्रहण' करना है।
• बुद्ध्यवस्थितम्: बुद्धि में स्थित। वह सत्ता जो बुद्धि के केंद्र में प्रतिष्ठित है।
• ईश्वरम्: ईश्वर को। यहाँ ईश्वर का अर्थ सृष्टि के सृजक के रूप में नहीं, अपितु 'इश' धातु से—अर्थात् जो इस देह और इंद्रियों का स्वामी है, उस अंतर्यामी पुरुष से है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ज्ञान-मीमांसा और योग के संधि-स्थल पर स्थित है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ अनुभव की पूरी शृंखला को स्पष्ट कर रहे हैं। जब हम बाहरी जगत से किसी विषय का संपर्क करते हैं, तो सबसे पहले 'उपलब्धि' होती है। उदाहरण के लिए, जब कान शब्द को सुनता है, तो वह केवल एक ध्वनि की उपलब्धि है। किंतु उस ध्वनि को 'सुनना' और यह जानना कि 'मैं सुन रहा हूँ', यह कार्य 'चित्त' द्वारा किया जाता है।
श्लोक का भाव यह है कि शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँचों की जो उपलब्धि इंद्रियों और चित्त के स्तर पर स्थित है, उसे जो चेतना (चित्त) के माध्यम से ग्रहण करता है, वह वास्तव में बुद्धि में स्थित वह 'ईश्वर' (स्वामी) है। यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म भेद है: उपलब्धि बाहरी है, ग्रहण करना आंतरिक है, और जो ग्रहण कर रहा है वह बुद्धि के भीतर स्थित वह परम पुरुष है।
यह वाक्य पिछले श्लोक (९.१३३) से शुरू होकर अगले श्लोक (९.१३५) तक विस्तृत है। श्लोक ९.१३३ में 'छठे' तत्व का उल्लेख था, ९.१३४ में उसकी कार्यविधि (ग्रहण करना) बताई गई है और ९.१३५ में उसका नाम 'पुरुष' बताया गया है। अतः यह श्लोक एक सेतु है जो 'अनुभव' को 'अनुभवकर्ता' से जोड़ता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'साक्षी-भाव' के अभ्यास का आधार है। सामान्यतः मनुष्य स्वयं को 'उपलब्धि' (विषय) या 'चित्त' (वृत्तियों) के साथ जोड़ लेता है; वह समझता है कि "मैं यह शब्द सुन रहा हूँ" या "मैं यह दुख अनुभव कर रहा हूँ"। किंतु याज्ञवल्क्य उसे दृष्टि बदलने का निर्देश दे रहे हैं।
साधक को इस श्लोक के माध्यम से यह अभ्यास करना है कि वह अपनी चेतना को 'उपलब्धि' से हटाकर 'ग्रहणकर्ता' पर ले जाए। जब भी कोई इंद्रिय-विषय (शब्द, रूप आदि) सामने आए, तो साधक स्वयं से पूछे—"इस उपलब्धि को ग्रहण करने वाला वह कौन है जो बुद्धि में स्थित है?"
यह अभ्यास साधक को 'विषय' से 'विषयी' की ओर ले जाता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि वह न तो शब्द है, न स्पर्श है और न ही वह चित्त की चंचलता है, बल्कि वह बुद्धि के केंद्र में स्थित वह स्थिर 'ईश्वर' या स्वामी है, तब वह चित्त की परिधि को लांघकर बुद्धि के उस स्थिर बिंदु पर प्रतिष्ठित होता है जहाँ से वह समस्त देहगत गुणों का साक्षी बन जाता है। यह अभ्यास साधक को 'भोक्ता' की निम्न भूमि से उठाकर 'साक्षी' की उच्च भूमि की ओर ले जाता है।
पुरुषाख्यः स विज्ञेयो भोक्तृभावः स उच्यते ।
अव्यक्तेन च रूपेण वैश्वानरमुखेन च ॥ ९.१३५ ॥
— उसे पुरुष नामवाला जानना चाहिए, वह भोक्ताभाव कहलाता है; और अव्यक्तरूपसे, वैश्वानरमुखसे (भी) —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३४) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस 'ईश्वर' या अंतर्यामी सत्ता का संकेत दिया जो बुद्धि में स्थित होकर चित्त के माध्यम से इंद्रिय-उपलब्धियों को ग्रहण करता है। वर्तमान श्लोक उस ग्रहणकर्ता के वास्तविक स्वरूप और उसकी कार्य-प्रणाली को स्पष्ट करते हुए उसे 'पुरुष' और 'भोक्ता' के रूप में परिभाषित करता है।
अन्वय और पदार्थ —
सः पुरुषाख्यः विज्ञेयः, स भोक्तृभावः उच्यते। अव्यक्तेन च रूपेण, वैश्वानरमुखेन च (विज्ञेयः)।
पदार्थ और निर्वचन:
• पुरुषाख्यः: पुरुष नाम वाला। यहाँ 'पुरुष' शब्द केवल लिंग-बोधक नहीं, अपितु 'पुर' (नगर/देह) के 'इश' (स्वामी) के अर्थ में है। वह जो देह-रूप नगर का अधिपति है।
• विज्ञेयः: जानने योग्य या जिसे विशेष अनुभव से जाना जाना चाहिए। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु 'विज्ञान' (अनुभूति) का विषय है।
• भोक्तृभावः: भोक्ता-भाव। वह स्थिति जिसमें वह समस्त अनुभवों का उपभोग करता है। यहाँ 'भोक्ता' शब्द का अर्थ विलासिता नहीं, अपितु 'अनुभवकर्ता' है।
• अव्यक्तेन रूपेण: अव्यक्त रूप से। वह सत्ता जो इंद्रियों और मन के लिए अदृश्य है, जिसका कोई स्थूल आकार नहीं है, किंतु जो अपनी उपस्थिति से सब कुछ प्रकाशित करती है।
• वैश्वानरमुखेन: वैश्वानर-मुख से। 'वैश्वानर' वह अग्नि है जो संपूर्ण जगत (विश्व) में व्याप्त है और देह में जठराग्नि के रूप में स्थित है। 'मुख' का अर्थ है—अभिव्यक्ति का माध्यम या ग्रहण करने वाला द्वार।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस रहस्य को खोल रहे हैं जो उनकी श्रुति में 'अदृष्टो द्रष्टा' (अदृश्य देखने वाला) के रूप में बीजरूप है। पिछले श्लोकों में पाँच मण्डलों (अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द) और पाँच तन्मात्राओं की चर्चा हुई; अब ऋषि यह बता रहे हैं कि इन सबके केंद्र में जो 'छठा' तत्व है, वह वास्तव में 'पुरुष' है।
ऋषि कहते हैं कि उस सत्ता को 'पुरुष' के नाम से जानना चाहिए। यह पुरुष कोई बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि वह शुद्ध चेतना है जो बुद्धि में स्थित होकर समस्त इंद्रिय-विषयों का साक्षी और भोक्ता है। यहाँ 'भोक्तृभाव' का अर्थ यह है कि देह के माध्यम से जो भी सुख, दुःख, रस या ज्ञान प्राप्त होता है, उसका अंतिम गंतव्य वह पुरुष ही है। वह केवल निष्क्रिय साक्षी नहीं है, बल्कि वह 'भोक्ता' के रूप में इस सृष्टि के अनुभवों को पूर्ण करता है।
इस पुरुष के प्रकट होने के दो आयाम बताए गए हैं:
प्रथम, 'अव्यक्त रूप'। यह उसकी वह स्थिति है जहाँ वह निराकार, निर्गुण और अगम्य है। इस रूप में वह केवल 'अक्षर' है, जिसे केवल गहन समाधि में अनुभव किया जा सकता है।
द्वितीय, 'वैश्वानर-मुख'। जब यही अव्यक्त पुरुष देह के माध्यम से कार्य करता है, तो वह 'वैश्वानर' (जठराग्नि/विश्व-अग्नि) के रूप में प्रकट होता है। वैश्वानर वह अग्नि है जो अन्न को पचाती है और प्राणशक्ति को पुष्ट करती है। यहाँ 'मुख' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है—जैसे मुख से भोजन ग्रहण किया जाता है, वैसे ही परमात्मा इस देह में वैश्वानर-अग्नि के माध्यम से जगत के रस और अन्न का उपभोग करता है।
अतः, यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जो पुरुष सूक्ष्म रूप में 'अव्यक्त' है, वही स्थूल रूप में 'वैश्वानर' बनकर देह के माध्यम से अनुभव प्राप्त कर रहा है। यह उस महान सेतु का वर्णन है जो निराकार ब्रह्म को साकार जगत के भोग से जोड़ता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ १३.२२ ॥
इस देहमें स्थित परम पुरुष साक्षी, अनुमति देनेवाला, भरण करनेवाला, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा भी कहा गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भी इसी तत्त्व का वर्णन है कि देह में स्थित वह परम पुरुष 'भोक्ता' और 'महेश्वर' है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों यहाँ एक ही सत्य को पुष्ट करते हैं कि देह का स्वामी (ईश्वर) ही वास्तव में अनुभवों का भोक्ता है। जहाँ गीता इसे 'परमात्मा' कहकर संबोधित करती है, वहीं यह स्मृति उसे 'वैश्वानर-मुख' कहकर उसकी क्रियात्मकता को स्पष्ट करती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'भोक्तृत्व' के प्रति दृष्टि बदलने का अभ्यास है। सामान्य मनुष्य यह मानता है कि "मैं" (अहंकार) भोक्ता हूँ, जिससे वह बन्धन में बँधता है। किंतु योगी इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि भोक्ता वास्तव में वह 'पुरुष' है, जो वैश्वानर-अग्नि के रूप में स्थित है।
अभ्यास यह है कि जब भी साधक भोजन ग्रहण करे या किसी विषय का अनुभव करे, तो वह यह भाव रखे कि "मैं नहीं, बल्कि मेरे भीतर स्थित वैश्वानर-मुख वाला वह पुरुष इस अन्न/अनुभव का उपभोग कर रहा है।" इस प्रकार भोजन एक शारीरिक क्रिया न रहकर 'भोजन-उपासना' बन जाता है। जब साधक अपने भीतर की जठराग्नि को वैश्वानर-पुरुष का मुख मानकर उसे आहुति देता है, तो वह स्थूल अन्न को सूक्ष्म प्राण और अंततः दिव्य प्रकाश में बदलने लगता है।
यह अभ्यास साधक को 'अहंकार-प्रधान भोक्ता' से उठाकर 'पुरुष-प्रधान साक्षी' की भूमि पर ले जाता है। वह समझ जाता है कि उसकी देह वास्तव में उस परमात्मा की वेदी है, जहाँ वैश्वानर के रूप में ईश्वर स्वयं अपनी सृष्टि का रसपान कर रहे हैं।
सर्वं परमात्मनो भोगाय
अन्नं रसमयं कृत्स्नं प्रकृत्याऽऽपादितं च यत् ॥
सर्वं प्रत्युपभोगार्थं वर्तते परमात्मनः ॥ ९.१३६ ॥
प्रकृतिसे उत्पन्न जो सारा रसमय अन्न है, वह सब परमात्माके उपभोगके लिए है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३५) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस 'पुरुष' या 'भोक्ता' का परिचय दिया, जो अव्यक्त रूप से वैश्वानर-मुख (जठराग्नि) के माध्यम से अनुभवों को ग्रहण करता है। अब वर्तमान श्लोक में ऋषि इस भोक्ता और उसके भोग्य (अन्न) के सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए, समस्त प्रकृतिका उद्देश्य बताते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
प्रकृत्याऽऽपादितं च यत् कृत्स्नं रसमयं अन्नं, तत् सर्वं परमात्मनः प्रत्युपभोगार्थं वर्तते।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्रकृत्याऽऽपादितं: प्रकृति द्वारा उत्पन्न या उत्पादित। यहाँ प्रकृति का अर्थ है वह मूल शक्ति जो नाम और रूप के माध्यम से स्थूल जगत का निर्माण करती है।
• कृत्स्नं रसमयं अन्नं: समस्त रसमय अन्न। 'अन्न' केवल वह पदार्थ नहीं जो मुख से खाया जाता है, अपितु वह सब कुछ है जो पोषण करता है और जिसमें रस (स्वाद, गुण, ऊर्जा) विद्यमान है। 'कृत्स्न' शब्द यह दर्शाता है कि इसमें सूक्ष्म और स्थूल, दोनों प्रकार के पोषक तत्व सम्मिलित हैं।
• प्रत्युपभोगार्थं: प्रत्युपभोग के लिए। 'उपभोग' का अर्थ यहाँ इंद्रिय-सुख नहीं, अपितु उस ऊर्जा का पुनः अवशोषण है जिससे जीवन चलता है। 'प्रत्यु' उपसर्ग यह संकेत देता है कि जो परमात्मा ने प्रकृति के रूप में बाहर भेजा, वह पुनः उसी की ओर लौट रहा है।
• परमात्मनः: परमात्मा का। यहाँ परमात्मा का अर्थ उस अंतर्यामी पुरुष से है जो देह के भीतर भोक्ता भाव में स्थित है।
• वर्तते: स्थित है या है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक महान सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं कि इस सृष्टि में कुछ भी 'पराया' या 'निजी' नहीं है। प्रकृति से उत्पन्न जो कुछ भी रसमय और पोषक है, वह मूलतः उस परमात्मा का ही विस्तार है और अंततः उसी के उपभोग के लिए है।
बाहरी दृष्टि से देखने पर मनुष्य अन्न खाता है, किंतु योगिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह प्रक्रिया 'परमात्मा का परमात्मा द्वारा ही उपभोग' है। जब हम कहते हैं कि अन्न परमात्मा के उपभोग के लिए है, तो इसका अर्थ यह है कि प्रकृति (शक्ति) ने जो कुछ भी सृजित किया, वह उस पुरुष (चेतना) के पोषण और अभिव्यक्ति के लिए था। यह श्लोक कर्मकाण्ड की उस विधि का दार्शनिक आधार है जहाँ भोजन से पूर्व उसे ईश्वर को समर्पित किया जाता है। यहाँ समर्पण कोई बाहरी औपचारिकता नहीं, अपितु इस सत्य की स्वीकृति है कि मैं (अहंकार) नहीं खा रहा, बल्कि मेरे भीतर स्थित परमात्मा, प्रकृति के रसमय स्वरूप का उपभोग कर रहा है।
यह विचार साधक को 'स्व' के संकुचित घेरे से निकालकर उसे विराट से जोड़ता है। जब अन्न को परमात्मा का भोग माना जाता है, तब भोजन करना एक यांत्रिक क्रिया न रहकर एक 'यज्ञ' बन जाता है। यह उस सत्य का विस्तार है कि संपूर्ण जगत उस एक पुरुष का शरीर है, और जो कुछ भी इस शरीर में घटित हो रहा है, वह उसी की इच्छा और उसी के लाभ के लिए है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥ … तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २.१८ ॥
प्रकाश, क्रिया और स्थिति स्वभाववाला, भूत और इन्द्रियोंके रूपवाला दृश्य (जगत्) भोग और अपवर्ग (मोक्ष) के लिए है। … दृश्यका स्वरूप उस (द्रष्टा पुरुष) के लिए ही है।
पातञ्जल योगसूत्र के अनुसार दृश्य जगत का स्वभाव ही यह है कि वह पुरुष के भोग और अपवर्ग (मोक्ष) के लिए है। जैसा कि यहाँ कहा गया है कि "दृश्य का स्वरूप उस द्रष्टा पुरुष के लिए ही है", ठीक वैसे ही बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यह स्पष्ट करती है कि प्रकृति का रसमय अन्न उस अंतर्यामी पुरुष के उपभोग के लिए ही उपलब्ध है। दोनों शास्त्रों का मेल यह है कि यह जगत और इसकी वस्तुएँ पुरुष के लिए एक साधन हैं—पहले भोग के लिए और फिर उसी बोध के माध्यम से मोक्ष के लिए।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'अर्पण-भाव' का अभ्यास है। सामान्यतः मनुष्य अन्न का सेवन अपनी जिह्वा के स्वाद या देह की भूख मिटाने के लिए करता है, जिससे आसक्ति और अहंकार बढ़ता है। किंतु योगी जब इस श्लोक के भाव को आत्मसात करता है, तो वह भोजन ग्रहण करते समय यह अनुभव करता है कि "यह रसमय अन्न प्रकृति का उपहार है और मैं इसे अपने भीतर स्थित परमात्मा को अर्पित कर रहा हूँ।"
अभ्यास यह है कि ग्रहण करते समय यह भाव रहे—'मैं केवल एक माध्यम हूँ, भोक्ता तो वह परमात्मा है।' जब साधक इस भाव में स्थित होता है, तो अन्न के साथ आने वाले मानसिक संस्कार (राग-द्वेष) समाप्त हो जाते हैं और अन्न 'प्रसाद' बन जाता है। यह अभ्यास साधक को 'भोक्ता' से 'साक्षी' की ओर ले जाता है। वह अनुभव करता है कि उसकी भूख वास्तव में उस विराट पुरुष की अभिव्यक्ति है। इस प्रकार, साधारण भोजन की क्रिया 'प्राणाग्निहोत्र' की तैयारी बन जाती है, जहाँ शरीर एक वेदी है और अन्न एक आहुति।
त्रिविधान्ननिरूपणम्
त्रिविधान्नं त्रिधा भोक्ता वेदितव्यं प्रयत्नतः ।
शरीरमापः सोमश्च त्रिविधं ह्यन्नमुच्यते ॥ ९.१३७ ॥
तीन प्रकारका अन्न और तीन प्रकारका भोक्ता प्रयत्नसे जानना चाहिए; शरीर, जल और सोम — (ये) तीन प्रकारका अन्न कहा जाता है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३६) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्थापित किया कि प्रकृति का समस्त रसमय अन्न वास्तव में परमात्मा के उपभोग के लिए है। अब इस श्लोक में ऋषि उस 'अन्न' और 'भोक्ता' के स्वरूप का सूक्ष्म विश्लेषण कर रहे हैं, ताकि साधक केवल स्थूल भोजन को ही अन्न न माने, अपितु जीवन के पोषण चक्र को समग्रता में समझ सके।
अन्वय और पदार्थ —
त्रिविधानं अन्नं, त्रिधा भोक्ता, प्रयत्नतः वेदितव्यम्। शरीरम्, आपः, सोमः च—इति त्रिविधं ह्यन्नमुच्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• त्रिविधानं अन्नं: तीन प्रकार का अन्न। यहाँ 'अन्न' का अर्थ केवल खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि वह समस्त पोषक तत्व है जो किसी भी स्तर पर शरीर या चेतना का पोषण करता है।
• त्रिधा भोक्ता: तीन प्रकार के भोक्ता। वह तत्व जो अन्न का उपभोग करता है या उसे आत्मसात करता है।
• प्रयत्नतः वेदितव्यम्: प्रयत्नपूर्वक जानना चाहिए। यह संकेत है कि यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं है, बल्कि साधना और विवेक के निरंतर अभ्यास (प्रयत्न) से ही अनुभव होता है।
• शरीरम्: यहाँ शरीर का अर्थ स्थूल देह नहीं, अपितु वह 'अन्नमय कोष' है जो स्वयं अन्न से निर्मित है और निरंतर अन्न के रूप में उपभोग किया जा रहा है।
• आपः: जल। यह केवल बाहरी जल नहीं, अपितु शरीर के भीतर का समस्त द्रव तत्व (रस, रक्त, लसीका आदि) है।
• सोमः: सोम यहाँ उस सूक्ष्म ओज, चंद्र-तत्व या मानसिक रस का प्रतीक है जो प्राणों को तृप्त करता है।
• उच्यते: कहा जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य अन्न की एक व्यापक परिभाषा दे रहे हैं। सामान्यतः मनुष्य केवल मुख से ग्रहण किए जाने वाले पदार्थ को अन्न मानता है, किंतु योगी की दृष्टि में 'अन्न' वह सब कुछ है जो किसी अन्य तत्व का आधार बनता है या उसे पोषण देता है। ऋषि कहते हैं कि तीन प्रकार के अन्न और तीन प्रकार के भोक्ताओं का ज्ञान 'प्रयत्न' से करना चाहिए। यह 'प्रयत्न' वास्तव में सजगता है।
ऋषि अन्न के तीन स्तर बताते हैं: प्रथम 'शरीर', द्वितीय 'आपः' (जल) और तृतीय 'सोम'।
प्रथम स्तर पर 'शरीर' अन्न है, क्योंकि यह स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर के लिए आधार है और अंततः यह प्रकृति के तत्वों में विलीन होकर पुनः अन्न बनता है। द्वितीय स्तर पर 'आपः' या जल अन्न है, क्योंकि बिना जल के कोई भी पोषक तत्व शरीर के भीतर प्रवाहित नहीं हो सकता; जल ही वह माध्यम है जो अन्न को रस में बदलकर कोशिकाओं तक पहुँचाता है। तृतीय और सूक्ष्मतम स्तर पर 'सोम' अन्न है। सोम वह दिव्य रस है जो मन और प्राण का पोषण करता है। जब स्थूल अन्न जल के संयोग से पचकर सूक्ष्म ओज में बदलता है, तो वह 'सोम' कहलाता है, जिसे अंततः वह आंतरिक पुरुष (भोक्ता) ग्रहण करता है।
इस प्रकार, स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने वाली यह एक श्रृंखला है: अन्न → जल → सोम। ऋषि यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि हमारी देह केवल मांस-मज्जा का पुंज नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली आहुति है, जहाँ शरीर, जल और सोम क्रमशः विभिन्न स्तरों पर 'भोग्य' (अन्न) की भूमिका निभा रहे हैं। भोक्ताओं का विवरण अगले श्लोक (९.१३८) में आएगा, किंतु यहाँ यह संकेत है कि जैसे-जैसे अन्न सूक्ष्म होता जाता है, उसे ग्रहण करने वाला भोक्ता भी सूक्ष्म होता जाता है।
श्रुति-संगति —
इस त्रिविध अन्न के रहस्य की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में मिलती है:
अथ यत्किं चेदमार्द्रम् तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा इदं सर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नादः ॥ १४.४.२.१३ ॥
फिर जो कुछ यह गीला (द्रव) है, उसे उसने रेतस् (बीज) से रचा — वही सोम है। इतना ही यह सब है — अन्न और अन्नाद (अन्न खानेवाला)। सोम ही अन्न है, अग्नि अन्नाद है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट कहती है कि जो कुछ भी आर्द्र (गीला/द्रव) है, वह 'सोम' है और यह संपूर्ण जगत 'अन्न' और 'अन्नाद' (अन्न खाने वाले) का ही खेल है। स्मृति में 'आपः' और 'सोम' का जो भेद दिखाया गया है, वह वास्तव में एक ही तत्व के दो स्तर हैं—एक स्थूल जल और दूसरा वह सूक्ष्म सोम जो पोषण का मूल है। श्रुति का 'सोम एव अन्नम्' और स्मृति का 'सोम अन्नमुच्यते' एक ही सत्य को उद्घाटित करते हैं कि अंतिम पोषण सोम-रूप ऊर्जा से ही होता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'भोजन' की क्रिया को 'यज्ञ' में बदलने का है। जब साधक प्रयत्नपूर्वक यह देखता है कि वह केवल रोटी या फल नहीं खा रहा, बल्कि वह स्थूल अन्न के माध्यम से 'आपः' (जल-तत्व) और फिर 'सोम' (दिव्य ऊर्जा) का सृजन कर रहा है, तो उसकी दृष्टि बदल जाती है।
यहाँ अभ्यास यह है कि प्रत्येक ग्रास के समय यह विवेक किया जाए कि— "यह स्थूल अन्न मेरे शरीर (अन्नमय कोष) का पोषण करेगा, यह जल मेरे भीतर के रसों को तृप्त करेगा और यह सोम मेरे प्राण और मन को ओजस्वी बनाएगा।" जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर का भोक्ता (परमात्मा) इन तीनों स्तरों के अन्न का उपभोग कर रहा है, तो वह 'अहं खाता हूँ' के अहंकार से मुक्त होकर 'परमात्मा मुझमें भोग कर रहा है' की स्थिति में पहुँच जाता है। यह विवेक साधक को स्थूल देह की आसक्ति से हटाकर सूक्ष्म ओज (सोम) की ओर ले जाता है, जिससे उसकी चेतना की भूमि भौतिकता से ऊपर उठकर आध्यात्मिक पोषण की ओर अग्रसर होती है।
त्रिभोक्ता
प्राणस्त्वग्निस्तथाऽऽदित्यस्त्रिभोक्ता एवमेव तत् ।
अमृतं कल्पयित्वा च यदन्नं समुपागतम् ॥ ९.१३८ ॥
प्राण, अग्नि और आदित्य — इस प्रकार (ये) तीन भोक्ता हैं। जो अन्न प्राप्त हुआ है, उसे अमृत मानकर —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३७) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अन्न के तीन प्रकारों—शरीर, आपः और सोम—का विवेचन किया। अब इस श्लोक में वे उन तीन भोक्ताओं का परिचय दे रहे हैं जो इन अन्न-तत्वों का उपभोग करते हैं, और भोजन के प्रति साधक की मानसिक अवस्था का निर्देश कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
प्राणः, अग्निः, तथा आदित्यः—त्रिभोक्ता एवमेव तत्। यदन्नं समुपागतम्, तत् अमृतं कल्पयित्वा च (भोज्यम्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्राणः, अग्निः, आदित्यः: ये तीन भोक्ता हैं। प्राण यहाँ जीवन-शक्ति है, अग्नि जठराग्नि और वैश्वानर है, तथा आदित्य वह चैतन्य पुरुष है जो सूर्यमण्डल और हृदय-आकाश में स्थित है।
• त्रिभोक्ता: तीन उपभोग करने वाले। यहाँ 'भोग' का अर्थ केवल खाना नहीं, बल्कि अन्न के सूक्ष्म तत्त्वों को आत्मसात कर उसे ऊर्जा में बदलना है।
• एवमेव तत्: इसी प्रकार वे (तीन) हैं।
• समुपागतम्: जो प्राप्त हुआ है। जो अन्न साधक के सम्मुख आया है।
• अमृतं कल्पयित्वा: अमृत मानकर या अमृत की कल्पना करके। 'कल्पयित्वा' का अर्थ है—दृष्टि बदलना। अन्न को केवल भौतिक पदार्थ न मानकर उसे अमरत्व प्रदान करने वाले दिव्य रस के रूप में देखना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'त्रिभोक्ता' के रहस्य को खोल रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने शरीर, जल और सोम को अन्न कहा था; अब वे बताते हैं कि इन तीनों का उपभोग कौन करता है।
प्रथम भोक्ता 'प्राण' है, जो शरीर के समस्त अंगों में व्याप्त है और अन्न से प्राप्त ऊर्जा को जीवन-शक्ति में परिवर्तित करता है। द्वितीय भोक्ता 'अग्नि' है, जो जठराग्नि के रूप में स्थूल अन्न को पचाती है और वैश्वानर के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा का संचालन करती है। तृतीय भोक्ता 'आदित्य' है, जो वह उच्चतम चैतन्य है, जिसके प्रकाश से ही प्राण और अग्नि क्रियाशील हैं। ये तीनों अलग-अलग नहीं, अपितु एक ही परमात्मा के तीन कार्यात्मक रूप हैं—एक प्राण रूप में, एक अग्नि रूप में और एक आदित्य रूप में।
श्लोक का दूसरा भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है: "अमृतं कल्पयित्वा च यदन्नं समुपागतम्"। यहाँ ऋषि बाहरी विधि से पहले आंतरिक भावना (भाव) की स्थापना कर रहे हैं। साधक के सम्मुख जो भी अन्न आया है, उसे केवल क्षुधा-तृप्ति का साधन न मानकर 'अमृत' मानना चाहिए। जब साधक अन्न को अमृत मानता है, तब वह भोजन केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि ओज और तेज में परिवर्तित हो जाता है। यह दृष्टि अन्न के स्थूल गुण को बदलकर उसे आध्यात्मिक पोषण में बदल देती है। यह वाक्य अगले श्लोकों (९.१३९-९.१४१) के लिए आधार तैयार करता है, जहाँ इस 'अमृत-अन्न' को प्राणाग्निहोत्र की विधि से अर्पित करने का निर्देश दिया गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ १.५ ॥
आदित्य ही प्राण (भोक्ता) है, चन्द्रमा ही रयि (भोग्य, अन्न) है। जो कुछ मूर्त और अमूर्त है, वह सब रयि ही है; इसलिए मूर्ति (आकारवाला सब) रयि ही है।
प्रश्न उपनिषद् में कहा गया है कि आदित्य ही प्राण (भोक्ता) है और चन्द्रमा रयि (भोग्य/अन्न) है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस विचार का विस्तार करती है। जहाँ प्रश्न उपनिषद् आदित्य और प्राण को एक ही मानकर उन्हें भोक्ता सिद्ध करता है, वहीं यह स्मृति साधक की सुविधा के लिए उन्हें प्राण, अग्नि और आदित्य के रूप में तीन स्तरों पर विभाजित करती है, ताकि साधक यह समझ सके कि अन्न का पाचन (अग्नि), उसका वितरण (प्राण) और उसका अंतिम लक्ष्य (आदित्य/परमात्मा) क्या है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'भोजन-साधना' का सूत्र है। साधक के लिए भोजन करना एक यांत्रिक क्रिया नहीं, बल्कि एक यज्ञ है।
अभ्यास यह है कि जब भोजन की थाली सम्मुख आए, तो उसे ग्रहण करने से पूर्व मन में यह दृढ़ संकल्प और भावना लाई जाए कि "यह अन्न वास्तव में अमृत है और मैं इसे अपने भीतर स्थित त्रिभोक्ताओं (प्राण, अग्नि और आदित्य) को अर्पित कर रहा हूँ।"
जब साधक अन्न को अमृत मानकर ग्रहण करता है, तो उसके मन की यह संकल्प-शक्ति अन्न के सूक्ष्म अणुओं की प्रकृति बदल देती है। इससे भोजन केवल मांस-मज्जा नहीं बनाता, बल्कि साधक को उस भूमि की ओर ले जाता है जहाँ शरीर हल्का और चेतना प्रदीप्त होती है। यह अभ्यास साधक को 'अन्नमय कोष' से ऊपर उठाकर 'प्राणमय' और 'विज्ञानमय' कोष की ओर अग्रसर करता है। यहाँ 'कल्पना' का अर्थ भ्रम नहीं, बल्कि 'दिव्य-दृष्टि' का प्रयोग है।
प्राणाग्निहोत्रविधिः
प्राणाग्निहोत्रविधिना भोज्यं तद्वदघापहम् ।
महाव्याहृतिभिश्चैवमभिमन्त्र्य पुनस्ततः ॥ ९.१३९ ॥
— प्राणाग्निहोत्रकी विधिसे खाना चाहिए; उस प्रकार (वह) पापनाशक है। और महाव्याहृतियोंसे (उसे) अभिमन्त्रित करके, फिर —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३८) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अन्न को 'अमृत' मानकर ग्रहण करने का निर्देश दिया और प्राण, अग्नि तथा आदित्य को उसका भोक्ता बताया। अब इस श्लोक से वे उस व्यावहारिक और योगिक विधि का वर्णन आरम्भ कर रहे हैं, जिससे साधारण भोजन एक दिव्य 'प्राणाग्निहोत्र' बन जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
तद्वदघापहम् (भोज्यं), प्राणाग्निहोत्रविधिना (भोज्यम्)। महाव्याहृतिभिश्चैवम् अभिमन्त्र्य, पुनस्ततः (अभिमन्त्रयेत्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्राणाग्निहोत्रविधिना: प्राणाग्निहोत्र की विधि द्वारा। 'प्राणाग्निहोत्र' वह आंतरिक यज्ञ है जिसमें जठराग्नि और प्राण-शक्तियों को आहुति दी जाती है। यह बाहरी अग्निहोत्र का आन्तरिक स्वरूप है।
• तद्वदघापहम्: उस प्रकार (विधि से किया गया भोजन) पापों का नाश करने वाला है। यहाँ 'अघ' (पाप) का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, बल्कि वह अविद्या और तामसिकता है जो अन्न के प्रति आसक्ति या अज्ञानवश उत्पन्न होती है।
• महाव्याहृतिभिश्चैवम्: और महाव्याहृतियों द्वारा इस (अन्न) को। महाव्याहृतियाँ हैं—भूः, भुवः, स्वः। ये केवल शब्द नहीं, अपितु पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौलोक के अधिष्ठाता तत्त्व हैं।
• अभिमन्त्र्य: मन्त्रों द्वारा संस्कारित करके। अभिमन्त्रण का अर्थ है—अन्न के स्थूल स्वरूप को मन्त्रों की शक्ति से सूक्ष्म और पवित्र बनाना।
• पुनस्ततः: फिर उसके बाद। यह शब्द संकेत करता है कि अभिमन्त्रण प्रथम सोपान है, जिसके बाद अन्य क्रियाएँ (जैसा कि अगले श्लोक ९.१४० में वर्णित है) आएंगी।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य भोजन को एक शारीरिक क्रिया से उठाकर उसे एक आध्यात्मिक साधना (यज्ञ) में परिवर्तित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब मनुष्य 'प्राणाग्निहोत्र' की विधि से भोजन करता है, तो वह भोजन 'अघापहम्' अर्थात् पापनाशक बन जाता है।
साधारणतः मनुष्य अपनी जिह्वा के स्वाद और शरीर की भूख को शांत करने के लिए खाता है, जिससे राग और द्वेष बढ़ते हैं। किन्तु जब साधक यह भाव रखता है कि वह अपने भीतर स्थित वैश्वानर अग्नि और प्राणों को आहुति दे रहा है, तब भोजन का उद्देश्य 'भोग' से बदलकर 'योग' हो जाता है। यह दृष्टि ही पापों का नाश करती है क्योंकि यहाँ अहंकार का विसर्जन होता है और समर्पण का भाव जागता है।
इस विधि का प्रथम चरण है—महाव्याहृतियों से अभिमन्त्रण। भूः, भुवः, स्वः का उच्चारण कर अन्न को अभिमन्त्रित करने का अर्थ है कि साधक उस अन्न को तीन लोकों के सार के रूप में देख रहा है। वह स्वीकार करता है कि यह अन्न पृथ्वी (भूः) से उत्पन्न हुआ, अन्तरिक्ष (भुवः) की वायु और सूर्य से पुष्ट हुआ और द्यौलोक (स्वः) की चेतना का अंश है। जब महाव्याहृतियों का स्पन्दन अन्न में पड़ता है, तो वह अन्न केवल कैलोरी या पोषक तत्त्व नहीं रह जाता, बल्कि वह 'प्राण-शक्ति' में परिवर्तित हो जाता है।
यह वाक्य ९.१३९ से आरम्भ होकर ९.१४२ तक विस्तृत है। इस श्लोक में केवल आरम्भिक विधि—अभिमन्त्रण—बताई गई है, जिसके उपरान्त अगले श्लोकों में विशिष्ट मन्त्रों का जप, आपोशान और पाँच प्राणों को आहुति देने की क्रिया का वर्णन है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अन्न-योग' का सूत्र है। योग में भोजन केवल शरीर का पोषण नहीं, बल्कि प्राणों का पोषण है। जब साधक महाव्याहृतियों का प्रयोग करता है, तो वह अपने स्थूल शरीर (भूः), प्राण-मय शरीर (भुवः) और कारण शरीर (स्वः) को एक सूत्र में पिरोता है।
यहाँ अभ्यास यह है कि भोजन के सम्मुख बैठते ही सबसे पहले मन को शांत कर महाव्याहृतियों का स्मरण किया जाए। यह क्रिया साधक को 'भोजन' की लालसा से हटाकर 'यज्ञ' के भाव में स्थित करती है। जब अन्न अभिमन्त्रित होता है, तो साधक के भीतर की जठराग्नि केवल भौतिक पाचन नहीं करती, बल्कि वह 'प्राणाग्नि' बन जाती है जो अविद्या के संस्कारों को जलाकर उसे चैतन्य ऊर्जा में बदल देती है। इस प्रकार, भोजन की यह विधि साधक को तामसिकता से ऊपर उठाकर सात्विक और फिर रजस-रहित अवस्था की ओर ले जाती है।
उच्छिष्टमिष्टोपहतमित्यनेनाभिमन्त्रयेत् ।
आपोशानं(न)क्रियापूर्वं जुहुयाद्वायवे हविः ॥ ९.१४० ॥
— "उच्छिष्टमिष्टोपहतम्…" — इस (मन्त्र) से अभिमन्त्रित करे; आपोशान (आचमन-जल पीने) की क्रिया पहले करके (प्राण) वायुको हवि दे —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१३९) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अन्न को महाव्याहृतियों से अभिमन्त्रित करने का निर्देश दिया था। अब इस श्लोक में वे उस विशिष्ट मन्त्र के संकेत और भोजन से पूर्व की अनिवार्य क्रिया 'आपोशान' का वर्णन कर रहे हैं, जो अन्न को शरीर में ग्रहण करने से पूर्व प्राण-शक्ति को जागृत करने की विधि है।
अन्वय और पदार्थ —
(भोज्यं) उच्छिष्टमिष्टोपहतम् इति (मन्त्रेना) अनेन अभिमन्त्रयेत्। आपोशानं क्रियापूर्वं (ततः) वायवे हविः जुहुयात्।
पदार्थ और निर्वचन:
• उच्छिष्टमिष्टोपहतम्: यह एक मन्त्र का प्रतीक है। 'उच्छिष्ट' वह है जो शेष रह गया (परमात्मा का वह अंश जो सृष्टि के रूप में शेष है), 'इष्ट' वह है जिसकी कामना की गई या जो यज्ञ में अर्पित है, और 'उपहत' वह है जो लय हो गया या प्रहार द्वारा सूक्ष्म कर दिया गया। यह मन्त्र अन्न के स्थूल स्वरूप को सूक्ष्मता की ओर ले जाने का संकेत है।
• अभिमन्त्रयेत्: मन्त्रों द्वारा संस्कारित करे। यहाँ अभिमन्त्रण का अर्थ है अन्न के भीतर स्थित प्राण-तत्त्व को जाग्रत करना।
• आपोशानं क्रियापूर्वं: आपोशान (आचमन या जल पीने की क्रिया) को पूर्व में करके। 'आपो' का अर्थ है जल और 'शान' का अर्थ है शान्त करना या तृप्त करना। भोजन से पूर्व जल का सेवन केवल शुद्धि नहीं, अपितु जठराग्नि और प्राणों को संतुलित करने की एक योगिक क्रिया है।
• वायवे हविः जुहुयात्: वायु (प्राण) को हवि अर्पित करे। यहाँ 'हवि' वह अन्न है जिसे हम खाते हैं, और 'जुहुयात्' (अर्पित करना) यह दर्शाता है कि भोजन करना कोई भौतिक तृप्ति नहीं, बल्कि प्राण-वायु के निमित्त किया गया एक आंतरिक यज्ञ है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य भोजन की प्रक्रिया को पूर्णतः यज्ञमय बना रहे हैं। वे निर्देश देते हैं कि भोजन ग्रहण करने से पूर्व 'उच्छिष्टमिष्टोपहतम्' प्रतीक वाले मन्त्र से अन्न का अभिमन्त्रण किया जाए। यह मन्त्र साधक को यह बोध कराता है कि जो अन्न वह ग्रहण कर रहा है, वह वास्तव में परमात्मा का ही एक रूप है जो प्रकृति में 'उच्छिष्ट' (अवशेष) के रूप में प्रकट हुआ है और अब वह उसे 'इष्ट' (अर्पित) कर रहा है।
इसके पश्चात वे 'आपोशान' अर्थात् आचमन की विधि बताते हैं। सामान्यतः आचमन को केवल मुख की शुद्धि माना जाता है, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य की दृष्टि में यह प्राणों का संस्कार है। जल का सेवन करके साधक अपने भीतर की अग्नि को संतुलित करता है ताकि वह अन्न को केवल शरीर के पोषण के लिए नहीं, बल्कि प्राणों की वृद्धि के लिए ग्रहण कर सके।
जब साधक यह क्रिया पूर्ण कर लेता है, तब वह अन्न को 'वायवे हविः' कहता है। यहाँ 'वायु' का अर्थ केवल श्वास नहीं, अपितु वह प्राण-शक्ति है जो शरीर के समस्त अंगों का संचालन करती है। जब हम यह भाव रखते हैं कि "मैं भोजन नहीं कर रहा, अपितु अपने भीतर स्थित प्राण-देवता को हवि दे रहा हूँ", तब वह भोजन तामसिकता से मुक्त होकर सात्विक और दिव्य बन जाता है। यह विधि साधक को इस बोध की ओर ले जाती है कि भोक्ता और भोगी दोनों एक ही परमात्मा के रूप हैं।
श्रुति-संगति —
भोजन से पूर्व आचमन की इस अनिवार्यता की पुष्टि श्रुति में मिलती है:
तद्विद्वांसः श्रोत्रियाः अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते तस्मादेवंविदशिष्यन्नाचामेदशित्वाचामेदेतमेव तदनमनग्नं कुरुते ॥ १४.९.२.१५ ॥
इसलिए विद्वान् श्रोत्रिय खाना खानेसे पहले आचमन करते हैं, और खाकर आचमन करते हैं; वे मानते हैं कि इससे वे इस (प्राण) को अनग्न (वस्त्रयुक्त) करते हैं। इसलिए ऐसा जाननेवाला खानेसे पहले आचमन करे, खाकर आचमन करे — इससे वह इस (प्राण) को ही अनग्न करता है।
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि विद्वान् और श्रोत्रिय पुरुष भोजन से पूर्व और पश्चात आचमन करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि इससे वे प्राण को 'अनग्न' (वस्त्रयुक्त) करते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'आपोशान' इसी श्रुति-विधान का विस्तार है। जिस प्रकार वस्त्र शरीर की रक्षा और मर्यादा करते हैं, उसी प्रकार आचमन प्राण-शक्ति को एक सुरक्षात्मक आवरण प्रदान करता है, जिससे अन्न का प्रभाव केवल स्थूल शरीर तक सीमित न रहकर सूक्ष्म प्राणों तक पहुँचे।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अन्न-योग' का सूत्र है। भोजन से पूर्व आचमन करना वास्तव में प्राणों को जगाने और उन्हें 'वस्त्र' पहनाने जैसा है। योगिक रहस्य यह है कि जब प्राण 'नग्न' या असंतुलित होते हैं, तो अन्न केवल मांस-मज्जा बढ़ाता है और आलस्य उत्पन्न करता है। किन्तु जब आचमन और अभिमन्त्रण द्वारा प्राणों को जागृत (अनग्न) कर लिया जाता है, तब वही अन्न 'हवि' बन जाता है और साधक की चेतना को ऊपर की ओर ले जाता है।
यहाँ अभ्यास यह है कि भोजन को एक यांत्रिक क्रिया न मानकर उसे 'प्राणाग्निहोत्र' के रूप में अनुभव किया जाए। साधक जब 'वायवे हविः' का भाव लाता है, तो वह अपनी जठराग्नि को वैश्वानर अग्नि के साथ एकाकार कर लेता है। इससे भोजन के सूक्ष्म तत्त्व प्राणों में विलीन होते हैं, जिससे साधक की ऊर्जा बढ़ती है और वह निम्न भूमियों (तामसिकता) से उठकर उच्च भूमियों (सत्व) की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास साधक को भोजन के प्रति आसक्ति से मुक्त कर उसे 'प्रसाद-भाव' में स्थित करता है।
प्राणो व्यानस्तथाऽपानः समानोदान एव च ।
ओंकारपूर्वाःस्वाहान्ताः पञ्च दद्यात्तथाऽऽहुतीः ॥ ९.१४१ ॥
— प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान — (इनको) ओंकारसे आरम्भ और "स्वाहा" से अन्त होनेवाली पाँच आहुतियाँ दे।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४०) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अन्न के अभिमन्त्रण और आपोशान की क्रिया का निर्देश दिया था, जिससे भोजन भौतिक तृप्ति के स्थान पर एक 'हवि' (यज्ञ-सामग्री) बन गया। अब इस श्लोक में वे उस हवि को शरीर के भीतर स्थित पाँच प्राणों में अर्पित करने की सूक्ष्म विधि बता रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
प्राणः, व्यानः, तथाऽपानः, समानः, उदान एव च (एतेभ्यः) ओंकार-पूर्वाः स्वाहा-अन्ताः पञ्च (आहुतीः) दद्यात्, तथाऽऽहुतीः (जुहुयात्)।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्राणः, व्यानः, अपानः, समानः, उदानः: ये शरीर के पाँच प्राण हैं। यहाँ 'प्राण' शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में भी है और विशिष्ट रूप से प्रथम प्राण के लिए भी।
• ओंकार-पूर्वाः: जिनके आरम्भ में 'ॐ' (प्रणव) हो। प्रणव वह बीज है जो स्थूल अन्न को ब्रह्म-शक्ति में परिवर्तित कर देता है।
• स्वाहा-अन्ताः: जिनका अन्त 'स्वाहा' शब्द से हो। 'स्वाहा' का अर्थ है—स्वयं को अर्पित कर देना या पूर्ण समर्पण। यह वह क्रिया-शब्द है जो हवि को उसके देवता (प्राण) तक पहुँचाता है।
• पञ्च दद्यात्: पाँच आहुतियाँ दे। यहाँ 'देने' का अर्थ है—अन्न के पाँच ग्रासों को पाँच प्राणों के निमित्त अर्पित करना।
• अहुतीः: आहुतियाँ। भोजन के ग्रास जब मन्त्र और ध्यान के साथ ग्रहण किए जाते हैं, तो वे 'अन्न' न रहकर 'अहुति' बन जाते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'प्राणाग्निहोत्र' की वास्तविक क्रिया का उद्घाटन कर रहे हैं। सामान्यतः मनुष्य भूख मिटाने के लिए अन्न खाता है, किन्तु योगी के लिए भोजन करना एक आंतरिक यज्ञ है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि अन्न के प्रथम पाँच ग्रासों को केवल मुख से नहीं, अपितु चेतना से पाँचों प्राणों—प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान—को समर्पित करना चाहिए।
इस समर्पण की विधि यह है कि प्रत्येक ग्रास के साथ 'ॐ' से आरम्भ होने वाला और 'स्वाहा' पर समाप्त होने वाला मन्त्र पढ़ा जाए। 'ॐ' उस परमात्मा का प्रतीक है जो अन्न के रूप में उपस्थित है, और 'स्वाहा' उस समर्पण का प्रतीक है जिससे अन्न का अहंकार मिटकर वह प्राण-शक्ति में विलीन हो जाता है। जब साधक 'ॐ प्राणाय स्वाहा' कहकर पहला ग्रास लेता है, तो वह अन्न केवल जठराग्नि में नहीं जलता, बल्कि वह प्राण-तत्त्व को तृप्त करता है। इसी क्रम में व्यान, अपान, समान और उदान को क्रमशः आहुतियाँ दी जाती हैं।
यहाँ 'दद्यात्' (देना चाहिए) क्रिया का प्रयोग यह दर्शाता है कि यह एक विधान है। यह विधि अन्न के भौतिक गुणों को आध्यात्मिक ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया है। जब हम बिना किसी मन्त्र या ध्यान के खाते हैं, तो अन्न केवल शरीर का पोषण करता है; किन्तु जब हम इसे प्राणाग्निहोत्र की रीति से ग्रहण करते हैं, तो यह हमारे भीतर के सूक्ष्म शरीर और प्राणिक तंत्र का शोधन करता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
प्राणाग्निहोत्र का यह विधान उपनिषदों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है:
तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥ ५.१९.१ ॥
इसलिए जो भोजन पहले आये, वह होमके योग्य है। वह जो पहली आहुति दे, उसे "प्राणाय स्वाहा" कहकर दे; (इससे) प्राण तृप्त होता है।
इस श्रुति-अंश में छान्दोग्य उपनिषद् स्पष्ट कहता है कि जो भोजन सबसे पहले आए, वह होम के योग्य है और पहली आहुति "प्राणाय स्वाहा" कहकर देनी चाहिए, जिससे प्राण तृप्त होता है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस श्रुति-विधान का विस्तार करती है। जहाँ छान्दोग्य उपनिषद् प्रथम आहुति का संकेत देता है, वहीं याज्ञवल्क्य यहाँ पाँचों प्राणों (प्राण, व्यान, अपान, समान, उदान) के क्रमबद्ध समर्पण की पूरी विधि बताते हैं। स्मृति और श्रुति दोनों का उद्देश्य एक ही है—अन्न को 'अमृत' में बदलना और भोजन की क्रिया को 'योग' में परिवर्तित करना।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'अन्न-योग' का अभ्यास है। योगी जानता है कि उसका शरीर पंचभूतों से बना है और इन तत्वों का संचालन पाँच प्राण करते हैं। यदि ये प्राण अतृप्त या असंतुलित हों, तो मन चंचल रहता है और ध्यान नहीं लगता।
अभ्यास यह है कि भोजन के समय साधक पूर्ण सजग रहे। वह प्रत्येक ग्रास को उठाते समय यह अनुभव करे कि यह अन्न साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप है। जब वह 'ॐ प्राणाय स्वाहा' का मानसिक जप करते हुए ग्रास ग्रहण करता है, तो वह ध्यान करता है कि यह ऊर्जा उसके प्राण-तत्त्व को तृप्त कर रही है। इसी प्रकार व्यान, अपान, समान और उदान के लिए आहुति देते समय वह अनुभव करता है कि शरीर का प्रत्येक सूक्ष्म अंग, प्रत्येक वायु और प्रत्येक कोशिका परमात्मा की आहुति से प्रकाशित हो रही है।
इस अभ्यास से साधक 'अन्नमय कोष' से ऊपर उठकर 'प्राणमय कोष' की शुद्धि करता है। यह क्रिया उसे इस अनुभूति की ओर ले जाती है कि वह केवल एक शरीर नहीं है जो अन्न खाता है, बल्कि वह एक चैतन्य पुरुष है जो अपने भीतर के दिव्य अग्निहोत्र का संचालन कर रहा है। इस प्रकार, भोजन की साधारण क्रिया एक गहन ध्यान-साधना बन जाती है, जिससे साधक की प्राण-शक्ति संतुलित होती है और वह उच्चतर भूमियों के लिए तैयार होता है।
वाग्यतः शेषमश्नीयाद्भुक्त्वाऽऽचम्य पुनः पुनः ।
प्राणोऽग्निर्विश्व इत्याभ्यां प्रत्याहारं विचिन्तयेत् ॥ ९.१४२ ॥
(फिर) मौन रहकर शेष (अन्न) खाये; खाकर बार-बार आचमन करे; और "प्राणोऽग्निः…" तथा "विश्वः…" — इन दो (मन्त्रों) से (प्राणोंमें) प्रत्याहारका चिन्तन करे —
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४१) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अन्न के प्रथम पाँच ग्रासों को ओंकार और स्वाहा के साथ पाँच प्राणों में अर्पित करने की विधि बताई थी। अब इस श्लोक में वे भोजन के शेष भाग के ग्रहण, उसके उपरांत की शुद्धि और भोजन के पश्चात चेतना को पुनः आंतरिक केंद्र पर स्थापित करने की प्रक्रिया का निर्देश दे रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(ततः) वाग्यतः शेषम् अश्नीयात्, भुक्त्वा पुनः पुनः आचम्य, (ततः) 'प्राणोऽग्निः...' तथा 'विश्वः...' इत्याभ्यां (मन्त्रभ्यां) प्रत्याहारं विचिन्तयेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• वाग्यतः: वाणी से रहित होकर, अर्थात् मौन रहकर। यहाँ मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं, अपितु ऊर्जा का संरक्षण है।
• शेषमश्नीयात्: शेष अन्न का भक्षण करे। प्रथम पाँच आहुतियों के बाद जो अन्न बचता है, उसे ग्रहण करने की विधि।
• आचम्य पुनः पुनः: बार-बार आचमन करे। आचमन का अर्थ है जल पीकर मुख और अंतःकरण की शुद्धि करना, जिससे भोजन के बाद आने वाली जड़ता (तमस) को दूर किया जा सके।
• प्राणोऽग्निः... तथा विश्वः...: ये उन दो मन्त्रों के संकेत हैं जो अगले श्लोकों (९.१४३ और ९.१४४) में विस्तार से दिए गए हैं। ये मन्त्र अन्न को परमात्मा के स्वरूप में देखने के साधन हैं।
• प्रत्याहारं विचिन्तयेत्: प्रत्याहार का चिन्तन करे। यहाँ प्रत्याहार का अर्थ है—भोजन के दौरान बाहरी विषयों और स्वाद में बिखरी हुई चेतना को पुनः प्राणों और आत्मा के केंद्र में समेटना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य भोजन की क्रिया को पूर्णता प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने पहले पाँच ग्रासों को 'अहुति' बनाकर प्राणों में समर्पित करवाया, जिससे अन्न का रूपांतरण ऊर्जा में हो गया। अब वे कहते हैं कि शेष अन्न का भक्षण 'वाग्यतः' अर्थात् मौन रहकर करना चाहिए।
मौन भोजन का रहस्य यह है कि जब साधक बोलता है, तो उसकी प्राण-शक्ति वाणी के माध्यम से बाहर की ओर प्रवाहित होती है। यदि भोजन के समय मौन रहा जाए, तो वह ऊर्जा भीतर की ओर मुड़ जाती है और अन्न का पाचन केवल शारीरिक न रहकर 'प्राणाग्नि' द्वारा आध्यात्मिक पाचन बन जाता है। मौन रहने से मन एकाग्र रहता है और अन्न का सूक्ष्म तत्त्व सीधे प्राणों में समाहित होता है।
भोजन के उपरांत 'पुनः पुनः आचमन' का निर्देश है। भौतिक रूप से यह मुख की शुद्धि है, किन्तु आन्तरिक रूप से यह इस बात का संकेत है कि साधक अब भौतिक तृप्ति के भाव को धोकर पुनः साधना की स्थिति में लौट रहा है।
अंत में, याज्ञवल्क्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगिक निर्देश देते हैं कि 'प्राणोऽग्निः' और 'विश्वः' इन दो मन्त्रों के द्वारा प्रत्याहार का चिन्तन किया जाए। भोजन की प्रक्रिया में हमारी इन्द्रियाँ (रसना, गंध, स्पर्श) बाहरी विषय (अन्न) में लीन हो जाती हैं। भोजन समाप्त होने के बाद यदि चेतना वहीं अटकी रहे, तो वह केवल शारीरिक तृप्ति बनकर रह जाती है। इसलिए, इन मन्त्रों के चिन्तन से साधक यह अनुभव करता है कि जो अन्न उसने ग्रहण किया, वह वास्तव में 'विश्व-रूप' परमात्मा ही था और वह अब 'प्राणाग्नि' के रूप में उसके भीतर प्रज्वलित है। यह चिन्तन इन्द्रियों को बाहर से खींचकर पुनः भीतर की ओर मोड़ देता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'भोजन' को 'योग' में बदलने की कला है। यहाँ अभ्यास तीन सोपानों में है:
१. मौन का अभ्यास: भोजन के समय वाणी का त्याग कर साधक अपनी ऊर्जा को संचित करता है। यह उसे स्थूल जगत से हटाकर सूक्ष्म जगत की ओर ले जाता है।
२. शुद्धि का अभ्यास: बार-बार आचमन करना इस बात का अभ्यास है कि संसार के विषयों का आनंद लेने के बाद भी साधक उनसे लिप्त नहीं रहता, अपितु स्वयं को शुद्ध कर पुनः केंद्र की ओर लौटता है।
३. प्रत्याहार का अभ्यास: यहाँ प्रत्याहार का अर्थ इन्द्रियों का दमन नहीं, बल्कि उनका 'पुनर्स्थापन' है। भोजन के समय जो मन स्वाद और तृप्ति में बाहर गया था, उसे 'प्राणोऽग्निः' (मेरे भीतर का प्राण ही अग्नि है) और 'विश्वः' (वह परमात्मा ही विश्वरूप है) के बोध से वापस प्राणों में समेट लिया जाता है।
इस अभ्यास से साधक 'भोजन-निद्रा' जैसी तमस प्रधान अवस्था में जाने के बजाय, भोजन के बाद एक उच्च चैतन्य अवस्था (सत्व) में स्थित होता है। वह इस अनुभव से गुजरता है कि अन्न केवल शरीर का पोषण नहीं, बल्कि आत्मा का ईंधन है। इस प्रकार वह भौतिक आहार से ऊपर उठकर 'प्राणाग्निहोत्र' की उस भूमि पर पहुँचता है जहाँ भोक्ता, भोजन और भक्षण—तीनों एक ही ब्रह्म-तत्त्व के रूप में अनुभव होते हैं।
ओं प्राणोऽग्निपरात्मानं पञ्चवायुभिरावृतः ।
स ईशः सर्वजगतः प्राणः प्रीणाति विश्वभृत् ॥ ९.१४३ ॥
"ॐ — पाँच वायुओंसे घिरा प्राणाग्नि परमात्मा है; वह सारे जगत्का ईश, विश्वका भरण करनेवाला प्राण (सबको) तृप्त करता है।"
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४२) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने भोजन के उपरांत मौन रहने, आचमन करने और दो विशिष्ट मन्त्रों के माध्यम से प्रत्याहार करने का निर्देश दिया था। अब इस श्लोक में वे उन दो मन्त्रों में से प्रथम मन्त्र का स्वरूप और उसका अर्थ प्रकट कर रहे हैं, जिससे साधक भोजन की भौतिक क्रिया को आध्यात्मिक अनुभूति में बदल सके।
अन्वय और पदार्थ —
ओं प्राणोऽग्निः परात्मानं (अस्ति), पञ्चवायुभिः आरुतः (अस्ति)। सः सर्वजगतः ईशः (अस्ति), विश्वभृत् प्राणः (सर्वान्) प्रीणाति।
पदार्थ और निर्वचन:
• प्राणोऽग्निः: प्राण ही अग्नि है। यहाँ 'अग्नि' केवल जठराग्नि नहीं, अपितु वह दिव्य तेज है जो अन्न को ऊर्जा में और ऊर्जा को चेतना में रूपांतरित करता है।
• परात्मानं: वह परमात्मा स्वरूप है। 'पर' का अर्थ है जो श्रेष्ठ है, जो सूक्ष्म है और जो समस्त इंद्रियों से परे है।
• पञ्चवायुभिरावृतः: पाँचों वायुओं (प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान) से घिरा हुआ। जैसे अग्नि ईंधन से घिरी होती है, वैसे ही यह परमात्मा-अग्नि पाँच प्राणों के आवरण में स्थित है।
• ईशः सर्वजगतः: समस्त जगत् का स्वामी। जो सूक्ष्म रूप में शरीर के भीतर है, वही स्थूल रूप में ब्रह्मांड का अधिपति है।
• विश्वभृत्: विश्व का भरण-पोषण करने वाला।
• प्रीणाति: तृप्त करता है। यहाँ तृप्ति केवल पेट भरने से नहीं, अपितु आत्मा के संतोष से है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य 'प्राणाग्निहोत्र' के प्रथम मन्त्र का रहस्य खोल रहे हैं। यह मन्त्र केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक साक्षात्कार है। साधक जब भोजन कर लेता है, तब उसकी चेतना अक्सर जठराग्नि की तृप्ति और अन्न के स्वाद में उलझकर जड़ हो जाती है। ऐसे समय में यह मन्त्र उसे पुनः चैतन्यता की ओर ले जाता है।
ऋषि कहते हैं कि जो प्राण हमारे भीतर श्वास और जीवन के रूप में विद्यमान है, वह वास्तव में 'अग्नि' है और वह अग्नि 'परात्मा' है। यह एक अत्यंत गंभीर रहस्य है—जो अन्न को पचा रहा है, वही परमात्मा है। बाहरी अग्नि में हम हवि देते हैं, किन्तु यहाँ शरीर ही वेदी है और भीतर की प्राणाग्नि ही वह देवता है जिसे अन्न रूपी हवि अर्पित किया गया।
इस परमात्मा-अग्नि का स्वरूप 'पञ्चवायु-वृत' बताया गया है। जिस प्रकार सूर्य मंडल के चारों ओर विभिन्न आवरण होते हैं, उसी प्रकार हृदय-केंद्र में स्थित यह दिव्य अग्नि पाँच वायुओं के आवरण में लिपटी हुई है। यह संकेत है कि जब तक साधक इन पाँचों वायुओं को संतुलित नहीं करता, वह इस अंतर्यामी अग्नि के दर्शन नहीं कर सकता।
यह प्राणाग्नि ही 'विश्वभृत्' है। इसका अर्थ यह है कि जो शक्ति इस समय साधक के शरीर में अन्न का पाचन कर रही है, वही शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड के जीवों का पोषण कर रही है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर की अग्नि और ब्रह्मांड की अग्नि एक ही है, तब वह 'अहं' (मैं खा रहा हूँ) के भाव से मुक्त होकर 'विश्व' के भाव में स्थित हो जाता है। यह मन्त्र भौतिक भोजन को 'ईश्वर-आहुति' में बदल देता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक भोजन के पश्चात 'प्रत्याहार' का एक सशक्त साधन है। भोजन के समय मन स्वाद और तृप्ति की बाहरी लहरों में बह जाता है। इस मन्त्र का जप और चिन्तन साधक को पुनः केंद्र पर लाता है।
अभ्यास यह है कि भोजन के बाद जब साधक 'प्राणोऽग्निः' का चिन्तन करे, तो वह अपना ध्यान नाभि-केंद्र और हृदय-आकाश की ओर ले जाए। वह यह अनुभव करे कि उसके भीतर एक दिव्य ज्योति प्रज्वलित है, जो अन्न को सोखकर उसे ओज और तेज में बदल रही है। यह अनुभव साधक को 'अन्नमय कोष' से उठाकर 'प्राणमय कोष' और फिर 'विज्ञानमय कोष' की ओर ले जाता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह केवल एक शरीर नहीं है जो अन्न खाता है, बल्कि वह उस 'विश्वभृत्' परमात्मा का एक अंश है जो संपूर्ण जगत् को तृप्त कर रहा है। इस प्रकार, भोजन की क्रिया एक योग-साधना बन जाती है, जहाँ 'तृप्ति' का अर्थ केवल क्षुधा का शांत होना नहीं, बल्कि परमात्मा के साथ एकत्व का अनुभव करना हो जाता है। यह अभ्यास साधक को जड़ता (तमस) से निकालकर प्रकाश (सत्व) की ओर ले जाता है।
विश्वोसि वैश्वानर विश्वरूप त्वं विश्वमाधारयसि याजमानः ।
विश्वं च पीत्वाहुतयश्च यत्र प्रादेशमात्रः पुरुषः स्मृतस्तु सः ॥ ९.१४४ ॥
"हे वैश्वानर! तुम विश्व हो, विश्वरूप हो; तुम यजमान बनकर विश्वको धारण करते हो" — और जहाँ विश्व और आहुतियाँ पी जाती हैं, वह प्रादेशमात्र (बित्ताभर) पुरुष कहा गया है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४३) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्राणाग्निहोत्र के प्रथम मन्त्र के माध्यम से यह स्थापित किया कि पाँच वायुओं से घिरा हुआ वह प्राणाग्नि ही वास्तव में सर्वजगत का ईश और परमात्मा है। अब इस श्लोक में वे दूसरे मन्त्र का उद्घाटन कर रहे हैं, जो साधक को 'परिमित' से 'अपरिमित' की ओर ले जाने वाला सेतु है।
अन्वय और पदार्थ —
(हे) वैश्वानर! त्वं विश्वोऽसि, त्वं विश्वरूपः (असि), त्वं याजमानः (भूत्वा) विश्वं आधारयसि। यत्र विश्वं च (तत्र) आहुतयश्च (च) पीत्वा (तिष्ठति), सः पुरुषः प्रादेशमात्रः स्मृतः।
पदार्थ और निर्वचन:
• वैश्वानर: विश्व का नर या विश्वरूप अग्नि। वह चेतना जो संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है और जो शरीर में जठराग्नि और प्राण के रूप में स्थित है।
• विश्वरूप: जिसका स्वरूप ही संपूर्ण विश्व हो। यहाँ 'रूप' का अर्थ केवल आकार नहीं, अपितु सत्ता और विस्तार है।
• याजमानः: वह जो यज्ञ का अधिष्ठाता हो। सामान्यतः याजमान वह होता है जो यज्ञ कराता है, किन्तु यहाँ परमात्मा स्वयं 'याजमान' है, क्योंकि संपूर्ण सृष्टि उसका ही यज्ञ है और वह स्वयं ही इसका भोक्ता और पोषक है।
• आधारयसि: धारण करना। वह शक्ति जिससे यह जगत् अपनी स्थिति बनाए हुए है।
• पीत्वा: ग्रहण करना। यहाँ 'पीना' केवल तरल पदार्थ का सेवन नहीं, अपितु आहुतियों (अन्न और प्राण) को आत्मसात कर उन्हें ऊर्जा में बदलना है।
• प्रादेशमात्रः: 'प्रदेश' का अर्थ है अँगूठे से तर्जनी तक की माप (लगभग एक बित्ता)। यह शब्द उस सूक्ष्म बिंदु या परिमित स्थान का संकेत है जहाँ अनंत सत्ता संकुचित रूप में स्थित प्रतीत होती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस महान विरोधाभास को स्पष्ट कर रहे हैं, जो योग और ज्ञान का सार है— 'अनंत का सूक्ष्म में वास'।
मन्त्र का प्रथम भाग उद्घोष करता है: "विश्वोऽसि वैश्वानर विश्वरूप त्वं विश्वमाधारयसि याजमानः"। यहाँ साधक उस वैश्वानर अग्नि को संबोधित कर रहा है जो केवल पेट की अग्नि नहीं, अपितु वह ब्रह्मांडीय चेतना है जिसने संपूर्ण विश्व को अपने भीतर समेटा हुआ है। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि वह 'याजमान' बनकर विश्व को धारण करता है, तो भाव यह है कि यह संपूर्ण सृष्टि परमात्मा का एक विराट यज्ञ है। जैसे एक याजमान यज्ञ के फल का अधिकारी होता है, वैसे ही यह विश्व उस परमात्मा की इच्छा का विस्तार है और वही इसका एकमात्र आधार है।
मन्त्र का द्वितीय भाग एक गहन रहस्य की ओर ले जाता है: "विश्वं च पीत्वाहुतयश्च यत्र प्रादेशमात्रः पुरुषः स्मृतस्तु सः"। यहाँ वह आश्चर्यजनक सत्य प्रकट होता है कि जो वैश्वानर संपूर्ण विश्व का आधार है, जो विश्वरूप है, वह शरीर के भीतर एक 'प्रादेशमात्र' (बित्ताभर) पुरुष के रूप में स्थित है। वह बिंदु जहाँ समस्त आहुतियाँ (अन्न, जल, वायु और विचार) विलीन हो जाती हैं और जहाँ से संपूर्ण शरीर को पोषण मिलता है, वही वह सूक्ष्म केंद्र है। यह उस परम पुरुष की वह स्थिति है जहाँ वह स्वयं को सीमित कर साधक के अनुभव के लिए उपलब्ध होता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे संपूर्ण आकाश एक छोटे से बीज के भीतर या एक बूंद जल में प्रतिबिंबित हो सकता है।
श्रुति-संगति —
इस 'प्रादेशमात्र' पुरुष का रहस्य शतपथ ब्राह्मण में स्पष्ट रूप से वर्णित है:
तान्होवाच एते वै यूयं पृथग्वैश्वानरान्विद्वांसः पृथगन्नमघस्त प्रादेशमात्रमिव ह वै देवाः सुविदिता अभिसम्पन्नास्तथा तु व एनान्वक्ष्यामि यथा प्रादेशमात्रमेवाभिसम्पादयिष्यामीति ॥ १०.६.१.१० ॥
(अश्वपतिने) उनसे कहा — "तुम लोग वैश्वानरको अलग-अलग जानते हुए अलग-अलग अन्न खाते रहे हो। देव (इस वैश्वानरको) प्रादेशमात्र (अँगूठेसे तर्जनीतककी नाप जितना) — भली-भाँति जाने हुए रूपमें — प्राप्त हुए हैं। मैं तुम्हें इन्हें ऐसे बताऊँगा कि प्रादेशमात्रको ही (पूरा) प्राप्त करा दूँ।"
इस श्रुति-अंश में अश्वपति ऋषि स्पष्ट करते हैं कि जो लोग वैश्वानर को अलग-अलग (बाहरी अग्नि या केवल जठराग्नि) जानते हैं, वे अन्न तो खाते हैं किन्तु सत्य को नहीं जानते। देवों ने उस वैश्वानर को 'प्रादेशमात्र' रूप में प्राप्त किया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति का विस्तार है। श्रुति जहाँ इस ज्ञान की उपलब्धि की बात करती है, वहीं यह स्मृति उसे 'प्राणाग्निहोत्र' की विधि में लाकर साधक के लिए एक दैनिक अभ्यास बना देती है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर ले जाने का अभ्यास है।
साधक जब भोजन करता है, तो वह केवल अन्न नहीं ग्रहण करता, अपितु वह उस 'विश्व' को ग्रहण करता है जिसे वैश्वानर ने धारण किया है। अभ्यास यह है कि भोजन के समय यह अनुभव किया जाए कि यह अन्न वास्तव में उस 'प्रादेशमात्र पुरुष' को दी जाने वाली आहुति है।
साधक के लिए यहाँ दो भूमियाँ हैं:
१. विश्वरूप भूमि: जहाँ वह अनुभव करता है कि वह और यह संपूर्ण जगत् एक ही चेतना (वैश्वानर) का विस्तार हैं।
२. प्रादेशमात्र भूमि: जहाँ वह अपनी चेतना को शरीर के भीतर उस सूक्ष्म केंद्र पर एकाग्र करता है जहाँ प्राण और अग्नि का मिलन होता है।
रहस्य यह है कि भीतर का पुरुष 'परिमित' (प्रादेशमात्र) केवल प्रतीत होता है, वास्तव में वह 'अपरिमित' (विश्वरूप) ही है। जब साधक इस बिंदु पर स्थिर होता है, तो वह अनुभव करता है कि जिस छोटे से स्थान में वह परमात्मा स्थित है, वही स्थान वास्तव में संपूर्ण ब्रह्मांड का द्वार है। इस अभ्यास से साधक की दृष्टि भौतिक अन्न से हटकर उस दिव्य तेज पर टिक जाती है, जिससे वह 'अन्नमय कोष' से ऊपर उठकर 'विज्ञानमय' और अंततः 'आनंदमय' अवस्था की ओर अग्रसर होता है।
एषा विश्वभृतीनां तनुर्विष्णोः सनातनी ।
अन्नरूपेण विज्ञेया ययेदं धार्यते जगत् ॥ ९.१४५ ॥
विश्वका भरण करनेवालोंमें विष्णुका यह सनातन शरीर अन्नरूपसे जानना चाहिए, जिससे यह जगत् धारण किया जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४४) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस 'प्रादेशमात्र' पुरुष का संकेत दिया जो संपूर्ण विश्व और उसकी आहुतियों को अपने भीतर समेटे हुए है। अब इस श्लोक में वे उस सूक्ष्म पुरुष के स्थूल विस्तार को समझाते हुए, अन्न के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
विश्वभृतीनां (परमात्माओं) एषा (अन्नः) विष्णोः सनातनी तनुः (अस्ति), (या) अन्नरूपेण विज्ञेया (अस्ति), येन इदं जगत् धार्यते।
पदार्थ और निर्वचन:
• विश्वभृतीनां: 'विश्व' का 'भरण' करने वालों का। यहाँ यह शब्द उन दिव्य शक्तियों या देवताओं के लिए प्रयुक्त है जो सृष्टि के पोषण का कार्य करते हैं, जिनमें विष्णु प्रधान हैं।
• तनुः: शरीर। यहाँ शरीर का अर्थ केवल हाड़-मांस का ढांचा नहीं, अपितु वह 'साधन' या 'माध्यम' है जिसके द्वारा परमात्मा अपनी इच्छा को साकार करता है।
• विष्णोः सनातनी: विष्णु का वह स्वरूप जो आदि और अंत से रहित है। 'विष्णु' शब्द का मूल अर्थ है 'विस्तार' (विष्णोत्)—जो सर्वत्र व्याप्त हो।
• अन्नरूपेण विज्ञेया: अन्न के रूप में जाना जाना चाहिए। 'विज्ञेया' शब्द संकेत करता है कि यह केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभव और विवेक से जानने योग्य रहस्य है।
• धार्यते: धारण किया जाना। वह आधार जिससे यह जगत् बिखरता नहीं, बल्कि एक व्यवस्था में टिका रहता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य एक अत्यंत गंभीर रहस्य खोल रहे हैं। सामान्य दृष्टि में अन्न केवल क्षुधा शांत करने वाला पदार्थ है, किन्तु योगी की दृष्टि में अन्न 'विष्णु का सनातन शरीर' है।
यहाँ 'विष्णु' का अर्थ उस सर्वव्यापी चेतना से है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। जिस प्रकार मनुष्य की आत्मा शरीर के माध्यम से कार्य करती है, उसी प्रकार वह विराट पुरुष (विष्णु) इस दृश्य जगत् को चलाने के लिए जिस 'शरीर' का उपयोग करता है, वह 'अन्न' है। यह जगत् अन्न से बना है और अन्न से ही पोषित है; अतः अन्न ही वह भौतिक सेतु है जिससे परमात्मा इस सृष्टि को धारण किए हुए है।
जब ऋषि कहते हैं कि इसे "अन्नरूपेण विज्ञेया" (अन्न के रूप में जानना चाहिए), तो वे साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जा रहे हैं। बाहरी विधि में हम अन्न ग्रहण करते हैं, किन्तु आन्तरिक विधि में हम उस अन्न के भीतर छिपे 'विष्णु-तत्त्व' का साक्षात्कार करते हैं। यह बोध कि "मैं जो खा रहा हूँ, वह वास्तव में ईश्वर का ही एक स्वरूप है", भोजन की क्रिया को 'कर्म' से उठाकर 'यज्ञ' बना देता है। यदि अन्न विष्णु का शरीर है, तो उसका अनादर करना साक्षात् परमात्मा का अनादर करने के समान है। इसीलिए इस स्मृति में अन्न के प्रति कृतज्ञता और उसकी पवित्रता पर बल दिया गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १५.१४ ॥
मैं वैश्वानर (जठराग्नि) होकर प्राणियोंके देहमें रहता हूँ, और प्राण-अपानसे युक्त होकर चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को 'वैश्वानर' (जठराग्नि) कहकर प्राणियों के देह में स्थित होने की बात करते हैं और अन्न को पचाने की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता का यहाँ अद्भुत मेल है—जहाँ गीता में परमात्मा 'पचाने वाली अग्नि' (वैश्वानर) के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर रहे हैं, वहीं यह स्मृति उस 'पचाये जाने वाले अन्न' को ही परमात्मा का 'शरीर' (तनु) बता रही है। अर्थात्, अग्नि भी परमात्मा है और अन्न भी परमात्मा है; एक भक्षक है और दूसरा भक्ष्य। जब भक्षक और भक्ष्य दोनों एक ही तत्त्व के दो रूप बन जाते हैं, तब भोजन की क्रिया 'अद्वैत' की साधना बन जाती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अन्न-योग' का आधार है। योगी जब अन्न को विष्णु का शरीर मानता है, तो उसके भीतर दो प्रमुख अभ्यास जाग्रत होते हैं:
प्रथम, अन्न का सम्मान: जब भोजन को साक्षात् विष्णु का शरीर माना जाता है, तब साधक अन्न का एक दाना भी व्यर्थ नहीं करता। जूठा छोड़ना या अन्न का अपमान करना उसके लिए आत्म-अपमान के समान हो जाता है, क्योंकि वह जानता है कि वह विष्णु के शरीर का ही अपमान कर रहा है।
द्वितीय, प्रसाद-भाव: भोजन करते समय यह अनुभव करना कि "विष्णु-शरीर (अन्न) विष्णु-अग्नि (वैश्वानर) में समाहित हो रहा है", साधक को 'अहंकार' से मुक्त करता है। वह अनुभव करता है कि वह स्वयं नहीं खा रहा, अपितु उसके भीतर स्थित परमात्मा ही परमात्मा को ग्रहण कर रहा है।
इस अभ्यास से साधक 'अन्नमय कोष' की शुद्धि करता है। जब अन्न को केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि 'विष्णु-तत्त्व' के रूप में ग्रहण किया जाता है, तो वह अन्न शरीर में जाकर केवल मांस-मज्जा नहीं बनता, अपितु 'ओज' और 'तेज' में परिवर्तित हो जाता है, जो आगे चलकर ध्यान और समाधि के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करता है। इस प्रकार साधक अन्नरूप विष्णु से चैतन्यरूप विष्णु की ओर अग्रसर होता है।
अन्नकामेन संसृष्टं ब्रह्मणा चाखिलं जगत् ।
तस्मादन्नात् परं तत्त्वं न भूतं न भविष्यति ॥ ९.१४६ ॥
ब्रह्माने अन्नकी कामनासे सारा जगत् रचा; इसलिए अन्नसे बढ़कर (कोई) तत्त्व न हुआ है, न होगा।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४५) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अन्न को विष्णु का सनातन शरीर बताकर उसे परमात्मा का ही विस्तार सिद्ध किया। अब इस श्लोक में वे सृष्टि-उत्पत्ति के मूल कारण और अन्न की उस सर्वोच्चता का उद्घाटन कर रहे हैं, जो इसे केवल भोजन नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय तत्त्व बनाती है।
अन्वय और पदार्थ —
ब्रह्मणा (परमात्मा द्वारा) अन्नकामेन (अन्न की इच्छा से) अखिलं जगत् संसृष्टम् (संपूर्ण जगत् रचा गया है), तस्मात् (इसलिए) अन्नात् परं तत्त्वं न भूतं न भविष्यति।
पदार्थ और निर्वचन:
• अन्नकामेन: अन्न की कामना से। यहाँ 'काम' का अर्थ सांसारिक तृष्णा नहीं, अपितु 'संकल्प' है। वह संकल्प जिसके द्वारा निराकार ब्रह्म ने स्वयं को साकार रूप में अभिव्यक्त करने का निर्णय लिया।
• संसृष्टम्: रचा गया या निर्मित किया गया। 'सृष्टि' का अर्थ है प्रक्षेपण। ब्रह्म ने स्वयं को अन्न के रूप में प्रक्षेपित किया।
• अन्नात् परं तत्त्वं: अन्न से बढ़कर कोई तत्त्व। यहाँ 'पर' का अर्थ श्रेष्ठता और आधार, दोनों से है।
• न भूतं न भविष्यति: न पहले हुआ, न भविष्य में होगा। यह अन्न की शाश्वतता और उसकी अपरिहार्यता को दर्शाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि सृष्टि के उस रहस्य को खोल रहे हैं जिसे वे 'अन्न' कह रहे हैं। सामान्यतः हम अन्न को केवल पृथ्वी से उगने वाला अनाज मानते हैं, किन्तु यहाँ 'अन्न' का अर्थ है—वह समस्त 'जड़ पदार्थ' जिससे यह दृश्य जगत निर्मित है।
ऋषि कहते हैं कि ब्रह्म ने 'अन्न की कामना' से इस जगत् को रचा। इसका भाव यह है कि परमात्मा जब अपनी आनंदमयी स्थिति से सृष्टि की रचना की ओर बढ़ा, तो उसने सबसे पहले जिस 'माध्यम' या 'तत्व' का संकल्प किया, वह 'अन्न' था। अन्न वह प्रथम ईंट है जिससे ब्रह्मांड की पूरी इमारत खड़ी है। इसीलिए, इस भौतिक जगत में अन्न से बढ़कर कोई तत्त्व नहीं है, क्योंकि बिना अन्न (पदार्थ) के न शरीर संभव है, न इंद्रियाँ और न ही चेतना का यह स्थूल अनुभव।
यह कथन कि "अन्न से बढ़कर कोई तत्त्व न होगा", इस सत्य की ओर संकेत करता है कि जब तक जीव इस संसार में है, उसकी यात्रा अन्न से आरम्भ होकर अन्न पर ही समाप्त होती है। यह केवल शारीरिक पोषण नहीं, बल्कि ब्रह्म का वह रूप है जो जीव को पोषण देकर उसे पुनः ब्रह्म की ओर ले जाने का साधन बनता है।
श्रुति-संगति —
इस विचार की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण के उस संवाद से होती है जहाँ अन्न और प्राण के सम्बन्ध पर विचार किया गया है:
अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुः तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात्प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतः ॥ १४.८.१३.१ ॥
कुछ कहते हैं "अन्न ब्रह्म है" — पर ऐसा नहीं, क्योंकि प्राणके बिना अन्न सड़ जाता है। कुछ कहते हैं "प्राण ब्रह्म है" — पर ऐसा नहीं, क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है। ये दोनों देवता एक होकर ही परम पदको प्राप्त होते हैं।
यहाँ श्रुति कहती है कि केवल अन्न ब्रह्म नहीं है क्योंकि वह प्राण के बिना सड़ जाता है, और केवल प्राण ब्रह्म नहीं है क्योंकि वह अन्न के बिना सूख जाता है। स्मृति का यह श्लोक श्रुति का विरोध नहीं, बल्कि उसकी पूरक व्याख्या है। स्मृति यहाँ 'सृष्टि-उत्पत्ति' की बात कर रही है कि जगत् का आधार अन्न है, जबकि श्रुति 'साधना' की बात कर रही है कि मुक्ति के लिए अन्न और प्राण का एक होना आवश्यक है। भाव यह है कि अन्न वह 'शरीर' है और प्राण वह 'चेतना' है; जब शरीर (अन्न) और चेतना (प्राण) एक लय में आते हैं, तभी साधक परमता को प्राप्त होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अन्न की इसी ज्येष्ठता और सर्वोपरिता का वर्णन तैत्तिरीय उपनिषद् में मिलता है:
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीं श्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्यन्ततः । अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते ॥ २.२ ॥
पृथिवीपर रहनेवाली जितनी भी प्रजाएँ हैं, वे अन्नसे ही उत्पन्न होती हैं, अन्नसे ही जीती हैं, और अन्तमें अन्नमें ही लीन हो जाती हैं। अन्न ही भूतोंमें ज्येष्ठ (सबसे पहले उत्पन्न) है, इसलिए वह सर्वौषध (सबकी औषधि) कहलाता है।
तैत्तिरीय उपनिषद् स्पष्ट करता है कि समस्त प्रजा अन्न से उत्पन्न होती है, अन्न से ही जीवित रहती है और अन्ततः अन्न में ही विलीन हो जाती है। स्मृति का यह वचन कि "अन्नात् परं तत्त्वं न भूतं न भविष्यति", तैत्तिरीय के "अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्" के साथ पूर्णतः मेल खाता है। दोनों ही शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि दृश्य जगत में अन्न ही वह मूल औषधि और आधार है जिससे जीवन का चक्र संचालित है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'कृतज्ञता' और 'अन्न-संस्कार' के अभ्यास की ओर ले जाता है। साधक जब यह अनुभव करता है कि उसके सम्मुख रखा अन्न केवल वस्तु नहीं, बल्कि उस ब्रह्म का संकल्प है जिसने पूरे जगत् को रचा, तब भोजन करना एक 'यज्ञ' बन जाता है।
साधक यहाँ यह अभ्यास करता है कि वह अन्न को 'विष्णु का शरीर' मानकर ग्रहण करे। जब वह यह भाव करता है कि "ब्रह्माने अन्नकामेन संसृष्टं जगत्", तब उसके भीतर अन्न के प्रति घृणा या केवल स्वाद की इच्छा समाप्त हो जाती है और उसके स्थान पर श्रद्धा जन्म लेती है। यह अभ्यास साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है—वह अन्न (स्थूल) को देखते हुए उसमें निहित ब्रह्म (सूक्ष्म) का अनुभव करने लगता है। यही वह भूमि है जहाँ से साधक 'अन्नमय कोष' को पार कर 'प्राणमय कोष' की ओर अग्रसर होता है। अन्न की पूजा और उसके प्रति कृतज्ञता ही यहाँ की वास्तविक साधना है।
अन्नार्थी पवते वायुरन्नार्थी ज्वलतेऽनलः ।
अन्नार्थी चाप्ययं सूर्यो रसान् गृह्णाति रश्मिभिः ॥ ९.१४७ ॥
अन्नके लिए वायु बहता है, अन्नके लिए अग्नि जलती है, और अन्नके लिए ही यह सूर्य किरणोंसे रसोंको ग्रहण करता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४६) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अन्न को सृष्टि का आधारभूत तत्त्व सिद्ध करते हुए उसे ब्रह्म का संकल्प बताया। अब इस श्लोक में वे यह दिखा रहे हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय शक्तियाँ किस प्रकार इस 'अन्न-तत्त्व' की सेवा में रत हैं और जगत का चक्र इसी के इर्द-गिर्द घूमता है।
अन्वय और पदार्थ —
वायुः अन्नार्थी पवते, अनलः अन्नार्थी ज्वलते, अयम् सूर्यः च अन्नार्थी रश्मिभिः रसान् गृह्णाति।
पदार्थ और निर्वचन:
• अन्नार्थी: अन्न के लिए, या अन्न की प्राप्ति/रक्षण के लिए। यहाँ 'अर्थी' शब्द केवल याचना नहीं, बल्कि 'उद्देश्य' को सूचित करता है।
• पवते: बहता है, गमन करता है। वायु की गतिशीलता का प्रयोजन।
• ज्वलते: प्रज्वलित होता है। अग्नि की ऊष्मा और रूपांतरण शक्ति का प्रयोजन।
• रसान् गृह्णाति: रसों को ग्रहण करता है। सूर्य की किरणों द्वारा पृथ्वी से सूक्ष्म सार को ऊपर खींचने की क्रिया।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि प्रकृति के स्थूल प्रक्रमों के पीछे छिपे आध्यात्मिक उद्देश्य को प्रकट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वायु का बहना, अग्नि का जलना और सूर्य का प्रकाश फैलाना—ये केवल भौतिक घटनाएँ नहीं हैं, अपितु ये तीनों शक्तियाँ 'अन्न' के पोषण और उसकी निरंतरता के लिए समर्पित हैं।
वायु बहता है ताकि बीजों का प्रकीर्णन हो, मेघ चलें और वर्षा हो, जिससे अन्न उत्पन्न हो सके। अग्नि जलती है ताकि पृथ्वी के भीतर के खनिज और बाहरी ताप से अन्न का पकना और परिपक्व होना संभव हो। सूर्य अपनी किरणों के माध्यम से पृथ्वी के रसों को ऊपर खींचता है, जिससे वनस्पतियों में जीवन-शक्ति का संचार होता है और वे अन्नरूप में परिणत होती हैं।
यहाँ ऋषि यह रहस्य खोल रहे हैं कि जिसे हम 'प्रकृति' कहते हैं, वह वास्तव में एक महान यज्ञ है, जिसका मुख्य उद्देश्य 'अन्न' का सृजन है। क्योंकि अन्न ही वह माध्यम है जिससे समस्त जीव अपनी देह का भरण करते हैं और अंततः उसी देह के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ते हैं। यदि ये तीनों शक्तियाँ—वायु, अग्नि और सूर्य—अन्न के प्रति समर्पित न होतीं, तो जीवन का आधार ही समाप्त हो जाता। अतः, अन्न केवल भोजन नहीं, बल्कि इन तीनों महान देव-शक्तियों के संयुक्त तप का फल है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'कृतज्ञता' और 'अन्न-संस्कार' का है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके सम्मुख रखे अन्न के एक दाने में वायु की गति, अग्नि की ऊष्मा और सूर्य का तेज समाहित है, तब वह अन्न को केवल पदार्थ नहीं, बल्कि 'प्रसाद' और 'देव-शक्ति' के रूप में देखता है।
योगिक दृष्टि से, यह श्लोक साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। वह देखता है कि बाहरी जगत में जो वायु, अग्नि और सूर्य हैं, वही उसके भीतर भी विद्यमान हैं:
१. वायु: प्राण-वायु, जो शरीर में प्राणों का संचार करती है।
२. अग्नि: जठराग्नि, जो अन्न को पचाकर उसे ओज और तेज में बदलती है।
३. सूर्य: हृदय-आकाश का वह प्रकाश (अन्तर्यामी), जो चेतना के रसों को ग्रहण करता है।
साधक इस बोध का अभ्यास करता है कि जिस प्रकार प्रकृति अन्न के लिए समर्पित है, उसी प्रकार उसकी अपनी आंतरिक शक्तियाँ भी उस 'परम-अन्न' (ब्रह्म) की प्राप्ति के लिए समर्पित होनी चाहिए। इस अनुभूति से साधक में अन्न के प्रति अपार श्रद्धा जागती है और वह अन्न का अपव्यय करना पाप समझने लगता है, क्योंकि अन्न व्यर्थ करना उन तीनों दिव्य शक्तियों (वायु, अग्नि, सूर्य) के तप का अपमान करना है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' से निकालकर 'समर्पण' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को प्रकृति के इस विराट यज्ञ का एक छोटा सा अंश अनुभव करता है।
यथा हि क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।
एवं सर्वाणि भूतानि आत्मयज्ञ(न्यन्न)मुपासते ॥ ९.१४८ ॥
जैसे भूखे बालक माताके चारों ओर बैठते हैं, वैसे ही सब भूत अन्नकी उपासना करते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४७) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि वायु, अग्नि और सूर्य जैसी विराट शक्तियाँ भी अन्न-तत्त्व के पोषण और उसकी निरंतरता के लिए ही कार्यरत हैं। अब इस श्लोक में वे इस निर्भरता को एक अत्यंत सरल और मार्मिक मानवीय उदाहरण के माध्यम से समझा रहे हैं, ताकि साधक अन्न और यज्ञ के अंतर्संबंध को हृदयंगम कर सके।
अन्वय और पदार्थ —
यथा हि क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते, एवं सर्वाणि भूतानि आत्मयज्ञम् (न्यन्नम्) उपासते।
पदार्थ और निर्वचन:
• क्षुधिता बाला: भूख से व्याकुल बालक। यहाँ 'क्षुधा' केवल शारीरिक भूख नहीं, अपितु अस्तित्व को बनाए रखने की तीव्र लालसा है।
• मातरं पर्युपासते: माता के चारों ओर बैठते हैं या माता की शरण में रहते हैं। 'उपआस' का अर्थ है समीप बैठना, जो पूर्ण समर्पण और विश्वास का प्रतीक है।
• सर्वाणि भूतानि: समस्त चराचर प्राणी।
• आत्मयज्ञम् (न्यन्नम्): यहाँ पाठ में संदिग्धता है—'आत्मयज्ञम्' या 'अन्नम्'। 'आत्मयज्ञ' वह आंतरिक यज्ञ है जहाँ प्राण ही अग्नि है और अन्न ही आहुति। 'अन्न' यहाँ केवल भौतिक आहार नहीं, अपितु वह जीवन-शक्ति है जो ब्रह्म का ही विग्रह है।
• उपासते: उपासना करते हैं, आश्रित रहते हैं या पोषण की प्रतीक्षा करते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य ऋषि एक अत्यंत सूक्ष्म सत्य को स्थूल उदाहरण से समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार एक छोटा बालक, जिसे अपनी भूख का ज्ञान है और जो अपनी तृप्ति के लिए पूर्णतः अपनी माता पर निर्भर है, वह अत्यंत सरलता और प्रेम से माता के चारों ओर लिपटकर बैठ जाता है, ठीक उसी प्रकार इस सृष्टि के समस्त प्राणी 'अन्न' या 'आत्मयज्ञ' के आश्रित हैं।
यहाँ ऋषि ने 'माता' और 'अन्न/यज्ञ' के बीच एक गहरा साम्य स्थापित किया है। माता केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि पोषण करने वाली (पोषणकर्त्री) है। उसी प्रकार, यह अन्न-तत्त्व संपूर्ण जगत का पोषण करने वाला है। जब साधक इसे 'अन्न' के रूप में देखता है, तो वह भौतिक पोषण की बात करता है; किंतु जब वह इसे 'आत्मयज्ञ' के रूप में देखता है, तो वह उस प्रक्रिया को देखता है जिसमें अन्न, प्राण-अग्नि में मिलकर चैतन्य में परिवर्तित होता है।
पाठ में 'आत्मयज्ञ' और 'अन्न' दोनों के संकेत हैं। वास्तव में, ये दोनों एक ही सत्य के दो पहलू हैं। जो अज्ञानी है, उसके लिए यह केवल 'अन्न' है जिसे वह पेट भरने के लिए खाता है। किंतु जो योगी है, उसके लिए भोजन करना 'आत्मयज्ञ' है। वह जानता है कि वह अन्न नहीं खा रहा, बल्कि अपने भीतर की वैश्वानर अग्नि में आहुति दे रहा है ताकि उसकी चेतना प्रदीप्त हो सके। अतः समस्त भूत, चाहे वे ज्ञात हों या अज्ञात, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसी पोषण-चक्र (यज्ञ) की उपासना कर रहे हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
तदेष श्लोकः यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत एवं सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥ ५.२४.५ ॥
इस विषयमें यह श्लोक है — जैसे यहाँ भूखे बालक माताके चारों ओर (भोजनकी आशामें) बैठे रहते हैं, वैसे ही सब भूत (ज्ञानीके) अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं।
छान्दोग्य उपनिषद् में इसी श्लोक का उल्लेख है, जहाँ 'आत्मयज्ञ' या 'अन्न' के स्थान पर 'अग्निहोत्र' शब्द का प्रयोग हुआ है— "जैसे भूखे बालक माता के चारों ओर बैठे रहते हैं, वैसे ही सब भूत अग्निहोत्र की उपासना करते हैं।"
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और छान्दोग्य उपनिषद् के इन वचनों में अद्भुत संगति है। छान्दोग्य में 'अग्निहोत्र' शब्द का प्रयोग बाहरी कर्मकांड के साथ-साथ उस दिव्य ऊर्जा के लिए हुआ है जो यज्ञ से उत्पन्न होती है। याज्ञवल्क्य ऋषि इसे 'आत्मयज्ञ' कहकर उस कर्म को भीतर की ओर मोड़ देते हैं। दोनों ही शास्त्र यह मानते हैं कि जिस प्रकार माता का प्रेम निस्वार्थ और पोषणकारी होता है, उसी प्रकार जब एक साधक विधिपूर्वक और ज्ञानपूर्वक अग्निहोत्र या आत्मयज्ञ करता है, तो उसकी तृप्ति से केवल वह स्वयं नहीं, बल्कि समस्त भूत-समुदाय तृप्त होता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'भोजन' की क्रिया को 'साधना' में बदलने का सूत्र है। सामान्य मनुष्य भूख मिटाने के लिए अन्न खाता है, किंतु योगी 'प्राणाग्निहोत्र' के भाव से अन्न ग्रहण करता है।
यहाँ अभ्यास यह है कि अन्न ग्रहण करते समय साधक स्वयं को उस 'क्षुधित बालक' की भांति अत्यंत सरल और समर्पित कर दे, और अन्न को 'माता' या 'परमात्मा' के रूप में देखे। जब भोजन को 'आत्मयज्ञ' मानकर ग्रहण किया जाता है, तो वह केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि प्राणों को शुद्ध करता है।
योगिक दृष्टि से, जब साधक यह अनुभव करता है कि उसके भीतर की अग्नि (वैश्वानर) ही वास्तव में समस्त जगत का पोषण करने वाली शक्ति है, तो उसका व्यक्तिगत भोजन एक वैश्विक यज्ञ बन जाता है। इस भाव से किया गया भोजन साधक को 'अहंकार' से मुक्त कर 'करुणा' की भूमि पर ले जाता है, क्योंकि वह अनुभव करता है कि जैसे वह अन्न का आश्रित है, वैसे ही समस्त सृष्टि एक ही विराट प्राण-शक्ति की आश्रित है। यह बोध साधक को स्थूल आहार से सूक्ष्म आहार (प्राण) की ओर ले जाने की पहली सीढ़ी है।
अविद्वद्भोजने दोषः
यो ह्यविद्वान् समश्नाति अन्नं मोहसमन्वितः ।
भस्मनीव हुतं हव्यं तद्वदन्नममन्त्रकम् ॥ ९.१४९ ॥
जो अज्ञानी मोहसे युक्त होकर अन्न खाता है — मन्त्ररहित वह अन्न राखमें डाली गयी आहुतिके समान (व्यर्थ) है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४८) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि जिस प्रकार बालक माता की शरण में जाता है, वैसे ही समस्त प्राणी अन्न के आश्रित हैं। अब इस श्लोक में वे उस 'आश्रय' को 'यज्ञ' के रूप में देखने की दृष्टि दे रहे हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि बिना बोध के किया गया भक्षण किस प्रकार निष्फल हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
यो ह्यविद्वान् मोहसमन्वितः अन्नं समश्नाति, तद्वदन्नममन्त्रकम् भस्मनीव हुतं हव्यं (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• अविद्वान्: वह जो 'विद्या' से रहित है। यहाँ विद्या का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं, अपितु यह बोध है कि अन्न विष्णु का शरीर है और जठराग्नि वैश्वानर है।
• मोहसमन्वितः: मोह के साथ युक्त। मोह वह अज्ञान है जो अन्न को केवल स्वाद, तृप्ति या भौतिक वस्तु मानता है, उसे ब्रह्म का विग्रह नहीं देखता।
• समश्नाति: ग्रहण करता है या खाता है।
• अमन्त्रकम्: मन्त्ररहित। यहाँ 'मन्त्र' का अर्थ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु वह 'मानसिक स्थापना' है जो अन्न को आहुति में बदल देती है।
• भस्मनीव हुतं हव्यं: राख में डाली गई आहुति के समान। 'हव्य' वह सामग्री है जो देवताओं को अर्पित की जाती है। यदि अग्नि के स्थान पर राख में आहुति डाली जाए, तो वह अग्नि तक नहीं पहुँचती और व्यर्थ हो जाती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य भोजन की क्रिया को एक 'यज्ञ' के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो मनुष्य इस सत्य को नहीं जानता कि उसके भीतर स्थित जठराग्नि वास्तव में विराट वैश्वानर अग्नि का ही रूप है, और वह अन्न जिसे वह ग्रहण कर रहा है, वह परमात्मा का ही शरीर है—ऐसा 'अविद्वान्' व्यक्ति जब मोहवश केवल शारीरिक भूख मिटाने के लिए अन्न खाता है, तो वह भोजन उसके लिए केवल एक भौतिक क्रिया बनकर रह जाता है।
ऋषि यहाँ एक अत्यंत गंभीर उपमा देते हैं: 'भस्मनीव हुतं हव्यं'। यज्ञ में जब अग्नि प्रज्वलित होती है, तभी आहुति देवों तक पहुँचती है। यदि कोई व्यक्ति अग्नि के अंगारों को हटाकर केवल ठंडी राख (भस्म) के ढेर पर घी या अन्न डाल दे, तो वह आहुति निष्फल हो जाती है क्योंकि वहाँ 'अग्नि' का अभाव है। ठीक उसी प्रकार, जब साधक बिना किसी चेतना, बिना किसी मन्त्र (बोध) और बिना किसी भावना के अन्न ग्रहण करता है, तो वह अन्न केवल शरीर का पोषण तो करता है, किन्तु वह 'यज्ञ' नहीं बनता। वह आध्यात्मिक दृष्टि से 'अमन्त्रक' है, अर्थात् उसमें वह दिव्य स्पंदन नहीं है जो उसे अमृतत्व की ओर ले जाए।
यहाँ 'मोह' का अर्थ है—अन्न को केवल पदार्थ मानना। जब हम अन्न को केवल स्वाद या शरीर की मशीन चलाने वाले ईंधन के रूप में देखते हैं, तो हम मोह में होते हैं। लेकिन जब हम यह देखते हैं कि यह अन्न सूर्य की रश्मियों, पृथ्वी के तत्व और परमात्मा की कृपा का संघात है, तब वह भोजन 'प्राणाग्निहोत्र' बन जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस स्मृति का यह विचार श्रुति के इस कथन से पूर्णतः मेल खाता है:
स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ॥ ५.२४.१ ॥
जो इस (वैश्वानर-विद्या) को न जानकर अग्निहोत्र करता है, वह वैसा ही है जैसे कोई अंगारोंको हटाकर राखमें आहुति डाले।
छान्दोग्य उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति वैश्वानर-विद्या को न जानकर अग्निहोत्र करता है, वह वैसा ही है जैसे कोई अंगारों को हटाकर राख में आहुति डाले। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-रहस्य को दैनिक भोजन की क्रिया पर लागू कर रही है। जहाँ छान्दोग्य उपनिषद् औपचारिक अग्निहोत्र की बात करता है, वहीं याज्ञवल्क्य ऋषि उसे 'भोजन' के स्तर पर ले आए हैं, ताकि प्रत्येक ग्रास एक आध्यात्मिक क्रिया बन सके।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'भोजन-योग' का आधार है। साधक के लिए यह निर्देश है कि वह भोजन को केवल शारीरिक आवश्यकता न मानकर उसे 'प्राण' के अर्पण के रूप में देखे।
अभ्यास यह है कि भोजन ग्रहण करने से पूर्व और ग्रहण करते समय यह भाव रखा जाए कि "मैं इस अन्न को अपने भीतर के वैश्वानर (जठराग्नि) में समर्पित कर रहा हूँ।" जब साधक इस बोध के साथ खाता है कि अन्न विष्णु का शरीर है और उसे ग्रहण करना एक पवित्र यज्ञ है, तो वह 'अमन्त्रक' स्थिति से ऊपर उठकर 'विद्वान्' की स्थिति में आता है।
बिना भावना के खाना केवल 'भक्षण' है, जबकि बोध के साथ खाना 'यज्ञ' है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर के मोह से निकालकर सूक्ष्म प्राण और अंततः अक्षर ब्रह्म की ओर ले जाता है, क्योंकि वह हर क्षण यह अनुभव करता है कि वह परमात्मा द्वारा परमात्मा को ही अर्पित कर रहा है।
विद्वद्भोजनफलम्
एवं ज्ञात्वा तु यो विप्रो विधिनान्नं समश्नुते ।
आत्मानं च तथान्नं च दातारं चैव तारयेत् ॥ ९.१५० ॥
इस प्रकार जानकर जो विप्र विधिसे अन्न खाता है, वह अपनेको, अन्नको और दाताको भी तार देता है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१४९) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चेतावनी दी थी कि अज्ञानी और मोहग्रस्त व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया गया अन्न राख में दी गई आहुति के समान निष्फल होता है। अब इस श्लोक में वे उस विपरीत स्थिति का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ बोध और विधि का संगम भोजन को एक मुक्ति-साधन (तारक) बना देता है।
अन्वय और पदार्थ —
यो विप्रो एवं ज्ञात्वा तु विधिना अन्नं समश्नुते, (सः) आत्मानं च, तथ अन्नं च, दातारं च एव तारयेत्।
पदार्थ और निर्वचन:
• एवं ज्ञात्वा: इस प्रकार जानकर। 'इस प्रकार' का अर्थ पिछले श्लोकों (९.१४५-१४९) में वर्णित बोध से है—कि अन्न विष्णु का सनातन शरीर है, जठराग्नि वैश्वानर है और यह भक्षण वास्तव में एक आत्मयज्ञ है।
• विप्रो: यहाँ 'विप्र' शब्द केवल जन्मजात जाति का सूचक नहीं है, अपितु उस 'विप्रत्व' का है जो ब्रह्म-ज्ञान और तप से प्राप्त होता है। वह जो विप्र (विशिष्ट) चेतना में स्थित है।
• विधिना: विधिपूर्वक। इसमें बाहरी मर्यादाएँ (जैसे मौन, आचमन, मन्त्र) और आन्तरिक भाव (समर्पण, कृतज्ञता) दोनों सम्मिलित हैं।
• समश्नुते: ग्रहण करता है या खाता है।
• तारयेत्: तार देता है, अर्थात संसार-बंधन से मुक्त करता है या उच्चतर चेतना की ओर ले जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य भोजन की क्रिया को केवल शारीरिक पोषण से उठाकर 'तारक' (मोक्षदायी) क्रिया बना रहे हैं। वे कहते हैं कि जब एक विप्र (ज्ञानी साधक) इस बोध के साथ अन्न ग्रहण करता है कि वह परमात्मा के शरीर को परमात्मा की ही अग्नि (वैश्वानर) में अर्पित कर रहा है, तब वह क्रिया साधारण भोजन न रहकर एक महायज्ञ बन जाती है।
यहाँ 'विधि' का अर्थ केवल कर्मकाण्ड नहीं, अपितु 'बोधयुक्त क्रिया' है। जब साधक अन्न को विष्णु का विग्रह मानकर उसे ग्रहण करता है, तो वह अन्न उसके भीतर जाकर केवल मांस-मज्जा नहीं बनता, अपितु ओज और तेज में परिवर्तित हो जाता है। इस अवस्था में वह साधक तीन स्तरों पर 'तारण' (उद्धार) करता है:
प्रथम, वह स्वयं को तारता है, क्योंकि उसका भोजन अब वासना की तृप्ति नहीं, अपितु साधना का ईंधन है। वह अन्न के प्रति आसक्ति से मुक्त होकर उसे केवल शरीर-रक्षण और आत्म-साक्षात्कार के साधन के रूप में देखता है।
द्वितीय, वह अन्न को तारता है। अन्न जब अज्ञानी के पेट में जाता है, तो वह केवल मल-मूत्र बन जाता है, किन्तु जब वह एक जागृत चेतना वाले साधक के शरीर में प्रवेश करता है, तो वह 'अमृत' के समान पवित्र हो जाता है। वह अन्न अपनी जड़ता को छोड़कर चैतन्य का हिस्सा बन जाता है।
तृतीय, वह दाता को तारता है। यह इस श्लोक का अत्यंत गूढ़ पक्ष है। जो व्यक्ति साधक को अन्न देता है, वह अनजाने में ही सही, एक जीवित यज्ञ में आहुति दे रहा होता है। साधक की पात्रता और उसका बोध उस दान को 'अक्षय' बना देता है। दाता का पुण्य केवल भौतिक नहीं रहता, अपितु साधक की आध्यात्मिक ऊर्जा के माध्यम से वह दाता भी सूक्ष्म रूप से उस परम-तत्व से जुड़ जाता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'भोजन' को 'योग' में बदलने की विधि है। सामान्यतः भोजन मन के स्वाद-इन्द्रियों का विषय होता है, जिससे रज और तम बढ़ते हैं। किन्तु यहाँ याज्ञवल्क्य उसे 'विधि' से जोड़ने की बात कर रहे हैं।
अभ्यास यह है कि अन्न ग्रहण करने से पूर्व और ग्रहण करते समय यह अनुभव किया जाए कि "मैं नहीं खा रहा, अपितु मेरे भीतर स्थित वैश्वानर अग्नि, विष्णु रूपी अन्न का ग्रहण कर रही है।" जब साधक इस भाव में स्थित होता है, तो भोजन की क्रिया 'प्राणाग्निहोत्र' बन जाती है।
यहाँ भिक्षा ग्रहण करना या आतिथ्य स्वीकार करना, दोनों ही यज्ञ के समान हैं। यदि ग्रहण करने वाला 'विप्र' (बोधयुक्त) है, तो वह दाता के अहंकार को मिटाकर उसे सेवा के आनंद से जोड़ देता है, जिससे दाता का भी आध्यात्मिक उत्थान होता है। यह अभ्यास साधक को 'अन्नमय कोष' से ऊपर उठाकर 'विज्ञानमय कोष' की ओर ले जाता है, जहाँ वह शरीर की भूख को आत्मा की तृप्ति में बदलना सीखता है।
तर्पितं च भवेत्तेन विश्वं भुवनसप्तकम् ।
दैव्ये पित्र्ये च यद्दत्तं तदक्षय्यं भवत्यपि ॥ ९.१५१ ॥
उससे सम्पूर्ण विश्व और सप्त भुवन तृप्त हो जाते हैं; देवताओं और पितरों को जो दिया गया है, वह भी अक्षय हो जाता है...
अवतरणिका — पिछले श्लोक (९.१५०) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि विधिपूर्वक और बोध के साथ अन्न ग्रहण करने वाला साधक स्वयं को, अन्न को और दाता को तार देता है। अब इस श्लोक में वे इस 'तारण' की व्यापकता और उसके ब्रह्माण्डीय प्रभाव का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(तस्मात् विधिना अन्नं समश्नुते विप्रः, तेन) विश्वं भुवनसप्तकम् च तर्पितं च भवेत् । दैव्ये पित्र्ये च यद् (अन्नं) दत्तं, तत् अक्षय्यं भवत्यपि ।
पदार्थ और निर्वचन:
• तेन: उस (विधिपूर्वक और बोध सहित किए गए भक्षण) से। यहाँ 'तेन' शब्द उस ज्ञान-युक्त क्रिया का संकेत है जिसे पिछले श्लोक में 'विधिना' कहा गया।
• विश्वं भुवनसप्तकम्: समस्त विश्व और सातों भुवन। यह केवल भौगोलिक स्थान नहीं, अपितु चेतना के सात स्तरों का संकेत है।
• तर्पितं च भवेत्: तृप्त हो जाते हैं। 'तर्पण' का अर्थ केवल जल देना नहीं, अपितु अभाव को समाप्त कर पूर्णता प्रदान करना है।
• दैव्ये पित्र्ये: देवताओं और पितरों के निमित्त। यहाँ देवता 'ऊर्ध्व' (उच्चतर चेतना) और पितर 'अधो' (पूर्व संचित संस्कार और पूर्वज) के प्रतीक हैं।
• अक्षय्यं भवति: जिसका क्षय न हो, जो अविनाशी हो जाए। साधारण अन्न पचकर समाप्त हो जाता है, किंतु बोध-युक्त अन्न 'अक्षय' फल देता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य योगीश्वर यह रहस्य प्रकट कर रहे हैं कि जब भोजन एक 'आत्मयज्ञ' बन जाता है, तो उसकी परिधि एक व्यक्ति के शरीर तक सीमित नहीं रहती। सामान्यतः मनुष्य केवल अपनी क्षुधा शांत करने के लिए खाता है, जिससे केवल उसका स्थूल शरीर तृप्त होता है। किंतु जो साधक यह जानकर अन्न ग्रहण करता है कि वह विष्णु के शरीर (अन्न) को वैश्वानर (जठराग्नि) में अर्पित कर रहा है, उसके द्वारा किया गया वह एक छोटा सा भक्षण संपूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए तर्पण बन जाता है।
इसका भाव यह है कि जब साधक अपनी व्यक्तिगत भूख को समष्टि की भूख से जोड़ देता है और अन्न को परमात्मा का स्वरूप मानकर ग्रहण करता है, तब उसकी तृप्ति में ही संपूर्ण विश्व की तृप्ति समाहित हो जाती है। वह स्वयं को 'भोक्ता' नहीं, बल्कि 'यज्ञ-कर्ता' अनुभव करता है। इस अवस्था में, उसके द्वारा दिया गया या ग्रहण किया गया अन्न केवल भौतिक पोषण नहीं रहता, बल्कि एक सूक्ष्म ऊर्जा बन जाता है। यही कारण है कि देवताओं और पितरों को दिया गया वह अंश 'अक्षय' हो जाता है; क्योंकि वह अब पदार्थ के स्तर से उठकर चेतना के स्तर पर पहुँच गया है, और चेतना का कभी क्षय नहीं होता।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस सूक्ष्म सत्य की पुष्टि छान्दोग्य उपनिषद् में मिलती है:
अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ ५.२४.२ ॥
और जो इसे इस प्रकार जानकर अग्निहोत्र करता है, उसका हवन सब लोकोंमें, सब भूतोंमें, सब आत्माओंमें हुआ होता है।
यह श्रुति स्पष्ट करती है कि जो व्यक्ति इस रहस्य को जानकर अग्निहोत्र (यहाँ प्राणाग्निहोत्र) करता है, उसका वह एक हवन केवल एक कुंड तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समस्त लोकों, समस्त भूतों और समस्त आत्माओं में संपन्न माना जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी उपनिषद्-सूत्र का विस्तार कर रही है कि बोधपूर्वक किया गया भोजन वास्तव में समस्त चराचर जगत का तर्पण है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'व्यष्टि' से 'समष्टि' में विसर्जन का अभ्यास है। साधारण मनुष्य 'मैं खा रहा हूँ' के अहंकार में बंधा रहता है, जिससे उसकी तृप्ति सीमित और क्षणिक होती है। किंतु योगी इस श्लोक के माध्यम से 'अहं' का विसर्जन कर 'विश्व' का अनुभव करता है।
अभ्यास यह है कि भोजन के समय यह अनुभव किया जाए कि मेरे भीतर की जठराग्नि वास्तव में ब्रह्माण्डीय वैश्वानर है और यह अन्न संपूर्ण सृष्टि का सार है। जब साधक इस भाव में स्थित होता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके तृप्त होने से सात भुवन तृप्त हो रहे हैं। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार-भूमि' से उठाकर 'करुणा और एकात्मता की भूमि' पर ले जाता है। यहाँ भोजन करना केवल शरीर का पोषण नहीं, बल्कि एक ध्यान-साधना बन जाता है, जहाँ दाता, अन्न और भोक्ता का भेद मिट जाता है और केवल एक ही अक्षय तत्त्व शेष रहता है।
परमेश्वरस्य सर्वव्यापित्वम्
एवं हि सर्वभावस्थं विदित्वा परमेश्वरम् ।
काष्ठादौ हि तृणान्ते च पाषाणान्तर्गतेऽपि च ॥ ९.१५२ ॥
इस प्रकार सब भावोंमें स्थित परमेश्वरको जानकर — (वह) काठ आदिसे लेकर तिनकेतक और पत्थरके भीतर भी —
अवतरणिका — पिछले श्लोकों में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अन्न के माध्यम से परमात्मा की व्यापकता और बोध-युक्त भक्षण के फल को समझाया। अब वे साधक को स्थूल अन्न के बोध से ऊपर उठाकर समस्त जड़-चेतन प्रपंच में व्याप्त उस परमेश्वर के दर्शन करा रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(साधक) एवं हि सर्वभावस्थं परमेश्वरम् विदित्वा (ततः फलम् किम्?) — काष्ठादौ हि (काष्ठम् आदिभ्यः), तृणान्ते च (तृणस्य अन्ते पर्यन्तम्), पाषाणान्तर्गतेऽपि च (पाषाण के भीतर स्थित होने पर भी)... (व्याप्य स तिष्ठति - श्लोक ९.१५३)।
पदार्थ और निर्वचन:
• सर्वभावस्थं: समस्त भावों (अवस्थाओं, तत्वों और प्रकृतियों) में स्थित। यहाँ 'भाव' का अर्थ केवल मानसिक अवस्था नहीं, अपितु अस्तित्व के सभी रूपों (पदार्थों) से है।
• विदित्वा: जानकर। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु 'अनुभूत ज्ञान' है, जहाँ ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिटने लगता है।
• काष्ठादौ: काठ (लकड़ी) आदि से। यह स्थूल और कठोर जड़ पदार्थ का प्रतीक है।
• तृणान्ते: तिनके के अंत तक। यह अत्यंत सूक्ष्म और क्षीण पदार्थ का प्रतीक है।
• पाषाणान्तर्गतेऽपि: पत्थर के भीतर स्थित होने पर भी। पत्थर जड़ता और स्थिरता का चरम है; उसके भीतर भी चेतना का होना इस ज्ञान की पराकाष्ठा है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य उस विराट दृष्टि का उद्घाटन कर रहे हैं, जो साधक को 'अहं' के संकुचित घेरे से निकालकर 'सर्वं' की व्यापकता में ले जाती है। यह श्लोक अपने आप में पूर्ण नहीं है, इसका क्रिया-वाक्य अगले श्लोक (९.१५३) में मिलता है— "ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तमेवं व्याप्य स तिष्ठति"। अतः पूर्ण अर्थ यह है कि जो साधक परमेश्वर को समस्त भावों में स्थित जानकर यह अनुभव करता है कि वह ईश्वर काठ जैसे स्थूल, तिनके जैसे सूक्ष्म और पत्थर जैसे कठोर पदार्थ के भीतर भी व्याप्त है, वह सत्य के निकट पहुँचता है।
यहाँ याज्ञवल्क्य जी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि परमात्मा केवल मंदिर, वेदी या ध्यानमग्न हृदय तक सीमित नहीं है, अपितु वह 'सर्वभावस्थ' है। जब साधक का बोध परिपक्व होता है, तो उसे जड़ और चेतन का भेद समाप्त दिखने लगता है। उसे अनुभव होता है कि जिस चेतना से वह स्वयं देख रहा है, वही चेतना पत्थर की स्थिरता में, तिनके की लचक में और काठ की सघनता में भी विद्यमान है। यह ज्ञान साधक को उस स्थिति में ले जाता है जहाँ वह संसार को 'परकीय' (दूसरों का) नहीं, बल्कि 'स्वकीय' (अपना ही विस्तार) मानने लगता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
परमेश्वर की इसी सर्वव्यापकता का उद्घोष ईशोपनिषद् के प्रथम मन्त्र में मिलता है:
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ १ ॥
जगत्में जो कुछ भी चलनेवाला (परिवर्तनशील) है, वह सब ईश्वरसे बसा (ढका) है। उसके दिये हुए (त्यागपूर्वक) से भोग करो; किसीके धनका लोभ मत करो।
यहाँ 'ईशा वास्यमिदं सर्वम्' का अर्थ है कि इस जगत में जो कुछ भी परिवर्तनशील है, वह सब ईश्वर से व्याप्त (ढका) है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी श्रुति-वचन का विस्तार है। जहाँ उपनिषद् इसे एक सत्य के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं याज्ञवल्क्य उसे 'काठ, तृण और पाषाण' के उदाहरणों से साधक के लिए प्रत्यक्ष और बोधगम्य बनाते हैं।
इसी प्रकार अग्नि पुराण में भी इस सत्य की पुनरावृत्ति की गई है:
ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा । ईशावास्यमिदं सर्वं महदादिजगद्धरिः ॥ २१६.१४ ॥
ईश्वरकी प्रेरणासे ही (जीव) स्वर्ग अथवा नरकको जाता है। यह सब ईश्वरका आवास है — महत्तत्त्व आदि (से बना) जगत् हरि (का ही रूप) है।
यहाँ 'महदादिजगद्धरिः' कहकर यह बताया गया है कि महत्तत्त्व आदि से निर्मित यह संपूर्ण जगत् वास्तव में हरि (परमात्मा) का ही रूप है। स्मृति और पुराण दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ईश्वर किसी एक स्थान पर स्थित नहीं, अपितु वह समस्त सृष्टि का आधार और आवास है।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'साक्षी भाव' से 'एकत्व भाव' की ओर ले जाता है। सामान्यतः साधक केवल अपने भीतर के प्रकाश को खोजता है, किंतु जब वह इस श्लोक के अभ्यास में उतरता है, तो वह अपने भीतर के 'सूर्य' (चेतना) को बाहर के प्रत्येक कण में देखना आरम्भ करता है।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि वह अपनी दृष्टि जहाँ भी पड़े—चाहे वह कोई पत्थर हो या छोटा सा तिनका—वहाँ केवल पदार्थ को न देखे, अपितु उस पदार्थ के भीतर स्पंदित उस 'तेज' और 'चेतना' का अनुभव करे। जब साधक यह अनुभव करता है कि "जो मुझमें है, वही इसमें है", तब उसके भीतर से 'लोभ' और 'द्वेष' का क्षय होने लगता है। व्यवहार में 'मा गृधः' (लोभ न करना) का उपदेश इसी दर्शन का व्यावहारिक फल है; क्योंकि जब सब कुछ ईश्वर ही है, तो किसी वस्तु के लिए तृष्णा या किसी व्यक्ति के प्रति घृणा का कोई आधार नहीं बचता। यह अभ्यास साधक को 'अद्वैत' की उस भूमि पर प्रतिष्ठित करता है जहाँ संपूर्ण ब्रह्माण्ड उसका अपना स्वरूप बन जाता है।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तमेवं व्याप्य स तिष्ठति ।
पाषाणमणिधातूनां तेजोरूपेण संस्थितः ॥ ९.१५३ ॥
— ब्रह्मासे लेकर तृण-स्तम्बतक इस प्रकार व्याप्त होकर स्थित है; पत्थर, मणि और धातुओंमें तेजरूपसे स्थित है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने साधक को यह बोध कराया कि परमात्मा का वास केवल सूक्ष्म शरीर में नहीं, अपितु काठ और तिनके जैसे जड़ पदार्थों में भी है। इसी विचार को विस्तार देते हुए इस श्लोक में वे सृष्टि की समस्त सीमाओं और पदार्थों में उस ईश्वर की व्याप्ति के स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
सः (परमेश्वरः) ब्रह्मादिः स्तम्बपर्यन्तम् एवं व्याप्य तिष्ठति । पाषाण-मणि-धातूनां तेजोरूपेण संस्थितः ।
पदार्थ और निर्वचन:
• ब्रह्मादिः: ब्रह्मा से (अर्थात् सृष्टि के आदि-निर्माता और सूक्ष्मतम चेतना से)।
• स्तम्बपर्यन्तम्: स्तम्भ (तृण-गुच्छ या जड़ स्तंभ) तक। यहाँ 'स्तम्भ' उस जड़ता का प्रतीक है जो चेतना के अभाव में स्थिर और अचेतन प्रतीत होती है।
• व्याप्य: व्याप्त होकर। यह 'व्याप्ति' वह स्थिति है जहाँ कोई रिक्त स्थान नहीं बचता; जैसे आकाश सर्वत्र है, वैसे ही वह चेतना सर्वत्र है।
• तेजोरूपेण: तेज के रूप में। यहाँ 'तेज' का अर्थ भौतिक अग्नि नहीं, अपितु वह 'प्रकाश-तत्त्व' है जो पदार्थ को अस्तित्व प्रदान करता है।
• संस्थितः: स्थित है। यह स्थिरता उस परमेश्वर की है जो जगत के परिवर्तनशील प्रवाह के बीच भी अपरिवर्तित रहता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस विराट सत्य का उद्घाटन कर रहे हैं जिसे 'सर्वव्यापकता' कहा जाता है। यह श्लोक पिछले श्लोक (९.१५२) के वाक्य को पूर्ण करता है। पूर्ण भाव यह है कि जो परमेश्वर काठ और तिनके में है, वह वास्तव में ब्रह्मा (सृष्टि के आदि-बिन्दु) से लेकर स्तम्भ (जड़तम पदार्थ) तक सम्पूर्ण प्रपंच में व्याप्त होकर स्थित है।
ऋषि यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म संकेत दे रहे हैं— "ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तम्"। ब्रह्मा सूक्ष्मतम और चेतन का शिखर हैं, जबकि स्तम्भ या तृण-गुच्छ जड़ता की परिधि है। इन दोनों छोरों के बीच जो कुछ भी है—देवता, मनुष्य, पशु, पौधे, खनिज—वह सब उसी एक चेतना का विस्तार है। साधक जब इस सत्य को देखता है, तो उसके लिए 'जड़' और 'चेतन' का भेद समाप्त हो जाता है।
आगे ऋषि कहते हैं कि वह परमात्मा पाषाण (पत्थर), मणि और विभिन्न धातुओं में 'तेज' के रूप में संस्थित है। सामान्य दृष्टि पत्थर को कठोर, अंधकारमय और चेतना-रहित मानती है, किन्तु योगी की दृष्टि यह देखती है कि पत्थर की वह कठोरता और उसका अस्तित्व भी उसी परमात्मा के 'तेज' का एक संघनित रूप है। यदि उस तेज का अभाव हो, तो पदार्थ का अस्तित्व ही मिट जाए। मणि की चमक और धातुओं की आभा वास्तव में उसी एक परम-तेज के भिन्न-भिन्न प्रतिबिंब हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'समत्व' के अभ्यास का आधार है। योगी जब इस सत्य का अनुभव करता है कि पत्थर, धातु और मणि में भी वही तेज है जो उसके अपने हृदय में है, तब उसके भीतर से 'घृणा' और 'भेद' का भाव मिट जाता है।
यहाँ अभ्यास यह है कि साधक अपने आस-पास की जड़ वस्तुओं को देखते हुए यह चिंतन करे कि "यह केवल पत्थर या धातु नहीं है, अपितु उसी एक चेतन-तेज का विवर्त है।" जब साधक जड़ पदार्थ में भी तेज को अनुभव करने लगता है, तब वह 'स्थूल भूमि' से ऊपर उठकर 'सूक्ष्म भूमि' की ओर अग्रसर होता है। वह अनुभव करता है कि जिसे वह 'जड़' समझ रहा था, वह वास्तव में चेतना की ही एक गहरी निद्रा या संघनित अवस्था है। इस अभ्यास से साधक के भीतर वह दृष्टि जाग्रत होती है जहाँ वह संपूर्ण ब्रह्मांड को एक ही प्रकाश-पुंज के रूप में देखता है, जिससे उसकी एकाग्रता और व्यापकता बढ़ती है।
वृक्षौषधितृणानां च रसरूपेण तिष्ठति ।
तन्मात्रभूतो भूतानां विश्वरूपेण संस्थितः ॥ ९.१५४ ॥
वृक्षों, ओषधियों और तृणोंमें रसरूपसे रहता है; भूतोंका तन्मात्रारूप होकर विश्वरूपसे स्थित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि परमात्मा पत्थर, मणि और धातुओं में 'तेज' के रूप में स्थित है। अब इस श्लोक में वे जड़ और चेतन के बीच की कड़ी—वनस्पतियों और सूक्ष्म तन्मात्रों—में उस ईश्वर की उपस्थिति का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(सः परमेश्वरः) वृक्ष-ओषधि-तृणानां च रसरूपेण तिष्ठति । भूतानां तन्मात्रभूतो विश्वरूपेण संस्थितः ।
पदार्थ और निर्वचन:
• वृक्ष-ओषधि-तृणानां: वृक्षों, औषधियों और तृणों (तिनकों) में। यहाँ वनस्पति जगत के तीन स्तर—विशाल वृक्ष, गुणकारी औषधि और लघु तृण—का उल्लेख है।
• रसरूपेण: रस के रूप में। यहाँ 'रस' का अर्थ केवल स्वाद नहीं, अपितु वह 'सत्त्व' या 'जीवन-धारा' है जो पौधे को जीवित रखती है और उसे पोषण देती है।
• तन्मात्रभूतो: तन्मात्र रूप होकर। 'तन्मात्र' का अर्थ है सूक्ष्म तत्त्व (जैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)। जब चेतना अपने स्थूल रूप को छोड़कर अत्यंत सूक्ष्म तरंग रूप में होती है, तो वह तन्मात्र कहलाती है।
• विश्वरूपेण: विश्वरूप होकर। वह एक ही सत्ता जब अनंत रूपों में प्रकट होती है, तब वह 'विश्वरूप' कहलाती है।
• संस्थितः: स्थित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जा रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने 'तेज' (प्रकाश/ऊर्जा) की बात की थी, यहाँ वे 'रस' की बात कर रहे हैं।
ऋषि कहते हैं कि वृक्षों, औषधियों और घास के तिनकों में वह परमात्मा 'रस' के रूप में विद्यमान है। वनस्पति जगत में चेतना का सबसे स्पष्ट प्रमाण उसका 'रस' है—वही रस जो पौधे को बढ़ने की शक्ति देता है, वही जो औषधि में रोगनाशक गुण भरता है और वही जो फल में मिठास लाता है। वास्तव में, वह रस परमात्मा का ही एक विवर्त (प्रकटीकरण) है। जब साधक किसी वृक्ष को देखता है या किसी औषधि का सेवन करता है, तो वह केवल भौतिक पदार्थ नहीं, अपितु ईश्वर के रसरूप का अनुभव कर रहा होता है।
आगे महर्षि एक अत्यंत गूढ़ रहस्य प्रकट करते हैं: "तन्मात्रभूतो भूतानां विश्वरूपेण संस्थितः"। इसका भाव यह है कि समस्त प्राणियों के अस्तित्व का आधार वे सूक्ष्म तन्मात्र (सूक्ष्म तत्व) हैं, और वे तन्मात्र स्वयं उस परमात्मा के ही रूप हैं। वह ईश्वर केवल एक स्थान पर सीमित नहीं है, बल्कि वह सूक्ष्म तन्मात्र बनकर समस्त भूतों (प्राणियों और पदार्थों) में व्याप्त है। इस प्रकार वह 'विश्वरूप' है—अर्थात् संपूर्ण ब्रह्मांड ही उसका शरीर है।
यहाँ याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ईश्वर और सृष्टि अलग नहीं हैं। जिस प्रकार स्वर्ण से बने विभिन्न आभूषणों में मूल तत्त्व स्वर्ण ही रहता है, उसी प्रकार वृक्ष, औषधि और मनुष्य जैसे भिन्न-भिन्न रूपों में मूल तत्त्व वह 'तन्मात्र-परमात्मा' ही है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस सत्य की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण के वचनों से होती है:
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ७.८–९ ॥
कौन्तेय! जलमें मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रकाश हूँ, सब वेदोंमें प्रणव, आकाशमें शब्द और पुरुषोंमें पुरुषत्व हूँ। पृथिवीमें पवित्र गन्ध और अग्निमें तेज मैं हूँ; सब भूतोंमें जीवन और तपस्वियोंमें तप मैं हूँ।
"रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥"
यहाँ भगवान स्वयं कहते हैं कि जल में मैं 'रस' हूँ और पृथ्वी में 'पवित्र गन्ध' हूँ। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता का यह मत एक ही सत्य को उद्घाटित करता है कि इंद्रियों द्वारा अनुभव किए जाने वाले गुण (रस, गन्ध, तेज) वास्तव में उस एक ही परमात्मा के विभिन्न स्वरूप हैं। जहाँ स्मृति 'तन्मात्र' शब्द का प्रयोग कर उसे सूक्ष्मता की दृष्टि से देखती है, वहीं गीता उसे 'जीवन' और 'गुण' के रूप में प्रस्तुत करती है। दोनों का लक्ष्य साधक को हर पदार्थ में ईश्वर को देखना सिखाना है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक साधक के लिए 'स्मरण' का एक महान साधन है। सामान्यतः मनुष्य इंद्रिय-विषयों (स्वाद, गन्ध, स्पर्श) में आसक्त होकर उनमें खो जाता है, जिससे वह बंधन में बँधता है। किंतु यहाँ याज्ञवल्क्य उस इंद्रिय-अनुभव को ही 'मुक्ति के द्वार' में बदल रहे हैं।
साधक का अभ्यास यह होना चाहिए कि जब वह किसी फल का रस चखे, किसी पुष्प की गन्ध ले या किसी औषधि का उपयोग करे, तो वह केवल स्वाद या गन्ध का अनुभव न करे, बल्कि यह भाव रखे—"यह रस वही परमात्मा है", "यह गन्ध वही ईश्वर है"। जब इंद्रिय-अनुभव 'स्मरण' में बदल जाता है, तो वह विषय नहीं रहता, अपितु साधना बन जाता है।
साधक इस अभ्यास से 'स्थूल' (वृक्ष/तृण) से 'सूक्ष्म' (रस/तन्मात्र) की ओर बढ़ता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक जगत के द्वैत को मिटाकर 'विश्वरूप' का अनुभव करने लगता है। जब वह हर स्वाद और हर गन्ध में उसी एक सत्ता को पहचान लेता है, तब उसकी चेतना बाहरी जगत से सिमटकर अपने भीतर के उस 'अक्षर' की ओर मुड़ने लगती है, जो समस्त तन्मात्रों का मूल है।
आत्मोपासनफलम्
एवं वेत्ति य आत्मानमेकधा संप्रतिष्ठितम् ।
ज्ञात्वा चोपासते सम्यक् सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ९.१५५ ॥
जो इस प्रकार एकरूपसे प्रतिष्ठित आत्माको जानता है और जानकर भली-भाँति उपासना करता है, वह अमृतत्वके योग्य होता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह रहस्य उद्घाटित किया कि परमात्मा जड़ पदार्थों में तेज के रूप में और वनस्पति जगत में रस एवं तन्मात्र के रूप में विश्वरूप होकर स्थित है। अब इस श्लोक में वे इस सर्वव्यापकता के ज्ञान को 'उपासना' में बदलने की विधि और उसके अंतिम फल का प्रतिपादन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
यः (साधकः) आत्मानम् एकधा संप्रतिष्ठितम् एवं वेत्ति, (ततः) ज्ञात्वा च (तम्) सम्यक् उपासते, स अमृतत्वाय कल्पते ।
पदार्थ और निर्वचन:
• एकधा संप्रतिष्ठितम्: एक रूप से प्रतिष्ठित। इसका अर्थ है कि आत्मा अलग-अलग पदार्थों में भिन्न-भिन्न नहीं है, अपितु वह एक ही सत्ता है जो विभिन्न रूपों (तेज, रस, तन्मात्र) में प्रतिष्ठित है। 'एकधा' यहाँ अद्वैत का संकेत है।
• एवं वेत्ति: इस प्रकार जानता है। यहाँ 'एवं' का सम्बन्ध पिछले श्लोकों (9.152-154) से है, जहाँ पत्थर, मणि, वृक्ष और तन्मात्रों में ईश्वर की उपस्थिति बताई गई है।
• ज्ञात्वा च: जानकर और। यहाँ 'च' यह दर्शाता है कि केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, ज्ञान के पश्चात एक और सोपान है।
• सम्यक् उपासते: भली-भाँति उपासना करता है। 'सम्यक्' का अर्थ है—बिना किसी संशय के, पूर्ण एकाग्रता और श्रद्धा के साथ उस सत्य को अपने अनुभव में उतारना।
• अमृतत्वाय कल्पते: अमृतत्व के योग्य होता है। 'कल्पते' का अर्थ है—पात्र होना या उस अवस्था को प्राप्त करने की सामर्थ्य रखना। अमृतत्व का अर्थ है जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति और अविनाशी स्वरूप में स्थित होना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ज्ञान और साधना के अटूट सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि जो साधक यह जान लेता है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड—चाहे वह कठोर पाषाण हो, सूक्ष्म तन्मात्र हो या चेतन मनुष्य—सबमें एक ही आत्मा एकरूप से प्रतिष्ठित है, वह सत्य के प्रथम द्वार पर पहुँच जाता है।
यहाँ 'जानने' (वेत्ति) और 'उपासना' (उपासते) के बीच का जो क्रम है, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर यह भ्रम होता है कि ज्ञान होने के बाद साधना की आवश्यकता नहीं रहती, या केवल साधना से ज्ञान प्राप्त होता है। किंतु याज्ञवल्क्य जी स्पष्ट करते हैं कि पहले 'बोध' आता है और फिर उस बोध को 'साधना' में परिवर्तित किया जाता है।
जब साधक यह जान लेता है कि परमात्मा केवल मंदिर या किसी विशेष मूर्ति में नहीं, अपितु काठ, तृण और पत्थर में भी है, तब उसकी दृष्टि बदल जाती है। इस ज्ञान के बाद जब वह 'सम्यक् उपासना' करता है, तो वह उपासना केवल एक क्रिया नहीं रहती, बल्कि एक निरंतर अनुभव बन जाती है। वह हर वस्तु में उसी एक आत्मा को देखता है। यही वह स्थिति है जहाँ 'विश्वरूप' का ज्ञान 'आत्मरूप' के अनुभव में बदल जाता है।
इस प्रकार, जब ज्ञान और उपासना का मिलन होता है, तब साधक 'अमृतत्व' के योग्य हो जाता है। अमृतत्व केवल मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं है, अपितु जीवित रहते हुए भी उस अविनाशी तत्व में स्थित हो जाना है, जिसे काल और परिस्थिति प्रभावित नहीं कर सकते।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'ज्ञान-योग' और 'भक्ति-योग' के समन्वय का सूत्र है। साधक के लिए यहाँ दो सोपान हैं:
१. प्रथम सोपान (वेत्ति - ज्ञान): यह वह भूमि है जहाँ साधक वैचारिक स्तर पर यह स्वीकार करता है कि "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (सब कुछ ब्रह्म ही है)। वह अपने मन में यह धारणा स्थापित करता है कि जिस चेतना का अनुभव वह अपने भीतर कर रहा है, वही चेतना बाहर की समस्त सृष्टि में व्याप्त है। यह अभ्यास उसे द्वैत और घृणा से मुक्त कर 'समत्व' की ओर ले जाता है।
२. द्वितीय सोपान (उपासते - उपासना): ज्ञान के बाद भी अभ्यास छूटता नहीं है। यहाँ उपासना का अर्थ है—उस एकरूप आत्मा का निरंतर स्मरण और ध्यान। जब साधक पत्थर, वृक्ष और मनुष्य में एक ही तत्व को देखते हुए उनकी सेवा या उपासना करता है, तो उसका अहंकार गलने लगता है। वह अब केवल 'स्व' की उपासना नहीं करता, बल्कि 'सर्व' की उपासना करता है।
साधक जब इस अभ्यास से गुजरता है, तो वह 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' और 'सूक्ष्म' से 'अक्षर' की ओर बढ़ता है। पहले वह परमात्मा को बाहर की वस्तुओं में देखता है (विश्वरूप), फिर उन्हें अपने हृदय के भीतर अनुभव करता है (आत्मरूप)। जब बाहरी जगत और आंतरिक जगत की यह दूरी समाप्त हो जाती है, तब वह अमृतत्व की भूमि पर प्रतिष्ठित होता है। यह श्लोक सिखाता है कि ज्ञान मार्ग प्रशस्त करता है और उपासना उस मार्ग पर चलाकर लक्ष्य तक पहुँचाती है।
पञ्चधा व्यवस्थित आत्मा
आदित्ये हृदये चैवमग्नौ व्योम्नि तथा परे ।
एक एव भवेदात्मा पञ्चधाऽवस्थितस्तु सः ॥ ९.१५६ ॥
आदित्यमें, हृदयमें, अग्निमें, व्योममें और परम (धाम) में — एक ही आत्मा पाँच प्रकारसे स्थित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि जड़ और चेतन, समस्त प्रकृति में एक ही परमात्मा व्याप्त है और इस सत्य को जानकर उपासना करने वाला साधक अमृतत्व को प्राप्त करता है। अब इस श्लोक में वे उस सर्वव्यापी आत्मा के पाँच विशिष्ट अधिष्ठानों का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक के लिए ध्यान के मुख्य केंद्र हैं।
अन्वय और पदार्थ —
आदित्ये, हृदये, एवमग्नौ, व्योम्नि तथा परे (स्थानेषु), सः (एकः) आत्मा पञ्चधा अवस्थितः (अस्ति), (परन्तु) एक एव भवेदात्मा ।
पदार्थ और निर्वचन:
• आदित्ये: सूर्य में। यहाँ आदित्य केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु जगत की चेतन शक्ति और प्रकाश का प्रतीक है।
• हृदये: हृदय में। यह वह स्थान है जहाँ आत्मा 'अन्तर्यामी' रूप में प्रतिष्ठित है।
• अग्नौ: अग्नि में। यह भौतिक अग्नि और शरीर की जठराग्नि तथा प्राण-अग्नि का सूचक है।
• व्योम्नि: आकाश में। यह वह व्यापकता है जो समस्त ब्रह्माण्ड को घेरे हुए है।
• परे: परम धाम में। वह स्थान जो इंद्रियों और मन की पहुँच से परे, शुद्ध चैतन्य स्वरूप है।
• पञ्चधा अवस्थितः: पाँच प्रकार से स्थित। इसका अर्थ है कि एक ही सत्ता ने पाँच अलग-अलग स्तरों या आयामों पर अपनी उपस्थिति प्रकट की है।
• एक एव भवेदात्मा: आत्मा एक ही है। यह इस श्लोक का मुख्य निष्कर्ष है कि अधिष्ठान पाँच हैं, किंतु सत्ता एक ही है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य उस अद्वैत सत्य को प्रतिपादित कर रहे हैं जिसे साधक अपनी साधना के विभिन्न सोपानों पर अनुभव करता है। ऋषि कहते हैं कि वह एक ही आत्मा पाँच स्थानों में प्रतिष्ठित है: आदित्य, हृदय, अग्नि, व्योम और परम धाम।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि ये पाँच स्थान अलग-अलग देवता या भिन्न-भिन्न सत्ताएँ नहीं हैं, बल्कि एक ही परमात्मा के पाँच अलग-अलग 'प्रकटीकरण' हैं। जब साधक बाहर की ओर देखता है, तो वह उसे 'आदित्य' के तेज में पाता है; जब वह अंतर्मुखी होता है, तो उसे 'हृदय' के शून्य में अनुभव करता है; जब वह रूपांतरण और तप की प्रक्रिया में होता है, तो वह 'अग्नि' के रूप में प्रकट होता है; जब वह अपनी चेतना का विस्तार करता है, तो वह 'व्योम' की व्यापकता बन जाता है; और जब वह समस्त प्रपंचों से ऊपर उठ जाता है, तब वह 'परम' पद में स्थित होता है।
यह विधान साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली एक सोपान-श्रृंखला है। बाहरी जगत का प्रकाश (आदित्य), शरीर का तेज (अग्नि), अंतःकरण का प्रकाश (हृदय), चेतना का विस्तार (व्योम) और अंततः शुद्ध चैतन्य (परम)—ये पाँचों एक ही सूत्र में पिरोए हुए हैं। याज्ञवल्क्य यहाँ यह रहस्य खोल रहे हैं कि जिसे हम अलग-अलग रूपों में पूजते हैं, वह वास्तव में एक ही आत्मा की विभिन्न अवस्थाएँ हैं।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'एकत्व' के अनुभव का अभ्यास है। साधक के लिए यहाँ यह सूत्र है कि ध्यान का आरम्भ कहीं से भी हो, उसका गंतव्य उसी 'एक आत्मा' में होना चाहिए।
साधक जब आदित्य (सूर्य) का ध्यान करता है, तो वह बाहरी प्रकाश से आंतरिक प्रकाश की ओर बढ़ता है। जब वह हृदय में ध्यान लगाता है, तो वह स्वयं के भीतर उस सूर्य को खोजता है। जब वह अग्नि का चिंतन करता है, तो वह अपने भीतर की अशुद्धियों को जलाकर शुद्ध चैतन्य की ओर बढ़ता है। जब वह व्योम (आकाश) का अनुभव करता है, तो उसकी सीमित पहचान (अहंकार) मिटकर वह सर्वव्यापी हो जाता है। और अंततः, वह 'परम' में लीन हो जाता है।
इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य यह है कि साधक किसी एक स्थान को पकड़कर वहीं न रुक जाए, बल्कि यह अनुभव करे कि जो आदित्य में है, वही हृदय में है, और जो हृदय में है, वही परम में है। जब साधक इन पाँचों अधिष्ठानों के बीच के भेद को मिटा देता है, तब वह 'पञ्चधा' (पाँच प्रकार) की स्थिति से ऊपर उठकर 'एक एव' (केवल एक) की स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह अभ्यास साधक को भिन्नता के भ्रम से निकालकर अद्वैत की भूमि पर ले जाता है, जहाँ उपासक और उपास्य का भेद समाप्त हो जाता है।
उपनिषत्प्रतिपादिताऽऽत्मोपासना
आदित्ये चैव हृदये चैकीभूतं विचिन्तयेत् ।
सर्वोपनिषदां चैव उपास्त्यैषा उदाहृता ॥ ९.१५७ ॥
आदित्य और हृदयमें (उसे) एक हुआ चिन्तन करे; सब उपनिषदोंकी यही उपासना कही गयी है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने आत्मा के पाँच अधिष्ठानों (आदित्य, हृदय, अग्नि, व्योम और परम धाम) का निर्देश करते हुए यह स्पष्ट किया कि सत्ता एक ही है, केवल उसकी अभिव्यक्तियाँ भिन्न हैं। अब इस श्लोक में वे उस सैद्धांतिक ज्ञान को व्यावहारिक साधना और चिन्तन की विधि में परिवर्तित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(साधकः) आदित्ये चैव हृदये च (स्थितं ब्रह्म) एकीभूतं विचिन्तयेत् । (यतः) सर्वोपनिषदां चैव (एव) उपास्त्यैषा उदाहृता ।
पदार्थ और निर्वचन:
• आदित्ये चैव हृदये च: आदित्य में और हृदय में भी। यहाँ 'आदित्य' बाह्य जगत के प्रकाशक सूर्य का प्रतीक है और 'हृदय' अन्तर्जगत के प्रकाशक आत्मा का।
• एकीभूतं: एक हुआ, अभिन्न या एकरूप। इसका अर्थ है कि बाह्य सूर्य और हृदय की ज्योति में कोई भेद नहीं है, वे एक ही चैतन्य के दो छोर हैं।
• विचिन्तयेत्: चिन्तन करे। यह केवल बौद्धिक विचार नहीं, अपितु 'ध्यान' की वह अवस्था है जहाँ ध्येय और ध्याता का भेद मिटने लगता है।
• सर्वोपनिषदां: समस्त उपनिषदों का। यहाँ 'सर्व' शब्द यह दर्शाता है कि यद्यपि उपनिषदों में अनेक विधियाँ हैं, किन्तु उनका अंतिम लक्ष्य और सार यही अद्वैत अनुभव है।
• उपास्त्यैषा उदाहृता: यह उपासना कही गई है (उद्धृत की गई है)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य साधक को उस परम रहस्य की ओर ले जा रहे हैं जहाँ बाह्य जगत और आन्तरिक जगत का द्वैत समाप्त हो जाता है। ऋषि का निर्देश है कि साधक आदित्य (सूर्य) और हृदय में स्थित उस एक ही सत्ता का 'एकीभूत' चिन्तन करे।
साधारण दृष्टि में सूर्य आकाश में स्थित एक देदीप्यमान पिंड है और हृदय शरीर के भीतर एक अंग, किन्तु योग की दृष्टि में सूर्य 'बाह्य आत्मा' है और हृदय की ज्योति 'आन्तरिक आत्मा'। जब साधक यह अनुभव करता है कि जो प्रकाश बाहर सूर्य के रूप में जगत को प्रकाशित कर रहा है, वही प्रकाश भीतर हृदय-आकाश में चैतन्य रूप में स्थित है, तब वह 'एकीभूत' चिन्तन की स्थिति में पहुँचता है। यह चिन्तन ही वास्तव में वह सेतु है जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।
महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह घोषणा कर रहे हैं कि यह विधि किसी एक विशेष शाखा या मत की नहीं, अपितु "सर्वोपनिषदां" अर्थात् समस्त उपनिषदों का निचोड़ है। उपनिषदों की विविध उपासनाएँ—चाहे वे ओम्कार की हों, प्राण की हों या ज्योति की—उन सबका अंतिम गंतव्य इसी अद्वैत अनुभूति में मिलता है कि 'जो बाहर है, वही भीतर है'। यह उपासना साधक को इस बोध तक ले जाती है कि वह स्वयं उस अनंत प्रकाश का अंश है।
श्रुति-संगति —
इस उपासना का मूल आधार स्वयं याज्ञवल्क्य की श्रुति में मिलता है:
रूपाण्येव यस्यायतनम् चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्वस्यात्मनः परायणं स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तम् पुरुषं सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति चक्षुरिति होवाच ॥ १४.६.९.१२ ॥
(शाकल्यने पूछा —) "रूप ही जिसका आयतन है, चक्षु लोक है, मन ज्योति है — जो उस पुरुषको सब आत्माओंका परम आश्रय जाने, वही (सच्चा) जाननेवाला है, याज्ञवल्क्य!" (याज्ञवल्क्य —) "मैं उस पुरुषको जानता हूँ जिसे तुम सब आत्माओंका परम आश्रय कहते हो — जो यह आदित्यमें पुरुष है, वही यह है। शाकल्य, बोलो — उसकी देवता कौन है?" (शाकल्य —) "चक्षु।"
यहाँ श्रुति स्पष्ट करती है कि जो पुरुष आदित्य में स्थित है, वही समस्त आत्माओं का 'परायण' (परम आश्रय) है। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि आदित्य और हृदय में एकीभूत चिन्तन करें, तो वे इसी श्रुति के रहस्य को खोल रहे हैं। श्रुति का 'आदित्य-पुरुष' ही हृदय का 'अन्तर्यामी' है। अतः बाह्य सूर्य का ध्यान वास्तव में हृदय के भीतर स्थित उसी पुरुष को जाग्रत करने का साधन है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का मुख्य अभ्यास 'ज्योति-एकत्व' का ध्यान है। इसका अभ्यास इस प्रकार है:
साधक पहले बाह्य सूर्य के प्रकाश का ध्यान करे और फिर धीरे-धीरे अपनी चेतना को हृदय के भीतर ले जाए। वह अनुभव करे कि सूर्य की किरणें केवल बाहर नहीं, बल्कि उसके हृदय-आकाश में भी प्रज्ज्वलित हैं। जब बाह्य सूर्य का तेज और हृदय की ज्योति एक ही प्रकाश-पुंज के रूप में अनुभव होने लगें, तब वह 'एकीभूत' अवस्था है।
यह अभ्यास साधक को 'साक्षी भाव' से 'एकत्व भाव' की ओर ले जाता है। इस चिन्तन से साधक की दृष्टि बदल जाती है; वह अब जगत को अपने से अलग नहीं, बल्कि स्वयं के ही प्रकाश का विस्तार देखने लगता है। यह साधना उसे उस भूमि पर प्रतिष्ठित करती है जहाँ वह स्वयं को 'विज्ञानघन' के रूप में अनुभव करने लगता है, क्योंकि उसने बाह्य और आन्तरिक प्रकाश के भेद को मिटा दिया है।
आदित्यो ब्रह्म इत्येतन्मित्राद्युपनिषत्सु च ।
छान्दोग्ये बृहदारण्ये तैत्तिरीये तथैव च ॥ ९.१५८ ॥
— "आदित्यो ब्रह्म" — यह (उपासना) मैत्री आदि उपनिषदोंमें, छान्दोग्यमें, बृहदारण्यकमें और तैत्तिरीयमें भी है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने साधक को आदित्य (बाह्य सूर्य) और हृदय (आन्तरिक सूर्य) में स्थित एक ही सत्ता के एकीभूत चिन्तन का निर्देश दिया था। अब इस श्लोक में वे इस उपासना की प्रमाणिकता सिद्ध कर रहे हैं कि यह केवल उनका निजी मत नहीं, अपितु संपूर्ण उपनिषदिक परम्परा का सार है।
अन्वय और पदार्थ —
(इति) "आदित्यो ब्रह्म" (इत्युक्तेन) इत्येतन्मित्राद्युपनिषत्सु च (अस्ति), छान्दोग्ये, बृहदारण्ये, तैत्तिरीये तथैव च (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• आदित्यो ब्रह्म: आदित्य ही ब्रह्म है। यहाँ 'आदित्य' केवल भौतिक सूर्य नहीं, अपितु उस प्रकाशक तत्त्व का नाम है जो जगत को प्रकाशित करता है और 'ब्रह्म' वह अनंत चैतन्य है जो सर्वव्यापी है।
• मित्राद्युपनिषत्सु: मैत्री आदि उपनिषदों में।
• तथैव च: उसी प्रकार (उपलब्ध) है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस महावाक्य का उल्लेख कर रहे हैं जो साधक के बाह्य और आन्तरिक जगत के भेद को मिटा देता है— "आदित्यो ब्रह्म"। ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सूर्य को ब्रह्मरूप में देखना या सूर्य में ब्रह्म की उपस्थिति का अनुभव करना किसी एक शाखा का विचार नहीं, अपितु यह मैत्री, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और तैत्तिरीय जैसे प्रमाणिक उपनिषदों का साझा उद्घोष है।
यहाँ 'आदित्य' शब्द का प्रयोग एक सेतु के रूप में किया गया है। स्थूल दृष्टि से सूर्य वह देदीप्यमान पिंड है जो अंधकार का नाश करता है, किन्तु योगिक दृष्टि से वह उस 'परम पुरुष' का बाह्य स्वरूप है जो हृदय-आकाश में ज्योति-रूप में स्थित है। जब साधक यह अनुभव करता है कि जिस प्रकाश से यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड आलोकित है, वही प्रकाश उसके अपने हृदय के भीतर 'आत्मा' के रूप में प्रदीप्त है, तब वह 'आदित्यो ब्रह्म' की वास्तविक उपासना में प्रवेश करता है।
यह उपासना केवल एक दार्शनिक स्थापना नहीं, बल्कि एक साधना-विधि है। उपनिषदों में इस सत्य को बार-बार दोहराने का उद्देश्य साधक को 'अनेक' से 'एक' की ओर ले जाना है। जब साधक यह देखता है कि आदित्य (ब्रह्मांडीय चेतना) और ब्रह्म (परम सत्ता) एक ही हैं, तब उसकी दृष्टि समस्त सृष्टि में उसी एक प्रकाश को देखने लगती है।
श्रुति-संगति —
बृहदारण्यक (शतपथ) में इस उपासना की प्रगाढ़ता इस प्रकार दिखती है:
स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्त्संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति स यएतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम् मूर्धा राजा भवति ॥ १४.५.१.२ ॥
गार्ग्यने कहा — "जो यह आदित्यमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।" अजातशत्रुने कहा — "इसके विषयमें मुझसे मत कहो; इसकी मैं 'सबको लाँघकर स्थित, सब भूतोंका मूर्धा (शिरोमणि), राजा' के रूपमें उपासना करता हूँ।" जो इसकी ऐसी उपासना करता है, वह सबसे ऊपर स्थित, सब भूतोंका मूर्धा और राजा होता है।
यहाँ गार्ग्य स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे आदित्य में स्थित पुरुष की ही ब्रह्मरूप से उपासना करते हैं। अजातशत्रु का मत इस उपासना का विरोध नहीं, अपितु इसका विस्तार है; वे उसी आदित्य-ब्रह्म को 'सब भूतों का मूर्धा' (शिरोमणि) मानकर उसकी उपासना करते हैं। इस प्रकार श्रुति यह सिद्ध करती है कि आदित्य-उपासना का चरम लक्ष्य ब्रह्म-साक्षात्कार ही है।
शास्त्र-साक्ष्य —
छान्दोग्य उपनिषद् में इस महावाक्य का सीधा आदेश मिलता है:
आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् तत्सदासीत्तत्समभवत्तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ ३.१९.१ ॥
"आदित्य ब्रह्म है" — यह उपदेश है; उसकी व्याख्या (यह है): आरम्भमें यह असत् (अव्यक्त) ही था; वह सत् हुआ, (बढ़कर) सम्भूत हुआ; वह अण्ड बन गया; वह एक संवत्सरभर पड़ा रहा; फिर फूटा — उसके दोनों कपाल चाँदी और सोना हुए।
यहाँ "आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः" कहकर इसे एक अनिवार्य उपदेश के रूप में प्रस्तुत किया गया है। छान्दोग्य की यह व्याख्या कि वह ब्रह्म ही पहले असत् था, फिर सत् हुआ और फिर ब्रह्मांडीय अण्ड के रूप में प्रकट हुआ, यह दर्शाती है कि सूर्य इस सृष्टि की उस प्रथम अभिव्यक्ति का प्रतीक है जहाँ ब्रह्म स्वयं को दृश्यमान करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी उपनिषदिक सत्य को साधक के लिए एक सरल ध्यान-सूत्र में परिवर्तित कर देती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ अर्थ 'प्रकाश का एकीकरण' है। योग की दृष्टि से, बाह्य सूर्य 'ऊर्जा' का स्रोत है और हृदय का सूर्य 'चेतना' का। जब साधक 'आदित्यो ब्रह्म' का अभ्यास करता है, तो वह अपनी चेतना को बाह्य सूर्य की किरणों से जोड़कर उसे हृदय की ज्योति में विलीन करना सीखता है।
अभ्यास यह है कि साधक सूर्य के दर्शन करते समय यह भाव रखे कि यह प्रकाश बाहर नहीं, बल्कि मेरे भीतर के ब्रह्म का ही विस्तार है। इस अभ्यास से साधक की दृष्टि 'द्वैत' (मैं और सूर्य अलग हैं) से हटकर 'अद्वैत' (सूर्य का प्रकाश और मेरा चैतन्य एक ही ब्रह्म है) की भूमि पर पहुँचती है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक बाह्य जगत की चकाचौंध में विचलित नहीं होता, क्योंकि उसने उस सूर्य को अपने हृदय में प्रतिष्ठित कर लिया है। इस प्रकार, वह स्थूल सूर्य की उपासना से सूक्ष्म ब्रह्म के अनुभव तक की यात्रा पूरी करता है।
तत्र मनोरनुमतिः · आदित्यमहिमा
एतदेव मनुप्रोक्तं देवानां चोपजीवनम् ।
पार्श्वे बाह्ये तथा पृष्ठे द्यौरस्य परिकल्पिता ॥ ९.१५९ ॥
यही मनुने कहा है, और (यही) देवताओंकी जीविका है। (उस सूर्यरूप मधुकोशकी) बगलमें, बाहर और पीठपर द्युलोक कल्पित है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'आदित्यो ब्रह्म' के महावाक्य द्वारा बाह्य सूर्य और हृदय-सूर्य की एकरूपता सिद्ध की थी। अब वे इस उपासना की प्राचीनता और उसकी व्यापकता को प्रतिपादित करते हुए इसे 'मधुविद्या' के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
एतदेव (इदं एव) मनुप्रोक्तं (मनुना उक्तम्), (एतदेव) देवानां चोपजीवनम् (अस्ति)। (तस्य मधुकोशस्य) पार्श्वे, बाह्ये तथा पृष्ठे द्यौरस्य (द्युलोकः) परिकल्पिता (अस्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• मनुप्रोक्तं: मनु द्वारा कहा गया। यहाँ मनु वह आदि-पुरुष हैं जिन्होंने प्रजापति से यह विद्या प्राप्त कर संसार को दी।
• उपजीवनम्: जीविका या पोषण। जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु से पोषित होती हैं, उसी प्रकार समस्त देवगण इस आदित्य-तेज (मधु) से अपनी शक्ति और सत्ता प्राप्त करते हैं।
• पार्श्वे, बाह्ये, पृष्ठे: बगल में, बाहर और पीठ पर। यह सूर्यमण्डल की संरचना का एक रूपक है, जहाँ सूर्य को एक 'मधुकोश' (छत्ते) के समान माना गया है।
• द्यौरस्य परिकल्पिता: द्युलोक इसकी परिधि में कल्पित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस रहस्यमयी 'मधुविद्या' का सूत्रपात कर रहे हैं, जो साधक को स्थूल जगत से उठाकर सूक्ष्म चैतन्य की ओर ले जाती है। ऋषि कहते हैं कि यह उपासना केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, अपितु 'मनुप्रोक्त' है—अर्थात् यह उस आदि-परम्परा से आई है जो ब्रह्मा से प्रजापति और प्रजापति से मनु तक पहुँची। यह इस बात का संकेत है कि सत्य की खोज के लिए गुरु-परम्परा और श्रुति का आश्रय अनिवार्य है।
यहाँ आदित्य को 'देवानां उपजीवनम्' कहा गया है। इसका भाव यह है कि ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियाँ, चाहे वे भौतिक देव हों या सूक्ष्म इंद्रियाँ, उस एक ही चैतन्य-प्रकाश (आदित्य) से अपनी ऊर्जा ग्रहण करती हैं। जिस प्रकार एक मधुकोश में सारा रस संचित रहता है और उसी से जीवन चलता है, उसी प्रकार यह संपूर्ण सृष्टि उस ब्रह्म-सूर्य का 'मधु' है।
श्लोक के दूसरे भाग में याज्ञवल्क्य सूर्यमण्डल की एक विशेष संरचना का वर्णन करते हैं। वे सूर्य को एक दिव्य मधुकोश के रूप में देखते हैं। इस रूपक में सूर्य का केंद्र वह बिंदु है जहाँ परम तत्व स्थित है, और उसके पार्श्व (बगल), बाह्य (बाहर) तथा पृष्ठ (पीछे) के भागों में द्युलोक और अन्य दिव्य मंडल कल्पित हैं। यह वर्णन साधक को यह समझाता है कि जिसे हम आकाश में एक गोलाकार सूर्य देखते हैं, वह वास्तव में एक अनंत ऊर्जा-केंद्र है, जिसकी परिधि में समस्त स्वर्ग और देव-लोक समाहित हैं। यह भौतिक सूर्य का भौगोलिक वर्णन नहीं, अपितु उसकी आध्यात्मिक व्याप्ति का चित्रण है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ३.११.४ ॥
यह (मधुविद्या) ब्रह्माने प्रजापतिसे कही, प्रजापतिने मनुसे, मनुने प्रजाओंसे; और यही ब्रह्म (-विद्या) पिता (अरुण) ने अपने ज्येष्ठ पुत्र उद्दालक आरुणिसे कही।
छान्दोग्य उपनिषद् के इस अंश में स्पष्ट है कि यह मधुविद्या ब्रह्मा ने प्रजापति से, प्रजापति ने मनु से और मनु ने प्रजाओं से कही। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी परम्परा का अनुसरण कर रही है। जहाँ उपनिषद् इस विद्या के संचरण की बात करता है, वहीं यह स्मृति उस विद्या को 'उपजीवनम्' कहकर उसके फल और उसकी संरचना (पार्श्व, बाह्य, पृष्ठ) को स्पष्ट कर रही है। दोनों ही ग्रन्थ आदित्य को केवल एक ग्रह नहीं, अपितु समस्त जीवन का रस (मधु) और आधार मानते हैं।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'परम्परा-श्रद्धा' और 'विस्तार' का अभ्यास कराता है। जब साधक यह जानता है कि यह विद्या मनु जैसे आदि-ऋषियों द्वारा प्रमाणित है, तो उसके भीतर संशय समाप्त होता है और वह पूर्ण समर्पण के साथ साधना में उतरता है।
अभ्यास की दृष्टि से, यहाँ 'मधुकोश' का ध्यान करना है। साधक अपने हृदय-आकाश में स्थित सूर्य को एक दिव्य मधुकोश के रूप में देखे, जिसका रस (तेज) चारों ओर फैल रहा है। 'पार्श्व, बाह्य और पृष्ठ' का ध्यान करते समय साधक अपनी चेतना को केंद्र से परिधि की ओर ले जाता है। यह अभ्यास साधक को 'अहं' की सीमित सीमा से निकालकर 'विभु' (सर्वव्यापी) होने के अनुभव की ओर ले जाता है। वह अनुभव करता है कि जिस प्रकार द्युलोक सूर्य की परिधि में है, उसी प्रकार उसके समस्त विचार, भावनाएँ और अनुभव उसके भीतर स्थित उस 'आदित्य-पुरुष' की परिधि में हैं। इस प्रकार साधक अपनी चेतना का विस्तार करता है और स्वयं को उस दिव्य मधु-रस (आनंद) में लीन करने का प्रयास करता है।
अन्तरिक्षमधश्चैव पुत्राश्चास्य मरीचयः ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः ॥ ९.१६० ॥
नीचे अन्तरिक्ष है, और किरणें इसके पुत्र (मधुमक्खियोंके अंडे) हैं; ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद,
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य को 'मधुकोश' (छत्ते) के समान बताते हुए द्युलोक को उसकी परिधि में कल्पित किया था। अब वे इस रूपक को विस्तार देते हुए ब्रह्माण्ड की संरचना और वेदों के प्राकट्य को आदित्य-तेज के साथ जोड़ रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(तस्य मधुकोशस्य) अधः अन्तरिक्षम्, अधश्चैव (तस्य) पुत्राः मरीचयः (सन्ति)। ऋग्वेदः, अथ यजुर्वेदः, सामवेदः ह्यथर्वणः (च सन्ति)।
पदार्थ और निर्वचन:
• अधः अन्तरिक्षम्: नीचे अन्तरिक्ष है। यहाँ 'अधः' का अर्थ है कि द्युलोक के नीचे का विस्तार, जो मधुकोश के मुख्य भाग या छत्ते के समान है।
• पुत्राः मरीचयः: किरणें इसके पुत्र हैं। 'मरीचय' का अर्थ है सूर्य की किरणें। मधुविद्या के रूपक में, जिस प्रकार छत्ते के भीतर मधुमक्खियों के अंडे या बच्चे पलते हैं, उसी प्रकार सूर्य-मण्डल के भीतर किरणें उसके तेज के अंश के रूप में विद्यमान हैं।
• ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। यहाँ वेदों का उल्लेख उन शक्तियों के रूप में है जो इस दिव्य मधु-रस का विस्तार और अभिव्यक्ति हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य 'मधुविद्या' के माध्यम से सृष्टि के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूप का समन्वय कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने द्युलोक को सूर्य-मधुकोश के बाहरी आवरण के रूप में दिखाया था, अब वे कहते हैं कि उस द्युलोक के नीचे जो अन्तरिक्ष है, वह वास्तव में उस दिव्य मधु का 'कोश' या 'छत्ता' है।
यहाँ 'मरीचय' (किरणों) को 'पुत्र' कहना अत्यंत गूढ़ है। पुत्र वह होता है जो पिता के स्वरूप और गुणों को वहन करता है। सूर्य का स्वरूप 'प्रकाश' है, और किरणें उसी प्रकाश का विस्तार हैं। जिस प्रकार मधुमक्खियों के बच्चे छत्ते के भीतर सुरक्षित रहकर धीरे-धीरे विकसित होते हैं, उसी प्रकार संपूर्ण चराचर जगत की जीवनी-शक्ति इन किरणों के रूप में सूर्य-मण्डल से प्रवाहित होकर अन्तरिक्ष में व्याप्त है।
इसके पश्चात ऋषि चारों वेदों का नाम लेते हैं। यहाँ वेदों को केवल ग्रन्थों के रूप में नहीं, अपितु सूर्य-तेज की विभिन्न तरंगों और अभिव्यक्तियों के रूप में देखा जाना चाहिए। ऋग्वेद ज्ञान का प्रकाश है, यजुर्वेद कर्म की शक्ति है, सामवेद उपासना का माधुर्य है और अथर्ववेद लौकिक एवं आध्यात्मिक संतुलन का विज्ञान है। ये चारों वेद उस एक ही 'आदित्य-मधु' के विभिन्न रस हैं। यह इस बात का संकेत है कि समस्त वैदिक ज्ञान का मूल स्रोत वह एक ही चैतन्य-सूर्य है, जो हृदय में भी स्थित है और आकाश में भी।
शास्त्र-साक्ष्य —
असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ ३.१.१–२ ॥
वह आदित्य ही देवोंका मधु है; द्युलोक उसका तिरछा बाँस (छत्तेका आधार) है, अन्तरिक्ष छत्ता है, किरणें (उसमें पलते) बच्चे हैं। उसकी जो पूर्वकी किरणें हैं, वे ही उसकी पूर्वी मधु-नाडियाँ (कोठरियाँ) हैं; ऋचाएँ ही मधु बनानेवाली (मक्खियाँ) हैं, ऋग्वेद ही फूल है, (और यज्ञमें डाले) वे जल अमृत हैं।
छान्दोग्य उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि "वह आदित्य ही देवों का मधु है; द्युलोक उसका तिरछा बाँस (आधार) है, अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें उसके बच्चे हैं।" बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी उपनिषद् के रहस्य को विस्तार दे रही है। जहाँ उपनिषद् इसे एक विद्या के रूप में प्रस्तुत करता है, वहीं यह स्मृति इसे योगिक दृष्टि से 'आदित्य-महिमा' के रूप में स्थापित करती है, ताकि साधक बाह्य सूर्य को देखते हुए अपने भीतर के ज्ञान-सूर्य (वेदों के रस) का अनुभव कर सके।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'तेज' और 'रस' के संबंध को समझने का अभ्यास है। योगिक दृष्टि से, सूर्य का 'मधु' वह दिव्य आनंद है जो समाधि की अवस्था में अनुभव होता है। जब साधक प्रातःकाल सूर्य के दर्शन करता है, तो उसे केवल एक भौतिक पिंड नहीं, अपितु एक 'मधुकोश' के रूप में देखना चाहिए, जिससे ज्ञान की किरणें (पुत्र) फूट रही हैं।
अभ्यास यह है कि जिस प्रकार सूर्य की किरणें अन्तरिक्ष को प्रकाशित करती हैं, उसी प्रकार साधक अपने भीतर के 'हृदय-सूर्य' से वेदों के सार (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व) को जाग्रत करे। यहाँ वेदों का स्मरण करना केवल शब्दों का पाठ नहीं, अपितु उस 'दिव्य रस' का अनुभव करना है जो चित्त को शुद्ध करता है। साधक इस भाव का अभ्यास करता है कि मेरा स्वाध्याय और मेरी प्रार्थना उसी आदित्य-तेज की किरणें हैं, जो मुझे स्थूल अन्तरिक्ष से उठाकर सूक्ष्म द्युलोक की ओर ले जा रही हैं। यह अभ्यास साधक को 'अविद्या' के अंधकार से निकालकर 'विज्ञान' के प्रकाश की ओर ले जाता है।
कल्पभाष्यपुराणानि उपवेदास्तथैव च ।
गुह्योपनिषदश्चैव पुपुष्पाणि (पुष्फुसाः) परिकीर्तिताः ॥ ९.१६१ ॥
कल्प, भाष्य, पुराण और उपवेद, तथा गुह्य उपनिषदें — (इसके) फूल कहे गये हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सूर्य को एक विराट मधुकोश के रूप में कल्पित करते हुए चारों वेदों को उस संरचना के मूल आधार के रूप में स्थापित किया। वर्तमान श्लोक उसी मधुकोश के विस्तार को पूर्ण करता है, जहाँ वेदों से निःसृत अन्य ज्ञान-शाखाओं को उस दिव्य पुष्प-माला के रूप में देखा गया है।
अन्वय और पदार्थ —
कल्प-भाष्य-पुराणानि, उपवेदाः तथैव च, गुह्योपनिषदः च एव (एते) पुपुष्पाणि (पुष्फुसाः) परिकीर्तिताः।
पदार्थ:
• कल्प — यज्ञ और अनुष्ठान की विधि-विधान संबंधी शास्त्र।
• भाष्य — यहाँ 'भाष्य' का अर्थ बाद के टीकाकारों के ग्रन्थ नहीं, अपितु वेदों के अर्थ को स्पष्ट करने वाले मूल व्याख्यात्मक अंश हैं।
• पुराणानि — प्राचीन इतिहास और धर्म-कथाओं के माध्यम से सत्य का बोध कराने वाले ग्रन्थ।
• उपवेदाः — वेदों के सहायक शास्त्र (जैसे आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और शिल्पवेद)।
• गुह्योपनिषदः — वे गुप्त उपनिषद जिनमें केवल दीक्षित साधकों को ही ब्रह्म-विद्या का रहस्य बताया जाता है।
• पुपुष्पाणि (पुष्फुसाः) — पुष्प रूप। यहाँ 'पुष्फुसाः' पाठ संदिग्ध है, किन्तु भाव 'पुष्प' (फूल) का ही है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में आदित्य की 'मधुविद्या' का अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर निरूपण है। ऋषि याज्ञवल्क्य ने पिछले श्लोक (9.160) में चारों वेदों को मधुकोश के मुख्य अंगों के रूप में दिखाया था। अब वे स्पष्ट करते हैं कि यदि वेद उस दिव्य वृक्ष या मधुकोश की जड़ और तना हैं, तो कल्प, भाष्य, पुराण, उपवेद और गुह्य उपनिषदें उसके 'पुष्प' हैं।
भाव यह है कि जिस प्रकार पुष्प वृक्ष के सबसे विकसित और सुगंधित अंग होते हैं, जो अंततः फल की ओर ले जाते हैं, उसी प्रकार ये शास्त्र वेदों के उस सार-तत्व को सरल और सुगम रूप में प्रस्तुत करते हैं। कल्प विधि सिखाता है, पुराण कथाओं से बोध कराते हैं, उपवेद लौकिक जीवन के प्रबंधन का ज्ञान देते हैं और गुह्य उपनिषद सीधे उस परम सत्य की ओर संकेत करते हैं।
यह वर्णन केवल बाहरी ग्रन्थों की सूची नहीं है, अपितु यह उस 'दिव्य रस' (मधु) के प्रकटीकरण की प्रक्रिया है। जिस प्रकार मधुमक्खियाँ फूलों से रस एकत्र कर मधु बनाती हैं, उसी प्रकार साधक इन विभिन्न शास्त्रों के माध्यम से वेदमय ज्ञान का रस संचित करता है। यहाँ 'गुह्य उपनिषदों' को पुष्प कहना यह दर्शाता है कि ज्ञान की पराकाष्ठा गुप्त और सूक्ष्म होती है, जो केवल उन्हीं के लिए खिलती है जो पात्रता रखते हैं।
योग-रहस्य —
योगिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को 'समग्रता' का अनुभव कराता है। साधक यहाँ यह सीखता है कि सत्य एक है, किन्तु उसकी अभिव्यक्ति के स्तर भिन्न-भिन्न हैं। कल्प और उपवेद 'स्थूल' स्तर के ज्ञान हैं, पुराण 'मध्यम' और उपनिषद 'सूक्ष्म' ज्ञान हैं।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक को किसी भी शास्त्र का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। वह यह अनुभव करे कि जिस प्रकार एक ही वृक्ष के फूल अलग-अलग रंगों और सुगंधों के होते हुए भी एक ही जड़ से पोषण पाते हैं, उसी प्रकार समस्त शास्त्र एक ही 'आदित्य-तत्व' (परम ज्ञान) से उत्पन्न हुए हैं।
साधक जब अपने हृदय-कमल में स्थित सूर्य का ध्यान करता है, तब उसे यह बोध होता है कि उसके भीतर का ज्ञान-पुंज ही वह मधुकोश है। इस अभ्यास में वह बाहरी ग्रन्थों के ज्ञान को अपने भीतर के अनुभव में परिवर्तित करता है। वह 'पुष्प' रूपी शास्त्रों के माध्यम से उस 'मधु' (अमृतत्व) तक पहुँचता है, जो अंततः उसे अक्षर-ब्रह्म में लीन कर देता है। इस प्रकार वह स्थूल विधि (कल्प) से सूक्ष्म रहस्य (उपनिषद) की ओर बढ़ते हुए पूर्णता को प्राप्त करता है।
ऋचो यजूंषि सामानि मधून्येतानि कुर्वते ।
तद्वेदैः संभृतं दिव्यं रसं तदमृतं मधु ॥ ९.१६२ ॥
ऋचाएँ, यजुः और साम — ये (मधुमक्खियोंकी भाँति) मधु बनाते हैं; वेदोंसे संचित वह दिव्य रस — वह अमृत है, मधु है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में वेदों की सहायक शाखाओं—कल्प, पुराण और उपनिषदों—को उस दिव्य मधुकोश के पुष्पों के रूप में दिखाया गया। वर्तमान श्लोक उस पुष्प-पराग से रस संचय करने की प्रक्रिया और उस रस के वास्तविक स्वरूप का उद्घाटन करता है।
अन्वय और पदार्थ —
ऋचः, यजूंषि, सामानि (इमानि) एतानि मधून्येतानि कुर्वते। तद्-वेदैः संभृतं दिव्यं रसम्, तद्-अमृतं मधु।
पदार्थ:
• ऋचः, यजूंषि, सामानि — ऋग्वेद की ऋचाएँ, यजुर्वेद के यजुः-मन्त्र और सामवेद के साम-गान।
• मधु कुर्वते — मधु का निर्माण करते हैं। यहाँ 'मधु' का अर्थ केवल मिठास नहीं, अपितु वह सूक्ष्म ऊर्जा या 'रस' है जो मन्त्रों के प्रभाव से उत्पन्न होता है।
• संभृतं — संचित किया हुआ, एकत्रित किया हुआ।
• दिव्यं रसम् — वह अलौकिक आनंद या चैतन्य जो इंद्रिय-विषयों से परे है।
• अमृतं — जो अविनाशी है, जिससे मृत्यु का अभाव हो जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य वेदों के बाह्य पाठ और उनके आन्तरिक फल के बीच के सेतु को स्पष्ट कर रहे हैं। पिछले श्लोकों में उन्होंने आदित्य को मधुकोश और शास्त्रों को उसके पुष्प बताया था। अब वे बताते हैं कि इन पुष्पों (शास्त्रों) से रस कौन निकालता है और वह रस क्या है।
यहाँ ऋचाएँ, यजुः और साम—ये तीनों केवल शब्द-समूह नहीं हैं, अपितु वे उन 'दिव्य मधुमक्खियों' के समान हैं जो ज्ञान-पुष्पों का रस चूसकर उसे 'मधु' में परिवर्तित करती हैं। भाव यह है कि जब साधक ऋग्वेद के मन्त्रों से ज्ञान का, यजुर्वेद के मन्त्रों से कर्म का और सामवेद के मन्त्रों से उपासना का रस निकालता है, तब उसके भीतर एक दिव्य रस का संचय होने लगता है।
यह 'मधु' कोई भौतिक पदार्थ नहीं, अपितु वेदों के माध्यम से संचित वह 'दिव्य रस' है जिसे 'अमृत' कहा गया है। यह वह अवस्था है जहाँ मन्त्र केवल वाणी का उच्चारण नहीं रह जाते, बल्कि एक अनुभव बन जाते हैं। जब वेद-मन्त्रों का सही विनियोग होता है, तब साधक के हृदय में जो आनंद और शांति उत्पन्न होती है, वही 'वेदसंभृत मधु' है। यह रस दिव्य है क्योंकि इसका स्रोत आदित्य (परमात्मा) है और यह अमृत है क्योंकि यह साधक को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर उसे अविनाशी तत्व में विलीन कर देता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'मन्त्र-जप' और 'स्वाध्याय' के आन्तरिक विज्ञान को समझाता है। योगिक अभ्यास में जब साधक मन्त्र का जप करता है, तो वह केवल शब्दों को नहीं दोहराता, बल्कि उन शब्दों के पीछे छिपे 'बीज' से रस खींचता है।
अभ्यास यह है कि हर पाठ, हर मन्त्र का उच्चारण एक 'मधु-संचय' की प्रक्रिया होनी चाहिए। जिस प्रकार मधुमक्खी पुष्प को नष्ट नहीं करती अपितु केवल रस लेती है, उसी प्रकार साधक को शास्त्रों के केवल शब्दों (अक्षर) में नहीं उलझना चाहिए, बल्कि उनके सार-रस को ग्रहण करना चाहिए।
जब ऋचाओं का ज्ञान, यजुषों का अनुशासन और सामों का माधुर्य साधक के भीतर एक साथ मिलते हैं, तब हृदय में एक 'दिव्य रस' का प्रवाह होने लगता है। यह रस साधक को 'सात्विक' भूमि से उठाकर 'दिव्य' भूमि की ओर ले जाता है। इस अभ्यास से साधक अनुभव करता है कि मन्त्रों की शक्ति उसके भीतर एक ऐसी मिठास (मधु) घोल रही है, जो संसार के समस्त कड़वे अनुभवों को समाप्त कर देती है। यह 'अमृत' का अनुभव ही वह स्थिति है जहाँ साधक का चित्त पूरी तरह स्थिर और आनंदमय हो जाता है।
वसवश्च तथा रुद्रा मरुतोऽङ्गिरसादयः ।
पूर्वादिदिग्विभागेन स्वकीयैः सवनैः स्थिताः ॥ ९.१६३ ॥
वसु, रुद्र, मरुत् और अङ्गिरस् आदि पूर्व आदि दिशाओंके विभागसे अपने-अपने सवनोंमें स्थित हैं —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में वेदों के मन्त्रों द्वारा संचित उस दिव्य रस को 'अमृत-मधु' बताया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस मधुकोश (सूर्य) की परिधि में स्थित उन दिव्य शक्तियों का वर्णन कर रहे हैं, जो इस ब्रह्माण्डीय व्यवस्था को संचालित करती हैं और उस परम ज्योति से अपनी तृप्ति प्राप्त करती हैं।
अन्वय और पदार्थ —
वसवः च तथा रुद्रा मरुतः अङ्गिरस-आदयः, पूर्वादि-दिग्-विभागेन स्वकीयैः सवनैः स्थिताः (सन्ति)।
पदार्थ:
• वसवः, रुद्रा, मरुतः, अङ्गिरस-आदयः — ये विभिन्न दिव्य शक्तियों के समूह हैं। वसुएँ (समष्टि के पोषक), रुद्र (परिवर्तन और संहार के अधिष्ठाता), मरुत (वायु और वेग के स्वामी) और अङ्गिरस आदि ऋषि-देवता।
• पूर्वादि-दिग्-विभागेन — पूर्व आदि दिशाओं के विभाजन के अनुसार। यहाँ दिशाएँ केवल भौगोलिक नहीं, अपितु चेतना के विभिन्न आयाम हैं।
• स्वकीयैः सवनैः — अपने-अपने सवनों में। 'सवन' का शाब्दिक अर्थ है—दूध दुहना या रस निकालना। यहाँ सवन का अर्थ है वह विशिष्ट समय या विधि जिसके द्वारा देवता सूर्य-मधुकोश से अपनी ऊर्जा ग्रहण करते हैं।
• स्थिताः — स्थित हैं। यह क्रिया अगले श्लोक (९.१६४) की क्रिया 'तृप्तिं समधिगच्छन्ति' से जुड़ी है। पूरा वाक्य यह है कि ये देवता दिशाओं और सवनों में स्थित होकर प्रभु के मुख को देखते हैं और तृप्त होते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य सूर्यमण्डल की उस सूक्ष्म संरचना का उद्घाटन कर रहे हैं जहाँ समस्त दैवीय शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। पिछले श्लोकों में उन्होंने सूर्य को एक 'मधुकोश' के रूप में देखा, जहाँ वेद-पुराण पुष्प हैं और मन्त्र मधु बनाने वाली मधुमक्खियाँ। अब वे बताते हैं कि इस मधुकोश का उपभोग कौन करता है।
वसु, रुद्र, मरुत और अङ्गिरस आदि देवता इस सूर्य-परमेश्वर की परिधि में दिशाओं के अनुसार विभाजित हैं। यहाँ 'दिशा' का अर्थ है—ऊर्जा के अलग-अलग प्रवाह। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर—ये केवल बाहरी दिशाएँ नहीं हैं, अपितु साधक के भीतर की विभिन्न प्रवृत्तियाँ और चेतना के स्तर हैं।
विशेष बात 'सवन' शब्द की है। जिस प्रकार गोशाला में गायों का सवन एक निश्चित समय पर होता है, उसी प्रकार इन देवताओं के लिए भी 'सवन' निर्धारित हैं। सवन का अर्थ है—उस दिव्य मधु (ऊर्जा) को खींचना। यह सवन प्रातः, मध्याह्न और सायं के समय होता है। भाव यह है कि ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियाँ—चाहे वे पोषक हों (वसु), संहारक हों (रुद्र) या वेगवती हों (मरुत)—सबकी ऊर्जा का स्रोत वह एक ही सूर्य-ब्रह्म है। वे अलग-अलग दिशाओं में स्थित दिखते हैं, पर उनका पोषण एक ही केंद्र से हो रहा है।
यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि विविधता (दिशाएँ और विभिन्न देवता) वास्तव में उस एक ही पूर्णता (सूर्य) का विस्तार है। अङ्गिरस आदि ऋषियों का यहाँ उल्लेख यह दर्शाता है कि केवल देवता ही नहीं, अपितु सिद्ध ऋषि भी उस सूर्य-ज्योति के सवन-क्रम में स्थित होकर उस अमृत-रस का पान करते हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'सर्वव्यापकता' के अनुभव का अभ्यास है। जब योगी ध्यान में सूर्य-पुरुष का साक्षात्कार करता है, तो वह अनुभव करता है कि उसके भीतर की समस्त वृत्तियाँ—चाहे वे शांत हों, उग्र हों या गतिशील हों—सब उस एक ही केंद्रीय ज्योति (हृदय-सूर्य) से ऊर्जा ले रही हैं।
यहाँ 'सवन' का योगिक अभ्यास 'काल-चेतना' से जुड़ना है। प्रातः, मध्याह्न और सायं के समय जब साधक संध्या या सूर्योपस्थान करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'सवन' को जाग्रत करता है। वह अनुभव करता है कि जिस प्रकार बाहरी देवता दिशाओं में स्थित होकर सूर्य से तृप्त होते हैं, उसी प्रकार उसके भीतर के प्राण और मन भी उस आंतरिक सूर्य (भर्ग) के दर्शन से तृप्त होते हैं।
साधक इस अभ्यास से इस भूमि पर आता है कि वह स्वयं को केवल एक शरीर न मानकर, एक ऐसा केंद्र माने जिसके चारों ओर समस्त दैवीय शक्तियाँ (वसु, रुद्र, मरुत) दिशाओं के रूप में व्याप्त हैं। जब वह इस 'दिग्-विभाजन' को समझकर पुनः केंद्र (सूर्य-मुख) की ओर मुड़ता है, तब वह अनेकता से एकत्व की ओर बढ़ता है। यह अभ्यास साधक को इस अनुभव तक ले जाता है कि समस्त जगत की ऊर्जा का स्रोत वह एक ही 'अक्षर' है, जो सूर्य के रूप में प्रकाशित है।
मुखमेकं समालोक्य रथनीडे स्थिता विभोः ।
तृप्तिं समधिगच्छन्ति नाश्नन्ति न पिबन्ति च ॥ ९.१६४ ॥
— (वे) प्रभुके रथ-नीड (घोंसले) में स्थित होकर उस एक मुखको देखकर ही तृप्ति पाते हैं; न खाते हैं, न पीते हैं;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में दिशाओं के विभाग और सवनों की स्थिति का वर्णन था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उन दिव्य शक्तियों की जीविका क्या है और वे किस प्रकार उस परम ज्योति से अपनी ऊर्जा प्राप्त करते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(ते) विभोः रथनीडे स्थिताः, (तस्य) एकं मुखं समालोक्य तृप्तिं समधिगच्छन्ति; (ते) न अश्नन्ति न च पिबन्ति।
पदार्थ:
• विभोः — सर्वव्यापी, प्रभु या उस परमेश्वर (सूर्य-पुरुष) के।
• रथनीडे — रथ के नीड (घोंसले या बैठने के स्थान) में। यहाँ 'नीड' उस सुरक्षित और केंद्रित स्थान का प्रतीक है जहाँ सूर्य-पुरुष प्रतिष्ठित हैं।
• समालोक्य — भली-भाँति देखकर या दर्शन करके। 'लोक' धातु का अर्थ है देखना, और 'सम्' उपसर्ग पूर्णता को दर्शाता है।
• एकं मुखं — उस एक मुख को। यह मुख केवल भौतिक आकृति नहीं, अपितु वह एकमात्र द्वार या केंद्र है जिससे समस्त तेज और अमृत प्रवाहित होता है।
• तृप्तिं समधिगच्छन्ति — पूर्ण तृप्ति को प्राप्त होते हैं।
• न अश्नन्ति न पिबन्ति च — न वे खाते हैं और न ही पीते हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य उस रहस्य को खोल रहे हैं जिसे 'मधुविद्या' कहा गया है। पिछले श्लोकों में उन्होंने बताया कि ऋचाएँ और यजुषें मिलकर दिव्य मधु का निर्माण करते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि उस मधु का उपभोग कैसे होता है?
ऋषि कहते हैं कि वसु, रुद्र और मरुत आदि देवता उस प्रभु के 'रथ-नीड' में स्थित हैं। यह रथ-नीड वह सूक्ष्म केंद्र है जहाँ सूर्य-पुरुष अपनी संपूर्ण सत्ता के साथ विराजमान हैं। इन दिव्य शक्तियों की तृप्ति किसी भौतिक अन्न या जल से नहीं होती, बल्कि वे केवल उस एक मुख (परम ज्योति) के दर्शन मात्र से तृप्त हो जाते हैं।
यहाँ 'एक मुख' का अर्थ उस एकत्व से है, जहाँ समस्त विभूतियाँ विलीन हो जाती हैं। जब साधक या देवता उस एक केंद्र को देखते हैं, तो उन्हें उस अमृत-रस का अनुभव होता है जो समस्त जगत का आधार है। यह स्थिति उस अवस्था की है जहाँ उपभोक्ता और उपभोग्य का भेद मिट जाता है; दर्शन ही भोजन बन जाता है और प्रकाश ही प्राण। अतः वे न खाते हैं, न पीते हैं, क्योंकि जो पूर्ण है, उसे किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती।
शास्त्र-साक्ष्य —
तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ ३.६.१ ॥
जो पहला अमृत है, उसपर वसु अग्निको मुख बनाकर जीते हैं। देवता न खाते हैं, न पीते हैं — इसी अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।
छान्दोग्य उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि देवता अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं और वे न खाते हैं, न पीते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक छान्दोग्य की इसी दृष्टि का विस्तार है। जहाँ उपनिषद् इसे 'अमृत-दर्शन' कहता है, वहीं याज्ञवल्क्य इसे 'विभोः मुख-दर्शन' कहकर उस ज्योतिर्मय पुरुष के साथ जोड़ देते हैं। दोनों ही ग्रन्थ इस बात की पुष्टि करते हैं कि सूक्ष्म जगत में पोषण का आधार भौतिक पदार्थ नहीं, बल्कि 'तेज' और 'दर्शन' है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'दर्शन-तृप्ति' के गहरे अभ्यास को इंगित करता है। साधारण मनुष्य अपनी भूख और प्यास को बाहरी वस्तुओं से शांत करता है, जिसे 'स्थूल पोषण' कहते हैं। किन्तु योगी जब ध्यान की उच्च भूमि पर पहुँचता है, तो वह अनुभव करता है कि वास्तविक तृप्ति बाहर नहीं, बल्कि भीतर स्थित उस 'एक मुख' (हृदय-सूर्य) के दर्शन में है।
साधक जब अपनी चेतना को रथ-नीड (केंद्र) में स्थित करता है और उस एक ज्योति-बिन्दु को समालोक्य (पूर्णतः देखता) है, तो उसे एक ऐसे आनंद का अनुभव होता है जो भौतिक भोजन से मिलने वाले सुख से करोड़ों गुना श्रेष्ठ है। इसे ही 'योगिक उपवास' का भीतरी अर्थ कहा जा सकता है—जहाँ शरीर भले ही अन्न का त्याग करे, किन्तु आत्मा उस दिव्य प्रकाश का पान कर पूर्णतः तृप्त रहती है। यह अभ्यास साधक को 'अन्नमय कोष' से ऊपर उठाकर 'विज्ञानमय कोष' की ओर ले जाता है, जहाँ वह केवल प्रकाश के दर्शन से ही अपनी समस्त मानसिक और आध्यात्मिक क्षुधा को शांत कर लेता है।
नीडमध्यगतं सूर्यं न च पश्यन्ति चक्षुषा ॥ ९.१६५ ॥
(पर) नीडके बीच स्थित सूर्यको (वे) आँखसे नहीं देखते —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह बताया गया कि वसु, रुद्र और मरुत आदि दिव्य शक्तियाँ प्रभु के रथ-नीड में स्थित होकर केवल उनके मुख के दर्शन से तृप्त हो जाती हैं। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस 'नीड' के रहस्य और वहाँ स्थित सूर्य की अदृश्यता के कारण को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(ते) चक्षुषा न पश्यन्ति सूर्यं नीडमध्यगतम्।
पदार्थ:
• नीडमध्यगतं — नीड (घोंसले या सूक्ष्म आवरण) के मध्य में स्थित। यहाँ 'नीड' उस सुरक्षात्मक आवरण का प्रतीक है जो परम ज्योति को ढके हुए है।
• सूर्यं — उस सूर्य-पुरुष को, जो हृदय और ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित हैं।
• न च पश्यन्ति — नहीं देखते हैं।
• चक्षुषा — आँखों से। यहाँ 'चक्षुषा' का अर्थ स्थूल भौतिक नेत्रों से है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य एक अत्यंत सूक्ष्म सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं। यह श्लोक पिछले श्लोक (९.१६४) से शुरू हुए वाक्य का विस्तार है, जो अगले श्लोक (९.१६६) में पूर्ण होता है। यहाँ ऋषि यह बता रहे हैं कि यद्यपि दिव्य शक्तियाँ उस प्रभु के सानिध्य में हैं, फिर भी वे सूर्य को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखते।
'नीड' का शाब्दिक अर्थ घोंसला होता है, किंतु योगिक और वैदिक दृष्टि से यह उस 'आवरण' का संकेत है जो परम तत्व और साधक (या अन्य शक्तियों) के बीच होता है। जिस प्रकार एक घोंसले के भीतर पक्षी सुरक्षित रहता है और बाहर से दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार वह सूर्य-पुरुष अपने तेज के आवरण (नीड) के मध्य स्थित है।
ऋषि कहते हैं कि उस नीड के मध्य स्थित सूर्य को 'चक्षुषा' अर्थात् भौतिक नेत्रों से नहीं देखा जा सकता। यहाँ 'न पश्यन्ति' का अर्थ यह नहीं है कि वे अंधे हैं, अपितु यह है कि जिस स्तर पर वह सूर्य स्थित है, वहाँ भौतिक दृष्टि की पहुँच नहीं है। भौतिक नेत्र केवल स्थूल पदार्थों और परावर्तित प्रकाश को देख सकते हैं, किंतु वह सूर्य स्वयं प्रकाश का मूल स्रोत है और वह एक ऐसे सूक्ष्म आवरण (नीड) में स्थित है जो केवल ज्ञान-चक्षु से ही भेदा जा सकता है।
यह स्थिति उस रहस्य की ओर संकेत करती है जहाँ साधक को यह बोध होता है कि जिसे वह बाहर सूर्य के रूप में देखता है, वह केवल एक प्रतिबिंब है; वास्तविक सूर्य तो भीतर के 'नीड' (हृदयाकाश के सूक्ष्म आवरण) में स्थित है, जो साधारण दृष्टि से ओझल है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गहरा अभ्यास यह है कि वह अपनी दृष्टि को 'बाह्य' से 'आंतरिक' की ओर मोड़े। जब तक साधक 'चक्षुषा' (भौतिक नेत्रों) पर निर्भर रहता है, वह केवल बाहरी जगत के प्रपंचों और सूर्य की भौतिक किरणों को ही देख पाता है। वह उस केंद्र को नहीं देख पाता जहाँ वास्तव में चेतना का सूर्य स्थित है।
अभ्यास यह है कि साधक यह अनुभव करे कि हृदय के भीतर एक 'नीड' है—एक ऐसा सूक्ष्म आवरण जो अविद्या या मानसिक विक्षेपों के रूप में है। इस आवरण के कारण ही वह अपने भीतर के सूर्य (आत्म-ज्योति) को नहीं देख पा रहा है। यहाँ साधक 'दृष्टि' और 'दर्शन' के भेद को समझता है। भौतिक दृष्टि (चक्षु) केवल आकार देखती है, जबकि योगिक दृष्टि (ज्ञान-चक्षु) उस निराकार ज्योति को अनुभव करती है।
साधक जब इस श्लोक का मनन करता है, तो वह इस भूमि पर पहुँचता है जहाँ वह समझ जाता है कि परमात्मा या आत्म-तत्व 'अदृश्य' नहीं है, बल्कि वह 'अति-दृश्य' है—इतना प्रकाशमान कि भौतिक नेत्र उसे सहन नहीं कर सकते या उसे देख नहीं पाते। अतः वह अपनी दृष्टि को अंतर्मुखी कर, नेत्रों को बंद कर, हृदय के उस केंद्र (नीड) में स्थित ज्योति के प्रति सजग होने का प्रयास करता है। यह अभ्यास उसे स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाने वाली पहली सीढ़ी है।
अर्चींषि केवलान्येव उच्चरन्ति मुहुर्मुहुः ।
संर(ल)क्षयन्ति कुहरे नीडान्तःस्थं घटोपमम् ॥ ९.१६६ ॥
— केवल किरणें ही बार-बार ऊपर उठती हैं; (वे) गुहामें, नीडके भीतर स्थित घटके समान (उस सूर्यकी) रक्षा करते हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि दिव्य शक्तियाँ भौतिक नेत्रों से नीड के मध्य स्थित सूर्य को नहीं देख पातीं। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उस अदृश्य केंद्र और दृश्य किरणों के परस्पर सम्बन्ध का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
केवल अर्चींषि एव मुहुर्मुहुः उच्चरन्ति; (तानि) कुहरे नीडान्तःस्थं घटोपमम् (सूर्यं) संर(ल)क्षयन्ति।
पदार्थ:
• अर्चींषि — किरणें या ज्वालाएँ। यहाँ यह सूर्य के तेज के उन सूक्ष्म प्रस्फुटनों का संकेत है जो केंद्र से बाहर की ओर प्रवाहित होते हैं।
• केवलान्येव — केवल किरणें ही। यह शब्द इस बात पर बल देता है कि स्रोत (सूर्य) गुप्त रहता है, केवल उसका प्रभाव (किरणें) ही प्रकट होता है।
• मुहुर्मुहुः — बार-बार, निरंतर। यह स्पंदन का सूचक है।
• उच्चरन्ति — ऊपर उठती हैं या प्रस्फुटित होती हैं।
• संर(ल)क्षयन्ति — यहाँ दो पाठ सम्भव हैं। 'संरक्षयन्ति' का अर्थ है रक्षा करना, और 'सलक्षयन्ति' का अर्थ है लक्ष्य करना या देखना। दोनों ही अर्थ यहाँ संगत हैं क्योंकि जो लक्ष्य में स्थित है, वही उसकी रक्षा करता है।
• कुहरे — गुहा में। हृदय के भीतर स्थित उस सूक्ष्म शून्य या आकाश को 'कुह' कहा गया है।
• नीडान्तःस्थं — नीड (आवरण) के भीतर स्थित।
• घटोपमम् — घट के समान। जो आकार में सीमित प्रतीत हो किंतु भीतर अनंत को समेटे हुए हो।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस परम ज्योति के कार्य-विधान को समझा रहे हैं। पिछले श्लोक में कहा गया कि सूर्य 'अदृश्य' है, तो यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि वह अदृश्य है, तो उसकी उपस्थिति का ज्ञान कैसे होता है? ऋषि उत्तर देते हैं कि केवल 'अर्चींषि' अर्थात् उसकी किरणें ही बार-बार ऊपर उठती हैं।
इसका अर्थ यह है कि वह परम पुरुष (सूर्य) स्वयं को प्रकट नहीं करता, अपितु अपनी किरणों के माध्यम से अपनी सत्ता का संकेत देता है। 'मुहुर्मुहुः' शब्द यह दर्शाता है कि यह प्रकाश स्थिर नहीं, अपितु एक लयबद्ध स्पंदन है, जो निरंतर केंद्र से परिधि की ओर और परिधि से केंद्र की ओर गति करता है।
ऋषि आगे कहते हैं कि ये किरणें उस 'घटोपम' सूर्य की रक्षा करती हैं या उसे लक्ष्य करती हैं, जो गुहा (कुह) और नीड के भीतर स्थित है। यहाँ 'घट' का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। सम्भवतः यह संकेत उसी घट का है जिसका वर्णन पूर्व में (श्लोक ९.९५ में) किया गया था—वह घट जो शरीर रूपी पात्र है और जिसके भीतर आत्मा का निवास है। जिस प्रकार घट के भीतर का आकाश बाहर के आकाश से अलग प्रतीत होता है, उसी प्रकार यह सूर्य-पुरुष शरीर रूपी घट और नीड रूपी आवरण के भीतर सुरक्षित है।
यदि हम 'संरक्षयन्ति' (रक्षा करना) अर्थ लें, तो भाव यह है कि सूर्य का तेज ही उसके केंद्र को बाहरी विकारों से सुरक्षित रखता है। यदि हम 'सलक्षयन्ति' (लक्ष्य करना) अर्थ लें, तो भाव यह है कि बाहर की ओर जाने वाली किरणें वास्तव में उस आंतरिक केंद्र की ही परिणति हैं और उनका मूल लक्ष्य वही केंद्र है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'दृश्य से अदृश्य' की ओर जाने की विधि है। सामान्य मनुष्य केवल 'अर्चींषि' (बाहरी प्रकटीकरण, इंद्रिय-विषय या स्थूल प्रकाश) को देखता है और उसे ही सत्य मान लेता है। किंतु योगी इस श्लोक के माध्यम से यह अभ्यास करता है कि जो किरणें 'मुहुर्मुहुः' ऊपर उठ रही हैं, उनका स्रोत कहीं नीचे, किसी 'कुह' (गुहा) में स्थित है।
अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को बाहर फैलने वाली किरणों (वृत्तियों) के साथ पकड़कर उन्हें वापस उनके स्रोत की ओर ले जाए। जब वह यह अनुभव करता है कि समस्त तेज का केंद्र हृदय-गुहा में 'घट' के समान स्थित है, तब वह स्थूल जगत से हटकर सूक्ष्म जगत में प्रवेश करता है। यह अभ्यास साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह यह जान पाता है कि बाहरी जगत की सारी ज्योति वास्तव में उसके भीतर स्थित सूर्य-पुरुष का ही विस्तार है। किरणों से स्रोत की ओर यह यात्रा ही ध्यान की वास्तविक प्रगति है।
हृद्याकाशगतो यो हि पद्मसंपुटमध्यगः ।
अनन्ता रश्मयस्तस्य दीपवद्यो स्थितो हृदि ॥ ९.१६७ ॥
जो हृदयाकाशमें, कमलसम्पुटके बीचमें स्थित है, दीपकी भाँति हृदयमें स्थित — उसकी अनन्त किरणें हैं —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि सूर्य रूपी परम ज्योति अपने आवरणों (नीड) के भीतर घट के समान स्थित है, जिसे केवल उसकी किरणों के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है। अब ऋषि उस बाहरी सूर्य के प्रतिबिंब को साधक के भीतर, उसके हृदय में प्रतिष्ठित कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
यो हि हृद्याकाशगतो (सः), पद्मसंपुटमध्यगः (अस्ति), (तस्य) अनन्ता रश्मयः, (सः) दीपवद्यो हृदि स्थितो (अस्ति)।
पदार्थ:
• हृद्याकाशगतो — हृदय के आकाश में स्थित। यहाँ 'हृद्याकाश' का अर्थ भौतिक हृदय नहीं, अपितु वह सूक्ष्म शून्य है जहाँ चेतना का निवास है।
• पद्मसंपुटमध्यगः — कमल के सम्पुट (पात्र या खोल) के मध्य में स्थित। 'सम्पुट' वह आवरण है जो अत्यंत कोमल और पवित्र होता है, जो भीतर की ज्योति को सुरक्षित रखता है।
• अनन्ता रश्मयः — जिसकी किरणें अनन्त हैं। यह इस बात का संकेत है कि इस आंतरिक सूर्य का प्रभाव सीमित नहीं है, वह समस्त अस्तित्व में व्याप्त है।
• दीपवत् — दीपक की भाँति। जैसे दीपक अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाता है और उसकी लौ स्थिर रहती है, वैसे ही यह ज्योति हृदय में स्थित है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य बाहरी ब्रह्मांडीय सूर्य और आंतरिक ज्योति के अभेद को सिद्ध कर रहे हैं। अब तक का वर्णन बाहरी सूर्य, उसके रथ-नीड और दिव्य शक्तियों की तृप्ति का था, किन्तु यहाँ ऋषि साधक को 'बाहर से भीतर' की ओर मोड़ रहे हैं।
भाव यह है कि जो सूर्य बाहर द्युलोक में स्थित है, वही वास्तव में प्रत्येक जीव के 'हृद्याकाश' में प्रतिष्ठित है। ऋषि इसे 'पद्मसंपुट' के भीतर बताते हैं। यह सम्पुट उस सूक्ष्म आवरण का प्रतीक है जो आत्मा को स्थूल शरीर के प्रभावों से बचाता है। जिस प्रकार एक दीपक अंधेरे कमरे में प्रकाश का एकमात्र स्रोत होता है, उसी प्रकार यह आंतरिक ज्योति हृदय के गहन अंधकार (अविद्या) को मिटाने वाली एकमात्र शक्ति है।
इस ज्योति की 'अनन्त रश्मियाँ' इस बात का प्रमाण हैं कि यह कोई सीमित प्रकाश नहीं, बल्कि वही 'विभु' परमात्मा है जो सर्वव्यापी है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जिसे हम बाहर सूर्य के रूप में पूजते हैं, वह वास्तव में हमारे भीतर ही दीपवत् प्रज्वलित है। साधक जब बाहरी सूर्य के तेज को हृदय के इस सूक्ष्म कमल-सम्पुट में स्थित देखता है, तब उसकी उपासना 'कर्म' से उठकर 'योग' बन जाती है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ ८.१.१ ॥
इस ब्रह्मपुर (शरीर) में जो यह छोटा-सा कमल-रूप घर (हृदय) है, उसमें एक छोटा-सा आकाश है; उसके भीतर जो है, उसीको खोजना चाहिए, उसीको जाननेकी इच्छा करनी चाहिए।
यह छान्दोग्य उपनिषद् का कथन इस स्मृति के श्लोक की पूर्ण पुष्टि करता है। जहाँ उपनिषद् 'ब्रह्मपुर' (शरीर) में 'दहरं पुण्डरीकं' (छोटे कमल रूपी घर) और उसके भीतर 'अन्तराकाश' की खोज करने का निर्देश देता है, वहीं बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति उस आकाश के भीतर स्थित 'दीपवत्' ज्योति और उसकी 'अनन्त किरणों' का साक्षात्कार कराती है। दोनों ही शास्त्र इस बात पर सहमत हैं कि सत्य की खोज बाहर नहीं, अपितु हृदय के उस सूक्ष्म कमल-आकाश के भीतर है।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'दहर-विद्या' का आधार है। साधक यहाँ 'स्थूल' से 'सूक्ष्म' की ओर संक्रमण करता है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को बाहरी जगत और इंद्रियों से हटाकर हृदय के केंद्र में ले जाए।
साधक अनुभव करता है कि हृदय के भीतर एक अत्यंत सूक्ष्म, प्रकाशमान कमल का सम्पुट है, जिसके मध्य में एक दिव्य दीपक प्रज्वलित है। यह दीपक ही 'सावित्री का भर्ग' है। जब साधक इस ज्योति को 'दीपवत्' (स्थिर और प्रकाशमान) रूप में स्थित पाता है, तब वह चंचल मन से मुक्त होकर एकाग्रता की भूमि पर पहुँचता है। यहाँ 'अनन्त रश्मियों' का ध्यान यह बोध कराता है कि मेरा हृदय ही संपूर्ण ब्रह्मांड है। इस अभ्यास से साधक की दृष्टि अंतर्मुखी होती है और वह उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ बाहरी सूर्य और आंतरिक आत्मा एक हो जाते हैं। यह ध्यान की वह अवस्था है जहाँ साधक स्वयं को केवल शरीर नहीं, बल्कि प्रकाशमय चेतना के रूप में अनुभव करने लगता है।
मार्गद्वयनिरूपणम्
सिताऽसिताः कद्रुनीलाः कपिलाः पीतलोहिताः ।
ऊर्ध्वमेकः स्थितस्तेषां यो भित्वा सूर्यमण्डलम् ॥ ९.१६८ ॥
— श्वेत, काली, भूरी-नीली, कपिल, पीली और लाल; उनमें एक ऊपरकी ओर स्थित है, जो सूर्यमण्डलको भेदकर —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-आकाश में स्थित उस दिव्य सूर्य का वर्णन किया जिसकी किरणें अनन्त हैं। अब ऋषि उन किरणों के विविध रंगों और उनकी दिशाओं के माध्यम से आत्मा की गतियों और गंतव्यों का रहस्य खोल रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(ते रश्मयः) सिताः, असिताः, कद्रुनीलाः, कपिलाः, पीत-लोहिताः (सन्ति)। तेषां (मध्यतः) एकः ऊर्ध्वं स्थितः, (सः) यो सूर्यमण्डलम् भित्वा (गच्छति)।
पदार्थ:
• सिताः, असिताः, कद्रुनीलाः, कपिलाः, पीत-लोहिताः — श्वेत, काली, भूरी-नीली, कपिल (भूरा-लाल), पीली और लाल। ये आंतरिक सूर्य की किरणों के विविध वर्ण हैं।
• ऊर्ध्वम् एकः स्थितः — उनमें से एक किरण ऊपर की ओर स्थित है। यहाँ 'एक' संख्या है, जो उस विशिष्ट मार्ग का संकेत है जो ऊर्ध्वगामी है।
• भित्वा सूर्यमण्डलम् — सूर्यमण्डल को भेदकर। 'भित्वा' का अर्थ है पार करना या आरपार निकल जाना।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य हृदय-सूर्य की किरणों के सूक्ष्म विश्लेषण के द्वारा 'मार्ग-द्वय' (दो मार्गों) का संकेत दे रहे हैं। हृदय के उस ज्योति-स्वरूप सूर्य से अनेक किरणें निकलती हैं, जो विभिन्न रंगों (श्वेत, कृष्ण, नील, कपिल, पीत और लोहित) की हैं।
बाहरी दृष्टि से ये रंग केवल प्रकाश का विच्छेदन हैं, किन्तु आंतरिक योगिक दृष्टि से ये चेतना की विभिन्न अवस्थाओं और गतियों के प्रतीक हैं। ऋषि यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि यद्यपि किरणें अनेक हैं और उनके वर्ण भिन्न हैं, किन्तु उनमें से एक विशेष किरण 'ऊर्ध्व' (ऊपर की ओर) स्थित है। यह ऊर्ध्वगामी किरण ही वह मुख्य सेतु है जो साधक को स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से अक्षर की ओर ले जाती है।
यह वाक्य यहाँ समाप्त नहीं होता, अपितु अगले श्लोक (९.१६९) तक विस्तृत है, जहाँ यह बताया गया है कि यह एक किरण सूर्यमण्डल को भेदकर ब्रह्मलोक के पार परम गति तक ले जाती है। भाव यह है कि हृदय की ज्योति में अनेक प्रवृत्तियाँ और मार्ग हो सकते हैं, किन्तु मुक्ति का मार्ग केवल एक ही है—ऊर्ध्वगामी मार्ग। जो साधक अपनी चेतना को इन विविध रंगों (सांसारिक आकर्षणों या मानसिक वृत्तियों) में न उलझाकर उस एक ऊर्ध्व किरण पर केंद्रित करता है, वही सूर्यमण्डल के आवरणों को भेदकर परम पद को प्राप्त करता है।
श्रुति-संगति —
हृदय-सूर्य की इन रंगीन किरणों का रहस्य श्रुति में भी मिलता है:
तस्मिञ्चुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गलं हरितं लोहितं चएष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित्तैजसः पुण्यकृच्च ॥ १४.७.२.१२ ॥
उस (मार्ग) में श्वेत, नील, पिङ्गल, हरा और लाल (रंग) कहते हैं; यह मार्ग ब्रह्म (ब्राह्मण) के द्वारा जाना गया है; उसीसे ब्रह्मवेत्ता, तैजस (तेजस्वी) और पुण्यकर्मा जाता है।
श्रुति स्पष्ट कहती है कि उस मार्ग में श्वेत, नील, पिङ्गल, हरा और लाल रंग हैं। यह वही मार्ग है जिसे 'ब्रह्मणा' (ब्रह्मवेत्ताओं द्वारा) जाना गया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति का विस्तार कर रही है। जहाँ श्रुति इन रंगों को एक 'पन्था' (मार्ग) के रूप में देखती है, वहीं स्मृति यह स्पष्ट करती है कि इन विविध रंगों के बीच वह एक 'ऊर्ध्व' किरण ही है जो वास्तव में ब्रह्मवेत्ता को तैजस और पुण्यकर्मा बनाकर परम गति तक पहुँचाती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'विवेक' और 'एकग्रता' का है। जब साधक हृदय-कमल में स्थित सूर्य का ध्यान करता है, तो उसे चेतना के स्तर पर विभिन्न रंगों या प्रकाश-पुंजों का अनुभव हो सकता है। योग-रहस्य यह है कि इन अनेक रंगों में उलझना नहीं है।
साधक को यह अनुभव करना है कि अनेकता के बीच एक 'एकत्व' है—वह एक ऊर्ध्वगामी किरण। अभ्यास यह है कि अपनी समस्त मानसिक ऊर्जा को उन क्षैतिज या अधोगामी किरणों से हटाकर उस एक ऊर्ध्व किरण में विलीन करना। यह अभ्यास साधक को 'बहु' से 'एक' की ओर ले जाता है। जब साधक इस एक किरण के साथ एकाकार होता है, तब वह सूर्यमण्डल (अहंकार और माया के आवरणों) को भेदने की क्षमता प्राप्त करता है। यह अनुभव साधक को निम्न भूमियों से उठाकर उच्चतर आध्यात्मिक भूमि की ओर अग्रसर करता है।
ब्रह्मलोकमतिक्रम्य ते यान्ति परमां गतिम् ।
यदस्य स्याद्रश्मिशतमूर्ध्वमेव(क?)मवस्थितः ॥ ९.१६९ ॥
— ब्रह्मलोकको पार कर (जाती है); उससे (योगी) परम गतिको जाते हैं। इसकी जो सौ किरणें ऊपरकी ओर ही स्थित हैं —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-सूर्य की किरणों के विविध रंगों का वर्णन करते हुए एक विशेष ऊर्ध्वगामी किरण का संकेत दिया था, जो सूर्यमण्डल को भेदकर ऊपर उठती है। वर्तमान श्लोक उसी ऊर्ध्व-मार्ग की परिणति और उसके गंतव्य का रहस्य खोलता है।
अन्वय और पदार्थ —
(ते रश्मयः) सूर्यमण्डलम् भित्वा ब्रह्मलोकम् अतिक्रम्य ते (साधकाः) परमां गतिम् यान्ति। अस्य (सूर्यस्य) यः रश्मिः शतम् ऊर्ध्वमेव अवस्थितः (अस्ति)।
पदार्थ:
• ब्रह्मलोकमतिक्रम्य — ब्रह्मलोक को पार करके। 'अतिक्रम्य' का अर्थ है सीमा से आगे निकल जाना।
• परमां गतिम् — परम गति को। यहाँ 'परम गति' का अर्थ उस अवस्था से है जहाँ से पुनरावृत्ति (जन्म-मरण) समाप्त हो जाती है।
• रश्मिशतमूर्ध्वमेव अवस्थितः — जिसकी सौ किरणें ऊपर की ओर ही स्थित हैं। यहाँ 'शत' (सौ) की संख्या उन किरणों की है जो उच्च लोकों की ओर जाती हैं, किन्तु 'परम गति' के लिए वह एक विशिष्ट मार्ग है जो ब्रह्मलोक को भी पार कर जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य उस ऊर्ध्व-मार्ग के चरम फल का वर्णन कर रहे हैं। पिछले श्लोक (९.१६८) का वाक्य यहाँ पूर्ण होता है—वह एक किरण जो सूर्यमण्डल को भेदकर ऊपर उठती है, वह केवल देवलोकों तक सीमित नहीं रहती, अपितु ब्रह्मलोक को भी अतिक्रमित (पार) कर देती है।
यहाँ 'परम गति' का संकेत है। सामान्यतः साधक स्वर्ग या ब्रह्मलोक को ही अंतिम लक्ष्य मानते हैं, किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य स्पष्ट कर रहे हैं कि ब्रह्मलोक भी एक पड़ाव है। जो साधक उस एक विशिष्ट ऊर्ध्व-किरण के माध्यम से अपनी चेतना को ले जाता है, वह ब्रह्मलोक की सीमा को पार कर उस 'परम गति' को प्राप्त करता है, जिसे अक्षर-ब्रह्म या मोक्ष कहा जाता है।
इसके पश्चात ऋषि एक और सूक्ष्म भेद बताते हैं कि इस हृदय-सूर्य की सौ किरणें ऊर्ध्व दिशा में ही स्थित हैं। यहाँ एक गहरा रहस्य है: एक किरण है जो 'परम गति' (मोक्ष) की ओर ले जाती है, और अन्य सौ किरणें हैं जो ऊर्ध्वगामी होते हुए भी विभिन्न देव-धामों की ओर जाती हैं। यह भेद अगले श्लोक (९.१७०) में और अधिक स्पष्ट होगा, जहाँ इन सौ किरणों का सम्बन्ध देव-निकायों से जोड़ा गया है। अतः यहाँ 'शत' (सौ) संख्या उन ऊर्ध्व-गतियों का समूह है जो श्रेष्ठ तो हैं, किन्तु 'परम' नहीं हैं।
शास्त्र-साक्ष्य —
हृदय की सूक्ष्म गतियों और ऊर्ध्व-मार्ग के विषय में उपनिषद् का मत इस स्मृति के साथ पूर्णतः मेल खाता है:
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ २.३.१६ ॥
हृदयकी एक सौ एक नाडियाँ हैं; उनमेंसे एक मूर्धाकी ओर निकली है। उससे ऊपर जाता हुआ (मनुष्य) अमृतत्वको पाता है; दूसरी नाडियाँ (प्राणके) निकलनेमें इधर-उधर (के लोकोंमें) ले जानेवाली होती हैं।
कठोपनिषद् के इस अंश में स्पष्ट कहा गया है कि हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं, जिनमें से केवल एक मूर्धा (ऊपर) की ओर निकली है। जो उस एक मार्ग से ऊपर जाता है, वह अमृतत्व को प्राप्त करता है, जबकि अन्य नाड़ियाँ उसे अन्य लोकों में ले जाती हैं।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और कठोपनिषद् के इस विवरण में अद्भुत संगति है। जहाँ उपनिषद् 'एक सौ एक नाड़ियों' की बात करता है, वहीं यह स्मृति 'एक' परम मार्ग और 'सौ' ऊर्ध्व किरणों का वर्णन करती है। दोनों ही शास्त्र इस बात की पुष्टि करते हैं कि मोक्ष का मार्ग अत्यंत सूक्ष्म और विशिष्ट है; वह भीड़ का मार्ग नहीं, बल्कि उस एक 'ऊर्ध्व-किरण' या 'एक नाड़ी' का मार्ग है जो साधक को संसार और देवलोकों के आकर्षण से ऊपर उठाकर परम पद पर प्रतिष्ठित करती है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'ऊर्ध्व-गमन' की चेतना जाग्रत करना है। योगिक दृष्टि से, जब साधक हृदय-सूर्य का ध्यान करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि उसकी चेतना केवल हृदय में स्थिर नहीं है, बल्कि वह एक प्रकाश-पुंज के रूप में ऊपर की ओर प्रवाहित हो रही है।
अभ्यास यह है कि ध्यान के समय साधक अपनी आंतरिक दृष्टि को उस एक 'ऊर्ध्व-किरण' पर केंद्रित करे। यह किरण केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि प्राण का वह सूक्ष्म प्रवाह है जो स्थूल शरीर की सीमाओं को भेदकर ऊपर उठता है। मृत्यु के समय या गहरे समाधि-भाव में, जब योगी इस ऊर्ध्व-मार्ग का स्मरण करता है, तो उसकी चेतना निम्न लोकों या कर्म-बंधनों में नहीं गिरती, अपितु ब्रह्मलोक को पार कर उस परम शून्य या अक्षर-ब्रह्म में विलीन हो जाती है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह 'अनेक' (सौ किरणों) से 'एक' (परम गति) की ओर बढ़ रहा है। यह अभ्यास उसे इस बोध से ऊपर ले जाता है कि केवल स्वर्ग या देवत्व ही लक्ष्य है; वह अब 'अतिक्रमण' (पार करने) की भूमि पर है, जहाँ लक्ष्य केवल मुक्ति है।
तेन देवनिकायानां स्वधामानि प्रपद्यते ।
ये चैकरूपाश्चाधस्ताद्रश्मयोऽस्य मृदुप्रभाः ॥ ९.१७० ॥
— उनसे (साधक) देवसमूहोंके अपने-अपने धामोंको पाता है; और जो एकरूप, मन्द प्रभावाली किरणें इसकी नीचेकी ओर हैं —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस एक विशिष्ट ऊर्ध्वगामी किरण का वर्णन किया जो ब्रह्मलोक को पार कर परम गति तक ले जाती है। वर्तमान श्लोक में वे उन अन्य किरणों का विवरण दे रहे हैं जो ऊर्ध्व दिशा में होते हुए भी विभिन्न देवलोकों के गंतव्य निर्धारित करती हैं और फिर अधोगामी किरणों का परिचय दे रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(तेन रश्मिभिः) देवनिकायानां स्वधामानि प्रपद्यते। ये (रश्मयः) च एकरूपाः च अधस्तात् (अस्ति), ते अस्य मृदुप्रभाः (सन्ति)।
पदार्थ:
• तेन — उन (सौ ऊर्ध्व किरणों) के द्वारा।
• देवनिकायानां स्वधामानि — देवताओं के समूहों के अपने-अपने धामों को।
• प्रपद्यते — प्राप्त करता है या पहुँचता है।
• एकरूपाः — एक समान स्वरूप वाले। यहाँ एकरूपता का अर्थ है कि वे विशिष्टता के बजाय एक सामान्य प्रवृत्ति (प्रवाह) की ओर ले जाने वाली हैं।
• अधस्तात् — नीचे की ओर।
• मृदुप्रभाः — मंद या कोमल प्रभा वाली। तीव्र प्रकाश ज्ञान और मोक्ष का प्रतीक है, जबकि मृदु प्रभा माया और सांसारिक आसक्तियों के प्रभाव को दर्शाती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य हृदय-सूर्य की किरणों के माध्यम से गतियों के विभाजन का रहस्य खोल रहे हैं। पिछले श्लोक (९.१६९) में जिस 'एक' किरण ने ब्रह्मलोक को पार कर 'परम गति' का मार्ग दिखाया, उसके अतिरिक्त जो शेष सौ किरणें ऊपर की ओर स्थित हैं, वे साधक को विभिन्न देव-समूहों के धामों तक ले जाती हैं।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि ऊर्ध्वगामी किरणों के भी दो स्तर हैं। एक वह जो समस्त सीमाओं को भेदकर अक्षर-ब्रह्म में विलीन कर देती है, और दूसरी वे सौ किरणें जो साधक के पुण्यों और उसकी सूक्ष्म वासनाओं के अनुसार उसे विभिन्न देवलोकों (जैसे इंद्रलोक, पितृलोक आदि) में प्रतिष्ठित करती हैं। साधक अपनी चेतना के उत्थान द्वारा इन देवधामों को प्राप्त करता है।
श्लोक का दूसरा भाग एक नए और भिन्न मार्ग का संकेत देता है—'अधस्तात् रश्मयः'। हृदय-सूर्य की कुछ किरणें नीचे की ओर भी प्रवाहित होती हैं। इन किरणों की विशेषता यह है कि ये 'एकरूप' और 'मृदुप्रभा' वाली हैं। जहाँ ऊर्ध्व किरणों में रंगों की विविधता (श्वेत, नील, पीत आदि) और तीव्रता थी, वहीं नीचे जाने वाली किरणें मंद और एक जैसी हैं। यह मंदता इस बात का संकेत है कि यहाँ चेतना का प्रकाश क्षीण हो गया है और वह जड़ता या मोह के प्रभाव में है। इन मृदु किरणों का संबंध उस मार्ग से है जो साधक को पुनः संसार के चक्र में बांधता है।
योग-रहस्य —
योगीश्वर याज्ञवल्क्य यहाँ साधक को यह बोध करा रहे हैं कि हृदय के भीतर स्थित इस ज्योति-पुरुष (सूर्य) से तीन प्रकार की गतियाँ निकलती हैं:
१. परम गति: वह एक किरण जो ब्रह्मलोक को भी पार कर जाती है। यह पूर्ण विमुक्ति का मार्ग है।
२. देव गति: वे सौ किरणें जो ऊर्ध्व हैं किन्तु सीमित हैं। यह उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियों का मार्ग है, किन्तु यहाँ पुनरावृत्ति की संभावना बनी रहती है।
३. मानुष/पशु गति: वे अधोगामी मृदु किरणें जो नीचे की ओर जाती हैं। यह संसार और कर्मभोग का मार्ग है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह ध्यान में स्थित होकर यह अनुभव करे कि उसकी चेतना किस किरण के साथ प्रवाहित हो रही है। यदि मन सांसारिक कामनाओं और मंद इच्छाओं में लीन है, तो वह 'मृदुप्रभा' वाली अधोगामी किरणों के प्रभाव में है। यदि वह केवल स्वर्गिक सुखों या दैवीय शक्तियों की आकांक्षा करता है, तो वह सौ ऊर्ध्व किरणों के दायरे में है। किन्तु जब साधक समस्त कामनाओं का त्याग कर केवल उस एक 'परम किरण' में अपनी दृष्टि स्थिर करता है, तब वह ब्रह्मलोक की सीमा को लाँघकर अक्षर-पद को प्राप्त होता है। यह श्लोक साधक को अपनी आंतरिक गतियों के प्रति सजग करता है कि वह केवल 'ऊपर' न जाए, बल्कि उस 'एक' विशिष्ट मार्ग को खोजे जो पूर्ण मुक्ति का द्वार है।
इह कर्मप्रभोगाय तैः संसरति सोऽवशः ।
एतद्यो न विजानाति मार्गद्वितयमात्मनः ॥ ९.१७१ ॥
— उनसे वह विवश होकर यहाँ कर्मफल भोगनेके लिए संसारमें घूमता है। जो आत्माके इन दो मार्गोंको नहीं जानता —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-सूर्य की उन मृदुप्रभा वाली अधोगामी किरणों का संकेत दिया, जो साधक को नीचे की ओर ले जाती हैं। वर्तमान श्लोक में वे स्पष्ट कर रहे हैं कि इन किरणों का परिणाम क्या होता है और इन दो मार्गों के अज्ञान का क्या दुष्परिणाम है।
अन्वय और पदार्थ —
(तेन रश्मिभिः) सोऽवशः इह कर्मप्रभोगाय संसरति। एतद् मार्गद्वितयम् आत्मनः यः न विजानाति (सः...)
पदार्थ:
• तेन — उन (अधोगामी मृदुप्रभा किरणों) के द्वारा।
• अवशः — विवश होकर; जिसके पास अपनी चेतना का नियंत्रण न हो।
• इह कर्मप्रभोगाय — इस संसार में कर्मों के फल को भोगने के लिए।
• संसरति — भटकता है या बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमता है।
• मार्गद्वितयम् — दो मार्ग (एक ऊर्ध्वगामी जो परम गति की ओर ले जाता है, और एक अधोगामी जो संसार की ओर)।
• विजानाति — विशेष रूप से जानता है (वि + ज्ञा); यहाँ केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभवजन्य ज्ञान की बात है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी उस विवशता का वर्णन कर रहे हैं, जो आत्म-ज्ञान के अभाव में उत्पन्न होती है। पिछले श्लोक (९.१७०) में उन्होंने बताया कि हृदय-सूर्य की कुछ किरणें नीचे की ओर जाती हैं। यहाँ वे कहते हैं कि जो साधक अपनी चेतना को ऊर्ध्वगामी किरणों में नहीं स्थित कर पाता, वह उन अधोगामी किरणों के प्रभाव में आकर 'अवशः' यानी विवश हो जाता है।
यह विवशता बाहरी नहीं, अपितु आंतरिक है। जब साधक का ध्यान हृदय-सूर्य के उस केंद्र पर नहीं होता जो अक्षर-ब्रह्म से जुड़ा है, तब उसकी वृत्तियाँ नीचे की ओर बहने लगती हैं। इन अधोगामी किरणों के सहारे वह 'इह कर्मप्रभोगाय संसरति'—अर्थात इस भौतिक जगत में केवल अपने संचित कर्मों के फल को भोगने के लिए भटकता रहता है। यहाँ 'संसरण' का अर्थ केवल जन्म-मृत्यु नहीं, बल्कि चेतना का निम्न स्तरों पर गिरना भी है।
ऋषि आगे एक अत्यंत गंभीर चेतावनी देते हैं कि जो मनुष्य आत्मा के इन 'दो मार्गों' (ऊर्ध्व और अधो) को नहीं पहचानता, उसकी गति और भी निम्न हो जाती है। मार्ग का ज्ञान न होना केवल अज्ञान नहीं है, बल्कि वह स्थिति है जहाँ जीव अपनी वास्तविक प्रकृति को पूरी तरह विस्मृत कर देता है। यह वाक्य अगले श्लोक (९.१७२) तक विस्तृत है, जहाँ बताया गया है कि इस अज्ञान का चरम परिणाम कीट-पतंग जैसी योनियों में पतन है।
श्रुति-संगति —
इस स्मृति का यह वचन सीधे तौर पर शतपथ ब्राह्मण के उस रहस्य का विस्तार है जहाँ दो मार्गों की चर्चा है:
अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकं जयन्ति ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद्रात्रिं रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद्यान्षण्मासान्दक्षिणादित्य एति मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रं ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनांस्तत्र भक्षयन्ति तेषां यदा तत्पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद्वायुं वायोर्वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति त एवमेवानुपरिवर्तन्तेऽथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १४.९.१.१९ ॥
और जो यज्ञ, दान और तपसे लोकोंको जीतते हैं, वे धूमको प्राप्त होते हैं; धूमसे रात्रिको, रात्रिसे कृष्ण पक्षको, कृष्ण पक्षसे उन छः महीनोंको जिनमें सूर्य दक्षिणकी ओर चलता है; महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे चन्द्रमाको। चन्द्रमाको प्राप्त होकर वे अन्न होते हैं; वहाँ देव उन्हें वैसे ही भोगते हैं जैसे सोम राजाको ("बढ़ो, घटो" कहकर)। जब वह (कर्मफल) चुक जाता है, तब वे इसी आकाशको प्राप्त होते हैं, आकाशसे वायुको, वायुसे वृष्टिको, वृष्टिसे पृथिवीको; पृथिवीको प्राप्त होकर अन्न होते हैं। इस प्रकार वे बार-बार घूमते रहते हैं। और जो इन दोनों मार्गोंको नहीं जानते, वे कीड़े, पतंगे और यह जो डँसनेवाला (साँप आदि) है — (वह) होते हैं।
श्रुति स्पष्ट कहती है कि जो यज्ञ, दान और तप से लोकों को जीतते हैं, वे एक निश्चित क्रम से चन्द्रमा तक पहुँचते हैं और फिर पुनः पृथ्वी पर आते हैं। लेकिन सबसे भयानक स्थिति उनके लिए है जो इन दोनों मार्गों (ऊर्ध्व और अधो) को नहीं जानते—'य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा'। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-वचन को आधार बनाकर यह समझा रही है कि हृदय-सूर्य की किरणों का विज्ञान ही वास्तव में उन दो मार्गों का विज्ञान है। जो इन किरणों के प्रवाह को नहीं समझता, वह प्रकृति के अधीन होकर विवशतापूर्वक निम्न योनियों में गिरता है।
योग-रहस्य —
योगी की दृष्टि से यह श्लोक 'जागरूकता' का अभ्यास है। साधक के लिए यहाँ 'दो मार्ग' केवल गंतव्य नहीं, बल्कि चेतना की दो प्रवृत्तियाँ हैं। एक प्रवृत्ति 'विषण्णात्मक' या अधोगामी है, जो इंद्रियों और कामनाओं के कारण नीचे की ओर खींचती है, और दूसरी 'उत्साहपूर्ण' या ऊर्ध्वगामी है, जो अक्षर-ब्रह्म की ओर ले जाती है।
साधक इस श्लोक से यह अनुभव करता है कि यदि वह केवल कर्मफल के भरोसे है, तो वह 'अवश' (विवश) है। योग का उद्देश्य इसी विवशता को समाप्त कर 'स्व-प्रकाश' में स्थित होना है। यहाँ 'जानना' (विजानाति) केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं है, बल्कि ध्यान के माध्यम से यह अनुभव करना है कि मेरी चेतना किस किरण के साथ प्रवाहित हो रही है। जब साधक हृदय-सूर्य की ऊर्ध्व किरणों का अनुभव करना शुरू करता है, तो वह स्वतः ही अधोगामी प्रवृत्तियों से मुक्त होने लगता है। इस प्रकार, मार्गों का ज्ञान ही स्वयं में एक साधन है, जो साधक को निम्न भूमि से उठाकर उच्च भूमि की ओर ले जाता है।
देहस्थशिराजालवर्णनम्
दंदशूकः पतङ्गो वा भवेत् कीटोऽथवा क्रिमिः ।
अलाबुतन्तुसदृशं शिराजालं तु संततम् ॥ ९.१७२ ॥
— वह साँप, पतंगा, कीड़ा या कृमि होता है। लौकीके तन्तुओं जैसा शिराओंका जाल फैला है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने आत्मा के दो मार्गों का वर्णन किया और चेतावनी दी कि जो इन मार्गों के भेद को नहीं जानता, वह विवश होकर संसार में भटकता है। वर्तमान श्लोक में वे इसी अज्ञान के परिणाम स्वरूप मिलने वाली योनियों और देह के भीतर स्थित उस सूक्ष्म संरचना का वर्णन कर रहे हैं, जिसमें यह विवश चेतना बंधी रहती है।
अन्वय और पदार्थ —
(सः) दंदशूकः पतङ्गो वा भवेत् कीटोऽथवा क्रिमिः। (तस्य देहे) अलाबुतन्तुसदृशं शिराजालं तु संततम् (अस्ति)।
पदार्थ:
• दंदशूकः — साँप (दंत और शूक/नुकीले दांतों वाला)।
• पतङ्गः — पतंगा या कीट जो प्रकाश की ओर आकर्षित होकर जल जाता है।
• कीटः — छोटा कीड़ा।
• क्रिमिः — सूक्ष्म कृमि या परजीवी।
• अलाबु-तन्तु-सदृशम् — लौकी (अलाबु) के भीतर पाए जाने वाले रेशों या तन्तुओं के समान।
• शिराजालम् — शिराओं (नसों) का जाल।
• संततम् — निरंतर फैला हुआ या विस्तृत।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उस जीव की गति बता रहे हैं जो अपने भीतर के सूर्य (हृदय-आत्मा) के ऊर्ध्वगामी मार्ग से अनभिज्ञ है। वे कहते हैं कि जो साधक या जीव इन दो मार्गों के रहस्य को नहीं जानता, वह अपनी चेतना के पतन के कारण 'दंदशूकः पतङ्गो वा भवेत् कीटोऽथवा क्रिमिः'—अर्थात साँप, पतंगा, कीड़ा या कृमि जैसी योनियों में जन्म लेता है।
यहाँ इन योनियों का उल्लेख केवल शारीरिक जन्म के लिए नहीं, अपितु चेतना की अवस्थाओं के प्रतीक के रूप में है। 'पतंगा' वह है जो बाहरी प्रकाश (मायावी आकर्षण) के पीछे भागकर स्वयं को नष्ट कर लेता है, 'कृमि' वह है जो केवल क्षय और गंदगी (तमस) में लिप्त रहता है। यह इस सत्य का उद्घाटन है कि जब आंतरिक सूर्य का प्रकाश ऊर्ध्वगामी नहीं होता, तब चेतना संकुचित होकर निम्नतम स्तरों पर गिर जाती है।
इसके पश्चात, ऋषि देह की एक अत्यंत सूक्ष्म शारीरिक संरचना का वर्णन करते हैं: 'अलाबुतन्तुसदृशं शिराजालं तु संततम्'। वे कहते हैं कि देह में लौकी के रेशों के समान शिराओं का एक विस्तृत जाल फैला हुआ है। जिस प्रकार लौकी के भीतर सूक्ष्म रेशे पूरे फल में व्याप्त होते हैं, उसी प्रकार शरीर में भी सूक्ष्म शिराओं का एक जाल है। यह वर्णन बाहरी शरीर विज्ञान का नहीं, अपितु ध्यान की दृष्टि से देखे गए उस सूक्ष्म ढाँचे का है जिसमें प्राण और चेतना का प्रवाह होता है। यह शिरा-जाल उस बंधन का प्रतीक है जिसमें अज्ञानी जीव उलझा रहता है। यह वाक्य अगले श्लोक (९.१७३) से जुड़ा है, जहाँ इस जाल के भीतर स्थित 'कमलसम्पुट' और उसके मध्य स्थित 'आत्मा' का वर्णन आता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, अपितु एक गंभीर चेतावनी है। योग की दृष्टि से 'दंदशूक' या 'पतंगा' होना उस मानसिक अवस्था का नाम है जहाँ साधक अपनी ऊर्जा को निम्न वृत्तियों (काम, क्रोध, मोह) में व्यर्थ नष्ट करता है। जब तक साधक यह नहीं समझता कि उसका वास्तविक स्वरूप वह ऊर्ध्वगामी किरण है जो ब्रह्मलोक को भेदती है, तब तक वह देह के इस 'शिरा-जाल' (अलाबुतन्तु) में उलझा रहता है।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब ध्यान में उतरता है, तो वह अनुभव करता है कि शरीर केवल मांस-मज्जा नहीं, बल्कि सूक्ष्म तन्तुओं और तरंगों का एक जाल है। इस श्लोक का योगिक संदेश यह है कि यदि चेतना को ऊर्ध्वगामी नहीं किया गया, तो वह इन्हीं सूक्ष्म तन्तुओं के जाल में फंसकर पुनः भौतिक संसार की निम्नतम अवस्थाओं की ओर खिंची चली जाएगी। साधक को इस 'शिरा-जाल' की जड़ता को पहचानकर, अपनी चेतना को हृदय-सूर्य के उस केंद्र की ओर ले जाना है, जहाँ से वह इन सभी बंधनों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त कर सके।
देहे आत्मस्थानम्
सपद्मसंपुटं चित्रं छादितं कर्णिकोज्ज्वलम् ।
तस्य मध्यगतो ह्यात्मा रश्मिभिः परिवारितः ॥ ९.१७३ ॥
— (उससे) ढका, विचित्र, कर्णिकासे उज्ज्वल कमलसम्पुट है; उसके बीच किरणोंसे घिरा आत्मा स्थित है —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने अज्ञानी जीव की निम्न योनियों में गति और देह के भीतर फैले शिराओं के जाल का वर्णन किया। अब वे उस जाल के भीतर छिपे उस परम केंद्र का संकेत दे रहे हैं, जहाँ आत्मा वास्तव में प्रतिष्ठित है।
अन्वय और पदार्थ —
(तस्य शिराजालेन) सपद्मसंपुटं चित्रं छादितं कर्णिकोज्ज्वलम् (अस्ति)। तस्य मध्यगतो हि आत्मा रश्मिभिः परिवारितः (अस्ति)।
पदार्थ:
• सपद्मसंपुटम् — कमल के सम्पुट (पात्र या आवरण) के सहित।
• चित्रम् — विचित्र, विविध रंगों वाला या अलौकिक।
• छादितम् — ढका हुआ या आवृत।
• कर्णिकोज्ज्वलम् — जिसकी कर्णिका (कमल का मध्य भाग/केन्द्र) अत्यंत उज्ज्वल और प्रकाशमान है।
• मध्यगतः — बिल्कुल बीच में स्थित।
• रश्मिभिः परिवारितः — किरणों के घेरे से घिरा हुआ या किरणों के परिवार के साथ।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य हृदय की सूक्ष्म संरचना का उद्घाटन कर रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने 'अलाबुतन्तुसदृशं शिराजालं' (लौकी के रेशों जैसा शिरा-जाल) का वर्णन किया था। वर्तमान श्लोक का भाव यह है कि उस शिराओं के जाल से ढका हुआ (छादितम्) एक 'पद्मसंपुट' है।
यहाँ 'चित्र' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कमल भौतिक नहीं, अपितु चैतन्य का कमल है, जो विविध रंगों और आभाओं से युक्त है। यह सम्पुट आत्मा के लिए एक सुरक्षा-कवच और एक मंदिर की भाँति है। इस कमल की विशेषता यह है कि यह 'कर्णिकोज्ज्वलम्' है—अर्थात इसका केंद्र अत्यंत प्रकाशमान है। जैसे कमल की पंखुड़ियाँ केंद्र की रक्षा करती हैं, वैसे ही यह सूक्ष्म सम्पुट आत्मा के तेज को संचित रखता है।
ऋषि कहते हैं कि इस उज्ज्वल कर्णिका के बिल्कुल मध्य में 'आत्मा' स्थित है। वह आत्मा एकाकी नहीं है, अपितु 'रश्मिभिः परिवारितः' है—अर्थात वह अपनी ही किरणों के परिवार से घिरा हुआ है। यह वही सूर्य-तत्व है जिसका वर्णन पिछले खण्डों में किया गया। जिस प्रकार बाहरी सूर्य की किरणें संपूर्ण जगत को प्रकाशित करती हैं, उसी प्रकार हृदय-कमल के भीतर स्थित यह आंतरिक सूर्य अपनी रश्मियों से साधक के अंतःकरण को आलोकित करता है।
यह वर्णन विधिक और रहस्यात्मक दोनों है। बाहरी दृष्टि से यह हृदय की धमनियों और तंत्रिकाओं का विन्यास है, किंतु आंतरिक दृष्टि से यह उस बिंदु का वर्णन है जहाँ स्थूल शरीर समाप्त होता है और शुद्ध चैतन्य का प्रकाश आरम्भ होता है। यह आत्मा का वह स्वरूप है जो अभी किरणों के घेरे में है, जिसे अगले श्लोकों में 'अंगुष्ठमात्र' और 'स्वेन तेजसा' जलते हुए दिखाया जाएगा।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक ध्यान की एक निश्चित प्रक्रिया का निर्देश है। योगिक अभ्यास में साधक पहले अपनी चेतना को बाहरी जगत से हटाकर देह के भीतर लाता है। जब वह हृदय प्रदेश में पहुँचता है, तो उसे पहले शिराओं का जाल (मानसिक विक्षेप और शारीरिक संवेदनाएँ) अनुभव होता है। यह श्लोक सिखाता है कि उस जाल के पार एक 'पद्मसंपुट' है।
साधक का अभ्यास यह है कि वह उस 'चित्र' कमल की कल्पना करे और अपनी दृष्टि को पंखुड़ियों से हटाकर सीधे 'कर्णिका' (केन्द्र) पर केंद्रित करे। 'कर्णिकोज्ज्वलम्' का अनुभव करना ही ध्यान की वह अवस्था है जहाँ साधक को हृदय में एक तीव्र प्रकाश पुंज का आभास होता है।
जब साधक इस उज्ज्वल केंद्र में स्थित 'रश्मिभिः परिवारित' आत्मा का दर्शन करता है, तब वह 'शिराजाल' (संसार के बंधन और देह-बोध) से ऊपर उठकर केंद्रस्थ चैतन्य में लीन होने लगता है। यह अभ्यास साधक को परिधि से केंद्र की ओर ले जाता है—जाल से कमल तक, और कमल से उस ज्योतिर्मय आत्मा तक। यहाँ 'किरणों के परिवार' का अनुभव करना यह दर्शाता है कि आत्मा केवल एक बिंदु नहीं, बल्कि एक अनंत ऊर्जा का स्रोत है जो स्वयं को प्रकाशित कर रही है।
आत्मपरिमाणं स्वरूपं च
प्रदीपतापप्रकाश्यै(शै)रवाप्नोति न चान्तरम् ।
अङ्गुष्ठपरिमाणं च ज्वलते स्वेन तेजसा ॥ ९.१७४ ॥
— (वह) दीपके ताप और प्रकाशवाली (किरणों) से (बाहरको) पाता है, पर भीतरको नहीं; अँगूठेके बराबर, अपने तेजसे जलता है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय के भीतर स्थित उस विचित्र कमल-सम्पुट का वर्णन किया, जिसकी उज्ज्वल कर्णिका के मध्य आत्मा किरणों से घिरा हुआ प्रतिष्ठित है। अब वे उस ज्योति-स्वरूप आत्मा के परिमाण और उसके प्रकाश की प्रकृति का उद्घाटन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(सः आत्मा) प्रदीपतापप्रकाश्यै(शै)रवाप्नोति न चान्तरम् । अङ्गुष्ठपरिमाणं च (सः) ज्वलते स्वेन तेजसा ।
पदार्थ:
• प्रदीपतापप्रकाश्यै(शै)रवाप्नोति — दीप के ताप और प्रकाश वाली किरणों से (बाहर की ओर) प्राप्त करता है या विस्तारित होता है।
• न चान्तरम् — और भीतर की ओर नहीं।
• अङ्गुष्ठपरिमाणम् — अँगूठे के समान आकार वाला।
• ज्वलते — प्रज्वलित रहता है, चमकता है।
• स्वेन तेजसा — अपने स्वयं के तेज से (बिना किसी बाहरी ईंधन या प्रकाश के)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य आत्मा के स्वरूप को एक 'ज्योति' के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। श्लोक की प्रथम पंक्ति—'प्रदीपतापप्रकाश्यै(शै)रवाप्नोति न चान्तरम्'—का अर्थ कुछ संदिग्ध प्रतीत होता है, किंतु इसका भाव संभवतः यह है कि जैसे एक दीपक की लौ ऊपर की ओर उठती है और प्रकाश बाहर की ओर फैलता है, वैसे ही आत्मा का तेज बाहर की ओर विस्तृत होकर संपूर्ण देह और जगत को प्रकाशित करता है, किंतु वह स्वयं के केंद्र (भीतर) की ओर नहीं लौटता, क्योंकि वह स्वयं ही परम केंद्र है। वह प्रकाश का स्रोत है, गंतव्य नहीं।
द्वितीय पंक्ति में ऋषि आत्मा के स्थूल परिमाण का संकेत देते हैं: 'अङ्गुष्ठपरिमाणं च'। यहाँ अँगूठे के बराबर होने का अर्थ यह नहीं है कि वह भौतिक मांस-मज्जा का कोई पिंड है, अपितु ध्यान की अवस्था में साधक को जिस सूक्ष्म ज्योति का आभास होता है, उसका परिमाण अँगूठे के समान प्रतीत होता है।
सबसे महत्वपूर्ण रहस्य 'ज्वलते स्वेन तेजसा' में छिपा है। संसार की समस्त ज्योतियाँ किसी न किसी बाहरी साधन पर निर्भर हैं—दीपक को तेल और बाती चाहिए, सूर्य को हाइड्रोजन और हीलियम की नाभिकीय संलयन प्रक्रिया चाहिए। किंतु हृदय-स्थली में स्थित यह पुरुष 'स्वयंप्रकाश' है। वह अपना प्रकाश स्वयं से उत्पन्न करता है। वह 'अधूमक' है, क्योंकि उसमें भौतिक दहन नहीं, अपितु चैतन्य का प्रकाश है। वह स्वयं ही प्रकाशक है और स्वयं ही प्रकाश।
शास्त्र-साक्ष्य —
आत्मा के इसी अङ्गुष्ठ-मात्र और ज्योति-स्वरूप होने की पुष्टि कठोपनिषद् में मिलती है:
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥ २.१.१२–१३ ॥
अँगूठेके बराबर पुरुष शरीरके मध्य (हृदय) में स्थित है — भूत और भविष्यका स्वामी; (उसे जानकर मनुष्य) किसीसे घृणा नहीं करता। अँगूठेके बराबर वह पुरुष धुएँरहित ज्योतिके समान है, भूत-भविष्यका स्वामी; वही आज है, वही कल भी।
यहाँ स्मृति और उपनिषद् का पूर्ण मेल है। कठोपनिषद् कहता है कि वह पुरुष 'ज्योतिरिवाधूमकः' (धुएँरहित ज्योति के समान) है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में 'स्वेन तेजसा ज्वलते' कहकर इसी बात को पुष्ट किया गया है कि वह आत्मा किसी बाहरी प्रकाश की अपेक्षा नहीं रखता, बल्कि स्वयं ही भूत-भविष्य का स्वामी और प्रकाश का मूल स्रोत है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अणु-तत्व' के ध्यान का आधार है। योग-साधना में जब साधक अपनी दृष्टि को बाहरी जगत से हटाकर हृदय-कमल के भीतर ले जाता है, तब उसे वहां एक सूक्ष्म ज्योति का अनुभव होता है।
अभ्यास यह है कि साधक उस ज्योति के 'आकार' (अङ्गुष्ठमात्र) पर अटकने के बजाय उसके 'गुण' (स्वतेजसा) पर ध्यान केंद्रित करे। वह यह अनुभव करे कि उसके भीतर एक ऐसा दीपक जल रहा है जिसे न हवा बुझा सकती है, न समय नष्ट कर सकता है, क्योंकि उसका ईंधन स्वयं 'चेतना' है। जब साधक इस 'स्वयंप्रकाश' स्वरूप का अनुभव करता है, तब वह बाहरी प्रकाशों (इंद्रिय-विषयों) के प्रति उदासीन होने लगता है। यह अभ्यास साधक को 'बाह्य-प्रकाश' से 'आन्तर-प्रकाश' की भूमि पर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को एक सीमित शरीर नहीं, बल्कि एक अनंत ज्योति-पुंज के रूप में देखना आरम्भ करता है।
प्रादेशमात्रं तपते वितस्तिं च प्रकाशते ।
तत्प्रदेशस्थितो ह्यात्मा चेतनः सर्वतो विभुः ॥ ९.१७५ ॥
प्रादेशमात्र (बित्ताभर) तपता है, और वितस्तिभर प्रकाशित होता है; उस स्थानमें स्थित आत्मा चेतन है, सब ओर व्यापक है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-कमल के मध्य स्थित आत्मा के 'अँगूठे के समान' परिमाण और उसके स्वयं के तेज से प्रज्वलित होने का वर्णन किया। अब वे उस ज्योति-स्वरूप आत्मा के ताप और प्रकाश के सूक्ष्म विस्तार तथा उसकी व्यापकता के रहस्य को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(सः आत्मा) प्रादेशमात्रं तपते, वितस्तिं च प्रकाशते । ततप्रदेशस्थितो ह्य आत्मा चेतनः (अस्ति), (सः) सर्वतो विभुः (अस्ति) ।
पदार्थ:
• प्रादेशमात्रम् — एक बित्ते के बराबर (लगभग ९ अँगुल)।
• तपते — ताप देता है, ऊष्मा उत्पन्न करता है।
• वितस्तिम् — एक वितस्ति (दो बित्ते या लगभग १८ अँगुल)।
• प्रकाशते — प्रकाशित होता है, आलोक फैलाता है।
• तत्प्रदेशस्थितः — उस विशिष्ट स्थान (हृदय-आकाश) में स्थित।
• चेतनः — चैतन्य स्वरूप, ज्ञानमय।
• सर्वतो विभुः — सब ओर व्याप्त, सर्वव्यापी, असीम।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी आत्मा के उस विरोधाभासी स्वरूप को उद्घाटित कर रहे हैं, जहाँ वह एक साथ 'परिमित' और 'अपरिमित' दोनों है।
प्रथम पंक्ति—'प्रादेशमात्रं तपते वितस्तिं च प्रकाशते'—में आत्मा की क्रिया के दो आयाम बताए गए हैं: ताप और प्रकाश। यहाँ 'प्रादेशमात्र' (एक बित्ते के बराबर) वह क्षेत्र है जहाँ आत्मा का 'ताप' केंद्रित है। योगिक दृष्टि से ताप का अर्थ है—तप, ऊर्जा और वह शक्ति जो साधक के भीतर अविद्या को जलाकर भस्म करती है। यह ताप उस केंद्र में है जहाँ आत्मा प्रतिष्ठित है। वहीं, उसका 'प्रकाश' (आलोक) 'वितस्ति' (दो बित्ते) तक विस्तृत है। प्रकाश का अर्थ है—ज्ञान और बोध। यह संकेत है कि आत्मा का प्रभाव उसके केंद्र से अधिक विस्तृत होता है; वह केवल स्वयं में सीमित नहीं, अपितु अपने चारों ओर ज्ञान का आलोक फैलाता है।
द्वितीय पंक्ति में ऋषि एक अत्यंत गूढ़ सत्य कहते हैं: 'तत्प्रदेशस्थितो ह्यात्मा चेतनः सर्वतो विभुः'। यहाँ 'तत्प्रदेश' उस हृदय-कमल के सूक्ष्म स्थान को कहा गया है जिसे पिछले श्लोकों में अँगूष्ठ-मात्र बताया गया था। याज्ञवल्क्य जी स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि आत्मा उस छोटे से प्रदेश में 'स्थित' प्रतीत होती है, किंतु वह केवल वहाँ कैद नहीं है। वह 'चेतन' है और 'सर्वतो विभु' है—अर्थात् वह सर्वव्यापी है।
भाव यह है कि जिस प्रकार सूर्य एक निश्चित स्थान (मण्डल) में स्थित दिखते हुए भी अपनी किरणों द्वारा संपूर्ण ब्रह्माण्ड को व्याप्त कर लेता है, उसी प्रकार हृदय-आकाश के सूक्ष्म बिंदु में स्थित यह चेतन-पुरुष अपनी सत्ता से समस्त चराचर जगत को ओढ़े हुए है। यह श्लोक ९.१४४ में वर्णित 'प्रादेशमात्र पुरुष' की उसी कड़ी को पूर्ण करता है, जहाँ साधक को पहले एक निश्चित बिंदु पर ध्यान केंद्रित करना होता है, ताकि वह उस बिंदु के माध्यम से अनंत की यात्रा कर सके।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'परिमित से अपरिमित' की ओर जाने की विधि है। योग-साधना में जब तक मन को एक 'आलम्बन' नहीं मिलता, वह भटकता रहता है। इसलिए याज्ञवल्क्य जी पहले आत्मा को 'प्रादेशमात्र' और 'वितस्ति' जैसे परिमाणों में बांधकर प्रस्तुत करते हैं, ताकि साधक का ध्यान हृदय के उस विशिष्ट सूक्ष्म केंद्र पर स्थिर हो सके।
अभ्यास यह है कि साधक पहले अपने हृदय-आकाश में उस 'प्रादेशमात्र' ताप (ऊर्जा) का अनुभव करे और फिर उस 'वितस्ति' प्रकाश (बोध) का। जब ध्यान उस सूक्ष्म प्रदेश में पूरी तरह स्थिर हो जाता है, तब साधक को यह अनुभव होता है कि जिसे वह एक छोटे से बिंदु में खोज रहा था, वह वास्तव में 'विभु' है—अर्थात वह स्वयं उसी व्यापक चेतना का अंश है।
यह अनुभव साधक को 'साधक' से 'सिद्ध' की भूमि पर ले जाता है। वह समझ जाता है कि हृदय का यह छोटा सा स्थान वास्तव में संपूर्ण ब्रह्माण्ड का द्वार है। यहाँ 'प्रदेश में स्थिति' उपासना का साधन है और 'विभुता का बोध' उसका साध्य। साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि उसका चैतन्य केवल देह तक सीमित नहीं, बल्कि वह सर्वव्यापी ब्रह्म का ही प्रतिबिंब है।
तत्त्वानि तत्र वै देवे तिष्ठन्त्यत्र समन्ततः ।
आप्यायन्ते च तेनैव दर्शनान्नात्र संशयः ॥ ९.१७६ ॥
उस देवमें सब तत्त्व चारों ओर स्थित हैं, और उसीसे तृप्त होते हैं — (यह) दर्शनसे (सिद्ध है), इसमें संशय नहीं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने हृदय-कमल के भीतर स्थित चेतन आत्मा के परिमाण और उसकी सर्वव्यापकता का वर्णन किया। अब वे यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वह हृदयस्थ देव केवल एक साक्षी मात्र नहीं है, अपितु समस्त शरीर और जगत के तत्त्वों का पोषण-आधार भी है।
अन्वय और पदार्थ —
तत्र वै (तस्मिन् देवे) समन्ततः तत्त्वानि तिष्ठन्ति, (ततत्वानि) तेनैव आप्यायन्ते च । (एतत्) दर्शनात् (सिद्धम्), अत्र न संशयः ।
पदार्थ:
• तत्र वै — उस देव में (यहाँ 'तत्र' हृदयस्थ उस ज्योति-स्वरूप आत्मा के लिए प्रयुक्त है)।
• तत्त्वानि — समस्त तत्त्व (पंचमहाभूत, इंद्रियाँ, प्राण और मन)।
• समन्ततः — चारों ओर, सर्वत्र।
• तिष्ठन्ति — स्थित हैं, आश्रित हैं।
• आप्यायन्ते — पुष्ट होते हैं, पोषण पाते हैं, तृप्त होते हैं।
• तेनैव — उसी (देव) के द्वारा, उसी से।
• दर्शनात् — दर्शन से (यहाँ दर्शन का अर्थ किसी दार्शनिक मत नहीं, अपितु योगिक अनुभव या प्रत्यक्ष साक्षात्कार है)।
• न संशयः — कोई संदेह नहीं है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी उस 'अंगुष्ठमात्र' और 'प्रादेशमात्र' आत्मा के प्रभाव की व्यापकता को समझा रहे हैं। पूर्व श्लोकों में आत्मा के परिमाण की बात की गई थी, जिससे यह भ्रम हो सकता है कि वह एक छोटे से स्थान में सीमित है। इस श्लोक के माध्यम से ऋषि यह रहस्य खोलते हैं कि वह सूक्ष्म केंद्र वास्तव में संपूर्ण ब्रह्मांड का केंद्र है।
'तत्त्वानि तत्र वै देवे तिष्ठन्त्यत्र समन्ततः' — इस पंक्ति का भाव यह है कि शरीर के समस्त तत्त्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, तथा सूक्ष्म प्राण और मन—उस हृदयस्थ देव (आत्मा) में ही स्थित हैं। जैसे एक बीज के भीतर संपूर्ण वृक्ष की संभावना और शक्ति निहित होती है, वैसे ही इस सूक्ष्म ज्योति-पुरुष में समस्त स्थूल और सूक्ष्म तत्त्व समाहित हैं। 'समन्ततः' शब्द यह दर्शाता है कि आत्मा केवल केंद्र में नहीं है, बल्कि वह केंद्र होते हुए भी चारों ओर व्याप्त है; वह परिधि भी है और केंद्र भी।
'आप्यायन्ते च तेनैव' — यहाँ 'आप्यायन्ते' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है—पुष्ट होना या तृप्त होना। शरीर की समस्त इंद्रियाँ और प्राण अपनी ऊर्जा कहाँ से पाते हैं? बाहरी भोजन केवल स्थूल शरीर का पोषण करता है, किंतु प्राणों की वास्तविक तृप्ति और चेतना का पोषण उसी अंतर्यामी देव से होता है। वह देव अपनी किरणों (तेज) के माध्यम से शरीर के प्रत्येक कण को जीवन-शक्ति प्रदान करता है। जब साधक इस सत्य को जान लेता है, तब उसे ज्ञात होता है कि वह बाहरी जगत में जिसे खोज रहा था, वह पोषण-शक्ति उसके अपने हृदय के भीतर प्रज्वलित है।
'दर्शनान्नात्र संशयः' — महर्षि कहते हैं कि यह कोई केवल बौद्धिक तर्क या कल्पना नहीं है, बल्कि 'दर्शन' से सिद्ध है। यहाँ दर्शन का अर्थ है—योगिक साक्षात्कार। जब साधक ध्यान की उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ वह हृदय-कमल के भीतर उस ज्योति को देखता है, तब उसे अनुभव होता है कि समस्त शरीर उसी प्रकाश का विस्तार है। यह अनुभव इतना प्रबल और प्रत्यक्ष होता है कि इसमें किसी संशय की गुंजाइश नहीं रहती।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अन्नमय कोश' से 'विज्ञानमय कोश' की ओर ले जाने वाला है। सामान्य मनुष्य अपनी तृप्ति के लिए बाहरी वस्तुओं (अन्न, विषय) पर निर्भर रहता है, जिसे 'अविद्या' कहा गया है। किंतु योगी इस श्लोक के माध्यम से यह अभ्यास करता है कि उसके शरीर का प्रत्येक तत्त्व—उसकी श्वास, उसकी धड़कन और उसके विचार—उस हृदयस्थ ज्योति से पुष्ट हो रहे हैं।
अभ्यास यह है कि ध्यान के समय साधक अपनी चेतना को हृदय-केंद्र में स्थित करे और यह अनुभव करे कि उस ज्योति से प्रकाश की किरणें निकलकर शरीर के प्रत्येक अंग और प्रत्येक कोशिका (तत्त्व) में प्रवेश कर रही हैं। इसे 'आंतरिक पोषण' का अभ्यास कहते हैं। जब साधक अनुभव करता है कि "मैं उसी देव से आप्यायित (पुष्ट) हो रहा हूँ", तब उसकी बाहरी (निर्भरता) समाप्त होने लगती है और वह आंतरिक आनंद में स्थित हो जाता है। यह वह भूमि है जहाँ साधक यह जान लेता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि उस देव का एक प्रतिबिंब है, और उसकी वास्तविक तृप्ति केवल उस देव के दर्शन में ही है।
आत्मचिन्तनफलम्
न च पश्यन्ति पुरुषं ह्यन्तस्थं परमं विभुम् ।
तं चिन्तयेत् समाधिस्थो यं ज्ञात्वा विप्रमुच्यते ॥ ९.१७७ ॥
(पर वे) भीतर स्थित परम व्यापक पुरुषको नहीं देखते। समाधिमें स्थित होकर उसका चिन्तन करे, जिसे जानकर (मनुष्य) मुक्त हो जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह सिद्ध किया कि हृदयस्थ देव ही समस्त तत्त्वों का पोषण-आधार है और उन्हीं के दर्शन से यह सत्य संशय-रहित हो जाता है। अब ऋषि उस विडम्बना को उजागर कर रहे हैं कि जो सबको पुष्ट करता है, वह स्वयं अदृश्य क्यों रहता है और उसे प्राप्त करने का साधन क्या है।
अन्वय और पदार्थ —
(परन्तु ते) अन्तस्थं परमं विभुं पुरुषं न च पश्यन्ति । समाधिस्थः तं चिन्तयेत्, यं ज्ञात्वा विप्रः उच्यते ।
पदार्थ:
• न च पश्यन्ति — नहीं देखते (यहाँ 'पश्यन्ति' का अर्थ केवल चक्षु-दृष्टि नहीं, अपितु अनुभव या साक्षात्कार है)।
• अन्तस्थं — भीतर स्थित (हृदय-कमल के भीतर)।
• परमं विभुम् — परम व्यापक, सर्वव्यापी, जिसकी सत्ता किसी सीमा में नहीं बंधी है।
• पुरुषं — चेतन तत्त्व, शुद्ध चैतन्य।
• समाधिस्थो — समाधि में स्थित होकर (चित्त की वह अवस्था जहाँ वृत्तियों का लय हो गया हो और केवल ध्येय शेष रहे)।
• चिन्तयेत् — चिन्तन करे, ध्यान करे, एकाग्रचित्त होकर उस स्वरूप में लीन हो जाए।
• विप्रः — विप्र (यहाँ विप्र का अर्थ केवल जन्म से ब्राह्मण नहीं, अपितु वह साधक है जिसने 'विप्र' होने का अर्थ—विविशेष या विशेष ज्ञान प्राप्त करना—सिद्ध कर लिया है)।
• मुच्यते — मुक्त हो जाता है (जन्म-मरण के चक्र से और अविद्या के बंधन से)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी उस सूक्ष्म सत्य को उद्घाटित कर रहे हैं जिसे सामान्य मनुष्य अपनी इंद्रियों के अहंकार में भूल जाता है। पिछले श्लोकों में उन्होंने बताया कि आत्मा अंगुष्ठमात्र स्थान पर स्थित है, फिर भी वह सर्वव्यापी है और समस्त तत्त्व उसी से पुष्ट होते हैं। यहाँ वे कहते हैं—'न च पश्यन्ति पुरुषं ह्यन्तस्थं परमं विभुम्'।
इसका भाव यह है कि जो परम विभु पुरुष सबको प्रकाशित कर रहा है, वह स्वयं अदृष्ट रहता है। यह वैसा ही है जैसे सूर्य के प्रकाश में सब कुछ दिखता है, परंतु आँखें सीधे सूर्य को नहीं देख पातीं, या जैसे दर्पण स्वयं को नहीं देख सकता। मनुष्य बाहरी जगत के रंगों, रूपों और विषयों में इतना उलझा है कि वह उस 'अन्तस्थ' (भीतर स्थित) प्रकाश को नहीं देख पाता। वह शरीर के शिरा-जाल और भौतिक अंगों को तो देखता है, परंतु उन अंगों को चलाने वाले उस चेतन पुरुष को नहीं पहचानता।
जब ऋषि कहते हैं कि 'तं चिन्तयेत् समाधिस्थो', तो वे साधक को एक विधि बता रहे हैं। चूँकि यह पुरुष इंद्रियों का विषय नहीं है, इसलिए इसे इंद्रियों से नहीं पाया जा सकता। इसे पाने के लिए 'समाधि' की स्थिति अनिवार्य है। समाधि वह अवस्था है जहाँ साधक अपनी चेतना को बाहर से समेटकर भीतर की ओर मोड़ लेता है। जब मन बाहरी विषयों से हटकर उस हृदयस्थ ज्योति में स्थिर होता है, तब उस 'विभु' का साक्षात्कार संभव होता है।
श्लोक का अंतिम अंश—'यं ज्ञात्वा विप्रमुच्यते'—इस साधना का चरम फल बताता है। यहाँ 'विप्र' शब्द का प्रयोग अत्यंत गूढ़ है। जो साधक अपने भीतर के उस पुरुष को जान लेता है, वही वास्तविक विप्र है। उस ज्ञान का परिणाम 'मुक्ति' है। यह मुक्ति किसी परलोक की प्राप्ति नहीं, अपितु इस बोध की प्राप्ति है कि "मैं यह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि वह अविनाशी, व्यापक पुरुष हूँ।" यह ज्ञान ही साधक को कर्मों के बंधन और अविद्या के अंधकार से मुक्त करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'दृष्टि' के परिवर्तन का सूत्र है। अब तक साधक ने शरीर की शुद्धि, प्राणायाम और प्रत्याहार का अभ्यास किया है, ताकि वह बाहरी जगत के शोर से मुक्त हो सके। इस श्लोक में वह अभ्यास 'चिन्तन' और 'समाधि' की ओर बढ़ता है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह जिसे खोज रहा है, वह कहीं बाहर नहीं, बल्कि उसके अपने हृदय के केंद्र में 'अन्तस्थ' है। अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को हृदय-कमल के उस बिंदु पर ले जाए जहाँ वह 'अंगुष्ठमात्र' ज्योति जल रही है। जब साधक समाधिस्थ होकर उस ज्योति का चिन्तन करता है, तो उसे अनुभव होता है कि वह छोटा सा बिंदु वास्तव में 'परम विभु' (सर्वव्यापक) है।
यह अनुभव साधक को एक भूमि से दूसरी भूमि पर ले जाता है—वह 'साक्षी भाव' से ऊपर उठकर 'एकत्व भाव' में प्रवेश करता है। जहाँ तक वह केवल देखता है, वह दृष्टा है; परंतु जब वह उस पुरुष में लीन हो जाता है, तब वह मुक्त हो जाता है। इस श्लोक का योगिक अभ्यास यह है कि अपनी समस्त इंद्रियों की ऊर्जा को हृदय के केंद्र में विलीन करना और उस परम व्यापकता का अनुभव करना, जो शरीर की सीमाओं से परे है।
ध्यानमाहात्म्यम्
मुक्तो न जायते भूयः प्राप्य विष्णोः परं पदम् ।
ध्यानेन सदृशं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम् ॥ ९.१७८ ॥
मुक्त होकर, विष्णुके परम पदको पाकर, (वह) फिर जन्म नहीं लेता। पापकर्मोंका ध्यानके समान कोई शोधन नहीं है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने समाधिस्थ होकर उस परम व्यापक पुरुष के चिन्तन का निर्देश किया, जिसे जानकर विप्र मुक्त हो जाता है। अब ऋषि उस मुक्ति की स्थिति और ध्यान की अपूर्व शोधन-शक्ति का वर्णन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(साधक) विष्णोः परं पदं प्राप्य मुक्तः भूयः न जायते । पापकर्मणाम् शोधनं ध्यानेन सदृशं नास्ति ॥
पदार्थ:
• विष्णोः परं पदम् — विष्णु का परम पद। यहाँ 'विष्णु' का अर्थ केवल एक देवता नहीं, अपितु 'विष्णु' धातु (विशृ) से व्युत्पन्न वह सर्वव्यापी सत्ता है जो समस्त चराचर में व्याप्त है। 'परम पद' वह अवस्था है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।
• मुक्तः — बंधनमुक्त। जन्म-मरण के चक्र और अविद्या के आवरण से स्वतंत्र।
• न जायते भूयः — फिर जन्म नहीं लेता। पुनर्जन्म की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
• पापकर्मणाम् — पापकर्मों का। यहाँ पाप का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु वे संस्कार और कर्म-बंधन हैं जो आत्मा को शरीर और मन के मोह में बाँधकर रखते हैं।
• शोधनं — शोधन, शुद्धिकरण। जैसे अग्नि सोने को तपाकर अशुद्धियों को दूर करती है, वैसे ही ध्यान चित्त के मैल को धो देता है।
• सदृशं नास्ति — उसके समान (कोई दूसरा साधन) नहीं है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य मुक्ति के स्वरूप और ध्यान की (प्रभावकारिता) को स्पष्ट कर रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि जब साधक उस सर्वव्यापी विष्णु (परम पुरुष) के परम पद को प्राप्त कर लेता है, तब वह 'मुक्त' हो जाता है। यह मुक्ति कोई भौतिक स्थान की प्राप्ति नहीं, अपितु अपनी ही वास्तविक सत्ता का साक्षात्कार है। जब साधक यह जान लेता है कि वह देह नहीं, अपितु वही विभु पुरुष है, तब पुनर्जन्म के बीज (वासनाएँ) भस्म हो जाते हैं, इसलिए वह 'भूयः न जायते'—पुनः जन्म नहीं लेता।
श्लोक के दूसरे चरण में ऋषि एक अत्यंत गंभीर रहस्य खोलते हैं कि पापकर्मों के शोधन के लिए ध्यान से श्रेष्ठ कोई अन्य साधन नहीं है। सामान्यतः स्मृतियों में प्रायश्चित्त के लिए दान, जप या तप की विधियाँ दी गई हैं, जो बाह्य और स्थूल शोधन हैं। किन्तु याज्ञवल्क्य जी यहाँ 'ध्यान' को सर्वोच्च शोधक बता रहे हैं। इसका कारण यह है कि पाप कर्मों का मूल 'अविद्या' और 'भ्रम' है। जब ध्यान के माध्यम से साधक अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है, तो वह भ्रम स्वतः नष्ट हो जाता है। जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं रहता, वैसे ही ध्यान के प्रकाश में पापकर्मों के संस्कार जलकर भस्म हो जाते हैं। यह शोधन केवल कर्मों का विलोपन नहीं, बल्कि चेतना का रूपांतरण है।
शास्त्र-साक्ष्य —
ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायतीव द्यौर्ध्यायन्तीवापो ध्यायन्तीव पर्वता देवमनुष्याः ॥ ७.६.१ ॥
ध्यान ही चित्तसे बढ़कर है। पृथिवी मानो ध्यान कर रही है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान कर रहा है, द्युलोक मानो ध्यान कर रहा है; जल, पर्वत, देव और मनुष्य मानो ध्यान कर रहे हैं (— इसीसे वे स्थिर और महान् हैं)।
छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि ध्यान चित्त से भी बढ़कर है और संपूर्ण सृष्टि—पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, जल और पर्वत—मानो निरंतर ध्यान की अवस्था में ही हैं। इसी ध्यान के कारण वे अपनी स्थिरता और महानता को बनाए रखते हैं।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह वचन छान्दोग्य के इस विचार की पुष्टि करता है। यदि संपूर्ण ब्रह्मांड की स्थिरता का आधार 'ध्यान' है, तो व्यक्तिगत स्तर पर चित्त की अशुद्धियों का शोधन भी केवल ध्यान से ही संभव है। जहाँ उपनिषद् ध्यान को सृष्टि के आधार के रूप में देखता है, वहीं यह स्मृति ध्यान को साधक के लिए 'मोक्ष-साधन' और 'परम शोधक' के रूप में प्रस्तुत करती है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक प्रायश्चित्त की एक नई परिभाषा देता है। प्रायः साधक अपने अतीत के पापों और त्रुटियों के स्मरण में उलझकर ग्लानि से भर जाता है, जो स्वयं में एक मानसिक बंधन है। याज्ञवल्क्य जी यहाँ संकेत कर रहे हैं कि पाप का शोधन 'पाप के स्मरण' से नहीं, अपितु 'अच्युत के ध्यान' से होता है।
अभ्यास यह है कि साधक अपने चित्त को उन कर्मों की ओर न ले जाए जो उसे नीचे गिराते हैं, बल्कि अपनी चेतना को ऊपर उठाकर उस 'परम पद' (विष्णु स्वरूप) में विलीन कर दे। जब ध्यान गहरा होता है, तो साधक 'कर्ता' भाव से मुक्त हो जाता है। जब 'कर्ता' ही नहीं रहा, तो पाप और पुण्य के संस्कार किसके साथ रहेंगे? इस अवस्था में साधक केवल एक साक्षी बन जाता है।
यह श्लोक साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह समझता है कि बाहरी क्रियाओं से अधिक आंतरिक एकाग्रता और स्वरूप-बोध प्रभावी है। यहाँ ध्यान का अर्थ केवल आँखें मूँदकर बैठना नहीं, अपितु अपनी चेतना को उस व्यापक पुरुष में विलीन कर देना है, जिससे वह स्वयं भी व्यापक हो जाए। यही वह शोधन है जो साधक को पुनः जन्म के चक्र से मुक्त कर परम पद तक पहुँचाता है।
श्वपाकेष्वपि भुञ्जानो ध्यायी नैव तु लिप्यते ।
ध्यानमेव परं ब्रह्म ध्यानमेव परं तपः ॥ ९.१७९ ॥
ध्यान करनेवाला चाण्डालोंके यहाँ भोजन करता हुआ भी लिप्त नहीं होता। ध्यान ही परम ब्रह्म है, ध्यान ही परम तप है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि पापकर्मों के शोधन के लिए ध्यान के समान कोई दूसरा साधन नहीं है। अब ऋषि इस शोधन की पराकाष्ठा बताते हुए यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि ध्यान की अग्नि साधक को बाहरी संस्कारों और भौतिक अशुद्धियों से पूर्णतः अलिप्त कर देती है।
अन्वय और पदार्थ —
(साधक) ध्यायी श्वपाकेषु अपि भुञ्जानो नैव तु लिप्यते । ध्यानमेव परं ब्रह्म, ध्यानमेव परं तपः ॥
पदार्थ:
• ध्यायी — वह साधक जो निरंतर ध्यान के अभ्यास में स्थित है, जिसका चित्त उस परम पुरुष में लीन है।
• श्वपाकेषु — श्वपाकों (चाण्डालों) के यहाँ। यहाँ 'श्वपाक' शब्द उस सामाजिक स्थिति का प्रतीक है जिसे स्मृति-परम्परा में अशुद्ध माना गया है।
• भुञ्जानो — भोजन करता हुआ।
• नैव तु लिप्यते — कदापि लिप्त नहीं होता। 'लिप्त' होने का अर्थ है—संस्कारों का चिपकना या मानसिक मल का उत्पन्न होना।
• परं ब्रह्म — परम सत्य, सर्वोच्च सत्ता। यहाँ ध्यान को ही ब्रह्म कहा गया है क्योंकि ध्यान की चरम अवस्था में साधक और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाता है।
• परं तपः — सर्वोच्च तप। तप का अर्थ है 'तपना' या शोधन। बाहरी शारीरिक कष्टों से श्रेष्ठ वह मानसिक तप है जो अविद्या को जला दे।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ध्यान की उस शक्ति का वर्णन कर रहे हैं जो साधक को 'अलिप्त' बना देती है। ऋषि कहते हैं कि जो साधक ध्यान में स्थित है, वह यदि श्वपाकों (चाण्डालों) के यहाँ भी भोजन ग्रहण करता है, तो भी वह उससे लिप्त नहीं होता।
यहाँ 'लिप्त' न होने का अर्थ यह है कि ध्यानी का चित्त इतना शुद्ध और स्थिर हो चुका होता है कि बाहरी जगत की कोई भी वस्तु, चाहे वह सामाजिक दृष्टि से कितनी ही अशुद्ध क्यों न मानी जाए, उसके आंतरिक तेज और पवित्रता को स्पर्श नहीं कर पाती। साधारण मनुष्य बाहरी स्पर्श या आहार से प्रभावित होकर मानसिक विकार या ग्लानि का अनुभव करता है, किन्तु ध्यानी के लिए केवल 'अन्न' का तत्त्व शेष रहता है, 'अशुद्धि' का संस्कार नहीं।
इसके पश्चात ऋषि एक अत्यंत गंभीर घोषणा करते हैं— "ध्यानमेव परं ब्रह्म, ध्यानमेव परं तपः"। वे ध्यान को केवल एक साधन नहीं, बल्कि स्वयं 'परम ब्रह्म' और 'परम तप' कह रहे हैं। जब साधक ध्यान की उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है, तब वह ध्यान ही ब्रह्म बन जाता है। इसी प्रकार, शरीर को भूखा रखना या कठोर आसन करना स्थूल तप है, किन्तु मन को विषयों से हटाकर एक बिंदु पर स्थिर करना वह सूक्ष्म तप है जो समस्त पापों और संस्कारों को भस्म कर देता है। अतः ध्यान ही वह सर्वोच्च अग्नि है जिसमें साधक स्वयं को तपाकर कुंदन बना लेता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस विचार का समर्थन उपनिषदों में मिलता है:
तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतं स्यादिति ॥ ५.२४.४ ॥
इसलिए ऐसा जाननेवाला यदि चाण्डालको जूठा भी दे दे, तो भी वह उसके आत्मा — वैश्वानर — में ही हवन किया हुआ होता है।
यह श्रुति कहती है कि जो व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है, यदि वह चाण्डाल को उच्छिष्ट (जूठा) भी दे दे, तो भी वह उसके आत्मा—वैश्वानर—में ही हवन किया हुआ होता है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और छान्दोग्य उपनिषद् दोनों का यहाँ एक ही निष्कर्ष है: जब साधक के भीतर का ज्ञान या ध्यान जाग्रत हो जाता है, तब बाहरी कर्मों की शुद्धि-अशुद्धि का प्रभाव समाप्त हो जाता है। जहाँ उपनिषद् 'देने' (दान) की क्रिया में वैश्वानर-अग्नि के माध्यम से अलिप्तता दिखाते हैं, वहीं यह स्मृति 'ग्रहण' (भोजन) की क्रिया में ध्यान की शक्ति से अलिप्तता सिद्ध करती है। दोनों ही स्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि आंतरिक बोध बाहरी विधिक बंधनों से ऊपर है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि 'भीतर की शुद्धि, बाहर की स्थिति से बड़ी होती है'। योग का लक्ष्य केवल बाहरी नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि चित्त को ऐसा बनाना है कि वह संसार के बीच रहकर भी कमल के पत्ते की भाँति जल से अलिप्त रहे।
अभ्यास की दृष्टि से साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि जब उसका ध्यान गहरा होता है, तो उसकी 'इन्द्रिय-गोचर' दुनिया बदल जाती है। वह भोजन को केवल शरीर के पोषण के रूप में देखता है, न कि किसी सामाजिक या मानसिक पूर्वाग्रह के रूप में। यह स्थिति तब आती है जब साधक का मन 'लेप' से परे हो जाता है।
साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि वास्तविक शोधन बाहरी स्नान या नियमों में नहीं, बल्कि उस 'परम तप' (ध्यान) में है जो हृदय के भीतर की अशुद्धियों को जलाता है। जब आंतरिक सूर्य (भर्ग) प्रज्वलित होता है, तो बाहरी अंधकार या मल उसे स्पर्श नहीं कर सकते। यह साधक को उस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह 'विभु' भाव को अनुभव करता है और समस्त द्वैत—शुद्ध-अशुद्ध, अपना-पराया—समाप्त होने लगता है।
ध्यानमेव परं शौचं तद्धाम(द्ध्यानं) परमं स्मृतम् ।
सर्वपापप्रसक्तोऽपि ध्यायेन्निमिषमच्युतम् ॥ ९.१८० ॥
ध्यान ही परम शौच है, ध्यान ही परम (धाम) कहा गया है। सब पापोंमें लगा हुआ भी (यदि) पलभर अच्युतका ध्यान करे —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ध्यान को 'परम ब्रह्म' और 'परम तप' कहकर उसकी सर्वोच्चता सिद्ध की। अब वे ध्यान के उस शोधक गुण का वर्णन कर रहे हैं, जो साधक को समस्त बाहरी और आंतरिक अशुद्धियों से मुक्त कर उसे परम पद की ओर अग्रसर करता है।
अन्वय और पदार्थ —
ध्यानमेव परं शौचम्, तद्धाम (द्ध्यानं) परमं स्मृतम् । सर्वपापप्रसक्तोऽपि निमिषमच्युतम् ध्यायेत् ॥
पदार्थ:
• ध्यानमेव परं शौचम् — ध्यान ही वास्तविक और सर्वोच्च शौच (शुद्धि) है। यहाँ 'शौच' का अर्थ केवल शरीर की बाहरी स्वच्छता नहीं, अपितु चित्त की वह निर्मलता है जहाँ कोई विकार शेष न रहे।
• तद्धाम (द्ध्यानं) परमं स्मृतम् — वह धाम (या वह ध्यान) परम कहा गया है। यहाँ 'धाम' का अर्थ उस विश्राम-स्थल या लक्ष्य से है जहाँ पहुँचकर साधक की खोज समाप्त होती है। यदि पाठ 'द्ध्यानं' लिया जाए, तो इसका अर्थ है कि ध्यान की अवस्था ही परम स्थिति है।
• सर्वपापप्रसक्तोऽपि — सब पापों में लिप्त होने पर भी, या अत्यंत दुराचारी होने पर भी। 'प्रसक्त' का अर्थ है—किसी वस्तु या भाव से गहरे रूप में जुड़ जाना।
• निमिषमच्युतम् — एक निमिष (पलभर) के लिए अच्युत (विष्णु/परम पुरुष) का। 'अच्युत' वह है जो अपने स्वरूप से कभी च्युत (विचलित) नहीं होता।
• ध्यायेत् — ध्यान करे। यह विधिलिङ् है, जो यहाँ एक संभावना और प्रोत्साहन को दर्शाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ध्यान की उस विलक्षण शक्ति का उद्घाटन कर रहे हैं, जो किसी भी मनुष्य के लिए मुक्ति का द्वार खोल सकती है। ऋषि कहते हैं कि ध्यान ही 'परम शौच' है। सामान्यतः शौच का अर्थ स्नान या शुद्धि की बाहरी क्रियाओं से लिया जाता है, किंतु योगीश्वर के लिए शौच वह है जो मन के मैल (मल) को धो दे। बाहरी जल शरीर को शुद्ध करता है, किंतु ध्यान की अग्नि अंतःकरण के गहरे संस्कारों और पापों को भस्म कर देती है। इसलिए, ध्यान ही वास्तविक शुद्धि है।
आगे वे कहते हैं कि यह ध्यान ही 'परम धाम' है। जिस प्रकार एक यात्री अपने गंतव्य (धाम) पर पहुँचकर विश्राम पाता है, उसी प्रकार साधक जब ध्यान में स्थित होता है, तो वह उस परम शांति और स्थिरता को प्राप्त करता है जिसे 'परम' कहा गया है।
इस श्लोक का सबसे गंभीर पक्ष यह है कि ऋषि यहाँ किसी भी मनुष्य के लिए आशा का द्वार खुला रखते हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति 'सर्वपापप्रसक्त' हो—अर्थात वह जीवन भर पापों में लिप्त रहा हो, उसका चरित्र दूषित हो या वह घोर अविद्या में हो—वह भी यदि एक 'निमिष' (पलभर) के लिए अच्युत का ध्यान करे, तो उसका कल्याण संभव है। यहाँ 'निमिष' का अर्थ केवल समय की अल्पता नहीं, बल्कि उस 'क्षण' की तीव्रता है जब साधक का चित्त पूर्णतः एकाग्र होकर उस अच्युत पुरुष से जुड़ जाता है। वह एक क्षण का सच्चा साक्षात्कार वर्षों के पापों के प्रभाव को समाप्त करने की क्षमता रखता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
इस भाव की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलती है:
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ९.३०–३१ ॥
यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भावसे मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने ठीक निश्चय कर लिया है। वह शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति पाता है; कौन्तेय! निश्चित जानो, मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि अत्यंत दुराचारी व्यक्ति भी अनन्य भाव से उन्हें भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए क्योंकि उसने 'सम्यग्व्यवसितो' (दृढ़ निश्चय) कर लिया है। वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता का यह मत एक ही सत्य को उद्घाटित करता है कि ईश्वर की कृपा और ध्यान की शक्ति किसी भी जड़ता को तोड़ सकती है। किंतु यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यह 'पलभर का ध्यान' पाप करने का लाइसेंस नहीं है, बल्कि यह उस व्यक्ति के लिए अंतिम सहारा है जो अब पश्चाताप कर जागृत हुआ है। जैसे गीता में 'अनन्य भाव' और 'सम्यक् निश्चय' की शर्त है, वैसे ही यहाँ 'अच्युत' का ध्यान उस अटूट विश्वास के साथ होना चाहिए कि अब मुझे केवल उसी शरण में जाना है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक अत्यंत उत्साहवर्धक है। अक्सर साधक यह सोचकर साधना आरम्भ नहीं करता कि उसका अतीत पापमय रहा है या वह अभी बहुत अशुद्ध है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि शुद्धि के लिए पहले शुद्ध होना आवश्यक नहीं है, बल्कि 'ध्यान' ही वह साधन है जो आपको शुद्ध करता है।
साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह आज, इसी क्षण से, जैसा भी है, अपने भीतर उस 'अच्युत' पुरुष का स्मरण आरम्भ करे। योगिक दृष्टि से, जब साधक पलभर के लिए भी अपने मन को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्यामी पुरुष (अच्युत) पर टिकाता है, तो वह 'अक्षर' के संपर्क में आता है। वह एक क्षण का संपर्क साधक को उसकी वास्तविक भूमि का बोध कराता है। यह 'निमिष' का ध्यान ही वह बीज है, जो आगे चलकर निरंतरता प्राप्त करता है और साधक को उस अवस्था तक ले जाता है जहाँ वह 'पङ्क्तिपावन' (अगले श्लोक के अनुसार) बन जाता है। अभ्यास यह है: अतीत के बोझ को छोड़कर, वर्तमान के एक क्षण में पूर्णतः लीन होना।
पुनस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावनपावनः ।
ध्यानमेव प्रवक्ष्यामि करणैः क्रियते यथा ॥ ९.१८१ ॥
— (तो) फिर तपस्वी हो जाता है, पंक्तिको पवित्र करनेवालोंको भी पवित्र करनेवाला। अब मैं ध्यान कहूँगा, (वह) करणों (इन्द्रियों-मन) से जैसे किया जाता है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बताया कि सब पापों में लिप्त व्यक्ति भी यदि एक निमिष के लिए अच्युत का ध्यान करे, तो वह शोधित हो जाता है। इसी शोधन की पराकाष्ठा और उसके फल का वर्णन इस श्लोक में है, जिसके पश्चात ऋषि ध्यान की व्यावहारिक विधि का आरम्भ कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(सः) पुनस्तपस्वी भवति, पङ्क्तिपावनपावनः । ध्यानमेव प्रवक्ष्यामि, करणैः क्रियते यथा ॥
पदार्थ:
• पुनस्तपस्वी भवति — वह फिर से तपस्वी हो जाता है। यहाँ 'पुनः' शब्द यह दर्शाता है कि ध्यान के प्रभाव से साधक अपनी खोई हुई आध्यात्मिक पात्रता और तप का तेज पुनः प्राप्त कर लेता है।
• पङ्क्तिपावनपावनः — पंक्ति को पवित्र करने वालों को भी पवित्र करने वाला। 'पङ्क्तिपावन' वे होते हैं जो अपनी शुद्धि और तप से उस समूह या पंक्ति को पवित्र कर देते हैं जिसमें वे बैठते हैं (जैसे श्रेष्ठ ऋषि या संत)। ऐसा व्यक्ति जो इन पङ्क्तिपावनों को भी पावन कर दे, वह ध्यान की उच्चतम अवस्था को प्राप्त तपस्वी है।
• ध्यानमेव प्रवक्ष्यामि — अब मैं केवल ध्यान (की विधि) कहूँगा। 'प्रवक्ष्यामि' भविष्यकाल की क्रिया है, जो संकेत देती है कि अब तक महिमा का वर्णन था, अब विधि का विवरण आरम्भ होगा।
• करणैः क्रियते यथा — करणों (इन्द्रियों और मन) के द्वारा वह जैसे किया जाता है। 'करण' वे साधन हैं जिनके माध्यम से चेतना बाहरी या आंतरिक जगत से जुड़ती है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ध्यान के उस रूपांतरणकारी प्रभाव को स्पष्ट कर रहे हैं, जो एक साधारण या पाप-ग्रस्त मनुष्य को भी परम तपस्वी बना देता है। ऋषि कहते हैं कि जब कोई साधक अच्युत का ध्यान करता है, तो वह केवल पापमुक्त नहीं होता, अपितु उसकी चेतना का स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि वह 'पङ्क्तिपावनपावनः' हो जाता है।
भाव यह है कि संसार में कुछ लोग अपनी साधना से पवित्र होते हैं और उनके सान्निध्य से अन्य लोग भी पवित्र होते हैं—इन्हें 'पङ्क्तिपावन' कहा गया। किंतु ध्यान की अग्नि में तपकर जो साधक निखरता है, उसका तेज इतना प्रखर होता है कि वह स्वयं उन पवित्र संतों को भी और अधिक शुद्ध और जाग्रत कर देता है। यह स्थिति उस अवस्था की है जहाँ साधक केवल व्यक्तिगत शुद्धि तक सीमित नहीं रहता, अपितु उसका अस्तित्व ही एक पवित्र ऊर्जा बन जाता है। यह तप की वह अवस्था है जहाँ बाहरी क्रियाएँ गौण हो जाती हैं और केवल 'अच्युत' का स्मरण ही समस्त तपस्याओं का सार बन जाता है।
इस श्लोक के उत्तरार्ध में ऋषि एक महत्वपूर्ण मोड़ लाते हैं। अब तक उन्होंने ध्यान की महिमा, उसके शोधक गुण और उसके फल का वर्णन किया, किंतु अब वे साधक को उस मार्ग पर ले जाना चाहते हैं जहाँ 'अनुभव' आरम्भ होता है। वे कहते हैं—"अब मैं ध्यान की विधि कहूँगा।" यहाँ 'करणैः' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। ध्यान कोई ऐसी क्रिया नहीं है जो करणों (इन्द्रियों और मन) के अभाव में अचानक घटित हो जाए, बल्कि यह करणों को ही एक विशेष दिशा में मोड़ने की कला है। जब तक करणों का निग्रह और उनका सही नियोजन नहीं होगा, तब तक ध्यान संभव नहीं है। अतः ऋषि अब यह बताने जा रहे हैं कि मन, बुद्धि और इन्द्रियों जैसे करणों का उपयोग करके उस परम पुरुष में कैसे लीन होना है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रशंसा' से 'अभ्यास' की ओर संक्रमण का बिंदु है। अब तक साधक ने ध्यान की शक्ति को सुना और उस पर श्रद्धा विकसित की; अब वह उस शक्ति को प्राप्त करने की विधि की ओर बढ़ रहा है।
यहाँ 'पुनस्तपस्वी' होने का योगिक अर्थ है—अपनी मूल आध्यात्मिक प्रकृति (स्वधर्म) में वापस लौट आना। अविद्या के कारण साधक अपनी तपस्वी प्रकृति को भूलकर कर्मों के जाल में फँस गया था; ध्यान उसे पुनः उसी 'तप' की स्थिति में प्रतिष्ठित कर देता है।
साधक के लिए यहाँ मुख्य संकेत 'करण' हैं। योग में करणों का अर्थ है—मन, बुद्धि, अहंकार और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। सामान्यतः ये करण साधक को बाहर की ओर (विषयों की ओर) खींचते हैं, जिससे ऊर्जा का क्षय होता है। लेकिन जब इन्हीं करणों को 'यथा' (विधिपूर्वक) मोड़ा जाता है, तो वे ही करण 'सोपान' (सीढ़ी) बन जाते हैं। इस श्लोक से साधक यह अनुभव करता है कि उसे अपने मन और इन्द्रियों को त्यागना नहीं है, बल्कि उन्हें एक विशेष अनुशासन में लाकर 'अच्युत' की ओर उन्मुख करना है। यह अभ्यास उसे स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाने की तैयारी है, जिसकी विस्तृत विधि अगले श्लोकों में वर्णित है।
ध्यानलक्षणम्
बुद्ध्यहंकारमनसां विषयानिन्द्रियाण्यपि ।
एकस्थाननिरोधेन ध्यानमित्यभिधीयते ॥ ९.१८२ ॥
बुद्धि, अहंकार और मन तथा विषयों एवं इन्द्रियों को भी एक ही स्थान पर रोकने से 'ध्यान' कहा जाता है ...
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने घोषणा की कि अब वे ध्यान की उस विधि का वर्णन करेंगे, जिससे करणों (इन्द्रियों और मन) के माध्यम से परम तत्व की प्राप्ति होती है। इसी क्रम में, विधि के विवरण से पूर्व ऋषि ध्यान के वास्तविक लक्षण और उसकी परिभाषा को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
बुद्ध्यहंकारमनसां विषयाणि इन्द्रियाणि अपि एकस्थाननिरोधेन ध्यानमित्यभिधीयते ।
पदार्थ:
• बुद्ध्यहंकारमनसां — बुद्धि, अहंकार और मन के। यहाँ षष्ठी विभक्ति यह दर्शाती है कि आगे आने वाले 'विषयों' का सम्बन्ध इन तीनों आंतरिक करणों से है।
• विषयाणि — विषय (इन्द्रिय-विषय और मानसिक वृत्तियाँ)।
• इन्द्रियाणि अपि — इन्द्रियाँ भी।
• एकस्थाननिरोधेन — एक ही स्थान पर निरोध (रोकने) के द्वारा। 'निरोध' का अर्थ केवल दबाना नहीं, अपितु अपनी स्वाभाविक दिशा (बाहर की ओर) से मोड़कर एक केंद्र पर स्थिर कर देना है।
• ध्यानमित्यभिधीयते — (इस प्रक्रिया को) ध्यान कहा जाता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ध्यान की एक अत्यंत सटीक और मनोवैज्ञानिक परिभाषा दे रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि जब बुद्धि, अहंकार, मन, उनके विषय और समस्त इन्द्रियाँ—ये सभी एक ही स्थान पर निरुद्ध हो जाते हैं, तब उस अवस्था को 'ध्यान' कहा जाता है।
यहाँ 'एकस्थान' का अर्थ वह केंद्र है जहाँ साधक अपने इष्ट या परमात्मा को प्रतिष्ठित करता है। सामान्यतः हमारी चेतना बिखरी हुई होती है; इन्द्रियाँ विषयों की ओर भागती हैं, मन स्मृतियों में भटकता है, अहंकार स्वयं को कर्ता मानकर सक्रिय रहता है और बुद्धि निरंतर निर्णय लेती रहती है। यह बिखराव ही दुःख और अविद्या का कारण है। जब इन समस्त प्रवृत्तियों को खींचकर एक बिंदु पर लाकर रोक दिया जाता है, तो वह 'निरोध' ध्यान बन जाता है।
इस श्लोक में 'विषयों' और 'इन्द्रियों' के साथ 'बुद्धि, अहंकार और मन' का उल्लेख महत्वपूर्ण है। साधक केवल आँखों या कानों को बंद करने से ध्यान में नहीं पहुँचता, क्योंकि भीतर का मन और अहंकार अभी भी विषयों का चिंतन करते रहते हैं। अतः वास्तविक ध्यान वह है जिसमें बाहरी इन्द्रियों के साथ-साथ आंतरिक सूक्ष्म करणों का भी निरोध हो जाए। जब अहंकार का 'मैं' और बुद्धि का 'विवेक' भी ध्येय-वस्तु में लीन हो जाते हैं, तब साधक द्वैत से अद्वैत की ओर बढ़ता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥ (भाष्य —) तस्मिन्देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशः प्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम् ॥ ३.२ ॥
वहाँ (धारणाके देशमें) प्रत्ययकी एकतानता ध्यान है। (भाष्य —) उस देशमें ध्येयको आलम्बन बनानेवाले प्रत्ययका एक-सा प्रवाह, जिसे कोई दूसरा प्रत्यय न छुए — वह ध्यान है।
इस विषय में पातञ्जल योगसूत्र कहता है कि धारणा के देश में प्रत्यय की एकतानता ही ध्यान है। व्यासभाष्य के अनुसार, ध्येय के आलम्बन पर प्रत्यय का एक ऐसा प्रवाह, जिसमें कोई दूसरा विचार बाधा न डाले, वह ध्यान है।
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और योगसूत्र की ये दोनों परिभाषाएँ एक-दूसरे की पूर्ण पूरक हैं। जहाँ योगसूत्र 'प्रत्यय की एकतानता' (एक ही विचार का निरंतर प्रवाह) पर बल देता है, वहीं यह स्मृति 'एकस्थान-निरोध' (समस्त करणों का एक बिंदु पर ठहरना) पर बल देती है। वास्तव में, निरोध ही वह आधार है जिस पर एकतानता का प्रवाह संभव होता है। जब तक मन और इन्द्रियाँ निरुद्ध नहीं होंगे, तब तक प्रत्यय की अविच्छिन्न धारा नहीं बह सकती। अतः निरोध साधन है और एकतानता उसकी अवस्था।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का अभ्यास दो चरणों में पूर्ण होता है। प्रथम चरण है—'निरोध'। साधक अभ्यास करता है कि उसकी इन्द्रियाँ विषयों से हटकर भीतर मुड़ें, मन की चंचलता रुके और अहंकार की सक्रियता शांत हो। यह एक प्रकार का मानसिक संकुचन है, जहाँ समस्त चेतना को एक केंद्र (एकस्थान) पर लाया जाता है।
द्वितीय चरण है—'स्थिरता'। जब बुद्धि, मन और अहंकार एक स्थान पर रुक जाते हैं, तब वहाँ एक शून्य या एक बिंदु निर्मित होता है। इसी बिंदु पर जब साधक का चित्त स्थिर होता है, तब वह 'ध्यान' की भूमि में प्रवेश करता है। साधक अनुभव करता है कि वह अब विषयों का भोक्ता नहीं, बल्कि केवल दृष्टा है।
इस अभ्यास से साधक 'क्षिप्त' और 'मूढ़' अवस्था से ऊपर उठकर 'एकाग्र' भूमि की ओर अग्रसर होता है। यहाँ 'एकस्थान' केवल एक भौतिक बिंदु नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक द्वार है जिससे होकर साधक स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर प्रस्थान करता है। जब करणों का निरोध होता है, तब साधक का व्यक्तित्व विलीन होने लगता है और केवल 'ध्येय' शेष रह जाता है।
ध्यानविधिः
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च बुद्धावेव निवेशयेत् ।
मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि प्रकृतावपि ॥ ९.१८३ ॥
इन्द्रियों और इन्द्रियोंके विषयोंको बुद्धिमें ही स्थापित करे; मन, बुद्धि, अहंकार और भूतोंको प्रकृतिमें;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ध्यान की परिभाषा देते हुए बताया कि समस्त आंतरिक और बाहरी करणों का एक स्थान पर निरोध ही ध्यान है। अब इस श्लोक में वे उस निरोध की क्रमिक विधि, अर्थात् 'लय-क्रम' का विवरण दे रहे हैं कि किस सूक्ष्म शक्ति को किसमें विलीन करना है।
अन्वय और पदार्थ —
इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थान् च बुद्धावेव निवेशयेत्। मनो बुद्धिरहंकारः भूतानि प्रकृतावपि (निवेशयेत्)।
पदार्थ:
• इन्द्रियाणि — ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ।
• इन्द्रियार्थान् — इन्द्रियों के विषयों को (रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द)।
• बुद्धावेव — बुद्धि में ही। यहाँ 'एव' शब्द बल देता है कि इन्द्रियों का अंतिम आश्रय बुद्धि ही होना चाहिए।
• निवेशयेत् — स्थापित करे या विलीन करे। यह विधिलिङ् लकार है, जो साधक के लिए एक अनिवार्य निर्देश है।
• मनो बुद्धिरहंकारः — मन, बुद्धि और अहंकार।
• भूतानि — पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) या स्थूल शरीर के तत्व।
• प्रकृतावपि — प्रकृति में भी। यहाँ प्रकृति का अर्थ उस मूल माया या प्रधान पुरुष से है जिससे यह संपूर्ण जगत और शरीर उत्पन्न हुआ है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य ध्यान की उस सूक्ष्म प्रक्रिया को समझा रहे हैं जिसे 'लय' कहा जाता है। ध्यान केवल आँखें मूँदकर बैठना नहीं है, अपितु चेतना के बिखराव को समेटकर उसे केंद्र की ओर वापस ले जाना है।
ऋषि निर्देश देते हैं कि साधक सर्वप्रथम अपनी इन्द्रियों और उन इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किए जाने वाले विषयों को बुद्धि में निवेश करे। सामान्य अवस्था में इन्द्रियाँ विषयों की ओर बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं, जिससे ऊर्जा का क्षय होता है। जब साधक विषयों को बुद्धि में विलीन करता है, तो वह विषयों के प्रति आसक्ति को समाप्त कर उन्हें केवल एक 'विचार' या 'स्मृति' के रूप में बुद्धि में स्थिर कर देता है। यह बाहरी जगत से आंतरिक जगत की ओर पहला कदम है।
इसके पश्चात, साधक को मन, बुद्धि, अहंकार और भौतिक तत्वों (भूतों) को प्रकृति में विलीन करना चाहिए। यहाँ एक सूक्ष्म क्रम है: पहले सबसे स्थूल (विषय और इन्द्रियाँ) को सूक्ष्म (बुद्धि) में समेटा गया, फिर उस सूक्ष्म (मन-बुद्धि-अहंकार) को और अधिक सूक्ष्म 'प्रकृति' (प्रधान) में विलीन करने का निर्देश है। यह प्रक्रिया एक वृत्ताकार संकुचन की भाँति है, जहाँ साधक अपनी संपूर्ण सत्ता को बाहर से भीतर की ओर सिकोड़ता जा रहा है।
यह श्लोक एक बड़े वाक्य का अंश है जो अगले श्लोक (९.१८४) तक विस्तृत है। यहाँ तक साधक ने सब कुछ प्रकृति में विलीन किया, और अगले श्लोक में वह प्रकृति को पुरुष (परमात्मा) में विलीन करेगा। यह पूर्ण विसर्जन की वह यात्रा है जहाँ 'मैं' और 'मेरा' का भाव मिटकर केवल शुद्ध चैतन्य शेष रह जाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
लय के इसी क्रमिक विसर्जन का निर्देश उपनिषदों में भी मिलता है:
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १.३.१३ ॥
बुद्धिमान् वाणी (इन्द्रियों) को मनमें लीन करे, उसे ज्ञान-आत्मा (बुद्धि) में लीन करे, ज्ञानको महान् आत्मामें लीन करे, और उसे शान्त आत्मामें लीन करे।
यह अंश स्पष्ट करता है कि बुद्धिमान साधक सबसे पहले वाणी (इन्द्रियों) को मन में, फिर मन को ज्ञान-आत्मा (बुद्धि) में, फिर उसे महान् आत्मा में और अंततः शान्त आत्मा में लीन करता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और कठोपनिषद् दोनों का मत एक ही है—साधना का मार्ग 'स्थूल से सूक्ष्म' की ओर है। जहाँ कठोपनिषद् में 'शान्त आत्मा' तक की यात्रा है, वहीं याज्ञवल्क्य ऋषि इस स्मृति में उसे 'प्रकृति' और फिर 'पुरुष' के विलीनीकरण के रूप में और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं।
योग-रहस्य —
योग की दृष्टि से यह श्लोक 'प्रतिप्रसव' का अभ्यास है। प्रकृति ने पुरुष से सृष्टि का विस्तार किया—पुरुष से प्रकृति, प्रकृति से अहंकार, अहंकार से बुद्धि, बुद्धि से मन और मन से इन्द्रियाँ बनीं। ध्यान इसी विकास-क्रम को उल्टा करने की कला है।
साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह विषयों का दास नहीं, बल्कि उनका स्वामी है। जब वह विषयों को बुद्धि में निवेश करता है, तो वह 'विषय-निरोध' की भूमि पर आता है। जब वह मन और अहंकार को प्रकृति में विलीन करता है, तो वह 'अहंकार-शून्यता' की स्थिति में पहुँचता है।
अभ्यास यह है कि साधक अपनी चेतना को एक संकीर्ण बिंदु की तरह ले जाए। पहले बाहरी शोर (विषय) को शांत कर उसे बुद्धि के पर्दे पर स्थिर करे, फिर उस बुद्धि और मन के स्पंदन को प्रकृति की निस्तब्धता में विलीन कर दे। यह अभ्यास साधक को 'बहिर्मुखी' से 'अंतर्मुखी' बनाता है। इस श्लोक का वास्तविक अनुभव तब होता है जब साधक को यह बोध हो कि उसका शरीर और मन केवल प्रकृति के खेल हैं, और वह स्वयं इन सबका साक्षी है।
प्रधानं पुरुषे योज्यं स न्यासः परिकीर्तितः ।
इन्द्रियेभ्यः परे ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः ॥ ९.१८४ ॥
और प्रकृतिको पुरुषमें जोड़े — वह न्यास कहा गया है। (कठ १.३.१०:) इन्द्रियोंसे परे विषय हैं, विषयोंसे परे मन,
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ध्यान के प्रथम सोपान के रूप में इन्द्रियों, विषयों, मन, बुद्धि और अहंकार को प्रकृति में विलीन करने की विधि बताई थी। अब इस श्लोक में वे इस लय-प्रक्रिया के अंतिम लक्ष्य और उसके शास्त्रीय आधार का उद्घाटन कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
प्रधानं पुरुषे योज्यं स न्यासः परिकीर्तितः । इन्द्रियेभ्यः परे ह्यर्था अर्थेभ्यः परमं मनः।
पदार्थ:
• प्रधानं — प्रकृति, मूल माया या वह जड़ शक्ति जिससे समस्त प्रपंच उत्पन्न हुआ है।
• पुरुषे — शुद्ध चैतन्य, आत्मा या दृष्टा में।
• योज्यं — जोड़ना चाहिए, विलीन करना चाहिए या स्थापित करना चाहिए।
• स न्यासः — वह (प्रक्रिया) 'न्यास' है। यहाँ न्यास का अर्थ किसी मन्त्र को शरीर के अंगों पर स्थापित करना नहीं, अपितु समस्त प्रकृतिको पुरुष में समर्पित कर देना है।
• परिकीर्तितः — कहा गया है या परिभाषित किया गया है।
• इन्द्रियेभ्यः परे — इन्द्रियों से परे।
• ह्यर्था — विषय (अर्थ) हैं। (यहाँ 'ह' अव्यय बल देने के लिए है)।
• अर्थेभ्यः परमं — विषयों से परे/ऊपर।
• मनः — मन है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य 'न्यास' शब्द को एक नवीन और गहन योगिक अर्थ दे रहे हैं। सामान्यतः न्यास का अर्थ मन्त्रों के द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों का पवित्रीकरण करना होता है, किन्तु यहाँ महर्षि उसे 'लय' की पराकाष्ठा के रूप में परिभाषित कर रहे हैं।
वे कहते हैं कि जब साधक अपनी समस्त प्रकृतिको—जिसमें इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार और पंचमहाभूत सम्मिलित हैं—उस शुद्ध पुरुष (आत्मा) में विलीन कर देता है, तो इस अंतिम योग को 'न्यास' कहा जाता है। यह वह स्थिति है जहाँ जड़ (प्रधान) और चेतन (पुरुष) का भेद समाप्त हो जाता है और साधक केवल दृष्टा भाव में प्रतिष्ठित हो जाता है। प्रकृतिको पुरुष में जोड़ना ही वास्तव में स्वयं को अपने मूल स्रोत में विलीन करना है।
श्लोक के दूसरे भाग में ऋषि कठोपनिषद् के उस महान सत्य का उद्धरण आरम्भ कर रहे हैं, जो चेतना के सोपानों को स्पष्ट करता है। वे कहते हैं कि इन्द्रियों से परे 'अर्थ' (विषय) होते हैं। यह सुनने में विचित्र लग सकता है कि इन्द्रियाँ विषयों से पहले आती हैं, किन्तु योगिक दृष्टि से इन्द्रियाँ केवल द्वार हैं; उन द्वारों के पीछे विषयों का अनंत संसार है। फिर उन विषयों से परे 'मन' की स्थिति है, जो इन सबको नियंत्रित और ग्रहण करता है। यह क्रम साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'समर्पण' और 'लय' का अभ्यास है। यहाँ 'न्यास' का अर्थ है—अन्तिम समर्पण। साधक जब ध्यान में बैठता है, तो वह केवल बाहरी शोर को नहीं रोकता, अपितु अपनी पूरी प्रकृति (स्वभाव, वृत्तियाँ, प्रवृत्तियाँ) को पुरुष में रख देता है।
अभ्यास की दृष्टि से यह 'प्रतिनिवृत्ति' का मार्ग है। सामान्यतः हम पुरुष (आत्मा) से निकलकर प्रकृति (विषयों) की ओर जाते हैं—यही बंधन है। यहाँ महर्षि इसके विपरीत निर्देश दे रहे हैं: विषयों को मन में, मन को बुद्धि में, बुद्धि को प्रकृति में और अंततः पूरी प्रकृति को पुरुष में विलीन करना। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मैं यह शरीर नहीं, यह मन नहीं, यह प्रकृति नहीं, अपितु वह शुद्ध पुरुष हूँ जिसमें यह सब विलीन हो गया", तब वह न्यास की भूमि पर पहुँचता है। यह अभ्यास साधक को 'अहंकार-शून्यता' की ओर ले जाता है, जहाँ केवल चैतन्य का प्रकाश शेष रहता है।
मनसश्च परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ।
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ॥ ९.१८५ ॥
मनसे परे बुद्धि, बुद्धिसे परे महान् आत्मा; महत्से परे अव्यक्त, अव्यक्तसे परे पुरुष —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इन्द्रियों और विषयों के लय के साथ 'न्यास' की परिभाषा दी थी। अब इस श्लोक में वे उस सूक्ष्म सोपान-क्रम को स्पष्ट कर रहे हैं, जिसके माध्यम से साधक स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए अंततः पुरुष (शुद्ध चैतन्य) में स्थित होता है।
अन्वय और पदार्थ —
मनसः परा बुद्धिः, बुद्धेः आत्मा महान् परः । महतः परमव्यक्तम्, अव्यक्तात् पुरुषः परः ॥
पदार्थ:
• मनसः परा — मन से परे (सूक्ष्म)।
• बुद्धिः — निश्चय करने वाली शक्ति या धृति।
• बुद्धेः आत्मा महान् — बुद्धि से परे 'महान् आत्मा' (महत् तत्व)।
• परः — श्रेष्ठ या अधिक सूक्ष्म।
• महतः परमव्यक्तम् — महत् (महान् आत्मा) से परे 'अव्यक्त' (मूल प्रकृति)।
• अव्यक्तात् पुरुषः परः — अव्यक्त से परे 'पुरुष' (शुद्ध दृष्टा/चैतन्य) है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी सृष्टि के निर्माण के विपरीत, विसर्जन या लय के मार्ग का मानचित्र प्रस्तुत कर रहे हैं। यह श्लोक पिछले श्लोक (९.१८४) में आरम्भ हुए वाक्य का विस्तार है, जो अगले श्लोक (९.१८६) में 'पुरुषान्न परं किञ्चित्' कहकर पूर्ण होता है।
यहाँ 'पर' शब्द का अर्थ मूल्य की ऊँच-नीच या श्रेष्ठ-हीनता से नहीं, अपितु सूक्ष्मता और कारणता के क्रम से है। जिस प्रकार फल का कारण फूल है और फूल का कारण बीज, उसी प्रकार साधक को अपनी चेतना को वापस उसके मूल कारण की ओर ले जाना है।
ऋषि समझाते हैं कि हमारी चेतना का सबसे बाहरी स्तर 'मन' है, जो चंचल और विषय-आसक्त है। जब साधक मन को स्थिर करता है, तब वह पाता है कि मन से अधिक सूक्ष्म और स्थिर 'बुद्धि' है। बुद्धि वह प्रकाश है जिसमें मन के विचार प्रतिबिम्बित होते हैं। बुद्धि के और ऊपर 'महान् आत्मा' (महत्) है—यह वह ब्रह्मांडीय बुद्धि है जहाँ व्यक्तिगत अहंकार का विलीनीकरण आरम्भ होता है। महत् से भी सूक्ष्म 'अव्यक्त' है, जो वह बीज-अवस्था है जहाँ समस्त प्रपंच सुप्त अवस्था में रहते हैं। और इस अव्यक्त (जड़ प्रकृति) से भी परे, जो उसका साक्षी है, वह 'पुरुष' है।
यह क्रम वास्तव में ध्यान की वह प्रक्रिया है जिसमें साधक अपनी पहचान को धीरे-धीरे सूक्ष्म करता जाता है। पहले वह स्वयं को मन से अलग करता है, फिर बुद्धि से, फिर महत् और अव्यक्त से, जब तक कि वह केवल 'पुरुष' (शुद्ध चैतन्य) के रूप में शेष नहीं रह जाता।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक ध्यान की 'सीढ़ी' है। अभ्यास के समय साधक को इस क्रम का अनुभव करना होता है:
१. मन का निरोध: सबसे पहले चंचल मन को बुद्धि के प्रकाश में स्थिर करना।
२. बुद्धि का विलीनीकरण: जब बुद्धि स्थिर हो जाए, तब उसे 'महत्' (उस विराट चेतना) में विलीन करना, जहाँ 'मैं' और 'मेरा' का बोध मिटने लगता है।
३. अव्यक्त में लय: महत् के लय होने पर साधक उस शून्य या अव्यक्त अवस्था का अनुभव करता है, जहाँ कोई गुण या विकार शेष नहीं रहता।
४. पुरुष में स्थिति: अंततः अव्यक्त के पर्दे के हटने पर वह शुद्ध 'पुरुष' (साक्षी) के रूप में स्थित हो जाता है।
यह अभ्यास साधक को 'अहंकार' की भूमि से उठाकर 'साक्षी' की भूमि पर ले जाता है। जब साधक यह अनुभव करता है कि "मैं मन नहीं हूँ, मैं बुद्धि भी नहीं हूँ, मैं अव्यक्त भी नहीं हूँ, मैं केवल वह पुरुष हूँ", तब वह वास्तव में ध्यान की उस अवस्था में पहुँचता है जिसे 'न्यास' कहा गया है। यह स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने वाली वह यात्रा है, जो अंततः साधक को उसके वास्तविक स्वरूप से मिलाती है।
पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ।
ऐशान्यभिमुखो भूत्वा उपविश्याऽऽसने शुभे ॥ ९.१८६ ॥
— पुरुषसे परे कुछ नहीं; वह सीमा है, वह परम गति है। (फिर) ईशान (उत्तर-पूर्व) की ओर मुँह करके, शुभ आसनपर बैठकर —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चेतना के स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने वाले सोपान-क्रम का वर्णन किया था, जिसमें मन, बुद्धि, महत् और अव्यक्त के पार पुरुष की स्थिति बताई गई। वर्तमान श्लोक उस सूक्ष्म यात्रा की चरम परिणति और उसके पश्चात ध्यान की व्यावहारिक विधि के आरम्भ को दर्शाता है।
अन्वय और पदार्थ —
पुरुषान्न परं किञ्चित्, सा काष्ठा, सा परा गतिः । ऐशान्यभिमुखो भूत्वा, शुभे आसने उपविश्यात् ॥
पदार्थ:
• पुरुषान्न परं किञ्चित् — पुरुष (शुद्ध चैतन्य) से परे और कुछ भी नहीं है।
• सा काष्ठा — वही अंतिम सीमा (अंतिम लक्ष्य) है।
• सा परा गतिः — वही परम गति (अंतिम गंतव्य) है।
• ऐशान्यभिमुखो भूत्वा — ईशान दिशा (उत्तर-पूर्व) की ओर मुख होकर।
• उपविश्यात् — बैठे (विधि लिंग)।
• शुभे आसने — शुभ आसन पर।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक का प्रथम चरण पिछले श्लोक (९.१८५) में आरम्भ हुए लय-क्रम का उपसंहार है। ऋषि स्पष्ट करते हैं कि जब साधक मन को बुद्धि में, बुद्धि को महत् में, महत् को अव्यक्त में और अव्यक्त को पुरुष में विलीन कर देता है, तब वह उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ 'पुरुष' के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता।
'पुरुषान्न परं किञ्चित्' का अर्थ है कि पुरुष ही वह अंतिम सत्य है जिसके पार जाने के लिए कोई और मार्ग या कोई और सत्ता नहीं है। इसे 'काष्ठा' कहा गया है। 'काष्ठा' का शाब्दिक अर्थ है लकड़ी का अंतिम सिरा या सीमा। जिस प्रकार एक डोरी का अंतिम सिरा उसे थामे रखता है, उसी प्रकार यह शुद्ध चैतन्य समस्त अस्तित्व की अंतिम सीमा है। यही 'परा गति' है—वह स्थिति जहाँ पहुँचकर गति (चंचलता) समाप्त हो जाती है और केवल स्थिरता शेष रहती है। यह वह अवस्था है जहाँ दृष्टा और दृश्य का भेद मिट जाता है और साधक स्वयं के स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
जब यह सैद्धांतिक समझ (कि पुरुष ही परम लक्ष्य है) घटित हो जाती है, तब ऋषि ध्यान की बाह्य विधि का निर्देश देते हैं। यहाँ से ध्यान का व्यावहारिक पक्ष आरम्भ होता है। याज्ञवल्क्य जी निर्देश देते हैं कि साधक 'ऐशान्य' अर्थात् ईशान दिशा की ओर मुख करके बैठे। ईशान दिशा उत्तर और पूर्व का संगम है। पूर्व सूर्य (प्रकाश) का और उत्तर स्थिरता का प्रतीक है। यह दिशा आध्यात्मिक जागरण और ज्ञान के उदय की दिशा मानी जाती है।
'शुभ आसने' का अर्थ केवल भौतिक स्वच्छता नहीं, अपितु ऐसा आसन है जो शरीर को स्थिरता दे और मन को एकाग्र करने में सहायक हो। शुभ आसन वह है जो न तो अत्यधिक कठोर हो कि शरीर में पीड़ा हो, और न ही इतना कोमल कि निद्रा आ जाए। इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि ध्यान केवल एक मानसिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें शरीर, दिशा और वातावरण का सामंजस्य भी आवश्यक है, ताकि सूक्ष्म चेतना का आरोहण निर्बाध हो सके।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'सिद्धांत' से 'साधना' की ओर संक्रमण का बिंदु है। पहले तीन पदों में साधक यह अनुभव करता है कि वह जिस पुरुष की खोज कर रहा है, वह उससे अलग नहीं है, बल्कि उसकी अपनी चेतना की अंतिम सीमा है। यह बोध साधक को 'साक्षी भाव' की भूमि पर ले जाता है।
जब साधक ईशान दिशा की ओर मुख करता है, तो वह वास्तव में अपने भीतर के 'ईशान' (परमेश्वर) की ओर उन्मुख होता है। दिशा का चयन मन को एक विशेष अनुशासन में बांधने का साधन है। शुभ आसन पर बैठना इस बात का संकेत है कि शरीर को अब एक 'यज्ञ-वेदी' की भाँति स्थिर करना है, जिस पर ध्यान की अग्नि प्रज्वलित की जा सके।
यहाँ साधक 'अव्यक्त' से 'पुरुष' की ओर जाने के बाद, पुनः शरीर के माध्यम से उस पुरुष को अनुभव करने की तैयारी करता है। यह एक पूर्ण चक्र है—बाहर से भीतर जाना और भीतर स्थित होकर पुनः बाह्य अनुशासन (आसन, दिशा) के माध्यम से उस आंतरिक सत्य को स्थिर करना। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर की सीमाओं से निकालकर सूक्ष्म चैतन्य की उस 'परा गति' की ओर ले जाता है, जहाँ केवल शुद्ध प्रकाश और शांति है।
नात्युच्छ्रिते नातिनीचे चैलाजिनकुशोत्तरे ।
तत्रोपविश्य सुमु(सु)खं गुरुं चादौ नमस्य च ॥ ९.१८७ ॥
— जो न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, वस्त्र, मृगचर्म और कुशसे बना हो; वहाँ सुखसे बैठकर, पहले गुरुको नमस्कार करके —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने ध्यान के लिए ईशान दिशा का निर्देश देते हुए 'शुभ आसन' पर बैठने का विधान बताया था। वर्तमान श्लोक उसी शुभ आसन के भौतिक स्वरूप और ध्यान के आरम्भ से पूर्व की अनिवार्य मानसिक तैयारी का विवरण देता है।
अन्वय और पदार्थ —
आसनं नात्युच्छ्रिते न च अतिनीचे (भवेत्), (तत्) चैल-अजिन-कुशोत्तरे (आसने) सुमुखं उपविश्य, आदौ गुरुं च नमस्य च ॥
पदार्थ:
• नात्युच्छ्रिते नातिनीचे — न बहुत ऊँचा (अति उच्च) और न ही बहुत नीचा (अति निम्न)।
• चैलाजिनकुशोत्तरे — वस्त्र (चैल), मृगचर्म (अजिन) और कुश (कुश) के ऊपर स्थित।
• सुमुखं — सुखपूर्वक, सहज भाव से।
• उपविश्य — बैठकर।
• गुरुं चादौ नमस्य च — और आरम्भ में गुरु को नमस्कार करे।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ ध्यान की बाहरी विधि का वर्णन है, किंतु यह विधि केवल शारीरिक सुविधा के लिए नहीं, अपितु सूक्ष्म ऊर्जा के संतुलन के लिए है। महर्षि याज्ञवल्क्य निर्देश देते हैं कि साधक का आसन 'नात्युच्छ्रिते नातिनीचे' होना चाहिए। यदि आसन बहुत ऊँचा हो, तो उसमें अहंकार और उद्वेग की संभावना रहती है; यदि बहुत नीचा हो, तो आलस्य और तामसिकता हावी होती है। अतः मध्य स्थिति, जो संतुलन का प्रतीक है, ध्यान के लिए अनिवार्य है।
आसन की सामग्री के रूप में 'चैल-अजिन-कुश' का क्रम बताया गया है। सबसे नीचे कुश (जो पृथ्वी की ऊर्जा को नियंत्रित करता है), उसके ऊपर मृगचर्म (जो साधक की एकाग्रता और स्थिरता को बढ़ाता है) और अंत में वस्त्र (जो शरीर को सहजता प्रदान करता है) होना चाहिए। यह त्रि-स्तरीय संरचना साधक को पृथ्वी के स्थूल प्रभाव से अलग कर सूक्ष्म धरातल पर प्रतिष्ठित करती है।
'सुमुखं उपविश्य' का अर्थ है कि शरीर में कोई तनाव न हो। जब साधक सहजता से बैठता है, तभी प्राणों का प्रवाह सुगम होता है। आसन की स्थिरता के पश्चात ऋषि एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश देते हैं—'गुरुं चादौ नमस्य च'। ध्यान की गहन प्रक्रिया में प्रवेश करने से पूर्व गुरु को नमस्कार करना केवल एक शिष्टाचार नहीं, अपितु अपनी व्यक्तिगत बुद्धि (अहंकार) को गुरु-तत्त्व में विलीन करने की क्रिया है। जब साधक गुरु के चरणों में नतमस्तक होता है, तब वह अपने भीतर के 'शिष्य' भाव को जाग्रत करता है, जिससे वह उस ज्ञान को ग्रहण करने के योग्य बनता है जो केवल श्रुति और अनुभव से प्राप्त होता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ६.११ ॥
पवित्र स्थानमें, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा, (नीचेसे) कुश, मृगचर्म और वस्त्र बिछाया हुआ अपना स्थिर आसन स्थापित करके —
यह श्लोक शब्दशः श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से मेल खाता है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने 'शुचौ देशे' (पवित्र स्थान) के साथ 'नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्' आसन का विधान बताया है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और गीता दोनों का यहाँ एक ही मत है कि ध्यान के लिए भौतिक आधार (आसन) का संतुलित और शुद्ध होना आवश्यक है, क्योंकि शरीर की स्थिरता के बिना मन की स्थिरता संभव नहीं है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थिरता' और 'समर्पण' का अभ्यास है। आसन का न ऊँचा होना न नीचा होना, वास्तव में साधक की मानसिक स्थिति का प्रतिबिंब है—जहाँ न तो अति-उत्साह (ऊँचाई) हो और न ही निराशा (नीचाई), केवल 'समत्व' हो।
गुरु-नमस्कार का योगिक रहस्य यह है कि ध्यान के समय जब साधक अपनी इन्द्रियों को अंतर्मुख करता है, तब उसके भीतर अनेक संस्कार और विचार उठते हैं। गुरु का स्मरण एक 'मानसिक लंगर' की भाँति कार्य करता है, जो साधक को भटकने से रोकता है। गुरु के प्रति कृतज्ञता का भाव हृदय के द्वार खोलता है, जिससे साधक सहजता से उस 'सुमुख' अवस्था में पहुँच जाता है जहाँ से वह आगामी श्लोकों में वर्णित दीर्घ प्रणव और पद्मासन के अभ्यास की ओर बढ़ सके। यह क्रिया साधक को 'बाहरी जगत' से हटाकर 'आंतरिक जगत' की दहलीज पर खड़ा कर देती है।
पद्मासनं च बध्वा वै दीर्घं प्रणवमुच्चरेत् ।
ऊरुस्थोत्तानचरणः सव्ये न्यस्येतरं करम् ॥ ९.१८८ ॥
— और पद्मासन बाँधकर दीर्घ प्रणवका उच्चारण करे; जाँघोंपर उत्तान (ऊपर तलवोंवाले) पैर रखकर, बायें (हाथ) पर दूसरा हाथ रखे;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में ध्यान के लिए शुभ आसन की सामग्री और गुरु-वंदन का विधान बताया गया था। वर्तमान श्लोक उस आसन की विशिष्ट शारीरिक मुद्रा और ध्वनि-साधना के आरम्भ का निर्देश देता है।
अन्वय और पदार्थ —
पद्मासनं च बध्वा वै, ऊरुस्थोत्तानचरणः (भूत्वा), सव्ये (हस्ते) इतरं करम् न्यस्य, दीर्घं प्रणवमुच्चरेत् ॥
पदार्थ:
• पद्मासनं बध्वा — पद्मासन (कमल मुद्रा) को बाँधकर।
• दीर्घं प्रणवमुच्चरेत् — दीर्घ (लंबा और गहरा) प्रणव (ओंकार) का उच्चारण करे।
• ऊरुस्थोत्तानचरणः — ऊरु (जाँघों) पर उत्तान (ऊपर की ओर मुड़े हुए तलवों वाले) चरण रखकर।
• सव्ये न्यस्य इतरं करम् — सव्य (बायें हाथ) पर दूसरा हाथ रखकर।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ ध्यान की उस शारीरिक स्थिरता का वर्णन है जो मन की स्थिरता का आधार बनती है। महर्षि याज्ञवल्क्य निर्देश देते हैं कि साधक 'पद्मासनं बध्वा' अर्थात् पद्मासन में स्थित हो। इस मुद्रा में दोनों पैर जाँघों पर इस प्रकार बंधे होते हैं कि तलवे ऊपर की ओर (उत्तान) रहते हैं। यह केवल एक शारीरिक स्थिति नहीं है, अपितु शरीर के निचले द्वारों को बंद कर ऊर्जा को ऊपर की ओर मोड़ने की एक विधि है। जब शरीर 'ऊरुस्थोत्तानचरणः' की स्थिति में स्थिर होता है, तब साधक का भौतिक आधार सुदृढ़ हो जाता है, जिससे वह लंबे समय तक बिना विचलित हुए ध्यान में लीन रह सकता है।
हाथों की स्थिति के लिए 'सव्ये न्यस्य इतरं करम्' कहा गया है। इसका अर्थ है कि दाहिने हाथ को बायें हाथ के ऊपर रखना। यह विन्यास शरीर के भीतर प्राणों के प्रवाह को संतुलित करता है और एक ऐसा बंद परिपथ बनाता है जिससे आंतरिक शक्ति बाहर विसरित नहीं होती।
जैसे ही शरीर इस पूर्ण स्थिरता को प्राप्त करता है, उसी क्षण 'दीर्घं प्रणवमुच्चरेत्' का निर्देश दिया गया है। यहाँ 'दीर्घ' शब्द महत्वपूर्ण है। यह केवल लंबा स्वर नहीं, अपितु वह उच्चारण है जो प्राण के पूर्ण विस्तार के साथ हो। प्रणव (ॐ) का उच्चारण शरीर, प्राण और मन को एक सूत्र में पिरो देता है। जब साधक पद्मासन की स्थिरता और प्रणव की ध्वनि को एक साथ लाता है, तब स्थूल शरीर और सूक्ष्म वाणी का समन्वय हो जाता है। यह उच्चारण साधक को बाहरी जगत के शोर से हटाकर अंतर्जगत की गहराई में ले जाने वाला सेतु है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ अभ्यास यह है कि वह शरीर और वाणी को एक साथ स्थिर करना सीखे। सामान्यतः मनुष्य का शरीर स्थिर होता है तो मन विचलित रहता है, और यदि मन को स्थिर करने का प्रयास करता है तो शरीर में व्याकुलता आती है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य ने 'आसन' (शरीर) और 'प्रणव' (वाणी/प्राण) का एक साथ प्रयोग बताया है।
पद्मासन शरीर को 'अचल' बनाता है और दीर्घ प्रणव मन को 'एकत्र' करता है। जब साधक जाँघों पर तलवों को ऊपर रखकर बैठता है और बायें हाथ पर दायाँ हाथ रखता है, तो वह स्वयं को एक 'यज्ञ-कुण्ड' की भाँति परिवर्तित कर लेता है। अब इस कुण्ड में 'दीर्घ प्रणव' वह अग्नि है जो साधक के भीतर के विकारों को भस्म कर उसे उच्च भूमि की ओर ले जाती है। यह अभ्यास साधक को स्थूल शरीर की सीमाओं से मुक्त कर उसे उस स्थिति में लाता है जहाँ वह आगामी श्लोकों में वर्णित 'पाषाण इव निश्चल' होने की क्षमता प्राप्त कर सके। यहाँ आसन और ध्वनि का संयोग ही ध्यान की वास्तविक देहली है।
उत्तानं किञ्चिदुन्नाम्य मुखं विष्टभ्य चोरसा ।
निमीलिताक्षः सत्त्वस्थो दन्तैर्दन्तान्न संस्पृशेत् ॥ ९.१८९ ॥
मुँह थोड़ा ऊपर उठाकर, छातीसे (शरीरको) थामे, आँखें मूँदे, सत्त्वमें स्थित होकर, दाँतोंसे दाँतोंको न छुए;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में पद्मासन की मुद्रा, हाथों के विन्यास और दीर्घ प्रणव के उच्चारण का विधान बताया गया था। वर्तमान श्लोक ध्यान की उस सूक्ष्म शारीरिक स्थिति का निर्देश देता है, जहाँ शरीर के ऊपरी अंगों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि प्राण का प्रवाह अबाध रहे और मन अंतर्मुखी हो सके।
अन्वय और पदार्थ —
मुखं किञ्चिदुत्तानं (कृत्वा), चोरसा (शरीरं) विष्टभ्य, अक्षि निमीलितः, सत्त्वस्थो भूत्वा, दन्तैर्दन्तान् न संस्पृशेत् ॥
पदार्थ:
• उत्तानं किञ्चिद् — थोड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ।
• मुखं — चेहरे या मस्तक को।
• विष्टभ्य — थामकर, स्थिर करके या सहारा देकर।
• चोरसा — वक्ष (छाती) से।
• निमीलिताक्षः — मूँदी हुई आँखों वाला।
• सत्त्वस्थो — सत्त्व गुण में स्थित होकर (शुद्ध, शांत और प्रकाशमय अवस्था में)।
• दन्तैर्दन्तान् न संस्पृशेत् — दाँतों से दाँतों का स्पर्श न होने दे।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ ध्यान की उस सूक्ष्म शारीरिक सजगता का वर्णन है, जो स्थूल आसन और सूक्ष्म ध्यान के बीच की कड़ी है। महर्षि याज्ञवल्क्य निर्देश देते हैं कि साधक 'उत्तानं किञ्चिदुन्नाम्य मुखं' अर्थात् अपने मुख को थोड़ा ऊपर की ओर उठाए। जब गर्दन और मस्तक का झुकाव हल्का ऊपर की ओर होता है, तब श्वास-मार्ग (श्वसन-नली) पूरी तरह खुल जाता है और रीढ़ की हड्डी का ऊपरी हिस्सा सीधा हो जाता है, जिससे प्राण का आरोहण सुगम होता है।
'चोरसा विष्टभ्य' का भाव है कि शरीर को वक्ष (छाती) से थामे। यहाँ 'विष्टभ्य' का अर्थ केवल शारीरिक सहारा नहीं, अपुतु वक्षस्थल में एक प्रकार की सजग स्थिरता लाना है। जब साधक अपनी छाती को प्रसारित और स्थिर रखता है, तब हृदय-आकाश में स्थित उस 'पुरुष' के लिए स्थान निर्मित होता है, जिसका दर्शन इस ध्यान का लक्ष्य है। यह स्थिति साधक को आलस्य और निद्रा से बचाती है।
'निमीलिताक्षः' का अर्थ है आँखें मूँद लेना। बाहरी जगत के विषयों को रोकने के लिए नेत्रों का बंद होना आवश्यक है, ताकि दृष्टि बाहर के दृश्य-जगत से हटकर भीतर के प्रकाश की ओर मुड़ सके। परंतु यह केवल पलकों का बंद होना नहीं है, बल्कि दृष्टि का अंतर्मुखी होना है।
साधक को 'सत्त्वस्थो' होना चाहिए। सत्त्व गुण वह अवस्था है जहाँ मन शांत, निर्मल और प्रकाशमय होता है। यदि मन रजोगुण (चंचलता) या तमोगुण (जड़ता/नींद) में होगा, तो शारीरिक मुद्रा सही होने पर भी ध्यान नहीं लगेगा। अतः शारीरिक स्थिरता के साथ मानसिक शुद्धि (सत्त्व) का होना अनिवार्य है।
अंत में, 'दन्तैर्दन्तान् न संस्पृशेत्' का निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है। दाँतों को आपस में सटाकर रखने से जबड़े में तनाव पैदा होता है, जो धीरे-धीरे मस्तिष्क की नसों में तनाव उत्पन्न करता है और मन को विचलित करता है। दाँतों के बीच सूक्ष्म अंतराल रखने से मुखमंडल शिथिल रहता है, जिससे साधक गहरे विश्राम और एकाग्रता की स्थिति में उतर पाता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
शारीरिक स्थिरता के इसी सिद्धांत का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है:
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ ६.१३ ॥
शरीर, सिर और गर्दनको सीधा और अचल धारण करके, स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता हुआ, दिशाओंको न देखता हुआ —
'समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥'
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और अचल रखने का निर्देश देते हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में 'मुखं उत्तानं' और 'चोरसा विष्टभ्य' के माध्यम से उसी 'समं शिरोग्रीवं' (सीधे सिर और गर्दन) की स्थिति को और अधिक सूक्ष्मता से समझाया गया है। जहाँ गीता में नासिकाग्र-दृष्टि का उल्लेख है, वहीं यहाँ 'निमीलिताक्षः' (बंद आँखें) कहा गया है। ये दोनों भिन्न विधियाँ हैं—एक में दृष्टि को एक बिंदु पर टिकाकर मन को स्थिर किया जाता है, और दूसरी में दृष्टि को पूरी तरह अंतर्मुखी कर लिया जाता है। दोनों का उद्देश्य एक ही है: शरीर की पूर्ण स्थिरता के माध्यम से मन का निरोध।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'बाह्य स्थिरता से आंतरिक स्थिरता' की यात्रा है। योग का रहस्य यह है कि जैसा शरीर होता है, वैसा ही मन होता है। यदि जबड़ा भिंचा हुआ है या गर्दन झुकी हुई है, तो मन में संकुचन और भारीपन रहेगा।
जब साधक मुख को थोड़ा ऊपर उठाता है और दाँतों को अलग रखकर जबड़े को ढीला छोड़ता है, तो वह शरीर के ऊपरी हिस्से से सभी प्रकार के तनाव को मुक्त कर देता है। यह 'शिथिलता' ही वास्तव में 'स्थिरता' का द्वार है। जब शरीर का कोई भी अंग तनावपूर्ण नहीं रहता, तब प्राण बिना किसी अवरोध के हृदय-कमल की ओर प्रवाहित होता है।
'सत्त्वस्थो' होने का अभ्यास यह है कि साधक अपनी श्वास के साथ यह अनुभव करे कि वह केवल एक शरीर नहीं, बल्कि एक प्रकाशमय चैतन्य है। इस मुद्रा में साधक अपनी चेतना को वक्षस्थल (हृदय) में केंद्रित करता है, जहाँ वह उस 'अचल दीप' के दर्शन की तैयारी करता है। यह शारीरिक विन्यास साधक को 'भुक्ति' (सांसारिक सुख) से हटाकर 'मुक्ति' (आंतरिक प्रकाश) की भूमि पर ले जाता है।
तालुस्थाऽचलजिह्वश्च संवृतास्यः सुनिश्चलः ।
संनियम्येन्द्रियग्रामं पाषाण इव निश्चलः ॥ ९.१९० ॥
जीभ तालुमें अचल स्थित हो, मुख बन्द हो, अत्यन्त निश्चल हो; इन्द्रियसमूहको संयत करके पत्थरकी भाँति अचल (होकर) —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में मुख की स्थिति, आँखों के बंद होने और दाँतों के परस्पर स्पर्श न करने का विधान बताया गया था। वर्तमान श्लोक उस शारीरिक स्थिरता की पराकाष्ठा का निर्देश देता है, जहाँ बाह्य इंद्रियों के द्वार पूरी तरह बंद होकर प्राण और मन का प्रवाह अंतर्मुखी हो जाता है।
अन्वय और पदार्थ —
जिह्वः तालुस्था अचलः च (भवतु), अस्यः संवृताः (भवतु), (साधकः) सुनिश्चलः (भवतु), इन्द्रियग्रामं संनियम्य, पाषाण इव निश्चलः (तिष्ठेत्) ॥
पदार्थ:
• तालुस्था — तालु (मुख की ऊपरी छत) पर स्थित।
• अचलजिह्वः — जिसकी जीभ स्थिर हो, हिलने-डुलने वाली न हो।
• संवृतास्यः — जिसका मुख बन्द हो।
• सुनिश्चलः — जो पूरी तरह से स्थिर हो, जिसमें कोई कंपन या हलचल न हो।
• संनियम्य — पूरी तरह संयमित करके, नियम में बाँधकर।
• इन्द्रियग्रामम् — इंद्रियों के समूह को (ग्राम का अर्थ समूह या समूहबद्धता है)।
• पाषाण इव — पत्थर की भाँति।
• निश्चलः — अचल, स्थिर।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में यहाँ ध्यान की उस अवस्था का वर्णन है जिसे 'काया-स्थैर्य' कहा जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य निर्देश देते हैं कि 'तालुस्थाऽचलजिह्वश्च' अर्थात् जीभ तालु पर अचल स्थित हो। जीभ का तालु से स्पर्श केवल एक शारीरिक मुद्रा नहीं है, अपितु यह वाणी के प्रस्थान-द्वार को रोकने की विधि है। जब जीभ स्थिर होती है, तब शब्द-प्रवाह रुक जाता है और साधक बाह्य संवाद से हटकर आंतरिक संवाद की ओर अग्रसर होता है।
'संवृतास्यः' का अर्थ है मुख बन्द रहना। मुख का बन्द होना इस बात का प्रतीक है कि अब साधक को बाहरी जगत से किसी भी प्रकार के आहार (शब्द, गंध, स्वाद) की आवश्यकता नहीं है। वह अपने भीतर के अमृत और प्राण का पान करने के लिए तैयार है। जब मुख बन्द होता है और जीभ स्थिर होती है, तब श्वास की गति अत्यंत सूक्ष्म और लयबद्ध हो जाती है, जो अगले श्लोक में बताए जाने वाले प्राणायाम के लिए अनिवार्य आधार है।
'संनियम्येन्द्रियग्रामं' का भाव है कि केवल शरीर को स्थिर करना पर्याप्त नहीं है, अपितु इंद्रियों के पूरे समूह (ग्राम) को संयमित करना होगा। इंद्रियाँ स्वभाव से चंचल हैं और वे सदैव बाहर की ओर भागती हैं। 'संनियम्य' का अर्थ है उन्हें उनकी विषय-वासनाओं से हटाकर एक सूत्र में बाँध लेना। जब इंद्रियाँ अपने विषयों का त्याग कर बुद्धि में विलीन होने लगती हैं, तब साधक 'सुनिश्चलः' अर्थात् पूर्णतः स्थिर हो जाता है।
अन्त में ऋषि कहते हैं— 'पाषाण इव निश्चलः'। पत्थर की भाँति अचल होने का अर्थ यह नहीं है कि शरीर जड़ हो जाए, अपितु यह कि शरीर की चेतना इतनी गहरी हो जाए कि बाहरी स्पर्श, ध्वनि या आंतरिक शारीरिक संवेदनाएँ साधक की एकाग्रता को भंग न कर सकें। यह वह स्थिति है जहाँ स्थूल शरीर का बोध समाप्त होने लगता है और केवल प्राण का स्पंदन शेष रहता है। यह स्थिरता ही वह सेतु है जो साधक को भौतिक शरीर से उठाकर हृदय के उस दीप की ओर ले जाती है, जिसका वर्णन आगामी श्लोकों में है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास 'मौन' के शारीरिक स्वरूप का अभ्यास है। जीभ का तालु पर स्थिर होना 'वाणी के मौन' का शरीर है। जब जीभ हिलती है, तो मन भी शब्दों के जाल में उलझा रहता है; जीभ के अचल होते ही मन की चंचलता कम होने लगती है।
यहाँ 'पाषाण इव' (पत्थर की भाँति) होने का अनुभव साधक को 'स्थिरता' की भूमि से 'लय' की भूमि की ओर ले जाता है। जब शरीर पत्थर जैसा अचल हो जाता है, तब प्राणों का बिखराव रुक जाता है और वे एक केंद्र पर एकत्रित होने लगते हैं। यह अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि वह केवल यह हाड़-मांस का शरीर नहीं है, बल्कि वह उस शरीर के भीतर स्थित एक दृष्टा है जो शरीर की स्थिरता का साक्षी है। इस अवस्था में पहुँचकर ही साधक अगले चरण में 'द्विगुणं त्रिगुणं' प्राणायाम करने में समर्थ होता है, क्योंकि बिना शारीरिक स्थिरता के प्राणायाम केवल श्वास का व्यायाम रह जाता है, योग नहीं।
द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्राणायाममुपक्रमेत् ।
ततो ध्येयः स्थितो योऽसौ हृदये दीपवत् प्रभुः ॥ ९.१९१ ॥
— दुगुना या तिगुना प्राणायाम आरम्भ करे; फिर जो प्रभु हृदयमें दीपकी भाँति स्थित है, वह ध्येय है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में शरीर की पूर्ण स्थिरता और इंद्रिय-संयम का विधान बताया गया था, जहाँ साधक पत्थर के समान अचल होकर बाहरी जगत से विच्छेद कर लेता है। अब इस शारीरिक स्थिरता के पश्चात, प्राणों के परिष्कार और ध्येय के साक्षात्कार की विधि का निर्देश दिया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
(साधकः) प्राणायामं द्विगुणं त्रिगुणं वापि उपक्रमेत्, ततः हृदये दीपवत् स्थितो योऽसौ प्रभुः, (सः) ध्येयः (अस्ति) ॥
पदार्थ:
• द्विगुणं त्रिगुणं — दुगुना या तिगुना। (यहाँ यह संख्या प्राणायाम की आवृत्ति या उसकी मात्रा के विस्तार का संकेत है)।
• उपक्रमेत् — आरम्भ करे, अभ्यास करे।
• ततः — उसके पश्चात, प्राणायाम के उपरांत।
• ध्येयः — जिसका ध्यान किया जाना चाहिए, ध्यान का विषय।
• स्थितो योऽसौ — जो वहाँ स्थित हैं।
• दीपवत् — दीपक के समान (प्रकाशमान और स्थिर)।
• प्रभुः — स्वामी, अधिष्ठाता, वह परम पुरुष।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ध्यान की प्रक्रिया में 'प्राण' और 'प्रकाश' के सम्बन्ध को स्पष्ट कर रहे हैं। शरीर के स्थिर होने के बाद साधक को 'द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्राणायाममुपक्रमेत्' अर्थात् दुगुना या तिगुना प्राणायाम आरम्भ करना चाहिए। यहाँ 'द्विगुण' और 'त्रिगुण' शब्दों के अर्थ में सूक्ष्मता है। संभवतः इसका आशय प्राणायाम की संख्या से है कि वह दो या तीन बार पूर्ण प्राणायाम करे, अथवा इसका अर्थ श्वास की मात्रा के विस्तार से हो सकता है कि वह सामान्य श्वास से दुगनी या तिगुनी अवधि तक प्राणों को धारण करे। यहाँ किसी निश्चित अनुपात का उल्लेख न कर 'वापि' (या) शब्द का प्रयोग किया गया है, जो साधक की क्षमता और उसकी योग-भूमि के अनुसार विकल्प देता है।
प्राणायाम का यह उद्देश्य केवल श्वास का नियमन नहीं, अपितु मन के वेग को रोकना है। जब प्राण स्थिर होते हैं, तब चंचल मन भी स्थिर हो जाता है। इसी स्थिरता के उपरांत साधक उस अवस्था में पहुँचता है जहाँ 'ततो ध्येयः स्थितो योऽसौ हृदये दीपवत् प्रभुः' — हृदय में दीपक के समान स्थित प्रभु ही ध्येय हैं।
यहाँ 'दीपवत्' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। दीपक की दो विशेषताएँ होती हैं: एक उसका 'प्रकाश' जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है, और दूसरा उसकी 'स्थिरता' (यदि वायु न हो)। हृदय में स्थित वह प्रभु (आत्मा/पुरुष) उसी प्रकार प्रकाशमान हैं जो साधक के अंतःकरण को आलोकित करते हैं। यह 'प्रभु' कोई बाहरी देवता नहीं, अपितु वही अंतर्यामी पुरुष हैं जिनका वर्णन याज्ञवल्क्य ने अपनी श्रुति में किया है। हृदय को ध्येय-स्थान इसलिए बनाया गया है क्योंकि यह चेतना का केंद्र है। जब प्राणायाम से चित्त शुद्ध होता है, तब हृदय के भीतर वह दिव्य ज्योति स्वतः प्रकट होने लगती है, जिसे साधक को केवल 'धारण' करना होता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'प्राण' से 'प्रकाश' की ओर जाने की यात्रा है। योग का क्रम है—स्थिरता → प्राणायाम → धारणा। पिछले श्लोकों में 'पाषाण इव' होकर शरीर को स्थिर किया गया, अब प्राणायाम के माध्यम से प्राणों को सूक्ष्म किया जा रहा है।
अभ्यास यह है कि जब शरीर पूरी तरह अचल हो जाए, तब साधक अपनी श्वास-प्रश्वास की गति को धीमा और गहरा करे (द्विगुण-त्रिगुण)। जैसे-जैसे प्राण शांत होते हैं, मन की वृत्तियाँ लय होने लगती हैं और हृदय-आकाश में एक सूक्ष्म प्रकाश का अनुभव होता है। साधक को उस प्रकाश को 'दीप' के समान स्थिर देखना है। यह अभ्यास साधक को 'स्थूल शरीर' की सीमा से निकालकर 'सूक्ष्म हृदय' के केंद्र में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ ध्येय कोई मानसिक कल्पना नहीं, अपितु हृदय में स्थित उस चैतन्य ज्योति का अनुभव है, जो साधक के अपने ही स्वरूप का प्रतिबिंब है। इस अवस्था में साधक 'साक्षी' भाव में प्रवेश करता है, जहाँ वह स्वयं को और अपने भीतर के प्रकाश (प्रभु) को एक ही केंद्र पर अनुभव करने लगता है।
धारयेत्तत्र चात्मानं धारणं धारयेद्बुधः ।
मोहजालमपास्याथ पुरुषो दृश्यते हि यः ॥ ९.१९२ ॥
बुद्धिमान् वहाँ आत्माको धारण करे — (यह) धारणा धारण करे; मोहजालको हटाकर तब वह पुरुष दिखायी देता है,
अवतरणिका — पिछले श्लोक में प्राणायाम के उपरांत हृदय में दीप की भाँति स्थित प्रभु को ध्येय मानने का निर्देश दिया गया था। अब इस श्लोक में उस ध्येय को प्राप्त करने की मानसिक प्रक्रिया, अर्थात् 'धारणा' और उसके फलस्वरूप होने वाले 'पुरुष-दर्शन' का रहस्य बताया गया है।
अन्वय और पदार्थ —
बुधः तत्र (हृदये) आत्मानं धारयेत्, (ततश्च) धारणं धारयेत् । अथ मोहजालम् अपास्य, यः पुरुषः (अस्ति), स दृश्यते हि ॥
पदार्थ:
• बुधः — विवेकी, बुद्धिमान् साधक (जो शरीर और आत्मा के भेद को जानता हो)।
• तत्र — वहाँ, अर्थात् पिछले श्लोक में वर्णित हृदय-स्थान में।
• धारयेत् — धारण करे, एकाग्र करे।
• धारणां धारयेत् — धारणा को ही धारण करे (धारणा में स्थिर हो जाए)।
• मोहजालम् — अविद्या, भ्रम और मानसिक विकारों का जाल।
• अपास्य — हटाकर, दूर करके।
• पुरुषः — वह शुद्ध चैतन्य, परम पुरुष।
• दृश्यते — प्रकट होता है, दिखाई देता है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'ध्यान' की पूर्व-अवस्था 'धारणा' की सूक्ष्म विधि समझा रहे हैं। श्लोक का प्रथम चरण है— 'धारयेत्तत्र चात्मानं'। यहाँ 'तत्र' शब्द हृदय-आकाश की ओर संकेत करता है। साधक अपनी चेतना को उस बिंदु पर ले जाए जहाँ प्रभु दीप की भाँति स्थित हैं। 'आत्मानं धारयेत्' का अर्थ है कि अपने चित्त रूपी आत्मा को उस ध्येय में विलीन कर देना।
इसके पश्चात ऋषि कहते हैं— 'धारणां धारयेत्'। यह एक अत्यंत गम्भीर निर्देश है। साधारण धारणा में साधक ध्येय को पकड़ता है, किन्तु यहाँ 'धारणा को धारण करने' की बात है। इसका भाव यह है कि साधक अब केवल ध्येय का चिंतन न करे, बल्कि उस 'एकाग्रता की स्थिति' में ही स्थिर हो जाए। जब साधक धारणा के प्रयास से ऊपर उठकर स्वयं धारणा बन जाता है, तब वह मानसिक द्वन्द्व से मुक्त हो जाता है।
जब यह स्थिरता आती है, तब 'मोहजालमपास्य' की स्थिति बनती है। मोहजाल वह अविद्या है जो पुरुष को प्रकृति के साथ जोड़कर रखती है और उसे शरीर या मन समझने पर विवश करती है। जैसे ही धारणा प्रगाढ़ होती है, यह मोहजाल छिन्न-भिन्न हो जाता है। इस जाले के हटने के बाद ही 'पुरुषो दृश्यते'— वह परम पुरुष प्रगट होता है। यहाँ 'दृश्यते' शब्द महत्वपूर्ण है; यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक अनुभव है। वह पुरुष कौन है और उसका स्वरूप क्या है, इसका विस्तार अगले श्लोक (९.१९३) में दिया गया है।
शास्त्र-साक्ष्य —
धारणा की इस प्रक्रिया की पुष्टि योगशास्त्र में भी मिलती है:
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ (भाष्य —) नाभिचक्रे हृदयपुण्डरीके मूर्ध्नि ज्योतिषि नासिकाग्रे जिह्वाग्र इत्येवमादिषु देशेषु बाह्ये वा विषये चित्तस्य वृत्तिमात्रेण बन्ध इति धारणा ॥ ३.१ ॥
चित्तको (किसी) देशमें बाँधना धारणा है। (भाष्य —) नाभिचक्र, हृदयकमल, मूर्धाकी ज्योति, नासिकाका अग्र, जिह्वाका अग्र — इत्यादि (शरीरके) स्थानोंमें, अथवा किसी बाहरी विषयमें, चित्तका केवल वृत्तिके द्वारा बँधना धारणा है।
यहाँ महर्षि पतंजलि धारणा को 'देशबन्धश्चित्तस्य' कहते हैं, अर्थात् चित्त को किसी एक देश (स्थान) में बाँधना। व्यासभाष्य में हृदयपुण्डरीक (हृदय कमल) को ऐसा ही एक देश माना गया है जहाँ चित्त को स्थिर किया जा सकता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और योगसूत्र दोनों का मेल यहाँ स्पष्ट है कि जब चित्त हृदय रूपी देश में बंध जाता है, तब वह बाहरी विषयों से विमुख होकर अन्तर्मुखी हो जाता है और अंततः पुरुष का साक्षात्कार करता है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'चित्त-वृत्ति' के निरोध और 'साक्षी-भाव' के उदय का मार्ग है। अभ्यास यह है कि साधक पहले हृदय में ज्योति का आभास करे (यह प्रथम धारणा है), फिर उस आभास में स्वयं को विलीन कर दे (यह धारणा को धारण करना है)।
योगिक अनुभव की दृष्टि से, जब तक मन में 'मैं ध्यान कर रहा हूँ' का भाव है, तब तक मोहजाल बना रहता है। जैसे ही 'कर्ता' का भाव मिटता है और केवल 'धारणा' शेष रहती है, साधक एक ऐसी भूमि पर पहुँच जाता है जहाँ वह स्वयं को शरीर न मानकर शुद्ध दृष्टा (पुरुष) के रूप में अनुभव करता है। यह अभ्यास साधक को 'सावित्री' के उस भर्ग (तेज) की ओर ले जाता है, जो हृदय के भीतर सूर्य के समान प्रकाशित है। यहाँ साधक 'चित्त' से 'पुरुष' की ओर संक्रमण करता है।
सहस्रकरपन्नेत्रः सूर्यवर्चाः सहस्रधा ।
द्वासप्ततिसहस्राणि हृदयादभिनिःसृताः ॥ ९.१९३ ॥
जो हजारों हाथ-पैर-नेत्रोंवाला, हजारों प्रकारसे सूर्यके समान तेजवाला है। हृदयसे बहत्तर हजार (नाडियाँ) निकली हैं —
अवतरणिका — पिछले श्लोक में मोहजाल को हटाकर हृदय-आकाश में स्थित उस परम पुरुष के दर्शन होने की बात कही गई थी। अब इस श्लोक में उस पुरुष के स्वरूप और हृदय से प्रस्फुटित होने वाली सूक्ष्म नाड़ियों के विन्यास का वर्णन है, जो साधक के अनुभव में प्रकट होते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(सः पुरुषः) सहस्र-कर-पन्नेत्रः, सहस्रधा सूर्यवर्चाः (अस्ति) । (तस्य) हृदयात् द्वासप्तति-सहस्राणि (नाड्यः) अभिनिःसृताः ॥
पदार्थ:
• सहस्रकर-पन्नेत्रः — सहस्र (हजारों) हाथों वाले, पैरों वाले और नेत्रों वाले। यहाँ 'सहस्र' संख्या मात्र नहीं, अपितु अनंत सामर्थ्य और सर्वव्यापकता का प्रतीक है।
• सूर्यवर्चाः — सूर्य के समान तेज वाले। 'वर्चा' का अर्थ है वह ओज जो अंधकार का नाश करे।
• सहस्रधा — हजारों प्रकार से या हजार गुना।
• द्वासप्तति-सहस्राणि — बहत्तर हजार (७२,०००)।
• अभिनिःसृताः — बाहर की ओर निकली हुई या प्रसारित।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उस 'पुरुष' के स्वरूप का उद्घाटन कर रहे हैं, जो धारणा के चरम पर साधक को दृष्टिगोचर होता है। ऋषि कहते हैं कि वह पुरुष 'सहस्रकर-पन्नेत्र' है। बाहरी दृष्टि से यह वर्णन विचित्र लग सकता है, किन्तु योगिक दृष्टि से इसका अर्थ है कि वह पुरुष सर्वशक्तिमान (सहस्र-कर), सर्वव्यापी (सहस्र-पद) और सर्वज्ञ (सहस्र-नेत्र) है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें एक साथ करोड़ों स्थानों को प्रकाशित करती हैं, उसी प्रकार उस पुरुष की चेतना समस्त चराचर जगत में व्याप्त है।
उसका तेज 'सूर्यवर्चा' है। यहाँ सूर्य केवल भौतिक पिंड नहीं, अपितु वह 'हिरण्यगर्भ' है जो ज्ञान का प्रतीक है। 'सहस्रधा' शब्द यह संकेत देता है कि उस एक पुरुष का तेज विभिन्न रूपों और आयामों में विभक्त होकर संपूर्ण सृष्टि को संचालित कर रहा है। साधक जब हृदय में दीपवत प्रभु को देखता है, तो उसे अनुभव होता है कि वह एक बिंदु मात्र नहीं, अपितु एक अनंत प्रकाश-पुंज है।
श्लोक का द्वितीय चरण शरीर के सूक्ष्म विन्यास की ओर ले जाता है— 'द्वासप्तति-सहस्राणि हृदयादभिनिःसृताः'। जब साधक की एकाग्रता इतनी प्रगाढ़ हो जाती है कि वह स्थूल शरीर के बोध से ऊपर उठ जाता है, तब उसे अनुभव होता है कि हृदय केवल रक्त का पंप नहीं, अपितु समस्त प्राण-शक्ति का केंद्र है। इस केंद्र से बहत्तर हजार सूक्ष्म धाराएँ (नाड़ियाँ) पूरे शरीर में प्रसारित हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि हृदय ही वह मुख्य बिंदु है जहाँ से सूक्ष्म शरीर का संचालन होता है।
श्रुति-संगति —
हृदय से नाड़ियों के इस प्रसार का रहस्य श्रुति में भी इसी रूप में मिलता है:
अथ यदा सुषुप्तो भवति यदा न कस्य चन वेद हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिः सहस्राणि हृदयात्पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते ॥ १४.५.१.२१ ॥
और जब (मनुष्य) गहरी नींदमें होता है, जब किसीको नहीं जानता — तब हिता नामकी बहत्तर हज़ार नाडियाँ, जो हृदयसे पुरीतत् (हृदयको घेरनेवाली झिल्ली) तक फैली हैं, उनसे लौटकर वह पुरीतत्में सोता है।
इस श्रुति-अंश में स्पष्ट कहा गया है कि 'हिता' नाम की बहत्तर हजार नाड़ियाँ हृदय से पुरीतत् (हृदय की झिल्ली) तक फैली हुई हैं। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इसी श्रुति-रहस्य का विस्तार कर रही है। श्रुति जहाँ सुषुप्ति (गहरी नींद) की अवस्था में प्राणों के हृदय में लौटने की बात करती है, वहीं यह स्मृति जाग्रत अवस्था में 'ध्यान' के माध्यम से उसी केंद्र को अनुभव करने की विधि बता रही है। दोनों का लक्ष्य एक ही है— हृदय-केंद्र की पहचान।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक 'अनुभव' का मानचित्र है। जब साधक पिछले श्लोकों में बताई गई विधि (पद्मासन, प्राणायाम, धारणा) का पालन करता है, तब उसकी चेतना बाहरी जगत से सिमटकर हृदय-केंद्र पर टिक जाती है। इस स्थिति में उसे दो अनुभव होते हैं:
प्रथम, वह अनुभव करता है कि उसके भीतर एक ऐसा प्रकाश है जो सूर्य से भी अधिक प्रखर है और जिसकी पहुँच (कर-पद-नेत्र) अनंत है। यह अनुभव साधक को 'अहंकार' के लघुत्व से निकालकर 'ब्रह्म' के विराटत्व में स्थापित करता है।
द्वितीय, उसे अपने भीतर एक सूक्ष्म जाल का अनुभव होता है— वे ७२,००० नाड़ियाँ। योगिक अभ्यास में यह अनुभव अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जब साधक यह जान लेता है कि समस्त प्राण-शक्ति हृदय से ही प्रसारित हो रही है, तो उसका ध्यान स्वतः ही उस केंद्र (हृदय) पर स्थिर हो जाता है। वह समझ जाता है कि यदि केंद्र शुद्ध हो जाए, तो समस्त नाड़ियों में प्रवाहित प्राण शुद्ध हो जाते हैं। यह श्लोक साधक को 'स्थूल देह' के बोध से 'सूक्ष्म देह' के बोध की ओर ले जाता है, जो कि समाधि की ओर बढ़ने वाली एक अनिवार्य सीढ़ी है।
हिता नाम हि ता नाड्यस्तासां मध्ये शशिप्रभम् ।
मण्डलं तस्य मध्यस्थ आत्मा दीप इवाचलः ॥ ९.१९४ ॥
— वे हिता नामकी नाडियाँ हैं; उनके बीच चन्द्रमाके समान प्रभावाला मण्डल है, और उसके बीचमें आत्मा दीपकी भाँति अचल स्थित है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में हृदय से प्रस्फुटित होने वाली बहत्तर हजार नाड़ियों के विन्यास का उल्लेख था। अब इस श्लोक में उन नाड़ियों के स्वभाव और उनके केंद्र में स्थित आत्मा के उस प्रकाशमय स्वरूप का वर्णन है, जो ध्यान की गहन अवस्था में साधक के अनुभव में आता है।
अन्वय और पदार्थ —
(ते) नाड्यः हिता नाम (अस्ति) । तासां मध्ये शशिप्रभम् मण्डलं (अस्ति), तस्य मध्यस्थः आत्मा दीप इवाचलः (तिष्ठति) ॥
पदार्थ:
• हिता नाम — 'हित' नाम की। यहाँ 'हित' का अर्थ है कल्याणकारी या वे नाड़ियाँ जो प्राण के प्रवाह को सुगम बनाकर साधक का हित करती हैं।
• शशिप्रभम् मण्डलं — चन्द्रमा के समान प्रभा (शीतल प्रकाश) वाला मण्डल।
• मध्यस्थः — बीच में स्थित।
• दीप इवाचलः — दीपक की भाँति अचल (स्थिर)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ सूक्ष्म शरीर के उस विन्यास को स्पष्ट कर रहे हैं, जहाँ ध्यान का लक्ष्य प्रतिष्ठित है। ऋषि कहते हैं कि हृदय से निकलने वाली वे बहत्तर हजार नाड़ियाँ 'हिता' नाम की हैं। 'हित' शब्द यहाँ केवल नाम नहीं, अपितु उनके गुण का बोध है; ये वे सूक्ष्म मार्ग हैं जो चेतना को स्थूल शरीर से ऊपर उठाकर सूक्ष्म स्तर पर ले जाते हैं और साधक के आध्यात्मिक उत्थान में सहायक (हितकारी) होती हैं।
इन समस्त नाड़ियों के विन्यास के मध्य एक 'शशिप्रभ मण्डल' का अनुभव होता है। चन्द्रमा की प्रभा का लक्षण शीतलता और शांति है। जब साधक प्राणायाम और धारणा के माध्यम से अपने चित्त को स्थिर करता है, तो हृदय-आकाश में एक ऐसा प्रकाश पुंज प्रकट होता है जो सूर्य की भाँति दाहक नहीं, अपितु चन्द्रमा की भाँति शीतल और सौम्य होता है। यह मण्डल उस मानसिक शांति का प्रतीक है जहाँ समस्त विक्षेप शांत हो चुके होते हैं।
इस शीतल प्रकाश-मण्डल के ठीक केंद्र में 'आत्मा' स्थित है, जिसका स्वरूप 'दीप इवाचलः' बताया गया है। दीपक की लौ जब वायुशून्य स्थान में जलती है, तो वह बिना डोले सीधी और स्थिर रहती है। उसी प्रकार, जब इन्द्रियाँ और मन निरोपित हो जाते हैं, तब आत्मा का वह स्वरूप एक स्थिर ज्योति के रूप में भासता है। यह 'अचल दीप' ही वह ध्येय है, जिसे साधक को देखना है। यहाँ 'दीप' शब्द ज्ञान के उस प्रकाश का संकेत है जो अविद्या के अन्धकार को मिटाता है और 'अचल' शब्द उस अवस्था का, जहाँ अब कोई परिवर्तन या विचलन शेष नहीं रहा।
योग-रहस्य —
साधक के लिए यह श्लोक ध्यान का एक स्पष्ट 'मानसिक चित्र' प्रस्तुत करता है। अभ्यास की दृष्टि से साधक को निम्नलिखित अनुक्रम का अनुभव करना होता है:
प्रथम, वह अनुभव करता है कि उसके हृदय से असंख्य सूक्ष्म किरणें (हिता नाड़ियाँ) प्रसारित हो रही हैं। यह अनुभव प्राण के विस्तार का है।
द्वितीय, उन समस्त किरणों के केंद्र में उसे एक धवल, शीतल और प्रकाशमय मण्डल का दर्शन होता है। यह 'शशिप्रभ मण्डल' मन की उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ राग-द्वेष की अग्नि शांत हो चुकी है और केवल शुद्ध चैतन्य की शीतलता शेष है।
तृतीय, उस मण्डल के ठीक मध्य में वह एक स्थिर, अविचल ज्योति (दीप) को देखता है। यह ज्योति ही उसका अपना वास्तविक स्वरूप—आत्मा है। साधक का अभ्यास इस ज्योति में अपनी दृष्टि और मन को एकाग्र करना है।
जब साधक इस 'अचल दीप' में स्थित हो जाता है, तब वह 'स्थितप्रज्ञ' की भूमि पर पहुँचता है। यहाँ अभ्यास यह है कि बाहरी जगत के प्रकाश और भीतर के प्रकाश के भेद को मिटाकर, केवल उस एक अविचल ज्योति में लीन हो जाना। यह स्थिति साधक को भौतिक शरीर के बोध से ऊपर उठाकर उस अक्षर-पुरुष की ओर ले जाती है, जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में किया गया था।
ध्यानफलम् · योगसिद्धिलक्षणानि
स ज्ञेयस्तं विदित्वेह पुनराजायते न तु ।
अन्तर्धानं स्मृतिः कान्तिर्दृष्टिश्रोत्रज्ञता परा ॥ ९.१९५ ॥
उसे जानना चाहिए; उसे यहाँ जानकर (मनुष्य) फिर जन्म नहीं लेता। अन्तर्धान, स्मृति, कान्ति, परम दृष्टि, श्रवण और ज्ञान,
अवतरणिका — पिछले श्लोक में हृदय-आकाश के उस केंद्र का वर्णन था जहाँ चन्द्रप्रभ मण्डल के मध्य आत्मा दीपक की भाँति अचल स्थित है। अब इस श्लोक में उस अचल आत्मा के साक्षात्कार का परम फल और उस अवस्था में प्राप्त होने वाली योगसिद्धियों के लक्षणों का विवरण आरम्भ हो रहा है।
अन्वय और पदार्थ —
(सः आत्मा) ज्ञेयः अस्ति । तं विदित्वेह (मनुष्यः) पुनराजायते न तु । (तस्य योगसिद्धेः लक्षणानि सन्ति) — अन्तर्धानम्, स्मृतिः, कान्तिः, दृष्टिश्रोत्रज्ञता परा (च) ॥
पदार्थ:
• ज्ञेयः — जानने योग्य। यहाँ अर्थ है कि वह अचल दीप-स्वरूप आत्मा ही साधना का अंतिम लक्ष्य और जानने योग्य तत्त्व है।
• विदित्वेह — 'विदित्व' (जानकर) + 'इह' (इस लोक में/इस देह में)। अर्थात् जब साधक इसी शरीर में रहते हुए उस आत्मा को जान लेता है।
• पुनराजायते न तु — फिर जन्म नहीं लेता। 'तु' यहाँ निषेध की पुष्टि के लिए है।
• अन्तर्धानम् — अदृश्य हो जाना। स्थूल शरीर के रहते हुए भी इन्द्रियों की पकड़ से ओझल हो जाना।
• स्मृतिः — यहाँ साधारण याददाश्त नहीं, अपितु 'जाति-स्मरण' या पूर्वजन्मों और सूक्ष्म जगत का पूर्ण बोध।
• कान्तिः — वह दिव्य ओज या आभा जो आत्मा के प्रकाश के प्रतिबिम्ब स्वरूप शरीर पर प्रकट होती है।
• दृष्टिश्रोत्रज्ञता परा — दृष्टि और श्रवण की वह परा-शक्ति, जिससे वह देखा और सुना जा सके जो साधारण इन्द्रियों की सीमा से परे है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ ध्यान-साधना के चरमोत्कर्ष और उसके फल की घोषणा कर रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि हृदय के मध्य स्थित वह अचल दीप-स्वरूप आत्मा ही 'ज्ञेय' है। इसका अर्थ यह है कि समस्त बाहरी क्रियाएँ, प्राणायाम और धारणाएँ केवल साधन थीं; साध्य तो वह आत्म-तत्त्व है। जब साधक इस देह में रहते हुए, इसी जीवन में उस परम पुरुष का साक्षात्कार कर लेता है, तब वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। भाव यह है कि पुनर्जन्म अविद्या के कारण होता है, और जब 'ज्ञेय' का ज्ञान हो जाता है, तो अविद्या का नाश हो जाता है, जिससे पुनरावृत्ति का कारण ही समाप्त हो जाता है।
परन्तु, इस परम लक्ष्य (मोक्ष) की प्राप्ति से पूर्व या उसके साथ-साथ, योग की अग्नि में तपते हुए साधक के भीतर कुछ विशेष शक्तियाँ जाग्रत होती हैं। याज्ञवल्क्य जी यहाँ उन 'योगसिद्धियों' का उल्लेख कर रहे हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि साधक सही मार्ग पर है और उसकी चेतना स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ चुकी है।
प्रथम लक्षण है 'अन्तर्धान'। यह केवल जादू या चमत्कार नहीं है, अपितु चेतना का शरीर के स्थूल स्वरूप से ऊपर उठ जाना है। जब साधक का ध्यान आत्मा के उस सूक्ष्म बिंदु पर स्थिर होता है, तो वह बाहरी जगत के लिए अदृश्य हो सकता है।
द्वितीय लक्षण 'स्मृति' है। योगिक दृष्टि से यह वह अवस्था है जहाँ चित्त का दर्पण इतना स्वच्छ हो जाता है कि उसमें केवल वर्तमान नहीं, अपितु भूत और भविष्य के सूक्ष्म संस्कार भी स्पष्ट दिखने लगते हैं।
तृतीय लक्षण 'कान्ति' है। जब हृदय का सूर्य और चन्द्रप्रभ मण्डल जाग्रत होता है, तो उसका प्रभाव साधक के मुखमंडल और देह पर एक अलौकिक तेज के रूप में प्रकट होता है।
चौथा लक्षण 'परा-दृष्टि और परा-श्रवण' है। यह इन्द्रियों का विस्तार है। साधक की दृष्टि अब केवल भौतिक वस्तुओं को नहीं, अपितु सूक्ष्म तरंगों और दिव्य स्वरूपों को देखने में सक्षम हो जाती है; इसी प्रकार उसका श्रवण दिव्य ध्वनियों (अनाहत नाद) को ग्रहण करने लगता है।
शास्त्र-साक्ष्य —
अन्तर्धान की इस सिद्धि के विषय में पातञ्जल योगसूत्र में कहा गया है:
कायरूपसंयमात्तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशासम्प्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥ ३.२१ ॥
शरीरके रूपमें संयम करनेसे, उसकी ग्राह्य (दिखायी देनेकी) शक्ति रुक जानेपर, (दूसरेकी) आँखके प्रकाशसे सम्पर्क न होनेसे अन्तर्धान (होता है)।
यह सूत्र स्पष्ट करता है कि जब साधक अपने शरीर के रूप में 'संयम' (धारणा, ध्यान और समाधि का समुच्चय) करता है और शरीर की ग्राह्य शक्ति (दिखाई देने का गुण) को स्तंभित कर देता है, तब वह अन्तर्धान हो जाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का 'अन्तर्धान' और योगसूत्र का यह सिद्धांत एक ही सत्य को उद्घाटित करते हैं—कि चेतना जब शरीर के स्थूल गुणों को नियंत्रित कर लेती है, तो शरीर भौतिक नियमों से परे हो जाता है।
योग-रहस्य —
साधक के लिए इस श्लोक का गूढ़ संदेश यह है कि 'सिद्धियाँ' लक्ष्य नहीं, अपितु मार्ग के संकेत-स्तम्भ हैं। मुख्य फल 'अपुनर्जन्म' है, जो केवल आत्मा के ज्ञान से संभव है।
अभ्यास की दृष्टि से, जब साधक पिछले श्लोकों में बताई गई विधि (अचल आसन, दीर्घ प्रणव और हृदय-दीप धारणा) का निरंतर अभ्यास करता है, तो वह धीरे-धीरे स्थूल देह के मोह से छूटने लगता है। जैसे-जैसे उसकी धारणा 'अचल दीप' पर गहरी होती है, उसकी चेतना का केंद्र बाहर से हटकर भीतर की ओर मुड़ जाता है। इस प्रक्रिया में जब वह अपनी चेतना को शरीर के बाहरी आवरण से हटाकर भीतर के सूक्ष्म प्रकाश में विलीन करता है, तब वह 'अन्तर्धान' के अनुभव की भूमि पर पहुँचता है।
साधक को चेतावनी यह है कि कान्ति, स्मृति और परा-ज्ञान जैसी सिद्धियाँ उसे विचलित न करें, क्योंकि ये केवल योग-सिद्ध होने के 'लक्षण' हैं, गंतव्य नहीं। वास्तविक सिद्धि तो वह है जहाँ वह जान ले कि वह शरीर नहीं, अपितु वह अचल प्रकाश-स्वरूप आत्मा है।
योगेनामृतत्वप्राप्तिः
निजं कायं समुत्सृज्य परकायप्रवेशनम् ।
अर्थानां छन्दतः सृष्टिर्योगसिद्धेस्तु लक्षणम् ॥ ९.१९६ ॥
अपना शरीर छोड़कर दूसरेके शरीरमें प्रवेश, और इच्छानुसार पदार्थोंकी सृष्टि — (ये) योगसिद्धिके लक्षण हैं।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने उस अचल आत्मा के साक्षात्कार के फल और योगसिद्धियों के आरम्भिक लक्षणों (अन्तर्धान, दिव्य कान्ति आदि) का वर्णन किया था। इसी क्रम में वर्तमान श्लोक उन सिद्धियों के और अधिक गहन और विस्मयकारी लक्षणों को स्पष्ट करता है, जो एक सिद्ध योगी की क्षमता को दर्शाते हैं।
अन्वय और पदार्थ —
(योगसिद्धेः लक्षणम् अस्ति) — निजं कायं समुत्सृज्य परकाय प्रवेशनम्, (तथा) अर्थानां छन्दतः सृष्टिः ॥
पदार्थ:
• निजं कायं समुत्सृज्य — अपने शरीर का त्याग करके। यहाँ 'समुत्सृज्य' का अर्थ मृत्यु नहीं, अपितु चेतना का शरीर से पृथक होना है।
• परकाय प्रवेशनम् — दूसरे के शरीर में प्रवेश करना।
• अर्थानां — पदार्थों का, वस्तुओं का या भौतिक संसाधनों का।
• छन्दतः — इच्छा से, मन की कामना के अनुसार।
• सृष्टिः — निर्माण करना या प्रकट करना।
• योगसिद्धेस्तु लक्षणम् — योग की सिद्धि होने पर ये (उपरोक्त क्रियाएँ) लक्षण हैं।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ उन विलक्षण शक्तियों का वर्णन कर रहे हैं जो ध्यान और प्राणायाम के चरम अभ्यास से प्राप्त होती हैं। ऋषि कहते हैं कि जब योगी की साधना पूर्ण होती है, तब वह अपनी चेतना को अपने स्थूल शरीर से अलग कर दूसरे के शरीर में स्थापित करने में समर्थ हो जाता है। यह 'परकाय प्रवेशन' कोई जादुई क्रिया नहीं, अपितु सूक्ष्म शरीर और प्राणों पर पूर्ण नियंत्रण का परिणाम है।
इसी प्रकार, 'अर्थानां छन्दतः सृष्टिः' का अर्थ है कि सिद्ध योगी अपनी इच्छा मात्र से आवश्यक पदार्थों को प्रकट कर सकता है या प्रकृति के तत्वों को अपनी आज्ञा से संचालित कर सकता है। यह शक्ति उस अवस्था में आती है जब साधक का मन प्रकृति के मूल तत्त्वों के साथ एकाकार हो जाता है और वह जान लेता है कि दृश्य जगत और उसका अपना स्वरूप एक ही चैतन्य का विस्तार है।
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि याज्ञवल्क्य इन शक्तियों को 'लक्षण' कह रहे हैं, 'लक्ष्य' नहीं। लक्षण वह संकेत है जिससे यह पता चलता है कि साधक एक निश्चित भूमि तक पहुँच गया है। जिस प्रकार फल आने से वृक्ष के स्वस्थ होने का पता चलता है, उसी प्रकार ये सिद्धियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि योग सिद्ध हो चुका है। परंतु, एक योगीश्वर होने के नाते याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि ये सिद्धियाँ मार्ग के पड़ाव हैं, गंतव्य नहीं। गंतव्य तो वह 'अचल दीप-स्वरूप आत्मा' है जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में था।
शास्त्र-साक्ष्य —
परकाय प्रवेश की इस प्रक्रिया के विषय में पातञ्जल योगसूत्र में स्पष्ट कहा गया है:
बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥ ३.३८ ॥
बन्धनके कारण (कर्माशय) के ढीले होनेसे और (चित्तके) संचार-मार्गको जान लेनेसे चित्तका दूसरेके शरीरमें प्रवेश (होता है)।
(बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥ — बन्धनके कारण (कर्माशय) के ढीले होनेसे और (चित्तके) संचार-मार्गको जान लेनेसे चित्तका दूसरेके शरीरमें प्रवेश (होता है)।)
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और योगसूत्र यहाँ पूर्णतः एकमत हैं। दोनों ही शास्त्र मानते हैं कि जब चित्त के बंधन ढीले पड़ जाते हैं और साधक को प्राणों के संचार-मार्गों का ज्ञान हो जाता है, तब वह अपनी चेतना को दूसरे शरीर में भेजने में सक्षम होता है। स्मृति यहाँ इसे 'योगसिद्धिका लक्षण' मानकर साधक को उसकी प्रगति का बोध करा रही है।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि वह अपनी पहचान को शरीर से अलग करना सीख रहा है। सामान्य मनुष्य स्वयं को 'देह' मानता है, इसलिए वह देह के बंधन में बँधा रहता है। जब योगी 'निजं कायं समुत्सृज्य' के अनुभव से गुजरता है, तो उसे यह साक्षात्कार होता है कि वह शरीर नहीं, अपितु वह चेतना है जो शरीर को संचालित करती है।
अभ्यास की दृष्टि से, यह अवस्था तब आती है जब साधक का चित्त इतना सूक्ष्म और एकाग्र हो जाता है कि वह भौतिक सीमाओं को लाँघ सकता है। 'इच्छा से सृष्टि' का योगिक अर्थ यह है कि जब साधक का संकल्प और ब्रह्मांडीय संकल्प एक हो जाते हैं, तब उसकी इच्छा ही सत्य बन जाती है।
परंतु, साधक के लिए चेतावनी यह है कि इन लक्षणों (सिद्धियों) में उलझना पुनः बंधन का कारण बन सकता है। यदि योगी इन शक्तियों को अपना लक्ष्य मान ले, तो वह आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से भटक सकता है। अतः इस श्लोक का अभ्यास करते समय साधक को यह स्मरण रखना चाहिए कि ये सिद्धियाँ केवल यह दर्शाती हैं कि वह सही दिशा में बढ़ रहा है, लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य शरीर का त्याग कर उस अमृतत्व को प्राप्त करना है, जिसका वर्णन अगले श्लोकों में आएगा।
सिद्धे योगे त्यजन् देहममृतत्वाय कल्पते ।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ॥ ९.१९७ ॥
योग सिद्ध होनेपर देह छोड़ता हुआ (योगी) अमृतत्वके योग्य होता है। (गीता १२.१२:) अभ्याससे ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञानसे ध्यान विशिष्ट है;
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने योगसिद्धि के उन लक्षणों का वर्णन किया था जिनमें योगी अपनी चेतना को शरीर से पृथक कर दूसरे शरीर में प्रवेश करने और इच्छाशक्ति से पदार्थों की सृष्टि करने में समर्थ हो जाता है। अब वर्तमान श्लोक में ऋषि इन सिद्धियों के पार उस अंतिम लक्ष्य—अमृतत्व—की ओर संकेत कर रहे हैं और साधना की सोपान-क्रम को स्पष्ट कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
सिद्धे योगे (योगी) अमृतत्वाय कल्पते देहम त्यजन् । अभ्यासजात् ज्ञानं श्रेयो हि, ज्ञानात् ध्यानं विशिष्यते ॥
पदार्थ:
• सिद्धे योगे — जब योग सिद्ध हो जाता है (अर्थात् जब चित्त पूर्णतः स्थिर होकर आत्मा में लीन हो जाता है)।
• त्यजन् देहम् — शरीर को छोड़ते हुए। यहाँ 'त्यजन' का अर्थ स्वेच्छा से आत्महत्या नहीं, अपितु जीवन-अवधि पूर्ण होने पर देह का सहज और सचेत त्याग है।
• अमृतत्वाय कल्पते — अमृतत्व (जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति) के योग्य हो जाता है।
• श्रेयो — श्रेष्ठ है।
• अभ्यासाज् — अभ्यास से (यहाँ अभ्यास का अर्थ है—निरन्तर साधना और अनुशासन)।
• विशिष्यते — अधिक विशिष्ट या श्रेष्ठ है।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य योग की पराकाष्ठा और उसके अंतिम फल का उद्घाटन कर रहे हैं। ऋषि कहते हैं कि जब साधक का योग सिद्ध हो जाता है, तब वह देह के बंधन से ऊपर उठ जाता है। सामान्य मनुष्य मृत्यु के समय भय, मोह और अज्ञान के वशीभूत होकर देह त्यागता है, जिससे वह पुनः जन्म के चक्र में बँध जाता है। किंतु सिद्ध योगी, जिसने हृदय के अचल दीप रूपी आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, वह देह त्यागते समय पूर्णतः सजग रहता है। वह जानता है कि यह शरीर केवल एक वस्त्र है। ऐसा योगी देह त्यागते समय अमृतत्व को प्राप्त करता है, क्योंकि उसकी चेतना अब शरीर में नहीं, अपितु उस अविनाशी पुरुष में प्रतिष्ठित हो चुकी होती है।
श्लोक के दूसरे भाग में महर्षि याज्ञवल्क्य साधना के सोपान बताते हैं, जो श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय के सार के समान हैं। वे कहते हैं कि 'अभ्यास' से 'ज्ञान' श्रेष्ठ है, और 'ज्ञान' से 'ध्यान' अधिक विशिष्ट है। यहाँ अभ्यास का अर्थ है—शरीर, प्राण और मन को अनुशासित करने की प्रारंभिक प्रक्रिया। इस अनुशासन से जब बुद्धि शुद्ध होती है, तब 'ज्ञान' का उदय होता है। परंतु ज्ञान केवल बोध है; उस बोध को अनुभव में बदलने के लिए 'ध्यान' की आवश्यकता होती है। ज्ञान बताता है कि "आत्मा अचल है", किंतु ध्यान उस अचलता का साक्षात् अनुभव कराता है। इसीलिए ध्यान को ज्ञान से भी ऊपर और विशिष्ट स्थान दिया गया है।
श्रुति-संगति —
सिद्ध योगी के इस अमृतत्व की पुष्टि श्रुति में भी मिलती है:
तदेष श्लोको भवति यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति ॥ १४.७.२.९ ॥
इस विषयमें यह श्लोक है — "जब इसके हृदयमें स्थित सब कामनाएँ छूट जाती हैं, तब मरणशील (मनुष्य) अमृत हो जाता है, और यहीं ब्रह्मको प्राप्त होता है।"
इस श्रुति-अंश के अनुसार, जब मनुष्य के हृदय में स्थित समस्त कामनाएँ छूट जाती हैं, तब वह मरणशील होते हुए भी अमृत हो जाता है और यहीं ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक इसी सत्य का विस्तार है। जब योग सिद्ध होता है, तो कामनाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं, और तब देह का त्याग केवल एक औपचारिक विदाई बन जाता है, बंधन नहीं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक साधना की 'भूमि' को स्पष्ट करता है। साधक पहले 'अभ्यास भूमि' में होता है, जहाँ वह प्राणायाम और नियमों के माध्यम से मन को वश में करता है। इसके बाद वह 'ज्ञान भूमि' में प्रवेश करता है, जहाँ उसे श्रुति और गुरु के माध्यम से सत्य का बोध होता है। अंत में वह 'ध्यान भूमि' में पहुँचता है, जहाँ वह उस सत्य में लीन हो जाता है।
इस श्लोक का गूढ़ रहस्य यह है कि 'अमृतत्व' देह त्यागने के बाद मिलने वाला कोई पुरस्कार नहीं है, बल्कि ध्यान की वह अवस्था है जहाँ योगी जीवित रहते हुए भी देह-अभिमान का त्याग कर देता है। जब वह मानसिक रूप से देह को त्यागकर आत्मा में स्थित हो जाता है, तभी वह 'अमृत' कहलाता है। अभ्यास, ज्ञान और ध्यान की यह कड़ी साधक को उस बिंदु तक ले जाती है जहाँ वह 'अहं' (देहाभिमान) से मुक्त होकर 'अक्षर' (अविनाशी) में विलीन हो जाता है।
अभ्यासज्ञानध्यानादिश्रेष्ठत्वपरंपरा
ध्यानात् कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनुत्तमा ।
ध्यानप्रकरणं ह्येतत् षडशीत्यधिकं शतम् ॥ ९.१९८ ॥
ध्यानसे कर्मफलका त्याग, और त्यागसे अनुपम शान्ति (मिलती है)। यह ध्यान-प्रकरण एक सौ छियासी श्लोकोंका है।
अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने साधना के सोपान बताए कि कैसे अभ्यास से ज्ञान और ज्ञान से ध्यान की श्रेष्ठता सिद्ध होती है। वर्तमान श्लोक में वे इस क्रम को पूर्ण करते हुए ध्यान के अंतिम फल और इस संपूर्ण प्रकरण के उपसंहार को प्रस्तुत कर रहे हैं।
अन्वय और पदार्थ —
ध्यानात् कर्मफलत्यागः, त्यागात् अनुत्तमा शान्तिः (जायते) । ह्येतत् ध्यानप्रकरणं षडशीत्यधिकं शतम् ॥
पदार्थ:
• ध्यानात् — ध्यान से (अर्थात् जब चित्त केवल एक लक्ष्य, उस अचल आत्मा में स्थिर हो जाता है)।
• कर्मफलत्यागः — कर्म के फलों का त्याग (अनासक्ति)।
• त्यागात् — उस त्याग से।
• शान्तिः — परम स्थिरता, विक्षेपों का अभाव।
• अनुत्तमा — जिससे उत्तम कुछ भी न हो, सर्वश्रेष्ठ।
• ध्यानप्रकरणं — ध्यान का यह विषय/अध्याय।
• षडशीत्यधिकं शतम् — एक सौ छियासी (१०० + ८६)।
भाष्य —
बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य साधना की वह पराकाष्ठा बता रहे हैं जहाँ क्रिया, ज्ञान और ध्यान एक बिंदु पर आकर मिल जाते हैं। ऋषि कहते हैं कि जब साधक 'ध्यान' की अवस्था में प्रतिष्ठित होता है, तो उसके भीतर 'कर्मफल का त्याग' स्वाभाविक रूप से घटित होता है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यह त्याग किसी बाहरी दबाव या वैराग्य के कृत्रिम प्रदर्शन से नहीं आता, अपितु ध्यान के अनुभव से आता है। जब योगी ने हृदय के भीतर उस 'अचल दीप' रूपी आत्मा का साक्षात्कार कर लिया, जिसे पिछले श्लोकों में वर्णित किया गया, तब उसे यह बोध हो जाता है कि समस्त बाहरी उपलब्धियाँ और फल क्षणभंगुर हैं। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर दीप की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, वैसे ही आत्म-प्रकाश के सामने कर्मों के छोटे-छोटे फल अपनी चमक खो देते हैं। अतः ध्यान का सीधा परिणाम 'त्याग' है—वह त्याग जो अभाव से नहीं, बल्कि पूर्णता के अनुभव से उपजा है।
आगे ऋषि कहते हैं कि इस त्याग से 'अनुत्तमा शान्ति' प्राप्त होती है। यह शान्ति केवल मानसिक शांति नहीं है, बल्कि वह अवस्था है जहाँ द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं। जब फल की इच्छा समाप्त होती है, तो तनाव, भय और चिंता का मूल ही नष्ट हो जाता है। यही वह 'अनुत्तमा' शान्ति है, जिससे श्रेष्ठ इस संसार में कुछ भी नहीं है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक स्वयं उस अक्षर-ब्रह्म में लीन हो जाता है।
श्लोक के अंतिम चरण में महर्षि इस प्रकरण की गणना बताते हुए कहते हैं कि यह ध्यान-प्रकरण एक सौ छियासी श्लोकों का है। यह केवल एक संख्या नहीं, अपितु इस गहन विषय की परिधि का निर्धारण है। यह गणना इस अध्याय की कुल श्लोक-संख्या से भिन्न हो सकती है, क्योंकि ऋषि यहाँ केवल 'ध्यान-प्रकरण' (मुख्य विषय-वस्तु) की गणना कर रहे हैं, जिसमें केवल ध्यान की विधि, लक्षण और फल सम्मिलित हैं।
योग-रहस्य —
साधक की दृष्टि से यह श्लोक साधना की 'कसौटी' है। योग का मार्ग केवल आंतरिक अनुभवों या सिद्धियों का संग्रह नहीं है, बल्कि उसका प्रमाण साधक के व्यवहार में 'त्याग' के रूप में दिखना चाहिए।
साधक स्वयं से यह प्रश्न करे: "क्या मेरे ध्यान के अभ्यास से फल की पकड़ ढीली हुई है?" यदि ध्यान के बाद भी फल की लालसा बनी हुई है, तो वह केवल एकाग्रता है, 'ध्यान' नहीं। वास्तविक ध्यान वह है जो साधक को 'कर्ता' के भाव से मुक्त कर 'साक्षी' बना दे।
अभ्यास की दृष्टि से, साधक जब हृदय-कमल में उस अचल ज्योति का ध्यान करता है, तो वह धीरे-धीरे बाहरी जगत के आकर्षणों से ऊपर उठता है। जैसे-जैसे ध्यान गहरा होता है, 'अहं' (मैं) और 'मम' (मेरा) का विसर्जन होता जाता है। यही विसर्जन 'त्याग' है। और जब 'मेरा' कुछ शेष नहीं रहता, तब जो बचता है, वही 'अनुत्तमा शान्ति' है। इस प्रकार साधक अभ्यास से ज्ञान, ज्ञान से ध्यान, ध्यान से त्याग और त्याग से उस परम शान्ति की भूमि तक पहुँचता है जहाँ जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है।