श्रीगणेशाय नमः।

हरिश्चन्द्रोपाख्यान : सत्य की रक्षा हेतु मनुष्य को किन कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है?

प्रतिज्ञा और सत्य की परीक्षा

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20–26 · पृष्ठ 118–151

5,306 शब्द · 27 मिनटका पाठ · 40 श्लोक

सूत ने शौनक से कहा

धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देने हेतु

विश्वामित्र मुनि ने राजा हरिश्चन्द्र से कहा, "हे राजन्! यदि आपके हृदय में लोभ है तो अपना सारा राज्य वापस ले लीजिये, अन्यथा जिस सुवर्ण की आपने प्रतिज्ञा की है, वह मुझे दे दीजिये। यदि आप यह मानते हैं कि आप दान दे चुके हैं, तो यह कह दीजिये कि अब मैं नहीं दूँगा और अपना सारा स्वर्ण छोड़कर चले जाइये।"

राजा हरिश्चन्द्र का मन अत्यन्त उदास हो गया। वे दोनों हाथ जोड़कर, दण्डवत प्रणाम करते हुए बोले, "हे मुनिवर! आप विषाद छोड़िये। मेरी प्रतिज्ञा है कि बिना स्वर्ण दिए मैं भोजन नहीं करूँगा। मैं आपका ऋण अवश्य चुका दूँगा। आप निश्चिन्त रहें, मैं आपका मनोवाञ्छित स्वर्ण आपको अवश्य दूँगा, किन्तु जब तक मुझे धन उपलब्ध नहीं हो जाता, तब तक कुछ समय के लिए प्रतीक्षा करें। मैं धन के लोभ में आपके जैसे महान व्यक्ति को पीड़ित कैसे कर सकता हूँ? इसलिए हे राजन्! आप कह दीजिये कि अब आपके पास स्वर्ण नहीं है, तो मैं आशा त्यागकर यहाँ से चला जाऊँगा।"

विश्वामित्र उवाच

मैं सूर्यवंशमें उत्पन्न एक क्षत्रिय राजा हूँ ॥ मनुष्योंकी सारी अभिलाषा पूर्ण करनेवाला मैं ॥ २ राजसूययज्ञ सम्पन्न कर चुका हूँ ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 2पृष्ठ 118

राजा ने अपनी विवशता बताते हुए आगे कहा, "हे विप्रवर! मेरी पत्नी और पुत्र का शरीर स्वस्थ है। मैं उनके शरीर को बेचकर आपका ऋण अवश्य चुका दूँगा। आप वाराणसी पुरी में किसी ग्राहक का अन्वेषण कीजिये, मैं अपनी पत्नी और पुत्र सहित उसका दास बन जाऊँगा। आप उन्हें बेचकर उसके मूल्य से ढाई भार सोना ले लीजिये और सन्तुष्ट हो जाइये।"

ऐसा कहकर राजा हरिश्चन्द्र अपनी भार्या और पुत्र के साथ उस काशीपुरी की ओर चल दिए, जहाँ साक्षात् भगवान शिव अपनी प्रिया उमा के साथ विराजमान रहते हैं। उस दिव्य और तेजोमयी काशी का दर्शन कर उन्होंने स्वयं को कृतार्थ समझा। गङ्गा तट पर स्नान और देवताओं के तर्पण से निवृत्त होकर वे पुरी में घूमने लगे। राजा सोचने लगे कि यह पुरी मानवों के भोग की वस्तु नहीं है, क्योंकि यह भगवान शिव की सम्पदा है। दुःख से अधीर और घबराए हुए राजा अपनी पत्नी के साथ पैदल चलते रहे।

पुरी में प्रवेश करते ही राजा ने विनम्र होकर मुनि से कहा, "हे मुने! मेरे प्राण, पुत्र तथा प्रिय पत्नी—सब उपस्थित हैं। इनमेंसे जिससे भी आपकी कार्यसिद्धि हो सके, उसे शीघ्रतापूर्वक ले लीजिये। हमसे आपका अन्य जो भी कार्य बन सकता है, वह भी बता दीजिये।"

विश्वामित्र बोले, "आपका कल्याण हो! वह महीना पूर्ण हो गया है, यदि आपको अपने वचन का स्मरण है तो प्रतिज्ञा की दक्षिणा चुका दीजिये।"

राजा ने उत्तर दिया, "हे ब्रह्मन्! आज महीना पूर्ण हुआ है, किन्तु अभी दिन का आधा भाग शेष है। अतः आप प्रतीक्षा करें।"

मुनि ने चेतावनी दी, "हे महाराज! ऐसा ही हो, मैं पुनः आऊँगा। किन्तु यदि आपने आज दक्षिणा नहीं दी, तो मैं आपको शाप दे दूँगा।"

सूत उवाच

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो विश्वामित्रो महातपाः ।
अन्तकेन समः क्रुद्धो धनं स्वं याचितुं हृदा ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 1पृष्ठ 122

जब विप्र रूप विश्वामित्र चले गए, तो राजा सोचने लगे कि इस दक्षिणा को कैसे पूरा करूँ? उन्होंने सोचा कि यदि बिना दक्षिणा दिए प्राण त्याग दिए, तो ब्राह्मण का धन अपहरण करने के कारण उन्हें कीड़ा या प्रेत योनि प्राप्त होगी। अतः स्वयं को बेच देना ही श्रेयस्कर है।

अ ० २१ ] सप्तम इत्युक्त्वा नृपतिश्रेष्ठो न धीरो दारविक्रये ।
निपपात महीपृष्ठे मूर्च्छयातिपरिप्लुतः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 39पृष्ठ 122

उस समय राजा की पत्नी ने अत्यन्त दयनीय वाणी में कहा, "हे महाराज! आप चिन्ता छोड़कर अपने धर्म का पालन कीजिये। सत्य से बहिष्कृत मनुष्य प्रेत के समान त्याज्य है। इस संसार में सत्य के पालन से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जिस व्यक्ति का वचन मिथ्या हो जाता है, उसके सभी पुण्य निष्फल हो जाते हैं। राजाओं को भी एक बार मिथ्या बोलने से स्वर्ग से च्युत होना पड़ा था।"

हा कष्टं किं तवानेन कृतं दैव महीक्षिता ।
यदिन्द्रोपेन्द्रतुल्योऽयं नीतः पापामिमां दशाम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 43पृष्ठ 122

राजा ने कहा, "हे गजगामिनी! हमारा पुत्र तो जीवित है ही, तुम जो कहना चाहती हो कहो।"

शयानं भुवि तं दृष्ट्वा मूर्च्छयापि महीपतिम् ।
उवाचेदं सुकरुणं राजपुत्री सुदुःखिता ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 40पृष्ठ 122

रानी ने दृढ़ता से कहा, "हे राजन्! आपकी वाणी असत्य नहीं होनी चाहिए। आप मुझे बेचकर उस धन से विप्र की दक्षिणा चुका दीजिये।"

हा महाराज कस्येदमपध्यानादुपागतम् ।
यस्त्वं निपतितो भूमौ रङ्कवच्छरणोचितः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 41पृष्ठ 122

राजा व्याकुल होकर बोले, "हे भामिनि! तुम ऐसी अप्रिय बात क्यों बोल रही हो?"

येनैव कोटिशो वित्तं विप्राणामपवर्जितम् ।
स एव पृथिवीनाथो भुवि स्वपिति मे पतिः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 42पृष्ठ 122

स्त्री के विक्रय की बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और मूर्छित हो गए। रानी ने विलाप करते हुए कहा, "इन्होंने करोड़ों की सम्पत्ति दान कर दी और आज ये दरिद्र की भाँति पृथ्वी पर सो रहे हैं! हे दैव! इन नरेशों को आपने इस पापमयी दशा में क्यों पहुँचा दिया?" यह कहते हुए रानी भी मूर्छित होकर गिर पड़ी। उसी समय भूख से पीड़ित बालक रोहित रोने लगा, "हे तात! मुझे अन्न दीजिये, हे माता! मुझे भोजन दीजिये।"

इत्युक्त्वा सापि सुश्रोणी मूच्छिता निपपात ह ।
भर्तुर्दुःखमहाभारेणासह्येनातिपीडिता ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 44पृष्ठ 122

जब विश्वामित्र ने जल के छींटे मारकर राजा को चेतना में लाया, तो राजा उन्हें देखते ही पुनः मूर्छित हो गए। मुनि कुपित होकर बोले, "हे राजन्! उठिये और दक्षिणा दीजिये। ऋण धारण करने वालों का दुःख बढ़ता जाता है। यदि आपने आज दक्षिञ्चा नहीं दी, तो सूर्यास्त होते ही मैं आपको शाप दे दूँगा।"

शिशुर्दृष्ट्वा क्षुधाविष्टः प्राह वाक्यं सुदुःखितः ।
तात तात प्रदेह्यन्नं मातर्मे देहि भोजनम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 45पृष्ठ 122

राजा भय से व्याकुल होकर बैठ गए। उधर रानी ने राजा को समझाया कि ब्राह्मण तीनों वर्णों के पिता हैं, अतः उनसे धन की याचना करना उचित है। किन्तु राजा ने कहा, "मैं क्षत्रिय हूँ, मैं याचना नहीं कर सकता। याचना करना ब्राह्मणों का कार्य है।"

क्षुन् बलवती जाता जिह्वाग्रे मेऽतिशुष्यति ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 20 · श्लोक 46पृष्ठ 122

"मैं क्षत्रिय हूँ, अतः किसीसे कुछ भी माँग नहीं सकता, अपितु अपने बाहुबलसे अर्जित धनका नित्य दान करता हूँ।" राजा के इन वचनों में उनके क्षत्रिय धर्म की दृढ़ता थी। रानी ने अत्यन्त करुणा भरे स्वर में कहा— "हे महाराज! यदि आपका मन याचना करनेमें समर्थ नहीं है तो इन्द्रसहित सभी देवताओंने न्यायपूर्वक मुझे आपको सौंपा है। आपने स्वामी बनकर मुझ आज्ञाकारिणी पत्नीकी सदा रक्षा की है। अतः हे महाद्युते! आप मेरा मूल्य लेकर गुरु विश्वामित्रकी दक्षिणा चुका दीजिये और अपने सत्यरूपी व्रतको सफल बनाइये।"

रानी के इन वचनों ने राजा के हृदय को झकझोर दिया। राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगे— "महान् कष्ट है, महान् कष्ट है!" उनकी आँखों से अश्रु बह रहे थे। उधर, विश्वामित्र का शाप भी उनके सामने खड़ा था कि यदि दक्षिणा नहीं दी गई, तो उन्हें नीचयोनि में जाना पड़ेगा।

राजा की विवशता देख व्यासजी कहते हैं कि अपनी धर्मपत्नी के बार-बार प्रेरित किये जाने पर राजा हरिश्चन्द्र ने अत्यन्त कठोर निर्णय लिया। वे बोले— "हे भद्रे! मैं अत्यन्त निष्ठुर होकर तुम्हारे विक्रयकी बात स्वीकार करता हूँ। यदि तुम्हारी वाणी ऐसा निष्ठुर वचन बोलनेलिये तत्पर है, तो जिस कामको महान्-से-महान् क्रूर भी नहीं कर सकता, मैं वह करूँगा।" राजा की इस बात पर वहाँ उपस्थित विद्वानों ने प्रश्न किया— "अपनी पत्नीका विक्रय करनेलिये यहाँ आये हुए तुम कौन हो?"

राजा ने अत्यन्त भारी मन से उत्तर दिया— "आपलोग मुझसे यह क्यों पूछते हैं कि तुम कौन हो? मैं मनुष्य नहीं; बल्कि महान् क्रूर हूँ, अथवा यह समझिये कि एक भयानक राक्षस हूँ, तभी तो ऐसा पाप कर रहा हूँ।"

विप्र उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य हरिश्चन्द्रो महीपतिः ।
दुःखेन महताविष्टो न चैनं किञ्चिदब्रवीत् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 14पृष्ठ 126

तभी, विश्वामित्र ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और अचानक राजा के सामने आकर बोले— "मैं धन देकर इस दासीको खरीदनेलिये तत्पर हूँ, अतः इसे मुझे दे दीजिये। मेरे पास बहुत धन है। मेरी पत्नी बहुत ही सुकुमार है, इसलिये वह गृहकार्य नहीं कर पाती, अतः इसे आप मुझे दे दीजिये। मैं इस दासीको स्वीकार तो कर लूँगा, किन्तु मुझे इसके बदले आपको धन कितना देना होगा?"

अ ० २२ ] सप्तम अस्ति मे वित्तमतुलं सुकुमारी च मे प्रिया ।
गृहकर्म न शक्नोति कर्तुमस्मात्प्रयच्छ मे ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 9पृष्ठ 126

ब्राह्मण के इन शब्दों ने राजा के हृदय को विदीर्ण कर दिया। उस ब्राह्मण ने धर्मशास्त्रों का हवाला देते हुए कहा— "धर्मशास्त्रोंमें स्त्री तथा पुरुषका जो मूल्य निर्दिष्ट है, वह इस प्रकार है— यदि स्त्री बत्तीसों लक्षणोंसे सम्पन्न, दक्ष, शीलवती और गुणोंसे युक्त हो तो उसका मूल्य एक करोड़ स्वर्णमुद्रा है और उसी प्रकारके पुरुषका मूल्य दस करोड़ स्वर्णमुद्रा होता है।"

विप्र उवाच

द्वात्रिंशल्लक्षणोपेता दक्षा शीलगुणान्विता ।
कोटिमौल्यं सुवर्णस्य स्त्रियः पुंसस्तथार्बुदम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 13पृष्ठ 126

जैसे ही ब्राह्मण ने धन वल्कल के ऊपर रखा, उसने रानी के बालों को पकड़कर उन्हें खींचना आरम्भ कर दिया। रानी तड़प उठीं और विलाप करते हुए बोलीं— "हे आर्य! जबतक मैं अपने पुत्रको भलीभाँति देख न लूँ तबतकके लिये आप मुझे छोड़ दीजिये; क्योंकि हे विप्र! फिरसे इस पुत्रका दर्शन तो दुर्लभ ही हो जायगा। हे पुत्र! अब दासी बनी हुई अपनी इस माँकी ओर देखो। हे राजपुत्र! तुम मेरा स्पर्श मत करो; क्योंकि अब मैं तुम्हारे स्पर्शके योग्य नहीं रह गयी हूँ।"

अहं गृह्णामि दासीं तु कति दास्यामि ते धनम् ।
एवमुक्ते तु विप्रेण हरिश्चन्द्रस्य भूपतेः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 10पृष्ठ 126

यह देखकर बालक रोहित की आँखों में आँसू भर आए। वह 'माँ-माँ' कहता हुआ उनकी ओर दौड़ा। कौवेके पङ्खके समान केशवाला वह राजकुमार जब हाथसे माताका वस्त्र पकड़कर गिरते हुए साथ चलने लगा, तब उस ब्राह्मणने क्रोधपूर्वक उसे मारने का प्रयास किया, किन्तु बालक ने अपनी माता को नहीं छोड़ा। रानी ने अन्तिम प्रार्थना की— "हे नाथ! मुझपर कृपा कीजिये और इस बालकको भी खरीद लीजिये; क्योंकि आपके द्वारा खरीदी गयी भी मैं इसके बिना आपका कार्य सिद्ध करनेमें समर्थ नहीं रहूँगी।"

विप्र उवाच

कर्मणश्च वयोरूपशीलानां तव योषितः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 11पृष्ठ 126

ब्राह्मण ने बालक का मूल्य भी वस्त्र पर फेंक दिया और उसे माता के साथ बन्धन में बाँधकर हर्षपूर्वक अपने घर की ओर चल दिया। उस समय रानी शैव्या अत्यन्त दयनीय अवस्था में राजा की प्रदक्षिणा करके, घुटनों के सहारे झुककर बोलीं— "यदि मैंने दान दिया हो, हवन किया हो तथा ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट किया हो, तो उस पुण्यके प्रभावसे राजा हरिश्चन्द्र पुनः मुझे पतिरूपमें प्राप्त हो जायँ।"

विप्र उवाच

हस्ते वस्त्रं समाकर्षन् काकपक्षधरः स्खलन् ।
तमागतं द्विजः क्रोधाद् बालमप्याहनत्तदा ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 19पृष्ठ 126

अपने प्राणप्रिय को चरणों में देखकर राजा हरिश्चन्द्र व्याकुल होकर विलाप करने लगे— "हाय, हाय! सत्य, शील और गुणोंसे सम्पन्न मेरी यह भार्या मुझसे अलग कैसे हो गयी? वृक्षकी छाया भी उस वृक्षको कभी नहीं छोड़ती। हे द्विज! राज्यका परित्याग करने और वनवास करनेमें मुझे वह दुःख नहीं होगा, जो पुत्रके वियोगसे हो रहा है। हे कल्याणि! मैंने तुम्हारा परित्याग कर दिया है और तुम्हें दुःखी बना दिया है। इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न तथा राज्यके सम्पूर्ण सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न मुझ जैसे पतिको पाकर भी तुम दासी बन गयी हो। हे देवि! इस महान् शोकरूपी सागरमें डूब रहे मुझ दीनका उद्धार अब कौन करेगा?"

विप्र उवाच

अनुरूपमिदं वित्तं गृहाणार्पय मेऽबलाम् ।
धर्मशास्त्रेषु यद् दृष्टं स्त्रियो मौल्यं नरस्य च ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 12पृष्ठ 126

राजा के विलाप और अपने कुल के विनाश के शोक में डूबे हुए, वह ब्राह्मण उन्हें कोड़े से पीटते हुए ले जाने लगा। राजा स्वयं से कहने लगे— "हा प्रिये! हा बालक! हा वत्स! मुझ अधमकी दुर्नीतिके कारण ही तुम सब इस दैवाधीन दशाको प्राप्त हुए हो, फिर भी मेरी मृत्यु नहीं हुई, अतः मुझे धिक्कार है!"

विप्र उवाच

ततः स विप्रो नृपतेः पुरतो वल्कलोपरि ।
धनं निधाय केशेषु धृत्वा राज्ञीमकर्षयत् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 15पृष्ठ 126

तक्षण, वे ब्राह्मण उन्हें लेकर ऊँचे-ऊँचे वृक्षों और घरों के पार ले जाते हुए अन्तर्धान हो गये। इसी समय तपस्वी विश्वामित्र अपने शिष्य के साथ वहाँ पहुँचे। वे अत्यन्त निष्ठुर और क्रूर दृष्टिगत हो रहे थे। उन्होंने कहा— "हे राजन्! हे महाबाहो! यदि आपने सत्यको सदा स्वीकार किया है तो राजसूययज्ञकी जिस दक्षिणाका वचन आपने पहले दे रखा था, उसे अब दे दीजिये।"

विप्र उवाच

राज्ञ्युवाच मुञ्च मुञ्चार्य मां सद्यो यावत्पश्याम्यहं सुतम् ।
दुर्लभं दर्शनं विप्र पुनरस्य भविष्यति ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 16पृष्ठ 126

राजा हरिश्चन्द्र ने प्रणाम करते हुए कहा— "हे राजर्षे! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे अनघ! राजसूययज्ञके अवसरपर मैंने जो दक्षिणाकी प्रतिज्ञा की थी, यह अपनी दक्षिणा आप ग्रहण कीजिये।"

विश्वामित्र ने पूछा— "हे राजन्! दक्षिणाके निमित्त जो यह धन आप दे रहे हैं, उसे आपने कहाँसे प्राप्त किया है? इसे मुझे साफ-साफ बताइये। मैं दूषित धन कदापि ग्रहण नहीं करता; मुझे पवित्र धन दीजिये।"

राजा ने अत्यन्त भारी हृदय से कहा— "हे महाभाग! अब यह सब बतानेसे क्या प्रयोजन; क्योंकि उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हे विप्र! इसे सुननेसे आपका शोक ही बढ़ेगा। मैंने अपनी पत्नीको एक करोड़ स्वर्णमुद्रामें और अपने रोहित नामक पुत्रको दस करोड़ स्वर्णमुद्रामें बेच दिया है। हे विप्र! इस प्रकार मेरे पास एकत्र इन ग्यारह करोड़ स्वर्णमुद्राओंको आप स्वीकार करें।"

व्यास उवाच

राजा बोले- हे भगवन्! हे कौशिक! १६ मैं अपनेको सूर्यवंशमें उत्पन्न समझता हूँ, अतः मैं धनके लोभसे चाण्डालके दासत्वको कैसे प्राप्त होऊँ? ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 23 · श्लोक 163पृष्ठ 131

यह सुनकर विश्वामित्र क्रोधित हो गये और बोले— "पालन करनेसे विमुख हे राजन्! यदि आप मेरी दक्षिणाको इतने द्रव्यके ही तुल्य मानते हैं, तो फिर मेरे परम तेजको शीघ्र ही देख लीजिये!"

राजा ने हाथ जोड़कर कहा— "हे भगवन्! मैं इसके अतिरिक्त और भी दक्षिणा दूँगा, किन्तु कुछ समयतक प्रतीक्षा कीजिये। अभी-अभी मैंने अपनी पत्नी तथा अबोध पुत्रको बेचा है।"

विश्वामित्र ने क्रोधित स्वर में कहा— "हे नराधिप! चौथा प्रहर उपस्थित है; यही प्रतीक्षा का अन्तिम समय है। इसके बाद आप मुझसे क्या कहेंगे?" यह कहकर और राजा को दयाहीन वचन सुनाकर, वे सम्पूर्ण धन लेकर वहाँ से चले गए।

विश्वामित्र के जाने पर राजा अत्यन्त शोकसन्तप्त हो उठे। वे बार-बार दीर्घ साँसें लेते हुए, नीचे की ओर मुख करके उच्च स्वर में विलाप करने लगे— "धन से बिक जाने के लिए उद्यत! प्रेतरूप मुझसे जिसका दुःख दूर हो सके, वह अभी शीघ्रता करके सूर्य के चौथे प्रहर में रहते-रहते मुझसे बात कर ले!"

उसी समय वहाँ एक चाण्डाल आया। उसका शरीर काला था, उदर लम्बा और बहुत मोटा था। उसके वक्ष भयानक थे और वह विशाल दाढ़ी तथा बड़े दाँतों वाला एक निर्दयी व्यक्ति लग रहा था। उसने अपने हाथ में एक जर्जर लाठी ले रखी थी और वह शवों की मालाओं से अलङ्कृत था। उस नराधम और भयावने चाण्डाल से दुर्गन्ध आ रही थी।

उस चाण्डाल ने राजा से कहा— "मैं तुम्हें दास के रूप में रखना चाहता हूँ; क्योंकि मुझे सेवक की अत्यन्त आवश्यकता है। शीघ्र बताओ कि इसके लिये तुम्हें कितना मूल्य देना होगा?"

उस निष्ठुर, अविनीत और क्रूर दृष्टि वाले चाण्डाल को देखकर महाराज हरिश्चन्द्र ने पूछा— "तुम कौन हो?"

चाण्डाल बोला— "हे राजेन्द्र! मैं 'प्रवीर' नाम से यहाँ विख्यात एक चाण्डाल हूँ।"

राजा ने धर्म के आधार पर विचार किया और कहा— "मेरा तो ऐसा विचार है कि ब्राह्मण या क्षत्रिय—कोई भी मुझे ग्रहण कर ले; क्योंकि उत्तम पुरुष के साथ उत्तम का, मध्यम के साथ मध्यम का और अधम के साथ अधम का धर्म स्थित रहता है—ऐसा विद्वानों ने कहा है।"

परन्तु चाण्डाल ने बिना सोचे-समझे उत्तर दिया— "यदि आप सत्य को प्रमाण मानते हैं, तो आप मेरे द्वारा खरीदे जा चुके हैं; इसमें कोई सन्देह नहीं है।"

राजा हरिश्चन्द्र बोले— "असत्य भाषण करने के कारण अधम मनुष्य शीघ्र ही भयानक नरक में जाता है। अतः मेरे लिये चाण्डाल बन जाना उचित है, किन्तु असत्य का आश्रय लेना श्रेष्ठ नहीं है।"

तभी क्रोध और अमर्ष से फैली हुई आँखों वाले तपोनिधि विश्वामित्र पुनः वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने राजा से कहा— "यह चाण्डाल आपके मन के अनुसार धन देने के लिये यहाँ उपस्थित है, तब आप इससे अपना मूल्य लेकर यज्ञ की सम्पूर्ण दक्षिणा मुझे क्यों नहीं दे देते? कोई अन्य व्यक्ति आपको धन देने वाला है नहीं। और हे राजन्! यह भी निश्चित है कि मैं धन लिये बिना नहीं जाऊँगा। यदि आप अभी मेरा धन नहीं देंगे, तो चौथे प्रहर की आधी घड़ी शेष रह जाने पर मैं शापरूपी अग्नि से आपको भस्म कर दूँगा।"

यह सुनकर राजा विकलतापूर्वक ऋषि विश्वामित्र के पाँव पकड़कर बोले— "आप प्रसन्न हों! मैं अत्यन्त दु:खी और दीन हूँ। चाण्डाल के सम्पर्क में रहना बड़ा ही कष्टप्रद है, अतः मुझ पर अनुग्रह कीजिये। अवशिष्ट धन चुकाने के लिये मैं आपके अधीन आपका सेवक बनूँगा।"

विश्वामित्र ने कहा— "हे महाराज! ऐसा ही हो, आप मेरे ही दास हो जाइये; किन्तु आपको सदा मेरे वचनों का पालन करना पड़ेगा।"

यह सुनकर राजा हर्षित हुए और उन्होंने इसे अपना पुनर्जन्म समझा। वे बोले— "हे द्विजश्रेष्ठ! मैं सदा आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। आदेश दीजिये, आपका कौन-सा कार्य सम्पन्न करूँ?"

तब विश्वामित्र ने चाण्डाल की ओर मुड़कर कहा— "हे चाण्डाल! इधर आओ, तुम मेरे इस दास का क्या मूल्य दोगे? मूल्य लेकर मैं तुम्हें इसे इसी समय दे दूँगा; क्योंकि मुझे दास से कोई प्रयोजन नहीं है, मुझे तो केवल धन की आवश्यकता है।"

चाण्डाल ने प्रसन्न होकर कहा— "हे द्विजवर! प्रयाग के दस योजन विस्तार वाले मण्डल की भूमि को रत्नमय कराकर मैं आपको दे दूँगा। इसके विक्रय से आपने मेरा यह महान कष्ट दूर कर दिया।" इसके पश्चात चाण्डाल ने स्वर्ण, मणि और मोतियों से युक्त हजारों प्रकार के रत्न विश्वामित्र को सौंप दिए।

राजा हरिश्चन्द्र के मुख पर उदासी छँट गई और उन्होंने धैर्यपूर्वक मान लिया कि विश्वामित्र ही उनके स्वामी हैं। उसी समय आकाशवाणी हुई— "हे महाभाग! आपने मेरी वह दक्षिणा दे दी और अब आप ऋण से मुक्त हो गये हैं।" राजा के मस्तक पर पुष्पों की वर्षा होने लगी और इन्द्र सहित सभी देवता 'साधु-साधु' कहने लगे।

हर्षित होकर राजा बोले— "हे महामते! आप ही मेरे माता-पिता तथा आप ही मेरे बन्धु हैं; क्योंकि आपने मुझे मुक्त कर दिया और क्षणभर में ऋणरहित भी बना दिया। आपका वचन मेरे लिये कल्याणप्रद है। कहिये, अब मैं कौन-सा कार्य करूँ?"

मुनि ने कहा— "हे राजन्! आज से इस चाण्डाल का वचन मानना आपका कर्तव्य होगा।" इतना कहकर विश्वामित्र धन लेकर चले गए।

चाण्डाल ने राजा से कहा— "काशी के दक्षिण भाग में महान श्मशान है। तुम न्यायपूर्वक उसकी रखवाली करो। तुम्हें कभी भी वहाँ से हटना नहीं चाहिए। इस जर्जर दण्ड को लेकर तुम अभी वहाँ चले जाओ, विलम्ब मत करो। तुम भली-भाँति घोषित कर दो कि यह दण्ड वीरबाहु का है।"

चाण्डाल के आदेश पाकर राजा हरिश्चन्द्र उस चाण्डाल के वशवर्ती होकर श्मशान में मृतकों के वस्त्र ग्रहण करने वाले हो गये।

जब वे श्मशान पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य अत्यन्त भयानक था। सर्वत्र चीत्कार हो रही थी। सारा स्थान गीधों और सियारों से व्याप्त था। चारों ओर हड्डियाँ बिखरी पड़ी थीं और महान दुर्गन्ध फैली थी। अधजले शवों के मुख निकले हुए दाँतों से हँसते हुए प्रतीत हो रहे थे। वहाँ जलते हुए मांस, वसा और मेद से 'साँय-साँय' की ध्वनि आ रही थी और अग्नि से 'चट-चटाने' का भयङ्कर शब्द सुनाई दे रहा था। उस श्मशान में उपस्थित लोग विलाप कर रहे थे— "पितामह, मातामह, पिता, पौत्र! आप कहाँ चले गये हैं; हे बान्धव! लौट आइये!" वह श्मशान प्रलयकालीन स्वरूप वाला था।

"हाय, मेरे भृत्य तथा मन्त्रीगण! तुम कहाँ हो? कुल-परम्परा से प्राप्त मेरा राज्य कहाँ गया?" राजा हरिश्चन्द्र श्मशान की उस नीरवता में स्वयं से ही विलाप करने लगे। वे सोचने लगे— "हे प्रिये! हे अबोध पुत्र! मुझ अभागे को छोड़कर ब्राह्मण के कोप से तुम लोग दूर कहाँ चले गये?" उनके हृदय में वेदना का ज्वार उठ रहा था। उन्हें स्मरण आ रहा था कि धर्म के बिना मनुष्य का कभी कल्याण नहीं हो सकता, अतः मनुष्य को यत्नपूर्वक धर्म को धारण करना चाहिए।

अ ० २५ ] सप्तम स राजा तत्र सम्प्राप्तो दुःखादेवमशोचत ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 24 · श्लोक 24पृष्ठ 136

किन्तु नियति का खेल देखिए, राजा अब उस अवस्था में थे जहाँ वे शवों के पिण्डदानार्थ बनने वाले भात से अपनी भूख मिटाते थे। वे शवों की माला पहनकर अपने मस्तक को मण्डित किए रहते थे और 'हाय-हाय' कहते हुए न दिन में सो पाते थे, न रात में। इस प्रकार महाराज हरिश्चन्द्र ने बारह महीने सौ वर्ष के समान अत्यन्त कष्टपूर्वक व्यतीत कर दिए।

ब्राह्मणस्य च कोपेन गता यूयं क्व दूरतः ।
विना धर्मं मनुष्याणां जायते न शुभं क्वचित् ॥

यत्नतो धारयेत्तस्मात्पुरुषो धर्ममेव हि ।
इत्येवं चिन्तयंस्तत्र चाण्डालोक्तं पुनः पुनः ॥

मलेन दिग्धसर्वाङ्गः शवानां दर्शने व्रजन् ।
लकुटाकारकल्पश्च धावंश्चापि ततस्ततः ॥

अस्मिञ्छव इदं मौल्यं शतं प्राप्स्यामि चाग्रतः ।
इदं मम इदं राज्ञ इदं चाण्डालकस्य च ॥

इत्येवं चिन्तयन् राजा व्यवस्थां दुस्तरां गतः ।
जीर्णैकपटसुग्रन्थिकृतकन्थापरिग्रहः ॥

चिताभस्मरजोलिप्तमुखबाहूदराङ्घ्रिकः ।
नानामेदोवसामज्जालिप्तपाण्यङ्गुलिः श्वसन् ॥

नानाशवौदनकृतक्षुन्निवृत्तिपरायणः I तदीयमाल्यसंश्लेषकृतमस्तकमण्डलः ॥

इस प्रकार सोचने लगे- हाय, मेरे भृत्य तथा मन्त्रीगण! तुम कहाँ हो? कुल - परम्परासे प्राप्त मेरा राज्य कहाँ गया? हे प्रिये! हे अबोध पुत्र! मुझ अभागेको छोड़कर ब्राह्मणके कोपसे तुमलोग दूर कहाँ चले गये? धर्मके बिना मनुष्यका कभी कल्याण नहीं हो सकता । अतएव मनुष्यको चाहिये कि यत्नपूर्वक धर्मको धारण करे ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 24 · श्लोक 24–263पृष्ठ 136

यह सब तब शुरू हुआ जब उनका पुत्र रोहित खेलने के लिए वाराणसी के समीप रोहिताख्य नामक स्थान पर गया था। वह बालक प्यास से व्याकुल होकर एक जलाशय के पास पहुँचा, जल पीकर और विश्राम करके जब उसने अपना बोझ उठाने का प्रयास किया, तभी वह भूमि पर गिर पड़ा। रोहित को मृत देखकर उसके साथी बालक भयभीत होकर रानी के पास पहुँचे और कहा— "हे विप्रदासि! आपका पुत्र हमलोगों के साथ खेलने गया था, वहाँ उसे साँप ने काट लिया और उसकी मृत्यु हो गई।"

हा भृत्या मन्त्रिणो यूयं क्व तद्राज्यं कुलोचितम् ।
हा प्रिये पुत्र मे बाल मां त्यक्त्वा मन्दभाग्यकम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 24 · श्लोक 25पृष्ठ 136

यह वज्रपात जैसा समाचार सुनकर रानी मूर्च्छित होकर जड़ कटे हुए केले के वृक्ष की भाँति भूमि पर गिर पड़ीं। कुछ समय बाद जब उन्हें चेतना आई, तो ब्राह्मण ने उन पर जल के छींटे मारे और क्रोधित होकर बोले— "हे दुष्टे! सायङ्काल के समय रोना निन्दनीय तथा दरिद्रता प्रदान करने वाला होता है। क्या तुम्हारे हृदय में लज्जा नहीं है?" रानी ничего बोल सकीं, वे केवल करुण क्रन्दन करने लगीं। उनका मुख आँसुओं से भीग गया था, वे धूल-धूसरित थीं और केश अस्त-व्यस्त थे।

ब्राह्मण उवाच

उसी समय विश्वामित्रकी प्रेरणासे एक प्रचण्ड रूपवाला डरावना महाविषधर काला सर्प ॥ ७ उस वल्मीकसे निकला ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 7पृष्ठ 137

ब्राह्मण ने निष्ठुरता से कहा— "दुष्टे! तुम्हें धिक्कार है; क्योंकि अपना मूल्य लेकर भी तुम मेरे कार्य की उपेक्षा कर रही हो। यदि तुम काम करने में असमर्थ थी, तो मुझसे वह धन तुमने क्यों लिया?" रानी ने गद्गद वाणी में कहा— "हे स्वामिन्! मेरे पुत्र को सर्प ने डँस लिया है, मैं उसे देखने जाऊँगी। हे सुव्रत! अब मेरे लिए उस पुत्र का दर्शन दुर्लभ हो गया है।"

अ ० २५ ] सप्तम ब्राह्मणेनैवमुक्ता सा न किञ्चिद्वाक्यमब्रवीत् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 13पृष्ठ 138

ब्राह्मण और कुपित होकर बोला— "कुटिल व्यवहार वाली हे शठे! क्या तुम्हें इस पाप का ज्ञान नहीं कि जो मनुष्य अपने स्वामी से वेतन लेकर कार्य की उपेक्षा करता है, वह महारौरव नरक में पड़ता है? यदि तुम्हें परलोक का भय है, तो आओ अपना कार्य करो।" रानी थर-थर काँपते हुए बोलीं— "हे नाथ! मुझ पर दया कीजिये। मुझे मुहूर्त भर के लिए वहाँ जाने दीजिये ताकि मैं अपने पुत्र को देख सकूँ।" उन्होंने ब्राह्मण के चरणों में सिर रखकर विलाप किया, किन्तु ब्राह्मण ने कहा— "तुम्हारे पुत्र से मेरा क्या प्रयोजन? तुम मेरे घर का कार्य सम्पन्न करो, अन्यथा कोड़े के प्रहार के लिए तैयार रहो।"

अथ तां कुपितो विप्रो राजपत्नीमभाषत ।
धिक्त्वां दुष्टे क्रयं गृह्य मम कार्यं विलुम्पसि ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 15पृष्ठ 138

रानी ने धैर्य धारण कर आधी रात तक ब्राह्मण के घर के कार्य किए। इसके पश्चात ब्राह्मण ने आदेश दिया कि वह अपने पुत्र का दाह संस्कार करके शीघ्र वापस आए। रानी अकेली ही रात में विलाप करती हुई वहाँ पहुँचीं। मृत पुत्र को देखकर वे एक झुण्ड से बिछड़ी हिरनी या बिना बछड़े की गाय की भाँति व्याकुल हो उठीं। वे चिल्लाने लगीं— "हे पुत्र! तुम मुझसे क्यों रूठ गये हो? पहले तो तुम 'अम्बा' कहकर मेरे पास आया करते थे।" इतना कहकर वे बालक के शव पर गिर पड़ीं और उसका मुख अपने मुख से लगाकर विलाप करने लगीं— "हा पुत्र! हा शिशो! हा वत्स! हे सुन्दर कुमार! आप कहाँ चले गये? मृत होकर भूमि पर पड़े अपने प्रिय पुत्र को तो देख लीजिये!"

रुरोद करुणं दीना पुत्रशोकेन पीडिता ।
अश्रुपूर्णमुखी दीना धूसरा मुक्तमूर्धजा ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 14पृष्ठ 138

रानी ने अत्यन्त शोक में कहा— "हे पुत्र! इस भयङ्कर निद्रा का त्याग करो और जागो। आधी रात हो रही है, सियारिनें बोल रही हैं, भूत-पिशाच की ध्वनियाँ सुनाई दे रही हैं। सूर्यास्त होते ही तुम्हारे मित्र चले गये, केवल तुम यहाँ कैसे रह गये?" रानी का हृदय टूट रहा था। उन्होंने कहा— "हे राजन्! आपका राज्य, मन्त्री, सिंहासन, छत्र और वह धन-वैभव कहाँ गया? इन सबके साथ तुम भी मुझे छोड़कर कहाँ चले गये?"

वे रोते हुए बोलीं— "जिस मुख पर मैं चन्दन का तिलक लगाती थी, आज उस मुख को कीड़ों ने विकृत कर दिया है और मक्खियाँ बैठ रही हैं। हे दैव! मैंने पूर्वजन्म में ऐसा क्या किया था कि इस कर्म-फल का अन्त मैं देख रही हूँ!" रानी का यह करुण विलाप सुनकर नगरपालक वहाँ पहुँचे। उन्होंने पूछा— "तुम कौन हो? यह बालक किसका है? रात के समय तुम यहाँ अकेली क्यों रो रही हो?"

रानी स्तब्ध होकर चुप रहीं, उनकी आँखों से आँसू बहते रहे। नगरपालकों को सन्देह हुआ और वे भयभीत होकर आपस में कहने लगे— "निश्चय ही यह कोई राक्षसी है जो बालकों को खाने के लिए यहाँ आई है, इसका वध कर देना चाहिए।"

"यह खेचरी कहीं भाग जाएगी!"—पहरेदारों ने क्रोध में भरकर यह शब्द कहे और हाथों में शस्त्र लिए रानी को घसीटते हुए चाण्डाल के घर की ओर ले गए। वे उसे चाण्डाल के पास छोड़कर बोले, "हे चाण्डाल! इस बालघातिनी को हमने बाहर देखा है। तुम इसे किसी स्थान पर शीघ्र ले जाकर मार डालो।"

अ ० २५ ] सप्तम इत्युक्त्वा तैर्गृहीता सा गाढं केशेषु सत्वरम् ।
भुजयोरपरैश्चैव कैश्चापि गलके तथा ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 63पृष्ठ 142

रानी की दशा देखकर चाण्डाल ने कहा, "मैं इसे जानता हूँ; यह लोक में प्रसिद्ध है। इससे पहले किसी ने इसे देखा नहीं था। इसने अनेक बार लोगों के बच्चों का भक्षण कर लिया है। आप लोगों ने इसे पकड़कर महान पुण्य अर्जित किया है, जिससे आपका यश जगत में सर्वदा बना रहेगा। अब आप यहाँ से सुखपूर्वक चले जाइए। ब्राह्मण या स्त्री का वध करने में कोई दोष नहीं लगता; अतः इसका वध करना मेरी दृष्टि में उचित है।" इतना कहकर चाण्डाल ने रानी को दृढ़ बन्धनों से बाँध दिया और उनके केश पकड़कर रस्सियों से पीटा।

अस्या वधश्च मे योग्य इत्युक्त्वा गाढबन्धनैः ।
बद्ध्वा केशेष्वथाकृष्य रज्जुभिस्तामताडयत् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 70पृष्ठ 142

तभी उसने हरिश्चन्द्र को बुलाकर कठोर वाणी में कहा, "हे दास! इस पापात्मा स्त्री का तत्काल वध कर दो; इसमें कोई सोच-विचार मत करो।" वज्रपात के समान उन शब्दों को सुनकर राजा हरिश्चन्द्र थर-थर काँप उठे। वे अत्यन्त व्याकुल होकर बोले, "मैं ऐसा करने में समर्थ नहीं हूँ। कृपया मुझे कोई दूसरा कार्य करने की आज्ञा दीजिए। आप जो भी कठिन से कठिन कार्य कहेंगे, मैं उसे सम्पन्न कर दूँगा।"

खेचरी यास्यतीत्युक्तं बहुभिः शस्त्रपाणिभिः ।
आकृष्य पक्कणे नीता चाण्डालाय समर्पिता ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 64पृष्ठ 142

उनका वचन सुनकर चाण्डाल ने कहा, "तुम बिलकुल मत डरो। तलवार उठाओ और इसका वध कर दो; क्योंकि ऐसी स्त्री का वध अत्यन्त पुण्यदायक माना गया है। बालकों को भय पहुँचाने वाली यह स्त्री रक्षा के योग्य नहीं है।"

अ ० २६ ] सप्तम एतच्छ्रुत्वा ततो वाक्यं हरिश्चन्द्रस्य भूपतेः ।
चाण्डालः कुपितः प्राह वेपमानं महीपतिम् ॥

स्कन्ध १३५ तब राजा हरिश्चन्द्रका यह वचन सुनकर उस चाण्डालने क्रुद्ध होकर थर - थर काँप रहे उन राजासे कहा ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 86पृष्ठ 144

राजा ने विवश होकर कहा, "जिस किसी भी उपाय से स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए, उनका वध कभी नहीं करना चाहिए; क्योंकि धर्मपरायण मुनियों ने स्त्री-वध को पाप बताया है। जो पुरुष जानकर या अनजान में स्त्री की हत्या करता है, वह महारौरव नरक में गिरकर यातना भोगता है।"

हे चाण्डाल बहिर्दृष्टा ह्यस्माभिर्बालघातिनी ।
वध्यतां वध्यतामेषा शीघ्रं नीत्वा बहिःस्थले ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 65पृष्ठ 142

चाण्डाल तर्कों से डगमगाया नहीं, उसने कहा, "यह सब मत बोलो! विद्युत के समान चमकने वाली यह तीक्ष्ण तलवार उठा लो। यदि एक का वध करने से बहुत प्राणियों को सुख हो, तो उसकी की हुई हिंसा निश्चय ही पुण्यप्रद होती है। यह दुष्टा संसार में बहुत से बच्चों को खा चुकी है, अतः शीघ्र इसका वध कर दो ताकि लोक शान्तिमय हो जाए।"

चाण्डालः प्राह तां दृष्ट्वा ज्ञातेयं लोकविश्रुता ।
न दृष्टपूर्वा केनापि लोकडिम्भान्यनेकधा ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 66पृष्ठ 142

राजा ने अन्तिम बार प्रयास करते हुए कहा, "हे चाण्डालराज! मैंने आजीवन स्त्री-वध न करने का कठोर व्रत ले रखा है। मैं स्त्री-वध के लिए प्रयत्न नहीं कर सकता, अपितु आपका अन्य कोई कार्य कर दूँगा।"

भक्षितान्यनया भूरि भवद्भिः पुण्यमर्जितम् ।
ख्यातिर्वः शाश्वती लोके गच्छध्वं च यथासुखम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 67पृष्ठ 142

चाण्डाल क्रुद्ध होकर बोला, "अरे दुष्ट! स्वामी के इस कार्य को छोड़कर तुम्हारे लिए दूसरा कौन सा कार्य है? वेतन लेकर मेरे कार्य की उपेक्षा क्यों कर रहे हो? जो सेवक स्वामी से वेतन लेकर उसके कार्य की उपेक्षा करता है, उसका दस हजार कल्पों तक नरक से उद्धार नहीं होता।"

चाण्डाल उवाच

( नैतद्वाक्यं सुघटितं यद्वाक्यं दासकीर्तितम् ।
) चाण्डालदासतां कृत्वा सुराणां भाषसे वचः ।
दास किं बहुना नूनं शृणु मे गदतो वचः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 87पृष्ठ 144

राजा ने पुनः प्रार्थना की, "अन्य अत्यन्त कठिन कार्य करने का आदेश दीजिए। आप अपने किसी शत्रु को बताएँ, मैं उसे शीघ्र मार डालूँगा और उसकी भूमि आपको सौंप दूँगा। हे देव! मैं देवताओं, नागों, सिद्धों और गन्धर्वों सहित इन्द्र को भी तीक्ष्ण बाणों से मारकर जीत लूँगा।"

चाण्डाल उवाच

निर्लज्ज तव चेदस्ति किञ्चित्पापभयं हृदि ।
किमर्थं दासतां यातश्चाण्डालस्य तु वेश्मनि ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 88पृष्ठ 144

चाण्डाल ने उपहास करते हुए कहा, "चाण्डाल की दासता करके तुम देवताओं जैसी बात करते हो? अरे दास! अधिक कहने का प्रयोजन क्या है? निर्लज्ज! यदि तुम्हारे हृदय में थोड़ा भी पाप का भय था, तो चाण्डाल के घर में दासता करना तुमने स्वीकार ही क्यों किया? अतः इस तलवार को उठाओ और इसके कमलवत् सिर को काट दो।" इतना कहकर उसने राजा को तलवार थमा दी।

चाण्डाल उवाच

गृहाणैनं ततः खड्गमस्याश्छिन्धि शिरोऽम्बुजम् ।
एवमुक्त्वाथ चाण्डालो राज्ञे खड्गं न्यवेदयत् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 89पृष्ठ 144

राजा हरिश्चन्द्र ने नीचे की ओर मुख करके रानी से कहा, "हे बाले! मुझ पापी के सामने यहाँ आकर बैठ जाओ। यदि मेरा हाथ मारने में समर्थ हो सका, तो मैं तुम्हारा सिर काट लूँगा।" हाथ में तलवार लेकर राजा रानी की ओर बढ़े। उस समय न तो राजा अपनी पत्नी को पहचान रहे थे और न ही रानी राजा को।

१३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ तेनाथ बाढमित्युक्त्वा प्रेषिता बालकं प्रति ।
सा जगामातिदुःखार्ता विलपन्ती सुदारुणम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 6पृष्ठ 145

अत्यन्त दुःख से पीड़ित रानी ने कहा, "हे चाण्डाल! यदि तुम थोड़ा भी उचित समझते हो तो मेरी बात सुनो। इस नगर से बाहर थोड़ी ही दूरी पर मेरा पुत्र मृत पड़ा है। मैं जब तक उस बालक को आपके पास लाकर उसका दाह न कर दूँ, तब तक प्रतीक्षा कीजिये; उसके बाद मुझे तलवार से मार दीजिएगा।"

कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ।
श्मशानभूमिमागत्य बालं स्थाप्याविशद्भुवि ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 8पृष्ठ 145

चाण्डाल ने कहा, "बहुत अच्छा!" और उसने रानी को बालक के पास भेज दिया। रानी करुण विलाप करती हुई वहाँ से चली गईं। वे अपने पुत्र के समीप पहुँचीं और कहने लगीं, "हा पुत्र! हा वत्स! हा शिशो!" उन्होंने देखा कि बालक सर्प के काटने से मृत पड़ा था। उनका शरीर दुर्बल, वर्ण विकृत और सिर के बाल धूल से धूमिल थे।

वे अत्यन्त शोक में डूबी हुई उस बालक को लेकर श्मशान भूमि में आईं और उसे जमीन पर लिटाकर स्वयं बैठ गईं। राजा हरिश्चन्द्र, जो अब जटाधारी के रूप में शुष्क वृक्ष की छाल जैसे दिख रहे थे, अपनी पत्नी को पहचान नहीं सके। रानी ने भी उन्हें नहीं पहचाना। वे विलाप करते हुए कहने लगीं, "हा हाय! कहीं मेरे ही पुत्र की यह दशा तो नहीं हो गई है और क्रूर यमराज ने उसे अपने अधीन कर लिया है?"

तभी रानी ने अत्यन्त पीड़ा में पूछा, "हे नाथ! हे राजन्! मुझ अत्यन्त दुःखिनी को छोड़कर आप किस स्थान पर विद्यमान हैं? आप किस कारण से निश्चिन्त हैं? राजर्षि हरिश्चन्द्र को राज्य से हाथ धोना पड़ा, उनके सुहृद्वर्ग अलग हो गए और उन्हें भार्या तथा पुत्र तक को बेच देना पड़ा। हा विधाता! तुमने यह क्या कर दिया?"

रानी के इन वचनों को सुनकर राजा हरिश्चन्द्र अपने स्थान से उठकर उनके समीप आए। अपनी साध्वी पत्नी और मृत पुत्र को देखते ही वे पहचान गए और बोले, "महान कष्ट है कि यह स्त्री मेरी ही पत्नी है और यह बालक भी मेरा ही पुत्र है!" इतना कहते ही राजा मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। रानी भी उन्हें पहचानकर उसी स्थिति में पहुँच गईं; दुःख के भार से उनकी समस्त इन्द्रियाँ चेष्टारहित हो गईं। कुछ समय बाद जब उन्हें पुनः चेतना आई, तो वे दोनों अत्यन्त दुःखित होकर एक साथ विलाप करने लगे।

सूत उवाच

स्वपुत्रमरणं भीरुर्यथावत्तं न्यवेदयत् ।
श्रुत्वा राजा तथा वाक्यं निपपात महीतले ॥

मृतपुत्रं समानीय जिह्वया विलिहन्मुहुः ।
हरिश्चन्द्रमथो प्राह शैव्या गद्गदया गिरा ॥

कुरुष्व स्वामिनः प्रेष्यं छेदयित्वा शिरो मम ।
स्वामिद्रोहो न तेऽस्त्वद्य मासत्यो भव भूपते ॥

मासत्यं तव राजेन्द्र परद्रोहस्तु पातकम् ।
एतदाकर्ण्य राजा तु पपात भुवि मूर्च्छितः ॥

क्षणेन चेतनां प्राप्य विललापातिदुःखितः ।
राजोवाच कथं प्रिये त्वया प्रोक्तं वचनं त्वतिनिष्ठुरम् ॥

यदशक्यं भवेद्वक्तुं तत्कर्म क्रियते कथम् ।
पल्युवाच मया च पूजिता गौरी देवा विप्रास्तथैव च ॥

भविष्यसि पतिस्त्वं मे ह्यन्यस्मिञ्जन्मनि प्रभो ।
श्रुत्वा राजा तदा वाक्यं निपपात महीतले ।
५८ मृतस्य पुत्रस्य तदा चुचुम्ब दुःखितो मुखम् ।
राजोवाच प्रिये न रोचते दीर्घं कालं क्लेशं मयाशितुम् ॥

वृत्तान्त सुनकर रानी अत्यन्त दुःखित होकर बहुत देरतक रोती रहीं; फिर उष्ण श्वास छोड़कर उन्होंने भीरुतापूर्वक अपने पुत्रके मरणसम्बन्धी वृत्तान्तका यथावत् वर्णन राजासे कर दिया । वह वृत्तान्त सुनते ही राजा पृथ्वीपर गिर पड़े और फिर उठकर मृतपुत्रको बाहोंमें लेकर बार- बार जिह्वासे उसके मुखका स्पर्श करने लगे ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 26 · श्लोक 50–523पृष्ठ 149

"बहुत से बन्धु-बानधवों तथा अपार धन-सहित मेरा सम्पूर्ण राज्य चला गया। आज दुर्भाग्य के कारण मुझ निर्दयी को अपना ही पुत्र दिखाई पड़ गया! विषधर सर्प के द्वारा डँसे गये पुत्र के कमल सदृश मुख को देखता हुआ मैं इस समय स्वयं भीषण विष से ग्रस्त हो गया हूँ!"

इन शब्दों के साथ राजा हरिश्चन्द्र का गला रुन्ध गया। आँसुओं से भरे हुए कण्ठ वाले राजा ने उस बालक को अपनी बाहों में उठा लिया और उसे अपने वक्ष:स्थल से लगाकर वे मूर्च्छा से अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

यह दृश्य देखकर मन व्याकुल हो उठता है कि ये वही चन्द्रमा के समान तेजस्वी हरिश्चन्द्र हैं? जिनकी सुन्दर ऊँची नासिका और पुष्प की कलियों जैसे दाँत विद्वानों के मन को प्रसन्न करते थे, वे आज इस श्मशान में कैसे आ गए? निन्दनीय दैव! तुम्हें धिक्कार है, जिसने इन देवतुल्य नरेश को चाण्डाल बना दिया। इनका राज्य नष्ट हो गया, बन्धु-बानधव अलग हो गए और इन्हें अपनी पत्नी तथा पुत्र तक बेचने पड़े। हे विधाता! तुम्हारी यह कैसी विडम्बना है?

यह श्मशान अत्यन्त भीषण है; जहाँ गीध और सियार सदा बोलते रहते हैं, जहाँ क्षुद्र जाति के पक्षी मँडराते हैं और जहाँ की दिशाएँ चिता से निकले धुएँरूपी मेघों से अन्धकारमय रहती हैं। यहाँ शवों के मांस को खाकर निशाचर प्रसन्नता से दृष्टिगोचर हो रहे हैं।

रानी शैव्या यह सब सुनकर अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी। उसने भारी मन से अपने पुत्र के मरण का सारा वृत्तान्त राजा को सुनाया। वह सुनते ही राजा पृथ्वी पर गिर पड़े और फिर उठकर मृतपुत्र को बाहों में लेकर बार-बार अपनी जिह्वा से उसके मुख का स्पर्श करने लगे।

तभी रानी शैव्या ने गद्गद वाणी में कहा, "अब आप मेरा सिर काटकर अपने स्वामी की आज्ञा का पालन कीजिये, जिससे आपको स्वामिद्रोह का दोष न लगे और आप सत्य से च्युत न हों। हे राजेन्द्र! आपकी वाणी असत्य नहीं होनी चाहिए और दूसरों के प्रति द्रोह भी महान पाप है।"

यह सुनते ही राजा हरिश्चन्द्र पुनः मूर्च्छित होकर गिर पड़े। चेतना आने पर वे अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगे, "हे प्रिये! तुमने ऐसा अतिनिष्ठुर वचन कैसे कह दिया? जो बात कही नहीं जा सकती, उसे कार्यरूप में कैसे परिणत किया जाय?"

रानी ने धैर्य बँधाते हुए कहा, "हे प्रभो! मैंने भगवती गौरी की उपासना की है और देवताओं तथा ब्राह्मणों की भली-भाँति पूजा की है। उनके आशीर्वाद से आप अगले जन्म में भी मेरे पति होंगे।"

यह सुनकर राजा पुनः भूमि पर गिर पड़े और अपने मृत पुत्र का मुख चूमने लगे। उन्होंने विलाप करते हुए कहा, "जाऊँ तो अगले जन्म में मुझे फिर चाण्डाल की दासता करनी पड़ेगी और मैं घोर नरक में भयङ्कर यातनाएँ भोगूँगा। इतना ही नहीं, महारौरव नरक में गिरकर अनेक सन्ताप सहने पड़ेंगे; फिर भी दुःखरूपी सागर में डूबे हुए मुझ अभागे का अब प्राण त्याग देना ही श्रेयस्कर है। वंश की वृद्धि करने वाला मेरा यह एकमात्र पुत्र भी आज दैव के प्रकोप से मर गया। इस प्रकार की दुर्गतिका मैं पराधीन होने के कारण प्राणों का त्याग कैसे करूँ? पर इस असीम दुःख से ऊबकर अब मैं अपना शरीर त्याग ही दूँगा। तीनों लोकों में, असिपत्र वन में और वैतरणी नदी में वैसा क्लेश नहीं है जैसा पुत्र-शोक में है। अतः हे तन्वङ्गी! मैं पुत्र-देह के साथ प्रज्वलित अग्नि में स्वयं भी कूद पड़ूंगा, इसके लिये तुम मुझे क्षमा करना।"

राजा ने आगे कहा, "पवित्र मुस्कान वाली प्रिये! अब तुम मेरी आज्ञा के अनुसार ब्राह्मण के घर जाओ। यदि मैंने दान किया है और सेवा से गुरुजनों को सन्तुष्ट किया है, तो उसके फलस्वरूप परलोक में तुम्हारे साथ और अपने इस पुत्र के साथ मेरा मिलन अवश्य होगा। इस लोक में अभिलषित मिलन अब कहाँ?"

राजा ने अपनी भावनाओं को समेटते हुए कहा, "एकान्त में हँसी के रूप में जो कुछ भी अनुचित वचन तुम्हें कहे गए हों, उन्हें क्षमा कर देना। मैं राजा की पत्नी हूँ—ऐसा सोचकर अभिमानपूर्वक मेरे उस ब्राह्मण की अवहेलना मत करना; क्योंकि स्वामी को देवतुल्य समझकर उन्हें पूर्ण प्रयत्न से सन्तुष्ट रखना चाहिए।"

रानी बोली, "हे राजर्षे! अत्यधिक दुःख के भार को सहन करने में असमर्थ मैं भी इस आग में कूद पड़ूँगी और आपके साथ ही चलूँगी। हे मानद! आपके साथ जाने में मेरा परम कल्याण है। आपके साथ रहकर मैं स्वर्ग और नरक—सब कुछ भोगूँगी।"

यह सुनकर राजा बोले, "हे पतिव्रते! ऐसा ही हो।"

तभी राजा हरिश्चन्द्र ने रक्तवर्ण का वस्त्र धारण करने वाली, करुणारस की सागर, जगदम्बा का ध्यान करना प्रारम्भ किया। वे जगत् की रक्षा में तत्पर माँ का ध्यान करने लगे। इस प्रकार ध्यानमग्न राजा के समक्ष इन्द्र सहित सभी देवता धर्म को आगे करके तुरन्त उपस्थित हुए। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेव, मरुद्गण, चारण, लोकपाल, नाग, सिद्ध, गन्धर्व, रुद्रगण, दोनों अश्विनीकुमार तथा महर्षि विश्वामित्र भी वहाँ उपस्थित थे।

In English

The Sacrifice of King Harishchandra

To fulfill a promise made to Sage Vishvamitra, King Harishchandra must pay a debt of gold. To settle the debt, the King is forced to sell his wife and son into slavery.

This page answers

  • Why did harishchandra have to sell his family?
  • What was the debt of king harishchandra to vishvamitra?
  • How did harishchandra pay the dakshina?
  • Who bought the wife and son of harishchandra?

Also written: Harishchandropakhyana, Harishchandra, Vishvamitra, Kaushika, Chandala, Paharedara, हरिश्चन्द्रोपाख्यान