श्रीगणेशाय नमः।

व्याख्या · बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः — भाष्य, दशमोऽध्यायः

20 मूल पद्य

यह पृष्ठ बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिके दशमोऽध्यायः — सूर्योपस्थाननिर्णयः — का भाष्य है: प्रत्येक श्लोक, उसका सीधा हिन्दी अनुवाद, और फिर विस्तृत भाष्य, जो उसे याज्ञवल्क्यकी अपनी श्रुति (शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक) से जोड़ता है। ऊपरके बटनोंसे अनुवाद, भाष्य, श्रुति-उद्धरण या उसका अर्थ अलग-अलग छिपाये जा सकते हैं।

दशमोऽध्यायः — सूर्योपस्थाननिर्णयः

अध्याय-सार — सूर्योपस्थाननिर्णय — बीस श्लोक, जो संध्याको पूरा करते हैं। मार्जन, प्राणायाम और ध्यान कहे जा चुके; अब सूर्यका उपस्थान (१०.१)। प्रतिदिनके अंग हैं: स्नान, मार्जन, प्राणायाम, उपस्थान और गायत्री-जप (१०.२)। ‘उदु त्यम्’, ‘चित्रं देवानाम्’, ‘उद्वयं तमसस्परि’, ‘तच्चक्षुः’ आदि ऋचाओंसे उपस्थान करे और गायत्री दस, तीस या सौ बार जपे (१०.३–७)। प्रातःकी संध्यामें सूर्यके दिखनेतक खड़े होकर जपनेसे रातका पाप जाता है, और सायंकी संध्यामें तारे दिखनेतक बैठकर जपनेसे दिनका (१०.८–१२)। जपयज्ञ विधियज्ञसे दस गुना श्रेष्ठ है, उपांशु जप सौ गुना और मानस जप हजार गुना (१०.१३–१४); ब्राह्मण जपसे ही सिद्ध होता है (१०.१५–१६)। संध्या केवल जल फेंकनेसे सिद्धि नहीं देती (१०.१८); ओंकार, गायत्री, व्याहृति, शिरस्, प्राणायाम, संध्या, मार्जन, जप और ब्रह्मके चिन्तनसे (मनुष्य) अंगों सहित चारों वेदोंका पारगामी होता है (१०.१९–२०)।

सूर्योपस्थाननिरूपणप्रतिज्ञा

श्लोक १०.१

मार्जनं प्राणसंरोधो ध्यानं च समुदाहृतम् ।

उपस्थानं प्रवक्ष्यामि सूर्यस्य क्रियते यथा ॥ १०.१ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ११९

मार्जन, प्राणायाम और ध्यान (ऊपर) कहे गये; अब मैं सूर्यका उपस्थान कहूँगा, जैसे (वह) किया जाता है।

अवतरणिका —

पिछले खण्ड में संध्या-साधना के उन अंगों का विवेचन हुआ जहाँ साधक अपनी बाहरी और भीतरी शुद्धि करता है। मार्जन से शरीर और मन का शोधन, प्राणायाम से प्राणों का निग्रह और ध्यान से चित्त का एकाग्रकरण संपन्न हुआ; अब यह प्रक्रिया अपने चरमोत्कर्ष की ओर बढ़ रही है।

अन्वय और पदार्थ —

(मार्जनं प्राणसंरोधो ध्यानं च) समुदाहृतम् । सूर्यस्य उपस्थानं क्रियते यथा (तद्) प्रवक्ष्यामि ॥

पदार्थ:

• मार्जनं: जल और मन्त्रों द्वारा शरीर तथा सूक्ष्म शरीर का शोधन।

• प्राणसंरोधो: प्राणों को रोकने की क्रिया, जिसे प्राणायाम कहा जाता है। यहाँ 'संरोध' शब्द का प्रयोग विशेष रूप से कुम्भक की स्थिति को इंगित करता है, जिससे मन स्थिर होता है।

• ध्यानं: उस स्थिर मन का उस परम तत्त्व (सूर्य-पुरुष) में लय होना।

• समुदाहृतम्: संक्षेप में कहा गया या पहले ही प्रस्तुत किया जा चुका है।

• उपस्थानं: शाब्दिक अर्थ है 'समीप खड़े होना'। आध्यात्मिक अर्थ में यह उस अवस्था को कहते हैं जहाँ साधक अपने इष्ट या आराध्य के सम्मुख पूर्ण समर्पण और सजगता के साथ उपस्थित होता है।

• प्रवक्ष्यामि: मैं कहूँगा (यहाँ वक्ता महर्षि याज्ञवल्क्य हैं)।

भाष्य —

इस श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य संध्या-साधना के क्रम को व्यवस्थित कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि मार्जन, प्राणसंरोध (प्राणायाम) और ध्यान—ये तीनों क्रियाएँ साधक को उस स्थिति में लाने के साधन थे, जहाँ वह 'उपस्थान' के योग्य हो सके।

बाहरी दृष्टि से देखें तो मार्जन शरीर की शुद्धि है, प्राणायाम प्राणों की शुद्धि और ध्यान मन की शुद्धि। जब शरीर, प्राण और मन तीनों शुद्ध और एकसूत्र हो जाते हैं, तब साधक सूर्य के सम्मुख खड़ा होता है। यह केवल भौतिक रूप से सूर्य की दिशा में खड़े होना नहीं है, अपितु अपनी चेतना को उस प्रकाश-पुंज के साथ एकाकार करने की तैयारी है।

यहाँ 'समुदाहृतम्' शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि पूर्व की क्रियाएँ स्वतंत्र नहीं थीं, बल्कि वे इसी 'उपस्थान' की आधारशिला थीं। बिना मार्जन के शरीर में जड़ता रहती है, बिना प्राणायाम के प्राण अस्थिर रहते हैं और बिना ध्यान के चित्त भटकता रहता है। जब ये तीनों पूर्ण होते हैं, तब साधक उस 'सूर्य' के समीप जाने का सामर्थ्य पाता है जो बाहर आकाश में भी है और भीतर हृदय-आकाश में भी। अब ऋषि उस विधि का वर्णन करने जा रहे हैं जिससे सूर्य का उपस्थान किया जाता है, जो वास्तव में साधक का अपने आत्म-स्वरूप (सूर्य-पुरुष) के सम्मुख उपस्थित होना है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' से 'साध्य' की ओर संक्रमण का बिंदु है। मार्जन, प्राणायाम और ध्यान—ये तीनों 'साधन' हैं। 'उपस्थान' वह स्थिति है जहाँ साधन समाप्त होता है और साक्षात्कार का आरम्भ होता है।

साधक के लिए उपस्थान का अर्थ है—अपनी पूरी सत्ता को केंद्र में लाना। जिस प्रकार सूर्य समस्त जगत को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार साधक जब उपस्थान करता है, तो वह अपने भीतर के उस 'अदृश्य द्रष्टा' को जाग्रत करता है जो सूर्य के समान प्रकाशमान है।

अभ्यास की दृष्टि से साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि वह अब केवल क्रियाएँ नहीं कर रहा, बल्कि वह उस परम तत्त्व के 'समीप' पहुँच गया है। यह वह भूमि है जहाँ साधक 'कर्ता' से 'साक्षी' की ओर बढ़ता है। उपस्थान का अभ्यास करते समय साधक को यह अनुभव करना चाहिए कि उसका हृदय ही सूर्य का मंदिर है और वह स्वयं उस ज्योति-पुरुष के सम्मुख नतमस्तक है। यह संध्या का वह अंतिम और निर्णायक अंग है जो साधक को बाहरी जगत से काटकर सीधे प्रकाश-तत्त्व से जोड़ देता है।

प्रत्यहं कर्तव्यानि

श्लोक १०.२

स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैर्मार्जनं प्राणसंयमः ।

सूर्यस्य चाप्युपस्थानं गायत्र्याः प्रत्यहं जपः ॥ १०.२ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ११९

जलदेवताके मन्त्रोंसे स्नान, मार्जन, प्राणायाम, सूर्यका उपस्थान और प्रतिदिन गायत्रीका जप — (ये संध्याके अंग हैं)।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने मार्जन, प्राणायाम और ध्यान की संक्षिप्त चर्चा करते हुए यह संकेत दिया कि अब वे सूर्य के 'उपस्थान' की विधि का वर्णन करेंगे। वर्तमान श्लोक में वे संध्या-साधना के संपूर्ण क्रम को एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधक को पूरी प्रक्रिया का एक समग्र मानचित्र प्राप्त हो सके।

अन्वय और पदार्थ —

अब्दैवतैर्मन्त्रैः स्नानम्, (तद्) मार्जनं, प्राणसंयमः, सूर्यस्य च उपस्थानं, गायत्र्याः प्रत्यहं जपः (एते संध्याङ्गानि) कर्तव्यानि ॥

पदार्थ:

• अब्दैवतैर्मन्त्रैः: 'अब्द' का अर्थ है जल। जल-देवता के विशिष्ट मन्त्रों के साथ।

• स्नानम्: जल द्वारा शरीर का प्रक्षालन। योगिक दृष्टि से यह केवल त्वचा की शुद्धि नहीं, अपितु जल-तत्त्व के माध्यम से जड़ता का विसर्जन है।

• मार्जनं: मन्त्रयुक्त जल का छिड़काव, जिससे सूक्ष्म शरीर के दोष दूर होते हैं।

• प्राणसंयमः: प्राणों का निग्रह। यहाँ 'संयम' शब्द का अर्थ है प्राणों को एक दिशा में लाना और उन्हें स्थिर करना।

• सूर्यस्य उपस्थानं: सूर्य के सम्मुख उपस्थित होना। यह बाहरी रूप से सूर्य की ओर मुख करना है और आन्तरिक रूप से हृदय-आकाश में स्थित सूर्य-पुरुष के प्रति सजग होना है।

• गायत्र्याः प्रत्यहं जपः: प्रतिदिन सावित्री मन्त्र का जप। यह इस पूरी साधना का बीज और फल दोनों है।

• कर्तव्यानि: किए जाने योग्य हैं (यह क्रिया पिछले श्लोकों और आने वाले निर्देशों के संदर्भ में है)।

भाष्य —

इस श्लोक में बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति संध्या-साधना के पाँच अनिवार्य अंगों का विधान करती है। यह क्रम अत्यंत वैज्ञानिक है, जो साधक को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।

प्रथम चरण 'स्नान' और 'मार्जन' है। जल-देवता के मन्त्रों से जब साधक स्नान और मार्जन करता है, तो वह केवल भौतिक मल नहीं हटाता, अपितु अपने भीतर के 'आप' (जल तत्त्व) को जाग्रत करता है। जब शरीर शुद्ध होता है, तभी प्राणों का निग्रह संभव है।

द्वितीय चरण 'प्राणसंयम' है। स्नान के पश्चात जब शरीर शिथिल और शुद्ध होता है, तब प्राणायाम के माध्यम से प्राणों को स्थिर किया जाता है। यह मन को एकाग्र करने की पूर्व-तैयारी है।

तृतीय चरण 'सूर्यस्य उपस्थानं' है। जब प्राण स्थिर हो जाते हैं, तब साधक उस ज्योति के सम्मुख उपस्थित होता है जो बाहर आकाश में सूर्य है और भीतर हृदय में 'विज्ञानमय पुरुष'। यह उपस्थान समर्पण की वह अवस्था है जहाँ साधक अपनी व्यक्तिगत सत्ता को उस विराट प्रकाश के सम्मुख समर्पित कर देता है।

अंतिम और मुख्य चरण 'गायत्री-जप' है। उपस्थान से प्राप्त एकाग्रता और समर्पण जब गायत्री के शब्दों में परिवर्तित होता है, तब वह जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं रहता, बल्कि एक आंतरिक यज्ञ बन जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ 'प्रत्यहं' (प्रतिदिन) शब्द पर बल दे रहे हैं, क्योंकि यह साधना एक निरंतरता है, जो साधक के संस्कार बदलती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः । सावित्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितः ॥ २.१०४ ॥

जलके समीप, नियमित होकर, नित्य-विधिमें स्थित, वनमें जाकर समाहित-चित्त सावित्रीका पाठ (जप) करे।

मनुस्मृति २.१०४मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 181

मनुस्मृति में भी इसी क्रम की पुष्टि मिलती है, जहाँ जल के समीप रहकर, नित्य विधि का पालन करते हुए और समाहित चित्त से सावित्री का पाठ करने का निर्देश है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति यहाँ मनुस्मृति के उस निर्देश को और अधिक विस्तार देती है, जिसमें केवल 'नित्य-विधि' कहा गया था, यहाँ उस विधि के पाँचों अंगों (स्नान, मार्जन, प्राणसंयम, उपस्थान और जप) को स्पष्ट रूप से क्रमबद्ध कर दिया गया है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की यात्रा का मार्गचित्र है। साधक यहाँ पाँच सोपानों से गुजरता है:

१. शरीर (स्नान): सबसे पहले स्थूल शरीर की शुद्धि।

२. सूक्ष्म शरीर (मार्जन): मन्त्रों के प्रभाव से आभामंडल और सूक्ष्म शरीर का शोधन।

३. प्राण (प्राणसंयम): प्राणों का निग्रह, जिससे मन की चंचलता समाप्त होती है।

४. ज्योति (उपस्थान): स्थिर मन का उस परम ज्योति (सूर्य) में विलीन होना।

५. अक्षर (गायत्री-जप): ज्योति में स्थित होकर उस अक्षर-ब्रह्म का अनुभव करना, जिसका प्रतीक गायत्री है।

साधक इस अभ्यास से अनुभव करता है कि उसकी चेतना धीरे-धीरे बाहर से भीतर की ओर सिमट रही है। स्नान और मार्जन उसे 'बाहर' से तैयार करते हैं, प्राणायाम उसे 'भीतर' ले जाता है, और उपस्थान व जप उसे उस 'केंद्र' पर प्रतिष्ठित कर देते हैं जहाँ वह स्वयं को सूर्य-पुरुष के साथ एकाकार पाता है। यह क्रम साधक को जाग्रत अवस्था से समाधि की दिशा में ले जाने वाला एक लघु-अभ्यास है।

श्लोक १०.३

उदुत्यं चित्रमित्याभ्यां प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिः ।

गायत्र्यास्तु जपं कृत्वा पूर्वमेव यथाविधि ॥ १०.३ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ११९

"उदु त्यम्…" और "चित्रम्…" — इन दो (ऋचाओं) से जलकी अञ्जलि अर्पित करे; पहले ही विधिपूर्वक गायत्रीका जप करके —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या के अनिवार्य अंगों—स्नान, मार्जन, प्राणायाम, उपस्थान और गायत्री-जप—का क्रम निर्धारित किया था। अब इस श्लोक से वे सूर्योपस्थान की व्यावहारिक विधि का विवरण आरम्भ कर रहे हैं, जिसमें जलाञ्जलि और जप के परस्पर सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है।

अन्वय और पदार्थ —

उदुत्यं (मन्त्रेण) चित्रम् (इत्यभ्यां मन्त्रेण) उदकाञ्जलिः प्रक्षिपेत्, (तथा) पूर्वमेव यथाविधि गायत्र्याः जपं कृत्वा (उपस्थानं कुर्यात्) ॥

पदार्थ:

• उदुत्यं, चित्रम्: ये दो विशिष्ट ऋचाओं के आरम्भिक शब्द हैं। 'उदु त्यम्' और 'चित्रम्' प्रतीकों द्वारा संकेतित ये मन्त्र सूर्य की स्तुति और उसकी दैवीय आभा के वर्णन से युक्त हैं।

• प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिः: 'उदक' (जल) और 'अञ्जलि' (दोनों हथेलियों को जोड़कर बनाया गया पात्र)। 'प्रक्षिपेत्' विधिलिङ् है, जिसका अर्थ है—अर्पित करना या छोड़ना। जल की अञ्जलि सूर्य को समर्पित करना कृतज्ञता और समर्पण का भाव है।

• गायत्र्यास्तु जपं कृत्वा: गायत्री मन्त्र का जप करके। यहाँ 'कृत्वा' (करके) शब्द यह दर्शाता है कि जप की क्रिया जलाञ्जलि के साथ या उससे पूर्व संपन्न होनी चाहिए।

• पूर्वमेव यथाविधि: 'पूर्वमेव' का अर्थ है—पहले ही। 'यथाविधि' का अर्थ है—शास्त्रसम्मत विधि से, जिसमें आसन, दिशा और प्राणायाम का अनुशासन सम्मिलित है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को बाह्य क्रिया (जलाञ्जलि) और आन्तर साधना (जप) के समन्वय की शिक्षा देता है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्योपस्थान की उस प्रक्रिया को बता रहे हैं जहाँ साधक अपनी चेतना को सूर्य-तत्त्व के सम्मुख स्थापित करता है।

विधि यह है कि साधक 'उदु त्यम्' और 'चित्रम्' प्रतीकों वाले मन्त्रों का पाठ करते हुए सूर्य को जल की अञ्जलि अर्पित करे। जल यहाँ केवल एक द्रव्य नहीं, अपितु साधक के भावों का वाहक है। जब साधक अञ्जलि देता है, तो वह अपने अहंकार और सीमित व्यक्तित्व को उस विराट सूर्य-प्रकाश में विसर्जित कर देता है।

श्लोक में 'पूर्वमेव यथाविधि' कहकर यह संकेत दिया गया है कि जलाञ्जलि की क्रिया से पूर्व या उसके साथ गायत्री का जप विधिपूर्वक संपन्न हो। यह क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि गायत्री-जप से चित्त शुद्ध और एकाग्र होता है, और उसी एकाग्रचित्त अवस्था में जब जलाञ्जलि दी जाती है, तब वह केवल एक शारीरिक क्रिया न रहकर एक 'यज्ञ' बन जाती है। यहाँ 'विधि' का अर्थ है—वह अनुशासन जिससे प्राण और मन एक दिशा में प्रवाहित हों।

इस क्रिया का आन्तर अर्थ यह है कि जिस प्रकार जल सूर्य की किरणों को ग्रहण कर चमकता है, उसी प्रकार साधक का हृदय गायत्री के जप से प्रकाशित होकर जब सूर्य (परमात्मा) के सम्मुख झुकता है, तब वह अपनी लघुता को पहचानकर विराटता में लीन होने का प्रयास करता है।

योग-रहस्य —

योगी के लिए यह श्लोक 'अर्पण' के अभ्यास का है। 'उदु त्यम्' और 'चित्रम्' मन्त्रों के साथ जल अर्पित करना वास्तव में अपने भीतर के 'अहं' को सूर्य-पुरुष (परमात्मा) में विसर्जित करने का अभ्यास है।

साधक यहाँ इस अनुभव से गुजरता है कि वह जो कुछ भी है, उसी एक प्रकाश-पुंज का अंश है। गायत्री-जप से उत्पन्न हुई मानसिक ऊर्जा जब जलाञ्जलि के माध्यम से बाह्य सूर्य की ओर प्रवाहित होती है, तो साधक के भीतर 'मैं' और 'वह' का भेद मिटने लगता है। यह अभ्यास साधक को 'साधना-भूमि' से 'समर्पण-भूमि' की ओर ले जाता है, जहाँ क्रिया (कर्म) और मन्त्र (ज्ञान) मिलकर भक्ति के रूप में प्रकट होते हैं।

उपस्थानमन्त्राः

श्लोक १०.४

उपस्थानं स्वकैर्मन्त्रैरादित्यस्य तु कारयेत् ।

वक्ष्यमाणैः प्रयत्नेन सूर्यस्य विषयाद्बुधः ॥ १०.४ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ११९

— बुद्धिमान् आगे कहे जानेवाले सूर्यके अपने मन्त्रोंसे यत्नपूर्वक आदित्यका उपस्थान करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में जलाञ्जलि के लिए प्रयुक्त होने वाले विशिष्ट मन्त्रों और गायत्री-जप के पूर्व-अनुष्ठान का निर्देश दिया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य सूर्योपस्थान की संपूर्ण प्रक्रिया को मन्त्रों के माध्यम से पूर्ण करने की विधि बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

बुधः प्रयत्नेन वक्ष्यमाणैः आदित्यस्य स्वकैर्मन्त्रैः तु उपस्थानं कारयेत् ॥

पदार्थ:

• बुधः: वह व्यक्ति जो विवेकशील है, जिसे सत्य और असत्य, स्थूल और सूक्ष्म का ज्ञान है। यहाँ 'बुद्धिमान' का अर्थ केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु वह साधक है जो क्रिया के पीछे के मन्त्र-रहस्य को जानता है।

• प्रयत्नेन: यत्नपूर्वक। यहाँ 'प्रयत्न' का अर्थ केवल शारीरिक श्रम नहीं, अपितु एकाग्रता और सजगता है। बिना सजगता के किया गया जप केवल यांत्रिक क्रिया है, साधना नहीं।

• वक्ष्यमाणैः: जो आगे कहे जाने वाले हैं। यह संकेत है कि आने वाले श्लोकों (१०.५, १०.६) में उन विशिष्ट ऋचाओं का विवरण दिया जाएगा।

• आदित्यस्य स्वकैर्मन्त्रैः: आदित्य के अपने मन्त्रों से। 'स्वक' शब्द यहाँ महत्वपूर्ण है; इसका अर्थ है वे मन्त्र जो सूर्य-तत्त्व के अनुकूल हैं, जो सूर्य की अपनी शक्ति और गुण-धर्मों को जाग्रत करने वाले हैं।

• उपस्थानं कारयेत्: उपस्थान करे। 'उपस्थान' का शाब्दिक अर्थ है—निकट बैठना या सम्मुख उपस्थित होना। आध्यात्मिक अर्थ में, अपनी चेतना को इष्ट-देवता (सूर्य) के स्वरूप में विलीन करना या उसके साथ तादात्म्य स्थापित करना 'उपस्थान' है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को बाहरी क्रिया से हटाकर मन्त्रों की शक्ति और उनके प्रति समर्पण की ओर ले जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि सूर्योपस्थान केवल जल चढ़ाने की एक रस्म नहीं है, अपितु यह आदित्य-तत्त्व के साथ एक सचेतन मिलन है।

ऋषि कहते हैं कि 'बुद्धिमान' साधक ही इस विधि को पूर्ण कर सकता है। इसका भाव यह है कि जब तक साधक यह नहीं जानता कि सूर्य केवल आकाश का एक पिंड नहीं, अपितु वह 'विज्ञानमय पुरुष' है जो हृदय-आकाश में भी स्थित है, तब तक उसका उपस्थान पूर्ण नहीं होता। 'प्रयत्नेन' शब्द यहाँ साधक को सचेत करता है कि मन्त्रों का उच्चारण केवल जिह्वा से न हो, अपितु मन और प्राण भी उस मन्त्र के अर्थ और कंपन में लीन रहें।

'स्वकैर्मन्त्रैः' के माध्यम से याज्ञवल्क्य यह संकेत दे रहे हैं कि जिस प्रकार प्रत्येक देवता का अपना विशिष्ट गुण होता है, उसी प्रकार सूर्य के मन्त्रों में वह तेज और प्रकाश निहित है जो साधक के भीतर के अज्ञान-अन्धकार को मिटा सके। आने वाले श्लोकों में जो ऋचाएँ बताई जाएँगी, वे साधक को स्थूल सूर्य से सूक्ष्म सूर्य (आत्मा) की ओर ले जाने वाली सीढ़ियाँ हैं। अतः यह उपस्थान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें साधक स्वयं को सूर्य के सम्मुख समर्पित कर अपनी चेतना का विस्तार करता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'उपस्थान' के माध्यम से 'साक्षी-भाव' की स्थापना का अभ्यास है। साधक जब 'प्रयत्नपूर्वक' सूर्य के मन्त्रों का जप करता है, तो वह अपनी बिखरी हुई मानसिक वृत्तियों को समेटकर एक बिंदु पर केंद्रित करता है।

यहाँ अभ्यास यह है कि साधक बाहरी सूर्य को देखते हुए अपनी दृष्टि को धीरे-धीरे भीतर की ओर मोड़े, जहाँ हृदय-कमल में सूर्य का ही स्वरूप (अंतर्यामी) प्रतिष्ठित है। 'उपस्थान' का अर्थ है—अपनी सीमित बुद्धि (बुधः) को विराट आदित्य-चेतना के सम्मुख लाना। जब साधक मन्त्रों के कंपन के साथ स्वयं को सूर्य के साथ जोड़ता है, तो वह 'अहं' (व्यक्तिगत पहचान) से ऊपर उठकर 'अहर्' (दिव्य प्रकाश) का अनुभव करने की भूमि की ओर अग्रसर होता है। यह अभ्यास साधक को बाहरी कर्मकाण्ड से हटाकर आंतरिक प्रकाश-साधना की ओर ले जाता है।

श्लोक १०.५

उदुत्यं चित्रं देवानामुद्वयं तमसः परि ।

तच्चक्षुर्देव इति च जपं कुर्यात्तु वै ऋचा ॥ १०.५ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ११९

"उदु त्यम्…", "चित्रं देवानाम्…", "उद्वयं तमसस्परि…" और "तच्चक्षुर्देवहितम्…" — इन ऋचाओंसे जप करे;

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में विवेकशील साधक को सूर्य के विशिष्ट मन्त्रों द्वारा उपस्थान करने का निर्देश दिया गया था। अब महर्षि याज्ञवल्क्य उन ऋचाओं का विवरण दे रहे हैं, जिनके द्वारा साधक अपनी चेतना को आदित्य-तत्त्व में प्रतिष्ठित करता है।

अन्वय और पदार्थ —

उदुत्यं (मन्त्रेण), चित्रं देवानाम् (मन्त्रेण), उद्वयं तमसः परि (मन्त्रेण), तच्चक्षुर्देव (इति) च — (एतैः ऋचाभिः) जपं कुर्यात्तु वै ऋचा ॥

पदार्थ:

• उदुत्यं, चित्रं देवानाम्, उद्वयं तमसः परि, तच्चक्षुर्देव: ये चारों सूर्योपस्थान के विशिष्ट मन्त्रों के आरम्भिक शब्द (प्रतीक) हैं। ये ऋचाएँ सूर्य के उदय, उसकी दिव्यता, अन्धकार के विनाश और उसकी सर्वद्रष्टा दृष्टि का वर्णन करती हैं।

• जपं कुर्यात्: जप करे। यहाँ 'जप' का अर्थ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, अपितु मन्त्र के अर्थ में मन को लीन करना है।

• वै: निश्चय ही। यह अवधरणवाचक शब्द है, जो यह दर्शाता है कि इन विशिष्ट ऋचाओं का प्रयोग अनिवार्य है क्योंकि ये सूर्य-तत्त्व के साथ तादात्म्य स्थापित करने के लिए सटीक साधन हैं।

• ऋचा: यहाँ 'ऋचा' शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए है कि ये मन्त्र केवल स्तुतियाँ नहीं, अपितु ऋत (ब्रह्माण्डीय नियम) पर आधारित दिव्य ध्वनियाँ हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक सूर्योपस्थान की मन्त्र-विधि को स्पष्ट करता है। पिछले श्लोक (१०.४) में जिस 'उपस्थान' की बात कही गई थी, वह यहाँ इन चार ऋचाओं के माध्यम से साकार होता है।

साधक को निर्देश है कि वह 'उदु त्यम्...', 'चित्रं देवानाम्...', 'उद्वयं तमसस्परि...' और 'तच्चक्षुर्देव...' इन ऋचाओं का जप करे। बाहरी दृष्टि से यह सूर्य के उदय होने पर उसकी वंदना है, किन्तु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में यह एक आंतरिक आरोहण है। 'उदु त्यम्' और 'उद्वयं' जैसे शब्द 'उदय' और 'ऊपर उठने' का संकेत देते हैं। जिस प्रकार सूर्य भौतिक जगत के अन्धकार को मिटाकर प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार इन मन्त्रों का जप साधक के भीतर अविद्या के अन्धकार को मिटाकर ज्ञान के सूर्य को उदित करता है।

'तच्चक्षुर्देव' मन्त्र का विशेष महत्त्व है। सूर्य को जगत की 'चक्षु' (आँख) कहा गया है। जब साधक इस मन्त्र का जप करता है, तो वह अपनी भौतिक दृष्टि को हटाकर उस दिव्य दृष्टि में प्रवेश करने का प्रयास करता है, जिससे सम्पूर्ण सृष्टि प्रकाशित है। यह जप केवल वाणी का व्यायाम नहीं, अपितु सूर्य के प्रकाशमय स्वरूप के साथ अपनी चेतना का एकीकरण है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'अन्धकार से ज्योति की ओर' (तमसो मा ज्योतिर्गमय) जाने का व्यावहारिक अभ्यास है। साधक यहाँ तीन स्तरों पर अनुभव करता है:

१. उदय का अनुभव: 'उदु त्यम्' और 'उद्वयं' के जप से साधक अपने भीतर सोई हुई चेतना को जाग्रत करता है। यह वह स्थिति है जहाँ साधक जड़ता से सजगता की ओर बढ़ता है।

२. दिव्यता का अनुभव: 'चित्रं देवानाम्' के माध्यम से वह सूर्य के उस स्वरूप का अनुभव करता है जो समस्त देवताओं का सार है। यहाँ साधक अपनी सीमित पहचान को त्यागकर विराट पुरुष के प्रकाश में स्वयं को देखता है।

३. दृष्टि का परिवर्तन: 'तच्चक्षुर्देव' का अभ्यास साधक को यह अनुभव कराता है कि वह स्वयं देखने वाला नहीं, अपितु उस परम ज्योति का प्रतिबिंब है। यहाँ 'चक्षु' का अर्थ है—विवेक। साधक अपनी अंतर्दृष्टि को सूर्य (हृदय-आकाश के सूर्य) में केंद्रित करता है, जिससे उसे सत्य का साक्षात्कार होता है।

इस अभ्यास से साधक 'साधारण मनुष्य' की भूमि से उठकर 'ज्योतिर्मय साधक' की भूमि की ओर अग्रसर होता है। वह अनुभव करता है कि जिस सूर्य की वह बाहरी पूजा कर रहा है, वही सूर्य उसके हृदय में ज्ञान-रुप प्रकाश बनकर उदित हो रहा है।

श्लोक १०.६

उद्गादित्ययं मन्त्र आकृष्णेनेति वै ऋचा ।

इष्टं मनः प्रयुञ्जीत भक्त्या तानि जपेत् सदा ॥ १०.६ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ११९

"उदगादयम्…" मन्त्र, और "आ कृष्णेन…" ऋचा; और "इषे त्वा…"(?) — इनसे मन लगाये; भक्तिसे इनका सदा जप करे।

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में सूर्योपस्थान के प्रथम चार मन्त्रों का निर्देश दिया गया था, जो साधक को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उन आगामी ऋचाओं का उल्लेख कर रहे हैं, जो उपस्थान की प्रक्रिया को पूर्णता प्रदान करती हैं और मन को भक्तिमय स्थिरता देती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

उदगादित्ययं मन्त्रः (च), आ कृष्णेन (इति) वै ऋचा । (तस्मात्) इष्टं मनः प्रयुञ्जीत, भक्त्या तानि जपेत् सदा ॥

पदार्थ:

• उदगादित्ययं मन्त्रः: 'उदगादयम्...' शब्दों से आरम्भ होने वाला मन्त्र। यह सूर्य के अरुणोदय और उसकी जाग्रत शक्ति का आह्वान है।

• आ कृष्णेन: 'आ कृष्णेन...' शब्दों से आरम्भ होने वाली ऋचा। यहाँ 'कृष्ण' शब्द अन्धकार या रात्रि का प्रतीक है, जिससे सूर्य का प्राकट्य होता है।

• इष्टं मनः प्रयुञ्जीत: यहाँ 'इष्टं' शब्द का प्रयोग संभवतः 'इष्ट' (प्रिय/वांछित) या 'इष्ट' (एकाग्र/संयमित) के अर्थ में है। भाव यह है कि साधक अपने मन को उस इष्ट-लक्ष्य (सूर्य-तत्त्व) में प्रयुत करे, अर्थात् मन को विचलित न होने दे।

• भक्त्या: श्रद्धा और समर्पण के साथ। योग में 'भक्ति' का अर्थ केवल भावुकता नहीं, अपितु मन्त्र के प्रति पूर्ण विश्वास और समर्पण है।

• जपेत् सदा: निरंतर जप करे। 'सदा' का अर्थ केवल समय की निरंतरता नहीं, अपितु हर अवस्था में मन्त्र के प्रभाव को जीवित रखना है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक सूर्योपस्थान की मन्त्र-श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। पिछले श्लोक (१०.५) में चार ऋचाएँ बताई गईं थीं, अब महर्षि 'उदगादयम्...' मन्त्र और 'आ कृष्णेन...' ऋचा का विधान कर रहे हैं।

बाहरी विधि में यह सूर्य के उदय होने पर की जाने वाली स्तुति है, किन्तु इसका आन्तर अर्थ अत्यंत गहरा है। 'उदगादयम्...' मन्त्र उस जाग्रति का प्रतीक है जब साधक के भीतर अज्ञान का अन्धकार छँटता है और ज्ञान का सूर्य उदय होता है। वहीं 'आ कृष्णेन...' ऋचा उस प्रक्रिया को दर्शाती है जहाँ साधक अपने भीतर के 'कृष्ण' (तमस या अविद्या) को पार कर प्रकाश-पुंज में स्थित होता है।

ऋषि यहाँ केवल मन्त्रों की सूची नहीं दे रहे, अपितु 'इष्टं मनः प्रयुञ्जीत' कहकर जप की मानसिक स्थिति का निर्देश दे रहे हैं। मन्त्र केवल ध्वनि नहीं हैं; यदि मन 'इष्ट' (लक्ष्य) में प्रयुत नहीं है, तो जप केवल वाक-जाल है। जब साधक भक्तिपूर्वक इन ऋचाओं का जप करता है, तब वह केवल बाहरी सूर्य को नहीं, अपितु अपने हृदय-आकाश में स्थित उस 'अदृश्य द्रष्टा' को पुकारता है, जो समस्त प्रकाश का स्रोत है। यह जप साधक को स्थूल जगत से हटाकर सूक्ष्म चेतना की ओर ले जाने का सेतु है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'मनस-संयम' का अभ्यास है। साधक जब 'उदगादयम्...' और 'आ कृष्णेन...' जैसी ऋचाओं का जप करता है, तो वह अपने मन को बाहरी सूर्य की किरणों के साथ जोड़कर उसे भीतर की ओर मोड़ता है।

यहाँ 'इष्टं मनः' का अभ्यास यह है कि जप के समय मन किसी अन्य विचार में न भटके, बल्कि मन्त्र के अर्थ और उसकी ध्वनि में ही लीन रहे। यह अभ्यास साधक को 'सावित्रिय' भूमि से ऊपर उठाकर उस स्थिति में ले जाता है जहाँ वह स्वयं को प्रकाशमय अनुभव करने लगता है। भक्ति यहाँ वह साधन है जो मन के बिखराव को रोककर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करती है। इस प्रकार, यह जप केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, अपितु मन को सूर्य-तत्त्व (आत्मा) में विलीन करने का एक सूक्ष्म योगिक अभ्यास है।

गायत्रीजपसंख्याकल्पाः

श्लोक १०.७

एतैर्मन्त्रैः प्रयुञ्जीत शक्त्याऽन्यानि जपेत् सदा ।

दश त्रिंशत् शतं वापि गायत्र्याः परिवर्तयेत् ॥ १०.७ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ११९

इन मन्त्रोंसे (उपस्थान) करे, और यथाशक्ति दूसरे (मन्त्र) भी सदा जपे; गायत्रीको दस, तीस या सौ बार दोहराये —

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में सूर्योपस्थान की उन ऋचाओं का निर्देश था, जिनसे साधक अपने मन को इष्ट-लक्ष्य में स्थिर करता है। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य उपस्थान की प्रक्रिया को पूर्ण करते हुए, साधक की व्यक्तिगत सामर्थ्य के अनुसार अन्य मन्त्रों के जप और गायत्री के आवर्तन की संख्या का विधान कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(साधकः) एतैर्मन्त्रैः (उपस्थानं) प्रयुञ्जीत, शक्त्याऽन्यानि (मन्त्रणि) सदा जपेत् । गायत्र्याः दश (वा) त्रिंशत् (वा) शतं वापि परिवर्तयेत् ॥

पदार्थ:

• एतैर्मन्त्रैः: उन मन्त्रों से, जिनका उल्लेख पिछले श्लोकों (१०.५ और १०.६) में किया गया है।

• प्रयुञ्जीत: प्रयुक्त करे या क्रियान्वित करे। यहाँ इसका अर्थ है कि उपस्थान की विधि को इन मन्त्रों के साथ पूर्ण करे।

• शक्त्याऽन्यानि: अपनी शक्ति (सामर्थ्य, समय और मानसिक स्थिति) के अनुसार अन्य मन्त्रों का भी।

• परिवर्तयेत्: दोहराये या आवर्तन करे। योग और मन्त्र-शास्त्र में 'परिवर्तन' का अर्थ है मन्त्र का एक पूर्ण चक्र पूरा करना।

• दश, त्रिंशत्, शतं: दस, तीस और सौ। ये संख्याएँ केवल गिनती नहीं, अपितु साधक की साधना-भूमि और समय की उपलब्धता के संकेत हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक संध्या-विधि के उस चरण की ओर ले जाता है जहाँ बाहरी क्रिया (उपस्थान) समाप्त होती है और आंतरिक एकाग्रता (जप) का आरम्भ होता है। महर्षि कहते हैं कि उपस्थान के लिए जिन ऋचाओं का विधान किया गया है, उनसे इस प्रक्रिया को पूर्ण किया जाए। किंतु वे साधक को केवल एक सीमित विधि में नहीं बाँधते, अपितु 'शक्त्याऽन्यानि' कहकर यह संकेत देते हैं कि यदि साधक की रुचि या सामर्थ्य अधिक है, तो वह अन्य वैदिक ऋचाओं का भी जप कर सकता है।

यहाँ 'शक्त्या' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग में शक्ति का अर्थ केवल शारीरिक बल नहीं, अपितु 'प्राण-शक्ति' और 'चित्त-धारिता' है। जिस साधक का चित्त अधिक स्थिर है, वह अधिक संख्या में जप कर सकता है; जो अभी आरम्भिक अवस्था में है, वह न्यूनतम संख्या से अपनी यात्रा शुरू करे।

इसके पश्चात, महर्षि गायत्री के आवर्तन की तीन संख्याएँ बताते हैं: दस, तीस और सौ। गायत्री का जप संध्या का हृदय है। इन संख्याओं का विधान यह दर्शाता है कि जप की सघनता के अनुसार फल की तीव्रता बदलती है। दस बार का जप न्यूनतम मर्यादा है, तीस बार का जप मध्यम साधना है और सौ बार का जप पूर्ण समर्पण और गहन शोधन की प्रक्रिया है। यह विधान यह स्पष्ट करता है कि मन्त्र का प्रभाव उसकी पुनरावृत्ति (परिवर्तन) से प्रगाढ़ होता है, जिससे मन की चंचलता समाप्त होकर वह 'अक्षर' में लीन होने लगता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

जप की संख्या और उसके प्रभाव के विषय में मनुस्मृति में भी उल्लेख मिलता है:

मनुस्मृति

सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्त्रिकं द्विजः । महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाहिर्विमुच्यते ॥ २.७९ ॥

द्विज (गाँवसे) बाहर इस त्रिक (ॐ, व्याहृति, सावित्री) का हज़ार बार अभ्यास करके एक महीनेमें बड़े पापसे भी वैसे छूट जाता है जैसे साँप केंचुलसे।

मनुस्मृति २.७९मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 228

(अर्थ: द्विज गाँव से बाहर इस त्रिक (ॐ, व्याहृति, सावित्री) का हज़ार बार अभ्यास करके एक महीने में बड़े पाप से भी वैसे छूट जाता है जैसे साँप केंचुल से।)

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति में दस, तीस और सौ की संख्याएँ नित्य संध्या के लिए हैं, जबकि मनुस्मृति में 'सहस्र' (हज़ार) की संख्या एक विशेष शोधन प्रक्रिया या प्रायश्चित्त के रूप में वर्णित है। दोनों ग्रंथों का मेल यह है कि मन्त्र का बार-बार आवर्तन साधक के अंतःकरण पर जमी हुई मलिनता (पाप) को वैसे ही उतार देता है जैसे साँप अपनी पुरानी त्वचा त्याग देता है। संख्या जितनी अधिक होगी, शोधन उतना ही गहरा होगा।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'संख्या' से 'शून्यता' की ओर ले जाने वाला है। जब साधक गायत्री को दस, तीस या सौ बार दोहराता है, तो वह वास्तव में अपनी चेतना को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जा रहा होता है।

प्रथम दस जपों में मन बाहरी जगत से हटकर मन्त्र के शब्दों पर टिकता है। तीस के आवर्तन तक पहुँचते-पहुँचते मन्त्र की ध्वनि हृदय में गूँजने लगती है और चित्त एकतत्व में स्थित होने लगता है। जब साधक सौ बार के आवर्तन को पूर्ण करता है, तब मन्त्र केवल शब्द नहीं रहता, अपितु वह एक 'प्रकाश-पुंज' बन जाता है जो साधक के भीतर के सूर्य (आत्मा) से एकाकार हो जाता है।

यहाँ 'परिवर्तन' का योगिक अर्थ है—चेतना का परिभ्रमण। जैसे-जैसे संख्या बढ़ती है, साधक की वृत्ति बाहरी जगत से सिमटकर अंतःकरण के केंद्र में स्थित हो जाती है। यह अभ्यास साधक को 'अधम' (न्यूनतम) से 'उत्तम' (पूर्ण) भूमि की ओर ले जाता है, जहाँ जप केवल क्रिया नहीं, अपितु एक निरंतर अनुभव बन जाता है।

गायत्रीजपसंख्याफलम्

श्लोक १०.८

अहोरात्रं कृतं ह्येनस्तत् सर्वं विप्रणश्यति ।

पूर्वां संध्यां जपंस्तिष्ठेन्नैशमेनो व्यपोहति ॥ १०.८ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. ११९

— (इससे) दिन-रातमें किया हुआ सारा पाप नष्ट हो जाता है। प्रातःकालकी संध्यामें खड़ा होकर जप करता हुआ रातके पापको दूर करता है,

अवतरणिका —

पिछले श्लोक में सूर्योपस्थान की ऋचाओं और गायत्री के आवर्तन की संख्या का विधान किया गया था। वर्तमान श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य इस साधना के फल और उसकी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति (आसन) के रहस्य को स्पष्ट कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

(एवं सूर्योपस्थानं कुर्वता) अहोरात्रं कृतं ह्येनस्तत् सर्वं विप्रणश्यति । (साधकः) पूर्वां संध्यां जपं स्तिष्ठन् नैशमेनो व्यपोहति ॥

पदार्थ:

• अहोरात्रं: अहो (दिन) + रात्र (रात)। पूर्ण चौबीस घण्टे का चक्र।

• ह्येनस्तत्: 'हि' (निश्चित ही) + 'एनत' (पाप/मल)। यहाँ 'एनत' का अर्थ वह मानसिक और कर्मिक मल है जो चेतना को ढंकता है।

• विप्रणश्यति: पूर्णतः नष्ट हो जाता है; विलीन हो जाता है।

• पूर्वां संध्यां: प्रातःकाल की संध्या।

• स्तिष्ठन्: खड़े होकर (उत्तिष्ठक स्थिति में)।

• नैशमेनो: निशा (रात) + मलं (मल)। रात्रि के समय संचित हुए पाप या तामसिक संस्कार।

• व्यपोहति: दूर करता है, हटाता है या विलोपित करता है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक केवल एक कर्मकाण्डीय विधि नहीं, अपितु चेतना के शुद्धिकरण का विज्ञान है। महर्षि कहते हैं कि जब साधक विधिपूर्वक सूर्योपस्थान और गायत्री जप करता है, तब दिन और रात (अहोरात्र) के दौरान संचित समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ 'पाप' का अर्थ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु वह 'मल' है जो हमारी बुद्धि और प्राण को अशुद्ध करता है, जिससे हम सत्य के स्वरूप को नहीं देख पाते।

श्लोक का दूसरा चरण एक विशिष्ट शारीरिक मुद्रा का निर्देश देता है: "पूर्वां संध्यां जपं स्तिष्ठन्"। प्रातःकाल की संध्या में जप के समय 'खड़े होने' (स्तिष्ठन्) का विधान है। बाहरी दृष्टि से यह सूर्य के उदय होने के साथ उनके सम्मान में खड़ा होना है, किंतु आन्तरिक दृष्टि से 'खड़ा होना' जाग्रत अवस्था का प्रतीक है। रात्रि के समय जब हम निद्रा और स्वप्न के प्रभाव में होते हैं, तब चेतना का स्तर नीचे गिर जाता है और तामसिक वृत्तियाँ (नैशमेनो) प्रबल होती हैं। प्रातःकाल खड़े होकर, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर जब साधक जप करता है, तो वह अपनी सुषुप्त चेतना को जाग्रत करता है। यह उर्ध्वगमन की स्थिति है, जो रात्रि के जड़त्व और अंधकार को काटकर साधक को प्रकाश की ओर ले जाती है।

अतः, प्रातःकालीन संध्या का यह अभ्यास रात के संचित मानसिक बोझ और प्रमाद को धोकर मन को पुनः निर्मल कर देता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ २.१०२ ॥

प्रातःसन्ध्यामें खड़े होकर (सावित्रीका) जप करनेवाला रातके पापको दूर करता है, और सायंसन्ध्यामें बैठकर (जप करनेवाला) दिनमें किये मलको नष्ट करता है।

मनुस्मृति २.१०२मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 241

यह स्मृति यहाँ मनुस्मृति के विधान के साथ पूर्णतः सहमत है। मनुस्मृति में भी स्पष्ट कहा गया है कि प्रातः संध्या में खड़े होकर जप करने वाला रात के पापों का शमन करता है। दोनों ग्रंथों का उद्देश्य साधक को यह समझाना है कि शारीरिक मुद्रा (आसन) का सीधा प्रभाव मानसिक अवस्था पर पड़ता है। खड़े होने की मुद्रा जाग्रति और तत्परता का प्रतीक है, जो रात्रि के आलस्य और अंधकार (तमस) को नष्ट करने के लिए अनिवार्य है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'शुद्धि' और 'जाग्रति' का अभ्यास है। साधक जब 'स्तिष्ठन्' (खड़े होकर) जप करता है, तो वह अपने शरीर के प्राण-प्रवाह को सीधा करता है। रात्रि के समय मन अवचेतन की गहराइयों में भटकता है, जिससे कई संस्कार और मल (नैशमेनो) संचित हो जाते हैं। प्रातःकाल सूर्य के सम्मुख खड़े होकर गायत्री का जप करना, वास्तव में अपने भीतर के 'आंतरिक सूर्य' (हृदय-ज्योति) को जाग्रत करना है।

साधक यहाँ अनुभव करता है कि जैसे बाहरी सूर्य उदय होने पर रात का अंधकार मिटता है, वैसे ही मन्त्र की शक्ति और शरीर की उर्ध्वगामी मुद्रा से उसके भीतर का अज्ञान-अंधकार नष्ट होता है। यह अभ्यास साधक को 'तमस' (जड़ता) से निकालकर 'रजस' (क्रियाशीलता) और अंततः 'सत्व' (प्रकाश) की भूमि पर ले जाता है। यहाँ जप केवल शब्दों का दोहराव नहीं, बल्कि प्राणों का सूर्य-तत्व में विलीनीकरण है।

श्लोक १०.९

पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ।

जपिनां होमिनां चैव ध्यायिनां तीर्थसेविनाम् ॥ १०.९ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२०

और सायंकालकी (संध्यामें) बैठकर (जप करता हुआ) दिनमें किये मलको नष्ट करता है। जप करनेवालों, होम करनेवालों, ध्यान करनेवालों, तीर्थसेवियों —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में प्रातःकालीन संध्या के विधान और रात्रि के दोषों के क्षय का वर्णन किया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य सायंकाल की साधना की मुद्रा और उसके द्वारा दिनभर के संचित मानसिक मल के शोधन का रहस्य बता रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् । जपिनां होमिनां चैव ध्यायिनां तीर्थसेविनाम् ॥

अन्वय: (साधकः) पश्चिमां (संध्यां) तु समासीनः दिवाकृतं मलं हन्ति। (एतत् फलम्) जपिनाम्, होमिनाम्, ध्यायिनाम्, तीर्थसेविनाम् (चैव अस्ति)।

पदार्थ:

• पश्चिमां: पश्चिम दिशा में अस्त होते सूर्य की संध्या।

• समासीनः: बैठकर। यह मुद्रा स्थिरता और अंतर्मुखता का प्रतीक है।

• मलं हन्ति: 'मल' यहाँ केवल बाहरी गंदगी नहीं, अपितु चित्त की अशुद्धि (राग-द्वेष-मोह) है। 'हन्ति' का अर्थ है—पूर्णतः नष्ट करना या विलोपित करना।

• दिवाकृतम्: दिन के समय किए गए कर्मों से उत्पन्न दोष।

• जपिनाम्, होमिनाम्, ध्यायिनाम्, तीर्थसेविनाम्: जप करने वालों, होम करने वालों, ध्यान करने वालों और तीर्थों की सेवा/यात्रा करने वालों का। यहाँ इन चार श्रेणियों के साधकों की बात की गई है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य संध्या-साधना के क्रियात्मक और फलभूत पक्ष को स्पष्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सायंकाल की संध्या में बैठकर जप करने वाला साधक दिनभर में एकत्रित हुए 'मल' का विनाश करता है।

यहाँ 'बैठकर' (समासीनः) करने का विधान अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रातःकाल की संध्या 'उत्थान' (खड़े होकर) की है, जो जाग्रतता और संकल्प का प्रतीक है, जबकि सायं की संध्या 'आसन' (बैठकर) की है, जो विश्राम, स्थिरता और आत्म-अवलोकन का प्रतीक है। दिनभर की भागदौड़, बाहरी जगत के संपर्क और इंद्रिय-गोचर विषयों के कारण चित्त में जो विक्षेप और मल (अशुद्धि) जमा होता है, उसे केवल स्थिर होकर, अंतर्मुखी होकर ही धोया जा सकता है।

आगे ऋषि उन साधकों का उल्लेख करते हैं जिनके लिए यह शुद्धि-प्रक्रिया विशेष फलदायी है—जप, होम, ध्यान और तीर्थ-सेवा। यहाँ एक सूक्ष्म संकेत है कि केवल बाहरी क्रिया पर्याप्त नहीं है; जब साधक जप (मन्त्र-शक्ति), होम (अग्नि-तप), ध्यान (एकाग्रता) और तीर्थ-सेवा (पवित्रता के प्रति समर्पण) को अपने जीवन में उतारता है, तब सूर्योपस्थान की यह विधि उसके लिए पूर्णतः प्रभावी होती है। यह श्लोक यह भी दर्शाता है कि संध्या केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि चित्त का 'डिटॉक्सिफिकेशन' (शोधन) है, जिससे साधक अगले दिन की नई यात्रा के लिए पुनः शुद्ध हो सके।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ २.१०२ ॥

प्रातःसन्ध्यामें खड़े होकर (सावित्रीका) जप करनेवाला रातके पापको दूर करता है, और सायंसन्ध्यामें बैठकर (जप करनेवाला) दिनमें किये मलको नष्ट करता है।

मनुस्मृति २.१०२मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 241

इस श्लोक की शब्दावली और विधान मनुस्मृति के इस अंश से पूर्णतः मेल खाता है। दोनों ही ग्रन्थ प्रातःकाल के लिए 'तिष्ठन्' (खड़े होकर) और सायंकाल के लिए 'समासीनः' (बैठकर) की मुद्रा का निर्देश देते हैं। यह सिद्ध करता है कि वैदिक परंपरा में शारीरिक मुद्रा का सीधा सम्बन्ध मानसिक अवस्था से है—प्रातःकाल का जागरण और सायंकाल का संकलन।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से 'मल' वह संस्कार है जो दिनभर के अनुभवों से चित्त की सतह पर जम जाता है। साधक जब सायंकाल में 'समासीन' होता है, तो वह अपनी ऊर्जा को बाहर से खींचकर भीतर की ओर मोड़ता है।

अभ्यास की दृष्टि से यहाँ चार सोपान दिए गए हैं:

१. जप: शब्द-ब्रह्म के माध्यम से मन के बिखराव को रोकना।

२. होम: अपनी कामनाओं और अहंकार की आहुति देना (आन्तरिक अग्निहोत्र)।

३. ध्यान: साक्षी भाव में स्थित होकर दिनभर के कर्मों का निरीक्षण करना।

४. तीर्थ-सेवा: अपने हृदय को ही तीर्थ मानकर उसमें पवित्रता का वास करना।

साधक जब इन चार अभ्यासों के साथ सूर्योपस्थान करता है, तो वह 'भुवन' (बाहरी जगत) से हटकर 'हृदय' (आन्तरिक जगत) में प्रवेश करता है। यह प्रक्रिया साधक को 'क्रिया-भूमि' से उठाकर 'अनुभव-भूमि' की ओर ले जाती है, जहाँ दिनभर के समस्त द्वन्द्व सूर्य के प्रकाश (ज्ञान) में विलीन हो जाते हैं।

श्लोक १०.१०

न पर्युषन्ति पापानि ये च स्नाताः शिरोव्रतैः ।

नास्ति गङ्गासमं तीर्थं न देवः केशवात् परः ॥ १०.१० ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२०

— और जो शिरोव्रत (सिरसे स्नान) करके स्नात हैं, उनके पाप टिकते नहीं। गङ्गाके समान कोई तीर्थ नहीं, केशवसे बड़ा कोई देव नहीं,

अवतरणिका — पिछले श्लोक में जप, होम, ध्यान और तीर्थ-सेवा के माध्यम से दिनभर के मानसिक मल के शोधन का वर्णन किया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य शुद्धि के एक और विशेष साधन 'शिरोव्रत' और तीर्थ एवं देव की सर्वोच्चता का संकेत दे रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

न पर्युषन्ति पापानि ये च स्नाताः शिरोव्रतैः । नास्ति गङ्गासमं तीर्थं न देवः केशवात् परः ॥

अन्वय: ये च शिरोव्रतैः स्नाताः (सन्तः), तेषां पापानि न पर्युषन्ति। गङ्गासमं तीर्थं नास्ति, केशवात् परः देवः न (अस्ति)।

पदार्थ:

• न पर्युषन्ति: टिकते नहीं, वास नहीं करते। 'पर्युषति' का अर्थ है किसी स्थान पर ठहरना। यहाँ पापों का चित्त में ठहरना निषिद्ध है।

• शिरोव्रतैः स्नाताः: शिरोव्रत के साथ स्नान करने वाले। 'शिरोव्रत' संभवतः वह व्रत या विधि है जिसमें सिर पर जल धारित कर या सिर के संकल्प के साथ पवित्र स्नान किया जाता है।

• गङ्गासमं तीर्थं नास्ति: गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। यहाँ 'तीर्थ' का अर्थ केवल नदी नहीं, अपितु वह 'तरण' (पार उतारने वाला) साधन है जो साधक को संसार से मुक्त करे।

• केशवात् परः देवः न: केशव से बढ़कर कोई देव नहीं है। 'केशव' वह है जो केशी (अहंकार रूपी असुर) का विनाश करता है या जिसके केश (किरणें) संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य बाह्य शुद्धि और आंतरिक शुद्धि के समन्वय को दर्शा रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने जप और ध्यान जैसे सूक्ष्म साधनों की चर्चा की थी, यहाँ वे 'शिरोव्रत' के साथ स्नान की महिमा बता रहे हैं।

ऋषि कहते हैं कि जो साधक शिरोव्रत के साथ स्नान करते हैं, उनके पाप टिकते नहीं। यहाँ 'पाप' का अर्थ केवल नैतिक त्रुटि नहीं, अपितु वे संस्कार हैं जो चित्त को मलिन कर देते हैं। स्नान जब केवल शरीर की शुद्धि न रहकर 'व्रत' (संकल्प) बन जाता है, तब वह संस्कार-शोधक हो जाता है। शिरोव्रत का भाव संभवतः यह है कि जब जल सिर से स्पर्श करता है, तो वह केवल त्वचा को नहीं, अपितु बुद्धि और मन के ऊपरी स्तरों को भी प्रक्षालित करता है। जब साधक मस्तक पर जल की धारा को अनुभव करता है, तो वह मानसिक स्थिरता और शीतलता का अनुभव करता है, जिससे चित्त के विक्षेप शांत होते हैं और पाप रूपी मल टिक नहीं पाते।

इसके पश्चात महर्षि दो परम सत्यों की घोषणा करते हैं—गंगा और केशव। वे कहते हैं कि गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। गंगा यहाँ केवल एक भौगोलिक नदी नहीं, अपितु 'ज्ञान की धारा' और 'शुद्धि की शक्ति' का प्रतीक है। जिस प्रकार गंगा समस्त अशुद्धियों को बहा ले जाती है, उसी प्रकार ज्ञान की गंगा साधक के अंतःकरण को निर्मल कर देती है। तीर्थ का अर्थ है 'तरण', वह माध्यम जो साधक को भवसागर से पार उतारे; और ज्ञान की वह धारा जो हृदय को शुद्ध कर दे, उससे बड़ा कोई तीर्थ नहीं है।

अंत में वे 'केशव' को सर्वोच्च देव बताते हैं। केशव का अर्थ है—वह जो 'केशी' (अहंकार) का अंत करता है। योग की दृष्टि से, जब तक साधक के भीतर 'मैं' का अहंकार (केशी) जीवित है, तब तक वह परमात्मा से दूर है। अतः केशव की शरण में जाने का अर्थ है—अहंकार का विसर्जन करना। जब अहंकार नष्ट होता है, तभी साधक उस परम देव का साक्षात्कार करता है जो समस्त देवताओं का मूल और आधार है। इस प्रकार, शिरोव्रत से शरीर और मन की शुद्धि, गंगा से ज्ञान का प्रवाह और केशव से अहंकार का नाश—यही पूर्ण शुद्धि का मार्ग है।

योग-रहस्य —

साधक के लिए इस श्लोक का अभ्यास द्विस्तरीय है। प्रथम—बाह्य रूप से पवित्र स्नान और शिरोव्रत का पालन, जिससे शरीर और इंद्रियाँ शांत हों। द्वितीय—आंतरिक रूप से 'गंगा' रूपी ज्ञान-धारा का आवाहन करना, जिससे चित्त के गहरे पाप (संस्कार) बह जाएँ।

योगिक अनुभव में 'केशव' का स्मरण करना वास्तव में अपने भीतर के 'केशी' (अहंकार) को समर्पित करना है। जब साधक यह अनुभव करता है कि उसका अपना पृथक अस्तित्व नहीं, बल्कि वह उस परम केशव की ही एक किरण है, तब वह 'पर' (श्रेष्ठ) देव की स्थिति को प्राप्त होता है। यहाँ स्नान का अर्थ है—अहंकार का विसर्जन और ज्ञान में स्नान।

श्लोक १०.११

गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति ।

सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम् ॥ १०.११ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२०

(और) गायत्रीसे बढ़कर जपनेयोग्य (मन्त्र) न हुआ, न होगा। हजार (जप) उत्तम, सौ मध्यम और दस अधम (कोटिका) है —

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने बाह्य तीर्थ और देव की सर्वोच्चता बताते हुए यह स्पष्ट किया कि पवित्र स्नान और श्रद्धा से पापों का क्षय होता है। अब वे साधक को उस परम साधन की ओर ले जा रहे हैं, जो तीर्थ और स्नान से भी अधिक प्रभावशाली है—वह है 'सावित्री' का जप।

अन्वय और पदार्थ —

गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति ।

सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम् ॥

अन्वय: (जप्यमन्त्रेषु) गायत्र्याः परं जप्यं न भूतं न भविष्यति। (तस्याः जपसंख्या) सहस्रं परमां, शतं मध्यां, दशं अवराम् (अस्ति)।

पदार्थ:

• गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति: गायत्री से बढ़कर जपने योग्य (मन्त्र) न हुआ (भूतं), न होगा (भविष्यति)। यहाँ 'परं' का अर्थ श्रेष्ठता और सूक्ष्मता दोनों से है।

• सहस्रपरमां: एक हजार बार जप करना 'परम' या उत्तम कोटि है।

• शतमध्यां: एक सौ बार जप करना 'मध्यम' कोटि है।

• दशावराम्: दस बार जप करना 'अवर' या अधम कोटि है। यहाँ 'अवर' का अर्थ बुरा नहीं, अपितु न्यूनतम या प्रारंभिक स्तर है।

• देवीं: गायत्री को 'देवी' कहा गया है, क्योंकि वह केवल शब्द-समूह नहीं, अपितु चेतना की वह शक्ति है जो साधक के भीतर प्रकाश का संचार करती है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य गायत्री मन्त्र की अद्वितीयता और उसके जप की मात्रा का निर्धारण कर रहे हैं। ऋषि का यह कथन कि "गायत्री से बढ़कर जप्य न हुआ, न होगा", केवल एक प्रशंसा नहीं, अपितु एक शाश्वत सत्य का उद्घाटन है। गायत्री वह सेतु है जो साधक को स्थूल जगत से सूक्ष्म अक्षर की ओर ले जाता है।

जब ऋषि कहते हैं कि यह 'परम' है, तो उनका संकेत उस 'तुरीय' अवस्था की ओर है, जहाँ मन्त्र केवल वाणी का विषय न रहकर हृदय की धड़कन बन जाता है। गायत्री की श्रेष्ठता इस बात में है कि वह सीधे 'धी' (बुद्धि) को प्रेरित करता है। अन्य मन्त्रों का फल विशिष्ट कामनाओं या देवताओं की कृपा पर निर्भर हो सकता है, किन्तु गायत्री का लक्ष्य स्वयं 'सत्य' और 'प्रकाश' का साक्षात्कार है।

जप की संख्या के विषय में ऋषि ने तीन श्रेणियाँ बताई हैं: हजार, सौ और दस। यह संख्या केवल गिनती नहीं, अपितु साधक की एकाग्रता और उसके समय के समर्पण का पैमाना है।

१. दश (अवर): यह न्यूनतम सीमा है। जो साधक केवल दस बार जप करता है, वह अपनी आध्यात्मिक लय को बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। यह बीज-रोपण के समान है।

२. शत (मध्यम): सौ बार का जप मन को स्थिर करने और चित्त की अशुद्धियों को धोने के लिए पर्याप्त है। यह साधना के विकास का चरण है।

३. सहस्र (परम): एक हजार बार का जप साधक को मन्त्र के साथ एकाकार कर देता है। यहाँ जप क्रिया नहीं, अपितु एक 'अवस्था' बन जाता है। जब मन्त्र की आवृत्ति इतनी अधिक होती है, तो वह प्राणों में रच-बस जाता है और साधक निरंतर सावित्री-मय हो जाता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

सावित्री की इस सर्वोच्चता और जप संख्या की पुष्टि अन्य शास्त्रों में भी मिलती है। मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है:

मनुस्मृति

एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामाः परं तपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ २.८३ ॥

एकाक्षर (ॐ) परम ब्रह्म है, प्राणायाम परम तप हैं; सावित्रीसे बढ़कर (कोई मन्त्र) नहीं है, और मौनसे सत्य श्रेष्ठ है।

मनुस्मृति २.८३मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 178

यहाँ 'सावित्र्यास्तु परं नास्ति' कहकर मनु ने भी गायत्री को सर्वश्रेष्ठ माना है। इसी प्रकार महाभारत के आश्वमेधिकपर्व में भी जप की वही संख्याएँ वर्णित हैं:

महाभारत

सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां शतावराम् । सावित्रीं जप कौन्तेय सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥

कौन्तेय! सब पापोंका नाश करनेवाली सावित्री देवीका जप करो — (प्रतिदिन) हज़ार उत्तम, सौ मध्यम, और (कम-से-कम) सौसे नीचे (दस) अधम है।

महाभारत, आश्वमेधिकपर्व (वैष्णवधर्म-प्रसंग)महाभारत (गीता प्रेस) खण्ड ६ · पृष्ठ 2102

महाभारत में भी 'सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां' कहकर उसी गणना का समर्थन किया गया है। इन दोनों ग्रंथों और बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के बीच पूर्ण सामंजस्य है। यह सिद्ध करता है कि वैदिक परंपरा में गायत्री जप की यह विधि और संख्या एक स्वीकृत मानक है, जो साधक की योग्यता और समय के अनुसार निर्धारित है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'जप-योग' का सूत्र है। साधक के लिए संख्या का रहस्य यह है कि जितनी अधिक आवृत्ति होगी, मन उतनी ही गहराई से मन्त्र के 'नाद' में उतरेगा।

दस बार का जप 'वाचिक' स्तर पर होता है, जहाँ मन भटक सकता है। सौ बार का जप 'उपांशु' की ओर ले जाता है, जहाँ श्वास और मन्त्र का समन्वय होने लगता है। एक हजार बार का जप साधक को 'मानस' जप की उस स्थिति में ले जाता है जहाँ मन्त्र बिना जिह्वा के हिलने के, हृदय के भीतर स्वतः गूँजने लगता है।

साधक इस अभ्यास से 'धी' (बुद्धि) के शोधन का अनुभव करता है। जैसे-जैसे जप की संख्या बढ़ती है, साधक की चेतना स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा करती है। 'सहस्र' जप का अर्थ है—अपने भीतर के हजार द्वारों (इंद्रिय-वृत्तियों) को मन्त्र के प्रकाश से आलोकित करना। इस अभ्यास से साधक 'अवर' भूमि (साधारण मनुष्य) से 'परम' भूमि (योगी) की ओर अग्रसर होता है, जहाँ वह स्वयं उस 'देवी' (प्रकाश-शक्ति) का अनुभव करने लगता है।

श्लोक १०.१२

गायत्रीं च जपन् विप्रो न स पापेन लिप्यते ।

पूर्वां संध्यां जपंस्तिष्ठेत् सावित्रीमर्कदर्शनात् ।

पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ १०.१२ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२०

— गायत्रीका जप करता हुआ विप्र पापसे लिप्त नहीं होता। प्रातःकालकी संध्यामें सूर्यके दर्शनतक खड़ा होकर सावित्री जपे, और सायंकालकी (संध्यामें) तारोंके भली-भाँति दिखनेतक बैठकर।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने सावित्री मन्त्र की अद्वितीयता और जप की तीन श्रेणियों (उत्तम, मध्यम और अवर) का विधान किया। अब वे इस जप की उस शारीरिक और मानसिक अवस्था का निर्देश कर रहे हैं, जिससे पापों का क्षय हो और साधक की चेतना सूर्य के साथ एकाकार हो सके।

अन्वय और पदार्थ —

गायत्रीं च जपन् विप्रो न स पापेन लिप्यते ।

पूर्वां संध्यां जपंस्तिष्ठेत् सावित्रीमर्कदर्शनात् ।

पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥

अन्वय: विप्रो गायत्रीं च जपन् स न पापेन लिप्यते। (सः) पूर्वां संध्यां अर्कदर्शनात् सावित्रीं जपं तिष्ठेत्, पश्चिमां तु (संध्यां) क्षविभावनात् सम्यक् समासीनः (जपेत्)।

पदार्थ:

• पापेन लिप्यते: 'लिप्त' होने का अर्थ है चिपक जाना। पाप यहाँ केवल नैतिक अपराध नहीं, अपितु वह अविद्या और मानसिक मल है जो आत्मा के प्रकाश को ढँक लेता है।

• पूर्वां संध्यां: प्रातःकाल का वह संधि-समय जब रात्रि समाप्त हो रही है और दिन का आरम्भ हो रहा है।

• तिष्ठेत्: खड़े होकर। यहाँ 'तिष्ठ' का अर्थ केवल शारीरिक स्थिति नहीं, अपितु सजगता और तत्परता है।

• अर्कदर्शनात्: 'अर्क' सूर्य का पर्याय है। जब तक सूर्य प्रत्यक्ष दिखाई न दे।

• पश्चिमां: सायंकाल की संध्या।

• समासीनः: बैठकर। यह स्थिति स्थिरता और अंतर्मुखी होने का संकेत है।

• सम्यगृक्षविभावनात्: 'इक्षु' या 'क्षु' नक्षत्रों के संदर्भ में या सामान्यतः तारों (नक्षत्रों) के भली-भाँति स्पष्ट दिखने तक।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में याज्ञवल्क्य जी बाहरी विधि के माध्यम से आंतरिक शुद्धि का मार्ग बता रहे हैं। प्रथम पंक्ति में वे घोषणा करते हैं कि गायत्री का जप करने वाला विप्र पाप से लिप्त नहीं होता। यहाँ 'विप्र' केवल जातिवाचक शब्द नहीं है, अपितु वह है जो 'विप्र' (विशिष्ट) चेतना का अधिकारी है, जो सत्य का अन्वेषण करता है। गायत्री का जप एक ऐसी अग्नि के समान है जो साधक के चित्त पर जमे हुए संस्कारों के मैल को जला देती है, जिससे वह 'अलिप्त' हो जाता है।

ऋषि आगे जप की शारीरिक स्थिति का विधान करते हैं। प्रातःकाल की संध्या में सूर्य के दर्शन होने तक खड़े होकर जप करने का निर्देश है। खड़ा होना (तिष्ठेत्) जाग्रत अवस्था का प्रतीक है। जैसे सूर्य उदय होकर जगत को जाग्रत करता है, वैसे ही साधक खड़ा होकर अपनी चेतना को ऊपर की ओर उठाता है। यह स्थिति 'उर्ध्वगति' की है, जहाँ साधक अपनी सुप्त वृत्तियों को जगाकर सूर्य (परमात्मा) के साक्षात्कार के लिए तत्पर रहता है।

सायंकाल की संध्या में बैठकर (समासीनः) तारों के दिखने तक जप करने का विधान है। दिन भर की क्रियाशीलता के बाद अब समय है स्थिरता का। बैठकर जप करना मन को समेटने और अंतर्मुखी होने की प्रक्रिया है। जब आकाश में तारे स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो वह संकेत है कि बाह्य जगत का प्रकाश मंद हो गया है और अब साधक को अपने भीतर के 'अन्तर-सूर्य' को देखना है।

इस प्रकार, प्रातःकाल का 'खड़ा होना' विस्तार और जागरण है, और सायंकाल का 'बैठना' संकोच और एकाग्रता है। यह विधि साधक को प्रकृति के चक्र के साथ लयबद्ध करती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्सावित्रीमार्कदर्शनात् । पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ २.१०१ ॥

प्रातःसंध्यामें सूर्यके दर्शनतक खड़े होकर सावित्री जपे; सायंसंध्यामें नक्षत्र भलीभाँति दिखनेतक बैठकर (जपे)।

मनुस्मृति २.१०१मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 181

यह श्लोक मनुस्मृति के विधान के साथ पूर्णतः मेल खाता है। मनुस्मृति में भी प्रातःकाल सूर्योदय तक खड़े होकर और सायंकाल नक्षत्रों के दर्शन तक बैठकर सावित्री जप का निर्देश है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति दोनों इस बात पर सहमत हैं कि संध्या-वंदन की शारीरिक मुद्रा केवल एक परंपरा नहीं, अपितु समय और प्रकृति के साथ शरीर और मन के सामंजस्य की विधि है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'संधि-काल' के महत्व को उद्घाटित करता है। संधि वह समय है जहाँ दो अवस्थाएँ मिलती हैं—रात और दिन, अंधकार और प्रकाश। जब बाह्य जगत में यह संधि होती है, तब साधक के भीतर भी मन और प्राण की संधि होती है।

प्रातःकाल खड़ा होकर जप करना 'प्राण' को ऊर्ध्वमुखी करने का अभ्यास है। यह साधक को आलस्य (तमस) से निकालकर प्रकाश (सत्व) की ओर ले जाता है। यहाँ 'अर्कदर्शन' केवल आँखों से सूर्य को देखना नहीं, अपितु हृदय-आकाश में उस सूर्य-पुरुष का अनुभव करना है।

सायंकाल बैठकर जप करना 'मन' को स्थिर करने का अभ्यास है। दिन भर की चंचलता के बाद, तारों के दर्शन तक का यह समय साधक को 'विश्राम' से 'ध्यान' की ओर ले जाता है। यह अभ्यास साधक को इस भूमि पर ले जाता है जहाँ वह बाहरी जगत के प्रकाश के बिना भी अपने भीतर के प्रकाश में स्थित रह सके।

साधक इस अभ्यास से यह अनुभव करता है कि वह न केवल शरीर है, अपितु वह उस विराट सूर्य का अंश है जो कभी अस्त नहीं होता। सुबह का जागरण और शाम का ठहराव, दोनों ही उसे उस 'अक्षर' की ओर ले जाते हैं जो समय और काल से परे है।

श्लोक १०.१३

ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।

सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ १०.१३ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२०

विधियज्ञ सहित जो चार पाकयज्ञ हैं, वे सब जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री मन्त्र की अद्वितीयता और जप की तीन श्रेणियों (उत्तम, मध्यम और अवर) का विधान किया। अब वे जप की महिमा को अन्य यज्ञों की तुलना में स्थापित करते हुए, जपयज्ञ की सूक्ष्मता और उसकी श्रेष्ठता का उद्घाटन कर रहे हैं।

अन्वय और पदार्थ —

ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।

सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥

अन्वय: ये चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः पाकयज्ञाः, ते सर्वे जपयज्ञस्य षोडशीं कलां न अर्हन्ति।

पदार्थ:

• पाकयज्ञ: 'पाक' का अर्थ है पकाना या संस्कारित करना। यहाँ पाकयज्ञ से तात्पर्य उन यज्ञों से है जिनमें अन्न या हवि का पाक मुख्य होता है और जो भौतिक सामग्रियों के माध्यम से संपन्न किए जाते हैं।

• विधियज्ञसमन्विताः: जो शास्त्रोक्त विधि, नियमों, सामग्री और अनुष्ठानिक मर्यादाओं से युक्त हैं।

• जपयज्ञ: मन्त्रों का मानसिक या वाचिक जप। यहाँ जप को 'यज्ञ' कहा गया है, क्योंकि इसमें मन्त्र की आहुति अंतःकरण की अग्नि में दी जाती है।

• कलां नार्हन्ति षोडशीम्: 'कला' सूक्ष्म अंश को कहते हैं। 'षोडशीं कलां' का अर्थ है सोलहवाँ हिस्सा। 'न अर्हन्ति' अर्थात् योग्य नहीं हैं या उसके तुल्य नहीं हैं। भाव यह है कि समस्त पाकयज्ञ मिलकर भी जपयज्ञ के एक सोलहवें हिस्से के बराबर भी नहीं हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति के इस श्लोक में योगीश्वर याज्ञवल्क्य बाहरी कर्मकाण्ड और आंतरिक साधना के बीच के मूल्य-भेद को स्पष्ट कर रहे हैं। यहाँ 'पाकयज्ञ' उन स्थूल यज्ञों के प्रतीक हैं जिनमें बाहरी सामग्री, अग्नि और विधि का बाहुल्य होता है। यद्यपि ये विधियज्ञ शास्त्रसम्मत हैं और शुभ फलदायी हैं, तथापि इनकी सीमा भौतिकता और समय की मर्यादाओं तक है।

महर्षि कहते हैं कि ये समस्त विधियज्ञ, जपयज्ञ की सोलहवीं कला के समान भी नहीं हैं। यहाँ 'सोलह' की संख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैदिक गणित और योग में सोलह कलाओं का संबंध पूर्णता से है (जैसे चन्द्रमा की सोलह कलाएँ)। जब याज्ञवल्क्य कहते हैं कि बाहरी यज्ञ जपयज्ञ की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं, तो उनका संकेत यह है कि जपयज्ञ वह 'पूर्ण' है जिसके सामने स्थूल कर्म केवल एक सूक्ष्म अंश मात्र हैं।

इसका रहस्य यह है कि पाकयज्ञ में साधक 'कर्ता' बनकर बाहरी वस्तुओं का अर्पण करता है, जबकि जपयज्ञ में साधक स्वयं को मन्त्र में विलीन कर देता है। जपयज्ञ में मन्त्र ही हवि है, श्वास ही वायु है और हृदय की चेतना ही अग्नि है। जब बाहरी विधि आंतरिक अनुभव में बदल जाती है, तब वह 'जपयज्ञ' बन जाता है, जो स्थूल कर्मों की तुलना में अनंत गुना अधिक शक्तिशाली और शीघ्र फलदायी होता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः । सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २.८६ ॥

जो चार पाकयज्ञ विधियज्ञ सहित हैं, वे सब जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं।

मनुस्मृति २.८६मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 178

यह श्लोक मनुस्मृति के वचन के साथ पूर्णतः मेल खाता है। मनु भी पाकयज्ञों की तुलना में जपयज्ञ की श्रेष्ठता को इसी शब्दावली में स्वीकार करते हैं। दोनों ग्रंथों का यह साझा मत यह सिद्ध करता है कि वैदिक परम्परा में 'कर्म' से 'मन्त्र' की ओर जाना ही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है। जहाँ मनु इसे सामाजिक और धार्मिक मर्यादा के रूप में देखते हैं, वहीं याज्ञवल्क्य इसे योग की दृष्टि से आंतरिक रूपांतरण की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'स्थूल से सूक्ष्म' की यात्रा का सूत्र है। पाकयज्ञ 'अन्नमय' और 'प्राणमय' कोश के स्तर के कर्म हैं, जबकि जपयज्ञ 'विज्ञानमय' और 'आनन्दमय' कोश की साधना है।

अभ्यास की दृष्टि से साधक यहाँ यह अनुभव करता है कि बाहरी अनुष्ठान केवल तैयारी हैं, वास्तविक सिद्धि 'जप' में है। जब साधक मन्त्र के अक्षरों को हृदय में स्थापित कर उनका जप करता है, तो वह बाहरी अग्निहोत्र से ऊपर उठकर 'अंतर्याग' में प्रवेश करता है। यहाँ सोलहवीं कला का निषेध यह बताता है कि जो फल हज़ारों बाहरी कर्मों से प्राप्त होता है, वह एक शुद्ध, एकाग्र और मन्त्र-निष्ठ जप से क्षण भर में प्राप्त किया जा सकता है। साधक इस बोध से 'कर्म-भूमि' से उठकर 'भाव-भूमि' की ओर अग्रसर होता है।

जपयज्ञमाहात्म्यम्

श्लोक १०.१४

विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः ।

उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ॥ १०.१४ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२०

विधियज्ञसे जपयज्ञ दस गुना श्रेष्ठ है; उपांशु (जप) सौ गुना, और मानस हजार गुना कहा गया है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में ऋषि याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया कि बाहरी सामग्रियों और पाक-विधियों से संपन्न यज्ञ, जपयज्ञ की सोलहवीं कला के समान भी नहीं हैं। अब वे इस जपयज्ञ की श्रेष्ठता के सोपानों को और अधिक सूक्ष्मता से परिभाषित कर रहे हैं कि जप की विभिन्न अवस्थाएँ किस प्रकार फल में वृद्धि करती हैं।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: जपयज्ञः विधियज्ञात् दशभिर्गुणैः विशिष्टो (अस्ति)। (तत्र) उपांशुः (जपः) शतगुणः स्यात्, (तथा) मानसः साहस्रः स्मृतः।

पदार्थ और निर्वचन:

• विधियज्ञः: वह यज्ञ जो बाहरी विधि, सामग्री, अग्नि-संस्कार और शास्त्रोक्त कर्मकाण्डों के साथ संपन्न किया जाता है।

• विशिष्टो दशभिर्गुणैः: दस गुणों (गुना) से श्रेष्ठ या विशिष्ट। यहाँ 'गुण' का अर्थ विशेषता नहीं, बल्कि 'गुना' है।

• उपांशुः: 'उपांशु' का शाब्दिक अर्थ है—पास या धीमे। ऐसा जप जिसमें होंठ न हिलें, केवल जीभ और तालु का सूक्ष्म स्पर्श हो और ध्वनि केवल स्वयं जप करने वाले को सुनाई दे।

• मानसः: वह जप जो केवल मन के भीतर होता है, जिसमें वाणी और शरीर का कोई भी अंग सक्रिय नहीं होता।

• साहस्रो: हजार गुना।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधक को स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा कराता है। याज्ञवल्क्य जी यहाँ यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि साधना का मूल्य उसकी बाहरी भव्यता में नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक गहराई और सूक्ष्मता में निहित है।

प्रथम स्तर पर, 'विधियज्ञ' की तुलना में 'जपयज्ञ' को दस गुना श्रेष्ठ बताया गया है। विधियज्ञ में साधक बाहरी उपकरणों (हवन-कुण्ड, समिधा, घी) पर निर्भर होता है, जबकि जपयज्ञ में साधक स्वयं का शरीर और वाणी ही यज्ञ-वेदी बन जाते हैं। मन्त्र की ध्वनि जब प्राण के साथ मिलती है, तो वह बाहरी आहुतियों से अधिक तीव्र प्रभाव उत्पन्न करती है।

द्वितीय स्तर पर, जप की विधाओं के आधार पर फल का विभाजन किया गया है। जब जप 'वैखरी' (स्पष्ट वाणी) से हटकर 'उपांशु' होता है, तो उसकी शक्ति सौ गुना बढ़ जाती है। उपांशु जप में ऊर्जा बाहर विसरित नहीं होती, बल्कि साधक के अपने परिवेश में ही संचित रहती है।

तृतीय और उच्चतम स्तर 'मानस जप' का है, जिसे हजार गुना श्रेष्ठ कहा गया है। मानस जप में वाणी का पूर्ण निग्रह होता है। यहाँ मन्त्र केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि एक 'संस्कार' और 'स्पंदन' बन जाता है जो सीधे चित्त के गहरे स्तरों को प्रभावित करता है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक शब्द से अर्थ की ओर और अर्थ से उस 'अक्षर' की ओर बढ़ता है जो शब्दों से परे है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः । उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ॥ २.८५ ॥

विधियज्ञसे जपयज्ञ दस गुना श्रेष्ठ है; उपांशु (जप) सौ गुना, और मानस हजार गुना कहा गया है।

मनुस्मृति २.८५मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 231

इस श्लोक की शब्दावली और विचार पूर्णतः मनुस्मृति के इस अंश से मेल खाते हैं। दोनों ही ग्रन्थ इस बात की पुष्टि करते हैं कि जप की सूक्ष्मता ही उसकी शक्ति का वास्तविक स्रोत है।

श्रीमद्भगवद्गीता

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ १०.२५ ॥

महर्षियोंमें मैं भृगु हूँ, वाणियोंमें एक अक्षर (ओंकार) हूँ, यज्ञोंमें जपयज्ञ हूँ, और स्थावरोंमें हिमालय हूँ।

श्रीमद्भगवद्गीता १०.२५गीता — शाङ्करभाष्य (गीता प्रेस) · पृष्ठ 254

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं को 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि' कहकर जपयज्ञ की सर्वोच्चता सिद्ध करते हैं। जहाँ विधियज्ञ एक साधन है, वहीं जपयज्ञ साक्षात ईश्वर का स्वरूप है, क्योंकि यह साधक को सीधे अंतर्यामी से जोड़ता है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्' के तीन स्तरों का अभ्यास है: वैखरी, उपांशु और मानसिक। साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि जैसे-जैसे वह अपनी चेतना को बाहर से भीतर की ओर मोड़ता है, उसकी साधना की तीव्रता बढ़ती जाती है।

१. वैखरी से उपांशु: जब साधक होंठों की हलचल को रोकता है, तो वह अपनी प्राण-शक्ति को बाहर बहने से रोकता है। यह 'प्रत्याहार' की प्रथम सीढ़ी है।

२. उपांशु से मानस: जब ध्वनि पूरी तरह लुप्त हो जाती है और केवल 'भाव' शेष रहता है, तब साधक मन के उस स्तर पर पहुँचता है जहाँ मन्त्र और मंत्र-साधक एक हो जाते हैं।

साधक के लिए अभ्यास यह है कि वह पहले मन्त्र को स्पष्ट रूप से जपे, फिर उसे उपांशु करे और अंततः उसे मानस जप में विलीन कर दे। यह प्रक्रिया साधक को 'स्थूल शरीर' → 'प्राणमय शरीर' → 'मनोमय शरीर' की भूमि से ले जाते हुए अंततः उस 'अक्षर' (ओंकार) में प्रतिष्ठित करती है, जिसकी चर्चा याज्ञवल्क्य ने श्रुति में की है। जितना अधिक जप भीतर की ओर जाएगा, उतना ही वह सूर्य (हृदय-ज्योति) के निकट पहुँचेगा।

श्लोक १०.१५

जपेनैव हि संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः ।

कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ १०.१५ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२१

ब्राह्मण जपसे ही सिद्धि पाता है, इसमें संशय नहीं; वह दूसरा (कर्म) करे या न करे, (सबका) मित्र ब्राह्मण कहलाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में जप की सूक्ष्मता के आधार पर उसके फल की गणना की गई थी, जहाँ मानस जप को सर्वाधिक श्रेष्ठ बताया गया। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस निष्कर्ष पर आते हैं कि एक ब्राह्मण (साधक) के लिए सिद्धि का एकमात्र और अनिवार्य मार्ग 'जप' ही है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ब्राह्मणः हि जपेनैव संसिद्ध्येत्, नात्र संशयः। (सः) अन्यत् कुर्यात् वा न कुर्यात्, (तथापि) मैत्रः ब्राह्मणः उच्यते।

पदार्थ और निर्वचन:

• जपेनैव: केवल जप के द्वारा ही। यहाँ 'एव' अवधरण का सूचक है, जो अन्य सभी बाहरी क्रियाओं की तुलना में जप की अनिवार्यता को सिद्ध करता है।

• संसिद्ध्येत्: सिद्धि को प्राप्त हो। सिद्धि का अर्थ यहाँ केवल चमत्कारिक शक्ति नहीं, अपितु उस तत्त्व का अनुभव है जिसका मन्त्र द्वारा आह्वान किया गया है।

• नात्र संशयः: इसमें कोई संदेह नहीं है। यह ऋषि का दृढ़ निश्चय है कि जप के बिना आंतरिक पूर्णता संभव नहीं।

• कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्: अन्य कर्म (जैसे बाहरी यज्ञ, अनुष्ठान, या सांसारिक कर्तव्य) करे या न करे।

• मैत्रः: सबका मित्र। वह जो द्वेषरहित है और जिसके भीतर की शांति सबके लिए कल्याणकारी है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक ब्राह्मणत्व की वास्तविक परिभाषा और उसकी सिद्धि के साधन को स्पष्ट करता है। यहाँ 'ब्राह्मण' शब्द केवल जन्मजात जाति के लिए नहीं, अपितु उस 'ब्रह्म-ज्ञानी' या 'ब्रह्म-साधक' के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसका लक्ष्य परमतत्त्व की प्राप्ति है।

याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि ब्राह्मण की सिद्धि 'जप' से ही होती है। जप का अर्थ केवल शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं, अपितु मन्त्र के बीज-रूप शक्ति को अपने भीतर जाग्रत करना है। जब साधक मन्त्र का जप करता है, तो वह शब्द से अर्थ की ओर और अर्थ से उस 'अक्षर' की ओर बढ़ता है जो वाणी से परे है। बाहरी कर्मकांड (विधियज्ञ) सहायक हो सकते हैं, किंतु वे केवल बाहरी शुद्धि करते हैं; आंतरिक रूपांतरण और सिद्धि केवल जप के माध्यम से ही संभव है, क्योंकि जप सीधे मन और प्राण को प्रभावित करता है।

श्लोक का दूसरा भाग अत्यंत गंभीर है— "कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्"। इसका भाव यह है कि यदि कोई साधक अन्य बाहरी कर्मों में निपुण न भी हो, या वह सांसारिक विधि-विधानों का पूर्ण पालन न भी कर पा रहा हो, किंतु यदि वह जप के माध्यम से अपने इष्ट या ब्रह्म में स्थित है, तो उसकी सिद्धि बाधित नहीं होती। जप उसे उस अवस्था में ले जाता है जहाँ वह 'मैत्र' हो जाता है।

'मैत्र' होने का रहस्य यह है कि जब जप के द्वारा साधक का अहंकार विलीन होता है और वह स्वयं को उस सर्वव्यापी ब्रह्म के अंश के रूप में अनुभव करता है, तब उसके भीतर समस्त प्राणियों के प्रति स्वाभाविक मैत्री भाव उत्पन्न हो जाता है। वह किसी के प्रति द्वेष नहीं रखता क्योंकि वह सबमें एक ही ज्योति को देखता है। ऐसा ब्राह्मण ही वास्तव में समाज और स्वयं के लिए कल्याणकारी होता है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति

जप्येनैव तु संसिध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ २.८७ ॥

ब्राह्मण जपसे ही सिद्धि पाता है, इसमें संशय नहीं; दूसरा (कर्म) करे या न करे — (सबका) मित्र (मैत्र) ब्राह्मण कहलाता है।

मनुस्मृति २.८७मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 232

मनुस्मृति में भी ठीक यही विचार व्यक्त किया गया है कि ब्राह्मण की सिद्धि जप से ही होती है और वह 'मैत्र' कहलाता है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और मनुस्मृति का यह मेल दर्शाता है कि वैदिक परंपरा में 'जप' को केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार का अनिवार्य साधन माना गया है। दोनों ग्रन्थ इस बात पर सहमत हैं कि बाहरी क्रियाओं की तुलना में आंतरिक मन्त्र-साधना का स्थान सर्वोपरि है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'वाक्-शुद्धि' से 'चित्त-शुद्धि' की यात्रा है। साधक जब जप का अभ्यास करता है, तो वह अपनी बिखरी हुई मानसिक वृत्तियों को एक बिंदु (मन्त्र) पर केंद्रित करना सीखता है।

अभ्यास की दृष्टि से, साधक को चाहिए कि वह जप को केवल होंठों की हलचल न बनाए, बल्कि मन्त्र के नाद को अपने हृदय में प्रतिध्वनित करे। जब जप 'मैत्र' भाव में बदल जाता है, तो साधक अनुभव करता है कि जप करने वाला, जप की जाने वाली वस्तु (देवता/ब्रह्म) और स्वयं जप (मन्त्र) — ये तीनों एक हो गए हैं। यह अवस्था साधक को द्वंद्वों से मुक्त कर उसे उस भूमि पर ले जाती है जहाँ वह समस्त सृष्टि के साथ एकात्मता का अनुभव करता है। यहाँ जप एक साधन है और 'मैत्र' भाव उस साधना का प्रत्यक्ष अनुभव और फल है।

श्लोक १०.१६

क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः ।

धनेन वैश्यशूद्रौ तु जपहोमैर्द्विजोत्तमः ॥ १०.१६ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२१

क्षत्रिय अपनी भुजाओंके बलसे अपनी विपत्तिको पार करे, वैश्य और शूद्र धनसे, और श्रेष्ठ द्विज जप और होमसे।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में यह स्पष्ट किया गया कि ब्राह्मण की सिद्धि का एकमात्र और अनिवार्य मार्ग जप है, जिससे वह समस्त जगत के लिए 'मैत्र' (हितैषी) बन जाता है। अब महर्षि याज्ञवल्क्य इस सिद्धांत को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए बताते हैं कि जीवन की आपत्तियों और संकटों से पार उतरने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का साधन उसकी प्रकृति और धर्म के अनुसार भिन्न होता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: क्षत्रियः बाहु-वीर्येण आत्मनः आपदम् तरेत्, वैश्य-शूद्रौ तु धनेन, द्विजोत्तमः (तु) जप-होमैः।

पदार्थ और निर्वचन:

• बाहु-वीर्येण: भुजाओं के बल से। यहाँ 'बाहु' केवल शारीरिक शक्ति का प्रतीक नहीं, अपितु संकल्प-शक्ति और रक्षा-धर्म के क्रियान्वयन का साधन है।

• तरेदापदम्: आपत्तियों (संकटों) को पार करे। 'तरति' धातु का प्रयोग यह दर्शाता है कि संकट एक नदी के समान है जिसे पार करना है।

• धनेन: धन के द्वारा। यहाँ धन का अर्थ केवल मुद्रा नहीं, अपितु संचित संसाधन और भौतिक सामर्थ्य है।

• जप-होमैः: जप और होम के द्वारा। 'जप' आंतरिक ध्वनि का संस्कार है और 'होम' आहुति का, जो साधक के अहंकार को अग्नि में समर्पित करने की प्रक्रिया है।

• द्विजोत्तमः: श्रेष्ठ द्विज। वह जो केवल जन्म से नहीं, अपितु विद्या और संस्कार से पुनर्जन्म पा चुका है और श्रेष्ठता की श्रेणी में है।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक जीवन के संघर्षों और उनसे मुक्ति के साधनों का एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक वर्गीकरण प्रस्तुत करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति भिन्न होती है, उसी प्रकार संकट के समय उनकी रक्षा का 'आधार' भी भिन्न होता है।

क्षत्रिय का धर्म रक्षा और शासन है; अतः जब वह संकट में होता है, तो उसकी भुजाओं का बल—अर्थात् उसका साहस, शौर्य और निर्णायक क्रिया—उसे उस आपत्ति से बाहर निकालता है। यह बाहरी जगत की चुनौतियों का सामना करने का भौतिक और मानसिक बल है।

वैश्य और शूद्र की प्रकृति सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के संचालन से जुड़ी है। उनके लिए 'धन' या भौतिक संसाधन संकट के समय सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं। यहाँ धन को केवल विलासिता नहीं, अपितु जीवन-रक्षण के एक साधन के रूप में देखा गया है।

परंतु, जब बात 'द्विजोत्तम' की आती है, तो याज्ञवल्क्य जी उनके साधन को पूरी तरह सूक्ष्म कर देते हैं। एक श्रेष्ठ ब्राह्मण या साधक के लिए भौतिक बल या धन संकटमोचक नहीं हो सकते, क्योंकि उसका क्षेत्र भौतिक नहीं, अपितु आध्यात्मिक है। उसके लिए 'जप' और 'होम' ही वे अस्त्र हैं जिनसे वह अपनी आत्मिक और सांसारिक आपत्तियों को पार करता है।

यहाँ 'होम' का अर्थ केवल अग्नि में सामग्री डालना नहीं है, अपितु अपनी समस्त वृत्तियों को ज्ञान की अग्नि में होम कर देना है। जब साधक जप के माध्यम से मन्त्र की शक्ति को जाग्रत करता है और होम के माध्यम से अपनी आसक्तियों को त्यागता है, तब वह उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ कोई भी 'आपत्ति' उसे विचलित नहीं कर पाती। यह श्लोक यह संदेश देता है कि साधक को बाहरी सहारेों के बजाय अपने आंतरिक अनुशासन और मन्त्र-शक्ति पर निर्भर रहना चाहिए।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन-सामर्थ्य' का बोध कराता है। साधक के लिए 'आपत्ति' केवल बाहरी संकट नहीं, अपितु मन के विकार, क्लेश और मानसिक अवरोध हैं।

साधक जब 'जप' का अभ्यास करता है, तो वह अपनी चेतना को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है। जप के माध्यम से वह चित्त की चंचलता को रोककर उसे एक बिंदु पर केंद्रित करता है। यह 'जप' ही वह सेतु है जो उसे भय और मोह रूपी आपत्तियों से पार ले जाता है। वहीं 'होम' का आंतरिक अभ्यास यह है कि साधक अपने भीतर के 'सूर्य' (हृदय-ज्योति) में अपनी लघुता और अहंकार की आहुति दे।

जब जप (नाद) और होम (अग्नि/तप) का संयोग होता है, तब साधक की आंतरिक शक्ति इतनी प्रखर हो जाती है कि वह संसार के द्वंद्वों से ऊपर उठकर 'द्विजोत्तम' की स्थिति प्राप्त करता है। इस अभ्यास से साधक 'सांसारिक अवलंबन' (बाहरी सहारे) की भूमि से उठकर 'आत्म-अवलंबन' (स्वयं के प्रकाश) की भूमि पर प्रतिष्ठित हो जाता है।

श्लोक १०.१७

गायत्रीजप्यनिरता ब्राह्मणा ब्रह्मचिन्तकाः ।

सूर्योपस्थाननिरतास्तस्य सायुज्यभागिनः ॥ १०.१७ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२१

गायत्रीके जपमें लगे, ब्रह्मका चिन्तन करनेवाले, सूर्योपस्थानमें लगे ब्राह्मण उसके (सूर्यके) सायुज्यके भागी होते हैं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह प्रतिपादित किया कि जहाँ क्षत्रिय बाहु-बल से और वैश्य-शूद्र धन से संकटों को पार करते हैं, वहीं श्रेष्ठ द्विज के लिए जप और होम ही पारगमन के साधन हैं। अब इस श्लोक में वे जप की उस पराकाष्ठा का वर्णन कर रहे हैं, जहाँ साधक केवल संकटों से मुक्ति ही नहीं, अपितु परमात्मा के साथ पूर्ण एकाकार होने की स्थिति को प्राप्त करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: गायत्री-जप्य-निरताः ब्राह्मणाः, (ये) ब्रह्म-चिन्तकाः, (तथा) सूर्य-उपस्थान-निरताः, तस्य (सूर्यस्य) सायुज्य-भागिनः (भवन्ति)।

पदार्थ और निर्वचन:

• गायत्री-जप्य-निरताः: गायत्री के जप में निरंतर लगे हुए। 'निरत' शब्द केवल क्रिया नहीं, अपितु एक ऐसी अवस्था है जहाँ जप साधक के स्वभाव में रच-बस गया हो, वह केवल समय पर किया गया कर्म न रहकर निरंतर प्रवाह बन गया हो।

• ब्रह्म-चिन्तकाः: ब्रह्म का चिन्तन करने वाले। यहाँ 'चिन्तन' का अर्थ बौद्धिक विचार नहीं, अपितु उस परम तत्त्व में चित्त का विलीन होना है।

• सूर्य-उपस्थान-निरताः: सूर्य के उपस्थान (सामीप्य/साधना) में निरंतर लगे हुए। उपस्थान का अर्थ है—बाहर सूर्य के सम्मुख खड़े होना और भीतर हृदय-सूर्य में प्रतिष्ठित होना।

• सायुज्य-भागिनः: सायुज्य के भागी। 'सायुज्य' का अर्थ है—एकत्व या पूर्ण विलय। जब साधक और साध्य के बीच का भेद मिट जाए और वह उसी स्वरूप को प्राप्त कर ले, तो उसे सायुज्य कहते हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक साधना की उस चरम परिणति को दर्शाता है जिसे 'सायुज्य' कहा गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य यहाँ तीन साधनों के समुच्चय की बात कर रहे हैं: गायत्री-जप, ब्रह्म-चिन्तन और सूर्योपस्थान। ये तीनों अलग-अलग क्रियाएँ नहीं, अपितु एक ही यात्रा के तीन सोपान हैं।

प्रथम सोपान 'गायत्री-जप' है। गायत्री केवल एक मन्त्र नहीं, अपितु चेतना को जाग्रत करने वाली वह शक्ति है जो साधक के 'धी' (बुद्धि) को दिव्य बनाती है। जब साधक गायत्री-जप में 'निरत' होता है, तो उसकी बुद्धि शुद्ध होकर उस प्रकाश की ओर मुड़ती है जहाँ से समस्त ज्ञान का उदय होता है।

द्वितीय सोपान 'ब्रह्म-चिन्तन' है। जप से जब बुद्धि शुद्ध होती है, तब वह 'ब्रह्म' के स्वरूप का चिन्तन करने में सक्षम होती है। यह चिन्तन उस 'अक्षर' का है जो अविनाशी है। यहाँ जप क्रिया से ऊपर उठकर 'भाव' में परिवर्तित हो जाता है।

तृतीय सोपान 'सूर्योपस्थान' है। सूर्य इस दृश्य जगत में उस अदृष्ट ब्रह्म का सबसे प्रत्यक्ष प्रतीक है। सूर्योपस्थान के माध्यम से साधक अपनी व्यक्तिगत चेतना को उस सार्वभौमिक ज्योति (सूर्य) के साथ जोड़ता है।

इन तीनों के समन्वय से साधक 'सायुज्य' का भागी बनता है। यहाँ 'तस्य' शब्द सूर्य के लिए प्रयुक्त हुआ है, किंतु याज्ञवल्क्य की दृष्टि में सूर्य केवल एक ग्रह या तारा नहीं है, अपितु वह 'हिरण्यपुरुष' का स्वरूप है। सायुज्य का अर्थ है—सूर्य के भीतर स्थित उस दिव्य पुरुष के साथ एक हो जाना। यह स्थिति केवल बाहरी अनुष्ठान से नहीं, अपितु आंतरिक रूपांतरण से आती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

सूर्य के भीतर स्थित उस दिव्य पुरुष और उससे एकता के रहस्य को उपनिषद् इस प्रकार स्पष्ट करते हैं:

छान्दोग्य उपनिषद्

अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ १.६.६ ॥

और जो यह आदित्यके भीतर सुवर्णमय पुरुष दिखायी देता है — सुनहरी दाढ़ी, सुनहरे केश, नखोंके सिरेतक सब-का-सब सुवर्ण ही।

छान्दोग्य उपनिषद् १.६.६उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 186

यहाँ सूर्य के भीतर एक सुवर्णमय पुरुष का वर्णन है, जिसके नख और केश तक स्वर्ण के हैं। यह स्वर्णमयता वास्तव में उस शुद्धतम चेतना का प्रतीक है जिसे सायुज्य के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।

ईश उपनिषद्

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः । यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥

हे पोषक, हे एकाकी ऋषि, हे नियन्ता, हे सूर्य, हे प्रजापतिके पुत्र — अपनी किरणोंको हटाओ, तेजको समेटो; तुम्हारा जो कल्याणतम रूप है, उसे मैं देखता हूँ। वह जो (सूर्यमें) पुरुष है, वह मैं हूँ।

ईश उपनिषद् १६उपनिषत्सञ्चयन (चौखम्बा) · पृष्ठ 47

ईशोपनिषद् का यह उद्घोष—"वह जो सूर्य में पुरुष है, वह मैं हूँ" (योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि)—सायुज्य की उच्चतम अवस्था है।

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति और इन उपनिषदों का मेल यह है कि जहाँ उपनिषद् इस एकता के 'अनुभव' (ज्ञान) को बताते हैं, वहीं यह स्मृति उस अनुभव तक पहुँचने की 'विधि' (गायत्री-जप, ब्रह्म-चिन्तन, सूर्योपस्थान) का निर्देश देती है। स्मृति यहाँ ज्ञान को साधन (साधना) से जोड़कर उसे व्यावहारिक बनाती है।

योग-रहस्य —

योगिक दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' से 'साध्य' की ओर संक्रमण है। साधक यहाँ तीन भूमियों से गुजरता है:

१. जप की भूमि: जहाँ वह ध्वनि और मन्त्र के माध्यम से मन को एकाग्र करता है। यह चित्त की शुद्धि का चरण है।

२. चिन्तन की भूमि: जहाँ वह मन्त्र के अर्थ और ब्रह्म के स्वरूप में स्थित होता है। यह प्रज्ञा का उदय है।

३. उपस्थान की भूमि: जहाँ वह स्वयं को उस ज्योतिर्मय पुरुष के सम्मुख समर्पित कर देता है।

सायुज्य का अभ्यास यह है कि साधक जब सूर्योपस्थान करे, तो वह केवल बाहरी सूर्य को न देखे, अपितु अपने हृदय के भीतर स्थित 'हृदय-सूर्य' का साक्षात्कार करे। जब बाहरी सूर्य का प्रकाश और भीतर के आत्म-प्रकाश का मिलन होता है, तब 'सायुज्य' घटित होता है। साधक अनुभव करता है कि वह और सूर्य (परमात्मा) अलग नहीं हैं। यह अभ्यास उसे 'अहं' से 'सोऽहम' की ओर ले जाता है, जहाँ वह स्वयं को उस विराट पुरुष के रूप में देखता है।

ओंकारादिजपफलम्

श्लोक १०.१८

एवंविधास्तु ये संध्यामुपतिष्ठन्ति ते द्विजाः ।

नोदकस्य तु विक्षेपात् संध्या भवति सिद्धिदा ॥ १०.१८ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२१

जो द्विज इस प्रकार संध्याका उपस्थान करते हैं, (उनकी) संध्या सिद्धि देती है — केवल जल फेंकनेसे नहीं।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने गायत्री-जप, ब्रह्म-चिन्तन और सूर्योपस्थान के माध्यम से सूर्य के साथ सायुज्य (एकत्व) प्राप्त करने का रहस्य बताया। अब इस श्लोक में वे उस साधना की प्रमाणिकता और उसकी विधि की सूक्ष्मता को स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल यांत्रिक क्रिया से सिद्धि संभव नहीं है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: ये द्विजाः, (जो) एवं-विधाम् संध्याम् उपतिष्ठन्ति, ते (सिद्धिं लभन्ते); तु उदकस्य विक्षेपात् संध्या सिद्धिदा न भवति।

पदार्थ और निर्वचन:

• एवंविधास्तु: इस प्रकार के। यहाँ 'एवंविधि' शब्द पिछले श्लोकों (१०.१३–१०.१७) में वर्णित जप-यज्ञ, मानसिक एकाग्रता, ब्रह्म-चिन्तन और सूर्य-सायुज्य की संपूर्ण प्रक्रिया की ओर संकेत करता है।

• उपतिष्ठन्ति: उपस्थान करते हैं। 'उप' (निकट) + 'स्था' (स्थित होना)। इसका अर्थ है साध्य के समीप स्थित होना। बाह्यतः यह सूर्य के सम्मुख खड़े होना है, आन्तरतः यह हृदय-आकाश में स्थित आत्मा के समीप होना है।

• उदकस्य विक्षेपात्: जल के फेंकने से। 'विक्षेप' का अर्थ है जल को अर्घ्य रूप में अर्पित करना या केवल हाथ से जल गिराना।

• सिद्धिदा: सिद्धि देने वाला। यहाँ सिद्धि का अर्थ केवल भौतिक लाभ नहीं, अपितु वह आध्यात्मिक पूर्णता है जो साधक को उसके लक्ष्य तक पहुँचाए।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक कर्म और ज्ञान के समन्वय की अनिवार्यता को रेखांकित करता है। महर्षि याज्ञवल्क्य स्पष्ट करते हैं कि संध्या केवल एक शारीरिक क्रिया या जल अर्पण करने की रस्म नहीं है। जो द्विज 'एवंविधि' से—अर्थात जिसमें प्रणव, व्याहृति, गायत्री, प्राणायाम और ब्रह्म-चिन्तन का समावेश हो—संध्या का उपस्थान करते हैं, उन्हें ही वास्तविक सिद्धि प्राप्त होती है।

अक्सर यह देखा जाता है कि साधक केवल बाह्य विधि (उदक-विक्षेप) को ही संध्या मान लेते हैं। जल अर्पण करना विधि का एक अंग है, संपूर्ण संध्या नहीं। यदि जल अर्पण के समय चित्त जाग्रत नहीं है, यदि प्राणों का लय नहीं है और यदि हृदय में सूर्य-पुरुष का ध्यान नहीं है, तो वह क्रिया केवल एक भौतिक विसर्जन है, आध्यात्मिक आरोहण नहीं। महर्षि यहाँ चेतावनी दे रहे हैं कि बिना आन्तरिक चेतना के केवल जल फेंकने मात्र से संध्या 'सिद्धिदा' नहीं होती।

इसका भाव यह है कि विधि शरीर के लिए है, और भाव आत्मा के लिए। जब शरीर जल अर्पित करता है और आत्मा ब्रह्म-चिन्तन में लीन होती है, तब वह क्रिया 'यज्ञ' बनती है। केवल जल का विक्षेप करना एक यांत्रिक प्रक्रिया है, जबकि 'एवंविधि' से उपस्थान करना एक योगिक प्रक्रिया है।

शास्त्र-साक्ष्य —

महाभारत

संध्यामुपासते ये वै नित्यमेव द्विजोत्तमाः । ते यान्ति नरशार्दूल ब्रह्मलोकं न संशयः ॥

नरश्रेष्ठ! जो श्रेष्ठ द्विज नित्य ही सन्ध्याकी उपासना करते हैं, वे ब्रह्मलोकको जाते हैं — इसमें संशय नहीं।

महाभारत, आश्वमेधिकपर्व (वैष्णवधर्म-प्रसंग)महाभारत (गीता प्रेस) खण्ड ६ · पृष्ठ 2101

महाभारत के इस अंश में नित्य संध्या उपासना करने वाले द्विजोत्तमाओं के ब्रह्मलोक जाने की निश्चितता बताई गई है। बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति इस कथन की पुष्टि करती है, किंतु साथ ही यह सूक्ष्म भेद भी जोड़ती है कि वह 'उपासना' केवल जल अर्पण जैसी बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि एक पूर्ण विधि है। जहाँ महाभारत फल (ब्रह्मलोक) पर बल देता है, वहीं यह स्मृति उस फल की प्राप्ति के लिए आवश्यक 'विधि' की शुद्धता और आन्तरिक गहराई पर बल देती है।

योग-रहस्य —

योग की दृष्टि से यह श्लोक 'क्रिया' और 'चेतना' के अंतर को समझाता है। साधक के लिए यहाँ अभ्यास यह है कि वह अपनी बाह्य क्रियाओं को आन्तरिक अनुभव से जोड़े।

जब साधक जल अर्पित करता है, तो उसे यह अनुभव करना चाहिए कि वह केवल जल नहीं, अपितु अपने भीतर के अविद्या रूपी अंधकार और मानसिक मलिनता को त्याग रहा है। 'उदक-विक्षेप' का आन्तरिक अर्थ है—चित्त की चंचलता का विसर्जन। यदि साधक जल फेंकते समय मन से विचलित है, तो वह केवल जल फेंक रहा है; परंतु यदि वह जल अर्पण करते समय अपने हृदय-सूर्य में प्रतिष्ठित है, तो वह 'उपस्थान' कर रहा है।

साधक इस श्लोक से यह सीखता है कि योग में 'कैसे' करना है, यह 'क्या' करने से अधिक महत्वपूर्ण है। केवल क्रिया का दोहराव सिद्धि नहीं देता, बल्कि क्रिया के साथ जुड़ी जागरूकता सिद्धि देती है। यह श्लोक साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'भाव-भूमि' की ओर ले जाता है, जहाँ बाह्य अर्घ्य, आन्तरिक समर्पण में बदल जाता है।

श्लोक १०.१९

ओंकारस्य तु गायत्र्या व्याहृतीनां शिरस्यपि ।

प्राणायामस्य संध्याया आत्मज्ञानस्य चैव हि ॥ १०.१९ ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२१

ओंकार, गायत्री, व्याहृतियों, शिरस्, प्राणायाम, संध्या और आत्मज्ञानके,

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने यह स्पष्ट किया कि केवल जल अर्पण करने जैसी यांत्रिक क्रिया से संध्या की सिद्धि नहीं होती। अब वे उन विशिष्ट अंगों का विवरण दे रहे हैं, जिनके सम्मिलित प्रयोग से यह साधना पूर्ण होती है और साधक वेदों के वास्तविक मर्म को प्राप्त करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तस्य) ओंकारस्य, गायत्र्याः, व्याहृतीनां, शिरस्य, प्राणायामस्य, संध्यायाः, आत्मज्ञानस्य च (फलम्/सिद्धिः)... (अगले श्लोक तक वाक्य विस्तृत है)।

पदार्थ और निर्वचन:

• ओंकारस्य: प्रणव (ॐ) का। यह समस्त वेदों का बीज और अक्षर-तत्त्व है।

• गायत्र्या: गायत्री मन्त्र का। यह ऋचाओं का शिर है और साधक की बुद्धि को प्रेरित करने वाला प्रकाश है।

• व्याहृतीनां: भूः, भुवः, स्वः आदि व्याहृतियों का। ये स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत की ओर ले जाने वाले सोपान हैं।

• शिरस्य: 'शिरस्' का अर्थ यहाँ 'शिरो-मन्त्र' या मन्त्र के उस आरम्भिक भाग से है जो साधक के चित्त को एकाग्र कर उसे मुख्य मन्त्र के लिए तैयार करता है।

• प्राणायामस्य: प्राण के नियमन का। यह शरीर और मन के बीच का सेतु है।

• संध्यायाः: संध्या-वंदन का। यहाँ संध्या का अर्थ केवल समय नहीं, अपितु वह 'संधि-काल' है जहाँ साधक अपनी चेतना को बाहरी जगत से हटाकर भीतर की ओर मोड़ता है।

• आत्मज्ञानस्य: स्वयं के स्वरूप (आत्मा) के बोध का। यह साधना का चरम लक्ष्य है, जिसके बिना समस्त क्रियाएँ केवल कर्मकाण्ड रह जाती हैं।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है। यहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य यह बता रहे हैं कि संध्या-साधना कोई एक अकेली क्रिया नहीं, बल्कि एक 'समग्र समुच्चय' है। यह वाक्य यहाँ समाप्त नहीं होता, अपितु अगले श्लोक (१०.२०) तक विस्तृत है, जहाँ इसका फल बताया गया है।

यहाँ ऋषि उन सात अंगों की सूची दे रहे हैं जो एक योगी की साधना के अनिवार्य सोपान हैं। सबसे पहले 'ओंकार' है, जो शून्य से सृजन की ओर ले जाता है। फिर 'गायत्री' है, जो उस सृजन को प्रकाश और बुद्धि प्रदान करती है। 'व्याहृतियाँ' साधक को पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक के सूक्ष्म स्तरों से परिचित कराती हैं। 'शिरस्' के प्रयोग से साधक का मस्तक (बुद्धि) स्थिर होता है, और 'प्राणायाम' के द्वारा वह प्राण-शक्ति को संतुलित कर मन को अंतर्मुखी करता है। 'संध्या' इस पूरी प्रक्रिया का वह ढांचा है जो साधक को समय और स्थान की सीमाओं से ऊपर उठाकर 'आत्मज्ञान' की स्थिति में प्रतिष्ठित करता है।

भाव यह है कि यदि इनमें से एक भी अंग छूट जाए, तो साधना अधूरी रह जाती है। जैसे बिना प्राण के शरीर मृत है, वैसे ही बिना आत्मज्ञान के जप और प्राणायाम केवल शारीरिक और मानसिक व्यायाम हैं। याज्ञवल्क्य यहाँ यह संकेत दे रहे हैं कि बाहरी विधि (जैसे जल अर्पण) केवल एक प्रतीक है, जबकि वास्तविक 'यज्ञ' इन सात अंगों के माध्यम से हृदय के भीतर घटित होता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'क्रमिक आरोहण' का मार्ग है। योगी इस श्लोक के माध्यम से यह अनुभव करता है कि उसकी साधना स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ रही है:

१. ओंकार से वह अक्षर-तत्त्व में स्थित होता है।

२. गायत्री से वह अपने अंतःकरण के सूर्य को जाग्रत करता है।

३. व्याहृतियों के माध्यम से वह अपनी चेतना का विस्तार करता है।

४. शिरस् और प्राणायाम से वह मन के विक्षेपों को रोककर प्राण को स्थिर करता है।

५. संध्या और आत्मज्ञान के संगम पर वह उस स्थिति में पहुँचता है जहाँ 'द्रष्टा' और 'दृश्य' का भेद मिट जाता है।

यह अभ्यास साधक को 'कर्म-भूमि' से उठाकर 'ज्ञान-भूमि' की ओर ले जाता है। यहाँ साधक केवल मन्त्र नहीं पढ़ता, बल्कि मन्त्र के अर्थ को अपने प्राणों में उतारता है। जब वह आत्मज्ञान के साथ इन अंगों का अभ्यास करता है, तब वह केवल एक उपासक नहीं, अपितु एक योगी बन जाता है।

श्लोक १०.२०

मार्जनस्य च जप्यस्य ब्रह्मणः परिचिन्तनात् ।

चतुर्णां चैव वेदानां साङ्गानां पारगो भवेत् ॥ १०.२० ॥

दशमोऽध्यायःकैवल्यधाम संस्करण, १९५१पृ. १२१

मार्जन और जपके, और ब्रह्मके चिन्तनसे (मनुष्य) अंगों सहित चारों वेदोंका पारगामी हो जाता है।

अवतरणिका — पिछले श्लोक में महर्षि याज्ञवल्क्य ने संध्या-साधना के उन अनिवार्य अंगों (ओंकार, गायत्री, व्याहृति आदि) की सूची आरम्भ की थी, जिनके बिना संध्या केवल एक यांत्रिक क्रिया मात्र रह जाती है। वर्तमान श्लोक उसी सूची को पूर्ण करते हुए इस समग्र साधना के अंतिम फल का उद्घाटन करता है।

अन्वय और पदार्थ —

अन्वय: (तस्य) मार्जनस्य च जप्यस्य (च) ब्रह्मणः परिचिन्तनात् (तस्य) चतुर्णां च वेदानां साङ्गानां पारगो भवेत्।

पदार्थ और निर्वचन:

• मार्जनस्य: मार्जन का। बाहरी रूप से यह जल के छिड़काव द्वारा शरीर की शुद्धि है, किन्तु आन्तरिक रूप से यह चित्त के मैल (मल) को धोने की प्रक्रिया है।

• जप्यस्य: जप के योग्य मन्त्रों के जप का। यहाँ 'जप्य' शब्द यह संकेत देता है कि मन्त्र केवल पढ़ने के लिए नहीं, अपितु निरंतर मानसिक पुनरावृत्ति (जप) के लिए हैं।

• ब्रह्मणः परिचिन्तनात्: ब्रह्म के गहन चिन्तन से। 'परिचिन्तन' का अर्थ है—चारों ओर से घेरकर, पूर्ण तन्मयता से उस परम तत्त्व में लीन हो जाना।

• चतुर्णां वेदानां: चारों वेदों (ऋक, यजु, साम, अथर्व) का।

• साङ्गानां: अंगों सहित। वेदों के 'अंग' (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) केवल ग्रन्थ नहीं, अपितु सत्य तक पहुँचने के विभिन्न आयाम और साधन हैं।

• पारगो भवेत्: पारगामी हो जाता है। 'पारग' वह है जो नदी को पार कर दूसरे तट पर पहुँच गया हो; अर्थात् जो शब्दों के जाल से निकलकर अर्थ (तत्त्व) में स्थित हो गया हो।

भाष्य —

बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति का यह श्लोक पिछले श्लोक (१०.१९) से आरम्भ हुए वाक्य को पूर्ण करता है। वाक्य की संरचना इस प्रकार है: "ओंकार, गायत्री, व्याहृति, शिरस्, प्राणायाम, संध्या और आत्मज्ञान के (साथ-साथ) मार्जन, जप और ब्रह्म-चिन्तन से मनुष्य चारों वेदों का पारगामी होता है।"

यहाँ याज्ञवल्क्य जी एक अत्यंत गूढ़ रहस्य खोल रहे हैं। सामान्य दृष्टि में वेदों का पारगामी होने का अर्थ है—उनके मन्त्रों को कंठस्थ करना या उनके व्याकरण को जानना। किन्तु योगीश्वर याज्ञवल्क्य के लिए 'वेद-पारग' होने का अर्थ है—वेदों के उस 'बीज' को अनुभव करना जिससे चारों वेद उत्पन्न हुए हैं।

जब साधक मार्जन से अपनी अंतःकरण की शुद्धि करता है, जप से चित्त को एकनिष्ठा करता है और ब्रह्म-चिन्तन से स्वयं को उस विराट चेतना में विलीन कर देता है, तब वह केवल एक 'पण्डित' नहीं बनता, अपितु 'ऋषि' बन जाता है। वह शब्दों के स्थूल रूप (अक्षर) से ऊपर उठकर उनके सूक्ष्म अर्थ (अक्षर-तत्त्व) को प्राप्त कर लेता है। इसीलिए यहाँ 'साङ्गानां' शब्द का प्रयोग हुआ है; क्योंकि जब साधक ब्रह्म-चिन्तन में स्थित होता है, तो वेदों के सभी अंग (जैसे छन्द और व्याकरण) स्वतः ही उसके अनुभव में समाहित हो जाते हैं। यह साधना बाहरी कर्मकाण्ड से आरम्भ होकर आत्म-साक्षात्कार पर समाप्त होती है।

शास्त्र-साक्ष्य —

मनुस्मृति में भी इस तथ्य की पुष्टि मिलती है कि अक्षर (ॐ), व्याहृति और सावित्री के जप से विप्र वेद-पुण्य को प्राप्त करता है:

मनुस्मृति

एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ २.७८ ॥

इस अक्षर (ॐ) का और व्याहृतियोंसे आरम्भ होनेवाली इस (सावित्री) का दोनों सन्ध्याओंमें जप करनेवाला वेदवेत्ता विप्र वेद(पाठ) के पुण्यसे युक्त होता है।

मनुस्मृति २.७८मनुस्मृति (गिरिजाप्रसाद द्विवेदी) · पृष्ठ 177

यह साक्ष्य स्पष्ट करता है कि वेदों का पुण्य केवल उनके पाठ में नहीं, अपितु संध्या के इन विशिष्ट अंगों के जप में निहित है।

इसी प्रकार, वेदों और इन मन्त्रों के सम्बन्ध में यह कहा गया है कि प्रजापति ने तीनों वेदों से अ-उ-म (ओंकार) और व्याहृतियों को दुहकर निकाला है:

मनुस्मृति

अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीति च ॥ २.७६ ॥

प्रजापतिने तीनों वेदोंसे अकार, उकार और मकार को, तथा "भूः, भुवः, स्वः" को दुहकर निकाला।

मनुस्मृति २.७६मनुस्मृति (हरगोविन्द शास्त्री) भाग १ · पृष्ठ 226

अतः जब याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि इन अंगों के अभ्यास से साधक वेदों का पारगामी होता है, तो इसका आधार यही है कि ओंकार और व्याहृतियाँ वेदों का 'सार' हैं। सार को प्राप्त कर लेने पर संपूर्ण विस्तार (चारों वेद) स्वतः प्राप्त हो जाता है।

योग-रहस्य —

साधक की दृष्टि से यह श्लोक 'साधन' से 'साध्य' की ओर ले जाने वाली अंतिम कड़ी है।

१. मार्जन का अभ्यास: साधक इसे केवल जल-क्रिया न मानकर, अपने भीतर के 'अहंकार' और 'वासनाओं' के मार्जन के रूप में अनुभव करता है।

२. जप का अभ्यास: यहाँ जप का अर्थ है—ध्वनि के माध्यम से मन को स्थिर करना। जब जप गहरा होता है, तो वह 'वाचिक' से 'उपांशु' और फिर 'मानस' होकर अंततः 'अजपा' में बदल जाता है।

३. ब्रह्म-चिन्तन का अभ्यास: यह योग की उच्चतम भूमि है। यहाँ साधक 'मैं' और 'ब्रह्म' के बीच के भेद को मिटा देता है।

इस श्लोक का योगिक मर्म यह है कि संध्या-वंदन वास्तव में 'लघु-वेद' है। जो साधक ओंकार से आरम्भ कर ब्रह्म-चिन्तन तक पहुँचता है, वह वेदों के हज़ारों पृष्ठों को पढ़ने के कष्ट के बिना, उनके मर्म को एक ही क्षण में अनुभव कर लेता है। वह 'अक्षर' (ॐ) के माध्यम से उस 'अक्षर-ब्रह्म' में स्थित हो जाता है, जो चारों वेदों का मूल आधार है। इस प्रकार, यह साधना साधक को 'विद्या' (सूचना) से 'विज्ञान' (अनुभव) की भूमि पर ले जाती है।

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मिलान जिन ग्रन्थोंसे हुआ — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः।

संकलन — Dwaipayan Pradhan। निर्यात तिथि — 2026-10-04।

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