श्रीगणेशाय नमः।

ब्राह्मणगीता : आत्मा का वास्तविक स्वरूप और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का मार्ग क्या है?

आत्मज्ञान और लोभ का त्याग

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · पर्व → अनुगीतापर्व · अध्याय 21–34 · पृष्ठ 1684–1743

8,411 शब्द · 43 मिनटका पाठ · 40 श्लोक

अर्जुन से कहा गया

श्रीकृष्ण द्वारा आत्म-स्वरूप की व्याख्या हेतु

"प्रिये! इस विषय में विद्वान् पुरुष इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। दस होता मिलकर जिस प्रकार यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, वह सुनो!"

ब्राह्मण उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
निबोध दशहोतॄणां विधानमथ यादृशम् ॥

ब्राह्मण कहते हैं — प्रिये! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं । दस होता मिलकर जिस प्रकार यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वह सुनो ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 21 · श्लोक 1पृष्ठ 1685

ब्राह्मण ने अपनी बात शुरू की और उस सूक्ष्म यज्ञ की व्याख्या करने लगे जो मनुष्य के भीतर निरन्तर चलता रहता है। उन्होंने समझाया कि कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा—ये दस इन्द्रियाँ मिलकर दस हविष्य यानी विषय बनती हैं: शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वाणी, क्रिया, गति, वीर्य, मूत्र-त्याग और मल-त्याग। ये दस देवता अग्नि के समान हैं। दिशा, वायु, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि, विष्णु, इन्द्र, प्रजापति और मित्र—ये दस देवता मिलकर उस यज्ञ की अग्नि बनते हैं।

ब्राह्मण उवाच

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चरणौ करौ ।
उपस्थं वायुरिति वा होतॄणि दश भामिनि ॥

भामिनि! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा ( वाक् और रसना), नासिका, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा- से दस होता हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 21 · श्लोक 2पृष्ठ 1685

"भामिनि! इन दस इन्द्रियों रूपी होता, दस देवतारूपी अग्नि में, दस विषयरूपी हविष्य और समिधाओं का हवन होता है। इस प्रकार मेरे अन्तर में निरन्तर यज्ञ हो रहा है; फिर मैं अकर्मण्य कैसे हूँ?" ब्राह्मण के शब्दों में अपने भीतर चल रहे इस जीवन्त यज्ञ का बोध था। उन्होंने आगे कहा कि इस यज्ञ में चित्त ही स्रुवा (हवन करने वाला पात्र) है और पवित्र एवं उत्तम ज्ञान ही उसका धन है। यह सम्पूर्ण जगत् पहले भली-भाँति विभक्त था—ऐसा सुना गया है। जानने में आनेवाला यह सारा जगत् चित्त रूप ही है, जो ज्ञान की अपेक्षा रखता है और शरीरधारी जीव उसे जानने वाला है।

ब्राह्मण उवाच

चित्तं स्रुवश्च वित्तं च पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् ।
सुविभक्तमिदं सर्वं जगदासीदिति श्रुतम् ॥

इस यज्ञमें चित्त ही स्रुवा तथा पवित्र एवं उत्तम ज्ञान ही धन है । यह सम्पूर्ण जगत् पहले भलीभाँति विभक्त था - ऐसा सुना गया है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 21 · श्लोक 6पृष्ठ 1685

वहाँ एक सूक्ष्म प्रक्रिया चल रही थी। वह शरीर का अभिमानी जीव 'गार्हपत्य' अग्नि है। उससे जो दूसरा पावक प्रकट होता है, वह 'मन' है, जिसे 'आहवनीय' अग्नि कहा जाता है। उसी में पूर्वोक्त हविष्य की आहुति दी जाती है और उससे वाचस्पति यानी वेदवाणी का प्राकट्य होता है। मन उस वाणी को देखता है और मन के अनन्तर रूप का प्रादुर्भाव होता है, जो नील-पीत आदि वर्णों से रहित है। वह रूप मन की ओर दौड़ता है।

ब्राह्मण उवाच

अरणीं ब्राह्मणीं विद्धि गुरुरस्योत्तरारणिः ।
तपःश्रुतेऽभिमथ्नीतो ज्ञानाग्निर्जायते ततः ॥

ब्राह्मणने कहा-देवि! तुम बुद्धिको नीचेकी अरणी और गुरुको ऊपरकी अरणी समझो । तपस्या और वेद- वेदान्तके श्रवण- मननद्वारा मन्थन करनेपर उन अरणियोंसे ज्ञानरूप अग्नि प्रकट होती है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 34 · श्लोक 3पृष्ठ 1741

ब्राह्मणी ने जिज्ञासावश प्रश्न किया—"प्रियतम! किस कारण से वाक् की उत्पत्ति पहले हुई और क्यों मन पीछे हुआ? जब कि मन से ही सोचे-विचारे वचन को व्यवहार में लाया जाता है। किस विज्ञान के प्रभाव से मति चित्त के आश्रित होती है? वह ऊँचे उठायी जाने पर विषयों की ओर क्यों नहीं जाती? कौन उसके मार्ग में बाधा डालता है?"

केन विज्ञानयोगेन मतिश्चित्तं समास्थिता ।
समुन्नीता नाध्यगच्छत् को वै तां प्रतिबाधते ॥

किस विज्ञानके प्रभावसे मति चित्तके आश्रित होती है? वह ऊँचे उठायी जानेपर विषयोंकी ओर क्यों नहीं जाती? कौन उसके मार्गमें बाधा डालता है?

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 21 · श्लोक 11पृष्ठ 1686

ब्राह्मण ने उत्तर दिया—"प्रिये! अपान पतिरूप होकर उस मतिको अपानभाव की ओर ले जाता है। वह अपानभाव की प्राप्ति मन की गति बताई गयी है, इसलिये मन उसकी अपेक्षा रखता है। परन्तु तुम मुझसे वाणी और मन के विषय में ही प्रश्न करती हो, इसलिये मैं तुम्हें उन्हीं दोनों का संवाद बताऊँगा।"

सर्वान्ननार्थयुक्तांश्च सर्वान् प्रत्यक्षहेतुकान् ।
यतः परं न विद्येत ततोऽभ्यासे भविष्यति ॥

वे सभी प्रत्यक्ष प्रतीत होनेवाले पदार्थ वास्तविक अर्थयुक्त नहीं हो सकते । जिससे पर -कुछ भी नहीं है, उसका साक्षात्कार तो ' नेति नेति' अर्थात् यह भी नहीं, यह भी नहीं –इस अभ्यासके अन्तमें ही होगा ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 34 · श्लोक 9पृष्ठ 1742

एक बार मन और वाणी दोनों ने जीवात्मा के पास जाकर पूछा—"प्रभो! हम दोनों में कौन श्रेष्ठ है? यह बताओ और हमारे सन्देह का निवारण करो।" तब भगवान आत्मदेव ने कहा—"मन ही श्रेष्ठ है।" यह सुनकर सरस्वती बोलीं—"मैं ही तुम्हारे लिये कामधेनु बनकर सब कुछ देती हूँ।" इस प्रकार वाणी ने स्वयं ही अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी।

मन इत्येव भगवांस्तदा प्राह सरस्वती ।
अहं वै कामधुक् तुभ्यमिति तं प्राह वागथ ॥

तब भगवान् आत्मदेवने कहा-' मन ही श्रेष्ठ है। ' यह सुनकर सरस्वती बोलीं- ' मैं ही तुम्हारे लिये कामधेनु बनकर सब कुछ देती हूँ । ' इस प्रकार वाणीने स्वयं ही अपनी श्रेष्ठता बतायी ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 21 · श्लोक 15पृष्ठ 1687

ब्राह्मण ने आगे स्पष्ट किया—"प्रिये! स्थावर और जङ्गम, ये दोनों मेरे मन हैं। स्थावर अर्थात् बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होने वाला यह जगत् है जो मेरे समीप है; और जङ्गम अर्थात् इन्द्रियातीत जो स्वर्ग आदि है, वह तुम्हारे अधिकार में है।" उन्होंने बताया कि जो मन्त्र, वर्ण अथवा स्वर उस अलौकिक विषय को प्रकाशित करता है, उसका अनुसरण करने वाला मन यद्यपि 'जङ्गम' कहलाता है, तथापि वाणी स्वरूपा तुम्हारे द्वारा ही मन का उस अतीन्द्रिय जगत् में प्रवेश होता है। "इसलिये तुम मन से भी श्रेष्ठ एवं गौरवशालिनी हो, क्योंकि तुमने स्वयं ही पास आकर समाधान अर्थात् अपने पक्ष की पुष्टि की है।"

ततो वाचस्पतिर्जज्ञे तं मनः पर्यवेक्षते ।
रूपं भवति वैवर्णं समनुद्रवते मनः ॥

उससे वाचस्पति ( वेदवाणी) -का प्राकट्य होता है । उसे मन देखता है । मनके अनन्तर रूपका प्रादुर्भाव होता है, जो नील- पीत आदि वर्णोंसे रहित होता है । वह रूप मनकी ओर दौड़ता है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 21 · श्लोक 9पृष्ठ 1686

ब्राह्मण ने एक गहरी बात कही—"महाभागे! प्राण और अपान के बीच में देवी सरस्वती सदा विद्यमान रहती हैं। वह प्राण की सहायता के बिना जब निम्नतम दशा को प्राप्त होने लगी, तब दौड़ी हुई प्रजापति के पास गयी और बोली—'भगवन्! प्रसन्न होइये'।" तभी वाणी को पुष्ट करते हुए पुनः प्राण प्रकट हुआ। इसीलिए उच्छ्वास लेते समय वाणी कभी कोई शब्द नहीं बोलती है।

वाणी दो प्रकार की होती है—एक घोषयुक्त जो स्पष्ट सुनाई देती है, और दूसरी घोषरहित जो सदा सभी अवस्थाओं में विद्यमान रहती है। इन दोनों में घोषरहित वाणी ही श्रेष्ठतम है क्योंकि उसे प्राण शक्ति की अपेक्षा नहीं रहती। "शुचिस्मिते! घोषयुक्त (वैदिक) वाणी भी उत्तम गुणों से सुशोभित होती है। वह दूध देने वाली गाय की भाँति मनुष्यों के लिये सदा उत्तम रस झरती है और ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाली उपनिषद्वाणी का बोध कराती है। इस प्रकार वाणीरूपी गौ दिव्य है।"

घोषिणी जातनिर्घोषा नित्यमेव प्रवर्तते ।
तयोरपि च घोषिण्या निर्घोषैव गरीयसी ॥

वाणी दो प्रकारकी होती है –एक घोषयुक्त (स्पष्ट सुनायी देनेवाली ) और दूसरी घोषरहित, जो सदा सभी अवस्थाओंमें विद्यमान रहती है । इन दोनोंमें घोषयुक्त वाणीकी अपेक्षा घोषरहित ही श्रेष्ठतम है ( क्योंकि घोषयुक्त वाणीको प्राणशक्तिकी अपेक्षा रहती है और घोषरहित उसकी अपेक्षाके बिना भी स्वभावतः उच्चरित होती रहती है )

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 21 · श्लोक 21पृष्ठ 1688

ब्राह्मणी ने फिर पूछा—"नाथ! जब वाक्य उत्पन्न नहीं हुए थे, उस समय कुछ कहने की इच्छा से प्रेरित करने वाली सरस्वती देवी ने पहले क्या कहा था?"

ब्राह्मण ने उत्तर दिया—"प्रिये! वह वाक् प्राण के द्वारा शरीर में प्रकट होती है, फिर प्राण से अपानभाव को प्राप्त होती है। तत्पश्चात् उदान स्वरूप होकर शरीर को छोड़कर व्यान रूप से सम्पूर्ण आकाश को व्याप्त कर लेती है। तदनन्तर समान वायु में प्रतिष्ठित होती है। इस प्रकार वाणी ने पहले अपनी उत्पत्तिका प्रकार बताया था। इसलिये स्थावर होने के कारण मन श्रेष्ठ है और जङ्गम होने के कारण वाग्देवी श्रेष्ठ हैं।"

ब्राह्मण ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा—"सुभगे! इसी विषय में इस पुरातन इतिहास का भी उदाहरण दिया जाता है। सात होताओं के यज्ञ जैसा विधान है, उसे सुनो।"

उन्होंने समझाया कि नासिका, नेत्र, जिह्वा, त्वचा, कान, मन और बुद्धि—ये सात होता अलग-अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीर में ही निवास करते हैं, तो भी एक-दूसरे को नहीं देखते हैं। ब्राह्मणी ने पूछा—"भगवन्! जब सभी सूक्ष्म शरीर में ही रहते हैं, तब एक-दूसरे को देख क्यों नहीं पाते? उनके स्वभाव कैसे हैं?"

ब्राह्मण बोले—"प्रिये! गुणों को न जानना ही गुणवान् को न जानना कहलाता है। ये सात होता एक-दूसरे के गुणों को कभी नहीं जान पाते। जीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि गन्धों को नहीं समझ पाते, किन्तु नासिका उसका अनुभव करती है। नासिका, कान, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि रसों का आस्वादन नहीं कर सकते, केवल जिह्वा स्वाद ले सकती है। नासिका, जीभ, आँख, कान, बुद्धि और मन स्पर्श का ज्ञान नहीं कर सकते, किन्तु त्वचा को उसका ज्ञान होता है। नासिका, जीभ, आँख, कान, त्वचा और बुद्धि को शब्द का ज्ञान नहीं होता, किन्तु कान को होता है। अन्त में, नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान और मन किसी बात का निश्चय नहीं कर सकते; निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है।"

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं मन एव च ।
न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति ॥

इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन- वे किसी बातका निश्चय नहीं कर सकते । निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 22 · श्लोक 12पृष्ठ 1691

ब्राह्मण ने इस विषय में इन्द्रियों और मन के संवाद का उदाहरण दिया। एक बार मन ने इन्द्रियों से कहा—"मेरी सहायता के बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रस का स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्श का अनुभव नहीं कर सकती और कानों को शब्द नहीं सुनाई दे सकते। इसलिये मैं सब भूतों में श्रेष्ठ और सनातन हूँ। मेरे बिना समस्त इन्द्रियाँ बुझी लपटों वाली आग और सूने घर की भाँति सदा श्रीहीन जान पड़ती हैं।"

इन्द्रियों ने उत्तर दिया—"महोदय! यदि आप हमारी सहायता लिये बिना ही विषयों का अनुभव कर सकते, तो हम आपकी बात मान लेतीं। हमारा लय हो जाने पर भी यदि आप तृप्त रह सकें और जीवन धारण कर सकें, तो आपकी बात सत्य होगी। यदि आप अपने सङ्कल्प मात्र से विषयों का यथार्थ अनुभव करने की शक्ति रखते हैं, तो जरा नाक के द्वारा रूप का, आँख से रस का, कान के द्वारा गन्ध का, जिह्वा से स्पर्श का, त्वचा से शब्द का और बुद्धि से स्पर्श का अनुभव कीजिये। आप जैसे बलवान लोग नियमों के बन्धन में नहीं रहते; नियम तो दुर्बलों के लिये होते हैं। हम लोगों की जूठन खाना आपको शोभा नहीं देता।"

बलवन्तो ह्यनियमा नियमा दुर्बलीयसाम् ।
भोगानपूर्वानादत्स्व नोच्छिष्टं भोक्तुमर्हति ॥

आप- जैसे बलवान् लोग नियमोंके बन्धनमें नहीं रहते, नियम तो दुर्बलोंके लिये होते हैं । आप नये ढंगसे नवीन भोगोंका अनुभव कीजिये । हमलोगोंकी जूठन खाना आपको शोभा नहीं देता ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 22 · श्लोक 23पृष्ठ 1693

इन्द्रियों ने आगे कहा कि जैसे शिष्य गुरु के पास जाकर श्रुति का अर्थ जानकर स्वयं उसका अनुसरण करता है, वैसे ही आप सोते और जागते समय हमारे ही दिखाए हुए भूत और भविष्य के विषयों का उपभोग करते हैं। "जो मनरहित हुए मन्दबुद्धि प्राणी हैं, उनमें भी हमारे लिये ही कार्य किये जाने पर प्राण-धारण देखा जाता है। बहुत से सङ्कल्पों का मनन और स्वप्नों का आश्रय लेकर भोग भोगने की इच्छा से पीड़ित हुआ प्राणी विषयों की ओर ही दौड़ता है।"

ब्राह्मण ने कहा – प्रिये! अब पञ्चहोताओं के यज्ञ का जैसा विधान है, उसके विषय में एक प्राचीन दृष्टान्त बताया जाता है। प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान - ये पाँचों प्राण हैं। विद्वान् पुरुष इन्हें सबसे श्रेष्ठ मानते हैं।

ब्राह्मणी बोली – नाथ! पहले तो मैं समझती थी कि स्वभावतः सात होता हैं; किन्तु अब आपके मुँहसे पाँच होताओं की बात मालूम हुई। अतः ये पाँचों होता किस प्रकार हैं? आप इनकी श्रेष्ठता का वर्णन कीजिये।

ब्राह्मण ने कहा – प्रिये! वायु प्राण के द्वारा पुष्ट होकर अपान रूप होती है, अपान के द्वारा पुष्ट होकर व्यान रूप, व्यान से पुष्ट होकर उदान रूप और उदान से परिपुष्ट होकर समान रूप होती है। एक बार इन पाँचों वायुओं ने सबके पूर्वज पितामह ब्रह्माजी से प्रश्न किया — ‘भगवन्! हममें जो श्रेष्ठ हो उसका नाम बता दीजिये, वही हमलोगों में प्रधान होगा।’

ब्राह्मण उवाच

प्राणेन सम्भृतो वायुरपानो जायते ततः ।
अपाने सम्भृतो वायुस्ततो व्यानः प्रवर्तते ॥ ४ ।
व्यानेन सम्भृतो वायुस्ततोदानः प्रवर्तते ।
उदाने सम्भृतो वायुः समानो नाम जायते ॥

तेऽपृच्छन्त पुरा सन्तः पूर्वजातं पितामहम् ।
यो नः श्रेष्ठस्तमाचक्ष्व स नः श्रेष्ठो भविष्यति ॥

ब्राह्मणने कहा – प्रिये! वायु प्राणके द्वारा पुष्ट होकर अपानरूप, अपानके द्वारा पुष्ट होकर व्यानरूप, व्यानसे पुष्ट होकर उदानरूप, उदानसे परिपुष्ट होकर समानरूप होता है । एक बार इन पाँचों वायुओंने सबके पूर्वज पितामह ब्रह्माजीसे प्रश्न किया — ‘ भगवन्! हममें जो श्रेष्ठ हो उसका नाम बता दीजिये, वही हमलोगोंमें प्रधान होगा '

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 23 · श्लोक 4–6पृष्ठ 1695

ब्रह्माजी ने कहा – प्राणधारियों के शरीर में स्थित हुए तुमलोगों में से जिसका लय हो जाने पर सभी प्राण लीन हो जायें और जिसके सञ्चरित होने पर सबके-सबके सञ्चार करने लगें, वही श्रेष्ठ है। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ।

ब्रह्मोवाच यस्मिन् प्रलीने प्रलयं व्रजन्ति सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे ।
यस्मिन् प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति सवै श्रेष्ठो गच्छत यत्र कामः ॥

ब्रह्माजीने कहा – प्राणधारियोंके शरीरमें स्थित हुए तुमलोगोंमेंसे जिसका लय हो जानेपर सभी प्राण लीन हो जायँ और जिसके संचरित होनेपर सब -के - सब संचार करने लगें, वही श्रेष्ठ है । अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 23 · श्लोक 7पृष्ठ 1696

यह सुनकर प्राणवायु ने अपान आदि से कहा— 'मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे सञ्चरित होने पर सब-के-सब सञ्चार करने लगते हैं, इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ।' फिर वह थोड़ी देर के लिये छिप गया और उसके बाद पुनः चलने लगा। तब समान और उदान वायु ने उससे कहा— 'प्राण! जैसे हम लोग इस शरीर में व्याप्त हैं, उस तरह तुम इस शरीर में व्याप्त होकर नहीं रहते। इसलिये तुम हमलोगों से श्रेष्ठ नहीं हो। केवल अपान तुम्हारे वश में है।'

तदनन्तर अपान बोला — 'मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे सञ्चरित होने पर सब-के-सब सञ्चार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ।' तब व्यान और उदान ने उसे कहा— 'अपान! केवल प्राण तुम्हारे अधीन है, इसलिये तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो सकते।'

इसके बाद व्यान ने उससे कहा — 'मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। मेरी श्रेष्ठता का कारण क्या है, वह सुनो। मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे सञ्चरित होने पर सब-के-सब सञ्चार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ।' तब व्यान कुछ देर के लिये लीन हो गया और फिर चलने लगा। उस समय प्राण, अपान, उदान और समान ने उससे कहा— 'व्यान! तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो, केवल समान वायु तुम्हारे वश में है।'

तब समान ने पुनः कहा — 'मैं जिस कारण से सबमें श्रेष्ठ हूँ, वह बताता हूँ सुनो। मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे सञ्चरित होने पर सब-के-सब सञ्चार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ।' यह कहकर समान कुछ देर के लिये लीन हो गया और पुनः चलने लगा। तब प्राण, अपान, व्यान और उदान ने उससे कहा — 'समान! तुम हमलोगों से श्रेष्ठ नहीं हो, केवल व्यान ही तुम्हारे वश में है।'

तभी समान ने कहा— 'श्रेष्ठोऽहम् अस्मि सर्वेषां श्रूयताम् येन हेतुना। मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ, इसका कारण सुनो। मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे सञ्चरित होने पर सब-के-सब सञ्चार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ।'

उसे सुनकर उदान कुछ देर के लिये लीन हो गया और फिर चलने लगा। तब प्राण, अपान, समान और व्यान ने उससे कहा — 'उदान! तुम हमलोगों से श्रेष्ठ नहीं हो। केवल व्यान ही तुम्हारे वश में है।' तदनन्तर वे सभी प्राण ब्रह्माजी के पास एकत्र हुए। उस समय उन सबसे प्रजापति ब्रह्मा ने कहा — 'वायुगण! तुम सभी श्रेष्ठ हो अथवा तुममें से कोई भी श्रेष्ठ नहीं है। तुम सबका धारण रूप धर्म एक-दूसरे पर अवलम्बित है। सभी अपने-अपने स्थान पर श्रेष्ठ हो और सबका धर्म एक-दूसरे पर अवलम्बित है।'

ब्राह्मण उवाच

ततस्तानब्रवीद् ब्रह्मा समवेतान् प्रजापतिः ।
सर्वे श्रेष्ठा न वा श्रेष्ठाः सर्वे चान्योन्यधर्मिणः ॥

ब्राह्मण कहते हैं - तदनन्तर वे सभी प्राण ब्रह्माजीके पास एकत्र हुए । उस समय उन सबसे प्रजापति ब्रह्माने कहा -' वायुगण! तुम सभी श्रेष्ठ हो । अथवा तुममेंसे कोई भी श्रेष्ठ नहीं है । तुम सबका धारणरूप धर्म एक- दूसरेपर अवलम्बित है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 23 · श्लोक 21पृष्ठ 1699

प्रजापति ने वहाँ एकत्र हुए सब प्राणों से फिर कहा — 'एक ही वायु स्थिर और अस्थिर रूप से विराजमान है। उसी के विशेष भेद से पाँच वायु होते हैं। इस तरह एक ही मेरा आत्मा अनेक रूपों में वृद्धि प्राप्त करता है। तुम्हारा कल्याण हो। तुम कुशलपूर्वक जाओ और एक-दूसरे के हितैषी रहकर परस्पर की उन्नति में सहायता पहुँचाते हुए एक-दूसरे को धारण किये रहो।'

ब्राह्मण ने कहा — प्रिये! इस विषय में देवर्षि नारद और देवमत के संवाद रूप प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं।

ब्राह्मण उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादमृषेर्देवमतस्य च ॥

ब्राह्मणने कहा — प्रिये! इस विषयमें देवर्षि नारद और देवमतके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 24 · श्लोक 1पृष्ठ 1700

देवमत ने पूछा — 'देवर्षे! जब जीव जन्म लेता है, उस समय सबसे पहले उसके शरीर में किसकी प्रवृत्ति होती है? प्राण, अपान, समान, व्यान अथवा उदान की?'

नारद जी ने कहा — 'मुने! जिस निमित्त कारण से इस जीव की उत्पत्ति होती है, उससे भिन्न दूसरा पदार्थ भी पहले कारण रूप से उपस्थित होता है। वह है प्राणों का द्वन्द्व। जो ऊपर (देवलोक), तिर्यक् (मनुष्यलोक) और अधोलोक (पशु आदि) में व्याप्त है, ऐसा समझना चाहिये।'

नारद उवाच

येनायं सृज्यते जन्तुस्ततोऽन्यः पूर्वमेति तम् ।
प्राणद्वन्द्वं हि विज्ञेयं तिर्यगूर्ध्वमधश्च यत् ॥

नारदजीने कहा — मुने! जिस निमित्त कारणसे इस जीवकी उत्पत्ति होती है, उससे भिन्न दूसरा पदार्थ भी पहले कारण-रूपसे उपस्थित होता है । वह है प्राणोंका द्वन्द्व । जो ऊपर ( देवलोक), तिर्यक् ( मनुष्यलोक ) और अधोलोक ( पशु आदि) में व्याप्त है, ऐसा समझना चाहिये ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 24 · श्लोक 3पृष्ठ 1700

देवमत ने पूछा — 'नारद जी! किस निमितत कारण से इस जीव की सृष्टि होती है? दूसरा कौन पदार्थ पहले कारण रूप से उपस्थित होता है तथा प्राणों का द्वन्द्व क्या है, जो ऊपर, मध्य में और नीचे व्याप्त है?'

नारद जी ने कहा — 'मुने! सङ्कल्प से हर्ष उत्पन्न होता है, मनोनुकूल शब्द से, रस से और रूप से भी हर्ष की उत्पत्ति होती है। रज में मिले हुए वीर्य से पहले प्राण आकर उसमें कार्य आरम्भ करता है। उस प्राण से वीर्य में विकार उत्पन्न होने पर फिर अपान की प्रवृत्ति होती है। शुक्र से और रस से भी हर्ष की उत्पत्ति होती है; यह हर्ष ही उदान का रूप है। उक्त कारण और कार्य रूप जो मिथुन है, उन दोनों के बीच में हर्ष व्याप्त होकर स्थित है। प्रवृत्तिके मूलभूत काम से वीर्य उत्पन्न होता है, उससे रज की उत्पत्ति होती है। ये दोनों वीर्य और रज समान और व्यान से उत्पन्न होते हैं; इसलिये इन्हें सामान्य कहा जाते हैं।

प्राण और अपान — ये दोनों भी द्वन्द्व हैं। ये नीचे और ऊपर को जाते हैं। व्यान और समान — ये दोनों मध्यगामी द्वन्द्व कहे जाते हैं। अग्नि अर्थात् परमात्मा ही सम्पूर्ण देवता हैं। वह वेद उन परमेश्वर की आज्ञा रूप है। उस वेद से ही ब्राह्मण में बुद्धियुक्त ज्ञान उत्पन्न होता है। उस अग्निका धुआँ तमोमय और भस्म रजोमय है। जिसके निमित्त हविष्य की आहुति दी जाती है, उस अग्निसे (प्रकाश स्वरूप परमेश्वर से) यह सारा जगत् उत्पन्न होता है।

यज्ञ वेत्ता पुरुष यह जानते हैं कि सत्त्वगुण से समान और व्यान की उत्पत्ति होती है। प्राण और अपान आज्य भाग नामक दो आहुतियों के समान हैं। उनके मध्य भाग में अग्निकी स्थिति है। यही उदान का उत्कृष्ट रूप है, जिसे ब्राह्मण लोग जानते हैं। जो निर्द्वन्द्व कहा गया है, उसे भी बताता हूँ, तुम मेरे मुख से सुनो।

अहोरात्रमिदं द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः ।
एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥

ये दिन और रात द्वन्द्व हैं, इनके मध्यभागमें अग्नि हैं । ब्राह्मणलोग इसीको उदानका उत्कृष्ट रूप मानते हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 24 · श्लोक 14पृष्ठ 1702

ये दिन और रात द्वन्द्व हैं, इनके मध्य भाग में अग्नि है। ब्राह्मण लोग इसी को उदान का उत्कृष्ट रूप मानते हैं। और असत् - ये दोनों द्वन्द्व हैं तथा इनके मध्य भाग में अग्नि है। ब्राह्मण लोग इसे सत्-उदान का परम उत्कृष्ट रूप मानते हैं। ऊर्ध्व अर्थात् ब्रह्म जिस सङ्कल्प नामक हेतु से समान और व्यान रूप होता है, उसी से कर्म का विस्तार होता है; अतः सङ्कल्प को रोकना चाहिये। जाग्रत् और स्वप्न के अतिरिक्त जो तीसरी अवस्था है, उससे उपलक्षित ब्रह्म का समान के द्वारा ही निश्चय होता है। एकमात्र व्यान शान्ति के लिये है। शान्ति सनातन ब्रह्म है। ब्राह्मण लोग इसी को उदान का परम उत्कृष्ट रूप मानते हैं।'

सच्चासच्चैव तद् द्वन्द्वं तयोर्मध्ये हुताशनः ।
एतद् रूपमुदानस्य परमं ब्राह्मणा विदुः ॥

और असत् -ये दोनों द्वन्द्व हैं तथा इनके मध्यभागमें अग्नि हैं । ब्राह्मणलोग इसे - सत्उदानका परम उत्कृष्ट रूप मानते हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 24 · श्लोक 15पृष्ठ 1702

ब्राह्मण ने कहा — प्रिये! इसी विषय में चार होताओं से युक्त यज्ञ का जैसा विधान है, उसको बताने वाले इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। भद्रे! उस सबके विधि-विधान का उपदेश किया जाता है। तुम मेरे मुख से इस अद्भुत रहस्य को सुनो।

भाविनि! करण, कर्म, कर्ता और मोक्ष - ये चार होता हैं, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् आवृत है। इनके जो हेतु हैं, उन्हें युक्तियों द्वारा सिद्ध किया जाता है। वह सब पूर्ण रूप से सुनो। घ्राण (नासिका), जिह्वा, नेत्र, त्वचा, पाँचवाँ कान तथा मन और बुद्धि — ये सात कारण रूप हेतु गुणमय जानने चाहिये। गन्ध, रस, रूप, शब्द, पाँचवाँ स्पर्श तथा मन्तव्य और बोद्धव्य — ये सात विषय कर्म रूप हेतु हैं। सूँघने वाला, खाने वाला, देखने वाला, बोलने वाला, पाँचवाँ सुनने वाला तथा मनन करने वाला और निश्चयात्मक बोध प्राप्त करने वाला - ये सात कर्ता रूप हेतु हैं।

ये प्राण आदि इन्द्रियाँ गुणवान् हैं, अतः अपने शुभाशुभ विषयोंरूप गुणों का उपभोग करती हैं। मैं निर्गुण और अनन्त हूँ, इनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है—यह समझ लेने पर ये सातों—घ्राण आदि मोक्ष के हेतु होते हैं। विद्वान पुरुष अपने घ्राण आदि इन्द्रियों के स्थान को विधिपूर्वक जानते हैं और देवता रूप होकर सदा हविष्य का भोग करते हैं। अज्ञानी पुरुष जब अन्न भोजन करता है, तो वह उसके प्रति ममत्व से युक्त हो जाता है; जो अपने लिये भोजन पकाता है, वह भी उसी ममत्व के दोष से मारा जाता है। वह अभक्ष्य-भक्षण और मद्यपान जैसे घातक दुर्व्यसनों को अपना लेता है और भक्षण के द्वारा उस अन्न की हत्या करता है, किन्तु अन्ततः स्वयं भी उसी के द्वारा मारा जाता है। पर जो विद्वान् इस अन्न को खाता है, अर्थात् अन्न से उपलक्षित समस्त प्रपञ्च को अपने आप में लीन कर देता है, वह ईश्वर-सर्वसमर्थ होकर पुनः अन्न आदिका जनक होता है; उस अन्न से उस विद्वान् पुरुष में कोई सूक्ष्म से सूक्ष्म दोष भी उत्पन्न नहीं होता।

हन्ता ह्यन्नमिदं विद्वान् पुनर्जनयतीश्वरः ।
न चान्नाज्जायते तस्मिन् सूक्ष्मो नाम व्यतिक्रमः ॥

जो विद्वान् इस अन्नको खाता है, अर्थात् अन्नसे उपलक्षित समस्त प्रपंचको अपने-आपमें लीन कर देता है, वह ईश्वर- सर्वसमर्थ होकर पुनः अन्न आदिका जनक होता है । उस अन्नसे उस विद्वान् पुरुषमें कोई सूक्ष्म से सूक्ष्म दोष भी नहीं उत्पन्न होता ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 25 · श्लोक 11पृष्ठ 1704

"जो मन से अवगत होता है, वाणी द्वारा जिसका कथन होता है, जिसे कान से सुना और आँख से देखा जाता है, जिसको त्वचा से छूआ और नासिका से सूँघा जाता है—इन मन्तव्य आदि छहों विषयरूपी हविस्यों का मन आदि छहों इन्द्रियों के संयमपूर्वक अपने आप में होम करना चाहिये। उस होम के अधिष्ठानभूत गुणवान् पावकरूप परमात्मा मेरे तन-मन के भीतर प्रकाशित हो रहे हैं।"

"मैंने योगरूपी यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ कर दिया है। इस यज्ञ का उद्भव ज्ञानरूपी अग्निको प्रकाशित करने वाला है। इसमें प्राण ही स्तोत्र हैं, अपान शस्त्र है और सर्वस्व का त्याग ही उत्तम दक्षिणा है। कर्ता (अहङ्कार), अनुमन्ता (मन) और आत्मा (बुद्धि)—ये तीनों ब्रह्मरूप होकर क्रमशः होता, अध्वर्यु और उद्गाता हैं। सत्यभाषण ही प्रशास्ता का शस्त्र है और अपवर्ग (मोक्ष) ही उस यज्ञ की दक्षिणा है।"

नारायण को जानने वाले पुरुष इस योगयज्ञ के प्रमाण में ऋचाओं का भी उल्लेख करते हैं। पूर्वकाल में भगवान् नारायणदेव की प्राप्ति के लिये भक्त पुरुषों ने इन्द्रियरूपी पशुओं को अपने अधीन किया था। भगवत्प्राप्ति हो जाने पर परमानन्द से परिपूर्ण हुए सिद्ध पुरुष जब सामगान करते हैं, तो उसका दृष्टान्त तैत्तिरीय उपनिषद् के विद्वान 'एतत् सामगायन्नास्ते' इत्यादि मन्त्रों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हे भीरु! तुम उस सर्वात्मा भगवान् नारायणदेव का ज्ञान प्राप्त करो।

तत्र सामानि गायन्ति तत्र चाहुर्निदर्शनम् ।
देवं नारायणं भीरु सर्वात्मानं निबोध तम् ॥

भगवत्प्राप्ति हो जानेपर परमानन्दसे परिपूर्ण हुए सिद्ध पुरुष जो सामगान करते हैं, उसका दृष्टान्त तैत्तिरीय उपनिषद्के विद्वान् ' एतत् सामगायन्नास्ते ' इत्यादि मन्त्रोंके रूपमें उपस्थित करते हैं । भीरु! तुम उस सर्वात्मा भगवान् नारायणदेवका ज्ञान प्राप्त करो ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 25 · श्लोक 17पृष्ठ 1705

ब्राह्मण ने अपनी प्रिये से कहा— "प्रिये! जगत् का शासक एक ही है, दूसरा नहीं। जो हृदय के भीतर विराजमान है, उस परमात्मा को ही मैं सबका शासक बतला रहा हूँ। जैसे पानी ढालू स्थान से नीचे की ओर प्रवाहित होता है, वैसे ही उस परमात्मा की प्रेरणा से मैं जिस तरह के कार्य में नियुक्त होता हूँ, उसी का पालन करता रहता हूँ। एक ही गुरु है, दूसरा नहीं; जो हृदय में स्थित है, उसी परमात्मा को मैं गुरु बतला रहा हूँ। उसी गुरु के अनुशासन से समस्त दानव हार गये हैं। एक ही बन्धु है, उससे भिन्न दूसरा कोई बन्धु नहीं है; जो हृदय में स्थित है, उसी परमात्मा को मैं बन्धु कहता हूँ। उसी के उपदेश से बान्धवगण बन्धुमान होते हैं और सप्तर्षि लोग आकाश में प्रकाशित होते हैं।"

"एक ही श्रोता है, दूसरा नहीं; जो हृदय में स्थित परमात्मा है, उसी को मैं श्रोता कहता हूँ। इन्द्र ने उसी को गुरु मानकर गुरुकुलवास का नियम पूरा किया अर्थात् शिष्यभाव से वे उस अन्तर्यामी की ही शरण में गये, जिससे उन्हें सम्पूर्ण लोकों का साम्राज्य और अमरत्व प्राप्त हुआ। एक ही शत्रु है, दूसरा नहीं; जो हृदय में स्थित है, उस परमात्मा को मैं गुरु बतला रहा हूँ। उसी गुरु की प्रेरणा से जगत् के सारे साँप सदा द्वेषभाव से युक्त रहते हैं।"

पूर्वकाल में सर्पों, देवताओं और ऋषियों की प्रजापति के साथ जो बातचीत हुई थी, उस प्राचीन इतिहास के जानकार लोग उसका उदाहरण देते हैं। एक बार देवता, ऋषि, नाग और असुरों ने प्रजापति के पास बैठकर पूछा— "भगवन्! हमारे कल्याण का क्या उपाय है? यह बताइये।"

कल्याण की बात पूछने वाले उन महानुभावों का प्रश्न सुनकर भगवान् प्रजापति ब्रह्माजी ने एकाक्षर ब्रह्म—'ॐकार' का उच्चारण किया। उस प्रणवनाद को सुनते ही सब लोग अपनी-अपनी दिशाओं की ओर भाग चले। जब उन्होंने उस उपदेश के अर्थ पर विचार किया, तो देखा कि सर्पों के मन में दूसरों को डँसने का भाव पैदा हुआ, असुरों में स्वाभाविक दम्भ आ गया, जबकि देवताओं ने दान और महर्षियों ने दम को अपनाने का निश्चय किया। इस प्रकार, एक ही गुरु के पास जाने और एक ही शब्द का उपदेश पाने के बाद भी, उनके मन में भिन्न-भिन्न भाव उत्पन्न हो गये। श्रोता गुरु के कहे उपदेश को जैसे-तैसे ग्रहण करता है; अतः प्रश्न पूछने वाले शिष्य के लिये अपने अन्तर्यामी से बढ़कर दूसरा कोई गुरु नहीं है। हृदय में प्रकट होने वाला परमात्मा ही गुरु, ज्ञानी, श्रोता और द्वेष्टा है। संसार में जो पाप करते हैं वे पापाचारी हैं और जो शुभ कर्म करते हैं वे शुभाचारी कहलाते हैं। जो कामनाओं द्वारा इन्द्रियसुख में लीन रहते हैं वे कामचारी हैं और जो इन्द्रियसंयम में रहते हैं वे ब्रह्मचारी हैं। पर जो व्रत और कर्मों का त्याग करके केवल ब्रह्म में स्थित हैं, वही मुख्य ब्रह्मचारी हैं। ब्रह्म ही उनकी समिधा है, ब्रह्म ही अग्नि है, ब्रह्म से ही वे उत्पन्न हुए हैं, ब्रह्म ही उनका जल है और ब्रह्म ही गुरु है। उनकी चित्तवृत्तियाँ सदा ब्रह्म में ही लीन रहती हैं।

ब्रह्मैव समिधस्तस्य ब्रह्माग्निर्ब्रह्मसम्भवः ।
आप ब्रह्म गुरुर्ब्रह्म स ब्रह्मणि समाहितः ॥

ब्रह्म ही उसकी समिधा है, ब्रह्म ही अग्नि है, ब्रह्मसे ही वह उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म ही उसका जल और ब्रह्म ही गुरु है । उसकी चित्तवृत्तियाँ सदा ब्रह्ममें ही लीन रहती हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 26 · श्लोक 17पृष्ठ 1708

ब्राह्मण ने आगे कहा— "प्रिये! जहाँ सङ्कल्परूपी डँस और मच्छरों की अधिकता होती है, शोक और हर्षरूपी गर्मी-सर्दी का कष्ट रहता है, मोहरूपी अन्धकार फैला हुआ है, लोभ तथा व्याधिरूपी सर्प विचरा करते हैं; जहाँ विषयों का ही मार्ग है जिसे अकेले ही तय करना पड़ता है और जहाँ काम तथा क्रोधरूपी शत्रु डेरा डाले रहते हैं—उस संसाररूपी दुर्गम पथ का उल्लङ्घन करके अब मैं ब्रह्मरूपी महान् वन में प्रवेश कर चुका हूँ।"

ब्राह्मणी ने व्याकुल होकर पूछा— "महाप्राज्ञ! वह वन कहाँ है? उसमें कौन-कौनसे वृक्ष, गिरि, पर्वत और नदियाँ हैं तथा वह कितनी दूरी पर है?"

ब्राह्मण ने उत्तर दिया— "प्रिये! उस वन में न भेद है न अभेद, वह इन दोनों से अतीत है। वहाँ लौकिक सुख और दुःख दोनों का अभाव है। उससे अधिक छोटी, उससे अधिक बड़ी और उससे अधिक सूक्ष्म भी दूसरी कोई वस्तु नहीं है; उसके समान सुखरूप भी कोई नहीं है। उस वन में प्रवेश करने पर द्विजातियों को न हर्ष होता है, न शोक; न वे स्वयं किसी प्राणी से डरते हैं और न ही दूसरे उनसे भय मानते हैं। वहाँ सात बड़े-बड़े वृक्ष हैं, उनके सात फल हैं तथा सात ही उन फलों के भोक्ता अतिथि हैं। वहाँ सात आश्रम हैं और सात प्रकार की समाधि तथा दीक्षाएँ हैं। वहाँ के वृक्ष पाँच रङ्गों के दिव्य पुष्पों और फलों की सृष्टि करते हुए वन को व्याप्त किए हुए हैं। दूसरे वृक्ष सुन्दर दो रङ्गवाले पुष्प-फल उत्पन्न कर वन को घेरे हुए हैं। तीसरे वृक्ष सुगन्धित दो रङ्गवाले पुष्प-फल प्रदान करते हैं। चौथे वृक्ष सुगन्धित केवल एक रङ्गवाले पुष्प-फल रचते हैं। वहीं दो महावृक्ष अव्यक्त रङ्गों वाले पुष्प-फलों से वन को व्याप्त किए हुए हैं।"

ब्राह्मण उवाच

न तत्राविश्य शोचन्ति न प्रहृष्यन्ति च द्विजाः ।
न च बिभ्यति केषांचित् तेभ्यो बिभ्यति केचन ॥

उस वनमें प्रवष्टि हो जानेपर द्विजातियोंको न हर्ष होता है, न शोक । न तो वे स्वयं किन्हीं प्राणियोंसे डरते हैं और न उन्हींसे दूसरे कोई प्राणी भय मानते हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 27 · श्लोक 6पृष्ठ 1710

"उस वन में एक ही अग्नि है, जीव शुद्धचेता ब्राह्मण है और पाँच इन्द्रियाँ समिधाएँ हैं। उससे जो मोक्ष प्राप्त होता है, वह सात प्रकार का है; इस यज्ञ की दीक्षा का फल अवश्य मिलता है क्योंकि गुण ही फल है। सात अतिथि ही फलों के भोक्ता हैं। वे महर्षिगण इस यज्ञ में आतिथ्य ग्रहण करते ही लय हो जाते हैं और तत्पश्चात् वह ब्रह्मरूप वन विलक्षण रूप से प्रकाशित होता है। वहाँ प्रज्ञारूपी वृक्ष शोभा पाते हैं, मोक्षरूपी फल लगते हैं और शान्तिमयी छाया फैली रहती है। ज्ञान वहाँ का आश्रय और तृप्ति हेतु जल है। उस वन के भीतर आत्मारूपी सूर्य का प्रकाश छाया रहता है। जो श्रेष्ठ पुरुष उस वन का आश्रय लेते हैं, उन्हें फिर कभी भय नहीं होता; वह वन ऊपर-नीचे और इधर-उधर सब ओर व्याप्त है और उसका कहीं भी अन्त नहीं है।"

"वहाँ सात स्त्रियाँ निवास करती हैं, जो लज्जा के मारे अपना मुँह नीचे की ओर किये रहती हैं। वे चिन्मय ज्योति से प्रकाशित हैं और सबकी जननी हैं; वे वन में रहने वाली प्रजा से उत्तम रस उसी प्रकार ग्रहण करती हैं जैसे अनित्यता सत्य को। वहाँ सात सिद्ध सप्तर्षि वसिष्ठ आदि के साथ उसी वन में लीन होते और उसी से उत्पन्न होते हैं। यश, प्रभा, भग, विजय, सिद्धि और तेज—ये सात ज्योतियाँ आत्मारूपी सूर्य का अनुसरण करती हैं। उस ब्रह्मतत्त्व में ही गिरि, पर्वत, झरने और नदियाँ स्थित हैं जो ब्रह्मजनित जल बहाया करती हैं। नदियों का सङ्गम भी उसके गूढ़ हृदयाकाश में सङ्क्षेप से होता है जहाँ योगरूपी यज्ञ का विस्तार रहता है। वही साक्षात् पितामह का स्वरूप है। आत्मज्ञान से तृप्त पुरुष उसी को प्राप्त होते हैं। जिनकी आशा क्षीण हो गयी है, जो उत्तम व्रत रखते हैं और तपस्या से जिनके पाप दग्ध हो गये हैं—वे ही पुरुष अपनी बुद्धिको आत्मनिष्ठ करके परब्रह्म की उपासना करते हैं। विद्या के प्रभाव से ही इस ब्रह्मरूपी वन का स्वरूप समझ में आता है। इस बात को जानने वाले मनुष्य इस वन में प्रवेश करने हेतु 'शम' (मनोनिग्रह) की प्रशंसा करते हैं, जिससे बुद्धि स्थिर होती है। ऐसे गुणवाले ब्राह्मण इस पवित्र वन को जानते हैं और तत्त्वदर्शी के उपदेश से प्रबुद्ध हुए आत्मज्ञानी पुरुष उस ब्रह्मवन को जानकर शम आदि साधनों के अनुष्ठान में लग जाते हैं।"

"मैं न तो गन्धों को सूँघता हूँ, न रसों का आस्वादन करता हूँ, न रूप को देखता हूँ, न किसी वस्तु का स्पर्श करता हूँ, न नाना प्रकार के शब्दों को सुनता हूँ और न कोई सङ्कल्प ही करता हूँ।"

ब्राह्मण ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि स्वभाव ही अभीष्ट पदार्थों की कामना रखता है और स्वभाव से ही सम्पूर्ण द्वेष्य वस्तुओं के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है। जैसे प्राण और अपान स्वभाव से ही प्राणियों के शरीरों में प्रविष्ट होकर अन्न-पाचन आदि का कार्य करते रहते हैं, उसी प्रकार स्वभाव से ही राग और द्वेष की उत्पत्ति होती है। तात्पर्य यह है कि बुद्धि आदि इन्द्रियाँ स्वभाव से ही पदार्थों में बरत रही हैं। इन बाह्य इन्द्रियों और विषयों से भिन्न जो स्वप्न और सुषुप्ति के वासनामय विषय एवं इन्द्रियाँ हैं, तथा उनमें भी जो नित्यभाव हैं, उनसे भी विलक्षण जो भूतात्मा है, उसको शरीर के भीतर योगीजन देख पाते हैं। उस भूतात्मा में स्थित हुआ मैं कहीं किसी तरह भी काम, क्रोध, जरा और मृत्यु से ग्रस्त नहीं होता। मैं सम्पूर्ण कामनाओं में से किसी की कामना नहीं करता और समस्त दोषों से भी कभी द्वेष नहीं करता; जैसे कमल के पत्तों पर जल-बिन्दु का लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरे स्वभाव में राग और द्वेष का स्पर्श नहीं है।

ब्राह्मण उवाच

गन्धान् न जिघ्रामि रसान् न वेद्मि रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि ।
न चापि शब्दान् विविधान् शृणोमि न चापि संकल्पमुपैमि कंचित् ॥

ब्राह्मण कहते हैं- मैं न तो गन्धोंको सूँघता हूँ, न रसोंका आस्वादन करता हूँ, न रूपको देखता हूँ, न किसी वस्तुका स्पर्श करता हूँ, न नाना प्रकारके शब्दोंको सुनता हूँ और न कोई संकल्प ही करता हूँ ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 28 · श्लोक 1पृष्ठ 1714

जिनका स्वभाव बहुत प्रकार का है, उन इन्द्रिय आदि को देखने वाले इस नित्यस्वरूप आत्मा के लिये सब भोग अनित्य हो जाते हैं। अतः वे भोग समुदाय उस विद्वान् को उसी प्रकार कर्मों में लिप्त नहीं कर सकते, जैसे आकाश में सूर्य की किरणों का समुदाय सूर्य को लिप्त नहीं कर सकता।

"प्रिये! इस विषय में अध्वर्यु और यतिके संवादरूप प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है, तुम उसे सुनो।"

किसी यज्ञ-कर्म में पशु का प्रोक्षण होता देख, वहीं बैठे हुए एक यति ने क्रोधित होकर अध्वर्यु से उसकी निन्दा करते हुए कहा— "यह हिंसा है!"

अध्वर्यु ने शान्त भाव से उत्तर दिया— "यह बकरा नष्ट नहीं होगा। यदि 'पशुर्वै नीयमानः' इत्यादि श्रुति सत्य है, तो यह जीव कल्याण का ही भागी होगा। इसके शरीर का जो पार्थिव भाग है, वह पृथ्वी में विलीन हो जाएगा; इसका जो कुछ भी जलीय भाग है, वह जल में प्रविष्ट हो जाएगा। नेत्र सूर्य में, कान दिशाओं में और प्राण आकाश में ही लय को प्राप्त होंगे। शास्त्र की आज्ञा के अनुसार बर्ताव करने वाले मुझको कोई दोष नहीं लगेगा।"

यो ह्यस्य पार्थिवो भागः पृथिवीं स गमिष्यति ।
यदस्य वारिजं किंचिदपस्तत् सम्प्रवेक्ष्यति ॥

‘ इसके शरीरका जो पार्थिव भाग है, वह पृथ्वीमें विलीन हो जायगा । इसका जो कुछ भी जलीय भाग है, वह जलमें प्रविष्ट हो जायगा ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 28 · श्लोक 9पृष्ठ 1715

यति ने तर्क देते हुए पूछा— "यदि तुम बकरे के प्राणों का वियोग हो जाने पर भी उसका कल्याण ही देखते हो, तब तो यह यज्ञ उस बकरे के लिये ही हो रहा है। तुम्हारा इस यज्ञ से क्या प्रयोजन है? श्रुति कहती है— 'पशो!' इस विषय में तुझे तेरे भाई, पिता, माता और सखा की अनुमति प्राप्त होनी चाहिए। इस श्रुति के अनुसार विशेषतः पराधीन हुए इस पशु को ले जाकर इसके पिता-माता आदि से अनुमति लो; अन्यथा तुझे हिंसा का दोष अवश्य प्राप्त होगा। पहले तुम्हें इस पशु के उन सम्बन्धियों से मिलना चाहिए; यदि वे भी ऐसा ही करने की अनुमति दे दें, तब उनका अनुमोदन सुनकर तदनुसार विचार कर सकते हो। तुमने इस छाग की इन्द्रियों को उनके कारणों में विलीन कर दिया है; मेरे विचार से अब तो केवल इसका निश्चेष्ट शरीर ही अवशिष्ट रह गया है। यह चेतनाशून्य जड़ शरीर ईंधन के ही समान है, उससे हिंसा के प्रायश्चित्त की इच्छा से यज्ञ करने वालों के लिये ईंधन ही पशु है। अतः जो काम ईंधन से होता है, उसके लिये पशु-हिंसा क्यों की जाए? वृद्ध पुरुषों का उपदेश है कि अहिंसा सब धर्मों में श्रेष्ठ है; जो कार्य हिंसा से रहित हो वही करने योग्य है, यही हमारा मत है। इसके बाद भी यदि मैं कुछ कहूँ तो यही कह सकता हूँ कि सबको यह प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिए कि 'मैं अहिंसा-धर्म का पालन करूँगा', अन्यथा आपके द्वारा नाना प्रकार के दोष सम्पादित हो सकते हैं। किसी भी प्राणी की हिंसा न करना ही हमें सदा अच्छा लगता है; हम प्रत्यक्ष फल के साधक हैं, परोक्ष की उपासना नहीं करते।"

अहिंसा सर्वभूतानां नित्यमस्मासु रोचते ।
प्रत्यक्षतः साधयामो न परोक्षमुपास्महे ॥

किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना ही हमें सदा अच्छा लगता है । हम प्रत्यक्ष फलके साधक हैं, परोक्षकी उपासना नहीं करते हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 28 · श्लोक 18पृष्ठ 1717

अध्वर्यु ने प्रश्न किया— "यते! यह तो तुम मानते ही हो कि सभी भूतों में प्राण है, तो भी तुम पृथ्वी के गन्ध गुणों का उपभोग करते हो, जलमय रसों को पीते हो, तेज के रूप का दर्शन करते हो और वायु के स्पर्श को छूते हो, आकाश जनित शब्दों को सुनते हो और मन से मति का मनन करते हो। एक ओर तो तुम किसी प्राणी के प्राण लेने के कार्य से निवृत्त हो और दूसरी ओर हिंसामें लगे हुए हो; द्विजवर! कोई भी चेष्टा हिंसा के बिना नहीं होती। फिर तुम कैसे समझते हो कि तुम्हारे द्वारा अहिंसा का ही पालन हो रहा है?"

यति ने उत्तर दिया— "आत्मा के दो रूप हैं— एक अक्षर और दूसरा क्षर। जिसकी सत्ता तीनों कालों में कभी नहीं मिटती, वह सत्स्वरूप अक्षर कहा गया है; जिसका सर्वथा और सभी कालों में अभाव है, वह क्षर कहलाता है। प्राण, जिह्वा, मन और रजोगुण सहित सत्त्वगुण— ये रज अर्थात् मायासहित सद्भाव हैं। इन भावों से मुक्त, निर्द्वन्द्व, निष्काम, समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखने वाले, ममतारहित, जितात्मा और सब ओर से बन्धन शून्य पुरुष को कभी और कहीं भी भय नहीं होता।"

प्राणो जिह्वा मनः सत्त्वं सद्भावो रजसा सह ।
भावैरेतैर्विमुक्तस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ॥

समस्य सर्वभूतेषु निर्ममस्य जितात्मनः ।
समन्तात् परिमुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥

प्राण, जिह्वा, मन और रजोगुणसहित सत्त्वगुण –ये रज अर्थात् मायासहित सद्भाव हैं । इन भावोंसे मुक्त निर्द्वन्द्व, निष्काम, समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेवाले, ममतारहित, जितात्मा तथा सब ओरसे बन्धनशून्य पुरुषको कभी और कहीं भी भय नहीं होता ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 28 · श्लोक 23-24पृष्ठ 1717

अध्वर्यु ने कहा— "बुद्धिमानों में श्रेष्ठ यते! इस जगत् में आप जैसे साधुपुरुषों के साथ ही निवास करना उचित है।"

यह सुनकर यति चुप हो गया। अध्वर्यु ने कहा— "भगवन्! विप्रवर! मैं आपकी बुद्धि से ज्ञान-सम्पन्न होकर यह बात कह रहा हूँ कि वेदमन्त्रों द्वारा निश्चित किये हुए व्रत का ही मैं पालन कर रहा हूँ; अतः इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है।"

अध्वर्युरुवाच सद्भिरेवेह संवासः कार्यो मतिमतां वर ।
भवतो हि मतं श्रुत्वा प्रतिभाति मतिर्मम ॥

भगवन् भगवद्बुद्धया प्रतिपन्नो ब्रवीम्यहम् ।
व्रतं मन्त्रकृतं कर्तुर्नापराधोऽस्ति मे द्विज ॥

अध्वर्युने कहा – बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ यते! इस जगत् में आप जैसे साधुपुरुषोंके साथ ही निवास करना उचित है । आपका यह मत सुनकर मेरी बुद्धिमें भी ऐसी ही प्रतीति हो रही है । भगवन्! विप्रवर! मैं आपकी बुद्धिसे ज्ञानसम्पन्न होकर यह बात कह रहा हूँ कि वेदमन्त्रोंद्वारा निश्चित किये हुए व्रतका ही मैं पालन कर रहा हूँ । अतः इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 28 · श्लोक 25-26पृष्ठ 1718

ब्राह्मण कहते हैं— "प्रिये!" अध्वर्यु की दी हुई युक्ति से वह यति चुप हो गया और फिर कुछ नहीं बोला। फिर अध्वर्यु भी मोहरहित होकर उस महायज्ञ में अग्रसर हुआ। इस प्रकार ब्राह्मण मोक्ष का ऐसा ही अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप बताते हैं और तत्त्वदर्शी पुरुष के उपदेश के अनुसार उस मोक्ष-धर्म को जानकर उसका अनुष्ठान करते हैं।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्व के अन्तर्गत अनुगीतापर्व में ब्राह्मणगीताविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ।

"भामिनि! इस विषय में भी कार्तवीर्य और समुद्र के संवादरूप एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है।"

पूर्वकाल में कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से प्रसिद्ध एक राजा था, जिसकी एक हजार भुजाएँ थीं। उसने केवल धनुष-बाण की सहायता से समुद्र पर्यन्त पृथ्वी को अपने अधिकार में कर लिया था। सुना जाता है कि एक दिन राजा कार्तवीर्य समुद्र के किनारे विचर रहा था। वहाँ उसने अपने बल के घमण्ड में आकर सैकड़ों बाणों की वर्षा से समुद्र को आच्छादित कर दिया।

तब समुद्र ने प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा— "वीरवर! राजसिंह! मुझ पर बाणों की वर्षा न करो। बोलो, तुम्हारी किस आज्ञा का पालन करूँ? शक्तिशाली नरेश्वर! तुम्हारे छोड़े हुए इन महान् बाणों से मेरे अन्दर रहने वाले प्राणियों की हत्या हो रही है; उन्हें अभय दान करो।"

ब्राह्मण उवाच

तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाच ह ।
मा मुञ्च वीर नाराचान् ब्रूहि किं करवाणि ते ॥

मदाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः ।
वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देह्यभयं विभो ॥

तब समुद्रने प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा –‘वीरवर! राजसिंह! मुझपर बाणोंकी वर्षा न करो । बोलो, तुम्हारी किस आज्ञाका पालन करूँ? शक्तिशाली नरेश्वर! तुम्हारे छोड़े हुए इन महान् बाणोंसे मेरे अन्दर रहनेवाले प्राणियोंकी हत्या हो रही है । उन्हें अभय दान करो '

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 29 · श्लोक 4-5पृष्ठ 1719

कार्तवीर्य अर्जुन बोला— "समुद्र! यदि कहीं मेरे समान धनुर्धर वीर मौजूद हो, जो युद्ध में मेरा मुकाबला कर सके, तो उसका पता बता दो; फिर मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊँगा।"

समुद्र ने कहा— "राजन्! यदि तुमने महर्षि जमदग्नि का नाम सुना हो, तो उन्हीं के आश्रम पर चले जाओ; उनके पुत्र परशुराम जी तुम्हारा अच्छी तरह सत्कार कर सकते हैं।"

किन्तु कार्तवीर्य अपने भाई-बन्धुओं के साथ मिलकर महर्षि के प्रतिकूल बर्ताव करने लगा। उसने अपने अपराधों से महात्मा परशुराम जी को उद्विग्न कर दिया। तब शत्रु सेना को भस्म करने वाले अमित तेजस्वी परशुराम जी का तेज प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने अपना फरसा उठाया और हजार भुजाओं वाले उस राजा को अनेक शाखाओं से युक्त वृक्ष की भाँति सहसा काट डाला।

उसे मरकर जमीन पर पड़ा देख उसके सभी बन्धु-बान्धव एकत्र हो गये और हाथों में तलवार व शक्तियाँ लेकर परशुराम जी पर चारों ओर से टूट पड़े। इधर परशुराम जी भी धनुष लेकर तुरन्त रथ पर सवार हो गये और बाणों की वर्षा करते हुए राजा की सेना का संहार करने लगे। उस समय बहुत से क्षत्रिय परशुराम जी के भय से पीड़ित होकर सिंह के सताए हुए मृगों की भाँति पर्वतों की गुफाओं में घुस गये। उन्होंने डर के मारे अपने क्षत्रियोचित कर्मों का भी त्याग कर दिया। बहुत दिनों तक ब्राह्मणों का दर्शन न कर सकने के कारण वे धीरे-धीरे अपने कर्म भूलकर शूद्र हो गये। इस प्रकार द्रविड, आभीर, पुण्ड्र और शबरों के सहवास में रहकर वे क्षत्रिय होते हुए भी धर्म-त्याग के कारण शूद्र की अवस्था में पहुँच गये।

एवं ते द्रविडाऽऽभीराः पुण्ड्राश्च शबरैः सह ।
वृषलत्वं परिगता व्युत्थानात् क्षत्रधर्मिणः ॥

इस प्रकार द्रविड, आभीर, पुण्ड्र और शबरोंके सहवासमें रहकर वे क्षत्रिय होते हुए भी धर्म - त्यागके कारण शूद्रकी अवस्थामें पहुँच गये ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 29 · श्लोक 16पृष्ठ 1721

तत्पश्चात् जब क्षत्रिय वीरों का संहार हुआ, तो ब्राह्मणों ने उनकी स्त्रियों से नियोग की विधिके अनुसार पुत्र उत्पन्न किये, किन्तु उन्हें भी बड़े होने पर परशुराम जी ने फरसे से काट डाला। इस प्रकार एक-एक करके जब इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार हो गया, तब परशुराम जी को दिव्य आकाशवाणी ने मधुर स्वर में, सब लोगों के सुनते हुए कहा—

"बेटा! परशुराम! इस हत्या के काम से निवृत्त हो जाओ। परशुराम! भला बारम्बार इन बेचारे क्षत्रियों के प्राण लेने में तुम्हें कौन-सा लाभ दिखायी देता है?"

राम राम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि ।
क्षत्रबन्धूनिमान् प्राणैर्विप्रयोज्य पुनः पुनः ॥

' बेटा! परशुराम! इस हत्याके कामसे निवृत्त हो जाओ । परशुराम! भला बारंबार इन बेचारे क्षत्रियोंके प्राण लेनेमें तुम्हें कौन- सा लाभ दिखायी देता है? '

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 29 · श्लोक 19पृष्ठ 1722

उस समय महात्मा परशुराम जी को उनके पितामह ऋचीक आदि ने भी इसी प्रकार समझाया था— "महाभाग! यह काम छोड़ दो, क्षत्रियों को न मारो।" अपने पिता के वध को सहन न करते हुए परशुराम जी ने उन ऋषियों से कहा— "आप लोगों को मुझे इस काम से निवारण नहीं करना चाहिए।"

पितर बोले— "विजय पाने वालों में श्रेष्ठ परशुराम! बेचारे क्षत्रियों को मारना तुम्हारे योग्य नहीं है; क्योंकि तुम ब्राह्मण हो, अतः तुम्हारे हाथ से राजाओं का वध होना उचित नहीं।"

पितर ऊचुः नार्हसे क्षत्रबन्धूंस्त्वं निहन्तुं जयतां वर ।
नेह युक्तं त्वया हन्तुं ब्राह्मणेन सता नृपान् ॥

पितर बोले — विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ परशुराम! बेचारे क्षत्रियोंको मारना तुम्हारे योग्य नहीं है; क्योंकि तुम ब्राह्मण हो, अतः तुम्हारे हाथसे राजाओंका वध होना उचित नहीं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 29 · श्लोक 22पृष्ठ 1722

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्व के अन्तर्गत अनुगीतापर्व में ब्राह्मणगीताविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।

पितरों ने कहा— "ब्राह्मणश्रेष्ठ! इसी विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है, उसे सुनकर तुम्हें वैसा ही आचरण करना चाहिए।"

पहले की बात है, अलर्क नाम से प्रसिद्ध एक राजर्षि थे, जो बड़े ही तपस्वी, धर्मज्ञ, सत्यवादी, महात्मा और दृढ़प्रतिज्ञ थे।

अलर्क ने अपने धनुष की सहायता से समुद्रपर्यन्त इस पृथ्वी को जीतकर अत्यन्त दुष्कर पराक्रम कर दिखाया था। इसके पश्चात् उनका मन सूक्ष्मतत्त्व की खोज में लगा। महामते! वे बड़े-बड़े कर्मों का आरम्भ त्यागकर एक वृक्ष के नीचे जा बैठे और सूक्ष्मतत्त्व की खोज के लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगे— "मुझे मन से ही बल प्राप्त हुआ है, अतः वही सबसे प्रबल है। मन को जीत लेने पर ही मुझे स्थायी विजय प्राप्त हो सकती है। मैं इन्द्रियरूपी शत्रुओं से घिरा हुआ हूँ, इसलिये बाहर के शत्रुओं पर हमला न करके इन भीतरी शत्रुओं को ही अपने बाणों का निशाना बनाऊँगा।"

अलर्क उवाच

मनसो मे बलं जातं मनो जित्वा ध्रुवो जयः ।
अन्यत्र बाणान् धास्यामि शत्रुभिः परिवारितः ॥

अलर्क कहने लगे- मुझे मनसे ही बल प्राप्त हुआ है, अतः वही सबसे प्रबल है । मनको जीत लेनेपर ही मुझे स्थायी विजय प्राप्त हो सकती है । मैं इन्द्रियरूपी शत्रुओंसे घिरा हुआ हूँ, इसलिये बाहरके शत्रुओंपर हमला न करके इन भीतरी शत्रुओंको ही अपने बाणोंका निशाना बनाऊँगा ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 30 · श्लोक 5पृष्ठ 1724

अलर्क ने स्वयं से कहा— "यह मन चञ्चलता के कारण सभी मनुष्यों से तरह-तरह के कर्म कराता है, अतः अब मैं मन पर ही तीखे बाणों का प्रहार करूँगा।" तभी जैसे मन ने उत्तर दिया— "अलर्क! तुम्हारे ये बाण मुझे किसी तरह नहीं बींध सकते। यदि इन्हें चलाओगे तो ये तुम्हारे ही मर्मस्थानों को चीर डालेंगे और मर्मस्थानों के चीरे जाने पर तुम्हारी ही मृत्यु होगी; अतः तुम अन्य प्रकार के बाणों का विचार करो, जिनसे तुम मुझे मार सकोगे।"

यह सुनकर अलर्क ने थोड़ी देर तक विचार किया। इसके पश्चात् उन्होंने अपनी नासिका को लक्ष्य किया और बोले— "मेरी यह नासिका अनेक प्रकार की सुगन्धियों का अनुभव करके भी फिर उन्हीं की इच्छा करती है। इसलिये इन तीखे बाणों को मैं इस नासिका पर ही छोड़ूँगा।" तभी नासिका बोली— "अलर्क! ये बाण मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इनसे तो तुम्हारे ही मर्म विदीर्ण होंगे और मर्मस्थानों के भेदन हो जाने पर तुम्हीं मरोगे; अतः तुम दूसरे प्रकार के बाणों का अनुसन्धान करो, जिससे तुम मुझे मार सकोगे।"

नासिका का यह कथन सुनकर अलर्क ने कुछ देर विचार किया और फिर अपनी जिह्वा को लक्ष्य करके कहा— "यह रसना स्वादिष्ट रसों का उपभोग करके फिर उन्हें ही पाना चाहती है। इसलिये अब इसी के ऊपर अपने तीखे सायकों का प्रहार करूँगा।" तब जिह्वा बोली— "अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तो तुम्हारे ही मर्मस्थानों को बींधेंगे। मर्मस्थानों के बिन्ध जाने पर तुम्हीं मरोगे। अतः दूसरे प्रकार के बाणों का प्रबन्ध सोचो, जिनकी सहायता से तुम मुझे मार सकोगे।"

यह सुनकर अलर्क कुछ देर तक सोचते-विचारते रहे। फिर उन्होंने अपनी त्वचा पर कुपित होकर कहा— "यह त्वचा नाना प्रकार के स्पर्शों का अनुभव करके फिर उन्हीं की अभिलाषा किया करती है, अतः नाना प्रकार के बाणों से मारकर इस त्वचा को ही विदीर्ण कर डालूँगा।" तब त्वचा ने कहा— "अलर्क! ये बाण किसी प्रकार मुझे अपना निशाना नहीं बना सकते। ये तो तुम्हारा ही मर्म विदीर्ण करेंगे और मर्म विदीर्ण होने पर तुम्हीं मौत के मुख में पड़ोगे। मुझे मारने के लिये तो दूसरी तरह के बाणों की व्यवस्था सोचो, जिनसे तुम मुझे मार सकोगे।"

स्पृष्ट्वा त्वग्विविधान् स्पर्शास्तानेव प्रतिगृध्यति ।
तस्मात् त्वचं पाटयिष्ये विविधैः कङ्कपत्रिभिः ॥

अलर्कने कहा — यह त्वचा नाना प्रकारके स्पर्शोका अनुभव करके फिर उन्हींकी अभिलाषा किया करती है, अतः नाना प्रकारके बाणोंसे मारकर इस त्वचाको ही विदीर्ण कर डालूँगा ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 30 · श्लोक 15पृष्ठ 1726

त्वचा की बात सुनकर अलर्क ने थोड़ी देर विचार किया और फिर अपने श्रोत्र (कान) को सुनाते हुए कहा— "यह श्रोत्र बारम्बार नाना प्रकार के शब्दों को सुनकर उन्हीं की अभिलाषा करता है, इसलिये मैं इन तीखे बाणों को श्रोत्र-इन्द्रिय के ऊपर चलाऊँगा।" तब श्रोत्र ने कहा— "अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तुम्हारे ही मर्मस्थानों को विदीर्ण करेंगे। तब तुम जीवन से हाथ धो बैठोगे। अतः तुम अन्य प्रकार के बाणों की खोज करो, जिनसे मुझे मार सकोगे।"

यह सुनकर अलर्क ने कुछ सोच-विचार कर अपने नेत्रों को सुनाते हुए कहा— "यह आँख भी अनेकों बार विभिन्न रूपों का दर्शन करके पुनः उन्हीं को देखना चाहती है। अतः मैं इसे अपने तीखे तीरों से मार डालूँगा।" तब आँख ने कहा— "अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तुम्हारे ही मर्मस्थानों को बींध डालेंगे और मर्म विदीर्ण हो जाने पर तुम्हें ही जीवन से हाथ धोना पड़ेगा। अतः तुम दूसरे प्रकार के सायकों का प्रबन्ध सोचो, जिनकी सहायता से तुम मुझे मार सकोगे।"

यह सुनकर अलर्क ने कुछ देर विचार करने के बाद अपनी बुद्धि को लक्ष्य करके यह बात कही— "यह बुद्धि अपने ज्ञानशक्ति से अनेक प्रकार का निश्चय करती है, अतः इस बुद्धि पर ही अपने तीक्ष्ण सायकों का प्रहार करूँगा।" तब बुद्धि बोली— "अलर्क! ये बाण मेरा किसी प्रकार भी स्पर्श नहीं कर सकते। इनसे तुम्हारा ही मर्म विदीर्ण होगा और मर्म विदीर्ण होने पर तुम्हीं मरोगे। जिनकी सहायता से तुम मुझे मार सकोगे, वे बाण तो कोई और ही हैं। उनके विषय में विचार करो।"

अलर्क उवाच

बुद्धिरुवाच नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन ।
तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ।
अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि ॥

बुद्धि बोली- अलर्क! ये बाण मेरा किसी प्रकार भी स्पर्श नहीं कर सकते । इनसे तुम्हारा ही मर्म विदीर्ण होगा और मर्म विदीर्ण होनेपर तुम्हीं मरोगे । जिनकी सहायतासे मुझे मार सकोगे, वे बाण तो कोई और ही हैं । उनके विषयमें विचार करो ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 30 · श्लोक 25पृष्ठ 1727

ब्राह्मण ने कहा— "देवि! तदनन्तर अलर्क ने उसी पेड़ के नीचे बैठकर घोर तपस्या की, किन्तु उससे मन-बुद्धिसहित पाँचों इन्द्रियों को मारने योग्य किसी उत्तम बाण का पता न चला। 'नाध्यगच्छत् परं श्रेयो योगान्मतिमतां वरः' अर्थात् हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! उन्हें ध्यानयोग से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी साधन प्राप्त नहीं हुआ।" तब वे सामर्थ्यशाली राजा एकाग्रचित्त होकर विचार करने लगे। बहुत दिनों तक निरन्तर सोचने-विचारने के बाद बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा अलर्क को योग से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी साधन प्रतीत हुआ।

वे मन को एकाग्र करके स्थिर आसन से बैठ गए और ध्यानयोग का साधन करने लगे। इस ध्यानयोग रूप एक ही बाण से मारकर उन बलशाली नरेश ने समस्त इन्द्रियों को सहसा परास्त कर दिया। वे ध्यानयोग के द्वारा आत्मा में प्रवेश करके परम सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त हो गये। इस सफलता से राजर्षि अलर्क को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने इस गाथा का गान किया— "अहो! बड़े कष्ट की बात है कि अब तक मैं बाहरी कामों में ही लगा रहा और भोगों की तृष्णा से आबद्ध होकर राज्य की ही उपासना करता रहा। ध्यानयोग से बढ़कर दूसरा कोई उत्तम सुख का साधन नहीं है, यह बात तो मुझे बहुत पीछे मालूम हुई है।"

पितामह ने कहा— "बेटा परशुराम! इन सब बातों को अच्छी तरह समझकर तुम क्षत्रियों का नाश न करो। घोर तपस्या में लग जाओ, उसी से तुम्हें कल्याण प्राप्त होगा।" अपने पितामहों के इस प्रकार कहने पर महान सौभाग्यशाली जमदग्नि-नन्दन परशुराम जी ने कठोर तपस्या की और इससे उन्हें परम दुर्लभ सिद्धि प्राप्त हुई।

इति त्वमनुजानीहि राम मा क्षत्रियान् जहि ।
तपो घोरमुपातिष्ठ ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥

( पितामहोंने कहा— ) बेटा परशुराम! इन सब बातोंको अच्छी तरह समझकर तुम क्षत्रियोंका नाश न करो । घोर तपस्यामें लग जाओ, उसीसे तुम्हें कल्याण प्राप्त होगा ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 30 · श्लोक 32पृष्ठ 1728

ब्राह्मण ने कहा— "देवि! इस संसार में सत्त्व, रज और तम— ये तीन शत्रु हैं। ये वृत्तियों के भेद से नौ प्रकार के माने गये हैं। हर्ष, प्रीति और आनन्द — ये तीन सात्त्विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेष भाव से तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह — ये तीन तामस गुण हैं। शान्त चित्त, जितेन्द्रिय, आलस्यहीन और धैर्यवान पुरुष शम-दम आदि बाण समूहों के द्वारा इन पूर्वोक्त गुणों का उच्छेद करके दूसरों को जीतने का उत्साह करते हैं।"

ब्राह्मण उवाच

यो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः ।
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ॥

तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः ।
श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥

ब्राह्मणने कहा- देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम—- ये तीन मेरे शत्रु हैं । ये - वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं । हर्ष, प्रीति और आनन्द — ये तीन सात्त्विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव- से तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह — ये तीन तामस गुण हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 31 · श्लोक 1-2पृष्ठ 1730

"इस विषय में पूर्वकाल की बातों के जानकार लोग एक गाथा सुनाया करते हैं। पहले कभी शान्तिपरायण महाराज अम्बरीष ने इस गाथा का गान किया था। कहते हैं— जब दोषों का बल बढ़ा और अच्छे गुण दबने लगे, उस समय महायशस्वी महाराज अम्बरीष ने बलपूर्वक राज्य की बागडोर अपने हाथ में ली। उन्होंने अपने दोषों को दबाया और उत्तम गुणों का आदर किया। इससे उन्हें बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई और उन्होंने यह गाथा गायी— 'मैंने बहुत-से दोषों पर विजय पायी और समस्त शत्रुओं का नाश कर डाला; किन्तु एक सबसे बड़ा दोष रह गया है। यद्यपि वह नष्ट कर देने योग्य है, तो भी अब तक मैं उसे नाश नहीं कर सका। उसी की प्रेरणा से इस प्राणी को वैराग्य नहीं होता। तृष्णा के वश में पड़ा हुआ मनुष्य संसार में नीच कर्मों की ओर दौड़ता है, सचेत नहीं होता। उससे प्रेरित होकर वह यहाँ नहीं करने योग्य काम भी कर डालता है। उस दोष का नाम है लोभ। उसे ज्ञान रूपी तलवार से काटकर मनुष्य सुखी होता है।"

"लोभ से तृष्णा और तृष्णा से चिन्ता पैदा होती है। लोभी मनुष्य पहले बहुत-से राजस गुणों को पाता है और उनकी प्राप्ति हो जाने पर उसमें तामसिक गुण भी अधिक मात्रा में आ जाते हैं। उन गुणों के द्वारा देह-बन्धन में जकड़कर वह बारम्बार जन्म लेता और तरह-तरह के कर्म करता रहता है। फिर जीवन का अन्त समय आने पर उसके देह के तत्त्व विलग-विलग होकर बिखर जाते हैं और वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इसके बाद फिर जन्म-मृत्यु के बन्धन में पड़ता है। इसलिये इस लोभ के स्वरूप को अच्छी तरह समझकर इसे धैर्यपूर्वक दबाने और आत्मराज्य पर अधिकार पाने की इच्छा करनी चाहिये। यही वास्तविक स्वराज्य है। यहाँ दूसरा कोई राज्य नहीं है। आत्मा का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर वही राजा है।"

तस्मादेतं सम्यगवेक्ष्य लोभं निगृह्य धृत्याऽऽत्मनि राज्यमिच्छेत् ।
एतद् राज्यं नान्यदस्तीह राज्य- मात्मैव राजा विदितो यथावत् ॥

' इसलिये इस लोभके स्वरूपको अच्छी तरह समझकर इसे धैर्यपूर्वक दबाने और आत्मराज्यपर अधिकार पानेकी इच्छा करनी चाहिये । यही वास्तविक स्वराज्य है । यहाँ दूसरा कोई राज्य नहीं है । आत्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वही राजा है '

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 31 · श्लोक 12पृष्ठ 1731

इस प्रकार यशस्वी अम्बरीष ने आत्मराज्य को आगे रखकर एकमात्र प्रबल शत्रु लोभ का उच्छेद करते हुए उपर्युक्त गाथा का गान किया था। ब्राह्मण ने कहा— "भामिनि! इसी प्रसङ्ग में एक ब्राह्मण और राजा जनक के संवाद रूप प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है। एक समय राजा जनक ने किसी अपराध में पकड़े हुए ब्राह्मण को दण्ड देते हुए कहा— 'ब्रह्मन्! आप मेरे देश से बाहर चले जाइये'।"

'ब्रह्मन्! आप मेरे देश से बाहर चले जाइये'—राजा जनक के इन शब्दों ने उस ब्राह्मण को विचलित कर दिया। सामर्थ्यशाली नरेश ने पूछा, 'महाराज! आपके अधिकार में जितना देश है, उसकी सीमा बताइये। मैं इस बात को जानकर दूसरे राजा के राज्य में निवास करना चाहता हूँ और शास्त्र के अनुसार आपकी आज्ञा का पालन करना चाहता हूँ।'

उस यशस्वी ब्राह्मण के ऐसे प्रश्न सुनकर राजा जनक बार-बार गरम उच्छ्वास लेने लगे। वे कुछ जवाब न दे सके। वे अमित तेजस्वी राजा एक गहन विचार में डूबे हुए थे। उस समय उन्हें मोह ने उसी प्रकार घेर लिया, जैसे राहु ग्रह सूर्य को घेर लेता है। जब राजा जनक का वह मोह शान्त हुआ और उन्होंने विश्राम किया, तब थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे ब्राह्मण से बोले—

'ब्रह्मन्! यद्यपि बाप-दादों के समय से ही मिथिला-प्रान्त के राज्य पर मेरा अधिकार है, तथापि जब मैं विचारदृष्टि से देखता हूँ, तो सारी पृथ्वी में खोजने पर भी कहीं मुझे अपना देश नहीं दिखाई देता। जब मुझे पृथ्वी पर अपने राज्य का पता नहीं चला, तब मैंने मिथिला में खोज की। वहाँ भी निराशा हुई, फिर मैंने अपनी प्रजा पर अपने अधिकार का निश्चय किया, किन्तु वहाँ भी सफलता नहीं मिली; तब मुझे मोह हो गया। विचार द्वारा उस मोह के नाश होने पर मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि कहीं भी मेरा राज्य नहीं है अथवा सर्वत्र मेरा ही राज्य है। एक दृष्टि से यह शरीर भी मेरा नहीं है और दूसरी दृष्टि से यह सारी पृथ्वी ही मेरी है। यह जिस तरह मेरी है, उसी तरह दूसरों की भी है—ऐसा मैं मानता हूँ। इसलिए द्विजोत्तम! अब आपकी जहाँ इच्छा हो, वहीं रहिये एवं जहाँ रहें, उसी स्थान का उपभोग कीजिये।'

जनक उवाच

यथा मम तथान्येषामिति मन्ये द्विजोत्तम ।
उष्यतां यावदुत्साहो भुज्यतां यावदुष्यते ॥

यह जिस तरह मेरी है, उसी तरह दूसरोंकी भी है - ऐसा मैं मानता हूँ। इसलिये द्विजोत्तम! अब आपकी जहाँ इच्छा हो, रहिये एवं जहाँ रहें, उसी स्थानका उपभोग कीजिये ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 32 · श्लोक 12पृष्ठ 1735

ब्राह्मण ने जिज्ञासावश पूछा—'राजन्! जब बाप-दादों के समय से ही मिथिला-प्रान्त के राज्य पर आपका अधिकार है, तब बताइये, किस बुद्धिका आश्रय लेकर आपने इसके प्रति अपनी ममता को त्याग दिया है? किस बुद्धिका आश्रय लेकर आप सर्वत्र अपना ही राज्य मानते हैं और किस तरह कहीं भी अपना राज्य नहीं समझते एवं किस तरह सारी पृथ्वी को ही अपना देश समझते हैं?'

जनक ने उत्तर दिया—'ब्रह्मन्! इस संसार में कर्मों के अनुसार प्राप्त होने वाली सभी अवस्थाएँ आदि-अन्त वाली हैं, यह बात मुझे अच्छी जानती है। इसलिये मुझे ऐसी कोई वस्तु नहीं प्रतीत होती जो मेरी हो सके। वेद भी कहता है—"यह वस्तु किसकी है? यह किसका धन है?" अर्थात किसी का नहीं है। जब मैं अपनी बुद्धि से विचार करता हूँ, तब कोई भी वस्तु ऐसी नहीं जान पड़ती जिसे अपनी कह सकें। इसी बुद्धिका आश्रय लेकर मैंने मिथिला के राज्य से अपना ममत्व हटा लिया है। अब जिस बुद्धिका आश्रय लेकर मैं सर्वत्र अपना ही राज्य समझता हूँ, उसे सुनो:

मैं अपनी नासिका में पहुँची हुई सुगन्ध को भी अपने सुख के लिए ग्रहण नहीं करना चाहता, इसलिये मैंने पृथ्वी को जीत लिया है और वह सदा मेरे वश में रहती है। मुख में पड़े हुए रसों का भी मैं तृप्ति के लिए आस्वादन नहीं करना चाहता, इसलिये जल-तत्त्व पर भी मैं विजय पा चुका हूँ। नेत्रों द्वारा देखे जाने वाले रूप और ज्योति को मैं अपने सुख के लिए अनुभव नहीं करना चाहता, अतः मैंने तेज को जीत लिया है। त्वचा के स्पर्श से प्राप्त होने वाले सुखों को मैं नहीं चाहता, इसलिए मेरे द्वारा जीता हुआ वायु सदा मेरे वश में रहता है। कानों में पड़े हुए शब्दों को भी मैं ग्रहण नहीं करना चाहता, इसलिये वे मेरे अधीन रहते हैं। मन में आने वाले विषयों का भी मैं अनुभव नहीं करना चाहता, इसलिये जीता हुआ मन सदा मेरे वश में रहता है। मेरे समस्त कार्यों का आरम्भ देवता, पितर, भूत और अतिथियों के निमित्त ही होता है।'

जनक की ये बातें सुनकर वह ब्राह्मण हँसा और कहने लगा—'महाराज! आपको मालूम होना चाहिए कि मैं धर्म हूँ और आपकी परीक्षा लेने के लिए ब्राह्मण का रूप धारण करके यहाँ आया हूँ। अब मुझे निश्चय हो गया कि संसार में सत्त्वगुणरूप नेमि से घिरे हुए और कभी पीछे की ओर न लौटने वाले इस ब्रह्मप्राप्ति रूप दुर्निवार चक्र का सञ्चालन करने वाले एकमात्र आप ही हैं।'

त्वमस्य ब्रह्मलाभस्य दुर्वारस्यानिवर्तिनः ।
सत्त्वनेमिनिरुद्धस्य चक्रस्यैकः प्रवर्तकः ॥

‘ अब मुझे निश्चय हो गया कि संसारमें सत्त्वगुणरूप नेमिसे घिरे हुए और कभी पीछेकी ओर न लौटनेवाले इस ब्रह्मप्राप्तिरूप दुर्निवार चक्रका संचालन करनेवाले एकमात्र आप ही हैं'

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 32 · श्लोक 26पृष्ठ 1737

ब्राह्मण ने आगे कहा—'भीरु! तुम अपनी बुद्धि से मुझे जैसा समझकर फटकार रही हो, वैसा मैं नहीं हूँ। मैं देहाभिमानी नहीं हूँ। तुम मुझे पाप-पुण्य में आसक्त देखती हो, किन्तु वास्तव में मैं ब्राह्मण, जीवन्मुक्त महात्मा, वानप्रस्थ, गृहस्थ और ब्रह्मचारी सब कुछ हूँ। इस भूतल पर जो कुछ दिखाई देता है, वह सब मेरे द्वारा व्याप्त है। संसार में जो कोई भी स्थावर-जङ्गम प्राणी है, उनका विनाश करने वाली मृत्यु मुझे उसी प्रकार समझो जैसे लकड़ियों का विनाश करने वाली अग्नि होती है। सम्पूर्ण पृथ्वी तथा स्वर्ग पर जो राज्य है, उसे यह बुद्धि जानती है; अतः बुद्धि ही मेरा धन है। ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और सन्न्यास आश्रम में स्थित ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों का मार्ग एक जैसा ही है। वे लोग भिन्न-भिन्न आश्रमों में रहते हुए भी एक ही बुद्धिका आश्रय लेते हैं। जिस प्रकार बहुत सी नदियाँ व्याकुलता के विभिन्न चिह्नों को छोड़कर अन्त में सागर को प्राप्त होती हैं, वैसे ही वे भी एकमात्र सत्स्वरूप ब्रह्म को ही प्राप्त होते हैं। यह मार्ग बुद्धिगम्य है, शरीर द्वारा इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता; क्योंकि सभी कर्म आदि और अन्त वाले हैं और शरीर केवल कर्म का हेतु है। इसलिये हे देवी! तुम्हें परलोक के लिए तनिक भी भय नहीं करना चाहिए। तुम परमात्मभाव की भावना में रत रहकर अन्त में मेरे ही स्वरूप को प्राप्त हो जाओगी।'

ब्राह्मण के उपदेश सुनकर ब्राह्मणी ने कहा—'नाथ! मेरी बुद्धि थोड़ी और अन्तःकरण अशुद्ध है। आपने सङ्क्षेप में जिस महान ज्ञान का उपदेश दिया है, वह बिखरा हुआ है और उसे समझना मेरे लिए कठिन है। अतः आप कोई ऐसा उपाय बताइये जिससे मुझे यह बुद्धि प्राप्त हो सके।'

ब्राह्मण ने मार्ग बताते हुए कहा—'देवी! तुम बुद्धिको नीचे की अरणी और गुरु को ऊपर की अरणी समझो। तपस्या और वेद-वेदान्त के श्रवण-मनन द्वारा मन्थन करने पर ज्ञान रूपी अग्नि प्रकट होती है।'

ब्राह्मणी ने प्रश्न किया—'नाथ! क्षेत्रज्ञ नाम से प्रसिद्ध शरीरान्तवर्ती जीवात्मा को जो ब्रह्म का स्वरूप बताया जाता है, यह कैसे सम्भव है? क्योंकि जीवात्मा ब्रह्म के नियन्त्रण में रहती है और जो जिसके नियन्त्रण में रहता है, वह उसका स्वरूप कैसे हो सकता है?'

ब्राह्मण ने उत्तर दिया—'देवी! क्षेत्रज्ञ वास्तव में देह-सम्बन्ध से रहित और निर्गुण है; क्योंकि उसके सगुण होने का कोई कारण नहीं दिखता। उस क्षेत्र का साक्षात्कार करने के लिए एक उपाय है—उसे देखने की क्रिया का त्याग कर देना। जैसे भौंरों द्वारा गन्ध को बिना देखे ही जान लिया जाता है, वैसे ही वह स्वतः जाना जाता है। यह कर्तव्य और अनकर्तव्य की बुद्धि से परे है। यहाँ जितनी कल्पनाएँ की जा सकती हैं, उतने ही सैकड़ों-हजारों अव्यक्त रूपों की कल्पना कर लें; वे सभी प्रत्यक्ष पदार्थ वास्तविक नहीं हो सकते। जिससे पर-कुछ भी नहीं है, उसका साक्षात्कार तो 'नेति नेति' अर्थात् यह भी नहीं, यह भी नहीं—इस अभ्यास के अन्त में ही होगा।'

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—'पार्थ! उस ब्राह्मणी की बुद्धि, जो क्षेत्रज्ञ के संशय से युक्त थी, अब क्षेत्र के ज्ञान से प्राप्त होकर पूर्ण हुई।'

अर्जुन ने पूछा—'श्रीकृष्ण! वह ब्राह्मणी कौन थी और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? अच्युत! जिन दोनों ने यह सिद्धि प्राप्त की, उनका परिचय मुझे बताइये।'

भगवान श्रीकृष्ण बोले—'अर्जुन! मेरे मन को तुम ब्राह्मण समझो और मेरी बुद्धिको ब्राह्मणी समझो; एवं जिसको क्षेत्रज्ञ कहा गया है, वह मैं ही हूँ।'

श्रीभगवानुवाच मनो मे ब्राह्मणं विद्धि बुद्धिं मे विद्धि ब्राह्मणीम् ।
क्षेत्रज्ञ इति यश्चोक्तः सोऽहमेव धनंजय ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- अर्जुन! मेरे मनको तो तुम ब्राह्मण समझो और मेरी बुद्धिको ब्राह्मणी समझो एवं जिसको क्षेत्रज्ञ - ऐसा कहा गया है, वह मैं ही हूँ ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 34 · श्लोक 12पृष्ठ 1743

In English

The Inner Sacrifice and the Hierarchy of Senses

A Brahmin explains to his wife the internal sacrificial process involving the ten senses and various deities. He describes the competition between speech, mind, and the five vital breaths (pranas) to determine which is supreme.

This page answers

  • What are the ten senses in the internal sacrifice?
  • Why is saraswati considered superior to the mind?
  • How do the seven hotas differ from each other?
  • Which of the five pranas is the most powerful?
  • What did brahma say about the competition between the breaths?

Also written: Brahmanagita, Brahmana, Mana, Prana, Apana, Udana, Samana, Vyana, Brahma, Prajapati, Adhvaryu, Yati, Narayana, Samudra, Parashurama, Alarka, Shrikrishna, Arjuna, Brahmani, Vak, ब्राह्मणगीता